PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 26 रीढ़ की हड्डी

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 26 रीढ़ की हड्डी Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 26 रीढ़ की हड्डी

Hindi Guide for Class 12 PSEB रीढ़ की हड्डी Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
‘रीढ़ की हड्डी’ किसका प्रतीक है ? इसका अपने शब्दों में वर्णन करें।
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी में रीढ़ की हड्डी’ स्त्री को समाज रूपी शरीर का आधार माना गया है जो आज नारी उपेक्षा और सामाजिक विसंगतियों का शिकार हो रही है। रीढ़ की हड्डी’ शील और चरित्र का भी पर्याय है, जिसकी आज के युवा वर्ग में दिन-ब-दिन कमी आती जा रही है।

प्रश्न 2.
‘लेकिन घर जाकर ज़रा यह तो पता लगाइए कि आपके लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी है भी या नहीं।’ उमा के इन शब्दों का क्या अर्थ है ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
उमा के प्रस्तुत शब्दों का अर्थ यह है कि मैडिकल कॉलेज में शिक्षा प्राप्त कर रहा उनका बेटा शंकर किस कारण से कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहता है तथा उनका बेटा लड़कियों के होस्टल में तांक-झाँक क्यों कर रहा था। क्या उसका चरित्र साफ़-सुथरा है ? क्या उसकी रीढ़ की हड्डी है भी या नहीं ?

प्रश्न 3.
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में लेखक क्या कहना चाहता है ? अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी में उमा के सशक्त चरित्र के माध्यम से लेखक नारी सशक्तिकरण का सन्देश देना चाहते हैं। उमा का यह कहना है कि ‘अब मुझे कह लेने दीजिए बाबू जी’ एक वैचारिक क्रान्ति के आने का सूचक है और उमा का कहना-‘इनसे ज़रा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होते ? क्या उनके चोट नहीं लगती ? युवक समाज के ऊपर एक करारा व्यंग्य है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 26 रीढ़ की हड्डी

प्रश्न 4.
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी के नाम की सार्थकता अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
रीढ़ की हड्डी’ एकांकी का नामकरण अत्यन्त सार्थक बन पड़ा है क्योंकि रीढ़ की हड्डी’ एकांकीकार के अनुसार समाज रूपी शरीर की स्त्री रीढ़ की हड्डी है तथा रीढ़ की हड्डी शील और चरित्र का भी पर्याय है। स्त्री समस्या से जुड़े हुए इस एकांकी में नारी के बदलते हुए क्रान्तिकारी विचारों की भी सूचना दी गई है साथ ही युवकों की चरित्रहीनता पर भी प्रकाश डाला गया है।

(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 5.
उमा का चरित्र-चित्रण लिखें।
उत्तर:
उमा एक पढ़ी-लिखी लड़की है। किन्तु समाज में प्रचलित रूढ़ियों के गुलाम उसके माता-पिता उसे मैट्रिक पास बताकर उसकी शादी करना चाहते हैं। यदि यह शादी हो जाती तो क्या उसकी सारी पढ़ाई बेकार न जाती ? उमा कृत्रिमता की घोर विरोधी है। वह एक लड़की की सुन्दरता उसके गुणों से देखी जाने के पक्ष में है। इसलिए उसे देखने आने वाले लड़के और उसके बाप के सामने वह किसी प्रकार का मेकअप करके नहीं जाना चाहती।

उमा जीवन के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण रखती है। उसे देखने आए लड़के के पिता गाने को कहते हैं तो वह गा देती है किन्तु जब उसे पूछा जाता है कि उसे चित्रकारी आती है ? सिलाई आती है ? कोई इनाम-विनाम भी जीता है ? तो उसका मन अन्दर-ही-अन्दर दुःखी हो उठता है। उसके भीतर की आधुनिक नारी जाग उठती है।

वह हल्की किन्तु मज़बूत आवाज़ में कहती है-जब कुर्सी मेज़ बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज़ से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीददार को दिखला देता है। पसन्द आई गई तो अच्छा वरना पिता के डाँटने पर वह कहती है, “अब मुझे कह लेने दीजिए बाबू जी ……….. यह जो महाशय मेरे खरीददार बनकर आए हैं इनसे ज़रा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होता ? क्या उनके दिल को चोट नहीं लगती ? क्या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं, जिन्हें कसाई अच्छी तरह देखभाल कर खरीदते हैं ?”

वह डंके की चोट पर लड़के के पिता से कहती है कि मैंने बी०ए० पास किया है। कोई पाप नहीं किया। मुझे अपने मान और इज्ज़त का ध्यान है। आपके बेटे की तरह लड़कियों के होस्टल में तांक-झाँक करने पर पकड़े जाने पर नौकरानी के पाँव पकड़ कर छूटा था। फिर उसी बेटे के लिए मेरा तथा मेरे माता-पिता का अपमान किया जा रहा है। जिसकी बैक बॉन ही नहीं है। इस प्रकार उमा के रूप में हम एक आधुनिक नारी के चरित्र को देखते हैं जो आज अबला नहीं है, वह धीरे-धीरे सबला हो रही है। अपने अस्तित्व के लिए वह बड़े से बड़ा संघर्ष तथा त्याग कर सकती है।

प्रश्न 6.
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में किस सामाजिक समस्या को छुआ गया है ? आपके अनुसार इस समस्या का क्या हल है ?
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी एक सामाजिक एकांकी है। इस एकांकी में आज की बहुचर्चित समस्या, लड़की के विवाह की समस्या को चित्रित किया गया है। आज हमारी विवाह प्रणाली इतनी दोषपूर्ण और विकृत हो गई है कि लड़की का बाप होना एक मुसीबत से कम नहीं माना जाता। इसका प्रमाण हमें रामस्वरूप के उस कथन से लगता है जब वह कहता है, “क्या करूँ मजबूरी है। वह लड़की वाला है। मतलब अपना है नहीं तो इन लड़कों और इनके बापों को ऐसी-ऐसी कोरी-कोरी सुनाता कि यह भी …………..

लड़की के पिता की मजबूरी यह है कि वह लड़की के विवाह के लिए उसे सज़ा संवार कर प्रस्तुत करना चाहता है। इसके लिए चाहे उसकी लड़की कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों का सहारा ही क्यों न लें। . समाज में लड़के वालों की मनोवृत्ति पर भी प्रस्तुत एकांकी में प्रकाश डाला गया है। उमा को देखने आने वाले लड़के के पिता का विचार है कि मर्दो का काम है पढ़ना और काबिल बनना। अगर औरतें भी यही करने लगी तब तो हो चुकी गृहस्थी। मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं। लड़की के पिता को लड़की सजा संवार कर पेश करने की भावना के पीछे लड़कों की यह मनोवृत्ति है कि उनकी पत्नी सुन्दर हो। इसी कारण उमा का चश्मा पहनना लड़के और उसके बाप को अखरता है।

लेखक ने विवाह संस्था में दोषों की समस्या को उठाते हुए उमा की स्पष्टवादिता से इनका समाधान भी कर दिया है। हमारे विचार में विवाह सम्बन्धी समस्या का हल केवल नारी के पास है। उसे पटियाला की डॉक्टर लड़की की तरह जागरूक होकर वैचारिक क्रान्ति लाने की आवश्यकता है। उसे दबना छोड़कर दबाने की शक्ति अपने में पैदा करनी होगी।

प्रश्न 7.
‘शंकर’ शारीरिक व चरित्र की दृष्टि से रीढ़ की हड्डी से विहीन है, आपका इसके बारे में क्या विचार है-शंकर का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर:
शंकर वकील गोपाल प्रसाद का बेटा है। वह अपने पिता के साथ उमा को देखने आया है। अपने पिता के साथ-साथ वह भी इस बात में विश्वास करता है कि लड़की सुन्दर तो हो किन्तु कम पढ़ी-लिखी हो। किन्तु जब पिता के उमा से उल-जलूल सवाल पूछने के पश्चात् उमा उसकी पोल खोल देती है कि वह पिछली फरवरी में लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द घूमता हुआ पकड़ा गया था और वहाँ वह नौकरानी के पैरों को पड़कर अपना मुँह छिपाकर भागा था।

हमारे विचार से शंकर शारीरिक और चरित्र की दृष्टि से रीढ़ की हड्डी से विहीन है। इसीलिए वह अपने पिता के सामने मिट्टी का माधो बना बैठा रहता है। चरित्र की दृष्टि से ही नहीं पढ़ाई की दृष्टि से भी वह रीढ़ की हड्डी से विहीन है। जब उससे रामस्वरूप पूछते हैं कि उसका कोर्स खत्म होने में अब सालभर रह गया होगा तो वह खींसे निपोरता हुआ उत्तर देता है-जी यही कोई साल दो साल। पूछने पर वह कहता है-जी एकाध साल का मार्जन रखता हूँ।

उसके शारीरिक रूप से रीढ़ की हड्डी से विहीन होने का प्रमाण हमें उनके पिता के इस वाक्य से मिल जाता हैझुककर क्यों बैठते हो ? ब्याह तय करने आए हो, कमर सीधी करके बैठो। तुम्हारे. दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर के बैक बोन ……………..

इस तरह हम देखते हैं कि शंकर शारीरिक एवं चारित्रिक दृष्टि से रीढ़ की हड्डी से विहीन है। जैसे बे पेंदे का लोटा।

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प्रश्न 8.
रीढ़ की हड्डी एकांकी के पुरुष पात्रों की तीन-तीन चारित्रिक विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी में तीन ही पुरुष पात्र हैं। रामस्वरूप, गोपाल प्रसाद और शंकर। इन पात्रों की तीन-तीन चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. रामस्वरूप

  • लड़की का पिता-पुत्री का पिता होने के कारण वह अपनी लड़की के विवाह के लिए लड़के वालों से झूठ भी बोलता है कि उसकी लड़की मैट्रिक पास है जबकि उसकी लड़की बी०ए० पास है।
  • दिखावे में विश्वास रखने वाला-अन्य मध्यम वर्गीय लोगों की तरह रामस्वरूप भी दिखावे में विश्वास रखता है। लड़के वालों के आने पर वह घर को सजाता है उनके खान-पान के लिए दिखावे की वस्तुएँ जुटाता है और यहाँ तक कि वह अपनी लड़की को भी अच्छे ढंग के कपड़े पहन कर लड़के के सामने आने और तरीके से चल कर आने को कहता है।
  • विनोदी प्रिय-रामस्वरूप विनोदी प्रिय है। अपनी पत्नी को वह ग्रामोफोन बाजा कहता है जिसका रिकार्ड एक बार चढ़ा तो रुकने का नाम नहीं लेता। अपनी बेटी के पाउडर आदि न लगाने की बात पर वह हँसी में कहता है आजकल की लड़कियों के सहारे तो पाउडर का कारोबार चलता है।

2. गोपाल प्रसाद:

  • घोर स्वार्थी-गोपाल प्रसाद इतना स्वार्थी है कि लड़की वालों से हँसी-मज़ाक की बातें करता हुआ भी ध्यान अपने मतलब की ओर रखता है। वह बात काट कर कहता है कि अब ‘बिजनेस’ की बात हो जाए। रामस्वरूप के अन्दर नाश्ते का प्रबन्ध करने जाने पर वह उसके मकान को गहरी दृष्टि से देखता है। उसका विचार है कि लड़की ठीक-ठाक हो, उसका घर-बार भी ठीक से तो जन्मपत्री अपने आप मिल जाती है।
  • दकियानूसी-गोपाल प्रसाद एक वकील है। सभा-सोसाइटी में जाता है। किन्तु बेटे के लिए कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहता है। उसका विचार है कि पढ़ाई-लिखाई केवल मर्दो का अधिकार है यदि औरतें भी यही काम करने लगीं, तो हो चुकी गृहस्थी। उसका विचार है कि दुनिया में कुछ चीजें ऐसी हैं जो सिर्फ मर्दो के लिए हैं।
  • अपनी चारपाई के नीचे लाठी नहीं फेरता-गोपाल प्रसाद को पता है कि उसके बेटे की बैकबोन नहीं है, उसमें स्थिरता नहीं है किन्तु लड़की के चश्मा लगाने पर उसे आपत्ति होती है। वे लड़की की चाल भी देखते हैं, उससे गाना भी सुनते हैं। वे चाहते हैं कि लड़की चित्रकारी भी जानती हो, सिलाई आदि भी करती हो। अपने लड़के की चरित्रहीनता की बात सुनकर वे जूं तक नहीं करते।

3. शंकर:

  • पढ़ाई में कमज़ोर-शंकर मैडिकल का छात्र है किन्तु वह स्वयं मानता है कि एक साल का कोर्स दो सालों में पास करेगा। उसके अनुसार-जी, एकाध साल का मार्जिन रखता हूँ।
  • बैक बोन विहीन-शंकर जानता है कि उसकी बैकबोन नहीं है जिसके कारण वह सीधा होकर बैठ नहीं सकता किन्तु अपने लिए लड़की वह सुन्दर किन्तु कम पढ़ी-लिखी चाहता है क्योंकि उसी के अनुसार-कोई नौकरी तो करानी नहीं है।
  • चरित्रहीन-शंकर का चरित्र भी ठीक नहीं। वह पिछली फरवरी में लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द चक्कर लगाता पकड़ा गया था और नौकरानी के पैर पकड़कर छूटा था।

(ग) सप्रसंग व्याख्या करें :

(1) जनाब मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं, शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ जगदीशचन्द्र माथुर द्वारा लिखित सामाजिक एकांकी रीढ़ की हड्डी’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ गोपाल प्रसाद लड़की के पिता रामस्वरूप से पुरुष प्रधान समाज की बात करता हुआ कहता है।

व्याख्या:
गोपाल प्रसाद तर्क देता हुआ कहता है कि मर्दो का काम है पढ़ना और काबिल होना। यदि यही काम औरतें करने लगेंगी तो हो चुकी गृहस्थी। जैसे मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं और शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं। गोपाल प्रसाद यह तर्क देकर कहना चाहता है कि पढ़ाई और लियाकत मर्दो का ही अधिकार है।

विशेष:
गोपाल प्रसाद के दकियानूसी विचारों का पता चलता है।

(2) जब कुर्सी-मेज़ बिकती है, तब दुकानदार कुर्सी-मेज़ से कुछ नहीं पूछता, केवल खरीददार को दिखला देता है। पसन्द आ गई तो अच्छा है, वरना ……
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जगदीशचन्द्र माथुर द्वारा लिखित सामाजिक एकांकी रीढ़ की हड्डी’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ उमा ने अपने को देखने आए गोपाल प्रसाद को उस समय कही हैं जब वह उसे कुछ बोलने के लिए कहते हैं।

व्याख्या:
जब उमा के पिता गोपाल प्रसाद को कुछ बोलकर कहने की बात कहते हैं तो उमा कहती है कि वह क्या जवाब दे। जब मेज़-कुर्सी बिकती है, तब दुकानदार कुर्सी-मेज़ से कुछ नहीं पूछता, केवल खरीददार को दिखला देता है। पसन्द आ गई तो खरीददार उसे खरीद लेता है नहीं तो चला जाता है।

विशेष:
भारतीय समाज में लड़की की स्थिति पर प्रकाश डाला गया है। विवाह के लिए दिखावे के समय उससे उसकी राय नहीं ली जाती। यही सामाजिक विडम्बना है।

(3) जी हाँ, और मेरी बेइज्जती नहीं होती तो आप इतनी देर से नाप-तोल कर रहे हैं ?
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जगदीशचन्द्र माथुर द्वारा लिखित सामाजिक एकांकी रीढ़ की हड्डी’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्ति उमा ने गोपाल प्रसाद को उस समय कहीं हैं जब वह उससे स्पष्ट और यथार्थ उत्तर सुनकर उसे अपनी इज्जत उतारने की बात कहता है।

व्याख्या:
जब उमा की खरी-खरी सुनकर गोपाल प्रसाद उमा के पिता से कहते हैं कि क्या उन्होंने उसकी इज्जत उतारने के लिए यहाँ बुलाया था तो उमा उत्तर देती हुई कहती है क्या हमारी बेइज्जती नहीं होती जो आप इतनी देर से नाप-तोल की बातें कर रहे हैं।

विशेष:
उमा के चरित्र की एक विशेषता–नारी की तेजस्विता की ओर संकेत किया गया है।

(4) अब मुझे कह लेने दीजिए बाबू जी। यह जो महाराज मेरे खरीददार बनकर आये हैं, इनसे ज़रा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होता ? क्या उनके चोट नहीं लगती ?

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जगदीश चन्द्र माथुर द्वारा लिखित एकांकी रीढ़ की हड्डी’ से ली गई हैं। ये शब्द उमा ने लड़के के पिता के उससे बार-बार प्रश्न पूछने से तंग आकर तथा पिता के डांटने पर कहे हैं।

व्याख्या:
उमा लड़के के पिता के प्रश्नों से परेशान होकर उत्तर देती है तो उसके पिता उसे डांट कर रोकते हैं। इस पर उमां कहती है कि उसे अपने मन की बात कहने के लिए बोलने दीजिए। वह लड़के के पिता की ओर संकेत करके जानना चाहती है कि वे जो उसे खरीदने आए हैं, क्या वे ये नहीं जानते कि लड़कियों का भी दिल होता है ? जब उन्हें कोई अपमानजनक बात कही जाती है। तो उनके दिल को भी ठेस पहुँचती है। विशेष-उमा अपने स्वाभिमान पर आँच नहीं आने देना चाहती।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 26 रीढ़ की हड्डी

PSEB 12th Class Hindi Guide रीढ़ की हड्डी Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी के रचयिता कौन हैं ?
उत्तर:
जगदीश चंद्र माथुर।

प्रश्न 2.
जगदीश चंद्र माथुर का जन्म कब और कहां हुआ था?
उत्तर:
जगदीश चंद्र माथुर का जन्म 16 जुलाई, सन् 1917 ई० में शाहजहांपुर में हुआ था।

प्रश्न 3.
जगदीश चंद्र माथुर के अधिकतर नाटक किस आधार पर रचे गए हैं ?
उत्तर:
इतिहास के आधार पर।

प्रश्न 4.
जगदीश चंद्र माथुर की प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
कोणार्क, शारदीया, पहला राजा, दशरथ नंदन, भोर का तारा, ओ मेरे सपने।

प्रश्न 5.
रीढ़ की हड्डी’ किस तरह की एकांकी हैं ?
उत्तर:
सामाजिक एकांकी।

प्रश्न 6.
लेखक ने एकांकी में किस समस्या को पाठकों/दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया है?
उत्तर:
मध्यवर्गीय समाज की शिक्षित लडकियों के विवाह से संबंधित।

प्रश्न 7.
विवाह के लिए लड़की देखने आए बाप-बेटा दोनों एकदम क्यों घबरा गए थे?
उत्तर:
क्योंकि लड़की ने चश्मा लगाया हुआ था।

प्रश्न 8.
लड़के के पिता लड़की से कैसे प्रश्न कर रहे थे?
उत्तर:
उल्टे-सीधे और बेहूदा।

प्रश्न 9.
लड़की ने लड़के के पिता के सामने किसकी चरित्रहीनता का पर्दाफाश कर दिया था?
उत्तर:
उनके बेटे शंकर की चरित्रहीनता का।

प्रश्न 10.
‘रीढ़ की हड्डी’ किसकी प्रतीक है?
उत्तर:
समाज रूपी शरीर का आधार और युवा पीढ़ी के चरित्र की।

प्रश्न 11.
शंकर किस कारण कम पढी-लिखी लड़की से विवाह करना चाहता था?
उत्तर:
क्योंकि उसका अपना चरित्र साफ-सुथरा नहीं था।

प्रश्न 12.
उमा का जीवन के प्रति कैसा दृष्टिकोण था?
उत्तर:
पूर्णरूप से यथार्थवादी दृष्टिकोण ।

प्रश्न 13.
उमा ने कहाँ तक शिक्षा प्राप्त की थी?
उत्तर:
बी० ए० तक।

प्रश्न 14.
उमा स्वभाव से कैसी थी?
उत्तर:
उमा स्वभाव से सीधी-सादी यथार्थवादी और कृत्रिमता की घोर विरोधी थी।

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प्रश्न 15.
राम स्वरूप की दो विशेषाताएं लिखिए।
उत्तर:
रामस्वरूप दिखावे में विश्वास रखने वाला, मध्यवर्गीय परिवार का विनोदप्रिय व्यक्ति है।

प्रश्न 16.
गोपाल प्रसाद कैसा व्यक्ति है?
उत्तर:
गोपाल प्रसाद घोर स्वार्थी, दकियानूसी और सभा-सोसाइटी में आने-जाने वाला व्यक्ति है।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 17.
जब कुर्सी-मेज़ बिकती है, तब दुकानदार कुर्सी-मेज़ से…………..
उत्तर:
कुछ नहीं पूछता केवल खरीददार को खिला देता है।

प्रश्न 18.
जी हाँ, और मेरी बेइज्जती नहीं होती तो……….।
उत्तर:
आप इतनी देर से नाप-तोल कर रहे हैं।

प्रश्न 19.
क्या करूँ मजबूरी हैं। वह……………।
उत्तर:
लड़की वाला है।

प्रश्न: 20.
जी हाँ, ज़रूर चले जाइए। लेकिन घर जाकर…………….।
उत्तर:
यह पता लगाइएगा कि आप के लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी है भी कि नहीं। हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 21.
उमा ने कमरे में पान की तश्तरी लेकर प्रवेश किया था। उत्तर-हाँ। प्रश्न 22. उमा ने गोपाल प्रसाद को करारा जवाब दिया था।
उत्तर:
हाँ।

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए प्रश्न

प्रश्न 1.
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी की नायिका का नाम लिखें।
उत्तर:
उमा।

प्रश्न 2.
रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में गोपाल प्रसाद के बेटे का नाम लिखें।
उत्तर:
शंकर।

प्रश्न 3.
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में उमा के पिता का नाम लिखें।
उत्तर:
रामस्वरूप।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘रीढ़ की हड्डी’ के लेखक कौन हैं ?
(क) जगदीश चन्द्र माथुर
(ख) सतीशचन्द्र
(ग) गिरीशचन्द्र
(घ) गिरिजा कुमार
उत्तर:
(क) जगदीश चन्द्र माथुर

2. रीढ़ की हड्डी कैसी एकांकी है ?
(क) प्रतीकात्मक
(ख) सामाजिक
(ग) राजनीतिक
(घ) सांस्कृतिक
उत्तर:
(ख) सामाजिक

3. ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में रीढ़ की हड्डी किसकी प्रतीक है ?
(क) मानवीय चरित्र की
(ख) जीवन की
(ग) समाज की
(घ) संसार की
उत्तर:
(क) मानवीय चरित्र की

4. गोपाल प्रसाद कैसा व्यक्ति था ?
(क) दकियानुसी
(ख) सैनिक
(ग) तेजस्वी
(घ) बलशाली
उत्तर:
(क) दकियानुसी

5. ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी का प्रमुख पात्र कौन है ?
(क) रामस्वरूप
(ख) देवस्वरूप
(ग) प्रसाद स्वरूप
(घ) हरिराय।
उत्तर:
(क) रामस्वरूप

रीढ़ की हड्डी Summary

रीढ़ की हड्डी जीवन परिचय

जगदीशचन्द्र माथुर जी का जीवन परिचय लिखिए।

जगदीशचन्द्र माथुर का जन्म 16 जुलाई, सन् 1917 में शाहजहाँपुर में हुआ था। आपने प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम० ए०, और बाद में आई०सी०एस० की परीक्षा उत्तीर्ण की और बिहार के शिक्षा आयुक्त नियुक्त हुए। भारत सरकार के विभिन्न पदों पर कार्य करने के बाद सन् 1978 में आपका निधन हो गया। आपने ऐतिहासिक नाटकों के साथ-साथ सामाजिक एकांकी भी लिखे हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ कोणार्क, शारदीया, पहलाराजा, दशरथ नन्दन नाटक भोर का तारा तथा ओ मेरे सपने एकांकी संग्रह हैं।

रीढ़ की हड्डी एकांकी का सार

रीढ़ की हड्डी श्री जगदीशचन्द्र माथुर का एक प्रसिद्ध सामाजिक एकांकी है, जिसमें आजकल के मध्यवर्गीय समाज में शिक्षित लड़की के विवाह की समस्या का चित्रण बड़े कलात्मक ढंग से किया गया है। – रामस्वरूप एक मध्यवर्गीय समाज का व्यक्ति है। उसने अपनी लड़की उमा को बी०ए० तक शिक्षा दिलाई है। उसका अधिक पढ़ जाना उसके विवाह में बाधक बन गया है। उमा को देखने के लिए गोपाल प्रसाद नाम का व्यक्ति अपने लड़के शंकर के साथ आता है। आरम्भ में कुछ औपचारिक बातें होती हैं। कुछ समय बाद लड़के का बाप बताता है कि उसे अपने बेटे के लिए अधिक पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। लड़की के बाप ने उससे झूठ ही कहा था कि उसकी लड़की मैट्रिक तक ही पढ़ी है। . उमा कमरे में पान की तश्तरी लेकर प्रवेश करती है।

उसके चश्मा पहने होने पर दोनों बाप-बेटा घबरा जाते हैं। उसके बाद शंकर के पिता उमा से उल्टे-सीधे प्रश्न करते हैं जिससे उमा की सहनशीलता जवाब दे देती है। वह गोपाल प्रसाद को करारा जवाब देती है। साथ ही वह उनके बेटे शंकर की चरित्रहीनता का भी पर्दाफाश करती है। वह बताती है कि पिछली फरवरी में उनका बेटा लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते हुए पकड़ा गया था और नौकरानी के पैर पकड़ कर इसने अपनी जान बचाई थी। यह सुनकर गोपाल प्रसाद तिलमिला उठता है और वहाँ से चलने को होता है। उमा तब व्यंग्य करती हुई उसे कहती है, “जी हाँ, ज़रूर चले जाइए। लेकिन घर जाकर यह पता लगाइएगा कि आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी है भी कि नहीं।”

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 25 वापसी

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 25 वापसी Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 25 वापसी

Hindi Guide for Class 12 PSEB वापसी Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
‘वापसी’ एकांकी का प्रमुख पात्र कौन है ? स्पष्ट करते हुए उसका चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर:
‘वापसी’ एकांकी का प्रमुख पात्र रायसाहब की बड़ी विधवा साली सरोजनी है। उसे रायसाहब ने रंगून में अपने पास बुला लिया था। वह उनकी बेटी चन्द्रिका का पालन पोषण करने लगी। धीरे-धीरे वह घर की स्वामिनी बन गई। रायसाहब के रिटायर होने के बाद वह उनके साथ ही स्वदेश आ गई। वह रायसाहब को शराब पीने से रोकती रही। अपने भाई कृपानाथ को भी शराब पीने पर डाँटती है। किन्तु दूसरे रिश्तेदारों की तरह वह भी स्वार्थी है और रायसाहब के सारे धन को स्वयं ही हड़पना चाहती है किन्तु मौका देखकर वह सौदेबाज़ी करने पर राजी हो जाती है।

प्रश्न 2.
‘वापसी’ एकांकी का नामकरण कहाँ तक सार्थक है ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘वापसी’ एकांकी का नामकरण संक्षिप्त और सार्थक है। रायसाहब की बर्मा वापसी के निर्णय के साथ ही एकांकी समाप्त हो जाता है। वापसी का आधार रायसाहब के सभी सगे-सम्बन्धियों का स्वार्थी होना था जो बाप बड़ा न भैया सब से बड़ा रुपैया के सिद्धान्त पर विश्वास रखते हैं। रायसाहब के धन के लिए वे जिस प्रकार लड़ते हैं, उसे देखकर रायसाहब की वापसी ही उचित थी।

प्रश्न 3.
‘वापसी’ एकांकी से क्या शिक्षा मिलती है ? अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
‘वापसी’ एकांकी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने पड़ोसियों के दुःख-दर्द में सिद्धेश्वर की तरह ही सहायता करनी चाहिए। किसी पड़ोसी के बीमार होने पर अपने आराम की परवाह न करते हुए डॉक्टर को बुलाना चाहिए। उसकी एवं उसके परिवार की जहाँ तक हो सके सहायता करनी चाहिए। साथ ही पड़ोसी के सगे-सम्बन्धियों के गलत व्यवहार पर उन्हें डाँटना भी चाहिए।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 25 वापसी

प्रश्न 4.
निम्नलिखित का चरित्र-चित्रण करें

  1. सिद्धेश्वर
  2. रायसाहब।

उत्तर:
(1) सिद्धेश्वर
सिद्धेश्वर रामप्रसन्न रायसाहब के एक निकट के सम्बन्धी अम्बिका का पडौसी है। वह शुभचिंतक है और इसीलिए वह रायसाहब का हाल-चाल पूछने आता है। पता चलने पर कि उनकी हालत खराब है। डॉक्टर को दिखाने की सलाह देता है। वह परामर्शदाता है। वह रायसाहब को धनी व्यक्ति जानकर उनके हाथ से कुछ दान-पुण्य, पूजा-पाठ कराने की भी सलाह देता है। इसके लिए वह किसी पंडित को भी बुलाने को तैयार हो जाता है। वह सहायक और धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति है और इसीलिए पंडित न मिलने पर वह स्वयं गीता का पाठ करता है। रायसाहब के सगे-संबंधियों को धन के लिए लड़ते-झगड़ते देख उन्हें डाँटता भी है। कुल मिला कर वह परोपकारी स्वभाव का व्यक्ति है।

