PSEB 9th Class Home Science Solutions Chapter 12 सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ

Punjab State Board PSEB 9th Class Home Science Book Solutions Chapter 12 सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Home Science Chapter 12 सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ

PSEB 9th Class Home Science Guide सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी एक सहायक सफाईकारक पदार्थ का नाम लिखें।
उत्तर-
कपड़े धोने वाला सोडा।

प्रश्न 2.
साबुन बनाने के लिए जरूरी पदार्थ कौन-से हैं?
उत्तर-
साबुन बनाने के लिए चर्बी तथा खार आवश्यक पदार्थ हैं। नारियल, महुए, सरसों, जैतून का तेल, सूअर की चर्बी आदि चर्बी के रूप में प्रयोग किये जा सकते हैं। जबकि खार कास्टिक सोडा अथवा पोटाश से प्राप्त की जाती है।

प्रश्न 3.
साबुन बनाने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं?
उत्तर-
साबुन बनाने की दो विधियाँ हैं-(i) गर्म तथा (ii) ठण्डी विधि।

प्रश्न 4.
वस्त्रों में कड़ापन क्यों लाया जाता है?
उत्तर-

  1. वस्त्रों में ऐंठन लाने से यह मुलायम हो जाते हैं तथा इनमें चमक आ जाती है।
  2. मैल भी वस्त्र के ऊपर ही रह जाती है जिस कारण कपड़े को धोना आसान हो जाता
  3. वस्त्र में जान पड़ जाती है। देखने में मज़बूत लगता है।

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प्रश्न 5.
वस्त्रों से दाग उतारने वाले पदार्थों को मुख्य रूप से कितने भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर-
इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है

  1. ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच-इससे ऑक्सीजन निकलकर धब्बे को रंग रहित कर देती है। हाइड्रोजन पराऑक्साइड, सोडियम परबोरेट आदि ऐसे पदार्थ हैं।
  2. रिड्यूसिंग एजेंट-यह पदार्थ धब्बे से ऑक्सीजन निकालकर उसे रंग रहित कर देते हैं। सोडियम बाइसल्फाइट तथा सोडियम हाइड्रोसल्फेट ऐसे पदार्थ हैं।

प्रश्न 6.
साबुन और साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ में क्या अन्तर है?
उत्तर-

साबुन साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ
(1) साबुन प्राकृतिक तेलों जैसे नारियल, जैतून, सरसों आदि अथवा चर्बी जैसे सूभर की चर्बी आदि से बनता है। (1) साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ शोधक रासायनिक पदार्थों से बनता है।
(2) साबुन का प्रयोग भारी पानी में नहीं किया जा सकता। (2) इनका प्रयोग भारी पानी में भी किया जा सकता है।
(3) साबुन को जब कपड़े पर रगड़ा जाता है तो सफ़ेद-सी झाग बनती है। (3) इनमें कई बार सफ़ेद झाग नहीं बनती।

प्रश्न 7.
वस्त्रों को सफ़ेद करने वाले पदार्थ कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
वस्त्रों को सफ़ेद करने वाले पदार्थ हैं-नील तथा टीनोपॉल अथवा रानीपॉल।
नील-नील दो प्रकार के होते हैं-

  1. पानी में घुलनशील तथा
  2. पानी में अघुलनशील नील। इण्डिगो, अल्ट्रामैरीन तथा प्रशियन नील पहली प्रकार के नील हैं। यह पानी के नीचे बैठ जाते हैं। इन्हें अच्छी तरह से मलना पड़ता है।
    एनीलिन दूसरी तरह के नील हैं। यह पानी में घुल जाते हैं।
    टीनोपॉल-यह भी सफ़ेद वस्त्रों को और सफ़ेद तथा चमकदार करने के लिए प्रयोग किये जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 8.
ठण्डी विधि द्वारा कौन-कौन सी वस्तुओं से साबुन कैसे तैयार किया जा सकता है? इसकी क्या हानियां हैं?
उत्तर-
ठण्डी विधि द्वारा साबुन तैयार करने के लिए निम्नलिखित सामान लोकास्टिक सोडा अथवा पोटाश-250 ग्राम महुआ अथवा नारियल तेल-1 लीटर पानी- 3/4 किलोग्राम मैदा- 250 ग्राम।
किसी मिट्टी के बर्तन में कास्टिक सोडा तथा पानी को मिलाकर 2 घण्डे तक रख दो। तेल तथा मैदे को अच्छी तरह घोल लो तथा फिर इसमें सोडे का घोल धीरे-धीरे डालो तथा मिलाते रहो। पैदा हुई गर्मी से साबुन तैयार हो जाएगा। इसको किसी सांचे में डालकर सुखा लो तथा चक्कियां काट लो।
हानियां-साबुन में अतिरिक्त खार तथा तेल और ग्लिसरॉल आदि साबुन में रह जाते हैं। अधिक खार वाले साबुन कपड़ों को हानि पहुँचाते हैं।

प्रश्न 9.
साबुन किन-किन किस्मों में मिलता है?
उत्तर-
साबुन निम्नलिखित किस्मों में मिलता है

  1. साबुन की चक्की-साबुन चक्की के रूप में प्रायः मिल जाता है। चक्की को गीले वस्त्र पर रगड़कर इसका प्रयोग किया जाता है।
  2. साबुन का पाऊडर-यह साबुन तथा सोडियम कार्बोनेट का बना होता है। इसको गर्म पानी में घोलकर कपड़े धोने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसमें सफ़ेद-सफ़ेद सूती वस्त्रों को अच्छी तरह साफ़ किया जाता है।
  3. साबुन का चूरा-यह बन्द पैकटों में मिलता है। इसको पानी में उबालकर सूती वस्त्र कुछ देर भिगो कर रखने के पश्चात् इसमें धोया जाता है। रोगियों के वस्त्रों को भी । कीटाणु रहित करने के लिए साबुन के उबलते घोल का प्रयोग किया जाता है।
  4. साबुन की लेस-एक हिस्सा साबुन का चूरा लेकर पाँच हिस्से पानी डालकर तब तक उबालो जब तक लेस-सी तैयार न हो जाये। इसको ठण्डा होने पर बोतलों में डालकर रख लो तथा ज़रूरत पड़ने पर पानी डालकर धोने के लिए इसे प्रयोग किया जा सकता है।

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प्रश्न 10.
अच्छे साबुन की पहचान क्या है?
उत्तर-

  1. साबुन हल्के पीले रंग का होना चाहिए। गहरे रंग के साबुन में मिलावट भी हो सकती है।
  2. साबुन हाथ लगाने पर थोड़ा कठोर होना चाहिए। अधिक नर्म साबुन में ज़रूरत से अधिक पानी हो सकता है जो केवल भार बढ़ाने के लिए ही होता है।
  3. हाथ लगाने पर अधिक कठोर तथा सूखा नहीं होना चाहिए। कुछ घटिया किस्म के साबुनों में भार बढ़ाने वाले पाऊडर डाले होते हैं जो वस्त्र धोने में सहायक नहीं होते।
  4. अच्छा साबुन स्टोर करने पर, पहले की तरह रहता है, जबकि घटिया साबुनों पर स्टोर करने पर सफ़ेद पाऊडर-सा बन जाता है। इनमें आवश्यकता से अधिक खार होती है जोकि वस्त्र को खराब भी कर सकती है।
  5. अच्छा साबुन जुबान पर लगाने से ठीक स्वाद देता है जबकि मिलावट वाला साबुन जुबान पर लगाने से तीखा तथा कड़वा स्वाद देता है।

प्रश्न 11.
साबुन रहित प्राकृतिक सफ़ाईकारी पदार्थ कौन-से हैं?
उत्तर-
साबुन रहित प्राकृतिक, सफ़ाईकारी पदार्थ हैं-रीठे तथा शिकाकाई। इनकी फलियों को सुखा कर स्टोर कर लिया जाता है।

  1. रीठा-रीठों की बाहरी छील के रस में वस्त्र साफ़ करने की शक्ति होती है। रीठों की छील उतारकर पीस लो तथा 250 ग्राम छील को कुछ घण्टे के लिए एक लिटर पानी में भिगो कर रखो तथा फिर इन्हें उबालो वस्त्र तथा ठण्डा करके छानकर बोतलों में भरकर रखा जा सकता है। इसके प्रयोग से ऊनी, रेशमी वस्त्र ही नहीं अपितु सोने, चांदी के आभूषण भी साफ़ किये जा सकते हैं।
  2. शिकाकाई-इसका भी रीठों की तरह घोल बना लिया जाता है। इससे कपड़े निखरते ही नहीं अपितु उनमें चमक भी आ जाती है। इससे सिर भी धोया जा सकता है।

प्रश्न 12.
साबुन रहित रासायनिक सफ़ाईकारी पदार्थों से आप क्या समझते हो ? इनके क्या लाभ हैं?
उत्तर-
साबुन प्राकृतिक तेल अथवा चर्बी से बनते हैं जबकि रासायनिक सफ़ाईकारी शोधक रासायनिक पदार्थों से बनते हैं। यह चक्की, पाऊडर तथा तरल के रूप में उपलब्ध हो सकते हैं।
लाभ-

  1. इनका प्रयोग हर तरह के सूती, रेशमी, ऊनी तथा बनावटी रेशों के लिए किया जा सकता है।
  2. इनका प्रयोग गर्म, ठण्डे, हल्के अथवा भारी सभी प्रकार के पानी में किया जा सकता है।

प्रश्न 13.
साबुन और अन्य साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थों के अतिरिक्त वस्त्रों की । धुलाई के लिए कौन-से सहायक सफ़ाईकारी पदार्थ प्रयोग किये जाते हैं?
उत्तर-
सहायक सफ़ाईकारी पदार्थ निम्नलिखित हैं

  1. वस्त्र धोने वाला सोडा-इसको सफ़ेद सूती वस्त्रों को धोने के लिए प्रयोग किया जाता है। परन्तु रंगदार सूती वस्त्रों का रंग हल्का पड़ जाता है तथा रेशे कमजोर हो जाते हैं।
    यह रवेदार होता है तथा उबलते पानी में तुरन्त घुल जाता है। इससे सफ़ाई की प्रक्रिया में वृद्धि होती है। इसका प्रयोग भारी पानी को हल्का करने के लिए, चिकनाहट साफ़ करने तथा दाग़ उतारने के लिए किया जाता है।
  2. बोरैक्स (सुहागा)-इसका प्रयोग सफ़ेद सूती वस्त्रों के पीलेपन को दूर करने के लिए तथा चाय, कॉफी, फल, सब्जियों आदि के दाग उतारने के लिए किया जाता है। इसके हल्के घोल में मैले वस्त्र भिगोकर रखने पर उनकी मैल उगल आती है। इससे वस्त्रों में ऐंठन भी लाई जाती है।
  3. अमोनिया- इसका प्रयोग रेशमी तथा ऊनी कपड़ों से चिकनाहट के दाग दूर करने के लिए किया जाता है।
  4. एसिटिक एसिड-रेशमी वस्त्र को इसके घोल में खंगालने से इनमें चमक आ जाती है। इसका प्रयोग वस्त्रों से अतिरिक्त नील का प्रभाव कम करने के लिए भी किया जाता है। रेशमी, ऊनी वस्त्र की रंगाई के समय भी इसका प्रयोग किया जाता है।
  5. ऑग्जैलिक एसिड-इसका प्रयोग छार की बनी चटाइयों, टोकरियों तथा टोपियों आदि को साफ़ करने के लिए किया जाता है। स्याही, जंग, दवाई आदि के दाग उतारने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 14.
वस्त्रों से दागों का रंगकाट करने के लिए क्या प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
कपड़ों से दागों का रंगकाट करने के लिए ब्लीचों का प्रयोग होता है। ये दो प्रकार के होते हैं।

  1. ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच-जब इनका प्रयोग धब्बे पर किया जाता है, इसकी ऑक्सीजन धब्बे से क्रिया करके इसको रंग रहित कर देती है तथा दाग उतर जाता है। प्राकृतिक धूप, हवा तथा नमी, पोटाशियम परमैंगनेट, हाइड्रोजन पराक्साइड, सोडियम परबोरेट, हाइपोक्लोराइड आदि ऐसे रंग काट हैं।
  2. रिड्यूसिंग ब्लीच-जब इनका प्रयोग धब्बे पर किया जाता है तो यह धब्बे से ऑक्सीजन निकालकर इसको रंग रहित कर देते हैं। सोडियम बाइसल्फाइट, सोडियम हाइड्रोसल्फाइट ऐसे ही रंग काट हैं। ऊनी तथा रेशमी वस्त्रों पर इनका प्रयोग आसानी से किया जा सकता है।
    परन्तु तेज़ रंग काट से वस्त्र खराब भी हो जाते हैं।

प्रश्न 15.
वस्त्रों को नील क्यों दिया जाता है?
उत्तर-
सफ़ेद सूती तथा लिनन के वस्त्रों पर बार-बार धोने से पीलापन-सा आ जाता है। इसको दूर करने के लिए वस्त्रों को नील दिया जाता है तथा वस्त्र की सफ़ेदी बनी रहती है।

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प्रश्न 16.
नील की मुख्य कौन-कौन सी किस्में हैं?
उत्तर-
नील मुख्यतः दो प्रकार का होता है

  1. पानी मैं अघुलनशील नील-इण्डिगो, अल्ट्रामैरीन तथा प्रशियन नील ऐसे नील हैं। इसके कण पानी के नीचे बैठ जाते हैं, इसलिए वस्त्रों को देने से पहले नील वाले पानी में अच्छी तरह हिलाना पड़ता है।
  2. पानी में घुलनशील नील-इनको पानी में थोड़ी मात्रा में घोलना पड़ता है तथा इससे वस्त्र पर थोड़ा नीला रंग आ जाता है। इस तरह वस्त्र का पीलापन दूर हो जाता है। एनीलिन नील ऐसा ही नील है।

प्रश्न 17.
नील देते समय ध्यान में रखने योग्य बातें कौन-सी हैं?
उत्तर-

  1. नील सफ़ेद वस्त्रों को देना चाहिए रंगीन कपड़ों को नहीं।
  2. यदि नील पानी में अघुलनशील हो तो पानी को हिलाते रहना चाहिए नहीं तो वस्त्रों पर नील के धब्बे से पड़ जाएंगे।
  3. नील के धब्बे दूर करने के लिए वस्त्र को सिरके वाले पानी में खंगाल लेना चाहिए। (4) नील दिए वस्त्रों को धूप में सुखाने पर उनमें और भी सफ़ेदी आ जाती है।

प्रश्न 18.
नील देते समय धब्बे क्यों पड़ जाते हैं? यदि धब्बे पड़ जायें तो क्या करना चाहिए?
उत्तर-
अघुलनशील नील के कण पानी के नीचे बैठ जाते हैं तथा इस तरह वस्त्रों को नील देने से वस्त्रों पर कई बार नील के धब्बे पड़ जाते हैं। जब नील के धब्बे पड़ जाएं तो वस्त्र को सिरके के घोल में खंगाल लेना चाहिए।

प्रश्न 19.
वस्त्रों में कड़ापन लाने के लिए किन वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए निम्नलिखित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है

  1. मैदा अथवा अरारोट-इसको पानी में घोलकर गर्म किया जाता है।
  2. चावलों का पानी-चावलों को पानी में उबालने के पश्चात् बचे पानी जिसको छाछ कहते हैं का प्रयोग वस्त्र में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  3. आलू-आलू काटकर पीस लिया जाता है तथा पानी में गर्म करके वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  4. गूंद-गूंद को पीसकर गर्म पानी में घोल लिया जाता है तथा घोल को पतले वस्त्र में छान लिया जाता है। इसका प्रयोग रेशमी वस्त्रों, लेसों तथा वैल के वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  5. बोरैक्स (सुहागा)-आधे लीटर पानी में दो बड़े चम्मच सुहागा घोल कर लेसों पर इसका प्रयोग किया जाता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 20.
वस्त्रों की धुलाई के लिए कौन-कौन से पदार्थ प्रयोग में लाए जा सकते हैं?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 21.
किस प्रकार के वस्त्रों को सफ़ेद करने की आवश्यकता पड़ती है? वस्त्रों में कड़ापन किन पदार्थों के द्वारा लाया जा सकता है?
उत्तर-
सफ़ेद सूती तथा लिनन के वस्त्रों को बार-बार धोने पर इन पर पीलापन सा आ जाता है। इनका यह पीलापन दूर करने के लिए नील देना पड़ता है।

वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए निम्नलिखित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है

  1. मैदा अथवा अरारोट-इसको पानी में घोलकर गर्म किया जाता है।
  2. चावलों का पानी-चावलों को पानी में उबालने के पश्चात् बचे पानी जिसको छाछ कहते हैं का प्रयोग वस्त्र में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  3. आलू-आलू काटकर पीस लिया जाता है तथा पानी में गर्म करके वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  4. गूंद-गूंद को पीसकर गर्म पानी में घोल लिया जाता है तथा घोल को पतले वस्त्र में छान लिया जाता है। इसका प्रयोग रेशमी वस्त्रों, लेसों तथा वैल के वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  5. बोरैक्स (सुहागा)-आधे लीटर पानी में दो बड़े चम्मच सुहागा घोल कर लेसों पर इसका प्रयोग किया जाता है।

Home Science Guide for Class 9 PSEB सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

रिक्त स्थान भरें

  1. साबुन वसा तथा …………………. के मिश्रण से बनता है।
  2. ………………. के बाहरी छिलके के रस में वस्त्रों को साफ़ करने की शक्ति होती है।
  3. अच्छा साबुन जीभ पर लगाने से ……………….. स्वाद देता है।
  4. सोडियम हाइपोक्लोराइट को …………………. पानी कहते हैं।
  5. सोडियम परबोरेट …………….. काट पदार्थ है।

उत्तर-

  1. क्षार,
  2. रीठों,
  3. ठीक,
  4. जैवले,
  5. आक्सीडाइजिंग।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
एक रिडयूसिंग काट पदार्थ का नाम लिखें।
उत्तर-
सोडियम बाइसल्फाइट।

प्रश्न 2.
पानी में अघुलनशील नील का नाम लिखें।
उत्तर-
इण्डिगो।

प्रश्न 3.
गोंद का प्रयोग किस कपड़े में कड़ापन लाने के लिए किया जा सकता
उत्तर-
वायल के वस्त्रों में।

प्रश्न 4.
रासायनिक साबुन रहित सफाईकारी पदार्थों में से कोई एक नाम बताएं।
उत्तर-
शिकाकाई।

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ठीक/ग़लत बताएं

  1. साबुन बनाने की दो विधियां हैं-गर्म तथा ठण्डी।
  2. हाइड्रोजन पराक्साइड, रिड्यूसिंग ब्लीच है।
  3. साबुन बनाने के लिए चर्बी तथा क्षार आवश्यक पदार्थ हैं।
  4. कपड़ों में अकड़ाव लाने वाले पदार्थ हैं – मैदा, अरारोट, चावलों का पानी आदि।
  5. सफेद कपड़ों को धुलने के बाद नील दिया जाता है।

उत्तर-

  1. ठीक
  2. ग़लत
  3. ठीक
  4. ठीक
  5. ठीक।

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
साबुन रहित प्राकृतिक, सफ़ाईकारी पदार्थ है
(A) रीठा
(B) शिकाकाई
(C) दोनों ठीक
(D) दोनों ग़लत।
उत्तर-
(C) दोनों ठीक

प्रश्न 2.
पानी में घुलनशील नील नहीं है
(A) इंडीगो
(B) अल्ट्रामैरीन
(C) परशियन नील
(D) सभी।
उत्तर-
(D) सभी।

प्रश्न 3.
कपड़ों में अकड़ाव लाने वाले पदार्थ हैं
(A) चावलों का पानी
(B) गोंद
(C) मैदा
(D) सभी।
उत्तर-
(D) सभी।

प्रश्न 4.
पानी में घुलनशील नील है
(A) एनीलीन
(B) इंडीगो
(C) अल्ट्रामैरीन
(D) परशियन नील।
उत्तर-
(A) एनीलीन

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
साबुन बनाने की गर्म विधि के बारे बताओ।
उत्तर-
तेल को गर्म करके धीरे-धीरे इसमें कास्टिक सोडा डाला जाता है। इस मिश्रण को गर्म किया जाता है। इस तरह चर्बी अम्ल तथा ग्लिसरीन में बदल जाती है। फिर उसमें नमक डाला जाता है, इससे साबुन ऊपर आ जाता है तथा ग्लिसरीन, अतिरिक्त खार तथा नमक नीचे चले जाते हैं । साबुन में सुगन्ध तथा रंग ठण्डा होने पर मिलाये जाते हैं तथा चक्कियां काट ली जाती हैं।

प्रश्न 2.
कपड़ों को नील कैसे दिया जाता है?
उत्तर-
नील देते समय वस्त्र को धोकर साफ़ पानी से निकाल लेना चाहिए। नील को किसी पतले वस्त्र में पोटली बनाकर पानी में खंगालना चाहिए। वस्त्र को अच्छी तरह निचोड़कर तथा बिखेरकर नील वाले पानी में डालो तथा बाद में वस्त्र को धूप में सुखाओ।

प्रश्न 3.
वस्त्रों की सफ़ाई करने के लिए कौन-कौन से पदार्थों का प्रयोग किया जाता है? नाम बताओ।
उत्तर-
वस्त्रों की सफ़ाई करने के लिए निम्नलिखित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है साबुन, रीठे, शिकाकाई, रासायनिक साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ (जैसे निरमा, रिन, लिसापोल आदि), कपड़े धोने वाला सोडा, अमोनिया, बोरैक्स, एसिटिक एसिड, ऑग्ज़ैलिक एसिड, ब्लीच, नील, रानीपॉल आदि।

प्रश्न 4.
ठण्डी विधि से साबुन बनाने का लाभ लिखें।
उत्तर-
ठण्डी विधि के लाभ

  1. इसमें मेहनत अधिक नहीं लगती।
  2. साबुन भी जल्दी बन जाता है।
  3. यह एक सस्ती विधि है।

सफ़ाईकारी और अन्य पदार्थ PSEB 9th Class Home Science Notes

  • साबुन चर्बी तथा खार के मिश्रण हैं।
  • साबुन दो विधियों से तैयार किया जा सकता है-ठण्डी विधि तथा गर्म विधि।
  • साबुन कई तरह के मिलते हैं-साबुन की चक्की, साबुन का चूरा, साबुन का पाऊडर, साबुन की लेस।
  • साबुन रहित सफाईकारी पदार्थ हैं-रीठे, शिकाकाई, रासायनिक साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ।
  • सहायक सफ़ाईकारी पदार्थ हैं-कपड़े धोने वाला सोडा, अमोनिया, बोरेक्स, एसिटिक एसिड, ऑम्जैलिक एसिड।
  • रंग काट दो तरह के होते हैं-ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच तथा रिड्यूसिंग ब्लीच।
  • नील, टीनोपाल आदि का प्रयोग कपड़ों को सफ़ेद रखने के लिए किया जाता है।
  • नील दो तरह के होते हैं-घुलनशील तथा अघुलनशील पदार्थ।
  • कपड़ों में ऐंठन अथवा अकड़न लाने वाले पदार्थ हैं-मैदा अथवा अरारोट, चावलों का पानी, आलू , गोंद, बोरैक्स।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

Punjab State Board PSEB 8th Class Welcome Life Book Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Welcome Life Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

Welcome Life Guide for Class 8 PSEB बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान InText Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
आपका कृतज्ञता से क्या मतलब है?
उत्तर-
इसका अर्थ सम्मान दिखाना।

प्रश्न 2.
क्या हमें अपने बड़ों से विनम्र होना चाहिए जब हमें उनसे कुछ चाहिए?
उत्तर-
नहीं, हमें हमेशा अपने बुजुर्गों के प्रति विनम्र रहना चाहिए।

प्रश्न 3.
हमारे दादा-दादी की देखभाल केवल हमारे माता-पिता की ज़िम्मेदारी है। यह कथन सही है या ग़लत?
उत्तर-
यह ग़लत है क्योंकि दादा-दादी की देखभाल परिवार के सभी सदस्यों की ज़िम्मेदारी है।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

प्रश्न 4.
क्या हमें अपना समय अपने बड़ों के साथ बिताना चाहिए?
उत्तर-
हाँ हमें अपने बुजुर्गों के साथ कुछ समय बिताना चाहिए क्योंकि वे हमें कई अच्छी बातें बता सकते हैं जो हमारे जीवन में हमारी मदद करेंगी।

प्रश्न 5.
हमारे दादा-दादी हमें कैसे उपयोगी बातें बता सकते हैं, भले ही वे जीवन जीने के आधुनिक तरीकों से अवगत न हों?
उत्तर-
जीवन से जुड़ी कई चीजें हैं जो नहीं बदली हैं। हमारे दादा-दादी ऐसी चीज़ों के लिए अधिक अनुभवी हैं। वे हमें अपने अनुभवों के बारे में बता सकते हैं। ये अनुभव हमें समान परिस्थितियों में हमारे कार्यों को तय करने में मदद करेंगे।

प्रश्न 6.
हमारे बुजुर्गों के बारे में ऐसी कौन-सी बातें हैं जो हमें हमेशा अपने दिमाग में रखनी चाहिए?
उत्तर-
आपको हमेशा उनके अनुभवों, कड़ी मेहनत, उनके प्रयासों, बलिदानों, संघर्षों और उनके सामने आने वाली कठिनाइयों के बारे में ध्यान में रखना चाहिए।

प्रश्न 7.
हमें हमेशा अपने बड़ों का आभारी क्यों होना चाहिए?
उत्तर-
हमें हमेशा अपने बुजुर्गों और माता-पिता के अथक प्रयासों के लिए आभारी होना चाहिए, जो कि हमेशा हमारी भलाई के लिए वह करते आए हैं और करते रहेंगे।

प्रश्न 8.
हम अपने माता-पिता और दादा-दादी के प्रति अपना सम्मान कैसे दिखा सकते हैं?
उत्तर-
हम अपनी भावनाओं, दयालु शब्दों और प्यार और गर्मजोशी से भरे हमारे भावों के माध्यम से उनके प्रति अपना सम्मान दिखा सकते हैं।

प्रश्न 9.
क्यों हमारे बुजुर्ग हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर-
वे हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हमारे लिए सबसे अच्छे मार्गदर्शक हैं।

प्रश्न 10.
क्या हमारे माता-पिता और दादा-दादी हमसे ज्यादा अनुभवी हैं?
उत्तर-
हां,हमारे माता-पिता और दादा-दादी हमसे ज्यादा अनुभवी हैं।

प्रश्न 11.
यदि किसी परिवार के साथ बड़े बुजुर्ग रहते हैं तो वह परिवार भाग्यशाली माना जाता है ऐसा क्यों?
उत्तर-
हां, क्योंकि बुजुर्ग अधिक अनुभवी होने के कारण कठिन परिस्थितियों में हमारी मदद कर सकते हैं और वे हमें उस कठिन परिस्थिति से बाहर आने के लिए हमारी कार्रवाई के बारे में मार्गदर्शन कर सकते हैं।

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प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कौन-सी बेहतर स्थिति है? (i) बड़ों बुजुर्गों के साथ रहना। (ii) बड़ों बुजुर्गों के बिना रहना
उत्तर-
बड़ों बुजुर्गों के साथ रहना बेहतर स्थिति है।

प्रश्न 13.
आप अपने बड़ों से प्यार करते हैं यह दिखाने के कुछ तरीके बताएं।
उत्तर-
निम्नलिखित ऐसे तरीके हैं जो यह संकेत करते हैं कि हम अपने बड़ों से प्यार करते हैं

  1. उनके साथ क्वालिटी टाइम बिताकर
  2. उनकी बात मानकर।

प्रश्न 14.
क्या हमें अपने माता-पिता और दादा-दादी के प्रति आभारी होना चाहिए?
उत्तर-
हां, हमें अपने माता-पिता और दादा-दादी के प्रति आभारी होना चाहिए।

प्रश्न 15.
हमें अपने दादा-दादी का आभारी क्यों होना चाहिए?
उत्तर-
हमें अपने दादा-दादी के प्रति आभारी होना चाहिए क्योंकि उन्होंने हमारे माता-पिता का पालन-पोषण अच्छे तरीके से किया। परिणामस्वरूप हमें ऐसे प्यारे और देखभाल करने वाले माता-पिता मिलते हैं।

प्रश्न 16.
जब हमें समस्याओं का सामना करना पड़ रहा हो तो हमें अपने बड़ों से सलाह लेनी चाहिए?
उत्तर-
हां, हमें अपने बड़ों से सलाह अवश्य लेनी चाहिए क्योंकि वे अधिक अनुभवी होने के कारण निश्चित रूप से जानते होंगे कि ऐसी स्थितियों में क्या किया जाना चाहिए।

प्रश्न 17.
परिवार में परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए सबसे ज्यादा कौन चिंतित होता है?
उत्तर-
परिवार में बुजुर्ग लोग विशेषकर माता-पिता और दादा-दादी परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए अधिक चिंतित होते हैं।

प्रश्न 18.
कक्षा में प्रथम स्थान पर आने के लिए एक छात्र की कौन मदद करता है?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी मुख्य बल हैं जो कक्षा में एक छात्र को प्रथम स्थान पर लाने में मदद करते है।

प्रश्न 19.
बच्चों की भलाई के लिए कौन बलिदान करता है?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी परिवार में बच्चों की बेहतरी के लिए कोई भी त्याग कर सकते हैं।

प्रश्न 20.
हमारा सबसे अच्छा समर्थक कौन है?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी हमारे सबसे अच्छे समर्थक हैं।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
अच्छे गणों का क्या मतलब है? एक अच्छे व्यक्ति का उत्कृष्ट गुण क्या है?
उत्तर-
गुणों (सदाचार) का अर्थ है गुण। अच्छे गुणों का मतलब है अच्छे गुण । एक अच्छे व्यक्ति का उत्कृष्ट गुण परिवार में माता-पिता, दादा-दादी और अन्य बुजुर्ग लोगों का प्यार करना, आदर करना, आभार और देखभाल करना है।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

प्रश्न 2.
अपने माता-पिता और दादा-दादी की देखभाल करने के क्या फायदे हैं?
उत्तर-
अपने माता-पिता और दादा-दादी की देखभाल करने के मुख्य लाभ हैं:

  1. माता-पिता और दादा-दादी की देखभाल करने से हमें इस बात की संतुष्टि मिलती है कि उन्होंने हमें बड़ा करने के लिए जो मेहनत कि हम उसके लिए उनका कुछ हद तक भुगतान कर रहे हैं।
  2. जब वे खुश हो जाते हैं ते वे हमें आशीर्वाद देते हैं और परिवार के सदस्यों का आशीर्वाद खासकर माता पिता और दादा-दादी हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रश्न 3.
हमारे माता-पिता और दादा-दादी का मस्मान करने के क्या फायदे हैं?
उत्तर-
हमारे माता-पिता और दादा-दादी का सम्मान करने से हम अच्छे इंसान बनते हैं। यह एक अच्छे समाज का निर्माण भी करता है। इसके अलावा, अपने माता-पिता का सम्मान करके हम उन्हें बताते हैं कि हम उनके बलिदानों और उनके द्वारा किए गए प्रयासों को जानते हैं और अभी भी हमारे जीवन को आसान और आरामदायक बना रहे हैं।

प्रश्न 4.
हमारे दादा-दादी को यह बताने के तरीके क्या हैं कि हम उनसे प्यार करते हैं?
उत्तर-
ऐसे कई तरीके और साधन हैं जिनके द्वारा हम अपने दादा-दादी को दिखा सकते हैं कि हम उनसे प्यार करते हैं। इनमें से कुछ है :

  1. सार्वजनिक रूप से उनकी प्रशंसा करके।
  2. हमारी सफलता उन्हें समर्पित करके।
  3. उनके साथ गुणवत्ता समय (क्वालिटी टाइम) बिताकर।
  4. उन्हें ध्यान से सुनने और जीवन में विभिन्न परिस्थितियों का सामना करने के बारे में उनके निर्देशों का पालन करते हुए।

प्रश्न 5.
हमारे माता-पिता हमारे लिए भगवान के समान हैं। इस कथन को सही साबित करें।
उत्तर-
यह सच है कि माता-पिता हमारे लिए भगवान के समान हैं। यह विश्वास करने के लिए हमें हमेशा उनके अनुभवों, कड़ी मेहनत, उनके प्रयासों, बलिदानों, संघर्षों और उनके सामने आने वाली कठिनाइयों को ध्यान में रखना चाहिए। इन कारणों से हमें सदैव उनके कल्याण के लिए किए गए अथक प्रयासों के लिए उनका आभारी होना चाहिए। उन्हें चुकाने के लिए हम अपनी भावनाओं, दयालु शब्दों और प्यार और गर्मजोशी से भरे भावों के माध्यम से उनके प्रति अपना सम्मान व्यक्त कर सकते हैं।

प्रश्न 6.
माता-पिता जैसे दादा-दादी भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हैं क्यों?
उत्तर-
हम जानते हैं कि माता-पिता हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे सबसे अच्छे मार्गदर्शक हैं और हमें वे सभी चीजें प्रदान करते हैं, जो कि हमें जीवन जीने के लिए और अपने जीवन में प्रगति करने की आवश्यक है। हालाँकि, दादा-दादी भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। यह सच है क्योंकि सबसे पहले उन्होंने हमारे माता-पिता को जीवन में इस स्तर तक पहुँचने में मदद की है। वे अनुभवी हैं और उन्होंने हमारे माता-पिता को अपने जीवन का आकार देने के लिए मार्गदर्शन किया है। समय के साथ वे अधिक अनुभवी हो गए हैं और वे कठिन परिस्थितियों को जीतने के लिए बेहतर तरीके से मार्गदर्शन कर सकते हैं। उनके पास अधिक समय है और इस तरह वे हमारी बात सुनेंगे और हमारी समस्याओं के समाधान के लिए कई तरह से हमारी मदद करेंगे।

प्रश्न 7.
यदि आपके दादा-दादी बीमार हैं तो आपको क्या करना चाहिए?
उत्तर-
यदि हमारे दादा-दादी बीमार हैं तो हम निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं

  1. हमें उनके पास बैठना चाहिए और उन छोटी-छोटी चीज़ों का ध्यान रखना चाहिए जिनकी उन्हें ज़रूरत थी।
  2. हम उन्हें समय पर पौष्टिक आहार दे सकते हैं।
  3. डॉक्टर द्वारा निर्धारित समय पर हम उन्हें दवा दे सकते हैं।
  4. हम उन्हें शौचालय या बाथरूप जाने में मदद कर सकते हैं।
  5. यदि वे चाहें तो हम उनसे बात कर सकते हैं।
  6. हम उन्हें बाहर बगीचे में घुमाने ले जा सकते हैं ताकि उनका मन बहल जाए।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
अपने माता-पिता और दादा-दादी के प्रति आभार और सम्मान दिखाने के विभिन्न तरीकों का वर्णन करें।
उत्तर-
हमारे माता-पिता और दादा-दादी के प्रति आभार और सम्मान दिखाने के तरीके निम्नलिखित हैं

  1. हमें उन चीजों के लिए उनकी सहायता करनी चाहिए जो वे प्रभावी रूप से नहीं कर सकते हैं।
  2. हम उन्हें घर में मौजूद आधुनिक यंत्रों (गैजेट्स) के बारे में बता सकते हैं।
  3. हमें उनसे सम्मानपूर्वक और विनम्र तरीके से बात करनी चाहिए।
  4. हमें हमेशा नियमित रूप से उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ करनी चाहिए।
  5. हमें उनके साथ कुछ क्वालिटी टाइम (गुणवत्ता समय) बिताना चाहिए। उनके दौरान हमें उनकी बातों को सुनना चाहिए और हमें अपने अनुभव भी उनके साथ साझा करने चाहिए।
  6. हमारे आस-पास, शहर या देश में क्या हो रहा है, इसके बारे में उन्हें अद्यतन (अपडेट) रखने के लिए हम उनके लिए अच्छी कहानियां और समाचार-पत्र पढ़ सकते हैं।
  7. हमें सभी शिष्टाचार में उन्हें सम्मान दिखाना चाहिए।
  8. हमें उनके भोजन और दवाओं का ध्यान रखना चाहिए।
  9. हमें अक्सर उन्हें बताना चाहिए कि जब हमें उनकी ज़रूरत होती है तो हमेशा हमारे साथ वहां रहने के लिए हम उनके आभारी होते हैं।
  10. हमें उनका हमेशा आज्ञाकारी होना चाहिए और उनके आदेशों की अवहेलना करने का कभी प्रयास नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 2.
आप यह कैसे प्रमाणित करेंगे कि हमारे माता-पिता और दादा-दादी हमारे सबसे बड़े सहायक हैं?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी हम सभी के लिए सबसे बड़ा सहारा हैं। यह निम्नलिखित तथ्यों की सहायता से सिद्ध किया जा सकता है:

  1. वे हमारी बुनियादी ज़रूरतों जैसे भोजन, कपड़े, आश्रय आदि का अच्छे से ध्यान रखते हैं।
  2. वे हमारी शिक्षा के लिए आवश्यक धन प्रदान करते हैं।
  3. वे हमारी पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में हमारी मदद करते हैं।
  4. वे हमारी उपलब्धियों के लिए हमारी प्रशंसा करते हैं।
  5. जब हम गलती करते हैं, तो वे हमें न केवल उन्हें दोहराने से हमें रोकते हैं बल्कि हमारा मार्गदर्शन भी करते हैं कि हम इन गलतियों को फिर से करने से कैसे बच सकते हैं?
  6. वे हमें अपना निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रेरणा प्रदान करते हैं।
  7. वे विभिन्न महत्त्वपूर्ण चीजों के लिए अनुसूची बनाने में हमारी मदद करते हैं और इसका सख्ती से पालन करते हैं।

प्रश्न 3.
माता-पिता और दादा-दादी सभी के जीवन में सबसे सम्मानित व्यक्ति होते हैं। आप इसे कैसे उचित ठहराएंगे?
उत्तर-
माता-पिता और दादा-दादी सभी के जीवन में सबसे सम्मानित व्यक्ति होते हैं। हम इसे इस आधार पर उचित ठहराएंगे कि हम हर साल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मातृ दिवस, पिता दिवस और दादा-दादी दिवस मनाते हैं हम हर साल 9 मई को मातृ दिवस (मदर्स डे) मनाते हैं। यह दिन हमारे जीवन में माँ की भूमिका के बारे में याद दिलाने के लिए मनाया जाता है। इस दिन हम एक माँ और उसके बच्चे के बीच के बंधन के बारे में याद करते हैं और हमारे जीवन में उनके प्रभाव और योगदान के प्रति आभार प्रकट करते हैं। हम हर साल 20 मई को पिता दिवस मनाते हैं। इस दिन हम एक पिता और उसके बच्चे के बीच के बंधन के बारे में याद करते हैं और हमारे जीवन में उनके प्रभाव और योगदान के प्रति आभार प्रकट करते हैं।
हम हर साल 13 सितंबर को दादा-दादी दिवस मनाते हैं। सन् 2020 में भारत में यह दिवस 9 सितंबर को मनाया गया। यह दिन हमें अपने जीवन में दादा-दादी की भूमिका के बारे में याद दिलाने के लिए मनाया जाता है। इस दिन हम दादा-दादी और उनके पोते के बीच के बंधन के बारे में याद करते हैं और हमारे जीवन में उनके प्रभाव और योगदान के लिए आभार प्रकट करते हैं।

प्रश्न 4.
आप यह दिखाने के लिए क्या करते हैं कि आप अपने बड़ों का सम्मान करते हैं और उनके प्रति आभारी हैं?
उत्तर-
मैं यह दिखाने के लिए कि मैं अपने बड़ों की देखभाल और उनका सम्मान करता हूं के लिए निम्नलिखित कार्य करता हूँ। अपने कार्यों से मैं यह दिखाने की कोशिश करता हूँ कि मैं सर्वशक्तिमान का आभारी हैं:

  1. मैं अपने माता-पिता और दादा-दादी को हर रोज़ सुप्रभात और शुभ रात्रि की शुभकामनाएं देता हूँ।
  2. स्कूल से आने के बाद मैं उनके साथ कुछ समय बिताता हूँ और स्कूल में होने वाली घटनाओं के बारे में जानकारी साझा करता हूं।
  3. हम सभी रात का खाना एक साथ बैठकर खाते हैं और दिन की घटनाओं के बारे में बात करते हैं।
  4. मैं हमेशा सोने से पहले आपने दादा-दादी के साथ बैठता हूँ, उनके साथ वक्त बिताता हूं और भनिष्य में अपने कार्यों के बारे में सलाह लेने के लिए उनकी बातें सुनता और समझता हूँ और उन पर अमल करता हूं।
  5. मैं उनके जीवन के सभी महत्त्वपूर्ण दिन मनाता हूँ जैसे उनके जन्मदिन, उनकी वर्षगांठ आदि।
  6. मैं उनकी दवाओं का रिकॉर्ड रखता हूँ और यह सुनिश्चित करता हूँ कि वे अपनी दवाओं को खाना ना भूलें।
  7. छुट्टियों में मैं अपने दादा-दादी के साथ पास के पार्क में जाता हूँ।
  8. मैं अपने दादा-दादी के साथ कुछ इनडोर गेम भी खेलता हूँ।
  9. मैं उनकी पसंद का संगीत बजाता हूँ और उनके बचपन के दिनों के बारे में बात करना पसंद करता हूँ।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
हमें हमेशा
(क) परिवार के बड़े बुजुर्गों से प्यार करना चाहिए
(ख) परिवार के बड़े बुजुर्गों का आदर करना चाहिए
(ग) परिवार के बड़े बुजुर्गों की बात को ध्यान से सुनना चाहिए
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 2.
हमारा बुजुर्गों के प्रति सम्मान दिखाना और उनके प्रति आभारी होना एक …………
(क) ज़रूरी नहीं
(ख) उत्कृष्ट गुण
(ग) समय की बर्बादी
(घ) सभी।
उत्तर-
(ख) उत्कृष्ट गुण।

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प्रश्न 3.
हमें अपने बड़ों के प्रति आभारी होना चाहिए क्योंकि वे हमारे कल्याण के लिए ……… अथक प्रयास करते हैं।
(क) हमेशा
(ख) किसी खास मौके पर
(ग) जब ज़रूरत हो
(घ) कभी नहीं।
उत्तर-
(क) हमेशा।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-सा हमारे बुजुर्गों के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने का तरीका है?
(क) विनम्रता से बोलना
(ख) दैनिक कार्यों में उनकी मदद करना
(ग) अच्छे से देखभाल करना।
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सा हमारे बुजुर्गों के प्रति सम्मान दिखाने का सबसे अच्छा तरीका है?
(क) उनके साथ गुणवत्ता समय बिता कर
(ख) उन्हें बाज़ार ले जाकर
(ग) उन्हें सिनेमा ले जाकर
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) उनके साथ गुणवत्ता समय बिताकर।

प्रश्न 6.
हमें अपने बड़े बुजुर्गों की देखभाल करनी चाहिए क्योंकि-
(क) उन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ किया है।
(ख) वे हमसे बहुत पहले पैदा हुए थे।
(ग) वे उस दौर में पैदा हुए थे जब कोई भी आधुनिक साधन नहीं थे।
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(क) उन्होंने हमारे लिए बहुत कुछ किया है।

प्रश्न 7.
हमें अपने बड़े बुजुर्गों के लिए ………… महसूस करना चाहिए।
(क) अच्छा
(ख) बुरा
(ग) गर्व
(घ) क तथा ग।
उत्तर-
(घ) (क) तथा (ग)।

प्रश्न 8.
हमारे माता-पिता और बड़ों की सहायता करना उनके लिए हमारे ………. को व्यक्त करने का एक तरीका है।
(क) प्यार
(ख) आदर
(ग) सम्मान
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 9.
अपने बड़ों की अच्छी देखभाल करना, उन्हें प्यार करना तथा उनको सम्मान देना हमारा ………. है।
(क) काम
(ख) कर्त्तव्य
(ग) व्यापार
(घ) शिक्षा।
उत्तर-
(ख) कर्तव्य।

