Punjab State Board PSEB 8th Class Hindi Book Solutions Hindi Grammar Bhav Vachak Sangya भाववाचक संज्ञा Exercise Questions and Answers, Notes.
PSEB 8th Class Hindi Grammar भाववाचक संज्ञा
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Punjab State Board PSEB 8th Class Hindi Book Solutions Hindi Grammar Bhav Vachak Sangya भाववाचक संज्ञा Exercise Questions and Answers, Notes.
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Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 24 उपेक्षिता Textbook Exercise Questions and Answers.
Hindi Guide for Class 12 PSEB उपेक्षिता Textbook Questions and Answers
(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दो:
प्रश्न 1.
कमला का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर:
कमला लड़की को जन्म देना बुरा नहीं समझती क्योंकि वह स्वयं अपने माँ-बाप की सबसे बड़ी बेटी है। उसके पिता तो लडकियों को माँ-बाप को सुख देने वाली मानते हैं। कमला लोगों की सहानुभूति, दिलासे की कोई परवाह नहीं करती। वह अपनी मौसी सास की टिप्पणियों की परवाह न कर बेटी को छाती से लगाते हुए सोचती है कि उसके लिए यह बेटी तो बेटों से भी बढ़कर है।
प्रश्न 2.
लेखक के मित्रों ने लड़की पैदा होने पर अपने उद्गार कैसे पेश किए ?
उत्तर:
लेखक के मित्र मिस्टर चोपड़ा ने लेखक को चुप और परेशान हाल में देखकर कहा–’एक ही तो होना था, लड़का या लड़की।’ भले ही उनकी आवाज़ धीमी और ढीली थी। मिसेज़ चोपड़ा ने लड़के और लड़की में कोई फर्क न होने की बात कह कर लेखक के तनाव को कुछ कम किया। मिसेज़ सहगल ने कहा हमारी भी तो दो लड़कियाँ हैं। सहगल साहब ने तो कभी सोचा भी नहीं अतः लड़की होने की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। मिस्टर गुप्ता ने सान्त्वना देते हुए कहा भगवान् ने चाहा तो एक छोड़ अनेक लड़के भी हो जाएँगे। मिसेज़ गुप्ता ने कहा कि लड़की होने से घबराने की कोई आवश्यकता नहीं।
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प्रश्न 3.
कमला के माँ-बाप ने लड़की पैदा होने पर उसे कैसे सांत्वना दी ?
उत्तर:
कमला के पिता ने लेखक को सान्त्वना देते हुए कहा कि बड़े खुश किस्मत हो, जो तुम्हारी पहली सन्तान बेटी है। लड़कियाँ ही माँ-बाप को सुख देने वाली होती हैं । कमला ने जितना सुख हमें दिया है, बस मैं ही जानता हूँ और साथ ही पंजाबी की एक लोकोक्ति भी सुना दी, जिस का अर्थ था कि यदि तू अपना सुख चाहता है तो तेरी पहली सन्तान लड़की हो।
(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दो:
प्रश्न 4.
उपेक्षिता कहानी का सार अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया सार।
प्रश्न 5.
‘परिवार में लड़की का पैदा होना ठीक क्यों नहीं समझा जाता’ उपेक्षिता कहानी के आधार पर इस तथ्य की पुष्टि करें।
उत्तर:
हमारे समाज में लड़की के जन्म को अभी भी एक अभिशाप समझा जाता है। इक्कीसवीं सदी शुरू हो गई किन्तु भ्रूण-हत्या आज भी हो रही है। सदियों से चली आ रही रूढ़ियों को हम बदल नहीं सके हैं। लड़के के जन्म पर लड्डू बाँटे जाते हैं, लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है जबकि लड़की को उपेक्षिता समझा जाता है। भले ही आज लड़की और लड़के में कोई भेद नहीं समझा जाता। किरण बेदी जैसी लड़कियाँ उच्च पदों पर पहुँच कर अपनी कार्यक्षमता का परिचय दे रही हैं किन्तु हमारी मानसिकता अभी तक बदली नहीं है। प्रस्तुत कहानी में अस्पताल की नर्स का व्यवहार और वहाँ मौजूद एक बूढी औरत का यह कहना कि ‘तैयारी तो लड़के की थी पर हुई लड़की’ इसी मानसिकता की ओर संकेत करता है। लेखक के पिता का कोई बात नहीं कहना तथा रिश्तेदारों को लड़की के जन्म की सूचना तार द्वारा न भेजकर पोस्टकार्ड द्वारा भेजने को कहना तथा रिश्तेदारों का उत्तर में बधाई न देना भी इसी मानसिकता की ओर संकेत करता है। मित्रों का सान्त्वना देना भी इसी बात का परिचायक है कि हमारे समाज में घर में लड़की का जन्म ठीक नहीं माना जाता।
(ग) सप्रसंग व्याख्या करो:
प्रश्न 6.
“कपड़े लत्ते तो बेचारों ने बहुत अच्छे ही बनाये हैं, तैयारी तो लड़के की थी, पर हुई लड़की।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता द्वारा लिखित कहानी ‘उपेक्षिता’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ अस्पताल में उपस्थित एक बुढ़िया ने नर्स को बच्ची का सामान देते देख कर अपनी साथ वाली औरत से कही हैं।
व्याख्या:
अस्पताल में जब लेखक नर्स को बच्ची का सामान दे रहा था तो वहाँ उपस्थित एक बुढ़िया ने पास वाली औरत से कहा कि बेचारों ने कपड़े-लत्ते तो बहुत अच्छे बनाए थे, जिन्हें देखकर लगता है कि उन्होंने तैयारी तो लड़के की की थी अर्थात् उन्हें लड़का पैदा होने की उम्मीद थी किन्तु हुई लड़की।
प्रश्न 7.
“लड़कियाँ तो पैदा होने के वक्त से ही माँ का खून चूसने लगती हैं। जान बच जाए तो समझो बड़ी बात है।”
उत्तर:
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता द्वारा लिखित कहानी ‘उपेक्षिता में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ लेखक से अस्पताल में मौजूद एक बूढ़ी औरत ने कही हैं जो लड़की के जन्म पर अपने अनुभव बता रही है।
व्याख्या:
अस्पताल में उपस्थित बूढी औरत ने लेखक से लड़की के जन्म लेने पर अपने अनुभव का वर्णन करते हुए कहा कि लड़कियाँ तो पैदा होते ही अपनी माँ का खून चूसने लगती हैं अर्थात् माँ को उसके विवाह दहेज की चिन्ता सताने लगती है। लड़की की और उसकी माँ की जान बच जाए तो इसे ही बड़ी बात समझना चाहिए।
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प्रश्न 8.
“ओ तीवी सुलछ्छनी, जेहड़ी जम्मे पहली लछछमी।”
उत्तर:
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्ति श्री वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता द्वारा लिखित कहानी ‘उपेक्षिता’ में से ली गई है। प्रस्तुत पंक्ति लेखक की माँ ने लेखक की पत्नी कमला के सिर हाथ फेरते हुए उसे सान्त्वना देते हुए कही है।
व्याख्या:
लेखक की माँ ने उसकी पत्नी को बेटी के जन्म लेने पर सान्त्वना देते हुए कहा कि वही स्त्री सुलक्षणों वाली होती है जो पहली कन्या अर्थात् लक्ष्मी को जन्म दे।
प्रश्न 9.
“मैं तो कहती हूँ लड़की हो या लड़का, पर हो किस्मत वाला।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति श्री वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता द्वारा लिखित कहानी ‘उपेक्षिता’ में से ली गई है। प्रस्तुत पंक्ति मिसेज़ चोपड़ा ने लेखक और उसकी पत्नी को सान्त्वना देते हुए कही है।
व्याख्या:
लड़की और लड़के में कोई अन्तर न होने की बात को आगे बढ़ाते हुए मिसेज़ चोपड़ा कहती हैं कि लड़की हो या लड़का किन्तु होना चाहिए किस्मत वाला क्योंकि सब अपनी-अपनी किस्मत लेकर आते हैं। परोक्ष में मिसेज़ चोपड़ा लेखक और उसकी पत्नी को दिलासा दिला रही है।
PSEB 12th Class Hindi Guide उपेक्षिता Additional Questions and Answers
अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
डॉ० वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
सन् 1930 ई० में रावलपिंडी (पाकिस्तान)में।
प्रश्न 2.
डॉ० मेंहदीरत्ता का योगदान किस साहित्यिक विधा के लिए सराहनीय है?
उत्तर:
रंगमंच।
प्रश्न 3.
डॉ० वीरेन्द्र ने चंडीगढ़ में किस संस्था की स्थापना की थी?
उत्तर:
‘अभिनेत’ नाट्य संस्था की।
प्रश्न 4.
माँ ने पहली लड़की को क्या कहा था?
उत्तर:
लक्ष्मी।
प्रश्न 5.
लेखक को पिता के द्वारा कहा गया कौन-सा वाक्य समझ नहीं आया था?
उत्तर:
कोई बात नहीं।
प्रश्न 6.
लड़की के जन्म की सूचना किस तरह देने के लिए कहा गया था?
उत्तर:
तार से नहीं बल्कि पोस्टकार्ड से।
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प्रश्न 7.
किसने कहा था कि आजकल लड़के और लड़की में कोई अंतर नहीं होता।
उत्तर:
मिसेज़ चोपड़ा ने।
प्रश्न 8.
चंडीगढ़ से बाहर रहने वालों ने किस तरह से बधाई दी थी?
उत्तर:
चंडीगढ से बाहर वालों ने खत लिखा लेकिन बधाई नहीं दी थी।
प्रश्न 9.
कौन लोगों की सहानुभूति-दिलाने की परवाह नहीं करती थी?
उत्तर:
कमला।
प्रश्न 10.
लड़की होने पर किसने न घबराने की बात कही थी?
उत्तर:
मिसेज गुप्ता ने।
प्रश्न 11.
किसने कहा था कि लड़कियाँ ही माँ-बाप को सुख देने वाली होती हैं ?
उत्तर:
कमला के पिता ने।
प्रश्न 12.
अस्पताल में बूढी औरत ने लड़कियों के जन्म होने पर क्या कहा था?
उत्तर:
लड़कियाँ तो पैदा होने के वक्त से ही माँ का खून पीने लगती हैं।
प्रश्न 13.
किस ने कहा था कि वही स्त्री सुलक्षणों वाली होती है कन्या को जन्म देती है ?
उत्तर:
लेखक की माँ ने।
प्रश्न 14.
लेखक के प्रसिद्ध कहानी संग्रहों के नाम लिखिए।
उत्तर:
शिमले की क्रीम, खरोंच, मिट्टी पर नंगे पांव, सिद्धार्थ से पूछूगा।
वाक्य पूरे कीजिए
प्रश्न 15.
…………………….पर हुई लड़की।
उत्तर:
तैयारी तो लड़के की थी।
प्रश्न 16.
मैं तो कहती हूँ लड़की हो या लड़का……
उत्तर:
पर हो किस्मत वाला।
प्रश्न 17.
ओ तीवीं सुलछ छनी………..
उत्तर:
जेहड़ी, जम्मे पहली लछछमी।
हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए
प्रश्न 18.
लेखक के घर लड़के ने जन्म लिया था।
उत्तर:
नहीं।
प्रश्न 19.
कमला के पिता ने लड़की का जन्म लेना अच्छा माना था।
उत्तर:
हाँ।
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प्रश्न 20.
लड़की के जन्म की सूचना तार से दी गई।
उत्तर:
नहीं।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
1. उपेक्षिता किस विद्या की रचना है ?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) रेखाचित्र
(घ) संस्मरण
उत्तर:
(क) कहानी
2. लेखक के अनुसार बच्चे किसका रूप होते हैं ?
(क) मां का
(ख) पिता का
(ग) भगवान का
(घ) दादा का
उत्तर:
(ग) भगवान का
3. उपेक्षित कहानी का केन्द्र बिन्दु कौन है ?
(क) लड़की
(ख) लड़का
(ग) सैनिक
(घ) किसान
उत्तर:
(क) लड़की
4. ‘वीरेन्द्र मेहंदीरत्ता’ किस विद्या के प्रमुख लेखक हैं ?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) रंगमंच
(घ) रेखाचित्र
उत्तर:
(ग) रंगमंच
उपेक्षिता जीवन परिचय
डॉ० वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता का जीवन परिचय लिखिए।
डॉ० वीरेन्द्र मेंहदीरत्ता का जन्म सन् 1930 में रावलपिण्डी (पाकिस्तान)में हुआ। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम० ए० किया। पंजाब विश्वविद्यालय से पीएच० डी० की डिग्री प्राप्त की। आपने लगभग 40 वर्ष तक राजकीय कॉलेज लुधियाना और पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग में पढ़ाया। आप पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से प्रोफेसर के पद से रिटायर हुए। कहानी के क्षेत्र के अतिरिक्त नाटक और रंगमंच में भी आप का योगदान सराहनीय है। चण्डीगढ़ में ‘अभिनेत’ नाट्य संस्था के आप संस्थापक हैं। शिमले की क्रीम, पुरानी मिट्टी नए ढाँचे, मिट्टी पर नंगे पाँव, खरोंच, सिद्धार्थ से पूछूगा-आपके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।
उपेक्षिता कहानी का सार
‘उपेक्षिता’ कहानी का सार 150 शब्दों में लिखें।
लेखक के घर एक लड़की ने जन्म लिया है। उसकी सुन्दरता को देख लेखक सोचता है कि बच्चे सचमुच भगवान् का रूप होते हैं किन्तु समाज में लड़की को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। अस्पताल की नर्स ने भी लड़की के जन्म की खबर सुनाना भी उचित नहीं समझा था। वहाँ उपस्थित एक बुढ़िया ने भी कहा-तैयारी तो लड़के की थी, पर हुई लड़की। समाज में लड़की को जन्म देना कष्टदायक माना जाता है जबकि लड़के को जन्म देने पर माँ अपनी तकलीफ़ भूल जाती है। लेखक सोचता है कि क्या उसकी पत्नी कमला भी ऐसे ही सोचती होगी? वह तो अपने माँ-बाप की सबसे बड़ी बेटी है। कमला के पिता ने भी लड़की के जन्म को अच्छा माना था। माँ ने भी पहली लड़की को लक्ष्मी कहा था। पर पिता ने कहा था कोई बात नहीं, घर में लक्ष्मी आई है। लेखक को ‘कोई बात नहीं’ का अर्थ समझ में नहीं आया। लगा कि वे लेखक को तसल्ली दे रहे हों और अपने मन को समझा रहे हों। इसी कारण लड़की के जन्म की सूचना तार द्वारा न भेजकर पोस्टकार्ड द्वारा भेजने को कहा था।
चण्डीगढ़ में जैसे-जैसे लोगों को पता चला-वे मिलने आने लगे। मिसेज़ चोपड़ा ने जब कहा कि आजकल लड़के और लड़की में कोई अन्तर नहीं होता तब लेखक का तनाव कुछ कम हुआ। लेखक के एक मित्र ने कहा कि लड़की के जन्म पर उसे चिन्तित नहीं होना चाहिए। चण्डीगढ़ से बाहर के रिश्तेदारों ने खत ज़रूर लिखा पर बधाई नहीं दी। उन्होंने अनेक प्रकार की बातें लिखीं पर लेखक की पत्नी ने बेटी को छाती से लगाते हुए कहा- मेरे लिए यह बेटी बेटों से भी बढ़कर है।
Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 23 ठेस Textbook Exercise Questions and Answers.
Hindi Guide for Class 12 PSEB ठेस Textbook Questions and Answers
(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दो:
प्रश्न 1.
‘ठेस’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर अपने विचार प्रकट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी का शीर्षक संक्षिप्त, सटीक और सार्थक है। सिरचन एक ग्रामीण कलाकार है, भले ही लोग उसे मुफ्तखोर, कामचोर या चटारे कहते हैं, किंतु वह अपनी कला में माहिर है। सिरचन एक स्वाभिमानी व्यक्ति है। चाची की जली-कटी सुनकर उसके स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है। वह नई धोती का मोह त्याग कर अधूरा काम छोड़ कर लौट आता है। वह कलाकार का, कला का अपमान नहीं सहन कर सकता। लेखक भी मानता है कि कलाकार के दिल में ठेस लगी है।
प्रश्न 2.
ठेस कहानी के आधार पर सिरचन का चरित्र-चित्रण करें।
उत्तर:
सिरचन एक ग्रामीण कलाकार है। चिक, शीतलपाटी, कुशासन आदि बनाने में माहिर। उसकी कला के कारण ही बड़े-बड़े लोग उसकी खुशामद करते हैं। सिरचन को गाँव वाले मुफ्तखोर, कामचोर और चटोर समझते हैं, किंतु वह कामचोर नहीं मुँहजोर अवश्य है। वह ठीक से सेवा न होने पर उच्चजाति वालों को भी बेइज्जत करने से नहीं झिझकता। सिरचन बड़ा स्वाभिमानी है, लेखक की चाची से सुगन्धित जर्दा माँगने पर जली-कटी सुनकर उसके हृदय को ठेस लगती है और वह काम छोड़कर चला जाता है। किन्तु अपनी कोमल हृदयता और आत्मीयता का परिचय देते हुए मानू को स्टेशन पर शीतपाटियाँ, चिकें और कुशासन देने पहुँच जाता है बदले में वह किसी प्रकार का प्रतिदान भी स्वीकार नहीं करता।
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प्रश्न 3.
सिरचन किस बात से नाराज़ होकर काम छोड़कर चला जाता है ?
उत्तर:
एक दिन सिरचन लेखक की बहन के लिए शीतलपाटी और चिक बना रहा था कि एक दिन मानू ने उसे पान का बीड़ा दिया। पान खाते समय सिरचन ने चाची से गमकौआ जर्दा माँग लिया। इस पर चाची भड़क उठी। उसने सिरचन को भला-बुरा कहा। यह सुनकर सिरचन के हृदय को ठेस लगी। वह अधूरा काम छोड़ अपनी छुरी, हँसिया उठाकर वहाँ से चला गया।
प्रश्न 4.
लेखक द्वारा मनाने पर भी न आने वाला सिरचन स्वयं ही मानू के लिए स्टेशन पर शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी कुश को क्यों पहुँचाता है ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
कामचोर, चटोरा तथा मुँहजोर कहलाने वाला सिरचन एक कलाकार था; कोमल हृदय वाला कलाकार। अपनी कला का अपमान होते देख उसके हृदय को ठेस लगती है पर मानू के प्रति उसके हृदय में आत्मीयता का भाव भी है। वह काकी की सबसे छोटी बेटी थी और उसका दूल्हा अफसर। फिर मानू ने तो उसे ठेस नहीं पहुँचाई थी बल्कि उसने तो उसे पान का बीड़ा लाकर दिया था। इसलिए मानू से स्नेह होने के कारण वह उसके लिए शीतलपाटी आदि लेकर स्टेशन पहुँचा था। बदले में वह किसी प्रतिदान को भी स्वीकार नहीं करता।
(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दो:
प्रश्न 5.
‘ठेस’ कहानी का सार अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया सार।
प्रश्न 6.
‘ठेस’ कहानी कलाकार की संवेदनशीलता की कहानी है, स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी में एक सच्चे कलाकार की कोमल भावनाओं और कारुणिक जीवन गाथा का मार्मिक चित्रण किया गया है। सिरचन एक कलाकार है। वह शीतलपाटी, चिक और कुशासन बनाने में माहिर है। बड़े-बड़े लोग उसकी खुशामद करते हैं, किन्तु वह चटोर है। एक बार तो उसने ब्राह्मण चौधरी के लड़के को कम परोसने पर बेइज्जत कर दिया था। सिरचन एक सच्चा कलाकार है। अपने काम के दौरान किसी की टोका-टाकी सहन नहीं कर सकता। सिरचन को लोग चटोर भी समझते थे। उसको बुलाने से पहले तली बघारी हुई तरकारी, दही की कढ़ी, मलाई वाले दूध का प्रबन्ध पहले से ही करना पड़ता था।
लेखक की सबसे छोटी बहन मानू पहली बार ससुराल जा रही थी। उसके दूल्हे ने चिक और शीतलपाटी भेजने की फरमाईश की थी। सिरचन के खाने-पीने का प्रबन्ध करके उसे काम पर बुलाया गया। सिरचन ने काम शुरू किया। लगता है कि बहुत बढ़िया वस्तुएँ बन रही हैं। इसी बीच मानू ने उसे पान दिया तो उसने चाची से सुगन्धित जर्दा माँग लिया जिस पर चाची ने उसे जली-कटी सुनाई। चाची की बातों से कलाकार सिरचन के हृदय को ठेस लगी। वह काम छोड़ कर चला गया। किन्तु मानू के ससुराल जाते समय शीतलपाटी, चिक और कुशासन सौंप कर अपनी संवदेनशीलता का परिचय दिया। उसने मोहर वाली धोती के दाम भी लेने से इनकार कर दिया।
(ग) सप्रसंग व्याख्या करें:
7. “बड़ी बात ही है बिटिया, बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो-दो पटेर की पाटियों का काम सिर्फ खंसारी का सत्तू खिलाकर कोई करवाए भला ? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है।”
उत्तर:
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ सिरचन ने महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी को कही हैं जो सिरचन की किसी कड़ी बात पर तिलमिला कर कहती है कि इतनी बड़ी बात।
व्याख्या:
सिरचन ने भज्जू की बेटी से कहा कि बड़ी बात ही है बेटी। बड़े आदमियों की बस बातें ही बडी होती हैं अर्थात् उनके कर्म और व्यवहार में बड़प्पन नहीं होता। यदि व्यवहार में बड़प्पन होता तो क्या दो-दो पटेर की पाटियाँ कोई सिर्फ खसारी का सत्तू खिला कर बनवा सकता है। यह काम तो तुम्हारी माँ ही करवा सकती है। सिरचन का स्पष्ट संकेत है कि उसे थोड़ा-सा खिला कर अधिक काम लिया जाता है।
विशेष:
8. “बबुआ जी! अब नहीं। कान पकड़ता हूँ, अब नहीं। मोहर छाप वाली धोती लेकर क्या करूँगा ? कौन पहनेगा ? ससुरी खुद मरी, बेटे-बेटियों को भी ले गई अपने साथ। बबुआ जी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता। यह शीतलपाटी को छूकर कहता हूँ, अब यह काम नहीं करूँगा।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ सिरचन ने लेखक से कही हैं, जब वह काम बीच में ही छोड़ आने पर उसे मनाने के लिए गया था। – व्याख्या-सिरचन ने लेखक से कहा कि मैं कान पकड़ता हूँ कि अब चिक आदि बनाने का काम नहीं करूँगा। आपकी माँ ने मुझे जो मोहर छाप वाली नई धोती देने का वादा किया था, उसे लेकर मैं क्या करूँगा। कौन पहनेगा उसे। मेरी पत्नी स्वयं तो मरी ही साथ में बेटे-बेटियों को भी ले गई। बबुआ जी, मेरी पत्नी यदि जीवित होती तो मैं ऐसी दुर्दशा को क्यों भोगता अर्थात् घर-घर काम करने क्यों जाता। यह शीतलपाटी उसी की बनी हुई है इसी को छू कर कहता हूँ कि अब मैं यह काम नहीं करूँगा।
विशेष:
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9. खिड़की के पास खड़े होकर सिरचन ने हकलाते हुए कहा-यह मेरी ओर से है। सब चीज़ है दीदी। शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी कुश की। गाड़ी चल पड़ी।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ द्वारा लिखित कहानी ‘ठेस’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ कहानी के अंत में सिरचन द्वारा लेखक की छोटी बहन मानू को अपनी तरफ से चिक आदि भेंट करने के समय की हैं।
व्याख्या-सिरचन मन को ठेस लगने पर लेखक के घर से काम छोड़ कर चला आता है, किंतु हृदय की कोमलता और आत्मीयता के कारण मानू के ससुराल जाते समय उसके लिए चिक आदि तैयार कर उसे भेंट करने पहुँच जाता है। गाड़ी की खिड़की के पास खड़े होकर सिरचन ने रुक-रुक कर बोलते हुए कहा यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए भेंट है। इस बंडल में वह सब चीज़ है जो तुम्हारे दूल्हा ने मंगवाई थीं। शीतलपाटी, चिक और जोड़ी कुशासन की। सिरचन के इतना कहते ही गाड़ी चल पड़ी।
विशेष:
प्रश्न 10.
‘ठेस’ कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
उत्तर:
‘ठेस’ कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चे कलाकार का दिल नहीं दुखाना चाहिए। जब उस के दिल को ठेस लगती है तो वह बढ़िया से बढ़िया खाने, अच्छे पैसों आदि की भी चिंता न करते हुए काम करने से इनकार कर देता है, जैसा कि सिरचन ने चाची के ताने सुनकर किया था। कलाकार का हृदय बहुत कोमल होता है इसलिए वह मानू को विदाई के अवसर पर स्टेशन पर ही भेंट स्वरूप चिक आदि दे देता है।
PSEB 12th Class Hindi Guide ठेस Additional Questions and Answers
अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
‘ठेस’ शीर्षक कहानी किसके द्वारा रचित है?
उत्तर:
फणीश्वर नाथं ‘रेणु’।
प्रश्न 2.
फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ का जन्म कहाँ और कब हुआ था?
उत्तर:
बिहार के पूर्णिया जिले में 11 फरवरी, सन् 1921 को।
प्रश्न 3.
रेणु जी की शिक्षा कहाँ-कहाँ हुई थी?
उत्तर:
रेणु जी की शिक्षा विराट नगर नेपाल तथा हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में हुई थी।
प्रश्न 4.
सिरचन कहां का कारीगर था?
उत्तर:
सिरचन गाँव का एक कारीगर था।
प्रश्न 5.
गाँव वाले सिरचन को किस नाम से पुकारते थे?
उत्तर:
गाँव वाले सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर और चटोर कहकर पुकारते थे।
प्रश्न 6.
सिरचन के काम करते समय टोक देने पर वह क्या करता था?
उत्तर:
सिरचन गुस्से में फुफकार उठता था और काम छोड़कर चल देता था।
प्रश्न 7.
ठेस कहानी में लेखक की छोटी बहन का क्या नाम है ?
उत्तर:
मानू।
प्रश्न 8.
दूल्हे ने क्या लेने की फरमाइश की थी?
उत्तर:
दूल्हे ने तीन जोड़ी चिक-चिक और पटेर की दो शीतल पाटियों की फरमाइश की थी।
प्रश्न 9.
सिरचन को क्या देने का वायदा किया गया था?
उत्तर:
असली मोहर छाप वाली नई धोती देने का वायदा किया गया था।
प्रश्न 10.
मानू ने चुपके से सिरचन को क्या दिया था?
उत्तर:
पान का बीड़ा।
प्रश्न 11.
किस की बात से सिरचन के मन को ठेस लगी थी?
उत्तर:
चाची की बात से सिरचन के मन को ठेस लगी थी।
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प्रश्न 12.
सिरचन सारा सामान देने के लिए कहाँ पहुँच गया था?
उत्तर:
रेलवे स्टेशन पर।
प्रश्न 13.
मानू फूट-फूट कर क्यों रोने लगी थी?
उत्तर:
अपनत्व के भाव के कारण।
वाक्य पूरे कीजिए
प्रश्न 14.
बबुआ जी। अब नहीं…..
उत्तर:
कान पकड़ता हूँ, अब नहीं।
प्रश्न 15.
यह शिलापाटी को छू कर कहता हूँ..
उत्तर:
अब यह काम नहीं करूंगा।
प्रश्न 16.
सब चीज़ है……..।
उत्तर:
दीदी।
हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए
प्रश्न 17.
कलाकार का दिल वास्तव में ही बहुत कोमल होता है।
उत्तर:
हाँ।
प्रश्न 18.
सब चीज़ है भैया।
उत्तर:
नहीं।
बोर्ड परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
प्रश्न 1.
‘ठेस’ कहानी के लेखक का नाम लिखें।
उत्तर:
फणीश्वर नाथ रेणु।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
1. फनीश्वर नाथ रेणु कैसे उपन्यासकार थे ?
(क) आंचलिक
(ख) व्यंग्यात्मक
(ग) संस्मरणात्मक
(घ) रचनात्मक
उत्तर:
(क) आंचलिक
2. रेणु का पहला आंचलिक उपन्यास कौन-सा है ?
(क) आँचल
(ख) मैला आँचल
(ग) तीसरी कसम
(घ) ठेस।
उत्तर:
(ख) मैला आँचल
3. मानू किस कारण फूट-फूट कर रोने लगी ?
(क) अपनत्व के
(ख) मानवता के
(ग) सेवा के
(घ) सुरक्षा के
उत्तर:
(क) अपनत्व के
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4. सिरचन क्या था ?
(क) सैनिक
(ख) कारीगर
(ग) सेवक
(घ) विद्यार्थी
उत्तर:
(ख) कारीगर
कठिन शब्दों के अर्थ
मुफ्तखोर = मुफ्त की खाने वाला। चटोर = लालची, स्वाद का लालची। मडैया = झोंपड़ी। खुशामद = चापलूसी। इलाका = क्षेत्र। बेपानी = बेइज्जत, अपमानित । नाखून से खाँट कर देना = बहुत-थोड़ा देना, कंजूसी से देना। हुलस कर = प्रसन्न होकर। नेनू = मक्खन। मोथी = एक प्रकार की घास। शीतलपाटी = खस की चिक। पनियाई = पानी भरी। हिन्दी पुस्तक-12 . पटेर = तालाबों में उगने वाला एक पौधा–काई। पाटी = चटाई। तन्मयता = तल्लीनता। मुँहज़ोर = बोलने में कड़वा। झाल = तीखापन। बरदाश्त करना = सहन करना। चिकनाई = चिकनापन। अधकपाली दर्द = आधे सिर का दर्द। ताल = ताड़एक वृक्ष। मूंज = एक प्रकार की घास। बेकाम = व्यर्थ का। खंसारी का सत्तू = भुने हुए जौ का आटा। तिलमिला उठना = क्रोध से बेचैन हो उठना। बबुनी = बिटिया। बैरिंग = बिना टिकट लगा। तैनात करना = नियुक्त करना। झब्बे = गुच्छे, फँदने। बिनाई = बुनती। सुधि = होश। सूप = छाज। बुंदिया = लड्डू की बूंदी। नैहर = मायका। बतकुट्ठी = बातें करना, बतियाना। गमकौआ = सुंगन्धित । जर्दा = तम्बाकू। मसखरी = मज़ाक । यत्परोनास्ति = इससे कोई बढ़कर नहीं है। हनहनाता हुआ = बड़बड़ाता हुआ। मुँह झौंसे = मुँह जले। आसनी कुश = कुशा (घास) का बना आसन।
ठेस जीवन परिचय
फणीश्वरनाथ रेणु जी का जीवन परिचय लिखिए।
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ जी का जन्म 11 फरवरी, सन् 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के हिगना गाँव में हुआ। आप की शिक्षा विराट नगर, नेपाल तथा हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में हुई। सन् 1942 के भारत छोड़ो जन आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने पर 3 वर्ष तक आप नजर बंद रहे। जेल से छूटने के पश्चात् आप का सम्बन्ध जयप्रकाश नारायण की समाजवादी पार्टी से हो गया। स्वतन्त्रता के बाद देश में आपात्काल स्थिति लागू किए जाने पर आप कुछ देर के लिए जेल में बंद रहे। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के जन आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। आपके पहले आँचलिक उपन्यास ‘मैला आँचल’ ने हिन्दी जगत में धूम मचा दी थी। रस प्रिया’ तीसरी कसम, ‘ठेस’ पंचलाइट इनकी प्रमुख कहानियां हैं।
ठेस कहानी का सार
ठेस कहानी का सार 150 शब्दों में दें।
सिरचन गाँव का एक कारीगर था। वह मोथी घास और पटेर की शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की चिकें, मूंज की रस्सी आदि बनाने में माहिर था। सिरचन की इसी कला के कारण बड़े-बड़े लोग उसकी खुशामद करते थे। उनकी सवारियाँ. उसकी झोंपड़ी के आगे बँधी रहतीं। किंतु गाँव वाले उसे मुफ्तखोर कामचोर और चटोर कहते थे। उसे बुलाने के लिए उसके खान-पान का विशेष प्रबन्ध करना ज़रूरी होता था। खाने के लिए कम मिलने पर वह दूसरों का अपमान करने से भी नहीं चूकता था । काम करते हुए यदि कोई उसे टोक देता तो वह फुफकार उठता और काम छोड़ कर चला जाता था। सिरचन मुँह ज़ोर है, कामचोर नहीं।
लेखक की सबसे छोटी बहन मानू की विदाई होने वाली थी। उसके दूल्हे ने तीन जोड़ी चिक और पटेर की दो शीतल पाटियाँ भेजने की फरमाइश की थी। इसलिए लेखक की माँ ने असली मोहर छाप वाली नई धोती देने का वादा करते हुए सिरचन को काम पर लगा दिया। सिरचन मन लगा कर काम करने लगा। काम करते समय सिरचन की जीभ जरा बाहर निकल आती थी। उसे अच्छा कलेवा दिया जाता था। मिठाई दी जाती थी। एक दिन मानू ने चुपके से एक पान का बीड़ा दिया। सिरचन ने पान खाते समय लेखक की चाची से जरा सुगन्धित जर्दा देने को कहा। इस पर चाची ने उसे भला-बुरा कहा, और डाँटा। चाची की बातें सुनकर सिरचन के मन को ठेस लगी। वह अधूरा काम छोड़ कर वहाँ से उठ कर चला गया था। लेखक के मनाने के लिए जाने पर भी वह नहीं आया। कलाकार के हृदय को ठेस लग गई थी।
लेखक जब अपनी छोटी बहन को ससुराल छोड़ने जा रहा था तो स्टेशन पर गाड़ी चलने के समय सिरचन दौड़ता हुआ आया और मानू के लिए शीतलपाटी चिक और कुशासन सौंप कर चला गया। उसने मोहर छाप वाली धोती के दाम भी लेने से इनकार कर दिया। मानू उसके इस अपनत्व भरे व्यवहार को देखकर फूट-फूट कर रोने लगी थी।
Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 22 तत्सत् Textbook Exercise Questions and Answers.
Hindi Guide for Class 12 PSEB तत्सत् Textbook Questions and Answers
(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें:
प्रश्न 1.
पशु और पेड़-पौधे वन के नाम से भयातुर क्यों होने लगे थे ?
उत्तर:
जंगल में आने वाले शिकारियों ने कहा था कैसा भयानक जंगल है और कितना घना वन है। उनकी बातों में जंगल की भयानकता की बात सुनकर वन के सभी पशु और पेड़-पौधे डर गए। उन्हें लगा कि अवश्य ही वन कोई शेर-चीतों से बढ़कर भयानक होगा।
प्रश्न 2.
शिकारी प्रमुख द्वारा अपने साथियों की सलाह न मानने का क्या कारण था ?
उत्तर:
जंगल के पेड़-पौधों और वनचरों ने आदमियों से जब जंगल दिखाने के लिए कहा नहीं तो उनकी खैर नहीं। इस पर शिकारी के साथियों ने कहा कि यार कह दो जंगल नहीं है। इस पर शिकारी प्रमुख ने मरने से न डरते हुए कहासदा कौन जिया है ? इससे इन भोले प्राणियों को भुलावे में क्यों रखें ? इसी कारण शिकारी प्रमुख ने अपने साथियों की सलाह मानने से इन्कार कर दिया।
प्रश्न 3.
शिकारी जब पुन: वन में आए तो पश और वनस्पतियाँ भड़क उंठीं. क्यों ?
उत्तर:
शिकारी जन जब दोबारा जंगल में आए तो सारा जंगल जाग उठा। वे सब तरह-तरह की बोली बोलकर अपना विरोध दर्शाने लगे। मानो आदमियों की भर्त्सना कर रहे थे। वे सभी इसलिए भड़क उठे क्योंकि आज तक उन्होंने जंगल नाम की कोई वस्तु नहीं देखी थी। आदमियों ने उसे भयानक भी कहा था। इसलिए वे भयानक वस्तु के बारे में जानना चाहते थे।
(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर लिखें:
प्रश्न 4.
तत्सत् कहानी का सार अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
देखें पाठ के आरम्भ में दिया गया कहानी का सार।
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प्रश्न 5.
‘तत्सत्’ कहानी का उद्देश्य स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘प्रस्तुत’ कहानी में जैनेन्द्र जी ने पशुओं और वनस्पतियों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि आज का व्यक्ति इतना व्यक्तिवादी हो गया है कि उसे अपने सिवा और कुछ सूझता ही नहीं। वह यह नहीं समझता कि उसका अस्तित्व समग्र में एक खण्ड के समान उसी प्रकार है जैसे किसी बाग में किसी फूल का। लेखक ने अपने इस उद्देश्य को स्पष्ट करने के लिए पशुओं और पेड़-पौधों का सहारा लिया है जिन्हें अपने-अपने अलग अस्तित्व का तो बोध है किन्तु अपने समग्र रूप जंगल से वे अनजान हैं। अपनी इसी अज्ञानता के कारण वे सभी अपनी-अपनी ढफली अपना-अपना राग अलापते रहते हैं। अन्त में जब उन्हें समग्रता का बोध होता है तो वे वन की सत्ता को स्वीकार कर लेते हैं।
प्रश्न 6.
‘तत्सत्’ कहानी के नामकरण की सार्थकता पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
तत्सत्’ कहानी एक प्रतीकात्मक कहानी है। इसमें लेखक ने कथा निर्माण के लिए वनचरों एवं वनस्पतियों की संवेदना को आधार बना कर किया है। जैनेन्द्र जी ने प्रायः सोद्देश्य शीर्षकों का चयन अधिक किया है। चाहे शीर्षक ‘तत्सत्’ कहानी के शीर्षक की तरह प्रतीकात्मक हों किन्तु यह शीर्षक सार्थक, आकर्षक एवं जिज्ञासा एवं कुतूहल भरा है। लेखक ने इस कहानी के कथानक द्वारा यह सिद्ध किया है कि यह जगत् सत्य नहीं है, अपितु वह ब्रह्म ही सत्य है तथा वही सर्वत्र व्याप्त है। अतः हम कह सकते हैं कि कहानी का शीर्षक अत्यन्त सार्थक बन पड़ा है। शीर्षक सारगर्भित भी है, रोचक और संक्षिप्त एवं आकर्षक भी है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस शीर्षक में एकजुटता का संदेश भी छिपा है जो हमारी वर्तमान राजनीतिक अवस्था के लिए अत्यन्त ज़रूरी है। देश है तो हम हैं अतः देशहित के लिए हमें निजी स्वार्थों को भूलकर एक हो जाना चाहिए।
(ग) सप्रसंग व्याख्या करें :
7. “जब छोटा था, तब इन्हें देखा था। इन्हें आदमी कहते हैं। इनमें पत्ते नहीं होते, तना ही तना है। देखा वे चलते कैसे हैं ? अपने तने की दो शाखाओं पर भी चलते चले जाते हैं।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित प्रतीकात्मक कहानी ‘तत्सत्’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ बड़ के वृक्ष ने शीशम के वृक्ष से उस समय कही हैं जब शीशम पूछता है कि जंगल को भयानक कहने वाले कौन थे ?
व्याख्या:
जब शीशम के पेड़ ने जंगल के सबसे बड़े पेड़ बड़ से उन शिकारियों के बारे में पूछना चाहा कि वे कौन थे, जिन्होंने जंगल को भयानक कहा था, तो बड़ ने उत्तर देते हुए कहा कि जब मैं छोटा था, तब इन्हें देखा था। इन्हें आदमी कहते हैं। ये ऐसे पेड़ होते हैं जिनमें पत्ते नहीं होते, तना ही तना होता है। तुमने देखा नहीं कि ये लोग कैसे चलते हैं ? अपने तने की दो टहनियों पर ही चलते चले जाते हैं। विशेष-एक पेड़ की आदमी के बारे में जानकारी पर प्रकाश डाला गया है।
8. “मालूम होता है, हवा मेरे भीतर के रिक्त में वन-वन-वन ही कहती हुई घूमती रहती है। पर ठहरती नहीं। हर घड़ी सुनता हूँ, वन है, वन है पर मैं उसे जानता नहीं हूं। क्या वह किसी को दिखा है ?”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित प्रतीकात्मक कहानी ‘तत्सत्’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ बाँस के पेड़ ने जंगल के दूसरे पेड़ों से कहीं हैं।
व्याख्या:
जब सब पेड़ों ने बाँस के पेड़ से पूछा कि वह उन्हें वन के बारे में बताए कि वह क्या है तो बाँस के पेड़ ने कहा कि ऐसा मालूम होता है कि हवा मेरे अन्दर के खाली स्थान में वन-वन-वन कहती घूमती रहती है, पर ठहरती नहीं। मैं हर घड़ी यह तो सुनता हूँ किं वन है, पर मैं उसे जाना नहीं हूँ। क्या वह किसी को दिखाई दिया है ? विशेष-वन के बारे में बांस के पेड़ की प्रतिक्रिया पर प्रकाश डाला गया है।
9. “ओ सिंह भाई, तुम बड़े पराक्रमी हो। जाने कहां कहां छापा मारते हो। एक बात तो बताओ, भाई ?”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्री जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित प्रतीकात्मक कहानी ‘तत्सत्’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में जंगल के सबसे बड़े पेड़ बड़ ने जंगल के सबसे शक्तिशाली पशु सिंह से वन के बारे में बताने के लिए कही
व्याख्या:
बड़ को जब जंगल के किसी पेड़ ने वन के बारे कुछ बताने से इन्कार कर दिया तो उसने वहाँ आए सिंह से यही प्रश्न पूछने के लिए प्रस्तुत पंक्तियाँ कहीं है। बड़ ने कहा-अरे सिंह भाई, तुम बड़े बहादुर हो। जाने कहाँ-कहाँ शिकार हासिल करने के लिए छापे मारते हो। एक बात तो बताओ भाई ? बड़ सिंह से वन के बारे में पूछना चाहता है कि क्या उसने कभी वन को देखा है ? विशेष-सिंह से वन के संबंध में बड़दादा पूछ रहे हैं।
PSEB 12th Class Hindi Guide तत्सत् Additional Questions and Answers
अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
जैनेन्द्र कुमार का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
जैनेन्द्र कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के कौडियागंज गाँव में सन् 1905 ई० में हुआ था।
प्रश्न 2.
जैनेन्द्र ने किन-किन विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त की थी?
उत्तर:
पंजाब विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से।
प्रश्न 3.
जैनेन्द्र की शिक्षा अधूरी क्यों रह गई थी?
उत्तर:
देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ने के कारण।
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प्रश्न 4.
जैनेन्द्र को किस विश्वविद्यालय ने डी० लिट० की उपाधि प्रदान की थी?
उत्तर:
दिल्ली विश्वविद्यालय ने।
प्रश्न 5.
जैनेन्द्र के कहानी संग्रहों के नाम लिखिए।
उत्तर:
ध्रुव यात्रा, नीलम देश की राजकन्या, फांसी।
प्रश्न 6.
जैनेन्द्र के चार उपन्यासों के नाम लिखिए।
उत्तर:
परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी।
प्रश्न 7.
‘तत्सत’ किस शैली में रचित कहानी है?
उत्तर:
प्रतीक शैली।
प्रश्न 8.
जैनेंद्र कैसे दार्शनिक और विचारक थे?
उत्तर:
बुद्धिवादी, दार्शनिक और विचारक।
प्रश्न 9.
कितने शिकारी शिकार की टोह में पहुँचे थे?
उत्तर:
दो शिकारी।
प्रश्न 10.
किस पेड़ ने दूसरे पेड़ को ‘दादा’ कहा था?
उत्तर:
शीशम के पेड़ ने बरगद के पेड़ को ‘दादा’ कहा था।
प्रश्न 11.
बबूल ने बड़दादा से क्या प्रश्न किया था?
उत्तर:
बबूल ने बड़दादा से प्रश्न किया था कि क्या उन्होंने कभी वन देखा था।
प्रश्न 12.
जंगल के प्राणियों ने मनुष्य के बारे में क्या निर्णय किया था?
उत्तर:
उन्होंने निर्णय किया था कि मनुष्य की बात का कोई भरोसा नहीं।
प्रश्न 13.
बड़दादा ने प्राणियों को ‘वन’ के बारे में क्या समझाया था ?
उत्तर:
बडदादा में प्राणियों को समझाते हुए कहा था कि ‘यह वन ही है हम नहीं’ हम सब ही वन हैं।
वाक्य पूरे कीजिए
प्रश्न 14.
