PSEB 7th Class Science Notes Chapter 14 विद्युत धारा तथा इसके चुंबकीय प्रभाव

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 14 विद्युत धारा तथा इसके चुंबकीय प्रभाव

→ विद्युत अवयवों को प्रतीकों द्वारा निरूपित किया जा सकता है जो कि बहुत सुविधाजनक है।

→ सर्कट चित्र (Circuit Diagram) विद्युत सर्कट का चित्रात्मक प्रतिरूप होता है।

→ विद्युत सैल का प्रतीक दो समानांतर रेखाएं हैं। जिनमें एक लंबी और दूसरी छोटी रेखा है।

→ बैटरी दो या दो से अधिक सैंलों का श्रेणी क्रम में संयोजक है।

→ बैटरी का उपयोग टार्च, ट्रांजिस्टर, रेडियो, खिलौने, टी०वी०, रीमोट कंट्रोल आदि में किया जाता है।

→ विद्युत बल्बों में एक पतला तंतु (फिलामैंट) होता है, जो विद्युत धारा के प्रवाह से दीप्त हो जाता है। ऐसा विद्युत धारा के तापीय प्रभाव से होता है।

→ विद्युत तापक (Heater), रूम तापक (हीटर) तथा टैस्टर आदि में विद्युत धारा के तापीय प्रभाव का उपयोग किया जाता है।

→ विशेष पदार्थ की तारें जिनमें से अधिक मात्रा में विद्युत धारा गुज़ारने से वह गर्म होकर पिघल जाती हैं; जिनका प्रयोग फ्यूज़ बनाने के लिए किया जाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 14 विद्युत धारा तथा इसके चुंबकीय प्रभाव

→ सर्कट में विद्युत फ्यूज़, विद्युत उपकरणों को आग लगने या किसी अन्य नुकसान से बचाने के लिए लगाए जाते हैं।

→ धातु की तार में से विद्युत धारा प्रवाह करने से वह चुंबक जैसा व्यवहार करती है। विद्युत धारा के इस प्रभाव को चुंबकीय प्रभाव कहते हैं।

→ ऐसा पदार्थ जिसमें से विद्युत धारा प्रवाह करने से वह चुंबकीय बन जाता है तथा विद्युत प्रवाह बंद करने पर अपना चुंबकीय गुण खो देता है, को विद्युत चुंबक कहते हैं।

→ लोहे के किसी टुकड़े के इर्द-गिर्द विद्युत रोधी तार लपेट कर उसमें से विद्युत धारा प्रवाहित की जाए तो लोहे का टुकड़ा चुंबकीय व्यवहार करता है। इस प्रकार बनाए गए चुंबक को विद्युत चुंबक कहते हैं। विद्युत चुंबक अस्थायी चुंबक होता है क्योंकि विद्युत धारा बंद करने से यह अपना चुंबकीय गुण खो/गंवा देता है।

→ विद्युत चुंबक का प्रयोग कई यंत्रों में किया जाता है; जैसे विद्युत घंटी, चुंबकीय क्रेन आदि।

→ चालक : वह पदार्थ, जो अपने में से विद्युत धारा को प्रवाहित होने देता है।

→ रोधक : वह पदार्थ जो अपने में से विद्युत धारा को प्रवाहित होने से रोकता है।

→ स्विच : यह एक साधारण युक्ति है जो विद्युत परिपथ में विद्युत धारा प्रवाह को पूर्ण होने या विद्युत धारा के प्रवाह को तोड़ने के लिए प्रयुक्त होती है।

→ सर्कट या परिपथ : विद्युत धारा के बहाव को बैटरी के धन-टर्मिनल से स्विच, बल्ब के रास्ते दूसरे ऋण-टर्मिनल तक पहुँचने का पथ, सर्कट या परिपथ कहलाता है।

→ बल्ब : एक साधारण युक्ति जिसमें विद्युत ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित/रूपांतरित करती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 14 विद्युत धारा तथा इसके चुंबकीय प्रभाव

→ ऐलीमैंट या तंतु : टंगस्टन धातु का एक बारीक टुकड़ा जो विद्युत धारा के प्रवाह से गर्म होकर प्रकाश उत्सर्जित करता है।

→ बैटरी : यह एक विद्युत रासायनिक सैलो का संयोजन है जो रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।

→ विद्युत चुंबक : कुंडली के भीतर एक नरम लोहे का टुकड़ा रखकर कुंडली में से विद्युत धारा प्रवाहित करने से लोहे के टुकड़े में चुंबक के गुण आ जाते हैं। इस युक्ति को विद्युत चुंबक कहते हैं।

→ विद्युत घण्टी : वह यांत्रिक युक्ति जो विद्युत चुंबक के सिद्धांत पर काम करती है तथा विद्युत धारा प्रवाहित करने से बार-बार ध्वनि उत्पन्न करती है।

→ विद्युत क्रेन : ऐसी क्रेन जिसके एक छोर पर बड़ा शक्तिशाली चुंबक जुड़ा हो जिसका इस्तेमाल करके लोहे से बने हुए भारी सामान को उठाकर एक स्थान-से-दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है या फिर कबाड़ में से लोहे को अलग किया जा सकता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय

→ यदि कोई वस्तु अपने इर्द-गिर्द की वस्तुओं तथा समयानुसार अपनी स्थिति में परिवर्तन नहीं करती तो उस वस्तु को विराम अवस्था में कहा जाता है।

→ यदि कोई वस्तु अपनी स्थिति अपने इर्द-गिर्द की वस्तुओं तथा समयानुसार अपनी स्थिति बदलती है तो वह गति अवस्था में होती है।

→ वस्तु की सीधी रेखा में गति को सरल रेखा गति कहते हैं।

→ किसी वस्तु की चक्कराकार पथ पर हो रही गति को चक्कराकार गति कहते हैं।

→ यदि कोई वस्तु अपनी मध्य स्थिति के इधर-उधर गति करती है, तो उस वस्तु की गति को दोलन गति कहते हैं।

