PSEB 6th Class Science Notes Chapter 13 चुंबक द्वारा मनोरंजन

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 13 चुंबक द्वारा मनोरंजन

→ मैग्नेटाइट एक प्राकृतिक चुंबक है।

→ कुछ चट्टानों में लोहे को आकर्षित करने का गुण होता है। उन्हें प्राकृतिक चुंबक कहते हैं।

→ चुंबक, लोहा, निकिल तथा कोबाल्ट जैसे कुछ पदार्थों को आकर्षित करता है। ऐसे पदार्थों को चुंबकीय पदार्थ कहते हैं।

→ जिन पदार्थों में लोहे को आकर्षित करने का गुण मौजूद होता है, उन्हें चुंबक कहते हैं।

→ ऐसे पदार्थ जो चुंबक द्वारा आकर्षित नहीं होते हैं, उन्हें अचुंबकीय पदार्थ कहते हैं।

→ प्रत्येक चुंबक के दो ध्रुव होते हैं-

  1. उत्तरी ध्रुव तथा
  2. दक्षिणी ध्रुव।

→ स्वतंत्रतापूर्वक लटकाने पर चुंबक सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में आकर ठहरता है।

→ दो चुंबक को असमान (विपरीत ध्रुव) एक-दूसरे को परस्पर आकर्षित करते हैं जबकि समान ध्रुव अपकर्षित करते हैं।

→ मनुष्य द्वारा बनाए गए चुंबक बनावटी चुंबक (कृत्रिम चुंबक) कहलाते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 13 चुंबक द्वारा मनोरंजन

→ लोहे के टुकड़े से बने चुंबक को कृत्रिम चुंबक कहते हैं।

→ चुंबक विभिन्न आकृतियों और आकार के होते हैं, जैसे-छड़ चुंबक, नाल चुंबक (हार्स शू अथवा यू शेप), बेलनाकार (सिलिंडरीकार)अथवा गोलांत चुंबक।

→ कंपास (दिक सूचक) को दिशा निर्धारण करने के लिए उपयोग किया जाता है।

→ जब किसी चुंबक को कंपास के समीप लाया जाता है तो कंपास की सूई विक्षेपित हो जाती है।

→ चुंबक को गर्म करने पर तथा हथौड़े से पीटने पर अथवा ऊंचाई से गिराने पर चुंबक अपना गुण खो देता है।

→ यदि चुंबक का सही ढंग से रख-रखाव न किया जाए तो चुंबक के गुण समय के साथ समाप्त हो जाते हैं।

→ छड़ चुंबकों को सुरक्षित रखने के लिए चुंबक के जोड़ों में असमान ध्रुवों को पास-पास रखा जाता है।

→ चुंबक को कैसेट, मोबाइल, टेलीविज़न, सी०डी०, कंप्यूटर आदि से दूर रखना चाहिए।

→ कंपास (दिक्-सूचक )–कंपास एक ऐसी युक्ति है जो दिशा निर्धारित के लिए उपयोग की जाती है।

→ चुंबक-वे पदार्थ जिनमें लोहे को आकर्षित करने का गुण होता है, चुंबक कहलाते हैं।

→ मैग्नेटाइट-मैग्नेटाइट एक प्राकृतिक चुंबक है जो सबसे पहले यूनान के गडरिए मैग्नस ने खोज निकाला था।

→ उत्तरी ध्रुव-स्वतंत्रतापूर्वक लटक रहे चुंबक का जो सिरा भौगोलिक उत्तर दिशा की ओर संकेत करता है, वह चुंबक का उत्तरी ध्रुव कहलाता है।

→ दक्षिणी ध्रुव-स्वतंत्रतापूर्वक लटक रहे चुंबक का जो सिरा भौगोलिक दक्षिण दिशा की ओर संकेत करता है, वह चुंबक का दक्षिणी ध्रुव कहलाता है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 12 विद्युत तथा परिपथ

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 12 विद्युत तथा परिपथ

→ बिजली सेल बिजली ऊर्जा का एक स्रोत है।

→ बिजली सेल के दो टर्मिनल होते हैं-एक धन टर्मिनल (+) तथा दूसरा ऋण टर्मिनल (-)।

→ बिजली बल्ब में एक फिलामैंट (तंतु) होता है जो इसके टर्मिनलों से जुड़ा होता है।

→ बिजली धारा प्रवाहित होने के कारण बल्ब दीप्तिमान हो जाता है।

→ बंद बिजली सर्किट में बिजली धारा बिजली सेल के एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल तक प्रवाहित होती है।

→ स्विच एक सरल युक्ति है जो बिजली धारा के प्रवाह को रोकती और चालू करने के लिए सर्किट का उपयोग की जाती है।

→ वे पदार्थ जो अपने में से बिजली धारा को प्रवाहित होने देते हैं, उन्हें बिजली चालक कहते हैं।

→ वे पदार्थ जो अपने में से बिजली धारा को प्रवाहित नहीं होने देते हैं, उन्हें बिजली रोधक कहते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 12 विद्युत तथा परिपथ

