PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 23 ग्रामीण ऋण

Punjab State Board PSEB 12th Class Economics Book Solutions Chapter 23 ग्रामीण ऋण Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Economics Chapter 23 ग्रामीण ऋण

PSEB 12th Class Economics ग्रामीण ऋण Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता का कोई एक उद्देश्य बताओ।
उत्तर-
उत्पादक व्यय-इस उद्देश्य के लिए ऋण जमीन खरीदने अथवा ज़मीन के सुधार के लिए प्राप्त किया जाता |

प्रश्न 2.
ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कोई एक कारण बताओ।
उत्तर-
किसान निर्धन होने के कारण कृषि अथवा पारिवारिक व्यय के लिए ऋण लेता है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण ऋणग्रस्तता का कोई एक प्रभाव बताओ।
उत्तर-
ऋण से किसान अपनी भूमि बेचकर ऋण तथा ब्याज का भार उतारता है। इसलिए वह भूमिरहित मज़दूर बन जाता है।

प्रश्न 4.
ग्रामीण ऋणग्रस्तता की समस्या के लिए कोई एक सुझाव दीजिए।
उत्तर-
भारत में किसानों पर चले आ रहे पुराने ऋण का निपटारा करना चाहिए। बहुत पुराने ऋण को समाप्त कर देना चाहिए।

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प्रश्न 5.
श्री ………….. का यह कथन ठीक है, “भारतीय किसान कर्जे में जन्म लेता है, कर्ज़ में रहता है तथा कर्ज़ में मर जाता है।”
(a) एम० एल० डार्लिंग
(c) मनमोहन सिंह
(c) एस० एस० जोहल
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(a) एम० एल० डार्लिंग।

प्रश्न 6.
अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण तथा विनियोग सर्वेक्षण (1980-81) के अनुसार भारत में .. प्रतिशत कृषक परिवार ऋणग्रस्त हैं।
(a) 43%
(b) 53%
(c) 63%
(d) 73%.
उत्तर-
(a) 43%.

प्रश्न 7.
भारत में ग्रामीण ऋण का मुख्य कारण …… ……
(a) निर्धनता
(b) पैतृक ऋण
(c) मानसून की अनिश्चितता
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(d) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 8.
ऋणग्रस्तता के मुख्य प्रतिकूल प्रभाव …
(a) आर्थिक प्रभाव
(b) सामाजिक प्रभाव
(c) नैतिक प्रभाव
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(d) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 9.
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता सम्बन्धी अनुमान सबसे पहले किसने लगाया ?
उत्तर-
भारत में ग्राणीण ऋणग्रस्तता का अनुमान समय से पहले 1911 में श्री मैकलेगन ने लगाया।

प्रश्न 10.
भारत में उत्पादक व्यय के लिए 35.1% ऋण प्राप्त किया जाता है।
उत्तर-
सही।

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प्रश्न 11.
भारत में किसान पारिवारिक व्यय के लिए 51% ऋण प्राप्त करते हैं।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 12.
पारिवारिक व्यय के लिए भारत के किसान द्वारा ऋण का कितने प्रतिशत ऋण प्राप्त किया जाता
(a) 30%
(b) 51%
(c) 50%
(d) 60%.
उत्तर-
(b) 51%.

प्रश्न 13.
भारत में उत्पादन उद्देश्य के लिए सबसे कम ऋण प्राप्त किया जाता है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 14.
अल्पकाल के ग्रामीण ऋण के उद्देश्य बताओ।
उत्तर-
किसानों को 15 मास अथवा इससे कम समय के लिए ऋण अनिवार्य है। इस ऋण का उद्देश्य घरेलू व्ययों को पूरा करना होता है।

प्रश्न 15.
मध्यकालीन ऋण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसानों को कुछ ऋण मध्यम समय के लिए भी प्राप्त करना पड़ता है। यह ऋण 15 मास से 5 वर्ष के समय तक हो सकता है।

प्रश्न 16.
दीर्घकाल के ऋण को स्पष्ट करो।
उत्तर-
किसानों द्वारा 5 वर्ष से अधिक समय के लिए जो ऋण अनिवार्य है, उसको दीर्घकाल का ऋण कहा जाता है।

प्रश्न 17.
उत्पादक तथा अन-उत्पादक ऋण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
उत्पादक ऋण वह ऋण होता है, जोकि भूमि के विकास अथवा कृषि की आवश्यकताओं बीज, खाद, औज़ारों इत्यादि पर व्यय करने के लिए प्राप्त किया जाता है। अन-उत्पादक व्यय शादियों, जन्म, मृत्यु अथवा मुकद्दमेबाजी के लिए प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 18.
ग्रामीण उधार में व्यापारिक बैंकों का योगदान स्पष्ट करो।
उत्तर-
2016-17 में 4 लाख करोड़ रु० का उधार व्यापारिक बैंकों द्वारा दिया गया।

प्रश्न 19.
किसान उधार कार्ड योजना से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसान उधार कार्ड योजना (Kishan Credit Card Scheme) भारत में 1998-99 में आरम्भ की गई। 2012-13 तक 82 लाख कार्ड दिए गए।

प्रश्न 20.
कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक के योगदान पर नोट लिखो।
उत्तर-
कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास राष्ट्रीय बैंक (NABARD) की स्थापना जुलाई, 1982 में की गई। इस बैंक का उद्देश्य ग्रामों में सड़कों, सिंचाई, पुलों, पक्की गलियों इत्यादि की सुविधाओं के लिए उधार का प्रबन्ध करना है। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए 2012-13 तक इस बैंक ने 42221 करोड़ रु० का ऋण प्रदान किया है।

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प्रश्न 21.
जो ऋण किसान अपनी वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लेता है, जिसकी अवधि 15 महीने तक की होती है को अल्पकालीन साख कहते हैं।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 22.
जो ऋण खेती के यन्त्र खरीदने, कुआं खुदवाने आदि कार्यों को पूरा करने के लिए 5 साल की अवधि के लिए लेता है को ……….. साख कहते हैं।
उत्तर-
मध्यकालीन साख (Medium Term Credit)।

प्रश्न 23.
जो ऋण पुराने कर्जे चुकाने, ट्रैक्टर खरीदने अथवा ज़मीन खरीदने के लिए 15 से 20 साल तक की अवधि के लिए लिए जाते हैं उनको … …. साख कहते हैं।
उत्तर-
दीर्घकालीन साख (Long Term Credit)।

प्रश्न 24.
जो कर्ज़ जन्म मृत्यु अथवा मुकद्दमेबाज़ी पर व्यय के लिए लिया जाता है को अन-उत्पादक कहते
उत्तर-
सही।

प्रश्न 25.
भारत में कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास राष्ट्रीय बैंक (NABARD) की स्थापना सन् …… में की गई।
(a) 1962
(b) 1972
(c) 1982
(d) 1992.
उत्तर-
(c) 1982.

प्रश्न 26.
भारत में कृषक को सबसे अधिक ऋण ………….. द्वारा दिया जाता है।
(a) साहूकार
(b) व्यापारी
(c) व्यापारिक और ग्रामीण बैंक
(d) सहकारी समितियां।
उत्तर-
(c) व्यापारिक और ग्रामीण बैंक।

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प्रश्न 27.
भारत में आज भी कृषक साहूकार से ऋण प्राप्त करता है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 28.
भारत में 2012-13 में संस्थागत ग्रामीण ऋण …………. था।
(a) 59%
(b) 69%
(c) 79%
(d) 89%.
उत्तर-
(b) 69%.

प्रश्न 29.
भारत में गैर-संस्थागत ग्रामीण ऋण बढ़ रहा है ?
उत्तर-
ग़लत।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कारण बताओ।
उत्तर-
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

  • निर्धनता-भारत का किसान निर्धन है। कृषि करने के लिए उसको कम समय तथा लंबे समय के ऋण की आवश्यकता पड़ती है।
  • धार्मिक तथा सामाजिक रीति-रिवाज-भारतीय किसान सामाजिक तथा धार्मिक रीति-रिवाजों पर बहुत व्यय करता है। इस कारण जन्म, मृत्यु, शादी इत्यादि उद्देश्यों के लिए ऋण लेना पड़ता है।

प्रश्न 2.
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के प्रभाव बताओ।
उत्तर-
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के मुख्य प्रभाव इस प्रकार हैं –

  1. आर्थिक प्रभाव-छोटे तथा सीमांत काश्तकारों को अपनी ज़मीन गिरवी रखकर ऋण लेना पड़ता है। ऋण तथा ब्याज वापिस करने के लिए उनको ज़मीन बेचनी पड़ती है तथा वह भूमिरहित मज़दूर बन जाता
  2. सामाजिक प्रभाव-सामाजिक तौर पर ऋण काश्तकार, साहूकार को गुलाम बना देता है। इसके । परिणामस्वरूप साहूकार किसान का शोषण करता है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण ऋणग्रस्तता की समस्या के लिए उपाय बताओ।
उत्तर-
ग्रामीण ऋणग्रस्तता की समस्या के लिए दो प्रकार के सुझाव दिए जाते हैं –
(A) पुराने ऋण का निपटारा-बहुत से राज्यों में कानून बनाए गए हैं ताकि पुराने ऋण का निपटारा किया जा सके।

  • नए कानून अनुसार जहां किसान ने ऋण का ब्याज ऋण की राशि से बढ़कर दिया है, उस स्थिति में पुराना ऋण समाप्त किया जाए।
  • पुराने ऋण की मूल राशि वापिस की जाए अथवा सरकारी एजेंसियों से कम ब्याज पर ऋण लेकर पुराने ऋण की वापसी की जाए।

(B) नए ऋण पर नियन्त्रण-पुराने ऋण के निपटारे से समस्या का हल नहीं किया जा सकता। इसलिए नए ऋण केवल उत्पादक उद्देश्यों के लिए दिए जाएं। ब्याज की दर कम की जाए। सामाजिक तथा धार्मिक उद्देश्यों के लिए ऋण को निरुत्साहित किया जाए।

प्रश्न 4.
उत्पादक तथा अन-उत्पादक उधार से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भारत में ग्रामीण कृषि उत्पादन वित्त की आवश्यकताओं का वर्गीकरण इस प्रकार है –

  1. उत्पादक उधार-किसानों को बीज, रासायनिक खाद, पानी, औज़ार इत्यादि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उधार लेना पड़ता है। इसको उत्पादक उधार कहा जाता है।
  2. अन-उत्पादक उधार-शादियों, जन्म-मृत्यु, मुकद्दमेबाजी इत्यादि आवश्यकताओं के लिए प्राप्त किया – ऋण अन-उत्पादक होता है।

प्रश्न 5.
अल्प, मध्यम तथा दीर्घकालीन ऋण क्या होता है ?
उत्तर-
अल्प, मध्यम तथा दीर्घकालीन उधार-उधार को समय के आधार पर तीन भागों में विभाजित किया जाता है-
1. अल्पकाल उधार-किसानों को अल्पकाल के लिए अल्पकाल की आवश्यकता पड़ती है जोकि 15 महीनों के लिए होता है, घरेलू आवश्यकताओं के लिए प्राप्त किया जाता है। किसान को बीज, खाद, दवाइयों की खरीद करनी होती है। इस उद्देश्य के लिए जो ऋण प्राप्त किया जाता है, वह फसल की कटाई उपरान्त अदा किया जाता है।

2. मध्यमकालीन उधार-किसान को उधार की आवश्यकता मध्यमकाल के लिए भी पड़ती है। यह ऋण 15 महीने से 5 वर्ष के समय तक का होता है। ट्रैक्टर, ट्यूबवैल तथा अन्य कृषि उत्पादन औज़ारों की खरीद करने के लिए मध्यमकाल के ऋण की आवश्यकता होती है। इस ऋण की वापसी के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है।

3. दीर्घकालीन उधार-दीर्घकालीन ऋण 5 वर्ष से 20 वर्ष तक के समय के लिए प्राप्त किया जाता है। यह ऋण अन्य ज़मीन खरीदने के लिए अथवा पुराने ऋण का भुगतान करने के लिए लिया जाता है। इस ऋण की वापसी दीर्घकाल में की जाती है।

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प्रश्न 6.
संस्थागत ऋण के कोई दो स्रोत बताएं।
उत्तर-

  • सहकारी साख समितियां-सहकारी साख समितियां उधार का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। 1950-51 में सहकारी समितियों द्वारा 23 करोड़ रु० का उधार दिया गया। 2016-17 में यह उधार 267 करोड़ रु० हो गया।
  • सहकारी कृषि तथा ग्रामीण विकास बैंक-किसानों की दीर्घकाल की आवश्यकताओं की पर्ति के लिए सहकारी साख बैंक स्थापित किए गए हैं। सहकारी बैंक भी साख का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। 1984-85 में सहकारी बैंकों द्वारा 3440 करोड़ रु० का ऋण दिया गया। 2016-17 में – 97321 हज़ार करोड़ रु० का ऋण दिया गया।

प्रश्न 7.
नाबार्ड पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक (NABARD)-भारत के रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने अल्पकाल तथा दीर्घकाल की कृषि उत्पादन ऋण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 1982 में कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की। इसकी अधिकारित पूंजी 2000 करोड़ रु० है। इस बैंक ने 6280 करोड़ रु० की अधिक पूंजी 2001-02 में एकत्रित की। यह बैंक ग्रामीण क्षेत्र की अल्पकाल तथा दीर्घकाल की उधार आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्थापित किया गया है। NABARD द्वारा 2016-17 में 51411 करोड़ रु० का ऋण अल्पकाल की आवश्यकताओं के लिए दिया गया, जिस पर रियायती ब्याज दर 3% निर्धारित की।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Typé Questions)

प्रश्न 1.
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के अनुमान को स्पष्ट करो।
अथवा
भारत में रिज़र्व बैंक के सर्व-भारती ऋण सर्वेक्षण 1991-92 का उल्लेख करो।
उत्तर-
भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् 1991-92 में रिज़र्व बैंक इंडिया सर्वभारती ऋण सर्वेक्षण किया। इस सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 42.8 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों पर ऋण था। 1971 में ग्रामीण परिवारों पर 500 रु० का औसत ऋण था जोकि 1991 में बढ़कर 1906 रु० हो गया था। किए गए सर्वेक्षण में काश्तकारों तथा गैर- काश्तकारों पर ऋण का अनुमान लगाया गया। यह ऋण ग्रामीण परिवारों द्वारा दी गई सूचना पर आधारित था। इस ऋण में संस्थागत ऋण (बैंकों, सहकारी बैंकों अथवा अन्य सरकारी संस्थाओं से प्राप्त ऋण) तथा गैर-संस्थागत ऋण (साहूकार, जागीरदार, रिश्तेदारों, महाजनों तथा मित्रों से प्राप्त ऋण) को शामिल किया गया था।

प्रश्न 2.
भारत में ग्रामीण परिवारों द्वारा लिए ऋण के उद्देश्य बताओ।
उत्तर-
भारत में ग्रामीण परिवारों द्वारा प्राप्त ऋण का प्रतिशत विवरण इस प्रकार है –
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 23 ग्रामीण ऋण 1

  1. उत्पादक व्यय-1971 से 1981 तक उत्पादक व्यय 50.1 से बढ़ाकर 69.2 प्रतिशत किया गया, परन्तु 1981 से 2019 तक उत्पादक व्यय घटकर 19% प्रतिशत रह गया है।
  2. पारिवारिक व्यय-पारिवारिक व्यय में 1971 से 1981 तक कुछ कमी आई। परन्तु 1981 से 2020 तक यह फिर बढ़कर 38% हो गया।
  3. अन्य व्यय-बीमारी, लड़ाई, मुकद्दमेबाज़ी, नशे इत्यादि उद्देश्यों के लिए ऋण में बहुत वृद्धि हुई है। 2020 में यह व्यय 22% था।

प्रश्न 3.
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कारण बताओ।
उत्तर-
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

  1. निर्धनता-भारत का किसान निर्धन है। कृषि करने के लिए उसको कम समय तथा लंबे समय के ऋण की आवश्यकता पड़ती है।
  2. धार्मिक तथा सामाजिक रीति-रिवाज-भारतीय किसान सामाजिक तथा धार्मिक रीति-रिवाजों पर बहुत व्यय करता है। इस कारण जन्म, मृत्यु, शादी इत्यादि उद्देश्यों के लिए ऋण लेना पड़ता है।
  3. विरसे में ऋण-किसान को पिता की मृत्यु के पश्चात् जब ज़मीन-जायदाद प्राप्त होती है तो विरसे में ऋण भी चुकाना पड़ता है। पिता-पुरखी ऋण का भार भी किसान को सहन करना पड़ता है।
  4. दोषपूर्ण ऋण प्रणाली-भारत में ऋण प्रणाली दोषपूर्ण है। किसान को अधिक ऋण महाजन, ज़मींदारों, रिश्तेदारों अथवा मित्रों से लेना पड़ता है। सरकारी एजेंसियों से प्राप्त ऋण की प्रणाली जटिल होने के कारण किसान साहूकार के ऋण के जाल में फंस जाता है।

प्रश्न 4.
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के प्रभाव बताओ।
उत्तर-
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के मुख्य प्रभाव इस प्रकार हैं –

  • आर्थिक प्रभाव-छोटे तथा सीमांत काश्तकारों को अपनी ज़मीन गिरवी रखकर ऋण लेना पड़ता है। ऋण तथा ब्याज वापिस करने के लिए उसको ज़मीन बेचनी पड़ती है तथा वह भूमिरहित मज़दूर बन जाता है।
  • सामाजिक प्रभाव-सामाजिक तौर पर ऋण काश्तकार, साहूकार को गुलाम बना देता है। इसके परिणामस्वरूप साहूकार किसान का शोषण करता है।
  • राजनीतिक प्रभाव-आजकल के युग में लोकतंत्र है। काश्तकारों को अपनी वोट साहकार के कहने अनुसार ही डालनी पड़ती है। इस प्रकार उसकी राजनीतिक स्वतन्त्रता समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 5.
ग्रामीण ऋणग्रस्तता की समस्या के लिए उपाय बताओ।
उत्तर-
ग्रामीण ऋणग्रस्तता की समस्या के लिए दो प्रकार के सुझाव दिए जाते हैं –
(A) पुराने ऋण का निपटारा-बहुत से राज्यों में कानून बनाए गए हैं ताकि पुराने ऋण का निपटारा किया जा सके।

  • नए कानून अनुसार जहां किसान ने ऋण का ब्याज ऋण की राशि से बढ़कर दिया है, उस स्थिति में पुराना ऋण समाप्त किया जाए।
  • पुराने ऋण की मूल राशि वापिस की जाए अथवा सरकारी एजेंसियों से कम ब्याज पर ऋण लेकर पुराने ऋण की वापसी की जाए।

(B) नए ऋण पर नियन्त्रण-पुराने ऋण के निपटारे से समस्या का हल नहीं किया जा सकता। इसलिए नए ऋण केवल उत्पादक उद्देश्यों के लिए दिए जाएं। ब्याज की दर कम की जाए। सामाजिक तथा धार्मिक उद्देश्यों के लिए ऋण को निरुत्साहित किया जाए।

प्रश्न 6.
कृषि उत्पादन वित्त का वर्गीकरण स्पष्ट करो।
उत्तर-
भारत में ग्रामीण कृषि उत्पादन वित्त की आवश्यकताओं का वर्गीकरण इस प्रकार है –

  1. उत्पादक उधार-किसानों को बीज, रासायनिक खाद्य, पानी, औज़ार इत्यादि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उधार लेना पड़ता है। इसको उत्पादक उधार कहा जाता है।
  2. अन-उत्पादक उधार-शादियों, जन्म-मृत्यु, मुकद्दमेबाजी इत्यादि आवश्यकताओं के लिए प्राप्त किया ऋण अन-उत्पादक होता है।
  3. अल्पकाल उधार-यह ऋण 15 माह तक के समय के लिए होता है, जो फसल की कटाई उपरान्त वापिस किया जाता है।
  4. मध्यमकाल उधार-यह ऋण 15 माह से 5 वर्ष तक के समय के लिए प्राप्त किया जाता है। इसका उद्देश्य कृषि उत्पादन औज़ारों की खरीद करना होता है।
  5. दीर्घकाल उधार-यह उधार 5 वर्ष से 20 वर्ष के समय के लिए प्राप्त किया जाता है। इसका उद्देश्य भूमि खरीदना अथवा ट्रैक्टर-ट्यूबवैल पर व्यय करना होता है।

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प्रश्न 7.
ग्रामीण साख में सहकारी उधार समितियों के योगदान की व्याख्या करो।
उत्तर-
भारत में आर्थिक विकास के लिए ग्रामीण सहकारी उधार समितियों का योगदान महत्त्वपूर्ण है। ये समितियां अल्पकाल तथा दीर्घकाल के ऋण की आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।
अल्पकाल की ग्रामीण सहकारी उधार संस्थाएं –

  1. राज्य सहकारी बैंक
  2. ज़िला केन्द्रीय सहकारी बैंक
  3. प्राइमरी कृषि उत्पादन उधार समितियां।

दीर्घकाल की ग्रामीण सहकारी संस्थाएं-

  • राज्य सहकारी कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास बैंक
  • प्राइमरी सहकारी कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास बैंक इस प्रकार सहकारी उधार समितियों का संस्थागत ढांचा कार्य करता है, जिस द्वारा अल्पकाल तथा दीर्घकाल की उधार आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।

भारत में 2012-13 में प्राइमरी सहकारी उधार समितियों ने 102592 करोड़ रु० का उधार दिया था। इस समय 369 जिलों में जिला केन्द्रीय सहकारी बैंक स्थापित हैं तथा 30 राज्यों में राज्य सहकारी बैंक स्थापित किए गए हैं। इन बैंकों द्वारा अल्पकाल तथा दीर्घकाल का उधार प्रदान किया जाता है। दिए गए उधार पर ब्याज की दर कम होती है। इन सहकारी समितियों की मुख्य समस्या दिए गए उधार की कम वापसी है। दिए गए उधार का 40% हिस्सा किसानों ने वापिस नहीं किया है।

प्रश्न 8.
भारत में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के योगदान को स्पष्ट करो।
उत्तर-
श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 1975 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक योजना आरम्भ की थी जोकि उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद तथा गोरखपुर, हरियाणा में भिवानी, राजस्थान में जयपुर तथा पश्चिमी बंगाल में मालदा ज़िलों में आरम्भ की गई। यह योजना केन्द्र (50%), राज्य सरकारों (15%), व्यापारिक बैंक (35%), पूंजी के योगदान द्वारा आरम्भ की गई थी। क्षेत्रीय बैंक मुख्य तौर पर व्यापारिक बैंकों की तरह ही कार्य करते हैं, परन्तु इनमें मुख्य अन्तर यह है कि क्षेत्रीय बैंक एक अथवा दो जिलों में ही कार्य करते हैं, जिन द्वारा छोटे किसानों को उधार दिया जाता है तथा यह उधार केवल उत्पादक कार्यों के लिए होता है।

ब्याज की दर कम प्राप्त की जाती है। यह बैंक कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक की सहायता से कार्य करते हैं। लोगों द्वारा जमा करवायी राशि पर व्यापारिक बैंकों से 1% अधिक ब्याज दिया जाता है। इस समय भारत के 23 राज्यों में 196 केन्द्रीय बैंक स्थापित हैं, जिनकी 14500 शाखाएं कार्य कर रही हैं। इन बैंकों ने 2012-13 में 57757 करोड़ रु० का ऋण प्रदान किया गया है।

इन बैंकों की मुख्य त्रुटि यह है कि उधार देते समय बहुत-सी पाबंदियां लगाई गई हैं। इसलिए साधारण निर्धन किसानों को उचित मात्रा में अनिवार्य ऋण प्राप्त नहीं होता। डॉ० ए० एस० खुसरो की प्रधानगी अधीन एक कमेटी की स्थापना की गई, जिसने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के दोष दूर करने के सुझाव दिए हैं। रिज़र्व बैंक ने ऐम० सी० भंडारी कमेटी की स्थापना की है, जिसने क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के विस्तार के लिए कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक के अधिक योगदान पर जोर दिया है।

प्रश्न 9.
ग्रामीण उधार में नबार्ड (NABARD) के योगदान को स्पष्ट करो।
उत्तर-
भारत के रिज़र्व बैंक ने ग्रामीण कृषि उत्पादन उधार की सुविधाओं पर आरम्भ से ध्यान दिया है। इस उद्देश्य के लिए जुलाई, 1982 में कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की गई। इस बैंक की अधिकारित पूंजी आरम्भ में 100 करोड़ रु० थी, जोकि बढ़ाकर 500 करोड़ रु० तथा फिर सन् 2000 में 2000 करोड़ रु० की गई है। इस बैंक द्वारा 6280 करोड़ रु. 2006-07 तथा 38489 करोड़ रु० 2019-20 में अन्य प्राप्त करके उधार की सुविधाओं में वृद्धि की है जोकि 60 हज़ार करोड़ रु० हो गया है। नाबार्ड द्वारा कृषि के विकास ग्रामों में छोटे पैमाने तथा घरेलू उद्योग स्थापित करने इत्यादि कार्य किए जाते हैं। यह बैंक ग्रामीण क्षेत्रीय बैंकों तथा क्षेत्रीय सेवा योजनाओं द्वारा गांवों में विकासवादी योजनाओं का संचालन करता है।

IV. दीर्य उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कारण तथा प्रभाव स्पष्ट करो। ग्रामीण ऋणग्रस्तता की समस्या के हल के लिए सुझाव दीजिए।
(Discuss the causes and effects of Rural Indebetedness in India. Suggest measures to solve the problem of Rural Indebtedness.)
उत्तर-
भारत में किसान पुराने समय से ऋणग्रस्तता की समस्या का शिकार रहा है। इसलिए श्री एम० एल० डार्लिंग ने यह ठीक कहा जाता है, “भारतीय किसान ऋण में जन्म लेता है, ऋण में जीवित रहता है तथा ऋण में मर जाता है।” (“‘The Indian Farmer is born in debt, lives in debt and dies in debt.” – M.L. Darling)

भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के अनुमान (Estimates of Indebtedness in India)-भारत में समय पर ग्रामीण ऋणग्रस्तता सम्बन्धी अनुमान लगाए गए हैं। 1924 में एम० एल० डारलिंग ने भारत के काश्तकारों पर 600 करोड़ रु० के ऋण का अनुमान लगाया था। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने 1951, 1961 तथा 1971 में ग्रामीण ऋणग्रस्तता सम्बन्धी सर्वेक्षण किए। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन (N.S.S.O.) ने सर्व भारती ऋण तथा निवेश सर्वेक्षण 1981, 1982 तथा 1991, 1992, 2020 में किए। इन सर्वेक्षणों के आधार पर भारत में ग्रामीण परिवारों पर औसत ऋण का विवरण इस प्रकार दिया गया है।
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 23 ग्रामीण ऋण 2
Source: R.B.I. Bulletin, 2020.
भारत में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा किए गए सर्वेक्षण से यह ज्ञात होता है कि 1971 में 42.8% परिवारों पर औसत 500 रु० का ऋण था, जोकि 2020 में बढ़कर 200000 रु० का हो गया है। ऋण के बढ़ने का कारण कीमत स्तर में वृद्धि होना है। परन्तु परिवारों की संख्या 1981 में घटकर 20% रह गई तथा 2020 में लगभग 50% परिवारों पर ऋण का भार 2 लाख रु० था। इसमें संस्थागत संस्थाओं जैसे कि सहकारी समितियों तथा व्यापारिक बैंकों से प्राप्त किया जाने वाले ऋण तथा गैर-संस्थागत संस्थाओं साहूकार, ज़मींदार, व्यापारी अथवा रिश्तेदारों से प्राप्त किया ऋण शामिल है।

N.S.S.O. (National Sample Survey Organization) राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन ने 29th राऊंड सर्वे में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के सम्बन्ध में यह कहा है –

  1. भारत में 48.6% किसानों पर ऋण है।
  2. जिन किसानों पर ऋण है उनमें से 61% के पास एक हेक्टर से कम भूमि है।
  3. किसानों पर जो ऋण है उसमें 41.6% ऋण गैर-कार्यों के लिए, 30.6%, पूंजीगत तथा 27.8% खेती सम्बन्धी कार्यों के लिए लिया गया।
  4. काश्तकारों पर जो ऋण है उसमें 57.7% सरकारी ऋण, संस्थाओं द्वारा तथा 42.3% गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा दिया जाता है।
  5. गैर-सरकारी ऋण का अनुमान 48000 करोड़ रु० है जिस पर 30% ब्याज प्राप्त किया जाता है।

ग्रामीण परिवारों द्वारा प्राप्त ऋण का वर्गीकरण (Classification of Loans of All Rural Households)-
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (R.B.I.) के सर्वेक्षण 2011 में ग्रामीण परिवारों पर ऋण का वर्गीकरण अग्रलिखित अनुसार किया गया-
A. उत्पादक उद्देश्य-भारत में ज़मीन तथा काश्तकारी यन्त्र खरीदने के लिए ऋण लिया जाता है। कुल ऋण में से 35.1% हिस्सा उत्पादक उद्देश्यों के लिए होता है।
B. पारिवारिक व्यय-परिवार के व्यय के लिए भी ऋण प्राप्त किया जाता है, जोकि कुल ऋण का 51% हिस्सा होता है।
C. अन्य उद्देश्य-ऋण, बीमारी, लड़ाई-झगड़े, फ़िजूलखर्ची अथवा नशा करने के लिए भी प्राप्त किया जाता है जोकि कुल ऋण का 27.9% हिस्सा होता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 23 ग्रामीण ऋण

ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कारण (Causes of Rural Indebtedness)-भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कारण इस प्रकार हैं-

  1. निर्धनता-काश्तकारों पर ऋण का सबसे प्रमुख कारण काश्तकारों की निर्धनता है। काश्तकार निर्धन होने के कारण ऋण प्राप्त करते हैं, जोकि बीमारी, शराब, शादी के लिए प्राप्त किया जाता है। निर्धन होने के कारण ऋण की वापसी कठिन होती है।
  2. पिता-पुरखीय ऋण-भारत के काश्तकारों पर ऋण का दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण विरासत में मिला ऋण होता है। भारत के किसान को जहां विरासत में ज़मीन प्राप्त होती है, उसको ऋण भी प्राप्त होता है.। पितापुरखीय ऋण का भार अधिक होने के कारण किसान सारा जीवन ऋण उतारने के प्रयत्न में ही मर जाता
  3. पिछड़ी हुई कृषि-भारत में कृषि का पिछड़ापन भी काश्तकारों के ऋण का कारण है। कृषि का उत्पादन कम होने के कारण किसान अच्छे यन्त्र, पशु, बीज, खाद्य इत्यादि आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऋण लेता है।
  4. सामाजिक तथा धार्मिक आवश्यकताएं-ग्रामों में सामाजिक रीति-रिवाजों तथा धार्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए व्यय किया जाता है जैसे कि शादी, जन्म, मृत्यु इत्यादि समय किसानों को बहुत व्यय करना पड़ता है। इस उद्देश्य के लिए ऋण प्राप्त किया जाता है।
  5. दोषपूर्वक ऋण प्रणाली-भारत में किसान आमतौर पर साहूकार से ऋण प्राप्त करता है। सरकारी एजेंसियों से आसानी से ऋण प्राप्त नहीं होता, जिस कारण काश्तकार गाँव में साहूकार से ऋण लेने के लिए मजबूर हो जाता है। एक बार साहूकार के जाल में फंसकर ऋण में से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

ग्रामीण ऋणग्रस्तता के परिणाम (Effects of Rural Indebtedness)-ग्रामीण ऋणग्रस्तता के परिणाम इस प्रकार हैं-

  • आर्थिक परिणाम-छोटे किसान ऋण प्राप्त करते हैं, जिसको वापिस करना मुश्किल होता है। इसलिए अन्त में ज़मीन बेचकर ऋण उतारा जाता है। इस कारण काश्तकारों के पास जमीन नहीं रहती तथा वह मज़दूर बन जाते हैं।
  • सामाजिक परिणाम-ग्रामों में ऋणग्रस्तता की समस्या से सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ता है। ऋण प्राप्त करने के पश्चात् काश्तकार द्वारा साहूकारों को नफरत करने लगते हैं। इससे निर्धन तथा अमीर का अन्तर बढ़ जाता है। इसलिए समाज में किसानों की स्थिति कमजोर हो जाती है। यह समस्या बिहार, उडीसा, आन्ध्र प्रदेश में अधिक पाई जाती है, जहां पर किसानों का शोषण किया जाता है।
  • राजनीतिक परिणाम साहूकार किसानों को अपनी इच्छानुसार वोट डालने के लिए मजबूर करते हैं। राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के उपरान्त साहूकार किसान विरोधी कानून बनाने में सफल होते हैं।

ग्रामीण ऋणग्रस्तता के हल के लिए उपाय (Measures of Solve the Rural Indebtedness)-ग्रामीण ऋणग्रस्तता सम्बन्धी दो प्रकार के सुझाव दिए जाते हैं-
A. वर्तमान ऋण का भार घटाना-किसानों पर वर्तमान ऋण के भार को घटाने की आवश्यकता है। इस उद्देश्य के लिए निम्नलिखित नीति का प्रयोग करना चाहिए –

  • बहुत पुराने ऋण को समाप्त कर देना चाहिए, जहां काश्तकार प्राप्त की गई राशि से अधिक ब्याज दे चुके हैं।
  • पिता-पुरखीय ऋण की मात्रा से अधिक ब्याज दे चुके हैं।
  • पुराने ऋण की सिर्फ मूल राशि को सरकारी एजेंसियों द्वारा भुगतान करके पुराना ऋण समाप्त कर देना चाहिए।

B. भविष्य के लिए ऋण पर नियन्त्रण (Control over future Indebtedness)-
पुराने ऋण का भुगतान करने के उपरान्त भविष्य के लिए इस प्रकार की नीति बनानी चाहिए –

  • निर्धन किसानों की आय में वृद्धि करने के यत्न करने चाहिएं।
  • ग्रामों में फिजूलखर्ची को रोकने की आवश्यकता है। इसलिए पंचायतों को योगदान डालना चाहिए।
  • किसानों को कम ब्याज पर ऋण सुविधाएं प्रदान करनी चाहिएं ताकि किसान अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। इस प्रकार उत्पादक ऋण की सुविधाओं में वृद्धि करके ऋणग्रस्तता की समस्या का हल किया जा सकता है।

2006-07 में केन्द्र सरकार ने 71680 करोड़ रु० ऋण राहत योजना अधीन विभाजित किए थे। सहकारी ऋण संस्थाओं द्वारा सन् 2006 में 14000 करोड़ रु० ऋण राहत के रूप में विभाजित किए गए। किसानों को ऋण से राहत दिलवानी चाहिए ताकि वह आत्महत्या न करें। 2020 में 40 लाख करोड़ रु० का ऋण दिया गया। बजट 2016-17 में सीमान्त काश्तकारों के ऋण में से सरकारी ऋण 70,000 करोड़ रु० की माफी दी है। गैर-सरकारी ऋण से राहत दिलाने के लिए सरकार योजना बना रही है।

प्रश्न 2.
भारत में कृषि उत्पादन वित्त की आवश्यकता को स्पष्ट करो। कृषि उत्पादन उधार की विशेषताएं बताओ।
(Explain the need for Agriculture Finance in India. Discuss the main features of Agricultural Finance.)
उत्तर-
प्रत्येक उत्पादक क्रिया के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। भारत में कृषि उत्पादन लोगों का मुख्य पेशा । है। इसलिए कृषि उत्पादन के लिए वित्त बहुत महत्त्वपूर्ण है।
कृषि उत्पादन वित्त की आवश्यकता (Need for Agricultural Finance)-

कृषि उत्पादन वित्त की आवश्यकता उत्पादक कार्यों के लिए होती है जैसे कि भूमि सुधार, कुएं तथा ट्यूबवैलों का निर्माण इत्यादि फसल को बीजने से लेकर मंडीकरण तक विभिन्न कार्यों के लिए वित्त अनिवार्य है। कृषि उत्पादन की आवश्यकताएं निम्नलिखित अनुसार हैं-
1. उत्पादक तथा अन-उत्पादक उधार-उत्पादन की विभिन्न क्रियाओं के लिए उधार की आवश्यकता होती है जैसे कि एक किसान ने बीज, रासायनिक खाद, पानी, औज़ार इत्यादि की खरीद करनी होती है। इसके बिना भूमि पर कुछ स्थायी सुधार करने की आवश्यकता होती है जैसे कि कुओं की खुदाई, खेत के इर्द-गिर्द बाड़ लगाना, भूमि को समतल करना। इन कार्यों के लिए उधार अथवा ऋण की आवश्यकता होती है, जिसको उत्पादक ऋण कहा जाता है। दूसरी ओर अन-उत्पादक ऋण वह ऋण होता है जो उपभोग के उद्देश्य के लिए प्राप्त किया जाता है।

जैसे कि शादियों पर किया गया व्यय, जन्म तथा मृत्यु के समय किया गया व्यय, मुकद्दमेबाजी पर भी व्यय करने के लिए उधार लिया जाता है। ऐसे ऋण की वापसी करनी मुश्किल होती है। अल्प, मध्यम तथा दीर्घकालीन उधार-उधार को समय के आधार पर तीन भागों में विभाजित किया जाता है –
(i) अल्पकाल उधार-किसानों को अल्पकाल के लिए अल्पकाल की आवश्यकता पड़ती है जोकि 15 महीनों के लिए होता है, घरेलू आवश्यकताओं के लिए प्राप्त किया जाता है। किसान को बीज, खाद, दवाइयों की खरीद करनी होती है। इस उद्देश्य के लिए जो ऋण प्राप्त किया जाता है, वह फसल की कटाई उपरान्त अदा किया जाता है।

(ii) मध्यमकालीन उधार-किसान को उधार की आवश्यकता मध्यमकाल के लिए भी पड़ती है। यह ऋण 15 महीने से 5 वर्ष के समय तक का होता है। ट्रैक्टर, ट्यूबवैल तथा अन्य कृषि उत्पादन औज़ारों की खरीद करने के लिए मध्यमकाल के ऋण की आवश्यकता होती है। इस ऋण की वापसी के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है।

(iii) दीर्घकालीन उधार-दीर्घकालीन ऋण 5 वर्ष से 20 वर्ष तक के समय के लिए प्राप्त किया जाता है। यह ऋण अन्य ज़मीन खरीदने के लिए अथवा पुराने ऋण का भुगतान करने के लिए लिया जाता है। इस ऋण की वापसी दीर्घकाल में की जाती है।

कृषि उत्पादन उधार की विशेषताएं (Main Features of Agricultural Finance)-

  1. कृषि उत्पादन उधार की आवश्यकता स्थायी होती है।
  2. कृषि उत्पादन प्रकृति पर निर्भर करता है। इसलिए कृषि उपज की निश्चितता न होने के कारण उधार की आवश्यकता होती है।
  3. कृषि उत्पादकता में भूमि को गिरवी रखकर उधार प्राप्त किया जाता है। भूमि को जल्दी नकदी के रूप में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। इसी कारण उधार लेने की मजबूरी होती है।
  4. कृषि उत्पादन में उपज को बीमा नहीं करवाया जा सकता। इसलिए कृषि उत्पादन के जोखिम को किसान स्वयं सहन करता है। इसी कारण उसको ऋण की आवश्यकता होती है।
  5. कृषि को मानसून पवनों के साथ जुआ कहा जाता है। इसलिए उपज की मात्रा तथा गुणवत्ता प्रकृति पर निर्भर करती है। इस कारण भी उधार लेना अनिवार्य होता है।
  6. फसल बीजने से फसल की कटाई तक काफ़ी अधिक समय होता है। इस समय में किसान ने निजी उपभोग की आवश्यकताओं को पूरा करना होता है। इस कारण भी उसको उधार की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3.
ग्रामीण उधार के विभिन्न स्रोतों का वर्णन करो। (Explain the main sources of Agriculture finance in India.)
अथवा
भारत में ग्रामीण उधार के लिए विभिन्न वित्तीय संस्थाओं के योगदान को स्पष्ट करो।
(Explain the contribution of different financial Institutions regarding Agricultural finance in India.)
उत्तर-
भारत में ग्रामीण उधार देने के दो स्रोत हैं। संस्थागत स्रोत जिनमें सरकार, सहकारी बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक शामिल हैं तथा गैर-संस्थागत स्रोत जिनमें साहूकार, व्यापारी, रिश्तेदार तथा मित्रों को शामिल किया जाता है। इन स्रोतों से प्राप्त उधार का विवरण इस प्रकार है –
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 23 ग्रामीण ऋण 3
भारत में संस्थागत स्रोत से उधार में निरन्तर वृद्धि हो रही है। 1950-51 में 7% उधार संस्थागत स्रोतों द्वारा दिया जाता था। 2013-14 में यह बढ़कर 69% हो गया है। गैर-संस्थागत उधार 1950-51 में 93% था जोकि अब घटकर 31% रह गया है। साहूकारों द्वारा 2020-21 में 95000 करोड़ रु० का उधार दिया गया। भारत में संस्थागत उधार बहुतसी एजेंसियों द्वारा दिया जाता है।

संस्थागत साख (Institutional Finance)-भारत में संस्थागत साख में बहुत वृद्धि हुई है। 1984-85 में संस्थागत उधार 6230 करोड़ रु० दिया गया, जोकि 2020-21 में बढ़कर 195000 करोड़ रु० हो गया है। संस्थागत साख मुख्य तौर पर निम्नलिखित संस्थाओं द्वारा दिया जाता है।
1. सहकारी साख समितियां-सहकारी साख समितियां उधार का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। 1950-51 में __ सहकारी समितियों द्वारा 23 करोड़ रु० का उधार दिया गया। 2020-21 में यह उधार 485 करोड़ रु० हो गया।

2. सहकारी कृषि तथा ग्रामीण विकास बैंक-किसानों की दीर्घकाल की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सहकारी साख बैंक स्थापित किए गए हैं। सहकारी बैंक भी साख का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। 1984-85 में सहकारी बैंकों द्वारा 3440 करोड़ रु० का ऋण दिया गया। 2020-21 में 95000 हज़ार करोड़ रु० का ऋण दिया गया।

3. व्यापारिक बैंक-भारत में व्यापारिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण इस कारण किया गया, क्योंकि व्यापारिक बैंक कृषि उत्पादन की साख आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करते थे। व्यापारिक बैंक कृषि उत्पादन में अल्पकाल तथा मध्यम काल समय की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उधार देते हैं। 2013-14 में व्यापारिक बैंकों में 368616 करोड़ रु० का उधार दिया गया, जोकि 2020-21 में बढ़कर 50,000 करोड़ रु० हो गया।

4. लीड बैंक योजना- भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के पश्चात् प्रो० डी० आर० गाडगिल की सिफ़ारिशों अनुसार लीड बैंक योजना आरम्भ की गई, जिसमें प्रत्येक जिले में एक बैंक को गांवों में साख प्रदान करने का कार्य सौंपा गया। इस योजना अधीन 1994-95 में 8255 करोड़ रु० कृषि उत्पादन कार्यों के लिए उधार दिए गए। 2020-21 में इन बैंकों द्वारा 15000 करोड़ रु० का उधार दिया गया।

5. ग्रामीण क्षेत्रीय बैंक-ग्रामीण क्षेत्रीय बैंक की योजना श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा आरम्भ की गई। यह योजना 1975 में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान तथा पश्चिमी बंगाल में आरम्भ की गई थी। प्रत्येक ग्रामीण क्षेत्रीय बैंक की अधिकारित पूंजी एक करोड़ रु० निश्चित की गई, जिसमें 50% केन्द्र सरकार, 15% राज्य सरकारें तथा 35% व्यापारिक बैंकों द्वारा पूंजी का प्रबन्ध किया गया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकता को पूरा करना था। विशेषकर छोटे तथा सीमान्त किसानों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए क्षेत्रीय बैंक स्थापित किए गए। इस समय 23 राज्यों में 196 क्षेत्रीय बैंक हैं, जिनकी 14500 ब्रांचे कार्य कर रही हैं। 2020-21 में क्षेत्रीय बैंकों ने 25000 हज़ार करोड़ रु० का ऋण दिया।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 23 ग्रामीण ऋण

6. कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक (NABARD) भारत के रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया ने अल्पकाल तथा दीर्घकाल की कृषि उत्पादन ऋण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 1982 में कृषि उत्पादन तथा ग्रामीण विकास के लिए राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की। इसकी अधिकारित पूंजी 2000 करोड़ रु० है। इस बैंक द्वारा 6280 करोड़ रु० की अधिक पूंजी 2001-02 में एकत्रित की। यह बैंक ग्रामीण क्षेत्र की अल्पकाल तथा दीर्घकाल की उधार आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्थापित किया गया है।

NABARD द्वारा 2010-11 में 1521 करोड़ रु० का ऋण अल्पकाल की आवश्यकताओं के लिए दिया गया, जिस पर रियायती ब्याज दर 3% निर्धारित की गई थी। यह संस्था सहकारी समितियों, सहकारी बैंकों तथा राज्य सरकारों द्वारा दीर्घकाल के ऋण की आवश्यकताओं की पूर्ति भी करती है। इस बैंक द्वारा ग्रामीण संरचनात्मक विकास फंड की स्थापना की गई है, जिस अनुसार भिन्न-भिन्न योजनाओं के लिए ऋण प्रदान किया जाता है।

1996 में 18300 करोड़ रु० का व्यय ग्रामीण विकास योजनाओं के लिए प्रदान किया गया जिसमें सड़कों, पुलों, सिंचाई योजनाओं का विस्तार किया गया। 2020-21 में इस उद्देश्य के लिए 25000 करोड़ रुपए का ऋण प्रदान किया गया है। वित्त मन्त्री निर्मला सीतरमण ने 2020-21 के बजट में कृषि उधार देने के लिए ₹ 15 लाख करोड़ रखे हैं।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

Punjab State Board PSEB 12th Class Economics Book Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Economics Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

PSEB 12th Class Economics भुगतान सन्तुलन Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
भुगतान सन्तुलन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भुगतान सन्तुलन एक वर्ष में एक देश का बाकी विश्व के देशों से आर्थिक लेन-देन के लेखांकन का विवरण होता है।

प्रश्न 2.
भुगतान सन्तुलन लेखे से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
एक वित्त वर्ष में एक देश द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन के सार को भुगतान सन्तुलन लेखा कहा जाता है।

प्रश्न 3.
भुगतान शेष खाता सदैव सन्तुलित होता है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
भुगतान शेष खाता तकनीकी दृष्टि से सदैव सन्तुलित होता है और इसको दोहरी लेखा पद्धति (Double Entry System) में प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें भुगतान तथा प्राप्तियां बराबर होती हैं।

प्रश्न 4.
आर्थिक नीतियों का महत्त्वपूर्ण लक्ष्य क्या है ?
उत्तर-
भुगतान सन्तुलन प्राप्त करना।

प्रश्न 5.
व्यापार शेष से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
व्यापार शेष में वस्तुओं के निर्यात और आयात का विवरण होता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

प्रश्न 6.
व्यापार शेष तथा भुगतान शेष में अन्तर बताएँ।
उत्तर-
व्यापार शेष, भुगतान शेष का अंश है।

प्रश्न 7.
दृश्य मदों से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
दृश्य मदों में वस्तुओं के लेन-देन का विवरण होता है।

प्रश्न 8.
व्यापार शेष में किस प्रकार की मदों को शामिल किया जाता है ?
उत्तर-
व्यापार शेष में दृश्य मदों के निर्यात तथा आयात को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 9.
भुगतान शेष में अदृश्य मदों से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भुगतान शेष में अदृश्य मदों में सेवाओं के निर्यात तथा आयात को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 10.
भुगतान शेष में किस प्रकार की मदों को शामिल किया जाता है ?
उत्तर-
भुगतान शेष में दृश्य तथा अदृश्य मदों को शामिल किया जाता है।
अथवा
भुगतान शेष में वस्तुओं तथा सेवाओं के निर्यात तथा आयात को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 11.
भुगतान सन्तुलन के चालू खाते से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भुगतान सन्तुलन के चालू खाते में दृश्य मदों, अदृश्य मदों और एक पक्षीय अन्तरण को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 12.
भुगतान सन्तुलन के पूँजी खाते से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
एक देश के निवासियों तथा सरकार की परिसम्पत्तियों और देनदारियों के लेन-देन को पूँजी खाते में शामिल किया जाता है।

प्रश्न 13.
भुगतान शेष में चालू खाते तथा पूँजी खाते के बिना और कौन-कौन सी मदों को शामिल किया जाता है ?
उत्तर-
चालू खाते और पूँजी खाते के बिना भुगतान शेष में सरकारी रिज़र्व सौदे और भूल चूक को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 14.
प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन क्या है ?
उत्तर-
जब किसी देश की देनदारियां उसकी लेनदारियों से कम होती हैं, तो इसको प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन कहते हैं।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

प्रश्न 15.
व्यापार शेष में ₹ 5000 करोड़ का घाटा है और आयात का मूल्य ₹ 9000 करोड़ है। निर्यात का मूल्य कितना है ?
उत्तर-
निर्यात का मूल्य = ₹ 4000 करोड़ क्योंकि व्यापार शेष निर्यात के मूल्य तथा आयात के मूल्य का अन्तर होता है।

प्रश्न 16.
व्यापार शेष में ₹ 300 करोड़ का घाटा है, निर्यात का मूल्य ₹ 500 करोड़ है। आयात का मूल्य कितना है ?
उत्तर-
आयात का मूल्य ₹ 800 करोड़ होगा क्योंकि व्यापार शेष निर्यात के मूल्य तथा आयात के मूल्य का अन्तर होता है।

प्रश्न 17.
कौन-सी मदें व्यापार शेष का निर्धारण करती है ?
उत्तर-
निर्यात तथा आयात, व्यापार शेष का निर्धारण करते हैं।

प्रश्न 18.
व्यापार शेष में अतिरेक (Surplus) कब होता है ?
उत्तर-
व्यापार शेष अतिरेक (Surplus) तब होता है जब निर्यात, आयात से अधिक हों।

प्रश्न 19.
चालू खाते की चार मदें बताएँ।
उत्तर-
चालू खाते की मदें-

  1. वस्तुओं तथा सेवाओं का निर्यात
  2. वस्तुओं तथा सेवाओं का आयात
  3. निजी अन्तरण (उपहार) (Private Transfers)
  4. सरकारी अन्तरण (विदेशों से सहायता) (Official Transfers)।

प्रश्न 20.
पूँजी खाते की चार मदें बताएँ।
उत्तर-
पूँजी खाते की मदें-

  • निजी लेन-देन
  • सरकारी लेन-देन
  • अप्रत्यक्ष निवेश
  • पत्राधार निवेश।

प्रश्न 21.
दृश्य मदों में ……………. के लेन-देन का विवरण होता है।
उत्तर-
वस्तुओं।

प्रश्न 22.
अदृश्य मदों में …………. के लेन-देन का विवरण होता है।
उत्तर-
सेवाओं।

प्रश्न 23.
भुगतान सन्तुलन में …………. मदों के निर्यात और आयात को शामिल किया जाता है।
(क) दृश्य मदों
(ख) अदृश्य मदों
(ग) दृश्य और अदृश्य मदों
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(ग) दृश्य और अदृश्य मदों।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

प्रश्न 24.
व्यापार संतुलन में दृश्य के निर्यात और आयात को शामिल किया जाता है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 25.
व्यापार सन्तुलन और भुगतान सन्तुलन में कोई अन्तर नहीं होता।
उत्तर-
ग़लत।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भुगतान सन्तुलन से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
भुगतान सन्तुलन लेखे से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भुगतान सन्तुलन एक वर्ष में एक देश का बाकी विश्व के देशों से आर्थिक लेन-देन के लेखांकन का विवरण होता है। एक वित्त वर्ष में एक देश द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन के सार को भुगतान शेष लेखा कहा जाता है। यह समष्टि अर्थशास्त्र का महत्त्वपूर्ण अंश है।

प्रश्न 2.
व्यापार शेष से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
व्यापार शेष में वस्तुओं के निर्यात तथा आयात के लेन-देन का विवरण होता है। एक देश द्वारा एक वर्ष में निर्यात वस्तुओं तथा आयात वस्तुओं के अन्तर को व्यापार सन्तुलन कहा जाता है। इसको दृश्य मदें (Visible goods) भी कहा जाता है। व्यापार शेष में सेवाओं (अदृश्य मदों) के लेन-देन को शामिल नहीं किया जाता।

प्रश्न 3.
व्यापार शेष तथा भुगतान शेष में अन्तर बताएं।
उत्तर-
व्यापार शेष एक वित्त वर्ष में दृश्य मदों (वस्तुओं) के लेन-देन का विवरण होता है जबकि भुगतान सन्तुलन एक वित्त वर्ष में दृश्य मदों (वस्तुओं) के आयात और निर्यात के साथ-साथ अदृश्य मदों (सेवाओं) के आयात-निर्यात को भी शामिल किया जाता है। जहाज़रानी, बीमा बैंकिंग ब्याज, भुगतान, लाभांश, सैलानियों के खर्च को दृश्य मदों में शामिल किया जाता है।

प्रश्न 4.
भुगतान सन्तुलन की दृश्य तथा अदृश्य मदें क्या हैं ?
उत्तर-
दृश्य मदें (Visible Items)-दृश्य मदों में वस्तुओं के आयात तथा निर्यात को शामिल किया जाता है। अदृश्य मदें (Invisible Items)—इसमें विदेशों की दी गईं सेवाएं तथा विदेशों से प्राप्त की गई सेवाओं को शामिल किया जाता है। इनको अदृश्य मदें इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनका निर्माण धातु से नहीं होता जैसे कि –

  • समुद्री जहाजों की सेवाओं का आयात तथा निर्यात
  • बैंकिंग सेवाओं का आयात तथा निर्यात।

प्रश्न 5.
भुगतान शेष के चालू खाते से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भुगतान शेष के चालू खाते का अर्थ है कि अल्पकाल में वस्तुओं के वास्तविक लेन-देन का लेखा-जोखा। इसमें दृश्य तथा अदृश्य दोनों प्रकार की वस्तुओं तथा सेवाओं के आयात तथा निर्यात को शामिल किया जाता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

प्रश्न 6.
भुगतान शेष के पूंजी खाते से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भुगतान शेष के पूंजी खाते का अर्थ है कि अल्पकाल तथा दीर्घकाल में पूंजी के अन्तर प्रवाह तथा बाहरी प्रवाह का लेखा-जोखा। इसमें व्यक्तियों तथा सरकार द्वारा विदेशों से प्राप्त ऋण उधार देना। अनुदान तथा स्वर्ण के आदान-प्रदान को शामिल किया जाता है। यह अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन का लेखा-जोखा होता है।

प्रश्न 7.
प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन का अर्थ बताएं।
उत्तर-
प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन-भुगतान सन्तुलन को प्रतिकूल कहा जाता है जब देश की प्राप्तियां कम होती हैं और देनदारी अधिक होती है इस स्थिति में भुगतान सन्तुलन को बराबर करने के लिए स्वर्ण में भुगतान करना पड़ता है अथवा अल्पकालीन ऋण लेकर सन्तुलन स्थापित करना पड़ता है। इस स्थिति में देश की प्राप्तियां कम होती हैं और भुगतान अधिक होता है।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भुगतान शेष से क्या अभिप्राय है ? भुगतान शेष की दृश्य तथा अदृश्य मदों को उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें।
उत्तर-
भुगतान शेष एक वित्त वर्ष में एक देश और शेष विश्व के देशों के साथ लेन-देन का विवरण होता है। इसमें दृश्य (Visible) तथा अदृश्य (Invisible) मदें शामिल होती हैं।
(i) दृश्य मदें (Visible Items)-दृश्य मदों में वस्तुओं के निर्यात तथा आयात को शामिल किया जाता है। जब निर्यात वस्तुओं तथा आयात वस्तुओं का चालू लेखा पेश किया जाता है तो इसको व्यापार सन्तुलन कहा जाता है। जैसा कि गेहूँ, कपड़े, लोहे आदि का आयात तथा निर्यात।

(ii) अदृश्य मदें (Invisible Items)-जब एक देश बाकी विश्व के देशों को सेवाएं प्रदान करता है और बाकी विश्व के देशों से सेवाएं प्राप्त की जाती हैं तो इनको अदृश्य मदें कहा जाता है। इसमें सेवाओं के निर्यात और आयात को शामिल किया जाता है। अदृश्य मदों में निम्नलिखित मदों को शामिल किया जाता है –

  1. जहाज़रानी, वस्तु सेवाओं की आयात और निर्यात
  2. बैंकिंग सेवाओं की आयात और निर्यात
  3. बीमा सेवाओं की आयात और निर्यात
  4. ब्याज का भुगतान तथा प्राप्ति
  5. लाभांश के रूप में भुगतान तथा प्राप्ति। ङ्केप्रश्न

2. भुगतान शेष के लेन-देन के वगीकरणण की पाँच श्रेणियों की व्याख्या करें। उत्तर- भुगतान शेष के लेन-देन के वर्गीकरण को मुख्य पाँच श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है-

  1. श्रेणी I. वस्तुओं तथा सेवाओं का लेखा-इस श्रेणी में वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात तथा आयात को शामिल किया जाता है।
  2. श्रेणी II. एक पक्षीय अन्तरण लेखा-इस खाते में एक देश द्वारा बाकी विश्व को दिए गए उपहार तथा अनुदान और प्राप्त किए अनुदान और उपहार का विवरण होता है।
  3. श्रेणी III. दीर्घकालीन पूँजी लेखा-देश के निवासियों तथा सरकार विदेशी परिसम्पत्तियों की वृद्धि या कमी का विवरण होता है। इसी प्रकार विदेशी निवासियों तथा सरकार के पास इस देश की दीर्घकालिक परिसम्पत्तियों ” की वृद्धि तथा कमी का विवरण होता है।
  4. श्रेणी IV अल्पकालीन निजी पूँजी लेखा-देश के निवासियों के पास निजी विदेशी परिसम्पत्तियों में वृद्धि या कमी का विवरण होता है। इसी प्रकार विदेशी निवासियों के पास इस देश की परिसम्पत्तियों में वृद्धि या कमी का विवरण भी इस खाते में शामिल किया जाता है।
  5. श्रेणी V अल्पकालीन सरकारी पूँजी लेखा-इस देश की सरकार तथा किसी मौद्रिक अधिकारियों द्वारा विदेशी अल्पकालिक परिसम्पत्तियों की मालकी में वृद्धि या कमी के साथ-साथ विदेशी सरकार तथा उनकी एजेन्सियों द्वारा अल्पकालिक परिसम्पत्तियों की वृद्धि तथा कमी का विवरण होता है।

प्रश्न 3.
(a) चालू लेखे
(b) पूँजी लेखे के अंशों (Components) की व्याख्या करें। उत्तर-भुगतान शेष के दो खाते होते हैं-
A. चालू खाता (Current Account) चालू खाते के मुख्य अंश निम्नलिखित हैं –

  • दृश्य मदें-वस्तुओं तथा सेवाओं का आयात और निर्यात।
  • अदृश्य मदें-सेवाओं का आयात और निर्यात।
  • एक पक्षीय अन्तरण-एक देश द्वारा विदेशों को दिए गए तथा प्राप्त किए उपहार तथा अनुदान।

B. पूँजी खाता (Capital Account)-पूँजी खाते के मुख्य अंश निम्नलिखित हैं –

  • सरकारी सौदे-एक देश द्वारा विदेशों को ऋण देना तथा प्राप्त करना जिस द्वारा परिसम्पत्तियों तथा देनदारियों की स्थिति प्रभावित होती है।
  • निजी सौदे-इस देश के व्यक्तियों द्वारा विदेश में निवेश करना तथा विदेशी व्यक्तियों द्वारा इस देश में निवेश करना शामिल करते हैं।
  • प्रत्यक्ष निवेश-विदेशों में निजी व्यक्तियों द्वारा किया गया निवेश तथा उस निवेश पर नियन्त्रण रखना।
  • पोर्ट फोलियो निवेश-विदेशों में शेयर, बान्ड आदि की खरीद परन्तु इस निवेश पर नियन्त्रण न होना। विदेशी पूँजीपतियों द्वारा इस देश में किया गया पोर्ट फोलियो निवेश भी पूँजी खाते में शामिल किया जाता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

प्रश्न 4.
भुगतान शेष के चालू खाते से क्या अभिप्राय है ? इस खाते की मुख्य मदों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर-
भुगतान शेष का चालू खाता वह खाता है जिसमें वस्तुओं, सेवाओं तथा एक पक्षीय अन्तरण का लेखा-जोखा रखा जाता है। मुख्य मदें (Main Components)-

  1. दृश्य मदें (Visible Items) चालू खाते में दृश्य मदों अर्थात् वस्तुओं तथा सेवाओं के आयात तथा निर्यात को शामिल किया जाता है। जब किसी देश की वस्तुओं के आयात तथा निर्यात का विवरण दिया जाता है तो इसको व्यापार शेष कहा जाता है।
  2. अदृश्य मदें (Invisible Items)-इसमें सेवाओं (Services) के आयात तथा निर्यात को शामिल किया जाता है। इनमें यातायात, संचार, बीमा, बैंकिंग आदि सेवाएं शामिल की जाती हैं।
  3. निवेश आय (Investment Income)-एक देश द्वारा विदेशों में किए गए निवेश से प्राप्त ब्याज तथा लाभ और इनके भुगतान के विवरण को चालू खाते में शामिल किया जाता है।
  4. उपहार तथा ग्रांट (Gifts and Grants) चालू खाते में एक पक्षीय भुगतान जैसा कि उपहार और ग्रांट जो विदेशों से प्राप्त किया गया तथा एक पक्षीय भुगतान जो विदेशों को दिया गया, इसको शामिल किया जाता है।

प्रश्न 5.
भुगतान शेष के पूँजी खाते से क्या अभिप्राय है ? इस खाते की मुख्य मदों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर-
पूँजी खाते से अभिप्राय उस खाते से है जिसमें एक देश की सरकार तथा निवासियों का शेष विश्व की सरकार तथा निवासियों से सम्बन्ध होता है। इसमें परिसम्पत्तियों तथा देनदारियों में परिवर्तन होता है। पूँजी खाते की मुख्य मदें इस प्रकार हैं-

  • सरकारी सौदे-जब एक देश की सरकार दूसरे देशों की सरकार से ऋण प्राप्त करती है जिस द्वारा परिसम्पत्तियों में परिवर्तन होता है तो इनको सरकारी सौदे कहा जाता है।
  • निजी सौदे-यह गैर-सरकारी सौदे होते हैं जब एक देश के निवासी विदेशों में तथा विदेशी इसमें निवेश करते हैं तो इनको निजी सौदे कहा जाता है। इनको भी पूँजी खाते में शामिल किया जाता है।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश-जब इस देश के निवासियों द्वारा विदेशों में तथा विदेशी निवासियों द्वारा इस देश में निवेश करके उस पर नियन्त्रण रखा जाता है तो इसको प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहा जाता है।
  • पोर्ट फोलियो निवेश (Port folio Investment)-एक देश के निवासी विदेशों में शेयर्स, बान्ड तथा प्रतिभूतियों की खरीद करते हैं और विदेशियों द्वारा इसमें शेयर्स, बान्ड आदि की खरीद की जाती है तो इसको पोर्ट फोलियो निवेश कहा जाता है। इस निवेश पर निवेशकर्ता का नियन्त्रण नहीं होता।

प्रश्न 6.
भुगतान शेष हमेशा सन्तुलन में होता है। स्पष्ट करें।
अथवा
भुगतान शेष के लेखे को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें।
उत्तर-
एक देश की प्राप्तियां तथा भुगतान को दोहरी अंकन प्रणाली द्वारा रिकार्ड किया जाता है। दोहरी अंकन प्रणाली में प्राप्तियां तथा देनदारियां हमेशा बराबर होती हैं। इसलिए यह कहा जाता है कि भुगतान शेष सदैव सन्तुलित रहता है परन्तु व्यावहारिक तौर पर यह असन्तुलित हो सकता है। इसको एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन 1
लेखे की दृष्टि से भुगतान शेष सदैव सन्तुलन में होता है। जैसा कि प्राप्तियां 300 + 300 + 100 + 300 = ₹ 1000. करोड़ भुगतान 600 + 100 + 80 + 220 == ₹ 1000 करोड़ के बराबर है।

प्रश्न 7.
भुगतान शेष की स्वप्रेरित मदों तथा समायोजक मदों से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भुगतान शेष को अर्थशास्त्री दो भागों में बांटते हैं-

  • स्वप्रेरित मदें (Autoxomous Items)-स्वप्रेरित मदों का अर्थ उन मदों से होता है जिनका मुख्य उद्देश्य , अधिकतम लाभ कमाना होता है। इनका सम्बन्ध भुगतान शेष में समानता स्थापित करना नहीं होता। इन मदों को रेखा से ऊपर की मदों का नाम भी दिया जाता है।
  • समायोजक मदें (Accomodating Items)-समायोजक मदें वे मदें होती हैं जिनका उद्देश्य लाभ अधिकतम – करना होता है। इनका सम्बन्ध लाभ के धनात्मक तथा ऋणात्मक होने से होता है। समायोजक मदों द्वारा भुगतान शेष में समानता स्थापित की जाती है। इन मदों को रेखा से नीचे की मदें भी कहा जाता है।

प्रश्न 8.
भुगतान शेष में असन्तुलन से क्या अभिप्राय है ? इसकी किस्मों का वर्णन करें।।
उत्तर-
भुगतान शेष में असन्तुलन दो प्रकार का हो सकता है-घाटे का भुगतान सन्तुलन, बचत का भुगतान सन्तुलन।
1. घाटे का भुगतान सन्तुलन (Deficit Balance of Payments)-जब किसी देश की प्राप्तियां (Receipts) कम होती हैं और देनदारियां (Payments) अधिक होती हैं तो इस स्थिति को घाटे का भुगतान सन्तुलन कहा जाता है। इस स्थिति को प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन (Unfavourable Balance of Payment) की स्थिति भी कहा जाता है। जब देश के निर्यात कम होते हैं और आयात अधिक होते हैं तो देश को सन्तुलन स्थापित करने के लिए ऋण लेना पड़ता है अथवा सोने के रूप में भुगतान करना पड़ता है।

