PSEB 9th Class SST Notes Geography Chapter 4 Climate

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Climate PSEB 9th Class SST Notes


  • Climate is the sum total of weather conditions over a large area for a long period of time.
  • There are many climatic conditions in India.

Factors influencing climate:

  • Many factors affect the climate of a place such as distance from the equator, distance from the sea, altitude of a place, impact of winds, relief effect, jet streams, etc.
  • The Indian Climate is almost the same due to its physical structure.


  • Rainfall is a type of precipitation when moisture falls on the earth in the form of drops of water.
  • It is of three types: Convectional rainfall, Orographic rainfall, and Cyclonic rainfall.

PSEB 9th Class SST Notes Geography Chapter 4 Climate

Meaning of Monsoon:

  • The word ‘Monsoon’ is said to be derived from the Arabic word ‘Mausim’ meaning season.
  • In this way, monsoon is a season in which wind changes its direction with the season.

Monsoon System:

  • The monsoons are experienced in the tropical area roughly between 20°N and 20°S.
  • It is created due to the opposite position of air pressure.
  • This position of air pressure changes continuously.
  • That’s why in different seasons, the situation of winds changes on either side of the Tropic of Cancer.
  • Except this, jet streams also play an important role in the mechanism of the monsoon.

Seasons in India:
In the annual season of India, there are four major seasons-winter seasons, summer season, advancing monsoon, and retreating monsoon.

Winter Season:

  • There is a winter season in almost the whole of India from December till February.
  • In this season, north-eastern trade winds blow over the whole country.
  • In this season, temperature decreases when we move from south to north.
  • It is a dry season but some amount of rainfall occurs on the Tamil Nadu coast from these winds as here they blow from sea to land.

Summer Season:

  • This season remains from March to May.
  • In March, the highest temperature is about 38° Celsius, recorded in the Deccan plateau.
  • Gradually, low-pressure area starts to move towards North India which experiences high temperatures.
  • In the north, these low-pressure winds are called loo, Kaal Baisakhi in West Bengal, and Mango shower in the coastal areas of Karnataka.

Advancing Monsoon:

  • This season remains from June to September.
  • South-West monsoon enters India through two branches-Arabian sea branch and the Bay of Bengal branch.
  • These winds give a lot of rainfall to the country.
  • North-East India experiences lots of rain but the North-West part of India remains dry.
  • The months of July and August experience almost 75% to 90% rainfall in the country.
  • Mawsynram, a place in the Garo and Khasi hills of North-East India, experiences the highest rainfall in the world.
  • The second place is Cherapunji.
  • Western Ghats of South India experience heavy rainfall due to monsoon winds coming from the Arabian Sea branch.

PSEB 9th Class SST Notes Geography Chapter 4 Climate

Retreating Monsoon:

  • During the months of October and November, the monsoon over the northern plains becomes weaker.
  • This is replaced by a high-pressure system.
  • The retreat of the monsoon is marked by clear skies and a rise in temperature.
  • Due to high temperature and humidity, the weather become rather oppressive.
  • This is commonly known as ‘October heat’.
  • On the coast of the southern plateau, cyclones create havoc and are often very destructive.

Distribution of Rain:

  • Parts of the western coast and north-eastern India receive over about 300 cm of rainfall annually.
  • But western Rajasthan and adjoining parts of Gujarat, Haryana, and Punjab receive less than 50 cm of annual rainfall.
  • Higher parts of the country (Himalayan region) receive snowfall.
  • The annual rainfall is highly variable from year to year.
  • Variability of monsoon brings flood in many parts and drought in the other parts.

Instruments for climate:

  • Many instruments are used to measure different climatic features such as Maximum and Minimum Thermometer, Android Barometer, Dry and Wet Bulb Thermometer, Rain Gauge, Anemometer, Wind wane, etc.

PSEB 9th Class SST Notes Geography Chapter 4 Climate

Natural Disasters:

  • Nature is all-powerful.
  • When any natural calamity occurs, it leads to the great loss of life and property.
  • The tsunami was one of the natural disasters which came in many countries of South Asia in December 2004.
  • It led to the death of thousands of people and the destruction of property as well.