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प्रश्न 10.
कथन (क) हमें अपने माता-पिता के प्रति ईमानदार होना चाहिए।
कथन (ख) जब हमारे माता-पिता बूढ़े व कमजोर हो जाते हैं तब हमें उनका ध्यान रखना चाहिए उपरोक्त लिखे कथनों में से कौन सा कथन सही हैं
(क) कथन क सही और ख गलत है
(ख) कथन क गलत और ख सही है
(ग) दोनों कथन सही हैं
(घ) दोनों कथन गलत हैं।
उत्तर-
(क) कथन क सही और ख गलत है।

प्रश्न 11.
हमें अपने बुजुर्गों के जीवन के विशेष दिन मनाने चाहिए इससे उन्हें …….. मिलेगी।
(क) दुःख
(ख) खुशी
(ग) गुस्सा
(घ) सभी।
उत्तर-
(ख) खुशी।

प्रश्न 12.
हमारे बुजुर्गों ने हमें बड़ा करने व पालन-पोषण में बहुत कष्ट झेले हैं। हम उनका यह ऋण चुका सकते हैं
(क) उन्हें प्यार दिखा कर
(ख) उन्हें सम्मान देकर
(ग) दोनों (क) व (ख) विकल्प
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(ग) दोनों (क) व (ख) विकल्प।

रिक्त स्थान भरो:

  1. अपने बुजुर्गों के प्रति सम्मान दिखाना और उनके प्रति आभारी होना एक ………….. है।
  2. हमें हमेशा अपने बुजुर्गों, अपने दादा-दादी और माता-पिता का …………. करना चाहिए।
  3. हमें अपने दादा-दादी और माता-पिता के प्रति अपने नि:स्वार्थ प्रेम और ……….. को व्यक्त करना चाहिए।
  4. हमें अपने बड़ों के साथ …………… बिताना चाहिए।
  5. हमें हमेशा अपने दादा-दादी और माता-पिता का ………… होना चाहिए।
  6. हमें अपने दादा-दादी और माता-पिता के यादगार बचपन की घटनाओं को ……….. चाहिए।
  7. हमारे ………… ने हमें आगे बढ़ाने के लिए बहुत कुछ किया है।
  8. हमारे …….. ने हमारी भलाई के लिए कई बलिदान दिए हैं।
  9. हमें अपने बड़ों से हमेशा ………… और ………. तरीके से बात करनी चाहिए।
  10. हमें अपने माता-पिता और दादा-दादी की ………….. नहीं करनी चाहिए।

उत्तर-

  1. उत्कृष्ट गुण
  2. सम्मान
  3. कृतज्ञता
  4. वालिटी टाइम (गुणवत्ता समय)
  5. आभारी
  6. सुनना
  7. माता-पिता
  8. बुजुर्गों
  9. सम्मान, विनम्र
  10. अवज्ञा।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 3 बड़ों के प्रति प्यार और सम्मान

सही/ग़लतः

  1. हमें अपने बुजुर्गों की बात नहीं माननी चाहिए क्योंकि वे आधुनिक जीवन के बारे में नहीं जानते हैं।
  2. हमारे दादा दादी ने हमारे लिए कुछ नहीं किया है।
  3. बड़ों के प्रति सम्मान दिखाना और उनकी देखभाल करना एक उत्कृष्ट गुण है।
  4. हमें अपने बुजुर्गों की सलाह ज़रूर सुननी चाहिए।
  5. हमें अपने बड़ों के साथ समय बिताकर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।
  6. दोस्तों के साथ खेलना हमारे बड़ों के साथ समय बिताने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।
  7. हमारे माता-पिता और बड़ों की अवज्ञा करना अच्छा नहीं है।
  8. हमें अपने माता-पिता से सम्मानपूर्वक बात करनी चाहिए।
  9. हमें सभी बुजुर्गों की मदद करनी चाहिए।
  10. हमारे बुजुर्ग हमसे कम अनुभवी हैं।

उत्तर-

  1. ग़लत
  2. ग़लत
  3. सही
  4. सही
  5. ग़लत
  6. गलत
  7. सही
  8. सही
  9. सही
  10. ग़लत।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र का दूसरे सामाजिक विज्ञानों, इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र के साथ सम्बन्ध बताएं। (Textual Question)
(Explain the relationship of Political Science with other Social Sciences i.e. History, Economics, Sociology and Ethics.)
उत्तर-
राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय राज्य तथा राज्य के अन्दर रहने वाले नागरिक हैं। मनुष्य के जीवन के अनेक पहलू हैं-राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक इत्यादि। इन सब पहलुओं का अध्ययन अनेक शास्त्र करते हैं। जैसे-राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, मनोविज्ञान इत्यादि। परन्तु मनुष्य की आर्थिक अवस्था का उसकी राजनीतिक अवस्था पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार धर्म का राजनीति पर प्रभाव पड़ता है अर्थात् व्यक्ति की विभिन्न अवस्थाओं का एक-दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतः राजनीतिशास्त्र का, जो मानव जीवन से सम्बन्धित है तथा समाजशास्त्र है, अन्य समाजशास्त्रों से सम्बन्ध होना स्वाभाविक है। डॉ० गार्नर के अनुसार, “सम्बन्धित विज्ञानों के बिना राजनीतिशास्त्र को समझना उतना ही कठिन है, जितना रसायन विज्ञान (Chemistry) के बिना जीव विज्ञान (Biology) को समझना या गणित (Mathematics) के बगैर यन्त्र विज्ञान (Mechanics) को।” राजनीति शास्त्र का समाज शास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान इत्यादि शास्त्रों से गहरा सम्बन्ध है। एक लेखक के शब्दों में-“ये सब शास्त्र एक फूल की पंखुड़ियों (Petals of flower) के समान हैं।”

राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। सीले (Seeley) ने इन दोनों में सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “बिना राजनीति विज्ञान के इतिहास का कोई फल नहीं। बिना इतिहास के राजनीति विज्ञान की कोई जड़ नहीं।”

बर्गेस (Burgess) ने दोनों के सम्बन्ध के बारे में लिखा है, “इन दोनों को अलग कर दो उनमें से एक यदि मृत नहीं तो पंगु अवश्य हो जाएगा और दूसरा केवल आकाश-पुष्प बनकर रह जाएगा।” (“Separate them and the one becomes a cripple, if not a corpse, the other a will of the wisp.”) फ्रीमैन (Freeman) के अनुसार, “इतिहास भूतकालीन राजनीति है और राजनीति वर्तमान इतिहास है।” (“History is nothing but past politics and politics is nothing but present History.”) इन विद्वानों के कथन से राजनीति तथा इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध का पता लगता है।

इतिहास की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of History to Political Science)—इतिहास से हमें बीती हुई घटनाओं का ज्ञान होता है। राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं। राजनीति विज्ञान में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए हमें इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है। राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए, उनके अतीत को जानना आवश्यक होता है और इतिहास से ही उनके अतीत को जाना जा सकता है। यदि हम इंग्लैंड की संसद् तथा राजतन्त्र का वर्तमान स्वरूप जानना चाहते हैं तो हमें वहां के इतिहास का गहरा अध्ययन करना पड़ेगा। राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। मानवीय इतिहास के विभिन्न समयों पर राजनीति क्षेत्र में अनेक कार्य किए गए, जिनके परिणाम और सफलता-असफलता का वर्णन इतिहास से प्राप्त होता है। राजनीति क्षेत्र के ये भूतकालीन कार्य एक प्रयोग के समान ही होते हैं और ये भूतकालीन प्रयोग भविष्य के लिए मार्ग बतलाने का कार्य करते हैं। भारत के इतिहास से पता चलता है कि वही शासक सफल रहेगा जो धर्म-निरपेक्ष हो। धार्मिक सहिष्णुता की नीति के आधार पर अकबर ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जबकि औरंगज़ेब की धर्मान्ध नीति के कारण मुग़ल साम्राज्य का पतन हो गया। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया। भारत आजकल धर्म-निरपेक्ष नीति को अपनाए हुए है। अतः राजनीति विज्ञान के अध्ययन का आधार इतिहास है।

इतिहास राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास मनुष्य की सफलताओं एवं विफलताओं का संग्रह है। अतीत में मानव ने क्या-क्या भूलें कीं, किस नीति को अपनाने से अच्छा और बुरा परिणाम निकला आदि बातों का ज्ञानदाता इतिहास ही है। भारतीय इतिहास में अकबर की सफलता और औरंगज़ेब की विफलता हमें राजनीतिक शिक्षा देती है। इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय और फ्रांस के लुई चौदहवें के निरंकुश राजतन्त्र हमें यह पाठ पढ़ाते हैं कि निरंकुश राज्य अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता। इतिहास द्वारा बतलाई गई भूलों के आधार पर ही राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन लाते हैं।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

कोई भी राजनीतिक संस्था अकस्मात् पैदा नहीं होती। उसका वर्तमान रूप शनैः-शनैः होने वाले क्रमिक विकास का फल है। किसी समय किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए संस्था का जन्म होता है और समयानुसार उसमें परिवर्तन भी आते रहते हैं और कई बार यह संस्था नया रूप भी धारण कर लेती है। इस पृष्ठभूमि में यह आवश्यक है कि राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन पर्यवेक्षण (Observation) विधि के द्वारा किया जाए जिसके लिए इतिहास का सहारा लेना अनिवार्य है। यह कहना उचित ही है कि इतिहास की उपेक्षा करने से राजनीति शास्त्र का अध्ययन केवल काल्पनिक और सैद्धान्तिक ही होगा। ऐसे अध्ययन का दोष बताते हुए लॉस्की (Laski) कहता है, “हर प्रकार के काल्पनिक राजनीति शास्त्र का परास्त होना अनिवार्य ही है क्योंकि मनुष्य कभी भी ऐतिहासिक प्रभावों से उन्मुक्त नहीं हो सकते।” विलोबी (Willoughby) के शब्दों में “इतिहास राजनीति शास्त्र को तीसरी दिशा प्रदान करता है।” (“History gives the third dimension to Political Science …………”)

इतिहास को राजनीति शास्त्र की देन (Contribution of Political Science to History)—परन्तु इतिहास का ही राजनीति शास्त्र पर प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि इतिहास भी राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ हासिल करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। इतिहास में केवल युद्ध, विजयों तथा अन्य घटनाओं का ही वर्णन नहीं आता बल्कि इसमें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक घटनाओं का भी वर्णन आता है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाता है। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तिवाद आदि धाराओं की चर्चा के बिना 17वीं शताब्दी का इतिहास अपूर्ण है। भारत के 20वीं शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस पार्टी का महत्त्व, असहयोग आन्दोलन, स्वराज्य पार्टी, भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स योजना, केबिनेट मिशन योजना, भारत का विभाजन, चीन का भारत पर आक्रमण तथा पाकिस्तान के आक्रमण आदि राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो भारत का इतिहास महत्त्वहीन रह जाएगा। लॉर्ड एक्टन ने राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “राजनीति इतिहास की धारा में उसी प्रकार इकट्ठी हो जाती है जैसे नदी की रेत में सोने के कण।”

राजनीति की इतिहास को एक महत्त्वपूर्ण देन यह है कि राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं। रूसो और मॉण्टेस्क्यू के विचारों का फ्रांस की राज्यक्रान्ति पर, कार्ल मार्क्स के विचारों का सोवियत रूस की राज्यक्रान्ति पर तथा महात्मा गांधी के विचारों का भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा।

दोनों में अन्तर (Differences between the two)-राजनीतिक विकास तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है।

1. इतिहास का क्षेत्र राजनीतिक विज्ञान से व्यापक है (Scope of History is wider than the scope of Political Science)-फ्रीमैन के कथन से समहत होना कठिन है क्योंकि पूर्ण भूतकालीन इतिहास राजनीति नहीं है और वर्तमान राजनीति कल का इतिहास नहीं है। इतिहास में प्रत्येक घटना का वर्णन किया जाता है। इसका क्षेत्र व्यापक है। जब हम 19वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ते हैं तो इसमें उस समय की सभी घटनाओं, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक का वर्णन आ जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध केवल राजनीतिक घटनाओं से होता है।

2. राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है, जबकि इतिहास केवल भूतकाल से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राजनीतिक संस्थाओं के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है। राज्य कैसा था, कैसा है और कैसा होना चाहिए, इन तीनों का उत्तर राजनीति शास्त्र से मिलता है, परन्तु इतिहास में केवल बीती घटनाओं का ही वर्णन आता है।

3. इतिहास वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान विचारशील है- इतिहास में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में इन घटनाओं का मूल्यांकन भी किया जाता है और इस मूल्यांकन के आधार पर निश्चित परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रकार इतिहास वर्णनात्मक है परन्तु राजनीति शास्त्र विचारात्मक भी है।

4. इतिहासकार नैतिक निर्णय नहीं देता, परन्तु राजनीति विज्ञान के विद्वानों के लिए नैतिक निर्णय देना आवश्यक है-इतिहासकार केवल बीती हुई घटनाओं का वर्णन करता है। वह घटनाओं की नैतिकता के आधार पर परख करके कोई निर्णय नहीं देता है। उदाहरण के लिए, दिसम्बर 1971 में भारत का पाकिस्तान से युद्ध हुआ। इतिहासकार का कार्य केवल युद्ध की घटनाओं का वर्णन करना है। इतिहासकार का इस बात के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है कि युद्धबन्दियों के साथ कैसा व्यवहार किया गया, असैनिक आबादी पर बम बरसाए गए तो कोई अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं। परन्तु राजनीति विज्ञान का विद्वान् युद्ध के नैतिक पहलू पर अपना निर्णय अवश्य देगा।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में अन्तर होते हुए भी घनिष्ठ सम्बन्ध है और इस विचार को सब विद्वान् मान्यता प्रदान करते हैं। गार्नर (Garmer) के शब्दों में, ‘अध्ययन विषय के तौर पर यह एक-दूसरे के सहायक व पूरक हैं।’

सीले (Seeley) ने इन दोनों को पूरक सिद्ध करने के लिए कहा है, “इतिहास के उदार प्रभाव के बिना राजनीति अशिष्ट है और राजनीति से अपने सम्बन्ध को भुला देने से इतिहास साहित्य मात्र रह जाता है।”

राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। प्राचीन काल में अर्थशास्त्र ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ (Political Economy) के नाम से प्रसिद्ध था। विद्वानों ने ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ की परिभाषा इस प्रकार की है-“यह राज्य के लिए राजस्व (Revenue) जुटाने की एक कला है।” भारतीय विद्वान् चाणक्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में राजनीतिक समस्याओं का वर्णन किया । इसी प्रकार राजनीति विज्ञान के कई मान्य ग्रन्थों जैसे अरस्तु की ‘Politics’ तथा लॉक की ‘नागरिक प्रशासन पर दो लेख’ (Two Treatises on Civil Government) में उन विषयों का विवेचन मिलता है, जिन्हें आजकल अर्थशास्त्र में शामिल किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन काल में दो शास्त्रों को एक माना जाता था, परन्तु 19वीं शताब्दी में एडम स्मिथ ने आर्थिक क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप को अनुचित बताया। एडम स्मिथ पहला विद्वान् था जिसने अर्थशास्त्र को राजनीति शास्त्र से अलग किया। 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया। अर्थशास्त्र का सम्बन्ध सम्पत्ति के उत्पादन, उपभोग, वितरण तथा विनिमय सम्बन्धी मनुष्य की गतिविधियों से है।

यह ठीक है कि 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र विज्ञान माना गया है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में कोई सम्बन्ध नहीं। अब भी दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है और आपस में आदानप्रदान करते हैं।

अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Economics to Political Science)-वर्तमान युग में मनुष्य तथा राज्य की मुख्य समस्याएं आर्थिक हैं। इतिहास से पता चलता है कि आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। जब मनुष्य आखेट अवस्था में से गुज़र रहा था अर्थात् जब मनुष्य का पेशा शिकार करना था तब राज्य के उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं होता था क्योंकि उस समय मनुष्य एक स्थान पर नहीं रहता था। जब मनुष्य ने कृषि करना आरम्भ किया, इसके साथ ही मनुष्य को एक निश्चित स्थान पर रहना पड़ा, जिससे राज्य की उत्पत्ति हुई। पहले सरकार पर बड़ेबड़े ज़मींदारों का प्रभाव होता था, परन्तु यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् सरकार पर उद्योगपतियों का प्रभाव हो गया है। आजकल हमारे देश में भी उद्योगपतियों का ही अधिक प्रभाव है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

व्यक्तिवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद मुख्यतः आर्थिक सिद्धान्त हैं परन्तु इनका अध्ययन राजनीतिशास्त्र में भी किया जाता है क्योंकि इन आर्थिक सिद्धान्तों ने राज्य के ढांचे को ही बदल दिया है। चीन में साम्यवाद है। उत्पादन के साधनों पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण है। सरकार की समस्त शक्तियां कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) के हाथ में ही हैं। अमेरिका में पूंजीवाद है, जिसके कारण वहां की सरकार संगठन तथा सरकार के उद्देश्य चीन की सरकार से भिन्न हैं। अतः आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के अनुसार, उत्पादन के साधनों में परिवर्तन होने पर राजनीतिक परिवर्तन होना अनिवार्य है। कार्ल मार्क्स का यह कथन सर्वथा सत्य तो नहीं है परन्तु इतना अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि आर्थिक परिवर्तन ही राजनीतिक परिवर्तन का मुख्य कारण भी होता है।

राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं। 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रान्तियां हुई हैं उनके परिणामस्वरूप ही यूरोप के इन देशों में उपनिवेशवाद और समाजवाद की नीति अपनाई। इस सम्बन्ध में बिस्मार्क और जोज़फ चैम्बरलेन के कथन महत्त्वपूर्ण हैं। बिस्मार्क का कथन था, “मुझे यूरोप के बाहर नए राज्यों की नहीं, बल्कि व्यापारिक केन्द्रों की आवश्यकता है।” (“I want outside Europe…not provinces but commerical enterprises.”)

राजनीतिक क्षेत्र की अनेक मत्त्वपूर्ण घटनाएं आर्थिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप ही घटित हुई हैं। भारत में आज लोकतन्त्र को इतनी सफलता नहीं मिली जितनी कि अमेरिका तथा इंग्लैंड में प्राप्त हुई है। भारत में सफलता न मिलने का मुख्य कारण लोगों की आर्थिक दशा है। भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है, अधिकारों तथा कर्तव्यों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग नहीं कर पाती। लोगों के वोट खरीद लिए जाते हैं। दूसरे विश्व-युद्ध के पश्चात् बहुत से देशों को अमेरिका से आर्थिक सहायता लेनी पड़ी जिसका परिणाम यह हुआ कि उन देशों की नीतियों पर भी अमेरिका का प्रभाव पड़ा।

अर्थशास्त्र को राजनीति विज्ञान की देन (Contribution of Political Science to Economics)-अर्थशास्त्र के अध्ययन में राजनीति विज्ञान से भी बहुत सहायता मिलती है। राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन-व्यवस्था यदि दृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। आर्थिक दशाओं का ही नहीं सरकार की नीतियों का भी आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। सरकार की कर नीति, आयात-निर्यात नीति, विनिमय की दर, बैंक नीति, व्यापार तथा उद्योग सम्बन्धी कानून, सीमा शुल्क नीति आदि का राज्य की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। सरकार पूंजीवाद तथा साम्यवाद को अपना कर देश की आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है। भारत सरकार ने पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं हैं ताकि लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा किया जा सके। सरकार बड़े-बड़े उद्योगों को अपने हाथों में ले रही है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा।

युद्ध एक सैनिक और राजनीतिक क्रिया है परन्तु इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भारी प्रभाव पड़ता है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति में गिरावट होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण वियतनाम युद्ध रहा है। इसी प्रकार 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 तथा 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों ने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित किया है।

अतः इस विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व पर निर्भर करता है।

अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में समानताएं (Points of Similarity between Economics and Political Science) अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में निम्नलिखित समानताएं पाई जाती हैं-

दोनों का विषय समाज में रह रहा मनुष्य है-समाज में रह रहा मनुष्य दोनों शास्त्रों का विषय है। दोनों का उद्देश्य मानव कल्याण है और उसी के लिए दोनों कार्य करते हैं।

दोनों ही आदर्शात्मक सामाजिक विज्ञान हैं-दोनों ही भूतकाल के आधार पर वर्तमान का विश्लेषण करके भविष्य के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में मानव जीवन के लिए ऐसे आदर्श स्थापित करते हैं जिनके द्वारा अधिक-से-अधिक मानव हित हो।

दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं- राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं।

दोनों में अन्तर (Difference between the two) राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार है

1. विभिन्न विषय-क्षेत्र (Different Subject Matter) राजनीति विज्ञान मनुष्य की राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन करता है और इस विज्ञान का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। परन्तु अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है। मनुष्य धन कैसे कमाता है, कैसे उसका उपयोग करता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर अर्थशास्त्र देता है। इस प्रकार दोनों का विषय-क्षेत्र अलग-अलग है।

2. दृष्टिकोण (Approach)—मिस्टर ब्राऊन (Mr. Brown) ने राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में भेद करते हुए लिखा है, “अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है जबकि राजनीति विज्ञान का मनुष्यों से। अर्थशास्त्र वस्तुओं की कीमतों का अध्ययन करता है और राजनीति विज्ञान सदाचार सम्बन्धी मूल्यों का।” इस प्रकार अर्थशास्त्र व्याख्यात्मक विज्ञान है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक विज्ञान है।

3. अध्ययन पद्धति (Method of Study)—दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि दोनों तथा अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीति विज्ञान के अध्ययन के अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है और इसके निष्कर्ष और सिद्धान्त अधिक सही होते हैं। इसका कारण यह है कि अर्थशास्त्र का सम्बन्ध मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं से है और इन आवश्यकताओं तथा इनकी पूर्ति का उल्लेख अंकों द्वारा दर्शाया जा सकता है। अर्थशास्त्र में मात्रात्मक आंकड़ों का संग्रह राजनीति विज्ञान की अपेक्षा अधिक सम्भव है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में भिन्नता होने के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि वर्तमान युग में दोनों ही अपने उद्देश्यों की प्राप्ति एक-दूसरे के सहयोग और सहायता के बिना नहीं कर सकते। डॉ० गार्नर (Dr. Garner) ने ठीक ही कहा है, “बहुत-सी आर्थिक समस्याओं का हल राजनीतिक आर्थिक हालतों से आरम्भ होता है।” विलियम एसलिंगर (William Esslinger) के विचारानुसार, “अर्थशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र की एकता का पाठ्यक्रम उपकक्षा में पढ़ाया जाना चाहिए।”

राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन का शास्त्र है। समाज- शास्त्र समाज की उत्पत्ति, विकास, उद्देश्य तथा संगठन का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र में मानव जीवन के सभी पहलुओं राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक इत्यादि का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में मानव जीवन के राजनीतिक पहलू का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र की एक शाखा है। प्रसिद्ध विद्वान् रेटजनहाफर ने ठीक ही कहा है, “राज्य अपने विकास के प्रारम्भिक चरणों में एक सामाजिक संस्था ही थी।” हम आगस्ट काम्टे (August Comte) के इस कथन से सहमत हैं, “समाजशास्त्र सभी समाजशास्त्रों की जननी है।” राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र परस्पर बहुत कुछ आदान-प्रदान करते हैं। प्रो० कैटलिन (Catline) ने तो यहां तक कहा है, “राजनीति और समाजशास्त्र अखण्ड हैं और वास्तव में एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं।”

राजनीति विज्ञान को समाजशास्त्र की देन (Contribution of Sociology to Political Science) समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। बिना समाजशास्त्र के अध्ययन के राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों को समझना कठिन है। प्रो० गिडिंग्स (Prof. Giddings) ने ठीक ही कहा है, “समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनभिज्ञ लोगों को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना उसी प्रकार है जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति को खगोल विज्ञान अथवा ऊष्मा गति की शिक्षा देना।” (“To teach the theory of the state to men who have not learned the first principles of sciology is like teaching Astronomy or Thermodynamics to men who have not learned Newton’s Laws of Motion.”) दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों को न जानने वाले व्यक्ति को खगोल विज्ञान की शिक्षा देना व्यर्थ है उसी प्रकार बिना समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनजान व्यक्ति को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना व्यर्थ है। समाजशास्त्रों में समाज के रीति-रिवाजों का अध्ययन किया जाता है। हम जानते हैं कि राज्य के कानून का पालन तभी किया जाता है यदि वह समाज के रीति-रिवाजों के अनुसार हो।

राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाज शास्त्र की बहुत देन है। समाजशास्त्र से पता चलता है कि राज्य मानव की सामाजिक भावना का परिणाम है। समाज के विकास के स्तर के साथसाथ राज्य का विकास हुआ है। राजनीतिक समाजशास्त्र (Political Sociology) राजनीति विज्ञान की एक शाखा पनप रही है, जो इस बात की स्पष्ट सूचक है कि राजनीतिक तथ्यों के विधिवत अध्ययन के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेना आवश्यक है। इस प्रकार समाज शास्त्र का राजनीति शास्त्र पर बहुत प्रभाव पड़ा है।

राजनीति विज्ञान की समाजशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Sociology)-परन्तु दूसरी ओर राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय राज्य हैराज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, राज्य क्या है, राज्य का विकास कैसे हुआ, राज्य का उद्देश्य क्या है इन सब प्रश्नों का उत्तर राजनीति विज्ञान में मिलता है। समाजशास्त्र को राज्य से सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी राजनीति शास्त्र से मिलती है। राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र का एक अंग है जिसके बिना समाजशास्त्र की विषय सामग्री पूर्ण नहीं हो सकती।

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राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के आपसी सम्बन्ध का एक प्रणाम यह है कि मॉरिस, गिन्सबर्ग, आगस्त काम्टे, लेस्टर वार्ड, समवर आदि समाजशास्त्रियों ने राज्य की प्रकृति और उद्देश्यों में इतनी रुचि दिखाई है, मानो वे समाजशास्त्र की मुख्य समस्याएं हों। इसी प्रकार डेविड ईस्टन, हैरल्ड लासवैल, ग्रेवीज ए० ऑल्मण्ड, पावेल, कोलमेन, मेक्स वेबर और राजनीति शास्त्र के अन्य आधुनिक विद्वानों द्वारा समाज शास्त्र से अधिक-से-अधिक मात्रा में अध्ययन सामग्री और अध्ययन पद्धतियां प्राप्त की गई हैं।

दोनों में अन्तर (Differences between the two) राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है-

दोनों के क्षेत्र अलग हैं-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र के क्षेत्र एक-दूसरे से पृथक् हैं। राजनीतिक शास्त्र का मुख्य विषय-क्षेत्र राज्य है जबकि समाजशास्त्र का मुख्य क्षेत्र समाज है।

राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र से संकुचित है-राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र के क्षेत्र से संकुचित है। राजनीति शास्त्र मनुष्य के राजनीतिक पहलू का ही अध्ययन कराता है जबकि समाजशास्त्र मनुष्य के सभी पहलुओं का अध्ययन कराता है।

राजनीति विज्ञान यह मानकर चलता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसमें हम यह अध्ययन नहीं करते कि मनुष्य सामाजिक प्राणी क्यों है। परन्तु समाजशास्त्र में इस प्रश्न का भी अध्ययन किया जाता है।

समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान से पहले बना–राजनीति शास्त्र में समाज बनने से पूर्व के मानव का अध्ययन नहीं किया जाता जबकि समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन वहीं से शुरू होता है। समाजशास्त्र के अन्तर्गत मानव जाति के दोनों युगों-संगठित तथा असंगठित-का अध्ययन किया जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र केवल संगठित युग का अध्ययन करता है।

समाजशास्त्र केवल भूत और वर्तमान से सम्बन्धित है परन्तु राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का भी अध्ययन किया जाता है जबकि समाज शास्त्र में समाज के अतीत तथा वर्तमान का ही अध्ययन किया जाता है।

समाजशास्त्र वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक है-समाजशास्त्र समाज की उत्पत्ति तथा विकास का विस्तृत रूप से अध्ययन करता है, परन्तु इस अध्ययन के पश्चात् कोई परिणाम नहीं निकलता। यह केवल सामाजिक घटनाओं का वर्णन करता है। उन घटनाओं में अच्छी तथा बुरी घटनाओं की पहचान नहीं कराता। राजनति शास्त्र केवल घटनाओं का वर्णन ही नहीं करता बल्कि परिणाम भी निकालता है, क्योंकि राजनीति विज्ञान का उद्देश्य एक आदर्श राज्य की स्थापना करना तथा आदर्श नागरिक पैदा करना है।

समाजशास्त्र में मनुष्य के चेतन (conscious) और अचेतन (unconscious) दोनों प्रकार के कार्यों का अध्ययन किया जाता है परन्तु राजनीति विज्ञान में केवल चेतन प्रकार के कार्यों का ही अध्ययन किया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में अन्तर होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध न होकर पूरक हैं। राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं।

राजनीति विज्ञान तथा नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। नीतिशास्त्र साधारण मनुष्य की भाषा में वह शास्त्र है, जो अच्छे-बुरे में अन्तर स्पष्ट करता है। नीतिशास्त्र वह शास्त्र है जिसके द्वारा धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, अहिंसा-हिंसा, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य तथा शुभ-अशुभ में अन्तर का पता चलता है। डीवी (Deewey) के अनुसार, “नीतिशास्त्र आचरण का वह विज्ञान है जिसमें मानवीय आचरण के औचित्य तथा अनौचित्य तथा अच्छाई तथा बुराई पर विचार किया जाता है।” नीतिशास्त्र के द्वारा हम निश्चित करते हैं कि मनुष्य का कौन-सा कार्य अच्छा है और कौनसा कार्य बुरा । यह शास्त्र नागरिकको आदर्श नागरिक बनाने में सहायक है। दूसरी ओर राज्य का मुख्य उद्देश्य भी आदर्श नागरिक बनाना है। इस प्रकार दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन यूनानी लेखकों प्लेटो तथा अरस्तु ने राजनीति शास्त्र को नीतिशास्त्र का ही एक अंग माना है। प्लेटो तथा अरस्तु के अनुसार, “राज्य एक सर्वोच्च नैतिक संस्था है। इसका उद्देश्य नागरिकों के नैतिक स्तर को ऊंचा करना है।” प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक’ (Republic) में राजनीति ही नहीं बल्कि नैतिक दर्शन भी भरा हुआ है। अरस्तु ने कहा था “राज्य जीवन को सम्भव बनाने के लिए उत्पन्न हुआ, परन्तु अब वह जीवन को अच्छा बनाने के लिए विद्यमान है।”

इटली के विद्वान् मैक्यावली ने सर्वप्रथम राजनीति तथा नीतिशास्त्र में भेद किया। इसके अनुसार राजा के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह नैतिकता के नियमों के अनुसार शासन चलाए। आवश्यकता पड़ने पर अनैतिकता का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। मैक्यावली के अनुसार-राजा के सामने सबसे बड़ा उद्देश्य राज्य की सुरक्षा है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य की परवाह नहीं करनी चाहिए। हाब्स (Hobbes) ने भी मैक्यावली के विचारों का समर्थन किया। बोदीन (Bodin), ग्रोशियस (Grotius) तथा लॉक (Locke) ने भी इन दोनों शास्त्रों को अलग किया, परन्तु रूसो (Rouseau) ने फिर इन दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया। कांट (Kant), ग्रीन (Green) ने भी रूसो के मत का समर्थन किया।

नीतिशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Ethics to Political Science)-वर्तमान समय में इन दोनों शास्त्रों में गहरा सम्बन्धा समझा जाता है। महात्मा गांधी ने दोनों शास्त्रों को अभिन्न माना है। उनके अनुसारसरकार को अपनी नीति नैतिकता के सिद्धान्तों पर बनानी चाहिए। सरकार की नीतियों में असत्य, अधर्म, कपट तथा पाप इत्यादि की मिलावट नहीं होनी चाहिए। कॉक्स के मतानुसार, “जो बात नैतिक दृष्टि से गलत है, वह राजनीतिक दृष्टि से सही नहीं हो सकती।” कोई भी सरकार ऐसे कानून पास नहीं कर सकती जो नैतिकता के विरुद्ध हों। यदि पास किए जाएंगे तो उनका विरोध होगा। इसके अतिरिक्त नैतिक नियम जो स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं, कानून का रूप धारण कर लेते हैं। गैटेल (Gettell) ने लिखा है, “जब नैतिक विचार स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं तो वे कानून का रूप ले लेते हैं।” लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने ठीक ही कहा है, “समस्या यह नहीं है कि सरकार क्या करती है बल्कि यह है कि उन्हें क्या करना चाहिए।” यदि राजनीति विज्ञान को नीतिशास्त्र से पृथक् कर दें तो यह निस्सार और निरर्थक हो जाएगी। उसमें प्रगतिशीलता और आदर्शता नहीं रह पाएगी। इसलिए लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने भी कहा है, “नीतिशास्त्र के अध्ययन के बिना राजनीति शास्त्र का अध्ययन विफल है।” इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान की अनेक शाखाएं आचार शास्त्र की नींव पर खड़ी हैं, जैसे अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्पूर्ण शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता पर आधारित है। आचार शास्त्र से संविधान भी प्रभावित होता है क्योंकि अनेक प्रकार के आदर्शों को संविधान में उचित स्थान देना अनिवार्य है। भारत और आयरलैंड के संविधान में हमें दिए गए राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व’ ही स्पष्ट उदाहरण है।

राजनीति विज्ञान की नीतिशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Ethics)—वर्तमान राज्य कल्याणकारी राज्य है। सरकार लोगों के नैतिक स्तर को ऊंचा करने के लिए कई प्रकार के कानून बनाती है। इसके साथ ही सरकार सामाजिक बुराइयों को दूर करती है। भारत सरकार ने सती-प्रथा, दहेज-प्रथा, छुआछूत आदि बुराइयों को कानून के द्वारा रोकने का प्रयत्न किया है और काफ़ी सफलता भी मिली है। भारत सरकार अहिंसा के सिद्धान्तों पर चल रही है और इन्हीं सिद्धान्तों का प्रचार कर रही है। भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील की स्थापना की थी ताकि संसार के दूसरे देशों में भी अहिंसा का प्रचार किया जा सके। सरकार राज्य में शान्ति की स्थापना करती है और नैतिकता शान्ति के वातावरण में ही विकसित हो सकती है। यदि राज्य शान्ति का वातावरण उत्पन्न न करे, तो नैतिक जीवन बिताना असम्भव हो जाएगा। इस प्रकार सरकार कानून द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करती है जिसमें नैतिकता विकसित हो सके। क्रोशे के मतानुसार, “नैतिकता अपनी पूर्णता और उच्चतम स्पष्टता राजनीति में ही पाती है।”

दोनों में अन्तर (Difference between the two)-राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी उन दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार हैं-

नीतिशास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित रहता है जब कि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से सम्बन्ध रखता है। नीतिशास्त्र मनुष्य के आन्तरिक तथा बाहरी दोनों कार्यों से सम्बन्धित है, परन्तु राजनीति विज्ञान मनुष्य के केवल बाहरी कार्यों से सम्बन्धित है।

राज्य के नियमों का पालन करवाने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि सरकार के किसी कानून का उल्लंघन कोई मनुष्य करता है तो उसे न्यायालय द्वारा दण्ड दिया जाता है, परन्तु नीतिशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड नहीं दिया जाता क्योंकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना अपराध नहीं केवल पाप है।

राजनीति विज्ञान मुख्यतः वर्णनात्मक है क्योंकि इसमें राज्य, सरकार की शक्तियां, संविधान इत्यादि का वर्णन करता है जबकि नीतिशास्त्र मुख्यतः आदर्शात्मक है और यह विषय जनता के सामने कुछ आदर्श रखे हुए हैं।

राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक सिद्धान्तों से है जबकि नीतिशास्त्र का सम्बन्ध केवल सिद्धान्तों से है। नीतिशास्त्र वास्तविकता से बहुत दूर है। यह केवल काल्पनिक है।

राज्य के नियमों तथा नैतिकता के नियमों में सदैव एकरूपता नहीं होती। सड़क के दाईं ओर चलना राज्य के नियम के विरुद्ध है, परन्तु नैतिकता के विरुद्ध नहीं।

राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं, परन्तु इस शास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इस बात से है कि वे क्या हैं परन्तु नीतिशास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इससे है कि वे क्या होने चाहिएं।
राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र के सम्बन्ध और अन्तर दोनों को स्पष्ट करते हुए कैटलिन ने कहा, “नीतिशास्त्र से एक राजनीतिज्ञ यह सीखता है कि अनेक मार्गों में से कौन-सा मार्ग सही है और राजनीति विज्ञान बतलाता है कि व्यावहारिक दृष्टि से कौन-सा मार्ग अपनाना सम्भव होगा।”

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

निष्कर्ष (Conclusion)-नीतिशास्त्र और राजनीति विज्ञान में भले ही कई भिन्नताएं हैं, फिर भी इनकी समीपता से इन्कार नहीं किया जा सकता। नीतिशास्त्र राजनीति विज्ञान के अध्ययन को समृद्ध बनाता है और व्यावहारिक राजनीति को उदात्त बनाने (To ennoble) के लिए प्रेरित करता है। आजकल की व्यावहारिक राजनीति में भ्रष्टाचार के उदाहरण सर्वप्रसिद्ध हैं और इन भ्रष्टाचारी तरीकों ने समाज के हर पक्ष को दूषित कर दिया है। इस भ्रष्टाचार से बचने के साधन नीतिशास्त्र ही सुझा सकता है।

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान एवं इतिहास में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relation between Political Science and History.)
उत्तर-
राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। सीले (Seeley) ने इन दोनों में सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “बिना राजनीति विज्ञान के इतिहास का कोई फल नहीं। बिना इतिहास के राजनीति विज्ञान की कोई जड़ नहीं।”

बर्गेस (Burgess) ने दोनों के सम्बन्ध के बारे में लिखा है, “इन दोनों को अलग कर दो उनमें से एक यदि मृत नहीं तो पंगु अवश्य हो जाएगा और दूसरा केवल आकाश-पुष्प बनकर रह जाएगा।” (“Separate them and the one becomes a cripple, if not a corpse, the other a will of the wisp.”) फ्रीमैन (Freeman) के अनुसार, “इतिहास भूतकालीन राजनीति है और राजनीति वर्तमान इतिहास है।” (“History is nothing but past politics and politics is nothing but present History.”) इन विद्वानों के कथन से राजनीति तथा इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध का पता लगता है।

इतिहास की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of History to Political Science)—इतिहास से हमें बीती हुई घटनाओं का ज्ञान होता है। राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं। राजनीति विज्ञान में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए हमें इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है। राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए, उनके अतीत को जानना आवश्यक होता है और इतिहास से ही उनके अतीत को जाना जा सकता है। यदि हम इंग्लैंड की संसद् तथा राजतन्त्र का वर्तमान स्वरूप जानना चाहते हैं तो हमें वहां के इतिहास का गहरा अध्ययन करना पड़ेगा। राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। मानवीय इतिहास के विभिन्न समयों पर राजनीति क्षेत्र में अनेक कार्य किए गए, जिनके परिणाम और सफलता-असफलता का वर्णन इतिहास से प्राप्त होता है। राजनीति क्षेत्र के ये भूतकालीन कार्य एक प्रयोग के समान ही होते हैं और ये भूतकालीन प्रयोग भविष्य के लिए मार्ग बतलाने का कार्य करते हैं। भारत के इतिहास से पता चलता है कि वही शासक सफल रहेगा जो धर्म-निरपेक्ष हो। धार्मिक सहिष्णुता की नीति के आधार पर अकबर ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जबकि औरंगज़ेब की धर्मान्ध नीति के कारण मुग़ल साम्राज्य का पतन हो गया। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया। भारत आजकल धर्म-निरपेक्ष नीति को अपनाए हुए है। अतः राजनीति विज्ञान के अध्ययन का आधार इतिहास है।

इतिहास राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास मनुष्य की सफलताओं एवं विफलताओं का संग्रह है। अतीत में मानव ने क्या-क्या भूलें कीं, किस नीति को अपनाने से अच्छा और बुरा परिणाम निकला आदि बातों का ज्ञानदाता इतिहास ही है। भारतीय इतिहास में अकबर की सफलता और औरंगज़ेब की विफलता हमें राजनीतिक शिक्षा देती है। इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय और फ्रांस के लुई चौदहवें के निरंकुश राजतन्त्र हमें यह पाठ पढ़ाते हैं कि निरंकुश राज्य अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता। इतिहास द्वारा बतलाई गई भूलों के आधार पर ही राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन लाते हैं।

कोई भी राजनीतिक संस्था अकस्मात् पैदा नहीं होती। उसका वर्तमान रूप शनैः-शनैः होने वाले क्रमिक विकास का फल है। किसी समय किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए संस्था का जन्म होता है और समयानुसार उसमें परिवर्तन भी आते रहते हैं और कई बार यह संस्था नया रूप भी धारण कर लेती है। इस पृष्ठभूमि में यह आवश्यक है कि राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन पर्यवेक्षण (Observation) विधि के द्वारा किया जाए जिसके लिए इतिहास का सहारा लेना अनिवार्य है। यह कहना उचित ही है कि इतिहास की उपेक्षा करने से राजनीति शास्त्र का अध्ययन केवल काल्पनिक और सैद्धान्तिक ही होगा। ऐसे अध्ययन का दोष बताते हुए लॉस्की (Laski) कहता है, “हर प्रकार के काल्पनिक राजनीति शास्त्र का परास्त होना अनिवार्य ही है क्योंकि मनुष्य कभी भी ऐतिहासिक प्रभावों से उन्मुक्त नहीं हो सकते।” विलोबी (Willoughby) के शब्दों में “इतिहास राजनीति शास्त्र को तीसरी दिशा प्रदान करता है।” (“History gives the third dimension to Political Science …………”)

इतिहास को राजनीति शास्त्र की देन (Contribution of Political Science to History)—परन्तु इतिहास का ही राजनीति शास्त्र पर प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि इतिहास भी राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ हासिल करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। इतिहास में केवल युद्ध, विजयों तथा अन्य घटनाओं का ही वर्णन नहीं आता बल्कि इसमें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक घटनाओं का भी वर्णन आता है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाता है। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तिवाद आदि धाराओं की चर्चा के बिना 17वीं शताब्दी का इतिहास अपूर्ण है। भारत के 20वीं शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस पार्टी का महत्त्व, असहयोग आन्दोलन, स्वराज्य पार्टी, भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स योजना, केबिनेट मिशन योजना, भारत का विभाजन, चीन का भारत पर आक्रमण तथा पाकिस्तान के आक्रमण आदि राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो भारत का इतिहास महत्त्वहीन रह जाएगा। लॉर्ड एक्टन ने राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध बताते हुए लिखा है, “राजनीति इतिहास की धारा में उसी प्रकार इकट्ठी हो जाती है जैसे नदी की रेत में सोने के कण।”

राजनीति की इतिहास को एक महत्त्वपूर्ण देन यह है कि राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं। रूसो और मॉण्टेस्क्यू के विचारों का फ्रांस की राज्यक्रान्ति पर, कार्ल मार्क्स के विचारों का सोवियत रूस की राज्यक्रान्ति पर तथा महात्मा गांधी के विचारों का भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा।

दोनों में अन्तर (Differences between the two)-राजनीतिक विकास तथा इतिहास में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है।
1. इतिहास का क्षेत्र राजनीतिक विज्ञान से व्यापक है (Scope of History is wider than the scope of Political Science)-फ्रीमैन के कथन से समहत होना कठिन है क्योंकि पूर्ण भूतकालीन इतिहास राजनीति नहीं है और वर्तमान राजनीति कल का इतिहास नहीं है। इतिहास में प्रत्येक घटना का वर्णन किया जाता है। इसका क्षेत्र व्यापक है। जब हम 19वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ते हैं तो इसमें उस समय की सभी घटनाओं, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक का वर्णन आ जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध केवल राजनीतिक घटनाओं से होता है।

2. राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है, जबकि इतिहास केवल भूतकाल से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राजनीतिक संस्थाओं के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन किया जाता है। राज्य कैसा था, कैसा है और कैसा होना चाहिए, इन तीनों का उत्तर राजनीति शास्त्र से मिलता है, परन्तु इतिहास में केवल बीती घटनाओं का ही वर्णन आता है।

3. इतिहास वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान विचारशील है- इतिहास में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में इन घटनाओं का मूल्यांकन भी किया जाता है और इस मूल्यांकन के आधार पर निश्चित परिणाम निकाले जाते हैं। इस प्रकार इतिहास वर्णनात्मक है परन्तु राजनीति शास्त्र विचारात्मक भी है।

4. इतिहासकार नैतिक निर्णय नहीं देता, परन्तु राजनीति विज्ञान के विद्वानों के लिए नैतिक निर्णय देना आवश्यक है-इतिहासकार केवल बीती हुई घटनाओं का वर्णन करता है। वह घटनाओं की नैतिकता के आधार पर परख करके कोई निर्णय नहीं देता है। उदाहरण के लिए, दिसम्बर 1971 में भारत का पाकिस्तान से युद्ध हुआ। इतिहासकार का कार्य केवल युद्ध की घटनाओं का वर्णन करना है। इतिहासकार का इस बात के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है कि युद्धबन्दियों के साथ कैसा व्यवहार किया गया, असैनिक आबादी पर बम बरसाए गए तो कोई अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं। परन्तु राजनीति विज्ञान का विद्वान् युद्ध के नैतिक पहलू पर अपना निर्णय अवश्य देगा।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा इतिहास में अन्तर होते हुए भी घनिष्ठ सम्बन्ध है और इस विचार को सब विद्वान् मान्यता प्रदान करते हैं। गार्नर (Garmer) के शब्दों में, ‘अध्ययन विषय के तौर पर यह एक-दूसरे के सहायक व पूरक हैं।’

सीले (Seeley) ने इन दोनों को पूरक सिद्ध करने के लिए कहा है, “इतिहास के उदार प्रभाव के बिना राजनीति अशिष्ट है और राजनीति से अपने सम्बन्ध को भुला देने से इतिहास साहित्य मात्र रह जाता है।”

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relation between Political Science and Economics.)
उत्तर-
राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। प्राचीन काल में अर्थशास्त्र ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ (Political Economy) के नाम से प्रसिद्ध था। विद्वानों ने ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ की परिभाषा इस प्रकार की है-“यह राज्य के लिए राजस्व (Revenue) जुटाने की एक कला है।” भारतीय विद्वान् चाणक्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में राजनीतिक समस्याओं का वर्णन किया । इसी प्रकार राजनीति विज्ञान के कई मान्य ग्रन्थों जैसे अरस्तु की ‘Politics’ तथा लॉक की ‘नागरिक प्रशासन पर दो लेख’ (Two Treatises on Civil Government) में उन विषयों का विवेचन मिलता है, जिन्हें आजकल अर्थशास्त्र में शामिल किया जाता है। इस प्रकार प्राचीन काल में दो शास्त्रों को एक माना जाता था, परन्तु 19वीं शताब्दी में एडम स्मिथ ने आर्थिक क्षेत्र में राज्य के हस्तक्षेप को अनुचित बताया। एडम स्मिथ पहला विद्वान् था जिसने अर्थशास्त्र को राजनीति शास्त्र से अलग किया। 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया। अर्थशास्त्र का सम्बन्ध सम्पत्ति के उत्पादन, उपभोग, वितरण तथा विनिमय सम्बन्धी मनुष्य की गतिविधियों से है।

यह ठीक है कि 20वीं शताब्दी के अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र विज्ञान माना गया है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में कोई सम्बन्ध नहीं। अब भी दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है और आपस में आदानप्रदान करते हैं।

अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Economics to Political Science)-वर्तमान युग में मनुष्य तथा राज्य की मुख्य समस्याएं आर्थिक हैं। इतिहास से पता चलता है कि आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। जब मनुष्य आखेट अवस्था में से गुज़र रहा था अर्थात् जब मनुष्य का पेशा शिकार करना था तब राज्य के उत्पन्न होने का प्रश्न ही नहीं होता था क्योंकि उस समय मनुष्य एक स्थान पर नहीं रहता था। जब मनुष्य ने कृषि करना आरम्भ किया, इसके साथ ही मनुष्य को एक निश्चित स्थान पर रहना पड़ा, जिससे राज्य की उत्पत्ति हुई। पहले सरकार पर बड़ेबड़े ज़मींदारों का प्रभाव होता था, परन्तु यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् सरकार पर उद्योगपतियों का प्रभाव हो गया है। आजकल हमारे देश में भी उद्योगपतियों का ही अधिक प्रभाव है।

व्यक्तिवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद मुख्यतः आर्थिक सिद्धान्त हैं परन्तु इनका अध्ययन राजनीतिशास्त्र में भी किया जाता है क्योंकि इन आर्थिक सिद्धान्तों ने राज्य के ढांचे को ही बदल दिया है। चीन में साम्यवाद है। उत्पादन के साधनों पर सरकार का पूर्ण नियन्त्रण है। सरकार की समस्त शक्तियां कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) के हाथ में ही हैं। अमेरिका में पूंजीवाद है, जिसके कारण वहां की सरकार संगठन तथा सरकार के उद्देश्य चीन की सरकार से भिन्न हैं। अतः आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के अनुसार, उत्पादन के साधनों में परिवर्तन होने पर राजनीतिक परिवर्तन होना अनिवार्य है। कार्ल मार्क्स का यह कथन सर्वथा सत्य तो नहीं है परन्तु इतना अवश्य स्वीकार करना पड़ेगा कि आर्थिक परिवर्तन ही राजनीतिक परिवर्तन का मुख्य कारण भी होता है।

राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं। 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रान्तियां हुई हैं उनके परिणामस्वरूप ही यूरोप के इन देशों में उपनिवेशवाद और समाजवाद की नीति अपनाई। इस सम्बन्ध में बिस्मार्क और जोज़फ चैम्बरलेन के कथन महत्त्वपूर्ण हैं। बिस्मार्क का कथन था, “मुझे यूरोप के बाहर नए राज्यों की नहीं, बल्कि व्यापारिक केन्द्रों की आवश्यकता है।” (“I want outside Europe…not provinces but commerical enterprises.”)

