PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 21 रेखीय ग्राफ : कालिक श्रृंखला

Punjab State Board PSEB 11th Class Economics Book Solutions Chapter 21 रेखीय ग्राफ: कालिक श्रृंखला Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Economics Chapter 21 रेखीय ग्राफ: कालिक श्रृंखला

PSEB 11th Class Economics रेखीय ग्राफ: कालिक श्रृंखला Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
काल श्रेणी ग्राफ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
समय अवधी पर आधारित मूल्यों को श्रेणी को काल श्रेणी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
जो रेखाचित्र वास्तविक मूल्यों के आधार पर बनाए जाते हैं तो उसको निरपेक्ष काल श्रेणी चित्र कहते
उत्तर-
सही।

प्रश्न 3.
यदि रेखाचित्र की रचना आनुपातिक माप के आधार पर की जाती है तो उसको सापेक्ष काल श्रेणी चित्र कहते हैं।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 4.
गलत आधार का प्रयोग कब किया जाता है ?
उत्तर-
जब आंकड़ों में अन्तर तो कम होता है परन्तु शून्य से दूरी अधिक होती है तो उस समय गलत आधार का प्रयोग किया जाता है।

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II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Question)

प्रश्न-
एक फ़र्म के स्वर्णिक लाभ के निम्नलिखित आंकड़ों से काल श्रेणी आरेख द्वारा प्रस्तुत करें।

वर्ष : 1977 1978 1979 1980 1981 1982 1983
लाभ (हज़ार ₹): 20 32 35 25 40 30 20

उत्तर:
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III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
निम्न तालिका में वर्ष 2001 से 2007 तक एक कॉलेज के विद्यार्थियों की संख्या दी गई है। इसे एक बिन्दु-रेखीय चित्र के रूप में प्रदर्शित करें –

वर्ष ( Years) विद्यार्थियों की संख्या (No. of Students)
2001 1,500
2002 2,000
2003 2,200
2004 3,000
2005 3,500
2006 3,800
2007 5,000

हल : रेखाचित्र में प्रदर्शित विभिन्न वर्षों में विद्याथियों की संख्या-
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प्रश्न 2.
निम्न आंकड़ों को ग्राफ द्वारा प्रदर्शित करें

वर्ष 2001 2002 2003 2004 2005 2006 2007
उत्पादन(प्रति हैक्टेयर क्विटल) 13.9 12.8 13.9 12.8 6.5 2.9 14.8

उत्तर-
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दो या दो से अधिक तथ्यों का रेखाचित्र
एक रेखाचित्र में एक से अधिक रेखाओं का भी प्रदर्शन सम्भव है। रंग, बनावट या लेख के आधार पर रेखाओं में विविधता उत्पन्न की जा सकती है।

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प्रश्न 3.
निम्न आंकड़ों को बिन्दुरेखा विधि से प्रदर्शित करें
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प्रश्न 4.
कृत्रिम आधार रेखा से क्या आशय है ?
उत्तर-
कृत्रिम आधार रेखा
(False Base Line) बिन्दुरेख की रचना में एक महत्त्वपूर्ण नियम यह है कि Vertical Scale को शून्य अर्थात् मूल बिन्दु से प्रारम्भ करना चाहिए ; किन्तु जब चलों के मान अत्यधिक विशाल होते हैं तब इस नियम को तोड़ना पड़ता है क्योंकि ऐसी दशा में यदि पैमाना शून्य से शुरू किया जाएगा तो मान बिन्दुओं को आधार रेखा से बहुत ऊंचाई पर अंकित करना पड़ेगा। बीच में अनावश्यक रूप से स्थान छूट जाएगा और फिर भी यह सम्भव है कि बिन्दुरेख पत्र की सीमित ऊंचाई में सभी बिन्दुओं को अंकित न किया जा सके। अतः कृत्रिम आधार रेखा की विधि अपनाई जाती है। इसके लिए शून्य आधार रेखा और न्यूनतम मान वाले बिन्दु के बीच शून्य रेखा के समीप ही लहरदार रेखाएं एक-दूसरे के निकट खींच कर Vertical Scale को तोड़ देते हैं।
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IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
समंकों के बिन्द-रेखीय प्रदर्शन के क्या लाभ तथा सीमाएं हैं ? (What are the advantages and defects of Graphs ?)
उत्तर-
समंकों के बिन्दु-रेखीय प्रदर्शन के लाभ
(Advantages of Graphs) बिन्दु-रेखीय समंकों के प्रदर्शन के निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. रेखाचित्र में समंकों को सरल रूप से प्रस्तुत किया जाता है।
  2. रेखाचित्र में समंकों को आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया जाता है
  3. रेखाचित्र से समंकों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।
  4. रेखाचित्रों से समंकों को संक्षिप्त करने में सहायता मिलती है।
  5. रेखाचित्रों से तुलनात्मक अध्ययनों में सहायता मिलती है।
  6. रेखाचित्रों से पूर्वानुमान लगाने में सहायता मिलती है।
  7. रेखाचित्रों से सांख्यिकीय विश्लेषण में सहायता मिलती है। इनकी सहायता से माध्यका तथा बहुलक पता किए जा सकते हैं।
  8. रेखाचित्रों से निष्कर्ष निकालने में सहायता मिलती है।

बिन्दु-रेखीय प्रदर्शन की सीमाएं और दोष : (Defects and Limitations of Graphs)
बिन्दु-रेखीय प्रदर्शन की प्रमुख सीमाएं अनलिखित हैं- .

  1. बिन्दु-रेखीय प्रदर्शन द्वारा केवल प्रवृत्ति का प्रदर्शन होता है, वास्तविक मूल्यों का ज्ञान मिलना सम्भव नहीं है।
  2. जो व्यक्ति बिन्दु-रेखीय प्रदर्शन का ज्ञान नहीं रखते उनके लिए इनका कोई मूल्य नहीं होता।
  3. इनमें निश्चितता का अभाव पाया जाता है।
  4. कई बार इनके प्रदर्शन का प्रभाव भ्रामक भी होता है।
  5. बिन्दु-रेखीय चित्रों को किसी तथ्य की पुष्टि के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
  6. रेखाचित्र में अशुद्ध निष्कर्ष भी निकाले जा सकते हैं।
  7. मापदण्ड में थोड़ा-सा परिवर्तन होने पर भी रेखाचित्र के आकार में बहुत परिवर्तन हो सकता है।

प्रश्न 2.
बिन्दुरेख बनाने के लिए नियम लिखें। (Write down the rules for the construction of Graph.)
उत्तर-
बिन्दुरेख बनाने के नियम
(Rules for the Construction of Graph) बिन्दुरेख बनाते समय निम्नलिखित नियमों का पालन किया जाना चाहिए

1. उचित शीर्षक (Proper Heading)-बिन्दुरेखा का शीर्षक स्पष्ट, उपयुक्त और पूर्ण होना चाहिए जिससे देखते ही यह ज्ञान हो जाए कि उसकी विषय-वस्तु क्या है।

2. बिन्दु रेखाओं का चित्रण (Plotting of graphs)—प्रायः बिन्दुरेख मूल बिन्दु के दाहिनी ओर ऊपर की ओर बनाया जाता है। अतः भुजाक्ष बिन्दुरेख पत्र के नीचे की ओर तथा कोटि अक्ष बायीं ओर होना चाहिए। भुजाक्ष की लम्बाई कोटि-अक्ष से डेढ़ गुना होनी चाहिए।

3. उचित मापदण्ड (Proper Scale)-रेखाचित्र के निर्माण में उचित पैमाने का विशेष महत्त्व है। सामान्यतः पैमाना ऐसा लिया जाना चाहिए कि चित्र पर सुन्दरता से अंकित किया जा सके।

4. कृत्रिम आधार रेखा का प्रयोग (Use of False Base Line)-नियमतः उदग्र पैमाना शून्य से प्रारम्भ होना चाहिए पर यदि प्रदर्शित होने वाले मूल्यों में अन्तर कम हो और न्यूनतम संख्या काफी बड़ी हो तो कृत्रिम आधार रेखा का प्रयोग किया जाना चाहिए।

5. अन्तर को स्पष्ट करना (Clear Difference)-जहां एक ही बिन्दुरेख पत्र पर कई वक्र बनाने हों तो प्रत्येक वक्र को अलग-अलग रंग या चौड़ाई या प्रकार प्रदर्शित करना चाहिए।

6. क्षैतिज और उदग्र मापदण्ड (Vertical and Horizontal Measure) क्षैतिज तथा उदग्र दोनों मापदण्ड अलग-अलग लिए जा सकते हैं और कभी-कभी उदग्र माप श्रेणी पर दो समंक-मालाओं को प्रदर्शित करने के लिए दो मापदण्ड साथ-साथ भी लिए जा सकते हैं।

7. आवश्यक टिप्पणियां (Required footnotes)-बिन्दुरेख के नीचे जहां आश्यक हो तो टिप्पणियां और समंकों का प्राप्ति स्थान भी दे देना चाहिए।

8. मापदण्ड प्रदर्शित करने वाले मूल्य (Table of Data)-इन मूल्यों को भुजाक्ष के नीचे और कोटि-अक्ष की बायीं ओर लिखना चाहिए। वक्रों के साथ समंकों को पास ही सारणी में दे देना चाहिए ताकि उनका विस्तृत अध्ययन किया जा सके जिस में उनकी शुद्धता की जांच सम्भव हो सके।

9. बिन्दु मिलाना (Joining of Points)-जब आंकड़ों को बिन्दु-रेखीय विधि द्वारा ग्राफ-पेपर पर पेश किया जाता है तो आंकड़ों से पहले बिन्दुओं का प्रयोग किया जाता है। बाद में इन बिन्दुओं को पैमाने द्वारा ठीक ढंग से मिलाना चाहिए अर्थात् बिन्दुओं को मिलाते समय जब पैमाने की सहायता ली जाती है तो रेखा बिन्दुओं के बीच ठीक प्रकार से गुज़रनी चाहिए और रेखा को पैन या पैन्सिल द्वारा मिलाया जाए अर्थात् रेखा खींचते समय समानता होनी चाहिए। ऐसा न हो कि रेखा कहीं से मोटी हो और कहीं बारीक या इतनी फीकी कि दिखाई देने में मुश्किल हो। ।

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10. स्वच्छता (Neatness) आंकड़ों को बिन्दु-रेखीय विधि द्वारा पेश करते समय सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सफाई रखने से चित्रकारी सुन्दर और आकर्षक होगी।

प्रश्न 3.
समय श्रेणी ग्राफ क्या होता है? मनघडंत उदाहरण द्वारा समय श्रेणी ग्राफ के निर्माण को स्पष्ट करें।
(What is Time Series Graph? Explain the Time Series Graph with the help of a Hypothetical example.)
उत्तर-
समय श्रेणी ग्राफ (Time Series Graph)-ग्राफ कई तरह के होते हैं, परन्तु दो तरह के ग्राफ अधिक प्रचलित हैं
(i) समय श्रेणी ग्राफ (Time Series Graphs)
(ii) आवृत्ति वितरण ग्राफ (Frequency Distribution Graphs)

(i) समय श्रेणी ग्राफ (Time series Graphs)-जब किसी तथ्य को समय के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है तो ऐसे ग्राफ को समय श्रेणी ग्राफ कहते हैं। साधारण तौर पर निश्चित समय को जब समान भागों में विभाजित कर मदों के समुच्चय को ग्राफ पेपर पर प्रदर्शन करने की विधि को समय श्रेणी ग्राफ कहा जाता है। उदाहरणस्वरूप मान लो 1951 से 1991 तक भारत की जनसंख्या की वृद्धि को ग्राफ पेपर पर प्रस्तुत किया जाए तो ऐसे आंकड़ों की श्रेणी को समय श्रेणी कहा जाता है।

समय सारणी के आधार पर जो ग्राफ अथवा चित्र बनाए जाते हैं उनको समय चित्र (Histogram) कहा जाता है। समय श्रेणी ग्राफ बनाने के लिए ग्राफ पेपर पर Ox रेखा तथा OY रेखा बनाई जाती है। Ox रेखा पर स्वतन्त्र चर तथा OY रेखा पर निर्धारित चर लिए जाते हैं। इस प्रकार ग्राफ का निर्माण किया जाता है तो उस विधि को ग्राफ विधि कहते हैं। समय श्रेणी ग्राफ को मुख्य तौर पर दो भागों में विभाजित कर स्पष्ट किया जा सकता है
(A) एक चर से सम्बन्धित ग्राफ (One Variable Graph)
(B) दो अथवा दो से अधिक चरों से सम्बन्धित ग्राफ (Two or more than two variable graph)

(A) एक चर से सम्बन्धित ग्राफ (One variable graph)-एक चर से सम्बन्धित आंकड़े दिए गए हों तो इनका ग्राफ बनाना आसान होता है। ऐसे ग्राफ की व्याख्या भी आसानी से की जा सकती है। उदाहरणस्वरूप भारत की स्वतन्त्रता . के पश्चात् जनसंख्या की वृद्धि को ग्राफ की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है।

वर्ष 1951 1961 1971 1981 1991 2001
जनसंख्या (करोड़ों में) 36 43 54 68 84 102

भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् जनसंख्या (एक घर समय चित्र)
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(B) दो अथवा दो से अधिक चरों से सम्बन्धित ग्राफ (Two or more than two variable graph)-जब दो अथवा दो से अधिक चरों को एक ही रेखा चित्र द्वारा दिखाया जता है तो ऐसे ग्राफ को दो अथवा दो से अधिक चरों से सम्बन्धित ग्राफ कहा जाता है। उदाहरणस्वरूप जनसंख्या के आंकड़ों में यदि हमें पुरुष तथा स्त्रियों की संख्या अलग-अलग दी गई है तो इन दोनों तत्त्वों को ही ग्राफ के रूप में प्रकट किया जाए तो ऐसे ग्राफ को दो चरों से सम्बन्धित ग्राफ कहा जाता है। . उदाहरण-भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् पुरुष तथा स्त्रियों की संख्या का विवरण निम्नलिखित सूचीपत्र में दिया गया है। इसको दो चरों से सम्बन्धित ग्राफ के रूप में पेश कीजिए
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भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् पुरुष तथा स्त्रियों की जनसंख्या (दो चर समय चित्र)
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PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण

Punjab State Board PSEB 11th Class Economics Book Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Economics Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण

PSEB 11th Class Economics रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
रेखाचित्रीय प्रदर्शन के लाभ लिखें।
उत्तर-
रेखाचित्रीय प्रदर्शन आंकड़ों को प्रस्तुत करने का आकर्षक, सरल व प्रभावशाली साधन है।

प्रश्न 2.
आवृत्ति आयत चित्र किसे कहते हैं ?
उत्तर-
आवृत्ति आयत चित्र वह रेखाचित्र है जिसमें अखण्डित श्रृंखला से सम्बन्धित मदों तथा उनकी आवृत्तियों को आयतों के रूप में ग्राफ पेपर पर प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 3.
संचयी आवृत्ति वक्र अथवा ओजाइव किसे कहते हैं ?
उत्तर-
संचयी आवृत्ति वक्र संचयी आवृत्ति वितरण को ग्राफ के रूप में प्रस्तुत करने वाला वक्र है। संचयी वक्र को ओजाइव (Ogive) भी कहते हैं।

प्रश्न 4.
आवृत्ति बहुभुज किसे कहते हैं ?
उत्तर-
आवृत्ति बहुभुज वह रेखाचित्र है जो आवृत्ति आयत चित्र (Histogram) के प्रत्येक आयत के शीर्ष के मध्य बिन्दुओं को सरल रेखाओं द्वारा मिलाकर बनाया जाता है।

प्रश्न 5.
कृत्रिम आधार रेखा किसे कहते हैं?
उत्तर-
शून्य रेखा अथवा मूल बिन्दु से कुछ ऊपर बनाई जाने वाली टेढ़ी-मेढ़ी रेखा जिस से धनात्मक प्रमाप आरम्भ की जाती है।

प्रश्न 6.
संचयी आवृत्ति वक्र को ओजाइव भी कहा जाता है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 7.
जब अखण्डित श्रृंखला को उनकी मदों के अनुसार आवृत्ति का प्रगटावा एक ग्राफ पेपर पर किया जाता है तो इसको …………………. कहते हैं।
(a) आवृत्ति वितरण
(b) आवृत्ति वक्र
(c) आवृत्ति आयत
(d) आवृत्ति बहुभुज।
उत्तर-
(c) आवृत्ति आयत।

प्रश्न 8.
आवृत्ति आयत (Histogram) की सभी आयतों के मध्य बिन्दुओं को सरल रेखा द्वारा मिला दिया जाता है तो इसको ……………….. कहते हैं।
उत्तर-
आवृत्ति बहुभुज (Polygon)।

प्रश्न 9.
आवृत्ति आयत का क्षेत्रफल = ……………………….. का क्षेत्रफल
उत्तर-
आवृत्ति वक्र।

प्रश्न 10.
संचयी आवृत्ति वक्र अथवा ओजाइव दो प्रकार की होती है
(i) ऊपरी सीमा से कम
(ii) ……….
उत्तर-
निचली सीमा से अधिक।

प्रश्न 11.
चित्रमयी और बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण में कोई एक अन्तर बताएँ।
उत्तर-
बिन्दु रेखीय चित्र को ग्राफ पर बनाते हैं और चित्रमयी को साधारण कागज़ पर बनाते हैं।

प्रश्न 12.
समय श्रेणी चित्र ………. के आधार पर बनाए जाते हैं।
उत्तर-
समय।

प्रश्न 13.
आवृत्ति आयत का क्षेत्रफल = …………….. का क्षेत्रफल।
उत्तर-
आवृत्ति वक्र।

प्रश्न 14.
संचयी आवृत्ति वक्र अथवा ओजाइव दो प्रकार की होती हैं।
(i) ऊपरी सीमा से कम
(ii) …………….
उत्तर-
निचली सीमा से अधिक।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
ग्राफ द्वारा प्रदर्शन का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
आंकड़ों को प्रस्तुत करने की एक महत्त्वपूर्ण विधि ग्राफ विधि अथवा बिन्दु रेखीय विधि होती है। इस विधि में आंकड़ों को ग्राफ पेपर (Graph Paper) पर प्रस्तुत किया जाता है। जब हम ग्राफ पेपर आंकड़ों को स्पष्ट करते हैं तो कम समय या कम परिश्रम से एक मनुष्य आंकड़ों को समझने योग्य हो जाता है। इसलिए क्राक्सटन तथा काउडन ने ठीक कहा है, “ग्राफ विधियां सीमित सूचना को जल्दी तथा प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने की लाभदायक विधियां हैं।”

प्रश्न 2.
ग्राफ द्वारा प्रदर्शन के कोई दो गुण बताएं।
उत्तर-

  1. आंकड़ों को सरल बनाना (To make data simple) आंकड़े मूल रूप में जटिल होते हैं, जिनको स्पष्ट करना तथा समझना कठिन होता है। इसलिए ग्राफ द्वारा आंकड़ों को आसानी से समझा जा सकता है।
  2. तुलना के लिए आसान (To make easy comparison)-जब आंकड़ों को ग्राफ की विधि द्वारा दिखाया जाता है तो इनमें तुलना करनी बहुत आसान हो जाती है जैसे कि पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के 10 + 2 कक्षा के विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त किए प्रतिशत अंकों की तुलना पिछले वर्ष के प्रतिशत अंकों से करते समय ग्राफ विधि लाभदायक होती है। इसी तरह एक मरीज़ के बुखार की स्थिति का अनुमान ग्राफ को देखकर डॉक्टर आसानी से लगा लेता है।

प्रश्न 3.
ग्राफ द्वारा प्रदर्शन की कोई दो सीमाएं बताएं।
उत्तर-

  1. निश्चितता की कमी (Lack of Accuracy)-ग्राफ विधि द्वारा आंकड़ों की प्रवृत्ति का पता चलता है। परन्तु इन आंकड़ों में निश्चितता की कमी होती है। ग्राफ द्वारा प्रदान की गई सूची युद्ध परिणाम प्रदान नहीं करती।
  2. गलत परिणाम (Wrong Results) -ग्राफ विधि द्वारा कई बार गलत परिणाम भी निकाले जा सकते हैं। क्योंकि रेखाचित्र द्वारा रेखाओं के उतार-चढ़ाव को देखकर 100% शुद्ध परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते।

प्रश्न 4.
आवृत्ति आयत से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
आवृत्ति आयत (Histogram)-आवृत्ति आयत चित्र वह चित्र है, जिनमें अखण्डित आवृत्ति वितरण (Continuous Frequency Distribution) को उनकी मदों के अनुसार आवृत्तियों का प्रकटावा एक ग्राफ पेपर पर किया जाता है। इस चित्र में OX पर मदों के वर्गांतर (Class Intervals) तथा OX पर वर्गांतर की आवृत्ति (Frequency) को प्रकट करते हैं। इस प्रकार आयतों के रूप में जो चित्र बन जाता है, उसको आयत आवृत्ति (Histogram) चित्र कहा जाता है।

प्रश्न 5.
आवृत्ति बहुभुज का अर्थ बताएं।
उत्तर-
आवृत्ति बहुभुज (Frequency Polygon) आवृत्ति बहुभज वह चित्र होता है जोकि आवृत्ति आयत (Histrogram) की सभी आयतों के ऊपरी भागों के मध्य बिन्दुओं को सीधी रेखा द्वारा मिलाकर बनाया जाता है। इसमें आवृत्ति बहुभुज के दोनों किनारों को आधार रेखाओं तक दोनों ओर बढ़ा दिया जाता है। इससे आवृत्ति बहुभुज का निर्माण हो जाता है। आवृत्ति बहुभुज तथा आवृत्ति आयतों का क्षेत्रफल एक-दूसरे के समान होता है।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित तालिका में विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त किए अंकों का विवरण दिया गया है। आवृत्ति आयत चित्र द्वारा प्रदर्शित करो।

अंक : 0-10 10-20 20-30 30-40 40-50
विद्यार्थियों की संख्या : 8 12 20 30 15

उत्तर-
आवृत्ति आयत (Histogram)
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 1

प्रश्न 2.
आवृत्ति बहुभुज से क्या अभिप्राय है ? निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से आवृत्ति बहुभुज का निर्माण करो।

अंक : 0-5 5-10 10-15 15-20 20-25 25-30
विद्यार्थी : 10 18 30 50 40 20

उत्तर-
आवृत्ति बहुभुज का अर्थ (Meaning of Frequency Polygon)-आवृत्ति बहुभुज का निर्माण करने से पहले हम आवृत्ति आयत (Histogram) का निर्माण करते हैं। आवृत्ति आयत के ऊपर के किनारों के मध्य बिन्दु को लेकर उनको आपस में मिला दिया जाए तो आधार रेखा तक बढ़ा दिया जाए तो इस प्रकार हमारे पास आवृत्ति बहुभुज का निर्माण हो जाता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 2नोट-प्रश्न अनुसार दिए आंकड़ों की सहायता से आवृत्ति आयत का निर्माण करने के पश्चात् आवृत्ति आयतों के ऊपर के भागों का मध्य a, b, c, d, e, f किया जाता है। इनको आपस में मिलाकर आधार रेखा तक बढ़ाने से बिन्दु M, N प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार M & N को आवृत्ति बहुभुज कहा जाता है। इसमें आवृत्ति आयतों का क्षेत्रफल आवृत्ति बहुभुज के क्षेत्रफल के समान होता है।

प्रश्न 3.
संचयी आवृत्ति वक्र से क्या अभिप्राय है ? संचयी आवृत्ति वक्र का निर्माण ऊँची सीमा पर कम विधि (Less than method) द्वारा स्पष्ट कीजिए।

अंक : 0-10 10-20 20-30 30-40 40-50
विद्यार्थी : 5 10 12 15 8

उत्तर-
संचयी आवृत्ति वक्र अथवा ओजाइव का अर्थ ऐसे वक्र से होता है, जिसमें आवृत्ति का जोड़ करके ग्राफ पेपर पर दिखाने से जो वक्र बन जाता है, उसको ओजाइव कहते हैं। इसको संचयी आवृत्ति वक्र भी कहा जाता है। इसका. निर्माण दो तरह से किया जाता है। वर्ग अन्तर की ऊँची सीमा तथा कम विधि (Less than method) तथा वर्ग अन्तर की नीचे वाली सीमा से अधिक विधि (More than method) से ओजाइव बनाई जाती है।

ओजाइव वक्र ऊँची सीमा से कम विधि की ओर (Ogive with less than method)-जब हम ऊँची सीमा से कम विधि की आवृत्ति के जोड़ को प्रकट करते हैं तो इससे संचयी आवृत्ति का निर्माण किया जाता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 3
नोट-समायोजित सूची अनुसार (0 तथा 0), (10 तथा 5) (20 तथा 15), (30 तथा 27) (40 तथा 42), (50 तथा 50) को आपस में मिलाने से जो बिन्दु प्राप्त होते हैं, उनको जिस रेखा द्वारा दिखाया जाता है, उस रेखा को ओजाइव कहते हैं।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 4

प्रश्न 4.
निम्नलिखित आंकड़ों द्वारा निम्न सीमा से अधिक विधि (More than Method) द्वारा संचित आवृत्ति वक्र का निर्माण करें।

अंक : 0-10 10-20 20-30 30-40 40-50
विद्यार्थियों की संख्या: 5 10 12 15 8

हल (Solution)-संचय आवृत्ति वक्र निम्न सीमा से अधिक विधि द्वारा (Ogive with More than Method)
इस विधि द्वारा समायोजित सूची का निर्माण अग्रलिखित अनुसार किया जाता है-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 5
नोट-समायोजित सूची के अनुसार (0 और 50), (10 और 45), (20 और 35), (30 और 23), (40 और 8) अथवा 50 से अधिक अंक प्राप्त करने वाला कोई विद्यार्थी नहीं है, इसलिए (50 और 0) के मिलाने से जो बिंदु प्राप्त होते हैं। उनको मिला दिया जाए तो उस रेखा को निम्न सीमा से अधिक विधि द्वारा ओजाइव कहा जाता है।
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IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
ग्राफ द्वारा प्रदर्शन के अर्थ बताओ। ग्राफ की रचना सम्बन्धी साधारण नियमों की व्याख्या करें।
(Explain the meaning of Graphic Presentation of Data. Explain the general rules for the construction of a Graph.)
उत्तर-
आंकड़ों को प्रस्तुत करने की एक महत्त्वपूर्ण विधि ग्राफ विधि अथवा बिन्दु रेखीय विधि होती है। इस विधि में आंकड़ों को ग्राफ पेपर (Graph Paper) पर प्रस्तुत किया जाता है। जब हम ग्राफ पेपर पर आंकड़ों को स्पष्ट करते हैं तो कम समय तथा कम परिश्रम से एक मनुष्य आंकड़ों को समझने योग्य हो जाता है। इसलिए क्राक्सटन तथा काउडन ने ठीक कहा है, “ग्राफ विधियां सीमित सूचना को जल्दी तथा प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने की लाभदायक विधियां हैं।” (“Graphic devices are extremely useful and effective for quickly presenting a limited amount of information.” —Croxton and Cowden)

ग्राफ प्रदर्शन के अर्थ (Meaning of Graphic Presentation)-ग्राफ प्रदर्शन आंकड़ों को प्रस्तुत करने की वह विधि होती है, जिसमें एक ग्राफ पेपर पर इनको रेखाओं तथा चित्रों के रूप में दिखाया जाता है। इस प्रकार आंकड़ों को ग्राफ पेपर पर प्रदर्शन करने के ढंग को आंकड़ों का ग्राफ द्वारा प्रदर्शन कहा जाता है।

ग्राफ निर्माण के नियम (Rules for constructing a Graph)-ग्राफ का निर्माण करते समय निम्नलिखित नियमों को ध्यान में रखना चाहिए –

  1. शीर्षक (Title)-प्रत्येक ग्राफ का शीर्षक स्पष्ट होना चाहिए। शीर्षक को पढ़ने से ही इस बात का पता लगना अनिवार्य होता है कि ग्राफ किस सूचना की जानकारी देता है।
  2. पैमाना (Scale)- चित्र बनाने से पहले पैमाने का चयन कर लेना चाहिए। पैमाने का चयन एकत्रित किए आंकड़ों पर निर्भर करता है। पैमाना इतना लेना चाहिए जो सभी आंकड़े सरलता से ग्राफ पर प्रस्तुत किए जा सकें।
  3. बिन्दुओं का मिलान (Plotting the Points)- ग्राफ पेपर पर OX अक्ष तथा OY अक्ष पर लिए गए तत्त्वों के सम्बन्ध को स्पष्ट किया जाता है। साधारण तौर पर अर्थशास्त्रियों के आंकड़े धनात्मक होते हैं। इसलिए OX अक्ष को बाएं से दाएं हाथ की ओर तथा OY अक्ष के नीचे से ऊपर की ओर दिखाया जाता है। यदि हम तथ्यों के सम्बन्ध को OX तथा OY रेखाओं पर लम्ब खींचकर स्पष्ट करते हैं तो हमारे पास बिन्दु प्राप्त हो जाते हैं।
  4. रेखाओं का प्रयोग (Use of lines) – ग्राफ में जब अधिक रेखाओं को प्रस्तुत किया जाता है तो इस स्थिति में सीधी रेखाएँ (straight lines), टूटी रेखाएँ (Dotted lines) अथवा बिन्दु रेखाएँ (Point Lines) का प्रयोग किया जाता है।
  5. बनावटी आधार रेखा (False Base Line)-हम जानते हैं कि OX तथा OY रेखाओं का आरम्भ 0 अथवा

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शून्य से होता है अर्थात् जहाँ OX तथा OY पर मदों की संख्या को दिखाने की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी स्थिति में बनावटी आधार रेखा का निर्माण किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए हम जिस ओर बनावटी आधार को दिखाना चाहते हैं, उस ओर रेखा पर कटाव पैदा कर देते हैं, क्योंकि वह सभी आंकड़े Ox अथवा OY पर दिखाने से रेखाचित्र का आकार बहुत विशाल हो जाता है, जिसको रेखा चित्र में स्पष्ट करना कठिन होता है। रेखाचित्र 5 (i), (ii) में OY रेखा पर बनावटी आधार रेखा लेने के अलग-अलग ढंग बताए गए हैं। भाग-1 अनुसार दो तिरछी रेखाएं (I/) बनाई जा सकती हैं। भाग-2 अनुसार बनावटी रेखाएं लहरों की तरह बढ़ती घटती हो सकती हैं।

प्रश्न 2.
ग्राफ अथवा रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शन के लाभ बताओ। ग्राफ प्रदर्शन की सीमाएँ भी लिखो । (Explain the advantages of Graphic Presentation. Discuss its limitations.)
उत्तर-
ग्राफ द्वारा आंकड़ों को प्रदर्शन करने के बहुत लाभ होते हैं। जैसे कि प्रो० वैसेलो ने ठीक कहा है, “आंकड़ों को समझने का सबसे सरल ढंग उन बिन्दु रेखाओं द्वारा अध्ययन करना होता है।” (“The simplest and commonest aid to the numerical reading is the graph.’ – Vesselo)

ग्राफ विधि द्वारा आंकड़ों को प्रदर्शन करने के मुख्य उद्देश्य तथा लाभ इस प्रकार हैं-
1. आंकड़ों को सरल बनाना (To make data simple)-आंकड़े मूल रूप में जटिल होते हैं, जिनको स्पष्ट करना तथा समझना कठिन होता है। इसलिए ग्राफ द्वारा आंकड़ों को आसानी से समझा जा सकता है।

2. तुलना के लिए आसान (To Make easy comparison)-जब आंकड़ों को ग्राफ की विधि द्वारा दिखाया जाता है तो इनमें तुलना करनी बहुत आसान हो जाती है जैसे कि पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के 10 + 2 कक्षा के विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त किए प्रतिशत अंकों की तुलना पिछले वर्ष के प्रतिशत अंकों से करते समय ग्राफ विधि लाभदायक होती है। इसी तरह एक मरीज़ के बुखार की स्थिति का अनुमान ग्राफ को देखकर डॉक्टर आसानी से लगा लेता है।

3. आंकड़ों को रोचक बनाना (To make data interesting) आंकड़ों को आकर्षक बनाने के लिए ग्राफ अथवा रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शन लाभदायक होता है। कीमत स्तर में परिवर्तनों को देखने के लिए ग्राफ विधि बहुत लाभदायक परिणाम प्रदान करती है।

4. समय श्रेणियों का प्रदर्शन (Presentation of time series)-ग्राफ समय श्रेणियों को प्रदर्शन करने के लिए अच्छी विधि मानी जाती है। इस द्वारा रेखा चित्रों द्वारा आंकड़ों को लाभदायक तथा प्रभावशाली ढंग द्वारा प्रदर्शन किया जा सकता है, जिससे लाभदायक परिणाम प्राप्त किए जाते हैं।

5. सांख्यिकी विधियों का अध्ययन (Study of Statistical methods)-आंकड़ा शास्त्र की बहुत-सी विधियों की व्याख्या ग्राफ विधि द्वारा की जा सकती है, जैसे कि मध्यका, बहुलक, सह-सम्बन्ध इत्यादि को रेखा चित्रों द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