जलवायु PSEB 9th Class SST Notes

→ जलवायु – किसी भी स्थान के लंबे समय के मौसम की औसत । निकाल कर जो परिणाम निकाला जाता है उस परिणाम को उस स्थान की जलवायु कहते हैं। भारत में जलवायु की अलग-अलग परिस्थितियां पाई जाती हैं।

→ जलवायु को प्रभावित करने वाले तत्त्व – किसी भी स्थान की जलवायु को कई कारक प्रभावित करते हैं; जैसे कि भूमध्य रेखा से दूरी, समुद्र से दूरी, समुद्री तल से ऊंचाई, धरातल का स्वरूप, जेट स्ट्रीम इत्यादि। हमारे देश की भौगोलिक संरचना ने देश की जलवायु को एक जैसा ही बना दिया है।

→ वर्षा – नमी भरी हवा ऊपर उठती है तथा ऊँचाई पर जाकर ठंडी हो जाती है। ठंडी होने के कारण यह नमी को संभालकर नहीं रख सकती तथा पानी के कण बादलों का रूप ले लेते हैं।

→ जब बादलों में से यह पानी के कण पृथ्वी पर गिरते हैं तो इसे वर्षा करते हैं। वर्षा तीन प्रकार की होती है-संवहनी वर्षा, पर्वतीय वर्षा तथा चक्रवाती वर्षा।

→ मानसून का अर्थ – ‘मानसून’ शब्द की व्युत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से हुई है। इसका शाब्दिक अर्थ है-ऋतु। इस प्रकार मानसून से अभिप्राय एक ऐसी ऋतु से है जिसमें पवनों की दिशा पूरी तरह उलट जाती है।

→ मानसून प्रणाली – मानसून की रचना उत्तरी गोलार्द्ध में प्रशान्त महासागर तथा हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग पर वायुदाब की विपरीत स्थिति के कारण होती है। वायुदाब की यह स्थिति परिवर्तित होती रहती है।

→ इस कारण विभिन्न ऋतुओं में विषुवत् वृत्त के आर-पार पवनों की स्थिति बदल जाती है। इस प्रक्रिया को दक्षिणी दोलन कहते हैं। इसके अतिरिक्त जेट वायुधाराएं भी मानसून के रचनातन्त्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

→ भारत की ऋतुएं – भारत के वार्षिक ऋतु चक्र में चार प्रमुख ऋतुएं होती हैंशीत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, आगे बढ़ते मानसून की ऋतु तथा पीछे हटते मानसून की ऋतु।

→ शीत ऋतु – लगभग सारे देश में दिसम्बर से फरवरी तक शीत ऋतु होती है। इस ऋतु में देश के ऊपर उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें चलती हैं। इस ऋतु में दक्षिण से उत्तर की ओर जाने पर तापमान घटता जाता है। कुछ ऊँचे स्थानों पर पाला भी पड़ता है।

→ शीत ऋतु से चलने वाली उत्तरी पूर्वी पवनों द्वारा केवल तमिलनाडु राज्य को लाभ पहुंचता है। ये पवनें खाड़ी बंगाल से गुजरने के बाद वहां पर्याप्त वर्षा करती हैं।

→ ग्रीष्म ऋतु – यह ऋतु मार्च से मई तक रहती है। मार्च मास में सबसे अधिक तापमान (लगभग 38° सें०) दक्कन के पठार पर होता है। धीरे-धीरे ऊष्मा की यह पेटी उत्तर की ओर खिसकने लगती है और उत्तरी भाग में तापमान बढ़ता जाता है।

→ मई के अन्त तक एक लम्बा संकरा निम्न वायु दाब क्षेत्र विकसित हो जाता है, जिसे ‘मानसून का निम्न वायुदाब गर्त’ कहते हैं। देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में चलने वाली गर्म-शुष्क पवनें (लू), केरल तथा कर्नाटक के तटीय भागों में होने वाली ‘आम्रवृष्टि’ और बंगाल तथा असम की ‘काल बैसाखी’ ग्रीष्म ऋतु की अन्य मुख्य विशेषताएं हैं।

