PSEB 8th Class Home Science Practical ऊनी कपड़ों को धोना और दाग उतारना

Punjab State Board PSEB 8th Class Home Science Book Solutions Practical ऊनी कपड़ों को धोना और दाग उतारना Notes.

PSEB 8th Class Home Science Practical ऊनी कपड़ों को धोना और दाग उतारना

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऊनी वस्त्रों की धुलाई के लिए किस प्रकार के जल का प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर-
मृदु जल का।

प्रश्न 2.
ऊनी वस्त्रों की धुलाई में कौन-से घोल अधिक प्रचलित हैं?
उत्तर-
पोटैशियम परमैंगनेट, सोडियम परऑक्साइड तथा हाइड्रोजन ऑक्साइड के हल्के घोल।

प्रश्न 3.
ऊनी कपड़ों को फुलाने की आवश्यकता क्यों नहीं होती?
उत्तर-
क्योंकि पानी में डुबाने से रेशे निर्बल हो जाते हैं।

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प्रश्न 4.
ऊनी वस्त्रों को धोते समय रगड़ना-कूटना क्यों नहीं चाहिए?
उत्तर-
रगड़ने से रेशे नष्ट हो जाते हैं तथा आपस में फँसते हुए जम जाते हैं।

प्रश्न 5.
वस्त्रों को पानी में आखिरी बार खंगालने से पहले पानी में थोड़ी-सी नील क्यों डाल देनी चाहिए?
उत्तर-
वस्त्रों को पानी में आखिरी बार खंगालने से पहले पानी में थोड़ी-सी नील इसलिए डाल देनी चाहिए जिससे कपड़ों में चमक आ जाए।

प्रश्न 6.
ऊनी वस्त्रों को धूप में क्यों नहीं सुखाना चाहिए?
उत्तर-
क्योंकि तेज़ धूप के प्रकाश के ताप से ऊन की रचना बिगड़ जाती है।

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प्रश्न 7.
ऊनी कपड़ों की धुलाई के लिए तापमान की दृष्टि से किस प्रकार के पानी का प्रयोग किया जाना चाहिए?
उत्तर-
ऊनी कपड़ों की धुलाई के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग करना चाहिए। धोते समय पानी का तापमान एक-सा होना चाहिए।

प्रश्न 8.
धोने के बाद ऊनी कपड़ों को किस प्रकार सुखाना चाहिए?
उत्तर-
धोने से पूर्व बनाए गए खाके पर कपड़ों को रखकर उसका आकार ठीक करके छाया में उल्टा करके, समतल स्थान पर सुखाना चाहिए जहाँ चारों ओर से कपड़े पर हवा लग सके।

प्रश्न 9.
ऊनी कपड़े को धोने के बाद हैंगर में लटकाकर क्यों नहीं सुखाया जाता?
उत्तर-
ऊनी कपड़े बहुत पानी चूसते हैं और भारी हो जाते हैं इसलिए अगर कपड़े को हैंगर में सुखाया जाये तो वह नीचे लटक जाता है और उसका आकार खराब हो जाता है।

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प्रश्न 10.
ऊनी कपड़े पर कीड़ों का असर न हो, इसलिए कपड़ों के साथ बक्स या अलमारी में क्या रखा जा सकता है?
उत्तर-
नैप्थलीन की गोलियाँ, पैराडाइक्लोरोबेंजीन का चूरा, तम्बाकू की पत्ती, कपूर, पिसी हुई लौंग, चन्दन का बुरादा, फिटकरी का चूरा या नीम की पत्तियाँ आदि।

प्रश्न 11.
कपड़ों पर दाग-धब्बे क्या होते हैं?
उत्तर-
दाग एक प्रकार के धब्बेदार चिह्न होते हैं जो कपड़ों पर किसी बाहरी पदार्थ के सम्पर्क या संस्पर्श में आ जाने से लग जाते हैं।

प्रश्न 12.
दाग-धब्बों की जानकारी के बारे में कौन-सी बातें महत्त्वपूर्ण हैं ?
उत्तर-

  1. वस्त्र के रेशों के वर्ग, रचना, वयन, रंग तथा परिसजा की जानकारी।
  2. धब्बे का वर्ग, प्रकृति और अवस्था की जानकारी।

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प्रश्न 13.
धब्बे की पहचान का पहला सुराग क्या है?
उत्तर-
रंग प्रायः धब्बे की पहचान का पहला सुराग है।

प्रश्न 14.
दाग-धब्बे छुड़ाने के क्रम में सबसे महत्त्वपूर्ण बात क्या है?
उत्तर-
धब्बे की पहचान करना।

प्रश्न 15.
पसीने के धब्बे को प्राणिज धब्बे के अन्तर्गत क्यों नहीं रखा जाता?
उत्तर-
क्योंकि इनके संगठन में प्रोटीन नहीं होता।

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प्रश्न 16.
कपड़ों पर लगने वाले धब्बे कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
छः प्रकार के-

  1. वानस्पतिक,
  2. प्राणिज,
  3. खनिज,
  4. चिकनाई के,
  5. रंग के,
  6. पसीने, मैल आदि के अन्य धब्बे।

प्रश्न 17.
वानस्पतिक धब्बों में कौन-से धब्बे आते हैं ?
उत्तर-
दूध, अण्डे, मांस, रक्त आदि के धब्बे।

प्रश्न 18.
चिकनाई धब्बों में कौन-से धब्बे आते हैं?
उत्तर-
घी, मक्खन तथा रसेदार सब्जी के धब्बे।

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प्रश्न 19.
खनिज धब्बों के उदाहरण बताओ।
उत्तर-
स्याही, दवाइयों तथा कोलतार के धब्बे।

प्रश्न 20.
वानस्पतिक धब्बे किस प्रकार दूर किए जा सकते हैं ?
उत्तर-
क्षारीय पदार्थों के उपयोग से।

प्रश्न 21.
प्राणिज धब्बों के लिए किस प्रकार के जल का उपयोग करना चाहिए ?
उत्तर-
ठण्डे जल का, क्योंकि गर्म जल से दाग और भी पक्के हो जाते हैं।

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प्रश्न 22.
चिकनाई के धब्बे किस विधि से दूर किए जा सकते हैं ?
उत्तर-
घोलक तथा चूषक विधि द्वारा।

प्रश्न 23.
धब्बों को शीघ्र ही क्यों छुड़ा देना चाहिए ?
उत्तर-
देर करने से वे पक्के हो जाते हैं और दाग कपड़ों को कमज़ोर भी करते हैं।

प्रश्न 24.
नाखून पालिश का धब्बा कैसे छुड़ाया जा सकता है ?
उत्तर-
नाखून पालिश का धब्बा छुड़ाने के लिए एमाइल एसिटेट से धब्बे को स्पंज करें। धब्बा छूटने पर सोडियम हाइड्रोसल्फाइट के विरंजक का प्रयोग करें।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ऊनी बुने हुए स्वेटर की धुलाई आप किस प्रकार करेंगी ?
उत्तर-
ऊनी स्वेटर पर प्रायः बटन लगे रहते हैं। यदि कुछ ऐसे फैन्सी बटन हों जिनको धोने से खराब होने की सम्भावना हो तो उता लेते हैं। यदि स्वेटर कहीं से फटा हो तो सी लेते हैं । अब स्वेटर का खाका तैयार करते हैं। इसके उपरान्त गुनगुने पानी में आवश्यकतानुसार लक्स का चूरा अथवा रीठे का घोल मिलाकर हल्की दबाव विधि से धो लेते हैं। तत्पश्चात् गुनगुने साफ़ पानी में तब तक धोते हैं, जब तक सारा साबुन न निकल जाए। ऊनी वस्त्रों के लिए पानी का तापमान एक-सा रखते हैं तथा ऊनी वस्त्रों को पानी में बहुत देर तक नहीं भिगोना चाहिए वरन् इसके सिकुड़ने का भय हो सकता है। इसके बाद एक रोंएदार (टर्किश) तौलिये में रखकर उसको हल्के हाथों से दबाकर पानी निकाल लेते हैं। फिर खाके पर रखकर किसी समतल स्थान पर छाया में सुखा लेते हैं।
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चित्र 3.1 ऊनी वस्त्र का खाका बनाना

प्रश्न 2.
ऊनी स्वेटर को आप कैसे सुखाओगे ?
उत्तर-
ऊनी स्वेटर को सुखाने के लिए खाके वाले कागज़ को खाट पर बिछाते हैं और उस पर स्वेटर रखते हैं। हाथों से थोड़ा-थोड़ा खींचकर उसका आकार ठीक करते हैं। स्वेटर को गर्म जगह पर लेकिन छाया में जहां हवा चलती हो रखकर सुखाते हैं। जब आधा सूख जाए तो उसको उलट देते हैं ताकि दोनों तरफ से अच्छी तरह सूख जाए।

प्रश्न 3.
ऊनी बुनी हुई जुराबों की धुलाई आप कैसे करेंगे ?
उत्तर-
ऊनी बुनी हुई जुराबों की धुलाई हम निम्नलिखित प्रकार से करेंगे-

  1. जुराबों को अच्छी तरह झाड़ना चाहिए। अगर उन पर कीचड़ लगा हो तो पहले सुखा लेना चाहिए और फिर ब्रुश से झाड़ना चाहिए।
  2. साबुन वाले गुनगुने पानी में धोना चाहिए। एड़ी और पंजे की तरफ खास ध्यान देना चाहिए। अगर ज़रूरत हो तो प्लास्टिक का ब्रुश इस्तेमाल करना चाहिए।
  3. ऊनी जुराब धोने के बाद 2-3 बार साफ गुनगुने पानी में खंगालना चाहिए।
  4. गहरी, नीली और काली जुराबों को अगर नील लगाया जाए तो इनके रंगों में चमक आ जाती है।
  5. जुराबों को तौलिए में रखकर निचोड़ना चाहिए।
  6. खाट या मूढ़े के ऊपर सीधा डालकर सुखाना चाहिए।
  7. इस पर प्रैस की ज़रूरत नहीं पड़ती है।

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प्रश्न 4.
वस्त्रों पर लगे घी, तेल, मक्खन या ग्रीज के धब्बे किस प्रकार छुड़ाएंगी?
उत्तर-

  1. घी, तेल, मक्खन तथा ग्रीज आदि चिकनाई के धब्बे, धोने वाले वस्त्रों पर से गर्म पानी और साबुन के घोल में डालकर छुड़ाये जा सकते हैं। जिन वस्त्रों को धोना नहीं है उन पर फ्रेंच चॉक (अवशोषक पदार्थ) रखकर, कुछ देर छोड़कर ब्रुश से झाड़ दें। इसे तब तक दोहराएँ जब तक कि चिकनाई का धब्बा पूरी तरह से दूर न हो जाए।
  2. चिकनाई के धब्बे के दोनों ओर ब्लॉटिंग पेपर रखकर खूब गर्म इस्तरी से कसकर दबाने से भी यह धब्बा दूर किया जा सकता है।
  3. चिकनाई के धब्बे छुड़ाने के लिए घोलक पदार्थ, जैसे पेट्रोल आदि का भी प्रयोग किया जा सकता है। इससे वस्त्र पानी के.सम्पर्क से बच जाता है।

प्रश्न 5.
स्याही के धब्बे किस प्रकार छुड़ाये जा सकते हैं ?
उत्तर-

  1. स्याही लगे वस्त्र के भाग को प्लेट में रख लें। इस पर नमक की एक परत बिछा दें। इस पर नींबू का रस निचोड़ कर धूप में रख दें। इसे बराबर नींबू के रस से तर रखना चाहिए। कभी-कभी नमक भी बदल देना चाहिए। दाग के हट जाने पर भी पानी से धो दें।
  2. स्याही के धब्बे हटाने के लिए वस्त्र को दही में भी भिगोया जाता है।
  3. सफेद सूती वस्त्र पर से धब्बे हटाने के लिए ब्लीचिंग पाऊडर के घोल का भी प्रयोग किया जा सकता है।
  4. इंक रिमूवर से भी इन्हें छुड़ाया जा सकता है।
  5. कच्चे दूध से भी स्याही का दाग छूट जाता है।

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प्रश्न 6.
वस्त्रों पर लगे रक्त के धब्बे कैसे छुड़ाए जा सकते हैं ?
उत्तर-

  1. रक्त के धब्बे ठण्डे पानी तथा साबुन से धोने पर छूट जाते हैं। जिन वस्त्रों को धोना नहीं है, उन पर स्टार्च के पेस्ट को फैलाकर, सुखाकर तथा ब्रुश से झाड़कर रक्त के धब्बे को छुड़ाया जा सकता है।
  2. अमोनिया से भी रक्त के धब्बे छूट जाते हैं। गुनगुने पानी में कुछ बूंदें अमोनिया की डालकर उसमें दाग को डुबो देना चाहिए, फिर साबुन के पानी से धो डालना चाहिए।

प्रश्न 7.
आप किसी वस्त्र पर लगा घास का धब्बा कैसे छुड़ाएँगी ?
उत्तर-
धोने वाले वस्त्रों पर से ,घास के धब्बे केवल साबुन के पानी से ही छूट जाते हैं। किरोसिन तेल में अथवा एल्कोहल में भी फुला देने से धब्बा दूर हो जाता है। मेथिलेटिड स्पिरिट का प्रयोग न धोये जा सकने वाले वस्त्रों पर से घास के धब्बे छुड़ाने के लिए किया जाता है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धब्बे छुड़ाने की सामग्री के रख-रखाव में सतर्कता सम्बन्धी सुझाव बताइए।
उत्तर-
धब्बे छुड़ाने की सामग्री के रख-रखाव में सतर्कता सम्बन्धी कुछ सुझाव निम्नलिखित प्रकार हैं

  1. धब्बे छुड़ाने वाले उत्पादों को बच्चों की पहुँच से ऊपर रखना चाहिए। यह स्थान खाद्य पदार्थों के स्थान से अलग होना चाहिए।
  2. बोतलों में कसकर ढक्कन लगा होना चाहिए तथा डिब्बों को बंद रखना चाहिए।
  3. इनके डिब्बों पर लिखे निर्देशों का पालन करना चाहिए। सभी चेतावनियों पर ध्यान देना चाहिए।
  4. धब्बे छुड़ाने वाली सामग्री के प्रयोग के लिए प्लास्टिक और धातु की अपेक्षा पोर्सलीन के आधार पात्र अधिक अच्छे लगते हैं। घोलकों के लिए तो प्लास्टिक के बर्तनों का कभी भी प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  5. धब्बे छुड़ाने के प्रक्रम में अपने हाथों की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए। रबर के दस्ताने पहनने चाहिएँ। इस बीच आँख और त्वचा को नहीं छूना चाहिए।
  6. घोलकों की वाष्प विषाक्त होती है अतः इनका प्रयोग अच्छी तरह से हवादार स्थान में करना चाहिए।
  7. अग्नि के समीप कभी भी रसायनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  8. रसायनों का प्रयोग करते समय धूमपान नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 2.
दाग-धब्बे छुड़ाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
दाग-धब्बे किस प्रकार छुड़ाये जाते हैं, यह जानते हुए भी दाग-धब्बे छुड़ाते समय कुछ महत्त्वपूर्ण बातें जान लेनी चाहिए जो निम्नलिखित हैं-

  1. धब्बा तुरन्त छुड़ाया जाना चाहिए। इसके लिए धोबी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए क्योंकि तब तक ये दाग-धब्बे और अधिक पक्के हो जाते हैं।
  2. दाग-धब्बे छुड़ाने में रासायनिक पदार्थों का कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।
  3. घोल को वस्त्र पर उतनी देर तक ही रखना चाहिए जितनी देर तक धब्बा फीका न पड़ जाये, अधिक देर तक रखने से वस्त्र कमज़ोर पड़ जाते हैं।
  4. चिकनाई को दूर करने से पूर्व उस स्थान के नीचे किसी सोखने वाले पदार्थ की मोटी तह रखनी चाहिए। धब्बे को दूर करते समय रगड़ने के लिए साफ़ और नरम पुराने रूमाल का प्रयोग किया जा सकता है।
  5. धब्बे उतारने का काम खुली हवा में करना चाहिए ताकि धब्बा उतारने के लिए प्रयोग किए जाने वाले रसायनों की वाष्प के दुष्प्रभाव से बचा जा सके।
  6. दाग किस प्रकार का है, जब तक इसका ज्ञान न हो तब तक गर्म जल का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि गर्म जल में धब्बे और अधिक पक्के हो जाते हैं।
  7. किसी अनजाने धब्बे पर प्रेस नहीं करना चाहिए। इससे स्याही या रंग के धब्बे और भी पक्के हो जाते हैं।
  8. जंग या फलों के धब्बे साबुन या क्षार के प्रयोग से और अधिक दिखाई देने लगते हैं।
  9. रंगीन वस्त्रों पर से धब्बे छुड़ाते समय कपड़े के कोने को जल में डुबोकर देखना चाहिए कि रंग कच्चा है अथवा पक्का।
  10. लिपस्टिक के धब्बे साबुन व क्षार के प्रयोग से और भी पक्के हो जाते हैं।
  11. धब्बा छुड़ाने की विधियों का ज्ञान अवश्य होना चाहिए क्योंकि विभिन्न वस्तुओं
    का प्रयोग अलग-अलग धब्बों को छुड़ाने हेतु किया जाता है।
  12. ऊनी वस्त्रों पर से धब्बे छुड़ाते समय न तो गर्म जल का प्रयोग करना चाहिए. और न ही क्लोरीन-युक्त रासायनिक पदार्थ का। इससे धब्बे और भी पक्के हो जाते हैं।
  13. एल्कोहल, स्प्रिट, बैन्जीन, पेट्रोल आदि से दाग छुड़ाते समय आग से बचाव रखना चाहिए।
  14. धातु के धब्बे पर ब्लीच का प्रयोग करने से तन्तु कमज़ोर पड़ जाते हैं।

PSEB 8th Class Home Science Practical ऊनी कपड़ों को धोना और दाग उतारना

ऊनी कपड़ों को धोना और दाग उतारना PSEB 8th Class Home Science Notes

  • स्वेटर को गर्म जगह पर लेकिन छाया में जहाँ हवा चलती हो रखकर सुखाना चाहिए।
  • गहरी, नीली और काली जुराबों को अगर नील लगाया जाए तो इनके रंगों में चमक आ जाती है।
  • सभी प्रकार के ताजे दाग आसानी से उतारे जाते हैं।
  • अगर दाग की किस्म का पता न हो तो दाग लगने वाले हिस्से को दाग के विशेष प्रतिकारक से साफ़ करना चाहिए।
  • रंगकाट का इस्तेमाल रंगदार कपड़ों पर तब तक नहीं करना चाहिए जब तक सारे कपड़े से रंग न उतारना हो।
  • गर दाग तेजाब से उतारे जाएं तो बाद में हल्के क्षार में और अगर क्षार से उतारे जाएं तो हल्के तेजाब में खंगालना चाहिए।
  • सूती और लिनन के कपड़ों पर से दाग उतारने के लिए कटे हुए नींबू को दाग वाले हिस्से पर रगड़ना चाहिए और फिर उस पर नमक रगड़ना चाहिए।
  • पुराने.दाग उतारने के लिए पहले पैट्रोल या बेन्जीन के साथ साफ़ करना चाहिए और फिर साबुन वाले पानी के साथ धोना चाहिए।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 6 वायुमण्डल-बनावट और रचना

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 6 वायुमण्डल-बनावट और रचना Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 6 वायुमण्डल-बनावट और रचना

PSEB 11th Class Geography Guide वायुमण्डल-बनावट और रचना Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक या दो शब्दों में दीजिए-

प्रश्न (क)
धरती के इर्द-गिर्द लिप्त हवा के गिलाफ का क्या नाम है ?
उत्तर-
वायुमंडल।

प्रश्न (ख)
थर्मामीटर की खोज किस वैज्ञानिक ने, कब की थी ?
उत्तर-
गैलीलियो ने 1593 में।

प्रश्न (ग)
सूर्य से आ रही UV किरणों का नाम क्या है ?
उत्तर-
अल्ट्रा वायलेट किरणें।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 6 वायुमण्डल-बनावट और रचना

प्रश्न (घ)
वायुमंडलीय गैसों में सबसे अधिक मात्रा किस गैस की है ?
उत्तर-
नाइट्रोजन 78.03%.

प्रश्न (ङ)
वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन-डाई-ऑक्साइड दोनों का मिलकर कितने प्रतिशत हिस्सा है ?
उत्तर-
20.95 + 0.03 = 20.98%.

प्रश्न (च)
जलवाष्प धरती से कितनी दूरी तक वायुमंडल में मिलते हैं ?
उत्तर-
5 किलोमीटर की ऊँचाई तक।

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प्रश्न (छ)
समताप मंडल की ऊँचाई कहाँ से कहाँ तक होती है ?
उत्तर-
16 किलोमीटर से 50 किलोमीटर तक।

प्रश्न (ज)
गैसीय और तरल पदार्थों के ताप-स्थानांतरण विधि का क्या नाम है ?
उत्तर-
वाष्पीकरण।

प्रश्न (झ)
सूर्य-सतह का तापमान कितने डिग्री सैल्सियस है ?
उत्तर-
10,180° F.

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प्रश्न (ज)
10. Green House का प्रभाव कायम रखने के लिए कौन-सी गैस सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है ?
उत्तर-
कार्बन-डाई-ऑक्साइड।

2. प्रश्नों के उत्तर एक या दो वाक्यों में दो :

प्रश्न (क)
वायुमंडलीय गैसीय मिश्रण की दो क्षीण विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर-
गैसीय मिश्रण रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन है। यह अदृश्य भी है।

प्रश्न (ख)
वायुमंडलीय आंकड़े भेजने वाले दो उपग्रहों के नाम लिखें।
उत्तर-
TIROS और GOES नामक उपग्रह।

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प्रश्न (ग)
ऑक्सीजन मानवीय शरीर में किस स्रोत पर कार्य करती है ?
उत्तर-
ऊर्जा का स्रोत।

प्रश्न (घ)
जलवाष्प किन रूपों में धरती पर बरसते हैं ?
उत्तर-
वर्षा, ओले, बर्फबारी, ओस आदि।

प्रश्न (ङ)
वायुमंडल में मौसम से संबंधित कौन-सी दो क्रियाएँ होती हैं ?
उत्तर-
वाष्पीकरण और संघनन।

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प्रश्न (च)
टरोपोपॉज़ (Tropopause) वायुमंडल की किन परतों के मध्य स्थित होता है ?
उत्तर-
परिवर्तन मंडल और समताप मंडल।

प्रश्न (छ)
पराबैंगनी किरणों की ज्यादा मात्रा से मनुष्य को कौन-से रोग हो सकते हैं ?
उत्तर-
पराबैंगनी किरणें मनुष्य को अंधा कर देती हैं और चमड़ी के रोग लग जाते हैं।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 60 से 80 शब्दों में दें:

प्रश्न (क)
धरती से छोड़ा एक गुब्बारा जो 700 किलोमीटर ऊपर चला जाए, तो वह वायुमंडल की परतों को किस क्रम में पार करेगा ?
उत्तर-

  1. परिवर्तन मंडल – 16 कि०मी० तक
  2. समताप मंडल – 50 कि०मी० तक
  3. मध्य मंडल – 80 कि०मी० तक
  4. आयन मंडल – 640 कि०मी० तक
  5. बाहरी मंडल — 640 कि.मी. से आगे।

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प्रश्न (ख)
परिवर्तन मंडल का अंग्रेजी नाम Troposphere रखने संबंधी संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-
यूनानी भाषा से लिए गए शब्द Tropos का अर्थ है-परिवर्तन या हलचल या मिक्सिंग। इस मंडल में मौसमीय परिवर्तन मिलते हैं।

प्रश्न (ग)
Ozone की परत की आवश्यकता और उस पर हो रहे नुकसान की चर्चा करें।
उत्तर-
ओज़ोन गैस की परत मानवीय जीवन के लिए ज़रूरी है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों को सोख लेती है और धरती को पराबैंगनी किरणों से बचाती है। वायुमंडल में ओजोन गैस की परत कम हो रही है, इसीलिए धरती का तापमान बढ़ रहा है और हिम-खंड पिघल रहे हैं और समुद्र-तल ऊँचा हो रहा है।

प्रश्न (घ)
वायुमंडल का विभाजन रासायनिक रचना के आधार पर करें।
उत्तर-
वायुमंडल में गैसें, जलवाष्प, धूलकण आदि शामिल होते हैं। नाइट्रोजन (78.03%) सबसे अधिक होता है, ऑक्सीजन (20.95%), कार्बनडाईऑक्साइड (0.03%) और जलवाष्प (2%) होते हैं।

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प्रश्न (ङ)
सूर्य-तापन (Insolation) क्या है ? एक नोट लिखें।
उत्तर-
धरती से प्राप्त होने वाले सूर्य-विकिरण को सूर्य-तापन कहते हैं। सूर्य धरती और वायुमंडल के लिए ऊर्जा का प्रमुख साधन है। सूर्य-ताप का केवल 1/2 करोड़वां हिस्सा ही धरती पर पहुँचता है। यह ताप केवल 1.94 कैलोरी . प्रति सैंटीमीटर प्रति मिनट है। इस ऊर्जा का केवल 51 प्रतिशत भाग धरती पर पहुँचता है और धरातल को गर्म करता है।

प्रश्न (च)
भूमध्य रेखीय कम वायुदाब पेटी की उत्पत्ति के तीन बिंदु लिखें।
उत्तर-

  1. उच्च तापमान
  2. संवहन धाराएँ
  3. दैनिक गति।

प्रश्न (छ)
सम-दाब रेखाएँ क्या होती हैं ? नोट लिखें।
उत्तर-
धरातल पर सम वायु-दाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाओं को सम-दाब रेखाएँ कहते हैं। ये वायु-दाब को समुद्र तल पर कम करके दिखाती हैं।

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4. प्रश्नों का उत्तर 150 से 250 शब्दों में दो-

प्रश्न (क)
वायुदाब पर असर डालने वाले कौन-से कारक होते हैं ? विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर-
वायुमंडल का दबाव (Atmospheric Pressure)
धरती की आकर्षण-शक्ति (Gravity) के कारण हर वस्तु में भार होता है। हवा में भी भार होता है। आमतौर पर एक घन फुट में 1.2 औंस भार होता है।

हवा का दबाव सभी दिशाओं में एक समान होता है। यह एक प्रकार का स्तंभ होता है, जो वायुमंडल की सबसे ऊँची सीमा तक पहुँचता है। समुद्र-तल पर प्रति वर्ग इंच पर वायुमंडल का दबाव 14.7 पौंड या 6.68 किलोग्राम होता है या 1.03 किलोग्राम प्रति वर्ग सैंटीमीटर होता है। वायुमंडल का औसत या साधारण दबाव (Normal Pressure) 45° अक्षांश और समुद्र तल पर 29.92 इंच या 76 सैंटीमीटर या 1013.2 मिलीबार होता है।

तत्त्व (Factors) अनेक स्थानों पर समान दशाओं के कारण वायु दबाव समान होता है या वायुमंडल में कोई गति नहीं होती, परंतु कई कारणों से समय और स्थान के अनुसार वायु-दबाव बदलता रहता है। वे कारण हैं-

1. तापमान (Temperature)—गर्म होने पर हवा फैलकर हल्की हो जाती है। ठंडी हवा सिकुड़कर भारी हो जाती है। इसलिए यदि तापमान अधिक होगा, तो हवा का दबाव कम होगा। यदि तापमान कम होगा, तो हवा का दबाव अधिक होगा। जैसे कहा जाता है कि, “A rising Thermometer shows a falling Barometer.” यही कारण है कि वायु-दबाव दिन में कम और रात को अधिक होता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 6 वायुमण्डल-बनावट और रचना 1

2. ऊँचाई (Altitude) हवा की ऊपरी सतहों का भार निचली सतहों पर पड़ता है। नीचे की हवा भारी और घनी हो जाती है। समुद्र तल पर अधिक वायु दबाव पड़ता है। ऊपर जाने पर प्रत्येक 300 मीटर की ऊंचाई पर हवा का दबाव 1 इंच या 34 मिलीबार गिर जाता है। अनुमान है कि वायुमंडल का आधा दबाव केवल 5000 मीटर की ऊँचाई तक सीमित होता है।

3. जल-कण (Water vapours)-जल-कण हवा की तुलना में हल्के होते हैं, इसीलिए शुष्क हवा नम हवा की अपेक्षा भारी होती है। यही कारण है कि स्थलीय पवनें (Land winds) शुष्क होने के कारण समुद्री पवनों (Sea winds) की अपेक्षा भारी होती हैं।

4. दैनिक गति (Rotation)-धरती की दैनिक गति के कारण कई स्थानों पर हवा इकट्ठी हो जाती है और दूसरे
स्थानों पर हवा का दबाव कम हो जाता है। 60° अक्षांश पर कम वायु धरती की दैनिक गति के कारण ही होती है।

प्रश्न (ख)
जनवरी और जुलाई के महीनों के ताप-विभाजन की विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर-
तापमान का विश्व-विभाजन (World Distribution of Temperature)-
1. जनवरी की समताप रेखाएँ (January Isotherms) जनवरी का महीना उत्तरी गोलार्द्ध में ठंडा और दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्म होता है। इसका कारण यह है कि इस समय सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर रेखा के निकट लंबवत् होता है, जिसके कारण वहाँ गर्मी की ऋतु और उत्तरी गोलार्द्ध में सर्दी की ऋतु होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल भाग की प्रधानता होती है, इसलिए बहुत-से भाग पर सागरीय प्रभाव नहीं होता, जिसके फलस्वरूप उच्च अक्षांशों में महाद्वीपों के भीतरी भागों में तापमान तेजी से कम हो जाता है। इस समय न्यूनतम तापमान के तीन क्षेत्र साईबेरिया, ग्रीनलैंड और उत्तरी कनाडा में पाए जाते हैं। उत्तर-पूर्वी साईबेरिया में स्थित वोयांस्क (Verkhoyansk) का तापमान -50° सैल्सियस तक गिर जाता है। यह संसार का सबसे अधिक ठंडा स्थान है। फरवरी सन् 1892 में यहाँ तापमान -69° सैल्सियस (Minus 69° Celsius) तक कम हो गया था। गर्म जल-धाराओं के प्रभाव के कारण उत्तर-पश्चिमी यूरोप उत्तरी अमेरिका की तुलना में कम ठंडा है। दक्षिणी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणों के लंबवत पड़ने के कारण सूर्य-ताप की प्राप्ति अधिक होती है, इसीलिए यहाँ तापमान अधिक रहता है। ब्राजील, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में 30° सैल्सियस से अधिक तापमान पाया जाता है।

2. जुलाई की समताप रेखाएँ (July Isotherms)-जुलाई, उत्तरी गोलार्द्ध का अत्यंत गर्म और दक्षिणी गोलार्द्ध का ठंडा महीना होता है। इस समय सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क रेखा के निकट लंबवत् होता है, जिसके कारण वहाँ गर्मी की ऋतु और दक्षिणी गोलार्द्ध में सर्दी की ऋतु होती है।

इस समय उत्तरी गोलार्द्ध के एक बहुत विस्तृत भाग में 30° सैल्सियस से भी अधिक तापमान रहता है। उत्तरी अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के मरुस्थलों और अर्ध शुष्क भूमियों में भी ज़ोरदार गर्मी पड़ती है। पाकिस्तान के जैकबाबाद (Jocobabad) और लीबिया में एल अज़ीज़ीया (El Azizia) संसार के सबसे अधिक गर्म स्थान हैं। एलअज़ीज़ीया में तो 58° सैल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 6 वायुमण्डल-बनावट और रचना

प्रश्न (ग)
धरती पर सूर्य-ताप की गतिशीलता के बारे में चार विधियाँ बताएँ।
उत्तर-
वायुमंडल का गर्म और ठंडा होना (Heating and Cooling of the Atmosphere)-
चाहे वायुमंडल के ताप का स्रोत सूर्य ही है, परंतु यह ताप भू-तल द्वारा ही प्राप्त होता है। वायुमंडल सूर्य की किरणों के लिए पारदर्शी है, जोकि भू-तल पर पहुँचकर उसे गर्म करती हैं। भू-तल का ताप वायुमंडल को प्राप्त होता है। वायुमंडल के गर्म और ठंडा होने के नीचे लिखे ढंग हैं-

1. संचालन (Conduction)—एक अणु दूसरे अणु को स्पर्श द्वारा गर्मी देता है। इस क्रिया को संचालन कहते हैं। दिन के समय सूर्य-ताप द्वारा भू-तल गर्म हो जाता है। जब वायुमंडल की सबसे निचली परत गर्म भू-तल के संपर्क में आती है, तो संचालन द्वारा यह गर्मी ग्रहण कर लेती है। फिर निचली परत ऊपरी परत को गर्मी प्रदान करती है। इस प्रकार वायुमंडल गर्म होने लगता है। रात के समय भू-तल ठंडा हो जाता है और इसके संपर्क में आकर वायु भी ठंडी हो जाती है। तब वह ऊपरी परतों को संचालन द्वारा ठंडक प्रदान करती है। फलस्वरूप वायुमंडल धीरे-धीरे ठंडा होना आरंभ हो जाता है।

2. संवहन (Convection)-दिन के समय जब भू-तल सूर्य-ताप द्वारा गर्म हो जाता है, तो वायुमंडल की निचली तह गर्म भू-तल को स्पर्श करके गर्म हो जाती है। गर्म होकर हवा फैलती है, जिससे इसका आयतन (Volume) बढ़ जाता है और वह हल्की हो जाती है। हल्की वायु ऊपर उठने लगती है। उस खाली स्थान को पूरा करने के लिए आस-पास से ठंडी और भारी हवा आने लगती है। थोड़े समय के बाद वह भी गर्म होकर ऊपर उठने लगती है। इस प्रकार वायु की तरंगें उत्पन्न हो जाती हैं, जिन्हें संवहन धाराएँ (Convectional Currents) कहते हैं। संवहन धाराएँ पूरे वायुमंडल को गर्म कर देती हैं। वायुमंडल के गर्म होने का सबसे बड़ा कारण ये धाराएँ ही हैं।

3. विकिरण (Radiation)-किसी गर्म वस्तु से जब ताप, तरंगों के रूप में प्रसारित होता है, तो उस क्रिया को विकिरण कहा जाता है। सूर्य-ताप द्वारा भू-तल के गर्म हो जाने पर इससे ताप का विकिरण होता है। इस प्रकार विकिरण लंबी तरंगों (Long waves) के रूप में होता है। वायुमंडल की गैसें सूर्य-ऊर्जा से आने वाली लघु और सूक्ष्म तरंगों को अधिक सोख नहीं सकतीं, परंतु भू-तल से उठने वाली लंबी तरंगों का अधिकांश भाग सोख लेती हैं। फलस्वरूप भू-तल की गर्मी से वायुमंडल गर्म होता रहता है। यही कारण है कि जिस दिन बादल होते हैं, उस दिन अधिक गर्मी होती है। मरुस्थलों के बादल रहित वायुमंडल में गर्मी का विकिरण उत्तम ढंग से होता है। शाम के समय और इसके बाद विकिरण के द्वारा भू-तल ठंडा होता रहता है, जिससे वायुमंडल भी अपनी गर्मी छोड़नी आरंभ कर देता है।

4. संपीड़न और समतापन द्वारा गर्म और ठंडा होना (Compression and Adiabatic Heating and Cooling) हवा का भार होता है। इस भार के कारण वायु भू-तल पर दबाव डालती है। इस दबाव के कारण संपीड़न (Compression) उत्पन्न होता है और वायु गर्म हो जाती है। वायुमंडल की ऊपरी परतें अपने दबाव से निचली परतों में संपीड़न उत्पन्न करके उन्हें गर्म कर देती हैं। इस प्रकार वायु के संपीड़न के कारण गर्म होने को समताप तापन (Adiabatic Heating) कहा जाता है। फलस्वरूप संपीड़न के कारण वायु गर्म होने और फैलने के कारण ठंडी हो जाती है।

प्रश्न (घ)
धरती पर तापमान के विभाजन पर कौन-से स्थायी तत्त्व प्रभाव डालते हैं ?
उत्तर
तापमान का क्षैतिजीय विभाजन (Horizontal Distribution of Temperature)-
भू-तल पर अक्षांशों के अनुसार तापमान विभाजन के अध्ययन को तापमान का क्षैतिजीय विभाजन कहकर पुकारा जाता है। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें पूरा वर्ष लंब पड़ती हैं और ध्रुवों पर सदा तिरछी (Oblique) पड़ती हैं। इसके फलस्वरूप भूमध्य रेखीय प्रदेश (Equatorial Region) में सूर्य-ताप (Insolation) सबसे अधिक और ध्रुवीय प्रदेशों में बहुत कम प्राप्त होता है। इस प्रकार भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर सूर्य-ताप की प्राप्ति कम होती जाती है।

तापमान के क्षैतिजीय विभाजन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Controlling the Horizontal Distribution of Temperature)—किसी भी स्थान पर वहां के वायु के तापमान को उस स्थान का तापमान (Temperature of a Place) कहते हैं। यह तापमान छाया में लिया जाता है। किसी भी स्थान के तापमान को नीचे लिखे कारक प्रभावित करते हैं-

1. भूमध्य रेखा से दूरी (Distance from the Equator)-भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर अक्षांशों में वृद्धि के साथ-साथ तापमान कम होता जाता है। (Temperature decreases from the equator to the poles.) किसी भी अक्षांश पर गर्मी, सूर्य की किरणों के कोण (Angle of Sun’s rays) पर निर्भर करती है। इसका मूल कारण यह है कि भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें सारा साल लगभग लंब पड़ती हैं और अक्षांशों के बढ़ने के साथ-साथ ये किरणें तिरछी होती जाती हैं। तिरछी किरणें लंब किरणों की तुलना में भू-तल के अधिक भाग को घेरती हैं। फलस्वरूप ये भू-तल के अधिक भाग को गर्म करती हैं और उनकी गर्मी अधिक क्षेत्र में फैलकर कम रह जाती है। इस प्रकार भूमध्य रेखा पर पड़ने वाली लंब किरणें, ध्रुवों पर पड़ने वाली तिरछी किरणों की तुलना में अधिक गर्मी प्रदान करती हैं। परिणामस्वरूप भूमध्य रेखा पर तापमान अधिक और ध्रुवों पर तापमान कम होता है।
उदाहरण-चेन्नई, कोलकाता की तुलना में अधिक गर्म होता है।

2. वायुमंडल की मोटाई (Thickness of the Atmosphere)-भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लंब पड़ती हैं और अक्षांशों में वृद्धि होने से सूर्य की किरणें तिरछी होती जाती हैं। लंब किरणों की तुलना में तिरछी किरणों को वायुमंडल का अधिकांश भाग पार करना पड़ता है, फलस्वरूप उनकी अधिक गर्मी वायुमंडल के जलवाष्प और गैसें सोख लेती हैं। इस प्रकार भूमध्य रेखा पर उच्च ताप और ध्रुवों पर निम्न ताप रहता है।

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3. भूमि की ढलान (Slope of the land)—सूर्यमुखी ढलानें सूर्य विमुखी ढलानों की अपेक्षा गर्म होती हैं। जिस भूमि की ढलान सूर्य की ओर होती है, वहाँ सूर्य की किरणें तुलना में सीधी पड़ती हैं, इसलिए ऐसी भूमि अधिक गर्मी प्राप्त करती है। इसके विपरीत जिस भूमि की ढलान सूर्य से परे होती है, वहाँ किरणें तुलना में तिरछी पड़ती हैं। फलस्वरूप ऐसी भूमि को कम गर्मी प्राप्त होती है। उदाहरण के तौर पर हिमालय की उत्तरी ढलान पर स्थित तिब्बत के पठार पर तापमान कम और भारत की ओर दक्षिणी ढलान के अधिकांश भागों और नीचे स्थित गंगा-सतलुज के मैदान में तापमान अधिक रहता है। अल्पस पर्वत में इन्हें धूपदार ढलाने (Sunny Slopes) कहते हैं।

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4. सागर तल से ऊँचाई (Altitude above sea-level) भू-तल के निकट वायु की मात्रा अधिक होती है। ऊँचाई के साथ-साथ वायु की मात्रा कम होती जाती है। उष्णता का ग्रहण करना वायु की मात्रा पर निर्भर करता है। परिणामस्वरूप सागर-तल और कुछ ऊँचाई पर स्थित स्थानों का तापमान उच्च और अधिक ऊँचाई पर निम्न होता है। सागर-तल से प्रति 165 मीटर की ऊँचाई के साथ तापमान 1° सैंटीग्रेड कम होता जाता है, इसीलिए मैदानों की तुलना में पर्वत ठंडे होते हैं। (Mountains are cooler than plains.) उदाहरण-शिमला और नैनीताल, दिल्ली और इलाहाबाद की तुलना में अधिक ठंडे होते हैं।

5. सागर तट से दूरी (Distance from the sea-coast)-गर्मियों में सागर, स्थल की तुलना में ठंडे होते हैं क्योंकि सागर की ठंडी पवनें (Sea Breeze) तटों की ओर चलती हैं और वहाँ के तापमान को कम कर देती हैं। इसके विपरीत सर्दियों में सागर, स्थल की तुलना में गर्म होते हैं क्योंकि ठंडी पवनें सागर की ओर चलती हैं और तटों की ठंडक अपने साथ सागर की ओर ले जाती हैं और तटों का तापमान कम नहीं होने देतीं। इस प्रकार तटों का तापमान वर्ष भर एक समान रहता है। इसके विपरीत सागर से दूर स्थित स्थान गर्मी की ऋतु में बहुत गर्म (Extreme climate) और सर्दी की ऋतु में बहुत ठंडे रहते हैं क्योंकि ये सागर के प्रभाव से दूर होते हैं। समुद्र का प्रभाव समकारी होता है और समकारी जलवायु (Equable Climate) होती है।
उदाहरण-दिल्ली की जलवायु कोलकाता की तुलना में कठोर होती है।

6. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)-तटवर्ती प्रदेशों के तापमान पर महासागरीय धाराओं का प्रभाव पड़ता है। गर्म धाराएँ तापमान को बढ़ा देती हैं और ठंडी धाराएँ तापमान को कम कर देती हैं। गर्म धाराओं के ऊपर से प्रवाहित करने वाली पवनें गर्म होकर निकटवर्ती क्षेत्र को गर्मी प्रदान करती हैं। इसके विपरीत ठंडी धाराओं के ऊपर से प्रवाहित करने वाली पवनें निकटवर्ती क्षेत्रों को ठंडा कर देती हैं। दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पश्चिमी तट की तुलना में अधिक गर्म होते हैं। इसका मूल कारण है कि पश्चिमी तटों पर ठंडी धाराएँ और पूर्वी तटों पर गर्म धाराएँ प्रवाहित करती हैं।
उदाहरण-खाड़ी की गर्म धाराओं के कारण पश्चिमी यूरोप के बंदरगाह सर्दी की ऋतु में भी खुले रहते हैं।

7. प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)-प्रचलित पवनें भी किसी स्थान के तापमान को प्रभावित करती हैं। उष्ण प्रदेशों की ओर से आने वाली पवनें तापमान अधिक कर देती हैं और शीत प्रदेशों की ओर से आने वाली पवनें तापमान को कम कर देती हैं। सर्दी की ऋतु में मध्य एशिया से आने वाली ठंडी पवनें उत्तरी और मध्य चीन के तापमान को बहुत कम कर देती हैं। हिमालय पर्वत इन पवनों को भारत की ओर आने से रोक देते हैं। नहीं तो, भारत भी उत्तरी चीन की भाँति बहुत ठंडा होता। इसी प्रकार सहारा मरुस्थल की गर्म पवनें इटली
के तापमान को अधिक कर देती हैं।

8. भूमि की प्रकृति (Nature of the land) रेत और काली मिट्टी तापमान बहुत जल्दी ग्रहण करने की शक्ति रखती हैं और जल्दी ही इसका विकिरण (Radiation) करके ठंडी हो जाती हैं। परिणामस्वरूप मरुस्थल तर (Wet) भूमि की तुलना में जल्दी गर्म और जल्दी ही ठंडे भी हो जाते हैं। मरुस्थलों में दिन के समय तापमान अधिक और रात को काफी कम हो जाता है। बर्फ से या वनस्पति से ढकी हुई भूमि सूर्य-ताप की अधिक मात्रा परावर्तित (Reflect) कर देती है जो बर्फ को पिघलाने और वनस्पति में से जल का वाष्पीकरण करने में खर्च हो जाता है।

9. वर्षा और बादल (Rainfall and Clouds)-जिन प्रदेशों में अधिक वर्षा होती है और वे बादलों से ढके रहते हैं, वहाँ तापमान अधिक नहीं होता क्योंकि बादल सूर्य-ताप के अधिकांश भाग को परावर्तित कर देते हैं। वर्षा का जल भूमि को ठंडक प्रदान करता है। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें चाहे पूरा वर्ष लंब पड़ती हैं, परंतु फिर भी वर्षा और बादलों के कारण तापमान बहुत अधिक नहीं होता। इसके विपरीत उष्ण मरुस्थलों में बादल और वर्षा की कमी के कारण तापमान अधिक रहता है। (Highest temperature of the world are found on the tropics and not on the equator.)

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प्रश्न (ङ)
वायुमंडल की रचना का तापमान के आधार पर वर्णन करें और प्रत्येक सतह के बारे में संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर-
वायुमंडल (Atmosphere)-
वायु अनेक गैसों के मिश्रण से बनी है। वायु ने पृथ्वी को चारों तरफ से एक विशाल आवरण के रूप में समेटा हुआ है। यह आवरण रंगहीन (Colourless), गंधरहित (Odourless) और स्वादरहित (Tasteless) है। पृथ्वी के चारों तरफ लिपटे वायु के इस विशाल आवरण को वायुमंडल कहते हैं। इसका अध्ययन ऋतु विज्ञान के अंतर्गत आता है। __ट्रीवार्था (Trevartha) के अनुसार, “पृथ्वी के इर्द-गिर्द गैसों का एक विशाल आवरण है, जो पृथ्वी का अटूट अंग है, वायुमंडल कहलाता है।” (“Surrounding the earth and yet an integral part of the planet is a gaseous envelope called the atmosphere.”)

मोंकहाऊस (Monkhouse) के अनुसार, “वायुमंडल गैसों की एक पतली परत है, जो गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी से चिपटी हुई है।” (“The atmosphere is a thin layer of gases held to the earth by gravitational attraction.”)
क्रिचफील्ड (Critchfield) के अनुसार, “वायुमंडल गैसों का एक गहरा आवरण है, जिसने पृथ्वी को पूरी तरह से घेरा हुआ है।” (“The atmosphere is a deep blanket of gases which entirely envelopes the earth.’)

वायुमंडल की ऊँचाई (Height of the Atmosphere) वायुमंडल रंगहीन (Colourless), गंधहीन (Odourless) स्वादहीन (Tasteless) और पारदर्शी (Transparent) है, जोकि पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण इसके साथसाथ पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमता है। वर्तमान समय में, स्पूतनिक और अन्य कृत्रिम उपग्रहों की सहायता से वायुमंडल की ऊँचाई 16,000 किलोमीटर से 32,000 किलोमीटर तक बताई गई है। परंतु मनुष्य के लिए पहले 5-6 किलोमीटर ी महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि उसी ऊँचाई तक मनुष्य के लिए अत्यंत उपयोगी गैसें-ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बनडाईऑक्साइड आदि काफी मात्रा में उपलब्ध हैं। भू-तल के निकट वायुमंडल सघन (Dense) होता है, परंतु ऊँचाई के साथ-साथ वायु की मात्रा कम होती जाती है भाव ऊँचाई के बढ़ने से वायुमंडल सूक्ष्म (Rarefied) होता जाता है। लगभग 572 किलोमीटर की ऊंचाई पर वायु की मात्रा आधी और 11 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक-चौथाई रह जाती है। वायुमंडल की जानकारी के लिए अनेक स्रोतों का प्रयोग किया जाता है।

वायुमंडल का महत्त्व (Importance of Atmosphere)—वायुमंडल मानव-जीवन पर कई प्रकार से प्रभाव डालता है-

  1. ऑक्सीजन गैस धरती पर मानव-जीवन का आधार है।
  2. नाइट्रोजन गैस वनस्पति का आधार है।
  3. वायुमंडल सूर्य के ताप को जब्त करके एक काँच के घर (Glass House) का काम करता है और पृथ्वी पर औसत दर्जे का तापमान (35°C) बनाए रखता है।
  4. वायुमंडल के जलवाष्प वर्षा का साधन हैं।
  5. वायुमंडल फसलों, मौसम, जलवायु, हवाई मार्गों पर प्रभाव डालता है।
  6. वायुमंडल की ओज़ोन गैस पराबैंगनी किरणों को रोककर पृथ्वी को हानिकारक प्रभावों से सुरक्षित करती है।

वायुमंडल की रचना (Composition of Atmosphere)-
वायुमंडल की रचना अलग-अलग गैसों (Gases), जलवाष्प (Water vapours) और धूलकणों (Dust Particles) के मेल से हुई है। वायुमंडल का 99 प्रतिशत भाग नाईट्रोजन (Nitrogen) और ऑक्सीजन (Oxygen) गैसों से बना हुआ है।

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1. गैसें (Gases)—वायुमंडल का 99% भाग दो गैसों-ऑक्सीजन (Oxygen) और नाइट्रोजन (Nitrogen) से बना है। वायुमंडल में कुछ भारी गैसें भी हैं। ऊपरी सतहों में हल्की गैसें भी होती हैं। वायुमंडल में पाई जाने वाली गैसें नीचे लिखी हैं-

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  • सक्रिय गैसें (Active Gases)—ऑक्सीजन, हाईड्रोजन, कार्बन-डाईऑक्साइड और ओज़ोन गैसें किसी स्थान की जलवायु पर प्रभाव डालती हैं। इन्हें सक्रिय गैसें कहा जाता है।
  • प्रभाव रहित गैसें (Inert Gases)-ऑर्गन, नियॉन, हीलियम, क्रिप्टोन और ज़ेनॉन प्रभावरहित गैसें हैं।

महत्त्वपूर्ण गैसें (Important Gases)-
1. नाइट्रोजन-वायुमंडल में इस गैस की सबसे अधिक मात्रा (4/5 भाग) है। यह गैस वस्तुओं को तेजी से जलने से बचाती है। यह पेड़-पौधों के जीवन के लिए लाभदायक होती है।

2. ऑक्सीजन (Oxygen)-मनुष्य के अस्तित्व के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण गैस है। इसके बिना मनुष्य साँस नहीं ले सकता। यह ऊर्जा की स्रोत है और वस्तुओं के जलने में सहायक होती है। ऊँचाई के साथ साथ इसकी मात्रा कम होती जाती है।

3. कार्बन-डाईऑक्साइड (Carbon Dioxide)—यह भारी गैस पृथ्वी की निचली सतह पर मिलती है।
औद्योगीकरण और ईंधन के अधिक प्रयोग के कारण इसकी मात्रा बढ़ रही है, जिसके प्रभाव से पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ गया है।

4. ओज़ोन (Ozone) यह अधिक ऊँचाई पर मिलती है और सूर्य की पराबैंगनी किरणों (Ultra Violet Rays) को सोख लेती है। इससे पृथ्वी और मानव जीवन की सुरक्षा होती है।

5. ऑर्गन और हाइड्रोजन भी महत्त्वपूर्ण गैसें हैं।

2. धूल-कण (Dust Particles)-वायुमंडल में धूल-कण काफी मात्रा में होते हैं। इनके कारण ही आकाश में धुंधलापन छा जाता है। सूर्य के उदय होने और सूर्य के अस्त होने की लालिमा और अन्य रंग धूल-कणों के कारण ही होते हैं। सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद का धुंधलका (Twilight) इन धूल कणों के कारण ही उत्पन्न होता है। जल-कण धूल-कणों के साथ चिपके रहते हैं। यहीं से संघनन (Condensation) या जल वाष्प के जल में परिवर्तन हो जाने की क्रिया आरंभ होती है। फलस्वरूप यह धूल-कण आर्द्रताग्राही केंद्र (Hygroscopic Nuclei) कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त ये सूर्य की गर्मी को ग्रहण करने और फैलाने में बहुत प्रभावशाली होते हैं। ये धूल-कण भू-तल की मिट्टी के अलावा धुएँ, ज्वालामुखी विस्फोट से निकली राख, समुद्री नमक से भी उत्पन्न होते हैं। ये धूल-कण उल्कापात से भी प्राप्त होते हैं।

धूल कणों का महत्त्व (Importance of Dust Particles)-

  • धूल-कण सूर्य से ताप को सोख लेते हैं, जिससे वायुमंडल का तापमान बढ़ जाता है।
  • धूल-कणों के चारों तरफ जल-वाष्प का संघनन हो जाता है, जिससे वर्षा, कोहरा, बादल आदि बनते हैं।
  • धूल-कणों के कारण दृश्यता (Visibility) कम हो जाती है और कोहरा छा जाता है।
  • धूल-कणों के कारण सूर्य का निकलना, सूर्य का डूबना और इंद्रधनुष जैसे रंग-बिरंगे नज़ारे देखने को मिलते हैं।

3. जलवाष्प (Water-Vapours) वायुमंडल में गैसों की तरह अदृश्य रूप में जल भी होता है, जिसे जलवाष्प कहा जाता है। ये वाष्प-कण समुद्रों, झीलों, नदियों आदि से वाष्पीकरण क्रिया (Evaporation) द्वारा प्राप्त होते हैं। ये अधिकतर वायुमंडल की निचली सतहों में पाए जाते हैं। वायुमंडल में इसका बहुत महत्त्व है। भू-तल और वनस्पति, मनुष्य और पशु जीवन इसी के फलस्वरूप संभव हो पाया है। वाष्पकण के कारण ही बादलों की रचना होती है जिससे वर्षा और हिमपात होता है। ओस, कोहरा आदि वाष्पकणों से ही बनते हैं। वायुमंडल में वाष्पकणों के कारण ही इंद्रधनुष (Rainbow) और माला या प्रभामंडल (Halo) की रचना होती है। बादलों में बिजली चमकने और गर्जने (Roaring) की क्रिया भी जलवाष्प के कारण होती है। वायुमंडल के केवल 2% भाग में जलवाष्प मिलते हैं पर ये धरती के इर्द-गिर्द ताप के विभाजन पर काबू रखते हैं। इनके कारण ही पैदा हुई शक्ति से चक्रवात, अंधेरियाँ और तूफान चलते हैं।

विश्व के औसत तापमान का बढ़ना (Global Warming)-कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस पृथ्वी से विकिरण को सोख लेती है। बढ़ते औद्योगीकरण, परिवहन के तेज़ साधन, ईंधन के प्रयोग और जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण वायुमंडल में कार्बन-डाई-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। इसी कारण पृथ्वी का ग्रीन-हाऊस प्रभाव भी बढ़ रहा है। – पृथ्वी का औसत तापमान 0.5° बढ़ गया है और डर है कि अगली सदी के अंत तक तापमान 3.5° बढ़ जाएगा। इससे समुद्र के पानी की सतह 11 मीटर ऊँची हो जाएगी और विश्व के कई तटवर्ती भाग पानी में डूब जाएंगे।

वायुमंडल का ढाँचा (Structure of the Atmosphere)-वायुमंडल के ढाँचे में अनेक सतहें हैं, जिनका वर्गीकरण तापमान और वायु-दबाव के आधार पर किया गया है। इन सतहों और उनकी विशेषताओं के बारे में आगे लिखा गया है

1. परिवर्तन मंडल (Troposphere)-वायुमंडल की यह सबसे निचली तह है। भू-तल से इसकी ऊँचाई 12 किलोमीटर तय की गई है। ध्रुवों की तुलना में भूमध्य रेखा की ओर इसकी ऊँचाई अधिक होती है। भूमध्य रेखा पर यह 16 किलोमीटर और ध्रुवों पर 6 किलोमीटर ऊँचा होता है। भारी गैसें, जलवाष्प और धूल-कण इसी मंडल में अधिक होते हैं। इसमें प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सैल्सियस तापमान कम हो जाता है। अंधेरी, तूफान, बादल गर्जन, बिजली चमकने आदि क्रियाएँ इसी मंडल में होती हैं। इसमें वायु कभी शांत नहीं रहती, निरंतर संवहन धाराएँ (Convection Currents) उठती रहती हैं और पवनें निरंतर रूप में प्रवाहित होती रहती हैं। फलस्वरूप इसे अशांत मंडल भी कहते हैं। इसमें संवहन धाराओं के उत्पन्न होने के फलस्वरूप इसे संवहनीय प्रदेश (Convectional Zone) का नाम भी दिया जाता है। ट्रोपोस्फीयर (Troposhere) दो शब्दों ‘ट्रोपो’ और ‘स्फीयर’ के मेल से बना है। ‘ट्रोपो’ का अर्थ है-परिवर्तन और ‘स्फीयर’ का अर्थ है-मंडल। इस प्रकार ट्रोपोस्फीयर का अर्थ हुआ-परिवर्तन मंडल, इसलिए इसे परिवर्तन मंडल कहा जाता है। इसे इस नाम से पुकारने का मुख्य कारण इसमें तापमान और वायु दिशा आदि में होने वाला परिवर्तन है।

महत्त्व (Importance)—परिवर्तन मंडल वायुमंडल की सबसे महत्त्वपूर्ण और निचली परत है।

  1. इस परत में जलवायु पर प्रभाव डालने वाली क्रियाएँ काम करती हैं।
  2. इस परत में गैसें, धूल-कण और जल-वाष्प मिलते हैं, जिनके कारण बादल, वर्षा, कोहरा आदि बनते
  3. इस परत में संवहन धाराएँ चलती हैं, जिससे ताप और नमी ऊँचाई तक पहुँच जाती है।
  4. इस क्षेत्र में ऊँचाई के साथ-साथ 1°C प्रति 165 मीटर की दर से तापमान कम होता है। इसे साधारण ताप कम होने की दर (Normal Lapse Rate) कहते हैं।
  5. इस परत में चक्रवात, अंधेरियाँ, तूफान आदि मौसम पर प्रभाव डालते हैं।

2. मध्य मंडल (Tropopause)-परिवर्तन मंडल की सीमा के ऊपर केवल 1/2 किलोमीटर चौडी एक परत है, जिसे मध्य मंडल कहते हैं। इसमें परिवर्तन मंडल की पवनें और संवहन धाराएँ चलनी बंद हो जाती हैं। यहाँ हर प्रकार की मौसमी घटनाएँ (Weather Phenomena) नहीं होतीं। यहाँ शांतमय वातवरण बना रहता है, इसलिए इसे शांत मध्यमंडल भी कहते हैं।

3. समताप मंडल (Stratosphere)-मध्य मंडल से ऊपर 13 से 80 किलोमीटर की ऊँचाई वाले वायुमंडल को समताप मंडल (Isothermal Zone) कहते हैं। इस मंडल की ऊँचाई अक्षाशों और ऋतुओं के अनुसार बदलती रहती है। ग्रीष्म ऋतु में इसकी ऊँचाई शीत ऋतु की तुलना में अधिक होती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि ग्रीष्म ऋतु में वायुमंडल की सभी परिवर्तनकारी क्रियाएँ अपनी अधिकतम सीमा पर होती हैं। इसका प्रभाव समताप मंडल की ऊँचाई में अंतर ला देता है। इस मंडल में तापमान लगभग एक समान रहता है, जिसके कारण उसका नाम समताप मंडल पड़ा है। इस खोज से पहले लोगों की यह धारणा थी कि वायुमंडल की ऊपरी सीमा तक तापमान कम होता जाता है। यह मंडल पूर्णरूप से संवहन-रहित (Non-Convective) होता है और इसमें अंधेरी, तूफान, बादल गर्जने और बिजली चमकने की क्रियाएँ नहीं होती। इसमें जल-कणों और धूल कणों की भी कमी होती है। महत्त्व (Importance)—इस क्षेत्र में जेट हवाई जहाज़ और रॉकेट आदि उड़ानों के लिए आदर्श दशाएँ
मिलती हैं।

4. ओज़ोन मंडल (Ozonosphere) वायुमंडल की यह सतह 80 किलोमीटर की ऊँचाई तक विस्तृत है। कुछ मौसम-वैज्ञानिक इसे समताप मंडल का भाग मानते हैं। इसमें ओजोन गैस की प्रधानता होती है। यह गैस सूर्य से निकलने वाली अत्यंत गर्म पराबैंगनी किरणों (Ultraviolet-Rays) को सोख लेती है।

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यदि यह मंडल न होता, तो ये पराबैंगनी किरणें पृथ्वी के वासियों को अंधा कर देतीं और उनकी त्वचा को जला देतीं। इसके विपरीत यदि ओज़ोन मंडल की मोटाई अधिक होती, तो पराबैंगनी किरणों की अधिकांश ऊर्जा नष्ट हो जाती और पृथ्वी पर जीवमंडल (Biosphere) होने की संभावना कम हो जाती क्योंकि भू-तल पर पर्याप्त मात्रा में गर्मी न पहुंचती। थोड़ी मात्रा में ये किरणें प्राणी-जीवन के लिए ज़रूरी हैं। इनसे शरीर को आवश्यक विटामिन मिलते हैं। यह वायुमंडल की मध्य वाली सतह है, इसलिए इसे मध्यमंडल (Mesosphere) भी कहते हैं।

ओज़ोन मंडल में सुराख (Ozone Hole)-सन् 1980 में, ओज़ोन मंडल की सतह पर अंटार्कटिका महाद्वीप के ऊपर एक बहुत बड़ा सुराख देखने में आया है, जिससे पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुँच सकती हैं।

5. आयन मंडल (Ionosphere)—इस मंडल की ऊँचाई 80 से 40 किलोमीटर तक है। इस मंडल में ऊँचाई के साथ तापमान कम होता जाता है। लगभग 80 किलोमीटर पर तापमान -100° (Minus 100°) सैल्सियस तक पहुँच जाता है। इससे ऊपर तापमान में बढ़ौतरी होती जाती है। लगभग 100 किलोमीटर पर तापमान 100° सैल्सियस तक पहुँच जाता है। आयन मंडल में स्वतंत्र रूप में आयन कण (Ionised Particles) काफ़ी मात्रा में मिलते हैं, जो रेडियो तरंगों (Radio Waves) को पृथ्वी की ओर मोड़ देते हैं। यदि यह मंडल न होता तो रेडियो तरंगें दूर आकाश में चली जाती और वापस न आतीं। इन आयन कणों के कारण इस मंडल में अनेक विचित्र बिजली तथा चुंबकीय घटनाएँ होती हैं। ध्रुवीय प्रदेशों में आकाश की ओर एक विचित्र और मनोरंजक प्रकाश देखने को मिलता है। इस आयन मंडल में एक बिजली-चुंबकीय घटना (Electromagnetic Phenomena) होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इस उत्तर-ध्रुवीय ज्योति (Aurora Borealis) और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिणी ध्रुवीय ज्योति (Aurora Australis) के नाम दिए जाते हैं। उच्च तापमान के कारण इसे ताप मंडल (Thermosphere) भी कहते हैं। इसमें हिम-किरणें (Cosmic Rays) भी मिलती हैं।

6. बाहरी मंडल (Exosphere)—यह वायुमंडल की सबसे ऊपरी सतह है, जिसकी ऊँचाई 640 किलोमीटर से अधिक है। यहां वायु अति सूक्ष्म होती है। इस मंडल से संबंधित अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। इसमें हीलियम और हाइड्रोजन गैसें मिलती हैं। यह सतह धीरे-धीरे अंतरिक्ष (Space) में विलीन हो जाती है।

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प्रश्न 6.
(च) जलवायु विज्ञान में कई सम मूल-रेखाएं (Isopleths) प्रयोग में लाई जाती हैं। किन्हीं 10 सम मूल रेखाओं के नाम और उनकी किस्म की चर्चा करें।
उत्तर-
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Geography Guide for Class 11 PSEB वायुमण्डल-बनावट और रचना Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न तु (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
जर्मनी के किस वैज्ञानिक ने जलवायु का वर्गीकरण पेश किया था ?
उत्तर-
कौपन।

प्रश्न 2.
सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों का नाम बताएँ।
उत्तर-
पराबैंगनी किरणे।

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प्रश्न 3.
वायुमंडल की अधिक-से-अधिक ऊँचाई बताएँ।
उत्तर-
16000 से 32000 कि०मी० ।

प्रश्न 4.
ऊँचाई के साथ तापमान कम होने की दर बताएँ।
उत्तर-
6.5°C प्रति कि०मी० ।

प्रश्न 5.
वायुमंडल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
पृथ्वी के इर्द-गिर्द गैसों का आवरण।

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प्रश्न 6.
वायुमंडल की दो प्रमुख गैसों के नाम बताएँ।
उत्तर-
ऑक्सीजन और नाइट्रोजन।

प्रश्न 7.
वायुमंडल में नाइट्रोजन गैस कितने प्रतिशत है ?
उत्तर-
78%.

प्रश्न 8.
वायुमंडल में ऑक्सीजन गैस कितने प्रतिशत है ?
उत्तर-
21%.

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प्रश्न 9.
वायुमंडल पृथ्वी के साथ क्यों जुड़ा हुआ है ? ।
उत्तर-
गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण।

प्रश्न 10.
वायुमंडल की निचली परत को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
परिवर्तन मंडल।

प्रश्न 11.
वायुमंडल की ऊपरी परत में मिलने वाली गैसों के नाम बताएँ।
उत्तर-
ऑर्गन, हीलियम।

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प्रश्न 12.
ओज़ोन गैस किन किरणों को सोख लेती है ?
उत्तर-
पराबैंगनी किरणों को।

प्रश्न 13.
वायुमंडल की कौन-सी परत मौसम की रचना करती है ?
उत्तर-
परिवर्तन मंडल।

प्रश्न 14.
किस परत में वायुमंडलीय विघ्न मिलते हैं ?
उत्तर-
परिवर्तन मंडल।

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प्रश्न 15.
किस परत में तापमान स्थिर होता है ?
उत्तर-
समताप मंडल।

प्रश्न 16.
सूर्य की किरणों की गति बताएँ।
उत्तर-
3 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड।।

प्रश्न 17.
पृथ्वी के ताप का प्रमुख स्रोत बताएँ।
उत्तर-
सूर्य।

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प्रश्न 18.
सूर्य की किरणें सबसे पहले किसे गर्म करती हैं-वायुमंडल या धरती ?
उत्तर-
धरती।

प्रश्न 19.
समताप रेखा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
समान तापमान वाली रेखाएँ।

प्रश्न 20.
तटीय भागों में कौन-सी जलवायु मिलती है ?
उत्तर-
समकारी सागरीय।

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प्रश्न 21.
महाद्वीपों के भीतरी भागों की जलवायु के बारे में बताएँ।
उत्तर-
अति गर्मी और अति सर्दी।

प्रश्न 22.
उत्तरी-पश्चिमी यूरोप की समकारी जलवायु किस धारा के कारण है ?
उत्तर-
खाड़ी की धारा।

प्रश्न 23.
किस धारा के कारण कनाडा की जलवायु ठंडी है ?
उत्तर-
लैबरेडार की धारा।

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प्रश्न 24.
कौन-सी ढलान अधिक गर्म है-उत्तरी या दक्षिणी ?
उत्तर-
दक्षिणी।

प्रश्न 25.
पर्वत ठंडे होते हैं या मैदान ?
उत्तर-
पर्वत।

प्रश्न 26.
सूर्य की कौन-सी किरणें अधिक गर्म होती हैं-लंब या तिरछी ?
उत्तर-
लंब।

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प्रश्न 27.
पृथ्वी पर तापमान के बढ़ने का एक प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
सागरीय जल की सतह में वृद्धि।

प्रश्न 28.
समुद्र तल पर एक वर्ग सैं०मी० क्षेत्रफल पर वायु का भार बताएँ।
उत्तर-
1.03 किलोग्राम।

प्रश्न 29.
हमारे शरीर पर लगभग कितना वायुदाब है ?
उत्तर-
लगभग 1 टन।

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प्रश्न 30.
ऊँचाई के साथ-साथ वायुमंडलीय दाब कम होने की दर क्या है ?
उत्तर–
प्रति 100 मीटर पर 12 मिलीबार या 300 मीटर पर 1 इंच।

प्रश्न 31.
सामान्य वायुदाब कितना होता है ?
उत्तर-
29.92 इंच या 76 सैं०मी० या 10.32 मिलीबार।

प्रश्न 32.
वायुमंडलीय दाब मापने वाले यंत्र का नाम बताएँ।
उत्तर-
बैरोमीटर।

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प्रश्न 33.
भूमध्य रेखीय कम वायु दाब पेटी का विस्तार बताएँ।
उत्तर-
5°N – 5°S.

प्रश्न 34.
भूमध्य रेखीय कम वायु दाब पेटी का नाम बताएँ।
उत्तर-
डोलड्रम।

प्रश्न 35.
उप-उष्ण कम दाब पेटी का नाम बताएँ।
उत्तर-
घोड़ा अक्षांश।

प्रश्न 36.
पृथ्वी की दैनिक गति से पैदा होने वाली शक्ति का नाम बताएँ।
उत्तर-
कोरोलिस बल।

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बहुविकल्पी प्रश्न

नोट-सही उत्तर चुनकर लिखें-

प्रश्न 1.
वायुमंडल की सबसे निचली परत को क्या कहते हैं ?
(क) मध्य मंडल
(ख) आयन मंडल
(ग) अधोमंडल
(घ) बाहरी मंडल।
उत्तर-
अधोमंडल।

प्रश्न 2.
वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा कितने % है ?
(क) 15.95%
(ख) 71.95%
(ग) 20.95%
(घ) 25.95%.
उत्तर-
20.95%.

प्रश्न 3.
कौन-सी गैस ग्रीन हाऊस गैस है ?
(क) कार्बनडाइऑक्साइड
(ख) ओज़ोन
(ग) ऑक्सीजन
(घ) नाइट्रोजन।
उत्तर-
कार्बनडाइऑक्साइड।

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प्रश्न 4.
कितनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन गैस कम हो जाती है ?
(क) 100 कि०मी०
(ख) 110 कि०मी०
(ग) 120 कि०मी०
(घ) 130 कि०मी०।
उत्तर-
120 कि०मी०।

प्रश्न 5.
मानव-जीवन के लिए जरूरी है
(क) नाइट्रोजन
(ख) ऑक्सीजन
(ग) ऑर्गन
(घ) ओजोन।
उत्तर-
ऑक्सीजन।

प्रश्न 6.
प्रकाश की गति बताएँ।
(क) 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
(ख) 5 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
(ग) 10 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड
(घ) 100 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड।
उत्तर-
3 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड।

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प्रश्न 7.
सूर्य से पृथ्वी को प्राप्त होने वाली ऊर्जा को क्या कहते हैं ?
(क) तापमान
(ख) सूर्य ताप
(ग) सौर-विकिरण
(घ) ऊर्जा।
उत्तर-
सूर्य ताप।

प्रश्न 8.
सूर्य से आने वाले ताप का कितना प्रतिशत भाग पृथ्वी पर पहुँचता है ?
(क) 51%
(ख) 47%
(ग) 65%
(घ) 44%.
उत्तर-
51%.

प्रश्न 9.
कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें किस दिन लंब पड़ती हैं ?
(क) 21 मार्च
(ख) 23 सितंबर
(ग) 22 दिसंबर
(घ) 21 जून।
उत्तर-
21 जून।

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प्रश्न 10.
सामान्य वायु दाब कितना होता है ?
(क) 34 मिलीबार
(ख) 300 मिलीबार
(ग) 1013 मिलीबार
(घ) 900 मिलीबार।
उत्तर-
1013 मिलीबार।

प्रश्न 11.
भूमध्य रेखीय खंड में कम वायुदाब का क्या कारण है ?
(क) दैनिक गति
(ख) चक्रवात
(ग) धाराएँ
(घ) संवाहक धाराएँ।
उत्तर-
संवाहक धाराएँ।

प्रश्न 12.
वायुदाब मापने की इकाई क्या है ?
(क) बार
(ख) मिलीबार
(ग) कैलोरी
(घ) मीटर।
उत्तर-
मिलीबार।

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अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न : (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1.
मौसम से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसी स्थान के थोड़े और विशेष समय में वायुमंडल की दशाओं (तापमान, वायुदाब, पवनों, नमी, बादल और वर्षा) के अध्ययन को मौसम कहते हैं।

प्रश्न 2.
मौसम मानचित्र क्या है ? भारत के मौसम मानचित्र कहाँ बनाए जाते हैं ?
उत्तर-
किसी स्थान या प्रदेश के किसी निश्चित दिन और समय पर वायुमंडलीय दशाओं को दिखाने वाले मानचित्रों को मौसम मानचित्र (Weather Maps) कहते हैं। भारत के मौसम मानचित्र पुणे (Pune) में तैयार किए जाते हैं।

प्रश्न 3.
जलवायु से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसी स्थान की एक लंबे समय के लिए (35 साल) औसत वायुमंडलीय दशाओं को जलवायु कहते हैं। जलवायु एक लंबे समय के बदलते मौसम का वर्णन होता है। (Climate is a composite picture of weather conditions.)

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प्रश्न 4.
जलवायु और मौसम में क्या अंतर है ?
उत्तर-
जलवायु और मौसम वायुमंडल की दशाओं का अध्ययन है, पर मौसम एक निश्चित और थोड़े समय का अध्ययन होता है, जबकि जलवायु एक लम्बे समय (35 साल) की वायुमंडलीय दशाओं का अध्ययन है। मौसम हर रोज़ बदलता रहता है, पर जलवायु एक स्थायी अवस्था है।

प्रश्न 5.
मौसम विज्ञान (Meteorology) और जलवायु विज्ञान (Climatology) में क्या अंतर है ?
उत्तर-
मौसम विज्ञान भौतिक विज्ञान की एक शाखा है, जिसमें एक छोटे-से क्षेत्र पर थोड़े समय के लिए वायुमंडलीय दशाओं का अध्ययन किया जाता है। जलवायु विज्ञान भौतिक भूगोल की एक शाखा है, जिसमें पृथ्वी पर अलग-अलग जलवायु के विभाजन का वर्णन किया जाता है।

प्रश्न 6.
वायुमंडल की परिभाषा बताएँ।
उत्तर-
पृथ्वी के इर्द-गिर्द गैसों का एक विशाल आवरण है, जो गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण पृथ्वी से चिपका हुआ है और उसने पृथ्वी को पूरी तरह से घेरा हुआ है।

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प्रश्न 7.
वायुमंडल की ऊँचाई बताएँ।
उत्तर-
कृत्रिम उपग्रहों की सहायता से पता लगा है कि वायुमंडल की ऊंचाई 16000 कि०मी० से 32000 कि०मी० तक है, पर मनुष्य के लिए निचले 5-6 कि०मी० ही महत्त्वपूर्ण होते हैं।

प्रश्न 8.
वायुमंडल की जानकारी के तीन स्रोत बताएँ।
उत्तर-

  1. उल्का
  2. उपग्रह
  3. मानव-रहित गुब्बारे।।

प्रश्न 9.
वायुमंडल की रचना के मूल तत्त्व कौन-से हैं ?
उत्तर-

  1. गैसें
  2. धूलकण
  3. जलवाष्प।

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प्रश्न 10.
वायुमंडल की रचना किन गैसों से हुई है ? इन गैसों की ऊँचाई बताएँ।
उत्तर-
गैस — ऊँचाई

1. नाइट्रोजन — 125 कि०मी० (78.03%)
2. ऑक्सीजन — 95 कि०मी० (20.95%)
3. कार्बनडाइऑक्साइड– 30 कि०मी० (0.03%)
4. हाइड्रोजन — 200 कि०मी० (0.01%)
5. ऑर्गन, हीलियम और ओज़ोन — (.08%)

प्रश्न 11.
वायुमंडल की प्रमुख परतों के नाम बताएँ।
उत्तर-

  1. अशांत मंडल (परिवर्तन मंडल)
  2. समताप मंडल
  3. ओज़ोन मंडल
  4. आयन मंडल
  5. बाहरी मंडल।

प्रश्न 12.
ओज़ोन गैस का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
ओजोन गैस सूर्य की पराबैंगनी किरणों (Ultraviolet rays) को सोखकर पृथ्वी की हानिकारक प्रभावों से रक्षा करती है। यह गैस 80 कि०मी० तक मिलती है।

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प्रश्न 13.
ओज़ोन मंडल में सुराख (Ozone Holes) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
सन् 1980 में ओज़ोन मंडल में अंटार्कटिका महाद्वीप के ऊपर एक बड़ा सुराख देखने में आया है, जिससे पराबैंगनी किरणें धरती पर पहुँच सकती हैं।

प्रश्न 14.
वायुमंडल में पाई जाने वाली ओज़ोन परत को समाप्त करने वाले प्रदूषणों के नाम बताएँ।
उत्तर-
उद्योगों से प्राप्त प्रदूषण ओजोन परत को समाप्त कर रहे हैं, जैसे-कार्बनडाइऑक्साइड, क्लोरीन, फ्लोरीन और क्लोरोफ्लोरो कार्बन।।

प्रश्न 15.
वायुमंडल में कार्बनडाइऑक्साइड गैस में वृद्धि क्यों हो रही है? इसका क्या प्रभाव हो सकता है ?
उत्तर-
औद्योगीकरण और ईंधन के अधिक प्रयोग के कारण कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है, जिसके प्रभाव से पृथ्वी का तापमान भी बढ़ रहा है।

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प्रश्न 16.
वायुमंडल में वाष्यकण क्यों महत्त्वपूर्ण हैं ?
उत्तर-
वाष्पकण सूर्य के ताप को सोख लेते हैं। ये धरती के ताप पर नियंत्रण रखते हैं। वाष्प कणों की गुप्त ऊर्जा से तूफान चलते हैं। जल वाष्प से वर्षा, बादल, ओस आदि बनते हैं।

प्रश्न 17.
वायुमंडल में धूल-कणों का महत्त्व क्या है ?
उत्तर-
धूल-कणों के आस-पास जल-वाष्प का संघनन होता है, जिससे वर्षा होती है। धूल-कणों के कारण दृश्यता कम हो जाती है। वायुमंडल में सूर्य के ताप को धूल कण सोख लेते हैं। धूलकणों को नमी-ग्रहण कण (Hygroscopic Nuclie) कहते हैं।

प्रश्न 18.
विश्वव्यापी ताप (Global Warming) में वृद्धि के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
औद्योगीकरण, तेज़ आवाजाही, जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण वायुमंडल में कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान 0.5° C बढ़ गया है।

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प्रश्न 19.
वायुमंडल की निचली परत कौन-सी है ? भूमध्य रेखा और ध्रुवों पर इसकी कितनी ऊँचाई है?
उत्तर-
वायुमंडल की निचली परत को परिवर्तन मंडल (अशांत मंडल) कहते हैं। भूमध्य रेखा पर इसकी ऊँचाई 16 कि०मी० और ध्रुवों पर 6 कि०मी० है।

प्रश्न 20.
परिवर्तन मंडल सबसे महत्त्वपूर्ण परत क्यों है ?
उत्तर-
इस परत में जलवायु पर प्रभाव डालने वाली क्रियाएँ होती हैं। इस परत में गैसें, धूल-कण, जल-वाष्प और संवहन धाराएँ चलती हैं, जिससे ताप और नमी पर प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 21.
मध्य परत से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
अशांत मंडल और समताप मंडल को अलग करने वाली 17 कि०मी० चौड़ी परत को मध्य परत (Tropo Pause) कहते हैं।

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प्रश्न 22.
समताप मंडल जैट जहाजों की उड़ान के लिए लाभदायक क्यों है ?
उत्तर-
यह मंडल संवहन-रहित है और इसमें वायुमंडलीय विघ्न नहीं हैं, इसीलिए यह मंडल रॉकेट, जैट जहाजों आदि की उड़ान के लिए आदर्श है।

प्रश्न 23.
सूर्य तापन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
धरती की सतह पर प्राप्त होने वाले सूर्य विकिरण को सूर्य तापन (Insolation) कहते हैं। यह कुल सूर्यविकिरण का V2,000,000,000 भाग है।

प्रश्न 24.
सूर्य तापन और विकिरण में अंतर बताएँ।
उत्तर-
सूर्य की सतह से पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाले सूर्य विकिरण को सूर्य तापन कहते हैं, जबकि सूर्य की बाहरी सतह-फोटोस्फीयर (Photosphere) से चारों ओर सूर्य की किरणों के फैलने को विकिरण कहते हैं।

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प्रश्न 25.
सूर्य तापन की किरणों की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर-
ये किरणें 3 लाख कि०मी० प्रति सैकिंड की गति से चलती हैं। ये लघु तरंगों के रूप में चलती हैं।

प्रश्न 26.
सूर्य के स्थिर अंक (Solar Constant) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
पृथ्वी प्रति मिनट 1.94 कैलोरी ताप प्रति वर्ग सैंटीमीटर प्राप्त करती है। इसे सूर्य का स्थिर अंक कहते हैं।

प्रश्न 27.
सूर्य तापन के कोई दो महत्त्व बताएँ।
उत्तर-
सूर्य तापन के कारण पृथ्वी मनुष्य के निवास योग्य है। सूर्य तापन के प्रभाव के कारण ऋतुओं का परिवर्तन, पवनें, धाराएँ, मौसम और जलवायु निर्भर करते हैं।

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प्रश्न 28.
उन दो प्रमुख कारकों के नाम बताएँ, जो सूर्य तापन की मात्रा पर प्रभाव डालते हैं।
उत्तर-

  1. सूर्य की किरणों का आप्तन कोण।
  2. दिन की लंबाई।

प्रश्न 29.
सूर्य ताप का कितना भाग वायुमंडल में नष्ट होता है और कितना भाग पृथ्वी पर पहुँचता है ?
उत्तर-
सूर्य ताप का 49% भाग वायुमंडल में नष्ट हो जाता है और 51% भाग पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है। यह सूर्य विकिरण का दो अरबवां भाग है।

प्रश्न 30.
सूर्य ताप किन क्रियाओं के कारण वायुमंडल में नष्ट होता है ?
उत्तर-
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प्रश्न 31.
वायुमंडल को गर्म करने वाली पाँच क्रियाओं के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. विकिरण (Radiation)
  2. संवहन (Convection)
  3. संचालन (Conduction)
  4. संपीड़न (Compression)
  5. अभिवहन (Advection)

प्रश्न 32.
भूमध्य रेखा पर संसार के सबसे ऊँचे तापमान क्यों नहीं मिलते ?
उत्तर-
लंब किरणें पड़ने के बावजूद, अधिक बादलों के कारण भूमध्य रेखा पर सूर्य का ताप कम होता है, परन्तु कर्क रेखा पर साफ़ आकाश के कारण अधिक तापमान होता है।

प्रश्न 33.
सौर कलंक (Sun Spot) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सूर्य के तल पर पाए जाने वाले धब्बों को सौर कलंक कहते हैं।

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प्रश्न 34.
किसी स्थान के तापमान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसी स्थान पर, छाया में (In Shade), भूमि तल से 4 फुट ऊँची वायु की मापी हुई गर्मी को उस स्थान का तापमान कहते हैं।

प्रश्न 35.
सूर्य ताप और तापमान में क्या अंतर है ?
उत्तर-
सूर्य से धरती को प्राप्त होने वाली ऊर्जा को सूर्य ताप कहते हैं। यह लघु तरंगों के रूप में भू-तल को गर्म करती है, पर तापमान से अभिप्राय किसी स्थान पर धरातल से एक मीटर ऊंची हवा में गर्मी की मात्रा से है।

प्रश्न 36.
किसी स्थान के औसत दैनिक तापमान से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसी दिन के उच्चतम तापमान और न्यूनतम तापमान के औसत को दैनिक तापमान कहते हैं।

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प्रश्न 37.
समताप रेखा क्या होती है ?
उत्तर-
धरातल पर एक समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा को समताप रेखा कहते हैं। इस तापमान को समुद्र तल पर कम करके दिखाया जाता है।

प्रश्न 38.
साधारण ताप कम होने की दर (Normal lapse rate) क्या होती है ?
उत्तर-
वायुमंडल में ऊँचाई के साथ 1°C प्रति 165 मीटर की दर से तापमान कम होता है। इसे साधारण ताप कम होने की दर कहते हैं।

प्रश्न 39.
संसार के तीन प्रमुख ताप कटिबंधों के नाम बताएँ।
उत्तर-

  1. उष्ण कटिबंध
  2. शीतोष्ण कटिबंध
  3. शीत कटिबंध।

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प्रश्न 40.
औसत या नार्मल वायु दाब कितना होता है?
उत्तर-
45° अक्षांश पर समुद्र तल पर वायुमंडल का औसत या नार्मल दाब 29.92 इंच या 76 सैंटीमीटर या 1013.2 मिलीबार होता है।

प्रश्न 41.
वायु दाब और तापमान में क्या संबंध है ? ।
उत्तर-
वायु दाब और तापमान में विपरीत संबंध है। तापमान बढ़ने पर वायुदाब कम हो जाता है।

प्रश्न 42.
वायु दाब ऊँचाई के साथ किस दर से कम होता है ?
उत्तर-
ऊँचाई पर जाने से प्रति 300 मीटर पर हवा का दाब 1 इंच या 34 मिलीबार कम हो जाता है।

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प्रश्न 43.
वायु दाब और परिक्रमण (Rotation) गति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
दैनिक गति के प्रभाव से विकेंद्रित बल के कारण कई क्षेत्रों में हवा बिखर जाती है और हवा का दाब कम हो जाता है। दैनिक गति के कारण विक्षेप भी साथ में उत्पन्न होता है, जिसे करोलिस बल कहते हैं। इस बल के कारण वायु दाब और पवनों की दिशा बदल जाती है। .

प्रश्न 44.
मिलीबार (Milibar) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
1000 डाईनज़ (Dynes) प्रति वर्ग सैंटीमीटर के वायु भार को मिलीबार कहते हैं।

प्रश्न 45.
वायु दाब किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-

  1. तापमान
  2. ऊँचाई
  3. जल वाष्प
  4. परिक्रमण।

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प्रश्न 46.
वायु दाब पेटियों के उत्पन्न होने के दो प्रमुख कारण बताएँ।
उत्तर-

  1. तापीय कारण (Thermal)
  2. गति संबंधी कारण (Dynamic)

प्रश्न 47.
भू-तल पर कुल कितनी वायु दाब पेटियाँ हैं ?
उत्तर-
भू-तल पर कुल 7 वायु दाब पेटियाँ हैं-उच्च वायु दाब पेटियाँ कम वायु दाब पेटियों को अलग करती हैं।

प्रश्न 48.
डोलड्रमज़ (Doldrums) की स्थिति बताएँ।
उत्तर-
भूमध्य रेखीय कम वायु दाब पेटी को डोल ड्रमज़ (शांत मंडल) कहते हैं, जिसका विस्तार 10° N और 10°S अक्षांशों के मध्य होता है।

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प्रश्न 49.
अश्व अक्षांश (Horse Latitudes) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
30°-35° उत्तर-दक्षिण अक्षांशों पर स्थित उच्च वायु दाब पेटी (शांत मंडल) को अश्व अक्षांश कहते हैं।

प्रश्न 50.
उप-ध्रुवीय कम दाब की पेटी के बनने के कोई तीन कारण बताएँ।
उत्तर-

  1. पृथ्वी की दैनिक गति के कारण वायु का ध्रुवों की ओर खिसकना।
  2. चक्रवातों के कारण कम वायु दाब का होना।
  3. गर्म धाराओं के कारण कम वायु दाब का होना।

प्रश्न 51.
समदाब रेखा (Isobars) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
धरातल पर समान वायु दाब वाले क्षेत्रों को जोड़ने वाली रेखा को समदाब रेखा कहते हैं। यह वायु दाब समुद्र तल पर कम करके दिखाया जाता है।

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लघु उत्तरात्मक प्रश्न । (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
वायुमंडल में धूल-कणों का महत्त्व क्या है ?
उत्तर-
वायुमंडल की निचली परत में धूल-कण मिलते हैं। इन धूल-कणों की कई तरह से विशेष महत्ता है।

  1. धूल-कण सूर्य ताप को सोख लेते हैं, जिससे वायुमंडल का तापमान बढ़ जाता है।
  2. धूल-कणों के चारों ओर जल-वाष्प का संघनन हो जाता है जिससे वर्षा, धुंध, बादल आदि बनते हैं।
  3. धूल-कणों के कारण दृश्यता (Visibility) कम हो जाती है और धुंध छा जाती है।
  4. धूल-कणों के कारण सूर्य के निकलने, सूर्य के डूबने और इंद्रधनुष जैसे रंग-बिरंगे नजारे देखने को मिलते हैं।

प्रश्न 2.
परिवर्तन मंडल को वायुमंडल की सबसे महत्त्वपूर्ण परत क्यों माना जाता है ?
उत्तर-
परिवर्तन मंडल वायुमंडल की सबसे महत्त्वपूर्ण और निचली परत है-

  1. इस परत में जलवायु पर प्रभाव डालने वाली क्रियाएँ काम करती हैं।
  2. इस परत में गैसें, धूल-कण और जल-वाष्प मिलते हैं, जिनके कारण बादल, वर्षा, धुंध आदि बनते हैं।
  3. इस परत में संवाहक धाराएँ चलती हैं, जिनके कारण ताप और नमी ऊँचाई तक पहुँच जाती है।
  4. इस क्षेत्र में ऊँचाई के साथ-साथ 1°C प्रति 165 मीटर की दर से तापमान कम होता है।
  5. इस परत में चक्रवात, अंधेरियाँ, तूफान आदि मौसम पर प्रभाव डालते हैं।

प्रश्न 3.
वायुमंडल में जल-वाष्य का महत्त्व क्या है ?
उत्तर-
वायुमंडल के 2% भाग में जल-वाष्प मिलते हैं। ये वायुमंडल की निचली परत पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं। ये सूर्य के ताप को सोख लेते हैं। ये धरती के आस-पास ताप के विभाजन को नियंत्रित रखते हैं। इनके कारण ही पैदा हुई शक्ति से चक्रवात, अंधेरियाँ और तूफान चलते हैं। जल-वाष्प के कारण ही वर्षा, धुंध, कोहरा, ओस, बादल आदि बनते हैं।

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प्रश्न 4.
वायुमंडल का महत्त्व क्या है ?
उत्तर-
वायुमंडल मानव-जीवन पर कई प्रकार से प्रभाव डालता है

  1. ऑक्सीजन गैस धरती पर मानव-जीवन का आधार है।
  2. कार्बन-डाइऑक्साइड गैस वनस्पति का आधार है।
  3. वायुमंडल सूर्य ताप को सोखकर एक काँच के घर (Glass House) का काम करता है।
  4. वायुमंडल के जल-वाष्प वर्षा का साधन हैं।
  5. वायुमंडल फसलों, मौसम, जलवाय, हवाई मार्गों पर प्रभाव डालता है।

प्रश्न 5.
परिवर्तन मंडल और समताप मंडल में अंतर बताएँ।
उत्तर –
परिवर्तन मंडल (Troposphere)

  1. यह वायुमंडल की सबसे निचली परत है।
  2. इसकी ऊँचाई ध्रुवों पर 8 कि०मी० और भूमध्य रेखा पर 20 कि०मी० होती है।
  3. इस परत में तापमान 1°C प्रति 165 मीटर की दर से कम होता है।
  4. इसमें उच्चवर्ती धाराएँ, बादल और अंधेरियाँ चलती हैं और इसे अशांत मंडल कहते हैं।

समताप मंडल (Stratosphere)

  1. यह भू-तल से ऊपर वायुमंडल की दूसरी परत है।
  2. इसकी ऊँचाई 16 कि०मी० से लेकर 72 कि०मी० तक होती है।
  3. इस परत में तापमान लगभग एक समान रहता है।
  4. इसमें उच्चवर्ती धाराएँ, बादल और अंधेरियाँ नहीं चलतीं और इसे शांत मंडल कहते हैं।

प्रश्न 6.
सूर्य तापन (Insolation) की परिभाषा दें।
उत्तर-
सूर्य वायुमंडल को गर्मी और रोशनी प्रदान करने वाला एक प्रमुख और मूल साधन है। सूर्य का व्यास पृथ्वी से सौ गुणा बड़ा है। सूर्य के धरातल का तापमान 10,000° F से अधिक है। सूर्य से सब दिशाओं में ताप तरंगें निकलती हैं। सूर्य का ताप रोशनी की गति से (186,000 मील या 3000,000 कि०मी० प्रति सैकिंड की दर से) वायुमण्डल में से निकलता है। धरती को सूर्य ताप का केवल दो अरबवां भाग ही (1/2000,000,000) प्राप्त होता है। अनुमान है कि धरती प्रति मिनट 1.94 calories गर्मी प्रति वर्ग सैंटीमीटर प्राप्त करती है। इसे सूर्य का स्थिर अंक (Solar Constant) कहते हैं। इस प्रकार धरती पर प्राप्त होने वाले सूर्य विकिरण को सूर्य तापन कहते हैं।

In = In coming
Insolation = Sol = Solar
Ation = Radiation
(Insolation means Incoming Solar Radiation.)

