लेज़ियम डम्बल (Lezium Dumble) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions लेज़ियम डम्बल (Lezium Dumble) Game Rules.

लेज़ियम डम्बल (Lezium Dumble) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 1.
लेज़ियम से आप क्या समझते हो ? लेजियम की मूलभूत अवस्थाएं बताइए।
उत्तर-
लेज़ियम-इसमें 16 लकड़ियों का एक लम्बा हैंडल होता है जिसके साथ लोहे की चेन लगी होती है। यह लकड़ी के दोनों सिरों से जुड़ी होती है। इसमें एक 5 इंच की छड़ होती है जिसको पकड़कर लेज़ियम से तालयुक्त झंकार और ध्वनि उत्पन्न की जा सकती है। इसका भार लगभग एक किलोग्राम होता है।
लेज़ियम का प्रयोग भारत देश के ग्रामीणीय क्षेत्रों में तालयुक्त क्रियाओं के लिए किया जाता है। इसके साथ ढोलक पर ताल दी जाती है। स्कूली छात्र इसमें बड़े उत्साह से भाग लेते हैं। इसलिए लेज़ियम से बच्चों का मनोरंजन बहुत अधिक होता है। शारीरिक व्यायाम के रूप में लेज़ियम का बहुत महत्त्व है, क्योंकि इसमें भाग लेने वालों को काफी व्यायाम करना पड़ता है।

