PSEB 7th Class Science Notes Chapter 7 मौसम, जलवायु तथा जलवायु के अनुसार जंतुओं में अनुकूलन

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 7 मौसम, जलवायु तथा जलवायु के अनुसार जंतुओं में अनुकूलन

→ किसी स्थान का मौसम दिन-प्रतिदिन तथा सप्ताह दर सप्ताह परिवर्तित होता रहता है।

→ मौसम तापमान, आर्द्रता तथा वर्षा पर निर्भर करता है।

→ नमी (आर्द्रता), वायु के जलवाष्पों का माप है।

→ भारतीय मौसम विभाग, मौसम के पूर्वानुमान के लिए प्रतिदिन विभिन्न स्थानों के ताप, वायु वेग आदि के आँकड़े एकत्रित करता है।

→ किसी स्थान पर तापमान, आर्द्रता, वर्षा, वायु वेग आदि के संदर्भ में वायुमंडल की परिस्थिति, उस स्थान का मौसम कहलाती है।

→ मौसम क्षण भर में परिवर्तित हो सकता है।

→ वे कारक जिन पर मौसम निर्भर करता है, मौसम के घटक कहलाते हैं।

→ तापमान मापने के लिए विशेष अधिकतम-न्यूनतम तापमापी उपयोग में लाए जाते हैं।

→ दिन का अधिकतम तापमान सामान्यतः दोपहर के बाद होता है और न्यूनतम तापमान सामान्यतः प्रात: में होता है।

→ मौसम में सभी परिवर्तन सूर्य के कारण होते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 7 मौसम, जलवायु तथा जलवायु के अनुसार जंतुओं में अनुकूलन

→ सर्दियों में दिन की लंबाई कम होती है और रात जल्दी हो जाती है।

→ किसी स्थान के मौसम की लंबाई, उस स्थान पर इकट्ठे आंकड़ों के आधार पर बने मौसम का पैटर्न, उस
स्थान की जलवायु कहलाता है।

→ विभिन्न स्थानों का जलवायु विभिन्न होता है। यह गर्म और शुष्क से गर्म और आर्द्र तक बदलता है।

→ जलवायु का जीवों पर गहरा प्रभाव है।

→ जंतु उन स्थितियों में जीने के लिए अनुकूलित होते हैं, जिनमें वे रहते हैं।
ध्रुवीय क्षेत्र, ध्रुवों के समीप होते हैं, जैसे-उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव।

→ कनाडा ग्रीनलैंड, आइसलैंड, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड, अमेरिका में अलास्का और रूस के साइबेरियाई क्षेत्र ध्रुवीय क्षेत्र हैं ।

→ भारत, मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्राजील, काँगो गणतंत्र, केन्या, युगांडा और नाइजीरिया में ऊष्ण कटिबंधीय वर्षा वन पाए जाते हैं।

→ ध्रुवीय क्षेत्रों में ठंडी जलवायु पाई जाती है।

→ पेंग्विन और ध्रुवीय भालू, ध्रुवीय क्षेत्रों में रहते हैं।

→ ध्रुवीय क्षेत्र सफेद बर्फ से ढके रहते हैं।

→ ध्रुवीय भालू के शरीर पर सफेद बाल इसकी रक्षा और शिकार पकड़ने में सहायता करते हैं।

→ पैंग्विन भी अच्छे तैराक होते हैं इसलिए यह आसानी से सफेद पृष्ठभूमि में मिल जाते हैं।

→ ध्रुवीय भालू और पेंग्विन के अतिरिक्त कई अन्य जंतु भी ध्रुवीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

→ कई मछलियाँ ठंडे पानी में रह सकती हैं।

→ उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में जलवायु सामान्यतः गर्म होती है, क्योंकि ये क्षेत्र भूमध्य रेखा के आस-पास स्थित होते हैं। इन क्षेत्रों में तापमान 15°C से 40°C तक बदलता रहता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 7 मौसम, जलवायु तथा जलवायु के अनुसार जंतुओं में अनुकूलन

→ भूमध्य रेखा के आस-पास के क्षेत्रों में वर्ष भर रात और दिन की लंबाई लगभग बराबर होती हैं।

→ मौसम : किसी स्थान पर तापमान, आर्द्रता, वर्षा, वायु वेग आदि के संदर्भ में वायुमंडल की प्रतिदिन की परिस्थिति उस स्थान का मौसम कहलाती है।

→ जलवायु : किसी स्थान के मौसम की लंबी अवधि, जैसे 25 वर्ष में एकत्रित आँकड़ों के आधार पर बना मौसम का पैटर्न, उस स्थान की जलवायु कहलाता है।

→ अनुकूलन : पौधों और जीवों के विशेष लक्षण अर्थात् स्वभाव जो उन्हें एक आवास में रहने के अनुकूल बनाते हैं, को अनुकूलन कहते हैं।

→ प्रवास : जंतुओं द्वारा सख्त जलवायु परिस्थितियों से बचने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान का स्थानांतरण प्रवास कहलाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 6 भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 6 भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन

→ परिवर्तन जीवन की प्रवृत्ति है। हमारे दैनिक जीवन में कई परिवर्तन होते हैं।

→ परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं-

  1. भौतिक परिवर्तन
  2. रासायनिक परिवर्तन।

→ परिवर्तन का सदैव कोई कारण होता है।

→ कुछ परिवर्तनों को नियन्त्रित किया जा सकता है और कुछ को नहीं किया जा सकता।

→ भौतिक परिवर्तन में कोई नया पदार्थ नहीं बनता।

→ रासायनिक परिवर्तन सामान्यतः अनुत्क्रमणीय होते हैं।

→ रासायनिक परिवर्तनों में पैदा होने वाले नए पदार्थों के गुण बिल्कुल अलग (नए) होते हैं।

→ परिवर्तनों को उनकी समानताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

→ पदार्थों के आकार, माप, रंग, अवस्था जैसे गुण उसके भौतिक गुण कहलाते हैं।

→ वह परिवर्तन जिसमें किसी पदार्थ के भौतिक गुणों में परिवर्तन हो जाता है, भौतिक परिवर्तन कहलाता है।

→ मैग्नीशियम की पट्टी (रिबन) चमकीले सफेद प्रकाश से जलती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 6 भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन

→ जब चूने के पानी में से कार्बन डाइऑक्साइड गुजारी जाती है, तो वह दुधिया हो जाता है।

→ रासायनिक परिवर्तनों में ध्वनि, प्रकाश, ताप (ऊष्मा), गंध, गैस, रंग आदि उत्पन्न होता है।

→ जलना एक रासायनिक परिवर्तन है जिसमें सदैव ऊष्मा निष्कासित होती है।

→ वायुमंडल में ओज़ोन की एक परत है।

→ जंग लगने के लिए ऑक्सीजन तथा पानी दोनों की आवश्यकता होती है।

→ गैल्वेनाइजेशन प्रक्रिया में लोहे पर जिंक की परत चढ़ाई जाती है।

→ लोहे को पेंट करके जंग लगने से बचाया जा सकता है।

→ क्रिस्टलीकरण विधि से किसी भी पदार्थ के विलयन में से बड़े आकार के क्रिस्टल प्राप्त किए जा सकते हैं।

→ भौतिक परिवर्तन : वे परिवर्तन, जिनमें केवल पदार्थों के भौतिक गुण ही बदलें और कोई नया पदार्थ न बने, भौतिक परिवर्तन कहलाता है। उदाहरण-जल में नमक का घोल।

→ रासायनिक परिवर्तन : वे परिवर्तन जिनके द्वारा बिल्कुल नए पदार्थ उत्पन्न हों, रासायनिक परिवर्तन कहलाता है। उदाहरण-कोले को जलाना।

→ जंग लगना : लोहे द्वारा नमी युक्त वायु में भूरे रंग की परत से ढक जाने की प्रक्रिया को जंग लगना कहते हैं।

→ गैल्वेनाइजेशन : लोहे को जंग से बचाने के लिए जिंक की परत चढ़ाई जाती है इस प्रक्रिया को गैल्बेनाइजेशन कहते हैं।

→ क्रिस्टलीकरण : किसी घुलनशील पदार्थ से बड़े आकार के क्रिस्टल प्राप्त करने की प्रक्रिया को क्रिस्टलीकरण कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 5 अम्ल, क्षारक और लवण

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 5 अम्ल, क्षारक और लवण

→ हम दैनिक जीवन में विभिन्न स्वादों के अनेक पदार्थों का सेवन करते हैं।

→ कुछ पदार्थों का स्वाद कड़वा, खट्टा, मीठा और नमकीन होता है।

→ पदार्थों का खट्टा स्वाद इनमें अम्लों की उपस्थिति के कारण होता है।

→ ऐसिड शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द एसियर से हुई जिसका अर्थ है-खट्टा।

→ ऐसे पदार्थ जिनका स्वाद कड़वा होता है तथा स्पर्श करने पर साबुन जैसे लगते हैं, क्षार कहलाते हैं।

→ सूचक वह पदार्थ हैं जो अम्लीय तथा क्षारीय प्रकृति के पदार्थों को भिन्न-भिन्न रंग देते हैं। इन पदार्थों को अम्लीय या क्षारीय प्रकृति के परीक्षण के लिए प्रयोग करते हैं।

→ हल्दी, लिटमस तथा गुड़हल (चाईना रोज़) की पत्तियाँ प्राकृतिक सूचक हैं।

→ उदासीन विलयन (घोल) लाल या नीले लिटमस के रंग को परिवर्तित नहीं करते क्योंकि यह न तो अम्लीय । होते हैं और न ही क्षारीय।

→ फ़िनॉल्फथेलीन एक संश्लिष्ट सूचक है जिसे प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है।

→ कुछ अम्ल प्रबल (तेज़) तथा कुछ दुर्बल (कमज़ोर) होते हैं।

→ किसी अम्ल और क्षार की परस्पर होने वाली अभिक्रिया, उदासीनीकरण अभिक्रिया कहलाती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 5 अम्ल, क्षारक और लवण

→ अपाचन (बदहज़मी) को दूर करने के लिए प्रति अम्ल (ऐंटऐसिड) का प्रयोग किया जाता है।

→ कीट के डंक के प्रभाव के उपचार के लिए खाने के सोडे (बेकिंग सोडा) से रगड़ कर या कैलेमाइन (जिंक कार्बोनेट) विलयन लगाया जाता है।

→ मिट्टी के तेज़ाबीपन (अम्लीयता) को बुझे चूने (क्षार) से उपचारित किया जाता है। यह उदासीनीकरण का ही उदाहरण है।

→ मिट्टी के खारेपन को जैविक पदार्थों के प्रयोग से समाप्त किया जाता है।

→ कारखानों से निकले अपशिष्ट उत्पादों को क्षार पदार्थों से उदासीन करके ही पानी में छोड़ना चाहिए।

→ अम्ल (ऐसिड) : ऐसे पदार्थ जिनका स्वाद खट्टा होता है तथा जो नीले लिटमस के घोल (विलयन) से क्रिया करके उसके रंग को लाल कर देते हैं, अम्ल कहलाते हैं।

→ क्षार (एल्कली) : ऐसे पदार्थ जिनका स्वाद कड़वा होता है तथा जो लाल लिटमस के घोल (विलयन) से क्रिया करके उसके रंग को नीला कर देते हैं, क्षार कहलाते हैं।

→ उदासीनीकरण : किसी अम्ल तथा क्षार की आपस में होने वाली प्रतिक्रिया उदासीनीकरण क्रिया कहलाती है।

→ उदासीन विलयन (घोल) : ऐसा घोल जो न अम्लीय प्रकृति का हो और न ही क्षारीय प्रकृति का है, उसे उदासीन विलयन (घोल) कहते हैं या फिर जो घोल सूचक के रंग को नहीं बदलता, उदासीन घोल कहलाता है।

→ सूचक : ऐसे पदार्थों के विलयन या ऐसे पदार्थ जो विभिन्न अम्लीय, क्षारों तथा उदासीन पदार्थों से क्रिया करके भिन्न-भिन्न रंग दर्शाते हैं, को सूचक कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 4 ऊष्मा

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 4 ऊष्मा

→ किसी वस्तु को छूकर उसके गर्म या ठंडा होने का पता करने का तरीका विश्वसनीय नहीं है।