(2) रायसाहब
रामप्रसन्न जो रंगून (बर्मा) में नौकरी करते थे, रायसाहब की पदवी प्राप्त की थी। वे पर्याप्त संपन्न थे और उन्होंने बहुत-सा धन कमाया था। पैंतीस वर्ष की नौकरी के बाद रिटायर होकर अपनी बड़ी विधवा साली के साथ स्वदेश लौटे। स्वदेश में आकर वे अपने भाई के घर न ठहर कर अपने एक रिश्तेदार अम्बिका के घर ठहरते हैं। वे समझदार और दुनियादारी समझने वाले इन्सान थे। इसीलिए उन्होंने अम्बिका के घर आकर अपने सगे-सम्बन्धियों को परखने के लिए बीमार होने का नाटक किया था और जब देखा था कि उनके सभी रिश्तेदार स्वार्थी स्वभाव के थे उन्हें उनसे प्यार नहीं था बल्कि उनके धन से प्यार था। इसी कारण उन्होंने वापस बर्मा जाने का निश्चय किया था।

(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 5.
‘वापसी’ एकांकी का सार लिखो।
उत्तर:
देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया सार।

प्रश्न 6.
‘वापसी’ एकांकी श्री उदयशंकर भट्ट का मानवीय संबंधों के खोखलेपन पर एक व्यंग्य है, व्याख्या करें।
उत्तर:
‘वापसी’ एकांकी भट्ट जी का एक सामाजिक एकांकी है, जिसमें लेखक ने मानवीय सम्बन्धों के खोखलेपन पर एक भरपूर व्यंग्य किया है। रायसाहब बर्मा में पैंतीस वर्षे रहकर वहाँ से जब ढेर सारा धन कमा कर स्वदेश लौटते हैं तो हर किसी की नज़र उनकी दौलत पर रहती है। रायसाहब अपने भाई दीनानाथ के यहाँ न ठहर कर अपने एक सम्बन्धी अम्बिका के घर ठहरते हैं। अम्बिका की पत्नी भागीरथी यह जानना चाहती है कि बर्मा में राय साहब ने अपने दोनों मकान बेच दिए हैं या नहीं। मतलब वह जानना चाहती है कि सारा पैसा वे अपने साथ ही लाए हैं। रायसाहब बीमार क्या पड़े कि सब ने उन्हें मरा समझ लिया। कृपानाथ उनका साला डॉक्टर को बुलाने जाता है तो डॉक्टर को बुलाने के स्थान पर शराब पीकर आता है।

यहाँ तक कि राय साहब की साली सरोजिनी भी उनका अन्त समय निकट आया समझती है। रायसाहब का भाई दीनानाथ भी मगरमच्छ के आँसू बहाने लगता है। वास्तव में उन सबकी नज़र रायसाहब के कैशबक्स पर थी, उसे हथियाने की हर कोई कोशिश करता है। सम्बन्धों में आई स्वार्थपरता के कारण ही रायसाहब जो बीमार होने का नाटक कर रहे थे, वे वापस बर्मा जाने का निर्णय लेते हैं, क्योंकि सब रिश्तेदारों की पोल खुलते देख ली थी।

प्रश्न 7.
सिद्धेश्वर के चरित्र द्वारा लेखक मानवीय मूल्यों की स्थापना करना चाहता है, कैसे ?
उत्तर:
एकांकी ‘वापसी’ में अम्बिका का पड़ोसी सिद्धेश्वर ही एक ऐंसा पात्र है, जिसे रायसाहब के धन से कोई लेना देना नहीं। वह तो नि:स्वार्थ भाव से एक पड़ोसी के नाते रायसाहब की सेवा करना चाहता है। जब उसे पता चलता है कि राय साहब का साला डॉक्टर लेने गया शराब पीकर आया है तो वह डॉक्टर बुलाने को तैयार हो जाता है। उसका विचार है कि जब तक साँस तब तक तो आस रखनी ही चाहिए। अतः डॉक्टर को अवश्य दिखाना चाहिए, किन्तु रायसाहब के सगे संबंधी तो उनके मरने का इंतज़ार कर रहे थे। यह जानकर कि रायसाहब धनी आदमी हैं, वह उनके हाथ से दान-पुण्य, पूजा-पाठ करवाने की सलाह देता है।

वह गीता पाठ के लिए किसी पंडित को भी लाने के लिए तैयार हो जाता है। किंतु सेवा करने के भाव से वह स्वयं ही गीता सुनाने को तैयार हो जाता है। वह अपने घर से गीता लाकर इसका पाठ भी करता है। इससे पूर्व वह डॉक्टर के यहाँ भी हो आता है। रायसाहब के सगे-सम्बन्धी जब छीनाझपटी और गाली-गलौच में लगे हुए थे, वह निष्काम और निःस्वार्थ भाव से गीता का पाठ करता रहता है। वह उन्हें इस प्रकार झगड़ा करने पर डाँटता भी है और खेद भी व्यक्त करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि लेखक ने सिद्धेश्वर के पात्र द्वारा मानवीय मूल्यों की स्थापना करने का प्रयास किया है।

(ग) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 8.
देखू कैश बॉक्स कैसे हथियाते हैं। खिलाएँ हम, रखें हम, प्यार करें हम, सेवा करें हम, दान-पुण्य करें हम और माल ले जाएँ ये, जो उनके कुछ भी नहीं, नौकरों की तरह जिन्हें रखा, आज वे उनके सगे बन गए।
उत्तर:
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री उदयशंकर भट्ट जी द्वारा लिखित एकांकी ‘वापसी’ से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ अम्बिका ने रायसाहब के साले कृपानाथ से उस समय कही हैं जब रायसाहब के कैशबॉक्स के लिए छीना झपटी हो रही थी।

व्याख्या:
कृपानाथ द्वारा रायसाहब का कैशबॉक्स उठा लेने पर अम्बिका उससे कहते हैं कि देखू कैशबॉक्स कैसे हथियाते हैं। रायसाहब को खिलायें हम, रखें हम, प्यार करें हम, सेवा करें हम, दान-पुण्य करें हम और माल अर्थात् उनकी धन-सम्पत्ति ले जाएँ ये, जो उनके कुछ भी नहीं। रायसाहब ने नौकरों की तरह जिन्हें रखा आज वे उनके सगे हो गए हैं। अम्बिका ने ये बातें इसलिए कहीं, क्योंकि रायसाहब बर्मा से आकर उसी के घर में ठहरे थे।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 25 वापसी

प्रश्न 9.
बड़े दुःख की बात है। एक प्राणी कष्ट में है और आप लोग उसकी अवस्था में दुःखी होना तो दूर, आपस में उसके पैसे के लिए लड़ रहे हो।
उत्तर:
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री उदयशंकर भट्ट जी द्वारा लिखित एकांकी ‘वापसी’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ अम्बिका के पड़ौसी सिद्धेश्वर ने गीता का पाठ करते समय रायसाहब के रिश्तेदारों से उस समय कही हैं जब वे रायसाहब के कैशबॉक्स के लिए लड़-झगड़ रहे थे।

व्याख्या:
रायसाहब के रिश्तेदारों को उनके कैशबॉक्स के लिए लड़ते-झगडते देख सिद्धेश्वर ने गीता का पाठ करते हुए रुक कर कहा कि बड़े दुःख की बात है। एक व्यक्ति कष्ट. में है अर्थात् मरने के करीब है और आप लोग ऐसी अवस्था में दुःखी होने की बजाए आपस में उनके पैसे के लिए लड़ रहे हैं।

प्रश्न 10.
मैं मरा नहीं, अभी जिन्दा हूँ। तुम्हारी परीक्षा ली थी। आज मेरी आँखें खुल गईं। मुझे मालूम हो गया, कौन कितने पानी में है। मैं तुम्हारा भाई भी नहीं। मैं वापिस बर्मा जाऊँगा।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ, श्री उदयशंकर भट्ट जी द्वारा लिखित एकांकी ‘वापसी’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ एकांकी के अन्त में रायसाहब ने अपने सगे-सम्बन्धियों को सम्बोधित करके कही हैं।

व्याख्या:
रायसाहब ने बीमार होने का नाटक किया था किन्तु उनके रिश्तेदार यह समझकर कि वे मरने ही वाले हैं, उनके धन के लिए लड़ने-झगड़ने लगे तो रायसाहब ने भेद खोलते हुए कहा कि मैं मरा नहीं, अभी जीवित हूँ। मैंने बीमारी का नाटक करके तुम्हारी परीक्षा ली थी। आज तुम्हारा व्यवहार देखकर मेरी आँखें खुल गईं। मुझे मालूम हो गया कि कौन कितने पानी में है अर्थात् कौन मुझ से सच्चा प्रेम करता है। मुझे तुम्हारे व्यवहार से यह मालूम पड़ गया है कि मैं तुम्हारा भाई भी नहीं। मैं वापस बर्मा जाऊँगा।

प्रश्न 11.
राय साहब वापस बर्मा क्यों चले जाते हैं ?
उत्तर:
राय साहब अपने रिश्तेदारों को उन के धन के लिए आपस में लड़ते-झगड़ते देखकर, यह निश्चय करते हैं कि उनके रिश्तेदारों को उनसे नहीं बल्कि उनके धन से प्रेम है, वापस बर्मा चले जाते हैं।

PSEB 12th Class Hindi Guide वापसी Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘वापसी’ एकांकी के लेखक कौन हैं ?
उत्तर:
उदय शंकर भट्ट।

प्रश्न 2.
श्री भट्ट जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
सन् 1897 ई० में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में।

प्रश्न 3.
श्री भट्ट किस विषय को स्कूल में पढ़ाया करते थे?
उत्तर:
संस्कृत में।

प्रश्न 4.
देश के विभाजन के बाद लेखक ने कहां कार्य किया था?
उत्तर:
दिल्ली के आकाशवाणी केंद्र में।

प्रश्न 5.
आपकी पाठ्यपुस्तक में संकलित एकांकी वापसी’ में रायसाहब का नाम क्या था?
उत्तर:
राम प्रसन्न।

प्रश्न 6.
वापसी का प्रमुख पात्र कौन है?
उत्तर:
रायसाहब की बड़ी विधवा साली सरोजनी।

प्रश्न 7.
रायसाहब ने सरोजनी को अपने पास कहाँ बुला लिया था?
उत्तर:
रंगून में।

प्रश्न 8.
सरोजनी राय साहब को क्या करने से रोकती थी?
उत्तर:
शराब पीने से।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 25 वापसी

प्रश्न 9.
रायसाहब के सभी रिश्तेदार स्वभाव से कैसे थे?
उत्तर:
स्वार्थी।

प्रश्न 10.
सिद्धेश्वर को आप रायसाहब के लिए क्या कहेंगे?
उत्तर:
शुभचिंतक।

प्रश्न 11.
स्वदेश लौटकर रायसाहब कहाँ रहे थे?
उत्तर:
अपने रिश्तेदार अंबिका के घर।

प्रश्न 12.
अपने सगे-संबंधियों को समझने के लिए रायसाहब ने क्या किया था?
उत्तर:
उन्होंने बीमार होने का नाटक किया था।

प्रश्न 13.
राय साहब के सभी रिश्तेदार स्वभाव से कैसे थे?
उत्तर:
लालची और स्वार्थी।

प्रश्न 14.
रायसाहब कितने वर्ष तक बर्मा में रहे थे?
उत्तर:
पैंतीस वर्ष तक।

प्रश्न 15.
राय साहब ने क्या निर्णय लिया था?
उत्तर:
वे वापस बर्मा जाने का निर्णय लेते हैं।

प्रश्न 16.
‘वापसी’ नामकरण की सार्थकता दो शब्दों में कीजिए।
उत्तर:

  1. संक्षिप्त
  2. सार्थक

प्रश्न 17.
गीता का पाठ कौन कर रहा था?
उत्तर:
सिद्धेश्वर

प्रश्न 18.
‘वापसी’ एकांकी में सरोजिनी का राय साहब से क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर:
सरोजिनी राय साहिब की विधवा साली है।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 19.
देख कैश बॉक्स……………।
उत्तर:
कैसे हथियाते हैं।

प्रश्न 20.
मैं मरा नहीं…………
उत्तर:
अभी जिन्दा हूँ।

प्रश्न 21.
……, कौन कितने पानी में है।
उत्तर:
मुझे मालूम हो गया।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 25 वापसी

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. वापसी किस विद्या की रचना है ?
(क) एकांकी
(ख) कहानी
(ग) उपन्यास
(घ) रेखाचित्र
उत्तर:
(क) एकांकी

2. वापसी एकांकी के प्रमुख पुरुष पात्र कौन हैं ?
(क) रायकुमार
(ख) रायसाहब
(ग) रामकुमार
(घ) राजकुमार
उत्तर:
(ख) रायसाहब

3. सिद्धेश्वर किसका पाठ कर रहा था ?
(क) गीता का
(ख) रामचरितमानस का
(ग) रामायण का
(घ) श्रीराम का
उत्तर:
(क) गीता का

4. ‘वापसी’ की प्रमुख पात्रा कौन है ?
(क) सरोजनी
(ख) सुत्रंदिनी
(ग) सुरम्या
(घ) सौम्या
उत्तर:
(क) सरोजनी

कठिन शब्दों के अर्थ

भाग्य फूटना = दुर्भाग्य। चूस डाला = निचोड़ दिया, कमजोर कर दिया। मिन्नत = खुशामद । लत = बुरी आदत। कुलच्छने = बुरे लक्षणों वाला। बेसुध = बेहोश विवश = मजबूर। भय = डर। आँख खुलना = सचेत होना।

वापसी Summary

वापसी जीवन परिचय

उदयशंकर भट्ट का संक्षिप्त जीवन परिचय दीजिए।

उदयशंकर भट्ट जी का जन्म सन् 1897 ई० में उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर में हुआ। शिक्षा-प्राप्ति के पश्चात् आपने लायलपुर (पाकिस्तान) के एक स्कूल में संस्कृत अध्यापक के रूप में नौकरी शुरू की। वहाँ से आप सनातन धर्म संस्कृत कॉलेज, लाहौर में पढ़ाते रहे। यहीं पर इन्होंने साहित्य साधना आरम्भ की। विभाजन के बाद इन्होंने दिल्ली के आकाशवाणी केंद्र में कार्य किया। इनके अभिनव एकांकी, स्त्री का हृदय, आदिम युग, समस्या का अन्त, अन्धकार और प्रकाश तथा पर्दे के पीछे एकांकी संग्रह विशेष उल्लेखनीय हैं। इन्होंने अनेक रेडियो एकांकी भी लिखे हैं। सन् 1964 ई० में इनका निधन हो गया था।

वापसी एकांकी का सार

वापसी एकांकी का सार लिखो।

रायसाहब राम प्रसन्न पैंतीस वर्ष तक रंगून में काम करने के बाद स्वदेश लौटे हैं। बर्मा में उन्होंने काफ़ी धन कमाया था जिसे लेकर वे स्वदेश लौटे थे। घर उनका कोई नहीं था अतः वे एक सम्बन्धी के यहाँ ठहरें। दिन-रात शराब में मस्त रहने के कारण उनका स्वास्थ्य गिर गया। एकांकी का जब पर्दा उठता है तो रायसाहब पलंग पर लेटे हैं। उसी कमरे में उनका कैशबक्स भी पड़ा है। रायसाहब की बेटी अपनी मासी से उनके इस तरह लेटे होने का कारण जानना चाहती है तो मासी सरोजिनी इसे अपना मन्दभाग्य बताती है कि वह रायसाहब को शराब पीने से न रोक सकी। सरोजिनी सन्दूक की चाबियों के गुच्छे की तलाश करती है। तभी उनका पड़ौसी सिद्धेश्वर आकर रायसाहब को किसी डॉक्टर को दिखाने की बात कहता है और उन्हें मृत्यु के करीब जानकर कोई दान-पुण्य की बात कहता है।

सरोजिनी किसी पण्डित से उन्हें गीता सुनाने की बात कहती है। सिद्धेश्वर उन्हें ज़मीन पर उतार देने की बात कहता है। तभी रायसाहब के सम्बन्धी अम्बिका, उनके भाई दीनानाथ तथा दीनानाथ का साला वंशीधर आते हैं। वे सब रायसाहब की मृत्यु निकट देख उनके कैशबक्स की चाबियों के लिए आपस में छीना-झपटी करते हैं, गाली-गलौच करते हैं और सौदेबाज़ी पर उतर आते हैं। अन्त में पता चलता है कि रायसाहब नाटक कर रहे थे। वे उठ बैठते हैं और अपने सगे सम्बन्धियों के व्यवहार से निराश होकर बर्मा वापस जाने का निर्णय करते हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 21 मधुआ

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 21 मधुआ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 21 मधुआ

Hindi Guide for Class 12 PSEB मधुआ Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
‘मधुआ’ कहानी में लेखक ने एक बालक द्वारा शराबी के हृदय परिवर्तन का सुन्दर चित्रांकन किया है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
मधुआ कहानी में लेखक ने बालक मधुआ के रोने-सिसकने की आवाज़ सुनकर एक शराबी के हृदय में उस बालक के प्रति संवेदना, सहानुभूति जागृत होने की बात कहकर एक शराबी, आलसी, निकम्मे व्यक्ति का हृदय परिवर्तन दिखाया है। बालक की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर आने के कारण वह फिर से कर्मठ बन जाता है और अपने पुराने धन्धे सान धरने का काम करना शुरू कर देता है। इसके लिए वह शराब पीने से तौबा भी कर लेता है।

प्रश्न 2.
‘मधुआ’ कहानी का नामकरण कहाँ तक सार्थक है ?
उत्तर:
कहानी का शीर्षक उसके मूलभाव, मूल संवेदना, मार्मिक घटना आदि का परिचायक होता है। इसी कारण शीर्षक कहानी का सम्पूर्ण अंशों में प्रतिनिधित्व करता है। ‘मधुआ’ कहानी का शीर्षक सरल, सुबोध, संक्षिप्त एवं आकर्षक है। जो उस बालक से सम्बद्ध होने के कारण और भी कुतूहलपूर्ण एवं रोचक है, जिसने एक शराबी के जीवन को कर्मण्यता की ओर प्रेरित करके उसे नया जीवन प्रदान किया। इसलिए प्रस्तुत कहानी का नामकरण अत्यन्त सार्थक एवं सोद्देश्य है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 21 जयशंकर प्रसाद

प्रश्न 3.
मधुआ कहानी द्वारा लेखक ने मद्यपान के कुप्रभावों को सामने रखते हुए दायित्व और स्नेह द्वारा इस समस्या का अनूठा समाधान ढूँढ़ा है-आपके इस विषय में क्या विचार हैं ?
उत्तर:
हमारा विचार है कि मानवीय मनोविज्ञान का एक सत्य यह भी है कि जब व्यक्ति पर कोई दायित्व आ जाता है, तब उसके भीतर से एक ऐसी प्रेरणा प्रस्फुटित होती है, जो उसके जीवन की दिशा को बदल देती है। शराब पीने की लत से निष्क्रिय बने शराबी पर जब मधुआ की ज़िम्मेदारी आ पड़ती है तो उसे शराब छोड़कर फिर से काम धन्धे पर लग जाना पड़ता है। वह फिर से घरवारी बन जाता है।

(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 4.
मधुआ कहानी के आधार पर मधुआ का चरित्र चित्रण करें।
उत्तर:
मधुआ ठाकुर सरदार सिंह के बेटे के बंगले पर लखनऊ में नौकरी करता है। वह कुंवर साहब का ओवर कोट उठाए दिनभर खेल में उनके साथ रहा करता था। एक दिन ऐसा संयोग हुआ कि खेल से जब कुंवर साहब सात बजे लौटे तो उसे घर का कुछ और काम भी करना पड़ा। काम करते हुए उसे रात के नौ बज गए। आटा वह रख नहीं सका था इसलिए रोटी न बना सका। सारा दिन भूखा रहने की शिकायत करने जब वह कुंवर साहब के नौकर के पास गया तो नौकर ने उसे इतनी डाँट पिलाई कि उसकी आँखों में आँसू छलक आए।

मधुआ को रोता हुआ देखकर शराबी के दिल में उसके प्रति हमदर्दी जागी, वह उसे साथ लेकर फाटक के बाहर चला आया। रात के दस बजे थे। कड़ाके की सर्दी थी। दोनों चुपचाप चलने लगे। शराबी ने मधुआ के फिर से सिसकने की आवाज़ सुनी। पूछने पर मधुआ ने बताया कि वह दिनभर का भूखा है। यह सुनकर शराबी उसे अपनी कोठरी में बिठाकर पूरे एक रुपए की मिठाई, पूरी आदि लेकर वापिस आया। गले में तरावट आते ही मधुआ हँसने लगा। दूसरे दिन सवेरे शराबी ने मधुआ की सुन्दर और कोमल काया से प्रभावित होकर कर्मठ बनने की बात सोची। मधुआ दूसरे दिन से शराबी के साथ सान धरने की मशीन पर काम करने लगा। उसने शराबी को यह बताया कि उसका इस दुनिया में कोई नहीं है।

प्रश्न 5.
‘मधुआ’ कहानी के आधार पर शराबी का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर:
‘मधुआ’ कहानी का शीर्षक भले ही एक बालक के नाम पर दिया गया है किन्तु इस कहानी का केन्द्रीय पात्र शराबी है। शराबी को शराब पीने की लत है। उसकी सारी माया, ममता शराब की बोतल पर ही टिकी है। इस शराब की लत के कारण ही उसने सान धरने का धन्धा भी छोड़ रखा है। अब तो वह रईसजादों को कहानियाँ सुनाकर उनसे मिलने वाले पैसों से शराब पीता है। एक दिन सात दिनों तक चने चबाने पर गुज़ारा करके भरपेट पीने की आस लेकर ठाकुर सरदार सिंह के पास पहुँचा। ठाकुर के यह कहने पर कि सात दिन भूखा रहकर आज तुम्हें पीने की बात क्यों सूझी है। इस पर शराबी ने अपना जीवन दर्शन बताते हुए कहा-‘सरदार ! मौज बहार की एक घड़ी, एक लम्बे दुःखपूर्ण जीवन से अच्छी है। उसकी खुमारी में रूखे दिन काट लिए जा सकते हैं। शराबी एक संवेदनशील हृदय रखने वाला व्यक्ति है। तभी तो उसकी कहानियों में दुखियों की दर्द भरी आहे, रंग महलों में घुट-घुट कर मरने वाली बेगमों की पीड़ा छिपी होती है। वह उसी दर्द को भूलाने के लिए शराब पीने की बात भी कहता है।

शराबी का हृदय मानवीय गुणों से भरपूर है। जब वह मधुआ को डाँट खाकर रोते हुए देखता है तो वह केवल उसके आँसू नहीं पोंछता, दुलार से उसे अपने साथ लेकर फाटक के बाहर आ जाता है। जब उसे पता लगता है कि बालक मधुआ सारे दिन का भूखा है तो वह ठाकुर साहब से मिले एक रुपए की पूरियाँ, मिठाई खरीद लाता है हालाँकि बाज़ार में जाकर कुछ देर के लिए उसकी नीयत डोलती है किन्तु उसके अन्दर का जागा हुआ इन्सान उसे पूरे एक रुपए का सामान लेकर मधुआ के पास आने पर विवश कर देता है। – शराबी उसी बालक के लिए घरबारी बनने को तैयार हो जाता है। वह ममत्व से उत्पन्न ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए पुनः कार्य आरम्भ कर देता है।

प्रश्न 6.
‘मधुआ’ कहानी का उद्देश्य स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘मधुआ’ प्रसाद जी की एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। इस कहानी में प्रसाद जी ने यह कहना चाहा है कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में दया, ममता, सहानुभूति आदि के गुण मौजूद रहते हैं, जो समय आने पर या उचित परिस्थितियाँ मिलने पर व्यक्ति में यह गुण जागृत हो जाते हैं। यही कहानीकार का उद्देश्य है। कहानी का चरित्र नायक एक शराबी और गैर-ज़िम्मेदार आदमी है। पर कुंवर साहब के अत्याचार से पीड़ित एक बालक के आँसू उससे वह करवा लेते हैं जो भूख नहीं करवा सकी थी। प्रसाद जी ने शराबी को एक संवेदनशील हृदय रखने वाला व्यक्ति दिखाकर ही उसे निष्क्रिय से कर्मठ इन्सान बनता दिखाता है। ठाकुर सरदार सिंह को जो कहानियाँ शराबी सुनाता है वह दुःख-दर्द से भरी होती हैं, जो शराबी को शराब पीने पर विवश भी करती हैं। नहीं तो शराबी के अनुसार इस बुरी बला को कौन अपने गले लगाता।

प्रसाद जी का उद्देश्य एक साथ एक व्यक्ति में दया, ममता, सहानुभूति आदि गुणों के उजागर होने की बात सिद्ध करना है। शराबी का हृदय रोते हुए मधुआ को देखकर पसीज उठता है। वह बड़े दुलार के साथ उसे अपने साथ ले आता है। शराबी की इस मौन सहानुभूति को बालक ने स्वीकार कर लिया। जब शराबी को यह पता चलता है कि बालक मधुआ दिनभर का भूखा है तो वह मानसिक द्वन्द्व पर विजय पाकर मधुआ के लिए पूरे एक रुपए की पूरी मिठाई खरीद लाता है। मानसिक द्वन्द्व में पड़ा शराबी फिर से घरबारी बनने को तैयार हो जाता है क्योंकि अब उसके ऊपर मधुआ की ज़िम्मेदारी आ गई थी। इस तरह परिस्थितियों ने एक निष्क्रिय व्यक्ति को एक कर्मठ, कर्त्तव्यनिष्ठ एवं त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति बना दिया। यही प्रसाद जी का उद्देश्य है जिसमें वे पूर्ण रूप से सफल हुए हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 21 जयशंकर प्रसाद

प्रश्न 7.
मधुआ कहानी के माध्यम से प्रसाद जी ने समाज की कई समस्याओं का समाधान किया है-आपके विचार में वे समस्याएँ क्या हैं और लेखक ने उन्हें कैसे हल किया है ?
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी में सबसे पहली समस्या जिसे प्रसाद जी ने पाठकों के सम्मुख रखा है वह है शराब पीने की समस्या। शराब पीने की लत लग जाने पर व्यक्ति किस प्रकार निष्क्रिय हो जाता है कि सान धरने की कला में निपुण शराबी भी अपनी कला को भूल बैठता है। वह शराब पीने के लिए सात दिनों तक चने चबाने पर गुजारा करता है। उसका तर्क यह है कि मौज़ बहार की एक घड़ी, एक लम्बे दु:ख पूर्ण जीवन से अच्छी है, उसकी खुमारी में रूखे दिन काट लिए जा सकते हैं। प्रसाद जी ने एक शराबी को कर्मठ कर्त्तव्य परायण व्यक्ति में बदलने के लिए उसमें मानवीय गुणों का जागना दिखाकर इस समस्या का समाधान प्रस्तुत किया है।

प्रसाद जी ने समाज में व्याप्त दूसरी समस्या जिसकी ओर इशारा किया है वह है अमीर लोगों द्वारा अपने भोले-भाले नौकरों पर अत्याचार करने की प्रवृत्ति। मधुआ कुंवर साहब के यहाँ खेल के मसय उनका ओवर कोट उठाने की नौकरी करता है। सारा-सारा दिन वह उनका ओवर कोट उठाए कुंवर साहब के साथ बना रहता है, किन्तु न तो कुंवर साहब को तथा न ही उनके किसी दूसरे नौकर को इस बात का ध्यान आता है कि बालक सारे दिन का भूखा है। मधुआ जब इस बात की शिकायत कुंवर साहब के नौकर से करता है तो उसे डाँट खानी पड़ती है। विपरीत इसके शराबी, मधुआ को वह सब कुछ खिलाता है जो वह खिला सकता था। प्रसाद जी ने इस समस्या का समाधान संकेत रूप में यह दिया है कि ऐसी नौकरी करने की अपेक्षा कोई छोटा-मोटा काम-धन्धा करना बेहतर रहेगा क्योंकि इससे किसी दूसरे की गुलामी तो न सहनी पड़ेगी।

(ग) सप्रसंग व्याख्या करें:

1. ‘मौज बहार की एक घड़ी, एक लम्बे दुःखपूर्ण जीवन से अच्छी है। उसकी खुमारी में रूखे दिन काट लिए जा सकते हैं।’
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित कहानी ‘मधुआ’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ शराबी ने ठाकुर सरदार सिंह को उस समय कही हैं जब ठाकुर साहब उससे पूछते हैं कि सात दिन तक चने चबाने पर गुजारा करने के बाद अच्छा भोजन करने की बजाए वह पेट भर पीना क्यों चाहता है ?