राजनीतिक क्षेत्र की अनेक मत्त्वपूर्ण घटनाएं आर्थिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप ही घटित हुई हैं। भारत में आज लोकतन्त्र को इतनी सफलता नहीं मिली जितनी कि अमेरिका तथा इंग्लैंड में प्राप्त हुई है। भारत में सफलता न मिलने का मुख्य कारण लोगों की आर्थिक दशा है। भारत की अधिकांश जनता ग़रीब है, अधिकारों तथा कर्तव्यों का स्वतन्त्रतापूर्वक प्रयोग नहीं कर पाती। लोगों के वोट खरीद लिए जाते हैं। दूसरे विश्व-युद्ध के पश्चात् बहुत से देशों को अमेरिका से आर्थिक सहायता लेनी पड़ी जिसका परिणाम यह हुआ कि उन देशों की नीतियों पर भी अमेरिका का प्रभाव पड़ा।

अर्थशास्त्र को राजनीति विज्ञान की देन (Contribution of Political Science to Economics)-अर्थशास्त्र के अध्ययन में राजनीति विज्ञान से भी बहुत सहायता मिलती है। राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन-व्यवस्था यदि दृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। आर्थिक दशाओं का ही नहीं सरकार की नीतियों का भी आर्थिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। सरकार की कर नीति, आयात-निर्यात नीति, विनिमय की दर, बैंक नीति, व्यापार तथा उद्योग सम्बन्धी कानून, सीमा शुल्क नीति आदि का राज्य की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। सरकार पूंजीवाद तथा साम्यवाद को अपना कर देश की आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है। भारत सरकार ने पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं हैं ताकि लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा किया जा सके। सरकार बड़े-बड़े उद्योगों को अपने हाथों में ले रही है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया है जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ा।

युद्ध एक सैनिक और राजनीतिक क्रिया है परन्तु इसका देश की अर्थव्यवस्था पर भारी प्रभाव पड़ता है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति में गिरावट होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण वियतनाम युद्ध रहा है। इसी प्रकार 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 तथा 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों ने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित किया है।

अतः इस विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। एक का अस्तित्व दूसरे के अस्तित्व पर निर्भर करता है।

अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में समानताएं (Points of Similarity between Economics and Political Science) अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में निम्नलिखित समानताएं पाई जाती हैं-

  • दोनों का विषय समाज में रह रहा मनुष्य है-समाज में रह रहा मनुष्य दोनों शास्त्रों का विषय है। दोनों का उद्देश्य मानव कल्याण है और उसी के लिए दोनों कार्य करते हैं।
  • दोनों ही आदर्शात्मक सामाजिक विज्ञान हैं-दोनों ही भूतकाल के आधार पर वर्तमान का विश्लेषण करके भविष्य के लिए आदर्श प्रस्तुत करते हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में मानव जीवन के लिए ऐसे आदर्श स्थापित करते हैं जिनके द्वारा अधिक-से-अधिक मानव हित हो।
  • दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं- राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित हैं।

दोनों में अन्तर (Difference between the two) राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार है

1. विभिन्न विषय-क्षेत्र (Different Subject Matter) राजनीति विज्ञान मनुष्य की राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन करता है और इस विज्ञान का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। परन्तु अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है। मनुष्य धन कैसे कमाता है, कैसे उसका उपयोग करता है इत्यादि प्रश्नों का उत्तर अर्थशास्त्र देता है। इस प्रकार दोनों का विषय-क्षेत्र अलग-अलग है।

2. दृष्टिकोण (Approach)—मिस्टर ब्राऊन (Mr. Brown) ने राजनीति विज्ञान तथा अर्थशास्त्र में भेद करते हुए लिखा है, “अर्थशास्त्र का सम्बन्ध वस्तुओं से है जबकि राजनीति विज्ञान का मनुष्यों से। अर्थशास्त्र वस्तुओं की कीमतों का अध्ययन करता है और राजनीति विज्ञान सदाचार सम्बन्धी मूल्यों का।” इस प्रकार अर्थशास्त्र व्याख्यात्मक विज्ञान है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक विज्ञान है।

3. अध्ययन पद्धति (Method of Study)—दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि दोनों तथा अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीति विज्ञान के अध्ययन के अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है और इसके निष्कर्ष और सिद्धान्त अधिक सही होते हैं। इसका कारण यह है कि अर्थशास्त्र का सम्बन्ध मनुष्य की आर्थिक आवश्यकताओं से है और इन आवश्यकताओं तथा इनकी पूर्ति का उल्लेख अंकों द्वारा दर्शाया जा सकता है। अर्थशास्त्र में मात्रात्मक आंकड़ों का संग्रह राजनीति विज्ञान की अपेक्षा अधिक सम्भव है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में भिन्नता होने के बावजूद भी यह कहा जा सकता है कि वर्तमान युग में दोनों ही अपने उद्देश्यों की प्राप्ति एक-दूसरे के सहयोग और सहायता के बिना नहीं कर सकते। डॉ० गार्नर (Dr. Garner) ने ठीक ही कहा है, “बहुत-सी आर्थिक समस्याओं का हल राजनीतिक आर्थिक हालतों से आरम्भ होता है।” विलियम एसलिंगर (William Esslinger) के विचारानुसार, “अर्थशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र की एकता का पाठ्यक्रम उपकक्षा में पढ़ाया जाना चाहिए।”

प्रश्न 4.
राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relations between Political Science and Sociology.)
उत्तर-
राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र मनुष्य के सामाजिक जीवन का शास्त्र है। समाज- शास्त्र समाज की उत्पत्ति, विकास, उद्देश्य तथा संगठन का अध्ययन करता है। समाजशास्त्र में मानव जीवन के सभी पहलुओं राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक इत्यादि का अध्ययन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में मानव जीवन के राजनीतिक पहलू का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र की एक शाखा है। प्रसिद्ध विद्वान् रेटजनहाफर ने ठीक ही कहा है, “राज्य अपने विकास के प्रारम्भिक चरणों में एक सामाजिक संस्था ही थी।” हम आगस्ट काम्टे (August Comte) के इस कथन से सहमत हैं, “समाजशास्त्र सभी समाजशास्त्रों की जननी है।” राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र परस्पर बहुत कुछ आदान-प्रदान करते हैं। प्रो० कैटलिन (Catline) ने तो यहां तक कहा है, “राजनीति और समाजशास्त्र अखण्ड हैं और वास्तव में एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं।”

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

राजनीति विज्ञान को समाजशास्त्र की देन (Contribution of Sociology to Political Science) समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। बिना समाजशास्त्र के अध्ययन के राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों को समझना कठिन है। प्रो० गिडिंग्स (Prof. Giddings) ने ठीक ही कहा है, “समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनभिज्ञ लोगों को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना उसी प्रकार है जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति को खगोल विज्ञान अथवा ऊष्मा गति की शिक्षा देना।” (“To teach the theory of the state to men who have not learned the first principles of sciology is like teaching Astronomy or Thermodynamics to men who have not learned Newton’s Laws of Motion.”) दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों को न जानने वाले व्यक्ति को खगोल विज्ञान की शिक्षा देना व्यर्थ है उसी प्रकार बिना समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनजान व्यक्ति को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना व्यर्थ है। समाजशास्त्रों में समाज के रीति-रिवाजों का अध्ययन किया जाता है। हम जानते हैं कि राज्य के कानून का पालन तभी किया जाता है यदि वह समाज के रीति-रिवाजों के अनुसार हो।

राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाज शास्त्र की बहुत देन है। समाजशास्त्र से पता चलता है कि राज्य मानव की सामाजिक भावना का परिणाम है। समाज के विकास के स्तर के साथसाथ राज्य का विकास हुआ है। राजनीतिक समाजशास्त्र (Political Sociology) राजनीति विज्ञान की एक शाखा पनप रही है, जो इस बात की स्पष्ट सूचक है कि राजनीतिक तथ्यों के विधिवत अध्ययन के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेना आवश्यक है। इस प्रकार समाज शास्त्र का राजनीति शास्त्र पर बहुत प्रभाव पड़ा है।

राजनीति विज्ञान की समाजशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Sociology)-परन्तु दूसरी ओर राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय राज्य हैराज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, राज्य क्या है, राज्य का विकास कैसे हुआ, राज्य का उद्देश्य क्या है इन सब प्रश्नों का उत्तर राजनीति विज्ञान में मिलता है। समाजशास्त्र को राज्य से सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी राजनीति शास्त्र से मिलती है। राजनीति विज्ञान समाजशास्त्र का एक अंग है जिसके बिना समाजशास्त्र की विषय सामग्री पूर्ण नहीं हो सकती।

राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के आपसी सम्बन्ध का एक प्रणाम यह है कि मॉरिस, गिन्सबर्ग, आगस्त काम्टे, लेस्टर वार्ड, समवर आदि समाजशास्त्रियों ने राज्य की प्रकृति और उद्देश्यों में इतनी रुचि दिखाई है, मानो वे समाजशास्त्र की मुख्य समस्याएं हों। इसी प्रकार डेविड ईस्टन, हैरल्ड लासवैल, ग्रेवीज ए० ऑल्मण्ड, पावेल, कोलमेन, मेक्स वेबर और राजनीति शास्त्र के अन्य आधुनिक विद्वानों द्वारा समाज शास्त्र से अधिक-से-अधिक मात्रा में अध्ययन सामग्री और अध्ययन पद्धतियां प्राप्त की गई हैं।

दोनों में अन्तर (Differences between the two) राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी दोनों में अन्तर है-

  • दोनों के क्षेत्र अलग हैं-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र के क्षेत्र एक-दूसरे से पृथक् हैं। राजनीतिक शास्त्र का मुख्य विषय-क्षेत्र राज्य है जबकि समाजशास्त्र का मुख्य क्षेत्र समाज है।
  • राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र से संकुचित है-राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र के क्षेत्र से संकुचित है। राजनीति शास्त्र मनुष्य के राजनीतिक पहलू का ही अध्ययन कराता है जबकि समाजशास्त्र मनुष्य के सभी पहलुओं का अध्ययन कराता है।
  • राजनीति विज्ञान यह मानकर चलता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसमें हम यह अध्ययन नहीं करते कि मनुष्य सामाजिक प्राणी क्यों है। परन्तु समाजशास्त्र में इस प्रश्न का भी अध्ययन किया जाता है।
  • समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान से पहले बना–राजनीति शास्त्र में समाज बनने से पूर्व के मानव का अध्ययन नहीं किया जाता जबकि समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन वहीं से शुरू होता है। समाजशास्त्र के अन्तर्गत मानव जाति के दोनों युगों-संगठित तथा असंगठित-का अध्ययन किया जाता है, परन्तु राजनीति शास्त्र केवल संगठित युग का अध्ययन करता है।
  • समाजशास्त्र केवल भूत और वर्तमान से सम्बन्धित है परन्तु राजनीति विज्ञान भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का भी अध्ययन किया जाता है जबकि समाज शास्त्र में समाज के अतीत तथा वर्तमान का ही अध्ययन किया जाता है।
  • समाजशास्त्र वर्णनात्मक है जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक है-समाजशास्त्र समाज की उत्पत्ति तथा विकास का विस्तृत रूप से अध्ययन करता है, परन्तु इस अध्ययन के पश्चात् कोई परिणाम नहीं निकलता। यह केवल सामाजिक घटनाओं का वर्णन करता है। उन घटनाओं में अच्छी तथा बुरी घटनाओं की पहचान नहीं कराता। राजनति शास्त्र केवल घटनाओं का वर्णन ही नहीं करता बल्कि परिणाम भी निकालता है, क्योंकि राजनीति विज्ञान का उद्देश्य एक आदर्श राज्य की स्थापना करना तथा आदर्श नागरिक पैदा करना है।
  • समाजशास्त्र में मनुष्य के चेतन (conscious) और अचेतन (unconscious) दोनों प्रकार के कार्यों का अध्ययन किया जाता है परन्तु राजनीति विज्ञान में केवल चेतन प्रकार के कार्यों का ही अध्ययन किया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति विज्ञान तथा समाजशास्त्र में अन्तर होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध न होकर पूरक हैं। राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। दोनों एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं।

प्रश्न 5.
राजनीति विज्ञान तथा नीतिशास्त्र में सम्बन्ध बताएं।
(Discuss the relations between Political Science and Ethics.)
उत्तर-
राजनीति विज्ञान तथा नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध है। नीतिशास्त्र साधारण मनुष्य की भाषा में वह शास्त्र है, जो अच्छे-बुरे में अन्तर स्पष्ट करता है। नीतिशास्त्र वह शास्त्र है जिसके द्वारा धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, अहिंसा-हिंसा, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य तथा शुभ-अशुभ में अन्तर का पता चलता है। डीवी (Deewey) के अनुसार, “नीतिशास्त्र आचरण का वह विज्ञान है जिसमें मानवीय आचरण के औचित्य तथा अनौचित्य तथा अच्छाई तथा बुराई पर विचार किया जाता है।” नीतिशास्त्र के द्वारा हम निश्चित करते हैं कि मनुष्य का कौन-सा कार्य अच्छा है और कौनसा कार्य बुरा । यह शास्त्र नागरिकको आदर्श नागरिक बनाने में सहायक है। दूसरी ओर राज्य का मुख्य उद्देश्य भी आदर्श नागरिक बनाना है। इस प्रकार दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन यूनानी लेखकों प्लेटो तथा अरस्तु ने राजनीति शास्त्र को नीतिशास्त्र का ही एक अंग माना है। प्लेटो तथा अरस्तु के अनुसार, “राज्य एक सर्वोच्च नैतिक संस्था है। इसका उद्देश्य नागरिकों के नैतिक स्तर को ऊंचा करना है।” प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक’ (Republic) में राजनीति ही नहीं बल्कि नैतिक दर्शन भी भरा हुआ है। अरस्तु ने कहा था “राज्य जीवन को सम्भव बनाने के लिए उत्पन्न हुआ, परन्तु अब वह जीवन को अच्छा बनाने के लिए विद्यमान है।”

इटली के विद्वान् मैक्यावली ने सर्वप्रथम राजनीति तथा नीतिशास्त्र में भेद किया। इसके अनुसार राजा के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह नैतिकता के नियमों के अनुसार शासन चलाए। आवश्यकता पड़ने पर अनैतिकता का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। मैक्यावली के अनुसार-राजा के सामने सबसे बड़ा उद्देश्य राज्य की सुरक्षा है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य की परवाह नहीं करनी चाहिए। हाब्स (Hobbes) ने भी मैक्यावली के विचारों का समर्थन किया। बोदीन (Bodin), ग्रोशियस (Grotius) तथा लॉक (Locke) ने भी इन दोनों शास्त्रों को अलग किया, परन्तु रूसो (Rouseau) ने फिर इन दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया। कांट (Kant), ग्रीन (Green) ने भी रूसो के मत का समर्थन किया।

नीतिशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन (Contribution of Ethics to Political Science)-वर्तमान समय में इन दोनों शास्त्रों में गहरा सम्बन्धा समझा जाता है। महात्मा गांधी ने दोनों शास्त्रों को अभिन्न माना है। उनके अनुसारसरकार को अपनी नीति नैतिकता के सिद्धान्तों पर बनानी चाहिए। सरकार की नीतियों में असत्य, अधर्म, कपट तथा पाप इत्यादि की मिलावट नहीं होनी चाहिए। कॉक्स के मतानुसार, “जो बात नैतिक दृष्टि से गलत है, वह राजनीतिक दृष्टि से सही नहीं हो सकती।” कोई भी सरकार ऐसे कानून पास नहीं कर सकती जो नैतिकता के विरुद्ध हों। यदि पास किए जाएंगे तो उनका विरोध होगा। इसके अतिरिक्त नैतिक नियम जो स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं, कानून का रूप धारण कर लेते हैं। गैटेल (Gettell) ने लिखा है, “जब नैतिक विचार स्थायी और प्रचलित हो जाते हैं तो वे कानून का रूप ले लेते हैं।” लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने ठीक ही कहा है, “समस्या यह नहीं है कि सरकार क्या करती है बल्कि यह है कि उन्हें क्या करना चाहिए।” यदि राजनीति विज्ञान को नीतिशास्त्र से पृथक् कर दें तो यह निस्सार और निरर्थक हो जाएगी। उसमें प्रगतिशीलता और आदर्शता नहीं रह पाएगी। इसलिए लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) ने भी कहा है, “नीतिशास्त्र के अध्ययन के बिना राजनीति शास्त्र का अध्ययन विफल है।” इसके अतिरिक्त राजनीति विज्ञान की अनेक शाखाएं आचार शास्त्र की नींव पर खड़ी हैं, जैसे अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्पूर्ण शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता पर आधारित है। आचार शास्त्र से संविधान भी प्रभावित होता है क्योंकि अनेक प्रकार के आदर्शों को संविधान में उचित स्थान देना अनिवार्य है। भारत और आयरलैंड के संविधान में हमें दिए गए राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व’ ही स्पष्ट उदाहरण है।

राजनीति विज्ञान की नीतिशास्त्र को देन (Contribution of Political Science to Ethics)—वर्तमान राज्य कल्याणकारी राज्य है। सरकार लोगों के नैतिक स्तर को ऊंचा करने के लिए कई प्रकार के कानून बनाती है। इसके साथ ही सरकार सामाजिक बुराइयों को दूर करती है। भारत सरकार ने सती-प्रथा, दहेज-प्रथा, छुआछूत आदि बुराइयों को कानून के द्वारा रोकने का प्रयत्न किया है और काफ़ी सफलता भी मिली है। भारत सरकार अहिंसा के सिद्धान्तों पर चल रही है और इन्हीं सिद्धान्तों का प्रचार कर रही है। भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील की स्थापना की थी ताकि संसार के दूसरे देशों में भी अहिंसा का प्रचार किया जा सके। सरकार राज्य में शान्ति की स्थापना करती है और नैतिकता शान्ति के वातावरण में ही विकसित हो सकती है। यदि राज्य शान्ति का वातावरण उत्पन्न न करे, तो नैतिक जीवन बिताना असम्भव हो जाएगा। इस प्रकार सरकार कानून द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न करती है जिसमें नैतिकता विकसित हो सके। क्रोशे के मतानुसार, “नैतिकता अपनी पूर्णता और उच्चतम स्पष्टता राजनीति में ही पाती है।”

दोनों में अन्तर (Difference between the two)-राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी उन दोनों में अन्तर है, जो इस प्रकार हैं-

  • नीतिशास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित रहता है जब कि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से सम्बन्ध रखता है। नीतिशास्त्र मनुष्य के आन्तरिक तथा बाहरी दोनों कार्यों से सम्बन्धित है, परन्तु राजनीति विज्ञान मनुष्य के केवल बाहरी कार्यों से सम्बन्धित है।
  • राज्य के नियमों का पालन करवाने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि सरकार के किसी कानून का उल्लंघन कोई मनुष्य करता है तो उसे न्यायालय द्वारा दण्ड दिया जाता है, परन्तु नीतिशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड नहीं दिया जाता क्योंकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना अपराध नहीं केवल पाप है।
  • राजनीति विज्ञान मुख्यतः वर्णनात्मक है क्योंकि इसमें राज्य, सरकार की शक्तियां, संविधान इत्यादि का वर्णन करता है जबकि नीतिशास्त्र मुख्यतः आदर्शात्मक है और यह विषय जनता के सामने कुछ आदर्श रखे हुए हैं।
  • राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक सिद्धान्तों से है जबकि नीतिशास्त्र का सम्बन्ध केवल सिद्धान्तों से है। नीतिशास्त्र वास्तविकता से बहुत दूर है। यह केवल काल्पनिक है।
  • राज्य के नियमों तथा नैतिकता के नियमों में सदैव एकरूपता नहीं होती। सड़क के दाईं ओर चलना राज्य के नियम के विरुद्ध है, परन्तु नैतिकता के विरुद्ध नहीं।
  • राजनीति विज्ञान में हम राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करते हैं, परन्तु इस शास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इस बात से है कि वे क्या हैं परन्तु नीतिशास्त्र का मुख्य सम्बन्ध इससे है कि वे क्या होने चाहिएं।
    राजनीति विज्ञान और नीतिशास्त्र के सम्बन्ध और अन्तर दोनों को स्पष्ट करते हुए कैटलिन ने कहा, “नीतिशास्त्र से एक राजनीतिज्ञ यह सीखता है कि अनेक मार्गों में से कौन-सा मार्ग सही है और राजनीति विज्ञान बतलाता है कि व्यावहारिक दृष्टि से कौन-सा मार्ग अपनाना सम्भव होगा।”

निष्कर्ष (Conclusion)-नीतिशास्त्र और राजनीति विज्ञान में भले ही कई भिन्नताएं हैं, फिर भी इनकी समीपता से इन्कार नहीं किया जा सकता। नीतिशास्त्र राजनीति विज्ञान के अध्ययन को समृद्ध बनाता है और व्यावहारिक राजनीति को उदात्त बनाने (To ennoble) के लिए प्रेरित करता है। आजकल की व्यावहारिक राजनीति में भ्रष्टाचार के उदाहरण सर्वप्रसिद्ध हैं और इन भ्रष्टाचारी तरीकों ने समाज के हर पक्ष को दूषित कर दिया है। इस भ्रष्टाचार से बचने के साधन नीतिशास्त्र ही सुझा सकता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 2 राजनीति विज्ञान का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र, इतिहास के ऊपर निर्भर है ? वर्णन करें।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र और इतिहास में घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजनीति शास्त्र में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए राजनीति शास्त्र को इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है। निःसन्देह राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। भारत के इतिहास से हमें पता चलता है कि वही शासक सफल रहेगा जो धर्म-निरपेक्ष हो। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया। इतिहास राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास की उपेक्षा करने से राजनीति शास्त्र का अध्ययन केवल काल्पनिक और सैद्धान्तिक ही होगा।

प्रश्न 2.
राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाजशास्त्र की बहुत बड़ी देन है।
राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है। समाजशास्त्र को राज्य से सम्बन्धित प्रत्येक जानकारी राजनीति शास्त्र से मिलती है। राजनीति शास्त्र समाजशास्त्र का एक अंग है जिसके बिना समाजशास्त्र की विषय सामग्री पूर्ण नहीं हो सकती।

प्रश्न 3.
राजनीति शास्त्र का अर्थशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-
प्राचीनकाल में अर्थशास्त्र ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ के नाम से प्रसिद्ध था। 20वीं शताब्दी में अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया। इतिहास से पता चलता है कि आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना अनिवार्य है। राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं।

राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। शासन व्यवस्था यदि सुदृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। सरकार पूंजीवाद तथा साम्यवाद को अपनाकर देश की आर्थिक व्यवस्था को बदल सकती है। निःसन्देह राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।

प्रश्न 4.
इतिहास, राजनीति शास्त्र के ऊपर कैसे निर्भर है ?
उत्तर-
इतिहास, राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ प्राप्त करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाएगा। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद, व्यक्तिवाद जैसी धाराओं की चर्चा के बिना 17वीं शताब्दी का इतिहास अधूरा है। भारत के 20वीं शताब्दी के इतिहास से यदि कांग्रेस पार्टी का महत्त्व, असहयोग आन्दोलन, स्वराज्य दल, भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स योजना, कैबिनेट मिशन योजना, भारत का विभाजन, चीन तथा पाकिस्तान द्वारा आक्रमण आदि राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो भारत का इतिहास महत्त्वहीन रह जाएगा। राजनीति की इतिहास को महत्त्वपूर्ण देन यह है कि राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं। रूसो और माण्टेस्क्यू के विचारों का फ्रांस की राज्य क्रान्ति पर, कार्ल मार्क्स के विचारों का रूस की राज्य क्रान्ति पर तथा महात्मा गांधी के विचारों का भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 5.
राजनीति शास्त्र को इतिहास की देन का वर्णन करें।
उत्तर-
राजनीति विज्ञान में राज्य तथा अन्य संस्थाओं के अतीत के अध्ययन के लिए हमें इतिहास पर निर्भर रहना पड़ता है। राजनीतिक संस्थाओं को समझने के लिए उनके अतीत को जानना आवश्यक होता है और इतिहास से ही उनके अतीत को जाना जा सकता है। राजनीति विज्ञान की प्रयोगशाला अथवा पथ-प्रदर्शक इतिहास है। मानवीय इतिहास के विभिन्न समयों पर राजनीतिक क्षेत्र में अनेक कार्य किए गए, जिनके परिणाम और सफलता-असफलता का पता इतिहास से ही लगता है। राजनीतिक क्षेत्र के ये प्रयोग एक भूतकालीन प्रयोग के समान ही होते हैं और ये भूतकालीन प्रयोग भविष्य के लिए मार्ग बताने का कार्य करते हैं। इतिहास के ज्ञान का पूरा लाभ उठाते हुए ही संविधान निर्माताओं ने भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाया है। इतिहास, राजनीति विज्ञान का शिक्षक है। इतिहास मनुष्य की सफलताओं एवं विफलताओं का संग्रह है। अतीत में मानव ने क्या-क्या भूलें कीं, किस नीति को अपनाने से अच्छा व बुरा परिणाम निकला आदि बातों का ज्ञानदाता इतिहास ही है। इतिहास द्वारा बताई गई भूलों के आधार पर राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन करते हैं।

प्रश्न 6.
राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में कोई चार अन्तर बताएं।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र तथा इतिहास में घनिष्ठता होते हुए भी निम्नलिखित अन्तर पाए जाते हैं-

  • इतिहास का क्षेत्र राजनीति विज्ञान से अधिक व्यापक है-इतिहास की विषय-वस्तु का क्षेत्र राजनीति शास्त्र की अपेक्षा अधिक व्यापक है। जब हम 19वीं शताब्दी का इतिहास पढ़ते हैं तो इसमें उस समय की सभी धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक घटनाओं का वर्णन होता है, परन्तु राजनीति शास्त्र केवल राजनीति घटनाओं से सम्बन्धित है।
  • राजनीति शास्त्र भूत, वर्तमान तथा भविष्य से सम्बन्धित है जबकि इतिहास केवल भूतकाल से सम्बन्धित है-राजनीति शास्त्र में राज्य के भूतकाल के अलावा उसके वर्तमान तथा भविष्य का भी अध्ययन किया जाता है जबकि इतिहास में केवल बीती घटनाओं का वर्णन होता है।
  • इतिहास वर्णनात्मक है, जबकि राजनीति शास्त्र विचारशील है-इतिहास में केवल घटनाओं का वर्णन किया जाता है जबकि राजनीति शास्त्र में घटनाओं के वर्णन के साथ-साथ उनका मूल्यांकन करके निश्चित परिणाम निकाले जाते हैं।
  • इतिहास नैतिक निर्णय नहीं देता, परन्तु राजनीति विज्ञान में विद्वानों के लिए नौतिक निर्णय देना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
अथशास्त्र की राजनीति शास्त्र को देन बताइए।
उत्तर-
आर्थिक समस्याएं मनुष्य की राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करती हैं। राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक समस्याओं का ही परिणाम है। व्यक्तिवाद, समाजवाद, पूंजीवाद तथा साम्यवाद मुख्यतः आर्थिक सिद्धान्त है परन्तु इनका अध्ययन राजनीति शास्त्र में किया जाता है क्योंकि इन सिद्धान्तों ने राज्य के ढांचे को ही बदल दिया है। आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना स्वाभाविक ही है। राजनीतिक परिवर्तनों का मुख्य कारण आर्थिक परिवर्तन होते हैं। राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं। 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में जो औद्योगिक क्रान्तियां हुईं, उनके परिणामस्वरूप ही उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की नीतियां अपनाई गईं। राजनीतिक क्षेत्र की अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाएं, आर्थिक गतिविधियों के फलस्वरूप ही घटित हुई हैं। भारत में लोकतन्त्र को अमेरिका और इंग्लैंड के समान सफलता न मिलने का मुख्य कारण इसकी आर्थिक दशा है।

प्रश्न 8.
राजनीति शास्त्र की अर्थशास्त्र को देन का वर्णन करें।
उत्तर-
अर्थशास्त्र के अध्ययन में राजनीति शास्त्र से भी बहुत सहायक मिलती है। राजनीतिक संगठन का देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत प्रभाव पड़ता है। शासन व्यवस्था यदि दृढ़ व शक्तिशाली है तो देश की आर्थिक दशा अच्छी होगी। आर्थिक दशाओं का ही नहीं सरकार की नीतियों का भी देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सरकार पूंजीवाद और साम्यवाद जैसी नीतियों को अपनाकर देश की अर्थव्यवस्था को बदल सकती है। सरकार द्वारा बड़े-बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किए जाने से देश की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। युद्ध बेशक एक सैनिक और राजनीतिक प्रक्रिया है परन्तु इसका देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 9.
राजनीति शास्त्र तथा अर्थशास्त्र में अन्तर बताएं।
उत्तर-
अर्थशास्त्र तथा राजनीति शास्त्र में गहरा सम्बन्ध होते हुए भी निम्नलिखित अन्तर हैं

  • विभिन्न विषय क्षेत्र-राजनीति विज्ञान मनुष्य की राजनीतिक समस्याओं का अध्ययन करता है और इसका मुख्य विषय राज्य तथा सरकार हैं परन्तु अर्थशास्त्र मनुष्य की आर्थिक समस्याओं का अध्ययन करता है। इस प्रकार दोनों का विषय क्षेत्र अलग-अलग है।
  • दृष्टिकोण-राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण में भी अन्तर पाया जाता है। अर्थशास्त्र व्याख्यात्मक विज्ञान है जबकि राजनीति शास्त्र मुख्यतः आदर्शात्मक विज्ञान है।
  • अध्ययन पद्धति में अन्तर-दोनों में एक महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है कि दोनों की अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र का अध्ययन राजनीति शास्त्र की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
समाजशास्त्र की राजनीति विज्ञान को देन का वर्णन करें।
उत्तर-
समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का कार्य करता है। बिना समाजशास्त्र के सिद्धान्तों को समझे राजनीति शास्त्र के नियमों को समझना अति कठिन है। दूसरे शब्दों में जिस प्रकार न्यूटन के गति नियमों से अनभिज्ञ व्यक्ति को खगोल विज्ञान की शिक्षा देना व्यर्थ है उसी प्रकार समाजशास्त्र के मूल सिद्धान्तों से अनभिज्ञ व्यक्ति को राज्य के सिद्धान्त पढ़ाना व्यर्थ है। राज्य के अधिकतर कानून समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत प्रणाली आदि समझने में समाजशास्त्र की बहुत देन है। समाजशास्त्र से पता चलता है कि राज्य मनुष्य की सामाजिक भावना का परिणाम है। समाज के विकास के स्तर के साथ-साथ राज्य का विकास हुआ है। राजनीतिक समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान की एक शाखा है, जो इस बात की स्पष्ट सूचक है कि राजनीतिक तथ्यों के विधिवत् एवं पूर्ण अध्ययन के लिए समाजशास्त्र की सहायता लेना बहुत आवश्यक है। इस प्रकार समाजशास्त्र राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 11.
राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में किन्हीं चार अन्तरों का वर्णन करें।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र में निम्नलिखित मुख्य अन्तर पाए जाते हैं-

  1. दोनों के विषय क्षेत्र अलग-अलग हैं-राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र दोनों के विषय क्षेत्र एक-दूसरे से पृथक् हैं। राजनीति विज्ञान का मुख्य विषय क्षेत्र राज्य है जबकि समाजशास्त्र समाज से सम्बन्धित है।
  2. समाजशास्त्र का क्षेत्र राजनीति शास्त्र की अपेक्षा व्यापक है-समाजशास्त्र का क्षेत्र राजनीति शास्त्र की अपेक्षा अधिक व्यापक है। राजनीति शास्त्र मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू का ही अध्ययन करता है परन्तु समाजशास्त्र में मानव जीवन के सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है।
  3. समाजशास्त्र की उत्पत्ति राजनीति शास्त्र से पहले हुई-राजनीति शास्त्र में राज्य बनने से पूर्व के मानव का अध्ययन नहीं किया जाता परन्तु समाजशास्त्र के विषय का अध्ययन मानव की उत्पत्ति से शुरू होता है।
  4. समाजशास्त्र वर्णनात्मक है, जबकि राजनीति शास्त्र आदर्शात्मक है।

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प्रश्न 12.
नीतिशास्त्र की राजनीति शास्त्र को चार देनों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. सरकार नैतिकता के सिद्धान्तों के अनुसार कानून बनाती है। कोई भी सरकार नैतिकता के विरुद्ध कानून नहीं बना सकती।
  2. जब राजनीति शास्त्र में हम यह निर्णय करते हैं कि राज्य कैसा होना चाहिए तब नीति शास्त्र हमारी बहुत सहायता करता है।
  3. नैतिक नियम जो स्थायी और लोकप्रिय हो जाते हैं, कुछ समय कानून का रूप धारण कर लेते हैं।
  4. नीति शास्त्र राजनीति शास्त्र को प्रगतिशीलता और आदर्शता प्रदान करती है।

प्रश्न 13.
नीतिशास्त्र किस प्रकार राजनीति शास्त्र से भिन्न है ? चार अन्तर बताइये।
उत्तर-
नीतिशास्त्र अग्रलिखित प्रकार से राजनीति शास्त्र से भिन्न है-

  • नीतिशास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित है जबकि राजनीति शास्त्र मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से सम्बन्धित है। नीति मनुष्य के आन्तरिक तथा बाहरी दोनों कार्यों से सम्बन्धित है परन्तु राजनीति विज्ञान केवल मनुष्य के बाहरी कार्यों से सम्बन्धित है।
  • राज्य के नियमों का पालन करवाने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाता है। यदि कोई मनुष्य सरकार के किसी कानून का उल्लंघन करता है तो उसे न्यायालय द्वारा दण्ड दिया जाता है, परन्तु नीतिशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने पर कोई दण्ड नहीं दिया जाता क्योंकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना अपराध नहीं केवल पाप है।
  • राजनीति शास्त्र मुख्यतः वर्णनात्मक है क्योंकि इसमें राज्य, सरकार की शक्तियां, संविधान आदि का वर्णन रहता है, जबकि नीतिशास्त्र मुख्यत: आदर्शात्मक है और यह विषय जनता के सामने कुछ आदर्श रखे हुए हैं।
  • राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक सिद्धान्तों से है, जबकि नीतिशास्त्र का सम्बन्ध केवल सिद्धान्तों से है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र का समाजशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र तथा समाजशास्त्र में घनिष्ठ सम्बन्ध है। समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है और इसके नियम राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों को समझने के लिए बहुत सहायक हैं। राज्य की उत्पत्ति, राज्य का विकास, जनमत, दल प्रणाली आदि समझने में समाजशास्त्र की बहुत बड़ी देन है।

प्रश्न 2.
राजनीति शास्त्र का अर्थशास्त्र से सम्बन्ध बताओ।
उत्तर-
राजनीतिक संस्थाओं का उदय व विकास आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम है। आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन आने पर राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तन होना अनिवार्य है। राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं।
शासन व्यवस्था यदि सुदृढ़ और शक्तिशाली है तो वहां की जनता की आर्थिक दशा अच्छी होगी। निःसन्देह राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं।

प्रश्न 3.
इतिहास, राजनीति शास्त्र के ऊपर कैसे निर्भर है ?
उत्तर-
इतिहास, राजनीति शास्त्र के अध्ययन से बहुत कुछ प्राप्त करता है। आज की राजनीति कल का इतिहास है। यदि इतिहास की घटनाओं से राजनीतिक घटनाओं को निकाल दिया जाए तो इतिहास केवल घटनाओं का संग्रह रह जाएगा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. राजनीति शास्त्र को इतिहास की किसी एक देन का वर्णन करें।
उत्तर- इतिहास द्वारा बतलाई गई भूलों के आधार पर ही राजनीतिज्ञ भविष्य में त्रुटियों में संशोधन लाते हैं।

प्रश्न 2. इतिहास को राजनीति शास्त्र की किसी एक देन का वर्णन करें।
उत्तर-राजनीतिक विचारधाराएं ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म देती हैं।

प्रश्न 3. राजनीति विज्ञान एवं इतिहास में कोई एक अन्तर बताएं।
उत्तर-इतिहास का क्षेत्र राजनीतिक विज्ञान से व्यापक है।

प्रश्न 4. किस विद्वान् ने सर्वप्रथम अर्थशास्त्र को राजनीति शास्त्र से अलग किया ?
उत्तर-एडम स्मिथ ने।

प्रश्न 5. अर्थशास्त्र की राजनीति विज्ञान को किसी एक देन का वर्णन करें।
उत्तर-राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियां मुख्यतः आर्थिक अवस्थाओं का परिणाम होती हैं।

प्रश्न 6. अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में एक समानता बताएं।
उत्तर-अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान दोनों का ही विषय समाज में रह रहा मनुष्य है।

प्रश्न 7. अर्थशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-अर्थशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान की अध्ययन पद्धतियां अलग-अलग हैं।

प्रश्न 8. राजनीति विज्ञान एवं समाज शास्त्र में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-राजनीति विज्ञान का क्षेत्र समाजशास्त्र से संकुचित है।

प्रश्न 9. राजनीति विज्ञान एवं नीति शास्त्र में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-नीति शास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित है, जबकि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पहलू से संबंध रखता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. शासन व्यवस्था यदि शक्तिशाली है, तो वहां की जनता की आर्थिक दशा ………. होगी।
2. अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान, दोनों ही भूतकाल, वर्तमान और …………… से सम्बन्धित हैं।
3. ………… का सम्बन्ध वस्तुओं से है, जबकि राजनीति विज्ञान का मनुष्यों से।
4. ………… के अनुसार बहुत-सी आर्थिक सम्स्याओं का हल राजनीतिक आर्थिक हालतों से आरम्भ होता है।
5. राजनीति शास्त्र समाज शास्त्र की एक ……….. है।
उत्तर-

  1. अच्छी
  2. भविष्य
  3. अर्थशास्त्र
  4. डॉ० गार्नर
  5. शाखा।

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प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. समाज शास्त्र राजनीति विज्ञान के लिए नींव का काम करता है।
2. राजनीति शास्त्र एवं समाज शास्त्र का मुख्य विषय राज्य है।
3. समाज शास्त्र राजनीति विज्ञान से पहले बना।
4. राजनीति शास्त्र का विषय क्षेत्र समाज शास्त्र से व्यापक है।
5. समाज शास्त्र वर्णनात्मक है, जबकि राजनीति विज्ञान आदर्शात्मक है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
यह कथन किसका है कि, “राज्य जीवन को सम्भव बनाने के लिए उत्पन्न हुआ, परन्तु अब वह जीवन को अच्छा बनाने के लिए विद्यमान है।”
(क) प्लेटो
(ख) अरस्तु
(ग) हॉब्स
(घ) लॉक।
उत्तर-
(ख) अरस्तु

प्रश्न 2.
नीतिशास्त्र की राजनीति विज्ञान को क्या देन है ?
(क) जो नैतिक नियम स्थायी एवं प्रचलित होते हैं, वे कानून का रूप धारण कर लेते हैं।
(ख) नैतिकता के कारण राजनीति विज्ञान में प्रगतिशीलता एवं आदर्शता बनी रहती है।
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्पूर्ण शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता पर आधारित है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान की नैतिक शास्त्र को क्या देन है ?
(क) सरकार लोगों के नैतिक स्तर को ऊंचा करने के लिए कानून बनाती है।
(ख) सरकार सामाजिक बुराइयों को दूर करती है।
(ग) सरकार राज्य में शान्ति की स्थापना करती है और नैतिकता शान्ति के वातावरण में ही विकसित होती है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 4.
राजनीति शास्त्र एवं नीति शास्त्र में क्या अन्तर पाया जाता है ?
(क) नीति शास्त्र मनुष्य के प्रत्येक कार्य से सम्बन्धित रहता है, जबकि राजनीति विज्ञान मनुष्य के जीवन के केवल राजनीतिक पक्ष से सम्बन्धित रहता है।
(ख) राज्य के कानूनों का पालन न करने वाले को दण्ड दिया जाता है, जबकि नीतिशास्त्र के नियमों को तोड़ना केवल पाप माना जाता है।
(ग) राजनीति विज्ञान मुख्यतः वर्णात्मक है, जबकि नीति शास्त्र आदर्शात्मक है।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र के अर्थ और क्षेत्र की विवेचना कीजिए।
(Discuss the definition and scope of political science.)
अथवा
राजनीति शास्त्र की परिभाषा दें तथा इसके क्षेत्र का वर्णन करें।
(Define political science and describe its scope.)
उत्तर-
राजनीति शास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में जन्म लेता है और समाज में ही रह कर अपने जीवन का पूर्ण विकास करता है। समाज के बिना वह रह नहीं सकता। संगठित समाज में जब एक ऐसी संस्था की स्थापना हो जाए जिसके द्वारा उस समाज का शासन चलाया जा सके तथा वह समाज सत्ता सम्पन्न हो और एक निश्चित भाग पर निवास करता हो तो वह राज्य बन जाता है।

राज्य के अन्दर रहकर ही मनुष्य अपना विकास कर सकता है। राज्य की एजेंसी सरकार द्वारा राज्य की इच्छा को व्यक्त किया जाता है और वही इस इच्छा को लागू करती है। वह शास्त्र जो राज्य और सरकार की जानकारी देता है, उसे हम राजनीति शास्त्र कहते हैं।

राजनीति शास्त्र को अंग्रेज़ी में पोलिटिकल साइंस (Political Science) कहते हैं । यह शब्द पोलिटिक्स (Politics) से निकला है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द पोलिस (Polis) से हुई है जिसका अर्थ है नगर-राज्य। ग्रीक लोग नगर-राज्यों में रहते थे, इसलिए उस समय पोलिटिक्स का अर्थ नगर-राज्य के अध्ययन से होता था परन्तु आज बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना हो गई है, इसलिए अब हम इसका अर्थ राज्य के अध्ययन से लेते हैं। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ में राजनीति शास्त्र वह विषय है जो राज्य का अध्ययन करता है। राजनीति विज्ञान के अर्थ को समझने के लिए विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं का अध्ययन करना अति आवश्यक है।

राजनीति विज्ञान की परम्परागत परिभाषाएं (Traditional definitions of Political Science)-राजनीति विज्ञान की परम्परागत परिभाषाओं को हम तीन भागों में बांट सकते हैं :-

(क) उन विद्वानों की परिभाषाएं जो राजनीति शास्त्र को केवल राज्य का अध्ययन करने वाला विषय मानते हैं।
(ख) उन विद्वानों की परिभाषाएं जो राजनीति शास्त्र को केवल सरकार से सम्बन्धित विषय मानते हैं।
(ग) उन विद्वानों की परिभाषाएं जो राजनीति शास्त्र को राज्य तथा सरकार दोनों से सम्बन्धित मानते हैं।

(क) राजनीति विज्ञान राज्य से सम्बन्धित है (Political Science is concerned with the state only)कुछ विद्वानों के मतानुसार, राजनीति शास्त्र का सम्बन्ध केवल राज्य से है। ब्लंटशली (Bluntschli), प्रो० गार्नर (Prof. Garner), गैटेल (Gettell), गैरीज़ (Garies) आदि इस विचार के मुख्य समर्थक हैं :-

  • ब्लंटशली (Bluntschli) के मतानुसार, “राजनीति शास्त्र उस विज्ञान को कहा जाता है जिसका सम्बन्ध राज्य से है और जिसमें राज्य की मूल प्रकृति, उसके रूपों, विकास तथा उसकी आधारभूत स्थितियों को समझने और जानने का प्रयत्न किया जाता है।”
  • प्रो० गार्नर (Prof. Garner) के मतानुसार, “राजनीति शास्त्र का आरम्भ तथा अन्त राज्य के साथ होता है।” (“Political Science begins and ends with the State.”)
  • लॉर्ड एक्टन (Lord Acton) के शब्दों में, “राजनीति शास्त्र और राज्य उसके विकास की आवश्यक अवस्थाओं के साथ सम्बन्धित है।” (Political Science is concerned with the State and with the conditions essential for its development.)

