PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव

Punjab State Board PSEB 11th Class Sociology Book Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Sociology Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (TEXTUAL QUESTIONS)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र का जनक किसे माना जाता है ?
उत्तर-
अगस्ते काम्ते को समाजशास्त्र का जनक माना जाता है।

प्रश्न 2.
एक पृथक समाज विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र की स्थापना हेतु उत्तरदायी दो महत्त्वपूर्ण कारकों के नाम बताइये।
उत्तर-
फ्रांसीसी क्रान्ति, प्राकृतिक विज्ञानों के विकास, औद्योगिक क्रान्ति तथा नगरीकरण की प्रक्रिया ने समाजशास्त्र को अलग सामाजिक विज्ञान के रूप में स्थापित करने में सहायता की।

प्रश्न 3.
किन दो शब्दों से ‘समाजशास्त्र’ की अवधारणा बनी तथा किस वर्ष समाजशास्त्र विषय का उद्भव हुआ ?
उत्तर-
समाजशास्त्र (Sociology) शब्द लातिनी शब्द ‘Socios’, जिसका अर्थ है समाज तथा ग्रीक भाषा के शब्द Logos, जिसका अर्थ है अध्ययन, दोनों से मिलकर बना है। सन् 1839 में अगस्ते काम्ते ने पहली बार इस शब्द का प्रयोग किया था।

प्रश्न 4.
समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र के सम्बन्ध में दो सम्प्रदायों के नाम बताएं।
उत्तर-
समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र के सम्बन्ध में दो स्कूलों के नाम हैं-स्वरूपात्मक सम्प्रदाय तथा समन्वयात्मक सम्प्रदाय।

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प्रश्न 5.
औद्योगीकरण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
औद्योगीकरण का अर्थ है सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तन का वह समय जिसने मानवीय समाज को ग्रामीण समाज से औद्योगिक समाज में बदल दिया।

प्रश्न 6.
ऐसे दो विद्वानों के नाम बताइये जिन्होंने भारत में समाजशास्त्र के विकास में योगदान दिया।
उत्तर-
जी० एस० घूर्ये, राधा कमल मुखर्जी, एम० एन० श्रीनिवास, ए० आर० देसाई इत्यादि।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
समाज के विज्ञान को समाजशास्त्र कहा जाता है। समाजशास्त्र में समूहों, सभाओं, संस्थाओं, संगठन तथा समाज के सदस्यों के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है तथा यह अध्ययन वैज्ञानिक ढंग से होता है। साधारण शब्दों में समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रान्ति द्वारा उत्पन्न दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन बताइये।
उत्तर-

  • औद्योगिक क्रान्ति के कारण चीज़ों का उत्पादन घरों से निकल कर बड़े-बड़े उद्योगों में आ गया तथा उत्पादन भी बढ़ गया।
  • इससे नगरीकरण में बढ़ौतरी हुई तथा नगरों में कई प्रकार की समस्याओं ने जन्म लिया ; जैसे कि अधिक जनसंख्या, प्रदूषण, ट्रैफिक इत्यादि।

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प्रश्न 3.
प्रत्यक्षवाद किसे कहते हैं ?
उत्तर-
प्रत्यक्षवाद (Positivism) का संकल्प अगस्ते कोंत (Auguste Comte) ने दिया था। उनके अनुसार प्रत्यक्षवाद एक वैज्ञानिक विधि है जिसमें किसी विषय वस्तु को समझने तथा परिभाषित करने के लिए कल्पना या अनुमान का कोई स्थान नहीं होता। इसमें परीक्षण, तजुर्बे, वर्गीकरण, तुलना तथा ऐतिहासिक विधि से किसी विषय के बारे में सब कुछ समझा जाता है।

प्रश्न 4.
वैज्ञानिक पद्धति किसे कहते हैं ?
उत्तर-
वैज्ञानिक पद्धति (Scientific Method) ज्ञान प्राप्त करने की वह विधि है जिसकी सहायता से वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया जाता है। यह विधि एक सामूहिक विधि है जो अलग-अलग क्रियाओं को एकत्र करती है जिनकी सहायता से विज्ञान का निर्माण होता है।

प्रश्न 5.
वस्तुनिष्ठता (Objectivity) को परिभाषित कीजिए ?
उत्तर-
जब कोई समाजशास्त्री अपना अध्ययन बिना किसी पक्षपात के करता है तो उसे वस्तुनिष्ठता कहा जाता है। समाजशास्त्री के लिए निष्पक्षता रखना आवश्यक होता है क्योंकि अगर उसका अध्ययन निष्पक्ष नहीं होगा तो उसके अध्ययन में और उसके विचारों में पक्षपात आ जाएगा तथा अध्ययन निरर्थक हो जाएगा।

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र एवं विषयवस्तु की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र संबंधी दो स्कूल प्रचलित हैं। प्रथम सम्प्रदाय है स्वरूपात्मक सम्प्रदाय जिसके अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूप का अध्ययन करता है जिस कारण यह विशेष विज्ञान है। दूसरा सम्प्रदाय है समन्वयात्मक सम्प्रदाय जिसके अनुसार समाजशास्त्र बाकी सभी सामाजिक विज्ञानों का मिश्रण है इस कारण यह साधारण विज्ञान है।

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प्रश्न 7.
समाजशास्त्री अपनी विषयवस्तु का अध्ययन करने के लिए किस प्रकार की वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करते हैं?
उत्तर-
समाजशास्त्री अपने विषय क्षेत्र का अध्ययन करने के लिए बहुत-सी वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करते हैं ; जैसे कि सैम्पल विधि, अवलोकन विधि, साक्षात्कार विधि, अनुसूची विधि, प्रश्नावली विधि, केस स्टडी विधि इत्यादि।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
स्वरूपात्मक चिन्तन सम्प्रदाय किस प्रकार समन्वयात्मक चिन्तन सम्प्रदाय से भिन्न है ?
उत्तर-
1. स्वरूपात्मक सम्प्रदाय (Formalistic School)—स्वरूपात्मक सम्प्रदाय के विचारकों के अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है जिसमें सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन किया जाता है। इन सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन कोई अन्य सामाजिक विज्ञान नहीं करता है जिस कारण यह कोई साधारण विज्ञान नहीं बल्कि एक विशेष विज्ञान है। इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक जार्ज सिम्मेल, मैक्स वैबर, स्माल, वीरकांत, वान विज़े इत्यादि हैं।

2. समन्वयात्मक सम्प्रदाय (Synthetic School)-इस सम्प्रदाय के विचारकों के अनुसार समाजशास्त्र कोई विशेष विज्ञान नहीं बल्कि एक साधारण विज्ञान है। यह अलग-अलग सामाजिक विज्ञानों से सामग्री उधार लेता है तथा उनका अध्ययन करता है। इस कारण यह साधारण विज्ञान है। इस विचारधारा के प्रमुख समर्थक दुर्थीम, हाबहाऊस, सोरोकिन इत्यादि हैं।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र के महत्त्व पर संक्षिप्त चर्चा कीजिए। ।
उत्तर-

  • समाजशास्त्र समाज के वैज्ञानिक अध्ययन करने में सहायता करता है।
  • समाजशास्त्र समाज के विकास की योजना बनाने में सहायता करता है क्योंकि यह समाज का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करके हमें उसकी पूर्ण संरचना की जानकारी देता है।
  • समाजशास्त्र अलग-अलग सामाजिक संस्थाओं का हमारे जीवन में महत्त्व के बारे में बताता है कि यह किस प्रकार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में योगदान देते हैं।
  • समाजशास्त्र अलग-अलग सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करके उनको खत्म करने के तरीकों के
    बारे में बताता है।
  • समाजशास्त्र ने जनता की मनोवृत्ति बदलने में सहायता की है। विशेषतया इसने अपराधियों को सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।
  • समाजशास्त्र अलग-अलग संस्कृतियों को समझने में सहायता प्रदान करता है।

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प्रश्न 3.
किस प्रकार फ्रांसीसी क्रान्ति का समाज पर एक व्यापक प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-
सन् 1780 में फ्रांसीसी क्रान्ति आई तथा इससे फ्रांस के समाज में अचानक ही बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया। देश की राजनीतिक सत्ता परिवर्तित हो गई तथा सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन आ गए। क्रान्ति से पहले बहुत-से विचारकों ने परिवर्तन के विचार दिए। इससे समाजशास्त्र के बीज बो दिए गए तथा समाज के अध्ययन की आवश्यकता महसूस होने लगी। अलग-अलग विचारकों के विचारों से इसकी नींव रखी गई तथा इसे सामने लाने का कार्य अगस्ते काम्ते (Auguste Comte) ने पूर्ण किया जो स्वयं एक फ्रांसीसी नागरिक थे। इस प्रकार फ्रांसीसी क्रान्ति ने समाजशास्त्र के उद्भव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 4.
किस प्रकार औद्योगिक क्रान्ति का समाज पर एक व्यापक पड़ा ?
उत्तर-
औद्योगिक क्रान्ति से समाज तथा सामाजिक व्यवस्था में बहुत से अच्छे तथा ग़लत प्रभाव सामने आए। उस समय नगर, उद्योग, नगरों की समस्याएं इत्यादि जैसे बहुत से मुद्दे सामने आए तथा इन मुद्दों ने ही समाजशास्त्र की नींव रखी। यह समय था जब अगस्ते काम्ते, इमाइल दुर्थीम, कार्ल मार्क्स, मैक्स वैबर इत्यादि जैसे समाजशास्त्री सामने आए तथा इनके द्वारा दिए सिद्धान्तों के ऊपर ही समाजशास्त्र टिका हुआ है। इन सभी समाजशास्त्रियों के विचारों में किसी-न-किसी ढंग से औद्योगिक क्रान्ति के प्रभाव छुपे हुए हैं। इस प्रकार औद्योगिक क्रान्ति के प्रभावों से समाज में बहुत से परिवर्तन आए तथा इस कारण समाजशास्त्र के जन्म में औद्योगिक क्रान्ति ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र अपनी विषय वस्तु में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करता है। विवेचना कीजिए। .
उत्तर-
समाजशास्त्र सामाजिक तथ्यों के अध्ययन के लिए कई वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करता है। तुलनात्मक विधि, ऐतिहासिक विधि, वरस्टैहन इत्यादि कई प्रकार की विधियों का प्रयोग करके सामाजिक समस्याएं सुलझाता है। यह सब वैज्ञानिक विधियाँ हैं। समाजशास्त्र का ज्ञान व्यवस्थित है। यह वैज्ञानिक विधि का प्रयोग करके ही ज्ञान प्राप्त करता है। इसमें कई अन्य वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है जैसे कि सैम्पल विधि, निरीक्षण विधि, अनुसूची विधि, साक्षात्कार विधि, प्रश्नावली विधि, केस स्टडी विधि इत्यादि। इन विधियों की सहायता से आंकड़ों को व्यवस्थित ढंग से एकत्र किया जाता है जिस कारण समाजशास्त्र एक विज्ञान बन जाता है।

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IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें:

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र से आपका क्या अभिप्राय है ? समाजशस्त्र के विषय क्षेत्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
साधारण शब्दों में, समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है जिसमें मनुष्य के आपसी सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है। समाजशास्त्र मानव व्यवहार की आपसी क्रियाओं का अध्ययन करता है। यह इस बात को समझने का भी प्रयास करता है कि किस प्रकार अलग-अलग समूह सामने आए, उनका विकास हुआ और किस प्रकार समाप्त हो गए और फिर बन गए। समाज शास्त्र में कार्य-विधियों, रिवाजों, समूहों, परम्पराओं, संस्थाओं इत्यादि का अध्ययन किया जाता है।

फ्रांसीसी वैज्ञानिक अगस्ते काम्ते (Auguste Comte) को समाज शास्त्र का पितामह माना जाता है। इनकी प्रसिद्ध पुस्तक, “पौज़िटिव फिलासफी” (Positive Philosophy) 1830-1842 के दौरान छ: भागों (Volumes) में छपी थी। इस पुस्तक में उन्होंने समाज का अध्ययन करने के लिए जिस विज्ञान का वर्णन किया उसका नाम उन्होंने ‘समाजशास्त्र’ रखा। इस विषय का प्रारम्भ 1839 ई० में किया गया।

यदि समाजशास्त्र के शाब्दिक अर्थों की विवेचना की जाए तो हम कह सकते हैं कि यह दो शब्दों Socio और Logos के योग से बना है। Socio का अर्थ है समाज और Logos का अर्थ है विज्ञान। यह दोनों शब्द लातीनी (Socio) और यूनानी (Logos) भाषाओं से लिए गए हैं। इस प्रकार समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ हैसमाज का विज्ञान। समाज के सम्बन्धों का अध्ययन करने वाले विज्ञान को समाजशास्त्र कहते हैं।

परिभाषाएं (Definitions)

  1. गिडिंग्ज़ (Giddings) के अनुसार, “समाजशास्त्र पूर्ण रूप से समाज का क्रमबद्ध वर्णन और व्याख्या
  2. मैकाइवर और पेज (Maclver and Page) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के बारे में है, सम्बन्धों के जाल को हम समाज कहते हैं।”
  3. दुखीम (Durkheim) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक संस्थाओं, उनकी उत्पत्ति और विकास का अध्ययन है।”
  4. जिन्सबर्ग (Ginsberg) के अनुसार, “समाजशास्त्र मनुष्य की अंतक्रियाओं और अंतर्सम्बन्धों, उनके कारणों और परिभाषाओं का अध्ययन है।”
  5. मैक्स वैबर (Max Weber) के अनुसार, “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रियाओं का व्याख्यात्मक बोध करवाने का प्रयास करता है।”

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि समाजशास्त्र, समाज का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। इसमें व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्धों अथात् व्यक्तियों के समूहों में पाया गया व्यवहार, उनके आपसी सम्बन्धों और कार्यों इत्यादि का अध्ययन किया जाता है। समाजशास्त्र यह भी बताता है कि मनुष्य के सभी रीति-रिवाज, जो उन्हें एक-दूसरे के साथ जोड़कर रखते हैं। इसके अतिरिक्त मनुष्य स्वभावों के उद्देश्यों और स्वरूपों को समझने का प्रयास समाजशास्त्र द्वारा ही किया जाता है।

समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र (Scope of Sociology) – समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र को वर्णन करने के लिए दो अलग-अलग विचारधाराओं से सम्बन्ध रखते हुए समाज शास्त्रियों ने अपने विचार दिए हैं। एक विचारधारा के समर्थकों ने समाजशास्त्र को एक विशेष विज्ञान के रूप में स्वीकार किया है किन्तु दूसरी विचारधारा के समर्थकों ने समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र सम्बन्धी इसका एक सामान्य विज्ञान के रूप में वर्णन किया है। कहने से तात्पर्य यह है कि इन दोनों विरोधी विचारधाराओं ने अपने ही विचारों के अनुसार इसके विषय-क्षेत्र सम्बन्धी वर्णन किया है जिसका वर्णन निम्नलिखित है
दो अलग-अलग विचारधाराएं इस प्रकार हैं-

I. स्वरूपात्मक विचारधारा-‘समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है।’
II. समन्वयात्मक विचारधारा-समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है।

I. स्वरूपात्मक विचारधारा-‘समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है।’ (Formalistic School : ‘Sociology as a Special Science.’)-इस विचारधारा के समाज शास्त्रियों ने समाजशास्त्र को शेष सामाजिक विज्ञानों (Social Sciences) की तरह एक विशेष विज्ञान (Special Science) माना है। इस विचारधारा के समर्थक समाजशास्त्र को सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों के अध्ययन करने तक सीमित रखकर इसे विशेष विज्ञान बताते हैं। अन्य कोई भी सामाजिक विज्ञान सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन नहीं करता, केवल समाजशास्त्र ही ऐसा विज्ञान है जो सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन करता है। इस कारण समाजशास्त्र को विशेष विज्ञान कहा जाता है।

इस सम्प्रदाय के विचारधारकों के अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है क्योंकि यह केवल सामाजिक सम्बन्धों के रूपों का अध्ययन करता है तथा स्वरूप एवं अन्तर-वस्तु अलग-अलग चीजें हैं। समाजशास्त्र अपना विशेष अस्तित्व बनाए रखने के लिए सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन करता है अन्तर-वस्तु का नहीं। इस प्रकार समाज शास्त्र मानवीय सम्बन्धों के स्वरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन है। क्योंकि इस संप्रदाय के समर्थक स्वरूप पर बल देते हैं, इसलिए इसे स्वरूपात्मक सम्प्रदाय कहते हैं। अब हम इस सम्प्रदाय के अलग-अलग समर्थकों द्वारा दिए विचारों पर विचार करेंगे।

1. सिमेल (Simmel) के विचार-सिमेल के अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है। उनके अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन करता है जबकि अन्य सामाजिक विज्ञान इन सम्बन्धों के अन्तर-वस्तु का अध्ययन करते हैं। सिमेल के विचारानुसार समाजशास्त्र का शेष सामाजिक विज्ञानों से अन्तर अलग-अलग दृष्टिकोण के आधार पर किया जाता है। सिमेल के अनुसार किसी भी सामूहिक सामाजिक घटना का अध्ययन किसी भी सामाजिक विज्ञान द्वारा ही किया जाता है। इस प्रकार समाजशास्त्र विशेष विज्ञान कहलाने के लिए उन भागों का अध्ययन करता है जिनका अध्ययन बाकी सामाजिक विज्ञान न करते हों। सिमेल के अनुसार अन्तक्रियाओं के दो रूप पाये जाते हैं तथा वह हैं सूक्ष्म रूप तथा स्थूल रूप।

सामाजिक सम्बन्ध जैसे प्रतियोगिता, संघर्ष, प्रभुत्व, अधीनता, श्रम विभाजन इत्यादि अन्तक्रियाओं का अमूर्त अथवा सूक्ष्म रूप होते हैं। सिमेल के अनुसार समाजशास्त्र इन सूक्ष्म रूपों का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। कोई अन्य सामाजिक विज्ञान इनका अध्ययन नहीं करते। इसके अतिरिक्त समाजशास्त्र के अन्य सामाजिक विज्ञानों के साथ वे ही सम्बन्ध हैं जो रेखागणित के प्राकृतिक विज्ञानों के साथ पाए जाते हैं अर्थात् रेखागणित भौतिक वस्तुओं के स्थानीय स्वरूपों का अध्ययन करता है तथा प्राकृतिक विज्ञान इन भौतिक वस्तुओं के अन्तर-वस्तुओं का अध्ययन करते हैं। इसी प्रकार जब समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करते हैं तो शेष सामाजिक विज्ञान भी प्राकृतिक विज्ञानों की तरह इन अन्तर-वस्तुओं का अध्ययन करते हैं। इस प्रकार मानव के व्यवहार के सूक्ष्म रूपों का अध्ययन केवल समाजशास्त्र ही करता है जिस कारण इसे विशेष विज्ञान होने का सम्मान प्राप्त है।

इस प्रकार सिमेल के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का और उनके सूक्ष्म रूपों का अध्ययन करता है इसलिए यह बाकी सामाजिक विज्ञानों से अलग है। इसलिए सिमेल के अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है।

2. वीरकांत (Vierkandt) के विचार-वीरकांत जैसे समाजशास्त्री ने भी समाजशास्त्र को ज्ञान की उस विशेष शाखा के साथ सम्बन्धित बताया जिसमें उसने उन मानसिक सम्बन्धों के प्रकारों को लिया जो समाज में व्यक्तियों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं। आपके अनुसार मनुष्य अपनी कल्पनाओं, इच्छाओं, स्वप्नों, सामूहिक प्रवृत्तियों के बिना समाज में दूसरे व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध उत्पन्न नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए प्रतियोगिता की भावना। एक खिलाड़ी की दूसरे खिलाड़ी के प्रति मुकाबले की भावना होती है, एक अध्यापक की दूसरे अध्यापक के साथ। कहने से तात्पर्य यह है कि प्रतियोगियों में पाए गए मानसिक सम्बन्ध एक ही होते हैं, अपितु भावनाएं एक समान नहीं होतीं। आपके अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों से मानसिक स्वरूपों को अलग करके अध्ययन करता है। एक और उदाहरण के अनुसार, समाजशास्त्र किसी समाज की उत्पत्ति, विशेषताएं, विकास, प्रगति आदि का अध्ययन न करके उस समाज के मानसिक स्वरूपों का अध्ययन करता है। इस प्रकार समाजशास्त्र, विज्ञान के मूल तत्त्वों का अध्ययन करता है। जैसे प्यार, नफरत, सहयोग, प्रतियोगिता, लालच इत्यादि। वीरकांत इस प्रकार से समाजशास्त्र में सामाजिक स्वरूपों को मानसिक स्वरूपों से अलग करता है। अतः इस आधार पर उसने समाजशास्त्र को एक विशेष विज्ञान बताया है।

3. वान विजे (Von Weise) के विचार-वान विज़े इस बात पर बल देता है कि समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है। वह कहता है कि सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों को उनकी अन्तर-वस्तु से अलग करके उसका अध्ययन किया जा सकता है। उनके अनुसार “समाजशास्त्र सामाजिक या अन्तर-मानवीय प्रक्रियाओं का अध्ययन है।” इस दृष्टि से समाज शास्त्र का सीमित अध्ययन क्षेत्र है जिस के आधार पर हम समाज शास्त्र को दूसरे समाज शास्त्रों से अलग कर सकते हैं। आपके अनुसार समाजशास्त्र दूसरे समाजशास्त्रों के परिणामों से इस प्रकार एकत्रित नहीं करता अपितु सामाजिक जीवन सम्बन्धी उचित जानकारी प्राप्त करता है तथा अपने विषय-वस्तु में अमूर्त कर लेता है। उसने सामाजिक सम्बन्धों के 600 से अधिक प्रकार बताए और उनके रूपों का वर्गीकरण किया है। उनके द्वारा किए गए वर्गीकरण से इस विचारधारा को समझना काफ़ी सरल होता है। इस प्रकार वान विजे ने भी समाजशास्त्र को एक विशेष विज्ञान मानने वाले विचारों का समर्थन किया है।

4. मैक्स वैबर के विचार (Views of Max Weber)-मैक्स वैबर ने भी स्वरूपात्मक विचारधारा के आधार पर समाजशास्त्र के क्षेत्र को सीमित बताया है। मैक्स वैबर ने समाजशास्त्र का अर्थ अर्थपूर्ण अथवा उद्देश्य पूर्ण सामाजिक क्रियाओं के अध्ययन से लिया है। उनके अनुसार प्रत्येक समाज में पायी गई क्रिया को हम सामाजिक क्रिया नहीं मानते। वह क्रिया सामाजिक होती है जिससे समाज के दूसरे व्यक्तियों के व्यवहार पर प्रभाव पड़ता हो। उदाहरण के लिए यदि दो अथवा दो से अधिक व्यक्तियों की आपस में टक्कर हो जाये तो यह टक्कर होना एक प्राकृतिक प्रकटन है, परन्तु उनके वह प्रयत्न जिनसे वे अलग होते हैं या जो भाषा प्रयोग करके वे एक-दूसरे से अलग होते हैं वह उनका सामाजिक व्यवहार होता है। समाजशास्त्र, मैक्स वैबर के अनुसार, सामाजिक सम्बन्धों के प्रकारों का विश्लेषण और वर्गीकरण करने से सम्बन्धित है। इस प्रकार वैबर के अनुसार समाजशास्त्र का उद्देश्य सामाजिक व्यवहारों का व्याख्यान करना और उन्हें समझना है। इसलिए यह एक विशेष विज्ञान है।

II. समन्वयात्मक सम्प्रदाय (Synthetic School)-समन्वयात्मक सम्प्रदाय के विचारक समाजशास्त्र को साधारण विज्ञान मानते हैं। उनके अनुसार सामाजिक अध्ययन का क्षेत्र बहुत खुला व विस्तृत है। इसलिए सामाजिक जीवन के अलग-अलग पक्षों जैसे-राजनीतिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, मानव वैज्ञानिक, आर्थिक इत्यादि का विकास हुआ है पर इन विशेष सामाजिक विज्ञानों के अतिरिक्त, जो कि किसी विशेष पक्ष का अध्ययन करते हैं, एक साधारण समाजशास्त्र की आवश्यकता है जोकि दूसरे विशेष विज्ञानों के परिणामों के आधार पर हमें सामाजिक जीवन के आम हालातों और सिद्धान्तों के बारे में बता सके। यह विचारधारा पहले सम्प्रदाय अर्थात् कि स्वरूपात्मक सम्प्रदाय से बिल्कुल विपरीत है क्योंकि यह सामाजिक सम्बन्धों के मूर्त रूप के अध्ययन पर ज़ोर देता है। इनके अनुसार, दूसरे सामाजिक विज्ञानों की सहायता के बिना हम सामाजिक सम्बन्धों को नहीं समझ सकते। इस विचारधारा के प्रमुख प्रवर्तक सोरोकिन (Sorokin), दुर्थीम (Durkheim) और हॉब हाऊस (Hob House) हैं।

1. सोरोकिन (Sorokin) के विचार-सोरोकिन ने स्वरूपात्मक विचारधारा की आलोचना करके समाजशास्त्र को एक विशेष विज्ञान न मानकर एक सामान्य विज्ञान माना है। उसके अनुसार, समाजशास्त्र सामाजिक प्रकटना (Social Phenomenon) के अलग-अलग भागों में पाए गए सम्बन्धों का अध्ययन करता है। दूसरा, यह सामाजिक और असामाजिक सम्बन्धों का भी अध्ययन करता है और तीसरा वह सामाजिक प्रकटन (Social Phenomenon) के साधारण लक्षणों का भी अध्ययन करता है। इस तरह उसके अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक सांस्कृतिक प्रकटन के साधारण स्वरूपों, प्रकारों और दूसरे कई प्रकार के सम्बन्धों का साधारण विज्ञान है।” इस प्रकार समाजशास्त्र समान सामाजिक-सांस्कृतिक प्रकटनों का सामान्य दृष्टिकोण से ही अध्ययन करता है।

2. हॉब हाऊस के विचार (Views of Hob House)-हॉब हाऊस ने भी सोरोकिन की तरह समाजशास्त्र के कार्यों के बारे में एक जैसे विचारों को स्वीकार किया है। उनके अनुसार यद्यपि समाजशास्त्र कई सामाजिक अध्ययनों का मिश्रण है परन्तु इसका अध्ययन सम्पूर्ण सामाजिक जीवन है। यद्यपि समाजशास्त्र समाज के अलगअलग भागों का अलग-अलग अध्ययन करता है पर वह किसी भी एक भाग को समाज से अलग नहीं कर सकता, और न ही वह दूसरे सामाजिक विज्ञानों की सहायता के बिना सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है। वास्तव में प्रत्येक सामाजिक विज्ञान किसी-न-किसी तरीके से एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। इतिहास का सम्बन्ध मनोवैज्ञानिक, मनोविज्ञान का राजनीति विज्ञान, राजनीति विज्ञान का समाज शास्त्र इत्यादि से है। इस प्रकार समाजशास्त्र इन सबका सामान्य विज्ञान माना जाता है क्योंकि यह मानवीय सामाजिक जीवन का सम्पूर्ण अध्ययन करता है, जिस कारण वह शेष विज्ञानों से सम्बन्धित है।

3. दुर्थीम के विचार (Durkheim’s views)-दुर्थीम के अनुसार, सभी सामाजिक संस्थाएं एक-दूसरे के साथ सम्बन्धित हैं और इनको एक-दूसरे से अलग करके हम इनका अध्ययन नहीं कर सकते। समाज का अध्ययन करने के लिए समाजशास्त्र दूसरे सामाजिक विज्ञानों पर निर्भर करता है। उसके अनुसार समाजशास्त्र को हम तीन भागों में बांटते हैं

  • सामाजिक आकृति विज्ञान
  • सामाजिक शरीर रचना विज्ञान
  • सामान्य समाज शास्त्र

पहले हिस्से का सम्बन्ध मनुष्यों से सम्बन्धित भौगोलिक आधार जिसमें जनसंख्या, इसका आकार, वितरण आदि आ जाते हैं।

दूसरे भाग का अध्ययन काफ़ी उलझन भरा है जिस कारण इसे आगे अन्य भागों में बांटा जाता है जैसे धर्म का समाजशास्त्र, आर्थिक समाजशास्त्र, कानून का समाजशास्त्र, राजनीतिक समाजशास्त्र। यह सब विज्ञान सामाजिक जीवन के अलग-अलग अंगों का अध्ययन करते हैं पर इनका दृष्टिकोण सामाजिक होता है। तीसरे भाग में सामाजिक नियमों का निर्माण किया जाता है।

इस प्रकार दुखीम ने अपने ऊपर लिखे विचारों के मुताबिक समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान माना है क्योंकि यह हर प्रकार की संस्थाओं और सामाजिक प्रक्रियाओं के अध्ययन करने से सम्बन्धित है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र से क्या आप समझते हैं ? समाजशास्त्र की प्रकृति की चर्चा करें।
उत्तर-
समाजशास्त्र का अर्थ (Meaning of Sociology)- इसके लिये देखें पुस्तक के प्रश्न IV का प्रश्न 1.

समाजशास्त्र की प्रकृति (Nature of Sociology) –
समाजशास्त्र की प्रकृति पूर्णतया वैज्ञानिक है जोकि निम्नलिखित चर्चा से स्पष्ट हो जाएगा-

1. समाजशास्त्र वैज्ञानिक विधि का प्रयोग करता है-समाजशास्त्री सामाजिक तथ्यों के अध्ययन करने हेतु वैज्ञानिक विधि का प्रयोग करते हैं। यह विधियाँ जैसे-Historical Method, Comparative Method, Case Study Method, Experimental Method, Ideal Type, Verstehen हैं। समाजशास्त्र में यह विधियाँ वैज्ञानिक विधियों के आधार पर तैयार की गई हैं। समाजशास्त्र में तथ्य ढूंढ़ने के लिए वैज्ञानिक विधियों के सभी पड़ावों का प्रयोग किया जाता है जैसे दूसरे प्राकृतिक विज्ञान करते हैं। . इन सब विधियों का आधार वैज्ञानिक है और समाजशास्त्र में इन सब विधियों को प्रयोग में लाया जाता है। वर्तमान समय में इन उपरोक्त लिखित विधियों के अतिरिक्त कई और विधियाँ भी प्रयोग में लाई जा रही हैं। इस प्रकार यदि हम वैज्ञानिक विधि का प्रयोग समाजशास्त्र के अध्ययन में कर सकते हैं तो इसे हम एक विज्ञान मान सकते हैं।

2. समाजशास्त्र कार्य-कारणों के सम्बन्धों की व्याख्या करता है-यह केवल तथ्यों को एकत्रित नहीं करता बल्कि उनके बीच कार्य-कारणों के सम्बन्धों का पता करने का प्रयास करता है। यह मात्र ‘क्यों है’ का पता लगाने का प्रयास नहीं करता अपितु यह ‘क्यों’ और ‘कैसे’ का भी पता लगाने का प्रयास करता है अर्थात् यह किसी तथ्य के कारणों और परिणामों का पता लगाने का भी प्रयास करता है।

समाजशास्त्र के द्वारा किसी भी समस्या सम्बन्धी केवल यह नहीं पता लगाया जाता कि समस्या क्या है ? इसके अतिरिक्त वह समस्या के उत्पन्न होने के कारणों अर्थात् ‘क्यों’ और ‘कैसे’ बारे में पता लगाने सम्बन्धी प्रयास करता है। उदाहरण के लिए यदि समाजशास्त्री बेरोज़गारी जैसी किसी भी समस्या का अध्ययन कर रहा हो तो इस समस्या के प्रति सम्बन्धित विषय सामग्री को एकत्रित करने तक ही अपने आपको सीमित नहीं रखता अपितु इस समस्या के उत्पन्न होने के कारण का भी पता लगाता है और साथ ही उनके परिणामों का भी जिक्र करने का प्रयास करता है कि यह समस्या कैसे घटी और क्यों घटी। कार्य-कारण सम्बन्धों की व्याख्या करने के आधार पर हम इसे एक विज्ञान मान सकते हैं।

3. समाजशास्त्र क्या है’ का वर्णन करता है क्या होना चाहिए’ के बारे में कुछ नहीं कहता (Explains only what is not what it should be)-समाजशास्त्री सामाजिक तथ्यों तथा घटनाओं को उसी रूप में पेश करता है जिस रूप में उसने उसे देखा है। वह सामाजिक तथ्यों का निष्पक्षता से निरीक्षण करता है और किसी भी तथ्य को बिना तर्क के स्वीकार नहीं करता। यह मात्र विषय को उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत करता है अर्थात् ‘क्या है’ का वर्णन करता है।

जब समाजशास्त्री को सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करना पड़ता है तो वह सामाजिक तथ्यों को बिना तर्क के स्वीकार नहीं करता। वह केवल वास्तविक सच्चाई को ध्यान रखने तक ही अपने आपको सीमित रखता है। जैसे हम देखते हैं कि भौतिक विज्ञान में भौतिक नियमों और प्रक्रियाओं का ही अध्ययन किया जाता है उसी प्रकार समाजशास्त्र में हम केवल सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करते हैं और उस सामाजिक घटना का बिना किसी प्रभाव के अध्ययन करते हैं और उसका वर्णन करते हैं। इस प्रकार समाजशास्त्र को एक सकारात्मक विज्ञान भी माना जाता है क्योंकि इसमें हम सामाजिक घटना का माध्यम तथ्यों के आधार पर अध्ययन करते हैं न कि प्रभाव के आधार पर। इसलिए भी हम समाजशास्त्र को एक विज्ञान मान सकते हैं।

4. समाजशास्त्र में पक्षपात रहित ढंग से अध्ययन किया जाता है (Objectivity)-समाजशास्त्र में किसी तथ्य का निरीक्षण बिना किसी पक्षपात के किया जाता है। समाजशास्त्री तथ्यों व प्रपंचों का निष्पक्ष और तार्किक रूप से अध्ययन करने का प्रयास करता है। मनुष्य अपनी प्रकृति के मुताबिक पक्षपाती हो सकता है, उसकी आदतें, भावनाएं इत्यादि अध्ययन में आ सकती हैं। परन्तु समाजशास्त्री प्रत्येक तथ्य का पक्षपात रहित तरीके से अध्ययन करता है और अपनी भावनाओं और पसन्दों को इसमें आने नहीं देता। :

समाजशास्त्र द्वारा किया गया किसी भी समाज का अध्ययन निष्पक्षता वाला होता है, क्योंकि समाजशास्त्री सामाजिक तथ्यों (facts) के आधार पर ही अध्ययन करने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए जाति प्रथा की समस्या का यदि वह अध्ययन करता है तो वह इस सम्बन्ध में विषय सामग्री एकत्रित करते समय अपने विश्वास, विचार, भावनाओं इत्यादि को दूर रखकर करता है क्योंकि यदि वह इन्हें शामिल करेगा तो किसी भी समस्या का हल ढूंढ़ना कठिन हो जाए। कहने का अर्थ यह है कि समाजशास्त्री पक्षपात रहित होकर समस्या का निरीक्षण करने का प्रयास करता है। इस आधार पर भी हम समाजशास्त्र को एक विज्ञान मान सकते हैं

5. समाजशास्त्र में सिद्धान्तों और नियमों का प्रयोग भी किया जाता है (Sociology does frame laws)—वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग भी समाजशास्त्रियों द्वारा किया जाता है। समाजशास्त्र के सिद्धान्त सर्वव्यापक (Universal) होते हैं, परन्तु समाज में पाए गए परिवर्तनों के कारण इनमें परिवर्तन आता रहता है। परन्तु कुछ सिद्धान्त ऐसे भी हैं जो सभी देशों के समय में समान रूप से सिद्ध होते हैं। यदि समाज में परिवर्तन न आए तो यह सिद्धान्त भी प्रत्येक समय लागू हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करके हम अलग-अलग समय की परिस्थितियों से सम्बन्धित भी अध्ययन कर सकते हैं जिससे हमें समाज की यथार्थकता का भी पता लगता है। इसलिए भी इसे विज्ञान माना जा सकता है।

6. समाजशास्त्र के द्वारा भविष्यवाणी संभव है (Prediction through Sociology is possible)समाजशास्त्र के द्वारा हम भविष्यवाणी करने में काफ़ी सक्षम होते हैं। जब समाज में कोई समस्या उत्पन्न होती है तो समाजशास्त्र उस समस्या से सम्बन्धित केवल विषय-वस्तु ही नहीं इकट्ठा करता बल्कि उस समस्या का विश्लेषण करके परिणाम निकालता है और उस परिणाम के आधार पर भविष्यवाणी करने के योग्य हो जाता है जिससे वह यह भी बता सकता है कि जो समस्या समाज में पाई गई है, उसका आने वाले समय में क्या प्रभाव पड़ सकेगा और समाज को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव

प्रश्न 3.
समाजशास्त्र में उदभव के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी थे ?
उत्तर-
18वीं शताब्दी के दौरन बहुत से मार्ग सामने आए जिन्होंने समाज को पूर्णतया परिवर्तित कर दिया। उन बहुत से मार्गों में से तीन महत्त्वपूर्ण कारकों का वर्णन निम्नलिखित है-

(i) फ्रांसीसी क्रान्ति तथा नवजागरण आन्दोलन
(ii) प्राकृतिक विज्ञानों का विकास
(iii) औद्योगिक क्रान्ति तथा नगरीकरण

इनका वर्णन इस प्रकार है-

(i) फ्रांसीसी क्रान्ति तथा नवजागरण आन्दोलन (French Revolution and Enlightenment Movement)-फ्रांस में सन् 1789 में एक क्रान्ति हुई। यह क्रान्ति अपने आप में पहली ऐसी घटना थी। इसका फ्रांसीसी समाज पर काफ़ी अधिक प्रभाव पड़ा क्योंकि इसने प्राचीन समाज को नए समाज में तथा ज़मींदारी व्यवस्था को पूंजीवादी व्यवस्था में बदल दिया। इसके साथ-साथ नवजागरण आन्दोलन भी चला जिसमें बहुत-से विद्वानों ने अपना योगदान दिया। इन विद्वानों ने बहुत सी पुस्तकें लिखीं तथा साधारण जनता की सोई हुई आत्मा को जगाया। इस समय के मुख्य विचारकों, लेखकों ने चर्च की सत्ता को चुनौती दी जोकि उस समय का सबसे बड़ा धार्मिक संगठन था। इन विचारकों ने लोगों को चर्च की शिक्षाओं तथा उनके फैसलों को अन्धाधुंध मानने से रोका तथा कहा कि वह स्वयं सोचना शुरू कर दें। इससे लोग काफ़ी अधिक उत्साहित हुए तथा उन्होंने अपनी समस्याओं को स्वयं ही तर्कशील ढंगों से सुलझाने के प्रयास करने शुरू किए।

इस प्रकार नवजागरण समय की विचारधारा समाजशास्त्र के उद्भव के लिए एक महत्त्वपूर्ण कारक बन कर सामने आई। इसे आलोचनात्मक विचारधारा का महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया। इसने लोकतन्त्र तथा स्वतन्त्रता के विचारों को आधुनिक समाज का महत्त्वपूर्ण भाग बताया। इसने जागीरदारी व्यवस्था में मौजूद सामाजिक अन्तरों को काफ़ी हद तक कम कर दिया तथा सम्पूर्ण शक्ति चर्च से लेकर जनता द्वारा चुनी सरकार को सौंप दी।

संक्षेप में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रान्ति तथा अमेरिका व फ्रांस की लोकतान्त्रिक क्रान्ति ने उस समय की मौजूदा संगठनात्मक सत्ता को खत्म करके नई सत्ता उत्पन्न की।

(ii) प्राकृतिक विज्ञानों का विकास (Growth of Natural Sciences)-19वीं शताब्दी के दौरान प्राकृतिक विज्ञानों का काफ़ी अधिक विकास हुआ। प्राकृतिक विज्ञानों को काफ़ी अधिक सफलता प्राप्त हुई तथा इससे प्रभावित होकर बहुत-से सामाजिक विचारकों ने भी उनका ही रास्ता अपना लिया। उस समय यह विश्वास कायम हो गया कि अगर प्राकृतिक विज्ञानों के तरीकों को अपना कर भौतिक तथा प्राकृतिक घटनाओं को समझा जा सकता है तो इन तरीकों को सामाजिक घटनाओं को समझने के लिए सामाजिक विज्ञानों पर भी लागू किया जा सकता है। बहुत से समाजशास्त्रियों जैसे कि अगस्ते काम्ते, हरबर्ट, स्पैंसर, इमाइल, दुर्थीम, मैक्स वैबर इत्यादि ने समाज के अध्ययन में वैज्ञानिक विधियों के प्रयोग की वकालत की। इससे सामाजिक विज्ञानों में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग शुरू हुआ तथा समाजशास्त्र का उद्भव हुआ।

(iii) औद्योगिक क्रान्ति तथा नगरीकरण (Industrial Revolution and Urbanisation)-समाजशास्त्र का उद्भव औद्योगिक क्रान्ति से भी प्रभावित हुआ। औद्योगिक क्रान्ति का आरम्भ सन् 1750 के बाद यूरोप विशेषतया ब्रिटेन में हुआ। इस क्रान्ति ने सम्पूर्ण यूरोप में काफ़ी अधिक परिवर्तन ला दिए। पहले उत्पादन घरों में होता था जो इस क्रान्ति में आरम्भ होने के पश्चात् उद्योगों में बड़े स्तर पर होने लगा। साधारण ग्रामीण जीवन तथा घरेलू उद्योग खत्म हो गए तथा विभेदीकृत नगरीय जीवन के साथ उद्योगों में उत्पादन सामने आ गया। इसने मध्य काल के विश्वासों, विचारों को बदल दिया तथा प्राचीन समाज आधुनिक समाज में परिवर्तित हो गया।

इसके साथ-साथ औद्योगीकरण ने नगरीकरण को जन्म दिया। नगर और बड़े हो गए तथा बहुत-से नए शहर सामने आ गए। नगरों के बढ़ने से बहुत-सी न खत्म होने वाली समस्याओं का जन्म हुआ जैसे कि काफ़ी अधिक भीड, कई प्रकार के प्रदूषण, ट्रैफिक, शोर-शराबा इत्यादि। नगरीकरण के कारण लाखों की तादाद में लोग गांवों से शहरों की तरफ प्रवास कर गए। परिणामस्वरूप लोग अपने ग्रामीण वातावरण से दूर हो गए तथा शहरों में गन्दी बस्तियाँ सामने आ गईं। नगरों में बहुत-से नए वर्ग सामने आए। अमीर अपने पैसे की सहायता से और अमीर हो गए तथा निर्धन अधिक निर्धन हो गए। नगरों में अपराध भी बढ़ गए।

बहुत से विद्वानों जैसे कि अगस्ते काम्ते, हरबर्ट स्पैंसर, मैक्स वैबर, दुर्थीम, सिम्मेल इत्यादि ने महसूस किया कि नई बढ़ रही सामाजिक समस्याओं को दूर करने के लिए समाज के वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है। इस प्रकार समाजशास्त्र का उद्भव हुआ तथा धीरे-धीरे इसका विकास होना शुरू हो गया।

प्रश्न 4.
समाजशास्त्र की उत्पत्ति तथा विकास का अध्ययन क्यों महत्त्वपूर्ण है ?
उत्तर-
(i) समाजशास्त्र एक बहुत ही नया ज्ञान है जोकि अभी अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही है। अगर हम समाजशास्त्र की अन्य सामाजिक विज्ञानों से तुलना करें तो हमें पता चलता है कि अन्य सामाजिक विज्ञान बहुत ही पुराने हैं जबिक समाजशास्त्र का जन्म ही सन् 1839 में हुआ था। यह समय वह समय था जब न केवल सम्पूर्ण यूरोप बल्कि संसार के अन्य देश भी बहुत-से परिवर्तनों में से निकल रहे थे। इन परिवर्तनों के कारण समाज में बहुत सी समस्याएं आ गई थीं। इन सभी परिवर्तनों, समस्याओं की जानकारी प्राप्त करना आवश्यक था तब ही समाज कल्याण के बारे में सोचा जा सकता था। इस कारण समाजशास्त्र के उद्भव तथा विकास का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है।

(ii) आजकल हमारे तथा यूरोपीय समाजों में बहुत सी समस्याएं मौजूद हैं। अगर हम सभी समस्याओं का ध्यान से अध्ययन करें तो पता चलता है कि इन समस्याओं का जन्म औद्योगिक क्रान्ति के कारण यूरोप में हुआ। बाद में यह समस्याएं बाकी संसार के देशों में पहुंच गईं। अगर हमें इन समस्याओं को दूर करना है तो हमें समाजशास्त्र के उद्भव के बारे में भी जानना होगा जोकि उस समय के दौरान ही हुआ था।

(iii) किसी भी विषय में बारे में जानकारी प्राप्त करने से पहले यह आवश्यक है कि हमें उसके उदभव के बारे में पता हो। इस प्रकार समाजशास्त्र का अध्ययन करने से पहले इसके उद्भव के बारे में अवश्य पता होना चाहिए।

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र में नवजागरण युग पर एक टिप्पणी लिखिये।।
उत्तर-
नवजागरण युग अथवा आत्मज्ञान के समय का अर्थ यूरोप ने बौद्धिक इतिहास के उस समय से है जो 18वीं शताब्दी के आरम्भ से शुरू हुआ तथा पूर्ण शताब्दी के दौरान चलता रहा। इस समय से सम्बन्धित बहुतसे विचारक, कल्पनाएं, आंदोलन इत्यादि फ्रांस में ही हुए। परन्तु आत्मज्ञान के विचारक अधिकतर यूरोप के देशों विशेषतया स्कॉटलैंड में ही क्रियाशील थे।

नवजागरण युग को इस बात की प्रसिद्धि प्राप्त है कि इसके मनुष्यों तथा समाज के बारे में नए विचारों की नई संरचनाएं प्रदान की। इस आत्मज्ञान के समय के दौरान कई नए विचार सामने आए तथा जो आगे जाकर मनुष्य की गतिविधियों के आधार बनें। उनका मुख्य केन्द्र सामाजिक संसार था जिसने मानवीय संसार, राजनीतिक तथा आर्थिक गतिविधियां तथा सामाजिक अन्तर्कियाओं के बारे में नए प्रश्न खड़े किए। यह सभी प्रश्न एक निश्चित पहचानने योग्य संरचना (Paradigm) के अन्तर्गत ही पूछे गए। Paradigm कुछ एक-दूसरे से सम्बन्धित विचारों, मूल्यों, नियमों तथा तथ्यों का गुच्छा है जिसके बीच ही स्पष्ट सिद्धान्त सामने आते हैं। आत्मज्ञान के Paradigm के कुछ महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं जैसे कि विज्ञान, प्रगति, व्यक्तिवादिता, सहनशक्ति, स्वतन्त्रता, धर्मनिष्पक्षता, अनुभववाद, विश्ववाद इत्यादि।