→ प्रकाश उत्सर्जित करने वाले बारीक तार को बल्ब का फिलामैंट (तंतु) कहा जाता है।

→ बल्ब का फिलामैंट (तंतु) खंडित होने पर बल्ब फ्यूज़ हो जाता है।

→ बिजली धारा के पथ को बिजली सर्किट (परिपथ) कहते हैं।

→ बल्ब-यह एक ऐसी युक्ति है जो बिजली धारा के प्रवाहित होने पर प्रकाश उत्सर्जित करती है।

→ बिजली चालक-जिन पदार्थों में से बिजली धारा गुज़र सकती है, उन्हें बिजली चालक कहते हैं।

→ बिजली सेल-बिजली सेल, बिजली का एक स्रोत है। इसमें जमा किए गए रसायनिक पदार्थों से बिजली धारा उत्पन्न होती है।

→ बिजली सर्किट (परिपथ)-बिजली धारा के प्रवाह के पथ को बिजली परिपथ कहते हैं।

→ फिलामैंट (तंत्)-बल्ब के अंदर लगी बारीक धातु की तार जो बिजली धारा के प्रवाह के कारण प्रकाश उत्सर्जित करती है, फिलामैंट कहलाता है।

→ बिजली रोधक-जो पदार्थ अपने में से बिजली धारा का प्रवाह नहीं होने देते हैं, वे बिजली रोधक कहलाते

→ स्विच-यह एक साधारण युक्ति है जो बिजली धारा के प्रवाह को रोकती है या चालू करती है अर्थात् बिजली परिपथ को तोड़ती है और पूरा करती है।

→ टर्मिनल-बिजली धारा का अंदर प्रवेश करने या बाहर जाने वाले बिंदु को बिजली सेल के टर्मिनल कहलाते हैं। बिजली सेल के दो टर्मिनल होते हैं-

  1. धन टर्मिनल (+) तथा
  2. ऋण टर्मिनल (-)।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 11 प्रकाश, छायाएँ और परावर्तन

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 11 प्रकाश, छायाएँ और परावर्तन

→ प्रकाश ऊर्जा का एक ऐसा रूप है जो हमें आस-पास की वस्तुएँ देखने में सहायता करता है।

→ प्रकाश का स्त्रोत प्राकृतिक या कृत्रिम हो सकता है, जैसे सूर्य, चंद्रमा, तारे, सी. एफ. एल., मोमबत्ती तथा एल. ई. डी.।

→ प्रकाश साधारणतया सीधी रेखा में चलता है।

→ अपारदर्शी वस्तुएँ अपने में से प्रकाश नहीं निकलने देती हैं और न ही इनके दूसरी ओर पड़ी वस्तुओं को देखा जा सकता है।

→ पारदर्शी वस्तुएँ अपने में से प्रकाश नहीं निकलने देती हैं और न ही इनके दूसरी ओर पड़ी वस्तुओं को देखा जा सकता है।

→ अल्पपारदर्शी वस्तुओं में से प्रकाश पूर्णरूप से नहीं गुज़र सकता है और न ही दूसरी और पड़ी वस्तुएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 11 प्रकाश, छायाएँ और परावर्तन

→ जब कोई अपारदर्शी वस्तु प्रकाश के पथ में आ जाती है तो इस अपारदर्शी के दूसरी ओर परछाईं बनती है।

→ चंद्रमा प्रकाशहीन है। यह सूर्य द्वारा अपने ऊपर पड़ रहे प्रकाश को परावर्तित करता है।

→ असमतल/खुरदरी सतह जैसे कपड़ा, किताब आदि द्वारा प्रकाश परावर्तन अनियमित परावर्तन होता है। इसके द्वारा किए परावर्तन के पश्चात् प्रकाश किरणें बिखर जाती हैं।

→ पिनहोल कैमरे को साधारण सामान से बनाया जा सकता है। इसके द्वारा सूर्य तथा प्रकाशमान वस्तुओं का प्रतिबिंब प्राप्त किया जा सकता है। यह प्रतिबिंब, उल्टा, वास्तविक तथा आकार में वस्तु से छोटा होता है।

→ दर्पण द्वारा परावर्तन होने के कारण स्पष्ट प्रतिबिंब बनते हैं।

→ प्रकाशमान वस्तुएँ-वे वस्तुएँ जिनके पास अपना स्वयं का प्रकाश होता है और वे प्रकाश को उत्सर्जित करती हैं।

→ प्रकाशहीन वस्तुएँ-वे वस्तुएँ जिनके पास अपना स्वयं का प्रकाश नहीं होता है परंतु अन्य प्रकाशमान वस्तुओं द्वारा उत्सर्जित प्रकाश से प्रकाशमान हो जाती हैं।

→ प्रकाश- यह ऊर्जा का एक ऐसा रूप है जो हमें आस-पास की वस्तुओं को देखने में सहायता करता है।

→ प्रकाश स्त्रोत-ऐसी प्रकाशमान वस्तुएँ जो प्रकाश उत्सर्जित करती हैं, जैसे—सूर्य, मोमबत्ती, सी. एफ. एल. आदि। ये प्रकाश स्त्रोत प्राकृतिक तथा कृत्रिम दोनों प्रकार के हो सकते हैं।