2. बचत का भुगतान शेष (Surplus Balance of Payments)-जब किसी देश की प्राप्तियां (Credits or Receipts) अधिक होती हैं और देनदारियां (Debits or Payments) कम होती हैं तो इस स्थिति को अनुकूल भुगतान शेष (Favourable Balance of Payments) कहा जाता है। जब देश का निर्यात अधिक होता है और आयात कम होता है तो देश को विदेशों से सोना प्राप्त होता है अथवा देश द्वारा विदेशों को अल्पकालिक ऋण दिए जाते हैं।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

प्रश्न 9.
भुगतान शेष में असन्तुलन के कारण बताओ।
उत्तर-
भुगतान शेष में असन्तुलन के मुख्य कारण इस प्रकार हैं-
A. आर्थिक कारण (Economic Causes)

  • बड़े पैमाने पर विकासवादी खर्च कारण, आयात में बहुत वृद्धि होती है और असन्तुलन पैदा हो जाता है।
  • किसी देश में व्यापार चक्रों के कारण सुस्ती और मन्दीकाल की अवस्था के कारण भुगतान सन्तुलन में असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।
  • देश में मुद्रा स्फीति के कारण विदेशों से आयात में वृद्धि होती है और असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।
    देश में विदेशों से आयात की जाने वाली वस्तुओं के स्थान पर प्रतिस्थापनों का विकास हो जाता है तो इससे शेष. घाटे में कमी हो
  • जाती है।
  • देश में उत्पादन लागत में कमी कारण भुगतान शेष में परिवर्तन उत्पन्न होता है।

B. राजनीतिक कारण (Political Causes)-जब देश में राजनीतिक स्थिरता नहीं होती तो पूँजी का निकास विदेशों में अधिक होता है और पूँजी का आयात कम हो जाता है तो भुगतान शेष में असन्तुलन पैदा हो जाता है।

C. सामाजिक कारण (Social Causes)-देश में लोगों के स्वाद, फैशन तथा प्राथमिकता में परिवर्तन के कारण भी असन्तुलन पैदा हो सकता है।

प्रश्न 10.
भुगतान शेष के असन्तुलन को दूर करने के लिए सुझाव दीजिए।
उत्तर-
भुगतान शेष के असन्तुलन को निम्नलिखित विधियों से ठीक किया जा सकता है-

  • निर्यात प्रोत्साहन (Export Promotion)-देश के निर्यात में वृद्धि करने के लिए उद्यमियों तथा निर्यातकर्ता को सहायता प्रदान करनी चाहिए। इस प्रकार भुगतान असन्तुलन ठीक किया जा सकता है!
  • आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution)–विदेशों से आयात करने वाला वस्तुओं के स्थान पर देश में ही उन वस्तुओं का उत्पादन करके भुगतान शेष के असन्तुलन को ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार देश की आवश्यकताएं देश में ही पूर्ण हो जाती हैं। आयात पर रोक लगानी चाहिए।
  • अवमूल्यन (Devaluation)-देश की करन्सी का मूल्य विदेशी मुद्रा की तुलना में घटाने को अवमूल्यन कहा जाता है। यह लोचशील विनिमय प्रणाली में सम्भव होता है। इससे निर्यात में वृद्धि होती है।
  • मुद्रा स्फीति पर नियन्त्रण (Control over Inflation) देश में मुद्रा स्फीति की दर को नियन्त्रण में करके देश की वस्तुओं की माँग विदेशों में बढ़ाई जा सकती है। इससे भुगतान असन्तुलन की स्थिति ठीक हो जाती है।

प्रश्न 11.
भुगतान सन्तुलन तथा राष्ट्रीय आय लेखे में सम्बन्ध स्पष्ट करें। .
उत्तर-
भुगतान सन्तुलन के खाते में भुगतान और प्राप्तियों को दोहरी अंकन प्रणाली द्वारा स्पष्ट किया जाता है। इसी प्रकार राष्ट्रीय आय के लेखे भी दोहरी अंकन प्रणाली के अनुसार ही बनाए जाते हैं। राष्ट्रीय आय में अन्तिम उपभोग को इस प्रकार स्पष्ट किया जाता है-
Y = C+ I + G + X
इसमें Y = राष्ट्रीय आय, C = वस्तुओं तथा सेवाओं का उपभोग, I = निवेश खर्च, X = निर्यात खर्च राष्ट्रीय आय का माप खुली अर्थव्यवस्था में इस प्रकार किया जाता है-
Y = C + S + T + M
इसमें Y = राष्ट्रीय आय, C = उपभोग खर्च, S = बचत, T = करों का भुगतान, M = आयात खर्च।
∴ C+ I + G + X = C+ S + T + M
I+ G+ X = S + T + M
Injections = Leakages
देश में निवेश, सरकारी खर्च तथा निर्यात द्वारा राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है तथा बचत, कर और आयात द्वारा आय का विकास होता है। इस प्रकार भुगतान सन्तुलन हमेशा सन्तुलन में रहता है।

प्रश्न 12.
भारत में भुगतान सन्तुलन के ढांचे को स्पष्ट करें।
उत्तर-
भारत में भुगतान सन्तुलन लेखे में सरकार की प्राप्तियां तथा भुगतान का विवरण होता है। भुगतान सन्तुलन ढांचे में तीन सैक्शन होते हैं-
(i) चालू खाता
(ii) पूँजी खाता
(iii) रिज़र्व प्रयोग अथवा समष्टि भुगतान सन्तुलन।
भारत के भुगतान सन्तुलन ढांचे को 2011-12 के आंकड़ों के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है –
India’s Balance of Payments : Summary (2011-12)
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन 2

Source : Economic Survey 2012-13. इस सूची पत्र से स्पष्ट होता है कि (i) चालू लेखा सन्तुलन (-) 78155 मिलियन डालर था। व्यापार सन्तुलन (-) 189759 मिलियन डालर और अदृश्य मदों से प्राप्ति 111604 मिलियन डालर थी। (ii) पूँजी लेखे में 67755 मिलियन डालर की आय प्राप्त हुई। इस प्रकार (ii) विदेशी मुद्रा के रिज़र्व भण्डार में प्रयोग के लिए 12831 मिलियन डालर की कमी हुई।

प्रश्न 13.
व्यापार शेष तथा भुगतान शेष में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर-
व्यापार शेष एक देश में वस्तुओं के आयात मूल्य तथा निर्यात मूल्य का अन्तर होता है। भुगतान शेष एक विशाल धारणा है। इसमें व्यापार शेष के साथ-साथ चालू खाते तथा पूँजी खाते के लेन-देन को भी शामिल किया जाता है। इनमें मुख्य अन्तर इस प्रकार हैं –

व्यापार शेष (Balance of Trade) भुगतान शेष (Balance of Payments)
(1) इसमें वस्तुओं के निर्यात तथा आयात का विवरण होता है। (1) इसमें वस्तुओं तथा सेवाओं के निर्यात तथा आयात का विवरण होता है।
(2) इसमें पूँजीगत लेन-देन को शामिल नहीं किया जाता जैसे कि परिसम्पत्तियों की खरीद बेच। (2) इसमें पूँजीगत लेन-देन को शामिल किया जाता है।
(3) यह एक सीमित धारणा है जोकि भुगतान शेष का एक भाग है। (3) यह एक विशाल धारणा है। व्यापार शेष इस धारणा का एक भाग होता है।
(4) व्यापार शेष प्रतिकूल, अनुकूल या सन्तुलन में हो सकता है। (4) भुगतान शेष सदैव बराबर होता है क्योंकि प्राप्तियां तथा भुगतान बराबर होते हैं।

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भुगतान शेष लेखे से क्या अभिप्राय है ? इसके मुख्य अंशों को स्पष्ट करें।
(What is meant by Balance of Payment Account ? Describe components of Balance of Payment Account.)
अथवा
भुगतान शेष की दृश्य मदों तथा अदृश्य मदों से क्या अभिप्राय है ? उदाहरण द्वारा स्पष्ट करो।
(What is meant by Visible and Invisible Items in Balance of Payment Account ? Explain with examples.)
उत्तर-
भुगतान शेष लेखांकन का अर्थ (Meaning of Balance of Payments Account)-भुगतान शेष लेखांकन का अर्थ एक देश का शेष विश्व के साथ आर्थिक लेन-देन के विवरण का लेखा-जोखा होता है। (The B.O.P. account is a summary of international transactions of a country in a financial year.)
भुगतान सन्तुलन को दोहरी अंकन प्रणाली द्वारा स्पष्ट किया जाता है। इसलिए भुगतान शेष लेखांकन का ढांचा इस प्रकार का होता है जिसमें भुगतान शेष सदैव सन्तुलन में रहता है।
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन 3
भुगतान शेष के मुख्य अंश अथवा तत्त्व (Components) of B.O.P.)
अथवा
भुगतान शेष की दृश्य तथा अदृश्य मदें (Visible and Invisible Items of Balance of Payments)-
भुगतान शेष की मुख्य मदों को ऊपर दिए ढांचे अथवा संरचना में दिखाया गया है। इनको निम्नलिखित अनुसार स्पष्ट किया जा सकता है-
1. वस्तुओं का निर्यात तथा आयात (दृश्य मदें)[Export and Import of Goods (Visible Items)] वस्तुओं के निर्यात तथा आयात को दृश्य मदें कहा जाता है। ऊपर दिए सूची पत्र 7.1 के अनुसार, वस्तुओं का निर्यात ₹ 300 करोड़ और वस्तुओं का आयात ₹ 600 करोड़ है। इस किस्म के व्यापार को दृश्य मदें कहा जाता है। इन मदों का विवरण कस्टम अधिकारियों द्वारा रखा जाता है।

2. सेवाओं का निर्यात तथा आयात (अदृश्य मदें) [Export and Import of Services (Invisible Items)]-हर एक देश विदेशों की सेवाएं प्रदान करता है और विदेशों से सेवाएं आयात की जाती हैं। सेवाओं के आदान-प्रदान को अदृश्य मदें कहा जाता है। सेवाओं में मुख्य रूप से निम्नलिखित मदों से आय को शामिल किया जाता है।

  • जहाज़रानी, बैंकिंग तथा बीमा (Shipping, Banking and Insurance) हर एक देश विदेशों को जहाज़रानी, बैंकिंग तथा बीमा की सेवाएं प्रदान करता है और बाकी विश्व के देशों से यह सेवाएं प्राप्त की जाती हैं। इनको अदृश्य मदें कहा जाता है।
  • टूरिज्म से आय (Income from Tourism)-टूरिज्म से आय को भी अदृश्य निर्यात कहा जाता है।
  • ब्याज तथा लाभांश (Interest and Dividends)-अदृश्य मदों में एक देश के निवासियों द्वारा निवेश करने से प्राप्त ब्याज तथा लाभांश को भी सेवाओं के निर्यात में शामिल किया जाता है। इस प्रकार सेवाओं के निर्यात तथा आयात द्वारा अदृश्य मदों से शुद्ध प्राप्त आय को भुगतान सन्तुलन में शामिल किया जाता है। इनको अदृश्य मदें (Invisible Items) कहा जाता है।

3. एक पक्षीय अन्तरण (Unilateral Transfers)-एक पक्षीय अन्तरण का अर्थ है एक देश द्वारा विश्व के शेष देशों को उपहार (Gifts), सहायता (Donations) आदि भेजना तथा बाकी विश्व के देशों से उपहार सहायता विदेशी धन प्राप्त करता है। जब विदेशों से उपहार या सहायता प्राप्त की जाती है तो इसके बदले में वर्तमान अथवा भविष्य में कोई भुगतान नहीं करना पड़ता। ये प्राप्तियां तथा भुगतान देश की सरकार तथा निजी नागरिकों द्वारा लिए या दिए जाते हैं।

4. पूँजीगत प्राप्तियां तथा भुगतान (Capital Receipts and Payments)-पूँजीगत प्राप्तियों में निवेश आय जैसा कि लगान, व्याज, लाभ और मज़दूरी के रूप में विश्व के शेष देशों से प्राप्त की जाती है। इसको पूँजीगत प्राप्ति में शामिल किया जाता है। इस प्रकार पूँजीगत भुगतान में लगान, ब्याज, लाभ और मजदूरी के रूप में बाकी विश्व के देशों को किए गए भुगतान को पूंजीगत भुगतान में शामिल किया जाता है। इनको भुगतान सन्तुलन लेखे में प्राप्तियां तथा भुगतान के रूप में लिखा जाता है। इनमें ऋण, निवेश, परिसम्पत्तियों की बिक्री, सोना चांदी तथा विदेशी मुद्रा के भण्डार को शामिल किया जाता है। भारत में भुगतान शेष के लेन-देन के वर्गीकरण को भागों में बांटा जाता है-

  • वस्तुओं तथा सेवा का खाता (Goods and Services Account)
  • एक पक्षीय अन्रण खाता (Unilateral Transfers Account)
  • दीर्घकालिक पूँजी खाता (Long Term Capital Account)
  • अल्पकालिक निजी पूँजी खाता (Short Term Private Capital Account)
  • अल्पकालिक सरकारी पूँजी खाता (Short Term Official Capital Account)

प्रश्न 2.
भुगतान शेष से क्या अभिप्राय है ? भुगतान शेष के प्रतिकूल होने के कारण बताएं। भुगतान शेष के असन्तुलन को ठीक करने के उपाय बताएं।
(What is meant by B.O.P. ? Discuss the Causes of adverse B.O.P. Suggest measures to correct dis-equilibrium in B.O.P.)
उत्तर-
भुगतान शेष एक देश का बाकी विश्व के देशों से निश्चित समय में अन्य देशों से आदान-प्रदान का विवरण होता है। हर एक देश विदेशों को वस्तुएं तथा सेवाएं भेजता है जिससे उस देश को आय प्राप्त होती है। वस्तुएं तथा सेवाएं मंगवाने से उस देश को भुगतान करना पड़ता है। भुगतान शेष वस्तुएं, सेवाएं तथा हर प्रकार के पूँजी आदान-प्रदान को शामिल करता है। सी० पी० किंडलबरजर के अनुसार, “एक देश का भुगतान शेष उस देश के निवासियों और विदेशी निवासियों के अन्तर्गत आर्थिक लेन-देन का विधिपूर्वक लेखा जोखा होता है।’ (The balance of payment of country is a systematic record of all economic transactions between its residents and residents of foreign countries.” C.P. Kindle-berger
भुगतान शेष = शुद्ध व्यापार शेष + शुद्ध सेवाओं में सन्तुलन + शुद्ध एक पक्षीय भुगतान + शुद्ध पूँजीगत लेखा सन्तुलन। व्यापार शेष (B.O.T.), भुगतान सन्तुलन का एक भाग होता है।

असन्तुलित भुगतान शेष के कारण (Causes of Disequilibrium in Balance of Payments)-
भुगतान शेष सदैव सन्तुलन में होता है परन्तु जब भुगतान शेष घाटे वाला (Deficit) अथवा बचत वाला (Surplus) होता है तो इसको पूँजी लेखे की सहायता से सन्तुलन में किया जाता है। जब हम भुगतान शेष में असन्तुलन की बात करते हैं तो इसका सम्बन्ध चालू खाते (Current Account) से होता है। भुगतान सन्तुलन के असन्तुलित होने के मुख्य कारण निम्नलिखित होते हैं-

1. आर्थिक तत्त्व (Economic Factors) –

  • अधिक विकासवादी खर्च (Huge Development Expenditure)-जब देश की सरकार देश के आर्थिक विकास पर बहुत अधिक खर्च करती है तो इस स्थिति में विदेशों से मशीनें और औज़ार आयात किए जाते हैं। इस कारण भुगतान शेष में घाटे का असन्तुलन पैदा हो जाता है।
  • व्यापारिक चक्र (Trade Cycles)-सुस्ती तथा मन्दी के कारण देश में सरकार को अधिक खर्च करना । पड़ता है। इसके फलस्वरूप घाटे वाला असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है। तेज़ीकाल के समय सरकार अधिक निर्यात करके विदेशी मुद्रा कमाती है। इससे बचत वाला असन्तुलन उत्पन्न होता है।
  • मुद्रा स्फीति (Inflation)-देश में मुद्रा स्फीति के कारण वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। देश के निर्यात कम हो जाते हैं और आयात बढ़ जाते हैं। इसलिए घाटे वाला असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।
  • आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution)-आयात प्रतिस्थापन का अर्थ है विदेशों से आयात की जाने वाली वस्तुओं का देश में ही उत्पादन करना। इस उद्देश्य के लिए विदेशों से नई मशीनें आयात की जाती हैं और भुगतान शेष घाटे वाला हो जाता है।
  • उत्पादन लागत में परिवर्तन (Change in Cost of Production)—जब तकनीक का विकास होता है तो इससे उत्पादन लागत में परिवर्तन हो जाता है। लागत कम होने से निर्यात में वृद्धि होती है और भुगतान शेष में असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।

2. राजनीतिक तत्त्व (Political Factors)-

  • राजनीतिक अस्थिरता (Political Instability)-जब किसी देश में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति होती है तो इससे पूँजी का विकास होता है और पूंजी का प्रवेश कम होने से घाटे के असन्तुलन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • आयात कर में कमी (Reduction in Import duty)-जब देश की सरकार, आयात कर में कमी करती है तो इस कारण आयात में वृद्धि होती है और घाटे वाला असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।

3. सामाजिक तत्त्व (Social Factors) –

  • स्वाद तथा फैशन में परिवर्तन (Changes in Tastes and Fashion)-जब किसी देश के लोगों के स्वाद, फैशन तथा प्राथमिकताओं में परिवर्तन होता है तो इसके परिणामस्वरूप आयात और निर्यात में परिवर्तन हो जाता है। इससे भी असन्तुलन उत्पन्न होता है।
  • जनसंख्या में वृद्धि (Population Growth)-जब एक देश में जनसंख्या में वृद्धि तेजी से होती है जो इससे वस्तुओं तथा सेवाओं की मांग में वृद्धि हो जाती है। परिणामस्वरूप भुगतान शेष में असन्तुलन उत्पन्न हो जाता है।

भुगतान शेष के असन्तुलन को ठीक करने के उपाय (Measures to Correct dis-equilibrium in B.O.P.) –
भुगतान शेष को निम्नलिखित विधियों से ठीक किया जा सकता है –

  1. निर्यात प्रोत्साहन (Export Promotion)-जब किसी देश में भुगतान शेष घाटे वाला होता है तो उस स्थिति में निर्यात में वृद्धि हो सके। इस प्रकार घाटे वाला असन्तुलन ठीक हो सकता है।
  2. आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution)-सरकार को आयात की जाने वाली वस्तुओं के स्थान पर देश में ही उन वस्तुओं का उत्पादन करना चाहिए। इससे आयात मूल्य में कमी हो जाएंगी और भुगतान शेष का असन्तुलन ठीक हो जाएगा।
  3. विदेशी मुद्रा पर नियन्त्रण (Exchange Control)-सरकार को विदेशी मुद्रा पर नियन्त्रण रखना चाहिए। निर्यात करने वाले उद्यमियों की विदेशी मुद्रा में आय को केन्द्रीय बैंक में जमा करवाना चाहिए और अधिक · महत्त्वपूर्ण आयात पर ही विदेशी मुद्रा को खर्च करना चाहिए। इससे भी भुगतान शेष में सुधार हो सकता है।
  4. मुद्रा का अवमूल्यन (Devaluation of Currency)-एक देश को घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन करना चाहिए। अवमूल्यन का अर्थ है किसी देश की मुद्रा का मूल्य दूसरे देशों की मुद्रा की तुलना में कम करना होता है। इससे विदेशी लोग इस देश की वस्तुओं तथा सेवाओं की अधिक खरीददारी करते हैं। इससे भुगतान असन्तुलन ठीक हो जाता है। परन्तु यह स्थिर विनिमय दर प्रणाली में ही सम्भव होता है।

5. मुद्रा की मूल्य कमी (Depreciation of Currency)-देश की मुद्रा की ख़रीद शक्ति को कम करने की प्रक्रिया को मुद्रा की मूल्य कमी कहा जाता है। यह परिवर्तनशील विनिमय दर प्रणाली में सम्भव होता है। यहां पर विनिमय दर माँग तथा पूर्ति द्वारा निर्धारित होती है। इससे निर्यात को प्रोत्साहन प्राप्त होता है और आयात कम हो जाता है।

6. मुद्रा स्फीति पर नियन्त्रण (Control Over Inflation)-जब किसी देश के कीमत स्तर में वृद्धि होती है तो उस देश की वस्तुओं की माँग विदेशों में कम हो जाती है, इसलिए स्फीति के स्तर को कम करके निर्यात में वृद्धि करनी चाहिए। इससे भुगतान असन्तुलन ठीक हो जाता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

v. संख्यात्मक प्रश्न (Numericals)

प्रश्न 1.
व्यापार का घाटा ₹ 5000 करोड़ है। आयात का मूल्य ₹ 9000 करोड़ है तो निर्यात का मूल्य ज्ञात करें।
उत्तर-
व्यापार का घाटा = ₹5000 करोड़, आयात
= ₹ 9000 करोड़ व्यापार का घाटा = निर्यात – आयात
= (-) 5000 = निर्यात –9000
= (-) 5000 + 9000 = निर्यात
निर्यात = ₹4000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 2.
व्यापार शेष का घाटा ₹ 300 करोड़ है। निर्यात का मूल्य ₹ 500 करोड़ है। आयात का मूल्य ज्ञात करो।
उत्तर-
व्यापार शेष का घाटा = ₹ 300 करोड़, निर्यात = ₹ 500 करोड़
व्यापार शेष का घाटा = निर्यात – आयात
(-) 300 = 500 – आयात
आयात = 500 + 300
= ₹ 800 करोड़ उत्तर

प्रश्न 3.
एक देश का निर्यात ₹ 10,000 करोड़ है। आयात ₹ 12,000 करोड़ है। व्यापार शेष ज्ञात करो।
उत्तर –
व्यापार शेष = निर्यात – आयात
= 10,000 – 12,000
= (-) ₹ 2000 करोड़
व्यापार शेष का घाटा = ₹ 2000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 4.
एक देश का आयात मूल्य ₹ 70050 करोड़ है। निर्यात मूल्य ₹ 85025 करोड़ है। व्यापार सन्तुलन ज्ञात करें।
उत्तर-
व्यापार शेष = निर्यात का मूल्य – आयात का मूल्य
= 85025 – 70050 = ₹ 14975 करोड़ उत्तर

प्रश्न 5.
यदि व्यापार बाकी (-) ₹600 करोड़ है और निर्यात की कीमत ₹ 500 करोड़ है तो आयत की कीमत पता कीजिए।
उत्तर-
व्यापार बाकी = निर्यात – आयात
-600 = 500 – आयात – 600 – 500 = – आयात
-1100 = – आयात
आयात की कीमत = ₹ 1100 करोड़ उत्तर

प्रश्न 6.
यदि व्यापार बाकी (-) ₹ 900 करोड़ है और निर्यात की कीमत ₹600 करोड़ है तो आयात की कीमत पता कीजिए।
उत्तर –
व्यापार बाकी = निर्यात की कीमत – आयात की कीमत
– 900 = 600 – आयात की कीमत
– 900 – 600 = – आयात की कीमत
– 1500 = – आयात की कीमत
आयात की कीमत = ₹ 1500 करोड़ उत्तर

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

प्रश्न 7.
यदि व्यापार बाकी (-) ₹ 1000 करोड़ है और निर्यात की कीमत ₹ 600 करोड़ है तो आयात की कीमत पता कीजिए।
उत्तर-
व्यापार बाकी = निर्यात की कीमत – आयात की कीमत
(-) 1000 = 600 – आयात की कीमत
– 1000 – 600 = – आयात की कीमत
– 1600 = – आयात की कीमत
आयात की कीमत = ₹ 1600 करोड़ उत्तर

प्रश्न 8.
यदि व्यापार बाकी ₹ 800 करोड़ का घाटा दर्शाता है। निर्यात की कीमत ₹ 900 करोड़ है तो आयात की कीमत ज्ञात करें।
उत्तर-
व्यापार बाकी = निर्यात – आयात
– 800 = 900 – आयात
– 800 – 900 = – आयात
– 1700 = – आयात
आयात = ₹ 1700 करोड़ उत्तर

प्रश्न 9.
यदि व्यापार बाकी ₹ 1600 करोड़ का घाटा दर्शाता है। निर्यात की कीमत ₹ 1800 करोड़ है तो आयात की कीमत पता करें।
उत्तर-
व्यापार बाकी = निर्यात – आयात
– 1600 = 1800 – आयात
– 1600 – 1800 = – आयात
– 3400 = – आयात
आयात = ₹ 3400 करोड़ उत्तर

प्रश्न 10.
व्यापार शेष ₹ 1200 करोड़ का घाटा दर्शाता है। यदि निर्यात की कीमत ₹ 1100 करोड़ है तो आयात की कीमत पता करें।
उत्तर-
व्यापार शेष = निर्यात – आयात
– 1200 = 1100 – आयात
– 1200 – 1100 = – आयात
– 2300 = – आयात
आयात = ₹ 2300 करोड़ उत्तर।

प्रश्न 11.
जब निर्यातों का मूल्य आयातों के मूल्य से ……….. होता है तो व्यापार शेष पक्ष का होगा।
उत्तर-
अधिक।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 15 भुगतान सन्तुलन

प्रश्न 12.
जब निर्यातों का मूल्य आयातों के मूल्य से ………… होता है तो व्यापार शेष प्रतिकूल होगा।
उत्तर-
कम।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 22 निर्धनता की समस्या

Punjab State Board PSEB 12th Class Economics Book Solutions Chapter 22 निर्धनता की समस्या Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Economics Chapter 22 निर्धनता की समस्या

PSEB 12th Class Economics निर्धनता की समस्या Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
निर्धनता से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
निर्धनता से अभिप्राय जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, सेहत इत्यादि को पूरा करने की अयोग्यता होती है।

प्रश्न 2.
भारत में सापेक्ष निर्धनता से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सापेक्ष निर्धनता से अभिप्राय है तुलनात्मक निर्धनता।

प्रश्न 3.
निरपेक्ष निर्धनता से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
निरपेक्ष निर्धनता से अभिप्राय उपभोग के विशेष बिन्दु को कम स्थिति में व्यय किया जाए, जिसको निर्धनता रेखा कहा जाता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 22 निर्धनता की समस्या

प्रश्न 4.
भारत के किस राज्य में सबसे अधिक तथा किस राज्य में सबसे कम निर्धनता है ?
उत्तर-
भारत में सबसे अधिक निर्धनता बिहार में पाई जाती है। बिहार में 55 प्रतिशत लोग निर्धनता रेखा से नीचे जीवन बिता रहे हैं। पंजाब में सबसे कम निर्धनता है। 12 प्रतिशत लोग निर्धनता रेखा से नीचे जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

प्रश्न 5.
जीवन स्वास्थ्य तथा कार्यकुशलता के लिए न्यूनतम उपभोग आवश्यकताओं की प्राप्ति की अयोग्यता को निर्धनता कहते हैं।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 6.
भिखारी अथवा अनियमित मज़दूर जिनके पास कभी-कभी धन आ जाता है को ……… निर्धन कहते हैं।
उत्तर-
चिरकालिक निर्धन (Chronic Poor)।

प्रश्न 7.
वह व्यक्ति जिन के पास अधिकांश समय धन होता है परन्तु कभी-कभी अल्पकाल के लिए रोज़गार नहीं मिलता उनको ………… निर्धन कहते हैं।
उत्तर-
अल्पकालिक निर्धन (Transient Poor)।

प्रश्न 8.
वह व्यक्ति जो कभी भी निर्धन नहीं होते उनको ………….. निर्धन कहते हैं।
उत्तर-
और-निर्धन (Non-Poor)।

प्रश्न 9.
वह सीमा बिन्दू जो किसी देश में लोगों को निर्धन तथा अनिर्धन में विभाजित करता है को ……………. कहते हैं।
उत्तर-
निर्धनता रेखा (Poverty Line)।

प्रश्न 10.
निर्धनता रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या के रूप में मापा जाता है को ………… अनुपात कहते हैं।
उत्तर-
व्यक्ति गणना अनुपात (Head Count Ratio)।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 22 निर्धनता की समस्या

प्रश्न 11.
भारत में निर्धनता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण बढ़ती हुई जनसंख्या है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 12.
गरीबी रेखा की सीमा आय रूप में की जाए अथवा उपभोग रूप में की जाए ?
उत्तर-
उपभोग रूप में।

प्रश्न 13.
भारत में गरीबी रेखा की सीमा किस माप दण्ड में निर्धारण होती है ?
उत्तर-
आय द्वारा।

प्रश्न 14.
व्यक्तिगत गणना अनुपात से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
व्यक्तिगत गणना अनुपात द्वारा गरीबों को गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या के रूप में माप करना होता है।

प्रश्न 15.
सन् 2012 में गरीबी रेखा को पुनः प्रभावित करने का आदेश किस संस्था ने दिया ?
उत्तर-
सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इण्डिया।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सापेक्ष तथा निरपेक्ष निर्धनता से क्या अभिप्राय है ? ।
उत्तर-
सापेक्ष निर्धनता-जब विभिन्न देशों, क्षेत्रों अथवा वर्गों में तुलना की जाती है तथा तुलनात्मक आय कम होती है तो इसको सापेक्ष निर्धनता कहा जाता है, जैसे कि अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय 58036 डालर है तथा भारत में प्रति व्यक्ति आय 6490 डालर है। इस प्रकार अमीर देशों की तुलना में भारत निर्धन देश है। निरपेक्ष निर्धनता-भारत में निरपेक्ष निर्धनता को निर्धन रेखा द्वारा मापते हैं। भारत के गाँवों में 1054 रु० प्रति माह तथा शहरों में 1984 रु० प्रति माह उपभोग व्यय करने वाले व्यक्तियों को निर्धन कहा जाता है, क्योंकि वह निर्धनता रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करते हैं।

प्रश्न 2.
निर्धनता रेखा से क्या अभिप्राय है? क्या निर्धनता रेखा का आय अथवा उपभोग के रूप में निर्धारण करना चाहिए ?
उत्तर–
प्रति व्यक्ति व्यय से सम्बन्धित यह ऐसा बिन्दु है, जोकि किसी क्षेत्र के व्यक्तियों को निर्धन होने अथवा निर्धन न होने में विभाजित करता है। भारत में निर्धन होने के लिए ग्रामीण क्षेत्र में 816 रु० का व्यय तथा शहरी क्षेत्र के लिए 1000 रु० के व्यय को निर्धनता का बिन्दु मानकर निर्धनता रेखा को निश्चित किया गया है। निर्धनता रेखा को निर्धारण करने के लिए आय से उपभोग (consumption) को सूचक मानना चाहिए, क्योंकि आय द्वारा खरीद शक्ति का ज्ञान प्राप्त होता है जबकि उपभोग द्वारा यह पता लगता है कि मनुष्य कौन-सी वस्तुओं का प्रयोग करता है तथा कितनी मात्रा में प्रयोग किया जाता है। इस कारण उपभोग द्वारा निर्धनता रेखा को निर्धारित करना चाहिए। योजना आयोग ने निर्धनता रेखा की नई सीमा 67 रुपये प्रतिदिन करने की सिफ़ारिश की है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 22 निर्धनता की समस्या

प्रश्न 3.
भारत में निर्धनता के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर-
भारत में निर्धनता के कारण (Causes of Poverty in India)—निर्धनता के कारण ही भारत की अर्थव्यवस्था कम विकसित है। भारत में निर्धनता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-

  1. विकास की कम दर-भारत की योजनाओं में आर्थिक विकास का लक्ष्य 5% वार्षिक रखा गया। परन्तु वास्तव में विकास दर 2.4% प्राप्त की गई। इस कारण निर्धनता की स्थिति पाई जाती है।
  2. राष्ट्रीय उत्पाद का कम स्तर- भारत में राष्ट्रीय उत्पाद का स्तर यू०एन०ओ० की शर्तों अनुसार नीचा है। कम प्रति व्यक्ति आय भी निर्धनता का सूचक है। भारत की GDP 2020-21 में, 1.34 लाख करोड़ तथा P.C.I ₹ 1,38,000 थी।

प्रश्न 4.
भारत में निर्धनता को दूर करने हेतु कोई दो सुझाव दें।
उत्तर-
निर्धनता को दूर करने के लिए सुझाव (Suggestion to Remove Poverty)
1. विकास की दर में वृद्धि-भारत में विकास की दर में वृद्धि करनी चाहिए। यदि देश में कृषि, उद्योग, वाणिज्य, यातायात की वृद्धि की जाए तो रोज़गार के अधिक अवसर प्रदान करके निर्धनता को दूर किया जा सकता है।

2. जनसंख्या पर रोक-भारत में तीव्रता से बढ़ रही जनसंख्या पर रोक लगाने के लिए जन्म दर में कमी करने की आवश्यकता है। इससे निर्धनता को दूर किया जा सकता है।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत में निर्धनता रेखा का कैसे निर्धारण किया जाता है ?
उत्तर-
भारत में निर्धनता रेखा को निश्चित करने के लिए निम्नलिखित विधि को अपनाया जाता है –

  1. उपभोग पर व्यय में सिर्फ निजी उपभोग व्यय को शामिल किया जाता है। सरकार द्वारा वस्तुओं पर किए व्यय को शामिल नहीं किया जाता।
  2. निजी उपभोग व्यय में सिर्फ खाद्य पदार्थों पर व्यय को ही शामिल नहीं किया जाता, बल्कि गैर-खाद्य पदार्थों पर व्यय को भी शामिल किया जाता है।
  3. खुराक पर व्यय की मदों से प्रति व्यक्ति भोजन में प्राप्त कैलोरियों द्वारा माप किया जाता है। अमीर तथा निर्धन वर्गों द्वारा उपभोग की कैलोरियों का विस्तार (Range) तथा स्तर (Level) मापा जाता है।
  4. विभिन्न वर्ग के लोगों द्वारा किए गए उपभोग से प्राप्त कैलोरियों के आधार पर आवृत्ति वितरण तैयार की जाती है। इस प्रकार निर्धन लोग कम कैलोरी तथा अमीर लोग अधिक कैलोरी भोजन का उपभोग करते हैं।
  5. आवृत्ति के आधार पर संख्या की जाती है। इससे ग्रामीण क्षेत्र के लिए विभिन्न तथा शहरी क्षेत्र के लिए विभिन्न निर्धनता रेखा निश्चित की जाती है। इस निर्धनता रेखा के बिन्दु से नीचे रहने वाले व्यक्तियों की संख्या की जाती है।

प्रश्न 2.
भारत में ग्रामीण तथा शहरी निर्धनता की स्थिति को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
भारत में निर्धनता रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्तियों की कुल संख्या में निरन्तर कमी हो रही है। इसको सूची पत्र द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। विश्व बैंक ने 18 अप्रैल 2013 को रिपोर्ट में कहा है कि भारत में एक तिहाई जनसंख्या गरीब है।
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 22 निर्धनता की समस्या 1
Source: NITI Aayog (NSSO)

  1. भारत में 1970-71 में 25 करोड़ गरीब थे, जिनकी संख्या 2019-20 में 22 करोड़ थी।
  2. शहरी क्षेत्र में 1970-71 में निर्धनों की संख्या 42% थी जो कि 2019-20 में 14% हो गई है।
  3. ग्रामीण क्षेत्र में 1970-71 में निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 54% थी, जोकि 2019-20 में घटकर 20% रह गई है।
  4. भारत में निर्धनों की कुल संख्या 1970-71 में 51 प्रतिशत थी। 2019-20 में यह संख्या घटकर 17% रह गई है। 2022 तक गरीबों की संख्या 18% रहने का अनुमान है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 22 निर्धनता की समस्या

प्रश्न 3.
भारत में निर्धनता के मुख्य कारण बताओ।
उत्तर-
भारत में निर्धनता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-

  1. कम विकास दर-भारत में वार्षिक विकास दर 4 प्रतिशत हो रही है, परन्तु जनसंख्या में वृद्धि 2 प्रतिशत वार्षिक होने के कारण प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि 2.4 प्रतिशत हुई। इसी कारण निर्धनता पाई जाती है।
  2. जनसंख्या में वृद्धि- भारत में जनसंख्या में वृद्धि इतनी तीव्रता से हुई है, जिस कारण निर्धनों की संख्या में बहुत वृद्धि हुई है।
  3. बेरोज़गारी- भारत में बेरोज़गारी तथा अल्पबेरोज़गारी ने निर्धनता में वृद्धि की है। देश में 2 करोड़ से – अधिक बेरोज़गार हैं।
  4. संस्थागत ढांचे की कमी- भारत में बिजली, पानी, सड़कें, यातायात तथा संचार, शिक्षा, सेहत इत्यादि बुरी स्थिति में हैं। इसलिए उत्पादन में वृद्धि कम दर पर हुई है तथा निर्धनता पाई जाती है।

प्रश्न 4.
निर्धनता दूर करने के लिए सरकार द्वारा उठाए कोई दो पगों की व्याख्या करो।
अथवा
स्वर्ण जयंती ग्राम स्वयं रोज़गार योजना तथा स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना पर नोट लिखो।
उत्तर-
1. स्वर्ण जयंती ग्राम स्वयं रोजगार योजना निर्धनता दूर करने के लिए यह योजना अप्रैल 1999 में लागू की गई। यह योजना केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा 75:25 के अनुपात में व्यय के आधार पर बनाई जाती है। इस योजना द्वारा स्वयं रोज़गार के लिए ऋण की सुविधाओं का प्रबन्ध किया गया है। इस योजना पर जनवरी, 2019-20 तक 48000 करोड़ रु० व्यय किए गए।

2. स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना- यह योजना शहरी स्वयं रोज़गार तथा शहरी मज़दूरी रोज़गार प्रोग्राम को एकत्रित करके 1997 में आरम्भ की गई। यह योजना भी केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा 75:25 अनुपात अनुसार व्यय के आधार पर बनाई गई है। इस योजना पर जनवरी, 2019-20 में 5270 करोड़ रु० व्यय किए गए। इस राशि से 28 हज़ार शहरी गरीब परिवारों को रोजगार प्रदान किया गया।

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
निर्धनता से क्या अभिप्राय है? भारत में निर्धनता के कारण बताओ। निर्धनता दूर करने के लिए सुझाव दीजिए।
(What is meant by Poverty ? Discuss the causes of Poverty in India ? Suggest measures to remove Poverty.)
उत्तर-
निर्धनता का अर्थ (Meaning of Poverty)-निर्धनता से अभिप्राय जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, सेहत इत्यादि को पूरा करने की अयोग्यता होती है। निर्धनता को दो रूपों में प्रकट किया जाता है –
(A) सापेक्ष निर्धनता (Relative Poverty)-यू० एन० ओ० की रिपोर्ट अनुसार सापेक्ष निर्धनता का अर्थ तुलनात्मक निर्धनता से होता है, जब विभिन्न देशों, क्षेत्रों अथवा वर्गों की तुलना की जाती है तथा तुलनात्मक आय कम होती है अथवा इसको सापेक्ष निर्धनता कहा जाता है। जैसे कि भारत की प्रति व्यक्ति आय 6490डालर, अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय 58030 डालर की तुलना में बहुत कम है। इसलिए भारत गरीब देश है। भारत में निर्धन व्यक्तियों की संख्या बिहार में 55% तथा पंजाब में 12% है। यह क्षेत्रीय निर्धनता है। इसी तरह कम आय 20% लोगों के पास राष्ट्रीय आय 7 प्रतिशत तथा अधिक आय वाले 20% लोगों के पास राष्ट्रीय आय 46 प्रतिशत है। यह वर्ग निर्धनता है।

(B) निरपेक्ष निर्धनता (Absolute Poverty)-भारत में निरपेक्ष निर्धनता को निर्धनता रेखा द्वारा मापते हैं। निर्धनता रेखा से अभिप्राय न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रति माह औसत व्यय की रेखा होती है। भारत में 2004-05 की कीमतों के अनुसार ग्रामों में 816 रु० तथा शहरों में 1000 रु० प्रति माह व्यय करने वाले व्यक्तियों को निर्धनता रेखा से नीचे का जीवन व्यतीत करने वाले निर्धन व्यक्ति कहा जाता है।

भारत में निर्धनता का विस्तार (Extent of Poverty in India)-भारत में 2019-20 में 22 करोड़ व्यक्ति निर्धन थे अर्थात् इनमें से 20% लोग ग्रामों तथा 14% लोग शहरों में निर्धन थे। जनसंख्या में से 35% लोग निर्धनता रेखा से नीचे थे। बाहरवीं योजना अनुसार 2022 तक 18% प्रतिशत लोग निर्धनता रेखा से नीचे रह जाएंगे। भारत के विभिन्न राज्यों में से बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा में निर्धनों की संख्या अधिक है जबकि हिमाचल प्रदेश/हरियाणा तथा पंजाब में निर्धनों की संख्या कम है। बिहार में सबसे अधिक 55% लोग निर्धन हैं, जबकि पंजाब में सबसे कम 12% लोग निर्धन हैं।

भारत में निर्धनता के कारण (Causes of Poverty in India)-निर्धनता के कारण ही भारत की अर्थव्यवस्था कम विकसित है। भारत में निर्धनता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-
1. विकास की कम दर- भारत की योजनाओं में आर्थिक विकास का लक्ष्य 10% वार्षिक रखा गया। परन्तु वास्तव में विकास दर 5.7% प्राप्त की गई। इस कारण निर्धनता की स्थिति पाई जाती है।

2. राष्ट्रीय उत्पाद का कम स्तर- भारत में राष्ट्रीय उत्पाद का स्तर यू० एन० ओ० की शर्तों अनुसार नीचा है। प्रचलित कीमतों पर 2019-20 में शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद 134 लाख करोड़ रु० तथा प्रति व्यक्ति आय 1,38,000 रु० थी। कम प्रति व्यक्ति आय भी निर्धनता का सूचक है।

3. अधिक जनसंख्या- भारत में निर्धनता का मुख्य तथा बड़ा कारण जनसंख्या का अधिक होना है। जनसंख्या की वृद्धि का कारण देश में जन्म दर से मृत्यु दर में बहुत अधिक कमी होना है। 1951 में भारत की जनसंख्या 36 करोड़ थी जोकि 2011 में 121 करोड़ हो गई है।

4. बढ़ती कीमतें-देश में उत्पादन की वृद्धि की कम दर तथा जनसंख्या की वृद्धि की अधिक दर के कारण कीमतों में वृद्धि तीव्रता से हो रही है। इससे निर्धन लोग अपनी आवश्यकताएं पूरी करने में असमर्थ हैं। 2019-20 में कीमतों में वृद्धि 5.2% रही।

5. पूंजी की कमी-भारत में प्राकृतिक साधन तो अधिक मात्रा में पाए जाते हैं परन्तु पूंजी की कमी के कारण साधनों का उचित प्रयोग नहीं हो रहा। इस कारण उत्पादकता कम है तथा निर्धनता पाई जाती है।

निर्धनता को दूर करने के लिए सुझाव (Suggestion to Remove Poverty)-

  1. विकास की दर में वृद्धि-भारत में विकास की दर में वृद्धि करनी चाहिए । यदि देश में कृषि, उद्योग, वाणिज्य, यातायात की वृद्धि की जाए तो रोज़गार के अधिक अवसर प्रदान करके निर्धनता को दूर किया जा सकता है।
  2. जनसंख्या पर रोक-भारत में तीव्रता से बढ़ रही जनसंख्या पर रोक लगाने के लिए जन्म दर में कमी करने की आवश्यकता है। इससे निर्धनता को दूर किया जा सकता है।
  3. आय की असमानता में कमी-भारत में अमीर लोगों पर अधिक कर लगाकर प्राप्त हुई आय को निर्धनों की भलाई पर व्यय करना चाहिए। इससे आर्थिक असमानता आएगी तथा निर्धनता को दूर किया जा सकेगा।
  4. निर्धनों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति- सरकार को निर्धन लोगों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पग उठाने चाहिए । इस उद्देश्य के लिए निर्धनों के लिए अधिक रोज़गार तथा परिवार नियोजन पर ज़ोर देना चाहिए।
  5. तकनीक में परिवर्तन- भारत में श्रम संघनी तकनीक द्वारा बेरोज़गारी को दूर किया जाए, कीमतों में स्थिरता द्वारा पिछड़े क्षेत्रों का विकास करके लोगों के लिए स्वयं रोज़गार के अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है।

प्रश्न 2.
भारत में सरकार द्वारा निर्धनता को दूर करने के लिए किए गए उपायों का वर्णन करो। (Discuss the measures undertaken by Indian Government to remove poverty.)
अथवा
भारत में निर्धनता घटाओ प्रोग्रामों पर प्रकाश डालें। (Explain the main programmes to remove poverty in India.)
अथवा
भारत में रोजगार की वृद्धि के लिए बनाई योजनाओं को स्पष्ट करो। (Explain the programmes increase employment in India.)
उत्तर-
भारत में पंचवर्षीय योजनाओं में निर्धनता घटाने के लिए निम्नलिखित प्रोग्राम रखे हैं –
1. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY)-यह योजना दिसम्बर, 2000 में आरम्भ की गई। इस योजना का उद्देश्य सभी ग्रामों को जिनमें 1000 से अधिक लोग रहते हैं तथा पहाड़ी क्षेत्रों में 500 से अधिक जनसंख्या है, उनको 2009 तक सड़कों द्वारा शहरों से जोड़ा जाएगा। 2019-20 तक इस योजना पर 20,000 करोड़ रु० व्यय करके 2.42 लाख किलोमीटर लम्बी सड़क पूरी की गई है।

2. इन्दिरा आवास योजना (I.A.Y.)-इस योजना में अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को मुफ्त आवास का प्रबन्ध करना है। यह योजना केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा 75:25 की दर से लागत के आधार पर बनाई गई है। इस योजना अधीन मैदानी क्षेत्रों में 25,000 रु० तथा पहाड़ी क्षेत्रों में 27,500 रु० की सहायता दी जाती है। 2019-20 में इस योजना पर 15000 करोड़ रु० व्यय करके 35 लाख घरों का निर्माण किया जा चुका है।

3. स्वर्ण जयंती ग्राम स्वः रोज़गार योजना (SGSY)-गांवों में निर्धनता दूर करने के लिए ग्रामीण विकास के उद्देश्य के लिए यह योजना अप्रैल, 1999 में आरम्भ की गई। इस योजना में निर्धनता रेखा से ऊपर रहने वाले निर्धन लोगों को स्वयं रोज़गार के लिए ऋण दिया जाता है। यह योजना केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा 75:25 की दर पर ऋण सुविधाएं प्रदान करती है जोकि बैंकों द्वारा दिया जाता है। इस योजना अधीन सरकार ने 2018-19 तक 10 हजार करोड़ रु० के ऋण प्रदान किए तथा 135.75 लाख लोगों को स्वयं रोज़गार प्रदान किया।

4. सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (S.G.RY.)-यह योजना 25 सितम्बर, 2001 को आरम्भ की गई। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में नकद तथा अनाज के रूप में मजदूरी देकर रोज़गार प्रदान करना है। इस उद्देश्य के लिए केन्द्र सरकार अनाज का 75% हिस्सा तथा नकद मज़दूरी का 100% हिस्सा लगाती है। इस योजना में वर्ष 2019-20 में 0.90 लाख टन अनाज तथा 21,000 करोड़ रु० नकद व्यय किए गए।

5. राष्ट्रीय कार्य के बदले अनाज योजना (N.P.P.W.P.)-यह योजना नवम्बर, 2004 में आरम्भ की गई। इस योजना का उद्देश्य देश के 150 सबसे पिछड़े जिलों में जहां सूखा, बाढ़, सेम की स्थिति है, उनमें कार्य के बदले अनाज प्रदान करके लोगों की जीविका बनाए रखना है तथा नकद मज़दूरी भी दी जाती है। 2004-05 में इस योजना पर 2020 करोड़ रु० तथा 20 लाख टन अनाज देकर 7.85 करोड़ मानवीय दिन (8 घंटे) काम दिया गया। जनवरी, 2020 तक वर्ष पर 5000 करोड़ रु० तथा 42 लाख टन अनाज दिया जा चुका है।

6. सूखा, रेगिस्तान बेकार भूमि विकास प्रोग्राम-यह योजना 1973-74 में आरम्भ की गई। 2017-18 में इस योजना पर 1820 करोड़ रु० व्यय किए गए ताकि बेकार भूमि को कृषि योग्य बनाया जा सके।

7. स्वर्ण जयंती शहरी रोज़गार योजना (S.J.S.R.Y.)-शहरी क्षेत्र में रोजगार के लिए चल रही शहरी स्वयं रोज़गार प्रोग्राम तथा शहरी मज़दूरी रोज़गार प्रोग्राम इत्यादि को मिलाकर स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना केन्द्र तथा राज्य सरकारों के 75:25 अनुपात के सहयोग से चलाई गई। 2019-20 में 1900 करोड़ रु० व्यय किए गए जिस द्वारा 5 लाख शहरी गरीब लोगों को रोजगार प्रदान किया गया।

8. वाल्मीकि-अम्बेदकर आवास योजना (V.A.M.B.A.Y.)-यह योजना दिसम्बर, 2001 में आरम्भ की गई। इस योजना का उद्देश्य गंदी बस्तियों तथा शहरी निर्धन बस्तियों में शौचालय (Toilets) बनाना था। इस उद्देश्य के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा 50:50 की दर पर व्यय किया जाता है। इस योजना को निर्मल भारत अभियान का नाम दिया गया है। 2017-18 में इस योजना पर 1311 करोड़ रु० व्यय करने का लक्ष्य है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 22 निर्धनता की समस्या

9. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारण्टी स्कीम (MGNREGS)-यह योजना आर्थिक तौर पर पिछड़े जिलों में आरम्भ की गई। इस योजना पर 2017-18 में 40 हज़ार करोड़ रुपए व्यय किये गए। जिस द्वारा 4.78 करोड़ परिवारों को इस स्कीम के अधीन रोज़गार प्रदान किए गये। इस स्कीम के अन्तर्गत प्रतिदिन मज़दूरी ₹ 132 निर्धारण की गई है।

10. आम आदमी बीमा योजना (AABY)—यह योजना 18 से 59 वर्ष के मज़दूरों पर लागू होगी जिसमें साधारण मृत पर 30,000 रु० दिये जाएंगे दुर्घटना की स्थिति में ₹ 75000 दिये जाएंगे। यदि अपाहज हो जाए तो ₹ 37500 दिये जाएंगे। इसके लिए ₹ 100 की किश्त देनी होती है। 30 अप्रैल, 2016 तक इस योजना के अन्तर्गत 5 करोड़ मजदूरों का बीमा हो चुका है।

11. कौशल विकास योजना (Skill Development Yojna)-गांवों में बच्चों के कौशल विकास के लिए 2019-20 में ₹ 4900 करोड़ खर्च किये जाएंगे।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 21 1991 से आर्थिक सुधार अथवा नई आर्थिक नीति

Punjab State Board PSEB 12th Class Economics Book Solutions Chapter 21 1991 से आर्थिक सुधार अथवा नई आर्थिक नीति Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Economics Chapter 21 1991 से आर्थिक सुधार अथवा नई आर्थिक नीति

PSEB 12th Class Economics 1991 से आर्थिक सुधार अथवा नई आर्थिक नीति Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
आर्थिक सुधारों से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
नई आर्थिक नीति का अर्थ बताओ।
उत्तर-
भारत में 1991 से किए गए आर्थिक सुधारों को नई आर्थिक नीति कहा जाता है।

प्रश्न 2.
उदारीकरण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
उदारीकरण का अर्थ है उद्योगों तथा व्यापार को परका की अनावश्यक पाबन्दियों से मुक्त करके अधिक प्रतियोगी बनाना।

प्रश्न 3.
निजीकरण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का संचालन तथा मालकी निजी क्षेत्र को परिवर्तित करने की क्रिया को निजीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 4.
विश्वीकरण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
विश्वीकरण का अर्थ है अर्थव्यवस्था का बाकी देशों से बिना रुकावट सम्बन्धी उत्पादन, व्यापार तथा वित्त सम्बन्धी आदान-प्रदान स्थापित करना।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 21 1991 से आर्थिक सुधार अथवा नई आर्थिक नीति

प्रश्न 5.
नई आर्थिक नीति के पक्ष में कोई एक तर्क दें।
उत्तर-
नई आर्थिक नीति द्वारा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करके विकसित देशों के समान आर्थिक विकास किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
नई आर्थिक नीति के विपक्ष में कोई एक तर्क दीजिए।
उत्तर-
नई आर्थिक नीति से विदेशी पूंजी तथा तकनीक पर निर्भरता बढ़ जाएगी। इससे उन्नत देशों को अधिक लाभ होगा।

प्रश्न 7.
आर्थिक सुधारों की आवश्यकता क्यों है ?
उत्तर-
भारत में राजकोषीय घाटा निरन्तर बढ़ रहा है।

प्रश्न 8.
राजकोषीय घाटे से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राजकोषीय घाटा कुल व्यय तथा कुल आय मनफी ऋण का अन्तर होता है।

प्रश्न 9.
विश्व व्यापार संगठन (W.T.0.) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं में विश्वीकरण के विकास के लिए बनाई गई संस्था को विश्व व्यापार संगठन कहा जाता है।

प्रश्न 10.
भारत में आर्थिक सुधारों अथवा नई आर्थिक नीति की आवश्यकता क्यों थी ?
उत्तर-

  • भारत में राजकोषीय घाटा अधिक हो गया था।
  • भुगतान सन्तुलन प्रतिकूल हो गया था।
  • विदेशी मुद्रा कोष कम हो गया था।

प्रश्न 11.
भारत में आर्थिक सुधारों की आवश्यकता थी क्योंकि
(a) भारत में राजकोषीय घाटा अधिक हो गया था।
(b) भुगतान सन्तुलन लगातार प्रतिकूल हो गया था।
(c) विदेशी मुद्रा कोष में बहुत कमी आ गई थी।
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(d) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 12.
नई आर्थिक नीति में उद्योग और व्यापार के लिए लाइसेंस के स्थान पर ……………. की नीति अपनाई है।
उत्तर-
उदारीकरण।

प्रश्न 13.
नई आर्थिक नीति में कोटा प्रणाली के स्थान पर . ………….. की नीति अपनाई गई।
उत्तर-
निजीकरण।

प्रश्न 14.
नई आर्थिक नीति में परमिट प्रणाली के स्थान पर ………….. नीति अपनाई गई।
उत्तर-
वैश्वीकरण।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 21 1991 से आर्थिक सुधार अथवा नई आर्थिक नीति

प्रश्न 15.
नई आर्थिक नीति अथवा आर्थिक सुधारों में किस नीति को अपनाया गया ?
(a) उदारीकरण
(b) निजीकरण
(c) वैश्वीकरण
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(d) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 16.
पहली पीढ़ी (First Generation) के सुधारों से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
वह सुधार जो प्रशासनिक मशीनरी द्वारा साधारण रूप में चलाए जाते हैं और इन सम्बन्धी विधानक कारवाई की ज़रूरत नहीं होती।

प्रश्न 17.
दूसरी पीढ़ी (Second Generation) के सुधारों से क्या अभिप्राय है ? .
उत्तर-
वह सुधार जिनके लिए विधानक (कानूनी) कारवाई की आवश्यकता होती है उनको दूसरी पीढ़ी के सुधार कहा जाता है।

प्रश्न 18.
आर्थिक सुधारों का ऋणात्मक प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
आर्थिक सुधारों से विदेशी निवेश और तकनीक पर निर्भरता बढ़ जाती है। .

प्रश्न 19.
भारत में आर्थिक सुधारों का पहला चरण कब प्रारम्भ हुआ ?
(a) 1951
(b) 1971
(c) 1991
(d) 2011.
उत्तर-
(c) 1991.

प्रश्न 20.
भारत में आर्थिक सुधारों का दूसरा चरण कब प्रारम्भ हुआ ?
उत्तर-
1999 में।

प्रश्न 21.
विश्व व्यापार संगठन (WTO) गैट (GATT) का उत्तराधिकारी है।
उत्तर-
सही।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
नई आर्थिक नीति (1991) क्यों आवश्यक हुई ?
उत्तर-
भारत में 1991 में आर्थिक सुधार की आवश्यकता इन कारणों से पड़ी-

  1. भारत में भुगतान सन्तुलन प्रतिकूल था, जिस कारण विदेशी ऋण का भार बढ़ गया था।
  2. भारत में आर्थिक संकट था। राजकोषीय घाटा बहुत बढ़ गया था।
  3. इराक की जंग के कारण तेल की कीमतें तथा साधारण कीमत स्तर निरन्तर बढ़ गया था।
  4. भारत में सार्वजनिक क्षेत्र असफल हो गया था। बहुत से सार्वजनिक उद्योगों में हानि हो रही थी।

प्रश्न 2.
निजीकरण पर नोट लिखो।
उत्तर-
नई आर्थिक नीति की एक विशेषता यह है कि निजीकरण का विस्तार किया गया है। सरकार द्वारा चलाए जाने वाले उद्योगों को निजी क्षेत्र में परिवर्तित किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित उपाय किए गए –
(1) सार्वजनिक क्षेत्र में 17 उद्योगों की जगह पर 4 उद्योग

  • सुरक्षा औज़ार
  • एटोमिक शक्ति
  • खाने
  • रेलवे सुरक्षित किए गए हैं। शेष सभी उद्योग निजी क्षेत्र के लिए खुले हैं।

(2) सार्वजनिक क्षेत्र की वर्तमान इकाइयों के शेयर निजी क्षेत्र में बेचे जाएंगे।
(3) अब वित्तीय संस्थाओं तथा उद्योगों में निजी निवेश किया जा सकेगा। इससे निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 45% से बढ़कर 55% हो जाएगी।

प्रश्न 3.
विनिवेश से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की बिक्री को विनिवेश कहा जाता है। आरम्भ में सरकार ने बीमार इकाइयां, जिन उद्योगों में हानि होती थी, उनको बेचने का निर्णय लिया। परन्तु धीरे-धीरे उद्योगों की कार्यकुशलता में वृद्धि करने के लिए बहुत-से अन्य उद्योगों का विनिवेश करना आरम्भ किया। इस प्रकार की प्रक्रिया आजकल चल रही है।

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प्रश्न 4.
वैश्वीकरण पर नोट लिखो।
उत्तर-
नई आर्थिक नीति की एक विशेषता अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण है। वैश्वीकरण का अर्थ है एक अर्थव्यवस्था का शेष विश्व के देशों से उत्पादन, व्यापार तथा वित्तीय सम्बन्ध स्थापित करना तथा विदेशी व्यापार पर लगे प्रतिबन्ध हटाना। भारत में खुलेपन की नीति के लिए निम्नलिखित उपाय किए गए हैं-

  1. विदेशी निवेशक अब भारतीय कम्पनियों में 51% से 100% तक निवेश कर सकते हैं।
  2. व्यापार पर लगे प्रतिबन्ध 5 वर्षों में हटा दिए गए।
  3. विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए, विदेशी निवेश प्रोत्साहन बोर्ड की स्थापना की गई है।

प्रश्न 5.
विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation-W.T.O.) क्या है?
उत्तर-
विश्व व्यापार संगठन (W.T.O.) की स्थापना 1 जून, 1995 में की गई। यह संगठन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि करने तथा वैश्वीकरण की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए स्थापित किया गया है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य व्यापार पर लगाए जाने वाले करों में कमी तथा अन्य रुकावटों को दूर करके अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में मुकाबले की स्थिति उत्पन्न करना है जिससे विश्वभर के लोगों को लाभ प्राप्त हो सके। यह संस्था गैट (GATT) की उत्तराधिकारी है। विश्व व्यापार संगठन ने बौद्धिक सम्पत्ति अधिकार से सम्बन्धित व्यापार तथा निवेश को शामिल करके अपने कार्य क्षेत्र को विशाल किया है।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
मुख्य आर्थिक सुधारों से क्या अभिप्राय है?
अथवा
नई आर्थिक नीति के अंश बताओ।
उत्तर-
भारत में जुलाई, 1991 से लागू किए विभिन्न नीति सम्बन्धों, उपायों तथा नीतियों से है, जिनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था में उत्पादकता तथा कुशलता में वृद्धि करके प्रतियोगी वातावरण तैयार करना है। इस नीति के अंश निम्नलिखित हैं –

  • देश में उद्योगों तथा व्यापार के लिए प्रचलित लाइसेंस नीति की जगह उदारीकरण की नीति को लागू करना।
  • उद्योगों में कोटा प्रणाली की जगह पर निजीकरण की नीति को लागू करना।
  • विदेशी नीति में परमिट की जगह पर वैश्वीकरण की नीति को लागू करना।

प्रश्न 2.
भारत में नई आर्थिक नीति उदारीकरण वाली है। इस सम्बन्ध में उठाए गए पग बताओ।
उत्तर-
भारत में नई आर्थिक नीति में अर्थव्यवस्था को सरकार के सीधे तथा भौतिक कन्ट्रोल से मुक्त किया गया है। इसको उदारीकरण (Liberalisation) वाली नीति कहा जाता है। इस सम्बन्धी निम्नलिखित पग उठाए गए हैं –

  1. ‘नई औद्योगिक नीति’ में उदारवादी नीति को अपनाया गया है, जिसकी घोषणा जुलाई, 1991 में की गई। सिगरेट, सुरक्षा, औज़ार, खतरनाक रसायन, दवाइयां, औद्योगिक ऊर्जा तथा शराब, इन 6 उद्योगों को छोड़कर शेष किसी उद्योग के लिए लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं।
  2. अब एम० आर० टी० पी० (एकाधिकार तथा व्यापार रोक कानून) की धारणा को समाप्त किया गया है। अब किसी फ़र्म को निवेश सम्बन्धी निर्णय लेते समय सरकार की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं।
  3. लघु पैमाने के उद्योगों की निवेश सीमा एक करोड़ रु० की गई।
  4. मशीनों के आयात की स्वतन्त्रता दी गई।
  5. उच्च तकनीक वाले कम्प्यूटर तथा उपकरण के आयात की छूट दी गई।

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प्रश्न 3.
नई आर्थिक नीति के उद्देश्य लिखो।
उत्तर-

  • आर्थिक विकास की दर में तीव्रता से वृद्धि।
  • औद्योगिक क्षेत्र में प्रतियोगिता को प्रोत्साहित करना।
  • निजी क्षेत्र द्वारा प्रतियोगिता से सार्वजनिक क्षेत्र की कार्यकुशलता में वृद्धि।
  • राजकोषीय घाटे में कमी तथा मुद्रा स्फीति पर नियन्त्रण।
  • आर्थिक समानता में कमी।

IV. दीर्य उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत की नई आर्थिक नीति की विशेषताएं बताओ। (Explain the features of New Economic Policy of India.)
उत्तर-
नई आर्थिक नीति की मुख्य विशेषताएं अनलिखित हैं-
1. उदारीकरण (Liberalisation)-नई आर्थिक नीति की प्रथम विशेषता उदारीकरण की नीति का अपनाना है। उदारीकरण से अभिप्राय उद्योगों तथा व्यापार को सरकार की अनावश्यक पाबंदियों से मुक्त करवाना है, जिस व्यापार उदारीकरण से कोरिया, सिंगापुर इत्यादि अल्पविकसित देशों ने आर्थिक विकास किया है, उसी तरह भारत भी आर्थिक विकास कर सकता है। इस उद्देश्य के लिए 6 उद्योगों को छोड़कर शेष उद्योगों के लिए लाइसेंस लेने की नीति समाप्त की गई। नई नीति में पंजीकरण (Registration) योजनाएं समाप्त की गई हैं।

2. निजीकरण (Privatisation)-जो उद्योग प्रथम सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित थे, उनको निजी क्षेत्र के लिए छीनने की नीति को निजीकरण की नीति कहा जाता है। सार्वजनिक क्षेत्र की असफलता को देखते हुए सरकार ने निजीकरण को आंशिक अथवा पूर्ण रूप में अपनाया है, इस नीति को (U Turn) का नाम दिया गया है अर्थात् सार्वजनिक उद्योगों का निजीकरण करना।

3. वैश्वीकरण (Globalisation)-एक देश का दूसरे देशों से मुक्त व्यापार, पूंजी आदान-प्रदान तथा मनुष्यों की गतिशीलता को वैश्वीकरण कहा जाता है। इसका उद्देश्य विदेशी पूंजी का प्रयोग करके विश्व अर्थव्यवस्था को शक्तिशाली बनाना है। विदेशी व्यापार को उत्साहित करके विदेशी निवेश में वृद्धि करना तथा मानवीय पूंजी का एक देश से दूसरे देशों में प्रयोग करना, वैश्वीकरण मनुष्य का मुख्य उद्देश्य है।

4. राजकोषीय सुधार (Fiscal Reforms)-राजकोषीय सुधार भी नई आर्थिक नीति की विशेषता है। इस नीति में सरकार अपनी आय में वृद्धि करके व्यय में कमी करने का यत्न करेगी ताकि देश में उत्पादन तथा आर्थिक विकास पर बुरा प्रभाव न पड़े। इस उद्देश्य के लिए कर प्रणाली में सुधार किए गए हैं। आयातनिर्यात कर घटाए गए हैं। उत्पादन कर में कमी की गई है।

5. मौद्रिक सुधार (Monetary Reforms)-भारत में नई आर्थिक नीति अनुसार मौद्रिक नीति में परिवर्तन किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य कीमत स्तर को स्थिर रखना है। सरकार ने इस उद्देश्य के लिए नरसिंगम कमेटी ने मौद्रिक सुधारों के लिए सिफ़ारिशें कीं, जिनको लागू किया गया है। इस उद्देश्य के लिए नकद रिज़र्व अनुपात (C.R.R.) को घटाकर 5% किया गया है। ब्याज की दर, मांग तथा पूर्ति अनुसार निश्चित की जाएगी। बैंकों को कार्य करने की स्वतन्त्रता दी गई है।

6. सार्वजनिक क्षेत्र नीति (Public Sector Policy)-सार्वजनिक क्षेत्र को भारत की स्वतन्त्रता के समय आर्थिक विकास का महत्त्वपूर्ण साधन माना गया था। परन्तु सार्वजनिक क्षेत्र में असफलता के कारण अब सरकार ने 6 उद्योगों को इस क्षेत्र के लिए रिज़र्व रखा है, बाकी के उद्योग निजी क्षेत्र को बेच दिए जाएंगे। सार्वजनिक क्षेत्र के बहुत से उद्योगों का विनिवेश कर दिया जाएगा। इस क्षेत्र के शेयर वित्तीय संस्थाओं, साधारण लोगों तथा श्रमिकों को बेचे जाएंगे।