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प्रश्न 7.
ताप बजट सिद्धान्त की व्याख्या करें।
उत्तर-
ताप बजट (Heat Budget)-ताप बजट से अभिप्राय ताप सन्तुलन से है। धरती पर औसत तापमान एक समान रहता है। धरती जितनी मात्रा में सूर्य ताप प्राप्त करती है, उतनी ही मात्रा में ताप धरातलीय विकिरण के द्वारा ब्रह्मांड में वापिस चला जाता है। इस प्रकार धरती और वायुमण्डल के ताप में एक सन्तुलन कायम हो जाता है। मान लो कि वायुमण्डल की ऊपरी सतह से प्राप्त होने वाला ताप 100 इकाई है। इसमें से 51 इकाई ताप ही धरती पर पहुँचता है, जैसे वायुमण्डल की ऊपरी सतह से प्राप्त ताप = 100%

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धरती की सतह पर प्राप्त ताप = 100 – 49 = 51%
धरती की सतह पर प्राप्त 51% ताप धरातलीय विकिरण के द्वारा ब्रह्माण्ड में वापिस चला जाता है। इससे वायुमण्डल गर्म हो जाता है।

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प्रश्न 8.
किसी स्थान का तापमान किस प्रकार अक्षांश पर निर्भर करता है ?
उत्तर-
भूमध्य रेखा से दूरी (Distance from the Equator)–धरातल पर तापमान सदा अक्षांश के अनुसार होता है। भूमध्य रेखा के निकट वाले स्थान दूर वाले स्थानों से अधिक गर्म होते हैं। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने से तापमान लगातार कम होता जाता है। (Temperature decreases from the Equator to the Poles.) किसी भी अक्षांश पर गर्मी सूर्य की किरणों के कोण (Angle of sun’s rays) पर निर्भर करती है। सीधी किरणें तिरछी किरणों की तुलना में अधिक गर्म होती हैं और कम सतह घेरने के कारण भूमि को जल्दी गर्म करती हैं। इसके अलावा सीधी किरणों को तिरछी किरणों की तुलना में वायुमण्डल में कम फासला तय करना पड़ता है। वायुमण्डल में मिली गैसें और वाष्प सूर्य की किरणों की गर्मी चूस लेते हैं। इसलिए तिरछी किरणों की बहुत सारी गर्मी नष्ट हो जाती है। अक्षांश के अनुसार सूर्य की किरणों का कोण बदलता रहता है और दिन की लम्बाई भी कम होती या बढ़ती रहती है।

भूमध्य रेखा पर सारा साल सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, इसलिए ये प्रदेश पूरा वर्ष समान रूप में गर्म रहते हैं ध्रुवों की ओर जाते हुए सूर्य की किरणें लगातार तिरछी होती जाती हैं, इसलिए उच्च अक्षांशों (Higher Latitudes) के प्रदेश ठंडी जलवायु वाले होते हैं।

उदाहरण (Example)-

  1. मद्रास (चेन्नई), कोलकाता की तुलना में अधिक गर्म है।
  2. भारत की जलवायु इंग्लैण्ड की जलवायु की तुलना में अधिक गर्म है।

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प्रश्न 9.
ऊँचाई और तापमान का क्या सम्बन्ध है ?
अथवा
पर्वत मैदानों की तुलना में अधिक ठण्डे क्यों होते हैं ?
उत्तर-
समुद्र तल से ऊँचाई के साथ-साथ तापमान कम होता जाता है। तापमान के कम होने की दर 1°C प्रति 165 मीटर है। वायुमण्डल धरती से छोड़े गए ताप विकिरण (Radiation) से गर्म हो जाता है, इसलिए निचली सतहें पहले गर्म होती हैं और ऊपरी सतहें बाद में। पहाड़ी प्रदेश धरातल या गर्मी के साधन से दूर होने के कारण ठण्डे रहते हैं। पर्वत मैदानों की अपेक्षा अधिक ठण्डे होते हैं। (Mountains are cooler than plains.) ऊँचाई के अनुसार हवा का दबाव, घनत्व, भाप और धूल के कणों की कमी होती है। इस प्रकार ऊँचे प्रदेशों की शुद्ध और स्वच्छ हवा गर्मी को ज़ब्त नहीं करती। पहाड़ी प्रदेशों की कठोर चट्टानें जल्दी ही गर्मी छोड़ देती हैं, जो बिना रोक-टोक के वायुमण्डल से बाहर निकल जाती हैं। इस प्रकार कोई भी स्थान जितना ऊँचा होगा, वह उतना ही ठण्डा होगा।

उदाहरण (Examples)–शिमला और लुधियाना लगभग एक ही अक्षांश पर स्थित हैं, पर लुधियाना में जून का औसत तापमान 35°C होता है, जबकि शिमला में जून का औसत तापमान 20°C होता है।

प्रश्न 10.
किसी स्थान के दैनिक तापान्तर और वार्षिक तापान्तर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
दैनिक तापांतर (Daily range of Temperature)-किसी स्थान पर किसी दिन के अधिक-सेअधिक और कम-से-कम तापमान के अन्तर को उस स्थान का दैनिक तापान्तर कहते हैं। इसे Diurnal या Daily Range of Temperature भी कहते हैं।

Daily Range of Temperature = Daily Maximum Temperature – Daily Minimum Temperature

विशेषताएँ (Characteristics)-

  1. यह तटीय प्रदेशों में कम होता है।
  2. देश के भीतरी भागों में तापान्तर अधिक होता है।
  3. बादलों से घिरे प्रदेशों में तापान्तर अधिक होता है।
  4. खुले और साफ आकाश के कारण मरुस्थलों में तापान्तर अधिक होता है।

वार्षिक तापान्तर (Annual range of Tempeature)—किसी वर्ष के सबसे गर्म और सबसे ठण्डे महीनों के औसत तापमान के अन्तर को वार्षिक तापान्तर कहते हैं। आम तौर पर जुलाई महीने को सबसे गर्म और जनवरी महीने को सबसे ठण्डा महीना माना जाता है।

Annual Range of Temperature = Mean monthly Temperature of the hottest month (July) — Mean monthly Temperature of the coldest month (January)

विशेषताएँ (Characteristics)

  1. भूमध्य रेखा पर वार्षिक तापान्तर कम होता है।
  2. ध्रुवों की ओर यह लगातार बढ़ता जाता है।
  3. अन्दरूनी क्षेत्रों की अपेक्षा तटीय प्रदेशों में वार्षिक तापान्तर कम होता है।
  4. विश्व में सबसे अधिक वार्षिक तापान्तर साइबेरिया में वरखोयांस्क (Verkhoyansk) में 38°C होता है।

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प्रश्न 11.
समताप रेखाओं से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
समताप रेखाएँ (Isotherms)-‘Iso’ शब्द का अर्थ है-समान और ‘Therms’ शब्द का अर्थ है’ तापमान।
इसलिए Isotherms’ शब्द का अर्थ है-समान तापमान की रेखाएँ (Lines of equal temperature) (Isotherms are lines joining the places of same (equal) temperature reduced to sea-level.) धरातल पर एक समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाओं को समताप रेखाएँ कहते हैं। इस तापमान को समुद्र तल से कम करके दिखाया जाता है। इस प्रकार ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने का यत्न किया जाता है। यह कल्पना की जाती है कि सभी स्थान समुद्र तल पर स्थित हैं। यदि कोई स्थान 1650 मीटर ऊँचा है और उसका वास्तविक तापमान 20°C है, तो उस स्थान का समुद्र तल पर तापमान 20°C + 10°C = 30°C होगा, क्योंकि प्रति 165 मीटर पर 1°C तापमान कम हो जाता है।

विशेषताएँ (Characteristics)-

  1. ये रेखाएँ पूर्व-पश्चिम दिशा की ओर फैली होती हैं।
  2. ये उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा दक्षिणी गोलार्द्ध में सीधी होती हैं क्योंकि यहाँ थल भाग की कमी होती है।
  3. ये रेखाएँ गर्मी की ऋतु में समुद्रों से भूमध्य रेखा की ओर तथा सर्दी की ऋतु में ध्रुवों की ओर मुड़ जाती हैं।
  4. जलवायु मानचित्रों में तापमान के विभाजन को समताप रेखाओं द्वारा दिखाया जाता है।

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प्रश्न 12.
समदाब रेखाओं पर नोट लिखें।
उत्तर-
समदाब रेखाएँ (Isobars)- Iso’ शब्द का अर्थ है-समान और ‘Bar’ शब्द का अर्थ है-दबाव। इसलिए ‘Isobars’ का अर्थ हुआ-समदाब रेखाएँ (Lines of Equal Pressure.)। .
(“’Isobars are lines joining the places of same pressure reduced to sea level.”) धरातल पर समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाओं को समदाब रेखाएँ कहते हैं।
इस वायु दाब को समुद्र तल से कम करके दिखाया जाता है। ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने का यत्न किया जाता है। यह कल्पना की जाती है कि सभी स्थान समुद्र तल पर स्थित हैं। यदि कोई स्थान 300 मीटर ऊँचा है और उसका वास्तविक वायु दाब 900 मिलीबार है, तो समुद्र तल पर उसका वायु दाब 900 + 34 = 934 मिलीबार होगा, क्योंकि प्रति 300 मीटर पर 34 मिलीबार वायु दाब कम हो जाता है।

विशेषताएँ (Characteristics)-

  1. ये रेखाएँ पूर्व-पश्चिम दिशा की ओर फैली होती हैं। दक्षिणी गोलार्द्ध में ये अक्षांश रेखाओं के लगभग समानांतर हैं।
  2. दक्षिणी गोलार्द्ध में ये अक्षांश रेखाओं के लगभग समानांतर हैं।
  3. ये अधिक दबाव से कम दबाव की ओर खिंची चली जाती हैं।
  4. ये स्थल की अपेक्षा समुद्रों पर अधिक नियमित (Regular) होती हैं।
  5. जलवायु मानचित्रों में वायुदाब को समदाब रेखाओं से दिखाया जाता है।
  6. इनसे पवनों की दिशा और गति का पता चलता है।

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प्रश्न 13.
अश्व अक्षांश से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
22° से 35° के बीच के अक्षांशों को अश्व अक्षांश (Horse latitudes) कहते हैं। कर्क रेखा और मकर रेखा के निकट का यह प्रदेश शांत मण्डल (Belt of calm) कहलाता है। शांत भू-खण्ड में धरातल पर समानान्तर (Horizontal) गति नहीं होती। हवाएँ ऊपर से नीचे (Descending) या नीचे से ऊपर (Ascending) को चलती रहती हैं। ये हवाएँ न तो स्थायी होती हैं और न ही अधिक तेजी से बहती हैं। (“It is a zone where no permanent winds blow.”) वायुमण्डल शान्त होता है और मौसम साफ़ रहता है।

लगातार नीचे आती हुई वायु और दबाव (Compression) के कारण यहाँ उच्च वायुदाब होता है। इन अक्षांशों से ध्रुवों की ओर पश्चिमी पवनें और भूमध्य रेखा की ओर व्यापारिक पवनें चलती हैं।

प्रभाव (Effects)-नीचे आती हुई हवाएँ नमी के अंश को कम कर देती हैं और तापमान को बढ़ाती हैं, इसलिए इन प्रदेशों में वर्षा नहीं होती और इन अक्षांशों में महाद्वीपों के पश्चिमी भागों पर संसार के प्रसिद्ध गर्म मरुस्थल (Hot Deserts) मिलते हैं, जैसे-अरब, सहारा, कैलेफोर्निया, ऐटेकामा, कालाहारी।

नाम का कारण (Reason of Calling it Horse Latitudes)-इन अक्षांशों को घोड़ा या अश्व अक्षांश (Horse Latitude) इसलिए कहते हैं क्योंकि इन अक्षांशों में वायु शान्त हो जाने के कारण जहाज़ों को चलाने में कठिनाई होती थी। प्राचीन काल में जहाज़ों में घोड़े भरकर अमेरिका में ले जाए जाते थे। जब ये जहाज़ इन अक्षांशों में से गुज़रते थे, तो उन्हें हल्का करने के लिए कुछ घोड़ों को समुद्र में फेंक दिया जाता था।

प्रश्न 14.
भूमध्य रेखा के शान्त खण्ड की स्थिति और प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
स्थिति (Location)—यह शान्त खण्ड भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5°N और 5°S के बीच स्थित है। इसे . भूमध्य रेखा का शान्त खण्ड (Equatioral Calm) कहते हैं। धरातल पर या तो वायु होती ही नहीं या बहुत शान्त वायु चलती है। यह शान्त खण्ड भूमध्य रेखा के चारों ओर फैला हुआ है।

कारण (Causes)—इस खण्ड में सूर्य की किरणें पूरा वर्ष सीधी पड़ती हैं और औसत तापमान ऊँचा रहता है। हवा गर्म और हल्की होकर लगातार संवाहक धाराओं (Convection Currents) के रूप में ऊपर उठती रहती है और धरातल पर वायु दबाव कम हो जाता है। _प्रभाव (Effects)-गर्म हवा ऊपर उठने के कारण ठण्डी हो जाती है और द्रवीकरण (condensation) की क्रिया होती है। इसलिए इस खण्ड में पूरा वर्ष वर्षा होती रहती है। औसत वार्षिक वर्षा 200 सैंटीमीटर होती है। प्राचीन समय में हवाओं से चलने वाले जहाज़, इन अक्षांशों में हवा की कमी के कारण फँस जाते थे। उन्हें चलाने में बहुत कठिनाई होती थी।

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निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
वायुमण्डल की बनावट का वर्णन करें। उत्तर
वायुमण्डल की बनावट (Composition of the Atmosphere)-
उत्तर-
वायुमण्डल की बनावट अलग-अलग गैसों, जलवाष्प (Water-vapours), धूल-कणों (Dust particles) के मिश्रण के फलस्वरूप हुई है। वायुमण्डल का 99 प्रतिशत नाइट्रोजन (Nitrogen) और ऑक्सीजन (Oxygen) द्वारा बना होता है।

I. गैसें (Gases)-वायुमण्डल में अनेक गैसें होती हैं, जिनमें नाइट्रोजन (Nitrogen), ऑक्सीजन (Oxygen), ऑर्गन (Organ), कार्बन-डाइऑक्साइड (Carbondioxide), हाइड्रोजन (Hydrogen), नीओन (Neon), हीलियम (Helium), क्रिप्टन (Krypton), जेनॉन (Xenon) और ओज़ोन (Ozone) प्रमुख हैं। इनमें से कुछ भारी गैसें और कुछ हल्की गैसें होती हैं। भारी गैसें वायुमण्डल की निचली परतों में और हल्की गैसें ऊपरी परतों में होती हैं, परन्तु वायुमण्डल में ऑक्सीजन और नाइट्रोजन गैसों की प्रधानता होती है। ये दोनों मिलकर वायुमण्डल में 99% होती हैं। वायुमण्डल में गैसों और उनकी मात्रा अग्रलिखित अनुसार है-

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वायुमण्डल में कार्बन-डाइऑक्साइड.20 किलोमीटर की ऊँचाई तक, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन 100 किलोमीटर की ऊँचाई तक और हाइड्रोजन 150 किलोमीटर से भी अधिक ऊँचाई में होती है।

1. सक्रिय गैसें (Active Gases)-ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, कार्बन-डाइऑक्साइड और ओजोन गैसें किसी . स्थान की जलवायु पर प्रभाव डालती हैं। इन्हें सक्रिय या क्रियाशील गैसें कहते हैं।
2. प्रभाव रहित गैसें (Inert Gases)-ऑर्गन, निओन, हीलियम, क्रिप्टॉन और जेनॉन प्रभाव रहित गैसें हैं।
3. महत्त्वपूर्ण गैसें (Important Gases)-

  • नाइट्रोजन (Nitrogen)-इस गैस की वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा (4/5 भाग) होती है। यह गैस वस्तुओं को तेज़ी से जलने से बचाती है। यह पेड-पौधों के जीवन के लिए लाभदायक है।
  • ऑक्सीजन (Oxygen)—मनुष्य के अस्तित्व के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण गैस है। इसके बिना मनुष्य साँस नहीं ले सकता। यह ऊर्जा का स्रोत है और वस्तुओं के जलने में सहायक होती है। ऊँचाई के साथ साथ यह कम होती जाती है।
  • कार्बन-डाइऑक्साइड (Carbon-dioxide)—यह भारी गैस पृथ्वी की निचली सतह पर मिलती है।
    औद्योगीकरण और ईंधन के अधिक प्रयोग के कारण इसकी मात्रा बढ़ रही है, जिसके प्रभाव से पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ गया है।
  • ओज़ोन (Ozone)—यह अधिक ऊँचाई पर मिलती हैं और सूर्य की पराबैंगनी किरणों (Ultra violet rays) को जब्त कर लेती है। इससे यह पृथ्वी पर मानव-जीवन की
    सुरक्षा करती है।
  • आर्गन और हाइड्रोजन (Argon and Hydrogen)—ये भी महत्त्वपूर्ण गैसें हैं।

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II. जल-वाष्प (Water Vapours) ताप से वायु गर्म हो जाती है और यह गर्म वायु भूमि पर स्थित जल का कुछ अंश और वर्षा के जल का कुछ भाग सोख लेती है। यह सोखा हुआ जल वायुमण्डल में न दिखाई देने वाले (Invisible) रूप में उपस्थित होता है। इसे जल-वाष्प कहते हैं। वायुमण्डल की ऊँचाई के साथ-साथ वाष्प की मात्रा कम हो जाती है। आम तौर पर ये 12 किलोमीटर से अधिक ऊँचाई पर नहीं होते। ताप द्वारा वायु के गर्म हो जाने पर इसमें जल-वाष्प धारण करने की सामर्थ्य बढ़ जाती है। शीतल वायु उष्ण वायु के टकराने से जल-वाष्प ग्रहण करती है। अवक्षेपण (Precipitation) का मुख्य स्रोत जल-वाष्प ही हैं। वायुमण्डल में संघनन क्रिया (Condensation) द्वारा जल-वाष्प जल में बदलकर अवक्षेपण से वर्षा, हिमपात आदि रूपों में धरती पर गिरते हैं। वायुमण्डल के केवल 2% भाग में जल-वाष्प मिलते हैं, परन्तु ये धरती के आस-पास ताप के विभाजन पर नियन्त्रण रखते हैं।

III. धूल-कण (Dust Particles)-चट्टानों के टूटने-फूटने और ज्वालामुखी के विस्फोट के कारण बहुत बारीक और सूक्ष्म कण वायु में लटकते रहते हैं। ये प्रकाश को फैलाने में सहायता करते हैं। वाष्प के रूप में जल इन धूल-कणों के आस-पास ही एकत्र होता है। फलस्वरूप आकाश नीले रंग का प्रतीत होता है। ये धूलकण कोहरा और धुंध बनाने में भी सहायता करते हैं। धूल-कणों के साथ चिपके जल-वाष्प संघनन क्रिया द्वारा बादलों का रूप धारण कर लेते हैं क्योंकि धूल-कण ठण्डे होकर जल-वाष्प में संघनन करते हैं। इस प्रकार धूल-कणों के कारण बादलों की रचना होती है, जो कि अवक्षेपण (Precipitation) करते हैं। इस प्रकार वायुमण्डल में स्थित धूल-कण मनुष्य के लिए बहुत महत्त्व रखते हैं। इन्हें आर्द्रताग्राही कण (Hygroscopic nuclei) कहते हैं।

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प्रश्न 2.
वायुमण्डल की प्रमुख विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर-
वायुमण्डल की विशेषताएँ (Properties of the Atmosphere)-

  • भू-तल के निकट वायुमण्डल घना (Dense) होता है। ऊपर ऊँचाई के साथ-साथ यह पतला होता जाता है।
  • जल-वाष्प अधिकतर 2000 मीटर की ऊँचाई तक और पूर्ण रूप में 1 किलोमीटर की ऊँचाई तक ही वायुमण्डल में स्थित होते हैं।
  • जल-वाष्प शुष्क वायु के मुकाबले में हल्के होते हैं। इस प्रकार यदि वायु में जल-वाष्प अधिक मात्रा में हों, तो वायु का घनत्व कम हो जाता है।
  • वायुमण्डल तापधारक (Diathermous) होता है, भाव इसमें ताप-किरणें ज़ब्त हो सकती हैं।
  • वायुमण्डल पारदर्शी (Transparent) होता है।
  • वायुमण्डल में अनेक गैसें, जलवाष्प, धूल-कण आदि पाए जाते हैं, परन्तु इसमें ऑक्सीजन और नाइट्रोजन दो गैसों की प्रधानता होती है। वायुमण्डल के लगभग 99 प्रतिशत भाग में ये दो गैसें ही होती हैं।
  • नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, ऑर्गन, कार्बन-डाइ-ऑक्साइड आदि भारी गैसें वायुमण्डल की निचली सतहों पर और निओन, हीलियम, क्रिप्टॉन, ओज़ोन आदि हल्की गैसें ऊपरी सतहों में मिलती हैं।
  • वायुमण्डल की निचली सतहों में धूल-कण पाए जाते हैं। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय लालिमा इन धूल कणों के फलस्वरूप ही होती है। धुंधलका भी इन धूल-कणों के कारण ही होता है।
  • वायुमण्डल में प्रवेश करने वाली उल्काओं (Meteors) के लिए यह रुकावट होता है। यह अपनी घर्षण क्रिया द्वारा इन्हें जला देता है, फलस्वरूप बहुत-सी उल्काएँ भूतल पर पहुँचने से पहले ही जल के राख हो जाती हैं।
  • वायुमण्डल संवहन, विकिरण और दबाव (Compression) द्वारा गर्म होता है। वायु पर जब दबाव पड़ता है, तो यह गर्म हो जाती है और फैलने पर वायु ठंडी हो जाती है।

प्रश्न 3.
वायुमण्डल की महत्ता के बारे में बताएँ।
उत्तर-
वायुमण्डल की महत्ता (Importance of Atmosphere)-
वायुमण्डल नीचे लिखे क्षेत्रों में मनुष्य के लिए महत्त्वपूर्ण है –

1. जीवन का आधार-वायुमण्डल में ऑक्सीजन गैस मानव-जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है। कार्बन-डाइऑक्साइड गैस वनस्पति के विकास के लिए ज़रूरी है। वायुमण्डल के बिना पृथ्वी के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इतना महत्त्वपूर्ण होने के कारण ही सौर-मण्डल में पृथ्वी को एक अद्वितीय ग्रह (Unique Planet) कहा जाता है।

2. तापमान का सन्तुलन-वायुमण्डल एक ग्लास-हाऊस के समान काम करता है और पृथ्वी के तापमान में सन्तुलन रखता है। दिन के समय वायुमण्डल सूर्य की किरणों को जब्त करता है और रात के समय भू-तल से होने वाले विकिरण को रोककर पृथ्वी के तापमान को मध्यम रखता है। पृथ्वी का औसत तापमान 35°C बना रहता है।

3. पराबैंगनी किरणों से सुरक्षा-ऊपरी परतों में ओज़ोन गैस (Ozone Gas) सूर्य की पराबैंगनी किरणों (Ultra violet rays) को जब्त करके पृथ्वी पर मनुष्यों और जीव-जन्तुओं की सुरक्षा करती है।

4. मौसम और जलवायु-वायुमण्डल मौसम और जलवायु पर प्रभाव डालता है, जिसके कारण पृथ्वी के अलग-अलग भागों में अनेक प्रकार की जलवायु मिलती है।

5. रेडियो प्रसारण-आयन मण्डल पृथ्वी की रेडियो तरंगों को पृथ्वी पर वापस भेजकर रेडियो प्रसारण में सहायता करता है।

6. उल्काओं से सुरक्षा-वायुमण्डल में प्रवेश करके कई उल्काएँ (Meteors) नष्ट हो जाती हैं और पृथ्वी को सुरक्षा प्रदान करती हैं।

7. वायु मार्ग-वायुमण्डल की सतह में शांत हवा के कारण जैट जहाज़ तेज़ गति से उड़ सकते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 6 वायुमण्डल-बनावट और रचना

प्रश्न 4.
ताप कटिबन्धों का वर्णन करें।
उत्तर-
ताप कटिबन्ध (Temperature Zones)-धरती की धुरी (Axis) पर तिरछा स्थित होने के कारण सूर्य की किरणें भू-मध्य रेखा पर तो सीधी पड़ती हैं, पर भू-मध्य रेखा से दूर जाने पर लगातार तिरछी होती जाती हैं। परिणामस्वरूप अक्षांश के अनुसार तापमान कम होता जाता है, इसलिए तापखण्ड अलग-अलग अक्षांश रेखाओं के साथ ही निर्धारित होते हैं। अलग-अलग अक्षांशों की स्थिति सूर्य की किरणों के कोण पर आधारित होती है।
धरातल पर ताप विभाजन कई ताप-खण्डों द्वारा दिखाया जाता है। पुरातन यूनानी विद्वानों ने इन अक्षांश रेखाओं के आधार पर धरती को नीचे लिखे पाँच खण्डों में विभाजित किया है-

1. उष्ण कटिबन्ध (तप्त खण्ड) (Torrid Zone)—यह कटिबन्ध कर्क रेखा (23 \(\frac{1}{2}\)°N) और मकर रेखा (23 \(\frac{1}{2}\)°S) के मध्य स्थित है। इस खण्ड में पूरा वर्ष सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, इसलिए यह कटिबन्ध धरती का सबसे गर्म कटिबन्ध है।

2. उत्तरी शीतोष्ण कटिबन्ध (Northern Temperate Zone)—यह कटिबन्ध कर्क रेखा (66\(\frac{1}{2}\)°N) और उत्तरी ध्रुव-चक्र (Arctic Circle) [66\(\frac{1}{2}\)°N) के मध्य स्थित है। इस खण्ड में तापमान की मध्यम दशाएँ होती हैं। इस खण्ड में सूर्य की किरणें सीधी नहीं पड़तीं।

3. दक्षिणी शीतोष्ण कटिबन्ध (Southern Temprate Zone)—यह खण्ड मकर रेखा (23\(\frac{1}{2}\)° S) दक्षिणी ध्रुव-चक्र (Antarctic Circle) (\(\frac{1}{2}\) °S) के मध्य स्थित है। इस खण्ड में न तो अधिक गर्मी पड़ती है और न ही अधिक सर्दी। इस खण्ड में गर्मियों में दिन लम्बे और सर्दियों में छोटे होते हैं।

4. उत्तरी शीत कटिबन्ध (Northern Frigid Zone)—यह खण्ड उत्तरी ध्रुव 90° N और 66\(\frac{1}{2}\) °N के मध्य स्थित है। यहाँ हर स्थान पर दिन या रात की लम्बाई 24 घण्टों से अधिक होती है और अत्यन्त सर्दी पड़ती है।

5. दक्षिणी शीत कटिबन्ध (Southern Frigid Zone)—यह खण्ड दक्षिणी ध्रुव 90° 5 और 66\(\frac{1}{2}\)°S के मध्य स्थित है। यहाँ पूरा वर्ष सूर्य की किरणें बहुत तिरछी पड़ती हैं, इसलिए यहाँ बहुत कम तापमान होता है। ध्रुवों पर छह-छह महीनों के दिन-रात होते हैं।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 18 भारत की विदेश नीति-निर्धारक तत्त्व एवं मूलभूत सिद्धान्त

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 18 भारत की विदेश नीति-निर्धारक तत्त्व एवं मूलभूत सिद्धान्त Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 18 भारत की विदेश नीति-निर्धारक तत्त्व एवं मूलभूत सिद्धान्त

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
भारत की विदेश नीति से आप क्या समझते हैं ? भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्वों के बारे में लिखिए।
(What do you understand by Foreign Policy of India ? Discuss about the Determinants of Indian Foreign Policy.)
अथवा
भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने वाले विभिन्न तत्वों की चर्चा कीजिए। (Explain the various determinants of India’s Foreign Policy.)
उत्तर-
विदेश नीति का अर्थ-आधुनिक युग अन्तर्राष्ट्रीयवाद का युग है। विश्व का प्रत्येक राज्य आत्मनिर्भर नहीं है। प्रत्येक राज्य को अपने हितों को पूरा करने के लिए अन्य राज्यों से सम्बन्ध स्थापित करने पड़ते हैं। इन सम्बन्धों का संचालन विदेश नीति द्वारा किया जाता है। साधारण शब्दों में विदेश नीति उन सिद्धान्तों और साधनों का एक समूह है जिसे राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करने के लिए, अपने उद्देश्यों को सही बताने के लिए और उनको प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। विभिन्न राष्ट्र दूसरे के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए और अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण को अपने व्यवहार के अनुसार बनाने के लिए विदेश नीति का प्रयोग करता है।
डॉ० महेन्द्र कुमार के शब्दों में, “विदेश नीति कार्यों की सोची-समझी क्रिया दिशा है, जिससे राष्ट्रीय हित की विचारधारा के अनुसार विदेशी सम्बन्धों में उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है।”

रुथना स्वामी के शब्दों में, “विदेश नीति ऐसे सिद्धान्तों और व्यवहार का समूह है जिनके द्वारा राज्य के अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों को नियमित किया जाता है।”

1947 में स्वन्तत्र होने के पश्चात् भारत को स्वतन्त्र रूप से अपनी विदेश नीति बनाने का अवसर मिला। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर अपनी विदेश नीति में परिवर्तन किए। भारतीय विदेश नीति को निर्धारित करने में अनेक तत्त्वों ने सहयोग दिया है। ये तत्त्व अग्रलिखित हैं

1. संवैधानिक आधार (Constitutional Basis) भारत के संविधान में राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्तों को केवल राज्य की आन्तरिक नीति से सम्बन्धित ही निर्देश नहीं दिए गए, बल्कि भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए। इस विषय में भी निर्देश दिए गए हैं।
अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य को निम्नलिखित कार्य करने के लिए कहा गया है –

(क) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
(ख) दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना।
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों, समझौतों तथा कानूनों के लिए सम्मान उत्पन्न करना।
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाना। राज्यनीति के इन निर्देशक सिद्धान्तों ने भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

2. भौगोलिक तत्त्व (Geographical Factors)-भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने में भौगोलिक तत्त्व ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत का समुद्र तट बहुत विशाल है। भारत के समुद्र तट की लम्बाई 3500 मील के लगभग है। हिन्द महासागर पर जिस किसी का भी प्रभुत्व हो वह आसानी से भारत के विदेशी व्यापार को अपने हाथ में ले सकता है और राजनीतिक दृष्टि से भी भारत के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अंग्रेज़ों का भारत में शासन स्थापित करने का कारण उनकी समुद्री शक्ति ही थी। भारत की सुरक्षा के लिए नौ-सेना का शक्तिशाली होना अति आवश्यक है और इसलिए भारत अपनी नौ-सेना को शक्तिशाली बनाने के लिए लगा हुआ है। परन्तु भारत की नौ-सेना को इंग्लैण्ड, अमेरिका तथा रूस की नौ-सेना के मुकाबले में आने में अभी काफ़ी समय लगेगा। इसलिए भारत ने ब्रिटेन के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध रखे हैं।

भारत की सीमाएं पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बर्मा के साथ लगती हैं। कश्मीर राज्य के कुछ प्रदेश ऐसे भी हैं, जिनकी सीमा अफगानिस्तान और रूस के साथ लगती है। यद्यपि इस समय वे पाकिस्तान के कब्जे में हैं। भारत की उत्तरी सीमा पर चीन है। चीन और भारत के बीच में हिमालय है जो प्राचीन और मध्ययुगों में प्रहरी का काम करता था। इसी कारण भारत पर कभी कोई महत्त्वपूर्ण आक्रमण उत्तर की ओर से नहीं हुआ था। परन्तु अब स्थिति बदल गई है। यह स्थिति वायुयानों के निर्माण के कारण और अन्य शस्त्रों के आविष्कारों से बदली है। 1962 में चीन के आक्रमण ने भारत की आंखें खोल दी हैं। उत्तरी सीमा की सुरक्षा के लिए चीन के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध होने आवश्यक हैं। इसलिए भारत का आरम्भ से ही यह प्रयास रहा है कि आज भी सरकार साम्यवादी चीन से सम्बन्ध सुधारने का प्रयास कर रही है। इसके अतिरिक्त भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया है ताकि चीन से शत्रुता न हो।

विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में साम्यवादी गुट और पश्चिमी गुट में जो विरोध है उसके कारण दोनों ही गुट इस प्रयत्न में रहे हैं कि भारत के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करें। भारत की भौगोलिक स्थिति हिन्द महासागर के मध्य में है। समुद्र मार्ग से उसका सम्बन्ध पश्चिमी एशिया और दक्षिणी-पूर्वी एशिया के राज्यों के साथ समान रूप से है। उत्तर में स्थित चीन और रूस भी इससे अधिक दूरी पर नहीं हैं और उनकी सीमाएं भी भारत के साथ लगती हैं। इस स्थिति में किसी एक गुट में शामिल होना और उसके साथ सैनिक सन्धियां करना भारत की सुरक्षा के लिए हानिकारक है। भारत की तटस्थता की नीति इन्हीं भौगोलिक तत्त्वों का परिणाम है।

3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)-किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति पर उस राष्ट्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का प्रभाव होता है और भारतीय विदेश नीति भी अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के प्रभाव से मुक्त नहीं है। 200 वर्ष के दीर्घकाल तक भारत को अंग्रेज़ों की दासता में रहना पड़ा, फलस्वरूप भारत अन्य राष्ट्रों की तुलना में ग्रेट ब्रिटेन के सम्पर्क में अधिक रहा और इसी कारण इंग्लैण्ड की सभ्यता व संस्कृति का भारत पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ा। अंग्रेज़ी भाषा ने भारत में दूसरी भाषा का स्थान प्राप्त कर लिया है और विश्व का ज्ञान वस्तुतः भारतीयों को अंग्रेजों द्वारा ही हुआ। अत: दोनों के विचारों व दृष्टिकोण में समानता होनी स्वाभाविक है। यद्यपि भारतीयों ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए निरन्तर कष्ट सहे और अथक संघर्ष किया, परन्तु सशस्त्र क्रान्ति की आवश्यकता नहीं पड़ी और द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् बदलती हुई परिस्थितियों के कारण अंग्रेज़ों ने स्वयं अपने प्रभुत्व का अन्त कर दिया जिस कारण दोनों देशों में इस पृष्ठभूमि के कारण आज भी मित्रता बनी हुई है और भारत राष्ट्रमण्डल का सदस्य भी है।

भारत व पाकिस्तान के सम्बन्धों के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का महत्त्वपूर्ण योगदान है। स्वतन्त्रता संघर्ष में मुसलमानों ने एक पृथक् राष्ट्र की मांग की और भारत दो टुकड़ों में विभाजित हो गया। भारतीय इस विभाजन का कारण मुसलमानों को मानते हैं। भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है इसलिए वह किसी धर्म से मतभेद नहीं करता, पाकिस्तान एक इस्लामी राज्य है और भारत में रहने वाले 18 करोड़ मुसलमानों के प्रति अपनी विशेष ज़िम्मेदारी का अहसास करवाना चाहता है। मध्यकालीन युग में मुसलमानों ने भारत को रौंदा व शासन किया और आज भी पाकिस्तान ऐसा अनुभव करता है कि वह पुनः भारत को जीत सकता है। मध्यकालीन युग की स्मृति आज भी दोनों राष्ट्रों के सम्बन्धों व धारणाओं को प्रभावित करती है। कश्मीर समस्या इसी कारण हल नहीं हो पा रही क्योंकि पाकिस्तान वहां के बहुसंख्यक मुसलमानों पर अपना अधिकार मानता है जबकि भारत कश्मीर को अपना अभिन्न अंग मानता है। भौगोलिक दृष्टि से इन दोनों राष्ट्रों का हित सहयोग की नीति के अन्तर्गत है, परन्तु ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इनके सम्बन्धों को कटु बनाती है।

चिरकाल तक साम्राज्यवाद के कारण शोषित व परतन्त्र रहने के कारण भारत की विदेश नीति पर प्रभाव पड़ा है और अब इसकी विदेश नीति का मुख्य सिद्धान्त साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का विरोध करना है और इसी कारण भारत एशिया व अफ्रीका में होने वाले स्वाधीनता संघर्षों का समर्थन करता रहा है।

4. आर्थिक तत्त्व (Economic Factors)-भारत की विदेश नीति के निर्धारण में आर्थिक तत्त्व ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भारत स्वतन्त्र हुआ उस समय भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। भारत में उस समय अनाज की भारी कमी थी और वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं। भारत अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए अमेरिका और ब्रिटेन पर निर्भर करता था। भारत का विदेशी व्यापार मुख्यतः ब्रिटेन व अमेरिका के साथ था। जिन मशीनरियों व खाद्य सामग्रियों को विदेशों में मंगवाना होता है वह भी उसे इन देशों से ही मुख्यतः प्राप्त करनी होती हैं और साथ ही अमेरिका व ब्रिटेन की पर्याप्त पूँजी भारत के अनेक कल-कारखानों में लगी हुई है और इनके साथ में यह स्वाभाविक था कि भारत की विदेश नीति पश्चिमी पूंजीवादी राज्यों के प्रति सद्भावनापूर्ण रही। 1950 के पश्चात् भारत और सोवियत संघ धीरे-धीरे एक-दूसरे के नजदीक आने लगे और भारत सोवियत संघ तथा अन्य समाजवादी देशों से तकनीकी तथा आर्थिक सहायता प्राप्त करने लगा।

दोनों गुटों से आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाई। पिछले कुछ वर्षों में भारत व रूस में भी व्यापारिक सम्बन्धों में वृद्धि हुई है, परन्तु अमेरिका व ब्रिटेन की तुलना में भारत का व्यापार साम्यवादी देशों के साथ अभी बहुत कम है। यदि भारत का सम्बन्ध पूंजीवादी राष्ट्र से मैत्रीपूर्ण न रहे तो इस विदेशी नीति के परिवर्तन से उसकी आर्थिक व्यवस्था को भारी आघात पहुंच सकता है। आजकल भारत अपने विदेशी व्यापार में वृद्धि करने के लिए एशिया और अफ्रीका के विकासशील देशों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर रहा है। वास्तव में भारत की विदेश नीति और इसके आर्थिक विकास में घनिष्ट सम्बन्ध है।

(क) जनसंख्या (Population) हमारे देश की विदेशी नीति को इसकी जनसंख्या भी प्रभावित करती है। इसी के कारण किसी राष्ट्र का विकास मन्द हो सकता है और एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र की सहायता पर निर्भर होना पड़ता है। जनसंख्या के कारण ही बड़ा राष्ट्र भी थोड़ी जनसंख्या वाले राज्य की तुलना में कमज़ोर प्रतीत होता है। भारत जैसा विशाल देश जनसंख्या के कारण आर्थिक विकास के कार्यों में जापान और अमेरिका की तुलना में कमजोर रह जाता है। इसके अतिरिक्त हमें सैनिक व्यय में भी कटौती करनी पड़ती है। इस जनसंख्या के कारण ही हमें विदेशों पर खाद्य सामग्री के लिए भी आश्रित होना पड़ता है। मोरगैन्थों के अनुसार, भारत ऐसा प्रमुख उदाहरण है, जिसकी विदेश नीति अन्न संकट के कारण कमज़ोर हुई है।

(ख) प्राकृतिक सम्पदा (Natural Sources)-किसी राष्ट्र की विदेशी नीति को निःसन्देह उस देश की प्राकृतिक सम्पदाएं भी पर्याप्त प्रभावित करती हैं। प्राकृतिक सम्पदाएं राष्ट्र के उद्योग व व्यापार के विकास का कारण होती हैं। अमेरिका व रूस के पास प्राकृतिक सम्पदाएं अधिक थीं जिनसे ये राष्ट्र आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर बने और सैनिक शक्ति को प्राप्त करने में सफल हुए। भारत की स्वतन्त्र विदेश नीति में भी इन प्राकृतिक सम्पदाओं का अपना स्थान है।

(ग) प्राविधिकी (Technology)-प्रत्येक राष्ट्र को आर्थिक विकास की प्राप्ति के लिए प्रारम्भ में विदेशी सहायता व प्राविधिकी पर निर्भर होना पड़ा है। उदाहरणतया अमेरिका प्रारम्भ में विदेशी धन व प्राविधिकी पर निर्भर रहा, जापान को समृद्ध व सशक्त बनने के लिए विदेशी धन पर नहीं बल्कि विदेशी प्राविधिकी पर अधिक आश्रित होना पड़ा, इसी तरह रूस को भी औद्योगिक राष्ट्र बनने के लिए विदेशी धन व प्राविधिकी की सहायता लेनी पड़ी। 1949 के पश्चात् चीनी समृद्धि के लिए रूसी पूंजी व प्राविधिकी उत्तरदायी है।

5. राष्ट्रीय हित (National Interest)-विदेश नीति के निमार्ण में राष्ट्रीय हित ने सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 4 दिसम्बर, 1947 को संविधान सभा में पण्डित नेहरू ने कहा था कि “आप चाहे कोई भी नीति अपनाएं, विदेश नीति का निर्धारण करने की कला राष्ट्रीय हित के सम्पादन में ही निहित है। हम अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति, सहयोग और स्वतन्त्रता की चाहे कितनी ही बातें करें और उनका कैसा ही अर्थ लगाएं पर अन्त में एक सरकार अपने राष्ट्र की भलाई के लिए ही कार्य करती है और कोई भी सरकार ऐसा कदम नहीं उठा सकती जो उसके राष्ट्र के लिए अहितकर हो। अतः सरकार का स्वरूप चाहे साम्राज्यवादी हो या साम्यवादी अथवा समाजवादी, उसका विदेश मन्त्री मूलत: राष्ट्रीय हित के लिए ही सोचता है।”

6. विचारधारा का प्रभाव (Impact of Ideology)-विदेश नीति का निर्माण करने से उस देश की विचारधारा का महत्त्वपूर्ण प्रभाव होता है। राष्ट्रीय आन्दोलन के समय कांग्रेस ने अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में तरह-तरह के आदर्श संसार के सामने प्रस्तुत किए थे। कांग्रेस ने सदैव विश्व शान्ति और शान्तिपूर्ण सह-जीवन का समर्थन तथा साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का घोर विरोध किया। सत्तारूढ़ होने पर कांग्रेस को अपनी विदेश नीति का निर्माण इन्हीं आदर्शों पर करना था। कांग्रेस महात्मा गांधी के आदर्शों तथा सिद्धान्तों से भी काफ़ी प्रभावित थी।

अत: भारत की विदेश नीति गांधीवाद से काफ़ी प्रभावित थी। इसलिए भारत की विदेश नीति में विश्व-शान्ति पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। समाजवादी देशों के प्रति भारत की सहानुभूति बहुत कुछ मार्क्सवादी प्रभाव का परिणाम मानी जाती है। पश्चिमी के उदारवाद का भी भारत की विदेश नीति पर काफ़ी प्रभाव है। हमारी विदेश नीति के निर्माता पं० नेहरू पश्चिमी लोकतन्त्रीय परम्पराओं से बहुत प्रभावित थे। वे पश्चिमी लोकतन्त्र और साम्यवाद दोनों की अच्छाइयों को पसन्द करते थे और उनकी बुराइयों से दूर रहना चाहते थे। अतः गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया गया। वर्तमान में साम्यवादी विचारधारा लुप्त होती जा रही है। साम्यवादी देशों ने अपनी विचारधाराओं में परिवर्तन किए हैं। इसलिए अब वह आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण पर बल दे रहे हैं। भारत पर भी इस विचारधारा के स्पष्ट चिन्ह दिखाई दे रहे हैं।

7. अन्तर्राष्ट्रीय तत्त्व (International Factors)—भारत की विदेश नीति के निर्धारण में अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भारत स्वतन्त्र हुआ उस समय रूसी गुट और अमरीकी गुट में शीत युद्ध चल रहा था। संसार के प्रायः सभी देश उस समय दो गुटों में विभाजित थे। पं० जवाहर लाल नेहरू ने किसी एक गुट में शामिल होने के स्थान पर गुटों से अलग रहना देश के हित में समझा। अत: भारत ने गुट-निरपेक्ष नीति का अनुसरण किया। पिछले कुछ वर्षों से अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति में परिवर्तन हुआ है। अमेरिका और चीन के सम्बन्धों में सुधार हुआ है और अमेरिका और पाकिस्तान बहुत नज़दीक है। इस अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति के कारण भारत और रूस और समीप आए हैं। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में अमेरिका ही एकमात्र सुपर शक्ति रह गया है। इसीलिए भारत भी अमेरिका के साथ अपने आर्थिक, सामाजिक सम्बन्धों को मज़बूत बनाने की दिशा में प्रयास कर रहा है।

8. सैनिक तत्त्व (Military Factors)-सैनिक तत्त्व ने भी भारत की विदेश नीति को प्रभावित किया है। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सैनिक दृष्टि से बहुत निर्बल था। इसलिए भारत ने दोनों गुटों से सैनिक सहायता प्राप्त करने के लिए गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाई। 1954 में अमेरिका और पाकिस्तान में एक सैनिक सन्धि हुई जिस कारण पाकिस्तान को अमेरिका से बहुत अधिक सैनिक सहायता मिली। भारत ने अमेरिका की इस नीति का विरोध किया और भारत ने सैनिक सहायता सोवियत संघ से प्राप्त करनी शुरू कर दी। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में अमेरिका ने खुलेआम पाकिस्तान का साथ दिया और भारत पर दबाव डालने के लिए अपना सातवां जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजा तो भारत को सोवियत संघ से 20 वर्षीय सन्धि करनी पड़ी। आजकल अमेरिका पाकिस्तान को आधुनिकतम हथियार दे रहा है, जिसका भारत ने अमरीका से विरोध किया है पर अमेरिका अपनी नीति पर अटल है। अतः भारत को भी अपनी रक्षा के लिए रूस तथा अन्य देशों से आधुनिकतम हथियार खरीदने पड़ रहे हैं।

9. राष्ट्रीय संघर्ष (National Struggle)—भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन ने विदेश नीति के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। (1) राष्ट्रीय आन्दोलन ने भारत में महाशक्तियों के संघर्ष को मोहरा बनने से बचने का संकल्प उत्पन्न किया। (2) अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक क्षेत्र में गुट-निरपेक्ष रहते हुए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की भावना जागृत हुई। (3) प्रत्येक तरह के उपनिवेशवाद, जातिवाद व रंग मतभेद का विरोध करने का साहस उत्पन्न हुआ व (4) स्वाधीनता संघर्ष के लिए सहानुभूति उत्पन्न हुई।

10. वैयक्तिक तत्त्व (Personal Factors) भारतीय विदेश नीति पर इस राष्ट्र के महान् नेताओं के वैयक्तिक तत्त्वों का भी प्रभाव पड़ा। पण्डित जवाहर लाल नेहरू के विचारों से हमारी विदेश नीति पर्याप्त प्रभावित हुई। पण्डित नेहरू साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व फासिस्टवाद के घोर विरोधी थे और वह समस्याओं का समाधान करने के लिए शान्तिपूर्ण मार्ग के समर्थक थे। वह मैत्री-सहयोग व सह-अस्तित्व के पोषक थे। साथ ही अन्याय का विरोध करने के लिए शक्ति प्रयोग के समर्थक भी थे। पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने अपने विचारों द्वारा हमारी विदेश नीति के ढांचे को ढाला।

पण्डित जवाहर लाल नेहरू के अतिरिक्त डॉ० राधाकृष्णन, कृष्णा मेनन, पणिक्कर जैसे महान नेताओं के विचारों ने भी हमारी विदेश नीति को प्रभावित किया। साम्यवादी चीन के प्रति जो प्रारम्भिक वर्षों में नीति अपनाई गई उसमें मुख्य रूप से पणिक्कर के व्यक्तित्व का प्रभाव था और भारत चीन की मैत्री का उचित अनुमान न लगा सका। उस समय पणिक्कर चीन में भारतीय राजदूत थे और पण्डित नेहरू उन्हीं की रिपोर्टों के आधार पर चीन के विषय में गलत अनुमान लगाते रहे। फलस्वरूप हमें चीन के हाथों मुंह की खानी पड़ीं, परन्तु 1962 की घटना ने हमारी विदेश नीति को यथार्थवाद की ओर अग्रसर किया। स्वर्गीय शास्त्री जी व भूतपूर्व प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी के काल में हमने अपनी विदेश नीति के मूल तत्त्वों को कायम रखते हुए उसमें व्यावहारिक तत्त्वों का भी प्रयोग किया।

शान्ति-प्रियता, सहिष्णुता, मैत्री, सहयोग एवं सह-अस्तित्व के तत्त्व आज भी हमारी विदेश नीति के आधार पर स्तम्भ हैं, किन्तु इन आधार स्तम्भों का धरातल व्यावहारिकता व यथार्थवाद पर आधारित है। शान्ति के गगनभेदी नारे ही केवल शान्ति स्थापित नहीं कर सकते हैं बल्कि इन नारों को गुन्ज़ाने वाले भारत को सर्वप्रथम सशक्त व समर्थ राष्ट्र बनाना ज़रूरी है। शत्रु राष्ट्रों का मुकाबला करने के लिए भारत को एक शक्तिशाली सैन्य राष्ट्र बनाना अनिवार्य हैं अन्यथा शान्ति व सहयोग का नारा गुन्जायमान होने के स्थान पर कण्ठ में अवरुद्ध होकर रह जाएगा। यद्यपि भारत की किसी प्रकार की आक्रामक व विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षा नहीं है किन्तु आत्म-रक्षा के लिए सैनिक दृढ़ता अनिवार्य है तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में हमारी आवाज़ बुलन्द रह सकेगी।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 18 भारत की विदेश नीति-निर्धारक तत्त्व एवं मूलभूत सिद्धान्त

प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन करो। (Explain the main features of India’s Foreign Policy.)
अथवा
भारत की विदेश नीति के मौलिक सिद्धान्तों का वर्णन करो। (Describe Basic Principles of the Foreign Policy of India.)
अथवा
भारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन करो। (Describe main Basic Principles of Foreign Policy of India.)
अथवा
विदेश नीति क्या होती है ? भारतीय विदेश नीति के अधीन पंचशील तथा गुट-निरपेक्षता का वर्णन करें।
(What do you mean by ‘Foreign Policy’ ? Discuss the Principles of ‘Non-Alignment’ and ‘Panchsheel’ under Indian foreign policy.)
उत्तर-
विदेश नीति का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं. 1 देखें।
भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्र हुआ। यद्यपि यह सत्य है कि भारत ब्रिटिश शासन के दौरान भी अपनी विदेश नीति का निर्माण करता था और अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में भाग लेता था, परन्तु वास्तव में भारत के नेता चाहते थे कि वह एक स्वतन्त्र विदेश नीति का निर्माण करें जोकि ब्रिटिश शासन से मुक्त होकर सम्भव था। अत: 1947 में जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो यह सुनहरा अवसर भारत के नेताओं को प्राप्त हुआ और भारत ने एक नए ढंग से अपनी विदेश नीति का निर्माण करना शुरू किया। परन्तु यह शुभारम्भ बिल्कुल नया नहीं था। मार्च, 1950 में लोकसभा में भाषण देते हुए पं० जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, “यह नहीं समझा जाना चाहिए कि हम विदेश नीति के क्षेत्र में एकदम नया शुभारम्भ कर रहे हैं। यह एक ऐसी नीति है जो हमारे अतीत के इतिहास से और हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़ी हुई है। इसका विकास उन सिद्धान्तों के अनुसार हुआ है जिनकी घोषणा अतीत के समय-समय पर करते रहे हैं।”

पामर एवं पार्किंस (Palmer and Perkins) के शब्दों में, “भारत की विदेश नीति की जड़ें विगत कई शताब्दियों में विकसित सभ्यताओं के मूल में छिपी हैं और चिन्तन शैलियां, ब्रिटिश नीतियों की विरासत, स्वाधीनता आन्दोलन तथा विदेशी मामलों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहुंच, गांधीवादी दर्शन के प्रभाव, अहिंसा तथा साध्य और साधनों के महत्त्व के गांधीवादी सिद्धान्तों आदि का प्रभावशाली योग रहा है।”

भारत की विदेश नीति की विशेषताएं (FEATURES OF INDIA’S FOREIGN POLICY)-

भारत की विदेश नीति की निम्नलिखित मुख्य विशेषताएं हैं-

1. गुट-निरपेक्षता की नीति (Non-Alignment) भारत की विदेश नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गटनिरपेक्षता है। भारत एक गुट-निरपेक्ष देश है और इसकी विदेश नीति भी गुट-निरपेक्षता पर आधारित है। पं० नेहरू ने कहा था-“जहां तक सम्भव हो, हम इन शक्ति गुटों से अलग रहना चाहते हैं, जिनके कारण पहले भी महायुद्ध हुए हैं और भविष्य में भी हो सकते हैं।” गुट-निरपेक्षता का अर्थ है-अपनी स्वतन्त्र नीति। जब तक भारत के प्रधानमन्त्री नेहरू रहे तब तक भारत पूर्ण रूप से गुट-निरपेक्षता की नीति पर बल देता रहा। अप्रैल, 1955 में बांडुंग सम्मेलन हुआ जिसमें गुट-निरपेक्षता का नारा दिया गया और उस समय से यह काफ़ी लोकप्रिय है। परन्तु 1962 में जब भारत पर चीन ने आक्रमण किया और भारत की युद्ध में हार हुई तो इसका विश्वास गुट-निरपेक्षता पर धीरे-धीरे कम होने लगा और भारत ने भी अन्य गुटों में शामिल होने वाले देशों की तरह सोवियत संघ की ओर हाथ बढ़ाना शुरू कर दिया। इन सम्बन्धों को और घनिष्ठ बनाने के लिए भारत ने रूस के साथ 1971 में एक महत्त्वपूर्ण सन्धि की। इस सन्धि के कारण आलोचकों ने भारत की विदेश नीति पर यह आरोप लगाना शुरू कर दिया कि भारत की विदेश नीति गुट-निरपेक्ष नहीं रही है, परन्तु यह आरोप सही नहीं है।

गुट-निरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि भारत अन्य देशों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकता। भूतपूर्व जनता सरकार ने मार्च, 1977 में सत्ता में आने पर गुट-निरपेक्षता की नीति पर बल दिया। जनता पार्टी ने यह घोषणा की थी कि जिस गुट-निरपेक्षता को श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा महत्त्व दिया गया था अब उसे पूर्ण रूप से लागू किया जाएगा। सातवां गुट-निरपेक्ष सम्मेलन मार्च, 1983 में दिल्ली में हुआ। भारत ने 7 मार्च, 1983 को गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का नेतृत्व सम्भाल लिया जबकि तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का नेतृत्व सम्भालते हुए सभी देशों से विश्व शान्ति, पूर्ण-नि:शस्त्रीकरण और नई आर्थिक व्यवस्था के लिए अभियान और ज्यादा तेज़ करने का आह्वान किया। इन्दिरा गांधी के पश्चात् श्री राजीव गांधी ने, वी० पी० सिंह ने, चन्द्रशेखर, पी० वी० नरसिम्हा राव, एच० डी० देवेगौड़ा, इन्द्र कुमार गुजराल, डा० मनमोहन सिंह और श्री नरेन्द्र मोदी ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया।

2. विश्व शान्ति और सुरक्षा की नीति (Policy of World Peace and Security)-भारत की विदेश नीति का सिद्धान्त, विश्वशान्ति और सुरक्षा को बनाए रखना है। भारत अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने के पक्ष में है। इसके लिए भारत आपसी बातचीत द्वारा या मध्यस्थता के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को हल करने के पक्ष में है। भारत ने सदैव विश्वशान्ति की स्थापना और सुरक्षा की नीति ही अपनाई है। यद्यपि पाकिस्तान ने भारत पर कई बार आक्रमण किया है तब भी भारत ने आपसी बातचीत के द्वारा पाकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने की कोशिश की है। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया और भारत का काफ़ी क्षेत्र अपने अधीन कर लिया तब भी भारत-चीन के साथ सम्बन्ध सुधारने के लिए प्रयास कर रहा है।

3. साम्राज्यवादियों तथा उपनिवेशियों का विरोध (Opposition of Imperialists and Colonialists)भारत स्वयं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का शिकार रहा है जिस कारण भारत ने सदैव साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध किया है। भारत साम्राज्यवाद को विश्वशान्ति का शत्रु मानता है और साम्राज्यवाद युद्ध को जन्म देता है। इसलिए भारत के नेताओं ने समय-समय पर दूसरे देशों में जाकर व संयुक्त राष्ट्र में भाषण देकर दूसरे देशों की समस्याओं को सुलझाने के साथ-साथ गुलाम देशों को साम्राज्यवाद से मुक्त करवाने का प्रयत्न किया है। भारत ने सभी गुलाम देशों में चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलन का समर्थन किया है और जब भी साम्राज्यवाद ने अपने पैर जमाने का प्रयास किया है तभी भारत ने उसका विरोध किया है। उदाहरण के लिए, द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् जब हालैण्ड ने इण्डोनेशिया पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहा तो भारत ने उसका विरोध किया। इसीलिए भारत ने एशिया तथा अफ्रीका के देशों को संगठित किया और संयुक्त राष्ट्र में इण्डोनेशिया की स्वतन्त्रता का प्रश्न उठाया। सच्चाई यह है कि इण्डोनेशिया को स्वतन्त्र करवाने में भारत ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

1956 में जब इंग्लैण्ड तथा फ्रांस ने मिल कर स्वेज नहर पर कब्जा करने के लिए हमला किया तब भारत ने मिस्र (Egypt) का साथ दिया और इंग्लैण्ड तथा फ्रांस को आक्रमणकारी घोषित किया। इसी प्रकार भारत ने मलाया, अल्जीरिया, कांगो, मोराक्को आदि देशों को स्वतन्त्र करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने क्यूबा (Cuba) पर अपना अधिकार जमाने का प्रयास किया तब भारत ने इसका विरोध किया। भारत की भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने कई बार संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा को सम्बोधित करते हुए उपनिवेशवाद को पूरी तरह समाप्त करने की अपील की। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने उपनिवेशवाद को पूरी तरह समाप्त करने की अपील की।

भूतपूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने उपनिवेशवाद विरोधी नीति को बुलन्द किया है। सितम्बर, 1986 में भारत के विदेश मन्त्री शिवशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में नामीबिया को दक्षिण अफ्रीका से मुक्त कराने के लिए एक दस सूत्रीय कार्यवाही योजना का प्रस्ताव रखा। दिसम्बर, 1989 में भारत ने पनामा में अमरीकी सैनिक हस्तक्षेप की निन्दा करते हुए मांग की कि वहां से अपनी सेनाएं तुरन्त वापस बुलाए।

4. जाति, रंग व भेदभाव की नीति के विरुद्ध (Opposed to the Policy of Caste, Colour and Discriminations etc.)-भारत की विदेश नीति का एक अन्य मूल सिद्धान्त यह है कि भारत ने जाति, रंग व भेदभाव की नीति के विरुद्ध सदैव आवाज़ उठाई है। भारत शुरू से ही जाति-पाति के बन्धन को समाप्त करने के पक्ष में रहा है और उसने अपनी विदेश नीति द्वारा समय-समय पर ऐसे प्रयत्न किए हैं जिनसे वह इस नीति को विश्व से समाप्त कर सके। अमेरिका में नीग्रो तथा दक्षिणी अफ्रीका में काले लोगों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जा रहा। भारत ने दक्षिण अफ्रीका की सरकार का विरोध किया है और इसी तरह रोडेशिया (जिम्बाब्वे) में भारत गोरे लोगों के शासन को समाप्त करवाने के पक्ष में रहा है। राजीव गांधी ने संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्दर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और विश्व नेताओं से अपनी बातचीत में दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति की कड़ी आलोचना की है।

राजीव गांधी ने रंगभेद की नीति को मानवता के नाम पर कलंक बताते हुए कहा है कि दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद को समाप्त करने के लिए विश्व समुदाय तत्काल व्यापक व सम्बद्ध कार्यक्रम प्रारम्भ करे। राजीव गांधी के मतानुसार रंगभेद को समाप्त करने का सबसे प्रभावी तरीका दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार के खिलाफ व्यापक और अनिवार्य आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना है। श्री राजीव गांधी ने विश्व समुदाय का आह्वान किया कि प्रिटोरिया शासन का समर्थन करने वाली एक मात्र आधा दर्जन सरकारों को पीछे धकेल कर दक्षिणी अफ्रीका के विरुद्ध कठोर कदम उठाए और उसे मज़बूर करे कि वह अश्वेतों से बातचीत करें और रंगभेद की नीति समाप्त करें। जाति, रंग व भेदभाव को खत्म करने के लिए 27 अप्रैल, 1994 को दक्षिणी अफ्रीका में बहु-जातीय चुनाव हुए।

5. अन्य देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध (Friendly relations with other States)-भारत की विदेश नीति की एक अन्य विशेषता यह है कि भारत विश्व के अन्य देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए सदैव तैयार रहता है। भारत ने न केवल मित्रतापूर्ण सम्बन्ध एशिया के देशों से ही बढ़ाए हैं बल्कि उसने विश्व के अन्य देशों से भी अपने सम्बन्ध बढ़ाए हैं। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने कई बार स्पष्ट शब्दों में घोषणा की थी कि भारत सभी देशों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। 11 फरवरी, 1981 को प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने निर्गुट राष्ट्रों के विदेश मन्त्रियों के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि हमने उपनिवेशवाद से मुक्ति पाई है और अब सभी देशों को मित्र बनाने की प्रक्रिया में लगे हुए हैं। हमें अन्यों की सुरक्षा की छतरी नहीं चाहिए, हम तो सभी देशों को मित्र बनाना चाहते हैं।

श्रीमती गांधी ने कहा जहां मैत्री है हम उसे मज़बूत करना चाहते हैं, जहां उदासीनता है वहां सद्भाव और रुचि पैदा करने का प्रयत्न और जहां शत्रुता है वहां हम उसे कम करने की कोशिश कर रहे हैं। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कई बार स्पष्ट घोषणा की कि भारत सभी देशों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। वी० पी० सिंह और पी० वी० नरसिम्हा राव की सरकार ने अन्य देशों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रयास किए। निःसन्देह भारत सरकार ने अपने पड़ोसी देशों के साथ ही बड़ी शक्तियों के साथ भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध कायम करने के लिए कुछ भी कसर नहीं उठा रखी है। वर्तमान समय में श्री नरेन्द्र मोदी की सरकार भी अन्य देशों से मित्रता के सम्बन्ध कायम करने के प्रयत्न कर रही है।

6. एशियाई अफ्रीकी देशों का संगठन (Unity of Afro-Asian Countries)-भारत ने पारस्परिक आर्थिक तथा राजनीतिक सम्बन्धों को मज़बूत बनाने के लिए एशिया तथा अफ्रीका के देशों को संगठित करने का प्रयास किया है। भारत का विचार है कि ये देश संगठित होकर उपनिवेशवाद का अच्छी तरह से विरोध कर सकेंगे तथा अन्य एशियाई और अफ्रीकी देशों की स्वतन्त्रता के लिए वातावरण उत्पन्न कर सकेंगे। इसके अतिरिक्ति एशिया तथा अफ्रीकी देशों का संगठन होना इसलिए भी आवश्यक है ताकि वे अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा कर सकें। साम्राज्यवादी देश अथवा विकसित देश यह समझते हैं कि एशिया तथा अफ्रीका के अविकसित देश आर्थिक तथा तकनीकी सहायता के लिए उन पर निर्भर रहेंगे और वे इस प्रकार उन पर अपना प्रभुत्व जमा सकेंगे।

परन्तु भारत ने अच्छी तरह समझ लिया कि इन देशों के लिए सबसे बड़ा खतरा नव उपनिवेशवाद (NeoColonialism) है। इन देशों की मुख्य समस्या राष्ट्र निर्माण है। राष्ट्र निर्माण के दो पहलू हैं-आर्थिक और राजनीतिक। आर्थिक क्षेत्र में इन देशों को मुख्य शक्तियां सहायता देकर उसकी राजनीतिक स्वतन्त्रता को समाप्त करने के लिए तैयार बैठी थीं। अतः यह डर था कि कहीं से अविकसित देश आर्थिक सहायता के बदले महान् शक्तियों से अपनी स्वतन्त्रता का सौदा न कर बैठें। इस स्थिति के भयंकर परिणाम हो सकते हैं।

अतः भारत ने अपने हितों और अन्य देशों के हितों को देखते हुए एशिया-अफ्रीका के देशों को संगठित किया ताकि ये देश किसी गुट में सम्मिलित न हों और स्वतन्त्रता के मूल्य को समझें। भारत ने इन देशों को गुट-निरपेक्षता का रास्ता दिखाया तथा अनेक देशों ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया और इस प्रकार गुट-निरपेक्ष दोनों का एक गुट बन गया। – इस दिशा में भारत ने 1947 में ही काम करना आरम्भ कर दिया था। 1947 में दिल्ली में एशियाई देशों का सम्मेलन हुआ जिसमें एशिया के देशों के लगभग सभी राष्ट्रवादी नेता सम्मिलित हुए। इस सम्मेलन में उपनिवेशवाद को एशिया में से समाप्त करने का प्रस्ताव पास किया गया। इस प्रकार एशिया के देशों का संगठन दिल्ली में आरम्भ हुआ।

18 अप्रैल, 1995 में बांडुंग सम्मेलन हुआ। जिसमें 29 देशों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में उपनिवेशवाद की निन्दा की गई और पंचशील सिद्धान्तों को स्वीकार किया गया। भारत के प्रधानमन्त्री पं० नेहरू संयुक्त अरब गणराज्य (United Arab Republic) के कर्नल नासिर तथा यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो ने दिल्ली में एक सम्मेलन किया और एशिया तथा अफ्रीका के देशों को संगठित करने पर विचार किया। इस प्रकार भारत ने एशिया और अफ्रीका के देशों को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मई, 1994 को दक्षिणी अफ्रीका गुट निरपेक्ष देशों के समूह में शामिल हो गया।

7. संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों को महत्त्व देना (Importance to Principles of United Nations)-भारत की विदेश नीति में संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों को भी महत्त्व दिया गया है और भारत द्वारा सदा से ही यह प्रयास किया गया है कि वह विश्वशान्ति स्थापित करने के लिए युद्धों को रोके। भारत ने सदैव संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों का पालन किया है और कभी किसी देश पर हमला नहीं किया है।

1947 में जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया तब भारत ने शीघ्र ही इस विवाद को संयुक्त राष्ट्र संघ को सौंप दिया। इसी तरह 1965 और 1977 में भारत-पाकिस्तान युद्ध होने पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र की अपील पर तुरन्त युद्ध बन्द कर दिया। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियों में सक्रिय भाग लिया है और संयुक्त राष्ट्र के साथ पूरा सहयोग दिया है। भारत 7 बार सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत के डॉ० नगेन्द्र सिंह अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश तथा मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। 1989 में न्यायमूर्ति आर० एस० पाठक अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश बने। भारत संयुक्त राष्ट्र की 18 सदस्यीय निःशस्त्रीकरण समिति का सदस्य है। भारत ने समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा शान्ति की स्थापना के लिए की गई कार्यवाहियों का न केवल समर्थन किया है बल्कि सहयोग भी दिया है।

8. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत तटस्थ नहीं है (India is not neutral in International Politics)यद्यपि भारत की विदेश नीति का मुख्य आधार गुट-निरपेक्षता है, परन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि भारत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में बिल्कुल भाग नहीं लेता। भारत किसी गुट में शामिल न होने के कारण ठीक को ठीक तथा गलत को गलत कहने वाली नीति अपनाता है। पं० नेहरू के ये शब्द आज भी सजीव हैं-“जहां स्वतन्त्रता के लिए खतरा उपस्थित हो, आपको धमकी दी जाती हो तथा जहां आक्रमण होता हो, वहां न तो हम तटस्थ रह सकते हैं और न ही तटस्थ रहेंगे।”
भारत न तो रूस का पक्षपात करता है और न ही अमेरिका का। यही कारण है कि जब कोरिया का युद्ध हुआ तो भारत ने अन्य गुट-निरपेक्ष देशों की भान्ति सोवियत संघ को दोषी ठहराया और वियतनाम के युद्ध में अमेरिका को ज़िम्मेदार ठहराया।

9. राष्ट्रमण्डल की सदस्यता (Membership of Commonwealth of Nations)-भारत की विदेश नीति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता राष्ट्रमण्डल की सदस्यता है। जब भारत स्वतन्त्र हुआ तब कुछ नेताओं का विचार था कि भारत को राष्ट्रमण्डल का सदस्य नहीं रहना चाहिए क्योंकि इसकी सदस्यता भारत की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध है। परन्तु भारत का राष्ट्रमण्डल का सदस्य बनने में ही हित था और राष्ट्रमण्डल की सदस्यता की भारत की स्वाधीनता में बाधा नहीं है। राष्ट्रमण्डल स्वतन्त्र राष्ट्रों का एक स्वैच्छिक समुदाय है जो आपसी सहयोग तथा सफलता द्वारा अपनी आम समस्याओं को हल करने का प्रयत्न करते हैं। राष्ट्रमण्डल की सदस्यता ने भारत को अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाने के योग्य बनाया है। राष्ट्रमण्डल की सदस्यता भारत के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हुई है।

10. निःशस्त्रीकरण का समर्थन (Support of Disarmament)-भारत की विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण पहलू निःशस्त्रीकरण का समर्थन है। भारत ने सदा ही निःशस्त्रीकरण का समर्थन किया। भारत का अटल विश्वास है कि शस्त्रों की होड़ में स्थायी विश्व शान्ति की स्थापना नहीं हो सकती। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कई बार यह कहा था कि शस्त्रीकरण की होड़ से विश्व शान्ति को खतरा पैदा हो गया है और इस बात पर जोर दिया है कि निःशस्त्रीकरण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में भारत ने सम्पूर्ण नि:शस्त्रीकरण के लिए कई बार प्रस्ताव पेश किए हैं। अक्तूबर, 1987 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह प्रस्ताव रखा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा परमाणु हथियार वाले सभी देशों को इन हथियारों का प्रसार रोकने के लिए सहमत कराए और साथ ही इन हथियारों का उत्पादन पूरी तरह रोकना चाहिए तथा हथियारों को बनाने के लिए काम में आने वाले विस्फोटक पदार्थ के उत्पादन में भी पूरी तरह कटौती करनी चाहिए।

11. भारत की परमाणु नीति (Atomic Policy of India)-भारत की विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण पहलू इसकी परमाणु नीति है। हालांकि स्वतन्त्रता के एक लम्बे समय तक भारत परमाणु सामग्री में अधिक सम्पन्न नहीं था, लेकिन फिर भी उसकी परमाणु नीति बिल्कुल स्पष्ट थी। 1974 और 1998 में किए गए परमाणु विस्फोटों ने भारत की परमाणु क्षमता से विश्व को अवगत करा दिया है। अब भारत एक परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र है। इन्दिरा गांधी से लेकर वर्तमान सरकारों तक सभी का भारत की परमाणु नीति के विषय में एक स्पष्ट दृष्टिकोण रहा है। भारत परमाणु शक्ति का शांतिपूर्ण उपायों के प्रयोग करने का समर्थक रहा है। भारत हमेशा निःशस्त्रीकरण का समर्थक रहा है और विश्व में परमाणु अस्त्रों की होड़ की कड़ी आलोचना करता है। इतना ही नहीं भारत सरकार का यह भी कहना है कि वह आक्रमण के समय परमाणु हथियार गिराने की पहल नहीं करेगी।

भारत एक निश्चित समय-सीमा के अन्तर्गत विश्व से सभी परमाणु अस्त्रों की समाप्ति चाहता है। भारत परमाणु शक्ति के विषय में किसी भी भेदभावपूर्ण संधि को स्वीकार नहीं करता। यही कारण है कि उसने 1968 में परमाणु सन्धि पर हस्ताक्षर नहीं किए। वर्तमान में भी भारत ने ‘व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध सन्धि’ (सी० टी० बी० टी०) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं क्योंकि यह सन्धि भी भेदभावपूर्ण है। आज भारत की परमाणु नीति बिल्कुल स्पष्ट है कि उसने परमाणु बम बनाने के सभी विकल्प खुले रखे हुए हैं।

12. पंचशील (Panchsheel)-भारत की विदेश नीति का एक और महत्त्वपूर्ण भाग है पंचशील, जो भारत की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को एक महत्त्वपूर्ण देन है। यह सिद्धान्त 1954 में बड़ा लोकप्रिय हुआ जब भारत और चीन के बीच तिब्बत प्रश्न पर सन्धि हुई। राज्यों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखने के लिए पांच सिद्धान्तों की रचना की गई, जिसे पंचशील के नाम से पुकारा जाता है। भारत द्वारा जब भी कोई निर्णय अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर लिया जाता है तो वह इन पांच सिद्धान्तों को सामने रख कर लेता है। भारत ने सदैव प्रयास किया है कि इन पांच सिद्धान्तों को अन्य देश भी स्वीकार करें। ये सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

  • राष्ट्रों को एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना चाहिए।
  • किसी राष्ट्र को दूसरे पर आक्रमण नहीं करना चाहिए।
  • कोई भी राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे।
  • विश्व के सभी देश एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करें चाहे वह अमीर हों या गरीब, कम क्षेत्र वाले हों या अधिक क्षेत्र वाले, छोटे हों या बड़े।
  • शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व अर्थात् सभी राष्ट्र एक-दूसरे के साथ मिल-जुल कर शान्तिपूर्वक रहें।

अप्रैल, 1955 में बांडुंग सम्मेलन हुआ जिसमें विश्व के सभी गुट-निरपेक्ष देशों ने भाग लिया और भारत ने भी भाग लिया, जिसके दौरान पंचशील सिद्धान्तों में पांच और सिद्धान्त जोड़ दिए गए

  • मानवीय मौलिक अधिकारों का सम्मान करना।
  • अकेले अथवा सामूहिक ढंग से आत्म-सुरक्षा करना अर्थात् यदि कोई देश भारत पर आक्रमण कर देता है तो वह चुपचाप न बैठ कर आक्रमणकारी का मुकाबला करेगा। परन्तु स्वयं युद्ध के लिए कभी पहल नहीं करेगा। 1962 में चीन आक्रमण, 1965 में पाकिस्तान तथा 1971 में बंगला देश की समस्या को लेकर पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत ने डट कर मुकाबला किया।
  • भारत जितने भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के समझौते या सन्धियां करेगा वह आत्म-निर्भर हो कर करेगा न किसी दबाव में आकर करेगा।
  • विभिन्न देशों के साथ होने वाले झगड़ों को भारत शान्तिपूर्वक निपटाएगा।

13. क्षेत्रीय सहयोग (Regional Co-operation)-भारत का सदा ही क्षेत्रीय सहयोग में विश्वास रहा है। भारत ने क्षेत्रीय सहयोग की भावना को विकसित करने के लिए 1985 में क्षेत्रीय सहयोग के लिए दक्षिण-एशियाई संघ (South Asian Association of Regional Co-operation) की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे संक्षेप में ‘सार्क’ (SAARC) कहा जाता है। इस संघ में भारत के अतिरिक्त पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, भूटान, नेपाल, अफगानिस्तान तथा मालद्वीप भी शामिल हैं।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 18 भारत की विदेश नीति-निर्धारक तत्त्व एवं मूलभूत सिद्धान्त

प्रश्न 3.
परिवर्तित अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण में भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति की प्रासंगिकता की व्याख्या करें।
(Discuss the Relevance of India’s Policy of Non-alignment in changing International Scenario.)
उत्तर-
शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् फरवरी, 1992 में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के विदेश मन्त्रियों के सम्मेलन में मिस्र ने कहा था कि सोवियत संघ के विघटन, सोवियत गुट तथा शीत युद्ध की समाप्ति के बाद गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है। अत: इसे समाप्त कर देना चाहिए। परन्तु न तो यह कहना उचित होगा कि गुट-निरपेक्ष आन्दोलन अप्रासंगिक हो गया और न ही यह कि इसे समाप्त कर देना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का औचित्य निम्नलिखित रूप से देखा जा सकता है-

  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विकासशील देशों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
  • निशस्त्रीकरण, विश्व शान्ति एवं मानवाधिकारों का सुरक्षा के लिए गुट-निरपेक्ष आन्दोलन आज भी प्रासंगिक
  • नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना के लिए गुट-निरपेक्ष आन्दोलन आवश्यक है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ को अमेरिका के प्रभुत्व से मुक्त करवाने के लिए भी इसका औचित्य है।
  • उन्नत एवं विकासशील देशों में सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए गुट-निरपेक्ष आन्दोलन आवश्यक है।
  • अशिक्षा बेरोजगारी, आर्थिक समानता जैसी समस्याओं के समूल नाश के लिए गुट-निरपेक्ष आन्दोलन आवश्यक है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का लोकतांत्रिक स्वरूप इसकी सार्थकता को प्रकट करता है।
  • गुट-निरपेक्ष देशों की एकजुटता ही इन देशों के हितों की रक्षा कर सकती है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में लगातार बढ़ती सदस्य संख्या इसके महत्त्व एवं प्रासंगिकता को दर्शाती है। आज गुटनिरपेक्ष देशों की संख्या 25 से बढ़कर 120 हो गई है अगर आज इस आन्दोलन का कोई औचित्य नहीं रह गया है या कोई देश इसे समाप्त करने की मांग कर रहा है तो फिर इसकी सदस्य संख्या बढ़ क्यों रही है। इसकी बढ़ रही सदस्य संख्या इसकी सार्थकता, महत्त्व एवं इसकी ज़रूरत को दर्शाती है।
  • गुट-निरपेक्ष देशों का आज भी इस आन्दोलन के सिद्धान्तों में विश्वास एवं इसके प्रति निष्ठा इसके महत्त्व को बनाए गए हैं।
    अत: यह कहना कि वर्तमान एक ध्रुवीय विश्व में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन अप्रासंगिक हो गया है, उचित नहीं लगता।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
विदेश नीति से क्या भाव है ?
अथवा
विदेश नीति से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
विदेश नीति उन सिद्धान्तों और साधनों का एक समूह है जो राष्ट्र अपनी राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करने, अपने उद्देश्यों को सही बताने और उनको प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। विभिन्न राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए और अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण को अपने व्यवहार के अनुसार बनाने के लिए विदेश नीति का प्रयोग करता है।
डॉ० महेन्द्र कुमार के शब्दों में, “विदेश नीति कार्यों की सोची समझी क्रिया दिशा है जिससे राष्ट्रीय हित की विचारधारा के अनुसार विदेशी सम्बन्धों में उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है।”
रुथना स्वामी के शब्दों में, “विदेश नीति ऐसे सिद्धान्तों और व्यवहार का समूह है जिनके द्वारा राज्य के अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों को नियमित,किया जाता है।”

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प्रश्न 2.
गुट-निरपेक्षता का क्या अर्थ है ?
अथवा
भारत की गुट-निरपेक्ष विदेश नीति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
गुट-निरपेक्षता का अर्थ है किसी शक्ति गुट में शामिल न होना और शक्तिशाली गुटों के सैनिक बन्धनों व अन्य सन्धियों से दूर रहना। पण्डित नेहरू ने कहा था, “जहां तक सम्भव होगा हम उन शक्ति गुटों से अलग रहना चाहते हैं जिनके कारण पहले भी महायुद्ध हुए हैं और भविष्य में भी हो सकते हैं।” गुट-निरपेक्षता का यह भी अर्थ है कि देश अपनी नीति का निर्माण स्वतन्त्रता से करेगा न कि किसी गुट के दबाव में आकर । गुंट-निरपेक्षता का अर्थ अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में तटस्थता नहीं है बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के हल के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना है। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट कहा था कि गुट-निरपेक्षता का अर्थ अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति उदासीनता नहीं है। स्वर्गीय प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी के अनुसार, “गुट-निरपेक्षता में न तो तटस्थता है और न ही समस्याओं के प्रति उदासीनता। इसमें सिद्धान्त के आधार पर सक्रिय और स्वतन्त्र रूप से निर्णय करने की भावना निहित है।” भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति एक सकारात्मक नीति है, केवल नकारात्मक नहीं है।

प्रश्न 3.
भारतीय विदेश नीति की तीन विशेषताएं बताइए।
अथवा
भारत की विदेश नीति के कोई चार मूल सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर-
भारत की विदेश नीति की मुख्य विशेषताएं या सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

  • गुट-निरपेक्षता–भारत की विदेश नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुट-निरपेक्षता है।
  • विश्व शान्ति और सुरक्षा की नीति-भारत की विदेश नीति का आधारभूत सिद्धान्त विश्व शान्ति और सुरक्षा को बनाए रखना है। भारत अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने के पक्ष में है। भारत ने सदैव विश्व शान्ति की स्थापना और सुरक्षा की नीति अपनाई है।
  • साम्राज्यवादियों तथा उपनिवेशों का विरोध-भारत स्वयं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का शिकार रहा है जिसके कारण भारत ने सदैव साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध किया है। भारत साम्राज्यवाद को विश्व शान्ति का शत्रु मानता है और साम्राज्यवाद युद्ध को जन्म देता है।
  • भारत ने सदैव ही जाति, रंग व भेदभाव की नीति के विरुद्ध विश्व में आवाज़ उठाई है।

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प्रश्न 4.
पंचशील क्या है ? भारतीय पंचशील के सिद्धान्त बताएं।
अथवा
पंचशील से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
पंचशील भारत की विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। पंचशील भारत की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को एक महत्त्वपूर्ण देन है। यह सिद्धान्त 1954 में बड़ा लोकप्रिय हुआ जब भारत और चीन के बीच तिब्बत के प्रश्न पर सन्धि हुई। दोनों राज्यों के बीच मैत्री के सम्बन्ध बनाए रखने के लिए पांच सिद्धान्तों की रचना की गई, जिन्हें पंचशील के नाम से पुकारा जाता है। ये सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

  • राष्ट्र को एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना चाहिए।
  • किसी राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण नहीं करना चाहिए।
  • विश्व के सभी देश एक-दूसरे के समान माने जाएं तथा सहयोग करें चाहे वे अमीर हों या ग़रीब, कम क्षेत्र वाले हों या बड़े क्षेत्र वाले, छोटे हों या बड़े।
  • कोई भी राष्ट्र दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे।
  • शान्तिपूर्ण सह-अस्तुित्व अर्थात् सभी राष्ट्र एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहें।

प्रश्न 5.
भारतीय विदेश नीति के मुख्य निर्धारक तत्त्वों का वर्णन करें।
अथवा
भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने वाले किन्हीं चार तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने में अनेक तत्त्वों ने सहयोग दिया है जिसमें मुख्य निम्नलिखित हैं.

  • संवैधानिक आधार–भारत के संविधान में राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए, बताया गया है। अनुच्छेद 51 के अनुसार भारत सरकार को अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा को बढ़ावा देना चाहिए तथा दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाने चाहिए।
  • राष्ट्रीय हित-विदेशी नीति के निर्माण में राष्ट्रीय हित ने सर्वाधिक भूमिका निभाई है। भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति अपने हितों की रक्षा के लिए अपनाई है। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रमण्डल का सदस्य और संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनना स्वीकार किया है।
  • आर्थिक तत्त्व-भारत की विदेश नीति के निर्धारण में आर्थिक तत्त्व ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • राष्ट्रीय हित-भारतीय विदेश नीति का एक अन्य निर्धारक तत्व राष्ट्रीय हित है।

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प्रश्न 6.
भारत की परमाणु नीति क्या है ?
अथवा
भारत की परमाणु नीति का वर्णन करें।
उत्तर-
भारत एक स्वतन्त्र राष्ट्र है और वह स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी विदेश नीति का संचालन करता है। भारत की विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी परमाणु नीति (Atomic Policy) है। हालांकि स्वतन्त्रता के एक लम्बे समय तक भारत परमाणु सामग्री में अधिक सम्पन्न नहीं था लेकिन फिर भी उसकी परमाणु नीति बिल्कुल स्पष्ट थी। 1974 और 1998 में किए गए परमाणु विस्फोटों ने भारत की परमाणु क्षमता से विश्व को अवगत करा दिया है। अब भारत एक परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र है। इन्दिरा गान्धी से लेकर वर्तमान सरकारों तक सभी का भारत की परमाणु नीति के विषय में एक स्पष्ट दृष्टिकोण रहा है। भारत परमाणु शक्ति का शान्तिपूर्ण उपायों के लिए प्रयोग करने का समर्थक रहा है। भारत हमेशा निःशस्त्रीकरण का समर्थक रहा है और विश्व में परमाणु अस्त्रों की होड़ की कड़ी आलोचना करता है। इतना ही नहीं भारत सरकार का यह भी कहना है कि वह आक्रमण के समय परमाणु बम गिराने की पहल नहीं करेगी।

प्रश्न 7.
भारत की अपने पड़ोसी देशों के प्रति क्या नीति है ?
उत्तर-
भारत सदैव ही पड़ोसी देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध चाहता है। भारत का मानना है कि बिना मित्रतापूर्ण सम्बन्ध के कोई भी देश सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक विकास नहीं कर सकता। इसलिए भारत ने पाकिस्तान, चीन, बंग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल एवं भूटान आदि पड़ोसी देशों से सम्बन्ध मधुर बनाये रखने के लिए समय-समय पर कई कदम उठाये हैं। उन्हीं महत्त्वपूर्ण कदमों में एक कदम सार्क की स्थापना है। इससे न केवल भारत के अन्य देशों के साथ सम्बन्ध ही मधुर होंगे, बल्कि दक्षिण एशिया और अधिक विकास कर सकेगा। भारत की नीति यह है कि पड़ोसी देशों के साथ जो भी मतभेद हैं, उन्हें युद्ध से नहीं, बल्कि बातचीत द्वारा हल किया जाना चाहिए।

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प्रश्न 8.
इसका क्या भाव है कि भारत उपनिवेशवाद और नस्लवाद का विरोधी है ?
अथवा
भारत की नस्लवाद के प्रति क्या नीति है?
उत्तर-
भारत ने सदैव ही उपनिवेशवाद तथा नस्लवाद का विरोध किया है। भारत स्वयं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का शिकार रहा है जिस कारण भारत ने सदैव साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध किया है। भारत उपनिवेशवाद को विश्व-शान्ति का शत्रु मानता है इसलिए भारत के नेताओं ने समय-समय पर दूसरे देशों में जाकर व संयुक्त राष्ट्र में भाषण देकर दूसरे देशों की समस्याओं को सुलझाने के साथ-साथ गुलाम देशों को उपनिवेशवाद से मुक्त करवाने का प्रयत्न किया है।

भारत की विदेश नीति का एक अन्य मूल सिद्धान्त यह है कि भारत ने जाति, रंग व भेदभाव की नीति के विरुद्ध सदैव आवाज़ उठाई है। भारत शुरू से ही जाति-पाति के बन्धन को समाप्त करने के पक्ष में रहा है और उसने अपनी विदेश नीति द्वारा समय-समय पर ऐसे प्रयत्न किए हैं जिनसे वह इस नीति को विश्व से समाप्त कर सके। अमेरिका में नीग्रो तथा दक्षिणी अफ्रीका में काले लोगों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जा रहा। भारत ने दक्षिणी अफ्रीका की सरकार का विरोध किया और इसी तरह रोडेशिया (जिम्बाब्बे) में भारत गोरे लोगों के शासन को समाप्त करवाने के पक्ष में रहा।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्षता का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
गुट-निरपेक्षता का अर्थ है किसी शक्ति गुट में शामिल न होना और शक्तिशाली गुटों के सैनिक बन्धनों व अन्य सन्धियों से दूर रहना। गुट-निरपेक्षता का अर्थ अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में तटस्थता नहीं है बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के हल के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना है। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट कहा था कि गुटनिरपेक्षता का अर्थ अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति उदासीनता नहीं है।

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प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति की दो विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  • गुट-निरपेक्षता–भारत की विदेश नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुट-निरपेक्षता है। गुटनिरपेक्षता का अर्थ है किसी गुट में शामिल न होना और स्वतन्त्र नीति का अनुसरण करना। भारत सरकार ने सदा ही गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया है।
  • विश्व-शान्ति और सुरक्षा की नीति-भारत की विदेश नीति का आधारभूत सिद्धान्त विश्व-शान्ति और सुरक्षा को बनाए रखना है। ..

प्रश्न 3.
पंचशील से आपका क्या भाव है?
उत्तर-
पंचशील भारत की विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। पंचशील भारत की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को एक महत्त्वपूर्ण देन है। यह सिद्धान्त 1954 में बड़ा लोकप्रिय हुआ जब भारत और चीन के बीच तिब्बत के प्रश्न पर सन्धि हुई। दोनों राज्यों के बीच मैत्री के सम्बन्ध बनाए रखने के लिए पांच सिद्धान्तों की रचना की गई, जिन्हें पंचशील के नाम से पुकारा जाता है।

प्रश्न 4.
पंचशील के कोई दो सिद्धान्त लिखें।
उत्तर-

  1. राष्ट्र को एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना चाहिए।
  2. किसी राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 5.
भारतीय विदेश नीति के मुख्य निर्धारक तत्त्वों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. संवैधानिक आधार-भारत के संविधान में राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए, बताया गया है।
  2. राष्ट्रीय हित-विदेश नीति के निर्माण में राष्ट्रीय हित ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति अपने हितों की रक्षा के लिए अपनाई है।

प्रश्न 6.
विदेश नीति से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
विदेश नीति उन सिद्धान्तों और साधनों का एक समूह है जो राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करे, अपने उद्देश्यों को सही बताए और उनको प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। विभिन्न राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए और अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण को अपने व्यवहार के अनुसार बनाने के लिए विदेश नीति का प्रयोग करते हैं।

प्रश्न 7.
भारत की परमाणु नीति क्या है?
उत्तर-
भारत की विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी परमाणु नीति (Atomic Policy) है। हालांकि स्वतन्त्रता के एक लम्बे समय तक भारत परमाण सामग्री में अधिक सम्पन्न नहीं था, लेकिन फिर भी उसकी परमाणु नीति बिल्कुल स्पष्ट थी 1974 और 1998 में किए गए परमाणु विस्फोटों ने भारत की परमाणु क्षमता से विश्व को अवगत करा दिया है। भारत परमाणु शक्ति का शान्तिपूर्ण उपायों के लिए प्रयोग करने का समर्थक रहा है।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
विदेश नीति से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
विदेश नीति उन नियमों और सिद्धान्तों का समूह है जिनके माध्यम से एक देश दूसरे देश के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है।

प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति का निर्माता किसे माना जाता है ?
उत्तर-
पण्डित जवाहर लाल नेहरू।

प्रश्न 3.
भारत की विदेश नीति के कोई दो आधारभूत सिद्धान्त लिखो। .
उत्तर-

  1. गुट-निरपेक्षता
  2. पंचशील।

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प्रश्न 4.
भारतीय विदेश नीति के कोई दो निर्धारक तत्त्व बताओ।
उत्तर-

  1. भारत की भौगोलिक स्थिति
  2. भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का इतिहास।

प्रश्न 5.
पंचशील से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
पंचशील उन पांच सिद्धान्तों का समूह है जिनका वर्णन 1954 में भारत और चीन के बीच हुए एक समझौते की प्रस्तावना में किया गया था।

प्रश्न 6.
पंचशील के दो मुख्य सिद्धान्त क्या हैं ?
उत्तर-

  1. एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखण्डता और प्रभुसत्ता का परस्पर सम्मान।
  2. किसी राष्ट्र को दूसरे पर आक्रमण नही करना चाहिए।

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प्रश्न 7.
भारत की अपने पड़ोसी देशों के प्रति क्या नीति है ?
उत्तर-
भारत ने अपने पड़ोसियों के प्रति मित्रता एवं सहयोग की नीति अपनाई है।

प्रश्न 8.
भारत के विश्व के देशों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का कोई एक सिद्धान्त बताइए।
उत्तर-
अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा को बढ़ावा।

प्रश्न 9.
क्या भारत पंचशील के सिद्धान्तों में विश्वास रखता है ?
उत्तर-
हाँ, भारत पंचशील के सिद्धान्तों में विश्वास रखता है।

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प्रश्न 10.
किस भारतीय प्रधानमन्त्री को पंचशील सिद्धान्तों का प्रतिपादक माना जाता है ?
उत्तर-
पं० जवाहर लाल नेहरू को।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. भारत को …………… को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई।
2. भारतीय …………… की महत्त्वपूर्ण विशेषता गुट-निरपेक्षता है।
3. भारतीय विदेश नीति के निर्माता …………… हैं।
4. बाडुंग सम्मेलन सन् ………… में हुआ।
5. भारत ने सदैव ही रंगभेद एवं साम्राज्यवाद का ………….. किया है।
उत्तर-

  1. 15 अगस्त, 1947
  2. विदेश नीति
  3. पं० जवाहर लाल नेहरू
  4. 1955
  5. विरोध।

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प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही या ग़लत का चुनाव करें

1. भारत एक शांतिप्रिय देश है।
2. भारत एक साम्राज्यवादी देश है।
3. भारत एक उपनिवेशवादी देश है।
4. आर्थिक तत्त्व भारतीय विदेश नीति को प्रभावित करते हैं।
5. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भारतीय विदेश नीति को प्रभावित नहीं करती।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. ग़लत
  4. सही
  5. ग़लत।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय विदेश नीति का आंतरिक निर्धारक तत्त्व है ?
(क) संवैधानिक आधार
(ख) भौगोलिक तत्त्व
(ग) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय विदेश नीति का बाहरी निर्धारक तत्त्व है?
(क) राष्ट्रीय हित
(ख) अंतर्राष्ट्रीय संगठन
(ग) आर्थिक तत्त्व
(घ) संवैधानिक आधार।
उत्तर-
(ख) अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से कौन-सी भारतीय विदेश नीति की विशेषता है ?
(क) गुट-निरपेक्षता
(ख) साम्राज्यवादियों का विरोध
(ग) उपनिवेशवादियों का विरोध
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 4.
पंचशील के सिद्धान्तों का प्रतिपादन कब किया गया ?
(क) 1954
(ख) 1956
(ग) 1958
(घ) 1960
उत्तर-
(क) 1954

प्रश्न 5.
निम्नलिखित में से कौन-सा पंचशील का सिद्धान्त है ?
(क) राष्ट्रों को एक-दूसरे की प्रभुसत्ता का सम्मान करना चाहिए
(ख) एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण नहीं करेगा।
(ग) एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के आंतरिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules.