→ यदि कोई वस्तु थोड़ी दूरी को तय करने में बहुत कम समय लगाती है, तो उस वस्तु को गति तेज़ होती है तथा यदि वस्तु उसी दूरी को तय करने में अधिक समय लगाती है तो उसकी गति मंद गति/धीमी गति कहलाती है।

→ इकाई/एकांक समय में तय की गई दूरी को चाल कहते हैं। इसकी S.I. इकाई मीटर/प्रति सैकण्ड (m/s) है।

→ चाल की गणना निम्नलिखित सूत्र द्वारा की जा सकती है :
PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय 1

→ एक सीधी रेखा के ऊपर एक गति से चल रही वस्तु की गति को एक समान गति कहते हैं, जबकि एक सीधी रेखा के ऊपर भिन्न-भिन्न गति से चल रही वस्तु की गति को असमान गति/चाल कहते हैं।

→ घड़ी, घंटों वाली सूई की गति, धरती की सूरज के इर्द-गिर्द गति तथा साधारण पेंडुलम की गति एक समान गति है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय

→ समय की S.I. इकाई सैकण्ड है। एक धागे से बांधकर किसी स्थिर जगह या स्टैंड से लटकाए गए भारी पुंज (धातु गोले) को साधारण पेंडुलम कहते हैं।

→ साधारण पेंडुलम की इधर-उधर की गति को आवर्ती या दोलन गति कहते हैं।

→ पेंडुलम के एक दोलन गति को पूरा करने के लिए लगे समय को आवर्त काल कहते हैं।

→ एक सैंकण्ड में पूरी की दोलन संख्या को आवर्ती कहते हैं। आवर्ती की S.I. इकाई हरटज़ है।

→ वाहनों की चाल मापने वाले यंत्र को स्पीडोमीटर कहते हैं।

→ स्पीडोमीटर वाहनों की चाल को किलोमीटर/घण्टा में मापता है।

→ वाहनों द्वारा तय की गयी दूरी मापने के लिए प्रयोग किये जाने वाले यंत्र को ओडोमीटर कहते हैं।

→ ग्राफ एक मात्रा की दूसरी मात्रा से तुलना को चित्र रूप में दर्शाता है।

→ सामान्य रूप से तीन प्रकार के ग्राफ प्रचलित हैं :

  1. रेखीय ग्राफ,
  2. छड़ ग्राफ,
  3. पाई चार्ट ग्राफ।

→ दूरी समय ग्राफ एक रेखा ग्राफ है। यह वस्तु द्वारा तय की गयी दूरी तथा समय के बीच ग्राफ को दर्शाता है। जो मात्रा स्वतन्त्र होती है उसको क्षितिज अक्ष (x-axis) तथा दूसरी मात्रा जो निर्भर होती है को उर्ध्वाकार अक्ष (y-axis) पर लिया जाता है।

→ समान समय अंतराल में समान दूरी तय करने वाली वस्तु की गति कहलाती है।

→ जब कोई वस्तु समान समय अंतरालों में असमान दूरी तय करे या असमान समय अंतरालों में समान दूरी तय करे, तो उसकी गति को असमान गति कहते हैं।

→ जब कोई वस्तु विराम अवस्था में है, तो उसकी दूरी-समय ग्राफ X-अक्ष के समानांतर एक सीधी रेखा है।

→ ग्राफ : वह दो राशियाँ जो आपस में एक-दूसरे पर निर्भर करती हैं तथा इनका चित्र द्वारा निरूपण ग्राफ कहलाता है।

→ चाल : इकाई समय अंतराल में वस्तु द्वारा तय की गई दूरी चाल कहलाती है।

→ समान चाल : जब कोई वस्तु समान समय अंतराल में समान दूरी तय करती है तो उस वस्तु की चाल होती है।

→ असमान चाल : समान समय अंतराल में एक समान दूरी न तय करने पर वस्तु की चाल असमान चाल कहलाती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय

→ सरल पेंडुलम : धातु या पत्थर के छोटे से टुकड़े को किसी दृढ़ (मज़बूत) बिंदू पर धागे की सहायता से लटकाने पर सरल पेंडुलम प्राप्त होता है।

→ दोलन : एक स्वतन्त्रतापूर्वक लटक रही वस्तु जब अपनी मध्य स्थिति से एक तरफ चर्म सीमा तक जाए और फिर दूसरे तरफ की चर्म सीमा तक जाए और आखिर में अपनी पूर्व स्थिति अर्थात् मध्य स्थिति पर पहुँच जाए जो वह वस्तु एक दोलन पूरा कर लेती है।

→ आवर्तन काल : सरल पेंडुलम द्वारा एक दोलन पूरा करने में लगा समय आवर्तनकाल कहलाता है।

→ एक समान गति : जब कोई वस्तु समान समय अंतराल में समान दूरी तय करती है भले ही समय अंतराल कितना ही छोटा क्यों न हो तो उस समय वस्तु की गति एक समान गति कहलाती है।

→ असमान गति : जब कोई वस्तु समान समय अंतराल में समान दूरी न तय करे भले ही समय अंतराल कितना भी छोटा क्यों न हो तो उस वस्तु की गति असमान गति कहलाती है। अध्याय के अन्तर्गत आने वाले प्रश्न-उत्तर

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 12 पौधों में प्रजनन

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 12 पौधों में प्रजनन

→ पौधों में दो प्रकार का प्रजनन होता है-

  1. अलैंगिक प्रजनन,
  2. लैंगिक प्रजनन।

→ अलैंगिक प्रजनन, प्रजनन की ऐसी विधि है, जिसके द्वारा केवल एक ही जनक से नए पौधे पैदा होते हैं।

→ दो-खंडन विधि, कलियों द्वारा, विखंडन, बीजाणु द्वारा, पुनर्जनन, अलैंगिक प्रजनन की भिन्न-भिन्न विधियाँ हैं।

→ दो-खंडन प्रजनन विधि में जीव दो बराबर हिस्सों में बाँटा जाता है। दोनों हिस्से विकसित होकर दो नए जीव बन जाते हैं।

