PSEB 12th Class History Solutions Chapter 18 ऐंग्लो-सिख संबंध : 1800-1839

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 18 ऐंग्लो-सिख संबंध : 1800-1839 Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 18 ऐंग्लो-सिख संबंध : 1800-1839

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रथम चरण 1800-09 ई० (First Stage 1800-09 A.D.)

प्रश्न 1.
आलोचनात्मक दृष्टिकोण से 1800 से 1809 तक के अंग्रेज़-सिख संबंधों का अध्ययन कीजिए।
(Study the Anglo-Sikh relations from 1800 to 1809 from a critical point of view.)
अथवा
रणजीत सिंह के अंग्रेज़ों के साथ 1800 से 1809 ई० तक संबंधों का आलोचनात्मक विवरण दीजिए। (Critically examine Ranjit Singh’s relations with the British from 1800 to 1809.)
अथवा
अमृतसर की संधि जिन परिस्थितियों में हुई उनकी पड़ताल कीजिए। इसकी क्या धाराएँ.थीं तथा इससे महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों को क्या लाभ हुए ?
(Examine the circumstances leading to the Treaty of Amritsar in 1809. What were its terms and respective advantages derived from it by the Maharaja Ranjit Singh and the British from it ?)
अथवा
किन परिस्थितियों के कारण 1809 ई० में अमृतसर की संधि हुई ? इस संधि का महत्त्व बताइए।
(Discuss the circumstances leading to the Treaty of Amritsar (1809). Examine the significance of this treaty.)
अथवा
अमृतसर की संधि के बारे में आप क्या जानते हैं ? इस संधि के कारण महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ों को क्या लाभ प्राप्त हुए ?
(What do you know about the Treaty of Amritsar ? What was gained by Maharaja Ranjit Singh and the English by this Treaty ?)
उत्तर-
अंग्रेज़ दीर्घकाल से पंजाब की ओर ललचाई दृष्टि से देख रहे थे। दूसरी ओर रणजीत सिंह भी समस्त पंजाब पर अपना एक-छत्र राज कायम करना चाहता था। दोनों धड़ों की साम्राज्यवादी महत्त्वाकाँक्षाओं ने परस्पर संबंधों को महत्त्वपूर्ण ढंग से प्रभावित किया। 1800-09 ई० तक महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेज़ों के मध्य संबंधों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—

1. यूसुफ अली का मिशन 1800 ई० (Mission of Yusuf Ali 1800 A.D.)-महाराजा रणजीत सिंह ने अफ़गानिस्तान के शासक शाह जमान से मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित कर लिये थे। इस कारण अंग्रेज़ी सरकार को यह ख़तरा हो गया कि कहीं शाह जमान तथा महाराजा रणजीत सिंह मिलकर अंग्रेज़ों पर आक्रमण न कर दें। अंग्रेज़ों ने 1800 ई० में यूसुफ अली को अपना प्रतिनिधि बनाकर महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में भेजा। परंतु यह मिशन अभी मार्ग में ही था कि अफ़गानिस्तान में राजगद्दी के लिये गृह युद्ध शुरू हो गया। शाह जमान के आक्रमण की संभावना समाप्त हो जाने के कारण यूसुफ अली को वापस बुला लिया गया। इस कारण यह मिशन केवल एक सद्भावना मिशन तक ही सीमित रहा।

2. होलकर का पंजाब आना 1805 ई० (Holkar’s visit to Punjab 1805 A.D.)-1805 ई० में अंग्रेजों से पराजित होकर मराठा सरदार जसवंत राव होलकर महाराजा रणजीत सिंह से अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता लेने के लिये पंजाब आया। ऐसी स्थिति में महाराजा ने बहुत सूझ-बूझ से काम किया। उसने होलकर को सहायता देने से इंकार कर दिया। वह एक पराजित शासक की सहायता करके अंग्रेजों से टक्कर मोल नहीं लेना चाहता था।

3. लाहौर की संधि 1806 ई० (Treaty of Lahore 1806 A.D.)-क्योंकि महाराजा रणजीत सिंह ने होलकर की कोई सहायता नहीं की थी इस कारण अंग्रेज़ महाराजा रणजीत सिंह पर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने 1 जनवरी, 1806 ई० को लाहौर में महाराजा रणजीत सिंह के साथ एक संधि की। इस संधि के अनुसार महाराजा रणजीत सिंह ने यह स्वीकार किया कि वह होलकर की कोई सहायता नहीं करेगा तथा उसको अमृतसर में से शांतिपूर्वक निकल जाने की अनुमति देगा। अंग्रेज़ों ने यह माना कि वे महाराजा रणजीत सिंह के राज्य में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

4. नेपोलियन का ख़तरा (Napoleonic Danger)-इस समय अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। 1807 ई० में नेपोलियन ने रूस के साथ टिलसिट की संधि पर हस्ताक्षर किये। इस संधि के अनुसार रूस ने नेपोलियन को भारत पर आक्रमण करने के समय पूरा सहयोग देने का वचन दिया। नेपोलियन के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण भारत में अंग्रेज़ी सरकार घबरा गई। उसने स्थिति का सामना करने के लिए महाराजा रणजीत सिंह के साथ मित्रता करने का निर्णय किया।

5. मैटकॉफ का प्रथम मिशन (Matcalfe’s First Mission)-अंग्रेज़ों ने महाराजा रणजीत सिंह के साथ संधि करने के लिये चार्ल्स मैटकॉफ को भेजा। वह 11 सितंबर, 1808 ई० को महाराजा को खेमकरण में मिला। यहाँ उसने अंग्रेजी सरकार के प्रस्ताव महाराजा रणजीत सिंह के समक्ष रखे। संधि के बदले महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के समक्ष ये शर्त रखीं—

  • उसको सभी सिख रियासतों का शासक माना जाये।
  • काबुल के शासक के साथ युद्ध के समय अंग्रेज़ तटस्थ रहेंगे परंतु यह बातचीत स्थगित कर दी गई।

6. मैटकॉफ का द्वितीय मिशन (Metcalfe’s Second Mission)–नेपोलियन स्पेन की लड़ाई में उलझ गया था। इस कारण उसका भारत पर आक्रमण का ख़तरा टल गया। अब अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने का निर्णय किया। इस संबंध में चार्ल्स मैटकॉफ 10 दिसंबर, 1808 ई० को महाराजा रणजीत सिंह को अमृतसर में मिला। परंतु इस बातचीत का भी कोई परिणाम न निकला।

7. लड़ाई की तैयारियाँ (Warfare Preparations)-अंग्रेज़ों ने अपनी शर्ते मनवाने के लिए लड़ाई की तैयारियां शुरू कर दी। उन्होंने फरवरी, 1809 ई० में सर डेविड आक्टरलोनी के नेतृत्व में एक सेना लुधियाना में भेजी। महाराजा रणजीत सिंह ने भी दीवान मोहकम चंद को फिल्लौर में नियुक्त किया। किसी समय भी लड़ाई शुरू हो सकती थी परंतु अंतिम क्षणों में महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेज़ों की शर्तों को स्वीकार कर लिया।

8. अमृतसर की संधि 1809 ई० (Treaty of Amritsar 1809 A.D.)-महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों में 25 अप्रैल, 1809 ई० को अमृतसर की संधि हुई। इस संधि के अनुसार सतलुज नदी को महाराजा रणजीत सिंह के राज्य की पूर्वी सीमा स्वीकार कर लिया गया। अब वह सतलुज पार के प्रदेशों पर कोई आक्रमण नहीं करेगा। अंग्रेजों ने महाराजा को सतलुज के इस ओर का स्वतंत्र शासक स्वीकार कर लिया। दोनों ने एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का निर्णय किया। ऐसा करने की स्थिति में संधि को रद्द समझा जायेगा।

9. अमृतसर की संधि की रणजीत सिंह को हानियाँ (Disadvantages of Treaty of Amritsar to Ranjit Singh)-1809 ई० में हुई अमृतसर की संधि की रणजीत सिंह को निम्नलिखित हानियाँ हुईं–

  • इस संधि के चलते महाराजा रणजीत सिंह का संपूर्ण सिख कौम के महाराजा बनने का स्वप्न. धूल में मिल गया।
  • इस संधि के कारण महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिष्ठा को एक गहरा आघात लगा।
  • इस संधि के कारण अंग्रेजों के लिए पंजाब को हड़पना सुगम हो गया।
  • इस संधि के कारण महाराजा रणजीत सिंह सतलुज पार के क्षेत्रों पर अधिकार न कर सका। इस कारण उसे भारी क्षेत्रीय एवं आर्थिक हानि हुई।

10. अमृतसर की संधि के रणजीत सिंह को लाभ (Advantages of Treaty of Amritsar to Ranjit Singh)-1809 ई० में हुई अमृतसर की संधि के रणजीत सिंह को निम्नलिखित लाभ हुए—

  • महाराजा ने अंग्रेज़ों के साथ संधि करके पंजाब राज्य को नष्ट होने से बचा लिया। रणजीत सिंह अगर अंग्रेजों के साथ टक्कर लेता तो उसे अपना राज्य गंवाना पड़ता।
  • अमृतसर की संधि से महाराजा रणजीत सिंह के राज्य की पूर्वी सीमा सुरक्षित हो गई। परिणामस्वरूप महाराजा उत्तर पश्चिम के महत्त्वपूर्ण प्रदेशों जैसे अटक, मुलतान, कश्मीर तथा पेशावर को पंजाब राज्य में सम्मिलित करने में सफल रहा।

11. अमृतसर की संधि से अंग्रेजों को लाभ (Advantages of Treaty of Amritsar to the British)अमृतसर की संधि से अंग्रेज़ों को निम्नलिखित लाभ हुए–

  • अंग्रेज़ों ने बिना किसी नुकसान के ही रणजीत सिंह को पूर्व की ओर बढ़ने से रोक दिया।
  • अंग्रेजों को काफ़ी प्रादेशिक लाभ हुआ। उनका साम्राज्य जमुना नदी से लेकर सतलुज नदी तक फैल गया।
  • अंग्रेज़ अपना ध्यान भारत की अन्य शक्तियों का दमन करने में लगा सके।
  • पंजाब अफ़गानिस्तान तथा अंग्रेज़ों के मध्य एक मध्यवर्ती राज्य बन गया।
  • अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया के सम्मान में काफ़ी वृद्धि हुई।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 18 ऐंग्लो-सिख संबंध : 1800-1839

दूसरा चरण 1809-39 ई० (Second Stage 1809-39 A.D.)

प्रश्न 2.
1809 से 1839 तक ऐंग्लो-सिख संबंधों का वर्णन करो।
(Describe the Anglo-Sikh relations during 1809-1839.)
अथवा
1809 से 1839 तक महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के संबंधों की मुख्य विशेषताएँ बताएँ । (Give the main features of the relations between Maharaja Ranjit Singh and the British during 1809 to 1839 A.D.)
अथवा 1809 से 1839 ई० तक महाराजा रणजीत सिंह के संबंधों का आलोचनात्मक वर्णन करें। (Critically discuss the Anglo-Sikh relations from 1809 to 1839 A.D.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ों के मध्य 25 अप्रैल, 1809 ई० को अमृतसर की संधि हुई। इससे अंग्रेज़-सिख संबंधों में नए युग का सूत्रपात हुआ। इस संधि के बाद महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेज़ों के मध्य रहे संबंधों का आलोचनात्मक वर्णन निम्नलिखित है—

1. कुछ संदेह तथा अविश्वास का समय (Period of some Distrust and Suspicion)-अमृतसर की संधि के बावजूद अंग्रेज़ों तथा महाराजा के बीच 1809 ई० से 1812 ई० तक परस्पर संदेह तथा अविश्वास का वातावरण बना रहा। दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे की सैनिक तथा कूटनीतिक योजनाओं के बारे जानकारी प्राप्त करने के लिए अपने जासूस छोड़े हुए थे। अंग्रेजों ने लुधियाना में एक शक्तिशाली सैनिक छावनी स्थापित कर ली। दूसरी ओर महाराजा रणजीत सिंह ने भी फिल्लौर में एक किले का निर्माण करवाया।

2. संबंधों में सुधार (Improvement in the Relations)-धीरे-धीरे महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के बीच संदेह दूर होने शुरू हो गए। 1812 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने डेविड आक्टरलोनी को कुंवर खड़क सिंह के विवाह पर निमंत्रण दिया। लाहौर दरबार में पहुँचने पर उसका हार्दिक अभिनंदन किया गया। 1812 ई० से लेकर 1821 ई० तक के समय दौरान अंग्रेज़ों तथा महाराजा रणजीत सिंह ने एक दूसरे के मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया।

3. वदनी की समस्या (Problem of Wadni)-1822 ई० में वदनी गाँव के स्वामित्व के बारे अंग्रेज़ों तथा महाराजा रणजीत सिंह के परस्पर संबंधों में कुछ समय के लिये तनाव पैदा हो गया। अंग्रेजों ने वदनी में से महाराजा रणजीत सिंह की सेना को निकाल दिया। इस कारण महाराजा रणजीत सिंह को बहुत क्रोध आया परंतु उसने लड़ाई नहीं की।

4. संबंधों में सुधार (Cordiality Restored)-1823 ई० में वेड जो कि लुधियाना में अंग्रेजों का पुलीटीकल एजेंट था, के हस्तक्षेप करने पर वदनी का क्षेत्र महाराजा रणजीत सिंह को वापस सौंप दिया गया। महाराजा रणजीत सिंह ने भी 1824 ई० में जब नेपाल सरकार ने अंग्रेजों के विरुद्ध महाराजा रणजीत सिंह से सहायता माँगी तो उसने इंकार कर दिया। इसी तरह 1825 ई० में महाराजा ने भरतपुर के राजा को अंग्रेजों के विरुद्ध सहयोग न दिया। 1826 ई० में जब महाराजा रणजीत सिंह बीमार पड़ा तो अंग्रेज़ों ने इलाज के लिये डॉक्टर मरे को भेजा। इस तरह दोनों के संबंधों में पुनः सुधार होना शुरू हो गया।

5. सिंध का प्रश्न (Question of Sind)-सिंध का क्षेत्र व्यापारिक तथा भौगोलिक पक्ष से बहुत महत्त्वपूर्ण था। 1831 ई० में अंग्रेजों ने अलैग्जेंडर बर्नज को संधि के बारे जानकारी प्राप्त करने के लिये भेजा। महाराजा रणजीत सिंह को कोई संदेह न हो इसलिये उसको रोपड़ में गवर्नर-जनरल लॉर्ड बैंटिंक के साथ एक मुलाकात के लिये निमंत्रण भेजा गया। यह मुलाकात 26 अक्तूबर, 1831 ई० को हुई। अंग्रेजों ने बड़ी चतुराई से महाराजा रणजीत सिंह को बातचीत में लगाये रखा। दूसरी ओर अंग्रेज़ सिंध के साथ एक व्यापारिक संधि करने में सफल हुए। इस कारण महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के बीच पुनः तनाव उत्पन्न हो गया।

6. शिकारपुर का प्रश्न (Question of Shikarpur)-शिकारपुर के प्रश्न पर महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के बीच तनाव बढ़ गया। 1836 ई० में जब मजारिस नामक एक कबीले. को महाराजा रणजीत सिंह ने पराजित किया तथा शिकारपुर पर अधिकार कर लिया उस समय वेड के नेतृत्व में एक अंग्रेज़ी सेना भी वहाँ पहुँच गई। महाराजा रणजीत सिंह पीछे हट गया क्योंकि वह अंग्रेजों के साथ लड़ाई मोल नहीं लेना चाहता था।

7. फिरोजपुर का प्रश्न (Question of Ferozepur)-फिरोजपुर शहर पर महाराजा रणजीत सिंह का अधिकार था परंतु 1835 ई० में अंग्रेजों ने इस पर कब्जा कर लिया था। 1838 ई० में अंग्रेजों ने यहाँ एक शक्तिशाली सैनिक छावनी बना ली। यद्यपि महाराजा को इस बात पर क्रोध आया परंतु अंग्रेजों ने उसकी कोई परवाह न की। .

8. त्रिपक्षीय संधि (Tripartite Treaty)-1837 ई० में रूस बहुत तीव्रता के साथ एशिया की ओर बढ़ रहा था। अंग्रेजों को यह ख़तरा हो गया कि कहीं रूस अफ़गानिस्तान के मार्ग से भारत पर आक्रमण न कर दे। इस आक्रमण को रोकने के लिए तथा अफ़गानिस्तान के शासक दोस्त मुहम्मद खाँ को गद्दी से उतारने के लिए अंग्रेजों ने अफ़गानिस्तान के भूतपूर्व शासक शाह शुजा तथा महाराजा रणजीत सिंह के साथ 26 जून, 1838 ई० को एक त्रिपक्षीय समझौता किया। अंग्रेज़ों ने महाराजा रणजीत सिंह से इस समझौते पर जबरन हस्ताक्षर करवाये।
त्रिपक्षीय संधि की मुख्य शर्ते थीं-

  • शाह शुजा को अंग्रेज़ों एवं महाराजा रणजीत सिंह के सहयोग से अफ़गानिस्तान का सम्राट् बनाया जाएगा।
  • शाह शुजा ने महाराजा रणजीत सिंह द्वारा विजित किए समस्त अफ़गान क्षेत्रों पर उसका अधिकार मान लिया।
  • सिंध के संबंध में अंग्रेज़ों व महाराजा रणजीत सिंह के मध्य जो निर्णय होंगे, शाह शुज़ा ने उन्हें मानने का वचन दिया।
  • शाह शुज़ा अंग्रेज़ों एवं सिखों की आज्ञा लिए बिना विश्व की किसी अन्य शक्ति के साथ संबंध स्थापित नहीं करेगा।
  • एक देश का शत्रु दूसरे दो देशों का भी शत्रु माना जाएगा।
  • शाह शुजा को सिंहासन पर बिठाने के लिए महाराजा रणजीत सिंह 5,000 सैनिकों सहित सहायता 2करेगा तथा शाह शुजा इसके स्थान पर महाराजा को 2 लाख रुपए देगा।

त्रिपक्षीय संधि रणजीत सिंह की एक और कूटनीतिक पराजय थी। इस संधि ने रणजीत सिंह की सिंध एवं शिकारपुर पर अधिकार करने की सभी इच्छाओं पर पानी फेर दिया था। महाराजा रणजीत सिंह की 27 जून, 1839 ई० को मृत्यु हो गई।

महाराजा रणजीत सिंह की अंग्रेजों के प्रति नीति की समीक्षा (An Estimate of Maharaja Ranjit Singh’s Policy towards the British)
महाराजा रणजीत सिंह के अंग्रेजों के साथ कैसे संबंध थे इस बारे में इतिहासकारों में मतभेद पाये जाते हैं। कछ इतिहासकारों का विचार है कि महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के साथ लड़ाई न करके अपनी सूझ-बूझ तथा दूरदर्शिता का परिचय दिया। महाराजा रणजीत सिंह अंग्रेजों की शक्ति से अच्छी तरह अवगत था। वह अपने से कई गुना शक्तिशाली शत्रु के साथ टक्कर लेकर उभरते हुए खालसा राज्य को नष्ट होते नहीं देखना चाहता था। दूसरे, अंग्रेजों के साथ मित्रता के कारण ही महाराजा रणजीत सिंह उत्तर-पश्चिम की ओर सिख साम्राज्य का विस्तार कर सका।

दूसरी ओर कुछ अन्य इतिहासकारों ने इस नीति की कड़ी आलोचना की है। उनका विचार है कि महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों के समक्ष सदैव झुकने की नीति अपनाई। 1809 ई० की अमृतसर की संधि द्वारा महाराजा रणजीत सिंह को सतलुज पार के प्रदेशों में से अपनी सेनाएँ निकालने के लिये विवश कर दिया गया था। सिंध, शिकारपुर तथा फिरोज़पुर के मामलों में महाराजा रणजीत सिंह का भारी अपमान किया गया था। त्रि-पक्षीय संधि भी महाराजा रणजीत सिंह पर जबरन थोपी गई थी। अत्याचारी के समक्ष सदैव झुकते रहना कभी उचित या योग्य नहीं कहा जा सकता। डॉक्टर एन०. के० सिन्हा के अनुसार,
“उसके हृदय के अंदर भी शायद वही चिंता थी जो प्रत्येक निर्माता को उत्तराधिकार में मिलती है । अपने हाथों से निर्मित साम्राज्य को वह युद्ध के ख़तरों के समक्ष नंगा करने से घबराता था तथा इसलिए उसने झुक जाने, झुक जाने तथा झुक जाने की नीति अपनाई।”1

1. “Perhaps with the solicitude inherent in all builders, he feared to expose the kingdom, he had created, to the risks of war and chose instead the policy of yielding, yielding and yielding.” Dr. N.K. Sinha, Ranjit Singh (Calcutta : 1975) p. 137.

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प्रश्न 3.
1800 से 1839 ई० तक रणजीत सिंह के अंग्रेजों के साथ संबंधों का विवरण दीजिए।
(Discuss the relations of Ranjit Singh with the British from 1800 to 1839.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ों के मध्य 25 अप्रैल, 1809 ई० को अमृतसर की संधि हुई। इससे अंग्रेज़-सिख संबंधों में नए युग का सूत्रपात हुआ। इस संधि के बाद महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेज़ों के मध्य रहे संबंधों का आलोचनात्मक वर्णन निम्नलिखित है—

1. कुछ संदेह तथा अविश्वास का समय (Period of some Distrust and Suspicion)-अमृतसर की संधि के बावजूद अंग्रेज़ों तथा महाराजा के बीच 1809 ई० से 1812 ई० तक परस्पर संदेह तथा अविश्वास का वातावरण बना रहा। दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे की सैनिक तथा कूटनीतिक योजनाओं के बारे जानकारी प्राप्त करने के लिए अपने जासूस छोड़े हुए थे। अंग्रेजों ने लुधियाना में एक शक्तिशाली सैनिक छावनी स्थापित कर ली। दूसरी ओर महाराजा रणजीत सिंह ने भी फिल्लौर में एक किले का निर्माण करवाया।

2. संबंधों में सुधार (Improvement in the Relations)-धीरे-धीरे महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के बीच संदेह दूर होने शुरू हो गए। 1812 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने डेविड आक्टरलोनी को कुंवर खड़क सिंह के विवाह पर निमंत्रण दिया। लाहौर दरबार में पहुँचने पर उसका हार्दिक अभिनंदन किया गया। 1812 ई० से लेकर 1821 ई० तक के समय दौरान अंग्रेज़ों तथा महाराजा रणजीत सिंह ने एक दूसरे के मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया।

3. वदनी की समस्या (Problem of Wadni)-1822 ई० में वदनी गाँव के स्वामित्व के बारे अंग्रेज़ों तथा महाराजा रणजीत सिंह के परस्पर संबंधों में कुछ समय के लिये तनाव पैदा हो गया। अंग्रेजों ने वदनी में से महाराजा रणजीत सिंह की सेना को निकाल दिया। इस कारण महाराजा रणजीत सिंह को बहुत क्रोध आया परंतु उसने लड़ाई नहीं की।

4. संबंधों में सुधार (Cordiality Restored)-1823 ई० में वेड जो कि लुधियाना में अंग्रेजों का पुलीटीकल एजेंट था, के हस्तक्षेप करने पर वदनी का क्षेत्र महाराजा रणजीत सिंह को वापस सौंप दिया गया। महाराजा रणजीत सिंह ने भी 1824 ई० में जब नेपाल सरकार ने अंग्रेजों के विरुद्ध महाराजा रणजीत सिंह से सहायता माँगी तो उसने इंकार कर दिया। इसी तरह 1825 ई० में महाराजा ने भरतपुर के राजा को अंग्रेजों के विरुद्ध सहयोग न दिया। 1826 ई० में जब महाराजा रणजीत सिंह बीमार पड़ा तो अंग्रेज़ों ने इलाज के लिये डॉक्टर मरे को भेजा। इस तरह दोनों के संबंधों में पुनः सुधार होना शुरू हो गया।

5. सिंध का प्रश्न (Question of Sind)-सिंध का क्षेत्र व्यापारिक तथा भौगोलिक पक्ष से बहुत महत्त्वपूर्ण था। 1831 ई० में अंग्रेजों ने अलैग्जेंडर बर्नज को संधि के बारे जानकारी प्राप्त करने के लिये भेजा। महाराजा रणजीत सिंह को कोई संदेह न हो इसलिये उसको रोपड़ में गवर्नर-जनरल लॉर्ड बैंटिंक के साथ एक मुलाकात के लिये निमंत्रण भेजा गया। यह मुलाकात 26 अक्तूबर, 1831 ई० को हुई। अंग्रेजों ने बड़ी चतुराई से महाराजा रणजीत सिंह को बातचीत में लगाये रखा। दूसरी ओर अंग्रेज़ सिंध के साथ एक व्यापारिक संधि करने में सफल हुए। इस कारण महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के बीच पुनः तनाव उत्पन्न हो गया।

6. शिकारपुर का प्रश्न (Question of Shikarpur)-शिकारपुर के प्रश्न पर महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के बीच तनाव बढ़ गया। 1836 ई० में जब मजारिस नामक एक कबीले. को महाराजा रणजीत सिंह ने पराजित किया तथा शिकारपुर पर अधिकार कर लिया उस समय वेड के नेतृत्व में एक अंग्रेज़ी सेना भी वहाँ पहुँच गई। महाराजा रणजीत सिंह पीछे हट गया क्योंकि वह अंग्रेजों के साथ लड़ाई मोल नहीं लेना चाहता था।

7. फिरोजपुर का प्रश्न (Question of Ferozepur)-फिरोजपुर शहर पर महाराजा रणजीत सिंह का अधिकार था परंतु 1835 ई० में अंग्रेजों ने इस पर कब्जा कर लिया था। 1838 ई० में अंग्रेजों ने यहाँ एक शक्तिशाली सैनिक छावनी बना ली। यद्यपि महाराजा को इस बात पर क्रोध आया परंतु अंग्रेजों ने उसकी कोई परवाह न की। .

8. त्रिपक्षीय संधि (Tripartite Treaty)-1837 ई० में रूस बहुत तीव्रता के साथ एशिया की ओर बढ़ रहा था। अंग्रेजों को यह ख़तरा हो गया कि कहीं रूस अफ़गानिस्तान के मार्ग से भारत पर आक्रमण न कर दे। इस आक्रमण को रोकने के लिए तथा अफ़गानिस्तान के शासक दोस्त मुहम्मद खाँ को गद्दी से उतारने के लिए अंग्रेजों ने अफ़गानिस्तान के भूतपूर्व शासक शाह शुजा तथा महाराजा रणजीत सिंह के साथ 26 जून, 1838 ई० को एक त्रिपक्षीय समझौता किया। अंग्रेज़ों ने महाराजा रणजीत सिंह से इस समझौते पर जबरन हस्ताक्षर करवाये।
त्रिपक्षीय संधि की मुख्य शर्ते थीं-

  • शाह शुजा को अंग्रेज़ों एवं महाराजा रणजीत सिंह के सहयोग से अफ़गानिस्तान का सम्राट् बनाया जाएगा।
  • शाह शुजा ने महाराजा रणजीत सिंह द्वारा विजित किए समस्त अफ़गान क्षेत्रों पर उसका अधिकार मान लिया।
  • सिंध के संबंध में अंग्रेज़ों व महाराजा रणजीत सिंह के मध्य जो निर्णय होंगे, शाह शुज़ा ने उन्हें मानने का वचन दिया।
  • शाह शुज़ा अंग्रेज़ों एवं सिखों की आज्ञा लिए बिना विश्व की किसी अन्य शक्ति के साथ संबंध स्थापित नहीं करेगा।
  • एक देश का शत्रु दूसरे दो देशों का भी शत्रु माना जाएगा।
  • शाह शुजा को सिंहासन पर बिठाने के लिए महाराजा रणजीत सिंह 5,000 सैनिकों सहित सहायता 2करेगा तथा शाह शुजा इसके स्थान पर महाराजा को 2 लाख रुपए देगा।

त्रिपक्षीय संधि रणजीत सिंह की एक और कूटनीतिक पराजय थी। इस संधि ने रणजीत सिंह की सिंध एवं शिकारपुर पर अधिकार करने की सभी इच्छाओं पर पानी फेर दिया था। महाराजा रणजीत सिंह की 27 जून, 1839 ई० को मृत्यु हो गई।

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संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
जसवंत राव होल्कर कौन था ? महाराजा रणजीत सिंह ने उसकी सहायता क्यों न की ? (Who was Jaswant Rao Holkar ? Why Maharaja Ranjit Singh did not help him ?)
उत्तर-
जसवंत राव होल्कर मराठा सरदार था। वह 1805 ई० में महाराजा रणजीत सिंह से अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता लेने के लिए अमृतसर पहुँचा। महाराजा रणजीत सिंह ने होल्कर की निम्नलिखित कारणों से कोई सहायतान की-प्रथम, महाराजा रणजीत सिंह अंग्रेज़ी सेना के अनुशासन को देखकर चकित रह गया था। द्वितीय, अमृतसर में हुए गुरमत्ता में निर्णय लिया गया कि जसवंत राव होल्कर की सहायता लाहौर राज्य के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकती है। तृतीय, महाराजा रणजीत सिंह पंजाब को युद्ध का क्षेत्र नहीं बनाना चाहता था। उसका राज्य अभी बहुत छोटा था तथा यह युद्ध नए उदय हो रहे सिख साम्राज्य के लिए हानिप्रद प्रमाणित हो सकता था।

प्रश्न 2.
अमृतसर की संधि की परिस्थितियों का वर्णन करें।
(Describe the circumstances leading to the Treaty of Amritsar.)
अथवा
अमृतसर की संधि की परिस्थितियों का अध्ययन करें।
(Study the circumstances leading to the Treaty of Amritsar.)
अथवा
1800 से 1809 ई० तक के अंग्रेज़-सिख संबंधों का विवरण दीजिए।
(Give an account of Anglo-Sikh relations from 1800 to 1809.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह पंजाब की सभी सिख रियासतों पर अपना अधिकार करना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने 1806 ई० और 1807 ई० में मालवा प्रदेश पर आक्रमण किए। उसने कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। सितंबर, 1808 ई० में रणजीत सिंह तथा चार्ल्स मैटकॉफ के मध्य वार्ता असफल रही। रणजीत सिंह ने दिसंबर, 1808 ई० में मालवा पर तीसरी बार आक्रमण किया। अब अंग्रेजों ने रणजीत सिंह से अपनी शर्ते मनवाने के लिए युद्ध की तैयारियाँ आरंभ कर दी। परिणामस्वरूप 25 अप्रैल, 1809 ई० को रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य अमृतसर की संधि पर हस्ताक्षर हो गए।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 18 ऐंग्लो-सिख संबंध : 1800-1839

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के बीच हुई अमृतसर की संधि की महत्ता बताएँ।
(Describe the significance of the Treaty of Amritsar signed between Maharaja Ranjit Singh and the English.) .
अथवा
अमृतसर की संधि (1809) का ऐतिहासिक महत्त्व क्या था ? (What was the historical significance of the Treaty of Amritsar (1809)?]
अथवा
अमृतसर संधि की शर्ते एवं महत्त्व लिखें। (Write the main clauses and importance of the Treaty of Amritsar.)
अथवा
अमृतसर की संधि का क्या महत्त्व था?
(What was the significance of the Treaty of Amritsar ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ों के मध्य हुई 25 अप्रैल, 1809 ई० को अमृतसर की संधि का पंजाब के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस संधि द्वारा रणजीत सिंह ने सतलुज नदी को राज्य की पूर्वी सीमा मान लिया। परिणामस्वरूप महाराजा रणजीत सिंह का सभी सिख रियासतों का महाराजा बनने का स्वप्न सदा के लिए टूट गया। रणजीत सिंह को न केवल राजनीतिक अपितु आर्थिक क्षति भी हुई। परंतु इस संधि द्वारा महाराजा अपने नव-निर्मित राज्य को अंग्रेजों से बचाने में सफल हो गया। यह संधि अंग्रेजों की एक बड़ी कूटनीतिक विजय थी।

प्रश्न 4.
अमृतसर की संधि की तीन शर्ते लिखें।
(What were the three conditions of the Treaty of Amritsar ?)
उत्तर-

  1. अंग्रेजी सरकार और लाहौर दरबार के मध्य मित्रता रहेगी।
  2. अंग्रेज़ी सरकार का सतलुज दरिया के उत्तर और महाराजा के प्रदेशों और प्रजा के साथ कोई संबंध नहीं रखेगी।
  3. महाराजा सतलुज दरिया के बाएँ तरफ के क्षेत्र जोकि उसके अधिकार में है उतनी ही सेना रखेगा जोकि उसके आंतरिक प्रबंध के लिए अनिवार्य है।

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प्रश्न 5.
सिंध के प्रश्न पर महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य तनाव क्यों उत्पन्न हो गया ?
(Why was tension created between Maharaja Ranjit Singh and the English over Sind tangle ?)
उत्तर-
सिंध का क्षेत्र व्यापारिक तथा भौगोलिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। इसलिए महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ दोनों इस क्षेत्र पर अधिकार करना चाहते थे। अंग्रेजों ने सिंध के साथ संधि करने के लिए कर्नल पोटिंगर को भेजा। वह 1832 ई० में सिंध के साथ एक व्यापारिक संधि करने में सफल रहा। इस कारण यह संधि अंग्रेज़ों के लिए बड़ी लाभदायक सिद्ध हुई। इस कारण अंग्रेजों तथा रणजीत सिंह के मध्य पुनः तनाव उत्पन्न हो गया। 1838 ई० में अंग्रेजों ने सिंध के अमीरों के साथ एक अन्य संधि कर ली। महाराजा रणजीत सिंह यह सहन करने को तैयार न था किंतु उसने अंग्रेजों के विरुद्ध कोई कदम उठाने का साहस न किया।

प्रश्न 6.
फिरोजपुर के प्रश्न पर महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य तनाव क्यों उत्पन्न हो गया ?
(Why was tension created between Maharaja Ranjit Singh and the English over Ferozepur tangle ?)
उत्तर-
अंग्रेज़ फिरोज़पुर जैसे महत्त्वपूर्ण नगर को अपने अधिकार में लेना चाहते थे। यहाँ से अंग्रेज़ रणजीत सिंह के राज्य की गतिविधियों के संबंध में काफ़ी जानकारी प्राप्त कर सकते थे। इसके अतिरिक्त पंजाब में घेराव डालने के लिए फिरोज़पुर पर अधिकार करना आवश्यक था। इसलिए 1835 ई० में अंग्रेजों ने बलपूर्वक फिरोजपुर पर अधिकार कर लिया। रणजीत सिंह ने अंग्रेजों द्वारा फिरोजपुर पर अधिकार करने तथा यहाँ छावनी बनाए जाने के कारण चाहे बहुत क्रोध किया, किंतु अंग्रेजों ने इसकी कोई परवाह न की।

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प्रश्न 7.
त्रिपक्षीय संधि पर अपने विचार व्यक्त करो।
(Give your own opinion on Tri-partite Treaty.)
अथवा
त्रिपक्षीय संधि तथा इसके महत्त्व पर एक टिप्पणी लिखें।
(Write a brief note on Tri-partite Treaty and its significance.)
उत्तर-
1837 ई० में रूस बड़ी तेजी से भारत की ओर बढ़ रहा था। अफ़गानिस्तान का शासक दोस्त मुहम्मद खाँ यह चाहता था कि अंग्रेज़ पेशावर का क्षेत्र रणजीत सिंह से लेकर उसे दे दें। अंग्रेज़ ऐसा नहीं कर सकते थे। परिणामस्वरूप उन्होंने अफ़गानिस्तान के भूतपूर्व शासक शाह शुजा से वार्ता आरंभ कर दी। 26 जून, 1838 ई० को अंग्रेजों, शाह शुजा तथा महाराजा रणजीत सिंह के मध्य एक त्रिपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि के अनुसार शाह शुजा को अफ़गानिस्तान का शासक बनाने का निर्णय किया गया। महाराजा रणजीत सिंह इस संधि में शामिल नहीं होना चाहता था, किंतु अंग्रेजों ने उसे ऐसा करने पर बाध्य किया।

प्रश्न 8.
1809 से 1839 ई० तक के अंग्रेज़-सिख संबंधों का विवरण दीजिए।
(Give an account of Agnlo-Sikh relations from 1809 to 1839.)
उत्तर-
1809 से 1839 ई० तक का काल अंग्रेज़-सिख संबंधों में विशेष स्थान रखता है। 1809 ई० में महाराजा रणजीत सिंह एवं अंग्रेजों के मध्य अमृतसर की संधि हुई। यह महाराजा रणजीत सिंह की अपेक्षा अंग्रेजों के लिए अधिक लाभकारी सिद्ध हुई। इस संधि के कारण महाराजा रणजीत सिंह का सभी सिख रियासतों का महाराजा बनने का स्वप्न चकनाचूर हो गया, किंतु उसने खालसा राज्य को नष्ट होने से बचा लिया। 1809 से 1830 ई० तक दोनों शक्तियों के मध्य कभी मित्रता तथा कभी तनाव स्थापित हो जाता। 1830 से 1839 ई० में दोनों शक्तियों के संबंधों में पुनः तनाव उत्पन्न हो गया।

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प्रश्न 9.
महाराजा रणजीत सिंह के अंग्रेजों के साथ संबंधों के स्वरूप का वर्णन करें। (Discuss the nature of Maharaja Ranjit Singh’s relation with the British.)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह की अंग्रेजों के सामने झुकने की नीति के बारे में अपने विचार लिखो। (Comment on Maharaja Ranjit Singh’s policy of yielding towards the British.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह ने सदैव अंग्रेजों के सामने झुकने की नीति अपनाई। अंग्रेजों ने उसे 1809 ई० में अमृतसर की संधि के लिए बाध्य किया। इस संधि के साथ महाराजा रणजीत सिंह के सभी सिखों का महाराजा बनने की आशा मिट्टी में मिल गई। 1822 ई० अंग्रेजों ने सदा कौर के कहने पर वदनी से रणजीत सिंह की सेनाओं को वहाँ से निकाल दिया। 1832 ई० में अंग्रेजों ने रणजीत सिंह को धोखे में रख कर संधि से व्यापारिक संधि कर ली। 1838 ई० में अंग्रेजों ने फिरोजपुर में एक छावनी स्थापित करके महाराजा रणजीत सिंह की शक्ति को एक बार फिर ललकारा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न – (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
अंग्रेज़ों तथा रणजीत सिंह का पहला संपर्क कब हुआ ?
उत्तर-
1800 ई०।

प्रश्न 2.
यूसफ अली कौन था ?
उत्तर-
अंग्रेजों ने यूसफ अली को 1800 ई० में लाहौर दरबार में अपना दूत बनाकर भेजा था।

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प्रश्न 3.
मराठों का नेता जसवंत राव होल्कर कब पंजाब आया था ?
उत्तर-
1805 ई०।

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य प्रथम मित्रतापूर्वक सन्धि कब हुई ?
उत्तर-
1806 ई०।

प्रश्न 5.
1806 ई० की लाहौर की संधि की कोई एक मुख्य शर्त बताओ।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह होल्कर की कोई सहायता नहीं करेगा।

प्रश्न 6.
चार्ल्स मैटकॉफ कौन था ?
उत्तर-
वह एक अंग्रेज अधिकारी था।

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प्रश्न 7.
चार्ल्स मैटकॉफ तथा महाराजा रणजीत सिंह के मध्य कितनी बार भेंट हुई ?
उत्तर-
दो।

प्रश्न 8.
महाराजा रणजीत सिंह ने मालवा प्रदेश पर कितनी बार आक्रमण किए ?
उत्तर-
तीन बार।

प्रश्न 9.
महाराजा रणजीत सिंह ने मालवा प्रदेश पर कब प्रथम आक्रमण किया ?
उत्तर-
1806 ई०।

प्रश्न 10.
कोई एक कारण बताएँ जिस कारण महाराजा रणजीत सिंह अंग्रेजों से संधि करने के लिए बाध्य हुआ।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह के दरबारियों ने उसे अंग्रेजों के साथ संघर्ष न करने की सलाह दी।

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प्रश्न 11.
अमृतसर की संधि कब हुई ?
अथवा
अमृतसर की संधि पर कब हस्ताक्षर हुए ?
उत्तर-
25 अप्रैल, 1809 ई०।

प्रश्न 12.
अमृतसर की संधि (1809) की कोई एक मुख्य धारा लिखें।
उत्तर-
अंग्रेजी सरकार और लाहौर दरबार के मध्य स्थायी मित्रता रहेगी।

प्रश्न 13.
1809 ई० की अमृतसर की संधि के अनुसार कौन-सी नदी महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों के मध्य सीमा बनी ?
उत्तर-
सतलुज नदी।

प्रश्न 14.
अमृतसर की संधि से महाराजा रणजीत सिंह को क्या हानि हुई ?
उत्तर-
इसने महाराजा रणजीत सिंह के सब सिख शासकों के महाराजा बनने के स्वप्न को भंग कर दिया।

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प्रश्न 15.
अमृतसर की संधि से महाराजा रणजीत सिंह को क्या लाभ हुआ ?
उत्तर-
इस संधि के कारण महाराजा रणजीत सिंह का राज्य समय से पूर्व नष्ट होने से बच गया।

प्रश्न 16.
अमृतसर की संधि से अंग्रेज़ों को हुआ कोई एक मुख्य लाभ बताएँ।
उत्तर-
इस संधि से अंग्रेजों की प्रतिष्ठा में काफ़ी वृद्धि हुई।

प्रश्न 17.
महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य वदनी का तनाव कब हुआ ?
उत्तर-
1822. ई० में।

प्रश्न 18.
1823 ई० में कौन लुधियाना का पुलिटिकल ऐंजट नियुक्त हुआ ?
उत्तर-
कैप्टन वेड।

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प्रश्न 19.
1826 ई० में किस अंग्रेज़ डॉक्टर ने महाराजा रणजीत सिंह का इलाज किया ?
उत्तर-
डॉक्टर मरे ने

प्रश्न 20.
महाराजा रणजीत सिंह तथा लॉर्ड विलियम बैंटिंक के मध्य मुलाकात कब हुई ?
उत्तर-
26 अक्तूबर, 1831 ई०।।

प्रश्न 21.
महाराजा रणजीत सिंह तथा लॉर्ड विलियम बैंटिंक के मध्य मुलाकात कहाँ हुई थी ?
उत्तर-
रोपड़।

प्रश्न 22.
अंग्रेजों ने सिंध के अमीरों से संधि कब की ?
उत्तर-
1832 ई०।

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प्रश्न 23.
अंग्रेजों ने फिरोज़पुर पर कब अधिकार कर लिया था ?
उत्तर-
1835 ई०।

प्रश्न 24.
त्रिपक्षीय संधि कब हुई ?
उत्तर-
26 जून, 1838 ई०।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
यूसुफ अली मिशन ……… में पंजाब आया।
उत्तर-
(1800 ई०)

प्रश्न 2.
जसवंत राव होल्कर ………… में पंजाब आया।
उत्तर-
(1805 ई०)

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प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह व अंग्रेजों के मध्य लाहौर की संधि………में हुई।
उत्तर-
(1806 ई०)

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह ने मालवा पर पहली बार ……में आक्रमण किया था।
उत्तर-
(1806 ई०)

प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह ने मालवा पर तीसरी बार ………..में आक्रमण किया था।
उत्तर-
(1808 ई०)

प्रश्न 6.
चार्ल्स मैटकॉफ महाराजा रणजीत को दूसरी बार …….में मिला।।
उत्तर-
(अमृतसर)

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प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह व अंग्रेज़ों के मध्य अमृतसर की संधि ……………..को हुई।
उत्तर-
(25 अप्रैल, 1809 ई०)

प्रश्न 8.
अमृतसर की संधि के अनुसार………दरिया को महाराजा रणजीत सिंह व अंग्रेजों के मध्य साम्राज्य की – सीमा माना गया था।
उत्तर-
(सतलुज)

प्रश्न 9.
1831 ई० में………में महाराजा रणजीत सिंह और लॉर्ड विलियम बैंटिंक की बैठक हुई।
उत्तर-
(रोपड़)

प्रश्न 10.
महाराजा रणजीत सिंह, शाह शुज़ा और अंग्रेजों के मध्य त्रिपक्षीय संधि……………..में हुई।
उत्तर-
(1838. ई०)

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(ii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
यूसुफ अली मिशन 1800 ई० में पंजाब आया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 2.
1805 ई० में मराठा नेता जसवंत राव होल्कर पंजाब आया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 3.
जसवंत राव होल्कर 1805 ई० में पंजाब आया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों के मध्य लाहौर की संधि 1805 ई० में हुई।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह ने मालवा पर प्रथम बार 1806 ई० में आक्रमण किया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 6.
चार्ल्स मैटकॉफ 1808 ई० में महाराजा रणजीत सिंह को पहली बार खेमकरण में मिला था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों के मध्य अमृतसर की संधि 25 अप्रैल, 1809 ई० को हुई।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 8.
अमृतसर की संधि के कारण महाराजा रणजीत सिंह के गौरव को भारी धक्का लगा था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 9.
1826 ई० में अंग्रेजों ने डॉक्टर मर्रे को महाराजा रणजीत के इलाज के लिए भेजा था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 10.
लार्ड विलियम बैंटिंक महाराजा रणजीत सिंह को 1831 ई० में रोपड़ में मिला था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 11.
अंग्रेज़ों ने 1835 ई० में फिरोजपुर पर कब्जा कर लिया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
महाराजा रणजीत सिंह, शाह शुज़ा और अंग्रेजों के मध्य त्रि-पक्षीय संधि 26 जून, 1838 ई० को हुई थी।
उत्तर-
ठीक

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(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
मराठों का नेता जसवंत राव होल्कर पंजाब कब आया था ?
(i) 1801 ई० में
(ii) 1802 ई० में
(iii) 1805 ई० में
(iv) 1809 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों के मध्य पहली संधि कब हुई ?
(i) 1805 ई० में
(ii) 1806 ई० में
(iii) 1807 ई० में
(iv) 1809 ई० में।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह ने मालवा पर कितनी बार आक्रमण किये ?
(i) दो बार
(ii) तीन बार
(iii) चार बार
(iv) पाँच बार।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह ने मालवा पर प्रथम आक्रमण कब किया ?
(i) 1805 ई० में
(ii) 1806 ई० में
(iii) 1807 ई० में
(iv) 1809 ई० में।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 5.
चार्ल्स मैटकॉफ महाराजा रणजीत सिंह को पहली बार कहाँ मिला था ?
(i) लुधियाना में
(ii) अमृतसर में
(iii) लाहौर में
(iv) खेमकरण में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों में अमृतसर की संधि कब हुई ?
(i) 1805 ई० में
(ii) 1809 ई० में
(iii) 1812 ई० में
(iv) 1821 ई० में।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 7.
1809 ई० की अमृतसर की संधि के अनुसार कौन-सी नदी महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेज़ों के मध्य सीमा बनी ?
(i) ब्यास नदी
(ii) सतलुज नदी
(iii) रावी नदी
(iv) जेहलम नदी।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 8.
महाराजा रणजीत सिंह और लॉर्ड विलियम बैंटिंक में मुलाकात कब हुई थी ?
(i) 1809 ई० में
(ii) 1811 ई० में
(ii) 1821 ई० में
(iv) 1831 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 9.
महाराजा रणजीत सिंह और लॉर्ड विलियम बैंटिंक में मुलाकात कहाँ हुई थी ?
(i) अमृतसर में
(ii) लुधियाना में
(iii) रोपड़ में
(iv) लाहौर में।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 10.
अंग्रेजों ने सिंध के अमीरों से व्यापारिक संधि कब की थी ?
(i) 1829 ई० में
(ii) 1830 ई० में
(iii) 1831 ई० में
(iv) 1832 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 11.
त्रिपक्षीय संधि कब हुई ?
(i) 1839 ई०
(ii) 1845 ई०
(iii) 1838 ई०
(iv) 1809 ई०।
उत्तर-
(iii)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
जसवंत राव होल्कर कौन था ? महाराजा रणजीत सिंह ने उसकी सहायता क्यों न की ? (Who was Jaswant Rao Holkar ? Why Ranjit Singh did not help him ?)
उत्तर-
जसवंत राव होल्कर मराठा सरदार था। वह 1805 ई० में अंग्रेजों से पराजित हो गया था। परिणामस्वरूप वह महाराजा रणजीत सिंह से अंग्रेजों के विरुद्ध सहायता लेने के लिए अमृतसर पहुँचा। महाराजा रणजीत सिंह ने होल्कर का यद्यपि गर्मजोशी से स्वागत किया, परंतु निम्नलिखित कारणों से कोई सहायता न की-प्रथम, महाराजा रणजीत सिंह अंग्रेज़ी सेना के अनुशासन को देखकर चकित रह गया था। दूसरा, अंग्रेजों की थोड़ी-सी सेना ने मराठों की विशाल सेना को युद्ध-भूमि से भागने के लिए विवश कर दिया था। इस कारण महाराजा रणजीत सिंह द्वारा यह परिणाम निकालना स्वाभाविक था कि थोड़ी-सी सिख सेना के शामिल होने से स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं पड़ना था। तीसरा, होल्कर के संबंध में कोई निर्णय लेने के लिए महाराजा रणजीत सिंह ने अमृतसर में सिख सरदारों का एक सम्मेलन बुलाया। इसमें काफ़ी सोचने-विचारने के पश्चात् यह निर्णय लिया गया कि जसवंत राव होल्कर की सहायता लाहौर राज्य के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकती है। चौथा, महाराजा रणजीत सिंह पंजाब को युद्ध का क्षेत्र नहीं बनाना चाहता था। उसका राज्य अभी बहुत छोटा था तथा यह युद्ध नए उदय हो रहे सिख साम्राज्य के लिए हानिप्रद प्रमाणित हो सकता था।

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प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह और अंग्रेजों के पहले पड़ाव के संबंधों का विश्लेषण कीजिए।
(Analyse the relationship of Ranjit Singh and Britishers in the first phase.)
अथवा
अमृतसर की संधि की परिस्थितियों का अध्ययन करें। (Study the circumstances leading to the Treaty of Amritsar.)
अथवा
1800 से 1809 ई० तक के अंग्रेज़-सिख संबंधों का विवरण दीजिए। (Give an account of Anglo-Sikh relations from 1800 to 1809.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह सभी सिख रियासतों को अपने अधिकार में लेना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने 1806 ई० और 1807 ई० में दो बार मालवा प्रदेश पर आक्रमण किए। उसने कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और कई शासकों से नज़राना प्राप्त किया। इन आक्रमणों से घबरा कर मालवा रियासतों के सरदारों ने अंग्रेजों से सहायता की याचना की। क्योंकि इस समय नेपोलियन के भारत पर आक्रमण का खतरा बढ़ गया था इसलिए अंग्रेज़ मालवा के सरदारों को सहयोग देने की अपेक्षा महाराजा रणजीत सिंह से संधि करना चाहते थे। परंतु सितंबर, 1808 ई० में रणजीत सिंह तथा चार्ल्स मैटकाफ के मध्य वार्ता असफल रही। रणजीत सिंह ने दिसंबर, 1808 ई० में मालवा पर तीसरी बार आक्रमण करके कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसी मध्य नेपोलियन का भारत पर हमले का ख़तरा टल गया। अब अंग्रेजों ने रणजीत सिंह से अपनी शर्ते मनवाने के लिए युद्ध की तैयारियाँ आरंभ कर दी। परिणामस्वरूप 25 अप्रैल, 1809 ई० को रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य अमृतसर की संधि पर हस्ताक्षर हो गए।

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के बीच हुई अमृतसर की संधि की महत्ता बताएँ।
(Describe the significance of the Treaty of Amritsar signed between Ranjit Singh and the English.)
अथवा
अमृतसर की संधि ( 1809) का ऐतिहासिक महत्त्व क्या था ? (P.S.E.B. Mar. 2017, Sept. 17) (Describe the historical significance of the Treaty of Amritsar.)
अथवा
अमृतसर संधि की शर्ते एवं महत्त्व लिखें। (Write the main clauses and importance of Amritsar Treaty.)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह एवं अंग्रेजों के बीच हुई अमृतसर की संधि की मुख्य शर्तों एवं महत्त्व के बारे में बताएँ।
(Describe the main clauses and importance of Treaty of Amritsar between Maharaja Ranjit Singh and the English.)
उत्तर-
25 अप्रैल, 1809.ई० को महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ों के मध्य अमृतसर में संधि हई थी। ऐतिहासिक दृष्टि से यह संधि बहुत महत्त्वपूर्ण थी। इस संधि द्वारा रणजीत सिंह ने सतलुज दरिया को राज्य की पूर्वी सीमा मान लिया। इस कारण महाराजा रणजीत सिंह का सभी सिख रियासतों का महाराजा बनने का स्वप्न सदा के लिए टूट गया। इस कारण रणजीत सिंह को न केवल राजनीतिक, अपितु आर्थिक क्षति भी हुई, परंतु यह संधि कुछ पक्षों से रणजीत सिंह के लिए लाभप्रद भी सिद्ध हुई। वह अपने नव-निर्मित राज्य को अंग्रेजों की सुदृढ़ शक्ति से बचाने में सफल हो सका। उसे उत्तर-पश्चिम की ओर अपने राज्य की सीमा बढ़ाने का अवसर मिला। दूसरी ओर. यह संधि अंग्रेजों के लिए बड़ी लाभदायक सिद्ध हुई। इस कारण अंग्रेज़ों का सतलुज नदी तक प्रभाव बढ़ गया। पंजाब की ओर से निश्चित हो जाने से अंग्रेज़ भारत के अन्य राज्यों में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर सके। इस संधि ने अंग्रेज़ों की प्रतिष्ठा में पर्याप्त वृद्धि की।

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प्रश्न 4.
सिंध के प्रश्न पर महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य तनाव क्यों उत्पन्न हो गया ?
(Why was tension created between Maharaja Ranjit Singh and the English over Sind tangle ?)
उत्तर-
सिंध का क्षेत्र व्यापारिक तथा भौगोलिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। इसलिए महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ दोनों इस क्षेत्र पर अधिकार करना चाहते थे। 1831 ई० में अंग्रेजों ने अलैग्जेंडर बर्नज को सिंध के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए भेजा। महाराजा रणजीत सिंह को कोई संदेह न हो, इसलिए उसे रोपड़ में गवर्नरजनरल लार्ड विलियम बैंटिंक से भेंट के लिए निमंत्रण भेजा। यह भेंट 26 अक्तूबर, 1831 ई० को हुई। अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी से रणजीत सिंह को बातों में लगाए रखा। दूसरी ओर अंग्रेजों ने सिंध के साथ संधि करने के लिए कर्नल पोटिंगर को भेजा। वह 1832 ई० में सिंध के साथ एक व्यापारिक संधि करने में सफल रहा। इस कारण यह संधि अंग्रेजों के लिए बड़ी लाभदायक सिद्ध हुई। इस कारण अंग्रेजों तथा रणजीत सिंह के मध्य पुनः तनाव उत्पन्न हो गया। 1838 ई० में अंग्रेजों ने सिंध के अमीरों के साथ एक अन्य संधि कर ली। इस कारण सिंध पूर्णतया अंग्रेज़ों के प्रभाव में आ गया। महाराजा रणजीत सिंह यह सहन करने को तैयार न था किंतु उसने अंग्रेजों के विरुद्ध कोई कदम उठाने का साहस न किया।

प्रश्न 5.
फिरोजपुर के प्रश्न पर महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ों के मध्य तनाव क्यों उत्पन्न हो गया?
(Why was tension created between Maharaja Ranjit Singh and the English over Ferozepur tangle ?)
उत्तर-
अंग्रेज़ फिरोज़पुर जैसे महत्त्वपूर्ण नगर को अपने अधिकार में लेना चाहते थे। यह नगर लाहौर से केवल 40 मील की दूरी पर स्थित था। यहाँ से अंग्रेज़ रणजीत सिंह के राज्य की गतिविधियों के संबंध में काफ़ी जानकारी प्राप्त कर सकते थे। इसके अतिरिक्त पंजाब में घेराव डालने के लिए फिरोज़पुर पर अधिकार करना आवश्यक था। यद्यपि अंग्रेज़ फिरोज़पुर की ओर काफ़ी समय से ललचाई दृष्टि से देख रहे थे, किंतु वे इस पर अपने अधिकार को स्थगित करते हुए आ रहे थे ताकि रणजीत सिंह उनसे नाराज़ न हो जाए। इसी कारण अंग्रेज़ 1835 ई० तक फिरोजपुर पर रणजीत सिंह का अधिकार मानते आए थे, किंतु अब स्थिति परिवर्तित हो चुकी थी। अंग्रेज़ों को रणजीत सिंह की मैत्री की कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी। इसलिए 1835 ई० में अंग्रेजों ने बलपूर्वक फिरोजपुर पर अधिकार कर लिया। 1838 ई० में अंग्रेजों ने यहाँ एक शक्तिशाली सैनिक छावनी बना ली। रणजीत सिंह ने अंग्रेज़ों द्वारा फिरोज़पुर पर अधिकार करने तथा यहाँ छावनी बनाए जाने के कारण चाहे बहुत क्रोध किया, किंतु अंग्रेजों ने इसकी कोई परवाह न की। महाराजा को मात्र क्रोध का चूंट पीकर रह जाना पड़ा।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 18 ऐंग्लो-सिख संबंध : 1800-1839

प्रश्न 6.
त्रिपक्षीय (तीन-पक्षीय) संधि पर नोट लिखें। (Write a brief note on Tri-partite Treaty and its significance.)
अथवा
तीन पक्षीय संधि के बारे में चर्चा करें।
(Discuss about Tri-partite Treaty.)
अथवा
त्रिपक्षीय संधि एवं उसके महत्त्व के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(Write a note about Tri-partite Treaty and its importance.)
उत्तर-
1837 ई० में रूस बड़ी तेजी से भारत की ओर बढ़ रहा था। इस आक्रमण को रोकने के लिए अंग्रेजों ने अफ़गानिस्तान के शासक दोस्त मुहम्मद खाँ से मित्रता करनी चाही, परंतु दोस्त मुहम्मद खाँ यह चाहता था कि अंग्रेज़ पेशावर का क्षेत्र रणजीत सिंह से लेकर उसे दे दें। अंग्रेज़ ऐसे अवसर पर रणजीत सिंह से अपने संबंध बिगाड़ना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने अफ़गानिस्तान के भूतपूर्व शासक शाह शुजा से वार्ता आरंभ कर दी। 26 जून, 1838 ई० को अंग्रेजों, शाह शुजा तथा महाराजा रणजीत सिंह के मध्य एक त्रिपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर किए गए। इस संधि के अनुसार शाह शुजा को अफ़गानिस्तान के सिंहासन पर बैठाने का निर्णय किया गया। शाह शुजा ने रणजीत सिंह द्वारा विजित किए समस्त अफ़गान क्षेत्रों पर उसका अधिकार मान लिया। महाराजा रणजीत सिंह को कहा गया कि वह शाह शुजा को 5,000 सैनिक सहायता के लिए भेजे। इसके बदले शाह शुजा रणजीत सिंह को 2 लाख रुपये देगा। महाराजा रणजीत सिंह इस संधि पर हस्ताक्षर करने को तैयार न था। किंतु अंग्रेजों ने उसे ऐसा करने पर बाध्य कर दिया। इस संधि ने महाराजा रणजीत सिंह की सिंध तथा शिकारपुर पर अधिकार करने की सभी इच्छाओं पर तुषारापात कर दिया।

प्रश्न 7.
1809 से 1839 ई० तक के अंग्रेज़-सिख संबंधों का विवरण दीजिए। (Give an account of Anglo-Sikh relations from 1809 to 1839.)
उत्तर-
1809 ई० में महाराजा रणजीत सिंह एवं अंग्रेजों के मध्य अमृतसर की प्रसिद्ध संधि हुई। यह संधि महाराजा रणजीत सिंह की अपेक्षा अंग्रेजों के लिए अधिक लाभकारी सिद्ध हुई। इस संधि के कारण यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह का सभी सिख रियासतों का महाराजा बनने का स्वप्न पूरा न हो सका, किंतु उसने खालसा राज्य को नष्ट होने से बचा लिया। 1809 ई० से 1830 ई० तक दोनों शक्तियों के मध्य कभी मित्रता स्थापित हो जाती तथा कभी उनमें तनाव स्थापित हो जाता। 1830 से 1839 ई० में दोनों शक्तियों के संबंधों में आपसी तनाव अधिक बढ़ गया। इसका कारण यह था कि अंग्रेजों ने सिंध, शिकारपुर तथा फिरोजपुर पर अकारण ही कब्जा कर लिया था। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह को 1838 ई० में त्रिपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया। इन कारणों से महाराजा रणजीत सिंह ने अपने को बहुत अपमानित महसूस किया। परिणामस्वरूप उसने इस अपमान का बदला लेने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध कोई पग उठाने का निर्णय किया। दुर्भाग्यवश 1839 ई० में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 18 ऐंग्लो-सिख संबंध : 1800-1839

प्रश्न 8.
रणजीत सिंह के अंग्रेजों के साथ संबंधों के स्वरूप का वर्णन करें। (Discuss the nature of Ranjit Singh’s relation with the British.)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह की अंग्रेजों के सामने झुकने की नीति के बारे में अपने विचार लिखो।’ (Comment on Maharaja Ranjit Singh’s policy of yielding towards the British.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह ने सदैव अंग्रेजों के समक्ष झुकने की नीति अपनाई। 1809 ई० में अंग्रेजों ने उसे अमृतसर की संधि करने के लिए बाध्य किया। इससे महाराजा रणजीत सिंह की समस्त सिखों का महाराजा बनने की आशाएँ धूल में मिल गईं। 1822 ई० में अंग्रेजों ने सदा कौर के कहने पर रणजीत सिंह की सेनाओं से वदनी खाली करवा लिया। 1832 ई० में अंग्रेज़ों ने रणजीत सिंह को धोखे में रख कर सिंध के अमीरों से एक व्यापारिक संधि कर ली। इस संबंधी जब महाराजा रणजीत सिंह को ज्ञात हुआ तो वह केवल छटपटा कर रह गया। 1835 ई० में अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह को शिकारपुर खाली करने के लिए विवश किया। इसी वर्ष अंग्रेजों ने फिरोजपुर पर अधिकार कर महाराजा रणजीत सिंह की शक्ति को एक और चुनौती दी। महाराजा केवल गुस्से के चूंट पी कर रह गया। अंग्रेज़ों ने रणजीत सिंह से 26 जून, 1838 ई० को त्रिपक्षीय समझौते पर बलपूर्वक हस्ताक्षर करवाए। ये घटनाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण थीं कि महाराजा रणजीत सिंह सदा अंग्रेजों के आगे झुकता रहा।

Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।

1
महाराजा रणजीत सिंह सभी सिख रियासतों को अपने अधिकार में लेना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने 1806 ई० और 1807 ई० में दो बार मालवा प्रदेश पर आक्रमण किए। उसने कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया और कई शासकों से नज़राना प्राप्त किया। इन आक्रमणों से घबरा कर मालवा रियासतों के सरदारो ने अंग्रेजों से सहायता की याचना की। क्योंकि इस समय नेपोलियन के भारत पर आक्रमण का खतरा बढ़ गया था इसलिए अंग्रेज़ मालवा के सरदारों को सहयोग देने की अपेक्षा महाराजा रणजीत सिंह से संधि करना चाहते थे। परंतु सितंबर, 1808 ई० में रणजीत सिंह तथा चार्ल्स मैटकाफ के मध्य वार्ता असफल रही। रणजीत सिंह ने दिसंबर, 1808 ई० में मालवा पर तीसरी बार आक्रमण करके कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसी मध्य नेपोलियन का भारत पर हमले का खतरा टल गया। अब अंग्रेजों ने रणजीत सिंह से अपनी शर्ते मनवाने के लिए युद्ध की तैयारियाँ आरंभ कर दीं। परिणामस्वरूप 25 अप्रैल, 1809 ई० को रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य अमृतसर की संधि पर हस्ताक्षर हो गए।

  1. महाराजा रणजीत सिंह ने मालवा पर प्रथम बार आक्रमण कब किया ?
    • 1805 ई०
    • 1806 ई०
    • 1807 ई०
    • 1808 ई०।
  2. महाराजा रणजीत सिंह ने मालवा पर आक्रमण क्यों किया ?
  3. नज़राना से क्या भाव है ?
  4. मालवा रियासतों के सरदारों ने अंग्रेजों से सहायता की माँग क्यों की ?
  5. महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य अमृतसर की संधि कब हुई ?