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. जिमनास्टिक टीम के खिलाड़ी = 8
  2. मुकाबला शुरू होने पर खिलाड़ी = नहीं
  3. बदला जा सकता है। ज्यूरी का फैसला = अंतिम
  4. चोट लगने पर या बीमार होने पर इंतज़ार किया जा सकता है। = 30 मिनट
  5. विजेता टीम के कितने खिलाड़ियों के अंक गिने जाते हैं। = 6 खिलाड़ी
  6. अंक दिये जाते हैं। = 0 से 10 तक
  7. बिना ज्यूरी के खिलाड़ी खेल छोड़ सकता है। = नहीं
  8. प्रतियोगिता के लिए अधिकारी = कम से कम 3 या पाँच
  9. लड़कों के लिए मुकाबले =
    • पैरेलल बार
    • वाल्टिंग होर्स
    • ग्राऊंड जिम्नास्टिक
    • हॉरिजोंटल बार
    • रोमन डिंग
    • पोमल होर्स।
  10. लड़कियों के लिए मुकाबले =
    • बीम बैलेंस (ज़रूरी)
    • ग्राऊंड जिम्नास्टिक (ज़रूरी)
    • अनइवर बार (ज़रूरी)
    • वाल्टिंग होर्स

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
जिमनास्टिक्स का इतिहास लिखें।
उत्तर-
इतिहास (History)-जिमनास्टिक्स एक प्राचीन खेल है। 2600 ईसा पूर्व चीन में जिमनास्टिक्स के व्यायाम किए जाते थे। परंतु इसका वास्तविक विकास यूनान व रोम में शुरू हुआ। ‘जिमनास्टिक्स’ शब्द यूनानी भाषा के ‘जिम्नोस’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ ‘नग्न शरीर’ है। नग्न शरीर के द्वारा जो व्यायाम किए जाते हैं उन्हें जिमनास्टिक कहा जाता है। ये व्यायाम शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किए जाते थे। यूनान में जिमनास्टिक पर अधिक बल दिया। स्पार्टवासी अपने युवा वर्ग को जिमनास्टिक का प्रशिक्षण प्रदान कराने में अधिक कठोर थे। उन दिनों लड़कियों और लड़कों से यह आशा की जाती थी कि वह जिमनास्टिक द्वारा अपने स्वास्थ्य को ठीक रखें। यूनान और रोम की सभ्यताओं के पतन के साथ-साथ जिमनास्टिक भी यूनान और रोम से समाप्त हो गई।

जिमनास्टिक के महान् गाड फादर जॉन गुट्स मुथूस ने जिमनास्टिक को पर्शियन स्कूलों में शुरू किया। इस प्रकार जर्मनी ने जिमनास्टिक की पुनः खोज की जिस कारण सन् 1881 में अन्तर्राष्ट्रीय जिमनास्टिक फेडरेशन (International Gymnastic Federation) अस्तित्व में आई। सन् 1894 में पहली जिमनास्टिक प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था। प्रथम आधुनिक ओलम्पिक्स खेलों में पुरुषों के लिए जिमनास्टिक को शामिल किया गया जबकि महिलाओं के लिए जिमनास्टिक को सन् 1928 के ओलम्पिक्स में शामिल किया गया। सन् 1974 एशियाई खेलों में पहली बार इसको शामिल किया गया जिसका आयोजन तेहरान में हुआ था। सन् 1975 में प्रथम विश्व कप का आयोजन हुआ था। जिमनास्टिक एक मनमुग्ध, आकर्षक और अत्यन्त लोकप्रिय खेल है।
जिमनास्टिक के नये सामान्य नियम (Latest General Rules Related to Gymnastics)—

  1. पुरुष छ: इवेंट्स में भाग लेते हैं जिनमें फ्लोर एक्सरसाइजिज़, वाल्टिंग हार्स, पोमेल्ड हार्स, रोमन रिग्स, हारीजोंटल बार और पैरलल बार्स होते हैं। महिलाएं चार इवेंट्स में भाग लेती हैं जिसमें वाल्टिंग हार्स, अन-ईवन बार्स, बैलेंसिंग बीम व फ्लोर एक्सरसाइज़िज होती हैं।
  2. सभी जिमनास्ट इवेंट के शुरू होने के पहले तथा बाद में जज के सामने उपस्थित होते हैं। वह सिग्नल मिलने पर ही व्यायाम शुरू करते हैं। अगर एक्सरसाइज के समय वे गिर जाएं तो उन्हें फिर शुरू करने के लिए 30 सैकेंड का समय दिया जाता है।
  3. टीम प्रतियोगिता के लिए प्रत्येक टीम के छह जिमनास्ट प्रत्येक एपरेंट्स पर एक अनिवार्य और एक ऐच्छिक एक्सरसाइज़ करते हैं। सबसे ऊँचे पांच स्कोर को जोड़ लिया जाता है जिससे टीम के अंक जोड़े जा सकें।
  4. जिमनास्ट के लिए उचित पोशाक पहनना आवश्यक है। वह पट्टियां बांध सकता है और स्लीपर्स पहन सकता है। जुराबें भी पहन सकता है। सिग्नल मिलने पर 30 सैकेंड में ही अपनी एक्सरसाइज़ शुरू करनी होती है। होरीजोंटल बार और रोमन रिंग्ज में कोच या एक जिमनास्ट होना ज़रूरी है।

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
जिमनास्टिक के उपकरणों के बारे लिखें।
उत्तर-
खेल के मैदान एवं खेल से सम्बन्धित उपकरणों का वर्णन (Specification of Play field & Sports Equipment)—
(A) पुरुषों के लिए उपकरण (Equipment for men)
1. फर्श 12 × 12 मी०
2. पैरलल बार (Parallel Bar)
बार्स की लम्बाई = 3500 मि०मी०
बार्स की चौड़ाई = 420-520 मि०मी०
बार्स की ऊंचाई = 1750 मि०मी०
जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
3. हॉरीजोंटल बार (Horizontal Bar)
बार का व्यास = 28 मि०मी०
बार की ऊंचाई = 2.550-2.700 मि०मी०
बार की लम्बाई = 2.400 मि०मी०
जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 2
4. पोमेल हॉर्स (Pommel Horse)
पोमेल हार्स की लम्बाई = 1600 मि०मी०
पोमेल हार्स की चौड़ाई = 350 मि०मी०
फर्श की ऊँचाई = 1100 मि०मी०
जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 3
5. रोमन रिंग्स (Roman Rings)
व्यास (ग्रिप) = 28 मि०मी०
फर्श से स्टैंड की ऊँचाई = 5.500 मि०मी०
चमड़े की पट्टियों की लम्बाई = 700 मि०मी०
मोटाई = 4 मि०मी०
रिंग के अंदर का व्यास = 180 मि०मी०
फर्श से रिंग की ऊँचाई = 2.500 मि०मी०
चौड़ाई पटरियों की = 3.5 मि०मी०
जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 4
6. वॉल्टिंग हॉर्स (Vaulting Horse)
वॉल्टिंग हॉर्स की ऊँचाई = 1350 मि०मी०
मध्य में समायोजन करने वाले स्टैप्स = 50 मि०मी०
हॉर्स की ऊँचाई = 1600 मि०मी०
जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 5

महिलाओं के लिए उपकरण (Equipment for Women)
1. फर्श = 12 मी० × 12 मी०
2. वाल्टिंग हॉर्स (Vaulting Horse)
वाल्टिंग हॉर्स की ऊँचाई = 1,250 मि०मी०
मध्य में समायोजन करने वाले स्टैप्स = 100-150 मि०मी०
हॉर्स की लम्बाई = 1,600 मि०मी०
3. बैलेसिंग बीम (Balancing Beam)
बीम की ऊँचाई = 1200 मि०मी०
बीम की लम्बाई = 1500 मि०मी०
बीम की चौड़ाई = 100 मि०मी०
ऊँचाई का समायोजन = 700-1200 मि०मी०
जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 6
4. अन-ईवन बार (Uneven Bar)
अन-ईवन बार की लम्बाई = 2400 मि०मी०
फर्श से बार की ऊँचाई = 2300 मि०मी०
बार्स के बीच की दूरी = 580-900 मि०मी०
अपराइट्स का व्यास = 50-60 मि०मी०
अपराइट्स की मोटाई = 30 मि०मी०
जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 7
जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 8

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

महत्त्वपूर्ण टूर्नामैंट्स
(Important Tournaments)

  1. ओलम्पिक गेम्स
  2. एशियन गेम्ज
  3. वर्ल्ड कप
  4. आल इंडिया इन्टर यूनिवर्सिटी जिमनास्टिक्स चैम्पियनशिप
  5. नेशनल चैम्पियनशिप
  6. फेडरेशन कप
  7. स्कूल नेशनल गेम्स
  8. चाइना कप।

प्रसिद्ध खिलाड़ी
(Famous Sports Personalities)
(क) भारतीय खिलाड़ी

  1. शामलाल
  2. कु० कृपाली पटेल
  3. डॉ० कल्पना देवनाथ
  4. मोण्टू देवनाथ
  5. अन्जू दुआ
  6.  सुनीता शर्मा ।

(ख) विदेशी खिलाड़ी

  1. ओलगा कोहबुत
  2. नादिया कोमानेली
  3. नेलोकिम
  4. लुदिमिला जिस्कोवा
  5. डोवलूपी
  6. कीरनजन्ज।
  7. एलीवश सादी।

प्रश्न
जिमनास्टिक के मुख्य कौशल लिखें।
उत्तर-
जिम्नास्टिक के मुख्य कौशल (Fundamental Skill of Gymnastics) पुरुषों के इवेंट्स (Men’s Events)
(A) पैरलल बार (Parrallel Bar)

  1. अप स्टार्ट
  2. फ्रंट अपराइज
  3. शोल्डर स्टैंट
  4. हैंड स्टैंड
  5. हैंड स्टैंड विद 180° टर्न
  6. हैंड स्टैंड टु फ्रंट टर्न ऑन दि शोल्डर
  7. वैकवर्ड रोल 8. हैंड स्टैंड टू कार्ट व्हील

(B) हॉरीजोंटल बार (Horizontal Bar)

  1. अप स्टार्ट विद ओवर ग्रिप
  2. अप स्टार्ट विद अंडर ग्रिप
  3. शॉर्ट सर्कल
  4. वन लैग सर्कल विद हील फुट
  5. हील फुट
  6. स्विंग विद श्रू वाल्ट।

(C) पोमेल्ड हार्स (Pommaled Horse)

  1. फ्रंट स्पोर्ट पोजीशन
  2. सिंगल लैग हॉफ सर्कल
  3. डबल लैग सर्कल्स
  4. फ्रंट सीजर्स।

(D) रोमन रिंग्स (Roman Rings)

  1. अप स्टार्ट
  2. बैक सर्कल टू बैक हैंग
  3. मसल-अप
  4. बैक लीवर
  5. बैक अपराइज
  6. डिस्लोकेशन
  7. बैक अपराइज विद एल पोजीशन।

(E) aitcent Era (Vaulting Horse)

  1. स्ट्रैडल वॉल्ट
  2. स्कैटवाल्ट
  3. कार्ट व्हील
  4. हैंड स्टैंड टू कार्ट व्हील
  5. हैंड स्प्रिंग।

(F) फर्श पर किए जाने वाले व्यायाम (Floor Exercises)

  1. फॉरवर्ड रोल टु हैंड स्टैंड
  2. बैकवर्ड रोल टु हैंड स्टैंड
  3. फॉरवर्ड रोल टु हैंड स्प्रिंग
  4. हैंड स्प्रिंग टु डाइव रोल
  5. राउंड ऑफ टु फ्लिक-फ्लैक
  6. वन लैग हैंड स्प्रिंग
  7. हैंड स्टैंड टु फारवर्ड रोल विद स्ट्रेट लैग्स।

महिलाओं के इवेंट्स (Women Events)
(A) बैलेसिंग बीम (Balancing Beam)

  1. गैलोप स्टैप विद बैलेंस
  2. सीर्जस जम्प
  3. फारवर्ड रोल
  4. बैकवर्ड रोल
  5. कार्ट व्हील
  6. ब्रिज
  7. बैलेंस
  8. डिस्काउंट

(B) वाल्टिंग हॉर्स (Vaulting Horse)

  1. स्पलिट वॉल्ट
  2. हैंड स्प्रिंग
  3. स्कवैट वॉल्ट।

(C) अन-ईवन बार्स (Un-even Bars)

  1. स्प्रिंग ऑन अपर बार
  2. बैक अप-राइज
  3. वन लैग फारवर्ड सर्कल
  4. वन लैग बैकवर्ड सर्कल
  5. क्रास बैलेंस
  6. हैंड स्प्रिंग।

(D) फर्श के व्यायाम (Floor Exercises)

  1. फारवर्ड रोल टु हैंड स्टैंड
  2. बैकवर्ड रोल टु हैंड स्टैंड
  3. राउंड आफ
  4. स्लोबैक हैंड स्प्रिंग
  5. स्पलिट सिटिंग
  6. स्लो हैंड स्प्रिंग
  7. हैंड स्प्रिंग
  8. हैड स्प्रिंग।

खिलाड़ी
(Players)
टीम में आठ खिलाड़ी होते हैं और सभी खिलाड़ी सभी अभ्यासों में ही भाग लेते हैं। टीम चैम्पियनशिप के लिए छः सर्वोत्तम खिलाड़ियों का प्रदर्शन गिना जाता है।

अंक या प्वाइंट
(Points)

  1. प्रत्येक अभ्यास के लिए 0 से 10 तक अंक लगाए जाते हैं। एक प्वाइंट के आगे 10 भागों में बांटा जाता है।
  2. यदि निर्णायकों का पैनल पांच का हो तो उच्चतम और न्यूनतम अंकों को जोड़ दिया जाता है और मध्य के तीन अंकों की औसत ले ली जाती है।
  3. यदि पैनल तीन निर्णायकों का हो तो तीनों के अंकों को ही औसत के लिए लिया जाता है।

निर्णय
(Decision)

  1. पांच या कम-से-कम तीन निर्णायक प्रत्येक इवेंट के लिए प्रतियोगिता की समाप्ति तक रखे जाते हैं। इसमें से एक मुख्य निर्णायक माना जाता है।
  2. निर्णायक प्रत्येक उपकरण (आप्रेटस) पर पहले खिलाड़ी के कौतुक के आधार पर अंकों बारे शेष खिलाड़ियों के कौतुकों का मूल्यांकन करते हैं। अभ्यास के लिए परामर्श भी कर सकते हैं ताकि सामान्य आधार का निर्णय कर सकें।
  3. इसके पश्चात् वे स्वतन्त्र रूप में निर्णय करते हैं और किसी विशेष बात (जैसे कि दुर्घटना) के अतिरिक्त वे परामर्श नहीं करते।
  4. तीनों निर्णायकों के अंकों की औसत से परिणाम निकाला जाएगा।
  5. यदि दो निर्णायकों के अंकों में मतभेद हो तो मुख्य निर्णायक की अंकों की संख्या भी देखी जाती है।
  6. मुख्य निर्णायक का यह कर्त्तव्य है कि वह अन्य दोनों निर्णायकों की सन्धि करवाए। यदि ऐसा न हो सके तो मुख्य निर्णायक अपना निर्णय सुना सकता है।

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
जिमनास्टिक्स के साधारण नियम लिखें।
उत्तर-
प्रतियोगिता के सामान्य नियम
(General Rules of Competition)

  1. प्रतियोगिता के समय खिलाड़ियों को बदलने की आज्ञा नहीं होती।
  2. इवेंट्स के जज तथा टीमें ठीक समय पर मैदान में पहुंच जानी चाहिएं।
  3. यदि किसी खिलाड़ी की दुर्घटना हो जाए या वह बीमार पड़ जाए तो कप्तान उसी . समय डॉक्टर को सूचित करें और उसकी पुष्टि प्राप्त करें।
  4. उस खिलाड़ी को स्वस्थ होने के लिए और फिर खेल में सम्मिलित होने के लिए आधे घंटे के लिए खेल स्थगित की जा सकती है। यदि इस समय तक भी खिलाड़ी की दशा में सुधार नहीं होता तो उसे खेल से निकाल दिया जाता है और खेल आरम्भ करनी पड़ती है।
  5. टीम प्रतियोगिताएं दो भागों में होंगी। पहले अनिवार्य अभ्यासों के लिए तथा फिर ऐच्छिक अभ्यासों के लिए।
  6. केवल वही प्रतियोगी फाइनल में भाग ले सकेंगे जिन्होंने टीम प्रतियोगिता के सभी इवेंट्स में भाग लिया होगा।
  7. अनिवार्य व्यायामों में खिलाड़ी को दूसरा अवसर व्यायाम करने के लिए मिल सकता है जबकि वह खिलाड़ी यह महसूस करें कि मेरा पहले प्रदर्शन (परफारमेंस) ठीक नहीं है, या वह अपने व्यायामों के कुछ व्यायाम करना भूल गया है लेकिन मैदान व्यायामों में दूसरा अवसर नहीं दिया जाता। दूसरा अवसर प्राप्त करने के लिए पहले व्यायाम समाप्त करने के उपरान्त खिलाड़ी को हाथ खड़े करके निर्णायक को दूसरा अवसर प्राप्त करने के लिए बताना होगा। परन्तु दूसरा अवसर अपनी टीम के सभी खिलाड़ियों के भाग लेने के बाद ही लेना होता है।
  8. लम्बी दौड़ों के वाल्ट पर प्रत्येक खिलाड़ी को दो बार प्रयत्न करने का अधिकार है। सर्वोत्तम प्रदर्शन उचित स्वीकार किया जाता है।
  9. फ्री स्टैडिंग अभ्यास को दोहराया नहीं जा सकता। (10) लम्बी दौड़ों के अतिरिक्त ऐच्छिक अभ्यास को दोहराया नहीं जाता।
  10. प्रबन्धक उपकरणों की व्यवस्था करेंगे। कोई भी टीम अपने निजी उपकरण प्रयोग नहीं कर सकती।

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

PSEB 10th Class Physical Education Practical जिम्नास्टिक्स (Gymnastics)

प्रश्न 1.
जिमनास्टिक में हमें कौन-कौन से उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है ?
उत्तर-
जिमनास्टिक में निम्नलिखित सामान की आवश्यकता पड़ती है—

  1. लड़के-
    • पैरेलल बार (Parallel Bar) अनिवार्य और ऐच्छिक।
    • वाल्टिंग हार्स (Walting Horse) अनिवार्य और ऐच्छिक।
    • ग्राऊड जिमनास्टिक (Ground Gymnastic) अनिवार्य और ऐच्छिक।
    • हारीजंटल बार (Horizontal Bar) अनिवार्य और एच्छिक।
  2. लड़कियाँ-
    •  बीम बैलेंस (Beam Balance) अनिवार्य और ऐच्छिक।
    • ग्राउंड जिमनास्टिक (Ground Gymnastic) अनिवार्य और ऐच्छिक।
    • वाल्टिंग हार्स (Walting Horse) अनिवार्य और ऐच्छिक।

प्रश्न 2.
जिमनास्टिक की टीम में कितने खिलाड़ी होते हैं ?
उत्तर-
जिमनास्टिक की टीम में आठ खिलाड़ी होते हैं जिनमें से 6 खिलाड़ी भाग लेते हैं और दो खिलाड़ी अतिरिक्त (Substitutes) होते हैं। जो 6 खिलाड़ी भाग लेते हैं और 6 खिलाड़ियों को Best निकाल लिया जाता है और उनके अंकों को जोड़ा जाता है।

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 3.
जिमनास्टिक में अंक कैसे लगाए जाते हैं ?
उत्तर-
प्वाईंटों का देना (Awarding of Points)-हर एक जिमनास्टिक अभ्यास के लिए 0 से लेकर 10 तक प्वाईंट होते हैं और हर एक प्वाईंट को आगे 10 हिस्सों में बांटा जाता है। यदि ज्यूरी में पांच जज हों तो सब से ज्यादा और सबसे कम अंकों में बांट कर मध्य के तीन निर्णय वाले (Awards) को जमा करके तीन से भाग कर के औसत अंक निकाल लिया जाता है। यदि ज्यूरी में तीन जज हों तो जजों द्वारा दिए गए अंकों की औसत निकाल ली जाती है।

प्रश्न 4.
ज्यूरी का फैसला कैसे होता है ?
उत्तर-
ज्यूरी का फैसला अन्तिम होता है और किसी भी प्रतियोगी (Competitor) को इसके विरुद्ध अपील करने का अधिकार नहीं होता है।

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 5.
यदि कोई प्रतियोगी बीमार हो जाए तो कितनी देर तक इन्तज़ार करना चाहिए ?
उत्तर-
यदि कोई खिलाड़ी बीमार हो जाए तो कम-से-कम 30 मिनट तक इन्तज़ार किया जाता है।

प्रश्न 6.
टीम चैम्पियनशिप के लिए कितने खिलाड़ियों को लिया जा सकता है ?
उत्तर-
टीम चैम्पियनशिप के लिए 6 सबसे अच्छे खिलाड़ियों को लिया जाता है।

जिम्नास्टिक्स (Gymnastics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 7.
जिमनास्टिक के साधारण नियमों का वर्णन करो।
उत्तर–
प्रतियोगिता के लिए साधारण नियम (General Rules for the Competition)-

  1. टीम में 8 खिलाड़ी होते हैं। हर एक खिलाड़ी सारे अभ्यासों में भाग लेते हैं। टीम चैम्पियनशिप के लिए 6 सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों का प्रदर्शन गिना जाता है।
  2. प्रतियोगिता शुरू होने के पश्चात् खिलाड़ी बदलने की आज्ञा नहीं होती।
  3. इवेंट्स के जज और टीमें ठीक समय पर मैदान में पहुंच जानी चाहिएं।
  4. टीम मुकाबले दो भागों में होंगे। पहला अनिवार्य अभ्यासों के लिए, फिर ऐच्छिक अभ्यासों के लिए। इनके समय बारे में फैसला कर लिया जाएगा और मुकाबले निर्धारित समय के अनुसार होंगे।
  5. केवल उन प्रतियोगियों को फाइनल में प्रवेश मिलेगा जिन्होंने टीम मुकाबले के सारे इवेंट्स में भाग लिया हो।
  6. कोई भी जिमनास्टिक खिलाड़ी यदि ज्यूरी की आज्ञा के बिना टीम में से जाता है तो उसको दोबारा आने की आज्ञा नहीं दी जाएगी।
  7. प्रतियोगिता के मध्य प्रतियोगियों को बदलने की आज्ञा नहीं।
  8. फ्री-स्टैंडिंग अभ्यास को दोहराया नहीं जा सकता।
  9. यदि किसी प्रतियोगी की तबीयत ख़राब हो जाए या कोई प्रतियोगी दुर्घटना का शिकार हो जाए तो उसकी रिपोर्ट लीडर द्वारा तुरन्त दी जानी चाहिए।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

Punjab State Board PSEB 11th Class Sociology Book Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Sociology Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
एक अकादमिक अनुशासन के रूप में समाज का औपचारिक अध्ययन किस देश में तथा किस शताब्दी में प्रारम्भ हुआ ?
उत्तर-
एक विषय के रूप में समाज का औपचारिक अध्ययन फ्राँस (यूरोप) में 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ।

प्रश्न 2.
उन तीन कारकों के नाम बताइये जो एक स्वतन्त्र अनुशासन के रूप में समाजशास्त्र के विकास के लिए उत्तरदायी है।
उत्तर-
औद्योगिक क्रान्ति, फ्रांसीसी क्रान्ति तथा नवजागरण के विचारों के फैलाव से समाजशास्त्र का विकास एवं स्वतन्त्र विषय के रूप में हुआ।

प्रश्न 3.
नवजागरण से सम्बद्ध दो विचारकों के नाम बताइए।
उत्तर-
चार्ल्स मान्टेस्कयू (Charles Montesquieu) तथा जीन जैक्स रूसो (Jean Jacques Rousseau)।

प्रश्न 4.
फ्रांसीसी क्रान्ति किस वर्ष अस्तित्व में आयी ?
उत्तर-
फ्रॉसीसी क्रान्ति सन् 1789 में हुई थी।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 5.
प्रत्यक्षवाद शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
यह माना जाता है कि समाज कुछ स्थिर नियमों के अनुसार कार्य करता है, जिन्हें ढूंढा जा सकता है। इसे ही सकारात्मकवाद कहते हैं।

प्रश्न 6.
किसने समाजशास्त्र की दो शाखाओं सामाजिक स्थितिकी तथा सामाजिक गतिकी की चर्चा की ?
उत्तर-
अगस्ते काम्ते ने यह नाम दिया।

प्रश्न 7.
अगस्ते कोंत के तीन चरणों के नियम को चार्ट द्वारा प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर-
PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक 1

प्रश्न 8.
कार्ल मार्क्स का वर्ग का सिद्धांत किस निर्धारणवाद पर आधारित है ?
उत्तर-
कार्ल मार्क्स का वर्ग का सिद्धांत उत्पादन के साधनों की मल्कियत पर आधारित है कि एक समूह के पास उत्पादन के साधन होते हैं तथा एक के पास नहीं होते हैं।

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प्रश्न 9.
‘कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो’ पुस्तक किसने लिखी है ?
उत्तर-
पुस्तक ‘कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो’ कार्ल मार्क्स ने लिखी है।

प्रश्न 10.
कार्ल मार्क्स द्वारा प्रस्तुत सामाजिक परिवर्तन के चरण कौन-से हैं ?
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार सामाजिक परिर्वतन के चार मुख्य स्तर हैं–आदिम समुदाय समाज, दासमूलक समाज, सामन्ती समाज तथा पूँजीवादी समाज।

प्रश्न 11.
किसने समाज में उपस्थित एकता की प्रकृति के आधार पर समाज को वर्गीकृत है ?
उत्तर-
एमिल दुर्शीम ने समाज में मौजूद एकता की प्रकृति के आधार पर समाज को बाँटा है।

प्रश्न 12.
एमिल दुर्थीम द्वारा प्रस्तुत एकता के दो प्रकार बताइये।
उत्तर-
यान्त्रिक एकता (Mechnical Solidarity) तथा सावयवी एकता (Organic Solidarity)।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 13.
मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सामाजिक क्रिया के प्रकारों की सूची बताइये।
उत्तर-
मैक्स वैबर ने चार प्रकार की सामाजिक क्रिया के बारे में बताया है- Zweekrational, Wertnational, Affeective क्रिया तथा Traditional क्रिया।

प्रश्न 14.
मैक्स वैबर द्वारा प्रस्तुत सत्ता के प्रकार बताइये।
उत्तर-
मैक्स वैबर ने सत्ता के तीन प्रकार दिए हैं-परंपरागत सत्ता, वैधानिक सत्ता तथा करिश्मई सत्ता।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
नवजागरण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
नवजागरण वह समय था जब काफ़ी अधिक बौद्धिक विकास हुआ तथा दार्शनिक विचारों में बहुत परिवर्तन आए। यह समय 17वीं-18वीं शताब्दी के बीच था। इस समय के मशहूर विचारक मान्टेस्क्यू तथा रूसो थे। यह विचारक विज्ञान की सर्वोच्चता तथा विश्वास के ऊपर तर्क को ऊँचा मानते थे। इन विचारों के कारण ही सामाजिक प्रकटन में वैज्ञानिक विधि के प्रयोग पर बल दिया।

प्रश्न 2.
धर्मशास्त्रीय तथा तत्वशास्त्रीय चरणों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
कोंत के अनुसार आध्यात्मिक पड़ाव में मनुष्य के विचार काल्पनिक थे। वह सभी चीज़ों को परमात्मा के रूप में समझता था। धारणा यह थी कि चाहे सभी चीज़े निर्जीव हैं परन्तु उनमें सर्वशक्ति व्यापक है। अधिभौतिक पड़ाव 14वीं से 16वीं शताब्दी तक चला। इस समय बेरोक निरीक्षण का अधिकार सामने आया जिसकी कोई सीमा नहीं थी। इस कारण आत्मिकता का पतन हुआ जिसका सांसारिक पक्ष पर भी प्रभाव पड़ा।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 3.
जीववाद (Animism) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
जीववाद एक विचारधारा है जिनमें लोग विश्वास करते हैं कि परमात्मा केवल चलने वाली या जीने वाली वस्तुओं में मौजूद है। शब्द Anima का अर्थ है आत्मा (Soul) या चाल (Movement)। लोगों ने जानवरों, पंक्षियों, पृथ्वी तथा हवा की भी पूजा करनी शुरू कर दी।

प्रश्न 4.
कार्ल मार्क्स की वर्ग की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार, “वर्ग लोगों के ऐसे बड़े-बड़े समूहों को कहते हैं जो सामाजिक उत्पादन की इतिहास की तरफ से निर्धारित किसी पद्धति में, अपने-अपने स्थान की दृष्टि से, उत्पादन के साधनों के साथ अपने संबंध की दृष्टि से, परिश्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका की दृष्टि से तथा परिणामस्वरूप सामाजिक सम्पत्ति के जितने हिस्से के वह मालिक होते हैं, उसके परिणाम तथा उसे प्राप्त करने के तौर-तरीके की दृष्टि से एक-दूसरे से अलग होते हैं।

प्रश्न 5.
वर्ग चेतना से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
प्रत्येक वर्ग अपने सदस्यों, उनकी सामाजिक स्थिति, रुतबें इत्यादि के बारे में चेतन होता है। इस प्रकार की चेतना को ही वर्ग चेतना कहा जाता है। सभी वर्गों के लोग अपने समूह के प्रति चेतन होते हैं जिस कारण वह साधारण तथा अपने वर्ग के सदस्यों के साथ ही संबंध रखना पसंद करते हैं।

प्रश्न 6.
ऐतिहासिक भौतिकवाद को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-
ऐतिहासिक भौतिकवाद वह दार्शनिक विद्या है जो एक अखण्ड व्यवस्था के रूप में समाज का तथा उस व्यवस्था के कार्य तथा विकास को शामिल करने वाले मुख्य नियमों का अध्ययन करती है। संक्षेप में ऐतिहासिक भौतिकवाद सामाजिक विकास का दार्शनिक सिद्धांत है। इस प्रकार यह मार्क्स का सामाजिक तथा ऐसिहासिक सिद्धांत है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 7.
सामाजिक तथ्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
दुर्थीम ने सामाजिक तथ्य का सिद्धांत दिया था तथा अपनी पुस्तक के प्रथम अध्याय के अंत में इसकी परिभाषा दी। दुर्थीम के अनुसार, “एक सामाजिक तथ्य क्रिया करने का प्रत्येक स्थायी, अस्थायी तरीका है जो व्यक्ति के ऊपर बाहरी दबाव डालने में समर्थ होता है अथवा दोबारा क्रिया करने का प्रत्येक तरीका है जो किसी समाज में आम रूप से पाया जाता है परन्तु साथ ही व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है।

प्रश्न 8.
सावयवी एकता (Organic Solidarity) पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-
सावयवी एकता आधुनिक समाजों में पाई जाती है तथा यह स्तर सदस्यों के बीच मौजूद अंतरों पर आधारित है। यह अधिक जनसंख्या वाले समाजों में पाई जाती है जहाँ पर लोगों के बीच अव्यक्तिगत सामाजिक संबंध पाए जाते हैं। इन समाजों में प्रतिकारी कानून पाए जाते हैं।

प्रश्न 9.
ज्वैकरेशनल क्रिया से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
Zweckrational क्रिया का अर्थ ऐसे सामाजिक व्यवहार से होता है जो उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए कई उद्देश्यों की अधिक-से-अधिक प्राप्ति के लिए तार्किक रूप से निर्देशित हो। इसमें साधनों के चुनाव केवल उनकी विशेष कार्यकुशलता की तरफ ही ध्यान नहीं दिया जाता बल्कि मूल्य में की तरफ भी ध्यान जाता है।

प्रश्न 10.
भावनात्मक क्रिया किसे कहते हैं ?
उत्तर-
यह वह क्रियाएं हैं जो मानवीय भावनाओं, संवेगों तथा स्थायी अर्थों के कारण होती हैं। समाज में रहते हुए, प्रेम, नफरत, गुस्सा इत्यादि जैसी भावनाओं का सामना करना पड़ता है। इस कारण ही समाज में शान्ति या अशान्ति की अवस्था उत्पन्न हो जाती है। इन व्यवहारों के कारण परंपरा तथा तर्क का थोड़ा सा भी सहारा नहीं लिया जाता।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 11.
सत्ता को परिभाषित कीजिए।
उत्तर-
वैबर के अनुसार प्रत्येक संगठित समूह में सत्ता में तत्त्व मूल रूप में मौजूद होते हैं। संगठित समूह में कुछ तो साधारण सदस्य होते हैं तथा कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके पास ज़िम्मेदारी होती है तथा वह अन्य लोगों से वैधानिक तौर पर आदेश देकर अपनी बात मनवाते हैं। इस बात मनवाने की व्यवस्था को ही सत्ता कहते हैं।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
अगस्त कोंत द्वारा प्रतिपादित तीन चरणों के नियम की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
अगस्त कोंत ने समाज के उद्विकास का सिद्धांत दिया तथा कहा कि समाज के विकास के तीन पड़ाव हैं-आध्यात्मिक पड़ाव, अधिभौतिक पड़ाव तथा सकारात्मक पड़ाव। आध्यात्मिक पड़ाव में मनुष्य के सभी विचार काल्पनिक थे तथा वह सभी वस्तुओं को किसी आलौकिक जीव की क्रियाओं के परिणाम के रूप में मानता था। धारणा यह थी कि चाहे सभी वस्तुएं निर्जीव हैं परन्तु उनमें वह शक्ति व्यापक है। दूसरा पड़ाव अधिभौतिकं पडाव था जो 14वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक चला। इस पड़ाव में क्रान्तिक आंदोलन शुरू हुआ तथा प्रोटैस्टैंटवाद सामने आया। 16वीं शताब्दी में नकारात्मक सिद्धांत सामने आया जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन था। इसमें बेरोक निरीक्षण का अधिकार था तथा निरीक्षण की कोई सीमा नहीं थी। सकारात्मक पड़ाव में औद्योगिक समाज शुरू हुआ तथा विज्ञान सामने आया। इसमें सामाजिक व्यवस्था तथा प्रगति में कोई द्वन्द नहीं होता है।

प्रश्न 2.
यान्त्रिक एकता की विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-

  • यान्त्रिक एकता वाले समाज के सदस्यों के व्यवहारों में समरूपता मिलती है तथा उनके व्यवहार एक जैसे होते हैं।
  • समान विश्वास तथा भावनाएं यान्त्रिक एकता के प्रतीक हैं। इस समाज के सदस्यों में सामूहिक चेतना मौजूद होती है।
  • यान्त्रिक समाजों में दमनकारी कानून मिलते हैं जहाँ पर अपराधी को पूर्ण दण्ड देने की व्यवस्था होती है।
  • नैतिकता यान्त्रिक समाजों का मूल आधार होती है जिस कारण समाज में एकता बनी रहती है।
  • धर्म यान्त्रिक समाज में एकता का महत्त्वपूर्ण आधार है तथा धर्म के अनुसार ही आचरण तथा व्यवहार किया जाता है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 3.
सावयवी एकता की विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-

  • आंगिक अथवा सावयवी एकता वाले समाजों में विभेदीकरण तथा विशेषीकरण पाया जाता है। समाज में बहत से वर्ग मिलते हैं।
  • इन समाजों में श्रम विभाजन का बोलबाला होता है तथा लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।
  • इन समाजों में बहुत से संगठन तथा समूह मिलते हैं जिस कारण इनमें प्रतिकारी कानूनों की प्रधानता होती
  • सावयवी समाजों में समझौतों पर आधारित संबंध सामाजिक एकता का स्रोत होते हैं तथा नौकरियों में व्यक्तियों को अनुबंध पर रखा जाता है।
  • सावयवी एकता वाले समाजों में धर्म का प्रभाव काफ़ी कम होता है।
  • इस प्रकार के समाज आधुनिक समाज होते हैं।

प्रश्न 4.
धर्मशास्त्रीय एवं तत्वशास्त्रीय चरणों में अंतर कीजिए।
उत्तर-
1. धर्मशास्त्रीय पड़ाव-यह पड़ाव मानवता के शुरू होने के समय शुरू होता है जब मनुष्य प्राकृतिक शक्तियों से डरता था। वह सभी चीजों को किसी आलौकिक शक्ति की क्रियाओं के परिणाम के रूप में देखता था। वह सोचता था कि चाहे सभी वस्तुएं निर्जीव हैं परन्तु सब में परमात्मा मौजूद है। यह पड़ाव आगे तीन उप-पड़ावों प्रतीक पूजन, बहु-देवतावाद तथा एक-ईश्वरवाद में विभाजित है।

2. तत्वशास्त्रीय पड़ाव-इस पड़ाव को काम्ते आधुनिक समाज का क्रान्तिक समय भी कहता है। यह पड़ाव 5 शताब्दियों तक 14वीं से 19वीं तक चला। इसे दो भागों में विभाजित किया गया है। प्रथम भाग में क्रान्तिक आंदोलन स्वयं ही चल पड़ा तथा क्रान्तिक फिलास्फी 16वीं शताब्दी में प्रोटैस्टैंटवाद में आने से शुरू हुई। दूसरा भाग 16वीं शताब्दी से शुरू हुआ। इसमें नकारात्मक सिद्धांत शुरू हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन था। इसमें बेरोक निरीक्षण का अधिकार था।

प्रश्न 5.
क्या आप सोचते हैं कि निकट भविष्य में साम्यवादी समाजों द्वारा पूँजीवाद को विस्थापित कर दिया जायेगा ?
उत्तर-
जी नहीं, हम नहीं सोचते कि आने वाले भविष्य में पूँजीवादी व्यवस्था को कम्युनिस्ट व्यवस्था बदल देगी। वास्तव में पूँजीवादी व्यवस्था स्वतन्त्र मार्कीट के सिद्धांत पर आधारित है जबकि कम्युनिस्ट अर्थव्यवस्था सरकारी नियन्त्रण के अन्तर्गत होती है तथा आजकल के समय में कोई भी सरकारी नियन्त्रण को पसन्द नहीं करता। 1917 में रूस में राजशाही को कम्युनिस्ट व्यवस्था ने बदल दिया था परन्तु वहां की अर्थव्यवस्था का कुछ ही समय में बुरा हाल हो गया था। इस कारण ही सन् 1990 में U.S.S.R. के टुकड़े हो गए थे तथा वह कई देशों में विभाजित हो गया था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कम्युनिस्ट पूँजीवादी व्यवस्था को नहीं बदल सकती।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें:

प्रश्न 1.
क्या समाजशास्त्र एक पूर्ण विज्ञान के रूप में विकसित हुआ है जिसकी कल्पना अगस्ते कोंत ने की थी ?
उत्तर-
शब्द समाजशास्त्र (Sociology) का प्रथम बार प्रयोग अगस्ते काम्ते ने 1839 में किया था। काम्ते ने एक पुस्तक लिखी ‘The Course on Positive Philosophy’ जो कि 6 भागों में छपी थी। इस पुस्तक में उन्होंने कहा था कि समाज में अलग-अलग भागों का अध्ययन अलग-अलग सामाजिक विज्ञान करते हैं, उदाहरण के लिए समाज के राजनीतिक हिस्से का अध्ययन राजनीति विज्ञान करता है, आर्थिक हिस्से का अध्ययन अर्थशास्त्र करता है। उस प्रकार एक ऐसा विज्ञान भी होना चाहिए जो समाज का अध्ययन करे। इस प्रकार उन्होंने समाज, सामाजिक संबंधों के अध्ययन की कल्पना की तथा उनकी कल्पना के अनुसार एक नया विज्ञान सामने आया जिसे समाजशास्त्र का नाम दिया गया।

काम्ते के पश्चात् हरबर्ट स्पैंसर ने भी कई संकल्प दिए जिससे समाजशास्त्र का दायरा बढ़ना शुरू हुआ। इमाईल दुर्थीम प्रथम समाज शास्त्री था जिसने समाजशास्त्र को एक विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने अध्ययनों में वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया तथा कहा कि समाज का वैज्ञानिक विधियों, जैसे कि निरीक्षण की सहायता से अध्ययन किया जा सकता है। उनके द्वारा दिए संकल्पों, जैसे कि सामाजिक तथ्य, आत्महत्या का सिद्धांत, श्रम विभाजन का सिद्धांत, धर्म का सिद्धांत इत्यादि में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग साफ झलकता है। समाजशास्त्र के इतिहास में दुर्थीम पहले प्रोफैसर थे।

समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में स्थापित करने में कार्ल मार्क्स तथा मैक्स वैबर ने भी बहुत बड़ा योगदान दिया। कार्ल मार्क्स ने संघर्ष का सिद्धांत दिया तथा सम्पूर्ण समाजशास्त्र संघर्ष सिद्धांत में इर्द-गिर्द घूमता है।

मार्क्स ने समाज का आर्थिक पक्ष से अध्ययन किया तथा बताया कि समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है। उन्होंने दो प्रकार के वर्गों तथा उनके बीच हमेशा चलने वाले संघर्ष का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग तथा वर्ग संघर्ष का सिद्धांत, अलगाव का सिद्धांत जैसे संकल्प समाजशास्त्र को दिए। मैक्स वैबर ने भी समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया तथा सामाजिक क्रिया का सिद्धांत दिया। उन्होंने समाजशास्त्र की व्याख्या दी, सामाजिक क्रिया का सिद्धांत दिया, सत्ता तथा प्रभुत्ता का सिद्धांत दिया, धर्म की व्याख्या दी तथा कर्मचारीतन्त्र का सिद्धांत दिया।

इन सभी समाजशास्त्र के संस्थापकों के पश्चात् बहुत से समाजशास्त्री हुए तथा समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में स्थापित करने में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। टालक्ट पारसन्ज़, जे० एस० मिल, राबर्ट मर्टन, मैलिनोवस्की, गिलिन व गिलिन, जी० एस० घूर्ये इत्यादि जैसे समाजशास्त्री इनमें से प्रमुख हैं।

अब पिछले कुछ समय से समाजशास्त्र में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग काफ़ी हद तक किया जा रहा है ताकि अध्ययन को अधिक-से-अधिक वस्तुनिष्ठ तथा निष्पक्ष रखा जा सके। इससे एक क्षेत्र में किए अध्ययनों को दूसरे क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकेगा। उपकल्पना, निरीक्षण, सैंपल विधि, साक्षात्कार, अनुसूची प्रश्नावली, केस स्टडी, वर्गीकरण, सारणीकरण, आँकड़ों के प्रयोग से समाजशास्त्र निश्चित रूप से एक विज्ञान के रूप में स्थापित हो गया है।

प्रश्न 2.
मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धांत बताइये।
उत्तर-
मार्क्स की उन्नत ‘वैज्ञानिक प्रस्थापना’ में यह बात भी शामिल है कि उन्होंने अलग सामाजिक समूहों पर सर्वप्रथम वर्गों के अस्तित्व की व्याख्या की थी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मार्क्स ने वर्गों की व्याख्या बहुत अच्छे प्रकार से की है। मार्क्स की विचारक खोज का मुख्य उद्देश्य यह पता करना था कि यह मानव समाज जिसमें हम सभी रहते हैं, और इसका जो रूप या स्वरूप हमें दिखाई देता है वह इस तरह क्यों है ? और इस समाज में परिवर्तन क्यों और किन शक्तियों के द्वारा आते हैं ? इसके साथ ही मार्क्स ने इसकी स्पष्ट व्याख्या और विवेचना की थी और लिखा था कि आने वाले समय में समाज में किस तरह और कैसे परिवर्तन आयेंगे ? अपनी खोजों के द्वारा मार्क्स और उसके निकट सहयोगी ‘ऐंजलस’ इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस समाज में काफ़ी अमानवीय शोषण फैला हुआ है। इसलिये उन्होंने अपनी खोज का दूसरा उद्देश्य उस समाज का निर्माण करना या स्थापना करनी है जो कि शोषण रहित हो बताया है ।

वर्ग किसे कहते हैं (What is Class) मार्क्स के वर्ग संघर्ष को समझने के लिये यह अति आवश्यक है कि पहले यह जाने कि वर्ग क्या है ? कार्ल मार्क्स ने इतिहास का अध्ययन करने के लिये इस बात की विशेष वकालत की कि हमें यह अध्ययन उस दृष्टिकोण से करना चाहिये जिसके साथ हम उन प्राकृतिक नियमों का पता लगा सकें जो पूरे मानव इतिहास का संचालन करते हैं और ऐसा करने के लिए हमें कुछ विशेष व्यक्तियों के कार्यों और आम व्यक्तियों के कार्यों और व्यवहारों की तरफ ध्यान देना चाहिये। प्रत्येक समाज लगभग कई जनसमूहों में बंटे हुए होते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न वर्ग एक विशेष सामाजिक आर्थिक इकाई का निर्माण करते थे। इस इकाई विशेष को हम वर्ग के नाम से जानते हैं।

मार्क्स ने अपने कम्युनिस्ट मैनीफैस्टो किस्से के पहले अध्याय की शुरुआत भी इन्हीं शब्दों से की है कि अभी तक समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है और इतिहास में वर्णित समाजों में हर समाज में विभिन्न प्रकार की श्रेणियां पाई जाती हैं। सामाजिक श्रेणियों की बहरूपी दर्जाबंदी, प्राचीन रोम में पैट्रोशियन, नाई पलेबियन और दास मिलते थे। मध्यकाल में हमें सामन्तवादी अधीन जागीरदारी, उस्ताद, कारीगर, मज़दूर कारीगर, ज़मीनी दास इत्यादि दिखाई पड़ते हैं और लगभग इन सभी में द्वितीय श्रेणियां या वर्ग पाए जाते हैं।

मार्क्स की वर्ग व्यवस्था के आधार पर ही लेनिन ने वर्गों की व्याख्या और परिभाषा पेश की है। लेनिन ने लिखा है कि, “वर्ग लोगों के ऐसे बडे-बडे समूहों को कहते हैं जो सामाजिक उत्पादन की इतिहास की तरफ से निर्धारित किसी पद्धति में अपनी-अपनी जगह की नज़र से उत्पादन के साधनों के साथ अपने सम्बन्धों जो कि अधिकतर मामलों में कानून के द्वारा निश्चित और निरूपित होते हैं की नज़रों से, मेहनत के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका को नज़र से और फलस्वरूप सामाजिक सम्पत्ति के जितने भाग के वह मालिक होते हैं, उसके परिमाण और उसको प्राप्त करने के तौर-तरीकों की नज़र से एक दूसरे से अलग होते हैं।”

मार्क्स के अनुसार, “इतिहास की भौतिकवादी धारणा में यह कहा गया है कि मानव जीवन के विकास के लिये आवश्यक साधनों का उत्पादन और उत्पादन के उपरान्त बनी वस्तुओं का लेन-देन (Exchange) प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था का आधार है। इतिहास में जितनी भी सामाजिक व्यवस्थाएं बनी हैं इसमें जिस तरह धन का बंटवारा हुआ है और समाज का वर्गों और श्रेणियों में बंटवारा हुआ है वह इस बात पर निर्भर है कि इस समाज में क्या उत्पादन हुआ है ? और कैसे हुआ है ? और फिर उपज की Exchange कैसे हुई ? मार्क्स के अनुसार, “किसी भी युग में परिश्रम का बंटवारा और जीवन जीने के साधनों की प्राप्ति के अलग-अलग साधनों के होने के कारण मनुष्य अलग-अलग वर्गों में बंट जाता है और प्रत्येक वर्ग की विशेष वर्ग चेतनता होती है।”

वर्ग से मार्क्स का अर्थ भारत की जातीय व्यवस्था से सम्बन्धित नहीं है बल्कि वर्ग से उनका अर्थ उस जातीय समूह व्यवस्था से है जिसकी परिभाषा उत्पादन की उस प्रक्रिया में उनकी भूमिका के साथ की जा सकती है। आम शब्दों में कहा जाये तो वर्ग लोगों के ऐसे समूहों को कहा जाता है, जो अपनी जीविका केवल एक ही ढंग से कमाते हैं, वर्ग का जन्म उत्पादन के तौर-तरीकों पर आधारित होता है। जैसे किसी उत्पादन व्यवस्था में परिवर्तन आता है, तो पुराने वर्गों के स्थान पर नये स्थान ले लेते हैं।

वर्ग संघर्ष (Class Struggle)-

इस तरह कार्ल मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो-दो वर्गों की विवेचना की है। मार्क्स की वर्ग की धारणाओं को प्रत्येक समाज में ध्यान से समझने के पश्चात् हम अब इस स्थिति में है कि उसकी वर्ग संघर्ष की धारणा को समझें। मार्क्स ने बताया कि समाज के प्रत्येक वर्ग में दो प्रकार के परस्पर विरोधी वर्ग रहे हैं। एक शोषण करने वाला व दूसरा जो शोषण को सहन करता है। इनमें आपस में संघर्ष होता है। इसे मार्क्स ने ‘वर्ग संघर्ष’ का नाम दिया है। कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र में वह कहते हैं कि समाज के अस्तित्व के साथ-साथ ही वर्ग संघर्ष का भी जन्म हो जाता है। मार्क्स का यह वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त उसके विचारों से और संसार में भी बहुत महत्त्वपूर्ण है।

उनके प्रभाव के कारण ही ‘स्माल थास्टरीन बैवलीन’ और ‘कूले’ इत्यादि ने भी वर्ग संघर्ष को अपने चिन्तन का एक अंग रूप माना है।
मार्क्स के अनुसार, “उत्पादन की प्रक्रियाओं में अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग भूमिकाएं होती हैं। अब वर्गों की आवश्यकताओं और हितों पर संघर्ष की स्थिति पैदा होना आवश्यक है। वही संघर्ष विरोधी विचारधारा में एक ‘आधार’ (Base) पैदा करता है। विकासशील उत्पादित शक्तियों और प्रकृतिवादी स्थिर सम्पत्ति के सम्बन्धों में टकराव पैदा होता है। इससे संघर्ष की गति भी तेजी से बढ़ती है। इतिहास की गति वर्गों की भूमिका के द्वारा ही निर्धारित होती है और सामाजिक एवं आर्थिक वर्ग उन सभी समाजों में पाए जाते हैं जहां श्रम विभाजन का आम सिद्धान्त लागू होता है।

मार्क्स के अनुसार वर्ग संघर्ष एक ऐसी उत्पादित व्यवस्था से जन्म लेता है, जो समाज को भिन्न-भिन्न वर्गों में बांट देती है। इसमें एक वर्ग तो काफ़ी कठोर परिश्रम करके उत्पादन करता है, जैसे दास, अर्द्धदास, किसान और मज़दूर इत्यादि और दूसरा वर्ग ऐसा है जो उत्पादन के लिये कोई परिश्रम किये बिना, बिना कोई काम किये उत्पादन के बड़े-बड़े भाग का उपयोग करता है, जैसे दासों के स्वामी, जागीरदार, ज़मींदार और पूंजीपति इत्यादि। मार्क्स के अनुसार, “इस वर्ग संघर्ष को मनुष्य के उत्पादन की पहली और ऊंची अवस्था तक पहुंचने में मदद करता है। वह मानते हैं कि कोई भी क्रान्ति जब सफल होती है तो उनके साथ नयी आर्थिक सामाजिक व्यवस्था का जन्म होता है।”

इस आधार पर ही मार्क्स ने अब तक के मानवीय इतिहास को चार युगों में विभाजित किया है-

1. पहला युग-इतिहास का पहला युग आदिम साम्यवादी समाज था। इस युग में उत्पादन के साधन अविकसित थे। उत्पादन के साधनों को आवश्यक वस्तुओं को उत्पन्न करने के लिए प्रयोग किया जाता था तथा संयुक्त परिश्रम के साथ इन्हें प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार उत्पादन पर सभी का समान अधिकार होता था। आर्थिक शोषण तथा वर्ग भेद नाम की कोई चीज़ मौजूद नहीं थी।

2. दूसरा युग-दूसरा युग दास मूलक समाज का था। कृषि, पशुपालन तथा धातु के औज़ारों के विकसित होने से उत्पादन व्यवस्था के सम्बन्ध बदल गए तथा दास प्रथा शुरू हो गयी। विकसित उत्पादन के साधनों के कारण व्यक्तिगत संपत्ति का संकल्प सामने आया। इस समय दास स्वामी तथा दासों के अलग-अलग वर्ग बन गए तथा वर्ग संघर्ष शुरू हो गया। मार्क्स का कहना था कि इस समाज से ही वर्ग संघर्ष की शुरुआत हुई क्योंकि मालिकों ने अपने दासों का शोषण करना शुरू कर दिया था।

3. तीसरा युग-सामन्ती समाज तीसरा युग था। इस युग में उत्पादन के साधनों पर कुछ सामन्तों तथा भूपतियों का अधिकार हो गया। इस युग में निजी सम्पत्ति की धारणा और सुद्रढ़ हो गई। कई विकासशील तथा अर्द्ध विकसित देशों में इस युग के अवशेष देखने को मिल जाएंगे। इस युग में सामन्तों तथा किसानों के दो वर्ग बन गए तथा वर्ग संघर्ष और तेज़ हो गया।

4. चौथा युग-चौथा युग पूँजीपति समाज था। 15वीं शताब्दी के अंत में विज्ञान का विकास होना शुरू हुआ। इससे उत्पादन व्यवस्था के सम्बन्धों तथा उत्पादन के नए साधनों में विरोध उत्पन्न हो गए। मशीनों का आविष्कार हुआ। बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हुए जिससे पूँजीवादी युग शुरू हो गया तथा यह आज भी चल रहा है। इस व्यवस्था में एक तरफ तो उद्योगों के मालिक थे तथा दूसरी तरफ उन उद्योगों में कार्य करने वाले श्रमिक थे। इस प्रकार दो वर्ग पूँजीपति तथा श्रमिक बन गए। इस युग में विज्ञान की प्रगति से, शिक्षा के बढ़ने, बड़े उद्योगों में श्रमिकों के इकट्ठे रहने के कारण आसानी से संगठित होने से वर्ग चेतना का काफ़ी विकास हो गया है। आज का शोषित वर्ग अब शोषण तथा वर्ग विरोधों को और सहन करने को तैयार नहीं हैं। अब वर्ग संघर्ष अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है। मार्क्स का कहना है कि पूँजीवादी युग का खात्मा आवश्यक है। शोषण पर आधारित यह अन्तिम व्यवस्था होगी। आज पूँजीवाद का खात्मा शुरू हो गया है। मनुष्यों का समाज तेज़ी से समाजवाद की तरफ बढ़ रहा है। रूस तथा चीन की समाजवादी सरकारों की स्थापना इसका प्रमाण है।

मार्क्स के अनुसार, “निजी सम्पत्ति ही शोषण की जड़ है। इसी के कारण ही मूल रूप से आर्थिक उत्पादन के क्षेत्र में समाज में दो मुख्य वर्ग हैं। इनमें एक वर्ग के हाथ में आर्थिक उत्पादन के सभी साधन केन्द्रित हो जाते हैं जिसके आधार पर यह वर्ग शोषित और कमजोर वर्ग का शोषण करता है।” इन वर्गों में आपस में समाज की हर युग (केवल आदिमयुग छोड़कर) में आपस में वर्ग संघर्ष चलता आया है। मार्क्स की मान्यता के अनुसार, सभी उत्पादन साधनों पर अधिकार करके शोषक वर्ग बल के साथ अपने सैद्धान्तिक विचारों एवं जीवन प्रणाली को सारे समाज पर थोपता है। मार्क्स के अनुसार, “वह वर्ग जो समाज की शोषक भौतिक शक्ति होता है, साथ ही समाज की शासक भौतिक शक्ति भी होता है। वह वर्ग जिसके पास भौतिक उत्पादन के साधन मौजूद होते हैं वह सामाजिक उत्पादन के साधनों पर भी नियन्त्रण रखता है। इस प्रकार के नियन्त्रण के लिए शोषक वर्ग बल प्रयोग भी करता है। उसके द्वारा समाज के ऊपर थोपे गये धर्म, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र और नैतिकता के विचार उसके इस प्रभाव को मज़बूत करने के लिये शोषण वर्ग के दास बन जाते हैं। शोषण की इस स्थिति को बरकरार रखने के लिए नये उभरते हुए शोषित वर्ग को बलपूर्वक दबाना आवश्यक हो जाता है। इसलिये मार्क्स ने कहा है बल नये समाज को अपने गर्भ में धारण करने वाले प्रत्येक पुराने समाज की ‘दाई’ (Midwife) है।

समाज का विकास अलग-अलग अवस्थाओं की देन हैं। किसी भी सामाजिक व्यवस्था अथवा ऐतिहासिक युग का मूल्यांकन हालातों, देश तथा काल के ऊपर निर्भर करता है। कोई भी सामाजिक व्यवस्था स्थायी नहीं है। सभी प्रक्रियाएँ द्वन्दात्मक होती है। उत्पादन की नई तथा पुरानी प्रक्रिया में जो अन्दरूनी संघर्ष होता है वह ही इसकी प्रेरक शक्ति होती है। पुरानी के स्थान पर नई पद्धति को अपनाना आवश्यक होता है। धीरे-धीरे होने वाले परिमाणात्मक परिवर्तन तेज़ी से अचानक होने वाले गुणात्मक परिवर्तन में बदल जाते है। इसलिए विकास के नियम के अनुसार क्रान्तिकारी परिवर्तन आवश्यक तथा स्वाभाविक होते हैं।

यह परिवर्तन बल (Force) पर आधारित होते हैं। विकास के रास्ते में उभरने वाली असंगतियों के आधार पर विरोधी शक्तियों में टकराव होता है। अंत में वर्ग संघर्ष तेज़ होता है जिसमें शोषित वर्ग अर्थात् मज़दूर वर्ग का अन्तिम रूप में जीतना आवश्यक है। मार्क्स के अनुसार इन विरोधों के कारण पूंजीवाद स्वयं विनाश की तरफ बढ़ता है।

पूँजीवादी व्यवस्था में दिन प्रतिदिन निर्धनता, बेरोज़गारी, भूखमरी बढ़ जाएगी। सहन करने की एक सीमा के पश्चात श्रमिक वर्ग क्रान्ति शुरू कर देगा। मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद शोषण पर आधारित अन्तिम व्यवस्था होगी। अपने स्वार्थों के साथ घिरे पूंजीवाद संसदीय नियमों के साथ अपने एकाधिकार का कभी भी त्याग नहीं करेंगे। जैसे कि महात्मा गांधी ने अपने ट्रस्टीशिप सिद्धान्त की व्याख्या में कहा था। शांतिपूर्ण तरीके से शोषण को खत्म नहीं किया जा सकता था। इसके लिये क्रान्ति ज़रूरी है। समाज का एक बहुत बड़ा भाग (सर्वहारा) मजबूर हो जायेगा और यही क्रान्तिकारी हरियाली को दर्शायेगा।”

सर्वहारा (मज़दूर) वर्ग की लीडरशिप में वर्ग संघर्ष के द्वारा राज्य के यन्त्र पर अधिकार हो जाने के बाद समाजवाद के युग का आरम्भ होगा। मार्क्स के अनुसार राज्य शोषक वर्ग के हाथ में होने के कारण दमन की नीति एक बहुत बड़ा हथियार होता है। क्रान्ति के बाद भी सामन्तवाद और पूंजीवाद के दलाल प्रति क्रान्ति की कोशिश करते हैं। इसलिए पूंजीवाद के समाजवाद के बीच जाने के समय मज़दूर की सत्ता की अस्थाई अवस्था होगी। समाजवाद की स्थापना के बाद शोषण का अन्त हो जायेगा। इससे वर्ग समाप्त हो जाएंगे। इससे प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मेहनत का पूर्ण भाग मिल सकेगा। समाजवाद की अधिक उन्नतावस्था में प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकता अनुसार मिलेगा। धीरे-धीरे राज्य जो शोषक वर्ग का हथियार रहा है, टूट जायेगा और इसके स्थान पर आपसी सहयोग और सहकारिता के आधार पर बनी संस्थाएं ले लेंगी। वर्गों और वर्ग संघर्ष का अन्त हो जायेगा।

सर्वहारा (मज़दूर) और पूंजीपति के बीच चले वर्ग संघर्ष का अन्त पूंजीवाद के अन्त के साथ ही होगा। उत्पादन के साधनों पर समाज का अधिकार हो जाने के साथ उत्पादन पर लगे प्रतिबन्ध हट जायेंगे। उत्पादन की शक्तियां और समय की बर्बादी भी खत्म हो जायेगी। वर्ग संघर्ष के द्वारा वर्गों का अन्त आज केवल एक दुःस्वप्न मात्र बन कर नहीं रह गया। संसार बड़ी तेज़ी से वर्गहीन समाजवादी समाज की स्थापना की तरफ बढ़ रहा है। ‘ऐंजलस’ ने काफ़ी समय पहले ही कहा था “आज इतिहास में पहली बार यह सम्भावना पैदा हो गई है कि सामाजिक उत्पादन के द्वारा समाज के प्रत्येक सदस्य को ऐसा जीवन मिल सके जो भौतिक दृष्टि से अच्छा हो जाये और दिन प्रतिदिन अधिक सुख सम्पन्न हो जाये, ऐसा नहीं एक ऐसे जीवन का निर्माण हो जिसमें व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का उन्मुख विकास संभावित हो। इस बात की सम्भावना पहली बार बनी है परन्तु बनी ज़रूर है।

श्रमिकों की क्रांति के द्वारा इन विरोधों तथा अन्य विरोधों का हल होगा। श्रमिकों की मुक्ति के इस कार्य को पूर्ण करना आधुनिक श्रमिक वर्ग का ऐतिहासिक फर्ज हैं। इसके बाद मनुष्य स्वयं श्रमिक के रूप में अपने इतिहास का निर्माण करेगा।

मार्क्स की एक दृढ़ विचारधारा है इस अन्तिम वर्ग संघर्ष के बाद होने वाले नये सामाजिक आर्थिक ढांचे में वर्ग संरचना में काफ़ी परिवर्तन की स्थिति होती है। जिन देशों में समाजवाद की विजय होती है वहां पर शोषक वर्ग समाप्त हो जाता है। वहां केवल मेहनतकश वर्ग ही रह जाता है। तब समाज का शासन शोषक वर्ग नहीं चलाता। जैसा कि पिछले सभी सामाजिक वर्गों में हुआ करता था, जिसमें भिन्न-भिन्न वर्ग होते थे बल्कि इसे मज़दूर वर्ग चलाता है। ये वर्ग समाज का नेतृत्व स्वतः अपने हाथों में ले लेता है और नये उत्पादन सम्बन्ध पैदा करता है। मजदूर वर्ग सभी मेहनतकश (उद्यमी) लोगों और मेहनतकश किसानों के साथ मिलकर अपना काम चलाते हैं । भिन्न-भिन्न वर्गों में नफरत भरे सम्बन्धों की जगह मित्रता, दोस्ती और आपसी भाईचारा ले लेता है। अन्ततः अमूल परिवर्तन उसको कहा जाता है जबकि समाज का मज़दूर वर्ग एक सहयोग पूर्ण वर्गहीन संरचना की तरफ बढ़ता है। इस तरह मज़दूर वर्ग की नीति का निशाना होता है वर्तमान सामाजिक समूहों के बीच के अन्तर को कम या समाप्त करना और एक वर्गहीन समाज का निर्माण करना।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 3.
रूस तथा चीन की साम्यवादी क्रांतियों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
(i) रूसी क्रान्ति (Russian Revolution)-रूस पर रोमानोव (Romanov) परिवार का राज्य था। प्रथम विश्व युद्ध (1914) के शुरू होने के समय ज़ार निकोलस II का रूस पर राज्य था। मास्को के इर्द-गिर्द के क्षेत्र के अतिरिक्त उस समय के रूसी साम्राज्य में आज के मौजूदा देश फिनलैंड, लाटवीया, लिथुआनिया, ऐसटोनिया, पोलैंड का हिस्सा, यूक्रेन तथा बैलारूस भी शामिल थे। जार्जिया, आर्मीनिया तथा अज़रबाईजान भी इसका हिस्सा थे।

1914 से पहले रूस में राजनीतिक दलों की मनाही थी। 1898 में समाजवादियों ने रूसी लोकतान्त्रिक वर्कज़ पार्टी शुरू की तथा वह कार्ल मार्क्स के विचारों का समर्थन करते थे। परन्तु सरकारी नीतियों के अनुसार, इसे गैरकानूनी ढंग से कार्य शुरू करना पड़ा। इसने अपना अखबार शुरू किया, मज़दूरों को इकट्ठा करना शुरू किया तथा हड़तालें करनी शुरू की।

रूस में तानाशाही शासक था। अन्य यूरोपियन देशों के विपरीत, ज़ार वहाँ की संसद् के प्रति जबावदेह नहीं था। उदारवादियों ने एक आन्दोलन चलाया ताकि इस गलत प्रथा को खत्म किया जा सके। उदारवादियों ने समाजवादी लोकतन्त्रीय तथा सामाजिक क्रान्तिकारियों के साथ मिलकर किसानों तथा मजदूरों को इकट्ठा किया। 1905 की क्रान्ति के दौरान संविधान की मांग की गई। उनके प्रयासों से प्रभावित होकर रूस के वर्कर चेतन हो गए तथा उन्होंने कार्य के घण्टे कम करने तथा तनख्वाह बढ़ाने की मांग की। जब वह क्रान्ति की तैयारी कर रहे थे, पुलिस ने उन पर हमला कर दिया। 100 से अधिक वर्कर मारे गए तथा 300 से अधिक जख्मी हो गए। क्योंकि यह घटना इतवार को हुई थी, इसलिए इसे Bloody Sunday के नाम से जाना जाता है।

1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ तथा ज़ार ने रूस को लड़ाई में धकेल दिया। रूस की स्थिति, जोकि पहले ही खराब चल रही थी, और भी खराब हो गई। रूस लड़ाई में बुरी तरह उलझ गया था। एक तरफ ज़ार संसद् (डुमा) को भंग करने का प्रयास कर रहा था तथा दूसरी तरफ संसद् के सदस्य इस स्थिति से बचने का प्रयास कर रहे थे। इस स्थिति में पेट्रोग्राड में 22 फरवरी, 1917 को एक फैक्ट्री बंद हो गई तथा सभी वर्कर बेरोज़गार हो गए। हमदर्दी के कारण वहां की 50 फैक्ट्रियों के वर्करों ने भी हड़ताल कर दी। इस समय तक कोई भी राजनीतिक दल इस आन्दोलन की अगुवाही नहीं कर रहा था। सरकारी इमारतों को वर्करों ने घेर लिया तथा सरकार ने कयूं लगा दिया। शाम तक वर्कर भाग गए परन्तु 24 व 25 तारीख तक वह फिर इकट्ठे हो गए। सरकार ने सेना को बुला लिया तथा पुलिस को उनकी निगरानी के लिए कहा गया।

25 फरवरी इतवार को सरकार ने संसद् (डुमा) को भंग कर दिया। नेताओं ने इसके विरुद्ध बोलना शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारी पूरी शक्ति से 26 तारीख को सड़कों पर वापिस आ गए। 27 तारीख को पुलिस का हैडक्वाटर तबाह कर दिया गया। सड़कों पर लोग बाहर आ गए तथा उन्होंने ब्रैड, तनख्वाह, कार्य में कम घण्टे तथा लोकतन्त्र के नारे लगाने शुरू कर दिए। सरकार ने सेना को वापिस बुला लिया परन्तु सेना ने लोगों पर गोली चलाने से मना कर दिया। जिस अफसर ने गोली चलाने का आदेश दिया था, उसे भी मार दिया गया। सेना के लोग भी आम जनता से मिल गए तथा सोवियत को बनाने के लिए उस इमारत में एकत्र हो गए जहाँ डुमा पिछली बार एकत्र हुई थी।

अगले दिन वर्करों का प्रतिनिधिमण्डल ज़ार को मिलने के लिए गया। सेना के बड़े अधिकारियों ने ज़ार को प्रदर्शनकारियों की बात मानने की सलाह दी। अंत 2 मार्च को ज़ार ने उनकी बात मान ली तथा ज़ार का शासन खत्म हो गया। अक्तूबर में लेनिन (Lenin) ने रूस का शासन संभाल लिया तथा रूसी क्रान्ति पूर्ण हो गई।

(ii) चीनी क्रान्ति (Chinese Revolution)-1 अक्तूबर, 1949 को चीनी कम्यूनिस्ट नेता माओ-त्से-तुंग ने People’s Republic of China को बनाने की घोषणा की। इस घोषणा से चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी तथा राष्ट्रवादी पार्टी के बीच चल रही लड़ाई खत्म हो गई जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद शुरू हुई थी। PRC के बनने के साथ ही चीन में लंबे समय से (1911 की चीनी क्रान्ति) चला आ रहा सरकारी उथल-पुथल का कार्य भी खत्म हो गया। राष्ट्रवादी पार्टी के हारने से अमेरिका ने चीन से सभी राजनीतिक संबंध खत्म कर दिए।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1921 में शंघाई में हुई थी। चीनी कम्यूनिस्टों ने 1926-27 के उत्तरी हमले के समय राष्ट्रवादी पार्टी का समर्थन किया। यह समर्थन 1927 के White Terror तक चला जब राष्ट्रवादियों ने कम्यूनिस्टों को मारना शुरू कर दिया।

1931 में जापान ने मंचुरिया पर कब्जा कर लिया। इस समय Republic of China की सरकार को तीन तरफ से हमले का डर था तथा वह थे जापानी हमला, कम्यूनिस्ट विद्रोह तथा उत्तर वाले लोगों के हमले का डर। चीन की सेना के कुछ उच्चाधिकारी Chiang-Kai-Shek के इस व्यवहार से दुखी हो गए कि वह आन्तरिक खतरों पर अधिक ध्यान दे रहा था न कि जापानी हमले पर। उन्होंने Shek को पकड़ लिया उसे कम्यूनिस्ट सेना से सहयोग करने के लिए कहा। यह राष्ट्रवादी सरकार तथा चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी (CCP) में सहयोग करने की पहली कोशिश थी परन्तु यह कोशिश कम समय के लिए ही थी। राष्ट्रवादियों ने जापान के ऊपर ध्यान करने की बजाए कम्यूनिस्टों को दबाने की तरफ ध्यान दिया जबकि कम्यूनस्टि ग्रामीण क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाने में लगे रहे।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कम्यूनिस्टों के लिए समर्थन काफ़ी बढ़ गया। चीन में अमेरिकी अधिकारियों राष्ट्रवादियों के क्षेत्र में लोगों के समर्थन को दबाने के प्रयास किए। इन अलोकतान्त्रिक नातियों तथा युद्ध के दौरान हो रहे भ्रष्टाचार ने चीन की सरकार को कम्यूनिस्टों के विरुद्ध काफ़ी कमज़ोर कर दिया। कम्यूनिस्ट पार्टी ने ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार करने शुरू किए जिससे उनका समर्थन बढ़ गया।

1945 में जापान युद्ध हार गया जिससे चीन में गृह युद्ध का खतरा बढ़ गया। Chiang Kai-Shek की सरकार को अमेरिकी समर्थन मिलना जारी रहा क्योंकि कम्यूनिस्टों के बढ़ते खतरे को चीन में केवल वह ही रोक सकता था। 1945 में Chiang-Kai-Shek तथा माओ-त्से-तुंग मिले ताकि लड़ाई के बाद की सरकार के गठन के ऊपर चर्चा की जा सके। दोनों लोकतन्त्र की बहाली, इकट्ठी सेना, चीन के राजनीतिक दलों की स्वतन्त्रता पर हामी भर चुके थे। सन्धि होने वाली थी परन्तु अमेरिका के दखल के कारण वह न हो सकी तथा 1946 में गृह युद्ध शुरू हो गए।

गृह युद्ध में 1947 से 1949 में कम्यूनिस्टों की जीत पक्की लग रही थी क्योंकि उन्हें जनसमर्थन प्राप्त था, उच्च दर्जे की सेना थी तथा मंचुरिया में जापानियों से छीने हुए हथियार भी थे। अक्तूबर 1949 में कई स्थान जीतने के पश्चात् माओ-त्से-तुंग ने People’s Republic of China के गठन की घोषणा की। Chiang-Kai-Shek अपनी सेना के पुनर्गठन के लिए ताईवान भाग गया। इस प्रकार 1949 में चीनी क्रान्ति पूर्ण हो गई।

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प्रश्न 4.
समाजशास्त्र में दुर्थीम का योगदान बताइये।
उत्तर-
प्रसिद्ध समाज शास्त्री और दार्शनिक इमाइल दुर्थीम का जन्म 15 अप्रैल 1858 को उत्तरी-पूर्वी फ्रांस के लॉरेन (Lorraine) क्षेत्र में स्थित एपीनल (Epinal) नामक स्थान में हुआ था। दुर्थीम की आरम्भिक शिक्षा एपीनल की एक संस्था में हुई थी। बचपन से ही दुर्थीम एक मेधावी, प्रतिभाशाली तथा होनहार छात्र के रूप मे जाने जाते थे। दुर्थीम के पूर्वज ‘रेबी शास्त्रकार’ के रूप में प्रसिद्ध हुए थे। इसीलिए प्रतिभा तो दुर्थीम को विरासत से प्राप्त हुई थी। एपीनल में ही ग्रेजुएट तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए दुर्थीम फ्रांस की राजधानी पैरिस में चले गए।

पैरिस में दुर्थीम की उच्च शिक्षा का आरम्भ हुआ। यहां पर उन्होंने विश्व प्रसिद्ध संस्था इकोल नारमेल अकादमी (Ecol Normale Superieure) में दाखिला लेने की कोशिश की। यहां यह बताना ज़रूरी है कि इस संस्था में बहुत बढ़िया विद्यार्थियों को ही दाखिला मिलता था। दो असफल प्रयासों के बाद 1879 में दुर्थीम को इस संस्था में दाखिला मिल ही गया। यह संस्था फ्रांसीसी, लातिनी और ग्रीक दर्शन विषयों पर शिक्षा प्रदान करती थी और वहां के पूरे पाठ्यक्रम में यही विषय शामिल थे। लेकिन प्रत्यक्षवादी और वैज्ञानिक प्रवृत्ति वाले दुीम इन विषयों में ज्यादा रुचि न ले सकें क्योंकि वो तो समाज की असली, राजनीतिक, बौद्धिक और सामाजिक इत्यादि दिशाओं के अध्ययन में रुचि रखते थे।

दुर्थीम का यह पूर्ण विश्वास था कि ज्ञान में प्रत्यक्षवाद (Positivism) ज़रूर होना चाहिए। उनका मानना था कि अगर किसी भी ज्ञान अथवा दर्शन का अध्ययन करते समय वर्तमान, बौद्धिक और सामाजिक समस्याओं का अध्ययन नहीं किया जाता तो उस ज्ञान का कोई फायदा नहीं हैं। अपने इन विचारों के कारण दुर्थीम इस विश्व प्रसिद्ध संस्था के वातावरण से इतने असंतुष्ट थे कि वह कभी-कभी तो अपने अध्यापकों के विरुद्ध भी हो जाते थे। लेकिन फिर भी दुर्थीम ने इकोल नारमेल को अपने अंदर इतना बसा लिया कि उन्होंने अपने पुत्र आंद्रे को यहां दाखिल करवाया।

प्रसिद्ध प्रत्यक्षवादी और महान् इतिहासकार प्रोफैसर कुलांज (Prof. Fustel de Coulanges) 1880 में इस संस्था के निदेशक बने। वह दुीम के उन अध्यापकों में से एक थे जिनका दुीम से विशेष प्यार था। कुलांज ने वहां के पाठ्यक्रम में बदलाव किया जिससे दुर्थीम बहुत खुश हुए। दुीम कुलांज का इतना आदर करते थे कि लातिनी भाषा में उन्होंने मान्टेस्क्यू (Montesquieu) नामक किताब लिखी जो उन्होने कुलांज को समर्पित किया। वहां ही दुर्थीम इमाइल बोटरोकस (Emile Boutrocus) को भी मिले। यहीं पर ही दुर्थीम और विश्व प्रसिद्ध विद्वानों को मिले और उन प्रतिभावान विद्यार्थियों को मिले जो बाद में प्रमुख समाजशास्त्री बने। इन प्रसिद्ध विद्वानों के सम्पर्क में आने से दुर्थीम के बौद्धिक और मानसिक चिंतन में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई।

1882 में वह इकोल नार्मेल को छोड़ कर 5 वर्षों तक पैरिस के पास स्थित हाई स्कूलों सेनस, सेंट क्युटिंन और ट्राईज़ में दर्शन शास्त्र पढ़ाते रहे। साथ ही साथ अपने प्रभाव से इन स्कूलों में समाजशास्त्र का नया पाठ्यक्रम भी शुरू किया। दुर्थीम बहुत बढ़िया अध्यापक के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसके बाद भी दुर्थीम का मन यहां न लगा। 1885-86 में वह उच्च अध्ययन के लिए नौकरी से एक वर्ष की छुट्टी लेकर वर्ष के अंत में जर्मनी चले गए।

जर्मनी में दुर्शीम ने अर्थशास्त्र, लोक मनोविज्ञान, सांस्कृतिक मनोविज्ञान इत्यादि का काफ़ी गहराई से अध्ययन किया । यहाँ दुीम ने काम्ते (Comte) के लेखों का बारीकी से अध्ययन किया और शायद उससे प्रभावित होकर समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद (Sociological Positivism) को जन्म दिया।

1887 में दुर्थीम जर्मनी आ गए और बोर्डिक्स विश्वविद्यालय में प्रवेश रूप से सामाजिक शास्त्र का एक नया अलग विभाग स्थापित किया और आप को यहां अध्ययन के लिए बुलाया गया। लगभग 9 वर्षा के निरन्तर अध्ययन के पश्चात् वह 1896 में इसी विभाग के प्रोफेसर बन गए। इस दौरान पैरिस विश्वविद्यालय द्वारा दुर्थीम को 1893 में उनके फ्रांसीसी भाषा में लिखे शोध ग्रंथ Dela Divsion du Travail Social (Division of Labour in Society) पर उनको बहुत डाक्टरेट की उपाधी दी। उनके इस ग्रंथ के छपने के बाद उनको बहुत प्रसिद्धि मिली। 1895 में दुर्शीम ने अपने दूसरे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ Les Regles de ea Methode Sociologique (The rules of Sociological Method) की रचना की। इसकी दो वर्षों के बाद 1897 में दुर्थीम ने तीसरे महान् ग्रंथ Le Suicide : Etude de Sociologie (Suicide A Study of Sociology) की रचना की। इन महान् ग्रंथों की रचना के बाद दुखीम का नाम विश्व के प्रमुख दार्शनिक समाज शास्त्री और महान् लेखक के रूप में जाना जाने लगा।

वर्ष 1898 में दुर्शीम ने ‘L’ Annee Sociologique नाम से समाजशास्त्र सम्बन्धी मैगज़ीन की शुरुआत की और 1910 तक आप इस मैगजीन के सम्पादक रहे। दुर्थीम के इस मैगजीन ने फ्रांस के बौद्धिक वातावरण को बहुत नाम कमाया। इसमें बहुत सारे उच्च कोटि के विचार को जार्जस, डेवी, लेवी स्टार्स, साईमन इत्यादि ने अपने पत्र छपवाए।

इस विश्वविद्यालय में दुर्थीम ने बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की और उसके बाद 1902 में पैरिस विश्वविद्यालय में दुर्थीम को शिक्षा शास्त्र के प्रोफैसर पद पर नियुक्त किया गया। यहां एक महत्त्वपूर्ण बात थी कि उस समय तक विश्व में समाज शास्त्र का कोई अलग विभाग नहीं होता था। यह दुर्थीम की कोशिशों का ही नतीजा था कि 1913 में शिक्षा शास्त्र विभाग का नाम बदल कर शिक्षा शास्त्र और समाजशास्त्र रख दिया गया। यहां दुर्थीम ने और विषयों के साथ-साथ विकास और परिवार की शुरुआत, नैतिक शिक्षा, धर्म की उत्पत्ति, काम्ते और सेंट साईमन के सामाजिक दर्शन को बहुत लगन के साथ पढ़ाया। जिन विद्यार्थियों ने दुीम से शिक्षा प्राप्त की वह उनसे बहुत प्रभावित हुए। दुर्शीम ने एक और पुस्तक Les Farmes Elementains delavie Religieuse (Elementary forms of Religious Life) की रचना की।

र्बोडिक्स विश्वविद्यालय में नियुक्त होने के पश्चात् ही उन्होंने विवाह करवा लिए। उनकी पत्नी का नाम लुईस डरेफू (Louise Drefus) था और उनके दो बच्चे थे। उनकी लड़की का नाम मैंरी (Marie) और लड़के का नाम आंद्रे (Andre) था। दुर्शीम की पत्नी सम्पादन के काम से लेकर चैक करना, उसको संशोधित करना, पत्र व्यवहार करने जैसे सभी कार्य को बहुत मेहनत से करके दुर्थीम की सहायता करती थी।

दुर्शीम ने 1914 के पहले विश्व युद्ध में अपने पुत्र आंद्रे को समाज सेवा के लिए पेश किया और स्वयं अपने लेखों और भाषणों से जनता का मनोबल बना रखने के लिए जुट गए। युद्ध ने दुर्शीम जी को मानसिक तौर से काफ़ी कमज़ोर कर दिया क्योंकि वह शांति के समर्थक थे। जब दुर्थीम युद्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे तो उनको अपने पुत्र की मौत का समाचार मिला जिसकी मृत्यु लड़ाई के बुरी तरह जख्मी होने के कारण बुलगारीया के अस्पताल में हुई थी। आंद्रे उनका केवल पुत्र ही नहीं बल्कि सबसे अच्छा विद्यार्थी भी था इसी कारण उसकी मृत्यु ने दुर्थीम को अन्दर से तोड़ दिया।

दुर्थीम 1916 के अंत में एकदम बीमार हो गए लेकिन इसके पश्चात् भी वह 1917 में नीतिशास्त्र पर किताब लिखने के लिए फाऊंट नबलियु स्थान पर गए। 15 नवंबर, 1917 को असाधारण प्रतिभा वाले इस समाजशास्त्री की 59 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई।

दुर्शीम की रचनाएं (Writings of Durkheim) –
दुर्शीम ने अपने जीवनकाल के समय कई महान् ग्रंथों की रचना की जिनके नाम निम्नलिखित हैं-

1. The Division of Labour in Society – 1893
2. The Rules of Sociological Method – 1895
3. Suicide – 1897
4. Elementary Forms of Religious Life – 1912
5. Education and Sociology (After Death) – 1922
6. Sociology and Philosophy (After Death) – 1924
7. Moral Education (After Death) – 1925
8. Sociology and Saint Simon(After Death) – 1924
9. Pragmatism and Sociology (After Death) – 1925

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 5.
वैबर द्वारा प्रस्तुत सामाजिक क्रिया के प्रकारों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
सामाजिक व्यवहार की पूरी व्याख्या करते हुए वैबर ने चार प्रकार के सामाजिक कार्यों की व्याख्या की है।

1. तार्किक उद्देश्यपूर्ण व्यवहार (Zweckrational)-वैबर ने बताया है कि तार्किक उद्देश्यपूर्ण सामाजिक व्यवहार का अर्थ ऐसे सामाजिक व्यवहार से होता है जो उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए अनेक उद्देश्यों की अधिक-से-अधिक प्राप्ति के लिए तार्किक रूप में निर्देशित हो, इसमें साधनों के चुनाव में केवल उनके विशेष प्रकार की कार्यकुशलता की तरफ ध्यान ही नहीं दिया जाता बल्कि भूल पर भी ध्यान दिया जाता है। साध्य और साधनों की अच्छी तरह जांच की जाती है और उसके आधार पर ही क्रिया सम्पादित होती है।

2. मूल्यात्मक व्यवहार (Wertrational)-मूल्यात्मक व्यवहार में किसी विशेष और स्पष्ट मूल को बहुत अधिक प्रभावशाली उपलब्ध साधनों के द्वारा स्थान दिया जाता है। दूसरे मूल्यों की कीमतों पर कुछ ध्यान नहीं दिया जाता है। इसमें तार्किक आधार नहीं हो सकता, बल्कि नैतिकता, धार्मिक या सुन्दरता के आधार पर ही मान ली गई है। नैतिक और धार्मिक मान्यताओं को बनाये रखने के लिए मूल्यात्मक क्रियाएं की जाती हैं। इन क्रियाओं को मानने में किसी भी प्रकार के तर्क की सहायता नहीं ली जाती है। वह इसी तरह ही मान ली जाती है क्योंकि इसके कारण सामाजिक सम्मान भी बढ़ता है और आत्मिक सन्तोष भी बढ़ता है।

3. संवेदात्मक व्यवहार (Assectual Behaviour)-ऐसी क्रियाएं मानवीय भावनाओं, संवेगों और स्थायी भावों के कारण होती हैं। समाज में रहते हुए हमें प्रेम, नफरत, गुस्सा इत्यादि भावनाओं का शिकार होना पड़ता है। इसके कारण ही समाज में शान्ति या अशान्ति की अवस्था पैदा हो जाती है। इन व्यवहारों के कारण परम्परा और तर्क का थोड़ा सा भी सहारा नहीं लिया जाता है।

4. परम्परागत व्यवहार (Traditional Behaviour)-परम्परागत क्रियाएं पहले से निश्चित प्रतिमानों के आधार पर की जाती हैं । सामाजिक जीवन को सरल और शांतमय रखने के लिए परम्परागत क्रियाएं महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। सम्भव है कभी वह स्थिति पैदा हो जाये, कि इन क्रियाओं द्वारा समाज में संघर्ष पैदा हो जाये कि इन क्रियाओं द्वारा तर्क, कार्यकुशलता और किसी और प्रकार का सहारा लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। सामाजिक प्रथाएं ही इन क्रियाओं को संचालित करती हैं ।।

वैबर ने बताया है कि सामाजिक क्रियाएं तीन प्रकार से निर्देशित होती हैं ।

प्रश्न 6.
वैबर किस प्रकार धर्म को आर्थिक क्रियाओं से जोड़ते हैं ?
उत्तर-
पूंजीवाद का सार (Essence of Capitalism)-वैबर का आरम्भिक अध्ययन एक ऐसी प्रवृत्ति पर केन्द्रित है जो आधुनिक समाज में विशेष रूप में दिखाई देती है। आर्थिक व्यवहारों पर धार्मिक प्रभावों को स्पष्ट करने के लिए 1904 से 1905 में जो लेख लिखे हैं उनके आधार पर उसकी सबसे प्रसिद्ध किताब The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism के नाम से छपी। इस किताब के अधिकतर भाग में वैबर ने इस समस्या पर प्रकाश डाला है कि प्रोटैस्टैंट धर्म के विचारों या नीतियों ने किस प्रकार पूंजीवाद के विकास को प्रभावित किया है। यह विचार मार्क्स के इस सिद्धान्त के लिए एक खुली चुनौती थी कि मानव की सामाजिक व धार्मिक चेतना उसके सामाजिक वर्ग द्वारा निर्धारित होती है।

वैबर के विचारों से आधुनिक औद्योगिक जगत् के मानव की एकता स्पष्ट है कि उसको सख्त मेहनत करनी चाहिए। वैबर के अनुसार, “कठोर काम एक कर्तव्य है व इसका नतीजा इसी के बीच शामिल है।” यह विचार वैबर के दृष्टिकोण से आधुनिक औद्योगिक जगत् के मानव का विशेष गुण है। मानव अपने काम में अच्छी तरह काम इसलिए नहीं करना चाहता क्योंकि उसको काम करना पड़ेगा बल्कि इसलिए कि वह ऐसा करना चाहता है। वैबर के अनुसार यह उसकी व्यक्तिक संतुष्टि का आधार है। वैबर ने स्वयं लिखा है कि एक व्यक्ति से अपनी आजीविका के मूल्य के प्रति होने वाले कर्त्तव्य का अनुभव करने की आशा की जाती है व वह ऐसा करता भी है चाहे वह किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो। अमरीका की एक कहावत है कि, “यदि कोई व्यक्ति काम करने के योग्य है तो उसे सबसे बढ़िया ढंग से पूरा करना चाहिए।” यह कहावत वैबर के अनुसार पूंजीवाद का सार भी है क्योंकि इस धारणा का सम्बन्ध किसी आलौकिक उद्देश्य से नहीं बल्कि आर्थिक जीवन में व्यक्ति को प्राप्त होने वाली सफलता से है। चाहे किसी विशेष समय में यह धारणा धार्मिक नैतिकता से सम्बन्धित रही है। पूंजीवाद के सार को स्पष्ट करने के लिए वैबर ने उसकी तुलना एक अन्य आर्थिक क्रिया से की है जिसका नाम उन्होंने परम्परावाद रखा है। आर्थिक क्रियाओं में परम्परावाद वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अधिक लाभ के बाद भी कम-से-कम काम करना चाहता है।

वह काम के दौरान अधिक-से-अधिक आराम करना पसन्द करता है व काम के नये तरीके से अनुकूलन करने की इच्छा नहीं करते हैं। वह जीवन जीने के लिए साधारण तरीकों से ही खुश हो जाते हैं व एकदम लाभ प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। सिद्धान्तहीन रूप से धन का इकट्ठा करना आर्थिक परम्परावाद का ही एक हिस्सा है तथा ये सारी विशेषताएं पूंजीवाद के सार से पूरी तरह उलट हैं । असल में आधुनिक पूंजीवाद अन्तर्सम्बन्धित संस्थाओं का एक ऐसा बड़ा एकत्र (Complex) है, जिसका आधार आर्थिक कोशिशें हैं न कि स्टोरियों की कोशिशें। पूंजीवाद के अन्तर्गत व्यापारी निगमों का कानूनी रूप, संगठित लेन-देन का केन्द्र, सरकारी कर्जा पत्रों के रूप में सार्वजनिक कर्जा देने की प्रणाली व ऐसे उद्योगों के संगठनों का समूह है जिनका उद्देश्य वस्तुओं के तार्किक आधार पर उत्पादन करना होता है न कि उनका व्यापार करना। वैबर का विचार था कि दक्षिणी यूरोप, रोम अभिजात वर्ग व ओलबी नदी के पूर्व के ज़मींदारों की आर्थिक क्रियाएं अचानक लाभ प्राप्त करने के लिए की गईं जिनमें उन्होंने सारे नैतिक विचारों का त्याग कर दिया। उनकी क्रियाओं में आर्थिक लाभ की तार्किक कोशिशों की कमी थी जिस कारण उन्हें पूंजीवाद के बराबर नहीं रखा जा सकता।

वैबर के अनुसार पूंजीवाद के सार का गुण केवल पश्चिमी समाज का ही गुण नहीं है। अनेकों समाजों में ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने अपने व्यापार को बढ़िया ढंग से चलाया, जो नौकरों से भी अधिक मेहनत करते हैं, जिनका जीवन सादा था व जो अपनी बचत को भी व्यापार में ही लगा देते थे पर इसके बाद भी इन पंजीवादी विशेषताओं का प्रभाव पश्चिमी समाजों में कहीं ज्यादा मिलता रहा है, इसका कारण यह था कि पश्चिम में यह गुण एक व्यक्तिगत गुण न रहकर जीवन जीने के आम तरीके के रूप में विकसित हुआ। इस तरह लोगों में फैली कठोर मेहनत, व्यापारिक व्यवहार, सार्वजनिक कर्जा व्यवस्था, पूंजी का लगातार व्यापार में लगाते रहना व मेहनत के प्रति इच्छा ही पूंजीवाद का सार है। इसके विपरीत एकदम लाभ पाने की कोशिश, मेहनत को बोझ व श्राप समझकर उसको न करना, धन को इकट्ठा करना व जीवन जीने के साधारण स्तर से ही सन्तुष्ट हो जाना आम आर्थिक आदतें हैं।

प्रोटैस्टैंट नीति (Protestant Ethic) यह स्पष्ट करने के बाद कि उनके अध्ययन का उद्देश्य पूंजीवाद का सार है वैबर ने ऐसे अनेकों कारण बताए हैं जिनके आधार पर सुधार आन्दोलन के धार्मिक विचारों में इसकी उत्पत्ति को ढूंढना है। वैबर ने अपने एक विद्यार्थी बाडेन (Baden) को राज्य में धार्मिक सम्बन्धों व शिक्षा को चयन का अध्ययन करने के लिए कहा। बाडेन ने एक परिणाम यह पेश किया कि कैथोलिक विद्यार्थियों की तुलना में प्रोटैस्टैंट विद्यार्थी उन शिक्षा संस्थाओं में अधिक दाखिला लेते हैं जो औद्योगिक जीवन से सम्बन्धित हैं। एक और कारण यह भी था कि यूरोप में समय-समय पर कम गणना समूहों ने अपनी सामाजिक व राजनीतिक हानि को कठोर आर्थिक मेहनत से पूरा कर लिया जबकि कैथोलिक ऐसा न कर सके। इन हालातों के प्रभाव से वैबर की इस धारणा को बल मिला कि धार्मिक नीति व आर्थिक क्रियाओं में कोई सम्बन्ध ज़रूर है। इसके बाद वैबर ने यह भी देखा कि 16वीं सदी में बहुत सारे अमीर प्रदेशों व शहरों में प्रोटैस्टैंट धर्म स्वीकार कर लिया क्योंकि प्रोटैस्टैंट धर्म अपनी अनेकों नीतियों के कारण आर्थिक लाभ की कोशिशों को आगे बढ़ा रहा है। इसी आधार पर वैबर ने यह पता करने की कोशिश की कि प्रोटैस्टैंट धर्म का प्रचार आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हुए देशों में हुआ व अंतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के बाद भी किसी क्षेत्र में कैथोलिक धर्म प्रभावशाली बना रहा।

The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism लिखने में वैबर का उद्देश्य बहुत कुछ इस विरोध की व्याख्या के कारण आर्थिक जीवन पर धार्मिक नीतियों के प्रभाव को स्पष्ट करना था। वैबर यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि प्रोटैस्टैंट धर्म की नीतियां किस तरह उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गईं जो आर्थिक लाभों को तार्किक दृष्टि से प्राप्त करने के हक में थीं। इस तरह वैबर के अनुसार किसी भी धर्म के साथ सम्बन्धित सिद्धान्तों पर इस नज़र से विचार करना चाहिए कि यह सिद्धान्त अपने शिष्यों को किस तरह के व्यवहारों का प्रोत्साहन देता है। इस प्रश्न को ध्यान में रखते हुए वैबर ने प्रोटैस्टैंट धर्म के शुद्ध विचारवादी पादरियों के लेखों को परखा व उनके द्वारा बनाए कालविनवादी सिद्धान्तों का समुदाय के दैनिक व्यवहार पर प्रभाव स्पष्ट किया।

प्रोटैस्टैंट धर्म के नीति के रूप में सेंट पाल के इस आदेश को व्यापक रूप से ग्रहण किया जाने लगा कि, “जो व्यक्ति काम नहीं करेगा वह रोटी नहीं खाएगा व ग़रीब की तरह अमीर भी भगवान के गौरव को बढ़ाने के लिए किसी न किसी समय पर व्यापार को ज़रूर करे।” इस तरह मेहनती जीवन ही प्रोटैस्टैंट धर्म शुद्ध विचारवादी धार्मिक भक्ति के अनुसार है।

रिचर्ड बैक्सटर (Richard Baxter) ने कहा कि, “केवल धर्म के लिए ही भगवान् हमारी क्रियाओं की रक्षा करता है। मेहनत ही शक्ति का नैतिक व प्राकृतिक उद्देश्य है, केवल मेहनत से ही भगवान् की सबसे ज्यादा सेवा हो सकती है।” एक अन्य सन्त जॉन बयिन ने कहा था कि, “यह नहीं कहा जाएगा कि आप क्यों विश्वास करते थे, केवल ये कहा जाएगा कि आप कुछ मेहनत भी करते थे या केवल बातें ही करते थे।” इस तरह प्रोटैस्टैंट धर्म की नीति में काम करते जीवन को ही खुदा की भक्ति के रूप में मान लिया गया। प्रोटैस्टैंट धर्म में मेहनत की प्रशंसा ने नये नियमों को जन्म दिया। इसके अनुसार समय को व्यर्थ नष्ट करना पाप है। जीवन छोटा व मूल्यवान् है, इसलिए मानव को हर समय भगवान् का गौरव बढ़ाने के लिए अपना समय अपने उपयोगी काम में लगाना चाहिए। व्यर्थ की बातचीत, लोगों को ज्यादा मिलना, ज़रूरत से ज्यादा सोना व दैनिक कार्यों को हानि पहुंचा कर धार्मिक कार्यों में लगे रहना पाप है क्योंकि इनके कारण भगवान् के द्वारा दिए आजीविका काम को भगवान् की इच्छा के अनुसार पूरा नहीं किया जा सकता। इस दृष्टिकोण से प्रोटैस्टैंट धर्म की नीतियां व्यक्तिगत नीति के इस आदर्श के विरुद्ध हैं, “अमीर व्यक्ति कोई काम न करे या यह कि धार्मिक ध्यान सांसारिक कार्यों से ज्यादा मूल्यवान् है। यही प्रोटैस्टैंट नीति है।”

पूंजीवाद व प्रोटैस्टैंट नीति का सम्बन्ध (Relationship of Capitalism and Protestant Ethic)पूंजीवाद के सार व प्रोटैस्टैंट नीतियों के अध्ययन से वैबर को इनके अनेकों आधारों में समानता मिलती है। इन समानताओं ने वैबर को इस तथ्य पर विचार करने से प्रेरणा दी है कि आर्थिक व्यवहारों व धार्मिक नीतियों में समानताएं किन परिस्थितियों के कारण समानताओं का वर्णन परिस्थितियों के परिणाम से है। वैबर ने पहले 16वीं व 17वीं सदी में धर्म संघों व उनकी मान्यताओं में होने वाले परिवर्तनों का मानवीय व्यवहारों पर प्रभावों का अध्ययन किया। शुरू में अनेकों धर्म संघों ने भौतिक चीजों की प्राप्ति व उनके इकट्ठा करने पर जोर दिया व कुछ समय के बाद धन के एकत्र को अधार्मिकता की श्रेणी में रखा जाने लगा जिसमें मेहनत के सामने सारी इच्छाओं को समाप्त कर लेना ठीक था। इस धर्म संघ ने इच्छाओं के दमन करने की निष्पक्षता को खत्म करने के रूप में न लेकर श्रम के रास्ते में आने वाली रुकावट को इच्छा खत्म करने के रूप में स्पष्ट किया। वैबर के अनुसार, “जब इच्छा ख़त्म कर लेने की धारणा धर्म केन्द्रों की सीमा से बाहर निकल कर सांसारिक नैतिकता को प्रभावित करने लगी तो इसने आधुनिक अर्थव्यवस्था (पूंजीवाद) की रचना में ही अपना योगदान शुरू कर दिया।” इस परिवर्तन ने वैबर को अध्ययन की एक दिशा प्रदान की। धर्म की नीतियां ही वे मूल कारण हैं जो व्यक्ति के आर्थिक वे धर्म-निरपेक्ष व्यवहारों को प्रभावित करती हैं।

इस तरह वैबर ने अत्यधिक परिणामों द्वारा यह स्पष्ट किया कि किस तरह प्रोटैस्टैंट धर्म की नीतियां योग के अनेकों देशों में आरम्भिक पूंजीवाद के विकास के लिए ठीक हैं। प्रोटैस्टैंट धर्म के सुधार आन्दोलन के शुरू से ही धार्मिक समारोहों में प्रवेश करने का अधिकार उन लोगों को दिया जिनकी इन धर्म की नीतियों में बहुत ज्यादा श्रद्धा थी। धार्मिक परिषदों के सदस्यों को यह सिद्ध करना पड़ता था कि उनमें अपने धर्म की नीतियों को व्यावहारिक रूप देने की पूरी समर्था है। यह परम्परा वैबर के अनुसार साधनों से सम्बन्ध आजीविका को महत्त्व देकर आधुनिक पूंजीवाद के विकास में बहत ज्यादा सहायक सिद्ध हई। धीरे-धीरे प्रोटैस्टैंट धर्म की नैतिक शिक्षाओं को मानने वालों के जीवन की शैली एक व्यवस्थित शैली में बदल गई। वैबर ने इस स्थिति को एक ऐसी घटना के रूप में स्वीकार किया कि जिससे पश्चिमी जीवन के भिन्न-भिन्न पहलुओं में तर्कवाद बढ़ा। यह तर्कवाद पश्चिमी सभ्यता के भिन्नभिन्न रूपों में स्पष्ट हुआ व पूंजीवाद के विकास से इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। इस तरह पूंजीवाद के सार व प्रोटैस्टैंट नीति के सम्बन्ध की व्याख्या के आधार पर धर्म को समझाया है।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions):

प्रश्न 1.
मार्क्स के अनुसार समाज में कितने वर्ग होते हैं ?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच।
उत्तर-
(A) दो।

प्रश्न 2.
इनमें से कौन-सा वर्ग का प्रकार मार्क्स ने दिया था जो हरेक समाज में मौजूद होता है ?
(A) पूंजीपति वर्ग
(B) श्रमिक वर्ग
(C) दोनों (A + B)
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(C) दोनों (A + B)।

प्रश्न 3.
कार्ल मार्क्स ने समाज में वर्ग संघर्ष का कौन-सा कारण दिया है ?
(A) पूंजीपति वर्ग द्वारा श्रमिक वर्ग का शोषण
(B) श्रमिक वर्ग द्वारा पूंजीपति वर्ग का शोषण
(C) दोनों वर्गों में ऐतिहासिक दुश्मनी
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(A) पूंजीपति वर्ग द्वारा श्रमिक वर्ग का शोषण।

प्रश्न 4.
इनमें से कौन-सा संकल्प मार्क्स ने समाजशास्त्र को दिया था ?
(A) वर्ग संघर्ष
(B) ऐतिहासिक भौतिकवाद
(C) अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपर्युक्त सभी।

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प्रश्न 5.
दुर्खीम का जन्म कब हुआ था ?
(A) 1870
(B) 1858
(C) 1864
(D) 1868.
उत्तर-
(B) 1858.