→ लैंगिक प्रजनन के दौरान पौधों के नर जनन तथा मादा जनन अंग नर युग्मक तथा मादा युग्मक पैदा करते हैं जो मिलकर युग्मज़ बनाते हैं। युग्मज़ नए पौधों में विकसित होता है।

→ लैंगिक प्रजनन केवल फूलदार पौधों में होता है।

→ कायिक प्रजनन एक ऐसी विधि है जिसमें जड़, तने या पत्ते जैसे अंगों द्वारा नए पौधे पैदा होते हैं। प्रजनन की इस विधि में न जनन अंग भाग लेते हैं तथा न ही बीज भाग लेते हैं।

→ पौधों में प्रजनन के कई बनावटी ढंग भी हैं। यह हैं कलमें लगाना, प्योंद चढ़ाना तथा ज़मीन के नीचे दाब लगाना।

→ पके हुए परागकणों का परागकोष से परागकण-ग्राही (वर्तिकाग्र) तक स्थानांतरण परागण क्रिया कहलाता है। यह उसी फूल पर या दूसरे फूल के स्त्री केसर की परागकण-ग्राही तक पहुँचते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 12 पौधों में प्रजनन

→ काई जैसे फूल रहित पौधे विखंडन द्वारा प्रजनन करते हैं; खमीर कलियों द्वारा, जब कि फफूंदी तथा मौस बीजाणुओं द्वारा प्रजनन करते हैं।

→ नर युग्मक तथा मादा युग्मक के अंडाणु में सुमेल (Fusion) को निषेचन क्रिया कहते हैं।

→ अंडाणुओं के निषेचन के बाद अंडाशय फल में तथा अंडाणु बीज रूप में विकसित हो जाते हैं।

→ बीजों को जनक पौधों से दूर पहुँचाने के लिए बीजों को बिखेरना आवश्यक होता है, ताकि बीज नये पौधे के रूप में विकसित हो सके।

→ प्रजनन : सजीवों के अपने जैसे नये जीव उत्पन्न करने की योग्यता को प्रजनन कहते हैं।

→ अलैंगिक प्रजनन : ऐसी विधि जिसमें नये पौधे उगाने के लिए बीजों की आवश्यकता नहीं होती। एक ही जनक से नया पौधा तैयार हो जाता है।

→ लैंगिक प्रजनन : नर तथा मादा के युग्मकों के संयोग से नया जीव पैदा करने को लैंगिक प्रजनन कहते हैं।

→ कायिक प्रजनन : जब पौधो के किसी भी अंग से नया पौधा तैयार हो, तो उसे कायिक प्रजनन कहते हैं।

→ विखंडन : प्राणियों के शरीर का दो या दो से अधिक भागों में बँटकर नये जीव का बनना विखंडन कहलाता है।

→ एकलिंगी पुष्प : वे फूल जिनमें केवल पुंकेसर या केवल स्त्री केसर मौजूद हों, को एकलिंगी पुष्प कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 12 पौधों में प्रजनन

→ द्विलिंगी पुष्प : वे फूल जिसमें पुंकेसर और स्त्री केसर दोनों मौजूद हो, उसे द्विलिंगी पुष्प कहते हैं।

→ निषेचन : नर युग्मक तथा मादा युग्मक के सुमेल को निषेचन क्रिया कहते हैं।

→ परागण : पके हुए परागकणों का परागकोष से परागकण–ग्राही या वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण कहलाता है।

→ स्वःपरागण : दो लैंगिक पुष्यों में परागकण, परागकोष में से जब उसी पुष्प के स्त्री केसर की परागकण ग्राही तक जाते हैं तो इस क्रिया को स्वः परागकण कहते हैं।

→ पर-परागण : पर-परागण क्रिया में परागकण एक पुष्प के पुंकेसर से किसी और फूल की परागकण-ग्राही (स्त्री केसर) तक जाते हैं। पर-परागकण क्रिया एक ही पौधे के दो पुष्पों या उसी प्रजाति के दो पौधों के पुष्पों के बीच होती है।

→ बीजों का उगना (बीजों का अंकुरन) : शुष्क मिट्टी पर पहुँच कर बीज पानी अवशोषित कर फूल जाते हैं। भ्रूण अंकुरित होना शुरू करता है, जड़ अंकुर मिट्टी में धंस जाता तथा तना अंकुर ऊपर हवा की ओर निकल आता है। पत्ते निकल आते हैं। इस प्रक्रिया को बीजों का अंकुरन कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 11 जंतुओं और पादपों में परिवहन

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 11 जंतुओं और पादपों में परिवहन

→ सभी सजीवों को विभिन्न टूटने-बनने की क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो प्राप्त किए भोजन से मिलती है।

→ पत्तों को प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन तैयार करने के लिए जल तथा CO2 की आवश्यकता होती है।

→ जानवरों में भोजन, ऑक्सीजन तथा जल शरीर के प्रत्येक सैल तक पहुँचाया जाता है तथा व्यर्थ पदार्थ सैलों से शरीर के निकासी अंग तक पहुंचाए जाते हैं।

→ जीवों में पदार्थों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना परिवहन कहलाता है।

→ विकसित जीवों की रक्त संचार प्रणाली में हृदय, रक्त वाहिनियां तथा रक्त होता है जो ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, भोजन, हार्मोनों तथा एंजाइमों का शरीर के एक भाग से दूसरे भागों में परिवहन करता है।

→ एक सैली जीवों में रक्त संचार प्रणाली नहीं होती।

→ रक्त में लाल रक्त सैल, श्वेत रक्त सैल, प्लेटलेट्स तथा प्लाज्मा होते हैं। रक्त का लाल रंग होमोग्लोबिन नाम के वर्णक के कारण होता है।

→ हृदय एक पेशीदार अंग है, जो रक्त के संचार के लिए पम्प की तरह निरन्तर धड़कता रहता है।

→ एक मिनट में धड़कनों की गिनती को नब्ज़ दर कहा जाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 11 जंतुओं और पादपों में परिवहन

→ धमनियों में ऑक्सीजन युक्त रक्त होता है तथा शिराओं में कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रक्त होता है।