व्याख्या:
शराबी जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए कहता है कि एक लम्बे दुःखपूर्ण जीवन से सुख की एक घड़ी अच्छी है। उसके कहने का भाव यह है कि उस लम्बे जीवन से क्या फायदा जिसमें दुःख-दर्द, मुसीबतें और चिन्ताएँ हों। इसके विपरीत हर्षोल्लास का एक दिन श्रेष्ठ है। उस एक क्षण की मस्ती में जीवन के दुःख भरे दिन काटे जा सकते हैं।

विशेष:

  1. शराबी अपने जीवन दर्शन को स्पष्ट कर रहा है। शराब पीने को वह दुःखों को भुलाने का साधन मानता है। साथ ही वह यह भी कहना चाहता है कि सुखद क्षणों के लिए दुःख भरे दिन काटे जा सकते हैं।
  2. भाषा काव्यात्मक, सहज तथा भावानुरूप है।

2. “सोचा था, आज सात दिन पर भर भेट पीकर सोऊंगा, लेकिन वह छोटा-सा रोना पाजी न जाने से आ धमका।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखी कहानी ‘मधुआं’ में से ली गई हैं। जब शराबी भोले-भाले बालक मधुआ को अपनी कोठरी में ले आता है तो बालक को दिनभर का भूखा जानकर उसके लिए पूरे एक रुपए की मिठाई-पूरी लाकर खिलाता है। मधुआ तो खा-पीकर सो जाता है किन्तु शराबी सोने की कोशिश करता हुआ प्रस्तुत पंक्तियाँ सोचता है।

व्याख्या:
शराबी अपने बदले हुए हालात पर विचार करता हुआ कहता है कि सात दिन तक शराब न पीने के बाद आज ठाकुर सरदार सिंह से मिलने वाले एक रुपए की शराब खरीद कर भर पेट पीकर सो जाता लेकिन यह छोटा-सा रोता हुआ पाजी बालक न जाने बीच में कहाँ से आ धमका।

विशेष:

  1. शराबी के मानसिक द्वन्द्व की ओर संकेत किया गया है।
  2. भाषा सहज, सरल तथा प्रसंगानुकूल है।

3. “बैठे बिठाये यह हत्या कहाँ से लगी। अब तो शराब न पीने की मुझे भी सौगन्ध लेनी पड़ेगी।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित कहानी ‘मधुआ’ में से ली गई हैं। जब मधुआ की ज़िम्मेदारी सिर पर आ पड़ने से शराबी अपना पुराना धन्धा सान धरने का काम शुरू करना चाहता है तो मधुआ के इस दृढ़ निश्चय को कि वह अब ठाकुर की नौकरी न कर सकेगा शराबी प्रस्तुत पंक्तियाँ मन ही मन सोचता है।

व्याख्या:
मधुआ के इस निर्णय को जानकर कि वह अब उसी के साथ रहना चाहता है शराबी मन ही मन सोचने लगा-बैठे बिठाए हत्या कहाँ से लगी। शराबी के कहने का तात्पर्य उसके अन्दर का शराबी मर गया था। इसलिए उसने सोचा अब तो शराब नहीं पीने की उसे सौगन्ध लेनी ही पड़ेगी।

विशेष:

  1. मधुआ के कारण शराबी की शराब पीने की लत समाप्त हो जाती है।
  2. भाषा सहज, भावपूर्ण तथा प्रवाहमयी है।

PSEB 12th Class Hindi Guide मधुआ Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जयशंकर प्रसाद का जन्म कहाँ और कब हुआ था ?
उत्तर:
जयशंकर प्रसाद का जन्म वाराणसी में सन् 1889 ई० में हुआ था।

प्रश्न 2.
प्रसाद जी ने किस कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की थी?
उत्तर:
प्रसाद जी ने केवल आठवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की थी।

प्रश्न 3.
प्रसाद जी ने अपने घर में रह कर किन-किन भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया था?
उत्तर:
प्रसाद जी ने अपने घर में रहकर संस्कृत, हिंदी, अंग्रेज़ी आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया था।

प्रश्न 4.
प्रसाद जी की पहली कविता कब और कहाँ छपी थी?
उत्तर:
सन् 1911 ई० में ‘इन्दु’ नामक पत्रिका में।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 21 जयशंकर प्रसाद

प्रश्न 5.
प्रसाद जी के द्वारा रचित उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर:
तितली, कंकाल और इरावती।

प्रश्न 6.
प्रसाद जी के द्वारा रचित कहानी संग्रहों के नाम लिखिए।
उत्तर:
प्रसाद जी के पाँच कहानी संग्रह हैं-आकाशदीप, आंधी, प्रतिध्वनि, छाया और इंद्रजाल।

प्रश्न 7.
प्रसाद जी ने कितने नाटक लिखे थे?
उत्तर:
लगभग एक दर्जन।

प्रश्न 8.
प्रसाद जी की कौन-सी रचना उनकी ख्याति की आधार है?
उत्तर:
कामायनी (महाकाव्य)।

प्रश्न 9. ‘मधुआ’ किस प्रकार की कहानी है?
उत्तर:
मनोवैज्ञानिक कहानी।

प्रश्न 10.
कहानी सुनने का चस्का किसे था?
उत्तर:
ठाकुर सरदार सिंह को।

प्रश्न 11.
ठाकुर ने शराबी को कहानी सुनाने के लिए कितने पैसे दिए थे?
उत्तर:
एक रुपया।

प्रश्न 12.
उस लड़के का नाम क्या था? जो शराबी को मिला था।
उत्तर:
मधुआ।

प्रश्न 13.
मधुआ क्यों रो रहा था?
उत्तर:
मधुआ भूख के कारण रो रहा था।

प्रश्न 14.
शराबी ने एक रुपया क्या खरीदने में खर्च कर दिया था?
उत्तर:
मिठाई, पूरी और नमकीन खरीदने पर।

प्रश्न 15.
शराबी ने किस काम को करना पुनः आरंभ कर दिया था?
उत्तर:
सान धरने का कार्य।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 16.
उसकी खुमारी में…………
उत्तर:
रूखे दिन काट लिए जा सकते हैं।

प्रश्न 17.
……………सौगंध लेनी पड़ेगी।
उत्तर:
अब तो शराब न पीने की।

प्रश्न 18.
बैठे बिठाये यह हत्या………………
उत्तर:
कहाँ से लगी।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 19.
ठाकुर का नाम सरदार सिंह था।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 20.
‘मधुआ’ मनोवैज्ञानिक कहानी है।
उत्तर:
हाँ।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 21 जयशंकर प्रसाद

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. जयशंकर प्रसाद की कीर्ति का आलोक स्तंभ कौन सा महाकाव्य है ?
(क) कामायनी
(ख) लहर
(ग) झरना
(घ) आँसू।
उत्तर:
(क) कामायनी

2. लेखक के कितने कहानी संग्रह हैं ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच
उत्तर:
(घ) पाँच

3. मधुआ किस विद्या की रचना है ?
(क) कहानी
(ख) निबंध
(ग) उपन्यास
(घ) रेखाचित्र
उत्तर:
(क) कहानी

4. मधुआ कैसी कहानी है ?
(क) व्यंग्यात्मक
(ख) मनोवैज्ञानिक
(ग) विचारात्मक
(घ) विवेचनात्मक
उत्तर:
(ख) मनोवैज्ञानिक

5. ठाकुर सरदार सिंह को क्या सुनने का शौक था ?
(क) कहानी
(ख) भाषण
(ग) कविता
(घ) व्यंग्य
उत्तर:
(क) कहानी

कठिन शब्दों के अर्थ

महक = बदबू। खुमारी = मस्ती, नशा। दिल्लगी = हंसी-मज़ाक । कंगाल = गरीब। सुकुमार = कोमल। कर्कश = कठोर, तीव्र । ढेबरी = दीया जलाने वाली टीन की डिबिया। गढ़ा भरना = पेट भरना। आलोक = प्रकाश, रोशनी। दारिद्रय = गरीबी। नियति = भाग्य। इन्द्रजाल = जादू। सान धरने की कल = चाकू, छुरी तेज़ करने की मशीन।

मधुआ Summary

मधुआ जीवन परिचय

जयशंकर प्रसाद का संक्षिप्त जीवन परिचय लिखिए।

जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 ई० में वाराणसी के एक धनी वैश्य परिवार में हुआ। इन्होंने स्कूल में केवल आठवीं तक ही शिक्षा पाई थी, तत्पश्चात् घर पर ही संस्कृत हिन्दी, अंग्रेज़ी आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। इनकी सर्वप्रथम कहानी ‘गाय’ सन् 1911 में ‘इन्दु’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। आकाशदीप, आँधी, प्रतिध्वनि, छाया
और इन्द्रजाल इनके पाँच कहानी संग्रह हैं। तितली, कंकाल और इरावती इनके उपन्यास हैं। इन्होंने लगभग दर्जन-भर नाटक भी लिखे हैं, जिनमें चन्द्रगुप्त, स्कन्धगुप्त अजातशत्रु और ध्रुवस्वामिनी प्रमुख हैं। ‘कामायनी’ महाकाव्य इनकी कीर्ति का आलोक स्तम्भ है। सन् 1937 ई० में इनका निधन हो गया था।

मधुआ कहानी का सार

प्रस्तुत कहानी में एक गरीब व्यक्ति के चारित्रिक विकास के माध्यम से सामाजिक विषमताओं और अन्यायों का चित्र खींचा गया है। यह एक मनोवैज्ञानिक कहानी है जिसमें एक कोमल, सुन्दर किन्तु पीड़ित बालक के दुःख से भरे जीवन से प्रभावित होकर एक निष्क्रिय शराबी भी कर्मठ बन जाता है। ठाकुर सरदार सिंह को कहानी सुनने का चस्का था। एक शराबी उन्हें तरह-तरह की कहानियाँ सुनाकर बदले में शराब के लिए पैसे लेता है। एक दिन शराबी ठाकुर साहब के पास कहानी सुनाने पहुँचता है और कहता है कि आज उसे सात दिन से ऊपर हो गए हैं, एक बूंद भी गले में नहीं उतरी। कहानी सुनाने से पहले ही ठाकुर साहब को नींद सताने लगी। उन्होंने उसे एक रुपया देकर अपने नौकर लल्लू को भेजने का आदेश देकर उसे विदा किया।

शराबी लल्लू को ढूँढ़ता हुआ जब उसकी कोठरी के पास पहुँचा तो उसने अन्दर से एक बालक के सिसकने का शब्द सुना। लल्लू उस बालक को डाँट रहा था। जब उसकी डाँट खाकर बालक बाहर निकला तो उसकी आँखों में आँसू देखकर शराबी ने उसे बड़े दुलार से उसकी आँखें पोंछते हुए उसे साथ लेकर फाटक के बाहर चला आया। बालक को पुनः रोता देख जब शराबी ने उसके रोने का कारण पूछा तो उसने बताया कि वह दिन भर से भूखा है। मार तो वह रोज ही खाता है लेकिन आज खाना भी नहीं मिला।

बालक की बात सुनकर शराबी उसे अपनी गन्दी कोठरी में ले गया और उसे वहाँ बैठाकर स्वयं उसके लिए कुछ लेने के लिए चला गया। शराबी की जेब में एक रुपया था, वह शराब पीना चाहता था किन्तु न जाने किस दैवीय शक्ति के कारण उसने पूरे एक रुपए की मिठाई, पूरी और नमकीन खरीदी और बालक को खाने के लिए दी। इसे खाकर बालक मुस्कुराने लगा। . . . दूसरे दिन सवेरे उठकर शराबी ने अपनी कोठरी में बिखरी हुई दरिद्रता को देखा और उसने बालक मधुआ के लिए फिर से गृहस्थी बनने की बात सोची और फिर से अपना पुराना सान धरने का धन्धा शुरू कर दिया। बालक भी उस की गठरी उठाकर उसके साथ चल पड़ा।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 19 शार्टकट सब ओर

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 19 शार्टकट सब ओर Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 19 शार्टकट सब ओर

Hindi Guide for Class 12 PSEB शार्टकट सब ओर Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
शार्टकट को जीवन दर्शन के रूप में अपनाने का श्रीगणेश कब हुआ ?
उत्तर:
एक प्राचीन कथा के आधार पर शार्टकट की इस नवीन प्रणाली को जन्म देने का श्रेय पार्वती जी को है, जिन्होंने अपने प्रिय पुत्र गणेश जी को, युवराज पद के संघर्ष में भगवान् शंकर के प्रिय पुत्र कार्तिकेय जी की अपेक्षा, यह सलाह दी कि तीनों लोकों की परिक्रमा करने की बजाए, अपने वाहन चूहे पर सवार होकर भगवान् शंकर की परिक्रमा कर लें। क्योंकि भगवान् शंकर भी तो त्रिलोकीनाथ हैं। त्रिलोक की परिक्रमा उनके सामने क्या महत्त्व रखती है। इसी शार्टकट को अपना कर गणेश जी ने विजय प्राप्त की।

प्रश्न 2.
शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ रहे शार्टकट का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
शिक्षा के क्षेत्र में शार्टकट के कारण पाठ्य-पुस्तकों की जगह कुंजियों, नोट्स की धूम मची है। मॉडल पेपर और टैस्ट पेपर छपते हैं जो एक सप्ताह, एक दिन, एक घंटा परीक्षा से पहले पढ़ लेने पर पास होने के पासपोर्ट समझे जाते हैं। आजकल तो परीक्षा से पाँच मिनट पूर्व शीर्षक की पुस्तकें भी छपनी शुरू हो गई हैं। इसी तरह ग्रेजुएट बनने के लिए भी वाया बठिण्डा नामक शार्टकट का चलन हो गया है। प्रभाकर, ज्ञानी या शास्त्री की परीक्षा पास कर केवल अंग्रेजी में एक पर्चा देकर ग्रेजुएट बना जा सकता है। साहित्य के क्षेत्र में भी बड़ी-बड़ी पुस्तकों की बजाए उनके लघु संस्करण छपने लगे हैं। प्रबन्ध काव्य की जगह मुक्तक काव्य ने ले ली है। एक नाटक की जगह एकांकी और कहानी की जगह छोटी कहानी की जगह शार्टकट के कारण ही ले रही है। यही नहीं साहित्य की प्रत्येक विधा को शार्टकट ने अपने शिकंजे में कस रखा है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 19 डॉ० संसार चन्द्र

प्रश्न 3.
‘शार्टकट सब ओर’ में लेखक ने व्यंग्य के द्वारा शार्टकट के कुप्रभावों की ओर कैसे संकेत किया है ?
उत्तर:
लेखक ने शार्टकट की संस्कृति के प्रभाव स्वरूप आगे बढ़ने की होड़ में बेतहाशा भागना शुरू कर दिया है। स्त्रियों ने टाइट ड्रैस पहननी शुरू कर दी है और बाल कटवाने शुरू कर दिये हैं। पाठ्य-पुस्तकों की बजाए कुंजियों, नोट्स और मॉडल टैस्ट पेपरों ने ले ली है। विवाह के झंझट से बचने के लिए प्रेम विवाह होने लगे हैं। ये सब शार्टकट के कुप्रभाव ही तो हैं।

(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 4.
‘शार्टकट सब ओर’ निबन्ध आज के युग का यथार्थ चित्रण है। इसमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में शार्टकट अपना कर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति का वर्णन किया गया है।
उत्तर:
प्रस्तुत निबन्ध में हास्य के पुट के साथ आधुनिक युग के गम्भीर यथार्थ को सामने रखा है। आज मनुष्य कामकाज के बोझ से इतना दब गया है कि शार्टकट के बिना उसकी गाड़ी चल ही नहीं सकती। उसके हर काम में हर क्षेत्र में शार्टकट का ही बोल बाला है। टाइट ड्रैस और हेयर कट इसी शार्टकट का ही परिणाम हैं। साहित्य के क्षेत्र में भी शार्टकट का सहारा लिया जाने लगा है। आज बड़ी-बड़ी पुस्तकें कोई नहीं पढ़ता। लघु संस्करणों ने उनकी जगह ले ली है। पाठ्य-पुस्तकों के स्थान पर कुंजियाँ, नोट्स, मॉडल पेपर, टैस्ट पेपर लोग पढ़ते हैं और अब तो ऐसी पुस्तकें भी बाज़ार में आ गई हैं जो परीक्षा से एक सप्ताह पहले, एक घण्टा पहले और पाँच मिनट पहले शीर्षक वाली हैं। ये सब शार्टकट का ही तो परिणाम है। उपन्यास की जगह कहानी, छोटी कहानी, नाटक की जगह एकांकी और महाकाव्य की जगह मुक्तक काव्य ने ले ली है। सच्चाई यह है कि आज शार्टकट ने साहित्य की प्रत्येक विधा को अपने शिकंजे में ले लिया है।

शादी के सिलसिले में प्रेम विवाह भी इसी शार्टकट की देन है। शिक्षा के क्षेत्र में वाया बठिण्डा ग्रेजुएट होने के लिए शार्टकट का सहारा लिया जाता है। लेखक ने शार्टकट के कारण गागर में सागर भरने की बात को स्पष्ट करते हुए कहा है कि आजकल लोगों के पास बात । तक करने की भी फुर्सत नहीं है इसलिए वे शार्टकट का सहारा लेकर इशारों ही इशारों में बात करते हैं। – इस तरह लेखक ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए शार्टकट का सहारा लेने की बात कही है। प्रश्न 5. ‘शार्टकट सब ओर’ निबन्ध का सार अपने शब्दों में लिखो। उत्तर-देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया सार। (ग) सप्रसंग व्याख्या करें

प्रश्न 6.
एक गम्भीर दौड़ छिड़ गई है। हर कोई एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में है। यह दौड़ कछुए और खरगोश की नहीं बल्कि सिर्फ खरगोशों की दौड़ है।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० संसार चन्द्र द्वारा लिखित निबन्ध ‘शार्टकट सब ओर’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक शार्टकट के माध्यम से लोगों के एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ की चर्चा कर रहे हैं।

व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि शार्टकट आधुनिक संस्कृति का दूसरा नाम बन जाने के कारण लोगों में एक गम्भीर दौड़ छिड़ गई है। हर कोई एक-दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है। यह दौड़ कोई कछुए और खरगोश की दौड़ नहीं जिसमें कछुआ तो धीरे-धीरे चलता है और खरगोश कुलाचे भरता हुआ सरपट दौड़ता है परन्तु यह दौड़ तो केवल खरगोशों की दौड़ है जिसमें हर कोई तेज़ी से भाग रहा है और एक-दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है।

विशेष:

  1. आधुनिक युग में हर कोई शार्टकट कर रहा है।
  2. भाषा सरल, सहज तथा प्रवाहमयी है।

प्रश्न 7.
मुक्तक रचना ने प्रबन्ध की कमर तोड़ दी है। एकांकी नाटक के प्राण हर रहा है। छोटी कहानी बड़ी का गला दबोच रही है। सच्चाई यह है कि साहित्य की प्रत्येक विधा को शिकंजे में कस कर शार्टकट किया जा रहा है।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० संसार चन्द्र द्वारा लिखित निबन्ध ‘शार्टकट सब ओर’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक साहित्य पर शार्ट के प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं।

व्याख्या:
लेखक शार्टकट के साहित्य पर पड़ने वाले प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहते हैं शार्टकट के कारण मुक्तक काव्य की रचना होने लगी जिसने प्रबन्ध काव्य की कमर तोड़ दी अर्थात् उसकी रचना बन्द हो गई। इसी तरह एकांकी ने नाटक के प्राण हर लिए अर्थात् शार्टकट के कारण नाटक के स्थान पर एकांकी का प्रचलन शुरू हो गया। इसी तरह छोटी कहानी ने कहानी का गला दबोच लिया अर्थात् कहानी के स्थान पर छोटी कहानी लिखी जाने लगी। सच तो यह है कि साहित्य की प्रत्येक विधा को निबन्ध, संस्मरण, रेखाचित्र-आदि को शार्टकट ने अपने शिकंजे में कस लिया है अर्थात् साहित्य की सभी विधाएँ इसके प्रभाव में आ गई हैं।

विशेष:

  1. साहित्य के क्षेत्र में मुक्तकों, कहानी, एकांकी को शार्टकट माना गया है।
  2. भाषा सहज तथा मुहावरों से युक्त है।

प्रश्न 8.
ये महानुभाव अपने समग्र कार्य व्यापार आँखों के इशारों से चलाते हैं। इसके पास बात करने की फुर्सत कहाँ। किसी उर्दू शायर ने सम्भवतः इनकी इस अदा पर कुर्बान होकर ही यह शेयर पढ़ा हैजमाने को फुरसत नहीं गुफ़तगू की
अरुसे सुखन ये इशारों के दिन हैं। प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० संसार चन्द्र द्वारा लिखित निबन्ध ‘शार्टकट सब ओर’ में से ली गई हैं।

प्रस्तुत:
पंक्तियाँ में लेखक ने बातचीत पर भी शार्टकट के प्रभाव का वर्णन किया है।

व्याख्या:
लेखक मौन व्रत को शार्टकट सम्प्रदाय का बहुत बड़ा अनुष्ठान मानते हुए कहते हैं कि ये लोग, जो मौन व्रत के समर्थक हैं, अपना सारा कार्य व्यापार आँखों के इशारों से चलाते हैं। उनके पास बात तक करने की फुर्सत नहीं है। किसी उर्दू कवि ने शायद इनकी इसी अदा पर न्योछावर होते हुए यह शेयर पढ़ा था जिसका अर्थ है कि ज़माने को बातचीत करने की भी फुर्सत नहीं है क्योंकि दुल्हन से बातचीत इशारों से करने के दिन हैं।

विशेष:

  1. लेखक ने मौन को भी वार्तालाप का शार्टकट माना है।
  2. भाषा बोलचाल की उर्दू शब्दों से युक्त है।

PSEB 12th Class Hindi Guide शार्टकट सब ओर Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डॉ० संसार चंद का जन्म कब और कहाँ हुआ था ?
उत्तर:
डॉ० संसार चंद का जन्म जम्मू के मीरपुर गाँव में सन् 1917 में हुआ था।

प्रश्न 2.
डॉ० संसार चंद के अधिकतर निबंध किस तरह के हैं ?
उत्तर:
व्यग्यात्मक।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 19 डॉ० संसार चन्द्र

प्रश्न 3.
डॉ० संसार चंद के द्वारा रचित कुछ निबंध संग्रहों के नाम लिखिए।
उत्तर:
सोने के दाँत, बातें या झूठी, तिनकों के घाट, महामूर्ख मंडल।

प्रश्न 4.
लेखक ने आज की संस्कृति को दूसरा नाम क्या दिया है?
उत्तर:
शार्टकट।

प्रश्न 5.
शार्टकट का इतिहास कैसा है?
उत्तर:
बहुत पुराना।

प्रश्न 6.
गणेश जी ने शार्टकट कैसे मारकर विजय प्राप्त कर ली थी?
उत्तर:
उन्होंने भगवान् शंकर की परिक्रमा करके विजय प्राप्त कर ली थी।

प्रश्न 7.
साहित्य के क्षेत्र में आजकल कौन-से शार्टकट के उदाहरण हैं ?
उत्तर:
मॉडल पेपर, टैस्ट पेपर, कुंजियां, नोट्स, लघु संस्करण।

प्रश्न 8.
लेखक के अनुसार कहानी किसका शार्टकट है?
उत्तर:
उपन्यास का।

प्रश्न 9.
मुक्तक किसके शार्टकट माने जाते हैं ?
उत्तर:
प्रबंध काव्य के।

प्रश्न 10.
‘वाया बठिंडा’ क्या है?
उत्तर:
शिक्षा से संबंधित डिग्री प्राप्त करने के लिए टुकड़ों में प्राप्त की गई शिक्षा।

प्रश्न 11.
लेखक की दृष्टि में आजकल सब तरफ किसका बोलबाला है?
उत्तर:
शार्टकट का।

प्रश्न 12.
लेखक की दृष्टि में कौन-सा मुहावरा शार्टकट की तरफ संकेत करता है?
उत्तर:
गागर में सागर भरना।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 19 डॉ० संसार चन्द्र

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 13.
हर कोई एक-दूसरे से..
उत्तर:
आगे बढ़ने की दौड़ में है।

प्रश्न 14.
…………….नाटक के प्राण हर रहा है।
उत्तर:
एकांकी।

प्रश्न 15.
छोटी कहानी बड़ी कहानी……………..।
उत्तर:
का गला दबोच रही है।

प्रश्न 16.
ये महानुभाव अपने समग्र कार्य.. ………….. …….से चलाते हैं।
उत्तर:
आँखों के इशारों।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 17.
शिक्षा के क्षेत्र में शार्टकट बढ़ रहे हैं।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 18.
मुक्तक रचना ने प्रबंध की कमर तोड़ दी है।
उत्तर:
हाँ।

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए प्रश्न

प्रश्न 1.
‘शार्टकट सब ओर’ निबंध के लेखक का नाम लिखें।
उत्तर:
डॉ० संसार चंद।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘शार्टकट सब ओर’ किस विद्या की रचना है ?
(क) निबंध
(ख). कहानी
(ग) संस्मरण
(घ) रेखाचित्र।
उत्तर:
(क) निबंध

2. ‘शार्टकट सब ओर’ कैसा निबंध है ?
(क) विचारात्मक
(ख) व्यंग्यात्मक
(ग) विवेचनात्मक
(घ) आत्म कथात्मक।
उत्तर:
(ख) व्यंग्यात्मक

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 19 डॉ० संसार चन्द्र

3. लेखक के अनुसार शार्टकट को जन्म देने का श्रेय किसकों है ?
(क) पार्वती को
(ख) शिव को
(ग) गणेश को
(घ) महादेवी को
उत्तर:
(क) पार्वती को

4. शार्टकट के कारण मुक्तक ने किसकी जगह ली ?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) प्रबंध काव्य
(घ) काव्य
उत्तर:
(ग) प्रबंध काव्य

5. शार्टकट का इतिहास कितना पुराना है ?
(क) बहुत पुराना
(ख) सौ साल पुराना
(ग) दो सौ साल पुराना
(घ) पचास साल पुराना
उत्तर:
(क) बहुत पुराना

कठिन शब्दों के अर्थ

शार्टकट = छोटा रास्ता। अबाध गति = बिना रुकावट के चाल। कुलाचें भरना = छलांगें मारना। सरपट भागना = तेज़ भागना । गर्जे कि = यहाँ तक कि। सिक्का मानना = प्रभाव मानना। श्रीगणेश करना = आरम्भ करना। परिक्रमा करना = चारों ओर चक्कर लगाना। द्रुतगामी = तेज़ चलने वाला। वाहन = सवारी। बिसात = हैसियत, सामर्थ्य । शिल्पविधि = रचना का तरीका। जनाज़ा = अर्थी । शार्ट = छोटा। किस्सा = कहानी। काबिले गौर = ध्यान देने योग्य। धूर्तराज = धोखेबाज़ों का राजा। मज़मून = विषय। बिलबिलाना = तड़पना । लबरेज़ होना = पूरा भरना। सब्र = सन्तोष। दामन = आँचल। फ़िलासफी = दर्शन। जेहाद = संघर्ष। बुलन्द करना = ऊँचा उठाना। अबूर करना = पार करना। ईजाद = आविष्कार। दुश्वार = कठिन। हनूज दिल्ली दूर अस्त = अभी दिल्ली दूर है। बेतकल्लुफ़ = निस्संकोच, बेधड़क, अनौपचारिक। तफ़रीह = दिल्लगी, हँसी। कारगर = उपयोगी। खारिज = अलग किया हुआ। जौक = एक प्रसिद्ध उर्दू कवि। हकीकत = वास्तविकता। बयान करना = वर्णन करना। चन्द एक = कुछ एक।वृहद् = बड़ा। भौन = भवन, घर। गुफ़तगू = बातचीत।

शार्टकट सब ओर Summary

शार्टकट सब ओर जीवन परिचय

डॉ० संसार चन्द्र जी का जीवन परिचय लिखिए।

डॉ० संसार चन्द्र का जन्म सन् 1917 में जम्मू के मीरपुर नामक गाँव में हुआ। हिन्दी संस्कृत में एम० ए० करने के बाद आपने पंजाब विश्वविद्यालय से पीएच०डी० एवं डी०लिट् की उपाधि प्राप्त की। आपने जम्मू में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। फिर सनातन धर्म कॉलेज (लाहौर) अम्बाला छावनी में हिन्दी संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रहे। बाद में पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में रीडर पद पर काम किया। सन् 1970 में जम्मू विश्वविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया। यहीं से 1977 में आप सेवानिवृत्त होकर चण्डीगढ़ में बस गए। आपने अधिकतर व्यंग्यात्मक निबन्ध लिखे हैं। आपके प्रसिद्ध निबन्ध संग्रहों में सोने के दाँत, अपनी डाली के काँटे, बातें ये झूठी हैं, गंगा जब उल्टी बहे, महामूर्ख मण्डल, तिनकों के घाट, लाख रुपए की बात उल्लेखनीय हैं।

शार्टकट सब ओर निबन्ध का सार

‘शार्टकट सब ओर’ निबन्ध का सार 150 शब्दों में लिखिए।

प्रस्तुत व्यंग्यपरक निबन्ध में डॉ० संसार चन्द्र ने आधुनिक युग के एक गम्भीर यथार्थ को प्रस्तुत किया है। लेखक का मानना है कि आज की संस्कृति का दूसरा नाम शार्टकट है। इसके पीछे हम बेतहाशा दौड़ रहे हैं। हर कोई जीवन के हर क्षेत्र में शार्टकट को अपना रहा है। शार्टकट का इतिहास बहुत पुराना है। इसे जन्म देने का श्रेय पार्वती जी को है जिन्होंने गणेश जी को तीनों लोकों की परिक्रमा का शार्टकट यह बताया कि वे भगवान् शंकर की परिक्रमा कर लें। शार्टकट अपना कर गणेश जी विजयी हुए।

साहित्य के क्षेत्र में भी आज लघु संस्करणों, कुंजियों, नोटों, मॉडल पेपर और टैस्ट पेपर का युग है। परीक्षा से एक सप्ताह पहले, एक घण्टा पहले शार्टकट का ही परिणाम है। इस दिशा में परीक्षा से पाँच मिनट पहले के शार्टकट निकल चुके हैं। इसी तरह नाटक की जगह एकांकी और उपन्यास की जगह कहानी, प्रबन्ध काव्य की जगह मुक्तक का प्रचलन शार्टकट का ही परिणाम है।

शादी के क्षेत्र में भी प्रेम विवाह शार्टकट के कारण प्रचलन हुआ है। आज माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आने पर ही फल लगने की कौन प्रतीक्षा करता है। शिक्षा के क्षेत्र में वाया बठिण्डा परीक्षा पास करना शार्टकट के कारण ही सम्भव हो सका है। स्पष्ट है कि आज के युग में शार्टकट का ही बोलबाला है। गागर में सागर भरने मुहावरे का भी यही अर्थ है कि व्यक्ति थोड़े में बहुत कुछ कह जाता है अर्थात् शार्टकट से काम लेता है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 24 उपेक्षिता