उत्तर-

  1. 1806 ई०।
  2. इन आक्रमणों का उद्देश्य महाराजा रणजीत सिंह सभी सिख रियासतों को अपने अधीन लाना चाहता था।
  3. नज़राना से भाव है महाराजा को दिए जाने वाले उपहार।
  4. मालवा रियासतों के सरदारों ने अंग्रेजों से सहायता इसलिए मांगी थी क्योंकि उनको खतरा था कि महाराजा रणजीत सिंह उनकी रियासतों पर अधिकार कर लेगा।
  5. महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेजों के मध्य अमृतसर की संधि 25 अप्रैल, 1809 ई० को हुई।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 18 ऐंग्लो-सिख संबंध : 1800-1839

2
सिंध का प्रदेश व्यापारिक एवं भौगोलिक पक्ष से बहुत महत्त्वपूर्ण था। इसलिए महाराजा रणजीत सिंह तथा अंग्रेज़ दोनों इस क्षेत्र को अपने अधिकार में लेना चाहते थे। 1831 ई० में अंग्रेजों ने अलैग्जेंडर बर्नस को सिंध के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए भेजा। महाराजा रणजीत सिंह को कोई संदेह न हो, इसलिए उसको रोपड़ में गवर्नरजनरल लॉर्ड विलियम बैंटिंक के साथ एक मुलाकात के लिए निमंत्रण भेजा। यह मुलाकात 26 अक्तूबर, 1831 ई० को हुई। अंग्रेजों ने बहुत चालाकी के साथ रणजीत सिंह को बातों में लगाए रखा। दूसरी ओर अंग्रेजों ने सिंध के साथ संधि करने के लिए कर्नल पोटिजर को भेजा। वह 1832 ई० में सिंध के साथ एक व्यापारिक संधि करने में सफल हुआ। जब रणजीत सिंह को इस संधि के विषय में ज्ञात हुआ तो वह कई रातों तक सुख की नींद न सो पाया, किंतु उसने अंग्रेज़ों के इस पग के विरुद्ध एक भी शब्द बोलने का साहस न किया।

  1. महाराजा रणजीत सिंह सिंध पर अधिकार क्यों करना चाहता था ?
  2. अलैग्जेंडर बर्नस कौन था ?
  3. महाराजा रणजीत सिंह तथा लार्ड विलियम बैंटिंक के मध्य मुलाकात कब हुई ?
  4. महाराजा रणजीत सिंह तथा लार्ड विलियम बैंटिंक के मध्य मुलाकात कहाँ हुई थी ?
    • रोपड़ में
    • अमृतसर में
    • लाहौर में
    • दिल्ली में।
  5. अंग्रेज़ों तथा सिंध के मध्य एक व्यापारिक संधि करने में कौन सफल हुआ ?

उत्तर-

  1. महाराजा रणजीत सिंह सिंध पर अधिकार इसलिए करना चाहता था क्योंकि इसका भौगोलिक तथा व्यापारिक पक्ष से बहुत महत्त्व था।
  2. अलैग्जेंडर बर्नस एक अंग्रेज़ अधिकारी था जिसे अग्रेज़ों ने सिंध के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए भेजा था।
  3. महाराजा रणजीत सिंह तथा लार्ड विलियम बैंटिक के मध्य मुलाकात 26 अक्तूबर, 1831 ई० को हुई।
  4. रोपड़ में।
  5. अंग्रेजों तथा सिंध के मध्य एक व्यापारिक संधि करने में कर्नल पोटिजर सफल हुआ।

3
अंग्रेज़ फिरोज़पुर जैसे महत्त्वपूर्ण नगर को अपने अधिकार में लेना चाहते थे। यह नगर लाहौर से केवल 40 मील की दूरी पर स्थित था। यहाँ से अंग्रेज़ रणजीत सिंह के राज्य की गतिविधियों के संबंध में काफ़ी जानकारी प्राप्त कर सकते थे। इसके अतिरिक्त पंजाब में घेराव डालने के लिए फिरोज़पुर पर अधिकार करना आवश्यक था। यद्यपि अंग्रेज़ फिरोज़पुर की ओर काफ़ी समय से ललचाई दृष्टि से देख रहे थे, किंतु वे इस पर अपने अधिकार को स्थगित करते हुए आ रहे थे ताकि रणजीत सिंह उनसे नाराज़ न हो जाए। इसी कारण अंग्रेज़ 1835 ई० तक फिरोजपुर पर रणजीत सिंह का अधिकार मानते आए थे, किंतु अब स्थिति परिवर्तित हो चुकी थी। अंग्रेजों को रणजीत सिंह की मैत्री की कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी। इसलिए 1835 ई० में अंग्रेजों ने बलपूर्वक फिरोजपुर पर अधिकार कर लिया। 1838 ई० में अंग्रेजों ने यहाँ एक शक्तिशाली सैनिक छावनी बना ली। रणजीत सिंह ने अंग्रेजों द्वारा फिरोज़पुर पर अधिकार करने तथा यहाँ छावनी बनाए जाने के कारण चाहे बहुत क्रोध किया, किंतु अंग्रेजों ने इसकी कोई परवाह न की।

  1. अंग्रेज़ फिरोजपुर पर क्यों अधिकार करना चाहते थे ?
  2. पंजाब में घेराव डालने के लिए ……………. पर अधिकार करना आवश्यक था।
  3. अंग्रेजों ने फिरोजपुर पर कब अधिकार कर लिया था ?
  4. अंग्रेजों ने फिरोज़पुर में कब एक सैनिक छावनी स्थापित की थी ?
  5. क्या महाराजा रणजीत सिंह फिरोजपुर के प्रश्न पर अंग्रेजों के आगे झुक गया था ?

उत्तर-

  1. अंग्रेज़ फिरोजपुर पर अधिकार करके महाराजा रणजीत सिंह के राज्य की गतिविधियों को पास से देख सकते थे।
  2. फिरोजपुर।
  3. अंग्रेजों ने 1835 ई० में फिरोजपुर पर अधिकार कर लिया था।
  4. अंग्रेजों ने 1838 ई० में फिरोज़पुर में एक सैनिक छावनी स्थापित कर ली थी।
  5. महाराजा रणजीत सिंह फिरोज़पुर के प्रश्न पर निःसन्देह अंग्रेजों के आगे झुक गया था।

कबड्डी (Kabaddi) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions कबड्डी (Kabaddi) Game Rules.

कबड्डी (Kabaddi) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. पुरुषों के लिए कबड्डी के मैदान की लम्बाई = 13 मीटर
  2. पुरुषों के लिए मैदान की चौड़ाई = 10 मीटर
  3. महिलाओं के लिए मैदान की लम्बाई = 12 मीटर
  4. महिलाओं के लिए मैदान की चौड़ाई = 8 मीटर
  5. जूनियर लड़के और लड़कियों के लिए मैदान = 11 × 8 मीटर “
  6. टीम के कुल खिलाड़ी = 12
  7. मैच का समय पुरुषों के लिए = 20-5-20 मिनट
  8. महिलाओं के लिए मैच का समय = 15-5-15 मिनट
  9. मैच के अधिकारी = एक रैफ़री, दो अम्पाइर,
    एक स्कोरर, एक टाइम
    कीपर, दो लाइन मैन
  10. लौन के अंक = 2
  11. लाइनों की चौड़ाई = 5 सैंटी मीटर
  12. ब्लॉक का आकार पुरुषों के लिए = 1 × 8 मीटर
  13. महिलाओं के लिए ब्लॉक का आकार = 1 × 6 मीटर
  14. कबड्डी खेल में लॉबी की चौड़ाई = 1 मी०
  15. मध्य रेखा से ब्लाक रेखा की दूरी = 2.75 मी०
  16. रेखाओं की चौड़ाई = 5 सैं०मी०
  17. मैच में खिलाड़ियों की संख्या = 7
  18. मध्यांतर = 5 मिनट

हकबड्डी (Kabaddi) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

कबड्डी खेल की संक्षेप रूप-रेखा
(Brief outline of the Kabaddi Game)

  1. प्रत्येक टीम में 12 खिलाड़ी होंगे परन्तु एक समय सात खिलाड़ी ही मैदान में उतरेंगे तथा 5 खिलाड़ी स्थानापन्न (Substitutes) होते हैं।
  2. टॉस जीतने वाली टीम अपनी पसन्द का क्षेत्र चुनती है तथा आक्रमण करने का अवसर प्राप्त करती है।
  3. खेल का समय 20-5-20 मिनटों का होता है तथा स्त्रियों और जूनियरों के लिए 15-5-15 का होता है जिसमें 5 मिनट का समय आराम का होता है।
  4. यदि कोई खिलाड़ी खेल के दौरान मैदान में से बाहर चला जाता है तो वह आऊट माना जाएगा।
  5. यदि किसी खिलाड़ी का कोई अंग सीमा के बाहरी भाग को छू जाए तो वह आऊट माना जाएगा।
  6. यदि किसी कारणवश मैच पूरा नहीं खेला जाता तो मैच दोबारा खेला जाएगा।
  7. खिलाड़ी अपने शरीर पर तेल या कोई और चिकनाहट वाली चीज़ नहीं मल सकता।
  8. खेल के समय कोई खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी को कैंची (Scissors grip) नहीं मार सकता।
  9. खिलाड़ी को चोट लगने की दशा में दूसरा खिलाड़ी उसके स्थान पर आ सकता
  10. ग्राऊंड से बाहर खड़े होकर खिलाड़ी को पानी दिया जा सकता है, ग्राऊंड के अन्दर आकर देना फाऊल है।
  11. कैप्टन रैफरी के परामर्श से टाइम आऊट ले सकता है, परन्तु टाउम-आऊट का समय दो मिनट से अधिक नहीं होना चाहिए।
  12.  एक टीम तीन खिलाड़ी बदल सकती है।
  13. यदि कोई टीम दूसरी टीम से लोना ले जाती है तो उस टीम को दो नम्बर और दिए जाते हैं।
  14. बदले हुए खिलाड़ियों को दोबारा नहीं बदला जा सकता।

हकबड्डी (Kabaddi) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
कबड्डी के खेल के मैदान, खेल अधिकारी तथा खेल के प्रमुख नियमों का वर्णन करें।
उत्तर-
खेल का मैदान (Play Ground) खेल का मैदान समतल तथा नर्म होगा। यह मिट्टी, खाद तथा बुरादे का होना चाहिए। पुरुषों के लिए मैदान का आकार 121/2 मीटर × 10 मीटर होगा। केन्द्रीय रेखा इसे दो समान भागों में बांटेगी। प्रत्येक भाग 10 मीटर × 161/4 मीटर होगा। स्त्रियों तथा जूनियर्ज़ के लिए मैदान का नाप 11 मीटर × 8 मीटर होगा। मैदान के दोनों ओर एक मीटर चौड़ी पट्टी होगी जिसे लॉबी (Lobby) कहते हैं। प्रत्येक क्षेत्र में केन्द्रीय रेखा से तीन मीटर दूर उसके समानान्तर मैदान की पूरी चौड़ाई के बराबर रेखायें खींची जाएंगी। इन रेखाओं को बॉक रेखाएं (Baulk Lines) कहते हैं। केन्द्रीय रेखा स्पष्ट रूप से अंकित की जानी चाहिएं। केन्द्रीय रेखा तथा अन्य रेखाओं की अधिकतम चौड़ाई 5 सैंटीमीटर या 2 इंच होनी चाहिए।
बोनस रेखा—(Bonus Lines)

  1. यह रेखा से 10 सें० मी० के अन्तर पर होती है और सीनियर के लिए बॉक रेखा से एक मीटर के अन्तर पर होती है।
  2. जब रेडर रेखा को पार के पश्चात् यदि कोई रेडर पकड़ा जाता है तो उसे अंक दिया जाता है।
  3. बोनस रेखा को पार करने के पश्चात् यदि कोई रेडर पकड़ा जाता है तो विरोधी टीम को उसका अंक दिया जाता है।
  4. यदि कोई रेडर बोनस रेखा पार करने के पश्चात् खिलाड़ी को हाथ भी लगाकर आता है तो उसे बोनस के अतिरिक्त एक अंक अधिक मिलता है।

खेल के नियम
(Rules of Game)
(1) टॉस जीतने वाली टीम या तो अपनी पसन्द का क्षेत्र ले सकती या पहले आक्रमण करने का अवसर प्राप्त कर सकती है। मध्यान्तर के पश्चात् क्षेत्र या कोर्ट बदल लिए जाते हैं।
(2) खेल के दौरान में मैदान से बाहर जाने वाला खिलाड़ी आऊट हो जाएगा।
(3) खिलाड़ी आऊट हो जाता है।

  • यदि किसी खिलाड़ी के शरीर का कोई भी भाग मैदान की सीमा के बाहर के भाग को स्पर्श कर ले।
  • संघर्ष करते समय खिलाड़ी आऊट नहीं होगा यदि उसके शरीर का कोई अंग या तो सीधे मैदान को छुए या उस खिलाड़ी को छुए जो सीमा के अन्दर है (शरीर का कोई न कोई भाग सीमा के बीच होना चाहिए।)

(4) संघर्ष आरम्भ होने पर लॉबी का क्षेत्र भी मैदान में सम्मिलित माना जाता है। संघर्ष की समाप्ति पर वे खिलाड़ी जो संघर्ष में सम्मिलित थे, लॉबी से होते हुए अपने-अपने क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं।
यदि बचाव करने वाली टीम के किसी खिलाड़ी का पैर पीछे वाली लाइन को छू जाता है तो वह आऊट नहीं है जब तक पैर लाइन से बाहर न निकले।
(5) आक्रामक खिलाड़ी ‘कबड्डी’ शब्द का लगातार उच्चारण करता रहेगा। यदि वह ऐसा नहीं करता तो अम्पायर उसे अपने क्षेत्र में वापिस जाने का और विपक्षी खिलाड़ी को आक्रमण करने का आदेश दे सकता है। इस स्थिति में उस खिलाड़ी का पीछा नहीं किया जाएगा।
KABADDI GROUND
कबड्डी (Kabaddi) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
(6) आक्रामक खिलाड़ी को ‘कबड्डी’ शब्द बोलते हुए विपक्षी कोर्ट में प्रविष्ट होना चाहिए। यदि वह विपक्षी के कोर्ट में प्रविष्ट होने के पश्चात् ‘कबड्डी’ शब्द का उच्चारण करता है तो अम्पायर उसे वापिस भेज देगा और विपक्षी खिलाड़ी को आक्रमण का अवसर दिया जाएगा। इस स्थिति में आक्रामक खिलाड़ी का पीछा नहीं किया जाएगा।
(7) यदि सचेत किए जाने पर कोई भी आक्रामक नियम नं0 6 का उल्लंघन करता है तो निर्णायक उसकी बारी समाप्त कर देगा और विपक्षी को एक अंक देगा, परन्तु उसे आऊट नहीं किया जाएगा।
(8) खेल के अन्त तक प्रत्येक पक्ष अपने आक्रामक बारी-बारी से भेजता रहेगा।
(9) यदि विपक्षियों द्वारा पकड़ा हुआ कोई आक्रामक उनसे बच कर अपने कोर्ट में सुरक्षित पहुंच जाता है तो उसका पीछा नहीं किया जाएगा।
(10) एक बारी में केवल एक ही आक्रामक विपक्षी कोर्ट में जाएगा। यदि एक साथ एक से अधिक आक्रामक विपक्षी कोर्ट में जाते हैं तो निर्णायक या अम्पायर उन्हें वापस जाने का आदेश देगा और उनकी बारी समाप्त कर दी जाएगी। इन आक्रामकों द्वारा छुए गए विपक्षी आऊट नहीं माने जाएंगे। विपक्षी इन आक्रामकों का पीछा नहीं करेंगे।
(11) जो भी पक्ष एक समय में एक से अधिक खिलाड़ी विपक्षी कोर्ट में भेजता है उसे चेतावनी दी जाएगी। यदि चेतावनी देने के पश्चात् भी वह ऐसा करता है तो पहले आक्रामक के अतिरिक्त शेष सभी को आऊट किया जाएगा।
(12) यदि कोई आक्रामक विपक्षी कोर्ट में सांस तोड़ देता है तो उसे आऊट माना जाएगा।
(13) किसी आक्रामक के पकड़े जाने पर विपक्षी खिलाड़ी जान-बूझ कर उसका मुंह बंद करके सांस रोकने या चोट लगने वाले ढंग से पकड़ने, कैंची या अनुचित साधनों का
प्रयोग नहीं करेंगे। ऐसा किए जाने पर अम्पायर उस आक्रामक को अपने क्षेत्र में सुरक्षित लौटा हुआ घोषित करेगा।
(14) कोई भी आक्रामक या विपक्षी एक दूसरे को सीमा से बाहर धक्का नहीं मारेगा। जो पहले धक्का देगा उसे आऊट घोषित किया जाएगा। यदि धक्का मार कर आक्रामक को सीमा से बाहर निकाला जाता है तो उसे अपने कोर्ट से सुरक्षित लौटा हुआ घोषित किया जाएगा।
(15) जब तक आक्रामक विपक्षी कोर्ट में रहेगा तब तक कोई भी विपक्षी खिलाड़ी केन्द्रीय रेखा से पार आक्रामक के अंग को अपने शरीर के किसी भाग से नहीं छुएगा। यदि वह ऐसा करता है उसे आऊट घोषित किया जाएगा।
(16) यदि नियम 15 का उल्लंघन करते हुए कोई आऊट हुआ विपक्षी आक्रामक को पकड़ता है या उसे पकड़े जाने में सहायता पहुंचाते हुए या आक्रामक को पकड़े हुए नियम का उल्लंघन करता है तो आक्रामक अपने कोर्ट में सुरक्षित लौटा घोषित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त संघर्ष दल के सभी विपक्षी सदस्य आऊट हो जाएंगे। जब कोई आक्रामक विरोधी टीम की ओर नम्बर ले कर आता है तो उसका नम्बर तब माना जाएगा यदि उसके शरीर के किसी भी अंग ने मध्य रेखा को पूरा पार किया हो।
(17) यदि कोई आक्रामक बिना अपनी बारी के जाता है तो अम्पायर उसे वापिस लौटने का आदेश देगा। यदि यह बार-बार ऐसा करता है तो उसके पक्ष को एक बार चेतावनी देने के पश्चात् विपक्षियों को एक अंक दे दिया जाएगा।
(18) नये नियमों के अनुसार बाहर से पकड़ कर पानी पीना फाऊल नहीं है।
(19) जब एक दल विपक्षी दल के सभी खिलाड़ियों को निष्कासित करने में सफल हो जाए तो उन्हें ‘लोना’ मिलता है। लोने के दो अंक अतिरिक्त होते हैं। इसके पश्चात् खेल पुनः शुरू होगा।
(20) आक्रामक को यदि अपने पक्ष के खिलाड़ी द्वारा विपक्षी के प्रति चेतावनी दी जाती है तो उसके विरुद्ध 1 अंक दिया जाएगा।
(21) किसी भी आक्रामक या विपक्षी को कमर या हाथ-पांव के अतिरिक्त शरीर के किसी भाग से नहीं पकड़ सकता। उस नियम का उल्लंघन करने वाला आऊट घोषित किया जाएगा।
(22) खेल के दौरान यदि एक या दो खिलाड़ी रह जाएं तथा विरोधी दल का कप्तान अपनी टीम को खेल में लाने के लिए उन्हें आऊट घोषित कर दे तो विपक्षियों को इस घोषणा से पहले शेष खिलाड़ियों की संख्या के बराबर अंकों के अतिरिक्त ‘लोना’ के दो अंक और प्राप्त होंगे।
(23) विपक्षी के आऊट होने पर आऊट खिलाड़ी उसी क्रम में जीवित किया जाएगा जिसमें वह आऊट हुआ था।
(24) यदि किसी चोट के कारण मैच 20 मिनट रुका रहे तो हम मैच re-play करवा सकते हैं।
(25) 5 खिलाड़ियों के साथ भी मैच आरम्भ किया जा सकता है परन्तु जब 5 खिलाड़ी आऊट हो जाएं तो हम पूरा लोना अर्थात् 5 + 2 अंक (खिलाड़ियों 1, 5 अंक और 2 अंक लोने के) देते हैं। जब दो खिलाड़ी आ जाएं तो वे टीम में डाले जा सकते हैं।
(26) लोना के दो अंक होते हैं।

हकबड्डी (Kabaddi) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
कबड्डी मैच के नियम बताएं।
उत्तर-
मैच के नियम
(Rules of Match)

  1. प्रत्येक पक्ष में खिलाड़ियों की संख्या बारह (12) होगी। एक साथ मैदान में सात खिलाड़ी उतरेंगे।
  2. खेल की अवधि पुरुषों के लिए 20 मिनट तथा स्त्रियों व जूनियरों के लिए 15 मिनट की दो अवधियां होंगी। इन दोनों अवधियों के बीच 5 मिनट का मध्यान्तर होगा।
  3. प्रत्येक आऊट होने वाले विपक्षी के लिए दूसरे पक्ष को एक अंक मिलेगा। लोना’ प्राप्त करने वाले पक्ष को दो अंक मिलेंगे।
  4. खेल की समाप्ति पर सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाले पक्ष को विजयी घोषित किया जाता है।
  5. कबड्डी का खेल बराबर रहने पर प्रत्येक टीम को पांच-पांच रेड क्रमानुसार दिये जाते हैं। सभी सात खिलाड़ी रेड के समय मैदान में रहेंगे। उस समय बॉक रेखा सभी तरह के फैसलों के लिए बोनस रेखा मानी जाएगी। इस खेल में खिलाड़ी को बॉक रेखा पार कर लेने पर एक अंक मिलेगा। रेडर बोनस रेखा जो बॉक रेखा में परिवर्तित हुई है, उसे पार कर लेता है और किसी विरोधी खिलाड़ी को हाथ भी लगा देता है तो उसे बोनस रेखा पार करने का एक अंक अधिक मिलेगा। इस अवसर पर कोई भी खिलाड़ी आऊट होने पर मैदान से बाहर नहीं जा सकता।
    रेड डालने से पहले दोनों टीमें अपने खिलाड़ियों के नम्बर और नाम क्रमानुसार रेड डालने के लिए रैफरी को देंगे और रैफरी के बुलाने पर दोनों टीमों के खिलाड़ी बारी-बारी रेड डालेंगे। उस समय टास नहीं होगा। पहले टास जीतने वाली टीम ही पहले रेड डालेगी। यद्यपि पांच-पांच रेड लाने पर भी मैच बराबर रहता है तो मैच का फैसला ‘अचानक मृत्यु (Sudden Death) के आधार पर होगा।

अचानक मृत्यु (Sudden Death)-इस अवसर पर दोनों टीमों का एक-एक रेड डालने का अवसर मिलेगा। जो भी टीम रेड डालते समय अंक बना लेती है उसे विजयी घोषित किया जाता है। इस तरह रेड डालने का सिलसिला उस समय तक चलता रहेगा, जब तक कोई एक टीम विजयी अंक प्राप्त नहीं कर लेती।

लोना (Lona)-जब एक टीम के सारे खिलाड़ी आऊट हो जाएं तो विरोधी टीम को 2 अंक अधिक मिलते हैं। उसे हम लोना कहते हैं।
टूर्नामैंट निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं—

  1. नाक आऊट (Knock Out)-इस में जो टीम हार जाती है, वह प्रतियोगिता से बाहर हो जाती है।
  2. लीग (League)-इस में यदि कोई टीम हार जाती है, वह टीम बाहर नहीं होगी। उसे अपने ग्रुप के सारे मैच खेलने पड़ते हैं। जो टीम मैच जीतती है उसे दो अंक दिये जाते हैं। मैच बराबर होने पर दोनों टीमों को एक-एक अंक दिया जाएगा। हारने वाली टीम को शून्य (Zero) अंक मिलेगा।
    यदि दोनों टीमों का मैच बराबर रहता है और अतिरिक्त समय भी दिया जाता है या जिस टीम ने खेल आरम्भ होने से पहले अंक लिया होगा वह विजेता घोषित की जाएगी।
    यदि दोनों टीमों का स्कोर शून्य (Zero) है तो जिस टीम ने टॉस जीता हो वह विजेता घोषित की जाएगी।
  3. किसी कारणवश मैच न होने की दशा में मैच पुनः खेला जाएगा। दोबारा किसी और दिन खेले जाने वाले मैच में दूसरे खिलाडी बदले भी जा सकते हैं, परन्तु यदि मैच उसी दिन खेला जाए तो उसमें वही खिलाड़ी खेलेंगे जो पहले खेले थे।
  4. यदि किसी खिलाड़ी को चोट लग जाए तो उस पक्ष का कप्तान ‘समय आराम’ (Time Out) पुकारेगा, परन्तु ‘समय आराम’ की अवधि दो मिनट से अधिक नहीं होगी तथा चोट लगने वाला खिलाड़ी बदला जा सकता है। खेल की दूसरी पारी शुरू होने से पहले दो खिलाड़ी बदले जा सकते हैं। एक या दो से कम खिलाड़ियों से खेल शुरू हो सकता है। जो खिलाड़ी खेल शुरू होने के समय उपस्थित नहीं होते, खेल के दौरान किसी भी समय मिल सकते हैं। रैफरी को सूचित करना ज़रूरी है। यदि चोट गम्भीर हो तो उसकी जगह दूसरा खिलाड़ी खेल सकता है। प्रथम खेल के अन्त तक केवल दो खिलाड़ी बदले जा सकते हैं।
  5. किसी भी टीम में पांच खिलाड़ियों से कम होने की दशा में खेल शुरू किया जा सकता है, परन्तु
    • टीम के सभी खिलाड़ी आऊट होने पर अनुपस्थित खिलाड़ी भी आऊट हो जाएंगे और विपक्षी टीम को ‘लोना’ दिया जाएगा।
    • यदि अनुपस्थित खिलाड़ी आ जाएं तो वे रैफरी की आज्ञा से खेल में भाग ले सकते हैं।
    • अनुपस्थित खिलाड़ियों के स्थानापन्न कभी भी लिए जा सकते हैं परन्तु जब वे इस प्रकार लिए जाते हैं तो मैच के अन्त तक किसी भी खिलाड़ी को बदला जा सकता है।
    • मैच पुनः खेले जाने पर किसी भी खिलाड़ी को बदला जा सकता है।
  6. प्रलेपन की अनुमति नहीं। खिलाड़ियों के नाखून खूब अच्छी तरह कटे होने चाहिएं। खिलाड़ियों की पीठ तथा सामने की ओर कम-से-कम चार इंच लम्बा नम्बर लगाया जाएगा। खिलाड़ी के कम-से-कम वस्त्र बनियान, जांघिया या लंगोट सहित निक्कर होंगे। शरीर पर तेल आदि चिकने पदार्थ का मलना मना है। खिलाड़ी धातु की कोई वस्तु धारण नहीं करेंगे।
  7. खेल के दौरान कप्तान या नेता के अतिरिक्त कोई भी खिलाड़ी आदेश नहीं देगा। कप्तान अपने अर्द्धक में ही आदेश दे सकता है।
  8. यदि खिलाड़ी ‘कबड्डी’ शब्द का उच्चारण ठीक प्रकार से नहीं करता तथा रैफरी (Referee) द्वारा एक बार चेतावनी दिए जाने पर वह बार-बार ऐसा करता है तो दूसरी टीम को एक प्वाईंट दे दिया जाएगा, परन्तु वह खिलाड़ी बैठेगा नहीं।
  9. यदि कोई खिलाड़ी आक्रमण (Raid) करने जा रहा है और उसकी टीम का कोच या अन्य अधिकारी ऐसा करता है तो रैफरी दूसरी टीम को उसके विरुद्ध एक प्वाईंट (अंक) दे देगा।

हकबड्डी (Kabaddi) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
कबड्डी खेल में अधिकारी व खेल में त्रुटियों का वर्णन करें।
उत्तर-
अधिकारी व उनके अधिकार

    • रैफरी (एक)
    • निर्णायक या अम्पायर (दो)
    • रेखा निरीक्षक (दो)
    • स्कोरर (एक)
  1. आमतौर पर निर्णायक का निर्णय अन्तिम होगा। विशेष दशाओं में रैफ़री इसे बदल भी सकता है भले ही दोनों अम्पायरों में मतभेद हो।
  2. निर्णेता (रैफरी) किसी भी खिलाड़ी को त्रुटि करने पर चेतावनी दे सकता है, उसके विरुद्ध अंक दे सकता है या मैच के लिए अयोग्य घोषित कर सकता है। ये त्रुटियां इस प्रकार की हो सकती हैं—
    • निर्णय के बारे में अधिकारियों को बार-बार कहना,
    • अधिकारियों को अपमानजनक शब्द कहना,
    • अधिकारियों के प्रति अभद्र व्यवहार करना या उनके निर्णय को प्रभावित करने के लिए प्रक्रिया,
    • विपक्षी को अपमानजनक बातें कहना।

त्रुटियां
(Fouls)

  1. आक्रामक का मुंह बन्द करके या गला दबा कर उसकी सांस तोड़ने की कोशिश करना।
  2. हिंसात्मक ढंग का प्रयोग।
  3. कैंची मार कर आक्रामक को पकड़ना।
  4. आक्रामक भेजने में पांच सैकिण्ड से अधिक समय लगाना।
  5. मैदान के बारे खिलाड़ी या कोच द्वारा कोचिंग देना। इस नियम के उल्लंघन पर अम्पायर अंक दे सकता है।
  6. ऐसे व्यक्तियों को निर्णायक या रैफ़री नम्बर दे कर बाहर निकाल सकता है। आक्रमण जारी रहने पर सीटी बजाई जाएगी।
  7. जानबूझ कर बालों से या कपड़े से पकड़ना फाऊल है।
  8. जानबूझ कर आक्रामक को धक्का देना फाऊल है।

फाऊल (Foul)
अधिकारी फ़ाऊल (Foul) खेलने पर खिलाड़ियों को तीन प्रकार के कार्ड दिखा सकता है, जो निम्नलिखित हैं
हरा कार्ड (Green Card)
यह कार्ड खिलाड़ी को किसी भी नियम का जानबूझ कर उल्लंघन करने पर चेतावनी के आधार पर दिखाया जा सकता है।
पीला कार्ड (Yellow Card)
यह कार्ड खिलाड़ी को दो मिनट के लिए मैदान से बाहर निकालने के लिए दिखाया जाता है।
लाल कार्ड (Red Card) यह कार्ड मैच अथवा टूर्नामैंट से बाहर निकालने के लिए दिखाया जाता है।

PSEB 10th Class Physical Education Practical कबड्डी (Kabaddi)

प्रश्न 1.
कबड्डी के मैदान की लम्बाई-चौड़ाई बताओ।
उत्तर-
कबड्डी के मैदान की लम्बाई 12.50 मीटर और चौड़ाई 10 मीटर होती है। जूनियर लड़के और लड़कियों के लिए 11 मीटर लम्बाई और 8 मीटर चौड़ाई होती है।

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प्रश्न 2.
खेलने वाले खिलाड़ियों की संख्या बताओ।
उत्तर-
कबड्डी के कुल खिलाड़ियों की संख्या 12 होती है। 7 खेलते हैं और 5 खिलाड़ी अतिरिक्त (Substitutes) होते हैं।

प्रश्न 3.
कबड्डी का समय कितना होता है?
उत्तर-
कबड्डी का समय 20-5-20 मिनट का होता है। जूनियर लड़के और लड़कियों के लिए 15-5-15 मिनट का समय होता है।

प्रश्न 4.
कबड्डी का खेल शुरू कैसे होता है ?
उत्तर-
कबड्डी का खेल टॉस से शुरू होता है। जो टीम टॉस जीत जाती है, वह अपनी पसन्द का क्षेत्र चुनती है।

हकबड्डी (Kabaddi) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 5.
कबड्डी में लोना (Lona) के कितने अंक होते हैं ?
उत्तर-
कबड्डी के खेल में जब सभी खिलाड़ी मर जाते हैं तो विरोधी टीम को दो और अंक दिए जाते हैं, जिसे लोना कहा जाता है।

प्रश्न 6.
खिलाड़ी कब आऊट माना जाता है?
उत्तर-
जब हमला करने वाली टीम का खिलाड़ी विरोधी टीम के किसी खिलाड़ी को हाथ लगा दे या खिलाड़ी मैदान में से अपने-आप बाहर चला जाए तो आऊट माना जाता है।

प्रश्न 7.
कबड्डी में टाइम आऊट कितने लिए जा सकते हैं ?
उत्तर-
कबड्डी में दो टाइम आऊट लिए जाते हैं, जिसका समय 30 सैकिंड होता है।

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प्रश्न 8.
कबड्डी में हार-जीत किस प्रकार होती है ?
उत्तर-
जो टीम अधिक अंक ले जाती है, उसको विजयी माना जाता है। बराबर की हालत में 5-5 मिनट दिए जाते हैं जब तक कि फैसला नहीं हो जाता।

प्रश्न 9.
कबड्डी का खेल खिलाने वाले अधिकारियों की संख्या बताओ।
उत्तर-

  1. रैफ़री – 1
  2. अम्पायर = 2
  3. लाइनमैन = 2
  4. स्कोरर – 1

प्रश्न 10.
कबड्डी खेल के मुख्य फाऊल बताओ।
उत्तर-
कबड्डी खेल के निम्नलिखित मुख्य फाऊल हैं—

  1. दम डालने वाले खिलाड़ी को कैंची मारना।
  2. बाहर से कोचिंग देना।
  3. बालों से पकड़ना।
  4. विरोधी खिलाड़ी का गला दबाना।
  5. दूसरे खिलाड़ी पर घातक आक्रमण करना।

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प्रश्न 11.
कबड्डी खेलने के पांच मुख्य नियम लिखो।
उत्तर-
कबड्डी खेल के नियम निम्नलिखित हैं—

  1. खेल के समय यदि कोई खिलाड़ी बाहर चला जाए तो आऊट माना जाता है।
  2. यदि कोई खिलाड़ी दम डालने वाले खिलाड़ी को पकड़ते हुए बाहर चला जाए और दम डालने वाला सुरक्षित अपने क्षेत्र में चला जाए तो पकड़ने वाला आऊट माना जाएगा।
  3. कबड्डी ऊंची आवाज़ में न सुनी जा सके।
  4. किसी खिलाड़ी को जानबूझ कर धक्का मार कर बाहर नहीं निकाला जा सकता है।
  5. विरोधी कोर्ट में यदि कोई खिलाड़ी दम तोड़ देता है तो वह आऊट हो जाता है।

प्रश्न 12.
क्या कबड्डी के खेल में कोई खिलाड़ी तेल मलकर खेल सकता है ?
उत्तर-
कबड्डी के खेल में कोई भी खिलाड़ी तेल या चिकनाई वाली कोई भी चीज़ मलकर नहीं खेल सकता है।

प्रश्न 13
कबड्डी के खेल में नया परिवर्तन कौन-सा हुआ है ?
उत्तर-
कबड्डी के खेल में एक मीटर बोनस लाइन लगाई गई है।

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प्रश्न 14.
एक रेडर को बोनस का क्या लाभ है ?
उत्तर-
एक रेडर को बोनस लाइन क्रास करने पर एक नम्बर मिल जाता है।

गतका (Gattka) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions गतका (Gattka) Game Rules.

गतका (Gattka) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. गतके के प्लेटफार्म का आकार = गोल
  2. प्लेटफार्म का व्यास = 30′, 20 सैं० मी०
  3. गतके छड़ की लम्बाई = 3’3″, 100 सैं० मी०
  4. छड़ी का भार = 500 ग्राम
  5. छड़ी बनी है = बैंत की
  6. छड़ी की मोटाई = 1/2″ से 3/4″ 2 सैं० मी० से 3. सैं० मी०
  7. बाउट का समय = 3 मिनट, 11/2,1/2 मिनट के दो हॉफ
  8. खिलाड़ियों की पोशाक = जर्सी या कमीज़, पर पटका आवश्यक
  9. अधिकारी = रैफरी कौंसल
    दो तकनीकी अधिकारी, जज 1,
    स्कोकर, 1 टाईम कीपर = 1

हथियारों की सूची

  1. तलवार
  2. ढाल
  3. वर्छा
  4. गंडासी
  5. कमंद तोड़
  6. छड़ी
  7. कटार
  8. गदा
  9. खण्डा
  10. तेग।

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

गतका खेल की संक्षेप रूपरेखा
(Brief outline of the Gattka)

  1. गतके की खेल में सात खिलाड़ी होते हैं जिनमें पांच प्रतियोगिता में भाग लेते हैं। दो खिलाड़ी बदलने होते हैं।
  2. गतके का प्लेटफार्म गोल और यह 71/2 मीटर रेडियम का होता है।
  3. गतके की लम्बाई हत्थी से तीन फुट (3”) की होती है जो बैंत की बनी होती
  4. गतके की बाऊट का समय तीन मिनट होता है।
  5. गतके की खेल में तीन जज, एक रैफरी और एक टाईम कीपर होता है।

प्रश्न
गतका के प्लेटफार्म, पोशाक और समय के बारे में लिखें।
उत्तर-
प्लेटफार्म-गतके का प्लेटफार्म गोल दायरा होता है जो 15 मीटर का होता
पोशाक-प्रतियोगी जर्सी अथवा कमीज़ पहन सकता है परन्तु सिर पर पटका होना आवश्यक है।
गतके का साइज़-गतका बैत का होता है जिसकी हत्थी होती है और उस से लगी तीन फुट की बैत की छड़ लगी होती है।
समय-प्रत्येक बाऊट का समय पांच मिनट होता है।

प्रश्न
गतका में ड्रा, बाई और वाक ओवर के बारे में बताइए।
उत्तर-
ड्रा, बाई और वाक ओवर
Draw, Byes and Walkover

  1. सभी प्रतियोगिता के लिए ड्रा निकालने से पहले बाऊट के लिए खिलाड़ियों के नाम A, B, C, D, E लिये जाते हैं।
  2. गतके की प्रतियोगिता के A नाम वाला खिलाड़ी विरोधी की टीम के A वाले खिलाड़ी से बाऊट में भाग लेगा।
  3. उन मुकाबलों में जिनमें चार से अधिक प्रतियोगी हों। पहली सीरीज़ के लिए बाई निकाली जाती है ताकि दूसरी सीरीज़ से प्रतियोगियों की संख्या कम हो जाए।
  4. पहली सीरीज़ में जिन खिलाडियों को बाई मिलती है वह दूसरी सीरीज़ के पहले गतका खेलेंगे यदि बाइयों की संख्या विषम हो तो अन्तिम बाई प्राप्त करने वाला खिलाड़ी दूसरी सीरीज़ में पहले मुकाबले के जेतू के बाऊट में भाग लेगा।
    गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
  5. कोई भी प्रतियोगी पहली सीरीज़ में बाईं और दूसरी सीरीज़ में walkover नहीं ले सकता न ही किसी को लगातार दो वाक ओवर मिलते हैं।

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
गतका खेल में 20 प्रतियोगियों की बाऊट निकालने की सारणी बनाओ।
उत्तर-
गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 2
उत्तर-सारणी-बाऊट की बाइयां निकालना

प्रविष्टियों की संख्या बाऊट बाईं
5. 1 3
6. 2 2
7. 3 1
8. 4
9. 1 7
10. 2 6
11. 3 5
12. 4 4
13. 5 3
14. 6 2
15. 7 1
16. 8
17. 1 15
18. 2 14
19. 3 13
20. 4 12

 

प्रश्न
गतका खेल की प्रतियोगिता कैसे करवाई जाती है ?
उत्तर-
गतके की प्रतियोगिता
(Limitation of Competition)
प्रतियोगिताओं की सीमा–किसी भी प्रतियोगिता में पांच प्रतियोगियों को भाग लेने की आज्ञा है।
नया ड्रा (Fresh Draw)–यदि किसी एक ही स्कूल/कॉलेज/अथवा क्लब के दो सदस्यों का पहली सीरीज़ में ड्रा निकल जाए तो उनमें एक-दूसरे के पक्ष में प्रतियोगिता से निकलना चाहे तो नया ड्रा निकाला जाएगा।
वापसी (Withdraw)-ड्रा निकालने के बाद यदि प्रतियोगी बिना किसी कारण के प्रतियोगिता से हटना चाहे तो अधिकारी प्रबन्धकों को इसकी सूचना देगा।
रिटायर होना (Retirement) यदि कोई प्रतियोगी किसी कारण मुकाबले से रिटायर होना चाहता है तो उसे अधिकारी को सूचित करना होगा।
बाई (Byes)—पहली सीरीज़ के बाद उत्पन्न होने वाली बाइयों के लिए वह विरोधी छोड़ दिया जाता है जिससे अधिकारी सहमत हो।

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
गतका प्रतियोगिता में बाऊट को कौन नियन्त्रण करता है ?
उत्तर-
बाऊट का नियन्त्रण
(Bout’s Control)

  1. सभी प्रतियोगिताओं के मुकाबले एक रैफरी, तीन जजों, एक टाइम कीपर द्वारा करवाए जाते हैं। जब तीन से कम जज हों तो रैफरी स्कोरिंग पेपर को पूरा करेगा। प्रदर्शनी बाऊट एक रैफरी द्वारा कण्ट्रोल किया जाएगा।
  2. रैफरी एक स्कोर पैड् या जानकारी स्लिप का प्रयोग खिलाड़ियों के नाम के लिए करेगा। इन सब स्थितियों को जब कि बाऊट चोट लगने के कारण या किसी अन्य कारणवश स्थगित हो जाए तो रैफरी इस पर रिपोर्ट करके अधिकारी को देगा।
  3. टाइम कीपर प्लेटफार्म के एक ओर बैठेगा तथा जज तीन ओर बैठेंगे। सीटें इस प्रकार की होंगी कि वे खिलाड़ियों को संतोषजनक ढंग से देख सके। ये दर्शकों से अलग होंगे।

प्वाईंट देना
(Awarding of Points)

  1. सभी प्रतियोगिताओं में जज प्वाईंट देंगे।
  2. प्रत्येक राऊंड के अन्त में प्वाईंट स्कोरिंग पेपर पर लिखे जाएंगे तथा बाऊट के अन्त में जमा किए जाएंगे।
  3. प्रत्येक जज को विजेता मनोनीत करना होगा उसे अपने स्कोरिंग पेपर पर हस्ताक्षर करने होंगे।

स्कोरिंग
(Scoring)

  1. जो गतके का खिलाड़ी अपने विरोधी को सबसे अधिक बार गतके से छुएगा उसे उतने ही अंक मिलेंगे। सिर पर छू लेने के 2 अंक बाकी एक अंक मिलेगा।
  2. यदि बाऊट में दोनों खिलाड़ियों के मिले अंक बराबर हों तो सिर को जिस खिलाड़ी ने अधिक बार छूआ हो उसे विजेता घोषित किया जाएगा। यदि जज यह सोचे कि वह इन दोनों पक्षों में बराबर है तो वह अपना निर्णय उस खिलाड़ी के पक्ष में देगा जिसने अच्छी . सुरक्षा (Defence) का प्रदर्शन किया हो।

बाऊट रोकना
(Stopping the Bout)

  1. यदि रैफरी के मतानुसार एक खिलाड़ी को चोट लगने के कारण खेल जारी नहीं रख सकता या बाऊट बन्द कर देता है तो उसके विरोधी को विजेता घोषित कर दिया जाता है।
  2. रैफरी को बाऊट रोकने का अधिकार है।
  3. यदि कोई प्रतियोगी समय पर बाऊट को शुरू करने में असमर्थ होता है तो वह बाऊट हार जाएगा।

शक्ति फाऊल
(Suspected Foul)
यदि रैफरी को फाऊल का सन्देह हो जाए जिसे उसने स्वयं साफ नहीं देखा वह जजों की सलाह ले सकता है तथा उसके अनुसार अपना फैसला दे सकता है ।

गतका (Gattka) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
गतका खेल में त्रुटियां लिखें।
उत्तर-
त्रुटियां
(Fouls)

  1. कोहनी को मारना
  2. गर्दन या सिर के नीचे जान-बूझ कर चोट लगाना।
  3. गिरे हुए प्रतियोगी को मारना।
  4. पकड़ना।
  5. सिर या शरीर के भार लेटना।
  6. रफिंग।
  7. कन्धे मारना।
  8. कुश्ती करना।
  9. निरन्तर सिर ढक कर रखना।
  10. कानों पर दोहरी चोट मारना।

PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 7 शीशा और धातुओं की सफ़ाई

Punjab State Board PSEB 7th Class Home Science Book Solutions Chapter 7 शीशा और धातुओं की सफ़ाई Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Home Science Chapter 7 शीशा और धातुओं की सफ़ाई

PSEB 7th Class Home Science Guide शीशा और धातुओं की सफ़ाई Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
चाँदी के गहनों या बर्तनों को साफ करने के लिए किस पदार्थ का प्रयोग करोगे ?
उत्तर-
चूने तथा गर्म पानी के प्रयोग से।

प्रश्न 2.
लोहे के जंग को किस पदार्थ से उतारोगे?
उत्तर-
चूने का प्रयोग करके।

प्रश्न 3.
पीतल के बर्तनों को साधारण विधि से चमकाने के लिए क्या प्रयोग करोगे ?
उत्तर-
नींबू व नमक से रगड़ेंगे।

PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 7 शीशा और धातुओं की सफ़ाई

प्रश्न 4.
ताँबे के बर्तनों को किस चीज़ से चमकाया जाता है ?
उत्तर-
ताँबे के बर्तनों को कपड़े साफ़ करने वाले सोडे द्वारा चमकाया जा सकता है।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
ताँबे को साफ़ करने के लिए सोडा क्यों नहीं इस्तेमाल में लाना चाहिए?
उत्तर-
सोडा या क्षारीय पदार्थों से ताँबे के बर्तन काले पड़ जाते हैं। अतः इसकी सफ़ाई के लिए सोडे का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

प्रश्न 2.
स्टील के बर्तन और चाकू को कैसे साफ़ करोगे?
उत्तर-
स्टील के बर्तन साफ़ करने के लिए गर्म पानी में अमोनिया का घोल बनाकर प्रयोग में लाना चाहिए। स्टेनलेस स्टील की वस्तुएँ रगड़कर नहीं धोनी चाहिएं। गर्म पानी में साबुन के घोल द्वारा इनको साफ़ करके, सूखे कपड़े से पोंछकर रख देना चाहिए। इनको चमकाने के लिए सिरके का प्रयोग भी किया जाता है। बर्तनों को सिरके से मलने के पश्चात् पानी से धो लेना चाहिए। तत्पश्चात् कपड़े से पोंछने पर ये चमक उठते हैं। चाकू पर जल्दी दाग़ पड़ जाते हैं। अगर साफ़ न किया जाए तो खराब हो जाता है। चाकू को कभी भी पानी में नहीं डालना चाहिए। इसे हमेशा नमी युक्त कपड़े से साफ़ करना चाहिए।

PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 7 शीशा और धातुओं की सफ़ाई

प्रश्न 3.
बर्तन साफ़ करने क्यों जरूरी है?
उत्तर-
खाना पकाने से बर्तन गन्दे हो जाते हैं। इसलिए बर्तन साफ़ करने ज़रूरी हैं। इसे सिरका, नमक और नींबू से रगड़कर साफ़ करना चाहिए।

प्रश्न 4.
एल्यूमीनियम को कैसे साफ़ करोगे?
उत्तर–
सोडा या क्षारीय पदार्थों से एल्यूमीनियम धातु के बर्तन काले पड़ जाते हैं, अत: इनकी सफ़ाई करने में क्षारीय पदार्थों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। इन बर्तनों को गर्म पानी में साबुन का घोल बनाकर साफ़ करना चाहिए। यदि बर्तन बहुत गन्दा हो गया है तो इसे उबलते हुए पानी में सिरके की कुछ बूंदें अथवा नींबू डालकर उसमें भिगो दिया जाना चाहिए। गीले बर्तनों को सूखे कपड़े से अवश्य पोंछकर रखना चाहिए।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सख्त और नरम धातएँ किसको कहते हैं?
उत्तर-
सख़्त धातुएँ—ये वे धातुएँ हैं जो जल्दी नहीं घिसती, जैसे-लोहा, पीतल आदि।
नरम धातुएँ-ये धातुएँ नरम होने के कारण जल्दी घिस जाती हैं, जैसे-सोना, ताँबा और टिन।

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प्रश्न 2.
अगर पीतल गन्दा हो तो कैसे साफ़ करोगे?
उत्तर-
पीतल की वस्तुओं पर अति शीघ्र दाग़ पड़ जाते हैं। इनको नींबू व नमक से रगड़कर साफ़ किया जाता है। तत्पश्चात् गर्म पानी से धोकर पोंछ लेना चाहिए। इमली या आम की खटाई से भी पीतल के बर्तन चमकाये जाते हैं। सजावट की वस्तुओं को चमकाने के लिए बने बनाये ब्रासो जैसे पॉलिश बहुत प्रभावशाली होते हैं।
खट्टी वस्तुओं के रखने से पीतल के बर्तनों पर हरे-हरे दाग़ बन जाते हैं। ऐसे हरे दागों को अमोनिया से छुड़ाया जाता है।

प्रश्न 3.
रोशनदान, खिड़कियाँ और अलमारियों के शीशे कैसे साफ़ करोगे ?
उत्तर-
शीशे को थोड़ा नमी युक्त कर लेना चाहिए। इसके बाद दोनों हाथों में अख़बार के कागज़ लेकर शीशे को रगड़ना चाहिए। अगर शीशा अधिक गन्दा हो तो चाक के चूरे में थोड़ा पानी मिलाकर शीशे के दोनों तरफ़ लगाकर थोड़ा सूख जाने के बाद अख़बार की कागज़ से रगड़ना चाहिए। शीशे को चमकाने के लिए साफ़ करने के बाद थोड़ा मैथिलेटिड स्पिरिट रूई के टुकड़े में डालकर शीशे पर लगा देना चाहिए। कई बार खिड़कियों या रोशनदान के शीशों पर मक्खियाँ बैठ जाती हैं और उन्हें गन्दा कर देती हैं। इसके लिए पैराफिन या मिट्टी का तेल इस्तेमाल करना चाहिए।

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प्रश्न 4.
धातुएँ साफ़ करने के लिए क्या-क्या सामान चाहिएँ ?
उत्तर-
धातुएँ साफ़ करने के लिए निम्नलिखित सामान चाहिएँ

  1. साबुन,
  2. चूना,
  3. मिट्टी या राख,
  4. नींबू,
  5. इमली,
  6. गर्म पानी का घोल,
  7. सिरका तथा नमक,
  8. ब्रासो आदि।

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अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्टील के बर्तनों को किस से साफ़ किया जाता है ?
उत्तर-
साबुन के घोल के साथ पानी की सहायता से।