मनुष्यों तथा उनके सामाजिक, राजनीतिक तथा ऐतिहासिक हालातों के बारे में कई विचार प्रचलित थे। उदाहरण के लिए, 17वीं शताब्दी में महत्त्वपूर्ण विचारकों जैसे कि हॉब्स (Hobbes) [1588-1679] तथा लॉक (Locke) [1632-1704] ने सामाजिक तथा राजनीतिक मुद्दों के ऊपर एक धर्मनिष्पक्ष तथा ऐतिहासिक पक्ष से काफ़ी कुछ लिखा। इसलिए उन्होंने मानवीय गतिविधियों को अपने व्यक्तिगत पक्ष से देखा। मानवीय गतिविधियां मनुष्य द्वारा होती हैं तथा इनमें ऐतिहासिक पक्ष काफ़ी महत्त्वपूर्ण होता है तथा इनमें परिवर्तन आना चाहिए। दूसरे शब्दों में जिन परिस्थितियों के कारण गतिविधियां होती हैं उनसे व्यक्ति अपने हालातों में परिवर्तन ला सकता है।

18वीं शताब्दी के दौरान ही लोगों ने सोचना शुरू कर दिया कि किस प्रकार सामाजिक, आर्थिक तथा ऐतिहासिक प्रक्रियाएं जटिल प्रघटनाएं हैं जिनके अपने ही नियम तथा कानून हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक व्यवस्थाओं के बारे में सोचा जाने लगा कि यह जटिल प्रक्रियाओं की उपज हैं जो सामाजिक दुनिया का अचानक निरीक्षण करके सामने नहीं आए। इस प्रकार समाजों का अध्ययन तथा उनका विकास प्राकृतिक संसार के वैज्ञानिक अध्ययन के साथ नज़दीक हो कर जुड़ गए तथा उनकी तरह नए ढंग करने लग गए।

इन विचारों के सामने लाने में दो विचारकों के नाम प्रमुख हैं : वीको (Vico) [1668-1774] तथा मान्टेस्क्यू (Montesquieu) [1689-1775]। उन्होंने New Science (1725) तथा Spirit of the Laws (748) किताबें क्रमवार लिखीं तथा यह व्याख्या करने का प्रयास किया कि किस प्रकार अलग-अलग सामाजिक हालात विशेष सामाजिक तत्त्वों से प्रभावित होते हैं। दूसरे शब्दों में, विशेष समाजों तथा उनकी कार्य प्रणालियों की व्याख्या करते समय जटिल ऐतिहासिक कारणों को भी शामिल किया जाता है।

रूसो (Rousseau) एक अन्य महत्त्वपूर्ण विचारक था जोकि इस प्रकार के विचार सामने लाने के लिए महत्त्वपूर्ण था। उसने एक पुस्तक ‘Social Contract’ लिखी जिसमें उसने कहा कि किसी देश के लोगों को अपना शासक चुनने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए। उसने यह भी लिखा कि अगले लोग स्वयं प्रगति करना चाहते हैं तो यह केवल उनके द्वारा चुनी गई सरकार के अन्तर्गत ही हो सकता है।

नवजागरण के लेखकों ने यह विचार नकार दिया कि समाज तथा देश सामाजिक विश्लेषण की मूल इकाइयां हैं। उन्होंने विचार दिया है कि व्यक्ति ही सामाजिक विश्लेषण का आधार है। उनके अनुसार व्यक्ति में ही गुण, योग्यता तथा अधिकार मौजूद होते हैं तथा इन सामाजिक व्यक्तियों के बीच सामाजिक सम्पर्क से ही समाज बना था। नवजागरण के लेखकों ने मानवीय कारण को महत्त्वपूर्ण बताया जोकि उस व्यवस्था के विरुद्ध था जिसमें प्रश्न पूछने को उत्साहित नहीं किया जाता था तथा पवित्रता अर्थात् धर्म सबसे प्रमुख थे। उन्होंने इस विचार का समर्थन किया कि अध्ययन के प्रत्येक विषय को मान्यता मिलनी चाहिए, कोई ऐसा प्रश्न न हो जिसका उत्तर न हो तथा मानवीय जीवन के प्रत्येक पक्ष का अध्ययन होना चाहिए। उन्होंने अमूर्त तर्कसंगतता की दार्शनिक परम्परा को प्रयोगात्मक परम्परा के साथ जोड़ दिया। इस जोड़ने का परिणाम एक नए रूप में सामने आया। मनुष्य की पता करने की इच्छा की नई व्यवस्था ने प्राचीन व्यवस्था को गहरा आघात पहंचाया तथा इसने वैज्ञानिक पद्धति से विज्ञान को पढ़ने पर बल दिया। इसने मौजूदा संस्थाओं के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा किया तथा कहा कि इन संस्थाओं में परिवर्तन करने चाहिए जो मानवीय प्रकृति के विरुद्ध हैं। सभी सामाजिक रुकावटों को दूर करना चाहिए जो व्यक्तियों के विकास में रुकावट हैं।

यह नया दृष्टिकोण न केवल प्रयोगसिद्ध (Empirical) तथा वैज्ञानिक था बल्कि यह दार्शनिक (Philosophical) भी था। नवजागरण विचारकों का कहना था कि सम्पूर्ण जगत् ही ज्ञान का स्रोत है तथा लोगों को यह समझ पर इसके ऊपर शोध करनी चाहिए। नए सामाजिक कानून बनाए जाने चाहिए तथा समाज को तर्कसंगत शोध (Empirical Inquiry) के आधार पर विकास करना चाहिए। इस प्रकार के विचार को सुधारवादी (Reformist) कहा जा सकता है जो प्राचीन सामाजिक व्यवस्था का विरोध करते हैं। यह विचारक इस बात के प्रति आश्वस्त थे कि नई सामाजिक व्यवस्था से प्राचीन सामाजिक व्यवस्था को सुधारा जा सकता है।

इस प्रकार नवजागरण के विचारकों के विचारों से नया सामाजिक विचार उभर कर सामने आया तथा इसमें से ही आरम्भिक समाजशास्त्री निकल कर सामने आए। अगस्ते काम्ते (Auguste Comte) एक फ्रांसीसी विचारक था जिसने सबसे पहले ‘समाजशास्त्र’ शब्द दिया। पहले उन्होंने इसे सामाजिक भौतिकी (Social Physics) का नाम दिया जो समाज का अध्ययन करता था। बाद वाले समाजशास्त्रियों ने भी वह विचार अपना लिया कि समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है। नवजागरण विचारकों की तरफ से दिए गए नए. विचारों ने समाजशास्त्र के उद्भव तथा विकास में कई प्रकार से सहायता की। बहुत से लोग मानते हैं कि समाजशास्त्र का जन्म नवजागरण के विचारों तथा रूढ़िवादियों के उनके विरोध से उत्पन्न हुए विचारों के कारण हुआ। अगस्ते काम्ते भी उस रूढ़िवादी विरोध का ही एक हिस्सा था। प्रारम्भिक समाजशास्त्रियों ने नवजागरण के कुछ विचारों को लिया तथा कहा कि कुछ सामाजिक सुधारों की सहायता से पुरानी सामाजिक व्यवस्था को सम्भाल कर रखा जा सकता है। इस कारण एक रूढ़िवादी समाजशास्त्रीय विचारधारा सामने आयी।

अगस्ते काम्ते भी प्राचीन सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता था तथा उसके बाद कार्ल मार्क्स ने भी ऐसा ही किया। कार्ल मार्क्स जर्मनी में पला बड़ा हुआ था जहां नवजागरण का महत्त्व काफ़ी कम रहा जैसे कि इसका महत्त्व इंग्लैंड, फ्रांस तथा उत्तरी अमेरिका में था। अगर हम ध्यान से देखें तो हम देख सकते हैं कि मार्क्स ने काफ़ी हद तक विचार नवजागरण के विचारों के कारण ही सामने आए हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions) :

प्रश्न 1.
किसके अनुसार समाजशास्त्र सभी विज्ञानों की रानी है ?
(A) काम्ते
(B) दुर्थीम
(C) वैबर
(D) स्पैंसर।
उत्तर-
(A) काम्ते।

प्रश्न 2.
यह शब्द किसके हैं-“समाजशास्त्र दो भाषाओं की अवैध सन्तान है ?”
(A) मैकाइवर
(B) जिन्सबर्ग
(C) बीयरस्टैड
(D) दुर्थीम।
उत्तर-
(C) बीयरस्टैड।

प्रश्न 3.
इनमें से कौन संश्लेषणात्मक सम्प्रदाय का समर्थक नहीं है ?
(A) दुर्थीम
(B) वैबर
(C) हाबहाऊस
(D) सोरोकिन।
उत्तर-
(B) वैबर।

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प्रश्न 4.
इनमें से कौन-सी समाजशास्त्र की प्रकृति की विशेषता है ?
(A) यह एक व्यावहारिक विज्ञान न होकर एक विशुद्ध विज्ञान है।
(B) यह एक मूर्त विज्ञानं नहीं बल्कि अमूर्त विज्ञान है।
(C) यह एक निष्पक्ष विज्ञान नहीं बल्कि आदर्शात्मक विज्ञान है।
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र की विषय वस्तु निश्चित क्यों नहीं है ?
(A) क्योंकि यह प्राचीन विज्ञान है
(B) क्योंकि यह अपेक्षाकृत नया विज्ञान है
(C) क्योंकि प्रत्येक समाजशास्त्री की पृष्ठभूमि अलग है
(D) क्योंकि सामाजिक सम्बन्ध निश्चित नहीं होते।
उत्तर-
(D) क्योंकि सामाजिक सम्बन्ध निश्चित नहीं होते।

प्रश्न 6.
किताब Social Order के लेखक कौन थे ?
(A) मैकाइवर
(B) सिमेल
(C) राबर्ट बीयरस्टैड
(D) मैक्स वैबर।
उत्तर-
(C) राबर्ट बीयरस्टैड।

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प्रश्न 7.
किसने समाजशास्त्र को Social Morphology, Social Physiology तथा General Sociology में बांटा है ?
(A) स्पैंसर
(B) दुर्थीम
(C) काम्ते
(D) वैबर।
उत्तर-
(B) दुर्थीम।

प्रश्न 8.
वैबर के अनुसार इनमें से क्या ठीक है ? ।
(A) साधारण प्रक्रियाओं का भी समाजशास्त्र है।
(B) समाजशास्त्र का स्वरूप साधारण है।
(C) समाजशास्त्र विशेष विज्ञान नहीं है।
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(C) समाजशास्त्र विशेष विज्ञान नहीं है।

प्रश्न 9.
सबसे पहले किस देश में समाजशास्त्र का स्वतन्त्र रूप में अध्ययन शुरू हुआ था ?
(A) फ्रांस
(B) जर्मनी
(C) अमेरिका
(D) भारत।
उत्तर-
(C) अमेरिका।

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प्रश्न 10.
किसने कहा था कि समाजशास्त्र का नाम ETHOLOGY रखना चाहिए ?
(A) वैबर
(B) स्पैंसर
(C) जे० एस० मिल
(D) काम्ते।
उत्तर-
(C) जे० एस० मिल।

II. रिक्त स्थान भरें (Fill in the blanks) :

1. …………. ने समाजशास्त्र को इसका नाम दिया था।
2. समाजशास्त्र में सर्वप्रथम प्रकाशित पुस्तक …….. थी।
3. समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र से संबंधित ……….. सम्प्रदाय हैं।
4. वैबर समाजशास्त्र के ……….. सम्प्रदाय से संबंधित है।
5. दुर्थीम समाजशास्त्र के ………… सम्प्रदाय से संबंधित है।
6. ………… के जाल को समाज कहते हैं।
7. …………. ने समाजशास्त्र को Pure Sociology का नाम दिया था।
उत्तर-

  1. अगस्ते काम्ते,
  2. Principles of Sociology,
  3. दो,
  4. स्वरूपात्मक,
  5. संश्लेषणात्मक,
  6. सामाजिक संबंधों,
  7. काम्ते।

III. सही/गलत (True/False) :

1. मैक्स वैबर को समाजशास्त्र का पिता माना जाता है।
2. सबसे पहले 1839 में समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग किया गया था।
3. किताब Society के लेखक मैकाइवर तथा पेज थे।
4. सिम्मेल स्वरूपात्मक सम्प्रदाय से संबंधित थे।
5. फ्रांसीसी क्रांति का समाजशास्त्र के उद्भव में कोई योगदान नहीं था।
6. पुनः जागरण आंदोलन ने समाजशास्त्र के उद्भव में योगदान दिया।
उत्तर-

  1. गलत,
  2. सही,
  3. सही,
  4. सही,
  5. गलत,
  6. सही।

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IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Wordline Question Answers):

प्रश्न 1.
किताब Sociology किसने लिखी थी ?
उत्तर-
किताब Sociology के लेखक हैरी एम० जॉनसन थे।

प्रश्न 2.
किताब Society के लेखक………….थे।
उत्तर-
किताब Society के लेखक मैकाइवर तथा पेज थे।

प्रश्न 3.
………….ने समाजशास्त्र को इसका नाम दिया था।
उत्तर-
अगस्ते काम्ते ने समाजशास्त्र को इसका नाम दिया था।

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प्रश्न 4.
किताब Cultural Sociology के लेखक कौन हैं ?
उत्तर-
किताब Cultural Sociology के लेखक गिलिन तथा गिलिन थे।

प्रश्न 5.
काम्ते के अनुसार समाजशास्त्र के मुख्य भाग कौन-से हैं ?
उत्तर-
काम्ते के अनुसार समाजशास्त्र के मुख्य भाग सामाजिक स्थैतिकी एवं सामाजिक गत्यात्मकता है।

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र में सर्वप्रथम कौन-सी पुस्तक छपी थी ?
उत्तर-
समाजशास्त्र में सर्वप्रथम छपने वाली पुस्तक Principles of Sociology थी।

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प्रश्न 7.
स्वरूपात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक कौन थे ?
उत्तर-
सिमेल, वीरकांत, वैबर स्वरूपात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक थे।

प्रश्न 8.
संश्लेषणात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक कौन थे ?
उत्तर-
दुर्थीम, सोरोकिन, हाबहाऊस इत्यादि संश्लेषणात्मक सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक थे।

प्रश्न 9.
समाजशास्त्र का पिता किस को माना जाता है?
उत्तर-
अगस्ते काम्ते (Auguste Comte) को समाजशास्त्र का पिता माना जाता है जिन्होंने इसे सामाजिक भौतिकी का नाम दिया था।

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प्रश्न 10.
काम्ते ने समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग पहली बार…………में किया था।
उत्तर-
काम्ते ने समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग पहली बार 1839 में किया था।

प्रश्न 11.
समाजशास्त्र क्या होता है?
उत्तर-
समाज में पाए जाने वाले सामाजिक सम्बन्धों के क्रमबद्ध तथा व्यवस्थित अध्ययन करने वाले विज्ञान को समाजशास्त्र कहा जाता है।

प्रश्न 12.
समाज क्या होता है?
उत्तर-
मैकाइवर तथा पेज के अनुसार सामाजिक सम्बन्धों के जाल को समाज कहते हैं।

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प्रश्न 13.
किस समाजशास्त्री ने समाजशास्त्र को एक विज्ञान का रूप दिया था?
उत्तर-
फ्रांसीसी समाजशास्त्री इमाईल दुीम (Emile Durkheim) ने समाजशास्त्र को एक विज्ञान का रूप दिया था।

प्रश्न 14.
समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र के बारे में कितने सम्प्रदाय प्रचलित हैं?
उत्तर-
समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र के बारे में दो सम्प्रदाय-स्वरूपात्मक तथा संश्लेषणात्मक सम्प्रदाय प्रचलित है।

प्रश्न 15.
समाजशास्त्र को Pure Sociology का नाम किसने दिया था?
उत्तर-
अगस्ते काम्ते ने समाजशास्त्र को Pure Sociology का नाम दिया था।

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प्रश्न 16.
समाजशास्त्र कौन-से दो शब्दों से बना है?
उत्तर-
समाजशास्त्र लातीनी भाषा के शब्द Socio तथा ग्रीक भाषा के शब्द Logos से मिलकर बना है।

अति लघु उतरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र का अर्थ।
उत्तर-
समाज के विज्ञान को समाजशास्त्र अथवा समाज विज्ञान कहा जाता है। समाजशास्त्र में समूहों, संस्थाओं, सभाओं, संगठन तथा समाज के सदस्यों के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है तथा यह अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से होता है ।

प्रश्न 2.
चार प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों के नाम।
उत्तर-

  1. अगस्ते काम्ते – इन्होंने समाजशास्त्र को शुरू किया
  2. इमाइल दुर्थीम – इन्होंने समाजशास्त्र को वैज्ञानिक रूप दिया
  3. कार्ल मार्क्स – इन्होंने समाजशास्त्र को संघर्ष का सिद्धांत दिया
  4. मैक्स वैबर – इन्होंने समाजशास्त्र को क्रिया का सिद्धांत दिया ।

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प्रश्न 3.
समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र।
उत्तर-
समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र में सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक संस्थाएं, सामाजिक प्रक्रियाएं, सामाजिक संहिताएं, संस्कृति, सभ्यता, सामाजिक संगठन, सामाजिक अंशाति, समाजीकरण, रोल, पद, सामाजिक नियन्त्रण इत्यादि का अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 4.
समाज का अर्थ।
उत्तर-
समाजशास्त्र में समाज का अर्थ है कि विशेष प्रकार के सामाजिक संबंधों के संगठन का पाया जाना तथा इसमें संगठन उन लोगों के बीच होता है जो काफ़ी समय से एक ही स्थान पर इकट्ठे रहते हों।

प्रश्न 5.
परिकल्पना।
उत्तर-
परिकल्पना का अर्थ चुने हुए तथ्यों के बीच पाए गए संबंधों के बारे में कल्पना किए हुए शब्दों से होता है जिसके साथ वैज्ञानिक जाँच की जा सकती है परिकल्पना को हम दूसरे शब्दों में सम्भावित उत्तर कह सकते हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव

प्रश्न 6.
स्वरूपात्मक विचारधारा।
उत्तर-
इस विचारधारा के अनुसार समाजशास्त्र केवल सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन करता है जिस कारण यह विशेष विज्ञान है। कोई अन्य विज्ञान सामाजिक संबंधों के स्वरूपों का अध्ययन नहीं करता केवल समाजशास्त्र करता है।

प्रश्न 7.
समन्वयात्मक विचारधारा।
उत्तर-
इस विचारधारा के अनुसार समाजशास्त्र एक साधारण विज्ञान है क्योंकि इसका अध्ययन क्षेत्र काफ़ी बड़ा तथा विस्तृत है। समाजशास्त्र सम्पूर्ण समाज का तथा सामाजिक संबंधों के मूर्त रूप का अध्ययन करता है।

प्रश्न 8.
समाजशास्त्र का महत्त्व।
उत्तर-

  • समाजशास्त्र पूर्ण समाज को एक इकाई मान कर अध्ययन करता है।
  • समाजशास्त्र सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करके उन्हें दूर करने में सहायता करता है।
  • समाजशास्त्र हमें संस्कृति को ठीक ढंग से समझने में सहायता करता है।

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प्रश्न 9.
समाजशास्त्र एक विज्ञान है ।
उत्तर-
जी हां, समाजशास्त्र एक विज्ञान है क्योंकि यह अपने विषय क्षेत्र का वैज्ञानिक विधियों को प्रयोग करके उसका निष्पक्ष ढंग से अध्ययन करता है। इस कारण हम इसे विज्ञान कह सकते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न 

प्रश्न 1.
समाज शास्त्र।
उत्तर-
फ्रांसिसी वैज्ञानिक अगस्ते काम्ते को समाज शास्त्र का पितामह माना गया है। सोशोलोजी शब्द दो शब्दों लातीनी (Latin) शब्द सोशो (Socio) व यूनानी (Greek) शब्द लोगस (Logos) से मिल कर बना है। Socio का अर्थ है समाज व लोगस का अर्थ है विज्ञान, अर्थात् कि समाज का विज्ञान्, अर्थ भरपूर शब्दों के अनुसार समाजशास्त्र का अर्थ समूहों, संस्थाओं, सभाओं, संगठन व समाज के सदस्य के अन्तर सम्बन्धों का वैज्ञानिक अध्ययन. करना व सामाजिक सम्बन्धों में पाए जाने वाले रीति-रिवाज, परम्पराओं, रूढ़ियों आदि सब का समाजशास्त्र में अध्ययन किया जाता है। इसके अलावा संस्कृति का ही अध्ययन किया जाता है।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ।
उत्तर-
समाजशास्त्र (Sociology) शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। Sociology दो शब्दों Socio व Logus से मिल कर बना है। Socio लातीनी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है, ‘समाज’ व Logos यूनानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है विज्ञान। इस प्रकार Sociology का अर्थ है समाज का विज्ञान जो मनुष्य के समाज का अध्ययन करता है।

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प्रश्न 3.
समाजशास्त्र के जनक किसे माना जाता है व कौन-से सन् में इसको समाजशास्त्र का नाम प्राप्त हुआ ?
उत्तर-
फ्रांसिसी दार्शनिक अगस्ते काम्ते को परम्परागत तौर पर समाजशास्त्र का पितामह माना गया। इसकी प्रसिद्ध पुस्तक “पॉजीटिव फिलासफी” छ: भागों में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में काम्ते ने सन् 1838 में समाज के सम्बन्ध में जटिल अध्ययन करने के लिए जिस विज्ञान की कल्पना की उसका नाम उसने सोशोलोजी रखा।

प्रश्न 4.
वैज्ञानिक विधि।
उत्तर-
वैज्ञानिक विधि में हमें ऐसी समस्या का चुनाव करना चाहिए जो अध्ययन इस विधि के योग्य हो तथा इस समस्या के बारे में जो कोई खोज पहले हो चुकी हो तो हमें जितना भी साहित्य मिले अथवा सर्वेक्षण करना चाहिए। परिकल्पनाओं का निर्माण करना अनिवार्य होता है ताकि बाद में यह खोज का अवसर बन सके। इसके अलावा वैज्ञानिक विधि को अपनाते हुए सामग्री एकत्र करने की खोज को योजनाबद्ध करना पड़ता है ताकि इसका विश्लेषण व अमल किया जा सके। एकत्र की सामग्री का निरीक्षण वैज्ञानिक विधि का प्रमुख आधार होता है। इसमें किसी भी तकनीक को अपनाया जा सकता है व बाद में रिकॉर्डिंग करके सामग्री का विश्लेषण किया जाना चाहिए।

प्रश्न 5.
समाजशास्त्र में वैज्ञानिक विधि का इस्तेमाल कैसे किया जाता है ?
उत्तर-
समाजशास्त्र सामाजिक तथ्यों के अध्ययन के लिए कई वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करता है। तुलनात्मक विधि, ऐतिहासिक विधि, वैरस्टीन विधि आदि (Comparatve method, Historical method and Versten method etc.) कई प्रकार की विधियों का प्रयोग करके सामाजिक समस्याएं सुलझाता है। यह सब विधियों वैज्ञानिक हैं। समाज शास्त्र का ज्ञान व्यवस्थित है। यह वैज्ञानिक विधि का उपयोग करके ही ज्ञान प्राप्त करता है।

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प्रश्न 6.
समाजशास्त्र कैसे एक विज्ञान है ?
उत्तर-
समाजशास्त्र में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है। इसमें समस्या को केवल “क्या है” के बारे ही नहीं बल्कि “क्यूं” व “कैसे” का भी अध्ययन करते हैं। समाज की यथार्थकता का भी पता हम लगा सकते हैं। समाजशास्त्र में भविष्यवाणी ही सहायी सिद्ध होती है। इस प्रकार उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि समाजशास्त्र में वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन भी किया जाता है। इसी कारण इसे हम एक विज्ञान भी स्वीकार करते हैं।

प्रश्न 7.
समाजशास्त्र में प्रयोगात्मक विधि का प्रयोग कैसे नहीं कर सकते ?
उत्तर-
समाजशास्त्र का विषय-वस्तु समाज होता है व यह मानवीय व्यवहारों व सम्बन्धों का अध्ययन करता है। मानवीय व्यवहारों में बहुत भिन्नता पाई जाती है। यदि हम बहन-भाई या माता-पिता या माता-पुत्र आदि सम्बन्धों को ले लें तो कोई भी दो बहनें, दो भाई इत्यादि का व्यवहार हमें एक जैसा नहीं मिलेगा। प्राकृतिक विज्ञान (Natural Science) में इस प्रकार की विभिन्नता नहीं पाई जाती बल्कि सर्व-व्यापकता पाई जाती है। इस कारण प्रयोगात्मक विधि का प्रयोग हम प्राकृतिक विज्ञान में कर सकते हैं व समाज शास्त्र में इस विधि का प्रयोग करने में असमर्थ होते हैं। क्योंकि मानवीय व्यवहार में स्थिरता बहुत कम होती है।

प्रश्न 8.
समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र के बारे में बताएं ।
उत्तर-
समाज, सामाजिक सम्बन्धों का जाल है व समाजशास्त्र इसका वैज्ञानिक अध्ययन करता है। इस अध्ययन में समाजशास्त्र सारे ही सामाजिक वर्गों का, सभाओं का, संस्थाओं आदि का अध्ययन करता है। समाज शास्त्र के विषय क्षेत्र के बारे में दो प्रकार के विचार पाए गए हैं-

  • स्वरूपात्मक सम्प्रदाय (Formalistic School) के अनुसार यह विशेष विज्ञान है जो सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन करता है। इसके मुख्य समर्थक जार्ज सिमल, मैक्स वैबर, स्माल, वीरकान्त, वान विज़े, रिचर्ड इत्यादि हैं।
  • समन्वयात्मक सम्प्रदाय (Synthetic School) के अनुसार यह एक सामान्य विज्ञान है। इसके मुख्य समर्थक इमाइल दुर्थीम, हाब हाऊस व सोरोकिन हैं। .

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प्रश्न 9.
समाजशास्त्र भविष्यवाणी नहीं कर सकता।
उत्तर-
समाजशास्त्र प्राकृतिक विज्ञान की भांति भविष्यवाणी नहीं कर सकता। यह सामाजिक सम्बन्धों व प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करता है। यह सम्बन्ध व प्रतिक्रियाएं प्रत्येक समाज में अलग-अलग होती हैं व इनमें परिवर्तन आते रहते हैं। समाज शास्त्र की विषय सामग्री की इस प्रकृति की वजह के कारण यह भविष्यवाणी करने में असमर्थ है। जैसे प्राकृतिक विज्ञान में भविष्यवाणी की जाती है। उसी तरह की समाजशास्त्र में भी भविष्यवाणी करनी सम्भव नहीं है। कारण यह है कि समाजशास्त्र का सम्बन्ध सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों या व्यवहारों से होता है व यह अस्थिर होते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक समाज अलग-अलग होने के साथ-साथ परिवर्तनशील भी होते हैं। अतः सामाजिक सम्बन्धों की इस प्रकार की प्रवृत्ति को देखते हुए हम सामाजिक सम्बन्धों के अध्ययन में यथार्थवता नहीं ला सकते।

प्रश्न 10.
अगस्ते काम्ते।
उत्तर-
अगस्ते काम्ते को समाजशास्त्र का पितामह (Father of Sociology) माना जाता है। 1839 में अगस्ते काम्ते ने कहा कि जिस प्रकार प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन अलग-अलग प्राकृतिक विज्ञान करते हैं, उस प्रकार समाज का अध्ययन भी एक विज्ञान करता है जिसे उन्होंने सामाजिक भौतिकी का नाम दिया। बाद में उन्होंने सामाजिक भौतिकी (Social Physics) का नाम परिवर्तित करके समाजशास्त्र कर दिया। काम्ते ने सामाजिक उद्विकास का सिद्धांत, विज्ञानों का पदक्रम, सकारात्मकवाद इत्यादि जैसे संकल्प समाजशास्त्र को दिए।

प्रश्न 11.
यूरोप में समाजशास्त्र का विकास।
उत्तर-
महान् फ्रांसीसी विचारक अगस्ते काम्ते ने 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में समाज के विज्ञान को सामाजिक भौतिकी का नाम दिया। 1839 में उन्होंने इसका नाम परिवर्तित करके समाजशास्त्र रख दिया। 1843 में J.S. Mill ने ब्रिटेन में समाजशास्त्र को शुरू किया। हरबर्ट स्पैंसर ने अपनी पुस्तक Principles of Sociology से समाज का वैज्ञानिक विधि से विश्लेषण किया। सबसे पहले अमेरिका ने 1876 में Yale University में समाजशास्त्र का अध्ययन स्वतन्त्र विषय रूप में हुआ। दुर्शीम ने अपनी पुस्तकों से समाजशास्त्र को स्वतन्त्र विषय के रूप में विकसित किया। इस प्रकार कार्ल मार्क्स तथा वैबर ने भी इसे कई सिद्धांत दिए तथा इस विषय का विकास किया।

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प्रश्न 12.
फ्रांसीसी क्रान्ति तथा समाजशास्त्र।
उत्तर-
1789 ई० में फ्रांसीसी क्रान्ति आई तथा फ्रांसीसी समाज में अचानक ही बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया। राजनीतिक सत्ता परिवर्तित हो गई तथा सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन आए। क्रान्ति से पहले बहुत से विचारकों ने परिवर्तन के विचार दिए। इससे समाजशास्त्र के बीज बो दिए गए तथा समाज के अध्ययन की आवश्यकता महसूस होने लग गयी। अलग-अलग विचारकों के विचारों से इसकी नींव रखी गई तथा इसे सामने लाने का कार्य अगस्ते काम्ते ने पूर्ण किया जो स्वयं एक फ्रांसीसी नागरिक था।

प्रश्न 13.
नवजागरण काल तथा समाजशास्त्र।
उत्तर-
नवजागरण काल ने समाजशास्त्र के उद्भव में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसका समय 18वीं शताब्दी की शुरूआत में शुरू हुआ तथा पूरी शताब्दी चलता रहा। इस समय के विचारकों जैसे कि वीको (Vico), मांटेस्क्यू (Montesquieu), रूसो Rousseou) इत्यादि ने ऐसे विचार दिए जो समाजशास्त्र के जन्म में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन सभी ने घटनाओं का वैज्ञानिक ढंग से विश्लेषण किया तथा कहा कि किसी भी वस्तु को तर्कसंगतता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज को तर्कसंगत व्याख्या के आधार पर विकसित करना चाहिए। इस प्रकार इन विचारों से नया सामाजिक विचार उभर कर सामने आया तथा इसमें से ही प्रारंभिक समाजशास्त्री निकले।

V. बड़े उत्तरों वाले प्रश्न :

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र की उत्पत्ति में अलग-अलग चरणों का वर्णन करें।
उत्तर-
मनुष्य एक चिन्तनशील प्राणी है। अपने जीवन के प्रारम्भिक स्तर से ही उसमें अपने इर्द-गिर्द के बारे में पता करने की इच्छा होती है। उसने समय-समय पर उत्पन्न हुई समस्याओं को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास किए। व्यक्तियों के बीच हुई अन्तक्रियाओं के साथ सामाजिक सम्बन्ध विकसित हुए जिससे नए-नए समूह हमारे सामने आए। मनुष्य के व्यवहार को अलग-अलग परम्पराओं तथा प्रथाओं की सहायता से नियन्त्रण में रखा जाता रहा है। इस प्रकार मनुष्य अलग-अलग पक्षों को समझने का प्रयास करता रहा है।

समाजशास्त्र की उत्पत्ति तथा विकास के चरण (Stages of Origin and Development of Sociology)—समाजशास्त्र की उत्पत्ति तथा विकास को मुख्य रूप से चार भागों में विभाजित किया जाता है-

1. प्रथम चरण (First Stage)-समाजशास्त्र के विकास के प्रथम चरण को दो भागों में विभाजित करके बेहतर ढंग से समझा जा सकता है
(i) वैदिक तथा महाकाव्य काल (Vedic And Epic Era)—चाहे समाजशास्त्र के विकास की प्रारम्भिक अवस्था की शुरुआत को साधारणतया यूरोप से माना जाता है। परन्तु इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत के ऋषियों-मुनियों ने सम्पूर्ण भारत का विचरण किया तथा यहां के लोगों की समस्याओं अथवा आवश्यकताओं का गहरा अध्ययन तथा उनका मंथन किया। उन्होंने भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था को विकसित किया। इस बात का उल्लेख संसार के सबसे प्राचीन तथा भारत में लिखे महान् ग्रन्थ ऋग्वेद (Rig Veda) में मिलता है। वेद, उपनिषद, पुराण, महाभारत, रामायण, गीता इत्यादि जैसे ग्रन्थों से भारत में समाजशास्त्र की शुरुआत हुई। वर्ण व्यवस्था के अतिरिक्त आश्रम व्यवस्था, चार पुरुषार्थ, ऋणों की धारणा, संयुक्त परिवार इत्यादि भारतीय समाज में विकसित प्राचीन संस्थाओं में से प्रमुख है। इन धार्मिक ग्रन्थों के अतिरिक्त कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भारत की उस समय की समस्याओं का समाजशास्त्रीय विश्लेषण देखने को मिलता है।

(ii) ग्रीक विचारकों के अध्ययन (Studies of Greek Scholars)-सुकरात के पश्चात् प्लैटो (Plato) (427-347 B.C.) तथा अरस्तु (Aristotle) (384-322 B.C.) ग्रीक विचारक हुए। प्लैटो ने रिपब्लिक तथा अरस्तु ने Ethics and Politics में उस समय के पारिवारिक जीवन, जनरीतियों, परम्पराओं, स्त्रियों की स्थिति इत्यादि का विस्तार से अध्ययन किया है। प्लैटो ने 50 से अधिक तथा अरस्तु ने 150 से अधिक छोटे बड़े राज्यों के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया तथा अपने विचार दिए हैं।

2. द्वितीय चरण (Second Stage)-समाजशास्त्र के विकास के द्वितीय चरण में 6वीं शताब्दी से लेकर 14वीं शताब्दी तक का काल माना जाता है। इस काल के प्रारम्भिक चरण में सामाजिक समस्याओं को समझने के लिए धर्म तथा दर्शन की सहायता ली गई। परन्तु 13वीं शताब्दी में समस्याओं को तार्किक ढंग से समझने का प्रयास किया गया। थॉमस एकन्युस (Thomes Acquines) तथा दांते (Dante) ने सामाजिक घटनाओं को समझने के लिए कार्य कारण के सम्बन्ध को स्पष्ट किया। इस प्रकार समाजशास्त्र की रूपरेखा बनने लंग गई।

3. तृतीय अवस्था (Third Stage) समाजशास्त्र के विकास के तृतीय चरण को शुरुआत 15वीं शताब्दी में हुई। इस समय में कई ऐसे महान् विचारक हुए जिन्होंने सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया। हाब्स (Hobbes), लॉक (Locke) तथा रूसो (Rouseau) ने सामाजिक समझौते का सिद्धान्त दिया। थॉमस मूर (Thomes Moore) ने अपनी पुस्तक यूटोपिया (Utopia), मान्टेस्क्यू (Montesque) ने अपनी पुस्तक The Spirit of Laws, माल्थस (Malthus) ने अपनी पुस्तक जनसंख्या के सिद्धान्त’ की सहायता स्ने सामाजिक घटनाओं का अध्ययन करके समाजशास्त्र के विकास में अपना योगदान दिया।

4. चतुर्थ चरण (Fourth Stage)-महान् फ्रांसीसी विचारक अगस्ते काम्ते (Auguste) ने 19वीं शताब्दी की शुरुआत में समाज के विज्ञान को सामाजिक भौतिकी (Social Physics) का नाम दिया। 1838 में उन्होंने इसका नाम बदल कर समाजशास्त्र (Sociology) रख दिया। उन्हें समाजशास्त्र का पितामह (Father of Sociology) भी कहा जाता है।

1843 में जे० एस० मिल (J.S. Mill) ने इग्लैंड में समाजशास्त्र को शुरू किया। हरबर्ट स्पैंसर ने अपनी पुस्तक Principles of Sociology तथा Theory of Organism से समाज का वैज्ञानिक विधि से विश्लेषण किया। सबसे पहले अमेरिका की Yalo University में 1876 ई० में समाजशास्त्र का अध्ययन स्वतन्त्र विषय के रूप में हुआ। दुर्थीम ने अपनी पुस्तकों की सहायता से समाजशास्त्र को स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में विकसित करने लिए लिए योगदान दिया। मैक्स वैबर तथा अन्य समाजशात्रियों ने भी बहुत से समाजशास्त्रीय सिद्धान्त दिए। वर्तमान समय में संसार के लगभग सभी देशों में यह विषय स्वतन्त्र रूप में नया ज्ञान एकत्र करने का प्रयास कर रहा है।

भारत में समाजशास्त्र का विकास (Development of Sociology in India) भारत में समाजशास्त्र के विकास को निम्नलिखित कई भागों में बांटा जा सकता है-

1. प्राचीन भारत में समाजशास्त्र का विकास (Development of Sociology in Ancient India)भारत में समाजशास्त्र की उत्पत्ति प्राचीन काल से ही शुरू हो गई थी। महर्षि वेदव्यास ने चार वेदों का संकल्प किया तथा महाभारत जैसे काव्य की रचना की। रामायण की रचना की गई। इनके अतिरिक्त उपनिषदों, पुराणों तथा स्मृतियों में प्राचीन भारतीय दर्शन की विस्तार से व्याख्या की गई है। इन सभी से पता चलता है कि प्राचीन भारत में विचारधारा उच्च स्तर की थी। इन ग्रन्थों से पता चलता है कि प्राचीन भारत की समस्याओं, आवश्यकताओं, घटनाओं, तथ्यों, मूल्यों, आदर्शों, विश्वासों इत्यादि का गहरा अध्ययन किया गया है। वर्तमान समय में भारतीय समाज में मिलने वाली कई संस्थाओं की शुरुआत प्राचीन समय में ही हुई थी। इनमें वर्ण, आश्रम, पुरुषार्थ, धर्म, संस्कार, संयुक्त परिवार इत्यादि प्रमुख हैं।

चाणक्य का अर्थशास्त्र, मनुस्मृति तथा शुक्राचार्य का नीति शास्त्र जैसे ग्रन्थ प्राचीन काल की परम्पराओं, प्रथाओं, मूल्यों, आदर्शों, कानूनों इत्यादि पर काफ़ी रोशनी डालते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि वैदिक काल से ही भारत में समाजशास्त्र का प्रारम्भ हो गया था।
मध्यकाल में आकर भारत में मुसलमानों तथा मुग़लों का राज्य रहा। उस समय की रचनाओं से भारत की उस समय की विचारधारा, संस्थाओं, सामाजिक व्यवस्था, संस्कृति का ज्ञान प्राप्त होता है।

2. समाजशास्त्र का औपचारिक स्थापना युग (Formal Establishment Era Sociology)-1914 से 1947 तक का समय भारत में समाजशास्त्र की स्थापना का काल माना जाता है। भारत में सबसे पहले बंबई विश्वविद्यालय में 1914 में स्नातक स्तर पर समाजशास्त्र पढ़ाने का कार्य शुरू हुआ। 1919 से अंग्रेज़ समाजशास्त्री पैट्रिक गिड़डस (Patric Geddes) ने यहां एम० ए० (M.A.) स्तर पर समाजशास्त्र पढ़ाने का कार्य शुरू किया। जी० एस० घूर्ये (G. S. Ghurya) उनके ही विद्यार्थी थे। प्रो० वृजेन्द्रनाथ शील के प्रयासों से 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाने का कार्य शुरू हुआ। प्रसिद्ध समाजशास्त्री डॉ० राधा कमल मुखर्जी तथा डॉ० डी० एन० मजूमदार उनके ही विद्यार्थी थे। चाहे 1947 तक भारत में समाजशास्त्र के विकास की गति कम थी परन्तु उस समय तक देश के बहुत से विश्वविद्यालियों में इसे पढ़ाने का कार्य शुरू हो गया था।

3. समाजशास्त्र का प्रसार युग (Expension Era of Sociology)-1947 में स्वतन्त्रता के पश्चात् देश के बहुत से विश्वविद्यालयों के समाजशास्त्र को स्वतन्त्र विषय के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। वर्तमान समय में देश के लगभग सभी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में इस विषय को पढ़ाया जा रहा है। विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त कई संस्थाओं में शोधकार्य चल रहे हैं।

Tata Institute of Social Science, Mumbai, Institute of Social Science, Agra, Institute of Sociology and Social work Lacknow I.I.T. Kanpur and I.I.T. Delhi इत्यादि देश के कुछेक प्रमुख संस्थान हैं जहां समाजशास्त्रीय शोध के कार्य चल रहे हैं। इनसे समाजशास्त्रीय विधियों तथा इसके ज्ञान में लगातार बढ़ौतरी हो रही है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव

प्रश्न 2.
फ्रांसीसी क्रान्ति तथा समाजशास्त्र के विकास की विस्तार से चर्चा करें।
उत्तर-
सामाजिक विचार उतना ही प्राचीन है जितना समाज स्वयं है, चाहे सामाजशास्त्र का जन्म 19वीं शताब्दी के पश्चिमी यूरोप में देखा जाता है। कई बार समाजशास्त्र को ‘क्रान्ति युग का बालक’ भी कहा जाता है। वह क्रान्तिकारी परिवर्तन जो पिछली तीन सदियों में आए हैं, उन्होंने आज के समय में लोगों के जीवन जीने के तरीके सामने लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन परिवर्तनों में ही समाजशास्त्र का उद्भव ढूंढ़ा जा सकता है। समाजशास्त्र ने सामाजिक उथल-पुथल (Social Upheavel) के समय में जन्म लिया था। प्रारम्भिक समाजशास्त्रियों ने जो विचार दिए, उनकी जड़ों में उस समय के यूरोप के सामाजिक हालातों में मौजूद थी।

यूरोप में आधुनिक युग तथा आधुनिकता को अवस्था ने तीन प्रमुख अवस्थाओं को सामने लाया तथा वह
थे प्रकाश युग (The Elightenment Period), फ्रांसीसी क्रान्ति (The French Revolution) तथा औद्योगिक क्रान्ति (The Industrial Revolution)। समाजशास्त्र का जन्म इन तीन अवस्थाओं अथवा प्रक्रियाओं की तरफ से लाए गए परिवर्तनों के कारण हुआ।

फ्रांसीसी क्रान्ति तथा समाजशास्त्र का उद्भव (The French Revolution and Emergence of Sociology) —फ्रांसीसी क्रान्ति 1789 ई० में हुई तथा यह स्वतन्त्रता व समानता प्राप्त करने के मानवीय संघर्ष में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण मोड़ (Turning point) साबित हुई। इससे यूरोप के समाज की राजनीतिक संरचना को बदल कर रख दिया। इसने जागीरदारी युग को खत्म कर दिया तथा समाज में एक नई व्यवस्था स्थापित की। इसने जागीरदारी व्यवस्था के स्थान पर लोकतान्त्रिक व्यवस्था को स्थापित किया।

फ्रांसीसी क्रान्ति से पहले फ्रांसीसी समाज तीन भागों में विभाजित था। प्रथम वर्ग पादरी वर्ग (Clergy) था। दूसरा वर्ग कुलीन (Nobility) वर्ग था तथा तीसरा वर्ग साधारण जनता का वर्ग था। प्रथम दो वर्गों की कुल संख्या फ्रांस की जनसंख्या का 2% थी, परन्तु उनके पास असीमित अधिकार थे। वह सरकार को कोई टैक्स नहीं देते थे। परन्तु तीसरा वर्ग को कोई अधिकार प्राप्त नहीं थे तथा उन्हें सभी टैक्सों का भार सहना पड़ता था। इन तीनों वर्गों की व्याख्या निम्नलिखित है-

1. प्रथम वर्ग-पादरी वर्ग (The First Order-Clergy)-यूरोप के सामाजिक जीवन में रोमन कैथोलिक चर्च सबसे प्रभावशाली तथा ताकतवर संस्था थी। अलग-अलग देशों में बहुत-सी भूमि चर्च के नियन्त्रण में थी। इसके अतिरिक्त चर्च को भूमि उत्पादन का 10% हिस्सा (Tithe) भी मिलता था। चर्च का ध्यान पादरी (Clergy) रखते थे तथा यह समाज का प्रथम वर्ग था। पादरी वर्ग दो भागों में विभाजित था तथा वह थे उच्च पादरी वर्ग तथा निम्न पादरी वर्ग (Upper Clergy and Lower Clergy)। उच्च पादरी वर्ग के पादरी कुलीन परिवारों से सम्बन्धित थे तथा चर्च की सम्पत्ति पर वास्तव में इनका अधिकार होता था। टीथे (Tithe) टैक्स का अधिकतर हिस्सा इनकी जेबों में जाता था। उनके पास विशेष अधिकार थे तथा वह सरकार को कोई टैक्स नहीं देते थे। वह काफ़ी अमीर थे तथा ऐश से भरपूर जीवन जीते थे। निम्न वर्ग में पादरी साधारण लोगों के परिवारों से सम्बन्धित थे। वह पूर्ण ज़िम्मेदारी से अपना कार्य करते थे। वह लोगों को धार्मिक शिक्षा देते थे। वह जन्म, विवाह, बपतिस्मा, मृत्यु इत्यादि से सम्बन्धित संस्कार पूर्ण करते थे तथा चर्च के स्कूलों को भी सम्भालते थे।

2. द्वितीय वर्ग-कुलीन वर्ग (Second Order-Nobility)-फ्रैंच समाज का द्वितीय वर्ग कुलीन वर्ग से सम्बन्धित था। वह फ्रांस की 2.5 करोड़ की जनसंख्या का केवल 4 लाख थे अर्थात् कुल जनसंख्या के 2% हिस्से से भी कम थे। शुरू से ही यह तलवार का प्रयोग करते थे तथा साधारण जनता की सुरक्षा के लिए लड़ते थे। इसलिए उन्हें तलवार का कुलीन (Nobles of Sword) भी कहा जाता था। यह भी दो भागों में विभाजित थे-पुराने कुलीन तथा नए कुलीन। पुराने कुलीन देश की कुल भूमि के 1/5 हिस्से के मालिक थे। कुलीन की स्थिति पैतृक थी क्योंकि उन्हें वास्तविक तथा पवित्र कुलीन कहा जाता था। यह सभी जागीरदारी होते थे। कुछ समय के लिए इन्होंने प्रशासक, जजों तथा फौजी नेताओं का भी कार्य किया। यह ऐश भरा जीवन जीते थे। इन्हें कई प्रकार के अधिकार प्राप्त थे। नए कुलीन वह कुलीन थे जिन्हें राजा ने पैसे लेकर कुलीन का दर्जा दिया था। इस वर्ग ने 1789 ई० की फ्रांसीसी क्रान्ति की शुरुआत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ समय के बाद इसकी स्थिति भी पैतृक हो गई।