अपने तन की दो शाखों पर ही……..
उत्तर:
चलते चले जाते हैं।
प्रश्न 15.
आस-पास के और पेड़ साल, सेंमर, सिरस…………
उत्तर:
उस बातचीत में हिस्सा लेने लगे।
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प्रश्न 16.
तब सबने घास से पूछा…………
उत्तर:
घास री घास, तू वन को जानती है।
प्रश्न 17.
चढ़ते-चढ़ते वह उसकी…….
उत्तर:
सबसे ऊपर की फुनगी तक पहुँच गया।
हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए
प्रश्न 18.
तत्सत् प्रतीक शैली में रचित है।
उत्तर:
हाँ।
प्रश्न 19.
जंगल में आदमी को देखने की बात बड़ ने स्वीकार की थी?
उत्तर:
हाँ।
प्रश्न 20.
“दादा ओ दादा, तुमने बहुत दिन देखे हैं। बताओ कि किसी वन को भी देखा है?”-घास ने कहा।
उत्तर:
नहीं।
प्रश्न 21.
बरगद ने सीटी-सी आवाज़ देखकर कहा, “मुझे बताओ, मुझे बताओ।”
उत्तर:
नहीं।
प्रश्न 22.
“मैं पोला हूँ। मैं बहुत जानता हूँ।”-बबूल ने कहा।
उत्तर:
नहीं।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
1. जैनेन्द्र कुमार कैसे कहानीकार हैं ?
(क) मनोवैज्ञानिक
(ख) विचारपरक
(ग) आत्मकथात्मक
(घ) विवेचनात्मक
उत्तर:
(क) मनोवैज्ञानिक
2. तत्सत् किस प्रकार की कहानी है ?
(क) आत्मकथात्मक
(ख) प्रतीकात्मक
(ग) विवेचनात्मक
(घ) व्यंग्यात्मक
उत्तर:
(ख) प्रतीकात्मक
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3. शीशम के पेड़ ने किसको दादा कहा ?
(क) बरगद
(ख) पीपल
(ग) वट
(घ) नीम
उत्तर:
(क) बरगद
4. लेखक के अनुसार आज व्यक्ति कैसा बन गया है ?
(क) संस्कारी
(ख) व्यक्तिवादी
(ग) भाववादी
(घ) निराशावादी
उत्तर:
(ख) व्यक्तिवादी
जैनेन्द्र कुमार सप्रसंग व्याख्या
1. “जब छोटा था, तब इन्हें देखा था। इन्हें आदमी कहते हैं। इनमें पत्ते नहीं होते, तना ही तना है। देखा वे चलते कैसे हैं ? अपने तने की दो शाखों पर ही चलते चले जाते हैं।”
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं जिसमें लेखक ने पशुओं और वनस्पतियों के माध्यम से मानव के व्यक्तिवादी होने पर व्यंग्य करते हुए यह स्पष्ट किया है कि उसका अस्तित्व समग्र में एक खंड जैसा है।
व्याख्या:
इन पंक्तियों में उस समय का वर्णन है जब शीशम जंगल के सब से बड़े वृक्ष बड़ से यह पूछता है कि जंगल को भयानक कहने वाले कौन थे ? तब बड़ उत्तर देते हुए कहता है कि जब वह छोटा था तब उसने इन्हें देखा था। इन्हें आदमी कहते हैं। ये ऐसे पेड़ हैं जिनके पत्ते नहीं होते, केवल तना ही तना होता है। वह शीशम से कहता है कि उसने देखा नहीं कि वे कैसे चलते हैं ? वे अपने तने की दो टहनियों के सहारे ही चलते चले जाते हैं। विशेष-लेखक ने मनुष्य के संबंध में वनस्पतियों की भावनाओं का चित्रण किया है।
2. बड़दादा ने कहा, “हमारी-तुम्हारी तरह इनमें जड़ें नहीं होती। बढ़े तो काहे पर ? इससे वे इधर-उधर चलते रहते हैं, ऊपर की ओर बढ़ना उन्हें नहीं आता। बिना जड़, न जाने वे जीते किस तरह हैं !” इतने में बबूल, जिसमें हवा साफ़ छनकर निकल जाती थी, रुकती नहीं थी और जिसके तन पर काँटे थे, बोला, “दादा, ओ दादा, तुमने बहुत दिन देखे हैं। बताओ कि किसी वन को भी देखा है ? ये आदमी किसी भयानक वन की बात कर रहे थे। तुमने उस भयावने वन को देखा है ?”
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने वन्य पशुओं और वनस्पतियों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आज का मनुष्य अपने व्यक्तिगत स्वार्थों में इतना अधिक लिप्त हो गया है कि वह यह भी भूल गया है कि वह उस विराट का ही एक अंश है।
व्याख्या:
इन पंक्तियों में उस समय का वर्णन है जब दो शिकारी वन की सघनता और भयानकता का वर्णन करके चले जाते हैं तो वन के वृक्ष आपस में बातें करते हैं। शीशम बड़ से पूछता है कि मनुष्य इतने छोटे कद के क्यों होते हैं ? तब बड़दादा उत्तर देते हैं कि इन मनुष्यों की उनके समान जड़ें नहीं होती हैं इसलिए ये बढ़ते नहीं हैं छोटे ही रहते हैं। ये इधर-उधर चलते-फिरते रहते हैं ऊपर की ओर ये बढ़ना नहीं जानते। बड़ को भी आश्चर्य होता है कि वे बिना जड़ के कैसे जी रहे हैं। तभी बबूल ने कहा कि दादा बड़ आपने तो बहुत समय देखा है। आप बतायें कि क्या आपने किसी वन को भी देखा है ? ये लोग किस वन की बात कर रहे थे ? क्या आपने उस भयानक वन को देखा है ? बबूल के शरीर पर काँटे थे और हवा उसमें से छन कर निकल जाती थी।
विशेष:
3. इसी तरह उनमें बातें होने लगीं। वन को उनमें कोई नहीं जानता था। आस-पास के और पेड़ साल, सेंमर, सिरस उस बातचीत में हिस्सा लेने लगे। वन को कोई मानना नहीं चाहता था। किसी को उसका कुछ पता नहीं था। पर अज्ञात भाव से उसका डर सबको था। इतने में पास ही जो बाँस खड़ा था और जो ज़रा हवा चलने पर खड़-खड़, सन्-सन् करने लगता था, उसने अपनी जगह से ही सीटी-सी आवाज़ देकर कहा, “मुझे बताओ, मुझे बताओ, क्या बात है । मैं पोला हूँ। मैं बहुत जानता हूँ।”
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने वन्य पशुओं और वनस्पतियों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आज का मनुष्य अपने स्वार्थों में लिप्त होकर यह भी भूल गया है कि वह स्वयं कुछ न होकर उस विराट का एक अंश मात्र है।
व्याख्या:
लेखक बताता है कि जब दो शिकारी वन की सघनता और भयंकरता का वर्णन करके चले गए तो वन्य प्राणियों तथा वनस्पतियों में परस्पर बातचीत होने लगी कि यह सघन और भयानक वन क्या किसी ने देखा है ? परन्तु उनमें से वन को कोई भी नहीं जानता था। वन के साल, सेंमर, सिरस आदि वृक्ष भी इस वार्तालाप में भाग लेने लगे। कोई भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि वन भी कुछ होता है। किसी को भी वन का कुछ भी पता नहीं था कि वन क्या होता है ? पर उन सबके मन में एक अनजाना-सा भय अवश्य छा गया था कि न जाने वन कैसा भयंकर होगा ? तभी पास उगा हुआ बाँस अपनी जगह से सीटी-सी आवाज़ करते हुए पूछने लगा कि मुझे बताओ कि क्या बात है ? मैं भीतर से खोखला होते हुए भी बहुत कुछ जानता हूँ। बाँस ज़रा-सी हवा के चलने पर ही खड़-खड़, सन्-सन् की आवाज़ करने लगता था।
विशेष:
4. तब सबने घास से पूछा, “घास री घास, तू वन को जानती है ?”
घास ने कहा, “नहीं तो दादा, मैं उन्हें नहीं जानती। लोगों की जड़ों को ही मैं जानती हूँ। उनके फल मुझसे ऊँचे रहते हैं। पदतल के स्पर्श से सबका परिचय मुझे मिलता है। जब मेरे सिर पर चोट ज्यादा पड़ती है, समझती हूँ यह ताकत का प्रमाण है। धीमे कदम से मालूम होता है, यह कोई दुखियारा जा रहा है।” “दुःख से मेरी बहुत बनती है, दादा ! मैं उसी को चाहती हुई यहाँ से वहाँ तक बिछी रहती हूँ। सभी कुछ मेरे ऊपर से निकलता है। पर वन को मैंने अलग करके कभी नहीं पहचाना।” ।
प्रसंग:
यह गद्यावतरण जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से अवतरित है। इसमें लेखक ने मनुष्य की स्वार्थी मनोवृत्ति पर व्यंग्य किया है। वह अपने में लीन रह कर यह भूल जाता है कि वह किसी विराट का अंश मात्र है।
व्याख्या:
इन पंक्तियों में लेखक वन के वन्य जीवों तथा वनस्पति जगत् में व्याप्त इस भय को अभिव्यक्ति प्रदान करता है जो उन्हें दो शिकारियों से यह सुनकर हो रहा था कि वन घना और भयंकर है। किसी ने आज तक वन को नहीं देखा था। इसलिए उन्होंने एक दूसरे से वन के बारे में पूछने के बाद तथा उनसे नकारात्मक उत्तर पा कर घास से पूछा कि क्या वह वन को जानती है ? घास ने भी यही उत्तर दिया कि वह वन को नहीं जानती। वह तो केवल उन लोगों को जानती है जिन की जड़ें होती हैं। बाकी सब कुछ उससे बहुत ऊँचा होता है, इसलिए वह उन्हें नहीं जान पाती।
वह तो सब के पैरों के तलवों के स्पर्श से ही सबको पहचानती है। जब किसी के उसके ऊपर चलने से उसे चोट पहुँचती है तो वह उसे समझती है कि यह इस की ताकत का प्रमाण है जो उसे कुचल रहा है। जब कोई धीमे-धीमे कदमों से उसके ऊपर चलता है तो उसे लगता है कि वह कोई दुःखी है जो इस प्रकार चल रहा है। वह दुःखियों की मददगार है क्योंकि दुःख उसे बहुत प्रिय है। दुःखियों की सेवा के लिए वह बिछी रहती है। सब उसके ऊपर से निकल जाते हैं परन्तु उसने वन को अलग से नहीं पहचाना है।
विशेष:
5. बड़दादा तो चुप रहे, लेकिन औरों ने कहा कि सिंहराज, तुम्हारे भय से बहुत-से जंतु छिपकर रहते हैं। वे मुँह नहीं दिखाते। वन भी शायद छिपकर रहता हो। तुम्हारा दबदबा कोई कम तो नहीं है। इससे तो साँप धरती में मुँह गाड़कर रहते हैं, ऐसी भेद की बातें उनसे पूछनी चाहिएं। रहस्य कोई जानता होगा, तो अँधेरे में मुँह गाड़कर रहने वाला साँप जैसा जानवर ही जानता होगा। हम पेड़ तो उजाले में सिर उठाए खड़े रहते हैं। इसलिए हम बेचारे क्या जानें।
शेर ने कहा कि जो मैं कहता हूँ, वही सच है। उसमें शक करने की हिम्मत ठीक नहीं है। जब तक मैं हूँ, कोई डर न करो। कैसा साँप और जैसा कुछ और। क्या कोई मुझसे ज्यादा जानता है ?
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने वन्य प्राणियों तथा वनस्पतियों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आज का व्यक्ति अपने स्वार्थों में लीन हो कर यह भूल गया है कि उस की अपनी कोई सत्ता नहीं है वह तो उस विराट का अंशमात्र है अतः उसे स्वार्थ सिद्ध के स्थान पर जन कल्याण करना चाहिए।
व्याख्या:
जब वनस्पतियों तथा वन्य प्राणियों से वन का कोई पता नहीं चलता तो कुछ वनस्पतियों ने साँप से वन के विषय में पता करने के लिए सिंह से कहा। उनका मानना था कि शायद सिंह के भय से वन भी अन्य जन्तुओं के समान कहीं छिपकर रहता होगा। वह भी सिंह को अपना मुँह नहीं दिखाना चाहता होगा। वे मानते हैं कि सिंह का बहुत रौब है। उसके इसी प्रभाव से भयभीत होकर अन्य जीव जन्तु उससे मुँह छिपाते फिरते हैं। उन्हें लगता है कि साँप सदा धरती के अन्दर मुँह गाड़कर रहता है इसलिए इस प्रकार की रहस्य पूर्ण बातें उसी में पूछनी चाहिएं।
वह अवश्य ही जानता होगा कि वन क्या है ? वनस्पतियाँ स्वयं को उजाले में सिर उठा कर खड़ी रहने वाली मानती हैं इसलिए वे भेदभाव से दूर रहती हैं। साँप जैसे अंधेरे में मुँह गाड़कर रहने वाले ही भेदभाव की नीति से परिचित हो सकते हैं। शेर उन्हें वन से भय न करने के लिए कहता है तथा उन्हें सांत्वना देता है कि जब तक वह है उन्हें किसी से भयभीत नहीं होना चाहिए। चाहे वह साँप का अन्य कोई क्यों न हो ? सिंह स्वयं को इन सबसे अधिक जमने वाला मानता है।
विशेष:
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6. उनमें सबको ही अपना-अपना ज्ञान था। अज्ञानी, कोई नहीं था। पर उस वन का जानकार कोई नहीं था। वह नहीं जाने, दो नहीं जानें, दस-बीस नहीं जानें, लेकिन जिसको कोई नहीं जानता, ऐसी भी भला कोई चीज़ कभी हुई है या हो सकती है ? इसलिए उन जंगली जंतुओं में और वनस्पतियों में खूब चर्चा हुई, खूब चर्चा हुई। दूर-दूर तक उनकी तू-तू मैं-मैं सुनाई देती थी। ऐसी चर्चा हुई, ऐसी चर्चा हुई कि विद्याओं पर विद्याएँ उसमें से प्रस्तुत हो गईं। अंत में तय पाया कि दो टाँगों वाला आदमी ईमानदार जीव नहीं है। उसने तभी वन की बात बनाकर कह दी है। वन बन गया है । सच में वह नहीं है।
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया कि वास्तविकता को जानने के कारण मनुष्य उसी प्रकार भटकता रहता है जैसे वन के विषय में जानकर वन्य प्राणी तथा वन की वनस्पतियाँ भयभीत हो रही थीं।
व्याख्या:
दो शिकारी व्यक्तियों द्वारा वन की भयानकता के विषय में सुनकर सभी वनस्पतियां तथा वन्य प्राणी वन को जानने के लिए व्याकुल हो उठते हैं कि वन है क्या ? परन्तु कोई भी वन को नहीं जानता था। सभी अपना-अपना पक्ष रखते हैं परन्तु समझदार होते हुए भी कोई नहीं बता पाया कि वन क्या है ? वन के विषय में किसी को भी कुछ नहीं पता था। वे सभी इस बात से परेशान थे कि उन में से जब कोई भी वन को नहीं जानता तो क्या वह हो भी सकता है ? उन में खूब तर्क-वितर्क होता है और दूर-दूर तक उन की बहस सुनाई देती है। प्रत्येक अपने कथन के पक्ष में अनेक तर्क प्रस्तुत करता है और एक से एक गहरी बातें करता है। जब कोई समाधान नहीं हुआ तो वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह दो टांगों वाला जीव जो आदमी कहलाता है ईमानदार नहीं है। उसने अपने मन से ही बना कर वन की बात कही है और हम इसे सच मान बैठे जबकि वास्तव में वन कहीं नहीं है।
विशेष:
7. उस समय आदमी और बड़दादा में कुछ ऐसी धीमी-धीमी बातचीत हुई कि वह कोई सुन नहीं सका। बातचीत के बाद वह पुरुष उस विशाल बड़ के वृक्ष के ऊपर चढ़ता दिखाई दिया। चढ़ते-चढ़ते वह उसकी सबसे ऊपर की फुनगी तक पहुँच गया। वहाँ दो नए-नए पत्तों की जोड़ी खुले आसमान की तरफ़ मुसकराती हुई देख रही थी। आदमी ने उन दोनों को बड़े प्रेम से पुचकारा। पुचकारते समय ऐसा मालूम हुआ, जैसे मंत्ररूप में उन्हें कुछ संदेश भी दिया है।
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गई हैं। इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया है किस प्रकार वास्तविकता से परिचित न होने पर हम भटक जाते हैं तथा विभिन्न प्रकार के व्यर्थ के वाद-विवादों में फँस जाते हैं जैसे कि वन के अस्तित्व से अनजान वन की वनस्पतियों और वन्य प्राणियों की दशा होती है।
व्याख्या:
लेखक कहता है कि जब दुबारा वे शिकारी उस जंगल में आते हैं तो वनस्पतियां उनसे वन के बारे में पूछती हैं। तब वे उन्हें बताते हैं कि वे सब मिलाकर वन हैं। उन्हें इस कथन पर विश्वास नहीं होता। तब बड़दादा और शिकारी में धीरे धीरे कुछ बातचीत होती है। इसे अन्य वनस्पतियां नहीं सुन पातीं। बड़दादा से बातचीत करके वह शिकारी उस विशाल बड़ के पेड़ के ऊपर चढ़ता है और चढ़ते-चढ़ते उसकी सबसे ऊपर वाली फुनगी तक पहुँच जाता है। वह वहाँ देखता है कि दो नए-नए पत्ते खुले आकाश की ओर देख रहे हैं। उन का देखना उसे ऐसा लगा जैसे वे आकाश को देखकर मुस्करा रहे हैं। वह शिकारी उन्हें प्रेमपूर्वक पुचकारता है। जब वह उन्हें ‘पुचकार रहा था तो ऐसा लग रहा था जैसे वह उन्हें मन्त्र के रूप में कोई संदेश भी दे रहा है।
विशेष:
8. वन के प्राणी यह सब-कुछ स्तब्ध भाव से देख रहे थे। उन्हें कुछ समझ में न आ रहा था। देखते-देखते पत्तों की वह जोड़ी उद्ग्रीव हुई। मानो उसमें चैतन्य भर आया। उन्होंने अपने आस-पास और नीचे देखा। जाने उन्हें क्या दिखा कि वे काँपने लगे। उनके तन में लालिमा व्याप गई। कुछ क्षण बाद मानो वे एक चमक से चमक आए। जैसे उन्होंने खंड को कुल में देख लिया। देख लिया कि कुल है, खंड कहाँ है।
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘तत्सत्’ से ली गयी हैं। इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि वास्तविकता से परिचित न होने पर मनुष्य उसी प्रकार से भटक जाता है जैसे वन के अस्तित्व से अनजान वनस्पतियों तथा वन्य प्राणियों की दशा होती है।
व्याख्या:
लेखक उस समय का वर्णन करता है जब एक शिकारी विशाल बड़ के वृक्ष की फुनगी तक पहुँचकर उसे पुचकारता है। वन के समस्त प्राणी यह दृश्य टकटकी लगाकर देखते रहते हैं। उनकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। उन्होंने देखा कि बड़ के पत्तों की वह जोड़ी उस शिकारी द्वारा पुचकारे जाने पर इस प्रकार ऊपर की ओर उठी जैसे उस में चेतनता आ गयी हो। वे अपने आस-पास और नीचे भी देखने लगीं। यह सब तथा कुछ अनजाना-सा देखकर वे काँप उठीं। उनका शरीर भय से लाल हो गया। परन्तु कुछ ही क्षणों के बाद वे एक अनोखी चमक से चमकने लगीं। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने अपने अंश अथवा खंड को उस पूर्ण में देख लिया है। जिस की वे अंश हैं। उन्होंने सम्पूर्ण को देखने के बाद यह अनुभव किया कि वे उस सम्पूर्ण की ही खंड मात्र हैं।
विशेष:
कठिन शब्दों के अर्थ
तत्सत् = उस का सत्य। गहन = घना। वन = जंगल। टोह = खोज। दहशत = भय, डर। अजब = विचित्र। ओछे = छोटे कद वाले, तुच्छ। प्रीति = प्रेम। पोला = खोखला। दीखा = दिखाई देना। पदतल = पैरों के तलवे। वाग्मी = वाचाल, बहुत बोलने वाला, घमंडी। वंश = बाँस। जिज्ञासु = जानने के इच्छुक। दबदबा = रौब। मंथर = धीमी। अतिशय = बहुत अधिक। श्याम = काला। छिद्र = सुराख। अंतर्भेद = अन्दर का हाल, रहस्य। फ़र्जी = नकली। रोज़ = दिन। भर्त्सना = फटकारना। निर्धम = भ्रम रहित, शंकाओं से मुक्त। उद्ग्रीव = ऊपर उठना। अभ्यंतराभ्यंतर = अंत:करण।
तत्सत् जीवन परिचय
जैनेन्द्र कुमार का संक्षिप्त जीवन परिचय लिखिए।
जैनेन्द्र कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ के कौड़ियागंज गाँव में सन् 1905 ई० में हुआ। इनकी आरम्भिक शिक्षा हस्तिनापुर जिला मेरठ में हुई। इन्होंने सन् 1919 में पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा पास करके काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, किन्तु गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर पढाई छोड कर स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। इन्हें भारत सरकार ने पद्मभूषण से तथा दिल्ली विश्वविद्यालय ने डी० लिट की उपाधि से सम्मानित किया था। इनकी रचनाओं में मनोभावों तथा संवेदनाओं का सूक्ष्म चित्रण मिलता है। जीविका चलाने के लिए व्यापार किया, नौकरी भी की किन्तु सफल न हो सके और स्वतन्त्र लेखन को ही जीवन का ध्येय बना लिया। ध्रुवयात्रा, नीलम देश की राजकन्या, फाँसी इनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं। परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी आदि उनके उपन्यास हैं। सन् 1989 ई० में इनका निधन हो गया था।
तत्सत् कहानी का सार
श्री जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित ‘तत्सत्’ नामक कहानी प्रतीक शैली में लिखी हुई है। इसमें जीवन के सूक्ष्म अनुभवों के स्वतंत्र मौलिक चिंतन द्वारा गूढ प्रश्नों का समाधान दार्शनिक दृष्टिकोण से किया गया है। जैनेन्द्र कुमार बुद्धिवादी दार्शनिक एवं विचारक हैं। वैयक्तिक स्थितियों के आंतरिक चित्रण का सुंदर और सहज रूप इस कहानी में उपलब्ध होता है। – एक घने जंगल में दो शिकारी शिकार की टोह में पहुँचे । दोनों पुराने शिकारी थे पर इतना भयानक वन उन्होंने आज तक न देखा था। एक बड़े पेड़ की छाँह में बैठकर उस भयानक और घने वन के संबंध में बात करते हुए, कुछ देर विश्राम करने के बाद वह दोनों चले गये। उनके चले जाने पर पास के शीशम के पेड़ ने उस.पेड़ से कहा कि.ए बड़ दादा अभी तुम्हारी छाँह में कौन बैठे थे, वे गये। बड़दादा उसे बताते हैं कि वे आदमी कहलाते हैं। उनके न पत्ते होते हैं न जड़ें, बस तना ही तना होता है। अपने तने की दो शाखों पर चलते हैं, इधर-उधर चलते हैं, ऊपर की ओर बढ़ना उन्हें नहीं
आता। तभी बबूल ने बड़दादा से पूछा कि क्या आपने वन देखा है। अभी ये आदमी किसी भयानक वन की बात कर रहे थे। बड़दादा ने कहा कि मैंने शेर, चीता, भालू, हाथी, भेड़िया सभी जानवर देखे हैं पर वन नाम के जानवर को मैंने अब तक नहीं देखा। आदमी एक टूटी-सी टहनी से आग की लपट छोड़कर शेर-चीतों को मार देता है। उन्हें ऐसे मरते अपने सामने हमने देखा है पर वन की लाश हमने नहीं देखी। वह ज़रूर कोई बड़ा भयानक जानवर होगा।
बड़दादा, शीशम और बबूल में इसी प्रकार बातें हो रही थीं। आस-पास के साल, सेंमर, सिरस, बाँस, घास आदि पेड़ भी इस बातचीत में हिस्सा लेने लगे। उनमें से कोई भी वन को नहीं जानता था। पर सभी अज्ञात रूप से वन से डरने लगे थे। सबमें काफ़ी बहस हुई पर कोई भी यह न बता सका कि वन कौन-सा जानवर है। तभी वहां सिंह आया। बड़दादा ने उससे वन के सम्बन्ध में पूछा। पर सिंह भी न बता सका कि वन कौन है। लोग सलाह करते हैं कि साँप से इस सम्बन्ध में पूछना चाहिए। संयोग से एक नाग भी उधर आ निकला। वन के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की कल्पना की गई पर इसका निश्चय नहीं हो सका कि वह कौन जानवर है। सभी जीव-जन्तु और पेड़-पौधों ने आपस में पूछताछ की और अंत में यह तय हुआ कि दो पैर वाले मनुष्य की बात का कोई भरोसा नहीं। मनुष्य ईमानदार जीव नहीं है। तभी उसने वन की बात कह दी पर वास्तव में वह कुछ नहीं है। बड़दादा ने कहा कि उन आदमियों को फिर आने दो तब उनसे पूछा जायेगा कि वन क्या है ?
एक दिन वे दोनों शिकारी फिर उधर आ निकले। उनके आने पर जंगल के सभी जीव-जन्तु, पेड़-पौधे तरह-तरह की आवाज़ों में बोलकर मानों उनका विरोध करने लगे। इस विचित्र स्थिति में अपने को पाकर आदमियों ने अपनी बंदूकें सम्भाली पर बड़दादा ने बीच में पड़कर जंगल के प्राणियों को शांत किया और उन आदमियों से पूछा कि जिस जंगल की तुम बात किया करते हो बताओ कि वह कहाँ है। आदमियों ने कहा कि जहाँ हम सब हैं यह जंगल ही तो है। इस पर किसी को भला कैसे विश्वास हो सकता था। वह सेंमर है, वह सिरस है, वह घास है, वह सिंह है, वह पानी है फिर भला जंगल कहाँ है। आदमी ने कहा यह सब कुछ जंगल ही है। पर सभी अपना नाम बताते और जंगल या वन कौन है यह कोई मानने को तैयार न था। आदमी और बड़दादा में थोड़ी देर तक धीमी आवाज़ में बातचीत होती रही। इसके बाद बड़दादा ने अन्य प्राणियों को बताया है कि यह वन ही है हम नहीं, हम सब ही वन हैं। समग्रता का बोध होने पर ही बड़दादा वन की सत्ता स्वीकार कर लेता है और अन्य वन्य प्राणियों को भी वन की सत्ता स्वीकार करने के लिए कहता है।
Punjab State Board PSEB 11th Class Hindi Book Solutions Hindi रचना अनुच्छेद-लेखन Questions and Answers, Notes.
(ख) अनच्छद लखन
यदि आप किसी भी छपी गद्य रचना को ध्यान से देखें तो आप पाएँगे कि प्रत्येक लेख, अध्याय, कहानी, उपन्यास आदि अनुच्छेदों में बंटा है । प्रत्येक अनुच्छेद पंक्ति से थोड़ा दाएँ हट कर शुरू किया जाता है । ऐसा उस गद्य रचना को पढ़ने और समझने में सहायक होता है।
परिभाषा:
अनुच्छेद लेखन का अर्थ है कि किसी कथन, निजी अनुभव अथवा संस्मरण को संक्षेप में किन्तु सार गर्भित ढंग से लिखना । मान लीजिए आपने कोई विशेष घटना देखी हो, किसी नेता का भाषण सुना हो अथवा कोई निजी अनुभव या कथन पर कुछ लिखना हो तो उसे एक ही अनुच्छेद में लिखना अनुच्छेद लेखन कहलाता है ।
अनुच्छेद लेखन और सार में अन्त:
अनुच्छेद लेखन सार लेखन से बिल्कुल विपरीत है । सार लेखन में एक अनुच्छेद दिया गया होता है उसका लगभग एक तिहाई शब्दों में संक्षेपीकरण या सार लिखना होता है, जबकि अनुच्छेद लेखन के लिए कोई एक विषय दिया गया होता है । जिस पर आपको केवल एक अनुच्छेद लिखना होता है । अनुच्छेद विषयानुसार छोटा बड़ा हो सकता है ।
अनुच्छेद लेखन का उद्देश्य:
परीक्षा में अनुच्छेद लेखन का प्रश्न विद्यार्थी की मौलिक सूझ-बूझ, स्मरण शक्ति और कल्पना शक्ति के विकास में सहायता करने के लिए रखा जाता है । भावी जीवन में इसका बहुत बड़ा महत्त्व होता है ।
अनुच्छेद लेखन के भेद:
अनुच्छेद लेखन दो प्रकार का होता है
(1)निजी अनुभव पर(किसी घटना आदि से सम्बन्धित) संस्मरणात्मक अनुच्छेद:
ऐसे अनुच्छेद में लेखक आपबीती उत्तम पुरुष एकवचन में लिखता है । जैसे भीड़ भरी बस की यात्रा, मतदान केन्द्र का दृश्य आदि विषयों पर लिखे अनुच्छेद।
(2) विचारात्मक अनुच्छेद:
ऐसे अनुच्छेद किसी महापुरुष के कथन, किसी मुहावरे या विचारात्मक विषय पर लिखे जाते हैं । जैसे परहित सरिस धर्म नहिं भाई, सवै दिन जात न एक समान, नेता नहीं नागरिक चाहिए, बढ़ते फैशन और युवावर्ग आदि।
अनुच्छेद लेखन में ध्यान देने योग्य बातें
विशेष:
यहाँ आपकी जानकारी एवं मार्ग दर्शन के लिए निजी अनुभव पर आधारित तथा कुछ विचारात्मक विषयों पर प्रसिद्ध साहित्याकरों, महापुरुषों द्वारा लिखे गए निबन्धों या आत्मकथाओं से अलग-अलग उदाहरण दे दिए गये हैं ।
प्रस्तुत पुस्तक में अनुच्छेद लेखन को दो भागों में प्रस्तुत किया गया है–(क) निजी अनुभव पर आधारित संस्मरणात्मक अनुच्छेद (ख) विचारात्मक विषयों, कथनों पर आधारित अनुच्छेद। परीक्षा की दृष्टि से सभी सम्भावित विषयों पर अनुच्छेद लेखन के उदाहरण दिये गये हैं । अभ्यास से आप किसी भी विषय पर आसानी से अनुच्छेद लिख सकते हैं ।
(क) निजी अनुभव पर आधारित संस्मरणात्मक अनुच्छेद
1. हीरो बनने के चक्कर में
अपने मित्र के कहने पर एक दिन मैंने भान्जे साहब से, क्योंकि वे मुझ से काफ़ी खुल गये थे, अपनी इच्छा प्रकट की । मित्र ने भी रद्दा जमाया । मेरी एक्टिंग, मेरे गले और मेरी बॉडी की प्रशंसा की और कहा कि इस बार यदि कैमरा टैस्ट हो जाए तो मेरे हीरो बनने के रास्ते में कोई बाधा नहीं हो सकती । मेरा ख्याल था कि मेरी इच्छा सुनते ही मामा का वह भान्जा झट मेरे साथ पूना की गाड़ी पर जा बैठेगा । इतने दिन मेरे पैसे पर उसने गुलछर्रे उड़ाए थे । लेकिन नहीं, ऐसी कोई बात नहीं हुई । बड़े इत्मीनान से उसने कहा कि यदि उसे पचास रुपए दिये जाएं तो वह मामा से मिलायेगा और पचास और दिये जाएं तो कैमरा टैस्ट का प्रबन्ध करेगा । मेरे लगभग सात-आठ सौ रुपए उन पन्द्रह बीस दिनों में खर्च हो चुके थे, पाँच-छ: सौ रुपए बचे थे । सौ-डेढ़ सौ का नुस्खा उसने बता दिया, लेकिन मैं चुप रहा । बोला कुछ नहीं । हां, मेरे होटल वाले मित्र को बड़ा क्रोध आया। उसने उसे डॉटा । बड़ी खिट-खिट हुई । आखिर वह पच्चीस रुपए उस समय, पच्चीस मामा से मिलाने पर ओर पचास टैस्ट करा देने और काम बनवा देने के बाद लेने को तैयार हो गया । खैर साहब, हम तीनों पूना के लिए दक्खन क्वीन में सवार हुए ।
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ट्रेन फर्राटे भरती उड़ चली और साथ ही मेरी कल्पना दक्खन क्वीन से भी तेज़ फर्राटे भरती उड़ चली। मुझे लगा कि मंज़िल अब बहुत दूर नहीं । माइक और साऊँड टैस्ट हुआ कि मैं हीरो बना । पूना पहुँच कर स्टेशन के पास ही एक होटल में टिका। नाश्ता-वाश्ता करके हम स्टूडियो को चले। गेट पर चौकीदार ने रोक दिया। तब मामा के उस भान्जे ने एक चिट्ठी लिखी । कुछ देर बाद उत्तर आ गया हमें बाहर ही रोक कर वह अन्दर गया । कोई पन्द्रह मिनट बाद वापस आया तो बोला मामा जी स्टूडियो में व्यस्त हैं, फिल्म की शूटिंग हो रही है। कल सुबह मिलने का टाइम उन्होंने दिया है। मैंने कहा, हमें शूटिंग ही दिखा दो । उसने कहा तुमने पहले कहा होता तो मैं तय कर आता, लेकिन अब कल ही दिखा दूंगा, बात पक्की हुई समझो। खुश-खुश हम लौटे। रात को मित्र ने सुझाया कि भान्जे को खुश रखना चाहिए ताकि यह टैस्ट ही न कराये, बल्कि तुम्हें हीरो का कांट्रेक्ट ले दे । बात उसकी ठीक थी । पूरी बोतल मेज़ पर आ गई । वह खत्म हुई तो दूसरी आयी । बस इतना ही याद है और कुछ याद नहीं । सुबह उठा तो देखा कमरा खाली है । बस जो कपड़े तन पर हैं, वही हैं, बाकी सब कुछ गायब हैं।
(-उपेन्द्रनाथ अश्क द्वारा लिखित एक रिपोर्ताज से)
2. सहानुभूति दिखाना भी मुसीबत मोल लेना है
एक और जाति को सहानुभूति दिखाकर मुझे भारी नुकसान उठाना पड़ा है । यह जाति परीक्षा में बैठने वाले स्टूडेंट्स की है जो अपने नम्बर बढ़वाने के लिए पहुँच जाते हैं । इस बारे में एक पुरानी घटना याद आ रही है । एक बार एक लड़की ने मुझे यहाँ तक धमकी दे दी कि अगर मैं उसे पास नहीं करता तो वह नदी में छलांग लगा देगी । मैं इतना डर गया कि मैंने सहानुभूति दिखाने का उसे वचन भी दे डाला । वह बिना सहायता के पास थी, लेकिन एक महीने के बाद मेरे बारे में जांच पड़ताल शुरू हो गई क्योंकि उस लड़की ने अपनी सहेलियों से शोखी मैं आकर यह कह दिया कि वह मेरी सहानभूति से पास हुई है । उसकी एक सहेली ने मेरे बारे में गुमनाम शिकायत लिख कर भेज दी । तब से कानों को हाथ लगाया और तय किया कि इनसे सहानुभूति करना कितना खतरनाक हो सकता है। अब भी कभी कभार स्टूडेंट्स आ टपकते हैं और यही दलील देते हैं कि सब परीक्षक सहानुभूति दिखाते हैं, मैं इतना कठोर क्यों हो गया हूँ ? मेरा एक ही जबाव होता है कि इस तरह की सहानुभूति दिखाने से मेरी नौकरी छूटने का भय है और मैं एक डरपोक आदमी हूँ। वह मेरी बात मानते तो नहीं लेकिन निराश होकर चले अवश्य जाते हैं ।।
(—श्री इन्द्रनाथ मदान द्वारा लिखित निबन्ध ‘सहानुभूति दिखाने पर’ में से)
3. आँखों देखा गोली काण्ड
दोपहर होते-होते नौजवानों की भीड़ ‘नहीं रखनी सरकार भाइयों नहीं रखनी, यह अंग्रेज़ी सरकार भाइयो नहीं रखनी’ के नारे लगाते हुए तिरंगा झण्डा लिए सचिवालय की ओर बढ़ने लगे। गोरखा फौज उनके सामने दीवार की तरह आकर खड़ी हो गई । जिलाधीश ने नौजवानों से पूछा, ‘तुम क्या चाहते हो ? ‘उन्होंने उत्तर दिया हम सचिवालय पर तिरंगा झण्डा फहरायेंगे । ज़िलाधीश ने कहा, वहाँ तो यूनियन-जैक लहरा रहा है । नौजवानों ने कहा-अब वहाँ तिरंगा लहरायेगा । अंग्रेज़ तमतमा उठा, बोला ऐसा कभी भी नहीं हो सकता । भाग जाओ । नौजवानों ने कहा हम तो आज तिरंगा झण्डा फहराकर ही लौटेंगे । अंग्रेज़ का अहंकार गुर्रा उठा, बोला, तुम में से जो झण्डा फहराना चाहता है वह आगे आए । ग्यारह विद्यार्थी भीड़ में से एक साथ आगे बढ़ कर आए। इन ग्यारह में सब से आगे जो विद्यार्थी था, उसकी देह ने अभी चौदहवीं वर्षगांठ भी न मनाई थी, पर उसके कंधों का तनाव ऐसा प्रचण्ड था कि पहाड़ के शिखिर भी देखकर शरमा जाएँ ? अंग्रेज़ ज़िलाधीश ने राक्षसी क्रूरता से उस किशोर से पूछा ‘तुम भी फहराओगे झण्डा ?’ ‘हाँ क्यों नहीं ?’ भारत की आत्मा उस बालक के कण्ठ से कूक उठी।
तभी अंग्रेज़ ने अपने गोरखा सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दिया ग्यारह राइफलें उभर कर गरी—’धड़ाम’ । जीते जागते ग्यारह राम-लक्ष्मण पलक मारते धरती पर गिर पड़े, खून से लथपथ, पर शान्त। ‘फायर’ अंग्रेज़ अफ़सर फिर चिल्लाया और सिपाहियों ने गोलियाँ दागीं। बहुत से लोग घायल हो कर गिर पड़े पर भागा कोई नहीं । पीछे कोई नहीं हटा । ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’, ‘अंग्रेज़ो भारत छोड़ो’ के नारों से आकाश गूंज उठा । तभी न जाने किधर से एक विद्यार्थी सचिवालय के गुम्बद पर जा चढ़ा और उसने तिरंगा झण्डा फहरा कर वहीं से नारे लगाये । अंग्रेज़ अफसर का मुँह एक बार तो काला पड़ गया था तब उसने दांत किटकिटा कर कहा—फायर तब वह किशोर टूटते तारे-सा धरती पर आ गिरा । अस्पताल की मेज़ पर उसने पूछा मेरे गोली कहाँ लगी है ? छाती में डॉक्टर ने कहा । तब ठीक है मैंने पीठ पर गोली नहीं खाई उसने कहा और हमेशा के लिए आँख मूंद ली ।
(— कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर के एक लेख से)
4. जब मैं घर से बाहर पढने गया
इस कमरे में भी मैं तो बहुत परेशान हाल में रहा । देश बहुत याद आता था । माता का प्रेम आँखों के सामने नाचा करता । रात हुई कि रोना शुरू हुआ । घर की अनेक प्रकार की स्मृतियों की चढ़ाई के कारण नींद कहां से आ पाती ? यह दुःख गाथा किसी से कह भी न सकता था । कहने से फायदा भी क्या था ? मैं स्वयं नहीं जानता था कि क्या करने से मेरा चित्तन्त होगा। मनुष्य विचित्र, रहन-सहन विचित्र, घर भी विचित्र । घरों में रहने की रीति-नीति भी वैसी ही विचित्र । क्या बोलने और क्या करने में यहाँ का शिष्टाचार भंग होता है, इस का भी बहुत कम पता था । तिस पर से खाने-पीने का बराव-बचाव । जो चीजें खा सकता वे रूखी और नीरस लगती थीं । इस से मेरी दशा सौते में सुपारी की सो हो गई । विलायत रुच नहीं रहा था और देश को लौटा नहीं जा सकता । विलायत आया था तो तीन साल पूर करने ही थे ।
(-महात्मा गान्धी की आत्म कथा से)
5. जब दाखिला लेने गया
एक महीने के बाद मैं फिर मि० रिचर्डसन से मिला और सिफारिशी चिट्ठी दिखाई । प्रिंसिपल ने मेरो ओर तीव्र नेत्रों से देख कर पूछा ‘इतने दिन कहाँ थे’ ? ‘बीमार हो गया था’ मैंने कहा। क्या बीमारी थी ? मैं इस प्रश्न के लिए तैयार न था। अगर ज्वर बताता हूँ तो शायद साहब मुझे झुठा समझें । ज्वर मेरी समझ में हल्की चीज़ थी, जिसके लिए इतनी लम्बी गैर हाजिरी अनावश्यक थी। कोई ऐसी बीमारी बतानी चाहिए जो अपनी कष्ट साध्यता के कारण दया भी उभारे । उस वक्त मुझे नाम याद न आया । ठाकुर इन्द्रनारायण सिंह से जब मैं सिफारिश के लिए मिला था तब उन्होंने अपने दिल की धड़कन की बीमारी की चर्चा की थी। वह शब्द याद आ गया मैंने कहा, पेलपिटेशन आफ हार्ट (दिल की धड़कन) सर ।
साहब ने विस्मित होकर मेरी ओर देखा और कहा, अब तुम बिल्कुल अच्छे हो ? जी हाँ, मैंने कहा । उन्होंने कहा, अच्छा प्रवेश पत्र लाओ । मैंने समझा बेड़ा पार हुआ । फार्म लिया, खाना पुरी की और पेश कर दिया । साहब उस समय कोई क्लास ले रहे थे । तीन बजे मुझे फार्म वापस मिला । उस पर लिखा था-इसकी योग्यता की जाँच की जाए । यह नई समस्या उपस्थित हुई। मेरा दिल बैठ गया । अंग्रेज़ी के सिवा और किसी विषय में पास होने की आशा न थी और बीजगणित से मेरी रूह काँपती थी । जो कुछ याद था वह भी भूल गया था, परन्तु दूसरा उपाय ही क्या था ।(-प्रेमचंद की आत्मकथा से)
(ख) विचारात्मक अनुच्छेद
1. मजदूरी का महत्व
खेद का विषय है कि हमारे और अन्य पूर्वी देशों में लोगों को मज़दूरी से लेश मात्र भी प्रेम नहीं है, पर वे तैयारी कर रहे हैं काली मशीनों का आलिगंन करने की । पश्चिम वालों के तो यह गले पड़ी हुई बहती नदी की काली कमली हो रही है । वे छोड़ना चाहते हैं, परन्तु काली कमली उन्हें नहीं छोड़ती । देखेंगे पूर्व वाले इस कमली को छाती से लगाकर कितना आनन्द अनुभव करते हैं। यदि हम में से हर आदमी अपनी दस उंगलियों की सहायता से साहसपूर्वक अच्छी तरह काम करे तो हम मशीनों की कृपा से बढ़े हुए पश्चिम वालों को, वाणिज्य के जातीय संग्राम में सहज ही पछाड़ सकते हैं । इंजनों की वह मज़दूरी किस काम की जो बच्चों, स्त्रियों और कारीगरों को ही भूखा और नंगा रखती है और केवल सोने, चाँदी, लोहे आदि धातुओं का ही पालन करती है। पश्चिम को विदित हो चुका है इससे मनुष्य का दुःख दिन पर दिन बढ़ता है ।
भारतवर्ष जैसे दरिद्र देश में मनुष्यों के हाथों की मज़दूरी के बदले कलों के काम लेना काल का डंका बजाना होगा । दरिद्र प्रजा और भी दरिद्र होकर मर जाएगी । चेतन से चेतन की वृद्धि होती है । मनुष्य को तो मनुष्य सुख दे सकता है। परस्पर की निष्कपट सेवा से मनुष्य जाति का कल्याण हो सकता है । धन एकत्र करना तो मनुष्य के आनन्द मण्डल का एक साधारण सा और महातुच्छ उपाय है । धन की पूजा करना नास्तिकता है, ईश्वर को भूल जाना है। अपने भाई-बहनों तथा मानसिक सुख और कल्याण के देने वालों को मार कर अपने सुख के लिए शारीरिक राज्य की इच्छा करना हैं। जिस डाल पर बैठे हैं, उसी डाल को स्वयं ही कुल्हाड़े से काटना है । अपने प्रियजनों से रहित राज्य किस काम का ? आओ, यदि हो सके तो, टोकरी उठा कर कुदाली हाथ में लें । मिट्टी खोंदे और अपने हाथ से उस के प्याले बनावें । फिर एक-एक प्याला घर-घर में, कुटियाकुटिया में रख आयें और सब लोग उसी में मजदूरी का प्रेमामृत पान करें ।
(सरदार पूर्ण सिंह के लेख ‘मज़दूरी और प्रेम से’ )
2. अंग्रेज़ी हटाओ, राष्ट्रभाषा और प्रान्तीय भाषा लाओ
संविधान के निर्णयानुसार 15 वर्षों के भीतर, अर्थात् सन् 1965 तक हिन्दी का राज भाषा विषयक रूप विकसित हो जाना चाहिए था अर्थात् उस समय तक कानून की सभी पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद हो जाना चाहिए, साहित्य एवं विज्ञान की इतनी पुस्तकें प्रकाशित हो जानी चाहिएं कि हिन्दी के माध्यम से विश्वविद्यालयों में ऊंची-से-ऊंची शिक्षा दी जा सके तथा न्यायालयों एवं महान्यायालयों में हिन्दी के माध्यम से विचार और विमर्श किया जा सके । साथ ही हिन्दी प्रान्तों में तब तक हिन्दी का इतना प्रचार भी कर देना है कि उन प्रान्तों के साथ केन्द्रीय एवं अन्य प्रान्तीय शासनों का पत्राचार हिन्दी में चल सके तथा जो व्यक्ति सार्वदेशीय धरातल से देश के साथ हिन्दी में बोलना चाहें, उन्हें शिक्षा साधनों के सीमित होने के कारण कोई कठिनाई नहीं हो । प्रायः लोग इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि अंग्रेज़ी के हटने पर जो स्थान रिक्त होगा वह सब का सब हिन्दी को मिल जाएगा। यह हिन्दी के पक्ष में अनुचित उत्साह है। अंग्रेजी केवल हिन्दी का अधिकार दबा कर नहीं बैठी है। वह अधिक स्थान तो क्षेत्रीय भाषाओं के ही दबाए हुए हैं । अंग्रेज़ी के हटने पर भी प्रान्तीय शासन और जनता चाहे तो, शिक्षा के भी काम वहाँ की प्रान्तीय भाषाओं में ही चलेंगे ।
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अतएव आवश्यकता है कि प्रत्येक क्षेत्र की जनता में अपनी मातृभाषा के लिए अनुराग उत्पन्न किया जाए । इसी अनुराग को जगाकर हम अंग्रेज़ी को वर्तमान पद से हटा सकते हैं । जब तक जनता में मातृभाषा के लिए प्रेम नहीं जागता, तब तक प्रान्तीय भाषाओं के क्षेत्रों में राष्ट्रभाषा का मार्ग भी वंचित रहेगा। प्रसन्नता की बात है कि हिन्दी प्रान्तों में शासन के कार्यों में हिन्दी का प्रयोग बढ़ने लगा है। इसका अनुकरण अन्य भाषा अनुच्छेद लेखन भाषी क्षेत्रों में भी होना चाहिए जिससे वहाँ के भी शासन सम्बन्धी कार्य क्षेत्रीय भाषाओं में किये जा सकें। प्रान्तों में जब क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग होना आरम्भ हो जाएगा, तभी वहाँ की जनता अंग्रेज़ी के स्थान पर अपनी राष्ट्रभाषा सीखने के महत्त्व को सरलता से समझेगी और तभी यह आशंका भी दूर हो जाएगी जिस से ग्रसित होने के कारण कहीं-कहीं लोग यह समझ रहें हैं कि राष्ट्रभाषा के प्रचार से क्षेत्रीय भाषाओं का दलन होने वाला है ।
(श्री रामधारी सिंह दिनकर के राष्ट्रभाषा शीर्षक लेख से-)
3. अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी
हिन्दू नारी का घर और समाज इन्हीं दो से विशेष सम्पर्क रहता है । परन्तु इन दोनों ही स्थानों में उसकी स्थिति कितनी करुण है उसके विचार मात्र से ही किसी भी सहृदय का हृदय काँपे बिना नहीं रहता । अपने पितृ गृह में उसे वैसे ही स्थान मिलता है जैसा किसी दुकान में उस वस्तु को प्राप्त होता है जिसके रखने और बेचने दोनों में ही दुकानदार को हानि की सम्भावना रहती है । जिस घर में उसके जीवन को ढलकर बनना पड़ता है, उसके चरित्र को एक विशेष रूप रेखा धारण करनी पड़ती है जिस पर वह शैशव का सारा स्नेह ढुलकाकर भी तृप्त नहीं होती उसी घर में वह भिक्षुक के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं । दुःख के समय अपने आहत हृदय और शिथिल शरीर को लेकर वह उसमें विश्राम नहीं पाती, भूल के समय वह अपना लज्जित मुख उसके स्नेहांचल में नहीं छिपा सकती और आपत्ति के समय एक मुट्ठी अन्न की भी उस घर से आशा नहीं रख सकती।
ऐसी ही है उसकी वह अभागी जन्म भूमि, जो जीवित रहने के अतिरिक्त और कोई अधिकार नहीं देती । पति गृह, जहाँ उस उपेक्षित प्राणी को जीवन का शेष भाग व्यतीत करना पड़ता है, अधिकार में उससे कुछ अधिक परन्तु सहानुभूति में उससे बहुत कम है इसमें सन्देह नहीं । यहाँ उसकी स्थिति पल-भर भी आशंका से रहित नहीं । यदि वह विद्वान पति की इच्छानुकूल विदुषी नहीं तो उसका स्थान दूसरी को दिया जा सकता है । यदि वह सौंदर्योपासक पति की कल्पना के अनुरूप अप्सरा नहीं है तो उसे अपना स्थान रिक्त कर देने का आदेश दिया जा सकता है । यदि वह पति कामना का विचार करके संतान या पुत्रों की सेना नहीं दे सकती, यदि वह रुग्ण है या दोषों का नितांत अभाव होने पर भी पति की अप्रसन्नता की दोषी है तो भी उसे घर में दासत्व स्वीकार करना पड़ेगा ।
(महादेवी वर्मा द्वारा लिखित ‘नारीत्व का अभिशाप’ शीर्षक निबन्ध से )
4. जीवन युद्ध है आराम नहीं
जीवन को जो आराम मानते हैं, वे जीवन को नहीं जानते । वे जीवन का स्वाद नहीं पाएँगे। जीवन युद्ध है आराम नहीं और अगर आराम है तो वह उसी को प्राप्य है जो उस युद्ध में पीछे कुछ न छोड़ अपने पूरे अस्तित्व से उस में जूझ पड़ता है । जो सपने लेते हैं वे सपने लेते रहेंगे । वे आराम नहीं, आराम के ख्याल में ही भरमाये रहते हैं । पर जो सदानन्द है, वह क्या सपने से मिलता है ? आदमी सोकर सपने लेता है । पर जो जागेगा वही पाएगा । सोने का पाना झूठा पाना है । सपना सपने से बाहर खो जाता है । असल उपलब्धि वहाँ नहीं । इससे मिलेगा वही जो कीमत देकर लिया जाएगा । जो आनन्दरूप है, वह जानने से जान लिया नहीं जाएगा । उसे तो दुःख पर दुःख उठाकर उपलब्ध करना होगा । इसलिए लिखने-पढ़ने और मनन करने से उसकी स्तुति अर्चना ही की जा सकती है, उपलब्धि नहीं की जा सकती । उपलब्धि तो उसे होगी जो जीवन के प्रत्येक क्षण योद्धा है, जो अपने को बचाता नहीं है, और बस अपने इष्ट को ही जानता है, कहो कि उसके लिए अपने को भी नहीं रखता है ।
(-जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित निबन्ध ‘युद्ध’ से)
5. सांस्कृतिक कार्यक्रम कितने असांस्कृतिक
आज हमारे देश में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की सर्वत्र धूम है । पंजाब में सभ्याचारक मेलों के नाम पर ऐसे कार्यक्रम सरकार द्वारा भी जगह-जगह करवाये जा रहे हैं । इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लचरपने को देखकर हमारा सिर शर्म से झुक जाता है और हम यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि क्या यही हमारी संस्कृति है जिसके बूते पर हम संसार का गुरु होने का दावा सदियों तक करते रहे हैं । आज किसी शिक्षण संस्था को देखिए, किसी राष्ट्रीय पर्व में शामिल होइए या किसी विदेशी अतिथि के स्वागत समारोह में जाइए-आपको सर्वत्र पायलों की झंकार और नुपुरों की मधुर रुनझुन सुनाई देगी। आज प्राइमरी स्कूलों के नन्हें-मुन्ने बालक-बालिकाओं से लेकर विश्वविद्यालयों के विकसित मस्तष्कि वाले युवक-युवतियां भी इन तथाकथित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मग्न दिखाई दे रही हैं। प्रश्न उठता है कि हमारे देश की संस्कृति केवल नृत्य, गीत, राग-रस तक ही सीमित रह गयी है । संस्कृति के उदात्त तत्व को केवल संगीत और अभिनय तक ही सीमित कर देना कहां तक न्याय है ? हमारे देश के विद्यालयों के अधिकांश छात्रों का पर्याप्त समय इन कार्यक्रमों की तैयारी में ही नष्ट हो जाता है । आज 15 अगस्त है तो कल 26 जनवरी !