ग्राफ विधियों की सीमाएं (Limitations of Graphic method)—ग्राफ द्वारा आंकड़ों का प्रदर्शन करने की मुख्य सीमाएं इस प्रकार हैं –

  1. निश्चितता की कमी (Lack of Accuracy)-ग्राफ विधि द्वारा आंकड़ों की प्रवृत्ति का पता चलता है। परन्तु इन आंकड़ों में निश्चितता की कमी होती है। ग्राफ द्वारा प्रदान की सूची युद्ध परिणाम प्रदान नहीं करती।
  2. गलत परिणाम (Wrong Results)-ग्राफ विधि द्वारा कई बार गलत परिणाम भी निकाले जा सकते हैं। क्योंकि रेखाचित्र द्वारा रेखाओं के उतार-चढ़ाव को देखकर 100% शुद्ध परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते।
  3. केवल तुलनात्मक अध्ययन (Only Comparative Study)-ग्राफ विधि द्वारा केवल तुलनात्मक अध्ययन करना ही सम्भव होता है। जब हम आंकड़ों द्वारा मनोवैज्ञानिक अथवा सामाजिक परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं तो ऐसा करना सम्भव नहीं होता।।
  4. बहमुखी सूचना का मुश्किल प्रदर्शन (Difficult Presentation of Multiple Information)-ग्राफ की विधि द्वारा जब किसी तत्त्व की बहुमुखी विशेषताओं को दिखाना हो तो ऐसा करना भी मुश्किल होता है। सारणीकरण की सहायता से हम कई प्रकार की सूचनाएँ एकत्रित तौर पर प्रदर्शित कर सकते हैं।

प्रश्न 3.
आवृत्ति वितरण ग्राफ से क्या अभिप्राय है ? आवृत्ति वितरण ग्राफ की प्रदर्शन विधियां बताएँ।
(What is Frequency Distribution Graph? Explain the methods of presentation of Frequency Distribution Graphs.)
उत्तर-
ग्राफ मुख्य तौर पर दो प्रकार के होते हैंसमय श्रेणी ग्राफ (Time Series Graphs) तथा आवृत्ति वितरण ग्राफ (Frequency Distribution Graphs) आवृत्ति वितरण ग्राफ का अर्थ (Meaning of Frequency Distribution Graph) आवृत्ति विवरण ग्राफ वह चित्र होते हैं, जिनमें चरों की आवृत्ति वितरण अनुसार उनको प्रस्तुत किया जाता है। इसमें आंकड़ों का प्रदर्शन समय अनुसार नहीं किया जाता, बल्कि मदों के मूल्यों की आवृत्ति के अनुसार ग्राफ बनाने की विधि को आवृत्ति वितरण ग्राफ कहा जाता है।

आवृत्ति वितरण प्रदर्शन की विधियां-आवृत्ति वितरण प्रदर्शन की मुख्य विधियां निम्नलिखित अनुसार हैं –

  1. रेखा आवृत्ति चित्र (Line Frequency Diagram)
  2. आवृत्ति आयत (Frequency Histogram)
  3. आवृत्ति बहुभुज (Frequency Polygon)
  4. आवृत्ति वक्र (Frequency Curve)
  5. संचयी आवृत्ति वक्र अथवा

ओजाइव (Cumulative Frequency curve or ogive)-
1. रेखा आवृत्ति चित्र (Line Frequency Diagram) रेखा आवृत्ति चित्र खण्डित आवृत्ति वितरण (Discrete Frequency Distribution) को प्रकट करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इस चित्र में OX वक्र पर मदों (Items) तथा OY वक्र पर आवृत्ति (Frequency) को अंकित किया जाता है। उदाहरण-एक फैक्टरी में पैनों का उत्पादन किया जाता है। मई में तीन लाख, जून में 5 लाख, जुलाई में 4 लाख पैनों का उत्पादन किया गया। इसको रेखा आवृत्ति रेखा आवृत्ति चित्र चित्र कहा जाता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 8

2. आवृत्ति आयत (Histogram)-आवृत्ति आयत चित्र वह चित्र है, जिनमें अखण्डित आवृत्ति वितरण (Continuous Frequency Distribution) को उनकी मदों के अनुसार आवृत्तियों का प्रकटावा एक ग्राफ पेपर पर किया जाता है। इस चित्र में OX पर मदों के वर्गांतर (Class Intervals) तथा OX पर वर्गांतर की आवृत्ति (Frequency) को प्रकट करते हैं। इस प्रकार आयतों के रूप में जो चित्र बन जाता है, उसको आयत आवृत्ति (Histogram) चित्र कहा जाता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 9अंक 0-10 10-20 20-30 . 30-40 विद्यार्थी 10 20
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उदाहरण-एक कक्षा में 0-10 अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या 10 है। 10-20 अंक प्राप्त करने वाले आवृत्ति बहुभुज 20 विद्यार्थी हैं तथा 20-30 तक अंक प्राप्त करने वाले 15 20B विद्यार्थी हैं, 30-40 तक अंक प्राप्त करने वाले 8 विद्यार्थी हैं। इस प्रकार के ग्राफ को आवृत्ति आयत (Histogram) कहा जाता है।

3. आवृत्ति बहुभुज (Frequency Polygron)-आवृत्ति बहुभुज वह चित्र होता है जोकि आवृत्ति आयत (Histogram) की सभी आयतों के ऊपरी भागों के मध्य बिन्दुओं को सीधी रेखा द्वारा मिलाकर बनाया जाता है। इसमें आवृत्ति बहुभुज के दोनों किनारों को आधार रेखाओं तक दोनों ओर बढ़ा दिया जाता है। इससे आवृत्ति बहुभुज का निर्माण हो जाता है। आवृत्ति रेखाचित्र 8 बहुभुज तथा आवृत्ति आयतों का क्षेत्रफल एक-दूसरे के समान होता है।

उदाहरण-ऊपर दी गई विधि अनुसार पहले आवृत्ति आयत बनाई जाती है। ऊपरी किनारों के मध्यों को आपस में मिलाकर ABC चित्र का निर्माण होता है, जिसको आवृत्ति बहुभुज कहा जाता है। इसमें धनात्मक किनारों (++) का क्षेत्र जोड़ा जाता है तथा ऋणात्मक किनारा (–) का क्षेत्र कम किया जाता है। इस प्रकार आवृत्ति आयत तथा आवृत्ति बहुभुज का क्षेत्रफल एक-दूसरे के समान हो जाता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 10

4. आवृत्ति वक्र (Frequency Curve)-आवृत्ति वक्र वह चित्र है जो कि आवृत्ति बहुभुज की तरह सीधी रेखाएं नहीं, बल्कि स्वतन्त्र हाथ से वक्र बनाने की विधि होती है। आवृत्ति वक्र अर्थात् आवृत्ति आयत का निर्माण करने के पश्चात् ऊपर के किनारों के मध्यों को स्वतन्त्र हाथ मिलाकर आधार रेखा से मिला दिया जाए तो आवृत्ति वक्र का निर्माण हो जाता है। उदाहरण-रेखाचित्र में ABC आवृत्ति बहुभुज है, जिसको डॉटड रेखा में दिखाया है। यदि स्वतन्त्र हाथ से एक रेखा DBE खींच देते हैं तो इस रेखा को आवृत्ति वक्र कहते है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 11
5. संचयी आवृत्ति वक्र अथवा ओजाइव (Cummulative Frequency curve or ogive)—जब आवृत्ति को संचयी अथवा जोड़ कर लिया जाए तो उस जोड़ की हुई आवृत्ति का चित्र बनाया जाए तो इसको संचयी आवृत्ति वक्र अथवा ओजाइव (Ogive) कहा जाता है।
(i) उदाहरण-ऊँची सीमा से कम (Less than Method)
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 12
रेखाचित्र में सूची पत्र अनुसार 10 अंक से कम अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी 10 हैं। 20 अंक से कम अंक प्राप्त करने वाले 10 + 20 = 30 विद्यार्थी हैं। 30 अंक से कम अंक प्राप्त करने वाले 10 + 20 + 15 = 45 विद्यार्थी हैं। इसलिए (10 तथा 10), (20 तथा 30), (30 तथा 45) को मिलाकर हमारे पास ऊँची सीमा से कम ओजाइव (Ogive) वक्र बन जाती है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 13
सूची पत्र तथा रेखाचित्र अनुसार 0 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या 45 है। 10 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या 35 तथा 20 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की संख्या 15 है। 30 से अधिक अंक प्राप्त वाला कोई विद्यार्थी नहीं है। यदि हम (0, 45), (10, 35), (20, 15) को आपस में मिला दें तो हमारे पास जो रेखा प्राप्त होती है उसको आगे रेखा से अधिक का ओजाइव कहा जाता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 20 रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण 15

PSEB 10th Class Science Notes Chapter 6 ਜੈਵਿਕ ਕਿਰਿਆਵਾਂ

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PSEB 10th Class Science Notes Chapter 6 ਜੈਵਿਕ ਕਿਰਿਆਵਾਂ

→ ਅਜਿਹੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਜੋ ਮਿਲ-ਜੁਲ ਕੇ ਇਕੱਠੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਅਣੂ ਰੱਖਿਆ ਦਾ ਕਾਰਜ ਕਰਦੀਆਂ ਹਨ, ਜੈਵਿਕ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਕਹਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ ।

→ ਊਰਜਾ ਦੇ ਸੋਮੇ ਨੂੰ ਅਸੀਂ ਭੋਜਨ ਅਤੇ ਸਰੀਰ ਅੰਦਰ ਲੈ ਜਾਣ ਦੀ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਨੂੰ ਪੋਸ਼ਣ ਕਹਿੰਦੇ ਹਾਂ ।

→ ਸਰੀਰ ਦੇ ਬਾਹਰ ਤੋਂ ਆਕਸੀਜਨ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨਾ ਅਤੇ ਸੈੱਲਾਂ ਦੀ ਲੋੜ ਅਨੁਸਾਰ ਭੋਜਨ ਸਰੋਤਾਂ ਦੇ ਵਿਘਟਨ ਵਿਚ ਉਸਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰਨ ਨੂੰ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਇਕ ਸੈੱਲੀ ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ ਭੋਜਨ ਗ੍ਰਹਿਣ ਕਰਨ, ਗੈਸਾਂ ਦੇ ਆਦਾਨ-ਪ੍ਰਦਾਨ ਅਤੇ ਫੋਕਟ ਪਦਾਰਥਾਂ ਦੇ ਨਿਸ਼ਕਾਸ਼ਨ ਦੇ ਲਈ ਕਿਸੇ ਖ਼ਾਸ ਅੰਗ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ ।

→ ਬਹੁ ਸੈੱਲੀ ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਕਾਰਜਾਂ ਲਈ ਭਿੰਨ-ਭਿੰਨ ਅੰਗ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਫੋਕਟ ਪਦਾਰਥਾਂ ਨੂੰ ਸਰੀਰ ਵਿੱਚੋਂ ਬਾਹਰ ਕੱਢਣ ਨੂੰ ਮਲ-ਤਿਆਗ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਊਰਜਾ ਦਾ ਸਰੋਤ ਭੋਜਨ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਪਦਾਰਥ ਅਸੀਂ ਖਾਂਦੇ ਹਾਂ ਉਹ ਭੋਜਨ ਹੈ । ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ ਊਰਜਾ ਅਤੇ ਭੋਜਨ ਪਦਾਰਥਾਂ ਦੀ ਸਾਧਾਰਨ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਲੋੜ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।

→ ਵਿਖਮਪੋਸ਼ੀ ਜੀਊਂਦੇ ਰਹਿਣ ਲਈ ਸਿੱਧੇ ਜਾਂ ਅਸਿੱਧੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਸਵੈਪੋਸ਼ੀ ‘ਤੇ ਨਿਰਭਰ ਹੁੰਦੇ ਹਨ । ਜੰਤੂ ਅਤੇ ਫੰਗਸ ਵਿਖਮਪੋਸ਼ੀ ਜੀਵ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਅਜਿਹੀ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਹੈ ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਸਵੈਪੋਸ਼ੀ ਬਾਹਰ ਤੋਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੇ ਪਦਾਰਥਾਂ ਨੂੰ ਊਰਜਾ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਇਕੱਠਾ ਕਰਕੇ ਜਮਾਂ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਹਨ । ਇਹ ਪਦਾਰਥ CO2ਅਤੇ ਪਾਣੀ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਜੋ ਸੂਰਜੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਅਤੇ ਕਲੋਰੋਫਿਲ ਦੀ ਮੌਜੂਦਗੀ ਵਿਚ ਕਾਰਬੋਹਾਈਡਰੇਟ ਵਿਚ ਬਦਲ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ।

→ ਪੱਤਿਆਂ ਦੀ ਸਤਹਿ ਤੇ ਛੋਟੇ-ਛੋਟੇ ਛੇਦ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸਟਮੈਟਾ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਲਈ ਗੈਸਾਂ ਦੀ ਅਦਲਾ-ਬਦਲੀ ਇਨ੍ਹਾਂ ਛੇਦਾਂ ਤੋਂ ਹੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।

→ ਸਟੋਮੈਟਾ ਤੋਂ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਪਾਣੀ ਦੀ ਵੀ ਹਾਨੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।

→ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਲਈ ਸੂਰਜੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਦੀ ਲੋੜ ਵੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।

PSEB 10th Class Science Notes Chapter 6 ਜੈਵਿਕ ਕਿਰਿਆਵਾਂ

→ ਪ੍ਰਦੇ ਨਾਈਟਰੋਜਨ, ਫਾਸਫੋਰਸ, ਲੋਹਾ ਅਤੇ ਮੈਗਨੀਸ਼ੀਅਮ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਮਿੱਟੀ ਵਿਚੋਂ ਕਰਦੇ ਹਨ ।

→ ਇਕ ਸੈੱਲੀ ਜੀਵ ਆਪਣੀ ਪੂਰੀ ਸਤਹਿ ਤੋਂ ਭੋਜਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਸਕਦੇ ਹਨ ।

→ ਅਮੀਬਾ ਸੈੱਲੀ ਸਤਹਿ ਤੋਂ ਉਂਗਲੀ ਜਿਹੇ ਅਸਥਾਈ ਵਾਰੇ ਜਾਂ ਪੈਰ ਦੁਆਰਾ ਭੋਜਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ ।

→ ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਆਹਾਰ ਨਲੀ ਮੂੰਹ ਤੋਂ ਗੁਦਾ ਤਕ ਫੈਲੀ ਇਕ ਲੰਬੀ ਨਲੀ ਹੈ ।

→ ਛੋਟੀ ਆਂਦਰ ਆਹਾਰ ਨਲੀ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਲੰਬਾ ਭਾਗ ਹੈ ।

→ ਐਂਜ਼ਾਈਮ (Enzymes)-ਇਹ ਜੈਵ ਉਤਪ੍ਰੇਰਕ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਜੋ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਪਦਾਰਥਾਂ ਨੂੰ ਸਰਲ ਪਦਾਰਥਾਂ ਵਿੱਚ ਖੰਡਿਤ ਕਰਨ ਲਈ ਜੀਵਾਂ ਦੁਆਰਾ ਵਰਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਐਂਜ਼ਾਈਮ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਪੋਸ਼ਣ (Nutrition)-ਅਜਿਹੀਆਂ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਦਾ ਇਕੱਠ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੁਆਰਾ ਪ੍ਰਾਣੀ ਆਪਣੀ ਕਿਰਿਆਸ਼ੀਲਤਾ ਨੂੰ ਬਣਾਈ ਰੱਖਣ ਲਈ ਅਤੇ ਅੰਗਾਂ ਦੇ ਵਾਧੇ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪੁਨਰ-ਨਿਰਮਾਣ ਲਈ ਜ਼ਰੂਰੀ ਪਦਾਰਥਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਉਪਭੋਗ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਪੋਸ਼ਣ ਕਹਾਉਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਸਵੈਪੋਸ਼ੀ (Autotrophs)-ਅਜਿਹੇ ਜੀਵ ਜੋ CO2, ਪਾਣੀ ਅਤੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਦੀ ਮੌਜੂਦਗੀ ਵਿੱਚ ਹਰੇ ਪਦਾਰਥ ਕਲੋਰੋਫਿਲ ਦੁਆਰਾ ਆਪਣਾ ਭੋਜਨ ਆਪ ਤਿਆਰ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸਵੈਪੋਸ਼ੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਵਿਖਮਪੋਸ਼ੀ (Heterotrophs)-ਅਜਿਹੇ ਜੀਵ ਜੋ ਆਪਣੇ ਭੋਜਨ ਲਈ ਦੂਸਰਿਆਂ ‘ਤੇ ਨਿਰਭਰ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਵਿਖਮਪੋਸ਼ੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਮ੍ਰਿਤਜੀਵੀ (Saprophytes)-ਅਜਿਹੇ ਜੀਵ ਜੋ ਆਪਣਾ ਭੋਜਨ ਮਰੇ ਹੋਏ ਅਤੇ ਸੜੇ-ਗਲੇ ਕਾਰਬਨਿਕ ਪਦਾਰਥਾਂ ਤੋਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦੇ ਹਨ ਨੂੰ ਮ੍ਰਿਤਜੀਵੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਪਰਜੀਵੀ (Parasites)-ਅਜਿਹੇ ਜੀਵ ਜੋ ਭੋਜਨ ਅਤੇ ਆਵਾਸ ਲਈ ਹੋਰ ਜੀਵਾਂ ‘ਤੇ ਨਿਰਭਰ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਪਰਜੀਵੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ । ਪਰਜੀਵੀ ਅੰਦਰੂਨੀ ਅਤੇ ਬਾਹਰੀ ਦੋ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਪ੍ਰਾਣੀ ਸਮਭੋਜੀ ਜੀਵ (Holozoa)-ਅਜਿਹੇ ਜੀਵ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਪਾਚਨ ਤੰਤਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਭੋਜਨ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ ਇਸ ਦਾ ਪਾਚਨ ਕਰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਪਚੇ ਹੋਏ ਭੋਜਨ ਦਾ ਸੋਖਣ ਕਰਕੇ ਬਾਕੀ ਅਣਪਚੇ ਭੋਜਨ ਨੂੰ ਉਤਸਰਜਿਤ ਕਰ ਦਿੰਦੇ ਹਨ, ਸਮਝੋਜੀ ਜੀਵ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਸ਼ਾਕਾਹਾਰੀ (Herbivorous)ਅਜਿਹੇ ਜੀਵ ਜੋ ਪੌਦਿਆਂ ਜਾਂ ਪੌਦਿਆਂ ਦੇ ਉਤਪਾਦਾਂ ਨੂੰ ਭੋਜਨ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਹਿਣ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਸ਼ਾਕਾਹਾਰੀ ਕਹਾਉਂਦੇ ਹਨ ।

→ ਮਾਸਾਹਾਰੀ (Carnivorous)-ਅਜਿਹੇ ਜੀਵ ਜੋ ਆਪਣਾ ਭੋਜਨ ਹੋਰ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਮਾਸ ਤੋਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਮਾਸਾਹਾਰੀ ਕਹਾਉਂਦੇ ਹਨ ।

→ ਸਰਬ ਆਹਾਰੀ (Omnivorous)-ਅਜਿਹੇ ਜੀਵ ਜੋ ਪੌਦਿਆਂ ਅਤੇ ਜੰਤੂਆਂ ਦੋਵਾਂ ਨੂੰ ਭੋਜਨ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਯੋਗ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸਰਬ ਆਹਾਰੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਪਾਚਣ (Digestion)-ਅਜਿਹੀ ਕਿਰਿਆ ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਭੋਜਨ ਪਦਾਰਥਾਂ ਦੇ ਵੱਡੇ, ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਅਤੇ ਅਘੁਲਣਸ਼ੀਲ, ਅਣੂ ਸੂਖ਼ਮ, ਸਰਲ ਅਤੇ ਘੁਲਣਸ਼ੀਲ ਅਣੂਆਂ ਵਿੱਚ ਪਰਿਵਰਤਿਤ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਪਾਚਣ ਕਹਾਉਂਦੀ ਹੈ ।

PSEB 10th Class Science Notes Chapter 6 ਜੈਵਿਕ ਕਿਰਿਆਵਾਂ

→ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ (Photosynthesis)-ਸੂਰਜ ਦੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਦੀ ਮੌਜੂਦਗੀ ਵਿਚ ਕਾਰਬਨ-ਡਾਈਆਕਸਾਈਡ (CO2) ਅਤੇ ਪਾਣੀ (H2O) ਵਰਗੇ ਸਰਲ ਯੋਗਿਕਾਂ ਤੋਂ ਹਰੇ ਪੌਦਿਆਂ ਦੁਆਰਾ ਕਲੋਰੋਫਿਲ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਨਾਲ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਕਾਰਬਨਿਕ ਭੋਜਨ ਪਦਾਰਥ (ਕਾਰਬੋਹਾਈਡਰੇਟ) ਦੇ ਨਿਰਮਾਣ ਦੀ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਨੂੰ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਸੰਤੁਲਨ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਤੀਬਰਤਾ ਬਿੰਦੂ (Compensation point)-ਜਦੋਂ ਛਾਂ ਵਿੱਚ ਸੂਰਜ ਡੁੱਬਣ ਸਮੇਂ ਅਤੇ ਤਰਕਾਲਾਂ ਵੇਲੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਦੀ ਦਰ ਘਟ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਉਸ ਸਮੇਂ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ ਵਿਚੋਂ ਨਿਕਲੀ CO2 ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਵਿਚ ਵਰਤੀ ਗਈ CO2 ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਇਸ ਅਵਸਥਾ ਨੂੰ ਜਦੋਂ ਵਾਤਾਵਰਨ ਵਿਚ CO2 ਦਾ ਅਵਸ਼ੋਸ਼ਣ ਨਾ ਦੇ ਬਰਾਬਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਸੰਤੁਲਨ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਤੀਬਰਤਾ ਬਿੰਦੂ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਸਾਹ ਲੈਣਾ (Respiration)-ਜੀਵਾਂ ਵਿਚ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਉਹ ਜੈਵ ਰਸਾਇਣਿਕ ਕਿਰਿਆ ਜਿਸ ਵਿਚ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਕਾਰਬਨਿਕ ਭੋਜਨ ਪਦਾਰਥਾਂ ਦਾ ਆਕਸੀਕਰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਜਿਸਦੇ ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ CO2 ਅਤੇ ਪਾਣੀ (ਜਲ-ਵਾਸ਼ਪ) ਬਣਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਊਰਜਾ ਮੁਕਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।

→ ਆਕਸੀ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ (Aerobic respiration)-ਆਕਸੀਜਨ ਦੀ ਮੌਜੂਦਗੀ ਵਿਚ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ ਨੂੰ ਆਕਸੀ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਅਣਆਕਸੀ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ (Anaerobic respiration)-ਆਕਸੀਜਨ ਦੀ ਗੈਰ-ਮੌਜੂਦਗੀ ਵਿਚ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ ਅਣਆਕਸੀ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ ਕਹਾਉਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ ਪਦਾਰਥ (Respiratory substance)-ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ ਵਿੱਚ ਆਕਸੀਕ੍ਰਿਤ ਜਾਂ ਅਪਘਟਿਤ ਹੋਣ ਵਾਲੇ ਪਦਾਰਥ ਨੂੰ ਸਾਹ ਪਦਾਰਥ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਗਲਾਈਕੋਲਿਸਿਸ (Glycolysis)-ਇਹ ਸੈੱਲਾਂ ਵਿੱਚ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਅਜਿਹੀ ਪ੍ਰਕਿਰਿਆ ਹੈ ਜਿਸ ਵਿਚ ਗੁਲੂਕੋਜ਼ ਦਾ ਇਕ ਅਣੂ ਅਪਘਟਿਤ ਹੋ ਕੇ ਅਣੂ ਪਾਇਰੂਵੇਟ (Pyruvate) ਬਣਾਉਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਉਸਾਰੂ ਕਿਰਿਆਵਾਂ (Anabolic activities)-ਉਹ ਜੈਵ ਰਸਾਇਣਿਕ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਸਰਲ ਪਦਾਰਥਾਂ ਦੇ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਦੁਆਰਾ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਪਦਾਰਥ ਬਣਦੇ ਹਨ, ਉਸਾਰੂ ਕਿਰਿਆ ਕਹਾਉਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਢਾਹੁ ਕਿਰਿਆਵਾਂ (Catabolic activities)-ਉਹ ਜੈਵ ਰਸਾਇਣਿਕ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਅਣੂ ਟੁੱਟ ਕੇ ਸਰਲ ਅਣੂਆਂ ਵਿੱਚ ਬਦਲ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਢਾਹੂ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਕਹਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ ।

→ ਕਿਣਵਨ (Fermentation)-ਉਹ ਕਿਰਿਆ ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਸੂਖ਼ਮਜੀਵ ਗੁਲੂਕੋਜ਼ ਜਾਂ ਸ਼ੱਕਰ ਦਾ ਅਧੂਰਾ ਵਿਘਟਨ ਸੈੱਲ ਦੇ ਬਾਹਰ ਕਰਕੇ CO2 ਅਤੇ ਸਰਲ ਕਾਰਬਨਿਕ, ਜਿਵੇਂ-ਈਥਾਈਲ ਅਲਕੋਹਲ, ਲੈਕਟਿਕ ਐਸਿਡ ਅਤੇ ਐਸਟਿਕ ਐਸਿਡ ਆਦਿ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਕਰਦੇ ਹਨ ਜਿਸਦੇ ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ ਕੁਝ ਉਰਜਾ ਵੀ ਮੁਕਤ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।

→ ਸਟੋਮੈਟਾ (Stomata)-ਪੱਤਿਆਂ ਦੀ ਸਤਹਿ ਤੇ ਹਵਾ ਅਤੇ ਜਲ-ਵਾਸ਼ਪਾਂ ਦੀ ਅਦਲਾ-ਬਦਲੀ ਦੇ ਲਈ ਖ਼ਾਸ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਬਹੁਤ ਸੂਖ਼ਮ ਛੇਦ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸਟੋਮੈਟਾ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਵਿਸਰਣ (Diffusion)-ਪਦਾਰਥ (liquid, solids and gases) ਦੇ ਅਣੂਆਂ ਦਾ ਵਧੇਰੇ ਸਾਂਦਰਤਾ (ਗਾੜ੍ਹਾਪਨ) ਵਾਲੇ ਸਥਾਨ ਤੋਂ ਘੱਟ ਸਾਂਦਰਤਾ ਵਾਲੇ ਸਥਾਨ ਵੱਲ ਨੂੰ ਜਾਣ ਦੀ ਕਿਰਿਆ ਨੂੰ ਵਿਸਰਣ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਸਾਹ ਕਿਰਿਆ (Breathing)-ਇਹ ਸਰਲ ਯੰਤਰਿਕ ਕਿਰਿਆ ਹੈ ਜਿਸ ਵਿਚ ਹਵਾ ਵਾਤਾਵਰਨ ਵਿਚੋਂ ਸਾਹ ਅੰਗਾਂ (ਫੇਫੜਿਆਂ) ਵਿੱਚ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਸਾਹ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸਾਹ ਅੰਗਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਬਾਹਰ ਆ ਕੇ ਵਾਤਾਵਰਨ ਵਿਚ ਵਾਪਸ ਚਲੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।

→ ਸਾਹ ਲੈਣਾ (Inspiration)-ਵਾਤਾਵਰਨ ਵਿੱਚੋਂ ਹਵਾ (O2) ਦਾ ਫੇਫੜਿਆਂ ਵਿਚ ਭਰਨ ਦੀ ਕਿਰਿਆ ਨੂੰ ਸਾਹ ਲੈਣਾ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਸਾਹ ਨਿਕਾਸ (Expiration)-ਅਜਿਹੀ ਕਿਰਿਆ ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਫੇਫੜਿਆਂ ਵਿਚੋਂ ਹਵਾ (CO2) ਨੂੰ ਬਾਹਰ | ਕੱਢਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

PSEB 10th Class Science Notes Chapter 6 ਜੈਵਿਕ ਕਿਰਿਆਵਾਂ

→ ਵਾਸ਼ਪ ਉਤਸਰਜਨ (Transpiration)-ਪੇੜ-ਪੌਦਿਆਂ ਦੇ ਪੱਤਿਆਂ ਦੁਆਰਾ ਪਾਣੀ ਦਾ ਵਾਸ਼ਪਣ ਵਾਸ਼ਪ ਉਤਸਰਜਨ ਕਹਾਉਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਜਾਈਲਮ (Xylem)-ਪੌਦਿਆਂ ਦੇ ਜਿਹੜੇ ਟਿਸ਼ੂ ਮਿੱਟੀ ਅਤੇ ਖਣਿਜਾਂ ਨੂੰ ਪੱਤਿਆਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਾਉਂਦਾ ਹੈ ਉਸ ਨੂੰ ਜਾਈਲਮ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਫਲੋਇਮ (Pholem)-ਪੌਦਿਆਂ ਦੇ ਜਿਹੜੇ ਟਿਸ਼ੂ ਪੱਤਿਆਂ ਵਿੱਚ ਬਣੇ ਭੋਜਨ ਨੂੰ ਪੌਦਿਆਂ ਦੇ ਹੋਰ ਭਾਗਾਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਫਲੋਇਮ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਸਥਾਨਾਂਤਰਣ (Translocation)-ਪੱਤਿਆਂ ਤੋਂ ਭੋਜਨ ਦਾ ਪੌਦੇ ਦੇ ਹੋਰ ਭਾਗਾਂ ਤੱਕ ਪੁੱਜਣਾ ਸਥਾਨਾਂਤਰਣ ਕਹਾਉਂਦਾ ਹੈ ।

→ ਧਮਨੀ (Artery)-ਅਜਿਹੀਆਂ ਨਾਲੀਆਂ ਜੋ ਦਿਲ ਤੋਂ ਆਕਸੀਜਨ-ਯੁਕਤ ਲਹੂ ਨੂੰ ਸਰੀਰ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਹਿੱਸਿਆਂ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਾਉਂਦੀ ਹੈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਧਮਨੀਆਂ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਸ਼ਿਰਾਵਾਂ (Veins)-ਅਜਿਹੀਆਂ ਨਾਲੀਆਂ ਜੋ ਸਰੀਰ ਦੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਹਿੱਸਿਆਂ ਤੋਂ ਲਹੂ ਦਿਲ ਤਕ ਪਹੁੰਚਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸ਼ਿਰਾਵਾਂ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਐਂਟੀਬਾਡੀਜ਼ (Antibodies)-ਸਰੀਰ ਵਿੱਚ ਜੀਵਾਣੁਆਂ ਜਾਂ ਰੋਗਾਣੂਆਂ ਦੁਆਰਾ ਪੈਦਾ ਕੀਤੇ ਗਏ ਜ਼ਹਿਰੀਲੇ ਪਦਾਰਥਾਂ ਨੂੰ ਨਸ਼ਟ ਕਰਨ ਵਾਲੀਆਂ ਵਸਤਾਂ ਨੂੰ ਐਂਟੀਬਾਡੀਜ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਡਾਇਆਲਿਸਿਸ (Dialysis)-ਸਰੀਰ ਵਿਚੋਂ ਬਣਾਵਟੀ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਯੂਰੀਆ ਆਦਿ ਫੋਕਟ ਪਦਾਰਥਾਂ ਨੂੰ ਬਾਹਰ ਕੱਢਣ ਦੀ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਨੂੰ ਡਾਇਆਲਿਸਿਸ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਪਰਾਸਰਣ ਨਿਯਮਣ (Osmoregulation)-ਸਰੀਰ ਵਿਚ ਪਾਣੀ ਦੀ ਉੱਚਿਤ ਮਾਤਰਾ ਨੂੰ ਬਣਾਈ ਰੱਖਣ ਨੂੰ ਪਰਾਸਰਣ ਨਿਯਮਣ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਲਸੀਕਾ (Lymph)-ਇਹ ਪੀਲੇ ਰੰਗ ਦਾ ਪਦਾਰਥ ਹੈ, ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਸਫ਼ੈਦ ਕਣ, ਗੁਲੂਕੋਜ਼, ਖਣਿਜ ਲੂਣ, ਆਕਸੀਜਨ ਆਦਿ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਮਲ-ਤਿਆਗ (Excretion)-ਸਰੀਰ ਵਿੱਚ ਢਾਹੂ-ਉਸਾਰੂ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਦੇ ਕਾਰਨ ਪੈਦਾ ਹਾਨੀਕਾਰਕ ਫੋਕਟ ਪਦਾਰਥਾਂ ਨੂੰ ਬਾਹਰ ਕੱਢਣ ਨੂੰ ਮਲ-ਤਿਆਗ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