3. तृतीय वर्ग-साधारण जनता (Thrid Order-Commoners)-कुल जनसंख्या के केवल 2% प्रथम दो वर्गों से सम्बन्धित थे तथा 98% जनता तृतीय वर्ग से सम्बन्धित थी। यह वर्ग अधिकार रहित वर्ग था जिसमें अमीर उद्योगपति तथा निर्धन भिखारी भी शामिल थे। किसान, मध्यवर्ग, मज़दूर, कारीगर तथा अन्य निर्धन वर्ग इस समूह में शामिल थे। इन लोगों को किसी भी प्रकार के अधिकार प्राप्त नहीं थे। इस कारण इस समूह ने पूर्ण दिल से 1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति में भाग लिया। उद्योगपति, व्यापारी, शाहूकार, डॉक्टर, वकील, विचारक, अध्यापक, पत्रकार इत्यादि मध्य वर्ग में शामिल थे। मध्य वर्ग ने फ्रांसीसी क्रान्ति की अगुवाई की। मजदूरों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उन्हें तो न केवल कम तनखाह मिलती थी बल्कि उन्हें बेगार (Forced Labour) भी करनी पड़ती थी। इन लोगों ने निर्धनता के कारण ढंगों में भाग लिया। यह लोग क्रान्ति के दौरान भीड़ में शामिल हो गए।

क्रान्ति की शुरुआत (Outbreak of Revolution)-लुई XVI फ्रांस का राजा बना तथा फ्रांस में वित्तीय संकट आया हुआ था। इस कारण उसे देश का रोज़ाना कार्य चलाने के लिए पैसे की आवश्यकता थी। वह लोगों पर नए टैक्स लगाना चाहता था। इस कारण उसे ऐस्टेट जनरल (Estate General) की मीटिंग बुलानी पड़ी जोकि एक बहुत पुरानी संस्था थी। पिछले 150 वर्षों में इसकी मीटिंग नहीं हुई थी। 5 मई, 1789 को ऐस्टेट जनरल की मीटिंग हुई तथा तृतीय वर्ग के प्रतिनिधियों ने मांग की कि सम्पूर्ण ऐस्टेट की इकट्ठी मीटिंग हो तथा वह एक सदन की तरह वोट करें। 20 जून, 1789 को देश की मीटिंग हाल पर सरकारी गार्डों ने कब्जा कर लिया। परन्तु तृतीय वर्ग मीटिंग के लिए बेताब था। इसलिए वह टैनिस कोर्ट में ही नया संविधान बनाने में लग गए। यह फ्रांसीसी क्रान्ति की शुरुआत थी।

फ्रांसीसी क्रान्ति की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना 14 जुलाई, 1789 को हुई। जब पैरिस की भीड़ ने बास्तील जेल पर धावा बोल दिया। उन्होंने सभी कैदियों को स्वतन्त्र करवा लिया। फ्रांस में इस दिन को स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। अब लुई XVI केवल नाम का ही राजा था। नैशनल असेंबली को बनाया गया ताकि फ्रांसीसी संविधान बनाया जा सके। इसने नए कानून बनाने शुरू किए। इसने मशहूर (Declaration of the right of man and citizen) बनाया। इस घोषणापत्र से कुछ महत्त्वपूर्ण घोषणाएं की गई जिसमें कानून के सामने समानता, बोलने की स्वतन्त्रता, प्रेस की स्वतन्त्रता तथा सभी नागरिकों की सरकारी दफ्तरों में पात्रता की घोषणा शामिल थी।

1791 में फ्रांस के राजा ने भागने का प्रयास किया परन्तु उसे पकड़ लिया गया तथा वापस लाया गया। उसे जेल में फेंक दिया गया तथा 21 जनवरी, 1793 को उसे जनता के सामने मार दिया गया। इसके साथ ही फ्रांस को गणराज्य (Republic) घोषित कर दिया गया। परन्तु इसके बाद आतंक का दौर शुरू हुआ तथा जिन कुलीनों, पादरियों तथा क्रान्तिकारियों ने सरकार का विरोध किया, उन्हें मार दिया गया। यह आतंक का दौर लगभग तीन वर्ष तक चला।

1795 में फ्रांस में Directorate की स्थापना हुई। Directorate 4 वर्ष तक चली तथा 1799 में नेपोलियन ने इसे हटा दिया। उसने स्वयं को पहले Director तथा बाद में राजा घोषित कर दिया। इस प्रकार नेपोलियन द्वारा Directorate को हटाने के बाद फ्रांसीसी क्रान्ति खत्म हो गई।

फ्रांसीसी क्रान्ति के प्रभाव (Effects of French Revolution)-फ्रांसीसी क्रान्ति के फ्रांस तथा सम्पूर्ण संसार पर कुछ प्रभाव पड़े जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
1. फ्रांसीसी क्रान्ति का प्रमुख प्रभाव यह था कि इससे पुरानी आर्थिक व्यवस्था अर्थात् जागीरदारी व्यवस्था खत्म हो गई तथा नई आर्थिक व्यवस्था सामने आई। यह नई आर्थिक व्यवस्था पूंजीवाद थी।

2. ऊपर वाले वर्गों अर्थात् पादरी वर्ग तथा कुलीन वर्ग के विशेषाधिकार खत्म कर दिए गए तथा सरकार की तरफ से वापस ले लिए गए। चर्च की सम्पूर्ण सम्पत्ति सरकार ने कब्जे में ले ली। सभी पुराने कानून खत्म कर दिए गए तथा नैशनल असेंबली ने सभी कानून बनाए।

3. सभी नागरिकों को स्वतन्त्रता तथा समानता का अधिकार दिया गया। शब्द ‘Nation’ को नया तथा आधुनिक अर्थ दिया गया अर्थात् फ्रांस केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है बल्कि फ्रांसीसी जनता है। यहां सम्प्रभुता (sovereignty) का संकल्प सामने आया अर्थात् देश के कानून तथा सत्ता सर्वोच्च है।।

4. फ्रांसीसी क्रान्ति का सम्पूर्ण संसार पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा। इसने अन्य देशों के क्रान्तिकारियों को अपनेअपने देशों के निरंकुश राजाओं के विरुद्ध कार्य करने के लिए उत्साहित किया। इससे प्राचीन व्यवस्था खत्म हो गई तथा लोकतन्त्र के आने का रास्ता साफ हुआ। इसने ही स्वतन्त्रता, समानता तथा भाईचारा का नारा दिया। इस क्रान्ति के पश्चात् अलग-अलग देशों में कई क्रान्तियां हुईं तथा राजतन्त्र को लोकतन्त्र में परिवर्तित कर दिया गया।

फ्रांसीसी क्रान्ति ने मानवीय सभ्यता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने यूरोप के समाज तथा राजनीतिक व्यवस्था को पूर्णतया बदल दिया। प्राचीन व्यवस्था के स्थान पर नई व्यवस्था सामने आ गई। फ्रांस में कई क्रान्तिकारी परिवर्तन आए तथा बहुत से कुलीनों को मार दिया गया। इस प्रकार फ्रांसीसी समाज में उनकी भूमिका पूर्णतया खत्म हो गई। नैशनल असेंबली के समय कई नए कानून बनाए गए तथा जिससे समाज में बहुत से बुनियादी परिवर्तन आए। चर्च को राज्य की सत्ता के अन्तर्गत लाया गया तथा उसने राजनीतिक तथा प्रशासकीय कार्यों को दूर रखा गया। प्रत्येक व्यक्ति को कुछ अधिकार दिए गए।

फ्रांसीसी क्रान्ति का अन्य देशों पर काफ़ी अधिक प्रभाव पड़ा। 19वीं शताब्दी के दौरान कई देशों में राजनीतिक क्रान्तियां हुईं। इन देशों की राजनीतिक व्यवस्था पूर्णतया बदल गई। समाजशास्त्र के उद्भव में यह महत्त्वपूर्ण कारण था। इन क्रान्तियों के साथ कई समाजों में अच्छे परिवर्तन आए तथा आरम्भिक समाजशास्त्रियों का यह मुख्य मुद्दा था। कई प्रारम्भिक समाजशास्त्री, जो यह सोचते थे कि क्रान्ति के केवल समाज पर केवल ग़लत प्रभाव होते हैं, अपने विचार परिवर्तित होने को बाध्य हुए। इन समाजशास्त्रियों में काम्ते तथा दुर्थीम प्रमुख हैं तथा इन्होंने इसके अच्छे प्रभावों पर अपने विचार दिए। इस प्रकार फ्रांसीसी क्रान्ति ने समाजशास्त्र के उद्भव (Origin) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 3.
संक्षेप में औद्योगिक क्रान्ति तथा समाजशास्त्र के उद्भव के सम्बन्धों की व्याख्या करें।
उत्तर-
आधुनिक उद्योगों की स्थापना औद्योगिक क्रान्ति के कारण हुई जो इंग्लैंड में 18वीं शताब्दी के अंतिम हिस्से तथा 19वीं शताब्दी के प्रथम हिस्से में शुरू हुई। इसने सबसे पहले ब्रिटेन तथा बाद में यूरोप तथा अन्य देशों के लोगों के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में बहुत से परिवर्तन लाए। इसके दो महत्त्वपूर्ण पक्ष थे-

1. औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में विज्ञान तथा तकनीक का व्यवस्थित प्रयोग विशेषतया नई मशीनों के आविष्कार के क्षेत्र में। इसने उत्पादन व्यवस्था को प्रोत्साहित किया तथा इसने फैक्टरी व्यवस्था तथा वस्तुओं के अधिक उत्पादन पर बल दिया।

2. पुराने समय से हट कर व्यवस्थित मज़दूरी तथा बाज़ार को ढूंढ़ना। चीज़ों का काफ़ी अधिक उत्पादन करना ताकि सम्पूर्ण विश्व के अलग-अलग बाजारों में भेजा जा सके। इन वस्तुओं के उत्पादन में प्रयोग होने वाला कच्चा माल भी अलग-अलग देशों से ही प्राप्त किया गया।

औद्योगिकरण से उन समाजों में उथल-पुथल मच गई जो सदियों से स्थिर थे। नए उद्योगों तथा तकनीक ने सामाजिक तथा प्राकृतिक वातावरण को बदल दिया। किसान ग्रामीण क्षेत्रों को छोड़ कर शहरों की तरफ जाने लग गए। इन समझौतों पर आधारित शहरों में बहुत सी सामाजिक समस्याएं उत्पन्न होनी शुरू हो गईं। परिवर्तन की दिशा का पता नहीं था तथा सामाजिक व्यवस्था के ऊपर बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया।

प्रथम औद्योगिक क्रान्ति 18वीं शताब्दी के दूसरे उत्तरार्द्ध में शुरू हुई परन्तु यह 1850 ई० तक द्वितीय औद्योगिक क्रान्ति में मिल गई। इस समय तकनीकी तथा आर्थिक प्रगति काफ़ी तेज़ हो गई क्योंकि इस समय भाप से चलने वाली मशीनों तथा बाद में बिजली पर आधारित मशीनें सामने आ गयीं। इतिहासकार यह मानते हैं कि औद्योगिक क्रान्ति मानवीय इतिहास में होने वाली सबसे महत्त्वपूर्ण घटना थी।

औद्योगिक क्रान्ति का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। ग्रामीण लोगों ने शहरों की तरफ जाना शुरू कर दिया जहां उन्हें गंदे हालातों में रहना पड़ा। बढ़ी जनसंख्या, बढ़ती मांगें, बढ़ते उत्पादन से नए बाज़ारों की मांग सामने आयी। इस से बड़ी शक्तियों में एशिया तथा अफ्रीका के देशों में क्षेत्र जीतने की होड़ शुरू हुई। पूर्ण संसार की व्यवस्था बदल गई। सम्पूर्ण संसार में अव्यवस्था फैल गई। 1800-1850 ई० के दौरान अलग-अलग वर्गों ने अपने अधिकारों के लिए हड़तालें करनी शुरू कर दी।

औद्योगिक क्रान्ति के महत्त्वपूर्ण विषय जिनसे प्रारम्भिक समाजशास्त्री सम्बन्धित थे वह थे मज़दूरों के हालात, जायदाद का परिवर्तन, औद्योगिक नगर, तकनीक तथा फैक्टरी व्यवस्था। इस पृष्ठभूमि में कुछ विचारक अपने समाज को नया बनाना चाहते थे। जो इन समस्याओं से सम्बन्धित थे वह प्रारम्भिक समाजशास्त्री थे क्योंकि वह इन समस्याओं का व्यवस्थित ढंग से अध्ययन करना चाहते थे। इन विचारकों में अगस्ते काम्ते, हरबर्ट स्पैंसर, इमाईल दुर्थीम, कार्ल मार्क्स तथा मैक्स वैबर प्रमुख थे। यह सभी विचारक अलग-अलग विषयों से आए थे।

अगस्ते काम्ते (1798-1857) को समाजशास्त्र का पितामह भी कहा जाता है। उनके अनुसार जो विधियां भौतिक विज्ञान (Phycis) में प्रयोग की जाती हैं, वह ही समाज के अध्ययन में प्रयोग की जानी चाहिए। इस अध्ययन से उद्विकास (Evolution) के नियम विकसित होंगे तथा समाज के कार्य करने के ढंग सामने आएंगे। जब इस प्रकार का ज्ञान उपलब्ध हो गया तो हम नए समाज की स्थापना कर पाएंगे। इस प्रकार काम्ते ने सामाजिक उद्विकास का सिद्धान्त दिया जिसे हरबर्ट स्पैंसर ने आगे बढ़ाया। स्पैंसर के उद्विकास के विचारों को सामाजिक डार्विनवाद (Social Darwinism) का नाम भी दिया जाता है।

समाजशास्त्र को एक स्वतन्त्र विषय तथा विज्ञान के रूप में स्थापित करने का श्रेय इमाईल दुर्थीम (18581917) को जाता है जो एक फ्रांसीसी समाजशास्त्री थे। दुर्थीम का कहना था कि समाजशास्त्री को सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करना चाहिए जो निष्पक्ष होते हैं। सामाजिक तथ्य व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं परन्तु वह व्यक्तिगत व्यवहार पर दबाव डालने की शक्ति रखते हैं। इस प्रकार सामाजिक तथ्य व्यक्तिगत नहीं होते।

जर्मन समाजशास्त्रियों में कार्ल मार्क्स तथा मैक्स वैबर प्रमुख हैं। मार्क्स (1818-1883) के विचार समाजशास्त्र में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनके अनुसार समाज में हमेशा से ही दो वर्ग रहे हैं जिनके पास है अथवा जिनके पास नहीं है (Have and Have-nots)। उनके अनुसार संघर्ष से ही समाज में परिवर्तन आता है। इस कारण उन्होंने वर्ग तथा वर्ग संघर्ष को सम्बन्ध महत्त्व दिया है। इस प्रकार मैक्स वैबर (1804-1920) की पुस्तकें भी काफ़ी महत्त्वपूर्ण हैं। उनके अनुसार समाजशास्त्री को सामाजिक कार्य (Social Action) के सम्बन्ध समाज का अध्ययन करना चाहिए।

इस प्रकार समाजशास्त्र के विकास में फ्रांस (काम्ते, दीम), जर्मनी (मार्क्स, वैबर) तथा ब्रिटेन (स्पैंसर) ने सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन देशों के समाजों में बहुत-से सामाजिक परिवर्तन आए जिस कारण इन समाजों में 19वीं शताब्दी में समाजशास्त्री का उद्भव तथा विकास हुआ।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव

प्रश्न 4.
भारत में समाजशास्त्र के महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर-
भारत एक ऐसा देश है जहां अलग-अलग संस्कृतियों, जातियों, धर्मों इत्यादि के लोग इकट्ठे मिलकर रहते हैं। भारत पर अनेकों आक्रमणकारियों ने अलग-अलग कारणों के कारण हमले किए जिस वजह से हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था लम्बे समय से विघटित रही है। अंग्रेजों ने भारत पर लगभग 200 वर्ष तक राज किया परन्तु उन्होंने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण भारत में सामाजिक विघटन रोकने के कोई प्रयास नहीं किए। इन हालातों के कारण हमारे देश में कई प्रकार की सामाजिक समस्याएं पैदा हो गईं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए सामाजिक हालातों का पूर्ण ज्ञान ज़रूरी है तथा यह समाजशास्त्र ही दे सकता है।

भारत में देश की आज़ादी के पश्चात् कई प्रकार की सामाजिक संस्थाएं शुरू हुईं जिससे यह स्पष्ट हुआ कि हमारे देश की सामाजिक समस्याओं के निवारण के लिए, समाज के लिए योजनाएं बनाने तथा पूर्ण समाज की संरचना को संगठित रखने के लिए समाजशास्त्र महत्त्वपूर्ण ही नहीं बल्कि ज़रूरी भी है। भारत में समाजशास्त्र का महत्त्व इस प्रकार है-

1. सामाजिक समस्याओं के हल में सहायक (Helpful in solving social problems)-हमारे समाज में अनेक प्रकार की समस्याएं प्रचलित हैं जैसे निर्धनता, भ्रष्टाचार, जातिवाद, भाषावाद, साम्प्रदायिकता, अधिक जनसंख्या इत्यादि। इन समस्याओं का मुख्य कारण सामाजिक हालात ही है। सामाजिक हालातों में परिवर्तन करके ही लोगों के विचारों को परिवर्तित किया जा सकता है जोकि समस्या के हल के लिए ज़रूरी है। समाजशास्त्र इन सामाजिक हालातों के कारकों के बारे में बताता है जिससे इन समस्याओं को समझना आसान हो गया है। इससे इन समस्याओं का हल ढूंढ़ने में आसानी हुई है।

2. ग्रामीण क्षेत्रों के निर्माण में मददगार (Helpful in rural reconstruction)-भारतीय समाज एक ग्रामीण समाज है जहां की ज्यादातर जनसंख्या गांवों में रहती है। हमारे समाज का विकास गांवों के विकास पर निर्भर करता है। हमारे गांवों में अनेक प्रकार की समस्याएं हैं जो न सिर्फ अलग-अलग प्रकृति की हैं बल्कि अपने आप में जटिल भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जातिवाद, बाल विवाह, जाति प्रथा, वहम इत्यादि समस्याएं प्रचलित हैं। इन समस्याओं का मुख्य कारण सामाजिक परिस्थितियां ही हैं। समाजशास्त्र की मदद से इन समस्याओं से सम्बन्धित ज्ञान इकट्ठा किया जा सकता है तथा बदले हुए हालातों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति को सुधारा जा सकता है।

3. शहरों के नियोजन में मददगार (Helpful in Urban Planning)-शहरीकरण तथा औद्योगिकीकरण ने हमारे समाज में कई प्रकार के परिवर्तन पैदा कर दिए हैं। हज़ारों नए व्यवसाय उत्पन्न हो गए हैं जिस वजह से गांवों की जनसंख्या शहरों में बस रही है। बहुत-से शहरों में जनसंख्या काफ़ी ज्यादा हो गई है जिस वजह से गन्दी बस्तियां बढ़ रही हैं। गन्दी बस्तियों से बहुत-सी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं जैसे अपराध, गरीबी, नशा करना इत्यादि। समाजशास्त्र इन सब के सम्बन्ध में ज्ञान इकट्ठा करता है तथा इन समस्याओं के समाधान के बारे में बताता है। इसके अलावा शहरों में भौतिकता में तो परिवर्तन आ रहे हैं परन्तु लोगों के विचारों में परिवर्तन नहीं आ रहे हैं जिससे कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। समाजशास्त्र उन बदले हुए हालातों के बारे में बताता है जिससे शहरों के लिए योजनाएं बनाना काफ़ी आसान हो गया है।

4. जनजातीय कल्याण में सहायक (Helpful in Tribal Welfare)-हमारे देश में नौ करोड़ के लगभग आदिवासी रहते हैं। समाजशास्त्र से हमें इनके बारे में सामाजिक तथा सांस्कृतिक ज्ञान प्राप्त होता है। अगर यह ज्ञान न हो तो इन समाजों को समझाना बहुत मुश्किल है क्योंकि यह लोग हमारी संस्कृति से दूर जंगलों, पहाड़ों में रहते हैं। समाजशास्त्र हमें इनके सामाजिक हालातों के बारे में बताता है जिसके आधार पर इनके कल्याण से सम्बन्धित नीतियां बनाई जाती हैं।

5. श्रमिकों के कल्याण में सहायक (Helpful in labour welfare)-हमारे समाजों का स्वरूप धीरेधीरे औद्योगिक हो रहा है जहां उत्पादन तथा श्रमिकों के सम्बन्ध बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। इन के बीच के सम्बन्धों में तनाव आने से हमारे समाज का आर्थिक विकास ही नहीं बल्कि सामाजिक सम्बन्ध तथा विकास भी प्रभावित होता है। चाहे स्वतन्त्रता के बाद श्रमिकों के कल्याण के लिए कई प्रकार के कानून बनाए गए हैं परन्तु इन का लाभ तभी प्राप्त होगा अगर इनको मानवीय दृष्टिकोण से विकसित किया जाए। यह दृष्टिकोण हमें समाजशास्त्र के ज्ञान से ही प्राप्त होता है।

6. राजनीतिक समस्याओं में मददगार (Helpful in political problems)-हमारे देश में बहुत सारे राजनीतिक दल हैं जिस वजह से राजनीतिक समस्याएं दिन प्रतिदिन बढ़ रही हैं। दल लोगों में झगड़े करवाते हैं। समाजशास्त्र के ज्ञान की मदद से अलग-अलग समुदायों की राजनीतिक, साम्प्रदायिक समस्याओं को कम किया जा सकता है तथा उनका हल निकाला जा सकता है। . इस तरह इस विवरण से यह स्पष्ट है कि हमारे देश के विकास के लिए योजनाएं बनाने में तथा हमारे समाज में फैली समस्याओं को खत्म करने में समाजशास्त्र का ज्ञान काफ़ी महत्त्व रखता है। अगर यह ज्ञान सारी जनसंख्या तक फैला दिया जाए तो हमारा समाज भी प्रगति करेगा तथा इसमें मिलने वाली समस्याएं भी धीरे-धीरे कम हो जाएंगी।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 1 समाजशास्त्र का उद्भव

समाजशास्त्र का उद्भव PSEB 11th Class Sociology Notes

  • समाजशास्त्र का उद्भव एक नई घटना है तथा इसके बारे में निश्चित समय नहीं बताया जा सकता कि यह कब विकसित हुआ। प्राचीन समय में बहुत से विद्वानों जैसे कि हैरोडोटस, प्लेटो, अरस्तु इत्यादि ने काफ़ी कुछ लिखा जो कि आज के समाज से काफ़ी मिलता-जुलता है।
  • एक विषय के रूप में समाजशास्त्र का उद्भव 1789 ई० की फ्रांसीसी क्रान्ति के बाद शुरू हुआ जब समाज में बहुत-से परिर्वतन आए। बहुत से विद्वानों जैसे कि अगस्ते काम्ते, हरबर्ट स्पैंसर, इमाईल दुर्थीम तथा मैक्स वैबर ने सामाजिक व्यवस्था, संघर्ष, स्थायीपन तथा परिवर्तन के अध्ययन पर बल दिया जिस कारण समाजशास्त्र विकसित हुआ।
  • तीन मुख्य प्रक्रियाओं ने समाजशास्त्र को एक स्वतन्त्र विषय के रूप में स्थापित करने में सहायता की तथा वह थी (i) फ्रांसीसी क्रान्ति तथा नवजागरण का आंदोलन (ii) प्राकृतिक विज्ञानों का विकास तथा (iii) औद्योगिक क्रान्ति तथा नगरीकरण।
  • 1789 ई० की फ्रांसीसी क्रान्ति में बहुत से विद्वानों ने योगदान दिया। उन्होंने चर्च की सत्ता को चुनौती दी तथा लोगों को बिना सोचे-समझे चर्च की शिक्षाओं को न मानने के लिए कहा। लोग इस प्रकार अपनी समस्याओं को तर्कपूर्ण ढंग से निपटाने के लिए उत्साहित हुए।
  • 16वीं से 17वीं शताब्दी के बीच प्राकृतिक विज्ञानों ने काफ़ी प्रगति की। इस प्रगति ने सामाजिक विचारकों को भी प्रेरित किया कि वह भी सामाजिक क्षेत्र में नए आविष्कार करें। यह विश्वास सामने आया कि जिस प्रकार प्राकृतिक विज्ञानों की सहायता से जैविक संसार को समझने में सहायता मिली, क्या उस ढंग को सामाजिक घटनाओं पर भी प्रयोग किया जा सकता है ? काम्ते, स्पैंसर, दुर्थीम जैसे समाजशास्त्रियों ने उस ढंग से सामाजिक घटनाओं को समझने का प्रयास किया तथा वे सफल भी हुए।
  • 18वीं शताब्दी में यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति शुरू हुई जिससे उद्योग तथा नगर बढ़ गए। नगरों में कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो गईं तथा उन्हें समझने तथा दूर करने के लिए किसी विज्ञान की आवश्यकता महसूस की गई। इस प्रश्न का उत्तर समाजशास्त्र के रूप में सामने आया।
  • अगस्ते काम्ते ने 1839 ई० में सबसे पहले समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग किया तथा उन्हें समाजशास्त्र का पितामह कहा जाता है। समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ है समाज का विज्ञान।
  • कई विद्वान् समाजशास्त्र को एक विज्ञान का दर्जा देते हैं क्योंकि उनके अनुसार समाजशास्त्र वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करता है, यह निष्कर्ष निकालने में सहायता करता है, इसके नियम सर्वव्यापक होते हैं तथा यह भविष्यवाणी कर सकता है।
  • कुछेक विद्वान् समाजशास्त्र को विज्ञान नहीं मानते क्योंकि उनके अनुसार समाजशास्त्र में परीक्षण करने की कमी होती है, इसमें निष्पक्षता नहीं होती, इसमें शब्दावली की कमी होती है, इसमें आँकड़े एकत्र करने में मुश्किल होती है इत्यादि।
  • समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र के बारे में दो सम्प्रदाय प्रचलित हैं तथा वह हैं स्वरूपात्मक सम्प्रदाय (Formalistic School) तथा समन्वयात्मक सम्प्रदाय (Synthetic School)।
  • स्वरूपात्मक सम्प्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र एक स्वतन्त्र विज्ञान है जो सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन करता है जो कोई विज्ञान नहीं करता है। जार्ज सिमेल, टोनीज़, वीरकांत तथा वान वीजे इस सम्प्रदाय के समर्थन हैं।
  • समन्वयात्मक सम्प्रदाय के अनुसार समाजशास्त्र एक स्वतन्त्र विज्ञान नहीं है। बल्कि यह अन्य सभी सामाजिक विज्ञानों का मिश्रण है जो अपनी विषय सामग्री अन्य सामाजिक विज्ञानों से उधार लेता है। दुर्थीम, हाबहाऊस, सोरोकिन इत्यादि इस सम्प्रदाय के प्रमुख समर्थक हैं।
  • समाजशास्त्र का हमारे लिए काफ़ी महत्त्व है क्योंकि यह अलग-अलग प्रकार की संस्थाओं का अध्ययन करता है, यह समाज के विकास में सहायता करता है, यह सामाजिक समस्याओं को हल करने में सहायता करता है तथा यह आम जनता के कल्याण के कार्यक्रम बनाने में सहायता करता है।
  • व्यक्तिवाद (Individualism)-वह भावना जिसमें व्यक्ति समाज के बारे में सोचने के स्थान पर केवल अपने बारे में सोचता है।
  • पूँजीवाद (Capitalism)-आर्थिकता की वह व्यवस्था जो बाज़ार के लेन-देन पर आधारित है। पूँजी का अर्थ है कोई सम्पत्ति जिसमें पैसा, इमारतें, मशीनें इत्यादि शामिल हैं जो बिक्री के लिए उत्पादन में प्रयोग की जाती हैं अथवा बाज़ार में लाभ कमाने के उद्देश्य से ली या दी जा सकती हैं। यह व्यवस्था उत्पादन के साधनों तथा सम्पत्तियों के व्यक्तिगत स्वामित्व पर आधारित है।
  • मूल्य (Value)-व्यक्ति अथवा समूह द्वारा माना जाने वाला विचार कि क्या आवश्यक है, सही है, अच्छा है अथवा गलत है।
  • समष्टि समाजशास्त्र (Macro Sociology)-बड़े समूहों, संगठनों तथा सामाजिक व्यवस्थाओं का अध्ययन।
  • व्यष्टि समाजशास्त्र (Micro Sociology)-आमने-सामने की अन्तक्रियाओं के संदर्भ में मानवीय व्यवहार का अध्ययन।
  • औद्योगीकरण (Industrialisation) सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तन का वह समय जिसने मानवीय समूह को ग्रामीण समाज से औद्योगिक समाज में बदल दिया।
  • नगरीकरण (Urbenisation)-वह प्रक्रिया जिसमें अधिक-से-अधिक लोग नगरों में जाकर रहने लग जाते हैं। इसमें नगरों में बढ़ौतरी होती है।

PSEB 7th Class Home Science Practical बच्चों के बूट

Punjab State Board PSEB 7th Class Home Science Book Solutions Practical बच्चों के बूट Notes.

PSEB 7th Class Home Science Practical बच्चों के बूट

बूट बनाना
एक 10 नम्बर की सलाई पर 40 कुंडे डालते हैं। एक कुंडा सीधा तथा एक उल्टा डालकर सारी सलाई बनाते हैं। इसी तरह 3 या 5 सलाइयाँ और बुन लेते हैं। आखिरी सलाई में एक कुंडा बढ़ा लेते हैं। (41)
बुनाई-

  • 3 सीधे, 2 उल्टे,
  • 2 सीधे, 2 उल्टे,
  • से लेकर अन्त तक इसी तरह बुनते हैं।

इस तरह 25 सलाइयां और बुनते हैं।
छिद्रों वाली पंक्ति-1 सीधा, धागा आगे, 1 सीधा जोड़ा, इसी तरह पूरी सलाई बुनते हैं, आखिरी 2 कुंडे सीधे बुनते हैं।
PSEB 7th Class Home Science Practical बच्चों के बूट 1
चित्र 7.II.1. बूट
बुनाई की 3 और सलाइयां चढ़ाते हैं। ऊन तोड़ देते हैं। पैर के ऊपर का भाग बनाने के लिए कुंडों को इस तरह बाँटते हैं- पहले तथा आखिरी 14 कुंडे सलाई से उतार कर बक्सूए या फालतू सलाइयों पर चढ़ा लेते हैं। सीधा किनारा सामने रखकर ऊन को बीच के कुंडों से जोड़ते हैं तथा इन 13 कुंडों पर 28 सलाइयाँ बुनाई की डालते हैं। ऊन तोड़ देते हैं। सीधा किनारा सामने रखते हैं। पहली फालतू सलाई के 14 कुंडे बुनते हैं, फिर पैर के ऊपर के भाग की ओर 14 कुंडे उठाते हैं। पैर के ऊपर वाले भाग में 13 कुंडे बुनते हैं, दूसरी ओर से फिर 14 कुंडे उठाते हैं तथा फिर दूसरी सलाई के 14 कुंडे बुनते हैं । (कुल—69)

PSEB 7th Class Home Science Practical बच्चों के बूट

11 सलाइयाँ सीधी बुनते हैं।
एडी तथा पंजा की गोलार्ड बनाना
पहली सलाई-1 सीधा, 1 जोड़ा, 26 सीधे, 1 जोड़ा, 5 सीधे, 1 जोड़ा, 26 सीधे, 1 जोड़ा, 2 सीधे।
दूसरी सिलाई-1 सीधा, 1 जोड़ा, 26 सीधे, (अगली 12 सलाइयों में हर सलाई पर इस जगह पर 2 कुंडे घटाते जाते हैं) जैसे 25 फिर (23-21) 1 जोड़ा, 5 सीधे, 1 जोड़ा, 23 सीधे (यहाँ भी हर सलाई पर 2-2 कुंडे घटाते जाते हैं। 1 जोड़ा, 1 सीधा।) अन्तिम 2 सलाइयों को 6 बार और बुनते हैं, प्रत्येक बार ऊपर बनाए स्थान पर 2-2 कुंडे घटाते जाते हैं ताकि अन्त में कुल 37 कुंडे रह जाएं। सभी कुंडे बंद कर देते हैं।
दूसरा बूट भी इसी तरह बनाते हैं।

पूरा करना-किसी मेज़ पर एक कंबल तथा उसके ऊपर चादर बिछाकर बूटों को उल्टा करके रखते हैं तथा ऊपर हल्की गर्म प्रैस करते हैं। टाँग और पैर के नीचे वाले भाग की सलाई करते हैं। तखने के पास जो छिद्र बनाए थे उनमें रिबन डाल देते हैं।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 8 परिवार

Punjab State Board PSEB 10th Class Home Science Book Solutions Chapter 8 परिवार Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Home Science Chapter 8 परिवार

PSEB 10th Class Home Science Guide परिवार Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
परिवार से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
परिवार समाज की मूल इकाई है और सामाजिक बनावट का आधार है। परिवार उन लोगों का एक समूह है जिनका आपसी खून या कानून का सम्बन्ध हो, एक घर में रहते हों और सांझी सम्पत्ति का प्रयोग करते हों, एक-दूसरे से भावनात्मक साँझ हो, साँझे दुःख-सुख हों तथा आवश्यकता पड़ने पर एक दूसरे की सहायता करें।

प्रश्न 2.
समाज की रचना का आधार क्या है?
उत्तर-
समाज की बनावट का आधार परिवार है। परिवार एक समाज की प्रारम्भिक इकाई है। परिवारों से मिल कर ही एक समाज जन्म लेता है। व्यक्ति परिवारों द्वारा समाज
से जुड़ते हैं और समाज में रहना सीखते हैं। परिवार की संस्था अस्तित्व में आने के पश्चात् ही समाज ने जन्म लिया है।

प्रश्न 3.
परिवार के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
मुख्यतः परिवार की दो किस्में हैं
1. संयुक्त परिवार – संयुक्त परिवार एक बड़ा परिवार होता है। संक्षेप में जिस घर में तीन पीढ़ियों के सदस्य एक स्थान, एक घर में रहते हों तथा परिवार के साधनों को साँझे रूप में प्रयोग करते हों को संयुक्त परिवार कहा जाता है।
2. इकाई परिवार – यह परिवार छोटा परिवार होता है जिसमें माता-पिता और उनके बच्चे रहते हों उसको इकाई परिवार कहा जाता है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 8 परिवार

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 4.
संयुक्त परिवार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
संयुक्त परिवार एक बड़ा परिवार होता है जिसमें माँ-बाप, उनके बच्चे और पोते-पोतियां इकट्ठे रहते हैं। इस परिवार में सब की साँझी कमाई होती है और घर के सभी सदस्य उसी कमाई से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। यह परिवार एक छत के नीचे रहता है और एक ही चूल्हे पर रोटी खाता है। दुःख-सुख में सारे परिवार के सदस्य इकट्ठे रहते हैं। परन्तु आजकल इस तरह के परिवार घटते जा रहे हैं।

प्रश्न 5.
इकाई परिवार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
इकाई परिवार एक छोटा परिवार होता है। इकाई परिवार में मां-बाप और उनकी सन्तान रहती है। यह एक स्वतन्त्र इकाई है। पश्चिमी देशों की तरह हमारे देश में भी इकाई परिवारों की संख्या बढ़ती जा रही है। मां-बाप की आय इस घर में कमाई का स्रोत होती है जिसको बच्चे और मां-बाप मिलकर खर्च करते हैं। इस तरह के परिवारों के सदस्यों में जहां स्वतन्त्रता और स्व: विश्वास की भावना बढ़ती है वहां स्वार्थ की भावना भी इस तरह के परिवार को अपने निकट सम्बन्धियों को इनसे दूर करती है।

प्रश्न 6.
संयुक्त परिवार की विशेषताएं क्या हैं?
अथवा
संयुक्त परिवार के क्या लाभ हैं?
उत्तर-

  1. संयुक्त परिवार में साँझी कमाई होती है जो आवश्यकता के समय काम आती है।
  2. इस परिवार में सभी कार्य विभाजित किए जाते हैं, एक सदस्य पर बोझ नहीं पड़ता।
  3. संयुक्त परिवार में बुजुर्ग, विधवा, अंगहीन या बच्चों को बहुत सहारा मिलता है।
  4. आजकल मां-बाप के पास बच्चों के लिए समय कम होता है और संयुक्त परिवार में बच्चे दादा-दादी से बहुत कुछ सीखते हैं।
  5. संयुक्त परिवार के सदस्यों में सहयोग और कुर्बानी की भावना अधिक होती है।
  6. संयुक्त परिवार में इकट्ठे रहने से परिवार का खर्च कम हो जाता है और बचत बढ़ जाती है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 8 परिवार

प्रश्न 7.
संयुक्त परिवार होने की क्या हानियां हैं?
उत्तर-
आजकल संयुक्त परिवारों की संख्या काफ़ी कम होती जा रही है। संयुक्त परिवारों के कई फायदे और कई नुकसान हैं। संयुक्त परिवार की हानियां निम्नलिखित हैं
नुकसान-

  1. संयुक्त परिवार में आर्थिक सुरक्षा के कारण परिवार के कई सदस्य निकम्मे और आलसी बन जाते हैं।
  2. कई बार लायक बच्चों के व्यक्तित्व का विकास नहीं होता क्योंकि परिवार में सभी को बराबर समझा जाता है।
  3. संयुक्त परिवार में औरतों को बहुत कम स्वतन्त्रता होती है।
  4. परिवार के कई सदस्यों को अपने पैरों पर स्वयं खड़े होने का अवसर नहीं मिलता।
  5. संयुक्त परिवार में आर्थिक स्वतन्त्रता कम होती है।

प्रश्न 8.
इकाई परिवार की विशेषताएं कौन-सी हैं?
उत्तर-
औद्योगीकरण और शहरीकरण से इकाई परिवारों की संख्या बढ़ रही है। इस प्रकार के परिवारों की विशेष बातें इस प्रकार हैं

  1. इस परिवार के सदस्य एक-दूसरे के अधिक निकट होते हैं।
  2. इस परिवार में आर्थिक स्वतन्त्रता होती है। पति-पत्नी अपनी इच्छा से खर्च कर सकते हैं।
  3. इस परिवार को एक या दो व्यक्तियों की कमाई पर ही गुज़ारा करना पड़ता है।
  4. इस तरह के परिवारों में घर के काम का सारा बोझ गृहिणी पर ही पड़ता है।
  5. इस परिवार के सदस्य बड़े-बूढ़ों के तुजुर्बो से लाभ नहीं उठा सकते।

प्रश्न 9.
छोटे परिवार का महत्त्व क्या है?
उत्तर-
बच्चे के सही पालन-पोषण के लिए परिवार का छोटा होना आवश्यक है। बड़े परिवार में बच्चे प्रायः अभावों का शिकार रहते हैं। किसी की सभी आवश्यकताएं पूर्ण नहीं होती। इसलिए परिवार की खुशी के लिए निम्नलिखित कारणों से परिवार छोटा होना चाहिए

  1. आपसी प्यार-छोटे परिवारों में आपसी प्यार की भावना अधिक देखने को मिलती है।
  2. आर्थिक विकास-छोटे परिवार में खर्च कम होने के कारण सब की आवश्यकताएं पूर्ण होने पर भी बचत हो सकती है जिससे परिवार आर्थिक विकास करता है।
  3. सर्वपक्षीय विकास-छोटे परिवार में मां-बाप बच्चों की ओर व्यक्तिगत ध्यान दकर उनकी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक आवश्यकताएँ पूर्ण करके उनका सर्वपक्षीय विकास कर सकते हैं।
  4. बच्चों में आत्म-विश्वास-बच्चों की आवश्यकताएं पूर्ण होने के कारण उनका सर्वपक्षीय विकास होता है और उनमें आत्म-विश्वास की भावना बढ़ती है।
  5. जनसंख्या में कम वृद्धि-छोटे परिवार होने से देश की जनसंख्या में कम वृद्धि होती है। इस से देश का आर्थिक विकास तेजी से होता है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 8 परिवार

प्रश्न 10.
छोटे परिवार के क्या लाभ हैं?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 11.
बच्चों में दूरी रखने का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
छोटे परिवार के होने के साथ-साथ बच्चों में अधिक दूरी होना भी आवश्यक है। क्योंकि गर्भ के समय मां को पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। यदि भोजन में कैल्शियम, लोहा, प्रोटीन, विटामिन आदि की भोजन में उचित मात्रा न हो तो माँ का स्वास्थ्य कमज़ोर पड़ जाता है। यदि दूसरा बच्चा भी जल्दी ही आ जाए तो उससे माँबच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर और भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त फासला कम होने की स्थिति में माँ के लिए दोनों बच्चों की संभाल और भी मुश्किल होती है। इसलिए मां-बच्चे के स्वास्थ्य का ध्यान, बच्चों की सही देखभाल और आर्थिक तत्त्वों को ध्यान रखते हुए यह कहना बिल्कुल ठीक है कि बच्चों के बीच कम-से-कम तीन वर्ष का फासला होना आवश्यक है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 12.
संयुक्त तथा इकाई परिवार की तुलना करो तथा दोनों के लाभ तथा हानियां बताओ।
उत्तर-

संयुक्त परिवार इकाई परिवार
1. यह परिवार बड़ा होता है। 1. यह परिवार छोटा होता है।
2. इस परिवार में आय सांझी होती है। 2. इस परिवार में आय केवल मां या बाप की होती है।
3. इस परिवार में इकट्ठे रहने से खर्च कम होता है। 3. इस परिवार के प्रारम्भिक खर्चे अधिक होते हैं।
4. इसमें काम बंटा होने के कारण गृहिणियों को कुछ आराम मिल जाता है। 4. इस परिवार के घर का सारा काम गृहिणी को करना पड़ता है।
5. इस परिवार के बच्चे दादा-दादी से बहुत कुछ सीखते हैं। 5. इस परिवार के बच्चे दादा-दादी के प्यार से वंचित रह जाते हैं।
6. इस परिवार में आर्थिक स्वतन्त्रता कम होती है। सभी सदस्य घर के मुखिया से पैसे लेकर खर्च करते हैं। 6. इस परिवार में पति-पत्नी आर्थिक रूप से स्वतन्त्र रहते हैं।

संयुक्त तथा इकाई परिवार के लाभ-इसके उत्तर के लिए प्रश्न 6 और 8 का उत्तर लिखो।

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प्रश्न 13.
(i) बच्चों में दूरी रखने से परिवार में आर्थिक समृद्धि होती है। इस तथ्य की पुष्टि करें।
अथवा
बच्चों में दूरी रखने का क्या महत्त्व है? विस्तारपूर्वक लिखें।
(ii) आर्थिक समृद्धि के लिए छोटा परिवार तथा बच्चों में दूरी होना क्यों आवश्यक है?
(iii) छोटे परिवार में आपसी प्यार कैसे बढ़ता है तथा इसका समूचे परिवार की सेहत पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
(i) बच्चों के जन्म के बीच आवश्यक दूरी होना बहुत जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार एक बच्चे और दूसरे बच्चे के जन्म के बीच कम-से-कम तीन वर्ष की दूरी होना मां और बच्चे के स्वास्थ्य और घर की खुशहाली के लिए और भी आवश्यक है।

बच्चों के जन्म में दूरी रखने का महत्त्व छोटा परिवार होने के साथ-साथ बच्चों में अधिक दूरी होना भी आवश्यक है क्योंकि गर्भ के समय मां को पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। यदि भोजन में प्रोटीन, कैल्शियम और लोहे की उचित मात्रा न हो तो बच्चे को सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि बच्चा मां के शरीर से इन तत्त्वों को प्राप्त करता है। इसी कारण मां में भी इन तत्त्वों की कमी हो जाती है। यदि बच्चों में फासला कम हो तो मां में इन तत्त्वों की कमी पूरी नहीं हो सकती और वह बहुत कमजोर हो जाती है। जल्दी-जल्दी बच्चे होने के कारण जन्म के पश्चात् भी मां-बच्चे की ओर पूरा समय और ध्यान नहीं दे सकती। जिस कारण बच्चों की ठीक देखभाल नहीं होती। इसलिए बच्चों में दूरी रखने का महत्त्व निम्नलिखित अनुसार है

  1. लिंग सम्बन्धी संतुष्टि-परिवार में मां-बाप की मानसिक शान्ति बहुत आवश्यक है जिसका काफ़ी सम्बन्ध लिंग भावना की संतुष्टि के साथ जुड़ा हुआ है। अधिक बच्चों का भार मां-बाप को बच्चों के साथ उलझाए रखता है जिससे उनकी अपनी लिंग भावना की पूर्ति ठीक ढंग से नहीं हो सकती। वह चिड़चिड़े से बन जाते हैं।
  2. बच्चों की सही देखभाल-यदि बच्चों में फासला होगा तो उनका पालन पोषण भी सही ढंग से हो सकता है और वह प्रत्येक पक्ष से विकसित होंगे और उनका स्वास्थ्य भी अच्छा होगा।
  3. आर्थिक रूप में खुशहाल-फासले से बच्चा होने के समय आर्थिक मुश्किल कम आती है क्योंकि फासले के दौरान बचाया पैसा अगले बच्चे के लिए प्रयोग किया जा सकता है और कुछ पैसा घर की खुशहाली के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है।
  4. मनोरंजन की पूर्ति-खेल बच्चों के लिए बहुत आवश्यक है। यदि बच्चों में फासला होगा तो मां-बाप उनके साथ मनोरंजन कर सकेंगे। उनके साथ थोड़ा बहुत खेल सकेंगे, टी० वी० देख सकेंगे या पार्क आदि में भी जा सकते हैं। इस तरह दोनों का ही मनोरंजन होगा।
  5. मां-बाप के लिए अधिक समय-कम फासले के बच्चे होने से मां-बाप बच्चों के साथ ही उलझे रहते हैं परन्तु यदि बच्चों में फासला होगा तो मां-बाप के पास भी अन्य रुचियों के लिए समय मिल सकता है।
  6. मृत्यु-दर में कमी-बच्चों में फासला रखने से उनकी देखभाल अच्छी होगी और जिसके कारण स्वास्थ्य अच्छा होगा और इस तरह बच्चों की मृत्यु-दर में कमी आएगी। आजकल प्रत्येक स्त्री, पुरुष अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और विकास के अवसर देना चाहता है। इसलिए परिवार नियोजित करना आवश्यक हो जाता है।

छोटा परिवार और आर्थिक खुशहाली आजकल महंगाई के ज़माने में परिवार की आर्थिक खुशहाली का परिवार के आकार से सीधा सम्बन्ध है। घर की बहुत-सी समस्याएं परिवार के छोटा होने से ही हल हो सकती हैं। . बच्चों की सही देखरेख के लिए आवश्यक हो जाता है कि परिवार छोटा हो। किसी के पास समय और पैसा नहीं कि बहुत-से बच्चों की देख-रेख कर सके। वैसे भी संसार में प्रत्येक वस्तु की कमी होती जा रही है और भारत जैसे देश में तो बड़े परिवारों की आवश्यकता नहीं जहां हज़ारों समस्याएं केवल जनसंख्या की वृद्धि से जुड़ी हुई हैं। इसलिए बच्चों के सर्वपक्षीय विकास के लिए परिवार छोटे-से-छोटा हो ताकि बच्चे सही ढंग से पल कर बड़े हों और ठीक जीवन व्यतीत कर सकें। बड़े परिवार में अधिक बच्चे सदैव भूख का शिकार ही रहते हैं। इसलिए हमारी सरकार और समाज छोटे परिवार का नारा लगा रहे हैं। हम कह सकते हैं निम्नलिखित कारणों से परिवार छोटा चाहिए —