लेजियम की मूलभूत अवस्थाएं

  1. लेज़ियम संकद-इसको बाईं भुजा में डालकर कंधे पर रखा जाता है, जोकि अंडे के रूप में होती है। लकड़ी का बड़ा हैंडल कंधे के पीछे और लोहे की चेन सामने होती है।
    लेज़ियम डम्बल (Lezium Dumble) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
  2. आराम-लेजियम को लोहे की छड़ से दाएं हाथ में पकड़कर और बाएं हाथ में पकड़कर बाईं तरफ लटके रहने दिया जाता है। जब विद्यार्थी इससे होशियार अवस्था में हो, तो आराम का आदेश दिया जाता है।
  3. होशियार-व्यायाम शुरू करने के लिए होशियार अवस्था में आना होता है। यह अवस्था उस समय की जा सकती है, जब बच्चे लेज़ियम को कंधे पर रखकर सावधान या आराम की अवस्था में हो, इस क्रिया की गणना दो में की जा सकती है। इसकी गणना में लोहे की छड़ को दाएं हाथ से पकड़ा जाता है। दो की गणना में लेज़ियम को बाएं कंधे से उतार कर छाती के सामने लाते हैं। बाएं हाथ में लकड़ी का हैंडल पकड़े हुए आगे को फैलाया जाता है और लोहे की छड़ को दाएं हाथ से छाती की तरफ खींचा जाता है। व्यायाम के बाद इस अवस्था में आना होता है।
  4. पवित्रता-यह अवस्था संकद अवस्था से हासिल की जाती है। दाएं घुटने को सीधा रख कर, बाएं घुटने में झुकाव डालकर, दायां पैर पीछे कर के घुटना झुकाकर, बाएं पैर पर आना चाहिए और उस पैर को नीचे दबाना चाहिए। शरीर का धड़ सीधा रख कर छाती, सिर और एड़ियों को ज़मीन पर रखते हुए ऊपर की तरफ करो इससे दायां पैर बाएं पैर के समकोण पर रहे, लेज़ियम होशियार अवस्था में होनी चाहिए।
  5. चार आवाज़-शुरू की अवस्था होशियार एक से घुटनों को सीधा रखते हुए, धड़ को नीचे झुकाओ और पैरों के नज़दीक पहला स्ट्रोक लो। इस अवस्था में बाईं कलाई बाहर की तरफ हो जाती है और लकड़ी का हैंडल शरीर के बराबर हो जाता है। दूसरी अवस्था में धड़ को ऊपर उठा कर और लोहे की चेन को लकड़ी के हैंडल से दूर खींच कर, दूसरा स्ट्रोक लें। इस अवस्था में लेज़ियम कमर के पास शरीर के सामने होगा।
    तीसरी अवस्था में धड़ सीधा करके खड़े होने की अवस्था में आकर, लकड़ी के हैंडल को जल्दी से दाएं कंधे के ऊपर लाओ, बायां हाथ सामने हो।
    चौथी अवस्था में हैंडल ऊपर की तरफ और मुंह सामने इस तरह फैलाओ जिससे लेजियम में देखा जा सके।
  6. एक जगह-इस व्यायाम में पहली चार गणनाएँ और लेजियम को अर्ध-गोलाकार रूप में घुमाकर बाएं से दाएं की तरफ लाया जाता है। इसके बाद अगली चार गणनाओं में इसे बाईं तरफ लाया जाता है।
  7. आदि लगाओ-इस व्यायाम में एक स्थान की सभी आठ गणनाएं उसी तरह होंगी और साथ ही प्रत्येक विषम गणना से पैर पर क्रिया की जाएगी, चार बार आवाज़ भिन्न करते समय बाईं टांग को दाईं टांग से लगाया जाएगा और बायां पैर दाईं एड़ी के नज़दीक ज़मीन पर रखा जाता है। टांगों को ऊपर ले जाते समय पहले उसको आगे फैलाओ और तब दूसरे के ऊपर ले जाओ।
  8. शुरू की अवस्था पवित्र-इस अवस्था में पीछे घूमते समय चार आवाज़ चार बार करो। शुरू की अवस्था में आने से क्रिया पूरी हो जाती है। घूमने की क्रिया दाएं तरफ को
    की जाती है और लेज़ियम को सामने की तरफ छाती की ऊँचाई तक रखा जाता है। ताल को बनाए रखने के लिए चौथी गणना के साथ तेज़ी से मुड़ा जाए। इस व्यायाम को करते समय भुजा गोलाकार घुमाई जाती है।
  9. दो रुख-यह आठ गणना का व्यायाम है। इसमें पवित्रता शुरू की अवस्था में होती है। तीन तक की गणना तीन गणना के सामने होती है। चौथे से उल्ट दिशा की तरफ़ मुंह करते हुए बदली हुई पवित्रता स्थिति में बाएं से एकदम आगे को झपटते हुए चार बार आवाज़ करो। पांच पर लेजियम को उल्टा करते हुए बाएं से दाएं पैर के नज़दीक होकर चार आवाज़ करो। छः दो बार, सात शुरू की दिशा में पूरी तरह मुड़ी और अच्छी पवित्रता अवस्थाएं बनाए रखते हुए चार आवाज़ तीन करो और आठ ऊपर शुरू की अवस्था जारी रखो।
  10. आगे छलांग-यह दस गणना का व्यायाम है। शुरू की अवस्था पवित्रता होती है। एक आगे झुककर बाएं पैर के नज़दीक चार बार आवाज़ तीन उस समय करो, जब दाएं पैर से लाया गया कदम पूरा हो जाए, जहां बाएं तरफ मुड़ा जाता है। तीसरी गणना से दाएं पैर से आगे कदम करते हुए पीछे मुड़ कर दूसरी दिशा की तरफ मुंह करके बाएं पैर से आगे को उछलते हैं। इस तरह बाएं पैर के नज़दीक पांच और चार आवाज़ एक किया जाता है। छठा और सातवां स्ट्रोक लेते समय लेज़ियम के साथ बनाया पैर भी आगे लाया जाता है
    और पवित्र अवस्था के साथ आगे रख दिया जाता है। आठ और चार आवाज़ चार बार करो। नौवें पर नीचे झुकते हुए चार आवाज़ एक स्ट्रोक बाएं पैर के नज़दीक लाया जाता है, दसवें पर धड़ को ऊपर उठा कर चार आवाज़ दो करके पवित्र अवस्था लेनी चाहिए।
  11. पीछे छलांग-इस व्यायाम के गणना दस से शुरू होगी और शुरू की अवस्था पवित्र होती है, पहला बाएं पैर के नज़दीक चार आवाज़ एक करो। दूसरे और तीसरे में दाएं तरफ घूमते हुए आवाज़ दो करो और विपरीत दिशा में बायां पैर आगे बढ़ा कर चार आवाज़ तीन करो और चार आवाज़ चार करो। पांच और बाएं पैर के नज़दीक आवाज़ एक करो। छठे और सातवें पर बाएं पैर की तरफ घूमते हए उस तरफ दायां पैर पीछे रखो। आठ से चार आवाज़ चार यहां विद्यार्थी बाएं तरफ पवित्र स्थिति में होंगे। नौवें से नीचे झुकते हुए चार आवाज़ एक दी जाती है।
  12. आगे झुकना-एक से बायां पैर थोड़ा सा आगे को रखें, दाईं तरफ नीचे झुको और झुके हुए धड़ की हालत में लेज़ियम खोलो। दो पर दायां पैर 3 इंच ऊपर उठाओ और झुके हुए धड़ की स्थिति में सामने की तरफ लेज़ियम बंद करो। तीन पर दायां पैर थोड़ सा आगे रखो और दायें तरफ गणना एक की हरकत दोहराओ। इस प्रकार व्यायाम जारी रखा जा सकता है। इस प्रकार लेज़ियम के भिन्न-भिन्न व्यायाम किए जा सकते हैं।

