PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 12 धर्मवीर भारती

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 12 धर्मवीर भारती Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 12 धर्मवीर भारती

Hindi Guide for Class 12 PSEB 12 धर्मवीर भारती Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
‘बाँध बाँधना’ निर्माण योजना का प्रथम चरण है। कवि किस प्रकार का बाँध बाँधकर कौन-सी शक्ति पैदा करना चाहता है ?
उत्तर:
नदियों के जल पर बाँध बाँधने से बिजली पैदा होती है। सिंचाई आदि के लिए काम में आती है। किन्तु कवि तो घृणा की नदी पर बाँध बाँधने अर्थात् रोकने की बात कहता है क्योंकि इससे जो शक्ति बनती है वह आग की तरह भस्म कर देने वाली है। यदि इस शक्ति को नियन्त्रित कर लिया जाए तो यह लाभकारी भी हो सकती है। घृणा को यदि आपसी सहयोग और सहानुभूति की भावना में बदल दिया जाए तो वह एक शक्ति बन सकती है जो जनकल्याण में सहायक सिद्ध हो सकती है।

प्रश्न 2.
‘यातायात’ में स्वच्छन्द विचारधारा को फलने-फूलने का मौका देने की बात की गई है-इसे स्पष्ट करें।
उत्तर:
कवि का मानना है यातायात की सुविधाएँ तभी साकार हो सकती हैं जब जीवन की राह में चलते हुए निराश हुए व्यक्ति को उसे उसकी इच्छानुसार नए गीतों को रचने और अपने विचारों को बिना किसी रोक-टोक के अभिव्यक्त करने की सुविधा प्राप्त हो जाए। तभी यातायात की उन्नति के लिए चलाई जा रही योजनाएँ सफल हो सकेंगी।

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प्रश्न 3.
‘कृषि’ में कवि ने विषमता रूढ़िवादिता की फसलें काटने की बात की है ? कवि किस प्रकार की खेती करना चाहता है और कैसे ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
कवि का मानना है कि हमारे बुजुर्गों ने जाने अनजाने जो विषमता और असमानता की फसलें बोई थीं। इन्हें काटना चाहिए क्योंकि इन्होंने समाज के दामन को तार-तार कर डाला है। उसकी जगह हमें आपसी प्रेम-प्यार, हमदर्दी, सुख-दुःख बाँटने की फसलें बोनी चाहिएँ क्योंकि भूमि सबकी है और दर्द सबका साँझा है।

प्रश्न 4.
‘स्वास्थ्य’ में भारती जी ने निर्माण योजना के अन्तिम चरण के रूप में अहम् के शिकार रोगियों के लिए अस्पतालों की व्यवस्था करने की बात की है। कवि का विचार स्पष्ट करें।
उत्तर:
कवि के मतानुसार निर्माण योजना तभी सफल हो सकती है जब हमारा नेता वर्ग स्वस्थ हो और वह स्वस्थ समाज का निर्माण कर सके और अतः समाज को चाहिए कि नेता वर्ग की इस बीमारी-अहम् की बीमारी का इलाज करने के लिए नए अस्पताल खोलने चाहिए अर्थात् ऐसे उपयुक्त वातावरण का निर्माण करना चाहिए जिससे हमारा नेता वर्ग स्वस्थ होकर देश की सेवा कर सके और देश को उन्नति और विकास के मार्ग पर आगे ले जा सके।

प्रश्न 5.
‘निर्माण योजना’ कविता का सार लिखो।
उत्तर:
‘सात गीत वर्ष’ काव्य संग्रह में संकलित ‘निर्माण योजना’ कविता में कवि ने निर्माण योजना को बाँध, यातायात, कृषि तथा स्वास्थ्य चार भागों में विभक्त किया है। बाँध शीर्षक कविता में कवि घृणा की नदी पर बाँध बनाने की बात कही है ताकि उससे पैदा होने वाली शक्ति हानिकारक न होकर लाभकारी सिद्ध हो सके। घृणा को आपसी प्रेम प्यार, हमदर्दी में बदला जाना चाहिए।

‘यातायात’ कविता में कवि ने मानव को, किसान को, कवि को मन मुताबिक चलने की सुविधा प्राप्त करने की बात कही है ताकि वे सब देश की उन्नति और विकास में योगदान दे सकें।

कृषि शीर्षक कविता में कवि ने समाज में उत्पन्न भेदभाव की फसलों को काटकर ऐसी खेती करने की सलाह देता है जिसमें आपसी प्रेम प्यार हो, आपसी सुख-दुःख बाँटने की बात हो, जिससे यह संसार, यह धरती फिर से हरी भरी हो जाए। क्योंकि धरती सबकी साँझी है और दर्द भी सबका साँझा होना चाहिए।
‘स्वास्थ्य’ शीर्षक कविता में कवि नेता वर्ग के अहम्भाव पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि जिस तरह से नेता लोग मंच पर जाकर भाषण देते हैं और व्यर्थ की बातें करते हैं उनसे लगता है कि वे अहम् रोग से पीड़ित हैं। समाज को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जिससे नेता वर्ग का यह रोग दूर हो सके और वे भी देश के लिए समाज के लिए हितकारी काम कर सकें।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 6.
बाँधो …. घृणा की है।
उत्तर:
कवि कहता है कि यह घृणा की नदी है काली चट्टानों की छाती चीर कर फूट निकली है और इसका गवाह अन्धकारमय विषैली गुफाओं में से उबल-कर बाहर आया है। नदी के इस भयानक प्रवाह को बाँधने की आवश्यकता है। ऐसी नदी पर ही हमें बाँध बाँधना चाहिए।

यह घृणा की नदी है अतः आग की तरह भस्म कर देने की शक्ति इसमें है। यदि इसे बढ़ने दिया गया तो इसकी लपेट में आकर बड़े-बड़े और हरे-भरे पेड़ भी जलकर राख का ढेर हो जाएंगे। केवल इतना जान लेने से कि यह घृणा की नदी है, यह बेमतलब नहीं है यदि इस को बाँध लिया जाए अर्थात् इस पर काबू पा लिया जाए तो यही नदी लाभकारी भी सिद्ध हो सकती है।

प्रश्न 7.
ये फसलें ………. दर्द सबका है।
उत्तर:
कवि धरती को, समाज को सुधारने के लिए भेदभाव पैदा करने वाले विचारों को दूर कर, आपसी भाईचारा, प्रेम, प्यार एवं एक-दूसरे से सहानुभूति पैदा करने का सन्देश देता हुआ कहता है कि जाने अनजाने हमारे पूर्वजों ने समाज के विभिन्न वर्गों में भेदभाव उत्पन्न करने की जो भावना भरी थी, समाज की भलाई के लिए हमें उस विषैली खेती को काट देना चाहिए भाव यह है समाज का, व्यक्ति का कल्याण इन भावनाओं को नष्ट करने में ही है बल्कि हमें तो आज मेहनत के, समान दुःख की भावना के, आपसी प्रेम प्यार के, एक दूसरे से सहानुभूति रखने वाले भावों को बढ़ावा देना चाहिए। हमें ऐसी सीमाएँ नहीं बाँधनी हैं जिससे समाज विभिन्न वर्गों में बँट जाए बल्कि इसके विपरीत कार्य करना चाहिए क्योंकि यह धरती सबकी है, दर्द सबके साँझे हैं।

PSEB 12th Class Hindi Guide धर्मवीर भारती Additional Questions and Answers

अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डॉ० धर्मवीर भारती का जन्म कब और कहाँ पर हुआ था?
उत्तर:
डॉ० भारती का जन्म 25 दिसम्बर, सन् 1926 में इलाहाबाद में हुआ था।

प्रश्न 2.
डॉ० भारती ने किस हिंदी पत्रिका का संपादन कार्य किया था?
उत्तर:
साप्ताहिक धर्मयुग।

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प्रश्न 3.
डॉ० भारती के द्वारा रचित दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
अंधायुग, कनुप्रिया।

प्रश्न 4.
‘निर्माण योजना’ कविता के कितने अंश हैं?
उत्तर:
चार।

प्रश्न 5.
‘निर्माण योजना’ के अंशों के नाम लिखिए।
उत्तर:
बाँध, यातायात, कृषि, स्वास्थ्य।

प्रश्न 6.
कवि ने काली चट्टानों से निकली नदी को क्या नाम दिया है ?
उत्तर:
घृणा की नदी।

प्रश्न 7.
घृणा की नदी के छते ही कौन सड़ जाएंगे?
उत्तर:
हरे-भरे वृक्ष सड़ जायेंगे।

प्रश्न 8.
घृणा की नदी में कौन सोये हुए हैं ?
उत्तर:
बिजली के शक्तिवान घोड़े सोये हुए हैं।

प्रश्न 9.
कवि ने पसीने से सींची हुई फसलों को कहाँ से लेकर कहाँ तक पहुंचाने की सुविधा मांगी है?
उत्तर:
खेतों से आंतों तक।

प्रश्न 10.
अतीत में कैसे बीज समाज में बोये गए थे?
उत्तर:
विषमता/भेदभाव के बीज समाज में बोये गए थे।

प्रश्न 11.
लेखक ने आज के सभी नेताओं को क्या माना है?
उत्तर:
लेखक ने उन्हें रोगी माना है जो अहम् से पीड़ित हैं।

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प्रश्न 12.
‘निर्माण योजना’ किस संकलन से ली गई है?
उत्तर:
‘सात गीत वर्ष’ से।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 13.
इनके छूते ही……..
उत्तर:
हरे वृक्ष सड़ जायेंगे।

प्रश्न 14.
इनकी लहरों में…………..
उत्तर:
बिजली के शक्तिवान घोड़े हैं सोये हुए।

प्रश्न 15.
सिंची हुई फसलों को………………।
उत्तर:
खेतों से आंतों तक जाने की सुविधा दो।

प्रश्न 16.
बस्ती-बस्ती में………..।
उत्तर:
नये अहम् के अस्पताल खुलवाओ।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 17.
कवि ने बीमार राजनीति पर अपनी चिंता व्यक्त की है।
उत्तर:
हाँ।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. धर्मवीर भारती किस पत्रिका के संपादक रहे ?
(क) धर्मात्मा
(ख) धर्मयग
(ग) धर्म
(घ) धर्माधिकारी।
उत्तर:
(ख) धर्मयग

2. धर्मवीर भारती को भारत सरकार ने किस सम्मान से अलंकृत किया ?
(क) पद्मश्री
(ख) पद्मभूषण
(ग) पद्मविभूषण
(घ) पद्मालंकार।
उत्तर:
(क) पद्मश्री

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3. ‘निर्माण योजना’ कविता के कितने अंश हैं ?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(घ) चार

4. कवि के अनुसार अतीत में समाज में कैसे बीज बोये गये थे ?
(क) विषमता
(ख) अविषमता
(ग) घृणा
(घ) अंतर।
उत्तर:
(क) विषमता

धर्मवीर भारती सप्रसंग व्याख्या

बांध

1. बाँधो।
नदी यह घृणा की है
काली चट्टानों के
सीने से निकली है
अन्धी जहरीली गुफाओं से
उबली है।
इसको छते ही
हरे वृक्ष सड़ जायेंगे
नदी यह घृणा की है।
लेकिन नहीं है निरर्थक यह
बँधने से इसको भी अर्थ मिल जाता है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
घृणा = नफरत। सीना = छाती। जहरीली = विषैली। निरर्थक = व्यर्थ, बेमतलब।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश श्री धर्मवीर भारती जी द्वारा लिखित काव्य संग्रह ‘सात गीत वर्ष’ में संकलित ‘निर्माण योजना’ शीर्षक के अन्तर्गत लिखी कविता ‘बाँध’ में से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश की आर्थिक अवस्था को सुधारने के लिए कई निर्माण योजनाओं पर कार्य चल रहा है। नदियों पर बाँध बाँधे जा रहे हैं जिससे जल को, सिंचाई के लिए और बिजली पैदा करने के लिए. प्रयोग में लाया जा सके।

कवि ने यहाँ किसी प्राकृतिक नदी पर बाँध बाँधने की आवश्यकता पर बल नहीं दिया बल्कि मानव मात्र में एक दूसरे के प्रति जो घृणा भाव पैदा हो गया है उसके भयानक प्रवाह पर मानव को बाँध लगाने की अर्थात् उस पर नियन्त्रण पाने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि यह घृणा की नदी है काली चट्टानों की छाती चीर कर फूट निकली है और इसका गवाह अन्धकारमय विषैली गुफाओं में से उबल-कर बाहर आया है। नदी के इस भयानक प्रवाह को बाँधने की आवश्यकता है। ऐसी नदी पर ही हमें बाँध बाँधना चाहिए।

यह घृणा की नदी है अतः आग की तरह भस्म कर देने की शक्ति इसमें है। यदि इसे बढ़ने दिया गया तो इसकी लपेट में आकर बड़े-बड़े और हरे-भरे पेड़ भी जलकर राख का ढेर हो जाएंगे। केवल इतना जान लेने से कि यह घृणा की नदी है, यह बेमतलब नहीं है यदि इस को बाँध लिया जाए अर्थात् इस पर काबू पा लिया जाए तो यही नदी लाभकारी भी सिद्ध हो सकती है।

विशेष:

  1. कवि का तात्पर्य यह है संसार में कुछ अच्छा या बुरा नहीं होता उसके अच्छा या बुरा होने की कसौटी उसके सद्पयोग अथवा मानवीय हित सापेक्ष होने में है।
  2. भाषा भावपूर्ण तथा प्रतीकात्मक है।

2. इसकी ही लहरों में ।
बिजली के शक्तिवान घोड़े हैं सोये हुए।
जोतो उन्हें खेतों में, हलों में
भेजो उन्हें नगरों में, कलों में
बदलो घृणा को उजियाले में
ताकत में,
नये-नये रूपों में साधो
बाँधो
नदी यह घृणा की है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
शक्तिवान घोड़े = यहाँ भाव हार्स पावर से है। साधो = सिद्ध करो, बदलो।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ धर्मवीर भारती द्वारा रचित कविता निर्माण योजना के प्रथम खंड बांध से ली गई हैं, जिसमें कवि ने घृणारूपी नदी पर बाँध बनाकर (प्रेम की सरिता)बहाने का संदेश दिया है।

व्याख्या:
कवि घृणा का सद्पयोग कर उसे मानवीय हित सापेक्ष बनाने की सलाह देता हुआ कहता है कि-कौन नहीं जानता कि नदी के प्रवाह में बिजली के शक्तिशाली घोड़ों की ताकत छिपी हुई है उस ताकत का प्रयोग हम खेतों में, हल जोतने में, नगरों में, कल कारखानों में प्रयोग कर सकते हैं कवि का संकेत जल से प्राप्त ऊर्जा की ओर है। कवि संदेश देते हुए कहता है कि उस ऊर्जा रूपी घृणा को हम उजाला पैदा करने वाली बना सकते है। उसकी शक्ति को हम विभिन्न रूपों में विकसित कर सकते हैं जिससे मानवता का कल्याण हो सके। अतः इस घृणा की नदी को स्वतन्त्र मत छोड़ो। इस पर नियन्त्रण करो। इस पर ऐसा बाँध बनाओ जो कल्याणकारी हो न कि विनाशकारी।

विशेष:

  1. कवि का तात्पर्य यह है कि यदि हम घृणा के वश में हो जाएँगे तो यह मनोवृत्ति विनाशकारी हो जाएगी और यदि हम इसे अपने वश में कर लेंगे तो यह हमारे लिए कल्याणकारी बन जाएगी।
  2. भाषा भावपूर्ण तथा प्रतीकात्मक है। पुनरुक्ति प्रकाश तथा रूपक अलंकार हैं।

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यातायात

1. बिना किसी बाधा के
नित नयी दिशाओं में
जाने की
सुविधा दो
बिना किसी बाधा के
श्रम के पसीने से
सिंची हुई फसलों को
खेतों से आंतों तक जाने की सुविधा दो।

कठिन शब्दों के अर्थ:
बाधा = रुकावट। सविधा = सहूलियत। श्रम = मेहनत।

प्रसंग;
प्रस्तुत पद्यांश श्री धर्मवीर भारती जी की काव्यकृति ‘सात गीत वर्ष’ में संकलित ‘निर्माण योजना’ शीर्षक के अन्तर्गत लिखी कविता ‘यातायात’ में से लिया गया है। देश में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् आर्थिक विकास के लिए अनेक निर्माण योजनाओं को शुरू किया गया जिनमें यातायात के क्षेत्र में भी विकास के लिए अनेक योजनाएं शुरू की गयी हैं किन्तु कवि का मानना है कि ‘यातायात’ केवल ट्रैफिक अथवा वाहनों की सुकर और सुविधापूर्वक गमन-आगमन की सुविधा नहीं, अपितु प्राप्त अवसरों के अधिकतम और आरोपित बँधनों से रहित, बन्धनहीन प्रयोग से है।

व्याख्या:
कवि सब के लिए आवागमन की सुविधाओं के लिए कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को यह पूरी सुविधा प्राप्त होनी चाहिए कि वह जिस भी नयी दिशा की ओर आगे बढ़ना चाहे उसे उस पर चलने के लिए बढ़ने के लिए कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। समाज में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि जो किसान अपनी मेहनत के पसीने से अपनी फसलों को सींचता है। उन फसलों की पैदावार बिना किसी रोक-टोक के उसके पेट की आँतों तक पहुँच कर उसकी भूख मिटा सके। यह न हो कि सारे समाज की भूख मिटाने वाला, अन्न उपजाने वाला किसान स्वयं भूखा रहे।

विशेष:

  1. कवि सब के लिए समान तथा स्वच्छन्द विचरण की सुविधाएँ चाहता है।
  2. भाषा भावपूर्ण एवं प्रतीकात्मक है। अनुप्रास अलंकार है।

2. बिना किसी बँधन के
हर चलते राही को
यात्रा में
अक्सर थक जाने पर
मनचाहे नये गीत गाने की
सुविधा दो
कभी कभी अजब सी रहस्यमयी पुकारों पर
मन को अपरिचित नक्षत्रों की राहों में
जाकर खो जाने की सुविधा दो।

कठिन शब्दों के अर्थ:
अक्सर = प्रायः । अजब सी = विचित्र सी।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश श्री धर्मवीर भारती द्वारा रचित कविता ‘निर्माण योजना’ के यातायात खंड से ली गई हैं, जिसमें कवि सब के लिए स्वच्छन्द विचरण की कामाना की हैं।

व्याख्या:
कवि कहता है कि कोई भी व्यक्ति जीवन की राह पर चलते हुए जब कभी थक जाए अर्थात् निराश हो जाए तो उसे बिना किसी बन्धन के मनचाहे नये गीत गाने की सहूलियत होनी चाहिए और जब कभी रहस्यमयी विचित्र-सी पुकारों को सुनकर व्यक्ति का मन अनजाने नक्षत्रों की राहों पर बढ़ने के लिए लालायित हो उठे, तो उसे ऐसा करने की सुविधा मिलनी चाहिए।

विशेष:

  1. कवि ने अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिकों को पर्याप्त सुविधा प्रदान करने की बात कही है जिससे वे अपने देश की ही नहीं समूची मानवता की सेवा कर सकें।
  2. भाषा भावपूर्ण तथा प्रतीकात्मक है। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

कृषि

ये फसलें काटो ……………
पिछले जमाने में
बीज जो बोये विषमता के
आज वहाँ साँपों की खेती उग आई है।
धरती को फिर से सँवारो
क्यारी में बीज नये डालो
पसीने के, आँसू के,
प्यार के, हमदर्दी के,
मेंड़ें मत बाँधो,
भूमि सबकी
दर्द सबका है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
जमाने में = युग में, समय में। विषमता = भेद-भाव। हमदर्दी = सहानुभूति। मेंहें = खेत की हदबन्दी, सिंचाई के लिए खेत में बनाया गया मिट्टी का घेरा, यहाँ भाव अवरोध या रुकावट खड़ी करने से है।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश श्री धर्मवीर भारती द्वारा लिखित काव्य संग्रह ‘सात गीत वर्ष’ में संकलित ‘निर्माण योजना’ शीर्षक के अन्तर्गत लिखी ‘कृषि’ कविता से लिया गया है, जिसमें कवि उन भेदभावों और असमानताओं की फसलों को काटने का आह्वान करता है जिन्हें जाने अनजाने हमारे पूर्वजों ने बो दिया था और जिसने समाज के दामन को तार-तार कर दिया है। अतः अब हमारे सामने एकमात्र यही एक रास्ता है कि उन फसलों को काट कर परिश्रम, प्यार और हमदर्दी की फसल के बीज बोये जायें क्योंकि भूमि सबकी है और दर्द भी सबका साँझा है।

व्याख्या:
कवि धरती को, समाज को सुधारने के लिए भेदभाव पैदा करने वाले विचारों को दूर कर, आपसी भाईचारा, प्रेम, प्यार एवं एक-दूसरे से सहानुभूति पैदा करने का सन्देश देता हुआ कहता है कि जाने अनजाने हमारे पूर्वजों ने समाज के विभिन्न वर्गों में भेदभाव उत्पन्न करने की जो भावना भरी थी, समाज की भलाई के लिए हमें उस विषैली खेती को काट देना चाहिए भाव यह है समाज का, व्यक्ति का कल्याण इन भावनाओं को नष्ट करने में ही है बल्कि हमें तो आज मेहनत के, समान दुःख की भावना के, आपसी प्रेम प्यार के, एक दूसरे से सहानुभूति रखने वाले भावों को बढ़ावा देना चाहिए। हमें ऐसी सीमाएँ नहीं बाँधनी हैं जिससे समाज विभिन्न वर्गों में बँट जाए बल्कि इसके विपरीत कार्य करना चाहिए क्योंकि यह धरती सबकी है, दर्द सबके साँझे हैं।

विशेष:

  1. कवि ने समस्त प्रकार के भेदभावों को मिटाकर कर समतावादी समाज की स्थापना की कामना की है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, भावपूर्ण तथा प्रतीकात्मक है।

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स्वास्थ्य

वे सब बीमार हैं,
वे जो उन्मादग्रस्त रोगी से
मंचों पर जाकर चिल्लाते हैं
बकते हैं
भीड़ में भटकते हैं
वात पित्त कफ़ के बाद
चौथे दोष अहम् से पीड़ित हैं।
बस्ती-बस्ती में
नये अहम् के अस्पताल खुलवाओ।
वे सब बीमार हैं।
डरो मत-तरस खाओ।

कठिन शब्दों के अर्थ:
उन्मादग्रस्त = पागलपन।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश श्री धर्मवीर भारती के काव्य संग्रह ‘सात गीत वर्ष’ में ‘निर्माण योजना’ शीर्षक के अन्तर्गत रचित ‘स्वास्थ्य’ कविता से लिया गया है। स्वास्थ्य निर्माण योजना का अन्तिम पड़ाव है। कवि ने वर्तमान युग के नेता वर्ग पर व्यंग्य करते हुए बताया है कि आज के नेता अहम् रोग के शिकार हैं अतः उनके इलाज के लिए भी नए अस्पताल खुलवाने चाहिए।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि आज के नेता सभी बीमार हैं जो एक पागल रोगी के समान मंचों पर जाकर चिल्लाते हैं और बकवास करते हैं अर्थात् व्यर्थ की बातें करते हैं और जनता की भीड़ में मारे-मारे फिरते हैं। वे रोग ग्रस्त हैं। वे वात, पित्त और कफ रोगों के अतिरिक्त चौथे रोग अहम् से भी पीड़ित हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन नेताओं के इलाज के लिए बस्ती-बस्ती में अहम् का इलाज करने वाले नए अस्पताल खोले जाएँ जिससे ये समाज का स्वस्थ निर्माण कर सकें। इसके लिए हमें उपयुक्त वातावरण का निर्माण करना चाहिए। इन नेताओं से हमें डरना नहीं चाहिए क्योंकि ये सब तो बीमार हैं। हमें तो इन पर तरस खाना चाहिए। अर्थात् इनके प्रति सहानुभूति दर्शानी चाहिए क्योंकि ये अस्वस्थ हैं, बीमार हैं।

विशेष:

  1. कवि ने बीमार राजनीति पर चिंता व्यक्त करते हुए उसे सही दिशा देने की प्रेरणा दी है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, भावपूर्ण तथा प्रतीकात्मक है। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

धर्मवीर भारती Summary

धर्मवीर भारती जीवन परिचय

धर्मवीर भारती जी का जीवन परिचय लिखिए।

धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसम्बर, सन् 1926 में इलाहाबाद में हुआ। यहीं से आपने हिन्दी विषय में एम० ए० तथा ‘सिद्ध साहित्य’ पर डी० फिल० की उपाधि प्राप्त की तथा इलाहाबाद में ही प्राध्यापक की नौकरी की। इनकी विशेष रुचि पत्रकारिता में थी। सन् 1960 में आप साप्ताहिक धर्मयुग के सम्पादक बन कर मुम्बई आ गए और सेवानिवृत्त होकर यहीं बस गए। यहीं 4 सितंबर, सन् 1997 को इनकी मृत्यु हो गई। भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया था। ठंडा लोहा, अंधा युग, सात मीत वर्ष और कनुप्रिया आपके प्रसिद्ध काव्यसंग्रह हैं।

निर्माण योजना कविताओं का सार

‘निर्माण योजना’ कविता के चार अंश हैं। प्रथम अंश ‘बाँध’ में कवि ने समाज में व्याप्त घृणा रूपी नदी को बाँध कर उसे प्रेम में परेशत कर मानव कल्याण का संदेश दिया है। ‘यातायात’ में कवि ने समाज को बन्धन मुक्त होकर स्वच्छंदतापूर्वक जीवनयापन करने की सुविधा प्रदान करने के लिए कहा है। ‘कृषि’ में समस्त भेदभाव समाप्त कर समाज को सुख की खेती करने का संदेश दिया है तथा अंतिम अंश ‘स्वास्थ्य’ में अहंकार को त्याग कर वास्तविकता को पहचानने पर बल दिया है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 11 गिरिजा कुमार माथुर

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 11 गिरिजा कुमार माथुर Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 11 गिरिजा कुमार माथुर

Hindi Guide for Class 12 PSEB गिरिजा कुमार माथुर Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
‘आदमी का अनुपात’ कविता में कवि ने मानव की संकीर्ण सोच और उसकी अहम् की भावना का चित्रण किया है-अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
कवि ने प्रस्तुत कविता में दो व्यक्तियों के एक ही कमरे में रहते हुए अलग-अलग रास्ते पर चलने, मिलजुल कर न रह सकने को उसकी संकीर्ण सोच का कारण बताया है। उसमें आपसी सहयोग की कमी भी इसी भाव के अन्तर्गत . आती है। मानव कल्याण के लिए यह मानसिक संकीर्णता उपयुक्त नहीं है।

प्रश्न 2.
विशाल संसार में मनुष्य का अस्तित्व क्या है ? प्रस्तुत कविता के आधार पर लिखो।
उत्तर:
इस विशाल संसार के अनेक ब्रह्माण्डों में से एक में मनुष्य रहता है। इस विशाल संसार में अनेक पृथ्वियाँ, भूमियाँ और सृष्टियाँ हैं। अतः आदमी का इस संसार में स्थान बहुत छोटा है। इतना छोटा कि वह किसी सूरत में विशाल संसार की बराबरी नहीं कर सकता। उसका अस्तित्व अत्यन्त तुच्छ है।

प्रश्न 3.
‘आदमी का अनुपात’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
कवि का मानना है कि आदमी का अस्तित्व उस विराटःसत्ता के सामने तुच्छ है। आदमी इस बात को समझता हुआ भी ईर्ष्या, अभिमान, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में पड़कर मानव कल्याण के रास्ते में रुकावटें खड़ी कर रहा है। वह अपने को दूसरों का स्वामी समझता है। ऐसे में भला वह दूसरों से कैसे मिलजुल कर रह सकता है। देश तो एक है किन्तु आज का आदमी इतने संकुचित दृष्टिकोण वाला, इतना व्यक्तिवादी हो गया है कि एक कमरे में रहने वाले दो व्यक्ति भी आपस में मिलजुल कर नहीं रह सकते। उन दोनों के रास्ते अलग और विचार अलग हैं। मानवता के कल्याण के लिए यह भावना सर्वथा अनुपयुक्त है।

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प्रश्न 4.
‘पन्द्रह अगस्त’ माथुर जी की राष्ट्रीयवादी कविता है-स्पष्ट करें।
उत्तर:
श्री माथुर जी के द्वारा रचित कविता पन्द्रह अगस्त एक राष्ट्रवादी कविता है। इसमें कवि ने राष्ट्रवादियों को सम्बोधित करते हुए राष्ट्र की स्वतन्त्रता को बनाए रखने एवं उसकी सुरक्षा करने का आह्वान किया है। भले ही हम अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो गए हैं किन्तु उनका प्रभाव बराबर बना हुआ है। इस पर हमें बाहरी और भीतरी शत्रुओं का भय भी बना हुआ है। बाहरी शत्रु कभी भी हम पर आक्रमण कर सकता है। उससे हमें लड़ना होगा और भीतरी शत्रु जैसे अभाव, ग़रीबी, बेरोज़गारी, साम्प्रदायिकता से भी हमें लड़ना होगा। किन्तु कवि को विश्वास है कि जन आन्दोलन राष्ट्र को सदा गतिशील बनाए रखेगा।

प्रश्न 5.
‘पन्द्रह अगस्त’ कविता का सार लिख कर इस का प्रतिपाद्य स्पष्ट करें।
उत्तर:
माथुर जी के काव्य संग्रह ‘धूप के धान’ में संकलित ‘पन्द्रह अगस्त’ शीर्षक कविता में शताब्दियों की दासता से मुक्ति के दिन पन्द्रह अगस्त, सन् 1947 के दिन के संदर्भ में नव-निर्माण की चिन्ता और सावधानी का स्वर मुखरित हुआ है। – कवि कहते हैं कि पन्द्रह अगस्त जीत की रात है। इस दिन कड़े संघर्ष के बाद अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति पाई थी। स्वतन्त्र होने पर देश में निर्माण के अनेक मार्ग खुल गए हैं किन्तु हे भारतवासियो ! तुम्हें सावधान रहना होगा। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश का यह पहला चरण ही है।