प्रश्न 6.
फ्रांस में समाजशास्त्र में काम्ते का उत्तराधिकारी किसे कहा जाता है ?
(A) वैबर
(B) मार्क्स
(C) दुखीम
(D) स्पैंसर।
उत्तर-
(C) दुर्खीम।

प्रश्न 7.
इनमें से कौन-सी पुस्तक दुर्खीम ने लिखी थी ?
(A) Division of Labour in Society
(B) Suicide-A Study of Sociology
(C) The Rules of Sociological Method
(D) All of these.
उत्तर-
(D) All of these.

प्रश्न 8.
इनमें से कौन-सा सिद्धान्त दुर्खीम ने दिया था ?
(A) श्रम विभाजन
(B) सामाजिक तथ्य
(C) आत्महत्या का सिद्धांत
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपर्युक्त सभी।

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प्रश्न 9.
दुर्खीम ने सामाजिक तथ्य के कितने प्रकार दिए हैं ?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच।
उत्तर-
(B) तीन।

प्रश्न 10.
दुर्खीम ने इनमें से सामाजिक तथ्य का कौन-सा प्रकार दिया था ?
(A) बाध्यता
(B) बाहरीपन
(C) सर्वव्यापकता
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 11.
इनमें से कौन-सा संकल्प वैबर ने समाजशास्त्र को दिया है ?
(A) सत्ता
(B) आदर्श प्रारूप
(C) सामाजिक क्रिया
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपर्युक्त सभी।

II. रिक्त स्थान भरें (Fill in the blanks) :

1. कार्ल मार्क्स …………… दार्शनिक थे।
2. मैक्स वैबर ने सामाजिक …………. का सिद्धांत दिया था।
3. श्रम विभाजन का सिद्धांत …………. ने दिया था।
4. ऐतिहासिक योगदान का संकल्प …………… ने दिया था।
5. कार्ल मार्क्स ने वर्ग ………….. का सिद्धांत दिया था।
6. वैबर अनुसार ………….. धर्म पूँजीवाद को सामने लाने के लिए उत्तरदायी है।
7. आत्महत्या का सिद्धांत ………….. ने दिया था।
उत्तर-

  1. जर्मन,
  2. क्रिया,
  3. दुर्खीम,
  4. कार्ल मार्क्स,
  5. संघर्ष,
  6. प्रोटैस्टैंट,
  7. दुर्खीम।

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III. सही/गलत (True/False) :

1. दुर्खीम फ्रांस में पैदा हुआ था।
2. दुर्खीम ने तीन प्रकार की आत्महत्या के बारे में बताया था।
3. वैबर ने चार प्रकार की सत्ता का वर्णन किया था।
4. मार्क्स के अनुसार समाज में तीन प्रकार के वर्ग होते हैं।’
5. मजदूर वर्ग पूँजीपति वर्ग का शोषण करता है।
6. सामाजिक एकता का सिद्धांत दुर्खीम ने दिया था।
उत्तर-

  1. सही,
  2. सही,
  3. गलत,
  4. गलत,
  5. गलत,
  6. सही।

IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Wordline Question Answers) :

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र का जन्मदाता किसे कहा जाता है ?
उत्तर-
अगस्ते काम्ते को समाजशास्त्र का जन्मदाता कहा जाता है।

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प्रश्न 2.
समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग पहली बार कब किया गया था ?
उत्तर-
समाजशास्त्र शब्द का प्रयोग पहली बार 1839 में किया गया था।

प्रश्न 3.
कार्ल मार्क्स कब तथा कहाँ पैदा हुए थे ?
उत्तर-
कार्ल मार्क्स 5 मई, 1818 को प्रशिया के राईन प्रांत के ट्रियर शहर में पैदा हुए थे।

प्रश्न 4.
कार्ल मार्क्स को कब तथा कहां डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई थी ?
उत्तर-
कार्ल मार्क्स को 1841 को जेना विश्वविद्यालय से डाक्टरेट की उपाधि मिली थी।

प्रश्न 5.
Communist Menifesto कब तथा किसने लिखी थी ?
उत्तर-
Communist Menifesto सन् 1848 को मार्क्स तथा ऐंजल्स ने लिखा था।

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प्रश्न 6.
कार्ल मार्क्स की मृत्यु कब हुई थी ?
उत्तर-
कार्ल मार्क्स की मृत्यु 14 मार्च,1883 को हुई थी।

प्रश्न 7.
मार्क्स के अनुसार समाज में कितने वर्ग होते हैं ?
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार समाज में दो प्रमुख वर्ग होते हैं-पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग।

प्रश्न 8.
मार्क्स ने समाजशास्त्र को कौन-से संकल्प दिए हैं ?
उत्तर-
मार्क्स ने समाजशास्त्र को वर्ग संघर्ष, ऐतिहासिक भौतिकवाद, सामाजिक परिवर्तन, अलगाव एवं अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत दिए हैं।

प्रश्न 9.
दुीम को फ्रांस में तथा समाजशास्त्र में किसका उत्तराधिकारी माना जाता है ?
उत्तर-
दुर्खीम को समाजशास्त्र में काम्ते का उत्तराधिकारी माना जाता है।

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प्रश्न 10.
दुखीम किस विश्वविद्यालय में प्रोफैसर नियुक्त हए थे ?
उत्तर-
दुर्खीम पैरिस विश्वविद्यालय में प्रोफैसर नियुक्त हुए थे।

प्रश्न 11.
दुर्जीम ने समाजशास्त्र को कौन-से सिद्धांत दिए थे ?
उत्तर-
दुर्खीम ने समाजशास्त्र को सामाजिक तथ्य, आत्महत्या, धर्म, श्रम विभाजन इत्यादि जैसे सिद्धांत दिए थे।

प्रश्न 12.
वैबर के अनुसार सत्ता के कितने प्रकार हैं ?
उत्तर-
वैबर के अनुसार सत्ता के तीन प्रकार होते हैं-परंपरागत, वैधानिक व करिश्मई।

प्रश्न 13.
वैबर के अनुसार कौन-सा धर्म विकास के लिए उत्तरदायी है ?
उत्तर-
वैबर के अनुसार पूँजीवाद के विकास के लिए प्रोटैस्टैंट धर्म उत्तरदायी है।

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प्रश्न 14.
वैबर ने समाजशास्त्र को क्या योगदान दिया है ?
उत्तर-
वैबर ने सत्ता के प्रकार, आदर्श प्रारूप, सामाजिक क्रिया, पूँजीवाद, प्रोटैस्टैंट धर्म की व्याख्या इत्यादि जैसे संकल्पों का योगदान दिया है।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पूँजीवादी वर्ग क्या होता है ?
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार पूँजीवादी वर्ग ऐसा वर्ग होता है जिसके पास उत्पादन के सभी साधन होते हैं तथा वह सभी उत्पादन के साधनों का मालिक होता है जिनकी सहायता से वह अन्य वर्गों का शोषण करता है। अपने साधनों की सहायता से वह पैसे कमाता है तथा आराम का जीवन व्यतीत करता है। मार्क्स ने अनुसार एक दिन मज़दूर वर्ग इस वर्ग की सत्ता उखाड़ फेंकेगा।

प्रश्न 2.
मज़दूर वर्ग क्या होता है ?
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार मज़दूर वर्ग के पास उत्पादन के साधनों की मल्कियत नहीं होती। उसके पास कोई पूँजी या पैसा नहीं होता। उसके पास रोटी कमाने के लिए अपना परिश्रम बेचने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता। वह हमेशा पूँजपति वर्ग के हाथों शोषित होता रहता है। इस शोषण के कारण वह निर्धन होता जाता है।

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प्रश्न 3.
पूँजीवाद क्या होता है ?
उत्तर-
पूँजीवाद एक आर्थिक व्यवस्था है जिसमें निजी सम्पत्ति की प्रधानता होती है तथा बाजार पर सरकारी नियन्त्रण न के बराबर होता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा तथा योग्यता के अनुसार कमाने का अधिकार होता है। पूँजीवाद में पूँजीपति अपने पैसे से और पैसा कमाता है तथा मजदूर वर्ग का शोषण करता है।

प्रश्न 4.
सामाजिक एकता क्या है ?
उत्तर-
दुर्खीम के अनुसार प्रत्येक समाज के कुछ मूल्य, आदर्श, विश्वास, व्यवहार के तरीके, संस्थाएं तथा कानून प्रचलित होते हैं जो समाज को बाँध कर रखते हैं। ऐसे तत्त्वों के कारण समाज में एकता बनी रहती है। इनके कारण समाज में संबंध बने रहते हैं तथा यह समाज में एकता उत्पन्न करते हैं जिसे हम सामाजिक एकता कहते हैं।

प्रश्न 5.
श्रम विभाजन क्या है ?
उत्तर-
दुर्खीम के अनुसार श्रम विभाजन का अर्थ अलग-अलग लोगों अथवा वर्गों में उनके सामर्थ्य तथा योग्यता के अनुसार कार्य का विभाजन करना है ताकि कार्य संगठित तरीके से पूर्ण किया जा सके। इसे ही श्रम विभाजन कहा जाता है। यह प्रत्येक समाज में पाया जाता है। इसकी उत्पत्ति नहीं बल्कि विकास होता है।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आध्यात्मिक पड़ाव।
उत्तर-
काम्ते की सैद्धान्तिक स्कीम में आध्यात्मिक पड़ाव बहुत महत्ता रखता है। उसके अनुसार इस अवस्था में मानव के विचार काल्पनिक थे। मानव सब वस्तुओं को परमात्मा के रूप में या किसी आलौकिक जीव की उस समय की क्रियाओं के परिणामस्वरूप में देवता मानता व समझता था। धारणा यह होती थी कि सभी वस्तुएं चाहे निर्जीव हो व सजीव हैं या कार्यरूप अलौकिक शक्तियां हैं अर्थात् सब वस्तुओं में वही शक्ति व्यापक है। धार्मिक पड़ाव में मानव के बारे चर्चा करते काम्ते कहते हैं कि इस अवस्था में सृष्टि के ज़रूरी स्वभाव की खोज करना या प्राकृतिक घटनाओं के होने के अन्तिम कारणों को जानने के यत्न में मानव का दिमाग यह मान लेता है कि सब घटनाएं अलौकिक प्राणियों की तत्कालीन घटनाओं का प्रमाण है। यह आगे तीन उप पड़ावों-प्रतीक पूजन, बहुदेवतावाद व ऐकेश्वरवाद में बांटा है।

प्रश्न 2.
अधिभौतिक पड़ाव।
उत्तर-
इस पड़ाव को काम्ते आधुनिक समाज का क्रान्तिकाल भी कहते हैं। यह पड़ाव पांच शताब्दियों तक 14वीं से 19वीं तक चला। इसे दो भागों में बाँट सकते हैं। प्रथम भाग में क्रान्तिक आन्दोलन स्वयं ही चल पड़ा। क्रान्तिक फिलासफी 16वीं सदी में प्रोटैस्टैंटवाद के आने से आरम्भ हुई। यहां ध्यान रखने योग्य बात यह है कि रोमन कैथोलिक वाद में आत्मिक व दुनियावी ताकतों के बिछड़ने से आध्यात्मिक सवालों के सामाजिक हालतों पर भी विचार करने का हौसला दिलाया। दूसरा भाग 16वीं सदी से आरम्भ हुआ। इस समय में नकारात्मक सिद्धान्त शुरू हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन था। इसमें प्रोटैस्टैन्टवाद हमारे सामने आया। इसमें बेरोक निरीक्षण का अधिकार था और यह विचार दिया कि निरीक्षण की कोई सीमा नहीं है जिस कारण आत्मिकता का पतन हुआ जिसका दुनियावी पक्ष पर भी असर हुआ।

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प्रश्न 3.
सकारात्मक पड़ाव।
उत्तर-
इस पड़ाव को काम्ते औद्योगिक समाज के तौर पर देखता है तथा वे इसकी शुरुआत भी 14वीं सदी से ही मानते हैं। इस पड़ाव में सिद्धान्त व उसके प्रयोग में एक अन्तर पैदा हुआ। बौद्धिक कल्पना तीन अवस्थाओं में बांटी गई। ये है औद्योगिक या असली, एस्थैटिक या शाब्दिक व वैज्ञानिक या फिलास्फीकल। यह तीन अवस्थाएं प्रत्येक विषय के प्रत्येक पक्ष से मेल खाती हैं। औद्योगिक योजना का विशेष गुण राजनीतिक आजादी का होना है व इन्कलाबी पात्र का होना है। काम्ते सबसे ज्यादा महत्ता फिलास्फी व विज्ञान को देता है। उसका विचार है कि सकारात्मक पड़ाव में इन दोनों की बढ़त होती है इस पड़ाव की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें सामाजिक व्यवस्था व विकास में कोई द्वन्द नहीं होता है।

प्रश्न 4.
सकारात्मकवाद।
उत्तर-
काम्ते के अनुसार सकारात्मकवाद का अर्थ वैज्ञानिक विधि है वैज्ञानिक विधि वह विधि है, जिसमें किसी विषय वस्तु के समझने व परिभाषित करने के लिए कल्पना या अनुमान का कोई स्थान नहीं होता। यह तो परीक्षण अनुभव वर्गीकरण व तुलना व ऐतिहासिक विधि की एक व्यवस्थित कार्य प्रणाली होती है। इस तरह परीक्षण, अनुभव, वर्गीकरण तुलना व ऐतिहासिक विधि द्वारा किसी विषय के बारे में सब कुछ समझना व उसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करना सकारात्मकवाद है। सकारात्मकवाद का सम्बन्ध वास्तविकता से है कल्पना से नहीं। इसका सम्बन्ध उन निश्चित तथ्यों से है न कि अस्पष्ट विचारों से जिनका पूर्व ध्यान सम्भव है। सकारात्मकवाद वह प्रणाली है जो कि सर्वव्यापक रूप में सब को मान्य है।

प्रश्न 5.
सामाजिक स्थैतिकी।
उत्तर-
काम्ते ने समाज शास्त्र की इस शाखा की परिभाषा देकर लिखा है, समाज शास्त्र के स्थैतिकी अध्ययन से मेरा अभिप्राय सामाजिक प्रणाली के विभिन्न भागों में होने वाली क्रियाओं व प्रतिक्रियाओं से सम्बन्धित नियमों की खोज करने से है। काम्ते अनुसार सामाजिक स्थैतिकी में हम विभिन्न संस्थाओं व उनके बीच सम्बन्धों की चर्चा करते हैं। कृषि समाज को केवल उसकी विभिन्न संस्थाओं के अन्तर्सम्बन्धों की व्यवस्था के रूप में समझा जा सकता है।

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प्रश्न 6.
सामाजिक गतियात्मकता।
उत्तर-
काम्ते के अनुसार समाज शास्त्र की दूसरी शाखा सामाजिक गतिशीलता में समाज की विभिन्न इकाइयों के विकास व उनमें होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। काम्ते के विचार में सामाजिक गति आत्मिकता के नियम केवल बड़े समाज में ही स्पष्ट रूप में देखे जा सकते हैं। इस सम्बन्ध में काम्ते का निश्चित विचार था कि सामाजिक परिवर्तन के कुछ निश्चित पड़ावों में से निकलते हैं व उनमें लगातार प्रगति होती है।

प्रश्न 7.
वर्ग संघर्ष।
उत्तर-
कार्ल मार्क्स ने प्रत्येक समाज में दो वर्गों की विवेचना की है। उसके अनुसार प्रत्येक समाज में दो विरोधी वर्ग एक शोषण करने वाला व दूसरा शोषित होने वाला वर्ग होते हैं, जिनमें संघर्ष होता है इसी को मार्क्स वर्ग संघर्ष कहते हैं । शोषण करने वाला वर्ग जिसको वह पूंजीपति वर्ग या Bourgouisses का नाम देता है उसके पास उत्पादन के साधन होते हैं और वह इन उत्पादन के साधनों से अन्य वर्गों को दबाता है। दूसरा वर्ग जिसके वह मजदूर वर्ग या Proletariats का नाम देता है। उसके पास उत्पादन के कोई साधन नहीं होते। उसके पास रोजी कमाने के लिए केवल अपनी मेहनत बेचने के अलावा कुछ नहीं होता। वह पूंजीपति वर्ग से हमेशा शोषित होता है। इन दोनों में हमेशा एक संघर्ष चलता रहता है। इसी को मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का नाम दिया है।

प्रश्न 8.
मार्क्स के अनुसार किस समय वर्ग एवं वर्ग संघर्ष का अन्त हो जाएगा?
उत्तर-
मजदूर वर्ग के नेतृत्व में वर्ग संघर्ष के द्वारा राज्य पर अधिकार हो जाने के पश्चात् समाजवाद के युग का आरम्भ होगा। मार्क्स के अनुसार, राज्य शोषक ‘वर्ग के हाथों’ में दमन का बहुत बड़ा हाथ होता है। क्रान्ति के बाद भी सामन्तवाद व पूंजीवाद के दलाल प्रति क्रान्ति की कोशिश करते हैं। इसलिए पूंजीवाद के समाजवाद में जान कर संक्रमण काल में मजदूर की सत्ता की अस्थायी अवस्था होगी। समाजवाद की स्थापना के बाद शोषण का अन्त हो जाने पर वर्ग खत्म हो जाएगा व प्रत्येक व्यक्ति को अपने श्रम के अनुसार उत्पादन का लाभ मिलेगा। पर साम्यवाद की अधिक उन्नत अवस्था में प्रत्येक को उसकी ज़रूरत के अनुसार ही मिलने लग जाएगा। धीरे-धीरे राज्य जो शोषक वर्ग का हथियार रहा है, बिखर जाएगा व इसकी जगह आपसी सहयोग व सहकारिता के अनुसार पर आधारित संस्थाएं ले लेंगी। वर्गों व वर्ग संघर्ष का अन्त हो जाएगा।

प्रश्न 9.
पूंजीवादी वर्ग।
उत्तर-
मार्क्स ने पूंजीवादी वर्ग की धारणा दी है। उस अनुसार, समाज में एक वर्ग ऐसा होता है जिसके पास उत्पादन के साधन होते हैं वह जो सभी उत्पादन के साधनों का मालिक होता है। वह अपने उत्पादन के साधनों की मदद से और वर्गों का शोषण करता है। इन साधनों की मदद से वे और पैसे कमाते हैं और अमीर हुए जाते हैं। इस पैसे व उत्पादन के साधनों की मलकीयत करके आराम की ज़िन्दगी व्यतीत करता है। यह एक प्रगतिशील वर्ग होता है। जो थोड़े समय में ही शक्तिशाली उत्पादन शक्ति का मालिक हो गया है, वह यहां आकर यदि उन्नति को रोकते हैं व मजदूर वर्ग का शोषण करते हैं एक दिन आएगा जब मज़दूर वर्ग, इस वर्ग की सत्ता उखाड़ फेंकेगे व समाजवादी समाज की स्थापना करेंगे।

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प्रश्न 10.
मज़दूर वर्ग।
उत्तर-
मार्क्स के अनुसार, समाज में दो वर्ग होते हैं। पूंजीपति वर्ग व मज़दूर वर्ग। इस मज़दूर वर्ग के पास उत्पादन के साधनों की मलकियत नहीं होती। उसके पास कोई पूंजी (पैसा) नहीं होती। उसके पास अपनी रोजी कमाने के लिए अपनी मेहनत बेचने के अलावा और कोई तरीका नहीं होता। वह हमेशा पूंजीपति वर्ग के हाथों शोषित होता रहता है। पूंजीपति वर्ग हमेशा उनसे अधिक-से-अधिक काम लेता रहता है व कम-से-कम पैसा देता है। उसकी मेहनत ही अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन करती है तथा उसको पूंजीपति वर्ग ही रखता है। इस शोषण के कारण ही मज़दूर वर्ग और ग़रीब होता जाता है। एक दिन दोनों में संघर्ष छिड़ जाएगा अन्त में मजदूर वर्ग पूंजीपति वर्ग को उखाड़ गिराएगा व समाजवादी समाज की स्थापना करेगा।

प्रश्न 11.
वैधानिक सत्ता।
उत्तर-
जहां कहीं भी नियमों की ऐसी प्रणाली है जो निश्चित सिद्धान्तों के अनुसार न्यायिक व प्रशासनिक रूप से की जाती है व जो एक नियमित समूह के सभी सदस्यों के लिए सही व मानने योग्य होती है, वहां व्यापक सत्ता है। जो व्यक्ति आदर्श की शक्ति को चलाते हैं वह विशेष रूप से श्रेष्ठ होते हैं। वह कानून द्वारा सारी विधि के अनुसार नियुक्त होते हैं या चुने जाते हैं और वे वैधानिक व्यवस्था को चलाने के लिए आप निर्देशित रहते हैं।

जो व्यक्ति बिना आदेशों के अधीन हैं वह वैधानिक रूप से समान हैं वह विधान का पालन करते हैं न कि उस विधान में काम करने वालों का। यह नियम उस उपकरण के लिए उपयोग किए जाते हैं जो वैधानिक सत्ता की प्रणाली का उपयोग करते हैं। यह संगठन स्वयं अबाध्य होते हैं। इसके अधिकारी उन नियमों के अधीन होते हैं जो इसकी सत्ता की सीमा निर्धारित करते हैं।

प्रश्न 12.
परम्परागत सत्ता।
उत्तर-
इस प्रकार की सत्ता में एक व्यक्ति की वैधानिक नियमों के अन्तर्गत एक पद पर बैठे होने के कारण नहीं बल्कि परम्परा के द्वारा माने हुए पदों पर बैठे होने के कारण प्राप्त होती है। चाहे इस पद को परम्परागत व्यवस्था के अनुसार परिभाषित किया जाता है। इस कारण ऐसे पद पर बैठे होने के कारण व्यक्ति को कुछ विशेष सत्ता मिल जाती है। उस प्रकार की सत्ता परम्परागत विश्वासों पर टिकी होने के कारण परम्परागत सत्ता कहलाती है। जैसे क्षेत्रीय युग में भारतीय गाँवों में मिलने वाली पंचायत में पंचों की सत्ता को ही ले लो। इन पंचों की सत्ता की तुलना भगवान् की सत्ता की तुलना से की जाती थी जैसे कि पंच परमेश्वर की धारणा में दिखाई देता था। उसी प्रकार पितृसत्तात्मक परिवार में पिता को परिवार से सम्बन्धित सभी विषयों में जो अधिकार पर सत्ता प्राप्त होती है उसका भी आधार वैधानिक न होकर परम्परा होता है।

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प्रश्न 13.
चमत्कारी सत्ता।
उत्तर-
व्यक्तिगत सत्ता का स्रोत परम्परा से बिल्कुल भिन्न भी हो सकता है। आदेश की शक्ति एक नेता भी प्रयोग कर सकता है चाहे वह एक पैगम्बर हो, नायक हो, या अवसरवादी नेता हो पर ऐसा व्यक्ति तो ही चमत्कारी नेता हो सकता है जब वह सिद्ध कर दे कि तान्त्रिक शक्तियां देवी शक्तियां नायकत्व या अन्य अभूतपूर्व गुणों के कारण उसके पास चमत्कार है।

इस प्रकार यह सत्ता न तो वैधानिक नियमों पर व न ही परम्परा पर बल्कि कुछ करिश्मा या चमत्कार पर आधारित होती हैं। इस प्रकार की शक्ति केवल उन व्यक्तियों के पास सीमित होती है जिनके पास चमत्कारी शक्तियां होती हैं इस प्रकार की सत्ता प्राप्त करने में व्यक्ति को काफ़ी समय लग जाता है व पर्याप्त यानी पूरे साधनों, कोशिशों के बाद ही लोगों द्वारा यह सत्ता स्वीकार की जाती है। दूसरे शब्दों में एक व्यक्ति के द्वारा अपने व्यक्तित्व का विकास इस प्रकार किया जाता है कि लोग यह समझने लगें कि उसने अपने व्यक्तित्व में कोई चमत्कारी शक्ति का विश्वास कर लिया है। इसके बल पर ही वह और लोगों को अपने सामने झुका लेता है। व्यक्तियों द्वारा सत्ता स्वीकार कर ली जाती है। इस तरह करिश्माई नेता अपने प्रति या अपने लक्ष्य या आदर्श के प्रतिनिष्ठा के नाम पर दूसरों से आज्ञापालन करने की माँग करता है। जादूगर, पीर, पैगम्बर, अवतार, धार्मिक नेता, सैनिक योद्धा, दल के नेता इसी तरह की सत्ता सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। लोग इसी कारण ऐसे लोगों की सत्ता स्वीकार कर लेते हैं।

प्रश्न 14.
सामाजिक क्रिया।
उत्तर-
वैबर अनुसार सामाजिक क्रिया व्यक्तिगत क्रिया से भिन्न है। इसकी परिभाषा देते हुए वैबर ने लिखा है कि, “किसी भी क्रिया को करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा लिए गए Subjective अर्थ के अनुसार उस क्रिया में दूसरे व्यक्तियों के मन के भावों पर क्रियाओं का समावेश हो तथा उसी के अनुसार गतिविधि निर्धारित हो।” वैबर के अनुसार सामाजिक क्रिया और व्यक्तियों के भूत, वर्तमान या होने वाले व्यवहार द्वारा प्रभावित हो सकती है व हर प्रकार की बाहरी क्रिया सामाजिक क्रिया नहीं हो सकती।

प्रश्न 15.
पूंजीवाद के मुख्य लक्षण बताओ।
उत्तर-

  • पूजीवाद में पूंजीपति का कमाए हुए लाभ पर पूरा अधिकार होता है।
  • पूंजीवाद में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करने की कोशिश की जाती है ताकि अधिक-से-अधिक लाभ उठाया जा सके।
  • व्यापार को वैज्ञानिक तरीके से किया या चलाया जाना चाहिए।
  • उत्पादन हमेशा बाज़ार के सामने रखकर या बेचने के लिए किया जाता है।
  • लेखा-जोखा रखने की उन्नत विधि अपनाई जाती है।

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प्रश्न 16.
सामाजिक तथ्य क्या है?
उत्तर-
विभिन्न प्रकार के समाजों में कुछ ऐसे तथ्य होते हैं, जो भौतिक प्राणीशास्त्री व मनोवैज्ञानिक तथ्यों से अलग होते हैं। दुर्खीम इस प्रकार के तथ्यों को सामाजिक तथ्य मानते हैं। दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की कुछ परिभाषा दी है। एक जगह दुर्खीम लिखते हैं, “सामाजिक तथ्य काम करने, सोचने व अनुभव करने के वे तरीके हैं जिस में व्यक्तिगत चेतना से बाहर भी अस्तित्व को बनाए रखने की उल्लेखनीय विशेषता होती है।”

एक अन्य स्थान पर दुर्खीम ने लिखा है, “सामाजिक तथ्यों में काम करने, सोचने, अनुभव करने के तरीके शामिल है, जो व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं व जो अपनी दबाव शक्ति के मध्यम से व्यक्ति को निर्धारित करते अपनी किताब के प्रथम Chapter की आखिरी पंक्तियों में इसकी विस्तार सहित परिभाषा पेश करते हुए लिखा है, “एक सामाजिक तथ्य क्रिया करने का प्रत्येक स्थायी, अस्थायी तरीका है, जो आदमी पर बाहरी दबाव डालने में समर्थ होता है या दोबारा क्रिया करने का प्रत्येक तरीका जो किसी समाज में आम रूप से पाया जाता है पर साथ ही साथ व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र भिन्न अस्तित्व रखता है।”

प्रश्न 17.
बाह्यता।
उत्तर-
बाह्यता (Exteriority)—सामाजिक तत्त्व की सबसे पहली व महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका बाहरीपन है। बाह्यता का अर्थ है सामाजिक तथ्य का निर्माण तो समाज के सदस्यों की ओर से ही होता है परन्तु सामाजिक तथ्य एक बार विकसित होने के पश्चात् फिर किसी व्यक्ति विशेष के नहीं रहते व वह उस अर्थ में कि इसको एक स्वतन्त्र वास्तविक रूप में अनुभव किया जाता है। वैज्ञानिक का उससे कोई आन्तरिक सम्बन्ध नहीं होता और न ही सामाजिक तथ्यों का व्यक्ति विशेष पर कोई प्रभाव पड़ता है।

इस प्रकार बाह्यता का अर्थ है कि सामाजिक तथ्य व्यक्ति के लिए बाहरी होते हैं। वह किसी व्यक्ति विशेष के नहीं होते बल्कि सम्पूर्ण समाज के होते हैं।

प्रश्न 18.
(विवशता) बाध्यता।
उत्तर-
बाध्यता या विवशता (Constraint) सामाजिक तथ्यों की दूसरी प्रमुख व महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी विवशता है। दूसरे शब्दों में व्यक्ति पर सामाजिक तथ्यों का एक दबाव या विवशता का प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः सामाजिक तथ्यों का निर्माण एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों द्वारा नहीं होता बल्कि अनेकों व्यक्तियों द्वारा होता है। अतः यह बहुत शक्तिशाली होते हैं व किसी व्यक्ति पर इनकी विवशता के कारण प्रभाव पड़ता है।

दुर्खीम का मानना है कि सामाजिक तथ्य केवल व्यक्ति के व्यवहार को नहीं बल्कि उसके सोचने विचारने आदि के तरीके को प्रभावित करते हैं। दुर्खीम बताते हैं कि हम सामाजिक तथ्यों की यह विशेषता इस रूप में देख सकते हैं कि यह सामाजिक तथ्य आदमी की अभिरुचि के अनुरूप नहीं बल्कि व्यक्ति के व्यवहार उनके अनुरूप होता है।

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प्रश्न 19.
व्यापकता।
उत्तर-
सामाजिक तथ्यों की तीसरी विशेषता यह है कि समाज विशेष में यह तथ्य आदि से अन्त तक फैले होते हैं। यह सब के साझे होते हैं। यह किसी व्यक्ति विशेष की व्यक्तिगत विशेषताएं नहीं होती। लेकिन व्यापकता अनेकों वैयक्तिक तथ्यों की केवल एक मात्र परिणाम ही नहीं होती। यह तो शुद्ध रूप में अपने स्वभाव से ही सामूहिक होती है। व्यक्तियों पर इनका प्रभाव इनकी सामूहिक विशेषता का परिणाम होता है।

प्रश्न 20.
सामाजिक तथ्य के प्रकार।
उत्तर-
दुर्खीम ने दो प्रकार के सामाजिक तथ्यों का वर्णन किया है। साधारण तथ्य (Normal) तथ्य तथा यह वह सामाजिक तथ्य होते हैं, जो पूरी मानव जाति के क्षेत्र में फैले होते हैं, व यदि वह सभी व्यक्तियों में नहीं तो उनमें से अधिकतर में पाए जाते हैं। व्याधिकीय या Pathological सामाजिक तथ्य वह होते हैं जो पूरी मानव जाति में न मिलकर कहीं-कहीं ही फैले होते हैं।

प्रश्न 21.
दमनकारी कानून क्या होते हैं ?
उत्तर-
दमनकारी कानून (Repressive Law)-दमनकारी कानूनों को एक प्रकार से सार्वजनिक कानून (Public Law) कहा जा सकता है। दुर्खीम के अनुसार, यह दो प्रकार के होते हैं –

(i) दण्ड सम्बन्धी कानून (Penal Laws)-जिनका सम्बन्ध कष्ट देने, हानि पहुंचाने, हत्या करने या स्वतन्त्रता न देने के साथ है। इन्हें संगठित दमनकारी कानून (Organized Repressive Law) कहा जा सकता है।

(ii) व्याप्त कानून (Diffused Laws)-कुछ दमनकारी कानून ऐसे होते हैं जो पूरे समूह में नैतिकता के आधार पर फैले होते हैं। इसलिए दुर्खीम इन्हें व्याप्त कानून कहते हैं। दुर्खीम के अनुसार, दमनकारी कानून का सम्बन्ध आपराधिक कार्यों से होता है। यह कानून अपराध व दण्ड की व्याख्या करते हैं। यह कानून समाज की सामूहिक जीवन की मौलिक दशाओं का वर्णन करते हैं। प्रत्येक समाज के अपने मौलिक हालात होते हैं इसलिए भिन्न-भिन्न समाजों में दमनकारी कानून भिन्न-भिन्न होते हैं। इन दमनकारी कानूनों की शक्ति सामूहिक दमन में होती है, व सामूहिक मन समानताओं से शक्ति प्राप्त करता है।

प्रश्न 22.
प्रतिकारी कानून।
उत्तर-
प्रतिकारी कानून (Restitutive Laws) कानून का दूसरा प्रकार प्रतिकारी कानून व्यवस्था है। यह कानून व्यक्तियों के सम्बन्धों में पैदा होने वाले असन्तुलन को साधारण स्थिति प्रदान करते हैं। इस वर्ग के अन्तर्गत व्यापारिक कानून, नागरिक कानून, संवैधानिक कानून, प्रशासनिक कानून इत्यादि आ जाते हैं। इनका सम्बन्ध पूरे समाज के सामूहिक स्वरूप से न होकर व्यक्तियों से होता है। यह कानून समाज के सदस्यों के व्यक्तिगत सम्बन्धों में पैदा होने वाले असन्तुलन को दोबारा सन्तुलित व व्यवस्थित करते हैं। दुर्खीम कहते हैं कि प्रतिकारी कानून व्यक्तियों व समाज को कुछ मध्य संस्थाओं से जोड़ता है।

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प्रश्न 23.
यान्त्रिक एकता क्या होती है?
उत्तर-
यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity)-दुर्खीम के अनुसार, यान्त्रिक एकता समाज की दण्ड संहिता में अर्थात् दमनकारी कानूनों के कारण होती है। समूह के सदस्यों में मिलने वाली समानताएं इस एकता का आधार हैं जिस समाज के सदस्यों में समानताओं से भरपूर जीवन होता है जहां विचारों, विश्वासों, कार्यों व जीवन शैली के साधारण प्रतिमान व आदर्श प्रचलित होते हैं व जो समाज इन समानताओं के परिणामस्वरूप एक सामूहिक इकाई के रूप में सोचता व क्रिया करता है वह यान्त्रिक एकता दिखलाता है। उसके सदस्य मशीन की तरह के भिन्न-भिन्न पुओं की भांति संगठित रहते हैं। दुर्खीम ने आपराधिक कार्यों को दमनकारी कानून व यान्त्रिक एकता की अनुरूपता का माध्यम बताया है।

प्रश्न 24.
आंगिक एकता क्या होती है?
उत्तर-
आंगिक एकता (Organic Solidarity)-दुर्खीम के अनुसार दूसरी एकता आंगिक एकता है। दमनकारी कानून की शक्ति सामूहिक चेतना में होती है। सामूहिक चेतना समानताओं से शक्ति प्राप्त करती है। आदिम समाज में दमनकारी कानूनों की प्रधानता होती है, क्योंकि उनमें समानताएं सामाजिक जीवन का आधार हैं। दुर्खीम के अनुसार, आधुनिक समाज श्रम विभाजन व विशेषीकरण से प्रभावित है जिसमें समानता की जगह विभिन्नताएं प्रमुख हैं। सामूहिक जीवन की यह विभिन्नता व्यक्तिगत चेतना को प्रमुखता देती है।

आधुनिक समाज में व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से समूह से बन्धा नहीं रहता। इस सम्बन्ध में मानवों के आपसी सम्बन्धों का महत्त्व ज्यादा होता है। यही कारण है कि दुर्खीम ने आधुनिक समाजों में दमनकारी कानून की जगह प्रतिकारी कानून की प्रधानता बताई है। विभिन्नता पूर्ण जीवन में मानवों को एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक काम में विशेष योग्यता प्राप्त कर सकता है व बाकी सारे कामों के लिए उसको दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। समूह के मैम्बरों की यह आपसी निर्भरता उनकी व्यक्तिगत असमानता उन्हें एक-दूसरे के नज़दीक आने के लिए मजबूर करती है। जिसके आधार पर समाज में एकता की स्थापना होती है। इस एकता को दुर्खीम ने आंगिक एकता (Organic Solidarity) कहा है। यह प्रतिकारी कानून व्यवस्था में दिखाई देता है।

प्रश्न 25.
सामाजिक एकता क्या है?
उत्तर-
दुखीम कहते हैं कि प्रत्येक समाज में कुछ मूल आदर्श, विश्वास, व्यवहार के तरीके, संस्थाएं व कानून प्रचलित होते हैं जो कि समाज को एक सूत्र में बांध कर रखते हैं। ऐसे तत्त्वों के कारण समाज में सम्बद्धता बनी रहती है व एकता भी बनी रहती है। यह कारक समाज में सर्वसम्मत्ति पैदा करते हैं व एकता को बढ़ाते हैं। इस प्रकार की एकता को सामाजिक एकता कहते हैं। इन कारणों के नष्ट होने या बिखरने से सामाजिक एकता खतरे में पड़ जाती है। जिस कारण समाज विघटन की ओर जाने लगता है।

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बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
काम्ते के तीन पड़ावों के सिद्धान्त का वर्णन करो।
उत्तर-
समाजशास्त्रीय क्षेत्र में काम्ते का एक महत्त्वपूर्ण योगदान उसके द्वारा पेश किया तीन पड़ावों का नियम है। उसने अपनी प्रसिद्ध किताब पाज़ीटिव फिलोस्फी (Positive Philosophy) में इस सिद्धान्त के बारे में बताया। इस सिद्धान्त का निर्माण काम्ते ने 1822 में किया जब कि उसकी उम्र केवल 24 साल की थी। काम्ते ने इस नियम का विचार कोन्डरसेट (Conderect), टुरर्गेट (Turoget) तथा सेन्ट साईमन (Saint Simon) से प्राप्त किया।

काम्ते का कहना है कि मानव के ज्ञान या चिन्तन प्रक्रियाओं का विकास नहीं हुआ है। वह तो कुछ निश्चित पड़ावों में से ही निकला है काम्ते लिखते हैं, “सारे समाजों में व सारे युगों में मानव के बौद्धिक विकास का अध्ययन करने से उस महान् आधार, मौलिक नियम का पता चलता है जिसके अधीन मानव का चिन्तन आवश्यक रूप से होता है व जिसका ठोस परिणाम संगठन के तथ्यों व हमारे ऐतिहासिक अनुभवों, दोनों में शामिल है। यह नियम इस प्रकार है, हमारा प्रत्येक प्रमुख संकल्प हमारे ज्ञान की प्रत्येक शाखा एक के बाद एक तीन भिन्न-भिन्न सैद्धान्तिक अवस्थाओं (Theoretical Conditions) में से होकर निकलती है तथा वह हैं आध्यात्मिक या काल्पनिक (Theological or fictious) अवस्था, अर्द्धभौतिक या अमूर्त (Metaphysical or abstract) अवस्था व वैज्ञानिक या सकारात्मक (Scientific or positive) अवस्था। सरल शब्दों में उपस्थित नियम का अर्थ है कि मानवीय जीवन के आरम्भ में जब लोगों ने किसी विषय के सम्बन्ध में बोध करना या ज्ञान प्राप्त करना होता था, तो वह आध्यात्मिक आधार पर सोच विचार करते थे। समय व्यतीत होने के साथ लोगों ने आध्यात्मिक आधार की जगह अर्द्धभौतिकी आधार के किसी भी विषय के बारे में ज्ञान प्राप्त करना शुरू किया पर समय कुछ आगे बढ़ा तो मानव ने उपरोक्त दोनों आधारों की बजाय किसी प्रपंच के सकारात्मक आधार पर समझना आरम्भ किया। प्रथम अवस्था में कल्पना, दूसरी में भावना व तीसरी में तर्क प्रधान रहता है।

काम्ते ने इस नियम को मानवीय स्वभाव के पहलुओं पर आधारित किया। मानवीय स्वभाव के तीन महत्त्वपूर्ण पहलू निम्नलिखित हैं-
1. भावनाएं (Feelings)—मानव की भावनाएं उसे काम करने के लिए उत्साहित करती हैं तथा इन्हीं कामों की सेवा करता रहता है।

2. सोचशक्ति या विचार (Thought)-मानव इन भावनाओं की तृप्ति करने के बारे में सोचता है और विचार बनाता है। यह विचार इन भावनाओं की तृप्ति करने की ज़िम्मेदारी लेते हैं तथा इन्हें संचालित करने में मदद लेते

3. कार्य (Action)-भावनाओं की तृप्ति या उन्हें पूरा करने के लिए मानव कार्य करता है।
काम्ते का कहना था कि व्यक्ति जीवन तो ही जी सकता है, यदि उसके स्वभाव के इन तीन पहलुओं में तालमेल हो। यदि व्यक्ति की भावनाएं कुछ और हों, सोच कुछ व कार्य कुछ और करे तो ऐसा व्यक्ति साधारण जीवन नहीं जी सकता। इसी प्रकार सामाजिक व्यक्तियों के बीच सांझे व संचालित व्यवहारों की प्रणाली का होना व निरन्तरता के लिए संस्थाएं, ज्ञान कीमतें व विश्वासों की किसी प्रणाली का होना ज़रूरी है जो कि सफलतापूर्वक ढंग से समाज के सदस्यों की भावनाएं, विचारों व कार्यों में सम्बन्ध स्थापित करें।

काम्ते ने मानवता के इतिहास का निरीक्षण किया और कहा कि उपरोक्त समस्या के हल के लिए तीन सामाजिक प्रणालियां विकसित हुई हैं जिनमें उपरोक्त तालमेल था। वह इस प्रकार हैं-

  1. आध्यात्मिक पड़ाव (Theological Stage)
  2. अधिभौतिक पड़ाव (Metaphysical Stage)
  3. सकारात्मक पड़ाव (Positive Stage)

1. आध्यात्मिक पड़ाव (Theological Stage)-काम्ते की सैद्धान्तिक योजना में आध्यात्मिक पड़ाव बहुत महत्त्व रखता है। हमारा विचार है कि इसके अनुसार सामाजिक क्रम विकास का आरम्भ समझने के लिए पहले पड़ाव का अच्छी तरह निरीक्षण करना अनिवार्य है। उसके अनुसार आध्यात्मिक पड़ाव में मानव के विचार काल्पनिक थे। मानव सब वस्तुओं को परमात्मा के रूप में या किसी अलौकिक जीव की उस समय की क्रियाओं के परिणाम के रूप में देखता था, मानता व समझता था। धारणा यह होती थी कि सब वस्तुएं चाहे निर्जीव हैं चाहे सजीव का कार्य रूप, अलौकिक शक्तियां हैं। अर्थात् सब वस्तुओं में वही शक्ति व्यापक है। धार्मिक पड़ाव में मानव के विचारों के बारे में चर्चा करते हुए काम्ते लिखते हैं कि आध्यात्मिक अवस्था में सृष्टि के आवश्यक स्वभाव की ख़ोज करने या प्राकृतिक घटनाओं के होने के अन्तिम कारण को जानने के यत्न में मानव का दिमाग यह मान लेता है कि सब घटनाएं आलौकिक प्राणियों को तत्कालीन घटनाओं का सबूत हैं । काम्ते के अनुसार इस स्तर को नीचे तीन उप-स्तरों में बांटा जा सकता है।

(i)  प्रतीक पूजन (Festishism) सामाजिक गतिशीलता में काम्ते अपनी फ़िलास्फी के मल तत्त्व को स्थापित करके उसका मानव इतिहास के विश्लेषण में उपयोग करता है। उसकी धारणा है कि उसका मूल तत्त्व, सामाजिक विज्ञानों को फिर सजीव करेगा। आध्यात्मिक पड़ाव काम्ते के विचार अनुसार प्रतीक पूजन या फैटिशवाद के सिवाय अन्य किसी तरह भी शुरू नहीं हो सकता था। मानवीय सोच में यह विचार बनना प्राकृतिक था कि सभी बाहरी वस्तुओं में उनकी तरह से ही जीवन है। इस स्थिति में बौद्धिक जीवन से जज्बात अधिक हावी थे। प्रतीक पूजन की फिलास्फी का मूल तत्त्व यह विश्वास है कि लोगों के जीवन पर कई किस्म के अनजाने असर कुछ वस्तुओं के कार्यों के कारण सामने आते हैं जिनको वह जीवित समझते हैं। प्रतीक पूजन आध्यात्मिकता का बिगड़ा स्वरूप नहीं बल्कि इसका स्रोत है।

प्रतीक पूजन का सदाचार, भाषा, बोध व समाज से एक विशेष किस्म का सम्बन्ध था। मानव जाति की आरम्भिक अवस्था में भावुकता हावी थी। जिससे सदाचार व नैतिकता पर अधिक दबाव डाला जाता था। भाषा का चिन्तनात्मक आधार नहीं है। काम्ते का विचार है कि मानवीय भाषा का एक रूपीय आकार है। बौद्धिक स्तर पर फैटिशवाद बहुत जबरदस्त प्रणाली थी। इस अवस्था में मानव केवल आध्यात्मिक संकल्प देख व जान सकता है। बहुत ही कम प्राकृतिक प्रघटन होंगे जिनका उसे निजी अनुभव था जिनमें उसका ज्ञान बढ़ा था। परिणामस्वरूप इस उप-पड़ाव की सभ्यता का सार बहुत ही निम्न था। सामाजिक स्तर पर फैटिशवाद ने एक विशेष प्रकार के पादरीवाद को जन्म दिया। इसमें भविष्य बताने वाले व जादू-टोना करने वाले पादरी पैदा हुए क्योंकि प्रतीक पूजन अवस्था में प्रत्येक वस्तु का मानव से सीधा सम्बन्ध था इसलिए पादरीवाद एक संगठित रूप में विकसित नहीं हुआ। फिर आदमी की ज़िन्दगी पर यह फैटिश देवता बहुत प्रभाव नहीं डालते थे। परिणामस्वरूप चिन्तनशील श्रेणी के जन्म का इस उप-पड़ाव में कोई मौका नहीं था।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि मानव की प्रकृति पर विजय इस उप-पडाव से आरम्भ होती है। सबसे विशेष पक्ष इस अवस्था में मानव का पशुओं को अपने बस करके पालतू बनाना है। काम्ते का ख्याल है कि बहुदेवतावाद, जोकि अगला उप-पड़ाव है का आरम्भ प्रतीक पूजन में ही ढूंढ़ा जा सकता है। एक प्रकार से वह इस बात को ऐतिहासिक ज़रूरत के स्तर पर ले जाते हैं। आध्यात्मिक पड़ाव के दूसरे उप-पड़ाव पर पहुँचने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बौद्धिक बदलाव मानव के तारों के बारे में विचार बदलने से शुरू हुए। तारों की पूजा फैटिशवाद में भी होती थी पर उनको देवताओं के दर्जे पर पहुँचने में एक अमूर्त स्थिति ने ठोस रूप दे दिया।

(ii) बहु देवतावाद-बहु देवतावाद की अवस्था सबसे अधिक सजीव रही है। इस उप-पड़ाव को समझने के लिए काम्ते सबसे पहले अपनी विश्लेषण विधि के बारे में प्रकाश डालते हैं। उसका कहना है कि हमारी विधि को बहु-देवतावाद के ज़रूरी गुणों का अमूर्त अध्ययन करना चाहिए। उसके बाद बह देवतावाद का उन गुणों के सन्दर्भ में निरीक्षण करना चाहिए। मानवीय बोध के विकास के आरम्भ में बहुत सी घटनाओं से सुमेल रखते देवताओं की आवश्यकता थी। बहु देवतावाद बुनियादी तौर से हर किस्म की वैज्ञानिक व्याख्या के खिलाफ थे, पर विज्ञान का आरम्भ इसी पड़ाव से हुआ। वास्तव में मानवीय बौद्ध का फैटिशवाद से बहु देवतावाद तक पहुँचना एक महान् प्राप्ति है। बहु देवतावाद की सामाजिक सोच दो पक्षों से कही जा सकती है यह है राजनीतिक व नैतिक।

(क) राजनीतिक आकार-राजनीति के बीज शुरू से ही मानव जाति में कई तरीकों से बीजे गए थे। शुरू में सियासत में सैनिक गुण जैसे कि हिम्मत व हौंसला सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व थे। बाद में समझदारी व कूटनीति ताकत का आधार बने। काम्ते के अनुसार बहु-देवतावाद की अवस्था में राजनीतिक आकार के कई पक्ष थे जैसे कि धर्म युद्ध व सैनिक प्रणाली। इसी उप-पड़ाव में धर्म ने सामाजिक महत्ता ग्रहण की। यूनानी सभ्यता में धार्मिक मेले व अन्य कई घटनाएं इस पक्ष को उजागर करते हैं। इसके सिवा इस अवस्था में सेना का विकास एक आवश्यकता थी। इस सैनिक सभ्याचार के विकास का मुख्य कारण यह था कि इस के बिना राजनीतिक आकार व उसकी तरक्की असम्भव थी। बहु-देवतावाद ने सैनिक अनुशासन को न केवल स्थापित ही किया बल्कि पूरी दृढ़ता से कायम भी रखा। राजनीतिक आकार के बहु देवतावाद के इस उप-पड़ाव में दो विशेष गुण हैं। यह हैं गुलाम प्रथा व आत्मिक व दुनियावी ताकत का केन्द्रीयकरण ।

(ख) नैतिकता-ऊपर दिए राजनीतिक आकार पर दिए वर्णन से स्पष्ट है कि नैतिकता की स्थिति बहुत बढ़िया नहीं थी। काम्ते के अनुसार गुलाम प्रथा में निजी पारिवारिक व सामाजिक सम्बन्ध बुरी तरह भ्रष्ट हो जाते हैं। इसके सिवा नैतिकता राजनीतिक आकार के मुकाबले निम्न स्थिति में होती है। काम्ते के अनुसार बहु-देवतावाद की तीन अवस्थाएं हैं

(1) प्रथम अवस्था को काम्ते ने मिस्त्री या दैव शासकीय अवस्था का नाम दिया है। मध्य अवस्था के बौद्धिक व सामाजिक तत्त्व केवल पुरोहित पक्षों के हाथों में सम्पूर्ण सत्ता आ जाने से ही विकसित हो सकते हैं। इसका व्यापक स्तर पर क्रियाओं व पद्धतियों के योग बनाना व मानना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। परिणामस्वरूप इस प्रकार की बहु देवतावाद की अवस्था में एक विशेष किस्म की संस्था ने जन्म लिया जिनको जाति कहते हैं। सबसे पहले जाति-प्रथा एशिया के देशों में विकसित हुई। यह जाति-प्रथा चाहे सैनिक सभ्याचार में से निकली थी पर इस ने युद्ध की रुचियों पर काबू पाया व पुरोहितवाद को सत्ता दी। पश्चिमी सभ्यता में जाति-प्रथा विकसित नहीं हुई।

कामते के अनुसार इस सभ्यता में सामाजिक समतावाद मुख्य कीमत रही है। वह मार्क्स से बहुत सहमत लगता है जब वह कहता है कि उपनिवेशवाद इन्हीं एशियाई देशों के लिए बढ़ा है, क्योंकि पश्चिमी देशों के समतावाद ने जाति-प्रथा को तोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पर जाति-प्रथा प्राचीन सभ्यता का व्यापक स्तर पर एक आधार है। इसकी व्यापकता इसकी मानवीय ज़रूरतों के लिए क्रियाशील होने का बहुत बड़ा सबूत है। जाति-प्रथा का बौद्धिक विकास में सब से बड़ी भूमिका इसका सिद्धान्त व अमल को भिन्न करना है। राजनीतिक तौर से इस की महत्ता समाज में शांति व व्यवस्था रखने में भी थी। पर इन सब गुणों के बावजूद दैवी शासकीय अवस्था उन्नति विरोधी थी।

(2) दूसरी अवस्था यूनानी या बौद्धिक थी जिसमें पहली बार बौद्धिक व सामाजिक तरक्की में अन्तर उत्पन्न किया गया। इस अवस्था के दौरान एक ऐसी चिन्तनशील कक्षा ने जन्म लिया जो सैद्धान्तिक सृजनों के अलावा कोई धन्धा नहीं करती थी इसलिए वह पुरोहित या पादरी समाज के विकल्प के रूप में उभर कर सामने आई। इसका असर विज्ञान की तरक्की पर पड़ा। इसमें सबसे विशेष रेखा गणित में हुआ क्रांतिकारी विकास है। विज्ञान के विकास को काम्ते बौद्धिक अवस्था में खोज के लिए तर्कशील स्वीकारात्मक को उपयोग से जोड़ते हैं। फिलासफी की प्रगति सबसे पहले विज्ञान के विकास के प्रभाव से शुरू हुई।

(3) तीसरी अवस्था को काम्ते ने रोमन या सैनिक का नाम दिया है। रोम की बहुत बड़ी प्राप्ति इसका अपने आप को दैवीय शासन से आजाद करवाना था जिसकी वजह से यहां राज्य प्रथा की जगह सीनेट का राज्य स्थापित हुआ। रोमन अवस्था का केन्द्रीय गुण इसकी युद्ध नीति थी। युद्ध का मुख्य उद्देश्य उपनिवेश इलाके स्थापित करना था। आदमी की चरित्र का विकास भी इस युद्ध सभ्याचार पर निर्भर था। उसको शुरू से ही सैनिक अनुशासन में पाला जाता था। अपनी जीत को बढ़ाने की लगातार बढ़ाने की नीति में ही रोम के पतन के कारण ढूंढ़े जा सकते हैं।

बहु-देवतावाद की इन तीन अवस्थाओं की एक व्यापक भूमिका है। काम्ते उन्हें मिस्त्र, यूनान व रोम के नमूनों के तौर पर देखता था। उसका मुख्य उद्देश्य तीन प्रकार के बहु देवतावाद को दर्शाना ही है।

(iii) एक ईश्वरवाद (Monotheism)-जब रोम ने सारे सभ्य जगत को इकट्ठा किया तो सामाजिक जीवन को ऊँचा करने के लिए एक ईश्वरवाद को बौद्धिक स्तर पर काम करने का मौका मिला। आध्यात्मिक फ़िलासफी का बौद्धिक पतन भी ज़रूरी होना था। काम्ते एक ईश्वरवाद की अवस्था की व्याख्या करने के लिए रोमन कैथोलिकवाद को उदाहरण के तौर पर पेश करता है। एक ईश्वरवाद मूलतयाः से एक विश्वास प्रणाली है जिसकी स्थापना राजनीतिक प्रणाली से स्वतन्त्र है। धर्म व राजनीतिक शक्ति में भिन्नता आना आधुनिक काल की महान् प्राप्ति है। रोमन कैथोलिकवाद की एक प्राप्ति नैतिकता को अपने अधिकार में लाना था। इससे पहले सदाचार सियासी ज़रूरतों द्वारा नियन्त्रत किया जाता था। इससे उप-पड़ाव में चिन्तनशील कक्षा का एक आज़ाद व प्रभावशाली अस्तित्व स्थापित हुआ। इसके परिणामस्वरूप सिद्धान्त व उसके अमल में पृथक्कता आई। अब सिद्धान्त बनाने के लिए अनुभव पर आधारित सन्दर्भ की आवश्यकता नहीं थी। राजनीति प्रणाली के बीच सुधार लाने के लिए अमूर्त सिद्धान्त बनाए जा सकते थे। इसी तरह समाज की भविष्य की ज़रूरतों के बारे में एक बात की जा सकती थी।

एक ईश्वरीवाद उप-पड़ाव में जागीरदारी प्रणाली को आधुनिक समाज की आधारशिला माना जा सकता है। नैतिक क्षेत्र में रोमन कैथोलिकवाद एक व्यापक नैतिकता कायम रखने में काफ़ी सफल रहा। नैतिकता की राजनीति से आज़ादी ने इसके विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग प्रकारों में पैदा होने में सहायता दी। जैसे निजी नैतिकता, पारिवारिक व सामाजिक नैतिकता परन्तु बौद्धिक गिरावट आई। इसके मुकाबले बहु-देवतावाद बौद्धिक विकास के लिए ज्यादा उचित था।

2. अधिभौतिक पड़ाव (Metaphysical Stage)-इस पड़ाव को काम्ते आधुनिक समाज क्रांति काल भी कहा जाता है। यह पड़ाव पांच सदियों तक चला। यह 14वीं से 19वीं सदी तक चला। इस समय को हम दो भागों में बांट सकते हैं। प्रथम भाग में क्रांतिक आन्दोलन अपने आप व अनजाने में ही शुरू हो गया। दूसरा भाग सोलहवीं सदी से आरम्भ हुआ। इसमें नकारात्मक सिद्धान्त शुरू हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक बदलाव था। क्रांतिक पड़ाव का आरम्भ एक ईश्वरीवाद का आत्मिक व दुनियावी शक्तियों को भिन्न करने के वक्त से ही माना जा सकता है। क्रान्तिक फिलासफी 16वीं सदी में प्रोटैस्टैंटवाद के आने से शुरू हुआ था। यहां ध्यान देने योग्य यह है कि रोमन कैथोलिकवाद में आत्मिक व दुनियावी शक्तियों में विभिन्नता ने आध्यात्मिक सवालों को सामाजिक मामलों पर ही विचार करने की शक्ति दी है। अधिभौतिक पड़ाव के द्वितीय भाग को हम तीन अवस्थाओं में बांट सकते हैं। प्रथम अवस्था में पुरानी प्रणाली का 15वीं सदी के अन्त तक अपने आप अन्त हो गया था। द्वितीय अवस्था में प्रोटैस्टैंट वाद हमारे सामने आया।

इसमें चाहे काफी निरीक्षण का अधिकार था पर यह ईसाई धर्मशास्त्र तक ही सीमित रहा। तृतीय अवस्था में देववाद (Deism) 18वीं सदी में आगे आया। इस ने निरीक्षण की सीमित सीमाओं को तोड़ कर यह विचार दिया कि इसकी कोई सीमा नहीं है। एक तरह से इस पड़ाव में मध्यकालीन दर्शन व कानूनी विशेषताओं का काल आया। इन्हीं दोनों ने कैथोलिक व्यवस्था को आघात दिया। परिणामस्वरूप आत्मिकता का पतन हुआ जिसका दुनियावी पक्ष पर भी सहजता से असर हुआ। जागीरदार समाज व उच्च श्रेणी का भी पतन हुआ। प्रोटैस्टैंट वाद ने व्यापक आज़ादी का रूझान पैदा किया, जिसके परिणाम से लोग पुरानी व्यवस्था के सामाजिक व बौद्धिक तत्त्वों को नष्ट करने के लिए तैयार हो गए। इस पड़ाव में नकारात्मक फिलासफी स्थापित हुई।

3. सकारात्मक पड़ाव (Positivism Stage)-सकारात्मक पड़ाव का आरम्भ समझने के लिए दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली बात यह कि काम्ते इसको औद्योगिक समाज के तौर पर देखते थे। दूसरी बात यह है कि वह इसका आरम्भ भी 14वीं सदी से ही मानते हैं जिसका अर्थ यह है कि आध्यात्मिक या क्रांतिक पड़ाव के साथसाथ ही सकारात्मक पड़ाव का आरम्भ हुआ, पर यह 19वीं सदी में आकर हावी होना प्रारम्भ हुआ। – सकारात्मक पड़ाव में सिद्धान्त व उसके प्रयोग में एक अन्तर पैदा हुआ। बौद्धिक कल्पना तीन अवस्थाओं में बांटी गई। ये थीं औद्योगिक या अमली, एस्थैटिक या काविक तथा वैज्ञानिक या फिलास्फीकल। यह तीन अवस्थाएं हर विषय के तीन पक्षों से मेल खाती हैं जैसे कि अच्छा या फायदेमन्द, सुन्दर और सच्चा। इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण औद्योगिक पक्ष है जिसके आधार पर हम प्राचीन समाज से आधुनिक अवस्था की तुलना कर सकते हैं। औद्योगिक पक्ष में महत्त्वपूर्ण गुण राजनीतिक आज़ादी का पैदा होना है।

अन्त में काम्ते सबसे अधिक महत्ता फिलासफी व विज्ञान को देता है। उसका विचार है कि सकारात्मक पड़ाव में इन दोनों की सब से अधिक प्रभाव होता है। इस पड़ाव की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें सामाजिक व्यवस्था व उन्नति में कोई द्वन्द्व नहीं होता।

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प्रश्न 2.
काम्ते के सकारात्मक (Positivism) के सिद्धान्त का वर्णन करो।
उत्तर-
काम्ते ने अपनी पुस्तक ‘पॉजटिव फिलास्फी’ में जिस प्रकार संकल्प ‘सकारात्मक’ का उपयोग किया है, स्पष्ट रूप में विवादात्मक है। इसने सही में इस संकल्प का उपयोग विचारधारक हथियार के तौर से क्रान्ति के साथ-साथ संघर्ष करने के लिए किया।

काम्ते का मुख्य उद्देश्य सामाजिक प्रपंच के समझने के लिए नकारात्मक फिलास्फी के आलोचनात्मक व विनाशकारी सिद्धान्तों को रद्द करना व उनकी जगह सकारात्मक फिलास्फी के रचनात्मक तथा उजागर सिद्धान्तों को स्थापित करना था। दूसरे शब्दों में काम्ते का मुख्य आदर्श सामाजिक अध्ययन व खोज के वैज्ञानिक स्तर पर लाना था। सकारात्मकवाद प्राकृतिक विज्ञानों की विधि को सामाजिक अध्ययन में उपयोग के सामाजिक विज्ञान को भी उन्होंने यथार्थ बनाता है जितना कि भौतिकवाद रासायनिक विज्ञान आदि हैं। उसका विश्वास था कि सकारात्मकवाद द्वारा वास्तविक व सकारात्मक विधि द्वारा ज्ञान प्राप्त होगा व उसकी व्यवहारिक उपयोग द्वारा सामाजिक उन्नति को सम्भव बनाया जा सकेगा। वास्तविक या सकारात्मक ज्ञान सामाजिक पुनर्संगठन की भी ठोस बुनियाद होगी। सकारात्मकवाद का अन्तिम उद्देश्य सामाजिक पुनर्निर्माण या पुनर्संगठन है।

अब प्रश्न उठता है कि संकल्प सकारात्मकवाद से काम्ते का क्या अर्थ था।
संक्षेप शब्दों में सामाजिक प्रपंच का अध्ययन करने के लिए काम्ते द्वारा प्रयोग की गई वैज्ञानिक विधि ही सकारात्मकवाद है। काम्ते ने यह विधि ह्युम, कान्त व गाल से अध्ययन विधि के रूप में ग्रहण की। इसने अपने सिद्धान्तों का निर्माण करते हुए सकारात्मकवाद का उपयोग किया परन्तु अपनी पुस्तकों में सकारात्मकवाद की स्पष्ट व्याख्या नहीं की व न ही इसके नियमों की उचितता को सबित करने का यत्न किया। ऐसा काम्ते ने जानबूझ कर किया क्योंकि उसका विश्वास था कि विद्या की चर्चा उस प्रपंच के अध्ययन से भिन्न करके नहीं की जा सकती, जिसकी इस विद्या द्वारा खोज की जाए।

काम्ते का सकारात्मकवाद से क्या अर्थ था। यह जानने का एक ही तरीका है कि हम उसके इस संक्षेप सम्बन्धी कथनों को एकत्र करें जो उसकी लेखनी में बिखरे हुए हैं।

काम्ते के सकारात्मकवाद के बारे में कथनों के विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि काम्ते अनुसार सकारात्मकवाद का अर्थ वैज्ञानिक विधि है। वैज्ञानिक विधि वह विधि है जिस में किसी विषयवस्तु को समझने व प्रभावित करने के लिए कल्पना या अनुमान का कोई स्थान नहीं होता। यह तो (1) परीक्षण (2) तर्जुबा (3) वर्गीकरण, तुलना तथा ऐतिहासिक विधि की एक व्यवस्थित कार्य प्रणाली होती है। इस तरह परीक्षण, तजुर्बे, वर्गीकरण, तुलना व ऐतिहासिक विधि पर आधारित वैज्ञानिक विधि द्वारा किसी विषय के बारे में सब कुछ समझना और उसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करना सकारात्मकवाद है।

चैम्बलिन ने काम्ते के सकारात्मकवाद के अर्थों को इन शब्दों में स्पष्ट किया है कि काम्ते ने यह अस्वीकार किया था कि सकारात्मकवाद अनीश्वरवादी है क्योंकि वह किसी भी रूप में पर्याप्त श्रमिकता से सम्बन्ध नहीं है। उसका यह भी दावा था कि सकारात्मकवाद किस्मतवादी नहीं है क्योंकि वह यह स्वीकार करता है कि बाहरी अवस्था में परिवर्तन हो सकता है। वह आशावादी भी नहीं है क्योंकि इसमें आशावाद के आध्यात्मिक आधार का अभाव है। यह भौतिकवादी भी नहीं क्योंकि यह भौतिक शक्तियों को बौद्धिक शक्तियों के अधीन करता है। सकारात्मकवाद का सम्बन्ध वास्तविकता से है कल्पना से नहीं, उपयोगी ज्ञान से है नाकि पूर्ण ज्ञान से, इसका सम्बन्ध उन निश्चित तथ्यों से है जिसका कि पूर्व-ध्यान सम्भव है। इसका सम्बन्ध यथार्थ ज्ञान से है न कि अस्पष्ट विचारों से आंगिक सच्चाई से है न कि दैवी सच्चाई से, सापेक्ष से है न कि निष्पक्ष से। अन्त में सकारात्मकवाद इस अर्थ में हमदर्दीपूर्ण है कि यह उन सब लोगों को एक भाईचारे में बांध देता है जो कि इसके मूल सिद्धान्तों तथा अध्ययन प्रणालियों पर विश्वास करते हैं। संक्षेप में सकारात्मकवाद विचार की वह प्रणाली है जो कि सर्वव्यापक रूप में सब को मान्य है।

उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि सकारात्मकवाद परीक्षण, निरीक्षण वर्णन, वर्गीकरण, तुलना, तजुर्बे व ऐतिहासिक विधि पर आधारित वैज्ञानिक विधि है जिससे किसी भी विषय-सम्बन्धी वास्तविक व सकारात्मक ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

कान्त व ह्यूम के विचारों का अनुसरण करते हुए काम्ते इस बात को स्पष्ट थे कि विज्ञान को क्या प्राप्त करना चाहिए तथा इसको प्राप्त करने के लिए यत्न करना चाहिए। वैज्ञानिक ज्ञान का अध्ययन-क्षेत्र सीमित है। वैज्ञानिक ज्ञान में ऐसे तर्क-वाक्य शामिल हैं जोकि परम्परा में सम्बन्धों के बारे में व जिनकी जांच की जा सकती है। यह तर्कवाद दो किस्मों के हैं-

  1. सहयोग की समानताएं (Uniformities of co-existence) अध्ययन किए जा रहे प्रपंच बीच भागों की अन्तर्निर्भरता के बारे में।
  2. अनुक्रमण की समानताएं (Uniformities of succession)

काम्ते के समय प्रकृति विज्ञान जैसे कि गणित, तारा विज्ञान, भौतिक विज्ञान, रासायन विज्ञान व जीव विज्ञान विकसित हो चुके थे और इनके विषय-वस्तु का अध्ययन वैज्ञानिक विधि द्वारा किया जाता था। काम्ते अपने समय की प्रचलित तात्विक तथा धार्मिक विधियों द्वारा सामाजिक प्रपंचों की अध्ययन प्रणाली से सन्तुष्ट नहीं थे। इसने तो वैज्ञानिक विधि को सर्वोच्च प्रधानता प्रदान की थी इसलिए यह सामाजिक अध्ययन कार्य को भी परीक्षण, निरीक्षण व वर्गीकरण को वैज्ञानिक कार्य प्रणाली के घेरे में लाने के पक्ष में हैं। काम्ते का कहना था कि अनुभव, निरीक्षण, तजुर्बा वर्गीकरण की व्यवस्थित कार्य प्रणालियों द्वारा न केवल प्राकृतिक प्रपंचों का ही अध्ययन सम्भव है बल्कि समाज का भी क्योंकि समाज भी प्रकृति का अंग है।

जिस प्रकार प्राकृतिक प्रपंच कुछ निश्चित नियमों पर आधारित होते हैं उसी तरह प्रकृति के अंग के रूप में सामाजिक प्रपंच भी कुछ निश्चित नियमों के अनुसार प्रतीत होते हैं। जैसे धरती की गति, सूर्य व चांद का उदय होना व छिपना आदि प्राकृतिक प्रपंच अवास्तविक नहीं हैं उसी तरह सामाजिक प्रपंच भी अवास्तविक नहीं होते, बल्कि पूर्व निश्चित नियमों अनुसार प्रतीत होते हैं। वैसे सामाजिक प्रपंच कैसे प्रतीत होते हैं ? इनकी गति व कर्म क्या हैं ? अर्थात् सामूहिक जीवन उस से सम्बन्धित मौलिक नियमों का अध्ययन यथार्थ रूप में सम्भव है। यह भी सकारात्मकवाद का बुनियादी सिद्धान्त है। स्पष्ट है कि काम्ते का सकारात्मकवाद कल्पना के आधार पर नहीं बल्कि निरीक्षण, परीक्षण, तजुर्बे, तुलना, ऐतिहासिक विधि को व्यवस्थित कार्य प्रणाली के आधार पर सामाजिक प्रपंचों की व्याख्या करता है। पहले कारण ढूंढ़ने की जगह कारण सम्बन्धों की खोज पर अधिक दबाव देता है।

उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि काम्ते अनुसार सकारात्मवादी प्रणाली के अन्तर्गत सब से पहले हम अध्ययन विषय को चुनते हैं फिर परीक्षण द्वारा उस विषय से सम्बन्धित प्रकट होने वाले सब तथ्यों को एकत्र करते हैं। उसके किसी भी विषय के बारे, चाहे वह भौतिक है या सामाजिक, तथ्यों या सामग्री एकत्र करने के लिए प्रमुख विधि परीक्षण है। इसके बाद उसका वर्णन किया जाता है। फिर विश्लेषण करके सामान्य विशेषताओं के आधार पर इनका वर्गीकरण किया जाता है। अन्त में उस विषय से सम्बन्धित परिणाम निकाला जाता है फिर उसकी प्रामाणिकता की जांच तथा तुलना ऐतिहासिक विधि के उपयोग से की जाती है।

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प्रश्न 3.
मैक्स वैबर द्वारा दिये गये सत्ता के प्रकारों का वर्णन करो ।
उत्तर-
मनुष्य की क्रियाएं मानवीय संरचना के अनुसार ही होती हैं। प्रत्येक संगठित समूह में सत्ता के तत्त्व मूल रूप में विद्यमान रहते हैं। संगठित संग्रह में कुछ तो आम (साधारण) सदस्य होते हैं और कुछ ऐसे व्यक्ति या सदस्य होते हैं जिनके पास जिम्मेवारी होती है। उन्हीं के पास ही सत्ता भी होती है। कुछ लोग प्रधान प्रशासक के रूप में होते हैं, सत्ता की दृष्टि से समूह की रचना इसी प्रकार की होती है और उसमें सत्ता के तत्त्व मौजूद रहते हैं।

मैक्स वैबर के अनुसार, “समाज में सत्ता विशेष रूप से आर्थिक आधारों पर ही आधारित होती है। यद्यपि आर्थिक कारक सत्ता के निर्माण में एक मात्र कारक नहीं कहा जाता है। आर्थिक जीवन में यह आसानी से स्पष्ट है कि एक तरफ मालिक वर्ग, उत्पादन के साधनों एवं मजदूरों की सेवाओं के ऊपर अधिकार डालने की कोशिश करते हैं और दूसरी तरफ मज़दूर वर्ग अपनी मज़दूरी (सेवाओं) के एवज़ में मजदूरों के लिए अधिक-से-अधिक अधिकार प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। सत्ता का केन्द्र उनके हाथ में रहता है जिनकी सम्पत्ति के ऊपर उत्पादन के साधन केन्द्रित हैं । इसी सत्ता के आधार पर ही मज़दूरों की आजादी खरीद ली जाती है और मालिकों को मजदूरों के ऊपर एक विशेष अधिकार प्राप्त हो जाता है।”

यद्यपि इस प्रकार की सत्ता अब कम होती जा रही है और काफ़ी कम भी हो गयी है। परन्तु फिर भी आर्थिक क्षेत्रों में निजी सम्पत्ति और उत्पादन के साधन किसी भी वर्ग के लिए सत्ता के निर्धारण में कारक सिद्ध होते हैं। संक्षेप में आर्थिक जीवन में एक स्थिर या संस्थागत अर्थव्यवस्था समाज के कुछ विशेष वर्गों को अधिकार या सत्ता प्रदान करती है। यह वर्ग अपनी उस सत्ता के बल पर दूसरे वर्ग के ऊपर काबू (Control) रखते हैं या उनसे ऊंची स्थिति पर विराजमान रहते हैं। संत्ता के संस्थागत होने के विषय में वैबर का विश्लेषण बहुत कुछ इसी दिशा में ही है। फिर भी वैबर ने तीन मुख्य सत्ताओं का वर्णन किया है, ये तीन प्रकार की सत्ता निम्नलिखित हैं-

  1. वैधानिक सत्ता (Legal Authority)
  2. परम्परागत सत्ता (Traditional Authority)
  3. करिश्माई सत्ता (Charismatic Authority)

1. वैधानिक सत्ता (Legal Authority)-जहां कहीं भी नियमों की ऐसी व्यवस्था है जो निश्चित सिद्धान्तों के अनुसार न्यायिक व प्रशासनिक रूप से प्रयोग की जाती है और जोकि एक निश्चित समूह के सभी सदस्यों के लिए सही व मानने योग्य हो वह वैधानिक सत्ता है। जो व्यक्ति आदर्श रूपी शक्ति को चलाते हैं वह निश्चित रूप से श्रेष्ठ होते हैं। वह व्यक्ति कानून की सभी विधियों के अनुसार ही नियुक्त होते हैं या चुने जाते हैं और वह स्वयं वैधानिक व्यवस्था को चलाने के लिए निर्देशित रहते हैं। जो व्यक्ति इन आदेशों के अधीन हैं वे विधान के रूप में समान होते हैं। वह विधान का पालन करते हैं न कि विधान के काम करने वालों का ये नियम के लिए उनके द्वारा प्रयोग किये जाते हैं जो विधान की सत्ता की व्यवस्था का प्रयोग करते हैं। इस संगठन के अपने नियम होते हैं । इसके अधिकारी उन नियमों के अधीन होते हैं जो इसकी सत्ता की सीमा को निर्धारित करते हैं।

यह नियम सत्ता का कार्य करने वालों के ऊपर प्रतिबन्ध लगाते हैं, अधिकारी के व्यक्तिक रूप को उसके अधिकारी के रूप में करने वाले कार्य के सम्पादन से अलग करते हैं और यह आशा रखते हैं कि सम्पूर्ण कार्यवाही वैध होने के लिए लिखित में होनी चाहिए। इस प्रकार राज्य की ओर से बनाए कुछ साधारण नियमों के अनुसार पैदा अनेकों पद ऐसे हैं जिनके साथ एक विशेष प्रकार की सत्ता जुड़ी होती है। इस कारण जो भी व्यक्ति उन पदों पर बैठ जाता है उनके हाथों में उन पदों से सम्बन्धित सत्ता भी चली जाती है।

इसमें सत्ता का स्रोत किसी व्यक्ति की निजी प्रसिद्धि नहीं होता बल्कि जिन नियमों के अन्तर्गत वह इस विशेष पद पर बैठा है वह उन नियमों की सत्ता के अन्दर रहता है। इसलिए उसका कार्य क्षेत्र वहां तक सीमित है जहां तक विधान से सम्बन्धित नियम उसे विशेष अधिकार प्रदान करते हैं। एक व्यक्ति को विधान के नियमों के अनुसार जितना अधिकार प्राप्त हुआ है वह उससे बाहर जाकर या उसके अधिक सत्ता का प्रयोग नहीं कर सकता। इस तरह व्यक्ति को वैधानिक सत्ता के क्षेत्र और उससे बाहर के क्षेत्र में आधारभूत अन्तर होता है। जैसे जो व्यक्ति किसी अधिकारी पद पर कार्य कर रहा है वह अपने दफ्तर में जिन अधिकारों का अधिकारी है वह उसके घर के क्षेत्र से बिल्कुल भिन्न होता है। घर में वह कोई अधिकारी न होकर बल्कि पिता या पति के रूप में सत्ता में है। एक जटिल समाज में सत्ता प्रत्येक व्यक्ति के हाथों में समान नहीं होती बल्कि इसमें एक ऊंच-नीच का भेदभाव भी होता है अर्थात् वैधानिक अधिकार के समाज में उच्च-निम्न सताएं विराजमान हैं।।

2. परम्परागत सत्ता (Traditional Authority)-परम्परागत सत्ता उस सत्ता की वैधता के विश्वास पर आधारित है, जो हमेशा बनी रहती है। आदेश की शक्ति को पूर्ण करने वाले व्यक्ति आम रूप से प्रभु के समान होते हैं। वह अपनी स्थिति के कारण व्यक्तिगत सत्ता का उपयोग करते हैं और उनके पास स्वतन्त्र रूप से व्यक्तिगत निर्णयों के विशेषाधिकार भी प्राप्त होते हैं। इस प्रथा की नकल और व्यक्तिगत निरंकुशता ही तो ऐसे नियमों की विशेषताएं होती हैं। जो व्यक्ति इस प्रभु के आदेशों के अधीन होते हैं वह शाब्दिक अर्थों में उसके शिष्य होते हैं। वह प्रभु के लिए व्यक्तिगत रूप से शिष्य होने के कारण उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। भूतकाल से बने हुए पद के लिए उनकी पवित्र श्रद्धा होती है। इसलिए वह उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था या प्रथा के लिए दो प्रकार के उदाहरण हैं। पैतृक (Ancestral) शासन में इस उपकर्म में व्यक्तिगत अनुगामी होते हैं।

जैसे कि घर का अधिकारी, सम्बन्धी या कृपा पात्र व्यक्ति। एक सामन्तवादी समाज में इस उपकर्म के अन्तर्गत व्यक्तिगत रूप से शिष्य मित्र होते हैं जिसके अधीन जगीरदार या करदाता सरकार होती है। यह व्यक्तिगत नीचे वाले अधिकारी ही अपने प्रभु सत्ता के निरंकुश आदेशों या परम्परागत आदेशों के अधीन होते हैं तथा उनकी क्रियाओं का क्षेत्र या आदेश की शक्ति एक निम्न स्तर पर उसके प्रभु की Mirror Image होती है। इसके विपरीत एक सामन्तवादी समाज के पदाधिकारी व्यक्तिगत रूप से निर्भर नहीं होते। बल्कि सामाजिक रूप से प्रमुख मित्र होते हैं। जिन्होंने प्रभु भक्ति की कसमें खाई होती हैं और Grant या Contract के आधार पर जिनका स्वतन्त्र रूप से क्षेत्र होता है। सामन्तवादी और पितृनामी शासन का भेद और दोनों व्यवस्थाओं में परम्परात्मक और निरंकुश आदेशों की निकटता सभी प्रकार की परम्परात्मक प्रभुता में छाई रहती है।

इस प्रकार की सत्ता में एक व्यक्ति को विधि के नियमों के अनुसार एक पद पर बैठे होने के कारण नहीं बल्कि परम्परा के कारण बने हुए पदों पर बैठने के कारण प्राप्त होती है। यद्यपि इस पद को परम्परानुसार परिभाषित किया जाता है। इस कारण ऐसे पदों पर बैठे होने के कारण व्यक्ति को कुछ विशेष प्रकार की सत्ता प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार की सत्ता परम्परात्मक विश्वासों पर टिकी होती है। इसलिए यह परम्परात्मक सत्ता कहलाती है। जिस तरह खेती-बाड़ी युग में भारतीय गांवों में मिलने वाली पंचायतों में पंचों की सत्ता को ही ले लीजिए। पहले इन पंचों की सत्ता विधिनुसार नहीं आती थी बल्कि परम्परागत रूप में ही उन्हें सत्ता प्राप्त हो जाती थी। यहां तक कि पंचों की सत्ता को ईश्वरीय सत्ता के समान तक समझा जाता था।