→ रक्त तथा टिशु द्रवों के बीच पोषक तत्त्वों, गैसों तथा फोकट (व्यर्थ) पदार्थों का आदान-प्रदान कोशिकाओं द्वारा होता है।

→ मनुष्य के उत्सर्जन तन्त्र में जोड़ा गुर्दा, एक जोड़ा मूत्र वाहिनियां, एक मूत्राशय तथा एक मूत्र मार्ग उत्सर्जन होता है।

→ गुर्दे व्यर्थ पदार्थों को मूत्र के रूप में, फेफड़े कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में तथा चमड़ी पसीने के रूप में शरीर से बाहर निकालते हैं।

→ मानवीय गुर्यों में उपलब्ध रक्त कोशिकाएं रक्त को छानने का कार्य करती हैं।

→ एक मशीन की सहायता से रक्त में व्यर्थ पदार्थों तथा फोकट तरल को बाहर निकालने की प्रक्रिया को डायलाइसिस कहते हैं।

→ प्रसरण वह प्रक्रिया है जिसमें गैसों तथा द्रवों के अणु अधिक सघनता वाले माध्यम से कम सघनता वाले माध्यम की ओर गति करते हैं।

→ परासरण वह प्रक्रिया है जिसमें घोलक एक अर्ध पारगामी (Semi Permeable) झिल्ली द्वारा कम सघनता वाले घोल से अधिक सघनता वाले घोल की ओर जाता है।

→ एक सैली जीव बाहरी पर्यावरण में पदार्थों की अदला-बदली सैल की सतह से करते हैं।

→ प्रकाश संश्लेषण : सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन-डाइऑक्साइड तथा जल जैसे सरल यौगिकों से हरे पौधों द्वारा क्लोरोफिल की मौजूदगी में कार्बोहाइड्रेट के निर्माण की प्रक्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहा जाता है।

→ परासरण : यह वह प्रक्रिया है जिसमें घोलक एक अर्द्ध-पारगामी झिल्ली द्वारा कम सघनता वाले घोल से अधिक सघनता वाले घोल की ओर जाता है तथा दोनों ओर के घोलों की सघनता बराबर हो जाती है। इस प्रकार का परिवहन बहुत कम दूरी तक ही होता है। पौधों के जड़बाल परासरण विधि द्वारा मिट्टी से जल ग्रहण करते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 11 जंतुओं और पादपों में परिवहन

→ वाष्प उत्सर्जन : पौधों के पत्तों द्वारा जल के वाष्पन को वाष्प उत्सर्जन कहते हैं।

→ स्थानान्तरण : पत्तों से भोजन का पौधों के अन्य भागों (हिस्सों) तक पहुंचना स्थानान्तरण कहलाता है।

→ फ्लोएम : पौधों के जो टिशु पत्तों में बने भोजन को पौधों के अन्य हिस्सों तक पहुँचाता है, उसे ‘फ्लोएम’ कहते हैं।

→ धमनियाँ : ऐसी वाहिनियाँ जो हृदय से ऑक्सीजन युक्त रक्त को शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाती हैं, उन्हें धमनियाँ कहते हैं।

→ शिराएँ : ऐसी वाहिनियाँ जो शरीर के भिन्न-भिन्न भागों से रक्त हृदय तक पहुँचाती हैं, उन्हें शिराएँ कहते हैं।

→ मानव उत्सर्जन तन्त्र : शरीर में कई क्रियाओं द्वारा पैदा हुए अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन तन्त्र कहते हैं।

→ डायलाइसिस : शरीर के गुर्दो में से बनावटी मशीन की सहायता से यूरिया तथा अन्य हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने की प्रणाली को डायालाइसिस कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 10 जीवों में श्वसन

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 10 जीवों में श्वसन

→ साँस लेना, श्वसन प्रक्रम का एक हिस्सा है, जिस दौरान सजीव ऑक्सीजन युक्त हवा अंदर लेते हैं तथा कार्बनडाइऑक्साइड युक्त हवा बाहर निकालते हैं।

→ साँस लेते समय हम जो ऑक्सीजन लेते हैं यह ग्लूकोज़ को पानी तथा कार्बन डाइऑक्साइड में तोड़ती है तथा ऊर्जा भी मुक्त करती है जो सजीवों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

→ सैंलमयी (कोशकीय) श्वसन क्रिया के दौरान जीव के सैलों (कोशिकाओं) में ग्लूकोज़ का विखण्डन होता है।

→ वायवीय श्वसन क्रिया के दौरान ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोज़ का विखण्डन होता है।

→ अवायवीय श्वसन क्रिया के दौरान ग्लूकोज़ का विखण्डन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है।

→ भारी व्यायाम के समय जब ऑक्सीजन की पूरी उपलब्धता नहीं होती तो भोजन का विखंडन अवायवीय श्वसन क्रिया द्वारा होता है।

→ तेज़ शारीरिक गतिविधियों के समय साँस लेने की दर भी बढ़ जाती है।

→ विभिन्न जीवों में साँस लेने के अंग भी भिन्न-भिन्न होते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 10 जीवों में श्वसन

→ साँस अंदर लेने पर फेफडे फैलते हैं तथा सांस छोड़ते (उच्छ्वसन) समय जब हवा बाहर निकलती है तो वापिस पहली स्थिति में आ जाते हैं।

→ रक्त में हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन को शरीर के भिन्न-भिन्न भागों (हिस्सों) तक ले जाता है।

→ गाय, भैंस, कुत्ते, बिल्लियों तथा अन्य स्तनधारियों में भी श्वसन अंग मनुष्य के श्वसन अंगों जैसे होते हैं तथा श्वसन क्रिया भी मनुष्य की तरह होती है।

→ केंचुए में गैसों की अदला-बदली गीली त्वचा द्वारा होती है। मछलियों में यह क्रिया गलफड़ों द्वारा तथा कीटों में श्वासनली द्वारा होती है।

