PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप

PSEB 11th Class Geography Guide भूचाल या भूकंप Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
भूचाल (भूकंप) क्या होते हैं ?
उत्तर-
धरती पर अचानक झटकों को भूचाल (भूकंप) कहते हैं।

प्रश्न 2.
हाईपोसैंटर क्या होता है ?
उत्तर-
भूचाल के केंद्र को हाईपोसैंटर कहते हैं।

प्रश्न 3.
अधिकेंद्र या ऐपीसैंटर क्या होता है ?
उत्तर-
धरती के ऊपर जिस स्थान पर भूचाल पैदा होता है, उसे अधिकेंद्र या एपीसैंटर कहते हैं।

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प्रश्न 4.
फोकस और अधिकेंद्र क्या होते हैं ? इनके चित्र भी बनाएँ।
उत्तर-
भूचाल जिस स्थान से आरंभ होता है, उसे फोकस कहते हैं। धरातल के जिस स्थान पर सबसे पहले भूचाल अनुभव होता है, उसे अधिकेंद्र कहते हैं।
(नोट-चित्र के लिए देखें अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के लघूत्तरात्मक प्रश्न)

प्रश्न 5.
भूचाल मापने वाले यंत्र को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-
सिस्मोग्राफ।

प्रश्न 6.
भूचाल आने के कारणों को विस्तार से लिखें।
उत्तर-
(उत्तर के लिए देखें-अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के लघूत्तरात्मक प्रश्न-1)

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प्रश्न 7.
प्लेट टैक्टॉनिक का सिद्धांत क्या है ?
उत्तर-
पृथ्वी का क्रस्ट कई प्लेटों में बँटा हुआ है। ये प्लेटें खिसकती रहती हैं। इन्हें प्लेट टैक्टॉनिक कहते हैं।

प्रश्न 8.
मानवीय कारण भूचाल के लिए कैसे ज़िम्मेदार हैं ?
उत्तर-
खानों को गहरा करने, डैम, सड़कों और रेल पटरियों को बिछाने के लिए ऐटमी धमाके करने से भूचाल आते हैं।

प्रश्न 9.
भूचाल की तीव्रता क्या होती है? भूचाल की तीव्रता कैसे मापी जाती है ?
उत्तर-
भूचाल की तीव्रता मापने के लिए रिक्टर पैमाने का प्रयोग किया जाता है। भूचाल की तीव्रता उसमें पैदा हुई शक्ति को कहा जाता है।

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प्रश्न 10.
अग्नि-चक्र क्या है ?
उत्तर-
प्रशांत महासागर के इर्द-गिर्द ज्वालामुखियों की श्रृंखला को अग्नि-चक्र कहते हैं।

प्रश्न 11.
भूचालों के विश्व-विभाजन का वर्णन करें।
उत्तर-
(उत्तर के लिए देखें-अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में निबंधात्मक प्रश्न सं.-2)

प्रश्न 12.
भारत में भूचाल क्षेत्रों के बारे में लिखें।
उत्तर-
भारत में प्रायद्वीप पठार स्थित खंड भूचाल रहित होते हैं। अधिकतर भूचाल हिमालय पर्वत, गंगा के मैदान और पश्चिमी तट पर आते हैं।

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प्रश्न 13.
सुनामी से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
सागर तल पर आए भूचाल (भूकंप) के कारण उत्पन्न हुई विशाल लहरों को सुनामी कहा जाता है।

प्रश्न 14.
क्या भूचालों की भविष्यवाणी की जा सकती है ?
उत्तर-
भूचालों की भविष्यवाणी करना भूचाल वैज्ञानिकों के लिए बहुत मुश्किल काम है या यह कह लीजिए कि लगभग असंभव है। केवल आम भूचालों से ग्रस्त क्षेत्र और धरती की पपड़ी पर प्लेट टैक्टॉनिक का नक्शा और प्लेट सीमा का गहन अध्ययन भूचालों के बारे में अनुमान लगाना आसान कर सकता है।

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Geography Guide for Class 11 PSEB भूचाल या भूकंप Important Questions and Answers

लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
भूचाल आने के कारणों को विस्तार से लिखें।
उत्तर-
भूचाल के कारण (Causes of Earthquakes)-प्राचीन काल में लोग भूचाल को भगवान का क्रोध मानते थे। धार्मिक विचारों के अनुसार, जब मानवीय पाप बढ़ जाते हैं, तो पापों के भार से धरती काँप उठती है। परंतु वैज्ञानिकों के अनुसार भूचाल के नीचे लिखे कारण हैं-

1. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)–ज्वालामुखी विस्फोट से आस-पास के क्षेत्र काँप उठते हैं और हिलने लगते हैं। अधिक विस्फोटक शक्ति के कारण खतरनाक भूचाल आते हैं। 1883 ई० में काराकटोआ विस्फोट से पैदा हुए भूचाल का प्रभाव ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणी अमेरिका तक अनुभव किया गया था।

2. दरारें (Faults)-धरती की हलचल के कारण धरातल पर खिंचाव या दबाव के कारण दरारें पड़ जाती हैं। इन्हीं के सहारे भू-भाग ऊपर या नीचे की ओर सरक जाते हैं और जिससे भूचाल पैदा होते हैं। 1923 में कैलीफोर्निया का भयानक भूचाल ‘सेन ऐंडरीयास-दरार’ (San Andreas Faults) के कारण हुआ था। 11 दिसंबर, 1927 में कोयना (महाराष्ट्र) का भूचाल भी इसी कारण आया था।

3. धरती का सिकुड़ना (Contraction of Earth)-धरती अपनी मूल अवस्था में गर्म थी, परंतु अब धीरे धीरे यह ठंडी हो रही है। तापमान कम होने से धरती सिकुड़ती है और चट्टानों में हलचल होती है।

4. गैसों का फैलना (Expansion of Gases)-धरती के भीतरी भाग से गैसें और भाप बाहर आने का यत्न करती हैं। इनके दबाव से भूचाल आते हैं।

5. चट्टानों की लचक शक्ति (Elasticity of Rocks)-जब किसी चट्टान पर दबाव पड़ता है, तो वह चट्टान उस दबाव को वापस धकेलती है, इससे भू-भाग हिल जाते हैं। .

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
भूचाल के अलग-अलग प्रकार बताएँ। भूचाली लहरों का वर्णन करें।
उत्तर-
भूचाल के प्रकार (Types of Earthquakes) –
भूचाल के पैदा होने के कई कारण होते हैं-
गहराई के आधार पर भूचाल के प्रकार (Types of Earthquakes according to Depth)-प्रसिद्ध वैज्ञानिकों गुटनबर्ग (Gutenberg) और रिचर (Ritchter) ने गहराई के आधार पर भूचालों को तीन वर्गों में बाँटा है।

जिन भूचालों की लहरें (Shock) 50 किलोमीटर या इससे कम गहराई पर उत्पन्न होती हैं, उन्हें साधारण भूचाल (Normal Earthquakes) कहते हैं। जब लहरें 70 से 250 किलोमीटर की गहराई से उत्पन्न होती हैं, तो इन्हें मध्यवर्ती भूचाल (Intermediate Earthquakes) कहते हैं। जब लहरों की उत्पत्ति 250 से 700 किलोमीटर की गहराई के बीच होती है तो इन्हें गहरे केंद्रीय भूचाल (Deep Focus earthquakes) कहते हैं।

भूमि-कंपन लहरें (Earthquake Waves) –
भूचाल संबंधी ज्ञान को भूचाल विज्ञान (Semology) कहते हैं। भूचाल की तीव्रता और उत्पत्ति-स्थान की तीव्रता पता करने के लिए भूचाल मापक-यंत्र (Seismograph) की खोज हुई है। इस यंत्र में लगी एक सूई द्वारा ग्राफ पेपर के ऊपर भूचाल के साथ-साथ ऊँची-नीची (लहरों के रूप में) रेखाएँ बनती रहती हैं। जिस स्थान-बिंदु से भूचाल आरंभ होता है, उसे भूचाल उत्पत्ति केंद्र (Seismic Focus) कहते हैं। भू-तल पर जिस स्थान-बिंदु पर भूचाल का अनुभव सबसे पहले होता है, उसे अधिकेंद्र (Epicentre) कहते हैं। यह भूचाल उत्पत्ति केंद्र के ठीक ऊपर से आरंभ होता है। भूचाल लहरें (Earthquake Waves) उत्पत्ति केंद्र में उत्पन्न होकर शैलों में कंपन करती हुई सबसे पहले अधिकेंद्र और इसके निकटवर्ती क्षेत्र में पहुँचती हैं। परंतु भूचाल का सबसे अधिक प्रभाव अधिकेंद्र और इसके निकटवर्ती क्षेत्र पर पड़ता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप 1

भूचाली लहरों को रेखाओं में लिया जाता है, जोकि अक्सर अंडे के आकार (Elliptical) की होती हैं। इन्हें भूचाल उत्पत्ति रेखाएँ (Homoseismal lines) कहा जाता है। ऐसे स्थानों को, जिन्हें एक जैसी लहरों के पहुँचने के कारण एक जैसी हानि हुई हो, तो मानचित्र पर रेखाओं द्वारा मिला दिया जाता है। इन रेखाओं को सम-भूचाल रेखाएँ (Isoseismal lines) कहते हैं।

भूचाल लहरें-उत्पत्ति केंद्र से उत्पन्न होने वाली भूमि-कंपन लहरें एक जैसी नहीं होती और न ही इनकी गति में समानता होती है। इन तथ्यों को आधार मानकर इन तरंगों को नीचे लिखे तीन भागों में बाँटा गया है-

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1. प्राथमिक लहरें (Primary or Push or ‘P’ waves)—ये लहरें ध्वनि लहरों (Sound waves) के समान आगे-पीछे (to and fro) होती हुई आगे बढ़ती हैं। ये ठोस भागों में तीव्र गति से आगे बढ़ती हैं और अन्य प्रकार की लहरों की अपेक्षा तीव्र चलने वाली लहरें होती हैं। इनकी गति 8 से 14 कि०मी० प्रति सैकिंड होती है। प्राथमिक लहरें तरल और ठोस पदार्थों को एक समान रूप में पार करती हैं।

2. गौण लहरें (Secondary or ‘S’ Waves)-ये लहरें ऊपर-नीचे (Up and down) होती हुई आगे बढ़ती _हैं। इनकी गति 4 से 6 किलोमीटर प्रति सैकिंड होती है। ये द्रव्य पदार्थों को पार करने में असमर्थ होती हैं और ये उसमें ही अलोप हो जाती हैं।

3. धरातलीय लहरें (Surface or ‘L’ waves)-इनकी गति 3 से 5 किलोमीटर प्रति सैकिंड होती है। ये धरती की ऊपरी परतों में ही चलती हैं अर्थात् ये भू-गर्भ की गहराइयों में प्रवेश नहीं करतीं। ये अत्यंत ऊँची और नीची होकर चलती हैं जिससे भू-तल पर अपार धन-माल की हानि होती है।

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प्रश्न 2.
भूचाल किसे कहते हैं ? भूचालों की उत्पत्ति के क्या कारण हैं ? विश्व में भूचाल क्षेत्रों के विभाजन के बारे में बताएँ।
उत्तर-
जब धरातल का कोई भाग अचानक काँप उठता है, तो उसे भूचाल कहते हैं। इस हलचल के कारण धरती हिलने लगती है और आगे-पीछे, ऊपर-नीचे सकरती है। इन्हें झटके (Termors) कहते हैं। (An Earthquake is a simple shiver on the skin of our planet.)

भूचाल के कारण (Causes of Earthquakes)—प्राचीन काल में लोग भूचाल को भगवान का क्रोध मानते थे। धार्मिक विचारों के अनुसार जब मानवीय पाप बढ़ जाते हैं, तो पापों के भार से धरती काँप उठती है। परंतु वैज्ञानिकों के अनुसार भूचाल के लिए उत्तरदायी कारण नीचे लिखे हैं-

1. ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)-ज्वालामुखी विस्फोट से आस-पास के क्षेत्र काँप उठते हैं
और हिलने लगते हैं। अधिक विस्फोटक शक्ति के कारण खतरनाक भूचाल आते हैं। 1883 में काराकाटोआ विस्फोट से पैदा हुए भूचाल का प्रभाव ऑस्ट्रेलिया और दक्षिणी अमेरिका तक अनुभव किया गया।

2. दरारें (Faults)-धरती की हलचल के कारण धरातल पर खिंचाव या दबाव के कारण दरारें पड़ जाती हैं। इनके सहारे भूमि-भाग ऊपर या नीचे की ओर सरकने से भूचाल पैदा होते हैं। 1923 में कैलीफोर्निया का भयानक भूचाल “सेन ऐंडरीयास-दरार’ (San Andreas Faults) के कारण हुआ था। 11 दिसंबर, 1927 में कोयना (महाराष्ट्र) का भूचाल भी इसी कारण आया था।

3. धरती का सिकुड़ना (Contraction of Earth) धरती अपनी मूल अवस्था में गर्म थी, परन्तु अब धीरे धीरे ठंडी हो रही है। तापमान कम होने से धरती सिकुड़ती है और चट्टानों में हलचल होती है।

4. गैसों का फैलना (Expansion of Gases)-धरती के भीतरी भाग से गैसें और भाप बाहर आने का यत्न करती हैं इनके दबाव से भूचाल आते हैं।

5. चट्टानों की लचक-शक्ति (Elasticity of Rocks)-जब किसी चट्टान पर दबाव पड़ता है, तो वह चट्टान उस दबाव को वापस धकेलती है, इससे भू-भाग हिल जाते हैं।

6. साधारण कारण (General Causes)-हल्के या छोटे भूचाल कई कारणों से पैदा हो जाते हैं-

  • पहाड़ी भागों में भू-स्खलन (Landslide) और हिम-स्खलन (Avalanche) होने से।
  • गुफाओं की छतों के बह जाने से।
  • समुद्री तटों से तूफानी लहरों के टकराने से।
  • धरती के तेज़ घूमने से।
  • अणु-बमों (Atom Bombs) के विस्फोट और परीक्षण से।
  • रेलों, ट्रकों और टैंकों के चलने से।

विश्व के भूचाल-क्षेत्र (Earthquake Zones of the World)-

  1. ज्वालामुखी क्षेत्रों में।
  2. नवीन बलदार पहाड़ों के क्षेत्रों में।
  3. समुद्र तट के क्षेत्र में।

भूचाल कुछ निश्चित पेटियों (Belts) में मिलते हैं-

  • प्रशांत महासागरीय पेटी (Circum Pacific Belt)—यह विशाल भूचाल क्षेत्र प्रशांत महासागर के दोनों तटों (अमेरिकी और एशियाई) के साथ-साथ फैला हुआ है। यहाँ विश्व के 68% भूचाल आते हैं। इसमें कैलीफोर्निया, अलास्का, चिली, जापान, फिलीपाइन प्रमुख क्षेत्र हैं। जापान में तो हर रोज़ लगभग 4 भूचाल आते हैं। हर तीसरे दिन एक बड़ा भूचाल आता है।
  • मध्य-महाद्वीपीय पेटी (Mid-world Belt)—यह पेटी यूरोप और एशिया महाद्वीप के बीच बलदार पर्वतों (अल्पस और हिमालय) के सहारे पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली है। यहाँ संसार के 11% भूचाल आते हैं। भारत के भूचाल-क्षेत्र 1. भारत के उत्तरी भाग में अधिक भूचाल आते हैं। 2. मध्यवर्ती मैदानी-क्षेत्र में कम भूचाल अनुभव होते हैं।
  • दक्षिणी भारत एक स्थिर भाग है। यहाँ भूचाल बहुत कम आते हैं।
  • भारत में आए हुए प्रसिद्ध भूचाल हैंकच्छ (1819), असम (1897), कांगड़ा (1903), बिहार (1934)।

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प्रश्न 3.
मानवीय जीवन पर भूचाल के प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
भूचाल के प्रभाव (Effects of Earthquakes)-भूचाल पृथ्वी की एक भीतरी शक्ति है, जो अचानक (Sudden) परिवर्तन ले आती है। यह जादू के खेल के समान क्षण-भर में अनेक परिवर्तन ले आती है। भूचाल मनुष्य के लिए लाभदायक और हानिकारक दोनों ही है। विनाशकारी प्रभाव के कारण इसे शाप माना गया है, परंतु इसके कई लाभ भी हैं। भूचालों से होने वाली हानियों व लाभों का वर्णन नीचे दिया गया है-

हानियाँ (Disadvantages)-
1. जान व माल का नाश (Loss of Life and Property)-भूचाल से जान व माल की बहुत हानि होती है। 1935 में क्वेटा के भूचाल से 60,000 लोग मारे गए थे। एक अनुमान के अनुसार पिछले 4000 वर्षों में 1/2 करोड़ आदमी भूचाल के कारण मारे जा चुके हैं।

2. नगरों का नष्ट होना (Distruction of Cities) भूचाल से पूरे के पूरे नगर नष्ट हो जाते हैं। पुल टूट जाते हैं, सड़कें टूट जाती हैं, रेल की पटरियाँ टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं जिससे आवाजाही रुक जाती है।

3. आग का लगना (Fire Incidents)-भूचाल से अचानक आग लग जाती है। 18 अप्रैल, 1906 ई० में सैन फ्रांसिस्को में आग से शहर का काफी बड़ा भाग जल गया था।

4. दरारों का निर्माण (Formation of Faults)-धरातल फटने से दरारें बनती हैं। असम में 1897 ई० के भूचाल के कारण 11 किलोमीटर चौड़ी और 20 किलोमीटर लंबी दरार बन गई थी।

5. भू-स्खलन (Landslide)-पहाड़ी क्षेत्रों के अलग-अलग शिलाखंड और हिमखंड (Avalanche) टूटकर नीचे गिरते रहते हैं। समुद्र में बर्फ के शैल (Iceberge) तैरने लगते हैं।

6. बाढ़ें (Floods)-नदियों के रास्ते बदलने से बाढ़ें आती हैं। 1950 ई० में असम में भूचाल से ब्रह्मपुत्र नदी में बाढ़ आई थी।

7. तूफानी लहरें (Tidal waves)-समुद्र में तूफानी लहरें तटों पर नुकसान करती हैं। इन्हें सुनामी (Tsunami) कहते हैं। 1775 ई० में लिस्बन (पुर्तगाल) में भूचाल से 12 मीटर ऊँची लहरों के कारण वह शहर नष्ट हो गया था।

8. तटीय भाग का धंसना (Sinking of the Coast)-भूचाल से तटीय भाग नीचे धंस जाते हैं। जापान में 1923 ई० के संगामी खाड़ी के भूचाल से सागर तल का कुछ भाग 300 मीटर नीचे धंस गया था।

लाभ (Advantages)-

  • भूचाल से निचले पठारों, द्वीपों और झीलों की रचना होती है।
  • भूचाल से कई चश्मों का (Springs) का जन्म होता है।
  • तटीय भागों में गहरी खाइयाँ बन जाती हैं, जहाँ प्राकृतिक बंदरगाह बन जाते हैं।
  • भूचाल द्वारा अनेक खनिज पदार्थ धरातल पर आ जाते हैं।
  • कृषि के लिए नवीन उपजाऊ क्षेत्र बन जाते हैं।
  • भूचाली लहरों द्वारा धरती के भू-गर्भ (Interior) के बारे में जानकारी मिलती है।
  • चट्टानों के टूटने से उपजाऊ मिट्टी का निर्माण होता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप

प्रश्न 4.
सुनामी से क्या अभिप्राय है ? इसके प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
सुनामी (Tsunami)—’सुनामी’ जापानी भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ है-‘तटीय लहरें’। ‘TSU’ , शब्द का अर्थ है-तट और ‘Nami’ शब्द का अर्थ है-तरंगें। इन्हें ज्वारीय लहरें (Tidal waves) या भूचाली तरंगें (Seismic Waves) भी कहा जाता है।

सुनामी अचानक ऊँची उठने वाली विनाशकारी तरंगें हैं। इससे गहरे पानी में हिलजुल होती है। इसकी ऊँचाई आमतौर पर 10 मीटर तक होती है। सुनामी उस हालत में पैदा होती है, जब सागर के तल में भूचाली क्रिया के कारण हिलजुल होती है और महासागर में सतह के पानी का लंब रूप में विस्थापन होता है। हिंद महासागर में सुनामी तरंगें बहुत कम महसूस की गई हैं। अधिकतर सुनामी प्रशांत महासागर में घटित होती है।

सुनामी की उत्पत्ति (Origin of Tsunami)-भीतरी दृष्टि से पृथ्वी एक क्रियाशील ग्रह है। अधिकतर भूचाल टैक्टॉनिक प्लेटों (Tectonic Plates) की सीमाओं पर पैदा होते हैं। सुनामी अधिकतर सबडक्शन जोन (Subduction Zone) के भूचाल के कारण पैदा होती है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे में विलीन (Coverage) हो जाती हैं। भारी पदार्थों से बनी प्लेटें हल्की प्लेटों के नीचे खिसक जाती हैं। समुद्र के गहरे तल का विस्तार होता है। यह क्रिया एक कम गहरे भूचाल को पैदा करती है।

26 दिसंबर, 2004 की सुनामी आपदा (Tsunami Disaster of 26th December, 2004)-प्रातः 7.58 बजे, एक काले रविवार (Black Sunday) 26 दिसंबर, 2004 को, क्रिसमस से एक दिन बाद सुनामी दुर्घटना घटी। यह विशाल, विनाशकारी सुनामी लहर हिंद महासागर के तटीय प्रदेश से टकराई। इस लहर के कारण इंडोनेशिया से लेकर भारत तक के देशों में 3 लाख आदमी विनाश के शिकार हुए थे।

महासागरीय तल पर एक भूचाल पैदा हुआ, जिसका अधिकेंद्र सुमात्रा (इंडोनेशिया) के 257 कि०मी० दक्षिण-पूर्व में था। यह भूचाल रिक्टर पैमाने पर 8.9 शक्ति का था। इन लहरों के ऊँचे उठने पर पानी की एक ऊँची दीवार बन गई थी।

आधुनिक युग के इतिहास में यह एक महान् दुर्घटना के रूप में लिखी जाएगी। सन् 1900 के बाद, यह चौथा बड़ा भूचाल था। इस भूचाल के कारण पैदा हुई सुनामी लहरों से हिरोशिमा बम की तुलना में लाखों गुणा अधिक ऊर्जा का विस्फोट हुआ था। इसलिए इसे भूचाल प्रेरित विनाशकारी लहर भी कहा जाता है। यह भारत और म्यांमार के प्लेटों के

मिलन स्थान पर घटी थी, जहाँ लगभग 1000 किलोमीटर प्लेट-सीमा खिसक गई थी। इसके प्रभाव से सागर तल 10 मीटर ऊपर उठ गया और ऊपरी पानी हज़ारों घन मीटर की मात्रा में विस्थापित हो गया था। इसकी गति लगभग 700 कि०मी० प्रति घंटा थी। इसे अपने उत्पत्ति स्थान से भारतीय तट तक पहुँचने में दो घंटे का समय लगा। इस दुर्घटना ने तटीय प्रदेशों के इतिहास और भूगोल को बदलकर रख दिया है।

सुनामी दुर्घटना के प्रभाव (Effects of Tsunami Disaster)-
हिंद महासागर के तटीय देशों इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, म्याँमार, भारत, श्रीलंका और मालदीव में सनामी दुर्घटना के विनाशकारी प्रभाव पड़े। भारत में तमिलनाडु, पांडेचेरी, आंध्र-प्रदेश, केरल आदि राज्य सबसे अधिक प्रभावित हुए। अंडमान और निकोबार द्वीप में इस लहर का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। इंडोनेशिया में लगभग 1 लाख आदमी, थाईलैंड में 10,000 आदमी, श्रीलंका में 30,000 आदमी तथा भारत में 15,000 आदमी इस विनाश के शिकार हुए।

भारत में सबसे अधिक नुकसान तमिलनाडु के नागापट्नम जिले में हुआ, जहाँ पानी शहर के 1.5 कि०मी० अंदर तक पहुँच गया था। संचार, परिवहन के साधन और बिजली की सप्लाई में भी मुश्किलें पैदा हुईं। अधिकतर श्रद्धालु वेलान कन्नी (Velan Kanni) के तट (Beach) के सागरीय पानी में बह गए। तट की विनाशकारी वापिस लौटती हुई लहरें हज़ारों लोगों को बहाकर ले गईं। मरीना तट (एशिया का सबसे बड़ा तट) पर 3 कि०मी० लंबे क्षेत्र में सैंकड़ों लोग सागर की चपेट में आ गए। यहाँ लाखों रुपयों के चल व अचल संसाधनों की बर्बादी हुई।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(ii) भूचाल या भूकंप 3

कलपक्कम अणु-ऊर्जा केंद्र में पानी प्रवेश करने पर अणु-ऊर्जा के रिएक्टरों को बंद करना पड़ा। मामलापुरम् के विश्व प्रसिद्ध मंदिर को तूफानी लहरों से बहुत नुकसान हुआ। सबसे अधिक मौतें अंडमान-निकोबार द्वीप पर हुईं। ग्रेट निकोबार के दक्षिणी द्वीप पर, जोकि भूचाल के केंद्र से केवल 150 कि०मी० दूर था, सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। निकोबार द्वीप पर भारतीय नौसेना का एक अड्डा नष्ट हो गया। ऐसा लगता है कि इन द्वीपों का अधिकांश क्षेत्र समुद्र ने निगल लिया हो। इस प्रकार सुनामी लहरों ने इन द्वीप समूहों के भूगोल को बदल दिया है और यहाँ फिर से मानचित्रण करना पड़ेगा। इस देश की मुसीबतों के शब्दकोश में एक नया शब्द ‘सुनामी मुसीबत’ जुड़ गया है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के अनुसार इस कारण पृथ्वी अपनी धुरी से हिल गई और इसका परिभ्रमण तेज़ हो गया है, जिस कारण दिन हमेशा के लिए एक सैकंड कम हो गया है। सुनामी लहरें सचमुच ही प्रकृति का कहर होती हैं।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 12 मुग़ल साम्राज्य की स्थापना

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 12 मुग़ल साम्राज्य की स्थापना Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 12 मुग़ल साम्राज्य की स्थापना

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
पानीपत के पहले दो युद्धों के बीच की राजनीतिक घटनाओं की रूप रेखा बताएं।
उत्तर-
पानीपत का प्रथम युद्ध 1526 ई० तथा दूसरा युद्ध 1556 ई० में हुआ। इन दो युद्धों के मध्य राजनीतिक घटनाएं चार व्यक्तियों के गिर्द घूमती हैं। ये व्यक्ति हैं-बाबर, हुमायूं, शेरशाह एवं उसके उत्तराधिकारी तथा अकबर। इन व्यक्तियों ने अपने-अपने ढंग से राजनीतिक घटनाओं को प्रभावित किया। संक्षेप में इनका वर्णन इस प्रकार है :

I. बाबर के अधीन राजनीतिक घटनाएं-

पानीपत की विजय (1526 ई०) द्वारा बहुत बड़ा प्रदेश बाबर के अधिकार में आ गया। बाबर ने दिल्ली के सिंहासन को काबुल के सिंहासन की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया और हिन्दुस्तान में ही रहने का निर्णय किया।

(i) राणा सांगा के साथ संघर्ष-बाबर के भारत में रहने के निर्णय के कारण उसका मेवाड़ के राणा संग्राम सिंह से संघर्ष होना अवश्यम्भावी था। राणा सांगा के अधीन मेवाड़ राजस्थान का सबसे शक्तिशाली राज्य बन गया था। जब बाबर ने सुल्तान इब्राहीम लोधी के इलाके से अफ़गानों को निकालना आरम्भ किया, तो उनमें से कुछ ने राणा सांगा से सहायता मांगी। राणा सांगा तो पहले ही उत्तरी भारत पर बाबर के अधिकार को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए रोड़ा समझता था। बाबर के विरुद्ध राणा सांगा के साथ गठजोड़ करने वाले महत्त्वपूर्ण अफ़गानों में सुल्तान इब्राहीम लोधी का भाई महमूद लोधी और मेवात का शासक हसन खां थे। मार्च 1527 ई० में राणा सांगा ने आगरा की ओर कूच किया। बाबर की सेना से उसका सामना फतेहपुर सीकरी के निकट खनुआ के स्थान पर हुआ। दस घण्टों के घमासान युद्ध में बाबर को निर्णायक विजय प्राप्त हुई। इस युद्ध में बाबर ने उन्हीं युद्ध-चालों का प्रयोग किया जो उसने पानीपत के युद्ध में अपनाई थीं। खनुआ ने युद्ध से मेवाड़ की शक्ति और सम्मान को गहरा आघात पहुंचा और बाबर के लिए भारत विजय के द्वार खुल गए।

(ii) बाबर के अन्य सैनिक अभियान और मृत्यु-एक-एक कर बाबर ने अपने विरोधी अफ़गानों को समाप्त करना शुरू कर दिया। खनुआ की लड़ाई के शीघ्र ही बाद उसने हसन खां मेवाती की राजधानी अलवर पर अधिकार कर लिया। बाबर ने महमूद लोधी को बिहार से खदेड़ दिया। महमूद लोधी ने बंगाल के शासक नुरसत शाह की शरण ली। अफ़गानों ने महमूद लोधी के नेतृत्व में मई, 1529 ई० में बाबर के विरुद्ध घाघरा-गंगा संगम के निकट युद्ध किया। उस युद्ध में बाबर को ही विजय मिली। नुसरत शाह ने बाबर को दिल्ली का बादशाह स्वीकार कर लिया। उसने यह भी मान लिया कि वह अफ़गानों को शरण नहीं देगा। इस प्रकार लोधियों का सारा प्रदेश अब बाबर के अधिकार में आ गया। दिसम्बर, 1530 ई० में उसकी मृत्यु हो गई और उसका पुत्र हुमायूं राजगद्दी पर बैठ गया।

II. हुमायूं के अधीन राजनीतिक घटनाएं-

(i) राज्य का विभाजन-हुमायूं ने अपने पिता से मिले राज्य को अपने भाइयों में बांट दिया। उसने कामरान को काबुल और पंजाब का प्रदेश और अस्करी तथा हिन्दाल को क्रमशः सम्भल और मेवात के प्रदेश दिए।

(ii) आरम्भिक विजयें तथा विद्रोह-इसके उपरान्त हुमायूं ने कालिंजर के शासक पर आक्रमण किया और उसे नज़राना देने के लिए विवश किया। 1532 ई० में उसने जौनपुर की ओर बढ़ते हुए महमूद लोधी को पराजित किया। तत्पश्चात् उसने 1534 ई० में अपने रिश्तेदार मिर्जा मुहम्मद ज़मां और मुहम्मद सुल्तान के विद्रोह को कुचला।

(iii) मालवा और गुजरात पर अस्थायी अधिकार-हुमायूं ने अब अपना ध्यान गुजरात की ओर लगाया। उसके विरोधी अफ़गानों तथा मिर्जा मुहम्मद जमां को शरण देकर बहादुरशाह भी अब हुमायूं का शत्रु बन गया था। उसने मालवा को 1531 ई० में विजय करके अपनी शक्ति को और अधिक बढ़ा लिया था। उसने अगले दो वर्षों में राजस्थान के कई किलों पर अधिकार जमा लिया। हुमायूं ने शीघ्र बहादुरशाह के विरुद्ध कूच किया। बहादुरशाह को अपना राज्य छोड़ना पड़ा। हुमायूं ने अपने भाई अस्करी को गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया। फरवरी 1532 ई० में हुमायूं मालवा लौटा। शीघ्र ही बहादुरशाह ने चम्पानेर और अहमदाबाद सहित गुजरात पर पुनः अधिकार कर लिया।

(iv) हुमायूं का भारत से निष्कासन-गुजरात से वापसी पर हुमायूं ने पूर्व में शेरशाह की ओर ध्यान दिया। अक्तूबर 1532 ई० में हुमायूं ने चुनार के किले को घेर लिया जो शेरखां के पुत्र कुतुब खां के अधिकार में था। यह मज़बूत किला बंगाल की ओर जाने वाले रास्ते पर था। इस पर अधिकार करने में छः माह लग गए । किला हुमायूं के अधिकार में आने के एक महीने बाद ही शेरखां ने बंगाल की राजधानी गौड़ पर अधिकार कर लिया। हुमायूं अब उसके विरुद्ध चल पड़ा। शेरखां ने स्थिति को समझते हुए हुमायूं से लड़ाई न की । हुमायूं ने आसानी से बंगाल पर अधिकार कर लिया किन्तु शेरखां ने बिहार पर आक्रमण करके हुमायूं की वापसी के रास्ते को रोक लिया। बंगाल से वापस लौटते समय शेरखां ने उसे पहले चौसा के स्थान पर तथा फिर कन्नौज के स्थान पर पराजित किया। अन्त में हुमायूं भारत छोड़कर भाग गया।

III. शेरशाह और उसके उत्तराधिकारियों की समकालीन राजनीतिक घटनाएं –

(i) शेरशाह द्वारा राज्य का विस्तार-शेरशाह ने कामरान को पंजाब से निकाल कर सिन्धु नदी तक के इलाके को अपने अधीन कर लिया। 1542 ई० में उसने मालवा को जीता। अगले वर्ष उसने मध्य भारत में स्थित रायसीन की चौहान रियासत को नष्ट कर दिया। 1543 में उसने मारवाड़ के मालदेव को पराजित किया। शेरशाह ने मेवाड़ तथा रणथम्भौर पर भी अधिकार कर लिया। उसने राजस्थान के अन्य इलाकों पर भी विजय प्राप्त की। इस प्रकार सारे राजस्थान पर शेरशाह का प्रभुत्व स्थापित हो गया। 1544 ई० के अन्तिम चरण में उसने कालिन्जर को घेर लिया तथा 22 मई, 1545 को उसने कालिन्जर को जीत लिया। उसी दिन धावा बोलते समय बारूद में आग लगने से उसकी मृत्यु हो गई। जब शेरशाह की मृत्यु हुई तब गुजरात को छोड़ कर लगभग सारा उत्तरी भारत उसके अधीन था।

(ii) शेरशाह के उत्ताधिकारियों की समकालीन राजनीतिक घटनाएं-शेरशाह की मृत्यु के बाद उसके छोटे पुत्र जलालखां ने इस्लामशाह की उपाधि धारण कर लगभग आठ वर्षों अर्थात् 1553 ई० तक शासन किया। उसने पूर्वी बंगाल को अपने राज्य में मिला लिया।

इस्लामशाह की मृत्यु (30 अक्तूबर, 1553) के बाद उसका बारह वर्षीय पुत्र फिरोज़ उत्तराधिकारी बना। किन्तु गद्दी पर बैठने के तीन दिन बाद ही उसके मामा मुबारिज़ खां ने उसका वध कर दिया। मुबारिज़ खां मुहम्मद आदिलशाह के नाम पर सिंहासन पर बैठा। उसे अफ़गान लोग अन्धा कहते थे। उसने पुराने अमीरों के विश्वास को जीतने का असफल प्रयत्न किया। किसी पठान की जगह आदिलशाह ने हेम को अपना वज़ीर बनाया जिससे अफ़गान अमीरों का रोष और भी बढ़ गया और वे स्वतन्त्र होने के बारे में सोचने लगे। शीघ्र ही शेरशाह द्वारा स्थापित राज्य पांच भागों में बंट गया।

(iii) हुमायूं का पुनः शक्ति में आना-हुमायूं ने स्थिति का लाभ उठाया। वह ईरान के शासक से सैनिक सहायता लेकर काबुल तक पहुंच चुका था। उसने 1554 के अन्त में पंजाब पर आक्रमण करने का निश्चय किया और छः महीनों के भीतर ही उसे हथिया लिया। सिकन्दरशाह सूर की सरहिन्द के निकट जून 1555 में पराजय हुई। हुमायूं ने दिल्ली पर और बाद में आगरा पर अधिकार कर लिया। किन्तु सात मास के पश्चात् हुमायूं की मृत्यु हो गई।

IV. अकबर के अधीन राजनीतिक घटनाएं हुमायूं की मृत्यु के समय अकबर की आयु 13 वर्ष थी। उसके संरक्षक बैरम खां ने उसका कलानौर में राजतिलक किया। उसके बाद वह दिल्ली की ओर चल दिया।

हुमायूं की मृत्यु के शीघ्र ही बाद हेमू ने आदिलशाह की ओर से आगरा पर अधिकार कर लिया और दिल्ली की तरफ चल पड़ा। मुग़ल सेनापति तारदी बेग पराजित हुआ। वह पंजाब की ओर भाग गया। बैरम खां ने तारदी बेग की पराजय के कारण उसका वध करवा दिया। उसके बाद अकबर ने पानीपत के युद्ध में नवम्बर 1556 ई० में हेमू को पराजित किया।

इस तरह पानीपत के प्रथम युद्ध की भान्ति पानीपत के दूसरे युद्ध ने भी मुग़लों के ही भाग्य को चमकाया। बाबर की विजय अस्थायी रही, परन्तु अकबर ने मुग़ल साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ किया और एक विशाल राज्य की स्थापना की।