→ ਨੇਫਰਾਂਨ (Nephron)-ਗੁਰਦਿਆਂ ਵਿਚ ਅਨੇਕ ਫਿਲਟਰੀਕਰਨ ਇਕਾਈਆਂ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਨੇਫਨ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े

Punjab State Board PSEB 11th Class Economics Book Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Economics Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े

PSEB 11th Class Economics प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
प्राथमिक आंकड़ों तथा द्वितीयक आंकड़ों में अन्तर करें।
उत्तर-
प्राथमिक आंकड़े वे आंकड़े हैं जो अनुसन्धानकर्ता अपने उद्देश्यों के अनुसार पहली बार आरम्भ से अन्त तक एकत्रित करता है। द्वितीयक आंकड़े वे आंकड़े हैं जो पहले ही व्यक्तियों तथा संस्थाओं द्वारा एकत्रित किये जा चुके होते हैं।

प्रश्न 2.
प्राथमिक आंकड़ों का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
आप जेब खर्च, उनके परिवार की आय, शिक्षा, जीवन स्तर सम्बन्धी आंकड़े एकत्रित करते हैं। इन आंकड़ों को प्राथमिक आंकड़े कहा जायेगा।

प्रश्न 3.
द्वितीयक आंकड़ों का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
भारतीय रेलवे से सम्बन्धित आंकड़े जो रेलवे बोर्ड द्वारा प्रकाशित किये जाते हैं, किसी अनुसन्धानकर्ता के लिए द्वितीयक आंकड़े हैं।

प्रश्न 4.
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान विधि वह है जिसमें एक अनुसन्धानकर्ता स्वयं अनुसन्धान क्षेत्र में जाकर सूचना देने वालों से प्रत्यक्ष तथा सीधा सम्पर्क स्थापित करता है और आंकड़े इकट्ठे करता है।

प्रश्न 5.
अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान किसे कहते हैं?
उत्तर-
अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान वह विधि है जिसमें किसी समस्या से अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्तियों से मौखिक (Oral) पूछताछ द्वारा आंकड़े प्राप्त किये जाते हैं।

प्रश्न 6.
प्राथमिक आंकड़े प्राचीन काल से ही दिए होते हैं।
उत्तर-
ग़लत।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े

प्रश्न 7.
गौण आंकड़े पहले से ही पुस्तकों इत्यादि में दिए होते हैं।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 8.
जो आंकड़े अनुसंधानकर्ता स्वयं इकट्ठा करता है उनको ……. आंकड़े कहते हैं।
(a) प्राथमिक
(b) गौण
(c) तीसरे दर्जे के
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(a) प्राथमिक।

प्रश्न 9.
जो आंकड़े पहले से ही किसी संस्था अथवा व्यक्ति द्वारा इकट्ठे किए गए होते हैं और अनुसन्धानकर्ता उनको अपनी खोज में प्रयोग करता है को ……………… आंकड़े कहा जाता है।
(a) प्राथमिक
(b) गौण
(c) सरकारी
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(b) गौण।

प्रश्न 10.
जब अनुसन्धानकर्ता सूचना देने वाले को प्रत्यक्ष रूप में सम्बन्ध स्थापित करके आंकड़े इकट्ठे करता है तो इस विधि को ……………… कहते हैं।
उत्तर-
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसंधान।

प्रश्न 11.
प्रश्नावली तथा अनुसूची में अन्तर होता है।
उत्तर-
ग़लत।

प्रश्न 12.
प्राथमिक आंकड़ों से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
वह आंकड़े जो अनुसंधानकर्ता द्वारा स्वयं इकट्ठे किये जाते हैं उन आंकड़ों को प्राथमिक आंकड़े कहा जाता है।

प्रश्न 13.
द्वितीयक आंकड़ों से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
वह आंकड़े जोकि किसी व्यक्ति तथा संस्था द्वारा इकट्ठे किये जाते हैं, जिनको अनुसंधानकर्ता अपनी खोज में प्रयोग करता है उनको द्वितीयक आंकड़े कहा जाता है।

प्रश्न 14.
जो आंकड़े अनुसंधानकर्ता द्वारा स्वयं इकट्ठे किये जाते हैं उनको प्राथमिक आंकड़े कहा जाता
उत्तर-
सही।

प्रश्न 15.
जो आंकड़े किसी व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा इकट्ठे किये जाते हैं और अनुसंधानकर्ता उनको अपनी खोज में प्रयोग करता है उनको द्वितीयक आंकड़े कहा जाता है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 16.
द्वितीयक आंकड़ों के प्रयोग के समय ध्यान रखना चाहिए कि आंकड़े भरोसे योग, उपयुक्त तथा उचित होने चाहिए।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 17.
द्वितीयक आंकड़ों को बगैर अर्थ और सीमाओं के अध्ययन बिना ग्रहण नहीं करना चाहिए।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 18.
NSSO से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे संगठन (NSSO) एक सरकारी संस्था है जोकि देश के विभिन्न क्षेत्रों संबंधी आंकड़ों को इकट्ठा करके रिपोर्ट प्रकाशित करता है। प्रश्न 19. द्वितीयक आंकड़ों के दो स्त्रोत बताएँ।
उत्तर-

  • भारत की जनगणना
  • राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे संगठन के प्रकाशन तथा रिपोर्ट।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़ों में कोई दो अंतर बताओ।
उत्तर-
प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़ों में अन्तर इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
1. मौलिकता में अन्तर (Difference in Originality)-सर्वप्रथम अन्तर यह है कि प्राथमिक समंक मौलिक समंक होते हैं। अनुसन्धानकर्ता इन्हें स्वयं एकत्रित करता है जबकि द्वितीयक समंक उसके द्वारा एकत्रित नहीं किए जाते, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति अथवा संस्था के द्वारा पूर्वकाल में एकत्रित किए जा चुके होते हैं।

2. धन, समय व परिश्रम में अन्तर (Difference in cost, time and labour)-प्राथमिक समंकों के संकलन में धन, समय, परिश्रम व बुद्धि का प्रयोग अधिक करना पड़ता है, क्योंकि नए सिरे से योजना को प्रारम्भ करना पड़ता है। द्वितीयक समंक तो पहले से ही एकत्रित होते हैं।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े

प्रश्न 2.
प्राथमिक समंकों को एकत्र करने की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान (Direct Personal Investigation) विधि को स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान (Direct Personal Investigation)-इस रीति में अनुसन्धानकर्ता सूचना देने वालों से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध स्थापित करके समंक एकत्र करता है। यह रीति बहुत सरल है। इसमें अनुसन्धानकर्ता स्वयं उन लोगों के सम्पर्क में आता है, जिनके विषय में आंकड़े एकत्र करना चाहता है। यदि अनुसन्धानकर्ता व्यवहार कुशल, धैर्यवान व मेहनती है तो इस रीति द्वारा आंकड़े बहुत विश्वसनीय होते हैं। इस रीति में अनुसन्धानकर्ता को निरीक्षण का भारी सहारा लेना पड़ता है। इस विधि को प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान विधि कहा जाता है।

प्रश्न 3.
प्राथमिक समंकों को एकत्र करने की कौन-सी विधियां हैं, बताओ।
उत्तर-
प्राथमिक आंकड़ों को एकत्रित करने की मुख्य विधियां निम्नलिखित हैं –

  1. प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान
  2. अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान
  3. संवाददाताओं द्वारा सूचना प्राप्ति
  4. डाक प्रश्नावली विधि
  5. गणकों द्वारा अनुसूचियों का भरना।

प्रश्न 4.
द्वितीयक समंकों को एकत्र करने के कोई पांच प्रकाशित स्रोत बताओ।
उत्तर –
द्वितीयक समंकों को एकत्र करने के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं –

  1. अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशन जैसे कि अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (I.M.F.) तथा विश्व बैंक (World Bank)।
  2. सरकारी प्रकाशन जैसे कि सकेन्द्रीय सांख्यिकी संस्था (C.S.0.)
  3. अर्द्ध-सरकारी संस्थाओं के प्रकाशन जैसे नगर-निगम, नगरपालिकाएं तथा जिला बोर्ड।
  4. आयोग व समितियों की रिपोर्ट (Respect of Commissions and Committees)
  5. समाचार-पत्र व पत्रिकाएं।

प्रश्न 5.
प्राथमिक आंकड़ों के मुख्य गुण बताओ।
उत्तर-
प्राथमिक आंकड़े (Primary Data) प्राथमिक आंकड़े वे आंकड़े होते हैं, जिनको अनुसन्धानकर्ता अनुसन्धान के लिए स्वयं एकत्र करता है। इन आंकड़ों के मुख्य गुण अग्रलिखित हैं-
गुण (Merits)-

  1. मौलिकता (Originality)-यह आंकड़े मौलिक होते हैं तथा अनुसन्धान के उद्देश्य के लिए उचित होते हैं।
  2. शुद्धता (Accuracy)-यह आंकड़े अनुसन्धानकर्ता द्वारा एकत्र किए जाते हैं, इसलिए इन आंकड़ों में शुद्धता होती है।
  3. एकरूपता (Uniformity)-प्राथमिक आंकड़े एकरूपता से एकत्रित किए जाते हैं, इसलिए यह समंक प्रयोग के अनुकूल तथा विश्वसनीय होते हैं।
  4. अधिक उपयोगी (More Suitable)-प्राथमिक आंकड़े वर्तमान सर्वेक्षण को ध्यान में रखकर एकत्रित किए जाते हैं। इसलिए यह आंकड़े अधिक उपयोगी होते हैं। .
  5. सांख्यिकी इकाइयां (Statistical Units)-सांख्यिकी अनुसंधान में जिन सांख्यिकी इकाइयों तथा धारणाओं का प्रयोग किया जाता है, उनके अनुसार ही आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं।

प्रश्न 6.
प्राथमिक आंकड़ों के मुख्य दोष बताओ।
उत्तर-
दोष (Demerits)

  1. अधिक समय (More time)-प्राथमिक आंकड़ों को एकत्रित करने के लिए बहुत-से समय की आवश्यकता होती है। इसलिए सूचना प्राप्त करने लिए देरी हो जाती है।
  2. खर्चीले (Expensive)-प्राथमिक आंकड़े एकत्रित करने में बहुत धन, समय तथा परिश्रम खर्च करना पड़ता
  3. पक्षपात (Biased)-प्राथमिक आंकड़े पक्षपात से प्रभावित होते हैं, क्योंकि अनुसन्धानकर्ता अपनी सुविधानुसार आंकड़े पेश करता है।
  4. निजी अनुसन्धान के लिए अनुचित (Unsuitable for Private Investigation)-प्राथमिक आंकड़े सरकारी अनुसन्धान के लिए अधिक उचित होते हैं, परन्तु निजी अनुसन्धान के क्षेत्र के लिए यह आंकड़े अनुचित माने जाते हैं।

प्रश्न 7.
द्वितीयक आंकड़ों के मुख्य गुण (Merits) बताओ।
उत्तर-
द्वितीयक आंकड़े (Secondary Data) द्वितीयक आंकड़े पहले ही किसी मनुष्य अथवा संस्था द्वारा एकत्रित किए गए होते हैं। जिनका प्रयोग अनुसन्धानकर्ता अपने उद्देश्य के लिए करता है।
गुण (Merits)-

  • किफायती (Economical) – द्वितीयक आंकड़ों के प्रयोग में खर्च कम होता है। समय तथा परिश्रम की भी बचत होती है।
  • सरल प्रयोग (Easy to use)-द्वितीयक आंकड़ों का प्रयोग सरलता से किया जा सकता है।
  • विश्वसनीय (Reliable)-सरकार द्वारा एकत्र किए गए आंकड़े विश्वसनीय होते हैं, जिनके प्रयोग अनुसन्धानकर्ता बिना शक कर सकता है।
  • विशाल क्षेत्र (Wide Scope)-द्वितीयक आंकड़े विशाल क्षेत्रों में उपलब्ध होते हैं। इनमें से चयन करने के पश्चात् सम्पादन करके आंकड़ों का उचित प्रयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 8.
अनुसन्धानकर्ता, गणक तथा सूचक की धारणाओं को स्पष्ट करो।
उत्तर-

  1. अनुसन्धानकर्ता (Investigator)-किसी अनुसन्धान में लगे व्यक्ति जिस द्वारा अनुसन्धान को नियोजित किया जाता है, उसको अनुसन्धानकर्ता कहते हैं।
  2. गणक (Enumerator)-जिस मनुष्य द्वारा आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं। साधारण तौर पर अनुसन्धानकर्ता द्वारा गणकों को आंकड़े एकत्रित करने के लिए काम पर लगाया जाता है, क्योंकि यह मनुष्य आंकड़े एकत्रित करने के लिए माहिर होते हैं।
  3. सूचक (Respondent)–अनुसन्धान सम्बन्धी जिन मनुष्यों द्वारा सूचना प्रदान की जाती है, उसको सूचक अथवा उत्तरदाता कहा जाता है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े

प्रश्न 9.
एक तालिका तथा प्रश्नावली में क्या अन्तर होता है ?
उत्तर-

  • तालिका (Schedule)-तालिका में भी विभिन्न प्रश्न होते हैं, परन्तु तालिका को गणक तैयार करते हैं। वह उत्तरदाता से प्रश्न पूछकर तालिका तैयार करते हैं।
  • प्रश्नावली (Questionaire) प्रश्नावली में भी प्रश्न होते हैं, परन्तु प्रश्नावली सूचकों को दे दी जाती है, जिसको सूचक भरकर अनुसन्धान को देते हैं।

प्रश्न 10.
आंकड़ों के एकत्रितकरण में गलतियों के मुख्य स्रोत बताओ।
उत्तर-
आंकड़ों के एकत्रितकरण में गलतियां होने की सम्भावना होती है, गलतियों के मुख्य स्रोत इस प्रकार हैं –

  1. अनुसन्धान द्वारा जो गणक आंकड़े एकत्रित करने के लिए रखे जाते हैं, वह विभिन्न पैमाने (Scale) से आंकड़े एकत्रित करते हैं तो गलती की सम्भावना होती है।
  2. सूचक प्रश्न अच्छी तरह नहीं समझ सकते तो गलत सूचना दे सकते हैं।
  3. प्रश्न इस प्रकार के हो सकते हैं, जिनके बारे सूचक उत्तर देना पसन्द नहीं करते।
  4. सूचकों द्वारा दी सूचना को गणक अच्छी तरह नोट नहीं करते।

प्रश्न 11.
द्वितीयक आंकड़ों का प्रयोग करते समय कौन-सी सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए ?
उत्तर-
द्वितीयक आंकड़ों का प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए-

  1. अनुकूलता (Suitability) – केवल वह द्वितीयक आंकड़े ही प्रयोग करने चाहिएं, जो अनुसन्धानकर्ता के उद्देश्य की पूर्ति करते हों।
  2. उचितता (Adequacy)-जो आंकड़ा अनुसन्धानकर्ता द्वितीयक आंकड़ों की सहायता से प्राप्त करता है, वह वर्तमान अनुसन्धान के लिए काफ़ी होने चाहिए हैं। .
  3. शुद्धता (Accuracy)-अनुसन्धानकर्ता को आंकड़ों की शुद्धता का विश्वास होना चाहिए।
  4. विश्वसनीय (Reliable)-द्वितीयक आंकड़े सरकारी संस्था द्वारा प्रदान किए गए हैं जो विश्वसनीय होते हैं।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़ों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
संग्रहण के विचार से समंक दो प्रकार के होते हैं-
1. प्राथमिक समंक (Primary Data)-प्राथमिक समंक वे आंकड़े हैं जिन्हें अनुसन्धान करने वाला अपने प्रयोग में लाने के लिए पहले-पहल इकट्ठा करता है या उस विषय के सम्बन्ध में यदि आंकड़े पहले भी इकट्ठे किए गए होते हैं तो भी अनुसन्धानकर्ता आरम्भ से अन्त तक सामग्री नये सिरे से एकत्र करता है। इसे प्राथमिक सामग्री कहते हैं। वैसेल (Wessel) के शब्दों में, “अनुसन्धान की प्रक्रिया के अन्तर्गत मौलिक रूप से जो आंकड़े इकट्ठे किए जाते हैं, उन्हें प्राथमिक आंकड़े कहते हैं।”

2. द्वितीयक समंक (Secondary Data)-द्वितीयक समंक वे समंक हैं जिनका संकलन पहले से हो चुका होता है और अनुसन्धानकर्ता उन्हें अपने प्रयोग में लाता हैं। यहां वह स्वयं संग्रहण नहीं करता। किसी अन्य उद्देश्य के लिए संकलित समंक को प्रयोग में लाता है। इस प्रकार के समंक अपने मौलिक रूप में नहीं होते हैं बल्कि सारणी प्रतिशत आदि में व्यक्त होते हैं। ब्लेयर (Blair) के शब्दों में, “द्वितीयक समंक वे हैं जो पहले से ही अस्तित्व में हैं और जो वर्तमान प्रश्नों के उत्तर में नहीं बल्कि किसी दूसरे उद्देश्य के लिए एकत्र किए गए हैं।”

प्रश्न 2.
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान तथा अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान में क्या अन्तर है?
उत्तर-
प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान (Direct Personal Investigation)-इस रीति में अनुसन्धानकर्ता सूचना देने वालों से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध स्थापित करके समंक एकत्र करता है। यह रीति बहुत सरल है। अनुसन्धानकर्ता स्वयं उन लोगों के सम्पर्क में आता है जिनके विषय में आंकड़े एकत्र करना चाहता है। यदि अनुसन्धानकर्ता का व्यवहार कुशल, धैर्यवान् व मेहनती है तो इस रीति द्वारा प्राप्त आंकड़े बहुत विश्वसनीय होते हैं। इस रीति में अनुसन्धानकर्ता को निरीक्षण का भारी सहारा लेना पड़ता है।

अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान (Indirect Oral Investigation)-अनुसन्धान का क्षेत्र विस्तृत होने पर अनुसन्धानकर्ता के लिए यह सम्भव नहीं हो पाता कि वह प्रत्यक्ष रूप से सबसे सम्पर्क स्थापित करे और आंकड़े एकत्र करे। ऐसी दशा में वह किसी ऐसे व्यक्ति से सूचनाएं प्राप्त करता है जिसे उस विषय में जानकारी है। इस नीति में अनुसन्धानकर्ता अप्रत्यक्ष एवं मौखिक रूप से सम्बन्धित व्यक्तियों के बारे में अन्य जानकार व्यक्ति से सूचना प्राप्त करता है। उदाहरण के तौर पर कक्षा के विद्यार्थियों के बारे में कोई सूचना कक्षा के मानीटर या अध्यापक से प्राप्त करनाको सूचकों की साक्षी (Witness) कहते हैं। इस विधि से तभी सफलता मिल सकती है जब प्रश्नकर्ता चतुर तथा लगनशील हो।

प्रश्न 3.
द्वितीयक आंकड़ों के गुण व अवगुण लिखें।
उत्तर-
द्वितीयक आंकड़ों के गुण –

  • द्वितीयक आंकड़ों का प्रयोग करना सुगम है|
  • इन आंकड़ों के प्रयोग में धन, समय और श्रम की बचत होती है।
  • कुछ अनुसन्धानों के लिए प्राथमिक समंक संकलित ही नहीं किये जा सकते।
  • कुछ अनुसन्धानों में विश्वसनीय द्वितीयक आंकड़े मिल जाते हैं।

द्वितीयक आंकड़ों के दोष –

  1. द्वितीयक आंकड़ों में प्राथमिक आंकड़ों की भान्ति शुद्धता का स्तर ऊंचा नहीं होता।
  2. वर्तमान युग के अनुकूल विश्वसनीय और पर्याप्त मात्रा में द्वितीयक आंकड़ों का मिलना कठिन होता है।
  3. प्रत्येक प्रकार के अनुसन्धान के लिए द्वितीयक आंकड़े नहीं मिल पाते।
  4. द्वितीयक आंकड़ों का प्रयोग सावधानी से करना होता है।

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सांख्यिकी अनुसन्धान करते समय कौन-कौन सी सावधानियों का प्रयोग आवश्यक होता है? (What are the precautions necessary for Statistical Investigation ?)
उत्तर-
सांख्यिकी का अर्थ उन विधियों से होता है, जिन द्वारा हम आंकड़ों को एकत्र करने, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा व्याख्या करते हैं। इस उद्देश्य के लिए जब तक अनुसन्धानकर्ता अनुसन्धान का काम आरम्भ करता है तो उसको आंकड़े एकत्रित करते समय बहुत-सी सभी बातों का ध्यान रखना चाहिए।

1. अनुसन्धान का उद्देश्य एवं क्षेत्र (Purpose of Investigation)-किसी समस्या को समझ लेने के पश्चात् अनुसन्धान के उद्देश्य की जानकारी भी आवश्यक होती है। अनुसन्धान करने के लिए सांख्यिकी आंकड़ों का प्रयोग किया जाता है। हम जानते हैं कि सांख्यिकी विधियों का उद्देश्य सिर्फ आंकड़ों को एकत्रित करना ही नहीं, बल्कि इसमें वर्गीकरण, प्रस्तुतीकरण, सारणियां, विश्लेषण तथा व्याख्या इत्यादि की क्रियाएं की जाती हैं। इससे प्राप्त किए आंकड़ों द्वारा उचित परिणाम निकाले जा सकते हैं। इसलिए बिना उद्देश्य से एकत्रित किए आंकड़े व्यर्थ होते हैं, जिस द्वारा कोई लाभदायक परिणाम प्राप्त नहीं किया जा सकता।

2. सूचना के साधन (Sources of Information)-जब हम आंकड़ों का उद्देश्य निर्धारित कर लेते हैं तो इसके पश्चात् आंकड़ों को एकत्र करने के लिए विभिन्न साधनों का प्रयोग किया जाता है। आंकड़ा एकत्र करने के दो स्रोत होते हैं।

(i) आन्तरिक तथा बाहरी स्त्रोत (Internal and External Sources)-जब आंकड़ों को किसी एक व्यक्ति अथवा संस्था से प्राप्त किया जाता है तथा यह आंकड़े एक स्थान पर ही प्राप्त किए जा सकते हैं तो इनको आन्तरिक साधन कहा जाता है। आन्तरिक आंकड़े निरन्तर तौर पर (Regularly) अथवा विशेष तौर पर (Adhoc) आधार पर एकत्रित किए जा सकते हैं। बाहरी आंकड़े वे आंकड़े होते हैं जोकि एक संस्था से बिना अन्य साधनों द्वारा भी आंकड़ों को प्राप्त किया जाता है। उदाहरणस्वरूप किसी एक फ़र्म द्वारा किए गए उत्पादन, बिक्री, लाभ तथा हानि के आंकड़ों को आन्तरिक आंकड़े कहा जाता है, जबकि एक देश में कारें बनाने वाली बहुत-सी फ़र्मों के उत्पादन बिक्री, लाभ तथा हानि के आंकड़ों को बाहरी आंकड़े कहा जाता है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े

(ii) प्राथमिक तथा द्वितीयक स्त्रोत (Primary and Secondary Sources)-प्राथमिक स्रोत का अर्थ उन साधनों से होता है जिनमें एक अनुसन्धानकर्ता अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्वयं आंकड़े एकत्रित करता है। यह आंकड़े मौलिक होते हैं। द्वितीयक साधन वह साधन है, जिनमें आंकड़े किसी अन्य मनुष्य अथवा संस्था द्वारा एकत्रित किए जाते हैं। इन आंकड़ों को अनुसन्धानकर्ता अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रयोग करता है।

3. सांख्यिकी इकाइयां तथा उनकी परिभाषा (Statistical Units and their Definitions)-सांख्यिकी इकाइयों का अर्थ ऐसे माप से होता है, जिस रूप में हम आंकड़ों को एकत्र करके विश्लेषण तथा व्याख्या करते है, जैसे कि आय को रुपयों में, अनाज को क्विटलों में, दूध-पेट्रोल को लिटरों में स्पष्ट किया जाता है। यह सांख्यिकी इकाइयां उचित होनी चाहिए, जिनकी जानकारी से विशेष परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं, जैसे कि प्रो० किंग ने कहा है, “सिर्फ अनिवार्य ही नहीं, बल्कि अति आवश्यक होता है कि सांख्यिकी इकाइयों को स्पष्ट रूप में परिभाषित किया जाए।” जब हम सांख्यिकी इकाइयों को ठीक रूप में परिभाषित करते हैं तो इससे प्राप्त किए परिणाम शुद्ध तथा उचित होते हैं।

4. शुद्धता की मात्रा (Degree of Accuracy)—एकत्रित किए गए आंकड़ों में जहां तक सम्भव हों, शुद्धता का होना आवश्यक होता है, यदि एकत्रित किए गए आंकड़े शुद्ध नहीं होते तो ऐसे आंकड़ों से उचित परिणाम नहीं निकाले जा सकते। इसमें कोई शक नहीं कि आंकड़ों में 100% शुद्धता नहीं पाई जा सकती। इसका मुख्य कारण यह होता है कि आंकड़ों को एकत्र करते समय कई बार अनुमान का सहारा लेना पड़ता है। कई बार अनुसन्धान पक्षपात न भी करना चाहता हो परन्तु सूचना देने वाला व्यक्ति ठीक आंकड़े प्रदान न करें तो भी शुद्धता के स्तर को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 2.
प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़ों से क्या अभिप्राय है ? प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़ों में अन्तर बताओ।
(What do you mean by primary and secondary data ? What is difference between primary and secondary data)
उत्तर-
प्राथमिक आंकड़े (Primary Data)-प्राथमिक आंकड़े वह आंकड़े होते हैं, जोकि अनुसन्धानकर्ता द्वारा स्वयं एकत्रित किए जाते हैं। ये आंकड़े पहले किसी मनुष्य अथवा संस्था द्वारा एकत्रित किए नहीं होते, ऐसे आंकड़ों को प्राथमिक आंकड़े कहा जाता है। प्रो० सीकरिस्ट के शब्दों में, “प्राथमिक आंकड़ों से अभिप्राय मौलिक आंकड़ों से होता है अर्थात् मुख्य तौर पर यह कच्चे माल जैसे होते हैं।” (“By Primary data are meant those which are original, that is they are essential Raw Materials.”-Secrist)

प्रो० वैसल के शब्दों में, “अनुसन्धान की प्रक्रिया में जो समंक मौलिक रूप में एकत्रित किए जाते हैं, इनको द्वितीयक आंकड़े कहा जाता है।” (“Data originally collected in the process of investigation are known as primary data.”-Wessel) द्वितीयक आंकड़े (Secondary Data) द्वितीयक आंकड़ों को दूसरे दर्जे के आंकड़े भी कहा जा सकता है। यह आंकड़े पहले ही किसी मनुष्य अथवा संस्था द्वारा एकत्रित किए जाते हैं।

परन्तु अनुसन्धान इन आंकड़ों का प्रयोग अपनी जांच-पड़ताल में कर लेता है। इन आंकड़ों को वह खुद एकत्रित नहीं करता, बल्कि अख़बारों, रसालों, पुस्तकों में छपे हुए आंकड़ों का प्रयोग अपने उद्देश्य के लिए कर लेता है तो ऐसे आंकड़ों को द्वितीयक आंकड़े कहा जाता है। प्रो० एम० एम० बलेयर के शब्दों में, “द्वितीयक आंकड़े वह हैं जो कि पहले ही अस्तित्व में होते हैं, जोकि वर्तमान प्रश्नों के उत्तर में नहीं, बल्कि किसी अन्य उद्देश्य के लिए एकत्रित किए जाते हैं। प्रो० वैसल अनुसार, “समंक जो दूसरे व्यक्तियों द्वारा एकत्रित किए जाते हैं, इनको द्वितीयक आंकड़े कहा जाता है।” (“Data Collected by other persons are called secondary data.” –Wessel)

द्वितीयक आंकड़े (Secondary Data) द्वितीयक आंकड़ों को दूसरे दर्जे के आंकड़े भी कहा जा सकता है। यह आंकड़े पहले ही किसी मनुष्य अथवा संस्था द्वारा एकत्रित किए जाते हैं। परन्तु अनुसन्धान इन आंकड़ों का प्रयोग अपनी जांच-पड़ताल में कर लेता है। इन आंकड़ों को वह खुद एकत्रित नहीं करता, बल्कि अख़बारों, रसालों, पुस्तकों में छपे हुए आंकड़ों का प्रयोग अपने उद्देश्य के लिए कर लेता है तो ऐसे आंकड़ों को द्वितीयक आंकड़े कहा जाता है। प्रो० एम० एम० बलेयर के शब्दों में, “द्वितीयक आंकड़े वह हैं जो कि पहले ही अस्तित्व में होते हैं, जोकि वर्तमान प्रश्नों के उत्तर में नहीं, बल्कि किसी अन्य उद्देश्य के लिए एकत्रित किए जाते हैं। प्रो० वैसल अनुसार, “समंक जो दूसरे व्यक्तियों द्वारा एकत्रित किए जाते हैं, इनको द्वितीयक आंकड़े कहा जाता है।” (“Data Collected by other persons are called secondary data.” –Wessel)

प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़ों में अन्तर (Difference between Primary and Secondary Data)
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े 1
प्रो० सीकरिस्ट के अनुसार, “प्राथमिक आंकड़े तथा द्वितीयक आंकड़ों में संकेत दर्जे का अन्तर होता है, प्रकार का कोई अन्तर नहीं होता अर्थात् ये आंकड़े जो कि किसी मनुष्य अथवा संस्था द्वारा एकत्रित किए गए हैं। उस मनुष्य अथवा संस्था के लिए ये आंकड़े प्राथमिक आंकड़े होते हैं, परन्तु ये आंकड़े जब किसी अन्य मनुष्य अथवा संस्था द्वारा प्रयोग किए जाते हैं तो ये द्वितीयक आंकड़े बन जाते हैं। इसलिए इन आंकड़ों में केवल दर्जे का ही अन्तर है प्रकार का कोई अन्तर नहीं।”

प्रश्न 3.
प्राथमिक आंकड़ों को एकत्रित करने की विधियों की व्याख्या करो। प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान के गुण तथा दोष बताओ।
(Explain the methods of collecting Primary Data. Give the merits and demerits of Direct Personal Investigation.)
उत्तर-
जब सांख्यिकी अनुसन्धान के लिए एक अनुसन्धानकर्ता स्वयं आंकड़े एकत्रित करता है तो इनको प्राथमिक आंकड़े कहा जाता है। प्राथमिक आंकड़ों को एकत्रित करने की प्रमुख्य विधियां निम्नलिखित अनुसार हैं-

  1. प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान (Direct Personal Investigation)
  2. अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान (Indirect Oral Investigation)
  3. संवाददाता से सूचना (Information from correspondents)
  4. डाक प्रश्नावली के माध्यम द्वारा सूचना (Information through Mailed Questionnaires)
  5. गणकों के माध्यम द्वारा सूचना (Information through anumerators)

प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान (Direct Personal Investigation)-प्राथमिक आंकड़ों को एकत्र करने के लिए प्रथम विधि प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुसन्धान विधि है। इस विधि में अनुसन्धानकर्ता आय स्वयं सूचना देने वालों के पास जाता है तथा आंकड़े एकत्रित करता है। इस विधि द्वारा विश्वसनीय आंकड़े एकत्रित किए जा सकते हैं, यदि अनुसन्धानकर्ता मेहनती, धैर्य वाला तथा निरपक्ष स्वभाव वाला होता है। उदाहरणस्वरूप गुरु नानक देव युनिवर्सिटी अमृतसर में काम करने वाले कर्मचारियों सम्बन्धी कोई जांच-पड़ताल करनी है तो जांचकर्ता युनिवर्सिटी में जाकर कर्मचारियों से बात करता है। इस प्रकार जो आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं, उनको प्राथमिक आंकड़े कहा जाता है।

विधि का क्षेत्र (Scope of the method)-यह विधि ऐसे अनुसन्धान के लिए उचित होती है जहां जांच-पड़ताल का क्षेत्र सीमित हो। जहां अनुसन्धान में मौलिक आंकड़ों की आवश्यकता होती है तथा आंकड़ों को गुप्त रखना हो। आंकड़े शुद्ध तथा जटिल हों तो अनुसन्धानकर्ता स्वयं ही ऐसे आंकड़े एकत्र कर सकता है।

गुण (Merits)-इस विधि के मुख्य गुण निम्नलिखित अनुसार हैं

  1. इस विधि द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़े मौलिक (original) होते हैं।
  2. यह विधि लचकदार (Elastic) भी है क्योंकि अनुसन्धानकर्ता प्रश्नों की आवश्यकता अनुसार बदल सकता है।
  3. इस विधि द्वारा एकत्रित किए आंकड़ों में शुद्धता का गुण पाया जाता है।
  4. यह विधि विश्वसनीय होती है तथा प्राप्त की जानकारी पर पूर्ण रूप में भरोसा किया जा सकता है।
  5. इस ढंग से मुख्य सूचना के बिना अधिक जानकारी भी प्राप्त हो जाती है।