→ पारदर्शी वस्तुएँ-ऐसी वस्तुएँ जिनमें से प्रकाश नहीं गुजर सकता है तथा इसके दूसरी तरफ पड़ी वस्तुएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, पारदर्शी वस्तुएँ कहलाती हैं।

→ अपारदर्शी वस्तुएँ-वे वस्तुएँ जो अपने में से प्रकाश को नहीं निकलने देती हैं और इनके दूसरी ओर पड़ी वस्तुएँ दिखाई नहीं देती हैं, को अपारदर्शी वस्तुएँ कहते हैं जैसे-गत्ते की शीट, लकड़ी, धातु तथा रबड़ आदि।

→ अल्पपारदर्शी वस्तुएँ-वे वस्तुएँ जो अपने में से प्रकाश को पूर्ण रूप से नहीं निकलने देती हैं अर्थात् अल्पमात्रा में प्रकाश को निकलने देती हैं तथा जिनके दूसरी तरफ पड़ी वस्तुएँ स्पष्ट नहीं दिखाई देती हैं, को अल्पपारदर्शी वस्तुएँ कहते हैं। जैसे टिशू पेपर, पतला कपड़ा, तेल लगा हुआ कागज़ आदि।

→ परछाई-जब किसी प्रकाश स्त्रोत से आ रही प्रकाश किरणों के पथ में कोई अपारदर्शी वस्तु रूकावट बन जाती है, तो प्रकाश उस में से नहीं गुज़र सकता है तथा अपारदर्शी वस्तु की दूसरी तरफ एक काला धब्बा (क्षेत्र) बन जाता है। जिसकी बनावट अपारदर्शी वस्तु जैसी होती है, को वस्तु की परछाई कहते हैं। परछाई का आकार अपारदर्शी वस्तु से बड़ा या छोटा हो सकता है।

→ सूरज घड़ी-यह एक ऐसा यंत्र है, जो सूरज की रोशनी के साथ बनने वाली परछाई द्वारा दिन में समय दर्शाता है।

→ सूरज ग्रहण-जब धरती के ईद-गिर्द चक्कर लगाते समय ऐसी स्थिति में आ जाते हैं कि चंद्रमा, धरती तथा सूरज के बीच आ जाए और तीनों एक सीधी रेखा में हों तब सूरज की परछाई धरती पर बन जाती है, जिसे सूरज ग्रहण कहते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 11 प्रकाश, छायाएँ और परावर्तन

→ चंद्रग्रहण-जब धरती, सूरज तथा चंद्रमा के बीच स्थित हो तथा तीनों एक सीधी रेखा में हो तो चंद्रमा की परछाई धरती पर बनती है जिसे चंद्र ग्रहण कहते हैं।

→ पिनहोल कैमरा-एक ऐसा यंत्र जिसके द्वारा किसी स्थिर वस्तु का वास्तविक, उल्टा तथा छोटा प्रतिबिंब बनता है। यह प्रकाश के इस गण पर आधारित है कि प्रकाश सीधी (सरल) रेखा में चलता है।

→ दर्पण-कोई पॉलिश की गई एक समान समतल सतह जिससे उस पर पड़ रहे प्रकाश की दिशा में परिवर्तन हो जाता है, दर्पण कहलाती है।

→ प्रकाश परावर्तन-जब प्रकाश किसी चमकदार अर्थात् पॉलिश की गई सतह पर पड़ता है, तो प्रकाश का प्रसार एक विशेष दिशा में पहले माध्यम में होता है। इस प्रकाश के प्रसार की दिशा परिवर्तन की प्रक्रिया को प्रकाश परावर्तन कहते हैं। प्रकाश परावर्तन दो प्रकार का होता है ।

→ नियमित परावर्तन-जब प्रकाश किसी समतल दर्पण या चमकदार धातु की सतह पर पड़ता है तो यह नियमित रूप से प्रकाश को परावर्तित कर देती है। प्रकाश के इस परावर्तन को नियमित परावर्तन कहते हैं।

→ अनियमित परावर्तन-जब प्रकाश किसी खुरदरी या असमतल सतह पर पड़ता है तो इससे प्रकाश का दिशा परिवर्तन होने के बाद प्रकाश का बिखराव (प्रकीर्णन) हो जाता है। ऐसे प्रकाश परावर्तन को अनियमित परावर्तन कहते हैं। प्रकाश के ऐसे परावर्तन के कारण हम अपने ईद गिर्द की वस्तुओं को देख पाते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 10 गति तथा दूरियों का मापन

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 10 गति तथा दूरियों का मापन

→ मापन का अर्थ है कि किसी अज्ञात राशि की तुलना उसी प्रकार की ज्ञात राशि की निश्चित मात्रा से तुलना करना।

→ एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए परिवहन के विभिन्न साधनों का उपयोग किया जाता है।

→ प्राचीनकाल में लोग पैर की लंबाई, अंगुली की चौड़ाई, एक कदम की दूरी को लंबाई आदि का उपयोग मापन के मात्रक के रूप में करते थे।

→ मात्रकों की अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली (S.I. मात्रक) उपयोग करते हैं जिसे समस्त संसार में मान्यता प्राप्त है।