इस स्वतन्त्रता को जन आन्दोलन से प्राप्त किया गया है और इसकी पहली रत्नमयी हिलोर उठी है। जीवन रूपी मोतियों के इस सूत्र में अभी सुख-समृद्धि के अनेक मोती पिरोये जाने शेष हैं। किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए किए जाने वाले संघर्ष के दौरान झेले जाने वाले कष्टों, दुःखों की याद किसी काले किनारे के समान अभी तक बनी हुई है अर्थात् पुराने दुःखों का इतिहास अभी समाप्त नहीं हुआ है। अतः हे भारतवासियो ! तुम्हें गम्भीर सागर से महान् बन कर समय की पतवार को अपने हाथों में थामना होगा।

भले ही आज पराधीनता की जंजीरें टूट गई हैं। पुराने साम्राज्य के सारे चिह्न मिट गए हैं। किन्तु अभी तक शत्रु, बाहरी और भीतरी, का खतरा बना हुआ है। अंग्रेज भले ही चले गए परन्तु अभी उनका प्रभाव नष्ट नहीं हुआ। भारतीय स्वतन्त्रता अभी तक भयमुक्त नहीं हुई है। किन्तु हमें विश्वास है कि स्वाधीनता के साथ जन जीवन में नई चेतना, नई ज़िन्दगी का संचार होगा। प्रस्तुत कविता में स्वाधीनता दिवस के हर्षोल्लास को प्रकट करते हुए नव-निर्माण की चिन्ता और सावधानी के स्वर प्रवलतर हैं। हर्ष और भय, उल्लास और चिन्ता के द्वन्द्व से निर्मित जटिल राग बोध के निरूपण की दृष्टि से प्रस्तुत कविता उल्लेखनीय है।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 6.
ऊँची हुई मशाल …… सावधान रहना।
उत्तर:
कवि कहता है कि स्वतन्त्रता प्राप्त करके हमारी मशाल ऊँची हो गई है किन्तु आगे रास्ता बड़ा कठिन है। अंग्रेज़ रूपी शत्रु तो चले गए हैं परन्तु अभी उनका प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ तात्पर्य यह है कि भारतीय स्वतन्त्रता अभी तक पूरी तरह भयमुक्त नहीं हुई है, अभी तक बाहरी और भीतरी शत्रु का भय बना हुआ है। हमारा समाज अंग्रेज़ी दमन के कारण मुर्दे के समान हो चुका है.। इस पर हमारा अपना घर भी कमज़ोर है किन्तु हम में एक नई ज़िन्दगी आ रही है यह अमर-विश्वास है। आज जनता रूपी गंगा में तूफान उठ रहा है अतः अरी लहर तुम गतिशील रहना। हे भारतवासियो ! अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए तुम सदा सावधान रहना, जागरूक रहना।

प्रश्न 7.
इस पर भी आदमी………दो दुनिया रचाता है।
उत्तर:
कवि कहता है कि यह जान लेने पर भी कि आदमी उस विराट के आगे बहुत छोटा है, वह ईर्ष्या, अहंकार स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में डूबा रहता है और अनगिनत शंख के समान कठोर दीवारें खड़ी करता है अर्थात् मानवता के विकास में अनेक बाधाएँ खड़ी करता है। वह अपने को दूसरों का स्वामी बताता है। ऐसी हालत में देशों की बात कौन कहे आदमी एक कमरे में भी दो दुनिया बनाता है अर्थात् एक कमरे में रहने वाले दो व्यक्ति भी मिल कर नहीं रह सकते। दोनों ही अपने-अपने रास्ते पर चलते हैं, एक-दूसरे से परे रहते हैं। मानव कल्याण के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं है।

PSEB 12th Class Hindi Guide गिरिजा कुमार माथुर Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
गिरिजा कुमार माथुर का जन्म कहाँ और कब हुआ था?
उत्तर:
मध्य प्रदेश के अशोक नगर में, 22 अगस्त, सन् 1919 ई० में।

प्रश्न 2.
श्री माथुर की प्रमुख चार रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
नाश और निर्माण, धूप के धाम, शिलापंख चमकीले, जन्म कैद।

प्रश्न 3.
श्री माथुर का देहांत कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
इनका देहांत 10 जनवरी, सन् 1994 ई० में दिल्ली में हुआ था।

प्रश्न 4.
‘आदमी का अनुपात’ कविता में इन्सान को कैसा बताया है ?
उत्तर:
अहंकारी, स्वार्थी, अविश्वासी, ईर्ष्या से भरा हुआ।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 11 गिरिजा कुमार माथुर

प्रश्न 5.
इन्सान अपनी ईर्ष्या-अहंकार के कारण क्या करता है?
उत्तर:
इन्सान ईर्ष्या के कारण मानवता के विकास में बाधाएँ खड़ी करता है।

प्रश्न 6.
‘पंद्रह अगस्त’ कविता में कवि ने किस चिंता को व्यक्त किया है?
उत्तर:
कवि ने अपनी इस कविता में नवनिर्माण की चिंता और सावधानी बनाने के भावों को व्यक्त किया है।

प्रश्न 7.
कवि ने देश की स्वतंत्रता के बाद किन से डरने की चेतावनी दी है ?
उत्तर:
कवि ने देश के बाहरी और भीतरी शत्रुओं से डरने की चेतावनी दी है। हमारा देश अंग्रेजी साम्राज्य के कारण कमज़ोर हो चुका है।

प्रश्न 8.
मानव कल्याण के लिए कवि ने किसे उचित नहीं माना?
उत्तर:
कवि ने मानसिक संकीर्णता को मानव कल्याण के लिए उचित नहीं माना।

प्रश्न 9.
इस विशाल संसार में मनुष्य का अस्तित्व कैसा है?
उत्तर:
इस विशाल संसार में मनुष्य का अस्तित्व अति तुच्छ है।

प्रश्न 10.
कवि की दृष्टि में आधुनिक इन्सान कैसा हो गया है?
उत्तर:
आधुनिक इन्सान ईर्ष्या से भरा हुआ, घमंडी, अविश्वासी और घृणा के भावों से युक्त है। वह स्वयं दूसरों का स्वामी बनना चाहता है। वह व्यक्तिवादी और संकुचित सोच वाला है।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 11.
लाखों ब्रह्माण्डों में……
उत्तर:
अपना एक ब्रह्मांड।

प्रश्न 12.
इस पर भी आदमी..
उत्तर:
ईर्ष्या, अहं, स्वार्थी, घृणा, अविश्वास लीन।

प्रश्न 13.
………………खुली समस्त दिशाएँ।
उत्तर:
विषम श्रृंखलाएँ टूटी हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 11 गिरिजा कुमार माथुर

प्रश्न 14.
लहर, तुम प्रवहमान रहना…………….
उत्तर:
पहरुए, सावधान रहना।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 15.
जीत की रात में पहरुए आराम से रहना।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 16.
इन्सान एक कमरे में भी दो दुनिया बनाता है।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 17.
लाखों ब्रह्माण्डों में अपना एक बह्माण्ड।
उत्तर:
हाँ।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘नाश और निर्माण’ किस विधा की रचना है ?
(क) काव्य
(ख) गद्य
(ग) कहानी
(घ) उपन्यास
उत्तर:
(क) काव्य

2. कवि को कहां का सूचना अधिकारी नियुक्त किया गया ?
(क) भारत में
(ख) नेपाल में
(ग) संयुक्त राष्ट्र संघ में
(घ) संसद में।
उत्तर:
(ग) संयुक्त राष्ट्र संघ में

3. कवि को किसका उपनिदेशक नियुक्त किया गया ?
(क) आकाशवाणी लखनऊ का
(ख) आकाशवाणी दिल्ली का
(ग) सदन का
(घ) लोकसभा का।
उत्तर:
(क) आकाशवाणी लखनऊ का

4. कवि के अनुसार ब्राह्मांड कितने हैं ?
(क) लाखों
(ख) हज़ारों
(ग) सैंकड़ों
(घ) असंख्य।
उत्तर:
(क) लाखों

5. कवि के अनुरूप लाखों ब्रह्मांडों में आदमी का अनुपात कितना है ?
(क) तुच्छ
(ख) बड़ा
(ग) छोटा
(घ) भारी।
उत्तर:
(ग) छोटा

6. ‘पंद्रह अगस्त’ कविता में कवि ने देशवासियों को किसकी रक्षा के लिए सचेत किया है ?
(क) धन
(ख) स्वतंत्रता
(ग) परतंत्रता
(घ) देश
उत्तर:
(ख) स्वतंत्रता

गिरिजा कुमार माथुर सप्रसंग व्याख्या

आदमी का अनुपात

1. दो व्यक्ति कमरे में
कमरे से छोटे
कमरा है घर में
घर है मुहल्ले में
मुहल्ला नगर में
नगर है प्रदेश में
प्रदेश कई देश में
देश कई पृथ्वी पर
अनगिन नक्षत्रों में
पृथ्वी एक छोटी
करोड़ों में एक ही
सबको समेटे है
परिधि नभ-गंगा की

कठिन शब्दों के अर्थ:
आदमी का अनुपात = आदमी का अस्तित्व । अनगिन = असंख्य। परिधि = सीमा, घेरा। नभ गंगा = आकाश गंगा।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश प्रगतिवादी कवि गिरिजा कुमार माथुर द्वारा लिखित काव्य संग्रह ‘शिलापंख चमकीले,’ में संकलित कविता ‘आदमी का अनुपात’ में से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में कवि ने मानव की मानव के प्रति संकीर्ण सोच और व्यक्तिवादिता पर प्रकाश डालते इसे मानवता के कल्याण के लिए घातक बताया है।

व्याख्या:
कवि आदमी के अस्तित्व की विराट ब्रह्मांड से तुलना करते हुए कहता है कि दो व्यक्ति कमरे में रहते हैं। आकार की दृष्टि से वे कमरे से भी छोटे हैं। कमरा घर में है, घर मुहल्ले में, मुहल्ला नगर में, नगर प्रदेश (राज्य) में, प्रदेश देश में, देश पृथ्वी पर और पृथ्वी असंख्य नक्षत्रों की तुलना में बहुत छोटी प्रतीत होती है और आकाश गंगा अपनी सीमा में करोड़ों नक्षत्रों को समेटे हुए है।

विशेष:

  1. कवि ने इस विराट ब्रह्मांड में आदमी की स्थिति का मूल्यांकन किया है।
  2. भाषा तत्सम एवं भावपूर्ण प्रधान है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 11 गिरिजा कुमार माथुर

2. लाखों ब्रह्माण्डों में
अपना एक ब्रह्माण्ड
हर ब्रह्माण्ड में
कितनी ही पृथ्वियाँ
कितनी ही भूमियाँ
कितनी ही सृष्टियाँ
यह है अनुपात
आदमी का विराट में।

कठिन शब्दों के अर्थ:
ब्रह्माण्ड = सम्पूर्ण विश्व।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ गिरिजा कुमार माथुर द्वारा रचित कविता ‘आदमी का अनुपात’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने आदमी की वास्तविकता चित्रित की है।

व्याख्या:
विराट स्वरूप ब्रह्माण्ड के सामने आदमी को बहुत छोटा बतलाते हुए कवि कहता है कि संसार में लाखों ब्रह्माण्ड हैं जिनमें आदमी का भी एक ब्रह्माण्ड है, जिसमें वह रहता है। हर ब्रह्माण्ड में कितनी ही पृथ्वियाँ हैं, कितनी ही भूमियाँ हैं और कितनी ही सृष्टियाँ हैं, अतः आदमी का ब्रह्माण्ड इन ब्रह्माण्डों के सामने बहुत छोटा है। वह उसकी बराबरी कभी नहीं कर सकता।

विशेष:

  1. मनुष्य की अकिंचन स्थिति का वर्णन किया गया है।
  2. भाषा सहज तथा भावपूर्ण है।

3. इस पर भी आदमी
ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन
संख्यातीत शंख-सी दीवारें उठाता है
अपने को दूजे का स्वामी बताता है
देशों की कौन कहे
एक कमरे में
दो दुनियां रचाता है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
लीन = लगा हुआ, मस्त। संख्यातीत = अनगिनत।

प्रसंग:
प्रस्तुत पक्तियाँ गिरिजा कुमार माथुर द्वारा रचित कविता ‘आदमी का अनुपात’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने आदमी की वास्तविकता चित्रित की है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि यह जान लेने पर भी कि आदमी उस विराट के आगे बहुत छोटा है, वह ईर्ष्या, अहंकार स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में डूबा रहता है और अनगिनत शंख के समान कठोर दीवारें खड़ी करता है अर्थात् मानवता के विकास में अनेक बाधाएँ खड़ी करता है। वह अपने को दूसरों का स्वामी बताता है। ऐसी हालत में देशों की बात कौन कहे आदमी एक कमरे में भी दो दुनिया बनाता है अर्थात् एक कमरे में रहने वाले दो व्यक्ति भी मिल कर नहीं रह सकते। दोनों ही अपने-अपने रास्ते पर चलते हैं, एक-दूसरे से परे रहते हैं। मानव कल्याण के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं है।

विशेष:

  1. मनुष्य अपने अहंकार के कारण ही परस्पर झगड़ता रहता है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान तथा भावपूर्ण है।

पन्द्रह अगस्त

1. आज जीत की रात
पहरुए सावधान रहना
खुले देश के द्वार
अचल दीपक समान रहना
प्रथम चरण है नये स्वर्ग का
है मंजिल का छोर
इस जन-मंथन में उठ आई
पहली रत्न हिलोर
अभी शेष है पूरी होना
जीवन-मुक्ता डोर
क्योंकि नहीं मिट याई दुख की
विगत साँवली कोर
ले युग की पतवार
बने अंबुधि महान रहना
पहरुए, सावधान रहना।

कठिन शब्दों के अर्थ:
जीत की रात = स्वतन्त्रता प्राप्ति की रात। पहरुए = देश वासी, देश के रक्षक। सावधान रहना = सचेत रहना। अचल = स्थिर। छोर = किनारा। हिलोर = तरंग। जीवन-मुक्ता = जीवन रूपी मोतियों की। विगत = बीती हुई। साँवली-अँधेरी = प्राचीन दुःखों और कष्टों भरा गुलामी का इतिहास । जल-मंथन = जन आन्दोलन। कोर = किनारा। अंबुधि = समुद्र।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश कवि गिरिजा कुमार माथुर जी की काव्यकृति ‘धूप के धान’ में संकलित कविता ‘पन्द्रह अगस्त’ में से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में कवि ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद बाहरी ओर भीतर शत्रुओं से सावधान रह कर स्वतन्त्रता की रक्षा करने की बात कही है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि आज जीत की रात है अर्थात् वर्षों की गुलामी के बाद संघर्ष करके हम ने स्वतन्त्रता प्राप्त की है अतः हे देशवासियो ! इस स्वतन्त्रता की रक्षा करने के लिए तुम सावधान अर्थात् सचेत रहना। देश के द्वार खुल गए हैं अर्थात् देश पराधीनता से मुक्त हो गया है इसलिए तुम स्थिर दीपक बन कर रहना। इन नए स्वर्ग का अर्थात् स्वतन्त्र भारत का यह पहला चरण है और लक्ष्य का प्रारम्भ है। इस जन आन्दोलन से अर्थात् जनता के निरन्तर संघर्ष से स्वतन्त्रता की यह रत्नों से युक्त लहर उठी है। अभी जीवन रूपी मोतियों के इस सूत्र में अनेक मोती पिरोये जाने शेष हैं। क्योंकि अभी तक बीते हुए काले किनारे अर्थात् परतन्त्रता के दिनों के दुःख भरे चिह्न बाकी हैं। अतः हे भारतवासियो ! समय की पतवार लेकर महान् समुद्र के समान बन कर रहना है। हे भारतवासियो ! तुम्हें अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए जागरूक रहना है।

विशेष:

  1. कवि देशवासियों को अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए सावधान रहने के लिए कह रहा है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान भावपूर्ण है। रूपक अलंकार है।

2. विषम श्रृंखलाएँ टूटी हैं
खुली समस्त दिशाएँ
आज प्रभजन बनकर चलती
युग-बंदिनी हवाएँ
प्रश्न चिह्न बन खड़ी हो गई
यह सिमटी सीमाएँ
आज पुराने सिंहासन की
टूट रही प्रतिमाएँ
उठत है तूफान, इन्दु तुम
दीप्तिमान रहना
पहरुए, सावधान रहना।

कठिन शब्दों के अर्थ:
विषम श्रृंखलाएँ = पराधीनता की भयानक जंजीरें। प्रभंजन = आँधी, तूफान । पुराने सिंहासन = पुरानी मान्यताएँ या पुराने साम्राज्य-अंग्रेज़ी शासक। टूट रही प्रतिमाएँ = मूर्तियाँ टूट रही हैं अर्थात् अंग्रेजी शासन के चिह्न नष्ट हो रहे हैं। इंदु = चन्द्रमा। दीप्तिमान रहना = जग मगाते रहना।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ गिरिजा-कुमार माथुर द्वारा रचित कविता ‘पन्द्रह अगस्त’ से ली गई हैं, जिसमें कवि देशवासियों को अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि पराधीनता की भयानक जंजीरें टूट गई हैं-भारत अब स्वतन्त्र हो गया है और निर्माण और प्रगति के सारे मार्ग खुल गए हैं किन्तु अभी तक बाहरी शत्रु जो हमारी सीमाओं पर खड़ा है कि जब भी हम असावधान हुए वह आक्रमण कर सकता है। जो तूफ़ानी हवा बन कर बह रहा है। आज हमारी सीमाएँ प्रश्न चिह्न बन कर खड़ी हो गई हैं। ये सीमाएँ हमारे निकट आ गई हैं। आज भले ही अंग्रेजी शासन की सभी मूर्तियाँ टूट रही हैं अर्थात् उसके सभी चिह्न नष्ट हो गए हैं किन्तु भीतरी शत्रु-अभावग्रस्तता, ग़रीबी, बेरोज़गारी, साम्प्रदायिक वैमनस्य की भावना रूपी तूफान अभी उठ रहा है। अतः हे चन्द्रमा ! तुम जगमगाते रहना। हे भारतवासियो ! तुम इन बाहरी और भीतरी शत्रुओं से सावधान रहना, जागरूक रहना।

विशेष:

  1. कवि ने देशवासियों को बाहरी तथा आंतरिक शत्रुओं से सावधान रहने के लिए कहा है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान तथा भावपूर्ण है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 11 गिरिजा कुमार माथुर

3. ऊँची हुई मशाल हमारी
आगे कठिन डगर है
शत्रु हट गया लेकिन उसकी
छायाओं का डर है
शोषण से मृत है समाज
कमज़ोर हमारा घर है
किन्तु आ रही नई जिन्दगी
यह विश्वास अमर है
जनगंगा में ज्वार,
लहर, तुम प्रवहमान रहना
पहरुए, सावधान रहना।

कठिन शब्दों के अर्थ:
डगर = रास्ता। शत्रु = अंग्रेज़। शोषण = दमन। मृत = मुर्दा । ज्वार = तूफान। प्रवाहमान = गतिशील।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ गिरिजा कुमार माथुर द्वारा रचित कविता ‘पन्द्रह अगस्त’ से ली गई हैं, जिसमें कवि देशवासियों को अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि स्वतन्त्रता प्राप्त करके हमारी मशाल ऊँची हो गई है किन्तु आगे रास्ता बड़ा कठिन है। अंग्रेज़ रूपी शत्रु तो चले गए हैं परन्तु अभी उनका प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ तात्पर्य यह है कि भारतीय स्वतन्त्रता अभी तक पूरी तरह भयमुक्त नहीं हुई है, अभी तक बाहरी और भीतरी शत्रु का भय बना हुआ है। हमारा समाज अंग्रेज़ी दमन के कारण मुर्दे के समान हो चुका है.। इस पर हमारा अपना घर भी कमज़ोर है किन्तु हम में एक नई ज़िन्दगी आ रही है यह अमर-विश्वास है। आज जनता रूपी गंगा में तूफान उठ रहा है अतः अरी लहर तुम गतिशील रहना। हे भारतवासियो ! अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए तुम सदा सावधान रहना, जागरूक रहना।

विशेष:

  1. कवि देशवासियों को अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रेरित किया है।
  2. भाषा सरल तथा भावपूर्ण है। उद्बोधनात्मक स्वर है।

गिरिजा कुमार माथुर Summary

गिरिजा कुमार माथुर जीवन परिचय

गिरिजा कुमार माथुर जी का जीवन परिचय लिखिए।

गिरिजा कुमार माथुर का जन्म 22 अगस्त, सन् 1919 ई० को मध्यप्रदेश के अशोक नगर में हुआ। लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम० ए० तथा एल० एल० बी० पास करके आपने झाँसी में कुछ समय तक वकालत की और बाद में आकाशवाणी में नौकरी कर ली। सन् 1950 में आपको संयुक्त राष्ट्र संघ में सूचना अधिकारी नियुक्त किया गया। सन् 1953 में वापस आकर इन्हें आकाशवाणी लखनऊ के उपनिदेशक पद पर नियुक्त किया गया। इन्होंने आकाशवाणी जालन्धर में भी कार्य किया और दिल्ली केन्द्र से उप महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए। इनका निधन 10 जनवरी, सन् 1994 को नई दिल्ली में हो गया था।

इनकी नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले, जो बंध नहीं सका, भीतरी नदी की यात्रा, जन्म कैद आदि प्रमुख रचनाएँ हैं।

गिरिजा कुमार माथुर कविताओं का सार

आदमी का अनुपात कविता में कवि ने अहंकारी मनुष्य को बताया है कि लाखों ब्रह्मांडों के मध्य उसका अनुपात कितना तुच्छ है, फिर भी वह स्वार्थवश अपनी अलग दुनिया रचना चाहता है, यहाँ तक कि एक कमरे में दो आदमी भी मिलकर नहीं रह पाते। ‘पन्द्रह अगस्त’ कविता ने देशवासियों को अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए सचेत रहने के लिए कहा है क्योंकि हमारी स्वतंत्रता पर बाहरी सीमा से शत्रु तथा आंतरिक रूप से देश की समस्याएं आक्रमण कर सकती हैं। इसलिए हमें सदा सजग प्रहरी बनकर इनसे जूझना होगा।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 10 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 10 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 10 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

Hindi Guide for Class 12 PSEB शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
‘चलना हमारा काम है’ कविता आशा और उत्साह की कविता है-स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में कवि ने गतिशीलता को ही जीवन माना है। स्थिरता को उसने मृत्यु समान माना है। गतिशील जीवन ही जीवन पथ में आने वाली बाधाओं को पार कर आगे बढ़ने की हिम्मत रखता है। जब व्यक्ति के पैरों में चलने की शक्ति है तो वह किनारे पर खड़ा क्यों देखता रहे । जीवन में सुख-दुःख, आशा-निराशा तो आते ही रहते हैं किन्तु जीवन रुकना नहीं चाहिए। स्पष्ट है कि कविता में आशा और उत्साह बनाए रखने की बात कही गई है।

प्रश्न 2.
‘चलना हमारा काम है’ कविता का सार लिखो।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में गतिशीलता को जीवन और स्थिरता को मृत्यु बताया गया है। गतिशील जीवन में बाधाओं को पार कर आगे बढ़ने की हिम्मत होती है। कवि कहते हैं कि जब मेरे पैरों में चलने की शक्ति है तो मैं दूर खड़ा क्यों देखता रहूँ। जब तक मैं अपनी मंज़िल न पा लूँ मैं रुकूँगा नहीं। जीवन में सुख-दुःख तो आते ही रहते हैं किन्तु भाग्य को दोष देकर मुझे रुकना नहीं है चलते ही जाना है। भले ही जीवन की इस यात्रा में कुछ लोग रास्ते से ही लौट गए किंतु जीवन तो निरंतर चलता ही रहता है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 10 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

प्रश्न 3.
‘मानव बनो, मानव ज़रा’ कविता का शीर्षक क्या सन्देश देता है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता का शीर्षक यह सन्देश देता है कि मानव कल्याण के लिए जियो अथवा अपना जीवन लगाओ ताकि मानवता तुम पर गर्व कर सके।

प्रश्न 4.
‘मानव बनो, मानव जरा’ कविता का सार लिखें।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में मनुष्य को आत्मनिर्भर होने की बात कही गई है। कवि का कहना है प्यार करना और उसमें खुशामद करना तथा किसी दूसरे का आश्रय ग्रहण करना तुम्हारी भूल है, इससे कोई लाभ न होगा। न ही आँसू बहाने और न ही किसी के आगे हाथ फैलाने से कोई लाभ होगा। कष्टों में हाय तौबा करना या कराहना तुम्हें शोभा नहीं देता। अपने इन आँसुओं का सदुपयोग करते हुए विश्व के कण-कण को सींच कर हरा-भरा कर देना है। अब पछताओ मत बल्कि यदि तुम्हें जलना ही है तो अपनी भस्म से इस धरती को उपजाऊ बनाओ।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 5.
मैं तो फ़कत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया।
जो बंद कर पलकें सहज
दो घूट हँस कर पी गया।
जिसमें सुधा मिश्रित गरल, वह साकिया का जाम है
चलना हमारा काम है।
उत्तर:
कवि कहते हैं कि मैं तो केवल इतना जानता हूँ कि जो मिट जाता है वही जी जाता है। जो स्वाभाविक रूप से आँखें बन्द करके सुख-दुःख ऐसे दो घुट हँसकर पी जाता है जिसमें अमृत मिश्रित विष होता है अर्थात् सुख के साथ दुःख भी होते हैं वही वास्तव में साकी का दिया हुआ शराब का प्याला है।

प्रश्न 6.
उफ़ हाय कर देना कहीं
शोभा तुम्हें देता नहीं
इन आँसुओं से सींच कर दो
विश्व का कण-कण हरा
मानव बनो, मानव ज़रा।
उत्तर:
कवि कहते हैं कि कष्ट में कराहना-हाय तौबा करना तुम्हें शोभा नहीं देता बल्कि तुम्हें चाहिए कि अपने इन आँसुओं से सींच कर विश्व के कण-कण को हरा कर दो अर्थात् धरती का कण-कण अपनी संवेदना से भर दो। अत: हे मनुष्य ! तुम मानव बनो और ज़रा मानव बन कर देखो।

PSEB 12th Class Hindi Guide शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ ने उच्च शिक्षा किस विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी?
उत्तर:
काशी हिंदू विश्वविद्यालय से।

प्रश्न 2.
सुमन जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार किस रचना पर प्राप्त हुआ था?
उत्तर:
मिट्टी की बारात पर।

प्रश्न 3.
कवि के विचार से जीवन और मृत्यु क्या है?
उत्तर:
कवि के विचार से गतिशीलता जीवन है और स्थिरता मृत्यु है।

प्रश्न 4.
इन्सान को अपने जीवन में शक्ति की प्राप्ति किससे होती है?
उत्तर:
इन्सान को गतिशील जीवन में बाधाओं को पार कर आगे बढ़ने से शक्ति प्राप्त होती है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 10 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

प्रश्न 5.
कवि के सामने तय करने के लिए कैसा रास्ता पड़ा है ?
उत्तर:
लंबा रास्ता।

प्रश्न 6.
जीवन की राह को किस तरह आसानी से काटा जा सकता है?
उत्तर:
एक-दूसरे से सुख-दुख को बांटते हुए जीवन की राह को आसानी से काटा जा सकता है।

प्रश्न 7.
जीवन की राह पर बढ़ते हुए इन्सान सदा किस से घिरा रहता है?
उत्तर:
वह निराशा से घिरा रहता है।

प्रश्न 8.
इन्सान का मूल कार्य क्या है?
उत्तर:
जीवन की राह में आगे बढ़ते जाना।

प्रश्न 9.
कवि ने दुनिया को क्या कहा है?
उत्तर:
सुंदर संसार रूपी सागर।

प्रश्न 10.
संसार में सभी को क्या सहने ही पड़ते हैं ?
उत्तर:
संसार में सभी को दु:ख सहने ही पड़ते हैं।

प्रश्न 11.
कवि पूर्णता की खोज में कहाँ-कहाँ भटकता रहा?
उत्तर:
कवि पूर्णता की खोज में दर-दर भटकता रहा।

प्रश्न 12.
जीवन की राह में सफलता की प्राप्ति किसे होती है?
उत्तर:
जीवन की राह में सफलता की प्राप्ति निरंतर आगे बढ़ने वालों को ही प्राप्त होती है।

प्रश्न 13.
कवि ने इन्सान को क्या न करने की सलाह दी है?
उत्तर:
कवि ने इन्सान को कष्टों से डरने, व्यर्थ पछताने, रोने-पीटने और निराशावादी न बनने की सलाह दी है।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 14.
जब तक न मंजिल पा सकूँ…………
उत्तर:
तब तक न मुझे विराम है।

प्रश्न 15.
इस विशद विश्व प्रवाह में,
उत्तर:
किसको नहीं बहना पड़ा।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 10 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

प्रश्न 16.
कर दो धरा को उर्वरा,
उत्तर:
मानव बनो, मानव बनो।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 17.
अपने हृदय की राख से धरती को उपजाऊ बना दो।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 18.
कवि जीवन की पूर्णता के लिए दर-दर भटकता फिरा।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 19.
कवि अपूर्ण जीवन लेकर कवि सब कुछ प्राप्त करता रहा।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 20.
आपस में कहने-सुनने से बोझ कम नहीं होता।
उत्तर:
नहीं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. सुमन को ‘मिट्टी की बारात’ कृति पर कौन सा पुरस्कार मिला ?
(क) साहित्य अकादमी
(ख) पद्मश्री
(ग) पद्मभूषण
(घ) पद्मविभूषण
उत्तर:
(क) साहित्य अकादमी

2. कवि को देव पुरस्कार किस काव्य संग्रह पर मिला ?
(क) आपका विश्वास
(ख) विश्वास बढ़ता ही गया
(ग) विश्वास
(घ) धूप
उत्तर:
(ख) विश्वास बढ़ता ही गया

3. कवि के अनुसार गतिशीलता क्या है ?
(क) जीवन
(ख) भाव
(ग) भावना
(घ) चलना
उत्तर:
(क) जीवन

4. कवि के अनुसार स्थिरता क्या है ?
(क) ठहरना
(ख) मृत्यु
(ग) जीवन
(घ) जीवन-मृत्यु
उत्तर:
(ख) मृत्यु

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 10 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

5. कवि के अनुसार संसार में वह किसकी खोज में दर-दर भटकता है ?
(क) पूर्णता
(ख) अपूर्णता
(ग) ईश्वर
(घ) शांति
उत्तर:
(क) पूर्णता

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ सप्रसंग व्याख्या

चलना हमारा काम है !

1. गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा,
है रास्ता इतना पड़ा।
जब तक न मंज़िल पा सकूँ, तब तक न मुझे विराम है,
चलना हमारा काम है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
गति = चाल। प्रबल = बलशाली, ज़ोर की। मंज़िल = ठिकाना, लक्ष्य। विराम = रुकना, आराम।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश डॉ० शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ द्वारा रचित कविता ‘चलना हमारा काम है’ में से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में कवि ने बताया है कि गतिशीलता जीवन है और स्थिरता मृत्यु । गतिशील जीवन में बाधाओं को लाँघते हुए आगे बढ़ने की शक्ति प्राप्त होती है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि जीवन चलते रहने का नाम है रुकने का नहीं। इसी तथ्य की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं कि जब मेरे पैरों में चलने की बलशाली शक्ति है तो फिर मैं क्यों जीवन-पथ पर जगह-जगह रुकता रहूँ। जब मैं यह जानता हूँ कि मेरे सामने बड़ा लम्बा रास्ता पड़ा है तो फिर मैं क्यों रुकूँ। मुझे तो तब तक चलना होगा जब तक मैं अपनी मंज़िल, अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर लूँ। मुझे रुकना नहीं है क्योंकि चलना ही हमारा काम है।

विशेष:

  1. कवि का मानना है जब तक मनुष्य को अपना लक्ष्य न प्राप्त हो जाए, उसे निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहिए।
  2. भाषा सहज, भावपूर्ण है।
  3. उद्बोधनात्मक शैली है।
  4. अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

2. कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया,
कुछ बोझ अपना बँट गया।
अच्छा हुआ तुम मिल गई,
कुछ रास्ता ही कट गया।
क्या राह में परिचय कहूँ, राही हमारा नाम है।
चलना हमारा काम है!

कठिन शब्दों के अर्थ:
राही = रास्ते पर चलने वाला।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० शिवमंगल सिंह सुमन रचित कविता ‘चलना हमारा काम है’ में से ली गई हैं, जिसमें कवि ने मनुष्य को निरंतर गतिमान रहने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि जीवन की डगर पर चलते समय अपनी जीवन संगिनी का साथ होने की बात कह रहे हैं। कवि कहते हैं कि जीवन का रास्ता तब कटता है जब साथी मुसाफिरों से व्यक्ति कुछ अपने दिल की बात या दु:ख दर्द की बात कहे और कुछ उनके दुःख दर्द की बात सुने। इस तरह रास्ता आसानी से कट जाता है। जीवन यात्रा में मनुष्य यदि दूसरों से सुख-दुःख बाँटता हुआ चले तो रास्ता आसानी से कट जाता है। कवि अपनी प्रियतमा को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अच्छा हुआ तुम मुझे मिल गईं, तुम्हारे साथ के कारण मेरा रास्ता तो सुखपूर्वक कट गया। क्या रास्ते में ही मैं अपना परिचय तुम्हें दूँ ? मेरा परिचय तो बस इतना ही समझ लो कि मैं भी तुम्हारी तरह रास्ता चलने वाला एक राही हूँ। हमें तो बस चलते ही जाना है क्योंकि चलना ही हमारा काम है।

विशेष:

  1. जीवन-संघर्ष में साथी के मिल जाने से डगर सहज हो जाती है।
  2. भाषा सरल तथा भावपूर्ण है। अनुप्रास अलंकार है।

3. जीवन अपूर्ण लिए हुए,
पाता कभी, खोता कभी
आशा-निराशा से घिरा
हँसता कभी रोता कभी,
गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है।
चलना हमारा काम है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
अपूर्ण जीवन = अधूरा जीवन । पाना = प्राप्त करना। खोना = गँवाना। गति-मति = चाल और बुद्धि। अवरुद्ध = रुका हुआ, बन्द। आठो याम = आठों पहर-दिन के चौबीस घंटों में आठ पहर होते हैं, हर समय।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा रचित कविता ‘चलना हमारा काम है’ में से ली गई हैं, जिसमें कवि ने मनुष्य को निरंतर गतिमान रहने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि अधूरा जीवन लेकर मनुष्य कभी कुछ प्राप्त कर लेता है और कभी कुछ खो देता है। वह सदा आशा-निराशा से घिरा रहता है। कभी वह हँसता है तो कभी रोता है अर्थात् कभी उसके जीवन में खुशियाँ आती हैं तो कभी दुःख आते हैं। इन सब के होते हुए यदि आठों पहर इस बात का ध्यान रहे कि कहीं हमारी चाल या हमारी बुद्धि में कोई रुकावट न आए तभी हम जीवन रूपी मार्ग पर अच्छी तरह चल सकेंगे। क्योंकि चलते रहना ही हमारा काम है।

विशेष:

  1. मनुष्य को कभी निराश नहीं होना चाहिए।
  2. भाषा सरल, भावपूर्ण है। ओज गुण प्रेरक स्वर है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 10 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

4. इस विशद विश्व प्रवाह में,
किस को नहीं बहना पड़ा।
सुख-दुःख हमारी ही तरह
किस को नहीं सहना पड़ा।
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ;‘मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है !

कठिन शब्दों के अर्थ:
विशद = स्वच्छ, सुन्दर। विश्व-प्रवाह = संसार रूपी सागर का बहाव। व्यर्थ = बेकार में। विधाता = भाग्य। वाम = उलटा, विपरीत। – प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा रचित कविता ‘चलना हमारा काम है’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने निरंतर गतिशील रहने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि इस सुन्दर संसार रूपी सागर के स्वच्छ प्रवाह में किस को नहीं बहना पड़ा अर्थात् जिसने संसार में जन्म लिया है उसे संसार के दुःख-सुख तो भोगने ही पड़े हैं। हमारी तरह हर किसी को दुःख सहने पड़े हैं। फिर मैं ही बेकार में यह कहता फिरूँ कि भाग्य मेरे विपरीत है अर्थात् मेरा मन्द भाग्य है। हमारा काम तो चलते ही रहना है।

विशेष:

  1. संसार में सबको सुख-दुःख सहना पड़ता है।
  2. भाषा सरल तथा भावपूर्ण है। रूपक तथा अनुप्रास अलंकार है।

5. मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा,
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोड़ा अटकता ही रहा,
पर हो निराशा क्यों मुझे ? जीवन इसी का नाम है।
चलना हमारा काम है !

कठिन शब्दों के अर्थ:
दर-दर भटकना = जगह-जगह मारे-मारे फिरना। पग = कदम। रोड़ा अटकना = बाधा पड़ना, रुकावट पड़ना। निराश = आशा छोड़ना, ना उम्मीद होना।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा रचित कविता ‘चलना हमारा काम है’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने निरंतर गतिशील रहने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि मैं तो जीवन की पूर्णता की खोज में जगह-जगह मारा-मारा फिरता रहा। तब मैंने पाया कि मुझे हर कदम पर कुछ न कुछ रुकावटें आती रहीं, परन्तु इन रुकावटों से विघ्न बाधाओं से क्या मुझे निराश हो जाना चाहिए ? अर्थात् कभी नहीं क्योंकि जीवन तो इसी का नाम है। अतः हमें विघ्न बाधाओं से निराश नहीं होकर जीवन में सदा चलते रहना चाहिए क्योंकि जीवन तो चलते रहने का नाम है।

विशेष:

  1. मनुष्य को बाधाओं से घबराना नहीं चाहिए।
  2. भाषा सरल तथा भावपूर्ण है। पुनरुक्ति प्रकाश तथा अनुप्रास अलंकार हैं।

6. कुछ साथ में चलते रहे,
कुछ बीच ही से फिर गये,
पर गति न जीवन की रुकी,
पर जो गिर गये सो गिर गये
चलता रह शाश्वत, उसी की सफलता अभिराम है।
चलना हमारा काम है !

कठिन शब्दों के अर्थ:
फिर गये = लौट गये। शाश्वत = निरन्तर। अभिराम = सुन्दर।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा रचित कविता ‘चलना हमारा काम है’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने गति को जीवन माना है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं जीवन की इस यात्रा में कुछ लोग साथ-साथ चलते रहे, कुछ बीच से ही निराश-हताश होकर लौट गये परन्तु जीवन की गति कभी रुकी नहीं। जीवन-यात्रा तो निरन्तर चलती रही जो लोग मार्ग में गिर गये वह समझो गिर गये, नष्ट हो गये। किन्तु जो निरन्तर चलता रहा है उसी की सफलता सुन्दर कहलाती है। अत: चलते जाओ क्योंकि चलना ही हमारा काम है।

विशेष:

  1. जीवनपथ पर साथी से मिलते-बिछड़ते रहते हैं।
  2. भाषा सहज, सरल तथा भावपूर्ण है।

7. मैं तो फ़कत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया
जो बन्दकर पलकें सहज
दो घूट हँसकर पी गया
जिसमें सुधा-मिश्रित गरल, वह साकिया का जाम है।
चलना हमारा काम है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
फ़कत = केवल। सहज = स्वाभाविक रूप से। सुधा = अमृत। गरल = विष। साकिया = शराब परोसने वाली लड़की। जाम = प्याला।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा रचित कविता ‘चलना हमारा काम है’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने गति को जीवन माना है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि मैं तो केवल इतना जानता हूँ कि जो मिट जाता है वही जी जाता है। जो स्वाभाविक रूप से आँखें बन्द करके सुख-दुःख ऐसे दो घुट हँसकर पी जाता है जिसमें अमृत मिश्रित विष होता है अर्थात् सुख के साथ दुःख भी होते हैं वही वास्तव में साकी का दिया हुआ शराब का प्याला है।

विशेष:

  1. कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति जीवन में सुख-दुःख को सहज भाव से लेता है। उसी का जीवन है।
  2. भाषा उर्दू शब्दों युक्त भावपूर्ण है।

मानव बनो, मानव ज़रा

1. है भूल करना प्यार भी
है भूल यह मनुहार भी
पर भूल है सबसे बड़ी
करना किसी का आसरा
मानव बनो, मानव ज़रा।

कठिन शब्दों के अर्थ:
मनुहार = खुशामद, चापलूसी। आसरा = सहारा, आश्रय।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की कविता ‘मानव बनो, मानव जरा’ में से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में कवि ने मनुष्य को आत्म-निर्भर होने की बात कही है। कवि का मानना है कि आँसू बहाने, किसी का आश्रय ग्रहण करने या किसी के सामने हाथ फैलाने का कोई लाभ नहीं है। अगर जलना ही है तो धरती के कल्याण के लिए जलो।

व्याख्या:
कवि मनुष्य को आत्मनिर्भर बनने का संदेश देते हुए कहते हैं कि प्यार करना भी भूल है और किसी की खुशामद करना भी भूल है। परन्तु इन सबसे बड़ी भूल है किसी दूसरे का आश्रय लेना अतः हे मनुष्य ! तुम मानव बनो, ज़रा मानव बन कर देखो।

विशेष:

  1. कवि ने आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी है।
  2. भाषा सरल तथा भावपूर्ण है। अनुप्रास अलंकार है।

2. अब अश्रु दिखलाओ नहीं
अब हाथ फैलाओ नहीं
हुंकार कर दो एक जिससे
थरथरा जाए धरा
मानव बनो, मानव ज़रा।

कठिन शब्दों के अर्थ:
हुँकार = गर्जन। धरा = पृथ्वी।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा रचित कविता ‘मानव बनो जरा’ से ली गई हैं, जिसमे कवि ने. मनुष्य का मानवतावाद का संदेश दिया है।

व्याख्या:
कवि मनुष्य को आत्मनिर्भर बनने का सन्देश देते हुए कहता है कि अब तुम आँसू बहा कर मत दिखाओ और न ही किसी के सामने हाथ फैलाओ बल्कि ऐसी गर्जना करो कि जिस से पृथ्वी काँप उठे। अतः हे मनुष्य ! तुम मानव बनो, ज़रा मानव बनकर देखो।

विशेष:

  1. मनुष्य को किसी के सम्मुख हाथ नहीं फैलाना चाहिए।
  2. भाषा सरल भावपूर्ण हैं।

3. उफ़ हाय कर देना कहीं
शोभा तुम्हें देता नहीं
इन आँसुओं से सींच कर दो
विश्व का कण-कण हरा
मानव बनो, मानव ज़रा।

कठिन शब्दों के अर्थ:
उफ़ हाय करना = कष्ट में कराह उठना।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा रचित कविता ‘मानव बनो ज़रा’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने मनुष्य का मानवतावाद का संदेश दिया है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि कष्ट में कराहना-हाय तौबा करना तुम्हें शोभा नहीं देता बल्कि तुम्हें चाहिए कि अपने इन आँसुओं से सींच कर विश्व के कण-कण को हरा कर दो अर्थात् धरती का कण-कण अपनी संवेदना से भर दो। अत: हे मनुष्य ! तुम मानव बनो और ज़रा मानव बन कर देखो।

विशेष:

  1. मनुष्य को दुःख में धैर्य धारण करना चाहिए।
  2. भाषा सरल तथा भावपूर्ण है। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 10 शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

4. अब हाथ मत अपने मलो
जलना अगर ऐसे जलो
अपने हृदय की भस्म से
कर दो धरा को उर्वरा
मानव बनो, मानव ज़रा।

कठिन शब्दों के अर्थ:
उर्वरा = उपजाऊ। हाथ मलना = पछताना।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० शिवमंगल सिंह सुमन द्वारा रचित कविता ‘मानव बनो ज़रा’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने मनुष्य का मानवतावाद को संदेश दिया है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि अब पछताने से कोई लाभ न होगा। तुम्हें यदि जलना ही है तो अपने हृदय की भस्म से धरती को उपजाऊ बना दो अर्थात् धरती के कल्याण के लिए जलो जिस से मानवता तुम पर गर्व कर सके। अतः हे मनुष्य ! तुम मानव बनो और ज़रा मानव बनकर तो देखो।

विशेष:

  1. मनुष्य को लोककल्याण करने की प्रेरणा दे रहा है।
  2. भाषा सरल मुहावरेदार है। उद्बोधनात्मक स्वर है।

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ Summary

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जीवन परिचय

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी का जीवन परिचय दीजिए।

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के झगरपुर गाँव में 16 अगस्त, सन् 1916 ई० को हुआ था। आप की आरम्भिक शिक्षा रीवां और ग्वालियर में हुई। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से आपने हिन्दी विषय में एम० ए० और डी० लिट० की उपाधियां प्राप्त की। इन्होंने हाई स्कूल के अध्यापक पद से लेकर विश्वविद्यालय के उप-कुलपति पद पर कार्य किया। सन् 1956-61 तक आपने नेपाल में भारत सरकार के सांस्कृतिक प्रतिनिधि के तौर पर कार्य किया। आपको ‘विश्वास बढ़ता ही गया’ काव्य संग्रह पर देव पुरस्कार, ‘पर आँखें नहीं भरीं’ पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नवीन पुरस्कार, ‘मिट्टी की बारात’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, तथा सोवियतलैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इनकी अन्य रचनाएँ हिल्लोक, प्रणय सृजन, जीवन के गान हैं।

शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ कविताओं का सार

चलना हमारा काम है कविता ने मनुष्य को सांसारिक जीवन में आने वाले सुख-दुःखों को समभाव से ग्रहण करते हुए निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी है क्योंकि कठिनाइयों का सामना करना ही जीवन है। कुछ साथी मिलेंगे, कुछ बिछड़ेंगे-परन्तु उत्साह और हिम्मत से आगे बढ़ते रहना चाहिए।

‘मानव बनो, मानव जरा’ कविता में कवि ने मनुष्य को आंसू बहाने, पराश्रित होने घबरा जाने के स्थान पर आत्मनिर्भर बनने का संदेश दिया है तथा संसार को संवेदनापूर्ण बनाकर लोककल्याण का मार्ग अपनाने पर बल दिया है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 9 सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 9 सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 9 सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

Hindi Guide for Class 12 PSEB सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
‘साँप’ कविता का उद्देश्य स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता आधुनिक नागरिक सभ्यता पर एक तीखा व्यंग्य है। कवि के अनुसार आज का सभ्य नगर निवासी पूरी तरह आत्म केन्द्रित हो चुका है। स्वार्थपरता उस पर इस सीमा तक हावी हो चुकी है कि उसकी सहज मानवीयता पूरी तरह लुप्त हो गई है। यही नहीं उसे दूसरों को पीड़ित करने और यातना देने में विशेष सुख प्राप्त होने लगा है।

प्रश्न 2.
‘साँप’ कविता तथाकथित सभ्य व नगर समाज पर एक करारी चोट है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं ?
उत्तर:
हम कवि से पूर्णतः सहमत हैं क्योंकि नगर में रहने वाला तथाकथित सभ्य समाज आज इतना स्वार्थी और आत्म केन्द्रित हो गया है कि उसे किसी दुःख दर्द की परवाह ही नहीं। भौतिकवाद और नकली चेहरे का मुखौटा ओढ़े हुए वह भीतर से इतना विषैला हो गया है जितना जंगल में रहने वाला साँप वह दूसरों को उसमें से चोट पहुँचाने में जरा भी नहीं हिचकता।

प्रश्न 3.
‘जो पुल बनाएँगे’ कविता में कवि ने प्राचीन प्रतीकों के माध्यम से आज के युग सत्य को प्रकट किया है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
कवि ने प्राचीन प्रतीकों नल-नील, श्रीराम और रावण के प्रतीकों द्वारा आज के इस सत्य का उद्घाटन किया है कि पुल बनाने वाले मजदूरों का नाम नहीं होता, नाम होता है इंजीनियर का। लड़ती सेना है नाम सरदार का होता है। वास्तविक निर्माता इतिहास के पन्नों में मिट कर रह जाता है। इतिहास में उसका कोई उल्लेख नहीं होता। नींव की ईंट की भूमिका को नज़रअंदाज कर दिया जाता है और उस नींव पर खड़े भवन को याद किया जाता है। लोग ताजमहल को याद करते हैं उसे बनाने वाले मजदूरों, कारीगरों को नहीं, बस यही कहते हैं कि इसे शाहजहाँ ने बनवाया है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 9 सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

प्रश्न 4.
‘साँप’ कविता का केन्द्रीय भाव लिखें।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में आधुनिक सभ्यता से ध्वस्त होते हुए मानव मूल्यों पर खेद व्यक्त किया गया है। आधुनिक सभ्यता में व्यक्ति स्वार्थी हो गया है जिसके कारण वह जंगली साँप की तरह एक-दूसरे को काटने और निगल जाने पर उतारू हो गया है। कवि के अनुसार इस प्रवृत्ति का आधार वर्तमान पूँजी व्यवस्था है और शोषण उसे सुरक्षित रखता है।

प्रश्न 5.
‘जो पुल बनाएँगे’ कविता का भाव अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में इतिहास के एक सत्य का उद्घाटन किया है कि इतिहास का वास्तविक निर्माता अनाम ही रह जाता है। नींव की ईंट की भूमिका को इतिहास नज़रअन्दाज कर देता है। ‘लड़े फौज नाम हो सरदार का’ वाली बात हो जाती

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 6.
साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं……विष कहाँ पाया ?”
उत्तर:
कवि साँप को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि तुम तो जंगली हो अर्थात् जंगलों में रहने वाले प्राणी हो अतः तुम अभी तक अपने को सभ्य नहीं कह सकते क्योंकि तुम्हें नगरों में बसना नहीं आया और नगरों में बसने वाले ही अपने आप को सभ्य कहलाते हैं। कवि के कहने का तात्पर्य यह है आधुनिक सभ्यता और संस्कृति के केन्द्र नगर में साँप पूरी तरह सभ्य नहीं हो सका अर्थात् साँप ने अभी तक नागरिक सभ्यता को स्वीकार नहीं किया। .. कवि साँप से पूछता है तुम सभ्य भी नहीं हुए, नगरों में बसना भी तुम्हें नहीं आया। फिर तुमने विष कहाँ से पाया है और कहाँ से दूसरों को काटने की कला सीखी ? क्योंकि ये गुण तो सभ्य कहलाने वाले शहरियों में हैं। तात्पर्य यह है कि नागरिक सभ्यता को स्वीकार किये बिना उसने कैसे शहरी जीवन की पूंजीवादी शोषण की प्रवृत्ति को पहचान लिया।

प्रश्न 7.
जो पुल बनाएँगे……..बन्दर कहलाएँगे।
उत्तर:
कवि कहते हैं कि जो लोग पुल बनाएँगे वे अवश्य ही पीछे रह जाएँगे। सेनाएँ उस पुल से पार हो जाएँगी और रावण मारे जाएँगे तथा श्रीराम विजयी होंगे। परन्तु पुल का निर्माण करने वाले नल और नील इतिहास में बन्दर ही कहलाएँगे। कवि का संकेत रामेश्वरम् में समुद्र पर बनाए गए पुल की ओर है जिसको पार कर श्रीराम की सेना ने रावण पर विजय प्राप्त की। किन्तु इतिहास में पुल निर्माता अनाम ही रह गए।

PSEB 12th Class Hindi Guide सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अज्ञेय जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
7 मार्च, सन् 1911 ई० को बिहार के जिला देवरिया के ‘कसया’ में।

प्रश्न 2.
अज्ञेय जी का देहावसान कब हुआ था?
उत्तर:
4 अप्रैल, सन् 1987 में।

प्रश्न 3.
अज्ञेय का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
सच्चिदानन्द हीरानंन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 9 सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

प्रश्न 4.
अज्ञेय के द्वारा रचित चार रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
कितनी नावों में कितनी बार, हरी घास पर क्षणभर, बावरा अहेरी, पूर्वा।

प्रश्न 5.
अज्ञेय के दो उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर:
नदी के द्वीप, शेखर एक जीवनी।

प्रश्न 6.
‘साँप’ कविता कैसी है?
उत्तर:
प्रयोगवादी-छोटी कविता।

प्रश्न 7.
‘साँप’ कविता की दो विशेषताएं लिखिए।
उत्तर:
प्रतीकात्मक भाषा, व्यंग्यात्मक शैली।

प्रश्न 8.
कवि ने साँप के प्रतीक से क्या व्यक्त करने की कोशिश की है?
उत्तर:
आधुनिक सभ्यता से ध्वस्त होते हुए मानव-मूल्यों पर खेद की अभिव्यक्ति।

प्रश्न 9.
कवि ने व्यंग्य से किसे पहचानने की तरफ संकेत किया है?
उत्तर:
कवि ने शहरी जीवन की पूँजीवादी शोषण प्रवृत्ति को पहचानने की तरफ संकेत किया है।

प्रश्न 10.
अपने आप को सभ्य कौन कहलाना चाहता है?
उत्तर:
नगरवासी।

प्रश्न 11.
पूर्ण रूप से आत्मकेंद्रित कौन हो चुके हैं ?
उत्तर:
स्वार्थ भावों से भरे हुए नगरवासी।

प्रश्न 12.
कवि ने ‘साँप’ कविता में किस शैली का प्रयोग किया है?
उत्तर:
व्यंग्यात्मक शैली।

प्रश्न 13.
‘जो पुल बनायेंगे’ के रचयिता कौन हैं?
उत्तर:
अज्ञेय जी।

प्रश्न 14.
कवि ने ‘जो पुल बनायेंगे’ कविता में किन के प्रति अपने हृदय की पीड़ा को व्यक्त किया है?
उत्तर:
मज़दूरों और शोषितों के प्रति।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 15.
तब कैसे सीखा डसना…………
उत्तर:
विष कहां पाया?

प्रश्न 16.
सेनाएं हो जाएंगी पार………….
उत्तर:
मारे जायेंगे रावन।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 9 सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

प्रश्न 17.
जो निर्माता रहे………….
उत्तर:
इतिहास में बंदर कहलायेंगे।]

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 18.
साँप ने डसना और विष प्राप्त करना सीख लिया है।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 19.
पुल बनाने वाले अवश्य ही पीछे रह जाएंगे।
उत्तर:
हाँ।

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए प्रश्न

प्रश्न 1.
साँप कविता के कवि का नाम लिखें।
उत्तर:
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

प्रश्न 2.
कवि अज्ञेय का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर:
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. अज्ञेय को ‘कितनी नावों में कितनी बार’ कविता पर पुरस्कार मिला ?
(क) ज्ञानपीठ
(ख) साहित्य अकादमी
(ग) पद्मश्री
(घ) पद्मभूषण।
उत्तर:
(क) ज्ञानपीठ

2. अज्ञेय किस काल के कवि माने जाते हैं ?
(क) प्रयोगवाद के
(ख) प्रगतिवाद के
(ग) छायावाद के
(घ) निराशावाद के।
उत्तर:
(क) प्रयोगवाद के

3. ‘सांप’ किस भाषा पर आधारित कविता है ?
(क) आशावाद
(ख) निराशावाद
(ग) व्यंग्य
(घ) हास्य।
उत्तर:
(ग) व्यंग्य

4. अज्ञेय को किसका प्रवर्तक कवि माना जाता है ?
(क) प्रगतिवाद का
(ख) प्रयोगवाद का
(ग) तार सप्तक का
(घ) छायावाद का।
उत्तर:
(ग) तार सप्तक का

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 9 सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

5. ‘नदी के द्वीप’ किस विधा की रचना है ?
(क) काव्य
(ख) गद्य
(ग) उपन्यास
(घ) कहानी।
उत्तर:
(ग) उपन्यास

सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ सप्रसंग व्याख्या

साँप

साँप !
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना
भी तुम्हें नहीं आया
एक बात पूछू-(उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डसना
विष कहाँ पाया?

प्रसंग:
‘साँप’ कविता प्रयोगवादी कविता के प्रवर्तक अज्ञेय जी की एक छोटी कविता है जो उनके काव्य संग्रह ‘इन्द्र धनुष रौंदे हुए’ में संकलित है। इस कविता में अज्ञेय जी ने आधुनिक सभ्यता से ध्वस्त होते हुए मानव मूल्यों पर खेद व्यक्त किया है। शहरी जीवन में आधुनिकता की विकृति सभ्यता के नाम पर व्यक्ति को अकेला छोड़ती हुई, पछाड़ती हुई तेजी से फैल रही है। आज का समाज भी उसी को नवीन संस्कृति मान कर प्राचीन संस्कारों, मूल्यों और आदर्शों को नकार रहा है।
साँप का प्रतीक लेकर नये व्यक्ति की व्याख्या में अज्ञेय जी ने आधुनिक नागरिक सभ्यता की प्रवृत्ति को स्पष्ट किया है जिसका आधार पूँजीवादी व्यवस्था है और शोषण उसे सुरक्षित रखने का आधार।

व्याख्या:
कवि साँप को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि तुम तो जंगली हो अर्थात् जंगलों में रहने वाले प्राणी हो अतः तुम अभी तक अपने को सभ्य नहीं कह सकते क्योंकि तुम्हें नगरों में बसना नहीं आया और नगरों में बसने वाले ही अपने आप को सभ्य कहलाते हैं। कवि के कहने का तात्पर्य यह है आधुनिक सभ्यता और संस्कृति के केन्द्र नगर में साँप पूरी तरह सभ्य नहीं हो सका अर्थात् साँप ने अभी तक नागरिक सभ्यता को स्वीकार नहीं किया। .. कवि साँप से पूछता है तुम सभ्य भी नहीं हुए, नगरों में बसना भी तुम्हें नहीं आया। फिर तुमने विष कहाँ से पाया है और कहाँ से दूसरों को काटने की कला सीखी ? क्योंकि ये गुण तो सभ्य कहलाने वाले शहरियों में हैं। तात्पर्य यह है कि नागरिक सभ्यता को स्वीकार किये बिना उसने कैसे शहरी जीवन की पूंजीवादी शोषण की प्रवृत्ति को पहचान लिया।

विशेष:

  1. कवि के कहने का भाव यह है कि अपने आप को सभ्य कहलाने वाला नगर निवासी पूरी तरह आत्म केन्द्रित हो चुका है। स्वार्थपरता उस पर इस सीमा तक हावी हो गयी है कि उसकी सहज मानवीयता पूर्ण रूप से लुप्त हो गई है। यही नहीं उसे तो दूसरों को पीड़ित करने और यातना देने में विशेष सुख प्राप्त होता है। इस तरह कवि ने आधुनिक सभ्यता के ध्वस्त होते हुए मानव मूल्यों पर खेद व्यक्त किया है।
  2. भाषा प्रतीकात्मक तथा भावपूर्ण है। शैली व्यंग्यात्मक है।

जो पुल बनायेंगे

जो पुल बनायेंगे
वे अनिवार्यतः
पीछे रह जायेंगे।
सेनाएं हो जायेंगी पार
मारे जायेंगे रावण
जयी होंगे राम,
जो निर्माता रहे,
इतिहास में
बन्दर कहलायेंगे।

कठिन शब्दों के अर्थ:
अनिवार्यतः = अवश्य ही, यकीनन। जयी = विजेता। निर्माता = बनाने वाले।

प्रसंग:
‘जो पुल बनायेंगे’ कविता प्रयोगवादी कवि अज्ञेय जी के काव्य संग्रह ‘पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ’ में संकलित है। प्रस्तुत कविता में कवि ने इतिहास के निर्माता अर्थात् नींव की ईंट के अनाम रह जाने की त्रासदी का उल्लेख किया है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि जो लोग पुल बनाएँगे वे अवश्य ही पीछे रह जाएँगे। सेनाएँ उस पुल से पार हो जाएँगी और रावण मारे जाएँगे तथा श्रीराम विजयी होंगे। परन्तु पुल का निर्माण करने वाले नल और नील इतिहास में बन्दर ही कहलाएँगे। कवि का संकेत रामेश्वरम् में समुद्र पर बनाए गए पुल की ओर है जिसको पार कर श्रीराम की सेना ने रावण पर विजय प्राप्त की। किन्तु इतिहास में पुल निर्माता अनाम ही रह गए।

विशेष:

  1. आधुनिक युग की भी यही त्रासदी है कि नींव की ईंट अर्थात् इतिहास निर्माता अनाम ही रह जाता है। आधुनिक युग में पुल बनाने वाले मजदूरों का कहीं नाम नहीं होता, नाम होता है तो इंजीनियर का।
  2. भाषा प्रतीकात्मक तथा भावपूर्ण है।

सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ Summary

सच्चिदानन्द हीरानन्द, वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जीवन परिचय