प्रश्न 2.
भारत की नई आर्थिक नीति के पक्ष में तर्क दो। (Give arguments in favour of New Economic Policy of India.)
उत्तर-
नई आर्थिक नीति में जो सुधार किए गए हैं, उसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं –
1. आर्थिक विकास की दर में वृद्धि-भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् 1951 से 1991 तक आर्थिक विकास की दर में वृद्धि 3.6% वार्षिक थी, जबकि प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि 1.4% थी। 1991: 2009 तक विकास दर 7.2% वार्षिक हो गई। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक सुधारों के कारण आर्थिक विकास में वृद्धि हुई है। 2017-18 में विकास दर 7.4% प्राप्त की गई।

2. औद्योगिक क्षेत्र की प्रतियोगिता में वृद्धि-औद्योगिक क्षेत्र की प्रतियोगिता में वृद्धि के लिए भी आर्थिक सुधार आवश्यक हैं। भारत के उद्योगों में उत्पादन लागत अधिक होने के कारण इनको सुरक्षा प्रदान की गई। इससे उद्योगों में मुकाबला करने की शक्ति बहुत घट गई। परिणामस्वरूप भारत का विदेशी व्यापार 1951 में विश्व व्यापार का 2% हिस्सा था, यह 1991 में घटकर 0.5 प्रतिशत रह गया। 2017-18 में भारत में विदेशी व्यापार 1.6% हो गया है। इसलिए आर्थिक सुधारों की आवश्यकता थी।

3. गरीबी तथा असमानता में कमी-भारत में गरीबी, असमानता तथा बेरोज़गारी की समस्या को योजनाओं द्वारा दूर नहीं किया जा सका। नई नीति द्वारा मानवीय साधनों का विकास करके रोज़गार तथा उत्पादन में वृद्धि करके लोगों की गरीबी को दूर करना भी इसका उद्देश्य है।

4. राजकोषीय घाटे तथा मुद्रास्फीति में कमी-भारत में राजकोषीय घाटा 1990-91 में 8.5% हो गया था। इससे देश में मुद्रा स्फीति की स्थिति उत्पन्न हो गई। सरकार को आन्तरिक तथा बाहरी ऋण लेना पड़ा। नई नीति द्वारा राजकोषीय घाटे पर काबू पाकर मुद्रा स्फीति में कमी सम्भव होगी।

5. सार्वजनिक उद्यमों की कार्यकुशलता में वृद्धि-सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में कार्यकुशलता तथा उत्पादकता में बहुत कमी है। नई आर्थिक नीति से सार्वजनिक क्षेत्र के दोष दूर करके इनकी कार्यकुशलता में वृद्धि की जाएगी। इसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक उद्यमों की प्रतियोगिता शक्ति बढ़ जाएगी।

प्रश्न 3.
भारत की नई आर्थिक नीति के विपक्ष में तर्क दीजिए। (Give arguments Against New Economic Policy of India.)
उत्तर-
नई आर्थिक नीति के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क देकर इसकी आलोचना की गई है –

  1. कृषि को कम महत्त्व-भारत में नई आर्थिक नीति में उद्योगों के विकास की ओर अधिक ध्यान दिया गया है। कृषि उत्पादन क्षेत्र के विकास की ओर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। भारत में कृषि के विकास के बिना आर्थिक विकास प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  2. विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का दबाव-भारत में खुले बाज़ार की नीति को अपनाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं जैसे कि अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (I.M.F.) तथा विश्व बैंक (World Bank) ने उदारीकरण की नीति अपनाने के लिए दबाव पाया, जिस कारण यह नीति अपनाई गई। भारत को इन संस्थाओं से ऋण प्राप्त होता है। इसलिए नई आर्थिक नीति अपनाई गई।
  3. विदेशी ऋण तथा तकनीक पर अधिक निर्भरता-नई आर्थिक नीति की आलोचना में कहा जाता है कि विदेशी ऋण पर भारत की निर्भरता बढ़ गई है। विदेशी तकनीक का आयात अनिवार्य हो गया है, क्योंकि भारत में उद्योगों की प्रतियोगिता शक्ति को आधुनिक तकनीकों के बगैर बढ़ाया नहीं जा सकता। विदेशी ऋण तथा तकनीकों पर निर्भरता देश के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
  4. निजीकरण को अधिक महत्त्व-निजीकरण की नीति को नई आर्थिक नीति में आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया गया है। सार्वजनिक क्षेत्र में रोज़गार के अधिक अवसर प्रदान किए जाते थे। निजीकरण द्वारा एकाधिकारी शक्तियों का विकास होगा, जिस द्वारा लोगों का शोषण किया जाएगा। बेरोज़गारी, काला धन, भ्रष्टाचार, श्रमिक शोषण, धन असमानता इत्यादि की बुराइयां उत्पन्न हो जाएंगी।
  5. अनिवार्य वस्तुओं की कमी-नई आर्थिक नीति द्वारा आरामदायक तथा विलास वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि होगी। स्कूटर, कारें, टेलीविज़न इत्यादि वस्तुओं की पैदावार बढ़ जाएगी, परन्तु अनिवार्य उपभोक्ता वस्तुएं तथा सामाजिक भलाई के लिए पैदावार में कमी आएगी। इससे गरीब लोगों के कष्ट में वृद्धि होगी।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 21 1991 से आर्थिक सुधार अथवा नई आर्थिक नीति

प्रश्न 4.
भारत की नई आर्थिक नीति (1991) की विशेषताएं बताओ। (Explain the main features of New Economic Policy of India.)
उत्तर-
भारत में 1991 में नई आर्थिक नीति अनुसार उदारीकरण की नीति अपनाई गई। इस उद्देश्य के लिए भारत सरकार ने 24 जुलाई, 1991 को नई औद्योगिक नीति की घोषणा की। इस नीति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
1. लाइसेंस की समाप्ति-उद्योगों को राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में प्रतियोगी बनाने के लिए 6 उद्योगों को छोड़कर बाकी उद्योगों को स्थापित करने के लिए लाइसेंस समाप्त किया गया।
भारत में-

      • शराब
      • सिगरेट
      • सुरक्षा उपकरण

(4) ख़तरनाक रसायन तथा (5) दवाइयों को छोड़कर शेष उद्योगों को लाइसेंस देने की आवश्यकता नहीं।

2. पंजीकरण की समाप्ति-नई औद्योगिक नीति के अनुसार नए उद्योग स्थापित करने अथवा उद्योगों में उत्पादन के विस्तार के लिए सरकारी आज्ञा की कोई आवश्यकता नहीं। सरकार को केवल सूचना ही देनी पड़ेगी।

3. सार्वजनिक क्षेत्र का संकुचन-सार्वजनिक क्षेत्र के लिए कुल 8 उद्योग सुरक्षित रखे गए हैं, जैसे कि परमाणु ऊर्जा, रेलवे, खानें, सैनिक साजो सामान इत्यादि, शेष सभी क्षेत्र में धीरे-धीरे निजी क्षेत्र को उत्पादन के अधिकार दिए जाएंगे। सार्वजनिक क्षेत्र के शेयर साधारण जनता तथा श्रमिकों में बेचकर इन उद्योगों की कार्यकुशलता में वृद्धि की जाएगी।

4. विदेशी पूंजी-नई नीति में विदेशी पूंजी निवेश सीमा 40% से बढ़ाकर 51% कर दी गई है। इस सम्बन्ध में विदेशी मुद्रा नियमन कानून (FERA) में आवश्यक संशोधन किया जाएगा। विदेशी पूंजी सम्बन्धी देश का केन्द्रीय बैंक, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया, पूरी नज़र रखेगा।

5. बोर्डों का गठन-विदेशी पूंजी के सम्बन्ध में चुने हुए क्षेत्रों में निवेश करने के लिए विशेष अधिकार प्राप्त बोर्डों की स्थापना की गई है। यह बोर्ड बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से बातचीत करके पूंजी लगाने के लिए अनिवार्य पग उठाएगा।

6. लघु उद्योगों को सुरक्षा-नई नीति में लघु उद्योगों की निवेश सीमा एक करोड़ रु० की गई है। इन उद्योगों द्वारा कुछ वस्तुओं के उत्पादन को सुरक्षित रखा जाएगा; जिनका उत्पादन बड़े उद्योग नहीं कर सकेंगे।

7. एकाधिकारी कानून से छूट- एकाधिकारी कानून के अधीन आने वाली कम्पनियों को भारी छूट दी गई है। अब निवेश की सीमा समाप्त की गई है। उद्यमी बिना परमिट नए उद्योग स्थापित कर सकेंगे। इस नीति में लाइसेंस की समाप्ति तथा एकाधिकारी कम्पनियों पर रोक हटा ली गई है। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी पूंजी को उत्साहित करके देश के उद्योगों का विकास करना है।

प्रश्न 5.
विश्व व्यापार संगठन (W.T.O.) पर नोट लिखो। भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्व व्यापार संगठन का प्रभाव स्पष्ट करो।
(Write a note on World Trade Organization (W.T.O.). Explain the effects of World Trade Organization on Indian Economy.)
उत्तर-
विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation-W.T.O.) की स्थापना 1 जून, 1995 को हुई। यह अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है, जोकि गैट (GATT) की बैठकों के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य वस्तुओं तथा सेवाओं के आयात-निर्यात में आने वाली रुकावटों को दूर करके, विदेशी निवेश के अवसरों में वृद्धि करना, व्यापार सम्बन्धी बुद्धिजीवी संपदा अधिकार (TRIPS) तथा व्यापार सम्बन्धित निवेश उपायों (TRIMS) का विस्तार करना है। इस संगठन के मुख्य उद्देश्य हैं-

  • वस्तुओं को मुक्त प्रवाह की आज्ञा देने के लिए रुकावटें दूर करना।
  • पूंजी के मुक्त प्रवाह के लिए प्रेरक वातावरण तैयार करके निवेश में वृद्धि करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रतियोगिता की स्थिति उत्पन्न करके उपभोक्ताओं को कम लागत पर वस्तुएं उपलब्ध करवाना।
  • विश्व के विभिन्न देशों को विश्व व्यापार में बुद्धिजीवी सम्पदा तथा व्यापार सम्बन्धित निवेश के लिए अधिक अवसर प्रदान करना।

विश्व व्यापार संगठन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव-
(Effects of World Trade Organisation on Indian Economy)
A. अनुकूल प्रभाव (Favourable Effects)

  1. निर्यात प्रोत्साहन-विश्व व्यापार संगठन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए निर्यात के अधिक अवसर प्रदान करेगा। इससे भारत का विदेशी व्यापार, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में अधिक योगदान डाल सकेगा।
  2. विकसित देशों की कोटा प्रणाली की समाप्ति-विश्व व्यापार संगठन द्वारा विकसित देशों द्वारा अपनाई जाने वाली कोटा प्रणाली को समाप्त किया जाएगा। इससे भारत के कपड़े के निर्यात में वृद्धि होगी।
  3. कृषि को विकसित देशों द्वारा कम सहायता-विश्व व्यापार संगठन की शर्ते लागू होने से विकसित देश कृषि क्षेत्र को कम सहायता प्रदान कर सकेंगे। इससे भारत में से कृषि पदार्थों के निर्यात में वृद्धि होगी।

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B. प्रतिकूल प्रभाव (Unfavourable Effects) –

  1. श्रम बाज़ार प्रति पक्षपात-विश्व व्यापार संगठन द्वारा पूंजी बाज़ार की ओर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, जबकि श्रम बाज़ार से पक्षपात की नीति अपनाई जा रही है। संगठन अनुसार पूंजी का निवेश एक देश द्वारा दूसरे देशों में बिना रुकावट किया जा सकता है। परन्तु श्रम बाज़ार में ऐसी स्वतन्त्रता नहीं होगी। इससे भारत जैसे कम विकसित देशों को हानि होगी।
  2. लघु पैमाने के उद्योगों पर बुरा प्रभाव-विश्व व्यापार संगठन बड़े पैमाने के उद्योगों तथा लघु पैमाने के उद्योगों में भिन्नता नहीं करता। इस कारण लघु पैमाने के उद्योगों को न सिर्फ देश में बड़े पैमाने के उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं से प्रतियोगिता करनी पड़ेगी, बल्कि विदेशी उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं का मुकाबला भी करना पड़ेगा। इससे अगरबत्ती, आइसक्रीम, मिनरल वाटर इत्यादि उद्योग नष्ट हो जाएंगे।
  3. विकसित देशों के दोहरे मापदण्ड-अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि विकसित देशों द्वारा दोहरे मापदण्ड अपनाए जाते हैं। एक ओर अमेरिका अपने किसानों को बहुत अधिक सब्सिडी देता है। भारत से निर्यात कपड़ों पर बहुत अधिक कर लगाया जाता है। भारत से निर्यात दुशालें, रसायन, सिले-सिलाए कपड़े इत्यादि पर पाबंदी लगाई जाती है, क्योंकि ये वस्तुएं बच्चों द्वारा उत्पादित की जा सकती हैं। इसी तरह जापान से निर्यात किए जाने वाले लोहा तथा इस्पात पर पाबन्दी लगाई हुई है। इस प्रकार के दोहरे मापदण्डों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 20 भारत में औद्योगिक विकास नीति तथा लाइसेसिंग

Punjab State Board PSEB 12th Class Economics Book Solutions Chapter 20 भारत में औद्योगिक विकास नीति तथा लाइसेसिंग Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Economics Chapter 20 भारत में औद्योगिक विकास नीति तथा लाइसेसिंग

PSEB 12th Class Economics भारत में औद्योगिक विकास नीति तथा लाइसेसिंग Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
घरेलू उद्योगों से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
घरेलू उद्योग वह उद्योग होता है जो कि एक परिवार के सदस्यों द्वारा कम पूंजी से लगाया जाता है।

प्रश्न 2.
लघु उद्योग किसे कहते हैं ?
उत्तर-
लघु उद्योग वे उद्योग हैं जिनमें एक करोड़ रुपए तक की पूंजी निवेश की गई हो।

प्रश्न 3.
औद्योगीकरण की कोई एक समस्या का वर्णन करें।
उत्तर-
बड़े घरानों का विकास-भारत में औद्योगिक क्षेत्र में कुछ घराने तीव्रता से विकसित हो रहे हैं।

प्रश्न 4.
नई औद्योगिक नीति में उदारवादी नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भारत की नई औद्योगिक नीति 1991 में सरकार ने उदारवादी नीति (Liberal Policy) अपनाई है।

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प्रश्न 5.
औद्योगिक विकास के लिए कोई एक सुझाव दें।
उत्तर-
औद्योगिक विकास के लिए सरकार को आधारभूत सुविधाओं में वृद्धि करनी चाहिए।

प्रश्न 6.
भारत में घरेलू तथा छोटे उद्योगों के महत्त्व पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
इन उद्योगों द्वारा रोज़गार के अधिक अवसर प्रदान किए जाते हैं।

प्रश्न 7.
छोटे पैमाने के उद्योगों की कठिनाइयां बताएं।
उत्तर-
घरेलू तथा छोटे उद्योगों में उत्पादन लागत अधिक आती है इसलिए बड़े उद्योगों से मुकाबला करना कठिन होता है।

प्रश्न 8.
भारत की 1991 की औद्योगिक नीति की कोई दो मुख्य विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  • सार्वजनिक क्षेत्र में केवल चार उद्योग सुरक्षित रखे गए हैं।
  • लाइसेंस प्राप्त करने की नीति का त्याग किया गया है।

प्रश्न 9.
किसी देश में उद्योगों की स्थापना में क्रान्तिकारी परिवर्तन को …………….. कहते हैं।
उत्तर-
औद्योगिक विकास।

प्रश्न 10.
परम्परागत वस्तुओं की पैदावार परम्परागत विधि से करने को ………………. उद्योग कहते हैं।
(a) छोटे उद्योग
(b) घरेलू उद्योग
(c) बड़े पैमाने के उद्योग
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(b) घरेलू उद्योग।

प्रश्न 11.
भारत में नई औद्योगिक नीति 1991 को ………………. नीति कहा जाता है।
उत्तर-
उदारवादी नीति।

प्रश्न 12.
बारहवीं योजना में औद्योगिक विकास का वार्षिक टीचा …………… प्रतिशत रखा गया है।
(a) 8%
(b) 9%
(c) 12%
(d) 14%.
उत्तर-
(b) 9%.

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प्रश्न 13. विभिन्न सिद्धान्त एवं क्रियाएं जो देश के औद्योगीकरण के लिए बनाए जाते हैं उनको ………… कहा जाता है।
(a) आर्थिक विकास
(b) औद्योगिक विकास
(c) औद्योगिक लाइसेंसिंग
(d) उपरोक्त में से कोई भी नहीं।
उत्तर-
(b) औद्योगिक विकास।

प्रश्न 14.
भारत में नई औद्योगिक नीति सन् …………………… में बनाई गई।
(a) 1956
(b) 1980
(c) 1991
(d) 2012.
उत्तर-
(c) 1991.

प्रश्न 15.
सन् 1991 में 6 उद्योगों को छोड़कर बाकी सभी उद्योगों के लिए लाइसेंस समाप्त कर दिया गया |
उत्तर-
सही।

प्रश्न 16.
नई औद्योगिक नीति अनुसार विदेशी पूंजी निवेश की सीमा बढ़ा कर 51 प्रतिशत कर दी गई है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 17.
भारत में औद्योगिक विकास के लिए पूंजी की कोई कमी नहीं है।
उत्तर-
ग़लत।

प्रश्न 18.
नई औद्योगिक नीति में निजी क्षेत्र को अधिक महत्त्व दिया गया है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 19.
भारत में औद्योगिक विकास की कोई एक समस्या बताएँ।
उत्तर-
भारत में आधारभूत उद्योगों का कम विकास हुआ है।

प्रश्न 20.
घरेलू तथा अल्प उद्योगों के महत्त्व को स्पष्ट करें।
उत्तर-
घरेलू तथा अल्प पैमाने के उद्योग श्रम के गहन होने के कारण इन द्वारा रोज़गार प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 21.
भारत में नई औद्योगिक नीति कब बनाई गई ?
(a) 1971
(b) 1981
(c) 1991
(d) 2001.
उत्तर-
(c) 1991.

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II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत में उद्योगों के महत्त्व सम्बन्धी कोई दो बिन्दु बताएँ।
उत्तर-
भारत में औद्योगीकरण का विशेष महत्त्व है। उद्योगों के विकास द्वारा राष्ट्रीय आय, उत्पादन तथा रोजगार में वृद्धि कर भारतीय अर्थ-व्यवस्था की विकास दर को बढ़ाया जा सकता है। उद्योगों का महत्त्व इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. रोज़गार में वृद्धि-औद्योगिक विकास द्वारा रोज़गार में वृद्धि की जा सकती है। भारत में भिन्न-भिन्न योजनाओं में रोज़गार की वृद्धि के लिए रखे गए लक्ष्य प्राप्त नहीं हुए इस कारण बेरोज़गारी में बहुत वृद्धि हुई है। 2019-20 में उद्योग द्वारा 125 मिलियन लोगों को रोज़गार प्रदान किया गया है। 2022 तक 200 मिलियन लोगों को रोजगार देने का अनुमान है।
  2. आर्थिक विकास- भारत के आर्थिक विकास की दर तीव्र करने के लिए उद्योगों का विकास महत्त्वपूर्ण |

प्रश्न 2.
भारत की 12वीं योजना में भारत के औद्योगिक ढांचे का वर्णन करें।
उत्तर-
बारहवीं योजना में उद्योग (Industries in 12th Plan)-बारहवीं योजना (2012-17) में औद्योगिक विकास का लक्ष्य 12% से 14% रखा गया है। इस योजना में 200 मिलियन लोगों को रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया है।

प्रश्न 3.
भारत की नई औद्योगिक नीति (1991) के गुण बताएं।
उत्तर-
नई औद्योगिक नीति के गुण (Merits)-

  • नई नीति से उद्योगों की कुशलता में वृद्धि होगी।
  • देश में विदेशी तकनीकों के प्रयोग के कारण उत्पादन में वृद्धि होगी।
  • यह नीति उदारवादी नीति है जिसमें निजी क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई है।
  • भारतीय उद्योगों को विदेशी उद्योगों से प्रतियोगिता करने के समर्थ बनाने का यत्न किया गया है।
  • घरेलू तथा छोटे उद्योगों को अधिक महत्त्व प्रदान किया गया है तथा मज़दूरों के कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाए गए हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय उद्योगों की कोई दो समस्याएं बताएं।
उत्तर-
1. कम प्राप्तियां (Less Achievements) भारत की भिन्न-भिन्न योजनाओं में विकास दर के लक्ष्य हमेशा अधिक रखे गए हैं। प्रत्येक योजना में 8% विकास दर प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया परन्तु वास्तव में 5.6% विकास दर प्राप्त की गई है। इसलिए निर्धारित लक्ष्यों तथा प्राप्तियों में बहुत अन्तर पाया जाता है।

2. बीमार उद्योग (Industrial Sickness)-भारत के रिज़र्व बैंक ने व्यापारिक बैंकों से जो सूचना प्राप्त की है उसके अनुसार 31 मार्च, 2020 तक 2,40,000 बीमार औद्योगिक इकाइयां थीं। 2020 में छोटे पैमाने के उद्योगों की बीमार इकाइयों की संख्या 1,00,000 थी। इस प्रकार बीमार इकाइयों की संख्या में वृद्धि होने के कारण औद्योगिक विकास नहीं हो रहा है।

प्रश्न 5.
भारत में औद्योगिक विकास के लिए कोई दो सुझाव दें।
उत्तर-

  1. आधुनिकीकरण (Modernisation)-भारत में उद्योगों के आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। इस लक्ष्य के लिए नई मशीनों तथा औज़ारों का निर्माण करना चाहिए ताकि उद्योगों में उत्पादन लागत कम हो सके।
  2. मूलभूत सुविधाएं (Basic Facilities)- उद्योगों के विकास के लिए मूलभूत सुविधाएं जैसे कि कच्चा माल, साख सहूलियतें, करों में राहत तथा लघु उद्योगों को सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त शक्ति, कोयला, यातायात के साधन, सड़कें, रेलों का विकास करने की आवश्यकता है।

प्रश्न 6.
भारत ने लाइसेंसिंग नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति (Industrial Lincensing Policy)-स्वतन्त्रता के बाद भारत सरकार ने सन् 1951 में एक एक्ट ‘औद्योगिक विकास एवं नियमन’ पास किया जिसके अनुसार प्रत्येक उद्योग को सरकार से अनुमति लेकर ही औद्योगिक उत्पादन करने का हक होता था। बिना सरकार की अनुमति और बिना लाइसेंस कोई भी व्यक्ति उद्योग स्थापित नहीं कर सकता था। उद्योग कहां स्थापित किया जाए, कौन-सी वस्तु का उत्पादन किया जाए और उस वस्तु का कितनी मात्रा में उत्पादन किया जाए, इन बातों के लिए लाइसेंस लेना ज़रूरी था। सरकार की इस नीति को औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति कहा जाता है।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत में औद्योगीकरण के महत्त्व को स्पष्ट करें।
उत्तर-
भारत में औद्योगीकरण का विशेष महत्त्व है। उद्योगों के विकास द्वारा राष्ट्रीय आय, उत्पादन तथा रोजगार में वृद्धि कर भारतीय अर्थ-व्यवस्था की विकास दर को बढ़ाया जा सकता है। उद्योगों का महत्त्व इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
1. रोज़गार में वृद्धि-औद्योगिक विकास द्वारा रोजगार में वृद्धि की जा सकती है। भारत में भिन्न-भिन्न योजनाओं में रोज़गार की वृद्धि के लिए रखे गए लक्ष्य प्राप्त नहीं हुए इस कारण बेरोजगारी में बहुत वृद्धि हुई है। 2019-20 में उद्योग द्वारा 160 मिलियन लोगों को रोजगार प्रदान किया गया है। 2022 तक 200 मिलियन लोगों को रोज़गार देने का अनुमान है।

2. आर्थिक विकास-भारत के आर्थिक विकास की दर तीव्र करने के लिए उद्योगों का विकास महत्त्वपूर्ण |

3. साधनों का उचित प्रयोग-भारत में प्राकृतिक साधन लोहा, कोयला, मैंगनीज़ तथा मानवीय साधन बहुत अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसका उचित प्रयोग करने के लिए उद्योगों का विकास महत्त्वपूर्ण है।

4. विदेशी व्यापार-भारत द्वारा विदेशों को निर्यात कम मात्रा में किया जाता है तथा आयात अधिक होने के कारण भुगतान सन्तुलन भारत के प्रतिकूल रहता है। औद्योगीकरण द्वारा विदेशी व्यापार में वृद्धि करके भुगतान सन्तुलन को अनुकूल किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
भारत की योजनाओं में औद्योगिक विकास दर पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
भारत एक विकासशील देश है। इससे 1991 की औद्योगिक नीति से पूर्व सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया था परन्तु अब निजी क्षेत्र को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है जिस कारण भारत में भिन्नभिन्न योजनाओं में विकास दर इस प्रकार रही है-
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इससे ज्ञात होता है कि भारत में उद्योगों की विकास दर 10% से कम रही है। देश के आर्थिक विकास में वृद्धि करने के लिए विकास दर में और वृद्धि करने की आवश्यकता है। वर्ष 2012-17 में औद्योगिक विकास दर का लक्ष्य 9% रखा गया है। 2020-21 में 9.4% विकास दर प्राप्त करने का लक्ष्य है।

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प्रश्न 3.
भारत में औद्योगिक विकास की मन्द गति के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
भारत में औद्योगिक विकास की मन्द गति के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

  1. आधारभूत उद्योगों का कम विकास-प्रत्येक देश का आर्थिक विकास आधारभूत उद्योगों के विकास पर निर्भर करता है। यद्यपि भारत में मशीनें, लोहा तथा इस्पात, सीमेंट इत्यादि बनाने के उद्योग स्थापित किए गए हैं परन्तु देश की आवश्यकताओं को देखते हुए इनका कम विकास हुआ है।
  2. पूंजी की कमी-उद्योगों के विकास के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है। भारत में अधिक लोग निर्धन हैं इसलिए लोगों की बचत कम है। बचत द्वारा ही पूंजी निर्माण किया जाता है। पूंजी की कमी के कारण उद्योगों की गति मन्द है।
  3. शक्ति की कमी-उद्योगों के विकास के लिए शक्ति साधनों की आवश्यकता होती है। भारत में शक्ति के तीन साधन विद्युत्, कोयला तथा तेल हैं। भारत में कोयला काफ़ी मात्रा में मिलता है परन्तु यह घटिया किस्म का होने के कारण आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करता। कोयले की खाने बिहार तथा बंगाल में केन्द्रित हैं इसलिए अन्य क्षेत्रों को कोयला भेजने की लागत बढ़ जाती है। इस कारण उद्योगों के विकास की गति मन्द है।
  4. क्षेत्र असमानता-भारत में अधिकतर उद्योग कुछ क्षेत्रों जैसे कि महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु में केन्द्रित हो गए हैं। कुछ राज्य जैसे कि पंजाब, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, राजस्थान उद्योगों के पक्ष से पिछड़े हुए राज्य हैं। क्षेत्रीय असमानता होने के कारण भी उद्योगों के विकास की गति मन्द है।

प्रश्न 4.
भारत में औद्योगिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए चार सुझाव दें।
उत्तर-
भारत में उद्योग पिछड़ी हुई स्थिति में हैं। उद्योगों के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं-

  • निजी क्षेत्र का विकास- भारत में सार्वजनिक क्षेत्र असफल हो गया है। इसलिए निजी क्षेत्र को उत्साहित करने की आवश्यकता है। सरकार को निजी क्षेत्र के विकास के लिए अधिक सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए। इससे निजी पूंजीपति अधिक उद्योग स्थापित करेंगे ताकि उद्योगों का विकास हो सके।
  • साधनों का उचित प्रयोग-भारत में प्राकृतिक साधन काफ़ी मात्रा में पाए जाते हैं। देश के प्राकृतिक साधनों का उचित प्रयोग करके उद्योगों का विकास किया जा सकता है।
  • आधुनिकीकरण तथा तकनीकी विकास-भारत में उत्पादन करने की विधियां पुरातन होने के कारण उद्योग पिछड़े हुए हैं। उद्योगों के विकास के लिए आवश्यक है कि आधुनिक युग में प्रयोग होने वाली मशीनों का प्रयोग किया जाए। तकनीकी तौर पर विकसित मशीनों के प्रयोग से न केवल उत्पादन लागत कम हो जाती है बल्कि उद्योग प्रतियोगिता करने में समर्थ हो जाते हैं।
  • अवरोध दूर करना-औद्योगिक विकास के लिए आधारभूत ढांचे के मुख्य अवरोधों को दूर करना चाहिए अर्थात् देश में शक्ति, यातायात के साधन, संचार तथा कच्चे माल इत्यादि अवरोधों को दूर किया जाए तो इससे औद्योगिक पिछड़ापन दूर किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
ग्यारहवीं योजना में औद्योगिक विकास पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
भारत में बारहवीं पंचवर्षीय योजना 2012-17 तक बनाई गई। इस योजना में उद्योगों के विकास तथा खनिज पदार्थों पर 196000 करोड़ रुपए खर्च करने के लिए रखे गए थे। ग्यारहवीं योजना में चार क्षेत्रों को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं है। विदेशी पूंजी 75% से 100% तक लगाई जा सकती है। पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया था। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निजी क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई है। इस प्रकार भारतीय उद्योगों को प्रतियोगिता के योग्य बनाया जा रहा है। बारहवीं योजना (2012-17) में औद्योगिक विकास दर 12% का लक्ष्य रखा गया है।

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत की अर्थ-व्यवस्था में उद्योगों के महत्त्व पर टिप्पणी लिखें। (Write a detailed note on the Importance of Industrialization in India.)
उत्तर-
भारत जैसे विकासशील देश के लिए औद्योगीकरण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके महत्त्व को निम्नलिखित अनुसार स्पष्ट किया जा सकता है-

  1. रोज़गार में वृद्धि-भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है। बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए रोजगार – के नए अवसर उत्पन्न करने के लिए औद्योगीकरण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। कृषि से जनसंख्या का बोझ घटाने के लिए उद्योगों का विकास महत्त्वपूर्ण है।
  2. राष्ट्रीय आय में वृद्धि-अगर हम विश्व के उन्नत देशों को देखते हैं तो आय में अधिक योगदान उद्योगों द्वारा दिया जाता है। भारत में 1950-51 में उद्योगों द्वारा 16% योगदान दिया गया था जो कि अब 2019-20 में बढ़ कर 25% हो गया है। आज भी उद्योगों से कृषि का योगदान महत्त्वपूर्ण है।
  3. पूंजी निर्माण में वृद्धि-पूंजी निर्माण के अतिरिक्त कोई भी देश आर्थिक उन्नति नहीं कर सकता। प्रो० लुईस का विचार था कि कोई देश इतना निर्धन नहीं होता कि राष्ट्रीय आय का 12% भाग पूंजी निर्माण न कर सके। परन्तु उद्योगों के विकास के अतिरिक्त बचत में वृद्धि नहीं हो सकती इसलिए पूंजी निर्माण में वृद्धि करने के लिए औद्योगिक विकास आवश्यक है।
  4. कृषि का विकास-कृषि का विकास औद्योगिक विकास के बिना सम्भव नहीं। उद्योगों में ऐसी मशीनें विकसित की जा सकती हैं जिनसे उत्पादन बढ़ाया जा सके। जब कृषि का उत्पादन बढ़ जाता है तो इससे उद्योगों का विकास होता है। इस प्रकार कृषि का विकास तथा औद्योगिक विकास एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं।
  5. विदेशी व्यापार का विकास-उद्योगों के विकास द्वारा विदेशी व्यापार में वृद्धि होती है। उद्योगों में जो वस्तुएं उत्पन्न की जाती हैं इनका निर्यात करके विदेशी पूंजी अर्जित की जा सकती है जो कि देश के आर्थिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण होती है।
  6. सन्तुलित आर्थिक विकास- भारत में आर्थिक विकास तीव्र करने के लिए सन्तुलित आर्थिक विकास करने की आवश्यकता है। जब एक देश में कृषि तथा उद्योग एक साथ विकसित होते हैं तो इस को सन्तुलित विकास कहा जाता है। इसलिए भारत में सन्तुलित विकास करके आर्थिक विकास तीव्र गति से प्राप्त किया जा सकता है।
  7. आत्म-निर्भरता- भारत में विदेशों से बहुत-सी वस्तुएं तथा मशीनें आयात की जाती हैं। इसलिए स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत का भुगतान सन्तुलन भारत के प्रतिकूल रहा है। औद्योगिक विकास द्वारा वस्तुओं की अधिक आवश्यकता को पूर्ण किया जा सकता है।
  8. सुरक्षा के लिए लाभदायक-देश की सुरक्षा के लिए औद्योगिक विकास लाभदायक होता है। देश में सुरक्षा सम्बन्धी उपकरणों का विकास करके विदेशों पर निर्भरता कम की जा सकती है।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता के पश्चात् योजनाओं के दौरान भारत में औद्योगिक विकास के ढांचे का वर्णन करें। (Explain the Industrial development of India after Independence during plan period.)
उत्तर-
भारत की स्वतन्त्रता से पूर्व भारत के औद्योगिक विकास की तरफ ध्यान नहीं दिया गया था क्योंकि इंग्लैण्ड के उद्योगों में जो माल तैयार होता था वह भारत की मण्डियों में बेचा जाता था। भारत में से कच्चा माल इंग्लैण्ड को निर्यात किया जाता था। इसलिए स्वतन्त्रता से पूर्व भारत में औद्योगिक विकास नहीं हुआ, परन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् औद्योगिक विकास की तरफ ध्यान देना आरम्भ किया गया है। इसलिए भारतीय योजनाओं के दौरान उद्योगों को जिस प्रकार महत्त्व दिया गया है उसका विवरण इस प्रकार से है-
1. प्रथम योजना में उद्योग (Industries in First Plan)-प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) में कृषि के विकास की तरफ अधिक ध्यान दिया गया, परन्तु औद्योगिक विकास के लिए विशेष कार्य नहीं किया गया, परन्तु इस योजना में कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योग जैसे कि सीमेंट, फैक्टरियां, टेलीफोन, इण्डस्ट्री, चितरंजन लोकोमोटिव वर्कस इत्यादि आरम्भ किए गए। इस योजना में उद्योगों के उत्पादन में 39% वृद्धि हुई है।

2. द्वितीय योजना में उद्योग (Industries in Second Plan)-द्वितीय योजना (1956-61) में उद्योगों के विकास की तरफ विशेष ध्यान दिया गया। यह योजना प्रो० पी० सी० महलानोबिस ने तैयार की थी। 1956 में औद्योगिक नीति की घोषणा की गई। इस योजना काल में सार्वजनिक क्षेत्र में आधारभूत उद्योग स्थापित करने को अधिक महत्त्व दिया गया। लोहा तथा इस्पात के उत्पादन के लिए दुर्गापुर, भिलाई तथा राऊरकेला के स्थान पर उद्योग स्थापित किए गए। नंगल में उर्वरक उद्योग स्थापित किया गया। इस योजना में औद्योगिक उत्पादन की विकास दर 6.6% वार्षिक रही।

3. तृतीय योजना में उद्योग (Industries in Third Plan)-भारत की तृतीय योजना (1961-66) में भारी उद्योग के विकास की तरफ विशेष ध्यान दिया गया। इसका मुख्य लक्ष्य औद्योगिक क्षेत्र में रोज़गार में वृद्धि करना रखा गया ताकि राष्ट्रीय आय में वृद्धि हो सके। इस योजना में जो उद्योग द्वितीय योजना में स्थापित किए गए थे उनकी योग्यता में वृद्धि की गई। भारत में मशीनों के पुर्जे, स्वास्थ्य से सम्बन्धित उपकरण तथा वैज्ञानिक औजार बनाने के कारखाने लगाए गए। इस योजना में औद्योगिक उत्पादन में 25% वृद्धि की गई।

4. चतुर्थ योजना में उद्योग (Industries in Fourth Plan)-चतुर्थ योजना (1969-74) से तीव्र गति से आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए औद्योगिक विकास की तरफ विशेष ध्यान दिया गया। भारत में पेट्रोल तथा रासायनिक पदार्थों के विकास के लिए निवेश में वृद्धि की गई। इस योजना काल में औद्योगिक उत्पादन को वार्षिक दर 5% रही।

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5. पांचवीं योजना में उद्योग (Industries in Fifth Plan)-पांचवीं योजना (1974-78) में औद्योगिक विकास में. ६, वार्षिक विकास दर प्राप्त करने के लिए बनाई गई थी। इस योजना में उद्योगों के विकास के लिए सा जनिक क्षेत्र में 39,426 करोड़ रुपए का निवेश किया गया। योजना काल में इस्पात, उर्वरक, खनिज तेल, निर्यात, कपड़ा, चीनी इत्यादि उद्योगों के विकास की तरफ विशेष ध्यान दिया गया परन्तु औद्योगिक उत्पादन में विकास दर 5.3% रही।

6. छठी योजना में उद्योग (Industries in Sixth Plan)-छठी योजना (1980-85) में नए उद्योग स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया। विशेषतया टेलीफोन तथा इलेक्ट्रोनिक्स उद्योगों की तरफ अधिक ध्यान. दिया गया। इस योजना में औसत वार्षिक विकास दर 5.5% वार्षिक रही।

7. सातवीं योजना में उद्योग (Industries in Seventh Plan)-सातवीं योजना (1985-90) में देश में औद्योगीकरण की नीति जारी रही। इस योजना में बड़े उद्योगों तथा खनिजों के उत्पादन की तरफ विशेष ध्यान दिया गया। उत्पादन में वृद्धि करने के लिए तकनीक को विकसित करने का कार्य आरम्भ किया गया। देश की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर उद्योगों को विकसित करने की योजना बनाई गई। विकास सम्भावना वाली सन्राइज इण्डस्ट्री (Sun Rise Industry) की स्थापना की गई। इस योजना काल में औद्योगिक विकास दर 8.5% वार्षिक रही।

8. आठवीं योजना में उद्योग (Industries in 8th Plan).- आठवीं योजना (1992-97) में उद्योगों पर कृषि से अधिक खर्च करने का कार्यक्रम बनाया गया। इस योजना में सार्वजनिक क्षेत्रों के उद्योगों के विकास के लिए 44.33 करोड़ रुपए खर्च किए गा ! इस निवेश का मुख्य लक्ष्य निजी उद्योगों की उत्पादन शक्ति में वृद्धि करना रखा गया।

9. नौवीं योजना में उद्योग (Industries in 9th Plan)-नौवीं योजना (1997-2002) में उदारीकरण की नीति को अपनाया गया है। नई औद्योगिक नीति के अनुसार उद्योगों में उत्पादन शक्ति को बढ़ाकर शेष विश्व की जस्तुओं से मुकाबला करने के योग्य बनाना है। इसके लिए सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के स्थान पर निजी क्षेत्र को अधिक प्राथमिकता दी है। पूंजी बाज़ार को विशाल बनाया गया है। इस योजना में औद्योगिक विकास दर 5.5% रही।

10. दसवीं योजना में उद्योग (Industries in 10th Plan)-दसवीं पंचवर्षीय योजना 2002-07 में उदारीकरण व निजीकरण की नीति को अपनाया गया है। इस योजना काल में 8.2% वार्षिक विकास दर प्राप्त की गई है।

11. ग्यारहवीं योजना में उद्योग (Industries in 11th Plan)-ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) में औद्योगिक विकास का लक्ष्य 15% प्रति वर्ष रखा गया है। ग्यारहवीं योजना में औद्योगिक विकास पर 153600 करोड़ रुपए व्यय किया गया।

12. बारहवीं योजना में उद्योग (Industries in 12th Plan)-बारहवीं योजना (2012-17) में औद्योगिक विकास का लक्ष्य 9% रखा गया है। इस योजना काल में 292098 करोड़ रुपए व्यय किये जाएंगे।

प्रश्न 3.
भारत में घरेलू तथा लघु पैमाने के उद्योगों के महत्त्व की व्याख्या करें। (Explain the importance of cottage and small scale industries in India.)
उत्तर-
माईक्रो, लघु तथा मध्यम उद्योगों की परिभाषा (Definition of Micro, Small and Medium Industries)-भारत में माईक्रो, लघु तथा मध्यम उद्योगों के विकास एक्ट के अनुसार इन उद्योगों का वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है-वित्त मन्त्री निर्मला सीतारमण ने 2 फरवरी 2020 को बजट में इन उद्योगों की परिभाषा बदल दी है-

निर्माण क्षेत्र (Manufacturing Sector)-

उद्यम श्रेणी प्लांट तथा मशीनरी पर निवेश
माईक्रो उद्यम ₹ 1 करोड़ से अधिक निवेश नहीं होना चाहिए।
लघु उद्यम ₹10 करोड़ से अधिक परन्तु ₹ 50 करोड़ का उत्पादन नहीं होना चाहिए।
मध्यम उद्यम ₹ 10 करोड़ से अधिक परन्तु ₹ 50 करोड़ से अधिक निवेश नहीं होना चाहिए।

भारत में घरेलु तथा छोटे पैमाने के उद्योगों का महत्त्व बहुत अधिक है। यह उद्योग भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 8% योगदान डालते हैं। इस उद्योगों द्वारा उत्पादन का 40% भाग निर्यात किया जाता है। भारत में इन उद्योगों की संख्या 26 मिलियन है जिसमें 60 मिलियन मज़दूरों को रोजगार दिया जाता है।

इन उद्योगों के महत्त्व को निम्नलिखित से ज्ञात किया जा सकता है –
1. रोज़गार (Employment)-घरेलू तथा छोटे पैमाने के उद्योग श्रम गहन होने के कारण रोज़गार में वृद्धि करते हैं। भारत में जनसंख्या बहुत अधिक है। इसलिए बेरोज़गारी की समस्या पाई जाती है। बेरोज़गारी को दूर करने के लिए घरेलू तथा छोटे पैमाने के उद्योग अधिक योगदान दे सकते हैं। लघु तथा मध्यम वर्ग के उद्योगों द्वारा 7.2 लाख लोगों को रोजगार प्रदान किया जाता है।

2. पूंजी की कम आवश्यकता (Need for Less Capital)-घरेलू तथा छोटे पैमाने के उद्योगों में पूंजी की कम आवश्यकता होती है। इसलिए भारत जैसे निर्धन देश में यह उद्योग विशेष महत्त्व रखते हैं।

3. विदेशी सहायता की आवश्यकता नहीं (No need of Foreign Help)-घरेलू तथा छोटे पैमाने के उद्योगों को स्थापित करने के लिए विदेशी मशीनों तथा आधुनिक तकनीकों की आवश्यकता नहीं होती। घरेलू तकनीक द्वारा ही उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है।

4. कृषि पर जनसंख्या का कम बोझ (Less Pressure of Population on Agriculture)-भारत में कृषि पर 70% लोग निर्भर करते हैं। कृषि पर से जनसंख्या का बोझ हटाने के लिए घरेलू तथा छोटे पैमाने के उद्योगों का विकास आवश्यक है।

5. आय का समान विभाजन (Equal Distribution of Income)-भारत में आय का असमान विभाजन पाया जाता है। अमीर तथा निर्धन लोगों की आय में अन्तर बहुत अधिक है। आय के समान विभाजन के लिए भी घरेलू तथा छोटे पैमाने के उद्योगों का विकास आवश्यक है।

6. उद्योगों का विकेन्द्रीकरण (Decentralisation of Industries)-बड़े पैमाने के उद्योग एक स्थान पर केन्द्रित हो जाते हैं। उद्योगों में विकेन्द्रीकरण के लिए घरेलू तथा छोटे उद्योगों का विकास आवश्यक है।

7. बड़े पैमाने के उद्योगों के लिए सहायक (Helpful to Large Scale Industries)-छोटे पैमाने के उद्योगों में ऐसी वस्तुओं का उत्पादन किया जा सकता है जो कि बड़े पैमाने के उद्योगों के लिए सहायक हो सके जैसे कि साइकिल बनाने के उद्योगों के लिए छोटे पैमाने के उद्योगों द्वारा हैण्डल, स्टैण्ड, तारें इत्यादि नियमित किए जा सकते हैं।

8. कम औद्योगिक लड़ाई-झगड़े (Less Industrial Disputes)-बड़े पैमाने के उद्योगों से औद्योगिक लड़ाई-झगड़े आरम्भ हो जाते हैं परन्तु छोटे पैमाने पर उत्पादन करने से औद्योगिक झगड़ों की सम्भावना कम हो जाती है।

9. किसानों की आय में वृद्धि (Supplement to Farmer’s Income)-घरेलू उद्योग विशेषतया किसानों द्वारा आरम्भ किए जा सकते हैं। इससे किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है।

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प्रश्न 4.
भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् औद्योगिक नीति की आलोचना सहित व्याख्या करें। (Critically examines the Industrial Policy of India after Independence.)
अथवा
भारत में 1991 की औद्योगिक नीति की व्याख्या करें। (Explain the Industrial Policy of 1991 in India.)
अथवा
भारत की नई औद्योगिक नीति को स्पष्ट करें। (Explain the New Industrial Policy of India.)
उत्तर-
भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् औद्योगिक नीति का निर्माण किया गया। औद्योगिक नीति समय-समय पर परिवर्तित की गई है, जिसका विवरण इस प्रकार है-
1. औद्योगिक नीति 1948 (Industrial Policy of 1948)-भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) को अपनाया गया। इसमें औद्योगिक विकास के लिए सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के कार्य क्षेत्र निर्धारित किए गए। उद्योगों को चार क्षेत्रों में विभाजित करके स्पष्ट किया गया।

  • सार्वजनिक क्षेत्र
  • सरकारी तथा निजी क्षेत्र
  • नियमित निजी क्षेत्र
  • निजी तथा सहकारी क्षेत्र में बनाई गई।

2. इस नीति में-

  • सार्वजनिक क्षेत्र में 17 उद्योगों का वर्णन किया गया।
  • सरकारी तथा निजी क्षेत्र में साझे तौर पर चलाने के लिए 12 उद्योग रखे गए।
  • निजी क्षेत्र में शेष उद्योगों को शामिल किया गया। घरेलू तथा छोटे पैमाने के उद्योगों की तरफ विशेष ध्यान दिया गया है।

इस औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक महत्त्व दिया गया तथा एकाधिकारी शक्तियों को नियन्त्रण में रखा गया।

3. औद्योगिक नीति 1997 (Industrial Policy of 1977)-1977 में जनता सरकार का राज्य स्थापित हुआ। इसलिए उन्होंने 1956 की औद्योगिक नीति में कुछ परिवर्तन किए परन्तु 1980 में कांग्रेस सरकार सत्ता में आई तो उन्होंने भी औद्योगिक नीति में परिवर्तन किए। नई औद्योगिक नीति 1991 (New Industrial Policy of 1991)–भारत सरकार ने 24 जुलाई, 1991 को नई औद्योगिक नीति की घोषणा की।

इस नीति की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं –

  1. सरकारी क्षेत्र का संकुचन (Contraction of Public Sector)-नई नीति के अनुसार सरकारी क्षेत्र में सैन्य उपकरण, परमाणु, ऊर्जा, खनन तथा रेल यातायात के चार उद्योग रहेंगे जबकि शेष उद्योग निजी क्षेत्र के लिए आरक्षित किए गए।
  2. लाइसेंस की समाप्ति (Delicensing)-नई औद्योगिक नीति में 18 उद्योग रखे गए जिनके लिए लाइसेंस लेने की आवश्यकता है जैसे कि कोयला, पेट्रोलियम, शराब, चीनी, मोटर, कारें, दवाइयां इत्यादि। इनके अतिरिक्त अन्य उद्योगों में लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं है।
  3. विदेशी पूंजी (Foreign Capital)-नई नीति के अनुसार विदेशी पूंजी निवेश की सीमा 40% से बढ़ा कर 51% की गई है।
  4. बोर्डों का संगठन (Organisation of Boards)-नई नीति के अनुसार विदेशी पूंजी को उत्साहित करने के लिए विशेष बोर्डों का गठन किया जाएगा।
  5. तकनीकी माहिर (Technical Experts)-नई नीति में तकनीकी माहिरों की सहायता लेकर औद्योगिक विकास किया जाएगा।
  6. सरकारी निर्णय (Government Decision)-सरकार ने भारतीय औद्योगिक अर्थव्यवस्था को अफसरशाही नियन्त्रण के चंगुल से बाहर निकालने का फैसला किया विशेषतया सुरक्षा के क्षेत्र तथा अन्य आवश्यक क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र में आरक्षित रखे जाएंगे जबकि अन्य क्षेत्रों में निजी पूंजीपतियों को निवेश करने की छूट दी जाएगी। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में लगातार हो रही हानि को ध्यान में रख कर नई औद्योगिक नीति उदारवादी नीति बनाई गई है। बारहवीं योजना में विकास दर 89% प्राप्त करने का लक्ष्य है।

नई नीति का मूल्यांकन (Evaluation of New Industrial Policy)गुण (Merits)-

  1. नई नीति से उद्योगों की कुशलता में वृद्धि होगी।
  2. देश में विदेशी तकनीकों के प्रयोग के कारण उत्पादन में वृद्धि होगी।
  3. यह नीति उदारवादी नीति है जिसमें निजी क्षेत्र को प्राथमिकता दी गई है।
  4. भारतीय उद्योगों को विदेशी उद्योगों से प्रतियोगिता करने के समर्थ बनाने का यत्न किया गया है।
  5. घरेलू तथा छोटे उद्योगों को अधिक महत्त्व प्रदान किया गया है तथा मजदूरों के कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाए गए हैं।

त्रुटियां (Shortcomings)-

  • इससे सार्वजनिक क्षेत्र का महत्त्व कम हो गया है।
  • सरकारी कर्मचारियों की निरन्तर छंटनी हो रही है।
  • आर्थिक शक्ति कुछ हाथों में केन्द्रित हो जायेगी तथा एकाधिकारी शक्तियों का निर्माण होगा।
  • विदेशी पूंजी से आर्थिक गुलामी की स्थिति उत्पन्न होगी।
  • इस नीति से सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं की जा सकती तथा पिछड़े क्षेत्रों का विकास नहीं होगा।

प्रश्न 5.
भारत में औद्योगीकरण की मुख्य समस्याओं का वर्णन करें। उद्योगों के विकास के लिए सुझाव दें।
(Explain the main problems of Industrialization in India. Suggest measures for the Industrial development.)
उत्तर –
भारत में औद्योगिक विकास सन्तोषजनक नहीं हुआ। आज भी कृषि क्षेत्र का योगदान राष्ट्रीय आय में अधिक है। औद्योगिक विकास न होने के मुख्य कारण इस क्षेत्र की कुछ समस्याएं हैं जो कि इस प्रकार हैं-

कम प्राप्तियां (Less Achievements)-
भारत की भिन्न-भिन्न योजनाओं में विकास दर के लक्ष्य हमेशा अधिक रखे गए हैं। प्रत्येक योजना में 8% विकास दर प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया परन्तु वास्तव में 5.6% विकास दर प्राप्त की गई है। इसलिए निर्धारित लक्ष्यों तथा प्राप्तियों में बहुत अन्तर पाया जाता है।

  1. बीमार उद्योग (Industrial Sickness)-भारत के रिज़र्व बैंक ने व्यापारिक बैंकों से जो सूचना प्राप्त की है उसके अनुसार 31 मार्च, 2019 तक 2,40,000 बीमार औद्योगिक इकाइयां थीं। 2019 में छोटे पैमाने के उद्योगों की बीमार इकाइयों की संख्या 1,13,178 थी। इस प्रकार बीमार इकाइयों की संख्या में वृद्धि होने के कारण औद्योगिक विकास नहीं हो रहा है।
  2. बड़े घरानों का विकास (Growth of Big Houses)-भारत में टाटा, बिरला, डाल्मिया, श्री राम, मफतलाल जैसे बड़े घरानों के पास सम्पत्ति निरन्तर बढ़ रही है। इस प्रकार देश की आर्थिक शक्ति थोड़े से हाथों में केन्द्रित हो रही है।
  3. विलास वस्तुओं का उत्पादन (Production of Luxury things)-भारत में औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन में अमीर लोगों द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं का अधिक उत्पादन किया जाता है जबकि साधारण लोगों द्वारा प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं में उत्पादन की तरफ ध्यान नहीं दिया गया।
  4. क्षेत्रीय असन्तुलन (Regional Imbalance)-भारत में उद्योग थोड़े से राज्यों में केन्द्रित हो गए हैं जैसे कि महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु राज्य औद्योगिक पक्ष से विकसित हैं जबकि बिहार, उड़ीसा, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश औद्योगिक पक्ष से पिछड़े हुए राज्य हैं।
  5. कम सुविधाएं (Less Facilities)-भारत के उद्योगों को बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है जैसे कि विदेशी प्रतियोगिता, विद्युत्, प्राकृतिक साधनों की कमी, प्रशिक्षण के माहिरों की कमी जिसके कारण औद्योगिक क्षेत्रों की उत्पादकता बहुत कम है। परिणामस्वरूप उद्योगों द्वारा लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं की जा सकती।

औद्योगिक (Suggestion for Industrial Growth) –

  • आधुनिकीकरण (Modernisation)-भारत में उद्योगों के आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। इस लक्ष्य के लिए नई मशीनों तथा औज़ारों का निर्माण करना चाहिए ताकि उद्योगों में उत्पादन लागत कम हो सके।
  • मूलभूत सुविधाएं (Basic Facilities) उद्योगों के विकास के लिए मूलभूत सुविधाएं जैसे कि कच्चा माल, साख सहूलियतें, करों में राहत तथा लघु उद्योगों को सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त शक्ति, कोयला, यातायात के साधन, सड़कें, रेलों का विकास करने की आवश्यकता है।
  • सरकारी सहायता (Government Assistance) सरकार को औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित करना चाहिए। बीमार इकाइयों के सम्बन्ध में उचित नीति अपनानी चाहिए। उत्पादन करने की विधियों में परिवर्तन करके मांग में वृद्धि करनी चाहिए।
  • वस्तुओं का मानकीकरण (Standardisation of Products)-भारत में वस्तुओं के मानकीकरण की आवश्यकता है ताकि विश्व स्तर पर वस्तुओं को प्रतियोगिता करने के योग्य बनाया जा सके। इसके लिए सरकार को नई मण्डियों की खोज करनी चाहिए। वस्तुओं का प्रचार करके मांग में वृद्धि करने की आवश्यकता है।
  • औद्योगिक केन्द्र (Industrial Centres)-देश में कच्चे माल, विद्युत्, जल, मज़दूरों इत्यादि साधनों को ध्यान में रख कर औद्योगिक केन्द्र स्थापित करने चाहिए, विशेषतया कृषि उद्योगों को गांवों में स्थापित करने की आवश्यकता है। इस प्रकार सरकार को भिन्न-भिन्न प्रकार की सूचना प्रदान करके उद्योगों के विकास की तरफ ध्यान देना चाहिए।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 20 भारत में औद्योगिक विकास नीति तथा लाइसेसिंग

प्रश्न 6.
औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति से क्या अभिप्राय है ? भारत में लाइसेंस नीति के उद्देश्य तथा कार्य कुशलता का मूल्यांकन करें।
(What is meant by Industrial Licensing Policy? Discuss the objectives of this Policy. Evaluate the working of this Policy.)
उत्तर-
औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति (Industrial Lincensing Policy) स्वतन्त्रता के बाद भारत सरकार ने सन् 1951 में एक एक्ट ‘औद्योगिक विकास एवं नियमन’ पास किया जिसके अनुसार प्रत्येक उद्योग को सरकार से अनुमति लेकर ही औद्योगिक उत्पादन करने का हक होता था। बिना सरकार की अनुमति और बिना लाइसेंस कोई भी व्यक्ति उद्योग स्थापित नहीं कर सकता था।

औद्योगिक कहां स्थापित किया जाए, कौन-सी वस्तु का उत्पादन किया जाए- और उस वस्तु का कितनी मात्रा में उत्पादन किया जाए, इन बातों के लिए लाइसेंस लेना ज़रूरी था। सरकार की इस नीति को औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति कहा जाता है। औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति के उद्देश्य (Objectives of Industrial Lincensing Policy)-औद्योगिक लाइसेंसिंग नीति के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं-

  1. निवेश तथा उत्पादन पर नियन्त्रण-औद्योगिक नीति का उद्देश्य भारत में निवेश तथा उत्पादन पर नियन्त्रण रखना था। इस प्रकार विभिन्न योजनाओं में औद्योगिक विकास के लक्ष्यों की पूर्ति सम्भव है।
  2. लघु उद्योगों का विकास-बड़े पैमाने के उद्योगों के विकास से लघु उद्योगों के विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है। लाइसेंसिंग नीति द्वारा सरकार उन उद्योगों को अनुमति नहीं देती थी जिनके विकास से लघु उद्योगों पर बुरा प्रभाव पड़े।
  3. क्षेत्रीय सन्तुलन-भारत में सभी उद्योग एक स्थान पर केन्द्रित न हो जाए और देश के हर क्षेत्र का विकास हो इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए भी लाइसेंसिंग नीति अनिवार्य भी है।
  4. तकनीकी सुधार-औद्योगिक नीति का उद्देश्य तकनीकी सुधारों को बढ़ावा देना भी है।
  5. विकेन्द्रीयकरण-उद्योगों के विकेन्द्रीयकरण के लिए भी लाइसेंसिंग नीति ज़रूरी थी। इस नीति का एक उद्देश्य उद्योगों का सन्तुलित विकास करना भी है। इसलिए नई औद्योगिक इकाइयां लाभ के लिए, वर्तमान में चल रही औद्योगिक ईकाइयों का पंजीकरण अनिवार्य है। नए उत्पादन बनाने के लिए और उत्पादन का विस्तार करने के लिए भी लाइसेंस लेना अनिवार्य है। यदि उद्यमी औद्योगिक इकाई के स्थान में परिवर्तन करता है तो इस के लिए भी सरकार की अनुमति अनिवार्य है।

लाइसेंसिंग नीति का मूल्यांकन (Evaluation of the Licensing Policy)-भारत में औद्योगिक नीति इस प्रकार रही है-
1. अनिवार्य लाइसेंसिंग-भारत में 1951 की नीति के अनुसार उन उद्योगों के लिए लाइसेंस लेना आवश्यक था जिनकी स्थाई पूंजी 10 लाख रुपए थी। इस सीमा में समय-समय पर परिवर्तन किया गया है। यह सीमा 1970 में एक करोड़, 1990 में 25 करोड़ कर दी गई। 1991 की नई औद्योगिक नीति में सुरक्षा से सम्बन्धित 14 उद्योगों को छोड़कर किसी उद्योग को लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं है। 1999 में से 6 उद्योग हैं जिनके लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य है। यह उद्योग है, तम्बाकू उत्पादन, सुरक्षा उपकरण, औद्योगिक विस्फोटक, दवाइयां, खतरनाक रसायन और एरोस्पेस । सरकार की इस नई औद्योगिक नीति को उदारवादी नीति कहा जाता है।

2. एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम (M.R.T.P. Act)–भारत सरकार ने एकाधिकार पर नियन्त्रण पाने के लिए एकाधिकार एवं प्रतिबन्धात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम बनाया था जिसको 1969 में लागू किया गया। बड़े औद्योगिक गृहों पर नियन्त्रण पाने के लिए इस नियम को लागू किया गया ताकि बड़े घरानों पर प्रतिबन्ध लगाया जा सके। इस नियम को 2002 में समाप्त कर दिया गया है।

3. लघु उद्योगों को संरक्षण-लघु उद्योगों के लिए सरकार ने कई वस्तुओं के उत्पादन को सुरक्षित कर दिया है जिनका उत्पादन बड़े पैमाने के उद्योगों में नहीं किया जा सकता। 2016-17 में लघु उद्योगों के लिए 598 वस्तुएं सुरक्षित की गई हैं।

4. सार्वजनिक क्षेत्र के लिए संरक्षण-सार्वजनिक क्षेत्र को भारत में पहले अधिक महत्त्व दिया जाता था। अब सार्वजनिक क्षेत्र के स्थान पर निजी क्षेत्र को अधिक महत्त्व दिया जाता है। स्वतन्त्रता के पश्चात् सार्वजनिक क्षेत्र के लिए 17 उद्योग सुरक्षित रखे गए थे। इन उद्योगों की संख्या 1991 में कम करके 8 की गई तथा 2004-05 में केवल 3 उद्योग ही सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित है। 31 मार्च, 2016 तक कुल 62 औद्योगिक इकाइयां काम कर रही थीं, जिनमें 5,28,951 करोड़ रुपए का निवेश किया गया था।

सरकार द्वारा सार्वजनिक उद्योगों के अध्ययन के लिए एक बोर्ड की स्थापना की गई। इस बोर्ड द्वारा अक्तूबर 2015 को 62 उद्योगों के पुनर्गठन की सिफ़ारिश की। बोर्ड ने 43 उद्योगों के पुनर्निर्माण (Revival) की मन्जूरी दी और 2 उद्योगों को बन्द करवा दिया। पुनर्निर्माण उद्योगों को 25104 करोड रुपए की सहायता दी। फलस्वरूप 13 उद्योगों द्वारा अधिक उत्पादन करके लाभ प्राप्त किया। भारत में लाइसेंसिंग नीति 1951 में लागू की गई इस नीति में सुधार के लिए समय-समय पर समितियों की स्थापना की गई। 1967 में हजारी समिति तथा 1969 में दत्त समिति में लाइसेंसिंग नीति में सुधार करने के लिए सुझाव दिये। इसके बाद औद्योगिक लाइसेंसिंग में 1991 तक बहुत तबदीली की गई। इन परिवर्तनों का मुख्य उद्देश्य लाइसेंसिंग नीति को सरल बनाना था।

इस प्रकार लाइसेंसिंग नीति में आए परिवर्तन के कारण अब यह नीति उदारवादी नीति में तबदील हो चुकी है। इस कारण देश में उद्योगों के विकास को बढ़ावा मिला है। नई सरकार ने ‘Make in India’ की नीति अपनाई है जिसमें नई क्रियाएं, नया आर्थिक ढांचा, नई मानसिक सोच तथा नए क्षेत्रों के विकास पर बल दिया गया है। वर्ष 2022 तक औद्योगिक क्षेत्र में 25% वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है। अब सरकार सार्वजनिक उद्यमों में विनिवेश की नीति अपना रही है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय

Punjab State Board PSEB 12th Class Economics Book Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Economics Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय

PSEB 12th Class Economics अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
राजकोषीय नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राजकोषीय नीति से अभिप्राय सरकार की आय तथा व्यय नीति से होता है।

प्रश्न 2.
राजकोषीय नीति के मुख्य औज़ार (Instruments) कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
सरकार की आय के मुख्य औज़ार-
(A) सरकार की आय के मुख्य औज़ार हैं-

  • कर
  • सार्वजनिक ऋण
  • घाटे की वित्त व्यवस्था।

(B) सरकार के व्यय से सम्बन्धित औज़ार हैं-

  • सार्वजनिक निर्माण जैसे कि सड़कें, नहरें इत्यादि
  • सार्वजनिक कल्याण (शिक्षा)
  • देश की सुरक्षा तथा अनुशासन
  • आर्थिक सहायता

प्रश्न 3.
अधिक मांग में कमी के लिए राजकोषीय नीति का प्रयोग कैसे किया जाता है ? कोई एक उपाय बताओ।
अथवा
स्फीतिक अन्तराल को घटाने के लिए कोई दो राजकोषीय उपाय बताओ।
उत्तर-
करों में वृद्धि-सरकार को प्रत्यक्ष कर अधिक लगाने चाहिए इससे देश के नागरिकों की आय तथा खरीद शक्ति कम हो जाती है तथा अधिक मांग अथवा स्फीतिक अन्तराल की समस्या का हल होता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय

प्रश्न 4.
अभावी मांग में वृद्धि के लिए राजकोषीय नीति के कोई एक उपाय बताओ।
अथवा
अस्फीतिक अन्तराल में कमी के लिए कोई एक राजकोषीय उपाय बताओ।
उत्तर-
करों में कमी-अभावी मांग की वृद्धि के लिए, करों में कमी करनी चाहिए। इससे मांग में वृद्धि होगी तथा अस्फीतिक अन्तराल में कमी होगी।

प्रश्न 5.
मौद्रिक नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
मौद्रिक नीति वह नीति है, जिसका सम्बन्ध मौद्रिक अधिकारियों द्वारा
(a) मुद्रा की पूर्ति
(b) ब्याज की दर
(c) मुद्रा की उपलब्धता को प्रभावित करना है अर्थात् मुद्रा नीति से अभिप्राय वह उपाय है जो अर्थव्यवस्था में नकद मुद्रा तथा उधार मुद्रा को नियन्त्रण करते हैं।

प्रश्न 6.
मौद्रिक नीति के कोई एक उपायों को स्पष्ट करो।
उत्तर-

  • बैंक दर-बैंक दर वह दर होती है, जिस पर किसी देश का केन्द्रीय बैंक, व्यापारिक बैंकों को उधार देता
  • खुले बाजार की नीति-खुले बाज़ार की नीति का अर्थ है बाज़ार में केन्द्रीय बैंक द्वारा प्रतिभूतियों को खरीदना तथा बेचना।

प्रश्न 7.
अधिक मांग के लिए मौद्रिक नीति का कोई एक उपाय बताओ।
अथवा
स्फीतिक अन्तराल में कमी के लिए मौद्रिक नीति का कोई एक उपकरण बताओ।
उत्तर-
बैंक दर में वृद्धि-बैंक दर में वृद्धि की जाती है ताकि ब्याज की दर बाज़ार में बढ़ जाए तथा लोग कम उधार लें।

प्रश्न 8.
अभावी मांग तथा मौद्रिक नीति का कोई एक उपाय बताओ।
अथवा
अस्फीतिक अन्तर समय मौद्रिक नीति का कोई एक उपकरण बताओ।
उत्तर-
बैंक दर में कमी-अभावी मांग समय बैंक दर में कमी की जाती है।