  1. आपसी प्यार — छोटे परिवार में आपसी प्रेम भावना अधिक होती है क्योंकि कम बच्चे मिल कर माता-पिता के पास बैठ सकते हैं। इस तरह एक-दूसरे का प्यार और सम्मान ले सकते हैं।
  2. आर्थिक विकास — बच्चे कम होने से उनकी लगभग सभी आवश्यकताएं आसानी से पूरी हो जाती हैं। इस तरह हर तरह का खर्चा किया जा सकता है और कुछ पैसे बचाए भी जा सकते हैं।
  3. सर्वपक्षीय विकास — छोटे परिवार में मां-बाप बच्चे की ओर व्यक्तिगत ध्यान देकर उनकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और आध्यात्मिक आवश्यकताएं पूर्ण करके उनका सर्वपक्षीय विकास कर सकते हैं। बच्चों को अच्छी और उच्च शिक्षा दी जा सकती है। आजकल स्कूल में दाखला लेने से लेकर बच्चों की नौकरी लगाने पर बहुत मुश्किल मुकाबला होता है जिसके लिए अधिक ध्यान की आवश्यकता होती है, जोकि बड़े परिवार वाले घर में मां नहीं दे सकती।
  4. पारिवारिक स्तर की ऊँचाई-छोटे परिवार में बच्चों की आवश्यकताएं पूर्ण करने के उपरान्त कुछ पैसे बचाए जा सकते हैं जिससे बाजार में जो कई तरह की वस्तुएं मिलती हैं उनको प्राप्त किया जा सकता है। बड़े परिवार की प्रारम्भिक आवश्यकताओं पर ही इतना खर्च हो जाता है कि दूसरे खर्च फिजूल लगते हैं। टी० वी०, कम्प्यूटर आदि केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि बच्चों का मानसिक स्तर भी ऊँचा करते हैं।
  5. ज़िम्मेदारियों की कमी-पुराने समय में जब परिवार में बच्चों की संख्या अधिक होती थी तो माताओं को सारा दिन रसोई में रोटी आदि पकाने से ही फुर्सत नहीं मिलती थी। छोटे परिवार से मां-बाप की ज़िम्मेदारियों की सिरदर्दी काफ़ी कम होती है।
  6. समूचे परिवार का स्वास्थ्य-कम बच्चों से जहां बच्चों के स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जा सकता है, वहाँ मां-बाप का स्वास्थ्य भी विशेष रूप में ठीक रहता है। जिस कारण वह बच्चों की ओर आसानी से अधिक समय ध्यान रख सकते हैं और उनकी आवश्यकताएँ पूर्ण कर सकते हैं।
  7. बच्चों में आत्म-विश्वास-जो बच्चे कमियों में रहते हैं, स्कूल में फटे-पुराने फैशन के कपड़े पहनते हैं उनमें कई बार हीनता की भावना आ जाती है जिसका उनके व्यक्तित्व पर बुरा प्रभाव पड़ता है। बच्चों में आत्म-विश्वास पैदा करने के लिए आवश्यक है कि उनको पूर्ण सुविधाएं मिलें जो कि छोटे परिवार में ही सम्भव हैं।
  8. देश की जनसंख्या को ठीक रखना-भारत की जनसंख्या 100 करोड़ से भी बढ़ गई है। इसका अधिक लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। नौकरियां कम और नौकरियां लेने वालों की संख्या अधिक होने के कारण सभी को नौकरी नहीं मिलती या उनकी योग्यता के अनुसार छोटी नौकरी मिलती है जिस कारण अराजकता पैदा होती है और कई बच्चे नशा करने लग जाते हैं या आत्महत्या करने की भी सोचते हैं। इसलिए छोटे परिवार में प्रत्येक बच्चे पर व्यक्तिगत रूप में ध्यान दिया जा सकता है। परिवार को छोटा रखने के लिए अच्छा होगा कि परिवार को देर से शुरू किया जाए। इसका यह फायदा है कि पति पत्नी को एक-दूसरे को समझने के लिए अधिक समय मिल जाता है और उनकी आर्थिक स्थिति भी सुधर जाती है।
    (ii) देखें भाग (i)
    (iii) देखें भाग (i)

प्रश्न 14.
बच्चों में दूरी रखने के महत्त्व को समझने से बच्चों की मृत्य-दर में कमी आई है। इस तथ्य की पुष्टि करें।
उत्तर-
एक बच्चे और दूसरे बच्चे के जन्म के बीच आवश्यक फासला होना बहुत ज़रूरी है। विशेषज्ञ अनुसार एक बच्चे के जन्म और दूसरे बच्चे के जन्म में कम-से कम तीन साल का फासला होना चाहिए जो माँ और बच्चे के स्वास्थ्य और घर की खुशहाली के लिए आवश्यक है। आज से 25-30 वर्ष पहले लोगों को छोटे परिवार और बच्चों के बीच फासले का महत्त्व नहीं मालूम नहीं था। पर विद्या का प्रसार होने से लोग छोटे परिवार और बच्चों के जन्म में फासले को समझने लगे हैं। बच्चों के जन्म के ठीक फासले का स्वास्थ्य पक्ष से मां और बच्चे दोनों को लाभ है। गर्भ अवस्था में मां को सन्तुलित भोजन की आवश्यकता होती है। यदि उस समय बच्चा मां का दूध पी रहा हो तो एक समय में दोनों बच्चों को मां के शरीर से पौष्टिक खुराक नहीं मिल सकती। इससे मां के शरीर में खनिज और विटामिन कम हो जाते हैं। परिणामस्वरूप मां का शरीर कमजोर हो जाता है। इससे गर्भ वाले बच्चे को और दूध पी रहे बच्चे को सन्तुलित भोजन नहीं मिलता और दोनों बच्चे और मां कमज़ोर हो जाते हैं। परिणामस्वरूप किसी गम्भीर बीमारी का शिकार हो सकते हैं। पुराने समय में जब बच्चे अधिक संख्या में होते थे और उनके बीच फासला कम होता था तो बच्चा जच्चा दोनों की मृत्यु-दर अधिक थी। परन्तु लोगों को छोटे परिवार और बच्चों के जन्म में फासले के महत्त्व का मालूम हो चुका है। शिक्षा के कारण गर्भवती मां की खुराक की ओर अधिक ध्यान दिया जाता है और ठीक फासला होने के कारण जच्चा बच्चा दोनों का स्वास्थ्य ठीक रहता है। इसलिए बच्चों की मृत्यु-दर में काफ़ी कमी आई है।

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प्रश्न 15.
(क) आर्थिक समृद्धि के लिए छोटा परिवार और बच्चों में दूरी रखना क्यों आवश्यक है?
(ख) छोटे परिवार का पूरे परिवार की सेहत पर क्या असर पड़ता है और यह देश की आबादी को कैसे ठीक रखता है?
उत्तर-
इसके लिए देखें प्रश्न 13 का उत्तर।

Home Science Guide for Class 10 PSEB परिवार Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
समाज की प्रारम्भिक इकाई क्या है?
उत्तर-
परिवार।

प्रश्न 2.
परिवार कितने प्रकार के हैं?
उत्तर-
दो, संयुक्त परिवार तथा इकाई परिवार।

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प्रश्न 3.
कौन-सा परिवार छोटा होता है?
उत्तर-
इकाई परिवार।

प्रश्न 4.
कौन-से परिवार में प्रारम्भिक खर्च अधिक होते हैं?
उत्तर-
इकाई परिवार में।

प्रश्न 5.
कौन-से परिवार में पति-पत्नी आर्थिक रूप से आज़ाद नहीं होते हैं?
उत्तर-
संयुक्त परिवार में।

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प्रश्न 6.
परिवार के एक महत्त्वपूर्ण कार्य का वर्णन करें।
उत्तर-
समाजीकरण तथा भाषा विकास।

प्रश्न 7.
बच्चों की आयु में अन्तर रखने का एक कारण बताएँ।
उत्तर-
बच्चों की अच्छी देखभाल हो जाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयुक्त परिवार की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्न में।

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प्रश्न 2.
इकाई परिवार की दो हानियां बताएं।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 3.
माता-पिता की अनुपस्थिति में दादा-दादी द्वारा तीन वर्षीय बच्चे की देखभाल के दो उपयोग बताइये।
उत्तर-
आजकल औरतें भी नौकरी करती हैं या घर के अन्य कार्यों के लिए घर से बाहर जाती हैं तथा बच्चे घर पर छोड़ने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में घर पर दादा-दादी हों तो बच्चों की देखभाल की चिन्ता नहीं रहती। दादी अनुभवी होती है तथा वह बच्चों की देखभाल अच्छी प्रकार कर सकती है तथा दादा-दादी का मन भी लगा रहता है। दादादादी को पोते-पोतियों से प्यार भी बहुत होता है।

प्रश्न 4.
संयुक्त परिवार से क्या हानियां हैं? पूर्ण जानकारी दीजिए।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में ।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयुक्त परिवार और इकाई परिवार के बारे विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर-
इकाई परिवार में मां-बाप और उनकी संतान इकट्ठे रहते हैं। यह एक स्वतन्त्र इकाई है। परन्तु जब परिवार में अन्य दूर निकट के रिश्तेदार भी रहने लग जाएं तो इस परिवार को संयुक्त परिवार कहा जाता है।
परिवार की किस्में-प्राय: परिवार दो प्रकार के होते हैं

  1. संयुक्त परिवार
  2. इकाई परिवार।

1. संयुक्त परिवार-संयुक्त परिवार में घर के कमाई करने वाले सदस्य अपनी कमाई को साझी कमाई में डाल देते हैं। उस साझी कमाई से परिवार का खर्च चलता है। कामकाज सभी सदस्य बांट कर करते हैं। छोटा-बड़ा अपना स्थान पहचानता है। सभी सदस्यं एक-दूसरे पर विश्वास रखते हैं। संयुक्त परिवार में शादी विवाह में वर का चुनाव भी साझी राय से होता है। विवाह होने से केवल लड़के लड़की का ही जोड़ नहीं होता बल्कि परिवारों का जोड़ होता है। संयुक्त परिवार में रिश्तेदारों को एक दूसरे से जोड़ने वाली वस्तु प्रेम भाव और एक-दूसरे के लिए अपने आपको कुर्बान करना है। संयुक्त परिवार वाला घर सब का साझा घर समझा जाता है। जहां कि कोई दूर या निकट सम्बन्धी आकर रह सकता है और साझे खाने में से खाना खा सकता है। साझा घर ग़रीब, यतीम को भी स्थान दे सकता है। दान पुण्य के काम-काज भी साझे फण्ड में से किए जा सकते हैं। आजकल आधुनिक विद्या और औद्योगीकरण के प्रभाव के अधीन संयुक्त परिवार धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। नए इकाई परिवार को प्राथमिकता दी जा रही है जिसमें भाईचारा समाप्त हो रहा है। मनुष्य अपने आप में मग्न रहने लग पड़ा है। संयुक्त परिवार की विशेष बातें

  1. संयुक्त परिवार में मां-बाप और बच्चों के अतिरिक्त अन्य रिश्तेदार भी रहते हैं।
  2. इसमें साझी कमाई होती है जो ज़रूरत के समय प्रयोग की जा सकती है। इकट्ठे रहने से खर्च भी कम होता है।
  3. इसमें सभी कार्य विभाजित किए होते हैं और काम-काज का सारा बोझ एक व्यक्ति पर नहीं पड़ता।
  4. बुजुर्ग, विधवा, अंगहीन या इस तरह के अन्य सदस्यों को संयुक्त परिवार में सहारा मिलता है।
  5. काम का सही विभाजन करने से सभी व्यक्तियों को कुछ फुर्सत मिल जाती है।
  6. इस तरह के परिवार में बच्चे बड़ों के तजुर्षों से बहुत कुछ सीखते हैं।
  7. ज़मीन या अन्य जायदाद का विभाजन नहीं होता इसलिए उत्पत्ति भी अधिक होती है।
  8. संयुक्त परिवार में प्रेमभाव, वस्तुओं का साझा प्रयोग, एक-दूसरे के लिए अपना आप कुर्बान करना आदि की शिक्षा अपने आप ग्रहण हो जाती है और एक की खुशी सब की खुशी मानी जाती है।
  9. इस प्रकार के परिवार में आर्थिक सुरक्षा के कारण कई बार कई सदस्य काम नहीं करना चाहते।
  10. संयुक्त परिवार के सदस्य अपनी इच्छा के अनुसार कुछ नहीं कर सकते। उनको प्रत्येक काम के लिए पहले परिवार की सहमति लेनी पड़ती है।
  11. कई बार. बहुत लायक बच्चों को उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए पूर्ण मौके नहीं मिलते क्योंकि संयुक्त परिवार में सब से एक जैसा व्यवहार होता है।
  12. छोटे बच्चों को उत्तरदायी बनने के मौके नहीं मिलते क्योंकि उनको हमेशा बड़ों की बात माननी पड़ती है। उपरोक्त से आप जान सकते हैं कि संयुक्त परिवार के जहां कुछ फायदे हैं वहां कुछ नुकसान भी हैं।

2. इकाई परिवार-आधुनिक विद्या और औद्योगीकरण के प्रभाव के कारण इकाई परिवार का महत्त्व बढ़ रहा है क्योंकि इकाई परिवार में माता-पिता और उनके बच्चे ही होते हैं। इस तरह बच्चों के अस्तित्व पर पूरा ध्यान दिया जा सकता है जोकि प्रत्येक मातापिता की इच्छा है। इकाई परिवार छोटा परिवार होता है जिसमें बच्चों के सभी गुणों का विकास अच्छी तरह हो सकता है। इकाई परिवार की विशेष बातें

  1. इकाई परिवार में पति, पत्नी और उनके बच्चे रहते हैं।
  2. इस परिवार में घर के सारे काम का भार स्त्री पर होता है और बाह्य काम का भार पुरुषों पर, काम बांटा नहीं जा सकता।
  3. इस परिवार में सदस्य एक-दूसरे के निकट होते हैं।
  4. आर्थिक रूप में स्वतन्त्रता होती है और पति-पत्नी अपनी इच्छा अनुसार खर्च कर सकते हैं।
  5. होनहार बच्चे के व्यक्तित्व को उभारा जा सकता है और आवश्यकता अनुसार पढ़ाई करवाई जा सकती है।
  6. इस तरह के परिवार में बच्चों के पास भावनात्मक सन्तुष्टि के लिए मां-बाप के अतिरिक्त और कोई अन्य साधन नहीं होता।
  7. इस तरह का परिवार संयुक्त परिवार की तरह सदस्यों की सभी आवश्यकताएं पूर्ण नहीं कर सकता। अपनी आवश्यकताओं के लिए सदस्यों को बाहरी स्रोत ढूंढने पड़ते हैं।
  8. इस में एक व्यक्ति की कमाई पर निर्भर रहना पड़ता है। खर्च भी अधिक होता है।
  9. ज़रूरत के समय मदद का कोई अन्य स्रोत नहीं होता। परिवार को अपने स्रोतों पर ही निर्भर करना पड़ता है।
  10. इस परिवार के सदस्य बड़ों के तजुर्बे से लाभ नहीं उठा सकते।
    संयुक्त परिवार की तरह इकाई परिवार के कुछ फायदे और कुछ नुकसान भी हैं। फिर भी आजकल इकाई परिवार बढ़ रहे हैं।

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प्रश्न 2.
संयुक्त तथा इकाई परिवार की विशेष बातों का वर्णन करें।
उत्तर-
देखें प्रश्न 1 का उत्तर।

प्रश्न 3.
परिवार के बारे में ज़रूरी बातें बताएं।
उत्तर-

  1. परिवार में स्त्री, पुरुष तथा बच्चे होते हैं। स्त्री पुरुष के बीच एक स्थिर सम्बन्ध शादी का होता है।
  2. शादी एक पवित्र सम्बन्ध है। पति-पत्नी के सम्बन्ध मधुर होने से परिवार में सुख-सुविधा रहती है। जब शादी का सम्बन्ध टूट जाता है तो परिवार भी बिखर जाता है।
  3. परिवार के सदस्यों में खून का रिश्ता होता है।
  4. परिवार के सदस्य यदि अलग-अलग रहते हों तो उन्हें परिवार नहीं कहा जाता। कुछ समय के लिए वे अलग रह सकते हैं, परन्तु आमतौर पर सभी एक ही घर में रहते हैं।
  5. प्रत्येक परिवार का अपना नाम होता है जिससे वह दूसरे परिवार से भिन्न होता है।

प्रश्न 4.
संयुक्त परिवार की विशेष बातें बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 5.
छोटे परिवार का महत्त्व विस्तार में बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 6.
बच्चों में फ़ासला करने से बच्चों की सही देखभाल तथा आर्थिक खुशहाली कैसे होती है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 7.
बच्चों में फासला करने से आर्थिक खशहाली तथा लिंग सम्बन्धी सन्तुष्टि कैसे होती है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 8.
संयुक्त तथा इकाई परिवार की हानियां बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें। इकाई परिवार की हानियां

  1. सारे घर का बोझ स्त्री पर तथा बाहर के कार्यों का बोझ पुरुष पर पड़ता है तथा काम बांटा नहीं जा सकता।
  2. बच्चों के पास भावनात्मक सन्तुष्टि के लिए केवल माता-पिता ही होते हैं।
  3. सभी सदस्यों की आवश्यकताएं पूर्ण नहीं की जा सकती। बाहरी स्रोतों से सहायता लेनी पड़ती है।

प्रश्न 9.
इकाई परिवार की क्या हानियां हैं? विस्तारपूर्वक लिखिये।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 10.
संयुक्त तथा इकाई परिवार की तुलना करो।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 11.
संयुक्त परिवार का क्या महत्त्व है? विस्तार से बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 12.
इकाई परिवार की क्या हानियां हैं? पूर्ण जानकारी दें।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. रिक्त स्थान भरें

  1. परिवार समाज की …………….. इकाई है।
  2. परिवार की …………….. किस्में हैं।
  3. ………….. परिवार छोटा परिवार होता है।
  4. आजकल ……………….. परिवारों की संख्या कम होती जा रही है।
  5. ………. परिवार आजकल लुप्त होते जा रहे हैं।

उत्तर-

  1. प्राथमिक,
  2. दो,
  3. इकाई,
  4. संयुक्त,
  5. संयुक्त।

II. ठीक/ग़लत बताएं

  1. परिवार समाज की प्राथमिक इकाई है।
  2. इकाई परिवार छोटा परिवार है।
  3. संयुक्त परिवारों की संख्या कम होती जा रही है।
  4. संयुक्त परिवार में कई बार बच्चों के व्यक्तित्त्व का विकास नहीं होता।

उत्तर-

  1. ठीक,
  2. ठीक,
  3. ठीक,
  4. ठीक।

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III. बहविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सामान्यतः परिवार की ………. किस्में हैं
(क) दो
(ख) चार
(ग) पांच
(घ) छः।
उत्तर-
(क) दो

प्रश्न 2.
निम्न में ठीक तथ्य है
(क) परिवार के सदस्यों में रक्त सम्बन्ध होता है।
(ख) संयुक्त परिवार में कमाई को सांझा कमाई में रखा जाता है।
(ग) बच्चे के पालन-पोषण के लिए छोटा परिवार होना चाहिए।
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

प्रश्न 3.
निम्न में ग़लत तथ्य है
(क) परिवार की संस्था का समाज से कोई सम्बन्ध नहीं है।
(ख) छोटा परिवार खुशहाल नहीं होता है।
(ग) संयुक्त परिवार में आर्थिक आज़ादी होती है।
(घ) सभी गलत।
उत्तर-
(घ) सभी गलत।

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परिवार PSEB 10th Class Home Science Notes

  • परिवार समाज की प्रारम्भिक इकाई है।
  • परिवार द्वारा ही मनुष्य समाज से जुड़ता है।
  • परिवार दो प्रकार के, संयुक्त और इकाई परिवार होते हैं।
  • इकाई परिवार में बच्चे अपने मां-बाप के पास रहते हैं।
  • इन दोनों किस्मों के फायदे और नुकसान भी हैं।
  • बच्चों की आयु में फासला कम-से-कम तीन वर्ष का आवश्यक होना चाहिए।
  • छोटे परिवार में खुशहाली होती है।
  • छोटे परिवारों में सदस्यों में आपसी प्यार अधिक होता है।
  • संयुक्त परिवारों में सुरक्षा की भावना अधिक होती है।
  • देश की जनसंख्या कम करने के लिए छोटे परिवारों का होना आवश्यक है।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

महाराजा रणजीत सिंह का चरित्र एवं व्यक्तित्व (Character and Personality of Maharaja Ranjit Singh)

प्रश्न 1.
महाराजा रणजीत सिंह के चरित्र और शख्सीयत का विस्तारपूर्वक वर्णन करें। (Explain in detail the character and personality of Maharaja Ranjit Singh)
अथवा
रणजीत सिंह का एक मनुष्य के रूप में वर्णन करें। (Describe Ranjit Singh as a man)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह के चरित्र का मूल्यांकन कीजिए। (Give a character estimate of Maharaja Ranjit Singh.)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह की एक व्यक्ति, एक सेनानी, एक शासक और एक राजनीतिज्ञ के रूप में चर्चा करें।
(Discuss Maharaja Ranjit Singh as a man, a general, a ruler and a diplomat.)
अथवा
आप रणजीत सिंह को इतिहास में क्या स्थान देंगे ? उसे शेर-ए-पंजाब क्यों कहा जाता है ?
(What place would you assign to Ranjit Singh in the history ? Why is he called Sher-i-Punjab ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह की गणना न केवल भारत के अपितु विश्व के महान् व्यक्तियों में की जाती है। वह बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी थे। वह अपने गुणों के कारण पंजाब में एक शक्तिशाली सिख साम्राज्य की स्थापना करने में सफल हुआ। उसे ठीक ही पंजाब का शेर-ए-पंजाब कहा जाता है। महाराजा रणजीत सिंह के आचरण और व्यक्तित्व का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—
I. मनुष्य के रूप में
(As a Man)

1. शक्ल सूरत (Appearance)—महाराजा रणजीत सिंह की शक्ल-सूरत अधिक आकर्षक नहीं थी। उसका कद मध्यम तथा शरीर पतला था। बचपन में चेचक हो जाने के कारण उसकी एक आँख भी जाती रही थी। इसके बावजूद महाराजा के व्यक्तित्व में इतना आकर्षण था कि कोई भी भेंटकर्ता उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। उसके चेहरे से एक विशेष प्रकार की तेजस्विता झलकती थी।

2. परिश्रमी एवं सक्रिय (Hard-working and Active)-महाराजा रणजीत सिंह बहुत परिश्रमी एवं सक्रिय व्यक्ति था। वह इस बात में विश्वास रखता था कि महान् व्यक्तियों को सदैव परिश्रमी एवं सक्रिय रहना चाहिए। महाराजा सुबह से लेकर रात को देर तक राज्य के कार्यों में व्यस्त रहता था। वह राज्य के बड़े-से-बड़े कार्य से लेकर लघु-से-लघु कार्य की ओर व्यक्तिगत ध्यान देता था।

3. साहसी एवं वीर (Courageous and Brave)—महाराजा रणजीत सिंह बहुत ही साहसी एवं वीर व्यक्ति था। उसे बाल्यकाल से ही युद्धों में जाने, शिकार खेलने, तलवार चलाने और घुड़सवारी करने का बहुत शौक था। उसने अल्पायु में ही हशमत खान चट्ठा का सिर काटकर अपनी वीरता का प्रमाण प्रस्तुत किया था। वह भयंकर लड़ाइयों के समय भी बिल्कुल घबराता नहीं था अपितु युद्ध में प्रथम कतार में लड़ता था।

4. अनपढ़ किंतु बुद्धिमान (Illiterate but Intelligent)—महाराजा रणजीत सिंह की पढ़ाई में रुचि नहीं थी। फलस्वरूप वह अशिक्षित ही रहा। अशिक्षित होने पर भी वह बहुत तीक्ष्ण बुद्धि और अद्भुत स्मरण-शक्ति का स्वामी था। उसे अपने राज्य के गाँवों के हज़ारों नाम और उनकी भौगोलिक दशा मौखिक रूप से याद थे। वह जिस व्यक्ति को एक बार देख लेता था उसे वह कई वर्षों के पश्चात् भी पहचान लेता था। उसकी समझ-बूझ इतनी थी कि विदेशों से आए यात्री भी चकित रह जाते थे।

5. दयालु स्वभाव (Kind Hearted)-महाराजा रणजीत सिंह अपनी दया के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय था। महाराजा ने कभी भी अपने शत्रुओं के साथ भी अत्याचारपूर्ण व्यवहार नहीं किया। लाहौर के इस शासक ने जिन्हें युद्ध-भूमि में पराजित किया, न केवल गले से लगाया, बल्कि उनकी संतान को भी जागीरें तथा पुरस्कार प्रदान किए। वह निर्धनों, पीड़ितों तथा कृषकों की सहायता के लिए प्रत्येक क्षण तैयार रहता था। उसकी दया की कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।
प्रसिद्ध लेखक फकीर सैयद वहीदुदीन के अनुसार,
“लोक दिलों में रणजीत सिंह की लोकप्रिय तस्वीर एक विजयी नायक अथवा एक शक्तिशाली सम्राट की अपेक्षा एक दयालु पितामह के लिए अधिक छाई है। उनमें ये तीनों गुण थे, परंतु उनकी दयालुता उनकी आन-शान तथा राज्य शक्ति पीछे छोड़ आई है तथा अभी तक जीवित है।”1.

6. सिख-धर्म का श्रद्धालु अनुयायी (A devoted follower of Sikhism)-महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था। वह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। वह अपनी इन विजयों के लिए धन्यवाद हेतु दरबार साहिब अमृतसर जाकर भारी चढ़ावा चढ़ाता था। वह स्वयं को गुरुघर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-एखालसा’ और दरबार को ‘दरबार खालसा जी’ कहता था। उसने सिंह साहिब की उपाधि को धारण किया था।. उसके सिक्कों पर ‘नानक सहाय’ तथा ‘गोबिंद सहाय’ शब्द अंकित थे। उसकी शाही मोहर पर ‘अकाल सहाय’ शब्द अंकित थे। महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत-से गुरुद्वारों में नवीन भवनों का निर्माण करवाया। हरिमंदिर साहिब के गुंबद पर सीने का काम करवाया। संक्षेप में कहें तो वह तन-मन से सिख धर्म का अनन्य श्रद्धालु था।

6. सहिष्णु (Tolerant) यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का पक्का श्रद्धालु था फिर भी वह अन्य धर्मों का सम्मान करता था। वह धार्मिक पक्षपात तथा सांप्रदायिकता से कोसों दूर था। उसके दरबार में उच्च पदों पर सिख, हिंदू, मुसलमान, डोगरे तथा यूरोपीय नियुक्त थे। उदाहरणतया उसका विदेश मंत्री फकीर अज़ीज-उद्दीन मुसलमान, प्रधानमंत्री ध्यान सिंह डोगरा और सेनापति मिसर दीवान चंद हिंदू थे। उसके राज्य में सभी धर्मों के लोगों को अपने रस्मों-रिवाज की पूरी स्वतंत्रता थी। डॉ० भगत सिंह के अनुसार,

“प्राचीन तथा मध्यकालीन भारतीय इतिहास का कोई भी शासक रणजीत सिंह की सहिष्णुता की नीति की समानता नहीं कर सकता।”2

1. “Ranjit Singh’s popular image is that of a kindly patriarch rather than that of conquering ‘ hero or a mighty monarch. He was all three, but his humanity has outlived his splendour and power.” Fakir Syed Waheeduddin, The Real Ranjit Singh (Patiala : 1981) p. 8.
2. “No ruler of ancient or medieval Indian history could match Ranjit Singh in his cosmopolitan approach.” Dr. Bhagat Singh, Life and Times of Maharaja Ranjit Singh (New Delhi : 1990) p. 337.

II. एक सेनानी तथा विजेता के रूप में
(As a General and Conqueror)
महाराजा रणजीत सिंह की गणना विश्व के महान् सेनानियों में की जाती है। उसने अपने जीवन में जितने भी युद्ध किए किसी में भी पराजय का मुख नहीं देखा। वह बड़ी से बड़ी विपदा आने पर भी नहीं घबराता था। उदाहरणतया 1823 ई० में नौशहरा की लड़ाई में खालसा सेना ने साहस छोड़ दिया था। ऐसे समय महाराजा रणजीत सिंह भाग कर युद्ध क्षेत्र में सबसे आगे पहुँचा तथा सैनिकों में नया जोश भरा।

निस्संदेह महाराजा रणजीत सिंह एक महान् विजेता भी था। 1797 ई० में जब रणजीत सिंह शुकरचकिया मिसल की गद्दी पर विराजमान हुआ तो उसके अधीन बहुत कम क्षेत्र था। उसने अपनी योग्यता तथा वीरता से अपने राज्य को एक साम्राज्य में बदल दिया था। उसके राज्य में लाहौर, अमृतसर, कसूर, स्यालकोट, काँगड़ा, गुजरात, जम्मू, अटक, मुलतान, कश्मीर तथा पेशावर जैसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश समिलित थे। महाराजा की विजयों के कारण उसका साम्राज्य उत्तर में लद्दाख से लेकर दक्षिण में शिकारपुर तक और पूर्व में सतलुज नदी से लेकर पश्चिमी में पेशावर तक फैला था। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० गंडा सिंह के अनुसार, “वह (महाराजा रणजीत सिंह) भारत के महान् नायकों में से एक था।”3

III. एक प्रशासक के रूप में
(As an Administrator) : निस्संदेह महाराजा रणजीत सिंह एक उच्चकोटि का प्रशासक था। उसके शासन का मुख्य उद्देश्य प्रजा का कल्याण था। प्रशासन चलाने के लिए महाराजा ने कई योग्य तथा ईमानदार मंत्री नियुक्त किए थे। महाराजा ने अपने राज्य को चार बड़े प्रांतों में विभक्त किया हुआ था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई मौजा अथवा गाँव थी। गाँव का प्रशासन पंचायत के हाथ होता था। प्रजा की स्थिति जानने के लिए महाराजा प्रायः भेष बदलकर राज्य के विभिन्न भागों का भ्रमण करता था। किसानों तथा निर्धनों को राज्य की ओर से विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं। परिणामस्वरूप महाराजा रणजीत सिंह के समय प्रजा बड़ी समृद्ध थी।

महाराजा रणजीत सिंह यह बात भी भली-भाँति समझता था कि साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एक शक्तिशाली सेना का होना अत्यावश्यक है। वह प्रथम भारतीय शासक था जिसने अपनी सेना को यूरोपीय पद्धति का सैनिक प्रशिक्षण देना आरंभ किया। महाराजा स्वयं सेना का निरीक्षण करता था। सैनिकों का ‘हुलिया’ रखने तथा घोड़ों को ‘दागने’ की प्रथा भी आरंभ की गई। सैनिकों तथा उनके परिवारों का राज्य की ओर से पूरा ध्यान रखा जाता था। डॉ० एच० आर० गुप्ता का यह कहना बिल्कुल ठीक है, “वह भारतीय इतिहास के उत्तम शासकों में से एक था।”4

3. “Rightly he may claim to be one of the greatest heroes of India.” Dr. Ganda Singh, Maharaja Ranjit Singh, Quoted from, the Panjab Past and Present (Patiala : Oct. 1980) Vol. XIV, p. 15.
4. “He was one of the best rulers in Indian history.” Dr. H. R. Gupta, History of the Sikhs (New Delhi : 1991) Vol. 5, p. 596.

IV. एक कूटनीतिज्ञ के रूप में
(As a Diplomat)
महाराजा रणजीत सिंह एक सफल कूटनीतिज्ञ था। अपने राजनीतिक जीवन के शुरू में उसने शक्तिशाली मिसल सरदारों के सहयोग से दुर्बल मिसलों पर अधिकार किया। तत्पश्चात् उसने एक-एक करके इन शक्तिशाली मिसलों को भी अपने अधीन कर लिया। वह जिन शासकों को पराजित करता था उन्हें आजीविका के लिए जागीरें भी प्रदान करता था। इसलिए वे महाराजा का विरोध नहीं करते थे। महाराजा ने अपनी कूटनीति से जहाँदद खाँ से अटक का किला बिना युद्ध किए ही प्राप्त कर लिया था। 1835 ई० में जब अफ़गानिस्तान का शासक दोस्त मुहम्मद खाँ आक्रमण करने आया तो महाराजा ने ऐसी चाल चली कि वह लड़े बिना ही युद्ध क्षेत्र से भाग गया।

1809 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने अंग्रेजों से मित्रता करके अपने राजनीतिक विवेक का प्रमाण दिया। यह उसकी दुर्बलता नहीं अपितु उसके राजनीतिक विवेक तथा दूरदर्शिता का प्रमाण था। उत्तर-पश्चिमी सीमा नीति के संबंध में भी महाराजा ने राजनीतिक समझदारी का प्रमाण दिया। अफ़गानिस्तान पर आक्रमण न करना महाराजा की बुद्धिमत्ता का एक अन्य प्रमाण था। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० भगत सिंह के अनुसार,
“कूटनीति में उसे परास्त करना कोई सहज कार्य नहीं था।”5

5. “It was not easy to beat him in diplomacy.” Dr. Bhagat Singh, op. cit., p. 339.

V. पंजाब के इतिहास में उसका स्थान . (HIs Place in the History of the Punjab)
महाराजा रणजीत सिंह की गणना न केवल भारत अपितु विश्व के महान् शासकों में की जाती है। विभिन्न इतिहासकार महाराजा रणजीत सिंह की तुलना मुग़ल बादशाह अकबर, मराठा शासक शिवाजी, मिस्र के शासक महमत अली एवं फ्रांस के शासक नेपोलियन आदि से करते हैं। इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह की उपलब्धियाँ इन शासकों से कहीं अधिक थीं। जिस समय महाराजा रणजीत सिंह सिंहासन पर बैठा तो उसके पास केवल नाममात्र का राज्य था। किंतु महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी योग्यता एवं कुशलता के साथ एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। ऐसा करके उन्होंने सिख साम्राज्य के स्वप्न को साकार किया। महाराजा रणजीत सिंह का शासन प्रबंध भी बहुत उच्चकोटि का था। उनके शासन प्रबंध का मुख्य उद्देश्य प्रजा की भलाई करना था। प्रजा के दुःखों को दूर करने के लिए महाराजा सदैव तैयार रहता था तथा प्रायः राज्य का भ्रमण भी किया करता था। महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उनके दरबार में सिख, हिंदू, मुसलमान, यूरोपियन इत्यादि सभी धर्मों के लोग उच्च पदों पर नियुक्त थे। महाराजा रणजीत सिंह ने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाकर उन्हें एक सूत्र में बाँधा। वह एक महान् दानी भी थे। उन्होंने अपने साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के लिए एक शक्तिशाली सेना का भी निर्माण किया। उन्होंने अंग्रेजों के साथ मित्रता स्थापित करके अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ का प्रमाण दिया। इन सभी गुणों के कारण आज भी लोग महाराजा रणजीत सिंह को ‘शेरए-पंजाब’ के नाम से स्मरण करते हैं। निस्संदेह महाराजा रणजीत सिंह को पंजाब के इतिहास में एक गौरवमयी स्थान प्राप्त है।
अंत में हम डॉ० एच० आर० गुप्ता के इन शब्दों से सहमत हैं,
“एक व्यक्ति, योद्धा, जरनैल, विजेता, प्रशासक, शासक तथा राजनीतिवेत्ता के रूप में रणजीत सिंह को . विश्व के महान् शासकों में उच्च स्थान प्राप्त है।”6

6. “As a man, warrior, general, conqueror, administrator, ruler and diplomat, Ranjit Singh occupies a high position among the greatest sovereigns of the world.” Dr. H.R. Gupta, op. cit., p. 596.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
महाराजा रणजीत सिंह का एक व्यक्ति के रूप में आप कैसे वर्णन करेंगे?
(How do you describe about Maharaja Ranjit Singh as a man ?)
अथवा
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह के विषय में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Ranjit Singh as a man ?)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह की शख्सियत के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the personality of Maharaja Ranjit Singh ?)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह के चरित्र और व्यक्तित्व की तीन विशेषताएँ बताएँ।
(Mention the three characteristics of the character and personality of Maharaja Ranjit Singh.)
उत्तर-
यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह शक्ल-सूरत से अधिक आकर्षक नहीं था, तथापि प्रकृति ने उसे अद्भुत स्मरण शक्ति तथा अदम्य साहस का वरदान देकर इस कमी को पूरा किया। महाराजा रणजीत सिंह का स्वभाव बड़ा दयालु था। वह अपनी प्रजा से बहुत प्यार करता था। उसने अपने शासनकाल के दौरान किसी भी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया था। महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का सच्चा सेवक था। इसके बावजूद उनका अन्य धर्मों के साथ व्यवहार बड़ा सम्मानजनक था।

प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह एक दयालु शासक था । कैसे ? (Maharaja Ranjit Singh was a kind ruler. How ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपनी दया के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय था। अपने शासनकाल के दौरान महाराजा रणजीत सिंह ने उन शासकों को जिन्हें युद्ध-भूमि में पराजित किया उन्हें जागीरें तथा पुरस्कार प्रदान किए। महाराजा ने अपने शासनकाल के दौरान किसी भी अपराधी को मृत्यु-दंड नहीं दिया था। वह निर्धनों, पीड़ितों तथा कृषकों की सहायता के लिए प्रत्येक क्षण तैयार रहता था। उसकी दया की कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।

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प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का श्रद्धालु अनुयायी था । अपने पक्ष में तर्क दीजिए।
(Maharaja Ranjit Singh was a devoted follower of Sikhism. Give arguments in your favour.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। वह अपनी विजयों को उस परमात्मा की कृपा समझता था। वह स्वयं को गुरु घर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ कहता था। वह स्वयं को ‘महाराजा’ कहलवाने के स्थान पर ‘सिंह साहिब’ कहलवाता था। महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत-से नवीन गुरुद्वारों का निर्माण करवाया। वह तन-मन-धन से सिख धर्म का अनन्य श्रद्धालु था।

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह एक धर्म-निरपेक्ष शासक थे। कैसे ?
(Maharaja Ranjit Singh was a secular ruler. How ?)
उत्तर-
यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का पक्का श्रद्धालु था फिर भी वह अन्य धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखता था। वह अपनी सहिष्णुता की नीति से विभिन्न धर्मों के लोगों के दिल जीतने में सफल रहा। उसके राज्य में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उसके दरबार में उच्च पदों पर सिख , हिंदू, मुसलमान, डोगरे तथा यूरोपीय नियुक्त थे। उसके राज्य में सभी धर्मों के लोगों को अपने रस्मों-रिवाजों की पूरी स्वतंत्रता थी।

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प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह का एक प्रशासक के रूप में उल्लेख कीजिए।
(Describe Maharaja Ranjit Singh as an administrator.)
अथवा
एक शासन प्रबंधक के रूप में महाराजा रणजीत सिंह के विषय में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Maharaja Ranjit Singh as an administrator ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह सिख पंथ का महान् विजेता था तथा एक उच्चकोटि का शासक प्रबंधक था। उसने प्रशासन को कुशलता से चलाने के उद्देश्य से योग्य व ईमानदार मन्त्रियों को नियुक्त किया गया था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई मौजा अथवा गाँव थी। गाँव का प्रशासन पंचायत के हाथ में होता था। प्रजा की स्थिति जानने के लिए महाराजा भेष बदल कर राज्य का भ्रमण भी किया करता था। महाराजा रणजीत सिंह ने इसके साम्राज्य की सुरक्षा व विस्तार के लिए शक्तिशाली सेना का भी गठन किया था।

प्रश्न 6.
“महाराजा रणजीत सिंह एक महान् सेनानी एवं विजेता था।” व्याख्या करें।
(“Maharaja Ranjit Singh was a great general and conqueror.” Explain.)
अथवा
“एक सैनिक और जरनैल के रूप” में महाराजा रणजीत सिंह के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Maharaja Ranjit Singh as a Soldier and a General ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह एक महान् सेनापति एवं विजेता था। उसने अपनी योग्यता तथा वीरता से अपने राज्य को एक विशाल साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया था। उसके राज्य में लाहौर, अमृतसर, स्यिालकोट, काँगड़ा, गुजरात जम्मू, मुलतान, कश्मीर तथा पेशावर जैसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश शामिल थे। महाराजा की विजयों के कारण उसका साम्राज्य उत्तर में लद्दाख से लेकर दक्षिण में शिकारपुर तक और पूर्व में सतलुज नदी से लेकर पश्चिम में पेशावर तक फैला हुआ था।

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प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह को शेरे-पंजाब क्यों कहा जाता है ? (Why Maharaja Ranjit Singh is called Sher-i-Punjab ?)
अथवा
आप रणजीत सिंह को इतिहास में क्या स्थान देंगे? उनको शेरे-पंजाब क्यों कहा जाता है ?
(What place would you assign in History to Ranjit Singh ? Why is he called Sher-iPunjab ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह एक सफल विजेता होने के साथ-साथ वह एक कुशल प्रबंधक भी सिद्ध हुआ। उसके शासन प्रबंध का मुख्य उद्देश्य प्रजा का कल्याण करना था। महाराजा रणजीत सिंह ने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई थी। उसने सेना का पश्चिमीकरण किया। उसने अंग्रेजों के साथ मित्रता करके पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में सम्मिलित होने से बचाए रखा। इन सभी गुणों के कारण रणजीत सिंह को शेर-ए-पंजाब कहा जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह की कोई एक विशेषता बताएँ।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह का स्वभाव बड़ा दयालु था।

प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह को किस घोड़े से विशेष लगाव था ?
उत्तर-
लैली।

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प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह सिख-धर्म का श्रद्धालु अनुयायी था। इसके संबंध में कोई एक प्रमाण दीजिए।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को सरकार-ए-खालसा कहता था।

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को क्या कहते थे ?
उत्तर-
सरकार-ए-खालसा।

प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह अपने आप को क्या कह कर बुलाते थे ?
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह अपने आप को क्या कहा करता था ?
उत्तर-
सिख पंथ का कूकर।

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प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह के दरबार को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-
दरबार-ए-खालसा।

प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह के एक गैर-सिख मंत्री का नाम बताएँ।
उत्तर-
फकीर अज़ीज़-उद्दीन।

प्रश्न 8.
महाराजा रणजीत सिंह के दरबारी इतिहासकार का नाम बताएँ।
उत्तर-
सोहन लाल सूरी।

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प्रश्न 9.
महाराजा रणजीत सिंह को एक महान् सेनानायक क्यों माना जाता है ?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह को किसी भी लड़ाई में पराजय का सामना नहीं करना पड़ा था।

प्रश्न 10.
महाराजा रणजीत सिंह एक सफल कूटनीतिज्ञ था। इसके संबंध में कोई एक प्रमाण दीजिए।
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह ने अफ़गानिस्तान पर अधिकार न करके अपनी सूझ-बूझ का प्रमाण दिया।

प्रश्न 11.
पंजाब के किस शासक को शेर-ए-पंजाब के नाम से याद किया जाता है ?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह को।

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प्रश्न 12.
महाराजा रणजीत सिंह को शेर-ए-पंजाब क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह को विशाल सिख साम्राज्य तथा उत्तम शासन व्यवस्था की स्थापना की।

प्रश्न 13.
महाराजा रणजीत सिंह को पारस क्यों कहा जाता था ?
उत्तर-
क्योंकि वह अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखता था।

(ii) रिक्त स्थान भरें । (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
महाराजा रणजीत सिंह की शक्ल सूरत………नहीं थी।
उत्तर-
(आकर्षक)

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प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह को सबसे अधिक……..नामक घोड़े से प्यार था।
उत्तर-
(लैली)

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह स्वयं को सिख पंथ का……..समझते थे।
उत्तर-
(कूकर)

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को……..कहते थे। .
उत्तर-
(सरकार-ए-खालसा)

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प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह अपने दरबार को………..कहते थे।
उत्तर-
(दरबार खालसा जी)

प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह शराब के बहुत………थे।
उत्तर-
(शौकीन)

प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह को……….के नाम से याद किया जाता है।
उत्तर-
(शेर-ए-पंजाब)

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(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
महाराजा सिंह बड़ा मेहनती तथा फुर्तीला था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह को लैली नामक घोड़े से बहुत प्यार था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह अपने आप को सिख धर्म का कूकर समझते थे।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को सरकार-ए-खालसा कहते थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह को केवल सिख धर्म के साथ प्रेम था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह शराब के साथ बहुत घृणा करते थे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 7.
महाराजा रणजीत सिंह न केवल एक महान् विजेता थे बल्कि एक उच्च कोटि के शासन प्रबंधक भी थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 8.
महाराजा रणजीत सिंह को आज भी लोग शेर-ए-पंजाब के नाम से याद करते हैं।
उत्तर-
ठीक

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह की क्या विशेषता थी ?
(i) वह बहुत परिश्रमी और सक्रिय था
(ii) उसका स्वभाव बहुत दयालु था
(iii) वह अनपढ़ किंतु बुद्धिमान था
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 2.
महाराजा रणजीत सिंह को किस घोड़े से विशेष लगाव था ?
(i) लैली
(ii) सैली
(iii) चेतक
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को क्या कहकर बुलाता था ?
(i) सरकार-ए-आम
(ii) सरकार-ए-खास
(iii) सरकार-ए-खालसा
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह के दरबार का सबसे प्रसिद्ध विद्वान् कौन था ?
(i) सोहन लाल सूरी
(ii) फ़कीर अज़ीजुद्दीन
(iii) राजा ध्यान सिंह
(iv) दीवान मोहकम चंद।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 5.
पंजाब के कौन-से शासक को शेरे-पंजाब के नाम से याद किया जाता है ?
(i) महाराजा रणजीत सिंह को
(ii) मझराजा दलीप सिंह को
(iii) महाराजा शेर सिंह को
(iv) महाराजा खड़क सिंह को।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह के समय ‘शाही मोहर’ पर कौन-से शब्द अंकित थे ?
(i) नानक सहाय
(ii) अकाल सहाय
(iii) गोबिंद सहाय
(iv) तेग़ सहाय।
उत्तर-
(ii)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
महाराजा रणजीत सिंह का एक व्यक्ति के रूप में आप कैसे वर्णन करेंगे ? (How do you describe about Maharaja Ranjit Singh as a man ?)
अथवा
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह के विषय में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Ranjit Singh as a man ?)
अथवा
महाराजा रणजीत सिंह के आचरण एवं व्यक्तित्व का वर्णन करें। (Write about the character and personality of Maharaja Ranjit Singh.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह चाहे अनपढ़ थे, परंतु वह बड़ी तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी थे। उनको हज़ारों गाँवों के नाम तथा उनकी भौगोलिक स्थिति मौखिक रूप से स्मरण थी। वह जिस व्यक्ति को एक बार देख लेते उसको कई वर्षों बाद भी पहचान लेते थे। महाराजा रणजीत सिंह का स्वभाव बड़ा दयालु था। वह अपनी प्रजा से बहुत प्यार करते थे। उन्होंने अपने शत्रुओं से कभी भी निर्दयतापूर्वक व्यवहार नहीं किया था। महाराजा ने अपने शासन काल के दौरान किसी भी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया था। महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म के सच्चे सेवक थे। वह अपना प्रतिदिन का कार्य प्रारंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनते तथा अरदास करते थे। वह अपनी सरकार को सरकार-ए-खालसा कहते थे। उन्होंने नानक सहाय और गोबिंद सहाय नाम के सिक्के जारी किए। उन्होंने गुरुद्वारों को भारी दान दिया। इसके बावजूद महाराजा रणजीत सिंह का अन्य धर्मों के साथ व्यवहार रिवाज मनाने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। महाराजा अन्य धर्म के लोगों को भी दिल खोल कर दान दिया करते थे।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