(ख) राजनीति विज्ञान सरकार के साथ सम्बन्धित है (Political Science is concerned with the Government)-कुछ विद्वान् राजनीति विज्ञान को सरकार के अध्ययन तक सीमित मानते हैं। सीले, लीकॉक आदि विद्वान् इसी विचार के समर्थक हैं।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

1. सीले (Seeley) का कहना है कि “जिस प्रकार राजनीतिक अर्थव्यवस्था सम्पत्ति का, प्राणिशास्त्र जीवन का, बीजगणित अंकों का और रेखागणित स्थान और इकाई का अध्ययन करता है उसी प्रकार राजनीति शास्त्र शासन-प्रणाली का अध्ययन करता है।” (“Political Science investigates the phenomena of government, or Political Economy deals with wealth, Biology with life, Algebra with number and Geometry with space and magnitude.”)
2. डॉ० लीकॉक (Dr. Leacock) के अनुसार, “राजनीति शास्त्र केवल सरकार से सम्बन्धित है।” (“Political Science deals with Government only.)”.

(ग) राजनीति विज्ञान राज्य तथा सरकार से सम्बन्धित (Political Science is concerned with State and Government)-कुछ विद्वानों के विचारानुसार राजनीति विज्ञान में राज्य और सरकार दोनों का अध्ययन किया जाता है। गैटेल, गिलक्राइस्ट, पाल जैनेट तथा लॉस्की ने इसी विचार का समर्थन किया है।

  • फ्रांसीसी लेखक पाल जैनेट (Paul Janet) के अनुसार, “राजनीति शास्त्र समाज शास्त्र का वह भाग है जो राज्य के आधारों तथा सरकार के सिद्धान्तों का अध्ययन करता है।” (“Political Science is that part of Social Science which treats the foundations of the State and principles of government.”)
  • गैटेल (Gettell) के अनुसार, “राजनीति शास्त्र को राज्य का विज्ञान कहा जा सकता है। इसका सम्बन्ध उन व्यक्तियों के समुदायों से है जो राजनीतिक संगठन का निर्माण करते हैं, उनकी सरकारों के संगठन से है और सरकारों के कानून बनाने तथा लागू करने और अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों वाली गतिविधियों से है। इसके मुख्य विषय राज्य सरकार तथा कानून हैं।”
  • गिलक्राइस्ट (Gilchrist) के अनुसार, “राजनीति विज्ञान राज्य और सरकार की सामान्य समस्याओं का विवेचन करता है।” (“Political Science deals with the general problems of the State and Government.”)

राजनीति विज्ञान की आधुनिक परिभाषाएं (Modern Definitions of Political Science)-द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद राजनीति शास्त्र की परिभाषा के सम्बन्ध में एक नवीन दृष्टिकोण का उदय हुआ है, जो निश्चित रूप से अधिक व्यापक और अधिक यथार्थवादी है। व्यवहारवादी क्रान्ति ने राजनीति शास्त्र की परिभाषाओं को नया रूप दिया है। कैटलिन, लासवैस, मेरियम, राबर्ट डाहल, डेविड ईस्टन, आल्मण्ड तथा पॉवेल, मैक्स वेबर आदि राजनीति शास्त्र के आधुनिक दृष्टिकोण के प्रतिनिधि विद्वान् हैं।

  • बैन्टले (Bentley) का कहना है कि राजनीति में महत्त्वपूर्ण ‘शासन’ और उसकी संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि शासन के कार्य की प्रक्रिया है और उस पर प्रभाव डालने वाले ‘दबाव समूह’ हैं। अतः राजनीति विज्ञान शासन की प्रक्रिया और दबाव समूहों के अध्ययन का शास्त्र है।
  • लासवैल और कैपलॉन (Lasswell and Kaplan) के अनुसार, “एक आनुभाविक खोज के रूप में राजनीति विज्ञान शक्ति के निर्धारण और सहभागिता का अध्ययन है।” (“Political Science as an empirical inquiry is the study of the shaping and sharing of power.”)
  • डेविड ईस्टन (David Easton) के अनुसार, “राजनीति मूल्यों का सत्तात्मक निर्धारण है जैसा कि यह शक्ति के वितरण और प्रयोग से प्रभावित होता है।” (“Politics is the study of authoritative allocation of values, as it is influenced by the distribution and use of power.”) ईस्टन ने राजनीति शास्त्र के अध्ययन-क्षेत्र में तीन बातों-नीति, सत्ता और समाज (Policy, Authority and Society) को प्रमुख माना है।
  • आलमण्ड और पॉवेल (Almond and Powell) ने कहा है कि आधुनिक राजनीति विज्ञान में हम ‘राजनीतिक व्यवस्था’ का अध्ययन और विश्लेषण करते हैं।
    स्पष्ट है कि आधुनिक विद्वान् राजनीति शास्त्र की परिभाषा पर एक मत नहीं हैं। कोई उसे मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन का शास्त्र मानता है, कोई उसे शक्ति के अध्ययन का और कोई सत्ता के अध्ययन का। इन समस्त आधुनिक दृष्टिकोणों का समन्वय करते हुए राबर्ट डाहल (Robert Dahl) ने कहा है कि “राजनीतिक विश्लेषण का शक्ति , शासन अथवा सत्ता के सम्बन्ध है।” (“Political analysis deals with power, rule or authority.”)

आधुनिक राजनीतिक विद्वानों में कई मतभेदों के बावजूद भी इस सम्बन्ध में विचार साम्य है कि वे राजनीति शास्त्र को अब राज्य या सरकार का विज्ञान नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि राजनीति विज्ञान मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार का, शक्ति का, सत्ता का तथा मानव समूह की अन्तः क्रियाओं का विज्ञान है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति शास्त्र की परिभाषा के सम्बन्ध में अपनाया गया यह आधुनिक दृष्टिकोण भी एकांगी ही है। शक्ति राजनीति शास्त्र के विभिन्न अध्ययन विषयों में से केवल एक है, एकमात्र नहीं। अतः राजनीति शास्त्र के कुछ विद्वानों विशेषतया वी० ओ० के (V.0. Key), जे० रोलैण्ड, पिनॉक और डेविड जी० स्मिथ आदि के द्वारा इस विषय की परिभाषा के सम्बन्ध में परम्परागत और आधुनिक दृष्टिकोण में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

पिनॉक और स्मिथ (Penock and Smith) ने पूर्णतया सन्तुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए लिखा है कि, “इस प्रकार राजनीति विज्ञान किसी भी समाज में उन सभी शक्तियों, संस्थाओं तथा संगठनात्मक ढांचों से सम्बन्धित होता है जिन्हें उस समाज में सुव्यवस्था की स्थापना और उसको बनाए रखने, अपने सदस्यों के अन्य सामूहिक कार्यों के उत्पादन तथा उनके मतभेदों का समाधान करने के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और अन्तिम सत्ता माना जाता है।”

राजनीति शास्त्र का विषय क्षेत्र (Scope of Political Science)-

राजनीति शास्त्र के क्षेत्र में तीन विचारधाराएं प्रचलित हैं :

  • पहली विचारधारा के अनुसार, राजनीति शास्त्र का विषय राज्य है।
  • दूसरी विचारधारा के अनुसार, राजनीति शास्त्र का विषय-क्षेत्र सरकार के अध्ययन तक ही सीमित है।
  • तीसरी विचारधारा के अनुसार, राजनीति शास्त्र राज्य तथा सरकार का अध्ययन करता है।

कुछ विद्वानों के अनुसार राजनीति शास्त्र राज्य तथा सरकार का ही अध्ययन नहीं, बल्कि मनुष्य का भी अध्ययन करता है। प्रो० लॉस्की ने ऐसा ही मत प्रकट किया है। उन्होंने लिखा है कि “राजनीति शास्त्र के अध्ययन का सम्बन्ध संगठित राज्यों से सम्बन्धित मनुष्यों के जीवन से है।”
संयुक्त राष्ट्र शौक्षणिक, वैज्ञानिक-सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के नेतृत्व में सितम्बर, 1948 में राजनीतिक वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन हुआ जिसमें उन्होंने राजनीति शास्त्र के क्षेत्र को निम्नलिखित शीर्षकों के अधीन निश्चित किया :

  • राजनीतिक सिद्धान्त (Political Theory)—इसमें राजनीतिक सिद्धान्त और राजनीतिक विचारों के इतिहास का अध्ययन शामिल है।
  • राजनीतिक संस्थाएं (Political Institutions)—इसमें संविधान, प्रान्तीय और स्थानीय सरकार के प्रशासनिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यों का अध्ययन शामिल है।
  • राजनीतिक दल (Political Parties)—इसमें राजनीतिक दलों, समूहों, जनमत इत्यादि का अध्ययन शामिल है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध (International Relation)—इसमें अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति, अन्तर्राष्ट्रीय संगठन, अन्तर्राष्ट्रीय कानून इत्यादि शामिल हैं।

इस विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि राजनीति शास्त्र निम्नलिखित विषयों का अध्ययन करता है :

1. राज्य का अध्ययन (Study of State)-राजनीति शास्त्र राज्य का विज्ञान है और इसमें मुख्यतः राज्य का अध्ययन किया जाता है। गैटल के मतानुसार राजनीति शास्त्र राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करता है।

(क) राज्य के अतीत का अध्ययन (The State as it had been)-राज्य वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द राजनीति शास्त्र घूमता है। परन्तु राज्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए इसमें राज्य की उत्पत्ति, उसके विस्तार, राजनीतिक संस्थाओं, विचारधाराओं के बदलते हुए स्वरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ख) राज्य के वर्तमान का अध्ययन (The State as it is)-राजनीति शास्त्र राज्य के वर्तमान स्वरूप का अध्ययन भी करता है। इसमें राज्य क्या है, राज्य के तत्त्व कौन-से हैं, राज्य की प्रकृति, राज्य के उद्देश्य, राज्य के अपने नागरिकों के साथ सम्बन्ध तथा राज्य अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्या-क्या साधन प्रयोग करता है आदि का अध्ययन किया जाता है। इसके अध्ययन का सीमा क्षेत्र बहुत विस्तृत है।

(ग) राज्य के भविष्य का अध्ययन (The State as it ought to be)-राज्य का अध्ययन इसके वर्तमान रूप के अध्ययन के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इसलिए राज्य प्रगतिशील है। राज्य का लगातार विकास हो रहा है। राज्य जन-कल्याण के लिए है, इसलिए भविष्य में भी राज्य का ढांचा इस प्रकार का होना चाहिए कि जनता को अधिक-से-अधिक लाभ मिले। राज्य-शास्त्री का यह कर्त्तव्य है कि वह राज्य के अतीत तथा वर्तमान का पूर्ण ज्ञान लेकर भविष्य के लिए सुझाव दे ताकि राज्य की मशीनरी इस ढंग की हो कि जनता का अधिकसे-अधिक कल्याण हो सके। इसमें हम यह देखते हैं कि भविष्य में राज्य कैसा होना चाहिए तथा क्या एक अन्तर्राष्ट्रीय राज्य की स्थापना हो सकेगी कि नहीं।

2. सरकार का अध्ययन (Study of Government)-सरकार राज्य का अभिन्न भाग है। सरकार के बिना राज्य की स्थापना नहीं की जा सकती। सरकार राज्य की ऐसी एजेंसी है जिसके द्वारा राज्य की इच्छा को प्रकट तथा कार्यान्वित किया जाता है। राज्य के उद्देश्यों की पूर्ति सरकार द्वारा ही की जाती है। राजनीति शास्त्र में हम अध्ययन करते हैं किसरकार क्या है, इसके अंग कौन-से हैं, इसके कार्य क्या हैं तथा इसके विभिन्न रूप कौन-से हैं।

3. शासन प्रबन्ध का अध्ययन (Study of Administration)-राजनीति शास्त्र लोक प्रशासन से सम्बन्धित है। शासन प्रबन्ध एक जटिल क्रिया है। राज्य प्रबन्ध में सरकारी कर्मचारी योगदान देते हैं और इन्हीं सरकारी कर्मचारियों से सम्बन्धित शास्त्र को लोक प्रशासन कहा जाता है। कर्मचारियों की नियुक्ति, स्थानान्तरण, अवकाश आदि सभी बातें जोकि लोक प्रशासन में आती हैं, राजनीति शास्त्र से सम्बन्धित होती हैं, अतः उन सबके लिए राजनीति शास्त्र का अध्ययन आवश्यक है।

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4. मनुष्य का अध्ययन (Study of Man)-मनुष्यों को मिलाकर राज्य बनता है। राजनीति शास्त्र, जिसमें मुख्यतः राज्य का अध्ययन किया जाता है, मनुष्य का अध्ययन भी करता है। इसमें मनुष्यों का राज्य के साथ क्या सम्बन्ध है, उनके अधिकार और कर्त्तव्य तथा नागरिकता की प्राप्ति तथा लोप इत्यादि बातों का अध्ययन किया जाता है।

5. समुदायों और संस्थाओं का अध्ययन (Study of Associations and Institutions)-राज्य के अन्दर कई प्रकार के समुदाय और संस्थाएं होती हैं जिनके द्वारा मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। राजनीति शास्त्र इन विभिन्न समुदायों और संस्थाओं का अध्ययन भी करता है। इसके अतिरिक्त चुनाव प्रणाली, जनमत का संगठन, दबाव गुट, लोक-सम्पर्क की व्यवस्था, प्रसारण के साधन आदि के बारे में भी राजनीति शास्त्र में अध्ययन किया जाता है।

6. राजनीतिक विचारधारा का अध्ययन (Study of Political Thought)-राज्य क्या है, राज्य के पास कौनकौन से अधिकार और शक्तियां हैं और उनकी क्या सीमाएं हो सकती हैं ? राज्य की आज्ञाओं को लोग क्यों माने, किन-किन व्यवस्थाओं में लोगों को राज्य की आज्ञाओं की अवहेलना करने का अधिकार होना चाहिए, राज्य की शक्ति व लोगों के अधिकारों के मध्य कहां लकीर खींची जाए जैसे बहुत-से महत्त्वपूर्ण और मौलिक प्रश्नों के उत्तर समयसमय पर विभिन्न राजनीतिक विद्वान् विचारकों ने दिए हैं। अतः इन सब बातों का अध्ययन हम राजनीति शास्त्र में करते हैं। आदर्शवाद, व्यक्तिवाद, उपयोगितावाद, फासिज्म, गांधीवाद आदि का अध्ययन राजनीति शास्त्र में किया जाता है।

7. राजनीतिक संस्कृति का अध्ययन (Study of Political Culture)-राजनीति शास्त्र में राज्य और सरकार का ही नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति के अध्ययन पर भी विशेष बल दिया जाता है। राजनीति के विद्वान् इन बातों का विश्लेषण करते हैं कि भौगोलिक परिस्थितियों, जातीय और भाषायी विभिन्नताओं, परम्पराओं और जनता के विश्वासों का राजनीतिक प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है।

8. नेतृत्व का अध्ययन (Study of Leadership)-राजनीति शास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण विषय नेतृत्व है। जब लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति और हितों की रक्षा के लिए संगठित होते हैं तब उन्हें नेतृत्व की आवश्यकता अनुभव होती है। कोई भी संगठन अपने उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर पाता जब तक उस संगठन का अच्छा नेतृत्व नहीं किया जाता। नेतृत्व के बिना कोई संगठन सफल नहीं हो सकता। समाज में सदा कुछ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक योग्यता रखते हैं और दूसरे व्यक्तियों को शीघ्र प्रभावित कर लेते हैं। ऐसे लोगों को नेतागण कहा जाता है। राजनीति शास्त्र में नेतृत्व और अच्छे नेता के गुणों का अध्ययन किया जाता है।

9. राजनीतिक दलों का अध्ययन (Study of Political Parties)-लोकतन्त्रीय प्रणाली बिना राजनीतिक दलों के नहीं चल सकती। राजनीतिक दल क्या हैं, राजनीतिक दलों के प्रकार, राजनीतिक दलों की भूमिका इत्यादि का राजनीति शास्त्र में अध्ययन किया जाता है।

10. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का अध्ययन (Study of International Politics and Organisation) वर्तमान समय में कोई भी राज्य आत्मनिर्भर नहीं है। प्रत्येक राज्य को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए एक राज्य दूसरे राज्यों से सम्बन्ध स्थापित करता है, जिससे कई समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। राजनीति शास्त्र अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का भी अध्ययन करता है। राजनीति शास्त्र में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का भी अध्ययन किया जाता है। राजनीति शास्त्र में युद्ध, शान्ति तथा शक्ति-सन्तुलन की समस्याओं पर विचार किया जाता है। प्रथम महायुद्ध के पश्चात् राष्ट्र संघ और द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी। राजनीति शास्त्र में राष्ट्र संघ और संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठन, कार्यों, सफलताओं एवं असफलताओं आदि का अध्ययन किया जाता है।

11. शक्ति तथा सत्ता का अध्ययन (Study of Power and Authority)-मैक्स वैबर, मैरियम, लासवैल, राबर्ट डाहल, डेविड ईस्टन आदि विद्वानों के मतानुसार राजनीति शास्त्र में सभी प्रकार की शक्ति तथा सत्ता का भी अध्ययन किया जाता है। शक्ति तथा सत्ता के क्या अर्थ हैं ? शक्ति तथा सत्ता किस प्रकार प्राप्त होती है, व्यक्ति और व्यक्ति समूह किस प्रकार से शासन संचालन और सार्वजनिक नीतियों के निर्माण को अपनी शक्ति तथा सत्ता से प्रभावित करते हैं इत्यादि ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर राजनीति शास्त्र से ही प्राप्त किया जा सकता है।

12. राजनीति शास्त्र के क्षेत्र के सम्बन्ध में आधुनिक दृष्टिकोण (Scope of Political Science-Most Modern Point of View)-आधुनिक दृष्टिकोण का राजनीतिक क्षेत्र अत्यधिक व्यापक है। आधुनिक विद्वानों ने राजनीति शास्त्र की नई दिशाएं निर्धारित की हैं। डॉ० वीरकेश्वर प्रसाद सिंह के शब्दों में, “इसे वैज्ञानिकता प्रदान करने के दृष्टिकोण से रूढ़िवादी विषयों, जैसे-राज्य के लक्ष्य, सर्वश्रेष्ठ सरकार, औपचारिक संस्थाओं का अध्ययन, ऐतिहासिक पद्धति आदि को इससे अलग कर दिया गया है। मूल्यों, राज्यों एवं उसकी संस्थाओं के बदले मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार तथा राजनीतिक गतिविधियों का अध्ययन राजनीति शास्त्र के अन्तर्गत किया जाने लगा है।” 1967 में अमेरिकन पोलिटिकल साइंस एसोसिएशन ने राजनीति शास्त्र के विषय क्षेत्र का निर्धारण करते समय इसके 27 उपक्षेत्रों की चर्चा की। जिनमें मुख्य हैं-मनुष्य और उसका राजनीतिक व्यवहार, समूह, संस्थाएं, प्रशासन, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति, सिद्धान्त, विचारवाद, मूल्य, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, सांख्यिकीय सर्वेक्षण, शोध पद्धतियां आदि।

आर्नल्ड ब्रेश्ट (Arnold Brecht) ने ‘International Encyclopaedia of Social Sciences’ 1968 में राजनीतिक सिद्धान्त के अन्तर्गत अग्र अध्ययन इकाइयां बताई हैं :

(1) समूह (Group), (2) सन्तुलन (Equilibrium), (3) शक्ति, नियन्त्रण एवं प्रभाव (Power, Control and Influence), (4) क्रिया (Action), (5) विशिष्ट वर्ग (Elite), (6) निर्णय (Decision) तथा विनिश्चय-प्रक्रिया, (7) पूर्वाभासित प्रतिक्रिया (Anticipated Action) तथा (8) कार्य (Function)।

13. नई धारणाओं का अध्ययन (Study of New Concepts)-राजनीति शास्त्र में कुछ नई धारणाओं ने जन्म लिया है। इसमें राजनीतिक प्रणाली (Political System), शक्ति की धारणा (Concept of Power), राजनीतिक समाजीकरण (Political Socialization), राजनीतिक सत्ता की धारणा (Concept of Political Authority), उचितता की धारणा (Concept of Legitimacy), प्रभाव की धारणा (Concept of Influence) आदि कुछ नई धारणाएं हैं। इन धारणाओं का अध्ययन राजनीति शास्त्र के अध्ययन क्षेत्र में शामिल है।

इसके अतिरिक्त कुछ समाज-शास्त्र से सम्बन्ध रखने वाली अवधारणाओं का अध्ययन भी इसके अन्तर्गत करते हैं। जैसे-राजनीति, संस्थाएं, सरकार, न्याय, स्वतन्त्रता, समानता आदि। कुछ नवीन अवधारणाएं-समाजीकरण, राजनीतिक विकास, राजनीतिक संचार आदि हैं। अब अत्यधिक वैज्ञानिकता पर बल दिया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-राजनीति शास्त्र के विषय क्षेत्र के अध्ययन से पता चलता है कि इसका क्षेत्र बहुत विशाल है। इसमें राज्य, सरकार, मनुष्य, समुदाय तथा संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है। इसमें कानून तथा विश्व समस्याओं का भी अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
राजनीति शास्त्र पढ़ने से क्या लाभ हैं?
(What are the advantages of studying Political Science ?)
अथवा
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के महत्त्व की व्याख्या करें। (Discuss the significance of the study of Political Science.)
उत्तर-
कुछ विद्वान् आज के वैज्ञानिक युग में राजनीति विज्ञान के सिद्धान्तों के अध्ययन का कोई मूल्य नहीं समझते, परन्तु उनकी यह धारणा ठीक नहीं है। आइवर ब्राउन (Ivor Brown) ने ठीक ही कहा है कि, “यदि इसे सामाजिक जीवन के यथार्थ मूल्यों के प्रति सहज बुद्धि के दृष्टिकोण से तथा उचित रीति से अध्ययन किया जाए तो राजनीतिक सिद्धान्त ठोस भी हैं और लाभप्रद भी।” प्रत्येक व्यक्ति, व्यक्ति होने के साथ-साथ राज्य का नागरिक भी है। उसका राज्य के साथ अटूट सम्बन्ध है। अतः प्रत्येक के लिए राजनीति शास्त्र का अध्ययन करना अनिवार्य है। इसके अध्ययन के अनेक लाभ हैं जिनमें से मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं

1. राजनीतिक शब्दावली का ठीक ज्ञान प्राप्त होता है (The Knowledge of the Political Terminology)राजनीति शास्र के अध्ययन का पहला लाभ यह है कि इससे राजनीतिक शब्दावली का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त होता है। इसके अध्ययन के बिना राज्य, सरकार, समाज, राष्ट्र, राष्ट्रीयता इत्यादि शब्दों के अर्थों का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त नहीं होता। साधारण मनुष्य राज्य तथा राष्ट्र, राज्य तथा सरकार में कोई अन्तर नहीं करता। राजनीति शास्त्र के अध्ययन से पता चलता है कि इन सब शब्दों में अन्तर है और एक शब्द को दूसरे शब्द के स्थान पर प्रयोग नहीं किया जा सकता। इसके अध्ययन से नागरिकों को स्वतन्त्रता तथा समानता के अर्थों का ठीक-ठीक पता चलता है।

2. राज्य तथा सरकार का ज्ञान (Knowledge of State and Government)-राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। राजनीति शास्त्र के अध्ययन से यह पता चलता है कि राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, राज्य क्या है, राज्य के उद्देश्य क्या हैं, इन उद्देश्यों की पूर्ति किस तरह की जा सकती है, सरकार क्या है, सरकार के कौनसे अंग हैं और इन अंगों का आपस में क्या सम्बन्ध है।

3. राज्य का व्यक्ति से सम्बन्ध दर्शाता है (It shows relationship between the State and Man)राजनीति शास्त्र के अध्ययन से राज्य तथा व्यक्ति के सम्बन्ध का ज्ञान होता है। प्राचीन काल से यह प्रश्न चला आ रहा है कि राज्य तथा व्यक्ति में क्या सम्बन्ध है ? राज्य व्यक्ति के लिए या व्यक्ति राज्य के लिए है? पहले यह समझा जाता था कि राज्य ही सब कुछ है। राज्य व्यक्ति पर मनमाने अत्याचार कर सकता है, इसलिए व्यक्ति पर बहुत अत्याचार किए गए। परन्तु आज हमें राजनीति शास्त्र के अध्ययन से राज्य तथा व्यक्ति के ठीक सम्बन्ध का ज्ञान होता है।

4. अधिकारों और कर्तव्यों का ज्ञान (Knowledge of Rights and Duties)-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य को अपना विकास करने में सहायता देने के लिए राज्य की तरफ से अधिकार दिए तथा उसके कर्त्तव्य निश्चित किए जाते हैं। मनुष्य तभी अपना विकास कर सकता है जब उसे अधिकारों तथा कर्तव्यों का पूरा ज्ञान प्राप्त हो। यह ज्ञान राजनीति शास्त्र से प्राप्त होता है।

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5. सहनशीलता (Toleration)-आज के युग में नागरिकों के अन्दर सहनशीलता की भावना का होना बहुत आवश्यक है। राजनीति शास्त्र लोगों को सहनशीलता का पाठ सिखाता है। राजनीति शास्त्र यह शिक्षा देता है कि प्रत्येक राज्य एक दूसरे की अखण्डता, प्रभुसत्ता का आदर करे। लोकतन्त्र में तो सहनशीलता की भावना का होना विशेष रूप में अनिवार्य है, क्योंकि लोकतन्त्र में यदि एक व्यक्ति को अपने विचार प्रकट करने व भाषण देने की स्वतन्त्रता है तो उसका कर्त्तव्य भी है कि दूसरे के अच्छे न लगने वाले विचारों को भी सहनशीलता से सुने और समझे। अत: यह भावना राजनीति शास्त्र के अध्ययन से उत्पन्न होती है।

6. विभिन्न देशों की शासन-प्रणालियों का ज्ञान (Knowledge of the Governmental Systems of Various countries) राजनीति शास्त्र के अध्ययन से विभिन्न देशों की शासन प्रणालियों का ज्ञान होता है। इसमें विश्व के संविधानों का अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार हमें इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका, स्विट्ज़लैण्ड, जर्मनी, जापान, पाकिस्तान इत्यादि देशों के संविधानों का ज्ञान मिलता है। दूसरे देशों के शासन सम्बन्धी ज्ञान से हम अपने देश के शासन में सुधार कर सकते हैं।

7. लोगों में जागरूकता उत्पन्न करता है (Promotes Vigilance among the People)-राजनीति शास्त्र के अध्ययन से नागरिकों के अधिकारों तथा कर्त्तव्य के ज्ञान, विश्व के दूसरे देशों की शासन प्रणाली के ज्ञान, राज्य तथा सरकार के ज्ञान से नागरिकों में जागरूकता उत्पन्न होती है जिससे वे देश के शासन को कार्य कुशल बनाने का प्रयत्न करते हैं। वे शासन कार्यों में दिल से भाग लेते हैं, सरकार की नीतियों की आलोचना करते तथा अपने सुझाव देते हैं। प्रजातन्त्र शासन प्रणाली की सफलता के लिए नागरिकों में जागरूकता होनी अति आवश्यक है। यह सत्य है कि सतत् चौकसी स्वतन्त्रता का मूल्य है (Enternal vigilance is the price of liberty)। यदि नागरिक अपनी स्वतन्त्रता को कायम रखना चाहते हैं तो उन्हें हमेशा ही जागरूक रहना होगा और जागरूकता राजनीति शास्त्र के अध्ययन से आती है।

8. स्वस्थ राजनीतिक दलों की उत्पत्ति (Growth of Healthy Political Parties)–लोकतन्त्र शासन के लिए स्वस्थ राजनीतिक दलों का होना अनिवार्य है। अच्छे व स्वस्थ राजनीतिक दल किसे कहा जा सकता है, इसका पता राजनीति शास्त्र से चल सकता है। हमें राजनीति शास्त्र से ही पता चलता है कि देश के अन्दर स्वार्थ सिद्धि के लिए उत्पन्न हुए छोटे-छोटे गुट व राजनीतिक दल नहीं अपितु इनका ढांचा तो राजनीतिक तथा आर्थिक आधार पर खड़ा होना चाहिए। राजनीति शास्र का ज्ञान रखने वाले नागरिक ही स्वस्थ दलों का निर्माण कर पायेंगे और ऐसे दल सदैव राष्ट्र हित के लिए कार्य करेंगे।

9. राजनीतिज्ञों तथा शासकों के लिए विशेष उपयोगिता (Special advantages to Politicians and Administrators)-राजनीति शास्त्र के अध्ययन से राजनीतिज्ञों तथा शासकों को विशेष लाभ है। देश के शासन को किस प्रकार चलाया जाए, किस प्रकार के कानून बनाए जाएं कि जनता के लिए अधिक लाभदायक हों? दूसरे देशों के साथ किस प्रकार की नीति को अपनाया जाए? नागरिकों को कौन-से अधिकार दिए जाएं? सरकार के कार्यों में किस प्रकार कुशलता लाई जाए? सार्वजनिक वित्त (Public Finance) के क्या सिद्धान्त हैं ? जनता पर किस प्रकार के टैक्स लगाने चाहिएं? वे कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनका सामना प्रत्येक राजनीतिज्ञ तथा शासक को करना पड़ता है और इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर राजनीति शास्र देता है।

10. वर्तमान समस्याओं का हल (Solution of Current Problems)-राजनीति शास्त्र ठोस सिद्धान्तों पर आधारित है और उन सिद्धान्तों को वर्तमान समस्याओं पर लागू करके समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। यदि नागरिकों और शासकों को यह पता है कि अमुक दशा में कौन-से कानून लागू करने चाहिएं तो देश में राजनीतिक प्रगति बड़ी सन्तोषप्रद होगी। यदि शासक अच्छी प्रकार सोच-विचार कर कदम उठाएं तो कोई कारण नहीं कि देश-विदेश की वर्तमान समस्याएं हल न हों।

11. प्रजातन्त्र की सफलता (Success of Democracy)-लोकतन्त्र की सफलता बहुत हद तक राजनीति शास्त्र के अध्ययन पर निर्भर है। लोकतन्त्र जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन होता है। प्रतिनिधियों का सुयोग्य होना अथवा न होना जनता पर निर्भर करता है। जनता को अच्छी सरकार प्राप्त करने के लिए अच्छे प्रतिनिधि चुनने होंगे और यह तभी हो सकता है जब जनता को राजनीतिक शिक्षा मिली हो।

लोकतन्त्र की सफलता में राजनीति शास्त्र का अध्ययन काफ़ी सहयोग देता है, क्योंकि इससे नागरिकों को अपने अधिकारों तथा कर्त्तव्यों का, सरकार के संगठन कार्यों तथा सरकार के उद्देश्यों का, शासन की विभिन्न समस्याओं का ज्ञान प्राप्त होता है।

12. विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं का ज्ञान (Knowledge of Various Political Ideology)राजनीति शास्त्र के अन्तर्गत विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं आदर्शवाद (Idealism), व्यक्तिवाद (Individualism), गांधीवाद (Gandhism), समाजवाद (Socialism), अराजकतावाद (Anarchism), साम्यवाद (Communism) आदि का अध्ययन होता है। इन विचारधाराओं के भिन्न-भिन्न उद्देश्य होते हैं।

13. विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों की जानकारी (Knowledge of Various International Organisations)-राजनीति शास्त्र के अन्तर्गत विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं का भी अध्ययन किया जाता है। इन संस्थाओं में संयुक्त राष्ट्र (United Nations), संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (United Nations Educational, Scientific and Cultural Organisation), विश्व स्वास्थ्य संघ (World Health Organisation), अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ (I.L.O.) आदि महत्त्वपूर्ण संगठन हैं।

14. छात्र वर्ग के लिए उपयोगी (Useful for Student-Class)-राजनीति शास्त्र विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी तथा अनिवार्य है। आज का छात्र भविष्य का नागरिक व शासक है। अतः छात्र वर्ग को राजनीतिक विचारधाराओं, राजनीतिक प्रणालियों, अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का ज्ञान होना अनिवार्य है।

निष्कर्ष (Conclusion)-अन्त में, हम यह कह सकते हैं कि राजनीति शास्त्र के अध्ययन के अनेक लाभ हैं। भारत में लोकतन्त्र की सफलता तभी हो सकती है जब जनता को शासन के बारे में ज्ञान प्राप्त हो और वे अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों का उचित प्रयोग करें। इसके लिए राजनीति शास्त्र का अध्ययन अति आवश्यक है। भारत में राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। सरकार भी विद्यार्थियों में राजनीतिक शिक्षा का प्रचार करने के लिए प्रयत्नशील है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र का शाब्दिक अर्थ बताओ।
अथवा
राजनीति (Politics) शब्द की उत्पत्ति तथा इसका अर्थ बताओ।
उत्तर-राजनीति शास्त्र को अंग्रेज़ी में पोलिटिकल साईंस (Political Science) कहते हैं। यह शब्द पोलिटिक्स (Politics) से निकला है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द पोलिस (Polis) से हुई है जिसका अर्थ है नगरराज्य। ग्रीक लोग नगर-राज्यों में रहते थे, इसलिए उस समय पोलिटिक्स का अर्थ नगर-राज्य के अध्ययन से होता था परन्तु आज बड़े-बड़े राज्यों की स्थापना हो गई है। इसलिए अब हम इसका अर्थ राज्य के अध्ययन से लेते हैं। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ में राजनीति शास्त्र वह विषय है जो राज्य का अध्ययन करता है।

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान की चार परम्परागत परिभाषाएं लिखें।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र की महत्त्वपूर्ण परिभाषाएं निम्नलिखित हैं-

  • प्रो० गार्नर के मतानुसार, “राजनीति शास्त्र का आरम्भ तथा अन्त राज्य के साथ होता है।”
  • लीकॉक के अनुसार, “राजनीति शास्त्र केवल सरकार से सम्बन्धित है।”
  • गैटेल के अनुसार, “राजनीति शास्त्र को राज्य का विज्ञान कहा जा सकता है। इसका सम्बन्ध व्यक्तियों के उन समुदायों से है जो राजनीतिक संगठन का निर्माण करते हैं, उनकी सरकारों के संगठन से है और सरकारों के कानून बनाने तथा लागू करने और अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों वाली गतिविधियों से है। इसके मुख्य विषय राज्य, सरकार तथा कानून हैं।”
  • गिलक्राइस्ट के अनुसार, “राजनीति विज्ञान राज्य और सरकार की सामान्य समस्याओं का विवेचन करता है।”

प्रश्न 3.
राजनीति विज्ञान की चार आधुनिक परिभाषाएं लिखें।
उत्तर-

  • बैन्टले का कहना है कि राजनीति में महत्त्वपूर्ण ‘शासन’ और उसकी संस्थाएं नहीं हैं बल्कि शासन के कार्य की प्रक्रिया है और उस पर प्रभाव डालने वाले दबाव समूह हैं। अत: राजनीति विज्ञान शासन प्रक्रिया और दबाव समूहों के अध्ययन का शास्त्र है।
  • लासवैल और कैपलॉन के अनुसार, “एक आनुभाविक खोज के रूप में राजनीति विज्ञान शक्ति के निर्धारण और सहभागिता का अध्ययन है।”
  • डेविड ईस्टन के अनुसार, “राजनीति मूल्यों का सत्तात्मक निर्धारण है जैसे कि यह शक्ति के वितरण और प्रयोग से प्रभावित होता है।”
  • आलमण्ड और पॉवेल के अनुसार, “आधुनिक राजनीति विज्ञान में हम राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन और विश्लेषण करते हैं।”

प्रश्न 4.
राजनीति शास्त्र के किन्हीं चार क्षेत्रों का वर्णन करो।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र निम्नलिखित विषयों का अध्ययन करता है

  • राज्य का अध्ययन-राजनीति शास्त्र में राज्य की उत्पत्ति, उसके विस्तार, राज्य का है, राज्य के तत्त्व, राज्य की प्रकृति और राज्य के भविष्य आदि का अध्ययन किया जाता है।
  • सरकार का अध्ययन–राजनीति शास्त्र में हम अध्ययन करते हैं कि सरकार क्या है ? इसके कौन-कौन से अंग हैं ? इसके कार्य क्या-क्या हैं तथा इसके विभिन्न रूप कौन-से हैं ?
  • शासन प्रबन्ध का अध्ययन-कर्मचारियों की नियुक्ति, स्थानान्तरण, अवकाश सभी बातें जोकि लोक प्रशासन में आती हैं, राजनीति शास्त्र से सम्बन्धित होती हैं।
  • समुदायों और संस्थाओं का अध्ययन-राजनीति शास्त्र में चुनाव प्रणाली, राजनीतिक दल, दबाव समूह, लोक सम्पर्क की व्यवस्था तथा अन्य समुदायों का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 5.
राजनीति विज्ञान के अध्ययन के चार लाभ बताइये।
उत्तर-
राजनीति विज्ञान के अध्ययन से अनेक लाभ हैं जिनमें से मुख्य निम्नलिखित हैं-

  • राजनीतिक शब्दावली का ठीक ज्ञान प्राप्त होता है-राजनीति शास्त्र के अध्ययन का पहला लाभ यह है कि इससे राजनीतिक शब्दावली का ठीक-ठाक ज्ञान प्राप्त होता है। इसके अध्ययन के बिना राज्य, सरकार, राष्ट्र, राष्ट्रीयता आदि शब्दों के अर्थों का सही ज्ञान प्राप्त नहीं होता।
  • राज्य तथा सरकार का ज्ञान-राजनीति शास्त्र का मुख्य विषय राज्य तथा सरकार है। राजनीति शास्त्र के अध्ययन से यह पता चलता है कि राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई ? राज्य क्या है ? राज्य के उद्देश्य क्या हैं ? इन उद्देश्यों की पूर्ति किस प्रकार की जा सकती है ? सरकार क्या है ? सरकार के कौन-से अंग हैं और उनका आपस में क्या सम्बन्ध है ?
  • अधिकारों तथा कर्तव्यों का ज्ञान-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य को अपना विकास करने में सहायता देने के लिए उसे राज्य की तरफ से अधिकार व कर्त्तव्य दिए गए हैं। मनुष्य तभी अपना पूर्ण विकास कर सकता है जब उसे अपने अधिकारों व कर्त्तव्यों का ज्ञान हो। यह ज्ञान उसे राजनीति शास्त्र से प्राप्त होता है।
  • राजनीति विज्ञान लोगों को सहनशीलता का पाठ सिखाता है।

प्रश्न 6.
राजनीति शास्त्र एक विज्ञान है। इसके पक्ष में चार तर्क दीजिए।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र के विज्ञान होने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं.-

  • राजनीति शास्त्र में प्रयोग सम्भव है-राजनीति शास्त्र में प्राकृतिक विज्ञानों की तरह प्रयोग, प्रयोगशाला में नहीं होते बल्कि इतिहास राजनीति शास्त्र के लिए एक प्रयोगशाला है। ऐतिहासिक घटनाएं एक प्रयोग हैं जिनसे राज्यशास्त्री अपने परिणाम निकालते हैं।
  • राजनीति शास्त्र में कार्य-कारण का सिद्धान्त-यह ठीक है कि प्राकृतिक विज्ञानों की तरह राजनीति शास्त्र में कार्य-कारण में सम्बन्ध स्थापित नहीं किया जा सकता, परन्तु फिर भी यदि घटनाओं का अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से किया जाए तो घटनाओं के ऐसे कारण ढूंढ निकाले जा सकते हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि समान कारणों का काफ़ी सीमा तक समान प्रभाव होता है। विद्वानों ने यह परिणाम निकाला है कि यदि किसी देश की जनता अधिक ग़रीब होती जाएगी तो इसका परिणाम उस देश में क्रान्ति है।
  • तुलनात्मक तथा निरीक्षण पद्धति सम्भव-राजनीति शास्त्र विज्ञान है क्योंकि इसमें भौतिक विज्ञानों की तरह तुलनात्मक प्रणाली का प्रयोग किया जा सकता है। अरस्तु ने 158 संविधानों का अध्ययन करके अपने जो सिद्धान्त प्रस्तुत किए उनमें आज बहत हद तक सच्चाई है।
  • राजनीति विज्ञान में भी भविष्यवाणी की जा सकती है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

प्रश्न 7.
राजनीति शास्त्र एक विज्ञान नहीं है। इस कथन के पक्ष में चार तर्क दीजिए।
उत्तर-
राजनीति शास्त्र एक विज्ञान नहीं है। इस विषय में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं-

  • राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों में एकता नहीं है-रसायन शास्त्र तथा भौतिक शास्त्र के सिद्धान्तों पर वैज्ञानिकों के एक ही विचार होते हैं अर्थात् इनके सिद्धान्तों में एकता पाई जाती है। परन्तु राजनीति शास्त्र में ऐसे सिद्धान्तों की कमी है जिनके विषय में विद्वानों के समान विचार हों।
  • राजनीति शास्त्र में कार्य-कारण सिद्धान्त का न लागू होना-राजनीति शास्त्र को इस आधार पर भी विज्ञान नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान या अन्य किसी विज्ञान की तरह कार्य-कारण का सिद्धान्त पूर्ण रूप से लागू नहीं होता।
  • राजनीति शास्त्र के सिद्धान्तों का प्रयोग असम्भव है-राजनीति शास्त्र विज्ञान नहीं है क्योंकि इसमें उस ढंग से प्रयोग नहीं किए जा सकते जिस ढंग से प्राकृतिक विज्ञानों में किए जाते हैं। राजनीति शास्त्र में रसायन विज्ञान की तरह ऐसे प्रयोग सम्भव नहीं हैं जिनका परिणाम सब समयों पर एक जैसा हो।
  • राजनीति विज्ञान में भविष्यवाणी करने में कठिनाई आती है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीति शास्त्र से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
राजनीति शास्त्र को अंग्रेज़ी में पोलिटीकल साईंस (Political Science) कहते हैं। यह शब्द पोलिटिक्स (Politics) से निकला है। इस शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के शब्द पोलिस (Polis) से हुई है जिसका अर्थ है नगरराज्य। ग्रीक लोग नगर-राज्यों में रहते थे, इसलिए उस समय पोलिटिक्स का अर्थ नगर-राज्य के अध्ययन से होता था। इस प्रकार शाब्दिक अर्थ में राजनीति शास्त्र वह विषय है जो राज्य का अध्ययन करता है।

प्रश्न 2.
राजनीति विज्ञान की दो परिभाषाएं लिखें।
उत्तर-

  1. प्रो० गार्नर के मतानुसार, “राजनीति शास्त्र का आरम्भ तथा अन्त राज्य के साथ होता है।”
  2. गैटेल के अनुसार, “राजनीति शास्त्र को राज्य का विज्ञान कहा जा सकता है। इसका सम्बन्ध व्यक्तियों के उन समुदायों से है जो राजनीतिक संगठन का निर्माण करते हैं, उनकी सरकारों के संगठन से है और सरकारों के कानून बनाने तथा लागू करने और अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों वाली गतिविधियों से है। इसके मुख्य विषय राज्य, सरकार तथा कानून हैं।”

प्रश्न 3.
राजनीति शास्त्र के क्षेत्र की व्याख्या करो।
उत्तर-

  1. राज्य का अध्ययन-राजनीति शास्त्र में राज्य की उत्पत्ति, उसके विस्तार, राज्य का है, राज्य के तत्त्व, राज्य की प्रकृति और राज्य के भविष्य आदि का अध्ययन किया जाता है।
  2. सरकार का अध्ययन-राजनीति शास्त्र में हम अध्ययन करते हैं कि सरकार क्या है ? इसके कौन-कौन से अंग हैं ? इसके कार्य क्या-क्या हैं तथा इसके विभिन्न रूप कौन-से हैं ?