जैसे कि ‘पंच परमेश्वर’ की धारणा में दिखता था। उसी प्रकार पितृसत्तात्मक परिवार में पिता को ही परिवार के साथ सम्बन्धित सभी विषयों में जो अधिकार और सत्ता प्राप्त होती है, उसका भी आधार वैधानिक न होकर परम्परा होती है। पिता के आदेश का पालन हम इसलिए नहीं करते कि उनको कोई वैधानिक सत्ता प्राप्त होती है बल्कि इसलिए करते हैं कि परम्परागत रूप में ऐसा होता रहा है। वैधानिक सत्ता वैधानिक नियमों के अनुसार निश्चित और सीमित होती है क्योंकि वैधानिक नियम निश्चित और स्पष्ट रूप से परिभाषित होते हैं। लेकिन परम्परा और सामाजिक नियमों में इतनी स्पष्टता और निश्चितता नहीं होती। इस कारण परम्परागत सत्ता की वैधानिक सत्ता की तरह कोई निश्चित सीमा नहीं होती है। उदाहरण के लिए किसी अधिकारी की सत्ता कहाँ से शुरू होकर कहां पर खत्म होती है, के बारे में कुछ सीमा तक निश्चित तौर पर कहा जा सकता है लेकिन उस व्यक्ति के घर में पति तथा पिता के रूप में सत्ता की क्या सीमाएँ हैं कहना कठिन है।

3. करिश्माई सत्ता (Charismatic Authority)—व्यक्तिगत सत्ता का स्रोत परम्परा से सर्वथा भिन्न भी हो सकता है। आदेश की शक्ति एक नेता भी प्रयोग कर सकता है। चाहे वह कोई पैगम्बर हो, या नायक हो, या अवसरवादी नेता हो परन्तु ऐसा नेता तभी चमत्कारी नेता हो सकता है, जब वह सिद्ध कर दे कि तान्त्रिक शक्तियां, दैवी शक्तियां या अन्य अभूतपूर्व गुणों के कारण उसके पास चमत्कार है। जो व्यक्ति इस प्रकार के नेता की आज्ञा का पालन करते हैं, वह शिष्य होते हैं। जो निश्चित नियमों या परम्परा से पवित्र पद की गरिमा की जगह उसके अभूतपूर्व गुणों में एक चमत्कारी नेता के अन्तर्गत पदाधिकारियों को उनके चमत्कार एवं व्यक्तिगत निर्भरता के आधार पर विश्वास करते हैं। उन शिष्य पदाधिकारियों को बड़ी मुश्किल से ही एक संगठन के रूप में माना जाता है और उनकी क्रियाओं का क्षेत्र और आदेश की शक्ति एवं दैवी सन्देश नकल करने वाले के आचरण पर निर्भर करती है। पदाधिकारियों का चुनाव इनमें से किसी एक आधार पर हो सकता है। परन्तु इनमें से कोई भी पदाधिकारी न तो नियमों से बंधा हुआ है न ही परम्परा के साथ बल्कि केवल नेता के निर्णय के साथ ही बंधा हुआ है।

इस प्रकार यह सत्ता न तो वैधानिक नियमों पर और न ही परम्परा पर, बल्कि करिश्मा या चमत्कार पर निर्भर करती है। इस प्रकार की शक्ति केवल उन व्यक्तियों तक सीमित होती है (आधारित होती), जिनके पास केवल चमत्कारी शक्तियां होती हैं। इस प्रकार की सत्ता प्राप्त करने में व्यक्ति को काफ़ी समय लग जाता है और पर्याप्त यानि पूरे साधनों के विचार के बाद लोगों द्वारा इस प्रकार की सत्ता स्वीकार की जाती है। दूसरे शब्दों में एक व्यक्ति के द्वारा अपने व्यक्तित्व का विकास इस तरह किया जाता है कि लोग ये समझने लगे कि उसने अपने व्यक्तित्व में कोई चमत्कारी शक्ति का विकास कर लिया है। इसी के बल पर ही वह लोगों को अपनी तरफ झुका लेता है और लोगों द्वारा उसकी सत्ता स्वीकार कर ली जाती है। इस तरह करिश्माई नेता अपने प्रति या अपने लक्ष्य के प्रति या आदर्शों के प्रति दूसरों से आज्ञा का पालन करवाने के लिए मांग करता है। जादूगर, पीर, पैगम्बर, अवतार, धार्मिक नेता, सैनिक, यौद्धा या किसी दल के नेता, इसी प्रकार की सत्ता सम्पन्न व्यक्ति माने जाते हैं।

लोग इस कारण ऐसे लोगों की सत्ता स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उनमें कुछ चमत्कारी गुण होते हैं जो साधारण व्यक्तियों में देखने को नहीं मिलते। इसी कारण प्रत्येक व्यक्ति के दिल में इन विशेष गुणों के प्रति श्रद्धा स्वाभाविक होती है। इन गुणों को ज्यादातर दैवीय गुणों के समान अथवा उनके अंश के रूप में माना जाता है। इस कारण इस प्रकार की सत्ता से सम्पन्न व्यक्ति की आज्ञा लोग श्रद्धा और भक्ति के साथ पूर्ण करते हैं। इस सत्ता की भी परम्परात्मक सत्ता के जैसी कोई निश्चित सीमा नहीं होती। इस सत्ता की एक विशेषता यह है कि हालात के अनुसार यह सत्ता वैधानिक अथवा परम्परात्मक सत्ता में बदल जाती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 4.
वैबर की सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त के बारे आप क्या जानते हैं ? व्याख्या करो।
उत्तर-
मैक्स वैबर की सामाजिक क्रिया (Max Weber’s Social-Action)-सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त की स्थापना में मैक्स वैबर का नाम काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। वैबर ने सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त की बड़ी ही खुली और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी व्याख्या की है। मैक्स वैबर सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त के द्वारा ही समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति को स्पष्ट करता है। अनेक समाजशास्त्री रेमण्ड, इरविंग, जैटलिन, बोगार्डस और रैक्स इत्यादि ने वैबर की आलोचना का काम उसके इस सामाज शास्त्र से ही आरम्भ किया है। इससे पहले कि हम वैबर के सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त को समझने की कोशिश करें हम यह जान लें कि क्रिया और व्यवहार में कोई तकनीकी अन्तर नहीं मानना चाहिए।

समाज के सदस्यों के लिए यह ज़रूरी है कि वह सम्बन्धों के निर्माण के लिए अन्तर क्रिया करे। इन अन्तर क्रियाओं के आधार पर ही सामाजिक सम्बन्धों का जन्म होता है और व्यक्ति का जीवन इन सम्बन्धों के साथ ही बंधा हुआ होता है। व्यक्ति की प्रत्येक प्रकार की क्रिया के पीछे कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है। इस उद्देश्य पूर्ति हेतु उसे क्रिया करनी पड़ती है। समाजशास्त्रीय रूप में सभी क्रियाएं सामाजिक क्रियाओं के दायरे में नहीं आती हैं बल्कि वही क्रियाएं सामाजिक क्रियाएं कही जाती हैं जिनको कर्ता अर्थात् क्रिया करने वाला कोई न कोई अर्थ देता है। व्यक्तियों की यह क्रिया बाहरी, अन्दरूनी, मानसिक एवं भौतिक हो सकती है। साथ ही काल या समय के नजरिये से क्रिया का सम्बन्ध वर्तमान, भूत, भविष्य तीनों में से किसी के साथ भी हो सकता है अर्थात् इसका सम्बन्ध किसी एक काल के साथ भी हो सकता है।

सामाजिक क्रिया के सिद्धान्त को पेश करने का सेहरा सबसे पहले ‘अल्फ्रेड मार्शल’ को जाता है। मार्शल ने उपयोगितावादी धारणा की विवेचना करके ‘गतिविधि’ की धारणा को विकसित किया। गतिविधि को मार्शल ने मूल्य की एक विशेष श्रेणी माना है। इसी श्रेणी में दुर्खीम ने ‘सामाजिक तथ्य’ को प्रकट किया।

आधुनिक काल में सामाजिक क्रिया धारणा के प्रमुख प्रवर्तक मैक्स वैबर थे, जिन्होंने अर्थपूर्ण सिद्धान्त को सामने रखा। इस तरह वैबलीन, मैकाइवर, कार्ल मैनहाईम, पारसंस और मर्टन के नाम महत्त्वपूर्ण हैं। हम इसी श्रेणी में विलियम वैट, डेविड काईजमैन और सी० राईट मिल्स को भी रख सकते हैं। मैक्स वैबर ने अपनी ‘सामाजिक क्रिया’ की धारणा को अपनी पुस्तक “The Theory of Social & Economic Organisation” में पेश (प्रस्तुत) किया।

मैक्स वैबर के अनुसार, “सामाजिक क्रिया व्यक्तिक क्रिया से अलग है। वैबर ने इसको परिभाषित करते हुए लिखा है कि किसी भी क्रिया को हम तभी ही सामाजिक क्रिया मान सकते हैं, जब उस क्रिया को करने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा लाये गये Subjective अर्थ के अनुसार उस क्रिया में दूसरे व्यक्तियों के सम्मान और भावों पर क्रियाएं इकट्ठी हों और उसी के अनुसार गतिविधि निर्धारित हो।”

मैक्स वैबर ने अपनी सामाजिक क्रिया की धारणा को समझाने के लिए इसको चार भागों में बांट कर समझाया है। वैबर ने लिखा है कि क्रियाओं का यह वर्गीकरण वस्तुओं के साथ सम्बन्धों पर आधारित है। पारसंस ने इसकी अभिमुखता का प्रारूप माना है। गरथ और मिल्स इसको प्रेरणा की दिशा कहते हैं।

वैबर के क्रिया के वर्गीकरण को समझने से पहले हम सामाजिक क्रिया की धारणा को पूरी तरह समझ लें। वैबर के अनुसार किसी भी क्रिया को सामाजिक क्रिया मानने से पहले हमें चार बातों का ध्यान रखना चाहिए।

(1) मैक्स वैबर का मानना है कि सामाजिक क्रिया दूसरे या अन्य व्यक्तियों के भूत, वर्तमान या होने वाले व्यवहार द्वारा प्रभावित हो सकती है। यदि हम अपने पहले किये हुए किसी काम के लिए क्रिया करते हैं, तो वह भूतकालीन क्रिया होगी। यदि वर्तमान समय में कोई क्रिया करते हैं तो वह वर्तमान और यदि भविष्य को ध्यान में रखते हुए कोई क्रिया करते हैं तो वह भविष्य वाली क्रिया कहलायेगी।

(2) वैबर का कहना है कि हर प्रकार की बाहरी क्रिया सामाजिक क्रिया नहीं हो सकती। बाहरी क्रिया असामाजिक है जो पूरी तरह जड़ और बेज़ानदार वस्तुओं द्वारा प्रभावित और उसकी क्रिया स्वरूप की जाती है। उदाहरण के लिए ईश्वर की अराधना, नमाज पढ़ना या अकेले ही समाधि लगाना, सामाजिक क्रिया नहीं है, परन्तु ब्राह्मणों के कहने पर पूजा अर्चना करना, मुल्लाओं के कहने पर नमाज पढ़ना इत्यादि सामाजिक क्रिया है।

(3) मनुष्य के कुछ सम्पर्क उस सीमा तक सामाजिक क्रिया में आते हैं जहां तक वह दूसरों के व्यवहार के साथ अर्थपूर्ण ढंग के साथ सम्बन्धित और प्रभावित होते हैं। हर प्रकार के सम्पर्क सामाजिक नहीं कहे जा सकते।

उदाहरण के लिए अगर सिनेमा की सीढ़ियां उतरते समय दो व्यक्ति आपस में टकरा जाएं तो यह सामाजिक क्रिया नहीं होगी, अगर वह आपस में संघर्ष पर उतर आए अथवा माफी मांगने लगे तो यह सामाजिक क्रिया होगी क्योंकि ऐसा करने से दोनों के व्यवहार आपस में सम्बन्धित और प्रभावित होते हैं।

(4) सामाजिक क्रिया न तो अनेक व्यक्तियों द्वारा की जाने वाली एक जैसी क्रिया को कहा जाता है और न ही उस क्रिया को कहा जाता है जो कि केवल दूसरे व्यक्तियों द्वारा प्रभावित होती है।

उदाहरण के लिए बारिश होने पर सड़क पर अनेकों व्यक्तियों द्वारा छाता खोल लेने की क्रिया सामाजिक क्रिया नहीं होती क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की क्रिया का दूसरे अथवा और व्यक्तियों से कोई सम्बन्ध नहीं होता। वैबर कहते हैं कि दूसरे की क्रिया की नकल करना सामाजिक क्रिया नहीं है, जब तक कि वह और व्यक्ति जिसकी कि नकल की जा रही है, की क्रिया साथ अर्थपूर्ण सम्बन्ध न रखता हो अथवा उसकी क्रिया द्वारा अर्थपूर्ण रूप से प्रभावित न होता हो।

मैक्स वैबर के अनुसार सामाजिक क्रिया को समझने के लिए उसकी अर्थ मूलक व्याख्या की आवश्यकता होती है। इस व्याख्या को दो भागों में विभक्त करके समझाया जा सकता है।

  1. औसत प्रकार की अर्थ मूलक व्याख्या
  2. विशुद्ध प्रकार की अर्थ मूलक व्याख्या

वैबर ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि सामाजिक क्रिया का अध्ययन विशुद्ध अर्थ मूलक की व्याख्या के लिए करना चाहिए परन्तु इनको समझने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण विधियों का भी वर्णन किया गया है जिनके आधार पर समाज की धारणाओं को सही तरह समझा गया है। इसमें वैबर ने तर्कपूर्ण और अर्थपूर्ण व्याख्या पर जोर दिया है।

इस सम्बन्ध में वैबर ने यह बताया है कि सभी सामाजिक क्रियाओं के कुछ निश्चित अर्थ होते हैं और एक प्रेरक शक्ति भी होती है। यह दोनों ही दूसरे व्यक्तियों की प्रेरक शक्तियों और क्रियाओं में बदलते रहते हैं।

यहाँ एक बात बहुत महत्त्व की है कि समाज शास्त्री किसी सामाजिक क्रिया की व्याख्या उसके अर्थ के आधार पर करता है जो कि दूसरे की क्रियाओं द्वारा निर्देशित होता है। इस प्रकार समाज शास्त्र प्राकृतिक विज्ञानों से पूरी तरह अलग हो जाता है।

सामाजिक क्रिया के प्रकार (Types of Social Action)-देखें पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न IV (5)

वैबर ने बताया है कि सामाजिक क्रियाएं तीन प्रकार से निर्देशित होती हैं-

  1. परम्परागत प्रयोग-इसका अर्थ यह है कि जो क्रियाएं परम्परा के आधार पर सम्पादित की जायें। सामाजिक प्रथाएं मनुष्य की क्रियाओं को प्रभावित करती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि लोगों की क्रियाएं परम्परा से हटकर बाहर नहीं जाती हैं और सामाजिक मर्यादा पूरी तरह बनी रहती है।
  2. हित-हित का अर्थ उन समरूपताओं से है जिसमें क्रियाओं को विवेकपूर्ण निर्देशन के रूप में समझा जा सके।
  3. न्यायसंगत व्याख्या-इससे सम्बन्धित व्यवहार क्रियाएं, कर्ता के किसी आदर्श के निश्चित होने की नज़र से निर्देशित होती हैं। ये ऐसे आदर्शों से भी निर्देशित होती हैं जोकि किसी विशेष निर्देश को पाने के लिए तार्किक समझे जाये।

सामाजिक क्रिया के सम्बन्ध में वैबर ने बताया कि सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर ही क्रिया निश्चित होती है।

वैबर ने आगे कहा है कि सामाजिक सम्बन्धों की पहली और आवश्यक कसौटी यह है कि उसमें प्रत्येक व्यक्ति की क्रिया का दूसरे की कोशिश की तरह परस्पर रूप से निर्देशन हो। इसके Contents की प्रकृति चाहे अलगअलग प्रकार की क्यों न हो जैसे कि संघर्ष विरोध, यौन आकर्षण, मित्रता, अनुराग या आर्थिक लेन-देन इत्यादि।

इस सम्बन्ध में अर्थ का बड़ा ही महत्त्व है, अर्थ का मतलब उस अर्थ से है जो किसी विशेष दशा में लिया जाता है। यह अर्थ औसत रूप या सैद्धान्तिक रूप से बनाकर, विशुद्ध रूप में लाया जाता है।

वैबर ने यह भी बताया कि सामाजिक सम्बन्धों में पारम्परिक रूप के साथ निर्देशित बल के Subjective अर्थ एक समान ही है।

“सामाजिक क्रिया को अभिमुखता की प्राकृतिक के आधार पर दोबारा विवेक अभिमुख, अविवेक अभिमुख, सहानुभूति अभिमुख और आपसी अभिमुख क्रिया के रूप में रखा जा सकता है।” मानव के ज्ञान पर ही कुछ व्यवहार आधारित होते हैं तथा यह ज्ञान ही साधन के लक्ष्य का आधार होता है, लेकिन साथ ही कुछ ऐसे व्यवहार भी होते हैं जिसमें ज्ञान की प्रधानता ना होकर सामाजिक मूल्यों को प्रधानता दी जाती है। इन व्यवहारों को विवेकपूर्ण माना जाता है। कुछ व्यवहार उस श्रेणी में आते हैं जहां अपनापन और हमदर्दी को मानव द्वारा महत्त्व दिया जाता है। चाहे वह व्यवहार अविवेकपूर्ण हो और कुछ व्यवहार विवेकपूर्ण इसलिए भी हो जाते हैं क्योंकि मानव परम्परा को महत्त्व दे बैठता है। मानव सम्बन्धी तथ्य प्रत्यक्षवादी परिप्रेक्ष्य से विवेकपूर्ण क्रिया के अन्तर्गत परिभाषित किए जाते हैं।

इस स्थिति में पैरेटो और वैबर के एक-दूसरे के विचारों में भिन्नता आ जाती है कि अविवेकपूर्ण क्रिया, विवेकपूर्ण क्रिया से सही अलग क्रिया है। आपसी क्रिया ऐसी क्रिया है जिसमें परम्परागत तथ्य प्रधानता रखते हैं, औसत श्रेणी में संवेगात्मक अथवा हमदर्दी अभिमुख क्रिया को लेते हैं। मानवीय क्रियाओं की अभिमुखता, प्रचलन रुचि और सही आज्ञा से भी हो सकती है। विद्वानों की राय है कि वैबर की क्रिया के सिद्धान्त को अपनी इच्छा तथा आधारित क्रिया के सिद्धान्त से कुछ हद तक जाना जा सकता है। पारसंस के क्रिया के सिद्धान्त पर वैबर का प्रभाव देखा जा सकता है। विवेक की धारणा को वैबर ने 6 प्रकार से प्रयोग में लिया है।

मैक्स वैबर ने जिस क्रिया के सिद्धान्त को दिया है वह मार्क्स के सिद्धान्त से बिल्कुल अलग है। साधनयुक्त विवेक को वैबर ने अपने विचारों में प्रमुख स्थान दिया है। कर्ता की तरफ से उद्देश्य की प्राप्ति के मूल्य और उद्देश्य दोनों का मूल्यांकन इस प्रकार के व्यवहार में किया जाता है। कर्ता के द्वारा एक उद्देश्य की प्राप्ति से दूसरे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए साधन के बारे में कल्पना की जाती है। इस तरह की भावना वैबर के विचारों में थी। विवेक शब्द का प्रयोग वैबर ने व्यवहार और विश्वास दोनों के लिए किया है। यानि विवेकपूर्ण व्यवहार वही है जिसमें कर्ता के द्वारा विवेक को स्थान दिया जाता है और उसी के अनुरूप विश्वास के स्तर पर भी विवेक को महत्त्व दिया गया है। सामाजिक व्यवहार के रूप में अनेक विद्वानों ने ऊपरलिखित विवेचनाओं से नतीजा निकाला है कि जिसमें संवेगात्मक और सहानुभूति के तत्त्व मौजूद होते हैं ऐसे व्यवहारों को विवेकपूर्ण व्यवहार कहा गया है।

विवेक वैबर के लिए एक आदर्श रहा है। आपसी सामाजिक रचना के टूटने का एक मुख्य कारण वो बढ़ता हुआ विवेकीकरण है। विशेष तौर पर हम विवेकीकरण की बढ़ती हुई मात्रा को बाज़ार के सम्बन्धों में देख सकते हैं।

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प्रश्न 5.
दुर्खीम के सामाजिक तथ्य की विवेचना करो।
अथवा
दुर्खीम के सामाजिक तथ्य के बारे में चर्चा करो।
उत्तर-
इमाइल दुर्खीम द्वारा दी गई “सामाजिक तथ्य” की विवेचना बहुत महत्त्वपूर्ण है। दुर्खीम के सामाजिक तथ्यों सम्बन्धी विचार उसकी दूसरी प्रमुख पुस्तक “दि रूलस ऑफ़ सोशोलोजीकल मैथड’ में दिखाई पड़ते हैं। दुर्खीम की 1895 में प्रकाशित ये पुस्तक समाजशास्त्र के शास्त्रीय ग्रन्थ के रूप में पहचानी जाती है।

दुर्खीम ने यह अनुभव किया कि समाज शास्त्र को एक स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में तब तक स्थापित नहीं किया जा सकता जब तक कि उसका अध्ययन वस्तु की विशेषता स्पष्ट न हो और इसकी खोज के लिये एक व्यवस्थित पद्धति शास्त्र का विकास न हो। इन दो उद्देश्यों के लिये दुर्खीम ने The Rules of Sociological Method की रचना की।

दुर्खीम ने काम्ते, स्पैंसर, मिल इत्यादि समाजशास्त्रियों की खामियों का अनुभव किया, और स्पष्ट लिखा है कि, “यह समाजशास्त्री जिनकी चर्चा हमने अभी की है, वह समाजों की प्रवृत्ति और समाजिक जैविकीय क्षेत्रों के मध्य सम्बन्धों के विषय में अस्पष्ट समाजीकरण से बहुत आगे चले गए थे।”

दुर्खीम ने अपने उद्देश्य के अनुरूप इस पुस्तक में दो प्रमुख कठिनाइयों का वर्णन किया।

  1. उन्होंने समाज शास्त्र के अध्ययन के लिये विद्यार्थियों के लिए सारी विषय सामग्री का निर्धारण किया। इस तरह करने के साथ उसने समाज-शास्त्र को मनोवैज्ञानिक और जीव संसार से मुक्त करवा कर उसे एक अलग स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान किया।
  2. प्राकृतिक विज्ञान की प्रत्यक्षयवादी, तथ्यात्मक अध्ययन पद्धति के रूप में देखा और इस पद्धति के सफल प्रयोग के लिये पालने योग्य नियमों का निर्माण किया।

दुर्खीम ने अपनी पुस्तक में सामाजिक तथ्य की विवेचना के लिए 6 मुख्य बातों की विवेचना की जिसको उसने 6 मुख्य (chapters) में पेश किया, जो कि निम्नलिखित हैं-

  1. सामाजिक तथ्य क्या है?
  2. सामाजिक तथ्यों के निरीक्षण और नियम।
  3. Normal और Pathological तथ्यों में भेद करने के नियम
  4. सामाजिक रूपों के वर्गीकरण के नियम
  5. सामाजिक तथ्यों की व्याख्या के नियम
  6. समाज शास्त्रीय प्रमाणों की स्थापना के साथ सम्बन्धित नियम।

सामाजिक तथ्य क्या हैं ?
(What are Social Facts ?)

दुर्खीम ने विषय सामग्री और अध्ययन पद्धति दोनों ही नज़रियों से समाज-शास्त्र को एक स्वतन्त्र सामाजिक विज्ञान के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। दुर्खीम ने समाज-शास्त्र की विषय सामग्री के रूप में सामाजिक तथ्यों को पेश किया है। दुर्खीम का स्पष्ट मानना है कि समाज-शास्त्र सभी मानवीय गतिविधियों का अध्ययन नहीं करता बल्कि अपने आपको केवल सामाजिक तथ्यों के अध्ययन तक ही सीमित रखता है।

दुर्खीम ने अपने इस अध्याय में यह बात स्पष्ट करने की कोशिश की है कि वास्तव में किन तथ्यों को सामाजिक तथ्य कहा जायेगा? सामाजिक तथ्यों की क्या विशेषताएं हैं और उनका अध्ययन किस प्रकार किया जायेगा? सामाजिक तथ्यों के अर्थ स्पष्ट करते हुए दुर्खीम कहते हैं कि सामाजिक तथ्यों के बारे में अनेक प्रकार की शंकाएं प्रचलित हैं और यही कारण है कि मनोविज्ञान, प्राणी शास्त्र और समाज शास्त्र के विषय वस्तु के सम्बन्धों में कई प्रकार की भ्रान्तियां भी मन में पड़ जाती हैं। स्वयं दुर्खीम ने लिखा है सामाजिक तथ्यों की पद्धति के बारे में जानने से पूर्व यह जानना ज़रूरी है कि कब तथ्यों को आमतौर पर ‘सामाजिक’ कहा जाता है। यह सूचना और भी अधिक आवश्यक है, क्योंकि ‘सामाजिक’ शब्द का प्रयोग अधिक अनिश्चित रूप में होता है। वर्तमान में इस शब्द का प्रयोग समाज में होने वाली किसी भी घटना के लिए किया जाता है चाहे उसकी सामाजिक रुचि कितनी ही कम क्यों न हो। परन्तु ऐसी कोई भी मानवीय घटना नहीं है जिसको सामाजिक न कहा जा सके। प्रत्येक व्यक्ति सोता है, खाता है, पीता है और विचार करता है और यह सामाजिक हित में होता है कि यह सभी कार्य सही व्यवस्थित ढंग से हों। यदि इन सबको सामाजिक तथ्य मान लिया जाये तो समाज शास्त्र की भिन्न रूप से कोई विषय वस्तु नहीं होगी। इससे समाज-शास्त्र, प्राणी शास्त्र और मनोविज्ञान शास्त्र में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

सामाजिक तथ्य के अर्थ की विवेचना करते हुए दुर्खीम ने सर्वप्रथम यह कहा कि सामाजिक तथ्यों को वस्तुओं के समान समझना चाहिए। यद्यपि दुर्खीम ने वस्तु शब्द का वास्तविक अर्थ कहीं भी स्पष्ट नहीं किया। दुर्खीम ने वस्तु शब्द को चार अलग-अलग अर्थों में प्रयोग किया है। यह हैं-

(1) सामाजिक तथ्य एक ऐसी वस्तु है, जिसमें कुछ विशेष गुण होते हैं जिसको बाहरी रूप में देखा जा सकता
है।
(2) सामाजिक तथ्य एक ऐसी वस्तु है, जिसको केवल अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।
(3) सामाजिक तथ्य एक ऐसी वस्तु है, जिसका अस्तित्व मनुष्य के ऊपर बिल्कुल निर्भर नहीं।
(4) सामाजिक तथ्य एक ऐसी वस्तु है, जिसको केवल बाहरी तौर पर देखते हुए जाना जा सकता है। परन्तु क्योंकि सामाजिक तथ्य वस्तु के समान है, अतः यह कोई स्थिर धारणाएं नहीं हैं बल्कि गतिशील धारणा के रूप में जानने योग्य है। इस तरह हम देखते हैं कि समाज में कुछ ऐसे तथ्य होते हैं जो कि भौतिक प्राणी शास्त्र और मनोवैज्ञानिक तथ्यों से अलग होते हैं। दुर्खीम इस प्रकार के तथ्यों को सामाजिक तथ्य मानते हैं। दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की कुछ परिभाषाएं पेश की हैं, एक स्थान पर दुर्खीम लिखते हैं, “सामाजिक तथ्य कार्य करने, सोचने और अनुभव करने के वह तरीके हैं, जिसमें व्यक्तिगत चेतना से बाहर ही अस्तित्व को बनाये रखने की उल्लेखनीय विशेषता होती है।”

एक अन्य स्थान पर दुर्खीम ने लिखा है कि, “सामाजिक तथ्यों में कार्य करने सोचने, अनुभव करने के वह तरीके हैं जिसमें व्यक्तिगत चेतना से बाहर भी अस्तित्व को बनाये रखने को उल्लेखनीय विशेषता होती है।” अपनी पुस्तक के पहले chapter की अन्तिम पंक्तियों में इसकी विस्तार के साथ परिभाषा पेश करते हुए लिखा है, “एक सामाजिक तथ्य क्रिया करने का हर स्थायी और अस्थायी तरीका है जो व्यक्ति पर बाहरी दबाव डालने में समर्थ होता है या फिर कृपा करने का हर तरीका जो किसी समाज में आम रूप में पाया जाता है परन्तु साथ ही साथ व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र अलग अस्तित्व रखता है।”

दुर्खीम की उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि “क्रिया करने के तरीके” सामाजिक तथ्य हैं। क्रिया करने के तरीकों में मानवीय व्यवहार के सभी पहलू शामिल हैं, जो उसके विचार, अनुभव और क्रिया के साथ सम्बन्ध रखते हैं। यह सामाजिक वास्तविकता के अंग हैं। ऐसी सामाजिक घटना स्थायी भी हो सकती है, और अस्थायी भी हो सकती है। उदाहरणार्थ किसी समाज में आत्महत्याओं की, विवाहों की, मृत व्यक्तियों की संख्या में बहुत कम अन्तर होता है। अर्थात् इनकी वार्षिक दर आमतौर पर स्थित रहती है। अतः इसको सामाजिक तथ्य कहा जाता है।

इस तरह ‘भगवान्’ को सामाजिक तथ्य नहीं कहा जाता है क्योंकि वह वास्तविक निरीक्षण से दूर है। इस तरह मनही-मन सोचा गया, कोई विचार भी सामाजिक तथ्य की श्रेणी में नहीं आयेगा क्योंकि उनका कोई स्पष्ट रूप नहीं है। परन्तु किसी विद्वान् द्वारा दिया गया कोई भी सिद्धान्त, या नियम या ईश्वरीय सम्बन्धी पूजा, प्रार्थना या आराधना, जिसमें टोटमवाद भी शामिल है, को सामाजिक तथ्य माना जायेगा क्योंकि उनका साफ निरीक्षण सम्भव है। भाषा, लोक कथा, धार्मिक विश्वास, क्रियाएं, Business के नियम, नैतिक नियम इत्यादि सामाजिक तथ्यों की कितनी ही अनुपम उदाहरणे हैं क्योंकि इन सभी का निरीक्षण एवं परीक्षण सम्भव है और यह व्यक्ति के साथ जुड़े होते हैं। यह व्यक्ति के ऊपर दबाव डालने की शक्ति रखते हैं।

इस प्रकार दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की विवेचना दो प्रमुख यथार्थक मापदंडों के माध्यम से बहुत ही स्पष्ट रूप से हमारे सामने पेश की है, वह मापदंड है

  1. वह वैज्ञानिक के दिमाग से बाहर होने चाहिए और
  2. उसका वैज्ञानिक पर ज़रूरी अथवा मजबूरी का प्रभाव होना चाहिए।

सामाजिक तथ्यों की विशेषताएं (Characteristics of Social Facts) –

दुर्खीम की विवेचना के आधार पर हम देखते हैं कि दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों की धारणा को समझने के लिए दो शब्दों बाहरीपन (Exteriority) और बाध्यता (Constraint) का सहारा लिया गया है। इन दोनों को सामाजिक तथ्यों की विशेषता के रूप में पेश किया जा सकता है।

1. बाहरीपन (Exteriority)-सामाजिक तथ्य की सबसे पहली और महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका बाहरीपन है। बाहरीपन का अर्थ है सामाजिक तत्त्वों का निर्माण लो समाज के सदस्यों के द्वारा ही होता है। परन्तु सामाजिक तथ्य एक बार विकसित होने के बाद फिर किसी व्यक्ति विशेष के नहीं रहते हैं और वह इस अर्थ में कि इसको एक स्वतन्त्र वास्तविकता के रूप में अनुभव किया जा सकता है अर्थात् विज्ञान का उसके साथ अन्दरूनी सम्बन्ध नहीं होता है और न ही सामाजिक तथ्यों का व्यक्ति विशेष पर कोई प्रभाव पड़ता है।

सामाजिक तथ्यों के बाहरीपन को स्पष्ट करने के लिए दुर्खीम ने इसको व्यक्तिगत चेतना,सामूहिक चेतना के अन्तर अथवा भेद के आधार पर स्पष्ट किया है। दुर्खीम ने व्यक्तिगत चेतना के स्वरूप और संगठन के अध्ययन से यह स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत चेतनाओं का मूल आधार भावनाएँ हैं। संवेदनाएं अलग-अलग सैलों की अंतर क्रियाओं का प्रतिफल है लेकिन अलग-अलग सैलों द्वारा पैदा होने वाली संवेदनाओं की अपनी खास विशेषता होती है, जो संगठन अथवा उत्पत्ति से पहले सोलां सैलों में से किसी में भी मौजूद नहीं थी। Synthesis and Suigeneris के इस सिद्धांत में दुर्खीम ने यह बताया है कि इकट्ठा होने से एक नई वस्तु का जन्म होता है। अर्थात् प्रसार और संयोग की क्रिया द्वारा तथ्य का रूप ही बदल जाता है। जैसे व्यक्तिगत विचारों का आधार स्नायुमंडल के अलग है। उसी प्रकार दुर्खीम कहते हैं कि सामाजिक विचारों का मूल आधार समाज के सदस्य होते हैं। सामूहिक चेतना का विकास व्यक्तिगत चेतना में मिलने से संगठन के विकास से होता है। इसी प्रकार दुर्खीम के शब्दों में, “यह व्यक्तिगत चेतना से बाहर रहने वाले विशेष तथ्यों को पेश करता है।”

एक उदाहरण से इसे और भी स्पष्ट किया जा सकता है। ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के एक निश्चित योग के साथ पानी बनता है। पानी की अपनी कुछ विशेषताएं हैं। ये विशेषताएं न ऑक्सीजन की हैं और न ही हाइड्रोजन की हैं। पानी को अलग करके फिर पुनः ऑक्सीजन और हाइड्रोजन को नहीं बनाया जा सकता। इस तरह व्यक्ति चेतनाओं के योग के साथ सामूहिक चेतना का निर्माण होता है। जो व्यक्तिगत तथ्यों से अलग अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है। अतः वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाहरी होती है।

2. विवशता (Constraint)-सामाजिक तथ्यों की दूसरी प्रमुख और महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी विवशता है। दूसरे शब्दों में व्यक्ति के ऊपर सामाजिक तथ्यों का एक दबाव या विवशता का एक प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः सामाजिक तथ्यों का निर्माण एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के द्वारा नहीं होता बल्कि अनेकों व्यक्तियों के द्वारा होता है। अतः ये बहुत शक्तिशाली होते हैं और किसी व्यक्ति के ऊपर इस विवशता के कारण प्रभाव पड़ता है।

दुर्खीम का मानना है कि सामाजिक तथ्य केवल व्यक्ति के व्यवहार को नहीं बल्कि उसके सोचने, विचार करने इत्यादि के तरीकों को भी प्रभावित करते हैं। दुर्खीम बताते हैं कि इन सामाजिक तथ्यों की यह विशेषता इस रूप में देख सकते हैं कि ये सामाजिक तथ्य व्यक्ति की अनुभूति के अनुरूप नहीं, बल्कि व्यक्ति का व्यवहार उनके
अनुरूप होता है।

दुर्खीम सामाजिक तथ्यों की इस विशेषता के विवेचन में अनेक उदाहरण पेश करते हैं। आपके अनुसार समाज में प्रचलित अनेक सामाजिक तथ्य जैसे कि नैतिक नियम, धार्मिक विश्वास, वित्तीय व्यवस्था, आदि सभी मनुष्य के व्यवहार और तरीकों को प्रभावित करते हैं। स्वयं दुर्खीम लिखते हैं कि यदि यह दबाव इन तथ्यों की अन्दरूनी विशेषताएं होती हैं और इसका सबूत यह है कि जब मैं इनका विरोध करने की कोशिश करता हूं तो यह और भी अधिक दबाव डाल देते हैं। वह आगे लिखते हैं” यदि मैं समाज के नियमों को नहीं मानता हूं तो जिस हंसी का पात्र मुझे बनाया जाता है और जिस तरह मुझे समाज से अलग रखा जाता है, और यह असली अर्थों में एक प्रकार के दण्ड या सज़ा की तरह प्रभाव डालने वाला होता है। यद्यपि ये विवशता तथा दबाव अप्रत्यक्ष होते हुए भी प्रभावकारी होते हैं।”

विवशता की एक और उदाहरण में दुर्खीम इसको स्पष्ट करते हैं, “मेरे लिए यह जरूरी नहीं कि मैं अपने देशवासियों से फ्रांसीसी अथवा किसी और भाषा में ही बात करूँ और प्रचलित मुद्रा का प्रयोग करूँ, लेकिन ये सब इससे विपरीत कार्य करना मेरे लिए संभव नहीं होगा। एक उद्योगपति के रूप में मैं बीत गई सदियों की तकनीकी विधियों को अपनाने में पूरी तरह स्वतन्त्र हैं लेकिन ऐसा करने से मैं अपने आपकी बरबादी को बुलावा दूंगा। लेकिन अगर मैं ज़रूरी तथ्यों से बचने की कोशिश करूंगा तो पूरी तरह असफल रह जाऊंगा। अगर मैं इन नियमों से अपने आप को स्वतन्त्र कर लेता हूँ तो सफलता से उनका विरोध करता हूँ तो भी मुझे हमेशा इनसे संघर्ष करने के लिए मज़बूर किया जाता है, और अंत में वह अपने बदले द्वारा अपने दबाव का अनुभव हमें करा देते हैं।”

दुर्खीम कहते हैं कि “कभी-कभी इस विवशता को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते। वह समाजीकरण की एक उदाहरण दे कर इसको स्पष्ट करते हैं कि जीवन के आरम्भिक काल में हमें बच्चे को खाने, पीने, व सोने के लिए विवश करते हैं। हम उसे सफ़ाई, शान्ति और कहना मानने के लिए भी विवश करते हैं। बाद में हम उसे दूसरों के प्रति उचित भाव, प्रथा, रीति रिवाजों, प्रति सम्मान करना और काम करने की आवश्यकता आदि के बारे में सिखाते हैं। विवशता अनुभव न होने के कारण यह होता है कि धीरे-धीरे यह विवशता आदतों में तबदील हो जाती है।”

सामूहिक चेतना व्यक्तिगत चेतना से उत्तम रूप है क्योंकि सामूहिक चेतना व्यक्तिगत चेतनाओं के अस्तित्व से विशेषताओं की संगठित (मिली-जुली) हुई चेतना है। दुर्खीम लिखते है, “एक सामाजिक तथ्य ‘विश्व दबाव’ की शक्ति से पहचाना जाता है जो कि व्यक्ति पर प्रयोग किया जाता है अथवा व्यक्ति पर प्रयोग करने योग्य हो।” दुर्खीम के अनुसार सामाजिक तथ्य ‘सामूहिक चेतना’ की श्रेणी में आते है इसीलिए यह चेतनाओं की चेतना है।

3. व्यापकता (Generality)—यह समाज विशेष में सांझे और आदि अंत तक फैले होते हैं। लेकिन यह विलक्षण विशेषता नहीं हो तो और न ही व्यापकता अनेकों व्यक्तिगत तथ्यों के केवल जोड़फल मात्र का परिणाम नहीं होते बल्कि यह तो शुद्ध रूप में अपने स्वभाव से ही सामूहिक होते हैं और व्यक्तियों पर इनका प्रभाव इनकी सामूहिक विशेषता का ही नतीजा है। इसीलिए इसको सामाजिक तथ्यों की तीसरी विशेषता कहा जाता है।
दुर्खीम के ऊपर लिखे सामाजिक तथ्यों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक तथ्यों की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएं होती हैं।

  1. सामाजिक तथ्य व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र अपना अलग स्वतन्त्र अस्तित्व रखते हैं। अर्थ यह कि व्यक्ति से अलग होते हैं।
  2. सामाजिक तथ्यों का व्यक्ति पर एक मज़बूरी का प्रभाव पड़ता है अर्थात् यह व्यक्ति पर दबाव डालने की शक्ति से भरे होते हैं।

ऊपर दी गई विवेचना के आधार पर दुर्खीम ने अपने पहले अध्याय की अंतिम लाईनों में सामाजिक तथ्य को पेश करते हुए लिखा है कि, “एक सामाजिक तथ्य काम करने का वह तरीका है, जो चाहे निश्चित हो अथवा नहीं, जो कि व्यक्ति पर बाहरी दबाव डालने की शक्ति रखता है अथवा काम करने का वह हर तरीका जो एक दिए हुए समाज में सभी तरफ सामान्य है और साथ ही व्यक्तिगत विचारों से स्वतन्त्र उसकी अपनी अलग स्थिति बनी रहती संक्षेप में दुर्खीम के अनुसार सामाजिक तथ्य कार्य करने का वह तरीका है, जो व्यक्तियों से बाहर है तथा व्यक्ति पर दबाव डालने की शक्ति रखता है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

प्रश्न 6.
दुर्खीम के श्रम विभाजन के सिद्धान्त की व्याख्या करो और इसके उत्तरदायक कारकों का स्पष्टीकरण करो।
अथवा
दुर्खीम के श्रम विभाजन के सिद्धान्त की विवेचना करो।
उत्तर-
दुर्खीम ने 1893 में फ्रैंच भाषा में अपनी पहली किताब De la Division du Trovail social के नाम से प्रकाशित की। चाहे यह दुर्खीम का पहला ग्रन्थ था पर उसकी प्रसिद्धि की यह एक आधार-शिला थी। इसी ग्रन्थ पर दुर्खीम को 1893 में पैरिस विश्वविद्यालय में डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई थी। इस महान् ग्रन्थ में दुर्खीम ने सामाजिक श्रम विभाजन का प्रत्यक्ष सिद्धान्त पेश किया है। दुर्खीम की यह किताब तीन भागों में बांटी हुई है हर भाग में दुर्खीम ने श्रम विभाजन के भिन्न-भिन्न पक्षों की विवेचना की है। ये तीन खण्ड हैं-

  1. श्रम विभाजन के प्रकार्य (The functions of Division of Labour)
  2. कारण व दशाएं (Causes and Conditions)
  3. श्रम विभाजन के असाधारण स्वरूप (Abnormal forms of Division of Labour)

दुर्खीम ने अपनी किताब के पहले भाग ‘श्रम विभाजन के प्रकार्य’ में श्रम विभाजन को सामाजिक एकता (Social solidarity) का आधार सिद्ध करने की कोशिश की है। साथ ही उसके वैज्ञानिक अध्ययन की नज़र से कानूनों के स्वरूप, एकता के रूप, मानवीय सम्बन्धों के स्वरूप, अपराध, दण्ड, सामाजिक विकास आदि अनेकों मुश्किलों व धारणाओं की व्याख्या पेश की है। दूसरे हिस्से में श्रम विभाजन के कारणों व परिणामों का विस्तृत विश्लेषण पेश किया है। तीसरे खण्ड में दुर्खीम ने श्रम विभाजन के असाधारण स्वरूपों की विवेचना दी है।
अब हम दुर्खीम के पहले दोनों भागों की विवेचना की मदद से सामाजिक श्रम-विभाजन के सिद्धान्त की विवेचना करेंगे।

श्रम विभाजन के प्रकार्य (Functions of Division of Labour) –

दुर्खीम प्रत्येक सामाजिक तथ्य को एक नैतिक तथ्य के रूप में स्वीकार करते हैं। कोई भी सामाजिक प्रतिमान नैतिक आधार पर ही सुरक्षित रहता है। एक कार्यवादी के रूप में सबसे पहले दुीम ने श्रम विभाजन के कार्य की खोज की है। दुर्खीम ने सबसे पहले ‘प्रकार्य’ शब्द का अर्थ स्पष्ट किया है प्रकार्य के उन्होंने दो अर्थ बताए हैं।

(1) प्रकार्य का मतलब गति व्यवस्था से है अर्थात् क्रिया से है।
क्रिया के द्वारा पूरी होने वाली ज़रूरत से है।

दुर्खीम ‘प्रकार्य’ का प्रयोग दूसरे शब्दों में करते हैं इस प्रकार श्रम विभाजन के प्रकार्य से उनका अर्थ यह है कि श्रम विभाजन की प्रक्रिया समाज के अस्तित्व के लिए कौन-सी मौलिक ज़रूरत को पूरा करती है। प्रकार्य तो वह है जिसकी अनावश्यकता में उसके तत्त्वों की मौलिक ज़रूरत की पूर्ति नहीं हो सकती।

आमतौर से यह कहा जाता है कि श्रम विभाजन का प्रकार्य सभ्यता का विकास करना है क्योंकि यह स्पष्ट सच है कि श्रम विभाजन के विकास के साथ-साथ विशेषीकरण के नतीजे के तौर पर समाज में सभ्यता बढ़ती है। श्रम विभाजन के परिणाम के तौर पर उत्पादन शक्ति में बढ़ावा होता है, भौतिक व बौधिक विकास होता है व साधारण जीवन में सुख के उपभोग व ज्ञान का प्रसार होता है इसलिए आमतौर पर श्रम विभाजन को सभ्यता का स्रोत कहा जाता है।

मुश्किलों व धारणाओं की व्याख्या पेश की है। दूसरे हिस्से में श्रम विभाजन के कारणों व परिणामों का विस्तृत विश्लेषण पेश किया है। तीसरे खण्ड में दुर्थीम ने श्रम विभाजन के असाधारण स्वरूपों की विवेचना दी है।
अब हम दुर्थीम के पहले दोनों भागों की विवेचना की मदद से सामाजिक श्रम-विभाजन के सिद्धान्त की विवेचना करेंगे।

श्रम विभाजन के प्रकार्य
(Functions of Division of Labour)
दुर्थीम प्रत्येक सामाजिक तथ्य को एक नैतिक तथ्य के रूप में स्वीकार करते हैं। कोई भी सामाजिक प्रतिमान नैतिक आधार पर ही सुरक्षित रहता है। एक कार्यवादी के रूप में सबसे पहले दुीम ने श्रम विभाजन के कार्य की खोज की है। दुर्थीम ने सबसे पहले ‘प्रकार्य’ शब्द का अर्थ स्पष्ट किया है प्रकार्य के उन्होंने दो अर्थ बताए हैं।

  1. प्रकार्य का मतलब गति व्यवस्था से है अर्थात् क्रिया से है।
  2. प्रकार्य का दूसरा अर्थ इस क्रिया या गति और उसके अनुरूप ज़रूरतों के आपसी सम्बन्धों से है अर्थात् क्रिया के द्वारा पूरी होने वाली ज़रूरत से है।

दुर्थीम ‘प्रकार्य’ का प्रयोग दूसरे शब्दों में करते हैं इस प्रकार श्रम विभाजन के प्रकार्य से उनका अर्थ यह है कि श्रम विभाजन की प्रक्रिया समाज के अस्तित्व के लिए कौन-सी मौलिक ज़रूरत को पूरा करती है। प्रकार्य तो वह है जिसकी अनावश्यकता में उसके तत्त्वों की मौलिक ज़रूरत की पूर्ति नहीं हो सकती।

आमतौर से यह कहा जाता है कि श्रम विभाजन का प्रकार्य सभ्यता का विकास करना है क्योंकि यह स्पष्ट सच है कि श्रम विभाजन के विकास के साथ-साथ विशेषीकरण के नतीजे के तौर पर समाज में सभ्यता बढ़ती है। श्रम विभाजन के परिणाम के तौर पर उत्पादन शक्ति में बढ़ावा होता है, भौतिक व बौधिक विकास होता है व साधारण जीवन में सुख के उपभोग व ज्ञान का प्रसार होता है इसलिए आमतौर पर श्रम विभाजन को सभ्यता का स्रोत कहा जाता है।

दुर्शीम ने विरोध किया है। उसने सभ्यता के विकास को श्रम विभाजन का प्रकार्य नहीं माना है। दुर्थीम के अनुसार स्रोत का काम नहीं है। सुखों में बढ़ोत्तरी या बौद्धिक व भौतिक विकास प्रकार्य विभाजन के परिणाम से उत्पन्न होते हैं। इसलिए यह इस प्रक्रिया के परिणाम हैं, काम नहीं। काम का अर्थ परिणाम नहीं होता।
सभ्यता के विकास में तीन प्रकार के विकास शामिल हैं और यह तीन प्रकार निम्नलिखित हैं-

  1. औद्योगिक अथवा आर्थिक पक्ष
  2. कलात्मक पक्ष
  3. वैज्ञानिक पक्ष।

दुर्शीम ने सभ्यता के इन तीनों ही पक्षों के विकास को नैतिक तत्त्वों से विहीन बताया है। उसके विचार में औद्योगिक, कलात्मक तथा वैज्ञानिक विकास के साथ-साथ समाजों में अपराध, आत्महत्या इत्यादि अनैतिक घटनाओं में बढ़ोत्तरी होती है। अंत दुर्थीम के श्रम विभाजन का कार्य सभ्यता का विकास नहीं है।

परन्तु दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन का प्रकार्य क्या है ? दुर्थीम के अनुसार नये समूहों का निर्माण व उनकी एकता ही श्रम विभाजन के काम हैं। दुर्थीम ने समाज के अस्तित्व से सम्बन्धित किसी नैतिक ज़रूरत को ही श्रम विभाजन के काम के रूप में खोजने की कोशिश की है। उसके विचार अनुसार समाज के सदस्यों की गणना व उनके आपसी सम्बन्धों में अधिकता होने से धीरे-धीरे श्रम विभाजन की प्रक्रिया का विकास हुआ है। इस प्रक्रिया में बहुत सारे नए-नए व्यावसायिक व सामाजिक समूहों का निर्माण हुआ। इन भिन्न-भिन्न समूहों की एकता का प्रश्न समाज के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। इनकी आपसी एकता की अनावश्यकता में सामाजिक व्यवस्था न सन्तुलन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए इन भिन्न-भिन्न समूहों में एकता एक नैतिक ज़रूरत है।

अनुसार स्रोत का काम नहीं है। सुखों में बढ़ोत्तरी या बौद्धिक व भौतिक विकास प्रकार्य विभाजन के परिणाम से उत्पन्न होते हैं। इसलिए यह इस प्रक्रिया के परिणाम हैं, काम नहीं। काम का अर्थ परिणाम नहीं होता।

सभ्यता के विकास में तीन प्रकार के विकास शामिल हैं और यह तीन प्रकार निम्नलिखित हैं-

  1. औद्योगिक अथवा आर्थिक पक्ष
  2. कलात्मक पक्ष
  3. वैज्ञानिक पक्ष।

दुर्खीम ने सभ्यता के इन तीनों ही पक्षों के विकास को नैतिक तत्त्वों से विहीन बताया है। उसके विचार में औद्योगिक, कलात्मक तथा वैज्ञानिक विकास के साथ-साथ समाजों में अपराध, आत्महत्या इत्यादि अनैतिक घटनाओं में बढ़ोत्तरी होती है। अंत दुर्खीम के श्रम विभाजन का कार्य सभ्यता का विकास नहीं है।

परन्तु दुर्खीम के अनुसार श्रम विभाजन का प्रकार्य क्या है ? दुर्खीम के अनुसार नये समूहों का निर्माण व उनकी एकता ही श्रम विभाजन के काम हैं। दुर्खीम ने समाज के अस्तित्व से सम्बन्धित किसी नैतिक ज़रूरत को ही श्रम विभाजन के काम के रूप में खोजने की कोशिश की है। उसके विचार अनुसार समाज के सदस्यों की गणना व उनके आपसी सम्बन्धों में अधिकता होने से धीरे-धीरे श्रम विभाजन की प्रक्रिया का विकास हुआ है। इस प्रक्रिया में बहुत सारे नए-नए व्यावसायिक व सामाजिक समूहों का निर्माण हुआ। इन भिन्न-भिन्न समूहों की एकता का प्रश्न समाज के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। इनकी आपसी एकता की अनावश्यकता में सामाजिक व्यवस्था न सन्तुलन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए इन भिन्न-भिन्न समूहों में एकता एक नैतिक ज़रूरत है।

दुर्खीम के अनुसार समाज की इसी ज़रूरत की पूर्ति श्रम-विभाजन की ओर से की जाती है। जहां एक ओर श्रम विभाजन से नए सामाजिक समूहों का निर्माण होता है, वहां दूसरी ओर इन समूहों की आपसी एकता व सामूहिकता बनी रहती है।

अन्त दुीम के अनुसार श्रम विभाजन का काम समाज में एकता स्थापित करना है। श्रम-विभाजन मानवों की क्रियाओं की भिन्नता से सम्बन्धित है पर यह भिन्नता भी समाज की एकता का आधार है। इस सामाजिक तथ्य के बारे दुर्खीम ने तथ्यात्मक आधार पर बताया है। उन्होंने कहा कि आपसी आकर्षण के दो विरोधी आधार हो सकते हैं। हम उन व्यक्तियों के प्रति ही नज़दीकी अनुभव करते हैं जो हमारी तरह हैं व उनकी ओर ही खिंचे जा सकते हैं। जो हमसे भिन्न हैं पर पूरी तरह की भिन्नता एक-दूसरे को अपनी ओर नहीं खींचती। ईमानदार बेइमानों को व खर्चीले कंजूसों को पसन्द नहीं करते। केवल यह भिन्नता इन दोनों को एक दूसरे के नज़दीक लाती है जो एक दूसरे की पूरक हैं। एक दोस्त में कोई कमी होती है, व वही चीज़ दूसरे में होती है जिस कारण दोनों के सम्बन्ध बनते हैं व एक दूसरे की ओर खिंचे जाते हैं।

दुर्खीम कहते हैं श्रम-विभाजन का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह नहीं कि यह बांटे हुए काम से उत्पादन में बढ़ोत्तरी करता है बल्कि यह है कि यह उनको संगठित करता है। अतः दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन समूहों का निर्माण करता है व उनमें एकता पैदा करता है।

कानून और एकता (Law and Solidarity) -दुर्खीम ने श्रम-विभाजन का काम समाज में एकता पैदा करना बताया है। सामाजिक एकता एक नैतिक तथ्य है। दुर्खीम श्रम-विभाजन से पैदा सामाजिक एकता को स्पष्ट करने के लिए कानून का वर्गीकरण करते हैं। किसी कानून के वर्गीकरण के अनुरूप उन्होंने सामाजिक एकता के प्रकार निर्धारित करते हैं। दुर्जीम ने दो प्रकारों के कानूनों के बारे में बताया है वे हैं-

(a) दमनकारी कानून (Repressive Law)
(b) प्रतिकारी कानून (Restitutive Law)

(a) दमनकारी कानून (Repressive Law)-दमनकारी कानूनों को एक प्रकार से सार्वजनिक कानून (Public Law) कहा जा सकता है। दुर्खीम के अनुसार यह दो प्रकार के होते हैं

(i) दण्ड सम्बन्धी कानून (Penal Law)-जिनका सम्बन्ध कष्ट देने, हानि पहुंचाने, हत्या करने या स्वतन्त्रता न देने से है। इनको संगठित दमनकारी कानून (Organized Repressive Law) कहा जाता है।

(ii) व्याप्त कानून (Diffused Law)-कुछ दमनकारी कानून ऐसे होते हैं जो पूरे समूह में नैतिकता के आधार पर फैले होते हैं। इसलिए दुर्खीम इनको व्याप्त कानून कहते हैं। दुर्खीम के अनुसार दमनकारी कानून का सम्बन्ध आपराधिक कार्यों से होता है। यह कानून अपराध व दण्ड की व्याख्या करते हैं। यह कानून समाज के सामूहिक जीवन की मौलिक दशाओं का वर्णन करते हैं। प्रत्येक समाज के अपने मौलिक हालात होते हैं। इसलिए भिन्नभिन्न समाजों में दमनकारी कानून भिन्न-भिन्न होते हैं। इन दमनकारी कानूनों की शक्ति सामूहिक दमन में होती है व सामूहिक मन समानताओं से शक्ति प्राप्त करता है।

(b) प्रतिकारी कानून (Restitutive Law) कानून का दूसरा भाग प्रतिकारी कानून व्यवस्था है। यह कानून व्यक्तियों के सम्बन्धों में पैदा होने वाले असन्तुलन को साधारण स्थिति प्रदान करते हैं। इस वर्ग के अन्तर्गत दीवानी (civil) कानून, व्यापारिक कानून, संवैधानिक कानून, प्रशासनिक कानून आदि आ जाते हैं। इनका सम्बन्ध पूरे समाज के सामूहिक स्वरूप से न होकर व्यक्तियों से होता है। यह कानून समाज के सदस्यों के व्यक्तिगत सम्बन्धों से पैदा होने वाले असन्तुलन के द्वारा सन्तुलित व व्यवस्थित होते हैं। दुर्खीम कहते हैं कि प्रतिकारी कानून व्यक्तियों व समाज के कुछ बीच की संस्थाओं से जोड़ते हैं।

कानून के उपरोक्त दो प्रकार के आधार पर दुर्खीम के अनुसार दो भिन्न-भिन्न प्रकार की सामाजिक एकताओं (Social Solidarity) का निर्माण होता है। यह दो प्रकार समाज की दो भिन्न-भिन्न जीवन-शैलियों के परिणाम हैं। दमनकारी-कानून का सम्बन्ध व्यक्तियों की साधारण प्रवृत्ति से है, समानताओं से है, जबकि प्रतिकारी कानून का सम्बन्ध विभिन्नताओं से या श्रम-विभाजन से है। दमनकारी कानून के द्वारा जिस प्रकार की सामाजिक एकता बनती है उसको दुर्खीम यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity) कहते हैं। प्रतिकारी कानून आंगिक एकता (Organic Solidarity) के प्रतीक है जिसका आधार श्रम-विभाजन है। अतः दुर्खीम के अनुसार समाज में दो प्रकार की सामाजिक एकता मिलती है।

(i) यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity)-दुर्खीम के अनुसार यान्त्रिक एकता समाज की दण्ड संहिता में अर्थात् दमनकारी कानूनों के कारण होती है। समूह के सदस्यों में मिलने वाली समानताएं इस एकता का आधार हैं। जिस समाज के सदस्यों में समानताओं से भरपूर जीवन होता है, जहां विचारों, विश्वासों, कार्यों व जीवन इकाई के रूप में सोचता व क्रिया करता है, वह यान्त्रिक एकता दिखाता है अर्थात् उसके सदस्य मशीन के औज़ार भिन्न पुों की तरह संगठित रहते हैं। दुर्खीम ने अपराधी कार्यों के दमनकारी एकता कानून व यान्त्रिक एकता की अनुरूपता का माध्यम बताया है।

(ii) आंगिक एकता (Organic Solidarity)-दुर्खीम के अनुसार दूसरी एकता आंगिक एकता है। दमनकारी कानून की शक्ति सामूहिक चेतना में होती है। सामूहिक चेतना समानताओं से शक्ति प्राप्त करती है। आदिम समाज में दमनकारी कानूनों की प्रधानता होती है क्योंकि उनमें समानताएं सामाजिक जीवन का आधार हैं। दुर्खीम के अनुसार आधुनिक समाज श्रम-विभाजन व विशेषीकरण से प्रभावित है जिसमें समानता की जगह विभिन्नताएं प्रमुख हैं। सामूहिक जीवन को यह विभिन्नता व्यक्तिगत चेतना को प्रमुखता देती है।

आधुनिक समाज में व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से समूह से बंधा नहीं रहता। इस समाज में मानवों के आपसी सम्बन्धों का महत्त्व अधिक होता है। यही कारण है कि दुर्खीम ने आधुनिक समाजों में दमनकारी कानून की जगह प्रतिकारी कानून की प्रधानता बताई है। विभिन्नतापूर्ण जीवन में मानवों को एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक काम में विशेष योग्यता प्राप्त कर सकता है व बाकी सभी कामों के लिए उसके अन्य लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। समूह के सदस्यों को यह आपसी निर्भरता, उनकी व्यक्तिगत असमानता, उनके एक-दूसरे के नज़दीक आने के लिए मजबूर करती है जिसके आधार पर समाज में एकता की स्थापना होती है। इस एकता को दुर्खीम ने आंगिक एकता (Organic Solidarity) कहा है। यह प्रतिकारी कानून व्यवस्था में दिखाई देता है।

दुर्खीम के अनुसार यह एकता शारीरिक एकता के समान है। हाथ, पैर, नाक, कान, आँख आदि अपने-अपने विशेष कामों के आधार पर स्वतन्त्र अंगों के रूप में हाजिर रहते हैं पर उनके काम तो ही सम्भव हैं जब तक एकदूसरे से मिले (जुड़े) हुए हैं, हाथ शरीर से भिन्न होकर कोई काम नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में शरीर के भिन्नभिन्न अंगों में एकता तो है पर वह आपसी निर्भरता पर टिकी हुई है।

दुीम के अनुसार जनसंख्या के बढ़ने से समाज की ज़रूरतें भी बढ़ती जाती है। इन बढ़ती हुई ज़रुरतों को पूरा करने के लिए श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण हो जाता है। इसी कारण ही आधुनिक समाजों में आंगिक एकता दिखाई देती है। हम दुर्खीम के कानून, सामूहिक चेतना, एकता तथा समाजों को निम्न बने चित्र में से समझ सकते है। समाज को बनाए रखने के लिए सामाजिक एकता का होना बहुत ज़रूरी है। आदिम समाजों में समूह के सदस्यों में पूरी समानता होती है जिस कारण उनमें सामूहिक चेतना अधिक प्रबल होती है। वह एक-दूसरे पर कार्यात्मक दृष्टि से ही निर्भर नहीं होते बल्कि इतने जुड़े होते हैं कि उनमें हमेशा स्वाभाविक एकता बनी रहती है। यह एकता दुर्खीम के शब्दों में ठीक वैसी ही होती है जैसी कि किसी यन्त्र की एकता होती है। जिस प्रकार यन्त्र के किसी एक भाग को हिलाने से पूरा यन्त्र हरकत में आता है ठीक उसी प्रकार समानताओं पर आधारित इस एकता को दुर्खीम यान्त्रिक एकता कहते हैं।

दूसरी तरफ आधुनिक समाजों में विशेषीकरण बढ़ने से कार्यों का विभाजन हो गया है जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक विभिन्नताएं बढ़ गई है। इस श्रम विभाजन के नतीजे के कारण समूह के सभी एक-दूसरे पर निर्भर हो गए हैं। किसी प्राणी की शारीरिक एकता की तरह, सामाजिक एकता के भिन्न-भिन्न अंगों में कार्यात्मक से उत्पन्न ज़रूरी सहयोग इस पूरी एकता की क्रियाशीलता का आधार है। इसीलिए दुर्खीम श्रम विभाजन से उत्पन्न जो एकता समाज को मिलती है उसे आंगिक एकता कहते हैं।

(iii) संविदात्मक एकता (Contractual Solildarity)-आंगिक व यान्त्रिक एकता के अध्ययन के बाद दुर्खीम ने एक और एकता के बारे में बताया है, जिसको उसने संविदात्मक एकता (Contractual Solidarity) या समझौते वाली एकता कहा है।

दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन की प्रक्रिया समझौते पर आधारित सम्बन्धों को जन्म देती है। समूह के लोग आपसी समझौते के आधार पर एक-दूसरे की सेवाओं को प्राप्त करते हैं व परस्पर सहयोग करते हैं। यह सच है कि आधुनिक समाजों में समझौतों के आधार पर लोगों में सहयोग व एकता स्थापित होती है पर श्रम-विभाजन का काम संविदात्मक एकता की उत्पत्ति करना ही नहीं है। दुर्खीम के विचार से संविदात्मक एकता एक व्यक्तिगत तथ्य है चाहे यह समाज द्वारा ही चलती है।

कारण तथा दशाएं (Causes and Conditions)-दुर्खीम की पुस्तक The division of Labour in Society का दूसरा भाग श्रम विभाजन के कारणों, दशाओं तथा परिणामों से सम्बन्धित है। दुर्खीम श्रम विभाजन के कारणों तथा दिशाओं की व्याख्या पेश करते हुए लिखते हैं कि श्रम विभाजन के विकास के प्रेरक तथा सुख में बढ़ौत्तरी की इच्छा अथवा ‘आनन्द प्राप्ति’ नहीं है क्योंकि सुख में व्यक्तिगत तथ्य मौजूद हैं तथा सुख की इच्छा मनोवैज्ञोनिक का विषय है। समाजशास्त्रीय विवेचना का नहीं चाहे श्रम विभाजन को दुर्खीम ने सामाजिक तथ्य माना है।

श्रम-विभाजन के कारण (Causes of Division of Labour)-दुीम ने श्रम-विभाजन की व्याख्या समाजशास्त्रीय आधार पर की है। उसने श्रम विभाजन के कारणों की खोज सामाजिक जीवन की दशाओं व उनसे पैदा सामाजिक ज़रूरतों से की है। इस नज़र से उसने श्रम-विभाजन के कारणों को दो भागों में बांटा है। पहला है प्राथमिक कारक व दूसरा है द्वितीय कारक। प्राथमिक कारक के रूप में दुर्खीम ने जनसंख्या में बढ़ोत्तरी व उससे उत्पन्न परिणामों को माना है। जबकिं द्वितीय कारकों को वह दो भागों में रखता है। वह है आम चेतना की बढ़ती हुई अस्पष्टता व पैतृकता का घटता हुआ प्रभाव।

अब हम इनके कारकों की विस्तार से व्याख्या करेंगे-

(i) जनसंख्या के आकार व घनत्व में बढ़ोत्तरी (Increase in Density and size of Population)दुर्खीम के अनुसार जनसंख्या के आकार व घनत्व में बढ़ोत्तरी ही श्रम-विभाजन का केन्द्रीय व प्राथमिक कारक है। दुर्खीम के अनुसार, “श्रम-विभाजन समाज में जटिलता व घनत्व के साथ सीधे अनुपात में रहता है व यदि सामाजिक विकास के दौरान यह लगातार बढ़ता है तो इसका कारण यह है कि समाज लगातार अधिक घनत्व व अधिक जटिल हो जाते हैं।” दुर्खीम के अनुसार जनसंख्या में बढ़ोत्तरी के दो पक्ष हैं-जनसंख्या के आकार में अधिकता व जनसंख्या के घनत्व में अधिकता। यह दोनों पक्ष श्रम-विभाजन को जन्म देते हैं। जनसंख्या में बढ़ोत्तरी होने से सरल समाज समाप्त हो जाते हैं और मिश्रित समाज बनने लग जाते हैं। जनसंख्या विशेष केन्द्रों पर एकत्र होने लगती है। जनसंख्या के घनत्व को भी दुर्खीम ने दो भागों में बांटा है-

(a) भौतिक घनत्व (Material Density)-शारीरिक नज़र से लोगों का एक ही स्थान पर एकत्र होना घनत्व है।
(b) नैतिक घनत्व (Moral Density)-भौतिक घनत्व के परिणाम से लोगों के आपसी सम्बन्ध बढ़ते हैं जिससे उनकी क्रियाओं व प्रतिक्रियाओं में बढ़ोत्तरी होती है। इन आपसी सम्बन्धों व अन्तर क्रियाओं में बढ़ोत्तरी से उत्पन्न जटिलता को दुर्खीम ने नैतिक घनत्व कहा है।

(ii) सामूहिक चेतना का कम होना या पतन-दुर्खीम ने श्रम-विभाजन को द्वितीय कारकों के बारे में बताया है। इसमें उसने सामूहिक चेतना के पतन को सबसे पहले रखा है। समानताओं पर आधारित समाज में सामूहिक चेतना प्रबल या ताकतवर होती है जिस कारण समूह के सदस्य व्यक्तिगत भावनाओं से प्रेरित होते हैं। सामूहिक भावना ही उनको रास्ता दिखाती है। दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन तब ही सम्भव है जब सामूहिक दृष्टिकोण की जगह व्यक्तिगत दृष्टिकोण का विकास हो जाए व व्यक्तिगत चेतना सामूहिक चेतना को नष्ट कर दे। अतः दुर्खीम के अनुसार, “चेतना निश्चित व मज़बूत होगी इसके विपरीत यह उतनी ही अधिक तेज़ होगी, जितना व्यक्ति अपने व्यक्तिगत वातावरण से समझौता करने में असमर्थ होगा।

(iii) पैतृकता व श्रम-विभाजन-दुीम ने द्वितीय कारक के दूसरे प्रकार को पैतृकता के घटते प्रभाव को कारण माना है। चाहे दुर्खीम ने सामाजिक घटनाओं की व्याख्या के लिए सामाजिक कारकों को ही प्राथमिकता दी है पर श्रम-विभाजन के विकास में पैतृकता का प्रभाव जितना अधिक होता है परिवर्तन के मौके उतने ही कम होते हैं।

अन्य शब्दों में श्रम विभाजन के विकास के लिए यह ज़रूरी है कि पैतृक गुणों को महत्त्व न दिया जाए। श्रम विभाजन का विकास तभी सम्भव है जब लोगों में प्रकृति तथा स्वभाव में भिन्नता हो, पैतृकता से प्राप्त योग्यताओं के आधार पर व्यक्तियों का वर्गीकरण करके उनको विशेष जातियों से सम्बन्धित करके, उनके पूर्वजों तथा अतीत से कठोरता से बांध देने की प्रक्रिया के फलस्वरूप यह होता है कि हम अपनी विशेष रुचिओं का विकास नहीं कर सकते तथा परिवर्तन नहीं कर सकते। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पैतृकता के आधार पर कार्यों का विभाजन भी श्रम विभाजन में रुकावट है। दुर्खीम के अनुसार समय की गति तथा सामाजिक विकास के साथ लगातार होने वाले परिवर्तन पैतृकता में लचकीला पन पैदा करते हैं अर्थात् पैतृकता के गुण कमजोर होने लग जाते हैं। परिणामस्वरूप व्यक्तियों की विभिन्नताएं विकसित हो जाती है तथा श्रम विभाजन में बढ़ोत्तरी होती है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि दुर्खीम ने जनसंख्या में बढ़ोत्तरी, सामूहिक चेतना का पतन तथा पैतृकता के घटते प्रभाव को श्रम विभाजन का कारक माना है।

श्रम-विभाजन के परिणाम (Consequences of Division of Labour)-श्रम-विभाजन के प्राथमिक व द्वितीय कारणों के पश्चात् दुर्खीम इसके विकास के परिणामस्वरूप होने वाले परिणामों पर रोशनी डालते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि ‘कार्य’ व ‘परिणाम’ दो भिन्न-भिन्न शब्द हैं। ऐसे बहत से तथ्य जो आम आदमी की नज़र से श्रम-विभाजन से कार्य दिखाई देते हैं। वह सच्चाई में उसके परिणाम है। दुर्खीम ने श्रम-विभाजन के बहुत सारे परिणामों की ओर हमारा ध्यान केन्द्रित किया है। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं

1. कार्यात्मक स्वतन्त्रता व विशेषीकरण-दुर्खीम ने शारीरिक श्रम-विभाजन व सामाजिक श्रम-विभाजन में अन्तर बताया है व सामाजिक श्रम-विभाजन के परिणाम बताए हैं। दुीम के अनुसार श्रम-विभाजन का एक परिणाम यह होता है कि जैसे ही काम अधिक बांटा जाता है उसी प्रकार काम करने की स्वतन्त्रता व गतिशीलता में बढ़ोत्तरी होती है। श्रम-विभाजन के कारण मानव अपनी कुछ विशेष योग्यताओं को विशेष काम में लगा देता है। दुीम के अनुसार श्रम-विभाजन के विकास का एक परिणाम यह भी होता है कि व्यक्तियों के काम उनके शारीरिक लक्षणों से स्वतन्त्र हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में मानव की संरचनात्मक विशेषताएं उनकी कार्यात्मक प्रवृत्तियों को अधिक प्रभावित नहीं करतीं।

2. सभ्यता का विकास-दुर्खीम ने शुरू में ही यह स्पष्ट किया है कि सभ्यता का विकास करना श्रम-विभाजन का काम नहीं है क्योंकि श्रम-विभाजन एक नैतिक तथ्य है व सभ्यता के तीन अंग, औद्योगिक या आर्थिक, कलात्मक व वैज्ञानिक विकास नैतिक विकास से सम्बन्ध नहीं रखते।

दुर्खीम ने श्रम-विभाजन के परिणाम के रूप में सभ्यता के विकास की व्याख्या की है। आपका कहना था कि जनसंख्या के आकार व घनता में अधिकता होने के साथ सभ्यता का विकास भी ज़रूरी हो जाता है। श्रम-विभाजन व सभ्यता दोनों साथ-साथ प्रगति करते हैं। परन्तु श्रम-विभाजन का विकास पहले होता है व उसके परिणामस्वरूप सभ्यता विकसित होती है। इसलिए दुर्खीम का मानना है कि सभ्यता न तो श्रम-विभाजन का लक्ष्य है व न ही उसका कार्य है बल्कि एक ज़रूरी परिणाम है।

3. सामाजिक प्रगति-प्रगति परिवर्तन का परिणाम है। श्रम-विभाजन भी परिवर्तन को जन्म देता है। परिवर्तन समाज में एक निरन्तर प्रक्रिया है। इसलिए प्रगति भी समाज में निरन्तर होती रहती है। दुर्खीम के अनुसार इस परिवर्तन का मुख्य कारण श्रम-विभाजन है। श्रम-विभाजन के कारण परिवर्तन होता है व परिवर्तन के कारण प्रगति होती है। इस तरह सामाजिक प्रगति श्रम-विभाजन का एक परिणाम है। दुर्खीम के विचार से प्रगति का प्रमुख कारक समाज है। हम इसलिए बदल जाते हैं क्योंकि समाज बदल जाता है। प्रगति तो रुक ही सकती है जब समाज रुक जाए पर वैज्ञानिक नज़र से यह सम्भव नहीं है। इसलिए दुर्खीम के अनुसार प्रगति भी सामाजिक जीवन का परिणाम है।

4. सामाजिक परिवर्तन व व्यक्तिगत परिवर्तन-दुर्खीम ने सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या श्रम-विभाजन के आधार पर की है। व्यक्तियों में होने वाले परिवर्तन समाज में होने वाले परिवर्तन का परिणाम हैं। दुर्खीम का मानना है कि समाज में होने वाले परिवर्तन मूल कारक हैं। जनसंख्या के आकार, वितरण व घनत्व में होने वाला परिवर्तन है जो मानवों में श्रम-विभाजन कर देता है व सारे व्यक्तिगत परिवर्तन इसी सामाजिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप होते हैं।

5. नवीन समूहों की उत्पत्ति व अन्तर्निर्भरता-दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन का एक परिणाम यह होता है कि विशेष कार्यों में लगे व्यक्तियों के विशेष हितों का विकास हो जाता है। इस प्रकार जितना अधिक श्रमविभाजन होता है उतनी ही अधिक अन्तर्निर्भरता बढ़ती है। अन्तर्निर्भरता सहयोग को जन्म देती है। इसलिए श्रमविभाजन सहयोग की प्रक्रिया को सामाजिक जीवन के लिए ज़रूरी बना देता है।

6. व्यक्तिवादी विचारधारा-दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन के परिणामस्वरूप व्यक्तिगत चेतना बढ़ती है। सामूहिक चेतना का नियन्त्रण कम हो जाता है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता व विशेषता व्यक्तिवादी विचारधारा को जन्म देती है। इस तरह श्रम-विभाजन के परिणामस्वरूप व्यक्तिवादी विचारधारा को बल मिलता है।

7. प्रतिकारी कानून व नैतिक दबाव-दुर्खीम के अनुसार श्रम-विभाजन कानूनी व्यवस्था में ही बदलाव कर देता है। श्रम-विभाजन के परिणामस्वरूप आपसी सम्बन्धों का विस्तार होता है व जटिलता व कार्यात्मक सम्बन्धों के कारण व्यक्तिगत समझौते का महत्त्व कम हो जाता है। मानवों के संविदात्मक या समझौते वाले सम्बन्धों को सन्तुलित करने के लिए प्रतिकारी या सहकारी कानूनों का विकास हो जाता है। श्रम-विभाजन जहां एक ओर व्यक्तिवाद को प्रोत्साहन देता है, वहां दूसरी ओर यह व्यक्तियों में विशेष आचरण से सम्बन्धित व सामूहिक कल्याण से सम्बन्धित नैतिक जागरूकता का भी निर्माण करता है। दुर्खीम के विचार से व्यक्तिवाद मानवों की इच्छा पर फल नहीं बल्कि श्रम-विभाजन से उत्पन्न सामाजिक परिस्थिति का आवश्यक परिणाम है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 12 पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक

पश्चिमी समाजशास्त्री विचारक PSEB 11th Class Sociology Notes

  • 19वीं तथा 20वीं शताब्दी के दौरान यूरोप के समाज में बहुत से परिवर्तन आए तथा यह कहा जाता है कि इन परिवर्तनों के अध्ययन के लिए ही समाजशास्त्र का जन्म हुआ।
  • 17वीं, 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में बहुत से विचारकों ने पुस्तकें लिखीं जिन्होंने समाजशास्त्र के उद्भव में काफ़ी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया तथा इनमें मान्टेस्कयू (Montesquieu), रूसो (Rousseau) इत्यादि प्रमुख
  • अगस्ते कोंत, जोकि एक फ्रांसीसी दार्शनिक थे, को समाजशास्त्र का पितामह माना जाता है। उसने अपनी पुस्तक ‘The Course on Postitive Philosophy’ लिखी जिसमें उन्होंने 1839 में पहली बार शब्द Sociology का प्रयोग किया तथा इसे समाजशास्त्र का नाम दिया।
  • कोंत ने सकारात्मकवाद का सिद्धांत दिया तथा कहा कि सामाजिक घटनाओं को भी वैज्ञानिक व्याख्या से समझा जा सकता है तथा सकारात्मकवाद वह विधि है। इस प्रकार सकारात्मकवाद प्रेक्षण, तजुर्बे, तुलना तथा ऐतिहासिक विधि की एक व्यवस्थित कार्य प्रणाली है जिससे समाज का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सकता है।
  • कोंत ने अलग-अलग समाजों का अध्ययन किया तथा कहा कि वर्तमान अवस्था में पहुँचने के लिए समाज को तीन पड़ावों से गुजरना पड़ता है तथा वह पड़ाव हैं-आध्यात्मिक पड़ाव, अधिभौतिक पड़ाव तथा सकारात्मक पड़ाव। यह ही कोंत का तीन पड़ावों का सिद्धांत है।
  • कार्ल मार्क्स एक जर्मन दार्शनिक थे जिन्हें संसार में उनके वर्ग तथा वर्ग संघर्ष पर दिए विचारों के लिए जाना जाता है। समाजवाद तथा साम्यवाद की धारणा भी मार्क्स ने ही दी है।
  • मार्क्स के अनुसार शुरू से लेकर अब तक का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। सभी समाजों में दो प्रकार के वर्ग होते हैं। प्रथम है पूँजीपति वर्ग जिसके पास उत्पादन के सभी साधन मौजूद हैं तथा दूसरा है मज़दूर वर्ग जिसके पास अपना श्रम बेचने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। दोनों के बीच अधिक प्राप्त करने के लिए संघर्ष चलता रहता है तथा इसको ही वर्ग संघर्ष कहते हैं।
  • इमाईल दुर्थीम भी समाजशास्त्र के संस्थापकों में से एक है। उन्होंने समाजशास्त्र को एक विज्ञापन के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। वह समाजशास्त्र के प्रथम प्रोफेसर भी थे।
  • वैसे तो समाजशास्त्र को दुर्थीम का काफ़ी योगदान है परन्तु उनके कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धांत हैं-सामाजिक तथ्य का सिद्धांत, आत्महत्या का सिद्धांत, श्रम विभाजन का सिद्धांत, धर्म का सिद्धांत इत्यादि।
  • दुर्थीम के अनुसार श्रम विभाजन का सिद्धांत हमारे समाज में प्राचीन समय से ही मौजूद है। श्रम विभाजन के कारण ही समाज की प्रवृत्ति निश्चित होती है तथा इसमें मौजूद कानूनों की प्रकृति भी निश्चित होती है।
  • मैक्स वैबर भी एक प्रमुख समाजशास्त्री थे। मार्क्स की तरह वह भी जर्मनी के दाशनिक थे। उन्होंने भी समाजशास्त्र को बहत से सिद्धांत दिए जिनमें से प्रमुख हैं-सामजिक क्रिया का सिद्धांत, सत्ता तथा उसके प्रकार, प्रोटैस्टैंट एथिक्स तथा पूँजीवाद की आत्मा इत्यादि।
  • वर्ग (Class)–लोगों का समूह जिनके उत्पादन के साधन समान होते हैं।
  • सत्ता (Authority)-शक्ति का वह विशेष रूप जिसे सामाजिक व्यवस्था के नियमों, परिमापों का समर्थन प्राप्त होता है तथा साधारणतया इसे उन सभी की तरफ से वैध माना जाता है जो इसमें भाग लेते हैं।
  • सामाजिक क्रिया (Social Action)—वह क्रिया जिसमें अन्य व्यक्तियों की क्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं को सामने रखा जाता है। इसे सामाजिक उस समय कहा जाता है जब क्रिया करने वाला व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के व्यवहारों को सामने रखता है।
  • वर्ग चेतना (Class Consciousness)-एक वर्ग के सदस्यों के बीच अपने समूह के साधारण हितों की चेतना की मौजूदगी।
  • वर्ग संघर्ष (Class Struggle)-पूँजीपति तथा मजदूर वर्ग के बीच हमेशा हितों का संघर्ष होता है। यह हितों का संघर्ष दोनों वर्ग के बीच संघर्ष का कारण बनता है। जब लोगों में वर्ग चेतना बढ़ जाती है तो वर्ग संघर्ष भी बढ़ जाता है।
  • सकारात्मवाद (Positivism)-सकारात्मकवाद में माना जाता है कि समाज कुछ नियमों के अनुसार कार्य करता है जिन्हें ढूंढ़ा जा सकता है।
  • यान्त्रिक एकता (Mechanical Solidarity)-समानताओं पर आधारित समाजों के सदस्यों के बीच एकता की एकता को यान्त्रिक एकता कहते हैं।
  • सावयवी एकता (Organic Solidarity)-कई समाजों में लोगों के बीच अंतर होते हैं जिस कारण वह एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। इन समाजों में लोगों के बीच मौजूद एकता को सावयवी एकता कहते हैं।

PSEB 8th Class Home Science Practical सलाद और सूप

Punjab State Board PSEB 8th Class Home Science Book Solutions Practical सलाद और सूप Notes.

PSEB 8th Class Home Science Practical सलाद और सूप

हरी सब्जियों का सलाद

सामग्री-

  1. बन्दगोभी – 1 छोटा फूल
  2. शिमला मिर्च — 1
  3. पालक के पत्ते — थोड़े-से
  4. टमाटर — 2
  5. राई का पाउडर — \(\frac{1}{4}\) चम्मच
  6. काली मिर्च — स्वादानुसार
  7. नमक — स्वादानुसार
  8. सिरका — 2 बड़े चम्मच
  9. लहसुन — 2 तुरिया

विधि—जिस शीशे के डोंगे में सलाद परोसना हो उसको धोकर, पोंछकर साफ़ कर लें। सब्जियों को धोकर, पोंछकर सलाद बनाने तक फ्रिज में रखें। डोंगे में लहसुन की पिसी हुई तुरियों को रखकर फिर बन्दगोभी को हाथों से तोड़कर डालें। उस पर नमक, काली मिर्च, राई का पाऊडर और सिरका डाल दें और सबसे ऊपर कटी हुई शिमला मिर्च और टमाटर रख दें। परोसने से पहले ठंडा करें और काँटे से हिला लें।

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कुछ अन्य प्रकार के सलाद

उबली हुई सब्जियों का सलाद

सामग्री

  1. बन्दगोभी — 250 ग्राम
  2. गाजर — 250 ग्राम
  3. मटर — 100 ग्राम
  4. फ्रांसबीन — कुछ फलियाँ
  5. चुकन्दर — 1
  6. अण्डे — 2
  7. आलू — 2
  8. सिरका — 2 चम्मच
  9. नमक, काली मिर्च — इच्छानुसार

विधि—सभी सब्जियों को धोकर हल्का-सा उबाल लें। आलू को उबालकर छील लें। चुकन्दर रंग छोड़ता है; इसलिए उसे अलग से उबालें। अब इन सब्जियों के छोटे-छोटे टुकड़े करके उसमें नमक, काली मिर्च व सिरका मिला दें। अण्डों को अच्छी तरह उबालकर उनके छिलके उतार लें। सब्जियों को प्लेट में सजाकर ऊपर से अण्डे के गोल-गोल टुकड़े सजाएँ।

दाल और सब्जियों का मिश्रित सलाद

सामग्री—

  1. राजमाह — 50 ग्राम
  2. काबुली चने — 50 ग्राम
  3. आलू — 100 ग्राम
  4. खीरा — 100 ग्राम
  5. हरा धनिया — थोड़ा-सा
  6. हरी मिर्च — 1-2
  7. प्याज — 1 छोटा
  8. नमक, काली मिर्च — स्वाद के अनुसार
  9. नींबू — 1 बड़ा

विधि—राजमाह और चने साफ़ करके भिगो दें। भीगे हुए चने और राजमाह उबाल लें। आलू भी उबाल लें। आलू को छीलकर काट लें। खीरे को छीलकर छोटे-छोटे टुकड़े कर लें। सबको मिलाकर, बारीक कटे हुए प्याज, हरा धनिया और हरी मिर्च भी डाल दें। अब इसमें नमक, काली मिर्च और नींबू मिलाकर परोसें।

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फलों के सलाद

सामग्री—

  1. केले — 1
  2. सन्तरा — 1
  3. सेब — 1
  4. नाशपाती — 1
  5. अमरूद — 2
  6. अन्नानास — दो गोल टुकड़े
  7. नींबू — 1
  8. चेरी — सजाने के लिए
  9. नमक, काली मिर्च — इच्छानुसार

विधि—सभी फलों को छीलकर, मनपसन्द गोल या लम्बे टुकड़ों में काट लें। चेरी को नहीं काटना चाहिए। प्लेट में अच्छी तरह से सजाकर नमक, काली मिर्च नींबू का रस डाल दें

सेब का खट्टा-मीठा सलाद

सामग्री—

  1. मीठे सेब — 1
  2. ककड़ी — 1
  3. बन्दगोभी — छोटी
  4. नींबू — 1
  5. टमाटर — 1
  6. चीनी — इच्छानुसार
  7. सन्तरा — 1
  8. नमक — इच्छानुसार
  9. हरी मिर्च — 2
  10. सलाद का पत्ता — 1
  11. प्याज — 1

विधि—सबसे पहले सब्जियों व फलों को अच्छी तरह से धो लें। सन्तरे को छीलकर तेज़ चाकू से बारीक-बारीक काट लें। सेब को छीलकर उसके भी छोटे-छोटे टुकड़े कर लें। बन्दगोभी व हरी मिर्च को बिल्कुल बारीक काट लें। फिर इन सब पर चीनी, नमक व नींबू का रस मिला लें। एक बड़ी प्लेट में सलाद व पत्ता बिछाकर इस मिश्रण को उस पर रखें। अब प्याज, ककड़ी व टमाटर को गोल-गोल काटकर उसके चारों ओर सजाएँ।

PSEB 8th Class Home Science Practical सलाद और सूप

टमाटर का सूप

सामग्री—

  1. टमाटर — 500 ग्राम
  2. प्याज — 1
  3. दालचीनी — 1 छोटा टुकड़ा
  4. नमक, काली मिर्च — आवश्यकतानुसार
  5. पानी — आवश्यकतानुसार
  6. कॉर्नफ्लोर — 2 चम्मच
  7. मक्खन — 1 छोटा चम्मच
  8. क्रीम — इच्छानुसार

विधि—टमाटर को धोकर टुकड़े कर लें। प्याज को बारीक काट लें। टमाटर, प्याज व दालचीनी को आवश्यकतानुसार पानी में धीमी आँच पर पकने के लिए रख दें। अच्छी तरह गल जाने पर छलनी से छान लें। कॉर्नफ्लोर को मक्खन में भून लें। अब कार्नफ्लोर के ऊपर टमाटर का सूप धीरे-धीरे डालते जायें और हिलाते जायें। इच्छानुसार नमक व काली मिर्च डालें। अब क्रीम डालकर गरम-गरम परोसें।
नोट-सूप को प्यालियों में डालकर ऊपर डबलरोटी के तले हुए टुकड़े डालकर परोसने से सूप की सुन्दरता और बढ़ जाती है।

पालक का सूप

सामग्री—

  1. पालक — 500 ग्राम
  2. प्याज — 1
  3. नमक, काली मिर्च — इच्छानुसार
  4. दालचीनी, लौंग — आवश्यकतानुसार
  5. कॉर्नफ्लोर — 2 चम्मच
  6. डबलरोटी — इच्छानुसार
  7. घी — तलने के लिए क्रीम
  8. क्रीम — इच्छानुसार

विधि—पालक को अच्छी तरह धोकर काट लें। प्याज भी बारीक काट लें। इसमें दालचीनी, लौंग व पानी डालकर पकाएँ। गल जाने पर छानकर रख लें। एक बर्तन में घी गर्म करें। उसमें कॉर्नफ्लोर और डबलरोटी के टुकड़े चौकोर करके तल लें। कॉर्नफ्लोर के ऊपर पालक का सूप डालें व हिलाते जायें। गर्म-गर्म सूप में इच्छानुसार नमक व काली मिर्च मिलाकर उसे डबलरोटी के टुकड़ों व क्रीम से सजाकर परोसें।

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गाजर का सूप

सामग्री—

  1. गाजर — \(\frac{1}{2}\) किलो
  2. दूध — 1 गिलास
  3. पानी — 2 गिलास
  4. काली मिर्च — \(\frac{1}{2}\) चम्मच
  5. जैफल पाउडर — \(\frac{1}{4}\) चम्मच
  6. सजावट के लिए धनिए या पुदीने के पत्ते नमक — स्वादानुसार

विधि—गाजरों को धोकर काट लें या कद्दूकस कर लें। इसमें पानी मिलाकर प्रेशरकुकर में 10 मिनट के लिए पकाएँ। ठंडा करके छान लें और दूध डालकर हल्की आँच पर 10 मिनट के लिए पकाएँ। अब इसे उबलने न दें। नमक, काली मिर्च और जैफल पाउडर मिलाकर प्याली में डालें और पुदीने या धनिए के पत्तों से सजाकर परोसें।

हरे मटर का सूप

सामग्री—

  1. हरे ताज़े छीले हुए मटर — 300 ग्राम
  2. मैदा — 2 चम्मच
  3. दूध — 2 प्याले
  4. मक्खन — 3 चम्मच
  5. पानी — 2 प्याले
  6. नमक और काली मिर्च — स्वादानुसार

विधि—इसको भी टमाटरों के सूप की तरह ही बनाया जा सकता है। सभी चीजों को अच्छी तरह मिक्सी में मिलाएँ। उबालने तथा गर्म करें और प्यालों में परोस दें।

PSEB 8th Class Home Science Practical सलाद और सूप

दाल का सूप बनाना

सामग्री—

  1. मूंग की धुली हुई दाल — 4 चम्मच
  2. गोभी — \(\frac{1}{2}\)फल
  3. आलू — 1
  4. शलगम — 1
  5. टमाटर — 1
  6. दूध — 1 प्याला
  7. पानी — 1 प्याला
  8. मक्खन — 1 चम्मच
  9. मैदा — 1 चम्मच

विधि—दाल को साफ़ करके कुछ देर के लिए भिगो दें। सब्जियों को काट लें। मक्खन को गर्म करके सब्जियों में डाल दें और साथ ही दाल, पानी, नमक और काली मिर्च डाल दें। जब गल जाए तो छलनी में छान लें। दूध में मैदा मिलाकर सूप में मिलाएं और उबालने तक पकाएँ और गर्म-गर्म पीने के लिए दें।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 1 भारत-एक परिचय

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 1 भारत-एक परिचय Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science Geography Chapter 1 भारत-एक परिचय

SST Guide for Class 10 PSEB भारत-एक परिचय Textbook Questions and Answers

I. निम्नलिखित प्रश्नों का एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दीजिए.

प्रश्न 1.
हमारे देश का आधुनिक नाम ‘इण्डिया’ कैसे पड़ा?
अथवा
भारत का आधुनिक नाम ‘इण्डिया’ किस धारणा पर आधारित है?
उत्तर-
हमारे देश का आधुनिक नाम सिन्धु नदी के नाम पर ‘इण्डिया’ पड़ा।

प्रश्न 2.
भारत की ग्लोब पर स्थिति का वर्णन करो।
उत्तर-
भारत एशिया महाद्वीप के दक्षिण में स्थित एक विशाल देश है।

प्रश्न 3.
हिन्द महासागर में भारत की स्थिति क्या है ?
उत्तर-
हिन्द महासागर में भारत की स्थिति केन्द्रीय है।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 1 भारत-एक परिचय

प्रश्न 4.
देश का क्षेत्रफल बताओ।
उत्तर-
भारत का क्षेत्रफल लगभग 32,87,263 वर्ग किलोमीटर है।

प्रश्न 5.
भारत की उत्तर-दक्षिणी तथा पूर्व-पश्चिमी दिशाओं में दूरस्थ बिन्दुओं के नाम एवं दूरी बताइए।
उत्तर-
कश्मीर से कन्याकुमारी तक क्रमश: 3214 किलोमीटर एवं अरुणाचल प्रदेश से कच्छ की खाड़ी तक 2933 किलोमीटर।

प्रश्न 6.
देश की समुद्र तटीय एवं थल सीमाओं की लम्बाई बताइए।
उत्तर-
भारत की स्थलीय सीमा की लम्बाई 15,200 किलोमीटर है जबकि इसकी तट रेखा की लम्बाई 6083 किलोमीटर है।

प्रश्न 7.
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का संसार में कौन-सा स्थान है?
उत्तर-
सातवां। प्रश्न 8. पंजाबी भाषाई राज्य के रूप में पंजाब की स्थापना कब हुई?