दोष (Demerits)—
इस विधि में निम्नलिखित दोष भी हैं-

  • इस विधि को विशाल क्षेत्र (Wide Areas) में लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि अनुसन्धानकर्ता प्रत्येक स्थान पर स्वयं जाकर आंकड़े एकत्रित नहीं कर सकता।
  • यह विधि अधिक खर्चीली (More Costly) है, आंकड़ों को एकत्र करने के लिए अधिक मेहनत की आवश्यकता होती है।
  • इस विधि में व्यक्तिगत पक्षपात (Favouritism) भी हो सकता है। इसलिए प्राप्त परिणाम दोषपूर्ण हो सकते हैं।
  • इस विधि द्वारा आंकड़े एकत्र करने के लिए अधिक समय (More time) नष्ट हो जाता है।
  • इस विधि के लिए सिखलाई के माहिर (Trained) व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े

प्रश्न 4.
अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान प्रयोग कब किया जाता है ? इसके गुण दोष तथा सावधानियां लिखें।
(Describe the suitability of Indirect oral investigation. What are its merits, demerits, and precautions.)
उत्तर-
अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान (Indirect Oral Investigation)-प्राथमिक आंकड़े एकत्र करने के लिए अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान की विधि भी अपनाई जाती है। इस विधि अनुसार अनुसन्धानकर्ता सूचना देने वाले सभी व्यक्तियों को नहीं मिलता, बल्कि ऐसे व्यक्तिों से जानकारी प्राप्त करता है, जिनको एक विशेष वर्ग के लोगों की पूर्ण जानकारी होती है तथा जो अच्छे ढंग से सूचना देने की योग्यता रखते हैं। उदाहरणस्वरूप जैसे कि किसी उद्योग में काम पर लगे मज़दूरों सम्बन्धी जानकारी मज़दूरों से प्राप्त न करके यह सूचना मौखिक रूप में मज़दूर समूहों तथा उद्योगपतियों से प्राप्त की जाती है। इस विधि को अप्रत्यक्ष मौखिक अनुसन्धान की विधि कहा जाता है।

विधि का क्षेत्र (Scope of the Method) यह विधि विशाल क्षेत्र में लागू की जा सकती है। जब सूचना देने वाले अज्ञानी होते हैं तथा उनकी संख्या इतनी अधिक हो कि सम्पर्क करना सम्भव न हो तो ऐसी स्थिति में अप्रत्यक्ष अनुसन्धान की विधि अधिक उचित होती है।

गुण (Merits) इस विधि के गुण निम्नलिखित हैं –

  1. यह विधि विशाल क्षेत्र (Wide Area) में लागू होती है।
  2. यह विधि कम खर्चीली (Less Costly) है। इसमें समय, धन तथा मेहनत कम खर्च होती है।
  3. इस विधि में पक्षपात (Bias) की सम्भावना नहीं होती।
  4. सूचना माहिरों (Experts) द्वारा दी जाती है, इसलिए सरलतापूर्वक जल्दी से आंकड़े प्राप्त किए जाते हैं।

दोष (Demerits)-इस विधि में निम्नलिखित दोष भी हैं-

  1. इस विधि द्वारा आंकड़ों में शुद्धता की कमी (Less Accuracy) हो सकती है, क्योंकि आंकड़ों सम्बन्धी लोगों की जगह पर मज़दूर समूहों अथवा मालिकों से प्राप्त किए जाते हैं।
  2. इस विधि में सूचना देने वाले पक्षपात (Bias) का प्रयोग कर सकते हैं।
  3. आंकड़े व्यक्तिगत दृष्टिकोण अनुसार दिए गए हैं, इसलिए प्राप्त किए परिणाम गलत (Wrong Results) भी हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
संवाददाता द्वारा सूचना प्राप्त करने के गुण व दोष लिखें। इनके प्रयोग में क्या सावधानियां बरतनी चाहिए ?
(What are the merits and demerits of correspondent method? What are precautions while using this method ?)
उत्तर-
संवाददाताओं से सूचना (Information from Correspondents)-इस विधि में अनुसन्धानकर्ता स्थानिक एजेन्टों अथवा संवाददाताओं की सहायता से सूचना प्राप्त करता है। ये संवाददाता अपने क्षेत्रों में से ज़रूरी सूचना एकत्रित करके अनुसन्धानकर्ता को भेज देते हैं। इस विधि द्वारा बहुत विशाल क्षेत्र में से उचित तथा नवीन आंकड़े सरलता से प्राप्त हो सकते हैं।

विधि का क्षेत्र (Scope of the Method) यह विधि साधारण तौर पर रसालों, अख़बारों, टेलीविज़न तथा रेडियो द्वारा अपनाई जाती है। स्थानिक संवाददाता दिन-प्रतिदिन की घटनाओं के बारे ताजा जानकारी प्रदान करते हैं।

गुण (Merits) इस विधि के मुख्य गुण इस प्रकार हैं

  • यह विधि किफ़ायती (Economical) होती है। इस विधि में धन, समय तथा परिश्रम की बचत होती है।
  • इस विधि को विशाल क्षेत्र (Wide Area) में लागू किया जा सकता है। इससे दूर-दूर से सूचना प्राप्त की जा सकती है।
  • इस विधि द्वारा निरन्तर (Continuously) तथा निरन्तरता से प्राप्त की जा सकती है।
  • जब बहुत ऊंचे दर्जे की शुद्धता न अनिवार्य हो तो सापेक्षक शुद्धता (Relative Accuracy) के लिए यह विधि अधिक उचित है।

दोष (Demerits)-इस विधि के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं

  1. इस विधि द्वारा एकत्रित किए आंकड़ों की मौलिकता की कमी (Less Originality) पाई जाती है।
  2. संवाददाताओं द्वारा भेजे आंकड़े पक्षपात (Biased Data) वाले हो सकते हैं।
  3. इस विधि अनुसार सूचना प्राप्त करना संवादाताओं की कुशलता पर निर्भर करता है। यदि संवाददाता कुशल न हो तो सूचना प्राप्त करने के लिए बहुत-सा समय (Time) नष्ट हो जाता है।
  4. विभिन्न संवाददाताओं द्वारा भेजी गई सूचना में एकसारता (Uniformity) का अभाव होता है, परिणामस्वरूप जांच-पड़ताल करनी कठिन हो जाती है।
  5. इसी विधि द्वारा सूचना देर से प्राप्त होती है। देरी से एकत्रित किए (Delay in collection) आंकड़े ज्यादा लाभदायक नहीं होते।

प्रश्न 6.
डाक प्रश्नावली के माध्यम द्वारा सूचना के गुण तथा दोष बताएं। (What are the merits and demerits of information through Mailed Questionnaires ?)
उत्तर-
डाक प्रश्नावली के माध्यम द्वारा सूचना (Information through Mailed Questionnaires)प्राथमिक आंकड़े एकत्रित करने के लिए डाक प्रश्नावली के माध्यम द्वारा सूचना के ढंग का प्रयोग भी किया जाता है। इस विधि में प्रश्नावली तैयार की जाती है तथा इसको विभिन्न सूचना देने वाले मनुष्यों के पास डाक द्वारा भेजा जाता है। प्रश्नावली के साथ एक विनती-पत्र भी भेजा जाता है, जिसमें प्रश्नावली को भरने के पश्चात् जल्दी वापस भेजने की विनती की जाती है तथा विश्वास दिलाया जाता है कि उसकी सूचना को गुप्त रखा जाएगा। सूचना देने वाला प्रश्नावली में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भरकर वापिस अनुसन्धानकर्ता को भेज देता है, इस प्रकार प्रश्नावलियों के आधार पर आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं।

विधि का क्षेत्र (Scope of Method) डाक के माध्यम द्वारा सूचना एकत्र करने की इस विधि को उस समय लागू किया जाता है जब जांच-पड़ताल का क्षेत्र विशाल होता है तथा सूचना देने वाले व्यक्ति शिक्षित होते हैं।

गुण (Merits) इस विधि द्वारा आंकड़े एकत्र करने के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

  1. इस ढंग को बहुत खर्चीली (Economical) विधि भी कहा जाता है क्योंकि विभिन्न स्थानों से कम खर्च करके सूचना एकत्र की जा सकती है।
  2. जब जांच-पड़ताल का विशाल क्षेत्र (Wide Area) होता है तो इस विधि द्वारा सरलता से आंकड़े एकत्र किए जा सकते हैं।
  3. इस विधि द्वारा एकत्रित किए आंकड़े मौलिक (original) होते हैं। क्योंकि सूचना देने वाले मनुष्य आंकड़ों को स्वयं भरकर भेजते हैं।

दोष (Demerits) – इस विधि के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं

  1. इस विधि का मुख्य दोष यह है कि सूचना देने वाले मनुष्य की कम रुचि (Lack of Interest) होने के कारण कई बार प्रश्नावलियों को वापस नहीं भेजा जाता। इसलिए सूचना प्राप्त न होने के कारण अनुसन्धान करने में देर लग जाती है।
  2. इस विधि में लोचशीलता की कमी (Less Elasticity) होने के कारण उचित सूचना प्राप्त नहीं होती, क्योंकि प्रश्न न समझ आने की स्थिति में सूचना देने में मुश्किल आती है।
  3. सूचना पक्षपात पूर्ण (Biased) भी हो सकती है, क्योंकि सूचना देने वाला अपनी इच्छानुसार सूचना प्रदान करता है। इसलिए उचित परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते।
  4. यह विधि सीमित क्षेत्र (Limited-Area) में लागू की जा सकती है, क्योंकि इसको केवल पढ़े-लिखे लोगों से आंकड़े प्राप्त करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
  5. यह विधि जटिल (Complex) भी होती है, क्योंकि प्रश्नावली में पूछे गए प्रश्न का उत्तर गलत भी दिया जा सकता है। इसलिए आंकड़ों की शुद्धता सौ प्रतिशत पूर्ण नहीं होती।

प्रश्न 7.
एक अच्छी प्रश्नावली में कौन-कौन से गुण होने चाहिए ? (What are the qualities of a good questionnaire ?)
उत्तर-
अच्छी प्रश्नावली के गुण (Qualities of a good questionnaire)-
1. अनुसन्धान का उद्देश्य-अनुसन्धान का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। इस प्रकार बनाए गए प्रश्न ऐसे होने चाहिए, जिन द्वारा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनिवार्य सूचना दी गई हो।

2. प्रश्नों की कम संख्या–प्रश्नावली में प्रश्नों की संख्या कम-से-कम होनी चाहिए। प्रश्न केवल अनुसन्धान से सम्बन्धित होने चाहिए तो ही सूचना देने वाला प्रश्नावली को सरलता से भर सकता है।

3. प्रश्नों का उचित क्रम-प्रश्नावली में दिए गए प्रश्न उचित तथा तर्कपूर्वक क्रम में होने चाहिए।

4. प्रश्नावली की सरलता-प्रश्नावली में सरलता का गुण होना चाहिए अर्थात् प्रश्न इस तरह के होने चाहिए कि सूचना देने वाले की समझ में सरलता से आ सकें तथा सूचना देने वाला उचित सूचना सरल ढंग से तथा स्पष्ट कर सके।

5. निजी प्रश्न-सूचना देने वालों को निजी प्रकार के प्रश्न नहीं पूछने चाहिए अर्थात् प्रश्नावली के प्रश्न लोगों की धार्मिक, सामाजिक, भावनाओं को चोट पहुँचाने वाले नहीं होने चाहिए।

6. सूचना का विश्वास-प्रश्नावली का महत्त्वपूर्ण गुण यह होना चाहिए है कि सूचना देने वाला बिना किसी डर से सूचना प्रदान कर सकें। इसलिए सूचना देने वाले बिना डर के उचित सूचना प्रदान करते हैं।

7. पक्षपात का अभाव-प्रश्नावली में ऐसे प्रश्न नहीं होने चाहिए जोकि पक्षपात को स्पष्ट करते हों। प्रश्न इस प्रकार के होने चाहिए, जो बिना पक्षपात तथा मतभेद अनुसार बनाए गए हों। ऐसी स्थिति में प्रश्नावली द्वारा उचित सूचना प्राप्त नहीं होगी, यदि प्रश्नावली पक्षपात रहित नहीं होती।

8. संख्या सम्बन्धी प्रश्न-इस बात का ध्यान रखना चाहिए है कि प्रश्न ऐसे न हों, जिनमें सूचना देने वाले को हिसाब-किताब लगाना पड़े, जैसे कि लोग अपनी आय में से कितने प्रतिशत हिस्सा फल तथा सब्जियों पर खर्च करते हैं। इसलिए प्रश्न बनाते समय अनुसन्धानकर्ता को गणना का स्वयं काम करना चाहिए तथा प्रश्न इस प्रकार के होने चाहिए जिनमें अनिवार्य सूचना अनुसन्धानकर्ता स्वयं प्राप्त करें।

9. पूर्व निरीक्षण-प्रश्नावली को अन्तिम रूप देने से पहले इसकी जांच-पड़ताल कर लेनी चाहिए अर्थात् स्थानिक तौर पर कुछ मनुष्यों को प्रश्नावलियों में विभाजित कर सूचना भरवा लेनी चाहिए। इस प्रकार प्रश्नावली के मार्ग में आने वाली मुश्किलों के अनुसार इसको परिवर्तित कर देना चाहिए। इसलिए पूर्व निरीक्षण का कार्य अच्छी प्रश्नावली के लिए उचित माना जाता है।

10. सच्चाई की परख-सूचना एकत्रित करने वाले को ऐसे प्रश्न भी पूछने चाहिए, जिनसे सच्चाई की परख की जा सके। इस उद्देश्य के लिए प्रश्नावली में सच्चाई की परख की सम्भावना होनी चाहिए।

11. प्रश्नावली का मनमोहक होना-प्रश्नावली मनमोहक तथा प्रभाव पाने वाली होनी चाहिए। प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनमें सूचना देने वाले की रुचि में वृद्धि हो। उत्तर देने के लिए उचित स्थान प्राप्त होना चाहिए।

12. निर्देश-प्रश्नावली को भरने के लिए स्पष्ट तथा उचित निर्देश देने चाहिए जिससे प्रश्नावली भरते समय किसी प्रकार की मुश्किल का सामना न करना पड़े।

13. सूचना देने वाली की सुविधा-प्रश्नावली भेजते समय सूचना देने वाले की सुविधा को ध्यान में रखना चाहिए। प्रश्न सीधे तथा सम्बन्धित होने चाहिए जिनका उत्तर बहुत कम समय में दिया जा सके। अनिवार्य डाक टिकट लिफाफे समेत अपना पूरा पता लिखकर भेजनी चाहिए। इस प्रकार सूचना देने वाले की सुविधा में ध्यान रखना चाहिए।

प्रश्नावली को भरकर वापस भेजने की विनती की जानी चाहिए। सूचना देने वाले को यह विश्वास दिलवाना अनिवार्य होता है कि एकत्रित की गई सूचना अनुसन्धान के लिए ही प्रयोग की जाएगी तथा पूर्ण तौर पर गुप्त रखी जाएगी। इस प्रकार की प्रश्नावली द्वारा कम समय में अधिक-से-अधिक सूचना प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 8.
द्वितीयक आंकड़े एकत्रित करने की विधियों को स्पष्ट कीजिए। (Explain the methods of collecting secondary data.)
उत्तर-
द्वितीयक आंकड़ों को एकत्र करने के दो मुख्य स्रोत होते हैं –
A. प्रकाशित स्रोत (Published Sources)
B. अप्रकाशित स्रोत (Unpublished Sources) A.
प्रकाशित स्त्रोत (Published Sources) द्वितीयक आंकड़ों के मुख्य प्रकाशित स्रोत अग्रलिखित अनुसार-
1. अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशन (I.M.F.)-द्वितीयक आंकड़ों को एकत्र करने के दो मुख्य स्रोत होते हैं। विश्व बैंक (World Bank) इत्यादि संस्थाएं सर्वेक्षण करके आंकड़ों को प्रकाशित करती हैं। इन आंकड़ों का प्रयोग व्यक्तियों द्वारा अनुसन्धान में किया जा सकता है।

2. सरकारी प्रशासन-प्रत्येक देश की सरकार देश में विभिन्न प्रकार के आंकड़े प्रकाशित करती है जैसे कि भारत में केन्द्रीय तथा राज्य सरकारें, विभिन्न विभागों से सम्बन्धित आंकड़े प्रकाशित करती हैं। ये आंकड़े सांख्यिकी विशेषज्ञों द्वारा एकत्रित किए जाते हैं, इस उद्देश्य के लिए सूचना मन्त्रालय स्थापित किए होते हैं।

3. अर्द्ध सरकारी प्रकाशन-अर्द्ध सरकारी संस्थाएं जैसे कि पंचायतें, नगरपालिकाएं, नगर-निगम, जिला परिषद् इत्यादि को विभिन्न प्रकार के आंकड़ों का रिकॉर्ड रखते हैं, जैसे कि जन्म, मृत्यु, सेहत, चुंगी द्वारा आय इत्यादि से सम्बन्धित आंकड़े प्रकाशित करती रहती है। ये आंकड़े भी अनुसन्धानकर्ता के लिए लाभदायक होते हैं।

4. आयोगों तथा कमेटियों की रिपोर्ट (Reports of Committees and Commissions) सरकार द्वारा विभिन्न उद्देश्यों के लिए आयोगों तथा कमेटियों की स्थापना की जाती है। इन आयोगों तथा कमेटियों द्वारा रिपोर्ट पेश की जाती हैं। जिनमें लाभदायक आंकड़े प्रदान किए जाते हैं, जैसे कि वित्त आयोग की रिपोर्ट, इजारेदार आयोग की रिपोर्ट, योजना कमीशन की रिपोर्ट इत्यादि द्वारा भी आंकड़े प्राप्त किए जा सकते हैं।

5. अनुसन्धान संस्थाओं के प्रकाशन (Publication of Research Institute) बहुत-सी अनुसन्धान संस्थाएं अनुसन्धान करने के पश्चात् विभिन्न प्रकार के आंकड़े प्रदान करती हैं जैसे कि विश्वविद्यालय तथा अनुसन्धान संस्थाएं जैसे कि भारतीय सांख्यिकी संस्था, राज्य सरकारों की सांख्यिकी संस्थाएं, अनुसन्धान करने के पश्चात् अनुसन्धान पत्र तथा पत्रिकाएं प्रकाशित करती हैं। द्वितीयक आंकड़ों को प्राप्त करने का यह एक महत्त्वपूर्ण स्रोत होता है।

6. समाचार-पत्र तथा पत्रिकाओं द्वारा प्रकाशन (Papers and Journal Publications)-प्रत्येक देश में समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओं में भी आंकड़े प्रकाशित किए जाते हैं जैसे कि आंकड़ों से सम्बन्धित समाचार-पत्र (Economics Times) तथा पत्रिकाएं। जैसे कि कामर्स योजना इत्यादि में भी आंकड़े प्रकाशित किए जाते हैं। यह पत्र तथा पत्रिकाएं भी द्वितीयक आंकड़ों का स्रोत बन सकती हैं।

B. अप्रकाशित स्रोत (Unpublished Sources)-द्वितीयक अथवा दूसरे दर्जा के आंकड़ों का अप्रकाशित साधनों द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है। बहुत-से उद्योग अपने पूंजी निर्माण, उत्पादन, बिक्री, मज़दूरों की संख्या का रिकार्ड अपने पास रखते हैं। इस रिकॉर्ड को प्रकाशित नहीं किया जाता। परन्तु अनुसन्धानकर्ता ऐसे अप्रकाशित साधनों से सूचना प्राप्त कर सकता है।

इसी तरह किसी व्यक्ति के पास हाथ देखने ऐतिहासिक पुस्तकों के आंकड़े सम्भाल कर रखे होते हैं अथवा पुराने बुजुर्गों को भूतकाल की दिलचस्प घटनाओं का पता होता है। इस प्रकार ऐसे आंकड़े जिनको प्रकाशित नहीं करवाया जाता, उन साधनों द्वारा भी सूचना प्राप्त की जा सकती है जो कि अनुसन्धान के लिए आंकड़ों का महत्त्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े

प्रश्न 9.
द्वितीयक आंकड़ों के प्रयोग सम्बन्धी कौन-कौन सी सावधानियां आवश्यक होती हैं ? (What are the precautions necessary for the use of Secondary Data ?)
उत्तर-
1. आंकड़ों का साधन (Sources of Data)-द्वितीयक आंकड़े प्रयोग करते समय आंकड़ों के स्रोत का पता होना चाहिए। यदि आंकड़े सरकार द्वारा एकत्रित किए गए हैं तो ये आंकड़े आमतौर पर उचित होते हैं। इसलिए प्रो० कुजनेटस अनुसार, “द्वितीयक आंकड़ों की शुद्धता उनके साधन पर निर्भर करती है।”

2. अनुसन्धान एजेन्सी की योग्यता (Ability to Collecting Agency) – द्वितीयक आंकड़े किसी मनुष्य अथवा संस्था द्वारा एकत्रित किए गए हैं। यदि अनुसन्धानकर्ता ईमानदार, तजुर्बेकार कुशल तथा निरपक्ष है तो एकत्रित किए आंकड़े विश्वसनीय होते हैं।

3. आंकड़ों का उद्देश्य तथा क्षेत्र (Motive and Scope of Data) – यदि द्वितीयक आंकड़े एकत्रित किए गए थे तो उन आंकड़ों के उद्देश्य तथा क्षेत्र को ध्यान में रखना चाहिए है। यदि अनुसन्धानकर्ता का उद्देश्य तथा क्षेत्र भी द्वितीयक आंकड़ों के अनुकूल है तो ऐसे आंकड़ों का प्रयोग सरलता से किया जा सकता है। इसलिए द्वितीयक आंकड़े अनुसन्धान के अनुकूल होने चाहिए।

4. आंकड़े एकत्र करने की विधि (Methods of Data Collections)-द्वितीयक आंकड़े किस विधि द्वारा एकत्रित किए गए हैं। इस सम्बन्धी भी अनुसन्धानकर्ता को ज्ञान होना चाहिए है। यदि आंकड़ों को एकत्रित करने के लिए अपनाई गई विधि विश्वसनीय है तो ऐसे आंकड़ों को सरलता से वर्तमान अनुसन्धान के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

5. आंकड़े एकत्रित करने का समय (Time of Collection)—जो आंकड़े हम प्राप्त करना चाहते हैं, उनकी जांच-पड़ताल के समय को भी ध्यान में रखना चाहिए अर्थात् कौन-कौन सी स्थितियों में ये आंकड़े एकत्रित किए गए थे। यदि जांच-पड़ताल कुछ विशेष स्थितियों लड़ाई, बाढ़, भूचाल के समय की गई थी तो ऐसे आंकड़ों से वर्तमान अनुसन्धान लाभदायक नहीं होगा। शान्ति समय स्थितियां असाधारण समय से भिन्न होती हैं।

6. शुद्धता का स्तर (Degree of Accuracy)-जो आंकड़े द्वितीयक आंकड़ों के रूप में प्रयोग किए जाते हैं, उनकी शुद्धता की जांच कर लेनी चाहिए। यदि शुद्धता का स्तर ऊंचा हो तो इन आंकड़ों को विश्वास से प्रयोग किया जा सकता है तथा लाभदायक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

7. सांख्यिकी इकाइयों का प्रयोग (Statistical Units) एकत्रित किए द्वितीयक आंकड़ों में प्रयोग की इकाइयों को भी ध्यान में रखना चाहिए। यदि वर्तमान अनुसन्धान में से उसी प्रकार की इकाइयों को शामिल किया गया है, जिनका प्रयोग पहले की तरह अनुसन्धान में किया गया था तो ऐसे आंकड़े विश्वसनीय परिणाम प्रदान करने में सहायक होते हैं। परन्तु यदि सांख्यिकी इकाइयों में भिन्नता पाई जाती है तो ऐसा आंकड़ों का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि अनुसन्धान के लिए ऐसे आंकड़े कम लाभदायक सिद्ध होते हैं।

इसलिए हम यह कह सकते हैं कि द्वितीयक आंकड़े जैसे दिखाई देते हैं, उसी रूप में ही उनको स्वीकार करना नहीं चाहिए। द्वितीयक आंकड़ों का प्रयोग करते समय इनका सम्पादन करके वर्तमान अनुसन्धान के अनुकूल बना लेना चाहिए। इस तरह विश्वसनीय परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

प्रश्न 10.
भारत में जनगणना संगठन पर नोट लिखो। (Write a note on Census Organisation in India.)
उत्तर –
भारत में विधिपूर्वक जनगणना 1891 में आरम्भ की गई परन्तु वैज्ञानिक ढंग से जनगणना का कार्य स्वतन्त्रता के पश्चात् 1951 में किया गया। जनगणना करने के लिए जिला स्तर पर जिला आंकड़ा विभागों की स्थापना की गई। उसके पश्चात् इस विधि में बहुत-से परिवर्तन किए गए हैं। आरम्भ में जिला स्तर पर जनसंख्या की संख्या तथा सामाजिक तथा आर्थिक आंकड़े भी एकत्रित किए जाते थे। 1961 की जनगणना में गांव, कस्बों तथा शहरों सम्बन्धी विभिन्न-सूचना एकत्रित की जाने लगी। 1971, 1981 तथा 1991 में जनगणना के आंकड़ों को वैज्ञानिक ढंग से पेश करने के लिए तालिका तथा आंकड़े पेश किए जाने लगे।

भारत में रजिस्ट्रार जनरल की नियुक्ति की गई है जो जनगणना के आंकड़े एकत्रित करने तथा पेश करने के लिए ज़िम्मेदार होता है। प्रत्येक दस वर्ष में जनसंख्या के आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं। प्रत्येक दहाके के प्रथम वर्ष जनसंख्या के आंकड़ों को एकत्रित किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नई दिल्ली में रजिस्ट्रार जनरल का दफ़्तर है। सभी राज्यों, केन्द्र प्रशासन राज्यों (Union Territories) में आंकड़ा विभाग बनाए हुए हैं। प्रत्येक सूबे के जिला स्तर पर आंकड़ा अफसर नियुक्त किया गया है जोकि जनगणना का कार्य करता है, जो आंकड़े जिला स्तर पर एकत्रित किए जाते हैं वे सूबे की राजधानी भेजे जाते हैं। प्रत्येक सूबे में आंकड़ों को एकत्रित करके रजिस्ट्रार जनरल के पास नई दिल्ली भेजे जाते हैं, जोकि इन आंकड़ों को प्रकाशित करता है।

जनगणना का कार्य जिले के प्रत्येक गांव, कस्बे तथा शहर में संख्या के आधार पर किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए जनसंख्या से सम्बन्धित आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं। प्रत्येक गांव का क्षेत्रफल, रिहायशी मकानों की संख्या का विवरण एकत्रित किया जाता है। जनसंख्या में पुरुषों तथा स्त्रियों की संख्या आयु के आधार पर की जाती है। जनजातियों तथा पिछड़ी जातियों का विवरण भी एकत्रित किया जाता है। देश में शिक्षित तथा अनपढ़ लोगों की संख्या का ध्यान भी रखा जाता है। इसके अतिरिक्त पुरुष/स्त्री का पेशा भी पूछकर दर्ज किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए श्रमिकों को 9 भागों में विभाजित किया जाता है।

(i) काश्तकार
(ii) कृषि मज़दूर
(iii) पशु पालन, मछली पालन, जंगलात, बागबानी इत्यादि सम्बन्धित कार्य।
(iv) खानों तथा उत्खाने, लट्ठा बनाना
(v)

  • निर्माण कार्य, इनमें मरम्मत का कार्य शामिल होता है।
  • घरेलू तथा छोटे उद्योग तथा मरम्मत

(vi) उसारी
(vii) व्यापार तथा कामर्स
(viii) यातायात, संचार तथा अनुपात।
(ix) अन्य सेवाएं, सीमान्त मज़दूर तथा गैर-मज़दूर तथा उनकी पुरुष-स्त्री अनुपात।

इस प्रकार की सूचना प्रत्येक वार्ड, गांव, कस्बे, शहरी तथा यूनियन टैरीटरी से प्राप्त की जाती है। इस सम्बन्ध में जनगणना संगठन ने कुछ धारणाओं की परिभाषा इस प्रकार दी है-

  1. रिहायशी मकान-जनगणना समय जो कोई मनुष्य तथा परिवार किसी घर में रहता है अथवा दुकान करता है।
  2. अनुसूचित जाति-सरकार द्वारा प्रकाशित नोटिफिकेशन में अनुसूचित जाति की लिस्ट दी हुई है जोकि हिन्दू, सिक्ख, बौद्धी तथा किसी अन्य धर्म के हो सकते हैं।
  3. शिक्षित-जो मनुष्य पढ़-लिख सकता है तथा समझ सकता है, उसको शिक्षित में शामिल किया जाता है। इसमें 0-6 वर्ष के बच्चों को शामिल नहीं किया जाता।
  4. मज़दूर-कोई भी पुरुष अथवा स्त्री जोकि धन कमाने के लिए शारीरिक तथा मानसिक कार्य करते हैं, उनको श्रमिक कहा जाता है। 1991 की जनगणना में सीमान्त मज़दूरों की धारणा को शामिल किया गया है, जिनमें अन्य मज़दूर जिनको वर्ष में 183 दिन कार्य मिलता है। परन्तु जिनको पिछले वर्ष के दौरान कोई कार्य प्राप्त नहीं हुआ उनको गैर मज़दूर कहा जाता है।
  5. काश्तकार-काश्तकार वह होता है जो अपनी भूमि अथवा किराए की भूमि पर कृषि करके अनाज उत्पन्न करता है।
  6. कृषि मज़दूर-जो मनुष्य किसी अन्य मनुष्य की जमीन पर पैसे कमाने के लिए कार्य करता है, उसको कृषि मज़दूर कहा जाता है।
  7. पशु-पालन, मछली-पालन इत्यादि कार्य-जो मनुष्य बागवानी अर्थात् सब्जियां, फल, मिर्च, मसाले इत्यादि उत्पादन के कार्य करते हैं। इनमें पशु-पालन तथा मछली पालन को शामिल किया जाता है।
  8. खाने तथा उत्खनन-खानों में से लोहा, कोयला, मैंगनीज़ इत्यादि खनिज पदार्थ का उत्पादन करना।

इस प्रकार जनगणना संगठन द्वारा जिला आंकड़ा विभाग, सूबा आंकड़ा विभाग के सहयोग से जनसंख्या सम्बन्धी आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं तथा इस उद्देश्य के लिए प्राथमिक आंकड़ों (Primary Data) का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
राष्ट्रीय सैम्पल सर्वेक्षण संगठन (National Sample Survey Organisation) पर टिप्पणी लिखो।
उत्तर-
भारत में सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण का कार्य राष्ट्रीय सैम्पल सर्वेक्षण संगठन द्वारा किया जाता है। यह संगठन उद्योगों तथा कृषि के क्षेत्र के आंकड़े एकत्रित करता है। उद्योगों के आंकड़े वार्षिक आधार पर किए जाते हैं तथा कृषि में उत्पादन का अनुमान सैम्पल सर्वेक्षण के आधार पर लगाया जाता है। यह संगठन कौशल के आदेशों अनुसार कार्य करता है। इसमें 5 बुद्धिजीवी 5 आंकड़े विशेषज्ञ होते हैं जोकि केन्द्र राज्य सरकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह संगठन डायरेक्टर जनरल तथा मुख्य कार्यकारी अफ़सर की अध्यक्षता में कार्य करता है। इसके साथ एक सहायक डायरेक्टर जनरल तथा चार डिप्टी डायरेक्टर जनरल होते हैं।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 15 प्राथमिक तथा द्वितीयक आंकड़े

यह संगठन आंकड़े एकत्रित करने के लिए तालिका तैयार करता है। एकत्रित किए आंकड़ों को संगठित किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए संगठन का हैड-आफिस कलकत्ता में स्थित है। संगठन का फील्ड उपरेशन डिवीज़न दिल्ली तथा फरीदाबाद में स्थित है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों में से आंकड़े एकत्रित करने के आदेश दिए जाते हैं। संगठन के 48 क्षेत्रीय दफ़्तर हैं तथा 117 सब-क्षेत्रीय दफ्तर हैं जोकि देश भर में फैले हुए हैं। आंकड़ों को संगठित करके प्रस्तुतीकरण का कार्य कोलकाता के हैड-आफिस में किया जाता है परन्तु इस उद्देश्य के लिए आंकड़ों के क्रमबद्ध करने के लिए दिल्ली, गिरधी, नागपुर, बंगलौर, अहमदाबाद तथा कोलकाता केन्द्र स्थापित किए गए हैं जहां कि सामाजिक तथा आर्थिक आंकड़ों को एकत्रित करके तालिका तथा तरतीब देने का कार्य किया जाता है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण

Punjab State Board PSEB 11th Class Economics Book Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Economics Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण

PSEB 11th Class Economics बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण का एक लाभ लिखें।
उत्तर-
चित्रों की सहायता से जटिल-से-जटिल आंकड़ों को सरल, साधारण एवं समझने योग्य बनाया जा सकता है। इनको देखते ही आंकड़ों की विशेषताएं समझ में आ जाती हैं।