→ तापमान किसी वस्तु की गर्मी अथवा ठंडक का दर्जा है।

→ किसी वस्तु के गर्म अथवा ठंडे होने का दर्जा अर्थात् तापमान एक यंत्र थर्मामीटर से मापा जाता है।

→ मानवीय शरीर या सजीव का तापमान डॉक्टरी थर्मामीटर (क्लीनिकल थर्मामीटर) से मापा जाता है।

→ डॉक्टरी थर्मामीटर पर एक स्केल देखा जाता है। यह स्केल या तो सेल्सियस [°C] या फारेनहाइट [°F] या फिर दोनों में होता है।

→ डॉक्टरी थर्मामीटर में एक काँच की समरूप सुराख वाली कोशिका नली होती है जिसके निचले सिरे पर एक बल्ब होता है।

→ डॉक्टरी थर्मामीटर के बल्ब के ऊपर एक टेढ़ापन या गांठ (Kuik) होती है जो पारे के लेवल (स्तर) को भार के कारण नीचे नहीं गिरने देता।

→ डॉक्टरी थर्मामीटर के प्रयोग करने से पहले तथा बाद में ऐंटीसैप्टिक के घोल से साफ कर लेना चाहिए।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 4 ऊष्मा

→ डॉक्टरी थर्मामीटर का मापक्रम 35°C से 42°C तक होता है।

→ डॉक्टरी थर्मामीटर को प्रयोग करने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि पारे का लेवल (स्तर) 35°C से कम हो, यदि ऐसा नहीं है तो थर्मामीटर को मज़बूती से पकड़ कर झटका देकर स्तर को 35°C से नीचे लाना चाहिए।

→ निरोगी मनुष्य का सामान्य तापमान 37°C या 98.4°F है।

→ वस्तुओं का तापमान मापने के लिए अन्य थर्मामीटर होते हैं। इनमें से एक है लैब (प्रयोगशाला) थर्मामीटर। प्रयोगशाला थर्मामीटर की रेज़-10°C से 110°C तक होती है।

→ प्रयोगशाला थर्मामीटर से वस्तु का तापमान उस समय मापना चाहिए जब थर्मामीटर के पारे का स्तर स्थिर हो जाए।

→ वह विधि जिसमें ऊष्मा का संचार किसी वस्तु के गर्म सिरे से ठंडे सिरे की ओर पदार्थ के कणों के द्वारा होता है उसको चालन कहते हैं। ठोस पदार्थ चालन विधि द्वारा गर्म होते हैं।

→ वह पदार्थ जो ऊष्मा का अच्छा संचार करते हैं, चालक अथवा सुचालक कहलाते हैं।

→ लोहा, चांदी, तांबा, एल्यूमीनियम से बनी वस्तुएँ ऊष्मा की चालक होती हैं।

→ वह पदार्थ जो ऊष्मा का अच्छा संचार नहीं करते उन्हें ऊष्मारोधी या कुचालक कहते हैं; जैसे-लकड़ी, प्लास्टिक तथा रबड़।

→ वायु ताप की सुचालक नहीं है।

→ ताप संचार की वह विधि जिसमें ऊष्मा का संचार पदार्थ के गर्म अणुओं की गति के कारण होता है, संवहन कहते हैं।

→ द्रव तथा गैसों में ऊष्मा का संचार संवहन विधि द्वारा होता है।

→ तटीय क्षेत्रों में दिन के समय समुद्र से तट की ओर बहती पवन को जल समीर कहते हैं।

→ तटीय क्षेत्रों में रात के समय तट से समुद्र की ओर बहती पवन को थल समीर कहते हैं।

→ माध्यम के बिना गर्म वस्तुओं द्वारा विकिरण छोड़ने के कारण ताप का संचार होने को विकिरण कहते हैं। ताप के विकिरण के लिए माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।

→ गहरे रंग के कपड़े हल्के रंग के कपड़ों के मुकाबले ताप को अधिक अवशोषित करते हैं। इसलिए सर्दियों को हम गहरे रंग तथा गर्मियों को हम हल्के रंग के कपड़े पहनते हैं।

→ ऊन के कपड़े सर्दियों में गर्मी देते हैं क्योंकि ऊन के रेशों में हवा फंसी होती है जो ऊष्मा की कुचालक हैं।

→ ताप : यह एक कारक है जो हमें गर्मी अनुभव करवाता है। यह एक प्रकार की ऊर्जा है।

→ तापमान : तापमान किसी वस्तु की गर्मी या ठंडक का दर्जा (कोटि) है। इसमें ऊष्मा के प्रवाह की दिशा का पता लगता है।

→ थर्मामीटर : यह एक यंत्र है जिस की सहायता से किसी वस्तु का तापमान मापा जा सकता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 4 ऊष्मा

→ सेल्सियस स्केल : सेल्सियस स्केल तापमान मापने का स्केल है। कई बार इसे सेंटीग्रेड स्केल भी कहते हैं।

→ रोधक : वह पदार्थ जिसमें से ताप का अच्छा/उचित संचार नहीं हो सकता, इस वस्तु को रोधक या ऊष्मारोधक माना जाता है।

→ चालन : यह ताप संचार की एक विधि है जिसमें ताप वस्तु के गर्म सिरे से ठंडे सिरे की ओर वस्तु के पदार्थ के अणुओं द्वारा होता है, परंतु वस्तु के अणु अपने स्थान पर स्थिर रहते हैं।

→ संवहन के अणु (तरल या गैस) : यह ताप संचार की वह विधि है जिसमें ताप गर्म अणुओं की गति कारण ताप के स्रोत से ठंडे भाग की ओर जाते हैं तथा ठंडे अणु उनका स्थान लेने के लिए किनारों से होकर ताप के स्रोत की ओर आते हैं। इस विधि द्वारा द्रव तथा गैसें गर्म होती हैं।

→ विकिरण : यह ताप संचार की वह विधि है जिसमें माध्यम को बिना गर्म किए स्रोत से ठंडे स्रोत की ओर ताप संचार करता है।

→ जल समीर : दिन के समय सूरज की गर्मी के कारण थल की मिट्टी के अणु जल्दी गर्म हो जाते हैं जबकि समुद्र का पानी इतना गर्म नहीं होता। इसलिए थल के निकट वाली हवा/वायु गर्म होकर हल्की होने के कारण ऊपर उठती है। इसका स्थान लेने के लिए समद्र से ठंडी वायु बहनी आरंभ हो जाती है। जिस कारण संवहन धाराएं बहनी शुरू होती हैं। यह समुद्र के तटीय क्षेत्र की ओर बहती हवा जल समीर कहलाती है।