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 1 भारत-एक परिचय

प्रश्न 8.
पंजाबी भाषाई राज्य के रूप में पंजाब की स्थापना कब हुई?
अथवा
हमारे आधुनिक पंजाब राज्य का जन्म कब हुआ?
उत्तर-
1 नवम्बर, 1966 ई० को।

प्रश्न 9.
देश इस समय कितने राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में बंटा हुआ है?
उत्तर-
28 राज्य और 8 केन्द्र शासित प्रदेश ।

प्रश्न 10.
भारत में क्षेत्रफल व जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़े व छोटे राज्यों के नाम लिखो।
उत्तर-
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य राजस्थान और सबसे छोटा राज्य गोआ है। जनसंख्या की दृष्टि से उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा और सिक्किम सबसे छोटा राज्य है।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 1 भारत-एक परिचय

II. निम्नलिखित प्रश्नों का संक्षेप में उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
क्या भारत एक उप-महाद्वीप है?
उत्तर-
अपने विस्तार और स्थिति के कारण भारत को उप-महाद्वीप का दर्जा दिया जाता है। उप-महाद्वीप एक विशाल तथा स्वतन्त्र भू-भाग होता है जिसकी सीमाएं विभिन्न स्थलाकृतियों द्वारा बनाईजाती हैं। ये स्थलाकृतियां इसे अपने आस-पास के क्षेत्रों से अलग करती हैं। भारत के उत्तर में हिमालय के पार अगील (Agill), मुझतघ (Mugtgh), कुनलुन (Kunlun), कराकोरम, हिन्दुकुश आदि पर्वत श्रेणियां उसे एशिया के उत्तर-पश्चिमी भागों से अलग करती हैं।
दक्षिण में पाक जलडमरु मध्य तथा मन्नार की खाड़ी इसे श्रीलंका से अलग करते हैं। पूर्व में अराकान योमा इसे म्यनमार से अलग करते हैं । थार का मरुस्थल इसे पाकिस्तान के बहुत बड़े भाग से अलग करता है। इतना होने पर भी हम वर्तमान भारत को उपमहाद्वीप नहीं कह सकते। भारतीय उप-महाद्वीप का निर्माण अविभाजित भारत, नेपाल, भूटान तथा बांग्लादेश मिल कर करते हैं।

प्रश्न 2.
भारतीय संस्कृति में किस प्रकार की अनेकताएं मिलती हैं?
उत्तर-
भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों में अलग-अलग धर्मों तथा जातियों के लोग रहते हैं। परिणामस्वरूप उनमें भाषा, वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान सम्बन्धी विभिन्नताएं पाई जाती हैं। उनके लोकगीत, मेले, त्योहार तथा रीतिरिवाज भी अलग-अलग हैं। यहां 187 भाषाएं प्रचलित हैं। देश के 97% भाग में केवल 23 भाषाएं बोली जाती हैं। संविधान में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग लोक नृत्य विकसित हुए। सच तो यह है कि हमारे देश के लगभग हर क्षेत्र में विभिन्नताएं पाई जाती हैं।

प्रश्न 3.
भारत के स्थानीय विस्तार पर नोट लिखें।
उत्तर-
भारत 8° 4′ 16” से 37° 17′ 53′ उत्तरी अक्षांशों के बीच तथा 68° 7′ 33″ से 97° 24′ 47” पूर्वी देशान्तरों के मध्य फैला हुआ है। कर्क रेखा इस देश के मध्य से गुजरती है। उत्तरी भारत का क्षेत्रफल दक्षिणी भारत से दो गुणा है। देश की कश्मीर से कन्याकुमारी तक की लम्बाई 3214 किलोमीटर तथा अरुणाचल प्रदेश से कच्छ की रण क्षेत्र तक की लम्बाई 2933 किलोमीटर है। इस विस्तार का अनुमान यूं भी लगाया जा सकता है कि जब अरुणाचल प्रदेश में दिन निकल रहा होता है तो गुजरात में रात्रि का आखिरी पहर चल रहा होता है।

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प्रश्न 4.
भारतीय भाषाओं तथा लोक कलाओं की देश की एकता व एकरूपता को क्या देन है?
उत्तर-
भारतीय भाषाओं तथा कलाओं ने इस देश की एकता में विशेष रंग भरा है। संस्कृत को ही लीजिए। इस देश में वेद तथा अन्य प्राचीन ग्रन्थ इसी भाषा में लिखे गए। राजस्थान से लेकर मणिपुर तक वेदों के प्रचार का श्रेय संस्कृत भाषा को ही जाता है। संस्कृत भाषा के मेल से ही उर्दू का जन्म हुआ और उसे मध्यकाल में दिल्ली के शासकों द्वारा मान्यता प्राप्त हुई। आज अंग्रेजी देश की सम्पर्क भाषा है और हिन्दी राष्ट्र भाषा है। पूरे देश में लोक कला अर्थात् लोकगीत समान भाव व्यक्त करते हैं। वीर रस ने ललित कलाओं को प्रभावित किया। इसी तरह भारतीय फिल्मों ने भारतीय संस्कृति को एकता प्रदान की।

प्रश्न 5.
भारत की क्षेत्रीय विभिन्नता किन्हीं दो तथ्यों के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर-
भारत की विशालता के कारण देश में बहुत अधिक क्षेत्रीय विभिन्नताएं पाई जाती हैं। इन्हें जन्म देने वाले दो तथ्यों का वर्णन इस प्रकार है —

विशाल क्षेत्र-भारत का पूर्व-पश्चिमी तथा उत्तर-दक्षिणी विस्तार अधिक होने के कारण यहां अधिक विभिन्नताएँ पैदा हो गई। प्रकृति के रूपों तथा मानवीय तत्त्वों में ये विभिन्नताएं साफ़ नज़र आती हैं। अपने विशाल भौगोलिक क्षेत्र के कारण भारत को उप महाद्वीप का दर्जा प्राप्त है।
धरातल-इस देश में जहां अरावली जैसे प्राचीन पर्वत हैं, वहां हिमालय जैसे युवा पर्वत भी स्थित हैं। इसके दक्षिण में कठोर तथा प्राचीन चट्टानों से निर्मित प्रायद्वीपीय पठार है। इसी प्रकार हिमालय तथा प्रायद्वीपीय पठार के मध्य विशाल उपजाऊ मैदान पाये जाते हैं।

प्रश्न 6.
भारत की अनेकता में एकता को दो तथ्यों से स्पष्ट करें।
उत्तर-
निम्नलिखित दो तथ्यों के आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत की विभिन्नताओं में एकता पाई जाती है —
(1) भारत के धरातलीय स्वरूप में बड़ी विभिन्नता है। यदि देश के उत्तर में हिमालय पर्वत है, तो दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार है। उत्तर में विशाल मैदान इस विभिन्नता को गहरा करते हैं। इन विभिन्नताओं के बावजूद मानसून पवनें देश को एकता प्रदान करती हैं। देश की अधिकतर वर्षा इन्हीं पवनों द्वारा होती है।
(2) भारत में 187 भाषाएं बोली जाती हैं। देश के 97 प्रतिशत भाग में 22 भाषाओं का अधिक महत्त्व है। इतना होने पर भी संस्कृत भाषा ने समस्त भारत के लोगों को एक सूत्र में पिरोया है। अंग्रेज़ी ने सम्पर्क भाषा के रूप में तथा हिन्दी ने राजभाषा के रूप में देश को एकता प्रदान की है।

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प्रश्न 7.
देश की प्राकृतिक विभिन्नता ने सांस्कृतिक विभिन्नता पैदा करने में क्या योगदान दिया है?
उत्तर-
भारत एक विशाल देश है। विशालता के कारण इस देश में अनेक प्राकृतिक विभिन्नताएं पाई जाती हैं। पहाड़ी प्रदेशों के लोग ऊनी वस्त्र पहनते हैं और उनका रहन-सहन भी अपनी प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुकूल है। प्रायद्वीपीय पठार के लोगों को कठोर परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। उनके कृषि उद्यम देश के अन्य भागों से भिन्न हैं। उनका खान-पान तथा पहरावा भी वहां की जलवायु के अनुकूल है। इसी तरह मैदानी भागों में लोगों ने कम परिश्रम से अधिक लाभ कमाया और अपने जीवन-स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयास किया।

प्रश्न 8.
“जब अरुणाचल प्रदेश में सूर्य उदय हो रहा होता है, तो गुजरात में अभी रात्रि होती है।” कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
अरुणाचल से गुजरात की दूरी 2933 किलोमीटर है। वास्तव में अरुणाचल से लेकर गुजरात में स्थित रण ऑफ़ कच्छ (Rann of Kutch) के मध्य 29° 12′ का देशान्तरीय अन्तर है। प्रति देशान्तर रेखा के चार मिनट का अन्तर आ जाता है। इस प्रकार दोनों स्थानों के समय में लगभग दो घण्टे का अन्तर पड़ जाता है। पूर्व में स्थित होने के कारण अरुणाचल प्रदेश का स्थानीय समय पश्चिम में स्थित गुजरात के स्थानीय समय से आगे रहता है। इसलिए जब अरुणाचल में सूर्य निकलता है, उस समय गुजरात में अभी रात होती है।

III. निम्नलिखित प्रश्नों का विस्तृत उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
देश के नामकरण के बारे में विस्तार से लिखें। इसके आकार एवं राजनैतिक व्यवस्था के बारे में भी बताइए।
उत्तर-
नाम-प्राचीन लेखों के अनुसार युगों-युगों से भारत के नाम में बदलाव आता रहा। एक धारणा के अनुसार इस का सब से पहला नाम ‘हिमाचल-शेत्-प्रयत्तम’ था। इस नाम के अनुसार इसका सम्बन्ध इस प्रदेश से था, जो हिमाचल एवम् रामेश्वरम् के बीच स्थित है।
आर्यों के आगमन से इस देश का नाम ‘आर्यवर्त’ पड़ा। ऋग्वेद के अनुसार भरत (दुष्यन्त का पुत्र) नामक राजा के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।
भारत का आधुनिक नाम ‘इण्डिया’ सिन्धु नदी से पड़ा। आर्यों ने उत्तर-पश्चिम में बहने वाली अति विशाल नदी का नाम सिन्धु रखा। सिन्धु शब्द से ही ‘हिन्दू’ शब्द का प्रचलन हुआ। जो लोग सिन्धु नदी के आस-पास रहते थे, ईरानियों ने उन्हें हिन्दू कह कर पुकारा। यूनानियों ने हिन्दू शब्द को ‘इंडोस’ में बदल दिया। रोमन लोगों ने इसी शब्द के आधार पर सिन्धु नदी को ‘इंडस’ कह कर पुकारा और इसी शब्द से ‘इण्डिया’ शब्द का प्रचलन हुआ। हिन्दू से हिन्दुस्तान बना और भरत से भारत। आज हमारे देश को इन तीनों नामों से पुकारा जाता है।
आकार-इसका आकार (त्रिभुजाकार) है। इसके एक ओर अरब सागर है तथा दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी। यह देश उत्तर में अधिक चौड़ा है। दक्षिण में जाते हुए इस का आकार छोटा होता जाता है। अन्ततः कन्याकुमारी पर यह एक बिन्दु के समान है।
राजनीतिक व्यवस्था अथवा प्रशासनिक बांट-भारत राज्यों का एक संघ है। प्रशासनिक रूप से भारत में 28 राज्य और 8 केन्द्र शासित प्रदेश हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (N.C.T.) दिल्ली भी भारत की प्रशासनिक इकाई है।
सच तो यह है कि हर रूप में भारत की अपनी एक अलग विशेषता है।

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प्रश्न 2.
देश की भौगोलिक स्थिति का देश की सुरक्षा, जलवायु, व्यापार एवं संस्कृति पर क्या प्रभाव है?
उत्तर-
भारत एशिया महादीप के दक्षिण में फैला हुआ एक विशाल देश है। हिन्द महासागर के शीर्ष पर स्थित होने के कारण इसे केन्द्रीय स्थिति प्राप्त है। आओ देखें, कि भारत की स्थिति का देश की सुरक्षा, जलवायु, व्यापार तथा संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ा है-..

सुरक्षा-भारत ने अपनी लम्बी तट रेखा की सुरक्षा के लिए एक शक्तिशाली नौ-सेना का गठन किया हुआ है। इसलिए दक्षिण में इसकी सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं। उत्तर की पर्वतीय अथवा स्थल सीमाओं की सुरक्षा के लिए स्थल तथा वायु सेना का गठन किया गया है। हमने जहां एक ओर उत्तर में पड़ोसी देशों के आक्रमणों को विफल किया तो दूसरी ओर श्रीलंका की आतंकवाद से तथा मालदीव की समुद्री लुटेरों से रक्षा की है।
जलवायु-हिमालय तथा हिन्द महासागर के बीच में स्थित होने के कारण भारत को मानसून पवनों का वरदान मिला है। भारत के अधिकांश भाग में ग्रीष्म काल में वर्षा होती है जबकि दक्षिण पूर्वी भागों में शीतकाल में वर्षा होती है।
व्यापार-हिन्द महासागर से निकलने वाले सभी मार्ग भारत से होकर जाते हैं। ये मार्ग भारत को एक ओर यूरोप तथा अमेरिका के देशों से जोड़ते हैं तो दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी एशिया तथा सुदूर पूर्व से मिलाते हैं।
संस्कृति-भारत के उत्तर-पश्चिमी देशों से आर्य, यूनानी, तुर्क, मुग़ल आदि अनेक विदेशी जातियां यहां आईं और इस देश में बस गईं। इन विभिन्न भाषा-भाषी जातियों ने भारत के लोगों से मेल-जोल बढ़ाया और भारतीय सभ्यता को नवीन रंगों से रंगा। इस आपसी मेल मिलाप से भारत के लोगों की वेश-भूषा, रहन-सहन तथा खान-पान में अनेक बदलाव आए।
सच तो यह है कि भारत अपनी स्थिति के कारण विश्व में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

प्रश्न 3.
“भारत एक विविधताओं वाला देश है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
भारत अपनी विशालता के कारण विभिन्नताओं का देश है। देश में पाई जाने वाली विभिन्नताओं का वर्णन इस प्रकार है —

धरातलीय विभिन्नता-भारत में एक ओर हिमालय पर्वत है तो दूसरी ओर प्रायद्वीपीय पठार हैं। इसमें जहां सतलुज, गंगा, ब्रह्मपुत्र का उपजाऊ मैदान है, वहीं थार का मरुस्थल भी है। हिमालय नवीन (युवा) पर्वत है, जबकि राजस्थान में फैला अरावली पर्वत प्राचीनतम है।
जलवायु सम्बन्धी विभिन्नता-कर्क रेखा (Tropic of Cancer) भारत के मध्य से गुज़रती है। परिणामस्वरूप इसके उत्तरी भाग में शीतोष्ण प्रकार की जलवायु पाई जाती है। समुद्र से दूर होने के कारण उत्तरी भागों में विषम जलवायु पाई जाती है जबकि विषुवत् रेखा के समीप होने के कारण दक्षिणी भागों में ऊष्ण जलवायु पाई जाती है। भारत के पूर्व में अत्यधिक वर्षा होती है जबकि पश्चिम में थार के मरुस्थल में बहत कम वर्षा होती है।
जातीय विभिन्नता-उत्तर-पूर्वी भारत में मध्य एशिया से आई मंगोल जाति के लोग रहते हैं जबकि उत्तर-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में तिब्बती लोग रहते हैं। पश्चिमी मैदानी भागों में आर्य तथा मुसलमान आकर बस गए। इसी तरह दक्षिण में द्राविड़ जाति के लोग निवास करते हैं और तमिलनाडु में श्रीलंका से आए तमिल जाति के लोग रहते हैं।
सांस्कृतिक विभिन्नता-देश के विभिन्न भागों में जातीय विभिन्नता होने के कारण लोगों की भाषा, रहन-सहन, खान-पान, घरों की बनावट, लोकगीत, लोक नृत्य, मेलों, त्योहारों तथा रीति-रिवाजों में अन्तर देखने को मिलता है। इस देश में 187 भाषाएं बोली जाती हैं।
सच तो यह है कि अन्य विभिन्नताओं के अतिरिक्त लोगों के कृषि करने के ढंग में भी अन्तर है और उनके जीवन स्तर में भी।

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प्रश्न 4.
देश में वर्तमान विविधताओं को कौन-कौन से तत्त्व प्रभावित करते हैं?
उत्तर-
भारत की क्षेत्रीय विभिन्नता को निम्नलिखित तत्त्व प्रभावित करते हैं

विशालता-भारत एक विशाल देश है। उत्तर से दक्षिण में इसकी लम्बाई 3214 कि० मी० तथा पूर्व से पश्चिम तक की लम्बाई 2933 कि० मी० है। इतने विशाल देश में समान धरातलीय स्वरूप होना असम्भव है। वास्तविकता यह है कि यहां के विभिन्न क्षेत्र अनेक बातों में आपस में मेल नहीं खाते।
धरातल-भारत का धरातल एक समान नहीं है। यहां पर्वत, पठार और मैदान आदि सभी स्थल रूप में पाये जाते हैं। इस देश में तंग घाटियां भी हैं और विशाल मरुस्थल भी हैं।
जलवायु-भारत में समान रूप से वर्षा नहीं होती। इस देश में ऐसे स्थान भी हैं जहां संसार में सबसे अधिक वर्षा होती है और ऐसे मरुस्थलीय प्रदेश भी हैं जहां नाममात्र की वर्षा होती है। देश के उत्तर में विषम जलवायु पाई जाती है, जबकि प्रायद्वीपीय भारत में गर्म तथा तटीय प्रकार की जलवायु मिलती है।
प्रवास-भारत में अलग-अलग दिशाओं तथा अलग-अलग प्रदेशों से लोग आकर अलग-अलग क्षेत्रों में बस गए। उत्तर-पूर्व में मंगोल जाति, उत्तर-पश्चिम में आर्य तथा मुसलमान जातियां तथा दक्षिण भारत में द्राविड़ जाति के लोग आकर बस गए।
संस्कृति-देश के विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग जातियों के लोग निवास करते हैं। उनकी भाषा, वेश-भूषा, खान-पान, रहन-सहन, लोकगीत, लोक नृत्य, मेले तथा त्योहार अलग-अलग हैं।
सच तो यह है कि धरातल और संस्कृति मिलकर क्षेत्रीय विभिन्नता को जन्म देते हैं।

प्रश्न 5.
देश की ‘अनेकताओं में एकता’ बनाये रखने में कौन-कौन से तत्त्वों का योगदान है?
उत्तर-
भारत विभिन्नताओं का देश है। फिर भी हमारे समाज में एक विशिष्ट एकता दिखाई देती है। भारतीय समाज को एकता प्रदान करने वाले मुख्य तत्त्व निम्नलिखित हैं।

मानसूनी ऋतु-मानसून पवनें अधिकांश वर्षा ग्रीष्म ऋतु में करती हैं। इससे देश की कृषि भी प्रभावित होती है और अर्थव्यवस्था भी। मानसूनी पवनें पहाड़ी प्रदेशों में वर्षा द्वारा बिजली की आपूर्ति को विश्वसनीय बनाती हैं। इसी के कारण ग्रामीण जनसंख्या को रोज़ी मिलती है।
धार्मिक संस्कृति-धार्मिक संस्कृति के पक्ष में दो बातें हैं। एक तो यह कि धार्मिक स्थानों ने देश के लोगों को एक सूत्र में बांधा है। दूसरे, धार्मिक सन्तों ने अपने उपदेशों द्वारा भाईचारे की भावना पैदा की है। तिरूपति, जगन्नाथ पुरी, अमरनाथ, अजमेर, श्री हरमन्दर साहिब, श्री पटना साहिब, श्री हेमकुण्ट साहिब तथा अन्य तीर्थ स्थानों पर देश के सभी भागों से लोग आते हैं और पूजा करते हैं। सन्तों ने भी धार्मिक समन्वय पैदा करने का प्रयास किया है।
भाषा तथा कला-लगभग सारे उत्तरी भारत में वेदों का प्रचार संस्कृत भाषा में हुआ। इसी भाषा के मेल से मध्य युग में उर्दू का जन्म हुआ। आज अंग्रेजी सम्पर्क भाषा है और हिन्दी राजभाषा है। इन सब ने मिलकर एक-दूसरे को निकट से समझने का अवसर प्रदान किया है। इसी तरह लोक गीतों तथा लोक कलाओं ने भी लोगों को समान भावनाएं व्यक्त करने का अवसर जुटाया है।
यातायात तथा संचार के साधन-रेलों तथा सड़कों ने विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को समीप लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दूरदर्शन तथा समाचार-पत्रों जैसे संचार के साधनों ने भी लोगों को राष्ट्रीय सोच देकर राष्ट्रीय धारा से जोड़ दिया है।
प्रवास-गांवों के कई लोग शहरों में आकर बसने लगे हैं। इनमें जातीय विभिन्नता होते हुए भी वे एक-दूसरे को समझने लगे हैं और मिलजुल कर रहने लगे हैं। इस प्रकार वे एक-दूसरे के निकट आए हैं।
सच तो यह है कि प्राकृतिक और सांस्कृतिक तत्त्वों ने देश को एकता प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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IV. भारतीय उप महाद्वीप के मानचित्र पर निम्नलिखित को दिखायें:

भारत के पड़ोसी देश (अलग-अलग रंगों की मदद से)
भारत के साथ लगते समुद्री क्षेत्र एवं उनके नाम
भारत में विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के नाम एवं राजधानियों के नाम
रन-आफ-कच्छ, कन्याकुमारी तथा श्रीनगर
बंगलादेश के साथ लगते भारतीय राज्य एवं उनकी राजधानियाँ
न्यू मूर (New Moore) द्वीप, दीव, लक्षद्वीप, एवं इन्दिरा पाइन्ट ।
उत्तर-विद्यार्थी अध्यापक की सहायता से स्वयं करें।

PSEB 10th Class Social Science Guide भारत-एक परिचय Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

I. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
जनसंख्या के हिसाब से विश्व में किस देश को सबसे पहला स्थान प्राप्त है?
उत्तर-
चीन।

प्रश्न 2.
जनसंख्या की दृष्टि से भारत को विश्व में कौन-सा स्थान प्राप्त है?
उत्तर-
दूसरा।

प्रश्न 3.
क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में भारत का कौन-सा स्थान है?
उत्तर-
सातवां।

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प्रश्न 4.
भारत कितनी ओर से हिन्द महासागर से घिरा है?
उत्तर-
भारत तीन ओर से हिन्द महासागर से घिरा है।

प्रश्न 5.
भारत के किस राज्य में स्त्री साक्षरता दर सबसे अधिक है?
उत्तर-
केरल।

प्रश्न 6.
आर्य काल में भारत किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर-
आर्यवर्त।

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प्रश्न 7.
प्राचीन लेखों के अनुसार भारत का पहला नाम हिमाचल-शेतू प्रयत्तम था। इसका क्या अर्थ है?
उत्तर-
हिमाचल तथा रामेश्वरम् के बीच बसा देश।

प्रश्न 8.
भारत को कौन-सी रेखा दो समान भागों में बांटती है?
उत्तर-
कर्क रेखा।

प्रश्न 9.
भारत की उत्तरी सिरे (कश्मीर) से दक्षिणी सिरे (कन्याकुमारी) तक कितनी लंबाई है?
उत्तर-
3214 किलोमीटर।

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प्रश्न 10.
क्षेत्रफल की दृष्टि से संसार का सबसे बड़ा देश कौन-सा है?
उत्तर-
रूस।

प्रश्न 11.
पंजाब की राजधानी का नाम बताओ।
उत्तर-
चण्डीगढ़।

प्रश्न 12.
भारत में गणतंत्र की स्थापना कब हुई थी?
उत्तर-
26 जनवरी, 1950.

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प्रश्न 13.
भारत के कौन-से पर्वत विश्व के प्राचीनतम पर्वत है?
उत्तर-
अरावली।

प्रश्न 14.
दिल्ली के शासकों द्वारा मान्यता प्राप्त उर्दू भाषा किन दो भाषाओं का सम्मिश्रण थी?
उत्तर-
उर्दू भाषा फारसी तथा संस्कृत भाषाओं का सम्मिश्रण थी।

प्रश्न 15.
भारत के पश्चिम में स्थित विशाल मरुस्थल का नाम बताओ।
उत्तर-
थार मरुस्थल।

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प्रश्न 16.
भारत की आकृति कैसी है?
उत्तर-
त्रिभुजाकार।

प्रश्न 17.
देश में राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त भाषाएं कितनी हैं?
उत्तर-
22.

प्रश्न 18.
आज विश्व का सबसे बड़ा प्रजातन्त्र अथवा लोकतंत्र कौन-सा है?
उत्तर-
भारत।

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प्रश्न 19.
भारत में किस भाषा को राष्ट्र/राज-भाषा का स्थान प्राप्त है?
उत्तर-
हिन्दी।

प्रश्न 20.
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में जनसंख्या का घनत्व कितना था?
उत्तर-
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में जनसंख्या का घनत्व 382 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर था।

प्रश्न 21.
बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में भारत के कौन-कौन से टापू स्थित हैं?
उत्तर-
बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में क्रमश: अण्दमान-निकोबार तथा लक्षद्वीप नामक टापू स्थित हैं।

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प्रश्न 22.
भारत किस महाद्वीप में स्थित है?
उत्तर-
भारत एशिया महाद्वीप में स्थित है।

प्रश्न 23.
भारत के वे कौन-से तीन राज्य हैं जिनकी सीमा पाकिस्तान के साथ लगती है?
उत्तर-
जम्मू-कश्मीर (अब केंद्र शासित प्रदेश) पंजाब, राजस्थान तथा गुजरात राज्यों की सीमा पाकिस्तान से लगती है।

प्रश्न 24.
भारत के किन्हीं चार केन्द्रीय प्रदेशों के नाम लिखो।
उत्तर-
दिल्ली, चण्डीगढ़, पांडिचेरी तथा लक्षद्वीप भारत के केन्द्रीय प्रदेश हैं।

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प्रश्न 25.
भारत का पूर्व-पश्चिमी विस्तार कितना है?
उत्तर-
भारत का पूर्व-पश्चिमी विस्तार 2933 कि० मी० है।

प्रश्न 26.
भारत के किन्हीं दो प्रान्तों के नाम बताओ जिनकी सीमा दूसरे देशों के साथ लगती है।
उत्तर-
पंजाब, उत्तर प्रदेश।

प्रश्न 27.
भारत के पूर्वी तट पर स्थित चार राज्यों के नाम बताएं।
उत्तर-
भारत के पूर्वी तट पर स्थित चार राज्य हैं-तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा तथा पश्चिमी बंगाल।

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प्रश्न 28.
अरब सागर से लगते चार भारतीय राज्यों के नाम बताओ।
उत्तर-
अरब सागर के साथ लगते चार भारतीय राज्य-गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा केरल हैं।

प्रश्न 29.
बंगला देश की सीमा से लगते किन्हीं चार भारतीय राज्यों के नाम लिखो।
उत्तर-
बंगला देश की सीमा से लगते चार भारतीय राज्य पश्चिमी बंगाल, असम, मेघालय तथा मिज़ोरम हैं।

प्रश्न 30.
उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़ तथा झारखण्ड की राजधानियों के नाम बताओ।
उत्तर-
उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तथा झारखण्ड की राजधानी रांची है।

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. जनसंख्या के हिसाब से विश्व में चीन को ……………… स्थान प्राप्त है।
  2. भारत को ………….. रेखा दो समान भागों में बांटती है।
  3. क्षेत्रफल की दृष्टि से ………….. संसार का सबसे बड़ा देश है।
  4. भारत के ……………. पर्वत विश्व के प्राचीनतम पर्वत हैं।
  5. भारतीय संविधान में ……………… भाषा को राष्ट्र भाषा का स्थान प्राप्त है।
  6. …………. में संसार की सबसे अधिक वर्षा होती है।
  7. …………… उत्तराखण्ड की राजधानी है।
  8. पंजाब, राजस्थान और ………….. राज्य की सीमा पाकिस्तान से लगती है।
  9. ……………. छत्तीसगढ़ की राजधानी है।
  10. ………. पंजाब तथा हरियाणा की राजधानी है।

उत्तर-

  1. पहला,
  2. कर्क,
  3. रूस,
  4. अरावली,
  5. हिन्दी,
  6. चिरापूंजी,
  7. देहरादून,
  8. गुजरात,
  9. रायपुर,
  10. चण्डीगढ़।

III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जनसंख्या की दृष्टि से भारत को विश्व में स्थान प्राप्त है —
(A) पहला
(B) दूसरा
(C) तीसरा
(D) चौथा।
उत्तर-
(B) दूसरा

प्रश्न 2.
क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में भारत को स्थान प्राप्त है —
(A) पहला
(B) पांचवां
(C) नौवां
(D) सातवां।
उत्तर-
(D) सातवां।

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प्रश्न 3.
भारत के किस राज्य में स्त्री साक्षरता दर सबसे अधिक है?
(A) केरल
(B) बिहारं
(C) दिल्ली
(D) पंजाब।
उत्तर-
(A) केरल

प्रश्न 4.
भारत की उत्तरी सिरे (कश्मीर) से दक्षिणी सिरे (कन्याकुमारी) तक की लम्बाई है —
(A) 3041 किलोमीटर
(B) 3400 किलोमीटर
(C) 3214 किलोमीटर
(D) 3450 किलोमीटर।
उत्तर-
(C) 3214 किलोमीटर

प्रश्न 5.
भारत में लोकतंत्र/गणराज्य की स्थापना हुई —
(A) 26 जनवरी, 1947
(B) 26 जनवरी, 1950
(C) 15 अगस्त, 1947
(D) 30 जनवरी, 1950
उत्तर-
(B) 26 जनवरी, 1950

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प्रश्न 6.
भारत की आकृति कैसी है?
(A) चतुर्भुज
(B) आयाताकार
(C) त्रिभुजाकार
(D) अण्डाकार।
उत्तर-
(C) त्रिभुजाकार

प्रश्न 7.
देश में राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं —
(A) 13
(B) 20
(C) 18
(D) 22
उत्तर-
(D) 22

प्रश्न 8.
2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या का प्रति वर्ग कि० मि० घनत्व है —
(A) 382
(B) 324
(C) 362
(D) 392
उत्तर-
(A) 382

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IV. सत्य-असत्य कथन

प्रश्न
सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/ग़लत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं

  1. भारत एशिया महाद्वीप के उत्तर में फैला एक विशाल देश है।
  2. कर्क रेखा भारत को उत्तरी एवं दक्षिणी दो भागों में बांटती है।
  3. भारत की. आकृति त्रिभुजाकार है।
  4. भारत की स्थल सीमा को कुल 10 देशों की सीमाएं लगती है।
  5. चंडीगढ़ हरियाणा तथा पंजाब दोनों राज्यों की राजधानी है।

उत्तर-

  1. (✗),
  2. (✓),
  3. (✓),
  4. (✗),
  5. (✓).

V. उचित मिलान

  1. छत्तीसगढ़ – रूस
  2. जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा देश – रायपुर
  3. क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा देश देहरादून
  4. उत्तराखंड – चीन

उत्तर-

  1. छत्तीसगढ़-रायपुर,
  2. जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा देश-चीन
  3. क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा देश-रूस,
  4. उत्तराखंड-देहरादून।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भारत के आकार और विस्तार की मुख्य विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
भारत की पूर्व से पश्चिम तक लम्बाई 2933 कि. मी. तथा उत्तर से दक्षिण तक 3214 कि० मी० है। भारत का कुल क्षेत्रफल लगभग 32.8 लाख वर्ग कि० मी० है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत संसार का सातवां बड़ा देश है। बड़े देशों में यह रूस के सातवें तथा कनाडा के तीसरे भाग के बराबर है। कुल मिला कर भारत ने पृथ्वी के स्थल भाग का लगभग 2.2% भाग घेरा हुआ है।

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प्रश्न 2.
“भारत का अक्षांशीय और देशान्तरीय विस्तार लगभग 30° है, फिर भी भारत का उत्तर-दक्षिण विस्तार पूर्व-पश्चिम के विस्तार से अधिक है।” कारण बताइए।
उत्तर-
इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारत का उत्तर-दक्षिण अक्षांशीय विस्तार 30° है और इतना ही इसका पूर्वपश्चिम देशान्तरीय विस्तार है। परन्तु जब इस विस्तार को किलोमीटर में निकालते हैं तो यह दूरी बराबर नहीं आती। देश का पूर्व-पश्चिम विस्तार 2933 किलोमीटर और उत्तर-दक्षिण विस्तार 3214 किलोमीटर है। इसका कारण यह है कि देशान्तर रेखाएं अक्षांश रेखाओं की भान्ति एक-दूसरे के समानान्तर नहीं हैं। सभी देशान्तर रेखाएं ध्रुवों पर आकर आपस में मिल जाती हैं और जैसे-जैसे हम विषुवत् रेखा से दूर होते जाते हैं देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी घटती जाती है। परिणामस्वरूप भारत का पूर्व-पश्चिम विस्तार (किलोमीटरों में) कम होता जाता है।

प्रश्न 3.
भारत का देशान्तरीय विस्तार कितना है? इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर-
भारत का देशान्तरीय विस्तार 30° है। इसका सबसे बड़ा महत्त्व यह है कि इस देश में सूर्य उदय के समय में काफ़ी स्थानीय अन्तर पाया जाता है, अर्थात् देश के सभी भागों में सूर्य एक ही समय पर उदय नहीं होता। उदाहरण के लिए अरुणाचल प्रदेश और गुजरात क्रमश: भारत के पूर्व और पश्चिम में स्थित हैं। दोनों में 30° देशान्तर का अन्तर है। प्रत्येक देशान्तर के बीच चार मिनट के समय का अन्तर होता है। इस प्रकार अरुणाचल प्रदेश तथा गुजरात के समय में दो घण्टे का अन्तर आ जाता है।

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बड़े उत्तर वाला प्रश्न (Long Answer Type Question)

प्रश्न
प्रशासनिक दृष्टि से भारत को कितने भागों में बांटा गया है? एक तालिका की सहायता से इनकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
भारत को प्रशासनिक दृष्टि से दो मुख्य भागों में बांटा गया है —

1. राज्य 2. केन्द्र शासित क्षेत्र।
राज्यों की संख्या 28 और केन्द्र शासित क्षेत्रों की संख्या 8 है। इन राज्यों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों के नामों, उनकी राजधानियों तथा क्षेत्रफल की तालिका आगे दी गई है —

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Based upon Survey of India map with the permission of the Surveyor General of India. The responsibility for the correctness of internal details rests with the publisher: The territorial waters of India extend into the sea to a distance of twelve nautical miles measured from the appropriate base line. The interstate boundaries between Arunachal Pradesh, Assam and Meghalaya shown on this map are as interpreted from the NorthEastern Areas (Reorganisation) Act. 1971, but have yet to be verified. The external boundaries and coastlines of India agree with the Record/Master Copy certified by Survey of India.

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2. केन्द्रीय शासित क्षेत्र क्षेत्र
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PSEB 12th Class History Solutions Chapter 3 16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 3 16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 3 16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

राजनीतिक दशा (Political Condition)

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी के जन्म समय ( 16वीं शताब्दी के आरंभ में) पंजाब की राजनीतिक दशा का वर्णन करो।
(Describe the political condition of Punjab at the time (In the beginning of the 16th century) of Guru Nanak Dev Ji’s birth.)
अथवा
बाबर के पंजाब पर किए गए आक्रमणों की संक्षिप्त जानकारी देते हुए उसकी सफलता के कारण बताएँ।
(While describing briefly the invasions of Babur over Punjab, explain the causes of his success.)
अथवा
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक अवस्था का वर्णन करें।
(Describe the political condition of Punjab in the beginning of 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक दशा बहुत दयनीय थी। पंजाब षड्यंत्रों का अखाड़ा बना हुआ था। उस समय पंजाब दिल्ली सल्तनत के अधीन था। इस पर लोधी वंश के सुल्तानों का शासन था। 16वीं शताब्दी के आरंभ में राजनीतिक दशा का शाब्दिक चित्रण निम्नलिखित अनुसार है—
लोधियों के अधीन पंजाब (The Punjab under the Lodhis)

1. ततार खाँ लोधी (Tatar Khan Lodhi)-1469 ई० में दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोधी ने ततार खाँ लोधी को पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया। वह इस पद पर 1485 ई० तक रहा। उसने बहुत कठोरता पूर्वक पंजाब पर शासन किया। 1485 ई० में ततार खाँ लोधी ने सुल्तान बहलोल लोधी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। सुल्तान ने अपने शहज़ादे निज़ाम खाँ को ततार खाँ के विद्रोह का दमन करने के लिए भेजा। ततार खाँ निज़ाम खाँ से लड़ता हुआ मारा गया।

2. दौलत खाँ लोधी (Daulat Khan Lodhi)-दौलत खाँ लोधी ततार खाँ लोधी का पुत्र था। उसे 1500 ई० में नए सुल्तान सिकंदर लोधी ने पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया। वह सिकंदर लोधी के शासनकाल में तो पूर्ण रूप से वफ़ादार रहा परंतु सुल्तान इब्राहीम के शासनकाल में वह स्वतंत्र होने के स्वप्न देखने लगा। इस संबंध में उसने, आलम खाँ लोधी जो कि इब्राहीम का सौतेला भाई था, के साथ मिलकर षड्यंत्र करने आरंभ कर दिए थे। जब इन षड्यंत्रों के संबंध में इब्राहीम लोधी को ज्ञात हुआ, तो उसने दौलत खाँ के पुत्र दिलावर खाँ को बंदी बना लिया। शीघ्र ही दिलावर खाँ पुनः पंजाब पहुँचने में सफल हो गया। यहाँ पहुँचकर उसने अपने पिता दौलत खाँ को दिल्ली में उसके साथ किए गए दुर्व्यवहार के संबंध में बताया। दौलत खाँ लोधी ने इस अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया।

3. प्रजा की दशा (Condition of Subject)-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में प्रजा की दशा बहुत दयनीय थी। शासक वर्ग का प्रजा की ओर ध्यान ही नहीं था। सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट हो चुके थे। चारों ओर रिश्वत का बोलबाला था। हिंदुओं पर अत्याचार बहुत बढ़ गए थे। उन्हें तलवार की नोक पर बलपूर्वक इस्लाम धर्म में शामिल किया जाता था। संक्षिप्त में उस समय चारों ओर अत्याचार, छल-कपट और भ्रष्टाचार फैला हुआ था। गुरु नानक देव जी ने वार माझ में इस प्रकार लिखा है—

काल काति राजे कसाई धर्म पंख कर उडरिया॥
कूड़ अमावस सच्च चंद्रमा दीसै नाहि कह चढ़िया॥

बाबर के आक्रमण
(Invasions of Babur)
1519 ई० से 1526 ई० के मध्य पंजाब को अपने अधिकार में लेने के लिए एक त्रिकोणीय संघर्ष आरंभ हो गया। यह संघर्ष इब्राहीम लोधी, दौलत खाँ लोधी तथा बाबर के बीच आरंभ हुआ। इस संघर्ष में अंततः बाबर विजयी हुआ। बाबर का जन्म मध्य एशिया में स्थित फरगना की राजधानी, अंदीजान में 14 फरवरी, 1483 ई० को हुआ था। वह तैमूर वंश से संबंध रखता था। बाबर ने भारत पर अपने साम्राज्य के विस्तार, भारतीय धन लूटने तथा भारत में इस्लाम के प्रसार के उद्देश्य से आक्रमण किए।

1. बाबर के प्रथम दो आक्रमण (First Two Invasions of Babur)—बाबर ने 1519 ई० में पंजाब पर दो बार आक्रमण किए। क्योंकि ये आक्रमण पंजाब के सीमावर्ती इलाकों पर किए गए थे। इसलिए इनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है।

2. बाबर का तीसरा आक्रमण 1520 ई० (Third Invasion of Babur 1520 A.D.)-बाबर ने 1520 ई० में पंजाब पर तीसरी बार आक्रमण किया। इस आक्रमण के दौरान बाबर ने सैदपुर पर आक्रमण किया। बाबर ने बहुसंख्या में निर्दोष लोगों की हत्या कर दी और उन्हें बेरहमी से लूटा। हज़ारों लोगों को बंदी बना लिया गया। गुरु नानक देव जी जो इस समय सैदपुर में ही थे, ने बाबर के इस आक्रमण की तुलना पाप की बारात के साथ की है। उन्होंने बाबर के अत्याचारों का वर्णन ‘बाबर वाणी’ में इस प्रकार किया है
खुरासान खसमाना किया, हिंदुस्तान डराया॥
आपे दोस न देई कर्ता, जम करि मुगल चढ़ाया।
ऐती मार पई करलाणै, तैं की दर्द न आया॥
बाबर की सेनाओं ने गुरु नानक देव जी को भी बंदी बना लिया था। तत्पश्चात् जब बाबर को यह ज्ञात हुआ कि उसकी सेनाओं ने किसी संत-महापुरुष को बंदी बनाया है, तो उसने शीघ्र उनकी रिहाई का आदेश दिया।

3. बाबर का चौथा आक्रमण 1524 ई० (Fourth Invasion of Babur 1524 A.D.)—पंजाब के गवर्नर दौलत खाँ लोधी के निमंत्रण पर बाबर ने 1524 ई० में पंजाब पर चौथा आक्रमण किया। वह बिना किसी विशेष विरोध के लाहौर तक पहुँच गया था। लाहौर के पश्चात् उसने दौलत खाँ लोधी के सहयोग से दीपालपुर पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् बाबर ने समस्त जालंधर दोआब को अपने अधिकार में ले लिया। बाबर ने जालंधर दोआब तथा सुल्तानपुर के प्रदेशों का शासन दौलत खाँ को सौंपा। क्योंकि यह दौलत खाँ की उम्मीदों से बहुत कम था, इसलिए उसने बाबर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। बाबर ने उसे पराजित कर दिया तो वह शिवालिक की पहाड़ियों की ओर भाग गया। बाबर के काबुल लौटने के पश्चात् शीघ्र ही दौलत खाँ ने पुनः पंजाब पर अधिकार कर लिया।

4. बाबर का पाँचवाँ आक्रमण 1525-26 (Fifth Invasion of Babur 1525-26 A.D.)-बाबर ने दौलत खाँ को पाठ पढ़ाने के लिए नवंबर 1525 ई० में भारत पर पाँचवीं बार आक्रमण किया। बाबर के आगमन का समाचार पाकर दौलत खाँ ज़िला होशियारपुर में स्थित मलोट के दुर्ग में जाकर छुप गया। बाबर ने दुर्ग को घेरे में ले लिया। दौलत खाँ ने कुछ सामना करने के पश्चात् अपने शस्त्र फैंक दिए। इस प्रकार बाबर ने एक बार फिर समूचे पंजाब को अपने अधिकार में ले लिया। पंजाब की विजय से प्रोत्साहित होकर बाबर ने अपनी सेनाओं को दिल्ली की ओर बढ़ने का आदेश दिया। जब इब्राहीम लोधी को इस संबंध में समाचार मिला तो वह बाबर का सामना करने के लिए पंजाब की ओर चल पड़ा। 21 अप्रैल, 1526 ई० को दोनों सेनाओं के मध्य पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ। इस युद्ध में इब्राहीम लोधी पराजित हुआ। इस प्रकार भारत में लोधी वंश का अंत हो गया और मुग़ल वंश की स्थापना हुई।

5. बाबर की विजय के कारण (Causes of Babur’s Success)—बाबर की विजय के लिए कई कारण उत्तरदायी थे। प्रथम, इब्राहीम लोधी अपनी प्रजा में बहुत बदनाम था। इस कारण प्रजा ने सुल्तान का साथ न दिया। द्वितीय, उसकी सेना बड़ी निर्बल थी तथा अधिकतर लूट-मार ही करती थी। तृतीय, बाबर एक योग्य सेनापति था। उसकी सेना को कई लड़ाइयों का अनुभव था। चतुर्थ, बाबर के पास तोपखाना था और इब्राहीम के सैनिक तीर कमानों तथा तलवारों के साथ उसका मुकाबला न कर सके। इन कारणों से अफगानों की पराजय हुई तथा बाबर विजयी रहा।

सामाजिक दशा
(Social Condition)

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 3 16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा

प्रश्न 2.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के समाज की मुख्य विशेषताएँ बयान करो।।
(Discuss the main features of the society of Punjab in the beginning of the 16th century.)
अथवा
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में सामाजिक अवस्था का वर्णन करें। (Discuss the social condition of the Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की सामाजिक दशा भी बहुत दयनीय थी। उस समय समाज हिंदू और मुसलमान नामक दो मुख्य वर्गों में विभाजित था। मुसलमान शासक वर्ग से संबंध रखते थे, इसलिए उन्हें समाज में विशेष अधिकार प्राप्त थे। दूसरी ओर हिंदू अधिक जनसंख्या में थे परंतु उन्हें लगभग सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था। उन्हें काफिर और जिम्मी कहकर पुकारा जाता था। समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें पुरुषों की जूती समझा जाता था। डॉक्टर जसबीर सिंह आहलुवालिया के अनुसार,
“जिस समय गुरु नानक जी ने अवतार धारण किया तो उस समय से पूर्व ही भारतीय समाज जड़ एवं पतित हो चुका था।”1
1. “When Guru Nanak appeared on the horizon, the Indian society had already become static and decadent.” Dr. Jasbir Singh Ahluwalia, Creation of Khalsa : Fulfilment of Guru Nanak’s Mission (Patiala : 1999) p. 19.

मुस्लिम समाज की विशेषताएँ (Features of the Muslim Society)
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के मुस्लिम समाज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—
1. समाज तीन वर्गों में विभाजित था (Society was divided into Three Classes)-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का मुस्लिम समाज उच्च वर्ग, मध्य वर्ग और निम्न वर्ग में विभाजित था।

  • उच्च वर्ग (The Upper Class)-इस वर्ग में अमीर, खान, शेख़, मलिक, इकतादार, उलमा और काजी इत्यादि शामिल थे। इस वर्ग के लोग बहुत ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। वे बहुत भव्य महलों में निवास करते थे। उच्च श्रेणी के लोगों की सेवा के लिए बड़ी संख्या में नौकर होते थे।
  • मध्य वर्ग (The Middle Class)-इस श्रेणी में सैनिक, व्यापारी, कृषक, विद्वान्, लेखक और राज्य के छोटे कर्मचारी शामिल थे। उनके जीवन तथा उच्च वर्ग के लोगों के जीवन-स्तर में बहुत अंतर था। किंतु हिंदुओं की तुलना में वे बहुत अच्छा जीवन बिताते थे।
  • निम्न वर्ग (The Lower Class)—इस वर्ग में दास-दासियाँ, नौकर और श्रमिक शामिल थे। इनकी संख्या बहुत अधिक थी। उनका जीवन अच्छा नहीं था। उनके स्वामी उन पर बहुत अत्याचार करते थे।

2. स्त्रियों की दशा (Position of Women)-मुस्लिम समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी। वे बहुत कम शिक्षित होती थीं। बहु-विवाह और तलाक प्रथा ने उनकी दशा और दयनीय बना दी थी।

3. भोजन (Diet)-उच्च वर्ग के मुसलमान कई प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाते थे। वे माँस, हलवा, पडी और मक्खन इत्यादि का बहुत प्रयोग करते थे। उनमें मदिरापान की प्रथा सामान्य हो गई थी। मदिरा के अतिरिक्त वे अफीम और भाँग का भी प्रयोग करते थे। निम्न वर्ग से संबंधित लोगों का भोजन साधारण होता था।

4. पहनावा (Dress)-उच्च वर्ग के मुसलमानों के वस्त्र बहुमूल्य होते थे। ये वस्त्र रेशम और मखमल से निर्मित थे। निम्न वर्ग के लोग सूती वस्त्र पहनते थे। पुरुषों में कुर्ता और पायजामा पहनने की, जबकि स्त्रियों में लंबा बुर्का पहनने की प्रथा थी।

5. शिक्षा (Education)-16वीं शताब्दी के आरंभ में मुसलमानों को शिक्षा देने का कार्य उलमा और मौलवी करते थे। वे मस्जिदों, मकतबों और मदरसों में शिक्षा देते थे। मस्जिदों और मकतबों में प्रारंभिक शिक्षा दी जाती थी, जबकि मदरसों में उच्च शिक्षा। उस समय मुसलमानों के पंजाब में सबसे प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र लाहौर और मुलतान में थे।

6. मनोरंजन के साधन (Means of Entertainment)-मुसलमान अपना मनोरंजन कई साधनों से करते थे। वे शिकार करने, चौगान खेलने, जानवरों की लड़ाइयाँ देखने और घुड़दौड़ में भाग लेने के बहुत शौकीन थे। वे शतरंज और चौपड़ खेलकर भी अपना मनोरंजन करते थे।

हिंदू समाज की विशेषताएँ (Features of the Hindu Society)
16वीं शताब्दी के आरंभ में हिंदू समाज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—

1. जाति प्रथा (Caste System)-हिंदू समाज कई जातियों व उप-जातियों में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान ब्राह्मणों को प्राप्त था। मुस्लिम शासन की स्थापना कारण ब्राह्मणों के प्रभाव में बहुत कमी आ गयी थी। इसा कारण अर्थात् मुस्लिम शासन के कारण ही क्षत्रियों ने नए व्यवसाय जैसे दुकानदारी, कृषि इत्यादि अपना लिए थे। वैश्य व्यापार और कृषि का ही व्यवसाय करते थे। शूद्रों के साथ इस काल में दुर्व्यवहार किया जाता था। इन जातियों के अतिरिक्त समाज में बहुत-सी अन्य जातियाँ एवं उप-जातियाँ प्रचलित थीं। ये जातियाँ परस्पर बहुत घृणा करती थीं।

2. स्त्रियों की दशा (Position of Women)-हिंदू समाज में स्त्रियों की दशा बहुत अच्छी नहीं थी। समाज में उनका स्तर पुरुषों के समान नहीं था। लड़कियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। उनका अल्पायु में ही विवाह कर दिया जाता था। इस काल में सती प्रथा बहुत ज़ोरों पर थी। विधवा को पुनर्विवाह करने की अनुमति नहीं थी।

3. खान-पान (Diet)-हिंदुओं का भोजन साधारण होता था। अधिकाँश हिंदू शाकाहारी होते थे। उनका भोजन गेहूँ, चावल, सब्जियाँ, घी और दूध इत्यादि से तैयार किया जाता था। वे माँस, लहसुन और प्याज का प्रयोग नहीं करते थे। ग़रीब लोगों का भोजन बहुत साधारण होता था।

4. पहनावा (Dress)-हिंदुओं का पहनावा बहुत साधारण होता था। वे प्रायः सूती वस्त्र पहनते थे। पुरुष धोती और कुर्ता पहनते थे। वे सिर पर पगड़ी भी बाँधते थे। स्त्रियाँ साड़ी, चोली और लहंगा पहनती थीं। निर्धन लोग चादर से ही अपना शरीर ढाँप लेते थे।

5. मनोरंजन के साधन (Means of Entertainment)-हिंदू नृत्य, गीत और संगीत के बहुत शौकीन थे। वे ताश और शतरंज भी खेलते थे। गाँवों के लोग जानवरों की लडाइयाँ और मल्लयद्ध देखकर अपना मनोरंजन करते थे। इनके अतिरिक्त हिंदू अपने त्यौहारों दशहरा, दीवाली, होली आदि में भी भाग लेते थे।

6. शिक्षा (Education)-हिंदू लोग ब्राह्मणों से मंदिरों और पाठशालाओं में शिक्षा प्राप्त करते थे। इनमें प्रारंभिक शिक्षा के संबंध में जानकारी दी जाती थी। पंजाब में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु हिंदुओं का कोई केंद्र नहीं था।

उपरलिखित विवरण से स्पष्ट है कि 16वीं शताब्दी के आरंभ में मुस्लिम और हिंदू समाज में अनेक कुप्रथाएँ प्रचलित थीं। समाज में झूठ, धोखा, छल और कपट इत्यादि का बोलबाला था। लोगों के चरित्र का पतन हो चुका था। उनमें मानवता नाम की कोई चीज़ नहीं रही थी। डॉक्टर ए० सी० बैनर्जी का यह कहना बिल्कुल सही है,
“यह अनिश्चितता तथा हलचल का लंबा अंधकारमय काल था जिसने लोगों के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपने भद्दे दाग छोड़े।”2
2. “It was a long, dark age of uncertainty and restlessness, leaving its ugly scars on all aspects of people’s life.” Dr. A.C. Banerjee, Guru Nanak and His Times (Patiala : 1984) p. 19.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 3 16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी के जन्म समय पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक दशा का वर्णन करें।
(Explain the political and social conditions of Punjab at the birth of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक दशा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(Give a brief account of the political and social conditions of Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक दशा बहुत दयनीय थी। पंजाब षड्यंत्रों का अखाड़ा बना हुआ था। उस समय पंजाब दिल्ली सल्तनत के अधीन था। इस पर लोधी वंश के सुल्तानों का शासन था। 16वीं शताब्दी के आरंभ में राजनीतिक दशा का शाब्दिक चित्रण निम्नलिखित अनुसार है—
लोधियों के अधीन पंजाब (The Punjab under the Lodhis)

1. ततार खाँ लोधी (Tatar Khan Lodhi)-1469 ई० में दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोधी ने ततार खाँ लोधी को पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया। वह इस पद पर 1485 ई० तक रहा। उसने बहुत कठोरता पूर्वक पंजाब पर शासन किया। 1485 ई० में ततार खाँ लोधी ने सुल्तान बहलोल लोधी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। सुल्तान ने अपने शहज़ादे निज़ाम खाँ को ततार खाँ के विद्रोह का दमन करने के लिए भेजा। ततार खाँ निज़ाम खाँ से लड़ता हुआ मारा गया।

2. दौलत खाँ लोधी (Daulat Khan Lodhi)-दौलत खाँ लोधी ततार खाँ लोधी का पुत्र था। उसे 1500 ई० में नए सुल्तान सिकंदर लोधी ने पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया। वह सिकंदर लोधी के शासनकाल में तो पूर्ण रूप से वफ़ादार रहा परंतु सुल्तान इब्राहीम के शासनकाल में वह स्वतंत्र होने के स्वप्न देखने लगा। इस संबंध में उसने, आलम खाँ लोधी जो कि इब्राहीम का सौतेला भाई था, के साथ मिलकर षड्यंत्र करने आरंभ कर दिए थे। जब इन षड्यंत्रों के संबंध में इब्राहीम लोधी को ज्ञात हुआ, तो उसने दौलत खाँ के पुत्र दिलावर खाँ को बंदी बना लिया। शीघ्र ही दिलावर खाँ पुनः पंजाब पहुँचने में सफल हो गया। यहाँ पहुँचकर उसने अपने पिता दौलत खाँ को दिल्ली में उसके साथ किए गए दुर्व्यवहार के संबंध में बताया। दौलत खाँ लोधी ने इस अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया।

3. प्रजा की दशा (Condition of Subject)-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में प्रजा की दशा बहुत दयनीय थी। शासक वर्ग का प्रजा की ओर ध्यान ही नहीं था। सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट हो चुके थे। चारों ओर रिश्वत का बोलबाला था। हिंदुओं पर अत्याचार बहुत बढ़ गए थे। उन्हें तलवार की नोक पर बलपूर्वक इस्लाम धर्म में शामिल किया जाता था। संक्षिप्त में उस समय चारों ओर अत्याचार, छल-कपट और भ्रष्टाचार फैला हुआ था। गुरु नानक देव जी ने वार माझ में इस प्रकार लिखा है—

काल काति राजे कसाई धर्म पंख कर उडरिया॥
कूड़ अमावस सच्च चंद्रमा दीसै नाहि कह चढ़िया॥

आर्थिक दशा
(Economic Condition)

प्रश्न 4.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की कृषि, व्यापार तथा उद्योगों के संबंध में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about agriculture, trade and industries of the Punjab in the beginning of the sixteenth century ?)
अथवा
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की आर्थिक दशा की मुख्य विशेषताएँ बयान करो।
(Describe the main features of the economic condition of Punjab in the beginning of the sixteenth century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों की आर्थिक दशा बहुत अच्छी थी। उपजाऊ भूमि, विकसित व्यापार तथा लोगों के परिश्रम ने पंजाब को एक समृद्ध प्रदेश बना दिया। 16वीं शताब्दी के पंजाब के लोगों के आर्थिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—

1. कृषि (Agriculture)-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। पंजाब की भूमि बहुत उपजाऊ थी। सिंचाई के लिए कृषक मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करते थे किंतु नहरों, तालाबों और कुओं का प्रयोग भी किया जाता था। यहाँ पर फसलों की भरपूर पैदावार होती थी। यहाँ की मुख्य फसलें गेहूँ, कपास, जौ, मकई, चावल और गन्ना थीं। फसलों की भरपूर उपज होने के कारण पंजाब को भारत का अन्न भंडार कहा जाता था।

2. उद्योग (Industries)-कृषि के पश्चात् पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय उद्योग था। ये उद्योग सरकारी भी थे और व्यक्तिगत भी। पंजाब के उद्योगों में वस्त्र उद्योग सर्वाधिक प्रसिद्ध था। यहाँ सूती, ऊनी और रेशमी तीनों प्रकार के वस्त्र निर्मित होते थे। समाना, सुनाम, सरहिंद, दीपालपुर, जालंधर, लाहौर और मुलतान इस उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र थे। कपड़ा उद्योग के अतिरिक्त उस समय पंजाब में चमड़ा, शस्त्र, बर्तन, हाथी दाँत और खिलौने इत्यादि बनाने के लिए उद्योग भी प्रचलित थे।

3. पशु पालन (Animal Rearing)-पंजाब के कुछ लोग पशु पालन का व्यवसाय करते थे। पंजाब में पालतू रखे जाने वाले मुख्य पशु गाय, बैल, भैंसे, घोड़े, खच्चर, ऊँट, भेड़ें और बकरियाँ इत्यादि थे। इन पशुओं से दूध, ऊन और भार ढोने का काम लिया जाता था।

4. व्यापार (Trade) पंजाब का व्यापार काफ़ी विकसित था। व्यापार का कार्यकछ विशेष श्रेणियों के हाथ में होता था। हिंदुओं की क्षत्रिय, महाजन, बनिया, सूद और अरोड़ा नामक जातियाँ तथा मुसलमानों में बोहरा और खोजा नामक जातियाँ व्यापार का कार्य करती थीं। माल के परिवहन का कार्य बनजारे करते थे। पंजाब का विदेशी व्यापार मुख्य रूप से अफ़गानिस्तान, ईरान, अरब, सीरिया, तिब्बत, भूटान और चीन इत्यादि देशों के साथ होता था। पंजाब से इन देशों को अनाज, वस्त्र, कपास, रेशम और चीनी निर्यात की जाती थी। इन देशों से पंजाब घोड़े, फर, कस्तूरी और मेवे आयात करता था।

5. व्यापारिक नगर (Commercial Towns)-16वीं शताब्दी के आरंभ में लाहौर और मुलतान पंजाब के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध व्यापारिक नगर थे। इनके अतिरिक्त पेशावर, जालंधर, लुधियाना, फिरोज़पुर, सुल्तानपुर, सरहिंद, स्यालकोट, कुल्लू, चंबा और काँगड़ा भी व्यापारिक दृष्टि से पंजाब के प्रसिद्ध नगर थे।

6. जीवन स्तर (Standard of Living)-उस समय पंजाब के लोगों के जीवन स्तर में बहुत अंतर था। मुसलमानों के उच्च वर्ग के लोगों के पास धन का बाहुल्य था। हिंदुओं के उच्च वर्ग के पास धन तो बहुत था, किंतु मुसलमान उनसे यह धन लूट कर ले जाते थे। समाज के मध्य वर्ग में मुसलमानों का जीवन स्तर तो अच्छा था, परंतु हिंदू अपना निर्वाह बहुत मुश्किल से करते थे। समाज में निर्धनों और कृषकों का जीवन-स्तर निम्न था। वे प्रायः साहूकारों के ऋणी रहते थे।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 3 16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा

प्रश्न 5.
सोलहवीं शताब्दी में पंजाब के लोगों की सामाजिक व आर्थिक दशा कैसी थी ?
(What were the social and economic condition of people of Punjab in 16th century ?)
अथवा
सोलहवीं सदी के आरंभ में पंजाब की सामाजिक और आर्थिक हालत का वर्णन करें।
(What were the social and economic condition of Punjab in the beginning of 16th century ? Discuss it.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की सामाजिक दशा भी बहुत दयनीय थी। उस समय समाज हिंदू और मुसलमान नामक दो मुख्य वर्गों में विभाजित था। मुसलमान शासक वर्ग से संबंध रखते थे, इसलिए उन्हें समाज में विशेष अधिकार प्राप्त थे। दूसरी ओर हिंदू अधिक जनसंख्या में थे परंतु उन्हें लगभग सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था। उन्हें काफिर और जिम्मी कहकर पुकारा जाता था। समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें पुरुषों की जूती समझा जाता था। डॉक्टर जसबीर सिंह आहलुवालिया के अनुसार,
“जिस समय गुरु नानक जी ने अवतार धारण किया तो उस समय से पूर्व ही भारतीय समाज जड़ एवं पतित हो चुका था।”1
1. “When Guru Nanak appeared on the horizon, the Indian society had already become static and decadent.” Dr. Jasbir Singh Ahluwalia, Creation of Khalsa : Fulfilment of Guru Nanak’s Mission (Patiala : 1999) p. 19.

मुस्लिम समाज की विशेषताएँ (Features of the Muslim Society)
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के मुस्लिम समाज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—

1. समाज तीन वर्गों में विभाजित था (Society was divided into Three Classes)-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का मुस्लिम समाज उच्च वर्ग, मध्य वर्ग और निम्न वर्ग में विभाजित था।

  • उच्च वर्ग (The Upper Class)-इस वर्ग में अमीर, खान, शेख़, मलिक, इकतादार, उलमा और काजी इत्यादि शामिल थे। इस वर्ग के लोग बहुत ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। वे बहुत भव्य महलों में निवास करते थे। उच्च श्रेणी के लोगों की सेवा के लिए बड़ी संख्या में नौकर होते थे।
  • मध्य वर्ग (The Middle Class)-इस श्रेणी में सैनिक, व्यापारी, कृषक, विद्वान्, लेखक और राज्य के छोटे कर्मचारी शामिल थे। उनके जीवन तथा उच्च वर्ग के लोगों के जीवन-स्तर में बहुत अंतर था। किंतु हिंदुओं की तुलना में वे बहुत अच्छा जीवन बिताते थे।
  • निम्न वर्ग (The Lower Class)—इस वर्ग में दास-दासियाँ, नौकर और श्रमिक शामिल थे। इनकी संख्या बहुत अधिक थी। उनका जीवन अच्छा नहीं था। उनके स्वामी उन पर बहुत अत्याचार करते थे।

2. स्त्रियों की दशा (Position of Women)-मुस्लिम समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी। वे बहुत कम शिक्षित होती थीं। बहु-विवाह और तलाक प्रथा ने उनकी दशा और दयनीय बना दी थी।

3. भोजन (Diet)-उच्च वर्ग के मुसलमान कई प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाते थे। वे माँस, हलवा, पडी और मक्खन इत्यादि का बहुत प्रयोग करते थे। उनमें मदिरापान की प्रथा सामान्य हो गई थी। मदिरा के अतिरिक्त वे अफीम और भाँग का भी प्रयोग करते थे। निम्न वर्ग से संबंधित लोगों का भोजन साधारण होता था।

4. पहनावा (Dress)-उच्च वर्ग के मुसलमानों के वस्त्र बहुमूल्य होते थे। ये वस्त्र रेशम और मखमल से निर्मित थे। निम्न वर्ग के लोग सूती वस्त्र पहनते थे। पुरुषों में कुर्ता और पायजामा पहनने की, जबकि स्त्रियों में लंबा बुर्का पहनने की प्रथा थी।

5. शिक्षा (Education)-16वीं शताब्दी के आरंभ में मुसलमानों को शिक्षा देने का कार्य उलमा और मौलवी करते थे। वे मस्जिदों, मकतबों और मदरसों में शिक्षा देते थे। मस्जिदों और मकतबों में प्रारंभिक शिक्षा दी जाती थी, जबकि मदरसों में उच्च शिक्षा। उस समय मुसलमानों के पंजाब में सबसे प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र लाहौर और मुलतान में थे।

6. मनोरंजन के साधन (Means of Entertainment)-मुसलमान अपना मनोरंजन कई साधनों से करते थे। वे शिकार करने, चौगान खेलने, जानवरों की लड़ाइयाँ देखने और घुड़दौड़ में भाग लेने के बहुत शौकीन थे। वे शतरंज और चौपड़ खेलकर भी अपना मनोरंजन करते थे।

हिंदू समाज की विशेषताएँ (Features of the Hindu Society)
16वीं शताब्दी के आरंभ में हिंदू समाज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—

1. जाति प्रथा (Caste System)-हिंदू समाज कई जातियों व उप-जातियों में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान ब्राह्मणों को प्राप्त था। मुस्लिम शासन की स्थापना कारण ब्राह्मणों के प्रभाव में बहुत कमी आ गयी थी। इसा कारण अर्थात् मुस्लिम शासन के कारण ही क्षत्रियों ने नए व्यवसाय जैसे दुकानदारी, कृषि इत्यादि अपना लिए थे। वैश्य व्यापार और कृषि का ही व्यवसाय करते थे। शूद्रों के साथ इस काल में दुर्व्यवहार किया जाता था। इन जातियों के अतिरिक्त समाज में बहुत-सी अन्य जातियाँ एवं उप-जातियाँ प्रचलित थीं। ये जातियाँ परस्पर बहुत घृणा करती थीं।

2. स्त्रियों की दशा (Position of Women)-हिंदू समाज में स्त्रियों की दशा बहुत अच्छी नहीं थी। समाज में उनका स्तर पुरुषों के समान नहीं था। लड़कियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। उनका अल्पायु में ही विवाह कर दिया जाता था। इस काल में सती प्रथा बहुत ज़ोरों पर थी। विधवा को पुनर्विवाह करने की अनुमति नहीं थी।

3. खान-पान (Diet)-हिंदुओं का भोजन साधारण होता था। अधिकाँश हिंदू शाकाहारी होते थे। उनका भोजन गेहूँ, चावल, सब्जियाँ, घी और दूध इत्यादि से तैयार किया जाता था। वे माँस, लहसुन और प्याज का प्रयोग नहीं करते थे। ग़रीब लोगों का भोजन बहुत साधारण होता था।

4. पहनावा (Dress)-हिंदुओं का पहनावा बहुत साधारण होता था। वे प्रायः सूती वस्त्र पहनते थे। पुरुष धोती और कुर्ता पहनते थे। वे सिर पर पगड़ी भी बाँधते थे। स्त्रियाँ साड़ी, चोली और लहंगा पहनती थीं। निर्धन लोग चादर से ही अपना शरीर ढाँप लेते थे।

4. मनोरंजन के साधन (Means of Entertainment)-हिंदू नृत्य, गीत और संगीत के बहुत शौकीन थे। वे ताश और शतरंज भी खेलते थे। गाँवों के लोग जानवरों की लडाइयाँ और मल्लयद्ध देखकर अपना मनोरंजन करते थे। इनके अतिरिक्त हिंदू अपने त्यौहारों दशहरा, दीवाली, होली आदि में भी भाग लेते थे।

5. शिक्षा (Education)-हिंदू लोग ब्राह्मणों से मंदिरों और पाठशालाओं में शिक्षा प्राप्त करते थे। इनमें प्रारंभिक शिक्षा के संबंध में जानकारी दी जाती थी। पंजाब में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु हिंदुओं का कोई केंद्र नहीं था।

उपरलिखित विवरण से स्पष्ट है कि 16वीं शताब्दी के आरंभ में मुस्लिम और हिंदू समाज में अनेक कुप्रथाएँ प्रचलित थीं। समाज में झूठ, धोखा, छल और कपट इत्यादि का बोलबाला था। लोगों के चरित्र का पतन हो चुका था। उनमें मानवता नाम की कोई चीज़ नहीं रही थी। डॉक्टर ए० सी० बैनर्जी का यह कहना बिल्कुल सही है,
“यह अनिश्चितता तथा हलचल का लंबा अंधकारमय काल था जिसने लोगों के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपने भद्दे दाग छोड़े।”2
2. “It was a long, dark age of uncertainty and restlessness, leaving its ugly scars on all aspects of people’s life.” Dr. A.C. Banerjee, Guru Nanak and His Times (Patiala : 1984) p. 19.

धार्मिक अवस्था (Religious Condition)

प्रश्न 6.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों की धार्मिक अवस्था का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Give a brief account of the religious condition of the people of Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में दो मुख्य धर्म हिंदू धर्म तथा इस्लाम प्रचलित थे। ये दोनों धर्म आगे कई संप्रदायों में विभाजित थे। इनके अतिरिक्त पंजाब में बौद्ध मत तथा जैन मत भी प्रचलित थे। इन धर्मों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. हिंदू धर्म (Hinduism)-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का सबसे प्रमुख धर्म हिंदू धर्म था। हिंदू धर्म वेदों में विश्वास रखता था। 16वीं शताब्दी में पंजाब के लोगों में रामायण तथा महाभारत बहुत लोकप्रिय थे। इस काल के समाज में ब्राह्मणों का प्रभुत्व था। जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी संस्कार ब्राह्मणों के बिना अधूरे समझे जाते थे। इस काल में ब्राह्मणों का चरित्र बहुत गिर चुका था। वे अपने स्वार्थों के लिए लोगों को लूटने के उद्देश्य से धर्म की गलत व्याख्या करते थे। वे भोली-भाली जनता को लूटकर बहुत खुशी अनुभव करते थे। उस समय पंजाब में हिंदू धर्म की निम्नलिखित संप्रदाएँ प्रचलित थीं

i) शैव मत (Shaivism)-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में शैव मत बहुत लोकप्रिय था। इस मत के लोग शिव के अधिकतर पुजारी थे। उन्होंने स्थान-स्थान पर शिवालय स्थापित किए थे जहाँ शैव मत की शिक्षा दी जाती थी। शैव मत को मानने वाले जोगी कहलाते थे। जोगियों की मुख्य शाखा को नाथपंथी कहा जाता था। इसकी स्थापना गोरखनाथ ने की थी। क्योंकि जोगी कान में छेद करवा कर बड़े-बड़े कुंडल डालते थे इसलिए उन्हें कानफटे जोगी भी कहा जाता था। पंजाब में जोगियों का प्रमुख केंद्र जेहलम में गोरखनाथ का टिल्ला था। जोगियों ने ब्राह्मणों की रस्मों तथा जाति प्रथा के विरुद्ध प्रचार किया।

ii) वैष्णव मत (Vaishnavism)-वैष्णव मत भी पंजाब में काफ़ी लोकप्रिय था। इस मत के लोग विष्णु तथा उसके अवतारों की पूजा करते थे। इस काल में श्री राम तथा श्री कृष्ण को विष्णु का अवतार मान कर उनकी पूजा की जाती थी। इनकी स्मृति में पंजाब में अनेक स्थानों पर विशाल तथा सुंदर मंदिरों का निर्माण किया गया। इस मत के अनुयायी मदिरा तथा माँस आदि का प्रयोग नहीं करते थे।

iii) शक्ति मत (Shaktism)-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों में शक्ति मत भी प्रचलित था। इस मत को मानने वाले लोग दुर्गा, काली तथा अन्य देवियों की पूजा करते थे। वे इन देवियों को शक्ति का प्रतीक समझते थे। इन देवियों को प्रसन्न करने के लिए पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी। इन देवियों की स्मृति में अनेक मंदिरों का निर्माण किया गया। इनमें से ज्वालामुखी, चिंतपुरणी, चामुण्डा देवी तथा नैना देवी के मंदिर बहुत प्रसिद्ध थे।

2. इस्लाम (Islam)-इस्लाम की स्थापना हज़रत मुहम्मद साहिब ने 7वीं शताब्दी में मक्का में की थी। उन्होंने समाज में प्रचलित सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों का खंडन किया। उन्होंने एक ईश्वर तथा आपसी भ्रातृत्व का संदेश दिया। 16वीं शताब्दी के आरंभ में इस्लाम धर्म का प्रचार बड़ी तीव्र गति से हो रहा था। इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, भारत पर शासन करने वाले सभी सुल्तान मुसलमान थे। दूसरा, उन्होंने तलवार की नोक पर लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाया। इस्लाम के अनुयायी सुन्नी तथा शिया नामक दो संप्रदायों में बंटे हुए थे। सुन्नी मुसलमानों की संख्या अधिक थी तथा वे कट्टर विचारों के थे। मुसलमानों के धार्मिक नेताओं को उलमा कहा जाता था। वे इस्लामी कानूनों की व्याख्या करते थे तथा लोगों को पवित्र जीवन बिताने की प्रेरणा देते थे। वे अन्य धर्मों को घृणा की दृष्टि से देखते थे।

3. सूफ़ी मत (Sufism)-सूफी मत इस्लाम से संबंधित एक संप्रदाय था। यह मत पंजाब में बहुत लोकप्रिय हुआ। यह मत 12 सिलसिलों में बँटा हुआ था। इनमें से चिश्ती तथा सुहरावर्दी सिलसिले पंजाब में बहुत प्रसिद्ध थे। पंजाब में थानेश्वर, हाँसी, नारनौल तथा पानीपत सूफ़ियों के प्रसिद्ध केंद्र थे। इस मत के लोग केवल एक अल्लाह में विश्वास रखते थे। वे सभी धर्मों का आदर करते थे। वे मनुष्य की सेवा करना अपना सबसे बड़ा कर्त्तव्य समझते थे। वे संगीत में विश्वास रखते थे। सूफ़ियों ने हिंदुओं तथा मुसलमानों में आपसी मेलजोल रखने, सुल्तानों को कट्टर नीति का त्याग करने के लिए प्रेरित करने, साहित्य तथा संगीत की उन्नति के लिए प्रशंसनीय योगदान दिया।

4. जैन मत (Jainism)-जैन मत पंजाब के व्यापारी वर्ग में प्रचलित था। इस मत के लोग 24 तीर्थंकरों, त्रिरत्नों, अहिंसा, कर्म सिद्धांत तथा निर्वाण में विश्वास रखते थे। वे ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते थे।

5. बौद्ध मत (Buddhism)-16वीं शताब्दी में पंजाब में बौद्ध मत को हिंदू धर्म का एक भाग माना जाता था। महात्मा बुद्ध को विष्णु का ही एक अवतार मानते थे। पंजाब के बहुत कम लोग इस मत में शामिल थे।

गुरु नानक देव जी ने अपनी रचनाओं में अनेक स्थानों पर 16वीं शताब्दी के लोगों की धार्मिक अवस्था का वर्णन किया है। उनके अनुसार हिंदू तथा मुसलमान दोनों धर्म बाह्याडंबरों जैसे शरीर पर भस्म मलना, माथे पर तिलक लगाना, कानों में कुंडल डालना, नदी में स्नान करना, रोजे रखना तथा कब्रों आदि की पूजा पर बहुत ज़ोर देते थे। धर्म की वास्तविकता को लोग पूरी तरह से भूल चुके थे। अंत में हम डॉक्टर हरी राम गुप्ता के इन शब्दों से सहमत हैं,
“संक्षेप में गुरु साहिब के आगमन के समय भारत के दोनों धर्म-हिंदू धर्म तथा इस्लाम-भ्रष्टाचारी तथा पतित हो चुके थे। वे अपनी पवित्रता तथा गौरव को गंवा चुके थे।”3
3. “In short, at the time of Guru Nanak’s advent both the religions in India, Hinduism and Islam, had become corrupt and degraded. They had lost their pristine purity and glory.” Dr. H.R. Gupta, History of Sikh Gurus (New Delhi : 1993) p.12.

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प्रश्न 7.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की सामाजिक तथा धार्मिक अवस्था का वर्णन करें।
(Describe the social and religious condition of the Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की सामाजिक दशा भी बहुत दयनीय थी। उस समय समाज हिंदू और मुसलमान नामक दो मुख्य वर्गों में विभाजित था। मुसलमान शासक वर्ग से संबंध रखते थे, इसलिए उन्हें समाज में विशेष अधिकार प्राप्त थे। दूसरी ओर हिंदू अधिक जनसंख्या में थे परंतु उन्हें लगभग सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था। उन्हें काफिर और जिम्मी कहकर पुकारा जाता था। समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें पुरुषों की जूती समझा जाता था। डॉक्टर जसबीर सिंह आहलुवालिया के अनुसार,
“जिस समय गुरु नानक जी ने अवतार धारण किया तो उस समय से पूर्व ही भारतीय समाज जड़ एवं पतित हो चुका था।”1
1. “When Guru Nanak appeared on the horizon, the Indian society had already become static and decadent.” Dr. Jasbir Singh Ahluwalia, Creation of Khalsa : Fulfilment of Guru Nanak’s Mission (Patiala : 1999) p. 19.