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 24 उपेक्षिता Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 24 उपेक्षिता

Hindi Guide for Class 12 PSEB उपेक्षिता Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
कमला का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर:
कमला लड़की को जन्म देना बुरा नहीं समझती क्योंकि वह स्वयं अपने माँ-बाप की सबसे बड़ी बेटी है। उसके पिता तो लडकियों को माँ-बाप को सुख देने वाली मानते हैं। कमला लोगों की सहानुभूति, दिलासे की कोई परवाह नहीं करती। वह अपनी मौसी सास की टिप्पणियों की परवाह न कर बेटी को छाती से लगाते हुए सोचती है कि उसके लिए यह बेटी तो बेटों से भी बढ़कर है।

प्रश्न 2.
लेखक के मित्रों ने लड़की पैदा होने पर अपने उद्गार कैसे पेश किए ?
उत्तर:
लेखक के मित्र मिस्टर चोपड़ा ने लेखक को चुप और परेशान हाल में देखकर कहा–’एक ही तो होना था, लड़का या लड़की।’ भले ही उनकी आवाज़ धीमी और ढीली थी। मिसेज़ चोपड़ा ने लड़के और लड़की में कोई फर्क न होने की बात कह कर लेखक के तनाव को कुछ कम किया। मिसेज़ सहगल ने कहा हमारी भी तो दो लड़कियाँ हैं। सहगल साहब ने तो कभी सोचा भी नहीं अतः लड़की होने की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। मिस्टर गुप्ता ने सान्त्वना देते हुए कहा भगवान् ने चाहा तो एक छोड़ अनेक लड़के भी हो जाएँगे। मिसेज़ गुप्ता ने कहा कि लड़की होने से घबराने की कोई आवश्यकता नहीं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 24 वीरेन्द्र मेंहदीरता

प्रश्न 3.
कमला के माँ-बाप ने लड़की पैदा होने पर उसे कैसे सांत्वना दी ?
उत्तर:
कमला के पिता ने लेखक को सान्त्वना देते हुए कहा कि बड़े खुश किस्मत हो, जो तुम्हारी पहली सन्तान बेटी है। लड़कियाँ ही माँ-बाप को सुख देने वाली होती हैं । कमला ने जितना सुख हमें दिया है, बस मैं ही जानता हूँ और साथ ही पंजाबी की एक लोकोक्ति भी सुना दी, जिस का अर्थ था कि यदि तू अपना सुख चाहता है तो तेरी पहली सन्तान लड़की हो।

(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 4.
उपेक्षिता कहानी का सार अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया सार।

प्रश्न 5.
‘परिवार में लड़की का पैदा होना ठीक क्यों नहीं समझा जाता’ उपेक्षिता कहानी के आधार पर इस तथ्य की पुष्टि करें।
उत्तर:
हमारे समाज में लड़की के जन्म को अभी भी एक अभिशाप समझा जाता है। इक्कीसवीं सदी शुरू हो गई किन्तु भ्रूण-हत्या आज भी हो रही है। सदियों से चली आ रही रूढ़ियों को हम बदल नहीं सके हैं। लड़के के जन्म पर लड्डू बाँटे जाते हैं, लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है जबकि लड़की को उपेक्षिता समझा जाता है। भले ही आज लड़की और लड़के में कोई भेद नहीं समझा जाता। किरण बेदी जैसी लड़कियाँ उच्च पदों पर पहुँच कर अपनी कार्यक्षमता का परिचय दे रही हैं किन्तु हमारी मानसिकता अभी तक बदली नहीं है। प्रस्तुत कहानी में अस्पताल की नर्स का व्यवहार और वहाँ मौजूद एक बूढी औरत का यह कहना कि ‘तैयारी तो लड़के की थी पर हुई लड़की’ इसी मानसिकता की ओर संकेत करता है। लेखक के पिता का कोई बात नहीं कहना तथा रिश्तेदारों को लड़की के जन्म की सूचना तार द्वारा न भेजकर पोस्टकार्ड द्वारा भेजने को कहना तथा रिश्तेदारों का उत्तर में बधाई न देना भी इसी मानसिकता की ओर संकेत करता है। मित्रों का सान्त्वना देना भी इसी बात का परिचायक है कि हमारे समाज में घर में लड़की का जन्म ठीक नहीं माना जाता।

(ग) सप्रसंग व्याख्या करो:

प्रश्न 6.
“कपड़े लत्ते तो बेचारों ने बहुत अच्छे ही बनाये हैं, तैयारी तो लड़के की थी, पर हुई लड़की।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता द्वारा लिखित कहानी ‘उपेक्षिता’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ अस्पताल में उपस्थित एक बुढ़िया ने नर्स को बच्ची का सामान देते देख कर अपनी साथ वाली औरत से कही हैं।

व्याख्या:
अस्पताल में जब लेखक नर्स को बच्ची का सामान दे रहा था तो वहाँ उपस्थित एक बुढ़िया ने पास वाली औरत से कहा कि बेचारों ने कपड़े-लत्ते तो बहुत अच्छे बनाए थे, जिन्हें देखकर लगता है कि उन्होंने तैयारी तो लड़के की की थी अर्थात् उन्हें लड़का पैदा होने की उम्मीद थी किन्तु हुई लड़की।

प्रश्न 7.
“लड़कियाँ तो पैदा होने के वक्त से ही माँ का खून चूसने लगती हैं। जान बच जाए तो समझो बड़ी बात है।”
उत्तर:
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता द्वारा लिखित कहानी ‘उपेक्षिता में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ लेखक से अस्पताल में मौजूद एक बूढ़ी औरत ने कही हैं जो लड़की के जन्म पर अपने अनुभव बता रही है।

व्याख्या:
अस्पताल में उपस्थित बूढी औरत ने लेखक से लड़की के जन्म लेने पर अपने अनुभव का वर्णन करते हुए कहा कि लड़कियाँ तो पैदा होते ही अपनी माँ का खून चूसने लगती हैं अर्थात् माँ को उसके विवाह दहेज की चिन्ता सताने लगती है। लड़की की और उसकी माँ की जान बच जाए तो इसे ही बड़ी बात समझना चाहिए।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 24 वीरेन्द्र मेंहदीरता

प्रश्न 8.
“ओ तीवी सुलछ्छनी, जेहड़ी जम्मे पहली लछछमी।”
उत्तर:
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्ति श्री वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता द्वारा लिखित कहानी ‘उपेक्षिता’ में से ली गई है। प्रस्तुत पंक्ति लेखक की माँ ने लेखक की पत्नी कमला के सिर हाथ फेरते हुए उसे सान्त्वना देते हुए कही है।

व्याख्या:
लेखक की माँ ने उसकी पत्नी को बेटी के जन्म लेने पर सान्त्वना देते हुए कहा कि वही स्त्री सुलक्षणों वाली होती है जो पहली कन्या अर्थात् लक्ष्मी को जन्म दे।

प्रश्न 9.
“मैं तो कहती हूँ लड़की हो या लड़का, पर हो किस्मत वाला।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति श्री वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता द्वारा लिखित कहानी ‘उपेक्षिता’ में से ली गई है। प्रस्तुत पंक्ति मिसेज़ चोपड़ा ने लेखक और उसकी पत्नी को सान्त्वना देते हुए कही है।

व्याख्या:
लड़की और लड़के में कोई अन्तर न होने की बात को आगे बढ़ाते हुए मिसेज़ चोपड़ा कहती हैं कि लड़की हो या लड़का किन्तु होना चाहिए किस्मत वाला क्योंकि सब अपनी-अपनी किस्मत लेकर आते हैं। परोक्ष में मिसेज़ चोपड़ा लेखक और उसकी पत्नी को दिलासा दिला रही है।

PSEB 12th Class Hindi Guide उपेक्षिता Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
डॉ० वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
सन् 1930 ई० में रावलपिंडी (पाकिस्तान)में।

प्रश्न 2.
डॉ० मेंहदीरत्ता का योगदान किस साहित्यिक विधा के लिए सराहनीय है?
उत्तर:
रंगमंच।

प्रश्न 3.
डॉ० वीरेन्द्र ने चंडीगढ़ में किस संस्था की स्थापना की थी?
उत्तर:
‘अभिनेत’ नाट्य संस्था की।

प्रश्न 4.
माँ ने पहली लड़की को क्या कहा था?
उत्तर:
लक्ष्मी।

प्रश्न 5.
लेखक को पिता के द्वारा कहा गया कौन-सा वाक्य समझ नहीं आया था?
उत्तर:
कोई बात नहीं।

प्रश्न 6.
लड़की के जन्म की सूचना किस तरह देने के लिए कहा गया था?
उत्तर:
तार से नहीं बल्कि पोस्टकार्ड से।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 24 वीरेन्द्र मेंहदीरता

प्रश्न 7.
किसने कहा था कि आजकल लड़के और लड़की में कोई अंतर नहीं होता।
उत्तर:
मिसेज़ चोपड़ा ने।

प्रश्न 8.
चंडीगढ़ से बाहर रहने वालों ने किस तरह से बधाई दी थी?
उत्तर:
चंडीगढ से बाहर वालों ने खत लिखा लेकिन बधाई नहीं दी थी।

प्रश्न 9.
कौन लोगों की सहानुभूति-दिलाने की परवाह नहीं करती थी?
उत्तर:
कमला।

प्रश्न 10.
लड़की होने पर किसने न घबराने की बात कही थी?
उत्तर:
मिसेज गुप्ता ने।

प्रश्न 11.
किसने कहा था कि लड़कियाँ ही माँ-बाप को सुख देने वाली होती हैं ?
उत्तर:
कमला के पिता ने।

प्रश्न 12.
अस्पताल में बूढी औरत ने लड़कियों के जन्म होने पर क्या कहा था?
उत्तर:
लड़कियाँ तो पैदा होने के वक्त से ही माँ का खून पीने लगती हैं।

प्रश्न 13.
किस ने कहा था कि वही स्त्री सुलक्षणों वाली होती है कन्या को जन्म देती है ?
उत्तर:
लेखक की माँ ने।

प्रश्न 14.
लेखक के प्रसिद्ध कहानी संग्रहों के नाम लिखिए।
उत्तर:
शिमले की क्रीम, खरोंच, मिट्टी पर नंगे पांव, सिद्धार्थ से पूछूगा।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 15.
…………………….पर हुई लड़की।
उत्तर:
तैयारी तो लड़के की थी।

प्रश्न 16.
मैं तो कहती हूँ लड़की हो या लड़का……
उत्तर:
पर हो किस्मत वाला।

प्रश्न 17.
ओ तीवीं सुलछ छनी………..
उत्तर:
जेहड़ी, जम्मे पहली लछछमी।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 18.
लेखक के घर लड़के ने जन्म लिया था।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 19.
कमला के पिता ने लड़की का जन्म लेना अच्छा माना था।
उत्तर:
हाँ।

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प्रश्न 20.
लड़की के जन्म की सूचना तार से दी गई।
उत्तर:
नहीं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. उपेक्षिता किस विद्या की रचना है ?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) रेखाचित्र
(घ) संस्मरण
उत्तर:
(क) कहानी

2. लेखक के अनुसार बच्चे किसका रूप होते हैं ?
(क) मां का
(ख) पिता का
(ग) भगवान का
(घ) दादा का
उत्तर:
(ग) भगवान का

3. उपेक्षित कहानी का केन्द्र बिन्दु कौन है ?
(क) लड़की
(ख) लड़का
(ग) सैनिक
(घ) किसान
उत्तर:
(क) लड़की

4. ‘वीरेन्द्र मेहंदीरत्ता’ किस विद्या के प्रमुख लेखक हैं ?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) रंगमंच
(घ) रेखाचित्र
उत्तर:
(ग) रंगमंच

उपेक्षिता Summary

उपेक्षिता जीवन परिचय

डॉ० वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता का जीवन परिचय लिखिए।

डॉ० वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता का जन्म सन् 1930 में रावलपिण्डी (पाकिस्तान)में हुआ। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम० ए० किया। पंजाब विश्वविद्यालय से पीएच० डी० की डिग्री प्राप्त की। आपने लगभग 40 वर्ष तक राजकीय कॉलेज लुधियाना और पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग में पढ़ाया। आप पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से प्रोफेसर के पद से रिटायर हुए। कहानी के क्षेत्र के अतिरिक्त नाटक और रंगमंच में भी आप का योगदान सराहनीय है। चण्डीगढ़ में ‘अभिनेत’ नाट्य संस्था के आप संस्थापक हैं। शिमले की क्रीम, पुरानी मिट्टी नए ढाँचे, मिट्टी पर नंगे पाँव, खरोंच, सिद्धार्थ से पूछूगा-आपके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।

उपेक्षिता कहानी का सार

‘उपेक्षिता’ कहानी का सार 150 शब्दों में लिखें।

लेखक के घर एक लड़की ने जन्म लिया है। उसकी सुन्दरता को देख लेखक सोचता है कि बच्चे सचमुच भगवान् का रूप होते हैं किन्तु समाज में लड़की को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। अस्पताल की नर्स ने भी लड़की के जन्म की खबर सुनाना भी उचित नहीं समझा था। वहाँ उपस्थित एक बुढ़िया ने भी कहा-तैयारी तो लड़के की थी, पर हुई लड़की। समाज में लड़की को जन्म देना कष्टदायक माना जाता है जबकि लड़के को जन्म देने पर माँ अपनी तकलीफ़ भूल जाती है। लेखक सोचता है कि क्या उसकी पत्नी कमला भी ऐसे ही सोचती होगी? वह तो अपने माँ-बाप की सबसे बड़ी बेटी है। कमला के पिता ने भी लड़की के जन्म को अच्छा माना था। माँ ने भी पहली लड़की को लक्ष्मी कहा था। पर पिता ने कहा था कोई बात नहीं, घर में लक्ष्मी आई है। लेखक को ‘कोई बात नहीं’ का अर्थ समझ में नहीं आया। लगा कि वे लेखक को तसल्ली दे रहे हों और अपने मन को समझा रहे हों। इसी कारण लड़की के जन्म की सूचना तार द्वारा न भेजकर पोस्टकार्ड द्वारा भेजने को कहा था।

चण्डीगढ़ में जैसे-जैसे लोगों को पता चला-वे मिलने आने लगे। मिसेज़ चोपड़ा ने जब कहा कि आजकल लड़के और लड़की में कोई अन्तर नहीं होता तब लेखक का तनाव कुछ कम हुआ। लेखक के एक मित्र ने कहा कि लड़की के जन्म पर उसे चिन्तित नहीं होना चाहिए। चण्डीगढ़ से बाहर के रिश्तेदारों ने खत ज़रूर लिखा पर बधाई नहीं दी। उन्होंने अनेक प्रकार की बातें लिखीं पर लेखक की पत्नी ने बेटी को छाती से लगाते हुए कहा- मेरे लिए यह बेटी बेटों से भी बढ़कर है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 23 ठेस

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 23 ठेस Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 23 ठेस

Hindi Guide for Class 12 PSEB ठेस Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
‘ठेस’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर अपने विचार प्रकट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी का शीर्षक संक्षिप्त, सटीक और सार्थक है। सिरचन एक ग्रामीण कलाकार है, भले ही लोग उसे मुफ्तखोर, कामचोर या चटारे कहते हैं, किंतु वह अपनी कला में माहिर है। सिरचन एक स्वाभिमानी व्यक्ति है। चाची की जली-कटी सुनकर उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है। वह नई धोती का मोह त्याग कर अधूरा काम छोड़ कर लौट आता है। वह कलाकार का, कला का अपमान नहीं सहन कर सकता। लेखक भी मानता है कि कलाकार के दिल में ठेस लगी है।

प्रश्न 2.
ठेस कहानी के आधार पर सिरचन का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर:
सिरचन एक ग्रामीण कलाकार है। चिक, शीतलपाटी, कुशासन आदि बनाने में माहिर। उसकी कला के कारण ही बड़े-बड़े लोग उसकी खुशामद करते हैं। सिरचन को गाँव वाले मुफ्तखोर, कामचोर और चटोर समझते हैं, किंतु वह कामचोर नहीं मुँहजोर अवश्य है। वह ठीक से सेवा न होने पर उच्चजाति वालों को भी बेइज्जत करने से नहीं झिझकता। सिरचन बड़ा स्वाभिमानी है, लेखक की चाची से सुगन्धित जर्दा माँगने पर जली-कटी सुनकर उसके हृदय को ठेस लगती है और वह काम छोड़कर चला जाता है। किन्तु अपनी कोमल हृदयता और आत्मीयता का परिचय देते हुए मानू को स्टेशन पर शीतपाटियाँ, चिकें और कुशासन देने पहुँच जाता है बदले में वह किसी प्रकार का प्रतिदान भी स्वीकार नहीं करता।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 23 फणीश्वरनाथ 'रेणु'

प्रश्न 3.
सिरचन किस बात से नाराज़ होकर काम छोड़कर चला जाता है ?
उत्तर:
एक दिन सिरचन लेखक की बहन के लिए शीतलपाटी और चिक बना रहा था कि एक दिन मानू ने उसे पान का बीड़ा दिया। पान खाते समय सिरचन ने चाची से गमकौआ जर्दा माँग लिया। इस पर चाची भड़क उठी। उसने सिरचन को भला-बुरा कहा। यह सुनकर सिरचन के हृदय को ठेस लगी। वह अधूरा काम छोड़ अपनी छुरी, हँसिया उठाकर वहाँ से चला गया।

प्रश्न 4.
लेखक द्वारा मनाने पर भी न आने वाला सिरचन स्वयं ही मानू के लिए स्टेशन पर शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी कुश को क्यों पहुँचाता है ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
कामचोर, चटोरा तथा मुँहजोर कहलाने वाला सिरचन एक कलाकार था; कोमल हृदय वाला कलाकार। अपनी कला का अपमान होते देख उसके हृदय को ठेस लगती है पर मानू के प्रति उसके हृदय में आत्मीयता का भाव भी है। वह काकी की सबसे छोटी बेटी थी और उसका दूल्हा अफसर। फिर मानू ने तो उसे ठेस नहीं पहुँचाई थी बल्कि उसने तो उसे पान का बीड़ा लाकर दिया था। इसलिए मानू से स्नेह होने के कारण वह उसके लिए शीतलपाटी आदि लेकर स्टेशन पहुँचा था। बदले में वह किसी प्रतिदान को भी स्वीकार नहीं करता।

(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 5.
‘ठेस’ कहानी का सार अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया सार।

प्रश्न 6.
‘ठेस’ कहानी कलाकार की संवेदनशीलता की कहानी है, स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी में एक सच्चे कलाकार की कोमल भावनाओं और कारुणिक जीवन गाथा का मार्मिक चित्रण किया गया है। सिरचन एक कलाकार है। वह शीतलपाटी, चिक और कुशासन बनाने में माहिर है। बड़े-बड़े लोग उसकी खुशामद करते हैं, किन्तु वह चटोर है। एक बार तो उसने ब्राह्मण चौधरी के लड़के को कम परोसने पर बेइज्जत कर दिया था। सिरचन एक सच्चा कलाकार है। अपने काम के दौरान किसी की टोका-टाकी सहन नहीं कर सकता। सिरचन को लोग चटोर भी समझते थे। उसको बुलाने से पहले तली बघारी हुई तरकारी, दही की कढ़ी, मलाई वाले दूध का प्रबन्ध पहले से ही करना पड़ता था।

लेखक की सबसे छोटी बहन मानू पहली बार ससुराल जा रही थी। उसके दूल्हे ने चिक और शीतलपाटी भेजने की फरमाईश की थी। सिरचन के खाने-पीने का प्रबन्ध करके उसे काम पर बुलाया गया। सिरचन ने काम शुरू किया। लगता है कि बहुत बढ़िया वस्तुएँ बन रही हैं। इसी बीच मानू ने उसे पान दिया तो उसने चाची से सुगन्धित जर्दा माँग लिया जिस पर चाची ने उसे जली-कटी सुनाई। चाची की बातों से कलाकार सिरचन के हृदय को ठेस लगी। वह काम छोड़ कर चला गया। किन्तु मानू के ससुराल जाते समय शीतलपाटी, चिक और कुशासन सौंप कर अपनी संवदेनशीलता का परिचय दिया। उसने मोहर वाली धोती के दाम भी लेने से इनकार कर दिया।

(ग) सप्रसंग व्याख्या करें:

7. “बड़ी बात ही है बिटिया, बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो-दो पटेर की पाटियों का काम सिर्फ खंसारी का सत्तू खिलाकर कोई करवाए भला ? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है।”
उत्तर:
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ सिरचन ने महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी को कही हैं जो सिरचन की किसी कड़ी बात पर तिलमिला कर कहती है कि इतनी बड़ी बात।

व्याख्या:
सिरचन ने भज्जू की बेटी से कहा कि बड़ी बात ही है बेटी। बड़े आदमियों की बस बातें ही बडी होती हैं अर्थात् उनके कर्म और व्यवहार में बड़प्पन नहीं होता। यदि व्यवहार में बड़प्पन होता तो क्या दो-दो पटेर की पाटियाँ कोई सिर्फ खसारी का सत्तू खिला कर बनवा सकता है। यह काम तो तुम्हारी माँ ही करवा सकती है। सिरचन का स्पष्ट संकेत है कि उसे थोड़ा-सा खिला कर अधिक काम लिया जाता है।

विशेष:

  1. कामगार के शोषण पर कटाक्ष है।
  2. भाषा बोलचाल की तथा भावपूर्ण है।

8. “बबुआ जी! अब नहीं। कान पकड़ता हूँ, अब नहीं। मोहर छाप वाली धोती लेकर क्या करूँगा ? कौन पहनेगा ? ससुरी खुद मरी, बेटे-बेटियों को भी ले गई अपने साथ। बबुआ जी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता। यह शीतलपाटी को छूकर कहता हूँ, अब यह काम नहीं करूँगा।”

उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ सिरचन ने लेखक से कही हैं, जब वह काम बीच में ही छोड़ आने पर उसे मनाने के लिए गया था। – व्याख्या-सिरचन ने लेखक से कहा कि मैं कान पकड़ता हूँ कि अब चिक आदि बनाने का काम नहीं करूँगा। आपकी माँ ने मुझे जो मोहर छाप वाली नई धोती देने का वादा किया था, उसे लेकर मैं क्या करूँगा। कौन पहनेगा उसे। मेरी पत्नी स्वयं तो मरी ही साथ में बेटे-बेटियों को भी ले गई। बबुआ जी, मेरी पत्नी यदि जीवित होती तो मैं ऐसी दुर्दशा को क्यों भोगता अर्थात् घर-घर काम करने क्यों जाता। यह शीतलपाटी उसी की बनी हुई है इसी को छू कर कहता हूँ कि अब मैं यह काम नहीं करूँगा।

विशेष:

  1. लेखक की चाची के कथन से लगी ठेस के कारण सिरचन भविष्य में चिक आदि न बनाने का निर्णय लिया
  2. भाषा सहज तथा भावपूर्ण है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 23 फणीश्वरनाथ 'रेणु'

9. खिड़की के पास खड़े होकर सिरचन ने हकलाते हुए कहा-यह मेरी ओर से है। सब चीज़ है दीदी। शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी कुश की। गाड़ी चल पड़ी।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ कहानी के अंत में सिरचन द्वारा लेखक की छोटी बहन मानू को अपनी तरफ से चिक आदि भेंट करने के समय की हैं।

व्याख्या-सिरचन मन को ठेस लगने पर लेखक के घर से काम छोड़ कर चला आता है, किंतु हृदय की कोमलता और आत्मीयता के कारण मानू के ससुराल जाते समय उसके लिए चिक आदि तैयार कर उसे भेंट करने पहुँच जाता है। गाड़ी की खिड़की के पास खड़े होकर सिरचन ने रुक-रुक कर बोलते हुए कहा यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए भेंट है। इस बंडल में वह सब चीज़ है जो तुम्हारे दूल्हा ने मंगवाई थीं। शीतलपाटी, चिक और जोड़ी कुशासन की। सिरचन के इतना कहते ही गाड़ी चल पड़ी।

विशेष:

  1. सिरचन के मन में मानू के प्रति स्नेह है इसलिए वह उसे विदाई के अवसर पर चिक आदि देने स्टेशन पर पहुंच जाता है।
  2. भाषा भावपूर्ण तथा सहज है।

प्रश्न 10.
‘ठेस’ कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
उत्तर:
‘ठेस’ कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चे कलाकार का दिल नहीं दुखाना चाहिए। जब उस के दिल को ठेस लगती है तो वह बढ़िया से बढ़िया खाने, अच्छे पैसों आदि की भी चिंता न करते हुए काम करने से इनकार कर देता है, जैसा कि सिरचन ने चाची के ताने सुनकर किया था। कलाकार का हृदय बहुत कोमल होता है इसलिए वह मानू को विदाई के अवसर पर स्टेशन पर ही भेंट स्वरूप चिक आदि दे देता है।

PSEB 12th Class Hindi Guide ठेस Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘ठेस’ शीर्षक कहानी किसके द्वारा रचित है?
उत्तर:
फणीश्वर नाथं ‘रेणु’।

प्रश्न 2.
फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ का जन्म कहाँ और कब हुआ था?
उत्तर:
बिहार के पूर्णिया जिले में 11 फरवरी, सन् 1921 को।

प्रश्न 3.
रेणु जी की शिक्षा कहाँ-कहाँ हुई थी?
उत्तर:
रेणु जी की शिक्षा विराट नगर नेपाल तथा हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में हुई थी।

प्रश्न 4.
सिरचन कहां का कारीगर था?
उत्तर:
सिरचन गाँव का एक कारीगर था।

प्रश्न 5.
गाँव वाले सिरचन को किस नाम से पुकारते थे?
उत्तर:
गाँव वाले सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर और चटोर कहकर पुकारते थे।

प्रश्न 6.
सिरचन के काम करते समय टोक देने पर वह क्या करता था?
उत्तर:
सिरचन गुस्से में फुफकार उठता था और काम छोड़कर चल देता था।

प्रश्न 7.
ठेस कहानी में लेखक की छोटी बहन का क्या नाम है ?
उत्तर:
मानू।

प्रश्न 8.
दूल्हे ने क्या लेने की फरमाइश की थी?
उत्तर:
दूल्हे ने तीन जोड़ी चिक-चिक और पटेर की दो शीतल पाटियों की फरमाइश की थी।

प्रश्न 9.
सिरचन को क्या देने का वायदा किया गया था?
उत्तर:
असली मोहर छाप वाली नई धोती देने का वायदा किया गया था।

प्रश्न 10.
मानू ने चुपके से सिरचन को क्या दिया था?
उत्तर:
पान का बीड़ा।

प्रश्न 11.
किस की बात से सिरचन के मन को ठेस लगी थी?
उत्तर:
चाची की बात से सिरचन के मन को ठेस लगी थी।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 23 फणीश्वरनाथ 'रेणु'

प्रश्न 12.
सिरचन सारा सामान देने के लिए कहाँ पहुँच गया था?
उत्तर:
रेलवे स्टेशन पर।

प्रश्न 13.
मानू फूट-फूट कर क्यों रोने लगी थी?
उत्तर:
अपनत्व के भाव के कारण।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 14.
बबुआ जी। अब नहीं…..
उत्तर:
कान पकड़ता हूँ, अब नहीं।

प्रश्न 15.
यह शिलापाटी को छू कर कहता हूँ..
उत्तर:
अब यह काम नहीं करूंगा।

प्रश्न 16.
सब चीज़ है……..।
उत्तर:
दीदी।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 17.
कलाकार का दिल वास्तव में ही बहुत कोमल होता है।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 18.
सब चीज़ है भैया।
उत्तर:
नहीं।

बोर्ड परीक्षा में पूछे गए प्रश्न

प्रश्न 1.
‘ठेस’ कहानी के लेखक का नाम लिखें।
उत्तर:
फणीश्वर नाथ रेणु।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. फनीश्वर नाथ रेणु कैसे उपन्यासकार थे ?
(क) आंचलिक
(ख) व्यंग्यात्मक
(ग) संस्मरणात्मक
(घ) रचनात्मक
उत्तर:
(क) आंचलिक

2. रेणु का पहला आंचलिक उपन्यास कौन-सा है ?
(क) आँचल
(ख) मैला आँचल
(ग) तीसरी कसम
(घ) ठेस।
उत्तर:
(ख) मैला आँचल

3. मानू किस कारण फूट-फूट कर रोने लगी ?
(क) अपनत्व के
(ख) मानवता के
(ग) सेवा के
(घ) सुरक्षा के
उत्तर:
(क) अपनत्व के

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 23 फणीश्वरनाथ 'रेणु'

4. सिरचन क्या था ?
(क) सैनिक
(ख) कारीगर
(ग) सेवक
(घ) विद्यार्थी
उत्तर:
(ख) कारीगर

कठिन शब्दों के अर्थ

मुफ्तखोर = मुफ्त की खाने वाला। चटोर = लालची, स्वाद का लालची। मडैया = झोंपड़ी। खुशामद = चापलूसी। इलाका = क्षेत्र। बेपानी = बेइज्जत, अपमानित । नाखून से खाँट कर देना = बहुत-थोड़ा देना, कंजूसी से देना। हुलस कर = प्रसन्न होकर। नेनू = मक्खन। मोथी = एक प्रकार की घास। शीतलपाटी = खस की चिक। पनियाई = पानी भरी। हिन्दी पुस्तक-12 . पटेर = तालाबों में उगने वाला एक पौधा–काई। पाटी = चटाई। तन्मयता = तल्लीनता। मुँहज़ोर = बोलने में कड़वा। झाल = तीखापन। बरदाश्त करना = सहन करना। चिकनाई = चिकनापन। अधकपाली दर्द = आधे सिर का दर्द। ताल = ताड़एक वृक्ष। मूंज = एक प्रकार की घास। बेकाम = व्यर्थ का। खंसारी का सत्तू = भुने हुए जौ का आटा। तिलमिला उठना = क्रोध से बेचैन हो उठना। बबुनी = बिटिया। बैरिंग = बिना टिकट लगा। तैनात करना = नियुक्त करना। झब्बे = गुच्छे, फँदने। बिनाई = बुनती। सुधि = होश। सूप = छाज। बुंदिया = लड्डू की बूंदी। नैहर = मायका। बतकुट्ठी = बातें करना, बतियाना। गमकौआ = सुंगन्धित । जर्दा = तम्बाकू। मसखरी = मज़ाक । यत्परोनास्ति = इससे कोई बढ़कर नहीं है। हनहनाता हुआ = बड़बड़ाता हुआ। मुँह झौंसे = मुँह जले। आसनी कुश = कुशा (घास) का बना आसन।