प्रश्न 2.
एक मनुष्य के रूप में महाराजा रणजीत सिंह की छः विशेषताएँ क्या थी ? (What were the six features of Maharaja Ranjit Singh as a man ?),
उत्तर-
1. शक्ल सूरत-महाराजा रणजीत सिंह की शक्ल-सूरत अधिक आकर्षक नहीं थी। उसका कद मध्यम तथा शरीर पतला था। बचपन में चेचक हो जाने के कारण उसकी एक आँख भी जाती रही थी। परंतु महाराजा के व्यक्तित्व में इतना आकर्षण था कि कोई भी भेंटकर्ता उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था।

2. परिश्रमी एवं सक्रिय—महाराजा रणजीत सिंह बहुत परिश्रमी एवं सक्रिय व्यक्ति था। महाराजा सुबह से लेकर रात को देर तक राज्य के कार्यों में व्यस्त रहता था। वह राज्य के बड़े-से-बड़े कार्य से लेकर लघु-से-लघु कार्य की ओर व्यक्तिगत ध्यान देता था।

3. साहसी एवं वीर-महाराजा रणजीत सिंह बहुत ही साहसी एवं वीर व्यक्ति था। उसे बाल्यकाल से ही युद्धों में जाने, शिकार खेलने, तलवार चलाने और घुड़सवारी करने का बहुत शौक था। वह भयंकर लड़ाइयों के समय भी बिल्कुल घबराता नहीं था अपितु युद्ध में प्रथम कतार में लड़ता था।

4. दयालु स्वभाव-महाराजा रणजीत सिंह अपनी दया के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय था। महाराजा ने कभी भी अपने शत्रुओं के साथ भी अत्याचारपूर्ण व्यवहार नहीं किया। वह निर्धनों, पीड़ितों तथा कृषकों की सहायता के लिए प्रत्येक क्षण तैयार रहता था।

5. सिख-धर्म का श्रद्धालु अनुयायी-महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था। वह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। वह स्वयं को . गुरुघर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ और दरबार को ‘दरबार खालसा जी’ कहता था।

6. शिक्षा का संरक्षक-महाराजा रणजीत सिंह यद्यपि स्वयं अनपढ़ था। परंतु उसने शिक्षा के प्रसार के लिए अनेक स्कूल खोले। आपने फ़ारसी, उर्दू, हिंदी तथा गुरमुखी पढ़ाने वाली संस्थाओं को अनुदान तथा जागीरें प्रदान की।

प्रश्न 3.
महाराजा रणजीत सिंह एक दयालु शासक था। कैसे ? (Maharaja Ranjit Singh was a kind ruler. How ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपनी दया के कारण प्रजा में बहुत लोकप्रिय था। अपने शासनकाल के दौरान महाराजा रणजीत सिंह ने सिख मिसलदारों, राजपूत राजाओं, पठान शासकों तथा अफ़गान सम्राटों को एक-एक करके विजित किया। आश्चर्य की बात यह है कि महाराजा ने कभी भी अपने शत्रुओं के साथ अत्याचारपूर्ण व्यवहार नहीं किया। उस समय काबुल तथा दिल्ली के सम्राट् जो सिंहासन के स्वामी बनते रहे, वे न केवल अन्य निकट दशा में दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ते रहे। ऐसे समय लाहौर के इस शासक ने जिन्हें युद्ध-भूमि में पराजित किया, न केवल गले से लगाया, बल्कि उनकी संतान को भी जागीरें तथा पुरस्कार प्रदान किए। महाराजा ने अपने शासनकाल के दौरान किसी भी अपराधी को मृत्यु-दंड नहीं दिया था। वह निर्धनों, पीड़ितों तथा कृषकों की सहायता के लिए प्रत्येक क्षण तैयार रहता था। उसकी दया की कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 21 महाराजा रणजीत सिंह का आचरण और व्यक्तित्व

प्रश्न 4.
महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का श्रद्धालु अनुयायी था। अपने पक्ष में तर्क दीजिए।
(Maharaja Ranjit Singh was a devoted follower of Sikhism. Give arguments in your favour.)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था। वह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी की एक कलगी अपने तोशेखाने में रखी हुई थी जिसको छूना वह अपने लिए सौभाग्य मानता था। वह अपनी विजयों को उस परमात्मा की कृपा समझता था। इन विजयों के लिए धन्यवाद हेतु वह दरबार साहिब अमृतसर जाकर भारी चढ़ावा चढ़ाता था। वह स्वयं को गुरु घर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ कहता था। वह स्वयं को ‘महाराजा’ कहलवाने के स्थान पर ‘सिंह साहिब’ कहलवाता था। उसके सिक्कों पर ‘नानक सहाय’ तथा ‘गोबिंद सहाय’ के शब्द अंकित थे। उसकी शाही मोहर पर ‘अकाल सहाय’ शब्द अंकित थे। सेना में ‘वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह’ का जय घोष किया जाता था। सरकारी कार्यों के लिए गुरु ग्रंथ साहिब के सम्मुख शपथ दिलाई जाती थी। महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत-से नवीन गुरुद्वारों का निर्माण करवाया तथा उनकी देख-रेख के लिए बड़ी-बड़ी जागीरें दीं। संक्षेप में, कहें तो वह तन-मन-धन से सिख धर्म का अनन्य श्रद्धालु था।

प्रश्न 5.
महाराजा रणजीत सिंह एक धर्म-निरपेक्ष शासक थे। कैसे ? (Maharaja Ranjit Singh was a Secular ruler. How ?)
उत्तर-
यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का पक्का श्रद्धालु था फिर भी वह अन्य धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखता था। वह धार्मिक पक्षपात तथा साँप्रदायिकता से कोसों दूर था। वह यह बात भली-भाँति जानता था कि एक शक्तिशाली तथा चिरस्थाई साम्राज्य की स्थापना के लिए सभी धर्मों के लोगों का सहयोग प्राप्त करना आवश्यक है। वह अपनी सहिष्णुता की नीति से विभिन्न धर्मों के लोगों के दिल जीतने में सफल रहा। उसके राज्य में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उसके दरबार में उच्च पदों पर सिख, हिंदू, मुसलमान, डोगरे तथा यूरोपीय नियुक्त थे। उदाहरणतया उसका विदेश मंत्री फकीर अजीज-उद्दीन मुसलमान, प्रधानमंत्री ध्यान सिंह डोगरा, वित्त मंत्री दीवान भवानी दास और सेनापति मिसर दीवान चंद हिंदू थे। इसी तरह जनरल मैतूरा, कोर्ट, गार्डनर इत्यादि यूरोपीय थे। दान देने के विषय में भी महाराजा किसी धर्म से किसी प्रकार का कोई भेद-भाव नहीं करता था। उसने हिंदू मंदिरों, मुस्लिम मस्जिदों तथा मकबरों की देख-रेख के लिए पर्याप्त धन दिया। उसके राज्य में सभी धर्मों के लोगों को अपने रस्मो-रिवाज की पूरी स्वतंत्रता थी।

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प्रश्न 6.
महाराजा रणजीत सिंह का एक प्रशासक के रूप में उल्लेख कीजिए।
(Describe Maharaja Ranjit Singh as an administrator.)
अथवा
एक शासन प्रबंधक के रूप में महाराजा रणजीत सिंह के विषय में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Ranjit Singh as an administrator ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह एक उच्च कोटि का शासन प्रबंधक था। उसके शासन का मुख्य उद्देश्य प्रजा का कल्याण था। प्रशासन में सहयोग प्राप्त करने के लिए महाराजा ने कई योग्य तथा ईमानदार मंत्री नियुक्त किए थे। प्रशासन को कुशलता से चलाने के लिए महाराजा ने अपने राज्य को चार बड़े प्रांतों में विभक्त किया हुआ था। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई मौजा अथवा गाँव थी। गाँव का प्रशासन पंचायत के हाथ में होता था। महाराजा पंचायतों के कार्य में कभी हस्तक्षेप नहीं करता था। वह प्रजा हित को कभी दृष्टिविगतं नहीं होने देता था। उसने राज्य के अधिकारियों को भी यह आदेश दिया था कि वे जन हित के लिए विशेष प्रयत्न करें। प्रजा की स्थिति जानने के लिए महाराजा प्रायः भेष बदल कर राज्य का भ्रमण किया करता था। महाराजा के आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों को दंड दिया जाता था। किसानों तथा निर्धनों को राज्य की ओर से विशेष सुविधाएँ दी गई थीं। परिणामस्वरूप महाराजा रणजीत सिंह के समय में प्रजा बड़ी समृद्ध थी।

प्रश्न 7.
“महाराजा रणजीत सिंह एक महान् सेनानी एवं विजेता था।” व्याख्या करें। (“Maharaja Ranjit Singh was a great general and conqueror.” Explain.).
अथवा
“एक सैनिक और जरनैल के रूप” में महाराजा रणजीत सिंह के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Maharaja Ranjit Singh as a Soldier and a General ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह अपने समय का एक महान् सेनानी था। अपने जीवन में उसने जितने भी युद्ध किए, किसी में भी पराजय का मुख नहीं देखा। वह बड़ी-से-बड़ी विपदा आने पर भी नहीं घबराता था। महाराजा अपने सैनिकों के कल्याण का पूरा ध्यान रखता था। बदले में वे भी महाराजा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने के लिए सदैव प्रस्तुत रहते थे। महान् सेनानी होने के साथ-साथ महाराजा रणजीत सिंह एक महान् विजेता भी था। 1797 ई० में जब रणजीत सिंह शुकरचकिया मिसल की गद्दी पर विराजमान हुआ तो उसके अधीन बहुत कम क्षेत्र था। उसने अपनी योग्यता तथा वीरता से अपने राज्य को एक साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया था। उसके राज्य में लाहौर, अमृतसर, कसूर, स्यालकोट, काँगड़ा, गुजरात, जम्मू, अटक, मुलतान, कश्मीर तथा पेशावर जैसे महत्त्वपूर्ण प्रदेश सम्मिलित थे। इन प्रदेशों को अपने राज्य में सम्मिलित करने के लिए महाराजा रणजीत सिंह को कई भयंकर युद्ध लड़ने पड़े। महाराजा की विजयों के कारण उसका साम्राज्य उत्तर में लद्दाख से लेकर दक्षिण में शिकारपुर तक और पूर्व में सतलुज नदी से लेकर पश्चिम में पेशावर तक फैला हुआ था।

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प्रश्न 8.
महाराजा रणजीत सिंह को शेरे पंजाब क्यों कहा जाता है ? (Why is Maharaja Ranjit Singh called Sher-i-Punjab ?)
अथवा
आप रणजीत सिंह को इतिहास में क्या स्थान देंगे ? उनको शेरे-पंजाब क्यों कहा जाता है ?
(What place would you assign in history to Ranjit Singh ? Why is he called Sher-iPunjab ?)
उत्तर-
महाराजा रणजीत सिंह की गणना न केवल भारत अपितु विश्व के महान् शासकों में की जाती है। विभिन्न इतिहासकार महाराजा रणजीत सिंह की तुलना मुग़ल बादशाह अकबर, मराठा शासक शिवाजी, मिस्र के शासक मेहमत अली एवं फ्राँस के शासक नेपोलियन आदि से करते हैं। इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह की उपलब्धियाँ इन शासकों से कहीं अधिक थीं। जिस समय महाराजा रणजीत सिंह सिंहासन पर बैठा तो उसके पास केवल नाममात्र का राज्य था। किंतु महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी योग्यता एवं कुशलता के साथ एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। ऐसा करके उन्होंने सिख साम्राज्य के स्वप्न को साकार किया। महाराजा रणजीत सिंह का शासन प्रबंध भी बहुत उच्चकोटि का था। उसके शासन प्रबंध का मुख्य उद्देश्य प्रजा की भलाई करना था। प्रजा के दुःखों को दूर करने के लिए महाराजा सदैव तैयार रहता था तथा प्रायः राज्य का भ्रमण भी किया करता था महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उनके दरबार में सिख, हिंदू, मुसलमान, यूरोपियन इत्यादि सभी धर्मों के लोग उच्च पदों पर नियुक्त थे। महाराजा रणजीत सिंह ने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपना कर उन्हें एक सूत्र में बाँधा। वह एक महान् दानी भी थे। उन्होंने अपने साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के लिए एक शक्तिशाली सेना का भी निर्माण किया। उन्होंने अंग्रेजों के साथ मित्रता स्थापित करके अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ का प्रमाण दिया। इन सभी गुणों के कारण आज भी लोग महाराजा रणजीत सिंह को ‘शेर-ए-पंजाब’ के नाम से स्मरण करते हैं। निस्संदेह महाराजा रणजीत सिंह को पंजाब के इतिहास में एक गौरवमयी स्थान प्राप्त है।

Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
1
महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था। वह अपना प्रतिदिन का कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ सुनता था तथा अरदास करता था। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी की एक कलगी अपने तोशेखाने में रखी हुई थी जिसको छूना वह अपने लिए सौभाग्य मानता था। वह अपनी विजयों को उस अकाल पुरख की कृपा समझता था। इन विजयों के लिए धन्यवाद हेतु वह दरबार साहिब अमृतसर जाकर भारी चढ़ावा चढ़ाता था। वह स्वयं को गुरुघर का और सिख पंथ का ‘कूकर’ मानता था। वह अपनी सरकार को ‘सरकार-ए-खालसा’ और दरबार को ‘दरबार खालसा जी’ कहता था। वह स्वयं को ‘महाराजा’ कहलवाने के स्थान पर ‘सिंह साहिब’ कहलवाता था। उसके सिक्कों पर ‘नानक सहाय’ तथा ‘गोबिंद सहाय’ शब्द अंकित थे। उसकी शाही मोहर पर ‘अकाल सहाय’ शब्द अंकित थे।

  1. महाराजा रणजीत सिंह को सिख धर्म में अटल विश्वास था ? कोई एक उदाहरण दें।
  2. कूकर से क्या भाव है ?
  3. महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को क्या कहता था ?
  4. महाराजा रणजीत सिंह की शाही मोहर पर कौन-से शब्द अंकित थे ?
  5. महाराजा रणजीत सिंह के सिक्कों पर ………… तथा ……….. के शब्द अंकित थे।

उत्तर-

  1. वह अपना दैनिक कार्य आरंभ करने से पूर्व गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ सुनता तथा अरदास करता था।
  2. कूकर से भाव है-दास एवं नौकर।
  3. महाराजा रणजीत सिंह अपनी सरकार को सरकार-ए-खालसा कहता था।
  4. महाराजा रणजीत सिंह की शाही मोहर पर अकाल सहाय शब्द अंकित थे।
  5. नानक सहाय, गोबिंद सहाय।

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2
यद्यपि महाराजा रणजीत सिंह सिख धर्म का पक्का श्रद्धालु था फिर भी वह अन्य धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखता था। वह धार्मिक पक्षपात तथा सांप्रदायिकता से कोसों दूर था। वह यह बात भली-भाँति जानता था कि एक शक्तिशाली तथा चिरस्थाई साम्राज्य की स्थापना के लिए सभी धर्मों के लोगों का सहयोग प्राप्त करना आवश्यक है। वह अपनी सहिष्णुता की नीति से विभिन्न धर्मों के लोगों के दिल जीतने में सफल रहा। उसके राज्य में नौकरियाँ योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। उसके दरबार में उच्च पदों पर सिख, हिंदू, मुसलमान, डोगरे तथा यूरोपीय नियुक्त थे। उदाहरणतया उसका विदेश मंत्री फकीर अज़ीज-उद्दीन मुसलमान, प्रधानमंत्री ध्यान सिंह डोगरा, वित्त मंत्री दीवान भवानी दास और सेनापति मिसर दीवान चंद हिंदू थे। इसी तरह जनरल वेंतूरा, कोर्ट, गार्डनर इत्यादि यूरोपीय थे।

  1. महाराजा रणजीत सिंह एक सहनशील शासक था। कैसे ?
  2. ध्यान सिंह डोगरा कौन था ?
  3. महाराजा रणजीत सिंह का विदेश मंत्री कौन था ?
  4. दीवान भवानी दास कौन था ?
  5. महाराजा रणजीत सिंह का सेनापति ………… था।

उत्तर-

  1. वह सभी धर्मों का आदर करता था।
  2. ध्यान सिंह डोगरा महाराजा रणजीत सिंह का प्रधानमंत्री था।
  3. महाराजा रणजीत सिंह का विदेश मंत्री फ़कीर अज़ीजुद्दीन था।
  4. दीवान भवानी दास महाराजा रणजीत सिंह का वित्त मंत्री था।
  5. मिसर दीवान चंद।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

Punjab State Board PSEB 10th Class Agriculture Book Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Agriculture Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

PSEB 10th Class Agriculture Guide आर्थिक विकास में कृषि का योगदान Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के एक – दो शब्दों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
गाँवों में देश की कितनी जनसंख्या रहती है?
उत्तर-
दो-तिहाई से अधिक।

प्रश्न 2.
भारत में कृषि पर सीधे तौर पर निर्भर करने वाली खेतिहर जनसंख्या कितनी है ?
उत्तर-
54%.

प्रश्न 3.
भारत के कुल घरेलू आमदन का कितने प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र से आता है ?
उत्तर-
वर्ष 2012-13 अनुसार 13.7%.

प्रश्न 4.
भारत में वर्ष 1950-51 में अनाज का उत्पादन पैदावार कितना था और वर्ष 2013-14 में अनाज का उत्पादन कितना हो गया?
उत्तर-
वर्ष 1950-51 में अनाज की पैदावार 51 मिलियन टन थी तथा वर्ष 2013-14 में 264 मिलियन टन हो गई।

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प्रश्न 5.
भारत की अर्थ-व्यवस्था के कौन-से तीन क्षेत्र हैं ?
उत्तर-
कृषि, औद्योगिक तथा सेवाएं क्षेत्र।

प्रश्न 6.
विश्व व्यापार में कृषि के क्षेत्र में भारत का कौन-सा स्थान है ?
उत्तर-
दसवां।

प्रश्न 7.
चावल के निर्यात में भारत ने कौन-से देश को पीछे छोड़ दिया है ?
उत्तर-
थाइलैंड को।

प्रश्न 8.
कच्चे माल के लिए कृषि पर निर्भर मुख्य उद्योगों के नाम लिखिए।
उत्तर-
कपड़ा उद्योग, चीनी उद्योग, पटसन उद्योग।

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प्रश्न 9.
वर्ष 2013 में कृषि से संबंधित कौन-सा अधिनियम सरकार ने पास किया है ?
उत्तर-
भोजन सुरक्षा अधिनियम।

प्रश्न 10.
भारत का कृषि व्यापार संतुलन किस तरह का है ?
उत्तर-
वर्ष 2013-14 अनुसार व्यापार संतुलन वृद्धि वाला है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के एक – दो वाक्यों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
आर्थिक विकास का कृषि पर लोगों की निर्भरता से कैसा संबंध है ?
उत्तर-
कृषि पर लोगों की निर्भरता के कारण आर्थिक विकास भी अच्छा होता है। जैसे-जैसे देश का आर्थिक विकास होता है, उसकी कृषि पर निर्भरता कम होती जाती है।

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प्रश्न 2.
भारत के मुख्य कृषि निर्यात कौन-से हैं ?
उत्तर-
चाय, कॉफी, कपास, तेल, फल, सब्जियां, दालें, काजू, मसाले, चावल, गेहूँ आदि का निर्यात किया जाता है।

प्रश्न 3.
भारत के मुख्य कृषि आयात कौन-से हैं ?
उत्तर-
दालें, तेल बीज, सूखे मेवे, खाने योग्य तेल आदि।

प्रश्न 4.
कृषि से संबंधित धंधे कौन से हैं ?
अथवा
कषि से संबंधित कोई चार सहायक धन्धों के नाम लिखें।
उत्तर-
डेयरी फार्म, मुर्गी पालन, मछली पालन, सुअर पालन, पशु पालन, शहद की मक्खियाँ पालना, वन कृषि आदि कृषि संबंधी धंधे हैं।

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प्रश्न 5.
देश में अनाज का भंडार क्यों किया जाता है ?
उत्तर-
कीमतों की वृद्धि के डर को काबू करने के लिए, ज़रूरतमंदों को हर माह अनाज जारी करने के लिए।

प्रश्न 6.
भोजन सुरक्षा अधिनियम में मुख्य प्रावधान क्या है ?
अथवा
भारत सरकार की ओर से वर्ष 2013 में पास किए भोजन सुरक्षा अधिनियम में मुख्य प्रावधान क्या है?
उत्तर-
देश की 75% ग्रामीण तथा 50% शहरी आबादी को 5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति माह के अनुसार अनाज उपलब्ध करवाने का प्रस्ताव है।

प्रश्न 7.
रेलवे का विकास देश में कृषि विकास के साथ कैसे जुड़ा हुआ है ?
उत्तर-
कृषि उत्पाद तथा कृषि के लिए आवश्यक वस्तुओं को देश के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचाने के लिए रेलवे को आय होती है तथा रेलवे का विकास तथा विस्तार होता है।

प्रश्न 8.
उन उद्योगों के नाम लिखिए जो अपने उत्पाद बेचने के लिए कृषि पर निर्भर करते हैं ?
अथवा
कृषि पर आधारित किन्हीं चार उद्योगों के नाम लिखो।
उत्तर-
ट्रैक्टर, कृषि मशीनरी, रासायनिक, खादें, नदीन नाशक, कीटनाशक आदि का प्रयोग कृषि में होता है। इन उद्योगों के उत्पाद कृषि क्षेत्र में बेचे जाते हैं।

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प्रश्न 9.
कृषि के क्षेत्र में कैसी बेरोज़गारी पायी जाती है ?
उत्तर-
कृषि के क्षेत्र में मौसमी तथा छुपी हुई बेरोज़गारी होती है।

प्रश्न 10.
खेतीबाड़ी से संबंधित धंधों से क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
कृषि सहयोगी धंधों से पौष्टिक आहार, जैसे-दुध, अण्डे, मीट, मछली, शहद आदि मिलते हैं। किसान इनसे अच्छी आय भी प्राप्त कर लेते हैं।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के पांच – छः वाक्यों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
भारत के आर्थिक विकास में कषि का क्या योगदान है ?
उत्तर-
देश की कुल आबादी का दो-तिहाई भाग कृषि पर निर्भर है तथा लगभग 54% श्रमिक रोजगार के लिए सीधे रूप से कृषि के साथ जुड़े हुए हैं। वर्ष 2012-13 के दौरान कृषि क्षेत्र ने देश की कुल घरेलू आमदन में 13.7% योगदान डाला है। बहुत सारे उद्योग कृषि पर निर्भर हैं; जैसे चीनी, पटसन तथा कपड़ा उद्योग। कई उद्योगों के उत्पाद कृषि में प्रयोग किए जाते हैं। यातायात, गोदाम, दुलाई से भी देश की आर्थिकता को लाभ मिलता है। कई कृषि उत्पाद निर्यात किए जाते हैं, जिस कारण देश को डालरों में आमदन होती है। कृषि वस्तुओं के निर्यात ड्यूटी से केन्द्र सरकार को आय होती है, राज्य सरकार, भूमि लगान, सिंचाई कर से आमदन प्राप्त करती है। इनके बाजारीकरण से प्राप्त फीस भी सरकारी खज़ाने में वृद्धि करती है। इस प्रकार भारत की आर्थिकता के विकास में कृषि का बहुत योगदान है।

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प्रश्न 2.
भारत के विदेशी व्यापार में देश की कृषि का क्या योगदान है ?
उत्तर-
भारत का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार गहरे स्तर पर कृषि से जुड़ा हुआ है। कई कृषि उत्पादों का निर्यात होता है; जैसे-चाय, कॉफी, मसाले, तेल, कपास, फल, सब्जियाँ, दालें, काजू तथा अब चावल तथा गेहूँ भी। वर्ष 2012 में भारत ने चावल के निर्यात से थाइलैंड को पीछे छोड़ कर पहला स्थान प्राप्त किया। भारत का कृषि तथा अनाज-निर्यात में दुनिया में दसवां स्थान हो गया है। कई कच्चे माल से बनी वस्तुओं सूती कपड़ों, धागों, बने वस्त्र, पटसन से बनी वस्तुओं का निर्यात होता है। वर्ष 2013-14 में भारत का कुल कृषि निर्यात 42 बिलियन डालर का था जबकि इसी वर्ष कृषि आयात केवल 17 बिलियन डालर था। इस प्रकार 2013-14 में भारत का व्यापार संतुलन 25 बिलियन डालर की वृद्धि वाला रहा।

प्रश्न 3.
देश में हरित क्रान्ति आने के क्या कारण हैं?
उत्तर-
जब देश आज़ाद हुआ तो कई दशकों तक देश को अनाज के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ा। देश के किसानों की न थकने वाली मेहनत, वैज्ञानिकों की लगातार खोजें, सुधरे बीज, कृषि मशीनरी, रासायनिक खादें, कीटनाशक दवाइयां आदि के प्रयोग से देश में हरित क्रान्ति आई है। देश में अनाज की पैदावार इतनी बढ़ गई है कि अब देश में चावल, गेहूँ तथा अन्य कृषि उत्पाद देश से निर्यात किए जा रहे हैं।

प्रश्न 4.
देश में कृषि पर निर्भरता कैसे कम की जानी चाहिए ?
उत्तर-
देश के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है कि कृषि पर निर्भरता कम की जाए। कृषि में मौसमी बेरोज़गार तथा छुपी बेरोज़गारी से संबंधित लोगों को उद्योग तथा सेवाओं में लगाया जाए। जैसे-जैसे देश का आर्थिक विकास होता है, कृषि पर निर्भरता घटती है तथा उद्योग तथा सेवाओं पर निर्भरता बढ़ती है।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 5.
देश में कृषि क्षेत्र के विकास से औद्योगिक विकास तथा औद्योगिक विकास से कृषि विकास कैसे संभव है ?
उत्तर-
देश में जब कृषि का विकास होगा या कृषि उत्पाद अधिक उपलब्ध होंगे। जिन के प्रयोग के लिए उद्योग स्थापित करने पड़ेंगे। देश का एक भाग जहां पर उत्पाद कम हो वहां भोजन के लिए यातायात तथा ढुलाई को आवश्यकता पड़ेगी। अधिक अनाज को संभालने के लिए गोदामों की आवश्यकता पड़ेगी। कृषि के साथ जुड़े कुछ उद्योग हैं-चीनी उद्योग, पटसन उद्योग, कपड़ा उद्योग, शैलर, तेल निकालने वाले कारखाने आदि। इस तरह कृषि विकास उद्योगों के विकास में योगदान डालेगा। परन्तु कृषि का विकास होता रहे इसलिए कृषि में कुछ उत्पादों की आवश्यकता पड़ेगी, जैसे-ट्रैक्टर उद्योग, मशीनरी, खादें कीटनाशक आदि रसायनों से संबंधित उद्योग जिनके उत्पाद कृषि में प्रयोग होते हैं। इस प्रकार औद्योगिक विकास से कृषि विकास संभव है।

Agriculture Guide for Class 10 PSEB आर्थिक विकास में कृषि का योगदान Important Questions and Answers

वस्तनिष्ठ प्रश्न

I. बहु-विकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
वर्ष 2012-13 के दौरान कृषि क्षेत्र ने देश की कुल घरेलू आमदन में …….. योगदान डाला है।
(क) 13.7 %
(ख) 15.9%
(ग) 11.5%
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) 13.7 %

प्रश्न 2.
भारत में 2013-14 में अनाज की पैदावार कितनी थी ?
(क) 264 मिलियन टन
(ख) 51 मिलियन टन
(ग) 100 मिलियन टन
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) 264 मिलियन टन

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 3.
भारत के मुख्य कृषि निर्यात हैं-
(क) चाय
(ख) कपास
(ग) दालें
(घ) सभी।
उत्तर-
(घ) सभी।

प्रश्न 4.
चावल के निर्यात में भारत ने कौन-से देश को पीछे छोड़ा-
(क) थाइलैंड
(ख) भूटान
(ग) अमेरिका
(घ) श्रीलंका।
उत्तर-
(क) थाइलैंड

प्रश्न 5.
वर्ष 2012 में देश में अनाज का भंडार कितना था?
(क) 82 मिलियन टन
(ख) 25 मिलियन टन
(ग) 52 मिलियन टन
(घ) 108 मिलियन टन।
उत्तर-
(क) 82 मिलियन टन

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 6.
भोजन सुरक्षा अधिनियम-2013 के अधीन एक महीने में प्रति व्यक्ति कितना अनाज़ देने का प्रावधान है ?
(क) 5 किलो
(ख) 10 किलो
(ग) 15 किलो
(घ) 20 किलो।
उत्तर-
(क) 5 किलो

II. ठीक/गलत बताएँ

1. कई प्रमुख उद्योगों को कच्चा माल कृषि से मिलता है।
2. वर्ष 2012 में भारत ने चावल का निर्यात करके थाइलैंड को पीछे छोड़ दिया है।
3. कृषि में मौसमी तथा छिपी बेरोज़गारी होती है।
4. 2013-14 में भारत का कुल कृषि निर्यात 42 बिलियन डॉलर था।
5. अनाज की उत्पादकता 2125 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर है।
उत्तर-

  1. ठीक
  2. ठीक
  3. ठीक
  4. ठीक
  5. ठीक।

III. रिक्त स्थान भरें-

1. ……………… हमारे देश की आर्थिकता की रीढ़ की हड्डी है।
2. विश्व व्यापार में कृषि के क्षेत्र में भारत का ………………… स्थान है।
3. 2012 में देश में अनाज का भंडार ……………….. टन था।
4. देश में डेयरी फार्म के धंधे में ……………….. परिवार लगे हैं।
उत्तर-

  1. कृषि
  2. दसवां
  3. 82 मिलियन
  4. 70 मिलियन।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कृषि हमारे देश की आर्थिकता की क्या है ?
उत्तर-
रीढ़ की हड्डी।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 2.
देश में डेयरी फार्म के धंधे में कितनी आबादी लगी हुई है ?
उत्तर-
70 मिलियन परिवार।

प्रश्न 3.
सेवाएं क्षेत्र में क्या-क्या आता है ?
उत्तर-
बैंक की सेवा, यातायात सुविधाएं, भंडार तथा गोदाम, बीमा, सैर-सपाटा आदि।

प्रश्न 4.
जनसंख्या के अनुसार हमारा देश दुनिया में कौन-से स्थान पर है?
उत्तर-
दूसरे स्थान पर।

प्रश्न 5.
घरों में उपभोग से सम्बन्धित कितने प्रतिशत भाग कृषि से सम्बन्धित है ?
उत्तर-
60%.

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प्रश्न 6.
अनाज की उत्पादकता कितनी है?
उत्तर-
2125 कि० ग्रा० प्रति हेक्टेयर।

प्रश्न 7.
2012 में देश में अनाज का भंडार कितना है?
उत्तर-
82 मिलियन टन।

प्रश्न 8.
एक अनुमान के अनुसार 82 करोड़ आबादी को कितना अनाज सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करवाया जाएगा?
उत्तर-
61 मिलियन टन।

प्रश्न 9.
भारत 2012 में कौन-से कृषि उत्पाद के निर्यात में पहले स्थान पर रहा?
उत्तर-
चावल के।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 10.
2013-14 में भारत का कुल कृषि का निर्यात कितना था?
उत्तर-
42 बिलियन डालर।

प्रश्न 11.
भारत में कितने प्रतिशत मज़दूर प्रत्यक्ष तौर पर कृषि में लगे हुए हैं ?
उत्तर-
54% मज़दूर प्रत्यक्ष तौर पर कृषि में लगे हुए हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कृषि आधारित छोटे पैमाने पर कौन-से उद्योग हैं ?
उत्तर-
कृषि आधारित छोटे पैमाने पर घरेलू उद्योग-जैसे-चावल शैलर, तेल निकालना आदि।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 2.
अर्थव्यवस्था में तीसरा क्षेत्र कौन-सा है? उदाहरण भी दें।
उत्तर-
अर्थव्यवस्था में तीसरा क्षेत्र-सेवाएँ क्षेत्र हैं। इसमें बैंक की सेवाएँ, यातायात सुविधाएं, भंडार के लिए गोदाम, बीमा, सैर-सपाटा आदि है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
देश अनाज की पैदावार में स्वः रोज़गार हो गया है। तुलना करके समझाएँ।
उत्तर-
वर्ष 1950-51 में अनाज की कुल पैदावार 51 मिलियन टन थी जो 2013-14 में 264 मिलियन टन हो गई है। वर्ष 2012 में देश के पास 82 मिलियन टन अनाज का भंडार था जो कि एक रिकार्ड है। इससे पता चलता है कि देश स्व:-निर्भर हो गया है।

प्रश्न 2.
देश में हरित क्रान्ति आने के कोई पांच कारण लिखें।
उत्तर-

  • देश में सिंचाई के साधनों को अधिकता में उपलब्ध होना।
  • रसायनिक खादों का प्रयोग करने से उत्पादन में वृद्धि होना।
  • अधिक उपज देने वाली किस्मों की खोज होना।
  • फसल की रोगों, कीटों, खरपतवार से सुरक्षा आसानी से होने लगी।
  • कृषि मशीनरी का अधिक प्रयोग।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 7 आर्थिक विकास में कृषि का योगदान

प्रश्न 3.
भारत में हरित क्रांति आने के कोई चार कारण लिखें।
उत्तर-
स्वयं करें।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

Punjab State Board PSEB 7th Class Social Science Book Solutions History Chapter 12 स्मारक निर्माण कला Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Social Science History Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

SST Guide for Class 7 PSEB स्मारक निर्माण कला Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षेप में उत्तर लिखें

प्रश्न 1.
उत्तरी भारत के प्रमुख मन्दिर कौन-से थे?
उत्तर-
800 से 1200 ई० तक उत्तरी भारत में अनेक मन्दिर बने। इनमें से प्रमुख मंदिर थे –
जगन्नाथ पुरी का विष्णु मन्दिर, भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर, कोणार्क का सूर्य मन्दिर तथा माऊंट आबू का तेजपाल मन्दिर।

प्रश्न 2.
भारतीय-मुस्लिम भवन निर्माण कला की प्रमुख विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
भवन-निर्माण कला भारतीय-मुस्लिम शैली की प्रमुख विशेषताएं नीचे दी गई हैं –

  1. यह शैली तुर्क, अफ़गान तथा भारतीय शैलियों का मिश्रण थी।
  2. इस शैली में अनेक मस्जिदें तथा मकबरे बनवाये गए। नुकीले मेहराब, मीनार तथा गुम्बद इस शैली की मुख्य विशेषताएं हैं।
  3. इन भवनों की दीवारों पर पवित्र कुरान की आयतें लिखी हुई है।
  4. अलाउद्दीन खिलजी के काल में बने अलाई दरवाज़े में लाल पत्थर तथा सफ़ेद संगमरमर का प्रयोग किया गया।
  5. कई इमारतों में स्तम्भों का प्रयोग भी किया गया है।

प्रश्न 3.
दक्षिण भारत के मंदिर कौन-से थे? नाम लिखें।
उत्तर-

  1. चोल शासक राजराजा द्वारा बना राजराजेश्वर मन्दिर।
  2. राजेन्द्र प्रथम चोल द्वारा बना गंगईकोंड चोलपुरम् का मन्दिर।
  3. एलोरा में राष्ट्रकूट शासकों द्वारा बना कैलाश मन्दिर।
  4. तंजौर में स्थित बृहदेश्वर का मन्दिर।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

प्रश्न 4.
दिल्ली सल्तनत काल में बनाए गए स्मारकों की सूची बनाओ।
उत्तर-
दिल्ली के सुल्तानों ने अनेक स्मारक बनवाये। इनमें से मुख्य स्मारकों का वर्णन इस प्रकार है –
1. दास शासकों द्वारा बने स्मारक-कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली में कुवत-उल-इस्लाम नाम की एक मस्जिद बनवाई। इसकी दीवारों पर कुरान की पवित्र आयतें अंकित हैं। उसने अजमेर में ‘अढ़ाई-दिन-का-झोंपड़ा’ नामक मस्जिद का निर्माण करवाया। उसने दिल्ली के समीप महरौली में कुतुबमीनार का निर्माण कार्य आरम्भ किया। परन्तु उसकी मृत्यु हो जाने के कारण यह निर्माण कार्य पूरा न हो सका। बाद में उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इस काम को पूरा करवाया। 70 मीटर ऊंची इस इमारत की पांच मंज़िलें हैं।

2. अलाउद्दीन खिलजी के काल में बने स्मारक-अलाउद्दीन खिलजी के राज्य-काल में भवन-निर्माण कला का बहुत अधिक विकास हुआ। उसके द्वारा बनवाई गई इमारतों में से ‘अलाई दरवाज़ा’ सबसे अधिक प्रसिद्ध है। यह दरवाजा लाल पत्थर और सफ़ेद संगमरमर का बना हुआ है। अलाउद्दीन खिलजी ने हज़ार स्तम्भों वाला महल, एक हौज़-ए-खास तथा जमायत-खाना नामक मस्जिद भी बनवाई थी।

3. तुग़लक शासकों द्वारा बने स्मारक-(1) गियासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली में तुगलकाबाद नाम का एक नगर बनवाया। (2) मुहम्मद-बिन-तुगलक ने जहांपनाह नाम के एक नये नगर का निर्माण करवाया। (3) फिरोजशाह तुग़लक ने भी कई नये नगर बसाए। इन नगरों में फिरोजाबाद, हिसार फिरोजा तथा जौनपुर प्रमुख हैं। उसने बहुत-सी मस्जिदें, स्कूल और पुल भी बनवाए।

4. लोधी तथा सैय्यद शासकों द्वारा बने भवन-लोधी और सैय्यद सुलतानों ने मुबारक शाह और मुहम्मदशाह के मकबरे बनवाए। सिकन्दर लोधी का मकबरा, बाड़ा, गुम्बद आदि स्मारक लोधी काल में बनवाए गए थे।

प्रश्न 5.
मुग़ल बादशाह शाहजहां को भवन निर्माताओं का शहजादा क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
शाहजहां को भवन बनवाने का बड़ा चाव था। उसके द्वारा बनवाए गए सभी भवन कला और सुन्दरता की दृष्टि से विशेष स्थान रखते हैं। उसने आगरा में जहांगीर महल, रानी जोधाबाई का महल, लाल किले की मोती मस्जिद तथा ताजमहल आदि बनवाए। ताजमहल संसार के सबसे सुन्दर भवनों में से एक है। दिल्ली में यमुना तट पर उसने लाल किला बनवाया। किले में उसने दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, मोती मस्जिद तथा अन्य कई भवन बनवाए। उसने अपने बैठने के लिए हीरे-मोती से जड़ित एक सिंहासन बनवाया जिसे तख्ते-ताऊस कहते हैं। शाहजहां की इन्हीं कृतियों के कारण उसे ‘भवन निर्माण कला का राजकुमार’ कहा जाता है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

(ख) निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

  1. ………… में बृहदेश्वर मन्दिर स्थित है।
  2. ………… द्वारा कुतुबमीनार का निर्माण किया गया था।
  3. मुग़ल बादशाह अकबर ने ………… को अपनी राजधानी बनाया।
  4. बुलन्द दरवाज़ा ………… में स्थित है।
  5. ताजमहल ………… द्वारा ……….. की याद में बनवाया गया था।
  6. ………… का निर्माण जहांगीर ने करवाया था।

उत्तर-

  1. तंजौर
  2. कुतुबुद्दीन ऐबक-इल्तुतमिश
  3. फतेहपुर सीकरी
  4. फतेहपुर सीकरी
  5. शाहजहाँ, अपनी बेग़म मुमताज़
  6. सिकन्दरा में अकबर के मकबरे।

(ग) निम्नलिखित प्रत्येक कथन के आगे ठीक (✓) अथवा गलत (✗) का चिन्ह लगाएं

  1. भारत में तुर्कों और अफ़गानों द्वारा भवन निर्माण कला की नई विधियों तथा नमूनों (प्रारूप) को तैयार किया गया था।
  2. चन्देल शासकों द्वारा खजुराहो में मन्दिरों का निर्माण करवाया गया था।
  3. अलाउद्दीन खिलजी ने सीरी को अपनी नई राजधानी बनाया था।
  4. मुहम्मद तुग़लक ने तुग़लकाबाद नगर को बसाया था।
  5. चोल शासकों द्वारा बनाए गए मन्दिरों में भवन निर्माण कला के द्रविड़ शैली नमूनों का प्रयोग किया। गया था।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✗)
  4. (✗)
  5. (✓)

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(घ) सही जोड़े बनाएं

नोट-पाठ्य-पुस्तक में दिए इस प्रश्न से सही मिलान नहीं किया जा सकता। इसलिए इस प्रश्न में थोड़ा-बहुत परिवर्तन किया है।

(क) – (ख)

  1. लिंगराज मन्दिर – भुवनेश्वर
  2. वृहदेश्वर मन्दिर – दिल्ली
  3. ढाई-दिन-का-झोंपड़ा – दिल्ली
  4. अदीना मस्जिद – आगरा
  5. हुमायूं का मकबरा – मालदा
  6. मोती मस्जिद – आगरा
  7. लाल किला – तंजौर
  8. ताज़ महल – अजमेर

उत्तर-

  1. लिंगराज मन्दिर – भुवनेश्वर
  2. वृहदेश्वर मन्दिर – तंजौर
  3. ढाई-दिन-का-झोंपड़ा – अजमेर
  4. अदीना मस्जिद – मालदा
  5. हुमायूं का मकबरा – दिल्ली
  6. मोती मस्जिद – आगरा
  7. लाल किला – दिल्ली
  8. ताजमहल – आगरा।

PSEB 7th Class Social Science Guide स्मारक निर्माण कला Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
संसार की सबसे बड़ी मूर्ति कौन-सी है ?
उत्तर-
कर्नाटक में श्रवणबेलगोला में स्थित गोमतेश्वर की मूर्ति संसार की सबसे बड़ी मूर्ति है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

प्रश्न 2.
800-1200 ई० में उत्तर भारत में बने मन्दिरों की सूची बनाओ।
उत्तर-

  1. जगन्नाथ पुरी का विष्णु मन्दिर
  2. भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर
  3. कोणार्क का सूर्य मन्दिर तथा माऊंट आबू का तेजपाल मन्दिर आदि।

प्रश्न 3.
तंजौर के बृहदेश्वर मन्दिर की संक्षिप्त जानकारी दीजिए। .
उत्तर-
तंजौर में स्थित बृहदेश्वर का मन्दिर दक्षिण भारत में मन्दिर निर्माण कला का एक शानदार नमूना है। भगवान् शिवजी को समर्पित यह मन्दिर राजराजा प्रथम द्वारा बनवाया गया था। इस मन्दिर के मुख्य द्वार को गोपुरम् कहा जाता है। इसकी ऊँचाई लगभग 94 मीटर है।

प्रश्न 4.
एलोरा के कैलाश मन्दिर पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर-
एलोरा का कैलाश मन्दिर राष्ट्रकूट शासकों की भवन-निर्माण कला का एक सुन्दर नमूना है। यह राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम द्वारा बनवाया गया था। इस मन्दिर का निर्माण चट्टानों को काटकर किया गया है। यह मन्दिर संसार के निर्माण-कला आश्चर्यों में से एक माना जाता है।

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प्रश्न 5.
मुग़ल बादशाह जहांगीर द्वारा बनवाए गए दो भवनों के नाम बताओ।
उत्तर-
मुग़ल बादशाह जहांगीर ने सिकन्दरा में अकबर का और आगरा में इतमाद-उद्-दौला का मकबरा बनवाया।

प्रश्न 6.
भवन निर्माण कला में प्रदेशिक (क्षेत्रीय) राजाओं का क्या योगदान था ?
उत्तर-
क्षेत्रीय राज्यों में बहमनी तथा विजयनगर राज्यों के नाम लिए जा सकते हैं।

  1. बहमनी शासकों ने जामा मस्जिद, चार मीनार, महमूद गवा का मदरसा आदि भवन बनवाए थे। गुलबर्गा में फिरोजशाह का मकबरा, भवन निर्माण कला का बहुत ही सुन्दर नमूना है।
  2. विजयनगर के राजाओं ने हजारा राम और विट्ठल स्वामी मन्दिर बनवाए थे।
  3. बहमनी तथा विजयनगर के शासकों के अतिरिक्त जौनपुर के शर्की शासकों ने भी महत्त्वपूर्ण स्मारक बनवाए। उनके द्वारा बनी अटाला मस्जिद बहुत ही विख्यात है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

प्रश्न 7.
निम्न पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
(क) अकबर द्वारा बनवाये गये स्मारकों का वर्णन करें।
(ख) दक्षिणी भारत के मन्दिरों के नाम लिखें।
(ग) ताजमहल।
उत्तर-
(क) अकबर द्वारा बनवाई गई इमारतें (भवन)-अकबर को भवन निर्माण कला से बहुत ही प्रेम था। उसने बहुत-से किलें और इमारतें बनवाईं जिनमें लाल पत्थर का प्रयोग किया गया है। अकबर द्वारा बनवाई गई इमारतों में जामा मस्जिद, पंच महल, दीवान-ए-खास और दीवान-ए-आम बहुत ही प्रसिद्ध हैं। अकबर ने गुजरात विजय के समय एक बुलन्द दरवाज़ा बनवाया। उसकी इमारतें ईरानी और हिन्दू भवन निर्माण कला के नमूनों पर बनी हैं।

(ख) दक्षिणी भारत के मन्दिरों के नाम-अभ्यास का प्रश्न 3 पढ़ें।

(ग) ताजमहल-ताजमहल मुग़ल सम्राट शाहजहां द्वारा बनवाई गई सबसे सुन्दर इमारत है। यह आगरा में यमुना नदी के तट पर बनी है। इसे शाहजहां ने अपनी प्रिय बेग़म मुमताज की याद में बनवाया था। ताजमहल का निर्माण करने के लिए लगभग 20,000 कारीगरों ने 22 साल तक काम किया था और इस पर तीन करोड़ रुपये खर्च आये थे।

ताजमहल अनेक भवन-निर्माण कलाओं का सुन्दर मिश्रण है। यह सफ़ेद संगमरमर का बना हुआ है। इसे अन्य देशों से मंगवाए गए लगभग 20 प्रकार के कीमती पत्थरों से सजाया गया है। इसकी सुन्दरता के कारण इसकी गणना संसार के सात आश्चर्यों में की जाती है।

प्रश्न 8.
शाहजहां ने ताजमहल के अतिरिक्त अन्य भी कई भवन बनवाये। उनकी संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-
शाहजहां ने ताजमहल के अतिरिक्त निम्नलिखित भवन बनवाए –
1. लाल किला-लाल किला शाहजहां द्वारा 1639 ई० में दिल्ली में, यमुना के किनारे बनवाया गया। यह लाल पत्थर का बना हुआ है। इस किले में रंग महल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, शाह बुर्ज, ख्वाब-गाह आदि कई सुन्दर इमारतें स्थित हैं। इसे कीमती पत्थरों, हीरों, सोने और चांदी की वस्तुओं से सजाया गया।

2. मोती मस्जिद-मोती मस्जिद शाहजहां द्वारा आगरा के लाल किले में बनवाई गई थी। इसे बनाने में लगभग तीन लाख रुपये का व्यय हुआ था। यह मस्जिद संगमरमर की बनी हुई है।

3. मुस्समन बुर्ज़- यह बुर्ज़ भी संगमरमर का बना हुआ है। यह बहुत ही सुन्दर है। यहां से ताजमहल स्पष्ट दिखाई देता है।

4. शाहजहानाबाद-1639 ई० में शाहजहां ने शाहजहानाबाद नामक नगर की नींव रखी। इस नगर को बनाने के लिए दूर-दूर से कुशल कारीगर तथा मजदूर बुलाये गये थे।

5. जामा मस्जिद-यह भारत की बड़ी मस्जिदों में से एक है। इसे बनाने में लगभग 10 साल का समय लगा था।

6. जहांगीर का मकबरा-शाहजहां ने यह मकबरा शाहदरा (पाकिस्तान) में बनवाया था। इसे संगमरमर से सजाया गया है।

7. शाहजहां का मोर-मुकुट-यह दीवान-ए-खास में रखा हुआ है। इसे तख्ते ताऊस भी कहते हैं। यह संगमरमर का बना हुआ है। इसे बनाने में सात साल लगे थे और इस पर एक करोड़ रुपये खर्च आया था। 1739 ई० में नादिरशाह इसे अपने साथ ईरान ले गया था।
शाहजहां बाग लगवाने में भी बहुत रुचि रखता था। उसने बहुत से बाग लगवाए थे। इनमें से दिल्ली का शालीमार बाग और काश्मीर का वज़ीर बाग बहुत प्रसिद्ध हैं। कुछ बाग ताजमहल और लाल किले में भी लगाए गए थे।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला

सही उत्तर चुनिए :

प्रश्न 1.
गौमतेश्वर की विश्व विख्यात मूर्ति श्रवण बेलगोला में स्थित है। बताइए यह किस राज्य में है?
(i) कर्नाटक
(ii) तमिलनाडु
(iii) आंध्र प्रदेश।
उत्तर-
(i) कर्नाटक।

प्रश्न 2.
हजार राम तथा विट्ठल स्वामी मंदिर किन शासकों ने बनवाए?
(i) विजयनगर के शासकों ने
(ii) चोल शासकों ने
(iii) राष्ट्रकूट शासकों ने।
उत्तर-
(i) विजयनगर के शासकों ने।

प्रश्न 3.
चित्र में फतेहपुर सीकरी में स्थित एक प्रसिद्ध भवन दिखाया गया है जिसे अकबर ने बनवाया था? यह किस नाम से प्रसिद्ध है?
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 12 स्मारक निर्माण कला 1
(i) चारमीनार
(ii) जामा मस्जिद
(iii) बुलंद दरबाज़ा।
उत्तर-
(iii) बुलंद दरवाज़ा।

तैराकी (Swimming) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions तैराकी (Swimming) Game Rules.