प्रश्न 9.
नकद रिज़र्व अनुपात (Cash Reserve Ratio) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नकद रिज़र्व अनुपात से अभिप्राय उस राशि से होता है जोकि व्यापारिक बैंकों को अपनी जमा राशि का निश्चित प्रतिशत हिस्सा केन्द्रीय बैंक के पास नकदी के रूप में रखना पड़ता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय

प्रश्न 10.
उधार की सीमान्त शर्ते (Marginal Requirements of Laws) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
उधार की सीमान्त शर्तों का अर्थ है उधार लेने के लिए गिरवी रखी जाने वाली वस्तु का प्रचलित कीमत तथा दिए जाने वाले ऋण की मात्रा का अन्तर होता है।

प्रश्न 11.
सस्ती मुद्रा नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सस्ती मुद्रा नीति वह स्थिति होती है, जिसमें लोगों को कम ब्याज की दर पर आसानी से मुद्रा प्राप्त हो जाती है।

प्रश्न 12.
महंगी मौद्रिक नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
महंगी मौद्रिक नीति वह स्थिति होती है, जिसमें ब्याज की दर अधिक होती है तथा आसानी से ऋण प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस नीति का उद्देश्य लोगों के व्यय को घटाना होता है ताकि मुद्रा स्फीति की समस्या का हल किया जा सके।

प्रश्न 13.
प्रत्यक्ष कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्रत्यक्ष कर वह कर होते हैं जोकि जिन मनुष्यों पर लगाए जाते हैं, उन मनुष्यों को ही कर का भार सहन करना पड़ता है।

प्रश्न 14.
अप्रत्यक्ष कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
अप्रत्यक्ष कर वह कर है जो लगाया एक मनुष्य पर जाता है, परन्तु उसका भार किसी अन्य मनुष्य को सहन करना पड़ता है।

प्रश्न 15.
वह कर जो जिन व्यक्तियों पर लगाए जाते हैं उनको ही कर का भार सहन करना पड़ता है को …………….. कहते हैं।
(क) प्रत्यक्ष कर
(ख) अप्रत्यक्ष कर
(ग) प्रगतिशील कर
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(क) प्रत्यक्ष कर।

प्रश्न 16.
वह कर जो लगाए एक व्यक्ति पर जाते हैं परन्तु कर का भार और व्यक्तियों को सहन करना पड़ता है को ………………… कहते हैं।
(क) प्रत्यक्ष कर
(ख) अप्रत्यक्ष कर
(ग) प्रगतिशील कर
(घ) प्रतिगामी कर।
उत्तर-
(ख) अप्रत्यक्ष कर।

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प्रश्न 17.
व्यापारिक चक्रों की चार अवस्थाएं
(क) खुशहाली,
(ख) सुस्ति,
(ग) मन्दी,
(घ)……. हैं।
उत्तर-
पूर्ण चेतना।

प्रश्न 18.
वह दर जो केंद्रीय बैंक, व्यापारिक बैंकों को उधार देते समय प्राप्त करता है को कहते हैं।
उत्तर-
बैंक दर।

प्रश्न 19.
घाटे की वित्त व्यवस्था से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जब सरकार उदार मुद्रा लेकर अथवा नए नोट छुपा कर सार्वजनिक व्यय करती है तो इस को घाटे की वित्त व्यवस्था कहते हैं।

प्रश्न 20.
किसी व्यापारिक बैंक की जमा राशि का वह न्यूनतम भाग जो केन्द्रीय बैंक के पास जमा रखना पड़ता है को ……………….. कहते हैं।
उत्तर-
न्यूनतम नकद निधि अनुपात।

प्रश्न 21.
वह नीति जिस द्वारा देश की सरकार और केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता लाने के लिए मुद्रा और ब्याज दर को नियंत्रित करते हैं को …………. कहते हैं।
उत्तर-
मौद्रिक नीति।

प्रश्न 22.
निश्चित उद्देश्यों को प्राप्ति करने के लिए आमदन, व्यय और ऋण संबंधी नीति को ……………. कहते हैं।
(क) मौद्रिक नीति
(ख) राजकोषीय नीति
(ग) वित्त नीति
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(ख) राजकोषीय नीति।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय

प्रश्न 23.
मंदीकाल और तेज़ीकाल की स्थिति को व्यापारिक चक्र कहा जाता है।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 24.
देश का केंद्रीय बैंक, व्यापारिक बैंकों को उधार देते समय जो ब्याज की दर प्राप्त करता है उसको बैंक दर कहते हैं।
उत्तर-
सही।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
राजकोषीय नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राजकोषीय नीति से अभिप्राय सरकार की आय तथा व्यय नीति से होता है। यह नीति अधिक मांग तथा अभावी मांग की समस्याओं का हल करने के लिए अपनाई जाती है। इसलिए सरकार के निश्चित उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आमदन (कर) तथा व्यय नीति को राजकोषीय नीति कहा जाता है।

प्रश्न 2.
राजकोषीय नीति के मुख्य औज़ार (Instruments) कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
सरकार की आय के मुख्य औज़ार-
(A) सरकार की आय के मुख्य औज़ार हैं-

  • कर
  • सार्वजनिक ऋण
  • घाटे की वित्त व्यवस्था

(B) सरकार के व्यय से सम्बन्धित औज़ार हैं-

  • सार्वजनिक निर्माण जैसे कि सड़कें, नहरें इत्यादि
  • सार्वजनिक कल्याण (शिक्षा)
  • देश की सुरक्षा तथा अनुशासन
  • आर्थिक सहायता।

प्रश्न 3.
अधिक मांग में कमी के लिए राजकोषीय नीति का प्रयोग कैसे किया जाता है ? कोई दो उपाय बताओ।
अथवा
स्फीतिक अन्तराल को घटाने के लिए कोई दो राजकोषीय उपाय बताओ।
उत्तर-

  1. करों में वृद्धि-सरकार को प्रत्यक्ष कर अधिक लगाने चाहिए इससे देश के नागरिकों की आय तथा खरीद शक्ति कम हो जाती है तथा अधिक मांग अथवा स्फीतिक अन्तराल की समस्या का हल होता है।
  2. सार्वजनिक व्यय में कमी-सरकार को सेहत, शिक्षा तथा आर्थिक सहायता के रूप में दी जाने वाली सहायता तथा कम व्यय करना चाहिए। इससे स्फीतिक अन्तर कम हो जाता है।

प्रश्न 4.
मौद्रिक नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
मौद्रिक नीति वह नीति है, जिसका सम्बन्ध मौद्रिक अधिकारियों द्वारा –
(a) मुद्रा की पूर्ति
(b) ब्याज की दर
(c) मुद्रा की उपलब्धता को प्रभावित करना है अर्थात् मुद्रा नीति से अभिप्राय वह उपाय है जो अर्थव्यवस्था में नकद मुद्रा तथा उधार मुद्रा को नियन्त्रण करते हैं।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय

प्रश्न 5.
मौद्रिक नीति के कोई दो उपायों को स्पष्ट करो।
उत्तर-

  • बैंक दर-बैंक दर वह दर होती है, जिस पर किसी देश का केन्द्रीय बैंक, व्यापारिक बैंकों को उधार देता है। बैंक दर के बढ़ने से ब्याज की दर बढ़ जाती है तथा उधार निर्माण कम हो जाता है।
  • खुले बाजार की नीति-खुले बाज़ार की नीति का अर्थ है बाज़ार में केन्द्रीय बैंक द्वारा प्रतिभूतियों को खरीदना तथा बेचना। जब साख निर्माण करना होता है तो केन्द्रीय बैंक प्रतिभूतियाँ खरीदता है।

प्रश्न 6.
अधिक मांग के लिए मौद्रिक नीति के कोई दो उपाय बताओ।
अथवा
स्फीतिक अन्तराल में कमी के लिए मौद्रिक नीति के कोई दो उपकरण बताओ।
उत्तर-

  1. बैंक दर में वृद्धि-बैंक दर में वृद्धि की जाती है ताकि ब्याज की दर बाज़ार में बढ़ जाए तथा लोग कम उधार लें।
  2. खुले बाज़ार की नीति-खुले बाज़ार में सरकार प्रतिभूतियाँ बेचती है। इसे लोग बैंकों में से पैसे लेकर केन्द्रीय बैंक की प्रतिभूतियाँ खरीद लेते हैं तथा स्फीतिक अन्तर तथा अधिक मांग कम हो जाती है।

प्रश्न 7.
अभावी मांग तथा मौद्रिक नीति के कोई दो उपाय बताओ।
अथवा
अस्फीतिक अन्तर समय मौद्रिक नीति के कोई दो उपकरण बताओ।
उत्तर-

  • बैंक दर में कमी-अभावी मांग समय बैंक दर में कमी की जाती है। ब्याज की दर कम हो जाती है तथा उधार मुद्रा की मांग में वृद्धि होती है।
  • खुले बाज़ार की नीति-केन्द्रीय बैंक खुले बाज़ार में प्रतिभूतियाँ खरीदता है। इससे अर्थव्यवस्था की कार्य शक्ति में वृद्धि होती है।

प्रश्न 8.
नकद रिज़र्व अनुपात (Cash Reserve Ratio) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नकद रिज़र्व अनुपात से अभिप्राय उस राशि से होता है जोकि व्यापारिक बैंकों को अपनी जमा राशि का निश्चित प्रतिशत हिस्सा केन्द्रीय बैंक के पास नकदी के रूप में रखना पड़ता है। नकद रिज़र्व अनुपात देश के केन्द्रीय बैंक द्वारा निश्चित किया जाता है।

III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
व्यापारिक चक्रों से क्या अभिप्राय है ? व्यापारिक चक्रों की मुख्य अवस्थाएं बताओ। ..
अथवा
चक्रीय परिवर्तनों की अवस्थाओं को स्पष्ट करो।
उत्तर-
व्यापारिक चक्र एक अर्थव्यवस्था में अच्छे समय तथा बुरे समय की स्थिति में होता है। अभावी मांग तथा अधिक मांग के परिणामस्वरूप किसी देश में आमदन, उत्पादन तथा रोज़गार में जो उतार-चढ़ाव आते हैं, उनको चक्रीय परिवर्तन अथवा व्यापारिक चक्र कहते हैं। व्यापारिक चक्रों की चार अवस्थाएं होती हैं।

  1. प्रथम अवस्था (खुशहाली)-इस स्थिति में आमदन, रोज़गार, व्यय, बचत, निवेश, लाभ में वृद्धि होती है।
  2. द्वितीय अवस्था (सुस्ती)-कुछ उद्योगों में आय रोज़गार उत्पादन घटता है, जिसका प्रभाव अन्य क्षेत्रों में पड़ता है।
  3. तीसरी अवस्था (मन्दी)-इस स्थिति में आमदन तथा रोज़गार बहुत कम हो जाते हैं तथा बुरी स्थिति होती है।
  4. चौथी अवस्था (पुनः चेतना)-इस स्थिति में रोज़गार बढ़ने लगता है तथा आर्थिक गति में वृद्धि होने लगती है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय 1

प्रश्न 2.
सरकारी क्षेत्र से अर्थव्यवस्था ( अधिक मांग की समस्या) पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
सरकारी क्षेत्र का महत्त्व प्रो० केन्ज़ ने स्पष्ट किया था। जब सरकार व्यय करती है तो इससे अभावी मांग को दूर किया जा सकता है तथा कर लगाकर सरकार अधिक मांग की समस्या का हल करती है। सरकार के योगदान के कारण अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं –

  1. कर (Taxes)-सरकार लोगों पर कर लगाती है। प्रत्यक्ष कर लगाने से लोगों की व्यय योग्य आय कम हो जाती है तथा अप्रत्यक्ष करों से लोगों की खरीद शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार करों में वृद्धि तथा कमी करके सरकार अभावी मांग तथा अधिक मांग की समस्या का हल करती है।
  2. सार्वजनिक व्यय (Public Expenditure)-सरकार द्वारा जो आय प्राप्त की जाती है, इसको लोगों की भलाई पर व्यय किया जाता है। सरकार द्वारा लोक निर्माण कार्यों, सड़कों, नहरों, पुलों इत्यादि पर व्यय किया जाता है तथा सरकार हस्तांतरण भुगतान, बुढ़ापा पैन्शन इत्यादि देती है। इससे लोगों की खरीद शक्ति पर वृद्धि होती है।
  3. सार्वजनिक ऋण (Public Debt)-जब देश में अधिक मांग की स्थिति होती है तो सरकार लोगों से ऋण लेती है। इससे लोगों की खरीद शक्ति कम हो जाती है।
  4. घाटे की वित्त व्यवस्था (Deficit Financing) अभावी मांग के समय सरकार घाटे की वित्त व्यवस्था का प्रयोग करती है। इससे लोगों की मौद्रिक आय में वृद्धि होती है तथा मांग बढ़ जाती है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय

प्रश्न 3.
उधार नियन्त्रण के विभिन्न ढंगों का संक्षेप में वर्णन करो।
अथवा
बैंक दर नीति तथा खुले बाज़ार की नीति उधार की उपलब्धता को कैसे प्रभावित करती है ?
उत्तर-
मौद्रिक नीति वह नीति होती है, जिसमें-

  • मुद्रा की पूर्ति
  • मुद्रा की लागत (ब्याज की दर) तथा
  • मुद्रा की उपलब्धता उधार (नियन्त्रण) द्वारा आवश्यक उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है।

मौद्रिक नीति के मुख्य औज़ार निम्नलिखित अनुसार हैं –

  1. बैंक दर (Bank Rate)-बैंक दर वह दर होती है, जिस पर देश का केन्द्रीय बैंक, व्यापारिक बैंकों को उधार देते समय ब्याज की दर प्राप्त करता है।
  2. खुले बाजार की नीति (Open Market Operations)-इस नीति में देश का केन्द्रीय बैंक खुले बाज़ार में प्रतिभूतियों की खरीद-बेच करता है। जब प्रतिभूतियां बेची जाती हैं तो लोगों के पास पैसा केन्द्रीय बैंक के पास चला जाता है तथा लोगों की खरीद शक्ति कम हो जाती है। व्यापारिक बैंकों की उधार देने की शक्ति भी कम हो जाती है।
  3. नकद रिज़र्व अनुपात (Cash Reserve Ratio)-केन्द्रीय बैंक के आदेश अनुसार व्यापारिक बैंकों को अपने पास जमा राशि का कुछ भाग केन्द्रीय बैंक के पास नकद रखना पड़ता है, जिसको नकद रिज़र्व अनुपात कहते हैं। इसमें वृद्धि करके उधार घटाया जाता है तथा नकद रिज़र्व अनुपात घटाकर उधार बढ़ाया जाता है।
  4. तरलता अनुपात (Liquidity Ratio)-केन्द्रीय बैंक के आदेश अनुसार व्यापारिक बैंकों को जमा राशि का कुछ भाग अपने पास नकद रखना पड़ता है, जिसको तरलता अनुपात कहा जाता है। इसमें वृद्धि करके उधार निर्माण को घटाया जाता है।
  5. सीमान्त आवश्यकता (Marginal Requirement) केन्द्रीय बैंक द्वारा दिए जाने वाले उधार की कटौती निर्धारण की जाती है। ₹ 100 की वस्तु गहने रखकर बैंक ₹ 80 का उधार दे सकते हैं तो 100 – 80 = ₹ 20 अथवा 20% सीमान्त आवश्यकता होगी। इसमें परिवर्तन करके उधार को प्रभावित किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
राजकोषीय नीति से क्या अभिप्राय है ? राजकोषीय नीति में सार्वजनिक व्यय तथा आय द्वारा (i) अधिक मांग (ii) अभावी मांग को कैसे नियन्त्रित किया जाता है ?
उत्तर-
राजकोषीय नीति का अर्थ सरकार की आय तथा व्यय की नीति से होता है। प्रो० डाल्टन के अनुसार, “सरकार के निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए, व्यय तथा उधार सम्बन्धी नीति को राजकोषीय नीति कहते हैं।” इस नीति से अधिक मांग तथा अभावी मांग की स्थिति का हल किया जाता है।
1. अधिक मांग दौरान राजकोषीय नीति-

  • कर नीति-करों में वृद्धि करनी चाहिए ताकि लोगों की मांग में कमी हो सके।
  • व्यय नीति-सरकार को सार्वजनिक कार्यों, भलाई कार्यों तथा हस्तान्तरण भुगतान पर कम व्यय करना चाहिए।
  • घाटे की वित्त व्यवस्था-ऐसे समय घाटे की वित्त व्यवस्था को घटाकर मुद्रा की पूर्ति में कमी करनी चाहिए।
  • ऋण नीति-सरकार को लोगों से उधार लेना चाहिए जिससे मांग में कमी हो जाएगी।

2. अभावी मांग दौरान राजकोषीय नीति –

  • करों में कमी-अभावी मांग (Deficient Demand) समय सरकार को कर घटा देने चाहिए इससे लोगों की मांग में वृद्धि हो जाती है।
  • व्यय में वृद्धि-अभावी मांग समय सरकार को व्यय अधिक करना चाहिए।
  • घाटे की वित्त व्यवस्था-सरकार को घाटे की वित्त व्यवस्था अपनाकर मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि करनी चाहिए।
  • सार्वजनिक ऋण की वापसी-सरकार को ऋण वापस करने चाहिए। इससे मांग में वृद्धि हो जाएगी।

प्रश्न 5.
अधिक मांग से क्या अभिप्राय है ? अधिक मांग को ठीक करने के लिए दो राजकोषीय उपाय बताओ।
उत्तर-
अधिक मांग वह स्थिति होती है, जोकि पूर्ण रोज़गार की स्थिति में कुल पूर्ति से कुल मांग की वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है। इस स्थिति में कुल मांग का स्तर पूर्ण रोज़गार के लिए कुल पूर्ति से अधिक हो जाता है। इस स्थिति को ठीक करने के लिए राजकोषीय नीति के दो उपाय निम्नलिखित अनुसार हैं-

  1. करों में वृद्धि-ऐसे समय जब अधिक मांग की स्थिति होती है, सरकार को करों में वृद्धि करनी चाहिए। नए कर लगाने चाहिए तथा पुराने करों की दर में वृद्धि करनी चाहिए। इसके परिणामस्वरूप देश के लोगों की व्यय योग्य आय कम हो जाएगी तथा मांग में कमी होने से अधिक मांग की समस्या का हल हो जाएगा।
  2. सार्वजनिक व्यय में कमी-सरकार को अधिक मांग की समस्या का हल करने के लिए सार्वजनिक व्यय में कमी करनी चाहिए। इसके परिणामस्वरूप लोगों की आय कम हो जाएगी। लोगों की मांग में कमी होगी।

प्रश्न 6.
अधिक मांग तथा अभावी मांग का हल कैसे किया जाता है ?
उत्तर-
अधिक मांग (Excess Demand)-यह ऐसी स्थिति है जोकि पूर्ण रोज़गार के स्तर पर कुल पूर्ति से अधिक मांग को प्रकट करती है। इस स्थिति का हल इस प्रकार किया जा सकता है-
1. राजकोषीय नीति-

  • सरकार को करों में वृद्धि करनी चाहिए
  • सार्वजनिक व्यय को सार्वजनिक कार्यों तथा हस्तान्तरण भुगतान के रूप में घटा देना चाहिए
  • सार्वजनिक ऋण अधिक लेना चाहिए।

2. मौद्रिक नीति-

  • बैंक दर में वृद्धि करके ब्याज की दर बढ़ानी चाहिए ताकि उधार निर्माण कम हों।
  • खुले बाज़ार में प्रतिभूतियाँ बेचनी चाहिए।
  • नकद रिज़र्व अनुपात में वृद्धि करनी चाहिए।
  • उधार की सीमान्त शतों में वृद्धि करनी चाहिए।

अभावी मांग (Deficient Demand)-यह स्थिति ऐसी होती हैं, जिसमें पूर्ण रोज़गार के स्तर पर कुल पूर्ति से कुल मांग कम होती है। इसका हल इस प्रकार करना चाहिए –
1. राजकोषीय नीति- इसका प्रयोग अधिक मांग के विपरीत करना चाहिए-

  • कर घटाने चाहिए
  • सार्वजनिक व्यय बढ़ाना चाहिए
  • ऋण की वापसी करनी चाहिए।

2. मौद्रिक नीति-

  • बैंक दर घटानी चाहिए
  • खुले बाजार में प्रतिभूतियां खरीदनी चाहिए
  • नकद रिज़र्व अनुपात घटा देना चाहिए
  • उधार की शर्ते नरम करनी चाहिए।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय

प्रश्न 7.
कोई चार उपाय बताओ जिनके द्वारा अभावी मांग की स्थिति को ठीक किया जा सकता है ?
अथवा
अस्फीतिक अन्तर का हल करने के लिए कोई चार उपाय बताओ।
उत्तर-
अभावी मांग वह स्थिति होती है, जिसमें पूर्ण रोज़गार के स्तर पर कुल पूर्ति से कुल मांग कम होती है। इस स्थिति को अस्फीतिक अन्तर कहा जाता है। इसका हल करने के लिए चार उपाय इस प्रकार हैं-

  1. करों में कमी-प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष करों में कमी करनी चाहिए । इससे लोगों की खरीद शक्ति में वृद्धि होगी।
  2. सार्वजनिक व्यय में वृद्धि-सरकार को सार्वजनिक कार्यों पर अधिक व्यय करना चाहिए। सरकार को निवेश में वृद्धि करके रोजगार बढ़ाना चाहिए ।
  3. बैंक दर में कमी-सरकार को बैंक दर घटानी चाहिए। इससे ब्याज़ की दर घट जाती है तथा लोग अधिक उधार लेते हैं। इससे मांग में वृद्धि होती है।
  4. नकद रिज़र्व अनुपात में कमी-केन्द्रीय बैंक को नकद रिज़र्व अनुपात घटा देना चाहिए। इसके परिणामस्वरूप व्यापारिक बैंक, अधिक उधार देने में सफल होते हैं तथा मांग में वृद्धि होती है।

प्रश्न 8.
कोई चार उपाय बताओ, जिसके द्वारा अधिक मांग की समस्या का हल किया जा सकता है ?
अथवा
स्फीतिक अन्तर को हल करने के लिए कोई चार उपाय बताओ।
उत्तर-
अधिक मांग वह स्थिति होती है, जिसमें पूर्ण रोजगार के स्तर पर कुल पूर्ति से कुल मांग अधिक होती है। इस स्थिति को स्फीतिक अन्तर की स्थिति कहा जाता है। इस स्थिति का हल इस प्रकार किया जा सकता है-

  • करों में वृद्धि-सरकार को प्रत्यक्ष कर तथा अप्रत्यक्ष कर बढ़ाने चाहिए।
  • सार्वजनिक व्यय में कमी-सरकार को सार्वजनिक कार्यों सड़कों, नहरों, बिजली इत्यादि पर व्यय कम करना चाहिए।
  • बैंक दर में वृद्धि-केन्द्रीय बैंक व्यापारिक बैंक को उधार देते समय जो ब्याज प्राप्त करता है उसको बैंक दर कहते हैं। इसमें वृद्धि करनी चाहिए।
  • नकद रिज़र्व अनुपात में वृद्धि-केन्द्रीय बैंक को नकद रिज़र्व अनुपात में वृद्धि करनी चाहिए। इससे व्यापारिक बैंक कम उधार दे सकते हैं तथा मांग में कमी हो जाती है।

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न । (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
राजकोषीय नीति से क्या अभिप्राय है ? राजकोषीय नीति के औज़ार बताओ। अभावी मांग तथा अधिक मांग के समय राजकोषीय नीति को स्पष्ट करो।
(What is Fiscal Policy ? Discuss the instruments of Fiscal Policy. Explain Fiscal Policy during deficient and Excess Demand.)
अथवा
राजकोषीय नीति द्वारा अस्फीतिक अन्तर तथा स्फीतिक अन्तर का हल कैसे किया जाता है ?
(How is the problem of Deflationary Gap and the Inflationary Gap be solved with Fiscal Policy ?)
उत्तर-
राजकोषीय नीति का अर्थ (Meaning of Fiscal Policy)-एक देश में निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सरकार की आय, व्यय तथा ऋण सम्बन्धी नीति को राजकोषीय नीति कहा जाता है। इसलिए राजकोषीय नीति सरकार की आय तथा व्यय की नीति होती है, जिस द्वारा अभावी मांग अथवा अधिक मांग की समस्याओं का हल किया जाता है।

राजकोषीय नीति के औज़ार (Instruments of Fiscal Policy)-राजकोषीय नीति के औज़ारों का वर्गीकरण इस प्रकार है-
(A) सरकारी व्यय से सम्बन्धित औज़ार (Instrument related to Government Expenditure)सरकारी व्यय से सम्बन्धित औज़ार हैं

  • सार्वजनिक निर्माण के कार्य जैसे कि सड़कें, नहरें, पुल इत्यादि का निर्माण करवाना।
  • लोक सेवाएं जैसे कि शिक्षा, सेहत, बुढ़ापे में सहायता इत्यादि पर व्यय।
  • उत्पादकों को उत्पादन बढ़ाने के लिए सबसिडी देना।
  • देश की आन्तरिक तथा बाहरी सुरक्षा पर व्यय करना।

(B) सरकारी आय से सम्बन्धित औज़ार (Instruments related to Public Revenue)-इस सम्बन्ध में मुख्य औज़ार निम्नलिखित हैं

  • कर-प्रत्येक देश की सरकार की आय का मुख्य स्रोत कर होते हैं। सरकार प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर लगाती है।
  • उधार-सरकार अपने व्यय को पूरा करने के लिए लोगों से उधार भी लेती है।
  • बजट नीति-सरकार द्वारा व्यय को पूरा करने के लिए घाटे की वित्त व्यवस्था अपनाई जाती है।

अभावी मांग अथवा अस्फीतिक अन्तराल समय राजकोषीय नीति (Fiscal Policy during Deficient Demand or Deflationary Gap)-अभावी मांग तथा अस्फीतिक अन्तराल को ठीक करने के लिए राजकोषीय नीति इस प्रकार की अपनानी चाहिए –

  1. करों में कमी-अभावी मांग अथवा अस्फीतिक अन्तराल को ठीक करने के लिए करों में कमी की जाए तो मांग में वृद्धि होगी तथा अस्फीतिक अन्तराल समाप्त हो जाएगा।
  2. सरकारी व्यय में वृद्धि-सरकार को सार्वजनिक कार्यों पर व्यय बढ़ा देना चाहिए। इससे लोगों की आय में वृद्धि होगी तथा मांग बढ़ जाएगी।
  3. घाटे की वित्त व्यवस्था-सरकार को घाटे की वित्त व्यवस्था अपनानी चाहिए। इससे कुल मांग में वृद्धि होगी।
  4. सार्वजनिक ऋण-सरकार को नया ऋण नहीं लेना चाहिए, बल्कि पुराने ऋण वापस करने चाहिए। इससे मांग में वृद्धि की जा सकती है।

अधिक मांग अथवा स्फीतिक अन्तराल समय राजकोषीय नीति (Fiscal Policy during Excess Demand & Inflationary Gap)-अधिक मांग तथा मुद्रा स्फीति समय सरकार को निम्नलिखित अनुसार राजकोषीय नीति अपनानी चाहिए-

  1. करों में वृद्धि-सरकार को लोगों पर कर अधिक लगाने चाहिए। इससे लोगों की मांग में कमी हो जाएगी।
  2. सरकारी व्यय में कमी-सरकार को मुद्रा स्फीति समय अपना व्यय घटा देना चाहिए।
  3. घाटे की वित्त व्यवस्था में कमी-सरकार को ऐसी स्थिति में घाटे की वित्त व्यवस्था को अपनाना नहीं चाहिए।
  4. सार्वजनिक ऋण-सरकार को लोगों से अधिक ऋण लेना चाहिए ताकि अधिक मांग में कमी आए तथा स्फीतिक अन्तर समाप्त हो सके।

प्रश्न 2.
मौद्रिक नीति से क्या अभिप्राय है ? मौद्रिक नीति के औज़ार बताओ। अभावी मांग तथा अधिक मांग की समस्या को हल करने के लिए मौद्रिक नीति के योगदान को स्पष्ट करो।
(What is Monetary Policy ? Explain the instruments of Monetary Policy. How can Monetary Policy be used during Excess Demand & Deficient Demand ?)
अथवा
मौद्रिक नीति द्वारा अस्फीतिक अन्तराल तथा स्फीति अन्तराल का हल कैसे किया जा सकता है ?
(How can the problem of Deflationary Gap & Inflationary Gap be solved with Monetary Policy ?)
उत्तर-
मौद्रिक नीति का अर्थ (Meaning of Monetary Policy)-मौद्रिक नीति वह नीति होती है, जिस द्वारा एक देश की सरकार केन्द्रीय बैंक द्वारा

  • मुद्रा की पूर्ति
  • मुद्रा की लागत अथवा ब्याज की दर तथा
  • मुद्रा की उपलब्धि द्वारा स्थिरता प्राप्त करने का प्रयत्न करती है।

मौद्रिक नीति के औज़ार (Instruments of Monetary Policy)-मौद्रिक नीति के औज़ारों का वर्गीकरण अग्रलिखित अनुसार किया जा सकता है
(A) मात्रात्मक औजार (Quantitative Instruments) मौद्रिक नीति के मात्रात्मक औज़ार वे औज़ार हैं, जिन के द्वारा उधार मुद्रा को नियन्त्रित किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए केन्द्रीय बैंक निम्नलिखित ढंगों का प्रयोग करता है-
1. बैंक दर (Bank Rate)- बैंक दर वह दर होती है, जोकि केन्द्रीय बैंक द्वारा व्यापारिक बैंकों को उधार देते समय ब्याज की दर प्राप्त की जाती है। बैंक दर बढ़ने से देश में ब्याज दर बढ़ जाती है। इसलिए उधार मुद्रा की मांग कम हो जाती है। जब केन्द्रीय बैंक द्वारा बैंक दर घटा दी जाती है तो बाज़ार में ब्याज की दर कम हो जाएगी तथा उधार मुद्रा विस्तार हो जाता है।

2. खुले बाजार की नीति (Open Market Operations)- उधार मिया के लिए केन्द्रीय बैंक खुले बाज़ार में प्रतिभूतियों (Securities) की खरीद बेच करता है। जब केन्द्रीय प्रतिभूतियाँ बेचता है तो लोग केन्द्र की प्रतिभूतियां खरीद लेते हैं तथा व्यापारिक बैंकों को उधार देन को शक्ति का ही जागो है। अब केन्द्रीय बैंक प्रतिभूतियाँ खरीदने लगता है तो बाज़ार में पैसे चले जाते हैं, इससे ज्यादा का अधिक उधार देने लगते

3. न्यूनतम नकद रिज़र्व अनुपात (Minimum Cash Reserve Ratio)- नाना नकद रिजाव अनुपात वह दर होती है, जो कि व्यापारिक बैंकों को अपनी जमा राशि का कुछ ‘हे ? बैंक के पास नत्र के रूप में रखना आवश्यक होता है। यदि रिज़र्व अनुपात 10% से बढ़ाकर मा. काया जाता है तो व्यापारिक बैंक कम उधार दे सकते हैं। पहले वह ₹ 100 में से ₹ 90 परन्तु अन् मारो

4. तरलता अनुपात (Liquidity Ratio)-प्रत्येक व्यापारिक बैंक को अपनी जमा छ प्रतिशत हिस्सा अपने पास नकदी अथवा प्रतिभूतियों के रूप में रखना अनिवार्य होता है। इसको तरलता अनुपात कहा जाता है। जब केन्द्रीय बैंक तरलता अनुपात में वृद्धि कर देता है तो उधार मुद्रा का कम निर्माण होता है।

(B) गुणात्मक औज़ार (Quantitative Instruments)-यह औज़ार विशेष प्रकार के उधार को नियंत्रित करते हैं
1. सीमान्त आवश्यकता (Marginal Requirements)-जब उधार लेते समय किसी वस्तु को गिरवी रखा
जाता है, उसको गिरवी रखकर कितना उधार दिया जाता है। इसके अन्तर को सीमान्त आवश्यकता कहा जाता है, जैसे कि ₹ 100 की वस्तु गिरवी रखकर ₹ 80 का उधार प्राप्त हुआ तो उधार की सीमान्त आवश्यकता 20% है। इसमें वृद्धि करके उधार घटाया जा सकता है।

2. उधार का राशन (Rationing of Credit) केन्द्रीय बैंक स्टेट के लिए उधार दी जाने वाली राशि का कोटा निर्धारण कर देता है, इसको उधार का राशन कहा जाता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 13 अभावी तथा अधिक मांग को ठीक करने के लिए उपाय

3. नैतिक दबाव (Moral Pressure) केन्द्रीय बैंक व्यापारिक बैंकों पर दबाव डालकर अधिक अथवा कम देने के लिए निवेदन करता है जोकि व्यापारिक बैंकों के लिए आदेश होता है।

अस्फीतिक अन्तर अथवा अभावी मांग के लिए मौद्रिक नीति (Monetary Policy for Deficient Demand or Deflationary Gap)-अभावी मांग अथवा अस्फीतिक अन्तराल समय निम्नलिखित अनुसार मौद्रिक नीति अपनाई जाती है-

  • बैंक दर घटा दी जाती है। इससे ब्याज की दर कम हो जाती है तथा उधार निर्माण में वृद्धि होती है।
  • खुले बाज़ार में केन्द्रीय बैंक प्रतिभूतियों की खरीद करता है। लोगों की खरीद शक्ति में वृद्धि होती है।
  • नकद रिज़र्व अनुपात को घटा दिया जाता है, इससे व्यापारिक बैंक अधिक उधार देने लगते हैं।
  • तरलता अनुपात को घटाया जाता है, व्यापारिक बैंक की उधार देने की शक्ति बढ़ जाती है।
  • उधार की सीमान्त शर्ते नर्म की जाती हैं।
  • उधार अधिक देने के लिए नैतिक प्रभाव का प्रयोग किया जाता है।

इस नीति को सस्ती मौद्रिक नीति (Cheap Monetary Policy) कहा जाता है। स्फीतिक अन्तराल अथवा अधिक मांग के लिए मौद्रिक नीति (Monetary Policy for Excess Demand or Inflationary Gap)-मुद्रा स्फीति अथवा अधिक मांग के समय निम्नलिखित मौद्रिक नीति अपनाई जाती है-

  • बैंक दर बढ़ा दी जाती है। इससे ब्याज की दर बढ़ जाती है।
  • खुले बाज़ार में केन्द्रीय बैंक प्रतिभूतियों को बेचने लगता है।
  • नकद रिज़र्व अनुपात में वृद्धि की जाती है। व्यापारिक बैंक कम उधार दे सकते हैं।
  • तरलता अनुपात में वृद्धि की जाती है। बैंक कम उधार देने लगते हैं।
  • सीमान्त शर्ते सख्त की जाती हैं।
  • उधार का राशन किया जाता है। इस नीति को महंगी मौद्रिक नीति (Dear Monetary Policy) कहा जाता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक

Punjab State Board PSEB 12th Class Economics Book Solutions Chapter 11 निवेश गुणक Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Economics Chapter 11 निवेश गुणक

PSEB 12th Class Economics निवेश गुणक Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
गुणक से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
निवेश में वृद्धि करने से राष्ट्रीय आय में वृद्धि जितने गुणा हो जाती है, उसको गुणक कहते हैं। जैसे कि निवेश में 10 करोड़ रु० की वृद्धि करने से राष्ट्रीय आय में ₹ 30 करोड़ की वृद्धि हो जाती है तो गुणक का आकार इस प्रकार होगा
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक 1

प्रश्न 2.
निवेश गुणक का सूत्र बताएँ।
उत्तर-
निवेश गुणक का सूत्र निम्नलिखित अनुसार है-
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक 2
उदाहरण के लिए निवेश 2 करोड़ करने से राष्ट्रीय आय में वृद्धि ₹ 4 करोड़ हो जाती है तो गुणक इस प्रकार होगा
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक 3

प्रश्न 3.
गुणक तथा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति का सम्बन्ध बताएँ।
उत्तर-
गुणक तथा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति का सम्बन्ध इस प्रकार प्रकट किया जा सकता है-
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}\)
यदि MPC = \(\frac{1}{2}\) है गुणक का आकार इस प्रक
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-\frac{1}{2}}=\frac{1}{\frac{1}{2}}=\frac{1 \times 2}{1}\) = 2

प्रश्न 4. गुणक (K) = ——- .
उत्तर-
गुणक K = \(\frac{\Delta \mathrm{y}}{\Delta \mathrm{I}}\)|

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक

प्रश्न 5. यदि MPC = \(\frac{1}{2}\) है तो गुणक का आकार ज्ञात करें।
उत्तर-
K = \(=\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-\frac{1}{2}}=\frac{\frac{1}{1}}{2}=\frac{1 \times 2}{1}\) = 2

प्रश्न 6.
गुणक दोधारी तलवार है जो राष्ट्रीय आय में तेज़ी से वृद्धि करती है अथवा कमी करती है ।
उत्तर-
सही।

प्रश्न 7.
यदि MPC = 1 है तो गुणक का आकार ———– होगा।
उत्तर-
(a) शुन्य (0)
(b) 1
(c) अनंत
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(c) अनंत।

प्रश्न 8.
यदि राष्ट्रीय आय में वृद्धि 4 करोड़ रुपये और निवेश में वृद्धि 2 करोड़ रुपये है तो गुणक ज्ञात करें।
उत्तर-
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक 4

प्रश्न 9.
यदि MPS = \(\frac{1}{4}\) है गुणक का आकार ज्ञात करें।
उत्तर-
K = \(\frac{1}{\mathrm{MPS}}=\frac{1}{\frac{1}{4}}=\frac{1 \times 4}{1}=4\)

प्रश्न 10.
जितनी सीमान्त बचत प्रवृत्ति (MPS) कम होगी गुणक का प्रभाव उतना ही कम होता है।
उत्तर-
गलत।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
गुणक से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
निवेश में वृद्धि करने से राष्ट्रीय आय में वृद्धि जितने गुणा हो जाती है, उसको गुणक कहते हैं। जैसे कि निवेश में ₹ 10 करोड़ की वृद्धि करने से राष्ट्रीय आय में ₹ 30 करोड़ की वृद्धि हो जाती है तो गुणक का आकार इस प्रकार होगा –
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक 5

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक

प्रश्न 2.
निवेश गुणक का सूत्र बताएँ। ‘
उत्तर-
निवेश गुणक का सूत्र निम्नलिखित अनुसार है –
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक 6
उदाहरण के लिए निवेश 2 करोड़ करने से राष्ट्रीय आय में वृद्धि ₹ 4 करोड़ हो जाती है तो गुणक इस प्रकार होगा
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक 7

प्रश्न 3.
गुणक तथा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति का सम्बन्ध बताएँ।
उत्तर-
गुणक तथा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति का सम्बन्ध इस प्रकार प्रकट किया जा सकता है-
K = \(\frac{1}{1-M P C}\)
यदि MPC = \(\frac{1}{2}\) है तो गुणक का आकार इस प्रकार होगा
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-\frac{1}{2}}=\frac{1}{\frac{1}{2}}=\frac{1 \times 2}{1}=2\)

III. लघु उत्तरीय प्रश्न | (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
गुणक की धारणा को स्पष्ट करो। यह सीमान्त बचत प्रवृत्ति से कैसे सम्बन्धित है ?
अथवा
गुणक से क्या अभिप्राय है ? गुणक तथा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति के सम्बन्ध को स्पष्ट करो।
उत्तर-
निवेश गुणक का अर्थ है, निवेश में वृद्धि से राष्ट्रीय आय में वृद्धि की अनुपात (The rate of change in Income due to change in investment)
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}=\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{\mathrm{MPC}}\)
इसमें K =गुणक, ΔY = आय में परिवर्तन, ΔI = निवेश में परिवर्तन, MPC = सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति, MPS = सीमान्त बचत प्रवृत्ति
Example : यदि ΔI = 100 करोड़, MPC = \(\frac{3}{4}\) , MPS = 1- \(\frac{3}{4}\) = \(\frac{1}{4}\)= तो राष्ट्रीय आय में वृद्धि को स्पष्ट करो।

K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-\frac{3}{4}}=\frac{1}{\frac{1}{4}}=\frac{1 \times 4}{1}=4\)
अथवा
K = \(\frac{1}{\mathrm{MPS}}=\frac{1}{\frac{1}{4}}=\frac{1 \times 4}{1}=4\)
यदि हमें MPC अथवा MPS का पता हो तो गुणक का आकार माप सकते हैं
∴ K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\) अथवा K. ΔI = ΔY = 4 x 10 = 40 करोड़ रुपए।

(i) स्पष्ट है कि MPC का पता हो तो K का आकार माप सकते हैं। जितनी MPC अधिक होगी, गुणक का आकार उतना बड़ा होगा। K तथा MPC का सीधा सम्बन्ध होता है।
(ii) MPS जितनी अधिक होगी गुणक का आकार उतना कम होगा अर्थात् K तथा MPS का विपरीत सम्बन्ध होता है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक

प्रश्न 2.
एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करो कि निवेश वृद्धि आय स्तर में वृद्धि को कैसे प्रभावित करती है ?
उत्तर-
किसी अर्थव्यवस्था में निवेश की वृद्धि महत्त्वपूर्ण होती है, जिससे राष्ट्रीय आय में वृद्धि कई गुणा अधिक हो जाती है। इसका कारण गुणक की धारणा का लागू होना होता है। गुणक की धारणा अधिक हो तो राष्ट्रीय आय में वृद्धि अधिक होगी। परन्तु गुणक की धारणा स्वयं सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति पर निर्भर करती है। यदि सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति (MPC) अधिक होती है तो गुणक का प्रभाव अधिक होगा। मान लो एक देश में सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति MPC = \(\frac{1}{2}\) = 0.5 है तथा निवेश में वृद्धि 100 करोड़ रुपये की जाती है। निवेश की वृद्धि राष्ट्रीय आय में कितनी वृद्धि करेगी, इसको निम्नलिखित अनुसार स्पष्ट करते हैं-
K = \(\frac{\Delta Y}{\Delta I}=K \times \Delta I=\Delta Y\)
अथवा
ΔY= \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}} \times \Delta \mathrm{I}\) (∵ K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}} \))
ΔY = \(\frac{1}{1-0.5} \times 100=\frac{1}{\frac{1}{2}} \times 100\)
100 x 2 = ₹ 200 करोड़ उत्तर
निवेश की वृद्धि से राष्ट्रीय आय में वृद्धि गुणक के आकार अनुसार हो जाती है।

प्रश्न 3.
एक अर्थव्यवस्था में निवेश व्यय में ₹ 1000 करोड़ की वृद्धि की जाती है। यदि MPC = 0.75 है तो आय तथा बचत में वृद्धि का पता करो।
उत्तर –
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.75}=\frac{1}{0.25}=\frac{1}{\frac{25}{100}}=\frac{1 \times 100}{25}\) = 4
K = \(\frac{\Delta Y}{\Delta I}\)
ΔY = K. ΔI
= 4 x 1000 = 4000 करोड़

MPS = 1 – MPC
= 1 – 0.75 = 0.25
बचत में वृद्धि = AY x MPS
= 4000 x 0.25 = ₹ 1000 करोड़ उत्तर

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
निवेश गुणक की परिभाषा दीजिए। इसका सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति से क्या सम्बन्ध है ? निवेश गुणक की कार्यकुशलता को स्पष्ट करो।।
(What is Multiplier ? How is it related to MPC ? Explain the working of Investment multiplier.)
उत्तर-
निवेश गुणक का अर्थ (Meaning of Multiplier)-इस धारणा का अर्थशास्त्र में केन्ज़ ने प्रयोग किया। निवेश गुणक की धारणा निवेश में परिवर्तन होने से आय में होने वाले परिवर्तन के सम्बन्ध को प्रकट करती है। जब निवेश में वृद्धि की जाती है तो राष्ट्रीय आय में वृद्धि जितने गुणा हो जाती है, उसको निवेश गुणक कहा जाता है। (The rate of change in Income due to change in investment is called Multiplier) इसका अनुमान इस प्रकार लगाया जाता है-
Κ. ΔΙ = ΔΥ
अथवा
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\)
इसमें K = गुणक, ΔY = आय में परिवर्तन, ΔI = निवेश में परिवर्तन। उदाहरणस्वरूप सरकार द्वारा 50 करोड़ रु० निवेश किया जाता है। इससे राष्ट्रीय आय में वृद्धि 100 करोड़ रु० हो जाती है तो
K = \(\frac{\Delta Y}{\Delta I}=\frac{100}{50}\) = 2

गुणक तथा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति का सम्बन्ध (Relationship between K and M.P.C.)-गुणक का मूल्य सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति द्वारा निर्धारण होता है। सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति जितनी अधिक होगी, गुणक का आकार उतना ही बड़ा होता है तथा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति जितनी कम होगी, गुणक का आकार उतना कम होगा। इनके सम्बन्ध को एक समीकरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\)
अथवा
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{Y}-\Delta \mathrm{C}}\)
[∵ Y = C+S
ΔY = ΔC + ΔS
ΔS = ΔI
∴ ΔY = ΔC+ΔI
ΔY – ΔC = ΔI]

दाईं ओर की समीकरण को ΔY से विभाजित करने से
K = \(\frac{\Delta Y / \Delta Y}{\Delta Y / \Delta Y-\Delta C / \Delta Y}=\frac{1}{1-\Delta C / \Delta Y}=\frac{1}{1-M P C}\)
अथवा
K= \(\frac{1}{\text { MPS }}\)
∵ (MPS = 1 – MPC)

उदाहरणस्वरूप-

  • यदि MPC शून्य है- यदि MPC शून्य है तो MPS = 1 होगी तथा गुणक का आकार इकाई के समान होगा अथवा आय में वृद्धि निवेश से एक गुणा होगी।
  • यदि MPC एक है- यदि MPC एक के समान है तो आय में वृद्धि बहुत अधिक गुणा होगी। परन्तु MPC न तो शून्य होती है तथा न ही एक के समान होती है। यह 0 से अधिक तथा 1 से कम होती है।
  • यदि MPC शून्य से अधिक तथा एक से कम है-MPC जितनी अधिक होगी, गुणक का आकार उतना अधिक होता है।

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MPC = \(\frac{1}{2} \) = तो K = 2, MPC =\(\frac{9}{10} \) तो K = 10.
गुणक की कार्यकुशलता (Working of Multiplier)-गुणक की कार्यकुशलता को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैंयदि
Y = ₹ 100 करोड़, Y1 = ₹ 200 करोड़, I = ₹ 10 करोड़,
I1 = ₹ 30 करोड़ तो गुणक का पता करो।
K = \(\frac{\Delta Y}{\Delta I}=\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{\mathrm{MPS}}\)
ΔY = (Y1 – Y) = 200 – 100 = 100
ΔI = (I1 – I) = 30 -10 = 20
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}=\frac{100}{20}\) = 5

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक

जितनी अधिक होगी, गुणक का आकार उतना अधिक होगा। MPC जब अधिक होगी तो MPS कम होती है। इसलिए MPS तथा गुणक का विपरीत सम्बन्ध होता है। जब सीमान्त बचत प्रवृत्ति (MPS) कम होती है तो गुणक का प्रभाव अधिक होता है। रेखाचित्र 1 अनुसार मौलिक सन्तुलन E बिन्दु पर है तथा राष्ट्रीय आय OY है। निवेश में वृद्धि ΔI होने से राष्ट्रीय अन्य OY से बढ़कर OY1 हो जाती है। इस प्रकार राष्ट्रीय आय में वृद्धि YY1 है इसे गुणक की Forward Working कहते हैं। यदि निवेश ΔI कम हो जाता है तो राष्ट्रीय आय YY2 कम हो जाती है इसे गुणक की Backward working कहते हैं।
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V. संरख्यात्मक प्रश्न (Numericals)

प्रश्न 1.
यदि गुणक का मूल्य 3 है और एक अर्थव्यवस्था में ₹ 100 करोड़ का निवेश किया जाए तो राष्ट्रीय आय में वृद्धि कितनी होगी ?
उत्तर-
गुणक के सूत्र अनुसार
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\)
3 = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{100}\) = 3 × 100 = ΔY
∴ ΔY = ₹ 300 करोड़ उत्तर

प्रश्न 2.
गुणक तथा सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति के सम्बन्ध को स्पष्ट करो।
उत्तर-
गुणक का मूल्य, सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। इनका आपस में सीधा सम्बन्ध होता है।
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}\)
यदि
MPC = \(\frac{1}{2}\) तो K = \(\frac{1}{1-\frac{1}{2}}=\frac{1}{\frac{1}{2}}=\frac{1 \times 2}{1}=2\)
MPC = \(\frac{4}{5}\) तो K = \(\frac{1}{1-\frac{4}{5}}=\frac{1}{\frac{1}{5}}=\frac{1 \times 5}{1} \) = 5

स्पष्ट है कि MPC जितनी अधिक होती है, गुणक का आकार उतना ही बड़ा होता है। MPC जितनी कम होती है, गुणक का मूल्य उतना कम होता है।

प्रश्न 3.
गुणक तथा सीमान्त बचत प्रवृत्ति के सम्बन्ध को स्पष्ट करो।
उत्तर-
गुणक तथा सीमान्त बचत प्रवृत्ति का सम्बन्ध विपरीत होता है-
K = \(\frac{1}{\text { MPS }}\)
यदि
MPS = \(\frac{1}{3}\) तो K = \(\frac{1}{\frac{1}{3}}=\frac{1 \times 3}{1}\) = 3
यदि MPS = \(\frac{1}{10}\) तो K = \(\frac{1}{\frac{1}{10}}=\frac{1 \times 10}{1}\) = 10
स्पष्ट है कि सीमान्त बचत प्रवृत्ति जितनी कम होती है गुणक का आकार उतना अधिक होता है तथा सीमान्त बचत प्रवृत्ति (MPS) जितनी अधिक होती है, गुणक का आकार उतना कम होता है। इनका परस्पर में विपरीत सम्बन्ध होता है।

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प्रश्न 4.
यदि सीमान्त बचत प्रवृत्ति 0.25 है तो गुणक का आकार (मूल्य ) क्या होगा ?
उत्तर –
K = \(\frac{1}{\text { MPS }}\)
= \(\frac{1}{0.25}=\frac{1}{\frac{25}{100}}=\frac{1 \times 100}{25}\) = 4 उत्तर

प्रश्न 5.
यदि एक अर्थव्यवस्था में निवेश में वृद्धि ₹ 10 करोड़ होती है तथा परिणामस्वरूप आय में वृद्धि ₹ 50 करोड़ हो जाती है। गुणक का मूल्य क्या होगा ?
उत्तर-
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 11 निवेश गुणक 10

प्रश्न 6.
यदि MPC = 0.8 है, निवेश में परिवर्तन ₹ 1000 है तो आय में परिवर्तन का पता करो।
उत्तर-
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.8}=\frac{1}{0.2}=\frac{1}{\frac{2}{10}}=\frac{1 \times 10}{2}=5\)
आय में परिवर्तन Κ X ΔΙ
= 5 x 1000
= ₹ 5000 उत्तर

प्रश्न 7.
यदि एक अर्थव्यवस्था में निवेश में वृद्धि ₹ 10,000 है, परिणामस्वरूप आय में वृद्धि ₹ 40,000 है तो सीमान्त बचत प्रवृत्ति (MPS) ज्ञात करो।
उत्तर
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}=\frac{40,000}{10,000} \) = 4
अथवा
K = \(\frac{1}{\text { MPS }}\) अथवा MPS = \(\frac{1}{K}=\frac{1}{4}\)
सीमान्त बचत प्रवृत्ति (MPS) = \(\frac{1}{4}\) or 0.25 उत्तर

प्रश्न 8.
यदि MPC = 0.75 है तो गुणक का मूल्य बताओ।
उत्तर –
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.75}=\frac{1}{0.25}=\frac{1}{\frac{25}{100}}=\frac{1 \times 100}{25}\) = 4
= \(1 \times \frac{100}{25}\) = 4

प्रश्न 9.
यदि एक अर्थव्यवस्था में MPC = 0.75 है, निवेश व्यय में वृद्धि ₹ 500 करोड़ होती है। कुल आय में वृद्धि बताओ तथा उपभोग व्यय ज्ञात करो।
उत्तर
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.75} \frac{1}{0.25}=\frac{1}{\frac{25}{100}}\) = 4
आय में वृद्धि = ΔI x K
= 500 x 4 = ₹ 2000 करोड़
उपभोग व्यय = 2000 x 0.75 = ₹ 1500 करोड़ उत्तर

प्रश्न 10.
निवेश में ₹ 20 करोड़ की वृद्धि के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आय में वृद्धि ₹ 100 करोड़ हो जाती है। MPC ज्ञात करो।
उत्तर
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}=\frac{100}{20}\) = 5
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}\)
5 = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}\)
5 (1 – MPC) = 1
5 – 5 MPC = 1
5 – 1 = 5 MPC
4 = 5MPC
MPC = \(\frac{4}{5}\) = 0.8 उत्तर

प्रश्न 11.
एक अर्थव्यवस्था में सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति 0.8 है। ₹ 500 करोड़ की निवेश में वृद्धि की जाती है। उपभोग व्यय तथा आय में कुल वृद्धि की गणना करें।
उत्तर-
K= \(\frac{1\cdot}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.8}=\frac{1}{0.2}=\frac{1}{\frac{2}{10}}=\frac{10}{12}=5\)
K = \(\frac{\Delta y}{\Delta \mathrm{I}}\)
∴ 5 = \(\frac{\Delta y}{500}\)
ΔΙx K
आय में वृद्धि (Δy) = 500 x 5 = ₹ 2500 करोड़
उपभोग में वृद्धि (ΔC) = Δy x MPC
= 2500 x 0.8
= 2500 x \(\frac{8}{10}\) = ₹ 2000 करोड उत्तर

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प्रश्न 12.
एक अर्थव्यवस्था में वास्तविक आय ₹ 500 करोड़ है, जबकि पूर्ण रोज़गार पर राष्ट्रीय आय ₹ 800 करोड़ है। यदि MPC = 0.75 है तो कितना निवेश बढ़ाया जाए कि पूर्ण रोज़गार की स्थिति प्राप्त हो जाए ?
उत्तर-
वास्तविक आय = ₹ 500 करोड़
पूर्ण रोज़गार पर आय = ₹ 800 करोड़
आय में अनिवार्य वृद्धि = 800 – 500 = ₹ 300 करोड़
M.P.C. = 0.75
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.75}=\frac{1}{0.25}=\frac{1}{\frac{25}{100}}=\frac{1 \times 100}{25}\) =4
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\) अथवा ΔI = \(\frac{\Delta Y}{K}=\frac{300}{4}\) = ₹ 75 करोड़ उत्तर।

प्रश्न 13.
यदि सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति 0.75 है। निवेश खर्च में वृद्धि 500 करोड़ रुपये की जाती है। आमदन और उपभोग में वृद्धि का माप करो ।
उत्तर-
सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति (MPC) = 0.75. ΔI = ₹ 500 करोड़
गुणक
= \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.75}=\frac{1}{0.25}=\frac{1}{\frac{25}{100}}=\frac{100}{25}\)
= 4
(i) आमदन में वृद्धि
K = \(\frac{\Delta Y}{\Delta I}\), K × ΔI = ΔY
ΔΥ = 4 × 500 = ₹ 2000 करोड़

(ii) उपभोग खर्च में वृद्धि = MPC ×ΔY = 0.75 × 2000 = ₹ 1500 करोड़ उत्तर

प्रश्न 14.
यदि एक अर्थव्यवस्था में निवेश खर्च की वृद्धि ₹ 700 करोड़ है। सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति 0.9 है। आमदन और उपभोग खर्च में वृद्धि ज्ञात करें।
उत्तर –
ΔI = ₹ 700 करोड़, MPC = 0.9
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.9}=\frac{1}{.1}\) = 10
(i) आमदन में वृद्धि = KΔI = 10 x 700 = ₹ 7000 करोड़
(ii) उपभोग खर्च में वृद्धि = ΔY x MPC = 7000 x 0.9 = ₹ 6300 करोड़ उत्तर

प्रश्न 15.
यदि एक अर्थव्यवस्था में निवेश की वृद्धि ₹ 600 करोड़ है। सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति 0.6 है। आमदन में वृद्धि और उपभोग खर्च में वृद्धि ज्ञात करें।
उत्तर-
ΔI = 600, MPC = 0.6
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.6}=\frac{1}{0.4}=\frac{\frac{1}{4}}{\frac{4}{10}}=\frac{10}{4} \) = 2.5
(i) आमदन में वृद्धि (ΔY) = K x ΔI = 2.5 x 600 = ₹ 1500 करोड़
(ii) उपभोग में वृद्धि (ΔC) = ΔY x MPC = 1500 x 0.6 = ₹ 900 करोड़ उत्तर

प्रश्न 16.
यदि MPC = 0 है तो गुणक पता करें।
उत्तर –
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0}=\frac{1}{1}\) = 1 उत्तर

प्रश्न 17.
यदि MPS = 0 है तो गुणक का आकार बताओ।
उत्तर-
MPC = 1 – MPS = 1 – 0 = 1
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-1}=\frac{1}{0}\) = ∞(Infinity)
K = \(\frac{1}{\mathrm{MPS}}=\frac{1}{0}\) = ∞ (Infinity)

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प्रश्न 18.
यदि गुणक 5 है तो सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति और सीमान्त बचत प्रवृत्ति ज्ञात करें।
उत्तर-
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPS}}\) = 5 = \(\frac{1}{\mathrm{MPS}}\)
∴ MPS = \(\frac{1}{5}\) = 0.2
और MPC = 1 – MPS = 1 – 0.2 = 0.8 उत्तर

प्रश्न 19.
यदि MPS = 0.2 है और राष्ट्रीय आमदन में वृद्धि ₹ 100 करोड़ करनी हो तो निवेश में वृद्धि कितनी करनी चाहिए ?
उत्तर –
K = \(\frac{1}{\mathrm{MPS}}=\frac{1}{0.2}=\frac{\frac{1}{2}}{\frac{10}{10}}=\frac{10}{2}\) = 5
और
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\) = K x ΔI = ΔY = 5 x ΔI = 100
ΔI = \(\frac{100}{5}\) = ₹ 20 करोड़ उत्तर

प्रश्न 20.
यदि MPC = 0.75 है और राष्ट्रीय आमदन में वृद्धि ₹ 2000 करोड़ करनी हो तो कितना निवेश करने की ज़रूरत है ?
उत्तर-
K=\(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{\Delta\mathrm{Y}}=\frac{1}{1-0.75}=\frac{\frac{1}{25}}{\frac{25}{100}}=\frac{100}{25} \)
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\) या KΔI = ΔY
= 4 x ΔI = 2000 = ΔI = \(\frac{2000}{4}\) = ₹ 500 करोड़ उत्तर

प्रश्न 21.
एक अर्थव्यवस्था में ₹ 200 करोड़ का अतिरिक्त निवेश होने पर यदि सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति (MPC) = \(\frac{1}{2}\) हो तो कितनी अतिरिक्त आय का सृजन होगा ?
उत्तर-
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-\frac{1}{2}}=\frac{1}{\frac{1}{2}}=\frac{1 \times 2}{1}=2 \)
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\)
2 = \(\frac{\Delta Y}{200}\) = 400 = BY
ΔY = ₹400 करोड़ उत्तर

प्रश्न 22.
एक अर्थव्यवस्था में सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति 0.75 है। यदि निवेश में ₹ 500 करोड़ की वृद्धि की जाए तो आय में कितनी वृद्धि होगी ?
उत्तर-
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.75}=\frac{1}{0.25}=\frac{1}{\frac{25}{100}}=\frac{1 \times 100}{25}\) = 4
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\) = 4
= \(\frac{\Delta Y}{500}\) = 4 x 500 = ΔY
ΔY = ₹ 2000 करोड़ उत्तर

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प्रश्न 23.
एक अर्थव्यवस्था में सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति 0.95 है। निवेश में ₹ 100 करोड़ की वृद्धि होने पर आय में वृद्धि ज्ञात कीजिए।
उत्तर-
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.95}=\frac{1}{0.05}=\frac{1}{\frac{5}{100}}=\frac{1 \times 100}{5}\) = 20
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\)
= 20 = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{100}\) = 20 x 100 ΔY
∴ ΔY = ₹ 2000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 24.
यदि एक अर्थव्यवस्था में सीमान्त उपभोग प्रवत्ति \( \frac{3}{4}\) में है और निवेश में ₹ 500 करोड़ की वृद्धि की जाती है तो आय में वृद्धि ज्ञात करो।
उत्तर –
दिया है MPC = \( \frac{3}{4}\)
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-\frac{3}{4}}=\frac{1}{\frac{1}{4}}=\frac{1 \times 4}{1}\) = 4
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\) = 4 = \(\frac{\Delta Y}{500}\)
ΔY = 500 x 4 = ₹ 2000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 25.
गुणक ज्ञात करें जब MPS = 0.4 है ।
उत्तर-
K = \(\frac{1}{\text { MPS }}=\frac{1}{0.4}=\frac{1}{\frac{0.4}{10}}=\frac{1 \times 10}{1}\) = 2.5 उत्तर

प्रश्न 26.
गुणक ज्ञात करें जब MPS = 0.5 है ।
उत्तर-
K = \(\frac{1}{\text { MPS }}=\frac{1}{0.5}=\frac{1}{\frac{0.5}{10}}=\frac{1}{\frac{1}{2}}=\frac{1 \times 2}{1}=2 \) उत्तर

प्रश्न 27.
गुणक ज्ञात करें जब MPS = 0.8 है ।
उत्तर –
K = \(\frac{1}{\mathrm{MPS}}=\frac{1}{0.8}=\frac{1}{\frac{8}{10}}=\frac{1 \times 10}{8}\) = 1.25

प्रश्न 28.
एक अर्थव्यवस्था में निवेश ₹ 300 करोड़ की वृद्धि होती है यदि सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति 0.6 है तो आय तथा उपभोग में वृद्धि कर ज्ञात करें।
उत्तर-
निवेश में वृद्धि (Δ I) = ₹ 300 करोड़
सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति (MPC = 0.6)
गुणक = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.6}=\frac{1}{0.4}=\frac{10}{4}\) = 2.5

गुणाक के सूत्र अनुसार-
K = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{\Delta \mathrm{I}}\)
= 2.5 = \(\frac{\Delta Y}{300}\)
= 750 = (ΔY)
आय में वृद्धि (ΔY) = ₹ 750 करोड़ उत्तर
उपभोग व्यय में वृद्धि (Δ C)ΔY x MPC = 750 x 0.6 = ₹ 450 करोड़ उत्तर

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प्रश्न 29.
एक अर्थव्यवस्था में निवेश में वृद्धि ₹ 900 करोड़ की होती है यदि सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति 0.6 है तो राष्ट्रीय आय तथा उपभोग व्यय में वृद्धि ज्ञात करें।
उत्तर-
निवेश में वृद्धि (ΔI) = ₹ 900 करोड़
सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति (MPC) = 0.6
K = \(\frac{1}{1-\mathrm{MPC}}=\frac{1}{1-0.6}=\frac{1}{0.4}=\frac{10}{4}\) = 2.5

गुणक के सुत्र अनुसार
K = \(\frac{\Delta Y}{\Delta I}\)
2.5 = \(\frac{\Delta \mathrm{Y}}{900}\)
= 2.5 x 900 = AY
2250 = ΔY
आय में वृद्धि ΔY = ₹ 250 करोड़
उपभोग व्यय में वृद्धि (ΔC) = ΔY x MPC
= 2250 x 0.6
= ₹ 1350 करोड़ उत्तर

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 14 सरकारी बजट तथा अर्थव्यवस्था

Punjab State Board PSEB 12th Class Economics Book Solutions Chapter 14 सरकारी बजट तथा अर्थव्यवस्था Textbook Exercise Questions, and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Economics Chapter 14 सरकारी बजट तथा अर्थव्यवस्था

PSEB 12th Class Economics सरकारी बजट तथा अर्थव्यवस्था Textbook Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
बजट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
बजट एक वित्तीय वर्ष दौरान सरकार की अनुमानित आय तथा अनुमानित व्यय का विवरण होता है।

प्रश्न 2.
बजट के कोई दो उद्देश्य बताओ।
उत्तर-

  • संसाधनों का पुनः वितरण
  • आय तथा धन का समान वितरण।

प्रश्न 3.
बजट के मुख्य अंश बताओ।
अथवा
राजस्व बजट तथा पूंजीगत बजट में अन्तर बताओ।
उत्तर-
बजट के मुख्य दो अंश होते हैं-

  1. राजस्व बजट-इसमें आय प्राप्तियां तथा आय व्यय को शामिल किया जाता है, जोकि सरकार को भिन्न-भिन्न स्रोतों से प्राप्त होती है।
  2. पूंजीगत बजट-इसमें पूंजीगत प्राप्तियां तथा पूंजीगत व्यय का विवरण होता है।

प्रश्न 4.
आय मदें क्या हैं ?
उत्तर-
आय मदों से अभिप्राय सरकार को प्राप्त होने वाली सब साधनों से आय से होता है।

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प्रश्न 5.
सरकारी आय के मुख्य अंश बताओ।
उत्तर-
सरकारी आय के मुख्य दो अंश होते हैं

  • कर प्राप्तियां
  • गैर-कर प्राप्तियां।

प्रश्न 6.
कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
कर एक कानूनो भुगतान है जोकि एक देश के निवासी सरकार को अदा करते हैं ताकि सरकार संयुक्त उद्देश्यों की पूर्ति कर सके।

प्रश्न 7.
कर आय को परिभाषित करो।
उत्तर-
कर आय- कर आय एक अनिवार्य भुगतान होता है, जोकि एक देश के लोग सरकार को अदा करते हैं।

प्रश्न 8.
गैर कर आप से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
गैर कर आय-और-कर आय अनिवार्य भुगतान नहीं है। यह आय लोगों को वस्तुएं तथा सेवाएं प्रदान करके प्राप्त की जाती है। गैर-कर आय तथा लाभ का सीधा सम्बन्ध होता है, जैसे कि ब्याज द्वारा आय, लाभ तथा लाभांश।

प्रश्न 9.
प्रत्यक्ष कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्रत्यक्ष कर-प्रत्यक्ष कर वह कर होता है, जोकि बदली नहीं किया जा सकता। जितने मनुष्यों पर कर . लगाया जाता है, उनको ही कर का भार सहन करना पड़ता है।