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प्रश्न 2.
अकबर तथा उसके उत्तराधिकारियों के अधीन दक्कन में मुग़ल साम्राज्य के विस्तार से सम्बन्धित मुख्य घटनाएं क्या थी ?
उत्तर-
दक्कन का प्रदेश नर्मदा के पार स्थित था। अकबर से पूर्व किसी भी मुसलमान शासक ने दक्कन के किसी प्रदेश को अपने राज्य का भाग नहीं बनाया। अकबर पहला बादशाह था जिसके राज्य के तीन प्रान्त दक्षिण से सम्बन्धित थे। अकबर के बाद उसके उत्तराधिकारियों ने दक्कन में पूरी रुचि दिखाई। औरंगजेब ने तो अपना आधा शासनकाल दक्कन में ही व्यतीत कर दिया और उसकी मृत्यु भी वहीं हुई। संक्षेप में अकबर तथा उसके उत्तराधिकारियों की दक्कन में विस्तारवादी-नीति का वर्णन इस प्रकार है :

I. अकबर के अधीन दक्कन नीति 1591 ई० में अकबर ने अपने प्रतिनिधियों अर्थात वकीलों को दक्षिणी राज्यों (खानदेश, अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा) भेजा ताकि उनके शासक उसके प्रभुत्व को स्वीकार कर लें। इनमें सबसे कम शक्तिशाली तथा उत्तरी भारत के सबसे निकट खानदेश का शासक राजा अली खां था। उसने तुरन्त अकबर के प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया और आजीवन स्वामिभक्त रहा। परन्तु उसके पुत्र एवं उत्तराधिकारी मीरा बहादुरशाह ने मुग़लों की अधीनता को त्यागने का निश्चय किया। अकबर ने तुरन्त खानदेश की राजधानी बुरहानपुर को अपने अधिकार में ले लिया। उसने राज्य के महत्त्वपूर्ण किले आसीरगढ़ पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार खानदेश 1601 ई० में मुग़ल साम्राज्य का एक प्रान्त बन गया। अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा के सुल्तानों ने अकबर के वकीलों का परामर्श मानने से इन्कार कर दिया। परिणामस्वरूप कई सैनिक अभियान अहमदनगर के विरुद्ध भेजे गए। आखिर 1599 ई० में दौलताबाद पर अधिकार कर लिया गया। अहमदनगर सल्तनत की राजधानी अहमदनगर पर भी 1600 ई० में मुग़लों का अधिकार हो गया। अकबर ने अहमदनगर राज्य को समाप्त नहीं किया बल्कि उसने वहां के प्रदेशों का एक अलग प्रान्त बना दिया। अकबर की मृत्यु से पूर्व दक्कन अर्थात् विंध्य पर्वत और कृष्णा नदी के बीच के प्रदेश में तीन अधीनस्थ रियासतें बन चुकी थीं-खानदेश, बरार और अहमदनगर। इस तरह मुग़ल अपने साम्राज्य को नर्मदा के उस पार तक ले जाने में सफल हुए।

II. जहांगीर की दक्कन नीति-

जहांगीर ने दक्कन में प्रथम अभियान 1608 ई० में भेजा था। किन्तु उसे 1617 ई० में सफलता प्राप्त हुई जब शाहज़ादा खुर्रम ने अहमदनगर के सुल्तान को सन्धि करने के लिए बाध्य किया। सन्धि की शर्त यह थी कि सुल्तान विजित प्रदेश मुग़लों को सौंप दे। चार वर्षों के पश्चात् खुर्रम ने न केवल अहमदनगर के सुल्तान को अपितु बीजापुर और गोलकुण्डा के सुल्तानों को भी खिराज देने के लिए विवश कर दिया। उन्होंने क्रमशः बारह, अठारह और बीस लाख रुपए वार्षिक खिराज देना स्वीकार कर लिया। यह दक्कन में जहांगीर की सफलता का उत्कर्ष था। परन्तु 1627 ई० में उसकी मृत्यु के समय दक्कन में मुग़ल स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी।

III. शाहजहां की दक्कन नीति –

(i) गोलकुण्डा के साथ शाहजहां की सन्धि-1636 ई० में शाहजहां ने गोलकुण्डा के सुल्तान को अपनी प्रभुसत्ता स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया। सुल्तान को यह शर्त भी माननी पड़ी कि गोलकुण्डा के सिक्कों पर तथा खुतबे में शाहजहां के नाम के अतिरिक्त पहले चारों खलीफों के नाम भी हों। यह शर्त शाहजहां ने इसलिए रखी थी क्योंकि गोलकुण्डा का सुल्तान शिया होने के नाते केवल मुहम्मद साहिब के दामाद हज़रत अली को खलीफा मानता था। उसने 16 वर्षों के बकाया 128 लाख रुपया देना तो स्वीकार कर ही लिया, साथ में आठ लाख रुपए वार्षिक खिराज देना भी स्वीकार कर लिया। इसके बदले में मुग़ल सम्राट को गोलकुण्डा के सुल्तान की बीजापुर और मराठों से रक्षा करनी थी

(ii) बीजापुर के साथ शाहजहां की सन्धि-इसी समय मुग़ल सेना ने बीजापुर पर आक्रमण किया। बीजापुर का सुल्तान समझौते के लिए राजी हो गया। उसने मुग़ल सम्राट् की प्रभुसत्ता को स्वीकार कर लिया। उसने यह भी स्वीकार कर लिया कि वह गोलकुण्डा पर आक्रमण नहीं करेगा। उसने शाहजहां को 20 लाख रुपया देना और उसकी मध्यस्थता को भी स्वीकार कर लिया। बदले में मुग़ल सम्राट ने बीजापुर के जीते हुए कुछ प्रदेश उसे लौटा दिए। साथ में उसे अहमदनगर राज्य के कुछ नये प्रदेश भी दिए गए। इसके बाद बीस वर्षों तक मुग़ल बादशाह को बीजापुर तथा गोलकुण्डा के विरुद्ध अभियान नहीं भेजना पड़ा।

(iii) गोलकुण्डा तथा बीजापुर पर आक्रमण-1636 ई० को सन्धियों के पश्चात् गोलकुण्डा और बीजापुर के सुल्तानों ने अपनी-अपनी शक्ति और प्रदेश में वृद्धि कर ली। उन्होंने विजयनगर राज्य के प्रदेशों को हड़प कर अपने राज्य का विस्तार किया। शाहजहां ने दक्कन के तत्कालीन गवर्नर औरंगजेब को आज्ञा दी कि वह गोलकुण्डा और बीजापुर से बकाया खिराज वसूल करे। अत: औरंगज़ेब ने फरवरी 1656 ई० में गोलकुण्डा के किले को घेर लिया। औरंगजेब के डर से गोलकुण्डा का सुल्तान शाहजहां को पहले ही अपने एलची भेज चुका था। जब औरंगजेब की जीत होने वाली थी उसी समय उसे बादशाह की आज्ञा मिली कि वह गोलकुण्डा का घेरा उठा ले और वापस आ जाए। बादशाह ने गोलकुण्डा से स्वयं खिराज वसूल किया।

1656 ई० के बाद शाहजहां ने औरंगजेब को बीजापुर को विजय करने की आज्ञा दी। औरंगज़ेब ने तुरन्त ही बीदर और कल्याणी पर अधिकार कर लिया और बीजापुर पर आक्रमण कर दिया। 1657 ई० में बीजापुर के सुल्तान ने डेढ़ करोड़ रुपए देना और मांगे सभी प्रदेशों को वापस करना स्वीकार कर लिया। परन्तु तभी औरंगजेब को युद्ध बन्द कर देने और पीछे हटने का आदेश मिला। औरंगज़ेब निराश होकर 1658 ई० के आरम्भ में औरंगाबाद लौट आया। .

IV. औरंगजेब की दक्कन नीति-

औरंगज़ेब एक महत्त्वाकांक्षी सम्राट् था और वह सारे भारत पर मुग़ल पताका फहराना चाहता था। इसके अतिरिक्त उसे दक्षिण में शिया रियासतों का अस्तित्व भी पसन्द नहीं था। दक्षिण के मराठे भी काफ़ी शक्तिशाली होते जा रहे थे। वह उनकी शक्ति को कुचल देना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने दक्षिण को विजय करने का निश्चय किया। उसने बीजापुर राज्य पर कई आक्रमण किए। कुछ असफल अभियानों के बाद 1686 ई० में वह इस पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा। अगले ही वर्ष उसने रिश्वत और धोखेबाजी से बीजापुर राज्य को भी अपने अधीन कर लिया। परन्तु इन दो राज्यों की विजय उसकी निर्णायक सफलता नहीं थी बल्कि उसकी कठिनाइयों का आरम्भ थी। अब उसे शक्तिशाली मराठों से सीधी टक्कर लेनी पड़ी। इससे पूर्व उसने वीर मराठा सरदार शिवाजी को दबाने के अनेक प्रयत्न किए थे, परन्तु उसे कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी। अब मराठों का नेतृत्व शिवाजी के पुत्र शंभू जी के हाथ में था। 1689 ई० में औरंगज़ेब ने उसे पकड़ लिया और उसका वध कर दिया। औरंगज़ेब की यह सफलता भी एक भ्रम मात्र थी। मराठे शीघ्र ही पुनः स्वतन्त्र हो गए। इसके विपरीत औरंगजेब का बहुत-सा धन और समय दक्षिण के अभियानों में व्यर्थ नष्ट हो गया। यहां तक कि 1707 ई० में दक्षिण में अहमदनगर के स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार ‘दक्षिण’ औरंगजेब और मुग़ल साम्राज्य दोनों के लिए कब्र सिद्ध हुआ।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
बाबर ने भारत का सर्वप्रथम अभियान कब किया?
उत्तर-
बाबर ने भारत का सर्वप्रथम अभियान 1519 ई० में किया।

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प्रश्न 2.
बाबर के भारत आक्रमण के समय दिल्ली का शासक कौन था ?
उत्तर-
इब्राहीम लोधी।

प्रश्न 3.
पानीपत की पहली लड़ाई किस-किस के बीच हुई?
उत्तर-
पानीपत की पहली लड़ाई बाबर एवं इब्राहीम लोधी के बीच हुई।

प्रश्न 4.
बाबर के आक्रमण के समय पंजाब का गवर्नर कौन था?
उत्तर-
बाबर के आक्रमण के समय पंजाब का गवर्नर दौलत खां लोधी था।

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प्रश्न 5.
हुमायूं की माता का क्या नाम था ?
उत्तर-
हुमायूं की माता का नाम महम बेगम था।

प्रश्न 6.
हुमायूं सिंहासन पर कब बैठा?
उत्तर-
हुमायूं 30 दिसम्बर, 1530 ई० में सिंहासन पर बैठा।

प्रश्न 7.
किस रानी ने हमायूं से बहादुरशाह के विरुद्ध सहायता मांगी थी?
उत्तर-
रानी कर्णवती ने हमायूं से बहादुरशाह के विरुद्ध सहायता मांगी थी।

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प्रश्न 8.
शेर खां ने शिक्षा कहां प्राप्त की?
उत्तर-
शेर खां ने जौनपुर में शिक्षा प्राप्त की।

प्रश्न 9.
शेर खां ने कौन-कौन से ग्रन्थों का अध्ययन किया था?
उत्तर-
शेर खां ने गुलस्तां, बोस्ता, सिकन्दरनामा आदि ग्रन्थों का अध्ययन किया था।

प्रश्न 10.
फरीद को शेर खां की उपाधि किसने दी?
उत्तर-
फरीद को शेर खां की उपाधि बहार खां लोहानी ने दी।

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प्रश्न 11.
शेर खां के सम्राट् बनने की भविष्यवाणी किस मुग़ल सम्राट् ने की थी?
उत्तर-
मुग़ल सम्राट् बाबर ने शेर खां के सम्राट बनने की भविष्यवाणी की थी।

प्रश्न 12.
अकबर के सिंहासनारोहण के समय दिल्ली का शासक कौन था?
उत्तर-
अकबर के सिंहासनारोहण के समय दिल्ली का शासक हेमू था।

प्रश्न 13.
बैरम खां का वध किसने किया?
उत्तर-
बैरम खां का वध मुबारक खां ने किया।

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प्रश्न 14.
अकबर ने किस निर्णायक युद्ध द्वारा दिल्ली पर अधिकार किया था ?
उत्तर-
अकबर ने पानीपत की दूसरी लड़ाई द्वारा दिल्ली पर अधिकार किया था।

प्रश्न 15.
किस राजपूत राजा ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की थी?
उत्तर-
राजपूत राजा राणा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की थी।

प्रश्न 16.
शाहजहां का सिंहासनारोहण कब हुआ ?
उत्तर-
शाहजहां का सिंहासनारोहण 1627 ई० में हुआ।

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प्रश्न 17.
शाहजहां ने किस बुंदेल नेता को संधि करने पर विवश किया ?
उत्तर-
शाहजहां ने जोझार सिंह ओरछा बुंदेल नेता को संधि करने पर विवश किया।

प्रश्न 18.
शाहजहां की सबसे प्रिय पत्नी कौन-सी थी?
उत्तर-
शाहजहां की सबसे प्रिय पत्नी मुमताज महल थी।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(i) बाबर के पिता का नाम
(ii) बाबर को भारत पर आक्रमण का निमंत्रण ………………… लोधी ने दिया।
(iii) हुमायूं की मृत्यु ………………… ई० में हुई।
(iv) शेरशाह सूरी का जन्म …………. ई० में हुआ।
(v) ………………… सूर साम्राज्य का संस्थापक था।
(vi) सूर साम्राज्य का अंतिम शासक …………… था।
(vii) ‘अकबरनामा’ का लेखक ……………. था।
(viii) ……………. अकबर का संरक्षक था।
(ix) जहाँगीर का वास्तविक नाम ………………… था।
(x) गुरु …………… की शहीदी के लिए जहाँगीर उत्तरदायी था।
(xi) शाहजहाँ के बचपन का नाम ……………… था।
(xii) औरंगजेब की मृत्यु ……………… ई० में अहमदनगर में हुई।
उत्तर-
(i) उमरशेख मिर्जा
(ii) दौलत खां
(iii) 1556
(iv) 1472
(v) शेरशाह सूरी
(vi) सिकंदर सूर
(vii) अबुल फज़ल
(viii) बैरम खां
(ix) मुहम्मद सलीम
(x) अर्जन देव जी
(xi) खुर्रम
(xii) 1707.

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3. सही/गलत कथन

(i) बाबर के आक्रमण के समय उत्तरी भारत का मेवाड़ सबसे शक्तिशाली हिन्दू राज्य था। — (√)
(ii) इब्राहीम लोधी मेरठ का शासक था। — (×)
(iii) भारत में बाबर की अंतिम लड़ाई पानीपत की लड़ाई थी। — (×)
(iv) शेर खां का पिता हसन खां जमाल खां के पास नौकरी करता था। — (√)
(v) शेर खां ने हुमायूं को सूरजगढ़ के युद्ध में पराजित किया। — ()
(vi) शेरशाह का मकबरा सहसराम नामक स्थान पर स्थित है। — (√)
(vii) अकबर का सिंहासनारोहण अमरकोट में हुआ। — (×)
(viii) नूरजहाँ ने राजकुमार खुसरो का वध करवाया। — (×)
(xi) जहाँगीर के शासनकाल में सर टॉमस रो भारत आया। — (√)
(x) औरंगजेब के शासनकाल में गुरु अर्जन देव जी ने शहीदी दी। — (×)

4. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
बाबर का पिता शासक था-
(A) कन्वाहा का
(B) फरगाना का
(C) काबुल का
(D) सिंध का
उत्तर-
(B) फरगाना का

प्रश्न (ii)
बाबर के आक्रमण के समय मेवाड़ का शासक था
(A) इब्राहीम लोधी
(B) दौलत खां लोधी
(C) राणा संग्राम सिंह
(D) आधम खां लोधी।
उत्तर-
(C) राणा संग्राम सिंह

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प्रश्न (iii)
चन्देरी का युद्ध हुआ
(A) 1528 ई० में
(B) 1526 ई० में
(C) 1556 ई० में
(D) 1530 ई० में ।
उत्तर-
(A) 1528 ई० में

प्रश्न (iv)
‘तुजके बाबरी’ का लेखक है
(A) अकबर
(B) बाबर
(C) जहांगीर
(D) अबुल फज़ल ।
उत्तर-
(B) बाबर

प्रश्न (v)
हुमायूं तथा शेर खां के बीच चौसा का युद्ध हुआ
(A) 1526 ई० में
(B) 1530 ई० में
(C) 1556 ई० में।
(D) 1539 ई० में ।
उत्तर-
(D) 1539 ई० में ।

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प्रश्न (vi)
शेर खां ने हुमायूं को हराया
(A) घाघरा के युद्ध में
(B) चंदेरी के युद्ध में
(C) चौसा के युद्ध में
(D) कालिंजर के युद्ध में ।
उत्तर-
(C) चौसा के युद्ध में

प्रश्न (vii)
शेरशाह की मृत्यु हुई
(A) घाघरा के युद्ध में
(B) चंदेरी के युद्ध में
(C) चौसा के युद्ध में
(D) कालिंजर के युद्ध में ।
उत्तर-
(D) कालिंजर के युद्ध में ।

प्रश्न (viii)
राजकुमार खुसरो का वध करवाया
(A) खुर्रम ने
(B) जहांगीर ने
(C) नूरजहां ने
(D) मुहम्मद सलीम ने ।
उत्तर-
(A) खुर्रम ने

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प्रश्न (ix)
औरंगजेब अपनी निम्न नीति द्वारा मुग़ल साम्राज्य को पतन की ओर ले गया
(A) हिंदू नीति
(B) राजपूत नीति
(C) दक्षिण नीति
(D) उपरोक्त सभी ।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी ।

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मुग़ल साम्राज्य के इतिहास के लिए चार प्रकार के स्त्रोतों के नाम बताएं।
उत्तर-
ऐतिहासिक स्त्रोत (अकबरनामा आदि), भवन, विदेशी यात्रियों के विवरण तथा मुग़लकालीन सिक्के मुग़ल इतिहास की जानकारी कराते हैं।

प्रश्न 2.
भारत में मुगल शासक अपने आपको किसका उत्तराधिकारी समझते थे और उसकी राजधानी कौनसी थी ?
उत्तर-
भारत के मुग़ल शासक अपने आपको तैमूर का उत्तराधिकारी मानते थे। उसकी राजधानी समरकन्द थी।

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प्रश्न 3.
बाबर के पिता का क्या नाम था और वह किस रियासत का शासक था ?
उत्तर-
बाबर के पिता का नाम उमरशेख मिर्जा था। वह फरगाना का शासक था।

प्रश्न 4.
उज़बेक कौन थे तथा उनके नेता का नाम बताएं।
उत्तर-
उज़बेक एक.प्रकार की जाति थी जो तैमूर के उत्तराधिकारियों से लड़ते रहते थे। उनका नेता शैबानी खां था।

प्रश्न 5.
शैबानी खां को ईरान के किस राजवंश के कौन-से शासक ने कब हराया ?
उत्तर-
शैबानी खां को ईरान के सफवी राजवंश के संस्थापक शाह इस्माइल ने 1510 में हराया।

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प्रश्न 6.
बाबर ने काबुल किस वर्ष जीता और समरकन्द पर उसने तीसरी बार किस वर्ष में अधिकार किया ?
उत्तर-
बाबर ने काबुल 1504 में जीता और समरकन्द पर उसने तीसरी बार 1511 में अधिकार किया।

प्रश्न 7.
बाबर को कौन-से वर्ष में बारूद के प्रयोग की सम्भवानाओं का पता चला और उसने अपने तोपखाने के लिए किसे नियुक्त किया ?
उत्तर-
बाबर को 1514 में बारूद के प्रयोग की सम्भावनाओं का पता चला और उसने तोपखाने के लिए अली नामक एक अनुभवी उस्ताद को नियुक्त किया।

प्रश्न 8.
16वीं सदी के आरम्भ में उत्तर भारत के चार प्रमुख राज्यों के नाम बताएं।
उत्तर-
16वीं सदी के आरम्भ में उत्तर भारत के चार प्रमुख राज्य-दिल्ली, लाहौर, मेवाड़ तथा बंगाल थे।

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प्रश्न 9.
इब्राहीम लोधी के विरोधी दो लोधी सरदारों के नाम बताएं।
उत्तर-
इब्राहीम लोधी के विरोधी दो लोधी सरदारों में से एक दौलत खां लोधी और दूसरा आलम खां लोधी था।

प्रश्न 10.
इब्राहीम लोधी के साथ बाबर का युद्ध कहां और कब हुआ ?
उत्तर-
इब्राहीम लोधी के साथ बाबर का युद्ध पानीपत में 1526 ई० में हुआ।

प्रश्न 11.
इब्राहीम लोधी के विरुद्ध बाबर की विजय के दो मुख्य कारण बताएं।
उत्तर-
बाबर की विजय का मुख्य कारण उत्तम युद्धनीति तथा सामरिक चालों के साथ तोपखाने का प्रयोग था।

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प्रश्न 12.
बाबर के समय राजस्थान का सबसे शक्तिशाली राज्य कौन-सा था और उसके शासक का नाम क्या था.?
उत्तर-
बाबर के समय राजस्थान का सबसे शक्तिशाली राज्य मेवाड़ था। उसके शासक का नाम राणा संग्राम सिंह था।

प्रश्न 13.
राणा सांगा के साथ गठजोड़ करने वाले दो अफ़गान सरदारों के नाम बताएं।
उत्तर-
राणा सांगा के साथ गठजोड़ करने वाले दो अफ़गान सरदार महमूद लोधी और हसन खां थे।

प्रश्न 14.
बाबर और राणा सांगा के बीच युद्ध कहां और कौन-से वर्ष में हुआ ?
उत्तर-
बाबर और राणा सांगा के बीच युद्ध 1527 ई० में फतेहपुर सीकरी के निकट खनुआ के स्थान पर हुआ।

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प्रश्न 15.
बाबर ने महमूद लोधी से युद्ध कहां और कौन-से वर्ष में किया ?
उत्तर-
बाबर ने महमूद लोधी से मई 1529 ई० में घाघरा-गंगा संगम के निकट युद्ध किया।

प्रश्न 16.
बाबर ने पंजाब पर किस वर्ष में अधिकार किया और उसकी मृत्यु कब हुई ?
उत्तर-
बाबर ने पंजाब पर 1524 ई० में अधिकार किया। उसकी मृत्यु 1530 ई० में हुई।

प्रश्न 17.
बाबर के चार बेटों के नाम बताएं।
उत्तर-
बाबर के चार बेटे हुमायूं, कामरान, अस्करी तथा हिन्दाल थे।

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प्रश्न 18.
हुमायूं ने कौन-से चार प्रदेश अपने भाइयों को सौंप दिए ?
उत्तर-
हुमायूं ने अपने भाइयों को-पंजाब, काबुल, सम्भल और मेवात के प्रदेश दिए।

प्रश्न 19.
हुमायूं के कौन-से दो रिश्तेदारों ने उसके विरुद्ध विद्रोह किया ?
उत्तर-
हुमायूं के दो रिश्तेदारों मिर्जा मुहम्मद जमां और मिर्ज़ा मुहम्मद सुल्तान ने उसके विरुद्ध विद्रोह किया।

प्रश्न 20.
हुमायूं ने गुजरात किस सुल्तान से जीता था और वहां का सूबेदार किसको नियुक्त किया ?
उत्तर-
हुमायूं ने गुजरात सुल्तान बहादुरशाह से जीता। उसने अपने भाई अस्करी को वहां का सूबेदार नियुक्त किया।

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प्रश्न 21.
गुजरात के दो प्रधान नगरों के नाम बताओ।
उत्तर-
गुजरात के दो प्रधान नगर-चम्पानेर और अहमदाबाद थे।

प्रश्न 22.
पूर्व तथा पश्चिम में हुमायूं के दो प्रमुख प्रतिद्वन्द्वियों ने नाम बताएं।
उत्तर-
पूर्व में शेरखां और पश्चिम में बहादुरशाह हुमायूं के प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी थे।

प्रश्न 23.
शेरखां किस कबीले से था और उसने आरम्भ में किस प्रदेश में अपनी शक्ति को संगठित किया ?
उत्तर-
शेरखां पठान कबीले से था। उसने दक्षिण बिहार में अपनी शक्ति को संगठित किया।

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प्रश्न 24.
शेरशाह ने किन वर्षों में बंगाल के शासक को दो बार हराया ?
उत्तर-
उसने बंगाल के शासक को पहले 1534 ई० में और फिर 1536 ई० में पराजित किया।

प्रश्न 25.
हुमायूं ने बंगाल के रास्ते में किस किले पर घेरा डाला और यह किसके अधिकार में था ?
उत्तर-
हुमायूं ने बंगाल के रास्ते चुनार के किले पर घेरा डाला। यह किला शेरखां के पुत्र कुतुब खां के अधिकार में था।

प्रश्न 26.
हुमायूं तथा शेरखां के बीच दो निर्णायक युद्ध किन स्थानों पर तथा कब हुए ?
उत्तर-
हुमायूं तथा शेरखां के बीच पहला युद्ध चौसा के स्थान पर जून 1539 ई० में और दूसरा युद्ध कन्नौज में मई 1540 ई० में हुआ।

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प्रश्न 27.
शेरखां ने शेरशाह की उपाधि कब धारण की और उसकी मृत्यु कब हुई ?
उत्तर-
चौसा के युद्ध के बाद शेरखां ने शेरशाह की उपाधि धारण की। उसकी मृत्यु 22 मई, 1545 ई० को हुई।

प्रश्न 28.
हुमायूं को हराने के बाद शेरशाह ने कौन-सी चार विजयें प्राप्त की ?
उत्तर-
हुमायूं को हराने के बाद शेरशाह ने पंजाब, मालवा, रायसिन तथा रणथम्भौर के प्रदेशों पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 29.
शेरशाह ने आवागमन की सुविधा के लिए कौन-से दो कार्य किए ?
उत्तर-
शेरशाह ने आवागमन की सुविधा के लिए सड़कें बनवाईं और उनके साथ-साथ थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सरायें बनवाईं।

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प्रश्न 30.
शेरशाह के लगान प्रबन्ध से किन्हें लाभ हुआ ?
उत्तर-
शेरशाह के लगान प्रबन्ध से राज्य तथा कृषकों को लाभ हुआ।

प्रश्न 31.
शेरशाह के बाद राज करने वाले चार सूर सुल्तानों के नाम बताएं।
उत्तर-
शेरशाह के बाद इस्लाम शाह, फिरोज, मुहम्मद आदिलशाह तथा सिकन्दर शाह सूर सुल्तान बने।

प्रश्न 32.
शेरशाह द्वारा स्थापित राज्य किन पांच भागों में बंट गया तथा इनके शासक कौन थे ?
उत्तर-
ये पांच भाग थे-पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार, बंगाल, मालवा, दिल्ली तथा आगरा और पंजाब। इनके शासक क्रमशः आदिलशाह सूर, मुहम्मद शाह, बाज़बहादुर, इब्राहीम शाह सूर तथा सिकन्दरशाह सूर थे।

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प्रश्न 33.
शेरशाह से हारने के बाद हुमायूं को किस देश के कौन-से शासक से सहायता मिली ?
उत्तर-
शेरशाह से हारने के बाद हुमायूं को ईरान के शाह ताहमस्प की सहायता मिली।

प्रश्न 34.
हुमायूं ने फिर से पंजाब कब जीता और उसकी मुत्यु कब हुई ?
उत्तर-
हुमायूं ने 1555 ई० में फिर से पंजाब जीता। उसकी 1556 ई० में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 35.
अकबर का राज्याभिषेक कहां हुआ तथा उस समय उसकी आयु क्या थी ?
उत्तर-
अकबर का राज्याभिषेक कलानौर में हुआ। उस समय उसकी आयु 13 वर्ष थी।

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प्रश्न 36.
अकबर के अभिभावक का नाम बताएं तथा कौन-से वर्षों में उसका प्रभाव रहा ?
उत्तर-
अकबर के अभिभावक का नाम बैरम खां था। उसका प्रभाव 1556 ई० से 1560 ई० तक रहा।

प्रश्न 37.
पानीपत का दूसरा युद्ध किस वर्ष में हुआ तथा इसमें अफ़गान सेनाओं का सेनापति कौन था ?
उत्तर-
पानीपत का दूसरा युद्ध 1556 ई० में हुआ। इस युद्ध में अफ़गान सेनाओं का नेतृत्व हेमू ने किया।

प्रश्न 38.
अकबर ने अपने राज्यकाल के आरम्भिक वर्षों में किन दो शक्तिशाली अमीरों से और कब छुटकारा प्राप्त किया ?
उत्तर-
अकबर ने आरम्भिक वर्षों में बैरम खां तथा आधम खां नामक अमीरों से क्रमशः 1560 ई० तथा 1562 ई० में छुटकारा प्राप्त किया।

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प्रश्न 39.
अकबर के सौतेले भाई का क्या नाम था और वह किस प्रदेश का शासक था ?
उत्तर-
अकबर के सौतेले भाई का नाम मिर्जा हकीम था। वह काबुल का शासक था।

प्रश्न 40.
1560 ई० से 1570 ई० के बीच अकबर ने किन चार राज्यों को अपने साम्राज्य में मिलाया ?
उत्तर-
इस अवधि के दौरान अकबर ने मालवा, मारवाड़, मेड़ता तथा गढ़-कटंगा आदि प्रदेशों को अपने साम्राज्य में मिलाया।

प्रश्न 41.
अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाली चार राजपूत रियासतों के नाम बताएं।
उत्तर-
अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाली चार राजपूत रियासतें थीं : जयपुर, कालिन्जर, बीकानेर तथा रणथम्भौर।

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प्रश्न 42.
अकबर ने गुजरात, बंगाल तथा उड़ीसा की विजयें कब प्राप्त की ?
उत्तर-
अकबर ने गुजरात को 1572-73, बंगाल को 1574-76 तथा उड़ीसा को 1591 ई० में विजय किया।

प्रश्न 43.
अकबर ने काबुल, कश्मीर, सिन्ध तथा बिलोचिस्तान की विजयें कौन-से वर्षों में प्राप्त की ?
उत्तर-
अकबर ने काबुल को 1581 ई०, कश्मीर को 1585 ई०, सिन्ध को 1591 ई० तथा बलुचिस्तान को 1595 ई० में विजय किया।

प्रश्न 44.
अकबर ने दक्षिण की कौन-सी चार सल्तनतों की ओर अपने वकील भेजे ?
उत्तर-
अकबर ने खानदेश, अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा में अपने वकील भेजे।

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प्रश्न 45.
सबसे पहले अकबर की अधीनता मानने वाला दक्षिण के किस राज्य का शासक था तथा उसका नाम क्या था ?
उत्तर-
सबसे पहले दक्षिण के खानदेश राज्य के शासक ने अकबर की अधीनता स्वीकार की। उसका नाम राजा अली खां था।

प्रश्न 46.
खानदेश की राजधानी कौन-सी थी और इसके किस महत्त्वपूर्ण किले पर अकबर ने अधिकार किया ?
उत्तर-
खानदेश की राजधानी बुरहानपुर थी। अकबर ने इसके असीरगढ़ नामक किले पर अधिकार किया।

प्रश्न 47.
अकबर ने किन वर्षों में बरार, दौलताबाद, अहमदनगर तथा खानदेश को जीत लिया ?
उत्तर-
अकबर ने बरार को 1596 ई०, दौलताबाद को 1599 ई०, अहमदनगर को 1600 ई० तथा खानदेश को 1601 ई० में जीता।

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प्रश्न 48.
दक्कन में अकबर ने कौन-से दो प्रान्त बनाए ?
उत्तर-
अकबर ने वहां खानदेश तथा बरार नाम के दो प्रान्त बनाए।

प्रश्न 49.
जहांगीर का आरम्भिक नाम क्या था तथा वह कब गद्दी पर बैठा ?
उत्तर-
जहांगीर का आरम्भिक नाम सलीम था। वह 1605 ई० में गद्दी पर बैठा।

प्रश्न 50.
जहांगीर ने नूरजहां से कब विवाह किया तथा उसका आरम्भिक नाम क्या था ?
उत्तर-
जहांगीर ने नूरजहां से 1611 ई० में विवाह किया। उसका आरम्भिक नाम मेहरुन्निसा था।

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प्रश्न 51.
नूरजहां के पिता और भाई के नाम बताएं ।
उत्तर-
नूरजहां के पिता का नाम ग्यासबेग तथा भाई का नाम आसफ खां था।

प्रश्न 52.
मेवाड़ के किस शासक ने और कब जहांगीर की अधीनता स्वीकार की ?
उत्तर-
मेवाड़ के राणा अमरसिंह ने 1615 ई० में जहांगीर की अधीनता स्वीकार की।

प्रश्न 53.
जहांगीर ने कांगड़ा का किला कब जीता और वहां कौन-सा अधिकारी नियुक्त किया ?
उत्तर-
जहांगीर ने कांगड़ा का किला 1620 ई० में जीता। उसने वहां अपना फौजदार नियुक्त किया।

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प्रश्न 54.
जहांगीर के समय कन्धार मुग़लों से कब छिन गया तथा इस पर किसने अधिकार किया ?
उत्तर-
जहांगीर के समय कन्धार 1622 ई० में छिन गया। इस पर ईरान के शाह अब्बास ने अधिकार किया।

प्रश्न 55.
जहांगीर के समय दक्कन की किन सल्तनतों ने मुग़ल साम्राज्य को खिराज देना स्वीकार कर लिया ?
उत्तर-
जहांगीर के समय अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा की सल्तनतों ने मुग़ल साम्राज्य को खिराज देना स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 56.
अहमदनगर कौन-से बादशाह के समय और कब मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया गया ?
उत्तर-
अहमदनगर को शाहजहां के समय 1633 ई० में मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया गया।

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प्रश्न 57.
गोलकुण्डा का सुल्तान इस्लाम के किस सम्प्रदाय से सम्बन्धित था तथा वह किसको पहला खलीफा मानता था ?
उत्तर-
गोलकुण्डा का सुल्तान इस्लाम के शिया सम्प्रदाय से सम्बन्धित था। वह मुहम्मद साहिब के दामाद हज़रत अली को पहला खलीफा मानता था।

प्रश्न 58.
शाहजहां ने कन्धार पर फिर से अधिकार कब किया गया तथा उस समय कन्धार का गवर्नर कौन था ?
उत्तर-
शाहजहां ने 1638 ई० में कन्धार पर फिर से अधिकार कर लिया गया। उस समय कन्धार का गवर्नर अली मर्दान खां था।

प्रश्न 59.
कन्धार मुगलों से हमेशा के लिए कब छिन गया और इस पर किस देश का अधिकार स्थापित हो गया ?
उत्तर-
कन्धार मुग़लों से 1649 ई० में छिन गया। इस पर ईरान का अधिकार स्थापित हो गया।

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प्रश्न 60.
शाहजहां ने मध्य एशिया की विजय के लिए कौन-से शहजादों को और किन वर्षों में भेजा ?
उत्तर-
शाहजहां ने मध्य एशिया की विजय के लिए मुराद को 1644 ई० और औरंगज़ेब को 1647 ई० में भेजा।

प्रश्न 61.
शाहजहां के चार पुत्रों के नाम बताएं।
उत्तर-
शाहजहां के चार पुत्रों के नाम दारा, शुजा, मुराद और औरंगजेब थे।

प्रश्न 62.
उत्तराधिकार के युद्ध कब हुए और औरंगजेब ने दारा को किन दो लड़ाइयों में हराया ?
उत्तर-
उत्तराधिकार के युद्ध अप्रैल तथा मई, 1658 ई० में हुए। औरंगजेब ने दारा को धरमत तथा सामूगढ़ की लड़ाइयों में हराया।

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प्रश्न 63.
शाहजहां का राज्य किस वर्ष जाता रहा और वह कब तक जीवित रहा ?
उत्तर-
शाहजहां का राज्य जून, 1658 ई० में जाता रहा। वह 1666 ई० तक जीवित रहा।

प्रश्न 64.
यूसुफजई पठानों ने किस वर्ष में तथा किन इलाकों में मुगलों के विरुद्ध सिर उठाया ?
उत्तर-
यूसुफजई पठानों ने 1667 ई० में पेशावर, अटक और हज़ारा नामक इलाकों में मुग़लों के विरुद्ध सिर उठाया।

प्रश्न 65.
अफरीदियों ने किस वर्ष मुगलों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की तथा इन्हें किस कवि का समर्थन प्राप्त था ?
उत्तर-
अफरीदियों ने 1672 ई० में मुग़लों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। इन्हें कवि खुशाल खां का समर्थन प्राप्त था।

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प्रश्न 66.
मारवाड़ की राजधानी कौन-सी थी और इसका राजा कौन था एवं उसकी मृत्यु किस वर्ष हुई ?
उत्तर-
मारवाड़ की राजधानी जोधपुर थी। इसका राजा जसवन्त सिंह था जिसकी मृत्यु 1678 ई० में हुई।

प्रश्न 67.
शहजादा अकबर ने औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह कब किया तथा उसे कौन-सी दो राजपूत रियासतों का समर्थन मिला ?
उत्तर-
शहजादा अकबर ने 1681 ई० में मेवाड़ और मारवाड़ के समर्थन से औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह किया।

प्रश्न 68.
औरंगजेब दक्कन में किस वर्ष से किस वर्ष तक रहा ?
उत्तर-
औरंगज़ेब दक्कन में 1682 ई० से 1707 ई० तक रहा।

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प्रश्न 69.
औरंगजेब ने बीजापुर कब जीता और उस समय उसका सुल्तान कौन था ?
उत्तर-
औरंगजेब ने 1686 ई० में बीजापुर को जीता। उस समय इसका सुल्तान सिकन्दर आदिलशाह था।