ठेस Summary

ठेस जीवन परिचय

फणीश्वरनाथ रेणु जी का जीवन परिचय लिखिए।

फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ जी का जन्म 11 फरवरी, सन् 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के हिगना गाँव में हुआ। आप की शिक्षा विराट नगर, नेपाल तथा हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में हुई। सन् 1942 के भारत छोड़ो जन आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने पर 3 वर्ष तक आप नजर बंद रहे। जेल से छूटने के पश्चात् आप का सम्बन्ध जयप्रकाश नारायण की समाजवादी पार्टी से हो गया। स्वतन्त्रता के बाद देश में आपात्काल स्थिति लागू किए जाने पर आप कुछ देर के लिए जेल में बंद रहे। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के जन आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। आपके पहले आँचलिक उपन्यास ‘मैला आँचल’ ने हिन्दी जगत में धूम मचा दी थी। रस प्रिया’ तीसरी कसम, ‘ठेस’ पंचलाइट इनकी प्रमुख कहानियां हैं।

ठेस कहानी का सार

ठेस कहानी का सार 150 शब्दों में दें।

सिरचन गाँव का एक कारीगर था। वह मोथी घास और पटेर की शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की चिकें, मूंज की रस्सी आदि बनाने में माहिर था। सिरचन की इसी कला के कारण बड़े-बड़े लोग उसकी खुशामद करते थे। उनकी सवारियाँ. उसकी झोंपड़ी के आगे बँधी रहतीं। किंतु गाँव वाले उसे मुफ्तखोर कामचोर और चटोर कहते थे। उसे बुलाने के लिए उसके खान-पान का विशेष प्रबन्ध करना ज़रूरी होता था। खाने के लिए कम मिलने पर वह दूसरों का अपमान करने से भी नहीं चूकता था । काम करते हुए यदि कोई उसे टोक देता तो वह फुफकार उठता और काम छोड़ कर चला जाता था। सिरचन मुँह ज़ोर है, कामचोर नहीं।

लेखक की सबसे छोटी बहन मानू की विदाई होने वाली थी। उसके दूल्हे ने तीन जोड़ी चिक और पटेर की दो शीतल पाटियाँ भेजने की फरमाइश की थी। इसलिए लेखक की माँ ने असली मोहर छाप वाली नई धोती देने का वादा करते हुए सिरचन को काम पर लगा दिया। सिरचन मन लगा कर काम करने लगा। काम करते समय सिरचन की जीभ जरा बाहर निकल आती थी। उसे अच्छा कलेवा दिया जाता था। मिठाई दी जाती थी। एक दिन मानू ने चुपके से एक पान का बीड़ा दिया। सिरचन ने पान खाते समय लेखक की चाची से जरा सुगन्धित जर्दा देने को कहा। इस पर चाची ने उसे भला-बुरा कहा, और डाँटा। चाची की बातें सुनकर सिरचन के मन को ठेस लगी। वह अधूरा काम छोड़ कर वहाँ से उठ कर चला गया था। लेखक के मनाने के लिए जाने पर भी वह नहीं आया। कलाकार के हृदय को ठेस लग गई थी।

लेखक जब अपनी छोटी बहन को ससुराल छोड़ने जा रहा था तो स्टेशन पर गाड़ी चलने के समय सिरचन दौड़ता हुआ आया और मानू के लिए शीतलपाटी चिक और कुशासन सौंप कर चला गया। उसने मोहर छाप वाली धोती के दाम भी लेने से इनकार कर दिया। मानू उसके इस अपनत्व भरे व्यवहार को देखकर फूट-फूट कर रोने लगी थी।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 22 तत्सत्

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 22 तत्सत् Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 22 तत्सत्

Hindi Guide for Class 12 PSEB तत्सत् Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
पशु और पेड़-पौधे वन के नाम से भयातुर क्यों होने लगे थे ?
उत्तर:
जंगल में आने वाले शिकारियों ने कहा था कैसा भयानक जंगल है और कितना घना वन है। उनकी बातों में जंगल की भयानकता की बात सुनकर वन के सभी पशु और पेड़-पौधे डर गए। उन्हें लगा कि अवश्य ही वन कोई शेर-चीतों से बढ़कर भयानक होगा।

प्रश्न 2.
शिकारी प्रमुख द्वारा अपने साथियों की सलाह न मानने का क्या कारण था ?
उत्तर:
जंगल के पेड़-पौधों और वनचरों ने आदमियों से जब जंगल दिखाने के लिए कहा नहीं तो उनकी खैर नहीं। इस पर शिकारी के साथियों ने कहा कि यार कह दो जंगल नहीं है। इस पर शिकारी प्रमुख ने मरने से न डरते हुए कहासदा कौन जिया है ? इससे इन भोले प्राणियों को भुलावे में क्यों रखें ? इसी कारण शिकारी प्रमुख ने अपने साथियों की सलाह मानने से इन्कार कर दिया।

प्रश्न 3.
शिकारी जब पुन: वन में आए तो पश और वनस्पतियाँ भड़क उंठीं. क्यों ?
उत्तर:
शिकारी जन जब दोबारा जंगल में आए तो सारा जंगल जाग उठा। वे सब तरह-तरह की बोली बोलकर अपना विरोध दर्शाने लगे। मानो आदमियों की भर्त्सना कर रहे थे। वे सभी इसलिए भड़क उठे क्योंकि आज तक उन्होंने जंगल नाम की कोई वस्तु नहीं देखी थी। आदमियों ने उसे भयानक भी कहा था। इसलिए वे भयानक वस्तु के बारे में जानना चाहते थे।

(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर लिखें:

प्रश्न 4.
तत्सत् कहानी का सार अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
देखें पाठ के आरम्भ में दिया गया कहानी का सार।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 22 जैनेन्द्र कुमार

प्रश्न 5.
‘तत्सत्’ कहानी का उद्देश्य स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘प्रस्तुत’ कहानी में जैनेन्द्र जी ने पशुओं और वनस्पतियों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि आज का व्यक्ति इतना व्यक्तिवादी हो गया है कि उसे अपने सिवा और कुछ सूझता ही नहीं। वह यह नहीं समझता कि उसका अस्तित्व समग्र में एक खण्ड के समान उसी प्रकार है जैसे किसी बाग में किसी फूल का। लेखक ने अपने इस उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए पशुओं और पेड़-पौधों का सहारा लिया है जिन्हें अपने-अपने अलग अस्तित्व का तो बोध है किन्तु अपने समग्र रूप जंगल से वे अनजान हैं। अपनी इसी अज्ञानता के कारण वे सभी अपनी-अपनी ढफली अपना-अपना राग अलापते रहते हैं। अन्त में जब उन्हें समग्रता का बोध होता है तो वे वन की सत्ता को स्वीकार कर लेते हैं।

प्रश्न 6.
‘तत्सत्’ कहानी के नामकरण की सार्थकता पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
तत्सत्’ कहानी एक प्रतीकात्मक कहानी है। इसमें लेखक ने कथा निर्माण के लिए वनचरों एवं वनस्पतियों की संवेदना को आधार बना कर किया है। जैनेन्द्र जी ने प्रायः सोद्देश्य शीर्षकों का चयन अधिक किया है। चाहे शीर्षक ‘तत्सत्’ कहानी के शीर्षक की तरह प्रतीकात्मक हों किन्तु यह शीर्षक सार्थक, आकर्षक एवं जिज्ञासा एवं कुतूहल भरा है। लेखक ने इस कहानी के कथानक द्वारा यह सिद्ध किया है कि यह जगत् सत्य नहीं है, अपितु वह ब्रह्म ही सत्य है तथा वही सर्वत्र व्याप्त है। अतः हम कह सकते हैं कि कहानी का शीर्षक अत्यन्त सार्थक बन पड़ा है। शीर्षक सारगर्भित भी है, रोचक और संक्षिप्त एवं आकर्षक भी है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस शीर्षक में एकजुटता का संदेश भी छिपा है जो हमारी वर्तमान राजनीतिक अवस्था के लिए अत्यन्त ज़रूरी है। देश है तो हम हैं अतः देशहित के लिए हमें निजी स्वार्थों को भूलकर एक हो जाना चाहिए।

(ग) सप्रसंग व्याख्या करें :

7. “जब छोटा था, तब इन्हें देखा था। इन्हें आदमी कहते हैं। इनमें पत्ते नहीं होते, तना ही तना है। देखा वे चलते कैसे हैं ? अपने तने की दो शाखाओं पर भी चलते चले जाते हैं।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित प्रतीकात्मक कहानी ‘तत्सत्’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ बड़ के वृक्ष ने शीशम के वृक्ष से उस समय कही हैं जब शीशम पूछता है कि जंगल को भयानक कहने वाले कौन थे ?

व्याख्या:
जब शीशम के पेड़ ने जंगल के सबसे बड़े पेड़ बड़ से उन शिकारियों के बारे में पूछना चाहा कि वे कौन थे, जिन्होंने जंगल को भयानक कहा था, तो बड़ ने उत्तर देते हुए कहा कि जब मैं छोटा था, तब इन्हें देखा था। इन्हें आदमी कहते हैं। ये ऐसे पेड़ होते हैं जिनमें पत्ते नहीं होते, तना ही तना होता है। तुमने देखा नहीं कि ये लोग कैसे चलते हैं ? अपने तने की दो टहनियों पर ही चलते चले जाते हैं। विशेष-एक पेड़ की आदमी के बारे में जानकारी पर प्रकाश डाला गया है।

8. “मालूम होता है, हवा मेरे भीतर के रिक्त में वन-वन-वन ही कहती हुई घूमती रहती है। पर ठहरती नहीं। हर घड़ी सुनता हूँ, वन है, वन है पर मैं उसे जानता नहीं हूं। क्या वह किसी को दिखा है ?”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित प्रतीकात्मक कहानी ‘तत्सत्’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ बाँस के पेड़ ने जंगल के दूसरे पेड़ों से कहीं हैं।

व्याख्या:
जब सब पेड़ों ने बाँस के पेड़ से पूछा कि वह उन्हें वन के बारे में बताए कि वह क्या है तो बाँस के पेड़ ने कहा कि ऐसा मालूम होता है कि हवा मेरे अन्दर के खाली स्थान में वन-वन-वन कहती घूमती रहती है, पर ठहरती नहीं। मैं हर घड़ी यह तो सुनता हूँ किं वन है, पर मैं उसे जाना नहीं हूँ। क्या वह किसी को दिखाई दिया है ? विशेष-वन के बारे में बांस के पेड़ की प्रतिक्रिया पर प्रकाश डाला गया है।

9. “ओ सिंह भाई, तुम बड़े पराक्रमी हो। जाने कहां कहां छापा मारते हो। एक बात तो बताओ, भाई ?”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित प्रतीकात्मक कहानी ‘तत्सत्’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में जंगल के सबसे बड़े पेड़ बड़ ने जंगल के सबसे शक्तिशाली पशु सिंह से वन के बारे में बताने के लिए कही

व्याख्या:
बड़ को जब जंगल के किसी पेड़ ने वन के बारे कुछ बताने से इन्कार कर दिया तो उसने वहाँ आए सिंह से यही प्रश्न पूछने के लिए प्रस्तुत पंक्तियाँ कहीं है। बड़ ने कहा-अरे सिंह भाई, तुम बड़े बहादुर हो। जाने कहाँ-कहाँ शिकार हासिल करने के लिए छापे मारते हो। एक बात तो बताओ भाई ? बड़ सिंह से वन के बारे में पूछना चाहता है कि क्या उसने कभी वन को देखा है ? विशेष-सिंह से वन के संबंध में बड़दादा पूछ रहे हैं।

PSEB 12th Class Hindi Guide तत्सत् Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जैनेन्द्र कुमार का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
जैनेन्द्र कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के कौडियागंज गाँव में सन् 1905 ई० में हुआ था।

प्रश्न 2.
जैनेन्द्र ने किन-किन विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त की थी?
उत्तर:
पंजाब विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से।

प्रश्न 3.
जैनेन्द्र की शिक्षा अधूरी क्यों रह गई थी?
उत्तर:
देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ने के कारण।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 22 जैनेन्द्र कुमार

प्रश्न 4.
जैनेन्द्र को किस विश्वविद्यालय ने डी० लिट० की उपाधि प्रदान की थी?
उत्तर:
दिल्ली विश्वविद्यालय ने।

प्रश्न 5.
जैनेन्द्र के कहानी संग्रहों के नाम लिखिए।
उत्तर:
ध्रुव यात्रा, नीलम देश की राजकन्या, फांसी।

प्रश्न 6.
जैनेन्द्र के चार उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर:
परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी।

प्रश्न 7.
‘तत्सत’ किस शैली में रचित कहानी है?
उत्तर:
प्रतीक शैली।

प्रश्न 8.
जैनेंद्र कैसे दार्शनिक और विचारक थे?
उत्तर:
बुद्धिवादी, दार्शनिक और विचारक।

प्रश्न 9.
कितने शिकारी शिकार की टोह में पहुँचे थे?
उत्तर:
दो शिकारी।

प्रश्न 10.
किस पेड़ ने दूसरे पेड़ को ‘दादा’ कहा था?
उत्तर:
शीशम के पेड़ ने बरगद के पेड़ को ‘दादा’ कहा था।

प्रश्न 11.
बबूल ने बड़दादा से क्या प्रश्न किया था?
उत्तर:
बबूल ने बड़दादा से प्रश्न किया था कि क्या उन्होंने कभी वन देखा था।

प्रश्न 12.
जंगल के प्राणियों ने मनुष्य के बारे में क्या निर्णय किया था?
उत्तर:
उन्होंने निर्णय किया था कि मनुष्य की बात का कोई भरोसा नहीं।

प्रश्न 13.
बड़दादा ने प्राणियों को ‘वन’ के बारे में क्या समझाया था ?
उत्तर:
बडदादा में प्राणियों को समझाते हुए कहा था कि ‘यह वन ही है हम नहीं’ हम सब ही वन हैं।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 14.
अपने तन की दो शाखों पर ही……..
उत्तर:
चलते चले जाते हैं।

प्रश्न 15.
आस-पास के और पेड़ साल, सेंमर, सिरस…………
उत्तर:
उस बातचीत में हिस्सा लेने लगे।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 22 जैनेन्द्र कुमार

प्रश्न 16.
तब सबने घास से पूछा…………
उत्तर:
घास री घास, तू वन को जानती है।

प्रश्न 17.
चढ़ते-चढ़ते वह उसकी…….
उत्तर:
सबसे ऊपर की फुनगी तक पहुँच गया।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 18.
तत्सत् प्रतीक शैली में रचित है।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 19.
जंगल में आदमी को देखने की बात बड़ ने स्वीकार की थी?
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 20.
“दादा ओ दादा, तुमने बहुत दिन देखे हैं। बताओ कि किसी वन को भी देखा है?”-घास ने कहा।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 21.
बरगद ने सीटी-सी आवाज़ देखकर कहा, “मुझे बताओ, मुझे बताओ।”
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 22.
“मैं पोला हूँ। मैं बहुत जानता हूँ।”-बबूल ने कहा।
उत्तर:
नहीं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. जैनेन्द्र कुमार कैसे कहानीकार हैं ?
(क) मनोवैज्ञानिक
(ख) विचारपरक
(ग) आत्मकथात्मक
(घ) विवेचनात्मक
उत्तर:
(क) मनोवैज्ञानिक

2. तत्सत् किस प्रकार की कहानी है ?
(क) आत्मकथात्मक
(ख) प्रतीकात्मक
(ग) विवेचनात्मक
(घ) व्यंग्यात्मक
उत्तर:
(ख) प्रतीकात्मक

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 22 जैनेन्द्र कुमार

3. शीशम के पेड़ ने किसको दादा कहा ?
(क) बरगद
(ख) पीपल
(ग) वट
(घ) नीम
उत्तर:
(क) बरगद

4. लेखक के अनुसार आज व्यक्ति कैसा बन गया है ?
(क) संस्कारी
(ख) व्यक्तिवादी
(ग) भाववादी
(घ) निराशावादी
उत्तर:
(ख) व्यक्तिवादी

जैनेन्द्र कुमार सप्रसंग व्याख्या

1. “जब छोटा था, तब इन्हें देखा था। इन्हें आदमी कहते हैं। इनमें पत्ते नहीं होते, तना ही तना है। देखा वे चलते कैसे हैं ? अपने तने की दो शाखों पर ही चलते चले जाते हैं।”

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं जिसमें लेखक ने पशुओं और वनस्पतियों के माध्यम से मानव के व्यक्तिवादी होने पर व्यंग्य करते हुए यह स्पष्ट किया है कि उसका अस्तित्व समग्र में एक खंड जैसा है।

व्याख्या:
इन पंक्तियों में उस समय का वर्णन है जब शीशम जंगल के सब से बड़े वृक्ष बड़ से यह पूछता है कि जंगल को भयानक कहने वाले कौन थे ? तब बड़ उत्तर देते हुए कहता है कि जब वह छोटा था तब उसने इन्हें देखा था। इन्हें आदमी कहते हैं। ये ऐसे पेड़ हैं जिनके पत्ते नहीं होते, केवल तना ही तना होता है। वह शीशम से कहता है कि उसने देखा नहीं कि वे कैसे चलते हैं ? वे अपने तने की दो टहनियों के सहारे ही चलते चले जाते हैं। विशेष-लेखक ने मनुष्य के संबंध में वनस्पतियों की भावनाओं का चित्रण किया है।

2. बड़दादा ने कहा, “हमारी-तुम्हारी तरह इनमें जड़ें नहीं होती। बढ़े तो काहे पर ? इससे वे इधर-उधर चलते रहते हैं, ऊपर की ओर बढ़ना उन्हें नहीं आता। बिना जड़, न जाने वे जीते किस तरह हैं !” इतने में बबूल, जिसमें हवा साफ़ छनकर निकल जाती थी, रुकती नहीं थी और जिसके तन पर काँटे थे, बोला, “दादा, ओ दादा, तुमने बहुत दिन देखे हैं। बताओ कि किसी वन को भी देखा है ? ये आदमी किसी भयानक वन की बात कर रहे थे। तुमने उस भयावने वन को देखा है ?”

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने वन्य पशुओं और वनस्पतियों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आज का मनुष्य अपने व्यक्तिगत स्वार्थों में इतना अधिक लिप्त हो गया है कि वह यह भी भूल गया है कि वह उस विराट का ही एक अंश है।

व्याख्या:
इन पंक्तियों में उस समय का वर्णन है जब दो शिकारी वन की सघनता और भयानकता का वर्णन करके चले जाते हैं तो वन के वृक्ष आपस में बातें करते हैं। शीशम बड़ से पूछता है कि मनुष्य इतने छोटे कद के क्यों होते हैं ? तब बड़दादा उत्तर देते हैं कि इन मनुष्यों की उनके समान जड़ें नहीं होती हैं इसलिए ये बढ़ते नहीं हैं छोटे ही रहते हैं। ये इधर-उधर चलते-फिरते रहते हैं ऊपर की ओर ये बढ़ना नहीं जानते। बड़ को भी आश्चर्य होता है कि वे बिना जड़ के कैसे जी रहे हैं। तभी बबूल ने कहा कि दादा बड़ आपने तो बहुत समय देखा है। आप बतायें कि क्या आपने किसी वन को भी देखा है ? ये लोग किस वन की बात कर रहे थे ? क्या आपने उस भयानक वन को देखा है ? बबूल के शरीर पर काँटे थे और हवा उसमें से छन कर निकल जाती थी।

विशेष:

  1. लेखक ने मनुष्य की ओछी मनोवृत्ति पर व्यंग्य किया है तथा बताया है कि आज का मनुष्य किस प्रकार अपने स्वार्थ में लिप्त हो गया है कि वह ऊपर उठना ही नहीं चाहता। अपने स्वार्थों में ही डूबा रहना चाहता है।
  2. भाषा सहज, सरल, लाक्षणिक तथा शैली प्रतीकात्मक है। यहाँ संवादात्मक शैली के दर्शन होते हैं।

3. इसी तरह उनमें बातें होने लगीं। वन को उनमें कोई नहीं जानता था। आस-पास के और पेड़ साल, सेंमर, सिरस उस बातचीत में हिस्सा लेने लगे। वन को कोई मानना नहीं चाहता था। किसी को उसका कुछ पता नहीं था। पर अज्ञात भाव से उसका डर सबको था। इतने में पास ही जो बाँस खड़ा था और जो ज़रा हवा चलने पर खड़-खड़, सन्-सन् करने लगता था, उसने अपनी जगह से ही सीटी-सी आवाज़ देकर कहा, “मुझे बताओ, मुझे बताओ, क्या बात है । मैं पोला हूँ। मैं बहुत जानता हूँ।”

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने वन्य पशुओं और वनस्पतियों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आज का मनुष्य अपने स्वार्थों में लिप्त होकर यह भी भूल गया है कि वह स्वयं कुछ न होकर उस विराट का एक अंश मात्र है।

व्याख्या:
लेखक बताता है कि जब दो शिकारी वन की सघनता और भयंकरता का वर्णन करके चले गए तो वन्य प्राणियों तथा वनस्पतियों में परस्पर बातचीत होने लगी कि यह सघन और भयानक वन क्या किसी ने देखा है ? परन्तु उनमें से वन को कोई भी नहीं जानता था। वन के साल, सेंमर, सिरस आदि वृक्ष भी इस वार्तालाप में भाग लेने लगे। कोई भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि वन भी कुछ होता है। किसी को भी वन का कुछ भी पता नहीं था कि वन क्या होता है ? पर उन सबके मन में एक अनजाना-सा भय अवश्य छा गया था कि न जाने वन कैसा भयंकर होगा ? तभी पास उगा हुआ बाँस अपनी जगह से सीटी-सी आवाज़ करते हुए पूछने लगा कि मुझे बताओ कि क्या बात है ? मैं भीतर से खोखला होते हुए भी बहुत कुछ जानता हूँ। बाँस ज़रा-सी हवा के चलने पर ही खड़-खड़, सन्-सन् की आवाज़ करने लगता था।

विशेष:

  1. वन्य जीवों तथा वनस्पति.जगत् में व्याप्त भयंकर वन के काल्पनिक भय का सजीव चित्रण करते हुए लेखक इस ओर संकेत करता है कि मनुष्य भी कई बार अज्ञात भय से भयभीत हो जाता है।
  2. भाषा सहज, सरल, ध्वनि अर्थ व्यंजन से युक्त, प्रवाहमयी है। शैली में संवादात्मकता तथा प्रतीकात्मकता है। बाँस का पोलापन उन लोगों पर व्यंग्य है जो कुछ न जानते हुए भी सर्वज्ञ बनने का ढोंग करते हैं।

4. तब सबने घास से पूछा, “घास री घास, तू वन को जानती है ?”

घास ने कहा, “नहीं तो दादा, मैं उन्हें नहीं जानती। लोगों की जड़ों को ही मैं जानती हूँ। उनके फल मुझसे ऊँचे रहते हैं। पदतल के स्पर्श से सबका परिचय मुझे मिलता है। जब मेरे सिर पर चोट ज्यादा पड़ती है, समझती हूँ यह ताकत का प्रमाण है। धीमे कदम से मालूम होता है, यह कोई दुखियारा जा रहा है।” “दुःख से मेरी बहुत बनती है, दादा ! मैं उसी को चाहती हुई यहाँ से वहाँ तक बिछी रहती हूँ। सभी कुछ मेरे ऊपर से निकलता है। पर वन को मैंने अलग करके कभी नहीं पहचाना।” ।

प्रसंग:
यह गद्यावतरण जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से अवतरित है। इसमें लेखक ने मनुष्य की स्वार्थी मनोवृत्ति पर व्यंग्य किया है। वह अपने में लीन रह कर यह भूल जाता है कि वह किसी विराट का अंश मात्र है।

व्याख्या:
इन पंक्तियों में लेखक वन के वन्य जीवों तथा वनस्पति जगत् में व्याप्त इस भय को अभिव्यक्ति प्रदान करता है जो उन्हें दो शिकारियों से यह सुनकर हो रहा था कि वन घना और भयंकर है। किसी ने आज तक वन को नहीं देखा था। इसलिए उन्होंने एक दूसरे से वन के बारे में पूछने के बाद तथा उनसे नकारात्मक उत्तर पा कर घास से पूछा कि क्या वह वन को जानती है ? घास ने भी यही उत्तर दिया कि वह वन को नहीं जानती। वह तो केवल उन लोगों को जानती है जिन की जड़ें होती हैं। बाकी सब कुछ उससे बहुत ऊँचा होता है, इसलिए वह उन्हें नहीं जान पाती।

वह तो सब के पैरों के तलवों के स्पर्श से ही सबको पहचानती है। जब किसी के उसके ऊपर चलने से उसे चोट पहुँचती है तो वह उसे समझती है कि यह इस की ताकत का प्रमाण है जो उसे कुचल रहा है। जब कोई धीमे-धीमे कदमों से उसके ऊपर चलता है तो उसे लगता है कि वह कोई दुःखी है जो इस प्रकार चल रहा है। वह दुःखियों की मददगार है क्योंकि दुःख उसे बहुत प्रिय है। दुःखियों की सेवा के लिए वह बिछी रहती है। सब उसके ऊपर से निकल जाते हैं परन्तु उसने वन को अलग से नहीं पहचाना है।

विशेष:

  1. लेखक ने शक्तिशाली द्वारा अशक्त को कुचले जाने पर व्यंग्य किया है तथा दुःखियों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की है।
  2. भाषा सहज परन्तु तत्सम शब्दों से युक्त भावपूर्ण एवं प्रवाहमयी है। शैली संवादात्मक एवं प्रतीकात्मक है।

5. बड़दादा तो चुप रहे, लेकिन औरों ने कहा कि सिंहराज, तुम्हारे भय से बहुत-से जंतु छिपकर रहते हैं। वे मुँह नहीं दिखाते। वन भी शायद छिपकर रहता हो। तुम्हारा दबदबा कोई कम तो नहीं है। इससे तो साँप धरती में मुँह गाड़कर रहते हैं, ऐसी भेद की बातें उनसे पूछनी चाहिएं। रहस्य कोई जानता होगा, तो अँधेरे में मुँह गाड़कर रहने वाला साँप जैसा जानवर ही जानता होगा। हम पेड़ तो उजाले में सिर उठाए खड़े रहते हैं। इसलिए हम बेचारे क्या जानें।

शेर ने कहा कि जो मैं कहता हूँ, वही सच है। उसमें शक करने की हिम्मत ठीक नहीं है। जब तक मैं हूँ, कोई डर न करो। कैसा साँप और जैसा कुछ और। क्या कोई मुझसे ज्यादा जानता है ?