प्रश्न 2.
चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण की एक सीमा लिखिए।
उत्तर-
चित्रों द्वारा आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण से केवल अनुमान (Estimate) लगाया जा सकता है। इसके द्वारा पूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता। इसके विपरीत सारणी द्वारा समस्या का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
दण्ड चित्र (Bar Diagram) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
दण्ड चित्र वह चित्र है जिसमें आंकड़ों को दण्डों (Bars) या आयतों के रूप में प्रकट किया जाता है।

प्रश्न 4.
वृत्तीय चित्र किसे कहते हैं?
उत्तर-
वृत्तीय चित्र वह चित्र है जिसमें एक वृत्त (Circle) को कई भागों में बांट कर किसी आंकड़े के भिन्न-भिन्न प्रतिशत या सापेक्ष मूल्यों को प्रस्तुत किया जाता है। वृत्तीय चित्रों का प्रयोग प्रतिशतों के आधार पर किया जाता है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण

प्रश्न 5.
बहुगुणी दण्ड चित्र (Multiple Bar Diagram) किसे कहते हैं?
उत्तर-
बहुगुणी दण्ड चित्र वह दण्ड चित्र हैं जो दो या दो से अधिक तथ्यों के आंकड़ों को प्रस्तुत करता है। इनका प्रयोग विभिन्न तथ्यों जैसे जन्म-दर तथा मृत्यु-दर की तुलना के लिए किया जाता है।

प्रश्न 6.
सरल दण्ड चित्र किसे कहते हैं?
उत्तर-
सरल दण्ड चित्र वे चित्र हैं जो एक ही प्रकार के संख्यात्मक तथ्यों के विभिन्न मूल्यों को दण्डों के द्वारा प्रकट करते हैं।

प्रश्न 7.
जब आंकड़ों को दण्डों के रूप में प्रकट किया जाता है तो इसको ………………… कहते हैं।
(a) दण्ड चित्र
(b) बहुदण्ड चित्र
(c) रेखाचित्र
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(a) दण्ड चित्र।

प्रश्न 8.
जब किसी तथ्य के विभिन्न भागों को प्रतिशत के रूप में प्रकट किया जाता है तो इसको ………. चित्र कहते हैं।
उत्तर-
प्रतिशत।

प्रश्न 9.
गोलाकार चित्र को …………… चित्र भी कहा जाता है।
उत्तर-
पाई।

प्रश्न 10.
दो अथवा दो से अधिक तथ्यों वाले चित्र को बहुदण्ड चित्र कहा जाता है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 11.
मानचित्र को रेखाचित्र भी कहा जाता है।
उत्तर-
ग़लत।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण

प्रश्न 12.
एक से अधिक तथ्यों वाले समूह और भागों के रूप में प्रकट करते हैं तो इस को ……………….. कहते हैं।
(a) दण्ड चित्र
(b) बहुदण्ड चित्र
(c) मानचित्र
(d) उप विभाजित दण्ड चित्र।
उत्तर-
(d) उप विभाजित दण्ड चित्र।

प्रश्न 13.
जब तस्वीर बना कर आंकड़ों को पेश किया जाता है तो इसको पाई चित्र कहते हैं।
उत्तर-
ग़लत।

प्रश्न 14.
आंकड़ों को चित्रों द्वारा स्पष्ट करने को …………… कहते हैं।
(a) सारणीयन
(b) वर्गीकरण
(c) व्यवस्थीकरण
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(d) इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 15.
दण्ड से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
दण्ड से अभिप्राय एक आयत अथवा आयतकार चित्र से है जिस द्वारा किसी चर के मूल्य प्रकट किये जाते हैं।

प्रश्न 16.
दण्ड चित्र दो प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
सही।

प्रश्न 17.
जो चित्र दो अथवा दो से अधिक तथ्यों को प्रकट करते हैं उनको ………. चित्र कहते हैं।
उत्तर-
बहुगुणी चित्र।

प्रश्न 18.
दण्ड चित्र का कोई एक लाभ बताएँ।
उत्तर-
दण्ड चित्र द्वारा आंकड़ों को आकर्षक (दिलकश) बनाया जा सकता है।

प्रश्न 19.
एक चित्र में दो से अधिक चरों को प्रकट किया जाता है तो इसको बहुगुणी चित्र कहा जाता है।
उत्तर-
सही।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण के अर्थ बताएं।
उत्तर-
चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण का अर्थ-आंकड़ों को रोचक तथा सरल बनाने के लिए आंकड़ा शास्त्रियों ने विभिन्न विधियों का प्रयोग किया है। इनमें से एक विधि आंकड़ों का चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण होता है। आंकड़ों का चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण वह विधि होती है, जिसमें आंकड़ों को डण्डा चित्र (Bar Diagrams), आयत (Rectangels), चतुर्भुज (Squares), पाई चित्र (Pie Diagrams), तस्वीरें (Pictograms), मानचित्रण (Artograms) इत्यादि के रूप में पेश किया जाता है। चाहे वर्गीकरण तथा सूचीकरण से काफ़ी हद तक आंकड़ों में सरलता आ जाती है, परन्तु इन आंकड़ों को रोचक तथा मनमोहक बनाने के लिए चित्रों द्वारा प्रदर्शन आवश्यक होता है। इसको स्पष्ट करते हुए प्रो० एस० जे० मेरोनी ने ठीक कहा है, “ठण्डे आंकड़े बहुत-से लोगों को गैर-उत्साहजनक होते हैं। जटिल स्थितियों को सरल तथा नियमित रूप देने के लिए चित्र सहायक होते हैं।”

प्रश्न 2.
चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर-

  1. रोचक बनाना (Attractive)-चित्रों की सहायता से आंकड़ों को रोचक बनाया जा सकता है। हम जानते हैं कि साधारण मनुष्य आंकड़ों में रुचि नहीं लेते, इसलिए चित्र बनाकर उन मनुष्यों को आंकड़ों का ज्ञान दिया जा सकता है।
  2. तुलना में आसानी (Easy Comparison)-चित्र आंकड़ों की तुलना में बहुत सहायता करते हैं, जैसे कि किसी देश में जनसंख्या की वृद्धि की तुलना समय के आधार पर चित्रों द्वारा की जा सकती है। इसी तरह कीमतों की वृद्धि को सूचकांक के चित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण की कोई दो सीमाएं बताएं।
उत्तर-

  1. ग़लत व्याख्या (Wrong Interpretation)- चित्रों द्वारा तथ्यों की ठीक व्याख्या नहीं की जा सकती। यह तो आंकड़ों को प्रदशित करने का एक साधन मात्र होता है। कई बार चित्रों को देखकर पाठक गलत परिणाम निकाल लेते हैं।
  2. सीमित सूचना (Limited Information)-विशाल आंकड़ों को चित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तो वास्तविक सूचना प्रदान नहीं की जा सकती। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए थोड़ी सूचना प्रदान की जाती है। परिणामस्वरूप आंकड़ों को पेश करने का उद्देश्य समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 4.
चक्र अथवा पाई चित्र से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
चक्र अथवा पाई चित्र (Pie Diagram)-चित्र को गोलाकार रूप में भी स्पष्ट किया जाता है। इस स्थिति में एक गोल चक्कर का निर्माण करने के पश्चात् इसमें 36° कोणों का योग होता है। इसलिए प्रत्येक मूल्य को स्पष्ट करते समय इसका मूल्य 360° के अनुपात में प्राप्त किया जाता है तथा जब हमारे पास प्रत्येक मूल्य का योगदान डिग्री के रूप में प्राप्त हो जाता है तो उस अनुसार हम गोलाकार चित्र का निर्माण करते हैं।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण

प्रश्न 5.
चित्र लेख से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
चित्र लेख (Pictograph)-चित्र लेख वह विधि होती है, जिस द्वारा तस्वीरों को बनाकर आंकड़ों का प्रदर्शन करने का प्रयत्न किया जाता है। उदाहरणस्वरूप एक देश की जनसंख्या को 1951 तथा 1991 के समय का तुलनात्मक अध्ययन करना है तो इस स्थिति में देश X की जनसंख्या के आंकड़े इस प्रकार दिए गए हैं-
(Population of A Country) देश X की जनसंख्या
1951-4 करोड़
1991-7 करोड़
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III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
दण्ड चित्र को कितने भागों में विभाजित किया जा सकता है ? स्पष्ट करो। दण्ड चित्र के निर्माण को भी स्पष्ट करो।
उत्तर-
दण्ड अथवा डण्डा चित्र-दण्ड चित्र वह चित्र होता है, जिसमें आंकड़ों को डंडे (Bars) अथवा आयतों के रूप में स्पष्ट किया जाता है। दण्ड चित्र का निर्माण इस प्रकार किया जाता है-

  1. डण्डा शब्द का प्रयोग आयत के लिए किया जाता है। चित्र में डण्डों की चौड़ाई समान रखनी चाहिए।
  2. डण्डे लंब रूप में अथवा लेटवें रूप में हो सकते हैं।
  3. यह डण्डे समान दूरी पर बनाने चाहिए।
  4. डण्डे बनाने का आधार (Base) एक होना चाहिए।

दण्ड चित्र अथवा डण्डा चित्र के रूप-दण्ड चित्र को एक पक्षीय चित्र (One dimensional diagram) भी कहा जाता है। यह मुख्य तौर पर निम्नलिखित रूप में बनाए जा सकते हैं-

  1. सरल डण्डा चित्र-सरल डण्डा चित्र वह चित्र है, जिसमें संख्याओं को विभिन्न मूल्यों के डण्डों द्वारा प्रकट किया जाता है।
  2. बहुगुणी डण्डा चित्र-बहुगुणी डण्डा चित्र वह चित्र है, जिनमें दो या दो से अधिक गुणों को प्रकट किया जाता है।
  3. उपविभाजित डण्डा चित्र-उपविभाजित डण्डा चित्र वह चित्र होते हैं, जो किसी तथ्य के कुल मूल्य के साथ इसके भागों को भी पेश करते हैं।
  4. प्रतिशत डण्डा चित्र-प्रतिशत डण्डा चित्र वह चित्र होते हैं, जिसमें किसी तथ्य के विभिन्न मूल्यों को प्रतिशत के रूप में दिखाया जाता है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित आंकड़ों के आधार तथा सरल दण्ड चित्र का निर्माण करो। वर्ष

वर्ष 1951 1961 1971 1981 1991 2001
भारत की जनसंख्या (करोड़ों में) 36 43 54 68 84 102

उत्तर-
सरल दण्ड चित्र ऐसा चित्र होता है, जिसमें एक गुण की व्याख्या ही की जाती है, जैसे कि जनसंख्या उत्पादन बिक्री, लाभ इत्यादि गुण को दिखाया जाए तो ऐसे चित्र को सरल दण्ड चित्र कहा जाता है। उदाहरणस्वरूप भारत की जनसंख्या के आंकड़े इस प्रकार दिए गए हैं।
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इस चित्र को सरल अथवा साधारण दण्ड चित्र (Simple Bar Diagram) कहा जाता है। इसको लंबवत डण्डा चित्र (Vertical Bar Diagram) भी कहते हैं।

प्रश्न 3.
बहुगुणी डण्डा चित्र से क्या अभिप्राय है ? निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से बहुगुणी डण्डा चित्र का निर्माण करो।
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उत्तर-
बहुगुणी डण्डा चित्र (Multiple Bar Diagram)-बहुगुणी डण्डा चित्र वह चित्र होते हैं जो दो अथवा दो से अधिक तथ्यों के आंकड़ों को पेश करते हैं, इनका प्रयोग विभिन्न तथ्यों जैसे कि जन्म दर, मृत्यु दर, आयात-निर्यात, लाभ-हानि, कॉलेज में आर्ट्स, साईंस पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या के रूप में पेश की जाती हैं। एक कालेज में आर्ट्स तथा साईंस के धिार्थियों का विवरण इस प्रकार दिया गया है-
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PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण

प्रश्न 4.
निम्नलिखित राष्ट्रीय आय में विभिन्न क्षेत्रों का भाग दिखाया गया है। गोल चक्करी तथा पाई रेखा चित्र बनाओ। क्षेत्र
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हल : राष्ट्रीय आय के आंकड़े प्रतिशत में दिए गए हैं। इनको 360° में परिवर्तित करके पाई चित्र बनाया जाएगा।
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IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण से क्या अभिप्राय है ? इसके लाभ तथा सीमाएं बताओ।
(What is the meaning of Diagrammatic Presentation ? Discuss its Advantages and limitations.)
उत्तर-
चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण का अर्थ-आंकड़ों को रोचक तथा सरल बनाने के लिए आंकड़ा शास्त्रियों ने विभिन्न विधियों का प्रयोग किया है। इनमें से एक विधि आंकड़ों का चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण होता है। आंकड़ों का चित्रों द्वारा प्रस्तुतीकरण वह विधि होती है, जिसमें आंकड़ों को डण्डा चित्र (Bar Diagrams), आयत (Rectangles), चतुर्भुज (Squares), पाई चित्र (Pie Diagrams), तस्वीरें (Pictograms), मानचित्रण (Artograms) इत्यादि के रूप में पेश किया जाता है। चाहे वर्गीकरण तथा सूचीकरण से काफ़ी हद तक आंकड़ों में सरलता आ जाती है, परन्तु इन आंकड़ों को रोचक तथा मनमोहक बनाने के लिए चित्रों द्वारा प्रदर्शन आवश्यक होता है। इसको स्पष्ट करते हुए प्रो० एस० जे० मोरोनी ने ठीक कहा है, “ठण्डे आंकड़े बहुत-से लोगों को गैर-उत्साहजनक होते हैं। जटिल स्थितियों को सरल तथा नियमित रूप देने के लिए चित्र सहायक होते हैं।”

चित्रों के लाभ अथवा महत्त्व (Importance or Advantages of Diagrams) चित्रों द्वारा आंकड़ों को प्रदर्शित करने के बहुत-से लाभ होते हैं, जिनकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है-

  1. सरल तथा समझने योग्य बनाना (Simple and Understandable)-आंकड़ों को सरल तथा समझने योग्य बनाने के लिए चित्र महत्त्वपूर्ण योगदान डालते हैं।
  2. रोचक बनाना (Attractive)-चित्रों की सहायता से आंकड़ों को रोचक बनाया जा सकता है। हम जानते हैं कि साधारण मनुष्य आंकड़ों में रुचि नहीं लेते, इसलिए चित्र बनाकर उन मनुष्यों को आंकड़ों का ज्ञान दिया जा सकता है।
  3. तुलना में आसानी (Easy Comparison)-चित्र आंकड़ों की तुलना में बहुत सहायता करते हैं, जैसे कि किसी देश में जनसंख्या की वृद्धि की तुलना समय के आधार पर चित्रों द्वारा की जा सकती है। इसी तरह कीमतों की वृद्धि को सूचकांक के चित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
  4. विश्लेषण में आसानी (Easy Interpretation) चित्रों की सहायता से जो परिणाम निकाले जाते हैं, उनके सम्बन्धी जानकारी आसानी से प्राप्त हो जाती है, जैसे कि जनसंख्या में वृद्धि को चित्र द्वारा स्पष्ट किया जाए तो आसानी से पता चल जाता है कि स्वतन्त्रता के पश्चात् अब तक जनसंख्या लगभग तीन गुणा बढ़ गई है।
  5. याद करने में आसानी (Easy Memorizing) चित्रों द्वारा तथ्यों को याद करना आसान होता है। आंकड़ों के रूप में इनको लम्बे समय तक याद रखने में मुश्किल का सामना करना पड़ता है। चित्र के रूप में देखे गए आंकड़े जल्दी याद हो जाते हैं।
  6. किफायती (Economical)-चित्रों द्वारा समय तथा परिश्रम बहुत कम लगता है। इस विधि द्वारा कम स्थान पर बहुत ज्यादा सूचना कम समय में प्रदान की जा सकती है, जैसे कि एक डॉक्टर मरीज की हालत को चारट देख कर जल्दी दवाई दे देता है।
  7. संक्षेप रूप देना (Condensation)-चित्रों द्वारा आंकड़ों को संक्षेप रूप दिया जाता है। इसलिए पुरानी कहावत ठीक है कि तस्वीर हज़ारों शब्दों के बराबर होती है। (A Picture is Worth thousands of Words.)

चित्रों की सीमाएं (Limitations of Diagrams) –
चित्रों द्वारा आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण की मुख्य सीमाएं निम्नलिखित अनुसार हैं-

  1. गलत व्याख्या (Wrong Interpretation) चित्रों द्वारा तथ्यों की ठीक व्याख्या नहीं की जा सकती। यह तो आंकड़ों को प्रदर्शन करने का एक साधन मात्र होता है। कई बार चित्रों को देखकर पाठक गलत परिणाम निकाल लेते हैं।
  2. सीमित सूचना (Limited Information)-विशाल आंकड़ों को चित्रों द्वारा प्रदर्शन किया जाता है तो वास्तविक सूचना प्रदान नहीं की जा सकती। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए थोड़ी सूचना प्रदान की जाती है। परिणामस्वरूप आंकड़ों को पेश करने का उद्देश्य समाप्त हो जाता है।
  3. अनुमानित मूल्य (Approximate Value)-चित्रों द्वारा आंकड़ों के पूरे मूल्य नहीं दिखाए जा सकते, बल्कि अनुमानित मूल्यों को ही स्पष्ट किया जाता है। इसलिए आंकड़ों को पूर्ण रूप में स्पष्ट करना मुश्किल हो जाता है।
  4. दुरुपयोग (Misuse)-चित्रों द्वारा आंकड़ों को उद्देश्य अनुसार तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है। इसलिए इश्तिहारबाज़ी में इनके भिन्न अर्थ प्रकट किए जाते हैं तथा ग्राहकों को कम उपयोगी वस्तुएं खरीदने के लिए प्रेरणा दी जा सकती है।

प्रश्न 2.
चित्र कितने प्रकार के होते हैं ? इन प्रकारों को स्पष्ट करें। (What are the types of diagrams ? Explain the meanings of the types of diagrams.)
उत्तर-
चित्रों को मुख्य तौर पर पांच भागों में विभाजित कर स्पष्ट किया जाता है। इसलिए चित्रों की 5 किस्में होती हैं, जिनको हम निम्नलिखित खाके की सहायता से स्पष्ट करते हैं-
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1. दण्ड चित्र (Bar Diagrams)-रेखाचित्रों को दण्ड चित्र अथवा डण्डा चित्र (Bar Diagrams) के रूप में प्रकट किया जा सकता है। आंकड़ों को पेश करने के लिए चित्रों की यह किस्म बहुत अधिक प्रयोग की जाती है। इस उद्देश्य के लिए सीधी रेखाओं जिनको साधारण डण्डा चित्र (Simple Bar Diagrams) अथवा बहु-डण्डा चित्र (Multiple Bar Diagrams) इत्यादि के रूप में प्रकट किया जाता है। जब हम चित्र के एक ओर अर्थात् ऊपर, नीचे, दाएं अथवा बाईं ओर डण्डे बनाते हैं तो इसको एक पक्षीय (One Dimensional) चित्र कहा जाता है। इसको दण्ड चित्र 4 द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
उदाहरण-
निम्नलिखित सारणी को डण्डा चित्र की सहायता से स्पष्ट करो।
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2. आयत चित्र (Rectangular Diagram)-चित्रों को स्पष्ट करने के लिए आयत (Rectangle) तथा वर्ग (Square) का प्रयोग भी किया जाता है। जब हम दो विस्तार वाले चित्रों में चित्र की लम्बाई तथा चौड़ाई दोनों को ही महत्त्व देना चाहते हैं तो ऐसे चित्रों को विस्तार (Two Dimensional) वाले चित्र कहा जाता है। ऐसे चित्रों में चित्रों का क्षेत्रफल महत्त्वपूर्ण होता है जोकि लम्बाई तथा चौड़ाई को गुणा करके प्राप्त किया जाता है। इसलिए आयताकार तथा वर्गाकार चित्रों को छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर बहुत-से तथ्यों की भी व्याख्या की जा सकती है। उदाहरणस्वरूप दो फ़र्मों के व्यय तथा लाभ की जानकारी इस प्रकार दी गई है। इसको आयत चित्र द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है – उदाहरण-फ़र्म A तथा फ़र्म B के व्यय पर लाभ का विवरण निम्नलिखित अनुसार है –
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण 12
इस प्रकार आयताकार चित्र फ़र्म A तथा B फ़र्म के व्यय, आय, लाभ इत्यादि की जानकारी प्रदान करते हैं।

3. चक्र अथवा पाई चित्र (Pie Diagram)-चित्र को गोलाकार रूप में भी स्पष्ट किया जाता है। इस स्थिति में एक गोल चक्कर का निर्माण करने के पश्चात् इसमें 36° कोणों का योग होता है। इसलिए प्रत्येक मूल्य को स्पष्ट करते समय इसका मूल्य 360° के अनुपात में प्राप्त किया जाता है तथा जब हमारे पास प्रत्येक मूल्य का योगदान डिग्री के रूप में प्राप्त हो जाता है तो उस अनुसार हम गोलाकार चित्र का निर्माण करते हैं। इस विधि को डॉक्टर ऊटा न्यूरैथ ने विकसित किया था। उदाहरणस्वरूप एक देश में राष्ट्रीय आय कुल आय का 50% भाग खेती में, 30% भाग उद्योगों में, 10% भाग सेवाओं तथा 10% भाग सबसे प्राप्त किया जाता है। इस स्थिति में विभिन्न क्षेत्रों को ध्यान में रखकर गोलाकार की कोणों का निर्माण निम्नलिखित अनुसार किया जाता है-

राष्ट्रीय आय में ………………………… |
कृषि में योगदान = \(\frac{50}{100}\) x 360° = 180°
उद्योगों में योगदान = \(\frac{30}{100}\) x 360° = 108°
सेवाओं में योगदान = \(\frac{10}{100}\) x 360 = 36°
शेष क्षेत्रों में योगदान = \(\frac{10}{100}\) x 360° = 36°
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण 13
विभिन्न क्षेत्रों के योगदान को डिग्रियों में पता करके गोल आकार चित्र (Pie Diagram) का निर्माण किया जाता

4. चित्र लेख (Pictograph)-चित्र लेख वह विधि होती है, जिस द्वारा तस्वीरों को बनाकर आंकड़ों का प्रदर्शन करने का प्रयत्न किया जाता है। उदाहरणस्वरूप एक देश की जनसंख्या को 1951 तथा 1991 के समय का तुलनात्मक अध्ययन करना है तो इस स्थिति में देश X की जनसंख्या के आंकड़े इस प्रकार दिए गए हैं-
(Population of A Country) देश X की जनसंख्या
1951-4 करोड़
1991-7 करोड़
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण 14
टिप्पणी = एक करोड़ इस प्रकार मनुष्यों, कारों अथवा उत्पादित वस्तुओं के चित्र बनाकर व्याख्या की जा सकती है।
5. मानचित्र (Cartrograph)-मानचित्र की विधि में विभिन्न देश के नक्शों में उन देशों में प्राप्त होने वाली वस्तुएं सम्बन्धी आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं। जब हमें तथ्यों को भौगोलिक आधार पर दिखाना हो तो मानचित्रों (Maps or Cartographes) का प्रयोग किया जाता है। उदाहरणस्वरूप भारत में प्रमुख नगरों दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता तथा चेन्नई के अधिकतम तथा न्यूनतम तापमान का विवरण देना हो तो भारत के नक्शे में इन स्थानों के नाम लिखकर न्यूनतम तथा अधिकतम तापमान का विवरण दिया जा सकता है। इस विधि को मानचित्र विधि कहा जाता है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 19 बिन्दु रेखीय प्रस्तुतीकरण

मानचित्र अनुसार दिल्ली का अधिकतम तापमान 40° तथा न्यूनतम 25° है।
कोलकाता का अधिक तापमान 30° तथा न्यूनतम 20° है।
मुम्बई का अधिकतम तापमान 30° तथा न्यूनतम 20°
चेन्नई का अधिकतम तापमान 35° तथा न्यूनतम 25°
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PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 14 सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व

Punjab State Board PSEB 11th Class Economics Book Solutions Chapter 14 सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Economics Chapter 14 सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व

PSEB 11th Class Economics सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
संख्यात्मक विश्लेषण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
संख्यात्मक विश्लेषण से तात्पर्य, किसी तथ्य के विभिन्न पहलुओं का संख्याओं के आधार पर विश्लेषण करना होता है। अर्थात् संख्यात्मक विश्लेषण वह क्रिया है, जिसमें ‘अंकों का विज्ञान’ प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 2.
सांख्यिकी की बहुवचन अथवा समंक के रूप में एक परिभाषा दीजिए।
उत्तर-
समंकों से हमारा अभिप्राय उन संख्यात्मक तत्त्वों से है, जो पर्याप्त सीमा तक अनेक प्रकार के कारणों से प्रभावित होते हैं।

प्रश्न 3.
सांख्यिकी की एकवचन अथवा विज्ञान के रूप में परिभाषा दीजिए।
उत्तर-
एकवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ सांख्यिकी विधियां अथवा सांख्यिकी विज्ञान से है।

प्रश्न 4.
सांख्यिकी विधियों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
सांख्यिकी विधियों से हमारा अभिप्राय उन विधियों से है जो अनेक कारणों से प्रभावित संख्यात्मक आंकड़ों की व्याख्या करने के लिए विशेष रूप से उपयोगी होती हैं।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 14 सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व

प्रश्न 5.
सांख्यिकी की एक सीमा लिखिए।
उत्तर-
सांख्यिकी केवल ऐसे तथ्यों का अध्ययन करती है जिन्हें संख्याओं के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
सांख्यिकी के किसी एक कार्य का वर्णन करें।
उत्तर-
सांख्यिकी का एक महत्त्वपूर्ण कार्य इस प्रकार हैतथ्यों की तुलना-सांख्यिकी का एक काम अलग-अलग तथ्यों में तुलना करना भी होता है।

प्रश्न 7.
सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट करने के लिए कोई एक मत दें।
उत्तर-
अर्थशास्त्र के लिए महत्त्व-सांख्यिकी अर्थशास्त्र का आधार है। आर्थिक समस्याओं को सुलझाने के लिए सांख्यिकी की सहायता ली जाती है।

प्रश्न 8.
“सांख्यिकी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।” इस मत की पुष्टि करें।
उत्तर-
डिजराइली ने कहा है, “झूठ तीन प्रकार के होते हैं झूठ, सफेद झूठ और सांख्यिकी।” इसलिए कुछ लोग यह कहते हैं कि सांख्यिकी झूठे होते हैं।

प्रश्न 9.
सांख्यिकी वह विधि है जो समंकों का संकलन, वर्गीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण व निर्वचन से सम्बन्धित है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 10.
सांख्यिकी का महत्त्व …………….. क्षेत्रों में होता है।
(a) अर्थशास्त्र
(b) आर्थिक नियोजन
(c) बैंकिंग
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(d) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 11.
सांख्यिकी को क्राकस्टन और काउडेन ने सांख्यिकी ………. कहा है।
उत्तर-
विधियां।

प्रश्न 12.
बहुवचन के रूप में सांख्यिकी की सब से अच्छी परिभाषा ………….. ने दी।
(a) एचनबाल
(b) बाउले
(c) होरेस सीक्रिस्ट
(d) क्राकस्टन और काउडेन।
उत्तर-
(c) होरेस सीक्रिस्ट।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 14 सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व

प्रश्न 13.
भारत की जनसंख्या 1951 में 36 करोड़ थी जोकि 2011 में 121 करोड़ हो गई है। इसको सांख्यिकी कहते हैं।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 14.
सांख्यिकी विज्ञान भी है और कला भी है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 15.
समंकों के संग्रहकरण, प्रस्तुतिकरण, विश्लेषण तथा विवेचन को वर्णात्मक सांख्यिकी कहा जाता
उत्तर-
सही।

प्रश्न 16.
सांख्यिकी में समूचे समूह को ब्रह्मांड कहा जाता है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 17.
सांख्यिकी में औसतों का अध्ययन किया जाता है जिसके कारण इनका दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।
उत्तर-
ग़लत।

प्रश्न 18.
सांख्यिकी का अर्थशास्त्र में प्रयोग नहीं किया जाता बल्कि अर्थशास्त्र सांख्यिकी के लिए लाभदायक
उत्तर-
ग़लत।

प्रश्न 19.
सांख्यिकी आर्थिक नियोजन का ………….. है।
उत्तर-
आधार।

प्रश्न 20.
सांख्यिकी में गुणात्मक आंकड़ों को प्रकट किया जाता है।
उत्तर-
ग़लत।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सांख्यिकी क्या है?
उत्तर-
आक्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार, “सांख्यिकी शब्द के दो अर्थ हैं।”

  1. बहुवचन के रूप में व्यवस्थित विधि द्वारा एकत्रित किए गए संख्यात्मक तथ्य जैसे कि जनसंख्या सम्बन्धी एकत्र किए गए आंकड़े।
  2. एकवचन के रूप में सांख्यिकी विधियां अर्थात् आंकड़ों को एकत्रित करने, उनके वर्गीकरण तथा प्रयोग करने सम्बन्धी विज्ञान।” इस प्रकार सांख्यिकी में उन विधियों का अध्ययन किया जाता है, जिन द्वारा आंकड़ों को एकत्रित करने, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा व्याख्या करने की समस्याओं का हल किया जाता है।

प्रश्न 2.
सांख्यिकी की एकवचन के रूप में परिभाषा दो।
अथवा
सांख्यिकी की उचित परिभाषा दो।
उत्तर-
प्रो० क्राक्स्टन तथा काउडेन के अनुसार, “सांख्यिकी को संख्यात्मक आंकड़ों का संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा व्याख्या से सम्बन्धित विज्ञान कहा जाता है।” सांख्यिकी उन विधियों से सम्बन्धित है, जिन द्वारा आंकड़ों को एकत्र करके, इनकी व्यवस्था की जाती है। आंकड़ों का विश्लेषण करके परिणाम प्राप्त किए जाते हैं।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 14 सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व

प्रश्न 3.
“सांख्यिकी विज्ञान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक विधि है,” स्पष्ट करो।
अथवा
सांख्यिकी के औज़ारों को स्पष्ट करें।
उत्तर-
प्रो० क्राक्स्टन तथा काउडेन ने कहा है कि सांख्यिकी विज्ञान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक विधियां हैं। इसमें वैज्ञानिक विधियों का अध्ययन किया जाता है। जैसे कि समंकों का संग्रहकरण (Collection), व्यवस्थीकरण (Organization), प्रस्तुतीकरण (Presentation), विश्लेषण (Analysis) तथा व्याख्या (Interpretation)। इन विधियों की सहायता से व्यावहारिक समस्याओं को आंकड़ों से हल किया जाता है। इनको सांख्यिकी औज़ार भी कहा जाता है।

प्रश्न 4.
सांख्यिकी की विषय सामग्री को स्पष्ट करें।
अथवा
वर्णात्मक सांख्यिकी तथा आगमन सांख्यिकी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
सांख्यिकी की विषय सामग्री को दो भागों में विभाजित किया जाता है-

  1. वर्णात्मक सांख्यिकी-वर्णात्मक सांख्यिकी से अभिप्राय उन विधियों से होता है, जो समंकों को एकत्र करने तथा विश्लेषण करके व्याख्या करने से होता है। इसमें केन्द्रीय प्रवृत्तियों का माप, अपकिरण, सहसम्बन्ध इत्यादि विधियां शामिल होती हैं।
  2. आगमन सांख्यिकी-आगमन सांख्यिकी का अर्थ एक समुच्चय में से सैंपल लेकर निष्कर्ष निकाले जाते हैं, जिनको सभी समुच्चयों पर लागू किया जाता है। इसको आगमन सांख्यिकी कहा जाता है।

प्रश्न 5.
एक तालिका द्वारा सांख्यिकी अध्ययन के चरण तथा उनसे सम्बन्धित उपकरण बताओ।
उत्तर –

चरण सांख्यिकी अध्ययन सांख्यिकी उपकरण
प्रथम चरण आंकड़ों का संकलन निर्देशन तथा संगणना विधि
द्वितीय चरण आंकड़ों का व्यवस्थीकरण
तीसरा चरण आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण तालिका, ग्राफ तथा रेखाचित्र
चौथा चरण आंकड़ों का विश्लेषण केन्द्रीय प्रवृत्तियों, सहसम्बन्ध सूचकांक के
पांचवां चरण आंकड़ों की व्याख्या सांख्यिकी विधियों का परिणाम तथा आंकड़ों के सम्बन्धों की व्याख्या

प्रश्न 6.
सिद्ध कीजिए कि सांख्यिकी आंकड़े होते हैं, परन्तु सभी आंकड़े सांख्यिकी नहीं।
उत्तर-
सांख्यिकी का सम्बन्ध आंकड़ों से होता है, परन्तु सभी आंकड़े सांख्यिकी नहीं, जैसे कि भारत की जनसंख्या 1951 में 36 करोड़ थी। यह सांख्यिकी नहीं। आंकड़ों के समुच्चय को सांख्यिकी कहा जाता है, जैसे कि भारत की जनसंख्या 1951 में 36 करोड़ थी, जोकि 2001 में बढ़कर 102.7 करोड़ हो गई है। इसको सांख्यिकी कहा जाएगा। क्योंकि इसमें आंकड़ों का समूह दिया गया है।