→ आगे बढ़ते मानसून की ऋतु – यह ऋतु जून से सितम्बर तक रहती है। देश में दक्षिणपश्चिमी मानसून चलती है जो दो शाखाओं में भारत में प्रवेश करती है-अरब सागर की शाखा तथा बंगाल की खाड़ी की शाखा। ये पवनें देश में पर्याप्त वर्षा करती हैं।

→ उत्तर-पूर्वी भारत में भारी वर्षा होती है, जबकि देश के उत्तरी-पश्चिमी कुछ भाग शुष्क रह जाते हैं। जुलाई तथा अगस्त के महीनों में देश की 75 से 90 प्रतिशत तक वार्षिक वर्षा हो जाती है।

→ गारो तथा खासी की पहाड़ियों की दक्षिणी श्रेणी के शीर्ष पर स्थित माउसिनराम में संसार भर में सबसे अधिक वर्षा होती है।

→ दूसरा स्थान यहां से कुछ ही दूरी पर स्थित चेरापूंजी को प्राप्त है। दक्षिणी भारत में पश्चिमी घाट की पवनाभिमुख ढालों पर अरब सागर की मानसून शाखा द्वारा भारी वर्षा होती है।

→ पीछे हटते मानसून की ऋतु – अक्तूबर तथा नवम्बर के महीनों में मानसून पीछे हटने लगता है। क्षीण हो जाने के कारण इसका प्रभाव कम हो जाता है। पृष्ठीय पवनों की दिशा भी उलटने लगती है।

→ आकाश साफ़ हो जाता है और तापमान फिर से बढ़ने लगता है। उच्च तापमान तथा भूमि की आर्द्रता के कारण मौसम कष्टदायक हो जाता है।

→ इसे ‘क्वार की उमस’ कहते हैं। इस ऋतु में दक्षिणी प्रायद्वीप के तटों पर उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात भारी वर्षा करते हैं। इस प्रकार ये बहुत ही विनाशकारी सिद्ध होते हैं।

→ वर्षा का वितरण – भारत में सबसे अधिक वर्षा पश्चिमी तटों तथा उत्तरी पूर्वी भागों में होती (300 सें० मी० से भी अधिक) है। परन्तु पश्चिमी राजस्थान तथा इसके निकटवर्ती पंजाब, हरियाणा तथा गुजरात के क्षेत्रों में 50 सें० मी० से भी कम वार्षिक वर्षा होती है।

→ देश के उच्च भागों (हिमालय क्षेत्र) में हिमपात होता है। वर्षण की यह मात्रा प्रति वर्ष घटती बढ़ती रहती है। मानसून की स्वेच्छाचारिता के कारण कहीं तो भयंकर बाढ़ें आ जाती हैं और कहीं सूखा पड़ जाता है।

→ जलवायु के यन्त्र – जलवायु का अनुमान लगाने के लिए कई प्रकार में यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। जैसे कि थर्मामीटर एनीराइड बैरोमीटर, सूखी तथा गीली गोली का थर्मामीटर, वर्षा मापक यन्त्र, वायुवेग मापक, वायु दिशा सूचक इत्यादि।

→ प्राकृतिक आपदाएं – प्रकृति के ऊपर किसी का ज़ोर नहीं चलता। इस प्रकार जब प्राकृतिक आपदाएं आती हैं तो काफी जान-माल का नुकसान होता है।

→ सुनामी भी इन प्राकृतिक आपदाओं में से एक थी जो दिसंबर 2004 में दक्षिण एशिया के देशों में आई तथा हज़ारों लोगों की मृत्यु हो गई थी।

ਜਲਵਾਯੂ PSEB 9th Class SST Notes

→ ਕਿਸੇ ਵੀ ਥਾਂ ਦੇ ਲੰਬੇ ਸਮੇਂ ਦੇ ਮੌਸਮ ਦੀ ਔਸਤ ਕੱਢ ਕੇ ਜੋ ਨਤੀਜਾ ਕੱਢਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਉਸ ਨਤੀਜੇ ਨੂੰ ਉਸ ਥਾਂ ਦੀ ਜਲਵਾਯੂ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਜਲਵਾਯੂ ਦੀਆਂ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਹਾਲਤਾਂ ਪਾਈਆਂ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ ।