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प्रश्न 2.
लोहे के सामान को कैसे साफ़ करते हैं ?
उत्तर-
मिट्टी या राख से रगड़कर।

प्रश्न 3.
एल्यूमीनियम के सामान को साफ़ करने के लिए किन पदार्थों का प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
नींबू के रस तथा पानी का।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पीतल की वस्तुओं को किन-किन चीज़ों से साफ़ किया जा सकता
उत्तर-

  1. राख व मिट्टी (रोज़ उपयोग किए जाने वाले बर्तनों के लिए)
  2. इमली, नींबू (अधिक गन्दे बर्तनों के लिए)
  3. गर्म पानी का घोल (सजावटी वस्तुओं के लिए)
  4. सिरका तथा नमक (दाग़ धब्बे पड़े हों तो)
  5. ब्रासो (चमकाने के लिए)।

PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 7 शीशा और धातुओं की सफ़ाई

प्रश्न 2.
धातु से बनी वस्तुओं को साफ़ करने के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-

  1. धातु की वस्तु से चिकनाई दूर करने के लिए सर्वप्रथम इसे गर्म साबुन वाले घोल से धोना चाहिए।
  2. सफ़ाई करते समय नीचे अख़बार का कागज़ बिछा लेना चाहिए जिससे फ़र्श या मेज़ गन्दा न हो।
  3. इसके पश्चात् इसे स्वच्छ गर्म पानी से अच्छी प्रकार धो लेना चाहिए।
  4. वस्तु पर पॉलिश करने से पहले इसे भली प्रकार सुखा लेना चाहिए।
  5. अन्त में इसे नर्म, सूखे कपड़े से पॉलिश लगाकर रगड़कर चमका लेना चाहिए।
  6. खाने के प्रयोग में लाये जाने वाले सभी बर्तनों को साफ़ करने के पश्चात् साफ़ पानी से अच्छी तरह धोकर सुखा लेना चाहिए।
  7. ध्यान रहे कि इन पर किसी भी प्रकार की पॉलिश नहीं लगाई जानी चाहिए, विशेषकर इनकी भीतरी सतहों पर जोकि खाने के सीधे सम्पर्क में आती हैं।
  8. ऐसा कोई पदार्थ जिससे धातुओं को हानि पहुँचती हो, प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।

प्रश्न 3.
तामचीनी को कैसे साफ करोगे ?
उत्तर-
तामचीनी साफ़ करने के लिए छोटा-सा बोरी का टुकड़ा लेना चाहिए। इसमें राख और साबुन मिलाकर टुकड़े की मदद से बर्तन को रगड़ना चाहिए। अगर बर्तन में भोजन सड़ गया हो तो अण्डे का छिलका रगड़ना चाहिए, इससे खूब चमक आती है और बर्तन के दाग़ साफ़ हो जाते हैं।

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बड़े उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
घर में प्रयोग किए जाने वाले धातु के सामान की सफ़ाई का वर्णन करो।
उत्तर-
हमारे दैनिक जीवन में विभिन्न धातुओं के प्रति बर्तन तथा वस्तु प्रयोग में लाई जाती हैं, अतएव इनकी सफ़ाई की जानकारी का ज्ञान होना भी आवश्यक है।
कुछ धातुओं पर शीघ्र ही खरोंच पड़ जाती है, उन्हें कोमल धातु कह सकते हैं, कुछ धातु कठोर होते हैं, उन पर शीघ्र खरोंच नहीं पड़ती।

  1. सफ़ाई से पूर्व वस्तु पर पड़ी चिकनाई व धूल को गर्म पानी व साबुन के घोल से धो लेना चाहिए।
  2. पॉलिश लगाने से पूर्व वस्तु को भली-भाँति सुखा लेना चाहिए।
  3. पॉलिश लगाने के बाद वस्तु को थोड़ी देर सूखने देना चाहिए, फिर मुलायम कपड़े से रगड़कर चमकाना चाहिए।

चाँदी-हवा के सम्पर्क से चाँदी का सामान काला हो जाता है इसीलिए इसे समय समय पर साफ़ किया जाना चाहिए। इसके लिए एक किलो पानी में एक छोटा चम्मच नमक व एक चम्मच सोडा मिलाकर एक साफ़ बर्तन में पांच मिनट तक उबालकर वस्तु को उसमें डाल दें। वस्तु निखर जायेगी, फिर वस्तु को निकालकर उसे स्वच्छ पानी व साबुन से धोकर मुलायम व सूखे कपड़े से पोंछ लेना चाहिए।

चाँदी के सामान को सूखे चूने में दो तीन घंटे रखकर फिर कूची से झाड़-पोंछकर भी चमकाया जाता है। चाँदी की वस्तु को आधे घंटे तक खट्टे दूध में भिगोकर उसके बाद उसे साबुन से धोकर पोंछ लेना चाहिए। चाँदी के बर्तन उब या बथुए के पानी से भी साफ़ किए जाते हैं।

ताँबा-तांबे की वस्तुएँ चूने की सफ़ेदी से साफ़ की जाती हैं। सफेद छने हुए चूने के पाउडर को भिगोकर एक कपड़े में लगाकर गन्दे ताँबे के बर्तन में फेरना चाहिए फिर उसे कपड़े से रगड़कर धो लेना चाहिए। चूना, सोडा व सिरका मिलाकर तो बहुत गन्दे ताँबे के बर्तन भी साफ़ किए जा सकते हैं।

लोहा-नमी के कारण लोहे पर बहुत जल्दी जंग लग जाती है। चूने से जंग को साफ़ करना चाहिए। कड़ाही, बाल्टी आदि पर लगी जंग को मिट्टी, बालू, राख या ईंट के टुकड़े से रगड़कर साफ़ किया जाता है। जंग छुड़ाने के बाद बर्तन को भली-भाँति धो-पोंछकर सरसों या मिट्टी का तेल लगाकर रख देना चाहिए। लोहे के बर्तन में पानी का अंश नहीं रहने देना चाहिए। बर्तन को खड़ा करके रखने से सतह पर पानी का अंश नहीं रहता।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
धातुएँ कितने प्रकार की हैं?
उत्तर-
दो।

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प्रश्न 2.
किसी कठोर धातु का नाम लिखें।
उत्तर-
लोहा।

प्रश्न 3.
सोना ……………. धातु है।
उत्तर-
नर्म।

प्रश्न 4.
सोडा या क्षारीय पदार्थों से एल्यूमीनियम धातु को क्या होता है?
उत्तर-
काली पड़ जाती है।

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प्रश्न 5.
पीतल की वस्तुओं को साफ़ करने के लिए बाज़ार से क्या मिलता है?
उत्तर-
ब्रासो।

प्रश्न 6.
नमी होने से लोहे को क्या हानि होती है?
उत्तर-
जंग लग जाता है।

प्रश्न 7.
चाँदी के बर्तन उबले आलू या …………… के पानी से भी साफ़ किए जाते हैं।
उत्तर-
बथुए।

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शीशा और धातुओं की सफ़ाई PSEB 7th Class Home Science Notes

  • धातुएँ दो प्रकार की होती हैं-(1) सख़्ज़ या कठोर धातुएँ, (2) नरम या मुलायम धातुएँ।
  • कठोर धातुएँ-ये वे धातुएँ हैं जो जल्दी नहीं घिसती, जैसे-लोहा, पीतल, स्टील आदि।
  • नरम धातुएँ ये धातुएँ नरम होने के कारण जल्दी घिस जाती हैं, जैसे- सोना, चाँदी, ताँबा और टिन।
  • स्टील और शीशे के बर्तन विम या किसी अन्य साफ़ करने वाले पाउडर से साफ़ करने चाहिएं और बाद में गर्म पानी से धोकर पोंछ लेने चाहिएं।
  • शीशे को चमकाने के लिए साफ़ करने के बाद थोड़ा मैथिलेटिड स्पिरिट रूई के टुकड़े में डालकर शीशे पर लगाना चाहिए।
  • स्टोव और पीतल की सजावट वाली चीज़ों को ब्रॉसो से साफ करना चाहिए, लेकिन खाने वाले बर्तनों को ब्रासो से साफ़ नहीं करना चाहिए।
  • ताँबे वाले बर्तन को खूब गर्म पानी से धोना चाहिए। तामचीनी या अनैमल में लगे चिकनाई और चाय के दाग़ छुड़ाने के लिए नमक का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • धातुओं को साफ़ करने के लिए साबुन, राख, विम, गर्म पानी, चाक, झाँवा, अण्डे के छिलकों की जरूरत होती है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य

PSEB 11th Class Geography Guide समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1 या 2 शब्दों में दें-

प्रश्न (क)
लहरों के ऊँचे भाग को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
क्रेस्ट (Crest)।

प्रश्न (ख)
भारत के समुद्री तट की लंबाई क्या है ?
उत्तर-
7516 कि०मी०।

प्रश्न (ग)
विश्व के दूसरे नंबर पर बड़ी बीच कौन-सी है ?
उत्तर-
मरीना बीच (चेन्नई)।

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प्रश्न (घ)
जब दो स्पिट आपस में मिल जाते हैं, तो इसको क्या कहा जाता है ?
उत्तर-
लूपड बार (Looped Bar)।

2. निम्नलिखित पर नोट लिखें-

(क) स्पिट (Spit)
(ख) समुद्री बीच (Sea Beach)
(ग) समुद्री गुफा (Sea Caves)
(घ) हाईड्रोलिक एक्शन (Hydrolic Action)।
उत्तर-
(क) स्पिट-रेत की वह श्रेणी जिसका एक सिरा तट से जुड़ा होता है और दूसरा सिरा समुद्र में डूबा होता है।
(ख) समुद्री बीच-तट के साथ मलबे से बनी श्रेणी को बीच कहते हैं।
(ग) समुद्री गुफा-सागर की लहरों के अपरदन से तट पर चट्टानें टूटकर गुफा का निर्माण करती हैं।
(घ) हाईड्रोलिक एक्शन-जब जल-दबाव के कारण चट्टानें टूटती हैं, तो उन्हें जल-दबाव क्रिया कहते हैं।

3. निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट करो-

(i) क्रेस्ट (Crest) और ट्रफ (Trough)
(ii) रेत बार (Sand Bar) और लैगून (lagoon)
उत्तर-
क्रेस्ट (Crest)-
(क) लहर के सबसे ऊँचे उठे हुए भाग को क्रेस्ट (Crest) कहते हैं।
(ख) हवा की शक्ति से लहरों का पानी ऊपर उठ जाता है।

ट्रफ (Trough)-
(क) लहर के सबसे नीचे दबे हुए भाग को ट्रफ (Trough) कहते हैं।
(ख) हवा की शक्ति कम होने से लहरों का पानी नीचे दब जाता है।

(ii) रेत बार (Sand Bar) – जब लहरें मलबे को तट के समानांतर एक श्रेणी के रूप में जमा कर देती हैं, तो इसे रेत बार कहते हैं।
लैगून (Lagoon) – कई तटों पर रेत की श्रेणियों के पीछे दलदले क्षेत्र बन जाते हैं, इनके मध्य पानी की एक झील बनती है, जिसे लैगून कहते हैं।

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4. निम्नलिखित के उत्तर विस्तार सहित दो :

प्रश्न (क)
समुद्री जल की खुर्चन (अपघर्षण) की क्रिया (Erosional work) क्या है और इससे बनने वाली धरातलीय आकृतियों की व्याख्या करें।
उत्तर-
समुद्री तरंगों के अपरदन द्वारा उत्पन्न भू-आकृतियाँ (Landforms Produced by Sea Wave Erosion)-

समुद्री तरंगें अपरदन द्वारा तटों पर नीचे लिखी भू-आकृतियों की रचना करती हैं-

1. खड़ी चट्टान/समुद्री क्लिफ (Sea Cliffs)—समुद्री लहरें सबसे अधिक प्रभाव तट पर स्थित चट्टानों के निचले भाग पर डालती हैं। नीचे से चट्टानें कट जाती हैं और एक नोच (Notch) बन जाती है। तरंगों के निरंतर हमले के कारण नोच गहरी होती जाती है जिससे ऊपर का भाग आगे को झुका हुआ लगने लगता है। कुछ समय के बाद यह झुका हुआ भाग अपने ही भार के कारण टूटकर नीचे गिर जाता है। इसके फलस्वरूप नोच के ऊपरी भाग फिर से खड़ी ढलान वाले हो जाते हैं। तट पर ऐसी खड़ी ढलान को खड़ी चट्टान/समुद्री क्लिफ कहते हैं।

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2. लहर-कटा चबूतरा (Wave-cut Platform or Bench)—कंधियों अथवा क्लिफों और नोचों (Notches) पर तरंगों के लगातार हमले के कारण वे कटकर स्थल की ओर पीछे को हटते रहते हैं। इसके परिणामस्वरूप अगले भाग में बनी एक नोच का विस्तार होता रहता है, जिसे लहर-कटा चबूतरा (Wave-cut Platform) कहते हैं।

3. समुद्री गुफाएँ (Sea Caves)-कमज़ोर चट्टानों वाली नोचों (Notches) में तरंगों के जल-दबाव (Hydraulic Pressure) के कारण उनमें दरारें उत्पन्न हो जाती हैं। तरंगें इन जोड़ों और दरारों के द्वारा प्रभाव डालकर उन्हें चौड़ा कर देती हैं। तरंगों के अपरदन के समय इन दरारों से भीतरी हवा दबाई जाती है और जब ये तरंगें समुद्र की ओर मुडती हैं तो जल के दबाव से मुक्त यह भीतरी हवा फैलती है और चट्टानों पर दबाव डालती है। इस क्रिया के निरंतर होते रहने से चट्टानें टूटती रहती हैं और कुछ समय के बाद गहरा खड्डा बन जाता है। धीरेधीरे यह खड्ड, गहरी गुफा का रूप धारण कर लेता है। दो पड़ोसी गुफाओं के बीच की दीवार टूट जाने पर
महराब (Arch) बन जाती है, जिसे प्राकृतिक पुल (Natural Bridge) कहते हैं।

4. समुद्री किनारे के सुराख (Spout Horns or Blow Holes)-तट पर हमले के समय तरंगें गुफाओं के मुँह को जल से बंद कर देती हैं, जिससे गुफाओं की अंदर की वायु अंदर ही बंद हो जाती है। यदि गुफा की छत कमज़ोर हो, तो वह वायु उसको फाड़कर ऊपर सुराख कर देती है। इसे समुद्री किनारे के सुराख कहते हैं। यदि तरंगों के हमले के समय वायु सीटी बजाती हुई इन सुराखों से निकलती है, तो गुफा में भरा जल भी वायु के साथ फव्वारे के समान बाहर निकलता है, इसीलिए इसे टोंटीदार सुराख (Spouting horn) कहकर भी पुकारते हैं।

5. खाड़ियाँ (Bays)–जब किसी तट पर कोमल और कठोर चट्टानें लंब रूप में स्थित हों, तो कोमल चट्टानें (Soft Rocks) अंदर की ओर अधिक कट जाती हैं। इस प्रकार कोमल चट्टानों में खाड़ियाँ (Bays) बन जाती हैं।

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6. हैडलैंड या केप या अंतरीप (Headland or Cape)-तट की लंबवर्ती स्थिति में फैली एक कठोर चट्टान के दोनों तरफ से नर्म चट्टानों का अपरदन हो जाता है और वहाँ खाड़ियाँ बन जाती हैं और वह सख्त चट्टान समुद्र में बढ़ी हुई रह जाती है, जिसे अंतरीप कहते हैं।

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7. स्टैक (Stack)-जब महराब की छत तरंगों द्वारा अपरदित हो जाती है अथवा किसी अन्य कारण से टूटकर नष्ट हो जाती है तो मेहराब का अगला भाग पिछले भाग से स्तंभ के रूप में अलग खड़ा रह जाता है। इस स्तंभ को स्टैक कहते हैं। स्कॉटलैंड के उत्तर में ओरकनीज़ (Orkneys) टापूओं में Old man of Hoai इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

Geography Guide for Class 11 PSEB समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
समुद्री जल की गतियाँ बताएँ।
उत्तर-
लहरें, धाराएँ और ज्वारभाटा।

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प्रश्न 2.
तट रेखा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जहाँ जल-मंडल, थल-मंडल और वायु-मंडल मिलते हों।

प्रश्न 3.
ब्रेकर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
लहरों का वह भाग, जो तट से टकराता है।

प्रश्न 4.
सागरीय जल किन चट्टानों पर घुलनशील क्रिया करता है ?
उत्तर-
चूने का पत्थर, डोलोमाइट और चॉक।

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प्रश्न 5.
क्लिफ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
तट पर खड़ी ढलान वाली चट्टान।

प्रश्न 6.
गुफ़ा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
क्लिफ़ के नीचे बने कटाव।

प्रश्न 7.
गुफ़ा कैसे बनती है ?
उत्तर-
Notch के बड़ा हो जाने पर।

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प्रश्न 8.
स्टैक कैसे बनते हैं ?
उत्तर-
कठोर चट्टानों के बचे-खुचे भाग।

प्रश्न 9.
भारत के पूर्वी तट पर किन्हीं दो लैगून झीलों के नाम बताएँ।
उत्तर-
चिलका झील और पुलीकट झील।

प्रश्न 10.
भारत के पश्चिमी तट पर किसी एक लैगून झील का नाम बताएँ।
उत्तर-
वेंबनाद झील।

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अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1.
सागरीय लहरों के तीन प्रकार बताएँ।
उत्तर-

  1. ब्रेकर
  2. स्वैश
  3. कवाश।

प्रश्न 2.
Under Tow से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
तट से टकराकर मुड़ती हुई लहर के नीचे के जल को Under Tow कहते हैं।

प्रश्न 3.
लहरों के अपरदन की क्रियाएँ बताएँ।
उत्तर-

  • जलीय दबाव क्रिया
  • घर्षण क्रिया
  • सहघर्षण क्रिया
  • घुलनशील क्रिया।

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प्रश्न 4.
समुद्री क्लिफ (Cliff) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
समुद्र तट पर खड़े ढलान वाले खंड को Cliff कहते हैं।

प्रश्न 5.
सागरीय लहरों का अपरदन किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-

  • तरंग की ऊँचाई
  • चट्टानों का झुकाव
  • चट्टानों की रचना
  • लहरों की दिशा।

प्रश्न 6.
समुद्री किनारे के सुराख (Blow-hole) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
तट के निकट गुफाओं की छत पर जल सुराख कर देता है, जिसमें से वायु गुज़रती है, उसे समुद्री किनारे के सुराख कहते हैं।

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प्रश्न 7.
स्टैक से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सागरीय तट पर कठोर चट्टानों के बचे-खुचे भाग को स्टैक कहते हैं।

प्रश्न 8.
बीच किसे कहते हैं ?
उत्तर-
तट के साथ-साथ मलबे के निक्षेप से बनी श्रेणियों को बीच कहते हैं।

प्रश्न 9.
रोधक किसे कहते हैं ?
उत्तर-
तट के समानांतर रेत की श्रेणी, जो रोकने का काम करती है, रोधक कहलाती है।

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प्रश्न 10.
लैगून से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
रोधक और तट के बीच बनी झील को लैगून कहते हैं।

प्रश्न 11.
स्पिट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
स्पिट रेत की एक श्रेणी होती है, जिसका एक सिरा तट से जुड़ा होता है और दूसरा सिरा खुले सागर में होता है।

प्रश्न 12.
मेहराब कैसे बनती है ?
उत्तर-
दो गुफ़ाओं के मिलने से छत एक ढक्कन के समान खड़ी रहती है, जिसे मेहराब (Arch) कहते हैं।

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प्रश्न 13.
तमबोलो से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जब कोई रेत, रोधक तट को किसी वायु के साथ जोड़ती है, उसे तमबोलो कहते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न: (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
लहरों के द्वारा अपरदन के अलग-अलग रूप बताएँ।
उत्तर-
अपरदन (Erosion)-तट पर तोड़-फोड़ का काम आमतौर पर सर्फ (Surf), लहरों या तूफ़ानी लहरों द्वारा ही होता है। समुद्री लहरों द्वारा अपरदन अधिक-से-अधिक 200 मीटर की गहराई तक होता है। यह अपरदन चार प्रकार से होता है-

  1. जल-दबाव क्रिया (Water Pressure)-सुराखों में जल के दबाव से चट्टानें टूटने और बिखरने लगती हैं।
  2. अपघर्षण (Abrasion)-बड़े-बड़े पत्थर चट्टानों से टकराकर उन्हें तोड़ते रहते हैं।
  3. टूट-फूट (Attrition)-पत्थरों के टुकड़े आपस में टकराकर टूटते रहते हैं।
  4. घुलनशील क्रिया (Solution)—समुद्री जल चूने वाली चट्टानों को घोलकर अलग कर देता है।

प्रश्न 2.
लहरों द्वारा अपरदन किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-
लहरों द्वारा अपरदन कई तत्त्वों पर निर्भर करता है- .

  1. चट्टानों की प्रकृति (Nature of Rocks)—तट पर स्थित कठोर चट्टानों की तुलना में कमज़ोर चट्टानें जल्दी ही टूट जाती हैं।
  2. लहरों का वेग और ऊँचाई (Speed and Height of Waves)-बड़ी और ऊँची लहरें अधिक कटाव करती हैं।
  3. तट के सागर की ओर ढलान (Slope) और ऊँचाई-कम ढलान वाले मैदानी तटों पर कटाव कम होता है।
  4. चट्टानों में सुराख (holes) और दरारों (Faults) का होना- यदि तटों की चट्टानों में सुराख और दरारें हों, तो तट का कटाव आसानी से होता है।
  5. जल की गहराई (Depth of water)-लहरें 30 फुट की गहराई तक ही कटाव करती हैं।

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प्रश्न 3.
समुद्री गुफाएँ कैसे बनती हैं ?
उत्तर-
समुद्री गुफाएँ (Sea Caves)-आधार की कोमल चट्टानों के टूटने या घुल जाने पर तट के पास खोखले स्थान बन जाते हैं। लहरों द्वारा हवा के बार-बार घूमने और निकलने की क्रिया से ये स्थान चौड़े हो जाते हैं और गुफाएँ बन जाती हैं। इन गुफाओं की ऊपरी छत कठोर चट्टानों से बनी होती है। दो पड़ोसी गुफ़ाओं के बीच की दीवार टूट जाने से मेहराब (Arch) बन जाती है। इसे प्राकृतिक पुल भी कहते हैं।

प्रश्न 4.
भू-जीभ (Spit) और भित्ती (Bar) में अंतर बताएँ।
उत्तर –
भू-जीभ (Spit)-

  1. मलबे के निक्षेप से बनी श्रेणी को भू-जीभ कहते हैं, जिसका एक सिरा तट से जुड़ा होता है और दूसरा सिरा खुले समुद्र में डूबा होता है।
  2. इसकी शक्ल एक जीभ के समान होती है।
  3. यह पानी में डूबी होती है और फिर से हुक (Hook) भी बन जाती है।

भित्ती (Bar)-

  1. लहरों द्वारा तट या खाड़ी के समानांतर निक्षेप से रेत की बनी ऊँची श्रेणी या रोक को भित्ती कहते हैं।
  2. यह रोक तट के समानांतर होती है।
  3. यह पानी से बाहर बनती है और इसके पीछे एक लैगून झील बन जाती है।

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निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
तरंगों के प्रकारों और उनके अपरदन कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्र का अपरदन, परिवहन और निक्षेपण कार्य, इसके जल में उत्पन्न होने वाली तीन गतियों – तरंगों या लहरों, ज्वारभाटा और जल-धाराओं द्वारा होता है। इनमें से तरंगें सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।

समुद्री तरंगें (Sea Waves)- पवनों के प्रभाव से सागरीय जल के तल के ऊँचा-नीचा होने को तरंग (Waves) कहते हैं। तरंग में जल अपने मूल स्थान से आगे नहीं बढ़ता, बल्कि अपने स्थान पर ही ऊपर-नीचे होता रहता है। महासागरों में पवनें बड़ी तेज़ी से चलती हैं। इस कारण कई बार 5 से 10 मीटर तक ऊँची तरंगें उठती हैं।

समुद्री तरंगों द्वारा अपरदन को नियंत्रित करने वाले कारक (Factors controlling the Erosion by Sea Waves)-

तरंगों द्वारा अपरदन सभी तटों पर एक समान नहीं होता, क्योंकि इनकी परिस्थितियाँ अलग-अलग स्थानों पर भिन्नभिन्न होती हैं। तरंगों द्वारा अपरदन को नीचे लिखे कारक प्रभावित करते हैं-

1. तरंगों की ऊँचाई (Height of the Waves) तरंगों की ऊँचाई के अनुसार ही तट पर जल आता है। ऊँची तरंगें तट पर ही अधिक जल फेंकती हैं। यह जल अधिक मात्रा में कंकड़, रेत आदि को प्रभावित करता है और तटों से टकराकर अधिक अपरदन करता है।

2. तटीय चट्टानों का झुकाव (Inclination of Coastal Rocks)—जिन तटों पर चट्टानों की परतों का – झुकाव समुद्र की ओर होता है, उन परतों के जोड़ तरंगों के सामने होते हैं, जिसके कारण उनका अपरदन आसान हो जाता है।

3. तटीय चट्टानों की संरचना (Structure of Coastal Rocks) चट्टानों की संरचना अपरदन को बहुत प्रभावित करती है। नर्म चट्टानें जल्दी टूटती हैं। कार्स्ट तटों पर तरंगें तेज़ गति से अपरदन करती हैं।

4. तरंगों की दिशा (Direction of Waves)-तटीय चट्टानों पर सीधी आकर टकराने वाली तरंगें अधिक अपरदन करती हैं।

5. वनस्पति फैलाव (Vegetation Cover)-तटों पर उगे पेड़-पौधों की जड़ें चट्टानों को खोखला कर देती हैं, जिस कारण तरंगों द्वारा तटों पर अपरदन आसान हो जाता है।

6. तरंगों की गहराई (Depth of Waves) तरंगों का अधिक कटाव 10 मीटर की गहराई तक ही होता है।

समुद्री लहरें (Sea Waves)-

समुद्री लहरों का काम समुद्री तटों तक ही सीमित रहता है। हवा के प्रभाव से समुद्र के पानी में लहरें पैदा होती हैं। हवा की शक्ति से समुद्र के पानी का कुछ भाग ऊपर उठ आता है और कुछ भाग नीचे दब जाता है। सबसे ऊँचे उठे हुए भाग को Crest और सबसे नीचे दबे भाग को ट्रफ (Trough) कहते हैं। महासागरों में लहरों की ऊँचाई 10 मीटर तक होती है, पर तूफान के समय लहरों की ऊँचाई 20 मीटर तक ऊँची हो जाती है।

लहरों के प्रकार (Types of Waves) –
1. ब्रेकर (Breaker)-समुद्र तट पर लहरों का उच्च भाग टूटकर तट की ओर आगे बढ़ता है। इसे ब्रेकर या सर्फ (Surf) या स्वैश (Swash) कहते हैं।

2. बैकवॉश (Backwash)-तट से टकराकर पानी वापिस जाती हुई लहर के नीचे-नीचे चलता है। इस वापिस जाते हुए जल को (Under Tow) या उतार (backwash) कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 4

समुद्री लहरों का कार्य (Work of Sea Waves)-दूसरे साधनों के समान लहरें भी अपरदन, परिवहन और निक्षेप का कार्य करती हैं।
अपरदन (Erosion)-तट पर तोड़-फोड़ का काम आमतौर पर सर्फ (Surf) लहरों या तूफानी लहरों द्वारा ही होता है। समुद्री लहरों द्वारा अपरदन अधिक-से-अधिक 200 मीटर की गहराई तक होता है। यह अपरदन चार प्रकार से होता है –

  1. जल-दबाव क्रिया (Water Pressure)-सुराखों में जल के दबाव से चट्टानें टूटने और बिखरने लगती हैं।
  2. अपघर्षण (Abrasion)-बड़े-बड़े पत्थर चट्टानों से टकराकर उन्हें तोड़ते रहते हैं।
  3. तोड़-फोड़ (Attrition)—पत्थरों के टुकड़े आपस में टकराकर टूटते रहते हैं।
  4. घुलनशील क्रिया (Solution)-समुद्री जल चूने वाली चट्टानों को घोलकर अलग कर देता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न 2.
समुद्री लहरों के निक्षेप से बनने वाली भू-आकृतियों का वर्णन करें।
उत्तर-
समुद्री तरंगों के निक्षेप द्वारा उत्पन्न भू-आकृतियां (Landforms Produced by Deposition of Sea Waves) – समुद्री तरंगों के निक्षेप द्वारा नीचे लिखी भू-आकृतियों का निर्माण होता है-

1. तरंग-निर्मित चबूतरा (Wave-built Platform)-तटों का अपरदन करके तरंगें, जिन पदार्थों को प्राप्त करती हैं, उनमें से हल्के पदार्थों को दूर ले जाकर पानी में डूबे हुए ढलान वाले तट पर निक्षेप कर देती हैं, जिससे वह भाग एक समतल चबूतरे का रूप धारण कर लेता है। यहाँ निक्षेप के कारण सागर गहरा हो जाता है। कभी-कभी यह चबूतरा पानी से बाहर भी दिखाई देने लग जाता है। इस चबूतरे को तरंग-निर्मित चबूतरा कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 5

2. बीच (Beach)—सागरीय तरंगों द्वारा अपरदन के भारी पदार्थों; जैसे-पत्थर, कंकड़ आदि को तट के पास ही अधिक मात्रा में ढेरी कर दिया जाता है, जिससे यह भाग थोड़ा ऊँचा और ढलान वाला हो जाता है। तट के इस क्षेत्र को बीच कहा जाता है। यहाँ पर ऊँची तरंगों के समय ही जल पहुँचता है। ये प्रदेश बड़े ज्वार (High Tides) और छोटे ज्वार (Low Tides) के मध्य में स्थित होते हैं। तट के पास ये ऊँचे प्रदेश खेलों के उत्तम स्थल बन जाते हैं, जैसे-मुंबई में जुहू बीच और चेन्नई में मरीना बीच।

3. अपतटीय रेत भित्तियाँ (Offshore Sand-bars) तरंगें तट से अपरदित किए पदार्थ विशेष रूप से रेत को तट के समानांतर पानी में डूबे भाग पर एक श्रेणी के रूप में ढेरी कर देती हैं। रेत की इस श्रेणी को अपतटीय रेत भित्ती कहते हैं। इसका ऊपरी भाग पानी के तल से भी ऊपर दिखाई देता है। ये रोधक का काम करती हैं।

4. भू-जीभ या स्पिट (Spits) – कभी-कभी तरंगों द्वारा बनाई किसी रेत भित्ती का एक सिरा स्थल से जुड़ा होता है और दूसरा समुद्र की ओर बढ़ा रहता है। उसे भू-जीभ या स्पिट कहते हैं। कभी-कभी इसका समुद्र की ओर का सिरा नुकीला हो जाता है, तो इसे कस्प (cusp) कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(v) समुद्र के अनावृत्तिकरण कार्य 6

5. हुक (Hook)-स्पिट का सिरा कभी-कभी समुद्री धाराओं या फिर तिरछी तरंगों के प्रभाव के कारण तट की ओर मुड़ जाता है। इसे हुक (Hook) कहते हैं।

6. संयोजक भित्ती या तमबोलो (Connecting bar or Tombolo)—कभी-कभी स्पिट द्वारा दो द्वीप या मुख्य स्थल किसी टापू के साथ जुड़ जाते हैं। ऐसी भित्ती को संयोजक भित्ती कहते हैं । इटली में इन्हें तमबोलो का नाम दिया जाता है। यदि स्पिट का बाहरी सिरा संयोजक भित्ती का रूप ग्रहण करते-करते तट की ओर मुड़कर उसके साथ आकर जुड़ जाए तो उसे Looped bar के नाम से पुकारा जाता है।

7. लैगून झीलें (Lagoons)—कई तटों पर रेत की श्रेणियों के पीछे झीलें बन जाती हैं, जिन्हें लैगून कहते हैं। भारत के पूर्वी तट पर चिल्का (Chilka) और पुलीकट (Pulikat) तथा केरल के तट पर वेबनाद झील. इसके उदाहरण हैं।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 8 सजावटी पौधे

Punjab State Board PSEB 7th Class Agriculture Book Solutions Chapter 8 सजावटी पौधे Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Agriculture Chapter 8 सजावटी पौधे

PSEB 7th Class Agriculture Guide सजावटी पौधे Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
बहूपयोगी वृक्ष का कोई एक उदाहरण दें।
उत्तर-
पैगोड़ा, अमलतास आदि।

प्रश्न 2.
खुशबूदार फूलों वाले किसी एक वृक्ष का नाम बताएं।
उत्तर-
पैगोड़ा, सोनचंपा, बड़ा चम्पा आदि।

प्रश्न 3.
बाड़ बनाने के लिए किसी एक उपयुक्त झाड़ी का नाम बताएं।
उत्तर-
कामिनी, केशिया, पीली कनेर।

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प्रश्न 4.
दो फूलदार झाड़ियों के नाम बताएं।
उत्तर-
रात की रानी, चांदनी, पीली कनेर।

प्रश्न 5.
खुशबूदार फूलों वाली झाड़ी का नाम लिखें।
उत्तर-
रात की रानी।

प्रश्न 6.
सजावटी पौधे लगाने के लिए उपयुक्त समय कौन-सा होता है ?
उत्तर-
बहार के मौसम में तथा वर्षा के दिनों में।

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प्रश्न 7.
परदा करने के लिए किस बेल का उपयोग करना चाहिए ?
उत्तर-
परदाबेल (वरनोनिया लता), गोल्डन शावर।

प्रश्न 8.
घरों के अंदर सजावट के लिए उपयोग में लाई जाने वाली किसी एक बेल का नाम बताएं।
उत्तर-
मनी प्लांट।

प्रश्न 9.
मर्मी की ऋतु वाले किसी एक मौसमी फूल का नाम लिखो।
उत्तर-
सूरजमुखी, दोपहर खिली, जीनीया।

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प्रश्न 10.
सर्द ऋतु वाले मौसमी फूलों का बीज कौन-से महीने बीजा जाता है ?
उत्तर-
सितम्बर के मध्य।

(ख) एक-दो वाक्य में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
छायादार वृक्ष के क्या गुण होने चाहिएं ?
उत्तर-
इन वृक्षों का फैलाव गोल, छतनुमा तथा पत्ते घने होने चाहिएं।

प्रश्न 2.
चार फूलदान झाड़ियों के नाम लिखें।
उत्तर-
चाइना रोज़, रात की रानी, पीली कनेर, बोगनविलिया, चांदनी आदि।

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प्रश्न 3.
बेलों को कहाँ लगाया जाता है ?
उत्तर-
बेलों को सहारे की आवश्यकता होती है, इनको दीवारों, वृक्षों आदि के पास लगाया जाता है ताकि इनकों सहारे से ऊपर चढ़ाया जा सके।

प्रश्न 4.
खुशबूदार फूलों वाली दो बेलों के नाम लिखें।
उत्तर-
चमेली, माधवी लता खुशबूदार फूल वाली बेलें हैं।

प्रश्न 5.
सजावटी झाड़ियों के क्या गुण होते हैं ?
उत्तर-
जिन स्थानों पर वृक्ष लगाने का स्थान न हो वहां झाड़ियां सरलता से लग जाती

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प्रश्न 6.
मौसमी फूल कौन-से होते हैं ?
उत्तर-
मौसमी फूल एक साल या एक मौसम में अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं।

प्रश्न 7.
सड़कों के पास वृक्ष किस उद्देश्य के लिए लगाए जाते हैं ?
उत्तर-
यह आसपास की सुंदरता में वृद्धि करते हैं तथा मिट्टी क्षरण से बचाते हैं।

प्रश्न 8.
ऊंची बाड़ तैयार करने के लिए कैसे वृक्षों का चुनाव करना चाहिए ?
उत्तर-
ऊंची बाड़ तैयार करने के लिए सीधे तथा लम्बे जाने वाले वृक्ष पास-पास लगाए जाते हैं।

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प्रश्न 9.
श्रृंगार वृक्ष किस उद्देश्य के लिए लगाए जाते हैं ?
उत्तर-
ये वृक्ष खूबसूरत फूलों के लिए लगाए जाते हैं।

प्रश्न 10.
झाड़ियों का प्रयोग आसानी से कहां किया जा सकता है ?
उत्तर-
जहां वृक्ष लगाने के लिए आवश्यकतानुसार स्थान न हो, वहां झाड़ियों का प्रयोग सरलता से हो जाता है।

(ग) पाँच-छ: वाक्यों में उत्तर दें :

प्रश्न 1.
सजावटी वृक्षों को लगाने के क्या लाभ हैं ?
उत्तर-

  1. सजावटी वृक्ष आसपास की सुंदरता में वृद्धि करते हैं।
  2. सजावटी वृक्ष मिट्टी क्षरण को रोकते हैं।
  3. वृक्ष वातावरण को भी शुद्ध रखने में भूमिका निभाते हैं।
  4. वृक्ष वातावरण को ठण्डा रखने में सहायक हैं।
  5. कई वृक्षों के फूल सुंगध वाले होते हैं जिससे वातावरण महक उठता है।
  6. कई वृक्ष यात्रियों को छाया देते हैं।

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प्रश्न 2.
सजावटी झाड़ियों का चुनाव कैसे किया जाता है ?
उत्तर-
सजावटी झाड़ियों के चुनाव के लिए किस्में इस प्रकार हैं—

  1. फूलदार झाड़ियां-रात की रानी, चाइना रोज़, बोगनविलिया,चांदनी, पीली कनेर आदि।
  2. सुंदर पत्तों वाली झाड़ियां-अलीयर, कामनी, क्लैरोडेंडरौन, पीली कनेर, केशिया आदि। .
  3. भू-ढपनी झाड़ियां-लैंटाना। .
  4. दीवारों के निकट लगने वाली झाड़ियां-टीकोमा, अकलिफा आदि।

प्रश्न 3.
सजावटी बेलों का चुनाव अलग-अलग स्थानों के लिए कैसे किया जाता है ?
उत्तर-
बेलों का चुनाव नीचे लिखे अनुसार किया जाता है’

  1. धूप वाले स्थान के लिए-बोगनविलिया, झुमका बेल, लसन बेल, गोल्डन शावर आदि।
  2. घर के अन्दर रखने के लिए-मनी प्लांट।
  3. बाड़ बनाने के लिए-बोगनविलिया, क्लैरोडेंडरौन, एस्प्रेगस आदि।
  4. हल्की बेलें-लोनीसोरा, मिठी मटरी आदि।
  5. खुशबूदार फूलों वाली बेलें-चमेली, माधवी लता।
  6. गमलों में लगाई जाने वाली-बोगनविलिया।
  7. भारी बेल-बिग़नोनिया, बोगनविलिया, माधवी लता, झुमका बेल, गोल्डन शावर।

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प्रश्न 4.
मौसमी फूलों का मौसम के आधार पर वर्गीकरण करें।
उत्तर-
मौसम के आधार पर फूलों का वर्गीकरण—

  1. गर्मी ऋतु के फूल-इन की बोवाई फरवरी-मार्च में की जाती है तथा खेत में लगाने के लिए पनीरी चार सप्ताह में तैयार हो जाती है। इस मौसम के मुख्य फूल हैंकोचिया, जीनीया, गेलारडिया, दोपहर खिली, गौंफरीना आदि।
  2. वर्षा ऋतु के फूल-इनकी जून के पहले सप्ताह बोवाई की जाती है तथा खेत में लगाने के लिए पनीरी जुलाई के पहले सप्ताह में तैयार हो जाती है। बाल्सम, कुक्कड़ कल्गी इस मौसम के फूल हैं।
  3. सर्दी ऋतु के फूल-इनको सितम्बर के मध्य में बोया जाता है तथा पनीरी अक्तूबर के मध्य में तैयार हो जाती है। इस ऋतु के फूल हैं-कैलैंडूला, डेहलिया, पटूनिया, गेंदा आदि।

प्रश्न 5.
सजावटी वृक्षों का चुनाव किन-किन उद्देश्यों के लिए किया जाता है? उदाहरण सहित लिखें।
उत्तर-
सजावटी वृक्षों का चुनाव अग्रलिखित उद्देश्यों के लिए किया जाता है—

  1. छाया के लिए-इन वृक्षों का फैलाव गोल तथा पत्ते घने तथा छाया देने वाले होते हैं। इनका उदाहरण है-नीम, सत्तपत्तिया, पीपल, पिलकन आदि।
  2. श्रृंगार के लिए-ये वृक्ष सुंदर फूलों के लिए लगाए जाते हैं; जैसे-कचनार, नीली गुलमोहर, लाल गुलमोहर आदि।
  3. सड़कों के आसपास लगाने वाले वृक्ष-ये वृक्ष छाया तथा शृंगार दोनों उद्देश्यों के लिए लगाए जाते हैं; उदाहरण, अमलतास, डेक, पिलकन, सिल्वर ओक आदि।
  4. बाड़ के तौर पर लगाए जाने वाले वृक्ष-इन का उद्देश्य ऊंची बाड़ तैयार करना है। यह मुख्य फसल को तेज़ हवा से बचाते हैं। इनको पास-पास लगाया जाता है तथा यह पर्दे का रूप धारण कर लेते हैं। उदाहरण सिल्वर ओक, सफैदा, पाप्लर, अशोका आदि।
  5. वायु प्रदूषण रोकने के लिए-कारखानों में से निकलता धुआं तथा रासायनिक गैसें वातावरण को दूषित करती हैं। इसलिए इस उद्देश्य के लिए पतझड़ वृक्ष जिनके पत्ते मोटे तथा चमकदार हों, लगाए जाते हैं; जैसे-शहतूत, पाप्लर, पैगोड़ा आदि।
  6. औषधी गुणों वाले वृक्ष-ये दवाई वाले वृक्ष हैं। इनका उदाहरण है-नीम, जामुन, अर्जुन, महुया, अशोका आदि।

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Agriculture Guide for Class 7 PSEB सजावटी पौधे Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
कांटों की सहायता से ऊपर चढ़ने वाली दो लताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
गुलाब और बोगनविलिया।

प्रश्न 2.
खुशबू के लिए लगाई जाने वाली दो लताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
जैसमीन, माधवी लता।

प्रश्न 3.
हल्के जामुनी रंग के घंटियों जैसे फूल किस लता पर लगते हैं ?
उत्तर-
एडीन्कोलाइमा।

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प्रश्न 4.
बुरे स्थानों को छिपाने के लिए कौन-सी लता लगाई जाती है ?
उत्तर-
अरिस्टोलोचिया।

प्रश्न 5.
माधवी लता पर किस रंग के फूल होते हैं ?
उत्तर-
सफेद रंग के।

प्रश्न 6.
गोल्डन शावर पर लगने वाले फूल किस रंग के होते हैं ?
उत्तर-
संतरी रंग के।

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प्रश्न 7.
पर्दै जैसा प्रभाव डालने वाली लता कौन-सी है ?
उत्तर-
वरनोनिया (पर्दा लता)।

प्रश्न 8.
छायादार स्थान पर कौन सी लता लगानी ठीक है ?
उत्तर-
फाइक्स रैप्नस।

प्रश्न 9.
पत्ते झड़ने वाली लताएं किस महीने में लगाई जाती हैं ?
उत्तर-
जनवरी-फरवरी में।

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प्रश्न 10.
धूप वाले स्थान पर लगाई जाने वाली दो लताओं के नाम बताओ ।
उत्तर-
गोल्डन शावर, झुमका बेल।

प्रश्न 11.
झुमका लता को और क्या कहते हैं ?
उत्तर-
रंगून क्रीपर।

प्रश्न 12.
बाजा लता कौन-सी है ?
उत्तर-
कैंपसिस ग्रैंडीफ्लोरा।

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प्रश्न 13.
बिना सहारे के उगाई जाने वाली किसी लता का नाम बताओ।
उत्तर-
बाजा लता।

प्रश्न 14.
ईंडरॉन लता किस काम आती है ?
उत्तर-
छायादार स्थान पर बाड़ लगाने के काम आती है।

प्रश्न 15.
गोल्डन शावर लता किस काम आती है ?
उत्तर-
धूप वाले स्थान के लिए, पर्दा लता और र ‘समी लताओं के रूप में काम आती है।

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प्रश्न 16.
भारी लताओं के नाम बताएं ।
उत्तर-
पीली चमेली, रेगमार और गुलाब।

प्रश्न 17.
पर्दा लताएं कौन-सी हैं ?
उत्तर-
गोल्डन शावर व बरनोनिया।

प्रश्न 18.
आन्तरिक सजावट के लिए प्रयोग की जाने वाली लताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
एसपैरेगश, सिंगोनियम, मनीप्लांट।

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प्रश्न 19.
सारा वर्ष हरी रहने वाली लताएं कब लगाई जाती हैं ?
उत्तर-
फरवरी-मार्च और जुलाई-सितम्बर में।

प्रश्न 20.
पतझड़ वाली लताएं कब लगाई जाती हैं ?
उत्तर-
जनवरी-फरवरी में।

प्रश्न 21.
सारा वर्ष हरी-भरी रहने वाली लता का नाम बताओ
उत्तर-
वरनोनिया, फाइक्स रैप्नस।

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प्रश्न 22.
इसको बाजा लता क्यों कहते हैं ?
उत्तर-
इसके फूल बाजों की तरह होते हैं।

प्रश्न 23.
वरनोनिया को पर्दा लता क्यों कहते हैं ?
उत्तर-
क्योंकि उसको जब बरामदे में लगाया जाता है तो पर्दे की तरह प्रभाव पड़ता है।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
लता किसे कहते हैं ?
उत्तर-
लता ऐसे पौधे हैं जिनका तना कमज़ोर होता है।

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प्रश्न 2.
दीवारों, वृक्षों आदि पर चढ़ने के लिए लताओं द्वारा अपनाई जाने वाली विधियां बताओ।
उत्तर-
इस कार्य के लिए लताएं अपने कांटों, टेंड्रिल और जड़ों की सहायता लेती हैं।

प्रश्न 3.
लताएं किस प्रकार की मिट्टी में लगाई जाती हैं ?
उत्तर-
उपजाऊ और पानी को देर तक समा कर रखने वाली किसी भी ज़मीन में लताओं को लगाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
लताएं लगाने के लिए किस आकार के गड्ढे खोदने चाहिएं ?
उत्तर-
लताएं लगाने के लिए 60 सें० मी० चौड़े , लम्बे और गहरे गड्डे खोदने चाहिएं।

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प्रश्न 5.
लताओं की सूखी और बीमार टहनियों को क्यों काटते रहना चाहिए ?
उत्तर-
लताएं अच्छी तरह फल-फूल सकें इसलिए इनकी सूखी और बीमार टहनियों को काट देना चाहिए।

प्रश्न 6.
ब्यूमोनसिया लता के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
इसे मार्च मास में बड़े और सफ़ेद रंग के फूल लगते हैं। इस लता को वृक्षों पर चढ़ाया जाता है। इसे बीज या कलम द्वारा उगाया जा सकता है।

प्रश्न 7.
एडीन्कोलाइमा और एंटीगोनोन लताओं को लगने वाले फूलों की तुलना करो।
उत्तर-
एडीन्कोलाइमा के फूल नवम्बर में हल्के जामुनी रंग के घंटियों जैसे होते हैं। एंटीगोनोन के फूल सितम्बर से मार्च तक सफ़ेद, गुलाबी रंग के होते हैं।

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प्रश्न 8.
अरिस्टोलोचिया लता के फूल किस प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
इसके फूल सितम्बर में बत्तख जैसे बड़े और सफ़ेद रंग के होते हैं और इसके बीच जामुनी रंग के धब्बे भी होते हैं।

प्रश्न 9.
ऊंची इमारतों की सजावट के लिए प्रायः कौन-सी लता लगाई जाती है?
उत्तर-
बिगलोनिया लता ऊंची इमारतों की सजावट के लिए प्रयोग में लाई जाती है। यह हमेशा हरी ही रहती है।

प्रश्न 10.
बोगनविलिया लता की विभिन्न किस्मों के नाम बताओ।
उत्तर-
बोगनविलिया लता की किस्में हैं-विजय, पार्था, ग्लैबरा और सुभरा।

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प्रश्न 11.
एंटीगोनोन लता के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
इसको नवम्बर में जामुनी रंग के घंटियों जैसे फूल लगते हैं। इसके पत्तों को रगड़ने पर लहसुन की सुगन्ध आती है। पत्ते साफ़ और चमकदार होते हैं। इन्हें कलमों के द्वारा बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न 12.
बाजा लता के बारे में क्या जानते हो ?
उत्तर-
इसे कैंपसिस ग्रैंडीफ्लोरा भी कहा जाता है। इसको संतरी रंग के बच्चों के बाजों की तरह फूल मई से अगस्त तक लगते हैं जो कि अक्तूबर से नवम्बर तक रहते हैं। इसके पत्ते सर्दियों में झड़ जाते हैं।
इस लता को कलमों के द्वारा लगाया जाता है। इसकी शाखा सख्त होती है और बिना सहारे चल सकती है।

प्रश्न 13.
अरिस्टोलोचिया के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
इस लता को खराब स्थानों को ढकने के लिए लगाया जाता है। इसको बत्तख की तरह बड़े और सफेद रंग के फूल लगते हैं। इनके बीच में जामुनी रंग के धब्बे जैसे भी होते हैं। इसके बीज लगाए जाते हैं।

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प्रश्न 14.
बिगलोनिया के बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
इसको ऊँची इमारतों को सजाने के लिए प्रयोग किया जाता है। यह हमेशा हरी रहती है। इसे पीले फूल जनवरी-फरवरी में लगते हैं। इसकी कलमें और बीज दोनों ही लगाए जा सकते हैं।

प्रश्न 15.
पीली चमेली के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
इसे दीवारों पर चढ़ाने के लिए लगाया जाता है। इसको 15-20 दिन के लिए मार्च में पीले फूल लगते हैं। इसकी वृद्धि कलमों के द्वारा की जाती है।

प्रश्न 16.
माधवी लता के बारे में जानकारी दो ।
उत्तर-
इस लता के पत्ते चमकदार होते हैं और फूल फरवरी-मार्च में लगते हैं। फूल सफ़ेद रंग के खुशबूदार होते हैं। इसको बीजों या कलमों द्वारा दोनों विधियों से लगाया जा सकता है।

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प्रश्न 17.
फाइक्स रैजस लता के बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
इस लता को शानदार स्थानों के लिए चुना जाता है। यह हमेशा हरी रहती है। यह जड़ों के द्वारा दीवारों पर चिपक जाती है। इसको पत्तों के लिए लगाया जाता है और काट कर कोई भी आकार दिया जा सकता है।

प्रश्न 18.
ब्यूमोनसिया लता के बारे में जानकारी दो ?
उत्तर-
यह लता वृक्षों पर चढ़ाने के लिए लगाई जाती है। इसे मार्च में बड़े सफ़ेद रंग के फूल लगते हैं। यह लता कलमों और बीजों के द्वारा भी लगाई जा सकती है।

प्रश्न 19.
एंटीगोनॉन लता के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
इसको स्थान ढकने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसको सितम्बर से मार्च तक सफेद गुलाबी रंग के फूल लगते हैं। इसको बीज तथा कलमों के द्वारा लगाया जा सकता है।

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प्रश्न 20.
गोल्डन शावर के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
यह सबसे सुन्दर बेल है। इसको सर्दियों में संतरी रंग के फूल लगते हैं। इसको इमारतों, घरों और बरामदों की सजावट के लिए लगाया जाता है।

प्रश्न 21.
झुमका लता के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
झुमका लता का दूसरा नाम रंगून क्रीपर भी है। इसको दीवारों, परगलों या वृक्षों पर चढ़ाने के लिए लगाया जाता है। इसको सारा साल ही सफ़ेद, लाल या गुलाबी फूल लगे रहते हैं। इसको कलमों और जड़ों के हिस्सों के साथ उगाया जा सकता है।

प्रश्न 22.
पर्दा लता के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
इसको बरामदे में लगाया जाता है और पर्दा लगा होने का भ्रम देती है। यह सारा साल ही हरी भरी रहती है। इस लता को दीवारों, बालकोनी पर चढ़ाने के लिए लगाया जाता है।

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बडे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
लताओं का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
लताओं से घरों, स्कूलों, कोठियों, कार्यालयों और सड़कों की सुन्दरता बढ़ती है। फूलों वाली लताएं बच्चों का मन मोह लेती हैं और उनके कोमल मन पर अच्छा प्रभाव डालती हैं। इससे बच्चों का मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास भी बढ़िया ढंग से होता है।

प्रश्न 2.
भिन्न-भिन्न स्थानों पर लगाई जाने वाली लताओं का विवरण दो।
उत्तर-
विभिन्न स्थानों पर लगाई जाने वाली लताएं हैं—

  1. धूप वाले स्थान के लिए-गोल्डन शावर, बोगनविलिया, झुमका लता इत्यादि।
  2. छायादार स्थान के लिए-मनीप्लांट, क्लैरोडेंडरॉन, सिंगोनीयम इत्यादि।
  3. बाड़ लगाने के लिए-क्लैरोडेंडरॉन, बोगनविलिया।
  4. मौसमी लताएं-गोल्डन शावर, बोगनविलिया।
  5. सुगन्ध के लिए-माधवी लता, जैसमीन (मोतिया-चमेली) इत्यादि।
  6. पर्दा लताएं-गोल्डन शावर, बरनोनिया।
  7. गमलों के लिए–सिंगोनीयम, बोगनविलिया, मनीप्लांट इत्यादि।
  8. अंदरूनी सजावट के लिए-ऐस्प्रेगस, मनीप्लांट, सिंगोनियम।
  9. भारी लताएं-रेगमार, गुलाब, पीली चमेली इत्यादि।

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प्रश्न 3.
लताएं लगाने की विधि क्या है ? इनकी देखभाल कैसे की जाती है ?
उत्तर-
भूमि-कोई भी उपजाऊ और देर तक पानी समा कर रखने वाली भूमि इन लताओं के लिए ठीक रहती है।
लताएं लगाने का समय-सारा वर्ष हरी रहने वाली लताओं के लिए उचित समय जुलाई-सितम्बर का मास होता है। पत्ते झड़ने वाली लताओं को जनवरी-फरवरी में लगाते हैं।

गड्ढे तैयार करना-लताओं के लिए 60 सें० मी० चौड़े लम्बे और गहरे गड्ढे खोदे जाते हैं और एक गड्ढे में 10 ग्राम बी० एच० सी० का पाऊडर और 8-10 कि० ग्रा० गली रूड़ी गोबर खाद मिला दें।

सिंचाई-लताएं लगाने के बाद ही लगातार पानी लगाएं और इन्हें आवश्यकता अनुसार ही सहारा दें।
देखभाल-बीमार और सूखी शाखाओं को काट दें। अच्छी तरह बढ़ फूल सकें इसके लिए इनकी कांट-छांट भी करते रहें। कीड़े-मकौड़े और रोगों से बचाव के लिए दवाइयों का छिड़काव करें।

प्रश्न 4.
बोगनविलिया लता के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
किस्में-बोगनविलिया की विभिन्न किस्में हैं-ग्लैबरा, पार्था, सुभरा और विजय। लगाने की विधि-सभी किस्मों को कलम के द्वारा लगाया जाता है। लगाने का समय-कलमों को जुलाई-अगस्त या जनवरी से फरवरी तक लगाया जाता है। रंगदार फूलों के लगने का समय-सफेद, जामुनी, लाल, पीले, संतरी रंगों के फूल मार्च-अप्रैल और नवम्बर-दिसम्बर में लगते हैं।

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प्रश्न 5.
रंगून क्रीपर किस लता को कहते हैं ? इसके फूल किस तरह के होते हैं और इसे कौन-से स्थान पर और किस विधि से लगाया जाता है ?
उत्तर-
झुमका लता को रंगून क्रीपर कहा जाता है। इसके फूल सफ़ेद गुलाबी या लाल रंग के होते हैं। फूल खुशबूदार होते हैं और सारा वर्ष लगे रहते हैं। इन लताओं को दीवारों, वृक्षों या परगलों पर चढ़ाने के लिए लगाया जाता है। इसे कलमों या जड़ों के भाग से उगाया जाता है।

प्रश्न 6.
अलग-अलग लताओं के नाम और फूलों के रंग बताओ और फूल कब लगते हैं ?
उत्तर-

  1. एंडीन्कोलाइमा-हल्के जामुनी रंग के घण्टियों के आकार के, नवम्बर में।
  2. व्यूमोनसिया लता-सफ़ेद रंग के, मार्च में।
  3. माधवी लता-सफ़ेद खुशबूदार, फरवरी-मार्च में।
  4. बिगलोनिया-पीले रंग के, जनवरी-फरवरी में।
  5. एंटीगोनान-सफ़ेद, गुलाबी, सितम्बर से मार्च। .
  6. अरिस्टोलोचिया-बत्तख की तरह बड़े और सफ़ेद, इनके बीच में जामुनी रंग के धब्बे होते हैं, सितम्बर में।
  7. झुमका लता-सफ़ेद, गुलाबी या लाल, सारा वर्ष।
  8. गोल्डन शावर-सर्दियों में, संतरी रंग के।
  9. पीली चमेली-मार्च में, पीले रंग के।
  10. बोगनविलिया-सफेद, जामुनी, लाल, नाभी, संतरी, पीले। मार्च-अप्रैल और नवम्बर-दिसम्बर में।
  11. कैम्पसिस ग्रैंडीफ्लोरा-मई से अगस्त में संतरी रंग के।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 8 सजावटी पौधे

प्रश्न 7.
धूप वाली जगह के लिए भारी बेलों, अंदरूनी सजावट वाली बेलों के बारे में बताओ।
उत्तर-

  1. धूप वाली जगह के लिए-गोल्डन शावर, झुमका बेल।
  2. भारी बेल-रेगमार, पीली चमेली।
  3. अंदरूनी सजावट-ऐस्प्रेगस, मनी प्लांट।

सजावटी पौधे PSEB 7th Class Agriculture Notes

  • वृक्ष, झाड़ियां, बेलें और मौसमी फूल आसपास की सुंदरता बढ़ाने में सहायक हैं तथा मिट्टी को क्षरण से भी बचाते हैं।
  • बहुपयोगी वृक्ष हैं-पैगोड़ा, अमलतास, लाल गुलमोहर, ऐरोकेरिया आदि।
  • छायादार वृक्ष हैं-नीम, सातपत्तिया, मोलसरी, सुखचैन, जामुन, पिलकन, पीपल आदि।
  • शृंगार वृक्ष हैं-नीली गुलमोहर, सिल्वर ओक, अमलतास, पिलकन, डेक आदि।
  • बाड़ के तौर पर लगाए जाने वाले वृक्ष हैं-सफैदा, पाप्लर, अशोका आदि।
  • सड़कों के आसपास लगाए जाने वाले वृक्ष हैं-डेक, पिलकन, सिल्वर ओक, नीली गुलमोहर आदि।
  • वायु प्रदूषण रोकने के लिए वृक्ष हैं-शहतूत, पाप्लर, पैगोड़ा आदि।
  • औषधि गुण वाले वृक्ष हैं-नीम, जामुन, अशोका, महुआ, अर्जुन आदि।
  • खुशबूदार फूलों वाले वृक्ष हैं-पैगोड़ा, सोनचंपा, बड़ा चम्पा।
  • फूलदार झाड़ियां हैं-रात की रानी, चांदनी, पीली कनेर, चाइमा रोज़, बोगनविलिया आदि।
  • सुंदर पत्तों वाली झाड़ियां हैं-अलीयर, कामिनी, केशिया आदि।
  • भू-ढपनी झाड़ियां हैं-लैंटाना।
  • दीवारों के निकट लगाने वाली झाड़ियां हैं-टीकोमा, अकलिफा आदि।
  • धूप वाले स्थान के लिए सजावटी बेलें हैं-गोल्डन शावर, झुमका बेल, बोगनविलिया।
  • भारी बेलें हैं-बिगनोनिया, माधवी लता, झुमका बेल, गोल्डन शावर आदि।
  • हल्की बेलें हैं-लोनीसोरा, मीठी मटरी आदि।
  • खुशबूदार फूलों वाली बेलें-चमेली, माधवी लता आदि।
  • बोगनविलिया को गमले में भी लगाया जा सकता है।
  • बाड़ लगाने वाली बेलें हैं-बोगनविलिया, क्लैरोडैडरोन, ऐस्प्रेगस आदि।
  • घर के अन्दर रखने वाली बेलें हैं-मनी प्लांट आदि।
  • पर्दा करने के लिए-परदा बेल, गोल्डन शावर आदि।
  • गर्मी ऋतु के फूल-कोचिया, जीनीया, सूरजमुखी, गेलारडिया, गौंफरीना, दोपहर खिली आदि।
  • वर्षा ऋतु के फूल हैं-बाल्सम, कुक्कड़ कल्गी आदि।
  • सर्दी ऋतु के फूल हैं-कैलेंडुला, डेहलीया, पहूनिया, गेंदा आदि।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 निर्वाचक

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 9 निर्वाचक Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 9 निर्वाचक

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
स्त्री मताधिकार से क्या अभिप्राय है ? स्त्री मताधिकार के विपक्ष में अपने चार तर्क दें। (What is Woman suffrage ? Write four arguments against women suffrage.) (P.B. 2017)
अथवा
स्त्री मताधिकार के पक्ष और विपक्ष में तर्क दें। (Give arguments for and against the Women Franchise.)
अथवा
स्त्री मताधिकार के पक्ष में तर्क दीजिए। (Give arguments for Women Suffrage.)
अथवा
स्त्री मताधिकार के पक्ष व विपक्ष में तर्क दीजिए। (Make a case for and against Women Suffrage.)
उत्तर-
महिला मताधिकार का अर्थ महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार देना है। लोगों में इस बात पर काफ़ी मतभेद रहा है कि स्त्रियों को मत का अधिकार मिलना चाहिए या नहीं। आधुनिक युग में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो स्त्रियों को मताधिकार देने के पक्ष में नहीं हैं। इंग्लैण्ड जैसे उदारवादी देश में भी स्त्रियों को समानता के आधार पर मताधिकार सन् 1928 में दिया गया था। अमेरिका में सन् 1920 में और फ्रांस में सन् 1946 में, स्विट्ज़रलैण्ड में जिसे प्रजातन्त्र का घर माना जाता है, स्त्रियों को मत डालने और चुनाव लड़ने का अधिकार सन् 1971 तक प्राप्त नहीं था लेकिन भारतीय संविधान में 1950 से ही स्त्रियों को मताधिकार दिया गया है। स्त्री मताधिकार के पक्ष तथा विपक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं.