→ पौधों में भी ग्लूकज़ का विखण्डन दूसरे जीवों के जैसा ही होता है।

→ पौधों में जड़ें मिट्टी से हवा लेती हैं।

→ पत्तों में छोटे-छोटे छेद होते हैं। जिन्हें स्टोमैटा कहते हैं। इनके द्वारा गैसों की अदला-बदली होती है।

→ श्वसन : जीवों में होने वाली वह जैव-रासायनिक क्रिया जिसमें जटिल कार्बनिक भोजन पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है। जिसके फलस्वरूप कार्बनडाइऑक्साइड तथा पानी बनते हैं तथा ऊर्जा मुक्त होती है।

→ वायवीय श्वसन : ऑक्सीजन की मौजूदगी में होने वाली श्वसन क्रिया को वायवीय श्वसन क्रिया कहा जाता है।

→ अवायवीय श्वसन : ऑक्सीजन की गैर-मौजूदगी में होने वाली श्वसन क्रिया अवायवीय श्वसन क्रिया कहलाती है।

→ स्टोमैटा : पत्तों की सतह पर हवा तथा जलवाष्पों का आदान-प्रदान के लिए खास प्रकार के बहुत सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जिन्हें स्टोमैटा कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 10 जीवों में श्वसन

→ श्वसन-क्रिया : यह सरल यांत्रिक क्रिया है जिसमें ऑक्सीजन से भरपूर हवा वातावरण में से खींच कर फेफड़ों में जाती है। इस क्रिया को श्वसन क्रिया (साँस लेना) कहते हैं। साँस लेने के बाद कार्बन डाइऑक्साइड युक्त हवा बाहर वातावरण (पर्यावरण) में निकाल दी जाती है, जिसे साँस छोड़ना (उच्छ्वसन) कहते हैं, श्वसन क्रिया कहलाती है।

→ साँस लेना : पर्यावरण में से ऑक्सीजन से भरपूर हवा खींच कर श्वास अंगों (फेफड़ों) को भरने की क्रिया को साँस लेना कहते हैं।

→ श्वास छोड़ना : ऐसी क्रिया जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड से युक्त हवा को फेफड़ों से बाहर निकाला जाता है।

→ सैंलमयी/कोशिकीय श्वसन क्रिया : सैल/ कोशिका के अंदर होने वाली वह प्रक्रिया जिसमें भोजन का रासायनिक श्वसन क्रिया अपघटन होने के उपरांत (पश्चात्) ऊर्जा पैदा होती है, को सैंलमयी/कोशिकीय श्वसन क्रिया कहते हैं।

→ श्वास दर : कोई व्यक्ति एक मिनट में जितनी बार साँस लेता है, उसे श्वास दर कहते हैं। आम (सामान्य) व्यक्ति की श्वास दर 12 से 20 प्रति मिनट होती है।

→ गलफड़े : यह रक्त-बहनियाँ पंखों जैसी विशेष अंग होती हैं जिनकी सहायता से कुछ जलजीव जैसे मछली आदि साँस लेते हैं। इनमें पानी तथा रक्त उल्ट (विपरीत) दिशा में बहते हैं जिससे ऑक्सीजन का प्रसरण (Diffusion) अधिक होता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 9 मृदा

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 9 मृदा

→ धरती की सबसे ऊपर की पर्त जिसमें पौधे या फसलें उग सकती हैं, मृदा कहलाती है।

→ मृदा, टूटी चट्टानों, कार्बनिक पदार्थ, जन्तु, पौधे तथा सूक्ष्मजीवों से बनी है।

→ मृदा की भिन्न-भिन्न पर्ते होती हैं, जिन्हें मृदा की परिछेदिका में देखा जा सकता है।

→ मृदा कार्बनिक तथा अकार्बनिक दोनों प्रकार के घटकों से बनी होती है।

→ पौधों के मृत तथा गले सड़े पत्ते या पौधे, कीट या मृत जन्तुओं के मृदा में दबे शरीर, पशुओं का गोबर आदि मिल कर कार्बनिक पदार्थ बनाते हैं, जिसे ह्यूमस (Humus) कहते हैं।

→ मृदा जिसमें कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों का मिश्रण होता है, फसलों के लिए अधिक लाभदायक है।

→ कणों के आकार के आधार पर मृदा चिकनी, रेतीली, पथरीली तथा दोमट होती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 9 मृदा

→ रासायनिक गुण के आधार पर मृदा अम्लीय, क्षारीय तथा उदासीन हो सकती है।

→ अम्लीय मिट्टी का pH 1 से 6 तक होता है।

→ क्षारीय मृदा का pH 8 से 14 तक होता है।

→ उदासीन मृदा का pH 7 होता है।

→ मृदा अथवा मृदा का गुण जानने के लिए pH पेपर का प्रयोग किया जाता है।

→ काली मृदा में लोहे के लवण होते हैं तथा यह कपास उगाने के लिए अच्छी होती है।

→ जिस मृदा में गंधक होती है, वह मृदा प्याज उगाने के लिए अच्छी होती है।

→ विभिन्न फसलें उगाने के लिए भिन्न-भिन्न मृदा की आवश्यकता होती है।

→ मृदा की ऊपरी पर्त बनने में कई साल लगते हैं।

→ बाढ़, आँधी, तूफ़ानों तथा खदानें खोदने के कारण मृदा की ऊपरी पर्त नष्ट हो जाने को मृदा अपरदन कहते हैं।

→ खदानें खोदने से, चरने वाले पशुओं के खुरों से मृदा नर्म हो जाती है तथा आँधी, जल से नर्म हुई मृदा का जल्दी मृदा अपरदन हो जाता है।

→ वृक्ष लगाकर, चैक डैम बनाकर, खेतों की मेडों पर घास लगाकर तथा नदियों या नहरों के किनारे पक्के करके मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 9 मृदा

→ मृदा : चट्टान/शैल कणों तथा ह्यूमस का मिश्रण मृदा कहलाता है।

→ मृदा परिच्छेदिका : मृदा की विभिन्न परतों से गुजरती हुई ऊर्ध्वाकाट मृदा परिच्छेदिका कहलाती है।