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने वन्य प्राणियों तथा वनस्पतियों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आज का व्यक्ति अपने स्वार्थों में लीन हो कर यह भूल गया है कि उस की अपनी कोई सत्ता नहीं है वह तो उस विराट का अंशमात्र है अतः उसे स्वार्थ सिद्ध के स्थान पर जन कल्याण करना चाहिए।

व्याख्या:
जब वनस्पतियों तथा वन्य प्राणियों से वन का कोई पता नहीं चलता तो कुछ वनस्पतियों ने साँप से वन के विषय में पता करने के लिए सिंह से कहा। उनका मानना था कि शायद सिंह के भय से वन भी अन्य जन्तुओं के समान कहीं छिपकर रहता होगा। वह भी सिंह को अपना मुँह नहीं दिखाना चाहता होगा। वे मानते हैं कि सिंह का बहुत रौब है। उसके इसी प्रभाव से भयभीत होकर अन्य जीव जन्तु उससे मुँह छिपाते फिरते हैं। उन्हें लगता है कि साँप सदा धरती के अन्दर मुँह गाड़कर रहता है इसलिए इस प्रकार की रहस्य पूर्ण बातें उसी में पूछनी चाहिएं।

वह अवश्य ही जानता होगा कि वन क्या है ? वनस्पतियाँ स्वयं को उजाले में सिर उठा कर खड़ी रहने वाली मानती हैं इसलिए वे भेदभाव से दूर रहती हैं। साँप जैसे अंधेरे में मुँह गाड़कर रहने वाले ही भेदभाव की नीति से परिचित हो सकते हैं। शेर उन्हें वन से भय न करने के लिए कहता है तथा उन्हें सांत्वना देता है कि जब तक वह है उन्हें किसी से भयभीत नहीं होना चाहिए। चाहे वह साँप का अन्य कोई क्यों न हो ? सिंह स्वयं को इन सबसे अधिक जमने वाला मानता है।

विशेष:

  1. लेखक ने सिंह जैसे घमंडियों तथा साँप जैसे आस्तीन के साँप लोगों पर व्यंग्य किया है जो अपने सामने किसी के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते हैं।
  2. भाषा सहज, सरल, लाक्षणिक, मुहावरों से युक्त, भावपूर्ण तथा प्रवाहमयी है। शैली संवादात्मक तथा व्यंग्यात्मक है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 22 जैनेन्द्र कुमार

6. उनमें सबको ही अपना-अपना ज्ञान था। अज्ञानी, कोई नहीं था। पर उस वन का जानकार कोई नहीं था। वह नहीं जाने, दो नहीं जानें, दस-बीस नहीं जानें, लेकिन जिसको कोई नहीं जानता, ऐसी भी भला कोई चीज़ कभी हुई है या हो सकती है ? इसलिए उन जंगली जंतुओं में और वनस्पतियों में खूब चर्चा हुई, खूब चर्चा हुई। दूर-दूर तक उनकी तू-तू मैं-मैं सुनाई देती थी। ऐसी चर्चा हुई, ऐसी चर्चा हुई कि विद्याओं पर विद्याएँ उसमें से प्रस्तुत हो गईं। अंत में तय पाया कि दो टाँगों वाला आदमी ईमानदार जीव नहीं है। उसने तभी वन की बात बनाकर कह दी है। वन बन गया है । सच में वह नहीं है।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया कि वास्तविकता को जानने के कारण मनुष्य उसी प्रकार भटकता रहता है जैसे वन के विषय में जानकर वन्य प्राणी तथा वन की वनस्पतियाँ भयभीत हो रही थीं।

व्याख्या:
दो शिकारी व्यक्तियों द्वारा वन की भयानकता के विषय में सुनकर सभी वनस्पतियां तथा वन्य प्राणी वन को जानने के लिए व्याकुल हो उठते हैं कि वन है क्या ? परन्तु कोई भी वन को नहीं जानता था। सभी अपना-अपना पक्ष रखते हैं परन्तु समझदार होते हुए भी कोई नहीं बता पाया कि वन क्या है ? वन के विषय में किसी को भी कुछ नहीं पता था। वे सभी इस बात से परेशान थे कि उन में से जब कोई भी वन को नहीं जानता तो क्या वह हो भी सकता है ? उन में खूब तर्क-वितर्क होता है और दूर-दूर तक उन की बहस सुनाई देती है। प्रत्येक अपने कथन के पक्ष में अनेक तर्क प्रस्तुत करता है और एक से एक गहरी बातें करता है। जब कोई समाधान नहीं हुआ तो वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह दो टांगों वाला जीव जो आदमी कहलाता है ईमानदार नहीं है। उसने अपने मन से ही बना कर वन की बात कही है और हम इसे सच मान बैठे जबकि वास्तव में वन कहीं नहीं है।

विशेष:

  1. लेखक ने तर्क-वितर्क की व्यर्थता की ओर संकेत किया है तथा मनुष्य की बेईमानी मनोवृत्ति पर व्यंग्य किया है।
  2. भाषा सहज, सरल, भावपूर्ण, प्रवाहमयी तथा लाक्षणिक है। शैली व्यंग्यात्मक तथा वर्णनात्मक है।

7. उस समय आदमी और बड़दादा में कुछ ऐसी धीमी-धीमी बातचीत हुई कि वह कोई सुन नहीं सका। बातचीत के बाद वह पुरुष उस विशाल बड़ के वृक्ष के ऊपर चढ़ता दिखाई दिया। चढ़ते-चढ़ते वह उसकी सबसे ऊपर की फुनगी तक पहुँच गया। वहाँ दो नए-नए पत्तों की जोड़ी खुले आसमान की तरफ़ मुसकराती हुई देख रही थी। आदमी ने उन दोनों को बड़े प्रेम से पुचकारा। पुचकारते समय ऐसा मालूम हुआ, जैसे मंत्ररूप में उन्हें कुछ संदेश भी दिया है।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया है किस प्रकार वास्तविकता से परिचित न होने पर हम भटक जाते हैं तथा विभिन्न प्रकार के व्यर्थ के वाद-विवादों में फँस जाते हैं जैसे कि वन के अस्तित्व से अनजान वन की वनस्पतियों और वन्य प्राणियों की दशा होती है।

व्याख्या:
लेखक कहता है कि जब दुबारा वे शिकारी उस जंगल में आते हैं तो वनस्पतियां उनसे वन के बारे में पूछती हैं। तब वे उन्हें बताते हैं कि वे सब मिलाकर वन हैं। उन्हें इस कथन पर विश्वास नहीं होता। तब बड़दादा और शिकारी में धीरे धीरे कुछ बातचीत होती है। इसे अन्य वनस्पतियां नहीं सुन पातीं। बड़दादा से बातचीत करके वह शिकारी उस विशाल बड़ के पेड़ के ऊपर चढ़ता है और चढ़ते-चढ़ते उसकी सबसे ऊपर वाली फुनगी तक पहुँच जाता है। वह वहाँ देखता है कि दो नए-नए पत्ते खुले आकाश की ओर देख रहे हैं। उन का देखना उसे ऐसा लगा जैसे वे आकाश को देखकर मुस्करा रहे हैं। वह शिकारी उन्हें प्रेमपूर्वक पुचकारता है। जब वह उन्हें ‘पुचकार रहा था तो ऐसा लग रहा था जैसे वह उन्हें मन्त्र के रूप में कोई संदेश भी दे रहा है।

विशेष:

  1. यहाँ लेखक ने प्रकृति के प्रति मानवीय प्रेम को व्यक्त किया है। वह वन संरक्षण का संदेश देता है।
  2. भाषा सहज, सरस, भावपूर्ण, प्रवाहमयी तथा काव्यात्मक है। शैली चित्रात्मक तथा भावात्मक है।

8. वन के प्राणी यह सब-कुछ स्तब्ध भाव से देख रहे थे। उन्हें कुछ समझ में न आ रहा था। देखते-देखते पत्तों की वह जोड़ी उद्ग्रीव हुई। मानो उसमें चैतन्य भर आया। उन्होंने अपने आस-पास और नीचे देखा। जाने उन्हें क्या दिखा कि वे काँपने लगे। उनके तन में लालिमा व्याप गई। कुछ क्षण बाद मानो वे एक चमक से चमक आए। जैसे उन्होंने खंड को कुल में देख लिया। देख लिया कि कुल है, खंड कहाँ है।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गयी हैं। इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि वास्तविकता से परिचित न होने पर मनुष्य उसी प्रकार से भटक जाता है जैसे वन के अस्तित्व से अनजान वनस्पतियों तथा वन्य प्राणियों की दशा होती है।

व्याख्या:
लेखक उस समय का वर्णन करता है जब एक शिकारी विशाल बड़ के वृक्ष की फुनगी तक पहुँचकर उसे पुचकारता है। वन के समस्त प्राणी यह दृश्य टकटकी लगाकर देखते रहते हैं। उनकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। उन्होंने देखा कि बड़ के पत्तों की वह जोड़ी उस शिकारी द्वारा पुचकारे जाने पर इस प्रकार ऊपर की ओर उठी जैसे उस में चेतनता आ गयी हो। वे अपने आस-पास और नीचे भी देखने लगीं। यह सब तथा कुछ अनजाना-सा देखकर वे काँप उठीं। उनका शरीर भय से लाल हो गया। परन्तु कुछ ही क्षणों के बाद वे एक अनोखी चमक से चमकने लगीं। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने अपने अंश अथवा खंड को उस पूर्ण में देख लिया है। जिस की वे अंश हैं। उन्होंने सम्पूर्ण को देखने के बाद यह अनुभव किया कि वे उस सम्पूर्ण की ही खंड मात्र हैं।

विशेष:

  1. लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि मनुष्य का अस्तित्व इस संसार में उस विराट के एक खंड के रूप में उसी प्रकार से है जैसे वाटिका में एक पुष्प-पादप। इसी प्रकार से समस्त वनस्पतियां और वन्य प्राणी भी विशाल वन के एक खंड मात्र हैं।
  2. भाषा तत्सम प्रधान, भावपूर्ण, प्रवाहमयी तथा प्रतीकात्मक है। शैली भावपूर्ण एवं प्रतीकात्मक है।

कठिन शब्दों के अर्थ

तत्सत् = उस का सत्य। गहन = घना। वन = जंगल। टोह = खोज। दहशत = भय, डर। अजब = विचित्र। ओछे = छोटे कद वाले, तुच्छ। प्रीति = प्रेम। पोला = खोखला। दीखा = दिखाई देना। पदतल = पैरों के तलवे। वाग्मी = वाचाल, बहुत बोलने वाला, घमंडी। वंश = बाँस। जिज्ञासु = जानने के इच्छुक। दबदबा = रौब। मंथर = धीमी। अतिशय = बहुत अधिक। श्याम = काला। छिद्र = सुराख। अंतर्भेद = अन्दर का हाल, रहस्य। फ़र्जी = नकली। रोज़ = दिन। भर्त्सना = फटकारना। निर्धम = भ्रम रहित, शंकाओं से मुक्त। उद्ग्रीव = ऊपर उठना। अभ्यंतराभ्यंतर = अंत:करण।

तत्सत् Summary

तत्सत् जीवन परिचय

जैनेन्द्र कुमार का संक्षिप्त जीवन परिचय लिखिए।

जैनेन्द्र कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ के कौड़ियागंज गाँव में सन् 1905 ई० में हुआ। इनकी आरम्भिक शिक्षा हस्तिनापुर जिला मेरठ में हुई। इन्होंने सन् 1919 में पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा पास करके काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, किन्तु गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर पढाई छोड कर स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। इन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण से तथा दिल्ली विश्वविद्यालय ने डी० लिट की उपाधि से सम्मानित किया था। इनकी रचनाओं में मनोभावों तथा संवेदनाओं का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। जीविका चलाने के लिए व्यापार किया, नौकरी भी की किन्तु सफल न हो सके और स्वतन्त्र लेखन को ही जीवन का ध्येय बना लिया। ध्रुवयात्रा, नीलम देश की राजकन्या, फाँसी इनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं। परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी आदि उनके उपन्यास हैं। सन् 1989 ई० में इनका निधन हो गया था।

तत्सत् कहानी का सार

श्री जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित ‘तत्सत्’ नामक कहानी प्रतीक शैली में लिखी हुई है। इसमें जीवन के सूक्ष्म अनुभवों के स्वतंत्र मौलिक चिंतन द्वारा गूढ प्रश्नों का समाधान दार्शनिक दृष्टिकोण से किया गया है। जैनेन्द्र कुमार बुद्धिवादी दार्शनिक एवं विचारक हैं। वैयक्तिक स्थितियों के आंतरिक चित्रण का सुंदर और सहज रूप इस कहानी में उपलब्ध होता है। – एक घने जंगल में दो शिकारी शिकार की टोह में पहुँचे । दोनों पुराने शिकारी थे पर इतना भयानक वन उन्होंने आज तक न देखा था। एक बड़े पेड़ की छाँह में बैठकर उस भयानक और घने वन के संबंध में बात करते हुए, कुछ देर विश्राम करने के बाद वह दोनों चले गये। उनके चले जाने पर पास के शीशम के पेड़ ने उस.पेड़ से कहा कि.ए बड़ दादा अभी तुम्हारी छाँह में कौन बैठे थे, वे गये। बड़दादा उसे बताते हैं कि वे आदमी कहलाते हैं। उनके न पत्ते होते हैं न जड़ें, बस तना ही तना होता है। अपने तने की दो शाखों पर चलते हैं, इधर-उधर चलते हैं, ऊपर की ओर बढ़ना उन्हें नहीं

आता। तभी बबूल ने बड़दादा से पूछा कि क्या आपने वन देखा है। अभी ये आदमी किसी भयानक वन की बात कर रहे थे। बड़दादा ने कहा कि मैंने शेर, चीता, भालू, हाथी, भेड़िया सभी जानवर देखे हैं पर वन नाम के जानवर को मैंने अब तक नहीं देखा। आदमी एक टूटी-सी टहनी से आग की लपट छोड़कर शेर-चीतों को मार देता है। उन्हें ऐसे मरते अपने सामने हमने देखा है पर वन की लाश हमने नहीं देखी। वह ज़रूर कोई बड़ा भयानक जानवर होगा।

बड़दादा, शीशम और बबूल में इसी प्रकार बातें हो रही थीं। आस-पास के साल, सेंमर, सिरस, बाँस, घास आदि पेड़ भी इस बातचीत में हिस्सा लेने लगे। उनमें से कोई भी वन को नहीं जानता था। पर सभी अज्ञात रूप से वन से डरने लगे थे। सबमें काफ़ी बहस हुई पर कोई भी यह न बता सका कि वन कौन-सा जानवर है। तभी वहां सिंह आया। बड़दादा ने उससे वन के सम्बन्ध में पूछा। पर सिंह भी न बता सका कि वन कौन है। लोग सलाह करते हैं कि साँप से इस सम्बन्ध में पूछना चाहिए। संयोग से एक नाग भी उधर आ निकला। वन के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की कल्पना की गई पर इसका निश्चय नहीं हो सका कि वह कौन जानवर है। सभी जीव-जन्तु और पेड़-पौधों ने आपस में पूछताछ की और अंत में यह तय हुआ कि दो पैर वाले मनुष्य की बात का कोई भरोसा नहीं। मनुष्य ईमानदार जीव नहीं है। तभी उसने वन की बात कह दी पर वास्तव में वह कुछ नहीं है। बड़दादा ने कहा कि उन आदमियों को फिर आने दो तब उनसे पूछा जायेगा कि वन क्या है ?

एक दिन वे दोनों शिकारी फिर उधर आ निकले। उनके आने पर जंगल के सभी जीव-जन्तु, पेड़-पौधे तरह-तरह की आवाज़ों में बोलकर मानों उनका विरोध करने लगे। इस विचित्र स्थिति में अपने को पाकर आदमियों ने अपनी बंदूकें सम्भाली पर बड़दादा ने बीच में पड़कर जंगल के प्राणियों को शांत किया और उन आदमियों से पूछा कि जिस जंगल की तुम बात किया करते हो बताओ कि वह कहाँ है। आदमियों ने कहा कि जहाँ हम सब हैं यह जंगल ही तो है। इस पर किसी को भला कैसे विश्वास हो सकता था। वह सेंमर है, वह सिरस है, वह घास है, वह सिंह है, वह पानी है फिर भला जंगल कहाँ है। आदमी ने कहा यह सब कुछ जंगल ही है। पर सभी अपना नाम बताते और जंगल या वन कौन है यह कोई मानने को तैयार न था। आदमी और बड़दादा में थोड़ी देर तक धीमी आवाज़ में बातचीत होती रही। इसके बाद बड़दादा ने अन्य प्राणियों को बताया है कि यह वन ही है हम नहीं, हम सब ही वन हैं। समग्रता का बोध होने पर ही बड़दादा वन की सत्ता स्वीकार कर लेता है और अन्य वन्य प्राणियों को भी वन की सत्ता स्वीकार करने के लिए कहता है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 20 गुरु गोबिन्द सिंह

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 20 गुरु गोबिन्द सिंह Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 20 गुरु गोबिन्द सिंह

Hindi Guide for Class 12 PSEB गुरु गोबिन्द सिंह Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 1.
‘जफ़रनामा’ के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
गुरु जी ने दीना नामक गाँव से मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब को फ़ारसी में एक पत्र लिखा जिसे जफ़रनामा कहते हैं। यह गुरु जी की एक उत्कृष्ट एवं विख्यात कविता है । इस कविता या पत्र में गुरु जी ने औरंगजेब की धर्मान्धता, संकीर्णता और अत्याचारों पर बड़ी फटकार बताई है।

प्रश्न 2.
गुरु जी के मानवीय दृष्टिकोण का परिचय कैसे मिलता है ? अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
गुरु जी ने भाई कन्हैया को कहा हुआ था कि युद्ध में प्रत्येक को जल पिलाओ चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान। मित्र हो या शत्रु। इतना ही नहीं मरहम पट्टी करने वालों को भी उनका यही आदेश था कि मित्र और शत्रु के भेद को भुला कर घायलों का उपचार किया जाए। इस आदेश से गुरु जी के मानवीय दृष्टिकोण का परिचय मिलता है।

प्रश्न 3.
बन्दा वैरागी कौन था ? गुरु जी से उसकी भेंट का अपने शब्दों में वर्णन करें।
उत्तर:
बन्दा वैरागी का असली नाम माधवदास था। वह दक्षिण में गोदावरी के किनारे रहता था। गुरु जी उस योगी और वैरागी से मिले। वह भी गुरु जी से प्रभावित हुआ और उनका शिष्य बन गया। गुरु जी ने उन्हें अत्याचार का विनाश करने के लिए पंजाब भेजा। बन्दा वैरागी के रूप में उन्होंने वीरतापूर्वक ढंग से अपने कर्त्तव्य को निभाने का प्रयत्न किया।

(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दो:

प्रश्न 4.
गुरु गोबिन्द सिंह के जन्म के समय की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए उनके बाल्यकाल का वर्णन करो।
उत्तर:
गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म सन् 1666 में नवम् गुरु तेग़ बहादुर के घर पटना में हुआ। उस समय औरंगजेब के अत्याचारों से भारतीय जनता दुःखी थी। गुरु जी का जन्म हिन्दू धर्म की रक्षा करने और उनका उद्धार करने के लिए हुआ था। बचपन से ही गुरु जी निडर, साहसी और आत्मविश्वासी थे। उन्हें बहादुरी के खेल खेलने का शौक था। पटना में नवाब की सवारी को देखकर चौबदार ने उन्हें खड़े होकर नवाब को सलाम करने को कहा। स्वाभिमानी गुरु जी ने न केवल स्वयं सलाम करने से इन्कार किया बल्कि अपने साथियों को भी सलाम न करने को कहा। बचपन में उन्होंने आनन्दपुर साहब आकर अपने पिता को यह कह कर बलिदान देने के लिए प्रेरित किया कि आप से बढ़कर महान् कौन हो सकता है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 20 डॉ० धर्मपाल मैनी

प्रश्न 5.
‘खालसा पंथ की साजना’ गुरु जी के जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
सन् 1699 का वैशाखी का दिन था। गुरु जी ने सब शिष्यों की एक सभा बुलाई और घोषणा की कि धर्म की रक्षा के लिए कुछ व्यक्तियों के बलिदान की आवश्यकता है। सभा में सन्नाटा छा गया। तभी गुरु जी की ललकार को सुनकर लाहौर का दयाराम सामने आया। गुरु जी उसे लेकर पास के एक तम्बू में गए और खून से भरी तलवार लेकर वे तम्बू से बाहर आए और बलिदान के लिए और भेंट माँगी। तब दिल्ली का धर्मदास सामने आया। गुरु जी उसे भी तम्बू में ले गए और खून की सनी हुई तलवार लेकर बाहर आए और तीसरा बलिदान माँगा।

तब द्वारिका का मोहकम चंद, बीदर (दक्षिण) का साहिबचन्द और जगन्नाथपुरी का हिम्मत राय बारी-बारी सामने आए। गुरु जी उन्हें भी बारी-बारी तम्बू में ले गए। कुछ देर बाद वे उन पाँचों को साथ लेकर तम्बू से बाहर आए और सारी सभा के सामने उन्हें प्रस्तुत कर उन्हें ‘पंज प्यारे’ की संज्ञा दी। गुरु जी ने पहले उन पाँचों को दीक्षित किया फिर आप उनसे दीक्षित हुए। इस प्रकार उन्होंने ‘खालसा पंथ’ की नींव रखी और अपने शिष्यों को अपने नाम के आगे सिंह लगाने का आदेश दिया। स्वयं भी गोबिन्द राय से गोबिन्द सिंह हो गए।

(ग) सप्रसंग व्याख्या करें:

प्रश्न 6.
गुरु जी को चिन्तित देखकर बालक गोबिन्द राय ने कारण पूछा। कारण सुनकर बालक गोबिन्द राय एक दम बोल उठा, “पिता जी, आपसे बढ़कर महान् व्यक्ति कौन हो सकता है।”

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० धर्मपाल मैनी द्वारा लिखित गुरु गोबिन्द सिंह जी की जीवनी में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा अपने पिता को बलिदान देने की प्रेरणा देने की घटना का उल्लेख है।

व्याख्या:
मुग़लों के अत्याचारों से दुःखी होकर कश्मीर के कुछ ब्राह्मण गुरु तेग़ बहादुर जी की शरण में आए और उनसे अपने धर्म की और अपनी रक्षा की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनकर गुरु जी इस परिणाम पर पहुँचे कि इस समय धर्म की रक्षा के लिए किसी महान व्यक्ति के बलिदान की आवश्यकता है। अपने पिता को चिन्तित देखकर पास बैठे बालक गोबिन्दराय ने कहा कि आपसे बढ़कर महान् व्यक्ति कौन हो सकता है।

विशेष:

  1. बालक गोबिन्द राय पिता को आत्मबलिदान की प्रेरणा देते हैं।
  2. भाषा सरल, सहज तथा उद्बोधनात्मक है।

प्रश्न 7.
इसी समय वे स्वयं गुरु गोबिन्दराय से गुरु गोबिन्द सिंह बन गए। इस प्रकार गुरु नानक की परम्परा में जो धर्म अब तक आध्यात्मिक प्रधान था, उसे गुरु ने वीरता का पाठ भी पढ़ा दिया।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० धर्मपाल मैनी द्वारा लिखित गुरु गोबिन्द सिंह जी की जीवनी में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में गुरु जी द्वारा खालसा पंथ की नींव रखने के बाद की घटना का उल्लेख किया गया है।

व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि खालसा पंथ की नींव रखने के बाद गुरु जी ने अपने नाम के साथ सिंह शब्द जोड़ दिया इस तरह वे गुरु गोबिन्द राय से गुरु गोबिन्द सिंह हो गए। इस तरह उन्होंने सिक्खों के पहले गुरु नानक देव जी की परम्परा में अब तक जो आध्यात्मिकता प्रधान थी उसमें वीरता भी जोड़कर सिक्ख धर्म को एक नया पाठ पढ़ाया।

विशेष:

  1. गुरु जी द्वारा खालसा पंथ की नींव रखने के बाद स्वयं को ‘सिंह’ कहने की परंपरा का वर्णन है।
  2. भाषा सहज, भावपूर्ण है।

प्रश्न 8.
गुरु जी ने इन 40 शूरवीरों को चालीस मुक्ते की उपाधि दी और उस स्थान का नाम, जहाँ वे वीर शहीद हुए थे, मुक्तसर रखा।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० धर्मपाल मैनी द्वारा लिखित ‘गुरु गोबिन्द सिंह जी की जीवनी’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने खिद्राणा नामक स्थान पर आनन्दपुर साहब में गुरु जी का साथ छोड़ गए 40 शिष्यों द्वारा अपने कुकृत्य पर पछताते हुए वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति प्राप्त करने की घटना के बाद गुरु.जी द्वारा उनके प्रति आदर व्यक्त करने की बात कही गई है।

व्याख्या:
खिद्राणा के युद्ध में वीरतापूर्वक लड़ते हुए 40 शिष्यों के वीरगति प्राप्त करने पर गुरु गोबिन्द सिंह जी ने उन 40 शूरवीरों को 40 मुक्ते की उपाधि प्रदान की और उस स्थान को, जहाँ वे शहीद हुए थे, मुक्तसर नाम दिया।

विशेष:

  1. मुक्तसर नगर के नामकरण का कारण स्पष्ट किया है।
  2. भाषा सहज तथा भावपूर्ण है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 20 डॉ० धर्मपाल मैनी

प्रश्न 9.
इन पुत्रन के सीस पर वार दिए सुत चार।
चार मुए तो क्या हुआ जीवित कई हजार।।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० धर्मपाल मैनी द्वारा लिखित ‘गुरु गोबिन्द सिंह जी की जीवनी’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ गुरु जी ने कहे जब उन से उनके पुत्रों की मृत्यु के बारे में पूछा था।

व्याख्या:
गुरु जी ने उत्तर देते हुए कहा कि मैंने अपने शिष्यों की रक्षा करने के लिए अपने चार पुत्रों को न्यौछावर कर दिया है। इन चारों की मृत्यु से कुछ न होगा बल्कि इनके बलिदान के कारण कई हजार वीर शिष्य पैदा हो जाएँगे।

विशेष:

  1. प्रस्तुत उक्ति से गुरु जी के त्यागपूर्ण, उदार एवं व्यापक दृष्टिकोण का पता चलता है।
  2. भाषा सहज, भावपूर्ण है। शैली ओजपूर्ण है।

PSEB 12th Class Hindi Guide गुरु गोबिन्द सिंह Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘गुरु गोबिंद सिंह’ शीर्षक निबंध किस के द्वारा रचित है?
उत्तर:
डॉ० धर्मपाल मैनी।

प्रश्न 2.
डॉ० मैनी ने अपनी उच्च शिक्षा कहाँ-कहाँ से प्राप्त की थी?
उत्तर:
पटियाला और बनारस से।

प्रश्न 3.
डॉ० मैनी ने किन-किन भाषाओं में साहित्य की रचना की है ?
उत्तर:
हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी।

प्रश्न 4.
‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब-एक परिचय’ किस के द्वारा रचित है?
उत्तर:
डॉ० धर्मपाल मैनी।

प्रश्न 5.
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म कब और किस नगर में हुआ था?
उत्तर:
सन् 1666 ई०, पटना।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 20 डॉ० धर्मपाल मैनी

प्रश्न 6.
गुरु गोबिंद सिंह जी का बचपन का नाम क्या था?
उत्तर:
गुरु जी के बचपन का नाम गोबिन्दराय था।

प्रश्न 7.
गुरु तेग़ बहादुर जी ने किस की रक्षा में अपना बलिदान दे दिया था?
उत्तर:
धर्म की रक्षा में।

प्रश्न 8.
बालक गोबिंदराय ने कितने वर्ष की अवस्था में गुरु गद्दी संभाली थी?
उत्तर:
नौ वर्ष की अवस्था में।

प्रश्न 9.
गुरु जी ने खालसा पंथ की स्थापना कब और कहाँ की थी?
उत्तर:
गुरु जी ने सन् 1699 में वैशाखी के दिन आनन्दपुर साहब में खालसा पंथ की स्थापना की थी।

प्रश्न 10.
गुरु जी किस दिन गोबिन्द राय से गोबिन्द सिंह हो गए थे?
उत्तर:
जिस दिन खालसा पंथ की स्थापना हुई थी–सन् 1699 में वैशाखी के दिन।

प्रश्न 11.
किस नदी के निकट मुग़ल सैनिकों ने अपना वादा तोड़ते हुए हमला किया था?
उत्तर:
सरसा नदी के निकट।

प्रश्न 12.
गुरु जी ने 40,मुक्त की उपाधि किन्हें दी थी?
उत्तर:
जिन चालीस सिखों ने खिदराणा में गुरु जी की ओर से लड़ते हुए शहीदी पाई थी।

प्रश्न 13.
गुरु जी किस बादशाह के करीब आ गए थे?
उत्तर:
बादशाह बहादुर शाह के।

प्रश्न 14.
गुरु जी किस दिन ज्योति-जोत समा गए थे? .
उत्तर:
सन् 1708 में। वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 15.
गुरु जी को चिन्तित देखकर…
उत्तर:
बालक गोबिन्द राय ने कारण पूछा।

प्रश्न 16.
इन पुत्रन के सीस पर बार दिए सुत चार, ………….।
उत्तर:
चार मुए तो क्या हुआ जीवित कई हज़ार।

प्रश्न 17.
इस प्रकार गुरु नानक की परंपरा में जो धर्म अब तक आध्यात्मिक प्रधान था,……
उत्तर:
उसे गुरु जी ने वीरता का पाठ भी पढ़ा दिया।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 18.
गुरु जी को चिन्तित देखकर बालक गोबिन्द राय ने कारण पूछा।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 19.
गुरु जी ने कहा, “पिता जी, आपसे बढ़कर महान् व्यक्ति कौन हो सकता है।”
उत्तर:
हाँ।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 20 डॉ० धर्मपाल मैनी

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. गुरु गोबिन्द सिंह जी सिक्खों के कौन-से गुरु थे ?
(क) सातवें
(ख) आठवें
(ग) नवम्
(घ) दशम्
उत्तर:
(घ) दशम्

2. गुरु गोबिन्द सिंह जी का बचपन का नाम क्या था ?
(क) गोबिन्द राय
(ख) मुकुल राय
(ग) सुरेन्द्र
(घ) शिवेन्द्र।
उत्तर:
(क) गोबिन्द राय

3. गुरु जी ने सन् 1699 में वैशाखी के दिन किस पंथ की स्थापना की ?
(क) खालसा पंथ
(ख) निर्गुण पंथ
(ग) सगुण पंथ
(घ) निराकार पंथ
उत्तर:
(क) खालसा पंथ

4. गुरु जी की भक्ति किसके प्रति समर्पित है ?
(क) निर्गुण के
(ख) सगुण के
(ग) अकाल पुरुष के
(घ) निराकार के
उत्तर:
(ग) अकाल पुरुष के

कठिन शब्दों के अर्थ

निर्भीकता = निडरता। द्वेष = कलह । टक्कर लेना = मुकाबला करना। साजना = सजाना, निर्माण करना। अदम्य = अद्भुत, अत्यन्त । नवरक्त = नया खून। आवेश = जोश। दीक्षा देना = गुरुमन्त्र देना। समता = बराबरी। कुकृत्य = बुरा कर्म । उत्कृष्ट = श्रेष्ठ। विख्यात = प्रसिद्ध। संकीर्णता = तंगदिली। टीला = ऊंचा स्थान। कलह = झगड़ा। अभाव = कमी। विधिवत = उचित तरीके से। आत्मीय = अपनापन। विकृत = बिगड़ा हुआ। चिल्ला चढ़ाना = धनुष की डोरी खींचना।