प्रश्न 10.
अप्रत्यक्ष कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
अप्रत्यक्ष कर-अप्रत्यक्ष कर वह कर होता है, जिसका भार बदली किया जा सकता है, जैसे कि बिक्री कर। यह कर दुकानदारों पर लगता है, परन्तु इसका भार ग्राहकों को सहन करना पड़ता है।

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प्रश्न 11.
प्रत्यक्ष कर तथा अप्रत्यक्ष कर की दो-दो उदाहरणे दीजिए।
उत्तर-
(i) प्रत्यक्ष कर-प्रत्यक्ष कर जिन मनुष्यों पर लगता है, उनको ही कर का भार सहन करना पड़ता है, जैसे कि

  • आय कर
  • निगम कर।

(ii) अप्रत्यक्ष कर-यह कर वस्तुओं तथा सेवाओं पर लगता है तथा इस कर का भार बदली किया जा सकता है जैसे कि

  • बिक्री कर
  • उत्पादन कर।

प्रश्न 12.
प्रगतिशील कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्रगतिशील कर वह कर है जिसमें आय बढ़ने के साथ कर की दर बढ़ जाती है।

प्रश्न 13.
प्रतिगामी कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्रतिगामी कर वह कर है जिनमें आय बढ़ने के साथ कर की दर कम हो जाती है।

प्रश्न 14.
आनुपातिक कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
आनुपातिक कर वह कर है जिसमें आय बढ़ने से कर की दर समान रहती है।

प्रश्न 15.
कर, पूंजी प्राप्ति क्यों नहीं है ?
उत्तर-
कर इसलिए पूंजी प्राप्ति नहीं है क्योंकि इससे न तो सरकार की देनदारी में वृद्धि होती है तथा न ही सरकार के भण्डार में कमी होती है।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 14 सरकारी बजट तथा अर्थव्यवस्था

प्रश्न 16.
ऋण की वापसी को पूंजी प्राप्ति क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
पूंजी प्राप्ति से अभिप्राय वह प्राप्तियां हैं जोकि देनदारी में वृद्धि करती हैं अथवा परिसम्पत्तियों में कमी करती हैं।

प्रश्न 17.
पूंजी प्राप्तियों में कौन-सी मदों को शामिल किया जाता है ?
उत्तर-
पूंजी प्राप्तियों में मुख्य तौर पर-

  1. सरकार द्वारा प्राप्त किए गए उधार
  2. सार्वजनिक उद्यमों अथवा परिसम्पत्तियों के विनिवेश द्वारा आय
  3. सरकार द्वारा जो ऋण दिया गया था, उस ऋण की वापसी इत्यादि पूंजी प्राप्तियां हैं।

प्रश्न 18.
उधार को पूंजी प्राप्तियां क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
पूंजी प्राप्ति वे प्राप्तियां होती हैं जोकि

  • सरकार की देनदारी में वृद्धि करती हैं
  • इनसे सरकार की परिसम्पत्तियों में कमी होती है। इसलिए उधार को पूंजी प्राप्ति कहा जाता है।

प्रश्न 19.
सार्वजनिक व्यय का वर्गीकरण करो।
उत्तर-
सार्वजनिक व्यय को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-
PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 14 सरकारी बजट तथा अर्थव्यवस्था 1

प्रश्न 20.
राजस्व व्यय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राजस्व व्यय-राजस्व व्यय वह व्यय है जो सरकार की देनदारियों में कमी नहीं करते तथा न ही सरकार की परिसम्पत्तियों में वृद्धि करते हैं, जैसे कि ब्याज का भुगतान तथा आर्थिक सहायता कानून तथा व्यवस्था पर व्यय इत्यादि।

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 14 सरकारी बजट तथा अर्थव्यवस्था

प्रश्न 21.
पूंजीगत व्यय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
पूंजीगत व्यय-पूंजीगत व्यय वह व्यय है, जो सरकार की देनदारियों में कमी करते हैं तथा सरकार की परिसम्पत्तियों में वृद्धि करते हैं, जैसे कि सरकारी भवनों का निर्माण अथवा ऋण की वापसी, सड़कें तथा डैमों का निर्माण।

प्रश्न 22.
नियोजन व्यय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नियोजन व्यय-देश द्वारा तैयार की गई वार्षिक योजना अनुसार जो व्यय किया जाता है, उसको योजना व्यय कहा जाता है।

प्रश्न 23.
गैर-नियोजन व्यय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
गैर-नियोजन व्यय-सरकार द्वारा तैयार की गई वार्षिक योजना के बिना सरकार द्वारा जो अन्य व्यय किया जाता है उसको गैर-नियोजन व्यय कहा जाता है।

प्रश्न 24.
ब्याज के भुगतान को राजस्व व्यय क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
ब्याज के भुगतान को राजस्व व्यय कहा जाता है, क्योंकि इससे ब्याज देने वाले की देनदारी में कमी नहीं होती, क्योंकि मूलधन का भार उस पर रहता है।

प्रश्न 25.
सबसिडी को राजस्व व्यय क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
सरकार विभिन्न उद्यमियों तथा विभिन्न वर्ग के लोगों को सबसिडी के रूप में सहायता करती है। इसको राजस्व व्यय कहा जाता है।

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प्रश्न 26.
विकासवादी व्यय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
विकासवादी व्यय वह व्यय होता है, जिसका सम्बन्ध देश के आर्थिक विकास से होता है।

प्रश्न 27.
गैर-विकासशील व्यय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
और-विकासशील व्यय वह व्यय है जो सरकार देश में गैर-विकासशील परन्तु अनिवार्य कार्यों पर व्यय करती है।

प्रश्न 28.
बजट घाटे से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सरकार का कुल अनुमानित व्यय सरकार की कुल वार्षिक प्राप्तियों से अधिक है तो इसको बजट का घाटा कहा जाता है।

प्रश्न 29.
राजकोषीय घाटे से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सरकार के कुल व्यय में से यदि राजस्व प्राप्तियों तथा ऋण वसूली तथा अन्य प्राप्तियों को बगैर उधार के घटा दिया जाए तो शेष राशि को राजकोषीय घाटा कहा जाता है।
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – कुल प्राप्तियां (बगैर उधार के) |
अथवा
राजकोषीय घाटा = उधार तथा अन्य देनदारियां

प्रश्न 30.
प्राथमिक घाटे से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्राथमिक घाटे से अभिप्राय है राजकोषीय घाटे में से यदि ब्याज भुगतान को घटा दिया जाए तो शेष राशि को प्राथमिक घाटा कहते हैं।
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान|

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प्रश्न 31.
राजस्व घाटे तथा राजकोषीय घाटे में अंतर बताओ।
उत्तर

  • राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियां
  • राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – कुल प्राप्तियां (बगैर उधार के)

प्रश्न 32.
घाटे के बजट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जब सरकार का अनुमानित व्यय अधिक होता है तथा अनुमानित प्राप्तियां कम होती हैं तो ऐसे बजट को घाटे का बजट कहा जाता है।

प्रश्न 33.
सन्तुलित बजट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
ऐसा बजट जिसमें सरकार का अनुमानित व्यय सरकार की अनुमानित आय के समान होता है तो ऐसे बजट को सन्तुलित बजट कहा जाता है।

प्रश्न 34.
वृद्धि के बजट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
वह बजट जिसमें सरकार की आय, सरकार के व्यय से अधिक होती है, ऐसे बजट को वृद्धि का बजट कहा जाता है।

प्रश्न 35.
घाटे के बजट की वित्त व्यवस्था कैसे की जाती है ?
उत्तर-
घाटे के बजट की वित्त व्यवस्था दो तरह से की जाती है-

  • उधार (Borrowing)
  • नई करन्सी छापकर (Printing New Currency)।

प्रश्न 36.
जब आय में वृद्धि के कारण कर की दर में वृद्धि होती है तो इसको ………….. कहते हैं।
(क) आनुपातिक कर
(ख) प्रगतिशील कर
(ग) मूल्य वृद्धि कर
(घ) विशिष्ट कर।
उत्तर-
(ख) प्रगतिशील कर।

प्रश्न 37.
जब आय में परिवर्तन होने से कर की दल में तबदीली नहीं होती तो उस कर को ……….. कहते
(क) प्रगतिशील कर
(ख) आनुपातिक कर
(ग) विशिष्ट कर
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(ख) आनुपातिक कर।

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प्रश्न 38.
जब वह कर जिस का भुगतान उस व्यक्ति को करना पड़ता है जिस पर यह कर लगाया जाता है तो इसको ………….. कहते हैं।
(क) अप्रत्यक्ष कर
(ख) प्रत्यक्ष कर
(ग) मूल्य वृद्धि कर
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) अप्रत्यक्ष कर।

प्रश्न 39.
पूँजीगत बजट किसको कहते हैं ?
उत्तर-
सरकार की पूँजीगत प्राप्तियों और पूँजीगत व्यय के विवरण को पूँजीगत बजट कहते हैं।

प्रश्न 40.
राजस्व बजट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राजस्व बजट वह बजट है जिसमें राजस्व प्राप्तियों तथा राजस्व व्यय का विवरण होता है।

प्रश्न 41.
निम्नलिखित में से कौन सा प्रत्यक्ष कर है?
(a) बिक्री कर
(b) वैट
(c) आय कर
(d) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(c) आय कर।

प्रश्न 42.
निम्नलिखित में से कौन सा अप्रत्यक्ष कर है?
(a) सम्पत्ति कर
(b) आबकारी कर
(c) आय कर
(d) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(b) आबकारी कर।

प्रश्न 43.
जब राजस्व व्यय, राजस्व प्राप्तियों से अधिक होता है तो इस स्थिति को ………………….. कहते हैं।
(a) राजकोषीय घाटा
(b) राजस्व घाटा
(c) राजस्व व्यय
(d) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(b) राजस्व घाटा।

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प्रश्न 44.
यदि आयात की कीमत निर्यात की कीमत से अधिक हो तो देश का व्यापार बाकी ……….. होता
(a) प्रतिकूल
(b) सन्तुलित
(c) दोनों
(d) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(a) प्रतिकूल।

प्रश्न 45.
जब कुल व्यय कुल प्राप्तियों से अधिक हो तो इस हालत को ………. कहते हैं।
(a) राजस्व घाटा
(b) राजकोषीय घाटा
(c) बजट घाटा
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(c) बजट घाटा।

प्रश्न 46.
मूल्य वृद्धि कर (VAT) से क्या अभिप्राय है।
उत्तर–
प्रत्येक फर्म द्वारा वस्तु और सेवा की लागत से अधिक निर्धारित कीमत अर्थात् मूल्य वृद्धि पर लगाए गए कर को मूल्य वृद्धि कर कहते हैं।

प्रश्न 47.
सरकारी बजट एक निजी वर्ष में सरकार की ………. आय और व्यय का विवरण है।
उत्तर-
अनुमानित।

प्रश्न 48.
इन में से कौन सा प्रत्यक्ष कर है ?
(a) आय कर
(b) बिक्री कर
(c) वैट
(d) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(a) आय कर।

II. अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
बजट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
बजट एक वित्तीय वर्ष दौरान सरकार की अनुमानित आय तथा अनुमानित व्यय का विवरण होता है। भारत में सरकारी बजट फरवरी महीने के आखिरी दिन संसद् में पेश किया जाता है। यह बजट सरकार को 1 अप्रैल से 31 मार्च तक के समय की आय तथा व्यय का विवरण होता है।

प्रश्न 2.
बजट के कोई दो उद्देश्य बताओ।
उत्तर-

  1. संसाधनों का पुनः वितरण-सरकारी बजट का मुख्य उद्देश्य संसाधनों का वितरण इस प्रकार करने से होता है ताकि आर्थिक लाभ के साथ-साथ सामाजिक कल्याण में वृद्धि की जा सके।
  2. आय तथा धन का समान वितरण-सरकारी बजट देश में आय तथा धन का समान वितरण करने का स होता है।

प्रश्न 3.
बजट के मुख्य अंश बताओ।
अथवा
राजस्व बजट तथा पूंजीगत बजट में अन्तर बताओ।
उत्तर-
बजट के मुख्य दो अंश होते हैं –

  • राजस्व बजट- इसमें आय प्राप्तियां तथा आय व्यय को शामिल किया जाता है, जोकि सरकार को भिन्न भिन्न स्रोतों से प्राप्त होती है।
  • पूंजीगत बजट-इसमें पूंजीगत प्राप्तियां तथा पूंजीगत व्यय का विवरण होता है।

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प्रश्न 4.
कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
कर एक अनिवार्य भुगतान है जोकि एक देश के निवासी सरकार को अदा करते हैं ताकि सरकार संयुक्त उद्देश्यों की पूर्ति कर सके। कर देकर किसी सेवा की मांग नहीं की जा सकती। कर का भुगतान कानूनी तौर पर अनिवार्य होता है। कर न देने वाले मनुष्य अथवा संस्था को सज़ा भी हो सकती है।

प्रश्न 5.
कर तथा गैर-कर आय को परिभाषित करो।
उत्तर-

  • कर आय-कर आय एक अनिवार्य भुगतान होता है, जोकि एक देश के लोग सरकार को अदा करते हैं। कर देने तथा लाभ का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता, जैसे कि आय कर, बिक्री कर इत्यादि।
  • गैर-कर आय-गैर-कर आय अनिवार्य भुगतान नहीं है। यह आय लोगों को वस्तुएं तथा सेवाएं प्रदान करके प्राप्त की जाती है। गैर-कर आय तथा लाभ का सीधा सम्बन्ध होता है, जैसे कि ब्याज द्वारा आय, लाभ तथा लाभांश।

प्रश्न 6.
प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-

  1. प्रत्यक्ष कर-प्रत्यक्ष कर वह कर होता है, जोकि बदली नहीं किया जा सकता। जितने मनुष्यों पर कर लगाया जाता है, उनको ही कर का भार सहन करना पड़ता है।
  2. अप्रत्यक्ष कर–अप्रत्यक्ष कर वह कर होता है, जिसका भार बदली किया जा सकता है, जैसे कि बिक्री कर। यह कर दुकानदारों पर लगता है, परन्तु इसका भार ग्राहकों को सहन करना पड़ता है।

प्रश्न 7.
कर, पूंजी प्राप्ति क्यों नहीं है ?
उत्तर-
कर इसलिए पूंजी प्राप्ति नहीं है क्योंकि इससे न तो सरकार की देनदारी में वृद्धि होती है तथा न ही सरकार के भण्डार में कमी होती है। पंजी प्राप्ति से सरकार की देनदारी अधिक होती है तथा भण्डार में कमी होती है, परन्तु कर से पूंजी प्राप्ति की दो विशेषताएं लागू नहीं होती।

प्रश्न 8.
ऋण की वापसी को पूंजी प्राप्ति क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
पूंजी प्राप्ति से अभिप्राय वह प्राप्तियां हैं जोकि देनदारी में वृद्धि करती हैं अथवा परिसम्पत्तियों में कमी करती हैं। सरकार द्वारा दिया गया ऋण, सरकार की परिसम्पत्ति होती है। जब ऋण की वापसी होती है तो सरकारी परिसम्पत्तियों में कमी होती है। इसलिए इसको पूंजी प्राप्ति कहा जाता है।

प्रश्न 9.
पूंजी प्राप्तियों में कौन-सी मदों को शामिल किया जाता है ?
उत्तर-
पूंजी प्राप्तियों में मुख्य तौर पर-

  1. सरकार द्वारा प्राप्त किए गए उधार
  2. सार्वजनिक उद्यमों अथवा परिसम्पत्तियों के विनिवेश द्वारा आय
  3. सरकार द्वारा जो ऋण दिया गया था, उस ऋण की वापसी इत्यादि पूंजी प्राप्तियां हैं। पूंजी प्राप्तियों से सरकार की देनदारी बढ़ती है अथवा सरकारी परिसम्पत्तियों में कमी होती है।

प्रश्न 10.
उधार को पूंजी प्राप्तियां क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
पूंजी प्राप्ति वे प्राप्तियां होती हैं जोकि-

  • सरकार की देनदारी में वृद्धि करती हैं
  • इनसे सरकार की परिसम्पत्तियों में कमी होती है।

जब सरकार देश में से अथवा विदेशों में से उधार प्राप्त करती है तो इससे सरकार की देनदारी बढ़ जाती है क्योंकि प्राप्त किए उधार को ब्याज समेत करने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है। इसलिए उधार को पूंजी प्राप्ति कहा जाता है।

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प्रश्न 11.
सार्वजनिक व्यय का वर्गीकरण करो।
उत्तर-
सार्वजनिक व्यय को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –
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प्रश्न 12.
राजस्व व्यय तथा पूंजीगत व्यय से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
राजस्व व्यय तथा पूंजीगत व्यय की दो-दो उदाहरणे दीजिए।
उत्तर-

  • राजस्व व्यय-राजस्व व्यय वह व्यय है जो सरकार की देनदारियों में कमी नहीं करते तथा न ही सरकार की परिसम्पत्तियों में वृद्धि करते हैं। जैसे कि ब्याज का भुगतान तथा आर्थिक सहायता कानून तथा व्यवस्था पर व्यय इत्यादि।
  • पूंजीगत व्यय-पूंजीगत व्यय वह व्यय है, जो सरकार की देनदारियों में कमी करते हैं तथा सरकार की परिसम्पत्तियों में वृद्धि करते हैं। जैसे कि सरकारी भवनों का निर्माण अथवा ऋण की वापसी, सड़कें तथा डैमों का निर्माण।

प्रश्न 13.
बजट घाटे से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सरकार वित्तीय वर्ष के लिए वार्षिक बजट का निर्माण करती है। इसमें वर्ष की अनुमानित प्राप्तियों तथा अनुमानित व्यय का विवरण होता है। यदि सरकार का कुल अनुमानित व्यय सरकार की कुल वार्षिक प्राप्तियों से अधिक है तो इसको बजट का घाटा कहा जाता है।

प्रश्न 14.
राजकोषीय घाटे से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सरकार के कुल व्यय में से यदि राजस्व प्राप्तियों तथा ऋण वसूली तथा अन्य प्राप्तियों को बगैर उधार के घटा दिया जाए तो शेष राशि को राजकोषीय घाटा कहा जाता है।
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – कुल प्राप्तियां (बगैर उधार के)
अथवा
राजकोषीय घाटा = उधार तथा अन्य देनदारियां

प्रश्न 15.
प्राथमिक घाटे से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्राथमिक घाटे से अभिप्राय है राजकोषीय घाटे में से यदि ब्याज भुगतान को घटा दिया जाए तो शेष राशि को प्राथमिक घाटा कहते हैं।
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान

प्रश्न 16.
घाटे के बजट की वित्त व्यवस्था कैसे की जाती है ?
उत्तर-
घाटे के बजट की वित्त व्यवस्था दो तरह से की जाती है-

  • उधार (Borrowing)-घाटे के बजट को पूरा करने के लिए सरकार बाज़ार में जनता, व्यापारिक बैंकों अथवा केन्द्रीय बैंक से उधार लेती है।
  • नई करेन्सी छापकर (Printing New Currency)-घाटे के बजट की पूर्ति यदि उधार द्वारा न हो तो सरकार नई करेन्सी छापकर घाटे के बजट की पूर्ति करती है।

प्रश्न 17.
सरकारी व्यय से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सरकारी व्यय का अर्थ (Meaning of Public Expenditure)-सरकारी व्यय से अभिप्राय एक वित्तीय वर्ष में सरकार द्वारा किए गए आनुपातिक व्यय से होता है। सार्वजनिक व्यय द्वारा सरकार लोगों की आर्थिक तथा सामाजिक भलाई में वृद्धि करने का प्रयत्न करती है। इससे आर्थिक उतार-चढ़ाव पर नियन्त्रण किया जाता है। देश के आर्थिक विकास में तेजी लाने के उद्देश्य की पूर्ति की जाती है। इसलिए सरकारी व्यय राष्ट्रीय हित के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर सरकार द्वारा किए गए व्यय से होता है जोकि एक वित्तीय वर्ष में सरकार द्वारा व्यय किया जाता है।

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III. लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
बजट के कोई चार उद्देश्य बताओ।
उत्तर-
सरकार की वार्षिक वित्तीय अनुमानित आय तथा अनुमानित व्यय के विवरण को बजट कहा जाता है। सरकारी बजट के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं-

  1. संसाधनों का पुन:वितरण-सरकारी बजट का उद्देश्य देश के संसाधनों का वितरण इस प्रकार करने से होता है, आर्थिक लाभ के साथ-साथ सामाजिक कल्याण प्राप्त करना भी होता है।
  2. आय तथा धन का समान वितरण-बजट का उद्देश्य देश में आय तथा धन का समान वितरण करना होता है। इससे देश में अमीर तथा गरीब का अन्तर कम हो जाता है।
  3. आर्थिक स्थिरता-बजट का उद्देश्य आर्थिक स्थिरता प्राप्त करना भी होता है। इससे मन्दीकाल तथा तेज़ीकाल की अवस्थाओं को नियन्त्रण में किया जाता है।
  4. निर्धनता तथा बेरोज़गारी को दूर करना-बजट द्वारा निर्धनता तथा बेरोजगारी को घटाने के उद्देश्य की पूर्ति भी की जाती है। इससे निर्धनता की समस्या का हल किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
राजस्व बजट तथा पूंजीगत बजट में क्या अन्तर होता है ?
उत्तर-
राजस्व बजट तथा पूंजीगत बजट में अन्तर –

अंतर का आधार राजस्व बजट पूंजीगत बजट
1. प्राप्तियां राजस्व बजट में राजस्व प्राप्तियों का विवरण होता है। पूंजीगत बजट में पूंजीगत प्राप्तियों का विवरण होता है।
2. व्यय राजस्व बजट में राजस्व व्यय का विवरण होता है। पूंजीगत बजट में पूंजीगत व्यय का विवरण होता है।
3. देनदारियां राजस्व प्राप्तियों से सरकार पर कोई देनदारी उत्पन्न नहीं होती। कर द्वारा प्राप्त आय से कोई देनदारी उत्पन्न नहीं होती तथा राजस्व व्यय सरकार की देनदारी को कम नहीं करते। पूंजीगत प्राप्ति से सरकार पर देनदारी उत्पन्न होती है। उधार लेने से देनदारी उत्पन्न होती है तथा पूंजीगत व्यय सरकार की देनदारी को कम करते हैं।
4. परिसम्पत्तियां राजस्व प्राप्ति से सरकार की परिसम्पत्तियों में कमी नहीं होती, राजस्व व्यय से परिसम्पत्तियों का निर्माण नहीं होता है। पूंजीगत प्राप्तियों से सरकार की परिसम्पत्तियों में कमी नहीं होती, पूंजीगत व्यय से परिसम्पत्तियों का निर्माण होता है।

प्रश्न 3.
प्रत्यक्ष कर तथा अप्रत्यक्ष कर में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर-
प्रत्यक्ष कर तथा अप्रत्यक्ष कर में अन्तर –

अन्तरका आधार प्रत्यक्ष कर अप्रत्यक्ष कर
1. कर लाभ तथा कर भार प्रत्यक्ष कर जिस मनुष्य पर लगाया जाता है, कर का भार भी उसी मनुष्य को सहन करना पड़ता है, जैसे कि आयकर। अप्रत्यक्ष कर एक मनुष्य पर लगाया जाता है, कर का भार किसी अन्य मनुष्य को सहन करना पड़ता है, जैसे कि बिक्री कर।
2. कर बदली प्रत्यक्ष कर की बदली (shifting) नहीं की जा सकती। अप्रत्यक्ष कर की बदली (shifting) की जा सकती है।
3. कर की दर प्रत्यक्ष कर साधारण तौर पर प्रगतिशील होते हैं। आय में वृद्धि होने से कर की दर बढ़ती जाती है। अप्रत्यक्ष कर साधारण तौर पर आनुपातिक होते हैं। आय अधिक अथवा कम होने की स्थिति में कर की दर समान रहती है।
4. वास्तविक भार प्रत्यक्ष कर का वास्तविक भार अमीर लोगों से अधिक होता है। अप्रत्यक्ष कर का वास्तविक भार गरीब लोगों से अधिक होता है।

प्रश्न 4.
प्रगतिशील कर, आनुपातिक कर तथा प्रतिगामी कर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-

  1. प्रगतिशील कर-प्रगतिशील कर वह कर होता है, जिसमें आय के बढ़ने से कर की दर बढ़ती जाती है। इस कर का भार गरीबों पर बहुत कम तथा अमीर लोगों पर अधिक होता है। प्रत्यक्ष कर साधारण तौर पर प्रगतिशील कर होते हैं।
  2. आनुपातिक कर-आनुपातिक कर वह कर होता है, जिसमें आय के बढ़ने अथवा घटने से कर की दर समान रहती है, जैसे कि बिक्री कर में कर की दर समान होती है। इस कर का वास्तविक भार गरीब लोगों पर अधिक होता है।
  3. प्रतिगामी कर-प्रतिगामी कर वह कर है जिसमें आय के बढ़ने से कर की दर घटती जाती है। ऐसे कर का भार अमीर लोगों पर कम तथा निर्धन लोगों पर अधिक होता है। इन करों को एक चार्ट की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है।

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प्रश्न 5.
राजस्व प्राप्तियां तथा पूंजीगत प्राप्तियों से क्या अभिप्राय है ? इनमें अन्तर स्पष्ट करो।
अथवा
किस आधार पर राजस्व प्राप्तियों तथा पूंजीगत प्राप्तियों के बीच सरकारी बजट में अन्तर किया जा सकता है ?
उत्तर-
1. राजस्व प्राप्तियां-राजस्व प्राप्तियां वे प्राप्तियां होती हैं, जिनसे सरकार की देनदारियाँ उत्पन्न नहीं होती तथा न ही परिसम्पत्तियों (Assets) में कमी होती है। इसके दो अंश हैं-

  • कर प्राप्तियां जैसे कि आय कर, निगम कर, बिक्री कर इत्यादि
  • गैर-कर प्राप्तियां जैसे कि ब्याज, लाभ, लाभांश तथा विदेशी सहायता इत्यादि।

2. पूंजीगत प्राप्तियां-पूंजीगत प्राप्तियां वे प्राप्तियां होती हैं, जिनसे सरकार की देनदारियां उत्पन्न होती हैं तथा परिसम्पत्तियों में कमी होती है, जैसे कि उधार (Borrowings) तथा ऋण की प्राप्ति, विनिवेश द्वारा प्राप्तियां इत्यादि। राजस्व प्राप्तियों तथा पूंजीगत प्राप्तियों में अन्तर राजस्व प्राप्तियों तथा पूंजीगत प्राप्तियों में मुख्य तौर पर यह अन्तर होता है कि राजस्व प्राप्तियों से सरकार की देनदारियां उत्पन्न नहीं होतीं। सरकार की परिसम्पत्तियों में भी कोई कमी नहीं होती। दूसरी ओर पूंजीगत प्राप्तियों से सरकार की देनदारियों में वृद्धि होती है तथा परिसम्पत्तियों में कमी हो जाती है।

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प्रश्न 6.
राजस्व व्यय तथा पूंजीगत व्यय से क्या अभिप्राय है ? इनमें अन्तर को स्पष्ट करो।
अथवा
किस आधार पर राजस्व व्यय तथा पूंजीगत व्यय के बीच सरकारी बजट में अन्तर किया जा सकता है ?
उत्तर-

  1. राजस्व व्यय-राजस्व व्यय वे व्यय होता है, जिस द्वारा न तो देनदारियों में कमी होती है तथा न ही परिसम्पत्तियों का निर्माण होता है। उदाहरणस्वरूप सरकार का अनुशासन पर व्यय, कानून तथा व्यवस्था बनाए रखने पर व्यय, सेना पर व्यय।
  2. पूंजीगत व्यय-पूंजीगत व्यय वह व्यय होता है, जिस द्वारा सरकार की देनदारियों में कमी होती है तथा परिसम्पत्तियों का निर्माण होता है। उदाहरणस्वरूप, सड़कें, नहरें, डैम, बिजली इत्यादि का निर्माण अथवा सार्वजनिक ऋण की वापसी। राजस्व व्यय तथा पूंजीगत व्यय में अन्तर-राजस्व व्यय तथा पूंजीगत व्यय में मुख्य अन्तर यह होता है कि राजस्व व्यय द्वारा देनदारियों में कमी नहीं होती तथा न ही परिसम्पत्तियों का निर्माण होता है। दूसरी ओर पूंजीगत व्यय में सरकार की देनदारियों में कमी होती है तथा परिसम्पत्तियों का निर्माण होता है।

प्रश्न 7.
विकासशील तथा गैर-विकासशील व्यय में अन्तर बताओ।
उत्तर-

  • विकासशील व्यय-विकासशील व्यय सरकार का वह व्यय होता है, जिस द्वारा देश का आर्थिक तथा सामाजिक विकास होता है, जैसे कि कृषि, उद्योगों, सेहत, शिक्षा, ग्रामीण विकास तथा भलाई इत्यादि पर किए गए व्यय को विकासशील व्यय कहा जाता है। विकासशील व्यय में अन्य मदें रेलें, डाकखाने, तार तथा संचार विभाग इत्यादि को भी शामिल किया जाता है।
  • गैर-विकासशील व्यय-गैर-विकासशील व्यय में सरकार द्वारा सेवाओं पर किए गए व्यय को शामिल किया जाता है, जैसे कि पुलिस, सुरक्षा, न्यायपालिका, अनुशासन, सहायता, कर एकत्रित करने के व्यय इत्यादि को शामिल किया जाता है। विकासशील तथा गैर-विकासशील व्यय में अन्तर-विकासशील तथा गैर-विकासशील व्यय में मुख्य अन्तर यह है कि विकासशील व्यय से राष्ट्रीय आय तथा उत्पादन में प्रत्यक्ष तौर पर वृद्धि होती है। इससे सरकार की परिसम्पत्तियों में वृद्धि होती है। दूसरी ओर गैर-विकासशील व्यय सरकार द्वारा साधारण सेवाएं प्रदान करने पर व्यय किया जाता है। इस व्यय से राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि प्रत्यक्ष तौर पर नहीं होती। यह केवल विकास की वृद्धि में सहायक तत्त्व होता है।

प्रश्न 8.
राजकोषीय घाटे का अर्थ तथा महत्त्व स्पष्ट करो।
उत्तर-
राजकोषीय घाटा किसी देश में कुल व्यय में से राजस्व प्राप्तियों तथा पूंजीगत प्राप्तियों (बगैर उधार के) के योग को घटाने से प्राप्त होता है।
Fiscal Deficit = Total Expenditure – (Revenue Receipts + Capital Receipts excluding Borrowings)
इसमें महत्त्वपूर्ण बात यह है कि राजकोषीय घाटे में हम उधार को लेखे-जोखे में नहीं लेते जो कि पूंजीगत प्राप्तियों का हिस्सा होता है। सरकार की कुल प्राप्तियों में राजस्व प्राप्तियों तथा गैर उधार पूंजीगत प्राप्तियों को शामिल किया जाता है। गैर उधार पूंजीगत प्राप्तियों में ऋण की वापसी तथा विनिवेश से आय को जोड़ते हैं। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि
Fiscal Deficit = Borrowings Requirements of the Government
महत्त्व-राजकोषीय घाटा एक देश की सरकार की वित्तीय वर्ष में उधार आवश्यकताओं को स्पष्ट करता है। (Significance or Implications)

प्रश्न 9.
राजस्व घाटे से क्या अभिप्राय है ? राजस्व घाटे के महत्त्व को स्पष्ट करो।
उत्तर-
राजस्व घाटे से अभिप्राय सरकार के कुल राजस्व व्यय तथा कुल राजस्व प्राप्तियों का अन्तर होता है।
Revenue Deficit =Total Revenue Expenditure – Total Revenue Receipts
उदाहरणस्वरूप भारत सरकार के वार्षिक बजट 2005-06 में कुल राजस्व व्यय ₹ 446512 करोड़ तथा कुल राजस्व प्राप्तियां ₹ 351200

करोड़ थीं। इस प्रकार राजस्व घाटा ₹ 95312 करोड़ हैं। महत्त्व (Significance or Implications) –

  • बचतों में कमी-राजस्व घाटे सरकार की बचतों में कमी को प्रकट करता है। इस घाटे को पूरा करने के लिए सरकार को उधार लेना पड़ता है अथवा भण्डारों की बिक्री करनी पड़ती है।
  • मुद्रा स्फीति-सरकार द्वारा प्राप्त किया उधार उपभोग व्यय के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसलिए देश में मुद्रा स्फीति की स्थिति उत्पन्न होती है। प्रश्न 10. योजना खर्च और गैर-योजना खर्च में अन्तर स्पष्ट करें।

उत्तर-योजना खर्च (Plan Expenditure)-यह खर्च योजना आयोग की स्वीकृति से सरकार व्यय करती है। योजना आयोग, योजना काल के लिए खर्च करने के निश्चित निर्देश जारी करता है। इसमें केन्द्र सरकार की योजनाओं का विवरण होता है, राज्य तथा केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता का विवरण भी होता है।

गैर-योजना खर्च (Non Plan Expenditure)-और-योजना खर्च वह व्यय है जोकि योजना के व्यय के बिना कार्य की पूर्ति करता है गैर-योजना खर्च, योजना खर्च के बगैर शेष सभी प्रकार के खर्च होते हैं।

प्रश्न 11.
घाटे की वित्त पूर्ति कैसे की जाती है ?
उत्तर-
घाटे की वित्त पूर्ति कैसे की जाती है। इसके मुख्य ढंग इस प्रकार हैं-

  1. मुद्रा विस्तार (Monetary Expansion)-इस ढंग अनुसार सरकार घाटे (Deficit) को पूरा करने के लिए घाटे की राशि के समान नए नोट छाप लेती है। इस विधि में देश की सरकार खज़ाना बिल केन्द्रीय बैंक को देकर उसके बदले में नकद मुद्रा प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार घाटे को पूरा किया जा सकता है।
  2. जनता से उधार (Borrowing from the Public)-घाटे की वित्त पूर्ति का दूसरा महत्त्वपूर्ण ढंग सरकार लोगों से उधार प्राप्त कर लेती है। बाज़ार में सरकार लोगों को उधार देने के लिए कहती है तो लोग सरकार की प्रतिभूतियां ब्रांड इत्यादि खरीद लेते हैं। इनको बाज़ार ऋण कहा जाता है।

प्रश्न 12.
कर की परिभाषा दें। कर की विभिन्न किस्में बताएँ।
उत्तर-
कर का अर्थ-कर कानूनी तौर पर लाज़मी भुगतान है जो कि देश की सरकार द्वारा लोगों की आय अथवा जायदाद पर लगाया जाता है। यह कंपनियों के उत्पादन पर भी लगता है, परन्तु इसके बदले में लाभ प्रदान करना अनिवार्य नहीं होता।

कर की किस्में (Types of Taxes)
1. प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर-

  • प्रत्यक्ष कर वह कर होते हैं जो कि जिन व्यक्तियों पर लगाए जाते हैं कर का भार भी उन व्यक्तियों को सहन करना पड़ता है। यह कर और व्यक्तियों अथवा संस्थाओं पर बदली नहीं किये जा सकते।
  • अप्रत्यक्ष कर वह कर हैं जो एक व्यक्ति पर लगाए जाते हैं, परन्तु उनका भार किसी और व्यक्ति अथवा व्यक्तियों को सहन करना पड़ता है।

2. प्रगतिशील, आनुपातिक और प्रतिगामी कर-

  • प्रगतिशील कर वह कर है जिनमें आय में वृद्धि से कर की दर में वृद्धि होती है।
  • आनुपातिक कर वह कर है जिन में आय में वृद्धि होने से कर की दर में कोई वृद्धि नहीं होती अथवा कर की दर सामान्य रहती है।
  • प्रतिगामी कर वह कर है जिन में आय में वृद्धि से कर की दर कम होने लगती है।

3. मूल्य वृद्धि और वज़न अनुसार कर –

  • मूल्य वृद्धि कर वह कर है जिन में वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से, मूल्य वृद्धि की राशि पर लगाए जाते हैं।
  • वज़न अनुसार कर वह कर है जो कि वस्तुओं के नाप-तोल पर लगाए जाते हैं।

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प्रश्न 13.
राजस्व प्राप्तियों से क्या अभिप्राय है? राजस्व प्राप्तियों के अंशों की व्याख्या करें।
उत्तर-
बजट प्राप्तियों का अर्थ (Meaning of Budget Receipts)-किसी वित्तीय वर्ष सरकार को प्राप्त होने वाली अनुमानित आय जोकि विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होती है, उसे बजट प्राप्तियां कहा जाता है। बजट प्राप्तियों के दो स्रोत हैं-
(1) राजस्व प्राप्तियां (Revenue Receipts)-राजस्व प्राप्तियों की दो विशेषताएं होती हैं

  • इन प्राप्तियों से सरकार की कोई देनदारी उत्पन्न नहीं होती।
  • इन प्राप्तियों से सरकारी भण्डारों में कोई कमी उत्पन्न नहीं होती। राजस्व प्राप्तियों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।

1. कर प्राप्तियां (Tax Receipts)-सरकार द्वारा लगाए गए करों द्वारा जो आय प्राप्त होती है, उसको कर प्राप्तियां कहा जाता है। कर (Tax) एक अनिवार्य भुगतान होता है जोकि एक देश के निवासी बिना किसी प्रतिफल की आशा से अदा करते हैं। कर की विशेषताएं हैं-

  • यह अनिवार्य भुगतान होता है।
  • कर तथा लाभ में कोई-सीधा सम्बन्ध नहीं होता।
  • कर लोगों की भलाई पर व्यय किया जाता है।
  • कर के पीछे कानून व्यवस्था होती है।
  • कर देना, व्यक्ति की निजी ज़िम्मेदारी होती है।

2. गैर कर प्राप्तियां (Non Tax Receipts) यह सरकार की वह प्राप्तियां हैं जो गैर कर साधनों से होती हैं। इन प्राप्तियों के मुख्य स्रोत निम्नलिखित हैं।

  • लाभ तथा लाभांश ।
  • फीस तथा जुर्माने।
  • विशेष कर
  • ब्याज
  • ग्रांट और तोहफे।

IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न माम। (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सरकारी बजट से क्या अभिप्राय है ? बजट के मुख्य उद्देश्य तथा अंश बताओ। (What is Government Budget ? Explain its main objectives and components.)
उत्तर-
सरकारी बजट का अर्थ (Meaning of Government Budget)-सरकारी बजट वार्षिक आय तथा व्यय का विवरण है जो आने वाले वर्ष के अनुमानों को प्रकट करता है। (“The budget is an annual statement of the estimated receipts and expenditures of the government over the fiscal year.”)
भारत में वार्षिक बजट 1 अप्रैल से अगले वर्ष 31 मार्च तक बनाया जाता है। बजट में पिछले वर्ष की प्राप्तियों का विवरण भी होता है, परन्तु आने वाले वर्ष में रखे गए उद्देश्यों की पूर्ति के लिए साधनों के प्रयोग सम्बन्धी नीति का निर्माण किया जाता है। इसमें आगामी वर्ष की सम्भावित आय तथा व्यय का विवरण होता है। बजट की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं-

  • सरकारी बजट सरकार की आय तथा व्यय का विवरण होता है।
  • बजट आने वाले वर्ष के अनुमानों से सम्बन्धित होता है।
  • सरकार कुछ उद्देश्यों को सामने रखकर बजट का निर्माण करती है।
  • अनुमानित आय तथा व्यय को प्रकट किया जाता है।
  • सरकारी बजट को सरकार की स्वीकृति लेनी अनिवार्य होती है। .

सरकारी बजट के उद्देश्य (Objectives of Government Budget)-सरकार बजट का निर्माण करते समय कुछ उद्देश्यों को ध्यान में रखती है। बजट के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखितानुसार हैं-
1. संसाधनों का पुनःवितरण (Reallocation of Resources)-सरकारी बजट का उद्देश्य देश के संसाधनों का वितरण इस प्रकार करने से होता है, जिससे आर्थिक लाभ के साथ-साथ सामाजिक कल्याण भी प्राप्त किया जा सके। इसलिए आर्थिक विकास के उद्देश्य को पूरा करने के साथ-साथ सरकार यह भी ध्यान रखती है कि लोगों के जीवन स्तर में वृद्धि हो।

2. आय तथा धन का समान वितरण (Equal distribution of Income and Wealth)-बजट द्वारा सरकार, आय तथा धन का समान वितरण का प्रयत्न करती है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अमीर लोगों पर अधिक कर लगाए जाते हैं तथा गरीब लोगों को सहायता प्रदान करके उनकी आय में वृद्धि करने के प्रयत्न लिए जाते हैं। भारत में आर्थिक नियोजन का यह मुख्य उद्देश्य रहा है।

3. आर्थिक स्थिरता (Economic Stability)-सरकार व्यापारिक चक्रों (Trade Cycles) को नियन्त्रण करने का प्रयत्न करती है। अर्थव्यवस्था में मन्दीकाल तथा तेज़ीकाल की अवस्थाओं पर नियन्त्रण करके असन्तुलन स्थापित करने के प्रयत्न किए जाते हैं। बजट में करों की दर में परिवर्तन इस प्रकार किया जाता है, जिससे देश में आर्थिक स्थिरता स्थापित की जा सके।

4.निर्धनता तथा बेरोज़गारी को दूर करना (Eradication of Poverty and Unemployment)-भारत जैसे देशों में निर्धनता तथा बेरोज़गारी नज़र आती है। इसका मुख्य कारण देश में तीव्रता से बढ़ रही जनसंख्या होती है। बजट में ऐसी नीतियों का निर्माण किया जाता है, जिससे निर्धनता तथा बेरोज़गारी की समस्या का हल किया जा सके।

5. सार्वजनिक उद्यमों का प्रबन्ध (Management of Public Entreprises) सरकार ऐसे उद्यम आरम्भ करती है, जिनमें प्राकृतिक एकाधिकारी (Natural Monopoly) हो। प्राकृतिक एकाधिकारी में बड़े पैमाने पर कार्य किया जाता है। इससे पैमाने की बचतें प्राप्त होती हैं। इससे उत्पादन लागत कम आती है। इसीलिए सरकार रेलवे, बिजली, डाकखाने इत्यादि उद्योगों में निवेश करके लोगों की सामाजिक भलाई में वृद्धि करने का प्रयत्न भी करती है।

बजट का प्रभाव (Impact of the Budget)-अर्थव्यवस्था के तीन स्तरों (Levels) पर बजट का प्रभाव पड़ता है-
1. कुल राजकोषीय अनुशासन (Aggregate Fiscal Discipline)—सरकार को व्यय का विवरण तैयार करते समय अपनी आय को ध्यान में रखना चाहिए। यदि सरकार अपनी आय से अधिक व्यय करती है तो घाटे की वित्त व्यवस्था अपनाई जाएगी। इससे देश में कीमत स्तर तीव्रता से बढ़ जाता है।

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2. संसाधनों का वितरण (Allocation of Resources)-सामाजिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर __संसाधनों का वितरण करना चाहिए। बजट का प्रभाव संसाधनों के वितरण के स्तर पर भी डालता है।

3. सरकारी सेवाएँ (Government Services)-सरकारी सेवाओं द्वारा भी अर्थव्यवस्था को बजट प्रभावित करता है। सरकार द्वारा प्रभावी तथा कुशल नीति का निर्माण करना चाहिए, जिस द्वारा सरकारी सेवाएं अच्छी तरह प्रदान की जा सकें तथा अर्थव्यवस्था में सामाजिक भलाई में वृद्धि हो। इस उद्देश्य के लिए सड़कें, नहरें, शिक्षा, सेहत सुविधाएं अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालती हैं।

बजट के अंश (Components of the Budget) बजट को दो भागों में बांटा जा सकता है –
1. राजस्व बजट (Revenue Budget)
2. पूंजीगत बजट (Capital Budget)

1. राजस्व बजट (Revenue Budget)-राजस्व जट में प्राप्तियों तथा आय, व्यय का विवरण होता है। यह आय सरकार को विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होती है तथा उस आय के व्यय का विवरण होता है।
2. पूंजीगत बजट (Capital Budget)-पूंजीगत बजट में पूंजीगत प्राप्तियों तथा दीर्घकाल के व्यय का विवरण होता है। इस प्रकार बजट की रचना के दो अंश होते हैं
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प्रश्न 2.
बजट प्राप्तियों से क्या अभिप्राय है ? सरकारी प्राप्तियों को आय प्राप्तियों तथा पूँजीगत प्राप्तियों में किस आधार तथा वर्गों में वितरण किया जाता है ?
(What do you understand Budget Receipts ? What is the basis of classifying Government Receipts into Revenue Receipts and Capital Receipts ?)
अथवा
आय प्राप्तियों तथा पूंजीगत प्राप्तियों से क्या अभिप्राय है ? आय प्राप्तियों तथा पूंजीगत प्राप्तियों के अंश बताओ।
(What are Revenue Receipts and Capital Receipts ? Explain the components of Revenue Receipts and Capital Receipts.)
उत्तर-
बजट प्राप्तियों का अर्थ (Meaning of Budget Receipts)-किसी वित्तीय वर्ष सरकार को प्राप्त होने वाली अनुमानित आय जोकि विभिन्न स्रोतों से प्राप्त होती है, उसे बजट प्राप्तियां कहा जाता है। बजट प्राप्तियां दो प्रकार की होती हैं-
1. राजस्व प्राप्तियां (Revenue Receipts)
2. पूंजीगत प्राप्तियां (Capital Receipts)
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राजस्व प्राप्तियां (Revenue Receipts)-राजस्व प्राप्तियों की दो विशेषताएं होती हैं

  • इन प्राप्तियों से सरकार की कोई देनदारी उत्पन्न नहीं होती।
  • इन प्राप्तियों से सरकारी भण्डारों में कोई कमी उत्पन्न नहीं होती।

राजस्व प्राप्तियों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है।
1. कर प्राप्तियां (Tax Receipts)—सरकार द्वारा लगाए गए करों द्वारा जो आय प्राप्त होती है, उसको कर प्राप्तियां कहा जाता है। कर (Tax) एक अनिवार्य भुगतान होता है जोकि एक देश के निवासी बिना किसी प्रतिफल की आशा से अदा करते हैं।

कर की विशेषताएं हैं –

  • यह अनिवार्य भुगतान होता है।
  • कर तथा लाभ में कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता।
  • कर लोगों की भलाई पर व्यय किया जाता है।
  • कर के पीछे कानूनी व्यवस्था होती है।
  • कर देना, व्यक्ति की निजी ज़िम्मेदारी होती है।

कर की किस्में (Types of Taxes)
(a) प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर (Direct and Indirect Taxes)

  • प्रत्यक्ष कर-प्रत्यक्ष कर वह कर है जोकि जिन मनुष्यों पर लगाए जाते हैं, कर का भार भी उन मनुष्यों को ही सहन करना पड़ता है जैसे कि आय कर, जायदाद कर इत्यादि।
  • अप्रत्यक्ष कर-अप्रत्यक्ष कर वह कर है जो लगाए तो एक मनुष्य पर जाते हैं, परन्तु इनका भार पूर्ण अथवा आंशिक तौर पर दूसरे मनुष्यों पर पाया जा सकता है।

(b) प्रगतिशील, आनुपातिक तथा प्रतिगामी कर (Progressive, Proportional and Regressive Tax)

  • प्रगतिशील कर-प्रगतिशील कर वह कर है, जिनमें आय के बढ़ने से कर की दर बढ़ती जाती है, जैसे कि एक लाख रुपये आय वाले को 5% तथा 2 लाख आय वाले व्यक्ति को 10% कर देना पड़े तो यह प्रगतिशील कर है।
  • आनुपातिक कर में आय के बढ़ने से कर की दर समान रहती है।
  • प्रतिगामी कर में आय के बढ़ने से कर की दर घटती जाती है।

(c) मूल्य वृद्धि तथा वज़न अनुसार कर (Advalorem and Specific Tax)

  • मूल्य वृद्धि कर (Value Added Tax)—वह कर है जोकि वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से मूल्य वृद्धि की राशि पर लगाए जाते हैं।
  • वज़न अनुसार कर-वस्तुओं के नाप-तोल पर लगते हैं।

2. गैर-कर राजस्व प्राप्तियां (Non Tax Revenue Receipts)-यह सरकार की आय की वे प्राप्तियां हैं जोकि गैर-कर साधनों से होती हैं, इन प्राप्तियों के मुख्य स्रोत इस प्रकार हैं-
(i) लाभ तथा लाभांश (Profits and Dividends) सरकार ने बहुत से उद्यम जैसे कि बैंक, बीमा कम्पनियां, रेलवे, बिजली पूर्ति इत्यादि स्थापित किए हैं। इनको सार्वजनिक उद्यम कहा जाता है। सरकार को उद्यमों से लाभ प्राप्त होता है। सरकार द्वारा किए गए निवेश पर लाभांश भी मिलता है।

(ii) फ़ीस तथा जुर्माने (Fees and Fines)-सरकार द्वारा प्रदान की सेवाओं के बदले में फ़ीस प्राप्त की जाती है, जैसे कि स्कूलों, अस्पतालों, कचहरी इत्यादि में सुविधा देने के लिए सरकार फ़ीस प्राप्त करती है। कानून भंग करने वाले लोगों पर जुर्माने लगाए जाते हैं, जोकि सरकार की आय का स्रोत होता है।

(iii) विशेष कर (Special Assessment)—सरकार द्वारा सड़कों, पार्क इत्यादि सुविधाएं प्रदान करने से इस क्षेत्र की जायदाद का मूल्य बढ़ जाता है तो सरकार विकास व्यय कर के एवज़ में विशेष कर लगाती है तो इसको विशेष कर कहा जाता है, जोकि सरकार की आय का स्रोत होती है।

(iv) ब्याज (Interest)-सरकार द्वारा दिए ऋण का ब्याज सरकार की आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत होता है।

(v) ग्रान्ट तथा उपहार (Grants and Gifts) सरकार विदेशों से सहायता ग्रान्ट तथा उपहार प्राप्त करती है जोकि गैर कर राजस्व प्राप्ति होती है।

3. पूंजी प्राप्तियां (Capital Receipts)-पूँजी प्राप्तियों से

(i) सरकार की देनदारी उत्पन्न होती है।
(ii) सरकार की परिसम्पत्तियों (भण्डारों) में कमी होती है।

प्रमुख पूंजी प्राप्तियां इस प्रकार हैं –

  • छोटी बचतें (Small Savings)-सरकार डाकखानों में छोटी बचतें, G.P.F., N.S.S., किसान विकास पत्र इत्यादि के रूप में पंजी प्राप्त करती है।
  • उधार (Borrowings)-सरकार देश से उधार लेती है तथा विदेशी सरकारों अथवा अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं I.M.F., विश्व बैंक इत्यादि से उधार प्राप्त करती है। ऐसा राजस्व घाटे को पूरा करने के लिए किया जाता है।
  • ऋण की वसूली (Recovery of Loans) केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों, सार्वजनिक उद्यमों तथा विदेशों को दिए गए ऋण की वसूली द्वारा भी पूँजी प्राप्ति का स्रोत है।
  • विनिवेश (Dis-Investment) सार्वजनिक उद्यम जिनमें सरकार को हानि होती है उनके बिक्री द्वारा प्राप्त होने वाली आय को विनिवेश कहा जाता है। यह भी पूंजी प्राप्ति का एक स्रोत है।

प्रश्न 3.
सरकारी व्यय से क्या अभिप्राय है ? सार्वजनिक व्यय का वर्गीकरण स्पष्ट करो। (What is meant by Government Expenditure. Explain its Classification.)
अथवा
राजस्व तथा पूंजीगत व्यय, योजना तथा गैर-योजना व्यय, विकास तथा गैर-विकास व्यय में अन्तर स्पष्ट करो। (Distinguish between Revenue and Capital Expenditure, Plan and Non-Plan Expenditure, Development and non-development expenditure.)
उत्तर-
सरकारी व्यय का अर्थ (Meaning of Public Expenditure)-सरकारी व्यय से अभिप्राय एक वित्तीय वर्ष में सरकार द्वारा किए गए आनुपातिक व्यय से होता है। सार्वजनिक व्यय द्वारा सरकार लोगों की आर्थिक तथा सामाजिक भलाई में वृद्धि करने का प्रयत्न करती है। इससे आर्थिक उतार-चढ़ाव पर नियन्त्रण किया जाता है। देश के आर्थिक विकास में तेजी लाने के उद्देश्य की पूर्ति की जाती है। इसलिए सरकारी व्यय राष्ट्रीय हित के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर सरकार द्वारा किए गए व्यय से होता है जो कि एक वित्तीय वर्ष में सरकार द्वारा व्यय किया जाता है।

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सरकारी व्यय का वर्गीकरण (Classification of Government Expenditure)-सरकारी व्यय का वर्गीकरण तीन भागों में किया जाता है
1. राजस्व तथा पूंजीगत व्यय (Revenue and Capital Expenditure)
2. योजना तथा गैर-योजना व्यय (Plan and Non-plan Expenditure)
3. विकासवादी तथा गैर विकासवादी व्यय (Development and Non-development Expenditure)

1. राजस्व तथा पूंजीगत व्यय (Revenue and Capital Expenditure)
(a) राजस्व व्यय (Revenue Expenditure)-राजस्व व्यय की दो विशेषताएं होती हैं

  • यह व्यय सरकार के लिए परिसम्पत्तियों का निर्माण नहीं करते
  • इस प्रकार के व्यय से सरकार की देनदारी में कमी नहीं होती। राजस्व व्यय सरकार की उपभोगी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। यह व्यय सरकारी विभागों के संचालन, कर्मचारियों के वेतन, पैंशन इत्यादि पर व्यय किया जाता है

(b) पूँजीगत व्यय (Capital Expenditure)-पूंजीगत व्यय से

  • सरकार परिसम्पत्तियों का निर्माण करती है।
  • यह सरकार की देनदारी में कमी करते हैं। ऐसे व्यय से अर्थव्यवस्था के भण्डार में वृद्धि होती है तथा सरकार की देनदारियों में कमी करता है। सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष में किए गए व्यय जिसके द्वारा नहरें, सड़कें, रेलों इत्यादि का निर्माण होता है, उनको पूंजीगत व्यय कहा जाता है।

2. योजना तथा गैर-योजना व्यय (Plan and Non-Plan Expenditure)-भारत में पंचवर्षीय योजनाएँ चलाई जाती हैं। ग्यारहवीं योजना 1 अप्रैल, 2007 से आरम्भ होकर 31 मार्च, 2012 तक चलीं। अब बारहवीं योजना चल रही है जो 31 मार्च, 2017 को पूरी होगी। प्रत्येक वर्ष योजना का निर्माण करते समय कुछ व्यय का अनुमान लगाया जाता है, जबकि कुछ व्यय गैर-नियोजित होता है।

(a) योजना व्यय (Plan Expenditure)-योजना का निर्माण करते समय रखे गए उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक वर्ष में सरकार द्वारा जो व्यय बजट में निर्धारित किया जाता है, उसको योजना व्यय कहा जाता है। वर्तमान नियोजन अधीन विकासवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जो व्यय सम्बन्धी सुझाव पेश किए जाते हैं, उनको योजना व्यय कहा जाता है। इसमें उपभोग तथा निवेश सम्बन्धी व्यय शामिल होते हैं, जिनको विभिन्न क्षेत्रों, कृषि, उद्योग, यातायात इत्यादि का विकास किया जाता है।

(b) गैर-योजना व्यय (Non-Plan Expenditure)-और-योजना व्यय वह व्यय है, जोकि योजना में व्यय के बिना अन्य कार्य की पूर्ति पर व्यय किया जाता है। गैर-योजना व्यय, योजना व्यय के बगैर शेष सभी व्यय होते हैं। (Non-Plan Expenditure is the expenditure other than the plan expenditure) सरकार को कुछ व्यय सुरक्षा, कानून तथा व्यवस्था अनुदान इत्यादि के रूप में करना पड़ता है, जिससे जनता को सामाजिक सुविधाएं प्रदान की जा सकें। ऐसे व्ययों को गैर-योजना व्यय कहा जाता है।

3. विकास तथा गैर-विकासशील व्यय (Development and Non-Development Expenditure)-
(a) विकास व्यय (Development Expenditure)-देश के आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिए सरकार द्वारा किए गए व्यय को विकास व्यय कहा जाता है। इसमें ग्रामीण, शहरी, कृषि, उद्योगों, सड़कें, नहरें, बिजली, पानी, सेहत सुविधाएँ तथा शिक्षा इत्यादि पर किया गया व्यय शामिल होता है। इसमें रेलें, डाकखानों तथा व्यापारिक उद्यमों के विकास के लिए किया गया व्यय भी शामिल किया जाता है।

(b) गैर-विकासशील व्यय (Non-Development Expenditure)-इसमें सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली साधारण सुविधाओं पर व्यय शामिल होता है, जैसे कि प्रशासन, सेना, पुलिस, ऋण का ब्याज़, बुढ़ापा पेंशन इत्यादि पर किया जाने वाला व्यय शामिल होता है। करों को एकत्रित करने पर व्यय भी गैर
विकासशील व्यय होता है।

सार्वजनिक व्यय का महत्त्व (Importance of Public Expenditure)-वर्तमान में सार्वजनिक व्यय का महत्त्व बढ़ गया है, क्योंकि –

  • सरकार के कार्यों में निरन्तर वृद्धि हो रही है। प्रत्येक राज्य कल्याण के कार्यों में भाग लेता है, इसलिए सार्वजनिक व्यय महत्त्वपूर्ण हो गया है।
  • आर्थिक विकास की वृद्धि के लिए भी सरकारी व्यय महत्त्वपूर्ण होता है। इससे आर्थिक विकास की दर बढ़ जाती है।
  • आर्थिक भलाई के कार्यों में वृद्धि होने के कारण सरकार सड़कें, बिजली, बुढ़ापा पेंशन, सेहत सुविधाएं प्रदान करती हैं।
  • व्यापारिक चक्रों को नियन्त्रण करने के लिए भी सरकारी व्यय का योगदान अधिक है।
  • आय तथा धन के समान वितरण के उद्देश्य की पूर्ति भी सरकारी व्यय से की जाती है।

प्रश्न 4.
सन्तुलित, वृद्धि तथा घाटे के बजट को स्पष्ट करो। इनके गुण तथा अवगुण बताओ। (Explain balanced, deficit or deficit Budgets. Give their relative merits and demerits.)
अथवा
सन्तुलित तथा असन्तुलित बजट में तुलना करो। इनके गुण तथा अवगुण बताओ। (Compare a balanced and unbalanced Budget. Give their merits and demerits.)
उत्तर-
बजट सरकार की वार्षिक अनुमानित प्राप्तियों तथा व्यय का विवरण होता है। (Budget is defined as an annual statement of the estimated receipts and expenditure of the government during a fiscal year)

बजट तीन प्रकार का होता है।

Estimates
1. Revenue = Expenditure Balanced Budget
2. Revenue > Expenditure Surplus Budget
3. Revenue < Expenditure Deficit Budget

1. सन्तुलित बजट (Balanced Budget)-एक सरकारी बजट को सन्तुलित बजट कहा जाता है यदि सरकार की राजस्व तथा पूंजीगत प्राप्तियां, सरकार के राजस्व तथा पूंजीगत व्यय के समान हों। प्राचीन काल में सन्तुलित बजट को अच्छा बजट माना जाता था। जैसे कि अर्थशास्त्र के पिता एड्म स्मिथ (Adam Smith) ने कहा था, “सरकारी व्यय, सरकारी आय से अधिक नहीं होना चाहिए” सरकार जनता के पैसे का प्रयोग अच्छी तरह नहीं कर सकती। व्यक्ति अपनी आय का प्रयोग निजी तौर पर अच्छी तरह कर सकते हैं। इसलिए परम्परागत अर्थशास्त्री सन्तुलित बजट के पक्ष में थे।

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गुण (Merits)-

  • फिजूल व्यय (Wasteful Expenditure)-सरकार द्वारा जो व्यय किया जाता है, उसमें फिजूल व्यय की सम्भावना अधिक होती है। इसलिए फिजूल व्यय से बचने के लिए सन्तुलित बजट अच्छा होता है।
  • वित्तीय स्थिरता (Financial Stability)-सन्तुलित बजट से वित्तीय स्थिरता प्राप्त होती है। वित्तीय साधनों की प्राप्ति पर अधिक ज़ोर नहीं दिया जाता। अवगुण (Demerits)

(i) व्यापारिक चक्रों के लिए अनुचित (Unsuitable for Trade cycles)-व्यापारिक चक्रों के लिए सन्तुलित बजट उचित नहीं क्योंकि मन्दीकाल तथा तेज़ीकाल का हल सन्तुलित बजट द्वारा नहीं किया जा सकता।

(ii) आर्थिक विकास के लिए अनुचित (Unsuitable for Economic Development) अल्प-विकसित देशों के आर्थिक विकास के लिए सन्तुलित बजट उचित नहीं होता। आर्थिक विकास के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है। जब सरकार की प्राप्तियां सरकार के अनुमानित व्यय से अधिक अथवा कम होती हैं तो इस स्थिति को असन्तुलित बजट (Unbalanced Budget) कहते हैं।

असन्तुलित बजट दो प्रकार का हो सकता है
(i) बचत का बजट (Surplus Budget) तथा
(ii) घाटे का बजट (Deficit Budget)

2. बचत का बजट (Surplus Budget)-बचत का बजट वह बजट होता है, जिसमें सरकार की अनुमानित आय सरकार के अनुमानित व्यय से अधिक होती है। इससे अभिप्राय है कि सरकार करों द्वारा अर्थव्यवस्था में से अधिक मुद्रा प्राप्त कर रही है तथा सरकार व्यय द्वारा अर्थव्यवस्था में कम मुद्रा भेज रही है। ऐसी स्थिति में लोगों की मांग कम हो जाएगी तथा मुद्रा स्फीति पर रोक लग जाती है। जब सरकार लोगों की मांग को घटाना चाहती है तो बचत का बजट बनाया जाता है।

गुण (Merits)

  • मुद्रा स्फीति पर नियन्त्रण (Control over Inflation)-यदि देश में कीमत स्तर में तीव्रता से वृद्धि होती है तो बचत के बजट द्वारा मुद्रा स्फीति पर नियन्त्रण पाया जा सकता है।
  • मांग में कमी (Decrease in Demand)-जब देश में मुद्रा स्फीति का कारण मांग में वृद्धि होता है तो मांग में कमी करने के लिए बचत का बजट लाभदायक सिद्ध होता है।

अवगुण (Demerits)

  • मन्दीकाल (Depression) यदि बचत का बजट दीर्घ समय के लिए अपनाया जाता है तो इससे अर्थव्यवस्था में मन्दीकाल की स्थिति उत्पन्न होने का डर उत्पन्न हो जाता है।
  • बेरोज़गारी (Unemployment)-मांग की कमी के कारण देश में बेरोज़गारी फैल जाती है। इसलिए बचत का बजट अन्य कई आर्थिक समस्याओं को जन्म देता है।

3. घाटे का बजट (Deficit Budget)-घाटे का बजट वह बजट है जिसमें सरकार की अनुमानित आय सरकार के अनुमानित व्यय से कम होती है अथवा हम कह सकते हैं कि सरकार का व्यय, सरकार की आय से अधिक हो जाता है तो इसी तरह के बजट को घाटे का बजट कहा जाता है। 1929-30 में अमेरिका में महामन्दी की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। अमेरिका अमीर देश था। वस्तुओं की पूर्ति अधिक थी, परन्तु मांग कम होने के कारण कीमतें तथा लाभ कम हो गए। उत्पादन घटने से बेरोजगारी फैल गई तो प्रो० जे० एम० केन्ज़ ने घाटे के बजट को अपनाने की सिफारिश की थी। आजकल घाटे का बजट अल्प-विकसित देशों में भी अपनाया जाता है।

गुण (Merits)

  • आर्थिक विकास (Economic Growth) अल्पविकसित देशों के आर्थिक विकास की गति तीव्र करने के लिए घाटे का बजट अच्छा होता है।
  • आर्थिक भलाई (Economic Welfare)-सरकार लोगों की आर्थिक भलाई में वृद्धि करना चाहती है तो घाटे के बजट द्वारा भलाई कार्यों पर अधिक व्यय किया जा सकता है।

अवगुण (Demerits)-

  1. फिजूल व्यय (Wasteful Expenditure)-घाटे के बजट द्वारा सरकार द्वारा फिजूल व्यय किया जाता है, इससे देश में भ्रष्टाचार में वृद्धि होती है।
  2. मुद्रा स्फीति (Inflation)-घाटे के बजट द्वारा देश में कीमतों का स्तर तीव्रता से बढ़ने लगता है। कीमतों की वृद्धि से आर्थिक तथा राजनीतिक संकट उत्पन्न होता है।

प्रश्न 5.
घाटे के बजट से क्या अभिप्राय है ? घाटे के बजट की किस्में बताओ। इनका माप कैसे किया जाता है ?
(What is meant by Budget Deficit? Explain the types of Budget deficit. How can these be measured ?)
अथवा
राजस्व घाटे, राजकोषीय घाटे तथा प्राथमिक घाटे से क्या अभिप्राय है ? इसके माप को उदाहरण द्वारा स्पष्ट करो।
(What is meant by Revenue Deficit, Fiscal Deficit and Primary Deficit ? Explain the measurement of these deficits with the help of an example.)
उत्तर–
बजट घाटे से सम्बन्धित चार धारणाएं हैं-

  1. बजट घाटा
  2. राजस्व घाटा
  3. राजकोषीय घाटा
  4. प्राथमिक घाटा।

इनकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है-

1. बजट घाटा (Budget Deficit)-जब सरकार का कुल व्यय अधिक होता है तथा कुल प्राप्तियां कम होती हैं तो इस प्रकार के बजट को घाटे का बजट कहा जाता है। इसमें एक ओर सरकार के कुल व्यय में से राजस्व प्राप्तियां तथा पूंजीगत प्राप्तियों को घटा दिया जाता है तो इनके अन्तर को बजट घाटा कहा जाता है। बजट घाटा कुल व्यय (राजस्व व्यय + पूंजीगत व्यय) (-) कुल प्राप्तियां (राजस्व प्राप्तियां + पूंजी प्राप्तियां) इसलिए बजट घाटा सरकार की कुल व्यय तथा कुल प्राप्तियों का अंतर होता है। (Budget deficit is the excess of government expenditures over the receipts) बजट घाटे को भारत सरकार के 2003-04 के बजट अनुमानों के आंकड़ों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।
Budget Deficit of Centre, State & Union territory. Govt’s as per 2004-05
Budgetary Estimates