‘अज्ञेय’ जी का जीवन परिचय दीजिए।

करतारपुर के भणोत सारस्वत ब्राह्मण परिवार से सम्बन्ध रखने वाले सच्चिदानंद का जन्म 7 मार्च, सन् 1911 ई० को बिहार के जिला देवरिया के ‘कसया’ नामक स्थान पर हुआ। वहाँ इनके पिता हीरानन्द शास्त्री पुरातत्व विभाग में काम करते थे। पिता के साथ इन्होंने अनेक प्रदेशों का भ्रमण किया। इन्होंने सन् 1925 ई० में पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिक पास करके यहीं से सन् 1929 में बी० एससी० की परीक्षा पास की। एम० ए० अंग्रेज़ी में दाखिला लिया किन्तु स्वतन्त्रता युद्ध में कूद पड़ने के कारण पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और क्रान्तिकारी साथियों के साथ पकड़े गए।

इस अवधि में ये चार वर्ष तक जेल में भी रहे और यहीं से आपने अपना साहित्यिक जीवन आरम्भ किया। अपने जीवन में आपने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया और अनेक नौकरियाँ की और छोड़ी तथा देश-विदेश की कई यात्राएँ कीं।

इन्हें इनकी काव्यकृति ‘आंगन के पार. द्वार’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, ‘कितनी नावों में कितनी बार’ भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा इंटरनेशनल पोएट्री एवार्ड से सम्मानित किया गया था। 4 अप्रैल, सन् 1987 को अज्ञेय जी का निधन हो गया। इनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ, हरी घास पर क्षणभर, बाबरा अहेरी, पूर्वा इन्द्रधनुष रौंदे हुए तारसप्तक हैं। शेखर एक जीवनी तथा नदी के द्वीप उनके प्रमुख उपन्यास हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 8 हरिवंशराय बच्चन

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 8 हरिवंशराय बच्चन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 8 हरिवंशराय बच्चन

Hindi Guide for Class 12 PSEB हरिवंशराय बच्चन Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
‘पौधों की पीढ़ियाँ’ में छोटे-छोटे सुशील और विनम्र पौधों का क्या कहना है ?
उत्तर:
बड़े बरगद के पेड़ की छत्र-छाया में रहने वाले छोटे-छोटे पौधे अपने को किस्मत वाला मानते हैं जो उन्हें बड़े पेड़ का संरक्षण मिला है। उन्हें किसी प्रकार की कोई चिन्ता नहीं है क्योंकि गर्मी, सर्दी या बरसात की सब मुसीबतें बरगद का पेड़ अपने ऊपर झेल लेता है। उसी के आसरे हम दिन काट रहे हैं। हम निश्चित हैं और सुखी हैं।

प्रश्न 2.
‘बरगद का पेड़’ किसका प्रतीक है ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
बरगद का पेड़ बड़े-बुजुर्गों का प्रतीक है जो अपने से छोटों को, अपने परिवार को संरक्षण प्रदान करते हैं तथा उनकी मुसीबतें अपने ऊपर झेल लेते हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 8 हरिवंशराय बच्चन

प्रश्न 3.
‘पौधों की पीढ़ियाँ’ युग सत्य को उद्भासित करती हैं, स्पष्ट करें।
उत्तर:
नई और पुरानी पीढ़ी में युगों से विचार भेद रहा है किंतु वर्तमान युग का सत्य यह है कि नई पीढ़ी ने विद्रोह दर्शाने के साथ-साथ पुरानी पीढ़ी के अस्तित्व को ही नकारना शुरू कर दिया है। उसे पुरानी पीढ़ी का अस्तित्व असहय लगने लगा है। इसी कारण वह पुरानी पीढ़ी को समूल नष्ट करने पर तुल गई है। युग की इस भयावह स्थिति का यथार्थ चित्र कवि ने प्रस्तुत कविता में चित्रित किया है।

प्रश्न 4.
‘मधु पात्र टूटने’ तथा ‘मंदिर के ढहने’ के द्वारा कवि क्या कहना चाहता है ?
उत्तर:
‘मधुपात्र टूटने’ के द्वारा कवि कहना चाहता है कि यदि किसी कारण से तुम्हारी कोई बहुमूल्य वस्तु खो जाती है तो उस को लेकर दु:खी होने की बजाए जो कुछ शेष बचा है उसी को काम में लाते हुए नए सिरे से निर्माण करना चाहिए। नए संसार की रचना करनी चाहिए। यही बात कवि ने मंदिर के ढहने के द्वारा कही है कि यदि तुम्हारी कल्पना, तुम्हारी भावनाओं, तुम्हारे सपनों से बना हुआ मंदिर ढह जाता है तो निराश न होकर शेष बचे ईंट, पत्थर और कंकर एकत्र कर एक नए संसार, नये मंदिर का निर्माण करना चाहिए।

प्रश्न 5.
‘अंधेरे का दीपक’ कविता का सार लिखो।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता बच्चन जी का एक आशावादी गीत है। कवि मनुष्य को यह सन्देश देना चाहता है कि कल्पना के असफल हो जाने पर, भावनाओं और स्वप्नों के टूट जाने पर तुम्हें निराश नहीं होना चाहिए बल्कि जो कुछ भी तुम्हारे पास बचा है उसे ही संजोकर नवनिर्माण करना चाहिए। रात भले ही अन्धेरी है पर दीपक जलाकर उस अन्धकार को दूर करने से तुम्हें किस ने रोका है।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 6.
कल्पना के हाथ से कमनीय …. था ।
उत्तर:
कवि कहते हैं कि माना कि रात अँधेरी है परन्तु इस अँधेरी रात में प्रकाश फैलाने के लिए दीपक जलाने से तुम्हें किस ने रोका है? मान लो कि तुम ने कल्पना में जिस सुंदर महल का निर्माण किया था और अपनी भावनाओं से जो तंबू तान दिए थे जिन्हें तुमने अपने स्वप्नों से अपनी पसंद के अनुसार सजाया था, और जो स्वर्ग में भी कठिनाई से प्राप्त अर्थात् दुर्लभ रंगों से लिप्त था। यदि वह महल, ढह जाए अर्थात् तुम्हारी कल्पना साकार नहीं होती, तुम्हारे सपने अधूरे रह जाते हैं, तो ढहे हुए उस महल के ईंट, पत्थर और कंकड़ों को जोड़ कर एक शांतिदायक कुटिया बनाना भी कब मना है ? माना कि रात अँधेरी है और अंधकार को दूर करने के लिए दीपक जलाने से तुम्हें कौन रोकता है ?

प्रश्न 7.
नहीं वक्त का जुल्म हमेशा ….. इसे समूचा।
उत्तर:
कवि वर्तमान पीढ़ी द्वारा बड़ों को समूल नष्ट करने की बात का उल्लेख करता हुआ कहता है कि हम समय के अत्याचार को सदा इसी प्रकार सहन नहीं करते जाएँगे। हम तो काँटों की आरी और कुल्हाड़ी तैयार करेंगे। फिर आप जब यहाँ आएँगे तो बरगद की डाली-डाली कटी हुई पाएँगे और यह बरगद का पेड़ जो अपने आपको बड़ा समझता है डालियों और पत्तों से रहित एक सूखे पेड़ की तरह नंगा बूचा रह जाएगा। हम इसे सारे का सारा निगल जाएँगे।

PSEB 12th Class Hindi Guide हरिवंशराय बच्चन Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
हरिवंशराय बच्चन’ का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
27 नवंबर, सन् 1907 को इलाहाबाद में।

प्रश्न 2.
बच्चन को साहित्य अकादमी पुरस्कार किस रचना पर प्राप्त हुआ था?
उत्तर:
‘दो चट्टानों’ पर।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 8 हरिवंशराय बच्चन

प्रश्न 3.
हरिवंशराय बच्चन की दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
मधुशाला, मधुबाला, निशा निमंत्रण, दो चट्टानें।

प्रश्न 4.
हरिवंशराय बच्चन’ का देहावसान कब हुआ था ?
उत्तर:
सन् 2002 में।

प्रश्न 5.
‘पौधों की पीढ़ियों’ में कवि ने किस-किस के बीच अंतर दर्शाया है?
उत्तर:
पुरानी और नई पीढ़ी की विचारधारा के बीच।

प्रश्न 6.
‘बरगद का पेड़’ किसका प्रतीक है?
उत्तर:
पुरानी पीढ़ी का।

प्रश्न 7.
नई पीढ़ी के प्रतीक कौन-से हैं ?
उत्तर:
बरगद के नीचे उगे छोटे-छोटे असंतुष्ट और रुष्ट कुछ पौधे।

प्रश्न 8.
कवि के अनुसार नई पीढ़ी किस स्वभाव की है?
उत्तर:
उग्र, विद्रोही और निरादर के भाव से भरी हुई।

प्रश्न 9.
‘अंधेरे का दीपक’ कविता में कवि का स्वर कैसा है?
उत्तर:
आशावादी।

प्रश्न 10.
‘अंधेरी रात’ किसकी प्रतीक है?
उत्तर:
गरीबी, निराशा, पीड़ा, हताशा और दुःख।

प्रश्न 11.
कवि की भाषा में कैसे शब्दों के प्रयोग की अधिकता है?
उत्तर:
तत्सम और तद्भव शब्दों की।

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प्रश्न 12.
कवि ने ‘बरगद का पेड़’ कविता के माध्यम से क्या व्यक्त किया है?
उत्तर:
वर्तमान युग की भयावह स्थिति की यथार्थता।।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 13.
छोटे-छोटे कुछ पौधे…….
उत्तर:
बड़े सुशील-विनम्र।

प्रश्न 14.
हमको बौना बना रखा..
उत्तर:
हम बड़े दुःखी हैं।

प्रश्न 15.
और निगल जाएँगे……
उत्तर:
तन हम इसे-इसे समूचा।

प्रश्न 16.
है अंधेरी रात………………………।
उत्तर:
पर दीवा जलाना कब मना है।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 17.
‘अंधेरे का दीपक’ एक निराशावादी कविता है।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 18.
नई-पुरानी पीढ़ियों में सदा ही भेद रहा है।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 19.
बरगद का पेड़ बड़े-बुजुर्गों का प्रतीक है।
उत्तर:
हाँ।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. भारत सरकार ने बच्चन को किस मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ नियुक्त किया ?
(क) भारत
(ख) स्वदेश
(ग) विदेश
(घ) श्रम
उत्तर:
(ग) विदेश

2. ‘दो चट्टानों’ पर कवि को कौन सा पुरस्कार मिला?
(क) साहित्य
(ख) साहित्य अकादमी
(ग) ज्ञानपीठ
(घ) पद्मभूषण
उत्तर:
(ख) साहित्य अकादमी

3. श्री हरिवंशराय बच्चन ने आत्मकथा कितने भागों में लिखी ?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
उत्तर:
(घ) चार

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4. बच्चन को भारत सरकार ने किस अलंकार से अलंकृत किया ?
(क) पद्मभूषण
(ख) पद्मविभूषण
(ग) पद्मश्री
(घ) ज्ञानपीठ
उत्तर:
(ख) पद्मविभूषण

5. ‘अंधेरे का दीप’ कविता किस प्रकार की कविता है ?
(क) आशावादी
(ख) निराशावादी
(ग) प्रयोगवादी
(घ) प्रगतिवादी
उत्तर:
(क) आशावादी

हरिवंशराय बच्चन सप्रसंग व्याख्या

पौधों की पीढ़ियाँ कविता का सार

‘पौधों की पीढ़ियाँ’ कविता में कवि ने पुरानी और नई पीढ़ी की विचारधारा के अन्तर को स्पष्ट किया है। प्राचीन समय में बुजुर्गों की छत्रछाया को वरदान माना जाता था, जो आज अभिशाप बन गई है। बरगद के पेड़ के नीचे उगे छोटे-छोटे पौधे स्वयं को उस की छत्रछाया में समस्त विपत्तियों से सुरक्षित मानकर सौभाग्यशाली मानते हैं। इसके बाद की पीढ़ी बरगद के नीचे के पौधे स्वयं को बदकिस्मत कहते हैं क्योंकि बरगद की छाया ने उन्हें बौना बनाकर खतरों का सामना नहीं करने दिया। इसके भी बाद की पीढ़ी उदंडतापूर्वक बरगद पर आरोप लगाती है कि उन्हें छोटा रखकर ही वह बड़ा बना हुआ है, यदि वे पहले जन्म लेते तो बरगद के बड़े भाई होते। इस प्रकार वर्तमान पीढ़ी द्वारा अपने अंग्रेजों के प्रति विद्रोह को कवि ने उचित नहीं माना है।

1. देखा, एक बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा है।
उसके नीचे हैं
छोटे-छोटे कुछ पौधे
बड़े सुशील-विनम्र
लगे मुझसे यों कहने,
“हम कितने सौभाग्यवान् हैं।
आसमान से आग बरसे, पानी बरसे,
आँधी टूटे, हमको कोई फिकर नहीं है ।
एक बड़े की वरद छत्र-छाया के नीचे
हम अपने दिन बिता रहे हैं
बड़े सुखी हैं !”

कठिन शब्दों के अर्थ:
सुशील = अच्छे स्वभाव वाले। विनम्र = विनीत, झुके हुए। आगी = आग। वरद = वर देने वाला। छत्र-छाया = आश्रय।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश छायावादोत्तर युग के कवि डॉ० हरिवंशराय बच्चन’ द्वारा लिखित काव्यकृति ‘बहुत दिन बीते’ में संकलित कविता ‘पौधों की पीढ़ियाँ’ में से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में कवि ने नई और पुरानी पीढ़ी की सोच में अन्तर को स्पष्ट किया है। नई पीढ़ी अपने बड़ों की छत्र-छाया में सुख का अनुभव करती थी जबकि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के प्रति विद्रोह करती है, उसके अस्तित्व को नकारते हुए उन्हें समूल नष्ट करने पर उतारू है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि मैंने देखा कि एक बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा है। उसके नीचे कुछ छोटे-छोटे पौधे उगे हैं जो बड़े अच्छे स्वभाव और विनीत भाव के थे। वे छोटे-छोटे पौधे कवि से कहने लगे कि हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि आसमान से चाहे आग बरसे या पानी अर्थात् गर्मी की ऋतु हो या वर्षा ऋतु , आँधी तूफान आए पर हमें कोई चिंता नहीं है। क्योंकि हम एक बड़े बरगद के वृक्ष की छत्र-छाया में रह कर अपने दिन बिता रहे हैं और बड़े सुखी हैं। बरगद उन की रक्षा करता है।

विशेष:

  1. कवि के अनुसार पुराने समय में लोग किसी बड़े के आश्रय में रह कर सुख एवं सुरक्षा का आभास करते थे क्योंकि उनका मानना था कि बड़े उनकी हर हाल में रक्षा करेंगे और सुख सुविधा का ध्यान रखेंगे और रखते हैं। बड़ों के संरक्षण में रह कर वे संतुष्ट थे। छोटे बड़ों के सामने विनम्र और विनीत भाव से खड़े रहते थे तथा उनका आदर करते थे।
  2. भाषा अत्यन्त सरल तथा प्रतीकात्मक है।
  3. अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश तथा मानवीकरण अलंकार हैं।

2. देखा, एक बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा है;
उसके नीचे हैं
छोटे-छोटे कुछ पौधे
असंतुष्ट और रुष्ट।
देखकर मुझको बोले,
“हम भी कितने बदकिस्मत हैं!
जो खतरों का नहीं सामना करते
कैसे वे ऊपर को उठ सकते हैं !”
इसी बड़े की छाया ने तो
हमको बौना बना रखा
हम बड़े दुःखी हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ:
रुष्ट = नाराज़। बौना = छोटे कद का।।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘पौधों की पीढ़ियाँ’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने नई और पुरानी पीढ़ी की बुजुर्गों के प्रति विचारधारा का विश्लेषण किया है।

व्याख्या:
कवि बदले परिवेश में नई पीढ़ी के मनोभावों को व्यक्त करता हुआ कहता है कि मैंने देखा कि बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा है जिसके नीचे कुछ छोटे-छोटे पौधे थे जो असंतुष्ट और नाराज़ थे। कवि कहता है कि मुझे देखकर वे छोटे-छोटे पौधे कहने लगे कि हम कितने बदकिस्मत हैं जो खतरों का सामना नहीं कर सकते क्योंकि हमारे स्थान पर यह बड़ा बरगद का पेड़ सब कुछ सह लेता है। बिना संघर्ष किए तथा खतरों का सामना करके हम कैसे उन्नति कर सकते हैं, क्योंकि इसी बड़े बरगद के पेड़ की छाया ने हमें छोटे कद का बना रखा है। अतः हम बड़े दुःखी हैं क्योंकि हम कुछ नहीं कर सकते।

विशेष:

  1. कवि का भाव यह है कि नई पीढ़ी अपने बुजुर्गों से बड़ी नाराज़ है क्योंकि उन्हें लगता है कि बड़ों का संरक्षण उन की उन्नति एवं विकास में बाधक बन रहा है। बड़ों के संरक्षण में वे संघर्ष करने, खतरों का सामना करने से वंचित रह जाते हैं। कवि ने यहाँ दूसरी पीढ़ी की बात की है जो बड़ों के संरक्षण से असंतुष्ट और नाराज़ है।
  2. भाषा सरल तथा प्रतीकात्मक है।
  3. अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश तथा मानवीकरण अलंकार है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 8 हरिवंशराय बच्चन

3. देखा, एक बड़ा बरगद का पेड़ खड़ा है
उसके नीचे हैं
छोटे-छोटे कुछ पौधे
तने हुए उद्दण्ड।
देखकर मुझको गरजे,
“हमको छोटा रखकर ही
यह बड़ा बना है,
जन्म अगर हम पहले पाते
तो हम इसके अग्रज होते,
हम इसके दादा कहलाते,
इस पर छाते।”

कठिन शब्दों के अर्थ:
तने हुए = अकड़ कर खड़े हुए। उदंड = गुस्ताख, जिसके स्वर में विद्रोह झलकता हो, किसी की न मानने वाला। अग्रज = बड़े। छाते = छाया प्रदान करते।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘पौधों की पीढ़ियाँ’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने नई और पुरानी पीढ़ी की विचारधारा का अन्तर प्रस्तुत किया है।

व्याख्या:
कवि वर्तमान पीढ़ी की अपने बड़ों के प्रति उदंडता का वर्णन करता हुआ कहता है कि मैंने देखा कि बरगद का बड़ा पेड़ खड़ा है, उसके नीचे छोटे-छोटे पौधे कुछ अकड़े हुए विद्रोही स्वभाव के बने हुए हैं । वे कवि को देखकर गरज कर बोले कि यह बरगद का पेड़ हमें छोटा बना कर ही बड़ा बना है। यदि हमारा जन्म भी इससे पहले हुआ होता तो हम इस के बड़े भाई अर्थात् बुजुर्ग या बड़े होते। तब हम इसके दादा कहलाते और इसे अपनी छाया प्रदान करते अर्थात् यह हमारे संरक्षण में रहता।

विशेष:

  1. कवि के अनुसार वर्तमान पीढ़ी अपने बड़ों का आदर करना तो दूर रहा वह उनके प्रति विद्रोह की भावना रखती है। उसे बड़ों का होना असह्य लगने लगा है।
  2. भाषा सरल किन्तु प्रतीकात्मक है।
  3. अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश तथा मानवीकरण अलंकार है।

4. नहीं वक्त का जुल्म हमेशा
हम यों ही सहते जाएँगे।
हम काँटो की
आरी और कुल्हाड़ी अब तैयार करेंगे,
फिर जब आप यहाँ आएँगे,
बरगद की डाली-डाली कटती पाएँगे।
ठूठ-मात्र यह रह जाएगा
नंगा-बूचा,
और निगल जाएँगे तन हम इसे समूचा।”

कठिन शब्दों के अर्थ:
जुल्म = अत्याचार । हमेशा = सदा। ढूंठ मात्र = डालियों और पत्तों से रहित सूखा पेड़। समूचा = सारा।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंशराय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘पौधों की पीढ़ियाँ’ से ली गई हैं, जिसमें नई और पुरानी पीढ़ी के विचारों का अन्तर स्पष्ट किया गया है।

व्याख्या:
कवि वर्तमान पीढ़ी द्वारा बड़ों को समूल नष्ट करने की बात का उल्लेख करता हुआ कहता है कि हम समय के अत्याचार को सदा इसी प्रकार सहन नहीं करते जाएँगे। हम तो काँटों की आरी और कुल्हाड़ी तैयार करेंगे। फिर आप जब यहाँ आएँगे तो बरगद की डाली-डाली कटी हुई पाएँगे और यह बरगद का पेड़ जो अपने आपको बड़ा समझता है डालियों और पत्तों से रहित एक सूखे पेड़ की तरह नंगा बूचा रह जाएगा। हम इसे सारे का सारा निगल जाएँगे।

विशेष:

  1. कवि के अनुसार वर्तमान पीढ़ी अपने बड़ों का निरादर करने पर ही नहीं तुली है बल्कि वह उन्हें समूल नष्ट करना भी चाहती है। इसीलिए वह अपनी पूर्व पीढी के प्रति विद्रोह की भावना रखती है।
  2. भाषा सरल, भावपूर्ण तथा प्रतीकात्मक है।
  3. मानवीकरण, अनुप्रास और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

अन्धेरे का दीपक कविता का सार

‘अन्धेरे का दीपक’ कविता में कवि का स्वर आशावादी है। वह कहता है कि यदि जीवन में तुमने कोई मधुर कल्पना की है और एक अत्यन्त सुन्दर महल बना लिया है, यदि वह टूट भी जाए तो निराश होने के स्थान पर उसी महल के ईंट, पत्थर जोड़कर नई झोंपड़ी तो बना ही सकते हो। यदि तुम्हारा बनाया सुन्दर मदिरापान का पात्र टूट जाए तो तुम अपनी ओर से निर्मल झरने का जल तो पी ही सकते हो। अन्धेरी रात में प्रकाश लाने के लिए दिया जलाने से तुम्हें कौन रोक सकता है ? इसलिए असफलताओं से निराश होने के स्थान पर फिर से प्रयास करना चाहिए। सफलता अवश्य ही मिलेगी।

1. है अँधेरी रात, पर दीवा जलाना कब मना है ?
कल्पना के हाथ से कमनीय
जो मन्दिर बना था,
भावना के हाथ ने जिसमें
वितानों को तना था,
स्वप्न ने अपने करों से
था जिसे रुचि से सँवारा
स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों
से, रसों से जो सना था।
ढह गया वह तो जुटाकर
ईंट, पत्थर कंकड़ों को।
एक अपनी शांति की
कुटिया बनाना कब मना है?
है अँधेरी रात, पर दीवा जलाना कब मना है ?

कठिन शब्दों के अर्थ:
कमनीय = कोमल, सुंदर। वितान = तंबू, खेमा। करों से = हाथों से। रुचि = पसंद। दुष्प्राप्य = कठिनाई से प्राप्त होने वाला। सना = लिप्त।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश छायावादोत्तर युग के कवि डॉ० हरिवंश राय बच्चन’ जी की काव्यकृति ‘सतरंगिनी’ में संकलित कविता ‘अंधेरे का दीपक’ में से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में कवि ने यह संदेश दिया है कि दुःख और अवसादपूर्ण क्षणों में भी मनुष्य को आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि माना कि रात अँधेरी है परन्तु इस अँधेरी रात में प्रकाश फैलाने के लिए दीपक जलाने से तुम्हें किस ने रोका है? मान लो कि तुम ने कल्पना में जिस सुंदर महल का निर्माण किया था और अपनी भावनाओं से जो तंबू तान दिए थे जिन्हें तुमने अपने स्वप्नों से अपनी पसंद के अनुसार सजाया था, और जो स्वर्ग में भी कठिनाई से प्राप्त अर्थात् दुर्लभ रंगों से लिप्त था। यदि वह महल, ढह जाए अर्थात् तुम्हारी कल्पना साकार नहीं होती, तुम्हारे सपने अधूरे रह जाते हैं, तो ढहे हुए उस महल के ईंट, पत्थर और कंकड़ों को जोड़ कर एक शांतिदायक कुटिया बनाना भी कब मना है ? माना कि रात अँधेरी है और अंधकार को दूर करने के लिए दीपक जलाने से तुम्हें कौन रोकता है ?

विशेष:

  1. कवि के अनुसार सुंदर सपनों के महल के ढह जाने पर निराश और हताश होकर नहीं बैठ जाना चाहिए। असफलता से निराश न होकर नव निर्माण का पुनः संकल्प करके जीवन को नए ढंग से जीना चाहिए।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, सरस तथा भावपूर्ण है।
  3. प्रश्न अलंकार तथा उद्बोधनात्मक स्वर है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 8 हरिवंशराय बच्चन

2. बादलों के अश्रु में धोया
गया नभ-नील नीलम
का बनाया था गया मधु
पात्र मनमोहक, मनोरम,
प्रथम ऊषा की किरण को
लालिमा-सी लाल मदिरा
थी उसी में चमचमाती
नव घनों में चंचला, सम,
वह अगर टूटा मिलाकर
हाथ की दोनों हथेली,
एक निर्मल स्रोत से
तृष्णा बुझाना कब मना है ?
है अंधेरी रात, पर दीवा जलाना कब मना है ?

कठिन शब्दों के अर्थ:
अश्रु = आँसू। मधुपात्र = शराब पीने का प्याला। मनमोहक = मन को मोहने वाला। मनोरम = सुंदर। मदिरा = शराब। चंचला = बिजली। निर्मल= साफ, स्वच्छ । स्रोत = चश्मा, धारा। तृष्णा = प्यास।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘अन्धेरे का दीपक’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने मनुष्य को कभी भी निराश नहीं होने का सन्देश दिया है।

व्याख्या:
कवि निराशा या असफलता मिलने पर भी निराश न होकर उत्साहित होकर फिर से नवनिर्माण की प्रेरणा देता हुआ कहता है कि यदि तुम ने बादलों के आँसुओं से धुले नीले आकाश जैसे बहुमूल्य नीलम पत्थर से बना शराब पीने का प्याला बनाया था, जो अत्यन्त मन को लुभाने वाला और सुंदर बन पड़ा था, उस प्याले में उषा की पहली किरण जैसी लाललाल शराब डाली थी; जो उस प्याले में पड़ी चमचमा रही थी जैसे नए बादलों में बिजली चमकती हो, वह प्याला यदि किसी कारणवश टूट भी जाए तो अपनी दोनों हाथों की हथेलियों की ओक बनाकर किसी साफ चश्मे से अपनी प्यास बुझाने की तो मनाही नहीं है ? माना कि रात अँधेरी है किंतु रात के अंधेरे को दूर करने के लिए दीपक जलाने से तुम्हें किसने रोका

विशेष:

  1. कवि का मानना है कि व्यक्ति को अपनी बहुमूल्य वस्तु के नष्ट होने पर दुःखी होने की बजाए जो कुछ भी पास बचा है उसी के भरोसे जिंदगी जीने का प्रयास करना चाहिए। जो कुछ नष्ट हो गया वह तो वापस नहीं आएगा अतः दुःखी न होकर पूरे उत्साह और लग्न से जीवन जीने के नए रास्ते की खोज करनी चाहिए।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, सरस तथा भावपूर्ण है।
  3. अनुप्रास, उपमा तथा मानवीकरण अलंकार है।

हरिवंशराय बच्चन Summary

हरिवंशराय बच्चन जीवन परिचय

हरिवंश राय बच्चन का जीवन परिचय दीजिए।

श्री हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवम्बर, सन् 1907 ई० को इलाहाबाद में हुआ। इन्होंने यहीं से अंग्रेज़ी में एम०ए० किया तथा यहीं अंग्रेजी साहित्य पढ़ाते रहे। इन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त की थी। इन्हें विदेश मन्त्रालय में हिन्दी-विशेषज्ञ के रूप में भारत सरकार ने नियुक्त किया था। ये राज्य सभा के भी सदस्य रहे थे। इन्हें काव्यकृति ‘दो चट्टानों’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। भारत सरकार ने इन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से अलंकृत किया। सन् 2002 में इनका निधन हो गया था।

बच्चन जी की प्रमुख रचनाएँ मधुशाला, मधुकलश, मधुबाला, मिलन यामिनी, निशा-निमन्त्रण, सतरंगिनी, दो चट्टानें हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 7 सुमित्रानन्दन पंत

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 7 सुमित्रानन्दन पंत Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 7 सुमित्रानन्दन पंत

Hindi Guide for Class 12 PSEB सुमित्रानन्दन पंत Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
‘दो लड़के’ कविता के प्रतिपाद्य को अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता कवि की एक प्रगतिवादी रचना है, जिसमे कवि ने मानवतावादी दृष्टिकोण अभिव्यक्त करते हुए मनुष्य को ही ईश्वर मानते हुए उसे धरती पर ही स्वर्ग बसाने के लिए कहा है, जिससे मनुष्य आपस में प्रेम प्यार से रहते हुए अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति कर सके। कोई भेदभाव न रहे, किसी का शोषण न हो, मानवीयता का प्रचार हो।

प्रश्न 2.
‘दो लड़के’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
दो लड़के’ शीर्षक कविता पंत जी की काव्यकृति ‘युगवाणी’ में संकलित है। प्रस्तुत कविता में कवि ने अपनी मानवतावादी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त किया है। कविता के आरम्भ में कवि ने यथार्थ का चित्रण करते हुए दो निर्धन निम्न जाति के नंग-धडंग किन्तु सुन्दर गठीले शरीर वाले लड़कों का वर्णन किया है बाद में कविं आत्मा की एकान्तिक उपासना को भौतिक शरीर के सामने नगण्य मानता हुआ कहता है कि संसार में रहने का सबसे अधिक अधिकार उसे है जो अधिक दुर्बल है। संसार में रहने के लिए मनुष्य को उपयुक्त साधनों की आवश्यकता है। मनुष्य एक-दूसरे को मानव-सुलभ प्रेमदान देता हुआ धरती पर स्वर्ग स्थापित कर सके।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 7 सुमित्रानन्दन पंत

प्रश्न 3.
‘सुख-दुःख’ में कवि ने सुख और दुःख को क्या-क्या उपमाएँ दी हैं ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
कवि ने सुख और दुःख को आँख-मिचौनी का खेल कहा है। कवि ने सुख और दुःख को उषा और सन्ध्या, मिलन और विरह, आँसू और हँसी तथा चाँद और बादलों से उपमा दी है।