→ ह्यूमस : मृदा में उपस्थित सड़े-गले जैव पदार्थ ह्यूमस कहलाते हैं।

→ मृदा-आर्द्रता या नमी : मृदा अपने अंदर जल को रोक के रखती है, जिसे मृदा आर्द्रता या नमी कहते हैं।

→ मृदा-अपरदन : जल, पवन या बर्फ के द्वारा मृदा की ऊपरी तह का हटना मृदा अपरदन कहलाता है।

→ अपक्षय : वह प्रक्रम जिसमें पवन, जल और जलवायु की क्रिया से चट्टानों के टूटने पर मृदा का निर्माण होता है, अपक्षय कहलाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 8 पवन, तूफ़ान और चक्रवात

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 8 पवन, तूफ़ान और चक्रवात

→ हमारे इर्द-गिर्द की हवा दबाव डालती है।

→ गतिशील हवा को पवन/आँधी कहते हैं।

→ बहुत तेज़ हवा चलने से दबाव घटता है।

→ गर्म होने पर हवा फैलती है और ठंडी होने पर सिकुड़ जाती है।

→ ठंडी हवा की तुलना में गर्म हवा हल्की होती है।

→ हवा अधिक दाब वाले क्षेत्रों से कम दाब वाले क्षेत्रों की ओर बहती है।

→ हवा की गति अनीमोमीटर यंत्र से मापी जाती है।

→ हवा की गति की दिशा पवन/विंड वेन (Wind Vane) से मापी जाती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 8 पवन, तूफ़ान और चक्रवात

→ पवन धाराएँ पृथ्वी के असमान रूप से गर्म होने के कारण उत्पन्न होती हैं।

→ मानसूनी पवन जल से भरी होती है तथा वर्षा लाती है।

→ चक्रवात विनाशकारी होते हैं।

→ उड़ीसा के तट को 18 अक्तूबर, 1999 में एक चक्रवात ने पार किया था।

→ चक्रवात का पवन वेग ज्यादा होता है।

→ चक्रवात बहुत ही शक्तिशाली चक्रीय रूप में घूमने वाला तूफ़ान होता है जो बहुत कम दबाव वाले केन्द्र के गिर्द घूमता है।

→ कीप आकार के बादलों के साथ घूमती तेज़ हवाओं वाले भयानक तूफ़ान को आंधी कहते हैं।

→ आसमानी बिजली (Lightning) के समय पैदा हुई ऊँची आवाज़ को गर्जन (Thunder) कहते हैं।

→ तेज़ आंधी के साथ आने वाली भारी वर्षा को तूफ़ान (Storm) कहते हैं। ।

→ अमेरिका का हरीकेन तथा जापान का टाइफून चक्रवात ही है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 8 पवन, तूफ़ान और चक्रवात

→ टारनेडो गहरे हरे रंग के कीपाकार बादल होते हैं, जो पृथ्वी तल और आकाश के बीच समाते हैं।

→ हर प्रकार की प्राकृतिक आपदाएँ जैसे कि चक्रवात, टारनेडो आदि संपत्ति, तारों, संचार प्रणाली तथा वृक्षों का नुकसान करते हैं।

→ आपदा के समय विशेष नीतियाँ अपनाई जाती हैं।

→ उपग्रहों तथा राडार की सहायता से चक्रवात चेतावनी 48 घंटे पहले दी जाती है।

→ स्वयं की सहायता सबसे अच्छी सहायता है। इसलिए किसी भी चक्रवात के आने से पहले अपनी सुरक्षा की योजना बना लेना तथा सुरक्षा के उपायों को तैयार रखना लाभदायक होता है।

→ पवन : गतिशील हवा पवन कहलाती है।

→ मानसून पवन : समुद्र से आने वाली पवन जो जलवाष्पों से भरी होती है, मानसून पवन कहलाती है।

→ टारनेडो : गहरे रंग के कीप के बादल जिनकी कीपकार संरचना आकाश से धरती तल की ओर आती है, टारनेडो कहलाती है।

→ चक्रवात : उच्च वेग से वायु की अनेक परतों को कुंडली के रूप में घूमना चक्रवात कहलाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 7 मौसम, जलवायु तथा जलवायु के अनुसार जंतुओं में अनुकूलन

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 7 मौसम, जलवायु तथा जलवायु के अनुसार जंतुओं में अनुकूलन

→ किसी स्थान का मौसम दिन-प्रतिदिन तथा सप्ताह दर सप्ताह परिवर्तित होता रहता है।

→ मौसम तापमान, आर्द्रता तथा वर्षा पर निर्भर करता है।

→ नमी (आर्द्रता), वायु के जलवाष्पों का माप है।

→ भारतीय मौसम विभाग, मौसम के पूर्वानुमान के लिए प्रतिदिन विभिन्न स्थानों के ताप, वायु वेग आदि के आँकड़े एकत्रित करता है।

→ किसी स्थान पर तापमान, आर्द्रता, वर्षा, वायु वेग आदि के संदर्भ में वायुमंडल की परिस्थिति, उस स्थान का मौसम कहलाती है।

→ मौसम क्षण भर में परिवर्तित हो सकता है।

→ वे कारक जिन पर मौसम निर्भर करता है, मौसम के घटक कहलाते हैं।

→ तापमान मापने के लिए विशेष अधिकतम-न्यूनतम तापमापी उपयोग में लाए जाते हैं।

→ दिन का अधिकतम तापमान सामान्यतः दोपहर के बाद होता है और न्यूनतम तापमान सामान्यतः प्रात: में होता है।

→ मौसम में सभी परिवर्तन सूर्य के कारण होते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 7 मौसम, जलवायु तथा जलवायु के अनुसार जंतुओं में अनुकूलन

→ सर्दियों में दिन की लंबाई कम होती है और रात जल्दी हो जाती है।

→ किसी स्थान के मौसम की लंबाई, उस स्थान पर इकट्ठे आंकड़ों के आधार पर बने मौसम का पैटर्न, उस
स्थान की जलवायु कहलाता है।