→ S.I. मात्रकों में लंबाई का मानक मात्रक मीटर है।

→ जब कोई वस्तु अपने चारों ओर की वस्तुओं की तुलना में समय के साथ अपनी स्थिति बदलती है तो ऐसी अवस्था को गति कहते हैं।

→ यदि कोई वस्तु सीधी रेखा में गति करती है तो उस गति को सरल रेखीय गति कहते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 10 गति तथा दूरियों का मापन

→ यदि कोई वस्तु किसी वृत्ताकार पथ पर गति करती है ताकि उस वस्तु की किसी निश्चित बिंदु से दूरी प्रत्येक समय समान रहती है तो ऐसी गति को वर्तुल गति कहते हैं।

→ ऐसी गति जो एक निश्चित समय अंतराल के पश्चात् दोहराई जाती है तो उसे आवर्ती गति कहते हैं।

→ दूरी-दो बिंदुओं के बीच की लंबाई का माप दूरी कहलाता है।

→ मापन-मापन से अभिप्राय एक अज्ञात राशि की एक ज्ञात राशि के साथ तुलना करना है।

→ इकाई-एक ज्ञात निश्चित राशि जिसे मानक राशि के रूप में प्रयोग किया जाता है उसे इकाई कहते हैं।

→ ओडोमीटर-मोटरवाहनों में लगाया गया यंत्र जिसे वाहन द्वारा तय की गई दूरी को मापने के लिए प्रयोग किया जाता है।

→ गति-जब कोई वस्तु समय अंतराल के पश्चात अपने आस-पास की वस्तुओं की तुलना में निरंतर स्थिति परिवर्तन करती है तो उस वस्तु को गति में कहा जाता है।

→ सरल रेखीय गति- यदि कोई वस्तु सरल रेखा में गति करती है तो उस वस्तु की गति सरल रेखीय गति कहलाती है।

→ वर्तुल गति-जब कोई वस्तु वृत्ताकार पथ पर गति करती है और उसकी किसी निश्चित बिंदु से दूरी प्रत्येक क्षण एक समान रहती है तो उस वस्तु की गति वर्तुल गति कहलाती है।

→ आवर्ती गति-यदि कोई वस्तु अपनी गति को एक निश्चित समय अंतराल के पश्चात बार-बार दोहराती है तो उस वस्तु की गति आवर्ती गति कहलाती है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 9 सजीव और उनका परिवेश

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 9 सजीव और उनका परिवेश

→ हमारे परिवेश में मौजूद सभी वस्तुओं को हम दो भागों में बाँट सकते है भाव सजीव तथा निर्जीव ।

→ प्राणी, पौधे, सूक्ष्म जीव सजीवों के कुछ उदाहरण हैं ।

→ पृथ्वी के प्रत्येक भाग में जीवन अनेक रूपों में विद्यमान है।

→ सभी सजीव वस्तुएँ एक दूसरे से भिन्न दिखती हैं, फिर भी उनमें कुछ विशेषताएँ एक समान होती हैं, जैसे भोजन की आवश्यकता, उत्तेजनाओं के प्रति प्रतिक्रिया, साँस लेना, मल-त्याग, वृद्धि, प्रजनन और गति।

→ निर्जीव वस्तुओं में कुछ विशेषताएँ एक समान होती हैं, जैसे गतिमान न होना, वृद्धि न होना, अपने जैसी अन्य वस्तुओं को पैदा न कर पाना, संवेदनशीलता न होना, साँस न लेना, अपशिष्ट उत्पादों को बाहर न निकालना, भोजन की आवश्यकता न होना, आदि।

→ जिस स्थान पर जीव रहता है उसे उस जीव का आवास कहते हैं।

→ आवास सजीवों को भोजन, पानी, हवा, सुविधा, और सुरक्षा के साथ-साथ प्रजनन करने के लिए सुरक्षित स्थल प्रदान करता है।

→ आवास कई प्रकार के हैं।

→ कुछ जीव जल में रहते हैं। इन्हें जली जीव कहा जाता है।

→ कुछ जीव जमीन पर रहते हैं। इन्हें स्थली जीव कहा जाता है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 9 सजीव और उनका परिवेश

→ कुछ जीव रेतीले इलाकों में रहते हैं। ये मरुस्थलीय जीव कहलाते हैं।

→ विभिन्न आवासों में जीवों की कई प्रकार की प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

→ एक आवास में मिलने वाले पौधे, जानवर, मनुष्य और सूक्ष्मजीव, पर्यावरण के जैविक भाग हैं।

→ किसी आवास के मिलने वाली निर्जीव वस्तुएँ जैसे चट्टानें, मिट्टी, वायु, जल, प्रकाश और तापमान उस आवास के निर्जीव या भौतिक भाग होते हैं।

→ जो जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं, उत्पादक कहलाते हैं।

→ वे जीव जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते हैं और अन्य जीवों द्वारा तैयार भोजन नहीं खा सकते हैं उपभोक्ता कहलाते हैं ।

→ जो जीव जीवित रहने के लिए पौधों को खाते हैं, वे शाकाहारी कहलाते हैं।

→ जो जीव जीवित रहने के लिए दूसरे जानवरों को मार कर उनका मांस खाते हैं, वे मांसाहारी कहलाते हैं।