प्रश्न 4.
विद्यार्थियों के लिए राजनीति शास्त्र का अध्ययन किस प्रकार महत्त्व रखता है ?
उत्तर-
विद्यार्थियों को राजनीतिक विचारधाराओं, राजनीतिक प्रणालियों और अपने अधिकारों, कर्तव्यों व सरकार की समस्याओं की जानकारी प्राप्त होना आवश्यक है। राजनीति शास्त्र के अध्ययन के द्वारा विद्यार्थियों को इन सभी विषयों की जानकारी प्राप्त होती है। राजनीति शास्त्र विद्यार्थियों को सूझवान व सचेत नागरिक बनने में मदद करता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. राजनीति शास्त्र का पिता किसे माना जाता है ?
उत्तर-अरस्तु को।

प्रश्न 2. ‘Polis’ किस भाषा का शब्द है ?
उत्तर-ग्रीक भाषा का।

प्रश्न 3. ‘Polis’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर-‘Polis’ का अर्थ है-नगर राज्य (City State)।

प्रश्न 4. ग्रीक लोग कहाँ रहते थे ?
उत्तर-ग्रीक लोग नगर राज्यों में रहते थे।

प्रश्न 5. ‘Political Science’ शब्द किस शब्द से निकला है ?
उत्तर-Politics से ।।

प्रश्न 6. ‘Politics’ शब्द की उत्पत्ति किस शब्द से हुई है?
उत्तर-Politics शब्द की उत्पत्ति ‘Polis’ से हुई है।

प्रश्न 7. अरस्तु ने कितने संविधानों का अध्ययन किया?
उत्तर-158 संविधानों का।

प्रश्न 8. किसी एक विद्वान् का नाम लिखें, जो राजनीति शास्त्र को विज्ञान मानता है?
उत्तर-अरस्तु।

प्रश्न 9. किसी एक विद्वान् का नाम बताएं, जो राजनीति शास्त्र को विज्ञान नहीं मानता है ?
उत्तर-मैटलैंड।

प्रश्न 10. “जब मैं ऐसे परीक्षा प्रश्नों के समूह को देखता हूँ, जिनका शीर्षक राजनीतिक विज्ञान होता है, तो मुझे प्रश्नों पर नहीं, बल्कि शीर्षक पर खेद होता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर-मैटलैंड।

प्रश्न 11. राजनीति शास्त्र की कोई एक उपयोगिता लिखें।
उत्तर-राजनीति शास्त्र के अध्ययन से राज्य तथा सरकार का ज्ञान मिलता है।

प्रश्न 12. नगर राज्यों का अध्ययन करने वाले विषय को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-राजनीति शास्त्र।।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. रिपब्लिक पुस्तक के लेखक ………… हैं
2. मैटलैंड राजनीति विज्ञान को विज्ञान ………….. मानता है।
3. राजनीति शास्त्र में राज्य और …………का अध्ययन किया जाता है।
4. अरस्तु ने …………. संविधानों का अध्ययन किया।
उत्तर-

  1. प्लेटो
  2. नहीं
  3. सरकार
  4. 158.

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 1 राजनीति विज्ञान का अर्थ, क्षेत्र तथा महत्व

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. राजनीति शास्त्र के अध्ययन का मुख्य विषय मशीन को ही समझा जाना चाहिए क्योंकि राजनीति शास्त्र की समस्त मशीनरी मशीन के इर्द-गिर्द ही घूमती है।
2. राजनीति शास्त्र को अंग्रेज़ी में अर्थशास्त्र (Economics) कहते हैं। यह शब्द पोलिटिक्स से निकला है।
3. पोलिस (Polis) का अर्थ है-नगर-राज्य।
4. गार्नर के अनुसार, “राजनीति शास्त्र केवल सरकार से संबंधित है।”
5. राजनीति शास्त्र के क्षेत्र के संबंध में तीन विचारधाराएं प्रचलित हैं।
उत्तर-

  1. ग़लत
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
Political Science शब्द किस शब्द से निकला है ?
(क) State से
(ख) Right से
(ग) Politics से
(घ) Freedom से।
उत्तर-
(ग) Politics से।

प्रश्न 2.
यह कथन किसका है, “राजनीति शास्त्र का आरम्भ तथा अंत राज्य के साथ होता है।”
(क) लॉस्की
(ख) गार्नर
(ग) विलोबी
(घ) गैरीज।
उत्तर-
(ख) गार्नर ।

प्रश्न 3.
राजनीति शास्त्र तथा राजनीति विज्ञान में क्या अंतर पाया जाता है ?
(क) राजनीति शास्त्र का जन्म राजनीति से पहले हुआ।
(ख) राजनीति विज्ञान नैतिकता पर आधारित है, जबकि राजनीति सुविधा पर।
(ग) दोनों के लक्ष्य अलग-अलग हैं।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 4.
राजनीति शास्त्र के विषय-क्षेत्र में शामिल हैं-
(क) राज्य का अध्ययन
(ख) सरकार का अध्ययन
(ग) राजनीतिक विचारधारा का अध्ययन
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन

Punjab State Board PSEB 8th Class Physical Education Book Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Physical Education Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन

PSEB 8th Class Physical Education Guide पौष्टिक और सन्तुलित भोजन Textbook Questions and Answers

नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
भोजन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भोजन एक वस्तु की भान्ति है। मनुष्य हर प्रकार के खाद्य पदार्थों का सेवन करता है। वह मांसाहारी भी है तथा निरामिष भी। मनुष्य लगभग दोनों प्रकार का भोजन खा सकता है; जैसे–अन्न, दालें, सब्जियां, फल, दूध तथा दूध से बने पदार्थ, मांस, मछली, अण्डे आदि। ___ भोजन शरीर का एक आवश्यक अंग है क्योंकि भोजन से शरीर में वृद्धि होती है तथा शरीर के टूटे-फूटे सैलों की मुरम्मत होती है तथा नए सैल बनते हैं। भोजन शरीर को बीमारियों का मुकाबला करने योग्य बनाता है।

प्रश्न 2.
पोष्टिक भोजन किसे कहते हैं ? (From Board M.Q.P.)
उत्तर-
पौष्टिक तत्त्व शरीर का पालन-पोषण करते हैं। खाद्य पदार्थों में कुछ ऐसे तत्त्व पाये जाते हैं जिन्हें खाने के बाद वे शरीर में पचकर शरीर का पोषण करते हैं। जिस भोजन

प्रोटीन के लाभ (Advantages of Proteins)-

  1. यह शरीर में शक्ति पैदा करते हैं।
  2. प्रोटीन शरीर के टूटे-फूटे सैलों की मुरम्मत करते हैं और नए सैलों का निर्माण करते हैं।
  3. ये भोजन को पचाने में सहायता करते हैं।
  4. ये हड़ियों का निर्माण करते हैं।
  5. इनके सेवन से हड्डियां मज़बूत बनती हैं।
  6. यह शरीर का तापमान ठीक रखते हैं।

प्रोटीन की कमी और अधिकता से होने वाली हानियां (Disadvantages of Excess or Less Protein) भोजन में प्रोटीन उचित मात्रा में होनी चाहिए। भोजन में इनकी कमी और वृद्धि दोनों स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। इनकी कमी से शरीर कमजोर हो जाता है, परन्तु इनके बढ़ने से अधिक रक्तचाप, मोटापा, जोड़ों का दर्द (गठिया), जिगर तथा गुर्दे की बीमारियां हो जाती हैं।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन

प्रश्न 5.
कार्बोहाइड्रेट्स क्या है ? शरीर में इसकी कम-से-कम मात्रा की हानियाँ लिखिए।
उत्तर-
कोर्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates)—यह कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का मिश्रण है। कार्बोहाइड्रेट्स दो प्रकार के होते हैं-शक्कर के रूप में मिलने वाले और स्टॉर्च के रूप में मिलने वाले।
प्राप्ति के स्रोत (Sources) शक्कर के रूप में यह हमें गन्ने के रस, गुड़, चीनी,

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन 1

अंगूर, खजूर, शहद, सूखे मेवों, गाजर आदि से मिलते हैं। स्टॉर्च के रूप में यह गेहूँ, मक्की, जौ, ज्वार, शकरकन्द, अखरोट तथा केले आदि से प्राप्त होते हैं।

कार्बोहाइड्रेट्स के लाभ (Advantages of Carbohydrates)-

  1. कार्बोहाइड्रेट्स हमारे शरीर को गर्मी तथा शक्ति प्रदान करते हैं।
  2. ये शरीर में चर्बी पैदा करते हैं।
  3. ये चर्बी से सस्ते होते हैं और ग़रीब व कम आय वाले लोग भी इनका प्रयोग कर सकते हैं।

कार्बोहाइड्रेट्स की कमी और अधिकता से होने वाली हानियाँ (Advantages of Carbohydrates)-

  1. कार्बोहाइड्रेटस की अधिक मात्रा लेने से भोजन शीघ्र हज़म नहीं होता। भोजन का अधिकांश भाग बिना पचे ही शरीर से बाहर निकल जाता है।
  2. इनके अधिक प्रयोग से शरीर में मोटापा आ जाता है तथा पेशाब सम्बन्धी कई रोग लग जाते हैं।
  3. इनका कम मात्रा में प्रयोग करने से शरीर कमजोर हो जाता है।
  4. कार्बोहाइड्रेट्स अधिक मात्रा में लेने से शूगर, ब्लड प्रेशर और जोड़ों का दर्द होने लगता है।

प्रश्न 6.
चर्बी से क्या अभिप्राय है ? यह कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर-
चर्बी (Fat)-यह कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन का मिश्रण है। यह शरीर में ईंधन का कार्य करती है। चर्बी का मुख्य कार्य शरीर में गर्मी और शक्ति पैदा करना है। एक साधारण व्यक्ति के दैनिक भोजन में चर्बी की मात्रा 50 से 70 ग्राम तक होनी चाहिए।
PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन 2

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—वनस्पति से प्राप्त होने वाली चर्बी सब्जियों, सूखे मेवों, फलों, अखरोट, बादाम, मूंगफली, बीजों से प्राप्त तेल आदि से प्राप्त होती है। पशुओं से प्राप्त होने वाली चर्बी, घी, दूध, मक्खन, मछली के तेल, अण्डे आदि में पाई जाती है।

चर्बी के अधिक प्रयोग से हानि (Disadvantages of Extra Fat)-

  • पाचनक्रिया बिगड़ जाती है।
  • रक्त-संचार में रुकावट पड़ जाती है।
  • शरीर में मोटापा आ जाता है।
  • हृदय रोग और शूगर का रोग होने का भय रहता है।

चर्बी के कम प्रयोग से हानि (Disadvantages of Less Faty)

  • चर्बी के कम प्रयोग के कारण शरीर दुबला पतला हो जाता है।
  • चर्बी की कमी के कारण शरीर में कमजोरी आ जाती है।

प्रश्न 7.
‘दूध एक सम्पूर्ण आहार है,’ वर्णन करें।
उत्तर-
दूध एक आदर्श तथा सम्पूर्ण भोजन है (Milk is an ideal Food) क्योंकि दूध में हर प्रकार के आवश्यक तत्त्व मिल जाते हैं। इसमें 3.6% चर्बी, 3.4% प्रोटीन, 4.8% कार्बोहाइड्रेट्स, 0.7% नमक तथा 7.5% पानी होता है। – दूध को सम्पूर्ण भोजन इसलिए कहा जाता है, क्योंकि छोटे बच्चों को केवल दूध ही दिया जाता है। यह बच्चों के लिए भोजन ही है। सामान्यतः घरों में हम रोगी व्यक्तियों के लिए दूध का प्रयोग करते हैं जो खुराक का कार्य करता है।

शरीर की उचित तन्दरुस्ती के लिए दूध एक प्रकार के सन्तुलित भोजन का कार्य करता है। दूध में भोजन के सभी आवश्यक तत्त्व प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, चर्बी, खनिज लवण,पानी तथा विटामिन उचित मात्रा में मिलते हैं। ये भिन्न-भिन्न तत्त्व मानव शरीर में भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं।

दूध में भोजन के सभी आवश्यक तत्त्वों के विद्यमान होने के कारण उसे उचित और आदर्श खुराक माना जाता है। इसलिए दूध को एक सम्पूर्ण भोजन कहा जाता है।

प्रश्न 8.
भोजन पकाने के कौन-कौन से सिद्धान्त हैं ?
उत्तर-
भोजन पकाने के मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:

  1. भोजन पकाने वाला व्यक्ति साफ़-सुथरा तथा आरोग्य होना चाहिए।
  2. भोजन पकाने वाला स्थान भी साफ़-सुथरा होना चाहिए। इसको जाली लगी हुई होनी चाहिए ताकि मच्छर, मक्खी आदि भीतर न जा सकें।
  3. भोजन पकाने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले बर्तन भी साफ़ होने चाहिएं।
  4. रोटी पकाने से दस-पन्द्रह मिनट पहले आटा अच्छी प्रकार गूंथ कर रख लेना चाहिए। बिना छाने आटे का प्रयोग अति लाभदायक है।
  5. सब्जियां और दालें साफ़ पानी में अच्छी प्रकार दो-तीन बार धो कर पकानी चाहिए ताकि इन पर छिड़की हुई दवायें साफ़ हो जाएं।
  6. भोजन को बहुत ज्यादा नहीं पकाना चाहिए क्योंकि ज़्यादा पकाने से भोजन के तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। भोजन कच्चा भी नहीं होना चाहिए क्योंकि कम पका हुआ भोजन जल्दी हज़म नहीं होता।
  7. भाप द्वारा प्रैशर कुक्कर में तैयार किया हुआ भोजन बहुत लाभदायक होता है। ऐसे भोजन के तत्त्व नष्ट नहीं होते।
  8. भोजन को सदा ढक कर रखना चाहिए।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन

प्रश्न 9.
भोजन खाने से सम्बन्धित ज़रूरी नियमों का वर्णन करें।
उत्तर-
भोजन सम्बन्धी जरूरी नियम-जो भोजन हम खाते हैं उसका पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए हमें कुछ नियमों का पालन करना चाहिए। इन नियमों का विवरण नीचे दिया जाता है-

  1. भोजन सदा नियमित समय पर करना चाहिए।
  2. भोजन करने से पहले हाथों को अच्छी तरह धोना चाहिए।
  3. भोजन अच्छी तरह चबा कर और धीरे-धीरे खाना चाहिए।
  4. भोजन करते समय न तो पढ़ना चाहिए और न ही बातें करनी चाहिए।
  5. भोजन खाते समय प्रसन्न रहना चाहिए। उस समय किसी प्रकार की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
  6. भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए।
  7. भोजन सदा आवश्यकतानुसार ही करना चाहिए। बहुत कम या बहुत अधिक खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
  8. तली हुई वस्तुएं शीघ्र नहीं पचतीं इसलिए इनको बहुत थोड़ी मात्रा में खाना चाहिए।
  9. बासी और खराब भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
  10. दोपहर का भोजन करने के उपरान्त कुछ समय के लिए आराम करना लाभदायक होता है।
  11. रात को सोने से दो घण्टे पहले भोजन खाना चाहिए। भोजन खाने के तुरन्त बाद सोना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।
  12. भोजन के शीघ्र बाद व्यायाम आदि करना हानिकारक होता है।
  13. गर्म-गर्म भोजन खाने के बाद ठण्डा पानी नहीं पीना चाहिए।
  14. भोजन खाने के बाद अच्छी तरह कुल्ली करके दाँतों को साफ़ करना चाहिए नहीं तो दाँतों में भोजन के अंश फंसे रहेंगे जिसके कारण मुंह से बदबू आएगी।
  15. भोजन करने वाला स्थान साफ़-सुथरा होना चाहिए।
  16. बहुत चटपटी और मसालेदार वस्तुएं स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं।
  17. भोजन ढक कर रखना चाहिए।
  18. भोजन सदा बदल-बदल कर करना चाहिए।
  19. मीठी और खट्टी वस्तुएं अधिक मात्रा में प्रयोग नहीं करनी चाहिए।
  20. पानी सदा भोजन के मध्य में पीना चाहिए।
  21. भोजन ठीक ढंग से पकाया हुआ होना चाहिए।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित पर नोट लिखें।
(क) मोटा आहार
(ख) पानी
(ग) खनिज पदार्थ
(घ) भोजन पकाना।
उत्तर-
(क) मोटा आहार (रेशेदार) (Roughage/Cellulose) मनुष्य के भोजन में विद्यमान रेशेदार कार्बोहाइड्रेट्स को मोटा आहार कहते हैं। हमें मोटा आहार सब्जियों फल, मूली, शलगम, गाजर, खीरा, सलाद तथा अन्य वनस्पति खाद्य-पदार्थों को छिल्के सहित खाने से प्राप्त होता है। इसकी कमी से हमें कब्ज तथा अधिकता से दस्त लग जाते हैं।

(ख) पानी (Water)—यह ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का यौगिक है। शरीर का लगभग 70% भाग पानी है। इसके बिना जीवन असम्भव है। वयस्क व्यक्तियों के लिए प्रतिदिन \(1 \frac{1}{2}\) से \(2 \frac{1}{2}\) लिटर पानी की आवश्यकता होती है, परन्तु जलवायु और कार्य की स्थिति में अन्तर होने से पानी की आवश्यकता घटती-बढ़ती रहती है। गर्मियों में पानी की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

पानी के लाभ (Advantages)-

  1. पानी रक्त को द्रव अवस्था में रखकर संचालन में सहायता प्रदान करता है।
  2. यह भोजन को घोल कर पाचन क्रिया में सहायता देता है।
  3. पानी की प्यास को शान्त करता है।
  4. पानी से शरीर का तापमान एक समान रहता है।
  5. पानी से गंदगी पसीने और मल-मूत्र के रूप में बाहर निकल जाती है।
  6. पानी शरीर में रक्त का दौरा आसान करता है।

(ग) खनिज पदार्थ (Mineral) हमारे शरीर को कैल्शियम, फॉस्फोरस, सोडियम, लोहा, मैग्नीशियम, पोटाशियम, आयोडीन, क्लोरीन और गन्धक जैसे तत्त्वों की अधिक आवश्यकता रहती है। ये तत्त्व लवण के रूप में भोजन से प्राप्त होते हैं। हमारे दैनिक भोजन में खनिज पदार्थों की मात्रा 10 से 15 ग्राम होनी चाहिए।

प्राप्ति के स्रोत (Sources) खनिज पदार्थ हरे पत्ते वाली सब्जियों, ताजे फलों, मांस, मछली, दूध, पनीर आदि पदार्थों से मिलते हैं।

खनिज पदार्थ के लाभ (Advantages of Mineral)-

  1. ये मांसपेशियों के तन्तुओं का विकास करते हैं। . :
  2. रक्त के रंग को लाल करते हैं।
  3. कैल्शियम रक्त को जमने में सहायता देता है।
  4. शरीर के सभी अंगों को ठीक काम करने में सहायता देते हैं।

खनिज पदार्थ की कमी से हानियां (Disadvantages of less Mineral) भोजन में इसकी कमी से निम्नलिखित रोग लग जाते हैं –

  1. शरीर शीघ्र रोगग्रस्त हो जाता है।
  2. हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं।
  3. शरीर में पीलापन आ जाता है।
  4. गिल्लड़ नामक रोग हो जाता है।

(घ) भोजन पकाना (Cooking)-कई खाद्य पदार्थ पकाने के बाद ही खाने योग्य होते हैं; जैसे दालें, अनाज़, सब्जियां आदि। खांद पदार्थों को भिन्न-भिन्न ढंगों से आग पर पका कर खाने योग्य बनाया जाता है। इस प्रक्रिया को भोजन पकाना कहते हैं। अच्छी तरह से पकाया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। भोजन को ठीक विधि से पकाया जाना चाहिए, क्योंकि अधिक देर आग पर रखने से भोजन में विटामिन सी और डी की विशेष हानि होती है।

निम्नलिखित कारणों के कारण भोजन को पकाना अत्यन्त आवश्यक है –

  1. ठीक ढंग से पका हुआ भोजन आसानी से पचने के योग्य बन जाता है।
  2. भोजन को पकाने से रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
  3. पकाया हुआ भोजन स्वादिष्ट होता है, इसलिए उसे खाने को मन करता है।
  4. पकाने से खाद्य पदार्थों को अधिक देर तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

Physical Education Guide for Class 8 PSEB प्राथमिक सहायता Important Questions and Answers

बहविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संतुलित भोजन है –
(क) प्रोटीन
(ख) कार्बोहाइड्रेट्स
(ग) चर्बी और खनिज लवण
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
प्रोटीन किस से बना है ?
(क) कार्बन
(ख) ऑक्सीजन
(ग) हाइड्रोजन
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन

प्रश्न 3.
प्रोटीन की किस्में हैं
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर-
(क) दो

प्रश्न 4.
कार्बोहाइड्रेट्स कितनी प्रकार के हैं ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर-
(ख) तीन

प्रश्न 5.
चर्बी के स्रोत हैं-
(क) फल और अखरोट
(ख) बादाम, मूंगफली
(ग) तिल
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 6.
सम्पूर्ण भोजन है-
(क) दूध
(ख) फल, दूध, अखरोट
(ग) बादाम
(घ) उपरोक्त कोई नहीं।
उत्तर-
(ख) फल, दूध, अखरोट

प्रश्न 7.
भोजन खाने के नियम –
(क) समय के अनुसार भोजन खाएं
(ख) भोजन खाने से पहले हाथ धो लें
(ग) भूख लगने पर ही भोजन करें
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

बहन छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
खाने की वे चीजें जो हमारी भूख को सन्तुष्ट करें और शरीर का विकास करें, भोजन कहलाती है।

प्रश्न 2.
भोजन में पाए जाने वाले खनिज लवणों के नाम बताएं। .
उत्तर-
कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौ कण, सोडियम, मैग्नीशियम, पोटाशियम, आयोडीन, क्लोरीन और गन्धक खाने के खनिज हैं।

प्रश्न 3.
भाप से पकाया भोजन अच्छा क्यों होता है ?
उत्तर-
भाप से पके भोजन में पौष्टिक तत्त्व खराब नहीं होते हैं ।

प्रश्न 4.
हमारे शरीर में कितने प्रतिशत तक पानी होता है ?
उत्तर-
हमारे शरीर में 60 प्रतिशत पानी होता है ।

प्रश्न 5.
प्रोटीन कितने प्रकार के होते हैं ? उनके नाम लिखो।
उत्तर-
प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं-पशु प्रोटीन तथा वनस्पति प्रोटीन।

प्रश्न 6.
पशु प्रोटीन के तीन स्रोत बताओ।
उत्तर-
मांस, मछली और दूध।

प्रश्न 7.
वनस्पति प्रोटीन के तीन स्त्रोत बताओ।
उत्तर-
दालें, मटर, सोयाबीन।

प्रश्न 8.
कार्बोहाइड्रेट्स क्या हैं ?
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट्स कार्बन और हाइड्रोजन का मिश्रण है।

प्रश्न 9.
विटामिन कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
विटामिन छ: प्रकार के होते हैं-A, B, C, D, E और K।

प्रश्न 10.
अंधराता रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है ?
उत्तर-
यह रोग विटामिन A की कमी के कारण होता है।

प्रश्न 11.
किस विटामिन की कमी के कारण स्कर्वी रोग हो जाता है ?
उत्तर-
विटामिन C की कमी के कारण।

प्रश्न 12.
बेरी-बेरी रोग किस विटामिन की कमी के कारण हो जाता है ?
उत्तर-
विटामिन B की कमी के कारण।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन

प्रश्न 13.
पायोरिया रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है ?
उत्तर-
विटामिन C की कमी के कारण।

प्रश्न 14.
बांझपन का रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है ?
उत्तर-
विटामिन E की कमी के कारण।

प्रश्न 15.
कौन-से विटामिन पानी में घुलनशील नहीं हैं ?
उत्तर-
विटामिन C, D, E और K।

प्रश्न 16.
छोटे बच्चे के लिए कौन-सा दूध अच्छा होता है ?
उत्तर-
माँ का दूध।

प्रश्न 17.
भोजन पकाने के कौन-कौन से ढंग हैं ? नाम बताओ।
उत्तर-
उबालना, भूनना, तलना और भाप द्वारा पकाना।

प्रश्न 18.
हमारे दैनिक भोजन में प्रोटीन की मात्रा कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर-
70 से 100 ग्राम।

प्रश्न 19.
कार्बोहाइड्रेट्स किन तत्त्वों का मिश्रण है ?
उत्तर-
ऑक्सीजन, हाइड्रोजन तथा कार्बन।

प्रश्न 20.
कार्बोहाइड्रेट्स किन दो रूपों में मिलते हैं ?
उत्तर-
स्टॉर्च तथा शर्करा के रूप में।

प्रश्न 21.
प्रोटीन किन तत्त्वों का मिश्रण है ?
उत्तर-
कार्बन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन तथा गन्धक।

प्रश्न 22.
जीवन तत्त्व किन्हें कहते हैं ?
उत्तर-
विटामिनों को।

प्रश्न 23.
पानी में घुलनशील विटामिन कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
विटामिन B तथा C।

प्रश्न 24.
हमारे भोजन में चर्बी (वसा) की मात्रा कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर-
50 से 70 ग्राम।

प्रश्न 25.
लोहे की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है ?
उत्तर-
रक्त में हीमोग्लोबिन कम हो जाता है।

प्रश्न 26.
भोजन खाने का स्थान कैसा होना चाहिए ?
उत्तर-
साफ-सुथरा और हवादार।

छोट जत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन हमारे शरीर के लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
प्रत्येक मनुष्य को जीवित रहने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। हम प्रतिदिन किसी-न-किसी खेल में भाग लेते हैं अथवा कई अन्य प्रकार के कार्य करते हैं।
इसके साथ ही हम हर समय शारीरिक क्रियाएं करते हैं। इन सभी क्रियाओं को पूरा करने के लिए हमें शक्ति की आवश्यकता होती है। वह शक्ति हमें भोजन से ही मिलती है।

प्रश्न 2.
भोजन से हमें क्या लाभ हैं ?
उत्तर-

  1. भोजन शरीर को शक्ति देता है।
  2. भोजन से शरीर बढ़ता है।
  3. भोजन से शरीर के टूटे-फूटे तन्तुओं की मुरम्मत होती है।
  4. इससे नए तन्तुओं का निर्माण होता है।
  5. भोजन से रोगों का मुकाबला करने के लिए शक्ति मिलती है।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 2 पौष्टिक और सन्तुलित भोजन

प्रश्न 3.
सन्तुलित भोजन के मुख्य तत्त्व कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
सन्तुलित भोजन के मुख्य तत्त्व हैं –

  1. प्रोटीन
  2. कार्बोहाइड्रेट्स अथवा कार्बोज़
  3. वसा (चर्बी)
  4. विटामिन
  5. खनिज लवण
  6. जल
  7. फोकट।

प्रश्न 4.
पानी हमारे शरीर के लिए क्यों लाभदायक है ?
उत्तर-
प्रत्येक मनुष्य को जीवित रहने के लिए पानी की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकते। पानी के नीचे लिखे लाभ हैं

  1. पानी शरीर के सभी सैलों के पालन-पोषण में सहायता करता है।
  2. यह भोजन को अच्छी प्रकार से घोलकर पाचन क्रिया में सहायता देता है।
  3. पानी पौष्टिक तत्त्वों को शरीर के सभी भागों तक ले जाता है।
  4. पानी शरीर के व्यर्थ पदार्थों को पसीने द्वारा बाहर निकाल देता है।
  5. पानी शरीर के तापमान को स्थिर रखता है।

प्रश्न 5.
भोजन पकाना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
भोजन पकाने की आवश्यकता-अच्छी तरह पका हुआ भोजन सेहत के लिए लाभदायक होता है। निम्नलिखित कारणों से भोजन को पकाना अत्यन्त आवश्यक है –

1. ठीक ढंग से पका हुआ भोजन आसानी से पचने के योग्य बन जाता है।
2. भोजन के पकाने से रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
3. पकाया हुआ भोजन स्वादिष्ट होता है। इसलिए उसे खाने को मन करता है।
4. पकाने से खाद्य पदार्थों को अधिक देर तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

बड़े उत्तर वाला प्रश्न

प्रश्न-
भोजन पकाने के विभिन्न ढंगों का वर्णन करें।
उत्तर-
भोजन पकाने के ढंग-भोजन पकाने के लिए निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है
1. उबालना (Boiling) 2. भाप द्वारा पकाना (Cooking With Steam) 3. भूनना (Roasting) 4. तलना (Fry)। इन तरीकों का नीचे संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है –

1. उबालना (Boiling)-इस विधि से खाद्य पदार्थों को पानी में उबालकर पकाया जाता है, परन्तु ऐसा करने से खनिज लवण और विटामिन पानी में घुलकर नष्ट हो जाते हैं। खाद्य पदार्थों को उबालते समय थोड़े-से पानी का प्रयोग करना चाहिए। यदि अधिक पानी पड़ जाए तो उस पानी को फेंक देना चाहिए। चावल, दालें, मांस और सब्जियां आदि उबाल कर ही पकाए जाते हैं।

2. भाप द्वारा पकाना (Cooking with Steam) भोजन भाप द्वारा भी पकाया जाता है। इस विधि से तैयार किए गए भोजन में से लाभदायक तत्त्व नष्ट नहीं होते। कुकर में पकाया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। इसलिए इस विधि को अन्य विधियों से श्रेष्ठ समझा जाता है।

3. भूनना (Roasting)-इस विधि द्वारा भोजन को सीधे आग पर रख कर भूना जाता है। अधिक भूनने से भी भोजन के तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार भूना हुआ मांस स्वादिष्ट होता है और शीघ्र हज्म हो जाता है।

4. तलना (Fry)-पकौड़े, समोसे और पूरियां आदि तेल में पकाए जाते हैं। तलने से भोजन शीघ्र तैयार हो जाता है तथा स्वादिष्ट भी बन जाता है। इस विधि से भी भोजन के पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। तले हुए खाद्य पदार्थ शीघ्र हज्म नहीं होते और स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होते हैं। सबसे अच्छा ढंग-ऊपर बताई गई चारों विधियों में से भाप द्वारा भोजन पकाने की विधि सबसे उत्तम है। इस विधि से पकाए हुए भोजन में से पौष्टिक तत्त्व नष्ट नहीं होते हैं। इस प्रकार पकाया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता

Punjab State Board PSEB 8th Class Welcome Life Book Solutions Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Welcome Life Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता

Welcome Life Guide for Class 8 PSEB शारीरिक स्वच्छता InText Questions and Answers

बहत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हम अच्छे स्वास्थ्य को कैसे बनाए रख सकते हैं?
उत्तर-
अच्छे स्वास्थ्य के लिए शरीर को साफ-सुथरा रखना चाहिए।

प्रश्न 2.
अच्छे स्वास्थ्य का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
अच्छा स्वास्थ्य खुद को और समाज के अन्य सदस्यों को बीमारी और कई अन्य बीमारियों से बचाने का एक तरीका है।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता

प्रश्न 3.
अच्छी आदतों से आपका क्या भाव है?
उत्तर-
अच्छी आदतें वह क्रिया और गतिविधियां हैं जो किसी व्यक्ति और समाज के लिए अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 4.
दो अच्छी आदतों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. खाने से पहले व बाद में हाथ धोना।
  2. खांसते व छींकते समय मुँह को ढकना।

प्रश्न 5.
क्या हमें सड़क के किनारे बिकने वाला खुला भोजन खाना चाहिए?
उत्तर-
नहीं, अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए हमें सड़क पर बिकने वाला अस्वस्थ भोजन नहीं खाना चाहिए।

प्रश्न 6.
हमें सड़क के किनारे बिकने वाला भोजन क्यों नहीं खाना चाहिए?
उत्तर-
क्योंकि सड़क पर बिकने वाला भोजन हमें बीमार तथा अस्वस्थ बना सकता है।

प्रश्न 7.
हमें नशीले पदार्थों से क्यों दूर रहना चाहिए?
उत्तर-
हमें अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दवाओं और नशीले पदार्थों से दूर रहना चाहिए क्योंकि इनके दुरुपयोग से हमारा शरीर बर्बाद और अस्वस्थ होता जाता है।

प्रश्न 8.
क्या हमें कच्ची सब्जियों को बिना धोए खाना चाहिए?
उत्तर-
नहीं, हमें कभी भी कच्ची सब्जियों को बिना धोए नहीं खाना चाहिए।

प्रश्न 9.
क्या हमें रोजाना स्नान करना चाहिए?
उत्तर-
जी हाँ। हमें रोज़ाना स्नान करना चाहिए।

प्रश्न 10.
क्या हमें रोजाना अपने बालों को धोना चाहिए?
उत्तर-
यदि हमारे बाल छोटे हैं तो हमें अवश्य रोज़ धोने चाहिए परन्तु यदि हमारे बाल लम्बे हैं तो हमें कम-सेकम सप्ताह में एक बार जरूर धोने व अच्छे से सखाने चाहिए।

प्रश्न 11.
क्या परिवार के सभी सदस्यों के लिए एक सामान्य तौलिया होना चाहिए?
उत्तर-
नहीं, हर सदस्य का अपना अपना अलग तौलिया होना चाहिए।

प्रश्न 12.
कितने समय बाद हमें अपने नाखुन काटने चाहिए?
उत्तर-
हमें साप्ताहिक तौर पर अपने नाखुन काटने चाहिए।

प्रश्न 13.
क्या हमारे शरीर की स्वच्छता की देखभाल हमारे लिए अच्छी है?
उत्तर-
जी हाँ। शरीर की स्वच्छता की देखभाल हमारे लिए अच्छी है।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता

प्रश्न 14.
हमें अपने दांतों को क्यों साफ करना चाहिए?
उत्तर-
दांतों को साफ-सुथरा व चमकदार रखने के लिए रोज़ाना दांतों की सफाई करनी चाहिए।

प्रश्न 15.
क्या परिवार के सभी सदस्यों के लिए एक सामान्य कंघी होनी चाहिए?
उत्तर-
नहीं । हर एक सदस्य की अपनी एक अलग कंघी होनी चाहिए।

प्रश्न 16.
हम खुद को बीमारियों से कैसे दूर रख सकते हैं?
उत्तर-
हम स्वस्थ रहकर खुद को बीमारियों से दूर रख सकते हैं।

प्रश्न 17.
दांतों की रोजाना सफाई करनी क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
दांतों की रोजाना सफाई करने से दांत व मसूड़े साफ तथा मजबूत रहते हैं।

प्रश्न 18.
हमें किस प्रकार के कपड़े पहनने चाहिए?
उत्तर-
हमें हमेशा साफ व सूखे कपड़े पहनने चाहिए।

प्रश्न 19.
हमें अपने नाखुनों को साफ क्यों रखना चाहिए?
उत्तर-
अपने नाखुनों को साफ रखने से हमें हानिकारक वैक्टीरिया के प्रसार से बचने में मदद मिलेगी।

प्रश्न 20.
हमें अपने शरीर को स्वच्छ क्यों रखना चाहिए?
उत्तर-
शरीर को स्वच्छ रखने से हम बीमारियों के प्रसार को रोकने में सफल होंगे।

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छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हम किस प्रकार अपने बालों को स्वस्थ रख सकते हैं?
उत्तर-
हम अपने बालों को अच्छी तरह धो कर व सुखा कर स्वस्थ रख सकते हैं। छोटे बालों को रोज़ाना धोना चाहिए और यदि बाल लम्बे हैं तो सप्ताह से एक बार धोने चाहिए। हमें अपने बालों को साबुन या शैंपू से अच्छी तरह धोना चाहिए और अच्छी तरह सुखाना चाहिए।

प्रश्न 2.
हम अपने दांतों को किस प्रकार स्वस्थ रख सकते हैं?
उत्तर-
दांतों को स्वस्थ रखने के लिए हमें रोज़ाना दांतों की सफाई करनी चाहिए। दांतों की सफाई के लिए एक अच्छे दन्तमंजन का इस्तेमाल करना चाहिए। दांतों की सफाई के लिए हम दातुन का प्रयोग भी कर सकते हैं।

प्रश्न 3.
स्वस्थ रहने के लिए हाथ साफ करना सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है सपष्ट करें।
उत्तर-
हमें अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह से साफ करना चाहिए, विशेष रूप से शौचालय जाने के बाद, खाना खाने से पहले और बाद में, खेलने के बाद आदि। बागवानी के बाद या कोई अन्य गतिविधियां जो हमारे हाथों को गंदा करती हैं। यदि हम गन्दे हाथों से खाते हैं तो हमारे बीमार होने की सम्भावना अधिक होती है। इसका कारण यह है कि वायरस और रोगाणु पैदा करने वाले कई रोग सीधा हमारे पेट में प्रवेश करते हैं और हमें बीमार करते हैं।

प्रश्न 4.
मुँह और नाक ढकना क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
खांसते और छींकते वक्त हमारे मुँह तथा नाक से रोगाणु पैदा करने वाली तरल बूंदें निकलती हैं जो कि दूसरे लोगों को बीमार कर सकती हैं। खांसते व छींकते वक्त मुँह और नाक को ढकना ज़रूरी है। क्योंकि ऐसा करने से रोगाणु पैदा करने वाली तरल बूंदों को रोका जा सकता है, जिससे दूसरे लोगों को स्वस्थ तथा रोगाणु मुक्त रखने में मदद मिलती है।

प्रश्न 5.
कुछ आदतें जो हमें स्वस्थ रहने में मदद करती हैं लिखें।
उत्तर-
निम्नलिखित आदतें हमें स्वस्थ रहने में मदद करती हैं

  1. हमें अपने नाखुन साफ रखने चाहिए और साप्ताहिक उन्हें काटना चाहिए।
  2. यदि हम अपने कपड़े दोबारा पहनना चाहते हैं तो हमें उन्हें धूप में रखना चाहिए।
  3. हमें सड़क के किनारे बेचे जाने वाले खुले भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि यह हमें बीमार करता है।
  4. दवाओं का दुरुपयोग हमारे शरीर को बर्बाद कर देता है इसलिए हमें अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दवाओं से दूर रहना चाहिए।