→ थल समीर : अधिक ऊष्मा अवशोषित करने के सामर्थ्य के कारण जल, थल से देर में ठंडा होता है जिस कारण थल की ठंडी हवा, समुद्री जल की ओर बहने लगती है, जिसे थल समीर कहते हैं।

→ फारेनहाइट स्केल: फारेनहाइट स्केल तापमान मापने के लिए बनाई गई स्केल है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 3 रेशों से वस्त्र तक

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 3 रेशों से वस्त्र तक

→ ऊन और रेशम के रेशे प्रकृति में जन्तुओं से प्राप्त होते हैं।

→ ऊन के रेशे भेड़, बकरी या याक से प्राप्त होते हैं।

→ भेड़ की पतली चमड़ी के ऊपर दो प्रकार के रेशे होते हैं-

  1. दाढ़ी के रुखे बाल तथा
  2. त्वचा के निकट मौजूद तन्तु रूपी मुलायम बाल।

→ वर्णात्मक प्रजनन विधि द्वारा जनकों का चयन करके अनिवार्य विशेष गुण जैसे मुलायम बालों वाली भेड़ें या घनी जत वाली भेड़ें पैदा की जा सकती हैं।

→ विभिन्न प्रकार की ऊन होती है, जैसे-भेड़ की ऊन, अंगोरा ऊन तथा कश्मीरी ऊन।

→ ऊन प्राप्ति के लिए भेड़ों को पाला जाता है।

→ सौर्टम रोग, एंथैक्स जीवाणु द्वारा संक्रमित होता है।

→ रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम के कीड़ों को पालना रेशम कीट पालन (सेरी कल्चर) कहलाता है।

→ मादा रेशम कीट सैंकड़ों अंडे देती हैं।

→ अंडों से निकलने वाले लारवा कैटरपिलर कहलाते हैं।

→ कैटरपिलर अपने आकार में वृद्धि करते हैं तथा प्यूपा (बालिग) बन जाते हैं।

→ प्यूपा अपने इर्द-गिर्द एक 8 की शक्ल का प्रोटीन का जाल बुन लेता है। जो हवा के संपर्क में आकर सख्त होकर रेशम का फाइबर बन जाता है।

→ प्यूपा इन रेशों से अपने आप को ढक लेता है तथा इस आकृति को कोकून कहते हैं।

→ सबसे सामान्य रेशम कीट ‘शहतूत रेशम’ कीट है। रेशम की अन्य किस्में टस्सर रेशम, मूंगा रेशम तथा कोसा रेशम हैं।

→ जिस प्रक्रिया द्वारा कोकून को उबालकर या भाप देकर रेशे निकाले जाते हैं, उसे रेशम की रीलिंग कहते हैं।

→ रीलिंग विशेष मशीनों से की जाती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 3 रेशों से वस्त्र तक

→ रेशमी कपड़े बुनने के लिए रेशमी धागे का प्रयोग करते हैं।

→ जत : भेड़ के शरीर के बालों का गुच्छा ।

→ रीलिंग : रेशम के कोकून को पानी में उबाल कर या भाप देकर रेशम के रेशे निकालने की प्रक्रिया रीलिंग कहलाती है।

→ सकोरिंग या अभिमार्जन : कटी हुई चमड़ी सहित बालों को टैंकियों में डालकर चिकनाई, धूल, मैल तथा पसीना आदि हटाने के लिए अच्छी तरह धोना, सकोरिंग या अभिमार्जन कहलाता है।

→ कोकून : रेशम के रेशों से बनी हुई परत जो कैटरपिलर को ढक लेती है, कोकून कहलाती है।

→ सेरी कल्चर (रेशम के कीड़े को पालना) : रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम के कीड़ों को पालना सेरी कल्चर कहलाता है।

→ शियरिंग या कटाई : भेड़ के बालों और चमड़ी की पतली परत को भेड़ के शरीर से हटाने की प्रक्रिया को शियरिंग या ऊन की कटाई कहा जाता है।

→ थ्रोइंग : कच्चे रेशम को या काते हुए रेशम को मज़बूत (मोटा) करने के लिए काता जाता है। इस प्रक्रिया को थ्रोइंग कहते हैं। यह अलग-अलग रेशों को टूटने से बचाता है।

→ कोंबिंग या कंघी करना : छोटे फूले हुए रेशे जिन्हें गांठे कहा जाता है, को हटाने की प्रक्रिया कोंबिंग या कंघी करना कहलाता है।

→ डाईंग या रंगाई करना : भेड़ों की ऊन को भिन्न-भिन्न रंगों में रंगा जा सकता है क्योंकि जो कुदरती या प्राकृतिक रंग केवल काला, भूरा या सफ़ेद होता है।

→ वर्णात्मक प्रजनन : विशेष आवश्यक गुणों की दो भेड़ों को उत्पन्न करने के लिए जनकों का चयन कर लिया जाता है फिर दोनों जनकों को प्रजनन में शामिल किया जाता है, इस प्रक्रिया को वर्णात्मक प्रजनन कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 2 जंतुओं में पोषण

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 2 जंतुओं में पोषण

→ जन्तु (प्राणी) पौधों की तरह अपना भोजन स्वयं तैयार नहीं करते हैं। वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से अपना भोजन पौधों (पादपों) से प्राप्त करते हैं।

→ प्राणी जटिल भोजन खाते हैं तथा उन्हें सरल पदार्थों में तोड़ते हैं।

→ भिन्न-भिन्न प्राणियों को पोषकों की आवश्यकता, भोजन ग्रहण करने के ढंग तथा शरीर में भोजन के प्रयोग के ढंग भिन्न-भिन्न होते हैं।

→ जो प्राणी केवल पौधे खाते हैं, उन्हें शाकाहारी कहा जाता है।

→ जो प्राणी केवल दूसरे प्राणी अथवा जन्तुओं को अपना भोजन बनाते हैं, उन्हें मांसाहारी कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 2 जंतुओं में पोषण

→ जो प्राणी पौधे तथा जन्तुओं दोनों को खाते हैं, उन्हें सर्वाहारी प्राणी कहा जाता है।