→ ਕਿਸੇ ਵੀ ਥਾਂ ਦੀ ਜਲਵਾਯੂ ਨੂੰ ਕਈ ਕਾਰਕ ਪ੍ਰਭਾਵਿਤ ਕਰਦੇ ਹਨ ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਭੂ-ਮੱਧ ਰੇਖਾ ਤੋਂ ਦੂਰੀ, ਸਮੁੰਦਰ ਤੋਂ ਦੁਰੀ, ਸਮੁੰਦਰੀ ਤਲ ਤੋਂ ਉੱਚਾਈ, ਧਰਾਤਲ ਦਾ ਅਸਰ, ਪੌਣਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ, ਜੈਟ ਸਟਰੀਮ ਆਦਿ । ਸਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਦੀ ਭੌਤਿਕ ਬਣਤਰ ਨੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਪੌਣ-ਪਾਣੀ ਨੂੰ ਮੋਟੇ ਤੌਰ ਉੱਤੇ ਇੱਕੋ ਜਿਹਾ ਬਣਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ।

→ ਨਮੀ ਭਰੀ ਹਵਾ ਉੱਪਰ ਉੱਠਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਉੱਚਾਈ ਉੱਤੇ ਜਾ ਕੇ ਠੰਢੀ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਠੰਡੀ ਹੋਣ ਕਾਰਨ ਇਹ | ਨਮੀ ਨੂੰ ਸਾਂਭ ਕੇ ਨਹੀਂ ਰੱਖ ਸਕਦੀ ਅਤੇ ਪਾਣੀ ਦੇ ਕਣ ਬੱਦਲਾਂ ਦੀ ਸ਼ਕਲ ਲੈ ਲੈਂਦੇ ਹਨ ।

→ ਜਦੋਂ ਬੱਦਲਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇਹ ਪਾਣੀ ਦੇ ਕਣ ਧਰਤੀ ਉੱਤੇ ਡਿਗਦੇ ਹਨ, ਤਾਂ ਇਸ ਨੂੰ ਵਰਖਾ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ । ਵਰਖਾ ਤਿੰਨ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ-ਸੰਵਹਿਣ ਵਰਖਾ, ਪਰਬਤੀ ਵਰਖਾ ਅਤੇ ਚੱਕਰਵਾਤੀ ਵਰਖਾ
ਮਾਨਸੂਨ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਉਤਪੱਤੀ ਅਰਬੀ ਭਾਸ਼ਾ ਦੇ ਮੌਸਮ’ ਸ਼ਬਦ ਤੋਂ ਹੋਈ ਹੈ ।

→ ਇਸ ਦਾ ਸ਼ਬਦੀ ਅਰਥ ਹੈ ਰੁੱਤ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਾਨਸੂਨ ਤੋਂ ਭਾਵ ਇਕ ਅਜਿਹੀ ਰੁੱਤ ਤੋਂ ਹੈ ਜਿਸ ਵਿਚ ਪੌਣਾਂ ਦੀ ਦਿਸ਼ਾ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਲਟ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।

→ ਮਾਨਸੂਨ ਦੀ ਰਚਨਾ ਉੱਤਰੀ ਅੱਧ ਗੋਲੇ ਵਿਚ ਪ੍ਰਸ਼ਾਂਤ ਮਹਾਂਸਾਗਰ ਅਤੇ ਹਿੰਦ ਮਹਾਂਸਾਗਰ ਦੇ ਦੱਖਣੀ ਭਾਗ ਦੇ ਵਾਯੂ ਦਾਬ ਦੀ ਵਿਪਰੀਤ ਸਥਿਤੀ ਦੇ ਕਾਰਨ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਵਾਯੂ ਦਾਬ ਦੀ ਇਹ ਸਥਿਤੀ ਬਦਲਦੀ ਵੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ । ਇਸ ਦੇ ਕਾਰਨ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਰੁੱਤਾਂ ਵਿਚ ਕਰਕ ਰੇਖਾ ਚੱਕਰ ਦੇ ਆਰ-ਪਾਰ ਪੌਣਾਂ ਦੀ ਸਥਿਤੀ ਬਦਲ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।