गुरु गोबिन्द सिंह Summary

गुरु गोबिन्द सिंह जीवन परिचय

डॉ० धर्मपाल मैनी जी का जीवन परिचय लिखिए।

डॉ० धर्मपाल मैनी का जन्म सन् 1929 में हुआ। महेन्द्रा कॉलेज, पटियाला से हिन्दी में एम० ए० करने के बाद हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस से पीएच० डी० की उपाधि प्राप्त की। आप एस० डी० राजकीय कॉलेज, लुधियाना में तथा पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक रहे। फिर आप गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में रीडर भी रहे। पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से सेवानिवृत्त होकर आप चण्डीगढ़ में ही बस गए हैं। आपने हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में लिखा है। इनकी प्रमुख रचनाएँ ‘संतो के धार्मिक विश्वास श्री गुरु ग्रंथ साहिब एक परिचय, गुरु गोबिन्द सिंह के काव्य में भारतीय संस्कृति हैं’

गुरु गोबिन्द सिंह निबन्ध का सार

‘गुरु गोबिन्द सिंह’ निबन्ध का सार 150 शब्दों में लिखें।

‘गुरु गोबिन्द सिंह’ का जन्म सन् 1666 में सिक्खों के नवम् गुरु तेग़ बहादुर जी के घर पटना में हुआ। आपका बचपन का नाम गोबिन्दराय था। पाँच वर्ष तक पटना में रहने के बाद आप विभिन्न तीर्थों की यात्रा करते हुए आनन्दपुर साहब पहुँचे। वहीं एक दिन इनके पिता ने धर्म की रक्षा के लिए किसी महान् व्यक्ति के बलिदान की बात कही। तब बालक गोबिन्द राय ने अपने पिता से कहा कि आप से बढ़कर महान् व्यक्ति और कौन हो सकता है। गुरु तेग़ बहादुर जी ने धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया। फलस्वरूप बालक गोबिन्दराय को नौ वर्ष की अवस्था में ही गुरु गद्दी सम्भालनी पड़ी। गद्दी सम्भालते ही गुरु जी ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी जिससे अनेक राजाओं और मुग़ल सरदारों को इनसे वैर और ईर्ष्या होने लगी। गढ़वाल के राजा फतेहशाह के साथ पांवटा से छ: मील दूर भंगाणी नामक स्थान पर गुरु जी को युद्ध करना पड़ा। नादौन में गुरु जी ने पहाड़ी राजाओं की सहायता करते हुए जम्मू के सूबेदार मियाँ खान के सेनापति से युद्ध किया।

सन् 1699 के वैशाखी के दिन गुरु जी ने आनन्दपुर साहब में खालसा पंथ की स्थापना की और हर सिक्ख को अपने नाम के साथ सिंह लगाने का आदेश दिया। आप भी उसी दिन से गोबिन्दराय से गोबिन्द सिंह हो गए। अप्रैल सन् 1704 को लाहौर और सरहिन्द के सूबेदारों ने आनन्दपुर साहब में गुरु जी को घेर लिया। आठ महीने की इस घेराबन्दी के दौरान 40 सिक्ख आपको छोड़कर चले गए। दिसम्बर 1704 में गुरु जी आनन्दपुर साहब छोड़कर निकले तो सरसा नदी के पास मुग़ल सैनिकों ने वादा तोड़ते हुए आप पर आक्रमण कर दिया। गुरु के सिंह बड़ी वीरता से लड़े। गुरु जी कुछ सिक्खों के साथ चमकौर पहुँचे और वहाँ कच्ची गढ़ी में मोरचा लगा लिया।

गुरु जी के साथ केवल 40 सिक्ख थे बाहर दुश्मन ने घेरा डाल लिया। इसी युद्ध में गुरु जी के दो बड़े बेटे अजीत सिंह और जुझार सिंह शहीद हो गए। गुरु जी रात को वहाँ से निकल मालवा प्रान्त की ओर बढ़े। सरसा के युद्ध में उनका परिवार उनसे बिछुड़ गया था। उनकी माता गुजरी अपने दो पोतों-जोरावर सिंह और फतेह सिंह को लेकर अपने रसोइए गंगू के साथ उसके गाँव में चली गई। गंगू ने धोखे से धन के लालच में आकर दोनों साहबजादों को सरहिन्द के नवाब को सौंप दिया जिसने उन्हें इस्लाम धर्म कबूल करने को कहा। साहबजादों के इन्कार करने पर उन्हें जीवित दीवार में चिनवा दिया गया।

गुरु जी का साथ छोड़ गए 40 सिक्ख अपनी करनी पर पछता रहे थे। उन्होंने खिद्राणा के स्थान पर युद्ध में गुरु जी की ओर से लड़ते हुए शहीदी पाई। गुरु जी ने उन्हें 40 मुक्ते की उपाधि दी और उस स्थान का नाम मुक्तसर रख दिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद गुरु जी बादशाह बहादुरशाह के करीब आ गए। इसी से ईर्ष्या करते हुए सरहिन्द के नवाब ने गुरु जी की हत्या करने की ज़िम्मेदारी दो पठानों को सौंपी जिनमें से एक ने एक दिन नन्देड़ (दक्षिण) में उनके पेट में छुरा घोंप दिया। उसी घाव के टांके एक दिन चिल्ला चढ़ाते समय खुल गए जिसके फलस्वरूप सन् 1708 में आप ज्योति-जोत समा गए।

गुरु गोबिन्द सिंह जी का साहित्यिक परिचय दीजिए। सिख धर्म के दशम् गुरु गोबिन्द सिंह जी अत्यन्त प्रतिभाशाली कवि थे। उनके काव्य प्रेम के कारण ही उस समय के अनेक कवि उनके आश्रय में रहते थे। उनके द्वारा रचित साहित्य को डॉ० जय भगवान गोयल ने तीन भागों में बांटा है

  1. भक्ति प्रधान एवं आध्यात्मिक विचारों से युक्त रचनाएँ-जापु साहिब, अकाल उस्तुति, ज्ञान प्रबोध, श्रीमुख वक सवैये-आदि।
  2. वीर रसात्मक रचनाएँ-बिचित्र नाटक, चौबीस अवतार कथाएँ, चंडी चरित्र (उक्ति विलास), चंडी-चरित्र द्वितीय, चंडी दी वार, शस्त्र नाम माला।
  3. उपख्यान चरित्र-इसमें नारी के प्रेम, शौर्य और प्रवंचना का विषद् वर्णन करते हुए उसके चरित्र का उद्घाटन किया गया है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 20 डॉ० धर्मपाल मैनी

साहित्यिक विशेषताएँ:
गुरु जी के साहित्य में भक्ति भावना की प्रधानता है। कुछ विद्वान् चाहे उन्हें युद्ध वीर के रूप में देखते हैं लेकिन वास्तव में वे पहले धर्म संस्थापक थे और बाद में योद्धा। उन्होंने अनेक स्थानों पर अवतारवाद
और मूर्ति पूजा का खंडन किया था। वे ईश्वर को निर्गुण, निराकार और अकाल पुरुष मानते थे। वे कहते हैं कि ईश्वर प्राप्ति का सरल एवं सहज. मार्ग उस ब्रह्म और उसके जीव-जन्तुओं से प्रेम करने में निहित हैं।
गुरु जी ने अपने साहित्य में भक्ति और वीरता का समन्वय किया था। चंडी चरित्र (उक्ति विलास) में उन्होंने ऐसी ही प्रार्थना की थी।

देहि शिवा वर मोहि इहै शुभ करमन ते कबहूँ न टरौं।
न डरों अरिसों जब जाय लरौ निश्चय कर अपनी जीत करों।

गुरु जी की भक्ति भावना की विशेषता है कि वे ‘अकाल पुरुष’ के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। इन्होंने अन्य भक्तोंकवियों की तरह विनय पद लिखे हैं। उनके काव्य में ब्रह्म की कृपालुता, भक्तिवत्सलता, दीनबंधुता आदि का वर्णन किया गया है। गुरु जी के काव्य में शक्ति की वंदना की गई है। उन्होंने भक्ति और वीरता का समन्वय करते हुए अपने शिष्यों के सामने आदर्श की स्थापना भी की थी। ‘चंडी-चरित्र’ (उक्त विलास) में गुरु जी ने ऐसा ही चित्रण किया है। गुरु जी ने आडंबरों का विरोध किया और पाखंडों का खंडन किया। उन्होंने मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए जातिपाति और भेदभाव का खंडन किया। वे भाई-चारे में विश्वास करते थे।

गुरु जी को फारसी, पंजाबी और ब्रजभाषा का गहरा ज्ञान था। दोहा, चौपाई, सवैया आदि छंदों का प्रयोग करते हुए उन्होंने तत्कालीन लोक भाषाओं का प्रयोग किया था। उसमें तत्कालीन विदेशी भाषाओं का प्रयोग भी किया गया है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 18 समय नहीं मिला

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 18 समय नहीं मिला Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 18 समय नहीं मिला

Hindi Guide for Class 12 PSEB समय नहीं मिला Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार कौन-से लोग बड़े हैं ?
उत्तर:
ऐसे बहुत से लोग हैं जो शीघ्र पत्रोत्तर न देने का बहाना यह कहकर देते हैं कि समय नहीं मिला। इस प्रकार लिखने का कुछ फैशन ही हो गया है। लोग भूल जाते हैं कि बड़े आदमी तो पत्रोत्तर देने में देरी कर सकते हैं, काम की अधिकता के कारण, किन्तु दूसरे लोग भी जो पत्रोत्तर देरी से देते हैं अपने आपको बड़ा समझने लगते हैं।

प्रश्न 2.
भारत और विदेश में समय की पाबंदी के सन्दर्भ में लेखक ने क्या विचार व्यक्त किये हैं ?
उत्तर:
लेखक लिखते हैं कि भारत में कोई सम्मेलन हो, कोई सभा हो, कोई मीटिंग हो, कभी सभा समय पर शुरू नहीं होती। कहीं भी समय की पाबन्दी का ध्यान नहीं रखा जाता। मीटिंग में दिए गए समय से घण्टा दो घण्टा बाद ही सभासद या सदस्य पहुँचते हैं, जबकि इंग्लैंड और यूरोप के दूसरे देशों में सभाएँ समय पर होती हैं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 18 श्रीमन्नारायण

प्रश्न 3.
विदेशों में लोग समय को किस प्रकार बर्बाद करते हैं ?
उत्तर:
विदेशों में लोग सिनेमा और थियेटर के टिकट लेने के लिए दो-दो, तीन-तीन घण्टे लगातार कतारों में खड़े रहकर समय बर्बाद करते हैं। यही हाल टेनिस या फुटबाल मैच देखने के टिकट घरों के सामने लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े व्यक्तियों का है। इन कतारों में जवान-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी दिखाई देते हैं।

प्रश्न 4.
इस निबन्ध से आपको क्या शिक्षा मिलती है ?
उत्तर:
प्रस्तुत निबन्ध से हमें पहली शिक्षा तो यह मिलती है कि किसी मित्र या रिश्तेदार का पत्र प्राप्त होने पर उसका तुरन्त उत्तर देना चाहिए, यह बहाना कभी न बनाना चाहिए कि समय नहीं मिला। दूसरी शिक्षा यह मिलती है कि सदा समय को धन समझते हुए उसकी उपयोगिता और महत्त्व को समझना चाहिए।

प्रश्न 5.
लेखक ने समय के सदुपयोग के लिए क्या सुझाव दिया है ?
उत्तर:
लेखक का सुझाव है कि हमें अपने जीवन पर गहरी और तीखी नज़र डालकर यह देखना चाहिए कि हमने कितना समय नष्ट किया है और उसका क्या सदुपयोग हो सकता है। यदि केवल सुबह जल्दी उठना शुरू कर दें तो हम काफ़ी समय बचा सकेंगे और दिन भर स्फूर्ति भी महसूस करेंगे।

(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 6.
‘समय नहीं मिला’ निबन्ध का सार अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया निबन्ध का सार।

प्रश्न 7.
समय धन से भी कहीं ज्यादा अहम चीज़ है-लेखक के इस कथन से आप कहां तक सहमत हैं ?
उत्तर:
लेखक के इस कथन से कि समय ही धन है, हम पूरी तरह सहमत हैं। क्योंकि धन को तो हाथों का मैल माना जाता है और हमारे हाथ काफ़ी मैले रहते ही हैं। इसका अर्थ यह है कि धन तो कभी भी कमाया जा सकता है और धन तो घटता-बढ़ता रहता है। इसीलिए शायद लक्ष्मी को चंचला कहा गया है कि यह एक स्थान पर टिक कर नहीं बैठती। किन्तु समय के महत्त्व से इनकार नहीं किया जा सकता। दिन में समय 24 घण्टों का ही रहेगा इसे न कम किया जा सकता है न बढ़ाया जा सकता है। गया हुआ धन तो लौट कर फिर आ सकता है किन्तु गया हुआ समय कभी लौट कर नहीं आता। जब चिड़ियाँ खेत चुग जाती हैं तो पछताने के सिवा कोई चारा नहीं रहता।

कहते हैं वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन इसीलिए हार गया था क्योंकि उसने पाँच मिनट समय को नहीं समझा। कहा तो यह भी जाता है कि आषाढ़ का चूका किसान और डाल से चूका बन्दर कहीं का नहीं रहता। ऐसा इसलिए है कि समय का निज़ाम सबके लिए एक जैसा है। किसी चित्रकार ने समय का चित्र बनाते समय उसके माथे पर बालों का गुच्छा बनाया था और पीछे से उसका सिर गंजा दिखाया था। इस चित्र का आशय यही है कि समय को सामने से आते हुए पकड़ो नहीं तो उसके गुजर जाने पर हाथ उसके गंजे सिर पर ही पड़ेगा। समय को जिसने धन मान लिया, समझ लिया वही जीवन में सफल है। भौतिक धन तो आज है कल नहीं भी हो सकता। अतः समय को ही धन समझना चाहिए।

(ग) सप्रसंग व्याख्या करें:

1. मेरा तो यह भी अनुभव है कि जो लोग सचमुच बड़े हैं और बहुत व्यस्त रहते हैं उनका पत्र व्यवहार भी बहुत व्यवस्थित रहता है।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्रीमन्नारायण द्वारा लिखित निबन्ध ‘समय नहीं मिला’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत निबन्ध में लेखक ने समय के सदुपयोग के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या:
लेखक बड़े आदमियों की व्यस्तता के कारण उनके पत्रोत्तर में देरी को उचित मानते हुए कहते हैं कि उसका यह अनुभव है जो लोग सचमुच बड़े हैं और व्यस्त रहते हैं उनका पत्र व्यवहार अर्थात् पत्रोत्तर देने का स्वभाव अत्यन्त ठीक हालत में रहता है।

विशेष:

  1. लेखक कहना चाहते हैं कि बड़े लोगों का जीवन क्योंकि नियमित रहता है इसलिए उनका पत्रोत्तर भी निहायत व्यवस्थित रहता है। इसी कारण वे बड़े लोग कहलाते हैं।
  2. भाषा तत्सम प्रधान तथा शैली आत्मकथात्मक है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 18 श्रीमन्नारायण

2. धन की दुनिया में अमीर-गरीब, बादशाह-कंगाल का फर्क है। पर खुशकिस्मती से समय के साम्राज्य में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं है। वक्त के निज़ाम में सब बराबर हैं, उसमें आदर्श लोकतंत्र है।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्रीमन्नारायण द्वारा लिखित निबन्ध ‘समय नहीं मिला’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक धन और समय की तुलना करता हुआ समय को आदर्श लोकतन्त्र के समान बता रहा है।

व्याख्या:
लेखक समय ही धन की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि धन तो घटता-बढ़ता रहता है किन्तु समय को घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता। दूसरे धन की दुनिया में किसी के पास अधिक धन है तो वह अमीर है, बादशाह है और किसी के पास धन कम है तो वह ग़रीब या कंगाल है किन्तु खुशकिस्मती से समय के साम्राज्य में ऊँच-नीच का छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं है। समय के सम्मुख सभी बराबर हैं। उसमें आदर्श लोकतन्त्र है जिसमें सबको बराबर के अधिकार हैं। समय सबके लिए एक जैसा होता है, कोई उसकी उपयोगिता को समझ लेता है तो कोई नहीं।

विशेष:

  1. समय सब के लिए बराबर अवसर प्रदान करता है। वह भेदभाव नहीं करता।
  2. भाषा भावपूर्ण तथा शैली उद्बोधनात्मक है।

PSEB 12th Class Hindi Guide समय नहीं मिला Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘समय नहीं मिला’ किस के द्वारा रचित निबंध है?
उत्तर:
श्री मन्नारायण।

प्रश्न 2.
श्री मन्नारायण का जन्म कहाँ और कब हुआ था?
उत्तर:
इटावा में सन् 1912 ई० में।

प्रश्न 3.
श्री मन्नारायण ने किन-किन पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया था?
उत्तर:

  1. सबकी बोली
  2. राष्ट्र भाषा प्रचार।

प्रश्न 4.
श्री मन्नारायण किसकी विचारधारा से प्रभावित थे?
उत्तर:
गांधी जी की विचारधारा से।

प्रश्न 5.
श्री मन्नारायण जी के द्वारा रचित तीन रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
रोटी का राग, मानव, सेवांग।

प्रश्न 6.
‘समय नहीं मिला’ निबंध का मूलभाव क्या है ?
उत्तर:
समय का सदुपयोग।

प्रश्न 7.
लेखक की शैली में किस तत्व की प्रधानता है?
उत्तर:
व्यंग्यात्मकता।

प्रश्न 8.
किस ने कहा था कि यदि भोजन करने का समय हो सकता है तो धार्मिक पुस्तकें पढ़ने का भी समय मिल सकता है?
उत्तर:
अंग्रेजी साहित्यकार डॉ० जॉनसन ने।

प्रश्न 9.
लेखक ने किस कहावत की व्याख्या की थी?
उत्तर:
‘समय ही धन’।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 18 श्रीमन्नारायण

प्रश्न 10.
लेखक ने अपने निबंध में किसे बधाई दी है ?
उत्तर:
उन लोगों को जो समय को बर्बाद नहीं करते और समय का पूरा लाभ उठाते हैं।

प्रश्न 11.
लेखक ने कभी भी न कहने के लिए क्या कहा था?
उत्तर:
‘समय नहीं मिलता।

प्रश्न 12.
किन देशों में सभाएँ सदा समय पर ही होती हैं ?
उत्तर:
इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में।

प्रश्न 13.
विदेशों में लोग समय कैसे बर्बाद करते हैं ?
उत्तर:
सिनेमा, थियेटर और मैच देखकर।

प्रश्न 14.
लेखक ने ‘समय नहीं मिलता’ में क्या संदेश दिया है?
उत्तर:
सदा समय का महत्त्व समझो और कभी झूठे बहाने न बनाओ।

प्रश्न 15.
‘समय बचाने’ के लिए लेखक ने क्या सुझाव दिया है ?
उत्तर:
सुबह जल्दी उठने से काफी समय बचाया जा सकता है।

वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 16.
……अमीर ग़रीब, बादशाह-कंगाल का फर्क है।
उत्तर:
धन की दुनिया में।

प्रश्न 17.
………………में सब बराबर है।
उत्तर:
वक्त के निज़ाम।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 18.
लेखक का मानना है कि अधिक व्यस्त लोगों का पत्र व्यवहार अधिक व्यवस्थित होता है?
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 19.
समय के साम्राज्य में ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं है।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 20.
समय ही धन है।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 21.
विदेशों में लोगों के द्वारा समय अधिक खराब किया जाता है।
उत्तर:
नहीं।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 18 श्रीमन्नारायण

प्रश्न 22.
लेखक ने निबंध में व्यंग्य का सहारा नहीं लिया है।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 23.
समय ही धन है।
उत्तर:
हाँ।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. सब की बोली तथा राष्ट्र भाषा प्रचार पत्रिकाओं के संपादक कौन थे ?
(क) श्री मन्नारायण
(ख) श्रीमान नारंग
(ग) श्री प्रफुल्ल पटेल
(घ) श्री हंस।
उत्तर:
उत्तर:

2. ‘समय नहीं मिला’ रचना की विद्या क्या है ?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) निबंध
(घ) संस्मरण।
उत्तर:
(ग) निबंध

3. ‘समय नहीं मिला’ कैसी रचना है ?
(क) व्यंग्यात्मक
(ख) विचारात्मक
(ग) विवेचनात्मक
(घ) आत्म कथात्मक।
उत्तर:
(क) व्यंग्यात्मक

4. लेखक के अनुसार सबसे बड़ा धन क्या है ?
(क) पैसा
(ख) समय
(ग) धन
(घ) सोना
उत्तर:
(ख) समय

5. समय नहीं मिला निबंध का मूलभाव है
(क) समय का सदुपयोग
(ख) समय की मांग
(ग) धन का उपयोग
(घ) धन की मांग
उत्तर:
(क) समय का सदुपयोग

कठिन शब्दों के अर्थ

मशगूल = व्यस्त। यथा समय = निश्चित समय पर। बेशुमार = अनगिनत। व्यवस्थित = ठीक हालत में। अस्त-व्यस्त = बिखरा हुआ। ख्याल = विचार। अक्सर = प्रायः । दिलासा = तसल्ली। इन्तजाम = प्रबन्ध। अहम = महत्त्वपूर्ण । कुदरत = प्रकृति । ज्वारभाटा = समुद्री तूफान । निज़ाम = बन्दोबस्त, प्रबन्ध। शरीक = शामिल। लालसा = इच्छा। तितर-बितर हो जाना = इधर-उधर बिखर जाना। हताश = निराश। बदकिस्मती = दुर्भाग्य। इक्के-दुक्के = कोई-कोई, कम संख्या में। अपवाद = नियमों के उल्लंघन करने का उदाहरण। मुकर्रर = निश्चित किया हुआ। जाहिर करना = प्रकट करना। संयोजक = सभा या मीटिंग का आयोजन करने वाला। अमुक = फलां, कोई खास । लतीफ़ा = चुटकला, हंसी की बात। हमदर्दी = सहानुभूति। मुमकिन = सम्भव, जो हो सके। प्रतिनिधि = नुमाइंदा। मुबारकबाद = बधाई। स्फूर्ति = ताज़गी। खुश मिजाज = हंसमुख।

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समय नहीं मिला Summary

समय नहीं मिला जीवन परिचय

श्रीमन्नारायण जी का जीवन-परिचय लिखिए।

श्रीमन्नारायण का जन्म सन् 1912 में इटावा में हुआ था। एम०ए० करने के बाद आप ‘सबकी बोली’ तथा ‘राष्ट्र भाषा प्रचार’ पत्रिकाओं के सम्पादक रहे। बाद में आप राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के महामन्त्री भी रहे। आप . गाँधीवादी विचारधारा से विशेष रूप से प्रभावित रहे। कांग्रेस के आन्दोलनों में आप शुरू से ही सक्रिय भाग लेते रहे। इनकी प्रमुख रचनाएँ-रोटी का राग, मानव, सेवांग का सन्त हैं। दैनिक जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं पर आप ने बहुत से छोटे-छोटे शिक्षाप्रद निबन्ध भी लिखे हैं।

समय नहीं मिला निबन्ध का सार

‘समय नहीं मिला’ निबन्ध का सार लगभग 150 शब्दों में लिखो।

प्रस्तुत निबन्ध में लेखक ने समय के सदुपयोग के महत्त्व पर प्रकाश डाला है। लेखक ने बड़े ही व्यंग्यात्मक ढंग से उन लोगों पर प्रहार किया है जो समय नहीं मिला का बहाना बनाते हैं कि ‘मुझे आपका काम तो याद है पर क्या करूँ बिल्कुल समय ही नहीं मिला’ कुछ इसी तरह का बहाना लोग पत्रोत्तर देने में करते हैं। लेखक ने उदाहरण देते हुए बताया कि एक व्यक्ति ने प्रसिद्ध अंग्रेजी के साहित्यकार डॉ० जानसन से जाकर कहा कि उसे धार्मिक पुस्तकें पढने का समय नहीं मिलता। साहित्यकार ने समझाया कि यदि भोजन करने का समय हो सकता है तो धार्मिक पुस्तकें पढ़ने का भी समय मिल सकता है।

लेखक ने ‘समय ही धन’ कहावत की व्याख्या करते हुए बताया है कि हम पैसा तो जितनी मेहनत करें कमा सकते हैं किन्तु समय को घटा या बढ़ा नहीं सकते। समय का प्रबंध सबके लिए बराबर है किन्तु फिर भी हम उसके महत्त्व को नहीं समझते। हम काम के घण्टे कम करने का शोर मचाते हैं पर यह नहीं सोचते कि खाली समय में लोग करेंगे क्या। क्या वे अपना समय सिनेमा का टिकट पाने के लिए बर्बाद न करेंगे।

लेखक उन लोगों को बधाई देता है जो समय का पूरा लाभ उठाकर एक मिनट भी बर्बाद नहीं करते। लेखक की सलाह है खुशमिजाज रहकर अपने समय का जितना अच्छा उपयोग कर सकें, उतनी ही आपकी प्रशंसा है। किन्तु आज से यह किसी से न कहें कि समय नहीं मिला।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 16 क्या निराश हुआ जाए?

Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 16 क्या निराश हुआ जाए? Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Hindi Chapter 16 क्या निराश हुआ जाए?

Hindi Guide for Class 12 PSEB क्या निराश हुआ जाए? Textbook Questions and Answers

(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
आजकल चिन्ता का क्या कारण है ?
उत्तर:
आज देश में आरोप-प्रत्यारोप का ऐसा वातावरण बन गया है कि लगता है कि कोई ईमानदार आदमी रहा ही नहीं। जो व्यक्ति जितने ऊँचे पद पर है, उसमें उतने ही अधिक दोष दिखाए जाते हैं। जो व्यक्ति कुछ करेगा उसके कार्य में कोई न कोई दोष तो होगा ही किन्तु उसके गुणों को भुलाकर दोषों को ही देखना निश्चय ही चिन्ता का विषय है।

प्रश्न 2.
जीवन के महान् मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था क्यों हिलने लगी है ?
उत्तर:
आज देश में कुछ ऐसा वातावरण बना है कि ईमानदारी से मेहनत करके रोटी रोज़ी कमाने वाले भोले-भाले मज़दर पिस रहे हैं और झठ और फरेब का धन्धा करने वाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी मूर्खता समझी जाने लगी है और सच्चाई केवल कायर और बेबस लोगों के पास रह गयी है। ऐसी हालत में लोगों की जीवन के महान् मूल्यों के बारे में आस्था हिलने लगी है।

प्रश्न 3.
वे कौन-से विकार हैं जो मनुष्य में स्वाभाविक रूप में विद्यमान रहते हैं ?
उत्तर:
लोभ-मोह, काम-क्रोध आदि विकार मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते पर इन्हें प्रधान शक्ति मान लेना और अपने मन तथा बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर छोड़ देना बहुत बुरा नीच आचरण है। हमारे यहाँ इन विकारों को संयम के बन्धन में बाँधकर रखने का प्रयत्न किया जाता है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 16 हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रश्न 4.
धर्म और कानून में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता जबकि कानून को दिया जा सकता है। भारत वर्ष में अब भी यह अनुभव किया जाता है कि धर्म कानून से बड़ी चीज़ है। कानून की त्रुटियों से लाभ उठाया जा सकता है जबकि धर्म में आस्था रखने वाला ऐसा नहीं करता। .