आज युवक समारोह (Youth Festival) है तो कल कुछ और । छात्रों को शिक्षा और उनके चरित्र के विषय में कुछ भी अवगत न कराया जाए परन्तु एक रसिक आयोजन अवश्य होगा। इन आयोजनों की तैयारी में छात्रों का अमूल्य समय और उससे भी मूल्यवान चरित्र कितना नष्ट होता है, इसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं है । आज विदेशी अतिथि आते हैं, हमारी सभ्यता, विचारधारा और जीवन निर्वाह के साधन देखने के लिए, परन्तु हम भारत की वास्तविकता दिखाने की अपेक्षा ‘कल्चरल प्रोग्राराम’ के नाम पर उन्हें दिखाते हैं अपनी जवान बहिन-बेटियों का नाच ? क्या हमारे पास कोई अच्छी वस्तु दिखाने को नहीं है । क्या हम उन्हें अरविन्द आश्रम, शान्ति-निकेतन और गुरुकुलों की सैर नहीं करा सकते? जो लोग इन नाचों को कराते हैं, चाहे वे माता-पिता हों या शिक्षक हों या सरकारी अधिकारी हों अथवा मन्त्री हों वे अवश्य ही पापों को प्रोत्साहन देने वाले हैं । हम शिक्षकों और शिक्षिकाओं से निवेदन करते हैं कि कृपया वे बालिकाओं को नाचना न सिखायें और उनका जीवन विलासिताप्रिय न बनाएं । प्रसिद्ध आचार्य श्री क्षति मोहन सेन ने ठीक ही कहा था कि मुझे तो ऐसा लगता है कि हम लोग संस्कृति शब्द का अर्थ ही भूल गये हैं ।
(कल्याण मासिक’ के वर्ष 62 के वार्षिकांक में प्रकाशित श्री भवानी लाल जी भारतीय के एक लेख से)
2. (क) निजी अनुभव पर आधारित संस्मरणात्मक अनुच्छेद
1. मेले में दो घंटे
भारत एक त्योहारों का देश है । इन त्योहारों को मनाने के लिए जगह- जगह मेले लगते हैं । इन मेलों का महत्त्व कुछ कम नहीं है किन्तु पिछले दिनों मुझे जिस मेले को देखने का सुअवसर मिला वह अपने आप में अलग ही था । इस मेले में बिताए दो घंटों का विवरण यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ । भारतीय मेला प्राधिकरण तथा भारतीय कृषि और अनुसंधान परिषद् के सहयोग से हमारे नगर में एक कृषि मेले का आयोजन किया गया था । भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों का इस मेले में सहयोग प्राप्त किया गया था । इस मेले में विभिन्न राज्यों ने अपने-अपने मंडप लगाए थे । उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार और महाराष्ट्र के मंडपों में गन्ने और गेहूँ की पैदावार से सम्बन्धित विभिन्न चित्रों का प्रदर्शन किया गया था। केरल, गोवा के काजू और मसालों, असम में चाय, बंगाल में चावल, गुजरात, मध्य प्रदेश और पंजाब में रुई की पैदावार से संबंधित सामग्री प्रदर्शित की थी ।
अनेक व्यावसायिक एवं औद्योगिक कम्पनियों ने भी अपने अलग-अलग मंडप सजाए थे । इसमें रासायनिक खाद , ट्रैक्टर, डीज़ल पम्प, मिट्टी खोदने के उपकरण, हल, अनाज की कटाई और छटाई के अनेक उपकरण प्रदर्शित किए गए थे । इसी मेले में मुझे यह जानकारी प्राप्त कर खुशी हुई कि पंजाब में बने ट्रैक्टरों की बिक्री और मांग देश में सबसे अधिक है । यह मेला एशिया में अपनी तरह का पहला मेला था । इसमें अनेक एशियाई देशों ने भी अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए मण्डप लगाए थे । इनमें जापान का मंडप सबसे विशाल था । इस मंडप को देख कर हमें पता चला कि जापान जैसा छोटासा देश कृषि के क्षेत्र में कितनी उन्नति कर चुका है । हमारे प्रदेश के बहुत-से कृषक यह मेला देखने आए थे । मेले में उन्हें अपनी खेती के विकास संबंधी काफी जानकारी प्राप्त हुई । इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण था मेले में आयोजित विभिन्न प्रान्तों के लोकनृत्यों का आयोजन । सभी नृत्य एक से बढ़ कर एक थे । मुझे पंजाब और हिमाचल प्रदेश के लोकनृत्य सबसे अच्छे लगे । इन नृत्यों को आमने-सामने देखने का मेरा यह पहला ही अवसर था । लगभग दो घंटे मेले में बिताने के बाद मैं घर लौट आया और अपने साथ ढेर सारी सूचना एकत्र करके लाया ।
2. प्रदर्शनी अवलोकन
पिछले महीने मुझे दिल्ली में अपने किसी मित्र के पास जाने का अवसर प्राप्त हुआ । संयोग से उन दिनों दिल्ली के प्रगति मैदान में एक अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी चल रही थी । मैंने अपने मित्र के साथ इस प्रदर्शनी को देखने का निश्चय किया । शाम अनुच्छेद लेखन को लगभग पांच बजे हम प्रगति मैदान पर पहुंचे । प्रदर्शनी के मुख्य द्वार पर हमें यह सूचना मिल गई कि इस प्रदर्शनी में लगभग तीस देश भाग ले रहे हैं । हमने देखा की सभी देशों ने अपने-अपने पंडाल बड़े कलात्मक ढंग से सजाए हुए हैं। उन पंडालों में उन देशों की निर्यात की जाने वाली वस्तुओं का प्रदर्शन किया जा रहा था। अनेक भारतीय कम्पनियों ने भी अपने-अपने पंडाल सजाए हुए थे । प्रगति मैदान किसी दुल्हन की तरह सजाया गया था । प्रदर्शनी में सजावट और रोशनी का प्रबन्ध इतना शानदार था कि अनायास ही मन से वाह निकल पड़ती थी ।
प्रदर्शनी देखने आने वालों की काफी भीड़ थी। हमने प्रदर्शनी के मुख्य द्वार से टिकट खरीद कर भीतर प्रवेश किया। सबसे पहले हम जापान के पंडाल में गए । जापान ने अपने पंडाल में कृषि, दूर संचार, कम्प्यूटर आदि से जुड़ी वस्तुओं का प्रदर्शन किया था । हमने वहां इक्कीसवीं सदी में टेलीफोन एवं दूर संचार सेवा कैसी होगी इस का एक छोटा-सा नमूना देखा । जापान ने ऐसे टेलिफोन का निर्माण किया था जिसमें बातें करने वाले दोनों व्यक्ति एक-दूसरे की फोटो भी देख सकेंगे । वहीं हमने एक पॉकेट टेलीविज़न भी देखा जो माचिस की डिबिया जितना था। सारे पंडाल का चक्कर लगाकर हम बाहर आए ।
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उसके बाद हमने दक्षिण कोरिया,ऑस्ट्रेलिय और जर्मनी के पंडाल देखे । उस प्रदर्शनी को देख कर हमें लगा कि अभी भारत को उन देशों का मुकाबला करने के लिए काफ़ी मेहनत करनी होगी । हमने वहां भारत में बनने वाले टेलीफोन, कम्प्यूटर आदि का पंडाल भी देखा । वहां यह जानकारी प्राप्त करके मन बहुत खुश हुआ कि भारत दूसरे बहुत-से देशों को ऐसा सामान निर्यात करता है । भारतीय उपकरण किसी भी हालत विदेशों में बने सामान से कम नहीं थे । कोई घण्टा भर प्रदर्शनी में घूमने के बाद हमने प्रदर्शनी में ही बने रस्टोरेंट में चाय-पान किया और इक्कीसवीं सदी में दुनिया में होने वाली प्रगति का नक्शा आँखों में बसाए विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में होने वाली अत्याधुनिक जानकारी प्राप्त करके घर वापस आ गए ।
3. नदी किनारे एक शाम
गर्मियों की छुट्टियों के दिन थे । कॉलेज जाने की चिंता नहीं थी और न ही होमवर्क की । एक दिन चार मित्र एकत्र हुए और सभी ने यह तय किया कि आज की शाम नदी किनारे सैर करके बिताई जाए । कुछ तो गर्मी से राहत मिलेगी कुछ प्रकृति के सौन्दर्य के दर्शन करके जी खुश होगा। एक ने कही दूजे ने मानी के अनुसार हम सब लगभग छ: बजे के करीब एक स्थान पर एकत्र हुए और पैदल ही नदी की ओर चल पड़े । दिन अभी ढला नहीं था बस ढलने ही वाला था । ढलते सूर्य की लाललाल किरणें पश्चिम क्षितिज पर ऐसे लग रही थीं मानो प्रकृति रूपी युवती लाल-लाल वस्त्र पहने मचल रही हो । पक्षी अपने-अपने घौंसलों की ओर लौटने लगे थे । खेतों में हरियाली छायी हुई थी । ज्यों ही हम नदी किनारे पहुंचे सूर्य की सुनहरी किरणें नदी के पानी पर पड़ती हुई बहुत भली प्रतीत हो रही थीं । ऐसे लगता था मानों नदी के जल में हजारों लाल कमल एक साथ खिल उठे हों। नदी तट पर लगे वृक्षों की पंक्ति देख कर ‘तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए’ कविता की पंक्ति याद हो आई । नदी तट के पास वाले जंगल से ग्वाले पशु चरा कर लौट रहे थे । पशुओं के पैरों से उठने वाली धूलि एक मनोरम दृश्य उपस्थित कर रही थी ।
हम सभी मित्र बातें कम कर रहे थे, प्रकृति के रूप रस का पान अधिक कर रहे थे । हमने देखा कुछ शहरी लोग नदी किनारे सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए आ रहे हैं । हमने उन लोगों से दूर रहना ही उचित समझा क्योंकि वे लोग बातें अधिक कर रहे थे, प्रकृति का रूप कम निहार रहे थे। थोड़ी ही देर में सूर्य अस्तांचल की ओर जाता हुआ प्रतीत हुआ । नदी का जो जल पहले लाल-लाल लगता था अब धीरे-धीरे नीला पड़ना शुरू हो गया था । उड़ते हुए बगुलों की सफेद-सफेद पंक्तियाँ उस धूमिल वातावरण में और भी अधिक सफेद लग रही थीं । नदी तट पर सैर करते-करते हम गांव से काफी दूर निकल आए थे। प्रकृति की सुन्दरता निहारते-निहारते ऐसे खोये थे कि समय का ध्यान ही न रहा । हम सब गांव की ओर लौट पड़े और हम सब ने एक-दूसरे को यह बताया कि हमने क्या देखा, क्या अनुभव किया । सभी एक मत थे कि नदी तट पर नृत्य करती हुई प्रकृति रूपी नदी की यह शोभा विचित्र थी, अनोखी थी जिसे कोई दिल वाला ही अनुभव कर सकता है। नदी किनारे सैर करते हुए बितायी वह शाम ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी।
4. छुट्टी का दिन
छुट्टी के दिन की हर किसी को प्रतीक्षा होती है । विशेषकर विद्यार्थियों को तो इस दिन की प्रतीक्षा बड़ी बेसबरी से होती है। उस दिन न तो जल्दी उठने की चिन्ता होती है; न कॉलेज जाने की। स्कूल में भी छुट्टी की घण्टी बजते ही विद्यार्थी कितनी प्रसन्नता से ‘छुट्टी ओए’ का नारा लगाते हुए कक्षाओं से बाहर आ जाते हैं । प्राध्यापक महोदय के भाषण का आधा वाक्य ही उनके मुँह में रह जाता है और विद्यार्थी कक्षा छोड़ कर बाहर की ओर भाग जाते हैं और जब यह पता चलता है कि आज दिन भर की छुट्टी है तो विद्यार्थी की खुशी का ठिकाना नहीं रहता । छुट्टी के दिन का पूरा मज़ा तो लड़के ही उठाते हैं। वे उस दिन खूब जी भर कर खेलते हैं, घूमते हैं । कोई सारा दिन क्रिकेट के मैदान में बिताता है तो कोई पतंग बाज़ी में सारा दिन बिता देते हैं । सुबह के घर से निकले शाम को ही घर लौटते हैं । कोई कुछ कहे तो उत्तर मिलता है कि आज तो छुट्टी है।
परन्तु हम लड़कियों के लिए छुट्टी का दिन घरेलू काम-काज का दिन होता है । हाँ यह ज़रूर है कि उस दिन पढ़ाई से छुट्टी होती है । छुट्टी के दिन मुझे सुबह सवेरे उठ कर अपनी माता जी के साथ कपड़े धोने में सहायता करनी पड़ती है । मेरी माता जी एक स्कूल में पढ़ाती हैं अत: उनके पास कपड़े धोने के लिए केवल छुट्टी का दिन ही उपयुक्त होता है। कपड़े धोने के बाद मुझे अपने बाल धोने होते हैं बाल धोकर स्नान करके फिर रसोई में माता जी का हाथ बटाना पड़ता है । छुट्टी के दिन ही हमारे घर में विशेष व्यंजन पकते हैं ।
दूसरे दिनों में तो सुबह सवेरे सब को भागम भाग लगी होती है। किसी को स्कूल जाना होता है तो किसी को दफ्तर । दोपहर के भोजन के पश्चात् थोड़ा आराम करते हैं । फिर माता जी मुझे लेकर बैठ जाती हैं । कुछ सिलाई, बुनाई या कढ़ाई की शिक्षा देने । उनका मानना है कि लड़कियों को ये सब काम आने चाहिएं । शाम होते ही शाम की चाय का समय हो जाता है । छुट्टी के दिन शाम की चाय में कभी समोसे, कभी पकौड़े बनाये जाते हैं । चाय पीने के बाद फिर रात के खाने की चिन्ता होने लगती है और इस तरह छुट्टी का दिन एक लड़की के लिए छुट्टी का नहीं अधिक काम का दिन होता है । सोचती हूं काश मैं लड़का होती तो मैं भी छुट्टी के दिन का पूरा आनन्द उठाती ।
5. वर्षा ऋतु की पहली वर्षा
जून का महीना था । सूर्य अंगारे बरसा रहा था । धरती तप रही थी । पशु-पक्षी तक गर्मी के मारे परेशान थे । हमारे यहां तो कहावत प्रचलित है कि ‘जेठ हाड़ दियाँ धुपां पोह माघ दे पाले’ । जेठ अर्थात् ज्येष्ठ महीना हमारे प्रदेश में सबसे अधिक तपने वाला महीना होता है । इसका अनुमान तो हम जैसे लोग ही लगा सकते हैं । मजदूर और किसान ही इस तपती गर्मी को झेलते हैं । पंखों, कूलरों या एयर कंडीशनरों में बैठे लोगों को इस गर्मी की तपश का अनुमान नहीं हो सकता । ज्येष्ठ महीना बीता, आषाढ़ महीना शुरू हुआ इस महीने में ही वर्षा ऋतु की पहली वर्षा होती है । सब की दृष्टि आकाश की ओर उठती है । किसान लोग तो ईश्वर से प्रार्थना के लिए अपने हाथ ऊपर उठा देते हैं । सहसा एक दिन आकाश में बादल छा गये । बादलों की गड़गड़ाहट सुन कर मोर अपनी मधुर आवाज़ में बोलने लगे । हवा में भी थोड़ी शीतलता आ गई । मैं अपने कुछ साथियों के साथ वर्षा ऋतु की पहली वर्षा का स्वागत करने की तैयारी करने लगा । धीरे-धीरे हल्की-हल्की बूंदा-बंदी शुरू हो गयी । हमारी मण्डली की खुशी का ठिकाना न रहा । मैं अपने साथियों के साथ गांव की गलियों में निकल पड़ा । साथ ही हम नारे लगाते जा रहे थे, ‘कालियाँ इट्टां काले रोड़ मीह बरसा दे जोरो जोर’। कुछ साथी गा रहे थे ‘बरसो राम धड़ाके से, बुढ़िया मर गई फाके से’ ।
किसान लोग भी खुश थे । उनका कहना था – ‘बरसे सावन तो पाँच के हों बावन’ नववधुएं भी कह उठी ‘बरसात वर के साथ’ और विरहिणी स्त्रियां भी कह उठीं कि ‘छुट्टी लेके आजा बालमा, मेरा लाखों का सावन जाए ।’ वर्षा तेज़ हो गयी थी । हमारी मित्र मंडली वर्षा में भीगती गलियों से निकल खेतों की ओर चल पड़ी । खुले में वर्षा में भीगने, नहाने का मजा ही कुछ और है । हमारी मित्र मंडली में गांव के और बहुत से लड़के शामिल हो गये थे । वर्षा भी उस दिन कड़ाके से बरसी । मैं उन क्षणों को कभी भूल नहीं सकता । सौन्दर्य का ऐसा साक्षात्कार मैंने कभी न किया था। जैसे वह सौंदर्य अस्पृश्य होते हुए भी मांसल हो । मैं उसे छू सकता था, देख सकता था और पी सकता था । मुझे अनुभव हुआ कि कवि लोग क्योंकर ऐसे दृश्यों से प्रेरणा पाकर अमर काव्य का सृजन करते हैं । वर्षा में भीगना, नहाना, नाचना, खेलना उन लोगों के भाग्य में कहां जो बड़ी-बड़ी कोठियों में एयरकंडीशनर कमरों में रहते हैं।
6. रेलवे प्लेटफार्म का दृश्य
एक दिन संयोग से मुझे अपने बड़े भाई को लेने रेलवे स्टेशन पर जाना पड़ा । मैं प्लेटफार्म टिकट लेकर रेलवे स्टेशन के अन्दर गया। पूछताछ खिड़की से पता लगा कि दिल्ली से आने वाली गाड़ी प्लेटफार्म नं० 4 पर आएगी । मैं रेलवे पुल पार करके प्लेटफार्म नं० 4 पर पहुंच गया। वहां यात्रियों की काफ़ी बड़ी संख्या मौजूद थी । कुछ लोग मेरी तरह अपने प्रियजनों को लेने के लिए आये थे तो कुछ लोग अपने प्रियजनों को गाड़ी में सवार कराने के लिए आये हुए थे । जाने वाले यात्री अपने-अपने सामान के पास खड़े थे । कुछ यात्रियों के पास कुली भी खड़े थे । मैं भी उन लोगों की तरह गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगा । इसी दौरान मैंने अपनी नज़र रेलवे प्लेटफार्म पर दौड़ाई ।
मैंने देखा कि अनेक युवक और युवितयाँ अनुच्छेद लेखन अत्याधुनिक पोशाक पहने इधर-उधर घूम रहे थे । कुछ युवक तो लगता था यहाँ केवल मनोरंजन के लिए ही आए थे । वे आने-जाने वाली लड़कियों, औरतों को अजीब-अजीब नज़रों से घूर रहे थे । ऐसे युवक दो-दो, चार-चार के ग्रुप में थे । कुछ यात्री टी-स्टाल पर खड़े चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे, परन्तु उनकी नज़रे बार-बार उस तरफ उठ जाती थीं, जिधर से गाड़ी आने वाली थी। कुछ यात्री बड़े आराम से अपने सामान के पास खड़े थे, लगता था कि उन्हें गाड़ी आने पर जगह प्राप्त करने की कोई चिन्ता नहीं । उन्होंने पहले से ही अपनी सीट आरक्षित करवा ली थी ।
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कुछ फेरी वाले भी अपना माल बेचते हुए प्लेटफार्म पर घूम रहे थे । सभी लोगों की नज़रें उस तरफ थीं जिधर से गाड़ी ने आना था । तभी लगा जैसे गाड़ी आने वाली हो । प्लेटफार्म पर भगदड़-सी मच गई । सभी यात्री अपना-अपना सामान उठा कर तैयार हो गये । कुलियों ने सामान अपने सिरों पर रख लिया । सारा वातावरण उत्तेजना से भर गया । देखते ही देखते गाड़ी प्लेटफार्म पर आ पहुंची । कुछ युवकों ने तो गाड़ी के रुकने की भी प्रतीक्षा न की । वे गाड़ी के साथ दौड़ते-दौड़ते गाड़ी में सवार हो गये । गाड़ी रुकी तो गाड़ी में सवार होने के लिए धक्कम-पेल शुरू हो गयी । हर कोई पहले गाड़ी में सवार हो जाना चाहता था। उन्हें दूसरों की नहीं केवल अपनी चिन्ता थी। मेरे भाई मेरे सामने वाले डिब्बे में थे । उनके गाड़ी से नीचे उतरते ही मैंने उनके चरण स्पर्श किये और उनका सामान उठाकर स्टेशन से बाहर की ओर चल पड़ा । चलते-चलते मैंने देखा जो लोग अपने प्रियजनों को गाड़ी में सवार कराकर लौट रहे थे उनके चेहरे उदास थे और मेरी तरह जिनके प्रियजन गाड़ी से उतरे थे उनके चेहरों पर रौनक थी, खुशी थी।
7. बस अड्डे का दृश्य
आजकल पंजाब में लोग अधिकतर बसों से ही यात्रा करते हैं । पंजाब का प्रत्येक गांव मुख्य सड़क से जुड़ा होने के कारण बसों का आना-जाना अब लगभग हर गांव में होने लगा है । बस अड्डों का जब से प्रबन्ध पंजाब रोडवेज़ के अधिकार क्षेत्र में आया है बस अड्डों का हाल दिनों-दिन बरा हो रहा है । हमारे शहर का बस अड्डा भी उन बस अड्डों में से एक है जिसका प्रबन्ध हर दृष्टि से बेकार है । इस बस अड्डे के निर्माण से पूर्व बसें अलग-अलग स्थानों से अलगअलग अड्डों से चला करती थीं । सरकार ने यात्रियों की असुविधा को ध्यान में रखते हुए सभी बस अड्डे एक स्थान पर कर दिये । शुरू-शुरू में तो लोगों को लगा कि सरकार का यह कदम बड़ा सराहनीय है किन्तु ज्यों-ज्यों समय बीतता गया जनता की कठिनाइयां, परेशानियां बढ़ने लगीं। हमारे शहर के बस अड्डे पर भी अन्य शहरों की तरह अनेक दुकानें बनाई गई हैं । जिनमें खान-पान, फल-सब्जियों आदि की दुकानों के अतिरिक्त पुस्तकों की, मनियारी आदि की भी अनेक दुकानें हैं । हलवाई की दुकान से उठने वाला धुआँ सारे यात्रियों की परेशानी का कारण बनता है । चाय पान आदि की दुकानों की साफ सफाई की तरफ कोई ध्यान नहीं देता । वहाँ माल भी महँगा मिलता है और गंदा भी।
बस अड्डे में अनेक फलों की रेहड़ी वालों को भी माल बेचने की आज्ञा दी गई है । ये लोग काले लिफाफे रखते हैं जिनमें वे सड़े गले फल पहले से ही तोल कर रखते हैं और लिफाफा इस चतुराई से बदलते हैं कि यात्री को पता नहीं चलता । घर पहुंच कर ही पता चलता है कि उन्होंने जो फल चुने थे वे सब बदल दिये गये हैं । अड्डा इन्चार्ज इस सम्बन्ध में कोई कार्यवाही नहीं करते। बस अड्डे की शौचालय की साफ-सफ़ाई न होने के बराबर है । यात्रियों को टिकट देने के लिए लाइन नहीं लगवाई जाती । बस आने पर लोग भाग दौड़ कर बस में सवार होते हैं । औरतों, बच्चों और वृद्ध लोगों का बस में चढ़ना ही कठिन होता है । बहुत बार देखा गया है कि जितने लोग बस के अन्दर होते हैं उतने ही बस के ऊपर चढ़े होते हैं । पंजाब में एक कहावत प्रसिद्ध है कि रोडवेज़ की लारी न कोई शीशा न कोई बारी । पर बस अड्डों का हाल तो उनसे भी बुरा है । जगह-जगह खड्डे, कीचड़, मक्खियां, मच्छर और न जाने क्या-क्या । आज यह बस अड्डे जेब कतरों और नौसर बाजों के अड्डे बने हुए हैं । हर यात्री को अपने-अपने घर पहुंचने की जल्दी होती है इसलिए कोई भी बस अड्डे की इस दुर्दशा की ओर ध्यान नहीं देता ।
8. मतदान केन्द्र का दृश्य
प्रजातन्त्र में चुनाव अपना विशेष महत्त्व रखते हैं । गत 13 फरवरी को हमारे कस्बे में नवांशहर विधानसभा क्षेत्र के लिए भी चुनाव हुआ । चुनाव से कोई महीना भर पहले विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा बड़े जोर-शोर से चुनाव प्रचार किया गया । धन और शराब का खुलकर वितरण किया गया । पंजाब में एक कहावत प्रसिद्ध है कि चुनाव के दिनों में यहाँ नोटों की वर्षा की जाती है और शराब की नदियां बहती हैं । चुनाव आयोग ने लाख सिर पटका पर ढाक के तीन पात ही रहे । आज मतदान का दिन है । मतदान से एक दिन पूर्व ही मतदान केन्द्रों की स्थापना की गई है । मतदान वाले दिन जनता में भारी उत्साह देखा गया ।
इस बार पंजाब में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक मशीनों का प्रयोग किया जा रहा था । अब मतदाताओं को मतदान केन्द्र पर मत-पत्र नहीं दिये जाने थे और न ही उन्हें अपने मत मतपेटियों में डालने थे । अब तो मतदाताओं को अपनी पसन्द के उम्मीदवार के नाम और चुनाव चिह्न के आगे लगे बटन को दबाना भर था । इस नए प्रयोग के कारण भी मतदाताओं में काफी उत्साह देखने में आया। मतदान प्रात: आठ बजे शुरू होना था किन्तु मतदान केन्द्रों के बाहर विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने पंडाल समय से काफ़ी पहले सजा लिये । उन पंडालों में उन्होंने अपनी-अपनी पार्टी के झण्डे एवं उम्मीदवार के चित्र भी लगा रखे थे । दो तीन मेजें भी पंडाल में लगाई गई थीं जिन पर उम्मीदवार के कार्यकर्ता मतदान सूचियाँ लेकर बैठे थे और मतदाताओं को मतदाता सूची में से उनकी क्रम संख्या तथा मतदान केन्द्र की संख्या तथा मतदान केन्द्र का नाम लिखकर एक पर्ची दे रहे थे ।
आठ बजने से पूर्व ही मतदान केन्द्रों पर मतदाताओं की लम्बी-लम्बी कतारें लगनी शुरू हो गई थीं । मतदाता विशेषकर स्त्री मतदाता खूब सज-धज कर आए थे । ऐसा लगता था कि वे किसी मेले में आए हों । दोपहर होते-होते मतदाताओं की भीड़ में कमी आने लगी । राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता मतदाताओं को घेर-घेर कर ला रहे थे । हालांकि चुनाव आयोग ने मतदाताओं को किसी प्रकार के वाहन में लाने की मनाही की है किन्तु सभी उम्मीदवार अपने-अपने मतदाताओं को रिक्शा, जीप या कार में बिठा कर ला रहे थे । सायं पांच बजते-बजते यह मेला उजड़ने लगा। भीड़ मतदान केन्द्र से हट कर उम्मीदवारों के पंडालों में जमा हो गयी थी और सभी अपने-अपने उम्मीदवार की जीत के अनुमान लगाने में मस्त थे ।
9. रेल यात्रा का अनुभव
हमारे देश में रेलवे ही एक ऐसा विभाग है जो यात्रियों को टिकट देकर सीट की गारण्टी नहीं देता । रेल का टिकट खरीद कर सीट मिलने की बात तो बाद में आती है पहले तो गाड़ी में घुस पाने की भी समस्या सामने आती है । और यदि कहीं आप बाल-बच्चों अथवा सामान के साथ यात्रा कर रहे हों तो यह समस्या और भी विकट हो उठती है । कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि टिकट पास होते हुए भी आप गाड़ी में सवार नहीं हो पाते और ‘दिल की तमन्ना दिल में रह गयी’ गाते हुए या रोते हुए घर लौट आते हैं । रेलगाड़ी में सवार होने से पूर्व गाड़ी की प्रतीक्षा करने का समय बड़ा कष्टदायक होता है । मैं भी एक बार रेलगाड़ी में मुम्बई जाने के लिए स्टेशन पर गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था । गाड़ी कोई दो घंटे लेट थी । यात्रियों की बेचैनी देखते ही बनती थी । गाड़ी आई तो गाड़ी में सवार होने के लिए जोर आज़माई शुरू हो गयी । किस्मत अच्छी थी कि मैं गाड़ी में सवार होने में सफल हो सका । गाड़ी चले अभी घंटा भर ही हुआ था कि कुछ यात्रियों के मुख से मैंने सुना कि यह डिब्बा जिसमें मैं बैठा था अमुक स्थान पर कट जाएगा ।
यह सुनकर मैं तो दुविधा में पड़ गया । गाड़ी रात के एक बजे उस स्टेशन पर पहुंची जहाँ हमारा वह डिब्बा मुख्य गाड़ी से कटना था और हमें दूसरे डिब्बे में सवार होना था । उस समय अचानक तेज़ वर्षा होने लगी । स्टेशन पर कोई भी कुली नज़र नहीं आ रहा था। सभी यात्री अपना-अपना सामान उठाये वर्षा में भीगते हुए दूसरे डिब्बे की ओर भागने लगे । मैं भी ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का स्मरण करते हुए अपना सामान स्वयं ही उठाने का निर्णय करते हुए अपना सामान गाड़ी से उतारने लगा । मैं अपना अटैची लेकर उतरने लगा कि एक दम से वह डिब्बा चलने लगा । मैं गिरते-गिरते बचा और अटैची मेरे हाथ से छूट कर प्लेटफार्म पर गिर पड़ा और पता नहीं कैसे झटके के साथ खुल गया । मेरे कपड़े वर्षा में भीग गये। मैंने जल्दी-जल्दी अपना सामान समेटा और दूसरे डिब्बे की ओर बढ़ गया । गर्मी का मौसम और उस डिब्बे के पंखे बन्द । खैर गाड़ी चली तो थोड़ी हवा लगी और कुछ राहत मिली । बड़ी मुश्किल से मैं मुम्बई पहुँचा ।।
10. बस यात्रा का अनुभव
पंजाब में बस-यात्रा करना कोई आसान काम नहीं है । एक तो पंजाब की बसों के विषय में पहले ही कहावत प्रसिद्ध है कि रोडवेज़ दी लारी न कोई शीशा न कोई बारी’ दूसरे 52 सीटों वाली बस में ऊपर-नीचे कोई सौ सवा सौ आदमी सवार होते हैं । ऐसे अवसरों पर कंडक्टर महाश्य की तो चांदी होती है । वे न किसी को टिकट देते हैं और न किसी को बाकी पैसे । मुझे भी एक बार ऐसी ही बस यात्रा करने का अनुभव हुआ । मैं बस अड्डे पर उस समय पहुँचा जब बस चलने वाली ही थी अतः मैं टिकट खिड़की की ओर न जाकर सीधा बस की ओर बढ़ गया। बस ठसा ठस भरी हुई थी । मुझे जाने की जल्दी थी इसलिए मैं भी उस बस में घुस गया । बड़ी मुश्किल से खड़े होने की जगह मिली । मेरे बस में सवार होने के बाद भी बहुत से यात्री बस में चढ़ना चाहते थे । कंडक्टर ने उन्हें बस की छत्त के ऊपर चढ़ने के लिए कहा । पुरुष यात्री तो सभी अनुच्छेद लेखन छत पर चढ़ गये परन्तु स्त्रियां और बच्चे न चढ़े। बस चली तो लोगों ने सुख की सांस ली। थोड़ी देर में बस कंडक्टर टिकटें काटता हुआ मेरे पास आया । मुझे लगा उसने शराब पी रखी है । मुझ से पैसे लेकर उसने बकाया मेरी टिकट के पीछे लिख दिया और आगे बढ़ गया ।
मैंने अपने पास खड़े एक सज्जन से कंडक्टर के शराब पीने की बात कही तो उन्होंने कहा कि शाम के समय ये लोग ऐसे ही चलते हैं । हराम की कमाई है शराब में नहीं उड़ाएंगे तो और कहाँ उड़ाएंगे । थोड़ी ही देर में एक बूढ़ी स्त्री का उस कंडक्टर से झगड़ा हो गया । कंडक्टर उसे फटे हुए नोट बकाया के रूप में वापस कर रहा था और बुढ़िया उन नोटों को लेने से इन्कार कर रही थी । कंडक्टर कह रहा था ये सरकारी नोट हैं हमने कोई अपने घर तो बनाये नहीं । इसी बीच उसने उस बुढ़िया को कुछ अपशब्द कहे । बुढ़िया ने उठ कर उसको गले से पकड़ लिया । सारे यात्री कंडक्टर के विरुद्ध हो गये। कंडक्टर बजाए क्षमा मांगने के और भी गर्म हो रहा था । अभी उन में यह झगड़ा चल ही रहा था कि मेरे गांव का स्टाप आ गया । बस रुकी और मैं जल्दी से उतर गया । बस क्षण भर रुकने के बाद आगे बढ़ गयी। मेरी सांस में सांस आई । जैसे मुझे किसी ने शिकंजे में दबा रखा हो। इसी घबराहट में मैं कंडक्टर से अपने बकाया पैसे लेना भी भूल गया।
11. परीक्षा भवन का दृश्य
अप्रैल महीने की पहली तारीख थी । उस दिन हमारी वार्षिक परीक्षाएं शुरू हो रही थीं । परीक्षा शब्द से वैसे सभी मनुष्य घबराते हैं परन्तु विद्यार्थी वर्ग इस शब्द से विशेष रूप से घबराता है । मैं जब घर से चला तो मेरा दिल भी धक-धक कर रहा था । रात भर पढ़ता रहा। चिन्ता थी कि यदि सारी रात के पढ़े में से कुछ भी प्रश्न पत्र में न आया तो क्या होगा । परीक्षा भवन के बाहर सभी विद्यार्थी चिन्तित से नज़र आ रहे थे । कुछ विद्यार्थी किताबें लेकर अब भी उनके पन्ने उलट पुलट रहे थे। कुछ बड़े खुश-खुश नज़र आ रहे थे। लड़कों से ज्यादा लड़कियां अधिक गम्भीर नज़र आ रही थीं । कुछ लड़कियाँ तो इसी आत्मविश्वास के कारण ही शायद हर परीक्षा में लड़कों से बाजी मार जाती हैं। मैं अपने सहपाठियों से उस दिन के प्रश्न पत्र के बारे में बात कर ही रहा था कि परीक्षा भवन में घंटी बजनी शुरू हो गई । यह संकेत था कि हमें परीक्षा भवन में प्रवेश कर जाना चाहिए। सभी विद्यार्थियों ने परीक्षा भवन में प्रवेश करना शुरू कर दिया । भीतर पहुँच कर हम सब अपने अपने रोल नं० के अनुसार अपनी-अपनी सीट पर जाकर बैठ गये ।
थोड़ी ही देर में अध्यापकों द्वारा उत्तर पुस्तिकाएं बांट दी गईं और हम ने उस पर अपना-अपना रोल नं० आदि लिखना शुरू कर दिया । ठीक नौ बजते ही एक घंटी बजी और अध्यापकों ने प्रश्न पत्र बाँट दिये । कुछ विद्यार्थी प्रश्न पत्र प्राप्त करके उसे माथा टेकते देखे गये। मैंने भी ऐसा ही किया। माथा टेकने के बाद मैंने प्रश्न पत्र पढ़ना शुरू किया । मेरी खुशी का कोई ठिकाना न था क्योंकि प्रश्न पत्र के सभी प्रश्न मेरे पढ़े हुए या तैयार किये हुए प्रश्नों में से थे । मैंने किये जाने वाले प्रश्नों पर निशान लगाये और कुछ क्षण तक यह सोचा कि कौन-सा प्रश्न पहले करना चाहिए और फिर उत्तर लिखना शुरू कर दिया । मैंने देखा कुछ विद्यार्थी अभी बैठे सोच ही रहे थे शायद उनके पढ़े में से कोई प्रश्न न आया हो । तीन घण्टे तक मैं बिना इधर-उधर देखे लिखता रहा । परीक्षा भवन से बाहर आकर ही मुझे पता चला कि कुछ विद्यार्थियों ने बड़ी नकल की परन्तु मुझे इसका कुछ पता नहीं चला । मेज़ से सिर उठाता तो पता चलता । मैं प्रसन्न था कि उस दिन मेरा पर्चा बहुत अच्छा हुआ था।
12. मेरे जीवन की अविस्मरणीय घटना
आज मैं बी० ए० प्रथम वर्ष में हो गया हूँ । माता-पिता कहते हैं कि अब तुम बड़े हो गये हो । मैं भी कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या मैं सचमुच बड़ा हो गया हूँ । हां, मैं सचमुच बड़ा हो गया हूँ । मुझे बीते दिनों की कुछ बातें आज भी याद हैं जो मेरा मार्गदर्शन कर रही हैं । एक घटना ऐसी है जिसे मैं आज भी याद करके आनन्द विभोर हो उठता हूँ । घटना कुछ इस तरह से है । कोई दो तीन साल पहले की घटना है । मैंने एक दिन देखा कि हमारे आंगन में लगे वृक्ष के नीचे एक चिड़िया का बच्चा घायल अवस्था में पड़ा है । मैं उस बच्चे को उठा कर अपने कमरे में ले आया। मेरी माँ ने मुझे रोका भी कि इसे इस तरह न उठाओ यह मर जाएगा किन्तु मेरा मन कहता था कि इस चिड़िया के बच्चे को बचाया जा सकता है । मैंने उसे चम्मच से पानी पिलाया । पानी मुँह में जाते ही उस बच्चे ने जो बेहोश-सा लगता था पंख फड़फड़ाने शुरू कर दिये । यह देख कर मैं प्रसन्न हुआ । मैंने उसे गोद में लेकर देखा कि उस की टांग में चोट आई है । मैंने अपने छोटे भाई से माँ से मरहम की डिबिया लाने को कहा । वह तुरन्त मरहम की डिबिया ले आया। उस में से थोड़ी सी मरहम मैंने उस चिड़िया के बच्चे की चोट पर लगाई ।
मरहम लगते ही मानो उसकी पीड़ा कुछ कम हुई । वह चुपचाप मेरी गोद में ही लेटा था । मेरा छोटा भाई भी उस के पंखों पर हाथ फेर कर खुश हो रहा था । कोई घण्टा भर मैं उसे गोद में ही लेकर बैठा रहा । मैंने देखा कि बच्चा थोड़ा उड़ने की कोशिश करने लगा था । मैंने छोटे भाई से एक रोटी मंगवाई और उसकी चूरी बनाकर उसके सामने रखी । वह उसे खाने लगा । हम दोनों भाई उसे खाते हुए देख कर खुश हो रहे थे । मैंने उसे अब अपनी पढ़ाई की मेज़ पर रख दिया । रात को एक बार फिर उस के घाव पर मरहम लगाई । दूसरे दिन मैंने देखा चिड़िया का वह बच्चा मेरे कमरे में इधर-उधर फुदकने लगा है । वह मुझे देख चींची करके मेरे प्रति अपना आभार प्रकट कर रहा था । एक दो दिनों में ही उस का घाव ठीक हो गया और मैंने उसे आकाश में छोड़ दिया । वह उड़ गया । मुझे उस चिड़िया के बच्चे के प्राणों की रक्षा करके जो आनन्द प्राप्त हुआ उसे मैं जीवन भर नहीं भुला पाऊँगा ।
13. आँखों देखी दुर्घटना का दृश्य
पिछले रविवार की बात है मैं अपने मित्र के साथ सुबह-सुबह सैर करने माल रोड पर गया। वहाँ बहुत से स्त्री-पुरुष और बच्चे भी सैर करने आये हुए थे। जब से दूरदर्शन पर स्वास्थ्य सम्बन्धी कार्यक्रम आने लगे हैं अधिक-से-अधिक लोग प्रातः भ्रमण के लिए इन जगहों पर आने लगे हैं। रविवार होने के कारण उस दिन भीड़ कुछ अधिक थी । तभी मैंने वहाँ एक युवा दम्पति को अपने छोटे बच्चे को बच्चा गाड़ी में बिठा कर सैर करते देखा । अचानक लड़कियों के स्कूल की ओर एक तांगा आता हुआ दिखाई पड़ा। उस में चार पाँच सवारियाँ भी बैठी थीं । बच्चा गाड़ी वाले दम्पत्ति ने तांगे से बचने के लिए सड़क पार करनी चाही। जब वे सड़क पार कर रहे थे तो दूसरी तरफ से बड़ी तेज़ गति से आ रही एक कार उस तांगे से टकरा गई। तांगा चलाने वाला और दो सवारियां बुरी तरह से घायल हो गये थे। बच्चा गाड़ी वाली स्त्री के हाथ से बच्चा गाड़ी छूट गयी किन्तु इस से पूर्व कि वह बच्चे समेत तांगे और कार की टक्कर वाली जगह पर पहुँच कर उन से टकरा जाती मेरे साथी ने भागकर उस बच्चा गाड़ी को सम्भाल लिया। कार चलाने वाले सज्जन को भी काफ़ी चोटें आई थीं पर उस की कार को कोई खास क्षति नहीं पहुंची थी।
माल रोड पर गश्त करने वाली पुलिस के तीन चार सिपाही तुरन्त घटना स्थल पर पहुँच गये । उन्होंने वायरलैस द्वारा अपने अधिकारियों और हस्पताल को फोन किया। कुछ ही मिनटों में वहाँ एम्बुलैंस गाड़ी आ गई । हम सब ने घायलों को उठा कर एम्बुलैंस में लिटाया। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी तुरन्त वहाँ पहुँच गये। उन्होंने कार चालक को पकड़ लिया था। प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस को बताया कि सारा दोष कार चालक का था। इस सैर सपाटे वाली सड़क पर वह 100 कि० मी० की स्पीड से कार चला रहा था और तांगा सामने आने पर ब्रेक न लगा सका। दूसरी तरफ बच्चे को बचाने के लिए मेरे मित्र द्वारा दिखाई फुर्ती और चुस्ती की भी लोग सराहना कर रहे थे। उस दम्पति ने उस का विशेष धन्यवाद किया । बाद में हमें पता चला कि तांगा चालक ने हस्पताल में जाकर दम तोड़ दिया । जिसने भी इस घटना के बारे में सुना वह दु:खी हुए बिना न रह सका ।
14. कैसे मनायी हम ने पिकनिक
पिकनिक एक ऐसा शब्द है जो थके हुए शरीर एवं मन में एक दम स्फूर्ति ला देता है । मैंने और मेरे मित्र ने परीक्षा के दिनों में बड़ी मेहनत की थी । परीक्षा का तनाव हमारे मन और मस्तिष्क पर विद्यमान था अतः उस तनाव को दूर करने के लिए हम दोनों ने यह निर्णय किया कि क्यों न किसी दिन माधोपुर हैडवर्क्स पर जाकर पिकनिक मनायी जाए । अपने इस निर्णय से अपने मुहल्ले के दो-चार और मित्रों को अवगत करवाया तो वे भी हमारे साथ चलने को तैयार हो गये। माधोपुर हैडवर्क्स हमारे शहर से लगभग 10 कि० मि० दूरी पर था अतः हम सब ने अपने-अपने साइकलों पर जाने का निश्चय किया । पिकनिक के लिए रविवार का दिन निश्चित किया गया क्योंकि उस दिन वहाँ बड़ी रौनक रहती है ।
रविवार वाले दिन हम सब ने नाश्ता करने के बाद अपने-अपने लंच बाक्स तैयार किये तथा कुछ अन्य खाने का सामान अपने-अपने साइकलों पर रख लिया । मेरे मित्र के पास एक छोटा टेपरिकार्डर भी था उसे भी उसने साथ ले लिया तथा साथ में कुछ अपने मन पसन्द गानों की टेपस् भी रख ली । हम सब अपनी-अपनी साइकल पर सवार हो, हँसते गाते एक-दूसरे को चुटकले सुनाते पिकनिक स्थल की ओर बढ़ चले । लगभग 45 मिनट में हम सब माधोपुर हैडवर्क्स पर पहुँच गये। वहां हम ने प्रकृति को अपनी सम्पूर्ण सुषमा के साथ विराजमान देखा । चारों तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे, शीतल, और मन्द-मन्द हवा बह रही थी । हम ने एक ऐसी जगह चुनी जहाँ घास की प्राकृतिक कालीन बिछी हुई थी । हमने वहाँ एक दरी, जो हम साथ
अनुच्छेद लेखन लाये थे, बिछा दी । साइकिल चलाकर हम थोड़ा थक गये थे अत: हमने पहले थोड़ी देर विश्राम किया । हमारे एक साथी ने हमारी कुछ फोटो उतारी । थोड़ी देर सुस्ता कर हमने टेप रिकार्डर चला दिया और गीतों की धुन पर मस्ती में भर कर नाचने लगे । कुछ देर तक हम ने इधर-उधर घूम कर वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों का नज़ारा किया । दोपहर को हम सब ने अपनेअपने टिफन खोले और सबने मिल बैठ कर एक दूसरे का भोजन बांट कर खाया । उस के बाद हम ने वहां स्थित कैनाल रेस्ट हाऊस रेस्टोरों में जाकर चाय पी । चाय पान के बाद हम ने अपने स्थान पर बैठ कर ताश खेलनी शुरू की । साथ में हम संगीत भी सुन रहे थे । ताश खेलना बन्द करके हमने एक दूसरे को कुछ चुटकले और कुछ आप बीती हंसी मज़ाक की बातें बताईं । हमें समय कितनी जल्दी बीत गया इसका पता ही न चला । जब सूर्य छिपने को आया तो हम ने अपना-अपना सामान समेटा और घर की तरफ चल पड़े । सच ही वह दिन हम सबके लिए एक रोमांचकारी दिन रहा।