लेज़ियम डम्बल (Lezium Dumble) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 2.
डम्बल से आप क्या समझते हो ? विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर-
डम्बल-डम्बल पश्चिमी देशों का खेल है। जो शरीर निर्माण के लिए ज़िमनेज़ियम में प्रयोग किया जाता है। डम्बल दो प्रकार के होते हैं। एक भारी लोहे के दूसरे हल्के लकड़ी के। डम्बल का अर्थ दो सिरा भार है। लकड़ी के डम्बल से स्कूलों के बच्चे कसरत करते हैं। एक हाथ में एक डम्बल पकड़ा जाता है और बाजुओं को घुमाकर इनका अभ्यास किया जाता है। डम्बल से कसरत करने का उद्देश्य वह कसरत है जिस से शारीरिक और मानसिक विकास हो सके। इनके साथ बाजुओं की मांसपेशियां मज़बूत होती हैं। छाती चौड़ी होकर ज्यादा हवा सांस के द्वारा दिल तक पहुँचाती है जिससे खून साफ होता है। साफ खून मिलने से शरीर निरोग और स्वस्थ रहता है, पुरातन समय में मलयुद्ध और कुश्तियां करने वाले डम्बल का अभ्यास ज़रूर करते हैं। जिन लोगों को बाजुओं की मांसपेशियां बनानी होती थी और छाती चौड़ी करनी होती थी वह भी डम्बल का व्यायाम करते थे।
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आज भी डम्बल का प्रयोग पुरातन समय की तरह ही होता है। डम्बल एक प्रकार का खेल भी है और व्यायाम भी। खेल और व्यायाम के साथ ही मनोरंजन का साधन भी है। डम्बल सूखी लकड़ी का बना होता है जिसके अन्दर मुट्ठी होती है। यह दोनों सिरों से गोल एवं मोटा होता है। इस मुट्ठी को हाथ से पकड़ा जाता है। सूखी लकड़ी के डम्बल मज़बूत होते हैं। इसकी आवाज़ भी काफी तीखी होती है। डम्बल व्यायाम में परस्पर टकराया जाता है। इसलिए इन्हें सावधानी से पकड़ने की जरूरत होती है। डम्बल को बीच से पकड़कर, पहले मुट्ठी के गिर्द, चारों उंगलियों को लपेट लिया जाता है। अंगूठा चारों उंगलियों के बीच रखा जाता है। डम्बल इस ढंग से पकड़ना चाहिए कि डम्बल टकराते समय हाथ से गिर न जाए।