स्त्री मताधिकार के विपक्ष में तर्क (Arguments against Women Suffrage)-स्त्री मताधिकार के विरुद्ध निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं
1. स्त्री का कार्य क्षेत्र घर है-यदि स्त्री को मत देने का अधिकार दिया जाए तो वह घर की ओर ठीक से ध्यान न दे सकेगी। इससे पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा घर की शान्ति समाप्त हो जाएगी।

2. स्त्री का मत पुरुष के मत की पुनरावृत्ति-अधिकतर स्त्रियां, अपने पति, पिता या भाई अदि के कहने के अनुसार ही अपने मत का प्रयोग करती हैं। वे अपनी ओर से यह सोचने का प्रयत्न नहीं करतीं कि वोट किसे देना चाहिए।

3. घरेलू शान्ति के भंग होने का खतरा-यदि स्त्री मताधिकार लागू किया जाए तो इससे घरेलू शान्ति भंग होने का बहुत भय रहता है।

4. स्त्रियां शारीरिक तौर पर दुर्बल होती हैं-यह भी कहा जाता है कि स्त्रियां शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होती हैं और अधिक परिश्रम नहीं कर सकतीं। वे पुरुष के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर राजनीति में भाग नहीं ले सकतीं।

5. स्त्रियां राजनीति के प्रति उदासीन रहती हैं-यह देखा गया है कि प्रायः स्त्रियां राजनीति के प्रति उदासनी रहती हैं। इसका कारण यह है कि उन्हें अपने घरेलू मामलों से ही अवकाश नहीं मिलता।

6. स्त्रियों में आत्म-विश्वास नहीं होता-स्त्रियों में आत्म-विश्वास और आत्म-निर्णय की भावना नहीं होती क्योंकि वे पुरुषों पर निर्भर रहती आई हैं। स्त्रियों के विचार भी रूढ़िवादी होते हैं और उन्हें राजनीतिक जीवन का अनुभव भी नहीं होता।

7. भ्रष्टाचार-राजनीति में कई प्रकार की चालबाजियां प्रयोग करके ही व्यक्ति सफल होते हैं। स्त्रियों के वे गुण जिनके कारण उनका आदर-मान है, समाज में समाप्त हो जाएगा।

8. स्त्रियां रूढ़िवादी होती हैं-इस प्रकार उनको मताधिकार देने का अर्थ है प्रगति के रास्ते में बाधाएं उत्पन्न करना।

9. स्त्रियां भावुक होती हैं-भावना में बहकर स्त्रियां मताधिकार का उचित प्रयोग नहीं कर सकतीं। राजनीति में भावनाओं का कोई स्थान नहीं है।

10. स्त्रियों के सम्मान में कमी-वर्तमान समय में राजनीति में गलत आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं, जिसके चलते स्त्रियां भी इस प्रकार की गंदी राजनीति से बच नहीं पायेंगी। इससे स्त्रियों के सम्मान में कमी आयेगी।

11. प्राकृतिक गुणों का नाश-स्त्रियों में दया, सहानुभूति, प्रेम, सहनशीलता तथा कोमलता जैसे प्राकृतिक गुण पाए जाते हैं, राजनीति में आने के कारण इन गुणों के समाप्त होने की सम्भावना बनी रहती है। – स्त्री मताधिकार के पक्ष में तर्क (Arguments in favour of Woman Suffrage)-प्रायः सभी देशों में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं, मत डालने का भी और चुनाव लड़ने का भी।

स्त्री मताधिकार के पक्ष में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं-
1. लिंग के आधार पर मताधिकार से वंचित रखना उचित नहीं-मिल (Mill) का कहना है कि मत का अधिकार स्वाभाविक है, अतः स्त्री को केवल लिंग के आधार पर मताधिकार से वंचित रखना न्याय-संगत नहीं है।

2. यह लोकतन्त्रात्मक है-स्त्रियों को मत का अधिकार देना लोकतन्त्र के सिद्धान्त के अनुसार है। लोकतन्त्र में समस्त जनता को शासन में भाग लेने का अधिकार मिलता है और जनता में जितना भाग पुरुष का है उतना ही स्त्री का

3. स्त्रियों को मताधिकार की अधिक आवश्यकता-शारीरिक दृष्टि से निर्बल व्यक्ति को कानून की रक्षा की अधिक आवश्यकता होती है। जो सबल है वह तो कानून को भी अपने हाथ में ले सकता है।

4. स्त्रियां दूसरे सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं-इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रशासन के क्षेत्र में भी स्त्रियों ने बड़ा प्रशंसनीय कार्य किया है। आजकल पुलिस और सेना में भी स्त्रियां काम कर रही हैं, फिर राजनीति के क्षेत्र में वे कार्य क्यों नहीं कर सकेंगी।

5. कानून मानने वालों को ही कानून बनाने का अधिकार होना चाहिए-राज्य के कानून स्त्री-पुरुष दोनों पर ही समान रूप में लागू होते हैं, दोनों पर समान रूप से ही कर लगते हैं। फिर पुरुष को ही कानून बनाने का अधिकार क्यों ? यह अधिकार दोनों को समान रूप से मिलना चाहिए।

6. स्त्रियां शान्तिप्रिय होती हैं-स्त्रियां स्वभाव से ही शान्ति-प्रिय होती हैं और इससे राजनीति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

7. स्त्री का मत पुरुष के मत की पुनरावृत्ति नहीं होता-यदि स्त्री अपने पति के अनुसार ही अपना मत देती है तो उसमें हानि क्या है। स्त्री का राजनीतिक क्षेत्र में महत्त्व बना रहता है।

8. राजनीति शुद्ध होगी-स्त्रियां अपनी कोमलता, मृदु भाषण और सहानुभूति से राजनीतिक क्षेत्र में व्यस्त पुरुषों की कठोरता, निर्दयता, बेईमानी और चालबाज़ी को दूर कर देंगी।

9. मताधिकार स्त्री के प्राकृतिक कार्यों में कोई रुकावट नहीं-भारत, इंग्लैण्ड, रूस, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अनेक देशों में स्त्रियों को मताधिकार दिया गया है और इन देशों में स्त्रियां अपने प्राकृतिक कार्यों को बड़ी सफलता से पूरा कर रही हैं।

10. नागरिक अधिकार तथा राजनीतिक अधिकार साथ-साथ चलते हैं- यदि स्त्रियों को राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होंगे तो उनको नागरिक अधिकार देने का कोई महत्त्व नहीं रहेगा।

11. स्त्रियां पुरुषों से पीछे नहीं-अन्य क्षेत्रों की तरह राजनीति में भी स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा पीछे नहीं हैं। जिस प्रकार पुरुष जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है उसी तरह स्त्रियां भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं। भारत में स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गान्धी, इंग्लैण्ड में एलिज़ाबेथ द्वितीय एवं मारग्रेट थैचर, इज़रायल में स्वर्गीय प्रधानमन्त्री गोल्डा मायर और श्रीलंका की भूतपूर्व एवं स्वर्गीय प्रधानमन्त्री श्रीमती भण्डारनायके जैसी महिलाएं इस बात के स्पष्ट उदाहरण हैं।

12. मानसिक रूप से भी दृढ़-स्त्रियां मानसिक रूप से भी पुरुषों के समान ही दृढ़ हैं। जिस प्रकार की सुविधाएं पुरुषों को मिलती हैं, यदि वैसी ही सुविधाएं स्त्रियों को भी मिलें तो स्त्रियां बेशक पुरुषों से आगे भी जा सकती हैं। वर्तमान समय में बहुत-सी स्त्रियां अच्छी शिक्षा प्राप्त करके राजनीतिक एवं प्रशासनिक पदों पर विराजमान हैं।

निष्कर्ष (Conclusion)-स्त्री मताधिकार के विरोध में कई तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं, उनमें अधिक जान नहीं है। स्त्री मताधिकार के लाभ बहत होते हैं और प्रायः सभी लोकतन्त्रीय देशों में स्त्रियों को पुरुषों के साथ समान रूप से मत डालने और चुनाव लड़ने का अधिकार दिया जाता है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 निर्वाचक

प्रश्न 2.
व्यस्क मताधिकार से क्या अभिप्राय है ? वयस्क मताधिकार के पक्ष तथा विपक्ष में दो-दो तर्क दीजिए।
(What is meant by Adult Franchise ? Write two arguments in favour and two in against Adult Franchise.)
अथवा
वयस्क मताधिकार के पक्ष और विपक्ष में दलीलें दो। (Write arguments in favour of and against Adult Franchise.).
अथवा
वयस्क मताधिकार के पक्ष व विपक्ष में तर्क दो।। (Give arguments for and against Adult Franchise.)
उत्तर-
वयस्क मताधिकार किसे कहते हैं ? (What is Franchise or Adult Suffrage ?) आज प्रजातन्त्र का युग है और सभी नागरिकों को समान रूप से मत डालने तथा चुनाव लड़ने का अधिकार दिया गया है अर्थात् आज सभी लोकतन्त्रात्मक देशों में वयस्क मताधिकार (Adult Franchise) का सिद्धान्त अपनाया गया है।

जब देश के सभी वयस्कों (Adults) जाति, धर्म, रंग, वंश, धन, स्थान आदि के आधार पर उत्पन्न भेदभाव के बिना, समान रूप से मतदान का अधिकार दे दिया जाए तो उस व्यवस्था को वयस्क मताधिकार या सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के नाम से पुकारा जाता है। वयस्क होने की उम्र राज्य द्वारा निश्चित की जाती है। इंग्लैण्ड और रूस में यह आयु 18 वर्ष है जबकि स्विट्ज़रलैण्ड में यह आयु 20 वर्ष है। भारत में पहले यह आयु 21 वर्ष की थी परन्तु 61वें संशोधन द्वारा यह आयु 18 वर्ष कर दी गई है। निश्चित आयु होने के पश्चात् प्रत्येक नागरिक बिना किसी भेदभाव के मत डालने का अधिकार बन जाता है। हां, एक निश्चित समय तक निवास की शर्त भी रखी जाती है।।

वयस्क मताधिकार के पक्ष में तर्क (Arguments in Favour of Adult Franchise)-आधुनिक युग में वयस्क मताधिकार को ही उचित तथा न्यायसंगत माना गया है। इसके पक्ष में अग्रलिखित तर्क दिए जाते हैं

1. प्रभुसत्ता जनता के पास है (Sovereignty is possessed by the People)-लोकतन्त्र में प्रभुसत्ता जनता के पास होती है और जनता की इच्छा तथा कल्याण के लिए शासन चलाया जाता है। जनता में अमीर-गरीब तथा अशिक्षित-शिक्षित सभी सम्मिलित हैं। इसलिए मत डालने का अधिकार सबको समानता के साथ मिलना चाहिए। यदि वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त लागू न किया जाए तो जनता की प्रभुसत्ता की बात सत्य सिद्ध नहीं होती।।

2. कानून का प्रभाव सब पर पड़ता है (Laws of State affects all the People)-राज्य में जो भी कानून बनते हैं उनका प्रभाव राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों पर पड़ता है। कानून की दृष्टि में सब नागरिक समान समझे जाते हैं और एक ही कानून सब लोगों पर समान रूप से लागू होते हैं। इसलिए उन कानूनों को बनाने का अधिकार भी सब को समान रूप से मिलना चाहिए। मिल (Mill) का कहना है कि, “लोकतन्त्र व्यक्ति की समानता का समर्थन करता है और राजनीतिक समानता उसी समय मिल सकती है जब सब नागरिकों को वोट का अधिकार दिया जाए। सरकार के कानूनों और नीतियों का सम्बन्ध सब लोगों के साथ है और जो सब पर प्रभाव डालता है। अतः इसका निर्णय सब के द्वारा होना चाहिए।”

3. समानता के सिद्धान्त पर आधारित (Based on the Principles of Equality)-संविधान नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है और समानता का सिद्धान्त लोकतन्त्र का मूल सिद्धान्त है। वयस्क मताधिकार समानता के सिद्धान्त पर आधारित है क्योंकि सभी नागरिकों को जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के भेदभाव के बिना मताधिकार दिया जाता है।

4. कानूनों का प्रभाव सब पर पड़ता है (Laws effect all the people)-राज्य में जो भी कानून बनते हैं उनका प्रभाव राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों पर पड़ता है। कानून की दृष्टि में सब नागरिक समान समझे जाते हैं और एक ही कानून सब लोगों पर समान रूप से लागू होते हैं इसलिए उन कानूनों को बनाने का अधिकार भी सबको समान रूप से मिलना चाहिए। मिल (Mill) का कहना है कि, “लोकतन्त्र व्यक्ति की समानता का समर्थन करता है और राजनीतिक समानता उसी समय मिल सकती है जब सब नागरिकों को वोट का अधिकार दिया जाए। सरकार के कानूनों और नीतियों का सम्बन्ध सब लोगों के साथ है और यह सब पर प्रभाव डालता है, अतः सबके द्वारा ही उसका निर्णय होना चाहिए।”

5. व्यक्ति के विकास के लिए मताधिकार आवश्यक (Right to vote is essential for the development of an individual)-लोकतन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का विकास करने के लिए कई प्रकार के अधिकार मिलते हैं। उन अधिकारों में मताधिकार भी आवश्यक है और इनके बिना कोई भी व्यक्ति अपना विकास नहीं कर सकता। दूसरे अधिकारों की रक्षा के लिए मताधिकार आवश्यक है। जिन लोगों के पास राजनीतिक अधिकार नहीं होते, उनके नागरिक और आर्थिक अधिकार भी सुरक्षित नहीं रह सकते।

6. सरकार को अधिक बल मिलता है (Government becomes strong)-समस्त जनता अर्थात् वयस्क मताधिकार द्वारा चुनी गई सरकार अधिक शक्तिशाली रहती है। इसका कारण यह है कि ऐसी सरकारों को यह विश्वास रहता है कि उसके साथ समस्त जनता है और वह जो भी कार्य करेगी सभी नागरिक उसे मानेंगे। यदि कुछ नागरिकों को मत का अधिकार न होगा तो सरकार समस्त जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती और उसे भय रहेगा कि ऐसे नागरिक कहीं उसके विरुद्ध न हों।

7. लोगों में राजनीतिक जागृति (Political awakening among the people)-वयस्क मताधिकार से लोगों में राजनीतिक जागृति उत्पन्न होती है और उन्हें राजनीतिक शिक्षा भी मिलती है। जिस व्यक्ति को मत डालने का अधिकार नहीं मिलता, वह राजनीतिक कार्यों के प्रति उदासीन रहता है परन्तु चुनाव के दिनों में राजनीतिक दल और उम्मीदवार मतदाताओं की राजनीतिक निद्रा को भंग करके उनमें सार्वजनिक कार्यों के प्रति रुचि उत्पन्न करते हैं।

8. लोगों में स्वाभिमान की जागृति (Self-respect among the people)-मताधिकार द्वारा लोगों में स्वाभिमान की भावना जागृत होती है। चुनावों के समय प्रत्येक उम्मीदवार को चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, धनी-निर्धनों सभी के पास जा कर वोट के लिए निवेदन करना पड़ता है। इससे लोग यह समझने लगते हैं उनका शासन में भाग है, सरकार को बनाने में उनका भी हाथ है। वे अपने को देश का महत्त्वपूर्ण अंग समझने लगते हैं। उनमें हीनता की भावना नहीं रहती।

9. राष्ट्रीय एकता (National Unity)-राष्ट्रीय एकता के लिए भी वयस्क मताधिकार का होना आवश्यक है। यदि कुछ व्यक्तियों को ही मताधिकार प्राप्त होगा तो समस्त जनता सरकार को अपना नहीं समझ सकती। जनता दो गुटों में बंट जाएगी और जिन लोगों को वोट का अधिकार न होगा, वे कभी भी सरकार का साथ देने से इन्कार कर सकते हैं। इससे राष्ट्रीय एकता की प्राप्ति नहीं हो सकती, परन्तु वयस्क मताधिकार के कारण सभी नागरिक राज्य को अपना समझने लगेंगे। भारत में वयस्क मताधिकार ने राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन दिया है।

10. क्रान्ति का भय नहीं रहता (No danger of revolution)—वयस्क मताधिकार के अनुसार चुनी हुई सरकार समस्त जनता का प्रतिनिधित्व करती है और इस सरकार के द्वारा जनता के हितों का पूरा-पूरा आदर किया जाना स्वाभाविक ही है। दूसरे, यदि सरकार जनमत का उल्लंघन करे तो लोगों के पास साधन है जिसके द्वारा यह उसे अपदस्थ कर सकते हैं। इन कारणों के परिणामवस्वरूप देश में शान्ति और व्यवस्था बनी रहती है और क्रान्ति का भय नहीं रहता। भारत में वयस्क मताधिकार के कारण क्रान्ति नहीं हुई। मताधिकार द्वारा जनता जब चाहे सरकार बदल सकती है। 1977 में जनता ने कांग्रेस सरकार को हरा कर सत्ता जनता पार्टी को सौंप दी। इसी प्रकार अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन शान्तिपूर्ण ढंग से हुआ।

11. सभी लोग कर देते हैं (All people are tax payers)-सभी लोग कर देते हैं। आज कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो कर न देता हो। बिक्री कर, उत्पादन शुल्क आदि सभी लोग देते हैं। इसलिए यह अधिकार सभी वयस्कों को मिलना चाहिए।

12. शान्ति और व्यवस्था स्थापित रहती है (Peace and order remain established)-वयस्क मताधिकार के सिद्धान्त को लागू करने से देश में शान्ति और व्यवस्था स्थापित होती है। कानून जनता के प्रतिनिधियों द्वारा उनकी इच्छानुसार बनाए जाते हैं। इस कारण उसका पालन सहज भाव से ही होता है। जनता का सरकार के साथ पूर्ण सहयोग होता है और इन बातों के कारण कानूनों का उल्लंघन बहुत कम होता है और शान्ति व व्यवस्था बनी रहती है।

13. अल्पसंख्यक सन्तुष्ट (Minorities feel satisfied)—प्रत्येक देश में अल्पसंख्यक पाए जाते हैं और भारत में धार्मिक, भाषायी व सांस्कृतिक अल्पसंख्यक रहते हैं। वयस्क मताधिकार के कारण अल्पसंख्यकों को अपने हितों एवं अधिकारों की रक्षा का अवसर मिल जाता है। वयस्क मताधिकार से अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व मिल जाता है। मताधिकार प्राप्त करके अल्पसंख्यक सन्तुष्ट रहते हैं और बहुसंख्यक भी उन पर किसी प्रकार की ज्यादती नहीं कर सकते हैं।

14. नागरिक-कल्याण के लिए सरकार की स्थापना (Establishment of a Government for the welfare of all) यदि मताधिकार कुछ व्यक्तियों को ही प्राप्त होगा तो सरकार केवल कुछ व्यक्तियों के कल्याण के लिए ही कानून बनाएगी परन्तु वयस्क मताधिकार के कारण सरकार सभी के कल्याण के लिए कार्य करेगी जोकि उचित भी है।

वयस्क मताधिकार के विपक्ष में तर्क (Arguments against Adult Franchise)-बहुत-से व्यक्ति ऐसे भी हैं जो वयस्क मताधिकार के विरुद्ध हैं और अपनी बात की पुष्टि के लिए बहुत-से-तर्क प्रस्तुत करते हैं-

1. शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए (Right to Vote only to the Educated)-बहुतसे लोगों का कहना है कि शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए। शिक्षित व्यक्ति अपने मत का ठीक प्रयोग कर सकता है। मिल का कहना है कि वयस्क मताधिकार से पहले शिक्षा को अनिवार्य बनाना आवश्यक है और जिसे लिखना-पढ़ना नहीं आता उसे वोट देने का अधिकार कभी नहीं मिलना चाहिए।

2. मूों का शासन (Government of the Fools)-वयस्क मताधिकार द्वारा मूल् का शासन स्थापित हो जाता है क्योंकि समाज में अनपढ़ और मूरों की संख्या अधिक होती है। सर जेम्स स्टीफेन (Sir James Stephen) का कहना है कि इससे जो वास्तविक तथा स्वाभाविक सम्बन्ध बुद्धि और मूर्खता में रहता है वह उल्ट जाएगा अर्थात् बुद्धिमानों को मूर्तों पर शासन करना चाहिए परन्तु इनसे मूर्ख बुद्धिमानों पर शासन करेंगे । (It inverts the time and national relation between wisdom and folly.) लेकी (Lecky) का भी यह मत है कि वयस्क मताधिकार द्वारा सत्ता उन व्यक्तियों के हाथों में चली जाएगी जो कंगाल, मूर्ख तथा निकम्मे हैं क्योंकि इनकी संख्या ही समाज में सबसे अधिक होती है।

3. मताधिकार सम्पत्ति के आधार पर मिलना चाहिए (Franchise should be Based on Property)कुछ लोगों का कहना है कि सम्पत्तिशाली व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए नहीं तो दूसरे लोग राष्ट्र के धन का दुरुपयोग करेंगे। मैकाले (Macaulay) का मत है कि ऐसी अवस्था में भूखे नंगे लोग सारी सम्पत्ति और वैभव को नष्ट करके आपस में छीना झपटी करके खा जाएंगे।

4. सब नागरिक समान नहीं (AII Citizens are not Equal)-इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि सभी नागरिक समान नहीं होते। प्रकृति ने सब व्यक्तियों को समान उत्पन्न नहीं किया। कुछ जन्म से मोटे, कुछ पतले, कुछ बुद्धिमान्, कुछ चतुर और कुछ बुद्धिहीन होते हैं। इसलिए समानता के आधार पर सभी वयस्कों को मताधिकार देना उचित नहीं है।

5. मत का दुरुपयोग (Misuse of Votes)–यदि अशिक्षित और निर्धन व्यक्तियों को भी मताधिकार दे दिया जाए तो वे इसका ठीक प्रयोग नहीं करेंगे। अशिक्षित व्यक्ति बिना सोचे-समझे अपने मत का प्रयोग कर अयोग्य व्यक्तियों का शासन स्थापित करेंगे और निर्धन व्यक्ति कुछ पैसों के लालच में आकर अपना वोट बेचने को तैयार हो जाएंगे। जाति, धर्म, वंश आदि के आधार पर भी मत का प्रयोग होगा और योग्यता की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा।

6. स्त्रियों को मताधिकार नहीं मिलना चाहिए (No Right to Vote to Women)-कुछ लोगों का विचार है कि स्त्रियों को मत डालने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। इससे घरेलू शान्ति नष्ट होने का भय रहता है। वैसे भी स्त्रियां अपने मत का प्रयोग अपनी इच्छा से नहीं करतीं और न ही उनमें इतनी सूझ-बूझ होती है कि वे मत का उचित प्रयोग कर सकें।

7. शासन एक कला है (Governing is an Art) आज शासन.को एक कला माना जाता है जिसके सामने बहुत-सी जटिल समस्याएं होती हैं। इसलिए योग्य और अयोग्य का विचार किए बिना मताधिकार देना बुद्धिमत्ता नहीं कहा जा सकता। मत का अधिकार उसे ही दिया जाना चाहिए जो इसके योग्य हो।

8. मताधिकार एक पवित्र राष्ट्रीय कर्त्तव्य है (Franchise is a sacred National Duty) मताधिकार कोई खिलौना नहीं कि बच्चा उसके साथ जैसे चाहे खेलता रहे और जैसे चाहे उसका प्रयोग करे। मताधिकार एक राष्ट्रीय कर्तव्य है। इसका प्रयोग बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ किया जाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि यह अधिकार सोचसमझ कर केवल योग्य नागरिकों को ही मिलना चाहिए।

9. वैज्ञानिक उन्नति के विरुद्ध (Against Scientific Progress)—सर हैनरी मेन का यह विश्वास है कि वयस्क मताधिकार वैज्ञानिक उन्नति के विरुद्ध कार्य करेगा। साधारण व्यक्तियों को गुमराह करके चालाक और रूढ़िवादी लोग सत्ता में आ जाते हैं जिनके अधीन वैज्ञानिक उन्नति नहीं हो पाती।

10. मताधिकार कोई जन्म-सिद्ध अधिकार नहीं (Franchise is not a Birthright)-मिल तथा लेकी (Mill and Lecky) जैसे लेखकों का विचार था कि मतदान का अधिकार कोई जन्म-सिद्ध अधिकार नहीं है। वह तो केवल उनको ही मिलना चाहिए जो इसके ठीक प्रयोग के लिए योग्यता रखते हैं।

11. केवल मताधिकार से अन्य अधिकार सुरक्षित नहीं हो जाते (Suffrage alone does not protect other rights)—यह विचार ठीक नहीं है कि मताधिकार नागरिक के अन्य अधिकारों की आधारशिला है। केवल नागरिक को मताधिकार दे देने से उसके सामाजिक तथा आर्थिक अधिकार सुरक्षित नहीं हो जाते। नागरिकों के सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए नागरिकों की सतत् जागरूकता, स्वतन्त्र न्यायपालिका, स्वतन्त्र प्रेस, स्वस्थ लोकमत, संगठित विरोधी दल आदि का होना अधिक आवश्यक है।

12. अधिक खर्चीला (More Expensive)—वयस्क मताधिकार से बहुत अधिक नागरिकों को मताधिकार प्राप्त हो जाता है। चुनाव के समय सरकार को बहुत अधिक व्यापक स्तर पर मतदान केन्द्रों की व्यवस्था करनी पड़ती है और उतने अधिक चुनाव अधिकारी नियुक्त करने पड़ते हैं। इससे बहुत अधिक खर्चा होता है और यह खर्चा अन्तिम रूप से गरीब जनता पर पड़ता है। उदाहरण के लिए 16वीं लोकसभा के चुनाव के समय भारत में मतदाताओं की संख्या 81 करोड़ से अधिक थी, जिस कारण चुनाव पर करोड़ों रुपए खर्च हुए।

जिन व्यक्तियों को मताधिकार नहीं मिलना चाहिए (Persons who should not be given the Right to Vote)-वयस्क मताधिकार लागू करने का यह अर्थ नहीं कि सभी वयस्क नागरिकों को पूर्ण रूप से मताधिकार दिया जाए। समाज में कुछ व्यक्ति या नागरिक ऐसे भी होते हैं जिन्हें मताधिकार नहीं दिया जा सकता-

  • नाबालिग (Minors). किसी भी राज्य में नाबालिग को मताधिकार नहीं दिया जा सकता।
  • पागल (Isane Persons)-ऐसे व्यक्तियों को भी जो पागल हों मताधिकार से वंचित रखा जाता है उन्हें मत प्रयोग के बारे में पता नहीं होता।
  • घोर अपराधी (Criminals)—घोर अपराधियों को भी मताधिकार से वंचित रखा जाता है ताकि उन्हें यह बात महसूस हो और भविष्य में अपराध न करें। अपने मत का दुरुपयोग करने वाले व्यक्तियों को भी इस अधिकार से वंचित रखा जाता है।
  • दिवालिए (Insolvent) दिवालिए को भी मतदान का अधिकार नहीं दिया जाता।
  • सरकारी कर्मचारी (Government Officials) कुछ विद्वानों का विचार है कि सरकारी कर्मचारी को भी मताधिकार नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि इससे वे राजनीति को भ्रष्ट करते हैं, परन्तु केवल कुछ ही देशों में सरकारी कर्मचारियों को मताधिकार से वंचित किया गया है।
  • धार्मिक नेता (Religious Leaders)-धार्मिक नेताओं को भी कई देशों में मताधिकार प्राप्त नहीं होता।
  • विदेशी (Aliens)-विदेशियों को भी मताधिकार प्राप्त नहीं होता है, क्योंकि वे अपने देश के प्रति वफादार होते है।

निष्कर्ष (Conclusion) वयस्क मताधिकार के बिना लोकतन्त्र न तो पूर्ण है और न ही सफल हो सकता है। लोकतन्त्र जनता का शासन होता है किसी वर्ग विशेष का नहीं, इसलिए आवश्यक है कि अपनी सरकार चुनने का अधिकार सब को एक समान होना चाहिए। वयस्क मताधिकार ही प्रजातन्त्र का प्रतीक और सूचक है। आज प्रायः सभी लोकतन्त्रीय राष्ट्रों में वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त अपनाया गया है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 निर्वाचक

प्रश्न 3.
अनुपातिक प्रतिनिधिता का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसके दो गुणों व दो दोषों का वर्णन करें।
(What do you understand by the term. ‘Proportional Representation ? Describe its two merits and two demerits.)
अथवा
आनुपातिक प्रतिनिधित्व के गुण और दोषों का वर्णन कीजिए। (Write down the merits and demerits of proportional representational system.)
उत्तर-
प्रजातन्त्रात्मक शासन में चुनी गई विधानपालिका के लिए आवश्यक है कि इसमें जनता के हर वर्ग और दल को पूरा-पूरा प्रतिनिधित्व मिले। परन्तु चुनाव के लिए जो प्रणाली आमतौर पर अपनाई जाती है, वह इस उद्देश्य की प्राप्ति में सफल नहीं हो सकती। यह प्रणाली है एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र और साधारण बहुमत की। इस प्रणाली के अनुसार एक निर्वाचन क्षेत्र में जितने भी उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हों, उनमें से जिसको दूसरे से अधिक वोटें प्राप्त हों वह विजयी घोषित कर दिया जाता है। इस प्रणाली के कुछ गम्भीर दोष हैं जैसे कि-

(1) मान लो कि किसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या एक हज़ार है और दो उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। मान लो चुनाव में एक उम्मीदवार को 501 वोटें मिली और दूसरे को 499। चूंकि पहले उम्मीदवार को दूसरे की अपेक्षा अधिक वोटें मिली हैं, वह निर्वाचित घोषित किया जाएगा। इसका दोष यह हुआ कि विधानमण्डल में 499 मतदाताओं को प्रतिनिधित्व नहीं प्राप्त हो सका।

(2) सन् 1971 के संसद् के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 43 प्रतिशत वोटें पड़ीं, परन्तु इसको संसद् में 68 प्रतिशत सीटें प्राप्त हुईं। इसी चुनाव में जनसंघ को 7 प्रतिशत वोटें पड़ी परन्तु संसद् में केवल चार प्रतिशत सीटें प्राप्त हुईं। इसी प्रकार कांग्रेस (संगठन) को 10 प्रतिशत से भी अधिक वोटें पड़ीं, परन्तु संसद् में इसे केवल 3 प्रतिशत सीटें प्राप्त हुईं। इसका दोष यह हुआ कि संसद् भारतीय जनता का ठीक अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं करती। इन दोषों को दूर करने के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का सुझाव दिया जाता है।

प्रश्न 4.
अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व से क्या भाव है ? अल्पसंख्यओं को प्रतिनिधित्व देने वाली किन्हीं चार विधियों का वर्णन करें।
(What is meant by Minority Representation ? Explain any four methods by which minority representation can be possible.)
उत्तर-
हर देश में लोग कई आधार पर बंटे होते हैं। कई समूहों या वर्गों के लोग संख्या में दूसरे वर्गों के लोगों से कम होते हैं। ऐसे लोगों को अल्पसंख्यक कहा जाता है जैसे कि भारत में ईसाई और पारसी लोग हैं।

लोकतन्त्र को वास्तविक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि देश के हर वर्ग व समूह को विधानमण्डल में उचित प्रतिनिधित्व मिले । उचित प्रतिनिधित्व का भाव यह है कि चुनाव प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि हर वर्ष में अपने प्रतिनिधि विधानपालिका में भिजवा सके ताकि हर वर्ग अपनी विचारधारा और दृष्टिकोण को पेश कर सके। यदि ऐसा नहीं हो सकेगा तो विधानमण्डल में कुछ ही बहुसंख्यक दलों या वर्गों के प्रतिनिधि होंगे और विधानमण्डल जनमत का दर्पण (Mirror of the Public Opinion) नहीं कहला सकेगा। मिल (Mill) ने भी कहा है कि, “लोकतन्त्र के लिए यह आवश्यक है कि अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो।”

आजकल प्रायः सभी देशों में एक सदस्यीय चुनाव क्षेत्र (Single member Constituency) है और चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होता है। उसका एक काफ़ी बड़ा दोष है कि इस प्रणाली में बहुमत वर्ग को ही सभी क्षेत्रों में प्रतिनिधि भेजने का अवसर मिलता है अर्थात् जिस वर्ग या राजनीतिक दल के मतदाताओं की संख्या बहुमत में हो उसका सभी क्षेत्रों में सफल होना स्वाभाविक है। इस तरह अल्पसंख्यक वर्ग या राजनीतिक दल के उम्मीदवार सभी क्षेत्रों में हार जाते हैं। कभी-कभी तो जहां कई राजनीतिक दल हों एक उम्मीदवार थोड़े से मत लेकर भी प्रतिनिधि चुना जाता है। मान लो एक दल को लगभग सभी क्षेत्रों में 60% मत प्राप्त होते हैं। इससे तो यह पता चलता है कि राज्य में केवल 60% मतदाताओं का ही वह दल प्रतिनिधित्व करता है और न्यायसंगत बात यह है कि संसद् में उस दल के कुल 60% सदस्य होने चाहिएं परन्तु वास्तव में उस दल को लगभग सभी स्थान प्राप्त हो जाते हैं। इसमें शेष 40 प्रतिशत लोगों को संसद् में कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिलता और उनके हितों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। इससे लोकतन्त्र वास्तविक नहीं बन सकता। प्रजातन्त्र को वास्तविक प्रजातन्त्र बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उन 40 प्रतिशत लोगों को भी सरकार में प्रतिनिधित्व दिया जाए। एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र प्रणाली में तो अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व मिलना सम्भव नहीं और कई बार तो उन्हें प्रतिनिधित्व मिलता ही नहीं। इसलिए कुछ ऐसे तरीके निकाले गए हैं जिसके द्वारा अल्पसंख्यक, वर्गों को कुछ उनकी संख्या के अनुसार, व्यवस्थापिका में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके। इन तरीकों की विस्तारपूर्वक व्याख्या नीचे दी जा रही है-

1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation System)-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा सभी वर्गों या राजनीतिक दलों को उनकी संख्या के अनुपात से व्यवस्थापिका में प्रतिनिधित्व मिलने की काफ़ी सम्भावना रहती है। बहुत ही छोटे दल या महत्त्वहीन दल को बेशक प्रतिनिधित्व न मिले, परन्तु अल्पसंख्यक कहे जाने वाले वर्गों को अवश्य स्थान मिल जाता है। आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के भी दो तरीके हैं—’एकल संक्रमणीय मत प्रणाली या प्राथमिकता मत प्रणाली तथा सूची प्रणाली।’

2. सीमित मत प्रणाली (Limited Vote System)-सीमित मत प्रणाली भी अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने का तरीका है। इस प्रणाली में बहु-सदस्यीय चुनाव क्षेत्र होते हैं और कम-से-कम तीन सदस्य चुने जाते हैं। प्रत्येक मतदाता को एक से अधिक परन्तु स्थानों की संख्या से कम मत दिए जाते हैं। मान लो एक क्षेत्र में 5 सदस्य चुने जाते हैं तो एक मतदाता को तीन वोटे मिलेंगे और वह अपने तीन वोट एक ही उम्मीदवार को नहीं दे सकता। बल्कि तीन अलग-अलग उम्मीदवारों को ही दे सकता है। इससे बहुसंख्यक वर्ग पांच में से तीन स्थान तो प्राप्त कर लेगा परन्तु दो स्थान फिर भी अल्पसंख्यक वर्गों को प्राप्त हो जाते हैं।

इसके गुण (Its Merits)-इस प्रणाली में कई गुण पाए जाते हैं-

(1) इस प्रणाली द्वारा अल्पसंख्यकों को व्यवस्थापिका में कुछ स्थान प्राप्त हो जाते हैं।
(2) यह तरीका आसान भी है क्योंकि इसमें मतों के संक्रमण की आवश्यकता नहीं होती। इसके दोष (Its Demerits)-इस प्रणाली के कई दोष भी हैं-

  • इससे अल्पसंख्यक वर्ग को संसद् में एक-दो स्थान बेशक मिल जाएं परन्तु अपनी संख्या के अनुपात में स्थान नहीं मिल सकते।
  • जिस देश में कई अल्पसंख्यक वर्ग हों, वहां यह प्रणाली उचित रूप से कार्य नहीं कर पाती। थोड़ी-थोड़ी संख्या वाले वर्गों को कोई स्थान प्राप्त होने की कोई सम्भावना नहीं होती, क्योंकि उनकी वोटें बंट जाती हैं।
  • यह प्रणाली एक सदस्यीय क्षेत्र में लागू नहीं हो सकती।
  • इस प्रणाली के अन्दर उप-चुनाव की कोई व्यवस्था नहीं हो सकती। जापान और इटली में इस प्रणाली को कुछ समय बाद बंद कर दिया गया था।

3. संचित मत प्रणाली (Cumulative Vote System)—संचित मत प्रणाली में बहु सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होते हैं। एक मतदाता को उतने ही मत मिलते हैं जितने कि सदस्य चुने जाने हों। मान लो उस क्षेत्र में 15 सदस्य चुने जाने हैं तो एक मतदाता को 15 वोट मिलते हैं। मतदाता को यह स्वतन्त्रता होती है कि वे अपने इन सभी वोटों का जैसे चाहे प्रयोग करे अर्थात् वह अपने सब वोट एक ही उम्मीदवार को दे सकता है और अलग-अलग उम्मीदवारों को भी।

इसके लाभ (Its Merits)-इस प्रणाली के कई गुण हैं। इस प्रणाली का यह लाभ है कि इसके द्वारा अल्पसंख्यक वर्गों को कुछ स्थान प्राप्त हो जाते हैं। अल्पसंख्यक मतदाता अपने सब मत एक ही उम्मीदवार को देंगे और इससे उसके पास काफ़ी मात्रा में वोट हो जाएंगे और उसके चुने जाने की सम्भावना हो जाएगी।

इसके दोष (Its Demerits)—इस प्रणाली में कई दोष पाए जाते हैं-

  • इस प्रणाली में भी अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी संख्या के अनुपात के अनुसार स्थान नहीं मिलते।
  • इस प्रणाली में बहुत-से मतों के व्यर्थ जाने की सम्भावना भी रहती है।
  • इस प्रणाली में राजनीतिक दलों का अच्छा संगठन होना चाहिए जिनके बिना अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल सकता। इससे राजनीतिक दलों की बुराइयां भी बढ़ जाती हैं।

4. द्वितीय मतदान प्रणाली (Second Ballot System)–इस प्रणाली के लिए एक सदस्यीय चुनाव क्षेत्र होना चाहिए। उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए कुल डाले गए वोटों का पूर्ण बहुमत प्राप्त होना चाहिए। यदि चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत प्राप्त न हो तो उस उम्मीदवार को जिसने चुनाव में सबसे कम मत प्राप्त किए हों चुनाव से निकाल दिया जाता है और दूसरी बार मतदान करवाया जाता है। यह क्रम तब तक चलता रहता है जब तक किसी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत प्राप्त न हो जाए।

5. पृथक् निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorate System)-अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का एक और तरीका भारत में अंग्रेजों ने लागू किया था। इसे पृथक् निर्वाचन प्रणाली कहा जाता है। इसके अन्तर्गत विभिन्न धर्मों और जातियों के लिए उनकी संख्या के अनुसार व्यवस्थापिका में स्थान सुरक्षित (Reserve) किए जाते हैं और उन विभिन्न धर्मों और जातियों के मतदाता अपने-अपने प्रतिनिधि अलग-अलग चुनते हैं अर्थात् मुसलमान मतदाता मुसलमान उम्मीदवारों को वोट देते हैं और दूसरे धर्मों और जातियों के मतदाता अपने-अपने उम्मीदवारों को। 1909 के एक्ट के अनुसार भारत में मुसलमानों को अपने प्रतिनिधि अलग चुनने का अधिकार दिया गया था। 1919 के एक्ट द्वारा सिक्खों को भी अपने प्रतिनिधि अलग चुनने का अधिकार दिया गया था। 1935 के एक्ट द्वारा इसे और फैलाया गया। इस प्रणाली को साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व (Communal Representation) भी कहा जाता था।

इस प्रणाली के गुण व दोष (Its Merits and Demerits)-इस प्रणाली का गुण तो केवल यही है कि प्रत्येक जाति और धर्म को लोगों के उनकी संख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व मिल जाता है, परन्तु इस प्रणाली के दोष अधिक हैं। इससे लोगों में राष्ट्रीय एकता उत्पन्न नहीं होती बल्कि वे जाति और धर्म के नाम पर छोटे-छोटे गुटों में बंट जाते हैं। लोगों में आपसी झगड़े होते हैं जैसे कि भारत में हिन्दू और मुसलमानों में हुए और बाद में देश के दो टुकड़े हो गए।

6. सुरक्षित स्थान सहित संयुक्त निर्वाचन (Reservation of Seats with Joint Electorate)-भारत में संविधान द्वारा अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का एक और तरीका अपनाया गया है। यह तरीका पृथक् निर्वाचन प्रणाली से अच्छा माना जाता है। इस तरीके के अनुसार अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के लिए उनकी जनसंख्या के आधार पर कुछ स्थान सुरक्षित कर दिए जाते हैं। उन सुरक्षित स्थानों के लिए उम्मीदवार उसी जाति या वर्ग से खडे हो सकते हैं, परन्तु मतदाता सभी नागरिक होते हैं अर्थात् अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्य समस्त मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं।

इसका लाभ यह है कि इससे अल्पसंख्यक वर्ग को प्रतिनिधित्व भी मिल जाता है और राष्ट्रीय एकता भी नष्ट नहीं होने पाती, परन्तु इसका दोष यह है कि इससे ऐसी जातियों और वर्गों में हीनता की भावना आ जाती है।

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प्रश्न 5.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली तथा अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के गुणों तथा अवगुणों की विस्तार सहित व्याख्या कीजिए।
(Discuss in details the Merits and Demerits of Direct Election System and indirect Election system.)
अथवा
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के गुणों तथा अवगुणों का वर्णन करो।
(Write merits and demerits of Direct Election System.)
उत्तर-
आधुनिक युग प्रजातन्त्र का युग है। प्रजातन्त्र जनता का, जनता के लिए तथा जनता द्वारा चलाया हुआ शासन होता है। प्रजातन्त्र के दो रूप होते हैं-एक प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र तथा दूसरा अप्रत्यक्ष प्रजातन्त्र। प्राचीन यूनान में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र प्रचलित था। आधुनिक युग में प्रत्यक्ष प्रजातन्त्र सम्भव नहीं है क्योंकि आधुनिक राज्यों की जनसंख्या इतनी अधिक है कि इसके लिए एक स्थान पर एकत्रित होकर कानून बनाना तथा नीति का निर्माण करना असम्भव है। इसलिए सरकार का काम लोगों के प्रतिनिधियों की ओर से चलाया जाता है। जनता द्वारा एक निश्चित समय के पश्चात् अपने प्रतिनिधियों को स्थानीय संस्थाओं के लिए तथा विधानसभाओं के लिए चुनकर भेजने के ढंग को चुनाव (Election) कहा जाता है। भारत में विधानसभाओं तथा संसद् के लोकसभा के सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं। नगरपालिका, जिला परिषद् तथा पंचायतों के सदस्य भी चुने जाते हैं। बिना चुनावों के लोकतन्त्रीय शासन के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। आज प्रायः सभी देशों में वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त अपनाया गया है। प्रतिनिधियों को चुनने के दो तरीके हैं-प्रत्यक्ष चुनाव तथा अप्रत्यक्ष चुनाव। .

प्रत्यक्ष चुनाव (Direct Election)-प्रायः निचले अर्थात् लोकप्रिय सदनों (Popular House) का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होता है। मतदाताओं के मतों के आधार पर ही सदस्य चुने जाते हैं। जब मतदाता स्वयं अपने प्रतिनिधि चुनें और वे प्रतिनिधि ही संसद् या व्यवस्थापिका में अपना पद ग्रहण करते हों तो उसे प्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। भारत में पंचायतों, नगरपालिकाओं, विधानसभाओं तथा लोकसभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
वयस्क मताधिकार से आपका क्या भाव है ? ।
उत्तर-
सार्वभौम वयस्क मताधिकार का अभिप्राय यह है कि एक निश्चित आयु के वयस्क नागरिकों को बिमा किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार देना है। वयस्क होने की आयु राज्य द्वारा निश्चित की जाती है। इंग्लैण्ड में पहले 21 वर्ष के नागरिक को मताधिकार प्राप्त था, परन्तु अब यह 18 वर्ष है। रूस और अमेरिका में वयस्क मताधिकार की आयु 18 वर्ष है। भारत में मताधिकार की आयु पहले 21 वर्ष थी, परन्तु 61वें संशोधन एक्ट द्वारा यह आयु 18 वर्ष कर दी गई है। सार्वभौम मताधिकार में पागलों, दिवालियों, बच्चों, सज़ा प्राप्त व्यक्तियों इत्यादि को मत देने का अधिकार प्राप्त नहीं होता। निश्चित आयु के होने के पश्चात् प्रत्येक नागरिक बिना किसी भेदभाव के मत डालने का अधिकारी बन जाता है, पर इसके साथ एक निश्चित समय तक निवास की शर्त भी रखी जाती है। आधुनिक युग में सार्वभौम वयस्क मताधिकार को ही उचित और न्यायसंगत माना गया है।

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प्रश्न 2.
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने से क्या अभिप्राय है ? अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने वाली दो विधियों के नाम लिखें।
अथवा
अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
प्रत्येक देश में लोग कई आधारों पर बंटे होते हैं। कई समूहों या वर्गों के लोग किसी राज्य में दूसरे वर्गों के लोगों से कम होते हैं। ऐसे लोगों को अल्पसंख्यक कहा जाता है जैसे कि भारत में ईसाई, मुस्लिम और पारसी लोग। लोकतन्त्र को वास्तविक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि देश के हर वर्ग तथा समूह को विधानमण्डल में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों को अपनी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। एक सदस्यीय चुनाव प्रणाली के अन्तर्गत अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। अतः अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देना आवश्यक है ताकि विधानमण्डल जनमत का दर्पण कहला सके।
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने वाली दो विधियां-इसके लिए प्रश्न नं. 19 देखें।

प्रश्न 3.
स्त्री मताधिकार के पक्ष में चार दलीलें लिखो।
उत्तर-
स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त होना चाहिए। स्त्री मताधिकार के पक्ष में मुख्यत: निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

  • यह लोकतन्त्रात्मक है-स्त्रियों को मत का अधिकार देना लोकतन्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार है। लोकतन्त्र में समस्त जनता को शासन में भाग लेने का अधिकार मिलता है और जनता में जितना भाग पुरुष का है, उतना ही स्त्री का है।
  • स्त्रियों को मताधिकार की अधिक आवश्यकता-शारीरिक दृष्टि से निर्बल व्यक्ति को कानून की रक्षा की अधिक आवश्यकता होती है। जो सबल है वह तो कानून को भी अपने हाथ में ले सकता है।
  • स्त्रियां दूसरे सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं-इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रशासन के क्षेत्र में स्त्रियों ने बड़ा प्रशंसनीय कार्य किया है। आजकल पुलिस और सेना में भी स्त्रियां कार्य कर रही हैं, फिर राजनीति के क्षेत्र में वे कार्य क्यों नहीं कर सकेंगी।
  • स्त्रियां शान्तिप्रिय होती हैं-स्त्रियां स्वभाव से ही शान्ति प्रिय होती हैं और इससे राजनीति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

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प्रश्न 4.
स्त्री मताधिकार के विपक्ष में चार तर्क दें।
अथवा
स्त्री मताधिकार के विरुद्ध चार तर्क दो।
उत्तर-
स्त्री मताधिकार के विरुद्ध मुख्य तर्क निम्नलिखित दिए जाते हैं

  • स्त्री का कार्य क्षेत्र घर है- यदि उसे मत देने का अधिकार दिया जाए तो वह घर की ओर ठीक ध्यान न दे सकेगी। इससे पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा घर की शान्ति समाप्त हो जाएगी।
  • स्त्री का मत पुरुष के मत की पुनरावृत्ति है-अधिकतर स्त्रियां अपने पति, पिता या भाई आदि के कहने के अनुसार ही अपने मत का प्रयोग करती हैं। वे अपनी ओर से यह सोचने का प्रयत्न नहीं करतीं कि वोट किसे देना चाहिए।
  • घरेलू शान्ति के भंग होने का खतरा–यदि स्त्री मताधिकार लागू किया जाए तो इससे घरेलू शान्ति के भंग होने का बहुत डर रहता है।
  • उदासीनता-स्त्रियां प्रायः राजनीति के प्रति उदासीन रहती हैं। इसलिए वे अपने वोट का उचित प्रयोग नहीं कर पातीं।

प्रश्न 5.
बालिग मताधिकार के पक्ष में चार तर्क दें।
अथवा
सार्वजनिक वयस्क (बालिग) मताधिकार के पक्ष में कोई चार तर्क दीजिए।
उत्तर-
वयस्क मताधिकार के पक्ष में मुख्य निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं-

  • प्रभुसत्ता जनता के पास है-लोकतन्त्र में प्रभुसत्ता जनता के पास होती है और जनता की इच्छा तथा कल्याण के लिए शासन चलाया जाता है। इसलिए मत डालने का अधिकार सबको समानता के साथ मिलना चाहिए। यदि वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त लागू न किया जाए तो जनता की प्रभुसत्ता की बात सत्य सिद्ध नहीं होती।
  • कानून का प्रभाव सब पर पड़ता है-राज्य में जो भी कानून बनते हैं उनका प्रभाव राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों पर पड़ता है। इसीलिए उन कानूनों को बनाने का अधिकार भी सबको समान रूप से मिलना चाहिए।
  • व्यक्ति के विकास के लिए मताधिकार आवश्यक-लोकतन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का विकास करने के लिए कई प्रकार के अधिकार मिलते हैं। उन अधिकारों में मताधिकार भी आवश्यक है और इसके बिना कोई भी व्यक्ति अपना विकास नहीं कर सकता। दूसरे अधिकारों की रक्षा के लिए मताधिकार आवश्यक है।
  • रकार को अधिक बल मिलता है-वयस्क मताधिकार द्वारा चुनी गई सरकार अधिक शक्तिशाली होती है।

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प्रश्न 6.
सार्वभौम वयस्क मताधिकार के विरोध में चार तर्क लिखिए।
उत्तर-
वयस्क मताधिकार के विरुद्ध मुख्य तर्क निम्नलिखित दिए जाते हैं

  • शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए-बहुत से लोगों का कहना है कि शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए। शिक्षित व्यक्ति अपने मत का ठीक प्रयोग कर सकता है। मिल का कहना है कि वयस्क मताधिकार से पहले शिक्षा को अनिवार्य बनाना आवश्यक है। जिसे लिखना-पढ़ना नहीं आता उसे वोट देने का अधिकार कभी नहीं मिलना चाहिए।
  • मूों का शासन-वयस्क मताधिकार द्वारा मूों का शासन स्थापित हो जाता है, क्योंकि समाज में अनपढ़ और मूों की संख्या अधिक होती है।
  • मत का दुरुपयोग- यदि अशिक्षित और निर्धन व्यक्तियों को भी मताधिकार दे दिया जाए तो वे इसका ठीक प्रयोग नहीं करेंगे। अशिक्षित व्यक्ति बिना सोचे-समझे अपने मत का प्रयोग कर अयोग्य व्यक्तियों का शासन स्थापित करेंगे और निर्धन व्यक्ति कुछ पैसों के लालच में आकर अपना वोट बेचने को भी तैयार हो जाएंगे।
  • खर्चीली व्यवस्था-वयस्क मताधिकार से बहुत अधिक लोगों को मताधिकार प्राप्त हो जाता है, जिससे चुनाव प्रक्रिया बहुत खर्चीली हो जाती है।

प्रश्न 7.
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व का क्या अर्थ है ?
अथवा
क्षेत्रीय प्रतिनिधत्व से क्या भाव है ? क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के कोई दो गुण बताएं।
उत्तर-
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व का सिद्धान्त प्रायः सभी देशों में पाया जाता है। इसके अनुसार सारे देश के मतदाताओं को प्रादेशिक इकाइयों में विभाजित कर दिया जाता है जिन्हें निर्वाचन क्षेत्र कहते हैं। एक निर्वाचन क्षेत्र से एक या अधिक प्रतिनिधि चुने जाते हैं। एक निर्वाचन क्षेत्र या प्रदेश में रहने वाले सभी मतदाता उस क्षेत्र के प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और प्रतिनिधि उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रादेशिक प्रतिनिधित्व में प्रतिनिधि क्षेत्र के समस्त मतदाताओं की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। निर्वाचन क्षेत्रों का विभाजन प्रायः भौगोलिक आधार पर किया जाता है। इन निर्वाचन क्षेत्रों का निश्चित समय के पश्चात् बढ़ती हुई जनसंख्या के आधार पर परिसीमन किया जाता है। यह कार्य परिसीमन आयोग के द्वारा किया जाता . है। भारत में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों का चुनाव प्रादेशिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर होता है और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है।