15. पर्वतीय स्थान की यात्रा
आश्विन महीने के नवरात्रों में पंजाब के अधिकतर लोग देवी दुर्गा माता के दरबार में हाजिरी लगवाने और माथा टेकने जाते हैं। पहले हम हिमाचल प्रदेश में स्थित माता चिन्तापूर्णी और माता ज्वाला जी के मंदिरों में माथा टेकने आया करते थे। इस बार हमारे मुहल्ले वासियों ने मिल कर जम्मू क्षेत्र में स्थित माता वैष्णों देवी के दर्शनों को जाने का निर्णय किया । हमने एक बस का प्रबन्ध किया था, जिसमें लगभग पचास के करीब बच्चे-बूढ़े और स्त्री-पुरुष सवार होकर जम्मू के लिए रवाना हुए । सभी परिवारों ने अपने साथ भोजन आदि सामग्री भी ले ली थी । पहले हमारी बस पठानकोट पहुँची, वहां कुछ रुकने के बाद हम ने जम्मू क्षेत्र में प्रवेश किया । हमारी बस टेढ़े-मेढ़े पहाड़ी रास्ते को पार करती हुई जम्मू तवी पहुँच गयी । सारे रास्ते में दोनों तरफ अद्भुत प्राकृतिक दृश्य देखने को मिले जिन्हें देख कर हमारा मन प्रसन्न हो उठा । बस में सवार सभी यात्री माता की भेंटें गा रहे थे और बीच में माँ शेरा वाली का जयकारा भी बुला रहे थे । लगभग 6 बजे हम लोग कटरा पहुँच गये । वहाँ एक धर्मशाला में हम ने अपना सामान रखा और विश्राम किया और वैष्णो देवी जाने के लिए टिकटें प्राप्त की। दूसरे दिन सुबह सवेरे हम सभी माता की जय पुकारते हुए माता के दरबार की ओर चल पड़े। कटरा से भक्तों को पैदल ही चलना पड़ता है । कटरे से माता के दरबार तक जाने के दो मार्ग हैं । एक सीढ़ियों वाला मार्ग तथा दूसरा साधारण ।
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हमने साधारण मार्ग को चुना । इस मार्ग पर कुछ लोग खच्चरों पर सवार होकर भी यात्रा कर रहे थे । यहाँ से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर माता का मन्दिर है । मार्ग में हमने बाण गंगा में स्नान किया । पानी बर्फ-सा ठंडा था फिर भी सभी यात्री बड़ी श्रद्धा से स्नान कर रहे थे। कहते हैं यहाँ माता वैष्णो देवी ने हनुमान जी की प्यास बुझाने के लिए बाण चलाकर गंगा उत्पन्न की थी । यात्रियों को बाण गंगा में नहाना ज़रूरी माना जाता है अन्यथा कहते हैं कि माता के दरबार की यात्रा सफल नहीं होती । चढ़ाई बिल्कुल सीधी थी । चढ़ाई चढ़ते हुए हमारी सांस फूल रही थी परन्तु सभी यात्री माता की भेंटें गाते हुए और माता की जय जयकार करते हुए बड़े उत्साह से आगे बढ़ रहे थे । सारे रास्ते में बिजली के बल्ब लगे हुए थे और जगह-जगह पर चाय की दुकानें और पीने के पानी का प्रबंध किया गया था । कुछ ही देर में हम आदक्वारी नामक स्थान पर पहुँच गये । मन्दिर के निकट पहुँच कर हम दर्शन करने वाले भक्तों की लाइन में खड़े हो गये । अपनी बारी आने पर हम ने माँ के दर्शन किये । श्रद्धा पूर्वक माथा टेका और मन्दिर से बाहर आ गए । आजकल मन्दिर का सारा प्रबन्ध जम्मू-कश्मीर की सरकार एवं एक ट्रस्ट की देख-रेख में होता है । सभी प्रबन्ध बहुत अच्छे एवं सराहना के योग्य थे । घर लौटने तक हम सभी माता के दर्शनों के प्रभाव को अनुभव करते रहे ।
16. ऐतिहासिक स्थान की यात्रा
यह बात पिछली गर्मियों की है । मुझे मेरे एक पत्र मित्रं का पत्र प्राप्त हुआ जिसमें मुझे कुछ दिन उसके साथ आगरा में बिताने का निमंत्रण दिया गया था । यह निमन्त्रण पाकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ । किसी महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थान को देखने का मुझे अवसर मिल रहा था । मैंने अपने पिता से बात की तो उन्होंने खुशी-खुशी मुझे आगरा जाने की अनुमति दे दी। मैं रेल द्वारा आगरा पहुँचा। मेरा मित्र मुझे स्टेशन पर लेने आया हुआ था । वह मुझे अपने घर लिवा ले गया । यह मात्र संयोग की बात थी या फिर मेरा सौभाग्य कि उस दिन पूर्णिमा थी और कहते हैं पूर्णिमा की चाँदनी में ताजमहल को देखने का आनन्द ही कुछ और होता है । रात के लगभग नौ बजे हम घर से निकले ।
दूर से ही ताजमहल के मीनारों और गुम्बदों का दृश्य दिखाई दे रहा था । हमने प्रवेश द्वार से टिकट खरीदे और अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगे। भारत सरकार ने ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के लिए कई उपाय किये हैं जिन में यात्रियों की संख्या को नियन्त्रित करना भी एक है। ताजमहल के चारों ओर लाल पत्थर की दीवारें हैं जिसमें एक बहुत बड़ा और सुन्दर उद्यान है जिस की सजावट और हरियाली देख कर मन मोहित हो उठता है । हमने ताजमहल परिसर में जब प्रवेश किया तो देखा कि अन्दर देशी कम विदेशी पर्यटक अधिक थे । ताजमहल तक जाने के लिए सब से पहले एक बहुत ऊँचे और सुन्दर द्वार से होकर जाना पड़ता है ।
ताजमहल उद्यान के एक ऊँचे चबूतरे पर बनाया गया है जो सफेद संगमरमर का बना है । इसका गुम्बद बहुत ऊँचा है उस के चारों ओर बड़ीबड़ी मीनारें हैं । ताजमहल के पश्चिम की ओर यमुना नदी बहती है । यमुना जल में ताज की परछाई बहुत सुंदर व मोहक लग रही थी । हम ने ताजमहल के भीतर प्रवेश किया। सबसे नीचे के भवन में मुग़ल सम्राट शाहजहां और उस की पत्नी और प्रेमिका मुमताज महल की कब्रे हैं । उन पर अरबी भाषा में कुछ लिखा हुआ है और बहुत से रंग बिरंगे बेलबूटे बने हुए हैं। इस कमरे के ठीक ऊपर एक ऐसा ही भाग है । सौन्दर्य की दृष्टि से भी उसका विशेष महत्त्व है। कहते हैं इस में बनी संगमरमर की जाली की जगह पहले सोने की बनी जाली थी जिसे औरंगजेब ने हटवा दिया था । कहते हैं कि ताजमहल के निर्माण में बीस वर्ष लगे थे और उस युग में तीस लाख रुपए खर्च हुए थे । इसे बनाने में तीस हज़ार मजदूरों ने योगदान किया था । यह स्मारक बादशाह ने अपनी पत्नी की याद में बनवाया था ।
आज इसे संसार का आठवां अजूबा भी कहा जाता है । दुनिया भर से हर वर्ष लाखों लोग इसे देखने के लिए आते हैं । आज ताजमहल भी प्रदूषण का शिकार हो रहा है इसे बचाने के हर सम्भव उपाय किये जाने चाहिए । इसे देखकर हमारे मन में यह भाव जाग्रत होते हैं कि सच्चा प्रेम सदा अमर रहता है । जी न करते हुए भी हमें वहाँ से लौटकर वापस घर आना पड़ा।
17. तेते पाँव पसारिये जेती लाम्बी सौर
बड़े बुजुर्गों ने ठीक ही कहा है कि लेते पाँव पसारिये जेती लाम्बी सौर। अर्थात् व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही कार्य करना चाहिए अथवा खर्च करना चाहिए। अपनी सामर्थ्य से बाहर खर्च करने पर व्यक्ति को कष्ट तो उठाना ही पड़ता है बाद में दुःख भी झेलना पड़ता है। आज महंगाई बढ़ने का एक कारण यह भी है कि मध्यम वर्ग ने अपनी चादर से बाहर पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। अमीर बनने या अमीरी का दिखावा करने के कारण वह सामर्थ्य से बाहर खर्च करने का आदी बन गया है। घर में दिखावे की प्रत्येक वस्तु फ्रिज, टी० वी०, कूलर, ए० सी० आदि पर खर्च कर वह चादर से बाहर पैर पसारने का यत्न करता है। आजकल कार रखना भी एक स्टेटस सिम्बल बन गया है।
मध्यवर्गीय व्यक्ति ब्याह-शादी में भी अमीरों की नकल करते हुए खर्च करता है चाहे उसका बाल-बाल कर्जे में बिंध जाए पर अपनी नाक रखने के लिए समाज में अपने रुतबे को ध्यान में रखते हुए वह आखा, ढाका, सगाई और विवाह जैसी दिखावे की रस्मों पर अपनी सामर्थ्य से बढ़कर खर्च करता है। पुराने समय में एक कमाता था तो दस खाते थे क्योंकि वे अपनी चादर के भीतर ही पैर पसारते थे और सुखी रहते थे। आज के ज़माने में दस के दस कमाते हैं फिर भी घर का खर्च नहीं चलता। कारण लोगों को चादर से बाहर पैर पसारने की आदत पड़ गई है। इसी कारण आज गृहस्वामिनी को भी नौकरी करनी पड़ रही है। चादर से बाहर पैर पसारने की आदत ने लोगों को पैसे की दौड़ में शामिल होने पर विवश कर दिया है और पैसा कमाने के लिए लोगों को कई प्रकार के अनैतिक कार्य भी करने पड़ रहे हैं। बड़ों की मानें तो चादर के भीतर ही पैर पसारने में सुख है।
18. जैसी संगति बैठिए तैसोई फल होत
अथवा
सत्संगति
अंग्रेज़ी में एक कहावत है कि “A man is known by the company he keeps”. अर्थात् मनुष्य अपनी संगति से जाना जाता है। कबीर जी ने बुरी संगति को काजल की कोठरी से उपमा देते हुए कहा है कि इसमें कितना ही सयाना जाए उसे एक न एक काली लकीर अवश्य लग जाएगी। इसलिए उन्होंने साधु संगति पर बल दिया है। साधु संगति अर्थात् सत्संगति मनुष्य के स्वभाव को निर्मल ही नहीं बनाती बल्कि उसके कई दोष अथवा विकार भी दूर करती है। इसके अनुच्छेद लेखन विपरीत कोयले की दलाली में हमेशा मुँह काला ही होता है। मनुष्य को सबसे पहले संगति अपने माता-पिता की मिलती है। माता-पिता यदि सज्जन होंगे तो बच्चे का स्वभाव भी अच्छा होगा।
माता-पिता से ही बच्चे गालियाँ निकालना, सिगरेट-शराब आदि पीना, झूठ बोलना, चोरी करना जैसी बुरी आदतें सीखते हैं। व्यक्ति के सम्पर्क में दूसरा व्यक्ति मित्र आता है। मित्र यदि सच्चरित्र, लायक, प्रतिभावान होगा तो व्यक्ति विशेष भी चरित्रवान और प्रतिभावान होगा। इसके विपरीत यदि मित्रगण अच्छे नहीं हैं तो व्यक्ति बुरी आदतें जैसे नशा करना आदि सीखते हैं। कुसंगति वैसी ही है, जैसे एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है और सत्संगति वैसी ही है जैसे चन्दन का वृक्ष जो अपने आस-पास के वृक्षों को भी सुगन्धित बना देता है। सत्संगति के कारण ही ढाक का पत्ता राजा तक पहुँचने का गौरव प्राप्त करता है क्योंकि पान का बीड़ा उसी में बाँधा जाता है। अतः यह ठीक ही कहा गया है कि”जैसी संगति बैठिए तैसोई फल होत”।
19. बोए पेड़ बबूल के आम कहाँ ते होय
यदि कोई व्यक्ति काँटेदार वृक्ष बबूल को बो कर उस पर मीठे आम लगने की आशा करता है तो निश्चय ही वह मूर्ख है। जो बोया जाता है अन्त में उसे ही काटना पड़ता है। इस नियम में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। हिन्दू विश्वास के अनुसार व्यक्ति के कर्म फल को टाला नहीं जा सकता। जो व्यक्ति दूसरों को दुःखी करता है, कष्ट पहुँचाता है वह कैसे दूसरों से सुख की कामना कर सकता है। उसे तो जीवन में दुःख ही मिलेगा। हिरण्यकश्यप, रावण, कंस आदि ने सुख और महत्त्व पाने की आशा से बुरे कर्म किए, लोगों को सताया, वे लोग दूसरों से सुख की आशा रखते थे जो दुराशा ही सिद्ध हुई और उन्हें अपने बुरे कर्मों का फल भोगना भी पड़ा। दुर्योधन ने भी सुखों की आशा में अपने भाई पाण्डवों पर अत्याचार किए, उनके अधिकार छीने किन्तु अन्त में जैसी करनी वैसी भरनी वाली बात ही हुई, दुर्योधन युद्ध में पराजित ही नहीं हुआ अपने प्राणों से भी हाथ धो बैठा।
अंग्रेजों ने भी भारत पर अधिकार बनाए रखने के लिए लाठी, गोली का प्रयोग किया। निरपराध और निहत्थे लोगों की हत्याएँ की, परन्तु अंग्रेजों के इन अत्याचारों ने क्रांति की भावना को न केवल जन्म दिया बल्कि उसे भड़काया भी। परिणामस्वरूप अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा। इससे यह स्पष्ट है कि व्यक्ति के अच्छे कर्म का फल सदा अच्छा ही होता है। आम बो कर ही आम खाए जा सकते हैं। बबूल बोकर आमों की आशा करना असम्भव तो है ही प्रकृति के नियमों के विरुद्ध भी है।
20. परिवर्तन प्रकृति का नियम है
अथवा
सब दिन न होत एक समान
संसार परिवर्तनशील है। कुछ परिवर्तन हमें नज़र आते हैं, कुछ सूक्ष्म रूप से होते रहते हैं। जैसे फूलदान में रखे फूल, आज ताज़े हैं पर कल वे मुरझा जाएँगे। यह हुआ सामने नज़र आने वाला परिवर्तन। वह फूलदान जिस मेज़ पर रखा है उस मेज़ में होने वाले परिवर्तन सूक्ष्म होते हैं। कल जहाँ सुन्दर भवन था आज वहाँ खण्डहर नज़र आता है। कल का शिशु आज का युवक बन जाता है। आज का युवक कल बूढ़ा हो जाएगा। अत: यह कहा जा सकता है कि परिवर्तन का नाम ही संसार है। हमारा जीवन भी परिवर्तनशील है। उसमें सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं। यदि सदा ही सुख या सदा ही दुःख रहें तो मनुष्य जीवन की इस एकरसता से ऊब जाएगा। पंत जी ने ठीक ही कहा है
जग पीड़ित है अति दुःख से,
जग पीड़ित रे अति सुख से।
सब दिन सदा एक समान नहीं रहते। रहीम जी ने ठीक ही कहा है “जब नीके दिन आइ हैं, बनत न लगि है देर।” अगर सभी के दिन एक जैसे रहते तो मनुष्य का जीवन आकर्षणहीन हो जाता। संसार में जहाँ सृजन है वहाँ संहार भी है। वही भारत जो एक दिन सोने की चिड़िया कहलाया करता था आज एक निर्धन देश कहलाता है। यह परिवर्तन की ही तो माया है। राजा हरिशचन्द्र को चाण्डाल का दास बनना पड़ा। भगवान् राम को चौदह बरस का बनवास हुआ। सीता जी का गर्भावस्था में परित्याग हुआ। यह सभी घटनाएँ परिवर्तन की सूचक हैं। यही परिवर्तन प्रकृति में सदा गतिशीलता बनाए रखता है।
21. अनुशासन
अपने ऊपर शासन करना अनुशासन है। अपने को वश में करना अनुशासन है। सत्ता, संस्था, समाज, वर्ग के नियमानुसार आचरण करना अनुशासन है। कुछ लोग माता-पिता और गुरुओं की आज्ञा का पालन करने को भी अनुशासन मानते हैं। नियमपूर्वक जीवन बिताना अर्थात् समय पर सोना, समय पर जागना, समय पर भोजन करना आदि नित्य कर्म करना भी अनुशासन में ही गिने जाते हैं। अनुशासन व्यक्ति के मन को निडर और निर्मल बनाता है। अनुशासन व्यक्ति के वचनों में मधुरता लाता है। अनुशासन में रहता हुआ व्यक्ति ही सत् कर्म करने की ओर प्रवृत्त होता है। उसके अन्तःकरण में दिव्य चेतना का प्रकाश होता है। आज देखने में आ रहा है कि समाज के प्रत्येक वर्ग में अनुशासनहीनता घर किए हुए है।
हमारी राय में इसके लिए सर्वप्रमुख उत्तरदायी माता-पिता हैं। क्योंकि वे आरम्भ में ही बच्चों को अनुशासन का प्रशिक्षण नहीं देते। अनुशासनहीनता का दूसरा बड़ा कारण हमारी शिक्षा प्रणाली है। आज की शिक्षा विद्यार्थी को निश्चित भविष्य का आश्वासन नहीं देती। अनिश्चित भविष्य होने के कारण युवा पीढ़ी में असन्तोष के साथसाथ अनुशासनहीनता भी बढ़ती जा रही है। अतः देश में अनुशासन की स्थापना के लिए शिक्षा व्यवस्था में नैतिक और चारित्रिक शिक्षा पर बल दिया जाना चाहिए। अनुशासित राष्ट्र विकास के पथ पर अग्रसर होगा। अनुशासित समाज सभ्यता और संस्कृति का उत्तम प्रतीक बनेगा।
22. कथनी से करनी भली
कहने का सम्बन्ध केवल जिह्वा से है। इसलिए यह कह देना बहुत आसान है, किन्तु जुबानी जमा खर्च से कुछ नहीं भरता जब तक उस कथन को क्रियात्मक रूप न दिया जाए। इसीलिए यह कहा जाता है कि कथनी से करनी भली। जो व्यक्ति केवल कहता है किन्तु आप उस बात का पालन नहीं करता उसका प्रभाव दूसरों पर कदापि नहीं पड़ सकता। दूसरों को गुड़ न खाने का उपदेश देने वाले के कथन का तभी प्रभाव होगा जब वह स्वयं गुड़ खाना छोड़ देगा। गाँधी जी प्रायः जिस बात का उपदेश दिया करते थे उसे वह अपनी जीवनचर्या के अंग के रूप में अपनाये होते थे। उन्होंने कताई का कोरा उपदेश ही नहीं दिया अपितु संध्या वंदना आदि की तरह ही उसे अपनी दैनिकचर्या का अंग बनाया।
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आजकल के साधु उपदेश देते समय प्राय: माया के मिथ्या होने की और उसके जाल में न फंसने की बात कहते हैं, किन्तु स्वयं बड़े-बड़े मठ और भवन बनाते हैं। गुरु गद्दी के लिए नित्य लड़ाई-झगड़े होने की बात आम है। क्या यह अच्छा होता यदि प्रत्येक साधु झोंपड़ी में रहकर जीवन बिताए और सेवा भाव को अपनाकर समाज कल्याण में जुट जाए। देश के दूसरे प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का उदाहरण हमारे सामने है जिन्होंने देश के लिए जो कहा वह कर भी दिखाया। कथनी और करनी में एकता के लिए मन, वचन, कर्म की एकाग्रता होनी जरूरी है। कहने से कर दिखाना कहीं श्रेष्ठ है।
23. निर्धनता एक अभिशाप है
धन सम्पत्ति का न होना ही निर्धनता है। यह मनुष्य जीवन के लिए एक भयानक अभिशाप है। भले ही यह कहा जाता है कि निर्धन व्यक्ति चैन से सोते हैं। किन्तु यह सत्य है कि निर्धनता भरा जीवन नरक के समान दुःखदायी होता है। निर्धन व्यक्ति का सारा जीवन रोटी, कपड़ा और मकान की दौड़-धूप में ही बीत जाता है। कड़ी मेहनत करने पर भी उसे भर-पेट रोटी नसीब नहीं होती। न तन ढाँपने को पूरे वस्त्र मिलते हैं और न ही सिर छुपाने के लिए कोई जगह। बीमारी की दशा में उनके पास दवाई तक खरीदने के पैसे नहीं होते। निर्धनता के कारण वे बच्चों का ठीक ढंग से पालन पोषण भी नहीं कर सकते। उनका भविष्य बनाने की बात तो दूर रही। अन्ततः निर्धनता ही बच्चों में चोरी की आदत डालती है अथवा अन्य अपराधों को जन्म देती है। निर्धनता एक ऐसा दुःख है, जिसको बटाने के लिए कोई आगे नहीं आता।
यहाँ तक कि उसके सगे-सम्बन्धी भी उससे मुँह फेर लेते हैं। निर्धन व्यक्ति न तो इस लोक को संवार सकता है न ही परलोक को। वह बेचारा तो अपनी मन की इच्छाओं को अपने मन में ही दबाए रखता है। कई बार निर्धनता अनुच्छेद लेखन व्यक्ति को आत्महत्या तक करने को विवश कर देती है। आंध्र प्रदेश का उदाहरण हमारे सामने है। वहाँ कितने ही किसानों ने निर्धनता से तंग आकर आत्महत्या कर ली है। कभी-कभी ऐसे समाचार भी सुनने में आते हैं कि निर्धनता से तंग आकर व्यक्ति ने अपने पूरे परिवार को समाप्त कर दिया। जो जीवन की सारी इच्छाओं का गला घोंट दे वह निर्धनता अभिशाप नहीं तो क्या है।
24. परिश्रम सफलता की कुंजी है
मनुष्य अपनी बुद्धि और परिश्रम द्वारा जो खजाना चाहे खोज ले और जहाँ तक चाहे उन्नति के शिखर पर पहुँच जाए। परिश्रम करना उसके अपने हाथ में है और सफलता रूपी देवी भी उसी के सामने प्रकट होती है जो परिश्रम करता है। एक साधारण किसान से लेकर बड़े-बड़े विज्ञान वेत्ताओं तक की सफलता का मूल कारण परिश्रम ही है। जो काम देखने में बड़े कठोर और भयंकर दिखाई देते हैं परिश्रम रूपी मंत्र उन्हें सरल बना देता है। यह एक ऐसी चमत्कारपूर्ण शक्ति है जिसके आगे असफलता का भूत टिक ही नहीं सकता। पूरे मनोयोग से किया हुआ परिश्रम मनुष्य को अपने ध्येय तक पहुँचा देता है। किसान के कठोर परिश्रम से ही धरती अनाज से भर जाती है। वैज्ञानिकों के कठोर परिश्रम के परिणामस्वरूप ही अनेक उपग्रह छोड़े जा चुके हैं। अन्तरिक्ष में मनुष्य की विजय वैज्ञानिकों के परिश्रम का ही परिणाम है। अपने परिश्रम द्वारा ही महान् वैज्ञानिक डॉक्टर ए० पी० जे० अब्दुल कलाम हमारे देश के राष्ट्रपति के पद पर आसीन हए थे। परिश्रम रूपी कुँजी को लेकर ही मनुष्य उन रहस्यों का ताला खोल सकता है जिनमें न जाने कितनी अमूल्य निधियाँ भरी पड़ी हैं। मनुष्य अपने जीवन का लक्ष्य पूरा करने में सफल तभी हो सकता है जब वह परिश्रम को अपने जीवन का मूल मन्त्र बना ले।
25. समय का सदुपयोग
समय सबसे मूल्यवान् वस्तु है। संसार की अन्य समस्त वस्तुएँ एक बार खो जाने पर पुनः प्रयास करके प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन एक बार जो समय गुजर गया उसे किसी भी स्थिति में दोबारा नहीं पाया जा सकता। ‘समय’ के बारे में विदेशी लेखकों व समीक्षकों ने अपने विचारों में कहा है-Time is precious’ ; “Time is gold.’ भारतीय मनीषियों ने समय की महत्ता को जानते हुए कहा है कि आज का काम कल पर मत छोड़ो।
“काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में प्रलय होयगी बहुरि करेगा कब।”
कल किसने जाना है, किसने देखा है। जो है बस यही एक पल है। इतिहास साक्षी है कि संसार में जिन लोगों ने समय के महत्त्व को समझा वे जीवन में सफल रहे और जिन्होंने समय के पालन में जरा सी भी चूक की, समय ने उसे भी कहीं का नहीं रखा। पृथ्वीराज चौहान समय के मूल्य को न समझने के कारण ही गौरी से पराजित हुआ। नेपोलियन भी वाटरलू के युद्ध में पाँच मिनटों के महत्त्व को न समझ पाने के कारण पराजित हुआ। इसके विपरीत जर्मन के महान् दार्शनिक कांट, जो अपना जीवन समय के बंधन में बाँधकर कुछ इस तरह बिताते थे कि लोग उन्हें दफ्तर आते देखकर अपनी घड़ियाँ मिलाया करते थे।
आधुनिक जीवन में तो समय का महत्त्व
और भी बढ़ गया है। आज जीवन में दौड़-भाग और व्यस्तता इतनी अधिक हो गई है कि यदि हम समय के साथ-साथ कदम मिलाकर न चलें तो जीवन की दौड़ में अवश्य पीछे रह जाएंगे। समय की दौड़ के साथ हमारे कदम न मिले तो यही सुनने को मिलेगा
‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।’ ।
अत: आज के युग में सच्चे कर्मयोगी की यही पहचान है ‘वर्तमान पर नज़र रखो और हर पल का भरपूर प्रयोग करो।’ अतः जब तक सांस है तब तक समय का सदुपयोग करो।
26. मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना
इस संसार में अनेकों धर्म, सम्प्रदाय और पंथ प्रचलित हैं, किन्तु कोई भी धर्म एक-दूसरे से ईर्ष्या, द्वेष या वैर-भाव रखने का उपदेश नहीं देता। प्रत्येक धर्म आपसी भाईचारे और प्रेम सौहार्द का संदेश देता है। धर्म का आधार केवल मनुष्य को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताना भर है। आज मनुष्य ने अपनी बौद्धिक क्षमता से प्रकृति के समस्त रहस्यों को जान लिया है, आकाश की ऊँचाइयों को छू लिया है, लेकिन खेदजनक है कि इक्कीसवीं सदी में पदार्पण करके भी हम आज भी मजहब के नाम पर रक्त बहाने को तत्पर हैं। हमारी अभी भी यह मानसिकता नहीं बदली। आज भी हमने धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर कई दीवारें खड़ी कर रखी हैं।
यह जानते हुए भी कि ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’, हम छोटी-छोटी बातों में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। इसी साम्प्रदायिकता के विष के परिणामस्वरूप देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए जिनमें हज़ारों बेकसूर लोग आहत हुए। इससे भी खेदजनक है जब पढ़े-लिखे लोग ही यह घोषणा करते फिरें कि यह प्रान्त मेरा है, यह धर्म मेरा है, इस पर दूसरों का कोई हक नहीं। अरे चाहिए तो यह कि हम सब यह कहें, यह सोचें कि यह देश हमारा है, इसकी प्रगति कैसे करें। हम सब मानव ही बने रहें यही सबसे बड़ी बात होगी। सभी धर्म एक हैं। सभी मनुष्य समान हैं। सभी में उसी अव्वल अल्लाह का नूर बसता है। सभी धर्म ‘सरबत का भला’ चाहते हैं। भारतीय सभ्यता तो आरम्भ से ही ‘जीयो और जीने दो’ के सिद्धान्त को मानने वाली रही है। अतः हमें भारत देश के विकास के लिए धर्म, मजहब के बन्धनों से मुक्त होकर एक राष्ट्र का नागरिक बनना होगा।
27. व्यायाम के लाभ
महर्षि चरक के अनुसार शरीर की जो चेष्टा देह को स्थिर करने एवं उसका बल बढ़ाने वाली हो, उसे व्यायाम कहते हैं। महाकवि कालिदास ने भी कहा है ‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ अर्थात् धर्म का सर्वप्रथम साधन स्वस्थ शरीर है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं तो मन भी स्वस्थ नहीं रह सकता। मन स्वस्थ नहीं तो विचार भी स्वस्थ नहीं हो सकते। इसलिए शरीर को स्वस्थ रखना व्यक्ति का परम कर्त्तव्य है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम नितान्त आवश्यक है। पुराने समय में हमारे बड़े-बुजुर्गों ने हमारी दिनचर्या कुछ ऐसी निश्चित की थी कि जिससे हमारा व्यायाम भी नियमित होता रहे और हमें पता भी न चले। सूर्योदय से पहले उठना, सैर को जाना, कसरत करना, बग़ीचे की सैर करना, खुली हवा में विचरना ये सब क्रियाएँ हमारे शरीर को स्वस्थ रखने का ही उपाय था।
लेकिन आज भौतिक सुख लिप्सा में ग्रस्त मानव इन सब नियमों की तिलांजलि देकर दिन-रात केवल धन के चक्कर में अपना स्वास्थ्य बिगाड़ने पर उतारू है। उसे अपने स्वस्थ और निरोग शरीर की परवाह उतनी नहीं जितनी धन को बचाने और कमाने की है। आराम पसन्द व्यक्ति हर काम पैसे के बल पर बैठे-बैठे ही कर लेना चाहता है। सारा दिन कुर्सी पर बैठकर काम करने वाला व्यक्ति यदि कोई व्यायाम नहीं करेगा तो स्वयं ही बीमारियों को आमन्त्रण देने का काम करेगा। आज अधिकतर लोग मधुमेह, उच्च रक्तचाप, आदि अनेक बीमारियों से ग्रस्त हैं उनके पीछे मूल कारण ही अव्यवस्थित दिनचर्या और अपौष्टिक खान-पान है। मनीषियों के साथ-साथ अब तो डॉक्टर भी सबको स्वस्थ रहने के लिए प्रातः भ्रमण और व्यायाम करने की सलाह देने लगे हैं। नीरोग रहने के लिए वे भी व्यायाम को ही आवश्यक और अचूक औषधि मानने लगे हैं। अतः नीरोगी काया के लिए व्यायाम अपरिहार्य है।
28. संगठन में शक्ति है
कहते हैं अकेला चना भाड़ भी नहीं झोंक सकता। पानी की एक बूंद का भी कुछ महत्त्व नहीं होता। जब तक पानी की अनेक बँदें मिलकर धारा का रूप धारण नहीं करती तो वे बड़े-बड़े पर्वतों को काटकर भी अपने लिए रास्ता बना लेती हैं। पानी की एक बूंद असमर्थ और तुच्छ होती है और यही बूंद मिलकर जब सागर बन जाती है तो वह शक्तिशाली बन जाती है। उसकी एक लहर बड़े-बड़े जहाजों को डूबोने की शक्ति रखती है। सागर की लहरें तटवर्ती नगरों को पल भर में वीरान बना सकती हैं। व्यक्ति अकेला एक कण की तरह है और उसका संगठित रूप सागर की शक्ति का रूप धारण कर लेता है। एक अकेला होता है दो ग्यारह होते हैं। भारतवासियों की संगठन शक्ति का ही यह परिणाम था कि उन्होंने शक्तिशाली अंग्रेज़ को देश छोड़ने पर विवश कर दिया। रूस में भी मज़दूर और किसान संगठन द्वारा ही ज़ार के राज्य को पलटने में समर्थ हो गए।
आज भी हम देखते हैं कि जिन मजदूरों या कर्मचारियों का मज़बूत संगठन होता है वे अपनी माँगें तुरन्त मनवा लेते हैं। जाल में बँधे हुए कबूतरों ने अपनी संगठित शक्ति द्वारा ही अपनी जान बचाई थी। अकेली लकड़ी को हर कोई तोड़ सकता है, किन्तु लकड़ियों के गढे को तोड़ना मुश्किल ही नहीं असम्भव भी है। अत: यह निश्चित ही है कि अकेला व्यक्ति चाहे कितना भी बुद्धिमान, धनवान्, शक्तिमान क्यों न हो वह संगठन के बिना सफल नहीं हो सकता क्योंकि संगठन में ही शक्ति है।
29. जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है
ज़िन्दादिली से जिया गया जीवन अल्पकालीन भले ही हो किन्तु आदर्श जीवन होता है। बंदा वैरागी से जब बादशाह ने पूछा कि बोल तुझे कैसी मौत चाहिए तो उसने निर्भीकता से बादशाह को गीता का ज्ञान सुनाते हुए कहा, तू कौन होता है मुझे पूछने वाला ? मेरा शरीर भले ही नाशवान है पर आत्मा अमर है। मैं मरकर भी नहीं मरूँगा। महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवा जी महाराज जितनी देर तक जीवित रहे ज़िन्दादिली से जिए। उन्होंने मुग़लों की अधीनता स्वीकार नहीं की। गुरु गोबिन्द सिंह जी के दोनों साहबजादों ने भी जिन्दादिली दिखाई। दीवारों में चुना जाना तो स्वीकार किया पर झुकना नहीं। ऐसी ही ज़िन्दादिली बाल हकीकत राय ने भी दिखाई। वे लोग अमर हो गए।
मरकर भी वे मरे नहीं। वे मृत्यु से भयभीत नहीं हुए। मृत्यु पर जैसे उन्होंने विजय पा ली हो। इसके विपरीत जो लोग मुर्दादिल होते हैं उनका जीवन पशुओं के समान व्यतीत होता है। जीवित रहकर भी वे मरे हुओं के समान होते हैं। उनका जीवन लोहार की धौंकनी की तरह होता है जो साँस लेती हुई भी मुर्दा होती है। आज की महानगरीय सभ्यता ने मनुष्य को मुर्दादिल बना दिया है। उसका हृदय संवेदना शून्य हो गया है। उसे हरदम अपने स्वार्थ साधन की चिन्ता होती है। वे समाज के लिए कोई आदर्श स्थापित नहीं कर पाते। जबकि जिन्दादिल मनुष्य जो कुछ भी कर जाता है वह आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन जाता है। मृत्यु तो एक दिन सबको आनी है लेकिन जब तक जिओ ज़िन्दादिली से जिओ जीवन का वास्तविक आनन्द इसी में है।
30. आँखों देखा हॉकी मैच
भले ही आज लोग क्रिकेट के दीवाने बने हुए हैं। परन्तु हमारा राष्ट्रीय खेल हॉकी ही है। लगातार कई वर्षों तक भारत हॉकी के खेल में विश्वभर में सब से आगे रहा, किन्तु खेलों में भी राजनीतिज्ञों के दखल के कारण हॉकी के खेल में हमारा स्तर दिनों दिन गिर रहा है। 70 मिनट की अवधि वाला यह खेल अत्यन्त रोचक, रोमांचक और उत्साहवर्धक होता है। मेरा सौभाग्य है कि मुझे ऐसा ही एक हॉकी मैच देखने को मिला। यह मैच नामधारी एकादश और रोपड़ हॉक्स की टीमों के बीच रोपड़ के खेल परिसर में खेला गया। दोनों टीमें अपने-अपने खेल के लिए पंजाब भर में जानी जाती हैं। दोनों ही टीमों में राष्ट्रीय स्तर के कुछ खिलाड़ी भाग ले रहे थे। रोपड़ हॉक्स की टीम क्योंकि अपने घरेलू मैदान पर खेल रही थी इसलिए उसने नामधारी एकादश को मैच के आरम्भिक दस मिनटों में दबाए रखा उसके फारवर्ड खिलाड़ियों ने दो-तीन बार विरोधी गोल पर आक्रमण किये। परन्तु नामधारी एकादश का गोलकीपर बहुत चुस्त और होशियार था। उसने अपने विरोधियों के सभी आक्रमणों को विफल बना दिया। तब नामधारी एकादश ने तेजी पकड़ी और देखते ही देखते रोपड़ हॉक्स के विरुद्ध एक गोल दाग दिया।
गोल होने पर रोपड़ हॉक्स की टीम ने भी एक जुट होकर दो-तीन बार नामधारी एकादश पर कड़े आक्रमण किये, परन्तु उनका प्रत्येक आक्रमण विफल रहा। इसी बीच रोपड़ हॉक्स को दो पनल्टी कार्नर भी मिले पर वे इसका लाभ न उठा सके। नामधारी एकादश ने कई अच्छे मूव बनाये उनका कप्तान बलजीत सिंह तो जैसे बलबीर सिंह ओलंपियन की याद दिला रहा था। इसी बीच नामधारी एकादश को भी एक पनल्टी कार्नर मिला जिसे उन्होंने बड़ी खूबसूरती से गोल में बदल दिया। इससे रोपड़ हॉक्स के खिलाड़ी हताश हो गये। रोपड़ के दर्शक भी उनके खेल को देख कर कुछ निराश हुए। मध्यान्तर के समय नामधारी एकादश दो शून्य से आगे थी। मध्यान्तर के बाद खेल बड़ी तेज़ी से शुरू हुआ। रोपड़ हॉक्स के खिलाड़ी बड़ी तालमेल से आगे बढ़े और कप्तान हरजीत सिंह ने दायें कोण से एक बढ़िया हिट लगाकर नामधारी एकल पर एक गोल कर दिया। इस गोल से रोपड़ हॉक्स के जोश में ज़बरदस्त वृद्धि हो गयी। उन्होंने अगले पांच मिनटों में दूसरा गोल करके मैच बराबरी पर ला दिया। दर्शक खुशी के मारे नाच उठे। मैच समाप्ति की सीटी के बजते ही दर्शकों ने अपने खिलाड़ियों को मैदान में जाकर शाबाशी दी। मैच का स्तर इतना अच्छा था कि मैच देख कर आनन्द आ गया।
31. परीक्षा शुरू होने से पहले
वैसे तो हर मनुष्य परीक्षा से घबराता है, किन्त विद्यार्थी इससे विशेष रूप से घबराता है। परीक्षा में पास होना ज़रूरी है नहीं तो जीवन का एक बहुमूल्य वर्ष नष्ट हो जाएगा। अपने साथियों से बिछड़ जाएंगे। ऐसी चिन्ताएं हर विद्यार्थी को रहती हैं। परीक्षा शुरू होने से पूर्व जब मैं परीक्षा भवन पहुँचा तो मेरा दिल धक-धक् कर रहा था। परीक्षा शुरू होने से आधा घंटा पहले मैं वहां पहुंच गया था। मैं सोच रहा था कि सारी रात जाग कर जो प्रश्न तैयार किए हैं यदि वे प्रश्नपत्र में न आए तो मेरा क्या होगा ? इसी चिंता में अपने सहपाठियों से खुलकर बात नहीं कर रहा था। परीक्षा भवन के बाहर का दृश्य बड़ा विचित्र था। परीक्षा देने आए कुछ विद्यार्थी बिल्कुल बेफिक्र लग रहे थे। वे आपस में ठहाके मारमार कर बातें कर रहे थे। कुछ ऐसे भी विद्यार्थी थे जो अभी तक किताबों या नोट्स से चिपके हुए थे। कुछ विद्यार्थी आपस में नकल करने के तरीकों पर विचार कर रहे थे।
मैं अकेला ऐसा विद्यार्थी था जो अपने साथ घर से कोई किताब या सहायक पुस्तक नहीं लाया था। क्योंकि मेरे पिता जी कहा करते हैं कि परीक्षा के दिन से पहले की रात को ज्यादा पढ़ना नहीं चाहिए। सारे साल का पढ़ा हुआ भूल नहीं जाता, यदि आप ने कक्षा में अध्यापक को ध्यान से सुना हो। वे परीक्षा के दिन से पूर्व की रात को जल्दी सोने की भी सलाह देते हैं ताकि सवेरे उठकर विद्यार्थी ताज़ा दम होकर परीक्षा देने जाए न कि थका-थका महसूस करे। परीक्षा भवन के बाहर लड़कों की अपेक्षा लड़कियाँ अधिक खुश नज़र आ रही थीं। उनके खिले चेहरे देखकर ऐसा लगता था मानो परीक्षा के भूत का उन्हें कोई डर नहीं। उन्हें अपनी स्मरण शक्ति पर पूरा भरोसा था।
इसी आत्मविश्वास के कारण तो लड़कियां हर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करती हैं। दूसरे, लड़कियाँ कक्षा में दत्तचित्त होकर अध्यापक का भाषण सुनती हैं जबकि लड़के शरारतें करते रहते हैं। थोड़ी देर में घंटी बजी। यह घंटी परीक्षा भवन में प्रवेश की घंटी थी । इसी घंटी को सुनकर सभी ने परीक्षा भवन की ओर जाना शुरू कर दिया। हंसते हुए चेहरों पर भी अब गम्भीरता आ गई थी। परीक्षा भवन के बाहर अपना रोल नं० और सीट नं० देखकर मैं परीक्षा भवन में दाखिल हुआ और अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। कुछ विद्यार्थी अब भी शरारतें कर रहे थे। मैं मौन हो धड़कते दिल से प्रश्न-पत्र बंटने की प्रतीक्षा करने लगा।
32. नशाबन्दी
भारत में नशीली वस्तुओं का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। विशेषकर हमारी युवा पीढ़ी इस लत की अधिक शिकार हो रही है। यह चिन्ता का कारण है। उपन्यास सम्राट् प्रेमचन्द जी ने कहा था कि जिस देश में करोड़ों लोग भूखों मरते हों वहां शराब पीना, गरीबों का रक्त पीने के बराबर है। किन्तु शराब ही नहीं अन्य नशीले पदार्थों के सेवन का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। कोई भी खुशी का मौका हो शराब पीने पिलाने के बिना वह अवसर सफल नहीं माना जाता। होटलों, क्लबों में खुले आम शराब पी-पिलाई जाती है। पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए। शराब को दारू अर्थात् दवाई भी कहा जाता है किन्तु कौन ऐसा है जो इसे दवाई की तरह पीता है। यहाँ तो बोतलों की बोतलें चढ़ाई जाती हैं। शराब महंगी होने के कारण नकली शराब का धन्धा भी फल-फूल रहा है। इस नकली शराब के कारण कितने लोगों को जान गंवानी पड़ी है। यह हर कोई जानता है कितने ही राज्यों की सरकारों ने सम्पूर्ण नशाबन्दी लागू करने का प्रयास किया।
किन्तु वे असफल रहीं। ऐसा उदाहरण हरियाणा का लिया जा सकता है। कितने ही होटल बन्द हो गए और नकली शराब बनाने वालों की चांदी हो गई। विवश होकर सरकार को नशाबन्दी समाप्त करनी पड़ी। पंजाब में भी टेकचन्द कमेटी ने नशाबन्दी लागू करने का बारह सूत्री कार्यक्रम दिया था। किन्तु जो सरकार शराब की बिक्री से करोड़ों रुपए कमाती हो, वह इसे कैसे लागू कर सकती है। आप शायद हैरान होंगे कि पंजाब में शराब की खपत देश भर में सब से अधिक है, किसी ने ठीक ही कहा है बुरी कोई भी आदत हो वह आसानी से नहीं जाती। किन्तु सरकार यदि दृढ़ निश्चय कर ले तो क्या नहीं हो सकता। सरकार को ही नहीं जनता को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि नशा अनेक झगड़ों को ही जन्म नहीं देता बल्कि वह नशा करने वाले के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। ज़रूरत है जनता में जागरूकता पैदा करने की। नशाबन्दी राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक है। शराब की बोतलों पर चेतावनी लिखने से काम न चलेगा, कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।
Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 20 गुरु गोबिन्द सिंह Textbook Exercise Questions and Answers.