→ ਇਸ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਨੂੰ ਦੱਖਣੀ ਦੋਲਨ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ । ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਸੈੱਟ ਵਾਯੂ ਧਾਰਾਵਾਂ ਵੀ ਮਾਨਸੂਨ ਦੇ ਰਚਨਾ ਤੰਤਰ ਵਿਚ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ ।

→ ਭਾਰਤ ਦੇ ਵਾਰਸ਼ਿਕ ਰੁੱਤ ਚੱਕਰ ਵਿਚ ਚਾਰ ਮੁੱਖ ਰੁੱਤਾਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ-ਸਰਦ ਰੁੱਤ, ਗਰਮ ਰੁੱਤ, ਅੱਗੇ ਵਧਦੇ | ਮਾਨਸੂਨ ਦੀ ਰੁੱਤ ਅਤੇ ਪਿੱਛੇ ਹਟਦੇ ਮਾਨਸੂਨ ਦੀ ਰੁੱਤ ।

→ ਲਗਪਗ ਸਾਰੇ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਦਸੰਬਰ ਤੋਂ ਫਰਵਰੀ ਤਕ ਸਰਦ ਰੁੱਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਇਸ ਰੁੱਤ ਵਿਚ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਉੱਪਰ ਉੱਤਰ-ਪੂਰਬੀ ਵਪਾਰਕ ਪੌਣਾਂ ਚਲਦੀਆਂ ਹਨ । ਇਸ ਰੁੱਤ ਵਿਚ ਦੱਖਣ ਤੋਂ ਉੱਤਰ ਵਲ ਜਾਣ ‘ਤੇ ਤਾਪਮਾਨ ਘੱਟਦਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਕੁੱਝ ਪਹਾੜੀ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿੱਚ ਪਾਲਾ ਵੀ ਪੈਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਸਰਦ ਰੁੱਤ ਵਿਚ ਚਲਣ ਵਾਲੀਆਂ ਉੱਤਰਪੂਰਬੀ ਪੌਣਾਂ ਦੁਆਰਾ ਸਿਰਫ਼ ਤਾਮਿਲਨਾਡੂ ਰਾਜ ਨੂੰ ਲਾਭ ਪੁੱਜਦਾ ਹੈ । ਇਹ ਪੌਣਾਂ ਖਾੜੀ ਬੰਗਾਲ ਤੋਂ ਲੰਘਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉੱਥੇ ਕਾਫ਼ੀ ਵਰਖਾ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ ।

→ ਗਰਮ ਰੁੱਤ ਮਾਰਚ ਤੋਂ ਮਈ ਤਕ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ । ਮਾਰਚ ਮਹੀਨੇ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਤਾਪਮਾਨ (ਲਗਪਗ 38° ਸੈਂਟੀਗੇਡ ਦੱਖਣ ਦੇ ਪਠਾਰ ‘ਤੇ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਹੌਲੀ-ਹੌਲੀ ਗਰਮੀ ਦੀ ਇਹ ਪੇਟੀ ਉੱਤਰ ਨੂੰ ਖਿਸਕਣ ਲਗਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਉੱਤਰੀ ਭਾਗ ਵਿਚ ਤਾਪਮਾਨ ਵੱਧਦਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਜਿਸ ਨੂੰ ਮਾਨਸੂਨ ਦਾ ਨਿਮਨ ਵਾਯੁਦਾਬ ਖੇਤਰ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਉੱਤਰ-ਪੱਛਮੀ ਭਾਗ ਵਿਚ ਚੱਲਣ ਵਾਲੀਆਂ ਗਰਮ ਖੁਸ਼ਕ ਪੌਣਾਂ (ਲੁ ਕੇਰਲ ਅਤੇ ਕਰਨਾਟਕ ਦੇ ਤਟੀ ਭਾਗਾਂ ਵਿਚ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਮੈਂਗੋ ਸ਼ਾਵਰ’ ਅਤੇ ਬੰਗਾਲ ਤੇ ਅਸਾਮ ਦੀ ‘ਕਾਲ-ਵੈਸਾਖੀ ਗਰਮ ਰੁੱਤ ਦੀਆਂ ਹੋਰ ਮੁੱਖ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ਤਾਵਾਂ ਹਨ ।