तैराकी (Swimming) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. तैराकी कुण्ड की लम्बाई = 50 मीटर
  2. कुण्ड की कम-से-कम चौड़ाई = 21 मीटर से 25 मीटर
  3. कुण्ड में पानी की गहराई = 1.8 मीटर से अधिक
  4. ब्रैस्ट स्ट्रोक में तैराक कौन-सी किक नहीं मार सकता = डालफिन किक
  5. तैराकी के अधिकारी = एक रैफ़री, एक सटारटर, टाइम कीपर प्रत्येक लेन में, समाप्ति जज प्रत्येक लेन पर
  6. टरन और स्ट्रोक के इन्सपैक्टर = प्रत्येक लेन पर
  7. रिकार्डर = एक
  8. लेन की संख्या = 8 लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 10 लेन
  9. लेन की चौड़ाई = 2.5 मी०
    स्टार्टिंग प्लेटफार्म
  10. पानी से प्लेटफार्म की ऊँचाई = 0.5 मी० से 0.75 मी०
  11.  प्लेटफार्म का दरिया (slope) = 0.50 मी० × 0.50 मी०
  12. अधिकतम ढलान = 10° से अधिक नहीं
  13. पूल के पानी का तापमान = + 20° सैल्सियस कम से कम
  14. तैराकी प्रतियोगिता = 1. फरी स्टाइल
    2. बैक स्ट्रोक
    3. ब्रैस्ट स्ट्रोक
    4. बटर फ्लाई स्ट्रोक
    5. रिले = 4 × 100 मीटर फ्री स्टाइल
    = 4 × 400 मीटर मैडले।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

तैराकी खेल की संक्षेप रूप-रेखा
(Brief outline of the Swimming Game)

  1. सभी तैराकी रेस इवेंट्स में प्रत्येक तैराक के लिए घूमते हुए पूल के सिरे के साथ शारीरिक स्पर्श करना आवश्यक होता है।
  2. तैराकी कुण्ड (Swimming Pool) की लम्बाई 50 मीटर तथा इसकी कम-से कम चौड़ाई 21 मीटर होती है।
  3. तैराकी कुण्ड में जल की गहराई 1.8 मीटर से अधिक होती है।
  4. इसमें लम्बाई में पानी के तल से 0.3 मीटर ऊपर तथा 0.8 मीटर नीचे छूट होगी।
  5. कोई भी तैराक ऐसी वस्तु का प्रयोग नहीं कर सकता या पहन नहीं सकता जिससे उसे अपनी तैराकी में गति को बढ़ाने में सहायता मिले।
  6. ब्रैस्ट स्ट्रोक तैराकी में तैराक डोल्फिन किक नहीं लगा सकता।
  7. बटर फ्लाई स्ट्रोक में दोनों भुजाओं को एक समय पानी के ऊपर आगे तथा पीछे जाना चाहिए।
  8. बैक स्ट्रोक तैराकी में पीठ की साधारण स्थिति बदलने वाला प्रतियोगी अयोग्य घोषित किया जाता है।
  9. फ्री-स्टाइल तैराकी में तैराक किसी भी ढंग से तैर सकता है।
  10. तैराकी तथा गोता लगाते समय किसी प्रकार की कोचिंग देना मना है।
  11. कोई भी तैराक रेस के इवेंट्स समय अपने शरीर पर तेल या चिकनी वस्तु नहीं मल सकता।
  12. तैराक को नियम अनुसार बनाई गई पोशाक ही पहननी चाहिए।
  13. तैराक को सदैव अपनी पंक्ति में ही तैरना चाहिए।
  14. लेन जिनकी चौड़ाई 2.5 मीटर होगी जोकि रस्सियों के साथ बनी होगी। प्रतियोगिता के समय पानी की सतह एक जैसी होगी।

प्रश्न
ओलम्पिक और अन्तर्राष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिता के लिए नियुक्त अधिकारियों का वर्णन करें।
उत्तर-
तैराकी कुण्ड (Swimming Pool)—तैराकी कुण्ड की लम्बाई 50 मीटर तथा इसकी कम-से-कम चौड़ाई 21 मीटर होती है। इसमें जल की गहराई 1.8 मीटर से अधिक होती है।
तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
इसकी लम्बाई में पानी के तल से 0.3 मीटर ऊपर तथा 0.8 मीटर नीचे छूट होगी। लेन (Lane) 8 जिनकी चौड़ाई 2.5 मीटर है रस्सियों से बंधी होगी। मुकाबले के समय पानी की सतह लगातार एक-सी बिना हलचल वाली होनी चाहिए।

अधिकारी (Officials)-ओलम्पिक खेलों, विश्व चैम्पियनशिप तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय तैराकी प्रतियोगिताओं के लिए निम्नलिखित अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे
रैफरी (1), स्टार्टर (1), मुख्य टाइम कीपर (3), मुख्य जज (1), समाप्ति के जज (प्रति लेन 3), टर्न के इन्सपैक्टर (प्रत्येक लेन में दोनों सिरों पर एक-एक), एनाऊंसर (2), रिकार्डर (1), क्लर्क ऑफ दी हाऊस परन्तु अन्य प्रतियोगिताओं के लिए कम-सेकम निम्नलिखित अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं—
रैफरी (1), स्टार्टर (1), टाइम कीपर (प्रति-लेन 1), समाप्ति के जज (प्रति लेन 1), टर्न तथा स्ट्रोक इन्सपैक्टर (प्रत्येक दो लेनों के लिए 1), रिकार्डर (1)।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
तैराकी प्रतियोगिता के नियम लिखें।
उत्तर-
तैराकी प्रतियोगिता के नियम
(Rules of Swimming Race)

  1. तैरते समय प्रतियोगी को बाधा डालने वाला व्यक्ति अयोग्य घोषित किया जाएगा।
  2. किसी त्रुटि (फाऊल) के कारण प्रतियोगी की सफलता की सम्भावना संकट में पड़ने की दिशा में जजों को यह अधिकार होगा कि वे उसे अगले दौरे में भाग लेने की आज्ञा दे दें। यदि त्रुटि फाइनल में हुई होगी तो उसे पुनः तैरने की आज्ञा दी जा सकती है।
  3. लौटते समय तैराकी कुण्ड अथवा मार्ग के अन्त में एक अथवा दोनों हाथों से स्पर्श करेंगे। गृह के तल से डग मारने की अनुमति नहीं।
  4. दौड़ के समय यदि प्रतियोगी तल पर खड़ा हो जाए तो उसे अयोग्य नहीं घोषित किया जाएगा, परन्तु वह चलेगा नहीं।
  5. जल-मार्ग की सारी दूरी पार करने वाला प्रतियोगी ही विजेता घोषित किया जाएगा।
  6. रिले दौड़ में जिस प्रतियोगी टीम के पांव निर्वाचित साथी के दीवार से स्पर्श से पूर्व भूमि से हट जाएंगे, वह अयोग्य घोषित किया जाएगा तब तक कि अपराधी प्रतियोगी मूल प्रारम्भ बिन्दु पर न लौट आए। प्रारम्भ प्लेटफार्म तक लौटना आवश्यक नहीं।
  7. प्रतियोगिता के समय किसी प्रतियोगी को कोई ऐसी वस्तु प्रयोग में लाने अथवा पहनने की आज्ञा नहीं होगी जोकि उसकी तैरने की गति तथा सहिष्णुता बढ़ाने में सहायता प्रदान करे।

प्रश्न
ब्रैस्ट स्ट्रोक, बटर फ्लाई स्ट्रोक, बैक स्ट्रोक और फ्री स्टाइल तैराकी क्या
उत्तर-
बटर फ्लाई स्ट्रोक-इसमें दोनों बाजू पानी की सतह के ऊपर इकट्ठे आगे से पीछे ले जाने पड़ते हैं।
मुकाबला शुरू होने पर और समाप्त होने पर छाती ऊपर दोनों कन्धे पानी की सतह पर सन्तुलित हों, पांवों की क्रियाएं इकट्ठी हों।
फ्री स्टाइल-फ्री स्टाइल तैराकी का अर्थ किस प्रकार या ढंग से तैराकी है। इससे भाव तैरने का ढंग जोकि बटर फ्लाई स्ट्रोक, ब्रैस्ट या बैक स्ट्रोक से अलग हो। फ्री स्टाइल में तैराकी कुण्ड पर और दौड़ की समाप्ति के समय तैराकी कुण्ड की दीवार हाथ से छूना ज़रूरी नहीं। वह अपने शरीर के किसी अंग से छू सकता है।
बैक स्ट्रोक-इसमें भाग लेने वाले शुरू होने वाले स्थान पर उस ओर मुंह करके हाथ कुण्ड पर रखें, पैर पानी में होने ज़रूरी हैं। कुण्ड में खड़े नहीं हो सकते।
शुरू का संकेत मिलने पर दौड़ते समय बैक से (पीठ से) तैरेंगे।

ब्रैस्ट स्ट्रोक-इससे शरीर तथा छाती सन्तुलित और दोनों कन्धे पानी की सतह के बराबर होंगे, हाथों और पांवों की क्रियाएं इकट्ठी होंगी जोकि एक लाइन में हों। छाती से दोनों हाथ इकट्ठे आगे पानी के अन्दर या ऊपर और पीछे होने चाहिएं।
टांगों की क्रिया में पांव पीछे से आगे की तरफ मुड़ें, मछली की तरह क्रिया नहीं की जा सकती। मुड़ते समय या समाप्ति पर छू दोनों हाथों से पानी के अन्दर या ऊपर ज़रूरी है। सिर का हिस्सा पानी की सतह से ऊपर रहना ज़रूरी है।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
स्कूल स्तर पर लड़के और लड़कियों के लिए तैराकी प्रतियोगिता का वर्णन करें।
उत्तर-
स्कूल स्तर पर लड़के और लड़कियों के लिए तैराकी प्रतियोगिताएं—
तैराकी प्रतियोगिताएं
तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 2

PSEB 10th Class Physical Education Practical तैराकी (Swimming)

प्रश्न 1.
तैराकी प्रतियोगताएं कितने की होती हैं ?
उत्तर-
तैराकी (Swimming) तैराकी प्रतियोगिताओं में निम्नलिखित मुकाबले होंगे—
1. लड़के (Boys)—

  1. फ्री स्टाइल (Free Style)-100, 200, 400, 800, 1500 मीटर।
  2. बैक स्ट्रोक (Back Stroke)-100, 200 मीटर।
  3. ब्रैस्ट स्ट्रोक (Breast Stroke)-100, 200 मीटर।
  4. बटरफ्लाई स्ट्रोक (Butterfly Stroke)-100 मीटर।
  5. रीले (Relay) 4 × 100 मीटर की फ्री स्टाइल। 4 × 100 मीटर मेडले (ब्रैस्ट, बैक, बटरफ्लाई और फ्री स्टाइल)।

लड़कियां (Girls)—

  1. फ्री स्टाइल (Free Style)-100, 200, 400 मीटर।
  2. बैक स्ट्रोक (Back Stroke)-100 मीटर।
  3. ब्रैस्ट स्ट्रोक (Breast Stroke)-100 मीटर।
  4. बटरफ्लाई स्ट्रोक (Butterfly Stroke)-100 मीटर।
  5. रीले (Relay)-4 × 100 मीटर फ्री स्टाइल। 4 × 100 मीटर मेडले (ब्रैस्ट, बैक, बटरफ्लाई और फ्री स्टाइल)।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 2.
तैराकी प्रतियोगिता में हीटें किस प्रकार बनाई जाती हैं और फाइनल कैसे होता है ?
उत्तर-
हीटों का बनाना और फाइनल (Seeding Heats and Finals)-सारे तैराकी मुकाबलों में सैमी फाइनल और फाइनल में हीटों का निर्माण इस प्रकार होगा—

  1. ट्रायल हीट (Trial Heat) सभी तैराक जिन्हें भाग लेना है, एक परफा में उनका समय उनके नामों के सामने भरकर योग्यता कमेटी को भेज दिया जाता है। जो प्रतियोगी अपना समय नहीं भरते, उनका नाम सूची के अन्त में दर्ज किया जाता है।
  2. सबसे तेज़ तैराक को सबसे अन्तिम हीट में, उससे कम तेज़ तैराक को अन्तिम से पहले वाली हीट में। इसी तरह बाकी के तैराकों या टीमों की हीट का फैसला किया जाता है।
  3. सबसे तेज़ तैराक को सैंटर वाली लाइन दी जाती है, उससे कम तेज़ उसके दाईं तथा बाईं ओर रखे जाते हैं।

फाइनल (Finals)—जहां आरम्भिक हीटों की आवश्यकता न हो तो लाइनों का निर्माण ऊपर दिए (3) के अनुसार होगा।

प्रश्न 3.
तैराकी प्रतियोगताओं के लिए नियुक्त अधिकारियों का वर्णन करो।
उत्तर-

रैफरी 1
जज 1
स्टार्टर 1
टाइम कीपर 1
रिकार्ड कीपर 2
इंस्पैक्टर 2
स्ट्रोक जज 1

 

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 4.
तैराकी सम्बन्धी हमें कौन-कौन सी सावधानियां प्रयोग में लानी चाहिएं ?
उत्तर-
तैराकी सम्बन्धी सावधानियां निम्नलिखित हैं—

  1. नाक और मुंह में पानी भरने की हालत में एकदम बाहर आ जाओ।
  2. हवा अपनी ताकत अनुसार करो।
  3. तैराकी सीखते समय बहुत गहरे पानी में न जाओ।
  4. गोते खाने की स्थिति में आवाज़ दो।
  5. तैराकी के समय शोर मत करो।

प्रश्न 5.
तैराकी प्रतियोगिता में अंक कैसे दिए जाते हैं ?
उत्तर-
तैराकी प्रतियोगिता में निम्नलिखित ढंग द्वारा अंक दिए जाते हैं—
पहली तीन पोजीशनों को क्रमश: (5-3-1) और रिले दौड़ों में 16-6-2 के अनुसार प्वाईंट दिए जाते हैं।

तैराकी (Swimming) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 6.
तैराकी दौड़ के मुख्य नियमों का वर्णन करो।
उत्तर-
दौड़ (The Race)—

  1. किसी तैराक को बाधा नहीं पैदा करनी चाहिए।
  2. यदि फाऊल के कारण किसी प्रतियोगी की सफलता कम (मध्यम) हो जाती है तो रैफरी उसको अगले राऊंड में हिस्सा लेने का अवसर देगा। यदि फाइनल में हो तो रैफरी दूसरी बार करवाने की आज्ञा दे सकता है।
  3. सारे इवेंट्स (Events) में तैराक घूमते हुए पूल के सिरे से शरीर स्पर्श अवश्य करेगा।
  4. किसी भी प्रतियोगी को किसी ऐसी वस्तु का प्रयोग नहीं करने दिया जाएगा जिससे तैराक को गति बढ़ाने में सहायता मिले।
  5. एक तैराक को उस लेन (Lane) में दौड (Race) समाप्त करनी पड़ेगी, जिससे उसने आरम्भ की है।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
अकबर के नव राजनीतिक संकल्प के सन्दर्भ में मुग़लों की मनसबदार प्रणाली तथा जागीरदारी प्रथा की चर्चा करें।
उत्तर-
अकबर ने अपनी आवश्यकतानुसार शासन को नवीन रूप प्रदान किया। उसने स्वयं को धार्मिक नेताओं से स्वतन्त्र रखने का प्रयास किया। उसने सैनिक तथा असैनिक कार्यों के लिए मनसबदार नियुक्त किए तथा जागीर व्यवस्था को नये रूप में आरम्भ किया। इन सब का वर्णन इस प्रकार है :

I. नया राजनीतिक संकल्प-

मुग़ल प्रशासन कई प्रकार से पहले की राज्य व्यवस्थाओं से भिन्न था। अकबर के शासनकाल में राज्यतन्त्र का एक नवीन रूप उभरा। यही रूप उसके उत्तराधिकारियों के शसनकाल में भी चलता रहा। इस राज्यतन्त्र में पहला तत्त्व राजपद के नये संकल्प का था। बाबर पहले ही खलीफा का सहारा लेने की बजाय इस बात पर बल देता था कि वह तैमूर का उत्तराधिकारी है। इस तरह उसने खलीफा की काल्पनिक सत्ता समाप्त कर दी थी।

अकबर एक कदम और आगे बढ़ा। उसने राजनीतिक और सरकारी क्षेत्र में मुल्लाओं की भूमिका को बहुत घटा दिया। 1579 में उसके राज्य के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों और विद्वानों ने ‘महाज़र’ नामक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किये। इसके अनुसार अकबर को इमाम-ए-आदिल अर्थात् एक न्यायशील नेता घोषित किया गया। अकबर को अब यह अधिकार दिया गया कि कानून के व्याख्याताओं द्वारा दी गई विरोधी रायों में से किसी एक का चुनाव कर के अपनी प्रजा के हित में निर्णय अथवा फतवा दे सके। वह कुरान के अनुकूल लोगों की भलाई के लिए स्वयं ही आज्ञा जारी कर सकता था। इस घोषणा के कारण अब वह मुसलमानों के विभिन्न सम्प्रदायों के साथ-साथ सारे ग़ैर-मुसलमान लोगों से अपनी प्रजा के रूप में समान व्यवहार कर सकता था। अकबर का यह विश्वास था कि उसने ईश्वर से अपनी सत्ता प्राप्त की है और सारी जनता ईश्वर की रचना होने के नाते बादशाह के समान व्यवहार की पात्र है। उसने हिन्दुओं से जज़िया तथा तीर्थ यात्रा कर लेने बन्द कर दिए।

उसने राजपूत राजकुमारियों से विवाह किया और उन्हें मुसलमान बनाये बिना ही महलों में अन्य रानियों के बराबर सम्मान दिया। उसने कई राजपूत सरदारों को भी अधीन राजाओं का दर्जा दिया।

हर्ष के पश्चात् अकबर पहला शासक था जिसने बड़े स्तर पर सामन्त प्रथा का विधिवत प्रयोग किया। उसके राज्य में 100 से भी अधिक सामन्त थे। सभी सामन्त गैर-मुसलमान थे। वे दूसरी शक्तियों से राजनीतिक सन्धि नहीं कर सकते थे। उन्हें गद्दी पर बैठने का अधिकार भी सम्राट प्रदान करता था। सामन्त के लिए यह आवश्यक था कि वह सम्राट को वार्षिक खिराज दे। सम्राट् की आज्ञा अनुसार आवश्यकता पड़ने पर सामन्तों को अभियानों के लिए सैनिक भेजने पड़ते थे। सम्राट् की अधीनता में रहते हुए सामन्तों को यह स्वतन्त्रता थी कि वे मुग़ल साम्राज्य में मनसबदार बन सकें। यह पद अधीन शासक के पद के अतिरिक्त था। इस प्रकार सामन्त और मनसबदार के रूप में अधीन राजा का मुग़ल साम्राज्य से दोहरा नाता रहता था। उसका अपना एक राजनीतिक स्तर भी होता था तथा वह प्रशासन का भागीदार भी होता था ।

II. मनसबदारी प्रणाली-

अकबर की मनसबदारी प्रणाली का मूल उद्देश्य सैनिक संगठन में सुधार लाना था। इस उद्देश्य से हर कमाण्डर का मनसब अथवा दर्जा निश्चित किया गया। इससे उसके अधीन सैनिकों की गिनती का पता चल जाता था। मनसब दस से आरम्भ होकर दस-दस के अन्तर से बढ़ते थे ताकि घुड़सवारों की गिनती करनी सरल हो जाए तथा पदों में अन्तर का भी स्पष्ट पता चले। जब अकबर को यह पता चला कि मनसबदार निश्चित संख्या में घुड़सवार नहीं रखते तो उसने दो प्रकार के मनसब बना दिए-जात और सवार। जात के अनुसार मनसबदार का व्यक्तिगत वेतन निश्चित किया जाता था और सवार मनसब से उसके घुड़सवारों की गिनती एवं उनके लिए वेतन निश्चित हो जाता था। अतः स्पष्ट है कि घुड़सवार न रखने को केवल जात मनसब दिया जाता था। इस प्रकार ‘सिविल’ और सैनिक अफसरों में अन्तर काफ़ी सीमा तक कम हो गया। अलग-अलग समय में एक ही व्यक्ति को सिविल’ से सैनिक और सैनिक से ‘सिविल’ सेवाओं में परिवर्तित किया जा सकता था। कुछ मनसबदारों के पास दोनों ही पद थे। ऐसे मनसबदारों को तीन वर्गों में बांटा गया था। पहले वर्ग के पास सवार तथा जात मनसब बराबर थे। दूसरे वर्ग में वे मनसबदार थे जिनका सवार मनसब जात मनसब के आधे से अधिक था। तीसरे प्रकार के मनसबदारों का सवार मनसब उसके जात मनसब के आधे से भी कम था। शाहजहां और औरंगजेब के शासनकाल में मनसबदारी प्रणाली में कुछ परिवर्तन अवश्य किया गया, किन्तु अकबर द्वारा विकसित की गई प्रणाली में मनसबदारों का मूल अस्तित्व बना रहा।

III. जागीरदारी प्रथा-

जागीरदारी प्रथा का स्रोत मनसबदारी था। अकबर सभी मनसबदारों को नकद वेतन नहीं दे सकता था। अतः उसने मनसबदारों को यह अधिकार दिया कि वे अपने वेतन के बराबर लगान वसूल कर लें। जिस भूमि से मनसबदार को लगान वसूल करने का अधिकार मिलता था, उसे उसकी जागीर माना जाता था। जागीरदार का अधिकार उस भूमि से लिए जाने वाले कर तक ही सीमित था। जो भूमि जागीर में नहीं दी जाती थी, उसे बादशाह का खालिसा कहा जाता था। जागीरों की भान्ति खालिसा भूमि भी देश के भिन्न-भिन्न भागों में होती थी।

मनसबदार की जागीर एक ही स्थान पर नहीं होती थी। साम्राज्य की नीति के अनुसार थोड़े-थोड़े समय बाद जागीरों को स्थानान्तरित कर दिया जाता था ताकि जागीरदार स्थानीय लोगों के साथ अधिक मेल-मिलाप न बढ़ा सकें। इसका परिणाम यह निकला कि जागीरदार अधिक लगान वसूल करने की चिन्ता में रहते थे और भूमि के सुधार की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं देते थे। उनका किसानों से व्यवहार भी अच्छा नहीं होता था। अकबर के उत्तराधिकारियों के समय जैसे-जैसे मनसबदारों की गिनती बढ़ती गई वैसे-वैसे जागीरदारों को उनकी इच्छा के अनुकूल जागीरें मिलनी कठिन हो गईं। 17वीं सदी के अन्त में तो मनसबदारों को जागीर प्राप्त करने के लिए कई वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। औरंगजेब के समय तक साम्राज्य का 80 प्रतिशत भाग जागीरों के रूप में दिया जा चुका था।
उन्हें अपनी जागीरों से आय भी कम प्राप्त होती थी। इस तरह जागीरदारी प्रथा में संकट की स्थिति बन गई और यह पतनोन्मुख हुई। इस प्रथा का पतन अन्तत: मुग़ल साम्राज्य के पतन का कारण बना।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध

प्रश्न 2.
लगान प्रबन्ध के सन्दर्भ में मुग़ल साम्राज्य के केन्द्रीय, प्रान्तीय तथा स्थानीय प्रशासन की चर्चा करें।
उत्तर-
मुग़लों ने भारत में उच्चकोटि की शासन-प्रणाली की व्यवस्था की। इसके अधीन केन्द्रीय, प्रान्तीय, स्थानीय शासन तथा लगान प्रबन्ध का वर्णन इस प्रकार है :-

1. केन्द्रीय शासन-केन्द्रीय शासन का मुखिया स्वयं सम्राट् था। उसे असीम शक्तियां प्राप्त थीं जिन पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं था। उसे धरती पर ‘ईश्वर की छाया’ समझा जाता था। वह मुख्य सेनापति और मुख्य न्यायाधीश था। वह इस्लाम धर्म का संरक्षक तथा मुस्लिम जनता का आध्यात्मिक नेता भी था। शासन कार्यों में उसे सलाह देने के लिए एक मन्त्रिमण्डल होता था। प्रत्येक मन्त्री के पास एक अलग विभाग होता था। इसमें से कुछ प्रमुख मन्त्री ये थे-वकील या वज़ीर, दीवानए-आला, मीर बख्शी, सदर-उल-सुदूर, खान-एन्सामां तथा प्रधान काजी। सम्राट् के पश्चात् वकील या वजीर का पद सबसे बड़ा होता था। वह सम्राट् का सलाहकार था तथा अन्य विभागों की देखभाल करता था। दीवान-ए-आला वित्त मन्त्री होने के नाते सभी प्रकार के कर एकत्रित करता था। मीर बख्शी मनसबदारों का रिकार्ड रखता था।

2. प्रान्तीय शासन-मुग़लों ने अपने साम्राज्य को विभिन्न प्रान्तों में बांटा हुआ था। अकबर के शासन काल में प्रान्तों की संख्या 15 थी, जो औरंगजेब के समय में बढ़ कर 22 हो गई। प्रान्तीय शासन का मुखिया सूबेदार अथवा नाज़िम होता था। वह प्रान्त में कानून तथा व्यवस्था बनाए रखता था। वह सरकारी आज्ञाओं को भी लागू करवाता था। शासन-कार्यों में उसकी सहायता के लिए प्रान्तीय दीवान होता था। वह प्रान्त के वित्त विभाग का मुखिया होता था। वह सूबेदार के अधीन नहीं होता था। इसके अतिरिक्त बख्शी, सदर, काजी, वाकियानवीस तथा कोतवाल आदि अन्य अधिकारी थे। वे प्रान्तों में वही काम करते थे जो उनके मुखिया केन्द्र में करते थे।

3. स्थानीय शासन-मुग़लों ने शासन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रान्तों को आगे सरकारों में बांटा हुआ था। सभी प्रान्तों की सरकारों की संख्या 105 थी। फौजदार, अमल गुज़ार, वितक्ची तथा खज़ानेदार सरकार के प्रमुख अधिकारी थे। फौजदार सरकार का सैनिक तथा कार्यकारी अध्यक्ष होता था। वह सरकार में शान्ति तथा अनुशासन की व्यवस्था करता था। वह ही सम्राट के फरमानों को लागू करवाता था। अमल-गुज़ार सरकार के वित्त विभाग का मुखिया होता था। वह निम्न राजस्व अधिकारियों के कार्यों पर निगरानी रखता था और किसानों को अधिक-से-अधिक भूमि को हल तले लाने के लिए प्रेरित करता था। अमल-गुज़ार की सहायता के लिए वितिक्ची तथा पोतदार अथवा खज़ानेदार नामक दो अधिकारी होते थे। वितिक्ची राजस्व तथा उपज के आंकड़ों का रिकार्ड रखता था और कानूनगो के कार्यों का निरीक्षण करता था। पोतदार तथा खज़ानेदार कृषकों से भूमि कर एकत्रित करके कोष में रखता था। कोष की एक चाबी उसके पास होती थी और दूसरी अमलगुज़ार के अधिकार में रहती थी।

प्रत्येक सरकार को कई परगनों में बांटा गया था। परगनों के प्रमुख कर्मचारियों में शिकदार, आमिल, कानूनगो आदि के नाम लिए जा सकते थे। शिकदार परगने का कार्यपालक अधिकारी होता था। वह परगने में शान्ति तथा व्यवस्था की स्थापना करता था। परगने में फौजदारी मुकद्दमे का फैसला भी वही करता था। आमिल परगने के राजस्व विभाग का मुखिया होता था। उसके कार्य भूमिकर एकत्रित करना, दीवानी मुकद्दमों का फैसला करना तथा शान्ति स्थापना में शिकदार की सहायता करना था। आमिल की सहायता के लिए कानूनगो तथा पोतदार नामक दो अधिकारी होते थे। कानूनगो कृषकों की भूमि तथा भूमिकर सम्बन्धी सारे रिकार्ड रखता था। वह पटवारियों के कार्यों का निरीक्षण भी करता था। पोतदार परगने के किसानों से कर एकत्रित करता था। ग्राम का प्रबन्ध पंचायत के हाथों में होता था। पंचायत के मुख्य कार्यों में लोगों के झगड़ों का निपटारा करना, सफ़ाई तथा शिक्षा का प्रबन्ध करना, मेलों तथा उत्सवों का आयोजन करना आदि प्रमुख थे।

4. न्याय प्रबन्ध-मुग़ल साम्राज्य के अन्य विभागों की भान्ति न्याय प्रबन्ध भी सुव्यवस्थित था। साम्राज्य के सभी नगरों एवं मुख्य कस्बों में एक काजी और एक मुफ्ती नियुक्त किया जाता था। वे शरीअत (इस्लामी कानून) की शर्तों के अनुसार न्यायिक प्रशासन की देखभाल करते थे। मुफ्ती कानून की व्याख्या करता था तथा काजी निर्णय देता था। काज़ी की कचहरी में गैर-मुसलमान भी जा सकते थे। गांवों और कस्बों में पंचायतें भी थीं जो छोटे-मोटे झगड़ों का निपटारा करती थीं। न्याय का अधिकांश कार्य पंचायत तथा काजी ही कर लेते थे। प्रान्त में सूबेदार, दीवान तथा अन्य कर्मचारियों को भी न्याय करने का अधिकार प्राप्त था, विशेष रूप से उन मामलों में जिनसे उनका सीधा सम्बन्ध था। इसी प्रकार केन्द्र में बादशाह के अतिरिक्त सदर एवं अन्य मन्त्री न्याय कार्य करते थे। शाही लश्कर के लिए नियुक्त विशेष काजी को ‘काज़ी-उल-कुजात’ कहते थे।

5. लगान प्रबन्ध-मुग़ल राज्य की आय का सबसे बड़ा स्रोत लगान (भूमिकर) था। अकबर ने कई अनुभवों के आधार पर भूमिकर की जब्ती व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था के अनुसार कृषि अधीन सारी भूमि को नापा गया। इस नाप के लिए एक निश्चित लम्बाई का गज़ प्रयोग में लाया गया जिसे इलाही गज़ कहते थे। नाप के लिए अब रस्से के स्थान पर बांस के टुकड़ों का प्रयोग होने लगा। फिर सारी भूमि को उर्वरता के आधार पर तीन श्रेणियों में बांट कर उनकी प्रति बीघा औसत उपज का हिसाब लगाया। इस औसत उत्पादन का तीसरा भाग सरकार का हिस्सा अथवा लगान निर्धारित किया गया। इसके पश्चात् प्रत्येक फसल को दस वर्षों की कीमतों की औसत निकाल कर लगान की मात्रा नकद राशि में निश्चित की गई। इस प्रकार प्रत्येक फसल को प्रति बीघा लगान दामों में निश्चित हुआ। ऐसे सभी प्रदेशों के लिए, जहां भूमि की उर्वरता तथा जलवायु लगभग एक थे, लगान को नकद राशि में परिवर्तित करने के लिए एक ही दर निश्चित की गई जिसे ‘दस्तूर’ कहते थे। कृषक से लिए जाने वाले लगान का हिसाब इसी दर से ही लगाते थे। बोई हुई भूमि के क्षेत्र का नाप प्रत्येक फसल के लिए किया जाता था। इस व्यवस्था में साधारणतः सरकार तथा किसान दोनों को आरम्भ से ही लगान की राशि का पता चल जाता था।

कुछ स्थानों पर जब्ती के साथ कनकूत तथा बटाई भी प्रचलित थी। बटाई के अनुसार फसल का एक निश्चित भाग लगान के रूप में लिया जाता था। यह किसानों के लिए तो लाभदायक था, परन्तु सरकार को कटी फसल की सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ती थी। कनकूत में ऐसी सुरक्षा की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि उसमें खड़ी फसल के आधार पर उपज का अनुमान लगा लिया जाता था। सरकार के करिन्दे बाद में लगान की दर के अनुसार सरकार का हिस्सा वसूल करते थे। प्रायः लगान की राशि निश्चित करके नकदी में उसकी उगराही होती थी। अकबर के उत्तराधिकारियों के समय लगान की दर बढ़ती चली गई तथा 17वीं सदी के अन्त में यह दर उत्पादन के तीसरे भाग से बढ़ कर लगभग आधा भाग हो गई। समय बीतने पर वार्षिक नाप भी छोड़ दिया गया और पहले वर्षों में वसूल किए लगान के आधार पर कृषक का या सारे गांव का सामूहिक लगान निश्चित किया जाने लगा। इसे नस्क कहा जाता था।

सच तो यह है कि मुग़ल सरकार का प्रशासन समय की आवश्यकता के अनुकूल था। इसलिए इसमें आवश्यकता के अनुसार समय-समय पर परिवर्तन भी होते रहते थे। परन्तु प्रशासन के मूल ढांचे में परिवर्तन नहीं होता था।

प्रश्न 3.
लोक कल्याण के कार्य तथा राजकीय संरक्षण का हवाला देते हुए मुग़ल काल में भवन निर्माण, चित्रकला, संगीत तथा साहित्य के क्षेत्र में हुई उन्नति पर लेख लिखें।
उत्तर-
मुग़ल काल में प्रजा हित का रूप वह नहीं था जैसा की वर्तमान कल्याणकारी राज्य में होता है। यह राजा की इच्छा पर निर्भर था कि वह प्रजा-हित के लिए क्या कुछ करता है या नहीं। फिर भी मुग़ल सम्राट् प्रजा हितकारी थे और वे सरकारी आय का कुछ भाग जनकल्याण तथा धर्मार्थ कार्यों पर व्यय करते थे। यात्रियों की सुविधा के लिए सरकार पुल और सड़कें बनवाती थी। लोगों के लिए अस्पताल और सराएं भी बनवाई जाती थीं। इनका प्रयोग सरकारी कार्यों के लिए भी होता था।

मुग़ल शासक मस्जिदों, मदरसों, सूफ़ी सन्तों तथा धार्मिक पुरुषों को संरक्षण देते थे। लोक कल्याण पर व्यय होने वाले राशि का अधिकतर भाग इन्हीं पर खर्च किया जाता था। इन्हें व्यय के लिए सरकार की ओर से कर मुफ़्त भूमि दे दी जाती थी। कुछ गैर-मुस्लिम संस्थाओं को भी सहायता मिलती थी। इनमें वैष्णव, जोगी, सिक्ख तथा पारसी संस्थाएं शामिल थीं। औरंगज़ेब के समय में भी इस सहायता पर कोई रोक न लगाई गई। अतः जब औरंगज़ेब ने कर मुक्त भूमि प्राप्त लोगों को भूमि का स्वामी घोषित किया तो गैर-मुस्लिम संस्थाएं भी अपनी-अपनी भूमि की स्वामी बन गईं। इस प्रकार की भूमि के स्वामी अब अपनी भूमि बेचने या गिरवी रखने में स्वतन्त्र थे।

भवन-निर्माण-

मुग़लकाल में एक लम्बे समय के पश्चात् देश में शान्ति स्थापित हुई। ऐसे वातावरण में जनता में अनेक कलाकार पैदा हुए। फलस्वरूप देश में सभी प्रकार की कलाओं तथा साहित्य का अद्वितीय विकास हुआ। बाबर को भवन बनवाने का बड़ा चाव था। उसके द्वारा बनवाए केवल दो भवन विद्यमान हैं-एक मस्जिद पानीपत में है और दूसरी मस्जिद रुहेलखण्ड के सम्भल नगर में है। हुमायूँ ने फतेहाबाद (जिला हिसार) में एक मस्जिद बनवाई। अकबर ने भी भवन-निर्माण कला को काफ़ी विकसित किया। उसके भवनों में फ़ारसी तथा भारतीय शैलियों का मिश्रण पाया जाता है। उसकी प्रमुख इमारतें ‘जहांगीर महल ‘हुमायूँ का मकबरा’ ‘फतेहपुर सीकरी में ‘जोधाबाई का महल’, ‘बुलन्द दरवाजा’ ‘दीवान-ए-खास’ प्रमुख हैं।

अकबर द्वारा बनाया गया ‘पंज-महल’ तथा ‘जामा मस्जिद’ भी देखने योग्य हैं। जहांगीर ने आगरा में एतमाद-उद्-दौला का मकबरा तथा सिकन्दरा में अकबर का मकबरा बनवाया। शाहजहां ने बहुत से भवनों का निर्माण करवाया। उसकी सबसे सुन्दर इमारत ‘ताजमहल’ है। उसने दिल्ली का लाल किला भी बनवाया। इसमें बने ‘दीवान-ए-खास’ तथा ‘दीवान-ए-आम’ विशेष रूप से देखने योग्य हैं। इसके अतिरिक्त उसने आगरा के दुर्ग में मस्जिद बनवाई। शाहजहां ने एक करोड़ रुपए की लागत से ‘तख्तए-ताऊस’ भी बनवाया। उसकी मृत्यु के बाद भवन निर्माण कला का विकास लगभग रुक-सा गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद साम्राज्य में अराजकता फैल गई। फलस्वरूप बाद के मुग़ल सम्राटों को इस ओर विशेष ध्यान देने का अवसर ही न मिल सका।

चित्रकला-

मुग़ल सम्राटों ने चित्रकला में भी विशेष रुचि दिखाई। बाबर को हिरात में फारस की चित्रकला का ज्ञान हुआ। उसने उसे संरक्षण प्रदान किया। उसने अपनी आत्मकथा को चित्रित करवाया। हुमायूँ फारस के दो कलाकारों को अपने साथ भारत ले आया था। ये चित्रकार ‘मीर सैय्यद अली’ तथा ‘अब्दुल समद’ थे। इन चित्रकारों ने सुप्रसिद्ध फ़ारसी ग्रन्थ ‘दास्ताने-अमीर हमजा’ को चित्रित किया। अकबर के शासनकाल में चित्रकला ने भारतीय रूप धारण कर लिया। उसने फतेहपुर सीकरी के महलों की दीवारों पर बड़े सुन्दर चित्र अंकित करवाए। ‘सांवलदास,’ ‘ताराचन्द’ ‘जगन्नाथ’ आदि अकबर के समय के प्रसिद्ध चित्रकार थे। जहांगीर की चित्रकला में बड़ी रुचि थी। वह चित्र देख कर ही उसे बनाने वाले का नाम बता दिया करता था। उसके दरबार में अनेक चित्रकार थे जिनमें आगा रज़ा, अब्दुल हसन, मुहम्मद मुराद बहुत ही प्रसिद्ध थे। जहांगीर के बाद केवल राजकुमार दारा शिकोह के प्रयत्नों से ही चित्रकला का कुछ विकास हुआ। औरंगज़ेब तो चित्रकला को प्रोत्साहन देना कुरान के विरुद्ध समझता था। उसने अपने दरबार से सभी चित्रकारों को निकाल दिया।

संगीत कला-

औरंगज़ेब को छोड़ कर सभी मुग़ल सम्राटों ने संगीत कला को भी प्रोत्साहन दिया। बाबर ने संगीत से सम्बन्धित एक पुस्तक की रचना भी की। हुमायूँ सोमवार तथा बुधवार को बड़े प्रेम से संगीत सुना करता था। उसने अपने दरबार में अनेक संगीतकारों को आश्रय दे रखा था। अकबर को संगीत-कला से विशेष प्रेम था। वह स्वयं भी उच्च कोटि का गायक था। अबुल फज़ल के अनुसार उसके दरबार में गायकों की संख्या बहुत अधिक थी। तानसेन, बाबा रामदास, बैजू बावरा तथा सूरदास उसके समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे। जहांगीर भी संगीतकारों का बड़ा आदर करता था। छः प्रसिद्ध गायक उसके दरबारी थे। शाहजहां प्रतिदिन शाम के समय संगीत सुना करता था। वह स्वयं भी एक अच्छा गायक था। उसकी आवाज़ बड़ी सुरीली थी। उसके दरबारी संगीतकारों में रामदास प्रमुख था। औरंगजेब को भी आरम्भ में गायन विद्या से काफ़ी लगाव था। परन्तु बाद में उसने अपने गायकों को दरबार से निकाल दिया । फलस्वरूप संगीत कला पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।

मुग़ल काल में फ़ारसी साहित्य ने बहुत उन्नति की। अकबर के समय का फ़ारसी का सबसे बड़ा लेखक अबुल फज़ल था।’आइन-ए-अकबरी’ और ‘अकबरनामा’ उसकी प्रमुख रचनाएं है। अकबर के समय में रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थों का अनुवाद फ़ारसी भाषा में किया गया। बाबर की आत्मकथा ‘तुजके बाबरी’ का अनुवाद भी तुर्की से फ़ारसी भाषा में किया गया। अकबर के पश्चात् जहांगीर ने अपनी आत्मकथा लिखी। इस पुस्तक का नाम ‘तुज़के जहांगीरी’ है। शाहजहां के समय में फ़ारसी में कई ऐतिहासिक ग्रन्थों की रचना हुई। इनमें से लाहौरी का ‘बादशाहनामा’ प्रमुख है। मुग़ल राजकुमारियों ने भी फ़ारसी साहित्य की उन्नति में काफ़ी योगदान दिया। बाबर की पुत्री गुलबदन बेगम ने “हुमायूँ नामा” लिखा था।

नूरजहां, मुमताज़ महल, जहांआरा, जेबूनिस्सा ने भी अनेक कविताओं की रचना की। मुग़लकाल में हिन्दी साहित्य का काफ़ी विकास हुआ। मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘पद्मावत’ की रचना इसी काल में की। इस समय के कवियों में सूरदास और तुलसीदास का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सूरदास ने ‘सूरसागर’ तथा तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ नामक महान् ग्रन्थों की रचना की। इनके अतिरिक्त केशव दास, सुन्दर, भूषण आदि कवियों ने साहित्य की खूब सेवा की। . सच तो यह है कि मुगलकाल अपनी ललित कलाओं के कारण इतिहास में विशेष स्थान रखता है। आज भी ताज तथा तानसेन मुगलकाल की चरम सीमा के प्रतीक माने जाते हैं। फतेहपुर सीकरी के भवन, लाल किला, दिल्ली की जामा मस्जिद इस बात के प्रमाण हैं कि मुग़लकाल में ललित कलाओं का खूब विकास हुआ। उस समय की कला-कृतियां आज भी देश भर की शोभा हैं।

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महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
मनसबदारी प्रथा किसने आरंभ की ?
उत्तर-
अकबर ने।

प्रश्न 2.
मुग़लकालीन कानूनगो किस प्रशासनिक स्तर का अधिकारी था ?
उत्तर-
परगने के स्तर का ।

प्रश्न 3.
बटाई से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
बटाई मुग़लकाल की एक लगान प्रणाली थी ।