प्रश्न 5.
किसी ऐसी घटना का वर्णन करो जिससे लोक चित्त में अच्छाई की भावना जागृत हो।
उत्तर:
कुछ महीने पहले की बात है कि मैं अपने मम्मी पापा के साथ टेक्सी में कही जा रहा था। टैक्सी से उतरते समय मेरी मम्मी टैक्सी में अपना पर्स भूल गईं। उसमें तीन हजार रुपए और मम्मी के कुछ गहने और मोबाइल था। हम सभी हैरान थे कि अब क्या किया जाए हमने तो टैक्सी का नम्बर और टैक्सी ड्राइवर का नाम भी नहीं पूछा था। थोड़ी देर बाद हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब वही टैक्सी ड्राइवर हमारे पास मम्मी का पर्स लौटने आ पहुँचा। मम्मी और पापा ने उसे सौ रुपया पुरस्कार देना चाहा तो उसने इन्कार करते हुए कहा-यह तो मेरा फर्ज़ था।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 150 शब्दों में लिखो।

प्रश्न 1.
‘क्या निराश हुआ जाए ?’ निबन्ध का सार लिखो।
उत्तर:
देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया निबन्ध का सार ।

प्रश्न 2. इस निबन्ध में द्विवेदी जी ने कुछ घटनाएँ दी हैं जो सच्चाई और ईमानदारी को उजागर करती हैं। उनमें से किसी एक घटना का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
द्विवेदी जी एक बार सपरिवार बस में यात्रा कर रहे थे। उनकी बस गंतव्य से पाँच मील पहले एक सूनी निर्जन जगह पर खराब हो गई। उस समय रात के दस बजे थे सभी यात्री घबरा गए। कंडक्टर बस के ऊपर से साइकल उठाकर चला गया। उसके जाने पर यात्रियों को संदेह हुआ कि उन्हें धोखा दिया जा रहा है। एक यात्री ने चिन्ता जताते हुए कहा कि यहाँ डकैती होती है, दो दिन पहले ही एक बस को लूटने की घटना हुई है। द्विवेदी जी परिवार सहित अकेले यात्री थे। बच्चे पानी के लिए चिल्ला रहे थे और पानी का कहीं ठिकाना न था।

इसी बीच कुछ नवयुवक यात्रियों ने ड्राइवर को पीटने का मन बनाया। जब लोगों ने उसे पकड़ा तो वह घबराकर । द्विवेदी जी से उसे लोगों से बचाने की प्रार्थना करने लगा। ड्राइवर ने कहा कि हम लोग बस का कोई उपाय कर रहे
हैं।

द्विवेदी जी लोगों को समझा-बुझा कर उसे पिटने से तो बचा लेते हैं किन्तु लोगों ने ड्राइवर को बस से उतार कर घेर लिया और कोई घटना होने पर पहले उसे मारना ही उचित समझा। इतने में यात्रियों ने देखा कि कंडक्टर एक खाली बस लिए चला आ रहा है। आते ही उसने बताया कि अड्डे से नयी बस लाया हूँ। फिर वह कंडक्टर द्विवेदी जी के पास आकर लोटे में पानी और थोडा दुध दिया। उसने कहा कि बच्चे का रोना उससे देखा न गया। सब यात्रियों ने उसे धन्यवाद दिया और ड्राइवर से क्षमा माँगी। रात बारह बजे से पहले ही वे बस अड्डे पहुंच गए।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 16 हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रश्न 3.
मानवीय मूल्य से सम्बन्धित यदि कोई ऐसी ही घटना आपके साथ घटित हुई हो, तो उसका वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
पिछले महीने की बात है कि मैं साइकिल पर जा रहा था कि एक ट्रक पीछे से आया और मुझे टक्कर मारकर चला गया। मैं सड़क पर जख्मी हालत में पड़ा था। मेरे पास से कई स्कूटर, कई कारें गुजरे किन्तु किसी ने मेरी ओर ध्यान नहीं दिया। मैं घायल अवस्था में सड़क के किनारे कोई एक घण्टा तक पड़ा रहा। मेरे शरीर से खून बह रहा था। चोट अधिकतर टांगों और बाहों पर लगी थी। मैंने सहायता के लिए कई लोगों को पुकारा भी किन्तु किसी को भी मेरी हालत पर दया नहीं आई। लगता था कि लोग पुलिस के डर से मेरी सहायता नहीं कर रहे थे। क्योंकि आजकल पुलिस वाले उलटे सहायता करने वाले पर ही केस बना देती है। कहती है एक्सीडेंट तुम्हीं ने किया है। मैं निराश होकर ईश्वर से प्रार्थना करने लगा।

तभी अचानक मेरे पास आकर एक कार रुकी। कार में दो व्यक्ति सवार थे। वे दोनों कार से उतरे। दोनों ने मिलकर मुझे अपनी कार में डाला और तुरन्त निकट के अस्पताल में ले गए। मेरी साइकिल जो बुरी तरह टूट चुकी थी, उन्होंने वही छोड़ दी। अस्पताल के डॉक्टर ने बताया कि इस रोमी को कम से कम एक बोतल खून की ज़रूरत है। उन दोनों व्यक्तियों ने बिना हिचक के अपना खून देने की रजामंदी प्रकट की। प्रभु कृपा से उन दोनों का खून मेरे खून के ग्रुप से मिल गया। तुरन्त उनमें से छोटी आयु के व्यक्ति ने अपना खून दिया। मेरे घावों की मरहम पट्टी कर दी गई थी। दो दिन के इलाज के बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गई। मुझे डॉक्टरों से पता चला कि वे सज्जन मेरे इलाज का सारा खर्चा अदा कर गए हैं। मैं उन दोनों व्यक्तियों को भगवान् समझता हूँ किन्तु खेद है कि मैं उनका नाम तक नहीं जानता।

(ग) सप्रसंग व्याख्या करें

1. “जीवन के महान् मूल्यों के बारे में आस्था ही हिलने लगी है।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबन्ध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से ली गई

व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि आज देश में ऐसा वातावरण बना है कि ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है। सच्चाई केवल डरपोक और बेबस लोगों के पास रह गयी ऐसी स्थिति में लोगों की जीवन के महान् मूल्यों के प्रति आस्था डाँवाडोल होने लगी है।

2. “धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, कानून को दिया जा सकता है।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबन्ध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से ली गई

व्याख्या:
लेखक कहते हैं भारत वर्ष में सदा कानून को धर्म माना जाता रहा है किन्तु आज कानून और धर्म में अन्तर आ गया है। लोग यह जानते हैं कि धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता जब कानून को दिया जा सकता है। इसी कारण . धर्म से डरने वाले लोग भी कानून की कमियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते।

3. ‘अच्छाई को उजागर करना चाहिए, बुराई में रस नहीं लेना चाहिए।’
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबन्ध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से ली गई

व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि दोषों से पर्दा उठाना बुरी बात नहीं है। लेकिन किसी की बुराई करते समय जब उसमें रस लिया जाता और उसे कर्त्तव्य मान लिया जाता है तो यह बुरी बात है और इससे भी बुरी बात वह जब अच्छाई को उतना ही रस लेकर प्रकट न करना।

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4. सामाजिक कायदें-कानून कभी युग-युग से परीक्षत आदर्शों से टकराते हैं, इससे ऊपरी सतह आलोड़ित भी होती है, पहले भी हुआ है, आगे भी होगा। उसे देखकर हताश हो जाना ठीक नहीं है।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबन्ध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से लिया गया है।

व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि सामाजिक नियम और कानून समाज के हित को ध्यान में रखकर मनुष्य द्वारा ही बनाये जाते हैं। उनकी ठीक सिद्ध न होने पर उन्हें बदल दिया जाता है। ये नियम-कानून सबके लिए होते हैं परन्तु कोईकोई नियम सबके लिए सुखकर नहीं होता। जब सामाजिक नियम-कानून युगों से परीक्षित आदर्शों से टकराते हैं तो जो हलचल होती है वह ऊपरी सतह पर ही होती है। वह हलचल भीतरी सतह में नहीं होती अतः इस हलचल को देखकर निराश हो जाना ठीक नहीं है।

PSEB 12th Class Hindi Guide क्या निराश हुआ जाए? Additional Questions and Answers

अति लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘क्या निराश हुआ जाए?’ किसके द्वारा रचित है?
उत्तर:
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी।

प्रश्न 2.
आचार्य द्विवेदी का जन्म कब और कहाँ हुआ था? ।
उत्तर:
सन् 1907 ई० में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में ‘आरत दुबे का छपर गाँव में’।

प्रश्न 3.
आचार्य द्विवेदी को भारत सरकार ने किस अलंकार से सम्मानित किया था ?
उत्तर:
पद्म भूषण से।

प्रश्न 4.
आचार्य द्विवेदी किन-किन विश्वविद्यालयों के हिंदी-विभागाध्यक्ष बने थे?
उत्तर:
हिंदू विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय।

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प्रश्न 5.
द्विवेदी जी के द्वारा रचित उपन्यासों में से किन्हीं दो का नाम लिखिए।
उत्तर:
अनामदास का पोथा, बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्र लेख।

प्रश्न 6.
‘क्या निराश हुआ जाए ?’ किस प्रकार का निबंध है?
उत्तर:
विचारात्मक निबंध।

प्रश्न 7.
इस निबंध में किस प्रकार की बुराइयों पर प्रकाश डाला गया है?
उत्तर:
सामाजिक बुराइयों पर।

प्रश्न 8.
जो आदमी कुछ नहीं करता वह अधिक सुखी क्यों होता है?
उत्तर:
उसके काम में कोई दोष ही नहीं निकल पाता।

प्रश्न 9.
वर्तमान में कौन पिस रहा है और कौन फल-फूल रहा है ?
उत्तर:
वर्तमान में मज़दूर पिस रहे हैं और धोखेबाज फल-फूल रहे हैं।

प्रश्न 10.
भारतवासियों ने आत्मा को क्या महत्त्व दिया था?
उत्तर:
भारतवासियों ने आत्मा को चरण और परम माना था।

प्रश्न 11
द्विवेदी जी ने लोभ-मोह को क्या कहा है ?
उत्तर-:
उन्हें विकार कहा है।

प्रश्न 12.
कानून को भारत में क्या महत्त्व दिया गया है?
उत्तर:
कानून को धर्म का दर्जा दिया गया है।

प्रश्न 13.
लोग किसी दुर्घटना में वाहन के चालक को ही ज़िम्मेदार क्यों मानते हैं ?
उत्तर:
लोगों को लगता है कि वाहन के कल-पुर्जा, चालन, देख-रेख आदि सभी की ज़िम्मेदारी वाहन के चालकी होती है, जो कि पूरी तरह से ठीक नहीं है।

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प्रश्न 14.
वर्तमान में ईमानदारी को क्या समझा जाता है?
उत्तर:
वर्तमान में ईमानदारी को मूर्खता का पर्यायवाची समझा जाता है। वाक्य पूरे कीजिए

प्रश्न 15.
ईमानदारी को…. .पर्याय समझा जाने लगा है।
उत्तर:
मूर्खता।

प्रश्न 16.
भारतवर्ष ने कभी भी………………के संग्रह क. अधिक महत्त्व नहीं दिया।
उत्तर:
भौतिक वस्तुओं।

प्रश्न 17.
बुराई में……………लेना बुरी बात है।
उत्तर:
रस।

हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए

प्रश्न 18.
दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है।
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 19.
जीवन के महान् मूल्यों के बारे में आस्था ही हिलने लगी है।
उत्तर:
हाँ।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. द्विवेदी जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार किस कृति पर मिला ?
(क) आलोक पर्व
(ख) आलोकित
(ग) आलोक
(घ) पर्व।
उत्तर:
(क) आलोक पर्व

2. ‘अशोक के फूल’ किस विधा की रचना है ?
(क) निबंध
(ख) कहानी
(ग) रेखाचित्र
(घ) संस्मरण।
उत्तर:
(क) निबंध

3. द्विवेदी जी का साहित्य किसका संगम है ?
(क) मानवतावाद का
(ख) भारतीय संस्कृति का
(ग) मानवतावाद एवं भारतीय संस्कृति का
(घ) कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) मानवतावाद एवं भारतीय संस्कृति का

4. ‘क्या निराश हुआ जाए’ कैसा निबंध है ?
(क) सकारात्मक
(ख) विचारात्मक
(ग) विवेचनात्मक
(घ) प्रेरणात्मक
उत्तर:
(ख) विचारात्मक

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क्या निराश हुआ जाए? गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. क्या यही भारतवर्ष है, जिसका सपना तिलक और गाँधी ने देखा था ? रवींद्रनाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय का महान् संस्कृति-सभ्य भारतवर्ष किस अतीत के गह्वर में डूब गया ? आर्य और द्रविड़, हिन्दू और मुसलमान, यूरोपीय और भारतीय आदर्शों की मिलन-भूमि ‘मानव महासमुद्र’ क्या सूख गया ? मेरा मन कहता है ऐसा हो नहीं सकता। हमारे महान् मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित’ “क्या निराश हुआ जाए ?” शीर्षक निबंध में से लिया गया है। इस गद्यांश में लेखक अपने इस विश्वास को प्रकट करता है कि अनेक विकृतियों के आ जाने के बावजूद भी भारतवर्ष से प्राचीन मानवीय आदर्श विलुप्त नहीं हुए हैं।

व्याख्या:
द्विवेदी जी कहते हैं कि आज चारों ओर भ्रष्टाचार, अनैतिकता, शोषण, बेईमानी आदि का बोलबाला है। वह प्रश्न करते हैं कि क्या यह वही भारतवर्ष है जिसका सपना हमारे महापुरुषों ने देखा था ? क्या इसी भारतवर्ष का स्वप्न कर्मयोगी लोकमान्य तिलक ने देखा था अथवा क्या यह राष्ट्रपति महात्मा गांधी के सपनों का भारत है ? संस्कृति से सभ्य यह रवींद्रनाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय का देश है। यहां की संस्कृति अत्यंत प्राचीन है और अध्यात्म प्रधान है। इस सुसंस्कृत और सुसभ्य देश को न जाने क्या हुआ है ? लगता है कि यह किसी अतीत की गुफा में लुप्त हो गया। भाव यह है कि वर्तमान भारत में उसका सुसंस्कृत और सभ्य रूप नहीं मिलता।

रवींद्रनाथ ठाकुर इस भारतवर्ष को ‘मानव महासमुद्र’ कहते थे। इसमें अनेकानेक जातियों के मनुष्य रहते हैं और वे नदियों की भांति इस महासमुद्र में लीन हैं। आर्य और द्रविड़, संस्कृति, हिंदू और मुस्लिम संस्कृति, भारतीय और यूरोपीय संस्कृति के आदर्शों और सिद्धान्तों का यह संगम स्थल है। क्या यह ‘महासमुद्र’ सूख गया है ? लेखक की मान्यता है कि ऐसा संभव नहीं है। आज भी यह महान् विचारकों, ऋषियों एवं दार्शनिकों के स्वप्नों और कल्पनाओं का देश है और भविष्य में भी इसी रूप में रहेगा।

विशेष:

  1. लेखक ने भारत के सुसंस्कृत भविष्य के प्रति आशा व्यक्त की है।
  2. भाषा-शैली सरल, सहज और स्वाभाविक है।

2. यह सही है कि इन दिनों कुछ ऐसा माहौल बना है कि ईमानदारी से मेहनत करके जीविका चलाने वाले निरीह और भोले-भाले श्रमजीवी पिस रहे हैं और झूठ तथा फरेब का रोज़गार करने वाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है, सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। ऐसी स्थिति में जीवन के महान् मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था ही हिलने लगी है।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इन पंक्तियों में लेखक ने आज के भारत के दोषपूर्ण वातावरण का यथार्थ चित्रण किया है।

व्याख्या:
लेखक कहता है कि आज इस देश के वातावरण में भ्रष्टाचार और अनैतिकता का बोलबाला है। आज ऐसा माहौल बन चुका है कि ईमानदारी और सच्चाई की कद्र नहीं है। ईमानदारी से मेहनत करके अपने जीवन का निर्वाह करने वाले भोले-भाले और सीधे-साधे लोगों का शोषण हो रहा है। उनकी मेहनत-मज़दूरी के बदले में उन्हें इतना कम पैसा मिलता है कि वह पेट भर भोजन भी नहीं पा सकते। इसके विपरीत असत्य तथा छल-कपट का व्यवहार करने वाले लोग समुन्नत और समृद्ध हो रहे हैं। इस प्रकार ईमानदारी पूर्ण श्रम पर झूठ और कपट हावी हो रहे हैं।

आज ईमानदारी और मूर्खता समानार्थक हो गए हैं। भाव यह है कि ईमानदारी को मूर्ख समझा जाने लगा है। इसी प्रकार जो व्यक्ति सच्चाई से काम लेते हैं उन्हें धर्मभीरु तथा लाचार कहा जाता है। इस प्रकार आज ऐसा माहौल हो गया है कि जीवन के उच्च मूल्यों, मानवीय एवं सांस्कृतिक आदर्शों के बारे में लोगों का विश्वास डगमगाने लगा है।

विशेष:

  1. आज के भ्रष्टाचारी वातावरण में साधारण लोगों की जीवन के आदर्शों से आस्था टूट रही है।
  2. भाषा-शैली सरल, सहज और प्रवाहमयी है।।

3. सदा मनुष्य-बुद्धि नयी परिस्थितियों का सामना करने के लिए नये सामाजिक विधि-निषेधों को बनाती है, उनके ठीक साबित न होने पर उन्हें बदलती है। नियम कानून सबके लिए बनाए जाते हैं, पर सबके लिए कभीकभी एक ही नियम सुखकर नहीं होते। सामाजिक कायदे-कानून कभी युग-युग से परीक्षित आदर्शों से टकराते हैं इससे ऊपरी सतह आलोड़ित भी होती है, पहले भी हुआ है, आगे भी होगा। उसे देखकर हताश हो जाना ठीक नहीं है।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में सें अवतरित किया गया है। इसमें लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि युग-परिवर्तन के साथ जब नये नियम बनाए जाते हैं, तब उनका पुराने परखै नियमों के साथ टकराव भी होता है, जिससे समाज में उथल-पुथल होती है, परन्तु इससे निराश होने की आवश्यकता नहीं है।

व्याख्या:
लेखक का कथन है कि मनुष्य हमेशा ही नई परिस्थितियों का सामना करने के लिए अपनी बुद्धि द्वारा कार्यालय सम्बन्धी नियम बनाता है। यह प्रत्येक युग के अनुकूल करने योग्य एवं न करने योग्य’ सामाजिक नियमों की प्रतिष्ठा करता है। इन सामाजिक विधि-निषेधों के उचित होने पर वे समाज द्वारा अपना लिए जाते हैं और ठीक न सिद्ध होने पर उन्हें छोड़ दिया जाता है। मनुष्य की बुद्धि उन्हें बदलती है ये विधि-निषेध के नियम कायदे सामान्य होते हैं। सबके लिए होते हैं, परन्तु एक ही नियम कई बार सबके लिए उपयोगी और सुखदायक नहीं होता।

ये सामाजिक विधिनिषेध के कायदे-कानून पुराने परखे नियमों से टकराते भी हैं और वर्तमान नये नियमों और पुराने परीक्षित मूल्यों में संघर्ष होता है। इससे समाज की बाहरी सतह पर हलचल भी होती है, परंतु यह नई बात नहीं है। यह पहले भी होता आया है और आगे भी होता रहेगा। अतः वर्तमान माहौल को देखकर निराश होना उचित नहीं है क्योंकि यह स्वाभाविक है फिर यह नयी बात नहीं है।

विशेष:

  1. पुराने सामाजिक कायदे-कानून तथा नये कायदे-कानून में संघर्ष होता ही रहता है। इससे निराश नहीं होना चाहिए।
  2. भाषा-शैली सरल, सहज तथा प्रभावशाली है।

4. भारतवर्ष ने कभी भी भौतिक वस्तुओं के संग्रह को बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया है, उसकी दृष्टि से मनुष्य के भीतर जो महान् आन्तरिक तत्व स्थिर भाव से बैठा हुआ है, वही चरम और परम है। लोभ-मोह, काम क्रोध आदि विकास मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते हैं, पर उन्हें प्रधान शक्ति मान लेना और अपने मन तथा बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर छोड़ देना बहुत निकृष्ट आचरण है।

प्रसंग:
यह गद्यावतरण डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ से अवतरित है। इसमें बताया गया है कि भारत में भौतिक चीजें इकट्ठी करने को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।

व्याख्या:
लेखक कहता है कि भारतवर्ष में किसी भी युग में दुनियावी चीजें एवं इंद्रिय सुख के भौतिक पदार्थों को इकट्ठा करने को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया गया है। यहां सुख-साधन जुटाना बहुत ही सीमित रहा है। भारतीय मनीषियों ने आंतरिक तत्व को अधिक महत्त्व दिया है। उनकी दृष्टि शरीर की अपेक्षा आत्म तत्व पर अधिक रही है जो स्थिर एवं नित्य है। उसे ही यहां श्रेष्ठतम माना गया है। वे हमारे देश की संस्कृति भौतिक मूल्यों के स्थान पर आत्मिक, मानवीय एवं नैतिक मूल्यों को महत्त्व देती रही है। भौतिक पदार्थ नश्वर हैं तथा आंतरिक मानवीय मूल्य परम सत्य है।

इसमें संदेह नहीं कि मनुष्य में काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों का अस्तित्व स्वाभाविक है, परन्तु इन्हें प्रधान शक्ति मान लेना उचित नहीं है। इन्हें मन और बुद्धि पर हावी होने देना अथवा इन्हें मनमानी करने देना क्षुद्र आचरण कहा जायेगा। यह सदाचरण अथवा उच्चारण नहीं हो सकता।

विशेष:

  1. भारतीय विचारधारा में भौतिक वस्तुओं के संग्रह की अपेक्षा मनुष्य के भीतर के परम तत्व को जानने पर बल दिया गया है।
  2. भाषा-शैली तत्सम प्रधान होते हुए भी सुबोध है।

PSEB 12th Class Hindi Solutions Chapter 16 हजारी प्रसाद द्विवेदी

5. दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है। बुराई यह मालूम होती है कि किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करके उसमें रस लिया जाता है और दोषोद्धाटन को एकमात्र कर्तव्य मान लिया जाता है। बुराई में रस लेना बुरी बात है, अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से उद्धृत किया गया है। इसमें लेखक ने बताया है कि किसी के दोषों को सबके समक्ष लाने में कोई बुराई नहीं, बुराई इस बात में है कि साथ-साथ गुणों को उजागर नहीं किया जाता।

व्याख्या:
लेखक कहता है कि किसी व्यक्ति के दोषों को उजागर करने में कोई विशेष बुराई नहीं। बुराई तो इस बात में है कि किसी व्यक्ति की बुराइयों को उजागर करने में ही रस लिया जाता है तथा दोषों को उजागर करने वाला यह समझने लगता है कि उसका कर्तव्य तो अमुक व्यक्ति की बुराइयों को उद्घाटित करना मात्र है। मनुष्य किसी के गुणों को उजागर करने में कतई रस नहीं लेता। आज यह उसका स्वभाव ही बन गया है। बुराई में रस लेना बुरी बात है, मगर किसी की अच्छाई को उतना ही रस लेकर लोगों के सामने प्रकट न करना उससे भी बुरी बात है।

विशेष:

  1. लेखक के अनुसार केवल दोषों को ही नहीं गुणों को भी उजागर किया जाना चाहिए। बुराई में रस लेना बुरी बात है।
  2. भाषा-शैली सरल और प्रवाहपूर्ण है।

6. मैं भी बहुत भयभीत था, पर ड्राइवर को किसी तरह मार-पीट से बचाया। डेढ़-दो घंटे बीत गए। मेरे बच्चे भोजन और पानी के लिए व्याकुल थे। मेरी और पत्नी की हालत बुरी थी। लोगों ने ड्राइवर को मारा तो नहीं, पर उसे बस से उतारकर एक जगह घेरकर रखा। कोई भी दुर्घटना होती है तो पहले ड्राइवर को समाप्त कर देना उन्हें उचित जान पड़ा। मेरे गिड़गिड़ाने का कोई विशेष असर नहीं पड़ा। इसी समय क्या देखता हूँ कि एक खाली बस चली आ रही है और उस पर हमारा बस कंडक्टर भी बैठा हुआ है।।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इन पंक्तियों में लेखक ने आज के भारत में प्रत्येक मानव पर संदेह करने की प्रवृत्ति को दर्शाया है।

व्याख्या:
यहां लेखक का कहना है कि बस के अचानक सुनसान जगह पर रुक जाने के कारण वह बहुत डरा हुआ था, किन्तु बस के ड्राइवर को बड़ी ही कठिनाई से पिटने से बचा लिया। बस को रुके लगभग डेढ़ से दो घंटे बीत चुके थे। बच्चे भूख से बेहाल और पानी के लिए तड़प रहे थे। स्वयं मेरी और मेरी धर्मपत्नी की दशा अत्यन्त विकट हो रही थी। यात्रियों ने ड्राइवर को मारने की बजाय, उसे नीचे उतारकर एक स्थान पर चारों ओर से उसे घेर लिया ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि यदि कोई अप्रिय बात होती तो वे सबसे पहले ड्राइवर को ही मृत्युदंड देते। लेखक पुनः कहता है कि उसकी प्रार्थना और विनय का कोई विशेष प्रभाव यात्रियों पर नहीं पड़ा। सहसा लेखक देखता है कि एक खाली बस हमारी ओर चली आ रही है और उस पर कंडक्टर भी बैठा हुआ है।

विशेष:

  1. लेखक ने मनुष्य को संदेह करने की प्रवृत्ति को दर्शाया है।
  2. शब्द एवं वाक्य योजना सटीक है। भाषा सरल सहज एवं भावों के अनुरूप है।

कठिन शब्दों के अर्थ

मन बैठ जाना = उदास हो जाना, निराश हो जाना। तस्करी = स्मग्लिंग–किसी प्रतिबन्धित वस्तु का दूसरे से देश में अवैध तरीके से चोरी छिपे लाना। भ्रष्टाचार = बुरा आचरण, बेईमानी। आरोप-प्रत्यारोप = एक-दूसरे पर दोष लगाना। अतीत = बीता हुआ समय। निरीह = बेचारा, निर्दोष। गह्वर = गुफा, खोह। मनीषियों = विद्वानों। माहौल = वातावरण। श्रमजीवी = मज़दूर। फरेब = धोखा। पर्याय = बदल। भीरू = डरपोक। आस्था = श्रद्धा, विश्वास। मनुष्य-निर्मित = मनुष्य द्वारा बनाई गई। त्रुटियों = गलतियों, कमियों। विधि-निषेध = कानून द्वारा निषिद्ध, यह करो वह न करो। साबित = प्रमाणित । कायदे = नियम। आलोड़ित = मथा हुआ। हताश = निराश। निकृष्ट = नीच। गुमराह = भटका हुआ। दरिद्रजनों = ग़रीबों। कोटि-कोटि = करोड़ों। सुविधा = आराम। पैमाना = स्तर। विधान = कानून। विकार = दोष। विस्तृत = बढ़ना, फैलना। दकियानूसी = पुराने विचारों का। धर्मभीरू = धार्मिक दृष्टि से डरपोक। संकोच = झिझक। पर्याप्त = काफी। आक्रोश = क्रोध। साबित करना = प्रमाणित करना। प्रतिष्ठा = सम्मान । पर्दाफाश करना == भेद खोलना। उद्घाटित करना = खोलकर सामने रखना। दोषोद्घाटन = दोषों को प्रकट करना। उजागर करना = प्रकट करना। गंतव्य = जहां पहुंचना/जाना हो। हिसाब बनाना = मन बनाना। कातर = व्याकुल, भयभीत।

क्या निराश हुआ जाए? Summary

क्या निराश हुआ जाए? जीवन परिचय

हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय लिखें।

हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म गाँव आरतदुबे का छपरा, जिला बलिया (उत्तर प्रदेश) में सन् 1907 में हुआ। संस्कृत विश्वविद्यालय काशी से शास्त्री की परीक्षा तथा हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त कर काशी विश्वविद्यालय तथा पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी-विभागाध्यक्ष रहे। इन्हें ‘आलोकपर्व’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण अलंकार से सम्मानित किया गया था। इनका साहित्य मानवतावाद एवं भारतीय संस्कृति से युक्त है। सन् 1979 में दिल्ली में उनका निधन हो गया।
अशोक के फूल, विचार और वितर्क, कल्पलता, कुटज, आलोक पर्व इनके निबन्ध संग्रह हैं। चारूचन्द्रलेख, बाणभट्ट की आत्मकथा, अनामदास का पोथा इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। सूर-साहित्य, हिन्दी-साहित्य की भूमिका इनके आलोचनात्मक ग्रन्थ हैं।

क्या निराश हुआ जाए? निबन्ध का सार

‘क्या निराश हुआ जाए ?’ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित विचारात्मक निबन्ध है, जिसमें लेखक ने देश की सामाजिक बुराइयों पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया है कि समाचार पत्रों को बुराइयों के साथ-साथ अच्छाइयों को भी उजागर करना चाहिए। लेखक का मन समाचार-पत्रों में ठगी, डकैती, चोरी, तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचार पढ़कर कभी-कभी बैठ जाता है। इन्हें पढ़कर लगता है कि देश में ईमानदार आदमी रह ही नहीं गया है। लेखक को एक बड़े आदमी ने एक बार कहा था कि जो आदमी कुछ नहीं करता वह अधिक सुखी है क्योंकि उसके किए काम में कोई दोष नहीं निकालता। लेखक को भारत की ऐसी हालत देखकर दुःख होता है किन्तु लेखक को विश्वास है कि हमारे महान् मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा। यह सच है कि इन दिनों कुछ ऐसा वातावरण बन रहा है कि ईमानदारी करके कमाने वाले मज़दूर पिस रहे हैं और धोखे का धन्धा करने वाले फल फूल रहे हैं।

लेखक का विचार है जो ऊपर से दिखाई देता है वह मनुष्य द्वारा ही बनाया गया है। मनुष्य सामाजिक नियमों को परिस्थिति अनुसार बदलता भी रहता है। इस बदलाव को देखकर निराश होना ठीक नहीं है। भारत वर्ष ने कभी भी सांसारिक वस्तुओं के संग्रह को महत्त्व नहीं दिया बल्कि उसने आत्मा को चरम और परम माना। लोभ-मोह आदि विकारों के वश में होना उसने कभी उचित नहीं माना। इन विचारों को संयम के बँधन से बाँधने का प्रयत्न किया। परन्तु भूख की, बीमार के लिए दवा की और भटके हुए को रास्ते पर लाने के उपायों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

लेखक कहते हैं कि व्यक्ति का चित्त हर समय आदर्शों पर नहीं चलता। मनुष्य ने जितने भी उन्नति के कानून बनाए उतने ही लोभ-मोह आदि विकार बढ़ते गए। आदर्शों का मजाक उड़ाया गया और संयम को दकियानूसी कहा गया। परन्तु इससे भारतीय आदर्श अधिक स्पष्ट और महान् दिखाई देने लगे।

भारतवर्ष में कानून को धर्म का दर्जा दिया गया किन्तु कानून और धर्म में अन्तर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता कानून को दिया जा सकता है। इसी कारण से धर्मभीरू कानून की कमियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते। भारतवर्ष में अब भी यह अनुभव किया जाता है कि धर्म कानून से बड़ी चीज़ है। भ्रष्टाचार आदि के प्रति लोगों का क्रोध यह सिद्ध करता है कि लोग इसे गलत समझते हैं। सैंकड़ों घटनाएँ आज भी घटती हैं जो लोक-चित्त में अच्छाई की भावना को जगाती हैं। लेखक ने ऐसी दो घटनाओं का उल्लेख किया जिनमें पहली रेलवे के एक टिकट बाबू की ईमानदारी और दूसरी एक बस कंडक्टर की मानवीयता को उजागर करने वाली घटना शामिल है। इन घटनाओं का उल्लेख करते हुए लेखक कहते हैं कि निराश होने की ज़रूरत नहीं है। भारत में अब भी सच्चाई और ईमानदारी मौजूद है।