→ विभिन्न स्थानों का जलवायु विभिन्न होता है। यह गर्म और शुष्क से गर्म और आर्द्र तक बदलता है।

→ जलवायु का जीवों पर गहरा प्रभाव है।

→ जंतु उन स्थितियों में जीने के लिए अनुकूलित होते हैं, जिनमें वे रहते हैं।
ध्रुवीय क्षेत्र, ध्रुवों के समीप होते हैं, जैसे-उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव।

→ कनाडा ग्रीनलैंड, आइसलैंड, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड, अमेरिका में अलास्का और रूस के साइबेरियाई क्षेत्र ध्रुवीय क्षेत्र हैं ।

→ भारत, मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्राजील, काँगो गणतंत्र, केन्या, युगांडा और नाइजीरिया में ऊष्ण कटिबंधीय वर्षा वन पाए जाते हैं।

→ ध्रुवीय क्षेत्रों में ठंडी जलवायु पाई जाती है।

→ पेंग्विन और ध्रुवीय भालू, ध्रुवीय क्षेत्रों में रहते हैं।

→ ध्रुवीय क्षेत्र सफेद बर्फ से ढके रहते हैं।

→ ध्रुवीय भालू के शरीर पर सफेद बाल इसकी रक्षा और शिकार पकड़ने में सहायता करते हैं।

→ पैंग्विन भी अच्छे तैराक होते हैं इसलिए यह आसानी से सफेद पृष्ठभूमि में मिल जाते हैं।

→ ध्रुवीय भालू और पेंग्विन के अतिरिक्त कई अन्य जंतु भी ध्रुवीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

→ कई मछलियाँ ठंडे पानी में रह सकती हैं।

→ उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में जलवायु सामान्यतः गर्म होती है, क्योंकि ये क्षेत्र भूमध्य रेखा के आस-पास स्थित होते हैं। इन क्षेत्रों में तापमान 15°C से 40°C तक बदलता रहता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 7 मौसम, जलवायु तथा जलवायु के अनुसार जंतुओं में अनुकूलन

→ भूमध्य रेखा के आस-पास के क्षेत्रों में वर्ष भर रात और दिन की लंबाई लगभग बराबर होती हैं।

→ मौसम : किसी स्थान पर तापमान, आर्द्रता, वर्षा, वायु वेग आदि के संदर्भ में वायुमंडल की प्रतिदिन की परिस्थिति उस स्थान का मौसम कहलाती है।

→ जलवायु : किसी स्थान के मौसम की लंबी अवधि, जैसे 25 वर्ष में एकत्रित आँकड़ों के आधार पर बना मौसम का पैटर्न, उस स्थान की जलवायु कहलाता है।

→ अनुकूलन : पौधों और जीवों के विशेष लक्षण अर्थात् स्वभाव जो उन्हें एक आवास में रहने के अनुकूल बनाते हैं, को अनुकूलन कहते हैं।

→ प्रवास : जंतुओं द्वारा सख्त जलवायु परिस्थितियों से बचने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान का स्थानांतरण प्रवास कहलाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 6 भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन

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PSEB 7th Class Science Notes Chapter 6 भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन

→ परिवर्तन जीवन की प्रवृत्ति है। हमारे दैनिक जीवन में कई परिवर्तन होते हैं।

→ परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं-

  1. भौतिक परिवर्तन
  2. रासायनिक परिवर्तन।

→ परिवर्तन का सदैव कोई कारण होता है।

→ कुछ परिवर्तनों को नियन्त्रित किया जा सकता है और कुछ को नहीं किया जा सकता।

→ भौतिक परिवर्तन में कोई नया पदार्थ नहीं बनता।

→ रासायनिक परिवर्तन सामान्यतः अनुत्क्रमणीय होते हैं।

→ रासायनिक परिवर्तनों में पैदा होने वाले नए पदार्थों के गुण बिल्कुल अलग (नए) होते हैं।

→ परिवर्तनों को उनकी समानताओं के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

→ पदार्थों के आकार, माप, रंग, अवस्था जैसे गुण उसके भौतिक गुण कहलाते हैं।

→ वह परिवर्तन जिसमें किसी पदार्थ के भौतिक गुणों में परिवर्तन हो जाता है, भौतिक परिवर्तन कहलाता है।

→ मैग्नीशियम की पट्टी (रिबन) चमकीले सफेद प्रकाश से जलती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 6 भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन

→ जब चूने के पानी में से कार्बन डाइऑक्साइड गुजारी जाती है, तो वह दुधिया हो जाता है।

→ रासायनिक परिवर्तनों में ध्वनि, प्रकाश, ताप (ऊष्मा), गंध, गैस, रंग आदि उत्पन्न होता है।

→ जलना एक रासायनिक परिवर्तन है जिसमें सदैव ऊष्मा निष्कासित होती है।

→ वायुमंडल में ओज़ोन की एक परत है।

→ जंग लगने के लिए ऑक्सीजन तथा पानी दोनों की आवश्यकता होती है।

→ गैल्वेनाइजेशन प्रक्रिया में लोहे पर जिंक की परत चढ़ाई जाती है।

→ लोहे को पेंट करके जंग लगने से बचाया जा सकता है।

→ क्रिस्टलीकरण विधि से किसी भी पदार्थ के विलयन में से बड़े आकार के क्रिस्टल प्राप्त किए जा सकते हैं।

→ भौतिक परिवर्तन : वे परिवर्तन, जिनमें केवल पदार्थों के भौतिक गुण ही बदलें और कोई नया पदार्थ न बने, भौतिक परिवर्तन कहलाता है। उदाहरण-जल में नमक का घोल।

→ रासायनिक परिवर्तन : वे परिवर्तन जिनके द्वारा बिल्कुल नए पदार्थ उत्पन्न हों, रासायनिक परिवर्तन कहलाता है। उदाहरण-कोले को जलाना।

→ जंग लगना : लोहे द्वारा नमी युक्त वायु में भूरे रंग की परत से ढक जाने की प्रक्रिया को जंग लगना कहते हैं।