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प्रश्न 4.
अकबर के समय के दो प्रसिद्ध कवियों के नाम बताओ।
उत्तर-
फैजी तथा वज़ीरी।

प्रश्न 5.
मुगलकालीन जीवन का एक कार्य बताओ ।
उत्तर-
भूमिकर निर्धारित करना ।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति

(i) अकबर की मनसबदारी प्रथा का मुख्य उद्देश्य ……………. संगठन में सुधार करना था।
(ii) अकबरकालीन मुग़ल स्थापत्य कला मुख्य रूप से भारतीय तथा …………… कलाओं का समन्वय थी।
(iii) औरंगज़ेब ने ……….. में बादशाही मस्जिद का निर्माण करवाया।
(iv) सूरसागर ………… की रचना है।
(v) ………. दरवाज़ा संसार का सबसे बड़ा द्वार है।
उत्तर-
(i) सैनिक
(ii) ईरानी
(iii) लाहौर
(iv) सूरदास
(v) बुलंद ।

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3. सही/ग़लत कथन

(i) जहांगीर ने चित्रकला का संरक्षण किया। — (✓)
(ii) हुमायूं तथा अकबर को चित्रकला से प्रेम नहीं था। — (✗)
(iii) अकबर ने गैर-मुसलमानों से जज़िया तथा तीर्थ यात्रा कर लेने बंद कर दिए। — (✓)
(iv) अकबर के समय भूमि की माप के लिए शहनशाही गज़ का प्रयोग किया जाता था। — (✗)
(v) औरंगज़ेब के समय मुग़ल प्रांतों की संख्या 22 थी। — (✓)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
मुगलकाल में पटवारी रिकार्ड रखता था:
(A) जनसंख्या से संबंधित
(B) गांव से संबंधित
(C) बड़े शहरों से संबंधित
(D) राज दरबार से संबंधित ।
उत्तर-
(B) गांव से संबंधित

प्रश्न (ii)
‘माहज़र’ नामक घोषणा-पत्र जारी हुआ-
(A) अकबर के समय में
(B) बाबर के समय में
(C) जहांगीर के समय में
(D) शाहजहां के समय में ।
उत्तर-
(A) अकबर के समय में

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प्रश्न (iii)
जब्ती-व्यवस्था क्या थी ?
(A) मुगलकाल की व्यवस्था
(B) मुगलकाल की शिक्षा प्रणाली
(C) अमीरों से ज़बरदस्ती धन छीनने की व्यवस्था
(D) मुगलकाल के लगान उगाहने की एक व्यवस्था।
उत्तर-
(D) मुगलकाल के लगान उगाहने की एक व्यवस्था।

प्रश्न (iv)
मुगलकाल में प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करता था-
(A) मीर बख्शी
(B) मुख्य सदर
(C) वकील या वज़ीर
(D) मुख्य काजी ।
उत्तर-
(C) वकील या वज़ीर

प्रश्न (v)
‘मनसब’ का शाब्दिक अर्थ है-
(A) पदवी
(B) सवार
(C) जात
(D) उमरा ।
उत्तर-
(A) पदवी

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II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
‘नायब-ए-अमीर अलमोमिनीन’ का क्या अर्थ था ?
उत्तर-
‘नायब-ए-अमीर अलमोमिनीन’ का अर्थ था : खलीफा का नायब। ।

प्रश्न 2.
‘माहज़र’ पर कब हस्ताक्षर किये गए तथा इसमें अकबर को किस रूप में पेश किया गया ?
उत्तर-
‘माहज़र’ पर 1579 ई० में हस्ताक्षर किये गये। इसमें अकबर को इमाम-ए-आदिल अर्थात् न्यायशील नेता के रूप में पेश किया गया।

प्रश्न 3.
अकबर ने गैर-मुसलमानों से लिए जाने वाले कौन-से दो कर समाप्त किए ।
उत्तर-
अकबर ने गैर-मुसलमानों से तीर्थ यात्रा कर तथा जजिया कर लेने बन्द कर दिए।

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प्रश्न 4.
सम्राट्-सामन्त सम्बन्धों में कौन-सी दो बातें आवश्यक थीं ?
उत्तर-
सामन्त दूसरी शक्तियों के साथ राजनीतिक सन्धि नहीं कर सकते थे। उन्हें मुग़ल सम्राट को वार्षिक नजराना भी देना पड़ता था।

प्रश्न 5.
अकबर की मनसबदारी प्रथा का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर-
अकबर की मनसबदारी प्रथा का मुख्य उद्देश्य सैनिक संगठन में सुधार करना था।

प्रश्न 6.
अकबर ने कौन-से दो प्रकार के मनसब बना दिए ?
उत्तर-
अकबर ने ज़ात और सवार नाम के दो अलग ‘मनसब’ बना दिए।

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प्रश्न 7.
पाँच सौ से अधिक मनसब लेने वालों की गिनती किन में होती थी ? अकबर के दो प्रसिद्ध मनसबदारों के नाम बताएं।
उत्तर-
पाँच सौ से अधिक मनसब लेने वालों की गिनती शासक वर्ग में होती थी। अकबर के दो प्रसिद्ध मनसबदार अबुल फज़ल तथा बीरबल थे।

प्रश्न 8.
वेतन में जागीरदार क्या अधिकार प्राप्त करता था ?
उत्तर-
जागीरदार को वेतन के बराबर लगान वसूल करने का अधिकार प्राप्त होता था।

प्रश्न 9.
जागीर किसे कहा जाता था ?
उत्तर-
जागीर से अभिप्राय उस भूमि से था जिससे मनसबदार को लगान वसूल करने का अधिकार मिलता था।

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प्रश्न 10.
खालिसा किसे कहा जाता था ?
उत्तर-
मुग़ल काल में उस सारी भूमि को खालिसा कहते थे जिससे किसी मनसबदार को लगान वसूल करने का अधिकार मिलता था।

प्रश्न 11.
जागीरों के स्थानान्तरण का किसानों पर क्या प्रभाव पड़ता था ?
उत्तर-
इसका प्रभाव यह पड़ता था कि जागीरदारों को अधिक से अधिक लगान वसूल करने की चिन्ता रहती थी और वे जागीर की भूमि की उन्नति की ओर अधिक ध्यान नहीं देते थे।

प्रश्न 12.
औरंगज़ेब के समय तक साम्राज्य की कुल आय का कौन-सा भाग जागीरों में दिया जा चुका था ?
उत्तर-
औरंगज़ेब के समय तक साम्राज्य का 80 प्रतिशत भाग जागीरों में दिया जा चुका था।

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प्रश्न 13.
अकबर के प्रारम्भिक वर्षों में केन्द्रीय सरकार में प्रमुख पद कौन सा था और यह किसको दिया गया ?
उत्तर-
अकबर के प्रारम्भिक वर्षों में केन्द्रीय सरकार में प्रमुख पद ‘वकील’ था। यह पद तब बैरम खां को दिया गया था।

प्रश्न 14.
दीवान के दो मुख्य कार्य बताएं।
उत्तर-
दीवान का कार्य भूमिकर निर्धारित करना और भूमि कर उगाहने सम्बन्धी नियम बनाना था। वह आय का बजट भी तैयार करता था।

प्रश्न 15.
मनसबदारों तथा शाही कारखानों से सम्बन्धित दो मन्त्रियों के नाम बताएं।
उत्तर-
मनसबदारों से सम्बन्धित मन्त्री मीर बख्शी तथा शाही कारखानों से सम्बन्धित मन्त्री मीर सामां था।

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प्रश्न 16.
सदर के दो मुख्य कार्य क्या थे ?
उत्तर-
सदर का काम शैक्षणिक तथा धार्मिक संस्थाओं की देखभाल करना था। वह योग्य व्यक्तियों तथा संस्थाओं को नकद धन या लगान मुक्त भूमि देता था।

प्रश्न 17.
कौन-से तीन मन्त्रियों का कार्य क्षेत्र प्रान्तों तक फैला हुआ था ?
उत्तर-
दीवान, भीर बख्शी तथा मीर सामां का कार्य क्षेत्र प्रान्तों तक फैला हुआ था।

प्रश्न 18.
अकबर तथा औरंगजेब के समय प्रान्तों की गिनती क्या थी ?
उत्तर-
अकबर के समय प्रान्तों की संख्या 15 और औरंगजेब के समय में 22 थी।

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प्रश्न 19.
प्रान्त से अगली प्रशासकीय इकाई कौन-सी थी और यह कौन-से अधिकारी के अधीन थी ?
उत्तर-
प्रान्त से अगली इकाई ‘सरकार’ थी। ‘सरकार’ का प्रबन्ध फौजदार के अधीन था।

प्रश्न 20.
राजस्व के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक इकाई कौन-सी थी और इसका मुख्य अफसर कौन था ?
उत्तर-
राजस्व की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई परगना थी। परगना आमिल के अधीन था।

प्रश्न 21.
कानूनगो किस स्तर का अधिकारी था और इसका मुख्य कार्य क्या था ?
उत्तर-
कानूनगो परगने का अधिकारी था जो आमिल के स्तर से छोटा होता था। वह भूमि तथा लगान सम्बन्धी रिकार्ड रखता था।

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प्रश्न 22.
चौधरी (मुग़लकालीन) किन के बीच सम्पर्क सूत्र था ?
उत्तर-
चौधरी परगने एवं तप्पे (एक प्रशासनिक विभाग) के कर्मचारियों और कृषकों के बीच सम्पर्क सूत्र था।

प्रश्न 23.
पटवारी किससे सम्बन्धित रिकार्ड रखता था ?
उत्तर-
पटवारी गांव से सम्बन्धित रिकार्ड रखता था।

प्रश्न 24
कस्बे में न्याय प्रबन्ध के दो महत्त्वपूर्ण अधिकारियों के नाम तथा कार्य बताएं।
उत्तर-
कस्बों में मुफ्ती कानून की व्याख्या करता था तथा काजी मुकद्दमों का निर्णय देता था।

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प्रश्न 25.
प्रान्तों और केन्द्र में न्याय देने वाले चार अधिकारियों के नाम बताएं।
उत्तर-
प्रान्तों में सूबेदार तथा दीवान को न्याय सम्बन्धी कार्य करने का अधिकार था। सदर तथा अन्य मन्त्री केन्द्र में न्याय देते थे।

प्रश्न 26.
पंचायतें कौन-से स्तरों पर झगड़ों का निपटारा करती थीं ?
उत्तर-
पंचायतें गांवों तथा कस्बों में झगड़ों का निपटारा करती थीं।

प्रश्न 27.
अकबर के समय कौन-से गज़ का प्रयोग किया जाता था और यह किस चीज़ का बना हुआ था ?
उत्तर-
अकबर के समय इलाही गज़ का प्रयोग किया जाता था। यह बांस का बना होता था।

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प्रश्न 28.
अकबर के समय उत्पादन का कौन-सा भाग लगान के रूप में निर्धारित किया गया तथा 17वीं सदी में यह दर कितनी हो गई ?
उत्तर-
अकबर के समय उत्पादन का 1/3भाग लगान के रूप में निर्धारित किया गया। 17वीं सदी में यह दर 1/2 भाग हो गई।

प्रश्न 29.
बटाई से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
बटाई एक लगान प्रणाली थी। इसके अनुसार उपज का एक निश्चित भाग लगान के रूप में लिया जाता था।

प्रश्न 30.
कनकूत से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
कनकूत अकबर कालीन लगान की एक प्रणाली थी जिसके अनुसार खड़ी फसल से उपज एवं लगान का अनुमान लगा लिया जाता था।

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प्रश्न 31.
नस्क से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नस्क लगान की वह व्यवस्था थी जिसके द्वारा पहले वर्षों के वसूल किए गए लगान के आधार पर सारे गांव या कृषक पर लगान निर्धारित किया जाता था।

प्रश्न 32.
अकबर के समय लगान निर्धारित करने की सबसे महत्त्वपूर्ण विधि क्या थी तथा यह किस पर आधारित थी ?
उत्तर-
अकबर के समय लगान निर्धारित करने की सबसे महत्त्वपूर्ण विधि ज़ब्ती व्यवस्था थी। इसके अन्तर्गत कृषि योग्य भूमि पर लगान निश्चित किया जाता था।

प्रश्न 33.
मुग़ल सरकार निर्माण के कौन-से चार प्रकार के कार्यों पर धन खर्च करती थी ?
उत्तर-
मुग़ल सरकार सड़कें, पुल, अस्पताल, सरायें आदि के निर्माण पर धन खर्च करती थी।

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प्रश्न 34.
धर्मार्थ में दान कौन से-दो रूपों में दिया जाता था ? …
उत्तर-
धमार्थ में दान नकद तथा लगान मुक्त भूमि के रूप में दिया जाता था।

प्रश्न 35.
मुग़ल साम्राज्य का सरंक्षण पाने वाले किन्हीं चार धर्मों के नाम बताएं।
उत्तर-
मुग़ल साम्राज्य का संरक्षण पाने वाले चार धर्म इस्लाम, सिक्ख, पारसी तथा वैष्णव एवं शैव मत थे।

प्रश्न 36.
1690 के बाद धर्मार्थ में भूमि लेने वाले का उस पर किस प्रकार का अधिकार हो गया ?
उत्तर-
वह इस भूमि का स्वामी बन गया। वह इसे बेच सकता था, गिरवी रख सकता था तथा दान में दे सकता था।

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प्रश्न 37.
अकबर ने कौन-सा नया शहर बसाया तथा इसकी भवन निर्माण कला का एक शानदार नमूना बताएं ?
उत्तर-
अकबर ने फतेहपुर सीकरी नामक शहर बसाया। यहां का एक प्रसिद्ध भवन बुलन्द दरवाज़ा है।

प्रश्न 38.
आगरा का लाल किला किसने बनवाया तथा किस बादशाह ने इसका विस्तार किया ?
उत्तर-
आगरा का लाल किला अकबर ने बनवाया तथा शाहजहां ने इसका विस्तार किया।

प्रश्न 39.
हुमायूँ, अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां के मकबरे किन स्थानों में हैं ?
उत्तर-
हुमायूँ, अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां के मकबरे क्रमशः दिल्ली, सिकन्दरा, लाहौर तथा आगरा में हैं।

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प्रश्न 40.
औरंगजेब ने कौन-सी दो मस्जिदों का निर्माण करवाया ?
उत्तर-
औरंगज़ेब ने दिल्ली के लाल किले में ‘मोती मस्ज़िद’ तथा लाहौर में ‘बादशाही मस्जिद’ का निर्माण करवाया।

प्रश्न 41.
शाहजहां द्वारा बनवाई गई दो सुन्दर इमारतों के नाम बताएं तथा ये कौन-से नगरों में हैं ?
उत्तर-
शाहजहां ने आगरा में ताजमहल तथा दिल्ली में जामा मस्जिद नामक सुन्दर भवन बनवाये।

प्रश्न 42.
कौन-से चार मुग़ल बादशाहों ने चित्रकला का संरक्षण किया ?
उत्तर-
हुमायूँ, अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां ने चित्रकला का संरक्षण किया।

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प्रश्न 43.
मुग़ल काल के चार प्रसिद्ध चित्रकारों के नाम बताएं।
उत्तर-
मुग़ल काल के चार प्रसिद्ध चित्रकार जसवन्त, बसावन, उस्ताद मंसूर तथा अब्दुल समद थे।

प्रश्न 44.
मुग़ल चित्रकला का प्रभाव कौन-सी दो शैलियों पर देखा जा सकता है ?
उत्तर-
मुग़ल चित्रकला का प्रभाव राजपूत शैली और पंजाब की पहाड़ी शैली में देखा जा सकता है।

प्रश्न 45.
कौन-से तीन मुग़ल बादशाहों को संगीत सुनने का शौक था और तानसेन किसके दरबार में था ?
उत्तर-
अकबर, जहांगीर तथा शाहजहां को संगीत सुनने का चाव था। तानसेन अकबर के दरबार में था।

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प्रश्न 46.
अकबर के समय फ़ारसी के तीन प्रसिद्ध कवियों के नाम बताएं।
उत्तर-
अकबरकालीन फ़ारसी के तीन कवि फैज़ी, उर्फी तथा वज़ीरी थे।

प्रश्न 47.
अकबर के समय के दो इतिहासकारों के नाम तथा उनकी रचनाएं बताएं।
उत्तर-
अकबरकालीन दो इतिहासकार थे-अबुल फजल तथा अब्दुल कादिर। अबुल फज़ल ने अकबर नामा और आइन-ए-अकबरी तथा अब्दुल कादिर ने मुन्तखब-उत्-तवारीख नामक ग्रन्थ लिखे।

प्रश्न 48.
अकबर ने संस्कृत की कौन-सी चार कृतियों का फ़ारसी में अनुवाद करवाया ?
उत्तर-
अकबर ने संस्कृत की चार कृतियों राजतरंगिणी, पंचतन्त्र, महाभारत तथा रामायण का फ़ारसी में अनुवाद करवाया।

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प्रश्न 49.
मुगलकाल में किन आठ प्रादेशिक भाषाओं का साहित्य लिखा गया ?
उत्तर-
मुगलकाल में बंगाली, उड़िया, गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी, अवधी, मराठी, ब्रजभाषा आदि आठ प्रादेशिक भाषाओं में साहित्य लिखा गया।

प्रश्न 50.
मुगल राज्य व्यवस्था तथा प्रशासन की जानकारी के स्रोतों के चार प्रकारों के नाम बताएं।
उत्तर-
मुग़ल राज्य व्यवस्था तथा प्रशासन की जानकारी के चार प्रकार के स्रोत हैं-अबुल फज़ल की ‘आइन-एअकबरी’, तत्कालीन कानूनी दस्तावेज़, बर्नियर का विवरण तथा प्रादेशिक साहित्य।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
‘माहज़र’ से क्या अभिप्राय था और इसका क्या महत्त्व था ?
उत्तर-
माहज़र एक महत्त्वपूर्ण घोषणा-पत्र था जो अकबर के समय में जारी हुआ। इस घोषणा-पत्र द्वारा अकबर को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त हुए। इस घोषणा-पत्र पर 1579 ई० में उसके राज्य के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों और विद्वानों ने हस्ताक्षर किए। इसके अनुसार अकबर को इमाम-ए-आदिल अर्थात् न्यायशील नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इस घोषणा के अनुसार अकबर को अब यह अधिकार दिया गया कि वह कानून के व्याख्याताओं द्वारा दी गई विभिन्न व्याख्याओं में से अपनी इच्छा के अनुसार किसी एक को चुन सके और अपनी प्रजा को फतवा दे सके। वह कुरान के अनुकूल लोगों की भलाई के लिए स्वयं आज्ञा जारी कर सकता था। निःसन्देह इस घोषणा ने अकबर के हाथ मज़बूत कर दिये। अब वह मुसलमानों के विभिन्न सम्प्रदायों के साथ-साथ अपनी गैर-मुस्लिम प्रजा से एक-सा व्यवहार कर सकता था।

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प्रश्न 2.
अकबर के अपने अधीन राजाओं के साथ किस प्रकार के सम्बन्ध थे ?
उत्तर-
अकबर का अपने अधीन राजाओं अर्थात् सामन्तों पर काफ़ी नियन्त्रण था। मुग़ल साम्राज्य के स्थानीय शासक या सामन्त दूसरी शक्तियों से राजनीतिक सन्धि नहीं कर सकते थे। उन्हें राजसिंहासन पर बैठने का अधिकार केवल सम्राट् देता था। सामन्त के लिए आवश्यक था कि वह सम्राट् को वार्षिक खिराज दे। उसे सम्राट की आज्ञा पर आवश्यकता के समय अभियानों के लिए सैनिक टुकड़ियां भेजनी पड़ती थीं। अकबर के राज्य में सामन्तों की संख्या सौ से भी अधिक थी। इनमें अधिकांश सामन्त गैर-मुस्लिम थे। सामन्तों को यह स्वतन्त्रता थी कि वे मुग़ल साम्राज्य में मनसबदार बन सकें। यह पद ‘अधीन शासक’ के पद के अतिरिक्त होता था। इस प्रकार सामन्त और मनसबदार के रूप में अधीन शासकों का मुग़ल साम्राज्य से दोहरा सम्बन्ध स्थापित हो जाता था। इस प्रकार के सम्राट-सामन्त सम्बन्धों से मुगल साम्राज्य को काफ़ी लाभ पहुंचा।

प्रश्न 3.
‘जात और सवार’ मनसबदार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
‘जात और सवार ‘ मनसब का आरम्भ अकबर ने किया था। अकबर को यह पता चला था कि मनसबदार निश्चित संख्या में घुड़सवार नहीं रखते। इसे रोकने के लिए ही उसने दो प्रकार के मनसब बना दिये : जात और सवार। जात के अनुसार मनसबदार का व्यक्तिगत वेतन निश्चित किया जाता था । परन्तु सवार मनसब से उसके घुड़सवारों की गिनती एवं उनके वेतन का पता चलता था। जो मनसबदार कोई घुड़सवार नहीं रखते थे उन्हें केवल जात मनसब ही दिया जाता था। इस प्रकार सिविल और सैनिक अफ़सरों में अन्तर काफ़ी सीमा तक कम हो गया। किसी व्यक्ति को ‘सिविल’ से सैनिक और सैनिक से सिविल सेवाओं में भी लिया जा सकता था। जिन मनसबदारों के पास दोनों पद थे, उन्हें तीन वर्गों में बांटा गया था। पहले वर्ग के सवार तथा जात मनसब समान होते थे : दूसरे वर्ग में वे मनसबदार थे जिनका सवार पब उनके जात मनसब के आधे से अधिक था। जिनका सवार मनसब जात मनसब के आधे से भी कम था, उनकी गणना तीसरे दर्जे के मनसबदारों में होती थी।

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प्रश्न 4.
जागीरदारी प्रणाली में संकट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जागीरदारी प्रणाली मुगलकालीन राज्य व्यवस्था का मुख्य अंग थी। परन्तु अकबर के उत्तराधिकारियों के समय में जागीरों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही चली गई। कहते हैं कि औरंगजेब के समय तक मुग़ल साम्राज्य का 80 प्रतिशत भाग जागीरों में बंटा हुआ था। अतः इस प्रथा में एक संकट सा उत्पन्न हो गया। अब मनसबदारों को जागीर दिए जाने के अनुमति पत्र मिल जाते थे, परन्तु उन्हें जागीर नहीं मिल पाती थी। यदि उन्हें जागीर मिल भी जाती तो उसकी आय उन्हें प्राप्त होने वाले वेतन से बहुत ही कम होती थी। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह बात मुग़ल साम्राज्य के पतन का कारण बनी।

प्रश्न 5.
मुग़ल साम्राज्य की केन्द्रीय सरकार में कौन-से मन्त्री थे और उनके मुख्य कार्य क्या थे ?
उत्तर-
केन्द्रीय सरकार में वकील के अतिरिक्त चार अन्य मुख्य मन्त्री थे। ये थे- दीवान, मीर सामां, मीर बख्शी तथा सदर। वकील का पद सभी मन्त्रियों में उच्च माना जाता था। परन्तु वह किसी भी विभाग का कार्य नहीं करता था। दीवान वित्त विभाग का मुखिया होता था। वह लगान की दर तथा लगान वसूल करने से सम्बन्धित नियम निर्धारित करता था। राज्य की वार्षिक आय-व्यय का हिसाब-किताब भी उसी के पास होता था। सैनिक विभागों के मुखिया को मीर बख्शी कहते थे। वह .सभी सैनिक कार्यों की देख-रेख करता था। वह अपने पास मनसबदारों की नियुक्ति तथा पदोन्नति के रिकार्ड रखता था। मीर सामां सरकारी कारखानों की देखभाल करता था और शाही महल की प्रतिदिन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। न्याय एवं धर्मार्थ विभाग के मुखिया को सदर कहते थे। वह सूफियों तथा अन्य धार्मिक पुरुषों को नकदी अथवा कर मुक्त भूमि के रूप में आवश्यक सहायता देता था।

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प्रश्न 6.
मुग़लों के स्थानीय प्रशासन के मुख्य अधिकारी कौन-से थे और उनके कार्य क्या थे ?
उत्तर-
प्रत्येक प्रान्त का मुखिया एक सूबेदार होता था। प्रान्त सरकारों तथा परगनों में विभक्त था। प्रत्येक सरकार में एक फ़ौजदार था। उसकी सहायता थानेदार करते थे। फ़ौजदारों तथा थानेदारों का काम शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखना था। राजस्व की दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई परगना थी जिसका मुख्य अधिकारी आमिल था। परगने में कानूनगो का पद भी बड़ा महत्त्वपूर्ण था। वह भूमि और लगान से सम्बन्धित सभी रिकार्ड रखता था। किसी-किसी प्रान्त में परगना तप्पों में बंटा होता था, जिनमें कई गाँव होते थे। प्रत्येक परगना या तप्पे में एक चौधरी होता था। वह सरकारी कर्मचारियों और कृषकों के बीच सम्पर्क सूत्र था। प्रत्येक गांव में कम-से-कम एक मुकद्दम या गांव का मुखिया होता था। उसका काम लगान की वसूली में चौधरी और अन्य कर्मचारियों की सहायता करना था। गांव से सम्बन्धित भूमि के रिकार्ड को रखने वाला कर्मचारी पटवारी कहलाता था।

प्रश्न 7.
जब्ती-व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
ज़ब्ती-व्यवस्था लगान उगाहने की एक व्यवस्था थी। अकबर ने यह व्यवस्था कई अनुभवों के बाद लागू की। इस व्यवस्था के अन्तर्गत सारी कृषि योग्य भूमि को पहले नापा गया। इस नाप के लिए एक निश्चित लम्बाई का माप या गज़ प्रयोग में लाया गया। उसे इलाही गज़ कहते थे। नाप के लिए रस्सी के स्थान पर बांस के टुकड़ों का प्रयोग किया गया क्योंकि रस्सी सूखने या गीली होने पर कम या अधिक नाप देती थी। पैमाइश के बाद भूमि को तीन भागों में बांट कर उनकी प्रति बीघा औसत उपज निकाली गई। इस औसत उत्पादन का तीसरा भाग सरकार का भाग अथवा लगान निर्धारित किया गया । इस के पश्चात् दस वर्षों की कीमतों का मध्यमान निकाल कर लगान की मात्रा नकद निश्चित की गई। अतः प्रत्येक फसल का प्रति बीघा लगान दामों में भी निश्चित किया गया। यह व्यवस्था साम्राज्य के अधिकांश भाग में लागू थी।

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प्रश्न 8.
मुग़ल शासक किस प्रकार के प्रजा हितार्थ कार्य करते थे और किस प्रकार का संरक्षण प्रदान करते थे ?
उत्तर-
मुग़ल सम्राट् प्रजा हितकारी थे और वे सरकारी आय का कुछ भाग जनकल्याण तथा धमार्थ कार्यों पर व्यय करते थे। यात्रियों की सुविधा के लिए सरकार पुल और सड़के बनवाती थी। लोगों के लिए अस्पताल और सराएं भी बनवाई जाती थीं। इनका प्रयोग सरकारी कार्यों के लिए भी होता था। मुगल शासक मस्जिदों, मदरसों, सूफ़ी सन्तों तथा धार्मिक पुरुषों को संरक्षण देते थे। लोक कल्याण पर व्यय होने वाली राशि का अधिकतर भाग इन्हीं पर खर्च किया जाता था। इन्हें व्यय के लिए सरकार की ओर से कर मुक्त भूमि दे दी जाती थी। कुछ गैर-मुस्लिम संस्थाओं को भी यह सहायता मिलती थी। इनमें वैष्णव, जोगी, सिक्ख तथा पारसी संस्थाएं शामिल थीं। औरंगज़ेब ने कर मुक्त भूमि प्राप्त लोगों को भूमि का स्वामी घोषित कर दिया था। इस प्रकार का भूमि स्वामी अब अपनी भूमि को बेचने या गिरवी रखने में स्वतन्त्र थे।

प्रश्न 9.
मुगलों की भवन निर्माण कला (Architecture) में क्या देन है ?
उत्तर-
मुग़ल काल में वास्तुकला ने बड़ी उन्नति की। मुग़ल शासकों ने अनेक भव्य महलों, दुर्गों तथा मस्जिदों का निमार्ण करवाया और बहते हुए पानी से सुसज्जित अनेक बाग लगवाये। भवन-निर्माण में सबसे पहले अकबर ने रुचि दिखाई। उसने फतेहपुर सीकरी में बुलन्द दरवाज़ा और जामा मस्जिद का निर्माण करवाया। उसने आगरे का किला तथा लाहौर में भी एक दुर्ग बनवाया। अकबर के बाद शाहजहाँ ने भवन-निर्माण में रुचि ली। उसका सबसे सुन्दर भवन आगरा का ‘ताजमहल’ है। उसने दिल्ली में लाल किला और जामा मस्जिद का निर्माण भी करवाया । उसकी एक अन्य प्रसिद्ध कृति एक करोड़ की लागत से बना ‘तख्ते ताऊस’ है। उसके बाद मुग़ल काल में भवन निर्माण कला का विकास रुक गया।

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प्रश्न 10.
मुगलकाल में चित्रकला के क्षेत्र में क्या उन्नति हुई ?
उत्तर-
मुग़ल काल में चित्रकला के क्षेत्र में असाधारण उन्नति हुई। अब्दुल समद, सैय्यद अली, सांवलदास, जगन्नाथ, ताराचन्द आदि चित्रकारों ने अपनी कलाकृतियों से चित्रकला का रूप निखारा। ये सभी चित्रकार अकबर के समय के प्रसिद्ध कलाकार थे। अकबर के बाद जहांगीर ने भी कला के विकास में रुचि ली। चित्रकला में उसकी इतनी रुचि थी कि वह चित्र को देखकर उसे बनाने वाले चित्रकार का नाम बता दिया करता था। उसके दरबार में भी आगा रजा, अब्दुल हसन, मुहम्मद नादिर, मुहम्मद मुराद आदि अनेक चित्रकार थे। जहांगीर की मृत्यु के बाद केवल राजकुमार दारा शिकोह ने ही चित्रकला के विकास में थोड़ा बहुत योगदान दिया। उसके प्रयत्नों से फकीर-उल्ला, मीर हाशिम आदि चित्रकार शाहजहां के दरबार की शोभा बने। औरंगजेब के काल में चित्रकला का विकास काफ़ी सीमा तक रुक गया।

प्रश्न 11.
मुगलकाल में साहित्यिक विकास का वर्णन करो।
उत्तर-
मुग़ल काल में साहित्य के क्षेत्र में खूब विकास हुआ। बाबर और हुमायूं साहित्य प्रेमी सम्राट् थे। बाबर स्वयं अरबी तथा फ़ारसी का बहुत बड़ा विद्वान् था। उसने ‘तुजके बाबरी’ नामक ग्रन्थ की रचना की जिसे तुर्की साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है। हुमायूं ने इस ग्रन्थ का अरबी भाषा में अनुवाद करवाया । उसके काल में लिखी गई पुस्तकों में ‘हुमायूंनामा’ प्रमुख है। सम्राट अकबर को भी विद्या से बड़ा लगाव था। उसके समय में लिखे गए ग्रन्थों में ‘अकबरनामा’ ‘तबकाते अकबरी’ ‘सूर सागर’ तथा ‘रामचरितमानस’ प्रमुख हैं। जायसी की ‘पद्मावत’ तथा केशव की रामचन्द्रिका की रचना भी इसी काल में हुई थी। जहांगीर ने भी साहित्य को काफ़ी प्रोत्साहन दिया। अनेक विद्वान् उसके दरबार की शोभा थे। वह स्वयं भी एक उच्चकोटि का विद्वान् था। उसने आत्मकथा लिखी थी। शाहजहां के समय अब्दुल हमीद लाहौरी एक प्रसिद्ध विद्वान् था। उसने ‘बादशाह नामा’ ग्रन्थ की रचना की थी । औरंगजेब के काल में साहित्य का विकास रुक गया।

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IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अकबर अथवा मुगलों के केन्द्रीय प्रशासन के ढांचे का वर्णन करो।
उत्तर-
अकबर एक उच्चकोटि का प्रशासक था। उसने केन्द्र को अधिक से अधिक मजबूत बनाने का प्रयास किया। उसके द्वारा प्रचलित शासन प्रणाली पूरे मुगलकाल तक जारी रही। संक्षेप में, अकबर अथवा मुगलों के केन्द्रीय प्रशासन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन निम्न प्रकार है :-

1 सम्राट-अकबर के काल में सम्राट् शासन का केन्द्र बिन्दु था। शासन की सारी शक्तियां उसी के हाथ में थीं। उसकी शक्तियों पर किसी प्रकार की कोई रोक नहीं थी। फिर भी सम्राट् अन्यायी तथा अत्याचारी तानाशाह के रूप में कार्य नहीं करता था। मुल्लाओं और मौलवियों का भी उस पर कोई प्रभाव नहीं था। वह अपने आपको ईश्वर का प्रतिनिधि समझता था।

2 मन्त्रिपरिषद्-शासन कार्यों में सम्राट् की सहायता के लिए मन्त्रिपरिषद् की व्यवस्था थी। मन्त्रियों के अधिकार आज के मन्त्रियों की भान्ति अधिक विस्तृत नहीं थे। वे सम्राट की आज्ञा अनुसार काम करते थे। अतः उन्हें सम्राट का सचिव कहना अधिक उचित है। प्रधानमन्त्री का पद अन्य मन्त्रियों से ऊंचा था। सभी गम्भीर विषयों पर सम्राट् उससे सलाह लेता था। सभी मन्त्री सम्राट के प्रतिऊत्तरदायी थे। वे अपने पद पर उसी समय तक कार्य कर सकते थे जब तक सम्राट् उनसे प्रसन्न रहता था।

प्रमुख मन्त्रियों तथा उनके विभागों का वर्णन इस प्रकार है :-

  • वकील या वजीर-वह प्रधानमन्त्री के रूप में कार्य करता था। वह सम्राट को प्रत्येक विषय में परामर्श देता था।
  • दीवान-वह आय-व्यय का हिसाब-किताब रखता था। उसके हस्ताक्षर के बिना किसी रकम का भुगतान सम्भव नहीं था।
  • मीर बख्शी-उसका कार्य सैनिक तथा असैनिक कर्मचारियों को वेतन देना था।
  • मुख्य सदर-धर्म सम्बन्धी सभी कार्य सम्पन्न करना उसका मुख्य कर्त्तव्य था।
  • खान-ए-सामां-वह सम्राट और उसके परिवार के लिए आवश्यक सामान की व्यवस्था करता था।
  • मुख्य काजी-मुख्य काजी न्याय-सम्बन्धी कार्य सम्पन्न करता था। सम्राट के बाद वही सबसे बड़ा न्यायाधीश था।
  • अन्य मन्त्री-उपर्युक्त मन्त्रियों के अतिरिक्त जंगलों का प्रबन्ध, डाक कार्यों, तोपखाने के प्रबन्ध आदि के लिए अलग मन्त्री होते थे। तोपखाने के मुखिया को मीर आतिश के नाम से पुकारा जाता था।

प्रश्न 2
अकबर के शासनकाल में प्रान्तीय प्रशासन का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
मुग़ल साम्राज्य बहुत विस्तृत था। प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखते हुए मुग़लों ने अपने राज्य को कई प्रान्तों में बांट रखा था। अकबर के समय में इन प्रान्तों की संख्या 15 थी। प्रान्तीय शासन का आधार केन्द्रीय शासन था। प्रान्त में एक सिपहसालार अथवा नाज़िम, एत दीवान, एक बख्शी, काजी, वाकयानवीस तथा कोतवाल आदि अधिकारी होते थे। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है

1. सिपहसालार अथवा नाजिम-प्रत्येक प्रान्त में एक सूबेदार होता था। उसकी नियुक्ति स्वयं सम्राट् द्वारा की जाती थी तथा अपने कार्यों के लिए वह केवल सम्राट के प्रति उत्तरदायी होता था। उसके कर्तव्य निम्न प्रकार थे-

  • वह अपने प्रान्त में न्याय तथा व्यवस्था का प्रबन्ध करता था।
  • यदि कोई जागीरदार अथवा अधिकारी उसकी आज्ञा की अवहेलना करता, तो वह उसे दण्ड दे सकता था।
  • वह अपने प्रान्त के लोगों के मुकद्दमों का निर्णय करता था।
  • अपने प्रान्त की प्रजा की सुविधा के लिए वह अस्पताल, सड़कें, बाग, कुएं आदि बनवाता था।
  • भूमि कर एकत्रित करने में वह दीवान-ए-आमिल तथा अन्य अधिकारियों की सहायता करता था।
  • सूबे के सैनिकों में अनुशासन बनाए रखना उसी का कर्तव्य था
  • वह इस बात का ध्यान रखता था कि प्रान्त का व्यय उसकी आय से बढ़ने न पाए।

2. प्रान्तीय दीवान-प्रान्त में सिपहसालार के बाद प्रान्तीय दीवान का नम्बर आता था। यह प्रान्त के वित्त विभाग का मुखिया था। उसकी नियुक्ति सम्राट केन्द्रीय दीवान की सिफ़ारिश से करता था। वह प्रान्त की आय-व्यय का हिसाब रखता था। माल विभाग के कर्मचारियों की निगरानी करना भी उसी का कर्त्तव्य था। वह परगनों से भूमिकर एकत्रित करता था। मास में दो बार वह केन्द्रीय दीवान को कृषकों की अवस्था के बारे में तथा एकत्रित किए हुए धन के बारे में सूचित करता था।

3. बख्शी-सम्राट् मीर बख्शी की सिफ़ारिश पर प्रान्तीय बख्शी को नियुक्ति करता था। वह प्रान्त में सेना की भर्ती करता था तथा घोड़ों को दागने का प्रबन्ध करता था। सैनिकों की पदोन्नति तथा तबदीली करवाना और उनमें अनुशासन बनाए रखना बख्शी का ही कार्य था। वह खज़ाना अधिकारी के रूप में वेतन देने का भी कार्य करता था।

4. सदर तथा काजी-प्रत्येक प्रान्त में एक सदर होता था। उसकी नियुक्ति सम्राट् मुख्य सदर की सिफ़ारिश पर करता था। वह प्रान्त के महात्माओं तथा पीर-फकीरों की सूचियां तैयार करता था तथा उन्हें अनुदान एवं छात्र-वृत्तियां दिलवाता था। धमार्थ दी गई भूमि का प्रबंध करना और उससे सम्बन्धित झगड़ों का निपटारा करना सदर का कार्य होता था। प्रान्तीय काजी प्रान्त का न्यायाधीश होता था। वह फौजदारी मुकद्दमों का निर्णय करता था।

5. वाकयानवीस-वाकयानवीस प्रान्त के गुप्तचर विभाग का मुखिया होता था। गुप्तचरों के माध्यम से वह सम्राट को प्रान्त के अधिकारियों के कार्यों के बारे में गुप्त सूचनाएं भेजता था।

6. कोतवाल-प्रान्त के बड़े-बड़े नगरों में कोतवाल की नियुक्ति की जाती थी। वह नगर में शान्ति तथा व्यवस्था का प्रबन्ध करता था। वह वेश्याओं, शराब तथा मादक वस्तुओं को बेचने वालों पर कड़ी निगरानी रखता था। वह विदेशियों की देख-रेख भी करता था। कब्रिस्तान तथा श्मशान की भूमि का ठीक प्रबन्ध करना भी उसी का कर्तव्य था।

सच तो यह है कि मुग़लों का प्रान्तीय शासन-प्रबन्ध काफ़ी कुशल था। इसमें वे सभी विशेषताएं विद्यमान् थीं जिनके कारण पूरे प्रान्त में सुव्यवस्था बनी रहे और प्रान्त केन्द्र के नियन्त्रण में रहें।

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प्रश्न 3.
मनसबदारी प्रथा से क्या अभिप्राय है ? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
‘मनसब’ अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ ‘पदवी’ अथवा ‘स्थान निश्चित करना’ है, परन्तु मुगलकाल में मनसबदार से अभिप्राय उस सैनिक अथवा नागरिक कर्मचारी से लिया जाता था जो प्रशासन चलाने में सम्राट की सहायता करता था। इर्विन के अनुसार ‘मनसबदार’ मुग़ल अधिकारी का पद होता था। यह पद उस अधिकारी का राज्य में दर्जा, वेतन तथा उसका शाही दरबार में स्थान निर्धारित करता था। प्रत्येक मनसबदार को अपने मनसब के अनुसार घुड़सवार, हाथी, ऊंट, खच्चर, छकड़े आदि रखने पड़ते थे, परन्तु एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि मनसबदार को अपने मनसब की संख्या के अनुसार घुड़सवार तथा अन्य साधन रखने का अधिकार नहीं था। वह उसका केवल एक निश्चित भाग ही रखता था। यह भाग राज्य की ओर से निश्चित किया जाता था। मनसब न केवल सैनिक अधिकारियों की ही दी जाती थी बल्कि असैनिक अधिकारियों को भी सौंपी जाती थी। मनसबदारों के अतिरिक्त अमीरों की और कोई भी श्रेणी नहीं थी।

मनसबदारी प्रथा की विशेषताएं-

1. मनसबदारों की नियुक्ति, पदोन्नति तथा पद-मुक्ति-मनसबदारों की नियुक्ति स्वयं सम्राट् करता था। उनकी नियुक्ति योग्यता के आधार पर की जाती थी। भर्ती होने वाले व्यक्ति को मीर बख्शी के पास ले जाया जाता था। वह उसे सम्राट के सम्मुख पेश करता था और सम्राट् उसकी सलाह से प्रस्तुत होने वाले व्यक्ति को मनसबदार नियुक्त कर देता था। नियुक्ति होने पर उसका नाम सरकारी रजिस्टरों में दर्ज कर लिया जाता था। मनसबदारों की पदोन्नति भी सम्राट की इच्छा पर निर्भर होती थी। सम्राट् जब चाहे किसी भी मनसबदार को पद से मुक्त कर सकता था।

2. मनसबदारों की श्रेणियां-अकबर के समय में सबसे छोटा मनसबदार दस तथा सबसे बड़ा मनसबदार दस हज़ार सैनिक अपने पास रखता था। परन्तु आगे चल कर यह संख्या बीस हज़ार हो गई थी। पांच हज़ार से ऊपर की मनसब केवल राजकुमारों को अथवा उच्च कोटि के सरदारों को ही सौंपी जाती थी। राजकुमारों को छोड़कर मुगल साम्राज्य में पांच हजार या उससे अधिक सैनिकों वाले मनसबदार को ‘अमीर-उल-उमरा’ कहा जाता था। 3,000 से 4,000 वाले मनसबदार को ‘उमरा-ए-कुबर’ तथा 1,000 से 2,500 को ‘उमरा’ कहा जाता था। 20 से 1,000 मनसब वाले को केवल ‘मनसबदार’ कहा जाता था। छोटे सरकारी कर्मचारियों को मनसबदार की बजाय ऐजिनदार कहते थे।

3. मनसबदारों के पद-अकबर ने अपने शासन काल के अन्तिम वर्षों में 5,000 से नीचे के मनसबों के लिए ‘जात’ और ‘सवार’ नामक दो पद जारी किए। ये पद केवल 300 अथवा इससे ऊंचे ‘मनसब’ को दे दिए जाते थे। उदाहरण के लिए 300 सवार तथा 750 ‘जात’ परन्तु इन दोनों पदों के महत्त्व के विषय में इतिहासकारों में मतभेद पाया जाता है। ब्लैकमैन के अनुसार ‘जात से अभिप्राय सैनिकों की उस निश्चित संख्या से था जो मनसबदारों को अपने यहां रखनी पड़ती थी जबकि ‘सवार से तात्पर्य केवल घुड़सवारों की निश्चित संख्या से था। इसके विपरीत इर्विन का मत है कि ‘जात’ पद किसी मनसबदार के घुड़सवारों की वास्तविक संख्या प्रकट करता था, परन्तु ‘सवार’ एक प्रतिष्ठा का पद था जो जात द्वारा सूचित घुड़सवारों की संख्या से कुछ अधिक संख्या का परिचय देता था।

4. मनसबदारों के वेतन-मनसबदारों का वेतन उनकी श्रेणियों पर निर्भर करता था । निम्नलिखित तालिका से हमें कुछ मनसबदारों के वेतन का पता चल सकता है :-
PSEB 11th Class History Solutions Chapter 13 मुग़ल राज्य-तन्त्र और शासन प्रबन्ध 1
इस वेतन में से मनसबदारों को अपने अधीन घुड़सवारों तथा घोड़ों का खर्च भी उठाना पड़ता था और सम्राट को कई प्रकार की भेटें देनी पड़ती थीं।

प्रश्न 4.
मनसबदारी प्रथा के गुण-दोषों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
मनसबदारी प्रथा के गुण :

  • इस प्रथा से जागीरदारी प्रथा समाप्त हो गई और विद्रोह का भय जाता रहा । अब प्रत्येक मनसबदार को वेतन लेने के लिए सम्राट् पर निर्भर रहना पड़ता था । इसके अतिरिक्त मनसबदारों पर सम्राट का पूरा नियन्त्रण होता था । उन्हें अपने सैनिकों तथा घोड़ों को उपस्थित करने के लिए किसी भी समय कहा जा सकता था । इस प्रकार सम्राट के विरुद्ध विद्रोह की सम्भावनाएं कम हो गईं ।
  • इस प्रथा में सभी पद योग्यता के आधार पर ही दिए जाते थे । अयोग्य होने पर मनसबदारों को पदमुक्त कर दिया जाता था। इस प्रकार योग्य तथा सफल अधिकारियों के नियुक्त होने से राज्य के सभी कार्य सुचारु रूप से चलने लगे ।
  • इससे सरकार जगीरदारों को बड़ी-बड़ी जगीरें देने के कारण होने वाली आर्थिक हानि से बच गई ।
  • ज़ब्ती प्रथा के अनुसार मृत्यु के पश्चात् मनसबदारों की सारी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली जाती थी । इससे सरकार की आय में काफ़ी वृद्धि हुई ।

मनसबदारी प्रथा के दोष :-

(i) मनसबदारी प्रथा का सबसे बड़ा दोष यह था कि मनसबदार सदैव सरकार को धोखा देने की चेष्टा में रहते थे । वे घुड़सवारों की निश्चित संख्या से बहुत कम घुड़सवार अपने पास रखते थे, परन्तु सरकार से वे पूरा वेतन प्राप्त करते थे । इस भ्रष्टाचार का अन्त करने के लिए घोड़ों को दागने तथा सैनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा अवश्य जारी की गई, परन्तु इससे कोई विशेष लाभ न हुआ ।

(ii) मनसबदारों को भारी वेतन दिया जाता था । इस प्रकार सरकार के काफ़ी धन का अपव्यय हो जाता था । दूसरी ओर मनसबदार अधिक समृद्ध हो जाने के कारण अपने कर्तव्य का ठीक प्रकार से पालन नहीं करते थे और विलासिता में अपने धन को नष्ट करते रहते थे ।

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प्रश्न 5.
मुग़लों के अधीन भारत में वास्तुकला के विकास का विवरण दीजिए ।
अथवा
वास्तुकला के विकास में अकबर, जहांगीर तथा शाहजहाँ के योगदान की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
मुग़ल काल में एक लम्बे समय के पश्चात् देश में शान्ति स्थापित हुई । शान्ति के कारण देश समृद्ध बना । राज्य के खजाने भर गए । ऐसे वातावरण में जनता में अनेक कलाकार पैदा हुए । सम्राटों ने कलाकारों को दरबार में आदरणीय स्थान दिया । फलस्वरूप देश में सभी प्रकार की कलाओं में नया निखार आया । कलाकारों ने धरती के सीने को भवनों से सजा दिया । संक्षेप में, इस काल में हुए वास्तुकला के विकास का वर्णन इस प्रकार है :-

1. बाबर के काल में-बाबर को भवन बनवाने का बड़ा चाव था । उसने आगरा, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर, अलीगढ़ में भवनों का निर्माण करने के लिए सैंकड़ों कारीगर लगाए थे । परन्तु उसके द्वारा बनाए हुए अधिकतर भवन अब नष्ट हो चुके हैं । इस समय उसके द्वारा बनाए गए केवल दो भवन विद्यमान हैं-एक मस्जिद पानीपत में है और दूसरी मस्जिद रुहेलखण्ड के सम्भल नगर में है।

2. हुमायूं के काल में-हुमायूं का अधिकतर समय युद्धों में गुज़रा । इसलिए वह कलाओं के विकास की ओर विशेष ध्यान न दे सका। फिर भी उसने कुछ मस्जिदों का निर्माण करवाया । उसमें एक मस्जिद फतेहाबाद (हरियाणा) में है ।

3. अकबर के काल में-अकबर ने भी भवन-निर्माण कला को काफ़ी विकसित किया । उसके भवनों में फ़ारसी तथा भारतीय शैलियों का मिश्रण पाया जाता है । आगरा के दुर्ग में जहांगीर महल’ तथा सीकरी की बहुत-सी इमारतों को देखने से ऐसा जान पड़ता है मानो इन्हें किसी राजपूत राजकुमार ने बनवाया हो । अकबर के शासनकाल के प्रथम वर्षों में दिल्ली में हुमायूं का मकबरा बना । अकबर द्वारा बनवाए नए फतेहपुर सीकरी के भवनों में जोधाबाई का महल बहुत सुन्दर है । 1576 ई० में उसने गुजरात विजय की खुशी में बुलन्द दरवाज़े का निर्माण करवाया । सीकरी में स्थित दीवान-ए-खास’ अकबर के कला-प्रेम का एक उत्तम नमूना है । अकबर द्वारा बना गया ‘पंच महल’ तथा ‘जामा मस्जिद’ भी देखने योग्य हैं ।

4. जहांगीर के काल में-जहांगीर को भवन निर्माण कला से विशेष प्रेम नहीं था । फिर भी उसके समय के दो भवन सिकन्दरा में ‘अकबर का मकबरा’ तथा आगरा में ‘एतमाद-उद्धौला का मकबरा’ कला की दृष्टि से काफ़ी महत्त्वपूर्ण हैं ।

5. शाहजहां के काल में-मुगल सम्राटों में शाहजहां को कला के क्षेत्र में विशेष स्थान प्राप्त है । उसने बहुत-से भवनों का निर्माण करवाया । उसकी सबसे सुन्दर इमारत ‘ताजमहल’ है । इसकी शोभा देखने वालों को चकाचौंध कर देती है । उसने दिल्ली का लाल किला बनवाया । इसमें बने ‘दीवान-ए-खास’ तथा ‘दीवान-ए-आम’ विशेष रूप से देखने योग्य हैं । शाहजहां ने आगरा के दुर्ग में मोती मस्जिद बनवाई जो भवन-निर्माण कला का एक सुन्दर नमूना है । शाहजहां ने एक करोड़ रुपये की लागत से ‘तख्त-ए-ताऊस’ को भी बनवाया ।

6. औरंगजेब के काल में-औरंगजेब के काल में भवन-निर्माण कला का विकास लगभग रुक गया । उसके समय में दिल्ली दुर्ग की मस्ज़िद, लाहौर की मस्ज़िद आदि कुछ इमारतों का निर्माण अवश्य हुआ, परन्तु ये सभी कला की दृष्टि से कोई महत्त्व नहीं रखतीं। – औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद साम्राज्य में अराजकता फैल गई । फलस्वरूप बाद के मुग़ल सम्राटों को इस ओर ध्यान देने का अवसर ही न मिल सका ।

PSEB 10th Class SST Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न.