→ ਅੱਗੇ ਵਧਦੇ ਮਾਨਸੂਨ ਦੀ ਰੁੱਤ ਜੂਨ ਤੋਂ ਸਤੰਬਰ ਤਕ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ । ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਦੱਖਣ-ਪੱਛਮੀ ਮਾਨਸੂਨ ਚਲਦੀ ਹੈ ਜੋ ਦੋ ਸ਼ਾਖਾਵਾਂ ਵਿਚ ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਦਾਖ਼ਲ ਹੁੰਦੀ ਹੈ-ਅਰਬ ਸਾਗਰ ਦੀ ਸ਼ਾਖਾ ਅਤੇ ਬੰਗਾਲ ਦੀ ਖਾੜੀ ਦੀ ਸ਼ਾਖਾ । ਇਹ ਪੌਣਾਂ ਦੇਸ਼ ਵਿਚ ਕਾਫ਼ੀ ਵਰਖਾ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ ਉੱਤਰ-ਪੂਰਬੀ ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਬਹੁਤ ਵਰਖਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਜਦਕਿ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਉੱਤਰ-ਪੱਛਮੀ ਕੁਝ ਭਾਗ ਖ਼ੁਸ਼ਕ ਰਹਿ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ।

→ ਜੁਲਾਈ ਅਤੇ ਅਗਸਤ ਦੇ ਮਹੀਨਿਆਂ ਵਿਚ ਦੇਸ਼ ਦੀ 75 ਤੋਂ 90 ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਤਕ ਵਰਖਾ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਗਾਰੋ ਅਤੇ ਖਾਸੀ ਦੀਆਂ ਪਹਾੜੀਆਂ ਦੀ ਦੱਖਣੀ ਸ਼ੇਣੀ ਦੇ ਸਿਖਰ ‘ਤੇ ਸਥਿਤ ਮਾਉਸਿਨਰਾਮ ਵਿਚ ਸੰਸਾਰ ਭਰ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਵਰਖਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।

→ ਦੂਜਾ ਸਥਾਨ ਕੁੱਝ ਹੀ ਦੂਰੀ ‘ਤੇ ਸਥਿਤ ਚਿਰਾਪੂੰਜੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੈ । ਦੱਖਣੀ ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਪੱਛਮੀ ਘਾਟ ਦੀਆਂ ਪਵਨਾਭਿਮੁਖ ਢਾਲਾਂ ‘ਤੇ ਅਰਬ ਸਾਗਰ ਦੀ ਮਾਨਸੂਨ ਸ਼ਾਖਾ ਦੁਆਰਾ ਭਾਰੀ ਵਰਖਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।