प्रश्न 6.
फलों और सब्जियों का प्रयोग करने से पहले हमें इन्हें क्यों धोना चाहिए?
उत्तर-
बाज़ार से लाए जाने वाले फल और सब्जियां कई हाथों से निकली हुई होती हैं और उनमें बहुत सारे कीटाणु होते हैं। यह कीटाणु हमारे शरीर में जाकर कई प्रकार की जानलेवा बीमारियां पैदा करते हैं। इसलिए ऐसी कई जानलेवा बीमारियों से बचने के लिए हमें फलों और सब्जियों को इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह धो लेना चाहिए।

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प्रश्न 7.
शरीर को साफ रखने के फायदों के बारे में नीचे लिखें।
उत्तर-
शरीर को साफ रखने के फायदे इस प्रकार हैं

  1. यह हमें स्वस्थ, तरोताजा तथा ऊर्जावान बनाए रखता है।
  2. हम शरीर को साफ रखकर बीमारियों में बच सकते हैं और दवाइयों और अस्पताल के खर्चों से बच सकते
  3. शरीर को साफ रखकर हम बीमारियों को फैलने से रोक सकते हैं तथा समाज को स्वस्थ रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
  4. स्वस्थ रहकर हम अधिक काम करेंगे और इस प्रकार हमारे देश के विकास और प्रगति में योगदान कर सकते हैं।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वस्थ रहने के लिए विभिन्न तरीकों व साधनों का वर्णन करें।
उत्तर-
निम्नलिखित आदतें हमें स्वस्थ रहने में मदद करती हैं जोकि इस प्रकार हैं

  1. रोज़ाना स्नान-हमें रोज़ाना साबुन व पानी से स्नान करना चाहिए जिससे शरीर पर लगी धूल मिट्टी धुल जाती है और हम स्वस्थ रहते हैं।
  2. बालों की सफ़ाई-हमें नियमित रूप से अपने बालों की सफाई करनी चाहिए। यदि बाल लम्बे हों तो उन्हें सप्ताह में एक बार साबुन या शैम्पू से अवश्य धोना चाहिए और यदि बाल छोटे हैं तो उन्हें प्रतिदिन साबुन या शैम्पू से धोना चाहिए और बालों को अच्छे से सुखाना चाहिए।
  3. दाँतों की सफाई- हमें नियमित रूप से दांतों की सफाई करनी चाहिए। दिन में दो बार दांतों को दंतमंजन से अच्छी तरह साफ करना चाहिए। ऐसा करने से हमारे दांत मजबूत व चमकदार बनते हैं साथ ही सांसों की बदबू से भी छुटकारा मिलता है।
  4. साबुन से हाथ धोना-हमें अपने हाथों को साबुन व पानी के साथ अच्छी तरह से धोना चाहिए, विशेषरूप से शौचालय जाने के बाद, भोजन करने से पहले व बाद में, खेलने के बाद, बागबानी के बाद तथा ऐसे कार्यों के बाद जिनके कारण हमारे हाथ गन्दे होते हैं। यदि हम बिना हाथों को धोए भोजन करते हैं तो हाथों पर लगे कीटाणु हमारे शरीर में जाकर कई प्रकार की बीमारियां पैदा कर सकते हैं जिससे हम अस्वस्थ हो जाएंगे।
  5. साफ़ कपड़े पहनना-हमें हमेशा ऐसे कपड़े पहनने चाहिए जो अच्छी तरह से साबुन से धुले और सही तरह से धूप में सूखे हों। यदि आप किसी भी वस्त्र को दोबारा पहनना चाहते हैं तो उसे पहले अच्छे से धूप लगवा लें फिर पहनें।
  6. अलग तौलिया और कंघा-परिवार के प्रत्येक सदस्य का अपना एक अलग तौलिया और कंघा होना चाहिए।
  7. मुँह तथा नाक को ढकना-खांसते व छींकते वक्त हमें अपने नाक और मुंह को रूमाल से ढकना ज़रूर चाहिए। यह नाक व मुंह से निकलने वाली तरल बूंदों को दूसरों के शरीर में जाने से रोकता है जिससे समाज के दूसरे लोग रोगमुक्त रहते हैं।
  8. नाखुनों की सफ़ाई-हमें हमेशा अपने नाखुनों को साफ रखना चाहिए तथा हर सप्ताह नाखुनों को काटना चाहिए।

प्रश्न 2.
सुबह के समय हमारी दिनचर्या क्या होनी चाहिए?
उत्तर-
निम्नलिखित गतिविधियां हमारी सुबह की दिनचर्या का हिस्सा होनी चाहिए:

  1. हमें सुबह उठने के तुरंत बाद अपना चेहरा धोना चाहिए और अपने दांतों को ब्रश करना चाहिए।
  2. टॉयलेट करने के बाद हमें अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह से धोना चाहिए।
  3. हमें व्यायाम या योग करना चाहिए।
  4. हमें साबुन और शैम्पू का उपयोग करके अपने शरीर और बालों को साफ़ करना चाहिए।
  5. हमें अपने शरीर और बालों को साफ़ और सूखे तौलिए से सुखाना चाहिए। हमारे लिए अलग तौलिया और कंघा होना चाहिए और इन्हें किसी के साथ साझा नहीं करना चाहिए।
  6. हमें सही ढंग से साफ़ और ठीक से प्रेस किए हुए कपड़े पहनने चाहिए।
  7. हमें ताज़ा और ठीक से पकाया हुआ नाश्ता लेना चाहिए, नाश्ते से पहले और बाद में हमें अपने हाथ धोने
    चाहिए।

प्रश्न 3.
हमारी दोपहर में या स्कूल से घर आने के बाद क्या दिनचर्या होनी चाहिए?
उत्तर-
निम्नलिखित गतिविधियाँ दोपहर की और स्कूल से घर आने के बाद दिनचर्या का हिस्सा होनी चाहिए:

  1. हमें अपने चेहरे और हाथों को अच्छी तरह से धोना चाहिए।
  2. हमें अपने स्कूल की वर्दी बदलनी चाहिए और साफ कपड़े पहनने चाहिए। हमें अपने गंदे कपड़ों को वॉशिंग मशीन या वॉशिंग एरिया में रखना चाहिए।
  3. हमें अपने स्कूल बैग को उचित स्थान पर रखना चाहिए।
  4. हमें थोड़ी देर आराम करना चाहिए और फिर कुछ पीने या खाने के लिए जाना चाहिए। गर्मियों में हमें घर पहुंचने के तुरंत बाद ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए।

प्रश्न 4.
लंच या डिनर के दौरान हमारी दिनचर्या क्या होनी चाहिए?
उत्तर-
दोपहर के भोजन के दौरान निम्नलिखित गतिविधियाँ हमारी दिनचर्या का हिस्सा होनी चाहिए:

  1. हमें ताजा और ठीक से पकाया हुआ लंच या डिनर लेना चाहिए। हमें दोपहर या रात के खाने से पहले और बाद में अपने हाथ धोने चाहिए।
  2. भोजन लेने के लिए हमें उचित रूप से धुले और साफ़ बर्तनों का उपयोग करना चाहिए।
  3. हमें अपनी थाली में खाना नहीं छोड़ना चाहिए। प्लेट में बचा यह कचरा रोगाणु पैदा करने वाली बीमारी को आमंत्रित करता है।
  4. हमें बर्तन धोने वाले स्थान पर या सिंक में बर्तनों को रखना चाहिए। यह अच्छा है यदि हम उन्हें तुरंत धो लें और इन्हें उचित स्थान पर रखें।
  5. हमें सड़क के किनारे से कुछ भी नहीं खाना चाहिए, यदि वह कवर नहीं है या विक्रेता उन्हें गंदे स्थान पर बेच रहा है।
  6. फलों और सब्जियों को खाने से पहले हमें इसे अच्छी तरह से धोना चाहिए।
  7. हमें धागे की मदद से दांतों के बीच फंसे भोजन को निकालना चाहिए।

प्रश्न 5.
खेलने के बाद खेल के मैदान से घर लौटने पर हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर-
जब हम खेलने के बाद खेल के मैदान से घर लौटते हैं, तो हमें निम्नलिखित कार्य करना चाहिए :

  1. घर वापस आने के बाद कुछ देर आराम करना चाहिए।
  2. आराम करने के बाद हमें अपना चेहरा और हाथ धोने चाहिए। गर्मियों के दौरान स्नान करना अच्छा होता
  3. हमें आपके कपड़े बदलने चाहिए।
  4. हमें जल स्तर की भरपाई के लिए कुछ पीना चाहिए।
  5. हम ऊर्जा के नुकसान की भरपाई के लिए कार्बोहाइड्रेट से भरपूर कुछ स्नैक्स (खाना खाना) खाने चाहिए।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता

प्रश्न 6.
सोने से पहले हमारी दिनचर्या क्या होनी चाहिए?
उत्तर-
हमें रात के खाने के लगभग दो घंटे बाद बिस्तर पर जाना चाहिए और सोने से पहले निम्न कार्य करना चाहिए

  1. हमें साफ-सुथरी रात की पोशाक पहननी चाहिए।
  2. हमें अपने हाथों और पैरों को गर्म पानी से धोना और साफ़ करना चाहिए। हमें गर्मियों के दौरान ताजे पानी से और सर्दियों के दौरान गर्म पानी से अपना मुंह अच्छी तरह से धोना चाहिए।
  3. हमें साफ बिस्तर का उपयोग करके एक बिस्तर बनाना चाहिए।
  4. हमें अपने बिस्तर के पास थोड़ा ताज़ा पानी रखना चाहिए।
  5. हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शयनकक्ष साफ-सुथरा और हवादार हो।

प्रश्न 7.
अपनी दिनचर्या की जाँच करने के बाद बताएं कि वे कौन-सी आदतें हैं जिनका अधिकांश लोगों द्वारा ध्यान नहीं दिया जाता है।।
उत्तर-
अपनी दिनचर्या से हम जानते हैं कि अधिकांस लोग यह जानने के बाद भी कुछ आदतों को अनदेखा करते हैं कि यह हमारी दिनचर्या में शामिल होना चाहिएं

  1. हम आमतौर पर सोने से पहले ब्रश नहीं करते हैं।
  2. हम आमतौर पर भोजन लेने के बाद अपने हाथ नहीं धोते हैं।
  3. हम आमतौर पर कपड़े का उपयोग करने से पहले अपने कपड़े धूप में नहीं रखते हैं।
  4. हम आमतौर पर रात का खाना खाते हैं और खाने के तुरंत बाद बिस्तर पर जाते हैं।
  5. हम नियमित रूप से योग का अभ्यास नहीं करते हैं।
  6. हम रात के खाने के दौरान भारी और गरिष्ठ भोजन खाते हैं।
  7. जब हम भूखे होते हैं तो हमें सड़क के किनारे बिकने वाला खुला खाना खाने से बचना चाहिए।
  8. हम बासी खाना गर्म करने के बाद या बिना गर्म किए खाते हैं।
  9. हम अपने भोजन में विभिन्न प्रकार की चीज़ों को नहीं रखते हैं।
  10. हम ज्यादातर मूल भोजन खाते हैं और नियमित रूप से सलाद और हरी पत्तेदार सब्जियां नहीं खाते हैं।
  11. खांसते या छींकते समय हम अपनी नाक और मुंह नहीं ढंकते।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
“हमारा सबसे अच्छा दोस्त हमारा:
(क) अच्छा स्वास्थ्य
(ख) पैसा
(ग) परिवार
(घ) रिश्तेदार।
उत्तर-
(क) अच्छा स्वास्थ्य।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित कार्यों में से कौन-सा कार्य हमें सेहतमन्द रहने में सहायता करता है?
(क) अधिक पौष्टिक भोजन खाना
(ख) नियमित व्यायाम करना
(ग) पर्याप्त आराम करना
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 3.
हमें अपने नाखुन काटने चाहिए:
(क) रोजाना
(ख) साप्ताहिक
(ग) महीने में एक दिन (मासिक)
(घ) कभी भी नहीं।
उत्तर-
(ख) साप्ताहिक।

प्रश्न 4.
हमें अपने दांतों की सफाई करनी चाहिए:
(क) सोने से पहले और सुबह उठने के बाद
(ख) खेल के मैदान से आने के बाद
(ग) पढ़ने के बाद
(घ) व्यायाम करने के बाद।
उत्तर-
(क) सोने से पहले और सुबह उठने के बाद।

प्रश्न 5.
हमेशा अपने मुंह को अपने हाथों से ढक लेना चाहिए:
(क) छींकने पर
(ख) खांसने पर
(ग) छींकने तथा खांसने पर
(घ) भोजन करते वक्त।
उत्तर-
(ग) छींकने तथा खांसने पर।

प्रश्न 6.
हमें हमेशा अपने पास रखना चाहिए:
(क) एक कलम
(ख) एक किताब
(ग) एक रूमाल
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(ग) एक रूमाल।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता

प्रश्न 7.
निम्नलिखित कार्यों में से कौन-सा कार्य हमें रोजाना करना चाहिए?
(क) नहाना
(ख) दांतों की सफाई
(ग) व्यायाम
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 8.
हमें रोज़ सुबह ………….. करना चाहिए।
(क) नाश्ता
(ख) दांतों की सफाई
(ग) व्यायाम
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ग़लत है?
(क) खांसते वक्त रूमाल का इस्तेमाल करना
(ख) हमेशा अपने नाखुनों को दांतों से काटना
(ग) हाथ धोने के बाद नल बन्द करना
(घ) हमेशा कूड़ा कूड़ेदान में फैंकना।
उत्तर-
(ख) हमेशा अपने नाखूनों को दांतों से काटना।

प्रश्न 10.
निम्नलिखित कथनों को ध्यान में रखते हुए सही विकल्प चुनें। कथन (क) हमें रोजाना सुबह नाश्ता करना चाहिए कथन (ख) हमें रोज़ाना अपने दांतों अथवा बालों की सफाई करनी चाहिए।
(क) कथन क सही तथा
(ख) गलत है
(ख) कथन क गलत तथा ख सही है
(ग) दोनों क व ख सही हैं
(घ) दोनों कथन गलत हैं।
उत्तर-
(ग) दोनों क व ख सही हैं।

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से कौन-सा ज़रूरी नहीं? अपने हाथों को ……… धोना।
(क) खाने से पहले
(ख) खाने के बाद
(ग) खाने से पहले व बाद
(घ) कभी नहीं।
उत्तर-
(ग) खाने से पहले व बाद।

प्रश्न 12.
हमें उबला हुआ पानी पीना चाहिए क्योंकि उबालने से पानी में मौजूद ……… मर जाते हैं।
(क) रोगाणु
(ख) खनिज पदार्थ
(ग) a व b
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) रोगाणु।

प्रश्न 13.
फ्लासिंग (दांतों की साफ करवाना) अनेक प्रकार के कार्य करता है। परन्तु निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य नहीं करता?
(क) दांतों के बीच से खाना हटाना।
(ख) मसूड़ों की कमी को रोकने में मदद करना
(ग) सांसों की बदबू को रोकने में मदद करना
(घ) दांतों की परत को बहाल करने में मदद करना।
उत्तर-
(घ) दांतों की परत को बहाल करने में मदद करना।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 1 शारीरिक स्वच्छता

रिक्त स्थान भरो:

  1. हमें हमेशा अपने पास एक ……………… रखना चाहिए।
  2. हमें हमेशा अपने …………….. खाना खाने से पहले अथवा बाद में धोने चाहिए।
  3. हमें हमेशा साफ व सूखे ……………… पहनने चाहिए।
  4. हमें हमेशा खांसते व छींकते वक्त अपना …………….. ढकना चाहिए।
  5. हमें हर सप्ताह अपने …………… काटने चाहिए। 6. हमें दिन में दो बार अपने ……………… साफ करने चाहिए।
  6. हमें हमेशा सड़क पर बिकने वाला …………… खाद्य पदार्थों को खाने से बचना चाहिए।
  7. हमें रोज़ाना ……………. करना चाहिए।
  8. हमें हमेशा अपने …………….. को सुलझे तथा साफ रखना चाहिए।
  9. हमारे ……………… को स्वस्थ रखकर अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है।

उत्तर –

  1. रूमाल
  2. हाथ
  3. कपड़े
  4. मुँह
  5. नाखुन
  6. दांत
  7. अस्वच्छ
  8. स्नान
  9. बालों
  10. शरीर।

सही/ग़लत:

  1. एक परिवार के पास केवल एक कंघी होनी चाहिए।
  2. हमें हमेशा अपने नाखुन साफ रखने चाहिए तथा उनको कभी नहीं काटना चाहिए।
  3. सड़क पर बिकने वाला खुला भोजन हमारी सेहत के लिए हानिकारक होता है।
  4. दांतों की रोज़ाना सफ़ाई हमारे दांतों और मसूड़ों को साफ और कमजोर रखने में मदद करती है।
  5. कीटाणु हमारे पेट में प्रवेश करने पर कई जानलेवा संक्रमण पैदा कर सकते हैं।
  6. फलों और सब्जियों को खाने से पहले अच्छी तरह धोना चाहिए।
  7. सड़क के किनारे बिकने वाले खुले भोजन को खाना एक अच्छी आदत है।
  8. रोज़ाना कसरत और योगा करना हमारे शरीर को कमज़ोर करता है।
  9. लंबे बालों को हफ्ते में कम-से-कम एक बार धोना चाहिए और अच्छी तरह सुखाना चाहिए।
  10. हम अपने आस-पास को गंदा रख अच्छा स्वास्थ्य पा सकते हैं।

उत्तर-

  1. ग़लत
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही
  6. सही
  7. ग़लत
  8. ग़लत
  9. सही
  10. ग़लत।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 2 आत्म-संयम

Punjab State Board PSEB 8th Class Welcome Life Book Solutions Chapter 2 आत्म-संयम Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Welcome Life Chapter 2 आत्म-संयम

Welcome Life Guide for Class 8 PSEB आत्म-संयम InText Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरी वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
आत्म-संयम क्या है?
उत्तर-
यह एक ऐसा गुण है जो हम सभी के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 2.
क्या आत्म-संयम सीखना आसान है?
उत्तर-
नहीं, आत्म-संयम सीखना आसान नहीं है।

प्रश्न 3.
क्या हम सभी एक ही समय में आत्म-संयम सीख सकते हैं?
उत्तर-
नहीं, अलग-अलग लोग अलग-अलग समय में आत्म-संयम सीखते हैं।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 2 आत्म-संयम

प्रश्न 4.
हमें अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में क्या मदद करता है?
उत्तर-
निरंतर प्रयास और आत्म-संयम हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करते हैं।

प्रश्न 5.
हमारी ताकत और कमजोरियों को जानना हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। हां या नहीं।
उत्तर-
हां, इससे हमें उन चीज़ों के बारे में पता चलेगा, जिन पर हमें कड़ी मेहनत करनी चाहिए।

प्रश्न 6.
क्यों हमारे लिए लक्ष्य निर्धारित करना महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर-
क्योंकि, यह हमें इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लगातार काम करने में मदद करता है।

प्रश्न 7.
स्कूल में हमारे प्रदर्शन को बेहतर बनाने में क्या हमारी मदद कर सकता है?
उत्तर-
आत्म-संयम, स्कूल में हमारे प्रदर्शन को बेहतर बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

प्रश्न 8.
हमें एक सकारात्मक और आशावादी सोच रखनी चाहिए। क्यों?
उत्तर-
इससे हमें आत्म-संयम विकसित करने में मदद मिलती है।

प्रश्न 9.
क्या हम अपनी आदतें बदल सकते हैं?
उत्तर-
हां, हम निरंतर प्रयासों और आत्म-संयम के साथ अपनी आदतों को बदल सकते हैं।

प्रश्न 10.
क्या हमें अपनी गलतियों को माफ़ करना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए?
उत्तर-
जी हां, हमें अपनी गलतियों को माफ़ करना चाहिए, गलतियों को याद रखने से यह हमारी प्रगति के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।

प्रश्न 11.
यदि हमारे हित और विचार दूसरों के साथ मेल नहीं खा रहे हैं तो हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर-
हमें अपने अद्वितीय हितों का पालन करने और अपने स्वतंत्र विचारों को व्यक्त करने का साहस होना चाहिए।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 2 आत्म-संयम

प्रश्न 12.
हम पारस्परिक संबंधों के लिए कैसे मजबूत हो सकते हैं?
उत्तर-
यदि हमारे पास आत्म-संयम है और निरंतर प्रयास करते हैं तो हमारे पारस्परिक संबंध मजबूत हो जाते हैं।

प्रश्न 13.
हम अपना आत्म-विश्वास कैसे बढ़ा सकते हैं?
उत्तर-
हमारा आत्म-विश्वास आत्म-संयम के साथ बढ़ता है।

प्रश्न 14.
हमें असफल होने से डरना नहीं चाहिए। यह सही है या नहीं।
उत्तर-
हां, यह इसलिए है क्योंकि असफलता सफलता की कुंजी है।

प्रश्न 15.
हम तनाव को हमसे दूर कैसे रख सकते हैं?
उत्तर-
हम अपने आप पर विश्वास करके अपने आप को तनाव मुक्त रख सकते हैं।

प्रश्न 16.
क्या हमें दूसरों द्वारा निर्धारित लक्ष्यों का पालन करना चाहिए?
उत्तर-
नहीं, हमें अपनी रुचि के आधार पर अपने लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए।

प्रश्न 17.
हमें अपने लक्ष्य कैसे निर्धारित करने चाहिए?
उत्तर-
हमें अपनी ताकत और कमज़ोरी जानने के बाद अपने लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए।

प्रश्न 18.
हमें दूसरों की नकल क्यों नहीं करनी चाहिए?
उत्तर-
हमें दूसरों की नकल नहीं करनी चाहिए क्योंकि हम उनसे अलग हैं और हमारे पास अलग-अलग क्षमताएं, कमजोरियां और ताकत हैं।

प्रश्न 19.
क्या हमें अन्य बुरी आदतों और कमजोरियों के साथ रहना चाहिए?
उत्तर-
नहीं, हमें अपनी बुरी आदतों को बदलने के लिए प्रयास करना चाहिए और अपनी कमजोरियों को कम करने पर काम करना चाहिए।

शेटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
आत्म-संयम क्या है?
उत्तर-
आत्म-संयम व्यक्ति की अपनी भावनाओं और इच्छाओं को नियंत्रित करने की क्षमता है, विशेष रूप से कठिन परिस्थितियों में आत्म-संयम सफल व्यक्तियों के व्यक्तित्व का एक प्रमुख घटक है। सभी लोग जो उच्च स्तर पर पहुंच चुके हैं, उनका खुद पर आत्म-संयम था।

प्रश्न 2.
आत्म-संयम नहीं होने के नुकसान क्या हैं?
उत्तर-
यदि किसी का खुद पर आत्म-संयम नहीं है, तो वह कठिन परिस्थितियों से मुकाबला नहीं कर पाएगा। जीवन फूलों की सेज़ नहीं है। इसलिए, जब भी हम कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं तो हम इसे अपने आत्मसंयम से दूर कर सकते हैं।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 2 आत्म-संयम

प्रश्न 3.
आत्म-संयम की विशेषताएं क्या हैं?
उत्तर-
आत्म-संयम एक आवश्यक गुण है जो हमें अपने निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हमारी भावनाओं, व्यवहार, पसंद और वरीयताओं को नियंत्रित करने की अनुमति देता है।

प्रश्न 4.
आत्म-संयम के क्या फायदे हैं?
उत्तर-
आत्म-संयम के साथ, हम अपने गंतव्य की ओर बढ़ सकते हैं, स्कूल में हमारे प्रदर्शन में सुधार होता है, हमारे पारस्परिक संबंध मज़बूत होते हैं, हमारा आत्म-विश्वास बढ़ता है, हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है।

प्रश्न 5.
क्या सुनिश्चित करता है कि हम एक दिन सफल हो जाएंगे?
उत्तर-
लक्ष्य निर्धारित करना यह सुनिश्चित करता है कि हम एक दिन सफल हो जाएंगे। एक बार जब हम अपनी क्षमता के अनुसार अपने प्रत्येक कार्य के लिए एक सीमा निर्धारित करते हैं, तो हम निश्चित रूप से अपने गंतव्य तक पहुंचने में सफल होंगे और इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि हमारी प्रगति कितनी धीमी है या हम अपने रास्ते में कितनी बार असफल हुए हैं।

प्रश्न 6.
अपनी आदतों को नियंत्रित करने के लिए दो सुझाव दें।
उत्तर-
यदि आप खुद को नियंत्रित करके अपनी आदतों और इच्छाओं के प्रभारी बनना चाहते हैं, तो यहां कुछ सुझाव दिए गए हैं

  1. अपनी कमियों के साथ-साथ ताकत की पहचान करें।
  2. सकारात्मक और आशावादी सोच रखें।

प्रश्न 7.
कुछ ऐसी आदतें लिखें जिन पर आपको गर्व है?
उत्तर-
मुझे अपनी निम्नलिखित आदतों पर गर्व है:

  1. मैं हमेशा वही बोलता हूँ जो मेरे मतलब का है और मैं अपनी बात रखता हूँ।
  2. मैं समय का बहुत पाबंद हूँ और आज का काम कल पर कभी नहीं डालता।
  3. मैं हमेशा जरूरतमंदों की मदद करता हूँ और अन्याय को कभी सहन नहीं करता।
  4. मैं ईश्वर द्वारा बनाए गए सभी जीवों से प्यार करता हूँ और मैं अपने देश को खुद से ज्यादा प्यार करता हूँ।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
विभिन्न चीज़ों का वर्णन करें जो आपको खुद को नियंत्रित करके अपनी आदतों और इच्छाओं का प्रभारी बनाते हैं।
उत्तर-
निम्नलिखित बातें मुझे अपनी आदतों और इच्छाओं को आत्म-संयम द्वारा प्रभारी बना सकती हैं:

  1. मुझे अपनी ताकत और कमजोरियों का पता होना चाहिए।
  2. मुझे आशावादी होना चाहिए और सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए।
  3. मुझे अपने लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए और उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए योजनाएं बनानी चाहिए।
  4. मुझे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए।
  5. मुझे फेल होने से डरना नहीं चाहिए। मैं अपनी असफलता से सीखता हूँ और सफलता पाने तक खुद को सुधारता हूँ।
  6. मुझे अपनी आदतों का विश्लेषण करना चाहिए। यदि मेरी सफलता में मेरी आदतें बाधा हैं, तो मुझे उन आदतों को बदलने के लिए अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए।
  7. मुझे पता है कि मैं कुछ कार्य करते समय कई गलतियां कर सकता हूँ। मैं अपनी गलतियों को लंबे समय तक अपने साथ लेकर नहीं चल सकता और गलतियां करने के लिए खुद को माफ करता हूँ। फिर, मैं अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ता हूँ।
  8. मैं हमेशा खुद से कहता हूँ कि मैंने अच्छा किया यदि मैंने कुछ स्तर की सफलता हासिल की।
  9. मुझे अपने आप पर विश्वास करना चाहिए और उनकी विशिष्टता की चिंता किए बिना अपने विचारों को व्यक्त करने का साहस करना चाहिए।
  10. मुझे पता है कि विभिन्न लोगों के अलग-अलग हित हैं। मुझे अपने हितों का पालन करना चाहिए, भले ही वे आम लोगों के साथ मेल न खा रहे हों।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 2 आत्म-संयम

प्रश्न 2.
आत्म-संयम का वर्णन करें।
उत्तर-
आत्म-संयम का अर्थ है व्यक्ति से संबंधित विभिन्न चीजों को नियंत्रित करना। यह एक आवश्यक गुण है जो हम सभी के पास होना चाहिए। यह हमें अपने निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हमारी भावनाओं, व्यवहार, पसंद और वरीयताओं को नियंत्रित करने की अनुमति देता है। यदि हमारे पास आत्म-संयम है, तो हम अपने गंतव्य की ओर बढ़ सकते हैं और स्कूल में हमारा प्रदर्शन बेहतर हो जाता है। इसके साथ हमारे पारस्परिक संबंध मज़बूत होते हैं और हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है। इससे हमें अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में भी मदद मिलती है।

आत्म-संयम हमें हमारे लक्ष्यों को निर्धारित करने और हमारी क्षमता के अनुसार प्रत्येक कार्य के लिए एक सीमा निर्धारित करने में मदद करता है। एक बार यह पूरा हो जाने के बाद हम निश्चित रूप से या कुछ समय बाद अपने गंतव्य तक पहुंचने में निश्चित रूप से सफल होंगे। हमारी प्रगति धीमी हो सकती है लेकिन हमारे जीवन के किसी पड़ाव पर हमारे पास आना निश्चित था।
खुशी से जीना और आत्म-संयम के बिना सफल बनना बहुत मुश्किल है।

प्रश्न 3.
एक गतिविधि की मदद से समझाएं कि हम आत्म-विश्वास और आत्म-संयम के माध्यम से अपने प्रदर्शन को कैसे बढ़ा सकते हैं?
उत्तर-
हम आत्म-विश्वास और आत्म-संयम के माध्यम से अपने प्रदर्शन को बढ़ावा दे सकते हैं यह निम्नलिखित गतिविधि की मदद से समझाया जा सकता है।
कागज़ की एक शीट और एक छोटी-सी किताब लें। क्या कागज़ की यह पतली शीट किताब पकड़ (hold) सकती है? इसका उत्तर ‘नहीं’ है क्योंकि हम जानते हैं कि यह संभव नहीं है। इसका कारण यह है कि कागज़ की शीट बहुत कमज़ोर है और इस प्रकार, यह उस पुस्तक के वज़न का समर्थन नहीं कर सकता है जो इसकी उठाने की क्षमता से परे है।
हम कागज़ की इस कम मजबूत शीट को एक मजबूत वस्तु में बदल सकते हैं। इसके लिए, कागज़ की इस पतली शीट को सिलेंडर या ट्यूब या पाइप के रूप में रोल करें। अब सिलेंडर या ट्यूब या पाइप के आकार की इस शीट पर एक छोटी-सी किताब रखें। – हम देख सकते हैं कि कागज़ की पतली शीट अब इस पर पुस्तक को सफलतापूर्वक पकड़ सकती है। यह प्रकट करता है कि पाइप का आकार लेकर कागज़ की शीट मजबूत हो गई है। इसने पुस्तक से अधिक वज़न सहन करने की शक्ति और क्षमता प्राप्त की है।
इसी तरह, हम बार-बार अभ्यास और आत्म-संयम के माध्यम से अपना आत्म-विश्वास भी बढ़ा सकते हैं। इस तरह हम अंततः अपनी क्षमताओं में सुधार करेंगे। यदि हम अपने आत्म-विश्वास को बढ़ाते हैं और अपनी भावनाओं, क्रोध, ईर्ष्या आदि को नियंत्रित करने और अपनी कमजोरियों को दूर करने में सक्षम होते हैं, तो हम निश्चित रूप से सफलता प्राप्त करेंगे।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित सवालों का जवाब दें:
(क) अपनी दो कमजोरियों के बारे में बताएं
(ख) अपनी दो शक्तियों के बारे में बताएं
(ग) अपने दो लक्ष्यों के बारे में बताएं जो कि आपने-अपने लिए निर्धारित किए हैं
(घ) अपनी उन दो उपलब्धियों का उल्लेख करें जिन पर आपको गर्व है
(ङ) अपनी दो आदतों का उल्लेख करें जिन्हें आप सुधारना चाहते हैं
(च) अपनी विफलताओं का उल्लेख करें जिन्होंने आपको बेहतर प्रगति के लिए सबक सिखाया है।
उत्तर-
(क) मेरी दो ताकतें।

  1. मेरा सकारात्मक रवैया है और कभी भी किसी भी परिस्थिति में हार नहीं माननी चाहिए।
  2. मैं अपनी तुलना दूसरों से नहीं करता और अपनी क्षमताओं के अनुसार अपने लक्ष्य निर्धारित करता हूँ।

(ख) मेरी दो कमजोरियां

  1. मैं दूसरों से वादे करते हुए अपने संसाधनों की परवाह नहीं करता
  2. मैं बिना यह जाने कि लोग झूठ बोल रहे हैं या सच उन पर भरोसा करता हूँ।

(ग) मेरे दो लक्ष्य

  1. मैं डॉक्टर/इंजीनियर बनना चाहता हूँ।
  2. मैं समाज में समता लाना चाहता हूँ।

(घ) मेरी दो उपलब्धियां जिन पर मुझे गर्व है

  1. मैंने राज्य स्तरीय वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
  2. मैंने एक गरीब छात्र की फीस का भुगतान करने के लिए अपनी बचाई हुई पॉकेट मनी दान कर दी है।

(ङ) मेरी दो आदतें जो मैं सुधारना चाहता हूँ

  1. जब मैं टेलीविजन देखता हूँ या अपने मोबाइल पर गेम खेलता हूँ तो मैं खुद को नियंत्रित नहीं कर सकता।
  2. मैं नियमित रूप से अध्ययन नहीं करता हूँ और परीक्षा के पास बहुत मेहनत करता हूँ।

(च) दो असफलताएँ जिन्होंने मुझे सबक सिखाया

  1. मैं दौड़ में पहले स्थान से चूक गया क्योंकि मैंने शुरुआत में बहुत तेज़ दौड़ लगाई जिससे मेरी ऊर्जा का उपभोग हुआ और मैं दूसरे स्थान पर आया। इसके अलावा, मैंने सीखा कि दौड़ में हमें समय के साथ गति बढ़ानी चाहिए।
  2. मैंने अनुमान लगाया कि मेरा दोस्त मेरी परियोजना को समय पर पूरा करने में मेरी मदद करेगा। परंतु, वह किसी कारण से मेरी मदद नहीं कर सका, मैं समय पर अपनी परियोजना को प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं था। मैंने सीखा कि मुझे समय पर काम पूरा करने के लिए लगातार और नियमित रूप से काम करना चाहिए।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 2 आत्म-संयम

प्रश्न 5.
अच्छी आदतें होने के क्या फायदे हैं?
उत्तर-
अच्छी आदतें हमारी कई तरह से मदद करती हैं। इनमें से कुछ हैं:

  1. हम लोगों द्वारा गौर किए जाते हैं और लोग हमें ज्यादा ध्यान से देखते और समझते हैं।
  2. दूसरे हमारी तारीफ करते हैं जिससे हमें खुशी मिलती है।
  3. हम सफल हो जाते हैं और निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करते हैं।
  4. हम असफलता से डरना बंद कर देते हैं और इस प्रकार हम असफलताओं के बावजूद सफलता के लिए प्रयास करते रहते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि हम कुछ या कई प्रयासों के बाद अपनी मंजिल तक पहुंच जाएंगे।
  5. अच्छी आदतें इस बात का सूचक हैं कि हमारे पास कुछ आत्म-संयम हैं। यदि हम अपनी अच्छी आदतों में सुधार करते हैं तो इससे हमें अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति में सुधार करने में मदद मिलेगी।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहुविकल्पीय प्रश्न:

प्रश्न 1.
यह एक आवश्यक गुण है जो हमें अपने निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हमारी भावनाओं के व्यवहार विकल्पों और पसंद को नियंत्रित करने की अनुमति देता है।
(क) आत्म-संयम
(ख) दक्षता (efficiency)
(ग) शारीरिक शक्ति
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(क) आत्म-संयम।

प्रश्न 2.
संयम के साथ
(क) हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ सकते हैं
(ख) विद्यालय में हमारा प्रदर्शन बेहतर हो जाता है।
(ग) हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

प्रश्न 3.
…………… के कारण हमारे शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
(क) आत्म संयम
(ख) अच्छी किताबें पढ़ना
(ग) अच्छे लोगों की संगत
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(क) आत्म संयम।

प्रश्न 4.
अपनी कमियों के साथ-साथ अपनी ताकत की पहचान करना ……………….
(क) हमेशा अच्छा है
(ख) खेलने के लिए अच्छा है
(ग) पढ़ने के लिए अच्छा है
(घ) व्यायाम करने के लिए अच्छा है।
उत्तर-
(क) हमेशा अच्छा है।

प्रश्न 5.
हमें हमेशा सकारात्मक और आशावादी ……….. बनाए रखनी चाहिए।
(क) खेल की योजना
(ख) सोच
(ग) दोनों (क), (ख)
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(ख) सोच।

प्रश्न 6.
हमें अपनी …………… को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए।
(क) गलतियों
(ख) विफलताओं
(ग) हार
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(घ) सभी विकल्प।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 2 आत्म-संयम

प्रश्न 7.
हमें अपनी उपलब्धियों के बारे में ………….. महसूस करना चाहिए।
(क) अच्छा
(ख) बुरा
(ग) गर्व
(घ) दोनों (क) और (ग)
उत्तर-
(घ) दोनों (क) और (ग)।

प्रश्न 8.
हम बार-बार अभ्यास करने के माध्यम से अपना आत्मविश्वास ………….. सकते हैं।
(क) घटा
(ख) बढ़ा
(ग) संभाल
(घ) सभी विकल्प।
उत्तर-
(ख) बढ़ा।

प्रश्न 9.
दूसरों की सहायता करना ……………… आदत है।
(क) अच्छी
(ख) बुरी
(ग) हानिकारक
(घ) नुकसानदायक।
उत्तर-
(क) अच्छी।

प्रश्न 10.
कथन 1 : हमें अपनी प्रतिबद्धता (Commitment) के प्रति ईमानदार होना चाहिए।
कथन 2 : हमें समय का पाबंद होना चाहिए। ऊपर दिए गए दोनों कथनों में से कौन-सा सही है?
(क) कथन 1 सही और कथन 2 गलत है
(ख) कथन 1 गलत और कथन 2 सही है
(ग) दोनों कथन सही हैं
(घ) दोनों कथन गलत हैं।
उत्तर-
(ग) दोनों कथन सही हैं।

प्रश्न 11.
अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना ……… की एक उदाहरण है।
(क) बुरा व्यवहार
(ख) शारीरिक शक्ति
(ग) आत्म-संयम
(घ) सही विकल्प।
उत्तर-
(ग) आत्म-संयम।

प्रश्न 12.
अपने जीवन के लिए एक लक्ष्य निर्धारित करना सहायक होता है
(क) निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर काम करना
(ख) अपनी मर्जी से काम करना
(ग) दोनों (क) और (ख) विकल्प
(घ) कोई भी नहीं।
उत्तर-
(क) निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर काम करना।

रिक्त स्थान भरो:

  1. यदि हम अपने ………………… को बढ़ाते हैं तो हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर पाएंगें।
  2. स्कूल में हमारा प्रदर्शन आत्म-संयम सीखने के बाद ………….. हो जाता है।
  3. अपने …………… को निर्धारित करें और अपने …………….. को प्राप्त करने के लिए योजना बनाएं।
  4. अपनी उपलब्धियों के लिए खुद को …………… करें।
  5. हमें अपने हितों का पालन करना चाहिए भले ही वे ………… हों।
  6. हमें हमेशा अपने ……………… को उनके प्रभाव से डरे बिना व्यक्त करना चाहिए।
  7. हमें अपनी …………….. और …………….. के बारे में पता होना चाहिए।
  8. हमें अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कड़ी ……….. करनी चाहिए।
  9. अलग-अलग लोग ……………. सीखने के लिए अलग-अलग समय लेते हैं।
  10. ……………. सफलता की कुंजी है।

उत्तर-

  1. आत्म-विश्वास
  2. बेहतर
  3. लक्ष्य, लक्ष्य
  4. पुरस्कृत
  5. अद्वितीय
  6. विचारों
  7. ताकत, कमज़ोरियों
  8. मेहनत
  9. आत्म-संयम
  10. आत्म-संयम।

PSEB 8th Class Welcome Life Solutions Chapter 2 आत्म-संयम

सही/गलत:

  1. आत्म-संयम आपको चीज़ों को (कार्यों को) करने से रोकता है।
  2. हम आत्म-संयम द्वारा अपने प्रदर्शन में सुधार कर सकते हैं।
  3. आत्म-संयम हमें महत्त्वपूर्ण चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है।
  4. एक ही समय में हर कोई आत्म-संयम सीख सकता है।
  5. आत्म-संयम एक आवश्यक गुण नहीं है।
  6. आत्म-संयम शारीरिक और मानसिक शक्ति से संबंधित नहीं है।
  7. हम सभी आत्म-संयम सीख सकते हैं।
  8. व्यायाम तथा योगा करने से हमें आत्म-संयम सीखने में मदद मिल सकती है।
  9. एक बार जब हम आत्म-संयम सीख लेते हैं तो इसका अभ्यास करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
  10. आत्म-संयम हमें अपने निर्धारित लक्ष्यों की सिद्धि के लिए अपनी भावनाओं, व्यवहार, पसंद और वरीयताओं को नियंत्रित करने की अनुमति देता है।

उत्तर-

  1. ग़लत
  2. सही
  3. सही
  4. ग़लत
  5. ग़लत
  6. ग़लत
  7. सही
  8. सही
  9. सही
  10. सही।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता

Punjab State Board PSEB 8th Class Physical Education Book Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Physical Education Chapter 1 प्राथमिक सहायता

PSEB 8th Class Physical Education Guide प्राथमिक सहायता Textbook Questions and Answers

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1.
प्राथमिक सहायता किसे कहते हैं ?
उत्तर–
प्राथमिक सहायता से भाव उस सहायता से है जो किसी रोगी या ज़ख्मी व्यक्ति को अचानक चोट लगने या दुर्घटना के तुरन्त बाद डॉक्टर के आने से पहले या अस्पताल पहुंचाने से पहले दी जाती है। इसे ही प्राथमिक सहायता कहा जाता है।

प्रश्न 2.
प्राथमिक सहायता के कौन-से उद्देश्य हैं ?
उत्तर-

  • रोगी को समीप के अस्पताल पहुँचाना या डॉक्टर के पास ले जाना।
  • रोगी की हालत को सुधारना।
  • रोगी की हालत को बिगड़ने से बचाना।
  • रोगी की जिंदगी को बचाना।

प्रश्न 3.
प्राथमिक सहायता बॉक्स (First Aid Box) में कौन-कौन सा सामान होना चाहिए?
उत्तर–
प्राथमिक सहायता प्रदान करने के लिए प्राथमिक सहायता बॉक्स में निम्नलिखित सामान होना चाहिए

  • तिकोनियां, गोल पट्टियां तथा गर्म पट्टियां ।
  • भिन्न-भिन्न प्रकार की पट्टियां।
  • थर्मामीटर, चिमटी, कैंची, टॉर्च तथा सेफ्टी पिन्ज आदि।
  • ओ०आर० एस० (ORS) के पैकेट।
  • लीकोपोर या एडहैसिव टेप (Anticeptic Tap/Adhesive Tap)
  • एक साफ़ रूई का पैकेट।
  • साँस ठीक करने के लिए इन्हेलर।
  • भिन्न-भिन्न प्रकार के कीटाणु रहित फाहे या रूई के फाहे।
  • दवाई को मापने हेतु गिलास या बेकेलाइट गिलास।
  • एन्टीसेप्टिक तथा कीटाणु नाशक : स्पिरिट, बीटाडिन, बोरिक एसिड, साबुन, बरनोल, टिचर, आयोडीन तथा डिसेल आदि दवाइयां (स्पिरिट या क्रीम)।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता

प्रश्न 4.
प्राथमिक सहायता के नियम लिखिए।
उत्तर-
प्राथमिक सहायता से भाव उस सहायता से है जो किसी रोगी या ज़ख्मी व्यक्ति को अचानक चोट लगने या दुर्घटना के तुरन्त बाद डॉक्टर के आने से पहले या अस्पताल पहुंचाने से पहले दी जाती है। इसे ही प्राथमिक सहायता कहा जाता है।
प्राथमिक सहायता के नियम -वर्तमान काल में किसी भी व्यक्ति का जीवन सुरक्षित नहीं है,क्योंकि हर रोज़ कोई-न-कोई घटनाएं होती रहती हैं। इनसे बचने के लिए हमें प्राथमिक सहायता का ज्ञान अथवा नियमों के बारे में जानकारी होनी जरूरी है। इसके मुख्य नियम इस प्रकार हैं-

  1. सबसे पहले घायल व्यक्ति के शरीर पर लगे घावों में से खतरनाक चोट का इलाज करना चाहिए।
  2. बहते खून को बन्द करना चाहिए।
  3. यदि रोगी बेहोश हो या उसका सांस तक रुक गया हो तो उसे बनावटी सांस देनी चाहिए।
  4. यदि कोई दुर्घटना हुई हो तो शीघ्र आवश्यकतानुसार तुरन्त चिकित्सा शुरू कर देनी चाहिए।
  5. रोगी की दशा खराब नहीं होने देनी चाहिए।
  6. रोगी को अन्तिम क्षणों तक बचाने की कोशिश जारी रखनी चाहिए।
  7. रोगी के चारों ओर भीड़ इकट्ठी नहीं होने देनी चाहिए।
  8. रोगी को आरामदेह स्थिति में रखो।
  9. रोगी का साहस बढ़ाते रहना चाहिए।
  10. रोगी को आघात से बचाना चाहिए।
  11. रोगी को पूर्णत: गर्म रखो, चाय या दूध आदि पीने के लिए दो।
  12. प्राथमिक सहायता देते समय कोई हिचक या संकोच नहीं करना चाहिए।
  13. आवश्यकतानुसार रोगी के शरीर के कपड़े उतार देने चाहिए।
  14. रोगी को प्राथमिक सहायता देते समय बहुत ही धैर्य, सहानुभूति और मृदु भाषा से काम लेना चाहिए।
  15. प्राथमिक सहायता देने के बाद रोगी को किसी योग्य डॉक्टर के पास अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए।

प्रश्न 5.
प्राथमिक सहायक किसे कहा जाता है?
उत्तर-
जिस व्यक्ति ने किसी अधिकारिक संस्था से प्राथमिक सहायता की शिक्षा प्राप्त करके टैस्ट पास किया हो, उसे प्राथमिक सहायक कहा जाता है।

प्रश्न 6.
प्राथमिक सहायक के गुण लिखिए।
उत्तर-
प्राथमिक सहायक का गुण (Qualities of First Aider)—प्राथमिक सहायक में निम्नलिखित गुण होने चाहिए

  • प्राथमिक सहायक बहुत ही समझदार और होशियार होना चाहिए, जिसको दूसरों की सेवा करने उपरान्त शान्ति मिले और अपना काम फर्ज़ समझकर करें।
  • प्राथमिक सहायक बड़ा चुस्त होना चाहिए जो कि रोगी को लगी चोट आदि को समझने की योग्यता रखता हो।
  • प्राथमिक सहायता योजनाबद्ध होनी चाहिए।
  • वह बहुत फुर्तीला होना चाहिए।
  • उसका व्यवहार हमदर्दी वाला होना चाहिए। वह सहनशील, लगनशील और त्याग की भावना रखता हो।
  • वह स्पष्ट व्यक्ति होना चाहिए ताकि आस-पास के लोगों को समझा सके।
  • उसे तुरन्त निर्णय लेने में सक्षम होना चाहिए ताकि यह जान सके कि अनेक चोटों से सबसे पहले किसकी देखभाल ज़रूरी है।
  • प्राथमिक सहायक दृढ़ संकल्प वाला होना चाहिए।
  • वह स्वाभिमानी होना चाहिए।
  • उसमें इतना धैर्य व सामर्थ्य होनी चाहिए कि वह रोगी या दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अन्तिम क्षणों तक सहायता दे सकता हो।
  • प्राथमिक सहायक उत्साही और साहसी होना चाहिए।
  • उसका व्यवहार अच्छा होना चाहिए।
  • प्राथमिक सहायक स्वस्थ तथा दृढ़ निश्चय वाला होना चाहिए।
  • प्राथमिक सहायक को प्राथमिक सहायता की पूरी तथा अच्छी जानकारी होनी चाहिए।
  • उसे बिना किसी भय या लालच के सहायता करनी चाहिए।

प्रश्न 7.
सी०पी०आर० (C.P.R.) के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
C-Cardio (सी-कार्डिओ) P_Pulmonary (पी-पलमोनरी) R-Resuscitation (आर-रिसेसीटेशन)
जब रोगी की नब्ज तथा श्वास क्रिया महसूस न हो, उसकी आंखों की हिलजुल बंद हो जाए तथा रोगी बेहोश हो जाए, तो उसके दिल तथा फेफड़ों को पुनः चलाने के लिए सी०पी०आर० किया जाए। सी०पी०आर० करते समय रोगी के दिल पर अपनी हथेलियां रखें उससे लगभग तीस बार दबाएं। फिर दो बार मुंह पर मुंह रखकर अपना सांस उसके मुंह में डालें। जब तक रोगी की नब्ज महसूस न हो मुँह से सांस देते रहें। यदि ठीक समय पर सी०पी०आर० किया जाए तो रोगी की जान बच सकती है।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता (1)

सी०पी०आर० कब करनी चाहिए?