क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के निम्नलिखित दो गुण हैं –

  1. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व से प्रादेशिक एकता को बढ़ावा मिलता है।
  2. क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व से अधिक विकास की सम्भावना बनी रहती है।

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प्रश्न 8.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से आपका क्या भाव है ?
अथवा
प्रत्यक्ष निर्वाचन विधि से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
लोकतन्त्र में जनता अपने प्रतिनिधि निर्वाचन द्वारा चुनती है। प्रतिनिधियों को चुनने के दो तरीके हैं-प्रत्यक्ष चुनाव तथा अप्रत्यक्ष चुनाव।
जब मतदाता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तौर पर अपने प्रतिनिधि चुने और वे प्रतिनिधि ही संसद् या व्यवस्थापिका में अपना पद ग्रहण करते हों तो उसे प्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। उदाहरण के लिए भारत में पंचायतों, नगरपालिकाओं, विधानसभाओं तथा लोक सभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं। इंग्लैण्ड में कॉमन सदन (House of Common) तथा अमेरिका में प्रतिनिधि सदन (House of Representative) के सदस्य जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं।

प्रश्न 9.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के कोई चार गुण लिखें।
उत्तर-
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-

  • मतदाताओं और प्रतिनिधियों में सीधा सम्पर्क-प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि इसमें मतदाताओं तथा प्रतिनिधियों के बीच सीधा सम्बन्ध रहता है, क्योंकि प्रतिनिधि मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं। प्रत्यक्ष सम्पर्क से प्रतिनिधि और मतदाता एक-दूसरे की भावनाओं और विचारों को समझते हैं।
  • यह प्रणाली अधिक लोकतन्त्रात्मक है-लोकतन्त्र में प्रभुसत्ता जनता में निहित होती है और समस्त शक्तियां अन्तिम रूप में जनता में निहित होती हैं। मतदाता प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। अतः प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का सिद्धान्त लोकतन्त्र के अनुकूल है।।
  • मतदाता की प्रतिष्ठा में वृद्धि-प्रत्यक्ष चुनाव में मतदाता प्रत्यक्ष तौर पर चुनाव में भाग लेते हैं। चुनाव के समय प्रत्येक उम्मीदवार को चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, धनी-निर्धन सभी के पास जाकर वोट के लिए निवेदन करना पड़ता है। इससे लोग यह समझने लगते हैं कि उनका शासन में भाग है, सरकार को बनाने में उनका भी हाथ है। इस तरह मतदाताओं की प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है।
  • समानता की भावना-प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप में मताधिकार प्रयोग करने का अवसर मिलता है।

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प्रश्न 10.
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में अन्तर बताइए।
अथवा
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनाव विधि में अन्तर लिखिए।
उत्तर-
जब मतदाता स्वयं अपने प्रतिनिधि चुनें और वे प्रतिनिधि ही संसद् या व्यवस्थापिका में अपना पद ग्रहण करते हों तो उसे प्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। परन्तु अप्रत्यक्ष चुनाव में जनता के चुने प्रतिनिधि संसद् या विधानसभा के सदस्यों का चुनाव करते हैं। संसद् के निम्न सदन का चुनाव आमतौर पर प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा होता है जबकि ऊपरि सदन के सदस्य अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा चुने जाते हैं। भारत में राज्यसभा के सदस्य इसी प्रकार से चुने जाते हैं, जबकि पंचायतों, नगरपालिकाओं, विधानसभाओं तथा लोकसभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं।

प्रश्न 11.
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से क्या भाव है ?
उत्तर-
प्रजातन्त्र के लिए चुनाव का होना अनिवार्य है। जनता निश्चित अवधि के पश्चात् अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। प्रतिनिधियों को चुनने के दो तरीके हैं-प्रत्यक्ष चुनाव तथा अप्रत्यक्ष चुनाव। जब वे प्रतिनिधि जिनके हाथ में शासन सत्ता रहती हो, जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से न चुने जाकर जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हों तो उस प्रणाली को अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली कहा जाता है। अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में जनता निर्वाचक मण्डल के सदस्यों को चुन लेती है और वे सदस्य मुख्य प्रतिनिधियों को चुन लेते हैं। भारत में राज्य सभा के सदस्य अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा चुने जाते हैं। राज्य सभा के सदस्यों का चुनाव राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति तथा राज्यों की विधान परिषदों के सदस्य भी अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली द्वारा चुने जाते हैं।

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प्रश्न 12.
चुनाव प्रणाली में अप्रत्यक्ष चुनाव के चार गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1. योग्य प्रतिनिधियों के चुनाव की अधिक सम्भावना – अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के अन्तर्गत मतदाताओं की संख्या पर्याप्त कम होती है। अल्प मतदाता उम्मीदवारों की योग्यताओं सम्बन्धी परस्पर विचार-विमर्श कर सकते हैं। प्रत्येक मतदाता का उम्मीदवार के साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क भी सम्भव हो सकता है। इस प्रकार योग्य प्रतिनिधियों के चुनाव की अधिक सम्भावना हो सकती है।

2. राजनीतिक दलों के प्रभावों की कम सम्भावना-अप्रत्यक्ष चुनाव के अधीन राजनीतिक दलों के कुप्रभावों की सम्भावना पर्याप्त कम हो जाती है। मताधिकार अल्प-मात्र बुद्धिमान् व्यक्तियों तक ही सीमित होता है इसलिए राजनीतिक दलों को विशाल स्तर पर जलसे, जुलूस का प्रबन्ध अथवा प्रचार करने की आवश्यकता नहीं होती।

3. कम खर्चीली विधि-इस प्रणाली अधीन अत्यधिक धन व्यय नहीं किया जाता। अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में मतदाताओं की संख्या कम तथा चुनाव क्षेत्र का आकार छोटा होने के कारण अत्यधिक धन व्यय करने की आवश्यकता नहीं होती।

4. सार्वजनिक उत्तेजना की कम सम्भावना-प्रत्यक्ष चुनाव प्राय: लोगों को उकसाते हैं। उनमें दल गुटबन्दी की भावना इतनी अधिक होती है कि छोटे-छोटे मामलों सम्बन्धी झगड़े करने के लिए तैयार रहते हैं। इसी कारण विभिन्न उम्मीदवारों के समर्थकों में दंगे-फसाद प्रायः होते रहते हैं परन्तु ऐसी स्थिति अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में कम ही सम्भव हो सकती है।

प्रश्न 13.
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के कोई चार दोष लिखें।
उत्तर-
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के निम्नलिखित दोष हैं-

  • अलोकतन्त्रीय प्रणाली-अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अलोकतन्त्रीय है, क्योंकि इस प्रणाली के द्वारा जनता को अपनी इच्छा को प्रकट करने का अवसर नहीं मिलता। सरकार के निर्माण में मतदाताओं का सीधा हाथ नहीं होता।
  • लोगों को राजनीतिक शिक्षा नहीं मिलती-अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के कारण लोगों को राजनीतिक शिक्षा नहीं मिलती, क्योंकि प्रतिनिधियों का चुनाव जनता के हाथ में नहीं होता है। मतदाता अपने आपको शासन का अंग और भागीदार अनुभव नहीं करते और वे चुनाव के प्रति उदासीन ही रहते हैं।
  • कम खर्चीली नहीं-यह प्रणाली उतनी कम खर्चीली नहीं जितनी कि सोची जाती है। इसका कारण यह है कि पहले निर्वाचक मण्डल के सदस्यों का चुनाव किया जाता है और बाद में निर्वाचक मण्डल के सदस्य प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। इस प्रकार इस प्रणाली में काफ़ी खर्चा होता है, जिस तरह प्रत्यक्ष प्रणाली में होता है।
  • इस प्रणाली में मतदाताओं एवं प्रतिनिधियों के बीच सीधा सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाता।

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प्रश्न 14.
पेशेवर प्रतिनिधित्व क्या है ? पेशेवर प्रतिनिधित्व के कोई दो गुण बताएं।
उत्तर-
व्यावसायिक प्रतिनिधित्व का अर्थ है कि एक क्षेत्र में रहने वाले सभी नागरिक एक प्रतिनिधि न चुनें बल्कि एक व्यवसाय से सम्बन्धित सारे नागरिक अपना प्रतिनिधि चुन कर भेजें और दूसरे व्यवसाय से सम्बन्धित नागरिक अपने प्रतिनिधि चुनें अर्थात् सभी व्यवसायों को विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो ताकि प्रत्येक व्यवसाय के लोगों के हितों की रक्षा की जा सके। इस प्रणाली के अन्तर्गत डॉक्टर, अध्यापक, वकील, मज़दूर, पूंजीपति और व्यापारी अपने-अपने अलग प्रतिनिधि चुनेंगे जो उन व्यवसायों से सम्बन्धित होंगे। अतः इस प्रणाली के अनुसार प्रत्येक व्यवसाय को विधानमण्डल में अपना प्रतिनिधि भेजने का अवसर मिल जाता है। इस प्रणाली का समर्थन सबसे पहले एक फ्रैंच लेखक ‘मिराबो’ ने किया था। फ्रांस की क्रान्ति के समय उसने यह घोषणा की थी कि विधानमण्डल को समाज के सब हितों का एक छोटा-सा दर्पण होना चाहिए। संसार के कई देशों में इस प्रणाली को लाग भी किया गया है। इस प्रणाली को पंजाब विश्वविद्यालय की सीनेट के चुनाव में भी अपनाया गया है।

पेशेवर प्रतिनिधित्व के दो गुण निम्नलिखित हैं-

  1. पेशेवर प्रतिनिधित्व में राष्ट्र के प्रत्येक वर्ग को प्रतिनिधत्व मिलता है।
  2. पेशेवर प्रतिनिधित्व अधिक प्रजातांत्रिक है।

प्रश्न 15.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
यह एक ऐसी चुनाव प्रणाली है जिसके अनुसार जनता के हर वर्ग या दल को विधानमण्डल में उतना ही प्रतिनिधित्व मिलता है जितना उनके समर्थकों का अनुपात होता है। एक वर्ग या दल के पीछे जितने प्रतिशत मतदाता होंगे उसे विधानमण्डल में उतने ही प्रतिशत सीटें प्राप्त होंगी। इस प्रणाली के तीन मुख्य लक्षण हैं-

  • बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र-निर्वाचन क्षेत्रों का बहु-सदस्यीय (Multi-member) होना आवश्यक है। आम मत यह है कि एक निर्वाचन क्षेत्र में तीन से लेकर पन्द्रह तक प्रतिनिधियों के चुने जाने की व्यवस्था है।
  • वोट की तरजीह-हर मतदाता के पास केवल एक ही वोट होती है, परन्तु पर्ची (Ballot-Paper) पर उस वोट के लिए भिन्न-भिन्न उम्मीदवारों के प्रति अपनी तरजीह या पसन्द (जैसे कि प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि) को अंकित कर सकता है।
  • वोटों की निश्चित संख्या-चुनाव में विजयी होने के लिए उम्मीदवार को वोटों की एक निश्चित संख्या (Quota) प्राप्त करनी होती है। इस संख्या को निर्धारित करने के लिए कुछ भिन्न-भिन्न नियम प्रचलित हैं।

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प्रश्न 16.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कोई चार गुण लिखो।
उत्तर-

  • प्रत्येक वर्ग या दल को उचित प्रतिनिधित्व-इस प्रणाली के अनुसार समाज का कोई वर्ग या देश का कोई भी दल प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं रह जाता है। जिस वर्ग या दल के पीछे जितने मतदाता होते हैं उसको उसी अनुपात में विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व मिल जाता है।
  • अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाता है, जिससे उनके हितों की रक्षा होती है।
  • एक राजनीतिक दल की निरंकुशता स्थापित नहीं होती-इस प्रणाली के अधीन किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता। विधानमण्डल में लगभग सभी दलों को कुछ-न-कुछ सीटें प्राप्त होती हैं जिससे कोई एक दल अपनी निरंकुशता स्थापित नहीं कर पाता।
  • कोई भी वोट व्यर्थ नहीं जाती-इस प्रणाली के अधीन प्रत्येक वोट की गिनती की जाती है।

प्रश्न 17.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कोई चार अवगुण लिखो।
उत्तर-

  • यह प्रणाली बहुत जटिल है-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली बहुत जटिल है। साधारण वोटर इसे समझ नहीं सकता। वोटों पर पसन्द अंकित करना, कोटा निश्चित करना, वोटों की गिनती करना और वोटों को पसन्द के अनुसार हस्तान्तरित करना आदि बातें एक साधारण पढ़े-लिखे व्यक्ति की समझ से बाहर हैं।
  • राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अन्तर्गत छोटे-छोटे दलों को प्रोत्साहन मिलता है। अल्पसंख्यक जातियां भी अपनी भिन्नता बनाये रखती हैं और दूसरी जातियों के साथ अपने हितों को मिलाना नहीं चाहतीं। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्र छोटे-छोटे वर्गों और गुटों में बंटकर रह जाता है और राष्ट्रीय एकता पनप नहीं पाती।
  • राजनीतिक दलों का अधिक महत्त्व-आनुपातिक प्रतिनिधित्व की सूची प्रणाली के अन्तर्गत राजनीतिक दलों का महत्त्व बहुत अधिक हो जाता है। मतदाता को किसी-न-किसी दल के पक्ष में वोट डालना होता है। निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकते।
  • उत्तरदायित्व का अभाव-इस प्रणाली के अधीन निर्वाचन क्षेत्र बहुसदस्यीय होते हैं और एक क्षेत्र में कई प्रतिनिधि होते हैं। चूंकि एक क्षेत्र का प्रतिनिधि निश्चित नहीं होता, इसलिए प्रतिनिधियों में उत्तरदायित्व की भावना पैदा नहीं होती।

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प्रश्न 18.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के विरुद्ध चार तर्क दें।
उत्तर-

  • योग्य प्रतिनिधियों के निर्वाचन की कम सम्भावना-प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के अधीन साधारण मतादाताओं को ग़लत प्रचार के द्वारा प्रभावित किया जा सकता है। परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष चुनाव विधि के अधीन योग्य उम्मीदवारों के निर्वाचित होने की सम्भावना होती है।
  • गुणवान् व्यक्ति ऐसे चुनावों से भयभीत होते हैं-प्रत्यक्ष चुनाव विधि के अधीन राजनीतिक गतिविधियों का स्तर निम्न स्तर पर पहुंच जाता है। ऐसी विधि के अधीन हिंसक घटनाएं भी प्रायः होती हैं। इस प्रकार की अवस्थाओं में बुद्धिमान् तथा गुणवान् व्यक्ति चुनाव लड़ने से भयभीत होते हैं।
  • यह चुनाव विधि धनवानों के लिए-इस प्रकार की चुनाव प्रणाली में अत्यधिक धन व्यय किया जाता है। ऐसी प्रणाली में कोई निर्धन गुणवान् व्यक्ति चुनाव लड़ने की कल्पना भी नहीं करता।
  • खर्चीली विधि-यह प्रणाली बहुत अधिक खर्चीली है।

प्रश्न 19.
अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की चार विधियां लिखो।
अथवा
अल्प (कम) गिनती को प्रतिनिधित्व देने की किन्हीं तीन मुख्य विधियों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर-
अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने वाले विभिन्न तरीके निम्नलिखित हैं-
1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली-आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा सभी वर्गों या राजनीतिक दलों को उनकी संख्या के अनुपात से व्यवस्थापिका में प्रतिनिधित्व मिलने की काफ़ी सम्भावना रहती है।

2. सीमित मत प्रणाली-सीमित मत प्रणाली भी अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने का तरीका है। इस प्रणाली में बहु-सदस्यीय चुनाव क्षेत्र होते हैं और कम-से-कम तीन सदस्य चुने जाते हैं। प्रत्येक मतदाता को एक से अधिक परन्तु स्थानों की संख्या से कम मत दिए जाते हैं।

3. संचित मत प्रणाली-संचित मत प्रणाली में बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होते हैं। एक मतदाता को उतने ही मत मिलते हैं जितने कि सदस्य चुने जाते हैं।

4. पृथक निर्वाचन प्रणाली-अल्पसंख्यक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का एक और तरीका भारत में अंग्रेजों ने लाग किया था। इसे पृथक निर्वाचन प्रणाली कहा जाता है। इसके अन्तर्गत विभिन्न धर्मों और जातियों के लिए उनकी संख्या के अनुसार व्यवस्थापिका में स्थान आसुरक्षित (Reserve) किए जाते हैं और उन विभिन्न धर्मों और जातियों के मतदाता अपने-अपने प्रतिनिधि अलग-अलग चुनते हैं अर्थात् मुसलमान मतदाता मुसलमान उम्मीदवारों को वोट देते हैं और दूसरे धर्मों और जातियों के मतदाता अपने-अपने उम्मीदवारों को। 1909 के एक्ट के अनुसार भारत में मुसलमानों को अपने प्रतिनिधि अलग चुनने का अधिकार दिया गया था।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
वयस्क मताधिकार से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सार्वभौम वयस्क मताधिकार का अभिप्राय यह है कि एक निश्चित आयु के वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार देना है। वयस्क होने की आयु राज्य द्वारा निश्चित की जाती है। भारत में मताधिकार की आयु पहले 21 वर्ष थी परन्तु 61वें संशोधन एक्ट द्वारा यह आयु 18 वर्ष कर दी गई है।

प्रश्न 2.
अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
प्रत्येक देश में लोग कई आधार पर बंटे होते हैं। कई समूह या वर्गों के लोग किसी संस्था में दूसरे वर्गों के लोगों से कम होते हैं। ऐसे लोगों को अल्पसंख्यक कहा जाता है जैसे कि भारत में ईसाई, मुस्लिम और पारसी लोग। लोकतन्त्र को वास्तविक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि देश के हर वर्ग तथा समूह को विधानमण्डल में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों को अपनी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

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प्रश्न 3.
स्त्री मताधिकार के पक्ष में दो तर्क दें।
उत्तर-
स्त्री मताधिकार के पक्ष में मुख्यतः निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं-

  1. यह लोकतन्त्रात्मक है-स्त्रियों को मत का अधिकार देना लोकतन्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार है।
  2. स्त्रियों को मताधिकार की अधिक आवश्यकता-शारीरिक दृष्टि से निर्बल व्यक्ति को कानून की रक्षा की अधिक आवश्यकता होती है। जो सबल है वह तो कानून को भी अपने हाथ में ले सकता है।

प्रश्न 4.
स्त्री मताधिकार के विरुद्ध दो तर्क दें।
उत्तर-

  1. स्त्री का कार्य क्षेत्र घर है-यदि उसे मत देने का अधिकार दिया जाए तो वह घर की ओर ठीक ध्यान न दे सकेगी। इससे पारिवारिक जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा तथा घर की शान्ति समाप्त हो जाएगी।
  2. स्त्री का मत पुरुष के मत की पुनरावृत्ति है-अधिकतर स्त्रियां अपने पति, पिता या भाई आदि के कहने के अनुसार ही अपने मत का प्रयोग करती हैं। वे अपनी ओर से यह सोचने का प्रयत्न नहीं करतीं कि वोट किसे देना चाहिए।

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प्रश्न 5.
सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के पक्ष में दो तर्क दें।
उत्तर-

  1. प्रभुसत्ता जनता के पास है-लोकतन्त्र में प्रभुसत्ता जनता के पास होती है और जनता की इच्छा तथा कल्याण के लिए शासन चलाया जाता है। इसके मत डालने का अधिकार सबको समानता के साथ मिलना चाहिए। यदि वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त लागू न किया जाए तो जनता की प्रभुसत्ता की बात सत्य सिद्ध नहीं होती।
  2. कानून का प्रभाव सब पर पड़ता है-राज्य में जो भी कानून बनते हैं उनका प्रभाव राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों पर पड़ता है। इसीलिए उन कानूनों को बनाने का अधिकार भी सबको समान रूप से मिलना चाहिए।

प्रश्न 6.
सार्वभौम वयस्क मताधिकार के विपक्ष में दो तर्क दीजिए।
उत्तर-

  • शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए-बहुत से लोगों का कहना है कि शिक्षित व्यक्तियों को ही मताधिकार मिलना चाहिए। शिक्षित व्यक्ति अपने मत का ठीक प्रयोग कर सकता है।
  • मूों का शासन-वयस्क मताधिकार द्वारा मूों का शासन स्थापित हो जाता है क्योंकि समाज में अनपढ़ और मूों की संख्या अधिक होती है।

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प्रश्न 7.
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
प्रादेशिक प्रतिनिधित्व के अनुसार सारे देश के मतदाताओं को प्रादेशिक इकाइयों में विभाजित कर दिया जाता है जिन्हें निर्वाचन क्षेत्र कहते हैं। एक निर्वाचन क्षेत्र से एक या अधिक प्रतिनिधि चुने जाते हैं। एक निर्वाचन क्षेत्र या प्रदेश में रहने वाले सभी मतदाता उस क्षेत्र के प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और प्रतिनिधि उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रादेशिक प्रतिनिधित्व में प्रतिनिधि क्षेत्र के समस्त मतदाताओं की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते
हैं।

प्रश्न 8.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जब मतदाता स्वयं प्रत्यक्ष रूप से या सीधे तौर पर अपने प्रतिनिधि चुने और वे प्रतिनिधि ही संसद या व्यवस्थापिका में अपना पद ग्रहण करते हों तो उसे प्रत्यक्ष चुनाव कहा जाता है। उदाहरण के लिए भारत में पंचायतों, नगरपालिकाओं, विधानसभाओं तथा लोक सभा के सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुने जाते हैं।

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प्रश्न 9.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
यह एक ऐसी चुनाव प्रणाली है जिसके अनुसार जनता के हर वर्ग या दल को विधानमण्डल में उतना ही प्रतिनिधित्व मिलता है जितना उनके समर्थकों का अनुपात होता है। एक वर्ग या दल के पीछे जितने प्रतिशत मतदाता होंगे उसे विधानमण्डल में उतने ही प्रतिशत सीटें प्राप्त होंगी।

प्रश्न 10.
प्रत्यक्ष चुनाव के कोई दो गुण लिखें।
उत्तर-

  1. प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में मतदाताओं एवं प्रतिनिधियों के बीच सीधा सम्बन्ध रहता है।
  2. प्रतिनिधियों में अधिक उत्तरदायित्व की भावना पाई जाती है।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
मताधिकार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
वोट डालने के अधिकार को मताधिकार कहा जाता है।

प्रश्न 2.
वयस्क मताधिकार से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
वयस्क मताधिकार का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
वयस्क मताधिकार से भाव सभी बालिग व्यक्तियों को बिना किसी भेद-भाव के मताधिकार देना है।

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प्रश्न 3.
बालग मताधिकार के पक्ष में दो तर्क दीजिए।
अथवा
वयस्क मताधिकार के पक्ष में कोई एक तर्क लिखिए।
उत्तर-

  1. प्रजातन्त्र में सभी व्यक्ति समान माने जाते हैं।
  2. बालग मताधिकार द्वारा चुनी गई सरकार अधिक शक्तिशाली होती है।

प्रश्न 4.
वयस्क मताधिकार के विरुद्ध एक दलील दीजिए।
उत्तर-
सभी व्यक्तियों को समान रूप से अधिकार देना तर्कहीन है।

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प्रश्न 5.
महिला मताधिकार का क्या भाव है ?
उत्तर-
महिला मताधिकार का अर्थ है बिना किसी भेदभाव के महिलाओं को मतदान का अधिकार देना।

प्रश्न 6.
जन-सहभागिता का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
जन-सहभागिता का अर्थ है, राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों द्वारा भाग लेना।

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प्रश्न 7.
स्त्री मताधिकार के विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर-
अधिकतर स्त्रियां अपने पति, पिता या भाई के कहने के अनुसार ही अपने मत का प्रयोग करती हैं. उनमें इतनी सोच-विचार करने की क्षमता नहीं होती कि वोट किसे दी जानी चाहिए।

प्रश्न 8.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का क्या अर्थ है ?
अथवा
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जिस चुनाव प्रणाली में मतदाता स्वयं अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं उसे प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली कहते

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प्रश्न 9.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का कोई एक गुण लिखिए।
उत्तर-
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अधिक लोकतान्त्रिक है।

प्रश्न 10.
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के दो दोष लिखें।
अथवा
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का एक दोष लिखिए।
उत्तर-

  1. आम नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं कर सकता।
  2. प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अधिक खर्चीली है।

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प्रश्न 11.
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली का क्या अर्थ है ?
अथवा
अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जब वे प्रतिनिधि जिनके हाथ में शासन सत्ता रहती है, जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से न चुने जा कर जनता के चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हों तो उस प्रणाली को अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली कहा जाता है।

प्रश्न 12.
स्त्री मताधिकार के पक्ष में कोई एक तर्क दें।
उत्तर-
स्त्री को केवल लिंग के आधार पर मताधिकार से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है।

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प्रश्न 13.
गुप्त मतदान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
गुप्त मतदान मत-पत्र द्वारा मतदान की वह पद्धति है जिसमें किसी को यह पता न चले कि मत किस पक्ष अथवा उम्मीदवार को दिया गया है।

प्रश्न 14.
किसी एक आधार पर निर्वाचक सहभागिता का महत्त्व लिखिए।
उत्तर-
निर्वाचक सहभागिता से लोगों को राजनीतिक शिक्षा मिलती है।

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प्रश्न 15.
क्या स्त्री मताधिकार आवश्यक है ?
उत्तर-
हां, स्त्री मताधिकार आवश्यक है।

प्रश्न 16.
अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या के अनुपात में विधानमण्डल में प्रतिनिधित्व कहलाता है।

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प्रश्न 17.
जन-सहभागिता का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
जन-सहभागिता का अर्थ है, राजनीतिक प्रक्रिया में लोगों द्वारा भाग लेना।

प्रश्न 18.
चुनाव मण्डल क्या होता है ?
उत्तर-
कुल जनसंख्या का वह भाग जो प्रतिनिधियों के चुनाव में भाग लेता है, सामूहिक रूप से निर्वाचक मण्डल कहलाता है।

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प्रश्न 19.
जन सहभागिता की क्या महत्ता है ?
उत्तर-
जन सहभागिता से लोकतन्त्र मज़बूत होता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. एकल संक्रमणीय मत प्रणाली ……………. प्रणाली की एक विधि है।
2. ……….. को प्रत्यक्ष लोकतन्त्र का घर कहा जाता है।
3. ………. विधानपालिका द्वारा बनाए गए कानूनों के विषय में लोगों की राय जानने का एक साधन होता है।
4. जब संसद् या विधानसभा का कोई स्थान किसी कारणवश खाली हो जाए तो उस स्थान की पूर्ति के लिए करवाया . गया चुनाव …………. कहलाता है।
5. चुनाव में सफल उम्मीदवार को …………………. कहा जाता है।
उत्तर-

  1. आनुपातिक प्रतिनिधित्व
  2. स्विट्ज़रलैण्ड
  3. जनमत संग्रह
  4. उप-चुनाव
  5. प्रतिनिधि।

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प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. इंग्लैण्ड में स्त्रियों को सन् 1928 में मताधिकार प्रदान किया गया।
2. अमेरिका में स्त्रियों को सन् 1950 में मताधिकार प्रदान किया गया।
3. भारतीय संविधान में सन् 1950 में ही स्त्रियों को मताधिकार दिया गया।
4. वयस्क मताधिकार से लोगों में राजनीतिक जागृति पैदा नहीं होती।
5. वयस्क मताधिकार द्वारा राष्ट्रीय एकता बनी रहती है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
Franchise का अर्थ है
(क) चुनाव लड़ने का अधिकार
(ख) मतदान करने का अधिकार
(ग) सार्वजनिक पद प्राप्त करने का अधिकार
(घ) समुदाय बनाने का अधिकार।
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 2.
चुनाव प्रक्रिया वह साधन है, जिसके द्वारा
(क) नौकरशाही नियुक्त की जाती है
(ख) न्यायाधीश नियुक्त किए जाते हैं
(ग) राजनीतिक दल कार्य करते हैं
(घ) चुनाव करवाए जाते हैं।
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 3.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विरोध किसने किया?
(क) जे० एस० मिल
(ख) गार्नर (ग) लॉस्की
(घ) नेहरू।
उत्तर-
(क)

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प्रश्न 4.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का अर्थ है कि
(क) संपूर्ण जनसंख्या को मतदान का अधिकार प्राप्त होता है
(ख) निश्चित आयु के वयस्क नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त होता है।
(ग) केवल शिक्षित व्यक्तियों को मतदान का अधिकार प्राप्त होता है।
(घ) केवल अमीरों को मतदान का अधिकार प्राप्त होता है।
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सा तर्क सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के विरुद्ध है-
(क) यह प्रजातन्त्रिक है
(ख) राजनीतिक समानता
(ग) राजनीतिक जागरूकता
(घ) राष्ट्र विरोधी।
उत्तर-
(घ)

हैंडबाल (Handball) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions हैंडबाल (Handball) Game Rules.

हैंडबाल (Handball) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. टीम के लिए खिलाड़ियों की गिनती = 12 (4 = 16) (7 + 5)
  2. टीम में खिलाड़ियों की संख्या (कोर्ट में) = 7
  3. गोल रक्षकों की संख्या = 2
  4. एक समय खेल में खिलाड़ी खेलते हैं = 7
  5. गेंद की परिधि, = 58 सैं०मी०-60 सैं०मी० पुरुषों के लिए
    = 54 सैं०मी०-56 सैं०मी० महिलाओं के लिए
  6. गेंद का भार पुरुषों के लिए = 425 से 475 ग्राम
  7. गेंद का भार महिलाओं के लिए = 325 से 375 ग्राम
  8. हैंडबाल खेल का समय पुरुषों के लिए = 30-10-30
  9. हैंडबाल खेल का समय महिलाओं के लिए = 25-10-25
  10. हैंडबाल खेल में अधिकारी = फस्ट रैफ़री, सैकिण्ड रैफ़री, टाइम कीपर स्कोरर होते हैं
  11. हैंडबाल कोर्ट का माप = 40 मी० ! 20 मी०
  12. गोल की ऊँचाई = 2 मी०
  13. गोल की चौड़ाई = 3 मी०
  14. गोल पोस्ट के बीच गोल लाइन की चौड़ाई = 8 सैं०मी०
  15. 8 से 14 वर्ष के लड़के और लड़कियों के लिए बाल का वज़न = 290 से 330 ग्राम
  16. 8 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए बल की परिधि = 50 से 52 सैं०मी०

हैंडबाल की संक्षेप रूपरेखा
(Brief outline of the Handball)

  1. हैंडबाल का खेल दो टीमों के मध्य खेला जाता है।
  2. हैंडबाल का खेल सैंटर लाइन से दूसरे को पास देकर शुरू होता है।
  3. हैंडबाल का समय पुरुषों के लिए 30-10-30 मिनट का होता है तथा स्त्रियों के लिए 25-10-25 मिनट का होता है।
  4. एक टीम के कुल खिलाड़ी 12 होते हैं जिनमें से 7 खिलाड़ी खेलते हैं तथा शेष 5 खिलाड़ी बदलवे (Substitutes) होते हैं।
  5. खिलाड़ी को खेल के मध्य किसी समय भी बदला जा सकता है।
  6. हैंडबाल के खेल में दो-दो टाइम आऊट हो सकते हैं। टाइम आऊट का समय एक मिनट का होता है।
  7. यदि किसी खिलाड़ी को चोट लग जाए तो रैफरी की आज्ञानुसार खेल को रोका जा सकता है तथा आवश्यकतानुसार बदलवां (Substitutes) खिलाड़ी मैदान में आ जाता है।
  8. हैंडबाल के बाल को लेकर दौड़ना फाऊल होता है।
  9. बाल का भार पुरुषों के लिए 475 ग्राम तथा स्त्रियों के लिए 425 ग्राम होता है।
  10. बाल का घेरा 58 से 60 सैंटी मीटर तक होता है।
  11. खेल के समय बाल बाहर चला जाये तो विरोधी टीम को उसी स्थान से थ्रो मिल जाती है।
  12. खेल में धक्का देना फाऊल होता है।
  13. हैंडबाल के खेल में फस्ट रैफ़री तथा सैकिण्ड रैफ़री होता है।
  14. खेल के मैदान की लम्बाई 40 मीटर तथा चौड़ाई 20 मीटर होती है।
  15. गोल कीपर बाहर वाली D से बाहर नहीं जा सकता।
  16. हैंडबाल के खेल में दो D होते हैं।
  17. यदि कोई खिलाड़ी बाल लेकर D की ओर जा रहा हो तो विरोधी खिलाड़ी उसकी बाजू पकड़ ले तो रैफरी पैनल्टी दे देता है।
  18. प्रत्येक खिलाड़ी गोल कीपर बन सकता है।
  19. जो टीम अधिक गोल कर लेती है उसे विजेता घोषित किया जाता है।
  20. रैफ़री खिलाड़ी को दो वार्निंग देकर खेल में से दो मिनट के लिए बाहर निकाल सकता है।
  21. गोल क्षेत्र में गोलकीपर के अतिरिक्त कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
  22. D में से किया गोल बे-नियम होता है।

हैंडबाल (Handball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

HAND BALL GROUND
हैंडबाल (Handball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
हैंडबाल (Handball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 2
3 Goal (Dimension is in cms)

हैंडबाल (Handball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
हैंडबाल खेल क्या है ? खेल में कितने खिलाड़ी होते हैं ?
उत्तर—
हैंडबाल टीम खेल खेल परिचय (Introduction of the Game)-हैंडबाल एक टीम खेल है। इसमें एक-दूसरे के विरुद्ध दो टीमें खेलती हैं। एक टीम में 12 खिलाड़ी होते हैं जिनमें 10 कोर्ट खिलाड़ी (Court Players) और दो गोल रक्षक (Goal keepers) होते हैं, परन्तु एक समय में सात से अधिक खिलाड़ी मैदान में नहीं उतरते। इसमें से 6 कोर्ट खिलाड़ी होते हैं और एक गोल रक्षक होता है। शेष 5 खिलाड़ी स्थानापन्न Substitutes होते हैं। एक खिलाड़ी चाहे तो खेल में सम्मिलित हो जाए या किसी समय उसका स्थान स्थानापन्न खिलाड़ियों में से दिया जा सकता है। गोल क्षेत्र में गोल रक्षक के सिवाए कोई भी प्रविष्ट नहीं हो सकता।

रैफ़री के थ्रो ओन (Throw on) के लिए सीटी बजाने के साथ ही खेल कोर्ट के मध्य में से आरम्भ की जाएगी।
प्रत्येक टीम विरोधी टीम के गोल में पैर डालने का प्रयास करती है और अपने गोल को विरोधियों के आक्रमणों से सुरक्षित रखने की कोशिश करती है।

गेंद को हाथों से खेला जाता है, परन्तु इसे घुटनों या इनसे ऊपर शरीर के किसी भाग से स्पर्श किया जा सकता है तथा खेला जा सकता है। केवल गोल रक्षक की सुरक्षा के लिए अपने गोल क्षेत्र में गेंद को शरीर के सभी भागों से स्पर्श कर सकता है।

खिलाडी भागते, चलते या खड़े होते हुए एक हाथ से बार-बार गेंद को ठप्पा मार कर उछाल सकते हैं। गेंद को उछालने के बाद पुनः पकड़ कर खिलाड़ी इसे अपने हाथों में लिए आगे तो बढ़ सकता है, परन्तु तीन कदम से अधिक नहीं। गेंद को अधिकतम 3 सैंकिंड तक पकड़ कर रखा जा सकता है।

गोल होने के पश्चात् गेम कोर्ट के मध्य में से थ्रो-इन के साथ पुनः आरम्भ होगी। थ्रोआन उस टीम का खिलाड़ी करेगा जिसके विरुद्ध गोल अंकित हुआ है। मध्य रेखा के ऊपर पांव रख कर पास देने पर खेल प्रारम्भ होगा। इस अवसर पर विरोधी खिलाड़ी इच्छानुसार कहीं पर भी खड़े रह सकते हैं।

अर्द्ध-अवकाश (Half time) के पश्चात् गोल और थ्रो-आन में परिवर्तन किया जाएगा। उस टीम को जो अधिक संख्या में गोल कर लेती है विजयी घोषित किया जाता है। यदि बाल मैदान के साइड से बाहर जाती है तो रेखा को काट कर थ्रो की जाती है। यदि दोनों टीमों द्वारा किए गए गोलों की संख्या समान हो अथवा कोई भी गोल न हो सके तो खेल अनिणीत (Drawn) होगी। बराबर रहने की स्थिति में मैच का फैसला पैनल्टी थ्रो द्वारा किया जाता है।

प्रत्येक खेल का आयोजन दो रैफरियों के द्वारा किया जाता है जिसको एक स्कोरर और एक टाइम कीपर सहायता प्रदान करते हैं। रैफ़री खेल के नियमों को लागू करते हैं। रैफ़री खेल के क्षेत्र में प्रविष्ट होने के क्षण से लेकर खेल के अन्त तक खेल के संचालक होते हैं।

प्रश्न
हैंडबाल खेल का क्षेत्र, गोल, गेंद, खिलाड़ी, गोल क्षेत्र, गोल थ्रो, पैनल्टी . थो के बारे में लिखें।
उत्तर-
खेल का क्षेत्र (The Playing Area) खेल का क्षेत्र दो गोल-क्षेत्रों में विभाजित होता है तथा खेल का कोर्ट आयताकार होता है जिसकी लम्बाई 40 मीटर और चौड़ाई 20 मीटर होती है। विशेष परिस्थितियों में खेल का क्षेत्र 38-44 मीटर लम्बा तथा 18-22 मीटर चौड़ा हो सकता है।

गोल (Goal)—प्रत्येक गोल रेखा के मध्य में गोल होंगे। एक गोल में 2 ऊंचे खड़े स्तम्भ होंगे जो क्षेत्र के कोनों से समान दूरी पर होंगे। स्तम्भ एक-दूसरे से 3 मीटर की दूरी पर होंगे तथा इनकी ऊंचाई 2 मीटर होगी। ये मज़बूती से भूमि में जकड़े होंगे तथा उन्हें एक क्षैतिज क्रॉस बार (Horizontal Cross Bar) द्वारा परस्पर अच्छी तरह मिलाया जाएगा। गोल रेखा का बाहरी सिरा तथा गोल पोस्ट का पिछला सिरा एक पंक्ति में होगा। स्तम्भ तथा क्रास बार वर्गाकार होंगे जिनका आकार 8 सैंटीमीटर × 8 सैंटीमीटर होगा। ये हैंडबाल लकड़ी, हल्की धातु या संशलिष्ट पदार्थ के बने होंगे जिनकी सभी साइडों पर 2 रंग किए होंगे जो पृष्ठभूमि में प्रभावशाली ढंग से रखे हों।

प्रत्येक गोल क्षेत्र से 6 मीटर दूर तथा गोल रेखा के समानान्तर 3 मीटर लम्बी रेखा अंकित करके बनाया जाता है। इस रेखा के सिरे चौथाई-वृत्तों द्वारा गोल रेखा से मिले होंगे। इन वृत्तों का अर्द्ध-व्यास गोल स्तम्भों के आन्तरिक कोने के पीछे से मापने पर 6 मीटर होगा। यह रेखा गोल क्षेत्र रेखा (Goal area line) कहलाती है।

गेंद (The Ball)-गेंद गोलाकार (Spherical) होनी चाहिए जिसमें एक रबड़ का ब्लैडर हो और इसका बाहरी खोल एक रंग के चमड़े या किसी एक रंग के संश्लिष्ट पदार्थ (Synthetic meterial) का बना हो। बाहरी खोल चमकदार या फिसलने वाला न हो, गेंद में बहुत ज़्यादा हवा नहीं भरी होनी चाहिए। पुरुषों तथा नवयुवकों के लिए गेंद का भार 475 ग्राम से अधिक और 425 ग्राम से कम नहीं होना चाहिए। उसकी परिधि 58 सैंटीमीटर से 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए। सभी नवयुवक तथा जूनियर लड़कों के लिए इसका भार 400 ग्राम से अधिक तथा 325 ग्राम से कम नहीं होना चाहिए। इसकी परिधि 54 से 56 सैं० मी० तक होनी चाहिए।

खिलाड़ी (The Players)—प्रत्येक टीम में 12 खिलाड़ी होते हैं जिनमें से 10 कोर्ट खिलाड़ी और 2 गोलकीपर होते हैं। इनमें से एक समय पर अधिकतम 7 खिलाड़ी मैदान में उतर सकते हैं जिनमें से 6 कोर्ट खिलाड़ी और एक गोलकीपर होंगे।

खेल की अवधि (The Duration of the Game)—पुरुषों के लिए 30-30 मिनट की दो समान अवधि में खेला जाएगा जिनके बीच 10 मिनट का मध्यान्तर होता है।
नोट-टूर्नामैंटों में खेल बिना मध्यान्तर के 15-15 मिनट की दो समान अवधि में खेला जाएगा।

स्त्रियों और जूनियर लड़कों के लिए खेल 25-25 मिनट की दो समान अवधि में खेला जाएगा जिनके बीच 10 मिनट का मध्यान्तर होता है।
गोल (Goal)-प्रत्यक्ष रूप से थ्रो ऑन करके विपक्षियों के विरुद्ध गोल नहीं किया जा सकता।
गेंद का खेलना (Playing the Ball) निम्नलिखित की अनुमति होगी—
गेंद को रोकना, पकड़ना, फेंकना, उछालना या किसी भी ढंग से या किसी भी दिशा । में हाथ (हथेलियां या खुले हाथ), भुजाओं, सिर, शरीर या घुटनों आदि का प्रयोग करते हुए गेंद पर प्रहार करना।

जब गेंद ज़मीन पर पड़ी हो तो इसे अधिकतम 3 सैकिण्ड तक पकड़े रखना, गेंद को पकड़ कर अधिकतम 3 कदम लेना।
गोल क्षेत्र (The Goal Area)—केवल गोल रक्षक को ही गोल क्षेत्र में प्रविष्ट होने या रहने की अनुमति होती है। गोलकीपर को इनमें प्रविष्ट हुआ माना जाएगा, यदि कोई खिलाड़ी इसे किसी भी प्रकार से स्पर्श कर लेता है। गोल क्षेत्र में गोल रेखा (Goal area line) सम्मिलित होती है।
गोल क्षेत्र में प्रविष्ट होने के निम्नलिखित दण्ड (Penalties) हैं—

  1. फ्री-थ्रो जब कोर्ट खिलाड़ी के अधिकार में गेंद हो।
  2. फ्री-थ्रो जब कोर्ट खिलाड़ी के अधिकार में गेंद न हो। परन्तु उसने गोल-क्षेत्र में प्रविष्ट हो कर साफ लाभ प्राप्त किया होता है।
  3. पैनल्टी-थ्रो यदि रक्षात्मक टीम का कोई खिलाड़ी जान-बूझ कर और स्पष्ट रूप से सुरक्षा के लिए गोल क्षेत्र में प्रविष्ट हो जाता है।

गोल रक्षक (The Goal Keeper)—गोल रक्षक को अनुमति होगी—

  1. रक्षात्मक कार्य में अपने गोल क्षेत्र में गेंद को अपने शरीर के सभी भागों में स्पर्श करने की।
  2. गोल क्षेत्र के बिना किन्हीं प्रतिबन्धों के गेंद के साथ इधर-उधर चलने की।
    हैंडबाल (Handball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 3
  3. बिना गेंद के गोल क्षेत्र में दौड़ने को, कोर्ट में वह कोर्ट खिलाड़ियों के नियमों का अनुसरण करेगा।
    स्कोर (Scoring)-गोल उस समय स्कोर हुआ माना जाता है जब गेंद विरोधियों की गोल रेखा से गोल पोस्टों तथा क्रॉस बार के नीचे गुज़र जाता है। बशर्ते कि गोल करने के लिए स्कोर करने वाले खिलाड़ी या उसकी टीम के खिलाड़ियों द्वारा नियमों का उल्लंघन न किया गया हो।
    हैंडबाल (Handball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 4
    CATCHING THE BALL

थ्रो-इन (Throw-in)—यदि सारी गेंद भूमि पर या वायु में साइड लाइन से बाहर चली जाती है तो खेल थ्रो-इन द्वारा पुनः आरम्भ की जाएगी।
थ्रो-इन उस टीम के विरोधी खिलाड़ियों द्वारा ली जाएगी जिसने अन्तिम बार गेंद को स्पर्श किया हो।
थ्रो-इन उसी बिन्दु से ली जाएगी जहां से गेंद ने साइड रेखा को पार किया हो।

कार्नर थ्रो (Corner Throw)—यदि भूमि पर या वायु में सारी गेंद रक्षात्मक टीम के खिलाड़ी द्वारा अन्तिम बार स्पर्श किए जाने से गोल के बाहर गोल रेखा के ऊपर से गुज़र जाती है तो आक्रामक टीम को एक कार्नर थ्रो दी जाएगी। यह नियम गोल रक्षक पर अपने ही गोल क्षेत्र में लाग नहीं होता। __ कोर्ट रैफ़री द्वारा सीटी बजाने के तीन सैकेंड के अन्दर-अन्दर कार्नर थ्रो गोल को उस साइड के इस बिन्दु से ली जाएगी जहां गोल रेखा तथा स्पर्श रेखा (Touch line) मिलती है, और जहां से गेंद बाहर निकली थी।
रक्षक टीम के खिलाड़ी गोल क्षेत्र रेखा के साथ ग्रहण कर सकते हैं।
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गोल-थो (Goal throw)-गोल-थ्रो निम्नलिखित अवस्थाओं में दी जाएगी—

  1. यदि सारी गेंद गोल से बाहर भूमि पर वायु में गोल रेखा के ऊपर से गुज़र जाती है जिसे अन्तिम बार आक्रामक टीम के खिलाड़ियों या गोल क्षेत्र के रक्षक टीम के गोलकीपर ने स्पर्श किया हो।
    हैंडबाल (Handball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 6
  2. यदि थ्रो-ऑन द्वारा गेंद सीधी विरोधी टीम में चली जाती है।

फ्री-थो (Free Throw) निम्नलिखित अवस्थाओं में फ्री-थ्रो दी जाती है—

  1. खेल के क्षेत्र में ग़लत ढंग से प्रविष्ट होने पर या छोड़ने पर।
  2. ग़लत थ्रो ऑन करने पर।
  3. नियमों का उल्लंघन करने पर।
  4. जानबूझ कर गेंद को साइड-लाइन से बाहर रोकने पर।

पैनल्टी थ्रो (Penalty Throw)—पैनल्टी थ्रो दी जाएगी—

  1. अपने ही अर्द्धक में नियमों के गम्भीर संधन करने पर।
  2. यदि कोई खिलाड़ी रक्षा के उद्देश्य से जान-बूझ कर अपने गोल क्षेत्र में प्रविष्ट होता है।
  3. यदि कोई खिलाड़ी जान-बूझ कर गेंद को अपने गोल क्षेत्र में धकेल देता है और गेंद गोल का स्पर्श कर लेती है।
  4. यदि गोल रक्षक गेंद को उठा कर अपने गोल क्षेत्र में जाता है।
  5. यदि कोर्ट के विरोधी अर्द्धक में गोल करने की स्पष्ट सम्भावना गोल रक्षक द्वारा नष्ट कर दी जाती है।
  6. गोल रक्षक के ग़लत प्रतिस्थापन्न (Substitution) पर।

पैनल्टी थ्रो के अवसर पर रैफ़री टाइम आऊट लेकर पैनल्टी थ्रो लगवाने के लिए सीटी बजाएगा जिसके साथ खेल के समय की शुरुआत हो जाएगी।
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Goal Keeper’s Position for Preventing Scoring
अधिकारी (Officials) हैंडबाल की खेल में निम्नलिखित अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं—

  1. रैफ़री = 1
  2. सैकिंड रैफरी = 1
  3. टाइम कीपर। = 1

निर्णय (Decisions)—जो टीम अधिक गोल कर देती है उसे विजयी घोषित किया जाता है।

हैंडबाल (Handball) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

PSEB 10th Class Physical Education Practical हैंडबाल (Handball)

प्रश्न 1.
हैंडबाल के खेल में कुल कितने खिलाड़ी होते हैं ?
उत्तर-
कुल 12 खिलाड़ी होते हैं जिनमें से 7 खिलाड़ी खेलते हैं और 5 खिलाड़ी अतिरिक्त होते हैं।

प्रश्न 2.
हैंडबाल कोर्ट की लम्बाई और चौड़ाई कितनी होती है ?
उत्तर-
लम्बाई 40 मीटर तथा चौड़ाई 20 मीटर।

प्रश्न 3.
हैंडबाल का घेरा कितना होता है ?
उत्तर-
पुरुषों के लिए 58-60 सेमी० तथा महिलाओं के लिए 54-56 सेमी०।

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प्रश्न 4.
हैंडबाल खेल की अवधि कित होती है ?
उत्तर-
पुरुषों के लिए 30-10-30 मिनट तथा महिलाओं के लिए 25-10-25 मिनट।

प्रश्न 5.
हैंडबाल का भार कितना होता है ?
उत्तर-
पुरुषों के लिए 475 ग्राम तथा महिलाओं के लिए 400 ग्राम।

प्रश्न 6.
हैंडबाल के खेल में कितने अधिकारी होते हैं ?
उत्तर-
रैफ़री-1, अम्पायर-1 तथा टाइम कीपर-1.