→ भिन्न-भिन्न प्रकार के प्राणियों में भोजन प्राप्त करने का ढंग भिन्न-भिन्न होता है।

→ परपोषी पोषण तीन प्रकार का होता है-

  1. मृतजीवी पोषण
  2. परजीवी पोषण
  3. प्राणीवत पोषण।

→ प्राणी उस पोषण के दौरान जटिल भोजन को शरीर के अंदर ले जाते हैं तथा जहाँ वह एंजाइमों की सहायता से सरल घुलनशील पदार्थों (यौगिकों) में विभाजित हो जाता है, जिसे शरीर द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।

→ भोजन प्राप्त करने की क्रिया के दौरान पाँच चरण-

  1. भोजन ग्रहण करना,
  2. पाचन करना,
  3. अवशोषण,
  4. स्वांगीकरण,
  5. निकास।

→ मानव पाचन तंत्र में मुख गुहिका, ग्रास नली, आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत तथा मलद्वार होता है।

→ मानव के मुख में चार प्रकार के दाँत होते हैं :

  1. काटने वाले (छेदक या कृतक) तीखे दांत (zncisors)
  2. भेदक या रदनक (Canianes)
  3. अग्र चवर्णक दाढ़ें (Premolar)
  4. चवर्णक दाढ़ें (Molars)

→ भोजन का पाचन मुख से आरंभ होकर छोटी आंत (क्षुद्रांत्र) तक होता है।

→ अवशोषित हुआ भोजन रक्त द्वारा शरीर के भिन्न-भिन्न भागों तक भेजा जाता है।

→ पानी तथा कुछ लवणों का अवशोषण बड़ी आंत (वृहदांत्र) में होता है।

→ अनपचा तथा अनअवशोषित भोजन मल के रूप में मल द्वार द्वारा उसका त्याग होता है।

→ मांसाहारी : ऐसे प्राणी जो केवल दूसरे प्राणियों (जन्तुओं) को अपना भोजन बनाते हैं, उन्हें मांसाहारी कहा जाता है।

→ सर्वाहारी : जो प्राणी पौधे तथा दूसरे जन्तु को भोजन के रूप में खाते हैं, उन्हें सर्वाहारी प्राणी कहा जाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 2 जंतुओं में पोषण

→ भोजन ग्रहण करना : भोजन को शरीर के अंदर ले जाने की क्रिया को भोजन ग्रहण करना कहते हैं।

→ पाचन : यह वह जैव-प्रक्रिया है जिसके दौरान जटिल पदार्थों को सरल पदार्थों में विभाजित किया जाता है। शरीर के अंदर ग्रंथी से रिसते हुए एन्जाइम (रसायन) इस पाचन क्रिया में सहायक होते हैं। पाचन मुख गुहिका से आरंभ होकर छोटी आंत में पूरा होता है।

→ अवशोषण : यह भोजन प्राप्त करने की क्रिया का एक चरण है जिसमें पचे हुए भोजन को छोटी आंत की अंदरूनी दीवार द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।

→ निष्कासन : अपचित भोजन, भोजन नली अथवा ग्रास नली से बाहर निकल जाता है। इस प्रक्रिया को निष्कासन कहते हैं।

→ मुख गुहिका : मुख से प्राप्त भोजन फिर मुख गुहिका में चला जाता है। यह दाँतों से आगे का क्षेत्र हैं।

→ इनेमल : दाँतों के ऊपर मज़बूत सुरक्षा प्रदान करने वाला पदार्थ इनेमल की परत होती है।

→ जटिल भोजन : प्राणियों (जन्तुओं) द्वारा तेज़ी में निगला हुआ भोजन खानों में जमा कर लिया जाता है। यहाँ भोजन का आंशिक पाचन होता है। इस आधे पचे भोजन को जटिल भोजन कहते हैं।

→ ग्रास नली : यह मानव शरीर की सबसे लम्बी नली है जो मुख से आरंभ होकर गुदा तक जाती है। इसमें एन्जाइमों द्वारा जटिल भोजन को सरल अणुओं में तोड़ा जाता है।

→ पित्ता : यह एक थैली है जिसमें यकृत (जिगर) जो कि एक सबसे बड़ी ग्रंथी है द्वारा रिसा हुआ रस जमा होता है।

→ कृमि रूपी अंग अथवा सीकम : यह प्राणियों की ग्रास नली की छोटी आंत तथा बड़ी आंत के बीच थैली जैसी रचना है, जिसे कृमि रूपी अंग या सीकम कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 2 जंतुओं में पोषण

→ पित्ता रस : जिगर या यकृत हमारे शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथी है जिसमें से रिसाव होता है जो पित्ते में जमा होता रहता है। इस रिसाव को पित्ता रस कहते हैं।

→ रूमीनेंट : घास खाने वाले जन्तु जैसे-गाय, भैंस को रूमीनेंट कहते हैं।

→ स्वांगीकरण : आंत द्वारा अवशोषित किया भोजन रक्त द्वारा शरीर के भिन्न-भिन्न भागों तक पहुँचा दिया जाता है। इस क्रिया को स्वांगीकरण कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 1 पादपों में पोषण

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 1 पादपों में पोषण

→ सभी सजीवों (पौधों और जंतुओं) के लिए भोजन ज़रूरी होता है।

→ भोजन के मुख्य अंश-कार्बोहाइड्रेट्स, वसा, प्रोटीन तथा लवण हैं, जो शरीर के निर्माण तथा वृद्धि के लिए। आवश्यक होते हैं।

→ जीव द्वारा भोजन प्राप्त करना तथा उसका उचित प्रयोग पोषण कहलाता है।

→ भिन्न-भिन्न जीवों के लिए भिन्न पोषण होता है।

→ भोजन संबंधी आदतों के आधार पर पोषण को दो श्रेणियों में बांटा जाता है-

  1. स्वपोषी पोषण
  2. परपोषी पोषण।

→ जो सजीव सरल पदार्थों से अपना भोजन स्वयं तैयार करते हैं, उन्हें स्वपोषी कहा जाता है तथा इस प्रकार के पोषण को स्वपोषण कहते हैं।