→ जो जीव जीवित रहने के लिए पौधों को या दूसरे जानवरों को मार कर उनका माँस दोनो खाते हैं, वे सर्वाहारी कहलाते हैं।

→ जो जीव मृत पौधों और जानवरों को सरल पदार्थों में तोड़ते हैं, उन्हें विभाजक कहा जाता है।

→ सजीवों की अपने को अपने परिवेश के अनुकूल ढालने की क्षमता को अनुकूलन अथवा अनुकूलित होना कहते हैं ।

→ जिस अवधि तक सजीव जीवित रहते हैं, उसे सजीवों का जीवन काल कहते हैं।

→ विभिन्न जीवों का जीवन काल अलग-अलग होता है।

→ वातावरण में होने वाले परिवर्तन जिन के प्रति हम जैविक रूप से प्रतिक्रिया करते हैं, उद्दीपन कहलाते हैं।

→ पौधों और जीवों दोनों को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

→ जीव ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 9 सजीव और उनका परिवेश

→ हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन को बाहर निकालते हैं।

→ प्रत्येक जीवित वस्तु एक निश्चित तापमान पर ही जीवित रह सकती है।

→ अनुकूलन जीवित चीजों की अपने परिवेश के साथ सह-अस्तित्व की क्षमता है।

→ कुछ जानवर सर्दियों में लंबी अवधि के लिए सोने जैसी स्थिति में चले जाते हैं, इस अवस्था को हाइबरनेशन कहा जाता है।

→ जीवनकाल–जीवन की वह अवधि जिसमें एक जीवित प्राणी रहता है।

→ आवास-वह स्थान जहाँ जीव रहते हैं।

→ सजीव-जिन वस्तुओं को भोजन की आवश्यकता होती है, उत्तेजनाओं पर प्रतिक्रिया करती हैं, साँस लेती हैं, अपशिष्ट उत्पादों को बाहर निकालती हैं, बढ़ती हैं, प्रजनन करती हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान तक चल कर जा सकती हैं, उन्हें सजीव कहा जाता है।

→ निर्जीव-जिन वस्तुओं को भोजन की आवश्यकता नहीं होती है, जो उत्तेजनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं करती हैं, साँस नहीं लेती हैं, अपशिष्ट उत्पादों को बाहर नहीं निकालती हैं, विकसित नहीं होती हैं, प्रजनन नहीं करती हैं और न ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक चल कर जा सकती हैं उन्हें निर्जीव कहा जाता है।

→ स्थलीय आवास-स्थलीय जीव पृथ्वी पर रहते हैं और उनके निवास स्थान को स्थलीय आवास कहा जाता है।

→ जलीय आवास-जलीय जीव पानी के भीतर रहते हैं और उनके आवास को जलीय आवास कहा जाता है।

→ मरुस्थलीय आवास-मरुस्थलीय जीव मरुस्थल में निवास करते हैं और उनके आवास को मरुस्थलीय आवास कहते हैं।

→ उत्पादक-वे जीव जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं उत्पादक कहलाते हैं ।

→ उपभोक्ता-वे जीव जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और अन्य जीवों द्वारा तैयार भोजन खा कर जीवित रहते है उन्हें उपभोक्ता कहते हैं ।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 9 सजीव और उनका परिवेश

→ शाकाहारी – जो जीव पौधों को या उनके द्वारा पैदा वस्तुओं को खाते हैं उन्हें शाकाहारी कहते हैं ।

→ मांसाहारी-जीव जो दूसरे जानवरों को मार कर उनका मांस खाते हैं उन्हें मांसाहारी कहते हैं ।

→ सर्वाहारी -जो प्राणी सभी प्रकार का भोजन करते हैं, वे सर्वाहारी कहलाते हैं।

→ विभाजक-सूक्ष्मजीव जो मृत पौधों और जानवरों से भोजन लेते हैं और उन्हें सरल पदार्थों में तोड देते हैं।

→ प्रजनन-यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीवित प्राणी अपने जैसे अन्य जीवित प्राणियों को जन्म देते हैं।

→ अनुकूलता-जीवित चीजों की अपने परिवेश के अनुकूल होने की क्षमता।

→ उदीपन-वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को उदीपन कहते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 8 शरीर मे गति

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 8 शरीर मे गति

→ शरीर में गतियों से हमारा भाव एक जीव के शरीर के किसी भी भाग की स्थिति में परिवर्तन है।

→ गमन एक जीव के पूरे शरीर की एक स्थान से दूसरे स्थान तक की गति है।

→ जानवर गमन और अन्य प्रकार की शारीरिक गतियाँ दिखाते हैं लेकिन पौधे गमन नहीं करते हैं, हालांकि वे कुछ अन्य प्रकार की गतियाँ अवश्य दिखाते हैं।

→ मनुष्य का चलना, मछलियों का तैरना, घोड़े का दौड़ना, साँप का रेंगना, टिड्डी का कूदना और पक्षियों का उड़ना आदि गमन के विभिन्न तरीके हैं।

→ जानवरों द्वारा गमन का उद्देश्य पानी, भोजन तथा आश्रय ढूंढने के साथ-साथ दुश्मनों से अपनी रक्षा करना है।