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक दशा कैसी थी ?
(What was the political condition of Punjab in the beginning of the 16th century ?)
अथवा
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक अवस्था ब्यान करें।
(Explain the political condition of Punjab in the beginning of 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक दशा बड़ी खराब थी। लोधी सुल्तानों की ग़लत नीतियों के परिणामस्वरूप यहाँ अराजकता फैली हुई थी। शासक वर्ग भोग-विलास में डूबा रहता था। सरकारी कर्मचारी, काज़ी तथा उलमा भ्रष्ट एवं रिश्वतखोर हो गए थे। मुसलमान हिंदुओं पर बहुत अत्याचार करते थे। उन्हें बलपूर्वक इस्लाम धर्म में सम्मिलित किया जाता था। राज्य की शासन-व्यवस्था भंग होकर रह गई थी। ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर पंजाब के गवर्नर दौलत खाँ लोधी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया।

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प्रश्न 2.
“16वीं सदी के आरंभ में पंजाब त्रिकोणी संघर्ष का अखाड़ा था।” व्याख्या करें।
(“’In the beginning of the 16th century, the Punjab was a cockpit of triangular struggle.” Explain.)
अथवा
16वीं सदी के शुरू में पंजाब ‘त्रिकोणी संघर्ष’ का वर्णन कीजिए।
(Explain the triangular struggle of the Punjab in the beginning of the 16th century.)
अथवा
पंजाब के तिकोने (त्रिकोने) संघर्ष के बारे में आप क्या जानते हैं ? (P.S.E.B. June 2017) (What do you know about the triangular struggle in Punjab ?)
अथवा
16वीं सदी के शुरू में पंजाब में हुए त्रिकोणीय संघर्ष के बारे में संक्षेप में लिखें।
(Write in brief about the triangular struggle of the Punjab in the beginning of the 16th country.)
उत्तर-
16वीं सदी के आरंभ में पंजाब त्रिकोणे संघर्ष का अखाड़ा था। यह त्रिकोणा संघर्ष काबुल के शासक बाबर, दिल्ली के शासक इब्राहीम लोधी तथा पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ लोधी के मध्य चल रहा था। दौलत खाँ लोधी पंजाब का स्वतंत्र शासक बनना चाहता था। इस संबंध में जब इब्राहीम लोधी को पता चला तो उसने दौलत खाँ के पुत्र दिलावर खाँ को बंदी बनाकर कारावास में डाल दिया। दौलत खाँ ने इस अपमान का बदला लेने के लिए बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया। इस त्रिकोणे संघर्ष के अंत में बाबर की जीत हुई।

प्रश्न 3.
दौलत खाँ लोधी कौन था ? (Who was Daulat Khan Lodhi ? )
अथवा
दौलत खाँ लोधी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Daulat Khan Lodhi.)
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी 1500 ई० में पंजाब का सूबेदार नियुक्त हुआ था। वह पंजाब में स्वतंत्र राज्य की स्थापना करने के स्वप्न देख रहा था। इस संबंध में जब इब्राहीम लोधी को पता चला तो उसने दौलत खाँ लोधी को शाही दरबार में उपस्थित होने को कहा। दौलत खाँ ने अपने छोटे पुत्र दिलावर खाँ को दिल्ली भेज दिया। दिलावर खाँ को दिल्ली पहुँचते ही बंदी बना लिया गया। शीघ्र ही वह किसी प्रकार कारागार से भागने में सफल हो गया। दौलत खाँ लोधी ने इस अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया।

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प्रश्न 4.
बाबर के भारत पर आक्रमण के कोई तीन कारण लिखें। (Write any three causes of the invansions of Babur over India.)
उत्तर-

  1. बाबर अपने सामग्रज्य का विस्तार करना चाहता था।
  2. वह भारत से अतुल्य संपदा लूटना चाहता था।
  3. वह भारत में इस्लाम का प्रसार करना चाहता था।

प्रश्न 5.
बाबर ने सैदपुर पर कब आक्रमण किया ? सिख इतिहास में इस आक्रमण का क्या महत्त्व है ? (When did Babar invade Saidpur ? What is its importance in Sikh History ?)
अथवा
बाबर के पंजाब के तीसरे हमले का संक्षिप्त वर्णन करें। (Give a brief account of Babur’s third invasion over Punjab.)
उत्तर-
बाबर ने सैदपुर पर 1520 ई० में आक्रमण किया यहाँ के लोगों ने बाबर का सामना किया। फलस्वरूप बाबर ने क्रोधित होकर बड़ी संख्या में लोगों की हत्या कर दी और उनके मकानों एवं महलों को लूटपाट करने के पश्चात् आग लगा दी गई। हज़ारों स्त्रियों को बंदी बना लिया गया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। गुरु नानक देव जी जो इस समय सैदपुर में ही थे, ने बाबर की सेनाओं द्वारा लोगों पर किए गए अत्याचारों का वर्णन ‘बाबर वाणी’ में किया है। बाबर की सेनाओं ने गुरु नानक देव जी को भी बंदी बना लिया था। बाद में बाबर की सेना ने गुरु जी को रिहा कर दिया।

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प्रश्न 6.
पानीपत की पहली लड़ाई का संक्षिप्त विवरण दो।
(Give a brief account of the First Battle of Panipat.)
अथवा
बाबर तथा इब्राहीम लोधी के मध्य युद्ध कब तथा क्यों हुआ ? ।
(Why and when did the battle take place between Babur and Ibrahim Lodhi ?)
अथवा
पानीपत की पहली लड़ाई तथा इसके महत्त्व का संक्षेप में वर्णन करें।
(Explain the First Battle of Panipat and its significance.)
उत्तर-
बाबर ने पंजाब के गवर्नर दौलत खाँ लोधी को सबक सिखाने के लिए नवंबर, 1525 ई० में पंजाब पर पाँचवीं बार आक्रमण किया। दौलत खाँ बाबर के सामने थोड़ा सा डटा परंतु शीघ्र ही उसने अपने हथियार डाल दिए। बाबर ने पंजाब की विजय से प्रोत्साहित होकर दिल्ली की ओर रुख किया। 21 अप्रैल, 1526 ई० को दोनों सेनाओं के बीच पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ। इस युद्ध में इब्राहीम लोधी की पराजय हुई। पानीपत की इस निर्णायक विजय के कारण भारत में मुग़ल वंश की स्थापना हुई।

प्रश्न 7.
पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर क्यों विजयी रहा ? (What led to the victory of Babur in the First Battle of Panipat ?)
अथवा
भारत में बाबर की विजय और अफ़गानों की पराजय के कारणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(Give a brief account of the causes of victory of Babur and defeat of the Afghans in India.)
उत्तर-

  1. दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोधी अपने दुर्व्यवहार और अत्याचार के कारण बहुत बदनाम था।
  2. इब्राहीम लोधी की सेना बहुत निर्बल थी।
  3. बाबर एक योग्य सेनापति था। उसको युद्धों का काफ़ी अनुभव था।
  4. बाबर द्वारा तोपखाने के प्रयोग ने भारी तबाही मचाई।

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प्रश्न 8.
पानीपत की प्रथम लड़ाई के तीन मुख्य परिणाम लिखें। (Write the three main results of the first battle of Panipat.)
उत्तर-

  1. लोधी वंश का अंत हो गया।
  2. मुग़ल साम्राज्य की स्थापना हो गई।
  3. नई युद्ध प्रणाली का आरंभ हुआ।

प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी के अनुसार शासक अन्यायकारी क्यों थे? (According to Guru Nanak Dev Ji why the rulers were unjust ?)
उत्तर-

  1. वे हिंदुओं से ज़जिया एवं तीर्थ यात्रा कर वसूलते थे।
  2. वे किसानों एवं जनसाधारण पर बहुत अत्याचार करते थे। .
  3. वे रिश्वत लिए बिना इन्साफ (न्याय) नहीं करते थे।

प्रश्न 10.
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की सामाजिक अवस्था कैसी थी?
(What was the social condition of Punjab in the beginning of the 16th century ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी के जन्म समय पंजाबियों की सामाजिक दशा के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the social condition of Punjab at the time of birth of Guru Nanak Dev ?)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का समाज मुसलमान और हिंदू नामक दो वर्गों में बँटा हुआ था। मुसलमानों को विशेष अधिकार प्राप्त थे क्योंकि वे शासक वर्ग से संबंधित थे। उन्हें राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। दूसरी ओर हिंदुओं को लगभग सारे अधिकारों से वंचित रखा गया था। मुसलमान उनको काफिर कहते थे। मुसलमान हिंदुओं पर बहुत अत्याचार करते थे। उस समय समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत दयनीय थी।

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प्रश्न 11.
सोलहवीं शताब्दी के शुरू में पंजाब में स्त्रियों की स्थिति कैसी थी? (What was the social condition of women in Punjab in the beginning of the 16th century ?)
अथवा
16वीं सदी के प्रारंभ में पंजाब की स्त्रियों की हालत के विषय में वर्णन कीजिए।
(Describe about the condition of women in Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी। हिंदू समाज में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर नहीं समझा जाता था। उस समय बहुत-सी लड़कियों को जन्म लेते ही मार दिया जाता था। उनका अल्पायु में विवाह कर दिया जाता था। उनकी शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया जाता था। उस समय सती प्रथा भी पूरे जोरों पर थी। विधवा पर अनेक प्रकार की पाबंदियाँ लगायी जाती थीं। मुस्लिम समाज में भी स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उन पर कई पाबंदियाँ लगाई गई थीं।

प्रश्न 12.
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के समाज में मुसलमानों की श्रेणियों का वर्णन करें।
(Give an account of the Muslim classes of Punjab in the beginning of 16th century.)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों में बँटा हुआ था—

  1. उच्च श्रेणी-उच्च श्रेणी में अमीर, खान, शेख, काज़ी और उलमा शामिल थे। इस श्रेणी के लोग बड़े ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे।
  2. मध्य श्रेणी-मध्य श्रेणी में व्यापारी, सैनिक, किसान और राज्य के छोटे-छोटे कर्मचारी सम्मिलित थे। उनके जीवन तथा उच्च श्रेणी के जीवन में काफ़ी अंतर था।
  3. निम्न श्रेणी-इस श्रेणी में अधिकतर दास-दासियाँ एवं मज़दूर सम्मिलित थे। उन्हें अपना जीवन निर्वाह करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। उनको अपने स्वामी के अत्याचारों को सहन करना पड़ता था।

प्रश्न 13.
16वीं सदी के आरंभ में पंजाब के समाज में मुसलमानों की सामाजिक अवस्था किस प्रकार थी?
(What was the social condition of Muslims of Punjab in the beginning of the 16th century ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी के जन्म के समय पंजाब के मुसलमान समाज की दशा के ऊपर रोशनी डालें।
(Throw light on the condition of muslim society of Punjab on the eve of Guru Nanak Dev Ji’s birth.)
उत्तर-
शासक वर्ग से संबंधित होने के कारण 16वीं शताब्दी में मुसलमानों की स्थिति हिंदुओं की अपेक्षा अच्छी थी। उस समय मुस्लिम समाज-उच्च श्रेणी, मध्य श्रेणी तथा निम्न श्रेणी में बँटा हुआ था। उच्च श्रेणी में अमीर, खान, शेख तथा मलिक इत्यादि आते थे। वे बहुत ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। मध्य श्रेणी में सैनिक, व्यापारी, किसान तथा राज्य के छोटे कर्मचारी सम्मिलित थे। वे भी अच्छा जीवन व्यतीत करते थे। निम्न श्रेणी में दास-दासियाँ एवं मज़दूर सम्मिलित थे। उन्हें अपने जीवन के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी।

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प्रश्न 14.
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के समाज में हिंदुओं की सामाजिक अवस्था कैसी थी ?
(What was the social condition of the Hindus of Punjab in the beginning of the 16th century ?)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के समाज में हिंदुओं की स्थिति बहुत दयनीय थी। समाज का बहुवर्ग होते हुए भी उन्हें लगभग सारे अधिकारों से वंचित रखा गया था। उनको काफिर और जिम्मी कहा जाता था। उन्हें जजिया और यात्रा कर आदि देने पड़ते थे। मुसलमान हिंदुओं को बलपूर्वक इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए विवश करते थे। उस समय हिंदू समाज कई जातियों व उपजातियों में बँटा हुआ था। उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों से घृणा करते थे। हिंदू समाज में स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी।

प्रश्न 15.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में प्रचलित शिक्षा प्रणाली के बारे में संक्षेप जानकारी दें।
(Give a brief account of prevalent education in the Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई है। मुसलमानों को शिक्षा देने का कार्य उलमा और मौलवी करते थे। वे मस्जिदों, मकतबों और मदरसों में शिक्षा देते थे। राज्य सरकार उन्हें अनुदान देती थी। उस समय मुसलमानों के पंजाब में सबसे अधिक शिक्षा केंद्र लाहौर और मुलतान में थे। हिंदू लोग ब्राह्मणों से मंदिरों और पाठशालाओं में शिक्षा प्राप्त करते थे। इनमें प्रारंभिक शिक्षा के संबंध में जानकारी दी जाती थी।

प्रश्न 16.
16वीं शताब्दी के आरंभ में लोगों के मनोरंजन के साधनों पर टिप्पणी लिखिए।
(Write a note on the means of entertainment of the people of Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में मुसलमान अपना मनोरंजन कई साधनों से करते थे। वे शिकार करने, चौगान खेलने, जानवरों की लड़ाइयाँ देखने और घुड़दौड़ में भाग लेने के बहुत शौकीन थे। वे समारोहों और महफिलों में बढ़कर भाग लेते थे। इनमें संगीतकार और नर्तकियाँ उनका मनोरंजन करती थीं। वे शतरंज और चौपड़ खेलकर भी अपना मनोरंजन करते थे। मुसलमान ईद, नौरोज और शब-ए-बरात इत्यादि के त्योहारों को बड़ी धूम-धाम से मनाते थे। 16वीं शताब्दी के आरंभ में हिंदू, नृत्य, गीत और संगीत के बहत शौकीन थे। वे ताश और शतरंज भी खेलते थे।

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प्रश्न 17.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की आर्थिक हालत का संक्षिप्त ब्योरा दें।
(Give a brief account of the economic condition of the Punjab in the beginning of the 16th century.)
अथवा
16वीं शताब्दी में पंजाब की आर्थिक दशा का संक्षिप्त वर्णन करें। .
(Briefly explain the economic condition of Punjab during the 16th century.)
अथवा
16वीं सदी के शुरू में पंजाब की आर्थिक दशा का वर्णन कीजिए।
(Briefly mention the economic condition of the Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में पंजाब के लोग आर्थिक तौर पर खुशहाल थे। पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। भूमि उपजाऊ होने के कारण यहाँ फ़सलों की भरपूर पैदावार होती थी। इस कारण पंजाब को भारत का अन्न भंडार की संज्ञा दी जाती थी। पंजाब के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय उद्योग था। ये उद्योग सरकारी और गैर-सरकारी दोनों तरह के थे। उस समय पंजाब में कपड़ा उद्योग, चमड़ा उद्योग और लकड़ी उद्योग बहुत प्रसिद्ध थे। उस समय पंजाब का व्यापार बड़ा विकसित था।

प्रश्न 18.
सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में पंजाब की खेती-बाड़ी संबंधी संक्षेप जानकारी दें। (Give a brief account of the agriculture of Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में पंजाब के लोगों का मुख्य कार्य खेती-बाड़ी था। पंजाब की ज़मीन बहुत उपजाऊ थी। खेती के अधीन और भूमि लाने के लिए राज्य सरकार की ओर से कृषकों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की जाती थीं। यहाँ के लोग बड़े परिश्रमी थे। सिंचाई के लिए कृषक मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करते थे किंतु नहरों, तालाबों और कुओं का प्रयोग भी किया जाता था। पंजाब की प्रमुख फ़सलें गेहूँ, जौ, मक्का, चावल, और गन्ना थीं। फ़सलों की भरपूर पैदावार होने के कारण पंजाब को भारत का अन्न भंडार कहा जाता था।

प्रश्न 19.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के उद्योग के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the Punjab industries in the beginning of the 16th century ?)
अथवा
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के प्रसिद्ध उद्योगों का विवरण दें। (Give an account of the main industries of Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
कृषि के पश्चात् पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय उद्योग था। ये उद्योग सरकारी भी थे और व्यक्तिगत भी। सरकारी उद्योग बड़े-बड़े शहरों में स्थापित थे जबकि व्यक्तिगत (निजी) गाँवों में । पंजाब के उद्योगों में वस्त्र उद्योग सर्वाधिक प्रसिद्ध था। इनमें सूती, ऊनी और रेशमी तीनों प्रकार के वस्त्र निर्मित होते थे। कपड़ा उद्योग के अतिरिक्त उस समय पंजाब में चमड़ा, शस्त्र, बर्तन, हाथी दाँत और खिलौने इत्यादि बनाने के उद्योग भी प्रचलित थे।

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प्रश्न 20.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के व्यापार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Give a brief account of the trade of Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
पंजाब का व्यापार काफ़ी विकसित था। माल के परिवहन का कार्य बनजारे करते थे। मेलों और त्योहारों के समय विशेष मंडियाँ लगाई जाती थीं। उस समय पंजाब का विदेशी व्यापार मुख्य रूप से अफ़गानिस्तान, ईरान, अरब, सीरिया, तिब्बत, भूटान और चीन इत्यादि देशों के साथ होता था। पंजाब से इन देशों को अनाज, वस्त्र, कपास, रेशम और चीनी निर्यात की जाती थी। इन देशों से पंजाब इन देशों में घोड़े, फर, कस्तुरी और मेवे आयात करता था।

प्रश्न 21.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का जीवन स्तर कैसा था? (What was the living standard of people in the beginning of the 16th century ?)
उत्तर-
उस समय पंजाब के लोगों का जीवन स्तर एक-सा नहीं था। मुसलमानों के उच्च वर्ग के लोगों के पास धन का बाहुल्य था और वे ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। वे बड़े शानदार महलों में रहते थे। हिंदुओं के उच्च वर्ग के पास धन तो बहुत था किंतु मुसलमान उनसे यह धन लूट कर ले जाते थे। समाज के मध्य वर्ग में मुसलमानों का जीवन स्तर तो अच्छा था , परंतु हिंदुओं का जीवन स्तर संतोषजनक नहीं था। समाज में निम्न श्रेणी के लोग न तो अच्छे वस्त्र पहन सकते थे न ही अच्छा भोजन खा सकते थे। वे प्रायः साहूकारों के ऋणी रहते थे।

प्रश्न 22.
16वीं शताब्दी के आरंभ में हिंदू धर्म की धार्मिक स्थिति कैसी थी ?
(What was the religious position of Hinduism in the beginning of the 16th century ?)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का प्रमुख धर्म हिंदू धर्म था। यह धर्म भारत का सबसे प्राचीन धर्म था। इस धर्म के लोग वेदों में विश्वास रखते थे। 16वीं शताब्दी में पंजाब में रामायण तथा महाभारत बहुत लोकप्रिय थे। वे अनेक देवी-देवताओं की पूजा, तीर्थ यात्राओं, नदियों में स्नान करने को बहुत पवित्र समझते थे। वे ब्राह्मणों का बहुत सम्मान करते थे। ब्राह्मणों के सहयोग के बिना कोई भी धार्मिक कार्य अधूरा समझा जाता था।

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प्रश्न 23.
इस्लाम पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Islam.)
अथवा
16वीं शताब्दी के आरंभ में इस्लाम की दशा कैसी थी ? (What was the condition of Islam in the beginning of the 16th century ?)
उत्तर-
हिंदू धर्म के पश्चात् पंजाब का दूसरा मुख्य धर्म इस्लाम था। इसकी स्थापना सातवीं शताब्दी में मक्का में हज़रत मुहम्मद साहिब द्वारा की गई थी। उन्होंने अरब समाज में प्रचलित सामाजिक-धार्मिक बुराइयों का खंडन किया। उन्होंने एक ईश्वर तथा परस्पर भ्रातृत्व का प्रचार किया। उनके अनुसार प्रत्येक मुसलमान को पाँच सिद्धांतों पर चलना चाहिए। इन सिद्धांतों को जीवन के पाच स्तंभ कहा जाता है।

प्रश्न 24.
सुन्नियों के बारे में एक संक्षेप नोट लिखें। (Write a short note on the Sunnis.)
अथवा
सुन्नी मुसलमान। . (The Sunni Musalman.)
उत्तर-
पंजाब के मुसलमानों की बहुसंख्या सुन्नियों की थी। दिल्ली सल्तनत के सभी सुल्तान तथा मुग़ल सम्राट सुन्नी थे। इसलिए उन्होंने सुन्नियों को प्रोत्साहित किया तथा उन्हें विशेष सुविधाएँ प्रदान की। उस समय नियुक्त किए जाने वाले सभी काज़ी, मुफ्ती तथा उलेमा जी कि न्याय तथा शिक्षा देने का कार्य करते थे, सुन्नी संप्रदाय से संबंधित थे। सुन्नी हज़रत मुहम्मद साहिब को अपना पैगंबर समझते थे। वे कुरान को अपना सबसे पवित्र ग्रंथ समझते थे। वे एक अल्लाह में विश्वास रखते थे। वह इस्लाम के बिना किसी अन्य धर्म के अस्तित्व को सहन करने को तैयार नहीं थे। वे हिंदुओं के कट्टर दुश्मन थे तथा उन्हें काफिर समझते थे।

प्रश्न 25.
शिया कौन थे? वर्णन करो। (Who were the Shias ? Explain.)
अथवा
शिया। (The Shias.)
उत्तर-
सुन्नियों के पश्चात् पंजाब के मुसलमानों में दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान शिया संप्रदाय को प्राप्त था। वे भी सुन्नियों की भांति हज़रत मुहम्मद साहिब को अपना पैगंबर मानते थे। वे कुरान को अपना पवित्र ग्रंथ स्वीकार करते थे। वे एक अल्लाह में विश्वास रखते थे। वे भी प्रतिदिन पाँच बार नमाज पढ़ते थे। वे भी रमज़ान के महीने में रोज़े रखते थे। वे भी मक्का की यात्रा करना आवश्यक समझते थे। शिया तथा सुन्नियों में कुछ अंतर थे। इन मतभेदों के कारण सुन्नी तथा शिया एक-दूसरे के विरोधी हो गए।

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प्रश्न 26.
उलमा कौन थे ? उनके प्रमुख कार्य क्या थे। (Who were Ulemas ? What were their main functions ?)
उत्तर-

  1. उलमा कौन थे ? उलमा इस्लाम के विद्वान थे।
  2. उलमा के कार्य- उलमा के प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे—
    • वे इस्लामी कानून (शरीअत) की व्याख्या करते थे।
    • वे सुल्तान को हिंदुओं के विरुद्ध जिहाद के लिए प्रेरित करते थे।
    • वे इस्लाम के प्रसार के लिए योजनाएँ तैयार करते थे।

प्रश्न 27.
सूफ़ी मत की मुख्य शिक्षाएँ लिखें। (Write the main teachings of Sufism.)
अथवा
सूफ़ी कौन थे? (Who were Sufies ?)
उत्तर-

  1. सूफ़ी मुसलमानों का एक प्रसिद्ध संप्रदाय था।
  2. वे एक अल्लाह में विश्वास रखते थे। वे अल्लाह को छोड़कर किसी अन्य की उपासना में विश्वास नहीं रखते थे।
  3. उनके अनुसार अल्लाह सर्वशक्तिमान् एवं सर्वव्यापक है।
  4. अल्लाह को प्राप्त करने के लिए वे पीर अथवा गुरु का होना अत्यावश्यक मानते थे। वे संगीत में विश्वास रखते थे।
  5. वे मानवता की सेवा को अपना परम धर्म मानते थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in one Word to one Sentence)

प्रश्न 1.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक दशा कैसी थी ?
अथवा
बाबर के आक्रमण के समय पंजाब की राजनीतिक दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत शोचनीय।

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प्रश्न 2.
पंजाब की राजनीतिक दशा के संबंध में गुरु नानक देव जी ने क्या फरमाया है ?
उत्तर-
प्रत्येक ओर झूठ एवं रिश्वत का बोलबाला था।

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी के जन्म के समय दिल्ली पर किस शासक का शासन था ?
अथवा
लोधी वंश का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
बहलोल लोधी।

प्रश्न 4.
सिकंदर लोधी कौन था ?
उत्तर-
भारत का सुल्तान।

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प्रश्न 5.
सिकंदर लोधी कब सिंहासन पर बैठा था ?
उत्तर-
1489 ई०।

प्रश्न 6.
इब्राहीम लोधी कब सिंहासन पर बैठा था ?
उत्तर-
1517 ई०।

प्रश्न 7.
लोधी वंश का अंतिम शासक कौन था ?
उत्तर-
इब्राहीम लोधी।

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प्रश्न 8.
दौलत खाँ लोधी कौन था ?
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी 1500 ई० से 1525 ई० तक पंजाब का सूबेदार था।

प्रश्न 9.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का शासक कौन था ?
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी।

प्रश्न 10.
पंजाब के त्रिकोणे संघर्ष से क्या भाव है ?
उत्तर-
16वीं सदी के आरंभ में इब्राहीम लोधी, दौलत खाँ लोधी तथा बाबर के मध्य चलने वाले सघंर्ष से है।

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प्रश्न 11.
बाबर कहाँ का शासक था ?
उत्तर-
काबुल।

प्रश्न 12.
बावर कौन था ?
उत्तर-
बावर काबुल का शासक था।

प्रश्न 13.
बाबर ने पंजाब पर अपना प्रथम आक्रमण कब किया ?
उत्तर-
1519 ई०।

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प्रश्न 14.
बाबर ने भारत पर आक्रमण क्यों किया ? कोई एक कारण लिखें।
उत्तर-
वह अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था।

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी ने बाबर के किस आक्रमण की तुलना ‘पाप की बारात’ से की है ?
उत्तर-
सैदपुर आक्रमण की।

प्रश्न 16.
बाबर ने सैदपुर पर आक्रमण कब किया ?
उत्तर-
1520 ई०

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प्रश्न 17.
बाबर से सैदपुर पर आक्रमण के समय किस सिख गुरु साहिबान को बंदी बना लिया था ?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी।

प्रश्न 18.
गुरु नानक देव जी को किस मुग़ल बादशाह ने गिरफ्तार किया था ?
उत्तर-
बाबर ने।

प्रश्न 19.
पानीपत की प्रथम लड़ाई कब हुई ?
उत्तर-
21 अप्रैल, 1526 ई०।

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प्रश्न 20.
पानीपत की प्रथम लड़ाई किसके मध्य हुई ?
उत्तर-
बाबर तथा इब्राहीम लोधी।

प्रश्न 21.
पानीपत की पहली लड़ाई का कोई एक महत्त्वपूर्ण परिणाम बताएँ।
उत्तर-
भारत में मुग़ल वंश की स्थापना।

प्रश्न 22.
पानीपत की प्रथम लड़ाई के पश्चात् भारत में किस वंश की स्थापना हुई ?
उत्तर-
मुग़ल वंश।

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प्रश्न 23.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का समाज किन दो प्रमुख वर्गों में विभाजित था ?
उत्तर-
मुस्लिम एवं हिंदु।

प्रश्न 24.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का मुस्लिम समाज कितने वर्गों में विभाजित था ?
उत्तर-
तीन।

प्रश्न 25.
16वीं शताब्दी पंजाब के मुस्लिम समाज की उच्च श्रेणी की कोई एक विशेषता लिखें।
उत्तर-
वे बहुत ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे।

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प्रश्न 26.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का हिंदू समाज कितनी जातियों में बँटा था ?
उत्तर-
चार।

प्रश्न 27.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में स्त्रियों की दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत अच्छी नहीं थी।

प्रश्न 28.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में मुस्लिम शिक्षा के एक प्रसिद्ध केंद्र का नाम बताएँ।
उत्तर-
लाहौर।

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प्रश्न 29.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय बताएँ।
उत्तर-
कृषि।

प्रश्न 30.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की किसी एक प्रमुख फ़सल का नाम बताएँ।
उत्तर-
गेहूँ।

प्रश्न 31.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का सर्वाधिक विख्यात उद्योग कौन-सा था ?
उत्तर-
कपड़ा उद्योग।

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प्रश्न 32.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का एक सर्वाधिक प्रसिद्ध गर्म वस्त्र तैयार करने के केंद्र का नाम बताओ।
उत्तर-
अमृतसर।

प्रश्न 33.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब से निर्यात की जाने वाली किन्हीं दो प्रमुख वस्तुओं के नाम बताएँ।
उत्तर-
वस्त्र तथा अन्न।

प्रश्न 34.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की किसी एक व्यापारिक श्रेणी का नाम बताएँ।
उत्तर-
महाजन।

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प्रश्न 35.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के योगियों की मुख्य शाखा को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-
नाथपंथी अथवा गोरखपंथी।

प्रश्न 36.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के योगियों की मुख्य शाखां को क्या कहा गया था ?
उत्तर-
वे शिव की पूजा करते थे।

प्रश्न 37.
योगियों को कनफटे योगी क्यों कहा जाता था ?
उत्तर-
क्योंकि वे कानों में बड़े-बड़े कुंडल डालते थे।।

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प्रश्न 38.
शैव मत से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
इस मत के लोग शिव जी के पुजारी थे।

प्रश्न 39.
वैष्णव मत से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
इस मत के लोग विष्णु तथा उसके अवतारों की पूजा करते थे।

प्रश्न 40.
शक्ति मत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
इस मत के लोग दुर्गा, काली आदि देवियों की पूजा करते थे।

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प्रश्न 41.
इस्लाम की स्थापना किसने की थी ?
उत्तर-
हज़रत मुहम्मद साहिब।

प्रश्न 42.
इस्लाम कितने स्तंभों में विश्वास रखता है ?
उत्तर-
पाँच।

प्रश्न 43.
चिश्ती सिलसिले के संस्थापक कौन थे ?
उत्तर-
शेख मुइनुद्दीन चिश्ती।

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प्रश्न 44.
शेख मुइनुद्दीन ने चिश्ती सिलसिले की स्थापना कहाँ की थी ?
उत्तर-
अजमेर।

प्रश्न 45.
पंजाब में चिश्ती सिलसिले का सबसे प्रसिद्ध नेता कौन था ?
उत्तर-
शेख फ़रीद जी।

प्रश्न 46.
सुहरावर्दी सिलसिले का संस्थापक कौन था?
उत्तर-
ख्वाज़ा बहाउद्दीन जकरिया।

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प्रश्न 47.
सुहरावर्दी सिलसिले की नींव कहाँ रखी गई थी ?
उत्तर-
मुलतान में।

प्रश्न 48.
सूफ़ियों का कोई एक मुख्य सिद्धांत बताएँ।
उत्तर-
वे केवल एक अल्लाह में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 49.
उलमा कौन होते थे ?
उत्तर-
वह मुसलमानों के धार्मिक नेता थे।

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प्रश्न 50.
जजिया से क्या भाव है ?
उत्तर-
गैर मुसलमानों से वसूल किया जाने वाला एक धार्मिक कर।

प्रश्न 51.
भक्ति लहर का कोई एक मुख्य सिद्धांत लिखें।
उत्तर-
एक परमात्मा में विश्वास।

प्रश्न 52.
पंजाब में भक्ति लहर का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी।

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प्रश्न 53.
पंजाब में किस धर्म का विकास हुआ ?
उत्तर-
सिख धर्म का।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक दशा बहुत……थी।
उत्तर-
(शोचनीय)

प्रश्न 2.
बहलोल लोधी ने……..में लोधी वंश की स्थापना की थी।”
उत्तर-
(1451 ई०)

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प्रश्न 3.
1469 ई० में गुरु नानक जी के जन्म समय दिल्ली का सुल्तान……था।
उत्तर-
(बहलोल लोधी)

प्रश्न 4.
इब्राहीम लोधी……..में दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।
उत्तर-
(1517 ई०)

प्रश्न 5.
दौलत खाँ लोधी पंजाब का गवर्नर ………. में बना।
उत्तर-
(1500 ई०)

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प्रश्न 6.
1519 ई० से 1526 ई० के समय दौरान पंजाब को अपने अधीन करने के लिए………..संघर्ष आरंभ हो
उत्तर-
(तिकोणा)

प्रश्न 7.
1504 ई० में बाबर……….का शासक बना।
उत्तर-
(काबुल)

प्रश्न 8.
1519 ई० से 1526 ई० के दौरान बाबर ने पंजाब पर……..आक्रमण किए थे।
उत्तर-
(पाँच)

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प्रश्न 9.
बाबर ने पंजाब पर पहला आक्रमण……….में किया।
उत्तर
(1519 ई०)

प्रश्न 10.
बाबर ने……..आक्रमण के दौरान गुरु नानक देव जी को बंदी बना लिया था।
उत्तर-
(सैदपुर)

प्रश्न 11.
पानीपत का पहला आक्रमण………को हुआ।
उत्तर-
(21 अप्रैल, 1526 ई०)

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प्रश्न 12.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का मुस्लिम समाज……..वर्गों में विभाजित था।
उत्तर-
(तीन)

प्रश्न 13.
पंजाब में मुसलमानों के उच्च शिक्षा के प्रसिद्ध केन्द्र…….और………थे।
उत्तर-
(लाहौर, मुलतान)

प्रश्न 14.
16वीं सदी के आरंभ में हिंदू समाज में ………………. को प्रमुखता प्राप्त थी।
उत्तर-
(ब्राह्मणों)

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प्रश्न 15.
16वीं सदी के आरंभ में स्त्रियों की दशा अच्छी………थी।
उत्तर-
(नही)

प्रश्न 16.
16वीं सदी के आरंभ में अधिकाँश हिंदू …………भोजन खाते थे।
उत्तर-
(शाकाहारी)

प्रश्न 17.
सदी के आरंभ में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय……….था।
उत्तर-
(कृषि)

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प्रश्न 18.
16वी सदी के आरंभ में पंजाब का सब से प्रसिद्ध उद्योग………..था।
उत्तर-
(कपड़ा उद्योग)

प्रश्न 19.
16वीं सदी के आरंभ में पंजाब में गर्म वस्त्र तैयार करने के प्रसिद्ध केंद्र…….और………था।
उत्तर-
(अमृतसर, कश्मीर)

प्रश्न 20.
16वीं सदी के आरंभ में ……… और………… पंजाब के सबसे प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र थे।
उत्तर-
(लाहौर, मुलतान)

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प्रश्न 21.
जोगी मत की स्थापना ……………. ने की थी।
उत्तर-
(गोरखनाथ)

प्रश्न 22.
……………भक्ति लहर का बानी था?
उत्तर-
(गुरु नानक देव जी)

प्रश्न 23.
इस्लाम का संस्थापक ……………. था।
उत्तर-
(हज़रत मुहम्मद साहिब)

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प्रश्न 24.
पंजाब में चिश्ती सिलसिले का सबसे प्रसिद्ध प्रचारक …………… था।
उत्तर-
(शेख फ़रीद)

(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक दशा बहुत अच्छी थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
लोधी वंश का संस्थापक सिकंदर लोधी था।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 3.
बहलोल लोधी 1451 ई० में सिंहासन पर बैठा था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 4.
सिकंदर लोधी 1489 ई० में दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 5.
इब्राहीम लोधी 1517 ई० में लोधी वंश का नया सुल्तान बना था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 6.
दौलत खाँ लोधी 1469 ई० में पंजाब का सूबेदार नियुक्त हुआ था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 7.
बाबर का जन्म 1494 ई० में हुआ था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 8.
बाबर ने 1504 ई० में काबुल पर कब्जा कर लिया था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 9.
बाबर ने भारत पर पहला आक्रमण 1519 ई० में किया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 10.
बाबर ने सैदपुर पर 1524 ई० में आक्रमण किया।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी ने बाबर के सैदपुर के आक्रमण की तुलना पाप की बारात से की है। . .
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 12.
बाबर और इब्राहिम लोधी के मध्य पानीपत की पहली लड़ाई 21 अप्रैल, 1526 ई० को हुई।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 13.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का मुस्लिम समाज दो श्रेणियों में बँटा हुआ था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 14.
मुस्लिम समाज की निम्न श्रेणी में सबसे अधिक संख्या किसानों की थी।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 15.
16वीं शताब्दी के मुस्लिम समाज में स्त्रियों का बहत सम्मान किया जाता था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 16.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में मुस्लिम शिक्षा के दो प्रसिद्ध केंद्र लाहौर और मुलतान थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 17.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के हिंदू समाज में ब्राह्मणों को प्रमुखता प्राप्त थी।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 18.
16वीं शताब्दी के आरंभ में क्षत्रियों का मुख्य व्यवसाय खेतीबाड़ी करना था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 19.
16वीं शताब्दी में स्त्रियों की दशा बड़ी शोचनीय थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 20.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय पशु पालन था।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 21.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में सब से अधिक गेहूँ की पैदावार की जाती थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 22.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग कपड़ा उद्योग था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 23.
16वीं शताब्दी में कश्मीर शालों के उद्योग के लिए अधिक प्रसिद्ध था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 24.
गोरखनाथ ने जोगियों की नाथ पंथी संप्रदाय की स्थापना की थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 25.
इस्लाम की स्थापना हज़रत मुहम्मद साहिब ने की थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 26.
चिश्ती सिलसिले की नींव शेख मुइनुद्दीन चिश्ती ने रखी थी। .
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 27.
पंजाब में चिश्ती सिलसिले का प्रमुख प्रचारक शेख फ़रीद था। .
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 28.
सुहरावर्दी सिलसिले का संस्थापक शेख बहाउद्दीन जकरिया था।
उत्तर-
ठीक

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
लोधी वंश की स्थापना किसने की थी ?
(i) बहलोल लोधी
(ii) दौलत खाँ लोधी
(iii) सिकंदर लोधी
(iv) इब्राहीम लोधी।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 2.
बहलोल लोधी कब सिंहासन पर बैठा था?
(i) 1437 ई० में
(ii) 1451 ई० में
(iii) 1489 ई० में
(iv) 1517 ई० में।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 3.
इब्राहीम लोधी कब दिल्ली के सिंहासन पर बैठा ?
(i) 1489 ई० में
(ii) 1516 ई० में
(iii) 1517 ई० में
(iv) 1526 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 4.
दौलत खाँ लोधी कौन था ?
(i) पंजाब का सूबेदार
(ii) दिल्ली का सूबेदार
(iii) अवध का सूबेदार
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 5.
दौलत खाँ लोधी किस राज्य का स्वतंत्र शासक बनना चाहता था ?
(i) मगध
(ii) दिल्ली ।
(iii) पंजाब
(iv) गुजरात।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 6.
दौलत खाँ लोधी को पंजाब का सूबेदार कब नियुक्त किया गया था?
(i) 1489 ई० में
(i) 1500 ई० में
(iii) 1517 ई० में
(iv) 1526 ई० में।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 7.
पंजाब के त्रिकोणीय संघर्ष में कौन शामिल नहीं था ?
(i) बाबर
(ii) दौलत खाँ लोधी
(iii) इब्राहीम लोधी
(iv) आलम खाँ लोधी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 8.
बाबर ने पंजाब पर प्रथम आक्रमण कब किया ?
(i) 1509 ई० में ।
(ii) 1519 ई० में
(iii) 1520 ई० में
(iv) 1524 ई० में।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 9.
बाबर ने सैदपुर पर आक्रमण कब किया था ?
(i) 1519 ई० में
(ii) 1520 ई० में
(iii) 1524 ई० में
(iv) 1526 ई० में।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 10.
बाबर के सैदपुर आक्रमण के समय कौन-से सिख गुरु साहिब को बंदी बनाया गया था ?
(i) गुरु नानक देव जी
(ii) गुरु अंगद देव जी
(iii) गुरु हरगोबिंद जी
(iv) गुरु तेग़ बहादुर जी।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 11.
बाबर और इब्राहीम लोधी के मध्य पानीपत की प्रथम लड़ाई कब हुई ?
(i) 1519 ई० में
(ii) 1525 ई० में ।
(iii) 1526 ई० में
(iv) 1556 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 12.
पानीपत की प्रथम लड़ाई में किसकी पराजय हुई ?
(i) बाबर की
(ii) महाराणा प्रताप की
(iii) इब्राहीम लोधी की
(iv) दौलत खाँ लोधी की।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 13.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का मुस्लिम समाज कितने वर्गों में विभाजित था ?
(i) दो
(ii) तीन
(iii) चार
(iv) पाँच।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 14.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के मुस्लिम समाज की उच्च श्रेणी में निम्नलिखित में से कौन शामिल नहीं थे ?
(i) मलिक
(ii) शेख
(iii) इक्तादार
(iv) व्यापारी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 15.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के मुस्लिम समाज में कौन शामिल था ?
(i) व्यापारी
(ii) सैनिक
(iii) किसान
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 16.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के मुस्लिम समाज की निम्न श्रेणी में निम्नलिखित में से कौन शामिल नहीं थे?
(i) काजी
(ii) नौकर
(iii) दास
(iv) मज़दूर।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 17.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के मुसलमानों का सबसे प्रसिद्ध शिक्षा का केंद्र कौन-सा था ?
(i) सरहिंद
(ii) जालंधर
(iii) पेशावर
(iv) लाहौर।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 18.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
(i) व्यापार
(ii) कृषि
(iii) उद्योग
(iv) पशु-पालन।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 19.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की सबसे प्रसिद्ध फ़सल कौन-सी थी ?
(i) गेहूँ
(ii) चावल
(iii) गन्ना
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 20.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग कौन-सा था?
(i) चमड़ा उद्योग
(ii) वस्त्र उद्योग
(iii) शस्त्र उद्योग
(iv) हाथी दाँत उद्योग।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 21.
16वीं शताब्दी के आरंभ में निम्नलिखित में से कौन-सा गरम कपड़ा उद्योग का केंद्र नहीं था ?
(i) जालंधर
(ii) अमृतसर
(iii) कश्मीर
(iv) काँगड़ा।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 22.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का सबसे प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र कौन-सा था ?
(i) लाहौर
(ii) लुधियाना
(iii) जालंधर
(iv) अमृतसर।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 23.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का प्रमुख धर्म कौन-सा था ?
(i) इस्लाम
(ii) हिंदू
(iii) इसाई
(iv) सिख।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 24.
योगियों की नाथपंथी शाखा की स्थापना किसने की थी ?
(i) गोरखनाथ
(ii) शिवनाथ
(iii) महात्मा बुद्ध
(iv) स्वामी महावीर।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 25.
पुराणों में विष्णु के कितने अवतारों का वर्णन किया गया है ?
(i) 5
(ii) 10
(iii) 24
(iv) 25
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 26.
16वीं शताब्दी के आरंभ में निम्नलिखित में से कौन-सा मत हिंदू धर्म के साथ संबंधित नहीं था ?
(i) शैव मत
(ii) वैष्णव मत
(iii) शक्ति मत
(iv) सूफी मत।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 27.
इस्लाम का संस्थापक कौन था ?
(i) अबु बकर
(ii) उमर
(iii) हज़रत मुहम्मद साहिब
(iv) अली।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 28.
इस्लाम की स्थापना कब की गई थी ?
(i) पाँचवीं शताब्दी में
(ii) छठी शताब्दी में
(iii) सातवीं शताब्दी में
(iv) आठवीं शताब्दी में।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 29.
इस्लाम का पहला खलीफ़ा कौन था ?
(i) अली
(ii) अबु बकर
(iii) उमर
(iv) उथमान।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 30.
सूफ़ी शेखों की विचारधारा को क्या कहा जाता है ?
(i) पीर
(i) दरगाह
(iii) तस्स वुफ़
(iv) सिलसिला।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 31.
चिश्ती सिलसिले का संस्थापक कौन था ?
(i) ख्वाजा मुइनुदीन चिश्ती
(ii) शेख बहाउदीन जकरिया
(iii) शेख फ़रीद जी
(iv) शेख निज़ामुदीन औलिया।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 32.
पंजाब में चिश्ती सिलसिले का सबसे प्रसिद्ध प्रचारक कौन था ?
(i) शेख निज़ामुद्दीन औलिया
(ii) शेख फ़रीद
(iii) शेख कुतबउदीन बख्तीआर काकी
(iv) ख्वाजा मुइनुदीन चिश्ती।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 33.
पंजाब में सुहरावर्दी सिलसिले का मुख्य केंद्र कहाँ था ?
(i) मुलतान
(ii) लाहौर
(iii) जालंधर
(iv) अमृतसर।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 34.
निम्नलिखित में से किसने कव्वाली गाने की प्रथा को आरंभ किया ?
(i) इस्लाम ने
(ii) सूफ़ियों ने
(iii) हिंदुओं ने
(iv) सिखों ने।
उत्तर-
(i)

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Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक हालत कैसी थी ? (What was the political condition of Punjab in the beginning of the 16th century ?)
अथवा
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक अवस्था ब्यान करें। (Explain the political condition of Punjab in the beginning of 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक दशा बड़ी डावाँडोल थी। लोधी सुल्तानों की गलत नीतियों के कारण चारों ओर अराजकता फैली हुई थी। शासक वर्ग भोग-विलास में डूबा हुआ था। दरबारों में प्रतिदिन जश्न मनाए जाते थे। इन जश्नों में नर्तकियाँ बड़ी संख्या में भाग लेती थीं और मदिरा के दौर चलते थे। फलस्वरूप प्रजा की ओर ध्यान देने के लिए किसी के पास समय ही नहीं था। सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट हो चुके थे। चारों ओर रिश्वत का बोलबाला था। यहाँ तक कि काजी एवं उलमा भी रिश्वत लेकर न्याय करते थे। मुसलमान हिंदुओं पर बहुत अत्याचार करते थे। उन्हें तलवार के बल पर इस्लाम धर्म में सम्मिलित किया जाता था। राज्य की शासन-व्यवस्था भंग होकर रह गई थी। ऐसी स्थिति का लाभ उठाकर पंजाब के गवर्नर दौलत खाँ लोधी ने स्वतंत्र होने का प्रयास किया। इस संबंध में उसने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया। बाबर ने दौलत खाँ लोधी को पराजित करके 1525 ई० के अंत में पंजाब पर अधिकार कर लिया था। उसने 21 अप्रैल, 1526 ई० में पानीपत के प्रथम युद्ध में सुल्तान इब्राहीम लोधी को पराजित करके भारत में मुगल वंश की स्थापना की।

प्रश्न 2.
“16वीं सदी के आरंभ में पंजाब त्रिकोणे संघर्ष का अखाड़ा था।” व्याख्या करें। . .
(“’In the beginning of the 16th century, the Punjab was a cockpit of triangular struggle.” Explain.)
अथवा
16वीं सदी के शुरू में पंजाब में ‘त्रिकोणीय संघर्ष’ का वर्णन कीजिए। (Explain the ‘Triangular struggle’ of the Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
पंजाब 16वीं सदी के आरंभ में त्रिकोणे संघर्ष का अखाड़ा था। यह त्रिकोणा संघर्ष राजसत्ता को प्राप्त करने के लिए काबुल के शासक बाबर, दिल्ली के शासक इब्राहीम लोधी तथा पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ लोधी के मध्य चल रहा था। दौलत खाँ लोधी पंजाब का स्वतंत्र शासक बनने के स्वप्न देख रहा था। इस संबंध में जब इब्राहीम लोधी को पता चला तो उसने दौलत खाँ लोधी को स्थिति को स्पष्ट करने के लिए शाही दरबार में उपस्थित होने को कहा। दौलत खाँ ने सुल्तान के क्रोध से बचने के लिए अपने छोटे पुत्र दिलावर खाँ को दिल्ली भेजा। दिल्ली पहुँचने पर इब्राहीम लोधी ने उसे बंदी बना कर कारावास में डाल दिया। दिलावर खाँ किसी प्रकार कारावास से भागने में सफल हो गया। पंजाब पहुँच कर उसने अपने पिता दौलत खाँ को दिल्ली में उसके साथ किए गए अपमानजनक व्यवहार के बारे में जानकारी दी। दौलत खाँ ने इस अपमान का बदला लेने के लिए बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया। बाबर भी इसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में था। इस त्रिकोणे संघर्ष के अंत में बाबर विजयी हुआ। उसने 1525-26 ई० में न केवल पंजाब अपितु दिल्ली पर भी कब्जा कर लिया। इस प्रकार भारत में मुग़ल वंश की स्थापना हुई।

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प्रश्न 3.
दौलत खाँ लोधी कौन था ? दौलत खौ लोधी एवं इब्राहीम लोधी के बीच संघर्ष के क्या कारण थे ?
(Who was Daulat Khan Lodhi ? What were the causes of struggle between Daulat Khan Lodhi and Ibrahim Lodhi ?)
अथवा
दौलत खाँ लोधी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Daulat Khan Lodhi.)
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी पंजाब का सूबेदार (गवर्नर) था। वह इस पद पर 1500 ई० में नियुक्त हुआ था। दौलत खाँ लोधी और सुल्तान इब्राहीम लोधी के बीच संघर्ष का मुख्य कारण यह था कि दौलत खाँ पंजाब में स्वतंत्र शासन स्थापित करने का यत्न कर रहा था। इस संबंध में उसने आलम खाँ लोधी जोकि इब्राहीम लोधी का सौतेला भाई था और जो दिल्ली का सिंहासन प्राप्त करना चाहता था, के साथ मिलकर षड्यंत्र करने आरंभ कर दिये थे। जब इन षड्यंत्रों के संबंध में इब्राहीम लोधी को ज्ञात हुआ तो उसने दौलत खाँ लोधी को शाही दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया। दौलत खाँ ने सुल्तान के क्रोध से बचने के लिए अपने छोटे पुत्र दिलावर खाँ को दिल्ली भेज दिया। जब दिलावर खाँ दिल्ली पहुंचा तो उसे बंदी बना लिया गया। उससे बहुत दुर्व्यवहार किया गया। शीघ्र ही वह किसी प्रकार कारागार से भागने और पुनः पंजाब लौटने में सफल हो गया। यहाँ पहुँच कर उसने अपने पिता दौलत खाँ को दिल्ली में उससे किए दुर्व्यवहार के संबंध में बताया। दौलत खाँ लोधी ने इस अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया। बाद में दौलत खाँ लोधी बाबर के विरुद्ध हो गया था। बाबर ने अपने पाँचवें आक्रमण के दौरान दौलत खाँ लोधी को पराजित कर पंजाब को अपने अधिकार में ले लिया था।

प्रश्न 4.
बाबर कौन था ? उसने पंजाब पर किस समय के दौरान और कितने आक्रमण किए ? इन आक्रमणों की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
(Who was Babar ? When and how many times did he invade Punjab ? Write briefly about these invasions.)
अथवा
पंजाब पर बाबर द्वारा किए गए आक्रमणों का संक्षिप्त वर्णन करें। . (Give a brief account of Babar’s invasions over Punjab.)
उत्तर-
बाबर काबुल का शासक था। उसने 1519 ई० से 1526 ई० के समय के दौरान पंजाब पर पाँच आक्रमण किए। बाबर ने पंजाब पर पहला आक्रमण 1519 ई० में किया। इस आक्रमण के दौरान बाबर ने भेरा और बाजौर नामक क्षेत्रों पर अधिकार किया। बाबर के वापस जाते ही वहाँ के लोगों ने पुनः इन क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसी वर्ष बाबर ने पंजाब पर दूसरी बार आक्रमण किया। इस बार बाबर ने पेशावर को अपने अधिकार में ले लिया। 1520 ई० में बाबर ने पंजाब पर अपने तीसरे आक्रमण के दौरान बाजौर, भेरा और स्यालकोट के प्रदेशों को अपने अधिकार में ले लिया। तत्पश्चात् बाबर ने सैदपुर पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के दौरान बाबर ने सैदपुर में भारी लूट-पाट की। मुग़ल सेनाओं ने अन्य लोगों के साथ-साथ गुरु नानक देव जी को भी बंदी बना लिया। बाद में बाबर के कहने पर उन्हें रिहा कर दिया गया। 1524 ई० में दौलत खाँ लोधी के निमंत्रण पर बाबर ने पंजाब पर चौथी बार आक्रमण किया। बाबर ने बिना किसी कठिनाई के पंजाब पर अधिकार कर लिया। बाद में दौलत खाँ लोधी बाबर के विरुद्ध हो गया। दौलत खाँ लोधी को सबक सिखाने के लिए बाबर ने पंजाब पर पाँचवीं बार नवंबर, 1525 ई० में आक्रमण किया। बाबर ने दौलत खाँ को पराजित करके पंजाब पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् बाबर ने 21 अप्रैल, 1526 ई० में पानीपत के प्रथम युद्ध में सुल्तान इब्राहीम लोधी को पराजित करके भारत में मुग़ल वंश की स्थापना की।

प्रश्न 5.
बाबर ने सैदपुर पर कब आक्रमण किया ? सिख इतिहास में इस आक्रमण का क्या महत्त्व है ? (When did Babar invade Saidpur ? What is its importance in Sikh History ?)
उत्तर-
बाबर ने सैदपुर पर 1520 ई० में आक्रमण किया। यहाँ के लोगों ने बाबर का सामना किया। फलस्वरूप बाबर ने क्रोधित होकर बड़ी संख्या में लोगों की हत्या कर दी और उनके मकानों एवं महलों को लूट-पाट करने के पश्चात् आग लगा दी गई। हजारों स्त्रियों को बंदी बना लिया गया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। गुरु नानक देव जी जो इस समय सैदपुर में ही थे, ने बाबर की सेनाओं द्वारा लोगों पर किए गए अत्याचारों का वर्णन ‘बाबर वाणी’ में किया है। बाबर की सेनाओं ने गुरु नानक देव जी को भी बंदी बना लिया था। बाद में जब बाबर को इस संबंध में ज्ञात हुआ कि उसकी सेनाओं ने किसी संत महापुरुष को बंदी बनाया है तो उसने शीघ्र ही उनकी रिहाई का आदेश दे दिया। बाबर ने अपनी आत्मकथा तुज़क-ए-बाबरी में लिखा है कि यदि उसे मालूम होता कि इस शहर में ऐसा महात्मा निवास करता है तो वह कभी भी इस शहर पर आक्रमण न करता। गुरु नानक देव जी के कहने पर बाबर ने बहत-से अन्य निर्दोष लोगों को भी रिहा कर दिया। इस प्रकार सिखों और मुग़लों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों की शुरुआत हुई।

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प्रश्न 6.
पानीपत की पहली लड़ाई के ऊपर नोट लिखें।
(Give a brief account of the First Battle of Panipat.)
अथवा
बाबर तथा इब्राहीम लोधी के मध्य युद्ध कब तथा क्यों हुआ ? (Why and when did the battle take place between Babar and Ibrahim Lodhi ?)
अथवा
पानीपत की पहली लड़ाई तथा इसके महत्त्व का संक्षेप में वर्णन करें। (Explain the First Battle of Panipat and its significance.)
उत्तर-
बाबर ने पंजाब के गवर्नर दौलत खाँ लोधी को सबक सिखाने के उद्देश्य से नवंबर, 1525 ई० में पंजाब पर पाँचवीं बार आक्रमण किया। दौलत खाँ ने थोड़ा सामना करने के पश्चात् अपने शस्त्र फेंक दिए। बाबर ने उसे क्षमा कर दिया। इस प्रकार बाबर ने एक बार फिर समूचे पंजाब को अपने अधिकार में ले लिया। पंजाब की विजय से प्रोत्साहित होकर बाबर ने इब्राहीम लोधी के साथ दो-दो हाथ करने का निर्णय किया। इस उद्देश्य से उसने अपनी सेनाओं को दिल्ली की ओर बढ़ने का आदेश दिया। जब इब्राहीम लोधी को इस संबंध में समाचार मिला तो वह अपने साथ एक लाख सैनिकों को लेकर बाबर का सामना करने के लिए पंजाब की ओर चल पड़ा। बाबर के अंतर्गत उस समय 20 हज़ार सैनिक थे। 21 अप्रैल, 1526 ई० को दोनों सेनाओं के बीच पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ। इस युद्ध में इब्राहीम लोधी की पराजय हुई और वह युद्ध-भूमि में मारा गया। पानीपत की इस निर्णयपूर्ण विजय के कारण पंजाब से लोधी वंश सदा के लिए समाप्त हो गया और अब यह मुग़ल वंश के अधीन हो गया।

प्रश्न 7.
पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर क्यों विजयी रहा ? (What led to the victory of Babar in the First battle of Panipat ?)
अथवा
भारत में बाबर की विजय और अफ़गानों की पराजय के कारणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(Give a brief account of the causes of victory of Babar and defeat of the Afghans in India.)
उत्तर-
पानीपत के युद्ध में बाबर की विजय के लिए कई कारण उत्तरदायी थे। दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोधी अपने दुर्व्यवहार और अत्याचार के कारण अपने सरदारों और प्रजा में बहुत बदनाम था। वे ऐसे शासक से छुटकारा पाना चाहते थे। इब्राहीम लोधी की सेना भी बहुत निर्बल थी। उसके बहुत-से सैनिक केवल लूटमार के उद्देश्य से एकत्रित हुए थे। उनके लड़ने के ढंग पुराने थे और उनमें योजना की कमी थी। इब्राहीम लोधी ने पानीपत में 8 दिनों तक बाबर की सेना पर आक्रमण न करके भारी राजनीतिक भूल की। यदि वह बाबर को सुरक्षा प्रबंध मज़बूत न करने देता तो शायद युद्ध का परिणाम कुछ और ही निकलता। बाबर एक योग्य सेनापति था। उसको युद्धों का काफ़ी अनुभव था। बाबर द्वारा तोपखाने के प्रयोग ने भारी तबाही मचाई। इब्राहीम लोधी के सैनिक अपने तीरकमानों और तलवारों के साथ इनका मुकाबला न कर सके। इनके कारण अफ़गानों की पराजय हुई और बाबर विजयी रहा।

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प्रश्न 8.
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की सामाजिक अवस्था का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(Explain the social condition of Punjab in the beginning of the 16th century.)
अथवा
गुरु नानक देव जी के जन्म समय पंजाबियों की सामाजिक दशा के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the social condition of Punjab at the time of birth of Guru Nanak Dev ?)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का समाज दो मुख्य वर्गों मुसलमान और हिंदू में बंटा हुआ था। शासक वर्ग से संबंधित होने के कारण मुसलमानों को समाज में विशेष अधिकार प्राप्त थे। वे राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त थे। दूसरी ओर हिंदुओं को लगभग सारे अधिकारों से वंचित रखा गया था। मुसलमान उनको काफ़िर कहते थे। मुसलमान हिंदुओं पर इतने अत्याचार करते थे कि बहुत-से हिंदू मुसलमान बनने के लिए विवश हो गए। उस समय समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत दयनीय थी। उच्च श्रेणी के मुसलमानों के वस्त्र बहुत बहुमूल्य होते थे। ये वस्त्र रेशम और मखमल के बने होते थे। शिकार, घुड़दौड़, शतरंज, नाच-गाने, संगीत, जानवरों की लड़ाइयाँ और ताश उस समय के लोगों के मनोरंजन के मुख्य साधन थे।

प्रश्न 9.
सोलहवीं शताब्दी के शुरू में पंजाब में स्त्रियों की स्थिति कैसी थी ? (What was the condition of women in Punjab in the beginning of the 16th century ?)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के शुरू में पंजाब में स्त्रियों की दशा बहुत शोचनीय थी। हिंदू समाज में स्त्रियों का स्थान पुरुषों के बराबर नहीं था। उनको घर की चारदीवारी के अंदर बंद रखा जाता था। उस समय बहुत-सी लड़कियों को जन्म लेते ही मार दिया जाता था। उस समय लड़कियों का विवाह अल्पायु में कर दिया जाता था। बाल विवाह के कारण उनकी शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया जाता था। उस समय सती प्रथा भी पूरे जोरों पर थी। विधवा को पुनः शादी करने की आज्ञा नहीं थी। मुस्लिम समाज में भी स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। समाज की ओर से उन पर कई प्रतिबंध लगाए गए थे। वेश्या प्रथा, तलाक प्रथा और पर्दा प्रथा के कारण उनकी हालत बड़ी दयनीय हो गई थी। मुस्लिम समाज में उच्च वर्ग की स्त्रियों को कुछ विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं पर इनकी संख्या बहुत कम थी।

प्रश्न 10.
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में मुस्लिम समाज किन-किन श्रेणियों में बंटा हुआ था और वे कैसा जीवन व्यतीत करते थे ?
(In to which classes were the Muslim society of the Punjab divided and what type of the life did they lead in the beginning of the 16th century ?)
अथवा
16वीं सदी के शुरू में पंजाब के समाज में मुसलमानों की श्रेणियों का वर्णन करें।
(Give an account of the Muslim Classes of Punjab in the beginning of the. 16th Century.)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों में बंटा हुआ था—

1. उच्च श्रेणी-उच्च श्रेणी में अमीर, खान, शेख, काज़ी और उलमा शामिल थे। इस श्रेणी के लोग बड़े ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। वे बड़े-बड़े महलों में रहते थे। वे अपना अधिकतर समय जश्न मनाने में व्यतीत करते थे। उलमा तथा काज़ी मुसलमानों के धार्मिक नेता थे। इनका मुख्य कार्य इस्लामी कानूनों की व्याख्या करना तथा लोगों को न्याय देना था।

2. मध्य श्रेणी-मध्य श्रेणी में व्यापारी, सैनिक, किसान और राज्य के छोटे-छोटे कर्मचारी सम्मिलित थे। उनके जीवन तथा उच्च श्रेणी के लोगों के जीवन में काफ़ी अंतर था। परंतु उनका जीवन स्तर हिंदुओं की उच्च श्रेणी के मुकाबले बहुत अच्छा था।

3. निम्न श्रेणी-इस श्रेणी में अधिकतर दास-दासियाँ एवं मज़दूर सम्मिलित थे। इनका जीवन अच्छा नहीं था। उन्हें अपना जीवन निर्वाह करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। उनको अपने स्वामी के अत्याचारों को सहन करना पड़ता था।

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प्रश्न 11.
16वीं सदी के आरंभ में पंजाब के समाज में मुसलमानों की सामाजिक अवस्था किस प्रकार थी ?
(What was the social condition of Muslims of Punjab in the beginning of the 16th century ?)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के मुस्लिम समाज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—

1. समाज तीन वर्गों में विभाजित था-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब का मुस्लिम समाज उच्च वर्ग, मध्य वर्ग और निम्न वर्ग में विभाजित-था।

i) उच्च वर्ग-इस वर्ग में अमीर, खान, शेख़, मलिक, इकतादार, उलमा और काज़ी इत्यादि शामिल थे। इस वर्ग के लोग बहुत ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। वे बहुत भव्य महलों में निवास करते थे। उन की सेवा के लिए बड़ी संख्या में नौकर होते थे।

ii) मध्य वर्ग—इस श्रेणी में सैनिक, व्यापारी, कृषक, विद्वान्, लेखक और राज्य के छोटे कर्मचारी शामिल थे। उनके जीवन तथा उच्च वर्ग के लोगों के जीवन-स्तर में बहुत अंतर था। किंतु हिंदुओं की तुलना में वे बहुत अच्छा जीवन बिताते थे।

iii) निम्न वर्ग-इस वर्ग में दास-दासियाँ, नौकर और श्रमिक शामिल थे। इनकी संख्या बहुत अधिक थी। उनका जीवन अच्छा नहीं था। उनके स्वामी उन पर बहुत अत्याचार करते थे।

2. स्त्रियों की दशा-मुस्लिम समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी। वे बहुत कम शिक्षित होती थीं। बहुविवाह और तलाक प्रथा ने उनकी दशा और दयनीय बना दी थी।

3. भोजन-उच्च वर्ग के मुसलमान कई प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाते थे। वे माँस, हलवा, पूड़ी और मक्खन इत्यादि का बहुत प्रयोग करते थे। निम्न वर्ग से संबंधित लोगों का भोजन साधारण होता था।

4. पहनावा-उच्च वर्ग के मुसलमानों के वस्त्र बहुमूल्य होते थे। ये वस्त्र रेशम और मखमल से निर्मित थे। निम्न वर्ग के लोग सूती वस्त्र पहनते थे। पुरुषों में कुर्ता और पायजामा पहनने की, जबकि स्त्रियों में लंबा बुर्का पहनने की प्रथा थी।

5. शिक्षा-16वीं शताब्दी के आरंभ में मुसलमानों को शिक्षा देने का कार्य उलमा और मौलवी करते थे। वे मस्जिदों, मकतबों और मदरसों में शिक्षा देते थे। मस्जिदों और मकतबों में प्रारंभिक शिक्षा दी जाती थी, जबकि मदरसों में उच्च शिक्षा। उस समय मुसलमानों के पंजाब में सबसे प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र लाहौर और मुलतान में थे।

6. मनोरंजन के साधन-16वीं शताब्दी के आरंभ में मुसलमान अपना मनोरंजन कई साधनों से करते थे। वे शिकार करने, चौगान खेलने, जानवरों की लड़ाइयाँ देखने और घुड़दौड़ में भाग लेने के बहुत शौकीन थे। वे अपने त्योहारों को बड़ी धूम-धाम से मनाते थे।

प्रश्न 12.
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के समाज में हिंदुओं की सामाजिक अवस्था कैसी थी ?
(What was the social condition of the Hindus of Punjab in the beginning of the 16th century ?)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में हिंदू समाज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—

1. जाति प्रथा—हिंदू समाज कई जातियों व उप-जातियों में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान ब्राह्मणों को प्राप्त था। मुस्लिम शासन की स्थापना के कारण क्षत्रियों ने नए व्यवसाय जैसे दुकानदारी, कृषि इत्यादि अपना लिए थे। वैश्य व्यापार और कृषि का ही व्यवसाय करते थे। निम्न जातियों के साथ इस काल में दुर्व्यवहार किया जाता था।

2. स्त्रियों की दशा-हिंदू समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी। समाज में उनका स्तर पुरुषों के समान नहीं था। लड़कियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। उनका अल्पायु में ही विवाह कर दिया जाता था। इस काल में सती प्रथा बहुत ज़ोरों पर थी। विधवा को पुनर्विवाह करने की अनुमति नहीं थी।

3. खान-पान—हिंदुओं का भोजन साधारण होता था। अधिकाँश हिंदू शाकाहारी होते थे। उनका भोजन गेहूँ, चावल, सब्जियाँ, घी और दूध इत्यादि से तैयार किया जाता था। वे माँस, लहसुन और प्याज़ का प्रयोग नहीं करते थे। गरीब लोग साधारण रोटी के साथ लस्सी पीकर अपना निर्वाह करते थे।

4. पहनावा—हिंदुओं का पहनावा बहुत साधारण होता था। वे प्रायः सूती वस्त्र पहनते थे। पुरुष धोती और कुर्ता पहनते थे। वे सिर पर पगड़ी भी बाँधते थे। स्त्रियाँ साड़ी, चोली और लहंगा पहनती थीं। निर्धन लोग चादर से ही अपना शरीर ढाँप लेते थे।

5.  मनोरंजन के साधन-हिंदू नृत्य, गीत और संगीत के बहुत शौकीन थे। वे ताश और शतरंज भी खेलते थे। गाँवों के लोग जानवरों की लड़ाइयाँ और मल्लयुद्ध देखकर अपना मनोरंजन करते थे। इसके अतिरिक्त हिंदू अपने त्योहारों दशहरा, दीवाली, होली आदि में भी भाग लेते थे।

6. शिक्षा-16वीं शताब्दी के आरंभ में हिंदू लोग ब्राह्मणों से मंदिरों और पाठशालाओं में शिक्षा प्राप्त करते थे। पंजाब में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु हिंदुओं का कोई केंद्र नहीं था। धनी वर्ग के हिंदू मदरसों से उच्च शिक्षा प्राप्त करते थे।

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प्रश्न 13.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में प्रचलित शिक्षा प्रणाली के बारे में संक्षेप जानकारी दें।
(Give a brief account of prevalent education in the Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई थी। मुसलमानों को शिक्षा देने का कार्य उलमा और मौलवी करते थे। वे मस्जिदों, मकतबों और मदरसों में शिक्षा देते थे। राज्य सरकार उन्हें अनुदान देती थी। मस्जिदों और मकतबों में प्रारंभिक शिक्षा दी जाती थी जबकि मदरसों में उच्च शिक्षा। मदरसे प्रायः शहरों में ही होते थे। उस समय मुसलमानों के पंजाब में सबसे अधिक शिक्षा केंद्र लाहौर और मलतान में थे। इनके अतिरिक्त जालंधर, सुल्तानपुर, समाना, नारनौल, भटिंडा, सरहिंद, स्यालकोट और काँगड़ा भी शिक्षा के प्रसिद्ध केंद्र थे। हिंदू लोग ब्राह्मणों से मंदिरों और पाठशालाओं में शिक्षा प्राप्त करते थे। इनमें प्रारंभिक शिक्षा के संबंध में जानकारी दी जाती थी। पंजाब में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु हिंदुओं का कोई केंद्र नहीं था। धनी वर्ग के हिंदू अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए मुसलमानों के मदरसों में भेज देते थे। उनकी संख्या न के बराबर थी क्योंकि मुसलमान हिंदुओं को घृणा की दृष्टि से देखते थे।

प्रश्न 14.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों के मनोरंजन के मुख्य साधन क्या थे ?
(What were the main means of entertainment of the people of Punjab in the beginning of the 16th century ?)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में मुसलमान अपना मनोरंजन कई साधनों से करते थे। वे शिकार करने, चौगान खेलने, जानवरों की लड़ाइयाँ देखने और घुड़दौड़ में भाग लेने के बहुत शौकीन थे। वे समारोहों और महफिलों में बढ़कर भाग लेते थे। इनमें संगीतकार और नर्तकियाँ उनका मनोरंजन करती थीं। वे शतरंज और चौपड़ खेलकर भी अपना मनोरंजन करते थे। मुसलमान ईद, नौरोज और शब-ए-बरात इत्यादि के त्योहारों को बड़ी धूम-धाम से मनाते थे। 16वीं शताब्दी के आरंभ में हिंदू, नृत्य, गीत और संगीत के बहुत शौकीन थे। वे ताश और शतरंज भी खेलते थे। गाँवों के लोग जानवरों की लड़ाइयाँ और मल्लयुद्ध देखकर अपना मनोरंजन करते थे। इनके अतिरिक्त हिंदू अपने त्योहारों में भी भाग लेते थे।

प्रश्न 15.
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की आर्थिक हालत का संक्षिप्त ब्योरा दें।
(Give a brief account of the economic condition of the Punjab in the beginning of the 16th century.)
अथवा
16वीं शताब्दी में पंजाब की आर्थिक हालत का वर्णन करें।
(Briefly explain the economic condition of Punjab during the 16th century.)
अथवा
16वीं सदी के शुरू में पंजाब की आर्थिक दशा का वर्णन कीजिए।
(Briefly mention the economic condition of the Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों की आर्थिक दशा बहुत अच्छी थी। उपजाऊ भूमि, विकसित व्यापार तथा लोगों के परिश्रम ने पंजाब को एक समृद्ध प्रदेश बना दिया। 16वीं शताब्दी के पंजाब के लोगों के आर्थिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. कृषि-16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। पंजाब की भूमि बहुत उपजाऊ थी। सिंचाई के लिए कृषक मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करते थे। यहाँ पर फसलों की भरपूर पैदावार होती थी। यहाँ की मुख्य फसलें गेहूँ, कपास, जौ, मकई, चावल और गन्ना थीं। फसलों की भरपूर उपज होने के कारण पंजाब को भारत का अन्न भंडार कहा जाता था।

2. उद्योग-कृषि के पश्चात् पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय उद्योग था। ये उद्योग सरकारी भी थे और व्यक्तिगत भी। पंजाब के उद्योगों में वस्त्र उद्योग सर्वाधिक प्रसिद्ध था। यहाँ सूती, ऊनी और रेशमी तीनों प्रकार के वस्त्र निर्मित होते थे। कपड़ा उद्योग के अतिरिक्त उस समय पंजाब में चमड़ा, शस्त्र, बर्तन, हाथी दाँत और खिलौने इत्यादि बनाने के लिए उद्योग भी प्रचलित थे।

3. पशु पालन-पंजाब के कुछ लोग पशु पालन का व्यवसाय करते थे। पंजाब में पालतू रखे जाने वाले मुख्य पशु गाय, बैल, भैंसे, घोड़े, खच्चर, ऊँट, भेड़ें और बकरियाँ इत्यादि थे। इन पशुओं से दूध, ऊन और भार ढोने का काम लिया जाता था।

4. व्यापार–पंजाब का व्यापार काफ़ी विकसित था। व्यापार का कार्य कुछ विशेष श्रेणियों के हाथ में होता था। पंजाब का विदेशी व्यापार मुख्य रूप से अफ़गानिस्तान, ईरान, अरब, सीरिया, तिब्बत, भूटान और चीन इत्यादि देशों के साथ होता था। पंजाब से इन देशों को अनाज, वस्त्र, कपास, रेशम और चीनी निर्यात की जाती थी। इन देशों से पंजाब घोड़े, फर, कस्तूरी और मेवे आयात करता था।

5. व्यापारिक नगर-16वीं शताब्दी के आरंभ में लाहौर और मुलतान पंजाब के दो प्रसिद्ध व्यापारिक नगर थे। इनके अतिरिक्त पेशावर, जालंधर, अमृतसर तथा लुधियाना पंजाब के अन्य प्रसिद्ध व्यापारिक नगर थे।

6. जीवन स्तर-उस समय पंजाब के लोगों के जीवन स्तर में बहुत अंतर था। मुसलमानों के उच्च वर्ग के लोगों के पास धन का बाहुल्य था। हिंदुओं के उच्च वर्ग के पास धन तो बहुत था, किंतु मुसलमान उनसे यह धन लूट कर ले जाते थे। समाज के मध्य वर्ग में मुसलमानों का जीवन स्तर तो अच्छा था, परंतु हिंदू अपना निर्वाह बहुत मुश्किल से करते थे। समाज में निर्धनों और कृषकों का जीवन-स्तर बहुत निम्न था।

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प्रश्न 16.
सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में पंजाब की खेती-बाड़ी संबंधी संक्षेप जानकारी दें। (Give a brief account of the agriculture of Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में पंजाब के लोगों का मुख्य कार्य खेती-बाड़ी था। पंजाब की जमीन बहुत उपजाऊ थी। खेती के अधीन और भूमि लाने के लिए राज्य सरकार की ओर से कृषकों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की जाती थीं। यहाँ के लोग बड़े परिश्रमी थे। सिंचाई के लिए कृषक मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करते थे किंतु नहरों, तालाबों और कुओं का प्रयोग भी किया जाता था। इन कारणों से चाहे पंजाब के कृषक पुराने ढंग से खेती करते थे तब भी यहाँ फसलों की भरपूर पैदावार होती थी। पंजाब की प्रमुख फसलें गेहूँ, जौ, मक्का , चावल और गन्ना थीं। इनके अतिरिक्त पंजाब में कपास, बाजरा, ज्वार, सरसों और कई किस्मों की दालें भी पैदा की जाती थीं। फसलों की भरपूर पैदावार होने के कारण पंजाब को भारत का अन्न भंडार कहा जाता था।

प्रश्न 17.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के उद्योग के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the Punjab Industries in the beginning of the 16th century ?)
अथवा
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के प्रसिद्ध उद्योगों का विवरण दें। (Give an account of the main industries of Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
कृषि के पश्चात् पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय उद्योग था। ये उद्योग सरकारी भी थे और व्यक्तिगत भी। सरकारी उद्योग बड़े-बड़े शहरों में स्थापित थे जबकि व्यक्तिगत (निजी) गाँवों में। पंजाब के उद्योगों में वस्त्र उद्योग सर्वाधिक प्रसिद्ध था। वहाँ सूती, ऊनी और रेशमी तीनों प्रकार के वस्त्र निर्मित होते थे। क्योंकि पंजाब के उच्च वर्ग के लोगों में रेशमी वस्त्र की बहुत माँग थी, इसलिए पंजाब में यह वस्त्र अधिक मात्रा में तैयार किया जाता था। समाना, सुनाम, सरहिंद, दीपालपुर, जालंधर, लाहौर और मुलतान इस उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र थे। गुजरात और स्यालकोट में चिकन के वस्त्र तैयार किए जाते थे। मुलतान और सुल्तानपुर शीट के वस्त्रों के लिए विख्यात थे। स्यालकोट में धोतियाँ, साड़ियाँ, पगड़ियाँ और बढ़िया कढ़ाई वाली लुंगियाँ तैयार की जाती थीं। अमृतसर, काँगड़ा और कश्मीर गर्म वस्त्र तैयार करने के प्रसिद्ध केंद्र थे। कपड़ा उद्योग के अतिरिक्त उस समय पंजाब में चमड़ा, शस्त्र, बर्तन, हाथी दाँत और खिलौने इत्यादि बनाने के लिए उद्योग भी प्रचलित थे।

प्रश्न 18.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के व्यापार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Give a brief account of the trade of Punjab in the beginning of the 16th century.)
उत्तर-
पंजाब का व्यापार काफ़ी विकसित था। व्यापार का कार्य कुछ विशेष श्रेणियों के हाथ में होता था। हिंदुओं की क्षत्रिय, महाजन, बनिये, सूद और अरोड़ा नामक जातियाँ तथा मुसलमानों की बोहरा और खोजा नामक जातियाँ व्यापार का कार्य करती थीं। माल के परिवहन का कार्य बनजारे करते थे। व्यापारी चोरों, डाकुओं के भय से काफिलों के रूप में चलते थे। उस समय हुंडी बनाने की भी प्रथा थी। शाहूकार ब्याज पर पैसा देते थे। मेलों और त्योहारों के समय विशेष मंडियाँ लगाई जाती थीं। पंजाब में ऐसी मंडियाँ मुलतान, लाहौर, जालंधर, दीपालपुर, सरहिंद, सुनाम और समाना इत्यादि स्थानों पर लगाई जाती थीं। इन मंडियों से बड़ी संख्या में लोग अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ खरीदते थे। पशुओं के व्यापार के लिए भी पंजाब में विशेष मंडियाँ लगती थीं। उस समय पंजाब का विदेशी व्यापार मुख्य रूप से अफ़गानिस्तान, ईरान, अरब, सीरिया, तिब्बत, भूटान और चीन इत्यादि देशों के साथ होता था। पंजाब से इन देशों को अनाज, वस्त्र, कपास, रेशम और चीनी निर्यात की जाती थी। इन देशों से पंजाब घोड़े, फर, कस्तूरी और मेवे आयात करता था।

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प्रश्न 19.
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का जीवन स्तर कैसा था ? (What was the living standard of people in the beginning of the 16th century ?)
उत्तर-
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब के लोगों का जीवन स्तर एक-सा नहीं था। मुसलमानों के उच्च वर्ग के लोगों के पास धन का बाहुल्य था और वे ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। वे बड़े शानदार महलों में रहते थे। उनकी पोशाकें बहुत कीमती होती थीं तथा वे विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खाते थे। सुरा तथा सुंदरी उनके जीवन का एक अभिन्न अंग था। उनकी सेवा के लिए बड़ी संख्या में नौकर, दास तथा दासियाँ होती थीं। हिंदुओं के उच्च वर्ग के पास धन तो बहुत था किंतु मुसलमान उनसे यह धन लूट कर ले जाते थे। इसलिए वे अपना धन छुप कर खर्च करते थे। समाज के मध्य वर्ग में मुसलमानों का जीवन स्तर तो अच्छा था, परंतु हिंदुओं का जीवन स्तर संतोषजनक नहीं था। हिंदू अपना निर्वाह बहुत मुश्किल से करते थे। समाज में निर्धनों और कृषकों का जीवन स्तर बहुत निम्न था। वे न तो अच्छे वस्त्र पहन सकते थे न ही अच्छा भोजन खा सकते थे। वे प्रायः साहूकारों के ऋणी रहते थे।

Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।

1
बहलोल लोधी की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र सिकंदर लोधी 1489 ई० में दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। उसने 1517 ई० तक शासन किया। मुस्लिम इतिहासकारों की दृष्टि में वह एक बहुत ही न्यायप्रिय और दयालु सुल्तान था परंतु उसकी न्यायप्रियता और दया केवल मुसलमानों तक ही सीमित थी। वह फिरोजशाह तुग़लक तथा औरंगजेब की भाँति एक कट्टर मुसलमान था। वह हिंदुओं को बहुत घृणा की दृष्टि से देखता था। उसने हिंदुओं के प्रति बहुत कठोर और अत्याचारपूर्ण नीति अपनाई। उसने हिंदुओं के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों को नष्ट कर दिया था तथा उनके स्थानों पर मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसने हिंदुओं का यमुना में स्नान करने पर प्रतिबंध लगा दिया। उसने हिंदुओं को बलपूर्वक इस्लाम धर्म में शामिल करना आरंभ कर दिया। उसने बोधन नामक एक ब्राह्मण को इसलिए मृत्यु के घाट उतार दिया क्योंकि उसने हिंदू धर्म को इस्लाम धर्म के समान अच्छा कहा था।

  1. सिकंदर लोधी कौन था ?
  2. सिकंदर लोधी कब सिंहासन पर बैठा ?
    • 1485 ई०
    • 1486 ई०
    • 1487 ई०
    • 1489 ई०
  3. मुस्लिम इतिहासकार सिकंदर लोधी को कैसा सुल्तान मानते थे ?
  4. सिकंदर लोधी ने हिंदुओं के प्रति कौन-सा कदम उठाया ?
  5. सिकंदर लोधी ने बोधन ब्राह्मण को क्यों मौत के घाट उतार दिया था ?

उत्तर-

  1. सिकंदर लोधी दिल्ली का सुल्तान था । उसने 1489 ई० से 1517 ई० तक शासन किया।
  2. 1489 ई०।
  3. एक बहुत ही न्यायप्रिय व दयालु सुल्तान।
  4. उसने हिंदुओं को ज़बरदस्ती इस्लाम धर्म में शामिल कर लिया।
  5. उसने हिंदू धर्म को इस्लाम धर्म के बराबर अच्छा कहा था।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 3 16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा

2
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में प्रजा की दशा बहुत दयनीय थी। शासक वर्ग जश्नों में अपना समय व्यतीत करते थे। ऐसी स्थिति में प्रजा की ओर किसी का ध्यान ही नहीं था। सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट हो चुके थे। चारों ओर रिश्वत का बोलबाला था। सुल्तान तो सुल्तान, काज़ी और उलेमा भी रिश्वत लेकर न्याय देते थे। हिंदुओं पर अत्याचार बहुत बढ़ गए थे। उन्हें तलवार की नोक पर बलपूर्वक इस्लाम धर्म में शामिल किया जाता था।

  1. 16वीं सदी के आरंभ में प्रजा की हालत कैसी थी ?
  2. 16वीं सदी के आरंभ में सरकारी कर्मचारियों का आचरण कैसा था ?
  3. 16वीं सदी के आरंभ में सुल्तान, काज़ी तथा उलेमा न्याय कैसे करते थे ?
  4. 16वीं सदी के आरंभ में राज्य की ओर से क्या नीति अपनाई जाती थी ?
  5. 16वीं शताब्दी में शासक वर्ग ……… में अपना समय व्यतीत करते थे।

उत्तर-

  1. 16वीं सदी के आरंभ में प्रजा की हालत दयनीय थी।
  2. उस समय सरकारी कर्मचारी बहुत भ्रष्ट हो चुके थे।
  3. उस समय सुल्तान, काजी तथा उलेमा रिश्वत लेकर न्याय करते थे।
  4. उस समय राज्य की ओर से हिंदुओं पर बहुत अत्याचार किए जाते थे।
  5. जश्नों ।

3
16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की सामाजिक दशा भी बहुत दयनीय थी। उस समय समाज हिंदू और मुसलमान नामक दो मुख्य वर्गों में विभाजित था। क्योंकि मुसलमान शासक वर्ग से संबंध रखते थे, इसलिए उन्हें समाज में विशेष अधिकार प्राप्त थे। उन्हें राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। दूसरी ओर हिंदू जोकि जनसंख्या के अधिकाँश भाग से संबंधित थे, को लगभग सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था। उन्हें काफिर और जिम्मी कहकर पुकारा जाता था। मुसलमान हिंदुओं पर इतने अत्याचार करते थे कि बहुत-से हिंदू मुसलमान बनने पर विवश हो गए थे।

  1. 16वीं सदी के आरंभ में पंजाब की सामाजिक दशा को बहुत खराब क्यों माना जाता था ?
  2. 16वीं सदी के आरंभ में किन लोगों को अधिकारों से वंचित रखा गया था ?
  3. काफ़िर किसे कहा जाता था ?
  4. जज़िया क्या था ?
  5. मुसलमान ………… वर्ग से संबंध रखते थे।

उत्तर-

  1. क्योंकि समाज में स्त्रियों की हालत बड़ी दयनीय थी।
  2. हिंदुओं को।
  3. गैर-मुसलमानों को काफ़िर समझा जाता था।
  4. जज़िया हिंदुओं से लिया जाने वाला एक कर था।
  5. शासक।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 3 16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दशा

4
16वीं शताब्दी के आरंभ में शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई थी। मुसलमानों को शिक्षा देने का कार्य उलेमा और मौलवी करते थे। वे मस्जिदों, मकतबों और मदरसों में शिक्षा देते थे। राज्य सरकार उन्हें अनुदान देती थी। मस्जिदों और मकतबों में प्रारंभिक शिक्षा दी जाती थी जबकि मदरसों में उच्च शिक्षा। मदरसे प्रायः शहरों में ही होते थे। उस समय मुसलमानों के पंजाब में सबसे प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र लाहौर और मुलतान में थे। इनके अतिरिक्त जालंधर, सुल्तानपुर, समाना, नारनौल, बठिंडा, सरहिंद, स्यालकोट और काँगड़ा भी शिक्षा के प्रसिद्ध केंद्र थे।

  1. 16वीं सदी के आरंभ में शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति क्यों नहीं हुई थी ?
  2. क्या मौलवी मुसलमानों को शिक्षा देने का कार्य करते थे ?
  3. मुसलमानों को आरंभिक शिक्षा कहाँ दी जाती थी ?
  4. 16वीं शताब्दी के आरंभ में मुसलमानों की शिक्षा का कोई एक प्रसिद्ध केंद्र का नाम लिखें।
  5. मदरसे प्रायः …………… में होते थे।

उत्तर-

  1. 16वीं शताब्दी के आरंभ में शिक्षा देने की जिम्मेवारी सरकार की नहीं होती थी।
  2. हाँ, मौलवी मुसलमानों को शिक्षा देने का कार्य करते थे।
  3. मुसलमानों को आरंभिक शिक्षा मस्जिदों तथा मकतबों में दी जाती थी।
  4. 16वीं सदी के आरंभ में मुसलमानों की शिक्षा का एक प्रसिद्ध केंद्र लाहौर था।
  5. शहरों।

5
सूफी मत 16वीं शताब्दी के आरंभ में पंजाब में बहुत लोकप्रिय था। सूफी संत शेख अथवा पीर के नाम से भी जाने जाते थे। वे एक अल्लाह में विश्वास रखते थे। वे अल्लाह को छोड़ कर किसी अन्य की पूजा में विश्वास नहीं रखते थे। उनके अनुसार अल्लाह सर्वशक्तिमान् है और वह प्रत्येक स्थान पर विद्यमान है। अल्लाह को प्राप्त करने के लिए वे प्रेम भावना पर बल देते थे। वे धर्म के बाह्याडंबरों में विश्वास नहीं रखते थे। अल्लाह को प्राप्त करने के लिए वे पीर अथवा गुरु का होना अत्यावश्यक मानते थे। वे संगीत में भी विश्वास रखते थे। उन्होंने कव्वाली गाने की प्रथा चलाई। मनुष्य की सेवा करना वे आवश्यक मानते थे। उनका जाति-प्रथा में कोई विश्वास नहीं था। वे अन्य धर्मों का आदर करते थे। सूफ़ी शेखों की विचारधारा को तस्सवुफ़ भी कहा जाता है।

  1. सूफ़ी मत किस धर्म से संबंधित था ?
  2. सूफ़ी शेख अन्य किस नाम से जाने जाते थे ?
  3. सूफ़ी शेखों की विचारधारा को क्या कहा जाता है ?
  4. सूफी मत का कोई एक सिद्धांत लिखें।
  5. अल्लाह को प्राप्त करने के लिए सूफ़ी किस का होना आवश्यक मानते थे ?
    • पीर
    • कव्वाली
    • दरगाह
    • उपरोक्त सारे।

उत्तर-

  1. सूफी मत इस्लाम धर्म से संबंधित था।
  2. सूफ़ी शेख ‘पीर’ के नाम से जाने जाते थे।
  3. सूफ़ी शेखों की विचारधारा को तस्सवुफ़ कहा जाता था।
  4. वह एक अल्लाह में विश्वास रखते हैं।
  5. पीर।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 सन्तुलित भोजन

Punjab State Board PSEB 10th Class Home Science Book Solutions Chapter 7 सन्तुलित भोजन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Home Science Chapter 7 सन्तुलित भोजन

PSEB 10th Class Home Science Guide सन्तुलित भोजन Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सन्तुलित भोजन से आप क्या समझते हो?
उत्तर-
सन्तुलित भोजन से भाव ऐसी मिली-जुली खुराक से है जिसमें भोजन के सभी आवश्यक तत्त्व जैसे, प्रोटीन, कार्बोज़, विटामिन, खनिज लवण आदि पूरी मात्रा में हों। भोजन न केवल माप-तोल में पूरा हो बल्कि गुणकारी भी हो ताकि मनुष्य की मानसिक
वृद्धि भी हो सके तथा बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी बनी रहे। सन्तुलित भोजन सभी व्यक्तियों के लिए एक-सा नहीं हो सकता। शारीरिक मेहनत करने वाले व्यक्तियों के लिए जो भोजन सन्तुलित होगा वह एक दफ्तर में काम करने वाले से भिन्न होगा।

प्रश्न 2.
भोजन को किन-किन भोजन समूहों में बांटा जा सकता है और क्यों?
उत्तर–
प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक तन्दुरुस्ती के लिए सन्तुलित भोजन का प्राप्त होना आवश्यक है जिसमें प्रोटीन, कार्बोज़, विटामिन, खनिज लवण पूरी मात्रा में हों। परन्तु ये सभी वस्तुएँ एक तरह के भोजन से प्राप्त नहीं हो सकतीं। इसलिए भोजन को उनके खुराकी तत्त्वों के आधार पर निम्नलिखित समूहों में विभाजित किया जाता है

  1. अनाज
  2. दालें
  3. सूखे मेवे
  4. सब्जियां
  5. फल
  6. दूध और दूध से बने पदार्थ
  7. मक्खन घी तेल
  8. मीट, मछली, अण्डे
  9. शक्कर, गुड़
  10. मसाले, चटनी आदि।

प्रश्न 3.
भोजन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
वे सभी पदार्थ जो हम खाते हैं (दवाइयां और शराब को छोड़कर) जिनसे हमारा शरीर बनता और बढ़ता है, को भोजन कहा जाता है। भोजन से हमारे शरीर में गर्मी और ऊर्जा पैदा होती है। इससे शरीर अपनी क्रियाएं करने के योग्य हो जाता है और अपने टूटे हुए सैलों की मुरम्मत भी कर सकता है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 सन्तुलित भोजन

प्रश्न 4.
दालों में कौन-से पौष्टिक तत्त्व होते हैं और अधिक मात्रा किसकी होती है?
उत्तर-
दालें जैसे मूंग, मोठ, मांह, राजमांह, चने आदि में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। इनमें 20-25 प्रतिशत प्रोटीन होती है। इसके अतिरिक्त विटामिन ‘बी’ खनिज पदार्थ विशेष रूप में कैल्शियम की अच्छी मात्रा में होते हैं। सूखी दालों में विटामिन ‘सी’ नहीं होता परन्तु अंकुरित हुई दालें विटामिन ‘सी’ का अच्छा स्रोत हैं।

प्रश्न 5.
प्रोटीन कौन-कौन से भोजन समूह में पाई जाती है?
उत्तर-
प्रोटीन मनुष्य के भोजन का आधार है। यह कई भोजन समूहों से प्राप्त की जा सकती है।

  1. जीव प्रोटीन-सब तरह का मीट मुर्गा, मछली, अण्डे, दूध ।
  2. पशु प्रोटीन-दूध, दही, दूध का पाऊडर और घी को छोड़कर सभी दूध से बनने वाली वस्तुएं।
  3. वनस्पति प्रोटीन- यह वनस्पति पदार्थों से प्राप्त होती है जैसे अनाज, दालें, मूंगफली, सोयाबीन आदि। जीव प्रोटीन को वनस्पति प्रोटीन से बढ़िया माना जाता है।

प्रश्न 6.
कार्बोहाइड्रेट्स कौन-कौन से भोजन समूह में पाए जाते हैं?
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट्स कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का मिश्रण है। ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन 2 : 1 के अनुपात में प्राप्त होती हैं। शरीर में 75 से 80 प्रतिशत ऊर्जा कार्बोहाइड्रेट्स से ही पूरी होती है। यह ऊर्जा का एक सस्ता तथा मुख्य स्रोत है।
PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 सन्तुलित भोजन 1
कार्बोहाइड्रेट्स के स्रोत-कार्बोहाइड्रेट्स के स्रोत निम्नलिखित हैं

  1. अनाज
  2. दालें
  3. जड़ों वाली तथा भूमि के अन्दर पैदा होने वाली सब्जियां जैसे आलू, कचालू, अरबी, जिमीकन्द तथा शकरकन्दी आदि।
  4. शहद, चीनी तथा गुड़
  5. जैम तथा जैली
  6. सूखे मेवे जैसे बादाम, अखरोट, खजूर, किशमिश तथा मूंगफली आदि।

प्रश्न 7.
सब्जियों में कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्व होते हैं?
उत्तर-
भोजन में सब्जियों का होना अति आवश्यक है क्योंकि इनसे विटामिन और खनिज पदार्थ मिलते हैं। भिन्न-भिन्न सब्जियों में भिन्न-भिन्न तत्त्व मिलते हैं। जड़ों वाली सब्जियां विटामिन ‘ए’ का अच्छा स्रोत हैं, हरी पत्तेदार सब्जियों में विटामिन ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’ और लोहा काफ़ी मात्रा में होता है। फलीदार सब्जियां प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 सन्तुलित भोजन

प्रश्न 8.
भोजन में मिर्च मसालों का प्रयोग क्यों किया जाता है?
उत्तर-
भोजन का स्वाद और महक बढ़ाने के लिए इनमें कई तरह के मसाले जैसे जीरा, काली मिर्च, धनिया, लौंग, इलायची आदि प्रयोग किए जाते हैं । यह मसाले भोजन का स्वाद बढ़ाने के अतिरिक्त भोजन शीघ्र पचाने में भी सहायता करते हैं क्योंकि ये पाचक रसों को उत्तेजित करते हैं जिससे भोजन शीघ्र हज़्म हो जाता है।

प्रश्न 9.
आहार नियोजन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
परिवार के विभिन्न सदस्यों के लिए तथा भिन्न-भिन्न समय पर कैसा भोजन तैयार करना है, इसे सोच-समझ कर बनाया जाता है। इस सोच समझ, नियोजन, योजना बनाने की प्रक्रिया को आहार नियोजन करना कहा जाता है। बुजुर्गों तथा बहुत छोटे बच्चों के लिए भिन्न प्रकार का नर्म भोजन चाहिए। युवाओं के लिए अधिक पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है। गर्भवती दूध पिलाने वाली मां के लिए भिन्न प्रकार का भोजन चाहिए। नौकरी पर जाने वाले, स्कूल जाने वाले बच्चे के लिए भिन्न प्रकार से आहार नियोजन करना पड़ता है।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 10.
सन्तुलित भोजन की योजना बनाते समय कौन-कौन सी बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर-
परिवार के सदस्य का स्वास्थ्य उनके खाने वाले भोजन पर निर्भर करता है। एक समझदार गृहिणी को अपने परिवार के सदस्यों को सन्तुलित भोजन प्रदान करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. परिवार के प्रत्येक सदस्य को रोज़ाना खुराकी तत्त्वों का ज्ञान होना चाहिए,
  2. आवश्यक पौष्टिक तत्त्व देने वाले भोजन की जानकारी और चुनाव,
  3. भोजन की योजनाबन्दी,
  4. भोजन पकाने का सही ढंग, और
  5. भोजन परोसने के ढंग का ज्ञान होना चाहिए।

प्रश्न 11.
किन-किन कारणों से अनेक लोगों को सन्तुलित भोजन उपलब्ध नहीं होता?
अथवा
सन्तुलित भोजन की मात्रा को प्रभावित करने वाले तत्त्वों के बारे में बताएं।
उत्तर-
दुनिया भर में 90% बीमारियों का कारण सन्तुलित भोजन का सेवन न करना है। विशेष रूप में तीसरी दुनिया के देशों में जनसंख्या के एक बड़े भाग को संतुलित भोजन नहीं मिलता। इसके कई कारण हैं जैसे —

  1. ग़रीबी-ग़रीब लोग अपनी आय कम होने के कारण उपयुक्त मात्रा में आवश्यक पौष्टिक तत्त्वों वाले भोजन नहीं खरीद सकते। सब्जियां, फल, दूध, आदि इन ग़रीब लोगों की खुराक का भाग नहीं बनते।
  2. शिक्षा की कमी-यह आवश्यक नहीं कि केवल ग़रीब लोग ही सन्तुलित भोजन से वंचित रहते हैं। कई बार शिक्षा की कमी के कारण अच्छी आय वाले भी आवश्यक पौष्टिक भोजन नहीं लेते। आजकल कई अमीर लोग भी जंक फूड या फास्ट फूट का प्रयोग अधिक करते हैं जो किसी तरह भी सन्तुलित भोजन नहीं होता।
  3. बढ़िया भोजन न मिलना-कई बार लोगों को खाने-पीने की वस्तुएं बढ़िया नहीं मिलतीं। आजकल सब्जियों में जहर की मात्रा काफ़ी अधिक होती है। शहर के लोगों को दूध भी बढ़िया किस्म का नहीं मिलता। इस तरह भी लोग सन्तुलित भोजन से वंचित रह जाते हैं।

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प्रश्न 12.
सन्तुलित भोजन से क्या भाव है? कौन-कौन से बिन्दु ध्यान में रख कर भोजन को सन्तुलित बनाया जा सकता है?
उत्तर-
देखें प्रश्न 1 का उत्तर। भोजन सन्तुलित बनाने के लिए बिन्दु

  1. सन्तुलित भोजन बनाने के लिए सभी भोजन समूहों में से एक या दो भोजन पदार्थ अवश्य ही लेने चाहिएं।
  2. सन्तुलित भोजन में कैलोरियों की उचित मात्रा हो।
  3. सभी पौष्टिक तत्त्व उचित मात्रा में हों। 17% कैलोरियां कार्बोहाइड्रेट्स से प्राप्त होनी चाहिए।
  4. भिन्न-भिन्न भोजन समूहों में, मिश्रित भोजन बना लेना चाहिए ताकि भोजन खाने को मन करे। एक जैसा भोजन प्रतिदिन नहीं खाया जा सकता।

प्रश्न 13.
किसी तीन भोजन समूहों के पौष्टिक तत्त्वों के बारे में बताएं।
उत्तर-

  1. सूखे मेवे-नारियल को छोड़ कर शेष सभी सूखे मेवे जैसे बादाम, मूंगफली, अखरोट, आदि में बहुत प्रोटीन होता है। इनमें 18-28% प्रोटीन होता है। इनमें खनिज, चर्बी तथा विटामिन भी अच्छी मात्रा में होते हैं।
  2. शक्कर तथा गुड़-यह कार्बोहाइड्रेट्स के अच्छे स्रोत हैं। यह शक्ति प्रदान करने वाले भोजन हैं। गुड़ में लोहा भी होता है।
  3. मक्खन, घी तथा तेल-यह समूह शक्ति के अच्छे स्रोत हैं। इनमें चर्बी तथा चर्बी में घुलनशील विटामिन होते हैं।

प्रश्न 14.
प्रोटीन कौन-कौन से भोजन समूहों में होते हैं? भोजन पदार्थों के नाम भी बताएं।
उत्तर-
प्रोटीन वाले भोजन समूह हैंअनाज, दालें, सूखे मेवे, दूध तथा दूध से बने पदार्थ, मीट, मछली, अण्डे।

  1. अनाज जैसे मक्की, गेहूं, बाजरा आदि।
  2. दालें जैसे मांह, मोठ, मूंगी आदि।
  3. सुखे मेवे जैसे बादाम, अखरोट, मूंगफली आदि।
  4. दूध तथा दूध से बने पदार्थ जैसे दूध, पनीर, दही, खोया आदि।

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प्रश्न 15.
भोजन के पौष्टिक तत्त्व नष्ट होने से बचाने के लिए खाना तैयार करते (बनाते) समय किन-किन बातों को ध्यान में रखोगे?
उत्तर-
भोजन को पकाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. भोजन को अधिक समय तक भिगोकर नहीं रखना चाहिए क्योंकि बहुत सारे घुलनशील तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
  2. सब्जियों तथा फलों के ज्यादा छिलके नहीं उतारने चाहिएं क्योंकि छिलकों के नीचे विटामिन तथा खनिज लवण ज्यादा मात्रा में होते हैं।
  3. सब्जियों को बनाने से थोड़ी देर पहले ही काटना चाहिए नहीं तो हवा के सम्पर्क के साथ भी विटामिन नष्ट हो जाते हैं।
  4. सब्जियां तथा फल हमेशा बड़े-बड़े टुकड़ों में काटने चाहिएं क्योंकि इस तरह से फल तथा सब्जियों की कम सतह पानी तथा हवा के सम्पर्क में आती है।
  5. सब्जियों को उबालते समय पानी में डालकर कम-से-कम समय के लिए पकाया जाए ताकि उनकी शक्ल, स्वाद तथा पौष्टिक तत्त्व बने रहें।
  6. भोजन को पकाने के लिए मीठे सोडे का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे विटामिन ‘बी’ तथा ‘सी’ नष्ट हो जाते हैं।
  7. मांस, अण्डे तथा अन्य प्रोटीन युक्त पदार्थों को धीमी आग पर पकाना चाहिए नहीं तो प्रोटीन नष्ट हो जाएंगे।
  8. भोजन हिलाते तथा छानते समय अधिक समय नहीं लगाना चाहिए क्योंकि इससे भोजन के अन्दर हवा इकट्ठी होने के कारण विटामिन ‘सी’ नष्ट हो जाता है।
  9. खाना बनाने वाले बर्तन तथा रसोई साफ़-सुथरी होनी चाहिए।
  10. भोजन में अधिक मसाले का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  11. एक ही प्रकार के भोजन पदार्थों का प्रयोग बार-बार नहीं करना चाहिए।
  12. जो लोग शाकाहारी हों उनके भोजन में दूध, पनीर, दालें तथा सोयाबीन का प्रयोग अधिक होना चाहिए।
  13. जहां तक हो सके भोजन को प्रैशर कुक्कर में पकाना चाहिए क्योंकि इससे समय तथा शक्ति के साथ-साथ पौष्टिक तत्त्व भी बचाए जा सकते हैं।

प्रश्न 16.
भोजन पदार्थों के भिन्न-भिन्न पौष्टिक तत्त्वों की जानकारी, सन्तुलित भोजन की योजना बनाने में कैसे सहायक हैं?
उत्तर-
सन्तुलित भोजन ऐसा भोजन है जिसमें शरीर के लिए पौष्टिक तत्त्व, कैलोरियां आदि आवश्यकता अनुसार हों। यह तभी हो सकता है यदि गृहिणी को भोजन पदार्थों के भिन्न-भिन्न समूहों में पौष्टिक तत्त्वों की जानकारी हो। यह आवश्यक नहीं कि अधिक कीमत वाले भोजन पदार्थों में ही अधिक पौष्टिक तत्त्व होते हैं जैसे प्रोटीन का बहुत सस्ता स्रोत सोयाबीन है। मूंगफली को ग़रीबों के बादाम कहा जाता है। बेर बहुत बढ़िया तथा सस्ता स्रोत है विटामिन तथा खनिज के। जब सब्जियों फलों का मौसम होता है तो यह सस्ते होते हैं। अच्छी गृहिणी अपने सीमित स्रोतों से अच्छा सन्तुलित भोजन तो ही बना सकती है यदि उसे सभी भोजन समूहों से प्राप्त होने वाले पौष्टिक तत्त्वों का ज्ञान हो तथा कौन-से स्रोत सस्ते हैं यह भी पता हो।

प्रश्न 17.
सब्ज़ियों तथा फलों में कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्व होते हैं?
उत्तर-
सब्जियां तथा फलों में विटामिन तथा खनिज पदार्थ होते हैं। जड़ वाली सब्जियों में कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं तथा विटामिन ‘सी’ भी होता है जैसे आलू, कचालू, शलगम, अरबी आदि। गाजर तथा शक्करकंदी विटामिन ए का अच्छा स्रोत है।
हरी पत्तेदार सब्जियों में विटामिन ए, बी, सी, कैल्शियम, लोहा आदि हैं। मटर तथा फ्रेन्च बीनस आदि में प्रोटीन भी होता है। फलों में विटामिन सी, ए आदि होते हैं।

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 18.
भोजन को समूहों में क्यों बांटा गया है? सन्तुलित भोजन बनाने के समय इसके क्या लाभ हैं?
अथवा
भोजन समूहों के बारे में विस्तारपूर्वक बताएँ।
उत्तर-
अलग-अलग भोजनों में अलग-अलग पौष्टिक तत्त्व मौजूद होते हैं। इसलिए भोजन को उनके पौष्टिक तत्त्वों के अनुसार अलग-अलग भोजन समूहों में बांटा गया है। अण्डे और दूध को पूर्ण खुराक माना गया है। लेकिन प्रतिदिन एक भोजन नहीं खाया जा सकता। इससे मन ऊब जाता है। इसलिए भोजन समूहों में से ज़रूरत अनुसार कुछन-कुछ लेकर सन्तुलित भोजन प्राप्त किया जाता है।

अलग-अलग भोजनों की पौष्टिक तत्त्वों के अनुसार बारम्बारता इस तरह है सन्तुलित भोजन बनाते समय सारे भोजन समूहों में से आवश्यक पौष्टिक तत्त्वों वाले भोजन लिए जाएंगे ताकि भोजन स्वादिष्ट और खुशबूदार बनाया जा सके।
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प्रश्न 19.
सन्तुलित भोजन की योजना बनाते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखोगे?
उत्तर-
परिवार के लिए सन्तुलित भोजन बनाना (Planning Balanced Diet for the family)-सन्तुलित भोजन बनाने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. मनुष्य की प्रतिदिन की पौष्टिक तत्त्वों की ज़रूरत का ज्ञान (Knowledge of daily nutritional requirements)
  2. ज़रूरी पौष्टिक तत्त्व देने वाले भोजनों की जानकारी तथा चुनाव (Knowledge of food stuffs that can provide essential nutrients)
  3. भोजन की योजनाबन्दी (Planning of meals)
  4. भोजन पकाने का ढंग (Method of cooking)
  5. भोजन परोसने का ढंग (Method of serving food)

1. मनुष्य की प्रतिदिन की पौष्टिक तत्त्वों की ज़रूरत का ज्ञान (Knowledge of daily nutritional requirements)-मनुष्य की भोजन की आवश्यकता उसकी आयु, लिंग, व्यवसाय तथा जलवायु के साथ-साथ शारीरिक हालत पर निर्भर करती है। जैसे भारा तथा शारीरिक कार्य करने वाले व्यक्ति को हल्का तथा दिमागी कार्य करने वाले मनुष्य की अपेक्षा ज्यादा कैलोरी तथा ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा लोहे की ज्यादा ज़रूरत है। इसलिए सन्तुलित भोजन बनाने से पहले पारिवारिक व्यक्तियों की पौष्टिक तत्त्वों की ज़रूरत का ज्ञान होना ज़रूरी है।
2. ज़रूरी पौष्टिक तत्त्व देने वाले भोजन की जानकारी (Knowledge of food stuffs that can provide essential nutrients)-प्राकृतिक रूप में मिलने वाले भोजन को उनके पौष्टिक तत्त्वों के आधार पर पाँच भोजन समूहों में बांटा गया है, जो कि पीछे टेबल नं० 1 में दिए गए हैं। प्रत्येक समूह में से भोजन पदार्थ शामिल करने से सन्तुलित भोजन तैयार किया जा सकता है। भिन्न-भिन्न प्रकार की आयु, लिंग तथा शारीरिक अवस्था के अनुसार पौष्टिक तत्त्वों की ज़रूरत भी भिन्न-भिन्न होती है।
3. भोजन की योजनाबन्दी (Planning of meals)-भोजन की ज़रूरत तथा चुनाव के बाद उसकी योजना बना ली जाए। कितने समय के अन्तराल के बाद भोजन खाया जाए जिससे पौष्टिक तत्त्वों की मात्रा पूरी हो सके। भोजन की योजनाबन्दी को निम्नलिखित बातें प्रभावित करती हैं

  1. परिवार के सदस्यों की संख्या।
  2. परिवार के सदस्यों की आयु, व्यवसाय तथा शारीरिक अवस्था।
  3. परिवार के सदस्यों की भोजन के प्रति रुचि तथा ज़रूरत।
  4. परिवार के रीति-रिवाज।
  5. भोजन पर किया जाने वाला व्यय तथा भोजन पदार्थों की खुराक।

पीछे दी गई बातों को ध्यान में रखते हुए पौष्टिक तत्त्वों की पूर्ति तथा भोजन की ज़रूरत के अनुसार सारे दिन में खाए जाने वाले भोजन को चार मुख्य भागों में बांटा गया है
(i) सुबह का नाश्ता (Breakfast) (ii) दोपहर का भोजन (Lunch) (iii) शाम का चाय-पानी (Evening Tea) (iv) रात का भोजन (Dinner)

1. सुबह का नाश्ता (Breakfast)-पूरे दिन की ज़रूरत का चौथा भाग सुबह के नाश्ते द्वारा प्राप्त होना चाहिए। अच्छा नाश्ता शारीरिक तथा मानसिक योग्यता को प्रभावित करता है। नाश्ते की योजना बनाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है
(क) शारीरिक कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए नाश्ता ठोस तथा कार्बोज़ युक्त होना चाहिए जबकि मानसिक कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए हल्का तथा प्रोटीन युक्त नाश्ता अच्छा रहता है।
(ख) यदि नाश्ते तथा दोपहर के खाने में ज्यादा लम्बा समय हो तो नाश्ता भारी लेना चाहिए तथा यदि अन्तर कम या समय कम हो तो नाश्ता हल्का तथा जल्दी पचने वाला होना चाहिए।
(ग) नाश्ते में सभी भोजन तत्त्व शामिल होने चाहिएं जैसे भारी नाश्ते के लिए भरा हुआ पराठा, दूध, दही या लस्सी तथा कोई फल लिया जा सकता है। हल्के नाश्ते के लिए अंकुरित दाल, टोस्ट, दूध तथा फल आदि लिए जा सकते हैं।

2. दोपहर का भोजन (Lunch)-पूरे दिन की ज़रूरत का तीसरा भाग दोपहर के भोजन द्वारा प्राप्त होना चाहिए। इसमें अनाज, दालें, दही, पनीर या मांस, मौसमी फल तथा हरी पत्तेदार सब्जियां होनी चाहिएं। भोजन में कुछ कच्ची तथा कुछ पक्की चीजें होनी चाहिएं। अधिकतर कार्य करने वाले लोग दोपहर का खाना साथ लेकर जाते हैं। इसलिए वह भोजन भी पौष्टिक होना चाहिए। उदाहरण के लिए दोपहर के भोजन में रोटी, राजमाह, कोई सब्जी, रायता तथा सलाद लिया जा सकता है तथा साथ ले जाने वाले भोजन में पुदीने की चटनी आदि तथा सैंडविच, गचक तथा कुछ फल सम्मिलित किया जा सकता है।

3. शाम की चाय (Evening Tea)-इस समय चाय के साथ कोई नमकीन या मीठी चीज़ जैसे बिस्कुट, केक, बर्फी, पकौड़े, समौसे आदि लिए जा सकते हैं।

4. रात का भोजन (Dinner)-इस भोजन में से भी पूरे दिन की ज़रूरत का तीसरा भाग प्राप्त होना चाहिए। रात तथा दोपहर के भोजन में कोई फर्क नहीं होता, परन्तु फिर भी इसको बनाते समय कई बातों का ध्यान रखना चाहिए। जैसे___ (क) दोपहर के भोजन की अपेक्षा रात का भोजन हल्का होना चाहिए ताकि जल्दी पच सके।
(ख) सारा दिन काम-काज करते हुए शरीर के तन्तुओं की टूट-फूट होती रहती है। इसलिए इनकी मरम्मत के लिए प्रोटीन वाले भोजन पदार्थ होने चाहिएं।
(ग) रात का भोजन विशेष ध्यान देकर बनाना चाहिए क्योंकि इस समय परिवार के सारे सदस्य इकट्ठे होकर भोजन करते हैं।

4. भोजन पकाने का ढंग (Method of Cooking) – भोजन की योजनाबन्दी का तभी फ़ायदा है जब भोजन को ऐसे ढंग के साथ पकाया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा खुराकी तत्त्वों की सम्भाल हो सके। भोजन खरीदते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए —

  1. सूखे भोजन पदार्थ जैसे अनाज, दालें अधिक मात्रा में खरीदनी चाहिएं परन्तु यह भी उतनी ही मात्रा में जिसकी आसानी से सम्भाल हो सके।
  2. फल तथा सब्जियां ताज़ी खरीदनी चाहिएं क्योंकि बासी फल तथा सब्जियों में विटामिनों तथा खनिज लवण नष्ट हो जाते हैं।
  3. हमेशा साफ़-सुथरी दुकानों से ही भोजन खरीदना चाहिए।

भोजन को पकाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए —

  1. भोजन को अधिक समय तक भिगोकर नहीं रखना चाहिए क्योंकि बहुत सारे घुलनशील तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
  2. सब्जियों तथा फलों के ज्यादा छिलके नहीं उतारने चाहिएं क्योंकि छिलकों के नीचे विटामिन तथा खनिज लवण ज्यादा मात्रा में होते हैं।
  3. सब्जियों को बनाने से थोड़ी देर पहले ही काटना चाहिए नहीं तो हवा के सम्पर्क के साथ भी विटामिन नष्ट हो जाते हैं।
  4. सब्जियां तथा फल हमेशा बड़े-बड़े टुकड़ों में काटने चाहिएं क्योंकि इस तरह से फल तथा सब्जियों की कम सतह पानी तथा हवा के सम्पर्क में आती है।
  5. सब्जियों को उबालते समय पानी में डालकर कम-से-कम समय के लिए पकाया जाए ताकि उनकी शक्ल, स्वाद तथा पौष्टिक तत्त्व बने रहें।
  6. भोजन को पकाने के लिए मीठे सोडे का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे विटामिन ‘बी’ तथा ‘सी’ नष्ट हो जाते हैं।
  7. मांस, अण्डे तथा अन्य प्रोटीन युक्त पदार्थों को धीमी आग पर पकाना चाहिए नहीं तो प्रोटीन नष्ट हो जाएंगे।
  8. भोजन हिलाते तथा छानते समय अधिक समय नहीं लगाना चाहिए क्योंकि इससे भोजन के अन्दर हवा इकट्ठी होने के कारण विटामिन ‘सी’ नष्ट हो जाता है।
  9. खाना बनाने वाले बर्तन तथा रसोई साफ़-सुथरी होनी चाहिए।
  10. भोजन में अधिक मसाले का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  11. एक ही प्रकार के भोजन पदार्थों का प्रयोग बार-बार नहीं करना चाहिए।
  12. जो लोग शाकाहारी हों उनके भोजन में दूध, पनीर, दालें तथा सोयाबीन का प्रयोग अधिक होना चाहिए।
  13. जहां तक हो सके भोजन को प्रैशर कुक्कर में पकाना चाहिए क्योंकि इससे समय तथा शक्ति के साथ-साथ पौष्टिक तत्त्व भी बचाए जा सकते हैं।

भोजन परोसने का ढंग (Method of Serving food)

  1. खाना खाने वाला स्थान, साफ़-सुथरा तथा हवादार होना चाहिए।
  2. खाना हमेशा ठीक तरह के बर्तनों में ही परोसना चाहिए जैसे तरी वाली सब्जियों के लिए गहरी प्लेट तथा सूखी सब्जियों के लिए चपटी प्लेट प्रयोग में लाई जा सकती है। .
  3. एक बार ही बहुत ज्यादा भोजन नहीं परोसना चाहिए बल्कि पहले थोड़ा तथा आवश्यकता पड़ने पर और लिया जा सकता है।
  4. सलाद तथा फल भी भोजन के साथ अवश्य परोसने चाहिएं।
  5. भोजन में रंग तथा भिन्नता होनी चाहिए। इसलिए धनिये के हरे पत्ते, नींबू तथा टमाटर आदि का प्रयोग किया जा सकता है।

यदि ऊपरलिखित बातों को ध्यान में रखकर भोजन तैयार किया जाए तो व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार प्रसन्न मन के साथ भोजन खाकर सन्तुलित भोजन का उद्देश्य पूरा कर सकता है।

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प्रश्न 19(A).
भोजन समूहों के बारे में विस्तार से बताएं।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्न ।

Home Science Guide for Class 10 PSEB सन्तुलित भोजन Important Questions and Answers

लघ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्या उचित कैलोरी वाली खुराक सन्तुलित भोजन होती है?
उत्तर-
आवश्यक नहीं कि उचित कैलोरी वाली खुराक सन्तुलित ही हो।

प्रश्न 2.
अंकुरित दाल में कौन-सा विटामिन बढ़ जाता है?
उत्तर-
विटामिन सी।

प्रश्न 3.
दालों में कितने प्रतिशत प्रोटीन होता है?
उत्तर-
20-25%.