  1. जब रोगी बेहोश हो।
  2. जब रोगी की आंखों में हल-चल बंद हो।
  3. जब रोगी की नब्ज न हिलती हो।
  4. जब रोगी की धड़कन न सुनाई दे।

सी०पी०आर० कब नहीं करनी चाहिए?

  1. जब रोगी की सांस कठिनाई से आ रही हो।
  2. जब रोगी को दिल का दौरा पड़ा हो।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता

प्रश्न 8.
मुँह से मुँह द्वारा बनावटी साँस देने के ढंग के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर–
बनावटी सांस कैसे दिया जाता है-जब रोगी के रुके हुए सांस को चलाने के लिए बनावटी सांस देना हो, तो उसे बनावटी सांस कहा जाता है।

मुँह से मुँह द्वारा बनावटी साँस देने के ढंग-रोगी के मुँह में कोई रुकावट हो, सबसे पहले प्राथमिक सहायता देने वाले को उस रुकावट से दूर कर देना चाहिए। फिर पीड़ित का नाक बंद करके अपने मुँह से हवा भरें और रोगी के मुँह पर अपना मुँह रख कर ज़ोर से अपना साँस उसके मुँह में भर दें।
PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता (2)

जब सहायता देने वाले का साँस रोगी के अंदर जाएगा तो रोगी की छाती में वायु भर जाएगी और फूल जाएगी।
प्राथमिक सहायता देने वाला यह क्रिया 12 से 16 बार करे अथवा जब तक पीड़ित का श्वास आना शुरू न हो जाए।

प्रश्न 9.
शैफ़र विधि द्वारा बनावटी श्वास कैसे दिया जाता है ? वर्णन करो।
उत्तर-
शैफ़र विधि-

1. रोगी की स्थिति-रोगी को भूमि पर मुंह के बल इस प्रकार लिटाना चाहिए कि उसकी बाहें सिर से ऊपर और हथेलियां भूमि की ओर हों।
PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता (3)
उसका सिर एक ओर मोड़ कर फुर्ती के साथ उसके कपड़े ढीले कर दो। यदि रोगी पीठ के भार लेटा हो तो उसे उल्टा करके मुंह के बल लिटा दो। ऐसा करने के लिए उसकी बाहों को उसके शरीर से हटा दो। उसकी दूर वाली टांग नज़दीक वाली टांग के ऊपर ले आओ। उसके चेहरे को बचाते हुए उसे इस प्रकार लिटाओ कि वह मुंह के बल हो जाए।

2. प्राथमिक सहायक की स्थिति-प्राथमिक सहायक को रोगी की कमर के एक ओर थोड़ा नीचे घुटनों के बल अपनी एड़ियां थोड़ा पीछे हटा कर बैठना चाहिए।बैठे हुए उसका मुंह रोगी के सिर की ओर होना चाहिए। इसके बाद उसे अपने हाथों को रोगी की कमर पर इस प्रकार रखना चाहिए कि एक हाथ रीढ़ की हड्डी पर और दूसरा हाथ दूसरी ओर हो। अंगूठे और टखने मिले हुए हों और अंगुलियां भूमि की ओर हों। दोनों बाहें सीधी हों।
PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता (4)

3. बनावटी सांस देने की क्रिया-प्राथमिक सहायक धीरे-धी रे आगे की ओर सरकते हुए अपने शरीर के भार को रोगी की कमर पर डालें। ऐसा करने से रोगी के पेट के अंग भूमि से उसका मध्य पेट या डायाफ्राम की ओर दब जायेगा। इस प्रकार से फेफड़ों से हवा निकल जायेगी। इस क्रिया में दो सैकिंड का समय लगना चाहिए। दो मिनट भार डालने के बाद रोगी की कमर से अपना भार हटा दो। अब धीरे-धीरे प्राथमिक सहायक अपनी एड़ियों पर आ जाए। इस प्रकार पेट के अंग पीछे हट जायेंगे और डायाफ्राम गिर जायेगा तथा फेफड़ों में हवा भी जाएगी। इस क्रिया में तीन सैकिंड लगने चाहिए। दोनों क्रियाओं में कुल पांच सैकिंड का समय लगना चाहिए और यह एक मिनट में 12 बार क्रिया होनी चाहिए।
PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता (5)

यह बनावटी सांस देने की क्रिया उस समय तक जारी रखनी चाहिए जब तक रोगी की श्वास-प्रक्रिया शुरू नहीं हो जाती।

Physical Education Guide for Class 8 PSEB प्राथमिक सहायता Important Questions and Answers

बहु विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राथमिक सहायता के उद्देश्य लिखें
(क) मरीज को नज़दीक अस्पताल लेकर जाना
(ख) रोगी की हालत सुधारना
(ग) हालत बिगड़ने न देना
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता

प्रश्न 2.
प्राथमिक सहायता के बॉक्स में सामान आवश्यक है –
(क) थर्मामीटर
(ख) कैंची
(ग) चिमटी
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3.
प्राथमिक सहायता के नियम हैं
(क) रक्त को बहने से रोकना
(ख) बेहोश रोगी को बनावटी श्वास देना
(ग) रोगी की हालत में सुधार लाना
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 4.
प्राथमिक सहायता के गुण हैं
(क) प्राथमिक सहायता करने वाला सूझवान और होशियार होना चाहिए
(ख) उसे योजनाबद्ध तरीके से काम करना चाहिए
(ग) वह अपने कार्य में निपुण होना चाहिए
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 5.
C.P.R. है –
(क) कार्डिओ
(ख) पलमोनरी
(ग) रिसेसीटेशन
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 6.
C.P.R. कब देनी चाहिए ?
(क) जब रोगी की नब्ज न चलती हो
(ख) रोगी की दिल की धड़कन बंद हो
(ग) रोगी की आँखों में हलचल न हो
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

बहुत छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
अगर कोई व्यक्ति बीमार हो जाए तो आप क्या करोगे ?
उत्तर-
रोगी का बुखार कम करने के लिए उपाय किया जाएगा और डॉक्टर को दिखाया जाएगा।

प्रश्न 2.
ज़हरीले जानवर के काटने से शरीर में क्या फैलने का डर रहता है ?
उत्तर-
ज़हर फैलने का।

प्रश्न 3.
प्राथमिक सहायक का व्यवहार कैसा होना चाहिए ?
उत्तर–
प्राथमिक सहायक का व्यवहार मीठा, नम्रता भरा और हमदर्दी भरा होना चाहिए।

प्रश्न 4.
जली हुई जगह का रंग कैसा हो जाता है ?
उत्तर-
जली हुई जगह का रंग बदसूरत लाल हो जाता है।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता

प्रश्न 5.
डॉक्टर के पहुंचने से पहले रोगी या घायल व्यक्ति को दी जाने वाली सहायता को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
प्राथमिक सहायता।

प्रश्न 6.
प्राथमिक सहायता का क्या उद्देश्य है ?
उत्तर-
रोगी या घायल की जान बचाना।

प्रश्न 7.
प्राथमिक सहायक (First Aider) को डॉक्टरी सहायता मिलने तक क्या करते रहना चाहिए ?
उत्तर-
रोगी की देखभाल।

प्रश्न 8.
साँप द्वारा डसे स्थान को किससे धोना चाहिए ?
उत्तर-
पानी और पोटाशियम के मिश्रण से।

प्रश्न 9.
सांप द्वारा डसे हुए स्थान पर चाकू या ब्लेड से कैसा कटाव करना चाहिए ?
उत्तर-
1″ लम्बा और = ” गहरा।

प्रश्न 10.
कटाव करने के लिए चाकू या ब्लेड कैसा होना चाहिए ?
उत्तर-
रोगाणु मुक्त।

प्रश्न 11.
किसी पागल कुत्ते के काटने से व्यक्ति की क्या दशा हो सकती है ?
उत्तर-
व्यक्ति की मृत्यु।

प्रश्न 12.
प्रारम्भिक सहायक में पहला गुण क्या होना चाहिए ?
उत्तर-
चुस्ती एवं फुर्ती।

प्रश्न 13.
रोगी के बेहोश होने पर श्वास बन्द होने पर क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
बनावटी साँस देना चाहिए।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राथमिक सहायता से क्या भाव है ?
उत्तर–
प्राथमिक सहायता से भाव उस सहायता से है, जो किसी रोगी द्वारा बीमार, बेहोश व्यक्ति या दुर्घटना के समय डॉक्टर के आने से पहले व्यक्ति को दी जाए।

प्रश्न 2.
पागल कुत्ते के काटने से जहर शरीर में किस तरह फैलता है?
उत्तर-
पागल कुत्ते के काटने से कुत्ते का जहर काटी हुई जगह पर नाड़ियों द्वारा नाड़ी तंत्र में पहुंच जाता है। वहां जहर दिमाग में दाखिल हो जाता है। यह जहर कुत्ते की लार में होता है। जख्म या खरोंच के साथ जहर व्यक्ति के सारे शरीर में फैल जाता है।

प्रश्न 3.
पागल कुत्ते के काटने से जो डॉक्टरी सहायता तुरंत न दी जा सके तो क्या करना चाहिए?
उत्तर-
कई बार पागल कुत्ते के काटने से मरीज को तुरंत डॉक्टरी सहायता नहीं पहुंचाई जा सकती। इस हालत में रोगी के जख्म को जला देना चाहिए। ऐसे करने के लिए बंधन खोल देना चाहिए और किसी तरल कास्टिक कार्बनिक या शोरे का तेजाब जख्म ऊपर लगाएं। ऐसे करने से जहर खत्म हो जाएगा।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 1 प्राथमिक सहायता

प्रश्न 4.
डंक लगने के चिह्न बताओ।
उत्तर-
किसी कीड़े आदि के डंक मारने पर डंक वाली जगह सूज जाती है। वहां दर्द महसूस होने लगता है और कई भयानक चिह्न पैदा हो जाते हैं।

प्रश्न 5.
जलने पर लक्षण बताओ।
उत्तर-
जलने के लक्षण-

  1. जली हुई जगह पर बहुत दर्द होती है।
  2. चमड़ी लाल हो जाती है और छाले पड़ जाते हैं।
  3. जले हुए अंग भद्दे लगते हैं।
  4. जलने के कारण कई बार सदमा भी लग जाता है।

प्रश्न 6.
लू लगने के पांच लक्षण लिखो।
उत्तर-
लू लगने के पांच लक्षण –

  1. रोगी बेहोश हो जाता है।
  2. रोगी की चमड़ी गर्म हो जाती है।
  3. रोगी के चेहरे का रंग नीला हो जाता है।
  4. रोगी को सांस लेने में कठिनाई आती है।
  5. रोगी की नब्ज़ तेज़ हो जाती है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 13 संविधान और इसके प्रकार

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 13 संविधान और इसके प्रकार Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 13 संविधान और इसके प्रकार

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
संविधान शब्द की परिभाषा कीजिए। संविधान के विभिन्न प्रकार क्या हैं ?
(Define the term Constitution. What are the different kinds of Constitution ?)
उत्तर–
प्रत्येक राज्य का अपना एक संविधान होता है। संविधान उन नियमों तथा सिद्धान्तों का समूह होता है जिनके अनुसार शासन चलाया जाता हो। प्रत्येक राज्य का शासन कुछ निश्चित नियमों तथा सिद्धान्तों के अनुसार चलाया जाता है। अर्थात् प्रत्येक राज्य में कुछ ऐसे सिद्धान्त तथा नियम निश्चित कर लिए जाते हैं जिनके अनुसार शासन के विभिन्न अंगों का संगठन किया जाता है, उनको शक्तियां प्रदान की जाती हैं, उनके आपसी सम्बन्धों को नियमित किया जाता है तथा नागरिकों और राज्य के बीच सम्बन्ध स्थापित किए जाते हैं। इन नियमों के समूह को ही संविधान कहा जाता है। इसकी परिभाषा कई विद्वानों द्वारा की गई है-

प्रो० जैलिनेक (Jellinek) का कहना है कि, “संविधान उन नियमों का समूह है जो राज्य के सर्वोच्च अंगों को निर्धारित करते हैं, उनकी रचना, उनके आपसी सम्बन्धों, उनके कार्यक्षेत्र तथा राज्य में उनके वास्तविक स्थान को निश्चित करते हैं।”
(“The constitution is a body of juridicial rules which determine the supreme organs of the state, prescribe their modes of creation, their mutual relations, their sphere of action and finally the fundamental place of each of them in relation of the state.”)

वुल्ज़े (Woolsey) के अनुसार, “संविधान उन नियमों का समूह है जिनके अनुसार सरकार की शक्तियां, शासितों के अधिकार तथा इन दोनों के आपसी सम्बन्धों को व्यवस्थित किया जाता है।” (“A constitution is the collection of the principles according to which the powers of government, the rights of the governed and the relation between the two are adjusted.”)

डायसी (Dicey) का कहना है कि, “राज्य के संविधान में वे सब नियम सम्मिलित होते हैं जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राज्य में प्रभुसत्ता के वितरण या प्रयोग पर प्रभाव पड़ता है।” (“The constitution of the state consists of all rules which directly or indirectly affect the distribution or exercise of sovereign power in the state.”)

ब्राइस (Bryce) का कहना है कि, “किसी राज्य के संविधान में वे कानून या नियम सम्मिलित होते हैं जिनके अनुसार सरकार के स्वरूप तथा इसके नागरिकों के प्रति अधिकारों तथा कर्तव्यों और नागरिकों के इसके प्रति अधिकारों तथा कर्तव्यों को निश्चित किया जाता है।” (“The constitution of a state consists of those rules or laws which determines the form of its government and the respective rights and duties of it towards its citizens and of the citizens towards government.”)

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 13 संविधान और इसके प्रकार

प्रो० गिलक्राइस्ट (Gilchrist) के शब्दों में, “राज्य का संविधान लिखित या अलिखित कानूनों या नियमों का वह समूह है जो सरकार के संगठन, सरकार के विभिन्न अंगों में शक्तियों के वितरण और शक्ति-प्रयोग के सामान्य नियमों को निश्चित करता है।” (“The constitution of a state is that body of rules of laws, written or unwritten, which determine the organisation of government, the distribution of powers of the various organs of government and the general principles on which these powers are to be exercised.”)

गैटल (Gettell) का कहना है कि, “संविधान उन नियमों का संग्रह है जिनके द्वारा सरकार और उसके नागरिकों के कानूनी सम्बन्धों को निश्चित किया जाता है और जिनके अनुसार राज्य की शक्ति का प्रयोग होता है।” (“The constitution is a collection of norms by which the legal relations between the government and its subjects are determined and in accordance with which the power of the state is exercised.”)

ऑस्टिन (Austin) ने कहा है कि, “संविधान वह है जो सर्वोच्च शासन के ढांचे को निश्चित करता है।” (“The constitution is that which fixes the structure of the supreme government.”)
ऊपर दी गई इन विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर संविधान की सरल परिभाषा इस प्रकार कर सकते हैं कि राज्य का संविधान राज्य का वह सर्वोच्च कानून है, जिसके अनुसार वहां की सरकार का स्वरूप, सरकार के विभिन्न अंगों और उनकी रचना, उनकी शक्तियां, उनके आपसी सम्बन्ध, राज्य और व्यक्तियों के आपसी सम्बन्धों तथा नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को निश्चित किया जाता है। संविधान में मुख्यतः पांच बातों का वर्णन होता है-

  1. सरकार का स्वरूप।
  2. सरकार के अंगों की रचना और उनके आपसी सम्बन्ध ।
  3. सरकार के विभिन्न अंगों की शक्तियां।
  4. नागरिकों और राज्य के आपसी सम्बन्ध अथवा नागरिकों के अधिकार तथा कर्त्तव्य।
  5. राज्य की नागरिकता व भू-क्षेत्र सम्बन्धी कानून।

संविधानों का वर्गीकरण (Classification of Constitutions)-
सभी राज्यों के संविधान एक से नहीं होते। प्रत्येक राज्य में वहां की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक परिस्थितियों तथा लोगों की राजनैतिक विचारधारा के अनुसार वहां का संविधान निश्चित होता है। प्रत्येक राज्य के mising

(1) विकसित संविधान तथा निर्मित संविधान (Evolved Constitution and Enacted Constitution) संविधान की रचना किस प्रकार हुई है, इसके आधार पर संविधान दो तरह के होते हैं-

(क) विकसित संविधान (Evolved Constitution)—जो संविधान ऐतिहासिक उपज या विकास का परिणाम हो, उसे विकसित संविधान कहा जाता है। यह संविधान किसी एक समय में किसी एक व्यक्ति या सभा द्वारा जानबूझ कर नहीं बनाया जाता बल्कि उसके नियम इतिहास के साथ-साथ ही सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार, रीतिरिवाज़ों और परम्पराओं के आधार पर बनते तथा विकसित होते हैं। इसके बनाने के लिए कोई संविधान सभा नहीं बुलाई जाती बल्कि संविधान की विभिन्न बातें समय-समय पर निश्चित होती चली जाती हैं। इंग्लैण्ड का संविधान ऐसे संविधान का सर्वोत्तम उदाहरण है। इंग्लैण्ड में आज तक कोई संविधान सभा संविधान बनाने के लिए नहीं बनाई गई है।

(ख) निर्मित संविधान (Enacted Constitution) निर्मित संविधान वह संविधान है जो किसी एक ही समय में किसी एक व्यक्ति, समिति या संविधान सभा के द्वारा निर्मित किया जाए। ऐसे संविधान का निर्माण इसी उद्देश्य के लिए बुलाई गई संविधान सभा के द्वारा किया जाता है। इसका यह अर्थ नहीं कि एक बार बनने के बाद इसमें कोई संशोधन नहीं हो सकता। बाद में इसकी धाराओं में समय-समय पर संशोधन होता रहता है। इसकी समस्त बातें सोचसमझ कर निश्चित की जाती हैं। भारत का संविधान निर्मित संविधान है। अधिकतर राज्यों के संविधान निर्मित हैं।

(2) लिखित संविधान तथा अलिखित संविधान (Written Constitution and Unwritten Constitution)
(क) लिखित संविधान (Written Constitution)-लिखित संविधान उसे कहा जाता है जिसके लगभग सभी नियम लिखित रूप में उपलब्ध हों। लिखित संविधान प्रायः निर्मित होता है जिसका निर्माण किसी संविधान सभा के द्वारा एक ही समय में काफ़ी सोच-विचार के बाद किया जाता है। लिखित संविधान को बनाते हुए शब्दों का प्रयोग इस प्रकार किया जाता है कि वे इस उद्देश्य को पूरी तरह से स्पष्ट कर दें जिस उद्देश्य के लिए वे लिखे जा रहे हैं। लिखित संविधान देश का सर्वोच्च कानून और एक पवित्र वस्तु माना जाता है। संविधान में इस बात का भी स्पष्ट वर्णन किया जाता है कि उसमें किस प्रकार संशोधन किया जा सकता है। इसके संशोधन का तरीका प्रायः साधारण कानून बनाने के तरीकों से भिन्न और कठोर होता है। भारत, अमेरिका, रूस, कनाडा, जापान आदि अधिकतर राज्यों के संविधान लिखित हैं।

(ख) अलिखित संविधान (Unwritten Constitution)—अलिखित संविधान उसे कहते हैं जिसकी धाराएं लिखित रूप में न हों बल्कि शासन संगठन अधिकतर रीति-रिवाज़ों और परम्पराओं पर आधारित हो। अलिखित संविधान पूर्णतः अलिखित नहीं होता, उसका कुछ अंश लिखित रूप में भी मिलता है। संसद् द्वारा समय-समय पर बनाए गए कानून और न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णय, जो शासन संगठन से सम्बन्धित हों, अलिखित संविधान का एक भाग होते हैं। अलिखित संविधान विकसित होता है, निर्मित नहीं होता। इंग्लैण्ड का संविधान अलिखित संविधान का एक उदाहरण है। वहां सरकार का संगठन और व्यक्ति तथा राज्य के आपसी सम्बन्ध रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं पर आधारित हैं।

(3) लचीला संविधान तथा कठोर संविधान (Flexible Constitution and Rigid Constitution)संविधान में संशोधन कैसे किया जा सकता है, इस बात के आधार पर भी संविधान दो प्रकार के होते हैं-लचीला या परिवर्तनशील संविधान तथा कठोर या अपरिवर्तनशील संविधान।

(क) लचीला या परिवर्तनशील संविधान उसे कहा जाता है कि जिसमें आसानी से संशोधन या परिवर्तन किया जा सके। जिस साधारण तरीके से संसद् साधारण कानून बनाती है, उसी साधारण तरीके से संविधान में बड़े से बड़ा परिवर्तन भी किया जा सकता है अर्थात् संवैधानिक कानून (Constitution Law) को बनाते समय संसद् को किसी विशेष तरीके को अपनाने की आवश्यकता नहीं होती। प्रो० बार्कर का कहना है कि जब किसी सरकार का रूप जनता या उसके प्रतिनिधियों की इच्छानुसार आसानी से बदला जा सकता है तो उसे लचीला संविधान कहा जाता है। ऐसे संविधान में संसद् को कानून बनाने की असीमित शक्ति प्राप्त होती है। इंग्लैण्ड का संविधान लचीला है। वहां की संसद् संविधान के बारे में कोई भी कानून बिल्कुल साधारण तरीके से पास कर सकती है।

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(ख) कठोर या अपरिवर्तनशील संविधान उसे कहा जाता है कि जिसे आसानी से बदला न जा सके। जब साधारण कानून के बनाने के तरीके और संविधान में संशोधन करने के तरीके में अन्तर हो अर्थात् संशोधन करने का तरीका कठिन हो तो उसे कठोर संविधान कहा जाता है। साधारण कानून बनाने वाली सत्ता संविधान का संशोधन नहीं कर सकती बल्कि कोई दूसरी ही सत्ता इसमें संशोधन करती है। कठोर संविधान को राज्य का सर्वोच्च कानून माना जाता है। संघात्मक राज्यों के संविधान प्रायः निर्मित, लिखित तथा कठोर होते हैं। अमेरिका का संविधान कठोर है जिसमें संशोधन करने के लिए संसद् के दोनों सदनों का 2/3 बहुमत और कम-से-कम 3/4 राज्यों का समर्थन प्राप्त होना आवश्यक है। भारत का संविधान भी कठोर है।

प्रश्न 2.
‘लचीले’ तथा ‘कठोर’ संविधान में भेद बताओ।
(Distinguish between “Flexible” and “Rigid” Constitutions.)
उत्तर–
प्रत्येक राज्य का अपना संविधान होता है। संविधान उन नियमों और सिद्धान्तों का संग्रह होता है जिनके अनुसार सरकार का स्वरूप, सरकार का संगठन, सरकार की शक्तियों, नागरिकों के अधिकार निश्चित होते है। संविधान कई प्रकार के होते हैं जैसे कि विकसित व निर्मित संविधान, लिखित व अलिखित संविधान तथा लचीले व कठोर संविधान । लचीले और कठोर संविधान का भेद संविधान में संशोधन के तरीके के आधार पर है।

लचीला या परिवर्तनशील संविधान (Flexible Constitution)-
लचीला संविधान उसे कहा जाता है जिसे आसानी से बदला जा सकता हो। लचीलने संविधान को देश की संसद् या व्यवस्थापिका साधारण तरीके से बदल सकती है तथा उसके लिए किसी विशेष तरीके को अपनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। संवैधानिक कानून और साधारण कानून में कोई विशेष अन्तर नहीं रहता तथा साधारण कानून जितनी आसानी से पास हो जाता है उसी प्रकार से संवैधानिक कानून भी पास हो जाता है। प्रो० बार्कर (Barker) का कहना है कि जब संविधान में परिवर्तन जनता या उसके प्रतिनिधियों की इच्छानुसार आसानी से किया जा सके तो उसे लचीला संविधान कहा जाता है।

लचीले संविधान वाले राज्य में कानून बनाने वाली सत्ता और संविधान में संशोधन करने वाली सत्ता में कोई अन्तर नहीं होता और इस प्रकार व्यवस्थापिका को कानून बनाने की अपार शक्ति प्राप्त होती है। प्रो० डायसी (Dicey) का कहना है कि “लचीले संविधान में हर प्रकार का कानून एक ही सत्ता द्वारा एक ही तरीके से आसानी से बदला जा सकता है।” इंग्लैंड का संविधान एक लचीला संविधान है। ब्रिटिश संसद् किसी भी प्रकार कानून बना सकती है और किसी भी कानून को अपनी इच्छानुसार आसानी से बदल सकती है। ब्रिटिश संसद् संवैधानिक कानून उसी साधारण तरीके से पास कर सकती है जिस तरह से दूसरे साधारण कानून । ऐसा कोई कानून नहीं जिसे ब्रिटिश संसद् बना न सकती हो या जिसमें परिवर्तन न कर सकती हो।

कठोर संविधान (Rigid Constitution)-
जिस संविधान को आसानी से न बदला जा सकता हो तथा उसे बदलने के लिए किसी विशेष तरीके को अपनाना पड़ता हो, उसे कठोर संविधान या परिवर्तनशील संविधान कहा जाता है। कठोर संविधान में संविधान को बदलने वाली सत्ता और साधारण कानून बनाने वाली सत्ता में अन्तर होता है तथा साधारण कानून के बनाने के तरीके और संविधान में संशोधन के तरीके में भी अन्तर होता है। कठोर संविधान में संसद् को असीमित शक्ति प्राप्त नहीं होती बल्कि उसकी वैधानिक शक्तियां संविधान द्वारा सीमित होती हैं। इसके अतिरिक्त संसद् के बनाए कानूनों पर न्यायपालिका को पुनर्निरीक्षण (Judicial Review) का अधिकार होता है। कठोर संविधान की व्यवस्था संघात्मक शासन प्रणाली में अवश्य की जाती है ताकि संविधान को केन्द्र या इकाइयां कोई भी अपनी इच्छा से संशोधन न कर सकें बल्कि दोनों की सहमति से ही उसमें परिवर्तन हो सके।

संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान एक कठोर संविधान है। वहां संविधान में संशोधन करने का तरीका साधारण कानून बनाने के तरीके से भिन्न है। संविधान में संशोधन का प्रस्ताव जब संसद् के दोनों सदनों में 2/3 बहुमत से पास हो जाए तो उसे राज्यों के पास भेजा जाता है। उस प्रस्ताव को उसी समय पास समझा जा सकता है जबकि कम-से-कम 3/4 राज्यों के विधानमण्डल उस पर अपनी स्वीकृति दे दें। संशोधन का प्रस्ताव 2/3 राज्यों के द्वारा भी पेश किया जा सकता है, जिसके आधार पर अमेरिकन संसद् एक सभा (Convention) बुलाती है । यदि वह सभा 2/3 बहुमत से उसे पास कर दे तो फिर 3/4 राज्यों का समर्थन मिलने पर ही वह संशोधन पास समझा जाता है तथा उसके बाद ही लागू हो सकता है। भारत का संविधान भी आंशिक रूप से कठोर है। इसकी महत्त्वपूर्ण धाराओं को बदलने के लिए संशोधन का प्रस्ताव पहले संसद् के दोनों सदनों 2/3 बहुमत से पास हो जाना चाहिए और इसके बाद कम-से-कम आधे राज्यों का समर्थन उसे मिलना चाहिए। साधारण कानून तो संसद् के दोनों सदनों के द्वारा साधारण बहुमत से पास होता है। इस प्रकार कठोर संविधान को आसानी से और साधारण तरीके से बदला नहीं जा सकता।

लचीले और कठोर संविधान में भेद को बताते हुए ब्राइस (Bryce) ने कहा है कि “लचीला संविधान वह संविधान है जिसमें परिवर्तन आसानी से तथा साधारण कानून निर्माण क्रिया के अनुसार ही हो सकते हैं। इसके विपरीत कठोर संविधान वह संविधान है जिसके संविधान का एक विशेष तरीका होता है।” अर्थात् संशोधन के तरीके के आधार पर ही लचीले और कठोर संविधान में भेद है, किसी दूसरे आधार पर नहीं।

प्रश्न 3.
लचीले संविधान के गुण तथा दोष लिखो।
(Describe merits and demerits of Flexible Constitution.)
उत्तर-
लचीले संविधान के गुण (Merits of Flexible Constitution)-
लचीले संविधान के निम्नलिखित गुण हैं-

1. यह समय के अनुसार बदलता जाता है (It changes according to time) लचीले संविधान का एक गुण तो यह है कि यह समयानुसार बदलता रहता है। इसमें संशोधन करने में कठिनाई नहीं होती और इसलिए समाज की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार, समय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इसमें आवश्यक परिवर्तन किए जा सकते हैं। इस प्रकार राज्य का संविधान समाज के इतिहास का प्रतिबिम्ब बन जाता है जिसके द्वारा हम समाज की किसी भी समय की सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक दशा को बड़ी आसानी से जान सकते हैं। इस प्रकार ‘लचीला संविधान’ समय की आवश्यकताओं का उचित ढंग से पूरा कर सकता है।

2. क्रान्ति की कम सम्भावनाएं (Less possibilities of revolution)-जिस देश में लचीला संविधान हो, वहां क्रान्ति और विद्रोह की सम्भावना नहीं रहती। संविधान लोगों की इच्छा के अनुसार आसानी से बदल जाता है, जिसके बदलने के लिए लोगों को न तो कोई विशेष तरीका अपनाने की आवश्यकता होती है और न ही उसके बदलने में किसी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। शासन के स्वरूप को बदलने के लिए लोगों को क्रान्ति का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जनता जब चाहे संविधान को बदल सकती है।

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3. यह राष्ट्र की प्रगति के साथ-साथ विकास करता है (It develops with the development of the Nation) लचीले संविधान का एक गुण यह भी है कि ऐसा संविधान राष्ट्र की प्रगति के साथ-साथ आगे बढ़ता है और सभ्यता के विकास में सहायता देता है, उसकी प्रगति में बाधा उत्पन्न नहीं करता। जब राष्ट्र आगे बढ़ता है तो संविधान उसके अनुकूल अपने आपको ढाल लेता है और इस प्रकार राष्ट्र को आगे बढ़ने में और अधिक सहायता देता है।

4. लचीला संविधान संकटकाल में सहायक रहता है (Flexible Constitution is helpful in the times of emergency) लचीले संविधान का एक लाभ यह है कि संकटकाल में सहायता देता है। संकटकालीन स्थिति का सामना करने के लिए संविधान में आसानी से परिवर्तन किया जा सकता है। संकट की स्थिति साधारण शासन-व्यवस्था से दूर नहीं की जा सकती। संविधान को संशोधित करके सरकार को असाधारण शक्तियां देकर उस संकट का आसानी से मुकाबला किया जा सकता है। ऐसा करना कठोर संविधान को खींचकर और मोड़कर, शासन व्यवस्था को भंग किए बिना परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है और जब आपत्ति टल जाए तो संविधान अपनी पहेली परिस्थिति में आ जाता है जैसे किसी पेड़ की टहनियां किसी गाड़ी के गुजरने के बाद अपने स्थान पर वापस आ जाती हैं।

लचीले संविधान के दोष
(Demerits of Flexible Constitution)-

लचीले संविधान में दोष भी बहुत से हैं जिनका वर्णन नीचे किया गया है-

1. यह स्थिर नहीं होता (It is not Stable) लचीले संविधान का एक दोष यह है कि इसमें स्थिरता नहीं होती। लचीला संविधान जल्दी-जल्दी बदलता रहता है। संविधान में जल्दी-जल्दी परिवर्तन होने के कारण शासन ठीक प्रकार से नहीं चल सकता। शासन में दृढ़ता का आना ऐसी स्थिति में सम्भव नहीं।

2. यह राजनैतिक दलों के हाथ में खिलौना बन जाता है (It becomes a plaything in the hands of political parties)–लचीले संविधान में यह भी दोष है कि वह राजनैतिक दलों के हाथों में एक खिलौना बनकर रह जाता है। जो भी राजनैतिक दल संसद् में बहुमत प्राप्त कर लेता है, वह उसको अपनी इच्छानुसार बदलने का प्रयत्न करता है। कई बार तो बहुमत दल इस प्रकार बदलने का प्रयत्न करता है जिससे उस दल को भविष्य में लाभ पहुंचता रहे, चाहे राष्ट्र को उससे हानि ही क्यों न हो। दलबन्दी की भावना के प्रभाव में आकर जब संविधान में कोई परिवर्तन किया जाता है तो उससे शासन व्यवस्था में अस्त-व्यस्तता का आना स्वाभाविक है।

3. संघात्मक राज्य के लिए यह उपयुक्त नहीं है (It is not suitable for a federation)-संघात्मक राज्य के लिए लचीला संविधान उपयुक्त नहीं है क्योंकि संघात्मक राज्य में संघ तथा प्रान्तों में शक्तियों का बंटवारा होता है और किसी को भी दूसरे की शक्तियों में हस्तक्षेप करने का अवसर नहीं दिया जा सकता। संघात्मक राज्य के लिए कठोर संविधान ही ठीक रहता है।

4. यह संविधान पिछड़े हुए देशों के लिए उपयुक्त नहीं (It is not suitable for undeveloped countries)लचीला संविधान उसी देश के लिए उपयुक्त हो सकता है जो विकसित हो, जहां नागरिकों में राजनैतिक शिक्षा का अभाव न हो तथा नागरिकों में राष्ट्र हित की भावनाएं विकसित हों। जिस देश के नागरिक स्वार्थी हों और साम्प्रदायिकता आदि के
चक्कर में पड़े हुए हों वहां कठोर संविधान ही ठीक रहता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति संविधान को अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए बदलने का प्रयत्न करता है।

प्रश्न 4.
कठोर संविधान के गुण और दोषों की व्याख्या करें।
(Discuss merits and demerits of Rigid Constitution.)
उत्तर
कठोर संविधान के गुण (Merits of Rigid Constitution)-
कठोर संविधान के निम्नलिखित गुण हैं-

1. यह स्थिर होता है (It is stable)-कठोर संविधान की यह एक विशेषता है कि यह स्थिर होता है। इसमें सोचसमझ कर ही शासन के स्वरूप, सरकार के संगठन और शक्तियों तथा नागरिकों के अधिकारों का वर्णन किया जाता है, जो सभी परिस्थितियों में उचित रूप से लागू हो सकें, इसलिए यह काफ़ी समय तक चलता है और इससे राजनैतिक निरन्तरता प्राप्त होती है।

2. यह राजनैतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता (It does not become a plaything in the hands of political parties) कठोर संविधान की यह एक विशेषता है कि यह राजनैतिक दलों के हाथों में खिलौना नहीं बनता क्योंकि कोई भी दल आसानी से इसमें संशोधन नहीं करवा सकता। छोटी-छोटी बात पर बहुमत दल इसमें परिवर्तन करके इसे अपने हितों की पूर्ति के लिए तरोड़-मरोड़ नहीं सकते।

3. यह संघात्मक राज्य के लिए लाभदायक है (It is useful for a federation)—संघात्मक राज्य के लिए कठोर संविधान बड़ा आवश्यक है। यदि संविधान कठोर न हो तो इस बात की सम्भावना रहती है संघ सरकार इकाइयों (units) की शक्तियों पर हस्तक्षेप न करने लगे।

4. यह लोगों के अधिकारों और स्वतन्त्रता की रक्षा करता है (It protects the rights and liberties of the individuals)-कठोर संविधान का यह भी एक लाभ है कि इसके द्वारा लोगों के अधिकारों और स्वतन्त्रता की रक्षा अच्छी प्रकार से हो सकती है। आजकल नागरिकों के अधिकार संविधान में लिख दिये जाते हैं और ऐसी व्यवस्था भी की जाती है कि कोई उनमें हस्तक्षेप न कर सके । संविधान मे लिखे अधिकारों से नागरिकों को आसानी से वंचित नहीं किया जा सकता।

5. यह शासन की निरंकुशता को रोकता है (It prevents the absolutism of the government) कठोर संविधान का एक यह भी लाभ है कि वह शासन को निरंकुश नहीं होने देता। कठोर संविधान द्वारा सरकार के सभी अंगों पर सीमाएं लगाई जाती हैं और उनकी शक्तियों को स्पष्ट रूप से निश्चित किया जाता है। कठोर संविधान में इस बात की सम्भावना नहीं रहती कि सरकार अपनी शक्ति का अपनी इच्छानुसार मनमाने तरीके से प्रयोग करे।

कठोर संविधान के दोष (Demerits of Rigid Constitution)-
कठोर संविधान के दोष भी कई हैं, जिनकी व्याख्या नीचे दी गई है-

1. यह समयानुसार बदलता नहीं (It does not change according to time) कठोर संविधान का सबसे बड़ा दोष यह है कि यह समयानुसार नहीं बदलता। इससे शासन अच्छी तरह से नहीं चल सकता। कई बार संविधान में आवश्यक संशोधन भी समय पर नहीं हो पाता जिसका परिणाम यह होता है कि परिस्थितियां सुधरने की बजाय और भी बिगड़ती चली जाती हैं।

2. यह क्रान्ति को प्रोत्साहन देता है (It encourages revolution)-कठोर संविधान का एक दोष यह भी है कि यह क्रान्ति को प्रोत्साहन देता है। यह बदलती हुई परिस्थितियों के साथ नहीं चल सकता और इस कारण लोगों की आवश्यकताओं को भी अच्छी तरह से पूरा नहीं कर सकता। जब लोग इसे आसानी से नहीं बदल सकते, तो वे इसके लिए क्रान्ति का सहारा लेते हैं। लोग यह समझने पर मजबूर हो जाते हैं कि अब क्रान्ति के अतिरिक्त कोई ओर चारा ही नहीं।

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3. यह राष्ट्र की प्रगति में बाधा डालता है (It puts an obstacle in the development of the Nation)कठोर संविधान को इस कारण भी अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि यह राष्ट्र की प्रगति में वक उत्पन्न करता है। राष्ट्र आगे बढ़ना चाहता है, तो संविधान उसे ऐसा करने से रोकने का प्रयत्न करता है। कठोर संविधान राष्ट्र को उन्हीं परिस्थितियों तथा दशाओं में हमेशा के लिए रखने का प्रयत्न करता, जिनमें कि उसका निर्माण हुआ था। कठोर संविधान प्रगतिशील राजनैतिक विचारधारा को प्रोत्साहित नहीं करता।

4. कठोर संविधान जजों के हाथ में एक खिलौना होता है (It is a plaything in the hands of judges)लचीला संविधान राजनीतिक दलों के हाथ का खिलौना बनता है तो कठोर संविधान जजों और वकीलों के हाथ में एक खिलौना बन जाता है। कठोर संविधान के होने का अर्थ है-न्यायपालिका की सर्वोच्चता। कठोर संविधान की व्याख्या करने, उसकी रक्षा करने, संघ तथा राज्यों के झगड़ों को निपटाने, संविधान के विरुद्ध कानूनों को रद्द करने आदि के सब अधिकार न्यायपालिका के पास होते हैं। इस कारण संविधान वह नहीं होता जोकि उसके निर्माताओं ने बनाया है बल्कि संविधान वह होता है जोकि न्यायाधीश बनाते हैं अर्थात् न्यायपालिका कई बार संविधान का एक नया ही रूप जनता के सामने रखती है।

5. यह संकटकाल में ठीक नहीं रहता (It is not suitable for emergency)-आपत्ति के समय में कठोर संविधान ठीक नहीं रहता क्योंकि आपत्ति का सामना करने के लिए उसमें आवश्यक परिवर्तन आसानी से नहीं किया जा सकता। इससे शासक परिस्थितियों का ठीक प्रकार से सामना नहीं कर पाते । संकटकाल में सरकार के पास विशेष शक्तियों का होना आवश्यक है। शान्ति के समय में सरकार के पास साधारण शक्तियां होती हैं। इसलिए संविधान में संकटकाल में संशोधन एकदम हो जाना चाहिए जोकि एक कठोर संविधान में सम्भव नहीं होता।