No. Item ₹ (in crores)
1. Total outlay (Expenditure) 902287
2. Current Revenue 655618
3.Gap (1-2) 246669
4. Net Capital Receipts 241587
5. Overall Budget Deficit (3-4) 5082

Source: Economic Survey 2005-06

भारत सरकार के बजट 2004-05 अनुसार बजट घाटा ₹ 5082 करोड़ था। कुल व्यय में से कुल प्राप्तियां घटाने से बजट घाटा प्राप्त होता है। कुल प्राप्तियों में चालू आय तथा शुद्ध पूंजी प्राप्तियां शामिल की जाती हैं।

2. राजस्व घाटा (Revenue Deficit)-राजस्व घाटे का सम्बन्ध सरकार के अधिक राजस्व व्यय तथा राजस्व प्राप्तियों के अन्तर से होता है। (The revenue deficit is the excess of government’s revenue expenditure over revenue receipts.) राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियां (Revenue Deficit = Revenue Expenditure – Revenue Receipts) जब किसी देश में राजस्व घाटा होता है तो इसकी पूर्ति पूंजी प्राप्तियों के रूप में उधार लेकर की जाती है जब उधार इस घाटे को पूरा किया जाता है तो सरकार की देनदारी बढ़ जाती है।

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महत्त्व अथवा निहित तत्त्व (Importance or Implications)-

  1. मुद्रा स्फीति (Inflation)-राजस्व घाटे को पूरा करने के लिए उधार प्राप्त किया जाता है। इसलिए देश में मुद्रा स्फीति की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  2. बचतों में कमी (Dis-savings)-सरकार राजस्व घाटे को पूरा करने के लिए भण्डारों की तथा परिसम्पत्तियों की बिक्री करती है। इससे भण्डारों की कमी हो जाती है।
  3. राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit)-राजकोषीय घाटे का अर्थ सरकार के राजस्व तथा पूंजीगत व्यय तथा उधार को छोड़कर राजस्व तथा पूंजीगत प्राप्तियों से होता है। (Fiscal deficit is the excess of total expenditure over the seem of revenue receipts and capital receipts excluding borrowings during a year)

जब सरकार का कुल व्यय कहते हैं तो इसमें राजस्व व्यय + पूंजीगत व्यय शामिल होता है तथा कुल प्राप्तियों में राजस्व प्राप्तियां + पूंजीगत प्राप्ति होती है, पर उधार को छोड़ दिया जाता है।
Fiscal deficit = Total Budget Expenditure – Total Budget Receipts other than borrowings
राजकोषीय घाटा = कुल बजट व्यय – उधार के बिना कुल बजट प्राप्तियाँ उधार पूंजीगत प्राप्तियों का हिस्सा होता है, परन्तु राजकोषीय घाटे में हम राजस्व प्राप्तियों तथा गैर-उधार पूंजीगत प्राप्तियों को शामिल करते हैं।

महत्त्व अथवा निहित तत्त्व (Importance or Implications) –

  1. मुद्रा स्फीति (Inflation) राजकोषीय घाटे का अधिक होना मुद्रा स्फीति का सूचक होता है।
  2. ऋण में अधिक भार (More Burden of Debt)-ऋण तथा ऋण का ब्याज अधिक हो जाता है। इसलिए राजकोषीय घाटे से देश की देनदारी बढ़ जाती है।
  3. विदेशी निर्भरता (Foreign Dependence)-राजकोषीय घाटा अधिक होने से विदेशी ऋण का भार बढ़ जाता है। इसलिए विदेशी निर्भरता बढ़ जाती है।
  4. प्राथमिक घाटा (Primary Deficit)—प्राथमिक घाटा, राजकोषीय घाटे तथा ब्याज भुगतान का अन्तर होता है।

प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान Primary Deficit = Fiscal Deficit – Interest Payments
महत्त्व अथवा छिपे तत्त्व (Importance or Implications) राजकोषीय घाटे में सरकार की उधार आवश्यकताओं तथा ब्याज भुगतान की जानकारी प्राप्त होती है, परन्तु प्राथमिक घाटे में सरकार को व्यय पूरा करने के लिए कितना उधार अनिवार्य है, इसकी जानकारी प्राप्त होती है, पर ब्याज भुगतान को इसमें छोड़ दिया जाता है।

राजस्व घाटे, राजकोषीय घाटे तथा प्राथमिक घाटे का उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण
भारत सरकार का 2005-06 (बजट अनुसार) प्राप्तियां तथा व्यय

₹ करोड़
1. राजस्व प्राप्तियां = 351200
2. राजस्व व्यय = 446512
3. राजस्व घाटा (2-1) = 95312
4. पूंजीगत प्राप्तियां = 163144
5. पूंजीगत व्यय = 67832
6. कुल व्यय (2+5) = 514344
7. ऋण वसूली तथा अन्य प्राप्तियां = 12000
8. राजकोषीय घाटा (6-7-1) = 151144
9. ब्याज भुगतान = 133945
10. प्राथमिक घाटा (8-9) = 17199

Source : Economic Survey 2005-06
पीछे दी सूचना अनुसार

  1. राजस्व घाटा = राजस्व व्यय-राजस्व प्राप्तियां = 351200 – 44612 = ₹ 95312 करोड़
  2. राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – ऋण वसूली तथा अन्य प्राप्तियां – राजस्व प्राप्तियां = 514344 – 12000 – 351200 = ₹ 151144 करोड़
  3. प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान = 151144 – 133945 = ₹ 17199 करोड़

V. संरख्यात्मक प्रश्न (Numericals)

प्रश्न 1.
निम्नलिखित आंकड़ों के अनुसार –
बजट घाटे का माप करो।

मदें ₹ करोड़
(i) कुल व्यय 50,000
(ii) कुल प्राप्तियां 48,000

उत्तर-
बजट घाटा = कुल व्यय – कुल प्राप्तियां
= 50000 – 48000 = ₹ 2000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 2.
निम्नलिखित सूचना के आधार पर बजट घाटे का माप करो-

मदें ₹ करोड़
(i) राजस्व प्राप्तियाँ 80,000
(ii) पूंजीगत प्राप्तियां 45,000
(iii) राजस्व व्यय 10,000
(iv) पूंजीगत व्यय 40,000

उत्तर-
बजट घाटा = (राजस्व व्यय + पूंजीगत व्यय)- (राजस्व प्राप्तियां + पूंजीगत प्राप्तियां)
= (10,0000 + 40,000) — (80,000 + 45000) = 1,40,000 – 1,25000
= ₹ 15,000 करोड़ उत्तर।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित सूचना के आधार पर राजस्व घाटे का माप करो

मदें ₹ करोड़
(i) राजस्व प्राप्तियां 45,000
(ii) राजस्व व्यय 75,000

उत्तर-
राजस्व घाटा = राजस्व व्यय – राजस्व प्राप्तियां
= 75000 – 45000
= ₹30.000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 4.
निम्नलिखित आंकड़ों द्वारा राजकोषीय घाटे का माप करो –

मदें ₹ करोड़
(i) कुल व्यय 50,000
(ii) कुल प्राप्तियां (बगैर उधार के) 40,000

उत्तर –
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – कुल प्राप्तियां (बगैर उधार के)
= 50,000 – 40,000 = ₹ 10,000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 5.
राजकोषीय घाटा बताओ।

मदें ₹ करोड़
(i) कुल व्यय 90,000
(ii) राजस्व प्राप्तियां 50,000
(iii) पूंजीगत प्राप्तियां (बगैर उधार के) 22,000

उत्तर –
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – राजस्व प्राप्तियां – पूंजीगत प्राप्तियां (बगैर उधार के)
= 90,000 – 50000 = 22,000
= ₹ 18,000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 6.
राजकोषीय घाटा ज्ञात करो –

मदें ₹ करोड़
(i) उधार तथा अन्य प्राप्तियां 151144
(ii) ब्याज भुगतान 133945
(iii) ऋण वसूली 12000

उत्तर-
राजकोषीय घाटा = उधार तथा अन्य प्राप्तियाँ
= ₹ 151144 करोड़ उत्तर

प्रश्न 7.
प्राथमिक घाटा ज्ञात करोमदें

मदें ₹ करोड़
(i) राजकोषीय घाटा 10,000
(ii) ब्याज भुगतान 4.000

उत्तर –
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज भुगतान = 10,000 – 4000 = ₹ 6,000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 8.
प्राथमिक घाटा ज्ञात करें –

मदें ₹ करोड़
(i) कुल व्यय 90,000
(ii) कुल प्राप्तियां (बगैर उधार के) 70,000
(iii) सरकार द्वारा व्याज का भुगतान 10,000

उत्तर-
प्राथमिक घाटा = कुल व्यय – कुल प्राप्तियाँ (बगैर व्याज के) – सरकार द्वारा व्याज का भुगतान = 90,000 – 70,000 – 10,000 = ₹ 10,000 करोड़ उत्तर

PSEB 12th Class Economics Solutions Chapter 14 सरकारी बजट तथा अर्थव्यवस्था

प्रश्न 9.
सरकार द्वारा ब्याज भुगतान ज्ञात करें –

मदें ₹ करोड़
(i) राजकोषीय घाटा 50,000
(ii) प्राथमिक घाटा 41,000

उत्तर-
सरकार द्वारा ब्याज का भुगतान  = राजकोषीय घाटा (-) प्राथमिक घाटा।
= 50,000 – 41,000 = ₹ 9,000 करोड़ उत्तर

प्रश्न 10.
सरकार के बजट में प्राथमिक घाटा ₹ 4400 करोड़ रुपए है ब्याज भुगतान पर खर्च ₹ 400 करोड़ है, राजकोषीय घाटा ज्ञात करें-
उत्तर-
राजकोषीय घाटा = प्राथमिक घाटा + ब्याज भुगतान
= 4400 + 400 = ₹ 4800 करोड़ उत्तर

PSEB 12th Class History Map Questions

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Map Questions Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB 12th Class History Map Questions

ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ (Battles of Guru Gobind Singh Ji:)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 1.
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀਆਂ ਪੂਰਵ-ਖ਼ਾਲਸਾ ਕਾਲ ਅਤੇ ਉੱਤਰ-ਖ਼ਾਲਸਾ ਕਾਲ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਦਿਖਾਏ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਆਖਿਆਤਮਕ ਨੋਟ ਲਿਖੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show the four places of battles of the Pre-Khalsa and Post-Khalsa period of Guru Gobind Singh.
(b) Write an explanatory note in about 20-25 words each on these battles.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੁਆਰਾ ਲੜੀਆਂ ਗਈਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਚਾਰ ਮੁੱਖ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਭਰੇ ਹੋਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਉੱਤੇ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਆਖਿਆਤਮਿਕ | ਨੋਟ ਲਿਖੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show the four important places of Guru Gobind Singh Ji’s battles.
(b) Write an explanatory note in about 20-25 words each on the battles as shown in the map.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਉੱਤੇ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਆਖਿਆਤਮਕ ਟਿੱਪਣੀ ਕਰੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show four important places where the battles of Guru Gobind Singh Ji were fought.
(b) Write an explanatory note in about 20-25 words each on these battles.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਭਰੋ-
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show four places of Guru Gobind Singh Ji’s battles.
(b) Explain in about 20-25 words each the places given in the map.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਵਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਦਿਓ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show four places of the battles of Guru Gobind Singh Ji.
(b) Explain these places in about 20-25 words on each.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਨਦੀਆਂ ਦਰਸਾਉਂਦੇ ਹੋਏ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਦਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਦਿਖਾਏ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ ।
(a) On the given outline map of Punjab showing the rivers depict four places of the battles of Sri Guru Gobind Singh Ji.
(b) Write an explanatory note in about 20-25 words each on the places of the battles shown in the map.)
ਉੱਤਰ-
ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਗੁਰਗੱਦੀ ਕਾਲ ਵਿੱਚ ਪਹਾੜੀ ਰਾਜਿਆਂ ਅਤੇ ਮੁਗ਼ਲਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਲੜਨਾ ਪਿਆ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੁਆਰਾ ਪੁਰਵ-ਖ਼ਾਲਸਾ ਕਾਲ ਅਤੇ ਉੱਤਰ ਖ਼ਾਲਸਾ ਕਾਲ ਵਿੱਚ ਲੜੀਆਂ ਗਈਆਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈਆਂ ਦਾ ਸੰਖੇਪ ਵਰਣਨ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਅਨੁਸਾਰ ਹੈ-

I. ਪੂਰਵ-ਖ਼ਾਲਸਾ ਕਾਲ ਦੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ (Battles of Pre-Khalsa Period)

1. ਭੰਗਾਣੀ ਦੀ ਲੜਾਈ 1688 ਈ. (Battle of Bhangani 1688 A.D.) – ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀਆਂ ਫ਼ੌਜੀ ਤਿਆਰੀਆਂ ਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਕਹਿਲੂਰ ਦੇ ਸ਼ਾਸਕ ਭੀਮ ਚੰਦ ਅਤੇ ਸ੍ਰੀਨਗਰ ਦੇ ਸ਼ਾਸਕ ਫ਼ਤਿਹ ਸ਼ਾਹ ਨੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਇੱਕ ਗਠਜੋੜ ਤਿਆਰ ਕਰ ਲਿਆ । 22 ਸਤੰਬਰ, 1688 ਈ. ਵਾਲੇ ਦਿਨ ਪਹਾੜੀ ਰਾਜਿਆਂ ਨੇ ਭੰਗਾਣੀ ਵਿਖੇ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀ ਫ਼ੌਜ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਢੋਰਾ ਦੇ ਪੀਰ ਬੁੱਧੂ ਸ਼ਾਹ ਨੇ ਆਪਣੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ਸਮੇਤ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦਾ ਸਾਥ ਦਿੱਤਾ । ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਜੋਸ਼ ਅੱਗੇ ਪਹਾੜੀ ਰਾਜੇ ਨਾ ਟਿਕ ਸਕੇ । ਉਹ ਮੈਦਾਨ ਛੱਡ ਕੇ ਭੱਜਣ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਹੋ ਗਏ । ਇਸ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਜਿੱਤ ਨਾਲ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਹੌਸਲੇ ਬਹੁਤ ਵੱਧ ਗਏ ।

2. ਨਾਦੌਣ ਦੀ ਲੜਾਈ 1690 ਈ. (Battle of Nadaun 1690 A.D.) – ਭੰਗਾਣੀ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਹਾਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਪਹਾੜੀ ਰਾਜਿਆਂ ਨੇ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਨਾਲ ਮਿੱਤਰਤਾ ਕਰ ਲਈ ।ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮੁਗਲਾਂ ਨੂੰ ਸਾਲਾਨਾ ਖਿਰਾਜ ਕਰ ਭੇਜਣਾ ਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਆਲਿਫ਼ ਖ਼ਾਂ ਦੇ ਅਧੀਨ ਇੱਕ ਫ਼ੌਜ ਪਹਾੜੀ ਰਾਜਿਆਂ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਭੇਜੀ ਗਈ । ਉਸ ਨੇ 20 ਮਾਰਚ, 1690 ਈ. ਨੂੰ ਪਹਾੜੀ ਰਾਜਿਆਂ ਦੇ ਨੇਤਾ ਭੀਮ ਚੰਦ ਦੀ ਸੈਨਾ ‘ਤੇ ਨਾਦੌਨ ਵਿਖੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਨੇ ਭੀਮ ਚੰਦ ਦਾ ਸਾਥ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਸਾਂਝੀ ਫ਼ੌਜ ਨੇ ਮੁਗ਼ਲ ਫ਼ੌਜ ਨੂੰ ਹਰਾ ਦਿੱਤਾ | ਆਲਿਫ਼ ਖ਼ਾਂ ਨੂੰ ਲੜਾਈ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿੱਚੋਂ ਨੱਸਣਾ ਪਿਆ |
PSEB 12th Class History Map Questions 1
II. ਉੱਤਰ-ਖ਼ਾਲਸਾ ਕਾਲ ਦੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ (Battles of Post-Khalsa Period)

3. ਸ੍ਰੀ ਆਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਲੜਾਈ 1701 ਈ. (First Battle of Sri Anandpur Sahib 1701 A.D.) – 1699 ਈ. ਵਿੱਚ ਖ਼ਾਲਸਾ ਪੰਥ ਦੀ ਸਿਰਜਨਾ ਦੇ ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਲੋਕ ਸਿੱਖ ਪੰਥ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਣ ਲੱਗੇ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੀ ਇਸ ਵਧਦੀ ਹੋਈ ਸ਼ਕਤੀ ਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਕਹਿਰ ਦੇ ਰਾਜਾ ਭੀਮ ਚੰਦ ਨੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਸ੍ਰੀ ਆਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਕਿਲ੍ਹਾ ਖ਼ਾਲੀ ਕਰਨ ਲਈ ਕਿਹਾ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਇਨਕਾਰ ਕਰਨ ‘ਤੇ ਭੀਮ ਚੰਦ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਸਾਥੀ ਪਹਾੜੀ ਰਾਜਿਆਂ ਨੇ 1701 ਈ. ਵਿੱਚ ਸ੍ਰੀ ਆਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਕਿਲੇ ਉੱਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਪਰ ਸਫਲਤਾ ਨਾ ਮਿਲਣ ਕਾਰਨ ਰਾਜਿਆਂ ਨੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨਾਲ ਸੰਧੀ ਕਰ ਲਈ ।

4. ਸ੍ਰੀ ਆਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਦੂਜੀ ਲੜਾਈ 1704 ਈ. (Second Battle of Sri Anandpur Sahib 1704 A.D.) – ਪਹਾੜੀ ਰਾਜੇ ਗੁਰੁ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਤੋਂ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਦੇ ਅਪਮਾਨ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਸਨ । ਇਸ ਉਦੇਸ਼ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮੁਗ਼ਲਾਂ ਫ਼ੌਜਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲ ਕੇ 1704 ਈ. ਵਿੱਚ ਸ੍ਰੀ ਆਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ‘ਤੇ ਦੁਸਰੀ ਵਾਰ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਦੇ ਅੰਦਰੋਂ ਇਸ ਫ਼ੌਜ ਦਾ ਡਟ ਕੇ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕੀਤਾ । ਘੇਰਾ ਲੰਬਾ ਹੋ ਜਾਣ ਕਾਰਨ ਕਿਲ੍ਹੇ ਦੇ ਅੰਦਰ ਰਸਦ ਥੁੜਨੀ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਈ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਕੁਝ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਕਿਲ੍ਹੇ ਵਿੱਚੋਂ ਭੱਜ ਨਿਕਲਣ ਦੀ ਬੇਨਤੀ ਕੀਤੀ । ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਇਨਕਾਰ ਕਰਨ ‘ਤੇ 40 ਸਿੱਖ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦਾ ਸਾਥ ਛੱਡ ਕੇ ਚਲੇ ਗਏ । ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਸਫਲਤਾ ਨਾ ਮਿਲਦੀ ਵੇਖ ਕੇ ਸ਼ਾਹੀ ਫ਼ੌਜਾਂ ਨੇ ਇੱਕ ਚਾਲ ਚੱਲੀ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਝੂਠੀਆਂ ਕਸਮਾਂ ਖਾ ਕੇ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੂੰ ਇਹ ਕਿਹਾ ਕਿ ਜੇਕਰ ਉਹ ਕਿਲ੍ਹਾ ਛੱਡ ਦੇਣ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਕਿਹਾ ਜਾਵੇਗਾ । ਇਸ ਲਈ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੇ ਕਿਲ੍ਹਾ ਛੱਡਣ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ ।

5. ਸ਼ਾਹੀ ਟਿੱਬੀ ਦੀ ਲੜਾਈ 1704 ਈ. (Battle of Shahi Tibbi 1704 A.D.) – ਜਿਵੇਂ ਹੀ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਨੇ ਸ੍ਰੀ ਆਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਨੂੰ ਖ਼ਾਲੀ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਸ਼ਾਹੀ ਫ਼ੌਜਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ‘ਤੇ ਟੁੱਟ ਪਈਆਂ । ਸਿੱਟੇ ਵੱਜੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਭਗਦੜ ਮਚ ਗਈ । ਸ਼ਾਹੀ ਟਿੱਬੀ ਵਿਖੇ ਹੋਈ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਭਾਈ ਉਧੈ ਸਿੰਘ ਨੇ ਆਪਣੇ 50 ਸਿੱਖਾਂ ਨਾਲ ਸ਼ਾਹੀ ਫ਼ੌਜਾਂ ਦਾ ਡਟ ਕੇ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਅੰਤ ਸ਼ਹੀਦੀਆਂ ਪਾ ਗਏ ।

6. ਚਮਕੌਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਲੜਾਈ 1704 ਈ. (Battle of Chamkaur Sahib 1704 A.D.) – ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਆਪਣੇ 40 ਸਿੱਖਾਂ ਨਾਲ 21 ਦਸੰਬਰ, 1704 ਈ. ਨੂੰ ਚਮਕੌਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਗੜ੍ਹੀ ਵਿੱਚ ਪਹੁੰਚੇ । ਇੱਥੇ 22 ਦਸੰਬਰ, 1704 ਈ. ਨੂੰ ਮੁਗ਼ਲ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਘੇਰਾ ਪਾ ਲਿਆ । ਇੱਥੇ ਬੜੀ ਘਮਸਾਨ ਦੀ ਲੜਾਈ ਹੋਈ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੇ ਦੋ ਵੱਡੇ ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦਿਆਂ ਅਜੀਤ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਜੁਝਾਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਬਹਾਦਰੀ ਦੇ ਉਹ ਜੌਹਰ ਵਿਖਾਏ ਕਿ ਮੁਗ਼ਲ ਹੈਰਾਨ ਰਹਿ ਗਏ । ਉਹ ਅੰਤ ਲੜਦੇ-ਲੜਦੇ ਸ਼ਹੀਦ ਹੋ ਗਏ । ਗੁਰੁ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਇੱਥੋਂ ਬਚ ਨਿਕਲਣ ਵਿੱਚ ਸਫਲ ਹੋ ਗਏ ।

7. ਖਿਦਰਾਣਾ ਦੀ ਲੜਾਈ 1705 ਈ. (Battle of Khidrana 1705 A.D.) – 29 ਦਸੰਬਰ, 1705 ਈ. ਨੂੰ ਸਰਹਿੰਦ ਦੇ ਮੁਗ਼ਲ ਫ਼ੌਜਦਾਰ ਵਜ਼ੀਰ ਖਾਂ ਨੇ ਖਿਦਰਾਣਾ ਵਿਖੇ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀ ਫ਼ੌਜ ਉੱਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਅਦੁੱਤੀ ਬਹਾਦਰੀ ਦੇ ਸਬੂਤ ਦਿੱਤੇ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ 40 ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਜੋ ਸ੍ਰੀ ਆਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਦੂਜੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਜੀ ਦਾ ਸਾਥ ਛੱਡ ਗਏ ਹਨ, ਨੇ ਸ਼ਹੀਦੀਆਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੀਆਂ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਕੁਰਬਾਨੀ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਨੇਤਾ ਮਹਾਂ ਸਿੰਘ ਦੀ ਬੇਨਤੀ ਦੇ ਕਾਰਨ ਗੁਰੂ ਜੀ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮੁਕਤੀ ਦਾ ਵਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਖਿਦਰਾਣਾ ਦਾ ਨਾਂ ਸ੍ਰੀ ਮੁਕਤਸਰ ਸਾਹਿਬ ਪੈ ਗਿਆ । ਇਹ ਲੜਾਈ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਅਤੇ ਮੁਗ਼ਲਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਲੜੀ ਜਾਣ ਵਾਲੀ ਆਖਰੀ ਲੜਾਈ ਸੀ ।

PSEB 12th Class History Map Questions

ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੀਆਂ ਮਹਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈਆਂ (Important Battles of Banda Singh Bahadur)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 2.
(ੳ) ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੇ ਸੈਨਿਕ ਕਾਰਨਾਮਿਆਂ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਦਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਦਿਖਾਏ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਖਿਆਤਮਕ ਨੋਟ ਲਿਖੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show the four places of military exploits of Banda Singh Bahadur.
(b) Write an explanatory note on each in about 20-25 words on the places of battles shown in the map.
ਜਾਂ
(ੳ) ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਹੋਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਉੱਤੇ ਲਗਭਗ 20-25 ਸਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਆਖਿਆਤਮਕ ਟਿੱਪਣੀ ਕਰੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, fill places of four important battles of Banda Singh Bahadur.
(b) Write an explanatory note on each in about 20-25 words on the places shown in the map.
ਜਾਂ
(ਉ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੀਆਂ ਜਿੱਤਾਂ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਖਿਆਤਮਕ ਟਿੱਪਣੀ ਕਰੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show four places of the battles ‘ of Banda Singh Bahadur.
(b) Write an explanatory note on each in about 20-25 words on the places shown in the map.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੀਆਂ ਸੈਨਿਕ ਮੁਹਿੰਮਾਂ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਵਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਦਿਓ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show four places of military exploits of Banda Singh Bahadur.
(b) Explain these places in about 20-25 words each.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਨਦੀਆਂ ਦਰਸਾਉਂਦੇ ਹੋਏ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਦਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਦਿਓ ।
(a) On the given outline map of Punjab showing the rivers depict the four battle places of Banda Singh Bahadur.
(b) Write an explanatory note on each in about 20-25 words on the places of the battle shown in the map.
ਉੱਤਰ-
ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ 1709 ਈ. ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਤੋਂ ਅਸ਼ੀਰਵਾਦ ਲੈ ਕੇ ਨੰਦੇੜ ਤੋਂ ਪੰਜਾਬ ਲਈ ਰਵਾਨਾ ਹੋਇਆ । ਉਸ ਨੇ ਮੁਗ਼ਲਾਂ ਨੂੰ ਅਜਿਹਾ ਸਬਕ ਸਿਖਾਇਆ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਦਿਨੇ ਤਾਰੇ ਨਜ਼ਰ ਆ ਗਏ । ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੀਆਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈਆਂ ਦਾ ਵੇਰਵਾ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਅਨੁਸਾਰ ਹੈ :-

1. ਸੋਨੀਪਤ ਉੱਤੇ ਹਮਲਾ (Attack on Sonepat) – ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੇ ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਨਵੰਬਰ, 1709 ਈ. ਵਿੱਚ 500 ਸਿੱਖਾਂ ਨਾਲ ਸੋਨੀਪਤ ਉੱਤੇ ਹਮਲਾ ਕੀਤਾ | ਸੋਨੀਪਤ ਦਾ ਫ਼ੌਜਦਾਰ ਬਿਨਾਂ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕੀਤੇ ਦਿੱਲੀ ਵੱਲ ਭੱਜ ਗਿਆ । ਇਸ ਜਿੱਤ ਨਾਲ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਹੌਸਲੇ ਬਹੁਤ ਵੱਧ ਗਏ ।

2. ਸਮਾਣਾ ਦੀ ਜਿੱਤ (Conquest of Samana) – ਸਮਾਣਾ ਵਿਖੇ ਗੁਰੂ ਤੇਗ਼ ਬਹਾਦਰ ਜੀ ਨੂੰ ਅਤੇ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੇ ਦੋ ਛੋਟੇ ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦਿਆਂ ਨੂੰ ਸ਼ਹੀਦ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਜੱਲਾਦ ਰਹਿੰਦੇ ਸਨ । ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੇ ਸਮਾਣਾ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰਕੇ ਅਨੇਕਾਂ ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਦਾ ਕਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਹ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਜਿੱਤ ਸੀ ।

3. ਕਪੂਰੀ ਦੀ ਜਿੱਤ (Conquest of Kapuri) – ਕਪੂਰੀ ਦਾ ਸ਼ਾਸਕ ਕਦਮਉੱਦੀਨ ਹਿੰਦੂਆਂ ਨਾਲ ਬਹੁਤ ਮਾੜਾ ਵਿਵਹਾਰ ਕਰਦਾ ਸੀ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੇ ਕਪੂਰੀ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰਕੇ ਕਦਮਉੱਦੀਨ ਨੂੰ ਮੌਤ ਦੇ ਘਾਟ ਉਤਾਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਪੂਰੀ ’ਤੇ ਜਿੱਤ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੀ ਗਈ ।

4. ਸਢੋਰਾ ਦੀ ਜਿੱਤ (Conquest of Sadhaura) – ਸਢੌਰਾ ਦਾ ਸ਼ਾਸਕ ਉਸਮਾਨ ਖ਼ਾ ਬੜਾ ਜ਼ਾਲਮ ਸੀ । ਉਸ ਨੇ ਪੀਰ ਬੁੱਧੂ ਸ਼ਾਹ ਨੂੰ ਇਸ ਲਈ ਤਸੀਹੇ ਦੇ ਕੇ ਕਤਲ ਕਰਵਾ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਕਿਉਂਕਿ ਉਸ ਨੇ ਭੰਗਾਣੀ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਕੀਤੀ ਸੀ । ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੇ ਸਢੋਰਾ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਨੂੰ ਕਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਇਸ ਸਥਾਨ ਦਾ ਨਾਂ ਕਤਲਗੜੀ ਪੈ ਗਿਆ ।

5. ਸਰਹਿੰਦ ਦੀ ਜਿੱਤ (Conquest of Sirhind) – ਸਰਹਿੰਦ ਦੇ ਫ਼ੌਜਦਾਰ ਵਜ਼ੀਰ ਖਾਂ ਨੇ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦੇ ਦੋ ਛੋਟੇ ਸਾਹਿਬਜ਼ਾਦਿਆਂ ਜ਼ੋਰਾਵਰ ਸਿੰਘ ਤੇ ਫ਼ਤਿਹ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਕੰਧ ਵਿੱਚ ਜ਼ਿੰਦਾ ਚਿਣਵਾ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਇਸ ਅਪਮਾਨ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣ ਲਈ 12 ਮਈ, 1710 ਈ. ਨੂੰ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੇ ਚੱਪੜਚਿੜੀ ਦੇ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਵਜ਼ੀਰ ਖਾਂ ਦੀਆਂ ਫ਼ੌਜਾਂ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਹਮਲੇ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਦੇ ਵਾਧੂ ਆਹੂ ਲਾਹੇ । ਵਜ਼ੀਰ ਖਾਂ ਨੂੰ ਯਮਲੋਕ ਪਹੁੰਚਾ ਕੇ ਉਸ ਦੀ ਲਾਸ਼ ਨੂੰ ਦਰੱਖ਼ਤ ਨਾਲ ਲਟਕਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਇਸ ਜਿੱਤ ਕਾਰਨ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਹੌਸਲੇ ਬਹੁਤ ਵੱਧ ਗਏ ।

6. ਰਾਹੋਂ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Rahon) – ਜਲੰਧਰ ਦੇ ਫ਼ੌਜਦਾਰ ਸ਼ਮਸ ਖ਼ਾਂ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਜ਼ਿਹਾਦ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ | ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਤੋਂ ਸਹਾਇਤਾ ਮੰਗੀ | ਅਕਤੂਬਰ, 1710 ਈ.
PSEB 12th Class History Map Questions 2
ਵਿੱਚ ਰਾਹੋਂ ਦੇ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਅਤੇ ਸ਼ਮਸ ਖ਼ਾਂ ਦੀਆਂ ਫ਼ੌਜਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਹੋਈ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਜੇਤੂ ਰਹੇ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਸਾਰੇ ਜਲੰਧਰ ਦੁਆਬ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ ।

7. ਮੁਗ਼ਲਾਂ ਦਾ ਲੋਹਗੜ੍ਹ ’ਤੇ ਹਮਲਾ Attack of Mughals on Lohgarh) – ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੀ ਵਧਦੀ ਹੋਈ ਸ਼ਕਤੀ ਨੂੰ ਦੇਖਦੇ ਹੋਏ ਮੁਗ਼ਲ ਬਾਦਸ਼ਾਹ ਬਹਾਦਰ ਸ਼ਾਹ ਨੇ ਮੁਨੀਮ ਖ਼ਾਂ ਅਧੀਨ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਫ਼ੌਜ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੂੰ ਕੁਚਲਣ ਲਈ ਭੇਜੀ । ਇਸ ਫ਼ੌਜ ਨੇ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੂੰ ਉਸ ਦੀ ਰਾਜਧਾਨੀ ਲੋਹਗੜ੍ਹ ਵਿਖੇ ਅਚਾਨਕ ਘੇਰ ਲਿਆ । ਕੁਝ ਦਿਨਾਂ ਤਕ ਮੁਗ਼ਲਾਂ ਨਾਲ ਡਟ ਕੇ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਨ ਮਗਰੋਂ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਕਿਲ੍ਹੇ ਵਿੱਚੋਂ ਬਚ ਨਿਕਲਣ ਵਿੱਚ ਕਾਮਯਾਬ ਹੋ ਗਿਆ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮੁਗ਼ਲ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਨਾ ਕਰ ਸਕੇ ।

8. ਗੁਰਦਾਸ ਨੰਗਲ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Gurdas Nangal) – ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੇ 1715 ਈ. ਵਿੱਚ ਬਹਿਰਾਮਪੁਰ, ਬਟਾਲਾ ਤੇ ਕਲਾਨੌਰ ਦੇ ਦੇਸ਼ਾਂ ‘ਤੇ ਦੁਬਾਰਾ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ । ਇਸ ‘ਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਨਵੇਂ ਬਣੇ ਸੂਬੇਦਾਰ ਅਬਦੁਸ ਸਮਦ ਖ਼ਾਂ ਨੇ ਗੁਰਦਾਸ ਨੰਗਲ ਦੇ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਉੱਤੇ ਅਚਾਨਕ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੁਨੀ ਚੰਦ ਦੀ ਹਵੇਲੀ ਵਿੱਚ ਘਿਰ ਗਿਆ । ਇਹ ਘੇਰਾ 8 ਮਹੀਨਿਆਂ ਤਕ ਚਲਦਾ ਰਿਹਾ । ਅੰਤ ਮਜਬੂਰ ਹੋ ਕੇ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਮੰਨਣੀ ਪਈ । 9 ਜੂਨ, 1716 ਈ. ਨੂੰ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਨੂੰ ਦਿੱਲੀ ਵਿਖੇ ਸ਼ਹੀਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ।

PSEB 12th Class History Map Questions

ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦਾ ਸਾਮਰਾਜ (Kingdom of Maharaja Ranjit Singh)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 3.
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ ਚਾਰ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਸਥਾਨ ਦਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਭਰੀ ਹਰੇਕ ਲੜਾਈ ਸੰਬੰਧੀ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਆਖਿਆਤਮਕ ਨੋਟ ਲਿਖੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show four important places of battles of Maharaja Ranjit Singh.
(b) Write an explanatory note in about 20-25 words on each battles.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੁਆਰਾ ਲੜੀਆਂ ਗਈਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਨਾਲ ਸੰਬੰਧਿਤ ਕੋਈ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਹੋਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਿਆਖਿਆਤਮਕ ਟਿੱਪਣੀ ਲਿਖੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show four places where Maharaja Ranjit Singh fought battles.
(b) Write an explanatory note on each in about 20-25 words on these battles.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ ਜਿੱਤਾਂ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਵਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਕਰੋ ।
(a) On the given outline map of Punjab, show four places of the battles of Maharaja Ranjit Singh.
(b) Explain these places in about 20-25 words each.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਨਦੀਆਂ ਦਰਸਾਉਂਦੇ ਹੋਏ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਦਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਕਰੋ ।
PSEB 12th Class History Map Questions 3
(a) On the given outline map of Punjab showing the rivers depict the four places of battles of Maharaja Ranjit Singh.
(b) Write an explanatory note in about 20-25 words eacg on the places of the battles shown in the map.
ਉੱਤਰ-
ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਇੱਕ ਮਹਾਨ ਜੇਤੁ ਸੀ । ਉਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਸ਼ਾਸਨ ਕਾਲ (1797-1839) ਦੇ ਦੌਰਾਨ ਇਸ ਵਿਸ਼ਾਲ ਸਾਮਰਾਜ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਕੀਤੀ । ਉਸ ਦੀਆਂ ਮੁੱਖ ਜਿੱਤਾਂ ਦਾ ਵਰਣਨ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਅਨੁਸਾਰ ਹੈ-

1. ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਜਿੱਤ 1799 ਈ. (Conquest of Lahore 1799 A.D.) – ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲੀ ਜਿੱਤ ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੀ । ਇੱਥੇ ਤਿੰਨ ਭੰਗੀ ਸਰਦਾਰਾਂ-ਸਾਹਿਬ ਸਿੰਘ, ਮੋਹਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਚੇਤ ਸਿੰਘ ਦਾ ਰਾਜ ਸੀ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਅੱਤਿਆਚਾਰਾਂ ਕਾਰਨ ਇੱਥੋਂ ਦੀ ਪਰਜਾ ਬੜੀ ਦੁਖੀ ਸੀ । ਉਸ ਨੇ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਲਾਹੌਰ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦਿੱਤਾ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਲਾਹੌਰ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਉਸ ਨੇ 7 ਜੁਲਾਈ, 1799 ਈ. ਨੂੰ ਲਾਹੌਰ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ ।

2. ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੀ ਜਿੱਤ 1805 ਈ. (Conquest of Amritsar 1805 A.D.) – ਧਾਰਮਿਕ ਪੱਖ ਤੋਂ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਮੱਕਾ ਸਮਝਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਇਹ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਵਪਾਰਿਕ ਕੇਂਦਰ ਵੀ ਸੀ । ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਹਾਰਾਜਾ । ਬਣਨ ਲਈ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਲਈ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੀ । 1805 ਈ. ਨੂੰ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਕੇ ਗੁਲਾਬ ਸਿੰਘ ਦੀ ਵਿਧਵਾ ਮਾਈ ਸੁੱਖਾਂ ਨੂੰ ਹਰਾ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਨੂੰ ਲਾਹੌਰ ਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ।

3. ਕਸੂਰ ਦੀ ਜਿੱਤ 1807 ਈ. (Conquest of Kasur 1807 A.D.) – ਕਸੂਰ ਦੇ ਸ਼ਾਸਕ ਕੁਤਬ-ਉਦ-ਦੀਨ ਨੇ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਅਧੀਨਤਾ ਨੂੰ ਮੰਨਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ 1807 ਈ. ਵਿੱਚ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਕਸੂਰ ’ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰਕੇ ਕੁਤਬ-ਉਦ-ਦੀਨ ਨੂੰ ਹਰਾ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਕਸੂਰ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ ।

4. ਕਾਂਗੜਾ ਦੀ ਜਿੱਤ 1809 ਈ. (Conquest of Kangra 1809 A.D.) – 1809 ਈ. ਵਿੱਚ ਕਾਂਗੜਾ ਦੇ ਸ਼ਾਸਕ ਸੰਸਾਰ ਚੰਦ ਕਟੋਚ ਨੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਤੋਂ ਗੋਰਖਿਆਂ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਸਹਾਇਤਾ ਮੰਗੀ । ਇਸ ਦੇ ਬਦਲੇ ਉਸ ਨੇ ਕਾਂਗੜਾ ਦਾ ਕਿਲ੍ਹਾ ਦੇਣ ਦਾ ਵਚਨ ਦਿੱਤਾ । ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਫ਼ੌਜ ਨੇ ਗੋਰਖਿਆਂ ਨੂੰ ਹਰਾ ਦਿੱਤਾ | ਪਰ ਹੁਣ ਸੰਸਾਰ ਚੰਦ ਨੇ ਕਿਲਾ ਦੇਣ ਵਿੱਚ ਕੁਝ ਟਾਲ-ਮਟੋਲ ਕੀਤੀ । ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਉਸ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਅਨੁਰੋਧ ਨੂੰ ਕੈਦ ਕਰ ਲਿਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਉਸ ਨੇ ਮਜਬੂਰ ਹੋ ਕੇ ਕਿਲ੍ਹਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਹਵਾਲੇ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।

5. ਮੁਲਤਾਨ ਦੀ ਜਿੱਤ 1818 ਈ. (Conguest of Multan 1818 A.D.) – ਮੁਲਤਾਨ ਸ਼ਹਿਰ ਵਪਾਰਿਕ ਅਤੇ ਭੁਗੋਲਿਕ ਪੱਖ ਤੋਂ ਬੜਾ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸੀ । ਇਸ ਨੂੰ ਜਿੱਤਣ ਲਈ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ 7 ਵਾਰ ਹਮਲੇ ਕੀਤੇ । ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਸ਼ਾਸਕ ਮੁਜੱਫਰ ਖ਼ਾਂ ਹਰ ਵਾਰੀ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਭਾਰੀ ਨਜ਼ਰਾਨਾ ਦੇ ਕੇ ਟਾਲ ਦਿੰਦਾ ਰਿਹਾ । 1818 ਈ. ਵਿੱਚ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਫ਼ੌਜ ਮਿਸਰ ਦੀਵਾਨ ਚੰਦ ਦੇ ਅਧੀਨ ਭੇਜੀ । ਘਮਸਾਨ ਦੇ ਯੁੱਧ ਮਗਰੋਂ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ ਫ਼ੌਜਾਂ ਨੇ ਮੁਲਤਾਨ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ ।

6. ਕਸ਼ਮੀਰ ਦੀ ਜਿੱਤ 1819 ਈ. (Conquest of Kashmir 1819 A.D.) – ਕਸ਼ਮੀਰ ਦੀ ਘਾਟੀ ਆਪਣੀ ਸੁੰਦਰਤਾ ਅਤੇ ਵਪਾਰ ਕਾਰਨ ਬੜੀ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਸੀ । ਮੁਲਤਾਨ ਦੀ ਜਿੱਤ ਤੋਂ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਬੜਾ ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਹੋਇਆ । ਇਸ ਲਈ ਉਸ ਨੇ 1819 ਈ. ਵਿੱਚ ਮਿਸਰ ਦੀਵਾਨ ਚੰਦ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਫ਼ੌਜ ਕਸ਼ਮੀਰ ਨੂੰ ਜਿੱਤਣ ਲਈ ਭੇਜੀ । ਇਸ ਫ਼ੌਜ ਨੇ ਕਸ਼ਮੀਰ ਦੇ ਸ਼ਾਸਕ ਜ਼ਬਰ ਖਾਂ ਨੂੰ ਹਰਾ ਕੇ ਕਸ਼ਮੀਰ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ ।

7. ਪਿਸ਼ਾਵਰ ਦੀ ਜਿੱਤ 1834 ਈ. (Conquest of Peshawar 1834 A.D.) – ਪਿਸ਼ਾਵਰ ਦਾ ਇਲਾਕਾ ਭੂਗੋਲਿਕ ਪੱਖ ਤੋਂ ਬੜਾ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸੀ । 1823 ਈ. ਵਿੱਚ ਅਫ਼ਗਾਨਿਸਤਾਨ ਦੇ ਵਜ਼ੀਰ ਮੁਹੰਮਦ ਆਜ਼ਿਮ ਸ਼ਾਂ ਨੇ ਪਿਸ਼ਾਵਰ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ । ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਉਸ ਨੂੰ ਨੌਸ਼ਹਿਰਾ ਵਿਖੇ ਹੋਈ ਇੱਕ ਘਮਸਾਨ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਹਰਾ ਕੇ ਪਿਸ਼ਾਵਰ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ । ਪਿਸ਼ਾਵਰ ਨੂੰ 1834 ਈ. ਵਿੱਚ ਲਾਹੌਰ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ।

PSEB 12th Class History Map Questions

ਪਹਿਲਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ (First Anglo-Sikh War)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 4.
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਖਿਆਤਮਕ ਨੋਟ ਲਿਖੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show the four places of the First Anglo-Sikh War.
(b) Write an explanatory note in about 20-25 words each on the above.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਪਹਿਲੇ ਅੰਗਰੇਜ਼-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਵਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ ।
(a) Show any four places of First Anglo Sikh War on the given map of Punjab.
(b) Write in about 20-25 words each about the spots shown on map.
ਜਾਂ
(ੳ) ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕੋਈ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਲਿਖੋ ।
(a) On the given outline map of Punjab, show four places of First Anglo Sikh War.
(b) Explain these places in about 20-25 words each.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਨਦੀਆਂ ਦਰਸਾਉਂਦੇ ਹੋਏ ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਵਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ ।
(a) On the given outline map of Punjab showing the rivers depict four places of First Anglo Sikh War.
(b) Write an explanatory note in about 20-25 words each on the places of the battles shown in the map.
PSEB 12th Class History Map Questions 4
ਉੱਤਰ-
1845-46 ਈ. ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਪਹਿਲਾ ਯੁੱਧ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਇਆ । ਇਹ ਯੁੱਧ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਮੁੱਖ ਸਥਾਨਾਂ ‘ਤੇ ਲੜਿਆ ਗਿਆ-

1. ਮੁਦਕੀ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Mudki) – ਫ਼ਿਰੋਜ਼ਪੁਰ ਤੋਂ 20 ਮੀਲ ਦੀ ਦੂਰੀ ‘ਤੇ ਮੁਦਕੀ ਨਾਂ ਦੇ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਅਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਚਕਾਰ ਪਹਿਲੀ ਲੜਾਈ 18 ਦਸੰਬਰ, 1845 ਈ. ਨੂੰ ਹੋਈ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਦੀ ਗੱਦਾਰੀ ਕਾਰਨ ਸਿੱਖ ਫ਼ੌਜਾਂ ਨੂੰ ਹਾਰ ਦਾ ਮੂੰਹ ਵੇਖਣਾ ਪਿਆ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਭਾਵੇਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਜੇਤੂ ਰਹੇ ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਅਹਿਸਾਸ ਹੋ ਗਿਆ ਕਿ ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਨਾ ਕੋਈ ਸੌਖਾ ਕੰਮ ਨਹੀਂ ਹੈ ।

2. ਫ਼ਿਰੋਜ਼ਸ਼ਾਹ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Ferozeshah) – 21 ਦਸੰਬਰ, 1845 ਈ. ਨੂੰ ਸਿੱਖਾਂ ਅਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਚਕਾਰ ਫ਼ਿਰੋਜ਼ਸ਼ਾਹ ਵਿਖੇ ਦੁਸਰੀ ਲੜਾਈ ਲੜੀ ਗਈ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਤੇਜਾ ਸਿੰਘ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ । ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹਿਊਗ ਗਫ਼, ਜਾਂਨ ਲਿਟਲਰ ਅਤੇ ਲਾਰਡ ਹਾਰਡਿੰਗ ਵਰਗੇ ਤਜਰਬੇਕਾਰ ਸੈਨਾਪਤੀ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਿਕਾਂ ‘ਤੇ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਹਮਲਾ ਕੀਤਾ । ਪਰ ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਤੇਜਾ ਸਿੰਘ ਦੀ ਗੱਦਾਰੀ ਕਾਰਨ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਮੁੜ ਹਾਰ ਦਾ ਮੂੰਹ ਵੇਖਣਾ ਪਿਆ ।

3. ਬੱਦੋਵਾਲ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Baddowal) – ਸਿੱਖਾਂ ਅਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਤੀਜੀ ਲੜਾਈ ਲੁਧਿਆਣਾ ਤੋਂ 18 ਮੀਲ ਦੂਰ ਬੱਦੋਵਾਲ ਵਿਖੇ 21 ਜਨਵਰੀ, 1846 ਈ. ਨੂੰ ਲੜੀ ਗਈ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਸਰਦਾਰ ਰਣਜੋਧ ਸਿੰਘ ਮਜੀਠੀਆ ਅਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੈਰੀ ਸਮਿਥ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਲੜਾਈ ਦਾ ਮੈਦਾਨ ਛੱਡਣ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਹੋਣਾ ਪਿਆ ।

4. ਅਲੀਵਾਲ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Aliwal) – ਹੈਰੀ ਸਮਿਥ ਬੱਦੋਵਾਲ ਵਿਖੇ ਹੋਈ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ । ਉਸ ਨੇ 28 ਜਨਵਰੀ, 1846 ਈ. ਨੂੰ ਅਲੀਵਾਲ ਵਿਖੇ ਰਣਜੋਧ ਸਿੰਘ ਅਧੀਨ ਸਿੱਖ ਫ਼ੌਜ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਹ ਲੜਾਈ ਬੜੀ ਭਿਆਨਕ ਸੀ । ਰਣਜੋਧ ਸਿੰਘ ਦੀ ਗੱਦਾਰੀ ਕਾਰਨ ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਜੇਤੂ ਰਹੇ ।

5. ਸਭਰਾਉਂ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Sobraon) – ਸਭਰਾਉਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਅੰਤਿਮ ਅਤੇ ਨਿਰਣਾਇਕ ਲੜਾਈ ਸੀ । ਇਹ ਲੜਾਈ 10 ਫ਼ਰਵਰੀ, 1846 ਈ. ਨੂੰ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਤੇਜਾ ਸਿੰਘ ਵਰਗੇ ਗੱਦਾਰ ਅਤੇ ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹਿਊ ਗਫ਼ ਅਤੇ ਲਾਰਡ ਹਾਰਡਿੰਗ ਵਰਗੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਸੈਨਾਪਤੀ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ । ਸਿੱਖ ਸੈਨਾਪਤੀ ਜੋ ਅੰਦਰ ਖਾਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਰਲੇ ਹੋਏ ਸਨ, ਮੌਕਾ ਵੇਖ ਕੇ ਲੜਾਈ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿੱਚੋਂ ਨੱਸ ਗਏ । ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ ਸਰਦਾਰ ਸ਼ਾਮ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਨੇ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕੀਤੀ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਆਪਣੀ ਬਹਾਦਰੀ ਦੇ ਉਹ ਜੌਹਰ ਦਿਖਾਏ ਕਿ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਨਾਨੀ ਚੇਤੇ ਆ ਗਈ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਤ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਹਾਰ ਦਾ ਮੂੰਹ ਵੇਖਣਾ ਪਿਆ ।

PSEB 12th Class History Map Questions

ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ (Second Anglo-Sikh War)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 5.
(ਓ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਉੱਤੇ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਹੋਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਕਰੋ ।
(a) On the given outline map of the Punjab, show the places of Second Anglo-Sikh War.
(b) Write an explanatory note on each in about 20-25 words on these battles.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਦੂਜੇ ਅੰਗਰੇਜ਼-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਵਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ ।
(a) Show four places of Second Anglo Sikh War on the given outline map of Punjab.
(b) Write in about 20-25 words on each about the spots shown in map.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਦਿਖਾਓ ।
(ਅ) ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਦਿਖਾਏ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਲਗਭਗ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਲਿਖੋ ।
(a) On the given outline map of Punjab, show the four places of Second Anglo Sikh War.
(b) Explain these places in about 20-25 words each.
ਜਾਂ
(ਉ) ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਮਾਨਚਿੱਤਰ ਵਿੱਚ ਨਦੀਆਂ ਦਰਸਾਉਂਦੇ ਹੋਏ ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਚਾਰ ਸਥਾਨ ਭਰੋ ।
(ਅ) ਭਰੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਸਥਾਨ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ 20-25 ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਕਰੋ ।
(a) On the given outline map of Punjab showing the rivers fill the places of battles of the Second Anglo Sikh War.
(b) Write an explanatory note in about 20-25 words on each the places of the battles shown in the map.
PSEB 12th Class History Map Questions 5
ਉੱਤਰ-
1848-49 ਈ. ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਦੂਸਰਾ ਯੁੱਧ ਹੋਇਆ । ਇਹ ਯੁੱਧ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਮੁੱਖ ਸਥਾਨਾਂ ‘ਤੇ ਲੜਿਆ ਗਿਆ ਸੀ-

1. ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Ramnagar) – ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਲੜਾਈ 22 ਨਵੰਬਰ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਰਾਮਨਗਰ ਦੇ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਹੋਈ | ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਅਤੇ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਭਾਰੀ ਜਾਨੀ ਅਤੇ ਮਾਲੀ ਨੁਕਸਾਨ ਹੋਇਆ ।

2. ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Chillianwala) – ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈਆਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਸੀ । ਇਹ ਲੜਾਈ 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਕਮਾਂਡ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਅਤੇ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਕਮਾਂਡ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਕਰਾਰੀ ਹਾਰ ਦਿੱਤੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੇ 132 ਸੈਨਿਕ ਅਫ਼ਸਰ ਵੀ ਮਾਰੇ ਗਏ ਸਨ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਦੀ ਥਾਂ ਸਰ ਚਾਰਲਸ ਨੇਪੀਅਰ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦਾ ਸਰਵਉੱਚ ਕਮਾਂਡਰ ਨਿਯੁਕਤ ਕਰਨ ਦਾ ਫ਼ੈਸਲਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ।

3. ਮੁਲਤਾਨ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Multan) – ਮੁਲਤਾਨ ਵਿੱਚ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹੀਆਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਜਨਰਲ ਵਿਸ਼ ਅਧੀਨ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਨੇ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਨੂੰ ਘੇਰਾ ਪਾਇਆ ਹੋਇਆ ਸੀ । ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਵੀ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨਾਲ ਆ ਰਲਿਆ ਸੀ । ਜਨਰਲ ਵਿਸ਼ ਨੇ ਚਲਾਕੀ ਨਾਲ ਜਾਅਲੀ ਚਿੱਠੀਆਂ ਦੁਆਰਾ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਵਿਚਾਲੇ ਫੁੱਟ ਪੁਆ ਦਿੱਤੀ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦਾ ਸਾਥ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ । ਇਕੱਲਾ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਨਾ ਕਰ ਸਕਿਆ ਅਤੇ ਅੰਤ ਮਜਬੂਰ ਹੋ ਕੇ 22 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅੱਗੇ ਹਥਿਆਰ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤੇ । ਮੁਲਤਾਨ ਦੀ ਇਸ ਜਿੱਤ ਨਾਲ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਫ਼ੌਜਾਂ ਦੇ ਹੌਸਲੇ ਮੁੜ ਵੱਧ ਗਏ ।

4. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Gujarat) – ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਆਖਰੀ ਅਤੇ ਨਿਰਣਾਇਕ ਲੜਾਈ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ, ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ । ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਇਹ ਲੜਾਈ 21 ਫ਼ਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ । ਇਹ ਲੜਾਈ ‘ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੇ ਨਾਂ ਨਾਲ ਵੀ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੈ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਗੋਲਾ-ਬਾਰੂਦ ਛੇਤੀ ਹੀ ਖ਼ਤਮ ਹੋ ਗਿਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ‘ਤੇ ਜ਼ਬਰਦਸਤ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ 3,000 ਤੋਂ 5,000 ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕ ਮਾਰੇ ਗਏ ਸਨ । 10 ਮਾਰਚ ਨੂੰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਆਪਣੇ ਹਥਿਆਰ ਜਨਰਲ ਗਿਲਬਰਟ ਅੱਗੇ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤੇ ।

29 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰ ਲਿਆ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਅਣਥੱਕ ਯਤਨਾਂ ਨਾਲ ਉਸਾਰੇ ਸਾਮਰਾਜ ਦਾ ਦੁਖਮਈ ਅੰਤ ਹੋਇਆ ।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ

Long Answer Type Questions

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 1.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਛੇ ਕਾਰਨਾਂ ਦਾ ਸੰਖੇਪ ਵਰਣਨ ਕਰੋ । (Explain in brief the six causes of Second Anglo-Sikh War.)
ਜਾਂ
ਦੁਜੇ ਅੰਗਰੇਜ਼-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕੀ ਕਾਰਨ ਸਨ ? (What were the causes of Second Anglo-Sikh War ?)
ਜਾਂ
ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਛੇ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਕੀ ਸਨ ? (What were the six main causes for Second Anglo-Sikh War ?) ਉੱਤਰ-
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ – ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਸਨ-

1. ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣ ਦੀ ਇੱਛਾ – ਇਹ ਠੀਕ ਹੈ ਕਿ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਹੋਏ ਪਹਿਲੇ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਹਾਰ ਹੋ ਗਈ ਸੀ, ਪਰ ਇਸ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੌਂਸਲੇ ਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਘੱਟ ਨਹੀਂ ਹੋਏ ਸਨ ।ਇਸ ਹਾਰ ਦਾ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਨੇਤਾਵਾਂ ਵੱਲੋਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਗੱਦਾਰੀ ਸੀ । ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਯੋਗਤਾ ‘ਤੇ ਪੂਰਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਸੀ । ਉਹ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਸਨ ।ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਇਹ ਇੱਛਾ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਇੱਕ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਬਣੀ ।

2. ਲਾਹੌਰ ਅਤੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀਆਂ ਸੰਧੀਆਂ ਤੋਂ ਪੰਜਾਬ ਅਸੰਤੁਸ਼ਟ – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਹੋਏ ਪਹਿਲੇ ਯੁੱਧ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨਾਲ ਲਾਹੌਰ ਅਤੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਨਾਂ ਦੀਆਂ ਸੰਧੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ। ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਅਣਥੱਕ ਯਤਨਾਂ ਸਦਕਾ ਬਣਾਏ ਸਾਮਰਾਜ ਨੂੰ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੰਧੀਆਂ ਦੁਆਰਾ ਖੇਰੂੰ-ਖੇਰੂੰ ਹੁੰਦਾ ਦੇਖ ਕੇ ਸਹਿਣ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੇ ਸਨ । ਇਸ ਲਈ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਇੱਕ ਹੋਰ ਯੁੱਧ ਲੜਨਾ ਪੈਣਾ ਸੀ ।

3. ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਵਿੱਚ ਅਸੰਤੋਸ਼ – ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਖ਼ਾਲਸਾ ਫ਼ੌਜ ਦੀ ਗਿਣਤੀ 20,000 ਪੈਦਲ ਤੇ 12,000 ਘੋੜਸਵਾਰ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਕਰ ਦਿੱਤੀ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਨੌਕਰੀ ਤੋਂ ਜਵਾਬ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਇਸ ਲਈ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਰੋਸ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਤਿਆਰੀਆਂ ਕਰਨ ਲੱਗੇ ।

4. ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਸਖ਼ਤ ਸਲੂਕ – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਵਿਧਵਾ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮਾਂ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਜੋ ਅਪਮਾਨਜਨਕ ਵਿਵਹਾਰ ਕੀਤਾ, ਉਸ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਫੈਲੇ ਰੋਸ ਨੂੰ ਹੋਰ ਭੜਕਾ ਦਿੱਤਾ । ਉਹ ਇਸ ਅਪਮਾਨ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਸਨ ।

5. ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਦਾ ਵਿਦਰੋਹ – ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਨੂੰ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਦੀਵਾਨ ਮਲਰਾਜ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸਥਾਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੈ । ਅੰਗਰੇਜ਼ ਸਰਕਾਰ ਨੇ 20 ਅਪਰੈਲ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਵਿੱਚ ਦੋ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਵੈਨਸ ਐਗਨਿਯੂ ਅਤੇ ਐਂਡਰਸਨ ਦੇ ਕਤਲਾਂ ਦੀ ਝੂਠੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਸਿਰ ਪਾਈ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦਾ ਖੂਨ ਖੌਲਣ ਲੱਗਾ ਅਤੇ ਉਸ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਦਾ ਝੰਡਾ ਬੁਲੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।

6. ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੀ ਨੀਤੀ – 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਭਾਰਤ ਦਾ ਨਵਾਂ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲ ਬਣਿਆ ਸੀ ।ਉਹ ਬਹੁਤ ਵੱਡਾ ਸਾਮਰਾਜਵਾਦੀ ਸੀ । ਉਹ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਅਧੀਨ ਕਰਨ ਲਈ ਕਿਸੇ ਸੁਨਹਿਰੀ ਮੌਕੇ ਦੀ ਭਾਲ ਵਿੱਚ ਸੀ । ਇਹ ਮੌਕਾ ਉਸ ਨੂੰ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ, ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹਾਂ ਨੇ ਦਿੱਤਾ ।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 2.
ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਸੰਖੇਪ ਨੋਟ ਲਿਖੋ । (Write a short note on the revolt of Diwan Mool Raj.)
ਜਾਂ
ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਸੰਬੰਧੀ ਸੰਖੇਪ ਜਾਣਕਾਰੀ ਦਿਓ । (Give a brief account of the revolt of Diwan Mool Raj of Multan.)
ਉੱਤਰ-
ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਨੂੰ 1844 ਈ. ਵਿੱਚ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਗਵਰਨਰ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ । ਉਹ ਲਗਭਗ 13\(\frac{1}{2}\) ਲੱਖ ਰੁਪਏ ਸਾਲਾਨਾ ਲਗਾਨ ਵਜੋਂ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੂੰ ਦਿੰਦਾ ਸੀ । ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਇਹ ਰਕਮ ਵਧਾ ਕੇ ਲਗਭਗ 20 ਲੱਖ ਰੁਪਏ ਸਾਲਾਨਾ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਗਈ । ਪਰ ਇਸ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਉਸ ਦੇ ਰਾਜ ਦਾ ਤੀਜਾ ਹਿੱਸਾ ਉਸ ਕੋਲੋਂ ਲੈ ਲਿਆ ਗਿਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨੇ ਗਵਰਨਰੀ ਦੇ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ ਆਪਣਾ ਅਸਤੀਫ਼ਾ ਦੇ ਦਿੱਤਾ | ਮਾਰਚ, 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਨਵੇਂ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਫਰੈਡਰਿਕ ਹਰੀ ਨੇ ਮੁਲਰਾਜ ਦਾ ਅਸਤੀਫ਼ਾ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰ ਲਿਆ । ਉਸ ਨੇ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਗਵਰਨਰ ਨਿਯੁਕਤ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ । ਉਸ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਦੋ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਐਗਨਿਯੂ ਅਤੇ ਐਂਡਰਸਨ ਨੂੰ ਭੇਜਿਆ ਗਿਆ ।

ਮੂਲਰਾਜ ਨੇ ਬਿਨਾਂ ਕਿਸੇ ਵਿਰੋਧ ਦੇ 19 ਅਪਰੈਲ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਕਿਲ੍ਹੇ ਦੀਆਂ ਚਾਬੀਆਂ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਦੇ ਹਵਾਲੇ ਕਰ ਦਿੱਤੀਆਂ । ਪਰ 20 ਅਪਰੈਲ ਨੂੰ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਸਿਪਾਹੀਆਂ ਨੇ ਦੋਨੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਦਾ ਕਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਮਲਰਾਜ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕਰਨ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਕੀਤਾ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਇਸ ਵਿਦਰੋਹ ਨੂੰ ਕੁਚਲਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਉਸ ਨੂੰ ਫੈਲਣ ਦਿੱਤਾ ਤਾਂ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰਨ ਦਾ ਬਹਾਨਾ ਮਿਲ ਸਕੇ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 3.
ਹਜ਼ਾਰਾ ਦੇ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਬਾਰੇ ਤੁਸੀਂ ਕੀ ਜਾਣਦੇ ਹੋ ? (What do you know about the revolt of Chattar Singh of Hazara ?)
ਉੱਤਰ-
ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਹਜ਼ਾਰਾ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ਸੀ । ਉਸ ਦੀ ਲੜਕੀ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨਾਲ ਮੰਗੀ ਹੋਈ ਸੀ | ਅੰਗਰੇਜ਼ ਇਸ ਰਿਸ਼ਤੇ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਸਨ ਕਿਉਂਕਿ ਇਸ ਨਾਲ ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਤਾਕਤ ਵੱਧ ਜਾਣੀ ਸੀ । ਇਹ ਤਾਕਤ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਹੜੱਪਣ ਦੀ ਨੀਤੀ ਦੇ ਰਾਹ ਵਿੱਚ ਰੋੜਾ ਅਟਕਾ ਸਕਦੀ ਸੀ : ਕੈਪਟਨ ਐਬਟ ਜਿਸ ਨੂੰ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਸਲਾਹਕਾਰ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ, ਸਿੱਖ ਰਾਜ ਨੂੰ ਤਬਾਹ ਕਰਨ ਦੀ ਯੋਜਨਾ ਤਿਆਰ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਉਸ ਦੁਆਰਾ ਭੜਕਾਏ ਗਏ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਦੇ ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਨੇ 6 ਅਗਸਤ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਰਿਹਾਇਸ਼ਗਾਹ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਹ ਵੇਖ ਕੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਕਰਨਲ ਕੈਨੋਰਾ ਨੂੰ ਵਿਦਰੋਹੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ਦਾ ਹੁਕਮ ਦਿੱਤਾ ।