प्रश्न 4.
‘सुख-दुःख’ कविता से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कविता से हमें यह शिक्षा मिलती है कि दुःख या सुख का निरन्तर रहना भी कष्टकारक होता है। अतः हमें सुख-दुःखों को आपस में बाँट लेना चाहिए ताकि जीवन में सन्तुलन बना रह सके।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 5.
सुन्दर लगती नग्न देह ………….. सच्चे।
उत्तर:
कवि उन दो निर्धन लड़कों की दीन-हीन दशा का चित्रण करते हुए कहता है कि उन लड़कों का नंगा शरीर सुन्दर लगता है जो व्यक्ति के मन और आँखों को मोह लेता है। मनुष्यता के नाते व्यक्ति के हृदय में अपनापन भर जाता है। ये पासी के बच्चे भी तो मनुष्य के ही बालक हैं। उनका रोम-रोम मनुष्य के सच्चे साँचे में ढला हुआ है।

प्रश्न 6.
यह साँझ उषा का आँगन …….. जीवन का।
उत्तर:
कवि कहते हैं कि यह संसार सन्ध्या और उषा का आँगन है अर्थात् यहाँ सन्ध्या रूपी दुःख भी है तो उषा रूपी सुख भी है। यहाँ विरह और मिलन का मिलाप होता है अर्थात् संसार में लोग मिलते भी हैं और बिछुड़ते भी हैं। इस तरह वे मिलन के सुख और बिछुड़ने के दुःख को झेलते हैं। मनुष्य के जीवन में हँसी भी है और आँसू भी हैं। उसे सुख-दुःख दोनों ही भोगने पड़ते हैं। यही मानव जीवन है।

PSEB 12th Class Hindi Guide सुमित्रानन्दन पंत Additional Questions and Answers

अति लघुत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सुमित्रानंदन पंत का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
पंत जी का जन्म अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक गांव में 21 मई, सन् 1900 ई० में हुआ था।

प्रश्न 2.
पंत जी को ‘चिदंबरा’ पर कौन-सा पुरस्कार प्राप्त हुआ था?
उत्तर:
भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार।।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 7 सुमित्रानन्दन पंत

प्रश्न 3.
पंत जी को डी० लिट् की उपाधि किस विश्वविद्यालय ने दी थी?
उत्तर:
कलकत्ता विश्वविद्यालय ने।

प्रश्न 4.
पंत जी का देहांत कब हुआ था?
उत्तर:
सन् 1977 ई० में।

प्रश्न 5.
दो निर्धन बालक प्रायः कहां आ जाते थे?
उत्तर:
लेखक के टीले पर बने घर के आंगन में।

प्रश्न 6.
दोनों बालक कवि को प्रतीत होते थे?
उत्तर:
सांवले रंग की मूर्ति की तरह, साँवले और चुस्त।

प्रश्न 7.
दोनों बालक किसकी तरह किलकारियां मारा करते थे?
उत्तर:
बंदर की तरह।

प्रश्न 8.
उन दोनों बच्चों की लगभग आयु कितनी थी?
उत्तर:
छः सात वर्ष।

प्रश्न 9.
कवि ने समाज में रहने वाले सभी लोगों को कैसा माना है?
उत्तर:
भेदभाव से रहित-पूरी तरह से एक समान।

प्रश्न 10.
कवि जीवन में सदा किसकी खेल-मिचौली देखना चाहता था?
उत्तर:
सुख-दुःख की खेल-मिचौली।

प्रश्न 11.
अधिक सुख और दुःख से यह जंग कैसा लगता है?
उत्तर:
पीड़ित।

प्रश्न 12.
कवि ने इस संसार को किसका आँगन माना है?
उत्तर:
सांझ-उषा का आँगन।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 13.
सुंदर लगती नग्न देह,…………
उत्तर:
मोहती नयन मन।

प्रश्न 14.
जग का अधिकारी है वह,……………….।
उत्तर:
जो है दुर्बलतर।।

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प्रश्न 15.
निष्ठुर है जड़ प्रकृति…………………।
उत्तर:
सहज भंगुर जीवित जन।

प्रश्न 16.
मानव का साम्राज्य बने,………
उत्तर:
मानव-हित निश्चय।।

प्रश्न 17.
जग पीड़ित है अति दुःख से,………….
उत्तर:
जग-पीड़ित रे अति-सुख से।

प्रश्न 18.
दुख-सुख की निशा-दिवा में….
उत्तर:
सोता-जगता जग जीवन।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 19.
‘दो लड़के’ एक प्रगतिवादी कविता है।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 20.
दो लड़के पल्लव में संकलित है।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 21.
कवि जीवन में चिर सुख-चिर दुख चाहता था।
उत्तर:
हाँ।

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि पंत का पूरा नाम लिखिए।
उत्तर:
सुमित्रानंदन पंत।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. हिंदी साहित्य का सर्वप्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार किसको मिला ?
(क) सुमित्रानंदन पंत
(ख) निराला
(ग) महादेवी वर्मा
(घ) प्रसाद
उत्तर:
(क) सुमित्रानंदन पंत

2. सुमित्रानंदन पंत को भारत सरकार ने किस सम्मान से अलंकृत किया ?
(क) पद्मविभूषण
(ख) पद्मभूषण
(ग) ज्ञानपीठ
(घ) भारत रत्न।
उत्तर:
(ख) पद्मभूषण

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 7 सुमित्रानन्दन पंत

3. सुमित्रानंदन पंत को किस कृति पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला ?
(क) चिदंबरा
(ख) चितकोबरा
(ग) ऋतंबरा
(घ) ऋतुम्बर
उत्तर:
(क) चिदंबरा

4. कवि ने संसार को किसका आंगन माना है ?
(क) सांझ का
(ख) ऊषा का
(ग) सांझ-ऊषा का
(घ) रात का।
उत्तर:
(ग) सांझ-ऊषा का

5. ‘दो लड़के’ कैसी कविता है ?
(क) प्रगतिवादी
(ख) प्रयोगवादी
(ग) छायावादी
(घ) हालावादी।
उत्तर:
(क) प्रगतिवादी

सुमित्रानन्दन पंत सप्रसंग व्याख्या

दो लड़के कविता का सार

‘दो लड़के’ कविता में कवि ने दो निर्धन नाटे, सांवले, मांसल, नंगे तन, छ:सात साल के लड़कों के फुर्तीलेपन, मामूली-सी वस्तुएं प्राप्त करके भी प्रसन्न हो जाने का वर्णन किया है। उन्हें अपने अभावग्रस्त जीवन में भी आनन्द की अनुभूति होती है, वे इस अभाव से चिन्तित नहीं हैं। कवि के मन में उनके प्रति अपनापन जाग उठता है। वह चाहता है कि ये बालक भी मानव की सन्तान हैं। इसलिए मानव-मात्र में कोई भेदभाव न रहे। मानव का कल्याण हो, शोषण न हो। सब परस्पर प्रेमभाव से रहें। सब की इच्छाएं पूर्ण हों तथा धरती पर ही स्वर्ग बन जाए।

1. मेरे आंगन में, टीले पर है मेरा घर,
दो छोटे-से लड़के आ जाते हैं अक्सर,
नंगे-तन, गदबदे, साँवले, सहज छबीले
मिट्टी के मटमैले पुतले -पर फुर्तीले।

कठिन शब्दों के अर्थ:
अक्सर = प्रायः । गदबदे = कोमल, भरे हुए शरीर वाले। सहज = स्वाभाविक रूप से। छबीले = सुन्दर, संजीला। पुतला = मूर्ति। फुर्तीला = चुस्त।।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक युग के प्रसिद्ध छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा लिखित कविता ‘दो लड़के’ में से लिया गया है। यह कविता कवि की काव्यकृति ‘युगवाणी’ में संकलित है। प्रस्तुत कविता में कवि प्रगतिवादी बन कर समाज के दो असहाय एवं पीड़ित बालकों का चित्रण करते हुए अपने मानवतावादी दृष्टिकोण को व्यक्त कर रहे हैं।

व्याख्या:
कवि अपने आँगन में आने वाले दो निर्धन बालकों का चित्रण करते हुए कहता है कि टीले पर बने मेरे घर के आँगन में दो छोटे-से लड़के प्रायः आ जाते हैं। वे शरीर से नंगे होते हैं, किन्तु भरे हुए शरीर वाले, साँवले रंग के स्वाभाविक रूप से सुन्दर दिखते हैं। वे मिट्टी से लथपथ होते हैं उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वे कोई मिट्टी की मूर्ति हो परन्तु हैं बड़े ही चुस्त अर्थात् वे हर काम बड़ी चुस्ती-फुर्ती से करते हैं।

विशेष:

  1. कवि ने अपने आंगन में आकर खेलने वाले दो बालकों का सजीव चित्रण किया है।
  2. भाषा तत्सम, तद्भव, देशज शब्दों से युक्त भावपूर्ण है।
  3. अनुप्रास तथा उत्प्रेक्षा अलंकार है।

2. जल्दी से, टीले के नीचे, उधर उतर कर
वे चुन ले जाते कूड़े से निधियाँ सुन्दर
सिगरेट के खाली डिब्बे, पन्नी चमकीली
फीतों के टुकड़े, तस्वीरें नीली पीली
मासिक-पत्रों के कवरों की, और बन्दर से
किलकारी भरते हैं, खुश हो-हो अन्दर से।
दौड़ पार आँगन के फिर हो जाते ओझल
वे नाटे छ:-सात साल के लड़के मांसल।

कठिन शब्दों के अर्थ:
टीला = छोटी पहाड़ी, ऊँची जगह । निधियाँ = खज़ाने। पन्नी = चमकीला कागज़ जो सिगरेट की डिबिया में होता है! कवर = मुख्य पृष्ठ। किलकारी भरना = खुशी से ऊँची आवाज़ में चीखना। नाटे = छोटे कद के। मांसल = पुष्ट शरीर वाले तगड़े।
प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता ‘दो लड़के’ से लिया गया है। इसमें कवि ने निर्धन वर्ग के दो नंग-धडंग छ:-सात वर्षीय बालकों की अभावों में भी मस्त रहने की दशा का चित्रण करते हुए उनके प्रति मानवीय संवेदना जगाने का प्रयास किया है।

व्याख्या:
अपने घर के आँगन में प्रायः आने वाले दो निर्धन किन्तु सुन्दर लड़कों का वर्णन करता हुआ कवि कहता है कि वे लड़के जल्दी से टीले के नीचे दूसरी तरफ उतर कर कूड़े से अपने लिए खज़ाना समझते हुए कुछ चीजें चुनकर ले जाते थे। जैसे कि सिगरेट के खाली डिब्बे, चमकीली पन्नी, बूटों के फीतों के टुकड़े और मासिक पत्रों के मुख्य पृष्ठों की नीली-पीली रंगीन तस्वीरें। इन चीजों को पाकर वे अन्दर से खुश हो-होकर बन्दरों के समान किलकारियाँ भरते हैं और आँगन को दौड़ कर पार कर आँखों से ओझल हो जाते हैं। वे छोटे कद के पुष्ट शरीर वाले छ: सात साल के लड़के

विशेष:

  1. कवि मानता है कि वे निर्धन बालक छोटी-छोटी चीजें पाकर भी प्रसन्न होते हैं। उन्हें अपनी निर्धनता या अभाव भरे जीवन की कोई चिन्ता नहीं है।
  2. भाषा सहज, तद्भव एवं देशज शब्दों से युक्त चित्रात्मक है।
  3. अनुप्रास तथा उपमा अलंकार हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 7 सुमित्रानन्दन पंत

3. सुन्दर लगती नग्न देह, मोहती नयन-मन,
मानव के नाते उर में भरता अपनापन।
मानव के बालक हैं ये पासी के बच्चे,
रोम-रोम मानव, साँचे में ढाले सच्चे।

कठिन शब्दों के अर्थ:
पासी = एक जाति। उर = हृदय।

प्रसंग:
यह काव्यांश सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता ‘दो लड़के’ से उद्धृत है। इसमें कवि ने निर्धन वर्ग के दो नंग-धडंग छ:-सात वर्षीय बालकों की अभावों में भी मस्त रहने की दशा का चित्रण करते हुए उनके प्रति मानवीय संवेदना जगाने का प्रयास किया है।

व्याख्या:
कवि उन दो निर्धन लड़कों की दीन-हीन दशा का चित्रण करते हुए कहता है कि उन लड़कों का नंगा शरीर सुन्दर लगता है जो व्यक्ति के मन और आँखों को मोह लेता है। मनुष्यता के नाते व्यक्ति के हृदय में अपनापन भर जाता है। ये पासी के बच्चे भी तो मनुष्य के ही बालक हैं। उनका रोम-रोम मनुष्य के सच्चे साँचे में ढला हुआ है।

विशेष:

  1. कवि के अनुसार वे दोनों लड़के निम्न और निर्धन जाति के होते हुए भी मानव के बच्चे होने के कारण सुन्दर प्रतीत होते हैं। उन्हें देखकर उसके मन में उनके प्रति अपनापन जागता है। कवि ने इन बालकों की चिन्तामुक्त दशा का वर्णन करते हुए इनके प्रति सद्भाव व्यक्त किया है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान परन्तु सरल तथा भावपूर्ण है।
  3. अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

4. अस्थि-माँस के इन जीवों का ही यह जग घर,
आत्मा का अधिवास न यह, वह सूक्ष्म अनश्वर !
न्योछावर है आत्मा नश्वर रक्त-मॉस पर,
जग का अधिकारी है वह, जो है दुर्बलतर !

कठिन शब्दों के अर्थ:
अस्थि-माँस = हड्डियाँ और माँस। जीव = प्राणी। अधिवास = रहने का स्थान। नश्वर = नाशवान्। दुर्बलतर = अत्यन्त कमज़ोर।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यावतरण सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता ‘दो लड़के’ से अवतरित है। इसमें कवि ने दो निर्धन नंगधडंग बालकों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की है।

व्याख्या:
कवि अपने मानवतावादी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करता हुआ कहता है कि यह संसार हाड़ मांस के प्राणियों का ही घर है। यह संसार आत्मा के रहने की जगह नहीं है क्योंकि आत्मा तो सूक्ष्म और न नाश होने वाली अर्थात् अमर है जबकि संसार की प्रत्येक वस्तु तो स्थूल और अनित्य है। कवि कहता है कि इस न नष्ट होने वाली-अमर आत्मा पर यह नाशवान् रक्त माँस का पुतला मानव न्योछावर है तात्पर्य यह है कि इस नाशवान् हाड़-माँस के पुतले मानव के सामने अनश्वर आत्मा क्षुद्र है। इस नाशवान संसार में रहने का वही अधिकारी है जो अत्यन्त कमज़ोर भी है तात्पर्य यह है कि निर्धन, कमज़ोर लोग भी इस संसार में रहने का अधिकार रखते हैं।

विशेष:

  1. कवि आत्मा की एकान्तिक उपासना को भौतिक शरीर के सामने नगण्य मानता है। कवि के लिए पूर्ण मानव ही ईश्वर है।
  2. भाषा सहज, सरल, देशज-तत्सम शब्दों से युक्त भावपूर्ण है।
  3. अनुप्रास अलंकार तथा चित्रमयता है।

5. वह्नि बाढ़, उल्का, झंझा की भीषण भू पर
कैसे रह सकता है कोमल मनुज कलेवर?
निष्ठुर है जड़ प्रकृति, सहज भंगुर जीवित जन,
मानव को चाहिए यहाँ मनुजोचित साधन !

कठिन शब्दों के अर्थ:
वह्नि = आग। उल्का = तारों का टूट कर धरती पर गिरना। झंझा = तूफान। भीषण = भयानक । कलेवर = शरीर। निष्ठुर = निर्दय, कठोर। जड़ = बेजान। सहज भंगुर = आसानी से या स्वाभाविक रूप से नष्ट होने वाला। मनुजोचित = मनुष्य के लिए उचित। साधन = तरीका।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्य-खंड सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता ‘दो लड़के’ से अवतरित है। इसमें कवि ने दो निर्धन नंगधडंग बालकों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की है।

व्याख्या:
कवि संसार की भीषणता का उल्लेख करता हुआ मनुष्य को जीने के लिए उचित साधन होने की चर्चा करता हुआ कहता है कि इस संसार में आग का डर है बाढ़ का उत्पीड़न है अर्थात् बाढ़ आकर दु:खी करती है। तारों के टूट कर धरती पर गिरने का भय है। यहाँ इस धरती पर भयंकर तूफान आते रहते हैं फिर भला कोमल शरीर वाला मनुष्य इस धरती पर या इस संसार में कैसे रह सकता है। बेजान प्रकृति भी बड़ी निर्दयी है और जीवन सहज ही नाश हो जाने वाला है। अतः इस संसार में रहने के लिए मनुष्य को उचित साधनों की आवश्यकता है।

विशेष:

  1. परोक्ष रूप में कवि प्रकृति द्वारा भी-आग, बाढ़, उल्कापात और तूफान द्वारा ग़रीबों को सताए जाने की बात कह रहा है और समाज से यह आशा करता है कि वह पिछड़ों और ग़रीबों के लिए भी जीने के उचित साधन जुटाए।
  2. तत्सम प्रधान भाषा में उपदेशात्मकता है।
  3. प्रश्न तथा अनुप्रास अलंकार तथा चित्रात्मकता का गुण है।

6. क्यों न एक हों मानव मानव सभी परस्पर
मानवता निर्माण करें जग में लोकोत्तर ?
जीवन का प्रासाद उठे भू पर गौरवमय,
मानव का साम्राज्य बने, मानव-हित निश्चय।

कठिन शब्दों के अर्थ:
परस्पर = आपस में। लोकोत्तर = अलौकिक । प्रासाद = महल। मानव-हित = मनुष्य की भलाई के लिए।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता ‘दो लड़के’ से उद्धृत है। इसमें कवि ने दो निर्धन बालकों के चिन्तामुक्त जीवन का चित्रण करते हुए मानव मात्र के परस्पर मिलजुल कर तथा भेदभाव से रहित समाज बनाकर रहने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि भेदभाव भरे, अमीर-गरीब का भेद रखने वाले इस संसार को बदलने का प्रयत्न करने के लिए कहता है कि क्यों न सभी मनुष्य आपस में मिलकर संसार में एक अलौकिक मानवता का निर्माण करें, जिससे पृथ्वी पर जीवन का गौरवशाली महल खड़ा किया जा सके और मनुष्य की भलाई के लिए मनुष्य का एक साम्राज्य बन जाए।

विशेष:

  1. कवि का तात्पर्य यह है कि इस संसार से अमीर-ग़रीब का भेद मिट जाना चाहिए। यह न हो कि एक तो आनन्द से जीवन व्यतीत करे और दूसरा पेट भर रोटी को भी तरसें, इसलिए हमें इस भेदभाव को मिटा कर समता की भावना युक्त संसार का निर्माण करना चाहिए।
  2. तत्सम प्रधान भाषा में प्रवाह तथा भावों का सुन्दर समन्वय है।
  3. अनुप्रास, प्रश्न तथा रूपक अलंकार है।

7. जीवन की क्षण-धूलि रह सके जहाँ सुरक्षित,
रक्त-माँस की इच्छाएँ जन की हों पूरित।
मनुज प्रेम से जहाँ रह सकें-मानव ईश्वर।
और कौन-सा स्वर्ग चाहिए तुझे धरा पर ?

कठिन शब्दों के अर्थ:
पूरित = पूरी।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यावतरण सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता ‘दो लड़के’ से अवतरित है। इसमें कवि ने दो निर्धन बालकों के चिन्तामुक्त जीवन का चित्रण करते हुए मानव मात्र के परस्पर मिलजुल कर तथा भेदभाव से रहित समाज बनाकर रहने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि धरती को ही स्वर्ग बनाने की कामना करते हुए कहता है कि हमें ऐसे संसार का निर्माण करना होगा जहाँ इस क्षणिक जीवन की मिट्टी सुरक्षित रह सके। प्रत्येक मनुष्य की इच्छाएं पूरी हो सकें। मनुष्य एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक रह सके। हे मनुष्य रूपी ईश्वर ! तुझे धरती पर फिर किस दूसरे स्वर्ग की कामना होगी.? मनुष्य का साम्राज्य ही तुम्हारा स्वर्ग होगा अर्थात् जिस प्रकार स्वर्ग में सभी सुख सुविधाएँ प्राप्त हैं, धरती पर भी वे सब प्राप्त होगी तो धरती स्वर्ग कहलाएगी।

विशेष:

  1. कवि का तात्पर्य यह है कि मनुष्य मनुष्य से प्रेम करके अपनी सभी इच्छाओं को पूरी कर सकता है तथा धरती को स्वर्ग बना सकता है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान तथा भावपूर्ण है।
  3. प्रश्न अलंकार है।

सुख-दुःख कविता का सार

‘सुख-दुःख’ कविता में कवि ने सदा के लिए न सुख चाहा है और न ही दुःख। कवि का मानना है कि सुख-दुःख के मधुर मिलन में ही जीवन की परिपूर्णता है। अत्यधिक सुख अथवा दुःख से लोग परेशान हो जाते हैं। सुख और दुःख का संगम ही उचित है। जैसे रात के बाद दिन अच्छा लगता है, वैसे ही दुःख के बाद सुख में आनन्द आता है। दुःख-सुख तो विरह के बाद मिलन में सुख के समान है। इस कविता में कवि ने सुख-दुःख से सम्बन्धित अपनी दाशनिक मान्यताओं को व्यक्त किया है।

1. मैं नहीं चाहता चिर-सुख,
मैं नहीं चाहता चिर-दुःख,
सुख-दुःख की खेल-मिचौनी,
खोले जीवन अपना मुख।

कठिन शब्दों के अर्थ:
चिर = देर तक रहने वाला। खेल-मिचौनी = आँख मिचौनी का खेल। खोले जीवन अपना मुख = जीवन अग्रसर हो।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश आधुनिक युग के प्रसिद्ध छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पन्त की काव्यकृति ‘गुंजन’ में संकलित ‘सुख-दुःख’ शीर्षक कविता में से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में कवि जीवन में सुख-दुःख की समानता होने की कामना करते हैं क्योंकि निरन्तर दुःख हो या सुख सदा मनुष्य को दुःखी करते हैं।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि मैं यह भी नहीं चाहता कि सुख देर तक मेरे जीवन में बना रहे और मैं यह भी नहीं चाहता दुःख देर तक मेरे जीवन में बना रहे। मैं तो यह चाहता हूँ कि मेरे जीवन में, सुख-दुःख आँख-मिचौनी का खेल । खेलते रहें अर्थात् सुख-दुःख मेरे जीवन में आते जाते रहें इस तरह मेरा जीवन चलता रहे।

विशेष:

  1. कवि का मानना है कि सुख-दुःख रथ के पहिये के समान हों कभी पहिए का एक भाग ऊपर आ जाए तो कभी दूसरा। सदा सुख या सदा दुःख बना रहने पर जीवन रुक जाएगा। आँख-मिचौनी के खेल में कभी एक छिपता है तो कभी दूसरा। इसी प्रकार जीवन में भी कभी सुख छिप जाए दूर हो जाए तो कभी दुःख। यही जीवन है।
  2. तत्सम प्रधान सहज भाषा का प्रयोग किया गया है।
  3. अनुप्रास अलंकार तथा लाक्षणिकता विद्यमान है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 7 सुमित्रानन्दन पंत

2. सुख-दुःख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरन,
फिर घन में ओझल हो शशि
फिर शशि से ओझल हो घन

कठिन शब्दों के अर्थ:
मिलन = संयोग। ओझल होना = छिप जाना।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता ‘सुख-दुःख’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने सुख-दुःख को समभाव से ग्रहण करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि सुख और दुःख के उचित संयोग से मेरा जीवन पूर्ण हो अर्थात् जीवन में सुख-दुःख आते जाते रहने चाहिए जैसे कभी बादलों में चाँद छिप जाए और कभी बादल चाँद से दूर हो जाएँ।

विशेष:

  1. चाँद सुख का प्रतीक माना जाता है और बादल दुःख के।
  2. भाषा तत्सम प्रधान लाक्षणिक से युक्त है।
  3. अनुप्रास तथा मानवीकरण अलंकार हैं।

3. जग पीड़ित है अति दुःख से,
जग पीड़ित रे अति-सुख से,
मानव-जग में बँट जावें
दुःख सुख से औ, सुख दुःख से।

कठिन शब्दों के अर्थ:
पीड़ित = दु:खी। अति = अत्यधिक।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता ‘सुख-दुःख’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने सुख-दुःख को समभाव से ग्रहण करने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि संसार दुःख की अधिकता से भी दु:खी है और सुख की अधिकता से भी दुःखी है अर्थात् मनुष्य निरन्तर दुःख या विपत्तियाँ सहता-सहता भी दुःखी हो जाता है और मनुष्य सुख के निरन्तर बने रहने से भी ऊब जाता है। इसलिए वह चाहता है कि मानव जगत् में दुःख-सुख से और सुख-दुःख से बँट जाएँ अर्थात् दुःखी मनुष्य के दुःखों को सुखी मनुष्य बाँट लें और सुखी मनुष्य के थोड़े सुख दुःखी मनुष्यों में बँट जाएँ। इस तरह जीवन में सुख-दुःख का सन्तुलन बना रहेगा।

विशेष:

  1. कवि ने सुख-दुःख के बराबर बँटवारे की कामना की है। सुखी व्यक्ति दुःखियों के दुःख को दूर करें।
  2. भाषा तत्सम प्रधान तथा भावपूर्ण है।
  3. कवि ने सुख-दुःख को समभाव से स्वीकार करने पर बल दिया है।

4. अविरत दुःख है उत्पीड़न
अविरत सुख भी उत्पीड़न
सुख-दुःख की निशा-दिवा में
सोता-जगता जग-जीवन।

कठिन शब्दों के अर्थ:
अविरत = निरन्तर, लगातार। उत्पीड़न = दुःख का कारण। दिवा = दिन।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता सुख-दुःख से लगी गई हैं, जिसमें कवि ने सुख-दुःख . में समन्वय पर बल दिया है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि निरन्तर दुःख भी दुःख का कारण बनता है अर्थात् मनुष्य को व्यथित कर देता है और निरन्तर सुख भी दुःख पैदा करने का कारण बनता है अर्थात् लगातार सुख सहते-सहते या भोगते-भोगते मनुष्य उदासीन हो जाता है। इसलिए चाहिए तो यह है कि दुःख-सुख रूपी रात-दिन में मनुष्य जीवन सोता-जागता रहे। क्योंकि लगातार दुःख सहते-सहते मनुष्य व्याकुल हो जाता है और सुख के दिनों में वह उत्सव और उल्लास मनाता है।

विशेष:

  1. मानव जीवन सुख-दुःख का ही मिश्रण है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान लाक्षणिक है।
  3. अनुप्रास, रूपक तथा मानवीकरण अलंकार हैं।

5. यह साँझ-उषा का आँगन,
आलिंगन विरह-मिलन का,
चिर हास-अश्रुमय आनन ।
रे इस मानव-जीवन का।

कठिन शब्दों के अर्थ:
आलिंगन = मिलाप। विरह = जुदाई, बिछुड़ना। आनन = चेहरा, मुख। ..