→ गैल्वेनाइजेशन : लोहे को जंग से बचाने के लिए जिंक की परत चढ़ाई जाती है इस प्रक्रिया को गैल्बेनाइजेशन कहते हैं।

→ क्रिस्टलीकरण : किसी घुलनशील पदार्थ से बड़े आकार के क्रिस्टल प्राप्त करने की प्रक्रिया को क्रिस्टलीकरण कहते हैं।

PSEB 7th Class Computer Notes Chapter 8 डॉस कमांडज्र

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PSEB 7th Class Computer Notes Chapter 8 डॉस कमांडज्र

जान पहचान-डॉस फाइलों का प्रबंध करती है। यह यूजर को असल तकनीक से दूर रखती है। यूजर सिर्फ हिदायतें देता है बाकी काम आपरेटिंग सिस्टम स्वयं ही करता है।

एम एस डॉस की ज़रूरी फाइल :
एम एस डॉस के लिए आवश्यक फाइल निम्न अनुसार है –
1. MSDOS.SYS
2. IO.SYS
3. Command.Com

एम एस डॉस की कमांड : डॉस में दो प्रकार की कमांडज़ होती हैं।
1. इंटरनल कमांड
2. एक्सटरनल कमांड

1. इंटरनल कमांड वे होती हैं जिन्हें चलाने के लिए किसी कमांड की ज़रूरत नहीं होती।

2. एक्सटर्नल कमांड वह होती है जिसे चालने के लिए बाहरी फाइल की आवश्यकता होती है।

डॉस का डिस्क प्रबंध :
डॉस ट्री रूप की डायरैक्टरी स्ट्रकचर में फाइलें सेव करती है। सबसे ऊपर रूट डायरैक्टरी होती है। उसके बाद अन्य डायरैक्टरी तथा अन्दर सव डायरैक्टरी आती-
PSEB 7th Class Computer Notes Chapter 8 डॉस कमांडज्र 1
फाइल को नाम देना : डॉस में फाइल को नाम देने के निम्न नियम हैं –

  1. फाइल के नाम के दो हिस्से होते हैं।
  2. स्पैशल क्रैक्टर का प्रयोग नहीं कर सकते।’
  3. अपर या लोअर केस दोनों में नाम लिख सकते हैं।

PSEB 7th Class Computer Notes Chapter 8 डॉस कमांडज्र

रूट डायरैक्टरी :
रूट डायरैक्टरी वह डायरैक्टरी होती है जिसके अन्दर अन्य सभी डायरैक्टरी होती हैं।

डॉस की डायरैक्टरी स्ट्रक्चर :
डॉस की डायरैक्टरी स्ट्रक्टर अलमारी के दराज की तरह है। इसमें सबसे उपर रूट डायरैक्टरी होती है। उस के अंदर डायरैक्टरी तथा सब डायरैक्टरी होती है। यह सब मिल कर एक ट्री बनाती है। एक डायरैक्टरी में कई चाइलड डायरैक्टरी हो सकती हैं, परन्तु चाईल्ड की एक ही पेरेंट डायरैक्टरी होती है। डास की डायरैक्टरी स्ट्रक्चर निम्न प्रकार की होती है।
PSEB 7th Class Computer Notes Chapter 8 डॉस कमांडज्र 2

इंटर्नल कमांडज़ :
इंटर्नल कमांडज़ वो होती हैं जिसके चलने के लिए किसी फाइल की आवश्यकता नहीं होती। डॉस की इंटरनल कमांड निम्न हैं –
1. Cls : Cls कमांड का प्रयोग स्क्रीन के कंटेंट को साफ करने के लिए किया जाता है। इससे सिर्फ स्क्रीन साफ होती है। कंटैंट डिलीट नहीं होता। इसका सिंटैक्स निम्न प्रकार हैCls

2. Date : Date कमांड का प्रयोग कम्प्यूटर पर तारीख देखने तथा बदलने के लिए किया जाता है। Date टाइप करने से पहले हमें तारीख दिखाई देती है फिर डॉस उसको बदलने के लिए पुछता है। यदि तारीख बदलनी हो तो बदली जा सकती है। Date

3. Time : Time कमांड का प्रयोग कम्प्यूटर पर टाइम देखने तथा बदलने के लिए किया जाता है। यह कमांड भी Date की तरह ही कार्य करती है।
Time

एक्सटर्नल कमांडज़ :
एक्सटर्नल कमांडज़ वो होती हैं जिनके चलने के लिए किसी फाइल की आवश्यकता होती है। इंटर्नल तथा एक्सटर्नल कमांडज़ में अंतर : Internal तथा External कमांड में निम्नलिखित अंतर हैं-

Internal External
1. ये कमांड DOS के अंदर होती है। 1. ये कमांड डॉस की बाहरी होती है।
2. इनकी कोई अपनी फाइल नहीं होती। 2. इनकी अपनी फाइल होती है।
3. ये छोटी होती हैं। 3. ये काफी बड़ी भी हो सकती हैं।
4. इनसे सरल कार्य किए जाते हैं। 4. इनका प्रयोग कठिन कार्य करने में होता है।
5. इनकी संख्या निश्चित है। 5. इनकी संख्या घटाई या बढ़ाई जा सकती है।

डॉस एडीटर :
डॉस एडीटर वह यूटिलिटी है जिसमें हम अपनी फाइल को एडिट कर सकते हैं। इसमें हम नई फाइल भी तैयार कर सकते हैं। इसमें काफी सारे अन्य विकल्प भी मौजूद होते हैं।

PSEB 7th Class Computer Notes Chapter 8 डॉस कमांडज्र

बैच फाइल :
वैच फाइल वह फाइल होती है जिसमें डॉस की काफी कमांडज़ स्टोर की जाती हैं ताकि उनको इक्ट्ठा ही चलाया जा सके। इस प्रकार हम ज्यादा कमांडज़ को इकट्ठा चला सकते हैं। बैच फाइल की एक्सटेंशन .bat होती है। इनके द्वारा हमारा काम काफी आसान तथा जल्दी हो जाता है।