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प्रश्न 7.
हैंडबाल में टाइम आऊट कितने होते हैं ?
उत्तर-
हैंडबाल में दो टाइम आऊट होते हैं।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल

Punjab State Board PSEB 12th Class Geography Book Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Geography Chapter 9 प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल

PSEB 12th Class Geography Guide प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल Textbook Questions and Answers

प्रश्न I. निम्नलिखित में सही उत्तर चुनें-

(क) जनसंख्या विभाजन दिखाने के लिए कौन-सा नक्शा बनाया जाता है ?
(A) वर्णात्मक नक्शा
(B) सममूल्य नक्शा
(C) बिंदु नक्शा
(D) वर्गमूल्य नक्शा।
उत्तर-
(C) बिंदु नक्शा।

(ख) जनसंख्या की दशक वृद्धि को दिखाने के लिए कौन-सा तरीका उचित है ?
(A) पंक्ति ग्राफ
(B) बार चित्र
(C) लकीरी चित्र
(D) बहाव नक्शा ।
उत्तर-
(C) लकीरी ग्राफ।

(ग) बहु-ग्राफ प्रदर्शित करता है ?
(A) केवल एक परिवर्तनशील तत्व
(B) केवल दो परिवर्तनशील तत्व
(C) दो से अधिक परिवर्तनशील तत्व
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(C) दो से अधिक परिवर्तनशील तत्व।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल

(घ) इनमें से किसके गत्यात्मक नक्शा कहा जाता है ?
(A) बिंदु नक्शा
(B) वर्णात्मक नक्शा
(C) सममूल्य नक्शा
(D) बहाऊ नक्शा ।
उत्तर-
(D) बहाऊ नक्शा।

प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर चार पंक्तियों में दें:

(i) विषयगत नक्शा क्या होता है ?
उत्तर-
आंकड़ों की विशेषताएँ दर्शाने के लिए और तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए ग्राफ और चित्र एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं लेकिन क्षेत्रीय परिदृश्य को दिखाने के लिए चित्र और ग्राफ असफल रहते हैं। इसलिए स्थानीय भिन्नता को दिखाने के लिए और क्षेत्रीय विभाजन को अच्छी तरह समझने के लिए कई तरह के नक्शे बनाए जाते हैं। इनको विषयगत और वितरण नक्शे कहा जाता है।

(ii) बहु-बार ग्राफ और मिश्रित बार ग्राफ में क्या अंतर है ?
उत्तर-
बहु-बार ग्राफ और मिश्रित बार ग्राफ में अंतर निम्नलिखित हैं-
बहु-बार ग्राफ- इनको दो या दो से अधिक परिवर्तनशील तत्वों को दर्शाने और तुलना करने उद्देश्य से बनाया जाता है।
मिश्रित बार ग्राफ – मिश्रित बार ग्राफ अलग-अलग इलाकों में हिस्सेदारी/समानता दिखाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल

(iii) बिंदु नक्शा बनाने के लिए क्या-क्या आवश्यक है ?
उत्तर-
बिंदु नक्शा बनाने के लिए आवश्यक बातें निम्नलिखित हैं-

  • संबंधित क्षेत्र का प्रबंधकीय सीमा के साथ नक्शे का खाका तैयार करना।
  • संबंधित क्षेत्र के विषय संबंधी आंकड़े एकत्रित करना।
  • बिंदु की कीमत के लिए नक्शों का चुनाव करना।
  • संबंधित क्षेत्र का प्राकृतिक नक्शा तैयार करना।

(iv) यातायात बहाव नक्शा बनाने का तरीका बताओ।
उत्तर-
यातायात बहाव नक्शे दो किस्म के आंकड़ों को पेश करने के लिए बनाए जाते हैं-
(i) गाड़ियों की उनके पहुंच के स्थान की तरफ संख्या
(ii) यात्रियों/परिवहन की जाने वाले वस्तुओं की संख्या।

इस प्रकार का नक्शा (मानचित्र) बनाने के लिए हमें वस्तुओं, सेवा गाड़ियों की संख्या इत्यादि के संबंधित आंकड़े, जिले में उनसे संबंधित वस्तुओं इत्यादि की उपज तथा स्थान बताया हो तथा आवश्यकता के पैमाने का चुनाव करके, जिस द्वारा आंकड़े बहाव नक्शे पर पेश किया जाना होता है, काफ़ी आवश्यक है तथा ज़रूरत अनुसार ट्रांसपोर्ट रूट का रूट नक्शा जिस पर स्टेशन दिखाये गए हों काफ़ी आवश्यक है।

नोट (Method)-कागज़ पर X बिंदु बना लो तथा सही पैमाने से सही दिशा की तरफ अ-ग-बिंदु लगा लो। मानो कि पैमाना है 1 cm : 10 km बिंदु x के उत्तर दिशा की तरफ 5.7 सैं०मी० लम्बी एक रेखा खींच लो। यह बिंदु अ की स्थिति दिखायेगी। इस प्रकार बिंदु ‘ग’ तक आवश्यकता अनुसार लंबाई की रेखाएं उनकी ही दिशा की तरफ लगा दो। बसों की संख्या का एक पैमाना बना लो तथा निर्धारित करो जोकि 6 से 10 की संख्या दिखा सके। इस पैमाने अनुसार मोटी तथा पट्टी संबंधित दिशाओं की तरफ को बना दो।

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(v) सममान नक्शा क्या है ? वृद्धि कैसे की जाती है ?
उत्तर-
Isopleth दो शब्दों के जोड़ से बना है (Iso + Plethron) Iso शब्द का अर्थ है समान तथा Plethron शब्द का अर्थ है। मूल्य इस प्रकार सममान रेखाएं वह रेखाएं हैं जिनका मूल्य तीव्रता तथा घनत्व समान हो। यह रेखा उन स्थानों को आपस में जोड़ती है जिनका मूल्य समान हो।

मिलावट/वृद्धि करने के तरीके- दो स्थानों के दर्ज मुख्य में बीच के मुख्य को पाने को मिलावट/वृद्धि कहते हैं। इसको पाने के लिए दो तरीके प्रयोग किये जाते हैं।

  1. दिए जाने वाले नक्शों का अधिक से अधिक तथा कम-से-कम मूल्य निर्धारित करके।
  2. दोनों मूल्यों का फैलाव ज्ञात करके।
  3. फैलाव के आधार पर अंतराल निर्धारित करके जैसे कि 5,10 या 15 इत्यादि।

(vi) वर्णात्मक नक्शा बनाने की विधि (ढंग) बताओ।
उत्तर-
वर्णात्मक नक्शे बनाने का ढंग इस प्रकार है-
1. किसी वस्तु के निश्चित आंकड़े इकट्ठे करो। आंकड़ों को बढ़ते घटते क्रम में करो। 2. यह आंकड़े औसत रूप में हो या प्रतिशत के रूप में हो। 3. आंकड़ों को समूहों, बहुत अधिक, मध्यम, कम तथा बहुत कम में विभाजित कर लो। 4. चुने गये समूहों को दर्शाने वाले रंग या गहराई बढ़ते या घटते क्रम में लिखो। 5. हर एक शासकीय इकाई में घनत्व के अनुसार से छायाकरण करके नक्शे तैयार किये जाते हैं।

(vii) पाई चार्ट के साथ आंकड़ा पेशकारी का ढंग बताओ।
उत्तर-
पाई चार्ट आंकड़ा पेशकारी की एक अच्छा ढंग है। यह दिये गये तत्व को सम्पूर्ण रूप में एक चक्र के द्वारा पेश करती है। आंकड़ों के उपभागों को दिखाने के लिए चक्र को बनते कोणों के अनुसार काटा तथा विभाजित किया जाता है।

  • आंकड़ों को घटते क्रम में लिखकर अलग-अलग भूमि उपयोगों का कोण पता किया जाता है।
  • चक्र बनाने के लिए जरूरत अनुसार चुनाव बहुत आवश्यक है। दिये आंकड़ों के लिए 3, 4 या 5 सैं०मी० का अर्धव्यास चुना जाना चाहिए।
  • एक लाइन केन्द्र से लेकर अर्धव्यास तक खींच लेनी चाहिए ताकि अर्ध-व्यास केंद्र को दिखाया जा सके।
  • चक्र की चाप से हर एक भूमि उपयोग श्रेणी के कोणों के अनुसार छोटे कोण से शुरू करके घड़ी की सुइयों की दिशा में कोण चिह्न लगाओ।
  • लकीरों को लगाकर चित्र पूरा कर दो।
  • फिर संकेत, शीर्षक, उपशीर्षक इत्यादि बना दो।

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प्रश्न III. दिए गए विकल्पों में सही विकल्प चुनो :

(i) निम्नलिखित आंकड़ों के लिए कौन-सा चित्र उचित रहेगा ? भारतीय राज्यों का कच्चा लोहा उत्पादन में प्रतिशत अनुपात :

मध्य प्रदेश 23.44
गोवा 21.82
कर्नाटक 20.95
बिहार 16.98
उड़ीसा 16.30
आन्ध्र प्रदेश 0.45
महाराष्ट्र 0.04

(i) लाइन ग्राफ
(ii) बहुविकल्पीय बार ग्राफ
(iii) पाई चार्ट
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(iii) पाई चार्ट।

(ii) किसी राज्य के अलग-अलग जिले स्थानीय आंकड़ों के तौर पर किस प्रकार दर्शाए जाएंगे ?
(i) बिंदुओं के साथ
(ii) लाइनों के साथ
(iii) बहुभुजों के साथ
(iv) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(iii) बहुभुजों के साथ।

(iii) निम्नलिखित में कौन-सा आपरेटर एक्शल फार्मूले में पहले हल होगा ?
(i) +
(ii) –
(iii) /
(iv) =
उत्तर-
(iv) =

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(iv) एक्शल में फंक्शन विजार्ड आपको किसके योग्य बनाती है ?
(i) रेखाचित्र बनाने के
(ii) गणितज्ञ या संख्यात्मक क्रिया के लिए
(iii) नक्शे बनाने के लिए
(iv) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(ii) गणितज्ञ या संख्यात्मक क्रिया के लिए।

प्रश्न IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30 पंक्तियों में दो :

प्रश्न 1.
कंप्यूटर (संगणक) के अलग-अलग हिस्सों के क्या काम हैं ?
उत्तर-
संगणक (कम्यूटर) एक इलैक्ट्रॉनिक उपकरण है। आमतौर पर हम इस प्रणाली को दो हिस्सों में विभाजित करते हैं
I. यंत्र सामग्री (Hardware)-सारे कंप्यूटर के भाग जिनको हाथ से छुआ जा सके।
II. प्रक्रिया सामग्री (Software) कंप्यूटर के जिस हिस्से को हाथ से छुआ न जा सके।

I. यंत्र सामग्री (Hardware)-कंप्यूटर के भौतिक हिस्से जिनको हम देख या छू सकते हैं, वह हार्डवेयर कहलाते हैं। यह भाग मशीनी, इलैक्ट्रॉनिक या इलैक्ट्रीकल हो सकते हैं। यह संगणक के यंत्र सामग्री कहलाते हैं। हर संगणक की यंत्र सामग्री अलग-अलग हो सकती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि संगणक किस उद्देश्य के लिए प्रयोग में लाया जा सके तथा व्यक्ति की आवश्यकता क्या है। एक कंप्यूटर में विभिन्न तरह के हार्डवेयर होते हैं जैसे कि सी०पी०यू०, हार्ड डिस्क, रैम, प्रोसैसर, मोनीटर, मदर बोर्ड, फ्लापी ड्राइव इत्यादि।
संगणक के सिर्फ पावर सप्लाई यूनिट की बोर्ड, माऊस इत्यादि भी यंत्र सामग्री के अंतर्गत आते हैं।

II. प्रक्रिया सामग्री (Software)-संगणक हमारी तरह हिन्दी या अंग्रेजी भाषा नहीं समझता। हम संगणक को जो निर्देश देते हैं वह एक नियत भाषा होती है इसको मशीनी लैंग्वेज़ (भाषा) या मशीन की भाषा कहते हैं। संगणक सॉफ्टवेयर लिखित प्रोग्रामों का एक समूह है जो कि संगणक की भंडार शाखा में जमा हो जाता है। आजकल कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसमें संगणक का उपयोग नहीं होता। आज संगणक का प्रयोग हर कार्यालय में किया जाता है।

संगणक के भाग हैं-

1. निवेश एवं निर्गत उपकरण (Input Output Device)-इन उपकरणों का प्रयोग संगणक में निवेश करने के लिए तथा संगणक द्वारा निर्गत दिखाने के लिए किया जाता है। निवेश उपकरण जैसे की बोर्ड का प्रयोग, आंकड़ों तथा प्रोग्रामों को संगणक स्मृति में भरने के लिए किया जाता है। दूसरी प्रकार चूंकि एक कंप्यूटर के भीतर सभी आँकड़ों, कार्यक्रमों को कोड स्वरूप में वैद्युत् धारा में संचित किया जाता है, निर्गत उपकरणों जैसे प्रिंटर, प्लाटर, इत्यादि का प्रयोग इन आंकड़ों की सूचनाओं के रूप में बदलने के लिए किया जाता है जिनका मानव द्वारा उपयोग किया जा सके।

2. सिस्टम यूनिट (System Unit)–सिस्टम यूनिट को सिस्टम कैबिनेट भी कहा जाता है। कंप्यूटर के इस भाग के कई हिस्से हैं जैसे मदरबोर्ड, रैम तथा प्रोसैसर सिस्टम यूनिट के अंदर ही आते हैं।

3. मैमोरी (Memory) कंप्यूटर में मैमोरी का प्रयोग प्रोग्राम तथा डाटा को संग्रहित करने के लिए होता है, ताकि बाद में ज़रूरत के अनुसार उसका प्रयोग किया जा सके। मैमोरी किसी भी कंप्यूटर का एक काफी महत्त्वपूर्ण अंग होता है। मैमोरी का उपयोग परिणामों को संग्रहित करने के लिए भी किया जाता है। मैमोरी दो प्रकार की ‘होती है।

  • रोम (Rom)—इसको Read Only Memory कहते हैं। इसमें जो जानकारी होती है उसमें कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता बस सिर्फ उसे पढ़ा जा सकता है।
  • रैम (Ram)-Random Access Memory इसका प्रयोग तब होता है जब कंप्यूटर पर काम करते हैं । यह जानकारी सिर्फ तब तक रहती है जब तक आपका कंप्यूटर काम कर रहा होता है। कंप्यूटर को बंद करते ही रैम की जानकारी नष्ट हो जाती है।

4. संग्रहक उपकरण (Storage Unit)—एक कंप्यूटर में कई संग्राहक इकाइयाँ जैसे हार्ड डिस्क, फ्लापी, टेप, मैगनेट, आप्टिकल डिस्क, कांपेक्ट डिस्क (सीडी), कार्टिज इत्यादि लगे होते हैं जिनका प्रयोग आंकड़ों तथा कार्यक्रम-निर्देशों को संचित करने के लिए होता है। इन युक्तियों की आंकड़ा-संग्रहण करने की क्षमता मेगाबाइड (MB) से गीगावाइट (GB) तक होती है।

5. संचार (Communication) संचार के लिए काफी उपकरणों का उपयोग किया जाता है। इन यंत्रों का उपयोग एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर के साथ जोड़ने के लिए तथा इंटरनैट का प्रयोग करने के लिए किया जाता है। वाई फाई रिसीवर, मोडम इत्यादि इस वर्ग में शामिल हैं।

6. सॉफ्टवेयर का एक हिस्सा आँकड़ा प्रक्रिया की पेशकारी के लिए, प्रयोग के लिए तथा कंप्यूटर के माध्यम में तालमेल बिठाता है। तत्वों को क्रमवार करने के लिए, अशुद्धियों को हटाने के लिए, आंकड़ों के जोड़-तोड़ तथा संभाल इत्यादि काम सॉफ्टवेयर द्वारा किये जाते हैं। प्रमुख सॉफ्टवेयर हैं—MS-Excel, Spreadsheet, Lotus-1,2,3, तथा D-Base, Arc-view, Are GIS-Geomedia इत्यादि। इनके द्वारा सॉफ्टवेयर नक्शे बनाने के लिए अध्ययन किया जाता है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल

प्रश्न 2.
आंकड़ा प्रक्रिया तथा आंकड़ा पेशकारी के लिए लुभावने तरीके के मुकाबले संगणक प्रयोग करने के क्या फायदे हैं ?
उत्तर-
आंकड़ा प्रक्रिया के परिणाम हासिल करने के लिए संगणक प्रक्रिया में से गुजरना पड़ता है। संगणक तकनीक ने पिछले एक दशक से इतना विकास कर लिया है कि आंकड़ों को मनचाहे ढंग के साथ पेश किया जा सकता है। इसके द्वारा आंकड़ा प्रक्रिया तथा पेशकारी तथा संचालन का काम अच्छे ढंग के साथ किया जा सकता है। संगणक की सहायता के साथ आंकड़ा प्रक्रिया तथा आंकड़ा पेशकारी के साथ अधिक अच्छे ढंग से जोड़ घटाव से लेकर तर्क के साथ हल होने वाले साधारण तथा जटिल सवाल भी हल किये जा सकते हैं। संगणक की सहायता के साथ आंकड़ा प्रक्रिया तथा आंकड़ा पेशकारी के लिए हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर दोनों की ही आवश्यकता होती है। संगणक के सॉफ्टवेयर का एक हिस्सा आंकड़े प्रक्रिया तथा आंकड़ों की पेशकारी के लिए प्रयोग योग्य तथा कंप्यूटर के मध्य में तालमेल बिठाता है।

इसके द्वारा आसानी के साथ तत्वों को क्रमशः से करना, अशुद्धियों को हटाना, आंकड़ों के जोड़-तोड़ तथा संभाल इत्यादि का काम जल्दी हो जाता है। कंप्यूटर तकनीक के विकास के साथ आंकड़ों को मनचाहे ढंग के साथ पेश भी किया जा सकता है। इसके द्वारा स्क्रीन के हिस्से को बड़ा करके देखा जा सकता है, रंग तबदील किये जा सकते हैं, तीन-पसारी तथा परिपेक्ष्य प्रदर्शन किया जा सकता है। विविध विषयों का ऐच्छिक अध्ययन किया जा सकता है। बहुभुज शेडिंग, लाइन स्टाइलिंग तथा प्वाइंट मेकर प्रदर्शित किया जा सकता है। इसके बिना प्रिंटर प्लाटर, स्पीकर इत्यादि के साथ तालमेल बिठाने में कोई मुश्किल नहीं आती। इसलिए हम कह सकते हैं कि आंकड़ा प्रक्रिया तथा आंकड़ा पेशकारी के लिए लुभावने तरीके के मुकाबले कंप्यूटर प्रयोग करने के फ़ायदे अधिक हैं।

प्रश्न 3.
वर्कशीट (कार्यपत्रक) क्या है ?
उत्तर-
वर्कशीट (कार्यपत्रक) आमतौर पर एक कागज़ की शीट होती है जिस पर विद्यार्थियों के लिए कुछ प्रश्न लिखे होते हैं तथा उत्तर लिए जाते हैं। एक्सल वर्कशील एकहरी स्प्रेडशीट होती है जिसका प्रयोग आंकड़ा प्रक्रिया नक्शे तथा रेखाचित्र इत्यादि बनाने के लिए किया जाता है। वर्कशीट टर्म का प्रयोग एक स्प्रेडशीट सॉफ्टवेयर के तौर पर भी किया जाता है तथा एक एकांऊटैंट की तरफ से प्रयोग किए गये एक पेपर जिस पर कोई रिकार्ड लिखा हैं, को वर्कशीट का नाम दिया जाता है। वर्कशीट शब्द का प्रयोग सबसे पहले 1900 में किया गया।

एक कक्षा के कमरे में वर्कशीट से भाव उन कागजों की शीटों से है, जिन पर प्रश्न तथा कुछ अभ्यास योग्य प्रश्न विद्यार्थी के लिए पूरा करने तथा जवाब रिकार्ड करने के लिए बनाई गई होती हैं। अकाऊंट में वर्कशीट का अर्थ है, एक खुले पन्ने होते हैं जिसमें वर्क शैड्यूल, काम का समय, खास हिदायतों इत्यादि का रिकार्ड रखा जाता है तथा कंप्यूटर में एक्सल वर्कशीट में आंकड़े बहुत ही सरल तरीके के साथ दाखिल तथा जमा किये जा सकते हैं। आंकड़ों की नकल की जा सकती है या एक सैल से दूसरे सैल में भेजे जाते हैं। इसके द्वारा आंकड़े मिटाये जा सकते हैं। इस वर्कशीट द्वारा काम के आंकड़े स्थाई तौर पर संभाले जा सकते हैं। इस तरह आंकड़े सरलता से दाखिल किये जाते हैं। कालम बनाकर आंकड़े दाखिल करने के समय नंबर-पैड के साथ ऐंटर की या डाऊन-चिह्नित का प्रयोग किया जाता है। स्तरों में आंकड़ों को दाखिल करते समय नंबर पैड के साथ राइट चिन्हित का भी प्रयोग किया जाता है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल

प्रश्न V. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 पंक्तियों में दो :

प्रश्न 1.
स्थानिक तथा गैर-स्थानिक आंकड़ों में क्या अन्तर है ? उदाहरणों सहित बताओ।
उत्तर-
स्थानिक तथा गैर-स्थानिक आंकड़ों में अंतर निम्नलिखित हैं –

स्थानिक आंकड़े-

  1. स्थानीय आंकड़े किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते हैं। यह धरती पर किसी स्थान को दर्शाता है।
  2. स्थानीय आंकड़ों में किसी क्षेत्र जैसे अस्पताल, स्कूल इत्यादि क्षेत्रों की भौगोलिक विशेषताओं के बारे में दिखाया जाता है।
  3. इनको तैयार करना थोड़ा मुश्किल होता है।
  4. इसमें लकीरों की सहायता के साथ नदियों, रेलवे लाइन इत्यादि दिखाये जाते हैं।
  5. जब नक्शे के ऊपर केवल स्कूल को दिखाया जाता है उसको स्थानीय आँकड़े कहते हैं।
  6. Shx तथा Shq फाइलों में स्थानिक आंकड़े होते हैं।

गैर-स्थानिक आंकड़े-

  1. x`जब कोई डाटा/आंकड़ा हमें धरती की किसी जगह के बारे ज्ञान की करवाए वह गैर-स्थानीय आंकड़े कहलाते हैं।
  2. गैर-स्थानिक आंकड़ों में नंबर, अंक, व्यक्ति या श्रेणियों की संख्या इत्यादि को दिखाया जाता है।
  3. गैर-स्थानीय आंकड़े तैयार करने आसान होते हैं।
  4. गैर-स्थानीय आंकड़ों की सहायता के साथ आंकड़ों की विशेषता बारे दिखाया जाता है।
  5. अगर स्कूल का नाम, कक्षा, कक्षों तथा विद्यार्थियों की संख्या के बारे बताया जाए। तब वह गैर स्थानीय आंकड़े कहलाते हैं।
  6. dbf एक dbase फाइल होती है जो कि Shx तथा Shp फाइलों से जुड़े होते हैं।

उदाहरण-जब हम किसी स्कूल, कस्बे, गाँव, इत्यादि की भौगोलिक विशेषता को बिन्दुओं, बहुभुजों या लकीरों की सहायता से नक्शे पर दिखाते हैं, तो उसे स्थानीय आंकड़े कहते हैं तथा अगर हम स्कूल का नाम, कक्षा, बच्चों की संख्या, गांव/कस्बे में घर, घरों में व्यक्तियों की संख्या का अध्ययन करते हैं, तब वह गैर-स्थानीय आंकड़ों की उदाहरण मानी जाती है।

प्रश्न 2.
भौगोलिक आंकड़ों के तीन रूप कौन-से हैं ?
उत्तर-
भौगोलिक आंकड़े कई तरह की जानकारी का संग्रह होते हैं। यह हमें किसी दृढ़ विषय के विभाजन तथा घनत्व के बारे जानकारी देता है। भौगोलिक आंकड़े कई प्रकार के होते हैं। अब भूगोल प्राकृतिक तथा मानवीय दोनों ही पक्षों को हल करता है। भौगोलिक आंकड़ों में हम धरती पर चट्टानों, मौसम, फसलों, उद्योगों, जानवरों तथा मानवीय आंकड़ों तथा इनकी विशेषता के बारे ज्ञान हासिल करते हैं। भौगोलिक आंकड़े गुणवाचक तथा परिमाणवाचक दोनों रूपों में हमें मिलते हैं। भौगोलिक आंकड़े समधर्मी (Analogue) तथा डिजीटल रूप में मिलते हैं। नक्शे के लिए जब चित्र आसमान से लिए जाते हैं तो वे समधर्मी आंकड़ों की उदाहरणे हैं तथा जब स्कैन करके कंप्यूटर में डाला जाता चित्र होता तो वह डिजीटल आंकड़े की उदाहरण होती है। भौगोलिक डाटा के मुख्य रूप हैं-

1. भौगोलिक (स्थानीय ) वर्गीकरण-यह वर्गीकरण भौगोलिक आंकड़ों तथा स्थानों में अंतर पर निर्भर करता है। इसको स्पष्ट करने के लिए हमें आंकड़े इकट्ठे करने होते हैं जैसे कि कितनी फर्मे (Firms) भारत में साइकिल बना रही हैं।

Number of Firms Producing Bicycles in 2013 Across Different Locations.

Place Number of Firms
Punjab 20
Haryana U.P. 25

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2. समयानुसार या ऐतिहासिक वर्गीकरण (Chronological Classification)-जब आंकड़ों का समय के आधार पर वर्गीकरण किया जाता है उसे Chronological वर्गीकरण कहते हैं। इसको निम्नलिखितानुसार स्पष्ट कर सकते हैं-

Sales of a Firm (2011-2013)

Year Sales(Rs)
2011 80 Lakhs
2012 90 Lakhs
2013 95 Lakhs

3. गुणवाचक वर्गीकरण (Qualitative Classification)—यह वर्गीकरण गुण या विशेषता के आंकड़ों के अनुसार होता है, जैसे कि डाटा को जनसंख्या के पेशे, धर्म तथा योग्यता के स्तरों के अनुसार विभाजित किया जाता है। इससे दो तरीकों से विभाजित किया जा सकता है

1. Simple Classification
2. Manifold Classification.

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प्रश्न 3.
संगणक की सहायता से उपयुक्त तरीका प्रयोग करते हुए आंकड़ों की पेशकारी करो तथा ग्राफ का विश्लेषण करो।
उत्तर-
आंकड़ा प्रक्रिया तथा पेशकारी के लिए कई प्रकार के तरीके प्रयोग किये जाते हैं पर ये तरीके काफी समय लेने वाले तथा मुश्किल होते हैं। आधुनिक युग में कंप्यूटर की सहायता के साथ आकडों की पेशकारी की जा रही है तथा इसके साथ यह बोझिल तथा समय खराब करने वाले काम आप आसानी से कर सकते हैं। कंप्यूटर एक इलैक्ट्रॉनिक उपकरण है। इसमें हार्डवेयर तथा साफ्टवेयर दो हिस्से होते हैं तथा आंकड़ा प्रक्रिया तथा आंकड़ा पेशकारी के लिए हम इन दोनों हिस्सों का प्रयोग करते हैं। आंकड़ों की पेशकारी अलग-अलग तरीकों से की जाती है। जैसे कि बार ग्राफ, हिस्टोग्राफ, पाई-चार्ट इत्यादि। अब हम आंकड़ों की पेशकारी के लिए उपयुक्त ढंग का प्रयोग करेंगे। हम एक्सल में इनकी पेशकारी तथा ग्राफ बनाने का विश्लेषण करेंगे-

  1. हर एक चित्र को क्रमानुसार नंबर देना आवश्यक है।
  2. हर एक चित्र का एक उपयुक्त शीर्षक बनाना चाहिए तथा शीर्षक ऐसा होना चाहिए जिसमें आंकड़ों का समय तथा स्थान भी स्पष्ट हो जाए।
  3. शीर्षक तथा उपशीर्षक, इकाइयों के यूनिट भी लिखे जाने चाहिए।
  4. शीर्षक, उपशीर्षक, इकाइयां इत्यादि को दर्शाने के लिए फौंट का ख्याल रखना चाहिए। फौंट ऐसा होना चाहिए कि हर एक चीज उपयुक्त स्थान पर मिल जाए। कंप्यूटर में आंकड़ों की पेशकारी के लिए अलग-अलग तरीके जैसे कि बार ग्राफ, हिस्टोग्राफ, मिश्रित बार चित्र, पाई चार्ट इत्यादि बनाये जाते हैं तथा कंप्यूटर पर इनका प्रयोग करना काफ़ी आसान तथा स्पष्ट हो जाता है। हम कंप्यूटर की सहायता से मिश्रित बार ग्राफ का प्रयोग करके आंकड़ों की पेशकारी करेंगे तथा ग्राफ का विश्लेषण करेंगे। सबसे पहले आँकड़े इकट्ठे करके एक सारणी बनाई जाए तथा फिर Excel पर एक बार ग्राफ बनाया जाए।

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  1. इसके लिए सबसे पहले Excel Open करेंगे फिर Spreadsheet को खोलेंगे जिसमें चार्ट बनाया जाएगा।
  2. फिर पूरे आंकड़े (Data) जिसको चार्ट में शामिल करना है उसको Select करो। Column तथा Row बना लो। जैसे कि बार चार्ट में सारणी बनाया जाता है। इसके बाद Chart Wizard टूलबार बटन पर क्लिक करो तथा Insert मीनू में चार्ट की किस्म Select कर लो। इसके बाद एक बार ग्राफ की सबटाइप चुन लो तथा फिर Next पर क्लिक करो।
  3. यह देख लो कि Data जो लिया है वह ठीक हो तथा Data Range भी चुन लो फिर Next पर क्लिक करो।
  4. इसके बाद (Title) शीर्षक चार्ट के लिए प्रवेश करो जो xaxis या yaxis के लिए आपने देना है।
  5. इसके बाद Finish पर क्लिक करो। आपका बार ग्राफ बन जाएगा।
  6. आखिर पर कोई बदलाव करने के लिए आप Chart Toolbar का प्रयोग कर सकते हैं।

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Geography Guide for Class 12 PSEB प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल Important Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Objective Type Question Answers)

A. बहु-विकल्पी प्रश्न :

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में कौन-सा प्रारंभिक आंकड़ों का स्रोत नहीं है ?
(A) इंटरव्यू
(B) शैड्यूल
(C) निजी निरीक्षण
(D) अखबार।
उत्तर-
(D) अखबार।

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प्रश्न 2.
नक्शा कला के डिजाइन के नीचे लिखे महत्त्वपूर्ण भागों में से कौन-सा भाग शामिल नहीं किया जाता है ?
(A) संकेत
(B) सही पैमाने का चुनाव
(C) शीर्षक
(D) दिशा।
उत्तर-
(B) सही पैमाने का चुनाव

प्रश्न 3.
जनसंख्या में वृद्धि जन्म दर तथा मृत्यु दर दिखाने के लिए कौन-से ग्राफ बनाये जाते हैं ?
(A) लकीरी ग्राफ
(B) साधारण बार चित्र
(C) बहु-बार चित्र
(D) पाई चित्र।
उत्तर-
(A) लकीरी ग्राफ

प्रश्न 4.
बहाव चार्ट क्या है ?
(A) नक्शे तथा ग्राफ का सुमेल
(B) नक्शे तथा डाटा का सुमेल
(C) आंकड़ों का सुमेल
(D) नक्शों का सुमेल।
उत्तर-
(A) नक्शे तथा ग्राफ का सुमेल

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प्रश्न 5.
किस विधि से सड़कों, रेलमार्गों इत्यादि लम्बे तथा कम चौड़े क्षेत्र के नक्शे को बड़ा या छोटा किया जाता है ?
(A) बिन्दु विधि
(B) समरूप त्रिभुजाकार विधि
(C) पैटोग्राफ के साथ
(D) फोटोग्राफिक कैमरे के साथ।
उत्तर-
(B) समरूप त्रिभुजाकार विधि

प्रश्न 6.
किस विधि के द्वारा वस्तु के उत्पादन तथा वितरण के आंकड़ों को बिन्दुओं के रूप में दिखाया जाता है ?
(A) बिन्दु नक्शे
(B) वितरण नक्शे
(C) समरूपी नक्शे
(D) लकीरी ग्राफ।
उत्तर-
(A) बिन्दु नक्शे

प्रश्न 7.
किस पद्धति को Choropleth Method कहते हैं ?
(A) वितरण नक्शे
(B) वर्णमात्री नक्शे
(C) यांत्रिक पद्धति
(D) विशेषतः नक्शे।
उत्तर-
(B) वर्णमात्री नक्शे

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प्रश्न 8.
Isopleth कौन से शब्दों का मेल से बनता है?
(A) Iso +pleth
(B) Isoe + pletho
(C) Iso + plethron
(D) Iso + Plethron.
उत्तर-
(C) Iso + plethron

प्रश्न 9.
Ctrl + N दबाने के साथ क्या होता है ?
(A) नई एक्शल फाइल खुलती है।
(B) कंप्यूटर में मौजूद हर फाइल खुल जाती है।
(C) पेस्ट करने के लिए दबाया जाता है।
(D) फाइल को कंप्यूटर में संभाला जाता है।
उत्तर-
(A) नई एक्शल फाइल खुलती है।

प्रश्न 10.
बिन्दुओं की सहायता के साथ निम्नलिखित में से कौन-से स्थानीय आंकड़े दिखा सकते हैं ?
(A) ज़िले
(B) स्कूल
(C) रेलवे स्टेशन
(D) जंगल।
उत्तर-
(B) स्कूल

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B. खाली स्थान भरें :

1. जीओ-सिनक्रोसिन सैटेलाइट (GSLY) को ……….. द्वारा तैयार किया गया है।
2. इंडियन रीजनल नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम में ……….. उपग्रह हैं।
3. लांच व्हीकल दो तरह के होते हैं PSLV तथा ………….।
4. दो पसारी चित्रों में …………… तथा …………. शामिल होते हैं।
5. बहु बार चित्र ……….. या ……….. अधिक परिवर्तनशील तत्वों को दर्शाने के लिए बनाये जाते हैं।
उत्तर-

  1. इसरो
  2. सात
  3. GSLV
  4. पाई चित्र, आयताकार
  5. दो या दो से।

C. निम्नलिखित कथन सही (√) है या गलत (x) :

1. पुरुषों तथा औरतों की जनसंख्या कुल ग्रामीण तथा शहरी आबादी को दर्शाने के लिए बहु बार चित्र बनाये जा सकते हैं।
2. बहाव चार्ट नक्शे तथा ग्राफ का सुमेल होते हैं।
3. विशेषत नक्शे आमतौर पर मात्रात्मक तथा गैर मात्रात्मक किस्मों में विभाजित किए जाते हैं।
4. Ctrl + z दबाने के साथ चुने हुए सैल में आंकड़े मिट जाते हैं।
5. पुलाडी हिस्से में 27 उपग्रह होते हैं।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. सही
  4. ग़लत
  5. ग़लत।

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले उत्तर (One Word/Line Question Answers) :

प्रश्न 1.
डाटा क्या है ?
उत्तर-
भिन्न प्रकार के आंकड़े जैसे कि वस्तु की मात्रा, गुण, गुणवत्ता, वितरण इत्यादि को स्पष्ट किया जाता है। संख्या पर आधारित जानकारी डाटा कहलाती है।

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प्रश्न 2.
आंकड़ा/डाटा कौन से स्रोतों से प्राप्त किया जाता है ?
उत्तर-
प्रारंभिक स्रोतों तथा गौण स्रोतों से डाटा प्राप्त किया जाता है।

प्रश्न 3.
दूसरे दर्जे के गौण आंकड़ों के स्त्रोतों में कौन-से स्रोत शामिल हैं ?
उत्तर-
इन स्रोतों में सरकारी प्रकाशनाएं, दस्तावेज, रिपोर्ट तथा प्रकाशित या अप्रकाशित स्रोत शामिल हैं।

प्रश्न 4.
रेखा ग्राफ किसको प्रदर्शित करने के लिए बनाये जाते हैं ?
उत्तर-
तापमान, वर्षा, जनसंख्या वृद्धि, जन्म दर तथा मृत्यु दर को।

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प्रश्न 5.
अलग-अलग परिवर्तनशील तत्वों को दिखाने के लिए कौन-से रैखिक नमूने प्रयोग किये जाते हैं ?
उत्तर-
सीधी रेखा (-), विभाजित रेखा (—), बिन्दु रेखा (….) या मिश्रित रेखा में विभाजित तथा बिन्दु रेखा।

प्रश्न 6.
दण्ड आरेख को और किस नाम से बुलाया जाता है ?
उत्तर-
कालमी चित्र।

प्रश्न 7.
तुरन्त तुलना के लिए कौन से चित्र बनाये जाते हैं ?
उत्तर-
साधारण दण्डचित्र।

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प्रश्न 8.
बहु-बार चित्र किस उद्देश्य के लिए बनाये जाते हैं ?
उत्तर-
दो या दो से अधिक परिवर्तनशील तत्वों को दर्शाने तथा तुलना करने के लिए।

प्रश्न 9.
भारत की 1951 की साक्षरता दर कितनी थी ?
उत्तर-
18.33 प्रतिशत।

प्रश्न 10.
अगर आंकड़ा प्रतिशत रूप में ही तब कोण प्राप्त करने के लिए कौन सा फार्मूला प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
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प्रश्न 11.
बहाव नक्शे किस किस्म के आंकड़े पेश करने के लिए बनाये जाते हैं ?
उत्तर-
गाड़ियों की उनके पहुंच स्थान की तरफ की संख्या तथा बारंबारता के लिए तथा मुसाफिरों तथा परिवहन की जाने वाली वस्तुओं की संख्या के लिए।

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प्रश्न 12.
बिन्दु नक्शे किसलिए बनाये जाते हैं ?
उत्तर-
यह नक्शे जनसंख्या, पशुओं की संख्या, फसलों की किस्मों इत्यादि के उपयोगों का विभाजन दिखाने के लिए बनाये जाते हैं।

प्रश्न 13.
बिन्दु नक्शे का कोई एक दोष बताओ।
उत्तर-
इनको बनाने में काफी समय लगता है तथा यह एक मुश्किल काम है।

प्रश्न 14.
सममान रेखाओं की किस्में बताओ।
उत्तर-
समदाब रेखाएं, समताप रेखाएं, समवर्षा रेखाएं, सम उच्च रेखाएं, सममेघ रेखाएं।

प्रश्न 15.
वर्णमात्री नक्शे किसे कहते हैं ?
उत्तर-
इस पद्धति में किसी एक वस्तु के वितरण को नक्शे के अलग-अलग शेडों या रंगों के द्वारा दर्शाया जाता है। किसी रंग की तुलना में Black and White Shading का प्रयोग करना अच्छा समझा जाता है।

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प्रश्न 16.
कंप्यूटर के हिस्सों को कौन से भागों में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर-
साफ्टवेयर तथा हार्डवेयर।

प्रश्न 17.
जी०पी०एस० के तीन हिस्से कौन-से हैं ?
उत्तर-
पुलाड़ी हिस्सा, नियंत्रण हिस्सा, उपयोगी हिस्सा।

प्रश्न 18.
पुलाड़ी हिस्से में कितने उपग्रह हैं ?
उत्तर-
24 उपग्रह, 2016 में इनकी संख्या बढ़ाकर 32 कर दी गई है।

प्रश्न 19.
लांच व्हीकल की किस्में बताओ।
उत्तर-
पोलर सैटेलाइट लांच व्हीकल (PSLV) तथा जीओ सिनक्रोसन सैटेलाइट लांच व्हीकल (GSLV) ।

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प्रश्न 20.
भारतीय नेवीगेशन सिस्टम का नाम बताओ।
उत्तर-
इण्डियन रीजनल नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम।

प्रश्न 21.
PSLV को किस द्वारा तैयार किया गया है?
उत्तर-
ISRO द्वारा।

प्रश्न 22.
वितरण नक्शे से क्या अर्थ है ?
उत्तर-
यह वे नक्शे हैं जो धरती के किसी भाग पर किसी तत्व के वितरण के मूल्य को या घनत्व को प्रकट करते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
डाटा की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर-
किसी क्षेत्र के फसली पैटर्न के अध्ययन के लिए उस क्षेत्र के फसली क्षेत्र, उपज, उत्पादन का अध्ययन करने के लिए सिंचाई के अधीन क्षेत्र, वर्षा की मात्रा, खादें तथा कीटनाशक दवाइयां इत्यादि के प्रयोग संबंधी अंकात्मक/डाटा जानकारी की ज़रूरत होती है। इसके अलावा भौगोलिक विश्लेषण संबंधी डाटा की भी अहम् भूमिका होती है।

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प्रश्न 2.
ग्राफ, चित्र तथा नक्शे बनाने के लिए आम नियम कौन से हैं ?
उत्तर-
ग्राफ, चित्र तथा नक्शे बनाने के लिए आम नियम निम्नलिखित हैं-

  • सही तरीके का चुनाव
  • सही पैमाने का चुनाव
  • रूपरेखा तैयार करना इस शीर्षक, संकेत तथा दिशा शामिल है।

प्रश्न 3.
बार ग्राफ (दण्ड आरेख) की रचना के लिए कौन-से नियमों में ध्यान रखना आवश्यक है ?
उत्तर-
दण्ड आरेख को कालमी चित्र भी कहते हैं। इसके मुख्य नियम हैं-

  • सारे बार समान चौड़ाई के होने चाहिए।
  • सारे बार एक समान दूरी पर होने चाहिए।
  • सारे बार अलग-अलग रंगों द्वारा आकर्षित तथा एक-दूसरे से अलग दिखाये जाते हैं।

प्रश्न 4.
आंकड़ा चित्रों के लाभ बताओ।
उत्तर-
आंकड़ा चित्रों के लाभ इस प्रकार हैं-

  • आंकड़ों का सजीव रूप–प्रायः किसी विषय सम्बन्धी आंकड़े नीरस व प्रेरणा रहित होते हैं। रेखाचित्र इन विषयों को एक सजीव तथा रोचक रूप देते हैं। एक ही दृष्टि में रेखाचित्र तथ्यों का मुख्य उद्देश्य व्यक्त करने में सहायक होते हैं।
  • सरल रचना-रेखाचित्रों की रचना सरल होने के कारण अनेक विषयों में इनका प्रयोग किया जाता है।
  • तुलनात्मक अध्ययन-रेखाचित्रों द्वारा विभिन्न आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन सरल हो जाता है।
  • अधिक समय तक स्मरणीय-रेखाचित्रों का दर्शनीय रूप मस्तिष्क पर एक लम्बे समय के लिए गहरी छाप छोड़ जाता है। यह आरेख दृष्टिक सहायता का एक महत्त्वपूर्ण साधन है।
  • विश्लेषण में उपयोगी-शोधकार्य में किसी तथ्य के विश्लेषण में रेखाचित्र सहायक होते हैं।
  • साधारण व्यक्ति के लिए उपयोगी-साधारण व्यक्ति आंकड़ों को चित्र द्वारा आसानी से समझ सकता है।

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प्रश्न 5.
चक्र चित्र (Pie Diagram) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
यह वृत्त चित्र (Circular Diagram) का ही एक रूप है। इसमें विभिन्न राशियों को जोड़ कर एक वृत्त द्वारा दिखाया जाता है। फिर इस वृत्त को विभिन्न भागों में बांटकर विभिन्न राशियों का आनुपातिक प्रदर्शन अंशों में किया जाता है। इस चित्र को चक्र चित्र, पहिया चित्र या सिक्का चित्र भी कहते हैं।

प्रश्न 6.
वृत्त चक्र के गुण-दोष बताओ।
उत्तर-

  1. चक्र चित्र विभिन्न वस्तुओं के तुलनात्मक अध्ययन के लिए उपयोगी है।
  2. ये कम स्थान घेरते हैं। इन्हें वितरण मानचित्रों पर भी दिखाया जाता है।
  3. इसका चित्रीय प्रभाव भी अधिक है।
  4. इसमें पूरे आँकड़ों का ज्ञान नहीं होता तथा गणना करनी कठिन होती है।

प्रश्न 7.
बहाव नक्शों के लिए कौन-सी जरूरतमंद वस्तुएं आवश्यक चाहिए ?
उत्तर-
बहाव नक्शों के लिए-

  • जरूरतमंद ट्रांसपोर्ट रूट का नक्शा जिस पर स्टेशन दिखाया गया हो उसकी आवश्यकता होती है।
  • वस्तुओं, सेवाओं, गाड़ियों की संख्या इत्यादि सम्बन्धी डाटा, जिनमें उनके संबंधित वस्तुओं की उपज तथा पहुंच का स्थान बताना बहुत आवश्यक है।
  • ज़रूरत के पैमाने का चुनाव भी आवश्यक है।

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प्रश्न 8.
वर्णमात्री नक्शे बनाने के सिद्धान्त क्या हैं ?
उत्तर-
जैसे-जैसे किसी वस्तु में वितरण का घनत्व बढ़ता जाता है। उसी प्रकार आभा भी अधिक गहरी होती जाती हैं। आभा को अधिक सघन करने के कई तरीके हैं-

  • बिन्दुओं का आकार बड़ा करके।
  • रेखाओं को मोटा करके।
  • रेखाओं को निकट करके।
  • रेखा जाल बनाकर।
  • रंगों को गहरा करके।

प्रत्येक मानचित्र के नीचे Scheme of Shades का एक सूचक दिया जाता है।

प्रश्न 9.
विषयगत नक्शे कौन से हैं ?
उत्तर-
जिन नक्शों के द्वारा आँकड़ों की विशेषता दर्शाने के लिए तथा तुलना करने के लिए ग्राफ तथा चित्र एक अहम् भूमिका निभाते हैं, विषयगत नक्शे होते हैं पर इनमें क्षेत्रीय परिदृश्य दिखाने के लिए चित्र तथा ग्राफ असफल होते हैं। इसलिए स्थानिक भिन्नता को तथा क्षेत्रीय वितरण को समझने के लिए इस तरह के नक्शे बनाये जाते हैं।

प्रश्न 10.
कंप्यूटर क्या कर सकता है ?
उत्तर-
कंप्यूटर एक इलैक्ट्रॉनिक उपकरण है। इसके अपने कई हिस्से होते हैं जिनमें कुछ हैं, मैमोरी, माइक्रो प्रोसैसर, निवेश एवं निर्गत उपकरण। कंप्यूटर के यह सारे हिस्से मिलकर बहुत ही अधिक प्रभावशाली उपकरण मतलब कंप्यूटर का निर्माण करते हैं। इसके द्वारा आंकड़ा पेशकारी, प्रक्रिया तथा संचालन का काम अच्छे ढंग के साथ किया जा सकता है। कंप्यूटर की सहायता के साथ जोड़ तथा घटाव से लेकर तर्क से हल करने वाले सारे साधारण तथा जटिल प्रश्न हल किये जा सकते हैं।

प्रश्न 11.
MS-Excel या स्प्रेडशीट क्या है ?
उत्तर-
यह कुछ ऐसे कंप्यूटर प्रोग्राम हैं जिनकी हम आंकड़ा प्रक्रिया के लिए सबसे अधिक उपयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त इसका प्रयोग नक्शे तथा रेखाचित्र बनाने में करते हैं। इसको रेखाचित्र या नक्शे बनाने वाले प्रोग्राम या स्प्रेडशीट के नाम से पहचाना जाता है।

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प्रश्न 12.
स्थानीय आंकड़े कौन से होते हैं ?
उत्तर-
जो आंकड़े किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति को दर्शाते उनको स्थानीय आंकड़े कहते हैं। इसे आमतौर पर बिन्दु रेखाओं तथा बहुर्भुज के रूप में मिलते हैं। इसमें ट्यूवबैल, कस्बे, गाँव, अस्पताल इत्यादि बिन्दुओं की सहायता के साथ, रेल की लाइनों, नदियों इत्यादि रेखाओं की सहायता के साथ तथा भूमि, तालाब, झीलों, जंगल, ज़िले इत्यादि बहुभुजों की सहायता से दिखाये जाते हैं।

प्रश्न 13.
Sun-Synchronerus Circular Orbit क्या है ?
उत्तर-
Sun-Synchronerus Circular Orbit होता है जब पृथ्वी के केन्द्रीय पार्ट को उपग्रह के साथ मिलाने वाली एक रेखा तथा पृथ्वी के केन्द्र को सूर्य के साथ मिलाने वाली रेखा के मध्य में बनने वाले कोण स्थाई हों।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
बिन्दु नक्शे बनाने के लिए मुख्य आवश्यकताएं कौन-सी हैं ?
उत्तर-
बिन्दु मानचित्र बनाने के लिए आवश्यकताएं-बिन्दु विधि द्वारा मानचित्र बनाने के लिए कुछ चीज़ों की आवश्यकता होती है-

  • निश्चित आंकड़े (Definite an Detailed Data)-जिस वस्तु का वितरण प्रकट करना हो उसके सही सही आंकड़े उपलब्ध होने चाहिए। ये आंकड़े प्रशासकीय इकाइयों के आधार पर होने चाहिए जैसे जनसंख्या तहसील या जिले के अनुसार होनी चाहिए।
  • रूपरेखा मानचित्र (Outline Map) उस प्रदेश का एक सीमा चित्र हो जिसमें जिले या राज्य इत्यादि शासकीय भाग दिखाए हों। यह सीमा चित्र समक्षेत्र प्रक्षेप पर बना हो।
  • धरातलीय मानचित्र (Relief Map)-उस प्रदेश का धरातलीय मानचित्र हो जिसमें Contours, thills, marshes, इत्यादि धरातल की आकृतियां दिखाई गई हों।
  • जलवायु मानचित्र (Climatic Map)-उस प्रदेश का जलवायु मानचित्र हो जिसमें वर्षा तथा तापमान का ज्ञान हो सके।
  • मृदा मानचित्र (Soil Map)—विभिन्न कृषि पदार्थों की उपज वाले मानचित्रों में भूमि के मानचित्र आवश्यक हैं क्योंकि हर प्रकार की मिट्टी की उपजाऊपन विभिन्न होता है।

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प्रश्न 2.
विषयगत नक्शों का महत्त्व वर्णन करो।
उत्तर-
विषयगत नक्शों का महत्त्व निम्नलिखितानुसार है-

  • यह आर्थिक भूगोल के अध्ययन के लिए विशेष रूप में महत्त्व रखता है। पृथ्वी पर अलग-अलग साधन तथा मनुष्य के सम्बन्ध में इन शक्तियों द्वारा स्पष्ट रूप से दर्शाया जा सकता है।
  • आंकड़ों की लम्बी-लम्बी तालिकाओं को याद रखना मुश्किल हो जाता है पर वितरण नक्शे किसी तत्व की दिमाग पर स्थाई छाप छोड़ देते हैं।
  • इनका उपयोग शिक्षा संबंधी कामों के लिए किया जाता है।
  • इन नक्शों के द्वारा एक नज़र में ही किसी वस्तु के वितरण का तुलनात्मक अध्ययन हो जाता है। यह स्पष्ट हो जाता है कि कौन सी वस्तु कौन से क्षेत्र में अधिक तथा कौन से क्षेत्र में कम होती है।
  • इन नक्शों के द्वारा क्षेत्रफल तथा उत्पादन की मात्रा का तुलनात्मक अध्ययन हो जाता है।
  • वितरण नक्शे वास्तविक आंकड़ों के स्थान नहीं ले सकते। असल में नक्शों के द्वारा एक भूगोलकार सिर्फ तत्त्व ही दर्शा सकता है।

प्रश्न 3.
आंकड़ा डाटा के प्रारंभिक स्रोत कौन-से हैं ?
उत्तर-
आंकड़ा डाटा के प्रारंभिक स्रोत इस प्रकार हैं-

  • निजी निरीक्षण-यह निरीक्षण किसी समूह, संस्था, व्यक्ति या क्षेत्र से सीधे निरीक्षण द्वारा जानकारी इकट्ठी की जाती है। क्षेत्रीय कार्य के द्वारा स्थल रूपों, प्रवाह प्रणाली, मिट्टी की किस्में तथा वनस्पति, जनसंख्या संरचना इत्यादि की जानकारी इकट्ठी की जाती है।
  • साक्षात्कार-इस द्वारा खोज की जानकारी पर वार्तालाप किया जाता है तथा इस पर्यावरण द्वारा जानकारी इकट्ठी की जाती है।
  • स्टेडले-इसमें कुछ सवाल तथा उनके जवाब एक कागज़ पर लिखे जाते हैं तथा प्रश्नों के जवाब देने वाले को उनको अपने चुनाव के अनुसार चुनना होता है। जिस स्थान पर जवाब देने के दो विचारों का चुनाव होता हैं उस स्थान पर कागज़ पर आवश्यकता अनुसार जगह छोड़ी जाती होती है। इस तरीके से बड़े क्षेत्र की जानकारी इकट्ठी की जाती है। पर सिर्फ पढ़े-लिखे व्यक्ति से ही इस तरीके की जानकारी इकट्ठी की जाती है।
  • अन्य तरीके-मिट्टी किट तथा पानी गुणवत्ता किट से भी सीधे तौर पर जल तथा मिट्टी की गुणवत्ता संबंधी आँकड़े इकट्ठे किये जा सकते हैं।

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प्रश्न 4.
आंकड़े को प्रदर्शित करने की कौन-कौन सी विधियां हैं ?
उत्तर-
आंकड़े रेखाचित्रों तथा वितरण मानचित्रों द्वारा प्रकट किए जाते हैं। आँकड़ों के विस्तार तथा प्रकृति के अनुसार ये रेखाचित्र निम्न प्रकार के हैं-

  1. रेखा आरेख चित्र (Line Graph)
  2. दण्डारेख चित्र (Bargraph)
  3. चलाकृति चित्र (Wheel diagram)
  4. तारक चित्र (Star Diagram)
  5. क्लाइमोग्राफ (Climograph)
  6. हीथर ग्राफ (Hythergraph)
  7. चित्रीय आरेख (Pictorial diagram)
  8. आयत चित्र (Rectangular Diagram)
  9. मुद्रिक चित्र (Ring Diagram)
  10. मेखला चित्र (Circular Diagram)

प्रश्न 5.
रेखाग्राफ की रचना तथा महत्त्व का वर्णन करो।
उत्तर-
सांख्यिकी चित्रों में रेखाग्राफ का महत्त्व बहुत अधिक है। इसमें प्रत्येक वस्तु को दो निर्देशकों की सहायता से दिखाया जाता है। यह ग्राफ किसी निश्चित समय में किसी वस्तु के शून्य में परिवर्तन को प्रकट करता है। आधार रेखा पर समय को प्रदर्शित किया जाता है जिसे ‘X’ अक्ष कहते हैं। ‘Y’ अक्ष या खड़ी रेखा पर किसी वस्तु के मूल्य को प्रदर्शित किया जाता है। दोनों निर्देशकों के प्रतिच्छेदन के स्थान पर बिन्दु लगाया जाता है। इस प्रकार विभिन्न बिन्दुओं को मिलाने से एक वक्र रेखा प्राप्त होती है। ये रेखा ग्राफ दो प्रकार के होते हैं।

  1. जब किसी निरन्तर परिवर्तनशील वस्तु (तापमान, नमी, वायु, भार इत्यादि) को दिखाना हो तो उसे वक्र रेखा से दिखाया जाता है।
  2. जब किसी रुक रुक कर बदलने वाली वस्तु का प्रदर्शन करना हो तो विभिन्न बिन्दुओं को सरल रेखा द्वारा मिलाया जाता है। जैसे वर्षा, कृषि उत्पादन, जनसंख्या।

महत्त्व-रेखा ग्राफ से तापमान, जनसंख्या वृद्धि, जन्म दर, विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन दिखाया जाता है। यह आसानी से बनाए जा सकते हैं। रेखा ग्राफ समय तथा उत्पादन में एक स्पष्ट सम्बन्ध प्रदर्शित करते हैं।

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प्रश्न 6.
दण्ड आरेख (Bar Diagram) के गुण तथा दोष लिखो।
उत्तर-
गुण-दोष (Merits and Demerits)

  • यह आंकड़े दिखाने की सबसे सरल विधि है।
  • इसके द्वारा तुलना करना आसान है।
  • दण्ड चित्र बनाने कठिन हैं जब समय अवधि बहुत अधिक हो।
  • जब अधिकतम तथा न्यूनतम संख्या में बहुत अधिक अन्तर हो, तो दण्ड चित्र नहीं बनाए जा सकते हैं।

प्रश्न 7.
वृत्त चक्र (Pie Diagram) की रचना के बारे में बताओ।
उत्तर-
यह वृत्त चित्र का ही एक रूप है। इसमें विभिन्न राशियों के जोड़ को एक वृत्त द्वारा दिखाया जाता है। फिर इस वृत्त को विभिन्न भागों में बांटकर विभिन्न राशियों का आनुपातिक प्रदर्शन अंशों में किया जाता है। इस चित्र को चक्र चित्र, पहिया चित्र या सिक्का चित्र भी कहते हैं।
रचना-इस चित्र में वृत्त का अर्द्धव्यास मानचित्र के आकार के अनुसार अपनी मर्जी से लिया जाता है। इसका सिद्धांत यह है कि कुल राशि वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर होती है। एक वृत्त के केंद्र पर 360° का कोण बनता है। प्रत्येक राशि के लिए वृत्तांश ज्ञात किए जाते हैं। इसलिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है-
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कई बार वृत्त के विभिन्न भागों को प्रभावशाली रूप से दिखाने के लिए इनमें भिन्न-भिन्न शेड कर दिए जाते हैं।

प्रश्न 8.
विषयगत नक्शे बनाने के लिए जरूरतमंद वस्तुओं तथा आम नियमों के बारे में बताओ।
उत्तर-
आंकड़ों की तुलना करने तथा विशेषताएं दर्शाने के लिए बनाये ग्राफ तथा चित्र इसमें अहम् भूमिका निभाते हैं। विषय नक्शे बनाने के लिए आवश्यकता की वस्तुएं हैं-

  • चुने हुए विषय संबंधी जिले स्तर पर आंकड़े।
  • चुने हुए क्षेत्र का प्रबंधन सीमाओं सहित नक्शा।
  • संबंधित क्षेत्र का भौतिक नक्शा।

विषयगत नक्शे बनाने के लिए मुख्य नियम-

  • इन नक्शों को योजना बंदी तरीके के साथ तथा सावधानी के साथ तैयार किया जाना चाहिए। पूर्ण रूप में तैयार नक्शा निम्न जानकारी देता है, जैसे कि क्षेत्र का नाम, विषय का शीर्षक, आंकड़े का स्रोत तथा साल, चिन्हों, प्रतीकों, रंगों की गहराइयों इत्यादि की सूचना।
  • विषयगत: नक्शों के साथ सही तरीके का चुनाव होना बहुत आवश्यक है।

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प्रश्न 9.
वर्णमात्री नक्शे बनाने की विधि के बारे में बताओ।
उत्तर-
इस विधि को Choropleth Method भी कहते हैं। इस विधि में किसी एक वस्तु के वितरण को मानचित्र पर विभिन्न आभाओं या रंगों द्वारा प्रकट किया जाता है। किसी रंग की अपेक्षा Black and White shading को प्रयोग करना उचित समझा जाता है।

विधि (Procedure)

  • किसी वस्तु के निश्चित आंकड़े प्राप्त करो। ये आंकड़े प्रशासकीय इकाइयों के आधार पर हों।
  • ये आंकड़े औसत के रूप में हो या प्रतिशत या अनुपात के रूप में, जैसे जनसंख्या का घनत्व।
  • घनत्व को प्रकट करने के लिए उचित अन्तराल चुन लेना चाहिए।
  • अन्तराल के अनुसार Shading का सूचक मानचित्र के कोने में बनाना चाहिए।
  • यह आभा घनत्व के अनुसार गहरी होती चली जाए।
  • प्रत्येक प्रशासकीय इकाई में घनत्व के अनुसार शेडिंग करके मानचित्र तैयार किया जा सकता है।

प्रश्न 10.
सममान नक्शे किसे कहते हैं ? इनके गुण बताओ।
उत्तर-
Isopleth शब्द दो शब्दों के जोड़ से बना है (Iso + Plethron) Iso का अर्थ है समान तथा plethron शब्द का अर्थ है मान रेखाएं अर्थात् वह रेखाएं हैं जिनका मूल्य तीव्रता तथा घनत्व समान हो। ये रेखाएं उन स्थानों को आपस में जोड़ती हैं जिनका मान समान हो।

गुण (Merits)

  • सममान रेखायें वर्षा, तापमान इत्यादि आंकड़ों के परिवर्तन को शुद्ध रूप से प्रदर्शित करती हैं।
  • ये रेखायें किसी स्थान पर उपस्थित मूल्य को प्रकट करती हैं।
  • अन्य विधियों की अपेक्षा यह एक अधिक वैज्ञानिक विधि है।
  • बिन्दु मानचित्र तथा वर्णमात्री को समान रेखा मानचित्र में बदला जा सकता है।
  • इन मानचित्रों का प्रशासकीय इकाइयों में कोई सम्बन्ध नहीं होता।

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प्रश्न 11.
संगणक सॉफ्टवेयर तथा हार्डवेयर बारे बताओ।
उत्तर-
संगणक के भौतिक हिस्से जिनको हम देख सकते हैं तथा छू सकते हैं वे हार्डवेयर कहलाते हैं। यह भाग मशीनी, इलैक्ट्रॉनिक या इलैक्ट्रीकल हो सकते हैं। ये कंप्यूटर के हार्डवेयर अलग-अलग हो सकते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता हैं कि कंप्यूटर किस उद्देश्य के लिए प्रयोग में लाया जा सके तथा व्यक्ति की आवश्यकता क्या है। एक कंप्यूटर में विभिन्न तरह के हार्डवेयर होते हैं जिसमें सी०पी०यू०, हार्ड डिस्क, रैम, प्रोसैसर, मॉनीटर, मदरबोर्ड, फ्लापी ड्राइव कंप्यूटर के सिर्फ पावर संचालित यूनिट की बोर्ड, माऊस इत्यादि भी हार्डवेयर के अंतर्गत आते हैं। कंप्यूटर हमारी तरह हिन्दी या अंग्रेजी भाषा नहीं समझता। हम कंप्यूटर को जो निर्देशन देते हैं उसकी एक नियत भाषा होती है इसको मशीन लैंगवेज़ या मशीन भाषा कहते हैं। कंप्यूटर साफ्टवेयर लिखित प्रोग्राम का एक समूह है जो कि कंप्यूटर की भंडार शाखा में जमा हो जाता है। इसमें MS-Excel, जी०पी०एस० इत्यादि शामिल हैं।

प्रश्न 12.
राकेट या लांच व्हीकल पर नोट लिखो।
उत्तर-
राकेट या लांच व्हीकल की सहायता से उपग्रह को अंतरिक्ष में दागा जा सकता है। कुछ दूरी पर पहुंच कर राकेट उपग्रह से अलग हो जाता है। उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंच जाता है तथा राकेट समुद्र या बंजर धरती पर वापिस आ जाता है। राकेट या लांच व्हीकल दो किस्मों के होते हैं-

  • पोलर सैटेलाइट लांच व्हीकल (PSLV)—इस व्हीकल को ISRO की तरफ से तैयार किया गया है। इस व्हीकल की सहायता से 1750 कि०ग्रा० तक के भार के Earth Observation उपग्रहों को 600-900 कि०मी० ऊंचाई तक के Sun-Synchronous Circular Polar Orbit में डाला जाता है।
  • जीऊ सिनक्रोसन सैटेलाइट लांच व्हीकल (GSLV)-इस व्हीकल को ISRO ने तैयार किया है। इसके मुख्य तीन पड़ाव होते हैं। इसकी तीसरी पड़ाव में क्रायोजनिक इंजन होता है। इसकी सहायता के साथ 2500 कि०ग्रा० या इससे भी भारे उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे जा स ते हैं।

प्रश्न 13.
भौगोलिक जानकारी तंत्र क्या है ?
उत्तर-
विद्वानों ने भौगोलिक जानकारी तंत्र का अलग-अलग तरीकों से वर्णन किया है। यह एक ऐसा तंत्र है जिस द्वारा हमें GPS उपग्रहों के द्वारा भेजे गये आंकड़ों को जान सकते हैं क्योंकि यह आंकड़े अंतरिक्ष से होते हैं। इनको पूरी तरह से समझना मुश्किल होता है। इन निरोल आंकड़ों को एक खास सिस्टम में निकाल कर आम मनुष्य की समझ में लाया जा सकता है। जी०पी०एस० तथा मनुष्य में तालमेल बिठाने का काम भौगोलिक जानकारी तंत्र ही करता है। इसकी सहायता के साथ स्थानिक तथा गैर-स्थानिक दोनों ही आंकड़ों को इकट्ठा किया जा सकता है। यह तंत्र आंकड़ों को इकट्ठा करता है उनको संभालता है तथा एक प्रतिक्रिया में से निकाल कर उसको उपयोग योग्य बनाता है। भौगोलिक जानकारी तंत्र की सहायता से शहरों तथा क्षेत्रों का योजनाबद्ध निर्माण भी किया जाता है। यह नक्शे तथा रेखाचित्रों के आगे की चीज है। कंप्यूटर तथा सूचना तकनीक में हो चुके विकास कारण इस तंत्र के साथ मौजूदा प्रबंधन की समस्याओं का हल किया जा सकता है।