Hindi Guide for Class 12 PSEB गुरु गोबिन्द सिंह Textbook Questions and Answers
(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दो:
प्रश्न 1.
‘जफ़रनामा’ के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
गुरु जी ने दीना नामक गाँव से मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब को फ़ारसी में एक पत्र लिखा जिसे जफ़रनामा कहते हैं। यह गुरु जी की एक उत्कृष्ट एवं विख्यात कविता है । इस कविता या पत्र में गुरु जी ने औरंगजेब की धर्मान्धता, संकीर्णता और अत्याचारों पर बड़ी फटकार बताई है।
प्रश्न 2.
गुरु जी के मानवीय दृष्टिकोण का परिचय कैसे मिलता है ? अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
गुरु जी ने भाई कन्हैया को कहा हुआ था कि युद्ध में प्रत्येक को जल पिलाओ चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान। मित्र हो या शत्रु। इतना ही नहीं मरहम पट्टी करने वालों को भी उनका यही आदेश था कि मित्र और शत्रु के भेद को भुला कर घायलों का उपचार किया जाए। इस आदेश से गुरु जी के मानवीय दृष्टिकोण का परिचय मिलता है।
प्रश्न 3.
बन्दा वैरागी कौन था ? गुरु जी से उसकी भेंट का अपने शब्दों में वर्णन करें।
उत्तर:
बन्दा वैरागी का असली नाम माधवदास था। वह दक्षिण में गोदावरी के किनारे रहता था। गुरु जी उस योगी और वैरागी से मिले। वह भी गुरु जी से प्रभावित हुआ और उनका शिष्य बन गया। गुरु जी ने उन्हें अत्याचार का विनाश करने के लिए पंजाब भेजा। बन्दा वैरागी के रूप में उन्होंने वीरतापूर्वक ढंग से अपने कर्त्तव्य को निभाने का प्रयत्न किया।
(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दो:
प्रश्न 4.
गुरु गोबिन्द सिंह के जन्म के समय की परिस्थितियों का वर्णन करते हुए उनके बाल्यकाल का वर्णन करो।
उत्तर:
गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म सन् 1666 में नवम् गुरु तेग़ बहादुर के घर पटना में हुआ। उस समय औरंगजेब के अत्याचारों से भारतीय जनता दुःखी थी। गुरु जी का जन्म हिन्दू धर्म की रक्षा करने और उनका उद्धार करने के लिए हुआ था। बचपन से ही गुरु जी निडर, साहसी और आत्मविश्वासी थे। उन्हें बहादुरी के खेल खेलने का शौक था। पटना में नवाब की सवारी को देखकर चौबदार ने उन्हें खड़े होकर नवाब को सलाम करने को कहा। स्वाभिमानी गुरु जी ने न केवल स्वयं सलाम करने से इन्कार किया बल्कि अपने साथियों को भी सलाम न करने को कहा। बचपन में उन्होंने आनन्दपुर साहब आकर अपने पिता को यह कह कर बलिदान देने के लिए प्रेरित किया कि आप से बढ़कर महान् कौन हो सकता है।
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प्रश्न 5.
‘खालसा पंथ की साजना’ गुरु जी के जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। अपने शब्दों में लिखो।
उत्तर:
सन् 1699 का वैशाखी का दिन था। गुरु जी ने सब शिष्यों की एक सभा बुलाई और घोषणा की कि धर्म की रक्षा के लिए कुछ व्यक्तियों के बलिदान की आवश्यकता है। सभा में सन्नाटा छा गया। तभी गुरु जी की ललकार को सुनकर लाहौर का दयाराम सामने आया। गुरु जी उसे लेकर पास के एक तम्बू में गए और खून से भरी तलवार लेकर वे तम्बू से बाहर आए और बलिदान के लिए और भेंट माँगी। तब दिल्ली का धर्मदास सामने आया। गुरु जी उसे भी तम्बू में ले गए और खून की सनी हुई तलवार लेकर बाहर आए और तीसरा बलिदान माँगा।
तब द्वारिका का मोहकम चंद, बीदर (दक्षिण) का साहिबचन्द और जगन्नाथपुरी का हिम्मत राय बारी-बारी सामने आए। गुरु जी उन्हें भी बारी-बारी तम्बू में ले गए। कुछ देर बाद वे उन पाँचों को साथ लेकर तम्बू से बाहर आए और सारी सभा के सामने उन्हें प्रस्तुत कर उन्हें ‘पंज प्यारे’ की संज्ञा दी। गुरु जी ने पहले उन पाँचों को दीक्षित किया फिर आप उनसे दीक्षित हुए। इस प्रकार उन्होंने ‘खालसा पंथ’ की नींव रखी और अपने शिष्यों को अपने नाम के आगे सिंह लगाने का आदेश दिया। स्वयं भी गोबिन्द राय से गोबिन्द सिंह हो गए।
(ग) सप्रसंग व्याख्या करें:
प्रश्न 6.
गुरु जी को चिन्तित देखकर बालक गोबिन्द राय ने कारण पूछा। कारण सुनकर बालक गोबिन्द राय एक दम बोल उठा, “पिता जी, आपसे बढ़कर महान् व्यक्ति कौन हो सकता है।”
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० धर्मपाल मैनी द्वारा लिखित गुरु गोबिन्द सिंह जी की जीवनी में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा अपने पिता को बलिदान देने की प्रेरणा देने की घटना का उल्लेख है।
व्याख्या:
मुग़लों के अत्याचारों से दुःखी होकर कश्मीर के कुछ ब्राह्मण गुरु तेग़ बहादुर जी की शरण में आए और उनसे अपने धर्म की और अपनी रक्षा की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनकर गुरु जी इस परिणाम पर पहुँचे कि इस समय धर्म की रक्षा के लिए किसी महान व्यक्ति के बलिदान की आवश्यकता है। अपने पिता को चिन्तित देखकर पास बैठे बालक गोबिन्दराय ने कहा कि आपसे बढ़कर महान् व्यक्ति कौन हो सकता है।
विशेष:
प्रश्न 7.
इसी समय वे स्वयं गुरु गोबिन्दराय से गुरु गोबिन्द सिंह बन गए। इस प्रकार गुरु नानक की परम्परा में जो धर्म अब तक आध्यात्मिक प्रधान था, उसे गुरु ने वीरता का पाठ भी पढ़ा दिया।
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० धर्मपाल मैनी द्वारा लिखित गुरु गोबिन्द सिंह जी की जीवनी में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में गुरु जी द्वारा खालसा पंथ की नींव रखने के बाद की घटना का उल्लेख किया गया है।
व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि खालसा पंथ की नींव रखने के बाद गुरु जी ने अपने नाम के साथ सिंह शब्द जोड़ दिया इस तरह वे गुरु गोबिन्द राय से गुरु गोबिन्द सिंह हो गए। इस तरह उन्होंने सिक्खों के पहले गुरु नानक देव जी की परम्परा में अब तक जो आध्यात्मिकता प्रधान थी उसमें वीरता भी जोड़कर सिक्ख धर्म को एक नया पाठ पढ़ाया।
विशेष:
प्रश्न 8.
गुरु जी ने इन 40 शूरवीरों को चालीस मुक्ते की उपाधि दी और उस स्थान का नाम, जहाँ वे वीर शहीद हुए थे, मुक्तसर रखा।
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० धर्मपाल मैनी द्वारा लिखित ‘गुरु गोबिन्द सिंह जी की जीवनी’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने खिद्राणा नामक स्थान पर आनन्दपुर साहब में गुरु जी का साथ छोड़ गए 40 शिष्यों द्वारा अपने कुकृत्य पर पछताते हुए वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति प्राप्त करने की घटना के बाद गुरु.जी द्वारा उनके प्रति आदर व्यक्त करने की बात कही गई है।
व्याख्या:
खिद्राणा के युद्ध में वीरतापूर्वक लड़ते हुए 40 शिष्यों के वीरगति प्राप्त करने पर गुरु गोबिन्द सिंह जी ने उन 40 शूरवीरों को 40 मुक्ते की उपाधि प्रदान की और उस स्थान को, जहाँ वे शहीद हुए थे, मुक्तसर नाम दिया।
विशेष:
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प्रश्न 9.
इन पुत्रन के सीस पर वार दिए सुत चार।
चार मुए तो क्या हुआ जीवित कई हजार।।
प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ डॉ० धर्मपाल मैनी द्वारा लिखित ‘गुरु गोबिन्द सिंह जी की जीवनी’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियाँ गुरु जी ने कहे जब उन से उनके पुत्रों की मृत्यु के बारे में पूछा था।
व्याख्या:
गुरु जी ने उत्तर देते हुए कहा कि मैंने अपने शिष्यों की रक्षा करने के लिए अपने चार पुत्रों को न्यौछावर कर दिया है। इन चारों की मृत्यु से कुछ न होगा बल्कि इनके बलिदान के कारण कई हजार वीर शिष्य पैदा हो जाएँगे।
विशेष:
PSEB 12th Class Hindi Guide गुरु गोबिन्द सिंह Additional Questions and Answers
अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
‘गुरु गोबिंद सिंह’ शीर्षक निबंध किस के द्वारा रचित है?
उत्तर:
डॉ० धर्मपाल मैनी।
प्रश्न 2.
डॉ० मैनी ने अपनी उच्च शिक्षा कहाँ-कहाँ से प्राप्त की थी?
उत्तर:
पटियाला और बनारस से।
प्रश्न 3.
डॉ० मैनी ने किन-किन भाषाओं में साहित्य की रचना की है ?
उत्तर:
हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी।
प्रश्न 4.
‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब-एक परिचय’ किस के द्वारा रचित है?
उत्तर:
डॉ० धर्मपाल मैनी।
प्रश्न 5.
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म कब और किस नगर में हुआ था?
उत्तर:
सन् 1666 ई०, पटना।
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प्रश्न 6.
गुरु गोबिंद सिंह जी का बचपन का नाम क्या था?
उत्तर:
गुरु जी के बचपन का नाम गोबिन्दराय था।
प्रश्न 7.
गुरु तेग़ बहादुर जी ने किस की रक्षा में अपना बलिदान दे दिया था?
उत्तर:
धर्म की रक्षा में।
प्रश्न 8.
बालक गोबिंदराय ने कितने वर्ष की अवस्था में गुरु गद्दी संभाली थी?
उत्तर:
नौ वर्ष की अवस्था में।
प्रश्न 9.
गुरु जी ने खालसा पंथ की स्थापना कब और कहाँ की थी?
उत्तर:
गुरु जी ने सन् 1699 में वैशाखी के दिन आनन्दपुर साहब में खालसा पंथ की स्थापना की थी।
प्रश्न 10.
गुरु जी किस दिन गोबिन्द राय से गोबिन्द सिंह हो गए थे?
उत्तर:
जिस दिन खालसा पंथ की स्थापना हुई थी–सन् 1699 में वैशाखी के दिन।
प्रश्न 11.
किस नदी के निकट मुग़ल सैनिकों ने अपना वादा तोड़ते हुए हमला किया था?
उत्तर:
सरसा नदी के निकट।
प्रश्न 12.
गुरु जी ने 40,मुक्त की उपाधि किन्हें दी थी?
उत्तर:
जिन चालीस सिखों ने खिदराणा में गुरु जी की ओर से लड़ते हुए शहीदी पाई थी।
प्रश्न 13.
गुरु जी किस बादशाह के करीब आ गए थे?
उत्तर:
बादशाह बहादुर शाह के।
प्रश्न 14.
गुरु जी किस दिन ज्योति-जोत समा गए थे? .
उत्तर:
सन् 1708 में। वाक्य पूरे कीजिए
प्रश्न 15.
गुरु जी को चिन्तित देखकर…
उत्तर:
बालक गोबिन्द राय ने कारण पूछा।
प्रश्न 16.
इन पुत्रन के सीस पर बार दिए सुत चार, ………….।
उत्तर:
चार मुए तो क्या हुआ जीवित कई हज़ार।
प्रश्न 17.
इस प्रकार गुरु नानक की परंपरा में जो धर्म अब तक आध्यात्मिक प्रधान था,……
उत्तर:
उसे गुरु जी ने वीरता का पाठ भी पढ़ा दिया।
हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए
प्रश्न 18.
गुरु जी को चिन्तित देखकर बालक गोबिन्द राय ने कारण पूछा।
उत्तर:
हाँ।
प्रश्न 19.
गुरु जी ने कहा, “पिता जी, आपसे बढ़कर महान् व्यक्ति कौन हो सकता है।”
उत्तर:
हाँ।
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बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
1. गुरु गोबिन्द सिंह जी सिक्खों के कौन-से गुरु थे ?
(क) सातवें
(ख) आठवें
(ग) नवम्
(घ) दशम्
उत्तर:
(घ) दशम्
2. गुरु गोबिन्द सिंह जी का बचपन का नाम क्या था ?
(क) गोबिन्द राय
(ख) मुकुल राय
(ग) सुरेन्द्र
(घ) शिवेन्द्र।
उत्तर:
(क) गोबिन्द राय
3. गुरु जी ने सन् 1699 में वैशाखी के दिन किस पंथ की स्थापना की ?
(क) खालसा पंथ
(ख) निर्गुण पंथ
(ग) सगुण पंथ
(घ) निराकार पंथ
उत्तर:
(क) खालसा पंथ
4. गुरु जी की भक्ति किसके प्रति समर्पित है ?
(क) निर्गुण के
(ख) सगुण के
(ग) अकाल पुरुष के
(घ) निराकार के
उत्तर:
(ग) अकाल पुरुष के
कठिन शब्दों के अर्थ
निर्भीकता = निडरता। द्वेष = कलह । टक्कर लेना = मुकाबला करना। साजना = सजाना, निर्माण करना। अदम्य = अद्भुत, अत्यन्त । नवरक्त = नया खून। आवेश = जोश। दीक्षा देना = गुरुमन्त्र देना। समता = बराबरी। कुकृत्य = बुरा कर्म । उत्कृष्ट = श्रेष्ठ। विख्यात = प्रसिद्ध। संकीर्णता = तंगदिली। टीला = ऊंचा स्थान। कलह = झगड़ा। अभाव = कमी। विधिवत = उचित तरीके से। आत्मीय = अपनापन। विकृत = बिगड़ा हुआ। चिल्ला चढ़ाना = धनुष की डोरी खींचना।
गुरु गोबिन्द सिंह जीवन परिचय
डॉ० धर्मपाल मैनी जी का जीवन परिचय लिखिए।
डॉ० धर्मपाल मैनी का जन्म सन् 1929 में हुआ। महेन्द्रा कॉलेज, पटियाला से हिन्दी में एम० ए० करने के बाद हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस से पीएच० डी० की उपाधि प्राप्त की। आप एस० डी० राजकीय कॉलेज, लुधियाना में तथा पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक रहे। फिर आप गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में रीडर भी रहे। पंजाब विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से सेवानिवृत्त होकर आप चण्डीगढ़ में ही बस गए हैं। आपने हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में लिखा है। इनकी प्रमुख रचनाएँ ‘संतो के धार्मिक विश्वास श्री गुरु ग्रंथ साहिब एक परिचय, गुरु गोबिन्द सिंह के काव्य में भारतीय संस्कृति हैं’
गुरु गोबिन्द सिंह निबन्ध का सार
‘गुरु गोबिन्द सिंह’ निबन्ध का सार 150 शब्दों में लिखें।
‘गुरु गोबिन्द सिंह’ का जन्म सन् 1666 में सिक्खों के नवम् गुरु तेग़ बहादुर जी के घर पटना में हुआ। आपका बचपन का नाम गोबिन्दराय था। पाँच वर्ष तक पटना में रहने के बाद आप विभिन्न तीर्थों की यात्रा करते हुए आनन्दपुर साहब पहुँचे। वहीं एक दिन इनके पिता ने धर्म की रक्षा के लिए किसी महान् व्यक्ति के बलिदान की बात कही। तब बालक गोबिन्द राय ने अपने पिता से कहा कि आप से बढ़कर महान् व्यक्ति और कौन हो सकता है। गुरु तेग़ बहादुर जी ने धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया। फलस्वरूप बालक गोबिन्दराय को नौ वर्ष की अवस्था में ही गुरु गद्दी सम्भालनी पड़ी। गद्दी सम्भालते ही गुरु जी ने अपनी शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी जिससे अनेक राजाओं और मुग़ल सरदारों को इनसे वैर और ईर्ष्या होने लगी। गढ़वाल के राजा फतेहशाह के साथ पांवटा से छ: मील दूर भंगाणी नामक स्थान पर गुरु जी को युद्ध करना पड़ा। नादौन में गुरु जी ने पहाड़ी राजाओं की सहायता करते हुए जम्मू के सूबेदार मियाँ खान के सेनापति से युद्ध किया।
सन् 1699 के वैशाखी के दिन गुरु जी ने आनन्दपुर साहब में खालसा पंथ की स्थापना की और हर सिक्ख को अपने नाम के साथ सिंह लगाने का आदेश दिया। आप भी उसी दिन से गोबिन्दराय से गोबिन्द सिंह हो गए। अप्रैल सन् 1704 को लाहौर और सरहिन्द के सूबेदारों ने आनन्दपुर साहब में गुरु जी को घेर लिया। आठ महीने की इस घेराबन्दी के दौरान 40 सिक्ख आपको छोड़कर चले गए। दिसम्बर 1704 में गुरु जी आनन्दपुर साहब छोड़कर निकले तो सरसा नदी के पास मुग़ल सैनिकों ने वादा तोड़ते हुए आप पर आक्रमण कर दिया। गुरु के सिंह बड़ी वीरता से लड़े। गुरु जी कुछ सिक्खों के साथ चमकौर पहुँचे और वहाँ कच्ची गढ़ी में मोरचा लगा लिया।
गुरु जी के साथ केवल 40 सिक्ख थे बाहर दुश्मन ने घेरा डाल लिया। इसी युद्ध में गुरु जी के दो बड़े बेटे अजीत सिंह और जुझार सिंह शहीद हो गए। गुरु जी रात को वहाँ से निकल मालवा प्रान्त की ओर बढ़े। सरसा के युद्ध में उनका परिवार उनसे बिछुड़ गया था। उनकी माता गुजरी अपने दो पोतों-जोरावर सिंह और फतेह सिंह को लेकर अपने रसोइए गंगू के साथ उसके गाँव में चली गई। गंगू ने धोखे से धन के लालच में आकर दोनों साहबजादों को सरहिन्द के नवाब को सौंप दिया जिसने उन्हें इस्लाम धर्म कबूल करने को कहा। साहबजादों के इन्कार करने पर उन्हें जीवित दीवार में चिनवा दिया गया।
गुरु जी का साथ छोड़ गए 40 सिक्ख अपनी करनी पर पछता रहे थे। उन्होंने खिद्राणा के स्थान पर युद्ध में गुरु जी की ओर से लड़ते हुए शहीदी पाई। गुरु जी ने उन्हें 40 मुक्ते की उपाधि दी और उस स्थान का नाम मुक्तसर रख दिया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद गुरु जी बादशाह बहादुरशाह के करीब आ गए। इसी से ईर्ष्या करते हुए सरहिन्द के नवाब ने गुरु जी की हत्या करने की ज़िम्मेदारी दो पठानों को सौंपी जिनमें से एक ने एक दिन नन्देड़ (दक्षिण) में उनके पेट में छुरा घोंप दिया। उसी घाव के टांके एक दिन चिल्ला चढ़ाते समय खुल गए जिसके फलस्वरूप सन् 1708 में आप ज्योति-जोत समा गए।
गुरु गोबिन्द सिंह जी का साहित्यिक परिचय दीजिए। सिख धर्म के दशम् गुरु गोबिन्द सिंह जी अत्यन्त प्रतिभाशाली कवि थे। उनके काव्य प्रेम के कारण ही उस समय के अनेक कवि उनके आश्रय में रहते थे। उनके द्वारा रचित साहित्य को डॉ० जय भगवान गोयल ने तीन भागों में बांटा है
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साहित्यिक विशेषताएँ:
गुरु जी के साहित्य में भक्ति भावना की प्रधानता है। कुछ विद्वान् चाहे उन्हें युद्ध वीर के रूप में देखते हैं लेकिन वास्तव में वे पहले धर्म संस्थापक थे और बाद में योद्धा। उन्होंने अनेक स्थानों पर अवतारवाद
और मूर्ति पूजा का खंडन किया था। वे ईश्वर को निर्गुण, निराकार और अकाल पुरुष मानते थे। वे कहते हैं कि ईश्वर प्राप्ति का सरल एवं सहज. मार्ग उस ब्रह्म और उसके जीव-जन्तुओं से प्रेम करने में निहित हैं।
गुरु जी ने अपने साहित्य में भक्ति और वीरता का समन्वय किया था। चंडी चरित्र (उक्ति विलास) में उन्होंने ऐसी ही प्रार्थना की थी।
देहि शिवा वर मोहि इहै शुभ करमन ते कबहूँ न टरौं।
न डरों अरिसों जब जाय लरौ निश्चय कर अपनी जीत करों।
गुरु जी की भक्ति भावना की विशेषता है कि वे ‘अकाल पुरुष’ के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। इन्होंने अन्य भक्तोंकवियों की तरह विनय पद लिखे हैं। उनके काव्य में ब्रह्म की कृपालुता, भक्तिवत्सलता, दीनबंधुता आदि का वर्णन किया गया है। गुरु जी के काव्य में शक्ति की वंदना की गई है। उन्होंने भक्ति और वीरता का समन्वय करते हुए अपने शिष्यों के सामने आदर्श की स्थापना भी की थी। ‘चंडी-चरित्र’ (उक्त विलास) में गुरु जी ने ऐसा ही चित्रण किया है। गुरु जी ने आडंबरों का विरोध किया और पाखंडों का खंडन किया। उन्होंने मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए जातिपाति और भेदभाव का खंडन किया। वे भाई-चारे में विश्वास करते थे।
गुरु जी को फारसी, पंजाबी और ब्रजभाषा का गहरा ज्ञान था। दोहा, चौपाई, सवैया आदि छंदों का प्रयोग करते हुए उन्होंने तत्कालीन लोक भाषाओं का प्रयोग किया था। उसमें तत्कालीन विदेशी भाषाओं का प्रयोग भी किया गया है।
Punjab State Board PSEB 11th Class Hindi Book Solutions Hindi रचना पत्र-लेखन Questions and Answers, Notes.
(क) पत्र-लेखन
पत्र लिखना भी एक कला है। जिस प्रकार संगीत, नृत्य इत्यादि के लिए अभ्यास की आवश्यकता है, उसी प्रकार पत्र लिखने के अभ्यास से ही अच्छा पत्र लिखा जा सकता है। एक विद्वान् ने कहा है जिस प्रकार कुंजी बक्स खोलने में सहायक होती है उसी प्रकार पत्र भी हृदय के अनेक द्वारों को खोलने में सहायक होते हैं। मनुष्य अपनी अनुभूतियों को पत्र द्वारा ही अभिव्यक्त (प्रकट) कर सकता है। यह दो व्यक्तियों के बीच हृदय सम्बन्धों को दृढ़ बनाने में सहायक होता है। अतः पत्र का हमारे जीवन में बड़ा महत्त्व है। इसका अनुभव आप इसी एक बात से लगा सकते हैं कि आज बहुत-से उपन्यास भी पत्र-शैली में लिखे जाने लगे हैं। उदाहरणस्वरूप, आप हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री उग्र जी का “चन्द हसीनों के खतूत” उपन्यास देख सकते हैं। पत्र में जितनी स्वाभाविकता होगी, वह उतना ही प्रभावशाली होगा। एक अच्छे पत्र से लेखक की भावनाएं ही व्यक्त नहीं होतीं, बल्कि उससे उसका व्यक्तित्व भी उभर कर सामने आता है।
अच्छे पत्र के गुण
अच्छे पत्र में निम्नलिखित गुण होने चाहिएँ
1. सरल भाषा-शैली:
पत्र में साधारणतः सरल और बोल-चाल की भाषा होनी चाहिए। शब्द बड़ी सावधानी से प्रयोग में लाए जाएं। थोड़े-से बहुत कहने की रीति को अपनाया गया हो। बात सीधे-साधे ढंग से कही जाए। घुमा-फिरा कर लिखने से पत्र की शोभा बिगड़ जाती है।
2. संक्षेप विवरण:
पत्र में व्यर्थ की व्याख्या नहीं होनी चाहिए। जितनी बात प्रश्न में पूछी गई है, उसकी व्याख्या करनी चाहिए। इधर-उधर की हांकने से पत्र में दोष आ जाता है। पत्र को पढ़ने वाले के दिमाग में सारी बात स्पष्ट हो जानी चाहिए, यह न हो कि वह किसी प्रकार की उलझन में फँसा रहे।
3. प्रभावोत्पादक:
पत्र ऐसा होना चाहिए कि जिसको पढ़कर पढ़ने वाले पर प्रभाव पड़े। इसके लिए उसे पत्र के आरम्भ और अन्त को ध्यानपूर्वक लिखना चाहिए। इसके लिए पत्र लिखने के नियमों का पूरा पालन किया गया हो।
पत्रों के प्रकार:
मुख्यतः पत्र दो तरह के होते हैं
1.अनौपचारिक पत्र-ऐसे पत्रों में निजी या पारिवारिक पत्र आते हैं। इन पत्रों को लिखते समय व्यक्ति को खुली छूट होती है कि वह जैसा चाहे पत्र लिख सकता है। ऐसे पत्र प्रायः अपने परिवार के सदस्यों-भाई, बहन, माता-पिता आदि तथा मित्रों को लिखे जाते हैं। ऐसे पत्रों का विषय प्रायः व्यक्तिगत होता है। कभी-कभी ऐसे पत्रों में उपदेश या सलाह भी दी जाती है। बधाई पत्र, शोक पत्र तथा सांत्वना पत्र भी इसी कोटि में आते हैं।
2. औपचारिक पत्र-निजी या पारिवारिक पत्रों को छोड़कर हम जितने भी पत्र लिखते हैं, वे सब औपचारिक पत्र होते हैं। ऐसे पत्र प्रायः उन लोगों को लिखे जाते हैं जिनसे हमारा व्यक्तिगत सम्बन्ध नहीं होता।
औपचारिक पत्रों के प्रकारऔपचारिक पत्र कई प्रकार के हो सकते हैं, जैसे
1. प्रशासनिक पत्र या अधिकारियों को पत्र-ऐसे पत्र उच्च अधिकारियों या शासकीय अधिकारियों को लिखे जाते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं
(क) आवेदन-पत्र
(ख) अधिकारियों को शिकायत सम्बन्धी पत्र
(ग) अधिकारियों या समाचार-पत्र के सम्पादक को सुझाव सम्बन्धी पत्र।
2. कार्यालयी पत्र:
ऐसे पत्र प्रायः एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय को लिखे जाते हैं। राज्य सरकार अपने अधीनस्थ कार्यालयों या केन्द्र सरकार को ऐसे पत्र लिखती है। केन्द्र सरकार के कार्यालय भी जो पत्र राज्य सरकारों या अपने कार्यालय के अधिकारियों को लिखते हैं वे भी इसी कोटि में आते हैं।
3. व्यावहारिक पत्र:
ऐसे पत्र किसी व्यापारिक संस्थान द्वारा अथवा किसी व्यापारिक संस्थान को उपभोक्ता या ग्राहक द्वारा लिखे जाते हैं।
ध्यान रहे कि औपचारिक पत्रों की भाषा नियमबद्ध और परम्परागत होती है। ऐसे पत्र अति संक्षिप्त होते हैं। पारिवारिक पत्र लिखते समय ध्यान में रखने योग्य बातें पारिवारिक या व्यक्तिगत पत्र लिखते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है
(1) लिखने की शैली उत्तम हो अर्थात् पत्र में उचित स्थान पर ठीक शब्दों का प्रयोग किया जाए जिससे पढ़ने वाले को पत्र में लिखी बातें आसानी से समझ में आ जाएं।
(2) पत्र की भाषा सरल होनी चाहिए। मुश्किल शब्दों का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए।
(3) पत्र संक्षिप्त होना चाहिए। (4) पत्र में छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए।
(5) पत्र में केवल प्रसंग की ही बात लिखनी चाहिए। कहानियां लिखने नहीं लग जाना चाहिए।
पारिवारिक पत्र के अंग
पारिवारिक पत्र लिखते समय पत्र के निम्नलिखित अंगों पर विशेष ध्यान देना चाहिए
1. पत्र का आरम्भ:
पत्र के आरम्भ में सबसे ऊपर दाहिनी ओर पत्र लिखने वाले का अपना पता लिखना चाहिए। पते के नीचे तिथि भी लिखनी चाहिए। जिस पंक्ति में तिथि लिखो जाए उससे अगली पंक्ति में पत्र के बायीं ओर हाशिया छोड़ कर जिसे पत्र लिखा जा रहा है उसे यथा विधि सम्बोधन करना चाहिए। आगे सम्बोधन शब्द अलग से दिये गये हैं। सम्बोधन से अगली पंक्ति में ऊपर की पंक्ति से कुछ अधिक स्थान छोड़कर अभिवादन सूचक लगाना चाहिए।
2. पत्र का कलेवर:
पत्र का कलेवर बहुत बड़ा नहीं चाहिए। पत्र में हर विचार अलग-अलग पैरा में लिखना चाहिए।
3. पत्र का अन्त:
पत्र समाप्त होने पर लिखने वाले को पत्र के अन्त में दायीं ओर अपना नाम, पारिवारिक सम्बन्ध का स्वनिर्देश भी लिखना चाहिए।
पत्र के आरम्भ तथा अन्त में लिखने वाली
कुछ याद रखने वाली बातें
पत्र लिखने वाला जिसे पत्र लिखता है उसके पारिवारिक सम्बन्ध के अनुसार पत्र में सम्बोधन, अभिवादन और स्वनिर्देश में परिवर्तन हो जाता है, जैसे-नीचे दिये ब्योरे में दिया गया है
1. अपने से बड़ों को-जैसे माता, पिता, बड़ा भाई, बड़ी बहन, चाचा, अध्यापक, गुरु आदि।
सम्बोधन-पूज्य, पूजनीय, परमपूज्य, आदरणीय,
अभिवादन-प्रणाम, नमस्कार, नमस्ते, सादर प्रणाम
स्वनिर्देश-आपका आज्ञाकारी, आपका स्नेह पात्र, आपका प्रिय भाई, आपका प्रिय भतीजा, आपका प्रिय शिष्य
याद रखिए
स्त्री सम्बन्धी या परिचितों के लिए भी ‘पूज्य’ और ‘आदरणीय’ सम्बोधन का प्रयोग होगा। जैसे पूज्य माता जी, आदरणीय मुख्याध्यापिका जी आदि। ‘पूज्य’ या ‘आदरणीया’ का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
2. अपने से छोटों को – जैसे छोटा भाई, मित्र आदि।
सम्बोधन – प्रिय, प्रियवर, चिंरजीव, प्यारे।।
अभिवादन – खुश रहो, शुभाशीष, शुभाशीर्वाद, स्नेह भरा प्यार, प्यार।
स्वनिर्देश – तुम्हारा शुभचिन्तक, शुभाभिलाषी, हितचिन्तक।
3. मित्रों को या हम उमर को
सम्बोधन – प्रिय भाई, प्रिय दोस्त (मित्र का नाम), प्रियवर, बन्धुवर, प्रिय बहन, प्रिय सखी, प्रिय-(सखी का नाम)
अभिवादन – नमस्ते, जयहिन्द, सप्रेम नमस्ते, मधुर स्मरण, स्नेह भरा नमस्ते, प्यार।
स्वनिर्देश – तुम्हारा मित्र, तुम्हारा स्नेही मित्र, तुम्हारा दोस्त, तुम्हारी सखी, तुम्हारी स्नेह पात्र, तुम्हारी अपनी, तुम्हारी अभिन्न सखी।
पत्र शुरू किन वाक्यों से करना चाहिए
ध्यान रखें:
आजकल पत्र का आरम्भ ऐसे वाक्यों में नहीं किया जाता
‘हम यहां पर कुशलपूर्वक हैं आपकी कुशलता श्री भगवान् से शुभ चाहते हैं।’ यह फैशन पुराना हो गया है। अतः सीधे वर्ण्य विषय का आरम्भ कर देना चाहिए।
पत्र समाप्त करने के लिए वाक्य
प्रशासकीय या अधिकारियों को लिखे जाने वाले पत्र में ध्यान रखने वाली बातें
ऐसे पत्र शासकीय काम-काज से सम्बन्धित होते हैं। कभी-कभी ऐसे पत्र आम आदमी भी लिखता है, जैसे-आवेदन पत्र या उच्च अधिकारियों को की जाने वाली शिकायत सम्बन्धी। ऐसे पत्रों में पत्र लिखने वाला कोई प्रार्थना या शिकायत अथवा सुझाव प्रस्तुत करता है। याद रखिए अधिकारियों को शिकायत भी प्रार्थना के रूप में ही की जानी चाहिए।
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अधिकारियों को लिखे जाने वाले औपचारिक पत्र के अंग
उच्च अधिकारियों को लिखे जाने वाले पत्र के निम्नलिखित अंग होते हैं
औपचारिक पत्र लिखते समय ध्यान में रखने योग्य बातें
1. पत्र का आरम्भ:
औपचारिक पत्र लिखते समय सब से पहले पत्र के बायें कौने में हाशिये के साथ सेवा में, लिखना चाहिए। उसके बाद कुछ जगह छोड़ कर दूसरी पंक्ति में जिस अधिकारी को पत्र लिखा जाना है उसका पदनाम, फिर उससे अगली पंक्ति में उसका पता लिखना चाहिए।
औपचारिक पत्र पदनाम से ही लिखने चाहिएँ। उसके बाद जहां आपने सेवा में लिखा है उसके ठीक नीचे विषय शब्द लिख कर (:) विराम चिह्न लगाना चाहिएइसी पंक्ति में जहां से आपने अधिकारी का पदनाम लिखा है उसके ठीक नीचे पत्र का विषय लिखना चाहिए।
औपचारिक पत्रों में अभिवादन शब्द अनौपचारिक पत्रों के समान अलग-अलग नहीं होता बल्कि सब पत्रों में एक-जैसा ही होता है, जैसे–महोदय, प्रिय महोदय।
2. पत्र का मूल भाग:
पत्र में जहाँ से आपने अधिकारी का पदनाम लिखा है उसके ठीक नीचे से सम्बोधन सूचक शब्द के बाद वाली पंक्ति में-पत्र लिखना आरम्भ करना है। पत्र की दूसरी पंक्ति आप ने वहां से शुरू करनी है जहाँ से आप ने सेवा में लिखा था। पत्र में पहले अनुच्छेद को क्रम नहीं दिया जाता। उसके बाद के अनुच्छेदों में 2, 3, 4 क्रम दिया जा सकता है।
औपचारिक पत्र लिखने की एक खास विधि होती है जिसका ध्यान रखना ज़रूरी है। ऐसे पत्र बहुत लम्बे नहीं होते। मतलब की बात कम-से-कम शब्दों में लिखनी चाहिए। भाषा में भी औपचारिकता बरतनी चाहिए।
3. प्रशंसात्मक अन्त:
अनौपचारिक पत्र यदि आम आदमी की तरफ से-जो स्वयं अधिकारी नहीं है-लिखा जाता है तो पत्र के मूल भाग के प्रशंसात्मक शब्द लिख कर समाप्त करना चाहिए। यह प्रशंसात्मक शब्द नयी पंक्ति में लिखना चाहिए। सभी ऐसे पत्रों में प्रशंसात्मक शब्द समान होता है, जैसे-‘धन्यवाद सहित’।
4. समाप्ति निर्देश:
औपचारिक पत्रों में समाप्ति निर्देश आपका आज्ञाकारी या भवदीय लिख कर नीचे पत्र भेजने वाला अपना हस्ताक्षर करता है तथा अपना पूरा पता लिखता है।
ऐसा पत्र की बायीं ओर लिखा जाता है। नीचे आपकी जानकारी के लिए अनौपचारिक तथा औपचारिक पत्रों की रूपरेखा दी जा रही है।
अनौपचारिक (पारिवारिक या सामाजिक) पत्र की रूपरेखा
अपने से बड़ों को पत्र-पिता को पत्र
18-लाजपतराय नगर,
जी० टी० रोड,
जालन्धर।
दिसम्बर, 18…
पूज्य पिता जी,
सादर प्रणाम।
आपका कृपा पत्र मिला, समाचार ज्ञात हुआ। निवेदन है कि……………………………………..