→ हड्डियाँ अथवा अस्थियों से बना ढांचा जो शरीर को सहारा देता है, कंकाल कहलाता है।

→ हड्डियाँ अथवा अस्थियाँ सख्त और कठोर होती हैं जबकि उपास्थियाँ नर्म और लचीली होती है।

→ मानव कंकाल हड्डियों और उपास्थि से बना होता है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 8 शरीर मे गति

→ मानव शरीर में जन्म के समय 300 हइडियाँ होती हैं।

→ वयस्क मानव शरीर में 206 हड्डियाँ होती हैं।

→ पसली पिंजर, पसलियों, रीढ़ की हड्डी और छाती की हड्डी से बना होता है। यह शरीर के आंतरिक अंगों की रक्षा करता है।

→ खोपड़ी मस्तिष्क को परिबद्ध कर उसकी सुरक्षा करती है।

→ जोड़ अथवा संधि वह स्थान है जहां हड्डियाँ अथवा अस्थियाँ आपस में मिलती हैं।

→ टैंडन अथवा कण्डरा एक लचीला ऊतक है जो हड्डियों अथवा अस्थियों को आपस में जोड़ता है।

→ शरीर की गति मांसपेशियों के संकुचन पर निर्भर करती है। ये मांसपेशियाँ हमेशा जोड़ी में काम करती हैं।

→ चाल जानवरों के अंगों की गति का पैटर्न है।

→ केंचुए अपने शरीर की मांसपेशियों के संकुचन और फैलाव से चलते हैं।

→ घोंघा एक बड़े चिपचिपे पेशीय पैर की सहायता से चलता है।

→ एक तिलचट्टा चल सकता है, दौड़ सकता है, चढ़ सकता है और उड़ सकता है।

→ पक्षियों के अग्रपाद पंखों में बदले हुए हैं जो उड़ान में मदद करते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 8 शरीर मे गति

→ मछली का शरीर धारा रेखीय होता है और यह अपने शरीर पर पार्श्व में पाए जाने वाले पंखों से चलती है ।

→ पक्षियों में धारा रेखीय शरीर और खोखली एवं हल्की हड्डियाँ होती हैं जो उड़ान के दौरान उनकी मदद करती हैं।।

→ साँप अपने पेट पर रेंग कर चलते हैं।

→ विभिन्न प्रकार के जोड़ अथवा संधियाँ अलग-अलग दिशाओं में गति की अनुमति देती हैं।

→ हमारे शरीर में कई प्रकार के जोड़ अथवा संधियाँ होती हैं जैसे बॉल और सॉकेट या कंदुक खल्लिका जोड़ अथवा संधि, हिंज जोड़ अथवा संधि, स्थिर या अचल जोड़ अथवा संधि और धुराग्र जोड़ अथवा संधि।

→ गेंद और सॉकेट या कंदुक खल्लिका जोड़ या संधि एक गोलाकार रूप में या सभी दिशाओं में गति की अनुमति देती है।

→ हिंज जोड़ या संधि आगे और पीछे गति की अनुमति देता है।

→ धुराग्र जोड़ या संधि आगे और पीछे की दिशा, दाएं या बाएं गति की अनुमति देता है। गर्दन और सिर का जोड या संधि इसका उदाहरण है।

→ स्थिर जोड़ अचल होते हैं।

→ एक्स-रे हड्डियों की संख्या गिनने और शरीर में हड्डियों के आकार का अध्ययन करने में मदद करता है।

→ गति-एक जीव के शरीर के किसी भी भाग की स्थिति में परिवर्तन को गति कहा जाता है।

→ गमन-एक जीव के पूरे शरीर का एक स्थान से दूसरे स्थान तक की गति को गमन कहा जाता है।

→ अस्थि-यह कंकाल का वह भाग है जो प्रकृति में कठोर होता है।

→ संधि-यह शरीर का वह स्थान है जहां दो या दो से अधिक हड्डियाँ किसी प्रकार की गति के लिए मिलती

→ उपास्थि-जोड़ों में पाए जाने वाला चिकने, मोटे और लचीले ऊतक को उपास्थि कहते हैं।

→ अचल संधि-जिन जोड़ों पर हड्डियाँ गति नहीं कर सकतीं उन्हें स्थिर अथवा अचल संधि कहा जाता है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 8 शरीर मे गति

→ गतिशील जोड़ अथवा संधि-जिन जोड़ों अथवा संधियों में हड्डियों की गति संभव होती है उन्हें गतिशील जोड़ अथवा संधि कहा जाता है।

→ कंकाल-शरीर का वह ढाँचा जो शरीर को सहारा और आकार देता है, कंकाल कहलाता है।

→ धारा रेखीय वस्तु-कोई भी वस्तु जो दोनों सिरों पर नोकीली तथा मध्य में चौड़ी या चपटी होती है, धारा रेखीय वस्तु कहलाती है।

→ कण्डरा-मजबूत, रेशेदार ऊतक जो मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़ता है, टैंडन अथवा कण्डरा कहलाता है।

→ स्नायुबंधन अथवा लिगामैंट-मजबूत, लचीला ऊतक जो दो हड्डियों को जोड़ता है उसे स्नायुबंधन अथवा लिगामैंट कहते हैं।