प्रश्न 7.
सांख्यिकी के दो महत्त्वपूर्ण कार्य बताओ।
उत्तर-
सांख्यिकी के दो महत्त्वपूर्ण कार्य हैं

  • तथ्यों में तुलना करना जैसे दो देशों में रहने वाले लोगों का जीवन स्तर, उन देशों की प्रति व्यक्ति आय की तुलना से लगाया जाता है।
  • तथ्यों में सम्बन्ध स्थापित करना, जैसे कि वस्तु की कीमत तथा उस वस्तु की मांग का विपरीत सम्बन्ध होता है, परन्तु दूसरी बातें समान रहती हैं।

प्रश्न 8.
सांख्यिकी के अविश्वास के कारण बताओ।
उत्तर-
सांख्यिकी के अविश्वास के मुख्य कारण इस प्रकार हैं –

  1. समंकों को पूर्व निर्धारक परिणामों अनुसार परिवर्तित किया जा सकता है।
  2. एक समस्या के लिए विभिन्न प्रकार के आंकड़े एकत्रित किए जा सकते हैं।
  3. उचित आंकड़ों को गलत ढंग से पेश करके लोगों को भ्रमित किया जा सकता है।
  4. जब समंक अधूरे एकत्रित किए जाते हैं तो गलत परिणाम प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 9.
“सांख्यिकी अपने आप कुछ सिद्ध नहीं करती। इसका प्रयोगी इसका गलत प्रयोग करता है।” स्पष्ट करो।
उत्तर –
सांख्यिकी के समंक अपने आप कुछ भी सिद्ध नहीं करते, बल्कि समंकों से इनको प्रयोग करने वाला कुछ भी सिद्ध कर सकता है। समंकों को एकत्र करने के लिए सांख्यिकी माहिर होते हैं। यदि वह एक शहर में औसत आय का माप करते समय 200 अमीर परिवारों के आंकड़े एकत्रित करके औसत आय निकालते हैं तो यह परिणाम उस शहर की ठीक आर्थिक स्थिति को ब्यान नहीं करेगा।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 14 सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व

प्रश्न 10.
आर्थिक सन्तुलन में सांख्यिकी का क्या महत्त्व है? .
उत्तर-
सन्तुलन का अभिप्राय उस स्थिति से होता है, जिस स्थिति को प्राप्त करके कोई मनुष्य उसको छोड़ना नहीं चाहता। एक उत्पादक वस्तु की कीमत निर्धारण करना चाहता है तो वस्तु की मांग तथा वस्तु की पूर्ति जहां समान होती है, उस जगह पर सन्तुलन स्थापित होगा तथा कीमत निश्चित की जाएगी। इस उद्देश्य के लिए मांग तथा पूर्ति के आंकड़े लाभदायक होते हैं।

प्रश्न 11.
समाज सुधारकों के लिए सांख्यिकी का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
सांख्यिकी को सामाजिक समस्याओं के लिए भी प्रयोग किया जाता है। एक समाज सुधारक के लिए सामाजिक बुराइयां जैसे कि दहेज प्रथा, जुआ, शराबखोरी इत्यादि से सम्बन्धित आंकड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं। इनकी जानकारी प्राप्त करने के पश्चात् वह इन बुराइयों का हल करने के लिए सुझाव देता है। इसलिए आंकड़ों की जानकारी महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रश्न 12.
सांख्यिकी का व्यापार में क्या महत्त्व है?
उत्तर-
एक अच्छा व्यापारी बाज़ार की पूर्ण जानकारी प्राप्त करके उत्पादन सम्बन्धी निर्णय लेता है। देश में वस्तु की कितनी मांग होगी तथा उस वस्तु की पूर्ति के लिए देश में कच्चा माल, श्रमिक, पूंजी इत्यादि सम्बन्धी आंकड़े प्राप्त करके व्यापारी अच्छे ढंग से उत्पादन कर सकता है। बोडिंगटन अनुसार, “एक अच्छा व्यापारी वह है जोकि शुद्धता के अनुकूल ही अनुमान लगा सकता है।”

प्रश्न 13.
सांख्यिकी विधियां साधारण बुद्धि का स्थानापन्न नहीं होती?
उत्तर-
सांख्यिकी विधियां साधारण बुद्धि से प्रयोग करनी चाहिए, परन्तु ये साधारण बुद्धि का स्थानापन्न नहीं होती। सांख्यिकी विधियां बहुत-सी मान्यताओं पर आधारित होती हैं। इसलिए जो परिणाम सांख्यिकी द्वारा प्राप्त किए जाते हैं, उनको आंकड़ों के एकत्रित करने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर देखना चाहिए, जैसे कि एक शहर में अस्पतालों की संख्या अधिक हो सकती है तथा उस शहर में मृतकों की संख्या भी अधिक हो सकती है, परन्तु यह परिणाम प्रत्येक स्थान पर उचित लागू नहीं होगा। इसलिए सांख्यिकी परिणाम गलत भी हो सकते हैं। इसलिए इनका प्रयोग बिना सोचेसमझे नहीं किया जाना चाहिए अर्थात् हमें अपनी बुद्धि का प्रयोग किए बिना सांख्यिकी विधियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 14.
आंकड़ों को एकत्रित करते समय किस प्रकार की त्रुटियों की सम्भावना हो सकती है?
उत्तर-
आंकड़ों का एकत्रीकरण, व्यवस्थीकरण, वर्गीकरण तथा विश्लेषण करते समय कई तरह की त्रुटियां हो सकती हैं, जैसे कि-

  • मापने सम्बन्धी त्रुटियां
  • प्रश्नावली में दोष होने सम्बन्धी त्रुटियां
  • आंकड़ों को लिखते समय त्रुटियां
  • गणना करने वाले द्वारा पक्षपात की त्रुटियां, इत्यादि।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
प्रो० होरेस सीक्रिस्ट की परिभाषा लिखें।
उत्तर-
समंकों से हमारा आशय तथ्यों के समूह से है जोकि एक पर्याप्त सीमा तक अनेक कारणों से प्रभावित होते हैं जिनको अंकों में व्यक्त किया जाता है, जोकि गणना किए जाते हैं अथवा शुद्धता के स्तर के आधार पर अनुमानित किए जाते हैं, जिनको पूर्व निश्चित उद्देश्य के लिए एक व्यवस्थित ढंग से एकत्रित किया जाता है तथा उन्हें एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करके रखा जाता है।

प्रश्न 2.
सांख्यिकी की एक उचित परिभाषा दें।
उत्तर-
सांख्यिकी की उपयुक्त परिभाषा-अर्थशास्त्र की भान्ति सांख्यिकी की परिभाषा में भी कितना मतभेद है। यह उपयुक्त विभिन्न परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है तथा दिन-प्रतिदिन विकसित होता गया है। फिर भी इन सभी परिभाषाओं के विवेचन से कुछ मूल तत्त्व प्रकट होते हैं जिनका एक उपयुक्त परिभाषा में समावेश करना आवश्यक है-

  1. सांख्यिकी की प्रकृति-इसमें यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह कला और विज्ञान दोनों हैं।
  2. विषय सामग्री-सांख्यिकी में समंकों का अध्ययन होता है अर्थात् ऐसे सामूहिक तथ्यों को जिनको संख्याओं में व्यक्त किया जा सकता है और जिन पर विविध कारणों का प्रभाव पड़ता है।
  3. उद्देश्य-सांख्यिकी में निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति का पर्याप्त रूप में अध्ययन होता है।
  4. सांख्यिकीय रीतियां-परिभाषा में सांख्यिकीय रीतियां-जैसे संग्रहण, वर्गीकरण, सारणीयन, प्रस्तुतीकरण, सम्बन्ध स्थापन, निर्वचन और पूर्वानुमान-का समावेश होना आवश्यक है।

इन्हें संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण और निर्वचन चार प्रमुख भागों में बांटा जा सकता है। सांख्यिकी की एक उपयुक्त परिभाषा निम्न हो सकती है- “सांख्यिकी एक विज्ञान और एक कला है जो सामाजिक, आर्थिक, प्राकृतिक व अन्य समस्याओं से सम्बन्धित समंकों के संग्रहण, वर्गीकरण, सारणीयन, प्रस्तुतीकरण, सम्बन्ध-स्थापन, निर्वचन और पूर्वानुमान से सम्बन्ध रखती है ताकि निर्धारित उद्देश्य की पर्ति हो सके।”

प्रश्न 3.
“सांख्यिकी विज्ञान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक विधि है।” समीक्षा करें।
उत्तर-
सांख्यिकी एक वैज्ञानिक विधि है। कुछ विद्वान् सांख्यिकी को विज्ञान नहीं बल्कि वैज्ञानिक विधि स्वीकार करते हैं। क्रॉक्सटन एवं काउडन ने भी इसी प्रकार का मत प्रकट किया है कि सांख्यिकी विज्ञान नहीं, वैज्ञानिक विधि है। उनके अनुसार सांख्यिकी स्वयं लक्ष्य नहीं, लक्ष्य प्राप्त करने का एक रास्ता है। वह साध्य नहीं, साधन है, परन्तु वैज्ञानिक विधि का अर्थ यह नहीं है कि सांख्यिकी विज्ञान नहीं है, सांख्यिकी विज्ञान है और इतना महत्त्वपूर्ण विज्ञान है कि यह अन्य विज्ञानों का आधार बन गई है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 14 सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व

प्रश्न 4.
सांख्यिकी की तीन सीमाएं लिखें।
उत्तर-
1. सांख्यिकी संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करता है, गुणात्मक तंथ्यों का नहीं-सांख्यिकी में केवल संख्यात्मक तथ्यों का ही अध्ययन सम्भव है और जिन तथ्यों का संख्यात्मक माप सम्भव नहीं होता, उनका अध्ययन सांख्यिकी में नहीं किया जाता, जैसे सभ्यता, दरिद्रता, ईमानदारी आदि गुणात्मक तथ्यों का अध्ययन सांख्यिकी में सम्भव नहीं है। इसके विपरीत कुछ तथ्य और समस्याएं ऐसी भी होती हैं जिनका संख्यात्मक वर्णन ही सम्भव नहीं होता और उनके गुणात्मक स्वरूप का ही अध्ययन करता है जैसे चरित्र, सुन्दरता, व्यवहार, बौद्धिक स्तर आदि। ऐसे विषय सांख्यिकी के क्षेत्र से बाहर रहते हैं, परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से इनका अध्ययन सम्भव बनाया जा सकता है।

2. सांख्यिकी तथ्यों में सजातीयता व समानता होनी चाहिए-समंकों के पारस्परिक तुलनात्मक अध्ययन हेतु यह आवश्यक है कि समंकों में सजातीयता व समानता हो। यदि समंकों में एकरूपता का अभाव है जो निष्कर्ष भ्रमात्मक होंगे जैसे चलने में मुद्रा की मात्रा एवं परीक्षाफल से सम्बन्धित समंकों के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि दोनों प्रकार के समंक सजातीय नहीं और इन पर आधारित निष्कर्ष भी गलत व भ्रमात्मक होंगे।

3. सांख्यिकी केवल साधन प्रस्तुत करती है, समाधान नहीं-सांख्यिकी का कार्य समंकों को संकलित करना है, उनमें निष्कर्ष निकालना नहीं है। सांख्यिकी का कार्य तो पक्षपात रहित ढंग से संकलित करके उन्हें प्रदर्शित करना है जिससे आंकड़ों का दुरुपयोग न हो सके और सही निष्कर्ष निकाले जा सकें। अत: सांख्यिकी साधन प्रस्तुत करती है, उसके समाधान के सम्बन्ध में कुछ नहीं बताती।

प्रश्न 5.
सांख्यिकी के उद्देश्य लिखें।
उत्तर-

  1. अनुसन्धान क्षेत्र में सांख्यिकी विधियों का प्रयोग करना।
  2. विभिन्न समस्याओं का विवेचनात्मक अध्ययन करना।
  3. प्राप्त सामग्री से महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकालना एवं पूर्वानुमान लगाना।
  4. भूतकालीन एवं वर्तमान समंकों को संकलित करके उन्हें काल श्रेणी के रूप में प्रस्तुत करना।
  5. प्राप्त समंकों को इस प्रकार रखना कि वे तुलना के योग्य हों।
  6. परिवर्तनों के कारणों एवं परिणामों का मूल्यांकन करना।

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सांख्यिकी से क्या अभिप्राय है? बहुवचन में सांख्यिकी की परिभाषा को स्पष्ट करो। (What is Statistics ? Explain the Definition of Statistics in the plural sense.) (T.B.Q.1)
उत्तर-
सांख्यिकी की बहुवचन के रूप में परिभाषा (Definition of statistics in plural sense)सांख्यिकी के पिता जर्मन के अर्थशास्त्री ऐचन वाल (Achen Wall) को माना जाता है। उन्होंने कहा था, “आंकड़ा शास्त्र राज्य से संबंध रखने वाले महत्त्वपूर्ण तथ्यों का संग्रह होता है, जोकि ऐतिहासिक तथा व्यावहारिक होते हैं।” इस तरह आंकड़ों से सम्बन्धित परिभाषाएं दी गईं। इस रूप में प्रो० होरेस सीकरिस्ट ने आंकड़ा शास्त्र की उचित परिभाषा दी। उनके शब्दों में, आंकड़ा शास्त्र से हमारा अभिप्राय तथ्यों के समुच्चय से होता है, जोकि बहुत-से कारणों से प्रभावित होता है, जिनको संख्या के रूप में दिखाया जाता है। एक उचित मात्रा की शुद्धता अनुसार संख्या अथवा अनुमानित ढंग से एकत्रित किया जाता है, जोकि पूर्व निर्धारण उद्देश्य के लिए एकत्रित किए जाते हैं तथा एक-दूसरे से सम्बन्धित रूप में पेश किए जाते हैं।

सांख्यिकी की मुख्य विशेषताएं (Main Characteristics of Statistics)-
बहुवचन के रूप में सांख्यिकी की विशेषताओं को होरेस सीकरिस्ट की परिभाषा को ध्यान में रखकर इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन किया जा सकता है-
1. सांख्यिकी तथ्यों का समुच्चय है-सीकरिस्ट की परिभाषा में यह स्पष्ट किया गया है कि सांख्यिकी से अभिप्राय तथ्यों के समुच्चय से होता है। जब हम यह कहते हैं कि भारत की जनसंख्या 1951 में 36 करोड़ थी तो इससे कोई परिणाम प्राप्त नहीं होता। परन्तु जब भारत की जनसंख्या की वृद्धि को स्पष्ट किया जाता है जोकि प्रत्येक दस वर्षों पश्चात् 36 करोड़, 43 करोड़, 54 करोड़, 68 करोड़, 84 करोड़ तथा 102.7 करोड़ हो गई है। इस सूचना से हम यह परिणाम निकालते हैं कि 1951-2001 तक 50 वर्षों में भारत की जनसंख्या लगभग तीन गुणा बढ़ गई है।

2. सांख्यिकी के आंकड़े अनेकों कारणों से प्रभावित होते हैं-सांख्यिकी की दूसरी विशेषता है कि तथ्यों को प्रभावित करने वाले अनेक कारण होते हैं। जैसे कि किसी क्षेत्र में गेहूँ की पैदावार अधिक होने के बहुत-से कारण होते हैं, जैसे कि भूमि की उपजाऊ शक्ति, सिंचाई की सुविधाएं, कृषि करने के आधुनिक ढंग, लोगों का मेहनती होना इत्यादि।

3. सांख्यिकी को संख्याओं में दर्शाया जाता है-सांख्यिकी में हम समस्याओं को संख्याओं के रूप में स्पष्ट करते हैं। गुणात्मक तत्त्वों जैसे कि अमीर-गरीब, गोरा-काला इत्यादि गुणों से सांख्यिकी का सम्बन्ध नहीं होता है।

4. सांख्यिकी के आंकड़े संख्या द्वारा अथवा अनुमानित एकत्रित किए जाते हैं-सांख्यिकी में आंकड़ों को एकत्रित करने की दो विधियां होती हैं। प्रथम विधि अनुसार आंकड़ों को संख्या अनुसार एकत्रित किया जाता है जैसे कि एक स्कूल अथवा कॉलेज में कितने विद्यार्थी पढ़ते हैं। कई बार आंकड़ों का अनुमान लगाना पड़ता है जैसे कि होस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों द्वारा नशीले पदार्थों पर किए गए खर्च के आंकड़े संख्या द्वारा एकत्रित नहीं किए जा सकते। इसलिए आंकड़ों का अनुमान लगाया जाता है।

5. सांख्यिकी के आंकड़ों में उचित मात्रा में शुद्धता होनी चाहिए-सांख्यिकी के आंकड़े एकत्रित करते समय शुद्धता के लिए एक उचित स्तर को ध्यान में रखना चाहिए।

6. सांख्यिकी के आंकड़े क्रमानुसार एकत्रित करना-आंकड़ा शास्त्र में जो आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं, इनको क्रमानुसार एकत्रित करना चाहिए है। आंकड़े एकत्रित करने से पहले योजना बनानी चाहिए है।

7. आंकड़ों का पूर्व निर्धारित उद्देश्य होना चाहिए-आंकड़ों को पहले निश्चित उद्देश्य के लिए ही एकत्रित करना चाहिए। यदि हम किसी देश को विकसित अथवा अल्पविकसित सिद्ध करना चाहते हैं तो दुनिया के विभिन्न राष्ट्रों की प्रति व्यक्ति आय की तुलना द्वारा इसको सिद्ध किया जा सकता है।

8. सांख्यिकी के आंकड़े एक-दूसरे से सम्बन्धित होने चाहिए-सांख्यिकी की एक विशेषता यह है कि जिन आंकड़ों को हम एकत्रित करते हैं, वह एक-दूसरे से सम्बन्धित हों अर्थात् उनमें तुलना की जा सके।

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प्रश्न 2.
सांख्यिकी की एकवचन के रूप में परिभाषा दो।(Define Statistics in the singular sense.)
अथवा
सांख्यिकी की सांख्यिकी विधियों के रूप में परिभाषा को स्पष्ट कीजिए। (Explain Statistics in the form of statistical method.)
उत्तर-
आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने सांख्यिकी को एकवचन के रूप में स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। इसलिए आंकड़ा शास्त्र को सांख्यिकी विधियों का शास्त्र अथवा सांख्यिकी विज्ञान कहा जाता है। इस सम्बन्ध में प्रो० क्राक्स्टन तथा काउडेन ने सांख्यिकी की परिभाषा को उचित रूप में स्पष्ट किया है। उनके अनुसार, “सांख्यिकी को संख्यात्मक आंकड़ों का संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा व्याख्या से सम्बन्धित विज्ञान कहा जा सकता है।” (“Statistics may be defined as the collection, presentation, analysis and Interpretation of Numerical data.”- Croxton and Cowden)
आधुनिक परिभाषाओं के अनुसार सांख्यिकी वह विज्ञान है, जिसमें पाँच विधियों का अध्ययन किया जाता है।
1. आंकड़ों के एकत्रित करना-सांख्यिकी में प्रथम कार्य आंकड़ों को एकत्रित करना होता है। सांख्यिकी में यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण भाग माना जाता है, क्योंकि परिणामों का ठीक होना इस बात पर निर्भर करता है कि आंकड़े कितने सही एकत्रित किए गए हैं।

2. आंकड़ों की व्यवस्था-सांख्यिकी में आंकड़ों को एकत्रित करने के पश्चात् इन आंकड़ों का संगठन करना महत्त्वपूर्ण होता है। इसलिए आंकड़ों का वर्गीकरण किया जाता है। वर्गीकरण के साथ केवल अनिवार्य आंकड़े रखे जाते हैं तथा गैर अनिवार्य आंकड़ों को छोड़ दिया जाता है।

3. आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-आंकड़ों को क्रम देने के पश्चात् उनके प्रदर्शन की विधि को अपनाया जाता है। आंकड़ों को सरल, संक्षेप तथा सुन्दर रूप देने के लिए सारणियों (Tables) द्वारा अथवा चित्रों (Diagrams) द्वारा तथा रेखाचित्रों (Graphs) द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। इस विधि में हम उन ढंगों का अध्ययन करते हैं, जिनके द्वारा सारणियों, चित्र तथा रेखाचित्र बनाए जाते हैं।

4. आंकड़ों का विश्लेषण-आंकड़ों का विश्लेषण सांख्यिकी विधियों की सहायता से किया जाता है। सांख्यिकी में आंकड़ों के विश्लेषण के लिए बहुत-से ढंग बताए गए हैं, जैसे कि प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ, अपकिरण के माप, विचलन का माप, सह-सम्बन्ध, सूचकांक इत्यादि बहुत-सी विधियां होती हैं, जिनके द्वारा आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है।

5. आंकड़ों की व्याख्या-सांख्यिकी की यह अंतिम विधि है, इसमें हम आंकड़ों के विश्लेषण की सहायता से परिणाम निकालते हैं। इस प्रकार आधुनिक अर्थशास्त्रियों ने सांख्यिकी को एक विज्ञान कहा है, जिसमें हम सांख्यिकी विधियों का अध्ययन करते हैं।

प्रश्न 3.
सांख्यिकी के क्षेत्र को स्पष्ट करो। (Explain the Scope of Statistics.)
उत्तर-
सांख्यिकी का क्षेत्र बहुत विशाल है। शायद ही कोई ऐसा शुद्ध विज्ञान अथवा समाज है, जहां पर सांख्यिकी का प्रयोग नहीं किया जाता। सांख्यिकी का प्रयोग बहुवचन के रूप में नहीं, बल्कि एकवचन के रूप में किया जाता है। सांख्यिकी के क्षेत्र को तीन भागों में विभाजित किया जाता है।
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1. सांख्यिकी का स्वरूप-सांख्यिकी के स्वरूप में हम इन बातों का अध्ययन करते हैं कि सांख्यिकी एक विज्ञान (science) है अथवा कला (art) है। सांख्यिकी एक विज्ञान भी है अथवा कला भी है। विज्ञान के रूप में सांख्यिकी के विषय-सामग्री का क्रमानुसार अध्ययन किया जाता है। इसके नियमों में कारण तथा परिणामों का सम्बन्ध होता है। परिणामों की परख की जा सकती है। यह सभी विशेषताएं सांख्यिकी में होने के कारण यह एक विज्ञान है।

सांख्यिकी कला भी है, क्योंकि वास्तविक समस्याओं का हल करने के लिए आंकड़ों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए यह मजबूरन रोशनी ही प्रदान नहीं करता, बल्कि फल भी देती है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसको सांख्यिकी विधियों (Statistical Methods) का अध्ययन करते हैं।

2. सांख्यिकी की विषय-सामग्री-सांख्यिकी की विषय-सामग्री को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है
(i) वर्णात्मक सांख्यिकी-वर्णात्मक सांख्यिकी से अभिप्राय उन विधियों से होता है, जिन द्वारा आंकड़ों का संग्रहण (collection)- प्रस्तुतीकरण (presentation) तथा विश्लेषण (analysis) करना होता है। विधियों में औसत (averages) का माप, अपकिरण का माप (disperion), विषमता का माप (skewness) इत्यादि को शामिल किया जाता है। संक्षेप रूप में हम कह सकते हैं कि वर्णात्मक सांख्यिकी एक कच्चे माल जैसा है, जिनके आधार पर परिणाम निकाले जाते हैं। यदि आप 10वीं कक्षा के विद्यार्थियों की औसत आय का माप करते हैं तो एक वर्णात्मक सांख्यिकी है।

(ii) आगमन सांख्यिकी-आगमन सांख्यिकी से अभिप्राय है कि सैंपल को आधार बनाकर जो परिणाम प्राप्त किए जाते हैं, वह परिणाम समुच्चय (Universe) पर लागू किए जा सकते हैं। समुच्चय का अर्थ है कि वह परिणाम औसतन उचित लागू होते हैं।

3. सांख्यिकी की सीमाएं-सांख्यिकी एक महत्त्वपूर्ण विज्ञान है, जोकि वास्तविक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रयोग किया जाता है, परन्तु इसकी कुछ सीमाएं ऐसी हैं, जिनको दूर नहीं किया जा सकता। इसकी कुछ महत्त्वपूर्ण सीमाएं निम्नलिखित अनुसार हैं –

  • सांख्यिकी व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन नहीं करता-आंकड़ा शास्त्र की महत्त्वपूर्ण कमी यह है कि इसमें समुच्चयों का अध्ययन किया जाता है तथा व्यक्तिगत इकाइयों का अध्ययन नहीं किया जाता। उदाहरणस्वरूप मान लो चार व्यक्तियों A, B, C तथा D की आय क्रमवार 10,000, 9000, 8000 तथा 1000 रु० मासिक है। औसत आय 10,000 + 9,000 + 8,000 + 1,000 = 28,000 : 4 = 7,000 रु० मासिक होगी। परन्तु औसत आय D मनुष्य की आय का प्रकटीकरण नहीं करती।
  • सांख्यिकी संख्यात्मक इकाइयों का अध्ययन करता है-इस विज्ञान में गुणात्मक तत्त्वों जैसे कि ईमानदारी, सुन्दरता, दोस्ती, बहादुरी इत्यादि का अध्ययन नहीं किया जाता। यह केवल संख्यात्मक इकाइयों का अध्ययन करता है।
  • केवल औसतों का अध्ययन-सांख्यिकी के परिणाम सर्वव्यापक तथा शत-प्रतिशत ठीक नहीं होते। यह तो औसत रूप में लागू होने वाले परिणामों का अध्ययन करता है। जब हम कहते हैं कि जापानी लोगों में देश प्रेम तथा कुर्बानी की भावना होती है तो यह अनिवार्य नहीं कि प्रत्येक जापानी में यह गुण पाए जाएं।
  • एक समान आंकड़ों का अध्ययन-प्रो० बाउले के अनुसार, सांख्यिकी की एक कमी यह है कि इसमें एक समान तथा एकरूप के आंकड़ों का अध्ययन किया जाता है। विभिन्न गुणों के आंकड़ों का अध्ययन सम्भव नहीं होता।

5. सांख्यिकी का गलत प्रयोग-सांख्यिकी का गलत प्रयोग किया जा सकता है। सांख्यिकी के आंकड़ों द्वारा झूठ को भी सच सिद्ध किया जा सकता है। इसलिए यह ठीक कहा गया है, “कुछ झूठ होते हैं, कुछ अति के झूठ तथा कुछ अत्यन्त झूठ सांख्यिकी हैं।” (“There are lies, damn lies and statistics.”)

6. केवल माहिरों द्वारा प्रयोग-सांख्यिकी एक विशेष प्रकार का शास्त्र है। इसका प्रयोग साधारण मनुष्यों द्वारा नहीं किया जा सकता। जिन मनुष्यों को सांख्यिकी का पूर्ण ज्ञान होता है, केवल उन माहिरों द्वारा ही सांख्यिकी का प्रयोग किया जा सकता है। प्रो० डबल्यू० आई० किंग के शब्दों में, “सांख्यिकी गीली मिट्टी जैसी है, जिससे आप परमात्मा अथवा शैतान की तस्वीर अपनी इच्छानुसार बना सकते हो।” (“Statistics are like clay, of which you can make a God or a Devil, as you please.”_W.I. King),

प्रश्न 4.
अर्थशास्त्र में सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट करें। (Explain the Importance of statistics in the Economics.)
उत्तर-
सांख्यिकी के महत्त्व को अर्थशास्त्र के क्षेत्र के लिए स्पष्ट करते हुए प्रो० मार्शल ने कहा था, “सांख्यिकी कच्ची मिट्टी जैसी है, जिससे मैं भी, दूसरे अर्थशास्त्रियों की तरह ईंटें बनाता हूँ।” (“Statistics are like the straw out of which I, like every economist have to make bricks” -Marshall) अर्थशास्त्र के क्षेत्र में सांख्यिकी का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। अर्थशास्त्र में सांख्यिकी के महत्त्व को निम्नलिखित अनुसार स्पष्ट किया जा सकता है –
1. आर्थिक तुलना-सांख्यिकी की सहायता से आर्थिक तुलना सम्भव होती है। आर्थिक तुलना दो प्रकार से की जाती है-

  • अन्तर-क्षेत्रीय तुलना-इससे अभिप्राय देश के विभिन्न क्षेत्रों में तुलना करने से होता है।
  • समय अनुसार तुलना-समय अनुसार तुलना का अर्थ समय के आधार पर तुलना करना, जैसे कि 1951 में भारत की जनसंख्या 36 करोड़ थी, जोकि 2001 में 102.7 करोड़ हो गई है।

2. आर्थिक सम्बन्धों का अध्ययन-सांख्यिकी में आर्थिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। जैसे कि वस्तु की कीमत में वृद्धि हो जाती है तो उस वस्तु की मांग कम हो जाती है। इस तरह के सम्बन्ध को सांख्यिकी की सहायता से स्पष्ट किया जाता है।

3. आर्थिक भविष्यवाणियां-सांख्यिकी द्वारा आर्थिक भविष्यवाणियां की जा सकती हैं। सांख्यिकी की सहायता से हम अनुमान लगा सकते हैं कि भारत की जनसंख्या आज से 20 वर्ष पश्चात् कितनी होगी।

4. आर्थिक सिद्धान्तों का निर्माण-अर्थशास्त्र में आर्थिक सिद्धान्तों का निर्माण किया जाता है। उस उद्देश्य के लिए सांख्यिकी आंकड़ों के आधार पर सांख्यिकी सम्बन्धों को स्पष्ट किया जाता है, जिससे आर्थिक परिणाम प्राप्त किए जाते हैं।

5. नीतियों का निर्माण–सांख्यिकी की सहायता से देश में आर्थिक नीतियों का निर्माण किया जाता है, जैसे कि प्रत्येक वर्ष देश का बजट बनाया जाता है।

6. आर्थिक सन्तुलन-सांख्यिकी की सहायता से आर्थिक सन्तुलन प्राप्त किया जाता है। उदाहरणस्वरूप प्रत्येक उपभोगी अपनी आय से अधिक-से-अधिक सन्तुष्टि प्राप्त करना चाहता है। जब वह अपने पैसे इस ढंग से खर्च करता है कि उसको प्रत्येक वस्तु से प्राप्त होने वाला सीमान्त तुष्टिगुण समान मिलता है तो उसकी सन्तुष्टि अधिकतम होती है। सीमान्त तुष्टिगुण को समान करने के लिए सांख्यिकी के समंकों की आवश्यकता होती है।

7. आर्थिक नियोजन में महत्त्व-भारत के योजना आयोग अनुसार देश के आर्थिक विकास के लिए नियोजन सांख्यिकी के अधिकतम प्रयोग पर निर्भर करता है। (“Planning for the Economic Development of the Country depends on the maximum use of statistics’’-Planning Commissions). एक देश का आर्थिक नियोजन सांख्यिकी के समंकों की सहायता से बनाया जाता है।

8. व्यापार के लिए लाभदायक-एक सफल व्यापारी वह होता है, जोकि आंकड़ों सम्बन्धी शुद्ध जानकारी रखता है, यदि एक व्यापारी आने वाले समय के लिए मांग व पूर्ति का अनुमान लगाता है तो उसको व्यापार में वृद्धि होती है, इसलिए सांख्यिकी व्यापारियों के लिए भी महत्त्वपूर्ण होती है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 14 सांख्यिकी का अर्थ, क्षेत्र तथा अर्थशास्त्र में महत्त्व

प्रश्न 5.
सांख्यिकी के अविश्वासी होने को स्पष्ट करें। इसके अविश्वास को दूर करने के उपाय भी बताओ। (Explain the Distrust of Statistics. Discuss the Remedies to Remove distrust.)
अथवा
“सांख्यिकी गीली मिट्टी जैसे होती है, जिससे आप इच्छानुसार देवता अथवा शैतान बना सकते हो।” स्पष्ट कीजिए। (“Statistics are like clay of which you can make a God or Devil as you please.” Discuss.)
अथवा
झूठ तीन प्रकार के होते हैं, झूठ, महाझूठ तथा सांख्यिकी। यह झूठ इसी क्रम में घटिया भी होते हैं। स्पष्ट करो।
(There are three types of lies; Lies, Damn lies, and Statistics, wicked in the order of their naming. Discuss.)
उत्तर-
आंकड़ा शास्त्र एक ऐसा विषय है जिसमें आंकड़ों द्वारा समस्याओं को प्रकट किया जाता है। हम जानते हैं कि सांख्यिकी का अर्थ आंकड़ों को एकत्रित करना, वर्गीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा व्याख्या से होता है, इसमें बहुत-से औज़ारों का प्रयोग किया जाता है ताकि समस्याओं को हल किया जा सके। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रत्येक शास्त्र में आंकड़ा शास्त्र की विधियां लाभदायक होती हैं, परन्तु आंकड़ों को पेश करने पर ही उनकी सच्चाई निर्भर करती है। एक अनुसन्धानकर्ता आंकड़ों को पेश करते समय निजी उद्देश्यों के लिए आंकड़ों का गलत प्रयोग कर सकता है।