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प्रश्न 14.
ग्लोबल पोजीशनिंग योजना (GPS) पर नोट लिखो।
उत्तर-
भूमण्डलीय स्थितीय तंत्र (ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम )(GPS) संयुक्त राज्य सेना द्वारा विकसित भूमंडलीय स्थितीय तंत्र सर्व ऋतु-रेडियो नौकायन प्रणाली है, जिसमें उपग्रह से नीचे प्रक्षेपित आँकड़ों का व्यक्तिगत यंत्र (रिसीवर) द्वारा प्रक्रमण होता है। यह विश्व में प्रतिदिन चौबीसों घंटे तीन आयामी स्थिति बताता है। अंतरिक्षीय उपग्रह प्रणाली की वृत्तीय कक्षा के परिक्रम पथ में 24 उपग्रह सम्मिलित होते हैं, तथा इसकी कक्षा में परिक्रमा अवधि 12 घंटे की होती है। यह परिक्रमा पथ 55° के कोण पर झुका होता है। उपग्रहों पर एक आण्विक घड़ी लगी होती है, जो घूर्णन के साथ स्थायी रूप से संकेत पैदा करती रहती है। ये संकेत उपग्रह के समय तथा पंचांग (किसी निश्चित समय बिंदु पर उपग्रह की स्थिति) में सम्बन्धित सूचना का वहन करती है। इसमें अक्षांश, देशान्तर तथा किसी भी स्थानीय इकाई की ऊँचाई प्राप्त करते हैं। इस प्रकार, भूमंडलीय स्थितीय तंत्र का स्थानीय मानचित्रण के क्षेत्र में अत्यधिक योगदान है।

प्रश्न 15.
भूमि उपयोग निरीक्षण के उद्देश्य क्या हैं ?
उत्तर-
कृषि भारतीय लोगों का मुख्य पेशा है। इसलिए सही भूमि उपयोग को समझना बहुत आवश्यक है। इस भूमि उपयोग के द्वारा हम कुछ त्रुटियों के बारे में जान सकते हैं तथा इन खामियों को दूर करके स्थिति को सुधारने के लिए सुझाव पेश कर सकते हैं। भूमि उपयोग निरीक्षण का मुख्य उद्देश्य एक कृषि के क्षेत्र में सही भूमि के उपयोग के बारे में जानना बहुत आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पूरा गाँव या गाँव का एक हिस्सा उसके आकार के अनुसार लिया जा सकता है। हम अपने उद्देश्य की पूर्ति को नंबर अलाट करके उनमें बीजी गई फसलों को भर कर तथा सम्बन्धित क्षेत्र का भूमि-उपयोग नक्शा तैयार करके कर सकते हैं। इसके लिए हमें मिट्टी, पानी के निकास, सिंचाई की सुविधाओं, खादों के सही उपयोग के बारे सही तथा स्पष्ट जानकारी इकट्ठी करनी बहुत आवश्यक है। इसके लिए खेतों के नंबर तथा गाँव के पास सीमाबंदी के नक्शे मिल सकते हैं जिससे ज़रूरत अनुसार जानकारी इकट्ठी की जा सकती है।

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निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रश्न 1.
आंकड़ा (डाटा) क्या है ? इसकी ज़रूरत क्यों होती है ? इसके मुख्य स्रोतों का वर्णन करो।
उत्तर-
डाटा-संख्या पर आधारित इकट्ठी की गई जानकारी डाटा कहलाती है। जैसे हम कई बार सुनते हैं कि लुधियाना में 60 सें०मी० तक लगातार वर्षा हुई तथा कर्नाटक में 24 घंटों में 40 सें०मी० वर्षा हुई इत्यादि। जब संख्या पर आधारित ऐसी जानकारी इकट्ठी की जाती है उसे डाटा कहते हैं।

डाटा की ज़रूरत-भूगोल के अध्ययन के लिए नक्शों की काफी आवश्यकता है।

  • किसी क्षेत्र के फ़सली पैटर्न का अध्ययन डाटा द्वारा करना आसान होता है। क्षेत्र के फ़सली पैटर्न का अध्ययन करने के लिए क्षेत्र का फसली क्षेत्र, फसल, उपज, उत्पादन, सिंचाई की सुविधा, वर्षा की मात्रा, खाद तथा कीटनाशक दवाइयों इत्यादि के प्रयोग सम्बन्धी आंकड़ात्मक जानकारी की आवश्यकता होती है।।
  • किसी शहर के विकास का अध्ययन करना शहर की आबादी, लोगों के पेशे, वेतन, उद्योगों, यातायात के साधनों इत्यादि सम्बन्धी आंकड़ों की आवश्यकता पड़ती है।
  • तथ्यों को जानने के लिए डाटा इकट्ठा करना बहुत आवश्यक है।

आँकड़ा/डाटा के स्रोत डाटा मुख्य रूप में निम्न दो स्रोतों से प्राप्त किया जाता है-

I. प्राथमिक स्रोत (Primary Source)—जो किसी व्यक्ति । संस्था द्वारा इकट्ठे किया जाए।
II. गौण स्त्रोत (Secondary Source)—किसी प्रकाशित या अप्रकाशित स्रोत से इकट्ठे किया जाए।

I. प्राथमिक स्त्रोत (Primary Sources)-

1. निजी प्रेक्षण (Personal Observation)–निजी प्रेक्षण किसी व्यक्ति या ग्रुप द्वारा सीधे प्रेक्षण द्वारा जानकारी इकट्ठा करने से सम्बन्धित है। क्षेत्री कार्यों के द्वारा स्थल रूपों, प्रवाह प्रणाली, मिट्टी की किस्मों, लिंग अनुपात, आयु संरचना, साक्षरता, यातायात के साधन, शहरी, ग्रामीण बस्तियाँ इत्यादि की जानकारी इकट्ठी की जाती है।
PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मकप्रयोग भूगोल 6
2. इंटरव्यू (Interview)-इस तरीके से खोजकर्ता सीधी जानकारी जवाब देने वाले से बातचीत द्वारा इकट्ठा कर . सकता है। इस प्रकार इंटरव्यू लेने वाला निम्नलिखित सावधानियों को इंटरव्यू लेते समय ध्यान में रखे-

  • इंटरव्यू लेने वाले द्वारा प्रश्नों की एक लिस्ट बना लेनी चाहिए ताकि बातचीत द्वारा अच्छी जानकारी इकट्ठी की जा सके।
  • इंटरव्यू लेने वाला इंटरव्यू का संचालन करने के उद्देश्य से पूरी तरह परिचित होना चाहिए तथा उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए काम करता हो।
  • इंटरव्यू लेने वाले को जवाबदेह व्यक्ति को अपने विश्वास में लेना आवश्यक है।
  • प्रश्नों की भाषा स्पष्ट तथा सादी होनी चाहिए।
  • ऐसे प्रश्नों से परहेज करना चाहिए जो किसी जवाबदेह की भावनाओं को दुःख पहुंचाएं।

3. प्रश्नावली (Questionnaire) इस तरीके में सरल प्रश्न तथा उनके योग्य उत्तर एक साफ पेपर पर लिख लेने चाहिए तथा जवाबदेह को अपनी योग्यता तथा समझ के अनुसार उन उत्तरों का चुनाव करना चाहिए। जिस स्थान पर जवाब देने वाले के विचारों को जानने की आवश्यकता होती है वहां कागज़ पर ज़रूरत अनुसार जगह दी होती है। इस प्रकार के तरीके के साथ बड़े क्षेत्र की जानकारी हासिल करनी अधिक उपयुक्त है। इस तरीके की सीमा की कमी यह है कि सिर्फ पढ़े लिखे तथा शिक्षित व्यक्ति की ही जानकारी इस द्वारा इकट्ठी की जा सकती है। इसके अतिरिक्त मिट्टी तथा जल की गुणवत्ता के सम्बन्ध में आंकड़े सीधे तौर पर मिट्टी, धूल तथा जल गुणवत्ता जांच की सहायता से इकट्ठे किए जा सकते हैं।

II. दूसरे दों के स्त्रोत (Secondary Sources of Data)-दूसरे दों में प्रकाशित तथा अप्रकाशित रिकार्ड जो कि सरकारी प्रकाशनायों, दस्तावेजों तथा रिपोर्टों के रूप में होते हैं।

प्रकाशित स्त्रोत (Published Sources)

  • सरकारी प्रकाशन (Government Publications)—इनमें भारत सरकार तथा राज्य की सरकारों के अलग अलग मंत्रालयों तथा विभागों के प्रकाशन तथा जिला बुलेटिन सबसे अधिक अच्छे स्रोत हैं। इन स्रोतों में भारतीय जनगणना, राष्ट्रीय सैंपल सर्वे की रिपोर्ट, भारतीय मौसम विभाग की रिपोर्ट, राज्य सरकार के आंकड़ासार तथा अलग-अलग कमीशन की रिपोर्ट आती हैं।
  • अर्धसरकारी प्रकाशन (Quasi Government Publications)-इस श्रेणी में शहरी विकास अथारिटी, नगर निगमों तथा जिला परिषदों इत्यादि की रिपोर्टों को शामिल किया जाता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशन (International Publications)—इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ की अलग-अलग एजैंसियों जैसे कि यूनेस्को/संयुक्त राष्ट्र विकास प्रोग्राम, यू०एन०डी०पी०, विश्व स्वास्थ्य संगठन, खाद्य तथा कृषि संगठन इत्यादि की रिपोर्ट आती हैं।
  • निजी प्रकाशन (Private Publications)-इसमें अलग-अलग अखबारों, सर्वे, संस्थानों द्वारा प्रकाशित रिपोर्टो, मोनोग्राफ तथा वार्षिक बुक इत्याद शामिल हैं।
  • अखबार तथा पत्रिका (Newspaper and Magazines). दैनिक अखबार तथा साप्ताहिक तथा मासिक पत्रिका इत्यादि इस कैटेगरी में शामिल हैं।
  • इलैक्ट्रॉनिक मीडिया (Electronic Media)-आज के समय में इसका खासकर इंटरनैट के आंकड़ों का मुख्य स्रोत के तौर पर उभरा हुआ रूप है।

अप्रकाशित स्रोत (Unpublished Sources)-

  1. सरकारी दस्तावेज (Government Documents)-अप्रकाशित रिपोर्टों मोनोग्राफ, दस्तावेज गौण स्रोतों का एक रूप है। उदाहरण के तौर पर पटवारियों का रिकार्ड किसी गाँव की जानकारी के लिए एक बहुत अच्छा स्रोत है।
  2. अर्धसरकारी दस्तावेज (Quasi-government Records)-अलग-अलग नगर निगम की रिपोर्टों तथा विकास प्रोग्राम इत्यादि की रिपोर्ट इस भाग में आती है।
  3. निजी दस्तावेज़ (Private Documents)-इनमें ट्रेड कंपनियां, ट्रेड यूनियनें, राजनीतिक तथा गैर-राजनीतिक संस्थाएं इत्यादि की रिपोर्ट शामिल होती हैं।

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प्रश्न 2.
आंकड़ा चित्र से क्या अभिप्राय है ? इनके लाभ तथा सीमाओं का वर्णन करो।
उत्तर-
आंकड़ा चित्र (Stastical Diagram)-आर्थिक भूगोल के अध्ययन में आंकड़ों का विशेष महत्त्व है। विभिन्न प्रकार के आंकड़े किसी वस्तु की मात्रा, गुण, घनत्व, वितरण इत्यादि को स्पष्ट करते हैं। ये आंकड़े अनेक तथ्यों की पुष्टि करते हैं। किसी क्षेत्र की जलवायु के अध्ययन में तापमान, वर्षा इत्यादि के आंकड़ों का भी अध्ययन किया जाता हैं। इन आंकड़ों का विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाले जाते हैं। परन्तु इस विश्लेषण के लिए अनुभव, समय तथा परिश्रम की आवश्यकता होती है। बड़ी-बड़ी तालिकाओं को याद करना बहुत कठिन तथा नीरस होता है। लम्बी-लम्बी सारणियां कई बार भ्रम उत्पन्न कर देती हैं। उन्हें सरल और स्पष्ट बनाने के लिए ये आंकड़े रेखाचित्रों द्वारा प्रकट किए जाते हैं। इन सांख्यिकीय आंकड़ों पर आधारित रेखाचित्रों तथा आलेखों को सांख्यिकीय आरेख कहा जाता है।

“सांख्यिकीय आंकड़ों को चित्रात्मक ढंग से प्रदर्शित करने वाले रेखाचित्रों को सांख्यिकीय आरेख कहते हैं।” इन विधियों में विभिन्न प्रकार की ज्यामितीय आकृतियां, रेखाएं, वक्र रेखाएं रचनात्मक ढंग से प्रयोग की जाती हैं। ये आंकड़ों को एक दर्शनीय रूप देकर मस्तिष्क पर गहरी छाप डालते हैं।

सांख्यिकीय आरेखों के लाभ (Advantages of Statistical Diagram)-

  • आंकड़ों का सजीव रूप-प्रायः किसी विषय सम्बन्धी आंकड़े नीरस व प्रेरणा रहित होते हैं। रेखाचित्र इन विषयों को एक सजीव तथा रोचक रूप देते हैं। एक ही दृष्टि में रेखाचित्र तथ्यों का मुख्य उद्देश्य व्यक्त करने में सहायक होते हैं।
  • सरल रचना-रेखाचित्रों की रचना सरल होने के कारण अनेक विषयों में इनका प्रयोग किया जाता है।
  • तुलनात्मक अध्ययन-रेखाचित्रों द्वारा विभिन्न आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन सरल हो जाता है।
  • अधिक समय तक स्मरणीय-रेखाचित्रों का दर्शनीय रूप मस्तिष्क पर एक लम्बे समय के लिए गहरी छाप छोड़ जाता है। यह आरेख दृष्टि की सहायता का एक महत्त्वपूर्ण साधन है।
  • विश्लेषण में उपयोगी-शोध कार्य में किसी तथ्य के विश्लेषण में रेखाचित्र सहायक होते हैं।
  • साधारण व्यक्ति के लिए उपयोगी-साधारण व्यक्ति आंकड़ों को चित्र द्वारा आसानी से समझ सकता है।
  • समय की बचत-रेखाचित्रों द्वारा तथ्यों को शीघ्र ही समझा जा सकता है जिसमें समय की बचत होती है।

ग्राफ चित्र बनाने के लिए आम नियम-

1. सही तरीके का चुनाव-आंकड़े, अलग-अलग विषयों जैसे कि तापमान, जनसंख्या में वृद्धि तथा वितरण, उत्पादन अलग-अलग वस्तुओं का वितरण तथा व्यापार इत्यादि को पेश करते हैं। आंकड़ों की इन विशेषताओं को सही तरीके से चुनने के लिए सही चित्रात्मक तरीके की आवश्यकता होती है।
2. सही पैमाने का चुनाव-पैमाना किसी नक्शे या चित्र पर आंकड़े के प्रदर्शन के लिए मापक के तौर पर प्रयोग में आता है। इस प्रकार सही पैमाने का चुनाव भी काफ़ी आवश्यक है।
3. रूपरेखा/डिजाइन-यह नक्शे कला का महत्त्वपूर्ण गुण है। नक्शा कला के डिजाइन के कुछ भाग इस प्रकार हैं –

  • शीर्षक-नक्शे के शीर्षक क्षेत्र के नाम तथा प्रयोग किए आंकड़ों के सम्बन्ध को दर्शाते हैं। यह भाग अलग-अलग आकार तथा मोटाई के अक्षरों तथा नंबरों के रूप में दिखाये जाते हैं।
  • संकेत-संकेत चित्र का महत्त्वपूर्ण भाग हैं। यह नक्शों में प्रयोग किए गये रंग, रंग की गहराई, चिन्हों इत्यादि की व्याख्या करता है।
  • दिशा-क्योंकि नक्शे में धरती के किसी हिस्से को दिखाया जाता है इसलिए यह विषय केन्द्रित होना आवश्यक है। इसलिए दिशा चिन्ह आवश्यक है।

चित्रों की रचना-आँकड़े लम्बाई चौड़ाई मात्रा इत्यादि मापने योग्य तरीकों पर आधारित होते हैं। इसको मुख्य रूप में तीन समूहों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. एक पसारी जैसे कि लकीरी ग्राफ, बहुलकीरी ग्राफ, दण्ड आरेख, हिस्टोग्राफ इत्यादि।
  2. दो पसारी जैसे कि वृत्त-चक्र तथा आयताकार चित्र।
  3. तीन पसारी जैसे कि घन तथा गोला चित्र इत्यादि।

आकंड़ो चित्रों की सीमाऍ (Limitations of Statistical Diagrams)—

  • आंकड़ों का शुद्ध रूप से निरूपण का सम्भव न होना-रेखाचित्र आंकड़ों को कई बार शुद्ध रूप में प्रदर्शित नहीं करते। इनमें थोड़ा बहुत परिवर्तन किया जाता है।
  • आरेख आंकड़ों के प्रतिस्थापन नहीं हैं-मापक के अनुसार रेखाचित्रों का आकार बदल जाता है तथा कई भ्रम उत्पन्न हो जाते हैं।
  • बहुमुखी आंकड़ों का निरूपण सम्भव नहीं है-एक ही रेखाचित्र पर एक से अधिक प्रकार के आंकड़े नहीं दिखाए जा सकते हैं। इसके द्वारा एक ही इकाई में मापे जाने वाले समान गुणों वाले आंकड़ों को ही दिखाया जा सकता है।
  • उच्चतम तथा न्यूनतम मूल्य में अधिक अन्तर-जब उच्चतम तथा न्यूनतम मूल्य में बहुत अधिक अन्तर हो तो रेखाचित्र नहीं बनाए जा सकते।
  • भ्रमात्मक परिणाम-उपयुक्त आरेख का प्रयोग न करने से गलत तथा भ्रमात्मक परिणाम निकलने की सम्भावना होती है।

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प्रश्न 3.
लकीरी ग्राफ (रेखाग्राफ) क्या है ? इसकी रचना तथा महत्त्व बताओ तथा निम्नलिखित आंकड़ों की सहायता से अमृतसर नगर के तापमान का लाइन ग्राफ बनाओ।
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उत्तर-
रेखा ग्राफ रेखा ग्राफ आमतौर पर समय श्रृंखला सम्बन्धित आंकड़े होते हैं जैसे की तापमान, वर्षा, जनसंख्या की वृद्धि, जन्म दर, मृत्यु दर, जंगलों अधीन क्षेत्र इत्यादि दिखाने के लिए बनाये जाते हैं।
अमृतसर नगर के तापमान का लाइन चित्र-ग्राफ पेपर पर आधार रेखा लगाओ। इस पर पांच-पांच लकीरों के अंतर के 12 महीने दिखाओ। इसको लेटवा पैमाना कहते हैं। लंबरेखा पर तापमान के लिए पैमाना बनाओ। हर एक वर्ग की दस रेखाओं 10° C तापमान प्रकट करती हैं। हर एक महीने के तापमान के लिए बिन्दु लगाओ। इन 12 बिन्दुओं को मिलाने के लिए एक वर्ग आकार का रेखाचित्र बनेगा।
PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मकप्रयोग भूगोल 8
रेखा ग्राफ-सांख्यिकी चित्रों में रेखा ग्राफ का महत्त्व बहुत अधिक है। इसमें प्रत्येक वस्तु को दो निर्देशकों की सहायता से दिखाया जाता है। यह ग्राफ किसी निश्चित समय में किसी वस्तु के शून्य में परिवर्तन को प्रकट करता है। आधार रेखा पर समय को प्रदर्शित किया जाता है जिसे ‘X’ अक्ष कहते हैं। ‘Y’ अक्ष या खड़ी रेखा पर किसी वस्तु के मूल्य को प्रदर्शित किया जाता है। दोनों निर्देशकों के प्रतिच्छेदन के स्थान पर बिन्दु लगाया जाता है। इस प्रकार विभिन्न बिन्दुओं को मिलाने से एक वक्र रेखा प्राप्त होती है। ये रेखा ग्राफ दो प्रकार के होते हैं-

  • जब किसी निरन्तर परिवर्तनशील वस्तु (तापमान, नमी, वायु, भार इत्यादि) को दिखाना हो तो उसे वक्र रेखा से दिखाया जाता है।
  • जब किसी रुक-रुक कर बदलने वाली वस्तु का प्रदर्शन करना हो तो विभिन्न बिन्दुओं को सरल रेखा द्वारा मिलाया जाता है। जैसे वर्षा, कृषि उत्पादन, जनसंख्या।

महत्त्व (Importance)-रेखाग्राफ से तापमान, जनसंख्या, वृद्धि, जन्म दर, विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन दिखाया जाता है। यह आसानी से बनाए जा सकते हैं। रेखा ग्राफ समय तथा उत्पादन में एक स्पष्ट सम्बन्ध प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 4.
बहुरेखा ग्राफ क्या होता है ? इसकी रचना तथा महत्त्व बताओ। निम्नलिखित 1980 से 2011 तक के आंकड़ों की सहायता से पंजाब अधीन अलग-अलग फसली रकबे (600 हैक्टेयर) का बहुरेखा ग्राफ बनाओ।
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उत्तर-
बहु-रेखाग्राफ भी रेखिक ग्राफ की तरह है जिसमें दो या फिर दो से अधिक परिवर्तनशील तत्व एक समान संख्या की लाइनों के द्वारा, तुरन्त तुलना करने के लिए दिखाये जाते हैं। इन बहु रैखिक ग्राफी के द्वारा अलग-अलग देशों/राज्यों में अलग-अलग फसलें जैसे कि चावल, गेहूं, दालों की उपजें, जन्म तथा मृत्यु दर, जीवन आस, लिंग अनुपात, लकीरों के द्वारा दिखाये जाते हैं। यह लकीरें कई तरह के होती हैं जैसे कि सीधी रेखा (-), विभाजित रेखा (—) तथा बिन्दु रेखा (….) इत्यादि या फिर अलग-अलग रंगों की रेखाएं इन तत्वों को दिखाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
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बहुरैखिक ग्राफ की रचना :

  • सबसे पहले X धुरा बनाओ तथा इससे 4 भागों में विभाजित कर लो (1980-81, 1990-91, 2000-2001, 2010-11) इत्यादि दोनों सिरों पर दो Y धुरे बनाओ।
  • इसके दाहिने तरफ Y धुरे पर सही पैमाना को निश्चित करके 5° या 10° के फर्क से फसली रकबे को दिखाओ।

महत्त्व-बहुरैखिक ग्राफ की सहायता से तापमान, जनसंख्या, वर्षा, फसलों का रकबा। जन्म दर, मृत्यु दर इत्यादि तत्व दिखाये जाते हैं। यह समय तथा उत्पादन में एक स्पष्ट सम्बन्ध प्रकट करते हैं।

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प्रश्न 5.
दण्ड आरेख (Bar Diagrams) क्या होते हैं ? इनके विभिन्न प्रकारों का वर्णन करो।
उत्तर-
दण्ड आरेख (Bar Diagrams)-आंकड़े दिखाने की यह सबसे सरल विधि है। इसमें आंकड़ों को समान चौड़ाई वाले दण्डों या स्तम्भों (Columns) द्वारा दिखाया जाता है। इन दण्डों की लम्बाई वस्तुओं की मात्रा के अनुपात के अनुसार छोटी-बड़ी होती है। प्रत्येक दण्ड किसी एक वस्तु की कुल मांग को प्रदर्शित करता है। इन आरेखों के प्रयोग से संख्याओं का तुलनात्मक अध्ययन आसानी से किया जा सकता है।

दण्ड आरेखों की रचना (Drawing of Bar Diagrams)—दण्ड चित्र बनाते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाता है-

1. मापक (Scale)-वस्तु की मात्रा के अनुसार मापक निश्चित करना चाहिए। मापक तीन बातों पर निर्भर करता
(क) कागज़ का विस्तार। (ख) अधिकतम संख्या। (ग) न्यूनतम संख्या।
मापक अधिक बड़ा या अधिक छोटा नहीं होना चाहिए।

2. दण्डों की लम्बाई (Length of Bars)—दण्डों की चौड़ाई समान रहती है, परन्तु लम्बाई मात्रा के अनुसार घटती-बढ़ती है।
3. शेड करना (Shading)–दण्ड रेखा खींचने के पश्चात् उसे काला कर दिया जाता है।
4. मध्यान्तर-दण्ड रेखाओं के मध्य अन्तर समान रखा जाता है।
5. आंकड़ों को निश्चित करना-सर्वप्रथम आंकड़ों को संख्या के अनुसार क्रमवार तथा पूर्णांक बना लेना चाहिए।

गुण-दोष (Merits and Demerits)-

  • यह आंकड़े दिखाने की सबसे सरल विधि है।
  • इनके द्वारा तुलना करना आसान है।
  • दण्ड चित्र बनाने कठिन हैं जब समय अवधि बहुत अधिक हो।
  • जब अधिकतम तथा न्यूनतम संख्या में बहुत अधिक अन्तर हो, तो दण्ड चित्र नहीं बनाए जा सकते हैं।

दण्ड आरेखों के प्रकार (Types of Bar Diagrams)–दण्ड आरेख मुख्यतः निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

1. क्षैतिज दण्ड आरेख (Horizontal Bars)—ये सरल दण्ड आरेख हैं। इन दण्डों से किसी वस्तु का कुछ वर्षों का वार्षिक उत्पादन, जनसंख्या इत्यादि दिखाए जाते हैं। ये समान चौड़ाई के होते हैं। ये आसानी से पढ़े जा सकते हैं।

2. लम्बवत् दण्ड आरेख (Vertical Bars)—ये आरेख किसी आधार रेखा के ऊपर खड़े दण्डों के रूप में बनाए जाते हैं। आधार रेखा को शून्य माना जाता है, दण्डों की ऊंचाई पैमाने के अनुसार मापी जाती है। इन दण्डों से वर्षा का वितरण भी दिखाया जाता है। जब उच्चतम तथा न्यूनतम संख्याओं में अन्तर बहुत अधिक हो तो दण्ड आरेख प्रयोग नहीं किए जाते। दण्ड की लम्बाई कागज़ के विस्तार से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि दण्डों की संख्या अधिक हो तो भी ये आरेख प्रयोग नहीं किए जाते।

3. संश्लिष्ट दण्ड आरेख (Compound Bars)-यदि एक दण्ड को अनेक भागों में विभाजित कर उसके द्वारा कई वस्तुओं को एक साथ दिखाया जाए तो संश्लिष्ट दण्ड का निर्माण होता है। विभिन्न भागों में अलग-अलग Shade कर दिए जाते हैं ताकि विभिन्न वस्तुएं स्पष्टतया अलग दृष्टिगोचर हों। इस विधि से जल सिंचाई के विभिन्न साधन, शक्ति के विभिन्न साधन इत्यादि दिखाये जाते हैं।

4. प्रतिशत दण्ड आरेख (Percentage Bar)-किसी वस्तु के विभिन्न भागों को उस वस्तु के कुल मूल्य के प्रतिशत अंश के रूप में दिखाना हो तो प्रतिशत दण्ड बनाए जाते हैं। दण्ड की कुल लम्बाई 100% को प्रकट करती है।

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प्रश्न 6.
भारत में अनाज के कुल उत्पादन के आंकड़ों को दण्ड रेखाचित्र से प्रकट करो।

वर्ष उत्पादन (लाख मी० टन) ।
1982-83 1300
1983-84 1525
1984-85 1450
1985-86 1500
1986-87 1530

उत्तर-
रचना-

  • सबसे पहले एक आधार रेखा खींचो। इसके सिरों पर लम्ब रेखाएं खींचो।
  • बाईं ओर की लम्ब रेखा पर उत्पादन की मापनी निश्चित करो। जैसे 1″ = 500 लाख मी० टन।
  • आधार रेखा पर समय का पैमाना निश्चित करके विभिन्न वर्षों की स्थिति दिखाओ।
  • मापक के अनुसार प्रत्येक वर्ष के उत्पादन के लिए दण्ड रेखा की ऊंचाई ज्ञात करो।

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वर्ष उत्पादन दण्ड रेखा की लम्बाई
1982-83 1300 2.60″
1983-84 1525 3.05″
1984-85 1450 2.90″
1985-86 1500 3.00″
1986-87 1530 3.06″

आधार रेखा पर समान चौड़ाई वाले दण्ड खींचो तथा इन्हें काली छाया से सजाओ।

प्रश्न 7.
वृत्त चित्र किसे कहते हैं ? इनकी रचना तथा गुण-दोष बताओ।
उत्तर-
चक्र चित्र (Pie Diagram)-यह वृत्त चित्र (Circular Diagram) का ही एक रूप है। इसमें विभिन्न चित्र के जोड़ को एक वृत्त द्वारा दिखाया जाता है। फिर इस वृत्त को विभिन्न भागों (Sectors) में बांटकर विभिन्न राशियों का आनुपातिक प्रदर्शन अंशों में किया जाता है। इस चित्र को चक्र चित्र (Pie Diagram) पहिया चित्र (Wheel Diagram) या सिक्का चित्र (Coin Diagram) भी कहते हैं।

रचना-
इस चित्र में वृत्त का अर्धव्यास मानचित्र के आकार के अनुसार अपनी मर्जी से लिया जाता है। इसका सिद्धांत यह है कि कुल राशि वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर होती है। एक वृत्त के केन्द्र पर 360° का कोण बनता है। प्रत्येक राशि के लिए वृत्तांश ज्ञात किए जाते हैं। इसलिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है-
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कई बार वृत्त के विभिन्न भागों को प्रभावशाली रूप से दिखाने के लिए इनमें भिन्न-भिन्न शेड (छायांकन) कर दिए जाते हैं।

गुण-दोष (Merits-Demerits)-

  • चक्र चित्र विभिन्न वस्तुओं के तुलनात्मक अध्ययन के लिए उपयोगी है।
  • ये कम स्थान घेरते हैं। इन्हें वितरण मानचित्रों पर भी दिखाया जाता है।
  • इसका चित्रीय प्रभाव (Pictorial Effect) भी अधिक है।
  • इसमें पूरे आंकड़ों का ज्ञान नहीं होता तथा गणना करना कठिन होता है।

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प्रश्न 8.
भारत में भूमि उपयोग के आंकड़ों को चलाकृति चित्र से दिखाओ।

उपयोग क्षेत्रफल (लाख हेक्टेयर में)
(i) वन 650
(ii) कृषि अयोग्य भूमि 470
(iii)जोतरहित भूमि 330
(iv) परती भूमि 220
(v) अप्राप्य भूमि 230
(vi) बोयी गयी भूमि योग 1400
योग 3300

 

रचना-प्रत्येक राशि के लिए वृत्तांश ज्ञात करो जब कि कुल योग के लिए कोण 360° है।
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एक वृत्त बनाकर प्रत्येक कोण काट कर उपविभाग करके, हर वृत्त खण्ड में छायांकन करके नाम लिखो।
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प्रश्न 9.
विषयक नक्शे (Thematic Maps) से क्या अभिप्राय है ? इनमें ज़रूरत की वस्तुएं बनाने के लिए तरीके, ज़रूरत तथा महत्ता का वर्णन करो।
उत्तर-
विषयक नक्शे-आंकड़ों की विशेषताएं दर्शाने के लिए तथा तुलना करने के लिए ग्राफ तथा चित्र एक महत्त्वपूर्ण रोल अदा करते हैं। पर क्षेत्रीय परिदृश्य दिखाने के लिए चित्र तथा ग्राफ सफल नहीं रहते। इसलिए स्थानीय भिन्नता को दिखाने के लिए क्षेत्र विभाजन को समझने के लिए कई तरह के नक्शे बनाये जाते हैं। विषयक नक्शे वह नक्शे हैं जो धरती के किसी भाग के किसी तत्त्व के वितरण की मूल्य अथवा घनत्व को प्रकट करते हैं।

I. विषयक नक्शे बनाने के लिए ज़रूरत की वस्तुएँ (Requirement for Making Thematic Maps)

  1. चुने हुए क्षेत्र सम्बन्धी आंकड़े।
  2. ज़रूरत के क्षेत्र का प्रबंधन सीमाओं रहित नक्शा
  3. सम्बन्धित क्षेत्र का भौतिक नक्शा।

विषयक नक्शे बनाने के लिए आम नियम (Rules for Making Thematic Maps)-विषयक नक्शे सावधानी से योजना बना कर बनाये जाने आवश्यक हैं। पूर्ण तौर पर तैयार नक्शा निम्नलिखित जानकारी देता है-

  1. क्षेत्र का नाम पता चलता है।
  2. विषय का शीर्षक
  3. आंकड़ों के स्रोत तथा वर्ष
  4. चिह्न, प्रतीकों, रंगों की गहराइयां, इत्यादि की सूचना ।
  5. पैमाना

II. विषयक नक्शे के लिए योग्य तरीके का चुनाव (To choose Appropriate ways for Thematic Maps)-

विषयक नक्शे की ज़रूरत (Need for Thematic Maps)—शुरू में किसी वस्तु के वितरण को दर्शाने के लिए नाम लिखने की विधि का प्रयोग किया जाता है। इस क्षेत्र में जो चीज़ पैदा होती थी, वहाँ उस चीज़ का नाम लिख दिया जाता था। जिस प्रकार भारत में चावल का उत्पादन दिखाने के लिए गंगा के डेल्टा में Rice लिखा जाता है। पर इस विधि के द्वारा न तो चीज़ के कुल उत्पादन तथा न ही उत्पादन क्षेत्र का सही पता चलता था। इसलिए विषयक नक्शे बनाए गए जिनमें वैज्ञानिक शुद्धता हो। भूगोल में अलग-अलग तथ्यों की पुष्टि करने के लिए कई तरह के आंकड़ों का प्रयोग किया जाता है। यह आंकड़े तालिकाओं के रूप में दिखाए जाते हैं। इन आंकड़ों का अध्ययन बड़ा नीरस तथा मुश्किल होता है तथा बहुत समय में ही नष्ट होता है। आंकड़ों को इकट्ठा देखकर किसी नतीजे पर पहुँचना मुश्किल होता है। इसलिए इन आंकड़ों को वितरण नक्शों के द्वारा
दर्शाकर दिमाग पर एक वास्तविक चित्र की छाप छोड़ी जाती है।

गुण (Advantages)-

  • यह आर्थिक भूगोल के अध्ययन के लिए विशेष रूप में महत्त्वपूर्ण है। धरती के अलगअलग साधन तथा मनुष्य का संबंध इन शक्तियों द्वारा स्पष्ट रूप में दर्शाया जा सकता है।
  • इन नक्शों द्वारा कारण तथा प्रभाव का नियम स्पष्ट हो जाता है। वस्तु विशेष के वितरण को प्रभावित करने वाले भौगोलिक तथ्य समझ में आ जाते हैं।
  • आंकड़ों की लम्बी-लम्बी तालिकाओं को याद रखना मुश्किल हो जाता है पर विषयक नक्शे किसी तथ्य की दिमाग पर स्थाई छाप छोड़ते हैं।
  • इनका उपयोग शिक्षा सम्बन्धी कामों के लिए किया जाता है।
  • इन नक्शों द्वारा एक नज़र में ही किसी वस्तु के वितरण का तुलनात्मक अध्ययन हो जाता है।
  • इन नक्शों द्वारा क्षेत्रफल तथा उत्पादन की मात्रा का तुलनात्मक अध्ययन हो जाता है।

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प्रश्न 10.
बिन्दु मानचित्र से क्या अभिप्राय है ? इसकी रचना के लिए क्या आवश्यकताएं हैं ? इसकी रचना सम्बन्धी समस्याओं का वर्णन करो तथा गुण दोष बताओ।
उत्तर-
बिन्दु मानचित्र (Dot Maps)-इस विधि के अन्तर्गत किसी वस्तु के उत्पादन तथा वितरण के आंकड़ों को बिन्दुओं द्वारा प्रकट किया जाता है। ये बिन्दु समान आकार के होते हैं। प्रत्येक बिन्दु द्वारा एक निश्चित संख्या (Specific Value) प्रकट की जाती है। जब किसी वस्तु की निश्चित संख्या तथा मात्रा (Absolute Figures) उपलब्ध हों। वितरण मानचित्र बनाने की यह सबसे अधिक प्रचलित सर्वोत्तम विधि है। (This is the most common method used for showing the distribution of population, livestock, crops, minerals etc.)

बिन्दु मानचित्र बनाने के लिए आवश्यकताएं (Requirements for drawing Dot Maps)-बिन्दु विधि द्वारा मानचित्र बनाने के लिए कुछ चीज़ों की आवश्यकता होती है।
1. निश्चित आंकड़े (Definite and Detailed Data)—जिस वस्तु का वितरण प्रकट करना हो उसके सही सही आंकड़े उपलब्ध होने चाहिएं। ये आंकड़े प्रशासकीय इकाइयों (Administrative Units) के आधार पर होने चाहिए। जैसे जनसंख्या, तहसील या जिले के अनुसार होनी चाहिए।

2. रूप रेखा मानचित्र (Outline Map)-उस प्रदेश का एक सीमा चित्र हो जिसमें ज़िले या राज्य इत्यादि शासकीय भाग दिखाए हों। यह सीमा चित्र समक्षेत्र प्रक्षेप (Equal Area Projection) पर बना हो।

3. धरातलीय मानचित्र (Relief Map)-उस प्रदेश का धरातलीय मानचित्र हो जिसमें Contours, Hills, Marshes इत्यादि धरातल की आकृतियां दिखाई गई हों।

4. जलवायु मानचित्र (Climatic Map)-उस प्रदेश का जलवायु मानचित्र हो जिसमें वर्षा तथा तापमान का ज्ञान हो सके।

5. मृदा मानचित्र (Soil Map)–विभिन्न कृषि पदार्थों की उपज वाले मानचित्रों में भूमि के मानचित्र आवश्यक हैं क्योंकि हर प्रकार की मिट्टी का उपजाऊपन विभिन्न होता है।

6. स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Map)-जनसंख्या के वितरण के लिए भूपत्रक मानचित्रों की आवश्यकता होती है जिनमें शहरी (Urban) तथा ग्रामीण (Rural Settlements), नगर, आवागमन के साधन और नहरें इत्यादि प्रकट की होती हैं।

रचना विधि (Procedure)-

  • वितरण मानचित्र की सभी आवश्यक सामग्री को इकट्ठा कर लेना चाहिए।
  • मानचित्र पर प्रशासकीय इकाइयों (Administrative Units) को दिखाओ।
  • राजनीतिक या प्रशासनिक इकाइयों के विस्तार को देखकर तथा आंकड़ों के कम-से-कम और अधिक-से अधिक मूल्य को देखकर बिन्दु का मूल्य ज्ञात करो।
  • प्रत्येक इकाई के लिए बिन्दुओं की संख्या गिनकर पूर्ण अंक बनाओ।
  • प्रत्येक इकाई में बिन्दुओं की संख्या हल्के हाथ से पेंसिल से लिख दो।
  • धरातल, जलवायु और मिट्टी के मानचित्रों की सहायता से उस क्षेत्र में नकारात्मक प्रदेश (Negative Areas) को ज्ञात करो और मानचित्र में पेंसिल से अंकित करो ताकि इन स्थानों को रिक्त छोड़ा जा सके।
  • बिन्दुओं के आकार को समान कर लो।
  • घनत्व के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में बिन्दु प्रकट करके मानचित्र बनाओ।

बिन्दु मानचित्र की समस्याएं (Problems of Dot Map)

1. बिन्दुओं का मान (Value of Dot)—बिन्दुओं को अंकित करने से पहले एक बिन्दु का मूल्य निश्चित कर लेना चाहिए। (The success of the map depends upon the choice of the value of a dot.) मानचित्र को प्रभावशाली बनाने के लिए बिन्दु का मूल्य ध्यानपूर्वक निश्चित करना चाहिए। कई बार गलत मूल्य के कारण बिन्दुओं की संख्या बहुत अधिक हो जाती है या बहुत थोड़ी रह जाती है। मापक या मूल्य ऐसा निश्चित करना चाहिए जिसमें क्षेत्र में बिन्दुओं की संख्या इतनी अधिक न हो कि उन्हें गिनना कठिन हो जाए। बिन्दुओं की संख्या इतनी कम भी न हो कि कुछ प्रदेश खाली रह जायें। मूल्य का चुनाव निश्चित करना तीन बातों पर निर्भर करता है-

  1. मानचित्र का मापक (Scale of the Map)
  2. अधिकतम तथा न्यूनतम आंकड़े (Maximum of Minimum Figures)
  3. प्रदर्शित तत्त्व का प्रकार (Type of the Element)

1. मानचित्र का मापक (Scale of the Map)–यदि मानचित्र लघु मापक (Small Scale) पर बना हुआ है तो बिन्दुओं की संख्या बहुत अधिक नहीं होनी चाहिए। एक बिन्दु का मूल्य अधिक होना चाहिए ताकि बिन्दुओं की संख्या इतनी हो जो उस छोटे मानचित्र में अंकित की जा सके नहीं तो अधिक बिन्दुओं के कारण मानचित्र
PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मकप्रयोग भूगोल 15
का प्रभाव स्पष्ट नहीं होगा। (The areas having low density will also appear dark and give a misleading idea.) यदि मानचित्र दीर्घ मापक पर हो तो एक बिन्दु का मूल्य बहुत अधिक नहीं होना चाहिए। एक बिन्दु के अधिक मूल्य के कारण कई क्षेत्रों में बिन्दुओं की संख्या बहुत कम होगी। (With very few dots the map will look blank.)

2. बिन्दुओं को लगाना (Placing of Dots)-बिन्दु मानचित्र बनाते समय ऋणात्मक क्षेत्र (Negative Areas) में बिन्दु नहीं लगाने चाहिएं। ऐसे क्षेत्र प्रायः दलदली भागों में, मरुस्थलों में, पर्वतों पर या बंजर भूमि में मिलते हैं। ये क्षेत्र धरातलीय मानचित्र, मृदा मानचित्र तथा जलवायु मानचित्र की सहायता से मानचित्र पर लगाये जा सकते हैं। इन स्थानों को रिक्त छोड़ दिया जाता है क्योंकि यहां उत्पादन असम्भव होता है। दीर्घ मापक मानचित्र पर क्षेत्र आसानी से दिखाये जा सकते हैं परन्तु लघु मापक मानचित्रों पर इन्हें दिखाना बहुत कठिन होता है।

  • बिन्दुओं की अधिक संख्या के कारण बिन्दु एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। (Dots should not merge together) इसमें मानचित्र पर संख्या गिनना असम्भव हो जाता है।
  • बिन्दु बिखरे हुए रूप में लगाना चाहिए अन्यथा नियमित बिन्दुओं के कारण समान वितरण दिखाई देगा (Straight rows of dots should be avoided.) जैसे कि शेडिंग मानचित्र (Shading Map) में दिखाई देता है। यह भौगोलिक नियम के विपरीत भी है। क्योंकि उत्पादन में विभिन्नता होती है।
  • गुरुत्वीय केन्द्र (Centre of Gravity)-बिन्दु अंकित करते समय प्रत्येक बिन्दु अपने चित्र के आकर्षण केन्द्र को प्रकट करे जैसे जनसंख्या मानचित्र में बिन्दुओं के केन्द्र नगरों के स्थान पर लगाने चाहिए।
  • अधिक उत्पादन के क्षेत्रों में इकट्ठे होने चाहिए।

3. बिंदुओं का आकार (Size of the Date)-बिन्दु मानचित्र की शुद्धता और सुन्दरता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रत्येक बिन्दु समान आकार का हो। इनका आकार दो बातों पर निर्भर करता है –

(a) मानचित्र मापक (Scale of the Map)
(b) बिन्दुओं की संख्या (Number of Dots)

यदि मानचित्र दीर्घ मापक पर बना हुआ है तो बिन्दु कुछ बड़े हो सकते हैं, परन्तु लघु मापक मानचित्रों पर बिन्दुओं का आकार अपेक्षाकृत छोटा होगा। इसी प्रकार यदि बिन्दुओं की संख्या अधिक है तो भी बिन्दु का आकार छोटा होगा। बिन्दुओं को समान आकार करने के लिए विशेष प्रकार की निब प्रयोग की जाती है जैसे

गुण (Merits)-

  • यह मानचित्र किसी वस्तु के क्षेत्रफल के साथ-साथ उसका मूल्य या मात्रा भी प्रकट करते (This method is both Quantitative and qualitative.)
  • मानचित्रों में नकारात्मक क्षेत्रों को खाली छोड़ा जा सकता है (Waste land can be avoided.)।
  • यह मानचित्र मस्तिष्क पर एक छाप छोड़ जाते हैं कि कहां उत्पादन अधिक है और कहां कम है। (It gives visual impression)।
  • इन मानचित्रों में रंग का गहरापन उत्पादन की मात्रा के अनुसार होता है। इसलिए ये मानचित्र वितरण के स्वरूप (Pattern of Distribution) को ठीक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। इस विधि द्वारा बिन्दुओं को सरलतापूर्वक गिना जा सकता है और बिन्दुओं को पुनः आंकड़ों में बदला जा सकता है। इस प्रकार किसी वस्तु की मात्रा का भी – सही ज्ञान हो जाता है।
  • इन मानचित्रों को शेडिंग मानचित्र (Shading Map) में बदला जा सकता है। अधिक बिन्दुओं वाले क्षेत्र को शेड (Shade) में पूरा दिखाया जा सकता है। एक ही मानचित्र कई अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है। जैसे Markets Fairs, Coal Fields, Villages इत्यादि दिखाने के लिए यह एक शुद्ध विधि है जिनमें वितरण तथा तीव्रता ठीक प्रकार से दिखाई जा सकती है।

दोष (Demerits)-

  • एक ही मानचित्र पर एक से अधिक वस्तुओं का वितरण नहीं दिखाया जा सकता।
  • इनके बनाने में काफ़ी समय लगता है और यह कठिन कार्य है।
  • इनका प्रयोग शिक्षा सम्बन्धी कार्यों में किया जाता है, परन्तु वैज्ञानिक कार्यों के लिए समान रेखा विधि (Isopleth) का प्रयोग किया जाता है।
  • यह मानचित्र अनुपातों, प्रतिशत तथा औसत आंकड़ों के लिए प्रयोग नहीं किए जा सकते। (This method cannot be used for ratios and percentages and average figures.)
  • बिन्दु अधिक स्थान घेरते हैं।

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वर्णमात्री मानचित्र (Shading Map)

प्रश्न 11.
वर्णमात्री मानचित्र किसे कहते हैं ? इसका सिद्धान्त क्या है ? इसकी रचना, विधि तथा गुण-दोष का वर्णन करो।
उत्तर-
वर्णमात्री मानचित्र (Shading Map)-इस विधि को Choropleth Method भी कहते हैं। इस विधि में किसी एक वस्तु के वितरण को मानचित्र पर विभिन्न आभाओं या रंगों द्वारा प्रकट किया जाता है। (In this method distribution of an element is shown by different shades.) forest 3412 Black and white shading को प्रयोग करना उचित समझा जाता है।

सिद्धान्त (Principle of Shading)-जैसे-जैसे किसी वस्तु में वितरण का घनत्व बढ़ता जाता है उसी प्रकार आभा (Shade) भी अधिक गहरी होती जाती है। (The lighter shades show lower densities and deeper shades show higher densities.) आभा को अधिक सघन करने के कई तरीके हैं-

  • बिन्दुओं का आकार बड़ा करके (Be enlarging the dots)
  • रेखाओं को मोटा करके (By thickening the lines)
  • रेखाओं को निकट करके (By bringing the lines closed together)
  • रेखा जाल बनाकर (By crossing the lines)।
  • रंगों को गहरा करके (By increasing the depth of the colour) प्रत्येक मानचित्र के नीचे Scheme of shades का एक सूचक (Index) दिया जाता है।

रचना विधि (Procedure)-

  • किसी वस्तु के निश्चित आंकड़े प्राप्त करो। ये आंकड़े प्रशासकीय इकाइयों के आधार पर हों।
  • ये आंकड़े औसत के रूप में हों या प्रतिशत या अनुपात के रूप में, जैसे जनसंख्या का घनत्व।
  • घनत्व को प्रकट करने के लिए उचित अन्तराल (Interval) चुन लेना चाहिए।
  • अन्तराल के अनुसार Shading का सूचक मानचित्र के कोने में बनाना चाहिए।
  • यह आभा घनत्व के अनुसार गहरी होती चली जाए।
  • प्रत्येक प्रशासकीय इकाई में घनत्व के अनुसार शेडिंग करके मानचित्र तैयार किया जा सकता है।

समस्याएं (Problems) –

1. प्रशासकीय इकाई का चुनाव (Choice of Administrative Unit)-प्रायः आंकड़े प्रशासकीय इकाइयों .. के आधार पर एकत्रित किए जाते हैं, जिसे ज़िले या तहसील के अनुसार मानचित्र बनाने के लिए सबसे पहले
PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मकप्रयोग भूगोल 16

प्रशासकीय इकाई का चुनाव करना होता है। प्रशासकीय इकाई न बड़ी होनी चाहिए और न बहुत छोटी। यदि काफ़ी बड़ी इकाई को चुन लिया जाए तो मानचित्र से भ्रम उत्पन्न हो सकता है कि इतने बड़े क्षेत्र में समान वितरण है। कई बार कई आंकड़े छोटी इकाइयों के आधार पर उपलब्ध नहीं होते इसलिए उस दशा में बड़ी
इकाइयां चुनी जाती हैं :

2. अन्तराल का चुनाव (Choice of Intervals)-घनता के अनुसार शेडिंग में अन्तर रखा जाता है। इसी अन्तर के अनुसार Scheme of Shading या Scale of Densities या सूचक बनाया जाता है। इस उद्देश्य के लिए सारे आंकड़ों को कुछ वर्गों में बांटा जाता है। यह वर्ग बनाते समय इन आंकड़ों की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।

  • अधिकतम संख्या (Maximum Figures)
  • निम्नतम संख्या (Minimum Figures)
  • मध्यम संख्या (Intermediate Figures)

श्रेणियों की संख्या काफ़ी होनी चाहिए ताकि प्रत्येक इकाई का सापेक्षित महत्त्व (Comparative importance) स्पष्ट रूप से दिखाई दे। बहुत अधिक श्रेणियां नक्शे पर गड़बड़ कर देती हैं और बहुत कम श्रेणियों के कारण वितरण की विभिन्नता प्रकट नहीं होती। (Too many categories can be confusing and too few categories can result in little differentiation.) प्रायः अंतराल नियमित (Regular) होता है परन्तु यह आवश्यक नहीं कि हर श्रेणी में अन्तर समान हो।

गुण (Merits)-

  • इस विधि के द्वारा किसी वस्तु के क्षेत्रीय घनत्व (Areal Density) के औसत वितरण को प्रकट किया जा सकता है। (It is useful for showing average figures of percentage or ratios.)
  • यह विधि अधिकतर फसलें, पशु, भू-उपयोग और जनसंख्या घनत्व को प्रकट करने के लिए प्रयोग की जाती है। इसके लिए क्षेत्रफल की प्रत्येक इकाई (Per unit area) के औसत आंकड़े दिए जाते हैं जैसे Number of persons per sq. km. 41 Number or livestock per sq. km 4 Yield of a crop per hectare.
  • एक जैसे प्रभाव के कारण यह रंग विधि से मिलता-जुलता है। (This method is somewhat similar to colour method.)
  • विभिन्न रंग प्रयोग करने से ये मानचित्र मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं। (It gives visual impression to the Mind.)
  • यह मानचित्र गुणात्मक होते हैं जिनमें केवल क्षेत्रफल के साथ-साथ आंकड़ों का ज्ञान हो जाता है।
  • इस विधि से विभिन्न प्रकार के अन्य मानचित्र भी बनाए जा सकते हैं।
  • जनसंख्या के घनत्व को प्रकट करने के कारण इसे मानवीय भूगोल का मुख्य उपकरण कहा जाता है।
    (Choropleth map is the Chief tool of human Geography.)

दोष (Demerits)-

  • ऐसे मानचित्रों के लिए आंकड़े इकट्ठे करना कठिन होता है।
  • इन मानचित्रों से केवल औसत का ही पता चलता है तथा कुल उत्पादन का अनुमान लगाना कठिन है।
  • इस विधि द्वारा किसी क्षेत्र में समान वितरण (Uniform Distribution) प्रकट किया जाता है जोकि भौगोलिक नियम के अनुसार नहीं है। किसी क्षेत्र के विभिन्न भागों में उत्पादन विभिन्न होता है।
  • प्रायः अधिक घनत्व वाले छोटे क्षेत्र अधिक महत्त्वपूर्ण दिखाई देते हैं जबकि किसी बड़े क्षेत्र में बहुत अधिक उत्पादन है, परन्तु औसत घनत्व कम है। ऐसा क्षेत्र अधिक उत्पादन होते हुए भी कम महत्त्वपूर्ण दिखाई देगा।
  • इस विधि द्वारा ऋणात्मक प्रदेश में भी उत्पादन प्रकट किया जाता है। जैसे मरुस्थल, दलदल, झील इत्यादि ऐसे क्षेत्रों में कुछ भी उत्पन्न नहीं होता, परन्तु वहां उत्पादन अंकित होता है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 9 प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल

प्रश्न 12.
सम मान रेखा मानचित्र किसे कहते हैं ? इसके विभिन्न प्रकार बताओ। इन मानचित्रों की रचना कैसे की जाती है ? इनके गुण तथा दोष बताओ।
उत्तर-
सम मान रेखाएं (Isopleths)-शब्द Isopleth दो शब्दों के जोड़ से बना है (Isos + plethron) | Isos शब्द का अर्थ है समान तथा Plethron शब्द का अर्थ है मान। इस प्रकार समान रेखाएं वे रेखाएं हैं जिनका मूल्य, तीव्रता तथा घनत्व समान हो। ये रेखाएं उन स्थानों को आपस में जोड़ती हैं । जनका मान (Value) समान हो। (Isopleths are lines of equal value in the form of quantity, intensity and density.)