प्रश्न 70.
औरंगजेब ने गोलकुण्डा कब जीता और उस समय उसका सुल्तान कौन था ?
उत्तर-
औरंगज़ेब ने 1687 ई० में गोलकुण्डा को जीता। उस समय इसका सुल्तान अबुल हसन था।

प्रश्न 71.
मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारणों की जड़ क्या थी ?
उत्तर-
मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारणों की जड़ औरंगजेब की दक्षिण नीति थी।

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III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
बाबर तथा लोधी अफ़गानों के बीच संघर्ष के बारे में बताएं।
उत्तर-
बाबर और लोधी अफ़गानों के बीच पांच वर्ष तक संघर्ष चला। सर्वप्रथम बाबर ने सिकन्दर लोधी को 1525 ई० में पंजाब में पराजित किया। तत्पश्चात् उसने इब्राहीम लोधी के साथ पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में 1526 ई० में टक्कर ली। इब्राहीम लोधी अपने कई हजार सैनिकों के साथ मारा गया। युद्ध में बाबर ने श्रेष्ठ युद्ध नीति का प्रदर्शन किया। इसके अतिरिक्त उसके तोपखाने ने भी शत्रुओं का साहस तोड़ दिया। बाबर ने शीघ्र ही दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया। उसने लोधी अफ़गानों को अपने प्रदेश से निकालना आरम्भ किया। अतः उन्होंने राणा संग्राम सिंह से सहायता मांगी। कनवाहा की लड़ाई (1527 ई०) में उन्होंने राणा सांगा का साथ दिया। इस युद्ध में बाबर की ही विजय हुई। 1529 ई० में अफगानों ने घाघरागंगा-संगम के निकट बाबर से युद्ध किया। इस बार भी बाबर विजयी रहा। इस तरह बाबर अफ़गानों की शक्ति कुचलने में सफल रहा।

प्रश्न 2.
बाबर तथा राणा सांगा के बीच युद्ध के बारे में बताएं।
उत्तर-
बाबर तथा राणा सांगा के बीच 1527 ई० में युद्ध हुआ। पानीपत की विजय के पश्चात् बाबर ने भारत में रहने का निश्चय किया। यह बात मेवाड़ के शासक राणा सांगा की महत्त्वाकांक्षाओं के मार्ग में बाधा थी। मेवाड़ राजस्थान का सबसे शक्तिशाली राज्य था। इसी बीच बाबर ने सुल्तान इब्राहीम लोधी के इलाकों से अफ़गानों को निकालना आरम्भ कर दिया। तंग आकर कुछ अफ़गान सरदारों ने राणा सांगा से सहायता मांगी। वह तुरन्त उनकी सहायता करने के लिए तैयार हो गया। मार्च 1527 ई० में राणा सांगा ने आगरा की ओर कूच किया। बाबर अपनी सेना को लेकर फतेहपुर सीकरी के निकट खनुआ आ पहुंचा। दोनों पक्षों में दस घण्टे तक युद्ध हुआ। बाबर को निर्णायक विजय प्राप्त हुई। राणा सांगा की प्रतिष्ठा को बड़ा आघात पहुंचा और एक वर्ष के भीतर ही उसकी मृत्यु हो गई। भारत में बाबर के लिए विजय द्वार खुल गए।

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प्रश्न 3.
हुमायूं तथा बहादुरशाह के बीच संघर्ष के बारे में बताएं।
उत्तर-
गुजरात के शासक बहादुरशाह के साथ हुमायूं के सम्बन्ध आरम्भ से ही शत्रुतापूर्ण थे। बहादुरशाह उन अफ़गानों को आश्रय दे रहा था जिन पर मुग़ल साम्राज्य के प्रति विद्रोह का आरोप था। वह दिल्ली पर अधिकार करने का भी आकांक्षी था। हुमायूं पहले तो शान्त रहा, परन्तु जब बहादुरशाह सभी युद्धों से निपट चुका, तब हुमायूं ने उस पर आक्रमण किया। उसने बहादुरशाह की सेना को मन्दसौर के स्थान पर घेरा। बहादुरशाह अपने पांच साथियों सहित शिविर बन्द करके भाग निकला। हुमायूं ने उसका मांडू तथा चम्पानेर तक पीछा किया। बहादुरशाह खम्बात की ओर भागने को विवश हो गया। हुमायूं वापिस लौट आया और उसने चम्पानेर पर अधिकार कर लिया। यहां हुमायूं ने फिर भूल की। वह विजित प्रदेशों का प्रबन्ध किए बिना ही आगरा लौट आया। परिणामस्वरूप उसके जाते ही शत्रुओं ने अपने आपको स्वतन्त्र घोषित कर दिया।

प्रश्न 4.
हुमायूं तथा शेरशाह सूरी के बीच संघर्ष के बारे में बताएं। .
उत्तर-
शेर खां भारत के पूर्वी प्रदेशों में अपनी शक्ति बढ़ा रहा था। 1531 ई० में हुमायूं शेर खां के विरुद्ध बढ़ा। परन्तु उसने पहले मार्ग में स्थित चुनार के किले को जीतना उचित समझा। इस अवसर का लाभ उठाकर शेर खां ने अपनी शक्ति दृढ़ कर ली। उधर उसके सैनिकों ने हुमायूं को मार्ग में तेहरिया गढ़ी के स्थान पर रोक दिया और उसे बंगाल की राजधानी गौड़ की ओर न बढ़ने दिया। इसी बीच शेर खां ने गौड़ का कोष और अफ़गान परिवार रोहतासगढ़ भेज दिए। इसके बाद ही हुमायूं गौड़ को जीत सका। यहां वह रंगरलियों में डूब गया। हुमायूं जब वापिस चला तो चौसा के स्थान पर दोनों पक्षों में पुनः युद्ध हुआ, जिसमें हुमायूं बुरी तरह पराजित हुआ। शेर खां हुमायूं का पीछा करता हुआ कन्नौज तक बढ़ आया। हुमायूं के लिए यह संकट की घड़ी थी। उसने 1000 सैनिक इकट्ठे किए और एक बार फिर कन्नौज की ओर बढ़ा। दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। चौसा की भान्ति यहां भी हुमायूं पराजित हुआ।

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प्रश्न 5.
शेरशाह किन कार्यों के लिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर-
शेरशाह सूरी ने 1540 ई० से 1545 ई० तक शासन किया। उसने मुग़ल राज्य (1540), मालवा (1542), मारवाड़ (1543) तथा रोहतासगढ़ तक के प्रदेश को विजय किया। इन महत्त्वपूर्ण विजयों के अतिरिक्त शेरशाह कई अन्य कार्यों के लिए भी प्रसिद्ध है। उसने अनेक सड़कें बनवाईं और सड़कों के किनारे थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सराएं बनवाईं। उसके द्वारा बनवाई गई सबसे लम्बी सड़क शाही सड़क (जी० टी० रोड) थी जो बंगाल से सिन्ध नदी तक जाती थी। सड़कों के कारण सेनाओं, व्यापारियों तथा जनसाधारण को लाभ पहुंचा। शेरशाह सूरी ने अपने राज्य में शान्ति स्थापित की तथा एक उत्तम प्रकार की लगान व्यवस्था आरम्भ की। इस लगान व्यवस्था से राज्य तथा कृषकों को बड़ा लाभ पहुंचा। सच तो यह है कि शेरशाह एक सफल विजेता तथा उच्चकोटि का प्रबन्धक था।

प्रश्न 6.
पानीपत की पहली लड़ाई का वर्णन करो।
उत्तर-
पानीपत की पहली लड़ाई 1526 ई० में हुई। इस लड़ाई के परिणामस्वरूप भारत में सुल्तानों के राज्य का अन्त हुआ और मुगल वंश की स्थापना हुई। इस लड़ाई के कई कारण थे। मध्य-एशिया के युद्धों में बाबर को असफलता का मुंह देखना पड़ा था। फरगाना का राज्य भी उससे छिन गया था। भारत में दिल्ली सल्तनत बहुत कमजोर हो चुकी थी। इसी समय दौलत खां लोधी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमन्त्रण दिया। इस प्रकार परिस्थितियां बाबर के लिए अनुकूल थीं। उसने इनका लाभ उठाया और अपनी सेनाओं सहित भारत आ पहुंचा। पानीपत के निकट आकर उसने बड़े अच्छे ढंग से मोर्चाबन्दी की और युद्ध की तैयारी करने लगा। 21 अप्रैल, 1526 ई० की प्रातः बाबर और इब्राहीम लोधी की सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ। इब्राहीम लोधी बाबर जैसा योग्य सेनापति नहीं था। अतः वह युद्ध में हार गया और मारा गया। युद्ध में विजय पाने के बाद बाबर ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया।

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प्रश्न 7.
बैरम खां के अधीन मुगल साम्राज्य का स्थिरीकरण किस प्रकार हुआ ?
उत्तर-
बैरम खां अकबर का संरक्षक था। उसी ने 1556 ई० में अकबर को कलानौर में हुमायूं का उत्तराधिकारी घोषित किया। इसीलिए शासन के आरम्भिक चार वर्षों में (1556 ई० से 1560 ई० तक) बैरम खां का मुग़ल दरबार में अत्यधिक प्रभाव रहा। हुमायूं की मृत्यु के शीघ्र बाद ही हेमू ने मुगल सेनापति तारदी बेग को पराजित कर दिया था। बैरम खां ने तारदी बेग की पराजय के कारण उसका वध करवा दिया। इसके बाद उसने अकबर को दिल्ली जाने का परामर्श दिया। 1556 ई० में पानीपत के मैदान में हेमू और मुग़ल सेनाओं में जम कर लड़ाई हुई। हेमू पराजित हुआ। इसी बीच उसके स्वामी आदिल शाह को बंगाल के खिज्र खां ने मार डाला। बैरम खां के प्रयत्नों के कारण सिकन्दर सूर ने आत्मसमर्पण कर दिया तथा बिहार में जागीर स्वीकार कर ली। बैरम खां ने ग्वालियर को भी जीता। इस प्रकार 1560 ई० तक बैरम खां ने काबुल से जौनपुर और पंजाब की पहाड़ियों से लेकर अजमेर तक फैले अकबर के राज्य को स्थिरता प्रदान की।

प्रश्न 8.
आपके विचार में भारत के मुसलमान शासकों में शेरशाह सूरी का क्या स्थान है ?
उत्तर-
शेरशाह सूरी को भारत के मुसलमान शासकों में एक बहुत ऊंचा स्थान प्राप्त है। एक साधारण जागीरदार के पुत्र की स्थिति से उठकर वह भारत का सम्राट बना। इस प्रकार उसने अपनी योग्यता, बल और उच्च कोटि के नेतृत्व का परिचय दिया। उसने केवल पांच वर्ष ही राज्य किया। इस थोड़े से समय में ही उसने शान्ति, सुरक्षा और सुव्यवस्था स्थापित करके देश को सुदृढ़ बनाया। वह प्रजा का हितैषी था। उसने अनुभव किया कि हिन्दू जनता का सहयोग प्राप्त किए बिना कोई भी राज्य स्थायी नहीं रह सकता। इसलिए उसने धार्मिक कट्टरता से मुक्त होकर हिन्दुओं के प्रति उदारता और सहनशीलता की नीति अपनाई। इस प्रकार शेरशाह ने अपने शासन सम्बन्धी सुधारों और धार्मिक उदारता की नीति से सम्राट अकबर के महान कार्य के लिए उचित वातावरण तैयार किया। यदि उसे राष्ट्र-निर्माता भी कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी।

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प्रश्न 9.
“शेरशाह सूरी अकबर का अग्रणी था” सिद्ध करो।
उत्तर-
निम्नलिखित चार बातों से यह स्पष्ट हो जाएगा कि शेरशाह सूरी अकबर का अग्रणी था :-
1. उच्च राजकीय आदर्श-शेरशाह सूरी कभी भी अपना समय नष्ट नहीं करता था। जनता की भलाई के लिए वह कठोर परिश्रम करता था। अकबर शेरशाह द्वारा दिखाई गई इसी राह पर चला।

2. प्रशासनिक विभाजन-शेरशाह ने शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्य को ‘सरकारों’ तथा ‘परगनों’ में बांटा हुआ था। अकबर ने भी शेरशाह के समय की प्रशासकीय इकाइयों तथा नागरिक संस्थाओं को उनके नाम बदलकर अपनाया।

3. प्रजा-हितार्थ कार्य-शेरशाह ने अपने राज्य में सड़कें बनवाईं और सड़कों के दोनों किनारों पर छायादार वृक्ष लगवाए। यात्रियों की सुविधा के लिए उसने सराएं बनवाईं। अकबर ने भी राज्य में सड़कों का जाल बिछाया। उसने अनेक सरायें बनवाईं, अस्पताल खुलवाए और कुएं खुदवाए।

4. धार्मिक सहनशीलता-शेरशाह पहला मुस्लिम शासक था जिसने हिन्दुओं के प्रति उदारता दिखाई। अकबर ने भी इसी उदारता की नीति को अपनाया।

प्रश्न 10.
“अकबर एक राष्ट्रीय शासक था।” क्यों ?
उत्तर-
अकबर पहला मुस्लिम सम्राट् था जिसने किसी धर्म या सम्प्रदाय को उन्नत करने की बजाए राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा दिया। उसने समस्त उत्तरी भारत को विजय करके एक सूत्र में बांधा। उसने समस्त राज्य में समान कानून तथा शासनप्रणाली लागू की। पहली बार हिन्दू-जनता को मुसलमानों के समान धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। जज़िया समाप्त कर दिया गया। मुग़ल सम्राट अकबर ने न केवल राजपूत राजकुमारियों से विवाह ही किया बल्कि उन्हें पूरी तरह हिन्दू परम्पराओं के अनुसार पूजा-पाठ करने की अनुमति भी दे रखी थी। दीन-ए-इलाही अकबर की धार्मिक सहनशीलता की चरम सीमा थी। उसने यह धर्म हिन्दू तथा मुसलमानों में एकता स्थापित करने के लिए आरम्भ किया था। इन सभी कार्यों द्वारा अकबर देश में राष्ट्रीय राज्य स्थापित करने में सफल हुआ।

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प्रश्न 11.
अकबर की धार्मिक नीति के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
अकबर आरम्भ में परम्परावादी मुसलमान था परन्तु धीरे-धीरे उसके धार्मिक विचारों में उदारता आने लगी। उसने तीर्थ-कर और जजिया कर हटा दिये। उसने फतेहपुर सीकरी में इबादतखाना बनवाया जहां सभी धर्मों और सम्प्रदायों के लोग धार्मिक विषय पर चर्चा करते थे। इन सभी विचारों के सम्मिश्रण से अकबर ने एक नवीन धर्म का प्रारम्भ किया जिसे दीन ए-इलाही का नाम दिया जाता है। अकबर ने इस धर्म में अच्छे-अच्छे सिद्धान्तों का संग्रह किया। इसके अतिरिक्त अकबर ने राजपूत राजाओं से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए। सभी हिन्दू रानियों को हिन्दू परम्पराओं के अनुसार पूजा-पाठ करने की स्वतन्त्रता प्राप्त थी। अकबर ने नौकरियों के द्वार सभी धर्मों के लोगों के लिए समान रूप से खोल रखे थे। इस प्रकार मुस्लिम युग में पहली बार किसी मुसलमान शासक के अधीन धार्मिक सहनशीलता का वातावरण अस्तित्व में आया।

प्रश्न 12.
दीन-ए-इलाही से आप क्या समझते हैं ? उसके मुख्य सिद्धान्तों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
दीन-ए-इलाही अकबर की धार्मिक भावनाओं के विकास की चरम सीमा थी। उसने इबादतखाने में हुए वादविवादों से यह निष्कर्ष निकाला कि सभी धर्म मूल रूप से एक हैं। इस बात से प्रेरणा लेकर उसने 1582 ई० में दीन-ए-इलाही धर्म प्रचलित किया। उसने इसमें सभी धर्मों के मौलिक सिद्धान्तों का समावेश किया। देवी-देवताओं तथा पीर-पैगम्बरों का इस नए धर्म में कोई स्थान न था। इसके अनुसार ईश्वर एक है और अकबर उसका सबसे बड़ा पुजारी है। इस धर्म के अनुयायियों के लिए मांस खाने की मनाही थी। इसके मानने वाले “अल्लाह-हु-अकबर” कहकर एक-दूसरे का स्वागत करते थे। वे . सम्राट के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने के लिए भी तैयार रहते थे। परन्तु दीन-ए-इलाही अधिक लोकप्रिय न हो सका। अकबर ने इसके प्रचार के लिए भी कोई विशेष पग न उठाया। परिणामस्वरूप अकबर की मृत्यु के साथ ही इस धर्म का अन्त हो गया।

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प्रश्न 13.
अकबर की राजपूतों के प्रति नीति का वर्णन करो।
उत्तर-
अकबर की राजपूत नीति उसकी राजनीतिक बुद्धिमता का प्रमाण थी। वह जानता था कि राजपूतों के सहयोग के बिना वह राष्ट्रीय शासक नहीं बन सकता। अतः उसने राजपूतों के प्रति मित्रता और सहनशीलता की नीति अपनाई। उसने राजपूत राजकुमारियों से विवाह किए, राजपूतों को उच्च पदों पर नियुक्त किया और उनको धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की। उसने अम्बर (जयपुर) के राजा बिहारीमल, बीकानेर तथा जैसलमेर के राजपूत राजाओं से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किए। भगवान् दास, मानसिंह, उदय सिंह आदि राजपूत अकबर के समय के उच्च सैनिक अधिकारी थे। उसने न तो राजपूतों के पवित्र मन्दिरों को तोड़ा और न ही अपने किसी युद्ध को जिहाद (धर्मयुद्ध) का नाम दिया। अकबर की राजपूत नीति का यह परिणाम हुआ कि राजपूत अकबर के मित्र बन गए। इस हिन्दू-मुस्लिम सहयोग के कारण ही अकबर आगे चलकर राष्ट्र-निर्माण के उद्देश्य में सफल हो सका।

प्रश्न 14.
एक शासक के रूप में जहांगीर के प्रमुख कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर-
जहांगीर अपने पिता अकबर की मृत्यु के बाद 1605 ई० में मुग़ल सम्राट् बना। उसने मेवाड़ के साथ चले आ रहे लगभग 40 वर्षों के संघर्ष को समाप्त किया। उसने बंगाल में शान्ति स्थापित करने में भी सफलता प्राप्त की। 1622 ई० में उसका स्वास्थ्य गिर जाने के कारण राजनीति की बागडोर उसकी पत्नी नूरजहां के हाथ आ गई जिसके साथ उसने 1611 ई० में विवाह किया था। जहांगीर को अपने दूसरे पुत्र खुर्रम (शाहजहां) के विद्रोह के कारण कन्धार का किला भी खोना पड़ा। तत्पश्चात् उसे अपने एक सरदार महावत खां के विद्रोह में उलझना पड़ा जहां से उसे नूरजहां ने बचाया। उसने अकबर द्वारा स्थापित मनसबदारी प्रणाली में कुछ परिवर्तन किए। उदाहरण के लिए उसने सवार के औसत वेतन को घटा दिया और इस प्रणाली में दुअस्पाह-सिह-अस्पाह व्यवस्था का समावेश किया। इस नई व्यवस्था के अनुसार इस पदवी के मनसबदार को उसके सवार की पदवी के आधार पर निश्चित सैनिकों से दुगुने सैनिक रखने पड़ते थे। इसके लिए उसे वेतन भी दुगुना ही दिया जाता था। 1627 ई० में जहांगीर की मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 15.
नूरजहां पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर-
नूरजहां का असली नाम मेहरून्निसा था। वह एक ईरानी सरदार ग्यासबेग की पुत्री थी। ग्यासबेग काम की तलाश में भारत आ रहा था। काफिले के सरदार मलिक मसऊद की सहायता से ग्यासबेग को अकबर के दरबार में छोटी-सी नौकरी मिल गई। 1595 ई० में मेहरून्निसा का विवाह एक ईरानी नवयुवक अली कुली खां से हो गया। अली कुली खां को सलीम से शेर अफ़गान की उपाधि भी प्राप्त हुई। सलीम जब राजा (जहांगीर) बना तो उसने शेर अफ़गान को बर्दवान का सूबेदार बना दिया। परन्तु 1607 ई० में शेर अफ़गान का वध कर दिया गया। इसके चार वर्ष बाद जहांगीर ने नूरजहां से स्वयं विवाह कर लिया। नूरजहां एक कुशल स्त्री थी। उसने शासन में काफ़ी अधिकार प्राप्त कर लिए। धीरे-धीरे शासन के सभी कार्य वह स्वयं करने लगी। प्रसिद्ध इतिहासकार एलफिंस्टन के मतानुसार, “नूरजहां बड़ी तीव्र बुद्धि की स्त्री थी जिसने फर्नीचर, आभूषणों तथा नवीन वेशभूषा का आविष्कार किया।”

प्रश्न 16.
शासक के रूप में शाहजहां के कार्यों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
शाहजहां अपने पिता जहांगीर की मृत्यु के बाद 1628 ई० में मुग़ल सम्राट् बना। अगले ही वर्ष उसने कन्धार पर फिर से मुगलों का अधिकार स्थापित किया, परन्तु लगभग 20 वर्ष बाद ईरानियों ने इस प्रदेश को पुनः अपने अधिकार में ले लिया। कन्धार के बाद शाहजहां ने मध्य एशिया में बल्ख और बदख्शां को विजय करने का प्रयत्न किया, परन्तु कन्धार की भान्ति ये प्रदेश भी मुग़ल राज्य का स्थायी अंग न बन सके। शाहजहां ने कला तथा प्रशासन के क्षेत्र में कुछ महत्त्वपूर्ण सफलताएं प्राप्त की। उसके द्वारा बनवाए गए आगरा तथा दिल्ली के भवन कला के सर्वोत्तम नमूने हैं। उसने मनसबदारी प्रथा में एक परिवर्तन किया। अब प्रत्येक सरकार को अपनी सवार पदवी के आधार पर निश्चित संख्या के एक-तिहाई सवारों को रखना पड़ता था। कुछ परिस्थितियों में यह संख्या एक-चौथाई अथवा पांचवां भाग भी होती थी। शाहजहां ने अपनी सेना को भी सुदृढ़ बनाया। 1666 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 17.
औरंगजेब की धार्मिक नीति का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
औरंगजेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था और वह सुन्नी सम्प्रदाय के अतिरिक्त किसी भी धर्म को फलता-फूलता नहीं देख सकता था। अतः उसने सभी गैर-मुस्लिम सम्प्रदायों के विरुद्ध असहनशीलता की नीति अपनाई। उसने हिन्दुओं के अनेक मन्दिर नष्ट-भ्रष्ट कर दिए और उन पर लगे करों में वृद्धि कर दी। उसने हिन्दुओं से ‘जज़िया’ नामक धार्मिक कर भी फिर से लेना आरम्भ कर दिया। 1671 ई० में एक आदेश द्वारा उसने प्रशासन में नियुक्त सभी हिन्दुओं को उनके पदों से हटा दिया। उसने उनके उत्सवों पर भी रोक लगा दी और इस बात की मनाही कर दी कि कोई भी हिन्दू पालकी में बैठकर नहीं जा सकता। इतना ही नहीं, उसने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए बल और प्रलोभन दोनों का प्रयोग किया। उसके इन कार्यों से सभी हिन्दू जातियां मुग़ल साम्राज्य के विरुद्ध हो गईं और स्थान-स्थान पर विद्रोह होने लगे। फलस्वरूप सारा प्रशासनिक ढांचा अस्त-व्यस्त हो गया।

प्रश्न 18.
औरंगजेब की राजपूत नीति क्या थी और इसके क्या परिणाम निकले ?
उत्तर-
राजपूतों के प्रति औरंगजेब की नीति अकबर की नीति के बिल्कुल विपरीत थी। अकबर ने उन्हें सीने से लगाया, परन्तु औरंगजेब ने उनकी पीठ में छुरा घोंपा। उसने अपने दो राजपूत सेनानायकों राजा जसवन्त सिंह तथा राजा जयसिंह के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया। राजा जयसिंह को उसने विष दिलवा दिया और जसवन्त सिंह को अटक के पार भेज कर मौत के मुंह में धकेल दिया। 10 दिसम्बर, 1678 ई० को जसवन्त सिंह की जमरूद में मृत्यु हो गई और मुग़लों ने बड़ी सरलता से जोधपुर पर अधिकार कर लिया। वहां फौजदार, किलादार, कोतवाल तथा अमीन के पदों पर मुसलमानों को नियुक्त कर दिया गया। औरंगज़ेब राजा जसवन्त सिंह के पुत्र अजीत सिंह को अपने अधिकार में रखना चाहता था। इसलिए औरंगज़ेब और मारवाड़ में एक लम्बा युद्ध चला, जिसमें मेवाड़ का राजा भी सम्मिलित हो गया। औरंगज़ेब का अपना पुत्र अकबर भी राजपूतों से मिल गया। औरंगज़ेब की राजपूत नीति के कारण राजपूत मुग़ल साम्राज्य के कट्टर विरोधी हो गए थे। उनकी यह शत्रुता मुग़ल साम्राज्य के विनाश का कारण बनी।

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प्रश्न 19.
औरंगजेब की दक्षिण नीति की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
औरंगजेब को दक्षिण की शिया रिसायतों का अस्तित्व पसन्द नहीं था। वह मराठों की शक्ति को भी कुचल देना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने दक्षिण को विजय करने का निश्चय किया। उसने गोलकुण्डा राज्य पर कई आक्रमण किए। कुछ असफल अभियानों के बाद 1687 ई० में वह इस राज्य पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा। अगले ही वर्ष उसने रिश्वत और धोखेबाजी से बीजापुर राज्य को अपने अधीन कर लिया। दक्षिण में मराठों का नेतृत्व शिवाजी के पुत्र शम्भा जी के हाथ में था। 1689 ई० में औरंगज़ेब ने उसे पकड़ लिया और उसका वध कर दिया। औरंगज़ेब की यह सफलता एक भ्रम मात्र थी। मराठे शीघ्र ही पुनः स्वतन्त्र हो गए। 1707 ई० में दक्षिण में अहमदनगर के स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार ‘दक्षिण’ औरंगज़ेब और मुग़ल साम्राज्य दोनों के लिए कब्र सिद्ध हुआ।

प्रश्न 20.
औरंगज़ेब भारत का राज्य लेने में किस तरह सफल हुआ ?
उत्तर-
1657 ई० में अपने पिता की बीमारी का समाचार सुन कर औरंगजेब ने बड़ी चालाकी से काम लिया। वह उस समय दक्षिण का सूबेदार था। उसने अपने भाई मुराद को, जो उस समय गुजरात का सूबेदार था, आधे राज्य का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। दोनों की संयुक्त सेनाएं आगरा की ओर बढ़ीं। मार्ग में उन्होंने राजा जसवन्त सिंह को हराया और फिर सामूगढ़ के मैदान में अपने बड़े भाई दारा को पराजित किया। तत्पश्चात् औरंगज़ेब ने अपने भाई मुराद को शराब पिला कर बन्दी बना लिया और ग्वालियर के किले में कैद कर लिया। बाद में उसे फांसी दे दी गई। उसने अपने पिता शाहजहां को भी कैद कर लिया। कुछ समय पश्चात् उसने दारा और उसके पुत्र सुलेमान शिकोह को मरवा दिया। इसी बीच उसके भाई शुजा का अराकान में वध हो चुका था। इस प्रकार अपने सभी शत्रुओं से मुक्त हो कर औरंगज़ेब भारत की राजगद्दी प्राप्त करने में सफल रहा।

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IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
बाबर के प्रारम्भिक जीवन, उसकी विजयों और चरित्र का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
प्रारम्भिक जीवन-बाबर का जन्म 1483 ई० को फरगाना की राजधानी अन्दीजन में हुआ। उसका पिता उमर शेख मिर्जा फरगाना का शासक था। जब बाबर 11 वर्ष का था तो उसके पिता का देहान्त हो गया। आरम्भ में बाबर ने तैमूर की राजधानी समरकन्द को जीतने का प्रयत्न किया, परन्तु वह इसमें असफल रहा। इस चक्कर में उसकी पैतृक सम्पत्ति फरगाना भी उनसे छिन गई। इतना होने पर भी बाबर ने साहस नहीं छोड़ा। 1504 ई० में उसने काबुल और गज़नी पर अधिकार कर लिया और अपने राज्य की स्थापना की।

बाबर की भारत-विजय-काबुल और गज़नी में राज्य स्थापित करने के पश्चात् बाबर ने भारत को विजय करने की योजना बनाई। आरम्भ में उसने कई भारतीय प्रदेशों पर आक्रमण किए, परन्तु उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण लड़ाई दिल्ली के शासक इब्राहीम लोधी के विरुद्ध थी। यह लड़ाई 1526 ई० में पानीपत के मैदान में हुई। बाबर के तोपखाने के सामने इब्राहिम लोधी की सेना न टिक सकी। इस युद्ध में इब्राहीम लोधी मारा गया और बाबर विजयी हुआ। पानीपत की विजय के पश्चात् बाबर ने दिल्ली और आगरा पर भी अधिकार कर लिया।

दिल्ली विजय के पश्चात् बाबर को राजपूत शासक राणा सांगा से टक्कर लेनी पड़ी। 1527 ई० में आगरा के समीप कनवाहा नामक गांव में बाबर और राणा सांगा के बीच भयंकर युद्ध हुआ। राणा सांगा अन्त में मैदान छोड़कर भाग निकला और बाबर को विजय प्राप्त हुई। 1529 ई० में उसने घाघरा के युद्ध में अफ़गानों को परास्त किया। इस प्रकार भारत पर बाबर का अधिकार हो गया।

बाबर का चरित्र-बाबर एक सफल शासक तथा अनुभवी सैनिक था। वह विद्वान् और कला-प्रेमी था। इसके अतिरिक्त वह बड़ा साहसी और धैर्यवान था। कठिनाइयों में वह कभी नहीं घबराया। एक व्यक्ति के रूप में भी उसका चरित्र बड़ा प्रभावशाली था। वह एक अच्छा पिता, दयालु स्वामी तथा उदार मित्र था। वह हंसमुख और मिलनसार था। वह सदा अपने से बड़ों का आदर तथा छोटों से प्रेम करता था। इन गुणों के बावजूद बाबर में शराब तथा विषय-भोग जैसे अवगुण भी थे। परन्तु यह अवगुण उसके कर्त्तव्यपालन के मार्ग में कभी बाधा नहीं बन पाये। सच तो यह है कि भारतीय इतिहास में बाबर को एक बहुत उच्च स्थान प्राप्त है।

प्रश्न 2.
बाबर के पश्चात् हुमायूं के सामने कौन-कौन सी कठिनाइयां थीं ?
उत्तर-
1530 ई० में बाबर की मृत्यु के पश्चात् हुमायूं राजसिंहासन पर बैठा। परन्तु गद्दी पर बैठते ही उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इन कठिनाइयों का वर्णन इस प्रकार है :

1. अस्थिर और अव्यवस्थित राज्य-हुमायूं को उत्तराधिकार में एक ऐसा राज्य मिला जो न तो सुदृढ़ था और न ही सुव्यवस्थित। बाबर ने न तो बंगाल को अपने अधीन किया था और न ही गुजरात को। राजपूत बाबर से पराजित अवश्य हुए थे, परन्तु उनकी शक्ति को पूर्णतः कुचला नहीं गया था। इस प्रकार हुमायूं चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ था।

2. विभाजित राज्य-राजगद्दी पर बैठते ही हुमायूं ने राज्य को अपने तीन भाइयों में बांट दिया। उसके तीनों भाई बड़े ही अयोग्य थे। उन्होंने हुमायूं की सहायता करने की बजाय उसके मार्ग में बाधाएं डालनी आरम्भ कर दी।

3. अफ़गानों का विरोध-पानीपत तथा घाघरा की लड़ाई में परास्त होकर भी अफ़गान शक्ति नष्ट नहीं हुई थी। बड़ेबड़े अफ़गान सरदार दिल्ली के सिंहासन को वापस लेना चाहते थे। प्रसिद्ध अफगान सरदार शेर खां तो हुमायूं के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन गया था।

4. खाली राजकोष-हुमायूँ के पिता बाबर ने अपनी उदारता के कारण अपना काफ़ी सारा धन व्यर्थ में व्यय कर दिया। फलस्वरूप हुमायूँ को एक ऐसा राजकोष मिला जो लगभग खाली हो चुका था। धन के अभाव में हुमायूँ के लिए शासन चलाना सरल नहीं था।

5. विश्वासपात्र सैनिकों का अभाव हुमायूं की सेना में किसी एक जाति के लोग नहीं थे। उसमें चुगताई, तुर्क, उजबेग, मुग़ल, अफ़गान और ईरानी सभी लोग शामिल थे। परिणामस्वरूप सेना में एकता का बड़ा अभाव था। सैनिक संगठन की कमी के कारण हुमायूं की कठिनाइयां और भी बढ़ गईं।

6. व्यक्तिगत दोष-हुमायूँ बड़ा ही विलासी व्यक्ति था। वह हर समय अफीम खाकर मस्त रहता था। शेर खां और बहादुरशाह जब उसके लिए खतरा बने हुए थे तो उसने अपना कीमती समय रंगरलियों में खो दिया। परिणामस्वरूप उसके शत्रुओं को शक्ति बढ़ाने को अवसर मिल गया।
इस प्रकार हुमांयू जीवन-भर इन कठिनाइयों से घिरा रहा। उसने अपनी भूलों से अपनी कठिनाइयों को और अधिक बढा दिया।

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प्रश्न 3.
शासक के रूप में हुमायूं की असफलता के क्या कारण थे ?
अथवा
हुमायूँ की भूलों का वर्णन करो।
उत्तर-
हुमायूं अपनी निम्नलिखित भूलों के कारण शासक के रूप में असफल रहा :

1. हुमायूं द्वारा राज्य का मूर्खतापूर्ण विभाजन-गद्दी पर बैठते ही हुमायूं के कदम लड़खडा गये। उसने अपने भाइयों में राज्य का विभाजन राज्य के हितों को ध्यान में रखकर न किया, बल्कि अपने भाइयों की इच्छाओं को ध्यान में रखकर किया। उसने कामरान को काबुल तथा कन्धार, अस्करी को सम्भल और हिन्दाल को अलवर का शासक बना दिया। शीघ्र ही उसे अपनी भूल के परिणाम भुगतने पड़े। कामरान कुछ ही दिनों में अपने असली रूप में प्रकट हुआ। वह हुमायूं को राज्याभिषेक पर बधाई देने की आड़ में पंजाब की ओर बढ़ आया और वहां अपना अधिकार जमा लिया। इससे हुमायूं का आधा राज्य जाता रहा और उसकी सैनिक शक्ति काफ़ी दुर्बल हो गई। उसके अन्य भाइयों ने भी उसके लिए अनेक कठिनाइयां उत्पन्न की।

2. समय तथा धन की बर्बादी-हुमायूँ समय तथा धन के महत्त्व को नहीं समझता था। उसने अपने आरम्भिक वर्षों में दिल्ली तथा आगरा में धन को पानी की तरह बहाया। उसने राज्याधिकारियों को बहुमूल्य पुरस्कार दिए। “उसने अपना काफ़ी समय और धन दिल्ली में एक विशाल दुर्ग बनाने की योजना में नष्ट किया।” यह सब काम उसने उस समय किया जब गुजरात का बहादुरशाह उसके शत्रुओं को पनाह दे रहा था और अपनी शक्ति बढ़ाने में लगा हुआ था। समय और धन की यह बर्बादी हुमायूं की दूसरी बड़ी भूल थी।

3. गुजरात अभियान की भूलें-गुजरात अभियान में हुमायूं ने अनेक भूलें कीं। उसने रानी कर्णवती की पेशकश को ठुकरा कर राजपूतों की मित्रता से हाथ धो लिया। उसका समय पर बहादुरशाह पर आक्रमण न करना भी उसकी भूल थी। जब बहादुरशाह कर्णवती के विरुद्ध उलझा हुआ था तो हुमायूं रंगरलियों में डूब गया। फिर जब हुमायूं ने बहादुरशाह का पीछा किया तो उसका वध किए बिना ही वापस लौट आया। यह उसकी बड़ी भूल थी, क्योंकि कुछ समय के पश्चात् बहादुरशाह दियु से लौटकर हुमायूं के लिए समस्या बन गया। उसे गुजरात का शासन अस्करी को नहीं सौंपना चाहिए था। अस्करी न तो इतना योग्य था और न ही हुमायूँ का स्वामिभक्त । अतः उसके अधीन गुजरात की शासन-व्यवस्था बिगड़ गई और यह प्रान्त मुग़लों के हाथों से निकल गया।

4. शेर खां के विरुद्ध संघर्ष में उसकी भूल- शेर खां के विरुद्ध अभियान में भी हुमायूँ ने अनेक भूलें कीं। उसने चुनार पर घेरा डालकर गौड़ खो दिया। फिर गौड़ की रंगीनियों में डूबकर आगरा जाने वाला मार्ग छिनवा बैठा। गौड़ की वापसी पर भी उसने सुरक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं किया। चौसा के मैदान में काफ़ी समय पड़ा रहना हुमायूं की भारी भूल थी। उसे शीघ्रातिशीघ्र आगरा पहुंचना चाहिए था। चौसा के मैदान में उसने पहरेदारी का काम एक विश्वासघाती को सौंप रखा था। शेर खां ने सोये हुए मुग़ल सैनिकों पर पौ फटने से पहले ही आक्रमण किया था। हुमायूं को इसकी कोई खबर तक न हुई। उसे तो स्वयं नदी में कूद कर अपनी जान बचानी पड़ी। हुमायूं की इन भूलों ने उसे भारत छोड़कर भागने के लिए विवश कर दिया।

प्रश्न 4.
“शेरशाह सूरी योग्यता तथा कूटनीति में अकबर का. अग्रगामी था।” कोई पांच तर्क देकर व्याख्या कीजिए।
अथवा
शेरशाह सूरी को अकबर का अग्रगामी कहना कहां तक उचित है ?
उत्तर-
शेरशाह तथा अकबर में वही सम्बन्ध था जो मार्गदर्शक तथा मार्ग पर चलने वालों में होता है। शेरशाह ने मार्ग तैयार किया। अकबर उस मार्ग पर चला भी और उसने वह मार्ग संवारा भी। निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जायेगा कि शेरशाह अकबर का अग्रगामी था :

1. उच्च राजकीय आदर्श-शेरशाह सूरी ने उच्च राजकीय आदर्श स्थापित किए। वह कभी भोग-विलास में अपना समय नष्ट नहीं करता था। जनता की भलाई के लिए वह कड़ा परिश्रम करता था। अकबर शेरशाह द्वारा दिखाई गई इसी राह पर चला।

2. प्रशासनिक विभाजन-शेरशाह ने शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए राज्य को ‘सरकारों’ तथा ‘परगनों’ में बाँटा हुआ था। अकबर ने भी शेरशाह के समय की प्रशासकीय इकाइयों तथा नागरिक संस्थाओं को अपनाया। अन्तर केवल दोनों के समय के अधिकारियों और प्रशासनिक इकाइयों के नामों में था।

3. भूमि-कर-प्रबन्ध-शेरशाह ने भूमि की पैमाइश करवाई, उपज को तीन श्रेणियों में बाँटा, एक-चौथाई भूमि-कर नियत किया तथा किसानों की सुविधा के लिए अनेक अन्य पग उठाये। अकबर ने भी शेरशाह की भूमि-प्रणाली को अपनाया, उसने भूमि को बाँसों के गजों से नपवाया और भूमि को चार भागों में बांटा। उसने किसानों को भी सुविधाएं प्रदान की।

4. धार्मिक सहनशीलता-धार्मिक सहनशीलता में भी शेरशाह सूरी ने अकबर का पथ-प्रदर्शन किया। शेरशाह पहला मुस्लिम शासक था जिसनें हिन्दुओं के प्रति उदारता दिखाई थी। अकबर ने तो क्षेत्र में एक नवीन आदर्श स्थापित किया। उसने हिन्दुओं से ‘जज़िया’ लेना बन्द कर दिया और उन्हें उच्च पदों पर भी नियुक्त किया।

5. सैनिक प्रबन्ध-सैनिक संगठन में भी शेरशाह सूरी अकबर का अग्रगामी था। अकबर ने शेरशाह की भान्ति स्थायी

6. मुद्रा-प्रणाली-शेरशाह ने मुद्रा-प्रणाली में प्रशासकीय सुधार किए। अकबर ने भी उसी द्वारा प्रचलित मुद्रा-प्रणाली को . अपनाया, परन्तु आवश्यकतानुसार उसका थोड़ा-सा रूप बदल दिया।

7. भवन-निर्माण कला-अकबर को भवन बनवाने का बड़ा चाव था, परन्तु इसकी प्रेरणा भी उसने शेरशाह सूरी से ही ली थी। शेरशाह ने सहसराम का मकबरा बनवाकर भवन-निर्माण में योगदान दिया था। अकबर ने भी अनेक सुन्दर भवन बनवाये। फतेहपुर सीकरी का बुलन्द दरवाज़ा, “जामा मस्जिद’, रानियों के महल तथा अन्य भवन उसने शेरशाह से प्रेरित होकर ही बनवाये थे।

8. प्रजा-हितार्थ कार्य-शेरशाह ने अनेक प्रजा-हितार्थ कार्य किये। उसने कई सड़कें बनवाईं। सड़कों के दोनों किनारों पर छायादार वृक्ष लगवाये और यात्रियों की सुविधा के लिए सरायों की व्यवस्था की। शेरशाह सूरी का अनुकरण करते हुए अकबर ने भी ये सभी प्रजा-हितार्थ कार्य किए। उसने कुछ सामाजिक सुधार भी किए।

9. सच तो यह है कि शेरशाह सूरी ने लगभग हर क्षेत्र में अकबर का मार्ग-दर्शन किया। डॉ० कानूनगो के शब्दों में, “शेरशाह ने अपने प्रशासकीय तथा आर्थिक सुधारों और सहनशील धार्मिक नीति द्वारा अकबर की महानता की नींव रखी।” (“Sher Shah laid the foundaitons of Akbar’s greatness by his administrative and economic reforms and the policy of religious toleration.”) अतः उसे अकबर का अग्रसर कहना उचित ही है।

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प्रश्न 5.
“अकबर ने सारे उत्तरी भारत को एकता के सूत्र में बांध दिया।” सिद्ध कीजिए।
अथवा
अकबर की
(क) उत्तरी भारत तथा
(ख) दक्षिणी भारत की विजयों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
अकबर एक महान् विजेता था। वह 1556 ई० में राजगद्दी पर बैठा। अल्प आयु होने के कारण बैरम खां ने उसका संरक्षण किया और उसके लिए अनेक प्रदेश विजय किए। उसने पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू को पराजित करके दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया। उसने मेवात को भी विजय किया। सिकन्दर सूरी की सेना ने उसके सामने आत्म-समर्पण कर दिया। तत्पश्चात् अकबर ने निम्नलिखित प्रदेश विजय किये :- .