→ ਅਕਤੂਬਰ ਅਤੇ ਨਵੰਬਰ ਦੇ ਮਹੀਨਿਆਂ ਵਿਚ ਮਾਨਸੂਨ ਪਿੱਛੇ ਹਟਣ ਲਗਦਾ ਹੈ । ਕਮਜ਼ੋਰ ਹੋ ਜਾਣ ਕਾਰਨ ਇਸ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਘੱਟ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਪੌਣਾਂ ਦੀ ਦਿਸ਼ਾ ਉਲਟਣ ਲਗਦੀ ਹੈ । ਅਸਮਾਨ ਸਾਫ਼ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਤਾਪਮਾਨ ਫਿਰ ਤੋਂ ਵੱਧਣ ਲਗਦਾ ਹੈ । ਉੱਚ ਤਾਪਮਾਨ ਅਤੇ ਭੂਮੀ ਦੀ ਸਿਲ਼ ਕਾਰਨ ਮੌਸਮ ਕਸ਼ਟਦਾਇਕ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਇਸ ਨੂੰ “ਕਵਾਰ ਦੀ ਉਮਸ’ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ । ਇਸ ਰੁੱਤ ਵਿਚ ਦੱਖਣੀ ਪਾਇਦੀਪ ਦੇ ਤੱਟਾਂ ਅਤੇ ਉਸ਼ਣ ਕਟੀਬੰਧੀ ਚੱਕਰਵਾਤ ਬਹੁਤ ਵਰਖਾ ਕਰਦੇ ਹਨ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਹ ਬਹੁਤ ਵਿਨਾਸ਼ਕਾਰੀ ਸਿੱਧ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਸਭ ਤੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਵਰਖਾ ਪੱਛਮੀ ਤੱਟਾਂ ਅਤੇ ਉੱਤਰ-ਪੂਰਬੀ ਭਾਗਾਂ ਵਿਚ ਹੁੰਦੀ (300 ਸੈਂਟੀਮੀਟਰ ਤੋਂ ਵੀ ਜ਼ਿਆਦਾ) ਹੈ ।

→ ਪਰ ਪੱਛਮੀ ਰਾਜਸਥਾਨ ਅਤੇ ਇਸ ਦੇ ਨੇੜੇ ਪੰਜਾਬ, ਹਰਿਆਣਾ ਅਤੇ ਗੁਜਰਾਤ ਦੇ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿਚ 50 ਸੈਂਟੀਮੀਟਰ ਤੋਂ ਵੀ ਘੱਟ ਵਰਖਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਦੇਸ਼ ਦੇ ਉੱਚੇ ਭਾਗਾਂ (ਹਿਮਾਲਾ ਖੇਤਰ) ਵਿਚ ਬਰਫ਼ ਪੈਂਦੀ ਹੈ ।

→ ਵਰਖਾ ਦੀ ਇਹ ਮਾਤਰਾ ਹਰ ਸਾਲ ਘੱਟਦੀ-ਵੱਧਦੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ । ਮਾਨਸੂਨ ਦੀ ਅਸਥਿਰਤਾ ਦੇ ਕਾਰਨ ਕਿਤੇ ਤਾਂ ਭਿਆਨਕ ਹੜ੍ਹ ਆਉਂਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਕਿਤੇ ਸੋਕਾ ਪੈ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਜਲਵਾਯੂ ਦਾ ਅਨੁਮਾਨ ਲਾਉਣ ਲਈ ਕਈ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਯੰਤਰਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਯੋਗ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ : ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਥਰਮਾਮੀਟਰ, ਐਨੀਰਾਈਡ, ਬੈਰੋਮੀਟਰ, ਸੁੱਕੀ ਅਤੇ ਗਿੱਲੀ ਗੋਲੀ ਦਾ ਥਰਮਾਮੀਟਰ, ਵਰਖਾ ਮਾਪਕ ਯੰਤਰ, ਵਾਯੂ ਵੇਗ ਮਾਪਕ, ਵਾਯੁ ਦਿਸ਼ਾ ਸੂਚਕ ਆਦਿ ।

→ ਕੁਦਰਤ ਦੇ ਭਾਣੇ ਉੱਤੇ ਕਿਸੇ ਦਾ ਜ਼ੋਰ ਨਹੀਂ ਚੱਲਦਾ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਦੋਂ ਕੁਦਰਤੀ ਆਫ਼ਤਾਂ ਆਉਂਦੀਆਂ ਹਨ ਤਾਂ ਬਹੁਤ ਜਾਨ-ਮਾਲ ਦਾ ਨੁਕਸਾਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ।

→ ਸੁਨਾਮੀ ਵੀ ਇਹਨਾਂ ਕੁਦਰਤੀ ਆਫ਼ਤਾਂ ਵਿਚੋਂ ਇਕ ਹੈ ਜਿਹੜੀ ਦਸੰਬਰ, 2004 ਵਿਚ ਦੱਖਣੀ ਏਸ਼ੀਆ ਦੇ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਆਈ ਸੀ ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਲੋਕ ਮਰ ਗਏ ਸਨ ।

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