ससमान रेखाओं के प्रकार (Types of Isopleths)-विभिन्न तत्त्वों को दिखाने वाली सम मान रेखाओं को निम्नलिखित नामों से पुकारा जाता है।

  • समदाब रेखाएं (Isobars)-समान वायु दाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समदाब रेखा कहते हैं।
  • समताप रेखाएं (Isotherms)—समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समताप रेखा कहते
  • समवृष्टि रेखा (Isohyetes)—समान वर्षा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समवृष्टि रेखा कहते हैं।
  • समोच्च रेखाएं (Contours) समान ऊंचाई वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समोच्च रेखा कहते हैं।
  • सममेघ रेखा (Iso Neph) समान मेघावरण वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को सममेघ रेखा कहते हैं।
  • अन्य (Others)-जैसे समगम्भीरता रेखा (Isobath), समलवणता रेखा (Iso-Haline) समभूकम्प रेखा (Iso Seismal), समधूप रेखा (Isohets) अन्य उदाहरण हैं।

समान रेखाओं की रचना (Drawings of Isopleths)-

  • सम्बन्धित क्षेत्र का रूपरेखा मानचित्र (Outline Map) की आवश्यकता होती है। इस मानचित्र पर सभी स्थानों की स्थिति अंकित हो।
  • इस क्षेत्र के अधिक-से-अधिक स्थानों के आंकड़े प्राप्त होने चाहिएं।
  • अधिकतम तथा न्यूनतम आंकड़ों के अनुसार इन रेखाओं के मध्य अन्तराल (Interval) चुनना चाहिए। अन्तराल या समान रेखाओं की संख्या न तो कम हो और न ही अधिक हो।
  • अन्तराल का चुनाव किसी तत्त्व के परिवर्तन की दर पर निर्भर करता है। बड़े क्षेत्र पर दूर-दूर स्थित रेखाएं मन्द परिवर्तन प्रकट करती हैं। यदि परिवर्तन दर तीव्र हो तथा क्षेत्र कम हो तो ये रेखाएं उपयोगी सिद्ध नहीं होती।
  • समान मान वाले स्थानों को मिलाकर समान रेखाएं खींची जाती हैं। यदि समान मूल्य वाले स्थान प्राप्त न हों तो विभिन्न मूल्य वाले स्थानों के बीच समानुपात दूरी पर इन रेखाओं का अन्तर्वेशन किया जाता है।
  • कई बार विभिन्न मूल्य क्षेत्रों को अलग-अलग स्पष्ट करने के लिए इन आभाओं (Shades) या रंगों का प्रयोग भी किया जाता है।

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गुण (Merits)-

  • समान रेखाएं वर्षा, तापमान इत्यादि आंकड़ों के परिवर्तन को शुद्ध रूप से प्रदर्शित करती हैं।
  • ये रेखाएं किसी स्थान पर उपस्थित मूल्य को प्रकट करती हैं।
  • अन्य विधियों की अपेक्षा यह एक अधिक वैज्ञानिक विधि है।
  • बिन्दु मानचित्र तथा वर्णमात्री को समान रेखा मानचित्रों में बदला जा सकता है।
  • इन मानचित्रों का प्रशासकीय इकाइयों में कोई सम्बन्ध नहीं होता।

दोष (Demerits)-

  • सममान रेखाओं का अन्तर्वेशन एक कठिन कार्य है।
  • यदि आंकड़े अनेक स्थानों पर प्राप्त न हों तो ये मानचित्र नहीं बनाए जा सकते।
  • घनत्व में अधिक तथा तीव्र परिवर्तन हो, तो ये मानचित्र अर्थपूर्ण नहीं रहते।
  • सममान रेखा मानचित्रों पर ग्रामीण तथा शहरी जनसंख्या को एक साथ नहीं दिखाया जा सकता।

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उपयोग (Uses)-

  • इन मानचित्रों का उपयोग जलवायु सम्बन्धी आंकड़े दिखाने के लिए किया जाता है।
  • इन रेखाओं द्वारा प्रतिशत या अनुपात के आंकड़े भी दिखाए जाते हैं।
  • इन मानचित्रों पर जनसंख्या घनत्व प्रतिवर्ग किलोमीटर, पशु संख्या, प्रति संख्या, प्रति एकड़ उत्पादन इत्यादि आंकड़े भी दिखाए जाते हैं।

प्रश्न 13.
ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) पर नोट लिखो।
उत्तर-
ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम एक सैटेलाइट आधारित नेवीगेशन सिस्टम है। जो किसी स्थान तथा समय जैसी सूचना प्रदान करती हैं। यह सिस्टम यू० एस० ए० के एक डिपार्टमैंट ऑफ़ डीफैंस द्वारा बनाया गया था जो कि 24 से 32 मीडीयम अर्थ ओरबिट सैटेलाइट के Microweight को बिल्कुल सही जानकारी देने के काम आता है। GPS का सबसे पहले सिर्फ Miltary Applications के उपयोग के लिए बनाया गया था। परंतु 1983 में US सरकार ने सिस्टम को पब्लिक प्रयोग के लिए खोलने की घोषणा कर दी तथा 1994 में पब्लिक के लिए खोल दिया गया। GPS स्थान तथा समय के साथ ही किसी भी जगह का पूरे दिन का मौसम बताने के भी काम आता है।
आजकल हम टैक्नोलॉजी का उपयोग स्मार्टफोन के लिए भी कर रहे हैं। जिसके द्वारा हम अपनी Location पता कर सकते हैं। यह सिस्टम ऐयरक्राफ्ट, रेलों तथा बसों जैसे यातायात के साधनों के लिए काफ़ी उपयोगी सिद्ध हुआ है। अगर हम किसी अज्ञात नंबर के बारे में पूरी जानकारी चाहते हैं तो हमें GPS की सहायता के साथ नंबर ट्रेस कर सकते

GPS कैसे काम करता है ?
GPS रिसीवर के साथ काम करता है जो सैटेलाइट में मिले डाटा को गिनता है। इस काऊंट (Count) को Traingulation कहते हैं। यहाँ पोजीशन को कम-से-कम एक बार में तीन सैटेलाइट की सहायता से पता किया जाता है। Position Longitude तथा Latitude के साथ दिखाई जाती है। यह 10 से 100 मीटर की रेंज में सही होती है। इसको अलग ऐप्लीकेशन तथा सॉफ्टवेयर अपने हिसाब से काम में लेते हैं।

जी०पी०एस० के मुख्य रूप में तीन हिस्से होते हैं-

  • अंतरिक्ष हिस्सा (Space Segment)—इसमें 24 उपग्रह शामिल हैं जो कि लगातार धरती के आस-पास घूमते-फिरते हैं। फरवरी 2016 में उपग्रहों की संख्या बढ़ाकर 32 कर दी गई है। इनमें से 31 उपग्रह लगातार सिग्नल भेजते रहते हैं। समय तथा मौसम का इनके काम पर कोई असर नहीं होता। जी०आई०एस० को सब तरह की जानकारी की ज़रूरत अनुसार दर्शाया जाता है। इसकी सहायता से जनसंख्या, आमदन, शिक्षा इत्यादि सम्बन्धी आंकड़ों का अध्ययन किया जाता है।
  • कंट्रोल हिस्सा (Control Segment)-इस हिस्से की सहायता से सारा जी०पी० एस० सिस्टम कंट्रोल किया जाता है। यह कंट्रोल अमेरिका की सरकार के हाथ में है।
  • उपयोगी हिस्सा (User Segment)-इस हिस्से में वह सारे उपकरण आते हैं जिनके द्वारा जी०पी०एस० सिस्टम का प्रयोग किया जाता है। यह उपकरण कार, मोबाइल, घड़ी इत्यादि भी हो सकते हैं।

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प्रश्न 14.
क्षेत्रीय प्रेक्षण से आपका क्या अभिप्राय है ? इसकी ज़रूरत तथा कार्य प्रणाली पर नोट लिखो।
उत्तर-
क्षेत्रीय प्रेक्षण-अन्य विज्ञानों की तरह भूगोल भी एक क्षेत्रीय विज्ञान भी है। इसलिए एक अच्छी तथा योजनाबद्ध क्षेत्रीय प्रेक्षण भौगोलिक जांच के पूरक होते हैं। इस प्रकार का प्रेक्षण स्थानिक वितरण तथा स्थानिक स्तर तथा उनके सम्बन्धों के प्रति हमारी समझ को बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय प्रेक्षण स्थानिक स्तर की जानकारी इकट्ठी करने में भी हमारी सहायता करता है जिसको दूसरे दर्जे के स्रोतों से हासिल नहीं किया जा सकता। इसलिए क्षेत्रीय प्रेक्षण ज़रूरत अनुसार जानकारी इकट्ठी करने के लिए किए जाते हैं।

भूगोल में क्षेत्रीय प्रेक्षण की ज़रूरत-भूगोल में क्षेत्रीय प्रेक्षण की काफ़ी महत्ता है।

  • इस प्रेक्षण के द्वारा स्थानिक वितरण तथा स्थानिक स्तर पर उनके सम्बन्ध प्रति हमारी समझ में वृद्धि होती है।
  • कई बार प्रकाशित आंकड़े भौगोलिक वैज्ञानिक के लिए पूरे नहीं होते इस समय सामाजिक-आर्थिक अलग अलग पक्षों का ज्ञान आवश्यक होता है. ऐसा ज्ञान हमें क्षेत्रीय प्रेक्षण द्वारा ही पता चलता है।
  • हम भौगोलिक प्रेक्षण द्वारा फस्टहैंड जानकारी एकत्र कर सकते हैं। इसलिए मनुष्य का पर्यावरण के साथ सम्बन्ध इत्यादि को समझने के लिए भूगोल में क्षेत्रीय प्रेक्षण की ज़रूरत है।

क्षेत्रीय प्रेक्षण की कार्य प्रणाली-इसकी कार्य प्रणाली को निम्नलिखित हिस्सों में विभाजित किया जाता है-

  • समस्या को परिभाषित करना (Defining the Problem)-सबसे पहले जिस समस्या का अध्ययन करना होता है उसको अच्छी तरह परिभाषित किया जाता है। समस्या स्वरूप को संक्षिप्त रूप से बताने वाले वाक्यों के साथ ऐसा किया जाता है। इसको प्रेक्षण के शीर्षक या उप शीर्षक से दर्शाया जाना चाहिए।
  • उद्देश्य (Objective)-उद्देश्यों को निर्धारित करना इस प्रेक्षण का दूसरा कार्य है। क्योंकि इस प्रेक्षण की रूप रेखा होते हैं तथा इनके द्वारा ही आंकड़े एकत्र करने के ढंग तथा विश्लेषण के तरीके का चुनाव होता है।
  • क्षेत्र (Scope)-अध्ययन किए जाने वाले भौगोलिक क्षेत्र जांच का समय तथा अगर आवश्यकता हो तो अध्ययनों का विषय निर्धारित करना भी किसी हद तक आवश्यक होता है। यह निर्धारण पहले निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति, नतीजों तथा उनके अमल के लिए भी उपयोगी है।

उपकरण तथा तकनीकें (Tools and Techniques of Information Collection)-असलियत में चुनी हुई समस्या की जानकारी एकत्र करने को क्षेत्रीय प्रेक्षण का नाम दिया जाता है। इसके लिए हमें कई उपकरणों की आवश्यकता होती है। इनमें नक्शे, आंकड़े, क्षेत्रीय निरीक्षण, सवाल, सारणी इत्यादि प्रारम्भिक तथा दूसरे दर्जे के स्रोतों को शामिल किया जाता है जैसे कि-

  • दर्ज तथा प्रकाशित आंकड़े (Recorded and Published Data)-इन आंकड़ों द्वारा हमें आंकड़ों के सम्बन्धी आधारभूत जानकारी प्राप्त होती है। यह आंकड़े हमें सरकारी संगठनों, एजेंसियों इत्यादि से मिलते हैं।
  • क्षेत्रीय सर्वेक्षण (Field Observations)-इस सर्वेक्षण का उत्तम होना खोजी निरीक्षण द्वारा जानकारी एकत्र करने की योग्यता पर आधारित है। क्षेत्रीय सर्वेक्षण का असल उद्देश्य भौगोलिक व्यवहारों के लक्षणों तथा संबंधों का निरीक्षण करना होता है। निरीक्षण के पूरक के तौर पर भी जानकारी एकत्र करने के लिए कुछ तकनीकों की जैसा कि स्कैच तथा फोटोग्राफी का प्रयोग किया जाता है।
  • माप-कुछ क्षेत्रीय सर्वेक्षण के लिए घटनाओं इत्यादि के लिए माप की आवश्यकता पड़ती है। इस द्वारा विस्तार के साथ विश्लेषण किया जा सकता है।

इंटरव्यू-जो सर्वेक्षण सामाजिक मुद्दों के साथ सम्बन्ध रखते हों की जानकारी निजी इंटरव्यू द्वारा एकत्र की जाती है। परंतु इस प्रकार जानकारी एकत्र करना, इंटरव्यू लेना, बल की क्षमता, समझ, व्यवहार तथा सम्बन्धों पर निर्भर करती है।

1. उपकरण (Tools) इंटरव्यू के लिए प्रश्न सारणियां तथा शैड्यूल बनाने चाहिए।

2. आधारभूत जानकारी-इंटरव्यू करते समय कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी जैसे कि स्थानों, इंटरव्यू देने वाले व्यक्ति का सामाजिक इतिहास इत्यादि नोट करना आधारभूत जानकारी है।

3. फैलाव (Coverage)-सर्वेक्षक को तय करना चाहिए कि सर्वेक्षण सारी जनसंख्या का होगा या नमूने पर आधारित होगा।

4. अध्ययन की इकाइयां-अध्ययन के तत्त्वों को विस्तार तथा स्पष्टता के साथ परिभाषित करना आवश्यक है इसके साथ ही अध्ययन के फैलाव का फैसला भी आवश्यक है।

5. नमूने का खाका (Sample of Design)-सैंपल सर्वेक्षण का खाका, सर्वेक्षण के उद्देश्य, जनसंख्या विभिन्नताओं, समय तथा खर्च का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

6. सावधानियां-इंटरव्यू इत्यादि अधिक संवेदनशील क्रियाएं हैं। इसलिए इनको अधिक ध्यान तथा सावधानी के साथ करना चाहिए। क्योंकि इसमें मानवीय समूह शामिल होते हैं। सही जानकारी प्राप्त करने के लिए आपको जाहिर करना पड़ेगा कि आप उनमें ही हो। इंटरव्यू करते समय इस बात का ध्यान रखो कि कोई व्यक्ति अपनी मौजूदगी कारण कोई दखलअंदाजी न करे।

7. संकलन तथा लेखा (Compilation and Computation)-निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति तथा एकत्र की गई जानकारी को संगठित करना पड़ता है। अध्ययन के उपविषयों के अनुसार लिखित, स्कैच, फोटो अध्ययनों इत्यादि को संगठित किया जाता है तथा प्रश्न-सारणी तथा शैड्यू पर आधारित जानकारी को सारणीबद्ध भी किया जाता है।

8. मानचित्रकारी प्रसंगता (Cartographic Application) हम नक्शे, चित्र, ग्राफ बनाने तथा उन्हें सही तथा साफ बनाने के लिए कम्प्यूटर के प्रयोग के बारे में भी सीख चुके हैं। व्यवहारों में विभिन्नताओं का दिशा प्रभाव प्राप्त करने के लिए चित्र तथा ग्राफ बहुत फायदेमंद हैं।

9. पेशकारी-क्षेत्रीय अध्ययन की संपूर्ण तथा स्पष्ट रिपोर्ट में कार्यशैली, प्रयोग में लाये उपकरण तथा तकनीकों का विस्तार सहित वर्णन होना आवश्यक है। रिपोर्ट का बड़ा भाग एकत्र की गई जानकारी की सारणियों, चार्टी, नतीजों, नक्शों तथा संदेशों समेत विश्लेषण तथा व्याख्या से सम्बन्धित होना चाहिए। रिपोर्ट के अंत में अध्ययन का सार होना चाहिए।

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प्रश्न 15.
भूमि उपयोग सर्वेक्षण पर नोट लिखो।
उत्तर-
भारत एक कृषि प्रधान देश है। किसी क्षेत्र में कृषि की विशेषताएं, प्रकार तथा भूमि उपयोग की जानकारी प्राप्त करने के लिए किसी एक गांव को इकाई मानकर भूमि उपयोग सर्वेक्षण किया जाता है। इस सर्वेक्षण के द्वारा हम कुछ कमियों के बारे जान सकते हैं तथा फिर इन कमियों को जानकर इनको दूर करने के लिए सुझाव इत्यादि बता सकते हैं।

सर्वेक्षण के मुख्य उद्देश्य-इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य यही है कि भूमि उपयोग के बारे में जानना ताकि कृषि को प्रभावशाली बनाया जा सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पूरा गाँव या इसका आधा हिस्सा, आकार के अनुसार सर्वेक्षण के लिए लिया जा सकता है। हम अपने उद्देश्य की पूर्ति खेतों को नंबर लगा करके तथा उनकी बोई गई फसलें

भरकर तथा सम्बन्धित क्षेत्र के भूमि उपयोग के नक्शे को तैयार कर सकते हैं। इसके लिए हमें मुख्य तौर पर मिट्टी, पानी के निकास, सिंचाई की सुविधाएं तथा खादों के प्रयोग की जानकारी इकट्ठी करनी आवश्यक है। गाँव के नक्शे की सहायता के साथ खेतों के नंबर तथा सीमाबंदी के बारे में पता लगाया जा सकता है।

विधि (Method)—सबसे पहले पटवारी से गांव का भू-कर मानचित्र प्राप्त किया जाता है जिस पर प्रत्येक खेत की सीमा तथा खसरा नंबर लिखा जाता है। इस मानचित्र की कई प्रतिलिपियाँ तैयार की जाती हैं। गांव की स्थिति निर्धारित की जाती है। इसके पश्चात् गांव के पटवारी के रिकॉर्ड से जानकारी प्राप्त की जाती है।

सर्वेक्षण की कार्य विधि-निर्धारित किए समय तथा तिथि को किसानों के साथ निजी पहचान कायम करो क्योंकि सर्वेक्षण के लिए यह बहुत आवश्यक है तथा फायदेमंद भी हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आप जब एक निश्चित बिन्दु से एक खेत से दूसरे खेत में जाते हो तो नक्शे पर भूमि-उपयोग की किस्मों को भी दर्शाते जाओ। यह दर्शाए निश्चित बिन्दु नक्शे पर सर्वेक्षण शुरू करने से पहले ही निर्धारित किए जाने चाहिए। खासकर कोड नंबर को विस्तार लिखित का प्रयोग भूमि उपभोग के लिए पड़ता है। जैसे कि गेहूँ के लिए, चावल के लिए, कपास के लिए इत्यादि।

इसके बाद एक अलग नक्शा ले लो तथा उस रंग तथा बनावट के अनुसार मिट्टी की किस्म लिखो तथा खेत की आम विशेषताओं जैसे कि ढलान तथा निकास, सिंचाई या सिंचाई के बिना वाली फसल इत्यादि के बारे नोटिस लगाओ। इसके बाद किसान को भूमि उपयोग सम्बन्धी पूछो। इसके लिए आपको एक शैड्यूल बनाने की ज़रूरत होगी। जिसमें आप यह जानकारी दर्ज करो।
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V. आंकड़ों की सारणी तथा प्रक्रिया-ऊपर दिए शैड्यूल को तैयार करने के पश्चात् आवश्यकता के अनुसार आंकड़ों की सारणी बनाओ। यह भूमि के प्रयोग तथा खेतों की संख्या के पक्ष से करना चाहिए।

VI. मानचित्र बनाना-अलग-अलग फसलों के लिए अलग-अलग रंग या शेड प्रयोग करके गांव की भूमि उपयोग का नक्शा तैयार करो। सिंचित तथा अनसिंचित फसलों को सही रंगों का प्रयोग करके दिखाओ। खेतों में रेत की किस्म, मात्रा तथा खाद के प्रयोग को दिखाता एक नक्शा भी तैयार करो।

VII. विश्लेषण-सारी इकट्ठी की जानकारी का विश्लेषण इस तरह करो-

  1. कृषि वाली भूमि का क्षेत्र/रकबा
  2. खेतों की कुल संख्या
  3. औसतन खेतों का रकबा
  4. मिट्टी की किस्में
  5. खरीफ की फसलों अधीन रकबा
  6. खरीफ की कुल फसलें
  7. रबी की फसलों के अधीन रकबा तथा कुल फसलें
  8. मध्य ऋतु की फसलें/रकबा
  9. सिंचित ऋतु की फसलें/रकबा
  10. रेत तथा खादों का प्रयोग।

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प्रयोगात्मक/प्रयोग भूगोल PSEB 12th Class Geography Notes

  • अंत में निष्कर्ष को पेश करो। इसमें भूमि का मूल्यांकन, दोष तथा सुधार करने के सुझाव भी बताओ।
  • आर्थिक भूगोल के अध्ययन में आंकड़ों का विशेष महत्त्व है। अलग प्रकार के आंकड़े किसी वस्तु की । मात्रा, गुण, घनत्व और वितरण इत्यादि को स्पष्ट करते हैं।
  • डाटा/आंकड़े की संख्या के आधार पर हम कह सकते हैं कि जो असली दुनिया के बीच/मध्य माप को परिभाषित करती है। डट्टम एक एकहरा (Single) माप है। जब हम लगातार हो रही वर्षा इत्यादि के । आधार पर संख्या और जानकारी एकत्र करते हैं वह आंकड़े/डाटा कहलाता है।
  • डाटा/आंकड़ा के स्रोत को मुख्य रूप में प्रारंभिक स्रोत (निजी सर्वेक्षण, साक्षात्कार, शैड्यूल इत्यादि) और गौण स्रोत (सरकारी प्रकाशन, निजी प्रकाशन, अखबार और पत्रिका इत्यादि) में विभाजित किया जाता है।
  • ग्राफ, चित्र और मानचित्र बनाने के लिए आम नियम जैसे कि सही तरीके का चुनाव करना, सही पैमाना और डिज़ाइन इत्यादि का चुनाव आवश्यक है।
  • आंकड़ों की रेखीय पेशकारी में पसारी चित्र, दो पसारी और तीन व पांच पसारी चित्रों में की जाती है। आमतौर पर बनाए जाने वाले इन मानचित्रों, चित्रों और उनकी रचना के तरीकों के आधार पर इनको लकीरी ग्राफ, बार ग्राफ, पाई चार्ट, तारा चित्र, बहाव चार्ट इत्यादि में विभाजित किया जाता है।
  • बहु लकीरी ग्राफ, लकीरी ग्राफ की ही एक किस्म है जिसमें दो या दो से अधिक परिवर्तनशील तत्व एक समान संख्या की लकीरों द्वारा, एकदम तुलना के लिए दिखाए जाते हैं।
  • विषय से संबंधित मानचित्रों की विशेषताएँ दर्शाने वाले और तुलना करने के लिए ग्राफ और चित्र एक अहम् भूमिका अदा करते हैं। स्थानीय अंतराल को दिखाने के लिए और श्रेणी विभाजन को अच्छी तरह समझने के लिए। कंप्यूटर एक बिजली यंत्र है। इसके अनेक भाग होते हैं। जैसे मैमोरी माइक्रो प्रोसेसर, इनपुट, आउटपुट सिस्टम इत्यादि।
  • कंप्यूटर की मदद से साधारण जोड़ घटाव से लेकर तर्क से हल होने वाले साधारण और जटिल प्रश्न भी हल किए जा सकते हैं। कंप्यूटर हार्डवेयर (यंत्र सामग्री) और सॉफ्टवेयर (प्रक्रिया सामग्री) की सहायता से नक्शे भी बनाए जा सकते हैं।
  • भौगोलिक सूचना तंत्र एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जिससे हम जी०पी०एस० उपग्रह के द्वारा भेजे गए आकड़ों और तथ्य को समझ सकते हैं।
  • ग्लोबल पोजिशनिंग योजना एक ऐसा नेवीगेशन सिस्टम है जो कि पूरे संसार के अलग-अलग कामों के विषय में जानकारी प्रदान करता है। जी०पी०एस० में 24 उपग्रह होते हैं। जी०पी० एस० के तीन भाग हैं-
    • अंतरिक्ष भाग
    • नियंत्रण भाग
    • प्रयोग योग्य भाग
  • आंकड़ा (Data)—अलग-अलग प्रकार के आंकड़े जैसे वस्तु की मात्रा, गुण, घनत्व और वितरण इत्यादि को , स्पष्ट करते हैं। किसी क्षेत्र की जलवायु के अध्ययन में तापमान, वर्षा इत्यादि के आंकड़ों का भी अध्ययन किया जाता है। संख्या के आधार पर यह जानकारी आंकड़ा अथवा डाटा कहलाती है।
  • लकीरी ग्राफ (Liner Graph)-जब समय से संबंधित सूचना जैसे कि तापमान, वर्षा, आबादी में वृद्धि,
    जन्म दर, मृत्यु दर इत्यादि को प्रदर्शित करने का ग्राफ बनाया जाता है उसे लकीरी ग्राफ कहा जाता है।
  • पाई चित्र (Pie Diagram)—यह आंकड़ों की ग्राफिक पेशकारी का ही एक तरीका है। यह तत्वों को एक चक्र द्वारा पेश करती है। आँकड़ों के उप-भाग को दिखलाने के लिए वक्र को बनते हुए कोणों के मुताबिक हिस्सों/भागों में विभाजित किया जाता है। इसलिए इसे चक्र चित्र भी कहा जाता है।
  • वर्णात्मक नक्शे (Choropleth Maps)-इस विधि में किसी एक वस्तु के वितरण को नक्शे पर अलग अलग रंगों द्वारा दर्शाया जाता है। किसी रंग की तुलना में Black and White Shading का प्रयोग करना अच्छा माना जाता है।
  • सममूल्य नक्शे (Isopleth Maps)-Isopleth शब्द दो शब्दों के मेल से बना है। (Iso + Plethron) Iso
    शब्द का अर्थ समान है और Plethron शब्द का अर्थ है मूल्य। इस तरह सममूल्य रेखाएं वे रेखाएं हैं जिनका मूल्य, तीव्रता और घनत्व समान हो। यह रेखाएं उन स्थानों को आपस में मिलाती हैं जिनका मूल्य समान होता है।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 7 गर्म कपड़ों की धुलाई और कपड़ों की सम्भाल

Punjab State Board PSEB 8th Class Home Science Book Solutions Chapter 7 गर्म कपड़ों की धुलाई और कपड़ों की सम्भाल Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Home Science Chapter 7 गर्म कपड़ों की धुलाई और कपड़ों की सम्भाल

PSEB 8th Class Home Science Guide गर्म कपड़ों की धुलाई और कपड़ों की सम्भाल Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कपड़ों को धोने से पहले उनकी मुरम्मत करना क्यों ज़रूरी है ?
उत्तर-
वरन् उसके और अधिक फटने या उधड़ने का भय रहता है।

प्रश्न 2.
धुलाई के उपरांत ऊन कई बार जुड़ जाती है क्यों ?
उत्तर-
ऊनी वस्त्र को धोते समय जब उसे पानी या साबुन के घोल में हिलाया-डुलाया जाता है तो ऊन के तन्तुओं को रेशे आपस में एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाते हैं जिसके फलस्वरूप ऊन जुड़ जाती है।

प्रश्न 3.
धुलाई के लिए गर्म पानी का प्रयोग किन कपड़ों के लिए किया जाता
उत्तर-
सूती कपड़ों के लिए।

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प्रश्न 4.
सम्भालने से पहले कपड़ों की माया/मांड उतारनी क्यों ज़रूरी है ?
उत्तर-
कई कीड़े कपड़ों से माया खाने के लिए कपड़ों में छेद कर देते हैं।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
कपड़ों को सम्भालकर रखना क्यों जरूरी है ?
उत्तर-
कपड़ों को सम्भालकर रखना बहुत ज़रूरी है ताकि उनको टिड्डियों आदि से बचाया जा सके। गर्मियों के मौसम में गर्म कपड़ों को अच्छी तरह सम्भाल कर रखना चाहिए ताकि गर्म कपड़ों वाला कीड़ा न खाए।

प्रश्न 2.
आप रेशमी कपड़ों को कैसे सम्भालोगे ?
उत्तर-
रेशमी कपड़ों को सम्भालना

  1. रोज़ पहनने वाले कपड़ों को हैंगर में लटकाकर अलमारी में रखना चाहिए।
  2. सूरज की तेज़ रोशनी से रंग फीके पड़ जाते हैं, इसलिए इन्हें तेज़ रोशनी में नहीं रखना चाहिए।
  3. कपड़ों को मैली स्थिति में कई दिनों तक नहीं रखना चाहिए। हमेशा कपड़ों को साफ़ करके सम्भालना चाहिए।
  4. गर्मियों में जब रेशमी कपड़े न पहनने हों तो उन्हें किसी पुरानी चादर, सूती धोती, तौलियों या गुड्डी कागज़ में लपेट कर रखना चाहिए।
  5.  सम्भालकर रखे जाने वाले कपड़ों में माया (माँड़) लगाकर नहीं रखना चाहिए।

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प्रश्न 3.
ऊनी कपड़ों को लटकाना क्यों नहीं चाहिए ?
अथवा
ऊनी कपड़ों को लटका कर क्यों नहीं सुखाना चाहिए ?
उत्तर-
ऊन बहुत पानी चूसती है और भारी हो जाती है, इसलिए अगर कपड़े को लटकाकर सुखाया जाए तो वह नीचे लटक जाता है और आकार खराब हो जाता है।

प्रश्न 4.
ऊनी कपड़ों को ज्यादा समय के लिए भिगोना क्यों नहीं चाहिए ?
उत्तर-
ऊन का तन्तु बहुत नर्म और मुलायम होता है। इसके ऊपर छोटी-छोटी तहें होती हैं जो कि पानी, गर्मी और क्षार से नर्म हो जाती हैं और एक दूसरे से उलझ जाती हैं इसलिए ज्यादा देर तक नहीं भिगोना चाहिए।

प्रश्न 5.
गर्म कपड़ों को धोते समय गर्म और ठण्डे पानी में क्यों नहीं डालना चाहिए ?
उत्तर-
क्योंकि इसके तन्तु आपस में जुड़ जाते हैं।

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
गर्म कपड़े धोने के समय कौन-कौन सी सावधानियां अपेक्षित हैं ?
उत्तर-
गर्म कपड़े धोने के समय निम्न सावधानियां अपेक्षित हैं-

  1. ऊनी वस्त्रों को धोते समय रगड़ना तथा कूटना नहीं चाहिए। .
  2. ऊनी वस्त्रों को धोने से पूर्व अधिक देर तक भिगोकर नहीं रखना चाहिए।
  3. ऊनी कपड़ों को कभी उबालना नहीं चाहिए।
  4. ऊनी वस्त्र धोने के लिए पानी बिल्कुल गुनगुना होना चाहिए। पानी का ताप सदैव एक-सा होना चाहिए।
  5. ऊनी वस्त्र धोने के लिए मृदु जल का ही प्रयोग करना चाहिए। अधिक क्षारयुक्त पानी से ऊन सख्त हो जाती है व सूखने पर पीली पड़ जाती है।
  6. ऊनी वस्त्र धोने के लिए साबुन क्षारत होना चाहिए। तीव्र क्षार का ऊन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।
  7. रंगीन ऊन के कपड़ों के लिए रीठों के घोल या डिटरजेन्ट्स का प्रयोग करना चाहिए।
  8. सफेद ऊनी कपड़ों को धोने के लिए घरेलू ब्लीचिंग घोलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि किसी ब्लीचिंग की आवश्यकता अनुभा की जाए तो हल्के हाइड्रोजन पर ऑक्साइड का प्रयोग करना चाहिए।
  9. वस्त्र को तब तक पानी में खंगालना चाहिए जब तक कि उसका साबुन या झाग पूर्ण रूप से निकल न जाए।
  10. वस्त्र को पानी में आखिरी बार खंगालने से पहले पानी में थोड़ा सा नील डाल देना चाहिए।
  11. ऊनी कपड़े को निचोड़ने के लिए उसे मोटे रोंएदार तौलिये में रखकर दोनों हाथों से चारों तरफ़ से दबाना चाहिए।
  12. काफी मात्रा में अपने अन्दर पानी सोख लेने के कारण गीले ऊनी कपड़े भारी हो जाते हैं। उन्हें धोने के बाद तार पर टाँग कर नहीं सुखाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से कपड़ा लम्बा तथा बेडौल हो जाता है।
  13. ऊनी कपड़े को उल्टा करके सेज या चारपाई पर छायादार स्थान पर सुखाना चाहिए।
  14. सुखाने पर कपड़े को उल्टा करके गीला कपड़ा रखकर इस्तरी करनी चाहिए।
  15. ऊनी कपड़ों को अधिक मैला होने से पहले ही धो लेना चाहिए।

प्रश्न 2.
गर्म कपड़े धोने से पहले क्या तैयारी करोगे ?
उत्तर-
1. गर्म कपड़ा कहीं फटा या उधड़ा हुआ हो तो ठीक कर लेना चाहिए ताकि धोने के समय छेद बड़ा न हो जाए।
2. गर्म कपड़े की बुनाई बड़ी खुली होती है जिससे उसमें मिट्टी फँस जाती है। इसलिए धोने से पहले कपड़ों को अच्छी तरह झाड़ना चाहिए।
3. धुलाई क्रिया को सफल बनाने के लिए गर्म वस्त्रों पर शोधक पदार्थों की क्या प्रतिक्रिया होती है, इसके विषय में जानकारी होनी चाहिए।
4. गर्म वस्त्र में प्रयोग किए रेशों के अनुरूप, अनुकूल शोधक पदार्थों को ही चुनना और प्रयोग करना चाहिए।
5. गर्म वस्त्रों पर दाग-धब्बे छुड़ाने वाले विभिन्न रसायनों तथा प्रतिकर्मकों आदि की क्या प्रतिक्रिया होती है, इसकी जानकारी रखनी चाहिए।
6. गर्म वस्त्रों की सफलतापूर्वक धुलाई के लिए उन्हें किस विधि से धोया जाए इसकी जानकारी आवश्यक है। वस्त्र की रचना के अनुसार ही विधि का प्रयोग करना चाहिए।
PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 7 गर्म कपड़ों की धुलाई और कपड़ों की सम्भाल 1
चित्र 7.1 गर्म कपड़ा धोने की तैयारी
7. सभी प्रकाकर के वस्त्रों को एक साथ मिलाकर नहीं धोना चाहिए। वस्त्रों को किस्म, रचना, रंग आदि के अनुसार छाँटकर अलग-अलग धोना चाहिए।
8. कम गन्दे वस्त्रों को अधिक गन्दे वस्त्रों के साथ नहीं धोना चाहिए।
9. वस्त्रों को धोने से पूर्व उनका निरीक्षण कर लेना चाहिए। यदि कहीं से सिलाई खुल गई हो या छेद आदि हो गया हो तो पहले उनकी मुरम्मत करनी चाहिए।
10. वस्त्र पर यदि कोई दाग या धब्बा लग गया है तो पहले उसे दूर करना चाहिए।
11. धोने से पूर्व वस्त्रों की जेबें देख लेनी चाहिएँ और यदि उनमें कुछ भी है तो उसे निकाल देना चाहिए।
12. धुलाई से पूर्व धुलाई में आवश्यक सहायक उपकरणों का पूर्व प्रबन्ध कर लेना चाहिए। इसमें समय की बचत होती है।
13. धुलाई में प्रयोग आने वाली रासायनिक प्रतिकर्मकों को बच्चों से दूर रखना चाहिए। __ (14) धुले वस्त्रों को सुखाने की उचित विधि का प्रयोग तथा उचित प्रबन्ध करना चाहिए।
14. धुलाई के लिए मृदु जल का प्रयोग करना चाहिए। (16) धोकर सुखाए वस्त्रों को तुरन्त प्रेस (इस्तरी) कर देना चाहिए।

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प्रश्न 3.
एक गर्म स्वेटर को कैसे धोओगे और प्रैस करोगे?
अथवा
आप घर में ऊनी वस्त्र कैसे धोएँगे तथा प्रैस करेंगे ?
उत्तर-
गर्म स्वेटर पर प्रायः बटन लगे रहते हैं। यदि कुछ ऐसे फैन्सी बटन हों जिनको धोने से खराब होने की सम्भावना हो तो उतार लेते हैं। यदि स्वेटर कहीं से फटा हो तो सी लेते हैं। अब स्वेटर का खाका तैयार करते हैं। इसके उपरान्त गुनगुने पानी में आवश्यकतानुसार लक्स का चूरा अथवा रीठे का घोल मिलाकर हल्की दबाव विधि से धो लेते हैं। तत्पश्चात् गुनगुने साफ़ पानी में तब तक धोते हैं जब तक सारा साबुन न निकल जाए। ऊनी वस्त्रों के लिए पानी का तापमान एक-सा रखते हैं तथा ऊनी वस्त्रों को पानी में बहुत देर तक नहीं भिमोमा चाहिए वरना इनके सिकुड़ने का भय रहता है। इसके बाद एक रोएंदार (टर्किश) तौलिए में रखकर उसको हल्के हाथों से दबाकर पानी निकाल लेते हैं। फिर खाके पर रखकर किसी समतल स्थान पर छाया में सुखा लेते हैं।
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चित्र 7.2 गर्म वस्त्र का खाका बनाना
प्रैस करना-सूखने के बाद वस्त्र को उल्टा करके उसके ऊपर गीला कपड़ा रखकर इस्तरी करनी चाहिए।

प्रश्न 4.
सूती और ऊनी कपड़ों को सम्भालते समय कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना आवश्यक है ?
उत्तर-
सूती कपड़ों की सम्भाल करते समय ध्यान रखने योग्य बातें निम्नलिखित हैं-

  1. कपड़ों को हमेशा धोकर और अच्छी तरह सुखाकर रखना चाहिए।
  2. कपड़ों पर माया (कलफ) लगाकर अधिक दिन के लिए नहीं रखना चाहिए।
  3. प्रेस करने के बाद कपड़े की नमी को पूरी तरह समाप्त करके ही कपड़ों को सम्भालना चाहिए।
  4. नमीयुक्त कपड़ों में फफूंदी लग जाती है जिससे कपड़े कमजोर हो जाते हैं तथा उन पर दाग लग जाते हैं। अत: बरसात में कपड़ों को अलमारी या सन्दूक में अच्छी तरह बन्द करके रखना चाहिए। धूप निकलने पर उन्हें धूप लगवाते रहना चाहिए।
  5. कपड़ों को नमी वाले स्थान में भूलकर भी नहीं रखना चाहिए।

ऊनी कपड़ों की संभाल-

  1. ऊनी कपड़ों की सम्भाल करने से पूर्व उन्हें ब्रुश से अच्छी तरह झाड़ लेना चाहिए।
  2. जो कपड़े गन्दे हों उन्हें धोकर या सूखी धुलाई (ड्राइक्लीनिंग) कराकर रखना चाहिए।
  3. ऊनी कपड़ों को बक्से, अलमारी आदि में धूप व हवा लगवाते रहना चाहिए।
  4. कपड़ों को नमी की हालत में या नमी के स्थान पर नहीं रखना चाहिए।
  5. जब बक्से में कपड़े बन्द किए जाएँ तो उनमें नैफ्थलीन की गोलियाँ, कपूर या नीम के सूखे पत्ते रखकर अच्छी प्रकार बन्द करना चाहिए।
  6. प्रत्येक कपड़े को अखबार के कागज़ में लपेटकर रखा जा सकता है, छपाई की स्याही के कारण कपड़ों को कीड़ा नहीं लगता।

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Home Science Guide for Class 8 PSEB गर्म कपड़ों की धुलाई और कपड़ों की सम्भाल Important Questions and Answers

I. बहुविकल्पी प्रश्न

प्रश्न 1.
ऊन के तंतु के गुण हैं
(क) कोमल
(ग) प्राणीजन
(ख) मुलायम
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

प्रश्न 2.
ऊन के रेशों के दुश्मन हैं
(क) नमी
(ग) क्षार
(ख) ताप
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

प्रश्न 3.
रेशमी कपड़ों को किस कागज़ में लपेट कर रखा जाता है ?
(क) गुड्डी कागज़
(ख) पुस्तकों के कागज़
(ग) दोनों ठीक
(घ) दोनों ग़लत।
उत्तर-
(क) गुड्डी कागज़

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प्रश्न 4.
ठीक तथ्य है
(क) रेशम के कपड़े कमज़ोर तथा मुलायम होते हैं।
(ख) रेयॉन के कपड़े को धूप में नहीं सुखाना चाहिए।
(ग) सूती कपड़ों के लिए गर्म पानी का प्रयोग किया जा सकता है।
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

II. ठीक/गलत बताएं

  1. ऊनी कपड़ों को लटका कर नहीं सुखाना चाहिए।
  2. रेशम के संभाल कर रखे जाने वाले कपड़ों को माया लगा कर नहीं रखना चाहिए।
  3. रेयॉन के कपड़ों के लिए ड्राइक्लीन धुलाई अच्छी रहती है।
  4. ऊनी कपड़ों को अच्छी प्रकार प्रेस करना चाहिए।
  5. रेशमी कपड़ों को धूप में सुखाना चाहिए।
  6. ऊनी वस्त्र अधिक गर्म पानी, क्षार, रगड़ने तथा मरोड़ने से खराब हो जाते हैं।

उत्तर-

III. रिक्त स्थान भरें

  1. ऊनी कपड़े को ……………… में नहीं सुखाना चाहिए।
  2. ऊनी कपड़ों को बन्द करके रखते समय ……………….. की गोलियां डाल दें।
  3. ऊनी कपड़ा भिगोने से ………………. हो जाता है।
  4. नमीयुक्त कपड़ों को संभालने से ……………….. लग जाती है।

उत्तर-

  1. धूप,
  2. नैथलीन,
  3. कमज़ोर,
  4. फफूंदी।

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IV. एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
ऊनी वस्त्र को धोने के लिए कैसा जल चाहिए ?
उत्तर-
मृदु जल।

प्रश्न 2.
ऊनी वस्त्र को संभालने के लिए नीम के पत्ते तथा अन्य कौन-से पत्ते भी रखे जाते हैं ?
उत्तर-
युक्लिप्टस।

प्रश्न 3. रेशमी कपड़ों को कैसे कागज़ में लपेट कर रखा जाता है ?
उत्तर-
गुड्डी कागज़।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूती कपड़े धोने के लिए कुछ देर तक साबुन के पानी में भिगो कर रखने से क्या लाभ होता है ?
उत्तर-
वस्त्रों पर लगा हुआ घुलनशील मैल पानी में घुल जाता है तथा अन्य गन्दगी, धब्बे आदि छूट जाते हैं।

प्रश्न 2.
रेयॉन के वस्त्रों की धुलाई कठिन क्यों होती है ?
उत्तर-
क्योंकि रेयॉन के वस्त्र पानी के सम्पर्क से निर्बल पड़ जाते हैं।

प्रश्न 3.
रेयॉन के वस्त्रों के लिए किस प्रकार की धुलाई अच्छी रहती है ?
उत्तर-
शुष्क धुलाई (ड्राइक्लीनिंग)

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प्रश्न 4.
रेयॉन के वस्त्रों पर अम्ल तथा क्षार का क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
शक्तिशाली अम्ल तथा क्षार दोनों से ही रेयॉन के वस्त्रों को हानि होती है।

प्रश्न 5.
रेयॉन के वस्त्रों को धोते समय क्या बातें वर्जित हैं ?
उत्तर-
वस्त्रों को पानी में फुलाना, ताप, शक्तिशाली रसायनों तथा एल्कोहल का प्रयोग करना वर्जित है।

प्रश्न 6.
रेयॉन के वस्त्रों की धुलाई के लिए कौन-सी विधि उपयुक्त होती है ?
उत्तर-
गूंधने और नपीड़न की विधि।

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प्रश्न 7.
रेयॉन के वस्त्रों पर इस्तरी किस प्रकार करनी चाहिए ?
उत्तर-
कम गर्म इस्तरी वस्त्र के उल्टी तरफ से करनी चाहिए। इस्तरी करते समय वस्त्र में हल्की सी नमी होनी चाहिए।

प्रश्न 8.
ऊन का तन्तु कैसा होता है ?
उत्तर-
काफ़ी कोमल, मुलायम और प्राणिजन्य।

प्रश्न 9.
ऊन का तन्तु आपस में किन कारणों से जुड़ जाता है ?
उत्तर-
नमी, क्षार, दबाव तथा गर्मी के कारण।

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प्रश्न 10.
ऊन के तन्तुओं की सतह कैसी होती है ?
उत्तर-
खुरदरी।

प्रश्न 11.
ऊन के रेशों की सतह खुरदरी क्यों होती है ?
उत्तर-
क्योंकि ऊन की सतह पर परस्पर व्यापी शल्क होते हैं।

प्रश्न 12.
ऊन के रेशों की सतह के शल्कों की प्रकृति कैसी होती है ?
उत्तर-
लसलसी, जिससे शल्क जब पानी के सम्पर्क में आते हैं तो फूलकर नरम हो जाते हैं।

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प्रश्न 13.
ऊन के रेशों के शत्रु क्या हैं ?
उत्तर-
नमी, ताप और क्षार।

प्रश्न 14.
ताप के अनिश्चित परिवर्तन से रेशों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
रेशों में जमाव व सिकुड़न हो जाती है।

प्रश्न 15.
ऊन के वस्त्रों को किस प्रकार के साबुन से धोना चाहिए ?
उत्तर-
कोमल प्रकृति के शुद्ध क्षार रहित साबुन से।

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प्रश्न 16.
अधिक क्षार मिले पानी का ऊन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
ऊन सख्त हो जाती है तथा सूखने पर पीली पड़ जाती है।

प्रश्न 17.
ऊनी वस्त्रों की धुलाई के लिए किस प्रकार के जल का प्रयोग करना चाहिए ?
उत्तर-
मृदु जल का।

प्रश्न 18.
ऊनी वस्त्रों की धुलाई में कौन-से घोल अधिक प्रचलित है ?
उत्तर-
पोटेशियम परमैंगनेट, सोडियम पर ऑक्साइड तथा हाइड्रोजन परऑक्साइड के हल्के घोल।

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प्रश्न 19.
ऊनी कपड़ों को फलाने की आवश्यकता क्यों नहीं होती ?
उत्तर-
क्योंकि पानी में डुबोने से रेशे निर्बल हो जाते हैं।

प्रश्न 20.
ऊनी वस्त्रों को धोते समय रगड़ना-कटना क्यों नहीं चाहिए ?
उत्तर-
रगड़ने से रेशे नाश हो जाते हैं तथा आपस में फँसते हुए जम जाते हैं।

प्रश्न 21.
वस्त्रों को पानी में आखिरी बार खंगालने से पहले पानी में थोड़ी-सी नील क्यों डाल देनी चाहिए ?
उत्तर-
जिससे कि ऊनी वस्त्रों में सफेदी व चमक बनी रहे।

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प्रश्न 22.
ऊनी कपड़ों को धूप में क्यों नहीं सुखाना चाहिए ?
उत्तर-
क्योंकि तेज़ धूप के प्रकाश के ताप से ऊन की रचना बिगड़ जाती है।

प्रश्न 23.
ऊनी कपड़ों की धुलाई के लिए तापमान की दृष्टि से किस प्रकार के पानी का प्रयोग किया जाना चाहिए ?
उत्तर-
ऊनी कपड़ों की धुलाई के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग करना चाहिए। धोते समय पानी का तापमान कपड़े को भिगोने से लेकर आखिरी बार खंगालने तक एक-सा होना चाहिए।

प्रश्न 24.
धोने के बाद ऊनी कपड़ों को किस प्रकार सुखाना चाहिए ?
उत्तर-
धोने से पूर्व बनाए गए खाके पर कपड़ों को रखकर उसका आकार ठीक करके तथा छाया में उल्टा करके, समतल स्थान पर सुखाना चाहिए जहाँ चारों ओर से कपड़े पर हवा लग सके।

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प्रश्न 25.
ऊनी कपड़ों पर कीड़ों का असर न हो इसलिए कपड़ों के साथ बक्से या अलमारी में क्या रखा जा सकता है ?
उत्तर-
नैष्थलीन की गोलियां,पैराडाइक्लोरो बेंजीन का चूरा, तम्बाकू की पत्ती, कपूर, पिसी हुई लौंग, चन्दन का बुरादा, फिटकरी का चूरा या नीम की पत्तियाँ आदि।

प्रश्न 26.
रेयॉन के वस्त्रों को रगड़ना क्यों नहीं चाहिए ?
उत्तर-
रेयॉन के वस्त्र कमज़ोर और मुलायम होते हैं। इसलिए गीली अथवा सूखी अवस्था में रगड़ना या मरोड़ना नहीं चाहिए।

प्रश्न 27.
ऊनी वस्त्रों को अधिक देर तक नल में भिगोने से क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
ऊन के तन्तु कमजोर हो जाते हैं।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
रेयॉन के वस्त्रों की धुलाई करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
रेयॉन के वस्त्रों की धुलाई करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. रेयॉन के वस्त्रों को भिगोना, उबालना या ब्लीच नहीं करना चाहिए।
  2. साबुन मृदु प्रकृति का प्रयोग करना चाहिए।
  3. गुनगुना पानी ही प्रयोग में लाना चाहिए, अधिक गर्म नहीं।
  4. साबुन का अधिक से अधिक झाग बनाना चाहिए जिससे साबुन पूरी तरह घुल जाए।
  5. गीली अवस्था में रेयॉन के कपड़े अपनी शक्ति 50% तक खो देते हैं। अतः वस्त्रों में से साबुन की झाग निकालने के लिए उन्होंने सावधानीपूर्वक निचोड़ना चाहिए।
  6. साबुन की झाग निचोड़ने के बाद वस्त्र को दो बार गुनगुने पानी में से खंगालना चाहिए
  7. वस्त्रों में से पानी को भी कोमलता से निचोड़कर निकालना चाहिए। वस्त्रों को मरोड़कर नहीं निचोड़ना चाहिए।
  8. वस्त्र को किसी भारी तौलिए में रखकर, लपेट कर हल्के-हल्के दबाकर नमी को सुखाना चाहिए।
  9. वस्त्र को धूप में नहीं सुखाना चाहिए।
  10. वस्त्र को लटका कर नहीं सुखाना चाहिए।
  11. वस्त्र को हल्की नमी की अवस्था में वस्त्र की उल्टी तरफ़ इस्तरी करना चाहिए।
  12. वस्त्रों को अलमारी में रखने अर्थात् तह करके रखने से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि उनमें से नमी पूरी तरह से दूर हो चुकी है या नहीं।

प्रश्न 2.
ऊनी कपड़ों की धुलाई में प्रारम्भ से अन्त तक की विभिन्न क्रियाओं की सूची बनाइए।
उत्तर-

  1. वस्त्रों का छांटना।
  2. वस्त्रों को झाड़ना या धूल-रहित करना।
  3. वस्त्रों में यदि कोई सुराख आदि हों तो उसकी मरम्मत करना।
  4. वस्त्र का खाका तैयार करना।
  5. दाग-धब्बे छुड़ाना।
  6. साबुन तथा पानी की तैयारी।
  7. धुलाई करना।
  8. वस्त्रों को सुखाना।
  9. वस्त्रों पर इस्तरी करना।

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प्रश्न 3.
ऊनी कपड़ों में रंग व चमक बनाए रखने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
ऊनी कपड़ों में रंग व चमक बनाए रखने के लिए अग्रलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. ऊनी वस्त्रों को अधिक गर्म पानी से नहीं धोना चाहिए।
  2. ऊनी वस्त्रों को धूप में नहीं सुखाना चाहिए।
  3. अधिक क्षारीय घोलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  4. यदि रंग कच्चा हो और धुलाई में निकलता दिखाई दे तो धुलाई के अन्तिम जल में थोड़ी-सी नींबू की खटाई या सिरका मिला देना चाहिए।
  5. कच्चे रंग के कपड़ों को रीठे के घोल से घोलना चाहिए।

प्रश्न 4.
ऊनी वस्त्रों की धुलाई के लिए किस प्रकार का साबुन प्रयोग करना चाहिए और क्यों ?
उत्तर-
ऊनी वस्त्रों की धुलाई के लिए मृदु साबुन का प्रयोग करना चाहिए जिसमें सोडा बहुत कम हो या बिल्कुल न हो। साबुन द्रव रूप में अथवा चिप्स के रूप में हो जो पानी में एक जैसा घोल बना ले। क्षारयुक्त साबुन से ऊन के तन्तु कड़े हो जाते हैं तथा सफेद ऊन में पीलापन आ जाता है। रंगीन वस्त्रों के लिए रीठे के घोल का प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि इसके प्रयोग से कपड़े का रंग नहीं उतरता।

प्रश्न 5.
ऊन क्यों जुड़ जाती है ?
उत्तर-
ऊन का तन्तु बहुत नर्म और मुलायम होता है। इसके ऊपर छोटी-छोटी तहें होती हैं जो कि पानी, गर्मी और क्षार से नर्म हो जाती हैं और एक-दूसरे से उलझ जाती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि कपड़ा जुड़ जाता है। इसलिए ऊन की धुलाई में विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 6.
ऊनी कपड़ों को सिकुड़ने व जुड़ने से बचाने के लिए आवश्यक चार बातें लिखो।
उत्तर-

  1. कपड़ों को रगड़ना नहीं चाहिए।
  2. पानी बहुत गर्म नहीं होना चाहिए।
  3. कपड़ों की धुलाई से क्षारों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  4. कपड़ों को गीली अवस्था में लटकाकर नहीं सुखाना चाहिए।

प्रश्न 7.
अधिक मैले ऊनी वस्त्रों को कैसे साफ़ करोगी ?
उत्तर-
ऊनी वस्त्र को रीठे का घोल या इजी वाले पानी में थोड़ी देर के लिए भिगोएँ। उसे हाथों से धीरे-धीरे रगड़ें। अधिक मैले भाग को हाथ की हथेली पर रखकर थोड़ा और साबुन
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चित्र 7.3 धीरे-धीरे मलने की विधि
लगाकर दूसरे हाथ से धीरे-धीरे रगड़ें यदि मैल साफ़ न हो तो उस भाग पर ब्रश का प्रयोग करें। जब वस्त्र साफ़ हो जाएँ तो फिर उसे समतल, छायादार स्थान पर सुखाएँ।

प्रश्न 8.
आप ऊनी वस्त्रों की देखभाल कैसे करोगे ?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सूती वस्त्रों की धुलाई किस प्रकार की जा सकती है ?
उत्तर-
1. वस्त्र धोने से पूर्व यह ध्यानपूर्वक देख लेना चाहिए कि कहीं वस्त्र फटा तो नहीं है। यदि फटा है तो उसकी सिलाई कर देनी चाहिए।
2. यदि वस्त्रों में किसी प्रकार का धब्बा लगा हो तो धोने से पहले छुड़ा लेना चाहिए। इसके पश्चात् समस्त वस्त्रों को उनके आकार व प्रकार के अनुसार उनके समूहों में विभाजित कर लेना चाहिए।
3. रंगीन और सफेद सूती वस्त्रों को अलग-अलग कर लेना चाहिए।
4. कपड़ों को पहले पानी में भिगो देना चाहिए। ऐसा करने से कपड़े का घुलनशील मैल पानी में घुल जाता है। वस्त्रों के अन्य गन्दगी-धब्बे आदि गल जाते हैं।

5. धोने के लिए गर्म पानी का प्रयोग अच्छा रहता है। कपड़े धोने का साबुन, रगड़ने का तख्ता या ब्रुश तथा कलफ आदि सभी चीजें तैयार रखनी चाहिएँ।

6. वस्त्र के प्रकार के अनुसार धुलाई करनी चाहिए। मज़बूत वस्त्र जैसे चादर, पतलून, सलवार आदि गर्म पानी में भिगोकर साबुन की टिक्की मिलानी चाहिए। रसोईघर के झाड़न

7. आदि गर्म पानी में साबुन डालकर भिगो देने चाहिएं, फिर हाथ से रगड़कर मलना चाहिए। कालर, कफ व कोर के नीचे के मैल को मुलायम ब्रुश से रगड़कर धोना चाहिए।

8.  रंगीन कपड़ों को हमेशा ठण्डे पानी में भिगोना व धोना चाहिए। यदि कपड़े बहुत अधिक गन्दे हों तो उन्हें गुनगुने पानी में भिगोना चाहिए।

9. कोमल वस्त्रों को अधिक नहीं रगड़ना चाहिए, उन्हें थोड़ा-सा रगड़कर और निचोड़कर धोना चाहिए।

10. कपड़ों में से साबुन निकालने के लिए उसे स्वच्छ पानी में से बार-बार निकालना चाहिए। जब कपड़ों में से साबुन का पूरा झाग निकल जाए और कपड़ा साफ़ हो जाए तो निचोड़ लेना चाहिए।

11. सफेद कपड़ों पर कलफ लगाते समय कलफ के घोल में थोड़ी सी नील डाल देनी चाहिए ताकि कपड़ों में चमक आ जाए, फिर भली-भाँति निचोड़कर कपड़े सुखाने चाहिएं।

12 पानी निचोड़कर वस्त्रों को धूप में सुखाना चाहिए। यदि कोई रंगीन वस्त्र है तो उसे छाया में सुखाना चाहिए।
13. कपड़ों को हमेशा उल्टा करके सुखाना चाहिए।
14. सूखे वस्त्र को नम करके इस्तरी कर लेनी चाहिए।

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प्रश्न 2.
दाग-धब्बे छुड़ाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
दाग-धब्बे किस प्रकार छुड़ाये जाते हैं, यह जानते हुए भी दाग-धब्बे छुड़ाते समय कुछ महत्त्वपूर्ण बातें जान लेनी चाहिए जो निम्नलिखित हैं

  1. दाग-धब्बा तुरन्त छुड़ाया जाना चाहिए। इसके लिए धोबी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए क्योंकि तब तक ये दाग-धब्बे और अधिक पक्के हो जाते हैं।
  2. दाग-धब्बे छुड़ाने में रासायनिक पदार्थों का कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।
  3. घोल को वस्त्र पर उतनी देर तक ही रखना चाहिए जितनी देर तक धब्बा फीका न पड़ जाए, अधिक देर तक रखने से वस्त्र कमज़ोर पड़ जाते हैं।
  4. चिकनाई को दूर करने से पूर्व उस स्थान के नीचे किसी सोखने वाले पदार्थ की मोटी तह रखनी चाहिए। धब्बे को दूर करते समय रगड़ने के लिए साफ़ और नरम पुराने रुमाल का प्रयोग किया जा सकता है।
  5. धब्बे उतारने का काम खुली हवा में करना चाहिए ताकि धब्बा उतारने के लिए प्रयोग किये जाने वाले रसायनों की वाष्प के दुष्प्रभाव से बचा जा सके।
  6. दाग किस प्रकार का है, जब तक इसका ज्ञान न हो तब तक गर्म जल का उपयोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि गर्म जल में कई तरह के धब्बे और अधिक पक्के हो जाते हैं।
  7. रंगीन वस्त्रों पर ये धब्बे छुड़ाते समय कपड़े के कोने को जल में डुबोकर देखना चाहिए कि रंग कच्चा है अथवा पक्का।
  8. धब्बा छुड़ाने की विधियों का ज्ञान अवश्य होना चाहिए क्योंकि विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग अलग-अलग धब्बों को छुड़ाने हेतु किया जाता है।
  9. ऊनी वस्त्रों पर से धब्बे छुड़ाते समय न तो गर्म जल का प्रयोग करना चाहिए और न ही क्लोरीन-युक्त रासायनिक पदार्थ का।
  10. एल्कोहल, स्प्रिट, बैन्जीन, पेट्रोल आदि से दाग छुड़ाते समय आग से बचाव रखना चाहिए।

प्रश्न 3.
रेशमी और सूती वस्त्रों की संभाल कैसे करेंगे ?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्न।

प्रश्न 4.
रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों को कैसे संभालोगे ?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्न।

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गर्म कपड़ों की धुलाई और कपड़ों की सम्भाल PSEB 8th Class Home Science Notes

  • ऊन का धागा जानवरों के बालों और पशम से बनता है।
  • ऊन के गीले कपड़ों को हैंगर में टाँगकर सुखाना नहीं चाहिए।
  • ऊन का कपड़ा भिगोने से कमज़ोर हो जाता है। इसलिए इसको सीधा साबुन वाले पानी में धोना चाहिए।
  • ऊनी कपड़े को साबुन वाले पानी में डालकर हाथों से दबाकर धोना चाहिए।
  • प्रैस करने के बाद ऊनी वस्त्रों को हैंगर में डालकर थोड़ी देर हवा में लटकाना चाहिए ताकि कपड़ा अच्छी तरह से सूख जाए।
  • ऊनी कपड़े में तह लगने के बाद प्रेस करने की ज़रूरत नहीं होती है।
  • गर्मियों के मौसम में गर्म कपड़ों को अच्छी तरह सम्भाल कर रखना चाहिए ताकि उनको गर्म कपड़ों वाला कीड़ा न खाए।
  • गन्दे कपड़ों को जो धोए जा सकते हों धोना चाहिए और दूसरे को ड्राइक्लीन करवा लेना चाहिए।
  • जब ऊनी कपड़े बक्से में बन्द किए जाएँ तो उनमें सूखे नीम, युक्लिप्टस के पत्ते या नैफ्थलीन की गोलियाँ डालनी चाहिए।
  • सूती कपड़ों को धोना और सम्भालकर रखना सबसे आसान है।
  • फफूंदी कपड़े को कमजोर कर देती है और इसके दाग भी बड़ी मुश्किल से उतरते हैं।
  • रेशमी कपड़ों का सूरज की रोशनी में रंग खराब हो जाते हैं, इसलिए कपड़े तेज़ रोशनी में नहीं रखने चाहिए।