साधारण तौर पर लोग आंकड़ों पर द्वारा विश्वास करते हैं। जिस कारण आंकड़ा शास्त्री कई बार झूठ को सच्च साबित करने में सफल हो जाते हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि, “झूठ तीन प्रकार के होते हैं-झूठ, महाझूठ तथा सांख्यिकी।” (“There are three kinds of lies, Damn lies, and statistics”) यह झूठ इसी क्रम में घटिया भी होते हैं। इसी तरह यह भी कहा जाता है, “आंकड़े प्रथम दर्जे के झूठ होते हैं” अथवा आंकड़े झूठ के तंतु होते हैं। यदि हम इन कथनों को देखते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि सांख्यिकी के सभी आंकड़े विश्वसनीय नहीं होते। यह तो अनुसन्धानकर्ता के अनुसन्धान पर निर्भर करता है कि किस प्रकार के आँकड़े एकत्रित करके प्रस्तुत किए जाते हैं।

यदि अनुसन्धानकर्ता गलत उद्देश्य की पूर्ति को मुख्य रखकर अनुसन्धान करता है तो उस अनुसन्धान के परिणाम गलत परिणाम प्रस्तुत करते हैं। परन्तु यदि उचित ढंग से आंकड़े एकत्रित करके विश्लेषण किया जाता है तो यह आंकड़े लाभदायक परिणाम भी प्रदान करते हैं। संख्याएं अपने आप में निष्कपट होती हैं। इन संख्याओं की प्रस्तुति पर निर्भर करेगा कि प्राप्त परिणाम भी सामाजिक विज्ञान के लिए लाभदायक है अथवा हानिकारक, इसीलिए यह ठीक कहा गया है, “आंकड़े तो गीली मिट्टी जैसे होते हैं, जिससे आप देवता अथवा शैतान कुछ भी बना सकते हो।”

सांख्यिकी की अविश्वासी के मुख्य कारण (Reasons for Distrust of Statistics) सांख्यिकी के प्रति अविश्वास के मुख्य कारण निम्नलिखित अनुसार हैं –

  1. आंकड़े अशुद्ध तथा पक्षपाती हो सकते हैं।
  2. आंकड़ा शास्त्री, आंकड़ों से कुछ भी सिद्ध कर सकता है।
  3. ठीक आंकड़े भी गुमराह कर सकते हैं।

इसलिए आंकड़ों का प्रयोग करते समय सावधानी से काम लेना चाहिए। प्रो० डब्लयू० आई० किंग के अनुसार, “सांख्यिकी विज्ञान एक बहुत ही लाभदायक सेवक होता है। परन्तु इसका मूल्य उनके लिए अधिक है जोकि इसका उचित प्रयोग करते हैं।” (“The Science of statistics is the most useful servant, but only of great value for those who understand its proper use.”-W. I. King)

अविश्वास दूर करने के सुझाव (Measures to Remove Distrust) सांख्यिकी के अविश्वास को दूर करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जाते हैं-

  1. विशेषज्ञों द्वारा प्रयोग-सांख्यिकी एक ऐसा विषय है जो केवल विशेषज्ञों द्वारा ही प्रयोग किया जा सकता है। इस स्थिति में निपुण व्यक्ति ही इसके विश्वसनीय परिणाम निकाल सकता है।
  2. पक्षपात का अभाव-आंकड़े पक्षपात रहित होने चाहिए। पक्षपात द्वारा एकत्रित किए आंकड़ों से उचित परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते।
  3. सीमाओं की ओर ध्यान-सांख्यिकी का प्रयोग करते समय सांख्यिकी की सीमाओं को ध्यान में रखना चाहिए।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण

Punjab State Board PSEB 11th Class Economics Book Solutions Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Economics Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण

PSEB 11th Class Economics सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
सारणीयन किसे कहते हैं ?
उत्तर-
सारणीयन द्वारा एकत्रित सामग्री को सरल, संक्षिप्त व बोधगम्य बनाया जाता है। सांख्यिकीय आंकड़ों को सारणी के रूप में प्रस्तुत करने की क्रिया को सारणीयन कहते हैं।

प्रश्न 2.
आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण से यह अभिप्राय है कि आंकड़ों को स्पष्ट तथा व्यवस्थित रूप से इस प्रकार आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया जाए कि उन्हें सभी व्यक्ति सरलतापूर्वक समझ सकें और उनसे उचित परिणाम निकाले जा सकें।

प्रश्न 3.
सारणीयन का एक लाभ लिखिए।
उत्तर-
इसकी सहायता से सांख्यिकीय सामग्री को इस प्रकार से प्रस्तुत किया जाता है कि इसे समझने में सरलता होती है तथा सांख्यिकीय प्रयोग के लिए ठीक हो जाती है।

प्रश्न 4.
एकत्रित किए आंकड़ों को कॉलम तथा पंक्तियों में प्रदर्शन करने को ……………. कहते हैं।
उत्तर-
सारणीयन।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण

प्रश्न 5.
आंकड़ों को चित्रों द्वारा प्रदर्शित करने को सारणीयन कहा जाता है।
उत्तर-
ग़लत।

प्रश्न 6.
आंकड़ों को कॉलम तथा पंक्तियों में प्रदर्शित करने को …………. कहते हैं।
(a) वर्गीकरण
(b) सारणीयन
(c) चित्रण
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(b) सारणीयन।

प्रश्न 7.
सारणी (Table) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
आंकड़ों को कॉलम तथा पंक्तियों में प्रदर्शन करने को सारणी कहते हैं।

प्रश्न 8.
पंक्ति शीर्षक (Stub) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
पंक्तियों के शीर्षक को पंक्ति शीर्षक (Stub) कहा जाता है।

प्रश्न 9.
उप शीर्षक (Caption) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सारणी के कॉलमों के शीर्षक को उप-शीर्षक कहा जाता है।

प्रश्न 10.
सारणी में क्षेत्र (Body) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
क्षेत्र में आंकड़ों सम्बन्धी सारणी में दी गई समूची सूचना को दिखाया जाता है।

प्रश्न 11.
सारणी में स्रोत से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सारणी के अन्त में द्वितीय आंकड़ों को प्राप्त करने के स्रोत अथवा आंकड़े कहां से प्राप्त किये गए हैं इसको प्रकट करने को स्रोत कहते हैं।

प्रश्न 12.
सारणी की मुख्य तीन किस्में बताएँ।
उत्तर-

  • उद्देश्य अनुसार सारणी
  • मौलिकता अनुसार सारणी
  • बनावट अनुसार सारणी।

प्रश्न 13.
जो सारणी एक से अधिक गुणों को प्रकट करती है उसको …………… कहा जाता है।
उत्तर-
जटिल सारणी।

प्रश्न 14.
सारणी तथा ग्राफ में कोई अन्तर नहीं होता।
उत्तर-
ग़लत।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सारणीयन से क्या अभिप्राय है ? .
उत्तर-
सारणीयन का अर्थ (Meaning of Tabulation)-सारणीयन आंकड़ों को पेश करने की वह विधि होती है, जिसमें तथ्यों सम्बन्धी एकत्रित किए आंकड़ों को विभिन्न कालमों (Columns) अथवा कतारों (Rows) में प्रस्तुत किया जाता है। एकत्रित किए आंकड़ों को पेश करने के लिए सारणियों का निर्माण महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि इससे आंकड़े सरल तथा सापेक्ष रूप धारण कर लेते हैं। इसलिए एकत्रित किए आंकड़ों को उनकी संख्याओं अनुसार कालमों तथा पंक्तियों में पेश करने की विधि को सारणी अथवा सूची कहा जाता है। इसको स्पष्ट करते हुए प्रो० एम० एम० ब्लेयर ने कहा है, “सारणीयन, विशाल अर्थों में कालमों तथा पंक्तियों के रूप में आंकड़ों को क्रमबद्ध करने से होता है।”

प्रश्न 2.
सारणीयन के कोई दो गुण बताएं।
उत्तर-

  1. जटिल आंकड़ों को सरल बनाना-सूचीकरण का मुख्य उद्देश्य एकत्रित किए जटिल आंकड़ों को सरल रूप प्रदान करना होता है। जब हम आंकड़ों को खानों तथा पंक्तियों में स्पष्ट करते हैं तो आंकड़े सरल हो जाते हैं।
  2. समझने में आसानी-आंकड़ों को जब सूची द्वारा स्पष्ट किया जाता है तो साधारण मनुष्य भी इनको समझने में आसानी महसूस करते हैं।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
वर्गीकरण तथा सारणीयन में दो आधारों पर अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर-
वर्गीकरण या सारणीयन में अन्तर (Difference between Classification and Tabulation)वर्गीकरण तथा सारणीयन दोनों ही सांख्यिकीय अनुसंधान कार्य के लिए महत्त्वपूर्ण क्रियाएं हैं, जिनके द्वारा संग्रहित समंकों को संक्षिप्त बनाने और उन्हें व्यवस्थित तथा क्रमबद्ध करने में सहायता मिलती है। फिर भी दोनों में अन्तर है।

  1. क्रम-दोनों का क्रम (Sequence) भिन्न है। पहले समंकों को वर्गीकृत किया जाता है। उसके पश्चात् ही उन्हें सारणियों में प्रस्तुत किया जाता है। अतः वर्गीकरण सारणीयन का आधार है।
  2. समानता व असमानता-वर्गीकरण में समंकों को समानता व असमानता के आधार पर अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया जाता है जबकि सारणीयन में उन वर्गीकृत समंकों को खानों व पंक्तियों में बद्ध करके प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार सारणीयन वर्गीकरण की यन्त्रात्मक प्रक्रिया (Mechanical function of Classification) है।
  3. विधि-वर्गीकरण सांख्यिकीय विश्लेषण की विधि है जबकि सारणीयन समंकों के प्रस्तुतीकरण की रीति है।

प्रश्न 2.
हिन्दू कॉलेज अमृतसर के विद्यार्थियों की आयु तथा लिंग अनुसार संख्या प्रदर्शित करने हेतु एक कोरी सारणी बनाइए।
उत्तर-
शीर्षक-हिन्दू कॉलेज अमृतसर के विद्यार्थियों की आयु व लिंगानुसार संख्या –
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण 1

प्रश्न 3.
एक उत्तम सारणी के आवश्यक लक्षण लिखें।
उत्तर-
एक अच्छी सारणी में कुछ आवश्यक विशेषताएं होनी चाहिएं जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं –

  1. सारणी संक्षिप्त और सूगढ़ होनी चाहिए जिससे आवश्यक और वांच्छनीय जानकारी सरलता से प्राप्त हो सके।
  2. सारणी स्पष्ट और शुद्धता से पूर्ण होनी चाहिए। यह देखने में सुन्दर और आकर्षक होनी चाहिए।
  3. सारणी अनुसंधान के उद्देश्य के अनुकूल होनी चाहिए।
  4. सारणी सुनियोजित तथा वैज्ञानिक ढंग से निर्मित की जानी चाहिए।
  5. सारणी में तथ्यों की व्यवस्था इस प्रकार की जानी चाहिए जिससे कि उनमें तुलना सरलता से की जा सके।
  6. सारणी में अनावश्यक वर्गीकरण नहीं किया जाना चाहिए।
  7. सारणी स्वयं परिचायक (Self-explanatory) होनी चाहिए जिसमें कि उचित शीर्षक, खानों व पंक्तियों के शीर्षक, मदों के योग तथा टिप्पणियां आदि स्पष्ट रूप में व्यक्त होनी चाहिए।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण

प्रश्न 4.
भारत की जनसंख्या की आयु के चार वर्ष वर्गों 0 – 5, 5 – 25, 25 – 50 तथा 50 से अधिक, में प्रस्तुत करने के लिए सारणी का खाका बनाएं।
उत्तर-
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प्रश्न 5.
निम्नलिखित आधारों पर वितरित डी० ए० वी० कॉलेज जालन्धर के 2009-10 वर्ष के विद्यार्थियों को प्रदर्शित करने के लिए एक कोरी सारणी की रचना करें।
(i) लिंग-पुरुष, स्त्री
(ii) विषय-विज्ञान, कला, वाणिज्य
उत्तर-
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IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सारणीयन से क्या अभिप्राय होता है ? सारणीयन के मुख्य उद्देश्य अथवा महत्त्व अथवा गुण बताओ। (What is meant by Tabulation ? Explain the objectives or Importance or Merits of Tabulation.)
उत्तर-
सारणीयन का अर्थ (Meaning of Tabulation)-सारणीयन आंकड़ों को पेश करने की वह विधि होती है, जिसमें तथ्यों सम्बन्धी एकत्रित किए आंकड़ों को विभिन्न कालमों (Columns) अथवा कतारों (Rows) में प्रस्तुत किया जाता है। एकत्रित किए आंकड़ों को पेश करने के लिए सारणियों का निर्माण महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि इससे आंकड़े सरल तथा सापेक्ष रूप धारण कर लेते हैं। इसलिए एकत्रित किए आंकड़ों को उनकी संख्याओं अनुसार कालमों तथा पंक्तियों में पेश करने की विधि को सारणी अथवा सूची कहा जाता है। इसको स्पष्ट करते हुए प्रो० एम० एम० ब्लेयर ने कहा है, “सारणीयन, विशाल अर्थों में कालमों तथा पंक्तियों के रूप में आंकड़ों को क्रमबद्ध करने से होता है।” (“Tabulation in its broadest sense is an orderly arrangement of data in Columns and rows.” – M. M. Blair)

प्रो० फर्गुसन अनुसार, “सूचीकरण वह क्रिया है, जिस द्वारा कम-से-कम परिश्रम करके अधिक-से-अधिक सूचना प्रदान की जा सकती है।” (“Tabulation is a process to enable the reader to grasp with minimum efforts the maximum information.” – Ferguson) इन परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि सांख्यिकी आंकड़ों को सारणी के रूप में पेश करने की क्रिया को सारणीयन कहा जाता है। एक अनुसूची (Table) आंकड़ों को कालमों तथा पंक्तियों में प्रदर्शित किया होता है।

सारणीयन का उद्देश्य, महत्त्व अथवा गुण (Objectives, Importance or Merits of Tabulation) –
सारणीयन बिखरे हुए आंकड़ों को वैज्ञानिक रूप देने की विधि होती है, जिससे बहुत-से उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है। इसलिए सारणीयन को महत्त्वपूर्ण विधि माना जाता है। इस विधि के मुख्य लाभ निम्नलिखित अनुसार हैं-

  1. जटिल आंकड़ों को सरल बनाना (Make simple to Complicated Data)-सूचीकरण का मुख्य उद्देश्य एकत्रित किए जटिल आंकड़ों को सरल रूप प्रदान करना होता है। जब हम आंकड़ों को खानों तथा पंक्तियों में स्पष्ट करते हैं तो आंकड़े सरल हो जाते हैं।
  2. समझने में आसानी (Easy to Understand)-आंकड़ों को जब सूची द्वारा स्पष्ट किया जाता है तो साधारण मनुष्य भी इनको समझने में आसानी महसूस करते हैं।
  3. किफायती (Economical) सारणीयन की सहायता से समय तथा परिश्रम की बचत होती है।
  4. तुलना में सहायक (Helpful in Comparison)-सूचीकरण द्वारा आंकड़ों को विभिन्न वर्गों में पेश किया जाता है। इसलिए विभिन्न वर्गों की तुलना करनी आसान हो जाती है।
  5. व्याख्या में सहायक (Helpful in Interpretation)-जब हम आंकड़ों को सारणियों के रूप में स्पष्ट करते हैं तो इस द्वारा आंकड़ों की व्याख्या करनी आसान हो जाती है अर्थात् सारणी को देखकर विभिन्न वर्गों की जानकारी कम समय में ही प्राप्त की जा सकती है।
  6. विश्लेषण में सहायक (Helpful in Analysis)-सारणीयन द्वारा आंकड़ों का विश्लेषण भी आसानी से किया जा सकता है। इस उद्देश्य के लिए विभिन्न सांख्यिकी विधियां मध्यमान, मध्यिका, बहुलक, अपकिरण इत्यादि का प्रयोग आसानी से हो सकता है।

प्रश्न 2.
सारणी की किस्मों को स्पष्ट कीजिए। उद्देश्यानुसार और मौलिकतानुसार सारणी को स्पष्ट करें। (Explain the types of Tabulation. How is Tabulation done on the basis of purpose and originality ?)
उत्तर-
सारणी की किस्में निम्नलिखित अनुसार स्पष्ट की जा सकती है-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण 4
ऊपर दिए चित्र अनुसार सारणी की किस्मों को निम्नलिखित अनुसार स्पष्ट किया जा सकता है-
1. उद्देश्य अनुसार (On the Basis of Purpose)-सारणी बनाने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर इसको दो किस्मों में विभाजित किया जा सकता है

  • साधारण उद्देश्य वाली सारणी (General Purpose Table)-साधारण उद्देश्य वाली सारणी वह सारणी होती है जोकि साधारण उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाई जाती है। इसमें मुख्य तौर पर आंकड़ों को प्रस्तुत किया जाता है तथा आवश्यकता पड़ने पर इन आंकड़ों का प्रयोग किया जा सकता है। ऐसी सारणी को संदर्भ सारणी भी कहा जाता
  • विशेष उद्देश्य के लिए सारणी (Special Purpose Table)-विशेष उद्देश्य वाली सारणी किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाई जाती है, जैसे कि किसी देश को विकसित अथवा अल्प विकसित सिद्ध करना हो तो विभिन्न देशों की प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों की तुलना की जाती है। ऐसी सारणी संक्षेप होती है, जिस कारण इसको सार सारणी (Summary Table) भी कहा जाता है।

2. मौलिकतानुसार (On the basis of Originality)-मौलिकता के आधार पर जो सारणियां बनाई जाती हैं, वह दो प्रकार की होती है-

  • मौलिक सारणियां (Original Tables)-मौलिक सारणियां वे सारणियां होती हैं, जिसमें आंकड़ों को जिस
    रूप में एकत्रित किया जाता है, उनको मूल रूप में ही पेश किया जाता है।
  • हासिल की सारणी (Derivative Table)-हासिल की सारणी वह सारणी होती है, जिसमें आंकड़े उसी रूप में पेश नहीं किए जाते हैं, जिस रूप में एकत्रित किए जाते हैं, बल्कि इन आंकड़ों को प्रतिशत अथवा अनुपात के रूप में दिखाया जाता है अर्थात् मौलिक सारणी में से ही नई सारणी निकालकर पेश की जाती है तो इस सारणी को हासिल की सारणी कहते हैं।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण

प्रश्न 3.
बनावट अनुसार सारणी के निर्माण को स्पष्ट करें। (Explain the tabulation on the basis of Construction.)
उत्तर-
बनावट अनुसार (On the basis of Construction)–बनावट के अनुसार सारणी को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।
(a) सरल सारणी (Simple Table)-सरल सारणी वह सारणी होती है जोकि आंकड़ों के एक गुण अथवा विशेषता के आधार पर बनाई जाती है। यह गुण आयु, लिंग, कार्य की किस्म इत्यादि के रूप में प्रकट किया जा सकता है जैसे कि सरकारी कॉलेज में विभिन्न विषयों को पढ़ने वाले विद्यार्थियों की सारणी को सरल सारणी कह सकते हैं।
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(b) जटिल प्रणाली (Complex Table)-एक सारणी में जब आंकड़ों को एक विशेषता से अधिक विशेषताओं अथवा गुणों के आधार पर प्रकट किया जाता है, तो ऐसी सारणी को जटिल सारणी कहा जाता है। जटिल सारणी तीन प्रकार की हो सकती है :
(i) द्विगुण सारणी (Two way Table)-एक सारणी में जब आंकड़ों की दो विशेषताओं को दिखाया जाता है तो इसको दो गुणों वाली सारणी कहा जाता है। उदाहरणस्वरूप एक सरकारी कॉलेज में लड़के तथा लड़कियों की संख्या अनुसार पढ़ने वाले कुल विद्यार्थियों की सारणी को दो गुणों वाली सारणी कहा जाता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 18 सारणीयन द्वारा आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण-सारणीकरण 6
(ii) त्रिगुण सारणी (Three way Table)-एक सारणी में जब तीन गुणों अथवा विशेषताओं के आधार पर आंकड़ों को पेश किया जाता है तो ऐसी सारणी को तीन गुणों वाली सारणी कहते हैं। उदाहरणस्वरूप सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में लड़के तथा लड़कियों की संख्या शहरी तथा ग्रामीण विद्यार्थियों की संख्या को दिखाया जाए तो इसको त्रिगुण सारणी कहा जाता है।
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(iii) बहुगुणों वाली सामग्री-जब आंकड़ों को तीन से अधिक विशेषताओं अथवा गुणों के आधार पर विभाजित किया जाता है तो ऐसी सारणी को बहुगुणों वाली सारणी कहते हैं। उदाहरणस्वरूप सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या को लिंग, फैकलटी, निवास तथा होस्टल में रहने वाले तथा घरों से रोज़ाना पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या अनुसार सारणी को बहुगुणी सारणी कहा जाता है।
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PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन

Punjab State Board PSEB 11th Class Economics Book Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Economics Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन

PSEB 11th Class Economics उत्पादक का सन्तुलन Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
उत्पादक से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
उत्पादक एक ऐसा व्यक्ति है जो लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री करने के लिए उनका उत्पादन करता है।

प्रश्न 2.
उत्पादक के सन्तुलन का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
एक उत्पादक अथवा फ़र्म सन्तुलन तब होता है जब उसको अधिकतम लाभ होता है अथवा न्यूनतम हानि होती है।

प्रश्न 3.
एक फ़र्म की साधारण सन्तुलन की शर्ते बताओ।
उत्तर-
फ़र्म के सन्तुलन की दो शर्ते होती हैं –

  • सीमान्त आय (MR) = सीमान्त लागत (MC)
  • सीमान्त लागत (MC) वक्र सीमान्त आय (MR) वक्र को नीचे से काटती हो।

प्रश्न 4.
सकल लाभ तथा शुद्ध लाभ में अन्तर बताओ।
उत्तर-
सकल लाभ कुल आय (TR) और कुल परिवर्तनशील लागत (AVC) का अन्तर होता है।
कुल लाभ = TR – AVC
शुद्ध लाभ, कुल आय (TR) और कुल लागत (TC) का अन्तर होता है।
शुद्ध लाभ = TR – TC

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन

प्रश्न 5.
सम विच्छेद बिन्दु अथवा उत्पादन बन्द करने वाला बिन्दु कब आता है ?
उत्तर-
सम विच्छेद बिन्दु (Break Even Point or Shut Down Point) –
TR = TC or AR = AC

प्रश्न 6.
पूर्ण प्रतियोगिता फर्म की दीर्घ काल के सन्तुलन की शर्ते बताएं।
उत्तर-
P = LMC = LAC

प्रश्न 7.
साधारण लाभ तब होता है जब MR = MC और ……. होती है।
उत्तर-
AR = AC होती है।

प्रश्न 8.
असाधारण लाभ तब होता है जब MR = MC और …… ।
उत्तर-
असाधारण लाभ तब होता है जब MR = MC और AR > AC होती है।

प्रश्न 9.
हानि तब होती है जब MR = MC और ……. ।
उत्तर-
हानि उस स्थिति को कहते हैं जब MR = MC और AR < AC होती है।

प्रश्न 10.
सीमान्त आय (MR) और सीमान्त लागत (MC) के समान होने पर क्या हमेशा अधिकतम लाभ होता है ?
उत्तर-
MR = MC सन्तुलन की एक शर्त होती है इस स्थिति में अनिवार्य नहीं कि फ़र्म को लाभ हो, बल्कि हानि भी हो सकती है।

प्रश्न 11.
वह स्थिति जिसमें उत्पादक का लाभ अधिकतम और हानि न्यूनतम होती है को ………… कहते हैं।
(a) उत्पादक का सन्तुलन
(b) उपभोक्ता का सन्तुलन
(c) दोनों ही
(d) इन में से कोई नहीं।
उत्तर-
(d) उत्पादक का सन्तुलन।

प्रश्न 12.
उत्पादक के सन्तुलन के लिए निम्नलिखित में कौन-सी शर्त उपयुक्त है।
(a) लाभ न्यूनतम होना चाहिए
(b) सीमान्त लागत, सीमान्त आय से कम होनी चाहिए।
(c) सीमान्त लागत वक्र, सीमान्त आय वक्र को नीचे से काटे।
(d) इन में से कोई नहीं।
उत्तर-
(c) सीमान्त लागत वक्र सीमान्त आय तक्र को नीचे से काटे।

प्रश्न 13.
क्या कुल उत्पादन कभी घट सकता है।
उत्तर-
कुल उत्पादन घट सकता है। जब सीमान्त लागत ऋणात्मक होती है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन

प्रश्न 14.
वह व्यक्ति जो अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन करके उनकी बिक्री करता है को ……….. कहते हैं।
(a) उपभोक्ता
(b) खुद्रा व्यापारी
(c) उत्पादक
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(c) उत्पादक।

प्रश्न 15.
कुल उत्पादन कब अधिकतम होता है ?
उत्तर-
कुल उत्पादन उस समय अधिकतम होता है जब सीमान्त उत्पादन शून्य होता है।।

प्रश्न 16.
एक उत्पादक उस स्थिति में होता है जब उसको अधिकतम लाभ होता है अथवा न्यूनतम हानि होती
उत्तर-
सन्तुलन।

प्रश्न 17.
फ़र्म का सन्तुलन उस स्थिति में होता है जब …… होती है जब MC वक्र MR वक्र को नीचे से ऊपर को जाती हुई काटें।
उत्तर-
MR = MC.

प्रश्न 18.
जब MR = MC और AR = AC होती है तो ……. लाभ होता है।
उत्तर-
साधारण।

प्रश्न 19.
जब MR = MC और AR = AC होती है तो ………… लाभ होता है।
उत्तर-
साधारण।

प्रश्न 20.
जब सीमान्त उत्पादन ऋणात्मक होती है तो कुल उत्पादन ………. लगता है।
उत्तर-
घटने।

प्रश्न 21.
जब सीमान्त उत्पादन शून्य हो जाता है तो कुल उत्पादन ……….. होता है।
उत्तर-
अधिकतम।

प्रश्न 22.
जब MR = MC और AR < AC होती है तो कार्य को ………. की स्थिति होती है।
उत्तर-
हानि।

प्रश्न 23.
जब MR = MC होती है तो फ़र्म सन्तुलन में होती है।
उत्तर-
ग़लत।

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II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
उत्पादक के सन्तुलन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
उत्पादक का सन्तुलन उस समय होता है जब वह वर्तमान उत्पादन की मात्रा से सन्तुष्ट होता है और उत्पादन में परिवर्तन करने की उसमें कोई प्रवृत्ति नहीं होता। हम यह भी कह सकते हैं कि उत्पादक का सन्तुलन उस स्थिति में होता है जब उसको अधिकतम लाभ होता है अथवा न्यूनतम हानि होती है।

प्रश्न 2.
एक उत्पादक के सन्तुलन अथवा अधिकतम लाभ की दो शर्ते बताएं।
उत्तर-
एक प्रतियोगी फ़र्म के लिए उत्पादक के सन्तुलन के लिए दो शर्ते अनिवार्य होती हैं –

  • फ़र्म की सीमान्त आय और सीमान्त लागत बराबर हो (MR = MC)
  • फ़र्म की सीमान्त लागत, सीमान्त आय वक्र के नीचे से ऊपर को जाती हुई काटे अर्थात् MC बढ़ रही होती है।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
उत्पादक से क्या अभिप्राय है ? उत्पादक के सन्तुलन की शर्ते बताओ।
उत्तर-
उत्पादक एक उत्पादन का साधन है, जोकि वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन करने के लिए उत्पादन के साधनों को एकत्रित करता है तथा इन वस्तुओं की बिक्री से अधिकतम लाभ प्राप्त करता है। उत्पादक अथवा फ़र्म का सन्तुलन उस स्थिति में होता है, जिसमें उसको अधिकतम लाभ अथवा न्यूनतम हानि होती है। उत्पादन के सन्तुलन की दो शर्तों होती हैं।

  • सीमान्त आय (MR) तथा सीमान्त आय MC समान होनी चाहिए है अथवा P = MC
  • सीमान्त लागत (MC) वक्र सीमान्त आय (MR) वक्र को नीचे से ऊपर की ओर जाती हुई काटकर गजरती हो।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन 1

रेखाचित्र 1 में प्रतियोगी फ़र्म का सन्तुलन दिखाया गया है। इसमें कीमत OP समान रहती है। इसलिए AR = MR सीधी रेखा बनती है। सीमान्त लागत (MC) रेखा सीमान्त आय (MR) को E बिन्दु पर नीचे से ऊपर की ओर जाती हुई काटकर गुजरती है। इसको सन्तुलन की स्थिति कहा जाता है। जहां कि कुल लाभ PEK प्राप्त होता है। कुल आय TR = OPEQ में कुल परिवर्तनशील लागत OKEQ घटा दी जाएं तो शेष PEK कुल लाभ है x जोकि अधिकतम है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन

प्रश्न 2.
पूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में जहां फ़र्मों के प्रवेश तथा निकास की स्वतन्त्रता होती है, फ़र्मों को शून्य असाधारण लाभ क्यों होता है ?
उत्तर-
पूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में सभी फ़र्मों को केवल साधारण लाभ प्राप्त होते हैं अथवा असाधारण लाभ शून्य होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि दीर्घकाल के सन्तुलन से यदि फ़र्मों को असाधारण लाभ होते हैं तो दीर्घकाल होने के कारण तथा फ़र्मों के प्रवेश की स्वतन्त्रता के कारण नई फ़र्ने उद्योग में शामिल हो जाती हैं। वस्तुओं की पूर्ति बढ़ जाती है। इससे कीमत कम हो जाती है तथा सभी फ़र्मों को साधारण लाभ होने लगते हैं अथवा असाधारण लाभ शून्य हो जाता है।

यदि किसी समय कीमत निर्धारण इस प्रकार होती है कि कुछ फ़र्मों को असाधारण हानि होती है। यदि दीर्घकाल तक फ़र्मों को हानि होगी तो वह फ़र्ने उद्योग को छोड़ जाती है। इससे वस्तुओं की पूर्ति कम हो जाती है तथा कीमत बढ़ जाती है। इस प्रकार दीर्घकाल में सभी फ़र्मों को केवल साधारण लाभ प्राप्त होते हैं अथवा असाधारण लाभ शून्य होगा।

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
उत्पादक के सन्तुलन से आपका क्या अभिप्राय है ? एक उत्पादक का सन्तुलन उस बिन्दु पर होता है, जहां सीमान्त आय समान सीमान्त लागत होती है। स्पष्ट करो।
(What is producer’s equilibrium ? A producer will be in equilibrium where his MR = MC, Explain.)
अथवा
एक फ़र्म के सन्तुलन को सीमान्त लागत तथा सीमान्त आय द्वारा स्पष्ट करें। (Explain the equilibrium of the firm with Marginal Cost and Marginal Revenue.)
उत्तर-
उत्पादन के सन्तुलन का अर्थ (Meaning of Producers Equilibrium)-एक उत्पादक को उस स्थिति में सन्तुलन में कहा जाता है, जिसमें उसको या तो अधिकतम लाभ प्राप्त होता है तथा या न्यूनतम हानि होती है। स्टोनियर तथा हेग के अनुसार, “एक उत्पादक सन्तुलन में होता है, जब उसको अधिकतम लाभ हों। परन्तु अधिकतम लाभ उस स्थिति में होता है, जहां सीमान्त आय तथा सीमान्त लागत समान होते हैं तथा MC वक्र MR को नीचे से ऊपर की ओर जाती हुई काटती है।”

उत्पादक के सन्तुलन की शर्ते-उत्पादक के सन्तुलन की दो शर्ते होती हैं –

  1. सीमान्त आय (MR) = सीमान्त लागत (MC) हों।
  2. सीमान्त लागत (MC) वक्र सीमान्त आय (MR) वक्र नीचे से ऊपर की ओर जाती हुई काटती हों। इन दो शर्तों को ध्यान में रखकर उत्पादक का सन्तुलन स्पष्ट करते हैं।

(A) पूर्ण प्रतियोगिता में उत्पादक का सन्तुलन (Producer’s Equilibrium Under Perfect Competition)-पूर्ण प्रतियोगिता के बाज़ार में कीमत MC उद्योग में मांग तथा पूर्ति द्वारा निर्धारण होती है। प्रत्येक उत्पादक अथवा फ़र्म उस कीमत को अपना लेती है, इसीलिए कीमत स्थिर रहती है अथवा औसत आय (AR) स्थिर रहता है तथा सीमान्त आय (MR) भी स्थिर रहेगा तथा औसत आय के समान होता है, जैसे कि रेखाचित्र 10.2 में कीमत OP दिखाई है, उत्पादक की AR = MR सीधी रेखा Ox के समान्तर हैं, क्योंकि कीमत समान रहती है। फ़र्म का लाभ अधिक से अधिक उस बिन्दु पर
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन 2
P= MC अथवा MR = MC

होगा जहां होता है, जिसको E बिन्दु द्वारा दिखाया है। फ़र्म OQ वस्तुओं का उत्पादन करेगी। फ़र्म का कुल लाभ (Gross Profit) = TR – TVC है अर्थात् कुल लाभ = शुद्ध लाभ + कुल स्थित लागत प्राप्त होता है। सीमान्त लागत (MC) के निम्न भाग OKEQ को कुल परिवर्तनशील लागत कहा जाता है तथा कुल आय OPEQ है। इस प्रकार कुल लाभ PEK है, जोकि अधिक से अधिक है। यदि यह फ़र्म OQ2 उत्पादन करती है तो इसको PABK लाभ प्राप्त होगा, जोकि पहले से EAB कम है, जिसको शेड़ किए क्षेत्र द्वारा दिखाया है। इसलिए OQ से कम उत्पादन नहीं करना चाहिए। यदि OQ, उत्पादन किया जाता है तो OQ उत्पादन से फ़र्म को PEK लाभ होता है, परन्तु QQ2 उत्पादन से ECD हानि होगी। इसलिए PEK में से EC घटाने से लाभ PEK से कम हो जाएंगा। इससे स्पष्ट है कि फ़र्म को अधिकतम लाभ की स्थिति में दो शर्तों अनिवार्य होती हैं।

  • MR = MC
  • MC must cut MR from below.