→ श्रोणि अस्थियाँ- इन्हें कूल्हे की अस्थियाँ भी कहते हैं। ये बॉक्स के समान एक ऐसी संरचना बनाती हैं जो आमाशय के नीचे के अंगों की रक्षा करती है।

→ धुराग्र संधि-गर्दन और सिर को जोडने वाली संधि को धुराग्र संधि कहते हैं। इसमें बेलनाकार अस्थि एक छल्ले में घूमती है।

→ पसली पिंजर-यह वक्ष की अस्थि एवं मेरुदंड से जुड़कर बना एक बक्सा होता है जो कोमल अंगों की सुरक्षा करता है।

→ कंधे की अस्थियाँ-कंधों के समीप दो उभरी हुई अस्थियाँ होती हैं जिन्हें कंधे की अस्थियाँ कहते हैं।

→ शूक-केंचुए के शरीर में बालों जैसी बारीक संरचनाएं होती हैं जिनकी सहायता से वह गति करता है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 7 पौधों को जानिए

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 7 पौधों को जानिए

→ पौधों को आम तौर पर उनकी ऊंचाई, तने और शाखाओं के आधार पर जड़ी-बूटीयों, झाड़ियों, पेड़ों और लताओं में वर्गीकृत किया जाता है।

→ जड़ी-बूटीयाँ एक मीटर से कम ऊँचे पौधे होते हैं और इनके तने मुलायम और हरे रंग के होते हैं।

→ झाड़ियाँ मध्यम आकार के (1-3 मीटर लम्बे) पौधे होते हैं। उनके तने सख्त होते हैं और उनकी शाखाएँ तने के आधार पर (जमीन के बहुत करीब) होती हैं।

→ पेड लम्बे और बड़े पौधे (ऊंचाई 3 मीटर से अधिक) होते हैं। उनका तना मजबूत होता है और उनकी शाखाएँ तने के आधार (जमीन से कुछ ऊंचाई) के ऊपर निकलती हैं।

→ पौधे के प्रत्येक भाग का एक विशिष्ट कार्य होता है।

→ पौधे की संरचना को दो भागों में बाँटा गया है-जड़ प्रणाली और तना प्रणाली।

→ जड़ प्रणाली जमीन के नीचे होती है और तना प्रणाली जमीन के ऊपर होती है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 7 पौधों को जानिए

→ जड़ और तना दोनों प्रणालियाँ भोजन का भंडारण करती हैं।

→ तना प्रणाली में तना, पत्तियाँ, फूल आदि आते हैं।

→ तने को गाँठों और अंतर-गाँठों में विभाजित किया जाता है।

→ तने का वह भाग जहाँ से नई शाखाएँ और पत्तियाँ निकलती हैं, गाँठ कहलाती है।

→ दो गाँठों के बीच के स्थान को अंतर-गाँठ कहते हैं।

→ तने पर छोटे-छोटे उभारों को कलियाँ कहते हैं।

→ पौधे का तना पानी को जड़ से पत्तियों और अन्य भागों तक और भोजन को पत्तियों से पौधे के अन्य भागों तक ले जाता है।

→ कमजोर तने वाले पौधे जो सीधे खड़े नहीं हो सकते और बढ़ने के लिए आसपास की वस्तुओं की सहायता से ऊपर चढ़ते हैं उन्हें आरोही अथवा कलाईंबर बेलें कहा जाता है।

→ कुछ जड़ी-बूटीयों के तने कमजोर होते हैं जो अपने आप सीधे खड़े नहीं हो सकते और जमीन पर फैल जाते हैं। ऐसे पौधों को क्रीपर बेलें कहा जाता है।

→ पत्ता पौधे का एक पतला, चपटा और हरा भाग होता है जो तने की गाँठ से निकलता है। विभिन्न पौधों के पत्ते आकार और रंग में भिन्न होते हैं।

→ पत्तों का हरा रंग क्लोरोफिल की उपस्थिति के कारण होता है, जो एक हरा वर्णक है।

→ पत्ता तने से पतले डंडी से जुड़ा होता है।

→ पत्ते के उभरे हुए भाग को ब्लेड या फलक या लैमिना कहते हैं।

→ पत्ते में शिराओं का जाल होता है जिसे शिरा विन्यास भी कहते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 7 पौधों को जानिए

→ शिरा विन्यास दो प्रकार का होता है अर्थात जालीदार एवं समानांतर।

→ विभिन्न पौधों में अलग-अलग प्रकार के शिरा विन्यास होते हैं।

→ पत्ते वाष्पोत्सर्जन विधि द्वारा वायु में जल छोड़ते हैं।

→ हरे पत्ते सूर्य के प्रकाश में जल और कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं।

→ पत्तों की सतह पर बहुत छोटे छिद्र होते हैं जिन्हें रंध्र कहते हैं।

→ जड़ें आमतौर पर दो प्रकार की होती हैं – पेशीय जड़ें और रेशेदार जड़ें।

→ शिराओं और पौधों की जड़ों के बीच घनिष्ठ संबंध है।

→ जिन पौधों के पत्तों में जालीदार शिराएँ होती हैं, उनमें पेशीय जड़ें होती हैं।

→ जिन पौधों की पत्तियों में समानांतर शिराएँ होती हैं उनमें रेशेदार जड़ें होती हैं।