→ सभी हरे पौधे तथा बैक्टीरिया (जीवाणु) स्वपोषी होते हैं।

→ युगलीना एक ऐसा जीव है जो दोनों स्वपोषण तथा परपोषण कर सकता है।

→ पत्तों को पौधों का भोजन तैयार करने का कारखाना कहा जाता है।

→ पौधे प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान पत्तों में मौजूद (उपस्थित) हरे रंग का तत्त्व (क्लोरोफिल) सूरज के प्रकाश की उपस्थिति में वायु की कार्बन-डाइऑक्साइड तथा पानी के साथ कार्बोहाइड्रेट्स के रूप में भोजन का निर्माण करता है।

→ पौधों के पत्तों की सतह पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिनके द्वारा हवा की कार्बन-डाइऑक्साइड तथा निर्मित ऑक्सीजन की अदला-बदली होती है। इन्हें ‘रंध्र’ (Stomata) कहा जाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 1 पादपों में पोषण

→ रंध्र (Stomata) गार्ड सेल (कोशिका) से घिरा होता है।

→ मिट्टी में उपस्थित पानी और लवण पौधों की जड़ों द्वारा अवशोषित किए जाते हैं तथा जाइलम उत्तक (टिशू) द्वारा पौधे के अन्य भागों में भेजे जाते हैं।

→ सभी सजीवों के लिए सूर्य ही ऊर्जा का मुख्य स्रोत है।

→ प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया में सौर प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।

→ कुछ पौधे ऐसे होते हैं जिनके पत्तों का रंग हरा नहीं होता परंतु किसी अन्य रंग के वर्णक होते हैं जैसे कौलीयम में लाल रंग का वर्णक तथा लाल बंद गोभी में बैंगनी रंग का वर्णक होता है। ऐसे पत्तियों में भी प्रकाश-संश्लेषण होता है, क्योंकि इन रंगों की पत्तियों में हरे रंग का वर्णक क्लोरोफिल भी होता है।

→ प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के मूल उत्पाद ऑक्सीजन गैस तथा ग्लूकोज़ हैं।

→ परपोषितों को चार श्रेणियों में बांटा जाता है-

  1. मृतजीवी
  2. परजीवी
  3. कीट-आहारी तथा
  4. सहजीवी।

→ जो जीव दूसरे सजीवों के शरीर से पोषण प्राप्त करते हैं, उन्हें परजीवी कहते हैं।

→ जो जीव पोषण के लिए मृत शरीरों तथा गले-सड़े पदार्थों पर निर्भर करते हैं, उन्हें मृतजीवी अथवा मृत आहारी कहते हैं।

→ सहजीवी सम्बन्ध में दो प्रकार के जीव भोजन के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं, जिसमें दोनों को लाभ होता है।

→ मृत जंतुओं, गले-सड़े पौधों और पत्तियों को विघटन करने वाले घटकों के कारण मिट्टी के आवश्यक पोषक तत्त्वों की पूर्ति होती रहती है।

→ पोषक तत्त्व: भोजन के मुख्य अंश जैसे-कार्बोहाइड्रेट्स, वसा, प्रोटीन, विटामिन तथा लवण जो शरीर के निर्माण में सहायक होते हैं, को पोषक तत्त्व कहते हैं।

→ स्वपोषण : जो सजीव सरल पदार्थों से अपना भोजन स्वयं तैयार करते हैं, उन्हें स्वपोषी कहा जाता है। इस प्रकार के पोषण को स्वपोषण कहते हैं।

→ परपोषण : जो सजीव अपना भोजन स्वयं तैयार नहीं करते परंतु अपने भोजन के लिए दूसरे जीवों पर निर्भर करते हैं, उन्हें परपोषी कहा जाता है। इस प्रकार के पोषण को परपोषण कहते हैं।

→ मृतजीवी : ऐसा पोषण जिसमें मृत जीवों अथवा गले-सड़े पदार्थों से जीवों को भोजन प्राप्त होता है।

→ परजीवी : वह जीव जो भोजन के लिए दूसरे पौधे तथा जीवों के ऊपर निर्भर करते हैं, उन्हें परजीवी कहा जाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 1 पादपों में पोषण

→ प्रकाश-संश्लेषण : यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पौधों की पत्तियों में हरे रंग का वर्णक (क्लोरोफिल) होता है, हवा में उपस्थित कार्बन-डाइऑक्साइड तथा जल द्वारा सौर-प्रकाश ऊर्जा की उपस्थिति में कार्बोहाइड्रेट्स (भोजन) के रूप में तैयार करते हैं। इसमें सौर ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित होती है।

→ क्लोरोफिल : यह एक हरे रंग का वर्णक है जो पौधों (पादपों) में उपस्थित होता है। यह उनके भोजन तैयार करने के लिए आवश्यक होता है।

→ कार्बोहाइड्रेट्स : यह एक प्रकार का सूक्ष्म पोषक है जो कई खाद्य पदार्थों, चीनी, स्टार्च तथा रंगों में मौजद होता है। स्वस्थ रहने के लिए हमारे शरीर को इस सूक्ष्म पोषक तत्त्व की आवश्यकता होती है।

→ स्टोमैटा (रंध्र) : पौधों के पत्तों की सतह पर छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। पत्तों पर इसकी संख्या अधिक होती है। स्टोमैटा के द्वारा गैसों की अदला-बदली होती है।

→ मेज़बान (Host) : जिस पौधे अथवा जीव के ऊपर परजीवी अपने भोजन के लिए निर्भर करता है, उसे मेज़बान (Host) कहा जाता है।

→ रासायनिक खाद : यह फैक्टरी में तैयार किए गए रासायनों का मिश्रण होता है। इसमें अधिक मात्रा में पादपों के लिए पोषक तत्त्व मौजूद होते हैं। यह मिट्टी में मौजूद पोषक तत्त्वों की कमी को दोबारा पूरा करती है। जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनी रहे।

→ राइजोबियम : यह एक बैक्टीरिया (जीवाणु) है जो फलीदार पौधों की जड़ों में होते हैं। यह हवा में
स्थित नाइट्रोजन को प्रयोग करने योग्य बना देते हैं, जिसका प्रयोग पौधे करते हैं तथा इसके बदले में पौधे इस जीवाणु को आश्रय तथा भोजन प्रदान करते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 16 कचरा-संग्रहण एवं निपटान