…………………………………………………………………….
……………………………………………………………………
………………………………………………………………………
पूज्य माता जी को मेरा प्रमाण कहना।
आपका आज्ञाकारी पुत्र
…………………………..
……………………………
प्रशासनिक पत्र की रूपरेखा
उच्च अधिकारियों को लिखा जाने वाला पत्र
सेवा में
कलक्टर,
ज़िला…………………………………..
पंजाब।
विषय:
लाऊडस्पीकर के प्रयोग पर पाबन्दी लगाये जाने बारे।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि…………………………………………
2. ………………………………………..
3…………………………………………
धन्यवाद सहित,
आपका विश्वासी
(हस्ताक्षर)
नाम-पता……………………………
………………………….
दिनांक ……………………….
विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बातें
ऊपर दी गई रूप-रेखा के अनुसार ही पत्र लिखने चाहिएँ, चाहे वे व्यक्तिगत पत्र हों या प्रशासनिक (प्रार्थना-पत्र आदि)। प्रायः देखने में आता है कि लोग इन नियमों का पालन नहीं करते हैं। हालांकि इस छोटी-सी बात को दफ्तरों का साधारण कर्मचारी जानता है। वह ऊपर दिये गये नियमों के अनुसार ही पत्र लिखता अथवा टाइप करता है। आगे चलकर इन नियमों का पालन करते हुए लिखे गये पत्र को ही अच्छे अंक दिये जाते हैं। आशा है आप पत्र लिखते समय इन नियमों का पूरी तरह पालन करेंगे।
1. कुकिंग गैस की अनियमित आपूर्ति की शिकायत।
सेवा में
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति अधिकारी
रामनगर,
जालन्धर।
विषय-कुकिंग गैस की अनियमित आपूर्ति बारे।
महोदय,
इस पत्र के द्वारा मैं आप का ध्यान नगर की एकमात्र कुकिंग गैस वितरण की ऐजेंसी द्वारा कुकिंग गैस की अनियमित आपूर्ति की ओर दिलाना चाहता हूँ।
महोदय, उपर्युक्त ऐजेंसी ने गैस के कनक्शन देते समय सभी उपभोक्ताओं को भरोसा दिलाया था कि गैस बुक करवाने के एक सप्ताह के भीतर कुकिंग गैस उपभोक्ता के घर पर पहुंचा दी जाएगी। भारतीय तेल कम्पनी ने भी ऐसी ही सुविधा की घोषणा कर रखी है, किन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि ऊपरिलिखित गैस एजेंसी के मालिक बार-बार याद दिलाने पर भी गैस की आपूर्ति में दो से तीन सप्ताह का समय लगाते हैं। कुकिंग गैस के उपभोक्ताओं को कितना कष्ट झेलना पड़ता है, इसका आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।
आप से प्रार्थना है कि आप समय-समय पर उक्त गैस ऐजेंसी का निरीक्षण करें और गैस की आपूर्ति को नियमित करने के आवश्यक निर्देश जारी करें। सुनने में आया है कि ऐजेंसी के मालिक गैस ब्लैक में बेचते हैं, भले ही हमारे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है, किन्तु यदि आप नियमित रूप से इस गैस एजेंसी के स्टॉक और वितरण प्रणाली का निरीक्षण करते रहेंगे तो गैस की ब्लैक रुक जाएगी।
हम आशा करते हैं कि नगर निवासियों को पेश आने वाली असुविधाओं को ध्यान में रखते हुए आप इस दिशा में तुरन्त व उचित कार्रवाई करेंगे। हम आपके आभारी होंगे।
धन्यवाद सहित,
आपका विश्वासी,
(सुजान सिंह कालरा)
512-नेहरू नगर,
जालन्धर शहर।
दिनांक 2 जनवरी, 20…..
2. किसी समाचार पत्र के सम्पादक को केबल नेटवर्क एवं वीडियो खेलों के दुष्परिणामों के बारे में।
113, कर्णपुरी,
मोहाली।
5 जनवरी, 20….
सेवा में
सम्पादक,
दैनिक जागरण
चंडीगढ़।
विषय : केबल नेटवर्क एवं वीडियो खेलों के दुष्परिणामों के बारे।
महोदय,
मैं आपके लोकप्रिय दैनिक की नियमित पाठिका हूँ। आपके समाचार-पत्र के माध्यम से मैं केबल नेटवर्क एवं वीडियो गेम्स के दुष्परिणामों से आपके पाठकों को अवगत करवाना चाहती हूँ।
भवदीय
मारिया
आशा है आप मेरे इन विचारों को अपने पत्र में प्रकाशित करके मुझे अनुगृहीत करेंगे। इस लेख में आपको उचित संशोधन करने की पूरी छूट है।
आज का युग विज्ञान का युग होने के कारण नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। इसी कारण देश के कोने-कोने में सुखसुविधाओं के अनेक साधन उपलब्ध हैं, किन्तु जब से दूरदर्शन पर केबल नेटवर्क का प्रसारण शुरू हुआ है शहरों के साथसाथ गाँव भी इसकी लपेट में आते जा रहे हैं। भले ही दूरदर्शन का प्रसार हमारे राष्ट्र की उन्नति का प्रतीक है परन्तु केबल नेटवर्क पर जो विदेशी चैनलों द्वारा जो अश्लील कार्यक्रम दिखाये जा रहे हैं उनका बुरा असर हमारी सभ्यता और संस्कृति पर भी हो रहा है।
इन कार्यक्रमों का सब से बुरा असर छोटे बच्चों पर हो रहा है, क्योंकि छोटे बच्चों पर बुरी बातों का जल्दी असर होता है। बच्चे अधिकतर अपने टी० वी० सैट के सामने बैठे रहते हैं। पढ़ाई की तरफ ध्यान देना तो दूर की बात वे खेलों की ओर भी ध्यान नहीं देते। अधिक देर तक टी० वी० सैट के सामने बैठने पर वे अनेक रोगों का शिकार हो रहे हैं। जिन में उनकी नेत्र ज्योति कमजोर होना सब से बड़ी बीमारी है। सोने पर सुहागा वीडियो गेम्स ने किया है। छोटे बच्चे घंटों तक इस खेल में मस्त रहते हैं।
हमारे यहाँ लगभग 40 चैनलों पर कार्यक्रम दिखाये जाते हैं जिस में ‘एफ’ चैनल जैसे चैनल तो फैशन-परेड ही दिखाते हैं। नग्न, अर्धनग्न लड़कियों को देख कर शहरों के ही नहीं, गाँवों के लड़के-लड़कियां भी बिगड़ने लगे हैं। इस दिशा में सरकार कुछ नहीं कर सकती। जो कुछ करना है हमें ही करना है। यदि हम यह प्रतिज्ञा कर लें कि अपने घरों में ऐसे गन्दे, बेहूदा कार्यक्रम नहीं देखेंगे तो समाज और देश का भला हो सकता है।
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3. निदेशक, शिक्षा निदेशालय को बोर्ड की वार्षिक परीक्षा के दौरान परीक्षा भवन में हो रही नकल की शिकायत करते हुए।
108, संत नगर
अमृतसर।
सेवा में
निदेशक,
शिक्षा निदेशालय,
चण्डीगढ़।
विषय:
परीक्षा भवन में नकल होने बारे। महोदय,
मैं इस पत्र द्वारा आपका ध्यान बोर्ड की वार्षिक परीक्षाओं के दौरान अपने क्षेत्र के उच्च माध्यमिक विद्यालय में हो रही नकल की ओर दिलाना चाहता हूँ। महोदय, आज वार्षिक परीक्षा शुरू हुए मात्र तीन ही दिन हुए हैं। इन तीन दिनों में मैंने देखा है कि परीक्षा भवन में खुले आम नकल हो रही है। कुछ गुंडा टाइप के विद्यार्थी तो खुले आम पुस्तकें खोलकर प्रश्न-पत्र हल करते हैं। उन्हें निरीक्षक दल का कोई भी अध्यापक कुछ नहीं कहता। देखा देखी दूसरे विद्यार्थी भी नकल करने लगे हैं।
महोदय, नकल के कारण मेरे जैसे कुछ विद्यार्थी काफ़ी घाटे में रहेंगे, क्योंकि जो मेहनत करता है, ईमानदारी से परीक्षा देता है उसके अंक तो कम आएँगे और नकल करने वाले विद्यार्थी अधिक अंक प्राप्त करने में सफल हो जाएंगे।
आप से विनम्र प्रार्थना है कि अपने निदेशालय की ओर से कुछ अधिकारियों को उड़न दस्ते के रूप में भेजकर उक्त विद्यालय में ही नहीं अन्य परीक्षा केन्द्रों पर भी छापे मारे जाएँ और दोषी विद्यार्थियों और अध्यापकों को कड़ी-से-कड़ी सज़ा दी जाए।
मैं आपसे अपना नाम और पता गुप्त रखने की प्रार्थना के साथ परीक्षा में नकल की रोकथाम किये जाने की उचित कार्रवाई किये जाने की भी प्रार्थना करता हूँ।
आपका विश्वासी,
अमरजीत सिंह
4. महाप्रबन्धक, राज्य परिवहन निगम को अपने गाँव में बस स्टॉप की मंजूरी के लिए पत्र लिखती लिखता है।
513, सेक्टर-6
मोहाली।
5 जून 20….
सेवा में
महाप्रबन्धक
पंजाब राज्य परिवहन निगम,
चण्डीगढ़।
विषय-गाँव दोनापावला में बस स्टाप की मंजूरी की प्रार्थना
महोदय,
मैं इस पत्र के माध्यम से दोनापावला गाँव के समस्त निवासियों, विशेषकर छात्रों की ओर से आपकी सेवा में यह निवेदन करना चाहता हूँ कि हमारे गाँव में एक नियमित बस स्टॉप बनाया जाए।
आपका ध्यान गाँववासियों की इस तकलीफ की ओर भी दिलाना चाहता हूँ कि नियमित बस-स्टॉप न होने के कारण सभी बसें हमारे गाँव में नहीं रुकती हैं। कभी कभार यदि कोई बस पीछे से खाली आ रही हो तो रुकती है नहीं तो नहीं रुकती। गाँववासियों को विशेषकर छात्रों को कई-कई घंटे बस की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कभी-कभी तो दिन भर कोई भी बस हमारे गाँव में रुकती ही नहीं। यदि आप हमारे गाँव में एक नियमित बस स्टॉप मंजूर करके उसकी मंजूरी की सूचना अपने सभी बस चालकों और कण्डक्टरों को प्रसारित कर सूचित कर दें तो हम आपके अति आभारी होंगे।
यहाँ यह बात भी आपके ध्यान में लाना ज़रूरी समझता हूँ कि हमारी ग्राम पंचायत ने इस आशय का एक प्रस्ताव पारित करके तथा बस स्टॉप के लिए पंचायत के खर्चे पर शैड बनाने के भरोसे की सूचना आपको पहले ही भेजी जा चुकी है।
आशा है आप गाँववासियों के कष्ट का निवारण करने हेतु उचित एवं शीघ्र कार्रवाई करेंगे।
धन्यवाद सहित,
विश्वजीत
5. मुख्य अभियन्ता राज्य विद्युत् बोर्ड को बिजली का बिल बढ़ा-चढ़ा कर भेजने की शिकायत बारे।
13, विधि नगर
मोहाली।
13 जनवरी, 20…..
सेवा में
मुख्य अभियंता,
चंडीगढ़।
विषय-बिजली के बिल में गड़बड़ी के विषय में।
महोदय,
मैं इस पत्र के माध्यम से आपके कार्यालय द्वारा भेजे गए जनवरी-फरवरी 2018 के बिजली के बिल में कुछ गड़बड़ी होने की ओर दिलाना चाहता हूँ।
मैं शान्ति नगर के मकान नं0 521 का निवासी हूँ। मेरा खाता नं० ए० डी० 1563 है। इस बार बिजली का बिल 2000/रुपए का भेजा गया है और अन्तिम मीटर रीडिंग 51007 दिखाई गई है। इस बिल में कोई गड़बड़ी लगती है। हमारा बिजली । का बिल कभी दो-तीन सौ से ऊपर नहीं आया। इस तथ्य की जांच आप मेरे खाते को देखकर कर सकते हैं। हमारा मीटर आज भी रीडिंग 41047 दिखा रहा है जबकि आपके बिल में 51007 दिखाया है। लगता है मीटर पढ़ने वाले कर्मचारी ने भूल से 4 के स्थान पर 5 अंक लिख दिया है।
आप से नम्र निवेदन है कि आप मामले की व्यक्तिगत स्तर पर जाँच करके मेरे बिजली के बिल को सही करके दोबारा भेजें ताकि मैं बिजली का किराया समय पर आपके कार्यालय में जमा करा सकूँ।
आपसे तुरन्त एवं उचित कार्रवाई करने की पुन: प्रार्थना की जाती है।
भवदीय
शिवराज।
6. पुलिस अधीक्षक को नगर में चोरी की बढ़ती घटनाओं की रोकथाम करने के उपाय करने की प्रार्थना करते हुए।
525, आदर्श नगर
अमृतसर,
13 जून, 20….
सेवा में
पुलिस अधीक्षक,
अमृतसर।
विषय-नगर में बढ़ती चोरी की घटनाओं की रोकथाम करने के बारे में। महोदय,
मैं आपके पुलिस क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले रामनगर मुहल्ले का निवासी हूं। इस पत्र द्वारा इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं कि हमारे मुहल्ले में पिछले कुछ दिनों से कई चोरियां हुई हैं। समाचार-पत्रों के माध्यम से हमें ऐसी जानकारी मिली है कि हमारे ही मुहल्ले में नहीं बल्कि नगर के अनेक क्षेत्रों में चोरी की घटना हुई है।
मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस सम्बन्ध में पुलिस विभाग ने कोई उचित कार्रवाई नहीं की है। ऐसे भी समाचार मिले हैं कि नगर में कोई ससंगठित चोरों का गिरोह आया हुआ है जो इन चोरियों के लिए उत्तरदायी है, पर लगता है आपका विभाग घोड़े बेचकर सो रहा है। नगर में इतनी घटनाएं हो गईं और पुलिस विभाग के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
मान्यवर, आप तो जानते ही हैं पुलिस विभाग पर आम नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा का उत्तरदायित्व होता है पर पुलिस ही ऐसी घटनाओं के प्रति उदासीनता दिखाए तो आम आदमी का पुलिस विभाग और लोकतन्त्र में विश्वास कैसे बहाल किया जा सकता है।
आपसे विनम्र प्रार्थना है कि आप इस सम्बन्ध में अपने विभाग को अधिक चुस्त-दुरुस्त करें और अपराधियों को पकड़ने के उचित उपाय करें ताकि आम जनता भयमुक्त होकर राहत की सांस ले सके और अपने आपको सुरक्षित समझ सके।
आपसे उचित और शीघ्र कार्रवाई के लिए पुनः प्रार्थना की जाती है।
धन्यवाद सहित,
भवदीय,
समर सिंह।
7. मुहल्ले में प्रदूषित जल की आपूर्ति के सम्बन्ध में नगरपालिका के स्वास्थ्य अधिकारी को शिकायती-पत्र लिखिए
मकान संख्या-1303
गांधी नगर,
लुधियाना।
13 अगस्त, 20….
सेवा में
स्वास्थ्य अधिकारी।
लुधियाना।
विषय- मुहल्ला गाँधी नगर में प्रदूषित जल की आपूर्ति के बारे में।
महोदय,
मैं मुहल्ला गाँधी नगर के निवासियों की ओर से आपका ध्यान, नगरपालिका द्वारा घरों में सप्लाई किये जाने वाले प्रदूषित जल के बारे में आकर्षित करना चाहता हूं। हमारे मुहल्ले में पिछले कई दिनों से नगरपालिका के नलों में गन्दा पानी आ रहा है। कभी-कभी उसमें कुछ कीड़े-मकोड़े भी देखे गए हैं। ऐसा जल पीने के योग्य नहीं है। ऐसे जल से तो लोग कपड़े तक धोने में भी झिझक महसूस करते हैं।
आपसे विनम्र प्रार्थना है कि आप जल आपूर्ति विभाग के कर्मचारियों को उचित आदेश देकर जहाँ-जहाँ से पानी की पाइप फटी हुई है और उनमें गन्दा पानी प्रवेश कर रहा है, उन पाइपों की तुरन्त मरम्मत करवाएं।
आपका ध्यान मैं इस बात की ओर भी दिलाना चाहता हूं कि ऐसा पानी पी कर लोगों का स्वास्थ्य तो बिगड़ेगा ही नगर में संक्रामक रोग फैलने का भी डर है।
मैं आशा करता हूं कि मुहल्ला वासियों के स्वास्थ्य का ध्यान करके तुरन्त शुद्ध एवं प्रदूषण रहित जल की आपूर्ति करने के लिए उचित व शीघ्र कार्रवाई करेंगे।
धन्यवाद सहित,
भवदीय,
अमरजीत सिंह।
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8. कलेक्टर महोदय, को पत्र लिखकर लाउडस्पीकरों के प्रयोग पर पाबन्दी लगाने की प्रार्थना।
103, रामनगर,
नवांशहर,
2 मार्च, 20….
सेवा में
उपायुक्त महोदय,
नवांशहर।
विषय-ऊँची आवाज़ में लाउडस्पीकर बजाने को बन्द करने के बारे में।
महोदय,
मैं आपकी सेवा में समूह छात्र वर्ग की ओर से प्रार्थना करना चाहता हूं कि आजकल हमारी वार्षिक परीक्षाएं शुरू हैं, किन्तु नगर में आए दिन किसी-न-किसी बात को लेकर लाउडस्पीकरों पर ऊँची-ऊँची आवाज़ में फिल्मी गाने बजाए जाते हैं। इस शोर से हमारी पढ़ाई में बाधा पड़ती है। लाउडस्पीकर की आवाज़ में घरों में एक-दूसरे से बात करना भी कठिन होता जाता है। कुछ सुनाई ही नहीं देता। घरों में बच्चे विशेषकर बूढ़े लोग काफ़ी परेशान होते हैं। रोगियों की दशा का तो अन्दाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है।
आपसे विनम्र, निवेदन है कि आप लाउडस्पीकर बजाने पर पाबन्दी लगा दें। यदि आप ऐसा न कर सकते हों तो कमसे-कम रात दस बजे के बाद हर हालत में लाउडस्पीकर का प्रयोग करने पर पाबन्दी लगा दें। ऐसी पाबन्दी लगाना आपके अधिकार क्षेत्र में है। समूह नगर निवासी आपके आभारी होंगे। नागरिक शोर प्रदूषण के भयंकर परिणामों से भी सुरक्षित रहेंगे।
आपसे उचित एवं शीघ्र कार्रवाई की पुनः प्रार्थना करता हूं।
धन्यवाद सहित,
भवदीय
विश्वास सिंह
9. महाप्रबन्धक, पंजाब राज्य सड़क, परिवहन निगम चण्डीगढ़ को बस कंडक्टर की पैसे लेकर टिकट न देने की शिकायत करते हुए।
202, कृष्ण कुंज
संत नगर,
अमृतसर।
2 अगस्त, 20…..
सेवा में
महाप्रबन्धक,
पंजाब राज्य सड़क परिवहन निगम,
चण्डीगढ़।
विषय- बस कंडक्टर के भ्रष्टाचार के बारे में शिकायत।
महोदय,
इस पत्र के माध्यम से मैं आपका ध्यान आपके परिवहन निगम की बस नं० 1313 के कंडक्टर के भ्रष्टाचार की ओर दिलाना चाहती हूँ।
कल मैं सुबह सात बजे के करीब ऊपर लिखी बस में अमृतसर के लिए जाने पर सवार हुई। मैंने नोट किया कि बस कंडक्टर यात्रियों से पैसे तो ले रहा है पर टिकट नहीं दे रहा। जब वह मेरे पास आया तो मैंने पैसे देकर उसे टिकट देने की मांग की। इस पर वह कंडक्टर भड़क उठा और मुझ से अशिष्ट भाषा में बात करने लगा। उसने कहा जब अन्य यात्री टिकट की मांग नहीं कर रहे हैं तो आप क्यों ऐसा कर रही हैं। उसने मुझे जो कुछ कहा वह मैं लिख नहीं सकती। मैंने उसे कहा कि तुम्हें महिलाओं से बात करने की भी तमीज़ नहीं है तो उसने कहा सारी तमीज़ तुम्हीं में है। बस में सवार अन्य यात्रियों ने उसे सभ्य व्यवहार करने को कहा पर उस पर कोई असर नहीं हुआ।
आपसे विनम्र प्रार्थना है कि आप उस कंडक्टर के विरुद्ध उचित अनुशासनिक कार्रवाई करें। उसके द्वारा टिकट के पैसों में घपला करने की भी जाँच कारवाई जाए। यह देखा जाए कि 52 यात्रियों वाली बस में उसने कितनी टिकटों के पैसे निगम के कार्यालय में जमा करवाये हैं। एक जागरूक नागरिक के नाते आपको इस भ्रष्टाचार की सूचना देना मैं अपना कर्तव्य समझ कर दे रही हूँ।
भवदीय,
सिमरनजीत कौर।
10. पिता जी के स्थानान्तरण पर प्राचार्य को पाठशाला त्याग प्रमाण-पत्र प्रदान करने हेतु आवेदन पत्र लिखिए।
सेवा में
प्राचार्य,
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय,
पटेल नगर।
विषय-पाठशाला त्याग प्रमाण-पत्र जारी किए जाने हेतु।
महोदय,
निवेदन है कि मैं आपकी पाठशाला में ग्यारहवीं कक्षा के अनुभाग ‘ख’ का विद्यार्थी हूं। मेरे पिताजी भारतीय स्टेट बैंक में मैनेजर के पद पर नियुक्त हैं। कुछ ही दिन पूर्व उनका स्थानान्तरण भोपाल हो गया है। हम सब भी उनके साथ भोपाल जा रहे हैं। आपसे विनम्र निवेदन है कि मुझे पाठशाला त्याग प्रमाण-पत्र प्रदान करने की कृपा करें। ताकि मैं भोपाल में किसी पाठशाला में प्रवेश ले सकूँ।
मैं आपका हृदय से आभारी रहूंगा।
आपका आज्ञाकारी छात्र
सतनाम सिंह
11. मुख्य अभियन्ता को अपने गाँव के रास्ते की मरम्मत के लिए प्रार्थना-पत्र लिखते हुए।
संत सदन,
राम नगर,
चंडीगढ़।
13 मई, 20….
सेवा में
मुख्य अभियन्ता,
सार्वजनिक बांधकाम विभाग,
पंजाब सरकार, चण्डीगढ़।
विषय-गाँव रामनगर की सड़क की मरम्मत बारे।
महोदय,
मैं इस पत्र के माध्यम से आपका ध्यान गाँव रामनगर के रास्ते की खस्ता हालत की ओर दिलाना चाहता हूँ। गत दो वर्षों से इस रास्ते की मरम्मत की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। सारे रास्ते पर कई-कई फुट चौड़े और गहरे खड्डे बने हुए हैं, जिससे अक्सर यहाँ दुर्घटनाएँ होती रहती हैं। यह रास्ता वर्षा के दिनों में तो एक नहर का रूप धारण कर लेता है। आपका ध्यान इस बात की ओर भी दिलाना चाहता हूँ कि जगह-जगह पानी जमा हो जाने पर उस पर मच्छर पलते हैं जो बीमारी फैलाने का कारण बन सकते हैं।
आपसे विनम्र प्रार्थना है कि अपने विभाग को इस रास्ते की मरम्मत पहल के आधार पर किये जाने के उचित एवं तुरन्त आदेश जारी किया जाएं ताकि आम जनता सुख की साँस ले सके और उनकी किसी संक्रामण रोग से रक्षा हो सके। सभी गाँव वासी आपके अति आभारी होंगे।
भवदीय
अक्षर।
12. प्राचार्य महोदय को रुग्णावकाश हेतु प्रार्थना-पत्र लिखते हुए।
सेवा में
प्राचार्य,
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय,
बालघाट
फरीदकोट।
विषय-रुग्णावकाश के लिए प्रार्थना।
महोदय,
मैं आपकी विद्यालय में कक्षा ग्यारह का विद्यार्थी हूं। गत एक सप्ताह से मुझे थोड़ा-थोड़ा बुखार था। बुखार की हालत में मैं विद्यालय आता रहा। आज बाद दोपहर से मुझे 102 डिग्री बुखार हो गया है। डॉक्टर को दिखाया है। उसने मुझे कमसे-कम चार दिनों के लिए आराम करने की सलाह दी है। अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि मुझे दिनांक 4 जनवरी से 7 जनवरी 20…… तक के लिए अवकाश की मंजूरी प्रदान की जाए। मैं आपका अति आभारी रहूंगा।
आपका आज्ञाकारी,
अंकेश भण्डारी
कक्षा XI, क्रम संख्या-642 अनुभाग ‘ख’
13. पुलिस थाने के थानेदार को अपने घर में हुई चोरी की खबर देते हुए।
म.नं. 513
गोविंदपुर
5 मई, 2018
सेवा में
थाना अधिकारी,
पुलिस थाना, गोविंद पुर
गोविंदगढ़।
विषय-घर में चोरी के बारे में प्रथम सूचना रिपोर्ट। महोदय,
निवेदन है कि मैं मोहन लाल सुपुत्र श्री सोहन लाल वासी मकान नं0 513 अपने घर में कल रात हुई चोरी के बारे प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाना चाहता हूँ। घटना का ब्योरा नीचे दिया जा रहा है-कल रात दिनांक 24 फरवरी सन् 20…. रात्रि के समय मेरे घर में चोरी हो गई है। यह घटना रात्रि के 2 बजे से 4 बजे के बीच होने की सम्भावना है क्योंकि रात एक बजे तक तो परिवार के सभी सदस्य दूरदर्शन पर एक फिल्म देख रहे थे। हमें चोरी का ज्ञान प्रायः 5 बजे के करीब हुआ जब मैं प्रातः प्रार्थना के लिए उठा। सोने के कमरे के अतिरिक्त सारे घर का सामान बिखरा पड़ा था। घर का बहुत-सा सामान और नकद पाँच हज़ार रुपए जो मेरे मेज़ की दराज़ में पड़े थे गायब पाये गये हैं।
आपसे विनम्र प्रार्थना है कि आप स्वयं हमारे घर पधार कर पंचनामा तैयार कर लें तथा चोरों के पैरों या हाथों के निशान उतारने के उपकरण भी साथ लाएं।
आपसे प्रार्थना है कि शीघ्र अति शीघ्र मामले की जाँच करके चोरों को पकड़ने और हमारा चोरी हो गया सामान बरामद करने के लिए उचित कार्रवाई करें। मैं आपका आभारी हूँगा।
धन्यवाद सहित,
भवदीय मोहनलाल
14. अधिक बस सेवा के लिए प्रार्थना-पत्र।
131, कबीर नगर,
मुक्तसर।
13 जनवरी, 20…..
सेवा में
सम्पादक,
पंजाब केसरी
अमृतसर।
विषय- ज्यादा बसें चलाए जाने के बारे राज्य परिवहन निगम से प्रार्थना।
महोदय,
आपके लोकप्रिय दैनिक पत्र द्वारा मैं राज्य परिवहन निगम से यह प्रार्थना करना चाहती हूँ कि प्रातः स्कूल एवं कॉलेज के खुलने तथा सायं इन शिक्षा संस्थाओं के बन्द होने के समय नगर-निगम की ओर से कुछ अतिरिक्त बसें चलाई जाएँ।
हमने अपने विद्यालय के प्राचार्य महोदय के द्वारा भी परिवहन विभाग के निदेशक महोदय को एक प्रत्यावेदन भिजवाया था किन्तु न तो उस पत्र की कोई पावती सूचना प्राचार्य महोदय को दी गई और न ही कोई वांछित कार्रवाई की गई। इसी कारण मैंने आपके पत्र द्वारा राज्य परिवहन निगम विभाग तक अपनी मांग पहुंचाने का निर्णय लिया है।
हमारी प्रार्थना है कि प्रातः 7 बजे से नौ बजे के बीच तथा सायं चार बजे से छ: बजे के बीच अतिरिक्त बसें चलाई जाएँ। इस अवधि में स्कूल-कॉलेज एवं दफ्तरों को जाने वाले यात्रियों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। प्राय: बसें पीछे से ठसा ठस भरी आती हैं तथा वे निश्चित बस स्टॉप पर रुकती ही नहीं। यदि रुकती भी है तो उनमें चढ़ना विशेषकर लड़कियों एवं महिलाओं के लिए भारी मुसीबत का कारण बनता है। ऐसी भीड़ भरी बसों में चढ़ने पर लड़कियों और महिलाओं को अभद्र व्यवहार या छेड़खानी जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ता है। कुछ ऐसी ही समस्याओं से महिलाओं को संध्या के समय चलने वाली बसों में दो-चार होना पड़ता है।
हमारी प्रार्थना है कि यदि नगर निगम और परिवहन विभाग इन समयों में कुछ अतिरिक्त बस सेवा चालू कर दें तो बहुतसी समस्याओं का समाधान हो सकता है। हमारी उचित एवं शीघ्र कार्रवाई के लिए विभाग से प्रार्थना है।
भवदीय,
नवनीत।
15. मुहल्ले में फैले मलेरिया से बचाव के लिए प्रार्थना-पत्र।
मकान नं. 13
नेहरू नगर
जालन्धर।
13 मई, 20….
सेवा में
मुख्याधिकारी,
स्वास्थ्य केन्द्र,
जालंधर।
विषय-नेहरू नगर, में फैले मलेरिया की रोकथाम बारे।
महोदय,
निवेदन है कि आप का ध्यान मुहल्ला नेहरू नगर, में फैले मलेरिया के फैलाव और उसकी रोकथाम के लिए उचित एवं शीघ्र कार्रवाई करने की ओर दिलाना चाहता हूँ।
हमारे मुहल्ले में मलेरिया जैसा भयानक रोग फैलने के दो मुख्य कारण हैं जिनकी ओर आपका ध्यान दिलाना ज़रूरी समझता हूँ। पहला कारण यह है कि मुहल्ले की सफ़ाई का कोई उचित प्रबन्ध नहीं है। जगह-जगह कूड़े-कर्कट के ढेर लगे हैं जिनसे बदबू फैलने के साथ-साथ मक्खी और मच्छर भी पलते हैं। दूसरा कारण मुहल्ले की गलियों और सड़कों की काफ़ी देर से मुरम्मत न होना है जिसके कारण जगह-जगह गड्ढे बन गये हैं। जिनमें बरसात का पानी जमा हो जाता है जो मच्छरों की संख्या में वृद्धि करने में सहायक होता है।
आपसे विनम्र प्रार्थना है कि मलेरिया की रोकथाम के लिए सबसे पहले मुहल्ले की सफ़ाई की ओर ध्यान दिया जाए तथा दूसरे डी० डी० टी० जैसी कीटाणु नाशक दवाइयों का सारे मुहल्ले में, और अगर हो सके तो सारे शहर में छिड़काव किया जाए। नगर के सभी अस्पतालों में मलेरिया से पीड़ित रोगियों के लिए अलग से एवं उचित प्रबन्ध किए जाएं। सभी स्वास्थ्य केन्द्रों में दवाइयों का समुचित स्टॉक उपलब्ध करवाया जाए।
महोदय आपको विदित ही है कि कुछ वर्ष पहले नवम्बर मास में बिहार तथा आन्ध्र प्रदेश में इस रोग से कितने लोगों की जानें गयी थीं। ऐसा न हो कि पंजाबवासियों के लिए और आपके लिए यह बीमारी भी एक रोग बन जाए। इसे फैलने से पूर्व ही इसके उचित उपाय करने की आप से पुनः प्रार्थना की जाती है।
धन्यवाद सहित,
अभिजीत सिंह
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16. नगरपालिका को बिल्डिंग के सामने पड़े कचरे से उत्पन्न होने वाली समस्याओं से अवगत करवाते हुए नगरपालिका स्वास्थ्य अधिकारी को इस कचरे को तुरन्त उठाने की प्रार्थना करते हुए।
1056, देवनगर
मोहाली।
1 मार्च, 20…..
सेवा में
स्वास्थ्य अधिकारी,
मोहाली।
विषय-लक्ष्मी बिल्डिंग मोहाली के सामने पड़े कचरे के ढेर को हटाये जाने के बारे।
महोदय,
इस पत्र के द्वारा मैं आपका ध्यान नगर में लक्ष्मी बिल्डिंग के सामने पड़े कचरे के ढेर की तरफ दिलाना चाहता हूँ। गन्दगी का यह ढेर गत एक महीने से यूँ ही पड़ा है, बल्कि इसमें दिन-प्रतिदिन और वृद्धि होती जा रही है। नगरपालिका का कोई भी सफ़ाई कर्मचारी इसे हटाने का प्रबन्ध नहीं करता। इस क्षेत्र में सफाई कर्मचारी को कई बार इस ढेर को उठाने की प्रार्थना की गई पर उस पर हमारी प्रार्थना का कोई असर नहीं होता। कई बार क्षेत्र के नगर पिता के ध्यान में भी यह बात लायी गयी है। उनका कहना है कि मैं चूंकि विरोधी दल का सदस्य हूँ, इसलिए मेरे क्षेत्र की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।
महोदय नगरवासियों के स्वास्थ्य एवं नगर की सफ़ाई का उत्तरदायित्व समूची नगरपालिका पर है न कि किसी एक नगर पिता पर । इस बिल्डिंग के सामने पड़े कचरे से इतनी दुर्गन्ध उठने लगी है कि बिल्डिंग में रहने वालों का जीना तो दूभर हो ही गया है, यहां से गुजरने वाले राहगीरों की परेशानी का कारण भी है। यदि आपने तुरन्त इस कचरे के ढेर को हटाने का प्रबन्ध न किया तो मुहल्ले में ही नहीं नगर में भी किसी संक्रामक रोग के फैलने का डर पैदा हो सकता है।
हम आशा करते हैं कि इस, सम्बन्ध में शीघ्र कार्रवाई करके आप बिल्डिंग वासियों की कठिनाई को दूर करने की कृपा करेंगे। हम सब आपके आभारी होंगे।
भवदीय,
सर्वजीत सिंह।
17. महाप्रबन्धक, पंजाब रोडवेज़, लुधियाना को बस कंडक्टर के अशिष्ट व्यवहार की शिकायत है।
1050, संतपुरी,
लुधियाना।
11 फरवरी, 20…….
सेवा में
महाप्रबन्धक,
पंजाब रोडवेज़,
लुधियाना।
विषय: बस कंडक्टर के अशिष्ट व्यवहार की शिकायत।
महोदय,
मैं आपका ध्यान आपके परिवहन की बस नं० PBN 2627 के कंडक्टर के अशिष्ट व्यवहार की ओर दिलाना चाहती हूँ। घटना दिनांक 4 मार्च की है। मैं अपने विद्यालय जाने के लिए सराभा नगर बस-स्टैण्ड से बस स्टैण्ड की ओर जाने वाली बस में सुबह के करीब 7 बजे सवार हुई। बस में काफ़ी भीड़ थी। बहुत-से लोग खड़े थे। बस कंडक्टर टिकटें काटते समय जहाँ लड़की बैठी थी उसकी सीट के साथ सटकर टिकट काट रहा था। जब वह मेरे पास टिकट देने के लिए आया तो वह कुछ आपत्तिजनक मुद्रा में मेरे साथ सटकर खड़ा हो गया।
पहले तो मैं अपने आपको बचाने के लिए कुछ परे खिसकी पर कंडक्टर भी उसी ओर बढ़ने लगा। मैंने उसे चेतावनी देते हुए सही ढंग से खड़े होने को कहा तो वह अनाप-शनाप बकने लगा। मैंने उसे कहा कि तुम्हें लड़कियों से बात तक करने की तमीज़ नहीं तो उसने कहा अपनी तमीज़ अपने पास रखो यहाँ तो ऐसे ही चलेगा। बस में सवार अन्य यात्रियों ने भी उसे मना किया कि वह लड़कियों से छेड़खानी क्यों करता है और सही ढंग से क्यों नहीं बोलता।
महोदय, बस से उतरने पर मेरी सहपाठिनों ने मुझे बताया कि वह कंडक्टर लड़कियों से आए दिन बदतमीज़ी करता है। आपसे विनम्र प्रार्थना है कि उस कंडक्टर के विरुद्ध उचित और शीघ्र अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए। किसी दिन विद्यार्थी वर्ग ने सामूहिक रूप से उसके विरुद्ध स्वयं कार्यवाही करने की ठान ली तो प्रशासन के लिए कानून व्यवस्था की समस्या खड़ी हो जाएगी।
मैं आशा करती हूँ कि आप उक्त कंडक्टर के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करेंगे एवं उसे भविष्य में यात्रियों से विशेषकर महिलाओं से अशिष्ट व्यवहार न करने की चेतावनी दी जाएगी।
धन्यवाद सहित,
भवदीया
सिमर कौर
18. परीक्षा में विशेष सफलता पाने पर माता की ओर से पुत्री को पत्र लिखो।
सी-17, शक्ति विहार,
लुधियाना।
तिथि : 2 जुलाई, 20….
चिरंजीव मालती,
स्नेहाशीष।
आज प्रात: जैसे ही समाचार-पत्र हाथ में लिया तो ऊपर ही मोटे-मोटे अक्षरों में तुम्हारी बारहवीं कक्षा के परीक्षापरिणाम सम्बन्धी खबर पढ़ी। जब रोल नम्बरों की सूची में तुम्हारा रोल नं० ढूंढ रही थी तो मेरी धड़कन तेज़ हो गई थी। यद्यपि मुझे पूरा विश्वास था कि तुम दसवीं के परीक्षा-परिणामों के अनुरूप यहां भी प्रथम श्रेणी में ही उत्तीर्ण होगी। तुम्हारा रोल नं० पाकर कुछ सन्तुष्टि हुई फिर उसी समय तुम्हारे पापा को गजट में तुम्हारा परिणाम देखने को भेजा। अंकों के आधार पर पता चला कि तुम 75 प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्रथम श्रेणी में पास हुई हो।
प्यारी बिटिया, तुम्हारे जन्म से ही मुझे तुमसे कुछ आशाएँ बंध गई थी कि जो लक्ष्य जीवन में मैं न पा सकी उन्हें तुम प्राप्त करो। मेरा आशीर्वाद सदा-सदा तुम्हारे साथ है, तुम जीवन में हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करो और अपना तथा परिवार का नाम रोशन करो। तुम्हारे पापा भी आज बहुत खुश हैं। तुम्हारा छोटा भाई तो खुशी से फूला ही नहीं समा रहा। वह तो अपने दोस्तों को भी बता आया है।
तुम्हारे पिता जी की ओर से तुम्हें ढेर सारा प्यार। निशांत की ओर से प्यार। पत्र का उत्तर शीघ्र देना।
तुम्हारी माता,
सुनीता।
19. कुसंगति में फंसे अपने छोटे भाई को पत्र लिखो जिसमें सदाचार के गुण बताते हुए उसे बुरी संगति से दूर रहने की प्रेरणा हो।
317-आदर्श नगर,
जालन्धर शहर।
दिनांक : 6 फरवरी, 20….
प्रिय भाई संजीव,
आयुष्मान रहो।
पिछले दो सप्ताह से तुम्हारा कुछ भी संवाद नहीं मिल रहा, क्या कारण है। सारा परिवार तुम्हारी ही चिन्ता में पड़ा हुआ है। कभी-कभी तो मन सोचने लगता है कि हमने तुम्हें दूर होस्टल में पढ़ने भेजकर कहीं कुछ ग़लत तो नहीं किया। हमने तो ऐसा केवल इसलिए किया कि तुम अच्छे विद्यालय में पढ़कर अच्छी विद्या ग्रहण कर सको ताकि तुम्हारा भविष्य सुन्दर हो जाए। लेकिन हमें निरन्तर डर लगा रहता है कि तुम कहीं पढ़ाई से विमुख होकर कुसंगति का शिकार न हो जाओ। जीवन की उन्नति का आधार सदाचार है। सदाचार का अर्थ है-श्रेष्ठ आचरण। इसमें सत्य, उच्च विचार, नैतिकता आदि गुण आते हैं। वस्तुत: नैतिक मूल्यों के बिना, मनुष्य-जीवन ही व्यर्थ है। सदाचारहीन व्यक्ति अपना तो सर्वनाश कर ही लेता है, वह अपने समाज और राष्ट्र को भी कलंकित कर देता है। उसका विवेक नष्ट हो जाता है। उसे भले-बुरे का ज्ञान ही नहीं रहता।
प्रिय राजीव ! विद्या की देवी सदाचारी पर ही रीझती है। आज तक जितने भी महापुरुष हुए हैं, वे सदाचार के बल पर ही ऊंचे उठे हैं। विद्या प्राप्ति के लिए जीवन में कठोर तप और साधना करनी पड़ती है। तप और साधना सदाचारी ही कर सकता है। आचारहीन तो हाथ ही मलता रह जाता है, विद्या रूपी सुवासित फूल उसे कभी प्राप्त नहीं हो पाता। वह प्रख्यात उक्ति एक बार फिर तुम्हें याद दिलाना चाहता हूँ कि-‘आचारहीन न पुनन्ति वेदाः’ अर्थात् चरित्रहीन व्यक्ति को देव भी पवित्र नहीं कर सकते।
प्रिय भाई ! शिक्षा-काल में तो सदाचार की महती आवश्यकता रहती है क्योंकि संयम, धैर्य, सहिष्णुता, गुरु सेवा, व्रत आदि गुणों से ही पूर्ण शिक्षा उपलब्ध होती है। सदाचार का सूर्य शिक्षा का प्रकाश फैला सकता है। इसलिए मेरा बार-बार तुम से यही अनुरोध है कि जीवन में सदाचार को अपनाओ। गुरुजनों की आज्ञा से सदाचारी रहते हुए विद्या प्राप्ति के लिए जुट जाओ। किसी चीज़ की आवश्यकता हो तो नि:संकोच लिख भेजो। पत्र का उत्तर शीघ्र दे दिया करो।
तुम्हारा बड़ा भाई, राकेश।
20. पुत्र के विवाह के अवसर पर अपने मित्र को निमन्त्रण देते हुए पत्र लिखो।
47-बी, किशनपुरा,
गोल मार्किट, फगवाड़ा।
दिनांक : 12 जनवरी, 20….