डम्बल करते समय शरीर की स्थिति—
डम्बल करते समय पैर से एड़ियां मिली होनी चाहिएं और पैर खुले होने चाहिएं। घटने एवं टांगें सीधी हों। कंधे को पीछे खींचने से छाती तनी होगी। आँखें सामने सीधी होंगी। डम्बल करते समय विद्यार्थी विश्राम से सावधान अवस्था में आता है और दोनों हाथों में डम्बल पकड़े होते हैं और उनको सावधान स्थिति में रहना पड़ता है।
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पहले अभ्यास को शुरू करते हुए लीडर सावधान की मुद्रा (अवस्था) में होने का निर्देश देता है। उसके आदेश पर विद्यार्थी सावधान अवस्था में डम्बल पकड़े हुए अपने हाथ ऊपर को उठाते हैं और वह डम्बलों को अपनी कहनी की तरफ मोडते हैं। डम्बलों को अपने पेट के पास लाते हैं और दोनों पैरों से मिलाते हुए एक ही सुर से बाएं और दाएं हाथ के डम्बल एक-दूसरे से टकराते हैं, डम्बल जब परस्पर टकराते हैं और साथ ही मिली जुली ध्वनि पैदा होती है। उसके अनुसार लीडर विश्राम का आदेश देता है। विश्राम के आदेश पर सभी विद्यार्थी अपने दाएं पैर को उठाएंगे और कम से कम 6 इंच की दूरी से ज़ोर से भूमि पर पटक के इकट्ठे ध्वनि पैदा करेंगे।

ऐसा करते हुए दोनों हाथों से पकड़े हुए डम्बल को पीछे की तरफ ले जाएंगे और इकट्ठे डम्बल इस तरह बजाएंगे कि एक साथ ध्वनि पैदा हो जाए। इसके बाद सावधान का आदेश देने से अभ्यास करता कुहनी को मोड़ कर और दोनों हाथों से पकड़े डम्बलों को अपनेअपने सामने लाकर टकराएंगे और एक साथ ध्वनि उत्पन्न करेंगे। फिर अपने दोनों हाथों को सीधा भूमि की तरफ ले जाते हैं। इस अभ्यास में निम्नलिखित अवस्थाएं होती हैं—
इस अवस्था में सबसे पहले सावधान हो जाएं। दोनों पैरों की एड़ियां आपस में मिलाई जाती हैं और पैर फैले हुए होते हैं। कुहनी घुमाकर दोनों हाथों में पकड़े डम्बलों को परस्पर टकराया जाता है और ध्वनि पैदा की जाती है।
दूसरी अवस्था में आने के लिए पहली अवस्था को बदल दिया जाता है। इसमें दोनों हाथों को सीधा आगे किया जाता है।
हाथों की हथेलियाँ भूमि की तरफ की जाती हैं। उपरोक्त मुद्रा में डम्बल परस्पर तीसरी अवस्था में आने के लिए दूसरी अवस्था में परिवर्तन किया जाता है।
तीसरी अवस्था से पहली अवस्था में आया जाता है। इस अवस्था में हाथों को अपनी ठोड़ी के नीचे लाया जाता है। इस अवस्था में हाथों की हथेलियां ऊपर की ओर होती हैं।
हाथों को ठोड़ी के नीचे लाकर डम्बलों को परस्पर टकराया जाता है और एक.साथ ध्वनि पैदा की जाती है।
चौथी अवस्था में आने के लिए फिर से तीसरी अवस्था में परिवर्तन किया जाता है। इस अवस्था में सावधान स्थिति में लाया जाया है। सावधान स्थिति में अभ्यास करने वाला एड़ियों को मिलाकर और पैर खोलकर रखते हैं। उनकी टांगें सीधी होती हैं और घुटने लगभग एक-दूसरे से मिले हुए होते हैं। हाथों में पकड़े हुए डम्बल नीचे शरीर के साथ स्पर्श करते हैं। इस समय गर्दन सीधी होती है। नज़रें सामने होती हैं। कंधे पीछे को खींचे हुए और सीना तना हुआ होता है।