(क) उत्तरी भारत की विजय-
1. मालवा की विजय-1560 ई० में अकबर ने मालवा पर विजय प्राप्त की और मालवा का प्रदेश पीर मुहम्मद को सौंप दिया गया। परन्तु पीर मुहम्मद शासन चलाने में असफल रहा और वहां के शासक बाज बहादुर ने मालवा को पुनः अपने अधिकार में ले लिया। 1562 ई० में अकबर ने उसके विरुद्ध एक बार फिर विशाल सेना भेजी। इस बार वह मालवा पर पूर्ण विजय प्राप्त करने में सफल रहा।

2. राजपूताना की विजय-1562 ई० में अकबर ने राजपूताना पर आक्रमण कर दिया। आमेर के राजा बिहारीमल ने शीघ्र ही अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अपनी बेटी का विवाह भी अकबर से कर दिया। इसके साथ कई अन्य राजपूत शासकों ने भी अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली, जैसे-कालिन्जर, मारवाड़, जैसलमेर, बीकानेर आदि।

3. मेवाड़ से संघर्ष-मेवाड़ का शासक अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं करना चाहता था। 1568 ई० में अकबर ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। परन्तु फिर भी महाराणा प्रताप ने उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की। वह अन्त तक मुग़लों से संघर्ष करता रहा।

4. गुजरात पर विजय-1572-73 ई० में अकबर ने गुजरात पर विजय प्राप्त कर ली।

5. बिहार-बंगाल की विजय-1574-76 ई० में अकबर ने अफ़गानों को पराजित करके बिहार और बंगाल पर विजय प्राप्त कर ली।

6. अन्य विजयें-अकबर ने धीरे-धीरे कश्मीर, सिन्ध, उड़ीसा, बिलोचिस्तान तथा कन्धार पर भी विजय प्राप्त कर ली।

(ख) दक्षिणी भारत की विजयें उत्तरी भारत में अपनी शक्ति संगठित कर अकबर ने दक्षिणी भारत की ओर ध्यान दिया। दक्षिण में उसने निम्नलिखित विजयें प्राप्त की :

  • बीजापुर तथा गोलकुण्डा की विजय-1591 ई० में अकबर ने बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर विजय प्राप्त कर ली।
  • खानदेश की विजय-1601 ई० में खानदेश के सुल्तान अली खां ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।
  • अहमदनगर पर अधिकार-1600 ई० में अकबर की सेनाओं ने अहमदनगर की संरक्षिका चांद बीबी को परास्त कर दिया तथा अहमदनगर पर विजय पा ली।
  • बरार पर अधिकार-अकबर ने दक्षिणी भारत के बरार प्रदेश पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार अकबर ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।

प्रश्न 6.
“शाहजहां के राज्यकाल को मुगल साम्राज्य का उत्कर्ष काल अथवा स्वर्ण युग कहा जाता है।” आप इस विचार से कहां तक सहमत हैं ?
अथवा
मुगलकालीन इतिहास को शाहजहां की क्या देन थी ? किन्हीं पांच देनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
शाहजहां महान् मुग़ल शासकों में से एक था। उसके राज्य को मुग़ल साम्राज्य का उत्कर्ष काल अथवा स्वर्ण युग कहा जाता है। शाहजहां के काल में देश में चारों ओर शान्ति और समृद्धि थी तथा कला के हर क्षेत्र में अतुलनीय प्रगति हो रही थी। हिन्दू और मुसलमानों में एकता थी तथा व्यपार और वाणिज्य ने काफ़ी उन्नति की। इन सभी बातों के कारण शाहजहां के काल को स्वर्ण युग कहा जाता है। इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस प्रकार है :-

1. पूर्ण शान्ति-शाहजहां के शासन काल मे सब ओर शान्ति का वातावरण था। राजपूत राज्य के शुभचिन्तक थे। उत्तरपश्चिम में कन्धार को छोड़कर शेष सम्पूर्ण मुग़ल साम्राज्य पूरी तरह सुरक्षित था। दक्षिण की ओर से अब कोई भय न था। इस काल में अहमदनगर भी मुग़ल साम्राज्य में मिल चुका था। पुर्तगालियों की शक्ति का भी पतन हो रहा था परंतु उनका स्थान किसी अन्य शक्तिशाली यूरोपीय जाति ने अभी नहीं लिया था। तात्पर्य यह कि शाहजहां के राज्य में पूर्ण सुख-शान्ति थी और देश आन्तरिक विद्रोहों तथा विदेशी आक्रमणों से पूरी तरह सुरक्षित था। .

2. अच्छी आर्थिक अवस्था तथा समृद्धि-देश में सुख और शान्ति बने रहने के कारण लोग अपने-अपने व्यवसायों में जुटे हुए थे। इस प्रकार उनकी आर्थिक दशा बहुत सुदृढ़ हो रही थी। राज्य प्रबन्ध अकबर के समय से ही बहुत अच्छा था।

3. भवन-निर्माण कला के क्षेत्र में उन्नति-शाहजहां का शासनकाल भवन-निर्माण कला के क्षेत्र में अनुपम उन्नति के लिए विशेषकर प्रसिद्ध है। उसने आगरा, दिल्ली और कई अन्य स्थानों पर सुन्दर भवनों का निर्माण करवाया। ताजमहल इस काल की एक अनूठी कृति थी। यह प्रसिद्ध मकबरा सम्राट ने अपनी प्यारी मलिका मुमताज महल की याद में बनवाया था और यह अब भी विश्व में दाम्पत्य-प्रेम और अनुराग का एक अद्वितीय स्मारक है। ताज के अतिरिक्त आगरा में स्थित मोती मस्जिद और दिल्ली में जामा मस्जिद तथा दीवाने खास शाहजहां के कुछ अन्य शानदार भवन हैं। सम्राट् ने लगभग एक करोड़ की लागत से प्रसिद्ध तख्ते-ताऊस का निर्माण भी करवाया।

4. अन्य ललित कलाओं का विकास-चित्रकला तथा संगीत कला को शाहजहां के काल में काफ़ी प्रोत्साहन मिला। उसके शासनकाल का सबसे प्रसिद्ध चित्रकार मुहम्मद नादिर समरकन्दी था। उसके दरबार के सर्वप्रसिद्ध संगीतकार थे जगन्नाथ, महापतेर, राम दास. और लाल खां जो तानसेन का जमाता था। शाहजहां के काल में साहित्य भी किसी अन्य कला से पीछे नहीं था। उसके दरबार में काज़बीकी, अब्दुल हमीद लाहौरी, पीर अबुल कासिम ईरानी, मिर्जा जयाबुद्दीन, शेख बहलोल कादरी आदि बड़े-बड़े विद्वान् थे। इन मुसलमान विद्वानों के अतिरिक्त इस काल में बहुत से हिन्दू विद्वान् भी थे, जैसे सुन्दरदास, चिन्तामणि, कवीन्द्राचार्य और जगन्नाथ।

5. सबके लिए एस समान न्याय-शाहजहां बड़ा न्यायप्रिय शासक था। न्याय करते समय वह बड़े-बड़े अधिकारियों को भी दोषी होने पर क्षमा नहीं करता था। उसके काल में दण्ड बड़े कठोर थे। इसलिए अपराध करने का किसी को साहस नहीं होता था।”

6. व्यापार और वाणिज्य में उन्नति-शाहजहां के काल में व्यापार तथा वाणिज्य ने काफ़ी उन्नति की। विदेशों के साथ भारत का व्यापार काफ़ी उन्नति पर था। परिणामस्वरूप बहुत-सा विदेशी धन भारत में आने लगा।

7. प्रजा हितार्थ कार्य-शाहजहां ने प्रजा की भलाई के लिए बहुत से तालाब, नहरें, सड़कें, पुल तथा सराएं आदि बनवाईं। उसने लाहौर के निकट के खेतों की सिंचाई के लिए एक लाख रुपए के व्यय से रावी नदी से एक बड़ी नहर निकलवाई और फिरोजशाह तुग़लक द्वारा बनवाई गई पश्चिमी यमुना नहर की मुरम्मत करवाई। शाहजहां के राजकीय इतिहासकार अब्दुल हमीद के अनुसार शाहजहां ने अकाल पीड़ितों की खुले दिल से सहायता की, मुफ्त लंगर खुलवाये और लोगों के लगान माफ कर दिए। इन सब बातों को देखते हुए हम कह सकते हैं कि शाहजहां का काल वास्तव में ही मुग़ल इतिहास का स्वर्ण युग था।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 12 मुग़ल साम्राज्य की स्थापना

प्रश्न 7.
औरंगजेब की राजपूत नीति तथा उसके परिणामों की व्याख्या कीजिए। उसकी यह नीति मुग़ल साम्राज्य के पतन के लिए कहां तक उत्तरदायी थी ?
अथवा
औरंगजेब ने राजपूतों के प्रति कैसी नीति अपनाई ? उसकी यह नीति मुगल साम्राज्य के लिए किस प्रकार घातक सिद्ध हुई ?
उत्तर-
औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसके हृदय में राजपूतों के लिए कोई प्रेम नहीं था। वह राजपूतों को अपने दरबार मे उच्च पद देने के पक्ष में नहीं था। परन्तु जब तक दो वीर राजपूत-सरदार मिर्जा राजा जयसिंह तथा जसवन्त सिंह राठौर-जीवित रहे, उसने राजूपतों के विरुद्ध कोई कठोर पग न उठाया। उनकी मृत्यु के पश्चात् औरंगजेब ने राजपूतों के प्रति दमन की नीति अपनाई। औरंगज़ेब की राजपूतों के प्रति ऐसी नीति और उसके परिणामों का वर्णन इस प्रकार है :-

जसवन्त सिंह की मृत्यु-जसवन्त सिंह राठौर मारवाड़ का शासक था। वह शाहजहां के राज्यकाल में मुग़ल दरबार का मनसबदार था। 10 दिसम्बर, 1678 ई० को जमरूद में जसवन्त सिंह का देहान्त हो गया। उसकी मृत्यु के पश्चात औरंगजेब के लिए मारवाड़ पर अधिकार करना सरल हो गया। औरंगज़ेब ने जसवन्त सिंह के सिंहासन पर नागौड़ के राजपूत सरदार इन्द्र सिंह को बिठाया। उसे 36 लाख रुपए दिए गए और वह अपने यहां मुसलमान अधिकारी रखने के लिए राजी हो गया। परन्तु शीघ्र ही औरंगज़ेब के इस कार्य का विरोध होने लगा।

अजीत सिंह तथा दुर्गादास-औरंगज़ेब जसवन्त सिंह के नवाजात शिशु अजीत सिंह को मारवाड़ का शासक स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। उसने अजीत सिंह को दिल्ली में ही कैद कर लिया। परन्तु दुर्गादास राठौर के प्रयत्नों से जसवन्त सिंह की दोनों रानियां और अजीत सिंह जोधपुर पहुंचने में सफल हुए।

मारवाड़ पर आक्रमण-मारवाड़ की जनता ने अजीत सिंह के पक्ष में विद्रोह कर दिया और इन्द्र सिंह को शासक मानने से इन्कार कर दिया। औरंगज़ेब ने अपने पुत्र अकबर को मेवाड़ पर अक्रमण करने का आदेश दिया। इस युद्ध में राजपूत पराजित हुए और इस प्रकार मारवाड़ फिर मुग़लों के अधिकार में आ गया। विवश होकर राजपूतों ने पर्वतों तथा वनों में आश्रय लिया और यहीं से उन्होंने गुरिल्ला युद्ध जारी रखा।

मेवाड़ तथा मारवाड़ का संगठन-मारवाड़ के पतन से मेवाड़ के राणा को बड़ा दुःख हुआ। उसने राठौरों और वीर सिसौदियों के साथ मुग़लों के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा स्थापित किया, परन्तु औरंगजेब की विशाल सेना के समक्ष यह संयुक्त मोर्चा विफल साबित हुआ। राजपूतों ने अब मुग़लों के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाई और काफ़ी सीमा तक सफल भी रहे।

अकबर का राजपूतों से गठजोड़ तथा विद्रोह-राजकुमार अकबर राजपूतों के सहयोग से दिल्ली का सिंहासन प्राप्त करना चाहता था। अतः उसने औरंगज़ेब के प्रति विद्रोह कर दिया। राजपूतों ने अकबर को हर सम्भव सहायता देने का वचन दिया। परन्तु यह मित्रता ज्यादा दिनों तक नहीं चली। औरंगज़ेब राजपूतों और अकबर के मध्य फूट डालने में सफल रहा।

उदयपुर की सन्धि-24 जून, 1681 ई० को औरंगज़ेब और मेवाड़ के राणा जयसिंह के बीच एक सन्धि हुई। इस सन्धि के अनुसार राजपूतों ने मुग़ल साम्राज्य के विरुद्ध कोई भी सहायता न करने का वचन दिया। जयसिंह को मेवाड़ का महाराणा मान लिया गया। उसे पांच हज़ारी मनसबदार भी नियुक्त किया गया।

उदयपुर की सन्धि के बाद भी राजपूतों ने मुग़लों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। पहले दुर्गादास और फिर अजीत सिंह के नेतृत्व में उनका संघर्ष चलता रहा। 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् अजीत सिंह ने जोधपुर के मुग़ल सूबेदार को मार भगाया और स्वयं मारवाड़ का स्वतन्त्र शासक बना।

राजपूत नीति के परिणाम-

  1. राजभक्त राजपूत मुग़लों के शत्रु बन गए। उनकी शत्रुता मुग़ल साम्राज्य के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई।
  2. राजस्थान की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। वहां की अव्यवस्था से पड़ोसी मुग़ल प्रदेश में अराजकता फैल गई।
  3. राजपूतों की मित्रता से वंचित होने के कारण सम्राट को अन्य अभियानों में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
  4. साम्राज्य को जन और धन की अपार हानि उठानी पड़ी।
  5. शाही प्रतिष्ठा को भारी ठेस लगी। राजपूतों के आकस्मिक हमलों ने मुग़ल साम्राज्य की जड़ें खोखली करने का कार्य किया।

सच तो यह है कि औरंगजेब की राजपूत नीति महान् राजनीतिक आदर्शों से प्रेरित न थी। उनका सहयोग प्राप्त करके मुग़ल साम्राज्य को सुदृढ़ करने के स्थान पर उसने राजपूतों को अपना शत्रु बना लिया। राजपूतों की मित्रता के कारण मुग़ल साम्राज्य सशक्त बना था और उनकी शत्रुता के कारण मुग़ल साम्राज्य पतन की ओर अग्रसर हुआ।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 12 मुग़ल साम्राज्य की स्थापना

प्रश्न 8.
शेरशाह सूरी के शासन-प्रबन्ध अथवा प्रशासनिक सुधारों का वर्णन करो।
अथवा
शेरशाह सूरी एक योग्य एवं प्रजाहितकारी शासक था ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
शेरशाह एक योग्य शासक था। उसने केवल पांच वर्ष राज्य किया। इतने कम समय में उसने इतना अच्छा राज्य प्रबन्ध किया कि इतिहास में उसका नाम अमर हो गया। उसके शासन-प्रबन्ध की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है :-

1. केन्द्रीय शासन-केन्द्रीय शासन का मुखिया शेरशाह स्वयं था। सारे काम उसकी आज्ञा से होते थे। उसकी सहायता के लिए अनेक मन्त्री भी थे। वह लोगों की भलाई का ध्यान रखता था। वह राज्य का भ्रमण करके लोगों की शिकायतें सुनता था। प्रजा उससे बड़ी प्रसन्न थी।

2. प्रान्तीय शासन-शेरशाह ने अपने राज्य को अनेक प्रान्तों में बांटा हुआ था। प्रान्तों को सरकारों अथवा ज़िलों में विभक्त किया गया था। प्रत्येक सरकार परगनों में बंटी हुई थी। शासन की इन इकाइयों में शेरशाह ने बड़े योग्य अधिकारी नियुक्त किए हुए थे। गांव के प्रबन्ध के लिए पंचायतें थीं।
PSEB 11th Class History Solutions Chapter 12 मुग़ल साम्राज्य की स्थापना 1

3. भूमि प्रबन्ध-शेरशाह ने सारे राज्य की भूमि की पैमाइश करवाई और उपज के आधार पर इसे तीन भागों में . बांटा-उत्तम, मध्यम तथा निम्न। उपज के आधार पर ही भूमिकर नियत किया गया जो उपज का एक-तिहाई भाग होता था।

4. कृषकों से अच्छा व्यवहार-शेरशाह सदा कृषकों की भलाई का ध्यान रखता था। उन्हें अकाल के दिनों में ऋण दिया जाता था। शेरशाह ने अपने सैनिकों को चेतावनी दी हुई थी कि वे चलते समय किसी कृषक की फसल को हानि न पहुँचाएं।

5. पुलिस-जनता के धन-माल तथा जीवन की रक्षा के लिए शेरशाह सूरी ने पुलिस की उत्तम-व्यवस्था की। अंपराधों के लिए स्थानीय अधिकारी स्वयं ज़िम्मेदार होते थे।

6. गुप्तचर विभाग-शेरशाह ने देश में गुप्तचर विभाग स्थापित किया। गुप्तचर राजा को सभी घटनाओं से सूचित करते रहते थे।

7. न्याय-शेरशाह एक प्रसिद्ध सम्राट् था। न्याय करते समय छोटे-बड़े या अमीर-ग़रीब का भेदभाव नहीं रखा जाता था। उसके दण्ड बड़े कठोर थे। दण्ड देते समय वह अपने सरदारों और निकट सम्बन्धियों को भी नहीं छोड़ता था।

8. सड़कों का निर्माण तथा डाक व्यवस्था-शेरशाह सूरी ने पुरानी सड़कों की मुरम्मत करवाई और नई सड़कों का निर्माण करवाया। उसकी बनवाई हुई सड़कों में से पहली सड़क पेशावर से सुनार गांव तक जाती है। दूसरी आगरा से बुरहानपुर तक जाती थी। तीसरी सड़क आगरा से जोधपुर तक और चौथी सड़क लाहौर से मुल्तान तक चली गई थी। शेरशाह सूरी ने डाक लाने और ले जाने के लिए सड़कों पर डाक चौकियों की स्थापना भी की।

9. प्रजा की भलाई के कार्य-शेरशाह सूरी ने प्रजा की भलाई के लिए अनेक कार्य किए। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए कुएँ खुदवाए और सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाये। रात को ठहरने के लिए थोड़-थोड़ी दूरी पर सराएं भी बनवाई गईं।

सच तो यह है कि शेरशाह सूरी एक महान् शासन-प्रबन्धक था। उसके शासन-प्रबन्ध की प्रशंसा करते हुए कीन ने ठीक ही कहा है, “किसी भी सरकार ने, यहां तक कि अंग्रेजी सरकार ने भी, इस पठान, (शेरशाह) जैसी योग्यता नहीं दिखाई।”

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 शारीरिक रचना और क्रिया विज्ञान का परिचय

Punjab State Board PSEB 11th Class Physical Education Book Solutions Chapter 3 शारीरिक रचना और क्रिया विज्ञान का परिचय Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Physical Education Chapter 3 शारीरिक रचना और क्रिया विज्ञान का परिचय

PSEB 11th Class Physical Education Guide शारीरिक रचना और क्रिया विज्ञान का परिचय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
रिक्त स्थान भरो : (Fill in the blanks)

  1. मानवीय शरीर एक ……………….. मशीन है।
  2. मानवीय शरीर के भिन्न-भिन्न अंग मिलकर शरीर की को चलाते हैं।

उत्तर-

  1. उलझी
  2. क्रिया प्रणाली।

प्रश्न 2.
कोशिका क्या है ? (What is cell ?)
उत्तर-
कोशिका (Cell) कोशिका अंगों का जन्म मानवीय कोशिका (सैल) के पैदा होने के साथ हुआ है।
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यह मानवीय जीवन की प्राथमिक इकाई होती है। इन्हें नंगी आँख के साथ नहीं देखा जा सकता। इनका काम अपने :अन्दर भोजन को एकत्रित करके रखना है और भोजन के ऑक्सीकरण द्वारा ऊर्जा पैदा करना होता है।
सैल के प्रकार (Types of Cell)—सैल दो प्रकार के होते हैं-यूकेरेओटिक तथा प्रकोरीओटिक। यूकेरेओटिक सैल पौधों, जानवरों तथा मनुष्यों में पाया जाता है।
यूकेरेओटिक सैलों के आधारभूत ढांचों में डी०एन०ए० (DNA) रिबोसोम, एंडोप्लास्मिक रैटीक्यूलम, गॉलजी उपकरण, साइटोस्केलेटन, माईटोकॉड्रिया, सैंटीअलाइज़, लाइसोम, प्लाज्मा झिल्ली और साइटोप्लाज्म आदि शामिल होते हैं। ।
सैल की बनावट तथा फंक्शन चार्ट
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PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 शारीरिक रचना और क्रिया विज्ञान का परिचय 3
Fig. Different types of cells

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प्रश्न 3.
हड्डियाँ क्या हैं ? इनकी किस्मों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखें। (What are the bones ? Write in detail about their types.)
उत्तर-
“हड्डियां” (Bones)-मनुष्य के शरीर की रचना अनगिनत कोशिकाओं (Cells) से बनी हुई है। मनुष्य शरीर के अंग भिन्न-भिन्न किस्म की कोशिकाओं से बने हुए हैं जो अलग-अलग तरह के काम में लगे हुए हैं। शरीर के सारे अंग चमड़ी द्वारा ढके हुए हैं। चमड़ी शरीर के अंगों की रक्षा करती है। यदि शरीर में किसी भाग को ज़ोर से दबाकर देखा जाए तो हमें कुछ चीज़ महसूस होगी। ये सख्ती हड्डियों के कारण होती है। हड्डियां कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों के मिलाप से बनती हैं। ये संवेदनशील अंगों की रक्षा करती हैं। हमारे शरीर में 206 हड्डियां होती हैं।

हड्डी की कड़क एवं रचना (Stiffiness and Construction of Bones)-शरीर के लगभग सारे अंगों में हड्डियां होती हैं। ये हड्डियां कई प्रकार की मज़बूत और कठोर कोशिकाओं से बनी होती हैं। हड्डियों में कड़क कुछ विशेष प्रकार के लक्षणों के कारण होती है। इनमें प्रमुख लक्षण कैल्शियम कारबोनेट, मैग्नीशियम फास्फेट और कैल्शियम फास्फेट की बड़ी हड्डियों के साथ-साथ छोटी-छोटी हड्डियां होती हैं जो इन तत्त्वों से ही बनी होती हैं।

मनुष्य का अस्थि पिंजर (Human Skeleton)-शरीर के अन्दर मिलने वाली बड़ी और छोटी हड्डियां मिलकर एक पिंजर की रचना करती हैं। ये पिंजर की भिन्न-भिन्न हड्डियां जब मिलकर शरीर के लिए काम करती हैं तो इसको हम मानवीय अस्थि पिंजर (Human Skeleton) कहते हैं।
मानवीय अस्थि पिंजर के कार्य (Functions of Human Skeleton)—

  1. मनुष्य अस्थि पिंजर शरीर को एक विशेष प्रकार की शक्ल देता है।
  2. ये शरीर को सीधा रखता है।
  3. पेशी प्रबन्ध और अन्य अंगों को सहारा देता है और उसके साथ मिलकर शरीर के अलग-अलग अंगों को हिलने और चलने-फिरने की शक्ति देता है।
  4. मनुष्य पिंजर में स्थान-स्थान पर उत्तोलक (Levers) बनते हैं।
  5. पिंजर का कुछ भाग जैसे पसलियां (Ribs) और सीना हड्डी (Sternum) की खास क्रिया सहायक होता है।
  6. अनियमित हड्डियां (Irregular Bones)-जैसे रीढ़ की हड्डियां।

हड्डियों का वर्गीकरण (Different Types of Bones)—

  1. लम्बी हड्डियां-ये अपने आकार में लम्बी होती हैं। ये लम्बी सॉफ्ट से मिलकर बनती हैं जिसके दो सिरे होते हैं। ये आमतौर पर सघन होती हैं, परंतु हड्डी के अंत में ये गुद्देदार होती हैं । टांग (फीमर), बाजू (ह्यूमर्स) आदि लम्बी हड्डियों की उदाहरण हैं।
  2. छोटी हड्डियां-ये आमतौर पर लम्बकारी, चपटी और आकार में छोटी हड्डियां होती हैं। ये ज्यादातर स्पंजी हड्डियां हैं जो कि सघन हड्डी की पतली परत के साथ ढकी होती हैं। छोटी हड्डियों में कलाई तथा ऐड़ी की हड्डियां शामिल होती हैं।
  3. चपटी हड्डियां-पतली, स्टीपांड और आमतौर पर समतल होती हैं; जैसे-खोपड़ी तथा कुछ चेहरे की हड्डियां।
  4. अनियमित हड्डियां-हड्डियां जो कि उपरोक्त तीनों श्रेणियों में नहीं आती, वह मुख्य तौर पर खोखली हड्डियां होती हैं। ये आमतौर पर स्पंजी हड्डियां होती हैं जो कि कॉमपैक्ट हड्डी की पतली परत के साथ ढकी होती हैं। रीढ़ की हड्डी तथा कुछ खोपड़ी की हड्डियां इसी की उदाहरण हैं।
  5. तिल रूप की हड्डियां-ये हड्डियां जोड़ों को पकड़ने में सहायक होती हैं। ये बीज के आकार की होती हैं। ये जोड़ों के नज़दीक मांस-पेशियों में पाई जाती हैं।

अस्थि पिंजर की कुल हड्डियों की गिनती
(Total Number of Bones in Human Skelton)

हड्डियां कुल गिनती
खोपड़ी और चेहरे की हड्डियां 22
धड़ की हड्डियां 33
पसलियों की हड्डियां 24
छाती की हड्डी 01
कॉलर की हड्डियां 02
कंधे की हड्डियां 02
बाजुओं की हड्डियां 60
टांगों की हड्डियां 62
कुल हड्डियां 206

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Fig. Different Types of Bones

मानव हड्डियों का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है :—
खोपड़ी की हड्डियां (Bones of the Skull)-खोपड़ी की हड्डियों में दिमाग घर की हड्डियां (Bones of the craniãUm) और चेहरे की हड्डियां (Bones of the face) शामिल हैं। ये कुल 22 हड्डियां हैं। 8 हड्डियां दिमाग घर और 14 चेहरे की हैं।
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Fig. Bones of the Skull

दिमाग घर की हड्डियां (Bones at the skull)-दिमाग घर की हड्डियां इस प्रकार हैं—

  1. माथे की हड्डी या ललाट हड्डी (Fronta-1 Bone)—ये हड्डी सामने माथे और ऊपरी भाग का निर्माण करती
  2. मोति अस्थि या टोकरी की हड्डियां (Parietal Bones)—ये हड्डियां गिनती में 2 हैं। ये खोपड़ी को दो बराबर भागों में बांटती हैं। इस प्रकार ये दाएं-बाएं और बाएं-दाएं का निर्माण करती हैं।
  3. कनपटी की हड्डियां (Temporal Bones)—ये गिनती में 2 हैं। ये दाएं कनपटी और बाईं कनपटी की बनाक्ट करती हैं।
  4. पंचर हड्डी (Sphenoid Bone)-इस हड्डी द्वारा खोपड़ी के आधार (Base) का निर्माण होता है। इसकी शक्ल चमगादड़ (Bat) या खुले हुए पंख जैसी होती है। कनपटी की हड्डियों और पिछली कपाल अस्थि (Dicipital Bones) में मिलती है।
  5. पिछली कपाल अस्थि (Occipital Bones)-ये हड्डी सिर के पिछले भाग का निर्माण करती है।
  6. छानगी हड्डी (Ethnoid Bone)-ये हड्डी नाक की छत का निर्माण करती है। ये पंचर हड्डी के आगे होती है। ये कनपटी को दो बराबर भागों में बांटती है। यह सामने की तरफ की ललाट हड्डी Frontal Bones से मिलती है।

चेहरे की हड्डियां (Bones of the face) चेहरे की कुल 14 हड्डियां हैं। ये इस प्रकार हैं—

  1. ऊपरी जबड़े की दो हड्डियां (Superior Maxillary Bones)
  2. निचले जबड़े की हड्डी (Inferior Maxillary Bones)
  3. तालू की दो हड्डियां (Palate Bones)
  4. नाक की हड्डियां (Nasal Bones)
  5. गोल की दो हड्डियां (Molar Bones)
  6. सीप आकार की दो हड्डियां (Spongy Bones)
  7. अश्रु की हड्डियां (Lachrymal bones) ये छोटी-छोटी दो हड्डियां हैं जो आंखों के रगेल का अगला भाग बनाती हैं।
  8. नाक के पर्दे वाली हड्डी (Vomer bone) एक ऐसी हड्डी है जो नाक के पर्दे का निर्माण करती है।

धड़ की हड्डियां (Bones of the Trunk)-मानवीय शरीर के गर्दन से लेकर कमर तक के भाग को धड़ (Trunk) कहते हैं। डायाफ्राम (Diaphragm) इस भाग के आधे में होता है जो उसको दो भागों में बांटता है। सामने की ओर सीना हड्डी (Breast Bones Sternum) और पिछले भाग में रीढ़ की हड्डी है। इन दोनों तरह की हड्डियों से पसली की हड्डियां जुड़ी होती हैं। इन सब हड्डियों को हम धड़ की हड्डियां (Bones of the Trunk) कहते हैं।

हम ऐसे भी कह सकते हैं कि धड़ की हड्डियों में रीढ़ की हड्डी पसलियां, कंधे की हड्डी, डायाफ्राम और गुर्दे की हड्डियां हैं। इन सबका बारी-बारी वर्णन निम्नलिखित है—

रीढ़ की हड्डी (Vertebral Column)-रीढ़ की हड्डी को मानवीय शरीर का आधार कहा जाता है। ये गर्दन से शुरू होकर मल-मूत्र के निकास स्थान तक जाती है। आदमी के शरीर में इसकी लम्बाई 70 सैंटीमीटर और औरतों के शरीर में 60 सैंटीमीटर होती है। इस बीच 33 मोहरे या मनके (Vertebral) हैं। इन 33 मनकों के संग्रह को हम रीढ़ की हड्डी (Vertebral Column) कहते हैं। रीढ़ की हड्डी का बीच का भाग खोखला होता है। ये मोहरे की नली (Neural Canal) का निर्माण करती है। इस बीच सुषम्ना नाड़ी (Spinal Cord) निकलती है।
रीढ़ की हड्डी के भाग (Parts of Vertebral Column)-रीढ़ की हड्डी को हम निम्नलिखित पांच प्रमुख भागों में बांट सकते हैं—

1. गर्दन के मनके (Cervical Vertebrae)-पहले सात मनकों को हम गर्दनी मनके कहते हैं। ये कंधे के ऊपर होते हैं। सब से पहले मनके को सिर का आधार स्थान (Atlas) कहते हैं। ये सिर को सहारा देता है। दूसरे गर्दन के मनके को (Axis) कहते हैं। पहले दोनों मनकों की बनावट शेष मनकों से अलग है।

2. पीठ के मनके (Dorsal Vertebrae)-ये 12 मनकों का समूह है। इन मनकों के आगे पसलियां होती हैं। ये सब मनके सामने की पसलियों के साथ और पीछे पीठ की रीढ़ की हड्डी से जुड़े होते हैं।

3. कमर के मनके (Lumber vertebrae)-ये पांच मनके होते हैं जो कमर का निर्माण करते हैं। इसकी कुल लम्बाई 18 सैंटीमीटर होती है। ये हिलने वाले मनके होते हैं। सबसे नीचे वाला मनका कीमत की या तिडागी की . हड्डी (Sacrum) ऊपर टिका होता है।
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4. तिलम की या तिड़ागी हड्डी (Sacrum)—इस बीच पांच मनके होते हैं जो मिलकर एक तिकोणी हड्डी का निर्माण करते हैं, जो मुलेह के ऊपरी और पिछले भाग में स्थित हैं। ये कूल्हे के बीच दोनों हड्डियों के बीच एक पंचर की तरह होती है।