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित कविता ‘सुख-दुःख’ से ली गई हैं, जिसमें कवि ने सुख-दुःख में समन्वय पर बल दिया है।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि यह संसार सन्ध्या और उषा का आँगन है अर्थात् यहाँ सन्ध्या रूपी दुःख भी है तो उषा रूपी सुख भी है। यहाँ विरह और मिलन का मिलाप होता है अर्थात् संसार में लोग मिलते भी हैं और बिछुड़ते भी हैं। इस तरह वे मिलन के सुख और बिछुड़ने के दुःख को झेलते हैं। मनुष्य के जीवन में हँसी भी है और आँसू भी हैं। उसे सुख-दुःख दोनों ही भोगने पड़ते हैं। यही मानव जीवन है।

विशेष:

  1. कवि ने सुख-दुःख के समन्वय पर बल दिया है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान एवं लाक्षणिक है।
  3. रूपक और मानवीकरण अलंकार हैं।

सुमित्रानन्दन पंत Summary

सुमित्रानन्दन पंत जीवन परिचय

सुमित्रानन्दन पन्त जी का जीवन परिचय दीजिए ।

सुमित्रानन्दन पन्त जी का जन्म अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक गाँव में 21 मई, सन् 1900 ई० को हुआ। इनके पिता का नाम पंडित गंगादत्त तथा माता का नाम सरस्वती था। इन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोड़ा तथा बनारस में प्राप्त की थी तथा उच्च शिक्षा के लिए प्रयाग के म्योर सैंट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया, किन्तु महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर पढ़ाई छोड़ दी और साहित्य साधना करने लगे। इन्होंने आकाशवाणी, इलाहाबाद में भी कार्य किया था। इन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण से, कलकत्ता विश्वविद्यलय ने डी० लिट् से, साहित्य अकादमी ने ‘कला और बूढ़ा चाँद’ पर सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार तथा भारतीय ज्ञानपीठ ने ‘चिदम्बरा’ पर सम्मानित किया था। सन् 1977 में इनका देहान्त हो गया था। इन्होंने कविता, नाटक, उपन्यास, कहानियां, निबन्ध आदि सभी लिखे हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ वीणा, पल्लव, गुंजन, युगान्त, ग्राम्या, लोकायतन, चिदंबरा, कला और बूढ़ा चांद हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 6 जयशंकर प्रसाद

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 6 जयशंकर प्रसाद Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 6 जयशंकर प्रसाद

Hindi Guide for Class 12 PSEB जयशंकर प्रसाद Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
मित्रता और शिष्टाचार में प्रसाद जी ने क्या अन्तर बतलाया है ?
उत्तर:
मित्रता व्यक्ति को भवसागर से पार उतरने में सहायक होती है, उसे सांसारिक दुःखों से छुटकारा दिलाती की बात करता है, वह दिखावटी बातें होती हैं जबकि सच्ची मित्रता सच्चे प्रेम पर आधारित होती है।

प्रश्न 2.
‘सच्ची मित्रता’ क्या है ? प्रस्तुत कविता के माध्यम से व्यक्त करें।
उत्तर:
सच्ची मित्रता इस स्वार्थ भरे संसार में किसी भाग्यशाली को ही प्राप्त होती है। सच्चा मित्र मुसीबत के समय व्यक्ति के काम आता है। अपनी सच्चाई और प्रेम से व्यक्ति को भवसागर से किसी मल्लाह की तरह पार लगा देता है। सच्चा मित्र निष्कपट और निस्वार्थ भाव से व्यवहार करता है।

प्रश्न 3.
‘याचना’ कविता में कवि ने प्रभु से क्या वरदान माँगा है ?
उत्तर:
‘याचना’ कविता में कवि ने प्रभु से यह वरदान माँगा है कि हे प्रभो ! जीवन में चाहे कितने ही दुःख आएँ, कितनी विपरीत परिस्थितियाँ क्यों न हों, चाहे अपने पराये सभी साथ छोड़ जाएँ मैं कभी भी ईश्वरी प्रेम से विमुख न होऊँ। सदा तुम्हारे प्रेम मार्ग पर तुम्हारे दिखाए प्रकाश में चलता रहूँ।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 6 जयशंकर प्रसाद

प्रश्न 4.
प्राकृतिक आपदाओं के समय हमारी मनोदशा कैसी होनी चाहिए ?
उत्तर:
प्राकृतिक आपदाओं के समय हम सदा प्रभु के चरण कमलों में ध्यान लगाये रखें। हमारा मन प्रभु की प्रेमधारा के बंधन की ओर खिंचता रहे। हमारा मन रूपी भंवरा प्रभु के चरण कमलों में विश्वास रखकर प्रसन्न रहे तथा हम प्रभु के प्रेम पथ में ही उसी के दिखाये प्रकाश में चलें।

प्रश्न 5.
‘याचना’ कविता में जयशंकर प्रसाद ने ईश्वर को किन-किन विशेषणों से अलंकृत किया है ?
उत्तर:
‘याचना’ कविता में कवि जयशंकर प्रसाद ने ईश्वर को पद्म पद, प्रेमधारा में बहने वाला, चरण-अरविन्द तथा प्रेम पथ एवं आलोक युक्त विशेषणों से अलंकृत किया है।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

1. कहीं तुम्हारा स्वार्थ लगा है……….मित्र रूप में रंगा हुआ।
उत्तर:
स्वार्थी मित्रों के सम्बन्ध में बताते हुए कवि लिखते हैं कि आजकल थोड़ी देर में अच्छे मित्र, पक्के मित्र या साथी के समान लोग बन जाते हैं और वे कहते हैं कि तुम प्यारे हो, बहुत प्यारे हो और तुम्हीं सब कुछ हो किन्तु ऐसा वे काम पड़ने पर ही कहते हैं अर्थात् काम पड़ने पर ही परिचय प्राप्त करते हैं। कवि कहते हैं मित्र बनाने में कहीं उनका मतलब है तो कहीं लोभ, कहीं तुम्हारी इज्ज़त बनी है तो कहीं रूप है जो मित्रता के रंग में रंगा हुआ है। स्वार्थ के कारण मित्रता दिखाने वाला व्यक्ति कहीं स्वार्थ के कारण ऐसा करता है तो कहीं लोभ के कारण अपने रंग बदलता है।

2. हम हों सुमन की सेज पर…………तव आलोक में।
उत्तर:
कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु ! हम चाहे फूलों के बिछौने पर सो रहे हों या काँटों की झाड़ी पर परन्तु हे स्वामी ! आप हमारे हृदय की ओट में छिपे रहना। हम चाहे इस लोक में हों या परलोक में हों या फिर पृथ्वी लोक में हों, हम सदा तुम्हारे ही दिखाये प्रेम के रास्ते पर चलें और तुम्हारे ही दिखाये प्रकाश में चलें।

PSEB 12th Class Hindi Guide जयशंकर प्रसाद Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
किस हिंदी-साहित्यकार को ‘सूंघनी साहू’ नाम से भी जाना जाता है?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद को।

प्रश्न 2.
जयशंकर प्रसाद का जन्म किस सन में हुआ था?
उत्तर:
सन् 1889 ई० में।

प्रश्न 3.
जयशंकर प्रसाद की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
कामायनी (महाकाव्य)।

प्रश्न 4.
प्रसाद जी के अनुसार आधुनिक युग में किसका मिलना बहुत कठिन है?
उत्तर:
अच्छे-सच्चे मित्र का मिलना।

प्रश्न 5.
प्रायः मित्र किस कारण साथ छोड़ जाते हैं ?
उत्तर:
स्वार्थ और लालच के कारण।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 6 जयशंकर प्रसाद

प्रश्न 6.
‘सच्ची मित्रता’ किस के द्वारा रचित कविता है?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद।

प्रश्न 7.
‘हृदय खोल मिलने वाले’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
निस्वार्थ भाव से मिलने वाले मित्र।

प्रश्न 8.
सच्चा मित्र दुखी हृदय के लिए कैसा व्यवहार करता है?
उत्तर:
सच्चा मित्र दुखी हृदय के लिए सदा सुख देने वाला साथी होता है और हर संकट में अपने मित्र का सहायक सिद्ध होता है।

प्रश्न 9.
‘याचना’ कविता किसके द्वारा रचित है?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद के द्वारा।

प्रश्न 10.
याचना कविता में कवि क्या कामना करता है?
उत्तर:
वह कामना करता है कि वह किसी भी स्थिति में परमात्मा से विमुख न हो और वह सदा ईश्वर के द्वारा दिखलाए गए पथ पर बढ़ता रहे।

प्रश्न 11.
कवि प्राकृतिक आपदाओं में अपना ध्यान सदा कहाँ लगाना चाहता है?
उत्तर:
प्रभु के चरण कमलों में। वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 12.
कहाँ मित्रता, कैसी बातें ?……..
उत्तर:
कहाँ मित्रता, कैसी बातें? अरे कल्पना है सब में।।

प्रश्न 13.
कहीं तुम्हारा ‘स्वार्थ’ लगा है,……………….
उत्तर:
कहीं ‘लोभ’ है मित्र बना।

प्रश्न 14.
पर प्राणधन ………………..
उत्तर:
तुम छिपे रहना इस हृदय की आड़ में। हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 15.
जयशंकर प्रसाद छायावादी कवि थे।
उत्तर:
हाँ।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 6 जयशंकर प्रसाद

प्रश्न 16.
ध्रुवस्वामिनी, कंकाल और अजात शत्रु प्रसाद जी के काव्य संग्रह हैं।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 17.
प्रसाद जी ने सुख-दुख में प्रभु स्मरण करने की प्रेरणा दी है।
उत्तर:
हाँ।

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए प्रश्न

प्रश्न 1.
कवि ‘प्रसाद’ का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. जयशंकर प्रसाद किस धारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं ?
(क) प्रगतिवाद
(ख) प्रयोगवाद
(ग) छायावाद
(घ) हालावाद
उत्तर:
(ग) छायावाद

2. प्रसाद को किस कृति पर मंगला प्रसाद पारितोषिक मिला ?
(क) कामायनी
(ख) आँसू
(ग) झरना
(घ) लहर
उत्तर:
(क) कामायनी

3. कवि के अनुसार आज के युग में किसका मिलना कठिन है ?
(क) अच्छे एवं सच्चे मित्र का
(ख) धन का
(ग) रिश्तों का
(घ) पत्नी का
उत्तर:
(क) अच्छे एवं सच्चे मित्र का

4. ‘याचना’ कविता के कवि कौन हैं ?
(क) निराला
(ख) प्रसाद
(ग) पंत
(घ) महादेवी वर्मा
उत्तर:
(ख) प्रसाद

5. कवि हर समय किसके चरणों में लीन रहना चाहते हैं ?
(क) प्रभु के
(ख) शिव के
(ग) श्री राम के
(घ) श्री कृष्ण के
उत्तर:
(क) प्रभु के

जयशंकर प्रसाद सप्रसंग व्याख्या

1. सच्ची मित्रता कविता का सार

इस कविता में कवि ने स्पष्ट किया है कि आधुनिक युग में सच्चे मित्र का मिलना अत्यन्त कठिन है। आजकल मित्रता के नाम पर लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति करते हैं। वे सामने तो प्रशंसा करते हैं परन्तु पीठ पीछे निन्दा करते हैं। ये मतलबी होते हैं। सच्ची तथा निःस्वार्थ भाव से मित्रता करने वाले लोग बहुत मुश्किल से मिलते हैं। जिसे ऐसा सच्चा मित्र मिल जाता है, वह अत्यन्त सौभाग्यशाली होता है तथा उसका जीवन सच्चा मित्र प्राप्त कर धन्य हो जाता है।

1. कहाँ मित्रता, कैसी बातें ? अरे कल्पना है सब ये
सच्चा मित्र कहाँ मिलता है ? दुखी हृदय को छाया-सा।
जिसे मित्रता समझ रहे हो, क्या वह शिष्टाचार नहीं ?
मुँह देखने की मीठी बातें, चिकनी-चुपड़ी ही सुन लो।
जिसे समझते हो तुम अपना मित्र भूल कर वही अभी।
जब तुम हट जाते हो, तुमको पूरा मूर्ख बनाता है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
कल्पना = मन-गढंत बात। छाया-सा = छाया के समान। शिष्टाचार = दिखावटी सभ्य व्यवहार।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित काव्यकृति ‘प्रेम पथिक’ में संकलित ‘सच्ची मित्रता’ शीर्षक कविता से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में कवि ने स्वार्थ भरे इस संसार में सच्चा मित्र कठिनाई से मिलने की बात कही है।

व्याख्या:
असली मित्र और नकली मित्र कौन होता है इस विषय पर विचार प्रकट करते हुए कवि कहते हैं कि आज कल सच्ची मित्रता कहाँ देखने को मिलती है ? सच्ची मित्रता सम्बन्धी जितनी भी बातें हैं वे सब मन की कपोल कल्पनाएँ हैं। आज के इस स्वार्थ भरे संसार में सच्चा मित्र कहाँ मिलता है ? जो मित्र दुःखी को सुख देने वाला तथा छाया के समान शीतलता प्रदान करने वाला हो। आज जिसे तुम मित्रता समझ रहे हो क्या वह औपचारिक व्यवहार तो नहीं है ? वह व्यक्ति जिसे तुम मित्र समझ रहे हो मुँह देखे की मीठी-मीठी बातें तो नहीं करता और तुम्हें उस की चिकनी चुपड़ी बातें ही सुनने को मिलती हैं। यही नहीं जिसे तुम भूल कर अपना मित्र समझते हो वह तुम्हारे सामने से हट जाने पर अर्थात् तुम्हारी पीठ पीछे तुम्हें पूरा मूर्ख कहता है अथवा तुम्हें मूर्ख बनाने की कोशिश करता है।

विशेष:

  1. कवि के कहने का भाव यह है कि आज के मित्र अवसरवादी होते हैं। दिखावे की या चिकनी चुपड़ी बातें करके वे अपना प्रभाव बना लेते हैं किन्तु जब तक आप की जेब में पैसा है तब तक वे आपके मित्र हैं। मुँह पर आपकी प्रशंसा करेंगे किन्तु पीछे-पीछे आपकी निन्दा करेंगे। अत: मित्र के चुनाव में सावधानी बरतनी चाहिए।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, सहज तथा भावपूर्ण है। सम्बोधनात्मक शैली है।
  3. अनुप्रास, प्रश्न तथा उपमा अलंकारों का प्रयोग किया गया है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 6 जयशंकर प्रसाद

2. क्षण भर में ही बने मित्रवर अंतरंग या सखा समान
प्रिय हो, ‘प्रियवर’ हो सब तुम हो, काम पड़े पर परिचित हो।
कहीं तुम्हारा ‘स्वार्थ’ लगा है, कहीं ‘लोभ’ है मित्र बना।
कहीं ‘प्रतिष्ठा’ कहीं रूप है-मित्ररूप में रंगा हुआ।

कठिन शब्दों के अर्थ:
मित्रवर = अच्छे मित्र। अंतरंग = पक्का, हृदय से परिचित। सखा = मित्र, साथी। प्रियवर = अच्छे प्रिय। स्वार्थ = मतलब। प्रतिष्ठा = मान, इज्जत।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता ‘सच्ची मित्रता’ से लिया गया है, जिसमें कवि ने स्वार्थी मित्रों से बचने तथा सच्चे मित्रों के गुणों का वर्णन किया है।

व्याख्या:
स्वार्थी मित्रों के सम्बन्ध में बताते हुए कवि लिखते हैं कि आजकल थोड़ी देर में अच्छे मित्र, पक्के मित्र या साथी के समान लोग बन जाते हैं और वे कहते हैं कि तुम प्यारे हो, बहुत प्यारे हो और तुम्हीं सब कुछ हो किन्तु ऐसा वे काम पड़ने पर ही कहते हैं अर्थात् काम पड़ने पर ही परिचय प्राप्त करते हैं। कवि कहते हैं मित्र बनाने में कहीं उनका मतलब है तो कहीं लोभ, कहीं तुम्हारी इज्ज़त बनी है तो कहीं रूप है जो मित्रता के रंग में रंगा हुआ है। स्वार्थ के कारण मित्रता दिखाने वाला व्यक्ति कहीं स्वार्थ के कारण ऐसा करता है तो कहीं लोभ के कारण अपने रंग बदलता है।

विशेष:

  1. कवि ने स्वार्थी मित्रों के लक्षण बताते हुए उनसे सावधान रहने के लिए कहा है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, सहज तथा भावपूर्ण है।
  3. अनुप्रास अलंकार है।

3. हृदय खोलकर मिलने वाले बड़े भाग्य से मिलते हैं
मिल जाता है जिस प्राणी को सत्य-प्रेममय मित्र कहीं
निराधार भवसिन्धु बीच वह कर्णधार को पाता है
प्रेम-नाव खेकर जो उसको सचमुच पार लगाता है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
हृदय खोलकर मिलना = दिल खोलकर अर्थात् निस्वार्थ भाव से मिलना। सत्यप्रेममय = सच्चाई और प्रेम से भरा। निराधार = आधार-सहारे के बिना। भवसिन्धु = संसार रूपी समुद्र । कर्णधार = पार लगाने वाला, मल्लाह।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता ‘सच्ची मित्रता’ से लिया गया है, जिसमें कवि ने स्वार्थी मित्रों से बचने तथा सच्चे मित्रों के गुणों का वर्णन किया है।

व्याख्या:
सच्चे मित्र के गुणों और विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कवि कहते हैं कि दिल खोल कर अर्थात् निःस्वार्थ भाव से मिलने वाले मित्र बड़े भाग्य से मिलते हैं और जिस भी व्यक्ति को सच्चाई और प्रेम से भरा मित्र मिल जाए समझो उसे बिना सहारे के व्यक्ति को संसार रूपी सागर के बीच पार ले जाने वाला मल्लाह मिल गया है। जो प्रेम रूपी नाव को खेकर उसे सचमुच पार लगा देता है।

विशेष:

  1. कवि के कहने का भाव यह है कि सच्चा मित्र बड़े भाग्य से मिलता है और जिसे सच्चा मित्र मिल जाता है। वह आसानी से संसार रूपी समुद्र से पार हो जाता है। क्योंकि सच्चा मित्र एक मल्लाह की तरह सांसारिक कठिनाइयों से पार उतार देता है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, सहज तथा भावपूर्ण है।
  3. रूपक अलंकार है।

2. याचना कविता का सार

प्रस्तुत कविता में कवि ने मनुष्य को सदा आशावादी बने रहने की प्रेरणा देते हुए लिखा है कि जीवन में चाहे कितनी भी मुसीबतें आएं हमें घबराना नहीं चाहिए। प्रलय हो जाए, पर्वत टूटकर गिरें, महानाशकारी वर्षा हो, मित्र-सम्बन्धी साथ छोड़ दें, अनेक कठिनाइयां झेलनी पड़ें परन्तु फिर भी हम सदा ईश्वर के दिखाए हुए सद्मार्ग पर चलते रहें और उस परमात्मा के प्रति निष्ठावान रहें।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 6 जयशंकर प्रसाद

1. जब प्रलय का हो समय, ज्वाला मुखी निजमुख खोल दे,
सागर उमड़ता आ रहा हो, शक्ति-साहस बोल दे,
ग्रह गण सभी हों, केन्द्रच्युत, लड़कर परस्पर भग्न हों
इस समय भी हम हे प्रभु ! तव पद्म-पद में लग्न हों।

कठिन शब्दों के अर्थ:
प्रलय = महानाश। साहस बोल दे = साहस जवाब दे जाए। ग्रह गण = ग्रहों के समूह । केन्द्रच्युत = अपने स्थान से हटना। भग्न हों = टूट जाएं। पद्म-पद = चरण कमल।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित कविता ‘याचना’ में से लिया गया है। प्रस्तुत कविता में कवि ने संदेश दिया है कि हमें दुःख हो या सुख हर हाल में ईश्वर को नहीं भुलाना चाहिए।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि जब महानाश का समय हो, ज्वालामुखी फूट पड़े, सागर उमड़ता आ रहा हो, हमारी शक्ति और साहस जवाब दे गए हों, सभी ग्रह अपने-अपने स्थान से हट गए हों और आपस में टकरा कर टूट चुके हों। ऐसे समय भी हे प्रभो ! हम आपके चरण कमलों में ही ध्यान लगाये रखें।

विशेष:

  1. कवि ने प्रलय जैसी कठिन स्थिति में भी प्रभु को स्मरण करते रहने पर बल दिया है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान तथा भावपूर्ण है।
  3. अनुप्रास तथा रूपक अलंकार हैं। विनय का भाव है। शान्त रस है।

2. जब शैल के सब श्रंग विद्युद-वृन्द के आघात से
हो गिर रहे भीषण मचाते विश्व में व्याघात से
जब घिर रहे हों प्रलय-घन अवकाश-गत आकाश में,
तब भी प्रभो ! यह मन खिंचे तब प्रेम-धारा पाश में।

कठिन शब्दों के अर्थ:
शैल = पर्वत। श्रृंग = चोटियाँ। विद्युद्-वृन्द = बिजलियों के समूह। भीषण = भयंकर। व्याघात = प्रहार, चोट, विघ्न । प्रलय-धन = महानाश के बादल। अवकाश-गत = खाली। प्रेमधारा-पाश = प्रेम की धारा का बन्धन।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता ‘याचना’ में से लिया गया है। इसमें कवि ने प्रत्येक स्थिति में सदा ईश्वर को स्मरण करते रहने की प्रेरणा देते हुए कठिन से कठिन परिस्थिति का भी धैर्यपूर्वक सामना करने के लिए कहा है।

व्याख्या:
कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि जब पर्वत की सब चोटियाँ बिजलियों के समूह के प्रहार से भयंकर शोर मचाते हुए गिर रही हों और संसार में विघ्न डाल रहे हों। जब खाली आकाश में महानाश के बादल घिर रहे हों, तब भी हे प्रभो ! हमारा यह मन तुम्हारी ही प्रेम की धारा के बन्धन की ओर खिंचा रहे।

विशेष:

  1. कवि ने प्रत्येक कठिन स्थिति में प्रभु स्मरण पर बल दिया है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान तथा भावपूर्ण है।
  3. अनुप्रास, रूपक अलंकार, शान्त रस तथा विनय का भाव है।

3. जब छोड़कर प्रेमी तथा सन्मित्र सब संसार में,
इस घाव पर छिड़कें नमक, हो दुःख खड़ा आकार में,
करुणानिधे ! हो दुःख सागर में कि हम आनन्द में,
मन मधुप हो विश्वस्त-प्रमुदित तब चरण-अरविन्द में।

कठिन शब्दों के अर्थ:
सन्मित्र = अच्छे मित्र। आकार में = रूप धारण करके। करुणानिधे = दया के भण्डारईश्वर। साबर में = अधिकता में। मन-मधुप = मन रूपी भंवरा। प्रमुदित = प्रसन्न। चरण-अरविन्द = चरण कमल।

प्रसंग:
यह काव्यांश जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता ‘याचना’ से अवतरित है। इसमें कवि ने प्रत्येक विकट परिस्थिति में धैर्य तथा आशा रखते हुए प्रभु के चरणों में अपना मन लगाने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि जब हमें इस संसार में सभी प्रेमीजन और अच्छे मित्र छोड़ कर चले जाएँ और हमारे जख्मों पर नमक छिडकने लगें अर्थात् हमारे दुःखों को, कष्टों को और भी बढा दें तथा जब दुःख साकार रूप धारण करके हमारे सामने खड़ा हो जाए। तब हे दया के भण्डार प्रभो ! हम चाहे अत्यधिक दुःख के सागर में हों या कि आनन्द में, हमारा मन रूपी भंवरा आप में विश्वास रखता हुआ आपके चरण कमलों में लीन रह कर प्रसन्न रहे।

विशेष:

  1. सगे-सम्बन्धियों के साथ छोड़ देने पर भी मनुष्य को विचलित नहीं होना चाहिए तथा प्रभु के चरणों में अपना मन लगाना चाहिए।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, भावपूर्ण तथा शांत रस है।
  3. रूपक, अनुप्रास अलंकार है।

4. हम हों सुमन की सेज पर कण्टकों की बाड़ में ।
पर प्राणधन ! तुम छिपे रहना इस हृदय की आड़ में
हम हों कहीं इस लोक में, उस लोक में, भूलोक में,
तब प्रेम पथ में ही चलें, हे नाथ ! तब आलोक में।

कठिन शब्दों के अर्थ:
सुमन = फूल। सेज = बिछौना। बाड़ = झाड़ी। प्राणधन = स्वामी, ईश्वर। आड़ = ओट। लोक = संसार। उस लोक = परलोक, स्वर्ग। भू-लोक = पृथ्वी। तब = तुम्हारे। हे नाथ = हे स्वामी, ईश्वर! आलोक = प्रकाश।

प्रसंग:
यह अवतरण जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता ‘याचना’ से अवतरित है। इसमें कवि ने प्रत्येक विकट परिस्थिति में धैर्य तथा आशा रखते हुए प्रभु के चरणों में अपना मन लगाने की प्रेरणा दी है।

व्याख्या:
कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु ! हम चाहे फूलों के बिछौने पर सो रहे हों या काँटों की झाड़ी पर परन्तु हे स्वामी ! आप हमारे हृदय की ओट में छिपे रहना। हम चाहे इस लोक में हों या परलोक में हों या फिर पृथ्वी लोक में हों, हम सदा तुम्हारे ही दिखाये प्रेम के रास्ते पर चलें और तुम्हारे ही दिखाये प्रकाश में चलें।

विशेष:

  1. कवि ने सुख-दुःख में सदा प्रभु स्मरण की प्रेरणा दी है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, शान्त रस तथा विनय भाव है।
  3. रूपक तथा अनुप्रास अलंकार एवं लाक्षणिकता विद्यमान है।

जयशंकर प्रसाद Summary

जयशंकर प्रसाद जीवन परिचय

जयशंकर प्रसाद जी का जीवन परिचय लिखिए।

जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 ई० में वाराणसी के सुंघनी साहू नामक वैश्य परिवार में हुआ था। सबसे छोटी सन्तान होने के कारण प्रसाद जी को माता-पिता का विशेष स्नेह प्राप्त था लेकिन पन्द्रह वर्ष की अवस्था होतेहोते इनके माता-पिता और बड़े भाई का देहान्त हो गया। परिवार का सारा बोझ इन्हीं के कन्धों पर आ पड़ा। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण ये कॉलेज की पढ़ाई नहीं कर सके। रुचि के अनुसार इन्होंने घर पर ही शिक्षा प्राप्त की। __ प्रसाद जी की आरम्भिक रचनाएँ ‘इन्दु’ नामक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुईं। इन्होंने काव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध और एकांकी लिखे हैं। कामायनी, आँसू, झरना, लहर, प्रेम-पथिक, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु, कंकाल इनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। इन्हें ‘कामायनी’ पर ‘मंगलाप्रसाद’ पारितोषिक से सम्मानित किया गया था। सन् 1937 ई० में इनका देहांत हो गया था।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 5 मैथिलीशरण गुप्त

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 5 मैथिलीशरण गुप्त Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 5 मैथिलीशरण गुप्त

Hindi Guide for Class 12 PSEB मैथिलीशरण गुप्त Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
‘सखि वे मुझसे कह कर जाते’ कविता में यशोधरा को किस बात का दुःख है ?
उत्तर:
यशोधरा को इस बात का दुःख है कि उसके पति चुपचाप उसे छोड़कर चले गए। जाते समय वे उसे बताकर भी नहीं गए। यदि वे कहते कि मैं सिद्धि प्राप्त करने के लिए जाना चाहते हैं तो मैं क्या उन्हें रोकती। मेरे पति भले ही मुझे इतना सम्मान देते हैं पर वे मुझे पहचान नहीं पाएँ।

प्रश्न 2.
‘सखि वे मुझ से कह कर जाते’ कविता का केन्द्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में कवि ने एक भारतीय नारी की मनोव्यथा और उसके आदर्श का एक साथ वर्णन किया है। भले ही पति उसका निरादर कर गए हैं, जो चुपचाप बिना बताये चले गए हैं फिर भी वह एक आदर्श नारी के समान पति के शुभ कार्य के लिए शुभकामना करती है।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 3.
नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इन से जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते ?
गए तरस ही खाते
सखि वे मुझ से कहकर जाते।
उत्तर:
हे सखी ! मेरी आँखें पति को कठोर कहती हैं। इसका कारण यही है कि वे मुझे बिना बताए घर छोड़कर चले गए। लेकिन मेरे इन नेत्रों से जो आंसू बह रहे हैं उनको वे दयालु एवं कोमल हृदय वाले कैसे सहन कर पाते ? अर्थात् वे मुझे इस लिए सोता हुआं छोड़कर चले गए क्योंकि वे मेरी आँखों से निकलने वाले आँसुओं को सहन न कर पाते और शायद उनको अपना फैसला ही बदल लेना पड़ता। इसलिए वे मुझ पर तरस खाते हुए ही यहाँ से गए हैं। हे सखी ! फिर भी यही अच्छा होता कि वे मुझे कह कर जाते।

PSEB 12th Class Hindi Guide मैथिलीशरण गुप्त Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
3 अगस्त, सन् 1886 ई० में जिला झांसी के चिरगांव में।

प्रश्न 2.
मैथिलीशरण गुप्त की किन्हीं चार रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
पंचवटी, साकेत, यशोधरा, भारत-भारती।

प्रश्न 3.
‘सखि ‘वे मुझ से कह कर जाते’ को किस खंडकाव्य से लिया गया है?
उत्तर:
खंडकाव्य ‘यशोधरा’ से।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 5 मैथिलीशरण गुप्त

प्रश्न 4.
यशोधरा किनकी पत्नी थी?
उत्तर:
गौतम बुद्ध की।

प्रश्न 5.
गौतम बुद्ध अपनी पत्नी को बिना बताए कहाँ चले गए थे?
उत्तर:
मोक्ष प्राप्ति के लिए वन में।

प्रश्न 6.
यशोधरा ने किसे संबोधित करते हुए अपने भावों को व्यक्त किया था?
उत्तर:
‘सखि’ कह कर।

प्रश्न 7.
यशोधरा के प्रति उनके पति का कैसा व्यवहार था?
उत्तर:
उनका अत्यधिक प्रेम और सम्मान का व्यवहार था।

प्रश्न 8.
यशोधरा के अनुसार डरपोक नारियाँ कौन नहीं होती?
उत्तर:
क्षत्रीय कुल की नारियां।

प्रश्न 9.
कवि ने अपनी कविता में मुख्य रूप से किस शब्द शक्ति का प्रयोग किया है?
उत्तर:
अभिधा शब्द शक्ति का।

प्रश्न 10.
यशोधरा के अनुसार उसके पति को कठोर कौन कहता है?
उत्तर:
यशोधरा की आँखें।

प्रश्न 11.
जब यशोधरा के पति उसे त्याग कर चले गए थे तब वह क्या कर रही थी?
उत्तर:
तब वह सो रही थी।

प्रश्न 12.
यशोधरा अपने पति के लिए क्या करती है?
उत्तर:
वह कामना करती है कि वे सिद्धि प्राप्त करें।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 1.
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,…………. …………।
उत्तर:
पर क्या गाते गाते।

प्रश्न 2.
दखी न हों इस जन के दुःख से…..
उत्तर:
उपालम्भ दूं मैं किस मुख से।

प्रश्न 3.
………., फिर भी क्या पूरा पहचाना।
उत्तर:
मुझ को बहुत उन्होंने माना। हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 4.
यशोधरा की,आँखें सिद्धार्थ को निष्ठुर कहती थी।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 5.
किस नाते से रानी अपने पति को युद्धभूमि हेतु तैयार करने की कामना किसने की थी?
उत्तर:
यशोधरा ने।

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प्रश्न 6.
‘सखि वे मुझसे कहकर जाते’ कविता के कवि ‘धर्मवीर भारती’ हैं। हां अथवा नहीं।
उत्तर:
नहीं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. मैथिलीशरण गुप्त को किस कवि की उपाधि प्राप्त है ?
(क) राष्ट्र कवि
(ख) राष्ट्र प्रेम
(ग) राष्ट्र भाव
(घ) राष्ट्रीय भावना
उत्तर:
(क) राष्ट्र कवि

2. भारत सरकार ने गुप्त को किस पुरस्कार से अलंकृत किया ?
(क) राष्ट्रीय कवि
(ख) पद्मभूषण
(ग) पद्मविभूषण
(घ) भारत रत्न
उत्तर:
(ख) पद्मभूषण

3. यशोधरा के पति कौन थे ?
(क) यश बुद्ध
(ख) गौतम बुद्ध
(ग) गौतम शर्मा
(घ) गौतम कवि
उत्तर:
(ख) गौतम बुद्ध

4. यशोधरा के पति क्या प्राप्त करने हेतु वन चले गए ?
(क) मोक्ष
(ख) धन
(ग) शांति
(घ) ज्ञान
उत्तर:
(क) मोक्ष

5. ‘सखि वे मुझ से कह कर जाते’ कविता किस खंड काव्य से संकलित है ?
(क) यशोधरा
(ख) वसुंधरा
(ग) वसुंधा
(घ) पयोधर
उत्तर:
(क) यशोधरा

मैथिलीशरण गुप्त सप्रसंग व्याख्या

1. सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते ?
मुझको बहुत उन्होंने माना;
फिर भी क्या पूरा पहचाना ?
मैंने मुख्य उसी को जाना,
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
पथ-बाधा = रास्ते की रुकावट। माना = सम्मान किया। पूरा = पूर्णतः।

प्रसंग:
प्रस्तुत अवतरण श्री मैथिलीशरण गुप्त के द्वारा रचित काव्य ग्रन्थ ‘यशोधरा’ के ‘सखी, वे मुझसे कहकर जाते’ से अवतरित है जिसमें कवि ने सिद्धार्थ के बिना बताए गृह त्याग पर यशोधरा के हृदय की पीड़ा को वाणी प्रदान की है। वह चाहती थी कि उसके पति सत्य की प्राप्ति अवश्य करें और ऐसा करने के लिए वह कुछ भी त्याग देती लेकिन वह अपनी पत्नी को उसके बारे में अवश्य बतला देते। वह किसी भी अवस्था में उनके मार्ग की बाधा न बनती बल्कि प्रसन्नता से उन्हें उनके मनचाहे पथ पर विदा करती।