6. कठोर संविधान कुछ समय बाद महत्त्वहीन हो जाता है (Rigid Constitution after sometime becomes a thing of the past)-कठोर संविधान का एक दोष यह भी है कि यह कुछ समय बाद महत्त्वहीन बन जाता है। संविधान की बातें उस समय के अनुसार होती हैं जबकि वह बनाया गया हो। समय परिवर्तन के कारण यदि उसमें परिवर्तन नहीं होता तो उसका कोई महत्त्व नहीं रहता और लोग उसे आदर की दृष्टि से नहीं देखते।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान का क्या अर्थ है ? इसकी दो परिभाषाएं लिखें।
उत्तर-
संविधान ऐसे नियमों तथा सिद्धान्तों का समूह है, जिसके अनुसार शासन के विभिन्न अंगों का संगठन किया जाता है, उनको शक्तियां प्रदान की जाती हैं, उनके आपसी सम्बन्धों को नियमित किया जाता है तथा नागरिकों और राज्य के बीच सम्बन्ध स्थापित किये जाते हैं। इन नियमों के समूह को ही संविधान कहा जाता है।

परिभाषाएं-

  • ब्राइस के अनुसार, “किसी राज्य के संविधान में वे कानून या नियम सम्मिलित होते हैं, जिनके अनुसार सरकार के स्वरूप तथा इसके नागरिकों के प्रति अधिकारों तथा कर्तव्यों और नागरिकों के इसके प्रति अधिकारों तथा कर्तव्यों को निश्चित किया जाता है।”
  • गिलक्राइस्ट के अनुसार, “राज्य का संविधान लिखित कानूनों या नियमों का वह समूह है, जो सरकार के संगठन, सरकार के विभिन्न अंगों में शक्तियों का वितरण और शक्ति प्रयोग के सामान्य नियमों को निश्चित करता है।”

प्रश्न 2.
अलिखित संविधान के चार गुण लिखिए।
उत्तर-

  1. यह समयानुसार बदलता रहता है-अलिखित संविधान का अर्थ यह है कि संविधान समय की परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।
  2. इतिहास का स्पष्ट चित्रण-अलिखित संविधान देश के इतिहास का स्पष्ट चित्रण करता है।
  3. क्रान्ति का भय नहीं होता-अलिखित संविधान के होने से क्रान्ति का भय नहीं होता। संविधान में आसानी से परिवर्तन हो जाता है। जनता को इसमें परिवर्तन करवाने के लिए क्रान्ति का सहारा नहीं लेना पड़ता।
  4. राष्ट्र की प्रगति में सहायक-अलिखित संविधान का एक लाभ यह है कि वह राष्ट्र की प्रगति में बाधा उत्पन्न नहीं करता बल्कि उसकी प्रगति में सहायक सिद्ध होता है।

प्रश्न 3.
अलिखित संविधान के चार दोष बताइए।
उत्तर-
अलिखित संविधान को निम्नलिखित बातों के आधार पर दोषपूर्ण बताया जाता है-

  1. यह निश्चित और अस्पष्ट होता है-अलिखित संविधान का एक दोष यह है कि यह स्पष्ट तथा निश्चित नहीं होता। इसकी धाराएं लिखी हुई न होने के कारण उनके बारे में लोगों में प्रायः मतभेद तथा लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं।
  2. शक्तियों का दुरुपयोग–अलिखित संविधान सरकार के विभिन्न अंगों को अपनी शक्तियों के दुरुपयोग करने या एक दूसरे की शक्तियों में हस्तक्षेप करने के लिए प्रोत्साहन देता है।
  3. संघ सरकार में इसका कोई लाभ नहीं-संघात्मक राज्यों के लिए लिखित संविधान का होना आवश्यक है क्योंकि अलिखित संविधान के कारण संघ और प्रान्तों में शक्तियों के बारे में मतभेद और झगड़े बहुत होते हैं।
  4. यह स्थिर नहीं होता-अलिखित संविधान में स्थिरता नहीं रहती बल्कि वह जल्दी-जल्दी बदलता रहता है। जहां संविधान में जल्दी-जल्दी परिवर्तन होता हो, वहां राजनीतिक जीवन में स्थिरता और एकता स्थापित नहीं हो पाती।

प्रश्न 4.
लिखित संविधान क्यों आवश्यक है ? दो कारण बताइए।
उत्तर-
लिखित संविधान उसे कहा जाता है जिसके लगभग सभी नियम लिखित रूप में उपलब्ध हों। लिखित संविधान प्रायः निर्मित होता है, जिसका निर्माण एक संविधान सभा द्वारा एक ही समय में काफ़ी सोच-विचार के बाद किया जाता है। आज अधिकतर राज्यों में लिखित संविधान पाया जाता है। लिखित संविधान के अनेक गुण होते हैं। लिखित संविधान निम्नलिखित कारणों से आवश्यक माना जाता है-

  • यह सोच-समझकर बनाया जाता है-लिखित संविधान एक संविधान सभा द्वारा बनाया जाता है और उसकी सब बातें अच्छी प्रकार से सोच-समझकर निश्चित की जाती हैं। भावना के आवेश में आकर इसका निर्माण नहीं होता।
  • यह निश्चित तथा स्पष्ट होता है-लिखित संविधान का एक गुण यह है कि यह लिखित तथा स्पष्ट होता है।
  • नागरिकों के अधिकारों की रक्षा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा लिखित संविधान द्वारा अधिक अच्छी तरह हो सकती है।
  • संघात्मक सरकार में आवश्यक-संघात्मक शासन प्रणाली के लिए संविधान का लिखित होना बड़ा आवश्यक है। संविधान द्वारा ही संघ तथा इकाइयों में शक्तियों का बंटवारा किया जाता है और इस बंटवारे को लिखित रूप देने से संघ और राज्यों में शक्तियों के बारे में मतभेद पैदा नहीं होते।

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प्रश्न 5.
लिखित संविधान की चार कमियां बताओ।
उत्तर-
लिखित संविधान की मुख्य कमियां इस प्रकार हैं-

  • यह कुछ समय बाद लाभदायक नहीं रहता-लिखित संविधान का एक दोष यह है कि यह समय के बाद बदलता नहीं और कुछ समय बाद यह लाभदायक नहीं रहता। परिवर्तित वातावरण में लिखा हुआ संविधान एक अतीत की वस्तु बनकर रह जाता है।
  • यह समयानुसार नहीं बदलता-लिखित संविधान और सामाजिक आवश्यकता में तालमेल नहीं हो पाता, इसीलिए इसे कई लोग अच्छा नहीं समझते।
  • क्रान्ति का भय-लिखित संविधान में क्रान्ति का भय अधिक होता है। लिखित संविधान समय की आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकता और न ही उसमें आसानी से संशोधन किया जा सकता है क्योंकि लिखित संविधान प्रायः कठोर ही होता है। समय के अनुसार परिवर्तन लाने के लिए जनता को कई बार विद्रोह तथा क्रान्ति का सहारा लेना पड़ता है।
  • राष्ट्र की प्रगति में बाधा-लिखित संविधान का एक दोष यह भी है कि वह राष्ट्र की प्रगति में रुकावट डालता है।

प्रश्न 6.
लचीला संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-
लचीला संविधान उसे कहा जाता है जिसमें आसानी से संशोधन या परिवर्तन किया जा सके। जिस साधारण तरीके से संसद् साधारण कानून बनाती है, उसी साधारण तरीके से संविधान में बड़े-से-बड़ा परिवर्तन भी किया जा सकता है अर्थात् संवैधानिक कानून (Constitutional Law) को बनाते समय संसद् को किसी विशेष तरीके को अपनाने की आवश्यकता नहीं है। प्रो० बार्कर का कहना है कि जब किसी सरकार का रूप जनता या उसके प्रतिनिधियों की इच्छानुसार आसानी से बदला जा सकता है तो उसे लचीला संविधान कहा जाता है। ऐसे संविधान में संसद् को कानून बनाने की असीमित शक्तियां प्रदान होती हैं। इंग्लैंड का संविधान लचीला है। ब्रिटिश संसद् संविधान के सम्बन्ध में कोई भी कानून साधारण बहुमत से पास कर सकती है।

प्रश्न 7.
लचीले संविधान के चार गुण लिखो।
उत्तर-
लचीले संविधान में निम्नलिखित गुण होते हैं-

  1. यह समयानुसार बदलता रहता है-लचीले संविधान का लाभ यह है कि यह संविधान समय की परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।
  2. इतिहास का स्पष्ट चित्रण-लचीला संविधान देश के इतिहास का स्पष्ट चित्रण करता है।
  3. क्रान्ति का भय नहीं होता-लचीले संविधान के होने से क्रान्ति का भय नहीं होता। संविधान में आसानी से परिवर्तन हो जाता है। जनता को इसमें परिवर्तन करवाने के लिए क्रान्ति का सहारा नहीं लेना पड़ता है।
  4. राष्ट्र की प्रगति में सहायक-लचीले संविधान का एक लाभ यह भी है कि वह राष्ट्र की प्रगति में बाधा उत्पन्न नहीं करता बल्कि उसकी प्रगति में सहायक सिद्ध होता है।

प्रश्न 8.
लचीले संविधान के चार दोष लिखो।
उत्तर-
लचीले संविधान को निम्नलिखित बातों के आधार पर दोषपूर्ण बताया जाता है-

  • यह अनिश्चित और अस्पष्ट होता है-लचीले संविधान का एक दोष यह है कि यह स्पष्ट तथा निश्चित नहीं होता। इसकी धाराएं लिखी हुई न होने के कारण उनके बारे में लोगों में प्रायः मतभेद तथा लडाई-झगडे होते रहते हैं।
  • शक्तियों का दुरुपयोग-लचीला संविधान सरकार के विभिन्न अंगों को अपनी शक्तियों के दुरुपयोग करने या एक दूसरे की शक्तियों में हस्तक्षेप करने के लिए प्रोत्साहन देता है।
  • संघ सरकार में इसका कोई लाभ नहीं-संघात्मक राज्यों के लिए संविधान का होना आवश्यक है क्योंकि लचीले संविधान के कारण संघ और प्रान्तों में शक्तियों के बारे में मतभेद और झगड़े बहुत होते हैं।
  • यह स्थिर नहीं होता-लचीले संविधान में स्थिरता नहीं रहती बल्कि यह जल्दी-जल्दी बदलता रहता है। जहां संविधान में जल्दी-जल्दी परिवर्तन होता हो, राजनीतिक जीवन में स्थिरता और एकता स्थापित नहीं हो पाती।

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प्रश्न 9.
कठोर संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-
कठोर संविधान उसे कहा जाता है जिसे आसानी से बदला न जा सके। जब साधारण कानून को बनाने के तरीके और संविधान में संशोधन करने के तरीके में अन्तर हो अर्थात् संशोधन का तरीका कठिन हो तो उसे कठोर संविधान कहा जाता है। साधारण कानून वाली सत्ता संविधान का संशोधन नहीं कर सकती बल्कि कोई दूसरी ही सत्ता इसमें संशोधन करती है। कठोर संविधान को राज्य का सर्वोच्च कानून माना जाता है। संघात्मक राज्यों के संविधान प्रायः निर्मित, लिखित तथा कठोर होते हैं। अमेरिका का संविधान कठोर है जिसमें संशोधन करने के लिए संसद् के दोनों सदनों का 2/3 बहुमत और कम-से-कम 3/4 राज्यों का समर्थन होना आवश्यक है। भारत के संविधान के कुछ भाग कठोर हैं।

प्रश्न 10.
कठोर संविधान के चार गुण लिखिए।
उत्तर-
कठोर संविधान के निम्नलिखित गुण हैं-

  • यह स्थिर होता है-कठोर संविधान की एक विशेषता यह है कि यह स्थिर होता है। इसलिए यह काफ़ी समय तक चलता है और इससे राजनीतिक निरन्तरता प्राप्त होती है।
  • यह राजनीतिक दलों के हाथों में खिलौना नहीं बनता-कठोर संविधान की यह भी एक विशेषता है कि यह राजनीतिक दलों के हाथों में खिलौना नहीं बनता क्योंकि कोई भी दल आसानी से इसमें संशोधन नहीं करवा सकता। छोटी-छोटी बातों पर बहुमत दल इसमें परिवर्तन करके इसे अपने हितों की पूर्ति के लिए तोड़-मोड़ नहीं सकते।
  • यह संघात्मक राज्य के लिए बड़ा लाभदायक है-संघात्मक राज्य के लिए कठोर संविधान बड़ा आवश्यक है। यह संविधान कठोर न हो तो इस बात की सम्भावना रहती है कि संघ सरकार राज्यों (प्रान्तों) की शक्तियों में हस्तक्षेप न करने लगे।
  • यह लोगों के अधिकारों और स्वतन्त्रता की रक्षा करता है-कठोर संविधान का यह भी एक लाभ है कि इसके द्वारा लोगों के अधिकारों और स्वतन्त्रता की रक्षा अच्छी प्रकार से हो सकती है। संविधान में लिखे अधिकारों से नागरिकों को आसानी से वंचित नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 11.
कठोर संविधान की चार हानियां लिखिए।
उत्तर-
कठोर संविधान के कई दोष भी हैं जिनकी व्याख्या नीचे दी गई है-

  1. यह समयानुसार बदलता नहीं-कठोर संविधान का सबसे बड़ा दोष है कि यह समयानुसार नहीं बदलता। इससे शासन अच्छी तरह से नहीं चल सकता।
  2. यह क्रान्ति को प्रोत्साहन देता है-कठोर संविधान का एक दोष यह भी है कि यह क्रान्ति को प्रोत्साहन देता है। जब लोग इसे आसानी से नहीं बदल सकते तो वे इसके लिए क्रान्ति का सहारा लेते हैं।
  3. यह राष्ट्र की प्रगति में बाधा डालता है-कठोर संविधान को इस कारण भी अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि यह राष्ट्र की प्रगति में बाधा उत्पन्न करता है।
  4. कठोर संविधान जजों के हाथों में एक खिलौना होता है-कठोर संविधान के होने का अर्थ है-न्यायपालिका की सर्वोच्चता। कठोर संविधान की व्याख्या करने, उनकी रक्षा करने, संघ तथा राज्यों के झगड़ों को निपटाने, संविधान के विरुद्ध कानूनों को रद्द करने आदि के सब अधिकार न्यायपालिका के पास होते हैं। इस कारण संविधान वह नहीं होता जोकि उसके निर्माताओं ने बनाया है बल्कि संविधान वह होता है जोकि न्यायाधीश बनाते हैं अर्थात् न्यायपालिका कई बार संविधान का एक नया रूप जनता के सामने रखती है।

प्रश्न 12.
लचीले और कठोर संविधान में भेद स्पष्ट करें।
उत्तर-
लचीले और कठोर संविधान में मुख्य अन्तर निम्नलिखित पाए जाते हैं-

  • लचीले संविधान का संशोधन किसी विशेष प्रक्रिया द्वारा नहीं होता। जिस पद्धति से कानूनों का निर्माण होता है उसी पद्धति से संविधान में भी संशोधन होता है, परन्तु कठोर संविधान के संशोधन के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है।
  • कठोर संविधान की अपेक्षा लचीले संविधान में संशोधन करना अत्यन्त सरल है। (3) कठोर संविधान में संवैधानिक तथा साधारण कानूनों में भेद होता है, परन्तु लचीले संविधान में ऐसा नहीं होता।
  • कठोर संविधान में विधानमण्डल की सत्ता सीमित होती है, परन्तु लचीले संविधान में उसकी सत्ता असीमित होती है।
  • कठोर संविधान में प्रायः नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लेख होता है, परन्तु लचीले संविधान में ऐसा नहीं देखा जाता।

प्रश्न 13.
किस प्रकार का संविधान अधिक उपयोगी है-लचीला अथवा कठोर ? कोई दो तर्क दीजिए।
उत्तर-
संविधान ऐसे नियमों और सिद्धान्तों का समूह होता है, जिसके अनुसार शासन के विभिन्न अंगों का संगठन किया जाता है, उनको शक्तियां प्रदान की जाती हैं, उनके आपसी सम्बन्धों को नियमित किया जाता है तथा नागरिकों और राज्यों के बीच सम्बन्ध स्थापित किए जाते हैं। प्रत्येक राज्य अपनी आवश्यकता एवं परिस्थितियों के अनुसार लिखित या अलिखित तथा कठोर या लोचशील संविधान अपनाता है। यह कहना अत्यन्त कठिन है कि लचीले और कठोर संविधान में से कौन-सा संविधान अधिक उपयोगी है। दोनों ही प्रकार के संविधानों के अपने गुण भी हैं और दोष भी हैं। लचीले या कठोर संविधान को तब उपयोगी माना जा सकता है यदि उसमें निम्नलिखित गुण पाए जाते हों

  • विश्व में अधिकांश नव-स्वतन्त्र राज्य अस्थिरता के दौर से गुज़र रहे हैं। तीसरी दुनिया के देशों में क्रान्ति व तख्ता पलट की सम्भावनाएं अधिक होती हैं। अतः इन दोनों में राजनीतिक स्थायित्व के लिए कठोर संविधान आवश्यक है।
  • संविधान में बदलती हुई ज़रूरतों के अनुसार परिवर्तित होने का गुण भी होना चाहिए। परन्तु यह इतना भी लोचशील न हो कि सत्ताधारी दल के हाथों का खिलौना बन जाए।
    अतः संविधान न तो अत्यधिक कठोर हो और न ही अत्यधिक लोचशील हो।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
संविधान ऐसे नियमों तथा सिद्धान्तों का समूह है, जिसके अनुसार शासन के विभिन्न अंगों का संगठन किया जाता है, उनको शक्तियां प्रदान की जाती हैं, उनके आपसी सम्बन्धों को नियमित किया जाता है तथा नागरिकों और राज्य के बीच सम्बन्ध स्थापित किये जाते हैं। इन नियमों के समूह को ही संविधान कहा जाता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 13 संविधान और इसके प्रकार

प्रश्न 2.
संविधान को परिभाषित करें।
उत्तर-

  • ब्राइस के अनुसार, “किसी राज्य के संविधान में वे कानून या नियम सम्मिलित होते हैं, जिनके अनुसार सरकार के स्वरूप तथा इसके नागरिकों के प्रति अधिकारों तथा कर्त्तव्यों और नागरिकों के इसके प्रति अधिकारों तथा कर्तव्यों को निश्चित किया जाता है।”
  • गिलक्राइस्ट के अनुसार, “राज्य का संविधान लिखित कानूनों या नियमों का वह समूह है, जो सरकार के संगठन, सरकार के विभिन्न अंगों में शक्तियों का वितरण और शक्ति प्रयोग के सामान्य नियमों को निश्चित करता है।”

प्रश्न 3.
अलिखित संविधान के दो गुण लिखिए।
उत्तर-

  1. यह समयानुसार बदलता रहता है-अलिखित संविधान का अर्थ यह है कि संविधान समय की परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।
  2. इतिहास का स्पष्ट चित्रण-अलिखित संविधान देश के इतिहास का स्पष्ट चित्रण करता है।

प्रश्न 4.
अलिखित संविधान के दो दोष बताइए।
उत्तर-

  1. यह निश्चित और अस्पष्ट होता है-अलिखित संविधान का एक दोष यह है कि यह स्पष्ट तथा निश्चित नहीं होता। इसकी धाराएं लिखी हुई न होने के कारण उनके बारे में लोगों में प्रायः मतभेद तथा लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं।
  2. शक्तियों का दुरुपयोग- अलिखित संविधान सरकार के विभिन्न अंगों को अपनी शक्तियों के दुरुपयोग करने या एक दूसरे की शक्तियों में हस्तक्षेप करने के लिए प्रोत्साहन देता है।

प्रश्न 5.
लिखित संविधान के दो गुण लिखो।
उत्तर-

  1. यह सोच-समझकर बनाया जाता है-लिखित संविधान एक संविधान सभा द्वारा बनाया जाता है और उसकी सब बातें अच्छी प्रकार से सोच-समझकर निश्चित की जाती हैं। भावना के आवेश में आकर इसका निर्माण नहीं होता।
  2. यह निश्चित तथा स्पष्ट होता है-लिखित संविधान का एक गुण यह है कि यह लिखित तथा स्पष्ट होता है।

प्रश्न 6.
लिखित संविधान की दो कमियां बताओ।
उत्तर-

  1. यह कुछ समय बाद लाभदायक नहीं रहता-लिखित संविधान का एक दोष यह है कि यह समय के बाद बदलता नहीं और कुछ समय बाद यह लाभदायक नहीं रहता। परिवर्तित वातावरण में लिखा हुआ संविधान एक अतीत की वस्तु बनकर रह जाता है।
  2. यह समयानुसार नहीं बदलता-लिखित संविधान और सामाजिक आवश्यकता में तालमेल नहीं हो पाता, इसीलिए इसे कई लोग अच्छा नहीं समझते।।

प्रश्न 7.
लचीला संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-
लचीला संविधान उसे कहा जाता है जिसमें आसानी से संशोधन या परिवर्तन किया जा सके। जिस साधारण तरीके से संसद् साधारण कानून बनाती है, उसी साधारण तरीके से संविधान में बड़े-से-बड़ा परिवर्तन भी किया जा सकता है अर्थात् संवैधानिक कानून (Constitutional Law) को बनाते समय संसद् को किसी विशेष तरीके को अपनाने की आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 8.
लचीले संविधान के दो गुण लिखो।
उत्तर-

  1. यह समयानुसार बदलता रहता है-लचीले संविधान का लाभ यह है कि यह संविधान समय की परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।
  2. इतिहास का स्पष्ट चित्रण-लचीला संविधान देश के इतिहास का स्पष्ट चित्रण करता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 13 संविधान और इसके प्रकार

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. संविधान की कोई एक परिभाषा दें।
उत्तर-बुल्जे के अनुसार, “संविधान उन नियमों का समूह है, जिनके अनुसार सरकार की शक्तियां, शासितों के अधिकार तथा इन दोनों के आपसी सम्बन्धों को व्यवस्थित किया जाता है।”

प्रश्न 2. संविधान के कोई दो रूप/प्रकार लिखें।
उत्तर-

  1. विकसित संविधान
  2. निर्मित संविधान।

प्रश्न 3. विकसित संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो संविधान ऐतिहासिक उपज या विकास का परिणाम हो, उसे विकसित संविधान कहा जाता है।

प्रश्न 4. लिखित संविधान किसे कहते हैं ? ।
उत्तर-लिखित संविधान उसे कहा जाता है, जिसके लगभग सभी नियम लिखित रूप में उपलब्ध हों।

प्रश्न 5. अलिखित संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-अलिखित संविधान उसे कहते हैं, जिसकी धाराएं लिखित रूप में न हों, बल्कि शासन संगठन अधिकतर रीति-रिवाज़ों और परम्पराओं पर आधारित हो।

प्रश्न 6. कठोर एवं लचीले संविधान में एक अन्तर लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान की अपेक्षा लचीले संविधान में संशोधन करना अत्यन्त सरल है।

प्रश्न 7. लचीले संविधान का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर- लचीला संविधान समयानुसार बदलता रहता है।

प्रश्न 8. किसी एक विद्वान् का नाम लिखें, जो लिखित संविधान का समर्थन करता है?
उत्तर-डॉ० टॉक्विल ने लिखित संविधान का समर्थन किया है।

प्रश्न 9. कठोर संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान राजनीतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता।

प्रश्न 10. एक अच्छे संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-संविधान स्पष्ट एवं सरल होता है।

प्रश्न 11. अलिखित संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-यह समयानुसार बदलता रहता है।

प्रश्न 12. अलिखित संविधान का कोई एक दोष लिखें।
उत्तर-अलिखित संविधान में शक्तियों के दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है।

प्रश्न 13. लिखित संविधान का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर-लिखित संविधान निश्चित तथा स्पष्ट होता है।

प्रश्न 14. लिखित संविधान का एक दोष लिखें।
उत्तर-लिखित संविधान समयानुसार नहीं बदलता।

प्रश्न 15. जिस संविधान को आसानी से बदला जा सके, उसे कैसा संविधान कहा जाता है ?
उत्तर-उसे लचीला संविधान कहा जाता है।

प्रश्न 16. जिस संविधान को आसानी से न बदला जा सकता हो, तथा जिसे बदलने के लिए किसी विशेष तरीके को अपनाया जाता हो, उसे कैसा संविधान कहते हैं ?
उत्तर-उसे कठोर संविधान कहते हैं। प्रश्न 17. लचीले संविधान का एक दोष लिखें। उत्तर-यह संविधान पिछड़े हुए देशों के लिए ठीक नहीं।

प्रश्न 18. कठोर संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान निश्चित एवं स्पष्ट होता है।

प्रश्न 19. कठोर संविधान का एक दोष लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान क्रान्ति को प्रोत्साहन देता है।

प्रश्न 20. शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Power) का सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर-शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त मान्टेस्क्यू ने प्रस्तुत किया।

प्रश्न 21. संविधानवाद की साम्यवादी विचारधारा के मुख्य समर्थक कौन हैं ?
उत्तर-संविधानवाद की साम्यवादी विचारधारा के मुख्य समर्थक कार्ल-मार्क्स हैं।

प्रश्न 22. संविधानवाद के मार्ग की एक बड़ी बाधा लिखें।
उत्तर-संविधानवाद के मार्ग की एक बाधा युद्ध है।

प्रश्न 23. अरस्तु ने कितने संविधानों का अध्ययन किया?
उत्तर-अरस्तु ने 158 संविधानों का अध्ययन किया।

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प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. ……………. संविधान उसे कहा जाता है, जिसमें आसानी से संशोधन किया जा सके।
2. जिस संविधान को सरलता से न बदला जा सके, उसे …………… संविधान कहते हैं।
3. लिखित संविधान एक ……………. द्वारा बनाया जाता है।
4. ……………. संविधान समयानुसार बदलता रहता है।
5. ……………. में क्रांति का डर बना रहता है।
उत्तर-

  1. लचीला
  2. कठोर
  3. संविधान सभा
  4. अलिखित
  5. लिखित संविधान।

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. अलिखित संविधान अस्पष्ट एवं अनिश्चित होता है।
2. लचीले संविधान में क्रांति की कम संभावनाएं रहती हैं।
3. कठोर संविधान अस्थिर होता है।
4. एक अच्छा संविधान स्पष्ट एवं निश्चित होता है।
5. कठोर संविधान समयानुसार बदलता रहता है।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. ग़लत
  4. सही
  5. ग़लत ।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
कठोर संविधान का गुण है
(क) यह राजनीतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता
(ख) संघात्मक राज्य के लिए उपयुक्त नहीं है
(ग) समयानुसार नहीं बदलता
(घ) संकटकाल में ठीक नहीं रहता।
उत्तर-
(क) यह राजनीतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता

प्रश्न 2.
एक अच्छे संविधान का गुण है-
(क) संविधान का स्पष्ट न होना
(ख) संविधान का बहुत विस्तृत होना
(ग) व्यापकता तथा संक्षिप्तता में समन्वय
(घ) बहुत कठोर होना।
उत्तर-
(ग) व्यापकता तथा संक्षिप्तता में समन्वय

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प्रश्न 3.
“संविधान उन नियमों का समूह है, जो राज्य के सर्वोच्च अंगों को निर्धारित करते हैं, उनकी रचना, उनके आपसी सम्बन्धों, उनके कार्यक्षेत्र तथा राज्य में उनके वास्तविक स्थान को निश्चित करते हैं।” किसका कथन है ?
(क) सेबाइन
(ख) जैलिनेक
(ग) राबर्ट डाहल
(घ) आल्मण्ड पावेल।
उत्तर-
(ख) जैलिनेक

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से एक अच्छे संविधान की विशेषता है-
(क) स्पष्ट एवं निश्चित
(ख) अस्पष्टता
(ग) कठोरता
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(क) स्पष्ट एवं निश्चित

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 12 राज्य और सरकार

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 12 राज्य और सरकार Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 12 राज्य और सरकार

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राज्य और सरकार में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
(Explain the difference between the State and Government.)
उत्तर-
प्राचीनकाल में राज्य तथा सरकार में कोई अन्तर नहीं किया जाता था। प्लेटो तथा अरस्तु ने राज्य तथा सरकार में कोई अन्तर नहीं किया। फ्रांस का बादशाह लुई चौदहवां कहा करता था कि, “मैं ही राज्य हूं।” (“I am the State.”) इंग्लैण्ड के स्टूअर्ट राजाओं ने अपनी असीमित शक्तियों को प्रमाणित करने के लिए राज्य तथा सरकार में कोई अन्तर नहीं किया। जॉन-लॉक (John Locke) प्रथम लेखक था जिसने राज्य तथा सरकार में स्पष्ट भेद किया। आज भी साधारण नागरिक राज्य तथा सरकार में कोई अन्तर नहीं करता है। परन्तु वास्तविकता यह है कि इन दोनों में अन्तर है। राज्य तथा सरकार में निम्नलिखित अन्तर पाए जाते हैं-

1. सरकार राज्य का अंग है (Government is a part of State)—सरकार राज्य का एक अंग है। राज्य के चार तत्त्व हैं-जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार तथा प्रभुसत्ता। सरकार राज्य के चार तत्त्वों में से एक तत्त्व है, परन्तु सरकार स्वयं राज्य नहीं है। जिस प्रकार शरीर का एक अंग स्वयं शरीर नहीं कहला सकता, उसी तरह राज्य का अंग स्वयं राज्य नहीं कहला सकता।

2. राज्य व्यापक है, सरकार संकुचित (State is more comprehensive then Government)—’राज्य’ शब्द सरकार से अधिक व्यापक है। राज्य में सरकार के सदस्य तथा उस प्रदेश में रहने वाले सभी लोग शामिल होते हैं। सरकार में कुल जनसंख्या का थोड़ा भाग ही शामिल होता है।

3. सरकार राज्य का एजेन्ट है (Government is an agent of the State)-सरकार राज्य की नौकर अथवा एजेण्ट है। सरकार का कार्य राज्य की इच्छा का पालन करना है। राज्य की इच्छा को लागू करना सरकार का परम कर्तव्य है। प्रो० लॉस्की ने भी सरकार को राज्य का एजेण्ट कहा है।

4. राज्य अमूर्त तथा सरकार मूर्त है (State is abstract, Government is concrete)-राज्य अमूर्त है जिसे देखा नहीं जा सकता। राज्य का कोई रूप नहीं है, राज्य की केवल कल्पना की जा सकती है। परन्तु सरकार मूर्त है जिसका रूप है और जिसको देखा जा सकता है। जिस प्रकार आत्मा को नहीं देखा जा सकता उसी तरह राज्य को नहीं देखा जा सकता, परन्तु शरीर की तरह सरकार को भी देखा जा सकता है।

4. राज्य स्थायी है, सरकार अस्थायी (State is permanent, Government is temporary)-राज्य स्थायी है जबकि सरकार अस्थायी है। राज्य तब तक बना रहता है जब तक इसके पास प्रभुसत्ता बनी रहती है। प्रभुसत्ता के खो जाने से राज्य राज्य नहीं रहता। राज्य कम परिवर्तनशील है, परन्तु सरकार अस्थायी है। सरकारें बदलती रहती हैं। इंग्लैण्ड में कभी लेबर पार्टी की सरकार होती है और कभी अनुदार पार्टी की। जून, 2017 में इंग्लैण्ड में अनुदार पार्टी एवं डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी की गठबन्धन सरकार बनी। भारत में मई, 2014 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन की सरकार बनी।

5. राज्य के पास प्रभुसत्ता है सरकार के पास नहीं (State possesses sovereignty, Government does not)—प्रभुसत्ता राज्य का अनिवार्य तत्त्व है। जिस प्रकार बिना पति-पत्नी परिवार का निर्माण नहीं हो सकता, उसी तरह बिना प्रभुसत्ता के राज्य का निर्माण नहीं हो सकता। राज्य के पास सर्वोच्च शक्ति है, राज्य के अधिकार मौलिक होते हैं और इसकी शक्तियों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता, परन्तु सरकार के पास प्रभुसत्ता नहीं होती। सरकार अपनी शक्तियां राज्य से प्राप्त करती है। सरकार की शक्तियां सीमित होती हैं।

6. राज्य की सदस्यता अनिवार्य होती है, सरकार की नहीं (Membership of the State is compulsory, not of the Government)-मनुष्य का जन्म जिस राज्य में होता है, वह उसी राज्य का नागरिक बन जाता है। मनुष्य को किसी-न-किसी राज्य का सदस्य होना पड़ता है, परन्तु सरकार की सदस्यता ऐच्छिक होती है। सरकार का सदस्य बनने के लिए योग्यता तथा इच्छा का होना आवश्यक है। यदि कोई नागरिक सरकार का सदस्य नहीं बनना चाहता, तो उसे इसके लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

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7. राज्य के लिए निश्चित भूमि अनिवार्य तत्त्व है, सरकार के लिए नहीं (Territory is essential for State, not for Government)-राज्य के निर्माण के लिए निश्चित भूमि आवश्यक है, इसके बिना राज्य का निर्माण नहीं हो सकता। परन्तु सरकार के लिए निश्चित भूमि आवश्यक तत्त्व नहीं है। दूसरे महायुद्ध में फ्रांस पर जब जर्मनी ने कब्जा कर लिया तब फ्रांस की सरकार इंग्लैण्ड में चलती थी।

8. राज्य के विरुद्ध क्रान्ति नहीं हो सकती (No revolution against the State)-राज्य के पास सर्वोच्च शक्ति होती है, इसलिए नागरिक राज्य के विरुद्ध क्रान्ति नहीं कर सकते। परन्तु नागरिक सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर सकते हैं। लोकतन्त्र सरकार में जनता को सरकार के विरुद्ध भाषण देने तथा शान्तिपूर्ण जुलूस निकालने का अधिकार होता है।

राज्य एक समान होते हैं, सरकार विभिन्न प्रकार की होती है (States are similar, Governments differ)-राज्य एक समान होते हैं। राज्य जनसंख्या तथा क्षेत्र के आधार पर छोटे-बड़े हो सकते हैं, परन्तु सभी राज्यों के पास प्रभुसत्ता होती है। प्रत्येक राज्य के चार तत्त्व अनिवार्य होते हैं। परन्तु सरकार के विभिन्न रूप होते हैं। किसी राज्य में लोकतन्त्रीय सरकार होती है, किसी में तानाशाही सरकार, किसी में संसदीय सरकार, किसी में अध्यक्षात्मक सरकार, किसी में एकात्मक सरकार तो किसी में संघात्मक सरकार।

निष्कर्ष (Conclusion)-उपर्युक्त चर्चा के आधार पर यह परिणाम निकालना आसान ही है कि राज्य और सरकार दो अलग-अलग धारणाएं और संस्थाएं हैं। साथ ही यह भी कह देना उचित होगा कि सरकार भले ही राज्य के अधीन होती है फिर भी सरकार के बिना राज्य का निर्माण नहीं हो सकता। सरकार का महत्त्व राज्य के निर्माण और संचालन में इतना अधिक है कि कई लेखक व्यावहारिक दृष्टिकोण से सरकार को राज्य का सकारात्मक रूप बताते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य और सरकार में चार अन्तर लिखें।
उत्तर-
राज्य और सरकार में अग्रलिखित अन्तर पाए जाते हैं-

  • सरकार राज्य का अंग है-सरकार राज्य का एक अंग है। राज्य के चार तत्त्व हैं-जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार तथा प्रभुसत्ता। सरकार राज्य के चार तत्त्वों में से एक तत्त्व है, परन्तु सरकार स्वयं राज्य नहीं है। जिस प्रकार शरीर का एक अंग स्वयं शरीर नहीं कहला सकता, उसी तरह राज्य का अंग स्वयं राज्य नहीं कहला सकता।
  • राज्य व्यापक है, सरकार संकुचित-‘राज्य’ शब्द सरकार से अधिक व्यापक है। राज्य में सरकार के सदस्य तथा उस प्रदेश में रहने वाले सभी लोग शामिल होते हैं। सरकार में कुल जनसंख्या का थोड़ा भाग ही शामिल होता है।
  • सरकार राज्य की एजेण्ट है–सरकार राज्य की नौकर अथवा एजेण्ट है। सरकार का कार्य राज्य की इच्छा का पालन करना है। राज्य की इच्छा को लागू करना सरकार का परम कर्तव्य है। प्रो० लॉस्की ने भी सरकार को राज्य का एजेण्ट कहा है।
  • राज्य अमूर्त तथा सरकार मूर्त है-राज्य अमूर्त है, जिसे देखा नहीं जा सकता। परंतु सरकार मूर्त है, जिसका रूप है और जिसको देखा जा सकता है।

प्रश्न 2.
कानूनी प्रभुसत्ता की कोई चार मुख्य विशेषताएं लिखें।
उत्तर-
कानूनी प्रभुसत्ता की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • राज्य में कानूनी प्रभु निश्चित प्रभु होता है जिसके बारे में कोई सन्देह नहीं हो सकता।
  • कानूनी प्रभुसत्ता एक व्यक्ति में भी निहित हो सकती है जैसे कि निरंकुश राजतन्त्र में राजा के पास और व्यक्तियों के समूह में भी हो सकता है जैसे कि लोकतन्त्र में संसद् के पास। इंग्लैण्ड में कानूनी प्रभुसत्ता संसद् के पास है।
  • राष्ट्र की इच्छा का निर्माण कानूनी प्रभु ही करता है तथा उसकी घोषणा करता है। राष्ट्र की इच्छा को कानून बनाकर घोषित किया जाता है।
  • कानूनी प्रभु ही अधिकारों का स्रोत होता है। लोगों को वही अधिकार प्राप्त होते हैं जो कानूनी प्रभु द्वारा दिए जाते हैं और उन अधिकारों को कानूनी प्रभु जब चाहे वापिस ले सकता है।

प्रश्न 3.
राज्य, सरकार से अधिक स्थायी है, कैसे ?
उत्तर-
राज्य स्थायी है जबकि सरकार अस्थायी है। राज्य तब तक बना रहता है जब तक इसके पास प्रभुसत्ता रहती है। राज्य कम परिवर्तनशील है, परन्तु सरकार अस्थायी है। सरकारें बदलती रहती हैं। आज़ादी से पूर्व भारत पर अंग्रेजों का राज्य था और आज़ादी प्राप्त होने के बाद सत्ता भारतीयों के हाथ में आ गई। भारत में कभी कांग्रेस की सरकार होती है तो कई बार कई दल आपस में मिलकर गठजोड़ सरकार बनाते हैं।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 12 राज्य और सरकार

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राज्य और सरकार में दो अन्तर लिखें।
उत्तर-

  • सरकार राज्य का अंग है-सरकार राज्य का एक अंग है। राज्य के चार तत्त्व हैं-जनसंख्या, निश्चित भू-भाग, सरकार तथा प्रभुसत्ता। सरकार राज्य के चार तत्त्वों में से एक तत्त्व है, परन्तु सरकार स्वयं राज्य नहीं है। जिस प्रकार शरीर का एक अंग स्वयं शरीर नहीं कहला सकता, उसी तरह राज्य का अंग स्वयं राज्य नहीं कहला सकता।
  • राज्य व्यापक है, सरकार संकुचित-‘राज्य’ शब्द सरकार से अधिक व्यापक है। राज्य में सरकार के सदस्य तथा उस प्रदेश में रहने वाले सभी लोग शामिल होते हैं। सरकार में कुल जनसंख्या का थोड़ा भाग ही शामिल होता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. समुदाय का अर्थ लिखें।
उत्तर-समुदाय व्यक्तियों का ऐसा समूह है, जिसका एक विशेष उद्देश्य होता है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिल-जुल कर अर्थात् संगठित होकर कार्य करते हैं।

प्रश्न 2. समुदाय की कोई एक परिभाषा लिखें।
उत्तर-जिन्सबर्ग के अनुसार, “समुदाय सामाजिक प्राणियों का एक समूह है,जो किसी निश्चित उद्देश्य या उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक सामान्य संगठन बना लेते हैं।”

प्रश्न 3. समुदाय का कोई एक तत्त्व लिखें।
उत्तर-समुदाय का निर्माण व्यक्तियों द्वारा किसी सामान्य या विशेष उद्देश्य के लिए किया जाता है।

प्रश्न 4. समुदाय के वर्गीकरण के कोई दो आधार बताएं।
उत्तर-

  1. सदस्यता के आधार पर
  2. अवधि के आधार पर।

प्रश्न 5. समुदाय का कोई एक महत्त्व लिखें।
उत्तर-समुदाय व्यक्ति के सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति करता है।

प्रश्न 6. सदस्यता के आधार पर समुदाय कितने प्रकार के हो सकते हैं ?
उत्तर-सदस्यता के आधार पर समुदाय दो प्रकार का होता है।

प्रश्न 7. अवधि के आधार पर समुदाय कितने प्रकार के हो सकते हैं?
उत्तर-अवधि के आधार पर समुदाय दो प्रकार का होता है।

प्रश्न 8. प्रभुसत्ता के आधार पर समुदाय कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-प्रभुसत्ता के आधार पर समुदाय तीन प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 9. पूर्ण सत्ताधारी समुदाय किसे कहते हैं ?
उत्तर-राज्य को पूर्ण सत्ताधारी समुदाय कहते हैं।

प्रश्न 10. ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, जिला परिषद् तथा नगर-निगम किस प्रकार के समुदाय हैं ?
उत्तर-ये सभी अर्धसत्ता प्राप्त समुदाय कहलाते हैं।

प्रश्न 11. भू-क्षेत्र के आधार पर समुदाय कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-भू-क्षेत्र के आधार पर समुदाय चार प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 12. नगर एवं गांव किस प्रकार के समुदाय हैं ?
उत्तर-नगर एवं गांव स्थानीय प्रकार के समुदाय हैं।

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प्रश्न 13. शिरोमणि अकाली दल किस प्रकार का संघ है ?
उत्तर-शिरोमणि अकाली दल प्रादेशिक समुदाय है।

प्रश्न 14. कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी किस प्रकार के समुदाय हैं ?
उत्तर-कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय समुदाय हैं।

प्रश्न 15. संयुक्त राष्ट्र एवं यूनेस्को किस प्रकार के संघ हैं?
उत्तर-संयुक्त राष्ट्र एवं यूनेस्को अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय हैं।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. राज्य की सदस्यता ………….. है, जबकि समुदाय की ऐच्छिक है।
2. …………. के लिए निश्चित भू-भाग आवश्यक है, समुदाय के लिए नहीं।
3. राज्य का उद्देश्य व्यापक होता है, जबकि ………….. का उद्देश्य सीमित होता है।
4. ………….. के पास प्रभुसत्ता है, समुदाय के पास नहीं है।
5. राज्य ……….. होता है, जबकि समुदाय अस्थायी होता है।
उत्तर-

  1. अनिवार्य
  2. राज्य
  3. समुदाय
  4. राज्य
  5. स्थायी ।

प्रश्न III. निम्नलिखित कथनों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. फ्रांस का बादशाह लुई 14वां कहा करता था, कि “मैं ही राज्य हूँ”।
2. राज्य सरकार का अंग है।
3. राज्य व्यापक है, सरकार संकुचित है।
4. राज्य सरकार की एजेन्ट है।
5. राज्य अमूर्त है तथा सरकार मूर्त है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राज्य और सरकार-
(क) दो अलग-अलग धारणाएं हैं
(ख) एक ही धारणा है
(ग) दोनों समान हैं
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) दो अलग-अलग धारणाएं हैं

प्रश्न 2.
सरकार के कितने अंग होते हैं ?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार।
उत्तर-
(ग) तीन

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 12 राज्य और सरकार

प्रश्न 3.
एक राज्य के लिए आवश्यक है-
(क) संसदीय
(ख) राजतन्त्रीय
(ग) अध्यक्षात्मक
(घ) कोई भी सरकार।
उत्तर-
(घ) कोई भी सरकार।

प्रश्न 4.
भारत में कैसी सरकार है ?
(क) संसदीय
(ख) अध्यक्षात्मक
(ग) राजतन्त्रीय
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) संसदीय