(B) एकाधिकारी तथा एकाधिकारी प्रतियोगिता में फ़र्म का सन्तुलन (Firm’s Equilibrium under Monopoly and Monopolistic Competition) एकाधिकारी तथा एकाधिकारी प्रतियोगिता में AR तथा MR घटती सीधी रेखाएं होती हैं। फ़र्म के सन्तुलन को रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट करते हैं। रेखाचित्र 3 में MR = MC द्वारा फ़र्म का सन्तुलन E बिन्दु पर स्थापित होता है। फ़र्म 00 उत्पादन करती है तथा इसको LEK लाभ प्राप्त होता है। यह कुल लाभ अधिकतम है। यदि यह फ़र्म OQ, उत्पादन करती है तो लाभ EAB कम प्राप्त होगा। यदि फ़र्म OQ2 उत्पादन करती है तो OQ तक LEK लाभ होता है, परन्तु OQ2 उत्पादन से ECD हानि होती है। इसलिए LEK में से ECD घटा दी जाए तो कुल लाभ LEK से कम हो AR जाएगा। इस प्रकार सन्तुलन की दो शर्ते पूरी होती है –
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन 3

  • सीमान्त आय = सीमान्त लागत है।
  • सीमान्त लागत वक्र सीमान्त आय वक्र को नीचे से ऊपर की ओर जाती हुई काटती है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन

(C) कुल आय तथा कुल लागत विधि द्वारा उत्पादक का सन्तुलन (Producers’s Equilibrium with Total Revenue & Total Cost Method)- उत्पादक का सन्तुलन कुल आय तथा कुल लागत विधि द्वारा भी माप सकते हैं। एक उत्पादक को अधिकतम लाभ तब प्राप्त होता है जब उसकी कुल आय अधिकतम तथा कुल लागत न्यूनतम हो।
Profit Maximum = TR Maximum – TCminimum
उत्पादक के सन्तुलन को रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। रेखाचित्र 4 में कुल आय तथा कुल लागत रेखाएँ दिखाई गई हैं। TC रेखा के समान्तर रेखा AB खींचते हैं जोकि कुल आय (TR) रेखा को R बिन्दु पर काटती है। RC को मिलाते है। जोकि OX रेखा को K बिन्दु पर काटती है। OK उत्पादन करने पर कुल आय KR अधिक है और कुल लागत KC कम है।

इसलिये RC लाभ प्राप्त होता है जो कि अधिकतम है। यदि उत्पादन को बढ़ाया जाता है या कम किया जाता है तो कुल लाभ कम हो जाएगा। जैसा कि OK1 उत्पादन करने से लाभ R1C1 है और OK2 उत्पादन करने से लाभ R2C2 है जोकि RC से कम है। यदि लाभ E1C1 अथवा E2C2 होता तो RC के बराबर होना था क्योंकि यह समांतर रेखाओं का अन्तर है क्योंकि R1C1 लाभ E1C1 से कम है और R2C2 लाभ E2C2 से कम हैं इसलिये यह लाभ RC से भी कम है इसलिये उत्पादक को OK उत्पादन करना चाहिये यहां पर उसको RC अधिकतम लाभ प्राप्त होता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 10 उत्पादक का सन्तुलन 4

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

Punjab State Board PSEB 11th Class Economics Book Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Economics Chapter 9 आय की धारणाएँ

PSEB 11th Class Economics आय की धारणाएँ Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
आय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसी फ़र्म द्वारा वस्तुओं की बिक्री से प्राप्त मौद्रिक आमदन को आय कहते हैं।

प्रश्न 2.
कुल आय से आप का क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
वस्तुओं की कुल मात्रा बेचने से जो कुल मुद्रा प्राप्त होती है उसको कुल आय कहा जाता है।

प्रश्न 3.
औसत आय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
औसत आय से अभिप्राय प्रति इकाई वस्तु की आय से होता है। औसत आय को वस्तु की कीमत भी कहा जाता है। AR = \(\frac{\mathrm{TR}}{\mathrm{Q}}\) और AR= PRICE

प्रश्न 4.
सीमान्त आय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसी वस्तु की एक अन्य इकाई बेचने से कुल आय में जो वृद्धि होती है उसको सीमान्त आय कहते हैं।
MR = TRn – TRn-1

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

प्रश्न 5.
आय की कौन-सी धारणा को कीमत कहा जाता है ?
उत्तर-
औसत आय की धारणा को कीमत कहा जाता है।

प्रश्न 6.
कुल आय कीमत तथा बिक्री की मात्रा में क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर-
कुल आय तथा बिक्री की मात्रा के अनुपात को कीमत कहते हैं।
Price = \(\frac{\text { T R }}{\text { Output }}\)

प्रश्न 7.
प्रतियोगिता वाली फ़र्म की कीमत और सीमान्त आय में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर-
प्रतियोगिता वाली फ़र्म की कीमत, सीमान्त आय के समान होती है।

प्रश्न 8.
प्रतियोगिता वाली फ़र्म की औसत आय तथा सीमान्त आय बराबर क्यों होती है ?
अथवा
पूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय तथा सीमान्त आय का आकार कैसा होता है ?
उत्तर-
पूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय तथा सीमान्त आय सदैव बराबर होती है क्योंकि कीमत एक-सार रहती है और यह OX के समानान्तर होती है।

प्रश्न 9.
एकाधिकार बाज़ार में औसत आय तथा सीमान्त आय का आकार कैसा होता है ?
उत्तर-
एकाधिकार बाज़ार में औसत आय (AR) घटती है तथा सीमान्त आय (MR) तीव्रता से घटती है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 1

प्रश्न 10.
औसत आय तथा सीमान्त आय में क्या सम्बन्ध होता है ?
उत्तर-

  • जब औसत आय बढ़ती है तो सीमान्त आय तीव्रता से बढ़ती है।
  • जब औसत आय समान रहती है तो सीमान्त आय उसके बराबर हो जाती है।
  • जब औसत आय घटती है तो सीमान्त आय तेजी से घटती है।

प्रश्न 11.
कीमत तथा सीमान्त आय में क्या सम्बन्ध होता है ?
उत्तर-

  1. पूर्ण बाज़ार में Price (AR) = MR
  2. अपूर्ण बाज़ार में Price (AR) > MR

प्रश्न 12.
यदि MR धनात्मक होता है तो TR की स्थिति क्या होती है ?
उत्तर-
R बढ़ता है।

प्रश्न 13.
यदि MR शून्य होता है तो TR की स्थिति क्या होती है ?
उत्तर-
TR अधिकतम होता है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

प्रश्न 14.
जब MR ऋणात्मक होता है तो TR की स्थिति क्या होती है ?
उत्तर-
TR घटता है।

प्रश्न 15.
औसत आय सदैव कीमत के समान होती है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 16.
निम्नलिखित सारणी को पूरा करें।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 2
उत्तर|
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 3

प्रश्न 17.
एक वस्तु की प्रति इकाई बिक्री से प्राप्त होने वाली राशि को …….. कहते हैं।
उत्तर-
कीमत।

प्रश्न 18.
निम्नलिखित सारणी को पूरा करें।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 4
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 5

प्रश्न 19.
जब सीमान्त आय कम हो रही होती है तो कुल आय ………….. से बढ़ती है।
उत्तर-
घटती दर।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित सारणी को पूरा करें।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 6
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 7

प्रश्न 21.
AR= ……………………… .
उत्तर-
AR = \(\frac{\mathrm{TR}}{\mathrm{Q}}\)

प्रश्न 22.
MR = …….
उत्तर-
MR = \(\frac{\Delta \mathrm{TR}}{\Delta \mathrm{Q}}\).

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

प्रश्न 23.
MR = \(\frac{\text { TR }}{\mathbf{Q}}\) = ……………………. .
उत्तर-
AR अथवा Price.

प्रश्न 24.
किसी फ़र्म द्वारा वस्तु की बिक्री से प्राप्त आय को ……… कहा जाता है।
उत्तर-
आय (Revenue)।

प्रश्न 25.
जब औसत आय बढ़ती है तो सीमान्त आय …… है। सीमान्त आय घटती है।
उत्तर-
ग़लत।

प्रश्न 26.
जब औसत आय घटती है तो सीमान्त आय तेजी से घटती है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 27.
सीमान्त आय धनात्मक, शून्य अथवा ऋणात्मक हो सकती है परन्तु औसत आय सदैव धनात्मक रहती है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 28.
जब औसत आय स्थिर रहती है तो सीमान्त आय, औसत आय के बराबर हो जाती है।
उत्तर-
सही।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

प्रश्न 29.
पूर्ण प्रतियोगिता के बाजार में औसत आय और सीमान्त आय पूर्ण लोचशील नहीं होती।
उत्तर-
ग़लत।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
एक फ़र्म अथवा उत्पादक के सन्तुलन से आपका क्या अभिप्राय है ? फ़र्म के सन्तुलन की शर्ते बताओ।
उत्तर-
एक फ़र्म अथवा उत्पादक सन्तुलन में होते हैं, जब उसको अधिकतम लाभ होता है अथवा न्यूनतम हानि होती है। फ़र्म के सन्तुलन की दो शर्ते हैं-

  • फ़र्म की सीमान्त आय (MR) = सीमान्त लागत (MC) होनी चाहिए।
  • सीमान्त लागत (MC) वक्र सीमान्त आय (MR) को नीचे से ऊपर की ओर जाती हुई काटकर गुजरती हों।

प्रश्न 2.
एक फ़र्म की साधारण सन्तुलन की शर्ते बताओ।
अथवा
एक प्रतियोगी फ़र्म के अधिकतम लाभ की क्या शर्त होती है ?
उत्तर-
देखो इसके लिए प्रश्न 9.1 देखें।

प्रश्न 3.
कुल लाभ तथा शुद्ध लाभ में अन्तर बताओ।
उत्तर-
यदि कुल आय (TR) में से कुल परिवर्तनशील लागत (TVC) घटा दी जाए तो इसको कुल लाभ कहा जाता है।
कुल लाभ = TR – TVC
अथवा
Net Profit + TFC
शुद्ध लाभ का अर्थ है कुल आय घटाओ कुल लागत
शुद्ध लाभ = कुल आय (TR) – कुल लागत (TC)
अथवा
Net Profit = TR – TVC – TFC |
शुद्ध लाभ = कुल लाभ – कुल स्थिर लागत।

प्रश्न 4.
साधारण लाभ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
एक फ़र्म को उसी समय साधारण लाभ प्राप्त होता है, जब उस फ़र्म का सन्तुलन इस प्रकार होता है।
MR = MC
&
AR = AC
औसत लागत में उत्पादक का अपनी मेहनत का ईवजाना भी शामिल होता है, जिसको शून्य असाधारण लाभ (zero abnormal profit) कहा जाता है। जैसेकि रेखाचित्र में OQ उत्पादन से साधारण लाभ होगा।

प्रश्न 5.
असाधारण लाभ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
एक फ़र्म को साधारण लाभ से अधिक लाभ प्राप्त होता है इसको असाधारण लाभ कहा जाता है।
जैसेकि रेखाचित्र 2 में OQ1 उत्पादन करने से E1C1 साधारण से अधिक लाभ होता है। इसको असाधारण लाभ कहा जाता है। उसी समय होती है।
TR > TC अथवा AR > AC |
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 8

प्रश्न 6.
समविच्छेद कीमत (Break-even Price) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जिस बिन्दु पर औसत आय तथा औसत लागत एक दूसरे को काटती है, उसको समविच्छेद कीमत कहा जाता है। रेखाचित्र 3 AR = AC बिन्दु B पर समान हैं। OP कीमत को समविच्छेद कीमत कहा जाता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 9

प्रश्न 7.
फ़र्म के बन्द होने के बिन्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
एक फ़र्म के बन्द होने का बिन्दु वह बिन्दु है जहां कि फ़र्म की कुल आय (TR) = कुल परिवर्तनशील लागत के समान होती है। यदि कीमत इस कीमत से थोड़ी-सी भी कम हो जाए तो फ़र्म कार्य बन्द कर देती है। इसीलिए इस बिन्दु को फ़र्म बन्द होने का बिन्दु कहा जाता है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
पूर्ण प्रतियोगिता अथवा एकाधिकारी में औसत आय तथा सीमान्त आय के सम्बन्ध को सूची पत्र द्वारा स्पष्ट करो।
अथवा
औसत आय तथा सीमान्त आय के सम्बन्ध को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करो।
अथवा
औसत आय तथा सीमान्त आय में क्या सम्बन्ध होता है ? .
उत्तर-

  • जब औसत आय समान होती है तो सीमान्त आय इसके समान होती है। यह स्थिति पूर्ण प्रतियोगिता में पाई जाती है।
  • जब औसत आय घटती है तो सीमान्त आय तीव्रता से घटती है। औसत आय हमेशा धनात्मक होती है परन्तु सीमान्त आय धनात्मक, शून्य अथवा ऋणात्मक हो सकता है, जैसे कि एकाधिकारी अथवा अपूर्ण प्रतियोगिता में होता है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 10
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 11
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 12
सूची पत्र अनुसार-

  • पूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय तथा सीमान्त आय समान होते हैं। जैसा कि रेखाचित्र 4 भाग-A में दिखाया गया है।
  • एकाधिकारी तथा अपूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय घटती है तो सीमान्त आय तीव्रता से घटती है। 4 वस्तुएं उत्पादन करने से MR = 0 है तो पांचवीं तथा छठी वस्तु के उत्पादन से MR ऋणात्मक है। जैसा कि रेखाचित्र 5 भाग-B में दिखाया गया है।

प्रश्न 2.
सीमान्त आय तथा कुल आय के सम्बन्ध को स्पष्ट करो।
अथवा
रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट करो कि सीमान्त आय शून्य होती है तो कुल आय अधिकतम होती है।
अथवा
सूची पत्र तथा रेखाचित्र द्वारा कुल आय, औसत आय तथा सीमान्त आय के सम्बन्ध को स्पष्ट करो।
उत्तर-
सीमान्त आय के योग से कुल आय प्राप्त की जाती है। इनके सम्बन्ध को सूची पत्र तथा रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट करते हैं
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 13
रेखाचित्र 6 अनुसार …

  1. कुल आय में वृद्धि घटते अनुपात पर होती है क्योंकि MR घटता है।
  2. कुल आय ₹ 12, 12 समान है तो MR = 0 हो जाता है।
  3. कुल आय घटने लगती है तो MR = (-) ऋणात्मक हो जाता है।
  4. जब MR = 0 है तो कुल आय QM अधिकतम है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 14

प्रश्न 3.
सीमान्त आय की परिभाषा दीजिए, पूर्ण प्रतियोगिता तथा एकाधिकारी में औसत आय तथा सीमान्त आय के सम्बन्ध को रेखाचित्रों द्वारा स्पष्ट करो।
उत्तर-
सीमान्त आय (Marginal Revenue)-जब वस्तु की एक अन्य इकाई बेचने से कुल आय में जो वृद्धि होती है, उसको सीमान्त आय कहा जाता है।
1. पूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय तथा सीमान्त आयपूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु की कीमत एक समान होती है। इसलिए औसत आय समान होती है। जब औसत आय समान होती है तो सीमान्त आय भी इसके समान होती है। जैसा कि रेखाचित्र 7 में दिखाया गया है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 15
2. एकाधिकारी में औसत आय तथा सीमान्त आयएकाधिकारी में वस्तु की कीमत को घटाकर ही अधिक बिक्री की जा सकती है। इसलिए जब औसत आय घटती है तो सीमान्त आय तीव्रता से दोगुणी दर पर घटती है। जैसा कि रेखाचित्र 8 में दिखाया गया है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 16

प्रश्न 4.
औसत आय की धारणा को कीमत कहा जाता है।
उत्तर-
वस्तु की औसत आय को कीमत भी कहा जाता है। उदाहरण के लिए एक वस्तु की कीमत ₹ 5 प्रति वस्तु है उपभोगी 20 इकाइयों की खरीद करता है तो कुल आय = 20 x 5 = ₹ 100 है। औसत आय इस प्रकार प्राप्त की जाती है-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 17
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 18
सूची पत्र तथा रेखाचित्र 9 में कीमत ₹ 5 दिखाई गई है और औसत आय भी कीमत के सामान्य होती है रेखा- चित्र में भी कीमत = औसत आय है। इस प्रकार औसत आय का दूसरा नाम कीमत होता है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
आय की धारणाओं को स्पष्ट करो। इनके सम्बन्धों की व्याख्या करो। (Explain the concepts of Revenue. Explain their Relationship.)
अथवा
कुल आय, औसत आय तथा सीमान्त आय से क्या अभिप्राय है ? इनके परस्पर सम्बन्ध को स्पष्ट करो।
(What do you mean by Total Revenue, Average Revenue and Marginal Revenue ? Explain their mutual relationship.)
उत्तर-
एक फ़र्म वस्तुओं का उत्पादन करने के पश्चात् उनकी बिक्री से जो आय प्राप्त करती है, उसको आय (Revenue) कहते हैं। आय की मुख्य तीन धारणाएं हैं

  1. कुल आय (Total Revenue)
  2. औसत आय (Average Revenue)
  3. सीमान्त आय (Marginal Revenue)

आय की इन तीन धारणाओं को एक सूचीपत्र की सहायता से स्पष्ट कर सकते हैं-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 19
1. कुल आय (Total Revenue)-उत्पादन की बेची गई इकाइयों को कीमत पर गुणा करने से कुल आय प्राप्त की जाती है, जैसे कि 1 वस्तु बेचने से कुल आय 10 x 1 = ₹ 10 तथा दो वस्तुएं बेचने से ₹ 2×9 = 18 प्राप्त होती है।
कुल आय = कीमत x उत्पादन

2. औसत आय (Average Revenue)-कुल उत्पादन को उत्पादन पर विभाजित करने से औसत आय प्राप्त होती है। औसत आय तथा कीमत हमेशा स्थिर होती है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 20
3. सीमान्त आय (Marginal Revenue)-वस्तु की एक इकाई अन्य बेचने से जो कुल आय में वृद्धि होती है, उसको सीमान्त आय कहा जाता है। जैसे कि सूची पत्र में 1 वस्तु बेचने से कुल आय ₹ 10 तथा 2 वस्तुएं बेचने से ₹ 18 आय प्राप्त होती है तो कुल आय में वृद्धि ₹ 8 है। जिसको सीमान्त आय कहा जाता है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 21
कल आय, औसत आय तथा सीमान्त आय का सम्बन्ध – रेखाचित्र 10 में कुल औसत, औसत आय तथा सीमान्त आय के सम्बन्ध को स्पष्ट किया गया है। रेखाचित्र के भाग (A) में दिखाया है कि जब औसत आय घटती है तो सीमान्त आय तीव्रता से घटती है।

  • औसत आय (AR) कभी भी शून्य नहीं होती, क्योंकि प्रत्येक वस्तु की कुछ-न-कुछ कीमत आवश्यक होती है।
  • सीमान्त आय (MR) तीव्रता से घटती है, यह शून्य (0) भी हो सकती है तथा ऋणात्मक (-) भी हो सकती है।
  • भाग B में कुल आय दिखाई है, जोकि पहले बढ़ती रेखाचित्र 10 जाती है। जबकि सीमान्त आय (MR) = 0 हो जाती है तो कुल आय अधिकतम (Maximum) होती है तथा जब सीमान्त आय (MR) ऋणात्मक हो जाती है तो कुल आय घटने लगती है।

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 22

विभिन्न बाजारों में आय रेखाओं का सम्बन्ध (Relationship between Revenue Curves in different Markets)-प्रतियोगिता के आधार पर बाज़ार को तीन भागों में विभाजित करते हैं-

  1. पूर्ण प्रतियोगिता का बाज़ार
  2. एकाधिकारी बाज़ार
  3. अपूर्ण प्रतियोगिता का बाज़ार इन तीन बाज़ार की स्थितियों में आय वक्र के सम्बन्धों को स्पष्ट किया जा सकता है

1. पूर्ण प्रतियोगिता में आय वक्र (Revenue Curves Under Perfect)-पूर्ण प्रतियोगिता के बाज़ार में कीमत उद्योग में मांग तथा कीमत द्वारा निर्धारण हो जाता है। प्रत्येक फ़र्म इस कीमत पर ही वस्तु की बिक्री करती है। उदाहरणस्वरूप
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 23
सूचीपत्र तथा रेखाचित्र 11 में औसत आय तथा सीमान्त आय ₹ 10, 10 समान हैं। इस स्थिति में AR = MR सीधी रेखा Ox के समान्तर बनती है, जिसको पूर्ण लोचशील वक्र कहा जाता है।

2. एकाधिकारी में आय वक्र (Revenue Curves Under Monopoly)-एकाधिकारी में वस्तु उत्पन्न करने वाला एक उत्पादन होता है। यदि वह कीमत में कमी करता है तो वस्तु की अधिक मात्रा बिकती है। औसत आय कम हो जाती है तो सीमान्त आय तीव्रता से घटती है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 24
सूचीपत्र में जब कीमत 10, 9, 8 घटती है तो सीमान्त आय 10, 8, 6 तीव्रता से घटती है। रेखाचित्र 12 में AR घटती है तथा MR तीव्रता से दोगुणी दर पर घटती है तथा मांग की लोच इकाई से कम (Ed < 1) होती है। 3. अपूर्ण प्रतियोगिता में आय वक्र (Revenue Curves Under Monopolistic Competition)-एकाधिकारी प्रतियोगिता के बाज़ार में फ़र्मे अपनी वस्तु को रजिस्टर्ड करवा लेती है, जैसे कि टैक्सला टी०वी० रजिस्टर्ड है। इससे कोई अन्य उत्पादन टी० वी० नहीं बना सकता। इसलिए फ़र्म का एकाधिकारी है, परन्तु बाज़ार में L.G., फिलिप्स इत्यादि अन्य टी० वी० भी हैं। इनमें प्रतियोगिता होती है।

इसीलिए इस बाज़ार को एकाधिकारी प्रतियोगिता अथवा अपूर्ण प्रतियोगिता का बाज़ार कहते हैं। इस बाज़ार में एकाधिकारी जैसे औसत MR आय AR घटती रेखा होती है तथा सीमान्त आय (MR) तीव्रता से घटती रेखा होती है। परन्तु इसकी औसत आय तथा सीमान्त आय अधिक लोचशील होती है, जैसे कि रेखाचित्र 13 में औसत आय तथा सीमान्त आय नीचे की ओर घटती सीधी रेखाएं हैं। परन्तु इनकी मांग की लोच इकाई से अधिक (Ed > 1) है, क्योंकि यदि कोका कोला ₹ 10 की जगह पर ₹ 9 हो जाए तथा पैप्सी कोक ₹ 10 का ही रहता है तो कोका कोला की मांग बहुत अधिक होगी।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 25

V. संख्यात्मक प्रश्न (Numericals)
आय की धारणाएं (Concepts Of Revenue)

प्रश्न 1.
एक फ़र्म की कुल आय अनुसूची दी गई है। इस फ़र्म की वस्तु कीमत कितनी है ?
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 26
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 27

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

प्रश्न 2.
निम्न सूचीपत्र को पूरा करो।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 28
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 29

प्रश्न 3.
निम्न सूची पत्र को पूरा करो। वस्तुओं की बिक्री ।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 30
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 31

प्रश्न 4.
निम्नलिखित सूची पत्र को पूरा करो।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 32
उत्तर –
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 33

प्रश्न 5.
निम्न सूची पत्र को पूरा करो।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 34
उत्तर –
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 35

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

प्रश्न 6.
एक प्रतियोगिता वाली फ़र्म को बाज़ार में ₹ 15 कीमत प्राप्त होती है।
(a) इस फ़र्म की कुल आय अनुसूची बताओ जब उत्पादन 0 से 10 तक वस्तुओं की इकाइयां किया जाता
(b) यदि बाज़ार में कीमत बढ़कर ₹ 17 हो जाए तो नई आय वक्र चपटी अथवा खड़वीं होगी ?
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 36
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 37
प्रतियोगिता वाले बाज़ार में जो कीमत ₹ 15 से बढ़कर ₹ 17 हो जाती है तो कुल आय वक्र खड़वी (Steeper) होगी, जैसे कि रेखाचित्र 14 में कीमत ₹ 15 है तो कुल आय की ढाल TR, है। जब कीमत बढ़कर ₹ 17 हो जाती है तो कुल आय की ढाल TRA है। TR अधिक खड़वी रेखा है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 38

प्रश्न 7.
निम्नलिखित सूचीपत्र को पूरा करो यदि वस्तु की एक इकाई 5 रुपए की बेची जा सकती है।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 39
उत्तर–
प्रति इकाई वस्तु की कीमत = 5 रुपए
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 40

प्रश्न 8.
निम्नलिखित सूचीपत्र को पूरा करो।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 41
उत्तर
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 42

प्रश्न 9.
निम्नलिखित सूची पत्र को पूरा करो
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 43
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 44

प्रश्न 10.
निम्नलिखित सूचीपत्र को पूरा करो-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 45
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 46

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

प्रश्न 11.
एक एकाधिकारी की मांग अनुसूची दी गई है। इससे कुल आय (TR), औसत आय (AR) तथा सीमान्त आय (MR) सूची बनाओ।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 47
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 48

प्रश्न 12.
एक एकाधिकारी फ़र्म की सीमान्त आय सूची दी हुई है। कुल आय तथा औसत आय सूची बनाओ।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 49
उत्तर –
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 50

प्रश्न 13.
निम्नलिखित सूचीपत्र से कुल आय TR, औसत आय AR तथा सीमान्त आय ज्ञात करो।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 51
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 52

प्रश्न 14.
निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से औसत लागत और कुल लागत ज्ञात करें –
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 53
उत्तर –
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 54

प्रश्न 15.
निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से औसत लागत और कुल लागत ज्ञात करें –
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 55
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 56

PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ

प्रश्न 16.
निम्नलिखित अनुसूची आंकड़ों की सहायता से औसत लागत और सीमान्त लागत ज्ञात कीजिए।
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 57
उत्तर-
PSEB 11th Class Economics Solutions Chapter 9 आय की धारणाएँ 58

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

Punjab State Board PSEB 3rd Class Maths Book Solutions Chapter 10 Data Handling Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 3 Maths Chapter 10 Data Handling

PAGE 197:

Question 1.
Following pictograph shows cartoon programes liked by students of school.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 1

PAGE 198:

Answer the questions on the basis of above pictograph:

(i) Which cartoon is most popular among students ?
Solution.
Dora.

(ii) Which cartoon is least popular among students ?
Solution.
Motu Patlu.

(iii) How many student like the cartoon of Doremon?
Solution.
4 × 10 = 40.

(iv) Which of the two cartoons are equally popular among students?
Solution.
Tom and Jerry and Krishna.

(v) How many students like Chhota Bheem and Motu Patlu ?
Solution.
(3 + 2) × 10 = 5 × 10 = 50.

(vi) Is there any other way to represent the above data ?
Solution.
Yes.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

Question 2.
Look at the pictograph given below and answer the questions : ||B| = 3 runs

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 2

(i) Who scored maximum number of runs and how many ?
Solution.
Rohit Sharma scored maximum 10 × 3 = 30 runs.

(ii)
Who scored minimum number of runs and how many ?
Solution.
Mahinder Singh Dhoni scored minimum 4 × 3 = 12 runs.

(ii)
Which two players scored same number of runs and how many ?
Solution.
Yuvraj Singh and Shikhar Dhawan both scored 6 × 3 = 18 runs each.

(iv) Total runs scored by Shikhar Dhawan and Virat Kohli ?
Solution.
Shikhar Dhawan and Virat Kohli both scored (6 + 7) × 3 = 39 runs.

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Question 3.
The following table shows the marks obtained by a III class student Gurjot in her exams :

Solution.

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PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

Question 4.
In a school, five classes have been given the responsibility to take care of 5 flower beds. The following table shows the number of flowers in each bed, alloted to the different classes:

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 5

Represent the above information with the help of a pictograph:
Assume PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 7 = 2 Flowers
Solution.

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PAGE 200:
Let’s learn:

Question 1.
The different figure shapes of maths kit are shown in the following box:

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 8

1. Represent the above data by using tally marks:
Solution.

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Question 2.
Today is Manjit Singh’s birthday. He is the student of 3rd class. His classmates have decorated a wall of the classroom with some colourful balloons.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 10

Represent the information given at previous page with the help of tally marks.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 11

Solution.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 12

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

Find:
(i) Which colour has maximum number of balloons ?
Solution.
Orange.

(ii) How many yellow balloons are there ?
Solution.
Seven.

(iii) How many balloons are there in total ?
Solution.
41.

Question 3.
Third class students were asked about their favourite fruits. Their choices are given below:

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 13

PAGE 203:

Represent the information given at previous page with the help of tally marks :

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 14

Solution.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 15

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

Find :
(i) Which fruit is the choice of maximum students?
Solution.
Banana.

(ii) Which fruit is the choice of least number of students?
Solution.
Apple.

(iii) How many students opt for Banana?
Solution.
7.

(iv) How many students like Apples?
Solution.
2.

Question 4.
The following table shows the favourite games of Third class students:

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PAGE 204:

Answer the following questions:

(i) Which is the most favourite game of students ?
Solution.
Cricket.

(ii) Which is the least favourite game of students ?
Solution.
Football.

(iii) How many students like to play Kho-Kho ?
Solution.
12.

(iv) How many students in total like to play Football and Cricket ?
Solution.
19.

(v) How many students are studying in class in ?
Solution.
39.

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Question 5.
The table given below shows the favourite colours of 3rd class students:

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 17

Answer these questions:
(i) Which is the most favourite colour of the students ?
Solution.
Blue.

(ii) Which is the least favourite colour of the students?
Solution.
Brown.

(iii) How many students like red colour ?
Solution.
5.

(iv) Which colours are equally liked by the students?
Solution.
Red and Green.

(v) How many students study in class HI?
Solution.
33.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

Worksheet:

Question 1.
If PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 18 = 5 students then PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 19 = ____ students.
Solution.
25

Question 2.
In a school’s annual day function four students of class III made bouquets that are shown in the pictograph as below.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 20

(i) Jaspreet Singh used one flower to make a bouquet. (✓ Or ✗)
Solution.
✗.

(ii) Sandeep used 20 flowers to make a bouquet. (✓ Or ✗)
Solution.
✓.

(iii) Sandeep used maximum number of flowers to make a bouquet. (✓ Or ✗)
Solution.
✗.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

(iv) Which of the student used 5 flowers to make a bouquet?
(a) Jaspreet Singh
(b) Harpreet Singh
(c) Amandeep Kaur
(d) Sandeep.
Solution.
(a) Jaspreet Singh.

(v) All students used _______ flowers to make a bouquet.
Solution.
15 × 5 = 75.

(vi) Which of the two students used same number of flowers to make bouquets ?
(a) Jaspreet Singh and Harpreet Singh
(b) Harpreet Singh and Amandeep Kaur
(c) Amandeep Kaur and Sandeep
(d) Harpreet Singh and Sandeep.
Solution.
(b) Harpreet Singh and Amandeep Kaur.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

(vii) Which tally marks is used to show the flowers used by Amandeep Kaur ?

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 21

Solution.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 22

(viii) Which student used PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 23 for the number of flowers show n in the tally marks?
(a) Amandeep Kaur
(b) Jaspreet Singh
(c) Sandeep
(d) Harpreet Singh
Solution.
(c) Sandeep.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

(ix) In the above table stands for PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 24 (✓ Or ✗)
Solution.

Multiple Choice Questions:

(i) The information about the children going to different place during summer, vacations is shown in the following table. After studying the table answer the following questions.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 25

Question 1.
What is the number of children going to Harmandir Sahib ?
(a) 48
(b) 15
(c) 8
(d) 7
Solution.
(c) 8.

Question 2.
The number of Children going to Chhatbeadh is ______ than going to Bhakhra Dam.
(a) Less
(b) More
(c) Equal
(d) None of these.
Solution.
(b) More.

PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling

Question 3.
Which number is ‘shown by the telly mark PSEB 3rd Class Maths Solutions Chapter 10 Data Handling 26?
Solution.
7.