5. हड्डियां (Bones)-ये रीढ़ की हड्डी का सबसे निचला भाग है। ये चार मनकों का संग्रह है। छाती की हड्डी (Stornum)-ये लगभग 6-7 इंच लम्बी होती है। इसका ऊपरी भाग चौड़ा और नीचे वाला भाग पतला होता है। इसके ऊपरी भाग या चौड़े भाग में गर्दनी मनके (Cervical vertabrae) दोनों ओर जुड़े होते हैं। ये गर्दनी मनके ऊपर और नीचे (Cortal Cartilages) द्वारा पड़ती है।

पसलियां (Ribs)-छाती की हड्डी के दोनों ओर 12-12 पसलियां होती हैं। इनका अगला भाग Cortal Cartilages द्वारा छाती की हड्डी में जुड़ता है। पहली सात पसलियां छाती की हड़ी से अलग-अलग रूप में जुड़ जाती हैं। आठवीं, नौवीं और दसवीं पसलियां छाती की हड्डी के साथ जुड़ने से पहले ही सातवीं पसली में जुड़ जाती हैं। आखरी दो पसलियां स्वतन्त्र हैं। इनको उड़ती या तैरती VERTEBRAL FLOATING पसलियां (Floating Ribs) भी कहा जाता है। ये सब पसलियां मिलकर एक पिंजर का निर्माण करती हैं। ये पिंजर दिल और फेफड़ों की रक्षा करता है। पसलियों के बीच के स्थान में मांसपेशियां होती हैं। ये मांसपेशियां श्वास लेने से फैलती या सिकुड़ती हैं जिस कारण ये पिंजर ऊपर नीचे उठता बैठता रहता है।
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भुजाओं की हड्डियां (Bones of the upper limbs)-भुजाओं की हड्डियों की गिनती 64 है। भुजाओं की गिनती 2 है। इस तरह प्रत्येक भुजा में 32 हड्डियां हैं। भुजाओं की हड्डियों में कंधे व हाथों की हड्डियां शामिल हैं। आइए इन हड्डियों का अलग-अलग तौर पर वर्णन करें—

(क) कंधे की हड्डियां (Bones of the shoulders)-कन्धे की हड्डियों में दो प्रमुख हड्डियां हैं—
1. हंसली हड्डियां या छाती की हड्डियां (Clavicles or Collar Bones)

(ख) मौर की हड्डी (Scapula)-इनका विस्तार से वर्णन नीचे किया गया है—
1. हंसली हड्डी या मौर की हड्डी (Clavicles or Collar Bones)-हंसली हड्डी की शक्ल अंग्रेजी के अक्षर S की तरह होती है। यह छाती के ऊपरी भाग में अगली तरफ स्थित होती है। यह एक तरफ छाती की हड्डी के सिरे के साथ व दूसरी तरफ कंधे की हड्डी के साथ जुड़ी होती है। दूसरा मुख्य काम कंधे की हड्डी को अपनी जगह पर स्थिर रखना है। छाती की हड्डी से जुड़े हुए हिस्से को छाती का बाहरी तल (External surface) व मौर की हड्डी के साथ जुड़ने वाले हिस्से को अर्सकुट तल (Acrominal surface) कहते हैं।
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Fig. Clavicles or Collar Bones
मौर की हड्डी (Scapula)—यह चौड़ी व तिकोने आकार की होती है। यह पीठ के ऊपरी भाग में होती है। इसके ऊपर वाले बाहरी कोण पर एक चिकना अंडे की तरह का गड्ढा होता है। इसमें डौले की हड्डी ठीक तरह बैठती है।
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बाजू की हड्डी (Bones of upper Arms)-बाजू की हड्डियों का वर्णन नीचे किया गया है—
डौले की हड्डी (Humerus)-डौले की एक लम्बी हड्डी होती है। इसका ऊपरी भाग गोल होता है जो कि कंधे की हड्डी में ठीक बैठता है। इसका निचला भाग बीणी व दोनों हड्डियों से मिल कर कुहनी के जोड़ (Elbow Joint) का निर्माण करती है।
बाज के अगले भाग की हड़ियां (Bones of for Arms)

1. छोटी वीण-हड्डी रेडियस (Radius)-यह बाजू के अगले भाग में अंगठे की तरफ एक बड़ी हड्डी है। इस हड्डी का ऊपरी सिरा गोल होता है। यह दोनों की हड्डी के साथ जुड़ा होता है। इसका नीचे का भाग हाथ के पास हड्डियों से जुड़ा होता है।

2. बड़ी वीण हड्डी (UIna)—यह बाजू के बीच में होता है। यह रेडियस या छोटी वीण हड्डी से कुछ बड़ी होती है। इसके तीन भाग होते हैं—
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(1) ऊपरी
(2) बीच वाला
(3) नीचे वाला
यह डौले की हड्डी के साथ कुहनी के जोड़ के द्वारा मिलती है। इसके
ऊपरी सिरे पर एक हड्डी बाहर को निकली रहती है। जिस के साथ कुहनी पर नोकदार उभार (Obsecranon) वाला है। जिसका निचला सिरा छोटा व गोल होता है, जोकि हाथ के पास हड्डियों से मिलता है।

3. कलाई की हड्डियां (Carpal Bones)—यह छोटी-छोटी 8 हड्डियां हैं जो कि चार-चार की दो लाइनों में स्थित हैं। यह इनके द्वारा जुड़ कर अपने स्थान पर ठीक तरह कायम रहती हैं। यह हड्डी के ऊपरी भाग बड़ी वीण हड्डी व निचली तरफ हथेली हड्डी के साथ जुड़ी होती है।

4. हथेली की हड्डियां (Metacarpal bones)–हथेली की पांच छोटी व पांच बड़ी हड्डियां हैं। ये एक तरफ उंगलियों की हड्डियों से जुड़ी होती हैं।

5. उंगलियों की हड्डियां (Bones of the fingers or Phalanges)-उंगलियों में कुल 14 हड्डियां हैं। प्रत्येक उंगली में तीन-तीन व अंगूठे में दो हड्डियां होती हैं। ये हड्डियां छोटी व मज़बूत होती हैं। हथेली की तरफ प्रत्येक हड्डी हथेली की हड्डियों से जुड़ी होती है। यह अंगुली के भीतर उंगली हड्डी जोड़ का निर्माण करती है।

टांग की हड्डियां (Bones of leg)-टांग की हड्डियों का वर्णन निम्नलिखित किया गया है—
1. हिप की हड्डी (The Hip Bone)-इस हड्डी की शक्ल बेढंगी सी होती है। ये काफ़ी बड़ी होती है। ये ऊपर और नीचे फैली हुई होती है और बीच से पतली होती है। ये हड्डी अगले तरफ दूसरे तरफ की साथी हड्डी से जुड़ती है। ये दोनों हड्डियां हड्डी Loccyx और तिड़ागी हड्डी (Sacrum) से मिलकर, पेडू गर्लड (Pelvic Girdle) का निर्माण करती है। हिप की हड्डी के नीचे लिखे तीन प्रमुख भाग हैं—

  1. पेडू अस्थि (Illum)-ये कूल्हे का ऊपरी चौड़ा भाग है।
  2. आसन अस्थि (Ischenum)—ये कूल्हे का निचला भाग है।
  3. पिऊबिस (Pubis)—ये कूल्हे का निचला भाग है।

ये तीन भाग बच्चों में उप-अस्थि से जुड़े होते हैं परन्तु आयु के बढ़ने के साथ जवानी तक ये हड्डी द्वारा जुड़ जाते हैं। कूल्हे के ये तीन भाग ही हड्डी से मिलकर एक प्याले या टोपी की शक्ल का निर्माण करते हैं। इस प्याले को एसीटैनबुलम (Acetabulum) कहते हैं। इस बीच जांघ की हड्डी (Femur) का गोल सिरा घूमता है। पेडू-अस्थि Pelvis की शक्ल एक बर्तन की तरह होती है जिसको निचली टांगें सहारा देकर रखती हैं। यह बर्तन पेट के कोमल अंगों की रक्षा करता है।
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2. जांघ की हड्डी (The Femur)-हमारे शरीर की जांघ की हड्डी सबसे लम्बी हड्डी है। यह शरीर की सभी … हड्डियों से शक्तिशाली होती है। यह डोलों की हड्डी की तरह होती है। इस का नीचे वाला भाग चौड़ा होता है व यह पिंडी की टिबिया (Tibia) हड्डी के साथ जोड़ का निर्माण करती है। इसके ऊपरी भाग पर गोल आकार की एक टोपी या प्याले जैसे होती है जो कि ऐसीटेबुलम (Acetabulum) में फंस कर चूल्हे के जोड़ का निर्माण करती है।
3. पिंजनी अस्थि या टिबिया (The Tibia)—यह टांग की दोनों हड्डियों से मोटी व बलशाली होती है। यह शरीर में लम्बाई व ताकत में जांच की हड्डी के बाद दूसरे नम्बर पर है। इसका रूप कुछ चपटा होता है। इस के दो सिरे उभरे होते हैं—

  1. ऊपरी भाग (Upper end)—यह मोटा होता है। इसका रूप कुछ चपट होता है।
  2. नीचे वाला भाग (Lower end) यह नीचे पैर के पास हड्डियों के साथ मिलता है। इसकी शाफ्ट (Shaft) तिकोनी होती है।

4. बाहरी पिंजनी अस्थि (The Fibula)—यह आकार में पिंजनी अस्थि (Tibia) से पतली है। यह पिंजनी वाली तरफ स्थित होती है। यह शरीर का सारा भार उठाती है। इस के नीचे लिखे मुख्य भाग हैं—
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1. ऊपरी
2. मध्य वाला
3. नीचे वाला

इसका ऊपरी व नीचे वाला भाग दोनों ही मजबूती के साथ जुड़े होते हैं। इस कारण यह पिंजनी अस्थि टिबिया के आसपास नहीं घूम सकती। यह टिबिया के बिल्कुल समानान्तर होती है। पिंजनी अस्थि (Tibia) व बाहरी पिंजनी अस्थि (Fibula) दोनों मिल कर नीचे के जोड़ का निर्माण करती हैं।

5. घुटने की हड्डी (Knee Cap or Patella)यह तिकोने आकार की हड्डी होती है। यह चौदह मज़बूत तंतुओं द्वारा स्थित रहती है। यह घुटने के जोड़ के ऊपर होती है व जोड़ की रक्षा करती है।
6. पैर की हड्डियां (Bones of the foot)-पैर की हड़ियां मुख्य रूप में नीचे लिखे तीन तरह की होती हैं—
(i) टखने की हड्डियां
(ii) पंजे की हड्डियां
(ii) उंगलियों की हड्डियां

  1. टखने की हड्डियां (Ankle Bones or Tarsal Bones) ये संख्या में सात हैं। ये छोटी-छोटी हड्डियां होती हैं। ये पैर के पिछले आधे भाग यानि एड़ी रखने व पैर का निर्माण करती हैं। ये हड्डियां कलाई की हड्डी से मोटी व मज़बूत होती हैं। ये शरीर का सारा भार बांट कर उठाती हैं। ये भी कलाई की हड्डियों की तरह दो लाइनों में होती हैं।
  2. पंजे की हड्डियां (In-stepbones, Meta Carpal Bones)—इनकी संख्या भी पांच है। यह आकार में पतली व लम्बी होती हैं। ये अगली तरफ उंगलियों व पिछली तरफ टखने की हड्डियों से जुड़ी होती हैं।
  3. उंगलियों की हड्डियां (The Phalenges of the foot or toes) हाथों की उंगलियों की हड्डियों की तरह पैर की उंगलियों की हड्डियों की संख्या में व बनावट में मिलती-जुलती हैं। अंगूठे में दो व प्रत्येक उंगली में तीनतीन हड्डियां होती हैं। यह हाथ की उंगलियों की हड्डियों के मुकाबले में लम्बाई में छोटी होती हैं।

पैरों को शरीर का सारा भार उठाना पड़ता है। इस कारण पैरों की हड्डियों की तरफ़ से ही भारी, चपटी व मजबूत होती है। पैरों में एक खाली स्थान (ARCH) होता है, जो मनुष्य को चलने में मदद करता है।

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प्रश्न 4.
जोड़ क्या हैं ? इनकी किस्में लिखें। किसी एक जोड़ की पूरी जानकारी दीजिए। (What are joints ? Names their types and explain any one type in detail.)
उत्तर-
परिभाषा (Definition)-प्रत्येक वह जगह जहां की दो या दो से अधिक हड्डियों से सिरे मिलते हैं, उनको जोड़ (Joints) कहते हैं।
जोड़ों की बनावट (Structure of Joints)-लम्बी हड्डियां अपने सिरों, बेडौल हड्डियां अपने तलों के कुछ हिस्सों व चपटी हड़ियां अपने किनारों के साथ जोड़ों का निर्माण करती हैं।
जोड़ मानव पिंजर (Human skeleton) को लचक देते हैं। आम तौर पर जोड़ों के तल हड्डियों के शाफ्टों से मोटे होते हैं।
जोड़ों की किस्में या श्रेणियों में बांट (Kinds, Types, Classification of Joints)—जोड़ों के कार्य और इनकी बनावट के आधार पर हम इनको निम्नलिखित मुख्य श्रेणियों में बांट सकते हैं—

  1. रिसावदार अथवा सिनोवीयल (Synovial) जोड़।
  2. रेशेदार जोड़।
  3. उप-अस्थि जोड़।

जोड़ों की इन श्रेणियों का संक्षिप्त वर्णन नीचे किया गया है—
1. रिसावदार अथवा सिनोवीयल जोड़ (Synovial Joints)-शरीर में इस प्रकार के काफ़ी जोड़ हैं, जैसे कि टांगों और भुजाओं के जोड़। इन जोड़ों के अन्दर बहुत ही मुलायम सिनोवीयल (Synovial) झिल्ली होती है। इस प्रकार के जोड़ों में रक्त की नाड़ियां (Blood Vessels) और लसीका वाहनियों (Lymphatic Vessels) का बहुत प्रसार होता है। यह जोड़ों के ठीक प्रकार से कार्य करने के लिए आवश्यक हैं। ये जोड़ शेष दो प्रकार के जोड़ों से काफ़ी अलग प्रकार के हैं।
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Fig. Synovial Joint
Fig. Section of Synovial Joint
रिसावदार जोड़ों की किस्में (Classification of Synovial Joints)-गति के आधार पर रिसावदार जोड़ों को हम निम्नलिखित मुख्य भागों में बांट सकते हैं—

1. कब्जेदार जोड़ (Hinged Joints)-इन जोड़ों में विरोधी तल इस प्रकार लगे होते हैं कि गति केवल एक ओर ही हो सकती है। इस प्रकार के जोड़ों की हड्डियां बहुत ही सुदृढ़ उप-अस्थियों के साथ बन्धी हुई हैं, जैसे-टखनों और उंगलियों के जोड़।

2. घूमने वाले जोड़ (Pivot Joints)—इस प्रकार को जोड़ों की गति चक्र में होती है। इस प्रकार के जोड़ में एक हड्डी छल्ला बनाती है और दूसरी इसमें एक धुरी की भांति फंसी हुई होती है। यह छल्ला एक सख़्त हड्डी और उपअस्थि का बना होता है। इसी प्रकार के जोड़ का निर्माण एटलस (Atlas) और एक्सिस (Axis) कशेरुकाओं के साथ होता है।
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Fig. Hinged Joint

3. फिसलनदार जोड़ (Sliding Joints)—इन जोड़ों में गति फिसलनदार होती है। इन जोड़ों की गति इनका निर्माण करने वाले तन्तुओं (Ligaments) के ऊपर निर्भर करती है। इस प्रकार के जोड़ साधारणतया तलों की विरोधता से बनते हैं। इस प्रकार के जोड़ प्राय: कलाई, घुटने और रीढ़ की हड्डी की कशेरुकाओं में मिलते हैं।

4. गेंद और छेद वाले जोड़ (Ball and Socket Joints)-इस प्रकार के जोड़ में हड्डी का एक सिरा गेंद
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Fig. Ball and Socket Joints
की भांति गोल और दूसरा एक प्याले की भांति होता है। गेंद वाला भाग प्याले में फिट होता है। इस प्रकार गेंद वाली हड्डी किसी भी दिशा में घूम सकती है। इस प्रकार के जोड़ कन्धे और कूल्हे में होते हैं।

5. कोनडिलॉयड जोड़ (Condyloid Joint)—ये कब्जेदार जोड़ जैसे ही जोड़ होते हैं। परंतु इनमें गति दोनों तरफ होती है। इस तरह के जोड़ों में लचकता, फैलाव जैसी गतियां या हलचलें पैदा की जाती हैं।

6. सैडल जोड़ (Saddle Joint)—इस प्रकार के जोड़ों में हड्डी उत्तल तथा अवतल प्रकार से जुड़ी होती है। अंगूठे का जोड़ इसका उदाहरण है।

2. रेशेदार जोड़ (Fibrous Joints)-वे जोड़ जिनमें हड्डियों के तल धागे जैसे बारीक रेशों से बन्धे हुए होते. हैं, रेशेदार जोड़ कहलाते हैं। ये जोड़ गतिहीन होते हैं, जैसे कपाल की हड़ियों के जोड़।
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Fig. Fibrous Joints
Fig. Cartilagenous Joints

3. उप-अस्थि जोड़ (Cartilaginous Joints)-इन विरोधी हड्डियों के सिरे उप-अस्थियों के साथ जुड़े होते हैं और इनमें गति किसी विशेष सीमा तक ही होती है। यह उप-अस्थि अन्त में हड्डी का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार की उप-अस्थियों में सीधा रक्त प्रसार नहीं होता। वे अपनी खुराक जोड़ के अन्दर से सिनोवीयल रस से प्राप्त करते हैं। यह स्वस्थ मांस पट्टी काफ़ी सुदृढ़ होती है और इसमें काफ़ी लचक भी होती है परन्तु जब जोड़ों में से सिनोवीयल रस की मात्रा समाप्त हो जाती है तो ये सख्त हो जाते हैं और इसी कारण जोड़ों में दर्द शुरू हो जाता है।

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Physical Education Guide for Class 11 PSEB शारीरिक रचना और क्रिया विज्ञान का परिचय Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
रीढ़ की हड्डी के मनके होते हैं ?
उत्तर-
रीढ़ की हड्डी के कुल 33 मनके होते हैं।

प्रश्न 2.
जब दो या दो से अधिक हड्डियां एक जगह मिलें तो उसे क्या कहते हैं ?
उत्तर-
जब दो या दो से अधिक हड्डियां एक जगह मिलें तो उसे जोड़ कहते हैं।

प्रश्न 3.
जोड़ों की किस्में होती हैं :
(a) रिसावदार अथवा सिनोवीयल जोड़
(b) रेशेदार जोड़
(c) उप-अस्थि जोड़।
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(d) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 4.
रिसावदार की किस्में होती हैं.
(a) चार
(b) तीन
(c) दो
(d) पाँच।
उत्तर-
(a) चार।

प्रश्न 5.
(1) बड़ी वीण हड्डी (UIna)
(2) छोटी वीण हड्डी-हड्डी रेडियस (Radius) ये हड्डियाँ कहाँ पाई जाती हैं ?
उत्तर–
बाजू की हड्डियों में पाई जाती हैं।

प्रश्न 6.
रिसावदार जोड़ों की कितनी किस्में हैं ?
उत्तर-
रिसावदार जोड़ों की चार किस्में हैं।

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प्रश्न 7.
लम्बी हड्डियां शरीर में कहाँ पाई जाती हैं ?
उत्तर-
लम्बी हड्डियां शरीर में बाजू और टांगों में पाई जाती हैं।

प्रश्न 8.
मनुष्य में कुल मिला कर कितनी हड्डियां होती हैं ?
उत्तर-
मनुष्य में कुल मिलाकर 206 हड्डियां होती हैं।

प्रश्न 9.
जोड़ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जब दो या दो से अधिक हड्डियां एक स्थान पर मिलें तो उसे जोड़ कहते हैं।

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प्रश्न 10.
अनाटमी क्या है ?
उत्तर-
अनाटमी वह विज्ञान है जो शरीर की बनावट और सभी अंगों का आपसी सम्बन्ध की जानकारी देते हैं।

अति छोटे उत्तरों वाले प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा और खेलों के बीच अनाटमी और फिजिओलोजी के दो लाभ लिखें।
उत्तर-

  1. खिलाड़ियों के प्रदर्शन में वृद्धि होती है।
  2. अच्छी सेहत बनती है।

प्रश्न 2.
कोशिकाएं (Cells) क्या हैं ?
उत्तर-
कोशिकाएं जीवन की प्राथमिक इकाई हैं। इन कोशिकाओं और कोशिका अंगों को नंगी आँख के साथ नहीं देखा जा सकता। इन्हें सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जा सकता है। ये अपने भीतर को एकत्रित करके रखते हैं और भोजन के ऑक्सीकरण द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। इस ऊर्जा का प्रयोग शारीरिक क्रियाएं करने के लिए किया जाता है।

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प्रश्न 3.
लम्बी हड्डियां शरीर में कहां पाई जाती हैं ?
उत्तर-
इस किस्म की हड्डियां टांगों तथा बाजुओं में पाई जाती हैं। यह हमें चलने-फिरने तथा क्रियाएं करने में मदद करती हैं। इन हड़ियों के बिना शारीरिक क्रियाएं करना असम्भव है। इन हड्डियों के दो सिरे तथा एक शाफ्ट होती है।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
अस्थि पिंजर के कोई तीन कार्य लिखो।
उत्तर-

  1. मनुष्य अस्थि पिंजर शरीर को एक खास प्रकार की शक्ल देता है।
  2. यह शरीर को सीधा रखता है।
  3. मनुष्य पिंजर में जगह-जगह पर उतोलक (Livers) बनते हैं।

प्रश्न 2.
हड्डियों की किस्में लिखो।
उत्तर-

  1. लम्बी हड्डियाँ
  2. छोटी हड्डियाँ
  3. चपटी हड्डियाँ
  4. बेढंगी हड्डियाँ
  5. तिल रूपी हड्डियाँ।

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प्रश्न 3.
शारीरिक रचना विज्ञान क्या है ?
उत्तर-
मानवीय शरीर रचना विज्ञान का अध्ययन करने से पता लगता है कि शारीरिक अंगों का जन्म मानवीय कोशिका (सैल) के उत्पन्न होने के साथ हुआ है। कोशिका (सैल) के समूह से ऊतक (टिशु) बनते हैं, और उतकों का समूह एकत्रित होकर अंग और अंगों के सुमेल से प्रबंध बनते हैं।

प्रश्न 4.
ऊतक तथा प्रबन्ध का वर्णन करो।
उन्नर-
1. ऊतक (Tissue)-कोशिका (सैल) के समूह से ऊतक बनते हैं। जब एक ही आकृति और काम करने वाली कोशिकाओं के समूह मिलकर काम करते हैं, तो उन्हें ऊतक कहा जाता है। इन ऊतकों में 60% से 90 तक पानी होता है। मानवीय शरीर में चार तरह के ऊतक पाये जाते हैं, जैसे-संयोजक ऊतक, मांसपेशियां ऊतक एवं नाड़ी ऊतक।

2. प्रबंध (System).-सैल के समूह ऊतक, ऊतक के समूह से अलग-अलग अंग तथा एक जैसे काम करने वाले अलग-अलग अंग मिलकर प्रबंध (System) बनाते हैं। साधारण शब्दों में शरीर के अलग-अलग अंगों के मिश्रण से प्रबंध बनते हैं, जैसे-श्वास प्रबंध, रक्त प्रवाह प्रबंध, मांसपेशियां प्रबंध, नाड़ी प्रबंध, मल त्याग आदि। ये अंग अपनाअपना काम लय और दूसरे अंगों के सहयोग के साथ करते हैं।

प्रश्न 5.
उड़ती या तैरती पसलियां क्या होती हैं ?
उत्तर-
छाती की हड्डी के दोनों ओर 12-12 पसलियां होती हैं। इनका अगला भाग Cortal Cartilages द्वारा छाती ” की हड्डी में जुड़ता है। पहली सात पसलियां छाती की हड्डी से अलग-अलग रूप में जुड़ जाती हैं। आठवीं, नौवीं और दसवीं पसलियां छाती की हड्डी के साथ जुड़ने से पहले ही सातवीं पसली में जुड़ जाती हैं। आखरी दो पसलियां स्वतन्त्र हैं। इनको उड़ती या तैरती पसलियां (Floating Ribs) भी कहा जाता है। ये सब पसलियां मिलकर एक पिंजर का निर्माण करती हैं। ये पिंजर दिल और फेफड़ों की रक्षा करता है। पसलियों के बीच के स्थान में मांसपेशियां होती हैं। ये मांसपेशियां श्वास लेने से फैलती या सिकुड़ती हैं। जिस कारण ये पिंजर ऊपर नीचे उठता बैठता रहता है।

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बड़े उत्तरों वाले प्रश्न | (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
शारीरिक क्रियाओं और खेलों के क्षेत्र में अनाटमी और फिजिओलोजी का योगदान तथा लाभ के बारे में लिखें।
उत्तर-
आधुनिक युग में शारीरिक शिक्षा और खेलों का मानवीय जीवन में बहुत महत्व हैं। ये व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास करने में सहायक होते है। खिलाड़ियों की तरफ से रोज़ खेल के मैदान में अलग-अलग प्रकार की क्रियाएं की जाती हैं। इन खेल क्रियाओं के अभ्यास से खिलाड़ियों के खेल प्रदर्शन में सुधार होता रहता है। जिससे खिलाड़ियों के अंगों और प्रबंधों के कार्य करने की समर्था में वृद्धि होती है। इसलिए खेल क्रियाओं में सुधार के लिए विभिन्न अंगों की बनावट और काम को समझना अनिवार्य है। शरीर को नया निरोग, ताकतवर रखने के लिए, शारीरिक रचना और क्रिया विज्ञान (Anatomy and Physiology) के बारे में जानकारी होना बहुत अनिवार्य है।
शारीरिक शिक्षा और खेलों के क्षेत्र में अनाटमी और फिजिओलोजी के लाभ—

  1. ये खिलाड़ी की समार्थ्यता के मूटयांकन में मदद करता है।
  2. ये मानवीय शरीर पर अभ्यासों के प्रभावों के अध्ययन में मदद करता है।
  3. ये ट्रेनिंग सैशन के दौरान शरीर की सही स्थिति बनाने में मदद करता है।
  4. ये चोटों की किस्मों की पहचान करने में मदद करता है।
  5. यह स्पोर्टस पोषण की आधारभूत जानकारी प्राप्त करने में मदद करता है।
  6. ये खेल की चोटों के शीघ्र उपचार करने में मदद करता है।
  7. ये किसी खिलाड़ी की स्पोर्टस कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में मदद करता है।
  8. ये खिलाड़ी को शरीरिक शक्ति के अनुसार किसी खेल का चुनाव करने में मदद करता है।
  9. ट्रेनिंग सैशन के दौरान हुई थकावट की रिकवरी में मदद करता है।
  10. ये किसी खिलाड़ी के शारीरिक ढांचे के सकारात्मक या नकारात्मक पहलुओं की जानकारी प्रदान करता है।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 3 शारीरिक रचना और क्रिया विज्ञान का परिचय

प्रश्न 2.
मानवीय अस्थि पिंजर पर व्यायाम के प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर-
मानवीय अस्थि पिंजर पर व्यायाम के प्रभाव (Effects of Exercise on Human Skeletal System)-व्यायाम के मानवीय अस्थि पिंजर पर क्या प्रभाव पड़ते हैं ? इस बात को समझने के लिए कम समय और लगातार व्यायाम करते रहना भाव प्रशिक्षण (Training) में अन्तर डालना चाहिए। थोड़ी-थोड़ी और लगातार व्यायाम करने के लिए मानवीय अस्थि पिंजर (Human Skeleton) के ऊपर कई प्रभाव पड़ जाते हैं। कभी-कभी अनियमित ढंग के साथ व्यायाम करने के साथ शरीर के ऊपर जो प्रभाव पड़ते हैं, थोड़ी देर के लिए (अस्थायी) होते हैं। अगर इस प्रकार के व्यायाम को कुछ दिन न किया जाए तो शरीर पहले की अवस्था पर आ जाता है, परन्तु कुछ महीनों तक लगातार नियमानुसार व्यायाम करते रहने पर शरीर में पूरी तरह परिवर्तन आ जाता है। जिनकी पहचान बहुत आसानी के साथ की जा सकती है।
लागातार व्यायाम करते रहने से मानवीय अस्थि पिंजर के ऊपर जो प्रभाव पड़ते हैं वह इस प्रकार हैं—

1. लम्बाई में वृद्धि (Increase in Height)-कुछ समय लगातार व्यायाम करने के साथ नवयुवकों की हड़ियों की लम्बाई में रुकावट की वृद्धि होती है। जिस कारण उनके शरीर की लम्बाई में बढ़ोत्तरी होती है। परन्तु इसमें याद रखने योग्य बात यह है कि वृद्धि बचपन की अवस्था के अन्त तक होती है।

2. जोड़ के तन्तुओं की ताकत में वृद्धि (Increase in the strength of ligaments of Joints) लगातार नियमानुसार व्यायाम करते रहने के साथ हड्डियों और जोड़ के तन्तुओं में मजबूती आ जाती है। जिस के साथ वह ज्यादा खिंच सहने योग्य हो जाते हैं।

3. शरीर सामर्थ्य में वृद्धि और शरीर के पित्त वाले विकारों की समाप्ति (Increase in physical capacity and elimination of physical defects)-शारीरिक सामर्थ्य में वृद्धि होती है और शरीर के पित्त वाले विकार भी काफ़ी ज्यादा खत्म हो जाते हैं।

4. जोड़ों में तड़क (Flexibility of Joints) लगातार व्यायाम करने के कारण जोड़ों में तड़क उत्पन्न होती

5. आसन सम्बन्धी अवगुणों का दूर होना (Removing Postural defects) लगातार व्यायाम करने के कारण शरीर के आसन सम्बन्धी अवगुण जिस तरह कुबड़ापन या रीढ़ की हड्डी आदि का सिकुड़ना दूर हो जाते हैं।

6. प्रणालियों को दोषों से मुक्त करना (Preventing defects in systems) लगातार व्यायाम करते रहने से आसन सम्बन्धी दोषों को दूर करके शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

बिंदा सिंह बहादुर का प्रारंभिक जीवन (Early Career of Banda Singh Bahadur)

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर के प्रारंभिक जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं ? संक्षिप्त वर्णन करें। (What do you know about the early career of Banda Singh Bahadur ? Explain briefly.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर जो सिख इतिहास में बंदा बहादुर के नाम से अधिक विख्यात हैं को अत्यंत गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। उसने अपनी योग्यता के बल पर पंजाब में एक के बाद एक महत्त्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त की। बंदा सिंह बहादुर के आरंभिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है—
1. जन्म और माता-पिता (Birth and Parentage)-बंदा सिंह बहादुर का जन्म 27 अक्तूबर, 1670 ई० में कश्मीर के जिला पुंछ के राजौरी नामक गाँव में हुआ। उसके बचपन का नाम लक्ष्मण देव था। उसके पिता जी का नाम राम देव था। वह डोगरा राजपूत जाति से संबंधित थे।

2. बचपन (Childhood)-लक्ष्मण देव एक बहुत ही निर्धन परिवार से संबंधित था। अतः जब लक्ष्मण देव कुछ बड़ा हुआ तो वह कृषि के कार्य में पिता जी का हाथ बँटाने लग पड़ा। लक्ष्मण देव अपने खाली समय में तीरकमान लेकर वनों में शिकार खेलने चला जाता।

3. बैरागी के रूप में (As a Bairagi)-जब लक्ष्मण देव की आयु लगभग 15 वर्ष की थी तो एक दिन शिकार खेलते हुए उसने एक गर्भवती हिरणी को तीर मारा। वह हिरणी और उसके बच्चे लक्ष्मण देव के सामने तड़प-तड़पकर मर गए। इस करुणामय दृश्य का लक्ष्मण के दिल पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उसने संसार को त्याग दिया और बैरागी बन गया। उसने अपना नाम बदल कर माधो दास रख लिया। घूमते-घूमते माधोदास की मुलाकात तंत्रविद्या में निपुण औघड़ नाथ से हो गई और वह उसका शिष्य बन गया। औघड़ नाथ की मृत्यु के बाद माधोदास नंदेड आ गया और शीघ्र ही अपनी तंत्र विद्या के कारण लोगों में विख्यात हो गया।
PSEB 12th Class History Solutions Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर 1
BANDA SINGH BAHADUR

4 गुरु गोबिंद सिंह जी से भेंट (Meeting with Guru Gobind Singh Ji)-1708 ई० में जब गुरु गोबिंद सिंह जी नंदेड आए तो वह माधोदास के आश्रम में उससे भेंट करने के लिए गए। गुरु साहिब और माधोदास के मध्य कुछ प्रश्न- उत्तर हुए। माधोदास गुरु साहिब के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि वह गुरु साहिब जी का अनुयायी बन गया। गुरु साहिब ने भी उसे अमृत छकाकर सिख बनाया और उसका नाम परिवर्तित करके बंदा सिंह बहादुर रख दिया।

5. बंदा सिंह बहादुर का पंजाब की ओर प्रस्थान (Banda Singh Bahadur Proceeds towards Punjab)-जब बंदा सिंह बहादुर ने गुरु साहिब से पंजाब में सिखों पर मुगलों द्वारा किए गए अत्याचारों और गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदानों के संबंध में सुना तो उसका राजपूती खून खौलने लगा। उसने इन अत्याचारों का प्रतिशोध लेने के लिए गुरु साहिब जी से पंजाब जाने के लिए आज्ञा माँगी। गुरु साहिब जी ने इस निवेदन को स्वीकार कर लिया। गुरु साहिब जी ने बंदा सिंह बहादुर को पाँच तीर दिए और उसकी सहायता के लिए 25 अन्य सिखों को भी साथ भेजा। गुरु साहिब ने पंजाब के सिखों के नाम कुछ हुक्मनामे भी दिए। इन हुक्मनामों में पंजाब के सिखों को यह आदेश दिया गया था कि बंदा सिंह बहादुर को अपना नेता मानें तथा मुग़लों के विरुद्ध धर्म युद्धों में उसका पूरा साथ दें। गुरु साहिब ने बंदा सिंह बहादुर को भी कुछ आदेश दिए। पहला, ब्रह्मचारी जीवन व्यतीत करना। दूसरा, सच्चाई के मार्ग पर चलना। तीसरा, नया धर्म अथवा संप्रदाय नहीं चलाना। चौथा, अपनी विजयों पर अहंकार नहीं . करना। पाँचवां, स्वयं को खालसा का सेवक समझना। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर ने गुरु जी का आशीर्वाद प्राप्त करके 1708 ई० में पंजाब की ओर रुख किया।

बंदा सिंह बहादुर के सैनिक कारनामे (Military Exploits of Banda Singh Bahadur)

प्रश्न 2.
बंदा सिंह बहादुर के सैनिक कारनामों की चर्चा करें और पंजाब के इतिहास में उसके महत्त्व का मूल्यांकन करें।
(Discuss the military exploits of Banda Singh Bahadur and estimate their significance in the History of the Punjab.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर के सैनिक कारनामों का विवरण दें।
(Give briefly the account of the battle fought by Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की मुग़लों के साथ लड़ाइयों का विस्तारपूर्वक वर्णन करें। (Write in detail the battles fought between Banda Singh Bahadur and the Mughals.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर के सैनिक कारनामों अथवा सफलताओं का संक्षेप में वर्णन करें।
(Explain briefly the military exploits or achievements of Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
गुरु गोबिंद सिंह जी तथा अन्य सिखों पर हुए अत्याचारों का प्रतिशोध लेने के लिए बंदा सिंह बहादुर गुरु जी की आज्ञा से पंजाब की ओर चल पड़ा। यहाँ पहुँचते ही उसने गुरु जी के हुक्मनामे जारी किये। परिणामस्वरूप हज़ारों की संख्या में सिख उसके ध्वज तले एकत्र हो गए। तद्उपरांत बंदा सिंह बहादुर ने अपनी सैनिक गतिविधियाँ आरंभ कर दीं
इसमें बंदा सिंह बहादुर काफ़ी सीमा तक सफल रहा। उसके महत्त्वपूर्ण सैनिक कारनामों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित अनुसार है—
1. सोनीपत पर आक्रमण (Attack on Sonepat)—बंदा सिंह बहादुर ने अपनी विजयों का आरंभ सोनीपत से किया। उसने 1709 ई० में सोनीपत पर आक्रमण कर दिया। सोनीपत का फ़ौजदार बिना मुकाबला किए ही दिल्ली की ओर भाग गया। इस प्रकार सिखों का सरलता से सोनीपत पर अधिकार हो गया।

2. समाना की विजय (Conquest of Samana)-समाना में गुरु तेग़ बहादुर जी को शहीद करने वाला और गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों को दीवार में जिंदा चिनवा देने वाले जल्लाद रहते थे। इसलिए बंदा सिंह बहादुर ने नवंबर, 1709 ई० में समाना पर बड़ा जोरदार आक्रमण किया। समाना सिखों ने खंडहर के ढेर में परिवर्तित कर दिया। यह बंदा सिंह बहादुर की पहली महत्त्वपूर्ण विजय थी।