PSEB 10th Class Social Science Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

नीचे दिए गए उद्धरणों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए

(1)

राष्ट्रीय आय का अनुमान लगाते समय वस्तुओं तथा सेवाओं को उनकी कीमतों से गुणा किया जाता है। यदि राष्ट्रीय उत्पाद की मात्रा को चालू कीमतों से गुणा किया जाता है तो उसे चालू कीमतों पर राष्ट्रीय आय या मौद्रिक आय कहा जाता है। इसके विपरीत यदि राष्ट्रीय उत्पादन की मात्रा को किसी अन्य वर्ष (जिसे आधार वर्ष भी कहते हैं) की कीमतों से गुणा किया जाए तो जो परिणाम प्राप्त होगा उसे स्थिर कीमतों पर राष्ट्रीय आय या वास्तविक राष्ट्रीय आय कहा जाता है। कीमतों में प्राय: परिवर्तन होता रहता है। इसके फलस्वरूप वस्तुओं तथा सेवाओं की मात्रा में बिना कोई परिवर्तन हुए राष्ट्रीय आय कम या अधिक हो सकती है। एक देश की वास्तविक आर्थिक प्रगति का अनुमान लगाने के लिए विभिन्न वर्षों की राष्ट्रीय आय एक विशेष वर्ष के कीमत स्तर पर मापी जानी चाहिए। कीमतें स्थिर रहने पर वास्तविक आय में होने वाले परिवर्तन केवल वस्तुओं तथा सेवाओं में होने वाले परिवर्तनों के फलस्वरूप उत्पन्न होंगे।
(a) राष्ट्रीय आय से क्या अभिप्राय है?
(b) सकल राष्ट्रीय आय तथा शुद्ध राष्ट्रीय आय में क्या अंतर है?
उत्तर –
(a) राष्ट्रीय आय एक देश के सामान्य निवासियों की एक वर्ष में मजदूरी, ब्याज, लगान तथा लाभ के रूप में साधन आय है। यह घरेलू साधन आय और विदेशों से अर्जित शुद्ध साधन आय का योग है।
(b) एक देश की राष्ट्रीय आय में यदि घिसावट व्यय शामिल रहता है तो उसे सकल राष्ट्रीय आय कहा जाता है। जबकि इसके विपरीत यदि राष्ट्रीय आय में घिसावट व्यय को घटा दिया जाता है तो उसे शुद्ध राष्ट्रीय आय कहा जाता हैं। अर्थात,
राष्ट्रीय आय + घिसावट व्यय = सकल राष्ट्रीय आय
राष्ट्रीय आय – घिसावट व्यय = शुद्ध राष्ट्रीय आय
‘सकल’ शब्द का प्रयोग शुद्ध शब्द की तुलना में विस्तृत अर्थों में किया जाता है।

(2)

उपभोग शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है; एक तो क्रिया के रूप में तथा दूसरे व्यय के रूप में। क्रिया के रूप में उपभोग वह क्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य की आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष संतुष्टि होती है जैसे प्यास बुझाने के लिए पानी का प्रयोग करना या भूख की संतुष्टि के लिए रोटी का प्रयोग करना। अतएव उपभोग वह क्रिया है जिसके द्वारा कोई मनुष्य अपनी आवश्यकता की संतुष्टि के लिए किसी वस्तु की उपयोगिता का प्रयोग करता है। व्यय के रूप में उपभोग से अभिप्राय उस कुल खर्चे से है जो उपभोग वस्तुओं पर किया जाता है।
राष्ट्रीय आय में से लोग अपनी आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष संतुष्टि के लिए वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने के लिए मुद्रा की जो राशि खर्च करते हैं उसे उपभोग या कुल उपभोग व्यय कहते हैं।
(a) उपभोग किसे कहते हैं? इसे प्रभावित करने वाले तत्त्व कौन-से हैं?
(b) उपभोग प्रवृत्ति क्या है? यह कितने प्रकार की होती है?
उत्तर-
(a) उपभोग से अभिप्राय किसी अर्थव्यवस्था में एक वर्ष की अवधि में उपभोग पर किए जाने वाले कुल व्यय से लिया जाता है।
उपभोग पर कई तत्त्वों जैसे वस्तु की कीमत, आय, फैशन आदि का प्रभाव पड़ता है। परन्तु उपभोग पर सबसे अधिक प्रभाव आय का पड़ता है। साधारणतया आय के बढ़ने से उपभोग बढ़ता है। परन्तु उपभोग में होने वाली वृद्धि आय में होने वाली वृद्धि की तुलना में कम होती है।
(b) आय के विभिन्न स्तरों पर उपभोग की विभिन्न मात्राओं को प्रकट करने वाली अनुसूची को उपयोग प्रवृत्ति कहा जाता है।
PSEB 10th Class Economics Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न 1

  1. औसत उपभोग प्रवृत्ति (Average Propensity to Consume) — कुल व्यय तथा कुल आय के अनुपात को औसत उपभोग प्रवृत्ति कहा जाता है। इससे मालूम होता है कि लोग अपनी कुल आय का कितना भाग उपभोग पर खर्च करेंगे तथा कितना भाग बचाएंगे। इसे ज्ञात करने के लिए उपभोग को आय से भाग कर दिया जाता है अर्थात
    PSEB 10th Class Economics Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न 2
  2. सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Consume) — आय में होने वाले परिवर्तन के फलस्वरूप उपभोग में होने वाले परिवर्तन के अनुपात को सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति कहते हैं।
    PSEB 10th Class Economics Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न 3

PSEB 10th Class SST Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

(3)

सार्वजनिक वित्त दो शब्दों से मिलकर बना है: सार्वजनिक + वित्त। सार्वजनिक शब्द का अर्थ है जनता का समूह जिसका प्रतिनिधित्व सरकार करती है और वित्त का अर्थ है मौद्रिक साधन। अतएव सार्वजनिक वित्त से अभिप्राय किसी देश की सरकार के वित्तीय साधनों अर्थात् आय और व्यय से है। अर्थशास्त्र के जिस भाग में सरकार की आय तथा व्यय संबंधी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है उसे सार्वजनिक वित्त कहा जाता है। अतएव सार्वजनिक वित्त राजकीय संस्थानों जैसे केन्द्रीय, राज्य या स्थानीय सरकारों के मामलों का अध्ययन है। सार्वजनिक वित्त में सरकार की आय अर्थात् कर, ब्याज, लाभ आदि शामिल होते हैं। सार्वजनिक व्यय जैसे सुरक्षा, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योगों, कृषि आदि पर किया गया व्यय तथा सार्वजनिक ऋण का अध्ययन किया जाता है। समय के साथ-साथ प्रत्येक देश की सरकार के द्वारा की जाने वाली आर्थिक क्रियाओं में बहुत अधिक वृद्धि हो गई है। इसके साथ-साथ सार्वजनिक वित्त का क्षेत्र भी बहुत अधिक विस्तृत हो गया है। इसके अन्तर्गत केवल राज्य की आय और व्यय का अध्ययन ही नहीं किया जाता बल्कि विशेष आर्थिक उद्देश्यों जैसे पूर्ण रोजगार, आर्थिक विकास, आय तथा धन का समान वितरण, कीमत स्थिरता आदि से संबंधित सरकार की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन भी किया जाता है।
(a) सरकार की आय के मुख्य साधन क्या हैं?
(b) सार्वजनिक वित्त के मुख्य उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर-
(a) सरकार की आय का मुख्य साधन कर (Tax) है। कर दो प्रकार का होता है।

  1. प्रत्यक्ष कर (Direct Taxes) — प्रत्यक्ष कर वह कर होता है जो उसी व्यक्ति द्वारा पूर्ण रूप से दिया जाता है जिस पर कर लगाया जाता है। उदाहरण के लिए आय कर, उपहार कर, निगम कर, सम्पत्ति कर आदि प्रत्यक्ष कर हैं।
  2. अप्रत्यक्ष कर (Indirect Taxes) — अप्रत्यक्ष कर वह कर होता है जिन्हें सरकार को एक व्यक्ति देता है तथा इनका भार दूसरे व्यक्ति को उठाना पड़ता है। अप्रत्यक्ष कर की परिभाषा उन करों के रूप में की जाती है जो वस्तुओं तथा सेवाओं पर लगाए जाते हैं, अतः लोगों पर यह अप्रत्यक्ष रूप से लगाए जाते हैं। बिक्री कर, उत्पादन कर, मनोरंजन कर, आयात-निर्यात कर अप्रत्यक्ष कर के उदाहरण हैं।

(b) सार्वजनिक वित्त के मुख्य उद्देश्य निम्न हैं:

  1. आय तथा सम्पत्ति का पुनः वितरण (Redistribution of Income and Wealth) — सार्वजनिक वित्त से सरकार कराधान तथा आर्थिक सहायता से आय और सम्पत्ति के बंटवारे में सुधार लाने हेतु प्रयासरत रहती है। संपत्ति और आय का समान वितरण सामाजिक न्याय का प्रतीक है जो कि भारत जैसे किसी भी कल्याणकारी राज्य का मुख्य उद्देश्य होता है।
  2. साधनों का पुनः आबंटन (Reallocation of Resources) — निजी उद्यमी सदैव यही आशा करते हैं कि साधनों का आबंटन उत्पाद के उन क्षेत्रों में किया जाए जहां ऊंचे लाभ प्राप्त होने की आशा हो। किन्तु यह भी संभव है कि उत्पादन के कुछ क्षेत्रों (जैसे शराब का उत्पादन) द्वारा सामाजिक कल्याण में कोई वृद्धि न हो। अपनी बजट संबंधी नीति द्वारा देश की सरकार साधनों का आबंटन इस प्रकार करती है जिससे अधिकतम लाभ तथा सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकें। उन वस्तुओं (जैसे शराब, सिगरेट) के उत्पादन पर भारी कर लगाकर उनके उत्पादन को निरुत्साहित किया जा सकता है। इसके विपरीत ‘सामाजिक उपयोगिता वाली वस्तुओं’ (जैसे ‘खादी’) के उत्पादन को आर्थिक सहायता देकर प्रोत्साहित किया जाता है।
  3. आर्थिक स्थिरता (Economic Stability) — बाज़ार शक्तियों (मांग तथा पूर्ति की शक्तियों) की स्वतन्त्र क्रियाशीलता के फलस्वरूप व्यापार चक्रों का समय-समय पर आना अनिवार्य होता है। अर्थव्यवस्था में तेजी और मंदी के चक्र चलते हैं। सरकार अर्थव्यवस्था को इन व्यापार चक्रों से मुक्त रखने के लिए सदैव वचनबद्ध होती है। बजट सरकार के हाथ में एक महत्त्वपूर्ण नीति अस्त्र है जिसके प्रयोग द्वारा वह अवस्फीति तथा मुद्रा स्फीति की स्थितियों का मुकाबला करती है।

(4)

प्रत्येक अल्पविकसित देश में उद्योगों, कृषि आदि अन्य क्षेत्रों का विकास तभी संभव हो सकता है, जब आधारिक संरचना पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों। आधारिक संरचना के अभाव में उद्योगों, कृषि आदि क्षेत्रों के विकास में रुकावटें उत्पन्न हो जाती हैं तथा उनकी वृद्धि दर कम हो जाती है। उदाहरण के लिए हम प्रतिदिन अनुभव करते हैं कि भारत में बिजली की कमी के कारण उद्योगों तथा कृषि को कितनी हानि उठानी पड़ती है। इसी प्रकार यदि यातायाद के साधन अपर्याप्त हों तो उद्योगों को समय पर कच्चा माल नहीं मिल सकेगा तथा उनका तैयार माल बाजार में नहीं पहुंच सकेगा। अतएव आधारिक संरचना की कमी उद्योगों तथा कृषि आदि उत्पादक क्षेत्रों के विकास की दर को कम कर देती है। इसके विपरीत आधारिक संरचना की उचित उपलब्धता इनके विकास की दर को तेजी से बढ़ाने में सहायक हो सकती है।
(a) आधारिक संरचना से क्या अभिप्राय है?
(b) आर्थिक आधारिक संरचना का अर्थ बताएं। महत्त्वपूर्ण आर्थिक संरचनाएं कौन-सी हैं?
उत्तर-
(a) किसी अर्थव्यवस्था के पूंजी स्टॉक के उस भाग को जो विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करने की दृष्टि से आवश्यक होता है, आधारिक संरचना कहा जाता है।
(b) आर्थिक आधारिक संरचना से अभिप्राय उस पूंजी स्टॉक से है जो उत्पादन प्रणाली को प्रत्यक्ष सेवाएं प्रदान करता है। उदाहरणादि-देश की यातायात प्रणाली रेलवे, वायु सेवाएं, उत्पादन तथा वितरण प्रणाली के एक हिस्से के रूप में ही सेवाएं प्रदान करतें हैं। इसी प्रकार बैंकिंग प्रणाली, मुद्रा तथा पूंजी बाज़ार दूसरे हिस्से के रूप में उद्योगों तथा कृषि को वित्त प्रदान करती है। महत्त्वपूर्ण आर्थिक संरचनाएं निम्नलिखित हैं

  1. परिवहन तथा संचार
  2. विद्युत् शक्ति
  3. सिंचाई
  4. बैंकिंग तथा अन्य वित्तीय संस्थाएं।

PSEB 10th Class SST Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

(5)

आधुनिक युग उपभोक्तावाद का युग है। उपभोक्ताओं के उपयोग एवं सुविधा के लिए प्रतिदिन नए उपभोक्ता पदार्थों की पूर्ति की जा रही है। नए प्रकार के खाद्य पदार्थों, नए फैशन के कपड़ों, सजावट के समान, गृहस्थी के उपयोग के लिए नए उपकरणों, परिवहन के नए साधनों, मनोरंजन के नए यन्त्रों जैसे-रंगीन टी०वी० विडियो आदि का निरन्तर आविष्कार तथा उत्पादन किया जा रहा है। इन वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए विज्ञापन तथा प्रचार का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है। आज का उपभोक्ता आकर्षक विज्ञापनों तथा अनेक उत्पादकों के प्रचार के आधार पर अपने उपभोग की सामग्री का चुनाव करता है। इस संबंध में उसका कई प्रकार से शोषण किया जाता है। उपभोक्ता को इस शोषण से संरक्षण देने के लिए उपभोक्ता संरक्षण की विधि प्रारम्भ की गई है।
(a) उपभोक्ता संरक्षण से क्या अभिप्राय है?
(b) उपभोक्ता के शिक्षण का अर्थ बताएं।
उत्तर-
(a) उपभोक्ता संरक्षण से अभिप्राय है कि उपभोक्ता वस्तुओं के उपभोक्ताओं की उत्पादकों के अनुचित व्यापार व्यवहारों के फलस्वरूप होने वाले शोषण से रक्षा करना।
(b) उपभोक्ता के हितों का संरक्षण करने के लिए उन्हें शिक्षित किया जाना भी आवश्यक है। इस उद्देश्य के लिए प्रतिवर्ष देश भर में 15 से 21 मार्च तक उपभोक्ता सप्ताह (Consumer’s Week) मनाया जाता है। इसमें उपभोक्ताओं में उनके अधिकारों के बारे में जागरूकता जगाने पर विशेष जोर दिया जाता है। इस अवसर पर प्रदर्शनियों, गोष्ठियों तथा नुक्कड़ सभाओं का आयोजन किया जाता है। उनमें उपभोक्ताओं को बताया जाता है कि उन्हें मिलावट, कम तोलने जैसे अनुचित व्यापारिक गतिविधियों के बारे में क्या करना चाहिए तथा इस संबंध में उन्हें कौन-सी कानूनी सुविधाएं प्राप्त हैं।

(6)

भारत एक कृषि प्रधान देश माना जाता है क्योंकि भारत में आज भी 68 प्रतिशत जनसंख्या कृषि क्षेत्र में रोजगार प्राप्त कर रही है। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारतवासियों ने अंग्रेजों से पिछड़ी हुई कृषि अर्थव्यवस्था ही विरासत में पाई थी। महात्मा गाँधी भी कृषि को “भारत की आत्मा” मानते थे। नेहरू जी ने भी इसलिए कहा था, “कृषि को सर्वाधिक प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।” डॉ० वी०के०वी० राव ने कृषि के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था, “यदि पंचवर्षीय योजनाओं के अन्तर्गत विकास के विशाल पहाड़ को लांघना है तो कृषि के लिए निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करना आवश्यक है।” प्रसिद्ध अर्थशास्त्री विद्वान् दांते वाला के अनुसार, “भारतीय अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास में कृषि क्षेत्र की सफलता देश को आर्थिक प्रगति के मार्ग की तरफ अग्रसर करती है।”
(a) कृषि से क्या अभिप्राय है?
(b) भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर-
(a) अंग्रेजी भाषा का एग्रीकल्चर शब्द लैटिन भाषा के दो शब्दों एग्री (Agri), खेत (Field) तथा कल्चर (Culture) (खेती) (Cultivation) से लिया गया है। दूसरे शब्दों में, एक खेत में पशुओं तथा फसलों के उत्पादन सम्बन्धी कला व विज्ञान को कृषि कहते हैं। अर्थशास्त्र में इस शब्द का प्रयोग खेती की क्रिया में सम्बन्धित प्रत्येक विषय में किया जाता है। कृषि का मुख्य उद्देश्य मज़दूरी पदार्थों जैसे अनाज, दूध, सब्जियाँ, दालों तथा उद्योगों के लिए कच्चे माल का उत्पादन करना है।
(b) भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्व निम्नलिखित है.

  1. राष्ट्रीय आय (National Income) — भारत की राष्ट्रीय आय का लगभग एक चौथाई भाग कृषि, वन आदि प्राथमिक क्रियाओं से प्राप्त होता है। योजनाकाल में राष्ट्रीय आय में कृषि क्षेत्र का योगदान विभिन्न वर्षों में 14.2 प्रतिशत से 51 प्रतिशत तक रहा है। .
  2. कृषि तथा रोज़गार (Agriculture and Employments) — भारत में कृषि रोज़गार का मुख्य स्रोत है। भारत में 70 प्रतिशत से भी ज्यादा कार्यशील जनसंख्या कृषि क्षेत्र में लगी हुई है। भारत में लगभग दो तिहाई जनसंख्या कृषि क्षेत्र पर निर्भर रहती है।
  3. कृषि तथा उद्योग (Agriculture and Industry) — कृषि क्षेत्र के द्वारा कई उद्योगों को कच्चा माल जैसेकपास, जूट, गन्ना तिलहन आदि प्राप्त होते हैं। कृषि के विकास के कारण लोगों की आय में वृद्धि होती है इसलिए वे उद्योगों द्वारा निर्मित वस्तुओं की अधिक मांग करते हैं। इसके फलस्वरूप उद्योगों के बाजार का विस्तार होता है।
  4. यातायात (Transport) — यातायात के साधनों जैसे रेलों, मोटरों, बैलगाड़ियों की आय का एक मुख्य साधन अनाज तथा अन्य कृषि पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाना ले जाना है।
  5. सरकार की आय (Government Income) — राज्य सरकारें अपनी आय का काफी भाग मालगुजारी से प्राप्त करती है। मालगुजारी राज्य सरकारों की आय का परम्परागत साधन है।

PSEB 10th Class SST Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

(7)

हरित क्रान्ति दो शब्दों से मिलकर बना है-हरित + क्रान्ति। हरित शब्द का अर्थ है हरियाली तथा क्रान्ति शब्द का अर्थ है इतनी तेजी से होने वाला परिवर्तन कि सभी उसकी ओर आश्चर्य से देखते रह जाएं। इस शब्द का प्रयोग कृषि के उत्पादन के लिए किया गया है। भारत में पहली तीन योजनाओं की अवधि में अपनाए गए कृषि सुधारों के कारण 1967-68 में अनाज के उत्पादन में पिछले वर्ष (1966-67) की तुलना में लगभग 25% की वृद्धि हुई। किसी एक वर्ष में अनाज के उत्पादन में इतनी अधिक वृद्धि होना एक क्रान्ति के समान था। इस कारण अर्थशास्त्रियों ने अमाज के उत्पादन में होने वाली इस वृद्धि को हरित क्रान्ति का नाम दिया है।
(a) हरित क्रान्ति के प्रभाव बताएं।
(b) हरित क्रान्ति क्या है? इसकी विशेषताएं बताएं।
उत्तर-
(a) हरित क्रान्ति के प्रभाव निम्नलिखित रहे हैं-

  1. उत्पादन में वृद्धि (Increase in Production) — हरित क्रान्ति के फलस्वरूप 1967-68 और उसके बाद के वर्षों में फसलों के उत्पादन में बड़ी तीव्र गति से वृद्धि हुई है। 1967-68 के वर्ष जिसे हरित क्रान्ति का वर्ष कहा जाता है, में अनाज का उत्पादन बढ़कर 950 लाख टन हो गया।
  2. पूंजीवादी खेती (Capitalistic Farming) — हरित क्रान्ति का लाभ उठाने के लिए धन की बहुत अधिक आवश्यकता है। इतना धन केवल वे ही किसान खर्च कर सकते हैं जिनके पास कम-से-कम 10 हेक्टेयर से अधिक भूमि हो। अतएव हरित क्रान्ति के फलस्वरूप देश में पूंजीवादी खेती को प्रोत्साहन मिला है।
  3. किसानों की समृद्धि (Prosperity of the Farmers) — हरित क्रान्ति के फलस्वरूप किसानों की अवस्था में काफी सुधार हुआ है। उनका जीवन स्तर पहले से बहुत ऊँचा हो गया है। कृषि का व्यवसाय एक लाभदायक व्यवसाय माना जाने लगा है। कई व्यवसायी इस ओर आकर्षित होने लगे हैं। देश में उपभोक्ता, वस्तुओं की मांग में वृद्धि हुई है। आवश्यकता की उच्चकोटि की वस्तुओं तथा विलासिता के पदार्थों की मांग बढ़ गई है। इसका औद्योगिक विकास पर भी उचित प्रभाव पड़ा है।
  4. खाद्यान्न के आयातों में कमी (Reduction in Imports of Food Grains) — हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत में खाद्यान्न के आयात पहले की अपेक्षा कम होने लगे हैं।

(b) हरित क्रान्ति से अभिप्राय कृषि उत्पादन विशेष रूप से गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में होने वाली उस भारी वृद्धि से है जो कृषि में अधिक उपज वाले बीजों के प्रयोग की नई तकनीक अपनाने के कारण सम्भव हुई।
विशेषताएं-

  1. भारत में 1968 का वर्ष हरित क्रान्ति का वर्ष था।
  2. इसमें “पंत” कृषि विश्वविद्यालय, पंतनगर ने कई किस्मों के बीजों के माध्यम से एक सराहनीय सहयोग दिया।
  3. हरित क्रान्ति लाने में भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान नई दिल्ली का भी सहयोग सराहनीय है।
  4. भारत में इस क्रान्ति को लाने का श्रेय डॉ० नोरमान वरलोग तथा एम०एन० स्वामीनाथन को जाता है।

(8)

भारत जैसे अल्पविकसित देशों की आर्थिक प्रगति के लिए औद्योगीकरण एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। उद्योगों के विकास द्वारा ही आय, उत्पादन तथा रोजगार की मात्रा को बढ़ाकर भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर में वृद्धि की जा सकती है। स्वतन्त्रता से पहले भारत में उद्योगों का बहुत ही कम विकास हुआ था, परन्तु आजादी के बाद सरकार ने देश के औद्योगिक विकास को बहुत अधिक महत्त्व दिया। इसके फलस्वरूप देश में कई उद्योग स्थापित किए गए तथा पुराने उद्योगों की उत्पादन क्षमता तथा कुशलता में भी वृद्धि की गई। भारतीय पंचवर्षीय योजनाओं में भी उद्योगों के विकास को काफी महत्त्व दिया गया है।
(a) औद्योगिक विकास का महत्त्व स्पष्ट करें।
(b) उद्योग किस प्रकार सन्तुलित अर्थव्यवस्था के निर्माण में सहायक है?
उत्तर-
(a)

  1. रोज़गार (Employment) — औद्योगीकरण के फलस्वरूप नए-नए उद्योगों का निर्माण होता है। देश के लाखों बेरोजगारों को इन उद्योगों में काम मिलने लगता है। इससे बेरोज़गारी कम होती है।
  2. आत्म निर्भरता (Self Sufficiency) — उद्योगों के विकास से देश की आवश्यक वस्तुएं देश में ही उत्पन्न होने लगेंगी। उनके लिए विदेशों पर निर्भरता कम हो जाएगी। इस प्रकार भारत कई वस्तुओं व सामान में आत्म निर्भर हो जाएगा। .
  3. राष्ट्रीय आय में वृद्धि (Increase in National Income) — भारत में औद्योगीकरण से प्राकृतिक साधनों का उचित प्रयोग हो सकेगा। इससे उत्पादन तथा व्यापार बढ़ेगा, राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी तथा लोगों की प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ेगी।
  4. राष्ट्रीय प्रतिरक्षा के लिए जरूरी (Essential for National Defence) — औद्योगीकरण से देश में लोहा, इस्पात, रसायन, हवाई जहाज़, सुरक्षा आदि कई उद्योगों की स्थापना हो जाएगी। इन उद्योगों का देश की प्रतिरक्षा के लिए बहुत महत्त्व है, क्योंकि इन उद्योगों से युद्ध के लिए बहुत सामान तैयार किया जाता है।
  5. भूमि पर जनसंख्या के दबाव में कमी (Less pressure of population on Land) — भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या खेती पर निर्भर करती है। इसके फलस्वरूप खेती काफी पिछड़ी हुई है। उद्योगों के विकास के कारण कृषि पर जनसंख्या का दबाव कम हो जाएगा। इससे कृषि जोतों का आकार बढ़ेगा व खेती की अधिक उन्नति हो सकेगी।

(b) भारत की अर्थव्यवस्था असन्तुलित है, क्योंकि देश की अधिकतर जनसंख्या व पूंजी कृषि में लगी हुई है। कृषि में अनिश्चितता है। औद्योगीकरण से अर्थव्यवस्था सन्तुलित होगी तथा कृषि की अनिश्चितता कम हो जाएगी।

PSEB 10th Class SST Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

(9)

“कुटीर उद्योग वह उद्योग हैं जो पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से परिवार के सदस्यों की सहायता से एक पूर्णकालीन या अंशकालीन व्यवसाय के रूप में चलाया जा सकता है।” इस प्रकार के उद्योग, अधिकतर कारीगर अपने घरों में ही चलाते हैं। मशीनों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। ये उद्योग प्रायः स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। इन उद्योगों को परिवारों के सदस्य ही चलाते हैं। मज़दूरी पर लगाए गए श्रमिकों का प्रयोग बहुत कम होता है। इनमें पूंजी बहुत कम लगती है। इन उद्योगों के अधिकतर गाँवों में स्थित होने से उन्हें ग्रामीण उद्योग भी कहा जाता है।
(a) कुटीर व लघु उद्योगों में क्या अन्तर है?
(b) कुटीर उद्योगों की समस्याएं क्या होती हैं?
उत्तर-
(a)

  1. कुटीर उद्योग प्रायः गाँवों में होते हैं जबकि लघु उद्योग अधिकतर शहरों में होते हैं।
  2. कुटीर उद्योग सामान्यत: स्थानीय माँग की पूर्ति करते हैं जबकि लघु उद्योग शहरी एवं अर्द्ध शहरी क्षेत्रों के लिए माल पैदा करते हैं। अत: उत्पादन का बाजार विस्तृत होता है।
  3. कुटीर उद्योग में परिवार के व्यक्ति ही काम करते हैं जबकि लघु उद्योग में भाड़े के श्रमिकों से काम लिया जाता है।
  4. कुटीर उद्योगों में सामान्य औज़ारों से उत्पादन होता है तथा पूंजी बहुत कम खर्च होती है जबकि लघु उद्योग शक्ति से चलते हैं तथा नियोजित पूंजी भी अधिक खर्च होती है।
  5. कुटीर उद्योग में परम्परागत वस्तुओं का उत्पादन जैसे चटाई, जूते आदि बनाए जाते हैं जबकि लघु उद्योग में आधुनिक वस्तुओं जैसे-रेडियो, टेलीविज़न और इलैक्ट्रॉनिक सामान आदि का उत्पादन किया जाता है।

(b)

  1. कच्चे माल तथा शक्ति की समस्या (Problem of Raw Material and Power) — इन उद्योग धन्धों को कच्चा माल उचित मात्रा में नहीं मिल पाता तथा जो माल मिलता है उसकी किस्म बहुत घटिया होती है और उसका मूल्य भी बहुत अधिक देना पड़ता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है। इन उद्योगों को बिजली तथा कोयले की कमी रहती है।
  2. वित्त की समस्या (Problem of Finance) — भारत में इन उद्योगों को ऋण उचित मात्रा में नहीं मिल पाता है। उन्हें वित्त के लिए साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ता है जो ब्याज की ऊँची दर लेते हैं।
  3. बिक्री सम्बन्धी कठिनाई (Problems of Marketing) — इन उद्योगों को अपनामाल उचित मूल्य एवं मात्रा में बेचने के लिए काफी कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं। जैसे इन उद्योगों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की बाहरी दिखावट अच्छी नहीं होती है।
  4. उत्पादन के पुराने तरीके (Old Methods of Production) — इन उद्योगों में अधिकतर उत्पादन के पुराने ढंग भी अपनाए जाते हैं। पुराने औज़ार जैसे-तेल निकालने की हानियाँ अथवा कपड़ा बुनने के लिए हथकरघा ही प्रयोग में लाया जाता है। इसके फलस्वरूप उत्पादन की मात्रा में कमी होती है तथा वस्तु घटिया किस्म की तैयार होती है। इन वस्तुओं की बाजार में मांग कम हो जाती है।

PSEB 10th Class SST Solutions Economics उद्धरण संबंधी प्रश्न

(10)

भारत के आर्थिक विकास में बड़े पैमाने के उद्योगों का बहुत महत्त्व है। उद्योगों में निवेश की गई स्थायी पूँजी का अधिकतर भाग बड़े उद्योगों में ही निवेश किया गया है। देश के औद्योगिक उत्पादन का बड़ा भाग इन्हीं उद्योगों से प्राप्त होता है।
(a) बड़े उद्योगों का वर्गीकरण कीजिए।
(b) बड़े उद्योगों का देश के औद्योगिकीकरण में महत्त्व बताएं।
उत्तर-
(a)

  1. आधारभूत उद्योग (Basic Industries) — आधारभूत उद्योग वे उद्योग हैं, जो कृषि तथा उद्योगों को आवश्यक इन्पुट्स प्रदान करते हैं। इनके उदाहरण हैं-स्टील, लोहा, कोयला, उर्वरक तथा बिजली।।
  2. पूंजीगत वस्तु उद्योग (Capital Goods Industries) — पूंजीगत उद्योग वे उद्योग हैं जो कृषि तथा उद्योग के लिए मशीनरी और यन्त्रों का उत्पादन करते हैं। इनमें मशीनें, मशीनी औजार, ट्रैक्टर, ट्रक आदि शामिल किए जाते हैं।
  3. मध्यवर्ती वस्तु उद्योग (Intermediate Goods Industries) — मध्यवर्ती वस्तु उद्योग वे उद्योग हैं जो उन वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जिनका दूसरी वस्तु के उत्पादन के लिए प्रयोग किया जाता है। इनके उदाहरण हैं टायर्स, मोबिल ऑयल आदि।
  4. उपभोक्ता वस्तु उद्योग (Consumer Goods Industries) — उपभोक्ता वस्तु उद्योग वे उद्योग हैं जो उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन, करते हैं। इनमें शामिल हैं चीनी, कपड़ा, कागज़ उद्योग आदि।

(b)

  1. पूंजीगत तथा आधारभूत वस्तुओं का उत्पादन (Production of Capitalistic and Basic Goods) — देश के औद्योगिकीकरण के लिए पूंजीगत वस्तुओं जैसे मशीनों, यन्त्रों तथा आधारभूत वस्तुओं जैसे इस्पात, लोहे, रासायनिक पदार्थों आदि का बहुत अधिक महत्त्व है। इन पूंजीगत तथा आधारभूत वस्तुओं का उत्पादन बड़े उद्योगों द्वारा ही सम्भव है।
  2. आर्थिक आधारित संरचना (Economic Infrastructure) — औद्योगिकीकरण के लिए आर्थिक संरचना अर्थात् यातायात के साधन, बिजली, संचार व्यवस्था आदि की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। यातायात के साधनों जैसे रेलवे के इन्जनों तथा डिब्बों, ट्रकों, मोटरों, जहाजों आदि का उत्पादन बड़े पैमाने के उद्योगों द्वारा ही किया जा सकता है।
  3. अनुसन्धान तथा उच्च तकनीक (Research and High Techniques) — किसी देश के औद्योगिकीकरण के लिए अनुसन्धान तथा उच्च तकनीक का बहुत महत्त्व है। इनके लिए बहुत अधिक मात्रा में धन तथा योग्य अनुसन्धानकर्ताओं की आवश्यकता होती है। बड़े पैमाने के उद्योग ही अनुसन्धान तथा योग्य अनुसन्धानकर्ताओं के लिए आवश्यक धन का प्रबन्ध कर सकते हैं।
  4. उत्पादकता में वृद्धि (Increase in Productivity) — बड़े पैमाने के उद्योगों में निवेश बहुत मात्रा में होने के कारण प्रति इकाई पूंजी बहुत अधिक होती है। इससे प्रति इकाई उत्पादकता में भारी वृद्धि होती है।

PSEB 7th Class Home Science Practical सादा बुनाई

Punjab State Board PSEB 7th Class Home Science Book Solutions Practical सादा बुनाई Notes.

PSEB 7th Class Home Science Practical सादा बुनाई

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
घर पर बुनाई करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर-
वस्त्र अधिक सुन्दर, मज़बूत व कम कीमत पर बनते हैं।

प्रश्न 2.
फंदों के खिंचाव में किस बात का महत्त्व है?
उत्तर-
फंदों के खिंचाव में सलाई के नम्बर का बहुत महत्त्व है।

प्रश्न 3.
बुनाई में सबसे पहला कार्य क्या होता है ?
उत्तर-
फंदे डालना।

PSEB 7th Class Home Science Practical सादा बुनाई

प्रश्न 4.
बुनाई करते समय ऊन को अधिक कसकर पकड़ने से क्या हानि होती
उत्तर-
बुनाई कस जाती है तथा ऊन की स्वाभाविकता नष्ट हो जाती है।

प्रश्न 5.
फंदे कितने प्रकार से डाले जाते हैं?
उत्तर-
फंदे दो प्रकार से डाले जाते हैं-

  1. एक सलाई द्वारा हाथ की सहायता से तथा
  2. दो सलाई द्वारा।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
सादी बुनाई की विधि बताइए।
उत्तर-
पहले सलाई पर आवश्यकतानुसार फंदे डाल लेने चाहिएं। पहली पंक्ति में सव फंदे सीधी बुनाई के बुनने चाहिएं। दूसरी पंक्ति में पहला फंदा सीधा फिर सब उल्टे और आखिरी फंटा फिर सीधा बुनना चाहिए। इसी तरह जितना चौड़ा बुनना हो उतना इन्हीं दो तरह की पंक्ति को बार-बार बुनकर बना सादी बुनाई लेना चाहिए।
PSEB 7th Class Home Science Practical सादा बुनाई 1
चित्र 7.1.1.

PSEB 7th Class Home Science Practical सादा बुनाई

प्रश्न 2.
मोतीदाने या साबूदाने की बुनाई की विधि बताएं।
उत्तर-
आवश्यकतानुसार फंदे सलाई पर डाल लेने के बाद पहली पंक्ति (सलाई) में एक सीधा, एक उल्टा, एक सीधा, एक उल्टा बुनते हुए इसी प्रकार सलाई बुन डालो।

दूसरी पंक्ति में जो फंदा उल्टा हो, उस पर सीधा व सीधे पर उल्टा फंदा बुनना चाहिए। इस प्रकार दूसरी पंक्ति सीधे से शुरू न होकर एक उल्टा दो सीधे के क्रम से बुनी जाएगी। इस बुनाई को धनिए या छोटी गांठ की बुनाई भी कहते हैं।

बड़े उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
बुनाई करते समय कौन-कौन सी सावधानियां बरतनी चाहिएं?
उत्तर-
बुनाई करते समय निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिएं

  1. फंदों के खिंचाव में सलाई के नम्बर का बहुत बड़ा हाथ होता है, इसलिए सदैव ठीक नम्बर की सलाइयों का प्रयोग करना चाहिए।
  2. मोटी ऊन के लिए मोटी सलाइयों तथा बारीक ऊन के लिए पतली सलाइयों का प्रयोग करना चाहिए।
  3. हाथ गीले न हों तथा फुर्ती और सफ़ाई के साथ चलाने चाहिएं।
  4. ऊन को इस प्रकार पकड़ना चाहिए कि हर जगह खिंचाव एक-सा रहे। यदि ऊन का खिंचाव अधिक रखा जाएगा तो कपड़े का स्वाभाविक लचीलापन कुछ सीमा तक समाप्त हो जाएगा।
  5. पंक्ति अधूरी छोड़कर बुनाई बन्द नहीं करनी चाहिए।
  6. जोड़ किसी पंक्ति के सिरे पर ही लगाना चाहिए, बीच में नहीं।
  7. वस्त्रों को नाम के अनुसार ही बुनना चाहिए। आस्तीनों व अगले पिछले भाग की लम्बाई मिलाने के लिए पंक्तियाँ ही गिननी चाहिएं।
  8. वस्त्र की सिलाई सावधानीपूर्वक करनी चाहिए।

PSEB 7th Class Home Science Practical सादा बुनाई

प्रश्न 2.
फंदे कितने प्रकार के डाले जा सकते हैं ? विधिपूर्वक लिखो।
उत्तर-
फंदे दो प्रकार से डाले जा सकते हैं

  1. सलाई की सहायता से,
  2. हाथ से।

1. सलाई की सहायता से (दो सलाई के फंदे)-ऊन के सिरे के पास एक लूप (सरफंदा) बनाकर सलाई पर चढ़ा लो। इस सलाई को बाएँ हाथ में पकड़ो। दूसरी सलाई व गोले की तरफ की ऊन दाहिने हाथ में लेकर दाहिनी तरफ की ऊन इस नोंक पर लपेटो और उसको फंदे से बाहर निकालो तो दाहिनी सलाई पर भी एक फंदा बन जाएगा। इस फंदे को बाईं सलाई पर चढ़ा लो। इसी प्रकार जितने फंदे डालने की ज़रूरत हो, डाले जा सकते हैं।
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चित्र 7.1.2. दो सलाई की सहायता से फंदे डालना

2. हाथ से (एक सलाई द्वारा फंदे डालना)-जितने फंदे डालने हों उनके काफ़ी ऊन सिरे से लेकर छोड़ देनी चाहिए। बाएँ हाथ के अंगूठे व पहली उंगली के बीच में सिरा नीचे छोड़ कर ऊन पकड़ो, फिर दाहिने हाथ से ऊन बाएँ हाथ की दो उंगलियों पर लपेटकर फिर अंगूठा व पहली उंगली के बीच लगाकर पहले धागे के ऊपर से लेकर पीछे छोड़ दो। इससे धागे की एक अंगूठी-सी बन जाएगी।
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चित्र 7.1.3. एक सलाई द्वारा फंदे डालना।
इस धागे की अंगूठी के अन्दर से एक सलाई डालो और पीछे हुए धागे की गोलाई में से निकाल लो। इसके बाद हल्के हाथ से दोनों ओर के धागे को खींचकर सलाई पर फंदा जमा लो। सलाई और ऊन (गोले की ओर का) दाहिने हाथ में पकड़ने चाहिएं। बाएँ हाथ से खाली सिरा पकड़ना चाहिए। इस सिरे को अंगूठे पर लपेटकर फंदा-सा बना लो। इस फंदे के नीचे से सलाई की नोक अन्दर डालो। अब दाहिने हाथ से ऊन सलाई के पीछे से सामने को ले जाओ। इस धागे को बाएँ अंगूठे से अन्दर से बाहर निकालो और बाएँ हाथ से धीरे से खींचकर धागा कस देना चाहिए। इसी प्रकार जितने फंदे डालने हों सलाई पर जमा देने चाहिएं।

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प्रश्न 3.
सीधे और उल्टे फंदे बुनने की विधि बताइएं।
उत्तर-
सीधे फन्दे बुनना (सीधी बुनाई)-सीधी बुनाई के किनारे बहुत ही साफ़ व टिकाऊ बनते हैं। सीधा बुनने के लिए आवश्यकतानुसार फंदे डालो।
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चित्र 7.1.4. सीधी बुनाई
पहली पंक्ति-फंदे वाली सलाई बाएँ हाथ में लो। दाहिनी सलाई पहले फंदे में । बाईं ओर से दाहिनी ओर डालो। इसकी नोंक पर ऊन का धागा चढ़ाओ और इसे उस फंदे में से निकाल लो। इस फंदे को दाहिनी ही सलाई पर रहने दो और बाईं सलाई के उस फंदे को जिसमें से इसको निकाला था, सलाई पर से नीचे गिरा लो। इसी प्रकार हर फंदे में से बुनते जाना चाहिए। जब बाईं सलाई से सब फंदे बुनकर दाहिनी सलाई पर आ जाएँ, तब खाली सलाई को दाहिने हाथ में बदलकर उसी प्रकार आगे की पंक्ति बुनी जाएगी, जैसे पहली पंक्ति में बुनी गई थी। पहली पंक्ति के बाद हर पंक्ति में पहला फंदा बिना बुना ही उतार लेने से बुनाई में किनारों पर सलाई आती है।
उल्टे फंदे बुनना (उल्टी बुनाई)-उल्टी बुनाई के लिए भी पहले अपनी आवश्यकतानुसार फंदे डाल लेने चाहिएं।
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चित्र 7.1.5. उल्टी बुनाई
पहली पंक्ति-ऊन सामने लाकर दाहिनी सलाई पहले फंदे में दाहिनी ओर से बाईं ओर को डालो। उस पर से ऊन एक बार लपेट कर फंदे में से निकाल लो। इसी प्रकार सब फंदों की बुनाई की जाएगी। पहली हर पंक्ति उल्टी ही बुनी जाए तो वैसा ही नमूना बनेगा जैसा कि हर पंक्ति को सीधी बुनाई से बुनने पर बनना है। सीधे ओर उल्टे फंदे मिलाकर बुनने से बहुत सुन्दर नमूने बन सकते हैं।