प्रश्न 4.
दुनिया भर में 90% रोगों का कारण ……….. का सेवन नहीं है।
उत्तर-
सन्तुलित भोजन।

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प्रश्न 5.
गेहूं-मक्का आदि अनाजों में कितने प्रतिशत प्रोटीन होती है?
उत्तर-
6-12%.

प्रश्न 6.
सूखे मेवों में कितने प्रतिशत प्रोटीन होती है?
उत्तर-
18-28%.

प्रश्न 7.
सब्जियों तथा फलों के छिलकों को क्यों नहीं उतारना चाहिए?
उत्तर-
इनके नीचे टिटामिन तथा खनिज लवण होते हैं।

प्रश्न 8.
मीठे सोडे का प्रयोग भोजन पकाने के लिए क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर-
इससे विटामिन बी तथा सी नष्ट हो जाते हैं।

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प्रश्न 9.
शाकाहारी लोगों को प्रोटीन कहां से मिलता है?
उत्तर-
दूध, पनीर, दालें, सोयाबीन।

प्रश्न 10.
फलीदार सब्जियों में कौन-सा पौष्टिक तत्त्व अधिक होता है?
उत्तर-
प्रोटीन।

लघ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
(i) आहार नियोजन क्या है तथा इसके क्या लाभ हैं?
(ii) भोजन का वर्गीकरण कैसे किया जाता है?
उत्तर-देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 2.
भोजन खरीदते समय कौन-सी बातों को ध्यान में रखोगे?
उत्तर-
भोजन खरीदते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. सूखे भोजन पदार्थ जैसे अनाज, दालें अधिक मात्रा में खरीदनी चाहिएं परन्तु यह भी उतनी ही मात्रा में जिसकी आसानी के साथ सम्भाल हो सके।
  2. फल तथा सब्जियां ताज़ी खरीदनी चाहिए क्योंकि बासी फल तथा सब्जियों में विटामिन तथा खनिज लवण नष्ट हो जाते हैं।
  3. हमेशा साफ़-सुथरी दुकानों से ही भोजन खरीदना चाहिए।

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प्रश्न 3.
भोजन देखने में भी सुन्दर होना चाहिए। क्या आप इस तथ्य से सहमत हैं? यदि हाँ तो क्यों?
उत्तर-
जी हाँ ; यह तथ्य बिल्कुल सही है कि भोजन देखने में अच्छा लगना चाहिए क्योंकि जो भोजन देखने में अच्छा न लगे उसको खाने को मन नहीं करता। यदि भोजन आँखों को न भाए तो मनुष्य उसका स्वाद भी नहीं देखना चाहता। भोजन को सुन्दर बनाने के लिए भोजन पकाने की विधि और उसको सजाने की जानकारी भी होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
(i) बढ़ते बच्चों के लिए कैसा भोजन चाहिए?
(ii) बढ़ने वाले बच्चों के भोजन में प्रोटीन का होना क्यों ज़रूरी है ?
उत्तर-
(i) बढ़ रहे बच्चों के शरीर में बने सैलों और तन्तुओं का निर्माण होता है और इसके लिए कार्बोज़ आदि अधिक मात्रा में चाहिएं ताकि तन्तुओं का निर्माण और तोड़-फोड़ की पूर्ति हो सके। इसके अतिरिक्त बच्चों की दौड़ने, भागने और खेलने में कैलोरियां अधिक खर्च होती हैं। इसलिए इनकी पूर्ति करने के लिए बच्चों के भोजन में आवश्यक मात्रा में मक्खन, घी, तेल, चीनी, शक्कर, दूध, अण्डा, मीट, पनीर और सब्जियों का शामिल होना आवश्यक है।
(ii) देखें भाग (i)।

प्रश्न 5.
गर्भवती औरत के लिए अधिक कैलोरियों की आवश्यकता होती है या दूध पिलाने वाली माँ के लिए, और क्यों?
उत्तर-
गर्भवती औरत या दूध पिलाने वाली माँ, दोनों का भोजन सन्तुलित होना चाहिए। परन्तु दूध पिलाने वाली माँ की खुराकी आवश्यकताएँ गर्भवती औरत से अधिक होती हैं। दूध पिलाने वाली माँ को गर्भवती और अन्य औरतों की अपेक्षा कैलोरियां और अन्य पौष्टिक तत्त्व अधिक मात्रा में चाहिएं। बच्चे की पूर्ण खुराक के लिए माँ का दूध काफ़ी मात्रा में आवश्यक है। यह दूध तभी प्राप्त होगा यदि माँ की खुराक में दूध, मीट, सब्ज़ियाँ, अण्डा, दालें, पनीर काफ़ी मात्रा में होंगे। पहले छ: महीने माँ का दूध बच्चे के लिए मुख्य खुराक होता है। इसलिए दूध पिलाती माँ को अधिक कैलोरियों वाला पौष्टिक भोजन चाहिए।

प्रश्न 6.
भोजन में शर्करा और वसा की क्या महत्ता है?
उत्तर-
भोजन में वसा तथा शर्करा, शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। एक ग्राम शर्करा से 4 कैलोरी तथा एक ग्राम वसा से 9 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है।

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प्रश्न 7.
निम्नलिखित के लिए कैल्शियम की अनुशंसित मात्रा लिखिए
(i) स्तनपान कराने वाली मां
(ii) वृद्धि करता हुआ बच्चा।
उत्तर-
(i) स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए कैल्शियम की मात्रा है-1000 मि०ग्रा०।
(ii) वृद्धि करते हुए बच्चों को आयु के अनुसार जैसे 4 से 9 वर्ष तक के लिए 400 मि० ग्रा० तथा 10 से 15 वर्ष तक के लिए 600 मि० ग्रा० की आवश्यकता है।

प्रश्न 8.
निम्नलिखित के लिए लोहे की आवश्यकता लिखिए:
(i) वयस्क पुरुष
(ii) गर्भवती महिला
(iii) किशोर।
उत्तर-
(i) वयस्क पुरुष के लिए 28 मि० ग्राम लोहे की आवश्यकता है।
(ii) गर्भवती महिला के लिए 38 मि० ग्राम लोहे की आवश्यकता है।
(iii) किशोरों के लिए आयु के अनुसार 20 से 50 मि० ग्राम तक की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 9.
अर्जुन को कम दिखाई देता है, उसकी इस अवस्था का क्या कारण है? उसे कौन-सा महत्त्वपूर्ण खाद्य पदार्थ लेना चाहिए?
अथवा
गीता को अंधेरे में कम दिखाई देता है और वह रंगों की ठीक से पहचान नहीं कर सकती। उसे कौन-सा रोग हो सकता है? वह किन-किन भोजन पदार्थों का प्रयोग करके इस रोग को दूर कर सकती है?
उत्तर-
विटामिन A की कमी से अंधराता (रतौंधी) रोग हो जाता है तथा अधिक कमी से नज़र कमजोर हो जाती है। विटामिन A की कमी न हो इसलिए मक्खन, गाजर, दूध, अण्डे की जर्दी, जिगर, मछली आदि का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 10.
नन्ही रिधि का रंग पीला है तथा थकान महसूस होती है उसे कौनसा रोग है और उसे कैसे ठीक किया जा सकता है?
अथवा
सुनीता की चमड़ी का रंग पीला पड़ गया है और बहुत थकावट महसूस करती है। उसे कौन-सा रोग हो सकता है और वह कौन-कौन से भोजन पदार्थों का प्रयोग करके इसे दूर कर सकती है?
उत्तर-
रंग पीला होना तथा थकान महसूस होना, रक्त की कमी (अनीमिया) रोग के चिन्ह हैं। इसको ठीक करने के लिए लोहे के खनिज वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए। जैसे दालें, मछली, लोबिया, पुदीना, पालक, मुर्गी के अण्डे आदि।

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प्रश्न 11.
सोनी के मसूड़े सूज जाते हैं और खून बहने लग जाता है। उसको कौनसा रोग हो सकता है ? वह कौन-कौन से भोजन पदार्थों का प्रयोग करके इस रोग को दूर कर सकता है?
उत्तर-
उसे स्कर्वी नामक रोग हुआ है। यह रोग विटामिन सी की कमी के कारण होता है। इस रोग को दूर करने के लिए खट्टे फल; जैसे-नींबू, संतरा, अंकुरित दालें, टमाटर, अमरूद आदि लेने चाहिए।

प्रश्न 12.
क्या कैलोरियों की उचित मात्रा होने से भोजन सन्तुलित होता है?
उत्तर-
खुराक व्यक्ति की आयु लिंग, काम करने और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करती है। कठिन काम करने वाले व्यक्ति को साधारण काम करने वाले व्यक्ति से अधिक कैलोरियों की आवश्यकता होती है। परन्तु खुराक में केवल कैलोरियों की उचित मात्रा से ही भोजन सन्तुलित नहीं बन जाता बल्कि इसके साथ-साथ पौष्टिक तत्त्वों की भी उचित मात्रा लेनी चाहिए। किसी एक पौष्टिक तत्त्व की कमी भी शरीर के लिए हानिकारक हो सकती है। इसलिए उचित कैलोरियों की मात्रा वाली खुराक को सन्तुलित नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 13.
मनीष को गलगंड का रोग हो गया है। यह रोग कौन से पौष्टिक तत्त्व की कमी से होता है और कौन-कौन से खाद्य पदार्थों को खुराक में शामिल करके इस रोग से बचा जा सकता है।
उत्तर-
यह रोग आयोडीन तत्त्व की कमी से होता है। आयोडीन युक्त नमक, सब्जियां, दालें, अनाज के प्रयोग से इसकी कमी को दूर किया जा सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन में भिन्नता कैसे ला सकते हैं तथा क्यों आवश्यक है?
उत्तर-
एक तरह का भोजन खाने से मन भर जाता है इसलिए खाने में रुचि बनाए रखने के लिए भिन्नता होनी आवश्यक है। यह भोजन में अनेक प्रकार से पैदा की जा सकती है

  1. नाश्ते में प्रायः परांठे बनते हैं परन्तु रोज़ाना अलग किस्म का परांठा बनाकर भोजन में भिन्नता लाई जा सकती है जैसे मूली का परांठा, मेथी वाला, गोभी वाला, मिस्सा परांठा आदि।
  2. सभी भोजन पदार्थ एक रंग के नहीं होने चाहिएं प्रत्येक सब्जी, दाल या सलाद का रंग अलग-अलग होना चाहिए। इससे भोजन देखने को अच्छा लगता है और अधिक पौष्टिक भी होता है।
  3. भोजन पकाने की विधि से भी खाने में भिन्नता आ सकती है जैसे तवे की रोटी, तन्दूर की रोटी, पूरी आदि बनाकर भोजन में भिन्नता लाई जा सकती है।

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प्रश्न 2.
बुखार में भोजन के तत्त्वों की आवश्यकता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
बुखार में खुराकी तत्त्वों की आवश्यकता शरीर में कई परिवर्तन आने के कारण बढ़ जाती है।

  1. ऊर्जा या शक्ति-बुखार में मैटाबोलिक दर बढ़ने से शरीर का तापमान बढ़ जाता है जिसके कारण 5% अधिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है इसलिए अधिक कैलोरियों वाली खुराक देनी चाहिए।
  2. प्रोटीन-शरीर में तापमान बढ़ने से तन्तुओं की तोड़-फोड़ तेज़ी से होती है इसलिए प्रोटीन अधिक मात्रा में लेनी चाहिए।
  3. कार्बोहाइड्रेट्स-बुखार से शरीर के कार्बोहाइड्रेट्स के भण्डार कम हो जाते हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स देने चाहिएं।
  4. विटामिन-बीमारी की हालत में शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है। इस स्थिति में बीमार मनुष्य को अधिक विटामिनों की आवश्यकता होती है।
  5. खनिज पदार्थ-सोडियम और पोटाशियम पसीने द्वारा अधिक निकल जाते हैं। इनकी पूर्ति के लिए दूध और जूस का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
  6. पानी-बीमार आदमी को पानी उचित मात्रा में पीना चाहिए क्योंकि रोगी के शरीर में से पानी पसीने और पेशाब के द्वारा निकलता रहता है।

प्रश्न 3.
आर्थिक स्तर और शारीरिक सेहत सन्तुलित भोजन की मात्रा को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर-
शारीरिक सेहत-सन्तुलित भोजन की आवश्यकता का सम्बन्ध शारीरिक सेहत से है। रोगी होने की अवस्था में शरीर के तन्तुओं की टूट-फूट अधिक होती है। इसलिए कैलोरियों तथा पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता अधिक होती है। 1°F तक तापमान बढ़ जाने पर (रोग की अवस्था में) 7% तक B.M.R. में वृद्धि होती है। कुछ रोगों में जैसे शक्कर रोग, ब्लड प्रैशर की स्थिति में कम ऊर्जा वाले भोजन की आवश्यकता है। आर्थिक स्तर-आर्थिक स्तर का प्रभाव सन्तुलित भोजन की प्राप्ति पर पड़ता है। कमजोर आर्थिक स्तर के लोग सस्ती खाद्य वस्तुओं से अपना सन्तुलित भोजन प्राप्त करते हैं। वे स्प्रेटा दूध, गुड़, सस्ते अनाज, सस्ती दालों आदि का प्रयोग करते हैं। कभी-कभी अधिक ग़रीब लोग सन्तुलित भोजन प्राप्त करने के समर्थ नहीं हो पाते। ग़रीब लोग घी के स्थान पर तेल, मीट, मछली के स्थान पर दालों का प्रयोग करके सन्तुलित भोजन की प्राप्ति करते हैं। अमीर लोग अपना सन्तुलित भोजन महंगी वस्तुओं, जैसे-दूध, घी, मक्खन, मीट, मछली, अण्डे, महंगी सब्जियों का प्रयोग करके करते हैं।

प्रश्न 4.
जलवायु और आयु सन्तुलित भोजन की मात्रा को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर-
आयु का प्रभाव-सन्तुलित भोजन की आवश्यकता आयु के अनुसार होती है। बचपन में शरीर की वृद्धि तेजी से होती है। शरीर की लम्बाई, भार आदि में वृद्धि होती है तथा पौष्टिक तत्त्वों की अधिक आवश्यकता होती है। किशोर होने पर शरीर में भौतिक तथा रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं तथा किशोर दौड़-भाग, खेल-कूद में भी अधिक समय लगाते हैं। इसलिए उनको ऊर्जा तथा पौष्टिक तत्त्वों की अधिक आवश्यकता होती है। बुढ़ापे में पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, शारीरिक वृद्धि भी रुक जाती है इसलिए पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता कम हो जाती है। – जलवायु का प्रभाव-सन्तुलित भोजन की आवश्यकता का सीधा सम्बन्ध जलवायु से है। गर्मियों में कम तथा सर्दियों में अधिक भोजन, जैसे–परोंठा, साग, मक्खन, घी, बादाम आदि की आवश्यकता होती है। सर्द देशों में जैविक प्रोटीनों की अधिक आवश्यकता होती है इससे उपपाचन की गति तेज़ हो जाती है।

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प्रश्न 5.
सन्तुलित भोजन की योजना बनाते समय कौन-सी बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 6.
खाना तैयार करते समय कौन-सी बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

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प्रश्न 7.
भारतीय मेडिकल खोज संस्था की ओर से भारतीयों के लिए की गई खुराकी तत्त्वों की सिफ़ारिश के बारे में लिखें।
उत्तर-
PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 सन्तुलित भोजन 4

प्रश्न 8.
बालिग औरतों के सन्तुलित भोजन का एक चार्ट बनाएं।
उत्तर-
PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 सन्तुलित भोजन 5

प्रश्न 9.
बालिग आदमियों के सन्तुलित भोजन का चार्ट बनाएं।
उत्तर-
PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 सन्तुलित भोजन 6

प्रश्न 10.
आहार नियोजन से आपका क्या भाव है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

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प्रश्न 11.
आहार नियोजन का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 12.
संतुलित आहार की प्राप्ति के लिए निर्धारित खाद्य वर्ग कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्न में।

प्रश्न 13.
भोजन के पौष्टिक तत्त्व कौन-कौन से हैं? प्रोटीन के कार्य, कमी के नतीजे और प्राप्ति के साधनों के बारे में बताइए।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 14.
विटामिन सी (C) के कार्य, कमी के नतीजे और प्राप्ति के साधनों के बारे में बताएं।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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प्रश्न 15.
भोजन समूह के बारे में विस्तार से बताओ।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 16.
विटामिन ए के कार्य, कमी के नतीजे और प्राप्ति के साधनों के बारे में लिखिए।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 17.
संतुलिज भोजन से क्या अभिप्राय है ? इस पर कौन-कौन से तत्त्व प्रभाव डालते हैं?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 18.
विटामिन डी (D) के कार्य, कमी के नतीजे और प्राप्ति के साधनों के बारे में लिखिए।
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. रिक्त स्थान भरें

  1. सूखे मेवे में ……. प्रतिशत प्रोटीन होता है।
  2. कार्बोज़ में ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन का अनुपात ……. होता है।
  3. भोजन पकाते समय ……. के प्रयोग से विटामिन बी तथा सी नष्ट हो जाते हैं।
  4. दालें …….. का स्रोत है।
  5. गर्भवती स्त्री को ……. भोजन खाना चाहिए।

उत्तर-

  1. 18-28,
  2. 1 : 2,
  3. मीठा सोडा,
  4. प्रोटीन,
  5. सन्तुलित।

II. ठीक/गलत बताएं

  1. अनाज, दालों में कार्बोज नहीं होता।
  2. दुनिया भर में 90% रोगों का कारण सन्तुलित भोजन का सेवन न करना है।
  3. फलीदार सब्जियों में प्रोटीन होता है।
  4. अंकुरित दालों में विटामिन ‘सी’ होता है।
  5. वयस्क आदमी के लिए 28 मि० ग्रा० लोहे की आवश्यकता है।
  6. मीठे सोडे के प्रयोग से विटामिन ‘बी’ तथा ‘सी’ नष्ट हो जाते हैं।

उत्तर-

  1. ग़लत,
  2. ठीक,
  3. ठीक,
  4. ठीक,
  5. ठीक,
  6. ठीक।

III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गेहूँ-मक्की में ……….. % प्रोटीन होती है।
(क) 6-12
(ख) 20-25
(ग) 40-50
(घ) 50-60
उत्तर-
(क) 6-12

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प्रश्न 2.
अंकुरित दाल में कौन-सा विटामिन होता है?
(क) सी
(ख) ए
(ग) बी
(घ) के।
उत्तर-
(क) सी

प्रश्न 3.
हरी पत्तेदार सब्जियों में निम्नलिखित तत्त्व होते हैं
(क) कैल्शियम
(ख) लोहा
(ग) विटामिन बी
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

प्रश्न 4.
भोजन की योजनाबंदी निम्न बातों पर निर्भर है
(क) परिवार के सदस्य
(ख) सदस्यों की आयु
(ग) भोजन के प्रति रुचि
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

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सन्तुलित भोजन PSEB 10th Class Home Science Notes

  • सन्तुलित भोजन से ही शरीर तन्दुरुस्त रह सकता है।
  • सन्तुलित भोजन में आवश्यक मात्रा में प्रोटीन, कार्बोज, विटामिन, चिकनाई, लवण और पानी होते हैं।
  • भोजन में केवल कैलोरियाँ होने से ही भोजन सन्तुलित नहीं बनता।
  • दालों, मीट, दूध तथा अण्डे आदि में प्रोटीन होती है।
  • अनाज दालें, गुड़, सूखे मेवे, मूंगफली, आलू, फल आदि कार्बोहाइड्रेट्स के स्रोत हैं।
  • सब्जियों में विटामिन और खनिज पदार्थ होते हैं।
  • खाना बनाने के लिए योजना बनाना एक अच्छी गहिणी की निशानी है।
  • परिवार की आय और आकार खाने की नियोजन को प्रभावित करते हैं।
  • गर्भवती औरत को पौष्टिक भोजन ही खाना चाहिए।
  • बुखार की हालत में पौष्टिक और हल्का भोजन खाना चाहिए।

मनुष्य के जीवन का आधार भोजन है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए भोजन का पौष्टिक होना आवश्यक है। जब मनुष्य अच्छा भोजन नहीं लेता तो वे बीमारियों का शिकार हो जाता है। मनुष्य अपने भोजन की आवश्यकता अनाज, सब्जियां, फल, दूध, दही, मीट, मछली आदि से पूरी करता है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 17 राष्ट्रीय एकीकरण

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 17 राष्ट्रीय एकीकरण Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 17 राष्ट्रीय एकीकरण

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय एकीकरण की परिभाषा लिखो। इसके रास्ते में आने वाली समस्याओं का वर्णन करो।
(Define National Integration. Explain the difficulties faced in the way of National Integration.)
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली तीन रुकावटों का वर्णन करें तथा भारत में एकता बनाए रखने के लिए तीन सुझाव भी दें।
(Explain three obstacles in the way of National Integration and also give any three suggestions to maintain National Integration in India.)
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण की परिभाषा लिखो। भारत में इसकी समस्याओं को हल करने के लिए सुझाव लिखो।
(Define National Integration. Write suggestions to solve the Problems of National Integration in India.)
उत्तर-
किसी भी राज्य की राष्ट्रीय अखण्डता तथा एकता उसके लिए सर्वोपरि होती है। कोई भी राज्य यह सहन नहीं कर सकता है कि उसकी राष्ट्रीय अखण्डता का विनाश हो। राष्ट्रीय अखण्डता राष्ट्रीय एकीकरण पर निर्भर करती है। राष्ट्रीय एकीकरण राज्य की प्रथम आवश्यकता है। राज्य के विकास के लिए यह आवश्यक है कि राज्य के अन्दर रहने वाले विभिन्न लोगों में एकता की भावना हो और यही भावना राष्ट्रीय एकीकरण का सार है। राष्ट्रीय का सम्बन्ध अनेकता में एकता स्थापित करना है। राष्ट्रीय एकीकरण की भावना द्वारा विभिन्न धर्मों, जातियों व भाषाओं के लोगों में परस्पर मेल-जोल बढ़ा कर एकता का विकास किया जाना है।

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ० एस० राधाकृष्णन (Dr. S Radhakrishnan) के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक घर नहीं है जो चूने और ईंटों से बनाया जा सकता है। यह एक औद्योगिक योजना भी नहीं है जिस पर विशेषज्ञों द्वारा विचार किया जा सकता है और रचनात्मक रूप दिया जा सकता है। इसके विपरीत एकीकरण एक ऐसा विचार है जिसका विकास लोगों के दिलों में होता है। यह एक चेतना है जिससे जनसाधारण को जागृत करना है।” (‘National integration is not a house which could be built by mortar and bricks. It is not an industrial plan. which could be discussed and implemented by experts. Integration, on the contrary, is a thought which must go into the heart of the people. It is the consciousness which must awaken the people at large.”’)

प्रो० माइरन वीनर (Myron Weiner) के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण का अभिप्राय उन विघटनकारी आन्दोलनों पर निगरानी रखना है जो राष्ट्र को खण्डित कर सकते हों और सम्पूर्ण समाज में ऐसी अभिवृत्तियों का होना है जो संकीर्ण हितों की अपेक्षा राष्ट्रीय और सार्वजनिक हितों को प्राथमिकता देती है।”

एच० ए० गन्नी (H.A. Gani) के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक ऐसी सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और शैक्षणिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोगों के दिलों में एकता, दृढ़ता और सम्बद्धता की भावना विकसित होती हो और उनमें सामान्य नागरिकता की भावना अथवा राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी की भावना का विकास होता है।” (“National integration is a socio-psychological and educational process through which a feeling of unity, solidarity and cohesion develops in the hearts of people and a sense of common citizenship or feeling of loyality to the nation is fostered among them.”)

भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधाएं (OBSTACLES IN THE WAY OF NATIONAL INTEGRATION IN INDIA)-

जैसा कि प्रारम्भ में ही कहा जा चुका है कि भारत में अनेक विभिन्नताएं हैं, ये सभी विभिन्नताएं वास्तव में राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधाएं बनती हैं। इसका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है

1. भाषा (Language)-भारत एक बहुभाषी राज्य है तथा सदैव से ही रहा है, भाषा की समस्या राष्ट्रीय अखण्डता के लिए खतरा बन चुकी है। भाषा को लेकर विभिन्न क्षेत्रों के लोगों में तनाव बढ़ता है। यूं तो हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाया गया है पर अहिन्दी भाषी प्रान्तों में हिन्दी विरोधी आन्दोलनों को जन्म दिया। यही कारण है कि आज भी राजकाज की भाषा अंग्रेज़ी ही चली आ रही है। यद्यपि सरकार ने इसके समाधान के लिए कुछ कदम उठाए हैं जैसा कि त्रि-भाषायी फार्मूला, पर इसको कोई अधिक सफलता नहीं मिल पाई है।

2. क्षेत्रवाद (Regionalism) क्षेत्रवाद या प्रादेशिकता का अर्थ है कि सारे की अपेक्षा किसी एक विशेष क्षेत्र के प्रति निष्ठा रखना। भारत में प्रादेशिकता की यह समस्या अत्यन्त गम्भीर है तथा एक देशव्यापी सिद्धान्त बन गया है। यह राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा बन गया है। इसके विकास के तीन प्रमुख कारण हैं। सर्वप्रथम इसका कारण ऐसा औद्योगिक या आर्थिक विकास जिसके कारण साधारण व्यक्ति को बहुत कम लाभ हुआ है। लोगों को बताया गया था कि उनके कष्टों का कारण ब्रिटिश शासन है तथा स्वतन्त्रता के बाद एक खुशहाल तथा सम्पन्न युग का प्रारम्भ होगा, पर ये सभी वायदे झूठे निकले तथा लोगों को सिवाए निराशा, कठिनाइयों व शोषण के कुछ नहीं मिला। दूसरा कारण था कि पिछड़े हुए क्षेत्रों के लोगों ने यह अनुभव करना आरम्भ कर दिया कि कारखाने या उद्योग लगाने में, रोज़गार की सुविधाएं उपलब्ध करवाने में, बांधों-पुलों इत्यादि के निर्माण में तथा केन्द्रीय अनुदान प्रदान करने में उनको अनदेखा किया जा रहा है। तीसरा इसका कारण यह भी रहा कि कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं ने शक्ति के लिए नंगा नाच करना प्रारम्भ कर दिया। इसमें वे कभी-कभी क्षेत्रवाद का प्रचार करने से भी न चूकते थे। इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में क्षेत्रीयवाद का काफ़ी बोलबाला है। यह राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा तो है ही साथ-ही-साथ राष्ट्रीयता अखण्डता के लिए सीधा खतरा भी है।

3. साम्प्रदायिकतावाद (Communalism)-अंग्रेजी शासन से पहले भारत में साम्प्रदायिकता देखने को नहीं मिलती थी यद्यपि युद्ध होते थे पर वे राजाओं के बीच थे। जनता में कटुता की भावना न थी। अकबर जैसा सम्राट तो हिन्दू-मुस्लिम एकता का समर्थक था। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत में साम्प्रदायिकता फैलाने का कार्य अंग्रेज़ों ने किया उनके द्वारा यहा फूट डालो राज्य करो की नीति अपनाई गई। क्योंकि उन्होंने सत्ता मुसलमानों से छीनी थी इसलिए प्रारम्भ में उन्होंने मुसलमान विरोधी तथा हिन्दू समर्थक नीति को अपनाथा। बाद में जब उन्हें मुसलमानों से कोई डर न रहा तो उनकी नीति मुसलमान समर्थक तथा हिन्दू विरोधी हो गई। उन्होंने साम्प्रदायिकता चुनाव प्रणाली को प्रारम्भ किया। यही साम्प्रदायिकता की आग धीरे-धीरे इतनी बढ़ी कि सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा एक लेखक शायर इकबाल भी पाकिस्तान के नारे लगाने लगा। जिन्नाह ने द्वि-राष्ट्रीय सिद्धान्त को अपनाया। इस प्रकार इसका अन्त अत्यधिक खून-खराबे के बाद भारत विभाजन तथा पाकिस्तान के निर्माण के रूप में हुआ। स्वतन्त्रता के पश्चात् भी यह आग ठण्डी न हुई। जो मुसलमान भारत में रह गए वे अल्प मत में होने के कारण अपने प्रति दुर्व्यवहार की शिकायत करते हैं। हिन्दू-मुसलमानों में तनाव यदा-कदा बढ़ता रहता है तो साम्प्रदायिक दंगे होते हैं। जिनमें न जाने कितनी जानें चली जाती हैं। कभी कानपुर, कभी मुरादाबाद, कभी मेरठ तो कभी दिल्ली में ये दंगे होते ही रहते हैं। महाराष्ट्र में भी हिन्दू-मुस्लिम फसाद होते रहते हैं। भारत में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के कारण साम्प्रदायिक दंगे-फसाद में वृद्धि हुई जोकि राष्ट्रीय एकता के लिए खतरनाक है। 6 दिसम्बर, 1992 को बाबरी मस्जिद को कार सेवकों ने गिरा दिया जिसके बाद देश के अनेक भागों में भीषण साम्प्रदायिक दंगे फसाद हुए। 2002 में गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे हुए।

4. जातिवाद (Casteism) जातिवाद की समस्या ने भी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा पहुंचाई है। इस समस्या के सम्बन्ध में प्रथम राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन में भाषण करते हुए तत्कालीन उप-राष्ट्रपति डॉ० राधाकृष्णन ने कहा था, “यद्यपि जाति का एक सामाजिक बुराई के रूप में अन्त हो रहा है, तथापि अब उसने एक राजनीतिक और प्रशासकीय बुराई का रूप धारण कर लिया है। हम जाति के प्रति निष्ठाओं को चुनाव जीतने के लिए नौकरियों में अधिक लोगों को रखने के लिए प्रयोग कर रहे हैं।”

श्री जयप्रकाश नारायण ने एक बार कहा था, “भारत में जाति सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल है।” जातीय संगठनों ने भारत की राजनीति में वही हिस्सा लिया है जो पश्चिमी देशों में विभिन्न हितों व वर्गों ने लिया है। चुनाव के समय उम्मीदवारों का चयन जाति के आधार पर किया जाता है और चुनाव प्रचार में जाति पर वोटें मांगी जाती हैं। प्रशासन में भी जातीयता का समावेश हो गया है।

5. ग़रीबी (Poverty)—ग़रीबी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में महत्त्वपूर्ण बाधा है। भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता ग़रीबी है। ग़रीब व्यक्ति अपने आपको और अपने परिवार को जीवित रखने के लिए संघर्ष में जुटा रहता है। जब एक ग़रीब व्यक्ति या ग़रीब वर्ग किसी दूसरे व्यक्ति या वर्ग को खुशहाल पाता है तो उसमें निराशा और घृणा की भावना उत्पन्न होती है और राजनीतिज्ञ ऐसे अवसरों का लाभ उठाकर आन्दोलन करवाते हैं। जो क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं वह आर्थिक विकास के लिए आन्दोलन करते हैं और कई बार अलग राज्य की मांग भी करते हैं।

6. सभी राजनीतिक दल संविधान के मूल मूल्यों पर सहमत नहीं (An the Political Parties do not accept the basic values of Constitution)-सभी राजनीतिक दल संविधान में निहित मूल मूल्यों (Basic Values) पर सहमत नहीं है। विशेषकर साम्यवादी और साम्प्रदायिकतावादी दल संविधान के मूल मूल्यों में विश्वास नहीं रखते। साम्यवादियों ने जब पश्चिमी बंगाल और केरल में सरकारें बनाईं तो उन्होंने सार्वजनिक रूप में घोषणा की थी कि उन्होंने संविधान को तोड़ने के उद्देश्य से सरकारें बनाई हैं। साम्प्रदायिक दल धर्म-निरपेक्षता में विश्वास नहीं रखते जो कि संविधान का आधारभूत सिद्धान्त है।

7. अनपढ़ता (Illiteracy)-भारत की अधिकांश जनता अशिक्षित है, जिसके स्वार्थी नेता अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए आम जनता को आसानी से मनचाहे रास्ते पर ले जाते हैं और अनपढ़ जनता स्वार्थी नेताओं की बातों में आकर आन्दोलन के पथ पर चल पड़ती है। कई बार आन्दोलनकारियों को यह भी पता होता कि उनके आन्दोलन का लक्ष्य क्या है और वे किस ओर जा रहे हैं ? स्वार्थी नेता धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर सीधे-सीधे लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं।

8. समाजवाद की असफलता (Failure of Socialism) प्रो० गोविंदराम वर्मा के मतानुसार समाजवाद की असफलता ने भी राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या को पैदा किया है। यदि समाजवाद सफल हो जाता तो आर्थिक विकास का फल सभी को चखने को मिलता। परन्तु अब बेरोज़गारी, पिछड़ापन, गरीबी, आर्थिक असमानता आदि ऐसे ही विघटनकारी आर्थिक तत्त्व हैं जो देश में भावनात्मक एकता पैदा नहीं करने देते, जिससे गम्भीर राजनीतिक समस्याएं उठ खड़ी होती हैं और देश की राजनीतिक व्यवस्था को भी खतरा पहुंचता है।

9. दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली (Defective Educational System) भारत की शिक्षा प्रणाली दोषपूर्ण है। हमारी शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों में चरित्र का निर्माण और अनुशासन कायम करने में सफल नहीं हुई। नैतिक और राष्ट्रीय मूल्यों का विकास नहीं हो रहा। इसका एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि अधिकांश शिक्षा संस्थाएं व्यक्तिगत व्यक्तियों तथा संस्थाओं के हाथ में है। भारतीय शिक्षा प्रणाली राष्ट्रीय एकीकरण की भावना विकसित करने में सफल नहीं रही।

10. असन्तुलित क्षेत्रीय विकास (Unbalanced Regional Development)-भारत के सभी क्षेत्रों का एकजैसा विकास नहीं हुआ है। कुछ क्षेत्रों का बहुत अधिक विकास हुआ है जबकि कुछ क्षेत्र आज भी पिछड़े हुए हैं। पिछड़े हुए क्षेत्रों के लोगों में यह भावना विकसित हो गई है कि सरकार उनके साथ भेदभाव कर रही है और यदि ये अलग हो जाएं तो अपना विकास कर सकेंगे। अतः असन्तुलित क्षेत्रीय विकास राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा है।

11. आन्दोलनों और हिंसा की राजनीति (Politics of Agitations and Violence)-पिछले कुछ वर्षों से भारत की राजनीति में आन्दोलन और हिंसा में वृद्धि हुई है। संविधान शान्तिपूर्वक साधनों द्वारा विरोध प्रकट करने का अधिकार देता है, पर राजनीति में हिंसा की घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। राजनीतिक हत्याओं में बहुत वृद्धि हुई है। चुनावों में कई स्थानों पर मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने के लिए बमों, बन्दूकों, छुरों-भालों आदि का खुलेआम प्रयोग किया जाता है। अतः आन्दोलनों और हिंसा की राजनीति राष्ट्रीय एकीकरण के लिए एक गम्भीर खतरा है।

12. भ्रष्टाचार (Corruption)-भारतीय प्रशासन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता भ्रष्टाचार है और इसने भी राष्ट्रीय एकीकरण में बाधा पहुंचाई है। प्रशासन में भ्रष्टाचार का बोलबाला है और चारों तरफ भाई-भतीजावाद चल रहा है, जिस कारण जनता का विश्वास प्रशासन के प्रति नहीं रहा। इसके फलस्वरूप दंगे-फसाद होते हैं जो राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधक हैं। हिंसा और अराजकतावाद के वातावरण ने राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या को और अधिक गम्भीर बनाया है।

13. सरकार की नीति (Government’s Policy) सरकार की नीति भी राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या के मार्ग में बाधा बनी हुई है। सरकार राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधक तत्त्वों को नष्ट करने में सफल नहीं हुई। यद्यपि कांग्रेसी नेता जातिवाद, क्षेत्रीयवाद, साम्प्रदायिकता आदि के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहते हैं परन्तु व्यवहार में कांग्रेस ने जातिवाद और क्षेत्रीयवाद को बढ़ावा ही दिया है। यह भी कहा जाता है कि सरकार सख्ती से कार्यवाही नहीं करती क्योंकि उसे उन लोगों के मत भी प्राप्त करने होते हैं। कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों के प्रतिसदैव ढीली नीति अपनाई है क्योंकि साधारणत: मुस्लिम वोट कांग्रेस के ही समझे जाते हैं।

14. क्षेत्रीय दल (Regional Parties) क्षेत्रीय दलों में वृद्धि राष्ट्रीय एकीकरण के लिए समस्या है। भारत में राष्ट्रीय दलों के मुकाबले में क्षेत्रीय दलों की संख्या बहुत अधिक है। 2016 में चुनाव आयोग ने 53 राजनीतिक दलों को राज्य स्तर के दलों के रूप में मान्यता प्रदान की। वर्तमान समय में क्षेत्रीय दलों का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय हित को महत्त्व न देकर क्षेत्रीय हितों पर जोर देते हैं। क्षेत्रीय दल अपने राजनीतिक लाभ के लिए लोगों की क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काते हैं। आजकल कई राज्यों में क्षेत्रीय दल सत्ता में हैं। क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय हित को हानि पहुंचाते हैं।

15. विदेशी ताकतें (Foreign Powers)-विदेशी ताकतें कुछ वर्षों से भारत में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रही हैं। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कई बार कहा कि विदेशी ताकतों से भारत की एकता व अखण्डता को खतरा है। पाकिस्तान खुले रूप में पंजाब और जम्मू-कश्मीर के आतंकवादियों को आधुनिक हथियार और वित्तीय सहायता दे रहा है।

16. आतंकवाद (Terrorism)—आतंकवाद पिछले कुछ वर्षों से भारत की एकता व अखण्डता के लिए खतरा बना हुआ है।
राष्ट्रीय एकीकरण की समस्याओं को दूर करने के उपाय-इसके लिए प्रश्न नं० 2 देखें।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 17 राष्ट्रीय एकीकरण

प्रश्न 2.
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली रुकावटों को दूर करने के सुझाव दीजिए।
(Give suggestions to remove hindrances which come in the way of National Integration in India.)
उत्तर-
भारत की एकता व अखण्डता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकीकरण अति आवश्यक है। बिना राष्ट्रीय एकीकरण के राष्ट्रीय अखण्डता को कायम नहीं रखा जा सकता। अतः राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए उन बाधाओं को दूर करना आवश्यक है जो राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में रोड़ा अटकाए हुए हैं। इन बाधाओं को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय हैं-

1. आर्थिक विकास (Economic Development)-राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए देश का आर्थिक विकास करना अति आवश्यक है। बेरोजगारी को दूर करके, आर्थिक विषमता को कम करके, गरीबी को दूर करके तथा आर्थिक लाभों को न्यायपूर्ण ढंग से वितरित करके ही राष्ट्रीय एकीकरण की सम्भावना को बढ़ाया जा सकता है।

2. राजनीतिक वातावरण में सुधार (Reforms in Political Atmosphere)-राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए देश के राजनीतिक वातावरण में सुधार करने भी ज़रूरी है। आज देश के विभिन्न सम्प्रदायों, जाति क्षेत्र के लोगों में एक-दूसरे के प्रति वांछित विश्वास का अभाव है। इस अविश्वास की स्थिति में राष्ट्रीय एकता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अतः राष्ट्रीय एकीकरण के लिए विभिन्न जातियों सम्प्रदायों एवं क्षेत्रों में विश्वास की भावना उत्पन्न करने के लिए राजनीतिक वातावरण में सुधार होना चाहिए।

3. समुचित शिक्षा व्यवस्था (Proper Education System)-समुचित शिक्षा व्यवस्था राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए महत्त्वपूर्ण साधन है। शिक्षा प्रणाली देश की आवश्यकताओं के अनुकूल होनी चाहिए। शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिससे साम्प्रदायवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद आदि की समस्याओं को हल किया जा सके। विभिन्न स्तरों पर पाठ्यक्रम ‘ऐसे होने चाहिए जिससे विद्यार्थियों में यह चेतना पैदा हो कि वे पहले भारतीय हैं और बाद में पंजाबी, बंगाली एवं मराठी हैं। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो विद्यार्थियों में धर्म-निरपेक्ष दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक हो।

4. भाषायी समस्या का समाधान (Solution of Linguistic Problem)-राष्ट्रीय एकीकरण को बनाए रखने के लिए भाषायी समस्या का समाधान करना अति आवश्यक है। राज्यों के पुनर्गठन पर पुनः विचार किया जाना चाहिए और जिन लोगों की भाषा के आधार पर मांग उचित है उस राज्य की स्थापना की जानी चाहिए। यह ठीक है कि हिन्दी को हिन्दी विरोधी लोगों पर नहीं थोपना चाहिए। यह राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए राष्ट्र भाषा का विकसित होना अति आवश्यक है। त्रि-भाषायी फार्मूले को सही ढंग से लागू किया जाना चाहिए।

5. सन्तुलित आर्थिक विकास (Balanced Economic Development)-राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए यह आवश्यक है कि देश के सभी क्षेत्रों का योजनाबद्ध आर्थिक विकास किया जाए। पिछड़े हुए क्षेत्रों का विकास बड़ी तेज़ी से किया जाना चाहिए।

6. धर्म निरपेक्षता को वास्तविक बनाना (Secularism should be real) यद्यपि संविधान द्वारा भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है, परन्तु इसे व्यावहारिक रूप देना अति आवश्यक है। लोगों में एक-दूसरे के धर्म के प्रति सहिष्णुता विकसित करना ज़रूरी है। यदि सरकारी कर्मचारी किसी धर्म विशेष के अनुयायियों के साथ पक्षपात करते पाए जाएं तो उनको कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।

7. भ्रष्टाचार को दूर करना (To remove Corruption) राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए प्रशासन में भ्रष्टाचार समाप्त करना आवश्यक है। भाई-भतीजावाद बन्द होना चाहिए।

8. सांस्कृतिक आदान-प्रदान-राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए विभिन्न भाषायी समुदायों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान अधिक-से-अधिक होना चाहिए। ऐसी संस्कृति का विकास होना चाहिए जो हमारे आधुनिक समाज के अनुरूप हो।

9. राजनीतिक दलों का योगदान (Contribution of Political Parties)-राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों का सहयोग अनिवार्य है। राजनीतिक दलों को अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए, धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्रीय भावनाओं को नहीं भड़काना चाहिए। राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय एकीकरण के लिए एक स्वस्थ जनमत का निर्माण करना चाहिए।

10. सरकार की नीतियों में परिवर्तन (Change in the Policies of Government)-राष्ट्रीय एकीकरण के लिए केन्द्रीय सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन करना होगा। सरकार को भेदभाव की नीति का त्याग करना होगा। कोई भी निर्णय लेते समय सरकार को यह नहीं सोचना चाहिए कि अमुक राज्य उसी के दल द्वारा शासित है अथवा नहीं। सरकार को लोगों की उचित मागों को तुरन्त स्वीकार कर लेना चाहिए ताकि जनता को आन्दोलन करने का अवसर न मिले। जब सरकार आन्दोलन के बाद मांगों को मानती है तो उससे लोगों में यह धारणा बन जाती है कि सरकार शक्ति की भाषा ही समझती है।

11. साम्प्रदायिक संगठनों पर प्रतिबन्ध (Restrictions on Communal Organisation)-राष्ट्रीय अखण्डता व एकता को बनाए रखने के लिए साम्प्रदायिक संगठनों एवं दलों पर कठोर प्रतिबन्ध लगाने चाहिए। परन्तु इसके साथसाथ ही आवश्यक है कि आम जनता को इस प्रकार के प्रतिबन्धों के औचित्य के सम्बन्धों में प्रशिक्षित किया जाए।

12. राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान (Respect for National Symbols)-राष्ट्रीय एकता अखण्डता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सभी भारतीय राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें। राष्ट्रीय झण्डे और राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना सभी का कर्त्तव्य है।

13. सिद्धान्तों पर आधारित राजनीति (Value Based Politics)-राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए यह आवश्यक है कि राजनीतिक सिद्धान्तों व मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए। राजनीतिज्ञों को धर्म, जाति, भाषा, अल्पसंख्या आदि की राजनीति से मुक्त होना पड़ेगा। पिछले कुछ वर्षों से कुछ नेताओं ने मूल्यों पर आधारित राजनीति की बात कह है पर आवश्यकता इसको अपनाने की है।

14. भावनात्मक एकीकरण (Emotional Integration) राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए भावनात्मक एकीकरण का होना आवश्यक है। भावनात्मक एकीकरण को देखा नहीं जा सकता और न ही खरीदा जा सकता है। यह भावना तो लोगों के दिलों में पाई जाती है और इसका विकास भी लोगों के मन और दिलों में होना चाहिए। लोगों के सामने देश प्रेम, त्याग, बलिदान आदि के आदर्श रखे जाने चाहिए ताकि सभी लोगों में भातृभाव व प्रेम की भावना विकसित हो।

15. अमीरी एवं ग़रीबी का अन्तर कम करना (To Narrow the gap between Rich and Poor) भारत में राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के लिए आवश्यक है, कि अमीरी एवं ग़रीबी के अन्तर को कम किया जाए।

16. सस्ता एवं सरल न्याय (Cheap and efficient Justice)-भारत में न्यायिक प्रक्रिया महंगी एवं जटिल होने से कारण गरीब लोगों को न्याय नहीं मिल पाता, जिससे उनका राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है। अत: सरकार को चाहिए कि लोगों को सस्ता एवं सरल न्याय उपलब्ध करवाएं।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 17 राष्ट्रीय एकीकरण

प्रश्न 3.
भारत के राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या के बारे में आप क्या जानते हैं ? भारत के द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण करने के लिए आज तक क्या कदम उठाए गए हैं ?
(What do you know by the problem of Indian National Integration ? What steps have been taken towards Indian National Integration ?).
अथवा
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं ? (What steps have been taken towards Indian National Integration ?)
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखिए।

राष्ट्रीय एकीकरण के लिए किए गए प्रयत्न (EFFORTS TOWARDS NATIONAL INTEGRATION)-

राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए किए गए प्रयत्नों को हम तीन भागों में बांट सकते हैं-

(1) सरकार द्वारा बनाए गए कानून।
(2) सरकारी तथा औपचारिक संगठनों द्वारा किए गए कार्य।
(3) अनौपचारिक संगठनों द्वारा किए गए कार्य।

1. सरकार द्वारा बनाए गए कानून-1961 में साम्प्रदायिक प्रचार पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए दो कानून पास किए। एक कानून द्वारा ऐसे किसी भी कार्य को कानून द्वारा दण्डनीय बना दिया गया जिससे विभिन्न धार्मिक मूल वंश पर आधारित अथवा भाषायी समुदायों अथवा जातियों के बीच शत्रुता और घृणा फैलती हो। दूसरे कानून द्वारा चुनाव में, धर्म मूल वंश, सम्प्रदाय, जाति अथवा भाषायी भावनाओं को उभारना दण्डनीय अपराध बना दिया गया। इन कानूनों में यह भी व्यवस्था की गई है कि जिस व्यक्ति को इस कानून के अन्तर्गत दण्ड मिलेगा। वह न तो चुनाव में मतदान कर सकता है और न ही चुनाव लड़ सकता है। 1963 में 16वां संशोधन किया गया। इस संशोधन का उद्देश्य भारत की अखण्डता और प्रभुसत्ता को सुरक्षित रखने से है। इस संशोधन द्वारा यह निश्चित किया गया कि राज्य विधानमण्डल या संसद् का चुनाव लड़ने से पहले तथा चुने जाने के बाद प्रत्येक उम्मीदवार को यह शपथ लेनी पड़ती है कि मैं भारतीय संविधान के प्रति वफ़ादार रहूंगा और भारत की अखण्डता व प्रभुसत्ता को बनाए रखूगा। 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में संशोधन करके राष्ट्र की एकता के साथ अखण्डता (Integrity) शब्द जोड़ा गया है।

2. सरकारी या औपचारिक संगठनों द्वारा किए गए कार्य-सरकार ने राष्ट्रीय एकीकरण का विकास करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए हैं
राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन 1961 (National Integration Conference 1961)-नई दिल्ली में 28 सितम्बर से 1 अक्तूबर, 1961 तक राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए सभी राजनीतिक दलों के नेताओं, प्रमुख शिक्षा शास्त्रियों, लेखकों और वैज्ञानिकों को आमन्त्रित किया गया। इस सम्मेलन का मत था कि राजनीतिक दलों ने सम्प्रदायवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद आदि को बढ़ावा देने में प्रोत्साहन दिया है। इसलिए सम्मेलन ने राजनीतिक दलों के लिए एक आचार संहिता पर बल दिया। इस संहिता में निम्नलिखित बातें कही गईं-

  • किसी भी दल को कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे विभिन्न धर्मों एवं भाषायी समुदायों में घृणा पैदा हो या उनके बीच तनाव उत्पन्न हो।
  • राजनीतिक दलों को साम्प्रदायिक, जातिगत, क्षेत्रीय अथवा भाषायी समस्याओं पर कोई ऐसा आन्दोलन शुरू नहीं करना चाहिए जिससे शान्ति के लिए कोई खतरा पैदा होता हो।
  • राजनीतिक दलों को अन्य दलों द्वारा आयोजित सभाओं, प्रदर्शनों आदि को तोड़ने के कोई काम नहीं करने चाहिए।
  • सरकार को नागरिक स्वतन्त्रताओं पर कोई अनुचित प्रतिबन्ध नहीं लगाने चाहिए और न ही उसे कोई ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे राजनीतिक दलों की सामान्य गतिविधियों में बाधाएं उत्पन्न होती हों।
  • दलगत हितों की प्राप्ति के लिए राजनीतिक सत्ता को प्रयोग में नहीं लाया जाना चाहिए। सम्मेलन ने यह सुझाव दिया कि शिक्षा को समवर्ती सूची में स्थान दिया जाए ताकि शिक्षा में एकरूपता लायी जा सके।

राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् (National Integration Council)-राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन, 1961 में ही राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् की भी रचना की गई जिसमें प्रधानमन्त्री, गृहमन्त्री, राज्यों के मुख्यमन्त्री, राजनीतिक दलों के सात नेता, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष, दो शिक्षा शास्त्री, अनुसूचित जातियों और जन-जातियों का आयुक्त तथा प्रधानमन्त्री द्वारा मनोनीत सात व्यक्तियों को स्थान दिया गया। इस परिषद् को सामान्य जनता, प्रेस तथा विद्यार्थियों के लिए आचार-संहिता बनाने का काम दिया गया। इस परिषद् का कार्य अल्पसंख्यकों की शिकायतों पर विचार करना भी था। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् को राष्ट्रीय एकीकरण के सभी पहलुओं पर विचार करने और उसके बारे में अपनी सिफ़ारिशें पेश करने का निर्देश दिया था।

राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का पुनर्गठन-राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का समय-समय पर पुनर्गठन किया गया। 12 अप्रैल, 2010 को राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का पुनर्गठन किया गया। 147 सदस्यीय परिषद् में 14 प्रमुख केन्द्रीय मंत्रियों सहित विपक्षी दल के नेता भी शामिल किए गए।
राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक-सितम्बर, 2013 को राष्ट्रीय एकता परिषद् की महत्त्वपूर्ण बैठक नई दिल्ली में हुई। इस बैठक में मुजफ्फरनगर दंगों के साम्प्रदायिक हिंसा का मुद्दा छाया रहा। प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने राज्यों को साम्प्रदायिक हिंसा से निपटने के लिए कठोर कार्यवाही करने को कहा।

3. अनौपचारिक संगठनों द्वारा किए गए कार्य-अनौपचारिक संगठनों में दो संगठन महत्त्वपूर्ण(1) इन्सानी बिरादरी तथा (2) अखिल भारतीय साम्प्रदायिकता विरोधी समिति। इन्सानी बिरादरी की स्थापना अगस्त, 1970 में की गई। श्री जय प्रकाश नारायण को इस संगठन का अध्यक्ष और शेख अब्दुल्ला को इसका उपाध्यक्ष बनाया गया, परन्तु इन संगठनों को साम्प्रदायिक संगठन कहा गया। अखिल भारतीय साम्प्रदायिकता विरोध समिति की नेता श्रीमती सुभद्रा जोशी थी। इस संगठन का विश्वास है कि देश में साम्प्रदायिक दंगों के लिए साम्प्रदायिकतावाद की संगठित शक्तियां उत्तरदायी हैं और इनमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सबसे अधिक प्रमुख है। इस समिति का छठा सम्मेलन 1974 में दिल्ली में हुआ। इस सम्मेलन में साम्प्रदायिक संगठनों पर कानून प्रतिबन्धों के लगाने की बात कही गई। इस समिति में कहा है कि जनसंघ जैसे साम्प्रदायिक संगठनों के प्रतिबन्धों को राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् में स्थान नहीं दिया जाना चाहिए तथा शिक्षा प्रणाली को धर्म-निरपेक्ष बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion)-संक्षेप में, राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में अनेक बाधाएं हैं, जिनसे राष्ट्रीय अखण्डता व एकता को खतरा पैदा हो गया है। आज देश को कमजोर करने वाली पृथक्कतावादी तथा साम्प्रदायिक ताकतों का कड़ाई से मुकाबला करना चाहिए।

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प्रश्न 4.
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के विभिन्न पहलुओं का विस्तार सहित वर्णन करो। (Write different aspects of National Integration in India in detail.)
उत्तर-
आज भारतीय राष्ट्र की सबसे बड़ी समस्या राष्ट्रीय एकीकरण की है। भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के विभिन्न पक्ष इस प्रकार हैं

1. राष्ट्रीय एकीकरण का राजनीतिक पहल-राष्ट्रीय एकीकरण की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की राजनीतिक मांगों की ओर उचित ध्यान दिया जाए। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ऐसी सत्ता की स्थापना होनी चाहिए जिसके प्रति लोग वफ़ादार हों। भारतीय संघ के राज्यों का पुनर्गठन इसलिए भाषा के आधार पर किया गया है और आज भारत में 29 राज्य हैं। केन्द्र और राज्यों में जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें हैं और उनमें जनता की निष्ठा हैं, परन्तु भारतीय जनता राजनीतिक दृष्टि से पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं हैं। आज भी विभिन्न भागों में अलग राज्य की स्थापना की मांग चली आ रही है।

2. राष्ट्रीय एकीकरण का सामाजिक पहलू-राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पहलू का अर्थ यह है कि देश में सभी भागों का विकास हो और लोगों में बहुत अधिक आर्थिक असमानताएं नहीं होनी चाहिएं। देश के पिछड़े क्षेत्र का विकास करना अति आवश्यक है। राष्ट्र के सभी सदस्यों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के साथ धर्म, जाति, रंग, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। भारत में यद्यपि संविधान के अन्तर्गत छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है, परन्तु इसके बावजूद आज भी देश के कई भागों में जाति-पाति के भेदभाव को दूर करना आवश्यक है।

3. राष्ट्रीय एकीकरण का सांस्कृतिक पक्ष-भारत में विभिन्न संस्कृतियों के लोग रहते हैं। संविधान ने सभी अल्प-संख्यकों को अपनी संस्कृति, अपनी भाषा तथा लिपि को कायम रखने तथा विकसित करने की स्वतन्त्रता दी है। ऐसी संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद भारत में रहने वाले अल्प-संख्यकों को यह सन्देह है कि भारत के बहु-संख्यक उनको संस्कृति को नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील हैं। भारत के सांस्कृतिक अल्प-संख्यकों को यह सन्देह है कि भारत के बहु-संख्यक उनको अपनी ही संस्कृति में शामिल करने के इच्छुक हैं। अल्प-संख्यकों का ऐसा सन्देह राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में एक बाधा है तथा इस क्षेत्र को ही राष्ट्रीय एकीकरण का सांस्कृतिक पक्ष माना जाता है।

4. राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष-राष्ट्रीय एकीकरण कोई ऐसा भवन नहीं है जिसका निर्माण अच्छे भवन निर्माताओं द्वारा ईंटों तथा गारे से किया जा सकता है। राष्ट्रीय एकीकरण वास्तव में एक धारणा अथवा विचार है जिसका निवास लोगों के हृदयों में होना अनिवार्य है। यह एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की चेतना तथा भावना है। परन्तु भारत में व्याप्त साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषायी, आतंकवाद तथा प्रान्तवाद के तत्त्व भारतीयों के हृदयों में ऐसी चेतना अथवा भावना विकसित नहीं होने देते हैं। ऐसी चेतना अथवा भावना के विकास की आवश्यकता को ही भारत में राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष माना जाता है।

5. राष्ट्रीय एकीकरण का आर्थिक पक्ष-राष्ट्रीय एकीकरण का आर्थिक पहलू इस बात की मांग करता है कि देश के सभी भागों का विकास हो और लोगों में बहुत अधिक आर्थिक असमानताएं नहीं होनी चाहिए। देश के पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना अति आवश्यक है। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ग़रीबी और बेकारी को दूर करना आवश्यक है क्योंकि ग़रीब और बेरोज़गार व्यक्ति के लिए एकीकरण का कोई महत्त्व नहीं है। यदि अधिकांश जनता ग़रीब है और देश के अनेक क्षेत्र बहुत पिछड़े हैं तो राष्ट्रीय एकीकरण का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय एकीकरण का अर्थ लिखो।
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण का साधारण अर्थ यह है कि एक देश में रहने वाले विभिन्न धर्मों, वर्गों, नस्लों तथा भाषाओं के लोगों में एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की भावना हो और वे अपने को एक अनुभव करते हों। राज्य के विकास के लिए यह आवश्यक है कि राज्य के अन्दर रहने वाले लोगों में एकता की भावना हो और यही भावना राष्ट्रीय एकीकरण का सार है। राष्ट्रीय एकीकरण का सम्बन्ध अनेकताओं में एकता स्थापित करना है। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ० एस० राधाकृष्णन के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक घर नहीं जो चूने और ईंटों से बनाया जा सके। यह एक औद्योगिक योजना भी नहीं है जिस पर विशेषज्ञों द्वारा विचार किया जा सके। इसके विपरीत एकीकरण का ऐसा विचार है जिसका विकास लोगों के दिलों में होता है। यह एक चेतना है जिसने जनसाधारण को जागृत करना है।” एच० ए० गन्नी के मतानुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक ऐसी सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और शैक्षणिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोगों के दिलों में एकता, दृढ़ता और सम्बद्धता की भावना विकसित होती है और उनमें सामान्य नागरिकता की भावना अथवा राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी की भावना का विकास होता है।”

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प्रश्न 2.
भारत के लिए राष्ट्रीय एकीकरण की विशेष आवश्यकता क्यों है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण राज्य की पहली आवश्यकता है। राज्य के विकास के लिए यह ज़रूरी है कि राज्य के अन्दर रहने वाले विभिन्न लोगों के मध्य एकता की भावना हो और यह भावना राष्ट्रीय एकीकरण का सार है। स्वतन्त्रता के इतने वर्ष बाद भी भारत में राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या पूरी तरह मौजूद है और यह भारत की राष्ट्रीय अखण्डता के लिए खतरा पैदा कर रही है। बहुत सारे राज्यों में पाई जाने वाली अलगाववादी प्रवृत्तियां, भाषायी भेदभाव, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भ्रष्टाचार, क्षेत्रीयवाद, आन्दोलन व हिंसा, असन्तुलित क्षेत्रीय विकास आदि समस्याओं ने भारतीय एकीकरण को बहुत प्रभावित किया है। ये सभी बातें इसका सबूत है कि भारत की राष्ट्रीय एकीकरण की समस्याओं का स्वरूप गम्भीर है। इसका एक बड़ा कारण भारत का विशाल क्षेत्रफल है जिसमें जाति, भाषा, धर्म, सभ्याचारिक, रीति-रिवाज आदि अनेक भिन्नताएं मिलती हैं। कुछ स्वार्थी लोग या राजनीतिक दल इन समस्याओं के द्वारा जनता की भावनाओं को जनाधार प्राप्त करने के लिए भड़काते हैं और इस तरह राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या को गम्भीर बनाकर देश की अखण्डता के वास्ते खतरा पैदा कर देते हैं। राष्ट्रीय एकीकरण के अभाव में ही हिन्दुस्तान का बंटवारा हुआ था और पाकिस्तान की स्थापना हुई थी जिसका मुख्य आधार धार्मिक था। अत: भारत को अपनी राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकीकरण की सख्त ज़रूरत है ताकि भारत इन समस्याओं का दृढ़तापूर्ण सामना कर सके।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली किन्हीं चार बाधाओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में चार रूकावटें लिखें।
उत्तर-
भारत में अनेक विभिन्नताएं हैं। ये सभी भिन्नताएं वास्तव में राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधाएं हैं। इनका वर्णन इस प्रकार है-

  • भाषा-भाषा की समस्या राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बन चुकी है। भाषा को लेकर विभिन्न क्षेत्रों के लोगों में तनाव बढ़ता है।
  • क्षेत्रवाद–क्षेत्रवाद या प्रादेशिकता का अर्थ है कि सारे देश की अपेक्षा किसी एक विशेष क्षेत्र के प्रति निष्ठा रखना। भारत में प्रादेशिकता की यह समस्या अत्यन्त गम्भीर है।
  • सम्प्रदायवाद-सम्प्रदायवाद राष्ट्रीय एकीकरण में बहुत बड़ी बाधा है।
  • जातिवाद ने भी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा पैदा की है।

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प्रश्न 4.
साम्प्रदायिकता का राष्ट्रीय एकीकरण पर क्या प्रभाव है ?
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के लिए साम्प्रदायिकता बाधा कैसे है?
उत्तर-
आजकल भारत की महत्त्वपूर्ण समस्या साम्प्रदायिकता है। साम्प्रदायिकता ने राष्ट्रीय एकीकरण को बहुत अधिक प्रभावित किया है। साम्प्रदायिकता राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में बहुत बड़ी बाधा है। साम्प्रदायिकता की भावना बढ़ने से लोगों की सोच साम्प्रदायिक रंग में रंगती जा रही है जिस कारण लोग राष्ट्र की अपेक्षा अपने-अपने सम्प्रदाय के प्रति अधिक वफ़ादार होते जा रहे हैं। साम्प्रदायिकता का तेजी से विकास होने के कारण राष्ट्रीय एकीकरण की गति धीमी हो गई है। साम्प्रदायिकता के प्रभाव के कारण लोग राष्ट्र की मुख्य धारा से दूर होते जा रहे हैं। साम्प्रदायिकता की समस्या को हल किए बिना राष्ट्रीय एकीकरण का ध्येय पूरा नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 5.
इंसानी बिरादरी का निर्माण क्यों किया गया था ?
अथवा
इन्सानी बिरादरी से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
इन्सानी बिरादरी एक गैर-सरकारी संगठन है, जिसकी स्थापना 1970 में प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी खान अब्दुल गफ्फार खां (सरहदी गान्धी) की प्रेरणा से हुई। श्री जय प्रकाश नारायण को इस संगठन का अध्यक्ष तथा श्री शेख अब्दुला को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य साम्प्रदायिक शक्तियों को नष्ट करके राष्ट्रीय भावना को विकसित करना था। सहनशीलता, आपसी समझ और सराहना (Toleration, Mutual Understanding and Appreciation) इस संगठन के तीन मूल तन्त्र थे परन्तु यह संगठन प्रभावी सिद्ध नहीं हुआ क्योंकि यह संगठन यह भी निश्चित नहीं कर पाया है कि देश में किन संगठनों को साम्प्रदायिक संगठन कहा जाए।

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प्रश्न 6.
राष्ट्रीय एकीकरण के राजनीतिक और सामाजिक पहलू का वर्णन करें।
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के राजनीतिक पक्ष का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
1. राष्ट्रीय एकीकरण का राजनीतिक पहलू-राष्ट्रीय एकीकरण की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की राजनीतिक मांगों की ओर उचित ध्यान दिया जाए। राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ऐसी सत्ता की स्थापना होनी चाहिए जिसके प्रति लोग वफ़ादार हो। भारतीय संघ के राज्यों का पुनर्गठन इसलिए भाषा के आधार पर किया गया है और आज भारत में 29 राज्य हैं। केन्द्र और राज्यों में जनता द्वारा निर्वाचित सरकारें हैं और उनमें जनता की निष्ठा है, परन्तु भारतीय जनता राजनीतिक दृष्टि से पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं है। आज भी विभिन्न भागों में अलग राज्य की स्थापना की मांग चली आ रही है।

2. राष्ट्रीय एकीकरण का सामाजिक पहलू-राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पहलू का अर्थ यह है कि देश में सभी भागों का विकास हो और लोगों में बहुत अधिक आर्थिक असमानताएं नहीं होनी चाहिएं। देश के पिछड़े क्षेत्रों का विकास करना अति आवश्यक है। राष्ट्र से सभी सदस्यों के साथ समान व्यवहार होना चाहिएं। समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के साथ धर्म, जाति, रंग, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। भारत में यद्यपि संविधान के अन्तर्गत छुआछूत को समाप्त कर दिया गया है, परन्तु इसके बावजूद आज भी देश के कई भागों में जाति-पाति के भेदभाव को दूर करना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के मनौवज्ञानिक पक्ष से आपका क्या भाव है ?
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष क्या है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण कोई ऐसा भवन नहीं है जिसका निर्माण अच्छे भवन निर्माताओं द्वारा ईंटों तथा गारे से किया जा सकता है। राष्ट्रीय एकीकरण वास्तव में एक धारणा अथवा विचार है जिसका निवास लोगों के हृदयों में होना अनिवार्य है। यह एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की चेतना तथा भावना है। परन्तु भारत में व्याप्त साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषायी आतंकवाद तथा प्रान्तवाद के तत्त्व भारतीयों के हृदयों में ऐसी चेतना अथवा भावना विकसित नहीं होने देते हैं। ऐसी चेतना अथवा भावना के विकास की आवश्यकता को ही भारत में राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष माना जाता है।

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प्रश्न 8.
राष्ट्रीय एकीकरणा के विकास में ‘शिक्षा’ क्या भूमिका निभा सकती है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए शिक्षा महत्त्वपूर्ण साधन है। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति में राजनीतिक चेतना पैदा होती है और शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जिससे साम्राज्यवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद आदि की समस्याओं को हल किया जा सके। शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों में धर्म-निरपेक्ष-दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है। शिक्षा द्वारा विद्यार्थियों में यह भावना विकसित की जा सकती है कि वे पहले भारतीय और बाद में पंजाबी, बंगाली, मराठी आदि है।

प्रश्न 9.
राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए चार सुझाव दीजिए।
उत्तर-
राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए उन बाधाओं को दूर करना आवश्यक है जो राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधक हैं। इन बाधाओं को दूर करने के निम्नलिखित उपाय हैं-

  • आर्थिक विकास-राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए देश का आर्थिक विकास करना अति आवश्यक है। बेरोज़गारी को दूर करके, आर्थिक विषमता को कम करके, ग़रीबी को दूर करके तथा आर्थिक लाभों को न्यायपूर्ण ढंग से वितरित करके ही राष्ट्रीय एकीकरण की सम्भावना को बढ़ाया जा सकता है।
  • राजनीतिक वातावरण में सुधार- राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए देश के राजनीतिक वातावरण में सुधार करना भी ज़रूरी है। अतः राष्ट्रीय एकीकरण के लिए विभिन्न जातियों, सम्प्रदायों एवं क्षेत्रों के विकास की भावना उत्पन्न करने के लिए राष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण में सुधार होना चाहिए।
  • समुचित शिक्षा व्यवस्था-समुचित शिक्षा व्यवस्था राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए महत्त्वपूर्ण साधन है।
  • भाषायी समस्या का समाधान-राष्ट्रीय एकीकरण को बनाए रखने के लिए भाषायी समस्या का समाधान करना अति आवश्यक है।

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प्रश्न 10.
भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण के लिए उठाए गए मुख्य कदमों का वर्णन कीजिए।
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए सरकार द्वारा उठाए गए किन्हीं चार उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  • 1961 में साम्प्रदायिक प्रचार पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए दो कानून पास किए गए। कानून द्वारा चुनाव में धर्म, मूल, वंश, सम्प्रदाय, जाति अथवा भाषायी भावनाओं को उभारना दण्डनीय अपराध बना दिया गया।
  • 1963 में संविधान में 16वां संशोधन किया गया। इस संशोधन का उद्देश्य भारत की अखण्डता और प्रभुसत्ता
    को सुरक्षित रखने से है।
  • 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में संशोधन करके राष्ट्र की एकता के साथ अखण्डता (Integrity) शब्द जोड़ा गया है।
  • सरकार ने 1961 में नई दिल्ली में राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में राष्ट्रीय एकीकरण को प्रोत्साहन देने के लिए राजनीतिक दलों के लिए एक आचार संहिता पर बल दिया गया।

प्रश्न 11.
राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् क्या है ?
उत्तर-
सितम्बर-अक्तूबर, 1961 में प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा पर नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में प्रधानमन्त्री, केन्द्रीय गृह मन्त्री, राज्यों के मुख्यमन्त्री, शिक्षा शास्त्री, प्रसिद्ध पत्रकार, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों से जुड़े प्रसिद्ध व्यक्तियों ने भाग लिया। सम्मेलन में एक राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् (National Integration Council) का निर्माण किया गया। इस परिषद् में प्रधानमन्त्री के अलावा केन्द्रीय गृह मन्त्री, राज्यों के मुख्यमन्त्री, राजनीतिक दलों के सात नेता, दो शिक्षा शास्त्री, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष, अनुसूचित जातियों तथा जन-जातियों के कमिश्नर तथा प्रधानमन्त्री द्वारा नियुक्त सात अन्य लोगों को नियुक्त किया गया। इस परिषद् की समय-समय पर प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता में बैठकें होती रहती हैं जिसमें राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए मार्ग खोजे जाते हैं।

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प्रश्न 12.
राष्ट्रीय एकीकरण के लिए जातिवाद किस प्रकार रुकावट बनता है ?
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के लिए जातिवाद बाधा कैसे है?
उत्तर-
जातिवाद की समस्या ने राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बहुत बाधा पहुंचाई है। इस समस्या के सम्बन्ध में प्रथम राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन में भाषण करते हुए तत्कालीन उप-राष्ट्रपति डॉ० राधाकृष्णन ने कहा था, “यद्यपि जाति का एक सामाजिक बुराई के रूप में अन्त हो रहा है, तथापि अब उसने एक राजनीतिक और प्रशासकीय बुराई का रूप धारण कर लिया है। हम जाति के प्रति निष्ठाओं को चुनाव जीतने के लिए अथवा नौकरियों में अधिक लोगों को रखने के लिए प्रयोग कर रहे हैं।”

श्री जय प्रकाश नारायण ने एक बार कहा था, “भारत में जाति सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल है।” जातीय संगठनों ने भारत की राजनीति में वही हिस्सा लिया है जो पश्चिमी देशों में विभिन्न हितों व वर्गों ने लिया है। चुनाव के समय उम्मीदवारों का चयन जाति के आधार पर किया जाता है और चुनाव प्रचार में जाति पर वोटें मांगी जाती हैं। प्रशासन में भी जातीयता का समावेश हो गया है। राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा जातीय हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।

प्रश्न 13.
ग़रीबी राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में कैसे रुकावट है ?
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ग़रीबी बाधा कैसे है?
उत्तर-
ग़रीबी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में महत्त्वपूर्ण बाधा है। भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता ग़रीबी है। ग़रीब व्यक्ति अपने आपको और अपने परिवार को जीवित रखने के लिए संघर्ष में जुटा रहता है। जब एक ग़रीब व्यक्ति या ग़रीब वर्ग किसी दूसरे व्यक्ति या वर्ग को खुशहाल पाता है तो उसमें निराशा और घृणा की भावना उत्पन्न होती है और राजनीतिज्ञ ऐसे अवसरों का लाभ उठाकर आन्दोलन करवाते हैं। जो क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से पिछड़े होते हैं वह आर्थिक विकास के लिए आन्दोलन करते हैं और कई बार अलग राज्य की मांग भी करते हैं।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय एकीकरण से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण का साधारण अर्थ यह है कि एक देश में रहने वाले विभिन्न धर्मों, वर्गों, नस्लों तथा भाषाओं के लोगों में एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की भावना हो और वे अपने को एक अनुभव करते हों। राज्य के विकास के लिए यह आवश्यक है कि राज्य के अन्दर रहने वाले लोगों में एकता की भावना हो और यही भावना राष्ट्रीय एकीकरण का सार है। राष्ट्रीय एकीकरण का सम्बन्ध अनेकताओं में एकता स्थापित करना है।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय एकीकरण की कोई एक प्रसिद्ध परिभाषा बताएं।
उत्तर-
डॉ० एस० राधाकृष्णन के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण एक घर नहीं जो चूने और ईंटों से बनाया जा सके। यह एक औद्योगिक योजना भी नहीं है जिस पर विशेषज्ञों द्वारा विचार किया जा सके। इसके विपरीत एकीकरण का ऐसा विचार है जिसका विकास लोगों के दिलों में होता है। यह चेतना है, जिसने जनसाधारण जो जागृत किया है।”

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली किन्हीं दो बाधाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  1. भाषा-भारत एक बहुभाषी राज्य है और सदैव से ही रहा है। भाषा की समस्या राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बन चुकी है।
  2. क्षेत्रवाद-क्षेत्रवाद या प्रादेशिकता का अर्थ है कि सारे देश की अपेक्षा किसी एक विशेष क्षेत्र के प्रति निष्ठा रखना।

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प्रश्न 4.
राष्ट्रीय एकीकरण के मनोवैज्ञानिक पक्ष से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण कोई ऐसा भवन नहीं है जिसका निर्माण अच्छे भवन निर्माताओं द्वारा ईंटों तथा गारे से किया जा सकता है। राष्ट्रीय एकीकरण वास्तव में एक धारणा अथवा विचार है जिसका निवास लोगों के हृदयों में होना अनिवार्य है। यह एक ही राष्ट्र से सम्बन्धित होने की चेतना तथा भावना है। परन्तु भारत में व्याप्त साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषायी झगड़े, आतंकवाद तथा प्रान्तवाद के तत्त्व भारतीयों के हृदयों में ऐसी चेतना अथवा भावना विकसित नहीं होने देते हैं। ऐसी चेतना अथवा भावना के विकास की आवश्यकता को ही भारत में राष्ट्रीय एकीकरण का मनोवैज्ञानिक पक्ष माना जाता है।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली रुकावटों को दूर करने के कोई दो उपाय लिखिए।
उत्तर-

  1. आर्थिक विकास-राष्ट्रीय एकीकरण लाने के लिए देश का आर्थिक विकास करना अति आवश्यक
  2. राजनीतिक वातावरण में सुधार-राष्ट्रीय अखण्डता को बनाए रखने के लिए देश के राजनीतिक वातावरण में सुधार करना भी ज़रूरी है।

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय एकीकरण कौन्सिल क्या है?
उत्तर-
सितम्बर-अक्तूबर, 1961 में प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू की प्रेरणा पर नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय एकीकरण सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में प्रधानमन्त्री, केन्द्रीय गृह मन्त्री, राज्यों के मुख्यमन्त्री, शिक्षा शास्त्री, प्रसिद्ध पत्रकार, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों से जुड़े प्रसिद्ध व्यक्तियों ने भाग लिया। सम्मेलन में एक राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् (National Integration Council) का निर्माण किया गया।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय एकीकरण का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
एक ही देश में रहने वाले विभिन्न संस्कृतियों के लोगों में एक ही राष्ट्र से सम्बन्ध होने की भावना विकसित करना राष्ट्रीय एकीकरण का वास्तविक अर्थ है।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय एकीकरण की कोई एक परिभाषा लिखिए।
उत्तर-
माईरन बीनर के अनुसार, “राष्ट्रीय एकीकरण की धारणा का अभिप्राय क्षेत्रीय राष्ट्रीयता की ऐसी भावना विकसित करना है, जो अन्य वर्गीय निष्ठाओं को समाप्त करती है, या उन छोटी निष्ठाओं से श्रेष्ठ होती है।”

प्रश्न 3.
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के दो पक्षों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. राजनीतिक पक्ष
  2. माजिक पक्ष।

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प्रश्न 4.
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के किसी एक पहलू के बारे में लिखें।
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण का राजनीतिक पक्ष देश के क्षेत्रीय संगठन से सम्बन्धित है।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का निर्माण कब हुआ ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण परिषद् का निर्माण सन् 1961 में किया गया।

प्रश्न 6.
‘इंसानी बिरादरी’ नाम की संस्था का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
‘इंसानी बिरादरी’ नाम की संस्था के संस्थापक खान अब्दुल गफ्फार खान थे।

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प्रश्न 7.
राष्ट्रीय एकीकरण के आर्थिक पक्ष का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण के आर्थिक पक्ष का अर्थ यह है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों का असन्तुलित आर्थिक विकास न हो, बल्कि सभी क्षेत्रों का उचित तथा सन्तुलित विकास हो।

प्रश्न 8.
राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पक्ष का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पक्ष का प्रत्यक्ष सम्बन्ध भारतीय समाज में शताब्दियों से चली आ रही जाति प्रथा से है, जब जाति के आधार पर मनुष्य के साथ पक्षपात किया जाए, तो ऐसी स्थिति राष्ट्रीय एकीकरण के सामाजिक पक्ष का प्रतीक होती है।

प्रश्न 9.
राष्ट्रीय एकीकरण के रास्ते में आने वाली दो रुकावटों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. साम्प्रदायिकता
  2. जातिवाद।

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प्रश्न 10.
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के विकास के लिए कोई एक सुझाव लिखें।
उत्तर-
गरीबी और बेरोज़गारी दूर करना।

प्रश्न 11.
राष्ट्रीय एकीकरण के लिए जातिवाद किस प्रकार रुकावट बनता है ?
उत्तर-
निम्न जातियों के साथ दुर्व्यवहार तथा जाति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था, राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा बनती है।

प्रश्न 12.
धरती के बेटों के सिद्धान्त से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
धरती के बेटों के सिद्धान्त का अभिप्राय अपने ही राज्य के लोगों को रोज़गार इत्यादि के अवसरों में प्राथमिकता देना है।

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प्रश्न 13.
माओवादी हिंसा ने राष्ट्रीय एकीकरण को कैसे प्रभावित किया है ?
उत्तर-
माओवादी हिंसा देश की एकता और अखंडता को कमज़ोर कर रही है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. राष्ट्रीय अखण्डता …………….. पर निर्भर करती है।
2. राष्ट्रीय एकीकरण का सम्बन्ध अनेकता में ……….. स्थापित करना है।
3. भारत में जाति, भाषा, धर्म एवं संस्कृति की अनेक …………. पाई जाती हैं।
4. भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में ………. भाषाओं का वर्णन किया गया है।
5. सन् ………. में भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया।
उत्तर-

  1. राष्ट्रीय एकीकरण
  2. एकता
  3. विभिन्नताएं
  4. 22
  5. 1956.

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प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही या ग़लत का चुनाव करें-

1. जातिवाद की समस्या ने राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा पहुंचाई है।
2. गरीबी राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा नहीं होती।
3. अनपढ़ता राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देती है।
4. राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने में शिक्षा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
5. भ्रष्टाचार ने राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा पहुंचाई है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. ग़लत
  4. सही
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यह कथन किसका है, “कि भारत के सामने यह खतरा है, कि वह अनेक छोटे-छोटे सर्वसत्तावादी राष्ट्रों में बंट जायेगा।”
(क) डॉ० एस० राधाकृष्णन
(ख) प्रो० सुनीता कुमार चैटर्जी
(ग) प्रो० आर० भास्करण
(घ) रजनी कोठारी।
उत्तर-
(ख) प्रो० सुनीता कुमार चैटर्जी

प्रश्न 2.
भारत में राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बाधा है
(क) क्षेत्रवाद
(ख) साम्प्रदायिकता
(ग) जातिवाद
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 3.
“समाजवाद की असफलता ने भी राष्ट्रीय एकीकरण की समस्या को पैदा किया है।” यह कथन किसका
(क) पं० नेहरू
(ख) श्री लाल बहादुर शास्त्री
(ग) प्रो० गोविन्द राम वर्मा
(घ) श्री अटल बिहारी वाजपेयी।
उत्तर-
(ग) प्रो० गोविन्द राम वर्मा

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए क्या उपाय किया जाना चाहिए ?
(क) आर्थिक विकास
(ख) राजनीतिक वातावरण में सुधार
(ग) समुचित शिक्षा व्यवस्था
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 5.
निम्न में से एक राष्ट्रीय एकीकरण का पक्ष माना जाता है-
(क) राजनीतिक पक्ष
(ख) सामाजिक पक्ष
(ग) सांस्कृतिक पक्ष
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।