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 16 कचरा-संग्रहण एवं निपटान

→ कोई भी पदार्थ जो पहले उपयोगी था परंतु अब उपयोगी नहीं है उसे अपशिष्ट अथवा कचरा कहा जाता है।

→ ठोस कचरा कूड़ा कहलाता है। यह प्राकृतिक तथा मानवीय गतिविधियों दोनों से उत्पन्न होता है।

→ कचरे में उपयोगी और अनुपयोगी दोनों प्रकार की वस्तुएँ होती हैं।

→ अपशिष्ट कई प्रकार के होते हैं जैसे औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू अपशिष्ट, कृषि अपशिष्ट, जैव चिकित्सा अपशिष्ट आदि ।

→ उदयोगों से पैदा होने वाले कचरे को औदयोगिक अपशिष्ट कहा जाता है ।

→ ठोस कचरा दो प्रकार का होता है (अ) बायोडिग्रेडेबल कचरा और (ब) गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरा।

→ कचरे के उचित निपटान के लिए हमें कचरे को निपटाने से पहले इसका पृथक्करण करना चाहिए।

→ कचरे के पृथक्करण के लिए हम अलग-अलग रंग के कूड़ेदानों का उपयोग करके ऐसा कर सकते हैं।

→ कचरे का प्रबंधन करने के लिए चार आर यानी पुन: उपयोग, कम करना, रीसाइक्लि करना, मना करने की अवधारणा बहुत प्रचलित हैं ।

→ कचरे में से कुछ हिस्से या वस्तुओं का पुन: उपयोग किया जा सकता है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 16 कचरा-संग्रहण एवं निपटान

→ आमतौर पर कचरा इकट्ठा करके लैंडफिल में फेंक दिया जाता है।

→ उपयोगी घटकों या कचरे के बायोडिग्रेडेबल घटक से खाद बनाने के लिए कंपोस्टिंग तथा वर्मी कंपोस्टिंग जैसी विधियों का उपयोग किया जा सकता है।

→ सूखे पत्तों, गेहूँ की भूसी और फसलों के कुछ हिस्से को जलाना नहीं चाहिए क्योंकि इन को जलाने से बहुत अधिक धुआँ, धूल और हानिकारक गैसें निकलती हैं।

→ सब्जियों और फलों के कचरे, कॉफी और चाय की पत्तियों, खरपतवारों आदि की वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए लाल कृमी सबसे अच्छे माने जाते हैं ।

→ लाल कृमी तैलीय, अचार, नमकीन भोजन और दूध उत्पाद वाले अपशिष्टों आदि की वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए अच्छे नहीं माने जाते हैं।

→ कुछ प्रकार के प्लास्टिक, कागज, काँच और धातु को पुनर्नवीनीकरण किया जा सकता है।

→ प्लास्टिक दुर्गंध के साथ जलता है और बहुत सारी हानिकारक गैसें पैदा करता है।

→ प्लास्टिक की थैलियों से नालियाँ और सीवर सिस्टम जाम हो जाता है।

→ जानवरों द्वारा खाए जाने वाले प्लास्टिक बैग उनकी मौत का कारण हैं।

→ प्लास्टिक उपयोगी है क्योंकि इनसे बनी चीजें लंबे समय तक चलती हैं।

→ भस्मीकरण विधि हानिकारक गैसें छोड़ती है और प्रदूषण का कारण बनती है।

→ फेंके गए मोबाइल या कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आदि वस्तुएँ ई-कचरे में शामिल हैं।

→ कूड़ा-कर्कट. ठोस कचरे को कचरा कहते हैं।

→ डंप-एक बड़ा निचला क्षेत्र जो कचरा निपटाने के लिए प्रयोग किया जाता था उसे डंप कहते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 16 कचरा-संग्रहण एवं निपटान

→ लैंडफिल-कचरा से भरा जाने वाला निचला क्षेत्र लैंडफिल अथवा भराव क्षेत्र कहते हैं।

→ बायोडिग्रेडेबल या जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट-अपशिष्ट पदार्थ जो सूक्ष्मजीवों की क्रिया द्वारा हानिरहित पदार्थों में विघटित हो सकते हैं उन्हें बायोडिग्रेडेबल या जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहते हैं।

→ गैर-जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट-अपशिष्ट पदार्थ जिन्हें आसानी से हानिरहित पदार्थों विघटित नहीं किया जा सकता है उन्हें बायोडिग्रेडेबल या गैर–जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहते हैं।

→ भस्मीकरण-बंद कंटेनरों में कचरे को जलाने की प्रक्रिया को भस्मीकरण कहते हैं।

→ वर्मी कंपोस्टिंग-लाल कमियों की सहायता से कंपोस्ट बनाने की विधि वर्मी कंपोस्ट कहलाती है।

→ गिजार्ड-लाल कृमियों में पीसने के लिए मौजूद दाँतों जैसी कठोर संरचना को गिजार्ड कहा जाता है।

→ पुनर्चक्रण-कुछ सामग्रियों को बार-बार उपयोग करने की प्रक्रिया को रीसाइक्लिंग अथवा पुनर्चक्रण कहते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 15 हमारे चारों ओर हवा

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 15 हमारे चारों ओर हवा

→ सभी सजीवों को जीने के लिए हवा की आवश्यकता होती है।

→ वायु हमारे चारों ओर हर जगह मौजूद है लेकिन हम इस को देख नहीं सकते हैं।

→ हमारी पृथ्वी हवा की एक पतली परत से घिरी हुई है, जो पृथ्वी की सतह से कई किलोमीटर ऊपर तक फैली हुई है। इसे वायुमंडल के रूप में जाना जाता है।

→ वायु जलवाष्प, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, धूल और धुएं से बनी है।

→ नाइट्रोजन और ऑक्सीजन हवा के मुख्य घटक हैं और बड़ी मात्रा में मौजूद हैं।

– हवा में नाइट्रोजन 78% और ऑक्सीजन 21% है।

→ जलने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

→ कार्बन डाइऑक्साइड एक ग्रीन हाउस गैस है।

→ वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन जीवों (मनुष्य, पशु) और पौधों की उपस्थिति से बना रहता है।

→ कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग पौधों द्वारा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया से भोजन बनाने के लिए किया जाता है। इस क्रिया से पौधे वायुमंडल में ऑक्सीजन छोड़ते हैं।