प्रिय बन्धु ज्ञानेश्वर,
सादर नमस्कार।
आपको यह जानकर हार्दिक आनन्द का अनुभव होगा कि मेरे पुत्र संजीव का शुभ विवाह जालन्धर निवासी और उद्यमी पंकज आर्य की सुपुत्री संगीता के साथ 6 फरवरी, 20…. को होना निश्चित हुआ है। अतः आपसे निवेदन है कि इस शुभ अवसर पर आप सपरिवार हमारे निवास स्थान पर पधारें और नव वर-वधू को आशीर्वाद प्रदान कर कृतार्थ करें।
कार्यक्रम
सेहरा बन्दी-5 बजे शाम।
बारात रवानगी-7 बजे रात्रि।
(जालन्धर के लिए)
उत्तरापेक्षी
समस्त परिवारगण।
तुम्हारा अभिन्न।
राजशेखर।
21. पुलिस अधीक्षक दिल्ली को यात्रा में सामान खो जाने पर रिपोर्ट दर्ज करवाने के बाद भी पुलिस की अकर्मण्यता के सम्बन्ध में आवेदन पत्र लिखें।
ए-13, शांतिपुरम
रोहिणी, दिल्ली।
3 जून, 20…..
सेवा में
पुलिस अधीक्षक,
रोहिणी, दिल्ली।
विषय-यात्रा में खोए सामान और पुलिस की अकर्मण्यता सम्बन्धी।
महोदय,
विनम्र निवेदन यह है कि मैं दिनांक 13 अगस्त को जालन्धर से दिल्ली (रोहिणी सैक्टर 12) में अपनी बहन की लड़की की शादी में सपरिवार जा रहा था। कंडक्टर ने मुझे सामान बस के ऊपर रखने के लिए कहा। मेरे मना करने पर भी वह जिद्द में अड़ गया कि आपका सामान ज्यादा है इसे आप बस के ऊपर ही रखें। बेबसी में मुझे अपना सामान ऊपर ही रखना पड़ा। रास्ते में अम्बाला से कुछ आगे चलकर बस जब एक स्थान पर खाना खाने के लिए रुकी तो मैं बस पर चढ़कर अपना सामान देख आया। तब तक तो सारा सामान ठीक रखा हुआ था। इसके बाद जब बस दिल्ली पहुँची तो मैंने कुली को कहकर अपना सामान उतरवाया तो बाकी सामान तो मिल गया, लेकिन मेरा एक सूटकेस गायब
था जिसमें हमारा कीमती सामान और कुछ रुपए थे।
मैंने जब कंडक्टर से पूछा तो उसने भी सीधे मुँह कोई बात नहीं की। मैंने फिर इस चोरी की सूचना तुरन्त ही पुलिस थाना, दिल्ली में की किन्तु आज आठ दिन हो गए हैं, लेकिन कोई भी उचित कार्रवाई नहीं की गई। इस सम्बन्ध में जब भी थानेदार महोदय से मिलने की कोशिश की तो वह ठीक से बात ही नहीं करता।
साहब, इस चोरी से मेरा बहुत बड़ा नुक्सान हुआ है। मेरे सारे कीमती जेवर चोरी चले गए हैं। अतः आपसे निवेदन है कि आप व्यक्तिगत रूप से रुचि लेकर इसकी जाँच करवाएँ ताकि मुझ ग़रीब को न्याय जल्दी-से-जल्दी मिल सके।
आशान्वित।
भवदीय
दिव्यम भारती
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22. हिन्दी की पुस्तकें मँगवाने के लिए पुस्तक प्रकाशक को पत्र लिखिए।
अ-111, संत नगर
नवांशहर।
10 मई, 20…..
सेवा में
प्रबन्धक,
मल्होत्रा बुक डिपो,
रेलवे रोड,
जालन्धर।
महोदय,
हमारे विद्यालय के पुस्तकालय के लिए हमें हिन्दी की निम्नलिखित पुस्तकें वी०पी०पी० द्वारा शीघ्रातिशीघ्र भेजकर अनुगृहीत करें। पुस्तकें भेजते समय इस बात का ध्यान रखें कि कोई पुस्तक मैली और फटी न हो। आपके नियमानुसार पाँच सौ रुपए मनीआर्डर द्वारा पेशगी के रूप में भेज रहा हूँ।
ये पुस्तकें पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के नये पाठ्यक्रम पर आधारित होनी चाहिएं।
पुस्तकें
1. हिन्दी साहित्यिक निबन्ध 8 प्रतियाँ
2. ऐम०बी०डी० नूतन पत्रावली 8 प्रतियाँ
3. ऐम०बी०डी० साहित्य रत्नाकर 8 प्रतियाँ
4. ऐम०बी०डी० हिन्दी व्याकरण बोध 8 प्रतियाँ
भवदीय,
मोहन लाल।
Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 18 समय नहीं मिला Textbook Exercise Questions and Answers.
Hindi Guide for Class 12 PSEB समय नहीं मिला Textbook Questions and Answers
(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें:
प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार कौन-से लोग बड़े हैं ?
उत्तर:
ऐसे बहुत से लोग हैं जो शीघ्र पत्रोत्तर न देने का बहाना यह कहकर देते हैं कि समय नहीं मिला। इस प्रकार लिखने का कुछ फैशन ही हो गया है। लोग भूल जाते हैं कि बड़े आदमी तो पत्रोत्तर देने में देरी कर सकते हैं, काम की अधिकता के कारण, किन्तु दूसरे लोग भी जो पत्रोत्तर देरी से देते हैं अपने आपको बड़ा समझने लगते हैं।
प्रश्न 2.
भारत और विदेश में समय की पाबंदी के सन्दर्भ में लेखक ने क्या विचार व्यक्त किये हैं ?
उत्तर:
लेखक लिखते हैं कि भारत में कोई सम्मेलन हो, कोई सभा हो, कोई मीटिंग हो, कभी सभा समय पर शुरू नहीं होती। कहीं भी समय की पाबन्दी का ध्यान नहीं रखा जाता। मीटिंग में दिए गए समय से घण्टा दो घण्टा बाद ही सभासद या सदस्य पहुँचते हैं, जबकि इंग्लैंड और यूरोप के दूसरे देशों में सभाएँ समय पर होती हैं।
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प्रश्न 3.
विदेशों में लोग समय को किस प्रकार बर्बाद करते हैं ?
उत्तर:
विदेशों में लोग सिनेमा और थियेटर के टिकट लेने के लिए दो-दो, तीन-तीन घण्टे लगातार कतारों में खड़े रहकर समय बर्बाद करते हैं। यही हाल टेनिस या फुटबाल मैच देखने के टिकट घरों के सामने लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े व्यक्तियों का है। इन कतारों में जवान-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी दिखाई देते हैं।
प्रश्न 4.
इस निबन्ध से आपको क्या शिक्षा मिलती है ?
उत्तर:
प्रस्तुत निबन्ध से हमें पहली शिक्षा तो यह मिलती है कि किसी मित्र या रिश्तेदार का पत्र प्राप्त होने पर उसका तुरन्त उत्तर देना चाहिए, यह बहाना कभी न बनाना चाहिए कि समय नहीं मिला। दूसरी शिक्षा यह मिलती है कि सदा समय को धन समझते हुए उसकी उपयोगिता और महत्त्व को समझना चाहिए।
प्रश्न 5.
लेखक ने समय के सदुपयोग के लिए क्या सुझाव दिया है ?
उत्तर:
लेखक का सुझाव है कि हमें अपने जीवन पर गहरी और तीखी नज़र डालकर यह देखना चाहिए कि हमने कितना समय नष्ट किया है और उसका क्या सदुपयोग हो सकता है। यदि केवल सुबह जल्दी उठना शुरू कर दें तो हम काफ़ी समय बचा सकेंगे और दिन भर स्फूर्ति भी महसूस करेंगे।
(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें:
प्रश्न 6.
‘समय नहीं मिला’ निबन्ध का सार अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया निबन्ध का सार।
प्रश्न 7.
समय धन से भी कहीं ज्यादा अहम चीज़ है-लेखक के इस कथन से आप कहां तक सहमत हैं ?
उत्तर:
लेखक के इस कथन से कि समय ही धन है, हम पूरी तरह सहमत हैं। क्योंकि धन को तो हाथों का मैल माना जाता है और हमारे हाथ काफ़ी मैले रहते ही हैं। इसका अर्थ यह है कि धन तो कभी भी कमाया जा सकता है और धन तो घटता-बढ़ता रहता है। इसीलिए शायद लक्ष्मी को चंचला कहा गया है कि यह एक स्थान पर टिक कर नहीं बैठती। किन्तु समय के महत्त्व से इनकार नहीं किया जा सकता। दिन में समय 24 घण्टों का ही रहेगा इसे न कम किया जा सकता है न बढ़ाया जा सकता है। गया हुआ धन तो लौट कर फिर आ सकता है किन्तु गया हुआ समय कभी लौट कर नहीं आता। जब चिड़ियाँ खेत चुग जाती हैं तो पछताने के सिवा कोई चारा नहीं रहता।
कहते हैं वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन इसीलिए हार गया था क्योंकि उसने पाँच मिनट समय को नहीं समझा। कहा तो यह भी जाता है कि आषाढ़ का चूका किसान और डाल से चूका बन्दर कहीं का नहीं रहता। ऐसा इसलिए है कि समय का निज़ाम सबके लिए एक जैसा है। किसी चित्रकार ने समय का चित्र बनाते समय उसके माथे पर बालों का गुच्छा बनाया था और पीछे से उसका सिर गंजा दिखाया था। इस चित्र का आशय यही है कि समय को सामने से आते हुए पकड़ो नहीं तो उसके गुजर जाने पर हाथ उसके गंजे सिर पर ही पड़ेगा। समय को जिसने धन मान लिया, समझ लिया वही जीवन में सफल है। भौतिक धन तो आज है कल नहीं भी हो सकता। अतः समय को ही धन समझना चाहिए।
(ग) सप्रसंग व्याख्या करें:
1. मेरा तो यह भी अनुभव है कि जो लोग सचमुच बड़े हैं और बहुत व्यस्त रहते हैं उनका पत्र व्यवहार भी बहुत व्यवस्थित रहता है।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्रीमन्नारायण द्वारा लिखित निबन्ध ‘समय नहीं मिला’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत निबन्ध में लेखक ने समय के सदुपयोग के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।
व्याख्या:
लेखक बड़े आदमियों की व्यस्तता के कारण उनके पत्रोत्तर में देरी को उचित मानते हुए कहते हैं कि उसका यह अनुभव है जो लोग सचमुच बड़े हैं और व्यस्त रहते हैं उनका पत्र व्यवहार अर्थात् पत्रोत्तर देने का स्वभाव अत्यन्त ठीक हालत में रहता है।
विशेष:
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2. धन की दुनिया में अमीर-गरीब, बादशाह-कंगाल का फर्क है। पर खुशकिस्मती से समय के साम्राज्य में ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं है। वक्त के निज़ाम में सब बराबर हैं, उसमें आदर्श लोकतंत्र है।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियाँ श्रीमन्नारायण द्वारा लिखित निबन्ध ‘समय नहीं मिला’ में से ली गई हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक धन और समय की तुलना करता हुआ समय को आदर्श लोकतन्त्र के समान बता रहा है।
व्याख्या:
लेखक समय ही धन की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि धन तो घटता-बढ़ता रहता है किन्तु समय को घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता। दूसरे धन की दुनिया में किसी के पास अधिक धन है तो वह अमीर है, बादशाह है और किसी के पास धन कम है तो वह ग़रीब या कंगाल है किन्तु खुशकिस्मती से समय के साम्राज्य में ऊँच-नीच का छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं है। समय के सम्मुख सभी बराबर हैं। उसमें आदर्श लोकतन्त्र है जिसमें सबको बराबर के अधिकार हैं। समय सबके लिए एक जैसा होता है, कोई उसकी उपयोगिता को समझ लेता है तो कोई नहीं।
विशेष:
PSEB 12th Class Hindi Guide समय नहीं मिला Additional Questions and Answers
अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
‘समय नहीं मिला’ किस के द्वारा रचित निबंध है?
उत्तर:
श्री मन्नारायण।
प्रश्न 2.
श्री मन्नारायण का जन्म कहाँ और कब हुआ था?
उत्तर:
इटावा में सन् 1912 ई० में।
प्रश्न 3.
श्री मन्नारायण ने किन-किन पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया था?
उत्तर:
प्रश्न 4.
श्री मन्नारायण किसकी विचारधारा से प्रभावित थे?
उत्तर:
गांधी जी की विचारधारा से।
प्रश्न 5.
श्री मन्नारायण जी के द्वारा रचित तीन रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
रोटी का राग, मानव, सेवांग।
प्रश्न 6.
‘समय नहीं मिला’ निबंध का मूलभाव क्या है ?
उत्तर:
समय का सदुपयोग।
प्रश्न 7.
लेखक की शैली में किस तत्व की प्रधानता है?
उत्तर:
व्यंग्यात्मकता।
प्रश्न 8.
किस ने कहा था कि यदि भोजन करने का समय हो सकता है तो धार्मिक पुस्तकें पढ़ने का भी समय मिल सकता है?
उत्तर:
अंग्रेजी साहित्यकार डॉ० जॉनसन ने।
प्रश्न 9.
लेखक ने किस कहावत की व्याख्या की थी?
उत्तर:
‘समय ही धन’।
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प्रश्न 10.
लेखक ने अपने निबंध में किसे बधाई दी है ?
उत्तर:
उन लोगों को जो समय को बर्बाद नहीं करते और समय का पूरा लाभ उठाते हैं।
प्रश्न 11.
लेखक ने कभी भी न कहने के लिए क्या कहा था?
उत्तर:
‘समय नहीं मिलता।
प्रश्न 12.
किन देशों में सभाएँ सदा समय पर ही होती हैं ?
उत्तर:
इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में।
प्रश्न 13.
विदेशों में लोग समय कैसे बर्बाद करते हैं ?
उत्तर:
सिनेमा, थियेटर और मैच देखकर।
प्रश्न 14.
लेखक ने ‘समय नहीं मिलता’ में क्या संदेश दिया है?
उत्तर:
सदा समय का महत्त्व समझो और कभी झूठे बहाने न बनाओ।
प्रश्न 15.
‘समय बचाने’ के लिए लेखक ने क्या सुझाव दिया है ?
उत्तर:
सुबह जल्दी उठने से काफी समय बचाया जा सकता है।
वाक्य पूरे कीजिए
प्रश्न 16.
……अमीर ग़रीब, बादशाह-कंगाल का फर्क है।
उत्तर:
धन की दुनिया में।
प्रश्न 17.
………………में सब बराबर है।
उत्तर:
वक्त के निज़ाम।
हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए
प्रश्न 18.
लेखक का मानना है कि अधिक व्यस्त लोगों का पत्र व्यवहार अधिक व्यवस्थित होता है?
उत्तर:
हाँ।
प्रश्न 19.
समय के साम्राज्य में ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं है।
उत्तर:
हाँ।
प्रश्न 20.
समय ही धन है।
उत्तर:
हाँ।
प्रश्न 21.
विदेशों में लोगों के द्वारा समय अधिक खराब किया जाता है।
उत्तर:
नहीं।
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प्रश्न 22.
लेखक ने निबंध में व्यंग्य का सहारा नहीं लिया है।
उत्तर:
नहीं।
प्रश्न 23.
समय ही धन है।
उत्तर:
हाँ।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
1. सब की बोली तथा राष्ट्र भाषा प्रचार पत्रिकाओं के संपादक कौन थे ?
(क) श्री मन्नारायण
(ख) श्रीमान नारंग
(ग) श्री प्रफुल्ल पटेल
(घ) श्री हंस।
उत्तर:
उत्तर:
2. ‘समय नहीं मिला’ रचना की विद्या क्या है ?
(क) कहानी
(ख) उपन्यास
(ग) निबंध
(घ) संस्मरण।
उत्तर:
(ग) निबंध
3. ‘समय नहीं मिला’ कैसी रचना है ?
(क) व्यंग्यात्मक
(ख) विचारात्मक
(ग) विवेचनात्मक
(घ) आत्म कथात्मक।
उत्तर:
(क) व्यंग्यात्मक
4. लेखक के अनुसार सबसे बड़ा धन क्या है ?
(क) पैसा
(ख) समय
(ग) धन
(घ) सोना
उत्तर:
(ख) समय
5. समय नहीं मिला निबंध का मूलभाव है
(क) समय का सदुपयोग
(ख) समय की मांग
(ग) धन का उपयोग
(घ) धन की मांग
उत्तर:
(क) समय का सदुपयोग
कठिन शब्दों के अर्थ
मशगूल = व्यस्त। यथा समय = निश्चित समय पर। बेशुमार = अनगिनत। व्यवस्थित = ठीक हालत में। अस्त-व्यस्त = बिखरा हुआ। ख्याल = विचार। अक्सर = प्रायः । दिलासा = तसल्ली। इन्तजाम = प्रबन्ध। अहम = महत्त्वपूर्ण । कुदरत = प्रकृति । ज्वारभाटा = समुद्री तूफान । निज़ाम = बन्दोबस्त, प्रबन्ध। शरीक = शामिल। लालसा = इच्छा। तितर-बितर हो जाना = इधर-उधर बिखर जाना। हताश = निराश। बदकिस्मती = दुर्भाग्य। इक्के-दुक्के = कोई-कोई, कम संख्या में। अपवाद = नियमों के उल्लंघन करने का उदाहरण। मुकर्रर = निश्चित किया हुआ। जाहिर करना = प्रकट करना। संयोजक = सभा या मीटिंग का आयोजन करने वाला। अमुक = फलां, कोई खास । लतीफ़ा = चुटकला, हंसी की बात। हमदर्दी = सहानुभूति। मुमकिन = सम्भव, जो हो सके। प्रतिनिधि = नुमाइंदा। मुबारकबाद = बधाई। स्फूर्ति = ताज़गी। खुश मिजाज = हंसमुख।
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समय नहीं मिला जीवन परिचय
श्रीमन्नारायण जी का जीवन-परिचय लिखिए।
श्रीमन्नारायण का जन्म सन् 1912 में इटावा में हुआ था। एम०ए० करने के बाद आप ‘सबकी बोली’ तथा ‘राष्ट्र भाषा प्रचार’ पत्रिकाओं के सम्पादक रहे। बाद में आप राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के महामन्त्री भी रहे। आप . गाँधीवादी विचारधारा से विशेष रूप से प्रभावित रहे। कांग्रेस के आन्दोलनों में आप शुरू से ही सक्रिय भाग लेते रहे। इनकी प्रमुख रचनाएँ-रोटी का राग, मानव, सेवांग का सन्त हैं। दैनिक जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं पर आप ने बहुत से छोटे-छोटे शिक्षाप्रद निबन्ध भी लिखे हैं।
समय नहीं मिला निबन्ध का सार
‘समय नहीं मिला’ निबन्ध का सार लगभग 150 शब्दों में लिखो।
प्रस्तुत निबन्ध में लेखक ने समय के सदुपयोग के महत्त्व पर प्रकाश डाला है। लेखक ने बड़े ही व्यंग्यात्मक ढंग से उन लोगों पर प्रहार किया है जो समय नहीं मिला का बहाना बनाते हैं कि ‘मुझे आपका काम तो याद है पर क्या करूँ बिल्कुल समय ही नहीं मिला’ कुछ इसी तरह का बहाना लोग पत्रोत्तर देने में करते हैं। लेखक ने उदाहरण देते हुए बताया कि एक व्यक्ति ने प्रसिद्ध अंग्रेजी के साहित्यकार डॉ० जानसन से जाकर कहा कि उसे धार्मिक पुस्तकें पढने का समय नहीं मिलता। साहित्यकार ने समझाया कि यदि भोजन करने का समय हो सकता है तो धार्मिक पुस्तकें पढ़ने का भी समय मिल सकता है।
लेखक ने ‘समय ही धन’ कहावत की व्याख्या करते हुए बताया है कि हम पैसा तो जितनी मेहनत करें कमा सकते हैं किन्तु समय को घटा या बढ़ा नहीं सकते। समय का प्रबंध सबके लिए बराबर है किन्तु फिर भी हम उसके महत्त्व को नहीं समझते। हम काम के घण्टे कम करने का शोर मचाते हैं पर यह नहीं सोचते कि खाली समय में लोग करेंगे क्या। क्या वे अपना समय सिनेमा का टिकट पाने के लिए बर्बाद न करेंगे।
लेखक उन लोगों को बधाई देता है जो समय का पूरा लाभ उठाकर एक मिनट भी बर्बाद नहीं करते। लेखक की सलाह है खुशमिजाज रहकर अपने समय का जितना अच्छा उपयोग कर सकें, उतनी ही आपकी प्रशंसा है। किन्तु आज से यह किसी से न कहें कि समय नहीं मिला।
Punjab State Board PSEB 12th Class Hindi Book Solutions Chapter 16 क्या निराश हुआ जाए? Textbook Exercise Questions and Answers.
Hindi Guide for Class 12 PSEB क्या निराश हुआ जाए? Textbook Questions and Answers
(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें:
प्रश्न 1.
आजकल चिन्ता का क्या कारण है ?
उत्तर:
आज देश में आरोप-प्रत्यारोप का ऐसा वातावरण बन गया है कि लगता है कि कोई ईमानदार आदमी रहा ही नहीं। जो व्यक्ति जितने ऊँचे पद पर है, उसमें उतने ही अधिक दोष दिखाए जाते हैं। जो व्यक्ति कुछ करेगा उसके कार्य में कोई न कोई दोष तो होगा ही किन्तु उसके गुणों को भुलाकर दोषों को ही देखना निश्चय ही चिन्ता का विषय है।
प्रश्न 2.
जीवन के महान् मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था क्यों हिलने लगी है ?
उत्तर:
आज देश में कुछ ऐसा वातावरण बना है कि ईमानदारी से मेहनत करके रोटी रोज़ी कमाने वाले भोले-भाले मज़दर पिस रहे हैं और झठ और फरेब का धन्धा करने वाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी मूर्खता समझी जाने लगी है और सच्चाई केवल कायर और बेबस लोगों के पास रह गयी है। ऐसी हालत में लोगों की जीवन के महान् मूल्यों के बारे में आस्था हिलने लगी है।
प्रश्न 3.
वे कौन-से विकार हैं जो मनुष्य में स्वाभाविक रूप में विद्यमान रहते हैं ?
उत्तर:
लोभ-मोह, काम-क्रोध आदि विकार मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते पर इन्हें प्रधान शक्ति मान लेना और अपने मन तथा बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर छोड़ देना बहुत बुरा नीच आचरण है। हमारे यहाँ इन विकारों को संयम के बन्धन में बाँधकर रखने का प्रयत्न किया जाता है।
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प्रश्न 4.
धर्म और कानून में क्या अन्तर है ?
उत्तर:
धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता जबकि कानून को दिया जा सकता है। भारत वर्ष में अब भी यह अनुभव किया जाता है कि धर्म कानून से बड़ी चीज़ है। कानून की त्रुटियों से लाभ उठाया जा सकता है जबकि धर्म में आस्था रखने वाला ऐसा नहीं करता। .
प्रश्न 5.
किसी ऐसी घटना का वर्णन करो जिससे लोक चित्त में अच्छाई की भावना जागृत हो।
उत्तर:
कुछ महीने पहले की बात है कि मैं अपने मम्मी पापा के साथ टेक्सी में कही जा रहा था। टैक्सी से उतरते समय मेरी मम्मी टैक्सी में अपना पर्स भूल गईं। उसमें तीन हजार रुपए और मम्मी के कुछ गहने और मोबाइल था। हम सभी हैरान थे कि अब क्या किया जाए हमने तो टैक्सी का नम्बर और टैक्सी ड्राइवर का नाम भी नहीं पूछा था। थोड़ी देर बाद हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब वही टैक्सी ड्राइवर हमारे पास मम्मी का पर्स लौटने आ पहुँचा। मम्मी और पापा ने उसे सौ रुपया पुरस्कार देना चाहा तो उसने इन्कार करते हुए कहा-यह तो मेरा फर्ज़ था।
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 150 शब्दों में लिखो।
प्रश्न 1.
‘क्या निराश हुआ जाए ?’ निबन्ध का सार लिखो।
उत्तर:
देखिए पाठ के आरम्भ में दिया गया निबन्ध का सार ।
प्रश्न 2. इस निबन्ध में द्विवेदी जी ने कुछ घटनाएँ दी हैं जो सच्चाई और ईमानदारी को उजागर करती हैं। उनमें से किसी एक घटना का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
द्विवेदी जी एक बार सपरिवार बस में यात्रा कर रहे थे। उनकी बस गंतव्य से पाँच मील पहले एक सूनी निर्जन जगह पर खराब हो गई। उस समय रात के दस बजे थे सभी यात्री घबरा गए। कंडक्टर बस के ऊपर से साइकल उठाकर चला गया। उसके जाने पर यात्रियों को संदेह हुआ कि उन्हें धोखा दिया जा रहा है। एक यात्री ने चिन्ता जताते हुए कहा कि यहाँ डकैती होती है, दो दिन पहले ही एक बस को लूटने की घटना हुई है। द्विवेदी जी परिवार सहित अकेले यात्री थे। बच्चे पानी के लिए चिल्ला रहे थे और पानी का कहीं ठिकाना न था।
इसी बीच कुछ नवयुवक यात्रियों ने ड्राइवर को पीटने का मन बनाया। जब लोगों ने उसे पकड़ा तो वह घबराकर । द्विवेदी जी से उसे लोगों से बचाने की प्रार्थना करने लगा। ड्राइवर ने कहा कि हम लोग बस का कोई उपाय कर रहे
हैं।
द्विवेदी जी लोगों को समझा-बुझा कर उसे पिटने से तो बचा लेते हैं किन्तु लोगों ने ड्राइवर को बस से उतार कर घेर लिया और कोई घटना होने पर पहले उसे मारना ही उचित समझा। इतने में यात्रियों ने देखा कि कंडक्टर एक खाली बस लिए चला आ रहा है। आते ही उसने बताया कि अड्डे से नयी बस लाया हूँ। फिर वह कंडक्टर द्विवेदी जी के पास आकर लोटे में पानी और थोडा दुध दिया। उसने कहा कि बच्चे का रोना उससे देखा न गया। सब यात्रियों ने उसे धन्यवाद दिया और ड्राइवर से क्षमा माँगी। रात बारह बजे से पहले ही वे बस अड्डे पहुंच गए।
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प्रश्न 3.
मानवीय मूल्य से सम्बन्धित यदि कोई ऐसी ही घटना आपके साथ घटित हुई हो, तो उसका वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
पिछले महीने की बात है कि मैं साइकिल पर जा रहा था कि एक ट्रक पीछे से आया और मुझे टक्कर मारकर चला गया। मैं सड़क पर जख्मी हालत में पड़ा था। मेरे पास से कई स्कूटर, कई कारें गुजरे किन्तु किसी ने मेरी ओर ध्यान नहीं दिया। मैं घायल अवस्था में सड़क के किनारे कोई एक घण्टा तक पड़ा रहा। मेरे शरीर से खून बह रहा था। चोट अधिकतर टांगों और बाहों पर लगी थी। मैंने सहायता के लिए कई लोगों को पुकारा भी किन्तु किसी को भी मेरी हालत पर दया नहीं आई। लगता था कि लोग पुलिस के डर से मेरी सहायता नहीं कर रहे थे। क्योंकि आजकल पुलिस वाले उलटे सहायता करने वाले पर ही केस बना देती है। कहती है एक्सीडेंट तुम्हीं ने किया है। मैं निराश होकर ईश्वर से प्रार्थना करने लगा।
तभी अचानक मेरे पास आकर एक कार रुकी। कार में दो व्यक्ति सवार थे। वे दोनों कार से उतरे। दोनों ने मिलकर मुझे अपनी कार में डाला और तुरन्त निकट के अस्पताल में ले गए। मेरी साइकिल जो बुरी तरह टूट चुकी थी, उन्होंने वही छोड़ दी। अस्पताल के डॉक्टर ने बताया कि इस रोमी को कम से कम एक बोतल खून की ज़रूरत है। उन दोनों व्यक्तियों ने बिना हिचक के अपना खून देने की रजामंदी प्रकट की। प्रभु कृपा से उन दोनों का खून मेरे खून के ग्रुप से मिल गया। तुरन्त उनमें से छोटी आयु के व्यक्ति ने अपना खून दिया। मेरे घावों की मरहम पट्टी कर दी गई थी। दो दिन के इलाज के बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी मिल गई। मुझे डॉक्टरों से पता चला कि वे सज्जन मेरे इलाज का सारा खर्चा अदा कर गए हैं। मैं उन दोनों व्यक्तियों को भगवान् समझता हूँ किन्तु खेद है कि मैं उनका नाम तक नहीं जानता।
(ग) सप्रसंग व्याख्या करें
1. “जीवन के महान् मूल्यों के बारे में आस्था ही हिलने लगी है।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबन्ध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से ली गई
व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि आज देश में ऐसा वातावरण बना है कि ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है। सच्चाई केवल डरपोक और बेबस लोगों के पास रह गयी ऐसी स्थिति में लोगों की जीवन के महान् मूल्यों के प्रति आस्था डाँवाडोल होने लगी है।
2. “धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, कानून को दिया जा सकता है।”
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबन्ध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से ली गई
व्याख्या:
लेखक कहते हैं भारत वर्ष में सदा कानून को धर्म माना जाता रहा है किन्तु आज कानून और धर्म में अन्तर आ गया है। लोग यह जानते हैं कि धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता जब कानून को दिया जा सकता है। इसी कारण . धर्म से डरने वाले लोग भी कानून की कमियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते।
3. ‘अच्छाई को उजागर करना चाहिए, बुराई में रस नहीं लेना चाहिए।’
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्ति डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबन्ध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से ली गई
व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि दोषों से पर्दा उठाना बुरी बात नहीं है। लेकिन किसी की बुराई करते समय जब उसमें रस लिया जाता और उसे कर्त्तव्य मान लिया जाता है तो यह बुरी बात है और इससे भी बुरी बात वह जब अच्छाई को उतना ही रस लेकर प्रकट न करना।
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4. सामाजिक कायदें-कानून कभी युग-युग से परीक्षत आदर्शों से टकराते हैं, इससे ऊपरी सतह आलोड़ित भी होती है, पहले भी हुआ है, आगे भी होगा। उसे देखकर हताश हो जाना ठीक नहीं है।
उत्तर:
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित निबन्ध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से लिया गया है।
व्याख्या:
लेखक कहते हैं कि सामाजिक नियम और कानून समाज के हित को ध्यान में रखकर मनुष्य द्वारा ही बनाये जाते हैं। उनकी ठीक सिद्ध न होने पर उन्हें बदल दिया जाता है। ये नियम-कानून सबके लिए होते हैं परन्तु कोईकोई नियम सबके लिए सुखकर नहीं होता। जब सामाजिक नियम-कानून युगों से परीक्षित आदर्शों से टकराते हैं तो जो हलचल होती है वह ऊपरी सतह पर ही होती है। वह हलचल भीतरी सतह में नहीं होती अतः इस हलचल को देखकर निराश हो जाना ठीक नहीं है।
PSEB 12th Class Hindi Guide क्या निराश हुआ जाए? Additional Questions and Answers
अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
‘क्या निराश हुआ जाए?’ किसके द्वारा रचित है?
उत्तर:
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी।
प्रश्न 2.
आचार्य द्विवेदी का जन्म कब और कहाँ हुआ था? ।
उत्तर:
सन् 1907 ई० में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में ‘आरत दुबे का छपर गाँव में’।
प्रश्न 3.
आचार्य द्विवेदी को भारत सरकार ने किस अलंकार से सम्मानित किया था ?
उत्तर:
पद्म भूषण से।
प्रश्न 4.
आचार्य द्विवेदी किन-किन विश्वविद्यालयों के हिंदी-विभागाध्यक्ष बने थे?
उत्तर:
हिंदू विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय।
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प्रश्न 5.
द्विवेदी जी के द्वारा रचित उपन्यासों में से किन्हीं दो का नाम लिखिए।
उत्तर:
अनामदास का पोथा, बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्र लेख।
प्रश्न 6.
‘क्या निराश हुआ जाए ?’ किस प्रकार का निबंध है?
उत्तर:
विचारात्मक निबंध।
प्रश्न 7.
इस निबंध में किस प्रकार की बुराइयों पर प्रकाश डाला गया है?
उत्तर:
सामाजिक बुराइयों पर।
प्रश्न 8.
जो आदमी कुछ नहीं करता वह अधिक सुखी क्यों होता है?
उत्तर:
उसके काम में कोई दोष ही नहीं निकल पाता।
प्रश्न 9.
वर्तमान में कौन पिस रहा है और कौन फल-फूल रहा है ?
उत्तर:
वर्तमान में मज़दूर पिस रहे हैं और धोखेबाज फल-फूल रहे हैं।
प्रश्न 10.
भारतवासियों ने आत्मा को क्या महत्त्व दिया था?
उत्तर:
भारतवासियों ने आत्मा को चरण और परम माना था।
प्रश्न 11
द्विवेदी जी ने लोभ-मोह को क्या कहा है ?
उत्तर-:
उन्हें विकार कहा है।
प्रश्न 12.
कानून को भारत में क्या महत्त्व दिया गया है?
उत्तर:
कानून को धर्म का दर्जा दिया गया है।
प्रश्न 13.
लोग किसी दुर्घटना में वाहन के चालक को ही ज़िम्मेदार क्यों मानते हैं ?
उत्तर:
लोगों को लगता है कि वाहन के कल-पुर्जा, चालन, देख-रेख आदि सभी की ज़िम्मेदारी वाहन के चालकी होती है, जो कि पूरी तरह से ठीक नहीं है।
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प्रश्न 14.
वर्तमान में ईमानदारी को क्या समझा जाता है?
उत्तर:
वर्तमान में ईमानदारी को मूर्खता का पर्यायवाची समझा जाता है। वाक्य पूरे कीजिए
प्रश्न 15.
ईमानदारी को…. .पर्याय समझा जाने लगा है।
उत्तर:
मूर्खता।
प्रश्न 16.
भारतवर्ष ने कभी भी………………के संग्रह क. अधिक महत्त्व नहीं दिया।
उत्तर:
भौतिक वस्तुओं।
प्रश्न 17.
बुराई में……………लेना बुरी बात है।
उत्तर:
रस।
हाँ-नहीं में उत्तर दीजिए
प्रश्न 18.
दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है।
उत्तर:
हाँ।
प्रश्न 19.
जीवन के महान् मूल्यों के बारे में आस्था ही हिलने लगी है।
उत्तर:
हाँ।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
1. द्विवेदी जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार किस कृति पर मिला ?
(क) आलोक पर्व
(ख) आलोकित
(ग) आलोक
(घ) पर्व।
उत्तर:
(क) आलोक पर्व
2. ‘अशोक के फूल’ किस विधा की रचना है ?
(क) निबंध
(ख) कहानी
(ग) रेखाचित्र
(घ) संस्मरण।
उत्तर:
(क) निबंध
3. द्विवेदी जी का साहित्य किसका संगम है ?
(क) मानवतावाद का
(ख) भारतीय संस्कृति का
(ग) मानवतावाद एवं भारतीय संस्कृति का
(घ) कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) मानवतावाद एवं भारतीय संस्कृति का
4. ‘क्या निराश हुआ जाए’ कैसा निबंध है ?