व्याख्या:
यशोधरा अपनी सखी से अपने हृदय की पीड़ा प्रकट करती है कि हे सखी ! यदि वह मुझे बता कर अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए जाते तो क्या मैं उनके मार्ग की बाधा बनती ? मैं उनके लक्ष्य में कभी कोई बाधा नहीं बनती बल्कि मैं तो प्रसन्न होकर उनको लक्ष्य प्राप्ति के लिए विदा करती। हे सखी ! मेरे पति मुझे बहुत मानते थे अर्थात् वे मेरा अत्यधिक मान करते थे। जो कुछ मैं चाहती थी वे उसे पूरा करते थे। लेकिन फिर भी मैं यहीं कहूंगी कि वे मुझे ठीक प्रकार से नहीं जान पाए। सच्चाई तो यह है कि मैंने अपने जीवन में उसी बात को महत्त्व दिया जो वे अपने मन में चाहते अथवा सोचते थे अर्थात् मैं हमेशा उनकी बात को पूरा करने का प्रयास करती रहती थी। अत: यदि वे मुझे कहकर या बताकर सिद्धि प्राप्त करने जाते तो मैं बहुत प्रसन्न होती। आज मुझे इसी बात का दु:ख है कि वे मुझे बता कर नहीं गये।

विशेष:

  1. यहाँ कवि ने यशोधरा के माध्यम से एक भोली-भाली भारतीय नारी की मनोव्यथा को सीधे एवं सरल शब्दों में व्यक्त किया है। यशोधरा एक आदर्श भारतीय नारी हैं, अतः वह पति की इच्छा को ही जीवन का सर्वस्व मानती
  2. अनुप्राम, स्वरमैत्री और प्रश्न अलंकार की छटा दर्शनी है।
  3. भाषा सरल सहज एवं प्रवाहपूर्ण है। करुण रस को प्रस्तुत किया गया है। प्रसाद गुण और अभिधा शब्द शक्ति के प्रयोग ने कथन को सहजता और सरलता प्रदान की है।

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2. स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमी भेज देती हैं रण में,
क्षात्र धर्म के नाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

शब्दार्थ:
सुसज्जित = (शस्त्रों, अस्त्रों से) सजा कर। पण = बाजी, प्रतिज्ञा। रण = युद्ध। क्षात्र धर्म = क्षत्रियों का कर्त्तव्य।

प्रसंग:
प्रस्तुत अवतरण श्री मैथिलीशरण गुप्त के द्वारा रचित काव्य ग्रन्थ ‘यशोधरा’ के ‘सखी, वे मुझसे कहकर जाते’ गीत से अवतरित है जिसमें सिद्धार्थ के चले जाने के पश्चात् यशोधरा की व्यथा को प्रकट किया गया है। रात के अन्धकार में अपनी पत्नी और पुत्र को सोता हुआ छोड़ कर के चले जाने पर यशोधरा को बहुत दुःख होता है। अपने मन की इसी व्यथा को एक सखी के सामने व्यक्त करते हुए वह कहती है

व्याख्या:
हे सखी ! हम क्षत्रिय कुल की नारियां डरपोक नहीं हैं। हम तो स्वयं अपने पतियों को शस्त्र-अस्त्र से क्षण भर में सजाती हैं और क्षत्रिय धर्म का पालन करने के लिए खुशी-खुशी उनको युद्ध क्षेत्र में भेज देती हैं। हमारे पति अपने प्राणों की बलि देने के लिए युद्ध क्षेत्र में जाते हैं। मौत का भय होते हुए भी हम उन्हें युद्ध-भूमि में भेजने में थोड़ीसी देर भी नहीं लगातीं। अत: इस समय यदि मेरे पति मुझे बताकर जाते तो मैं किसी प्रकार की आना-कानी नहीं करती बल्कि उनको खुशी-खुशी भेज देती।

विशेष:

  1. यहाँ कवि ने भारतीय ललनाओं की वीरता का वर्णन किया है, जो हंसते-हंसते अपने पति को शस्त्रअस्त्रों से सजाकर युद्ध-भूमि में भेजती हैं।
  2. अनुप्रास और स्वरमैत्री अलंकार का स्वाभाविक प्रयोग है।
  3. भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहपूर्ण है। अभिधा शब्द शक्ति का प्रयोग है। प्रसाद गुण है। करुण रस है।

3. हुआ न यह भी भाग्य अभागा।
किस पर विफल गर्व अब जागा।
जिसने अपनाया था, त्यागा।
रहें स्मरण हो आते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

शब्दार्थ:
विफल = असफल। स्मरण = याद। गर्व = गौरव। भाग्य = किस्मत।

प्रसंग:
प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी साहित्य के राष्ट्रवादी कवि मैथिलीशरण गुप्त द्वार रचित काव्य ‘यशोधरा’ के सभी वे मुझ से कहकर जाते’ गीत में से उद्धृत है। सिद्धार्थ अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को रात के समय सोते हुए छोड़ कर मोक्ष-प्राप्ति के लिए वनों में चला गया। उसने अपनी पत्नी को इसके बारे में बताना भी उचित नहीं समझा। इस गीत में यशोधरा अपनी सखी के समक्ष अपनी मनोव्यथा व्यक्त करते हुए कहती है

व्याख्या:
हे सखी ! मैं कितनी भाग्यहीन हूँ कि मेरा पति मुझे कुछ भी कहकर नहीं गया। मुझ अभागिन को वे बिना बताये चले गए। यदि वे कहकर जाते तो कम से कम मैं यह गर्व तो कर सकती थी कि मेरा पति मुझ से पूछ कर सत्य की खोज में गया है अथवा वे मेरी अनुमति से गए हैं। तब तो उनकी साधना में मेरा भी कुछ योगदान होता। लेकिन अब तो मैं पूर्ण परित्यकता हूँ। जिसने मुझे अपनी पत्नी बनाया था वहीं मुझे छोड़ कर चला गया। अब तो मेरी एक ही आशा है कि वे मुझे याद आते रहें, वे कभी भूले नहीं ताकि मैं अपना बाकी का जीवन उनकी याद में बिता सकूँ। हे सखी ! यदि वे मुझे कहकर जाते तो ही मेरे लिए अच्छा होता।

विशेष:

  1. यहाँ विरहिणी यशोधरा की शिकायत सर्वथा उचित जान पड़ती है। उसका अपने-आप को भाग्यहीन कहना उसकी विनम्रता का सूचक है।
  2. करुण रस का सुन्दर परिपाक है।
  3. भाषा सरल सहज एवं प्रवाहपूर्ण है। प्रसाद गुण एवं अभिधा शब्द शक्ति का प्रयोग है।

4. नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते।
पर इनसे जो आंसू बहते।
सदय हृदय वे कैसे सहते ?
गए तरस ही खाते।
सखि, वे मुझ से कहकर जाते।

शब्दार्थ:
निष्ठुर = कठोर, क्रूर। नयन = आँखें। सदय = दयालु। तरस = दया।

प्रसंग:
प्रस्तुत अवतरण श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘काव्य-यशोधरा’ के गीत ‘सखी, वे मुझसे कहकर जाते से अवतरित किया गया है जिसमें कवि ने पति के द्वारा दी गई पत्नी की पीड़ा एवं व्यथा को वाणी प्रदान की है। गौतम बुद्ध सत्य के लिए चुपचाप घर छोड़ कर चले गए। विरहिणी यशोधरा विरह व्यथा से व्याकुल हो जाती है। वह अपने पति को कभी निष्ठुर कहती है, तो कभी दयालु । इसी प्रसंग में वह अपनी सखी से कहती है।

व्याख्या:
हे सखी ! मेरी आँखें पति को कठोर कहती हैं। इसका कारण यही है कि वे मुझे बिना बताए घर छोड़कर चले गए। लेकिन मेरे इन नेत्रों से जो आंसू बह रहे हैं उनको वे दयालु एवं कोमल हृदय वाले कैसे सहन कर पाते ? अर्थात् वे मुझे इस लिए सोता हुआं छोड़कर चले गए क्योंकि वे मेरी आँखों से निकलने वाले आँसुओं को सहन न कर पाते और शायद उनको अपना फैसला ही बदल लेना पड़ता। इसलिए वे मुझ पर तरस खाते हुए ही यहाँ से गए हैं। हे सखी ! फिर भी यही अच्छा होता कि वे मुझे कह कर जाते।

विशेष:

  1. प्रस्तुत पद्यांश में गुप्त जी ने यशोधरा के हृदय के अन्तर्द्वन्द्व और वेदना-व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति की है।
  2. सदय हृदय में अनुप्रास अलंकार का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहमयी है। करुण रस प्रधान है। प्रसाद-गुण तथा अभिधा शब्द शक्ति है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 5 मैथिलीशरण गुप्त

5. जायें, सिद्धि पावें वे सुख से।
दुखी न हों इस जन के दुःख से,
उपालम्भ हूँ मैं किस मुख से ?
आज अधिक वे भाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

शब्दार्थ:
सिद्धि = सफलता, सत्य की प्राप्ति। उपालम्भ = उलाहना। भाते = अच्छे लगते, प्रिय लगते।

प्रसंग:
प्रस्तुत अवतरण श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित काव्य ‘यशोधरा’ के गीत ‘सखी वे मुझसे कहकर जाते’ से अवतरित है। यशोधरा इस बात से अत्यधिक दुःखी है कि उसका पति उसे बिना बताए ही घर छोड़कर चला गया। शायद वह यह समझता होगा कि यशोधरा उसके मार्ग में बाधा बनेगी अथवा हाय-तौबा करेगी। लेकिन ऐसी बात नहीं। यशोधरा को तो इस बात की प्रसन्नता होती कि उसका पति सत्य-प्राप्ति के लिए जा रहा है। वह अपने पति की मंगल कामना करती हुई अपनी सखी से कहती है

व्याख्या:
हे सखी ! मैं चाहती हूँ कि जब वे चले गए हैं तो जाएं और वे सुखपूर्वक सत्य की साधना करें। मेरे कारण वे किसी प्रकार से भी दुःखी न हों अर्थात् उन्हें सुखपूर्वक वन में सत्य-प्राप्ति के लिए साधना करनी चाहिए और अपनी पत्नी अथवा पुत्र के दुःखों के बारे में सोचकर दुःखी नहीं होना चाहिए। आज मैं किस मुँह से उनको उलाहना दूं क्योंकि मैं तो उनको उपालम्भ भी नहीं दे सकती। उन को सत्य-प्राप्ति का पूरा-पूरा अधिकार था और वे इसी कार्य के लिए गये। इसीलिए तो वे मुझे अधिक अच्छे लग रहे हैं। भाव यह है कि यशोधरा की दृष्टि में सत्य की साधना एक महान् उद्देश्य है। वह अपनी सखी से पुनः कहती है कि फिर भी अच्छा होता यदि वे मुझे कहकर जाते।

विशेष:

  1. यशोधरा की वेदना-व्यथा उदारता का रूप धारण कर लेती है। सच्चा प्रेम अपने प्रेमी को बांधता नहीं, अपितु मुक्त करता है। पतिव्रता पत्नी होने के कारण वह अपने पति की मंगल कामना चाहती है।
  2. प्रसाद गुण तथा अभिधा शब्द शक्ति है।
  3. भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहपूर्ण है। स्वरमैत्री तथा प्रश्न अलंकार का प्रयोग है।

6. गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे।
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते गाते ?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।

कठिन शब्दों के अर्थ:
अपूर्व-अनुपम = परम विचित्र वस्तु।

प्रसंग:
प्रस्तुत अवतरण श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित काव्य ‘यशोधरा’ के गीत ‘सखी वे मुझसे कहकर जाते’ से लिया गया है, जिसमें सिद्धार्थ के निर्वाण की तपस्या करने के लिए चले जाने के बाद यशोधरा की व्यथा को व्यक्त किया गया है।

व्याख्या:
यशोधरा कहती है कि यदि मेरे प्रियतम यहाँ से गए हैं तो यह भी निश्चित है कि वे एक दिन यहाँ लौटकर अवश्य आयेंगे और अपने साथ कोई परम विचित्र एवं श्रेष्ठ पदार्थ लाएँगे। तब क्या मैं रोते हुए उनका स्वागत करूँगी या गाते-गाते उनका स्वागत करूँगी। विरहिणी यशोधरा अपने प्रियतम का स्वागत हँसते-हँसते नहीं कर सकती क्योंकि उसके प्रियतम तो उसे बिना बताए चले गए हैं, वे उसे छोड़ गए हैं। हे सखी मुझे यही दुःख है कि वे मुझसे कहकर नहीं गए।

विशेष:

  1. कवि ने यशोधरा की मानसिक दशा का यथार्थ अंकन किया है। वह सदा अपने पति के स्वागत के लिए तत्पर है।
  2. भाषा तत्सम प्रधान तथा भावानुकूल है। प्रसादगुण तथा करुण रस है।
  3. अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार हैं।

मैथिलीशरण गुप्त Summary

मैथिलीशरण गुप्त जीवन परिचय

मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय दीजिए।

आधुनिक काल के प्रमुख कवि मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्म 3 अगस्त, सन् 1886 ई० में जिला झांसी के चिरगांव नामक स्थान पर हुआ। राम भक्ति और काव्य रचना की प्रेरणा इन्हें अपने पिता रामचरण जी से मिली थी। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इनका मार्गदर्शन किया और उत्साह बढ़ाया। इनकी शिक्षा घर पर ही हुई थी और इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, बंगला, मराठी आदि अनेक भाषाओं का अध्ययन किया था।
राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत कविताएं लिखने के कारण इन्हें राष्ट्रकवि माना जाता है। इन्हें भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ से तथा आगरा विश्वविद्यालय ने डी० लिट् से अलंकृत किया था। ये सन् 1952 से 1954 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे थे। इनके महाकाव्य साकेत पर इन्हें मंगला प्रसाद पुरस्कार प्रदान किया गया था। इनका 12 दिसम्बर, सन् 1964 को देहान्त हो गया था। इनकी रचनाओं में भारत-भारती, पंचवटी, जयद्रथ वध, साकेत, यशोधरा .एवं गुरुकुल प्रसिद्ध हैं।

मैथिलीशरण गुप्त कविता का सार

प्रस्तुत कविता ‘यशोधरा’ खण्डकाव्य से ली गई है। इसमें कवि ने गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा की व्यथा को व्यक्त किया है। गौतम बुद्ध मोक्ष प्राप्ति के लिए बिना यशोधरा को बताए तथा महल में छोड़कर वन में चले जाते हैं तो यशोधरा को लगता है कि उनके पति यदि उसे बताकर जाते तो वह उनके पथ की बाधा नहीं बनती बल्कि स्वयं ही उन्हें सजाकर विदा करती, किन्तु उसे यह भी सौभाग्य नहीं मिला और उसके पति ने उसे मुक्ति के मार्ग में बाधक सामान्य नारी समझा और उसके धर्म, त्याग, साहस आदि को नहीं पहचाना। वह अब भी उनके लिए सिद्धि प्राप्त करने की कामना करती है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह

Hindi Guide for Class 12 PSEB गुरु गोबिन्द सिंह Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
‘गुरु गोबिन्द सिंह ने वर याचना के अन्तर्गत क्या वर माँगा है ?
उत्तर:
गुरु जी ने पारब्रह्म की शक्ति से यह वर माँगा है कि वे अच्छे कर्म करने से कभी पीछे न हटें । निर्भय होकर : शत्रु के साथ जा भिड़ें और अपनी जीत को निश्चित करें। जब जीवन की अवधि समाप्त हो जाए अर्थात् मृत्यु निकट हो तो युद्ध भूमि में लड़ता हुआ मरूँ।

प्रश्न 2.
‘अकाल उस्तुति’ में गुरु जी ने ईश्वर के स्वरूप का वर्णन कैसे किया है ?
उत्तर:
गुरु जी ने ईश्वर के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है कि वह रूप, रंग और आकृति से रहित है अर्थात् निर्गुण या निराकार है। वह जन्म-मरण के बन्धन से भी मुक्त है अर्थात् अजर-अमर है। वह आदि पुरुष है तथा धर्म-कर्म में कुशल है। उस पर जन्त्र, तन्त्र तथा मन्त्र का भी कोई असर नहीं होता अथवा वह इन से परे है। वह निराकार हाथी से लेकर चींटी तक के हृदय में बसता है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह

प्रश्न 3.
गुरु जी ने ‘सांसारिक नश्वरता’ के अन्दर किन-किन राजा, महाराजा, अभिमानी तथा बलि पुरुषों के उदाहरण दिये हैं-वर्णन करें।
उत्तर:
गुरु जी ने सांसारिक नश्वरता के प्रसंग में सतयुग के राजा मान्धाता, रघुकुल के रजा दिलीप, शाहजहाँ के बेटे दारा शिकोह तथा मानी दुर्योधन के उदाहरण दिये हैं जो अपनी मृत्यु न टाल सके और मिट्टी में मिल गए।

प्रश्न 4.
‘भक्ति भावना’ में गुरु जी ने मानव को प्रभु पर विश्वास रखने और अडिग रहने का क्या संदेश दिया है ?
उत्तर:
भक्ति भावना में गुरु जी ने मनुष्य को व्यर्थ के आडंबरों में भटकने से रोकते हुए उस सर्वपालक ईश्वर पर विश्वास रखने के लिए कहा है जो स्वयं सब प्रकार के विकारों से रहित है तथा सृष्टि के प्रत्येक प्राणी का पोषक है। उसकी भक्ति ही मनुष्य को समस्त बंधनों से मुक्ति दिला सकती है।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 5.
काम न क्रोध न लोभ न मोह ……….. पति लै है।
उत्तर:
प्रस्तुत सवैया में गुरु गोबिन्द सिंह जी ईश्वर की विशेषताओं का परिचय देते हुए कहते हैं कि उस ईश्वर में काम, क्रोध, लोभ, मोह, रोग, शोक, भोग, भय आदि कुछ नहीं है अर्थात् वह इन विकारों से परे हैं। वह देह रहित है, सबसे स्नेह करने वाला है फिर भी विरक्त है। उसका कोई घर बार नहीं, वह सबसे अच्छा है। वह जानने वालों को भी देता है और अनजानों को भी देता है अथवा वह ज्ञानियों और अज्ञानियों दोनों को देता है, ज़मीन वाले को और बिना ज़मीन वाले को भी देता है अर्थात् अमीर हो या ग़रीब वह सब को देता है। अरे मूर्ख मनुष्य तू इधर उधर क्यों भटकता फिरता है तुम्हारी सुध तो सुंदर लक्ष्मीपति श्री विष्णु भगवान लेंगे।

प्रश्न 6.
देहि सिवा बर मोहि इहै ………. जूझ मरों॥
उत्तर:
गुरु जी परम शक्ति से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि मुझे ऐसा वरदान दो कि मैं कभी भी अच्छे कर्म करने से पीछे न हटूं। जब मैं युद्ध भूमि में जाऊँ तो मैं शत्रु से भयभीत न होऊँ, उससे भिड़ जाऊँ और अपनी विजय को निश्चित हिन्दी पुस्तक-12 बना दूं। मैं इस वीरता से लइँ कि मेरी जीत निश्चित हो जाए। मैं सदा मन से आपका ही शिष्य हूँ। इसी लालच से कि मैं आपके गुणों का गान कर रहा हूँ जब मेरी आयु की अवधि समाप्त हो जाए अर्थात् मेरी मृत्यु होने वाली हो तो मेरी यह इच्छा है कि मैं युद्ध भूमि में लड़ता हुआ मरूँ।

PSEB 12th Class Hindi Guide गुरु गोबिन्द सिंह Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
गुरु गोबिंद सिंह का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
22 दिसम्बर, सन् 1666 को बिहार के पटना शहर में।

प्रश्न 2.
गुरु जी ने खालसा पंथ की स्थापना कब और कहाँ की थी?
उत्तर:
सन् 1699 ई० को वैसाखी वाले दिन आनंदपुर साहिब में।

प्रश्न 3.
गुरु जी ने किन भाषाओं में साहित्य रचना की थी?
उत्तर:
फ़ारसी और ब्रज भाषाओं में।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह

प्रश्न 4.
‘वर याचना’ में किससे याचना की गई है?
उत्तर:
पारब्रह्म से।

प्रश्न 5.
गुरु जी के द्वारा निराकार-निर्गुण किसे कहा गया है?
उत्तर:
ईश्वर को।

प्रश्न 6.
किस का पार पाना अत्यंत कठिन है?
उत्तर:
आदि पुरुष का।

प्रश्न 7.
सतयुग में किन छत्रधारियों के अभिमान का उल्लेख किया गया है?
उत्तर:
राजा मान्धाता और रघुकुल के राजा दिलीप।

प्रश्न 8.
गुरु जी ने समदर्शी किसे कहा है?
उत्तर:
ईश्वर को।

प्रश्न 9.
गुरु जी के अनुसार परमात्मा में कौन-कौन से विकार नहीं होते?
उत्तर:
काम, क्रोध, लोभ, मोह, रोग, शोक, भोग, भय आदि।

प्रश्न 10.
गुरु जी ने परमात्मा से क्या-क्या मांगा था?
उत्तर:
अच्छे कर्म, निर्भयता और शक्ति।

प्रश्न 11.
गुरु जी कहाँ ज्योति-जोत समा गए थे?
उत्तर:
नांदेड़ (महाराष्ट्र)।

प्रश्न 12.
गुरु जी ने किन-किन अभिमानी और शक्तिशालियों के नाम उदाहरण स्वरूप दिए थे?
उत्तर:
राजा मान्धाता, दिलीप, दारा शिकोह और दुर्योधन।

प्रश्न 13.
‘चण्डी चरित्र’ किसकी रचना है ?
उत्तर:
गुरु गोबिन्द सिंह जी की।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 14.
काहे को डोलत है तुमरी सुधि,..
उत्तर:
सुंदर सिरी पदमापति लै है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह

प्रश्न 15.
भोग-भोग भूम…………………… ।
उत्तर:
अन्त भूम मैं मिलत हैं।

प्रश्न 16.
रूप राग न रेख………
उत्तर:
न जन्म मरन बिहीन। हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 17.
गुरु जी की वाणी ब्रजभाषा में नहीं है।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 18.
गुरु जी ने निराकार ब्रह्म का चित्रण किया था।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 19.
कवि ने नेताओं को किससे पीड़ित माना है?
उत्तर:
अहम् से पीड़ित।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. गुरु जी के अनुसार किसका पार पाना अत्यंत कठिन है ?
(क) आदि पुरुष का
(ख) प्रभु का ।
(ग) ईश्वर का
(घ) नदी का
उत्तर:
(क) आदि पुरुष का

2. गुरु जी ने समदर्शी किसे कहा है ?
(क) मन को
(ख) ईश्वर को
(ग) संसार को
(घ) धन को
उत्तर:
(ख) ईश्वर को

3. गुरु जी परम शक्ति से कौन से कार्य करने का वरदान मांगते हैं ?
(क) अच्छे कर्म
(ख) नित्य कर्म
(ग) सत्य कर्म
(घ) आदि कर्म
उत्तर:
(क) अच्छे कर्म

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह

4. रघुकुल के राजा कौन थे ?
(क) मान्धाता
(ख) दिलीप
(ग) अश्वात्थामा
(घ) महीप
उत्तर:
(ख) दिलीप

5. दुर्योधन जैसे बड़े-बड़े राजा किसके कारण नष्ट हो गए ?
(क) घमंड के
(ख) नमंड के
(ग) धन के
(घ) ईर्ष्या के
उत्तर:
(क) घमंड के

गुरु गोबिन्द सिंह सप्रसंग व्याख्या

देह सिवा, बर मोहि इहै, सुभ कर्मन ते कबहूँ न टरों।
न डरों अरि सों जब जाइ लरों, निसचे करि अपनी जीत करों।
अरु सिख हों अपने ही मन को, इह लालच हउ गुन तउ उचरों।
जब आव की अउध निदान बनै, अति ही रन में तब जूझ मरो॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
देह = प्रदान करो। इहै = यही। न टरों = न टलू, न हहूँ। अरि = शत्रु। सिख हों = शिष्य हूँ। आव = आयु। अउध = अवधि ।

प्रसंग:
प्रस्तुत सवैया गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा रचित ‘वर याचना’ शीर्षक कविता से लिया गया है। प्रस्तुत सवैया में गुरु जी ने पारब्रह्म की शक्ति से वर देने की याचना की है।

व्याख्या:
गुरु जी परम शक्ति से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि मुझे ऐसा वरदान दो कि मैं कभी भी अच्छे कर्म करने से पीछे न हटूं। जब मैं युद्ध भूमि में जाऊँ तो मैं शत्रु से भयभीत न होऊँ, उससे भिड़ जाऊँ और अपनी विजय को निश्चित हिन्दी पुस्तक-12 बना दूं। मैं इस वीरता से लइँ कि मेरी जीत निश्चित हो जाए। मैं सदा मन से आपका ही शिष्य हूँ। इसी लालच से कि मैं आपके गुणों का गान कर रहा हूँ जब मेरी आयु की अवधि समाप्त हो जाए अर्थात् मेरी मृत्यु होने वाली हो तो मेरी यह इच्छा है कि मैं युद्ध भूमि में लड़ता हुआ मरूँ।

विशेष:

  1. कवि ने आदि शक्ति से अपनी विजय तथा उनकी कृपा की कामना की है।
  2. ब्रजभाषा, सवैया छंद, अनुप्रास अलंकार तथा वीर रस है।

अकाल उस्तुति

रूप राग न रेख रंग, न जन्म मरन बिहीन।
आदि नाथ अगाध पुरुख, सुधरम करम प्रबीन।
जन्त्र मन्त्र न तन्त्र जाको, आदि पुरख अपार।
हसत कीट बिखै बसै सब, ठउर मैं निरधार॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
रूप राग न = अरूप। रेख-रंग न = निराकार, आकृति रहित। बिहीन = रहित। अगाध पुरुख = अकाल पुरुष। अपार = असीम, जिसे पार न किया जा सके। बिखै = बीच। ठउर = स्थान।

प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यावतरण गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा रचित ‘अकाल उस्तुति’ से अवतरित है। इसमें गुरु जी ने ईश्वर के स्वरूप का वर्णन किया है।

व्याख्या:
गुरु जी कहते हैं कि ईश्वर रूप, रंग और आकृति से रहित है अर्थात् वह निराकार, निर्गुण है। वह जन्म-मरण से भी परे है। वह अकाल पुरुष है; आदिनाथ है-जो धर्म और कर्म में कुशल है। उस पर जंत्र, तंत्र और मंत्र का कोई असर नहीं होता अथवा वह जंत्र, तंत्र और मंत्र से परे है। वह आदि पुरुष है जिसका पार पाना कठिन है। वह हाथी, कीड़े आदि सब में निराकार रूप से विद्यमान रहता है।

विशेष:

  1. कवि ने निराकार ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन किया है।
  2. ब्रज भाषा का प्रयोग है।
  3. शांत रस है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 4 गुरु गोबिन्द सिंह

सांसारिक नश्वरता

जोगी जती ब्रह्मचारी बड़े बड़े छत्रधारी,
छत्र ही की छाया कई कोस लौ चलत हैं।
बड़े बड़े राजन के दाबत फिरत देस,
बड़े बड़े राजनि के दर्प को दलत हैं।
मान से महीप औ दिलीप केसे छत्रधारी,
बड़ो अभिमान भुजदंड को करत है।
दारा से दिलीसर, दर्बोधन से मानधारी,
भोग-भोग भूम अन्त भूम मै मिलत हैं॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
जती = संन्यासी, तपस्वी। छत्रधारी = छत्र धारण करने वाले बड़े-बड़े महंत। कोस = दूरी का एक मापदंड-सवा मील का एक कोस होता है। दाबत फिरत = दबाते फिरते हैं, अधीन करते हैं । दर्प = घमंड। दलत हैं = कुचल देते हैं। मान से = सत युग के एक राजा-मान्धाता जैसे। महीप = राजा। दिलीप = रघुकुल के एक राजा-राजा दिलीप के पुत्र ही राजा रघु हुए जिनके नाम पर रघुकुल जाना जाता है। भुजदंड = भुजाओं की शक्ति, बाहुबल। दारा = शाहजहाँ का बेटा, औरंगज़ेब का बड़ा भाई। दिलीसर = दिल्ली का राजा। मानधारी = घमण्डी। भूम = भूमि।

प्रसंग:
प्रस्तुत कवित्त गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा लिखित ‘सांसारिक नश्वरता’ से लिया गया है, जिसमें गुरु जी ने सांसारिक नश्वरता पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या:
गुरु जी कहते हैं कि योगी, यती अर्थात् संन्यासी या तपस्वी तथा बड़े-बड़े छत्रधारी महंत, जो छत्रधारण कर कई-कई कोस चला करते थे तथा बड़े-बड़े राजा जो दूसरे देशों को अपने अधीन करते थे और बड़े-बड़े राजाओं के घमंड को चूर करते थे। सतयुग के राजा मान्धाता और रघुकुल के राजा दिलीप जैसे छत्रधारी जो अपने बाहुबल पर बड़ा अभिमान करते थे तथा दारा जैसे दिल्ली के बादशाह और दुर्योधन जैसे घमंडी राजा धरती का भोग कर अन्त में धरती में ही मिल गए अर्थात् सभी शक्तिशाली और घमंडी राजा अपनी मृत्यु को न टाल सके अन्त में वे सब मिट्टी में मिल गए।

विशेष:

  1. गुरु जी के कहने का अभिप्राय यह है कि यह संसार अथवा यह मानव शरीर नाशवान् है अतः इस पर घमण्ड नहीं करना चाहिए।
  2. ब्रज भाषा सरल, सरस एवं प्रवाहमयी है।
  3. कवित्त छंद एवं शांत रस है।
  4. अनुप्रास एवं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

भक्ति भावना

काम न क्रोध न लोभ न मोह न रोग न सोग न भोग न भै है।
देह बिहीन सनेह सभो तन नेह बिरकत अगेह अछै है॥
जान को देत अजान को देत, जमीन को देत जमान को दै है।
काहे को डोलत है तुमरी सुधि, सुन्दर सिरी पदमापति लै है।