→ श्वसन के लिए जानवरों और मनुष्यों द्वारा ऑक्सीजन का सेवन किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप वे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्पादन करते हैं।

→ कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग अग्निशामक के रूप में किया जाता है क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड जलने का समर्थन नहीं करता है।

→ हवा को संपीड़ित किया जा सकता है और यह दबाव भी डालती है।

→ चलती हवा को पवन कहा जाता है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 15 हमारे चारों ओर हवा

→ पवन में एक पवनचक्की को घुमाने की शक्ति होती है जो बिजली पैदा करती है।

→ पवन चक्कियाँ बहुत उपयोगी होती हैं क्योंकि वे बिजली पैदा करती हैं।

→ पवन बीजों, परागकणों के विसरण में मदद करती है।

→ पवन नौकाओं, जलयानों, ग्लाइडरों, हवाई जहाजों आदि की आवाजाही में मदद करती है।

→ परागकणों के विसरण को परागण के रूप में जाना जाता है।

→ वायुमंडल की ऊपरी परत में मौजूद ओजोन सूर्य की यूवी किरणों से हमारी रक्षा करती है।

→ वायु-यह नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, जल वाष्प आदि कई गैसों का मिश्रण है।

→ पवन-चलती हवा पवन है।

→ पवन चक्की-एक उपकरण जिसे हवा से घुमाया जा रहा है और बिजली उत्पादन के लिए प्रयोग किया जाता है।

→ वायुमंडल-पृथ्वी के चारों ओर वायु का पतला आवरण वायुमंडल का निर्माण करता है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 14 पानी

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PSEB 6th Class Science Notes Chapter 14 पानी

→ जल एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है और इसे जीवन के लिए वरदान माना जाता है।

→ जल पूरी पृथ्वी पर मौजूद है।

→ पृथ्वी की सतह का लगभग 3/4 भाग पानी से ढका हुआ है।

→ मानव शरीर में 70% पानी होता है।

→ हमें अपने दैनिक कार्यों तथा अन्य वस्तुओं के उत्पादन के लिए जल की आवश्यकता होती है। पानी के दो मुख्य स्रोत सतही जल और भूजल हैं।

→ जल तीन अवस्थाओं अर्थात ठोस, द्रव और गैस में पाया जाता है।

→ हमें तालाबों, झीलों, नदियों, कुओं आदि से पानी मिलता है।

→ समुद्र या सागर का पानी खारा होता है। यह पीने के लिए और घरेलू, कृषि और औद्योगिक जरूरतों के लिए उपयुक्त नहीं है।

→ चूंकि जल एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है, इसलिए इसे संरक्षित किया जाना चाहिए।

→ जल का विवेकपूर्ण उपयोग और उसे बचाना ही जल संरक्षण है।

→ बारिश का पानी, पानी का शुद्ध रूप है और पीने के लिए सुरक्षित है।

→ वर्षा जल संचयन एक ऐसी तकनीक है जो वर्षा जल के संग्रहण द्वारा जल संरक्षण करती है। इस पानी का पुनउपयोग विभिन्न उपयोगी उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

→ जल चक्र एक चक्रीय प्रक्रिया है जिसमें जल पृथ्वी और वायुमंडल के बीच परिचालित होता है।

→ महासागरीय जल, जल चक्र को जल की आपूर्ति करता है और इस प्रकार एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 14 पानी

→ महासागरों, झीलों, गीले कपड़ों और पौधों का पानी वाष्पित हो जाता है।

→ बादल हवा में वाष्पित जल के संघनन रूप मात्र हैं।

→ बादल बारिश का कारण बनते हैं और पानी पृथ्वी, महासागरों, झीलों आदि में लौट आता है।

→ पहाड़ों पर बर्फ पिघलती है और पानी नदियों में चला जाता है।

→ जल भी भूमि द्वारा अवशोषित किया जाता है और भूजल के रूप में हमारे लिए उपलब्ध हो जाता है।

→ भारी बारिश और बारिश नहीं होने से बहुत सारी समस्याएँ होती हैं।

→ भारी बारिश बाढ़ का कारण बनती है जो जीवन और संपत्ति को नष्ट कर देती है।

→ अपनी सामान्य सीमा से अधिक मात्रा में पानी का अतिप्रवाह बाढ़ के रूप में जाना जाता है।

→ बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है।

→ किसी क्षेत्र में कोई वर्षा या बहुत कम वर्षा सूखे का कारण है। सूखे की स्थिति में भोजन, चारा और पानी की उपलब्धता नगण्य हो जाती है।

→ जनसंख्या वृद्धि के साथ उद्योग और कृषि भी बढ़ते हैं जो पानी के उपयोग पर जोर देते हैं।

→ पिघलना या गलन-ठोस के द्रव में बदलने की प्रक्रिया को पिघलना या गलन कहते हैं।

→ गलनांक-जिस तापमान पर कोई ठोस द्रव में बदलता है उस तापमान को गलनांक कहते हैं।

→ जमना या हिमीकरण-किसी तरल के ठोस में बदलने की प्रक्रिया को जमना या हिमीकरण कहते हैं।

PSEB 6th Class Science Notes Chapter 14 पानी

→ वाष्पीकरण-किसी तरल के वाष्प में बदलने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं।

→ वाष्पोत्सर्जन-जिस प्रक्रिया से पौधे हवा में अपना पानी खो देते हैं उसे वाष्पोत्सर्जन कहते हैं।

→ संघनन-जलवाष्पों के जल में परिवर्तन की प्रक्रिया संघनन कहलाती है।

→ अवक्षेपण-वर्षा और हिम के रूप में जल का गिरना अवक्षेपण कहलाता है।

→ बादल–संघनित पानी की बूंदे मिलकर बादल बनाती हैं।

→ जल चक्र-जल का हवा में वाष्पीकरण, संघनन द्वारा बादलों का बनना और पृथ्वी पर वर्षा का गिरना प्रकृति में जल चक्र का निर्माण करता है।

→ वर्षा जल संचयन या संग्रहण-वर्षा जल को ऐसे समय में उपयोग के लिए एकत्र करना जब वह उपलब्ध न हो वर्षा जल संचयन या संग्रहण कहलाता है।