3. घुड़ाम तथा मुस्तफाबाद पर अधिकार (Conquest of Ghuram and Mustafabad)-समाना की विजय के पश्चात् बंदा सिंह बहादुर ने घुड़ाम एवं मुस्तफाबाद पर आक्रमण किया तथा सुगमता से अधिकार कर लिया।

4. कपूरी की विजय (Conquest of Kapuri)-कपूरी का शासक कदमुद्दीन हिंदुओं के साथ बहुत दुर्व्यवहार करता था। फलस्वरूप बंदा बहादुर ने कपूरी पर आक्रमण करके कदमुद्दीन को मौत के घाट उतार दिया। इस प्रकार कपूरी पर विजय प्राप्त की गई।

5. सढौरा की विजय (Conquest of Sadhaura) सढौरा का शासक उस्मान खाँ अपने अत्याचारों के लिए कुख्यात था। उसने पीर बुद्ध शाह की इसलिए हत्या करवा दी थी, क्योंकि उसने भंगाणी की लड़ाई में गुरु गोबिंद सिंह जी की सहायता की थी। अतः बंदा सिंह बहादुर ने इसका बदला लेने के लिए सढौरा पर आक्रमण कर दिया। यहाँ पर मुसलमानों को इतनी भारी संख्या में मारा गया, कि सढौरा का नाम कत्लगढ़ी पड़ गया।

6. सरहिंद की विजय (Conquest of Sirhind)-सरहिंद पर विजय प्राप्त करना बंदा सिंह बहादुर के लिए अति महत्त्वपूर्ण था। सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ ने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों को दीवार में जिंदा चिनवा दिया था। उसकी सेनाओं के हाथों ही गुरु जी के दोनों बड़े साहिबज़ादे चमकौर साहिब की लड़ाई में शहीद हो गए थे। वज़ीर खाँ के ही भेजे गए दो पठानों में से एक पठान ने गुरु साहिब को नंदेड़ के स्थान पर छुरा मार दिया। इस कारण वह ज्योति-जोत समा गए। अतः सिखों में सरहिंद प्रति अत्यधिक घृणा थी। 12 मई, 1710 ई० को दोनों सेनाओं के बीच सरहिंद से लगभग 16 किलोमीटर दूर चप्पड़चिड़ी नामक स्थान पर भयंकर लड़ाई हुई। फ़तह सिंह के हाथों वज़ीर खाँ के मरते ही मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई। सिखों ने वज़ीर खाँ के शव को एक वृक्ष पर लटका दिया तथा समूचे सरहिंद में भारी लूटपाट की। यह बंदा सिंह बहादुर की अति महत्त्वपूर्ण विजय थी।

7. यमुना-गंगा दोआब की विजय (Conquest of Jamuna-Ganga Doab)-सरहिंद की विजय के बाद बंदा सिंह बहादुर ने यमुना-गंगा दोआब के प्रदेशों पर आक्रमण किया। शीघ्र ही बंदा सिंह बहादुर ने सहारनपुर, बेहात, ननौता और अंबेटा को अपने अधिकार में ले लिया।

8. जालंधर दोआब की विजय (Conquest of Jalandhar Doab)-जालंधर दोआब का फ़ौजदार शमस खाँ बड़ा अत्याचारी था। उसके अत्याचारों से तंग आकर सिखों ने बंदा सिंह बहादुर से सहायता माँगी। अतः 12 अक्तूबर, 1710 ई० में राहों के स्थान पर बंदा सिंह बहादुर ने शमस खाँ को करारी पराजय दी। फलस्वरूप समूचे जालंधर दोआब पर उसका अधिकार हो गया। इसके उपरांत बंदा सिंह बहादुर ने अमृतसर, बटाला, कलानौर और पठानकोट के प्रदेशों पर भी बड़ी आसानी से अधिकार कर लिया।

9. मुग़लों का लोहगढ़ पर आक्रमण (Attack of Mughals on Lohgarh)—बंदा सिंह बहादुर की बढ़ती हुई शक्ति को देखते हुए मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ने उसकी शक्ति का दमन करने का निर्णय किया। उसने जरनैल मुनीम खाँ के नेतृत्व में 60,000 सैनिकों की एक विशाल सेना पंजाब भेजी। इस सेना ने 10 दिसंबर, 1710 ई० को बंदा सिंह बहादुर की राजधानी लोहगढ़ पर अचानक आक्रमण कर दिया। सिख दुर्ग के भीतर से ही मुग़लों का डटकर सामना करते रहे। खाद्य-पदार्थों की कमी के कारण सिखों का पक्ष कमज़ोर पड़ने लगा। अतः बंदा सिंह बहादुर वेश बदल कर नाहन की पहाड़ियों की ओर चला गया।

10. गुरदास-नंगल की लड़ाई (Battle of Gurdas-Nangal)-बंदा सिंह बहादुर ने शीघ्र ही अपनी स्थिति को फिर से दृढ़ बना लिया। उसने बड़ी सरलता से बहरामपुर, रायपुर, कलानौर और बटाला के प्रदेशों पर फिर से अधिकार कर लिया। अतः नए मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर के आदेश पर लाहौर के सूबेदार अब्दुस समद खाँ ने बंदा सिंह बहादुर को गुरदास-नंगल के स्थान पर अचानक घेरे में ले लिया। बंदा सिंह बहादुर ने दुनी चंद की हवेली से मुग़ल सेना का सामना जारी रखा। यह घेरा 8 मास तक चला। धीरे-धीरे खाद्य-सामग्री की कमी के कारण सिखों की स्थिति गंभीर हो गई। ऐसे समय में बाबा बिनोद सिंह अपने साथियों सहित गढ़ी छोड़ कर चला गया। इस कारण बंदा सिंह बहादुर की स्थिति और बिगड़ गई। अंततः 7 दिसंबर, 1715 ई० को बंदा सिंह बहादुर तथा 740 सिखों को बंदी बना लिया गया।

11. बंदा सिंह बहादुर का बलिदान (Martyrdom of the Banda Singh Bahadur)-बंदा सिंह बहादुर और उसके साथियों को फरवरी 1716 ई० में दिल्ली भेजा गया। दिल्ली पहुँचने पर उनका जलूस निकाला गया। बंदा सिंह बहादुर को एक पिंजरे में बंद किया गया था। मार्ग में उसका एवं अन्य सिखों का भारी अपमान किया गया। सिख इस दौरान प्रसन्नचित्त गुरवाणी का जाप करते रहे। फिर उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए कहा गया। परंतु सिखों ने भी इस्लाम को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। इसके उपरांत प्रतिदिन 100 सिखों को शहीद किया जाने लगा। अंत में 9 जून, 1716 ई० को बंदा सिंह बहादुर को शहीद करने से पहले जल्लाद ने उसके चार वर्ष के पुत्र अजय सिंह की उसकी आँखों के सामने निर्ममता से हत्या की। तत्पश्चात् बंदा सिंह बहादुर का अंग-अंग काट कर उन्हें शहीद कर दिया गया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बंदा सिंह बहादुर को 19 जून, 1716 ई० को शहीद किया गया था। अंत में हम प्रसिद्ध इतिहासकार पतवंत सिंह के इन शब्दों से सहमत हैं,

“इस प्रकार उस व्यक्ति के जीवन का अंत हुआ जिसने 7 वर्ष के अल्पकाल में ही अपनी विजयों द्वारा महान् मुग़ल साम्राज्य को ऐसी चुनौती प्रस्तुत की कि वह दुबारा उस प्रदेश (पंजाब) पर पुनः आत्मविश्वास से शासन न कर सका।”1

1. “So ended the life of a man who in seven short years had so mocked the might of the Mughals with his victories that they could never again reassert their authority over the land they had once ruled with such a plomb.” Patwant Singh, The Sikhs (New Delhi : 1999) p. 81 .

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर

प्रश्न 3.
बंदा सिंह बहादुर के जीवन तथा सफलताओं का वर्णन करें। (Describe the career and achievements of Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर जो सिख इतिहास में बंदा बहादुर के नाम से अधिक विख्यात हैं को अत्यंत गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। उसने अपनी योग्यता के बल पर पंजाब में एक के बाद एक महत्त्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त की। बंदा सिंह बहादुर के आरंभिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है—
1. जन्म और माता-पिता (Birth and Parentage)-बंदा सिंह बहादुर का जन्म 27 अक्तूबर, 1670 ई० में कश्मीर के जिला पुंछ के राजौरी नामक गाँव में हुआ। उसके बचपन का नाम लक्ष्मण देव था। उसके पिता जी का नाम राम देव था। वह डोगरा राजपूत जाति से संबंधित थे।

2. बचपन (Childhood)-लक्ष्मण देव एक बहुत ही निर्धन परिवार से संबंधित था। अतः जब लक्ष्मण देव कुछ बड़ा हुआ तो वह कृषि के कार्य में पिता जी का हाथ बँटाने लग पड़ा। लक्ष्मण देव अपने खाली समय में तीरकमान लेकर वनों में शिकार खेलने चला जाता।

3. बैरागी के रूप में (As a Bairagi)-जब लक्ष्मण देव की आयु लगभग 15 वर्ष की थी तो एक दिन शिकार खेलते हुए उसने एक गर्भवती हिरणी को तीर मारा। वह हिरणी और उसके बच्चे लक्ष्मण देव के सामने तड़प-तड़पकर मर गए। इस करुणामय दृश्य का लक्ष्मण के दिल पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उसने संसार को त्याग दिया और बैरागी बन गया। उसने अपना नाम बदल कर माधो दास रख लिया। घूमते-घूमते माधोदास की मुलाकात तंत्रविद्या में निपुण औघड़ नाथ से हो गई और वह उसका शिष्य बन गया। औघड़ नाथ की मृत्यु के बाद माधोदास नंदेड आ गया और शीघ्र ही अपनी तंत्र विद्या के कारण लोगों में विख्यात हो गया।
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BANDA SINGH BAHADUR

4. गुरु गोबिंद सिंह जी से भेंट (Meeting with Guru Gobind Singh Ji)-1708 ई० में जब गुरु गोबिंद सिंह जी नंदेड आए तो वह माधोदास के आश्रम में उससे भेंट करने के लिए गए। गुरु साहिब और माधोदास के मध्य कुछ प्रश्न- उत्तर हुए। माधोदास गुरु साहिब के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि वह गुरु साहिब जी का अनुयायी बन गया। गुरु साहिब ने भी उसे अमृत छकाकर सिख बनाया और उसका नाम परिवर्तित करके बंदा सिंह बहादुर रख दिया।

5. बंदा सिंह बहादुर का पंजाब की ओर प्रस्थान (Banda Singh Bahadur Proceeds towards Punjab)-जब बंदा सिंह बहादुर ने गुरु साहिब से पंजाब में सिखों पर मुगलों द्वारा किए गए अत्याचारों और गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदानों के संबंध में सुना तो उसका राजपूती खून खौलने लगा। उसने इन अत्याचारों का प्रतिशोध लेने के लिए गुरु साहिब जी से पंजाब जाने के लिए आज्ञा माँगी। गुरु साहिब जी ने इस निवेदन को स्वीकार कर लिया। गुरु साहिब जी ने बंदा सिंह बहादुर को पाँच तीर दिए और उसकी सहायता के लिए 25 अन्य सिखों को भी साथ भेजा। गुरु साहिब ने पंजाब के सिखों के नाम कुछ हुक्मनामे भी दिए। इन हुक्मनामों में पंजाब के सिखों को यह आदेश दिया गया था कि बंदा सिंह बहादुर को अपना नेता मानें तथा मुग़लों के विरुद्ध धर्म युद्धों में उसका पूरा साथ दें। गुरु साहिब ने बंदा सिंह बहादुर को भी कुछ आदेश दिए। पहला, ब्रह्मचारी जीवन व्यतीत करना। दूसरा, सच्चाई के मार्ग पर चलना। तीसरा, नया धर्म अथवा संप्रदाय नहीं चलाना। चौथा, अपनी विजयों पर अहंकार नहीं . करना। पाँचवां, स्वयं को खालसा का सेवक समझना। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर ने गुरु जी का आशीर्वाद प्राप्त करके 1708 ई० में पंजाब की ओर रुख किया।

बंदा सिंह बहादुर की सफलता एवं असफलता के कारण (Causes of Banda Singh Bahadur’s Success and Failure)

प्रश्न 4.
बंदा सिंह बहादुर की आरंभिक सफलताओं और अंतिम असफलताओं के क्या कारण थे ?
(What were the causes of initial success and ultimate failure of Banda Singh Bahadur ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादर की आरंभिक सफलता तथा अंत में असफलता के क्या कारण थे ?
(What were the causes of early success and ultimate failure of Banda Singh Bahadur ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की आरंभ में सफलताओं और बाद में असफलताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
(Give a brief account of initial success and ultimate failure of Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
I. बंदा सिंह बहादुर की सफलता के कारण (Causes of Banda Singh Bahadur’s Success)
बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब के सिखों का जिस योग्यता, लगन और वीरता से नेतृत्व किया उसका इतिहास में कोई और उदाहरण मिलना मुश्किल है। उसने बड़ी तीव्रता से पंजाब के विस्तृत भू-भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। बंदा सिंह बहादुर की इस आरंभिक सफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे—
1. मुगलों के घोर अत्याचार (Great Atrocities of the Mughals)-पंजाब के मुग़ल शासक सिखों के कट्टर शत्रु थे। सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ ने गुरु गोबिंद सिंह जी के विरुद्ध अनेक सैनिक अभियान भेजे। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों (जोरावर सिंह जी तथा फतह सिंह जी) को जीवित ही दीवार में चिनवा दिया था। गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों बड़े साहिबजादे (अजीत सिंह जी और जुझार सिंह जी) चमकौर साहिब की लड़ाई में उसके सैनिकों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। अतः सिखों का खून खौल रहा था। परिणामस्वरूप, वे बंदा सिंह बहादुर के झंडे अधीन एकत्र हो गए और बंदा सिंह बहादुर के लिए विजय अभियान आसान हो गया।

2. गुरु गोबिंद सिंह जी के हुक्मनामे (Hukamnamas of Guru Gobind Singh Ji)—गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर के हाथ सिख संगत के नाम कुछ हुक्मनामे’ भेजे थे। इन हुक्मनामों में गुरु साहिब ने सिख संगत को मुग़लों के विरुद्ध होने वाले धर्म युद्धों में बंदा सिंह बहादुर को पूरा सहयोग देने को कहा। सिख संगत के सहयोग के कारण बंदा सिंह बहादुर एवं उसके साथियों का उत्साह बढ़ गया।

3. औरंगजेब के कमजोर उत्तराधिकारी (Weak Successors of Aurangzeb)-1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् हुआ मुग़ल शासक बहादुर शाह उत्तराधिकारिता के युद्ध में ही उलझा रहा। अतः वह साम्राज्य में व्याप्त अराजकता को नियंत्रण में रखने में असफल रहा जबकि उसके बाद बनने वाला मुग़ल बादशाह जहाँदार शाह बहुत ही अयोग्य शासक प्रमाणित हुआ। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर ने इस स्वर्ण अवसर का उचित लाभ उठाया तथा अनेक सफलताएँ प्राप्त की।

4. बंदा सिंह बहादुर का योग्य नेतृत्व (Able leadership of Banda Singh Bahadur)-बंदा सिंह बहादुर एक निर्भीक योद्धा एवं योग्य सेनापति था। उसने सभी लड़ाइयों में सेना का स्वयं नेतृत्व किया तथा वह अपने अधीन सैनिकों को युद्ध के समय में अत्यधिक प्रोत्साहित करता था। परिणामस्वरूप, बंदा सिंह बहादुर ने अपने आरंभिक वर्षों में प्रशंसनीय सफलताएँ प्राप्त की।

5. बंदा सिंह बहादुर के प्रारंभिक आक्रमण छोटे-छोटे मुग़ल अधिकारियों के विरुद्ध थे (Banda Singh Bahadur’s early exploits were against petty local Mughal Officials)-बंदा सिंह बहादुर के प्रारंभिक आक्रमण सरहिंद को छोड़कर छोटे-छोटे मुग़ल अधिकारियों के विरुद्ध थे। ये अधिकारी अपने अत्याचारों के कारण प्रजा में बहुत बदनाम थे। फलस्वरूप, जब बंदा सिंह बहादुर ने इन प्रदेशों पर आक्रमण किये तो स्थानीय लोगों ने बंदा सिंह बहादुर को अपना समर्थन दिया। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर एक के बाद दूसरी सफलता प्राप्त करता गया।

6. बंदा सिंह बहादुर का अच्छा शासन प्रबंध (Good Administration of Banda Singh Bahadur)बंदा सिंह बहादुर ने अपने अधीन प्रदेशों में बहुत अच्छे शासन प्रबंध की व्यवस्था की थी। उसने बहुत ही योग्य एवं ईमानदार अधिकारी नियुक्त किए। उसने ज़मींदारी प्रथा को खत्म करके किसानों को न केवल ज़मींदारों के अत्याचारों से बचाया बल्कि उन्हें भूमि का स्वामी भी बना दिया। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर को पंजाब के लोगों से पूरा समर्थन मिला और इसी कारण उसे आरंभिक काल में अनेक सफलताएँ प्राप्त हुईं।

II. बंदा सिंह बहादुर की अंतिम असफलता के कारण (Causes of Banda Singh Bahadur’s Ultimate Failure)
पंजाब आने के बाद बंदा सिंह बहादर ने अपने प्रारंभिक वर्षों में अनेक महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त की। परंतु शीघ्र ही उसे असफलता का मुँह देखना पड़ा। बंदा सिंह बहादुर की इस अंतिम असफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे—
1. मुगल साम्राज्य की शक्ति (Strength of the Mughal Empire)-मुग़ल साम्राज्य के पास विशाल तथा असीमित साधन थे। दूसरी ओर बंदा सिंह बहादुर के साधन बहुत सीमित थे। मुग़लों की तुलना में उसके सैनिकों की संख्या बहुत कम थी। बंदा सिंह बहादुर की आय का मुख्य साधन लूटमार ही था। ऐसी स्थिति में मुग़लों पर पूर्ण विजय प्राप्त करना बंदा सिंह बहादुर के लिए बिल्कुल असंभव था।

2. सिखों में संगठन का अभाव (Lack of Organisation among the Sikhs)-बंदा सिंह बहादुर के अधीन सिख सैनिकों में संगठन और अनुशासन का अभाव था। वे किसी योजनानुसार लड़ाई नहीं करते थे। अतः संगठन और अनुशासन के अभाव में ऐसे सिखों का असफल होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

3. बंदा सिंह बहादुर द्वारा आदेशों का उल्लंघन (Violation of Instructions by Banda Singh Bahadur)-गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को कुछ आवश्यक आदेश दिए थे। कालांतर में उसने इनका उल्लंघन करना आरंभ कर दिया। उसने गुरु साहिब के आदेशों के विरुद्ध चंबा की राजकुमारी से विवाह करवा लिया था और शाही ठाठ से रहने लग पड़ा था। उसने ‘वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फ़तह’ के स्थान पर ‘फ़तह धर्म और फ़तह दर्शन’ के शब्दों को प्रचलित करके सिख मत में परिवर्तन लाने का प्रयास किया। फलस्वरूप, गुरु गोबिंद सिंह जी के अनेक श्रद्धालु सिख बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध हो गए।

4. फ़र्रुखसियर की सिखों के विरुद्ध कार्यवाहियाँ (Measures of Farukhsiyar against the Sikhs)1713 ई० में फ़र्रुखसियर मुग़लों का नया बादशाह बना था। वह सिखों को कुचलने के लिए पूर्ण प्रतिबद्ध था। उसने सिखों का दमन करने के लिए अब्दुस समद खाँ को लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया। अब्दुस समद खाँ ने सिखों की शक्ति का दमन करने के लिए कोई कसर न उठा रखी। परिणामस्वरूप, बंदा सिंह बहादुर और उसके साथियों को आत्म-समर्पण करना ही पड़ा।

5. गुरदास-नंगल में सिखों पर अचानक आक्रमण (Surprise attack on the Sikhs at Gurdas Nangal)-अप्रैल, 1715 ई० में बंदा सिंह बहादुर पर हुआ अचानक आक्रमण भी उनके पतन का एक प्रमुख कारण बना। बंदा सिंह बहादुर तथा उसके साथी सिख अचानक आक्रमण के कारण दुनी चंद की हवेली में घिर गए। इस हवेली में से अधिक समय तक मुग़लों का सामना नहीं किया जा सकता था। इसके बावजूद बंदा सिंह बहादुर ने 8 माह तक लड़ाई जारी रखी पर अंत में उसे पराजय स्वीकार करनी पड़ी।

6. बंदा सिंह बहादुर और बिनोद सिंह में मतभेद (Differences between Banda Singh Bahadur and Binod Singh)-गुरदास नंगल की लड़ाई के समय बंदा सिंह बहादुर और उसके साथी बिनोद सिंह में मतभेद उत्पन्न हो गए। बिनोद सिंह हवेली छोड़कर भाग निकलने के पक्ष में था। दूसरी ओर बंदा सिंह बहादुर चाहता था कि कुछ समय और लड़ाई को जारी रखा जाए। परिणामस्वरूप, बिनोद सिंह अपने साथियों सहित हवेली छोड़कर निकल गया। अतः बंदा सिंह बहादुर को पराजय का मुख देखना पड़ा।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर

प्रश्न 5.
बंदा सिंह बहादुर की आरंभिक सफलता के क्या कारण थे ?
(What were the causes of the initial success of Banda Singh Bahadur ?)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की सफलता के कारण (Causes of Banda Singh Bahadur’s Success)
बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब के सिखों का जिस योग्यता, लगन और वीरता से नेतृत्व किया उसका इतिहास में कोई और उदाहरण मिलना मुश्किल है। उसने बड़ी तीव्रता से पंजाब के विस्तृत भू-भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। बंदा सिंह बहादुर की इस आरंभिक सफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे—
1. मुगलों के घोर अत्याचार (Great Atrocities of the Mughals)-पंजाब के मुग़ल शासक सिखों के कट्टर शत्रु थे। सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ ने गुरु गोबिंद सिंह जी के विरुद्ध अनेक सैनिक अभियान भेजे। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों (जोरावर सिंह जी तथा फतह सिंह जी) को जीवित ही दीवार में चिनवा दिया था। गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों बड़े साहिबजादे (अजीत सिंह जी और जुझार सिंह जी) चमकौर साहिब की लड़ाई में उसके सैनिकों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। अतः सिखों का खून खौल रहा था। परिणामस्वरूप, वे बंदा सिंह बहादुर के झंडे अधीन एकत्र हो गए और बंदा सिंह बहादुर के लिए विजय अभियान आसान हो गया।

2. गुरु गोबिंद सिंह जी के हुक्मनामे (Hukamnamas of Guru Gobind Singh Ji)—गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर के हाथ सिख संगत के नाम कुछ हुक्मनामे’ भेजे थे। इन हुक्मनामों में गुरु साहिब ने सिख संगत को मुग़लों के विरुद्ध होने वाले धर्म युद्धों में बंदा सिंह बहादुर को पूरा सहयोग देने को कहा। सिख संगत के सहयोग के कारण बंदा सिंह बहादुर एवं उसके साथियों का उत्साह बढ़ गया।

3. औरंगजेब के कमजोर उत्तराधिकारी (Weak Successors of Aurangzeb)-1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् हुआ मुग़ल शासक बहादुर शाह उत्तराधिकारिता के युद्ध में ही उलझा रहा। अतः वह साम्राज्य में व्याप्त अराजकता को नियंत्रण में रखने में असफल रहा जबकि उसके बाद बनने वाला मुग़ल बादशाह जहाँदार शाह बहुत ही अयोग्य शासक प्रमाणित हुआ। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर ने इस स्वर्ण अवसर का उचित लाभ उठाया तथा अनेक सफलताएँ प्राप्त की।

4. बंदा सिंह बहादुर का योग्य नेतृत्व (Able leadership of Banda Singh Bahadur)-बंदा सिंह बहादुर एक निर्भीक योद्धा एवं योग्य सेनापति था। उसने सभी लड़ाइयों में सेना का स्वयं नेतृत्व किया तथा वह अपने अधीन सैनिकों को युद्ध के समय में अत्यधिक प्रोत्साहित करता था। परिणामस्वरूप, बंदा सिंह बहादुर ने अपने आरंभिक वर्षों में प्रशंसनीय सफलताएँ प्राप्त की।

5. बंदा सिंह बहादुर के प्रारंभिक आक्रमण छोटे-छोटे मुग़ल अधिकारियों के विरुद्ध थे (Banda Singh Bahadur’s early exploits were against petty local Mughal Officials)-बंदा सिंह बहादुर के प्रारंभिक आक्रमण सरहिंद को छोड़कर छोटे-छोटे मुग़ल अधिकारियों के विरुद्ध थे। ये अधिकारी अपने अत्याचारों के कारण प्रजा में बहुत बदनाम थे। फलस्वरूप, जब बंदा सिंह बहादुर ने इन प्रदेशों पर आक्रमण किये तो स्थानीय लोगों ने बंदा सिंह बहादुर को अपना समर्थन दिया। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर एक के बाद दूसरी सफलता प्राप्त करता गया।

6. बंदा सिंह बहादुर का अच्छा शासन प्रबंध (Good Administration of Banda Singh Bahadur)बंदा सिंह बहादुर ने अपने अधीन प्रदेशों में बहुत अच्छे शासन प्रबंध की व्यवस्था की थी। उसने बहुत ही योग्य एवं ईमानदार अधिकारी नियुक्त किए। उसने ज़मींदारी प्रथा को खत्म करके किसानों को न केवल ज़मींदारों के अत्याचारों से बचाया बल्कि उन्हें भूमि का स्वामी भी बना दिया। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर को पंजाब के लोगों से पूरा समर्थन मिला और इसी कारण उसे आरंभिक काल में अनेक सफलताएँ प्राप्त हुईं।

प्रश्न 6.
बंदा सिंह बहादुर की अंतिम असफलता के क्या कारण थे ?
(What were the causes of ultimate failure of Banda Singh Bahadur ?)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की अंतिम असफलता के कारण (Causes of Banda Singh Bahadur’s Ultimate Failure)
पंजाब आने के बाद बंदा सिंह बहादर ने अपने प्रारंभिक वर्षों में अनेक महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त की। परंतु शीघ्र ही उसे असफलता का मुँह देखना पड़ा। बंदा सिंह बहादुर की इस अंतिम असफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे—
1. मुगल साम्राज्य की शक्ति (Strength of the Mughal Empire)-मुग़ल साम्राज्य के पास विशाल तथा असीमित साधन थे। दूसरी ओर बंदा सिंह बहादुर के साधन बहुत सीमित थे। मुग़लों की तुलना में उसके सैनिकों की संख्या बहुत कम थी। बंदा सिंह बहादुर की आय का मुख्य साधन लूटमार ही था। ऐसी स्थिति में मुग़लों पर पूर्ण विजय प्राप्त करना बंदा सिंह बहादुर के लिए बिल्कुल असंभव था।

2. सिखों में संगठन का अभाव (Lack of Organisation among the Sikhs)-बंदा सिंह बहादुर के अधीन सिख सैनिकों में संगठन और अनुशासन का अभाव था। वे किसी योजनानुसार लड़ाई नहीं करते थे। अतः संगठन और अनुशासन के अभाव में ऐसे सिखों का असफल होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

3. बंदा सिंह बहादुर द्वारा आदेशों का उल्लंघन (Violation of Instructions by Banda Singh Bahadur)-गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को कुछ आवश्यक आदेश दिए थे। कालांतर में उसने इनका उल्लंघन करना आरंभ कर दिया। उसने गुरु साहिब के आदेशों के विरुद्ध चंबा की राजकुमारी से विवाह करवा लिया था और शाही ठाठ से रहने लग पड़ा था। उसने ‘वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फ़तह’ के स्थान पर ‘फ़तह धर्म और फ़तह दर्शन’ के शब्दों को प्रचलित करके सिख मत में परिवर्तन लाने का प्रयास किया। फलस्वरूप, गुरु गोबिंद सिंह जी के अनेक श्रद्धालु सिख बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध हो गए।

4. फ़र्रुखसियर की सिखों के विरुद्ध कार्यवाहियाँ (Measures of Farukhsiyar against the Sikhs)1713 ई० में फ़र्रुखसियर मुग़लों का नया बादशाह बना था। वह सिखों को कुचलने के लिए पूर्ण प्रतिबद्ध था। उसने सिखों का दमन करने के लिए अब्दुस समद खाँ को लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया। अब्दुस समद खाँ ने सिखों की शक्ति का दमन करने के लिए कोई कसर न उठा रखी। परिणामस्वरूप, बंदा सिंह बहादुर और उसके साथियों को आत्म-समर्पण करना ही पड़ा।

5. गुरदास-नंगल में सिखों पर अचानक आक्रमण (Surprise attack on the Sikhs at Gurdas Nangal)-अप्रैल, 1715 ई० में बंदा सिंह बहादुर पर हुआ अचानक आक्रमण भी उनके पतन का एक प्रमुख कारण बना। बंदा सिंह बहादुर तथा उसके साथी सिख अचानक आक्रमण के कारण दुनी चंद की हवेली में घिर गए। इस हवेली में से अधिक समय तक मुग़लों का सामना नहीं किया जा सकता था। इसके बावजूद बंदा सिंह बहादुर ने 8 माह तक लड़ाई जारी रखी पर अंत में उसे पराजय स्वीकार करनी पड़ी।

6. बंदा सिंह बहादुर और बिनोद सिंह में मतभेद (Differences between Banda Singh Bahadur and Binod Singh)-गुरदास नंगल की लड़ाई के समय बंदा सिंह बहादुर और उसके साथी बिनोद सिंह में मतभेद उत्पन्न हो गए। बिनोद सिंह हवेली छोड़कर भाग निकलने के पक्ष में था। दूसरी ओर बंदा सिंह बहादुर चाहता था कि कुछ समय और लड़ाई को जारी रखा जाए। परिणामस्वरूप, बिनोद सिंह अपने साथियों सहित हवेली छोड़कर निकल गया। अतः बंदा सिंह बहादुर को पराजय का मुख देखना पड़ा।

बंदा सिंह बहादुर के चरित्र तथा सफलताओं का मूल्याँकन (Estimate of Banda Singh Bahadur’s Character and Achievements)

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प्रश्न 7.
बंदा सिंह बहादुर की सफलताओं पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालें। (P.S.E.B. July 2006) (Describe in detail about the achievements of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर के चरित्र एवं उपलब्धियों का विवेचन करें। क्या वह रक्त-पिपासु मनुष्य था ?
(Assess the character and achievements. of Banda Singh Bahadur Was he a ruthless blood-sucker ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर के चरित्र तथा सफलताओं का मूल्यांकन करें।
(Form an estimate of the character and achievements of Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर एक बहुमुखी प्रतिभा का स्वामी था। वह एक वीर योद्धा, कुशल सेनापति, योग्य शासन प्रबंधक, सिख धर्म का सच्चा अनुयायी तथा पावन जीवन व्यतीत करने वाला मनुष्य था। बंदा सिंह बहादुर के चरित्र और सफलताओं का मूल्याँकन निम्नलिखित अनुसार है—
मनुष्य के रूप में (As a Man)
1. शक्ल-सूरत (Physical Appearance)—बंदा सिंह बहादुर की शक्ल-सूरत गुरु गोबिंद सिंह जी से काफी हद तक मिलती-जुलती थी। उसका शरीर पतला, कद मध्यम और रंग गेहुँआ था। वस्तुतः उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावपूर्ण था कि उसके शत्रु भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे।

2. वीर और साहसी (Brave and Bold)—बंदा सिंह बहादुर को इतिहास में उसकी वीरता और साहस के कारण ही प्रसिद्धि प्राप्त है। बड़े-से-बड़े संकट में भी वह घबराता नहीं था। लोहगढ़ के दुर्ग में जब वह घिर गया था तथा गुरदास-नंगल की लड़ाई में उसने अपने अद्वितीय साहस का प्रमाण दिया। उसका संपूर्ण जीवन ही उसकी बहादुरी के कारनामों से भरा पड़ा है।

3. सिख धर्म का सच्चा अनुयायी (A true follower of Sikhism)-बंदा सिंह बहादुर का सिख धर्म में बहुत दृढ़ विश्वास था। वह सिख धर्म का सच्चा अनुयायी था। शासन संभालने पर उसने गुरु नानक साहिब एवं गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम पर सिक्के जारी किये। इस प्रकार उसने सिख धर्म का प्रचार किया।

4. सहिष्णु (Tolerant)-चारित्रिक रूप में बंदा सिंह बहादुर की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णुपन था। उसने अपने धर्म के प्रचार के लिए कोई अत्याचार नहीं किया। उसकी मुग़लों के साथ लड़ाई भी अत्याचार के विरुद्ध थी। उसकी अपनी सेना में अनेक मुसलमान भर्ती थे और उन्हें पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर धार्मिक रूप से पूर्ण सहिष्णु था।

5. उच्च आचरण (High Character)-बंदा सिंह बहादुर का आचरण बहुत उज्ज्वल था। वह बड़ा सरल तथा पवित्र जीवन व्यतीत करता था। वह शराब, माँस और अन्य मादक द्रव्यों का प्रयोग नहीं करता था। वह महिलाओं का बहुत सम्मान करता था। उसने सिखों को यह आदेश दिया था, कि वे लड़ाई के समय भी महिलाओं से किसी प्रकार की अभद्रता न करें।

योद्धा तथा सेनापति के रूप में (As a Warrior and General)
बंदा सिंह बहादुर अपने समय का एक महान् योद्धा तथा उच्च कोटि का सेनापति था। उसने अपने सीमित साधनों के बावजूद महान् मुग़ल साम्राज्य के साथ करारी टक्कर ली । उसने मुग़लों के साथ हुई लड़ाइयों में शानदार सफलताएँ प्राप्त की। वह युद्ध-चालों में बहुत प्रवीण था तथा आवश्यकता पड़ने पर पीछे हटने में अपना अपमान नहीं समझता था। वह शत्रु के कमज़ोर पक्ष पर अचानक आक्रमण करके अपनी विजय सुनिश्चित कर लेता था। वह युद्ध के मैदान को अपनी सुविधा के अनुसार चुनता और इस प्रकार अपनी स्थिति को दृढ़ कर लेता था। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर ने अपनी प्रत्येक लड़ाई में विजय प्राप्त की। प्रसिद्ध इतिहासकार एस० एस० गाँधी का कहना बिल्कुल ठीक है, “वह (बंदा सिंह बहादुर) उच्च कोटि का योद्धा तथा सेनापति था।”2

प्रशासक के रूप में (As an Administrator)
बंदा सिंह बहादुर एक उच्चकोटि का प्रशासक भी था। उसने अपने जीते हुए प्रदेशों में उचित प्रशासनिक व्यवस्था की। उसने खालसा के नाम पर शासन किया। उसने अपने राज्य में मुसलमान कर्मचारियों को हटा दिया क्योंकि वे भ्रष्ट हो चुके थे और उनकी जगह योग्य हिंदुओं तथा सिखों को नियुक्त किया। निम्न वर्गों के लोगों को भी उच्च पदों पर नियुक्त किया गया। बंदा सिंह बहादुर ने अपने राज्य में ज़मींदारी प्रथा का भी अंत कर दिया। इससे किसान भूमि के स्वामी बन गए। बंदा सिंह बहादुर अपने निष्पक्ष न्याय के कारण भी बहुत विख्यात था। न्याय करते समय वह किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करता था। प्रसिद्ध लेखक हरबंस सिंह का कहना बिल्कुल सही
“बंदा सिंह बहादुर का शासन यद्यपि अल्पकालिक रहा, परंतु इसका पंजाब के इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा।”3

2. “He was a warrior and a general of the highest order.” S. S. Gandhi, Struggle of the Sikhs for Sovereignty (Delhi : 1980) p. 33.
3. Banda Singh’s rule, though short-lived, had a far reaching impact on the history of the Punjab.” Harbans Singh, The Heritage of the Sikhs (New Delhi : 1983) p. 118.

संगठनकर्ता के रूप में
(As an Organiser)
जब बंदा सिंह बहादुर नांदेड़ से पंजाब आया था तो उसके साथ केवल 25 सिख थे। शीघ्र ही उसने अपने ध्वज के नीचे हज़ारों सिखों को एकत्र कर लिया। उसने नई भावना उत्पन्न करके उन्हें शक्तिशाली मुग़ल साम्राज्य से टक्कर लेने के लिए तैयार किया। बंदा सिंह बहादुर ने अल्पकाल में ही मुग़ल साम्राज्य की नींव को हिला कर रख दिया। शीघ्र ही बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब में एक स्वतंत्र सिख राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि बंदा सिंह बहादुर में महान् संगठनकर्ता के सभी गुण विद्यमान् थे।

बंदा सिंह बहादुर का इतिहास में स्थान (Banda Singh Bahadur’s Place in History)
बंदा सिंह बहादुर को पंजाब के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उसने अल्पकाल में ही मुग़लों के शक्तिशाली साम्राज्य की नींव को हिला कर रख दिया। उसने मुग़लों के अजय होने के भ्रम को भंग कर दिया। उसने सिखों में स्वतंत्रता की नई भावना उत्पन्न की। बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब से ज़मींदारी प्रथा को समाप्त करके एक क्रांतिकारी पग उठाया। उसने निम्न जातियों को शासन प्रबंध के उच्च पद देकर एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया। इस प्रकार अपनी महान् उपलब्धियों के कारण बंदा सिंह बहादुर का इतिहास में एक प्रमुख स्थान है।
डॉक्टर राजपाल सिंह के शब्दों में,
“निस्संदेह बंदा सिंह बहादुर 18वीं शताब्दी के महान् नेताओं में से एक था। वास्तव में उसका नाम स्वतंत्रता, निष्ठा एवं शहीदी का प्रतीक बन गया।”4
एक अन्य विख्यात इतिहासकार डॉक्टर जी० एस० दियोल के अनुसार,
“18वीं शताब्दी के पंजाब के इतिहास में बंदा बहादुर को विशेष स्थान प्राप्त है।”5

4. ‘No doubt, Banda Bahadur emerges as one of the most outstanding leaders that produced in the eighteenth century……… In fact, his name has come to symbolize freedom, dedication and sacrifice.” Dr. Raj Pal Singh, Banda Bahadur and His Times (New Delhi : 1998) p. XIII.
5. “Banda Bahadur occupies a significant place in the history of the Punjab of the 18th century.” Dr. G. S. Deol, Banda Bahadur (Jalandhar : 1972) p. 7.