ਕਰਨਲ ਕੈਨੋਰਾ ਜੋ ਕੈਪਟਨ ਐਬਟ ਨਾਲ ਮਿਲਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ, ਨੇ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਹੁਕਮ ਨੂੰ ਮੰਨਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਉਸ ਨੇ ਆਪਣੀ ਪਿਸਤੌਲ ਨਾਲ ਗੋਲੀਆਂ ਚਲਾ ਕੇ ਦੋ ਸਿੱਖ ਸਿਪਾਹੀਆਂ ਨੂੰ ਮਾਰ ਦਿੱਤਾ । ਉਸ ਸਮੇਂ ਇੱਕ ਸਿੱਖ ਸਿਪਾਹੀ ਨੇ ਅੱਗੇ ਵੱਧ ਕੇ ਆਪਣੀ ਤਲਵਾਰ ਨਾਲ ਕੈਨੋਰਾ ਦਾ ਕੰਮ ਤਮਾਮ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਜਦੋਂ ਇਸ ਘਟਨਾ ਦੀ ਖ਼ਬਰ ਐਬਟ ਨੂੰ ਪਹੁੰਚੀ ਤਾਂ ਉਹ ਗੁੱਸੇ ਨਾਲ ਅੱਗ ਬਬੂਲਾ ਹੋ ਗਿਆ । ਉਸ ਨੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਉਸ ਦੇ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ ਹਟਾ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਉਸ ਦੀ ਜਾਗੀਰ ਜ਼ਬਤ ਕਰ ਲਈ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਖ਼ੂਨ ਉਬਲ ਗਿਆ ਤੇ ਉਸ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਬਗਾਵਤ ਕਰਨ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 4.
ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ‘ ਤੇ ਇੱਕ ਸੰਖੇਪ ਨੋਟ ਲਿਖੋ । (Write a note on the battle of Chillianwala.)
ਉੱਤਰ-
ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈਆਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਸੀ । ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਜੋ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਫ਼ੌਜਾਂ ਦਾ ਸੈਨਾਪਤੀ ਸੀ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਫ਼ੌਜ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਨ ਲਈ ਵਧੇਰੇ ਸੈਨਿਕ ਸਹਾਇਤਾ ਪਹੁੰਚਣ ਦੀ ਉਡੀਕ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਇਸੇ ਸਮੇਂ ਗਫ਼ ਨੂੰ ਇਹ ਸੂਚਨਾ ਮਿਲੀ ਕਿ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਅਟਕ ਦੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਨੂੰ ਜਿੱਤ ਲਿਆ ਹੈ ਤੇ ਉਹ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਆ ਰਿਹਾ ਹੈ । ਅਜਿਹਾ ਹੋਣ ‘ਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਲਈ ਭਾਰੀ ਖ਼ਤਰਾ ਪੈਦਾ ਹੋ ਸਕਦਾ ਸੀ । ਇਸ ਲਈ ਹਿਉਗ ਗਫ਼ ਨੇ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਪਹੁੰਚਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਵਿਖੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ ਫ਼ੌਜਾਂ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਬੋਲ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਘਮਸਾਣ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੇ ਚੰਗੇ ਛੱਕੇ ਛੁਡਵਾਏ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਇੰਨਾ ਭਾਰੀ ਨੁਕਸਾਨ ਹੋਇਆ ਕਿ ਇੰਗਲੈਂਡ ਵਿੱਚ ਵੀ ਹਾਹਾਕਾਰ ਮਚ ਗਈ ।ਇਸ ਅਪਮਾਨਜਨਕ ਹਾਰ ਕਾਰਨ ਸੈਨਾਪਤੀ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਦੇ ਸਨਮਾਨ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਧੱਕਾ ਲੱਗਿਆ। ਉਸ ਦੀ ਜਗ੍ਹਾ ਚਾਰਲਸ ਨੇਪੀਅਰ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦਾ ਨਵਾਂ ਸੈਨਾਪਤੀ ਨਿਯੁਕਤ ਕਰਕੇ ਭਾਰਤ ਭੇਜਿਆ ਗਿਆ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 5.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਸਮੇਂ ਹੋਈ ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦਾ ਕੀ ਮਹੱਤਵ ਸੀ ? (What is the importance of the battle of Gujarat in the Second Anglo-Sikh War ?)
ਉੱਤਰ-
ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਆਖਰੀ ਅਤੇ ਫੈਸਲਾਕੁੰਨ ਲੜਾਈ ਸੀ । ਇਹ ਲੜਾਈ 21 ਫ਼ਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ 40,000 ਸੀ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਚਤਰ ਸਿੰਘ, ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ। ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਲਗਭਗ 68,000 ਸੀ ਅਤੇ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਕਿਉਂਕਿ ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਦੋਹਾਂ ਪੱਖਾਂ ਵੱਲੋਂ ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਬਹੁਤ ਜ਼ਿਆਦਾ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ ਇਸ ਲਈ ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਨੂੰ ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਬੜੀ ਬਹਾਦਰੀ ਨਾਲ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕੀਤਾ । ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਗੋਲਾ-ਬਾਰੂਦ ਖ਼ਤਮ ਹੋ ਜਾਣ ਕਾਰਨ ਅੰਤ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਹਾਰ ਦਾ ਮੂੰਹ ਵੇਖਣਾ ਪਿਆ।

ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਭਾਰੀ ਨੁਕਸਾਨ ਹੋਇਆ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਭਗਦੜ ਮਚ ਗਈ । ਚਤਰ ਸਿੰਘ, ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਰਾਵਲਪਿੰਡੀ ਵੱਲ ਦੌੜ ਗਏ । ਅੰਗਰੇਜ਼ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪਿੱਛਾ ਕੀਤਾ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ 10 ਮਾਰਚ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਹਥਿਆਰ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤੇ । ਬਾਕੀ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ 14 ਮਾਰਚ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅੱਗੇ ਆਪਣੇ ਹਥਿਆਰ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤੇ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਜਿੱਤ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ 29 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰ ਲਿਆ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਰਾਜ ਦਾ ਅੰਤ ਹੋ ਗਿਆ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 6.
ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕੀ ਪ੍ਰਭਾਵ ਪਏ ? (What were the results of the Second Anglo-Sikh War ?)
ਜਾਂ
ਸੰਖੇਪ ਵਿੱਚ ਦੂਸਰੇ ਅੰਗਰੇਜ਼-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਪ੍ਰਭਾਵਾਂ ਦਾ ਅਧਿਐਨ ਕਰੋ । (Study in brief the results of Second Anglo-Sikh War.)
ਜਾਂ
ਦੂਜੀ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਲੜਾਈ ਦੇ ਕੋਈ ਛੇ ਪ੍ਰਭਾਵ ਲਿਖੋ । (Explain the any six effects of Second Anglo-Sikh War.) ਉੱਤਰ-
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਬੜੇ ਦੂਰ-ਦੁਰਾਡੇ ਸਿੱਟੇ ਨਿਕਲੇ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸੰਖੇਪ ਵਰਣਨ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਅਨੁਸਾਰ ਹੈ-

  • ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸਾਮਰਾਜ ਦਾ ਅੰਤ – ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸਿੱਟਾ ਇਹ ਨਿਕਲਿਆ ਕਿ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸਾਮਰਾਜ ਦਾ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਖਾਤਮਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਆਖਰੀ ਸਿੱਖ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗੱਦੀ ਤੋਂ ਲਾਹ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ।
  • ਸਿੱਖ ਫ਼ੌਜ ਨੂੰ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ – ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਮਗਰੋਂ ਇਸ ਸੈਨਾ ਨੂੰ ਵੀ ਨਿਸ਼ਸਤਰ ਕਰ ਕੇ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਦੇ ਧੰਦੇ ਵਿੱਚ ਲਗਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਗਈ । ਕੁਝ ਨੂੰ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਭਾਰਤੀ ਸੈਨਾ ਵਿੱਚ ਭਰਤੀ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ।
  • ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਅਤੇ ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜਾ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਨਿਕਾਲੇ ਦੀ ਸਜ਼ਾ – ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਮੌਤ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਸੀ । ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਇਸ ਸਜ਼ਾ ਨੂੰ ਕਾਲੇਪਾਣੀ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਵਿੱਚ ਬਦਲ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਪਰ ਉਸ ਦੀ 11 ਅਗਸਤ, 1851 ਈ. ਨੂੰ ਕਲਕੱਤੇ (ਕੋਲਕਾਤਾ) ਵਿਖੇ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ । ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਸਿੰਘਾਪੁਰ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚ ਭੇਜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਇੱਥੇ ਉਸ ਦੀ 5 ਜੁਲਾਈ, 1856 ਈ. ਨੂੰ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ।
  • ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾ – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਵੀ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਅਲਾਹਾਬਾਦ ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਕਲਕੱਤੇ (ਕੋਲਕਾਤਾ) ਦੀਆਂ ਜੇਲ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ । 1854 ਈ. ਵਿੱਚ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੋਹਾਂ ਨੂੰ ਰਿਹਾਅ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।
  • ਪੰਜਾਬ ਲਈ ਨਵਾਂ ਰਾਜ ਪ੍ਰਬੰਧ – ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾ ਲੈਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਚਲਾਉਣ ਲਈ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਬੋਰਡ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਕੀਤੀ । ਇਹ 1849 ਈ. ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ 1853 ਈ. ਤਕ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੁਧਾਰਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਦੇ ਦਿਲਾਂ ਨੂੰ ਜਿੱਤ ਲਿਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਉਹ 1857 ਈ. ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਸਮੇਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਵਫ਼ਾਦਾਰ ਰਹੇ।
  • ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨਾਲ ਮਿੱਤਰਤਾ ਵਾਲਾ ਸਲੂਕ – ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਮੇਂ ਪਟਿਆਲਾ, ਨਾਭਾ, ਜੀਂਦ, ਮਲੇਰਕੋਟਲਾ, ਫ਼ਰੀਦਕੋਟ ਅਤੇ ਕਪੂਰਥਲਾ ਦੀਆਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਸਹਿਯੋਗ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਆਪਣੀ ਮਿੱਤਰਤਾ ਬਣਾਈ ਰੱਖੀ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨੂੰ ਅਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 7.
ਕੀ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਉੱਚਿਤ ਸੀ ? ਆਪਣੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿਓ ? (Was it proper for Lord Dalhousie to annex Punjab to the British empire ? Give arguments in support of your answer.)
ਜਾਂ
ਕੀ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸੰਯੋਜਨ ਨਿਆਂਸੰਗਤ ਸੀ ? ਆਪਣੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਵਰਣਨ ਕਰੋ । (Was the annexation of Punjab by Lord Dalhousie justified ? Give reasons in your favour.)
ਜਾਂ
“ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਇੱਕ ਘੋਰ ਵਿਸ਼ਵਾਸਘਾਤ ਸੀ ।” ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ । (“Annexation of Punjab was a violent breach of trust.” Explain.)
ਜਾਂ
ਕੀ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸੰਯੋਜਨ ਨਿਆਂ ਸੰਗਤ ਸੀ ? ਇਸ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਛੇ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿਉ । (Was the annexation of Punjab justified ? Give six reasons for it.)
ਉੱਤਰ-
ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਨਿਆਂਸੰਗਤ ਨਹੀਂ ਸੀ ।

1. ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਬਗਾਵਤ ਲਈ ਭੜਕਾਇਆ ਗਿਆ – ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਬਾਅਦ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਅਜਿਹੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਹੋਈਆਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਬਗਾਵਤ ਲਈ ਭੜਕਾਇਆ। ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਕਈ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਇਲਾਕੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਖੋਹ ਲਏ ਸਨ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਬਹੁਤ ਮਾੜਾ ਸਲੂਕ ਕੀਤਾ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਅਤੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਬਗ਼ਾਵਤ ਲਈ ਭੜਕਾਇਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਬਗ਼ਾਵਤ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਹੋਣਾ ਪਿਆ ।

2. ਬਗ਼ਾਵਤ ਨੂੰ ਸਮੇਂ ਸਿਰ ਨਾ ਦਬਾਇਆ ਗਿਆ – ਜਦੋਂ ਮੁਲਤਾਨ ਵਿਚ ਵਿਦਰੋਹ ਦੀ ਅੱਗ ਭੜਕੀ ਤਾਂ ਉਸ ‘ਤੇ ਛੇਤੀ ਹੀ ਕਾਬੂ ਪਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਸੀ । ਅੱਠ ਮਹੀਨਿਆਂ ਤਕ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨੂੰ ਫੈਲਣ ਦੇਣ ਪਿੱਛੇ ਇਕ ਡੂੰਘੀ ਰਾਜਸੀ ਚਾਲ ਸੀ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਵੱਡੀ ਸੈਨਿਕ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ਦਾ ਬਹਾਨਾ ਮਿਲ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ ।

3. ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਸੀ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕੀਤਾ ਹੈ । ਪਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਕੇਵਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਹੀ ਪੂਰਾ ਕੀਤਾ, ਜਿਹੜੀਆਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਲਾਹੇਵੰਦ ਸਨ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਇਹ ਕਹਿਣਾ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਨਿਰਾ ਝੂਠ ਹੀ ਹੈ ।

4. ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਪੂਰਨ ਸਹਿਯੋਗ ਦਿੱਤਾ – ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਤਾਂ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਕਬਜ਼ਾ ਹੋਣ ਤਕ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਵਫ਼ਾਦਾਰੀ ਨਾਲ ਨਿਭਾਉਂਦਾ ਰਿਹਾ | ਲਾਹੌਰ ਸਰਕਾਰ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਰੱਖੀ ਹੋਈ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦਾ ਪੂਰਾ ਖ਼ਰਚਾ ਦੇ ਰਹੀ ਸੀ । ਉਸ ਨੇ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਜ, ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੁਆਰਾ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਬਗ਼ਾਵਤਾਂ ਨੂੰ ਕੁਚਲਣ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਫ਼ੌਜਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਸਹਿਯੋਗ ਵੀ ਦਿੱਤਾ

5. ਪੂਰੀ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਸੀ – ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਇਹ ਦੋਸ਼ ਲਗਾਇਆ ਸੀ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਪੂਰੀ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਮਿਲ ਕੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਪਰ ਇਸ ਕਥਨ ਵਿੱਚ ਜ਼ਰਾ ਵੀ ਸੱਚਾਈ ਨਹੀਂ ਹੈ । ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਕੇਵਲ ਮੁਲਤਾਨ ਅਤੇ ਹਜ਼ਾਰਾ ਪ੍ਰਾਂਤਾਂ ਵਿੱਚ ਹੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਹੋਇਆ ਸੀ । ਬਹੁਤੀ ਸਿੱਖ ਫ਼ੌਜ ਅਤੇ ਲੋਕ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਵਫ਼ਾਦਾਰ ਰਹੇ।

6. ਪੰਜਾਬ ‘ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ਵਾਸਘਾਤ ਸੀ – ਪੰਜਾਬ ‘ਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਕਬਜ਼ਾ ਇੱਕ ਘੋਰ ਵਿਸ਼ਵਾਸਘਾਤ ਸੀ । 1846 ਈ. ਵਿੱਚ ਹੋਈ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਂਤੀ ਕਾਇਮ ਰੱਖਣ ਦੀ ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀ ਸੀ । ਇਸ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਵਿਗੜ ਰਹੇ ਹਾਲਾਤਾਂ ਲਈ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਦੋਸ਼ੀ ਠਹਿਰਾਇਆ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 8.
ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੇ ਇਸ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਛੇ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿਓ ਕਿ ਉਸ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਉੱਚਿਤ ਸੀ । (Give any six arguments in favour of Dalhousie’s annexation of the Punjab to the British empire.)
ਜਾਂ
ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੀ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ੇ ਦੀ ਨੀਤੀ ਦੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿਓ । (Give arguments in favour of Dalhousie’s policy of the annexation of Punjab.)
ਉੱਤਰ-
1. ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਤੋੜਿਆ – ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਇਹ ਦੋਸ਼ ਲਗਾਇਆ ਕਿ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਤੋੜਿਆ ਹੈ । ਸਿੱਖ ਸਰਦਾਰਾਂ ਨੇ ਇਹ ਵਚਨ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਸਹਿਯੋਗ ਦੇਣਗੇ । ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਰਾਜ ਵਿੱਚ ਅਸ਼ਾਂਤੀ ਅਤੇ ਵਿਦਰੋਹ ਫੈਲਾਉਣ ਦਾ ਯਤਨ ਕੀਤਾ । ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦੀ ਬਗ਼ਾਵਤ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਸਿੱਖ ਜਾਤੀ ਦੀ ਬਗਾਵਤ ਦੱਸਿਆ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਵਿਗੜ ਰਹੇ ਹਾਲਾਤ ‘ਤੇ ਕਾਬੂ ਪਾਉਣ ਲਈ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੀ ।

2. ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਚੰਗਾ ਮੱਧਵਰਤੀ ਰਾਜ ਨਾ ਰਹਿਣਾ – ਲਾਰਡ ਹਾਰਡਿੰਗ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਸੀ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਇਕ ਲਾਭਦਾਇਕ ਮੱਧਵਰਤੀ ਰਾਜ ਸਿੱਧ ਹੋਵੇਗਾ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਬਿਟਿਸ਼ ਰਾਜ ਨੂੰ ਅਫ਼ਗਾਨਿਸਤਾਨ ਵੱਲੋਂ ਕਿਸੇ ਖ਼ਤਰੇ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਨਹੀਂ ਕਰਨਾ ਪਵੇਗਾ । ਪਰੰਤੂ ਉਸ ਦਾ ਇਹ ਵਿਚਾਰ ਗਲਤ ਸਿੱਧ ਹੋਇਆ ਕਿਉਂਕਿ ਸਿੱਖਾਂ ਅਤੇ ਅਫ਼ਗਾਨਾਂ ਵਿੱਚ ਦੋਸਤੀ ਹੋ ਗਈ ਸੀ । ਇਸ ਲਈ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸਮਝਿਆ ।

3. ਕਰਜ਼ੇ ਦੀ ਅਦਾਇਗੀ ਨਾ ਕਰਨਾ – ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਇਹ ਦੋਸ਼ ਲਗਾਇਆ ਕਿ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ 22 ਲੱਖ ਰੁਪਏ ਸਾਲਾਨਾ ਦੇਣਾ ਸੀ । ਪਰ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੇ ਇੱਕ ਪਾਈ ਵੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਨਾ ਦਿੱਤੀ । ਇਸ ਲਈ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਉੱਚਿਤ ਸੀ ।

4. ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨਾ ਲਾਭਦਾਇਕ ਸੀ – ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਜਿੱਤ ਮਗਰੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਸੀ ਕਿ ਆਰਥਿਕ ਪੱਖ ਤੋਂ ਪੰਜਾਬ ਕੋਈ ਲਾਭਦਾਇਕ ਪਾਂਤ ਨਹੀਂ ਹੈ । ਪਰ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਦੋ ਸਾਲ ਰਹਿਣ ਪਿੱਛੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗਿਆ ਕਿ ਇਹ ਰਾਜ ਕਈ ਪੱਖਾਂ ਤੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਲਈ ਲਾਭਦਾਇਕ ਸਿੱਧ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਕਾਰਨਾਂ ਕਰਕੇ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਹੜੱਪਣ ਦਾ ਪੱਕਾ ਨਿਸ਼ਚਾ ਕਰ ਲਿਆ ।

5. ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੀ – ਇਹ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਜੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਾ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਤਾਂ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿਰੁੱਧ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਸਾਜ਼ਸ਼ਾਂ ਕਰਦੇ ਰਹਿਣਾ ਸੀ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਭਾਰਤ ਦੇ ਦੂਜੇ ਹਿੱਸਿਆਂ ਵਿਚ ਵੀ ਪੈ ਸਕਦਾ ਸੀ । ਇਸ ਲਈ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸਮਝਿਆ ।

6. ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਚੰਗਾ – ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੇ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨ ਦੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਦਲੀਲ ਇਹ ਦਿੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਕਿ ਅਜਿਹਾ ਕਰ ਕੇ ਉਸ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਇੱਕ ਚੰਗਾ ਕੰਮ ਕੀਤਾ । ਅਜਿਹਾ ਕਰਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਫ਼ੈਲੀ ਬਦਅਮਨੀ ਨੂੰ ਦੂਰ ਕੀਤਾ । ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਵਿੱਚ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸੁਧਾਰਾਂ ਨੂੰ ਲਾਗੂ ਕੀਤਾ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਸੁੱਖ ਦਾ ਸਾਹ ਲਿਆ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 9.
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਨੋਟ ਲਿਖੋ । (Write a note on Maharaja Dalip Singh.)
ਉੱਤਰ-
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਛੋਟਾ ਪੁੱਤਰ ਸੀ । ਉਹ 15 ਸਤੰਬਰ, 1843 ਈ. ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਨਵਾਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਬਣਿਆ ਸੀ । ਉਸ ਸਮੇਂ ਉਸ ਦੀ ਉਮਰ ਕੇਵਲ 5 ਸਾਲ ਸੀ । ਇਸ ਲਈ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨੂੰ ਉਸ ਦਾ ਸਰਪ੍ਰਸਤ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਸੀ । ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੇ ਰਾਜ ਦਾ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਚਲਾਉਣ ਲਈ ਹੀਰਾ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਰਾਜ ਦਾ ਨਵਾਂ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਸੀ । ਭਾਵੇਂ ਉਹ ਬੜਾ ਸਿਆਣਾ ਸੀ ਪਰ ਉਸ ਨੇ ਪੰਡਤ ਜੱਲਾ ਨੂੰ ਮੁਸ਼ੀਰ-ਏ-ਖ਼ਾਸ ਦੇ ਅਹੁਦੇ ‘ਤੇ ਨਿਯੁਕਤ ਕਰਕੇ ਬਹੁਤ ਸਾਰੇ ਰਾਜ ਦਰਬਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਨਾਰਾਜ਼ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ ।

1844 ਈ. ਵਿੱਚ ਹੀਰਾ ਸਿੰਘ ਦੇ ਕਤਲ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜਵਾਹਰ ਸਿੰਘ ਰਾਜ ਦਾ ਨਵਾਂ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਬਣਿਆ ਪਰ ਉਹ ਬੜਾ ਹਠੀ ਅਤੇ ਅਯੋਗ ਸੀ । ਉਸ ਨੂੰ ਸਤੰਬਰ, 1845 ਈ. ਵਿੱਚ ਕੰਵਰ ਪਿਸ਼ੌਰਾ ਸਿੰਘ ਦੇ ਕਤਲ ਕਾਰਨ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਮੌਤ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਦੇ ਦਿੱਤੀ ਸੀ । ਉਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਅਹੁਦੇ ‘ਤੇ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਉਹ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਪਹਿਲੇ ਅਤੇ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਹਾਰ ਦਾ ਮੂੰਹ ਦੇਖਣਾ ਪਿਆ | ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗੱਦੀ ਤੋਂ ਲਾਹ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ 29 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰ ਲਿਆ ! 22 ਅਕਤੂਬਰ, 1893 ਈ. ਨੂੰ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਪੈਰਿਸ ਵਿਖੇ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ਸੀ ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 10.
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਜਾਂ ਜਿੰਦ ਕੌਰ ਤੇ ਇੱਕ ਨੋਟ ਲਿਖੋ । (Write a note on Maharani Jindan or Jind Kaur.)
ਜਾਂ
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਬਾਰੇ ਤੁਸੀਂ ਕੀ ਜਾਣਦੇ ਹੋ ? (What do you know about Maharani Jindan ?)
ਉੱਤਰ-
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ, ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮਾਂ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਰਾਣੀ ਸੀ । ਜਦੋਂ 15 ਸਤੰਬਰ, 1843 ਈ. ਨੂੰ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਨਵਾਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਤਾਂ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨੂੰ ਉਸ ਦਾ ਸਰਪਸਤ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਕਿਉਂਕਿ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਪੰਜਾਬ ਰਾਜ ਨੂੰ ਆਜ਼ਾਦ ਕਾਇਮ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਸੀ ਇਸ ਲਈ ਉਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਰੜਕਦੀ ਸੀ । ਇਸ ਲਈ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਦਸੰਬਰ, 1846 ਈ. ਵਿੱਚ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨਾਲ ਹੋਈ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਨੂੰ ਖੋਹ ਲਿਆ ਸੀ ਅਤੇ ਉਸ ਦੀ ਡੇਢ ਲੱਖ ਰੁਪਿਆ ਸਾਲਾਨਾ ਪੈਨਸ਼ਨ ਨਿਯਤ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਗਈ । ਅਗਸਤ, 1847 ਈ. ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਰਾਣੀ ਨੂੰ ਸ਼ੇਖੂਪੁਰਾ ਦੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਵਿੱਚ ਨਜ਼ਰਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।

ਮਈ, 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਮਹਾਰਾਣੀ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਨਿਕਾਲਾ ਦੇ ਕੇ ਬਨਾਰਸ ਭੇਜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਬਹੁਤ ਮਾੜਾ ਸਲੂਕ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ । ਅਪਰੈਲ, 1849 ਈ. ਵਿੱਚ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਭੇਸ ਬਦਲ ਕੇ ਨੇਪਾਲ ਪਹੁੰਚਣ ਵਿੱਚ ਸਫਲ ਹੋ ਗਈ । 1861 ਈ. ਵਿੱਚ ਜਦੋਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਇੰਗਲੈਂਡ ਤੋਂ ਭਾਰਤ ਆਇਆ ਤਾਂ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਉਸ ਨੂੰ ਮਿਲਣ ਲਈ ਨੇਪਾਲ ਤੋਂ ਆਈ । ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਆਪਣੀ ਮਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਹੀ ਇੰਗਲੈਂਡ ਲੈ ਗਿਆ ।ਇੱਥੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਦੋਹਾਂ ਨੂੰ ਇਕੱਠੇ ਨਾ ਰਹਿਣ ਦਿੱਤਾ | ਅੰਤ 1 ਅਗਸਤ, 1863 ਈ. ਨੂੰ ਉਹ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਤੋਂ ਚਲ ਵਸੀ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 11.
ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਸੰਖੇਪ ਨੋਟ ਲਿਖੋ । (Write a brief note on Bhai Maharaj Singh.)
ਉੱਤਰ-
ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਨੌਰੰਗਾਬਾਦ ਦੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਸੰਤ ਭਾਈ ਬੀਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਚੇਲੇ ਸਨ । 1845 ਈ. ਵਿੱਚ ਉਹ ਭਾਈ ਬੀਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮੌਤ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਗੱਦੀ ‘ਤੇ ਬੈਠੇ । ਉਹ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਸੁਤੰਤਰਤਾ ਨੂੰ ਬਣਾਈ ਰੱਖਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿੱਚ ਸਨ । ਇਸ ਉਦੇਸ਼ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪਿੰਡ-ਪਿੰਡ ਵਿੱਚ ਜਾ ਕੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਨਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸੰਪੱਤੀ ਜ਼ਬਤ ਕਰ ਲਈ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰਾਉਣ ਵਾਲੇ ਨੂੰ 10,000 ਰੁਪਏ ਇਨਾਮ ਦੇਣ ਦੀ ਘੋਸ਼ਣਾ ਕੀਤੀ । ਇਸ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਨਿਡਰ ਹੋ ਕੇ ਆਪਣਾ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਦੇ ਰਹੇ ।ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ, ਹਜ਼ਾਰਾ ਦੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਦਾ ਝੰਡਾ ਬੁਲੰਦ ਕਰਨ ਲਈ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕੀਤਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਵਿੱਚ ਹਿੱਸਾ ਲਿਆ ।

ਉਹ ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸਿੱਖ ਫ਼ੌਜਾਂ ਦੁਆਰਾ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅੱਗੇ ਹਥਿਆਰ ਸੁੱਟਣ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਸਨ । ਅਜਿਹਾ ਹੋਣ ‘ਤੇ ਉਹ ਜੰਮੂ ਚਲੇ ਗਏ ।ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕਾਬਲ ਦੇ ਸ਼ਾਸਕ ਨਾਲ ਮਿਲ ਕੇ 3 ਜਨਵਰੀ, 1850 ਈ. ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਕਰਨ ਦੀ ਇੱਕ ਯੋਜਨਾ ਬਣਾਈ । ਇਸ ਯੋਜਨਾ ਬਾਰੇ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਪਤਾ ਚਲ ਗਿਆਂ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਉਸ ਨੇ ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਨੂੰ 28 ਦਸੰਬਰ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਕਲਕੱਤਾ ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਸਿੰਘਾਪੁਰ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ । ਇੱਥੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ 5 ਜੁਲਾਈ, 1856 ਈ. ਨੂੰ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ।

ਪ੍ਰਸਤਾਵ ਰੂਪੀ ਪ੍ਰਸ਼ਨ (Essay Type Questions)
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕਾਰਨ ਕਰਨ (Causes of the Second Anglo-Sikh War)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 1.
ਉਨ੍ਹਾਂ ਪਰਿਸਥਿਤੀਆਂ ਦਾ ਵਰਣਨ ਕਰੋ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਕਰਕੇ ਦੂਜਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਹੋਇਆ । ਇਸ ਯੁੱਧ ਲਈ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਕਿੱਥੋਂ ਤਕ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰ ਸਨ ? (Discuss the circumstances leading to the Second Anglo-Sikh War. How far were the British responsible for it ?)
ਜਾਂ
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਕੀ ਸਨ ? (What were the main causes of the Second Anglo-Sikh War ?)
ਜਾਂ
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਕਾਰਨਾਂ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ । (Explain important causes of the Second Anglo-Sikh War.)
ਜਾਂ
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕਾਰਨ ਲਿਖੋ । (Write the reasons of Second Anglo-Sikh War.)
ਉੱਤਰ-
ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀ ਜਿੱਤ ਹੋਈ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਹਾਰ ਦਾ ਮੂੰਹ ਵੇਖਣਾ ਪਿਆ | ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੁਆਰਾ ਸਿੱਖਾਂ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਅਪਮਾਨਜਨਕ ਵਿਹਾਰ ਅਤੇ ਥੋਪੀਆਂ ਗਈਆਂ ਸੰਧੀਆਂ ਨਾਲ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਗੁੱਸਾ ਹੋਰ ਭੜਕ ਉੱਠਿਆ । ਇਸ ਦਾ ਨਤੀਜਾ ਦੁਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਸਾਹਮਣੇ ਆਇਆ । ਇਸ ਯੁੱਧ ਦੇ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਸਨ-

1. ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣ ਦੀ ਇੱਛਾ (Sikh desir to avenge their defeat in the First Anglo-Sikh War) – ਇਹ ਠੀਕ ਹੈ ਕਿ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਹੋਏ ਪਹਿਲੇ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਹਾਰ ਹੋ ਗਈ ਸੀ, ਪਰ ਇਸ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੌਸਲੇ ਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਘੱਟ ਨਹੀਂ ਹੋਏ ਸਨ । ਇਸ ਹਾਰ ਦਾ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਨੇਤਾਵਾਂ ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਤੇਜਾ ਸਿੰਘ ਵੱਲੋਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਗੱਦਾਰੀ ਸੀ । ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਯੋਗਤਾ ‘ਤੇ ਪੂਰਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਸੀ । ਉਹ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਸਨ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਇਹ ਤੀਵਰ ਇੱਛਾ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਇੱਕ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਬਣੀ ।

2. ਲਾਹੌਰ ਅਤੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀਆਂ ਸੰਧੀਆਂ ਤੋਂ ਪੰਜਾਬੀ ਅਸੰਤੁਸ਼ਟ (Punjabis were dissatisfied with the Treaties of Lahore and Bhairowal) – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਹੋਏ ਪਹਿਲੇ ਯੁੱਧ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨਾਲ ਲਾਹੌਰ ਅਤੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਨਾਂ ਦੀਆਂ ਸੰਧੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੰਧੀਆਂ ਰਾਹੀਂ ਜਲੰਧਰ ਦੁਆਬ ਵਰਗੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਉਪਜਾਉ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਅਧੀਨ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ | ਕਸ਼ਮੀਰ ਦਾ ਇਲਾਕਾ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਮਿੱਤਰ ਗੁਲਾਬ ਸਿੰਘ ਦੇ ਹਵਾਲੇ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਅਣਥੱਕ ਯਤਨਾਂ ਸਦਕਾ ਬਣਾਏ ਸਾਮਰਾਜ ਨੂੰ ਖੇਰੂੰ-ਖੇਰੂੰ ਹੁੰਦਾ ਦੇਖ ਕੇ ਸਹਿਣ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੇ ਸਨ । ਇਸ ਲਈ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਇੱਕ ਹੋਰ ਯੁੱਧ ਲੜਨਾ ਪੈਣਾ ਸੀ ।

3. ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਵਿੱਚ ਰੋਸ (Resentment among the Sikh Soldiers) – ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਖ਼ਾਲਸਾ ਫ਼ੌਜ ਦੀ ਗਿਣਤੀ 20,000 ਪੈਦਲ ਤੇ 12,000 ਘੋੜਸਵਾਰ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਕਰ ਦਿੱਤੀ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਨੌਕਰੀ ਤੋਂ ਜਵਾਬ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਇਸ ਲਈ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਰੋਸ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਤਿਆਰੀਆਂ ਕਰਨ ਲੱਗੇ ।

4. ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਸਖ਼ਤ ਸਲੂਕ (Harsh Treatment with. Maharani Jindan) – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਵਿਧਵਾ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮਾਂ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਜੋ ਅਪਮਾਨਜਨਕ ਵਿਵਹਾਰ ਕੀਤਾ ਉਸ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਫੈਲੇ ਰੋਸ ਨੂੰ ਹੋਰ ਭੜਕਾ ਦਿੱਤਾ । ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੰਧੀ ਰਾਹੀਂ ਨਾਬਾਲਗ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਰਪ੍ਰਸਤ ਮੰਨਿਆ ਸੀ । ਪਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਰਾਹੀਂ ਮਹਾਰਾਣੀ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਖੋਹ ਲਈਆਂ । 1847 ਈ. ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਣੀ ਨੂੰ ਸ਼ੇਖੂਪੁਰਾ ਦੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਵਿੱਚ ਨਜ਼ਰਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਮਹਾਰਾਣੀ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਨਿਕਾਲਾ ਦੇ ਕੇ ਬਨਾਰਸ ਭੇਜ ਦਿੱਤਾ । ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਗਈ ਬਦਸਲੂਕੀ ਕਾਰਨ ਸਾਰੇ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਗੁੱਸੇ ਦੀ ਲਹਿਰ ਦੌੜ ਗਈ ।

5. ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦਾ ਵਿਦਰੋਹ (Revolt of Diwan Moolraj) – ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਨੂੰ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸਥਾਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੈ । 1844 ਈ. ਵਿੱਚ ਮੂਲਰਾਜ ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਜ਼ਿਮ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ | ਪਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀਆਂ ਗ਼ਲਤ ਨੀਤੀਆਂ ਦੇ ਕਾਰਨ ਦਸੰਬਰ 1847 ਈ. ਨੂੰ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨੇ ਆਪਣਾ ਅਸਤੀਫ਼ਾ ਦੇ ਦਿੱਤਾ । 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਸਰਦਾਰ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਜ਼ਿਮ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ | ਮੁਲਰਾਜ ਤੋਂ ਚਾਰਜ ਲੈਣ ਲਈ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਦੇ ਨਾਲ ਭੇਜੇ ਗਏ ਦੋ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਵੈਨਸ ਐਗਨਿਯੁ ਅਤੇ ਐਂਡਰਸਨ ‘ਤੇ ਕੁਝ ਸਿਪਾਹੀਆਂ ਨੇ ਹਮਲਾ ਕਰਕੇ 20 ਅਪਰੈਲ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਕਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ | ਅੰਗਰੇਜ਼ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕਤਲ ਦੀ ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਮੁਲਰਾਜ ਦੇ ਸਿਰ ਪਾਈ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਦਾ ਖੂਨ ਖੌਲਣ ਲੱਗਾ ਅਤੇ ਉਸ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਦਾ ਝੰਡਾ ਬੁਲੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ | ਭਾਰਤ ਦਾ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਅਜਿਹੇ ਹੀ ਮੌਕੇ ਦੀ ਤਲਾਸ਼
PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ 1
ਵਿੱਚ ਸੀ । ਉਹ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ ਕਿ ਇਹ ਵਿਦਰੋਹ ਜ਼ਿਆਦਾ ਭੜਕ ਜਾਏ ਅਤੇ ਉਸ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲ ਜਾਏ । ਡਾਕਟਰ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਸਿੰਘ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ,
‘‘ਉਹ ਚੰਗਿਆੜੀ ਜਿਸ ਨੇ ਭਾਂਬੜ ਬਾਲਿਆ ਅਤੇ ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸੁਤੰਤਰ ਰਾਜ ਸੜ ਕੇ ਸੁਆਹ ਹੋ ਗਿਆ, ਮੁਲਤਾਨ ਤੋਂ ਉੱਠੀ ਸੀ ।’’ 1

6. ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਵਿਦਰੋਹ (Revolt of Chattar Singh) – ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਹਜ਼ਾਰਾ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ਸੀ । ਉਸ ਦੇ ਇੱਕ ਸਿਪਾਹੀ ਨੇ ਇੱਕ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਕੈਨੋਰਾ ਦਾ ਕਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ’ਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਉਸ ਦੇ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ ਹਟਾ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਉਸ ਦੀ ਜਾਗੀਰ ਜ਼ਬਤ ਕਰ ਲਈ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਬਗਾਵਤ ਕਰਨ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਚਾਰ-ਚੁਫ਼ੇਰੇ ਬਗਾਵਤ ਦੀ ਅੱਗ ਫੈਲ ਗਈ ।

7. ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਵਿਦਰੋਹ (Revolt of Sher Singh) – ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਪੁੱਤਰ ਸੀ । ਜਦੋਂ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਵਿਰੁੱਧ ਕੀਤੀ ਗਈ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀ ਬਦਸਲੂਕੀ ਬਾਰੇ ਪਤਾ ਲੱਗਿਆ ਤਾਂ ਉਸ ਨੇ ਵੀ 14 ਸਤੰਬਰ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਕਰਨ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਉਸ ਦੀ ਅਪੀਲ ‘ਤੇ ਕਈ ਸਿੱਖ ਉਸ ਦੇ ਝੰਡੇ ਅਧੀਨ ਇਕੱਠੇ ਹੋ ਗਏ ।

8. ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੀ ਨੀਤੀ (Policy of Lord Dalhousie) – ਜਨਵਰੀ, 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਭਾਰਤ ਦਾ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲ ਬਣਿਆ ਸੀ । ਉਸ ਨੇ ਲੈਪਸ ਦੀ ਨੀਤੀ ਰਾਹੀਂ ਭਾਰਤ ਦੀਆਂ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤਾ | ਕੇਵਲ ਪੰਜਾਬ ਹੀ ਇੱਕ ਅਜਿਹਾ ਰਾਜ ਸੀ ਜਿਸ ਨੂੰ ਹਾਲੇ ਤਕ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਿਆ ਸੀ । ਉਹ ਕਿਸੇ ਸੁਨਹਿਰੀ ਮੌਕੇ ਦੀ ਤਲਾਸ਼ ਵਿੱਚ ਸੀ । ਇਹ ਮੌਕਾ ਉਸ ਨੂੰ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ, ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੁਆਰਾ ਕੀਤੇ ਗਏ ਵਿਦਰੋਹਾਂ ਤੋਂ ਮਿਲਿਆ ।

ਜਦੋਂ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਵਿਦਰੋਹ ਦੀ ਅੱਗ ਭੜਕਦੀ ਨਜ਼ਰ ਆਈ ਤਾਂ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਵਿਦਰੋਹੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ਦਾ ਆਦੇਸ਼ ਦਿੱਤਾ । ਅੰਗਰੇਜ਼ ਕਮਾਂਡਰ-ਇਨ-ਚੀਫ਼ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ 16 ਨਵੰਬਰ ਨੂੰ ਫ਼ੌਜ ਲੈ ਕੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਨ ਲਈ ਦਰਿਆ ਚਨਾਬ ਵੱਲ ਚਲ ਪਿਆ ।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ

ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ (Events of the War)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 2.
ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਹੋਏ ਦੂਜੇ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਦਾ ਸੰਖੇਪ ਵਰਣਨ ਕਰੋ । (Discuss in brief the events of the Second Anglo-Sikh War.)
ਉੱਤਰ-
ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀਆਂ ਚਲਾਕ ਨੀਤੀਆਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼-ਸਿੱਖ ਸੰਬੰਧਾਂ ਨੂੰ ਇੱਕ ਹੋਰ ਯੁੱਧ ਦੇ ਨੇੜੇ ਲਿਆ ਖੜਾ ਕੀਤਾ | ਮਲਰਾਜ, ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨੂੰ ਦੇਖਦੇ ਹੋਏ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਨੂੰ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਕੁਚਲਣ ਲਈ ਭੇਜਿਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਦੂਜਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਿਆ । ਇਸ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਮੁੱਖ ਘਟਨਾਵਾਂ ਹੇਠ ਲਿਖੀਆਂ ਸਨ-

1. ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Ramnagar) – ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਲੜਾਈ 22 ਨਵੰਬਰ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਰਾਮਨਗਰ ਦੇ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਹੋਈ | ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਉਸ ਅਧੀਨ 20,000 ਸੈਨਿਕ ਸਨ । ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ ਅਤੇ ਉਸ ਅਧੀਨ 15,000 ਸੈਨਿਕ ਸਨ । ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਹਮਲੇ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੇ ਛੱਕੇ ਛੁਡਾ ਦਿੱਤੇ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਤੋਂ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗ ਗਿਆ ਕਿ ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਨਾ ਆਸਾਨ ਨਹੀਂ ਹੈ ।

2. ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Chillianwala) – ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈਆਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇੱਕ ਸੀ । ਇਹ 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ । ਜਦੋਂ ਗਫ਼ ਨੂੰ ਇਹ ਖ਼ਬਰ ਮਿਲੀ ਕਿ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਆਪਣੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ਸਮੇਤ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਪਹੁੰਚ ਰਿਹਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਸ ਨੇ 13 ਜਨਵਰੀ ਨੂੰ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਹ ਲੜਾਈ ਬਹੁਤ ਭਿਆਨਕ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦੇ 695 ਸੈਨਿਕ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ 132 ਅਫ਼ਸਰ ਵੀ ਮਾਰੇ ਗਏ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀਆਂ 4 ਤੋਪਾਂ ਵੀ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਹੱਥ ਆ ਗਈਆਂ । ਸੀਤਾ ਰਾਮ ਕੋਹਲੀ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ,
‘‘ਜਦੋਂ ਦਾ ਭਾਰਤ ਉੱਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕੀਤਾ ਸੀ ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਇਹ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਭੈੜੀ ਹਾਰ ਸੀ ।’’ 1

ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੇ ਹੋਏ ਭਾਰੀ ਵਿਨਾਸ਼ ਕਾਰਨ ਇੰਗਲੈਂਡ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਹਾਹਾਕਾਰ ਮਚ ਗਈ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਨੂੰ ਬਦਲ ਕੇ ਸਰ ਚਾਰਲਸ ਨੇਪੀਅਰ ਨੂੰ ਮੁੱਖ ਸੈਨਾਪਤੀ ਨਿਯੁਕਤ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ।

3. ਮੁਲਤਾਨ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Multan) – ਮੁਲਤਾਨ ਵਿਖੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਉਸ ਨਾਲ ਆ ਰਲਿਆ ਸੀ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਇੱਕ ਚਾਲ ਚੱਲੀ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਜਾਅਲੀ ਚਿੱਠੀਆਂ ਲਿਖ ਕੇ ਮਲਰਾਜ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਵਿਚਕਾਰ ਗ਼ਲਤ-ਫਹਿਮੀ ਪੈਦਾ ਕਰ ਦਿੱਤੀ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਮੁਲਰਾਜ ਦਾ ਸਾਥ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ । ਦਸੰਬਰ, 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਜਰਨਲ ਵਿਸ਼ ਨੇ ਮੁਲਰਾਜ ਦੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਨੂੰ ਘੇਰਾ ਪਾ ਲਿਆ | ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵੱਲੋਂ ਸੁੱਟਿਆ ਇੱਕ ਗੋਲਾ ਅੰਦਰ ਪਏ ਬਾਰੂਦ ’ਤੇ ਆਣ ਡਿੱਗਾ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਬਹੁਤ ਸਾਰਾ ਬਾਰੂਦ ਨਸ਼ਟ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਮਲਰਾਜ ਦੇ 500 ਸੈਨਿਕ ਵੀ ਮਾਰੇ ਗਏ । ਇਸ ਭਾਰੀ ਨੁਕਸਾਨ ਕਾਰਨ ਮੁਲਰਾਜ ਲਈ ਮੁਕਾਬਲੇ ਨੂੰ ਜਾਰੀ ਰੱਖਣਾ ਬੜਾ ਔਖਾ ਹੋ ਗਿਆ ! ਅੰਤ ਮਜਬੂਰ ਹੋ ਕੇ 22 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਮੁਲਰਾਜ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅੱਗੇ ਹਥਿਆਰ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤੇ । ਮੁਲਤਾਨ ਦੀ ਇਸ ਜਿੱਤ ਨਾਲ ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀ ਜੋ ਹੱਤਕ ਹੋਈ ਸੀ, ਉਸ ਦੀ ਕਾਫ਼ੀ ਹੱਦ ਤਕ ਪੂਰਤੀ ਹੋ ਗਈ ।

4. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ (Battle of Gujarat) – ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਅਤੇ ਨਿਰਣਾਇਕ ਲੜਾਈ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜਾ ਸਿੰਘ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਆ ਗਏ । ਅਫ਼ਗਾਨਿਸਤਾਨ ਦੇ ਬਾਦਸ਼ਾਹ ਦੋਸਤ ਮੁਹੰਮਦ ਖ਼ਾਂ ਨੇ ਵੀ ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ, 3,000 ਘੋੜਸਵਾਰ ਸੈਨਾ ਭੇਜੀ ਸੀ । ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਕੁਲ ਫ਼ੌਜ 40,000 ਸੀ । ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਹੀ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ | ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਕੋਲ 68,000 ਸੈਨਿਕ ਸਨ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਦੋਹਾਂ ਪਾਸਿਆਂ ਤੋਂ ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਕਾਫ਼ੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ । ਇਸ ਲਈ ਇਹ ਲੜਾਈ ਇਤਿਹਾਸ ਵਿੱਚ ‘ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈਂ ਦੇ ਨਾਂ ਨਾਲ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੈ ।

ਇਹ ਲੜਾਈ 21 ਫ਼ਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਹੋਈ । ਸਿੱਖਾਂ ਦੀਆਂ ਤੋਪਾਂ ਦਾ ਬਾਰੂਦ ਛੇਤੀ ਮੁੱਕ ਗਿਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀਆਂ ਤੋਪਾਂ ਨਾਲ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ‘ਤੇ ਜ਼ਬਰਦਸਤ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ਦਾ ਭਾਰੀ ਨੁਕਸਾਨ ਹੋਇਆ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ 3,000 ਤੋਂ 5,000 ਤਕ ਸੈਨਿਕ ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਮਾਰੇ ਗਏ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਵਿੱਚ ਭਗਦੜ ਮੱਚ ਗਈ । 10 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਰਾਵਲਪਿੰਡੀ ਦੇ ਨੇੜੇ ਜਨਰਲ ਗਿਲਬਰਟ ਅੱਗੇ ਆਪਣੇ ਹਥਿਆਰ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤੇ ।
ਇੱਕ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਇਤਿਹਾਸਕਾਰ ਪਤਵੰਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ,
‘‘ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਅੰਤ ਹੋਇਆ ਅਤੇ ਇਸ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਗੌਰਵਮਈ ਸਾਮਰਾਜ `ਤੇ ਪਰਦਾ ਪੈ ਗਿਆ ।’’ 2

ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਿੱਟੇ (Consequences of the War)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 3.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਮੁੱਖ ਸਿੱਟਿਆਂ ਦਾ ਵਰਣਨ ਕਰੋ । (Discuss the main results of the Second Anglo-Sikh War.)
ਉੱਤਰ-
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਬੜੇ ਦੂਰ-ਦੁਰਾਡੇ ਸਿੱਟੇ ਨਿਕਲੇ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸੰਖੇਪ ਵਰਣਨ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਅਨੁਸਾਰ ਹੈ-

1. ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸਾਮਰਾਜ ਦਾ ਅੰਤ (End of the Empire of Maharaja Ranjit Singh) – ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸਿੱਟਾ ਇਹ ਨਿਕਲਿਆ ਕਿ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸਾਮਰਾਜ ਦਾ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਖ਼ਾਤਮਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਆਖਰੀ ਸਿੱਖ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗੱਦੀ ਤੋਂ ਲਾਹ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਉਸ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਛੱਡ ਕੇ ਭਾਰਤ ਦੇ ਕਿਸੇ ਵੀ ਹਿੱਸੇ ਵਿੱਚ ਰਹਿਣ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਦਿੱਤੀ ਗਈ । ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਦੀ ਸਾਰੀ ਜਾਇਦਾਦ ’ਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਕਬਜ਼ਾ ਹੋ ਗਿਆ | ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਕੋਹਿਨੂਰ ਹੀਰਾ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਰਾਣੀ ਵਿਕਟੋਰੀਆ ਨੂੰ ਭੇਂਟ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਕੁਝ ਸਮੇਂ ਦੇ ਬਾਅਦ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਇੰਗਲੈਂਡ ਭੇਜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । 1893 ਈ. ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਪੈਰਿਸ ਵਿਖੇ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ।

2. ਸਿੱਖ ਫ਼ੌਜ ਨੂੰ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ (Sikh Army was Disbanded) – ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਮਗਰੋਂ ਇਸ ਸੈਨਾ ਨੂੰ ਵੀ ਨਿਸ਼ਸਤਰ ਕਰ ਕੇ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਦੇ ਧੰਦੇ ਵਿੱਚ ਲਗਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਗਈ । ਕੁਝ ਨੂੰ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਭਾਰਤੀ ਸੈਨਾ ਵਿੱਚ ਭਰਤੀ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ।

3. ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਅਤੇ ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਨਿਕਾਲੇ ਦੀ ਸਜ਼ਾ (Banishment of Diwan Moolraj and Bhai Maharaj Singh) – ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਮੌਤ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਸੀ । ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਇਸ ਸਜ਼ਾ ਨੂੰ ਕਾਲੇਪਾਣੀ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਵਿੱਚ ਬਦਲ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਪਰ ਉਸ ਦੀ 11 ਅਗਸਤ, 1851 ਨੂੰ ਕਲਕੱਤੇ ਕੋਲਕਾਤਾ) ਵਿਖੇ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ | ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਇਲਾਹਾਬਾਦ ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਕਲਕੱਤੇ ਕੋਲਕਾਤਾ) ਦੀ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ । ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਸ ਨੂੰ ਸਿੰਘਾਪੁਰ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚ ਭੇਜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਇੱਥੇ ਉਸ ਦੀ 5 ਜੁਲਾਈ, 1856 ਈ. ਨੂੰ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ।

4. ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾ (Punishment to Chattar Singh and Sher Singh) – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਵੀ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਇਲਾਹਾਬਾਦ ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਕਲਕੱਤੇ ਕੋਲਕਾਤਾ) ਦੀਆਂ ਜੇਲ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ । 1854 ਈ. ਵਿੱਚ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੋਹਾਂ ਨੂੰ ਰਿਹਾਅ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।

5. ਪੰਜਾਬ ਲਈ ਨਵਾਂ ਰਾਜ ਪ੍ਰਬੰਧ (New Administration for the Punjab) – ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾ ਲੈਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਚਲਾਉਣ ਲਈ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਬੋਰਡ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਕੀਤੀ । ਇਹ 1849 ਈ. ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ 1853 ਈ. ਤਕ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਢਾਂਚੇ ਵਿੱਚ ਕਈ ਤਬਦੀਲੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ । ਉੱਤਰ-ਪੱਛਮੀ ਸੀਮਾ ਨੂੰ ਵਧੇਰੇ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ । ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਨਿਸ਼ਸਤਰੀਕਰਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਨਿਆਂ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਨੂੰ ਵਧੇਰੇ ਸਸਤਾ ਅਤੇ ਛੇਤੀ ਨਿਆਂ ਦੇਣ ਵਾਲੀ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ । ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਸੜਕਾਂ ਅਤੇ ਨਹਿਰਾਂ ਦਾ ਜਾਲ ਵਿਛਾਇਆ ਗਿਆ । ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਨੂੰ ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਜਾਗੀਰਦਾਰੀ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਨੂੰ ਸਮਾਪਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਵਪਾਰ ਨੂੰ ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਕਰਨ ਲਈ ਯਤਨ ਕੀਤੇ ਗਏ । ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਪੱਛਮੀ ਢੰਗ ਦੀ ਸਿੱਖਿਆ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤੀ ਗਈ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੁਧਾਰਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਦੇ ਦਿਲਾਂ ਨੂੰ ਜਿੱਤ ਲਿਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਉਹ 1857 ਈ. ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਸਮੇਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਵਫ਼ਾਦਾਰ ਰਹੇ ।

6. ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨਾਲ ਮਿੱਤਰਤਾ ਵਾਲਾ ਸਲੂਕ (Friendly attitude towards Princely States of the Punjab) – ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਮੇਂ ਪਟਿਆਲਾ, ਨਾਭਾ, ਜੀਂਦ, ਮਲੇਰਕੋਟਲਾ, ਫ਼ਰੀਦਕੋਟ ਅਤੇ ਕਪੂਰਥਲਾ ਦੀਆਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਸਹਿਯੋਗ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਆਪਣੀ ਮਿੱਤਰਤਾ ਬਣਾਈ ਰੱਖੀ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 4.
ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿਚਕਾਰ ਹੋਏ ਦੁਸਰੇ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕਾਰਨ ਅਤੇ ਸਿੱਟੇ ਬਿਆਨ ਕਰੋ । (Discuss the causes and results of Second Anglo-Sikh War.)
ਜਾਂ
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ-ਯੁੱਧ ਦੇ ਕਾਰਨਾਂ ਅਤੇ ਪਰਿਣਾਮਾਂ ਦਾ ਵਰਣਨ ਕਰੋ । (What were the causes and results of the 2nd Anglo-Sikh War ? Explain.)
ਉੱਤਰ-
ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀ ਜਿੱਤ ਹੋਈ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਹਾਰ ਦਾ ਮੂੰਹ ਵੇਖਣਾ ਪਿਆ | ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੁਆਰਾ ਸਿੱਖਾਂ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਅਪਮਾਨਜਨਕ ਵਿਹਾਰ ਅਤੇ ਥੋਪੀਆਂ ਗਈਆਂ ਸੰਧੀਆਂ ਨਾਲ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਗੁੱਸਾ ਹੋਰ ਭੜਕ ਉੱਠਿਆ । ਇਸ ਦਾ ਨਤੀਜਾ ਦੁਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਸਾਹਮਣੇ ਆਇਆ । ਇਸ ਯੁੱਧ ਦੇ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਸਨ-

1. ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣ ਦੀ ਇੱਛਾ (Sikh desir to avenge their defeat in the First Anglo-Sikh War) – ਇਹ ਠੀਕ ਹੈ ਕਿ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਹੋਏ ਪਹਿਲੇ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਹਾਰ ਹੋ ਗਈ ਸੀ, ਪਰ ਇਸ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੌਸਲੇ ਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਘੱਟ ਨਹੀਂ ਹੋਏ ਸਨ । ਇਸ ਹਾਰ ਦਾ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਨੇਤਾਵਾਂ ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਤੇਜਾ ਸਿੰਘ ਵੱਲੋਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਗੱਦਾਰੀ ਸੀ । ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਯੋਗਤਾ ‘ਤੇ ਪੂਰਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਸੀ । ਉਹ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਸਨ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਇਹ ਤੀਵਰ ਇੱਛਾ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਇੱਕ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਬਣੀ ।

2. ਲਾਹੌਰ ਅਤੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀਆਂ ਸੰਧੀਆਂ ਤੋਂ ਪੰਜਾਬੀ ਅਸੰਤੁਸ਼ਟ (Punjabis were dissatisfied with the Treaties of Lahore and Bhairowal) – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿਚਾਲੇ ਹੋਏ ਪਹਿਲੇ ਯੁੱਧ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨਾਲ ਲਾਹੌਰ ਅਤੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਨਾਂ ਦੀਆਂ ਸੰਧੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੰਧੀਆਂ ਰਾਹੀਂ ਜਲੰਧਰ ਦੁਆਬ ਵਰਗੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਉਪਜਾਉ ਦੇਸ਼ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਅਧੀਨ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ | ਕਸ਼ਮੀਰ ਦਾ ਇਲਾਕਾ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਮਿੱਤਰ ਗੁਲਾਬ ਸਿੰਘ ਦੇ ਹਵਾਲੇ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਅਣਥੱਕ ਯਤਨਾਂ ਸਦਕਾ ਬਣਾਏ ਸਾਮਰਾਜ ਨੂੰ ਖੇਰੂੰ-ਖੇਰੂੰ ਹੁੰਦਾ ਦੇਖ ਕੇ ਸਹਿਣ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੇ ਸਨ । ਇਸ ਲਈ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਇੱਕ ਹੋਰ ਯੁੱਧ ਲੜਨਾ ਪੈਣਾ ਸੀ ।

3. ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਵਿੱਚ ਰੋਸ (Resentment among the Sikh Soldiers) – ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਖ਼ਾਲਸਾ ਫ਼ੌਜ ਦੀ ਗਿਣਤੀ 20,000 ਪੈਦਲ ਤੇ 12,000 ਘੋੜਸਵਾਰ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਕਰ ਦਿੱਤੀ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਨੌਕਰੀ ਤੋਂ ਜਵਾਬ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਇਸ ਲਈ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੇ ਮਨਾਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਰੋਸ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨਾਲ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਤਿਆਰੀਆਂ ਕਰਨ ਲੱਗੇ ।

4. ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਸਖ਼ਤ ਸਲੂਕ (Harsh Treatment with. Maharani Jindan) – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਵਿਧਵਾ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮਾਂ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਜੋ ਅਪਮਾਨਜਨਕ ਵਿਵਹਾਰ ਕੀਤਾ ਉਸ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਫੈਲੇ ਰੋਸ ਨੂੰ ਹੋਰ ਭੜਕਾ ਦਿੱਤਾ । ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੰਧੀ ਰਾਹੀਂ ਨਾਬਾਲਗ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਰਪ੍ਰਸਤ ਮੰਨਿਆ ਸੀ । ਪਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਰਾਹੀਂ ਮਹਾਰਾਣੀ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਖੋਹ ਲਈਆਂ । 1847 ਈ. ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਣੀ ਨੂੰ ਸ਼ੇਖੂਪੁਰਾ ਦੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਵਿੱਚ ਨਜ਼ਰਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਮਹਾਰਾਣੀ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਨਿਕਾਲਾ ਦੇ ਕੇ ਬਨਾਰਸ ਭੇਜ ਦਿੱਤਾ । ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਗਈ ਬਦਸਲੂਕੀ ਕਾਰਨ ਸਾਰੇ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਗੁੱਸੇ ਦੀ ਲਹਿਰ ਦੌੜ ਗਈ ।

5. ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦਾ ਵਿਦਰੋਹ (Revolt of Diwan Moolraj) – ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਨੂੰ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸਥਾਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੈ । 1844 ਈ. ਵਿੱਚ ਮੂਲਰਾਜ ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਜ਼ਿਮ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ | ਪਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀਆਂ ਗ਼ਲਤ ਨੀਤੀਆਂ ਦੇ ਕਾਰਨ ਦਸੰਬਰ 1847 ਈ. ਨੂੰ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨੇ ਆਪਣਾ ਅਸਤੀਫ਼ਾ ਦੇ ਦਿੱਤਾ । 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਸਰਦਾਰ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਜ਼ਿਮ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ | ਮੁਲਰਾਜ ਤੋਂ ਚਾਰਜ ਲੈਣ ਲਈ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਦੇ ਨਾਲ ਭੇਜੇ ਗਏ ਦੋ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਵੈਨਸ ਐਗਨਿਯੁ ਅਤੇ ਐਂਡਰਸਨ ‘ਤੇ ਕੁਝ ਸਿਪਾਹੀਆਂ ਨੇ ਹਮਲਾ ਕਰਕੇ 20 ਅਪਰੈਲ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਕਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ | ਅੰਗਰੇਜ਼ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕਤਲ ਦੀ ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਮੁਲਰਾਜ ਦੇ ਸਿਰ ਪਾਈ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਦਾ ਖੂਨ ਖੌਲਣ ਲੱਗਾ ਅਤੇ ਉਸ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਦਾ ਝੰਡਾ ਬੁਲੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ | ਭਾਰਤ ਦਾ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਅਜਿਹੇ ਹੀ ਮੌਕੇ ਦੀ ਤਲਾਸ਼
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ਵਿੱਚ ਸੀ । ਉਹ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ ਕਿ ਇਹ ਵਿਦਰੋਹ ਜ਼ਿਆਦਾ ਭੜਕ ਜਾਏ ਅਤੇ ਉਸ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨ ਦਾ ਮੌਕਾ ਮਿਲ ਜਾਏ । ਡਾਕਟਰ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਸਿੰਘ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ,
‘‘ਉਹ ਚੰਗਿਆੜੀ ਜਿਸ ਨੇ ਭਾਂਬੜ ਬਾਲਿਆ ਅਤੇ ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸੁਤੰਤਰ ਰਾਜ ਸੜ ਕੇ ਸੁਆਹ ਹੋ ਗਿਆ, ਮੁਲਤਾਨ ਤੋਂ ਉੱਠੀ ਸੀ ।’’ 1

6. ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਵਿਦਰੋਹ (Revolt of Chattar Singh) – ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਹਜ਼ਾਰਾ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ਸੀ । ਉਸ ਦੇ ਇੱਕ ਸਿਪਾਹੀ ਨੇ ਇੱਕ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਕੈਨੋਰਾ ਦਾ ਕਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ’ਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਉਸ ਦੇ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ ਹਟਾ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਉਸ ਦੀ ਜਾਗੀਰ ਜ਼ਬਤ ਕਰ ਲਈ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਬਗਾਵਤ ਕਰਨ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਚਾਰ-ਚੁਫ਼ੇਰੇ ਬਗਾਵਤ ਦੀ ਅੱਗ ਫੈਲ ਗਈ ।

7. ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਵਿਦਰੋਹ (Revolt of Sher Singh) – ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਪੁੱਤਰ ਸੀ । ਜਦੋਂ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਵਿਰੁੱਧ ਕੀਤੀ ਗਈ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀ ਬਦਸਲੂਕੀ ਬਾਰੇ ਪਤਾ ਲੱਗਿਆ ਤਾਂ ਉਸ ਨੇ ਵੀ 14 ਸਤੰਬਰ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਕਰਨ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਉਸ ਦੀ ਅਪੀਲ ‘ਤੇ ਕਈ ਸਿੱਖ ਉਸ ਦੇ ਝੰਡੇ ਅਧੀਨ ਇਕੱਠੇ ਹੋ ਗਏ ।

8. ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੀ ਨੀਤੀ (Policy of Lord Dalhousie) – ਜਨਵਰੀ, 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਭਾਰਤ ਦਾ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲ ਬਣਿਆ ਸੀ । ਉਸ ਨੇ ਲੈਪਸ ਦੀ ਨੀਤੀ ਰਾਹੀਂ ਭਾਰਤ ਦੀਆਂ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤਾ | ਕੇਵਲ ਪੰਜਾਬ ਹੀ ਇੱਕ ਅਜਿਹਾ ਰਾਜ ਸੀ ਜਿਸ ਨੂੰ ਹਾਲੇ ਤਕ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਿਆ ਸੀ । ਉਹ ਕਿਸੇ ਸੁਨਹਿਰੀ ਮੌਕੇ ਦੀ ਤਲਾਸ਼ ਵਿੱਚ ਸੀ । ਇਹ ਮੌਕਾ ਉਸ ਨੂੰ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ, ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੁਆਰਾ ਕੀਤੇ ਗਏ ਵਿਦਰੋਹਾਂ ਤੋਂ ਮਿਲਿਆ ।

ਜਦੋਂ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਵਿਦਰੋਹ ਦੀ ਅੱਗ ਭੜਕਦੀ ਨਜ਼ਰ ਆਈ ਤਾਂ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਵਿਦਰੋਹੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ਦਾ ਆਦੇਸ਼ ਦਿੱਤਾ । ਅੰਗਰੇਜ਼ ਕਮਾਂਡਰ-ਇਨ-ਚੀਫ਼ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ 16 ਨਵੰਬਰ ਨੂੰ ਫ਼ੌਜ ਲੈ ਕੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਨ ਲਈ ਦਰਿਆ ਚਨਾਬ ਵੱਲ ਚਲ ਪਿਆ ।

ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਬੜੇ ਦੂਰ-ਦੁਰਾਡੇ ਸਿੱਟੇ ਨਿਕਲੇ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸੰਖੇਪ ਵਰਣਨ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਅਨੁਸਾਰ ਹੈ-

1. ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸਾਮਰਾਜ ਦਾ ਅੰਤ (End of the Empire of Maharaja Ranjit Singh) – ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸਿੱਟਾ ਇਹ ਨਿਕਲਿਆ ਕਿ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸਾਮਰਾਜ ਦਾ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਖ਼ਾਤਮਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਆਖਰੀ ਸਿੱਖ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗੱਦੀ ਤੋਂ ਲਾਹ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਉਸ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਛੱਡ ਕੇ ਭਾਰਤ ਦੇ ਕਿਸੇ ਵੀ ਹਿੱਸੇ ਵਿੱਚ ਰਹਿਣ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਦਿੱਤੀ ਗਈ । ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਦੀ ਸਾਰੀ ਜਾਇਦਾਦ ’ਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਕਬਜ਼ਾ ਹੋ ਗਿਆ | ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਕੋਹਿਨੂਰ ਹੀਰਾ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ ਰਾਣੀ ਵਿਕਟੋਰੀਆ ਨੂੰ ਭੇਂਟ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਕੁਝ ਸਮੇਂ ਦੇ ਬਾਅਦ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਇੰਗਲੈਂਡ ਭੇਜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । 1893 ਈ. ਵਿੱਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਪੈਰਿਸ ਵਿਖੇ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ।