→ फूल एक पौधे का सबसे सुंदर, आकर्षक और रंगीन हिस्सा होता है जो पौधे का प्रजनन अंग होता है।

→ जिस भाग से फूल तने से जुड़ा होता है, उसे पेडिकल केहते हैं।

→ फूलों के अलग-अलग भाग होते हैं- हरी पत्तियाँ, पंखुड़ियाँ, पुंकेसर और मादा केसर।

→ फूल की बाहरी हरी पत्ती जैसी संरचनाओं को हरी पत्तियाँ और सामूहिक रूप से उन्हें कैलेक्स कहा जाता है।

→ एक फूल की हरी पत्तियों के अंदर मौजूद रंगीन, पत्ती जैसी संरचनाओं को पंखुड़ी कहा जाता है और सामूहिक रूप से उन्हें कोरोला भी कहा जाता है।

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→ पंखुड़ियाँ कीड़ों को आकर्षित करती हैं और प्रजनन में मदद करती हैं।

→ पुंकेसर, नर प्रजनन अंग है और मादा केसर मादा प्रजनन अंग है।

→ प्रत्येक पुंकेसर में एक पतला तना होता है जिसे तंतु कहा जाता है और इसके शीर्ष पर दो भागों में विभाजित संरचना होती है जिसे पराग कोशिका कहा जाता है।

→ पराग कोशिकाएं पराग का निर्माण करती हैं और प्रजनन में भाग लेती हैं।

→ मादा केसर एक पतली, बोतल के आकार की संरचना होती है जो फूल के बीच में मौजूद होती है।

→ महिला केसर को आगे तीन भागों में बांटा गया है-

  1. अंडाशय
  2. वर्तिका
  3. वर्तिकाग्र।

मादा केसर का निचला भाग अंडाशय कहलाता है। इसमें बीज और अंडे होते हैं जो प्रजनन में भाग लेते हैं।

→ मादा केसर के संकीर्ण, मध्य भाग को वर्तिका कहा जाता है।

→ वर्तिका के शीर्ष पर चिपचिपा भाग वर्तिकाग्र कहलाता है।

→ जड़ी-बूटी- एक मीटर से कम ऊंचाई वाले और मुलायम एवं हरे तने वाले पौधे जड़ी-बूटी अथवा खरपतवार कहलाते हैं।

→ आरोही या कलाईंबर लताएँ-कमजोर तने वाले पौधे होते हैं जो सीधे खड़े नहीं हो सकते हैं और बढ़ने के लिए आसपास की वस्तुओं पर निर्भर रहते हैं। उन्हें आरोही या कलाईंबर लताएँ कहा जाता है।

→ क्रीपर या लता बेल-कुछ जड़ी-बूटीयों या खरपतवारों के तने कमजोर होते हैं जो अपने आप सीधे खड़े नहीं हो पाते और जमीन पर फैल जाते हैं। ऐसे पौधों को क्रीपर या लता बेलें कहा जाता है।

→ जड़ प्रणाली-जड़ वाले पौधे के भूमिगत भाग को जड़ प्रणाली कहा जाता है।

→ तना प्रणाली-जड़ वाले पौधे की जमीन के ऊपरी भाग को तना प्रणाली कहा जाता है।

→ डंडी-पत्ते की लंबी संरचना जो पत्ते को तने से जोड़ता है।

→ फलक या लैमिना-पत्ते का सपाट, हरा भाग।

→ गाँठ-तने पर वह स्थान जहाँ पत्तियाँ निकलती हैं।

→ अंतर-गाँठ-दो गांठों के बीच का तने का भाग।

→ विन्यास- एक पत्ती में शिराओं की व्यवस्था।

→ एक्सिल-पत्ते का तने से बना कोण।

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→ वाष्पोत्सर्जन-पत्तों से जलवाष्प का वाष्पीकरण।

→ रंध्र-पत्तों की सतह पर महीन छिद्र।

→ पंखुड़ियाँ-एक फूल की हरी पंखुड़ियों के अंदर रंगीन, पत्ती जैसी संरचनाओं को पंखुड़ियाँ कहा जाता है।

→ कोरोला-पंखुड़ियों के समूह जिसे कोरोला कहा जाता है।

→ हरी पत्तियाँ-फूल की बाहरी हरी पत्ती जैसी संरचनाओं को हरी पत्तियाँ कहते हैं।

→ कैलेक्स-हरी पत्तियों के समूह को कैलेक्स कहते हैं।

→ पुंकेसर-फूल का नर भाग।

→ पराग कोशिकाएँ-पुंकेसर के दो भागों वाले शीर्ष को पराग कोशिका कहते हैं।

→ मादा केसर-फूल का मादा भाग।

→ अंडाशय-मादा केसर का नीचे वाला चौड़ा भांग जिसमें बीज होते हैं, अंडाशय कहलाता है।

→ वर्तिका-मादा केसर के संकीर्ण, मध्य भाग को वर्तिका कहा जाता है।

→ वर्तिकाग्र-वर्तिका के शीर्ष पर चिपचिपा भाग वर्तिकाग्र कहलाता है।