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संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर के बचपन का नाम क्या था ? वह बैरागी क्यों बना ? (What was Banda Singh Bahadur’s childhood name ? Why did he become a Bairagi ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर के आरंभिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Describe briefly the early life of Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर के बचपन का नाम लक्ष्मण देव था। उसे बचपन से ही शिकार खेलने का शौक था। एक दिन वह जंगल में शिकार खेलने के लिए गया। उसने वहाँ पर एक ऐसी हिरणी को तीर मारा जो गर्भवती थी। जब लक्ष्मण देव ने उस हिरणी का पेट चीरा तो उसके पेट से दो बच्चे निकले। वे भी उसकी आँखों के सामने तड़पतड़प कर मर गए। इस दर्दनाक दृश्य का लक्ष्मण देव के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वह जानकी प्रसाद नाम के एक साधु से प्रभावित होकर बैरागी बन गया।

प्रश्न 2.
बंदा बैरागी कौन था ? वह सिख कैसे बना ?
(Who was Banda Bairagi ? How did he become a Sikh ?)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर जिसका बचपन का नाम लक्ष्मण देव था, कश्मीर के जिला पुंछ के राजौरी गाँव का रहने वाला था। एक दिन गर्भवती हिरणी को मारने के कारण उसके दिल पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप वह बैरागी बन गया। उसने अपना नाम बदल कर माधो दास रख लिया। उसने 1708 ई० में नंदेड़ में उसकी भेंट गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ हुई। माधो दास गुरु साहिब के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुआ और वह सिख बन गया।

प्रश्न 3.
गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को पंजाब भेजते समय क्या कार्यवाही की तथा उसे क्या आदेश दिए ?
(What action and orders were given to Banda Singh Bahadur by Guru Gobind Singh Ji before sending him to Punjab ?)
उत्तर-
गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को पंजाब भेजने से पूर्व अपने पाँच तीर दिए और उसकी सहायता के लिए पाँच प्यारे तथा 20 अन्य बहादुर सिखों को साथ भेजा। इसके अतिरिक्त गुरु साहिब ने पंजाब के सिखों के नाम कुछ हक्मनामे भी दिए। गुरु साहिब ने बंदा सिंह बहादुर को ब्रह्मचारी जीवन व्यतीत करना, सदा सत्य बोलना, नया धर्म नहीं चलाना, अपनी विजयों पर अहंकार नहीं करना, स्वयं को खालसा का सेवक समझना और उनकी इच्छाओं के अनुसार आचरण करने का आदेश दिया।

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प्रश्न 4.
बंदा सिंह बहादुर ने सिखों का राज्य किस तरह स्थापित किया ?
(How did Banda Singh Bahadur set up the Sikh empire ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर ने सिख राज्य की स्थापना कैसे की ?
(How did Banda Singh Bahadur establish the Sikh State ?)
उत्तर-
गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को पंजाब में मुग़लों के विरुद्ध सिखों का नेतृत्व करने का आदेश दिया। जब बंदा सिंह बहादुर नांदेड़ से पंजाब पहुँचा तो सिखों ने उसे बढ़-चढ़ कर सहयोग दिया। रास्ते में बंदा सिंह बहादुर ने कैथल, समाना, कपूरी और सढौरा को लूटा और बहुत-से मुसलमानों की हत्या कर दी। 12 मई, 1710 ई० में चप्पड़चिड़ी की भयंकर लड़ाई में सरहिंद का फ़ौजदार वज़ीर खाँ मारा गया। सरहिंद की विजय बंदा सिंह बहादुर की एक बहुत बड़ी सफलता थी। उसने लोहगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। उसने नए सिक्के चलाकर स्वतंत्र सिख राज्य की स्थापना की।

प्रश्न 5.
बंदा सिंह बहादुर के सैनिक कारनामों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए । (Give a brief account of the military exploits of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की किन्हीं तीन सैनिक विजयों की चर्चा करें। (Describe any three military conquests of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की तीन मुख्य सैनिक सफलताओं का वर्णन करो । (Describe the three major military achievements of Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-

  1. बंदा सिंह बहादुर ने अपनी विजयों का आरंभ 1709 ई० में सोनीपत से किया। बंदा सिंह बहादुर ने इसे सुगमता से जीत लिया था।
  2. बंदा सिंह बहादुर ने नवंबर, 1709 ई० में समाना पर आक्रमण करके दस हज़ार मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया ।
  3. बंदा सिंह बहादुर ने कपूरी पर आक्रमण करके वहाँ के अत्याचारी शासक कदमऊद्दीन को मौत के घाट उतार दिया।
  4. सढौरा का शासक उसमान खाँ भी अपने अत्याचारों के कारण बहुत बदनाम था। बंदा सिंह बहादुर ने उसे एक अच्छा सबक सिखाया
  5. बंदा सिंह बहादुर ने 12 मई, 1710 ई० को चप्पड़चिड़ी नामक स्थान पर वज़ीर खाँ को पराजित कर सरहिंद पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 6.
बंदा सिंह बहादुर की सढौरा विजय पर एक संक्षिप्त नोट लिखें । (Write a short note on the conquest of Sadhaura by Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
सढौरा का शासक उस्मान खाँ अपने अत्याचारों के लिए कुख्यात था। उस क्षेत्र में कोई भी हिंदू स्त्री ऐसी नहीं जिसे उसने अपमानित न किया हो। वह हिंदुओं को धार्मिक उत्सव मनाने नहीं देता था। उसने पीर बुद्ध शाह की हत्या करवा दी। बंदा सिंह बहादुर ने इन अपमानों का प्रतिशोध लेने के लिए सढौरा पर आक्रमण कर दिया। यहाँ पर मुसलमानों को इतनी बड़ी संख्या में मौत के घाट उतारा गया कि सढौरा का नाम कत्लगढ़ी पड़ गया।

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प्रश्न 7.
बंदा सिंह बहादुर की सरहिंद की विजय पर संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on the conquest of Sirhind by Banda Singh Bahadur.).
अथवा
चप्पड़चिड़ी की लड़ाई का संक्षेप में वर्णन करें।
(Give a brief accoúnt of battle of Chapparchiri.)
उत्तर-
सिखों में सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ के विरुद्ध भारी रोष था। उस ने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों-साहिबजादा जोरावर सिंह जी और साहिबज़ादा फ़तह सिंह जी को जीवित ही दीवार में चिनवा दिया था। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर ने 12 मई, 1710 ई० को चप्पड़चिड़ी नामक स्थान पर वज़ीर खाँ पर आक्रमण कर दिया। यह लड़ाई बड़ी भयानक थी। वज़ीर खाँ के मरते ही उसकी सेना में भगदड़ मच गई। इस लड़ाई में सिख विजयी रहे। इस महत्त्वपूर्ण विजय के कारण सिखों के उत्साह में बहुत वृद्धि हुई।

प्रश्न 8.
बंदा सिंह बहादुर की लोहगढ़ लड़ाई पर एक संक्षिप्त नोट लिखो। (Write a short note on the battle of Lohgarh by Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की बढ़ती हुई शक्ति मुग़लों के लिए एक चुनौती थी। इसलिए मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ने बंदा सिंह बहादुर की शक्ति का दमन करने का निर्णय किया। इस उद्देश्य से उसने अपने एक सेनापति मुनीम खाँ के अधीन 60,000 सैनिकों की एक विशाल सेना पंजाब भेजी। इस सेना ने 10 दिसंबर, 1710 ई० को लोहगढ़ पर अचानक आक्रमण कर दिया। लोहगढ़ बंदा सिंह बहादुर की राजधानी थी। खाद्य-पदार्थों की कमी के कारण सिखों के लिए इस लड़ाई को अधिक समय तक जारी रखना असंभव था। बंदा सिंह बहादुर वेश बदलकर दुर्ग से बच निकलने में सफल हो गया।

प्रश्न 9.
गुरदास नंगल की लड़ाई पर एक संक्षेप नोट लिखें।
(Write a short note on the battle of Gurdas Nangal.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर एवं मुग़लों के मध्य हुई गुरदास नंगल की लड़ाई का संक्षिप्त वर्णन कीजिए ।
(Give a brief account of the battle of Gurdas Nangal fought between Banda Singh Bahadur and the Mughals.)
उत्तर-
अब्दुस समद खाँ ने अप्रैल, 1715 ई० में बंदा सिंह बहादुर को गुरदास नंगल के स्थान पर घेर लिया। धीरे-धीरे खान-पान की सामग्री समाप्त होने पर सिखों की स्थिति दयनीय हो गई । ऐसे समय में बाबा विनोद सिंह ने बंदा सिंह बहादुर को दूनी चंद की हवेली से भाग निकलने का परामर्श दिया। परंतु बंदा सिंह बहादुर ने इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप, विनोद सिंह अपने साथियों को लेकर गढ़ी छोड़कर भाग निकला। विवश होकर बंदा सिंह बहादुर को अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी।

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प्रश्न 10.
बंदा सिंह बहादुर को कब, कहाँ तथा कैसे शहीद किया गया ?
(When, where and how was Banda Singh Bahadur martyred ?)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर और कुछ अन्य सिखों को बंदी बनाने के बाद अब्दुस समद खाँ ने इन सिखों को फरवरी, 1716 ई० में दिल्ली भेजा। दिल्ली में इनका जुलूस निकाला गया। मार्ग में उनका भारी अपमान किया गया। उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए कहा गया, परंतु सिखों ने इंकार कर दिया। अतः प्रतिदिन 100 सिखों को शहीद किया जाने लगा। अंत में 9 जून, 1716 ई० को बंदा सिंह बहादुर की बारी आई। उसे शहीद करने से पूर्व जल्लाद ने उसके चार वर्ष के पुत्र अजय सिंह की उसकी आँखों के सामने निर्ममता से हत्या कर दी। अंत में बंदा सिंह बहादुर का अंग-अंग काटकर उन्हें शहीद किया गया।

प्रश्न 11.
बंदा सिंह बहादुर की आरंभिक सफलताओं के कारणों का उल्लेख करो। (Mention the causes of early success of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की आरंभिक सफलता के क्या कारण थे ? (What were the main causes of early success of Banda Singh Bahadur ?)
उत्तर-

  1. पंजाब के मुग़ल शासकों द्वारा सिखों पर किए गए घोर अत्याचारों के कारण पंजाब के लोगों ने बंदा सिंह बहादुर को हर प्रकार का सहयोग दिया।
  2. गुरु गोबिंद सिंह जी की अपील पर सिखों ने बंदा सिंह बहादुर को पूर्ण सहयोग दिया।
  3. औरंगज़ेब के उत्तराधिकारी बहुत अयोग्य थे । परिणामस्वरुप वे बंदा सिंह बहादुर की बढ़ती हुई शक्ति की ओर ध्यान न दे सके।
  4. बंदा सिंह बहादुर ने एक उच्च कोटिं के शासन प्रबंध की स्थापना की थी।
  5. पंजाब के पहाड़ भी बंदा सिंह बहादुर की आरंभिक सफलताओं में सहायक सिद्ध हुए।

प्रश्न 12.
अंत में बंदा सिंह बहादुर की असफलता के क्या कारण थे ? (What were the causes of final failure of Banda Singh Bahadur ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की असफलता के कारणों का वर्णन करें।
(Mention the causes of ultimate failure of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की असफलता का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(Describe in brief the failure of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की असफलता के कोई तीन कारण बताएँ। (Give any three causes of the failure of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की अंतिम असफलता के क्या कारण थे ?
(What were the causes of final failure of Banda Singh Bahdur.)
उत्तर-

  1. मुग़ल साम्राज्य का अत्यंत शक्तिशाली होना बंदा सिंह बहादुर की असफलता का एक मुख्य कारण बना।
  2. बंदा सिंह बहादुर ने गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा दिए गए निर्देशों का उल्लंघन आरंभ कर दिया था।
  3. पंजाब के हिंदू राजाओं तथा ज़मींदारों ने बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध सरकार को अपना सहयोग दिया।
  4. पंजाब के सूबेदार अब्दुस समद खाँ ने बंदा सिंह बहादुर की शक्ति कुचलने में कोई प्रयास नहीं छोड़ा।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर

प्रश्न 13.
बंदा सिंह बहादुर के व्यक्तित्व की विशेषताएँ बताएँ । (Describe traits of Banda Singh Bahadur’s personality.)
उत्तर-

  1. बंदा सिंह बहादुर बड़ा ही निडर और साहसी था । बड़ी से बड़ी मुसीबत आने पर भी घबराता नहीं था ।
  2. वह सिख धर्म का सच्चा सेवक था । उसने अपनी सफलताओं को गुरु साहिब का वरदान माना।
  3. बंदा सिंह बहादुर एक महान् सेनापति था। अपने सीमित साधनों के बावजूद उसने मुग़ल शासकों को नानी याद करवा दी थी।
  4. बंदा सिंह बहादुर एक योग्य शासक भी था। उसने अपने जीते हुए प्रदेशों में बहुत अच्छे शासन प्रबंध की व्यवस्था की थी ।

प्रश्न 14.
एक योद्धा और सेनापति के रूप में बंदा सिंह बहादुर की सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन करो। (Describe briefly the achievements of Banda Singh Bahadur as a warrior and general.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर का एक वीर योद्धा तथा सेनापति के रूप में मूल्यांकन करें।
(Explain the main contribution of Banda Singh Bahadur as a brave warrior and great military general.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर एक महान् योद्धा और उच्चकोटि का सेनापति था। बंदा सिंह बहादुर के साधन मुग़लों के मुकाबले नाममात्र थे, परंतु उसने अपनी योग्यता के बल पर 7-8 वर्ष मुग़ल सेना के नाक में दम कर रखा था। उसने जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ीं, लगभग सभी में उसने बड़ी शानदार सफलताएँ प्राप्त की। युद्ध के मैदान में वह बड़ी तीव्रता से स्थिति का अनुमान लगा लेता था और अवसर अनुसार अपना निर्णय तुरंत कर लेता था। वह युद्ध की चालों में बड़ा निपुण था। वह युद्ध तभी शुरू करता था जब उसे विजय की पूर्ण आशा होती थी।

प्रश्न 15.
एक प्रशासक के रूप में बंदा सिंह बहादुर की सफलताओं की संक्षिप्त जानकारी दें।
(Write briefly about Banda Singh Bahadur’s achievements as an administrator.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर ने अपने विजित प्रदेशों में अच्छे शासन प्रबंध की व्यवस्था की। उसने खालसा के नाम से शासन किया और अपने राज्य में गुरु साहिब द्वारा दर्शाए गए नियमों को लागू करने का यत्न किया। उसने अपने राज्य में भ्रष्ट कर्मचारियों को हटाकर बड़े योग्य और ईमानदार व्यक्तियों को नियुक्त किया। निर्धनों और निम्न जाति के लोगों को उच्च पदों पर लगाकर उनको एक नया सम्मान दिया। बंदा सिंह बहादुर ने ज़मींदारी प्रथा का अंत करके एक अत्यंत सराहनीय कार्य किया।

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प्रश्न 16.
बंदा सिंह बहादुर को पंजाब के इतिहास में आप क्या स्थान देते हैं ?
(What place would you assign to Banda Singh Bahadur in the History the Punjab ?)
अथवा
पंजाब के इतिहास में बंदा सिंह बहादुर को क्या स्थान प्राप्त है ? (What is the place of Banda Singh Bahadur in the History of the Punjab ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की सिखों को मुख्य देन क्या है ?
(What is the main contribution of Banda Singh Bahadur to Sikhs ?) .
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर को पंजाब के इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त है। वह एक महान् योद्धा, वीर सेनापति, योग्य प्रशासक तथा उच्च कोटि का नेता था। वह पहला व्यक्ति था जिसने सिखों को अत्याचारियों का मुकाबला करने तथा स्वतंत्रता के लिए मर मिटने का पाठ पढ़ाया। उसने मुग़लों के अजेय होने के जादू को तोड़ा। बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब से ज़मींदारी प्रथा को समाप्त करके एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी पग उठाया। उसने निर्धनों और निम्न वर्ग के लोगों को शासन प्रबंध में ऊँचे पद देकर एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न A (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर-
27 अक्तूबर, 1676 ई०।।

प्रश्न 2.
बंदा सिंह बहादुर का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर-
राजौरी।

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प्रश्न 3.
बंदा सिंह बहादुर का आरंभिक नाम क्या था ?
अथवा
बंदा सिंह बहादुर का बचपन का क्या नाम था ?
उत्तर-
लक्ष्मण देव।

प्रश्न 4.
बंदा सिंह बहादुर के पिता का क्या नाम था ?
उत्तर-
रामदेव।

प्रश्न 5.
बंदा सिंह बहादुर का वैराग्य धारण करने के पश्चात् क्या नाम पड़ा ?
अथवा
बैरागी बनने के पश्चात् बंदा सिंह बहादुर ने अपना नाम क्या रखा ?
उत्तर-
माधो दास।

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प्रश्न 6.
बंदा सिंह बहादुर बैरागी क्यों बना ?
अथवा
बंदा सिंह बहादुर के आरंभिक जीवन की कौन-सी घटना थी जिसने उसे वैरागी बना दिया ?
अथवा
किस घटना ने बंदा सिंह बहादुर के जीवन को परिवर्तित किया ?
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर ने एक ऐसी हिरणी को मार दिया था जो गर्भवती थी।

प्रश्न 7.
गुरु गोबिंद सिंह जी को बंदा सिंह बहादुर कहाँ मिला था ?
उत्तर-
नांदेड़ में।

प्रश्न 8.
बंदा सिंह बहादुर का यह नाम क्यों पड़ा ?
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर को यह नाम गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा दिया गया था।

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प्रश्न 9.
बंदा सिंह बहादुर ने अपने सैनिक कारनामों का आरंभ कब किया ?
उत्तर-
1709 ई०।

प्रश्न 10.
बंदा सिंह बहादुर ने अपने सैनिक कारनामों का आरंभ कहाँ से किया था ?
उत्तर-
सोनीपत।

प्रश्न 11.
बंदा सिंह बहादुर की पहली महत्त्वपूर्ण विजय कौन-सी थी ?
उत्तर-
समाना।

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प्रश्न 12.
बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा पर आक्रमण क्यों किया ?
उत्तर-
क्योंकि यहाँ का शासक उस्मान खाँ अपने अत्याचारों के लिए बहुत कुख्यात था।

प्रश्न 13.
बंदा सिंह बहादुर ने क्या नारा दिया ?
उत्तर-
फ़तेह धर्म, फ़तेह दर्शन।

प्रश्न 14.
बंदा सिंह बहादुर की सबसे महत्त्वपूर्ण विजय कौन-सी थी ?
उत्तर-
सरहिंद।

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प्रश्न 15.
बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद कब विजय किया ?
अथवा
चप्पड़चिड़ी की लड़ाई कब हुई ?
उत्तर-
12 मई, 1710 ई०

प्रश्न 16.
बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद पर आक्रमण क्यों किया?’
उत्तर-
क्योंकि यहाँ का फ़ौजदार वज़ीर खाँ सिखों का घोर शत्रु था।

प्रश्न 17.
वज़ीर खाँ कौन था ?
उत्तर-
सरहिंद का फ़ौजदार।

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प्रश्न 18.
सरहिंद की लड़ाई में बंदा सिंह बहादुर ने किसे पराजित किया था ?
उत्तर-
वज़ीर खाँ को।

प्रश्न 19.
बंदा सिंह बहादुर ने अपनी राजधानी का क्या नाम रखा ?
उत्तर-
लोहगढ़।

प्रश्न 20.
बंदा सिंह बहादुर ने किस राज्य की राजकुमारी के साथ विवाह किया ?
उत्तर-
चंबा।

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प्रश्न 21.
बंदा सिंह बहादुर के पुत्र का क्या नाम था ?
उत्तर-
अजय सिंह।

प्रश्न 22.
बंदा सिंह बहादुर और मुग़लों के बीच हुई अंतिम लड़ाई कौन-सी थी ?
उत्तर-
गुरदास नंगल।

प्रश्न 23.
बंदा सिंह बहादुर की मुग़लों से अंतिम लड़ाई में मुग़ल सेना का नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर-
अब्दुस समद खाँ।

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प्रश्न 24.
गुरदास नंगल का युद्ध कब हुआ ?
उत्तर-
1715 ई०।

प्रश्न 25.
बंदा सिंह बहादुर को किसने शहीद करवाया था?
उत्तर-
अब्दुस समद खाँ।

प्रश्न 26.
बंदा सिंह बहादुर को कब शहीद किया गया था ?
उत्तर-
9 जून, 1716 ई०।

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प्रश्न 27.
बंदा सिंह बहादुर को कहाँ शहीद किया गया था ?
उत्तर-
दिल्ली।

प्रश्न 28.
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के समय किस मुगल बादशाह का शासन था ?
उत्तर-
फर्रुखसियर

प्रश्न 29.
बंदा सिंह बहादुर ने किस प्रथा को समाप्त किया ?
उत्तर-
ज़मींदारी प्रथा।

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प्रश्न 30.
बंदा सिंह बहादुर की प्रारंभिक सफलता का कोई एक कारण बताओ।
उत्तर-
मुग़लों के घोर अत्याचारों के कारण पंजाब के लोग बंदा सिंह बहादुर के झंडे तले इकट्ठे हुए।

प्रश्न 31.
बंदा सिंह बहादुर की असफलता का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर के साधन मुग़लों की तुलना में बहुत सीमित थे

प्रश्न 32.
बंदा सिंह बहादुर ने किस नाम के सिक्के जारी किए ?
उत्तर-
नानकशाही तथा गोबिंदशाही।

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प्रश्न 33.
बंदा सिंह बहादुर की सिखों को मुख्य देन क्या थी ?
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर ने सिखों को राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रथम सबक सिखाया।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर का जन्म …… में हुआ।
उत्तर-
(1670 ई०)

प्रश्न 2.
बंदा सिंह बहादुर का जन्म ……… गाँव में हुआ था।
उत्तर-
(राजौरी)

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प्रश्न 3.
बंदा सिंह बहादुर के पिता का नाम …….. था।
उत्तर-
(रामदेव)

प्रश्न 4.
बंदा सिंह बहादुर का आरंभिक नाम …… था।
उत्तर-
(लक्ष्मण देव)

प्रश्न 5.
…….. के शिकार ने बंदा सिंह बहादुर के जीवन को एक नई दिशा प्रदान की।
उत्तर-
(एक हिरनी)

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प्रश्न 6.
जानकी प्रसाद नामक एक वैरागी ने लक्ष्मण देव का नाम बदल कर …… रख दिया।
उत्तर-
(माधो दास)

प्रश्न 7.
1708 ई० में बंदा सिंह बहादुर की गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ ……. में मुलाकात हुई।
उत्तर-
(नंदेड़)

प्रश्न 8.
गुरु गोबिंद सिंह जी ने माधो दास को …… का नाम दिया।
उत्तर-
(बंदा सिंह बहादुर)

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प्रश्न 9.
बंदा सिंह बहादुर ने अपनी विजयों का आरंभ ………. से किया।
उत्तर-
(सोनीपत)

प्रश्न 10.
बंदा सिंह बहादुर ने ………. में सोनीपत को विजय किया।
उत्तर-
(1709 ई०)

प्रश्न 11.
बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा के शासक …….. को एक कड़ी पराजय दी।
उत्तर-
(उस्मान खाँ)

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प्रश्न 12.
बंदा सिंह बहादुर के समय सरहिंद का फ़ौजदार …… था।
उत्तर-
(वजीर खाँ)

प्रश्न 13.
बंदा सिंह बहादुर ने ……… को सरहिंद का शासक नियुक्त किया।
उत्तर-
(बाज़ सिंह)

प्रश्न 14.
बंदा सिंह बहादुर की राजधानी का नाम …….. था।
उत्तर-
(लोहगढ़)

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प्रश्न 15.
बंदा सिंह बहादुर ने …….. को अपनी राजधानी बनाया।
उत्तर-
(लोहगढ़)

प्रश्न 15.
गुरदास नंगल की लड़ाई …….. में हुई।
उत्तर-
(1715 ई०)

प्रश्न 16.
बंदा सिंह बहादुर को …….. में शहीद किया गया।
उत्तर-
(दिल्ली)

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प्रश्न 17.
बंदा सिंह बहादुर को……..में शहीद किया गया।
उत्तर-
(1716 ई०)

प्रश्न 18.
………ने सिख कौम के पहले सिक्के जारी किए।
उत्तर-
(बंदा सिंह बहादुर)

(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर का जन्म 27 अक्तूबर, 1670 ई० को हुआ था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 2.
बंदा सिंह बहादुर का जन्म राजौरी में हुआ।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 3.
बंदा सिंह बहादुर के पिता जी का नाम लक्ष्मण देव था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 4.
बंदा सिंह बहादुर के बचपन का नाम रामदेव था।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 5.
जानकी प्रसाद नामक एक बैरागी ने लक्ष्मण देव का नाम बदल कर माधो दास रख दिया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 6.
गुरु गोबिंद सिंह जी बंदा सिंह बहादुर को दिल्ली में मिले थे।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 7.
बंदा सिंह बहादुर ने अपनी विजयों का आरंभ 1709 ई० में सोनीपत से किया था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 8.
बंदा सिंह बहादुर ने कंपूरी में कदमुद्दीन को हराया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 9.
बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा के शासक उस्मान खाँ को करारी हार दी थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 10.
बंदा सिंह बहादुर की सबसे महत्त्वपूर्ण विजय रोपड़ की थी।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 11.
बंदा सिंह बहादुर ने 1710 ई० में सरहिंद पर विजय प्राप्त की थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
बंदा सिंह बहादुर के समय सरहिंद का फ़ौजदार वजीर खाँ था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 13.
बंदा सिंह बहादुर ने लोहगढ़ को अपने राज्य की राजधानी बनाया था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 14.
गुरदास नंगल की लड़ाई 1715 ई० में लड़ी गई थी। ”
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 15.
बंदा सिंह बहादुर को 1716 ई० में शहीद किया गया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 16.
बंदा सिंह बहादुर को लाहौर में शहीद किया गया था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 17.
बंदा सिंह बहादुर पंजाब का पहला ऐसा शासक था जिसने सिख सिक्के जारी किए।
उत्तर-
ठीक

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(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर का जन्म कब हुआ ?
(i) 1625 ई० में
(ii) 1660 ई० में
(iii) 1670 ई० में
(iv) 1675 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 2.
बंदा सिंह बहादुर का जन्म कहाँ हुआ ?
(i) राजगढ़ में
(ii) राजौरी में
(iii) सढौरा में
(iv) नांदेड़ में।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 3.
बंदा सिंह बहादुर का आरंभिक नाम क्या था ?
(i) लक्ष्मण देव
(ii) राम देव
(iii) माधो दास
(iv) ग़रीब दास।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 4.
बंदा सिंह बहादुर के पिता का क्या नाम था ?
(i) नाम देव
(ii) राम देव
(iii) सहदेव
(iv) लक्ष्मण देव।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 5.
बंदा सिंह बहादुर बैरागी क्यों बना ?
(i) एक गर्भवती हिरणी को मारने के कारण
(ii) एक गर्भवती शेरनी को मारने के कारण
(iii) एक गर्भवती हथनी को मारने के कारण
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 6.
बैरागी बनने के बाद बंदा सिंह बहादुर ने अपना क्या नाम रखा ?
(i) लक्ष्मण देव
(ii) माधो दास
(ii) जानकी प्रसाद
(iv) औघड़ नाथ।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 7.
बंदा सिंह बहादुर की गुरु गोबिंद सिंह जी से भेंट कहाँ हुई थी ?
(i) श्री आनंदपुर साहिब
(ii) अमृतसर
(iii) गोइंदवाल साहिब
(iv) नांदेड़।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 8.
गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को पंजाब क्यों भेजा ?
(i) सिख राज की स्थापना के लिए
(ii) मुग़लों के अत्याचारों का बदला लेने के लिए
(iii) अफ़गानों के अत्याचारों का बदला लेने के लिए
(iv) उपरोक्त सी।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 9.
बंदा सिंह बहादुर ने अपने सैनिक कारनामों का आरंभ कब किया ?
(i) 1708 ई० में
(ii) 1709 ई० में
(iii) 1710 ई० में
(iv) °1715 ई० में।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 10.
बंदा सिंह बहादुर ने अपने सैनिक कारनामों का आरंभ कहाँ किया ?
(i) पानीपत से
(ii) सोनीपत से
(iii) समाना से
(iv) कपूरी से।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 11.
बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा के किस शासक को पराजित किया था ?
(i) रहमत खाँ
(ii) जकरिया खाँ
(iii) उस्मान खाँ
(iv) वज़ीर खाँ।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 12.
बंदा सिंह बहादुर की सबसे महत्त्वपूर्ण विजय कौन-सी थी ?
(i) सढौरा की
(ii) लोहगढ़ की
(iii) रोपड़ की
(iv) सरहिंद की।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 13.
वज़ीर खाँ कहाँ का मुग़ल सूबेदार था ?
(i) समाना
(ii) सोनीपत
(iii) सरहिंद
(iv) गुरदास नंगल।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 14.
बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद पर कब विजय प्राप्त की थी ?
(i) 1708 ई० में
(ii) 1709 ई० में
(iii) 1710 ई० में
(iv) 1712 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 15.
बंदा सिंह बहादुर की राजधानी का क्या नाम था ?
(i) लोहगढ़
(ii) गुरदास नंगल
(iii) अमृतसर
(iv) कलानौर।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 16.
बंदा सिंह बहादुर ने किस राज्य की राजकुमारी के साथ विवाह किया ?
(i) बिलासपुर
(ii) चंबा
(iii) मंडी
(iv) कुल्लू।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 17.
बंदा सिंह बहादुर के पुत्र का क्या नाम था ?
(i) अजय सिंह
(ii) अभय सिंह
(iii) दया सिंह
(iv) बिनोद सिंह।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 18.
गुरदास नंगल की लड़ाई कब हुई ?
(i) 1709 ई० में
(ii) 1710 ई० में
(iii) 1712 ई० में
(iv) 1715 ई० में।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 19.
बंदा सिंह बहादुर को कहाँ शहीद किया गया था ?
(i) दिल्ली में
(ii) लाहौर में
(iii) मुलतान में
(iv) अमृतसर में।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 20.
बंदा सिंह बहादुर को कब शहीद किया गया ?
(i) 1714 ई० में
(ii) 1715 ई० में
(iii) 1716 ई० में
(iv) 1718 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 21.
बंदा सिंह बहादुर को किस मुग़ल बादशाह के आदेश पर शहीद किया गया था ?
(i) औरंगजेब
(ii) बहादुर शाह प्रथम
(iii) जहाँदार शाह
(iv) फर्रुखसियर।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 22.
बंदा सिंह बहादुर की प्रारंभिक सफलता का क्या कारण था ?
(i) बंदा सिंह बहादुर का अच्छा शासन प्रबंध
(ii) औरंगजेब के कमज़ोर उत्तराधिकारी ।
(iii) गुरु गोबिंद सिंह जी के हक्मनामे
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 23.
बंदा सिंह बहादुर की अंतिम असफलता का मुख्य कारण क्या था ?
(i) मुग़ल साम्राज्य का शक्तिशाली होना
(ii) गुरदास नंगल पर अचानक आक्रमण
(iii) बंदा सिंह बहादुर और विनोद सिंह में मतभेद
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
बंदा सिंह बहादुर के बचपन का नाम क्या था ? वह बैरागी क्यों बना ? (What was Banda Singh Bahadur’s childhood name ? Why did he become a Bairagi ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर के आरंभिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन करें। (Describe briefly the early life of Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर जो सिख इतिहास में बंदा बहादुर के नाम से अधिक विख्यात हैं, को अत्यंत गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। बंदा सिंह बहादुर के आरंभिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—
1. जन्म और माता-पिता-बंदा सिंह बहादुर का जन्म 27 अक्तूबर, 1670 ई० में कश्मीर के जिला पुंछ के राजौरी नामक गाँव में हुआ। उसके बचपन का नाम लक्ष्मण देव था। उनके पिता जी का नाम राम देव था। वह डोगरा राजपूत जाति से संबंधित थे।

2. बचपन-लक्ष्मण देव एक बहुत ही निर्धन परिवार से संबंधित था। अत: लक्ष्मण देव कुछ बड़ा हुआ तो वह कृषि के कार्य में पिता जी का हाथ बंटाने लग पड़ा। लक्ष्मण देव अपने खाली समय में तीर-कमान लेकर वनों में शिकार खेलने चला जाता था।

3. जीवन में नया मोड़-जब लक्ष्मण देव की आयु लगभग 15 वर्ष की थी तो एक दिन शिकार खेलते हुए उसने एक गर्भवती हिरणी को तीर मारा। वह हिरणी और उसके बच्चे लक्ष्मण देव के सामने तड़प-तड़प कर मर गए। इस करुणामय दृश्य का लक्ष्मण के दिल पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसने संसार को त्याग दिया।

4. बैरागी के रूप में-लक्ष्मण देव शीघ्र ही जानकी प्रसाद नामक बैरागी के संपर्क में आया। जानकी प्रसाद ने उसका नाम बदल कर माधो दास रख दिया। शीघ्र ही माधोदास की मुलाकात तंत्र विद्या में निपुण औघड़ नाथ से हो गई और वह उसका शिष्य बन गया। औघड़ नाथ की मृत्यु के बाद माधोदास नंदेड़ आ गया और शीघ्र ही अपनी तंत्र विद्या के कारण लोगों में विख्यात हो गया।

5. गुरु गोबिंद सिंह जी से भेंट-1708 ई० में जब गुरु गोबिंद सिंह जी नंदेड़ आए तो वह माधोदास के आश्रम में उससे भेंट करने के लिए गए। गुरु साहिब और माधोदास के मध्य कुछ प्रश्न-उत्तर हुए। माधोदास गुरु साहिब के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि वह गुरु जी का अनुयायी बन गया। गुरु जी ने भी उसे अमृत छकाकर सिख बनाया और उसका नाम परिवर्तित करके बंदा सिंह बहादुर रख दिया।

6. बंदा सिंह बहादुर का पंजाब की ओर प्रस्थान-जब बंदा सिंह बहादुर ने गुरु गोबिंद सिंह जी से पंजाब में सिखों पर मुग़लों द्वारा किए गए अत्याचारों और गुरु तेग़ बहादुर जी के बलिदानों के संबंध में सुना तो उसका राजपूती खून खौलने लगा। उसने इन अत्याचारों का प्रतिशोध लेने के लिए गुरु जी से पंजाब जाने की आज्ञा माँगी। गुरु जी ने इस निवेदन को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर ने गुरु जी का आशीर्वाद प्राप्त करके 1708 ई० में पंजाब की ओर रुख किया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर

प्रश्न 2.
बंदा बैरागी कौन था ? वह सिख कैसे बना ? (Who was Banda Bairagi ? How did he become a Sikh ?)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर जिसका बचपन का नाम लक्ष्मण देव था, कश्मीर के जिला पंछ के राजौरी गाँव का रहने वाला था। उसके पिता एक साधारण कृषक थे। एक गर्भवती हिरणी को मारने के कारण उसके दिल पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप वह बैरागी बन गया। लक्ष्मण. देव का नाम बदल कर माधो दास रख दिया गया। उसने पंचवटी के एक साधु औघड़नाथ से तंत्र विद्या की जानकारी प्राप्त की। कुछ समय वहाँ रहने के बाद माधो दास नांदेड़ नामक स्थान पर आ गया। नांदेड़ में ही 1708 ई० में उसकी भेंट गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ हुई। इस भेंट के दौरान गुरु गोबिंद सिंह जी और माधो दास के मध्य कुछ प्रश्न-उत्तर हुए। माधो दास गुरु साहिब के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि वह गुरु साहिब का बंदा (दास) बन गया। गुरु गोबिंद सिंह जी ने उसे अमृत छका कर सिख बना दिया और उसको बंदा सिंह बहादुर का नाम दिया। इस तरह बंदा बैरागी सिख बना।