(क) सकारात्मक
(ख) विचारात्मक
(ग) विवेचनात्मक
(घ) प्रेरणात्मक
उत्तर:
(ख) विचारात्मक
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क्या निराश हुआ जाए? गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या
1. क्या यही भारतवर्ष है, जिसका सपना तिलक और गाँधी ने देखा था ? रवींद्रनाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय का महान् संस्कृति-सभ्य भारतवर्ष किस अतीत के गह्वर में डूब गया ? आर्य और द्रविड़, हिन्दू और मुसलमान, यूरोपीय और भारतीय आदर्शों की मिलन-भूमि ‘मानव महासमुद्र’ क्या सूख गया ? मेरा मन कहता है ऐसा हो नहीं सकता। हमारे महान् मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा।
प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित’ “क्या निराश हुआ जाए ?” शीर्षक निबंध में से लिया गया है। इस गद्यांश में लेखक अपने इस विश्वास को प्रकट करता है कि अनेक विकृतियों के आ जाने के बावजूद भी भारतवर्ष से प्राचीन मानवीय आदर्श विलुप्त नहीं हुए हैं।
व्याख्या:
द्विवेदी जी कहते हैं कि आज चारों ओर भ्रष्टाचार, अनैतिकता, शोषण, बेईमानी आदि का बोलबाला है। वह प्रश्न करते हैं कि क्या यह वही भारतवर्ष है जिसका सपना हमारे महापुरुषों ने देखा था ? क्या इसी भारतवर्ष का स्वप्न कर्मयोगी लोकमान्य तिलक ने देखा था अथवा क्या यह राष्ट्रपति महात्मा गांधी के सपनों का भारत है ? संस्कृति से सभ्य यह रवींद्रनाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय का देश है। यहां की संस्कृति अत्यंत प्राचीन है और अध्यात्म प्रधान है। इस सुसंस्कृत और सुसभ्य देश को न जाने क्या हुआ है ? लगता है कि यह किसी अतीत की गुफा में लुप्त हो गया। भाव यह है कि वर्तमान भारत में उसका सुसंस्कृत और सभ्य रूप नहीं मिलता।
रवींद्रनाथ ठाकुर इस भारतवर्ष को ‘मानव महासमुद्र’ कहते थे। इसमें अनेकानेक जातियों के मनुष्य रहते हैं और वे नदियों की भांति इस महासमुद्र में लीन हैं। आर्य और द्रविड़, संस्कृति, हिंदू और मुस्लिम संस्कृति, भारतीय और यूरोपीय संस्कृति के आदर्शों और सिद्धान्तों का यह संगम स्थल है। क्या यह ‘महासमुद्र’ सूख गया है ? लेखक की मान्यता है कि ऐसा संभव नहीं है। आज भी यह महान् विचारकों, ऋषियों एवं दार्शनिकों के स्वप्नों और कल्पनाओं का देश है और भविष्य में भी इसी रूप में रहेगा।
विशेष:
2. यह सही है कि इन दिनों कुछ ऐसा माहौल बना है कि ईमानदारी से मेहनत करके जीविका चलाने वाले निरीह और भोले-भाले श्रमजीवी पिस रहे हैं और झूठ तथा फरेब का रोज़गार करने वाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है, सच्चाई केवल भीरु और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। ऐसी स्थिति में जीवन के महान् मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था ही हिलने लगी है।
प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इन पंक्तियों में लेखक ने आज के भारत के दोषपूर्ण वातावरण का यथार्थ चित्रण किया है।
व्याख्या:
लेखक कहता है कि आज इस देश के वातावरण में भ्रष्टाचार और अनैतिकता का बोलबाला है। आज ऐसा माहौल बन चुका है कि ईमानदारी और सच्चाई की कद्र नहीं है। ईमानदारी से मेहनत करके अपने जीवन का निर्वाह करने वाले भोले-भाले और सीधे-साधे लोगों का शोषण हो रहा है। उनकी मेहनत-मज़दूरी के बदले में उन्हें इतना कम पैसा मिलता है कि वह पेट भर भोजन भी नहीं पा सकते। इसके विपरीत असत्य तथा छल-कपट का व्यवहार करने वाले लोग समुन्नत और समृद्ध हो रहे हैं। इस प्रकार ईमानदारी पूर्ण श्रम पर झूठ और कपट हावी हो रहे हैं।
आज ईमानदारी और मूर्खता समानार्थक हो गए हैं। भाव यह है कि ईमानदारी को मूर्ख समझा जाने लगा है। इसी प्रकार जो व्यक्ति सच्चाई से काम लेते हैं उन्हें धर्मभीरु तथा लाचार कहा जाता है। इस प्रकार आज ऐसा माहौल हो गया है कि जीवन के उच्च मूल्यों, मानवीय एवं सांस्कृतिक आदर्शों के बारे में लोगों का विश्वास डगमगाने लगा है।
विशेष:
3. सदा मनुष्य-बुद्धि नयी परिस्थितियों का सामना करने के लिए नये सामाजिक विधि-निषेधों को बनाती है, उनके ठीक साबित न होने पर उन्हें बदलती है। नियम कानून सबके लिए बनाए जाते हैं, पर सबके लिए कभीकभी एक ही नियम सुखकर नहीं होते। सामाजिक कायदे-कानून कभी युग-युग से परीक्षित आदर्शों से टकराते हैं इससे ऊपरी सतह आलोड़ित भी होती है, पहले भी हुआ है, आगे भी होगा। उसे देखकर हताश हो जाना ठीक नहीं है।
प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में सें अवतरित किया गया है। इसमें लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि युग-परिवर्तन के साथ जब नये नियम बनाए जाते हैं, तब उनका पुराने परखै नियमों के साथ टकराव भी होता है, जिससे समाज में उथल-पुथल होती है, परन्तु इससे निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
व्याख्या:
लेखक का कथन है कि मनुष्य हमेशा ही नई परिस्थितियों का सामना करने के लिए अपनी बुद्धि द्वारा कार्यालय सम्बन्धी नियम बनाता है। यह प्रत्येक युग के अनुकूल करने योग्य एवं न करने योग्य’ सामाजिक नियमों की प्रतिष्ठा करता है। इन सामाजिक विधि-निषेधों के उचित होने पर वे समाज द्वारा अपना लिए जाते हैं और ठीक न सिद्ध होने पर उन्हें छोड़ दिया जाता है। मनुष्य की बुद्धि उन्हें बदलती है ये विधि-निषेध के नियम कायदे सामान्य होते हैं। सबके लिए होते हैं, परन्तु एक ही नियम कई बार सबके लिए उपयोगी और सुखदायक नहीं होता।
ये सामाजिक विधिनिषेध के कायदे-कानून पुराने परखे नियमों से टकराते भी हैं और वर्तमान नये नियमों और पुराने परीक्षित मूल्यों में संघर्ष होता है। इससे समाज की बाहरी सतह पर हलचल भी होती है, परंतु यह नई बात नहीं है। यह पहले भी होता आया है और आगे भी होता रहेगा। अतः वर्तमान माहौल को देखकर निराश होना उचित नहीं है क्योंकि यह स्वाभाविक है फिर यह नयी बात नहीं है।
विशेष:
4. भारतवर्ष ने कभी भी भौतिक वस्तुओं के संग्रह को बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया है, उसकी दृष्टि से मनुष्य के भीतर जो महान् आन्तरिक तत्व स्थिर भाव से बैठा हुआ है, वही चरम और परम है। लोभ-मोह, काम क्रोध आदि विकास मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते हैं, पर उन्हें प्रधान शक्ति मान लेना और अपने मन तथा बुद्धि को उन्हीं के इशारे पर छोड़ देना बहुत निकृष्ट आचरण है।
प्रसंग:
यह गद्यावतरण डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ से अवतरित है। इसमें बताया गया है कि भारत में भौतिक चीजें इकट्ठी करने को अधिक महत्त्व नहीं दिया गया।
व्याख्या:
लेखक कहता है कि भारतवर्ष में किसी भी युग में दुनियावी चीजें एवं इंद्रिय सुख के भौतिक पदार्थों को इकट्ठा करने को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया गया है। यहां सुख-साधन जुटाना बहुत ही सीमित रहा है। भारतीय मनीषियों ने आंतरिक तत्व को अधिक महत्त्व दिया है। उनकी दृष्टि शरीर की अपेक्षा आत्म तत्व पर अधिक रही है जो स्थिर एवं नित्य है। उसे ही यहां श्रेष्ठतम माना गया है। वे हमारे देश की संस्कृति भौतिक मूल्यों के स्थान पर आत्मिक, मानवीय एवं नैतिक मूल्यों को महत्त्व देती रही है। भौतिक पदार्थ नश्वर हैं तथा आंतरिक मानवीय मूल्य परम सत्य है।
इसमें संदेह नहीं कि मनुष्य में काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों का अस्तित्व स्वाभाविक है, परन्तु इन्हें प्रधान शक्ति मान लेना उचित नहीं है। इन्हें मन और बुद्धि पर हावी होने देना अथवा इन्हें मनमानी करने देना क्षुद्र आचरण कहा जायेगा। यह सदाचरण अथवा उच्चारण नहीं हो सकता।
विशेष:
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5. दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है। बुराई यह मालूम होती है कि किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करके उसमें रस लिया जाता है और दोषोद्धाटन को एकमात्र कर्तव्य मान लिया जाता है। बुराई में रस लेना बुरी बात है, अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है।
प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ में से उद्धृत किया गया है। इसमें लेखक ने बताया है कि किसी के दोषों को सबके समक्ष लाने में कोई बुराई नहीं, बुराई इस बात में है कि साथ-साथ गुणों को उजागर नहीं किया जाता।
व्याख्या:
लेखक कहता है कि किसी व्यक्ति के दोषों को उजागर करने में कोई विशेष बुराई नहीं। बुराई तो इस बात में है कि किसी व्यक्ति की बुराइयों को उजागर करने में ही रस लिया जाता है तथा दोषों को उजागर करने वाला यह समझने लगता है कि उसका कर्तव्य तो अमुक व्यक्ति की बुराइयों को उद्घाटित करना मात्र है। मनुष्य किसी के गुणों को उजागर करने में कतई रस नहीं लेता। आज यह उसका स्वभाव ही बन गया है। बुराई में रस लेना बुरी बात है, मगर किसी की अच्छाई को उतना ही रस लेकर लोगों के सामने प्रकट न करना उससे भी बुरी बात है।
विशेष:
6. मैं भी बहुत भयभीत था, पर ड्राइवर को किसी तरह मार-पीट से बचाया। डेढ़-दो घंटे बीत गए। मेरे बच्चे भोजन और पानी के लिए व्याकुल थे। मेरी और पत्नी की हालत बुरी थी। लोगों ने ड्राइवर को मारा तो नहीं, पर उसे बस से उतारकर एक जगह घेरकर रखा। कोई भी दुर्घटना होती है तो पहले ड्राइवर को समाप्त कर देना उन्हें उचित जान पड़ा। मेरे गिड़गिड़ाने का कोई विशेष असर नहीं पड़ा। इसी समय क्या देखता हूँ कि एक खाली बस चली आ रही है और उस पर हमारा बस कंडक्टर भी बैठा हुआ है।।
प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित ‘क्या निराश हुआ जाए ?’ शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इन पंक्तियों में लेखक ने आज के भारत में प्रत्येक मानव पर संदेह करने की प्रवृत्ति को दर्शाया है।
व्याख्या:
यहां लेखक का कहना है कि बस के अचानक सुनसान जगह पर रुक जाने के कारण वह बहुत डरा हुआ था, किन्तु बस के ड्राइवर को बड़ी ही कठिनाई से पिटने से बचा लिया। बस को रुके लगभग डेढ़ से दो घंटे बीत चुके थे। बच्चे भूख से बेहाल और पानी के लिए तड़प रहे थे। स्वयं मेरी और मेरी धर्मपत्नी की दशा अत्यन्त विकट हो रही थी। यात्रियों ने ड्राइवर को मारने की बजाय, उसे नीचे उतारकर एक स्थान पर चारों ओर से उसे घेर लिया ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि यदि कोई अप्रिय बात होती तो वे सबसे पहले ड्राइवर को ही मृत्युदंड देते। लेखक पुनः कहता है कि उसकी प्रार्थना और विनय का कोई विशेष प्रभाव यात्रियों पर नहीं पड़ा। सहसा लेखक देखता है कि एक खाली बस हमारी ओर चली आ रही है और उस पर कंडक्टर भी बैठा हुआ है।
विशेष:
कठिन शब्दों के अर्थ
मन बैठ जाना = उदास हो जाना, निराश हो जाना। तस्करी = स्मग्लिंग–किसी प्रतिबन्धित वस्तु का दूसरे से देश में अवैध तरीके से चोरी छिपे लाना। भ्रष्टाचार = बुरा आचरण, बेईमानी। आरोप-प्रत्यारोप = एक-दूसरे पर दोष लगाना। अतीत = बीता हुआ समय। निरीह = बेचारा, निर्दोष। गह्वर = गुफा, खोह। मनीषियों = विद्वानों। माहौल = वातावरण। श्रमजीवी = मज़दूर। फरेब = धोखा। पर्याय = बदल। भीरू = डरपोक। आस्था = श्रद्धा, विश्वास। मनुष्य-निर्मित = मनुष्य द्वारा बनाई गई। त्रुटियों = गलतियों, कमियों। विधि-निषेध = कानून द्वारा निषिद्ध, यह करो वह न करो। साबित = प्रमाणित । कायदे = नियम। आलोड़ित = मथा हुआ। हताश = निराश। निकृष्ट = नीच। गुमराह = भटका हुआ। दरिद्रजनों = ग़रीबों। कोटि-कोटि = करोड़ों। सुविधा = आराम। पैमाना = स्तर। विधान = कानून। विकार = दोष। विस्तृत = बढ़ना, फैलना। दकियानूसी = पुराने विचारों का। धर्मभीरू = धार्मिक दृष्टि से डरपोक। संकोच = झिझक। पर्याप्त = काफी। आक्रोश = क्रोध। साबित करना = प्रमाणित करना। प्रतिष्ठा = सम्मान । पर्दाफाश करना == भेद खोलना। उद्घाटित करना = खोलकर सामने रखना। दोषोद्घाटन = दोषों को प्रकट करना। उजागर करना = प्रकट करना। गंतव्य = जहां पहुंचना/जाना हो। हिसाब बनाना = मन बनाना। कातर = व्याकुल, भयभीत।
क्या निराश हुआ जाए? जीवन परिचय
हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय लिखें।
हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म गाँव आरतदुबे का छपरा, जिला बलिया (उत्तर प्रदेश) में सन् 1907 में हुआ। संस्कृत विश्वविद्यालय काशी से शास्त्री की परीक्षा तथा हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त कर काशी विश्वविद्यालय तथा पंजाब विश्वविद्यालय में हिन्दी-विभागाध्यक्ष रहे। इन्हें ‘आलोकपर्व’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण अलंकार से सम्मानित किया गया था। इनका साहित्य मानवतावाद एवं भारतीय संस्कृति से युक्त है। सन् 1979 में दिल्ली में उनका निधन हो गया।
अशोक के फूल, विचार और वितर्क, कल्पलता, कुटज, आलोक पर्व इनके निबन्ध संग्रह हैं। चारूचन्द्रलेख, बाणभट्ट की आत्मकथा, अनामदास का पोथा इनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। सूर-साहित्य, हिन्दी-साहित्य की भूमिका इनके आलोचनात्मक ग्रन्थ हैं।
क्या निराश हुआ जाए? निबन्ध का सार
‘क्या निराश हुआ जाए ?’ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित विचारात्मक निबन्ध है, जिसमें लेखक ने देश की सामाजिक बुराइयों पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया है कि समाचार पत्रों को बुराइयों के साथ-साथ अच्छाइयों को भी उजागर करना चाहिए। लेखक का मन समाचार-पत्रों में ठगी, डकैती, चोरी, तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचार पढ़कर कभी-कभी बैठ जाता है। इन्हें पढ़कर लगता है कि देश में ईमानदार आदमी रह ही नहीं गया है। लेखक को एक बड़े आदमी ने एक बार कहा था कि जो आदमी कुछ नहीं करता वह अधिक सुखी है क्योंकि उसके किए काम में कोई दोष नहीं निकालता। लेखक को भारत की ऐसी हालत देखकर दुःख होता है किन्तु लेखक को विश्वास है कि हमारे महान् मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा। यह सच है कि इन दिनों कुछ ऐसा वातावरण बन रहा है कि ईमानदारी करके कमाने वाले मज़दूर पिस रहे हैं और धोखे का धन्धा करने वाले फल फूल रहे हैं।
लेखक का विचार है जो ऊपर से दिखाई देता है वह मनुष्य द्वारा ही बनाया गया है। मनुष्य सामाजिक नियमों को परिस्थिति अनुसार बदलता भी रहता है। इस बदलाव को देखकर निराश होना ठीक नहीं है। भारत वर्ष ने कभी भी सांसारिक वस्तुओं के संग्रह को महत्त्व नहीं दिया बल्कि उसने आत्मा को चरम और परम माना। लोभ-मोह आदि विकारों के वश में होना उसने कभी उचित नहीं माना। इन विचारों को संयम के बँधन से बाँधने का प्रयत्न किया। परन्तु भूख की, बीमार के लिए दवा की और भटके हुए को रास्ते पर लाने के उपायों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
लेखक कहते हैं कि व्यक्ति का चित्त हर समय आदर्शों पर नहीं चलता। मनुष्य ने जितने भी उन्नति के कानून बनाए उतने ही लोभ-मोह आदि विकार बढ़ते गए। आदर्शों का मजाक उड़ाया गया और संयम को दकियानूसी कहा गया। परन्तु इससे भारतीय आदर्श अधिक स्पष्ट और महान् दिखाई देने लगे।
भारतवर्ष में कानून को धर्म का दर्जा दिया गया किन्तु कानून और धर्म में अन्तर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता कानून को दिया जा सकता है। इसी कारण से धर्मभीरू कानून की कमियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते। भारतवर्ष में अब भी यह अनुभव किया जाता है कि धर्म कानून से बड़ी चीज़ है। भ्रष्टाचार आदि के प्रति लोगों का क्रोध यह सिद्ध करता है कि लोग इसे गलत समझते हैं। सैंकड़ों घटनाएँ आज भी घटती हैं जो लोक-चित्त में अच्छाई की भावना को जगाती हैं। लेखक ने ऐसी दो घटनाओं का उल्लेख किया जिनमें पहली रेलवे के एक टिकट बाबू की ईमानदारी और दूसरी एक बस कंडक्टर की मानवीयता को उजागर करने वाली घटना शामिल है। इन घटनाओं का उल्लेख करते हुए लेखक कहते हैं कि निराश होने की ज़रूरत नहीं है। भारत में अब भी सच्चाई और ईमानदारी मौजूद है।
Punjab State Board PSEB 11th Class Hindi Book Solutions Chapter 34 टूटते परिवेश Textbook Exercise Questions and Answers.
Hindi Guide for Class 11 PSEB टूटते परिवेश Textbook Questions and Answers
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें –
प्रश्न 1.
‘टूटते परिवेश’ एकांकी में एक मध्यवर्गीय परिवार को टूटते हुए दिखाकर प्राचीन और नवीन पीढ़ी के सम्बन्ध को व्यक्त किया है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
वैसे तो आदिकाल से ही प्राचीन और नवीन पीढ़ी में संघर्ष चला आ रहा है किन्तु बीसवीं शताब्दी तक आते-आते इस संघर्ष ने इतना भीषण रूप धारण कर लिया कि सदियों से चले आ रहे संयुक्त परिवार टूटने लगे। विशेषकर मध्यवर्गीय परिवारों पर इस टूटन की गाज सबसे अधिक गिरी। ‘टूटते परिवेश’ एकांकी में विष्णु प्रभाकर जी ने इसी समस्या को उठाया है। एकांकी में विश्वजीत और उसकी पत्नी करुणा पुरानी पीढ़ी तथा एकांकी के शेष सभी पात्र नई पीढ़ी के। एकांकी के आरम्भ में ही विश्वजीत की मंझली बेटी मनीषा के प्रस्तुत संवाद इसी संघर्ष को दर्शाता है-‘मैं पूछती हूँ कि मैं क्या आपको इतनी नादान दिखाई देती हूँ कि अपना भला-बुरा न सोच सकूँ ? जी नहीं, मैं अपना मार्ग आपको चुनने का अधिकार नहीं दे सकती, कभी नहीं दे सकती। मैं जा रही हूँ, वहाँ जहाँ मैं चाहती हूँ।’
अपने अधिकारों की आड़ में नई पीढ़ी धर्म, सभ्यता, संस्कृति, नैतिकता, सच्चरित्रता सभी का मज़ाक उड़ाती है। विवेक कहता है-पूजा में देर कितनी लगती है। बस पाँच मिनट …. और दीप्ति का यह कहना-‘गायत्री मंत्र ही पढ़ना है तो वह यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। फिर पूजा की ज़रूरत ही क्या है।’ नई पीढ़ी की यह बातें धर्म का मज़ाक उड़ाने के बराबर है।
पुरानी पीढ़ी के विश्वजीत चाहते हैं कि दीवाली के अवसर पर तो सारा परिवार मिल बैठ कर लक्ष्मी पूजन कर ले, किन्तु नई पीढ़ी के पास तो इस बात के लिए समय ही कहाँ हैं। वह क्लब में, होटल में दीवाली नाइट मनाने जा सकते। पिता के होटल में जाने से मना करने पर विवेक उसे गुलाम बनाना चाहता है। पुरानी पीढ़ी कहती है कि युग बीत जाता है, नैतिकता हमेशा जीवित रहती है।’ जबकि नई पीढ़ी करती है-‘जीवन भर नैतिकता की दुहाई देने के सिवा आपने किया ही क्या है।’ चरित्र के विषय में नई पीढ़ी का विचार है कि जिसने सचरित्रता का रास्ता छोड़ा उसी ने सफलता प्राप्त की। नई पीढ़ी नेता और पिता को एक छद्म के दो मुखौटे कहती है। नई पीढ़ी मुक्त यौनाचार में विश्वास रखती है। तो पुरानी पीढ़ी सचरित्रता को ही सब से बड़ा मानती है। पुरानी पीढ़ी सब कुछ हो जाने पर भी सन्तान का हित, उसका मोह नहीं त्यागती, किन्तु नई पीढ़ी स्वार्थ में अन्धी होकर अपने पिता, अपने परिवार तक की परवाह नहीं करती।
इस प्रकार एकांकीकार ने संयुक्त परिवार टूटने का सबसे बड़ा कारण नई पीढ़ी के स्वार्थान्ध हो जाने को बताया है। प्रस्तुत एकांकी में लेखक ने इसी संघर्ष का सजीव चित्रण किया है।
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प्रश्न 2.
‘टूटते परिवेश’ एकांकी का सार लिखें।
उत्तर:
टूटते परिवेश’ एकांकी के लेखक विष्णु प्रभाकर हैं। इसमें उन्होंने देश में नवयुवकों की बदल रही सोच को दिखाया है। ज्ञान-विज्ञान और नागरीकरण का जो प्रभाव हमारे धार्मिक, सामाजिक या नैतिक जीवन पर पड़ा है, उसे एक परिवार की जीवन स्थितियों के माध्यम से दिखाया गया है। इसमें पुरानी पीढ़ी नैतिकता, सिद्धान्त, त्याग, मानवीयता धर्म और चरित्र के परिवेश में रहना चाहती है और नई पीढ़ी उच्छंखल, अनैतिक, अव्यवहारिक तथा स्वच्छंद वातावरण में रहना चाहती है। इसी से परिवार में टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है और परिवार टूटकर बिखर जाता है। प्रस्तुत एकांकी तीन अंकों में बँटा हुआ है। किन्तु घटनास्थल एक ही है।
एकांकी की कथावस्तु एक मध्यवर्गीय परिवार की नई पुरानी दो पीढ़ियों के संघर्ष और परिवार टूटने की कहानी है। नाटक के आरम्भ में परिवार के मुखिया विश्वजीत और उसकी पत्नी करुणा तथा बेटियों मनीषा और दीप्ति का परिचय दिया गया है। दीवाली का शुभ दिन है और विश्वजीत चाहते हैं कि सारा परिवार मिल बैठकर पूजा करे किन्तु नई पीढ़ी तो पूजा अर्चना को एक ढोंग समझती है। यही नहीं नई पीढ़ी भारतीय सभ्यता का मज़ाक भी उड़ाती है। परिवार का कोई भी सदस्य पूजा करने घर नहीं पहुँचता। सब को अपनी-अपनी पड़ी है। सभी दीवाली घर पर नहीं होटलों और क्लबों में मनाने चले जाते हैं। . एकांकी के दूसरे अंक में नई और पुरानी पीढ़ी का संघर्ष उग्र रूप धारण कर लेता है। मनीषा किसी विधर्मी से विवाह कर लेती है। दीप्ति हिप्पी बनी आवारा घूमती है और सिगरेट भी पीने लगी है। विवेक, जो सिवाए अर्जियाँ लिखने के कोई दूसरा काम नहीं जानता, विद्रोह करने पर उतारू हो जाता है और उनका साथ देने की बात कहता है।
विश्वजीत परिवार के सदस्यों (नई पीढ़ी) के व्यवहार से दुःखी होकर आत्महत्या करने घर से निकल जाते हैं घर पर सारा परिवार एकत्र होता है किन्तु किसी के पास अपने परिवार के मुखिया को ढूँढ़ने का समय नहीं है। हर कोई न कोई बहाने बनाता है। किन्तु विश्वजीत स्वयं ही लौट आते हैं कि यह सोचकर कि आत्महत्या का अर्थ है मौत और मौत का एक दिन निश्चित है। तब आत्महत्या क्यों की जाए।
विश्वजीत के लौट आने पर उसका बड़ा बेटा शरद् तो उनसे हाल-चाल भी नहीं पूछता है और अपने काम की जल्दी बता कर चला जाता है। परिवार के दूसरे सदस्य भी चले जाते हैं और पुरानी पीढ़ी के लोग विश्वजीत और उसकी पत्नी अकेले रह जाते हैं इस आशा में कि उनके बच्चे एक-न-एक दिन लौट आएँगे।
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प्रश्न 3.
निम्नलिखित की चारित्रिक विशेषताएँ लिखें-
(क) विश्वजीत
(ख) विवेक
(ग) दीप्ति उत्तर
(क) विश्वजीत :
परिचय-विश्वजीत पुराने विचारों का व्यक्ति है, परिवार का मुखिया है। उसके तीन बेटे-दीपक, शरद् और विवेक हैं तथा तीन बेटियाँ-इन्दू, मनीषा और दीप्ति। उसकी आयु 60-70 वर्ष की है।
निराश पिता :
दीवाली का दिन है और विश्वजीत चाहता है कि परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा करें। तीन घंटे की प्रतीक्षा के पश्चात् भी कोई भी पूजा करने नहीं आता। जब उसकी पत्नी यह कहती है कि कोई नहीं आएगा तो विश्वजीत कहता है “कोई कैसे नहीं आएगा। घर के लोग ही न हों तो पूजा का क्या मतलब। यही तो मौके हैं, जब सब मिल बैठ पाते हैं।” मनीषा बिना बताए, बिना पूछे अपने किसी मित्र के साथ दीवाली मनाने जा चुकी होती है। इन्दू अपने पति के साथ दीवाली नाइट देखने जा रही है। दीपक दीवाली की शुभकामनाएँ देने मुख्यमन्त्री के घर गया है। रह गए दीप्ति और विवेक। उन्हें भी घर में होने वाली लक्ष्मी पूजा में कोई रुचि नहीं है। विश्वजीत के चेहरे की निराशा और उभर आती है, वह कहता है-“क्या हो गया है दुनिया को ? सब अकेले-अकेले अपने लिए ही जीना चाहते हैं। दूसरे की किसी को चिन्ता ही नहीं रह गई है। एक हमारा ज़माना था कि बड़ों की इजाजत के बिना कुछ कर ही न सकते थे।”
संतान से दुःखी :
विश्वजीत एक दुःखी पिता है, जिसकी सन्तान उसके कहने में नहीं है। विवेक के बेकार होने का उसे दुःख है। वह कहता है-“कुछ काम करता तो मेरी सहायता भी होती।” बेटों के व्यवहार से विश्वजीत को जो कष्ट होता है उसे वह निम्न शब्दों में व्यक्त करता है-“कैसा वक्त आ गया है ? एक हमारा ज़माना था, कितना प्यार, कितना मेल, एक कमाता दस खाते । हरेक एक-दूसरे से जुड़ने की कोशिश करता था और अब सब कुछ फट रहा है। सब एक-दूसरे से भागते हैं।”
उसकी पत्नी भी इस सम्बन्ध में व्यंग्य करती है “…… अपनी औलाद तो सम्भाले सम्भलती नहीं, बात करते हो भारत माता की।”
मानसिक असंतुलन :
विश्वजीत अपनी सन्तान के व्यवहार से दुःखी होकर जड़ हो जाता है। उसे जीवन में कोई रस नहीं दिखाई देता। गुस्से में आकर वह अपने आपको गालियाँ निकालने लगता है। हीन भावना और घोर निराशा का शिकार होकर वह आत्महत्या करने के लिए घर से बाहर चला जाता है, किन्तु यह सोचकर लौट आता है कि जब मौत का एक दिन निश्चित है तो आत्महत्या करके जान क्यों दी जाए। अन्तिम क्षण तक उसे बचा रखना चाहिए।
पिता का विश्वास :
जब विश्वजीत की पत्नी कहती है कि जब बच्चे उसे छोड़ कर चले गए तो वह भी बच्चों को छोड़ दे। तब विश्वजीत कहता है कि वह अपनी मजबूरियों का क्या करें। स्वभाव की, बच्चों को प्यार करने की. इनका बाप होने की तथा उनको खो देने पर यह आशा रखने की मजबूरी की एक दिन वे लौट आएंगे।
(ख) विवेक :
टूटते परिवेश एकांकी में विवेक पश्चिमी सभ्यता में रंगी नई युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। उसमें पुरानी पीढ़ी के प्रति घृणा है, बुजुर्गों के बनाए हुए नियमों का उल्लंघन करने में अपनी बहादुरी समझता है, उसके सामने न तो देश का हित है न ही अपने परिवार का। वह अपने माता-पिता की इज्जत भी नहीं करता। उसे अपनी सभ्यता, संस्कृति के प्रति कोई रुचि नहीं है। बस बात-बात में बड़ों से बहस करनी जानता है। नई पीढ़ी के बिगड़े हुए युवकों के सभी अवगुण उसमें मौजूद हैं।
परिचय :
विवेक, विश्वजीत का सब से छोटा बेटा है। उसकी आयु चौबीस वर्ष के लगभग हो गई है, किन्तु अभी तक बेकार है। बस अर्जियाँ लिखता रहता है। दूसरों को सफ़ाई की शिक्षा देने वाला विवेक अपनी अर्जियाँ तक भी सम्भाल कर नहीं रख सकता। वह घर में उन्हें इधर-उधर बिखेर देता है।
अव्यावहारिक :
विवेक एक ऐसा युवक है, जिसने किसी का आदर करना सीखा ही नहीं। उसे पुराने लोगों से चिढ़ है। चाहे वह उसका अपना बाप ही क्यों न हो। वह अपने बाप से कहता है-”पापा आप का ज़माना कभी का बीत गया। अब बीते जीवन की धड़कनें सुनने से अच्छा है कि वर्तमान की साँसों की रक्षा की जाए।” विवेक के पिता जब उसे दीवाली मनाने होटल पैनोरमा जाने से रोकते हैं तो वह उन्हें कहता है–“आप हमारे पिता हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। लेकिन इसलिए ही आप हमें रोक नहीं रहे हैं। आप हमें इसलिए रोक रहे हैं कि आप हमें पैसे देते हैं। पिता तो आप शरद्, इन्दू, मनीषा सभी के हैं। उन्हें रोक सके आप ? मैं आप पर आश्रित हूँ लेकिन गुलाम नहीं।”
सभ्यता संस्कृति से दूर :
विवेक एक ऐसा युवक है, जिसे अपनी सभ्यता-संस्कृति का कोई लिहाज़ नहीं, जो बड़ों का मज़ाक उड़ा सकता है वह भला धर्म और देवी-देवताओं का आदर कैसे कर सकता है। दीवाली के दिन होने वाली लक्ष्मी पूजा का मजाक उड़ाता हुआ वह कहता है-“पूजा में देर कितनी लगती है-पाँच मिनट। पंडित जी तो आए नहीं बस आप तीन बार गायत्री मंत्र पढ़ लीजिए।”
चरित्रहीन तथा कायर :
विवेक की दृष्टि में चरित्र का कोई महत्त्व नहीं। चरित्र हीनता ने उसे कायर भी बना दिया है। उसकी छोटी बहन हिप्पी बनी अनेक युवकों के साथ आवारागर्दी करती है; सिगरेट पीती है। उसकी मर्दानगी नहीं
जागती। उसकी बड़ी बहन एक विधर्मी से, बिना सूचना दिए, बिना आज्ञा विवाह कर लेती है, उसे जोश नहीं आता। उल्टे वह अपनी बड़ी बहन के कृत्य को उचित ठहराता है।
संयुक्त परिवार में विश्वास :
विवेक संयुक्त परिवार की प्रणाली में विश्वास नहीं रखता। जब उसके पिता कहते हैं कि देश और समाज के प्रति तुम्हारे भी कुछ कर्त्तव्य हैं तो विवेक कहता है-“कर्त्तव्य की दुहाई दे देकर आप लोगों ने सदा अपना स्वार्थ साधा है। संयुक्त परिवार में बाँधे रखा है। अब भी आप चाहते हैं कि हम आपकी वैसाखी बने रहें। नहीं पापा! वैसाखियों का युग अब बीत गया।”
घुटन का अनुभव :
विवेक को अपने घर में अपने देश में घुटन महसूस होती है। इस घुटन से छुटकारा पाने का साधन वह विदेश जाकर प्राप्त करना चाहता है।
इस प्रकार लेखक ने विवेक के चरित्र द्वारा आज की युवा पीढ़ी के उन युवकों का चरित्र प्रस्तुत किया है, जिन्हें आता-जाता कुछ नहीं, डींगें बड़ी-बड़ी हांकते हैं। हर बात में दोष निकालते हैं करते-धरते कुछ नहीं। जैसे थोथा चना बाजे घना।
(ग) दीप्ति :
परिचय :
दीप्ति नई पीढ़ी की उस युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो मध्यवर्गीय परिवारों की होती हुई भी अमीर लोगों की नकल करना अपना धर्म समझती है। आधुनिक बनने के चक्कर में वह चरित्र भी गँवा बैठती है।
नारी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग :
दीप्ति विश्वजीत की सब से छोटी लड़की है। मध्यवर्गीय परिवार में जन्म लेकर भी वह हिप्पी बनी घूमती है, ‘सिगरेट पीती है’, आवारागर्दी करती है। लड़कों से दोस्ती करती है और वयस्क होने से पूर्व ही नितिन नाम के लड़के से विवाह करने का निश्चय कर लेती है। अपने ईश्क की बात वह निधड़क होकर अपनी माँ से कहती है।
परम्पराओं से दूर :
दीप्ति अपने भाई की तरह त्योहार, धर्म, पूजा आदि में कोई रुचि नहीं रखती उसकी रुचि घर पर दीवाली की पूजा करने से अधिक क्लब या होटल में दीवाली नाइट मनाने की है। धर्म और पूजा का मज़ाक उड़ाना वह अपना अधिकार समझती है। वह कहती है-‘गायत्री मंत्र पढ़ना है तो यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। फिर पूजा की ज़रूरत ही क्या है।’ पूजा करने को वह लकीर पीटना कहती है। वह कहती है-‘चलो भैया लकीर पीटनी है, पीट लो जब तक पीटी जा सके।
अपनी बड़ी बहन मनीषा द्वारा किसी विधर्मी से विवाह करने को वह बुरा नहीं समझती बल्कि वह अपनी बहन को बधाई देने को तैयार हो जाती है।
आधुनिक विचारधारा का दुरुपयोग :
दीप्ति आवारागर्दी करने का भी अपना अधिकार समझती है। वह अपने भाई से कहती है-मैं कहाँ जाती हूँ ? कहाँ नहीं जाती ? तुम्हें इससे मतलब ? दीप्ति आधुनिकता की झोंक में अपनी माँ तक का भी निरादर कर देती है। अपनी माँ के चूल्हा चौंका करना, दूसरों का इन्तज़ार करना कर्त्तव्य नहीं आदत लगती है।
इस तरह हम देखते हैं कि दीप्ति आधुनिकता की झोंक में एक बिगड़ी हुई लड़की के रूप में हमारे सामने आती है जो न बड़ों की इज्जत करती है, न धर्म, सभ्यता, संस्कृति की कोई परवाह करती है।
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प्रश्न 4.
‘आज की नारी स्वतन्त्रता की सीमा लाँध रही है’ एकांकी के आधार पर उत्तर दें।
उत्तर:
टूटते परिवेश एकांकी में आधुनिकता की आड़ में नारी स्वतन्त्रता की सीमा लाँघती दिखाई गई है। एकांकी के आरम्भ में ही मनीषा का दर्शकों को सम्बोधन करके कहा गया निम्न कथन इसका एक उदाहरण है ………. मैं पछती हूँ कि मैं आपको इतनी नादान दिखाई देती हूँ कि अपना भला-बुरा न सोच सकूँ ? जी नहीं, मैं अपना मार्ग आपको चुनने का अधिकार नहीं दे सकती, नहीं दे सकती, कभी नहीं दे सकती। मैं जा रही हूँ, वहीं मैं जाना चाहती हूँ।” वही मनीषा अपने प्रेमी से विवाह रचा लेती है तो घरवालों को केवल फ़ोन पर सूचना भर देती है। वही मनीषा जब उसके पापा घर से गायब हो जाते हैं तो वह क्षण भर भी वहाँ ठहर नहीं सकती। नारी स्वातंत्र्य का वह अनुचित लाभ उठाती है।
इसी तरह का एकांकी का दूसरा पात्र दीप्ति का है जो अभी वयस्क नहीं हुई कि हिप्पी बनी घूमती है, आवारागर्दी करती है; सिगरेट पीती है। वह यह नहीं समझती कि वैश्या और देवी में कोई अन्तर होता है। दीप्ति को धार्मिक त्योहारों, धर्म में, पूजा इत्यादि में कोई रुचि नहीं है। दीवाली के दिन उसका ध्यान लक्ष्मी पूजा में न होकर क्लब या होटल में मनाई जा रही दीवाली नाइट की तरफ अधिक है। वह आधुनिकता की आँधी में बहती हुई राजनीतिक सिद्धान्तों से, धन का परिश्रम से, आनन्द का आत्मा से, ज्ञान का चरित्र से, व्यापार का नैतिकता से, विज्ञान का मानवीयता से और पूजा का त्याग से कोई सम्बन्ध नहीं मानती। दीवाली पूजा को वह लकीर पीटना कहती है। वह अभी वयस्क भी नहीं हुई कि अपने किसी प्रेमी से विवाह करने की बात अपनी माँ के मुँह पर ही कह देती है। इस पर अकड़ यह है कि अपनी माँ से कहती है………. फिर भी आप नाराज़ हैं तो मुझे इसकी चिन्ता नहीं। दीप्ति होस्टल में भी इसी उद्देश्य से भर्ती होती है कि उसे वहाँ हर तरह की आज़ादी मिल सके और कोई उसे रोकने-टोकने वाला न रहे।
इस प्रकार एकांकीकार ने नारी स्वातंत्र्य की आड़ में नारी को अपनी सीमाएँ लाँघते हुए दिखाया है।
(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें-
प्रश्न 1.
विवेक और दीप्ति अपने पिता विश्वजीत से किस प्रकार व्यवहार करते हैं ?
उत्तर:
विवेक और दीप्ति अपने पिता से अच्छा व्यवहार नहीं करते। दीवाली की पूजा वे पिता के कहने पर घर पर करने को तैयार नहीं। पिता की बातें उन्हें बुजुर्गाई भाषा लगती है। वे पिता से बात-बात में बहस करते हैं। विवेक अपने पिता का गुलाम नहीं बनना चाहता। उसे सचरित्रता से कोई सरोकार नहीं और दीप्ति हिप्पी बनना, सिगरेट पीना, आवारागर्दी करना अपना अधिकार समझती है। उसने नितिन से विवाह करने का निश्चय करके एक तरह से विश्वजीत के मुँह पर तमाचा मारा है।
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प्रश्न 2.
विवेक विदेश क्यों जाना चाहता है ?
उत्तर:
विवेक अपने पिता को विदेश जाने का कारण बताते हुए कहता है कि वह विदेश में जाकर लोगों से यह जानने का प्रयास करेगा कि नैतिकता क्या है ? कर्त्तव्य और अधिकार की परिभाषा क्या है ? फिर एक पुस्तक लिखेगा और ईश्वर ने चाहा तो कुछ कर भी सकेगा। किन्तु वास्तविकता यह थी कि संयुक्त परिवार में रहकर उसका दम घुटता है। उस घर से उसे बदबू आती है। वह इस यंत्रण से छटपटाना नहीं चाहता, उससे मुक्ति चाहता है। वह अपने मातापिता के प्रति कर्त्तव्य की वैसाखी नहीं बनना चाहता इसीलिए वह मुक्ति के नाम पर भागना चाहता है।
प्रश्न 3.
देश के भीतर एक और देश बनाए बैठे हैं हम। भीतर के देश का नाम है स्वार्थ, जो प्रान्त, प्रदेश, धर्म और जाति-इन रूपों में प्रकट होता है।’ दीप्ति के इस कथन से किस समस्या की ओर संकेत किया गया है ?
उत्तर:
प्रस्तुत पंक्तियों में देश में फैले भ्रष्टाचार की समस्या को उठाया गया है। दलबदलु विधानसभा के सदस्य अपने स्वार्थ के कारण दल बदलते हैं और नाम लेते हैं देश भक्ति का कि उन्होंने यह कार्य देश हित में किया है। स्वार्थ समाज के हर क्षेत्र में व्याप्त है चाहे वह धर्म हो या जाति । सत्ता में भी बना रहना राजनीतिज्ञों का स्वार्थ हो गया है।
प्रश्न 4.
‘स्वभाव की मजबूरी, बच्चों को प्यार करने की मजबूरी इन का बाप होने की मजबूरी, इनको खो देने पर यह आशा रखने की मजबूरी कि एक दिन लौट आएंगे।’ इन पंक्तियों में विश्वजीत का अन्तर्द्वन्द्व स्पष्ट उभर कर आया है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
विश्वजीत पुरानी पीढ़ी का है नयी पीढ़ी की उसकी सन्तान उसे छोड़कर चली गई है। परिवार टूट गया है अत: वह निराश होकर अपने को जीवित नहीं मानता है और अपनी गिनती मूर्यों में नहीं करता। उसकी पत्नी ने कहा भी था कि बच्चों के जाने के बाद वे स्वतन्त्र हो गए हैं, बच्चों के दायित्व से स्वतन्त्र हो गए हैं किन्तु विश्वजीत एक ऐसा बाप है, जिसे अपने बच्चों से मोह है, बच्चे उसे पुरानी पीढ़ी का मानते हैं जो उनके आधुनिक जीवन में फिट नहीं बैठता। परन्तु विश्वजीत पुरानी मान्यताओं के कारण मजबूर है कि एक दिन बच्चे उसे समझेंगे और उसे विश्वास है एक-न-दिन उसके बच्चे अवश्य लौट आएंगे। प्रस्तुत पंक्तियों में विश्वजीत के इस मानसिक द्वन्द्व की ओर संकेत किया गया है।
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प्रश्न 5.
इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने नई पीढ़ी को क्या सन्देश दिया है ?
उत्तर:
प्रस्तुत एकांकी के माध्यम से लेखक ने यह सन्देश दिया है कि बड़े बुजुर्ग नई पीढ़ी को जो कहते हैं वह उनके भले के लिए कहते हैं। घर के बुजुर्गों के पास जीवन का बहुत बड़ा अनुभव होता है इसीलिए आधुनिक विचारधारा को अपनाते समय पुरानी परम्पराओं को नहीं भूलना चाहिए। परम्पराएं हमारे अस्तित्व की जड़े हैं इसीलिए बड़ों का कहना मानना ही उनका धर्म होना चाहिए। हर काम में मन मर्जी नहीं करनी चाहिए और सबसे बड़ा सन्देश यह है कि नई पीढ़ी को कभी भी अपनी सभ्यता और संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए।
प्रश्न 6.
इस एकांकी का शीर्षक कहाँ तक सार्थक है ? स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘टूटते परिवेश’ एकांकी का शीर्षक अत्यन्त उपयुक्त, सार्थक और सटीक बन पड़ा है। एकांकी में नई और पुरानी पीढ़ी के बीच हो रहे संघर्ष को परिवारों के टूटने का कारण बताया।
पुरानी पीढ़ी के आदमी अपने स्वभाव को नई पीढ़ी के स्वभाव के साथ बदल नहीं पाते। इसीलिए दोनों में टकराहट होती है। विश्वजीत पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। वह नैतिकता, सिद्धान्त, त्याग, मानवीयता, धर्म तथा चरित्र निर्माण के परिवेश में रहना चाहता है जबकि उसकी संतान इस परिवेश से मुक्ति चाहती है। फलस्वरूप जीवन मूल्य ही बदल गए हैं। एकांकी के आरम्भ में ही मनीषा के कथन से इस तथ्य की ओर संकेत किया गया है। नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी का आदर नहीं करती है और उन्हें अपनी सभ्यता संस्कृति का सही ज्ञान नहीं है। ऐसे परिवेश टूटने से कैसे बच सकते हैं।
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PSEB 11th Class Hindi Guide टूटते परिवेश Important Questions and Answers
अति लघूत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
‘टूटते परिवेश’ किसकी रचना है ?
उत्तर:
टते परिवेश विष्णु प्रभाकर की रचना है।
प्रश्न 2.
‘टूटते परिवेश’ में लेखक ने क्या दर्शाया है ?
उत्तर:
टते परिवेश में लेखक ने देश में नवयुवकों की बदल रही सोच को दिखाया है।
प्रश्न 3.
विश्वजीत क्यों दुःखी था ?
उत्तर:
विश्वजीत परिवार के सदस्यों के व्यवहार से दुःखी था।
प्रश्न 4.
विश्वजीत के बड़े बेटे का क्या नाम है ?
उत्तर:
विश्वजीत के बड़े बेटे का नाम शरद है।
प्रश्न 5.
‘टूटते परिवेश’ किस प्रकार की विधा है ?
उत्तर:
एकांकी।
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प्रश्न 6.
‘टूटते परिवेश’ में किस सोच को दिखाया गया है ?
उत्तर:
नवयुवकों की बदल रही सोच को।
प्रश्न 7.
पुरानी पीढ़ी ……….. में रहना चाहती है।
उत्तर:
नैतिकता एवं मानवीयता के धर्म।
प्रश्न 8.
‘टूटते परिवेश’ एकांकी कितने अंकों में बंटी है ?
उत्तर:
तीन अंकों में।
प्रश्न 9.
नयी पीढ़ी भारतीय सभ्यता का ………. उड़ाती है।
उत्तर:
मज़ाक।
प्रश्न 10.
नयी पीढ़ी के लोग दीपावली मनाने कहाँ जाते हैं ?
उत्तर:
होटलों एवं क्लबों में।
प्रश्न 11.
एकांकी के दूसरे अंक में पुरानी पीढ़ी का संघर्ष कैसा रूप धारण कर लेता है ?
उत्तर:
उग्र रूप।
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प्रश्न 12.
दीप्ति क्या बनकर घूमती है ?
उत्तर:
हिप्पी।
प्रश्न 13.
मनीषा किसी ……….. से विवाह कर लेती है।
उत्तर:
विधर्मी।
‘प्रश्न 14.
दीप्ति ने क्या पीना शुरू कर दिया था ?
उत्तर:
सिगरेट।
प्रश्न 15.
विवेक क्या लिखता रहता था ?
उत्तर:
अर्जियाँ।
प्रश्न 16.
विश्वजीत क्या करने के लिए घर से निकल जाता है ?
उत्तर:
आत्महत्या करने के लिए।
प्रश्न 17.
पुरानी पीढ़ी किसे बड़ा मानती है ?
उत्तर:
सचरित्रता को।
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प्रश्न 18.
पुरानी पीढ़ी सब कुछ हो जाने पर भी क्या नहीं त्यागती है ?
उत्तर:
संतान का मोह।
प्रश्न 19.
संयुक्त परिवार के टूटने का सबसे बड़ा कारण क्या है ?
उत्तर:
स्वार्थ में अंधा होना।
प्रश्न 20.
विश्वजीत की पत्नी का क्या नाम था ?
उत्तर:
करुणा।
बहुविकल्पी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
‘टूटते परिवेश’ एकांकी के लेखक कौन हैं ?
(क) प्रेमचन्द
(ख) विष्णु प्रभाकर
(ग) देव प्रभाकर
(घ) मनु भंडारी।
उत्तर:
(ख) विष्णु प्रभाकर
प्रश्न 2.
इस एकांकी में लेखक ने किसकी बदलती सोच का चित्रण किया है ?
(क) लोगों की
(ख) नवयुवकों की
(ग) नेताओं की
(घ) लेखकों की।
उत्तर:
(ख) नवयुवकों की
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प्रश्न 3.
पुरानी पीढ़ी किसके परिवेश में रहना चाहती है ?
(क) नैतिकता के
(ख) त्याग के
(ग) मानवता के
(घ) इन सभी के।
उत्तर:
(घ) इन सभी के
प्रश्न 4.
नई पीढ़ी किसके परिवेश में रहना चाहती है ?
(क) अनैतिकता
(ख) उच्छृखलता
(ग) स्वच्छंदता
(घ) इन सभी के।
उत्तर:
(घ) इन सभी के।
कठिन शब्दों के अर्थ :
आलोकित करना-दिखाना। अर्जी-प्रार्थना-पत्र। बदइन्तजामी-ठीक से प्रबन्ध न होना। बुर्जुआई भाषा-सीधी और साफ़ बात कहना। इश्तहार-विज्ञापन। लकीर पीटना-बनी-बनाई परम्पराओं पर चलना। विध्वंस करना-नष्ट करना। सीलन-चिपचिपापन, गीला और सूखे के बीच की स्थिति। यन्त्रणाकष्ट, दुःख। निरर्थक-जिसका काई अर्थ न हो।
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टूटते परिवेश एकांकी का सार
टूटते परिवेश’ एकांकी के लेखक विष्णु प्रभाकर हैं। इसमें उन्होंने देश में नवयुवकों की बदल रही सोच को दिखाया है। ज्ञान-विज्ञान और नागरीकरण का जो प्रभाव हमारे धार्मिक, सामाजिक या नैतिक जीवन पर पड़ा है, उसे एक परिवार की जीवन स्थितियों के माध्यम से दिखाया गया है। इसमें पुरानी पीढ़ी नैतिकता, सिद्धान्त, त्याग, मानवीयता धर्म और चरित्र के परिवेश में रहना चाहती है और नई पीढ़ी उच्छंखल, अनैतिक, अव्यवहारिक तथा स्वच्छंद वातावरण में रहना चाहती है। इसी से परिवार में टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है और परिवार टूटकर बिखर जाता है। प्रस्तुत एकांकी तीन अंकों में बँटा हुआ है। किन्तु घटनास्थल एक ही है।
एकांकी की कथावस्तु एक मध्यवर्गीय परिवार की नई पुरानी दो पीढ़ियों के संघर्ष और परिवार टूटने की कहानी है। नाटक के आरम्भ में परिवार के मुखिया विश्वजीत और उसकी पत्नी करुणा तथा बेटियों मनीषा और दीप्ति का परिचय दिया गया है। दीवाली का शुभ दिन है और विश्वजीत चाहते हैं कि सारा परिवार मिल बैठकर पूजा करे किन्तु नई पीढ़ी तो पूजा अर्चना को एक ढोंग समझती है। यही नहीं नई पीढ़ी भारतीय सभ्यता का मज़ाक भी उड़ाती है। परिवार का कोई भी सदस्य पूजा करने घर नहीं पहुँचता। सब को अपनी-अपनी पड़ी है। सभी दीवाली घर पर नहीं होटलों और क्लबों में मनाने चले जाते हैं। . एकांकी के दूसरे अंक में नई और पुरानी पीढ़ी का संघर्ष उग्र रूप धारण कर लेता है। मनीषा किसी विधर्मी से विवाह कर लेती है। दीप्ति हिप्पी बनी आवारा घूमती है और सिगरेट भी पीने लगी है। विवेक, जो सिवाए अर्जियाँ लिखने के कोई दूसरा काम नहीं जानता, विद्रोह करने पर उतारू हो जाता है और उनका साथ देने की बात कहता है।
विश्वजीत परिवार के सदस्यों (नई पीढ़ी) के व्यवहार से दुःखी होकर आत्महत्या करने घर से निकल जाते हैं घर पर सारा परिवार एकत्र होता है किन्तु किसी के पास अपने परिवार के मुखिया को ढूँढ़ने का समय नहीं है। हर कोई न कोई बहाने बनाता है। किन्तु विश्वजीत स्वयं ही लौट आते हैं कि यह सोचकर कि आत्महत्या का अर्थ है मौत और मौत का एक दिन निश्चित है। तब आत्महत्या क्यों की जाए।
विश्वजीत के लौट आने पर उसका बड़ा बेटा शरद् तो उनसे हाल-चाल भी नहीं पूछता है और अपने काम की जल्दी बता कर चला जाता है। परिवार के दूसरे सदस्य भी चले जाते हैं और पुरानी पीढ़ी के लोग विश्वजीत और उसकी पत्नी अकेले रह जाते हैं इस आशा में कि उनके बच्चे एक-न-एक दिन लौट आएँगे।