  1. पहली अवस्था-अभ्यास नं० 4 की अवस्था का अभ्यास करने वाले सावधान की अवस्था में खड़े होते हैं। दोनों बाजुओं को आगे की तरफ फैलाया जाता है। हाथ की हथेलियां आगे को झुकी होती हैं।
    इस अवस्था में डम्बल परस्पर टकरा कर ध्वनि पैदा करते हैं और इस तरह करते समय नज़र सामने की तरफ सीधी रखी जाती हैं।
  2. दूसरी अवस्था—दूसरी अवस्था में आने के लिए पहली अवस्था में परिवर्तन किया जाता है।
    दोनों हाथों को ऊपर की तरफ सीधा किया जाता है और डम्बल सिर के ऊपर लाए जाते हैं। इस अवस्था में दोनों की हथेलियां आगे की तरफ आती हैं। बाजू पीछे रख कर डम्बल आपस में टकराए जाते हैं और एक साथ ध्वनि उत्पन्न की जाती है। इस अवस्था में ध्यान रखना चाहिए कि अभ्यास करने वाले का चेहरा सूरज की तरफ न हो।

(इ) तीसरी अवस्था-इस अवस्था में आने के लिए दूसरी अवस्था में परिवर्तन किया जाता है। ऊपर उठे हुए बाजुओं को पहले नीचे लेकर आते हैं, कुहनी मोड़ कर बाजू ऊपर की ओर जाती हैं और ठोड़ी के नीचे की जाती है।
डम्बलों को ठोड़ी के नीचे टकराकर ध्वनि पैदा की जाती है।

(ई) चौथी अवस्था–इस अवस्था में आने के लिए उठे हुए हाथों को नीचे लाया जाता है।
चौथी अवस्था में सावधान मुद्रा बनाई जाती है, जिस में अभ्यास करने वाले एड़ियां मिलाकर और पैर खोलकर खड़े होते हैं, टांगें सीधी होती हैं और घुटने लगभग एक-दूसरे से स्पर्श करते हैं, इस समय गर्दन सीधी रखी जाती है। नज़रें सामने को देखते हुए, कंधे पीछे को खींचे हुए और सीना तना हुआ होता है।
अभ्यास 5 में निम्नलिखित चार अवस्थाएं आती हैं—

  1. पहली अवस्था में अभ्यास करने वाला सावधान मुद्रा में आता है। फिर कुहनियों को मोड़ कर हाथ ऊपर की तरफ ले जाते हैं और फिर हाथ ठोड़ी के नीचे किए जाते हैं।
  2. दूसरी अवस्था में आने के लिए पहली अवस्था में काफी परिवर्तन किया जाता है। ऊपर को उठी बाजू को नीचे लाया जाता है और बाजुओं को पीछे करके हाथ पीछे लाए जाते हैं, फिर दोनों को सीधा करने के बाद कुहनियां पेट के साथ लगाई जाती है। इस मुद्रा में डम्बल परस्पर टकराकर एक ही समय ध्वनि उत्पन्न की जाती है।
  3. तीसरी अवस्था में आने के लिए पीछे किए हुए हाथों को वहां से हटा कर आगे लाया जाता है। इस मुद्रा में डम्बल परस्पर टकराकर एक ही समय ध्वनि उत्पन्न की जाती
  4. चौथी अवस्था में अभ्यास करने वाले सावधानी की अवस्था में आ जाते हैं, डम्बल मुट्ठी से हाथों में पकड़े हुए शरीर को स्पर्श करेंगे।

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