कठिन शब्दों के अर्थ:
भोग = भोग विलास, ऐश्वर्य। सभी तन = सबसे। विरकत = विरक्त, उदासीन । अगेह = बिना घर-बार के। डोलत = भटकते। सुधि लैहे = ध्यान पदमापति = लक्ष्मी के पति, भगवान विष्णु।

प्रसंग:
प्रस्तुत सवैया गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा लिखित ‘भक्ति भावना’ प्रसंग से लिया गया है, जिसमें कवि ने सहजभाव से परमात्मा पर आस्था रखने के लिए कहा है।

व्याख्या:
प्रस्तुत सवैया में गुरु गोबिन्द सिंह जी ईश्वर की विशेषताओं का परिचय देते हुए कहते हैं कि उस ईश्वर में काम, क्रोध, लोभ, मोह, रोग, शोक, भोग, भय आदि कुछ नहीं है अर्थात् वह इन विकारों से परे हैं। वह देह रहित है, सबसे स्नेह करने वाला है फिर भी विरक्त है। उसका कोई घर बार नहीं, वह सबसे अच्छा है। वह जानने वालों को भी देता है और अनजानों को भी देता है अथवा वह ज्ञानियों और अज्ञानियों दोनों को देता है, ज़मीन वाले को और बिना ज़मीन वाले को भी देता है अर्थात् अमीर हो या ग़रीब वह सब को देता है। अरे मूर्ख मनुष्य तू इधर उधर क्यों भटकता फिरता है तुम्हारी सुध तो सुंदर लक्ष्मीपति श्री विष्णु भगवान लेंगे।

विशेष:

  1. कवि ईश्वर को समदर्शी बताते हुए सब की सुध लेने वाला बताया है।
  2. ब्रजभाषा सरल, सरस एवं प्रवाहमयी है।
  3. सवैया छंद एवं शांत रस है।
  4. अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।

गुरु गोबिन्द सिंह Summary

गुरु गोबिन्द सिंह जीवन परिचय

गुरु गोबिन्द सिंह जी का जीवन परिचय दीजिए।

सिखों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म 22 दिसम्बर, सन् 1666 ई० को बिहार प्रदेश के पटना शहर में हुआ। अपने पिता गुरु तेग़ बहादुर जी के हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए बलिदान देने पर नौ वर्ष की अवस्था में ही आप गुरु गद्दी पर विराजमान हुए। गुरु जी ने अपने जीवन काल में मुग़ल शासकों के साथ अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं। इन लड़ाइयों में गुरु जी के बेटे भी शहीद हुए। सन् 1699 ई० की वैसाखी वाले दिन गुरु जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होंने न केवल अपना नाम गोबिन्द राय से गोबिन्द सिंह किया बल्कि प्रत्येक सिक्ख को अपने नाम के साथ सिंह शब्द जोड़ने का आदेश भी दिया।

गुरु जी ने अपने जीवन में अनेक साहित्यिक रचनाएँ भी की, जिनमें जाप साहिब, चंडी चरित्र, बिचित्तर नाटक, गोबिन्द गीता और गिआन प्रबोध प्रसिद्ध हैं। गुरु जी ने फ़ारसी और ब्रज भाषाओं में साहित्य रचा। 7 अक्तूबर, सन् 1708 ई० में नांदेड़ (महाराष्ट्र) में गुरु जी ज्योति-जोत समा गए।

गुरु गोबिन्द सिंह छंदों का सार

श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा रचित ‘वर याचना’ में कवि ने परमब्रह्म की शक्ति से शुभ कर्म करने, युद्धभूमि में वीरता से लड़ने की याचना की है। ‘अकाल उस्तुति’ में उन्होंने निराकार किन्तु कण-कण में व्याप्त अकाल पुरूष का वर्णन किया है। ‘सांसारिक नश्वरता’ में कवि ने मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराते हुए बताया है. कि सब ने एक दिन मिट्टी में मिल जाना है। ‘भक्ति भावना’ में कवि ने ईश्वर के सर्वपालक रूप का वर्णन करते हुए उन्हें संसार के प्रत्येक प्राणी का ध्यान रखने वाला बताया है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 3 बिहारी

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 3 बिहारी Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 3 बिहारी

Hindi Guide for Class 12 PSEB बिहारी Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 40 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
बिहारी के भक्तिपरक दोहों में श्रीकृष्ण के किस स्वरूप का चित्रण किया गया है ? वर्णन करें।
उत्तर:
बिहारी के भक्तिपरक दोहों में श्रीकृष्ण का जो स्वरूप चित्रण किया गया है उसमें उनके सिर पर मोर के पंख वाला मुकुट लगा है। कमर में उन्होंने तड़ागी पहन रखी है। उन्होंने हाथों में मुरली पकड़ रखी है और उन्होंने गले में वैजयंती माला पहन रखी है।

प्रश्न 2.
बिहारी के भक्तिपरक दोहों की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
बिहारी के भक्तिपरक दोहों में राधा वल्लभ सम्प्रदाय का अनुकरण करते हुए सतसई के आरम्भ में राधा जी की स्तुति की है। दूसरे सतसई में अधिकांश दोहे शृंगारपरक हैं अतः कवि ने शृंगार रस के मुख्य प्रवर्तक श्रीकृष्ण और राधा की युगल मूर्ति की स्तुति की है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 3 बिहारी

प्रश्न 3.
बिहारी के सौन्दर्य चित्रण में श्रीकृष्ण की तुलना किससे की गई है ?
उत्तर:
बिहारी ने श्रीकृष्ण के सौन्दर्य का चित्रण करते हुए कहा है कि श्रीकृष्ण साँवले शरीर वाले पीले वस्त्र ओढ़े हुए ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो नीलम की मणि के पर्वत पर प्रभात वेला के सूर्य का प्रकाश पड़ रहा हो।

प्रश्न 4.
बिहारी ने गुणों के महत्त्व को बड़प्पन के लिए आवश्यक बताते हुए क्या उदाहरण दिया है ? स्पष्ट
उत्तर:
बिहारी ने गुणों के महत्त्व को बड़प्पन के लिए आवश्यक बताते हुए धतूरे और सोने का उदाहरण दिया है। दोनों को ही कनक कहा जाता है किन्तु धतूरे से गहने नहीं गढ़वाये जा सकते। इसलिए महत्त्व गुणों का है न कि नाम का।

प्रश्न 5.
बिहारी के अनुसार लालची व्यक्ति का कैसा स्वभाव होता है ?
उत्तर:
बिहारी के अनुसार लालची व्यक्ति ने चूंकि आँखों पर लोभ का चश्मा चढ़ाया होता है इसलिए वह प्रत्येक व्यक्ति के पास दीन बनकर भीख माँगने जाता है। लोभ का चश्मा पहनने के कारण उसे छोटा व्यक्ति भी बड़ा दिखाई देता है। वह यह नहीं देखता कि वह व्यक्ति उसे कुछ दे भी सकता है या नहीं।

(ख) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 6.
मेरी भव बाधा हरौ …………. दुति होइ।
उत्तर:
कवि कहता है कि जिस चतुर राधा के सुन्दर तन की झलक पड़ने मात्र से अर्थात् जिसके दर्शन मात्र से श्रीकृष्ण प्रसन्न हो उठते हैं, उसी राधा से मेरा निवेदन है कि मेरी सांसारिक मुसीबतों या दुःखों से मुझे मुक्ति दिलाएँ।

प्रश्न 7.
अति अगाधु ……………. प्यास बुझाइ।
उत्तर
जो वस्तु व्यक्ति के समय पर काम आए वही उसके लिए बड़ी होती है इसी तथ्य पर प्रकाश डालते हुए कवि कहते हैं कि नदी, कुआँ, सरोवर और बावड़ी चाहे कितने ही गहरे हों या उथले हों मनुष्य की प्यास जिस जलाशय से बुझती है वही उसके लिए सागर सिद्ध होता है।

PSEB 12th Class Hindi Guide बिहारी Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बिहारी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
ग्वालियर के निकट गाँव गोबिंदपुर और सन् 1595 में।

प्रश्न 2.
बिहारी सतसई में कुल कितने दोहे हैं?
उत्तर:
713 दोहे।

प्रश्न 3.
बिहारी किस संप्रदाय से संबंधित थे?
उत्तर:
राधा वल्लभ संप्रदाय से।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 3 बिहारी

प्रश्न 4.
नायिका के माथे पर लगी बिंदी उसकी सुंदरता को कितना बढ़ा देती है?
उत्तर:
असंख्य गुणा।

प्रश्न 5.
‘नीलमणि के पर्वत पर सुबह की पीली-पीली धूप’ के माध्यम से किसे व्यक्त किया गया है?
उत्तर:
श्री कृष्ण की शोभा को।

प्रश्न 6.
नीति के आधार पर अधिक धन जोड़ने को बिहारी ने कैसा माना है?
उत्तर:
अनुचित।

प्रश्न 7.
बिहारी के काव्य की प्रमुख भाषा कौन-सी है?
उत्तर:
ब्रजभाषा। ।

प्रश्न 8.
लालची व्यक्ति का लालच कब समाप्त होता है?
उत्तर:
कभी भी नहीं।

प्रश्न 9.
बिहारी के अनुसार सबसे बड़ी वस्तु कौन-सी होती है?
उत्तर:
जो वस्तु समय पर काम आए वही सब से बड़ी होती है।

प्रश्न 10.
कोई भी व्यक्ति किससे गुणवान बनता है?
उत्तर:
अपने गुणों से।

प्रश्न 11.
श्री कृष्ण के गले में कौन-सी माला शोभा देती है?
उत्तर:
वैजयंती माला।

प्रश्न 12.
धतूरे और सोने को बिहारी ने किस एक ही नाम से व्यक्त किया है?
उत्तर:
कनक।

प्रश्न 13.
बढ़त-बढ़त संपति सलिल में किन दो अलंकारों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश ।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 14.
खाए खरचे जो बचे, तो…..
उत्तर:
जोरियै करोरि।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 3 बिहारी

प्रश्न 15.
घर-घर डोलत दीन ह्वै…..
उत्तर:
जन-जन या चल जाइ।

प्रश्न 16.
घटत-घटत पुनि न घटै………….
उत्तर:
बरू समूल कुम्हिलाइ।

प्रश्न 17.
जा तनको झांई प..
उत्तर:
स्याम हरित-दुति होई।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 18.
बिहारी की काव्य भाषा अवधी थी।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 19.
बिहारी ने अपने जीवन काल में एक ही पुस्तक की रचना की थी।
उत्तर:
हाँ।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. बिहारी किस काल के कवि हैं ?
(क) आदिकाल
(ख) भक्तिकाल
(ग) रीतिकाल
(घ) आधुनिक काल
उत्तर:
(ग) रीतिकाल

2. बिहारी किस भाषा के कवि थे ?
(क) ब्रज
(ख) अवधी
(ग) खड़ी बोली
(घ) हिंदी
उत्तर:
(क) ब्रज

3. नायिका के माथे पर बिंदी लगाने से उसकी शोभा कितने गुणा बढ़ जाती है ?
(क) अनगिनत
(ख) गिनत
(ग) अत्यंत
(घ) अतीव
उत्तर:
(क) अनगिनत

4. संसार में व्यक्ति किससे गुणवान बनता है ?
(क) धन से
(ख) तन से
(ग) गुणों से
(घ) शिक्षा से
उत्तर:
(ग) गुणों से

बिहारी सप्रसंग व्याख्या

1. मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।
जा तन को झाँई परें, स्यामु हरित-दुति होई॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
भव = संसार । बाधा = रुकावटें, विघ्न। भव बाथा = सांसारिक दुःख या कष्ट । झाँई = परछाईं, झलक,ध्यान। परै = पड़ते ही। स्यामु = श्रीकृष्ण, काले पदार्थ-दुःख दारिद्र आदि। हरित-दुति = हरे रंग वाला, हरा भरा।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि बिहारी द्वारा लिखित बिहारी सतसई में संकलित ‘भक्ति वर्णन’ शीर्षक दोहों में से लिया गया है। प्रस्तुत दोहे में कवि सतसई के मंगलाचरण के रूप में श्रीराधा जी की स्तुति कर रहा है।

व्याख्या:
कवि कहता है कि जिस चतुर राधा के सुन्दर तन की झलक पड़ने मात्र से अर्थात् जिसके दर्शन मात्र से श्रीकृष्ण प्रसन्न हो उठते हैं, उसी राधा से मेरा निवेदन है कि मेरी सांसारिक मुसीबतों या दुःखों से मुझे मुक्ति दिलाएँ।

विशेष:

  1. कवि बिहारी मूलतः राधा वल्लभीय सम्प्रदाय के अनुयायी थे इसी कारण उन्होंने राधा जी से मंगलाचरण में प्रार्थना की है।
  2. ब्रज भाषा का प्रयोग है।
  3. श्रृंगार रस एवं लक्षणा शब्द शक्ति का प्रयोग है।
  4. श्लेष, काव्यलिंग तथा अनुप्रास अलंकार हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 3 बिहारी

2. जप माला छापा तिलक सरै न एकौ काम।
मन काँचै नाचै वृथा, साँचे राँचै राम॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
जप माला = नाम जपने की माला। छापा = माथे पर लगाया जाने वाला छापा-तीन लकीरें । सरै = पूरा नहीं होता। काँचै = कच्चा, भक्ति रहित। वृथा = व्यर्थ में । राँचै = प्रसन्न होता है।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित सतसई के भक्तिवर्णन’ प्रसंग से लिया गया है। जिसमें कवि ने सत्यनिष्ठ भाव से प्रभु भक्ति पर बल दिया है।

व्याख्या:
कवि भक्ति के क्षेत्र में आडम्बर का खंडन करता हुआ भक्ति में सच्ची निष्ठा को कसौटी मानते हुए कहता है कि भगवान् का नाम जपने वाली माला, माथे पर लगाया जाने वाला छापा और तिलक इन सभी से कोई भी काम पूरा नहीं होता क्योंकि यह सब तो दिखावा मात्र है। यदि व्यक्ति के मन में सच्ची भक्ति नहीं है तो वह अकारण ही (व्यर्थ ही) नाचता है। अर्थात् उछलकूद करके भगवान् का कीर्तन या भजन करता है किन्तु भगवान् तो सच्चे भक्त पर ही प्रसन्न होते हैं अर्थात् भगवान् को किसी प्रकार का आडम्बर पसन्द नहीं वह तो सच्ची निष्ठा ही पसन्द करते हैं।

विशेष:

  1. संत कबीर ने भी कहा है
    माला फेरत जग मुया गया न मन का फेर।
    कर का मनका डारिके मनका मनका फेर॥
    कवि ने आडंबरपूर्ण भक्ति का विरोध किया है।
  2. ब्रज भाषा हैं।
  3. दोहा छंद एवं संगीतात्मकता का प्रवाह है।
  4. अनुप्रास एवं यमक अलंकार है।

सौंदर्य वर्णन

3. सोहत औढ़े, पीत पटु,स्याम सलौने गात।
मनौ नीलमनि सैल पर, आतपु परयौ प्रभात॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
सोहत = शोभा पाते हैं। पीत पटु = पीले कपड़े। स्याम = साँवले। सलौने = सुन्दर।गात = शरीर। मनौ = मानो। नीलमनि सैल = नीलम मणि के पर्वत पर। आतपु = धूप। प्रभात = प्रातः, सुबह।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि बिहारी द्वारा लिखित ‘बिहारी सतसई’ में संकलित ‘सौंदर्य वर्णन’ शीर्षक दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने नायक के सांवले रूप-सौन्दर्य का चित्रांकन किया है।

व्याख्या:
नायिका की सखी नायक की अनुपम शोभा का वर्णन करके उसके चित्त में अनुराग उत्पन्न करने के लिए कहती है कि-हे सखी! नायक के साँवले वर्ण के सुन्दर शरीर पर पहने हुए वस्त्र ऐसे शोभा पा रहे हैं मानो नीलमणि के पर्वत पर सुबह के समय की पीली-पीली धूप पड़ रही हो।

विशेष:

  1. नायक के रूप-सौंदर्य का आकर्षक वर्णन किया गया है।
  2. ब्रजभाषा, दोहा छंद, अनुप्रास तथा उत्पेक्षा अलंकार हैं।

4. कहत सबै बेंदी दिए अंक दस गुनौ होत।
तिय लिलार बेंदी दिए अगनित बढ़तु उदोत॥

कठिन शब्दों के अर्थ:

बेंदी = बिंदी, बिन्दु, जीरो, सिफर। अंक = हिनसा, अंक, संख्यावाचक।तिय ललार = स्त्री के माथे पर। अगनित = असंख्य, अनगिनत। उदोत = काँति, शोभा, अंक की दृष्टि से मूल्य।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित सतसई के ‘सौंदर्य वर्णन’ प्रसंग से लिया गया है, जिसमें कवि ने नायिका के सौंदर्य का वर्णन किया है।

व्याख्या:
नायिका ने अपने माथे पर बिन्दी लगा रखी है जिससे उसकी सुन्दरता और भी बढ़ गई है। नायिका के इस रूप को देख कर नायक मोहित हो जाता है। वह कहता है कि सभी कहते हैं कि बिन्दु लगाने से अंक दस गुना हो जाता हैजैसे एक को बिन्दु लगाने पर दस और दस को बिन्दु लगाने पर सौ हो जाता है उसका मूल्य दस गुना बढ़ जाता है किन्तु स्त्री के माथे पर बिन्दु लगाने से उसकी शोभा कई गुणा बढ़ जाती है।

विशेष:

  1. कवि के अंक ज्ञान का परिचय मिलता है। जिसे उसने नायिका की सौंदर्य वृद्धि में प्रयोग किया है।
  2. ब्रजभाषा है।
  3. दोहा छंद है।

नीति के दोहे

5. बड़े न हजै मनन बिन, विरद बड़ाई पाय।
कहत धतूरे सौ कनक, गहनो गढ़यो न जाय॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
न हजै = नहीं हो सकता। बिन = बिना। विरद बड़ाई = यश की प्रशंसा। धतूरा = एक नशीला पौधा। कनक = सोना।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि बिहारी द्वारा लिखित ‘बिहारी सतसई’ के ‘नीति’ शीर्षक दोहों में से लिया गया है। इसमें कवि ने मनुष्य के गुणों की महानता की अभिव्यक्ति की है।

व्याख्या:
गुणों के अभाव में केवल व्यर्थ की प्रशंसा के सहारे कोई बड़ा नहीं बन सकता। इसी तथ्य पर प्रकाश डालते हुए कवि कहते हैं कि बिना गुणों के केवल व्यर्थ की प्रशंसा पाकर कोई बड़ा नहीं बन सकता, जिस प्रकार धतूरे को कनक भी कहते हैं जो सोने का पर्याय है किन्तु धतूरे से गहने नहीं गढ़े जा सकते अर्थात् धतूरे को कनक कह देने से उसमें सोने के गुण नहीं आ सकते। अतः महत्त्व गुणों का है न कि व्यर्थ की प्रशंसा का।।

विशेष:

  1. मनुष्य केवल गुणों से ही महान बन सकता है, झूठी प्रशंसा से नहीं।
  2. ब्रजभाषा का प्रयोग है।
  3. उपदेशात्मक शैली है।
  4. दोहा छंद है।
  5. अनुप्रास अलंकार है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 3 बिहारी

6. अति अगाधु, अति औथरौ, नदी, कूपु सुरु बाइ।
सो ताकौ सागरू, जहाँ जाकी प्यास बुझाइ॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
अगाधु = अथाह, गहरे। औथरौ = उथली, छिछला। कूपु = कुआँ। सरू = सरोवर। बाई = बावड़ी, बाऊली।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित सतसई के ‘नीति के दोहे’ प्रसंग से लिया गया है, जिसमें कवि ने समय पर काम आने वाली वस्तु को श्रेष्ठ माना है।

व्याख्या:
जो वस्तु व्यक्ति के समय पर काम आए वही उसके लिए बड़ी होती है इसी तथ्य पर प्रकाश डालते हुए कवि कहते हैं कि नदी, कुआँ, सरोवर और बावड़ी चाहे कितने ही गहरे हों या उथले हों मनुष्य की प्यास जिस जलाशय से बुझती है वही उसके लिए सागर सिद्ध होता है।

विशेष:

  1. वस्तु वही महान् होती है जो समय पर काम आए। यदि कोई छोटा व्यक्ति भी समय पर काम आता है या सहायता करता है तो वह व्यक्ति छोटा न होकर महान् कहलाता है।
  2. ब्रज भाषा सरल एवं सरस है।
  3. दोहा छंद है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।

7. जगत जनायौ जिहि सकलु सो हरि जान्यो नाहिं।
ज्यों आँखिन सब देखिये, आँख न देखी जाहिं॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
जनायौ = ज्ञान दिया गया। जिहि = जिस के द्वारा। सकलु = सम्पूर्ण । हरि = ईश्वर। देखियै = देखा जाता है।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित सतसई के ‘नीति के दोहे’ प्रसंग से लिया गया है, जिसमें कवि ने जीवनोपयोगी तथ्यों का निरूपण किया है।

व्याख्या:
कवि ने यह बताया है कि ईश्वर की सच्ची अनुभूति आत्मज्ञान से ही सम्भव है। कवि कहते हैं कि जिस ईश्वर द्वारा हमें सारे संसार का ज्ञान प्राप्त हुआ उसी ईश्वर को हम नहीं जान पाए। ईश्वर की कृपा के कारण ही हम इस संसार में जन्मे और संसार का ज्ञान प्राप्त कर सके किन्तु यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि हमारे लिए वही ईश्वर अपरिचित रहा अर्थात् हम उसे जान नहीं सके। हमारी स्थिति ठीक उस आँख की तरह है जो संसार भर को देख लेती है किन्तु अपने आप को नहीं देख पाती। मनुष्य की आँखें औरों को देख सकती हैं, अपने आप को नहीं।

विशेष:

  1. अज्ञानता के कारण मानव ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर पाता।
  2. ब्रज भाषा है।
  3. दोहा छंद का प्रयोग है।
  4. अनुप्रास अलंकार है।

8. घर घर डोलत दीन द्वै, जन जन याचत जाइ।
दिये लोभ-चसमा चखनि, लघु पुनि बड़ो लखाइ॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
ह्वै = होकर। जन-जन = हर व्यक्ति। याचत जाइ = जा जाकर भीख माँगता है। लोभ-चसमा = लालच रूपी चश्मा। चखनि = आँखों पर। लघु = छोटा। पुनि = फिर। लखाइ = दिखाई देता है।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित सतसई के ‘नीति के दोहे’ प्रसंग से लिया गया है, जिसमें कवि ने जीवनोपयोगी तथ्यों का निरूपण किया है। प्रस्तुत दोहे में कवि लोभी व्यक्ति के व्यवहार की निन्दा कर रहे हैं।

व्याख्या:
कवि कहते हैं कि लोभी व्यक्ति अपनी आँखों पर लालच रूपी चश्मा चढ़ाकर और प्रकट रूप से दीन बन कर घर-घर जाता है और हर व्यक्ति से भीख माँगता है। लोभ का चश्मा चढ़ाये होने के फलस्वरूप उसे छोटा व्यक्ति भी बड़ा दिखाई पड़ता है अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति से कुछ-न-कुछ पाने की आस रखता है। लोभ का चश्मा चढ़ा होने के कारण वह यह भी नहीं देख पाता कि व्यक्ति भीख देने में समर्थ है भी या नहीं।

विशेष:

  • लालची व्यक्ति का लालच कभी कम नहीं होता है।
  • ब्रज भाषा सरल एवं सरस है।
  • दोहा छंद है।
  • अनुप्रास, रूपक एवं पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 3 बिहारी

9. बढ़त बढ़त संपति-सलिल, मन-सरोज बढ़ि जाइ।
घटत घटत पुनि न घटै, बरू समूल कुम्हिलाइ॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
संपति-सलिल = संपत्ति (धन) रूपी पानी। मन-सरोज = मन रूपी कमल। पुनि न = फिर नहीं। बरू = बल्कि। समूल = जड़ सहित, मूलधन सहित। कुम्हिलाइ = मुरझा जाता है, हानि हो जाती है।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित सतसई के ‘नीति के दोहे’ प्रसंग से लिया गया है, जिस में कवि ने जीवनोपयोगी तथ्यों का निरूपण किया है।

व्याख्या:
कवि धन की प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए कवि कहते हैं कि मनुष्य जीवन में धन रूपी जल जैसे-जैसे बढ़ता जाता है उसका मन रूपी कमल भी विकसित होता रहता है अर्थात् उसके मन में अनेक प्रकार की सांसारिक इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं किन्तु जब यह धन रूपी जल धीरे-धीरे घटना शुरू होता है तो उसका मन रूपी कमल जड़सहित मुरझा जाता है अर्थात् वह धीरे-धीरे नहीं अपितु जड़सहित नष्ट हो जाता है। जैसे पानी घटने पर कमल एकदम मुरझा जाता है उसी प्रकार व्यक्ति के जीवन में जैसे-जैसे धन की वृद्धि होती.जाती है वैसे-वैसे उसकी इच्छाएँ भी बढ़ती जाती हैं और जब धन घटने लगता है तो उसके मन की इच्छाएँ भी समाप्त हो जाती हैं।.

विशेष:

  1. मन की कामनाएँ धन की वृद्धि अथवा कमी के अनुसार बढ़ती-घटती रहती हैं।
  2. ब्रज भाषा सरल, सरस एवं प्रवाहमयी है।
  3. दोहा छंद है।
  4. अनुप्रास, रूपक एवं पुनरुक्ति प्रकाश की छटा है।

10. मीत न नीति गलीत हौ, जो धरियै धन जोरि।
खाए खरचे जो बचे, तो जोरियै करोरि॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
मीत = मित्र। न नीति = नीति नहीं है अर्थात् नीति की दृष्टि से उचित नहीं है। गलीत हौ = दुर्दशा में रहकर। धरियै = रखो। जोरि = जोड़कर।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित सतसई के ‘नीति के दोहे’ प्रसंग से लिया गया है, जिसमें कवि ने जीवनोपयोगी तथ्यों का वर्णन किया है।

व्याख्या:
कवि धन जोड़ने की नीति बताते हुए कहते हैं कि यदि अपनी दुर्दशा करके धन जोड़ा जाए तो यह नीति की दृष्टि से उचित नहीं है। यदि खाने-खर्चने के बाद अर्थात् आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करने के बाद यदि कुछ बचता है तो करोड़ों रुपए जोड़े जा सकते हैं। कहने का भाव यह है कि मन मार कर या आवश्यक वस्तुओं पर खर्च न करके धन जोड़ना उचित नहीं है, हाँ यदि खाने-खर्चने के बाद कुछ धन बच जाता है तो करोड़ों जोड़े जा सकते हैं।

विशेष:

  1. मनुष्य को धन-संग्रह अपनी भावनाओं को मार कर नहीं करना चाहिए।
  2. ब्रज भाषा सरल एवं प्रवाहमयी है।
  3. ब्रजभाषा एवं संगीतात्मकता का समावेश है।
  4. दोहा छंद है।
  5. अनुप्रास अलंकार है।

11. गुनी गुनी सबकै कहैं निगुनी गुनी न होतु।
सुन्यौ कहूँ तरु अरक तें, अरक-समानु उदोतु॥

कठिन शब्दों के अर्थ:
सबकै कहैं = सबके कहने पर। निगुनी = गुण विहीन। गुनी = गुणवान। अरक = आक (मदार) का पौधा। अरक-समानु = सूर्य जैसा। उदोतु = प्रकाश।।

प्रसंग:
प्रस्तुत दोहा बिहारी द्वारा रचित सतसई के ‘नीति के दोहे’ प्रसंग से लिया गया है, जिस में कवि ने जीवनोपयोगी तथ्यों का वर्णन किया है।

व्याख्या:
कवि ने बताया है कि मात्र प्रशंसा करने से कोई अमीर नहीं हो जाता। कवि कहते हैं कि यदि सभी लोग किसी गुण विहीन व्यक्ति को गुणवान कहकर पुकारने लगे तो वह कभी भी गुणवान नहीं हो सकता अर्थात् व्यक्ति गुणवान अपने गुणों से होता है, नाम से नहीं। क्या आक के पौधे से प्रकाश निकलता हुआ देखा है जबकि आक के पौधे और सूर्य दोनों को ही अरक कहा जाता है।

विशेष:

  1. मात्र प्रशंसा से कोई महान नहीं हो सकता।
  2. ब्रज भाषा सरस एवं प्रवाहमयी है।
  3. दोहा छंद है।
  4. अनुप्रास एवं उपमा अलंकार है।

बिहारी Summary

बिहारी जीवन परिचय

प्रश्न-कवि बिहारी लाल का संक्षिप्त जीवन परिचय दीजिए।

रीतिकाल के प्रसिद्ध कवि बिहारी लाल का जन्म ग्वालियर के निकट गाँव बसुवा गोबिंदपुर में सन् 1595 को हुआ। इनके पिता केशव राय माथुर चौबे ब्राह्मण थे। सात-आठ वर्ष की अवस्था में आप अपने पिता के साथ ओरछा चले आए, इन्होंने यहीं केशवराय से काव्य की शिक्षा ली थी। विवाह के पश्चात् वे अपनी ससुराल मथुरा में रहने लगे थे। जयपुर नरेश जयसिंह ने इनकी प्रतिभा से प्रसन्न होकर इन्हें अपना राजकवि बना लिया था। यहीं पर इन्होंने ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘बिहारी सतसई’ की रचना की थी। उसके प्रत्येक दोहे पर इन्हें राजा ने एक स्वर्ण मुद्रा पुरस्कारस्वरूप प्रदान की थी। बिहारी सतसई में कुल 713 दोहे हैं। पत्नी का देहान्त होने पर बिहारी विरक्त होकर वृन्दावन आ गए। यहीं सन् 1663 में इनका निधन हो गया।

बिहारी दोहों का सार

बिहारी द्वारा रचित भक्ति के दोहों में राधा जी से सांसारिक बाधाओं से मुक्ति प्रदान करने की याचना की गई है तथा आडंबरपूर्ण भक्ति को व्यर्थ बताया गया है। सौंदर्य-वर्णन में नायक और नायिका के सौंदर्य का आकर्षक चित्रण किया गया है तथा नीति के दोहों में व्यर्थ की प्रशंसा के स्थान पर गुणों को महत्त्व देने, समय पर काम आई वस्तु को श्रेष्ठ मानने, अज्ञानता के कारण ईश्वर को न जानने, लोभ के दुर्गुणों तथा उचित धन संग्रह के संबंधों में बताया गया है।