2. ਸਿੱਖ ਫ਼ੌਜ ਨੂੰ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ (Sikh Army was Disbanded) – ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਮਗਰੋਂ ਇਸ ਸੈਨਾ ਨੂੰ ਵੀ ਨਿਸ਼ਸਤਰ ਕਰ ਕੇ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੂੰ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਦੇ ਧੰਦੇ ਵਿੱਚ ਲਗਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਗਈ । ਕੁਝ ਨੂੰ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਭਾਰਤੀ ਸੈਨਾ ਵਿੱਚ ਭਰਤੀ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ।

3. ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਅਤੇ ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਨਿਕਾਲੇ ਦੀ ਸਜ਼ਾ (Banishment of Diwan Moolraj and Bhai Maharaj Singh) – ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਮੌਤ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਸੀ । ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਇਸ ਸਜ਼ਾ ਨੂੰ ਕਾਲੇਪਾਣੀ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਵਿੱਚ ਬਦਲ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਪਰ ਉਸ ਦੀ 11 ਅਗਸਤ, 1851 ਨੂੰ ਕਲਕੱਤੇ ਕੋਲਕਾਤਾ) ਵਿਖੇ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ | ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਇਲਾਹਾਬਾਦ ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਕਲਕੱਤੇ ਕੋਲਕਾਤਾ) ਦੀ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ । ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਸ ਨੂੰ ਸਿੰਘਾਪੁਰ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚ ਭੇਜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਇੱਥੇ ਉਸ ਦੀ 5 ਜੁਲਾਈ, 1856 ਈ. ਨੂੰ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ।

4. ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾ (Punishment to Chattar Singh and Sher Singh) – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਵੀ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ ਸੀ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਇਲਾਹਾਬਾਦ ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿੱਚ ਕਲਕੱਤੇ ਕੋਲਕਾਤਾ) ਦੀਆਂ ਜੇਲ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ । 1854 ਈ. ਵਿੱਚ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੋਹਾਂ ਨੂੰ ਰਿਹਾਅ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।

5. ਪੰਜਾਬ ਲਈ ਨਵਾਂ ਰਾਜ ਪ੍ਰਬੰਧ (New Administration for the Punjab) – ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾ ਲੈਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਚਲਾਉਣ ਲਈ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਬੋਰਡ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਕੀਤੀ । ਇਹ 1849 ਈ. ਤੋਂ ਲੈ ਕੇ 1853 ਈ. ਤਕ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਢਾਂਚੇ ਵਿੱਚ ਕਈ ਤਬਦੀਲੀਆਂ ਕੀਤੀਆਂ । ਉੱਤਰ-ਪੱਛਮੀ ਸੀਮਾ ਨੂੰ ਵਧੇਰੇ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ । ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਨਿਸ਼ਸਤਰੀਕਰਨ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਨਿਆਂ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਨੂੰ ਵਧੇਰੇ ਸਸਤਾ ਅਤੇ ਛੇਤੀ ਨਿਆਂ ਦੇਣ ਵਾਲੀ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ । ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਸੜਕਾਂ ਅਤੇ ਨਹਿਰਾਂ ਦਾ ਜਾਲ ਵਿਛਾਇਆ ਗਿਆ । ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਨੂੰ ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਜਾਗੀਰਦਾਰੀ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਨੂੰ ਸਮਾਪਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਵਪਾਰ ਨੂੰ ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਕਰਨ ਲਈ ਯਤਨ ਕੀਤੇ ਗਏ । ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਪੱਛਮੀ ਢੰਗ ਦੀ ਸਿੱਖਿਆ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤੀ ਗਈ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਸੁਧਾਰਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਦੇ ਦਿਲਾਂ ਨੂੰ ਜਿੱਤ ਲਿਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਉਹ 1857 ਈ. ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਸਮੇਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਵਫ਼ਾਦਾਰ ਰਹੇ ।

6. ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨਾਲ ਮਿੱਤਰਤਾ ਵਾਲਾ ਸਲੂਕ (Friendly attitude towards Princely States of the Punjab) – ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਮੇਂ ਪਟਿਆਲਾ, ਨਾਭਾ, ਜੀਂਦ, ਮਲੇਰਕੋਟਲਾ, ਫ਼ਰੀਦਕੋਟ ਅਤੇ ਕਪੂਰਥਲਾ ਦੀਆਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਸਹਿਯੋਗ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨਾਲ ਆਪਣੀ ਮਿੱਤਰਤਾ ਬਣਾਈ ਰੱਖੀ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਰਿਆਸਤਾਂ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ।

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ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ (Annexation of the Punjab)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 5.
“ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ ਇੱਕ ਬਹੁਤ ਵੱਡਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸਘਾਤ ਸੀਂ” । ਚਰਚਾ ਕਰੋ । (“Annexation of Punjab was a violent breach of trust.” Discuss.)
ਜਾਂ
ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਵਿਲਯ ਦਾ ਆਲੋਚਨਾਤਮਕ ਵਰਣਨ ਕਰੋ । (Examine critically Lord Dalhousie’s annexation of Punjab.)
ਜਾਂ
‘‘ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਰਾਹੀਂ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਸਿਧਾਂਤਹੀਨ ਅਤੇ ਅਣਉੱਚਿਤ ਸੀ ।” ਕੀ ਤੁਸੀਂ ਇਸ ਕਥਨ ਨਾਲ ਸਹਿਮਤ ਹੋ ? ਆਪਣੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿਓ । (“The annexation of Punjab by Lord Dalhousie to the British Empire was unprincipled and unjustified.” Do you agree to this view ? Give arguments in your favour.)
ਉੱਤਰ-
ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲ ਬਣ ਕੇ ਆਇਆ ਸੀ । ਉਹ ਭਾਰਤ ਦੇ ਸਾਰੇ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਸਾਮਰਾਜਵਾਦੀ ਸੀ । ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਵੀ ਉਸ ਦੀ ਸਾਮਰਾਜਵਾਦੀ ਨੀਤੀ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਹੋਣਾ ਪਿਆ । 29 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ. ਲਾਹੌਰ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨ ਦੀ ਘੋਸ਼ਣਾ ਕੀਤੀ ਗਈ । ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲਾਹੌਰ ਕਿਲ੍ਹੇ ਤੋਂ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਝੰਡੇ ਨੂੰ ਉਤਾਰਿਆ ਗਿਆ ਅਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੇ ਝੰਡੇ ਨੂੰ ਲਹਿਰਾਇਆ ਗਿਆ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸਿੱਖ ਰਾਜ ਦਾ ਖ਼ਾਤਮਾ ਹੋ ਗਿਆ ।

I. ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੀ ਮਿਲਾਉਣ ਦੀ ਨੀਤੀ ਦੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਦਲੀਲਾਂ (Arguments in favour of Dalhousie’s Policy of Annexation)

ਡਬਲਿਊ. ਡਬਲਿਉ. ਹੰਟਰ, ਮਾਰਸ਼ਮੈਨ ਅਤੇ ਐੱਮ. ਐੱਸ. ਲਤੀਫ ਆਦਿ ਇਤਿਹਾਸਕਾਰਾਂ ਨੇ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣ ਦੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਹੇਠ ਲਿਖੀਆਂ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ਹਨ-

1. ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਤੋੜਿਆ (Sikhs had broken their Promises) – ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਇਹ ਦੋਸ਼ ਲਗਾਇਆ ਕਿ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਤੋੜਿਆ ਹੈ । ਸਿੱਖ ਸਰਦਾਰਾਂ ਨੇ ਇਹ ਵਚਨ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਸਹਿਯੋਗ ਦੇਣਗੇ | ਪਰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਰਾਜ ਵਿੱਚ ਅਸ਼ਾਂਤੀ ਅਤੇ ਵਿਦਰੋਹ ਫੈਲਾਉਣ ਦਾ ਯਤਨ ਕੀਤਾ । ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਦੀ ਬਗ਼ਾਵਤ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਸਿੱਖ ਜਾਤੀ ਦੀ ਬਗਾਵਤ ਦੱਸਿਆ । ਉਸ ਅਨੁਸਾਰ ਇਹ ਬਗਾਵਤ ਦੁਬਾਰਾ ਸਿੱਖ ਰਾਜ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਕਰਨ ਲਈ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ । ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਵਿਦਰੋਹ ਕਰ ਕੇ ਮੁਲਰਾਜ ਦਾ ਸਾਥ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਵਿਗੜ ਰਹੇ ਹਾਲਾਤ ‘ਤੇ ਕਾਬੂ ਪਾਉਣ ਲਈ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੀ । ਇਸੇ ਕਾਰਨ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਸੀ,
“ਨਿਰਸੰਦੇਹ ਮੈਨੂੰ ਇਹ ਪੱਕਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਹੈ ਕਿ ਮੇਰੀ ਕਾਰਵਾਈ ਸਮੇਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਨਿਆਂਪੂਰਨ ਅਤੇ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੀ ।’’ 1

2. ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਚੰਗਾ ਮੱਧਵਰਤੀ ਰਾਜ ਨਾ ਰਹਿਣਾ (Punjab remained no more a useful Buffer State) – ਲਾਰਡ ਹਾਰਡਿੰਗ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਸੀ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਇੱਕ ਲਾਭਦਾਇਕ ਮੱਧਵਰਤੀ ਰਾਜ ਸਿੱਧ ਹੋਵੇਗਾ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਬ੍ਰਿਟਿਸ਼ ਰਾਜ ਨੂੰ ਅਫ਼ਗਾਨਿਸਤਾਨ ਵੱਲੋਂ ਕਿਸੇ ਖ਼ਤਰੇ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਨਹੀਂ ਕਰਨਾ ਪਵੇਗਾ | ਪਰੰਤੂ ਉਸ ਦਾ ਇਹ ਵਿਚਾਰ ਗ਼ਲਤ ਸਿੱਧ ਹੋਇਆ ਕਿਉਂਕਿ ਸਿੱਖਾਂ ਅਤੇ ਅਫ਼ਗਾਨਾਂ ਵਿੱਚ ਦੋਸਤੀ ਹੋ ਗਈ ਸੀ । ਇਸ ਲਈ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸਮਝਿਆ ।

3. ਕਰਜ਼ੇ ਦੀ ਅਦਾਇਗੀ ਨਾ ਕਰਨਾ (Non-payment of the Loans) – ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਇਹ ਦੋਸ਼ ਲਗਾਇਆ ਕਿ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ 22 ਲੱਖ ਰੁਪਏ ਸਾਲਾਨਾ ਦੇਣਾ ਸੀ । ਪਰ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੇ ਇੱਕ ਪਾਈ ਵੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਨਾ ਦਿੱਤੀ । ਇਸ ਲਈ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਉੱਚਿਤ ਸੀ ।

4. ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨਾ ਲਾਭਦਾਇਕ ਸੀ (It was advantageous to annex Punjab) – ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਜਿੱਤ ਮਗਰੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਵਿਚਾਰ ਸੀ ਕਿ ਆਰਥਿਕ ਪੱਖ ਤੋਂ ਪੰਜਾਬ ਕੋਈ ਲਾਭਦਾਇਕ ਪ੍ਰਾਂਤ ਨਹੀਂ ਹੈ । ਪਰ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਦੋ ਸਾਲ ਰਹਿਣ ਪਿੱਛੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਤਾ ਲੱਗਿਆ ਕਿ ਇਹ ਰਾਜ ਕਈ ਪੱਖਾਂ ਤੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਲਈ ਲਾਭਦਾਇਕ ਸਿੱਧ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਕਾਰਨਾਂ ਕਰਕੇ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਹੜੱਪਣ ਦਾ ਪੱਕਾ ਨਿਸ਼ਚਾ ਕਰ ਲਿਆ ।

5. ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਲਾਭਦਾਇਕ (Advantageous for the people of Punjab) – ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦਾ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰਨਾ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਵਰਦਾਨ ਸਿੱਧ ਹੋਇਆ । ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮੌਤ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਸਾਜ਼ਸ਼ਾਂ ਦਾ ਇੱਕ ਅੱਡਾ ਬਣ ਚੁੱਕਿਆ ਸੀ । ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਦਾ ਫਾਇਦਾ ਉਠਾ ਕੇ ਚੋਰਾਂ, ਡਾਕੂਆਂ ਅਤੇ ਠੱਗਾਂ ਨੇ ਆਪਣਾ ਧੰਦਾ ਜ਼ੋਰਾਂ ‘ਤੇ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਕੇ ਇੱਥੇ ਸ਼ਾਂਤੀ ਦੀ ਮੁੜ ਸਥਾਪਨਾ ਕੀਤੀ । ਪੁਲਿਸ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਅਤੇ ਨਿਆਂ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਨੂੰ ਵਧੇਰੇ ਕੁਸ਼ਲ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ । ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਅਤੇ ਵਪਾਰ ਨੂੰ ਉਤਸ਼ਾਹਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਸੜਕਾਂ ਅਤੇ ਨਹਿਰਾਂ ਦਾ ਜਾਲ ਵਿਛਾਇਆ ਗਿਆ । ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਪੱਛਮੀ ਸਿੱਖਿਆ ਦੇਣ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ।

6. ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੀ (Annexation of the Punjab was Inevitable)-ਇਹ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਜੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਾ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਤਾਂ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿਰੁੱਧ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਸਾਜ਼ਸ਼ਾਂ ਕਰਦੇ ਰਹਿਣਾ ਸੀ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਭਾਰਤ ਦੇ ਦੂਜੇ ਹਿੱਸਿਆਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਪੈ ਸਕਦਾ ਸੀ । ਇਸ ਲਈ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸਮਝਿਆ ।

II. ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੀ ਮਿਲਾਉਣ ਦੀ ਨੀਤੀ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਦਲੀਲਾਂ (Arguments against Dalhousie’s Policy of Annexation)

ਈਵਾਨਜ਼ ਬੈਂਲ, ਜਗਮੋਹਨ ਮਹਾਜਨ, ਗੰਡਾ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਖੁਸ਼ਵੰਤ ਸਿੰਘ ਆਦਿ ਇਤਿਹਾਸਕਾਰਾਂ ਦੁਆਰਾ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਏ ਜਾਣ ਵਿਰੁੱਧ ਅੱਗੇ ਲਿਖੀਆਂ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਹਨ-

1. ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਬਗਾਵਤ ਲਈ ਭੜਕਾਇਆ ਗਿਆ (Sikhs were provoked to Revolt) – ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਬਾਅਦ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਅਜਿਹੀਆਂ ਘਟਨਾਵਾਂ ਹੋਈਆਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਬਗਾਵਤ ਲਈ ਭੜਕਾਇਆ । ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਕਈ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਇਲਾਕੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਖੋਹ ਲਏ ਸਨ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਉਸ ਦੇ ਖ਼ਜ਼ਾਨੇ ‘ਤੇ ਮਾੜਾ ਅਸਰ ਪਿਆ। ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਦੀ ਵਧੇਰੇ ਫ਼ੌਜ ਨੂੰ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ | ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਬਹੁਤ ਮਾੜਾ ਸਲੂਕ ਕੀਤਾ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਅਤੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਬਗਾਵਤ ਲਈ ਭੜਕਾਇਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਬਗਾਵਤ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਹੋਣਾ ਪਿਆ ।

2. ਬਗਾਵਤ ਨੂੰ ਸਮੇਂ ਸਿਰ ਨਾ ਦਬਾਇਆ ਗਿਆ (Revolt was not suppressed in Time) – ਜਦੋਂ ਮੁਲਤਾਨ ਵਿੱਚ ਵਿਦਰੋਹ ਦੀ ਅੱਗ ਭੜਕੀ ਤਾਂ ਉਸ ’ਤੇ ਛੇਤੀ ਹੀ ਕਾਬੂ ਪਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਸੀ | ਅੱਠ ਮਹੀਨਿਆਂ ਤਕ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨੂੰ ਫੈਲਣ ਦੇਣ ਪਿੱਛੇ ਇੱਕ ਡੂੰਘੀ ਰਾਜਸੀ ਚਾਲ ਸੀ । ਇਸ ਸਮੇਂ ਦੌਰਾਨ ਚਤਰ ਸਿੰਘ, ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਸਿੰਘ ਨੇ ਵੀ ਬਗ਼ਾਵਤ ਕਰ ਦਿੱਤੀ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਵੱਡੀ ਸੈਨਿਕ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ਦਾ ਬਹਾਨਾ ਮਿਲ ਗਿਆ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਕਰ ਲਿਆ ।

3. ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ (British had not fulfilled the terms of the Treaty) – ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਸੀ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕੀਤਾ ਹੈ । ਪਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਕੇਵਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਹੀ ਪੂਰਾ ਕੀਤਾ, ਜਿਹੜੀਆਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਲਾਹੇਵੰਦ ਸਨ ।ਉਦਾਹਰਨ ਦੇ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਇਹ ਸ਼ਰਤ ਮੰਨੀ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਦਸੰਬਰ, 1846 ਈ. ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲਾਹੌਰ ਵਿੱਚੋਂ ਆਪਣੀਆਂ ਫ਼ੌਜਾਂ ਨੂੰ ਕੱਢ ਲੈਣਗੇ । ਜਦੋਂ ਇਹ ਸਮਾਂ ਆਇਆ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਇਸ ਸਮੇਂ ਨੂੰ ਵਧਾ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਇਹ ਕਹਿਣਾ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਨਿਰਾ ਝੂਠ ਹੀ ਹੈ ।

4. ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੇ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਪੂਰਨ ਸਹਿਯੋਗ ਦਿੱਤਾ (Lahore Darbar gave full cooperation in fulfilling the terms of the Treaty) – ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਤਾਂ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦਾ ਕਬਜ਼ਾ ਹੋਣ ਤਕ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਵਫ਼ਾਦਾਰੀ ਨਾਲ ਨਿਭਾਉਂਦਾ ਰਿਹਾ | ਲਾਹੌਰ ਸਰਕਾਰ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਰੱਖੀ ਹੋਈ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦਾ ਪੂਰਾ ਖ਼ਰਚਾ ਦੇ ਰਹੀ ਸੀ । ਉਸ ਨੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ, ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੁਆਰਾ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਬਗਾਵਤਾਂ ਦੀ ਨਿੰਦਿਆ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਬਗਾਵਤਾਂ ਨੂੰ ਕੁਚਲਣ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਫ਼ੌਜਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਸਹਿਯੋਗ ਵੀ ਦਿੱਤਾ ।

5. ਕਰਜ਼ੇ ਬਾਰੇ ਅਸਲੀਅਤ (Facts about Loan) – ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਲਗਾਇਆ ਇਹ ਦੋਸ਼ ਕਿ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੇ ਕਰਜ਼ੇ ਦੀ ਇੱਕ ਪਾਈ ਵੀ ਵਾਪਸ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਤੱਥਾਂ ਦੇ ਬਿਲਕੁਲ ਉਲਟ ਸੀ। ਲਾਹੌਰ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਫ਼ਰੈਡਰਿਕ ਕਰੀ ਨੇ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੂੰ ਇੱਕ ਚਿੱਠੀ ਲਿਖੀ ਸੀ ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਸੀ ਕਿ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੇ 13,56,837 ਰੁਪਏ ਦੇ ਮੁੱਲ ਦਾ ਸੋਨਾ ਜਮਾਂ ਕਰਵਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ । ਜੇ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੇ ਆਪਣਾ ਸਾਰਾ ਕਰਜ਼ਾ ਨਹੀਂ ਮੋੜਿਆ ਤਾਂ ਇਸ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਉੱਤੇ ਆਉਂਦੀ ਸੀ ।

6. ਪੂਰੀ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਸੀ (The whole Sikh Army and the People did not Revolt) – ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨੇ ਇਹ ਦੋਸ਼ ਲਗਾਇਆ ਸੀ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਪੂਰੀ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਨੇ ਮਿਲ ਕੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ । ਪਰ ਇਸ ਕਥਨ ਵਿੱਚ ਜ਼ਰਾ ਵੀ ਸੱਚਾਈ ਨਹੀਂ ਹੈ । ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਕੇਵਲ ਮੁਲਤਾਨ ਅਤੇ ਹਜ਼ਾਰਾ ਪ੍ਰਾਂਤਾਂ ਵਿੱਚ ਹੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਹੋਇਆ ਸੀ | ਬਹੁਤੀ ਸਿੱਖ ਫ਼ੌਜ ਅਤੇ ਲੋਕ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਵਫ਼ਾਦਾਰ ਰਹੇ ।

7. ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ਵਾਸਘਾਤ ਸੀ (Annexation of the Punjab was a Breach of Trust) – ਦਸੰਬਰ, 1846 ਈ. ਵਿੱਚ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸਾਰਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਆਪਣੇ ਹੱਥਾਂ ਵਿੱਚ ਲੈ ਲਿਆ ਸੀ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਅਮਨ-ਅਮਾਨ ਕਾਇਮ ਰੱਖਣ ਦੇ ਉਦੇਸ਼ ਨਾਲ ਲਾਹੌਰ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਵੀ ਰੱਖ ਲਈ ਸੀ । ਅਜਿਹੀ ਹਾਲਤ ਵਿੱਚ ਮੁਲਤਾਨ ਅਤੇ ਹਜ਼ਾਰਾ ਵਿੱਚ ਹੋਈ ਬਗ਼ਾਵਤ ਨੂੰ ਕੁਚਲਣ ਦੀ ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਦੀ ਸੀ । ਜੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਬਗਾਵਤਾਂ ਨੂੰ ਕੁਚਲਣ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਨਾਕਾਮ ਰਿਹਾ ਤਾਂ ਉਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਹੀ ਸੀ । ਆਪਣੇ ਕਸੂਰਾਂ ਲਈ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾ ਦੇਣਾ ਇੱਕ ਬੇਇਨਸਾਫ਼ੀ ਵਾਲੀ ਗੱਲ ਸੀ । ਇਹ ਇੱਕ ਘੋਰ ਵਿਸ਼ਵਾਸਘਾਤ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਹੋਰ ਕੀ ਸੀ ।
ਉੱਪਰ ਲਿਖਿਤ ਵੇਰਵੇ ਤੋਂ ਇਹ ਸਪੱਸ਼ਟ ਹੈ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਅਤੇ ਨੈਤਿਕ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਤੋਂ ਬਿਲਕੁਲ ਨਾਜਾਇਜ਼ ਸੀ । ਅੰਤ ਵਿੱਚ ਅਸੀਂ ਮੇਜਰ ਈਵਾਨਜ਼ ਬੈੱਲ ਦੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਸ਼ਬਦਾਂ ਨਾਲ ਸਹਿਮਤ ਹਾਂ,
“ਇਹ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਜਿੱਤ ਨਹੀਂ ਬਲਕਿ ਘੋਰ ਵਿਸ਼ਵਾਸਘਾਤ ਸੀ ।” 1

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ

ਸੰਖੇਪ ਉੱਤਰਾਂ ਵਾਲੇ ਪ੍ਰਸ਼ਨ (Short Answer Type Questions)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 1.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕਾਰਨਾਂ ਦਾ ਸੰਖੇਪ ਵਰਣਨ ਕਰੋ । (Explain in brief the causes of Second Anglo-Sikh War.)
ਜਾਂ
ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕਾਰਨਾਂ ਦਾ ਵਰਣਨ ਕਰੋ । (Describe major causes of the Second Anglo-Sikh War.)
ਜਾਂ
ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਤਿੰਨ ਮੁੱਖ ਕਾਰਨ ਕੀ ਸਨ ? (What were the three main causes for Second Anglo-Sikh War ?)
ਉੱਤਰ-

  1. ਸਿੱਖ ਪਹਿਲੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਹੋਈ ਹਾਰ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਸਨ ।
  2. ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨਾਲ ਜੋ ਅਪਮਾਨਜਨਕ ਸਲੂਕ ਕੀਤਾ, ਉਸ ਨਾਲ ਸਿੱਖ ਭੜਕ ਉੱਠੇ ।
  3. ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਦਾ ਝੰਡਾ ਬੁਲੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।
  4. ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਛੇਤੀ ਤੋਂ ਛੇਤੀ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ ।
  5. ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨੇ ਬਲਦੀ ‘ਤੇ ਤੇਲ ਪਾਉਣ ਦਾ ਕੰਮ ਕੀਤਾ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 2.
ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਸੰਖੇਪ ਨੋਟ ਲਿਖੋ । (Write a short note on the revolt of Diwan Mool Raj.)
ਜਾਂ
ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਸੰਬੰਧੀ ਸੰਖੇਪ ਜਾਣਕਾਰੀ ਦਿਓ । (Give a brief account of the revolt of Diwan Mool Raj of Multan.)
ਉੱਤਰ-
ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨੂੰ 1844 ਈ. ਨੂੰ ਵਿੱਚ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਗਵਰਨਰ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ । ਉਸ ਤੋਂ ਵਸੂਲ ਕੀਤਾ ਜਾਣ ਵਾਲਾ ਸਲਾਨਾ ਲਗਾਨ ਬਹੁਤ ਵਧਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਸੀ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਨੇ ਆਪਣੇ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ ਅਸਤੀਫ਼ਾ ਦੇ ਦਿੱਤਾ । ਨਵੇਂ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਨੇ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਗਵਰਨਰ ਨਿਯੁਕਤ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ । ਦੋ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਐਗਨਿਯੁ ਅਤੇ ਐਂਡਰਸਨ ਨੂੰ ਉਸ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਭੇਜਿਆ ਗਿਆ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕਤਲ ਦਾ ਝੂਠਾ ਇਲਜ਼ਾਮ ਮੂਲਰਾਜ ’ਤੇ ਪਾਇਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਉਹ ਵਿਦਰੋਹ ਕਰਨ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਹੋ ਗਿਆ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 3.
ਹਜ਼ਾਰਾ ਦੇ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਬਾਰੇ ਤੁਸੀਂ ਕੀ ਜਾਣਦੇ ਹੋ ? (What do you know about the revolt of Chattar Singh of Hazara ?)
ਉੱਤਰ-
ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਹਜ਼ਾਰਾ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ਸੀ । ਕੈਪਟਨ ਐਬਟ ਦੁਆਰਾ ਭੜਕਾਏ ਗਏ ਹਜ਼ਾਰਾ ਦੇ ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਨੇ 6 ਅਗਸਤ, 1848 ਈ. ਨੂੰ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਰਿਹਾਇਸ਼ਗਾਹ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਹ ਵੇਖ ਕੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਕਰਨਲ ਕੈਨੋਰਾ ਨੂੰ ਵਿਦਰੋਹੀਆਂ ਵਿਰੁੱਧ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ਦਾ ਹੁਕਮ ਦਿੱਤਾ ! ਕਰਨਲ ਕੈਨੋਰਾ ਨੇ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਹੁਕਮ ਨੂੰ ਮੰਨਣ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਕੈਪਟਨ ਐਬਟ ਨੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਉਸ ਦੇ ਅਹੁਦੇ ਤੋਂ ਹਟਾ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਕਾਰਨ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਖੂਨ ਉਬਲ ਗਿਆ ਤੇ ਉਸ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਬਗ਼ਾਵਤ ਕਰਨ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 4.
ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਸੰਖੇਪ ਨੋਟ ਲਿਖੋ। (Write a note on the battle of Chillianwala.)
ਜਾਂ
ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਬਾਰੇ ਤੁਸੀਂ ਕੀ ਜਾਣਦੇ ਹੋ ? (What do you know about the battle of Chillianwala ?)
ਉੱਤਰ-
ਚਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਇੱਕ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈ ਸੀ । ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਜੋ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਫ਼ੌਜਾਂ ਦਾ ਸੈਨਾਪਤੀ ਸੀ, ਨੂੰ ਇਹ ਸੂਚਨਾ ਮਿਲੀ ਕਿ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਆ ਰਿਹਾ ਹੈ । ਇਸ ਲਈ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਨੇ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਪਹੁੰਚਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਜ਼ਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਵਿਖੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ ਫ਼ੌਜਾਂ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਬੋਲ ਦਿੱਤਾ । ਇਸ ਘਮਸਾਨ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੇ ਚੰਗੇ ਛੱਕੇ ਛੁਡਵਾਏ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 5.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਸਮੇਂ ਹੋਈ ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦਾ ਕੀ ਮਹੱਤਵ ਸੀ ? (What was the importance of the battle of Gujarat in the Second Anglo-Sikh War ?)
ਉੱਤਰ-
ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਆਖਰੀ ਅਤੇ ਫੈਸਲਾਕੁੰਨ ਲੜਾਈ ਸੀ ।ਇਹ ਲੜਾਈ 21 ਫ਼ਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ 40,000 ਸੀ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਚਤਰ ਸਿੰਘ, ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ । ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਲਗਪਗ 68,000 ਸੀ ਅਤੇ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਹਾਰ ਹੋਈ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 29 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 6.
ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕੀ ਪ੍ਰਭਾਵ ਪਏ ? (What were the results of Second Anglo-Sikh War ?)
ਜਾਂ
ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕੋਈ ਤਿੰਨ ਪ੍ਰਭਾਵਾਂ ਦਾ ਵਰਣਨ ਕਰੋ । (Explain any three effects of Second Anglo-Sikh War.)
ਜਾਂ
ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕੋਈ ਤਿੰਨ ਨਤੀਜੇ ਦੱਸੋ । (Explain any three results of Second Anglo-Sikh War.)
ਜਾਂ
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਕੀ ਸਿੱਟੇ ਨਿਕਲੇ ? (What were the results of Second Anglo-Sikh War ?)
ਉੱਤਰ-

  1. ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸਿੱਟਾ ਇਹ ਨਿਕਲਿਆ ਕਿ 29 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ।
  2. ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਅੰਤਿਮ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ 50,000 ਪੌਂਡ ਸਾਲਾਨਾ ਪੈਨਸ਼ਨ ਦੇ ਕੇ ਗੱਦੀਓਂ ਲਾਹ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ।
  3. ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ਨੂੰ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ।
  4. ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਅਤੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਦੇਸ਼ ਨਿਕਾਲੇ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ।
  5. ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸ਼ਾਸਨ ਪ੍ਰਬੰਧ ਚਲਾਉਣ ਲਈ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨਿਕ ਬੋਰਡ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਕੀਤੀ ਗਈ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 7.
ਕੀ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਉੱਚਿਤ ਸੀ ? ਆਪਣੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿਓ । (Was it proper of Lord Dalhousie to annex Punjab to the British Empire ? Give arguments in support of your answer.)
ਜਾਂ
“ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਇੱਕ ਘੋਰ ਵਿਸ਼ਵਾਘਾਤ ਸੀ ।” ਵਿਆਖਿਆ ਕਰੋ । (“Annexation of Punjab was a violent breach of trust.” Explain.)
ਜਾਂ
ਕੀ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸੰਯੋਜਨ ਨਿਆਂ ਸੰਗਤ ਸੀ ? ਕਾਰਨ ਦੱਸੋ । (Was the annexation of Punjab justified ? Give reasons.)
ਜਾਂ
ਕੀ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਸੰਯੋਜਨ ਨਿਆਂ ਸੰਗਤ ਸੀ ? ਕਾਰਨ ਦੱਸੋ । (Was the annexation of Punjab justified ? Give reasons.)
ਉੱਤਰ-
ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਵੀ ਉੱਚਿਤ ਨਹੀਂ ਸੀ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਲਾਹੌਰ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਕਈ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਇਲਾਕੇ ਖੋਹ ਲਏ । ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਦੀ ਜ਼ਿਆਦਾਤਰ ਫ਼ੌਜ ਨੂੰ ਤੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਸੈਨਿਕਾਂ ਵਿੱਚ ਰੋਸ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਿਆ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਨੂੰ ਰਾਜ ਦੇ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸਨ ਤੋਂ ਵੱਖ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਗਵਰਨਰ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ਅਤੇ ਹਜ਼ਾਰਾ ਦੇ ਗਵਰਨਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਵਿਦਰੋਹ ਲਈ ਭੜਕਾਇਆ ਤਾਂ ਕਿ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਬਹਾਨਾ ਬਣਾ ਕੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਕਬਜ਼ੇ ਵਿੱਚ ਕਰ ਸਕਣ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 8.
ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੇ ਇਸ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿਓ ਕਿ ਉਸ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਉੱਚਿਤ ਸੀ । (Give arguments in favour of Dalhousie’s annexation of the Punjab to the British empire.)
ਜਾਂ
ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੀ ਪੰਜਾਬ ਉੱਤੇ ਕਬਜ਼ੇ ਦੀ ਨੀਤੀ ਦੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਦਲੀਲਾਂ ਦਿਓ । (Give arguments in favour of Dalhousie’s policy of the annexation of Punjab.)
ਜਾਂ
ਕੀ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਉੱਚਿਤ ਸੀ ? ਕਾਰਨ ਦੱਸੋ । (Was the annexation of Punjab justified ? Give reasons.)
ਉੱਤਰ-

  1. ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਰਤਾਂ ਨੂੰ ਤੋੜਿਆ ਸੀ ।
  2. ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਬਗ਼ਾਵਤ ਕੀਤੀ ਸੀ ।
  3. ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਂਤੀ ਸਥਾਪਿਤ ਕਰਨ ਲਈ ਇਸ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਮਿਲਾਉਣਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੀ ।
  4. ਪੰਜਾਬ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਲਈ ਇੱਕ ਖ਼ਤਰਾ ਬਣ ਸਕਦਾ ਸੀ ।
  5. ਪੰਜਾਬ ’ਤੇ ਕਬਜ਼ਾ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਲਈ ਲਾਭਦਾਇਕ ਸਿੱਧ ਹੋ ਸਕਦਾ ਸੀ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 9.
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਨੋਟ ਲਿਖੋ । (Write a note on Maharaja Dalip Singh.)
ਉੱਤਰ-
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦਾ ਸਭ ਤੋਂ ਛੋਟਾ ਪੁੱਤਰ ਸੀ । ਉਹ 15 ਸਤੰਬਰ, ‘ 1843 ਈ. ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਨਵਾਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਬਣਿਆ ਸੀ । ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੇ ਲਾਲ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਦੇ ਅਹੁਦੇ ‘ਤੇ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਪਰ ਉਹ ਗੱਦਾਰ ਨਿਕਲਿਆ । ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਪਹਿਲੇ ਅਤੇ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਹਾਰ ਦਾ ਮੂੰਹ ਦੇਖਣਾ ਪਿਆ | ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗੱਦੀ ਤੋਂ ਲਾਹ ਦਿੱਤਾ । 22 ਅਕਤੂਬਰ, 1893 ਈ. ਨੂੰ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਪੈਰਿਸ ਵਿਖੇ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ਸੀ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 10.
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਜਾਂ ਜਿੰਦ ਕੌਰ ‘ਤੇ ਸੰਖੇਪ ਨੋਟ ਲਿਖੋ । (Write a brief note on Maharani Jindan or Jind Kaur.)
ਜਾਂ
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਬਾਰੇ ਤੁਸੀਂ ਕੀ ਜਾਣਦੇ ਹੋ ? (What do you know about Maharani Jindan ?)
ਉੱਤਰ-
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ, ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀ ਰਾਣੀ ਸੀ ਉਸ ਨੂੰ 15 ਸਤੰਬਰ, 1843 ਈ. ਨੂੰ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਨਵੇਂ ਨਿਯੁਕਤ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦਾ ਸਰਪ੍ਰਸਤ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ । ਇਸ ਲਈ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਦਸੰਬਰ, 1846 ਈ. ਵਿੱਚ ਹੋਈ ਭੈਰੋਵਾਲ ਦੀ ਸੰਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਨੂੰ ਖੋਹ ਲਿਆ ਸੀ । ਅਪਰੈਲ, 1849 ਈ. ਵਿੱਚ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਭੇਸ ਬਦਲ ਕੇ ਨੇਪਾਲ ਪਹੁੰਚਣ ਵਿੱਚ ਸਫਲ ਹੋ ਗਈ । ਅੰਤ 1 ਅਗਸਤ, 1863 ਈ. ਨੂੰ ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਇੰਗਲੈਂਡ ਵਿੱਚ ਇਸ ਸੰਸਾਰ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾਂ ਲਈ ਅਲਵਿਦਾ ਕਹਿ ਗਈ ।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 11.
ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ‘ਤੇ ਇੱਕ ਸੰਖੇਪ ਨੋਟ ਲਿਖੋ । (Write a brief note on Bhai Maharaj Singh.)
ਉੱਤਰ-
ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਨੌਰੰਗਾਬਾਦ ਦੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਸੰਤ ਭਾਈ ਬੀਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਚੇਲੇ ਸਨ । ਉਹ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਸੁਤੰਤਰਤਾ ਦੇ ਹੱਕ ਵਿੱਚ ਸਨ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਜ, ਹਜ਼ਾਰਾ ਦੇ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਦਾ ਝੰਡਾ ਬੁਲੰਦ ਕਰਨ ਲਈ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਕੀਤਾ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਵਿੱਚ ਹਿੱਸਾ ਲਿਆ । ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸਿੰਘਾਪੁਰ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚ 5 ਜੁਲਾਈ, 1856 ਈ. ਨੂੰ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ਸੀ ।

ਵਸਤੁਨਿਸ਼ਠ ਪ੍ਰਸ਼ਨ (Objective Type Questions)
ਇੱਕ ਸ਼ਬਦ ਤੋਂ ਇੱਕ ਵਾਕ ਵਿੱਚ ਉੱਤਰ (Answer in one Word to one Sentence)

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 1.
ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਕਦੋਂ ਲੜਿਆ ਗਿਆ ?
ਉੱਤਰ-
1848-49 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 2.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਮੇਂ ਭਾਰਤ ਦਾ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 3.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਕੋਈ ਇੱਕ ਕਾਰਨ ਲਿਖੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਸਿੱਖ ਪਹਿਲੇ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਹੋਈ ਆਪਣੀ ਹਾਰ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੈਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਸਨ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 4.
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਜਾਂ
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ (ਜਿੰਦ ਕੌਰ) ਕੌਣ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮਾਂ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 5.
ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ਗਵਰਨਰ ਸੀ ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 6.
ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦੁਆਰਾ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਕਰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਇੱਕ ਕਾਰਨ ਦੱਸੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਵੱਲੋਂ ਵਸੂਲ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਸਾਲਾਨਾ ਲਗਾਨ ਦੀ ਰਕਮ ਕਾਫ਼ੀ ਵਧਾ ਦਿੱਤੀ ਸੀ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 7.
ਸਾਵਨ ਮਲ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦਾ ਪਿਤਾ ਅਤੇ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 8.
ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਹਜ਼ਾਰਾ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 9.
ਸਰਦਾਰ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਦਾ ਪੁੱਤਰ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 10.
ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਬਗਾਵਤ ਦਾ ਝੰਡਾ ਕਿਉਂ ਬੁਲੰਦ ਕੀਤਾ ?
ਉੱਤਰ-
ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੁਆਰਾ ਉਸਦੇ ਪਿਤਾ ਨਾਲ ਕੀਤੇ ਗਏ ਦੁਰਵਿਹਾਰ ਦੇ ਕਾਰਨ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 11.
ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਉਹ ਨੌਰੰਗਾਬਾਦ ਦੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਸੰਤ ਸਨ ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 12.
ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਕਿਸ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨਾਲ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਇਆ ?
ਜਾਂ
ਕਿਸ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨੇ ਦੂਜੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਨੂੰ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤਾ ?
ਉੱਤਰ-
ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 13.
ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ ਕਦੋਂ ਹੋਈ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
22 ਨਵੰਬਰ, 1848 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 14.
ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਕਦੋਂ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 15.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਆਖਰੀ ਲੜਾਈ ਕਿਹੜੀ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 16.
ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਕਦੋਂ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
21 ਫ਼ਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 17.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਦੌਰਾਨ ਲੜੀ ਗਈ ਉਸ ਲੜਾਈ ਦਾ ਨਾਂ ਦੱਸੋ ਜਿਹੜੀ ਇਤਿਹਾਸ ਵਿੱਚ ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੇ ਨਾਂ ਨਾਲ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੈ ?
ਉੱਤਰ-
ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 18.
ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦਾ ਕੋਈ ਇੱਕ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਸਿੱਟਾ ਦੱਸੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 19.
ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਕਦੋਂ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ?
ਜਾਂ
ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਕਦੋਂ ਮਿਲਾਇਆ ਗਿਆ ?
ਉੱਤਰ-
29 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 20.
ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨ ਦੇ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਦਿੱਤੀ ਜਾਣ ਵਾਲੀ ਕੋਈ ਇੱਕ ਦਲੀਲ ਦੱਸੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨਾ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਲਾਭਦਾਇਕ ਸੀ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 21.
ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਦੁਆਰਾ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਰਨ ਵਿਰੁੱਧ ਦਿੱਤੀ ਜਾਣ ਵਾਲੀ ਕੋਈ ਇੱਕ ਦਲੀਲ ਲਿਖੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਬਗਾਵਤ ਲਈ ਭੜਕਾਇਆ ਸੀ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 22.
ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਉਹ ਨੌਰੰਗਾਬਾਦ ਦੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਸੰਤ ਭਾਈ ਬੀਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਚੇਲਾ ਸੀ ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 23.
ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮੌਤ ਕਦੋਂ ਹੋਈ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
1856 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 24.
ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮੌਤ ਕਿੱਥੇ ਹੋਈ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਸਿੰਘਾਪੁਰ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 25.
ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਆਖ਼ਰੀ ਸਿੱਖ ਮਹਾਰਾਜਾ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਜਾਂ
ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਆਖ਼ਰੀ ਸਿੱਖ ਸ਼ਾਸਕ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਜਾਂ
ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਅੰਤਿਮ ਸਿੱਖ ਮਹਾਰਾਜਾ ਕੌਣ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 26.
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮੌਤ ਕਿੱਥੇ ਹੋਈ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
ਪੈਰਿਸ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 27.
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮੌਤ ਕਦੋਂ ਹੋਈ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
1893 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 28.
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਦੀ ਮੌਤ ਕਦੋਂ ਹੋਈ ਸੀ ?
ਉੱਤਰ-
1863 ਈ. ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 29.
ਸਿੱਖ ਰਾਜ ਦੇ ਪਤਨ ਦਾ ਕੋਈ ਇੱਕ ਕਾਰਨ ਦੱਸੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਉੱਤਰਾਧਿਕਾਰੀ ਕਮਜ਼ੋਰ ਨਿਕਲੇ ।

ਖ਼ਾਲੀ ਥਾਂਵਾਂ ਭਰੋ (Fill in the Blanks)

ਨੋਟ :-ਖ਼ਾਲੀ ਥਾਂਵਾਂ ਭਰੋ :

1. ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਅਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਵਿਚਕਾਰ ਦੂਜੀ ਲੜਾਈ …………………… ਈ. ਵਿੱਚ ਹੋਈ ।
ਉੱਤਰ-
(1848-49)

2. ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਮੇਂ ਭਾਰਤ ਦਾ ਗਵਰਨਰ ਜਨਰਲ …………………….. ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
(ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ)

3. ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਸਮੇਂ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਹਾਰਾਜਾ …………………….. ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
(ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ)

4. ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮਾਂ ਦਾ ਨਾਂ ……………………….. ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
(ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ)

5. 1844 ਈ. ਵਿੱਚ …………………………. ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ਨਿਯੁਕਤ ਹੋਇਆ ।
ਉੱਤਰ-
(ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ)

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6. ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ………………………… ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
(ਹਜ਼ਾਰਾ)

7. ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਪਹਿਲੀ ਲੜਾਈ ਦਾ ਨਾਂ ……………………… ਦੀ ਲੜਾਈ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
(ਰਾਮਨਗਰ)

8. ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ …………………………. ਨੂੰ ਹੋਈ ।
ਉੱਤਰ-
(22 ਨਵੰਬਰ, 1848 ਈ.)

9. ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ …………………………. ਨੂੰ ਹੋਈ ।
ਉੱਤਰ-
(13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ.)

10. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਇਤਿਹਾਸ ਵਿੱਚ ………………………… ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੇ ਨਾਂ ਨਾਲ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੈ ।
ਉੱਤਰ-
(ਤੋਪਾਂ)

11. ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ………………………….. ਨੂੰ ਮਿਲਾਇਆ ।
ਉੱਤਰ-
(29 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ.)

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ਠੀਕ ਜਾਂ ਗਲਤ (True or False)

ਨੋਟ :-ਹੇਠ ਲਿਖਿਆਂ ਵਿੱਚੋਂ ਠੀਕ ਜਾਂ ਗਲਤ ਦੀ ਚੋਣ ਕਰੋ-

1. ਦੁਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ 1848-49 ਈ. ਵਿੱਚ ਲੜਿਆ ਗਿਆ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

2. ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਮੇਂ ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਭਾਰਤ ਦਾ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

3. ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਮੇਂ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

4. ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮਾਂ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

5. ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ 1846 ਈ. ਵਿੱਚ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ਬਣਿਆ ।
ਉੱਤਰ-
ਗਲਤ

6. ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ ਨਾਲ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਇਆ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

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7. ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ 12 ਨਵੰਬਰ, 1846 ਈ. ਨੂੰ ਹੋਈ ।
ਉੱਤਰ-
ਗ਼ਲਤ

8. ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਹੋਈ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

9. ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਨੂੰ ਇੱਕ ਕਰਾਰੀ ਹਾਰ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਕਰਨਾ ਪਿਆ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

10. ਦੁਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਨਾਲ ਸਮਾਪਤ ਹੋ ਗਿਆ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

11. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ 21 ਫ਼ਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਹੋਈ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

12. ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ 29 ਮਾਰਚ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

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13. ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਨੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਸਦੇ ਸਾਮਰਾਜ ਦੀ ਵਾਗਡੋਰ ਸੰਭਾਲੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਗਲਤ

14. ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਆਖਰੀ ਸਿੱਖ ਮਹਾਰਾਜਾ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਠੀਕ

15. ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਅੰਤਿਮ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਸੀ ।
ਉੱਤਰ-
ਗ਼ਲਤ

ਬਹੁਪੱਖੀ ਪ੍ਰਸ਼ਨ (Multiple Choice Questions)

ਨੋਟ :-ਹੇਠ ਲਿਖਿਆਂ ਵਿੱਚੋਂ ਠੀਕ ਉੱਤਰ ਦੀ ਚੋਣ ਕਰੋ-

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 1.
ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਕਦੋਂ ਲੜਿਆ ਗਿਆ ?
(i) 1844-45 ਈ. ਵਿੱਚ
(ii) 1845-46 ਈ. ਵਿੱਚ
(iii) 1847-48 ਈ. ਵਿੱਚ
(iv) 1848-49 ਈ. ਵਿੱਚ ।
ਉੱਤਰ-
(iv) 1848-49 ਈ. ਵਿੱਚ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 2.
ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੇ ਸਮੇਂ ਭਾਰਤ ਦਾ ਗਵਰਨਰ-ਜਨਰਲ ਕੌਣ ਸੀ ?
(i) ਲਾਰਡ ਲਿਟਨ
(ii) ਲਾਰਡ ਰਿਪਨ
(iii) ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ
(iv) ਲਾਰਡ ਹਾਰਡਿੰਗ ।
ਉੱਤਰ-
(iii) ਲਾਰਡ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 3.
ਦੁਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਸਮੇਂ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਹਾਰਾਜਾ ਕੌਣ ਸੀ ?
(i) ਮਹਾਰਾਜਾ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ
(ii) ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ
(iii) ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ
(iv) ਮਹਾਰਾਜਾ ਖੜਕ ਸਿੰਘ ।
ਉੱਤਰ-
(iii) ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 4.
ਮਹਾਰਾਣੀ ਜਿੰਦਾਂ ਕੌਣ ਸੀ ?
(i) ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮਾਂ
(ii) ਮਹਾਰਾਜਾ ਖੜਕ ਸਿੰਘ ਦੀ ਭੈਣ
(iii) ਮਹਾਰਾਜਾ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਪਤਨੀ
(iv) ਰਾਜਾ ਗੁਲਾਬ ਸਿੰਘ ਦੀ ਪੁੱਤਰੀ ।
ਉੱਤਰ-
(i) ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮਾਂ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 5.
ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਕੌਣ ਸੀ ?
(i) ਗੁਜਰਾਤ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ
(ii) ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ
(iii) ਕਸ਼ਮੀਰ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ
(iv) ਪਿਸ਼ਾਵਰ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ
ਉੱਤਰ-
(ii) ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 6.
ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਵਿਦਰੋਹ ਕਦੋਂ ਕੀਤਾ ਸੀ ?
(i) 1844 ਈ. ਵਿੱਚ
(ii) 1845 ਈ. ਵਿੱਚ
(iii) 1846 ਈ. ਵਿੱਚ
(iv) 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ।
ਉੱਤਰ-
(iv) 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 7.
ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਅਟਾਰੀਵਾਲਾ ਕਿੱਥੋਂ ਦਾ ਨਾਜ਼ਿਮ ਸੀ ?
(i) ਹਜ਼ਾਰਾ
(ii) ਮੁਲਤਾਨ
(iii) ਕਸ਼ਮੀਰ
(iv) ਪਿਸ਼ਾਵਰ ।
ਉੱਤਰ-
(i) ਹਜ਼ਾਰਾ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 8.
ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਕਿਸ ਲੜਾਈ ਨਾਲ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਇਆ ਸੀ ?
(i) ਮੁਲਤਾਨ ਦੀ ਲੜਾਈ
(ii) ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ
(iii) ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ
(iv) ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ ।
ਉੱਤਰ-
(iv) ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 9.
ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ ਕਦੋਂ ਹੋਈ ਸੀ ?
(i) 12 ਨਵੰਬਰ, 1846 ਈ.
(ii) 15 ਨਵੰਬਰ, 1847 ਈ.
(iii) 17 ਨਵੰਬਰ, 1848 ਈ.
(iv) 22 ਨਵੰਬਰ, 1848 ਈ. ।
ਉੱਤਰ-
(iv) 22 ਨਵੰਬਰ, 1848 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 10.
ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਕਦੋਂ ਹੋਈ ?
(i) 22 ਨਵੰਬਰ, 1848 ਈ.
(ii) 3 ਜਨਵਰੀ, 1848 ਈ.
(iii) 10 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ.
(iv) 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ।
ਉੱਤਰ-
(iv) 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 11.
ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਯੁੱਧ ਕਦੋਂ ਖ਼ਤਮ ਹੋਇਆ ?
(i) 22 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ.
(ii) 23 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ.
(ii) 24 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ.
(iv) 25 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ।
ਉੱਤਰ-
(i) 22 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 12.
ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਕਿਸ ਲੜਾਈ ਨਾਲ ਖ਼ਤਮ ਹੋਇਆ ?
ਜਾਂ
ਉਸ ਲੜਾਈ ਦਾ ਨਾਂ ਦੱਸੋ ਜਿਹੜੀ ਇਤਿਹਾਸ ਵਿੱਚ ‘ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੇ ਨਾਂ ਨਾਲ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੈ ?
(i) ਮੁਲਤਾਨ ਦੀ ਲੜਾਈ
(ii) ਰਾਮਨਗਰ ਦੀ ਲੜਾਈ
(iii) ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ
(iv) ਚਿਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ।
ਉੱਤਰ-
(iii) ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 13.
ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਕਦੋਂ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ ?
(i) 22 ਨਵੰਬਰ, 1848 ਈ.
(ii) 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ.
(iii) 22 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ.
(iv) 21 ਫਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ।
ਉੱਤਰ-
(iv) 21 ਫਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 14.
ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵਿੱਚ ਕਦੋਂ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ ?
(i) 1849 ਈ.
(ii) 1850 ਈ.
(iii) 1848 ਈ.
(iv) 1947 ਈ. ।
ਉੱਤਰ-
(i) 1849 ਈ. ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 15.
ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਆਖ਼ਰੀ ਸਿੱਖ ਮਹਾਰਾਜਾ, ਕੌਣ ਸੀ ?
(i) ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ
(ii) ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ
(iii) ਮਹਾਰਾਜਾ ਖੜਕ ਸਿੰਘ
(iv) ਮਹਾਰਾਜਾ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ।
ਉੱਤਰ-
(i) ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 16.
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮੌਤ ਕਦੋਂ ਹੋਈ ਸੀ ?
(i) 1857 ਈ. ਵਿੱਚ
(ii) 1893 ਈ. ਵਿੱਚ
(iii) 1849 ਈ. ਵਿੱਚ
(iv) 1892 ਈ. ਵਿੱਚ ।
ਉੱਤਰ-
(ii) 1893 ਈ. ਵਿੱਚ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 17.
ਮਹਾਰਾਜਾ ਦਲੀਪ ਸਿੰਘ ਦੀ ਮੌਤ ਕਿੱਥੇ ਹੋਈ ਸੀ ?
(i) ਪੰਜਾਬ
(ii) 1893 ਈ. ਵਿੱਚ
(iii) ਨੇਪਾਲ
(iv) ਲੰਡਨ ।
ਉੱਤਰ-
(ii) 1893 ਈ. ਵਿੱਚ ।

Source Based Questions
ਨੋਟ-ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਪੈਰਿਆਂ ਨੂੰ ਧਿਆਨ ਨਾਲ ਪੜ੍ਹੋ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਅੰਤ ਵਿੱਚ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਪ੍ਰਸ਼ਨਾਂ ਦੇ ਉੱਤਰ ਦਿਓ-

1. ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਨੂੰ ਆਰੰਭ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਸਥਾਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੈ । ਮੁਲਤਾਨ ਸਿੱਖ-ਰਾਜ ਦਾ ਇੱਕ ਸੂਬਾ ਸੀ । 1844 ਈ. ਵਿੱਚ ਇੱਥੋਂ ਦੇ ਨਾਜ਼ਿਮ (ਗਵਰਨਰ) ਸਾਵਨ ਮਲ ਦੀ ਮੌਤ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਸ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਮੂਲਰਾਜ ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਜ਼ਿਮ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ । ਇਸ ਮੌਕੇ ‘ਤੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਨੇ ਮੁਲਤਾਨ ਸੂਬੇ ਦੁਆਰਾ ਲਾਹੌਰ ਦਰਬਾਰ ਨੂੰ ਦਿੱਤਾ ਜਾਣ ਵਾਲਾ ਸਾਲਾਨਾ ਲਗਾਨ 13,47,000 ਰੁਪਏ ਤੋਂ ਵਧਾ ਕੇ 19,71,500 ਰੁਪਏ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । 1846 ਈ. ਵਿੱਚ ਇਸ ਨੂੰ ਵਧਾ ਕੇ 30 ਲੱਖ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ । ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਮੁਲਤਾਨ ਵਿੱਚ ਵਿਕਣ ਵਾਲੀਆਂ ਕੁਝ ਜ਼ਰੂਰੀ ਵਸਤਾਂ ਤੋਂ ਕਰ ਹਟਾ ਲਿਆ ਅਤੇ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ 1/3 ਹਿੱਸਾ ਵੀ ਵਾਪਸ ਲੈ ਲਿਆ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਕਾਰਨਾਂ ਕਰਕੇ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਵਧਿਆ ਹੋਇਆ ਲਗਾਨ ਨਹੀਂ ਦੇ ਸਕਦਾ ਸੀ ।

ਇਸ ਸੰਬੰਧੀ ਉਸ ਨੇ ਬਿਟਿਸ਼ ਸਰਕਾਰ ਨੂੰ ਕਈ ਵਾਰ ਕਿਹਾ ਪਰ ਉਹ ਨਾ ਮੰਨੀ । ਅੰਤ ਮਜਬੂਰ ਹੋ ਕੇ ਦਸੰਬਰ, 1847 ਈ. ਨੂੰ ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਨੇ ਆਪਣਾ ਅਸਤੀਫ਼ਾ ਦੇ ਦਿੱਤਾ । ਮਾਰਚ, 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਨਵੇਂ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਫ਼ਰੈਡਰਿਕ ਕਰੀ ਨੇ ਸਰਦਾਰ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਜ਼ਿਮ ਨਿਯੁਕਤ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ । ਮੂਲਰਾਜ ਤੋਂ ਚਾਰਜ ਲੈਣ ਲਈ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਦੇ ਨਾਲ ਦੋ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫਸਰਾਂ ਵੈਨਸ ਐਗਨਿਯੂ ਅਤੇ ਐਂਡਰਸਨ ਨੂੰ ਭੇਜਿਆ ਗਿਆ । ਮੂਲਰਾਜ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਚੰਗਾ ਸਵਾਗਤ ਕੀਤਾ 19 ਅਪਰੈਲ ਨੂੰ ਮੁਲਰਾਜ ਨੇ ਕਿਲ੍ਹੇ ਦੀਆਂ ਚਾਬੀਆਂ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਦੇ ਹਵਾਲੇ ਕਰ ਦਿੱਤੀਆਂ | ਪਰ ਅਗਲੇ ਦਿਨ 20 ਅਪਰੈਲ ਨੂੰ ਮੂਲਰਾਜ ਦੇ ਕੁਝ ਸਿਪਾਹੀਆਂ ਨੇ ਹਮਲਾ ਕਰਕੇ ਦੋਹਾਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫਸਰਾਂ ਨੂੰ ਕਤਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ । ਫ਼ਰੈਡਰਿਕ ਕਰੀ ਨੇ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਦੀ ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਮੁਲਰਾਜ ਦੇ ਸਿਰ ਪਾਈ ।

1. ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਨੂੰ ਕਦੋਂ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਜ਼ਿਮ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ ?
2. ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਨੇ ਕਿਹੜੇ ਕਾਰਨ ਕਰਕੇ ਆਪਣਾ ਅਸਤੀਫ਼ਾ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ?
3. 1848 ਈ. ਵਿੱਚ ਰੈਜ਼ੀਡੈਂਟ ਫ਼ਰੈਡਰਿਕ ਕਰੀ ਨੇ ਕਿਸ ਨੂੰ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਜ਼ਿਮ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ?
4. ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੇ ਕਿਹੜੇ ਦੋ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਦੇ ਕਤਲ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਦੀਵਾਨ ਮੁਲਰਾਜ ’ਤੇ ਪਾਈ ?

5. ਫ਼ਰੈਡਰਿਕ ਕਰੀ ਨੇ ਮੁਲਤਾਨ ਦੇ ਵਿਦਰੋਹ ਦੀ ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ …………………. ਦੇ ਸਿਰ ਪਾਈ ।
ਉੱਤਰ-
1. ਦੀਵਾਨ ਮੂਲਰਾਜ ਨੂੰ 1844 ਈ. ਵਿੱਚ ਮੁਲਤਾਨ ਦਾ ਨਵਾਂ ਨਾਜ਼ਿਮ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ ।
2. ਉਸ ਦੁਆਰਾ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਸਲਾਨਾ ਲਗਾਨ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਵਾਧਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਸੀ ।
3. ਸਰਦਾਰ ਕਾਹਨ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ।
4. ਵੈਨਸ ਐਗਨਿਯੂ ਅਤੇ ਐਂਡਰਸਨ ।
5. ਮੁਲਰਾਜੇ ।

2. ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀਆਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈਆਂ ਵਿਚੋਂ ਇੱਕ ਸੀ । ਇਹ ਲੜਾਈ 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ । ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਦਾ ਇਹ ਵਿਚਾਰ ਸੀ ਕਿ ਉਸ ਕੋਲ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਨ ਲਈ ਸ਼ਕਤੀਸ਼ਾਲੀ ਫ਼ੌਜ ਨਹੀਂ ਹੈ । ਇਸ ਲਈ ਉਹ ਵਧੇਰੇ ਸੈਨਿਕ ਸਹਾਇਤਾ ਪਹੁੰਚਣ ਦੀ ਉਡੀਕ ਕਰਨ ਲੱਗਾ । ਜਦੋਂ ਗਫ਼ ਨੂੰ ਇਹ ਖ਼ਬਰ ਮਿਲੀ ਕਿ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਆਪਣੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ਸਮੇਤ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਪਹੁੰਚ ਰਿਹਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਸ ਨੇ 13 ਜਨਵਰੀ ਨੂੰ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਇਹ ਲੜਾਈ ਬਹੁਤ ਭਿਆਨਕ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਸੈਨਾ ਵਿੱਚ ਤਬਾਹੀ ਮਚਾ ਦਿੱਤੀ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੇ 695 ਸੈਨਿਕ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ 132 ਅਫ਼ਸਰ ਸਨ, ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਮਾਰੇ ਗਏ ਅਤੇ 1651 ਹੋਰ ਸੈਨਿਕ ਜ਼ਖ਼ਮੀ ਹੋਏ | ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀਆਂ 4 ਤੋਪਾਂ ਵੀ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਹੱਥ ਆ ਗਈਆਂ ।

1. ਦੁਸਰੇ-ਐਂਗਲੋ ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈ ਕਿਹੜੀ ਸੀ ?
2. ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਕਦੋਂ ਹੋਈ ?
3. ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਕੌਣ ਸੀ?
4. ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਕਿਸ ਦੀ ਹਾਰ ਹੋਈ ?
5. ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਕਿੰਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫ਼ਸਰ ਮਾਰੇ ਗਏ ਸਨ ?
(i) 132
(ii) 142
(iii) 695
(iv) 1651.
ਉੱਤਰ-
1. ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਲੜਾਈ ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਸੀ ।
2. ਇਹ ਲੜਾਈ 13 ਜਨਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਹੋਈ ।
3. ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਹਜ਼ਾਰਾ ਦੇ ਨਾਜ਼ਿਮ ਸਰਦਾਰ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਪੁੱਤਰ ਸੀ ।
4. ਚਿਲਿਆਂਵਾਲਾ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਦੀ ਹਾਰ ਹੋਈ ।
5. 132.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 23 ਦੂਸਰਾ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ : ਕਾਰਨ, ਸਿੱਟੇ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਦਾ ਮਿਲਾਉਣਾ

3. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਅਤੇ ਨਿਰਣਾਇਕ ਲੜਾਈ ਸਿੱਧ ਹੋਈ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਚਤਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੈਨਿਕ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨਾਲ ਆਣ ਮਿਲੇ ਸਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ । ਭਾਈ ਮਹਾਰਾਜ ਸਿੰਘ ਵੀ ਗੁਜਰਾਤ ਪਹੁੰਚ ਗਿਆ ਸੀ । ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਅਫ਼ਗਾਨਿਸਤਾਨ ਦੇ ਬਾਦਸ਼ਾਹ ਦੋਸਤ ਮੁਹੰਮਦ ਖ਼ਾਂ ਨੇ ਵੀ ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਲਈ ਆਪਣੇ ਪੁੱਤਰ ਅਕਰਮ ਖਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ 3,000 ਘੋੜਸਵਾਰ ਸੈਨਾ ਭੇਜੀ ਸੀ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖਾਂ ਦੀ ਕੁੱਲ ਫ਼ੌਜ 40,000 ਸੀ । ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਅਜੇ ਵੀ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗ ਹੀ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ ਕਿਉਂਕਿ ਸਰ ਚਾਰਲਸ ਨੇਪੀਅਰ ਅਜੇ ਭਾਰਤ ਨਹੀਂ ਪੁੱਜਾ ਸੀ । ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਕੋਲ 68,000 ਸੈਨਿਕ ਸਨ ।

ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਦੋਹਾਂ ਪਾਸਿਆਂ ਤੋਂ ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਕਾਫ਼ੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਇਹ ਲੜਾਈ ਇਤਿਹਾਸ ਵਿੱਚ ‘ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੇ ਨਾਂ ਨਾਲ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੈ । ਇਹ ਲੜਾਈ 21 ਫ਼ਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਸਵੇਰੇ 7.30 ਵਜੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਈ । ਸਿੱਖਾਂ ਦੀਆਂ ਤੋਪਾਂ ਦਾ ਬਾਰੂਦ ਛੇਤੀ ਮੁੱਕ ਗਿਆ । ਜਦੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਬਾਰੇ ਪਤਾ ਲੱਗਿਆ ਤਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀਆਂ ਤੋਪਾਂ ਨਾਲ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ‘ਤੇ ਜ਼ਬਰਦਸਤ ਹਮਲਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ । ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀਆਂ ਤਲਵਾਰਾਂ ਕੱਢ ਲਈਆਂ ਪਰ ਉਹ ਤੋਪਾਂ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਿੰਨਾ ਕੁ ਚਿਰ ਕਰਦੇ । ਇਸ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖ ਸੈਨਾ ਦਾ ਭਾਰੀ ਨੁਕਸਾਨ ਹੋਇਆ ।

1. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਦੂਸਰੇ ਐਂਗਲੋ-ਸਿੱਖ ਯੁੱਧ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਅਤੇ …………………… ਲੜਾਈ ਸਿੱਧ ਹੋਈ ।
2. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਕਦੋਂ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ ?
3. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕੌਣ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ ?
4. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਨੂੰ ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ਕਿਉਂ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ?
5. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਕੌਣ ਜੇਤੂ ਰਿਹਾ ?
ਉੱਤਰ-
1. ਨਿਰਣਾਇਕ ।
2. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ 21 ਫ਼ਰਵਰੀ, 1849 ਈ. ਨੂੰ ਲੜੀ ਗਈ ਸੀ ।
3. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਸੈਨਾ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਲਾਰਡ ਹਿਊਗ ਗਫ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ ।
4. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਨੂੰ ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਲੜਾਈ ਇਸ ਕਰਕੇ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਇਸ ਵਿੱਚ ਦੋਹਾਂ ਪਾਸਿਆਂ ਤੋਂ ਭਾਰੀ ਤੋਪਾਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ ।
5. ਗੁਜਰਾਤ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਜੇਤੂ ਰਹੇ ।