प्रश्न 3.
बंदा सिंह बहादुर की गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ हुई मुलाकात का वर्णन करें। (Discuss Banda Singh Bahadur’s meeting with Guru Gobind Singh Ji.)
उत्तर-
1708 ई० में जब गुरु गोबिंद सिंह जी नंदेड़ आए तो वे माधो दास के आश्रम में उससे भेंट करने के लिए गए। जब गुरु जी उसके आश्रम में पहुँचे तो उसने उन्हें चारपाई पर बिठाया और अपनी तंत्र विद्या से उनकी चारपाई उलटानी चाही। परंतु गुरु साहिब चारपाई पर शाँत बैठे रहे। उन पर माधो दास की तंत्र विद्या का तनिक भी प्रभाव न हुआ। यह देखकर माधो दास आश्चर्यचकित रह गया और उसने गुरु साहिब से कुछ प्रश्न पूछने आरंभ कर दिए जिनका उत्तर गुरु जी ने इस प्रकार दिया—
माधो दास-तुम कौन हो ?
गुरु गोबिंद सिंह जी-मैं वही हूँ जिसे तुम जानते हो।
माधो दास-मैं कैसे जानता हूँ।
गुरु गोबिंद सिंह जी-अपने मन में सोचो।
माधो दास-तो क्या आप गुरु गोबिंद सिंह जी हैं ?
गुरु गोबिंद सिंह जी-हाँ !
माधो दास-तो आप यहाँ किस लिए आये हैं ?
गुरु गोबिंद सिंह जी-तुम्हें अपना शिष्य बनाने के लिए।
माधो दास-मुझे स्वीकार है, साहिब ! मैं आप ही का बंदा (दास) हूँ।
माधो दास गुरु साहिब के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि वह गुरु साहिब का अनुयायी बन गिया। गुरु साहिब ने भी उसे अमृत छकाकर सिख बनाया और उसका नाम परिवर्तन करके बंदा सिंह बहादुर रख दिया।

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प्रश्न 4.
गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को पंजाब भेजते समय क्या कार्यवाही की तथा उसे क्या आदेश दिए ? ‘
(What action and orders were given to Banda Singh Bahadur by Guru Gobind Singh Ji before sending him to Punjab ?)
उत्तर-
गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को पंजाब भेजने से पूर्व अपने पाँच तीर दिए और उसकी सहायता के लिए पाँच प्यारे बिनोद सिंह, काहन सिंह, बाज सिंह, दया सिंह, रण सिंह तथा 20 अन्य बहादुर सिखों को साथ भेजा। इसके अतिरिक्त गुरु साहिब ने पंजाब के सिखों के नाम कुछ हुक्मनामे भी दिए। इन हुक्मनामों में पंजाब के सिखों को यह आदेश दिया गया था कि वे बंदा सिंह बहादुर को अपना नेता स्वीकार करें तथा मुग़लों के विरुद्ध धर्म युद्धों में अपना पूरा समर्थन दें। गुरु साहिब ने बंदा सिंह बहादुर को आगे दिए आदेशों का पालन करने के लिए कहा-पहला, ब्रह्मचारी जीवन व्यतीत करना। दूसरा, सदा सत्य बोलना और सच्चाई के मार्ग पर चलना। तीसरा, नया धर्म अथवा संप्रदाय नहीं चलाना। चौथा, अपनी विजयों पर अहंकार नहीं करना। पाँचवां, स्वयं को खालसा का सेवक समझना और उनकी इच्छाओं के अनुसार आचरण करना। बंदा सिंह बहादुर ने गुरु साहिब से आदर सहित तीर लिए और उनकी आज्ञा का पालन करने का प्रण किया। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर ने अक्तूबर, 1708 ई० में गुरु जी का आशीर्वाद प्राप्त करके पंजाब के लिए प्रस्थान किया।

प्रश्न 5.
बंदा सिंह बहादुर ने सिखों का राज्य किस तरह स्थापित किया ? (How did Banda Singh Bahadur set up the Sikh empire ?)
उत्तर-
गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर को पंजाब में मुग़लों के विरुद्ध सिखों का नेतृत्व करने का आदेश दिया। जब बंदा सिंह बहादुर नांदेड़ से पंजाब पहुँचा तो सिखों ने उसे बढ़-चढ़ कर सहयोग दिया। उसका पहला काम सरहिंद के फौजदार वज़ीर खाँ से गुरु जी के दो छोटे साहिबजादों (साहिबजादा जोरावर सिंह जी तथा साहिबजादा फ़तह सिंह जी.) की शहीदी का बदला लेना था। इस उद्देश्य से वह बहुत से सिखों को साथ लेकर सरहिंद की ओर चल पड़ा। रास्ते में बंदा सिंह बहादुर ने कैथल, समाना, कपूरी और सढौरा को लूटा और बहुत से मुसलमानों की हत्या कर दी। 12 मई, 1710 ई० में चप्पड़चिड़ी की भयंकर लड़ाई में वज़ीर खाँ मारा गया। बड़ी संख्या में मुसलमानों को मौत के घाट उतारा गया। सरहिंद की विजय बंदा सिंह बहादुर की एक बहुत बड़ी सफलता थी। उसने गंगा दोआब, जालंधर दोआब और गुरदासपुर के बहुत सारे क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था। उसने लोहगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। उसने नए सिक्के चलाकर स्वतंत्र सिख राज्य की स्थापना की।

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प्रश्न 6.
बंदा सिंह बहादुर की कोई छः मुख्य सैनिक सफलताओं के बारे में लिखें। (Describe six major military achievements of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की छः महत्त्वपूर्ण विजयों की संक्षिप्त जानकारी दें। (Give a brief account of the six important conquests of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की मुख्य सैनिक सफलताओं का वर्णन करो। (Describe major military achievements of Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की महत्त्वपूर्ण लड़ाइयों का विवरण निम्नलिखित अनुसार है—
1. सोनीपत पर आक्रमण-बंदा सिंह बहादुर ने सर्वप्रथम नवंबर 1709 ई० में 500 सिखों सहित सोनीपत पर आक्रमण किया। सोनीपत का फ़ौजदार बिना सामना किए दिल्ली की ओर भाग गया। इस सरल विजय से सिखों का साहस बहुत बढ़ गया।

2. समाना की विजय-समाना में गुरु तेग़ बहादुर जी को तथा गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों को शहीद करने वाले जल्लाद रहते थे। बंदा सिंह बहादुर ने समाना पर आक्रमण करके दस हज़ार मुसलमानों का वध कर दिया। यह बंदा सिंह बहादुर की प्रथम महत्त्वपूर्ण विजय थी।

3. कपूरी की विजय-कपूरी का शासक कदमुद्दीन हिंदुओं के साथ बहुत दुर्व्यवहार करता था। फलस्वरूप बंदा सिंह बहादुर ने कपूरी पर आक्रमण करके कदमुद्दीन को मौत के घाट उतार दिया। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर ने कपूरी पर सुगमता से विजय प्राप्त की।

4. सढौरा की विजय-सढौरा का शासक उसमान खाँ बड़ा अत्याचारी था। उसने पीर बुद्ध शाह की इसलिए निर्मम हत्या करवा दी थी क्योंकि उसने भंगाणी की लड़ाई में गुरु गोबिंद सिंह जी की सहायता की थी। अत: बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा पर आक्रमण कर दिया तथा बहुसंख्या में मुसलमानों की हत्या कर दी। इस कारण इस स्थान
का नाम कत्लगढ़ी पड़ गया।

5. सरहिंद की विजय-सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ ने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों साहिबजादा जोरावर सिंह जी तथा साहिबजादा फ़तह सिंह जी को दीवार में जिंदा चिनवा दिया था। इस अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए 12 मई, 1710 ई० को बंदा सिंह बहादुर ने चप्पड़चिड़ी के स्थान पर वज़ीर खाँ की सेनाओं पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में सिखों ने मुसलमानों का भयंकर रक्त-पात किया। वजीर खाँ की हत्या करके उसके शव को वृक्ष पर लटका दिया गया। इस विजय के कारण सिखों का साहस बहुत बढ़ गया।

6. अमृतसर, बटाला, कलानौर और पठानकोट की विजयें-बंदा सिंह बहादुर की विजयों से प्रोत्साहित होकर अमृतसर, बटाला, कलानौर और पठानकोट के सिखों ने भी वहाँ के अत्याचारी मुग़ल शासकों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। बंदा सिंह बहादुर के सहयोग से सिखों ने इन प्रदेशों पर बड़ी आसानी से अधिकार कर लिया।

प्रश्न 7.
बंदा सिंह बहादुर की सरहिंद की विजय पर संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the conquest of Sirhind by Banda Singh Bahadur.)
अथवा
सरहिंद की लड़ाई का संक्षेप में वर्णन करो।
(Write briefly about the Battle of Sirhind.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ से गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों की शहीदी का बदला कैसे लिया ?
(How did Banda Singh Bahadur take revenge on Wazir Khan, the Faujdar of Sirhind for the martyrdom of younger sons of Guru Gobind Singh Ji ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की सरहिंद विजय का वर्णन करें। यह लड़ाई सिखों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण थी ?
(Describe Banda Singh Bahadur’s conquest of Sirhind. Why was this battle significant for the Sikhs ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की मुख्य सैनिक सफलताओं का वर्णन करो। (Describe major military achievements of Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की महत्त्वपूर्ण लड़ाइयों का विवरण निम्नलिखित अनुसार है—
1. सोनीपत पर आक्रमण-बंदा सिंह बहादुर ने सर्वप्रथम नवंबर 1709 ई० में 500 सिखों सहित सोनीपत पर आक्रमण किया। सोनीपत का फ़ौजदार बिना सामना किए दिल्ली की ओर भाग गया। इस सरल विजय से सिखों का साहस बहुत बढ़ गया।

2. समाना की विजय-समाना में गुरु तेग़ बहादुर जी को तथा गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों को शहीद करने वाले जल्लाद रहते थे। बंदा सिंह बहादुर ने समाना पर आक्रमण करके दस हज़ार मुसलमानों का वध कर दिया। यह बंदा सिंह बहादुर की प्रथम महत्त्वपूर्ण विजय थी।

3. कपूरी की विजय-कपूरी का शासक कदमुद्दीन हिंदुओं के साथ बहुत दुर्व्यवहार करता था। फलस्वरूप बंदा सिंह बहादुर ने कपूरी पर आक्रमण करके कदमुद्दीन को मौत के घाट उतार दिया। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर ने कपूरी पर सुगमता से विजय प्राप्त की।।

4. सढौरा की विजय-सढौरा का शासक उसमान खाँ बड़ा अत्याचारी था। उसने पीर बुद्ध शाह की इसलिए निर्मम हत्या करवा दी थी क्योंकि उसने भंगाणी की लड़ाई में गुरु गोबिंद सिंह जी की सहायता की थी। अत: बंदा सिंह बहादुर ने सढौरा पर आक्रमण कर दिया तथा बहुसंख्या में मुसलमानों की हत्या कर दी। इस कारण इस स्थान का नाम कत्लगढ़ी पड़ गया।

5. सरहिंद की विजय-सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ ने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों साहिबजादा जोरावर सिंह जी तथा साहिबजादा फ़तह सिंह जी को दीवार में जिंदा चिनवा दिया था। इस अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए 12 मई, 1710 ई० को बंदा सिंह बहादुर ने. चप्पड़चिड़ी के स्थान पर वज़ीर खाँ की सेनाओं पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में सिखों ने मुसलमानों का भयंकर रक्त-पात किया। वज़ीर खाँ की हत्या करके उसके शव को वृक्ष पर लटका दिया गया। इस विजय के कारण सिखों का साहस बहुत बढ़ गया।

6. अमृतसर, बटाला, कलानौर और पठानकोट की विजयें-बंदा सिंह बहादुर की विजयों से प्रोत्साहित होकर अमृतसर, बटाला, कलानौर और पठानकोट के सिखों ने भी वहाँ के अत्याचारी-मुग़ल शासकों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। बंदा सिंह बहादुर के सहयोग से सिखों ने इन प्रदेशों पर बड़ी आसानी से अधिकार कर लिया।

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प्रश्न 7.
बंदा सिंह बहादुर की सरहिंद की विजय पर संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the conquest of Sirhind by Banda Singh Bahadur.)
अथवा
सरहिंद की लड़ाई का संक्षेप में वर्णन करो।
(Write briefly about the Battle of Sirhind.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ से गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों की शहीदी का बदला कैसे लिया ?
(How did Banda Singh Bahadur take revenge on Wazir Khan, the Faujdar of Sirhind for the martyrdom of younger sons of Guru Gobind Singh Ji ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की सरहिंद विजय का वर्णन करें। यह लड़ाई सिखों के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण थी ?
(Describe Banda Singh Bahadur’s conquest of Sirhind. Why was this battle significant for the Sikhs ?).
अथवा
चप्पड़चिड़ी की लड़ाई का संक्षेप में वर्णन करें। (Give a brief account of the battle of Chapparchiri.)
उत्तर-
सरहिंद की विजय बंदा सिंह बहादुर की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विजयों में से एक थी। सरहिंद का फ़ौज़दार वज़ीर खाँ सिखों का घोर शत्रु था। उसने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों (साहिबजादा जोरावर सिंह जी एवं साहिबज़ादा फ़तह सिंह जी) को दीवार में जिंदा चिनवा दिया था। उसकी सेनाओं के हाथों ही गुरु जी के दोनों बड़े साहिबज़ादे (साहिबज़ादा अजीत सिंह जी एवं साहिबज़ादा जुझार सिंह जी) चमकौर साहिब की लड़ाई में शहीद हो गए थे। वज़ीर खाँ द्वारा भेजे गए पठान ने गुरु साहिब को नांदेड़ के स्थान पर छुरा मार दिया था जिसके कारण वे ज्योति-जोत समा गए थे। इन कारणों से बंदा सिंह बहादुर वज़ीर खाँ को एक ऐसा पाठ पढ़ाना चाहता था जोकि मुसलमानों को दीर्घकाल तक याद रहे। 12 मई, 1710 ई० को दोनों सेनाओं के बीच सरहिंद से लगभग 16 किलोमीटर दूर चप्पड़चिड़ी में बहुत भयंकर लड़ाई आरंभ हुई। आरंभ में वज़ीर खाँ के तोपखाने के कारण सिखों को बहुत क्षति पहुँची किंतु उन्होंने धैर्य का त्याग नहीं किया। बंदा सिंह बहादुर ने सत् श्री अकाल की जय-जयकार गुंजाते हुए मुसलमानों पर बड़ा जोरदार आक्रमण किया। मुसलमानों के लिए इस आक्रमण को रोकना बड़ा मुश्किल हो गया। फ़तह सिंह ने वज़ीर खाँ को यमलोक पहुँचा दिया। उसकी मृत्यु के साथ ही मुग़ल सेना में भगदड़ मच गई। सिखों ने इन भागे जा रहे सैनिकों का पीछा करके उनकी बड़ी संख्या में हत्या कर दी। वज़ीर खाँ के शव को एक वृक्ष पर उल्टा लटका दिया। 14 मई को सिख सेनाएँ सरहिंद पहुँची। उन्होंने मुसलमानों के ऐसे छक्के छुड़ाए कि उनकी आत्मा भी काँप उठी। इस प्रकार बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद की ईंट से ईंट बजा दी।

प्रश्न 8.
बंदा सिंह बहादुर की लोहगढ़ लड़ाई पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the battle of Lohgarh by Banda Singh Bahadur.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की बढ़ती हुई शक्ति मुगलों के लिए एक चुनौती थी। इसलिए मुग़ल बादशाह बहादुर । शाह ने बंदा सिंह बहादुर की शक्ति का दमन करने का निर्णय किया। इस उद्देश्य से उसने अपने एक जरनैल मुनीम खाँ के अंतर्गत 60,000 सैनिकों की एक विशाल सेना पंजाब भेजी। इस सेना ने 10 दिसंबर, 1710 ई० को लोहगढ़ पर अचानक आक्रमण कर दिया। लोहगढ़ बंदा सिंह बहादुर की राजधानी का नाम था। इसे उसने मुखलिसपुर के स्थान पर बनाया था। सिख दुर्ग के भीतर से मुग़लों का डटकर सामना करते थे। खाद्य-पदार्थों की कमी के कारण सिखों के लिए इस लड़ाई को अधिक समय तक जारी रखना संभव नहीं था। बंदा सिंह बहादुर इतनी. सरलता से मुग़लों के हाथ आने वाला नहीं था। वह वेश बदलकर दर्ग से बच निकलने में सफल हो गया और नाहन की पहाड़ियों की ओर चला गया। अगले दिन जब मुगलों ने दुर्ग पर अधिकार किया तो उन्हें यह जानकर बहुत निराशा हुई कि हाथ आया बाज़ उड़ गया है।

प्रश्न 9.
गुरदास नंगल की लड़ाई पर एक संक्षेप नोट लिखें। (Write a short note on the battle of Gurdas Nangal.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर एवं मुग़लों के मध्य हुई गुरदास नंगल की लड़ाई का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(Give a brief account of the battle of Gurdas-Nangal fought between Banda Singh Bahadur and the Mughals.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर के अधीन पंजाब में बढ़ रही सिखों की शक्ति को रोकने के लिए मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर ने अब्दुस समद खाँ को लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया। उसको सिखों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए। उसने अप्रैल, 1715 ई० में एक विशाल सेना के साथ बंदा सिंह बहादुर को गुरदास नंगल के स्थान पर घेर लिया। बंदा सिंह बहादुर तथा उसके साथी सिखों ने दुनी चंद की हवेली से इस मुग़ल सेना से मुकाबला जारी रखा। यह घेरा आठ महीने तक चलता रहा। धीरे-धीरे खान-पान की सामग्री समाप्त होने पर सिखों की स्थिति बड़ी दयनीय हो गई। ऐसे समय में बाबा बिनोद सिंह ने बंदा सिंह बहादुर को हवेली से भाग निकलने का परामर्श दिया पर बंदा सिंह बहादुर ने इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप बिनोद सिंह अपने साथियों को साथ लेकर गढ़ी छोड़कर भाग निकला। इससे बंदा सिंह बहादुर की स्थिति और बिगड़ गई। अंत में विवश होकर बंदा सिंह बहादुर को अपनी पराजय स्वीकार करनी पड़ी। इस प्रकार 7 दिसंबर, 1715 ई० को बंदा सिंह बहादुर और उसके दो सौ साथियों को बंदी बना लिया गया।

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प्रश्न 10.
बंदा सिंह बहादुर को कब, कहाँ तथा कैसे शहीद किया गया ? (When, where and how was Banda Singh Bahadur martyred ?)
उत्तर-
गुरदास नंगल से अब्दुस समद खाँ ने 200 सिखों को बंदी बनाया था, परंतु बाद में लाहौर की ओर आते मार्ग में उसने 540 अन्य सिखों को बंदी बना लिया। बंदा सिंह बहादुर और इन 740 सिखों को फरवरी, 1716 ई० में दिल्ली भेजा गया। दिल्ली पहुँचने पर उनका जुलूस निकाला गया। बंदा सिंह बहादुर को एक पिंजरे में बंद किया गया था। मार्ग में उनका भारी अपमान किया गया। बाद में उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए कहा। ऐसा करने पर उन्हें प्राण दान दिए जा सकते थे, परंतु इन स्वाभिमानी सिखों में से किसी ने भी इस्लाम धर्म स्वीकार करने से इंकार कर दिया। अत: प्रतिदिन 100 सिखों को शहीद किया जाने लगा। अंत में 9 जून, 1716 ई० को बंदा सिंह बहादुर की बारी आई। उसे शहीद करने से पूर्व जल्लाद ने उसके चार वर्ष के पुत्र अजय सिंह की उसकी आँखों के सामने निर्ममता से हत्या की और उसके तड़पते हुए दिल को निकाल कर बंदा सिंह बहादुर के मुँह में लूंस दिया। तत्पश्चात् बंदा सिंह बहादुर का अंग-अंग काटकर उसे शहीद किया गया। बंदा सिंह बहादुर के सैनिक कारनामे एवं शहीदी आने वाली नस्लों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बन गई।

प्रश्न 11.
बंदा सिंह बहादुर की आरंभिक सफलताओं के कारणों का उल्लेख करो। (Mention the causes of early success of Banda Singh Bahadur.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की आरंभिक सफलताओं के कारण बतायें।
(What were the causes of early success of Banda Singh Bahadur ?) .
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की सफलता के छः प्रमुख कारण कौन से थे ? (P.S.E.B. Model Test Paper) (What were the six causes of success of Banda Singh Bahadur ?)
उत्तर-
1. मुगलों के घोर अत्याचार-पंजाब के मुग़ल शासक सिखों के कट्टर शत्रु थे। सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ ने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों (साहिबजादा जोरावर सिंह जी तथा साहिबजादा फतह सिंह जी) को जीवित ही दीवार में चिनवा दिया था। गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों बड़े साहिबज़ादे (साहिबजादा अजीत सिंह जी और साहिबजादा जुझार सिंह जी) चमकौर साहिब की लड़ाई में उसके सैनिकों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। अतः सिखों का खून खौल रहा था। परिणामस्वरूप वे बंदा सिंह बहादुर के झंडे अधीन एकत्र हो गए।

2. गुरु गोबिंद सिंह जी के हुक्मनामे-गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा सिंह बहादुर के हाथ सिख संगत के नाम कुछ हुक्मनामे भेजे. थे। इन हुक्मनामों में गुरु साहिब ने सिख संगत को मुगलों के विरुद्ध होने वाले धर्म युद्धों में बंदा सिंह बहादुर को पूरा सहयोग देने को कहा। सिख संगत के सहयोग के कारण बंदा सिंह बहादुर एवं उसके साथियों का उत्साह बढ़ गया।

3. औरंगजेब के कमज़ोर उत्तराधिकारी-1707 ई० में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद हुआ मुग़ल शासक बहादुर शाह उत्तराधिकारिता के युद्ध में ही उलझा रहा। अतः वह साम्राज्य में व्याप्त अराजकता को नियंत्रण में रखने में असफल रहा जबकि उसके बाद मुग़ल बादशाह बनने वाला जहाँदार शाह एक वेश्या लाल कंवर के चक्करों में फंसा रहा। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर ने इस स्वर्ण अवसर का उचित लाभ उठाया तथा अनेक सफलताएँ प्राप्त की।

4. बंदा सिंह बहादुर का योग्य नेतृत्व बंदा सिंह बहादुर एक निर्भीक योद्धा एवं योग्य सेनापति था। उसने सभी लड़ाइयों में सेना का स्वयं नेतृत्व किया तथा वह अपने अधीन सैनिकों को युद्ध के समय में अत्यधिक प्रोत्साहित करता था। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर ने अपने आरंभिक वर्षों में प्रशंसनीय सफलताएँ प्राप्त की।

5. बंदा सिंह बहादुर का अच्छा शासन प्रबंध-बंदा सिंह बहादुर ने अपने अधीन प्रदेशों में बहुत अच्छे शासन प्रबंध की व्यवस्था की थी। उसने बहुत ही योग्य एवं ईमानदार अधिकारी नियुक्त किए। उसने ज़मींदारी प्रथा को खत्म करके किसानों को न केवल ज़मींदारों के अत्याचारों से बचाया बल्कि उन्हें भूमि का स्वामी भी बना दिया। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर को पंजाब के लोगों से पूरा समर्थन मिला।

6. पंजाब के पहाड़ तथा जंगल-पंजाब के पहाड़ तथा जंगल बंदा सिंह बहादुर की आरंभिक सफलताओं में सहायक सिद्ध हुए। बंदा सिंह बहादुर ने संकट के समय इन पहाड़ों तथा जंगलों में जाकर आश्रय लिया। यहाँ वे पुनः संगठित होकर मुग़ल प्रदेशों पर आक्रमण कर देता था।

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प्रश्न 12.
बंदा सिंह बहादुर जी असफलता के छः मुख्य कारणों का वर्णन करें।
(What were the six causes of failure of Banda Singh Bahadur ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की अंतिम असफलता के क्या कारण थे ? (What were the causes of final failure of Banda Singh Bahadur ?)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर की मुग़लों के विरुद्ध अंतिम असफलता के कारण लिखें। (Write down the causes of ultimate failure of Banda Singh Bahadur aganist Mughals.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर पंजाब,में एक स्थाई सिख शासन की स्थापना में क्यों विफल रहा? (Why did Banda Singh Bahadur fail in setting up a permanent Sikh rule in Punjab ?)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की अंतिम असफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे—
1. मुग़ल साम्राज्य की शक्ति-मुग़ल साम्राज्य के पास विशाल तथा असीमित साधन थे। दूसरी ओर बंदा सिंह बहादुर के साधन बहुत सीमित थे। मुग़लों की तुलना में उसके सैनिकों की संख्या बहत कम थी। ऐसी स्थिति में मुग़लों पर पूर्ण विजय प्राप्त करना बंदा सिंह बहादुर के लिए बिल्कुल असंभव था।

2. सिखों में संगठन का अभाव-बंदा सिंह बहादुर के अधीन सिख सैनिकों में संगठन और अनुशासन का अभाव था। वे किसी योजनानुसार लड़ाई नहीं करते थे। अतः संगठन और अनुशासन के अभाव में ऐसे सिखों का असफल होना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।

3. बंदा सिंह बहादुर द्वारा आदेशों का उल्लंघन-बंदा सिंह बहादुर ने गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा दिए आदेशों का उल्लंघन करना आरंभ कर दिया था। फलस्वरूप गुरु गोबिंद सिंह जी के अनेक श्रद्धालु सिख बंदा सिंह बहादुर के विरुद्ध हो गए।

4. फ़र्रुखसियर की सिखों के विरुद्ध कार्यवाहियाँ-1713 ई० में फ़र्रुखसियर मुग़लों का नया बादशाह बना था। वह सिखों को कुचलने के लिए पूर्ण प्रतिबद्ध था। उसने सिखों का दमन करने के लिए अब्दुस समद खाँ को लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया। अब्दुस समद खाँ ने सिखों की शक्ति का दमन करने के लिए कोई कसर न उठा रखी। परिणामस्वरूप बंदा सिंह बहादुर और उसके साथियों को आत्म-समर्पण करना ही पड़ा।

5. गुरदास नंगल में सिखों पर अचानक आक्रमण-अप्रैल, 1715 ई० में बंदा सिंह बहादुर पर हुआ अचानक आक्रमण भी उनके पतन का एक प्रमुख कारण बना। बंदा सिंह बहादुर तथा उसके साथी सिख अचानक आक्रमण के कारण दुनी चंद की हवेली में घिर गए। इस हवेली में से अधिक समय तक मुग़लों का सामना नहीं किया जा सकता था। इसके बावजूद बंदा सिंह बहादुर ने 8 माह तक लड़ाई जारी रखी पर अंत में उसे पराजय स्वीकार करनी पड़ी।

6. बंदा सिंह बहादुर और बिनोद सिंह में मतभेद-गुरदास नंगल की लड़ाई के समय बंदा सिंह बहादुर और उसके साथी बिनोद सिंह में मतभेद उत्पन्न हो गए। बिनोद सिंह हवेली छोड़कर भाग निकलने के पक्ष में था। दूसरी ओर बंदा सिंह बहादुर चाहता था कि कुछ समय और लड़ाई को जारी रखा जाए। परिणामस्वरूप बिनोद सिंह अपने साथियों सहित हवेली छोड़कर निकल गया। अत: बंदा सिंह बहादुर को पराजय का मुख देखना पड़ा।

प्रश्न 13.
बंदा सिंह बहादुर के व्यक्तित्व की मख्य विशेषताएँ बताएँ। (Describe the main traits of Banda Singh Bahadur’s personality.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर बड़ा ही निडर और साहसी था। बड़ी से बड़ी मुसीबत आने पर भी वह घबराता नहीं था। मुग़लों के साथ हुई लड़ाइयों में उसने अपनी अद्वितीय वीरता का परिचय दिया। वह इतना निडर था कि जब मुग़ल बादशाह ने उसको पूछा कि वह किस प्रकार की मृत्यु पसंद करेगा तो उसने बिना झिझक उत्तर दिया कि जैसी मृत्यु बादशाह अपने लिए पसंद करेगा। वह सिख धर्म का सच्चा सेवक था। उसने अपनी सफलताओं को गुरु साहिब का वरदान माना। उसने गुरु नानक देव जी और गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम पर अपने सिक्के जारी किए। उसने सिख धर्म का प्रचार अत्यंत उत्साह के साथ किया। बंदा सिंह बहादुर एक महान् सेनापति था। अपने सीमित साधनों के बावजूद उसने मुग़ल शासकों की रातों की नींद हराम कर दी थी। वह युद्ध की चालों में बड़ा दक्ष था और युद्ध के मैदान में वह स्थिति के अनुसार अपनी कार्यवाही बड़ी तीव्रता के साथ करता था। बंदा सिंह बहादुर एक योग्य शासक भी था। उसने अपने जीते हुए प्रदेशों में बहुत अच्छे शासन प्रबंध की व्यवस्था की थी। उसने पहली बार निर्धनों को ऊंचे पदों पर नियुक्त किया था। वह अपनी प्रजा को निष्पक्ष न्याय देता था। उसने अपने राज्य में से ज़मींदारी प्रथा को समाप्त करके किसानों को उनके अत्याचारों से बचाया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर

प्रश्न 14.
एक योद्धा और सेनापति के रूप में बंदा सिंह बहादुर की सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन करो।
(Describe briefly the achievements of Banda Singh Bahadur as a Warrior and General.)
अथवा
बंदा सिंह बहादुर का एक वीर योद्धा तथा सेनापति के रूप में मूल्यांकन करें।
(Explain the main contributions of Banda Singh Bahadur as a brave warrior and great military organiser.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर एक महान् योद्धा और उच्चकोटि का सेनापति था। बंदा सिंह बहादुर के साधन मुग़लों के मुकाबले नाममात्र थे, परंतु उसने अपनी योग्यता के बल पर 7-8 वर्ष मुग़ल सेना के नाक में दम कर रखा था। उसने जितनी भी लड़ाइयां लड़ीं, लगभग सभी में उसने बड़ी शानदार सफलताएँ प्राप्त की। युद्ध के मैदान में वह बड़ी तीव्रता से स्थिति का अनुमान लगा लेता था और अवसर अनुसार अपना निर्णय तुरंत कर लेता था। वह युद्ध की चालों में बड़ा निपुण था। यदि किसी स्थान पर वह यह समझता था कि शत्रुओं की सेनाएँ उसके मुकाबले में बहुत अधिक हैं तो वह पीछे हटने में अपना अपमान नहीं समझता था। वह युद्ध तभी शुरू करता था जब उसे विजय की पूर्ण आशा होती थी। वह आवश्यकतानुसार खुले मैदानों, पहाड़ों या किलों में से लड़ता था। वास्तव में इन जंगी चालों ने उसको एक उच्चकोटि का सेनापति बना दिया था।

प्रश्न 15.
एक प्रशासक के रूप में बंदा सिंह बहादुर की सफलताओं की संक्षिप्त जानकारी दें। (Write briefly about Banda Singh Bahadur’s achievements as an administrator.)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर एक योग्य शासन प्रबंधक था। उसने अपने विजित प्रदेशों में अच्छे शासन प्रबंध की व्यवस्था की। उसने खालसा के नाम से शासन किया और अपने राज्य में गुरु साहिब द्वारा दर्शाए गए नियमों को लागू करने का यत्न किया। उसने अपने राज्य में भ्रष्टाचारी कर्मचारियों को हटाकर बड़े योग्य और ईमानदार व्यक्तियों को नियुक्त किया। निर्धनों और निम्न जाति के लोगों को उच्च पदों पर लगाकर उनको एक नया सम्मान दिया। बंदा बहादुर ने ज़मींदारी प्रथा का अंत करके एक अत्यंत सराहनीय कार्य किया। इससे एक तो वे ज़मींदारों द्वारा किए गए अत्याचारों से बच गए और दूसरे वे भूमि के मालिक बन गए। बंदा सिंह बहादुर अपने निष्पक्ष न्याय के कारण भी बहुत प्रसिद्ध था। न्याय करते समय वह ऊँच-नीच में कोई भेद नहीं करता था। निस्संदेह बंदा सिंह बहादुर का शासन प्रबंध खालसा शासन के अनुसार था।

प्रश्न 16.
बंदा सिंह बहादुर को पंजाब के इतिहास में आप क्या स्थान देते हैं ? (What place would you assign to Banda Singh Bahadur in the History of Punjab ?)
अथवा
पंजाब के इतिहास में बंदा सिंह बहादुर को क्या स्थान प्राप्त है ? (What is the place of Banda Singh Bahadur in the History of the Punjab ?)
उत्तर-
निस्संदेह बंदा सिंह बहादुर को पंजाब के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। वह पहला व्यक्ति था जिसने सिखों की स्वतंत्रता की नींव डाली। उसने पंजाबियों को अत्याचारों का मुकाबला करने के लिए मर मिटने का पाठ पढ़ाया। उसने 7-8 वर्षों के थोड़े से समय में मुग़लों के शक्तिशाली साम्राज्य की नींव हिला कर एक आश्चर्यजनक कार्य कर दिखाया। उसने मुग़लों के अजेय होने के जादू को तोड़ा तथा उन्हें अनेक लड़ाइयों में पराजित किया। उसने सिखों में स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए नव प्राण फूंके। उसके द्वारा सुलगाई गई स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए यह चिंगारी अंदर ही अंदर सुलगती रही जो बाद में भयंकर आग का रूप धारण कर गई तथा जिसमें मुग़ल साम्राज्य जलकर भस्म हो गया। बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब से ज़मींदारी प्रथा को समाप्त करके एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी पग उठाया। उसने निर्धनों और सदियों से शोषित निम्न वर्ग के लोगों को शासन प्रबंध में ऊँचे पद देकर एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप ये लोग बंदा सिंह बहादुर के एक इशारे पर अपनी कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए। वास्तव में बंदा सिंह बहादुर के प्रशंसनीय योगदान के कारण उसके नाम को सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 11 बंदा सिंह बहादुर

Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
1
बंदा सिंह बहादुर जिसका बचपन का नाम लक्ष्मण देव था, कश्मीर के जिला पुंछ के राजौरी गाँव का रहने वाला था। उसके पिता एक साधारण कृषक थे। एक गर्भवती हिरणी को मारने के कारण उसके दिल पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप वह बैरागी बन गया। लक्ष्मण देव का नाम बदल कर माधो दास रख दिया गया। उसने पंचवटी के एक साधु औघड़नाथ से तंत्र विद्या की जानकारी प्राप्त की। कुछ समय वहाँ रहने के बाद माधो दास नांदेड़ नामक स्थान पर आ गया। नांदेड़ में ही 1708 ई० में उसकी भेंट गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ हुई। इस भेंट के दौरान गुरु गोबिंद सिंह जी और माधो दास के मध्य कुछ प्रश्न-उत्तर हुए। माधो दास गुरु साहिब के व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि वह गुरु साहिब का बंदा (दास) बन गया। गुरु गोबिंद सिंह जी ने उसे अमृत छका कर सिख बना दिया और उसको बंदा बहादुर का नाम दिया। इस तरह बंदा बैरागी सिख बना।

  1. बंदा सिंह बहादुर के बचपन का क्या नाम था ?
  2. बंदा सिंह बहादुर के दिल में किस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा ?
  3. गुरु गोबिंद सिंह जी तथा बंदा सिंह बहादुर के मध्य मुलाकात कहाँ हुई थी ?
  4. गुरु गोबिंद सिंह जी तथा बंदा सिंह बहादुर के मध्य भेंट कब हुई थी ?
    • 1705 ई०
    • 1706 ई०
    • 1707 ई०
    • 1708 ई०
  5. बंदा सिंह बैरागी सिख कैसे बना था ?

उत्तर-

  1. बंदा सिंह बहादुर के बचपन का नाम लक्ष्मण देव था।
  2. बंदा सिंह बहादुर द्वारा एक गर्भवती हिरणी का शिकार करने के कारण उसके दिल पर गहरा प्रभाव पड़ा।
  3. गुरु गोबिंद सिंह जी तथा बंदा सिंह बहादुर के मध्य मुलाकात नांदेड़ में हुई।
  4. 1708 ई०।
  5. गुरु गोबिंद सिंह जी ने माधो दास को अमृत छकाया। इस प्रकार बंदा बैरागी सिख बन गया।

2
सरहिंद के फ़ौजदार वज़ीर खाँ ने गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों जोरावर सिंह तथा फ़तह सिंह को दीवार में जिंदा चिनवा दिया था। इसलिए बंदा सिंह बहादुर उसे एक ऐसा पाठ पढ़ाना चाहता था जो मुसलमानों को दीर्घकाल तक स्मरण रहे। 12 मई, 1710 ई० को बंदा सिंह बहादुर ने चप्पड़चिड़ी के स्थान पर वज़ीर खाँ की सेनाओं पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में सिखों ने मुसलमानों का ऐसा रक्त-पात किया कि उनकी आत्मा भी काँप उठी। वज़ीर खाँ की हत्या करके उसके शव को वृक्ष पर उल्टा लटका दिया गया। 14 मई, 1710 ई० को सारे सरहिंद में भारी रक्तपात और लूटपात की गई। इस भव्य विजय के कारण सिखों का साहस बहुत बढ़ गया।

  1. वज़ीर.खाँ कौन था ?
  2. बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद पर आक्रमण क्यों किया ?
  3. वज़ीर खाँ किस स्थान पर सिखों के साथ मुकाबला करते हुए मारा गया था ?
  4. चप्पड़चिड़ी की लड़ाई कब हुई थी ?
    • 1706 ई०
    • 1708 ई०
    • 1709 ई०
    • 1710 ई०
  5. चप्पड़चिड़ी की लड़ाई में कौन विजयी रहा ?

उत्तर-

  1. वज़ीर खाँ सरहिंद का नवाब था।
  2. बंदा सिंह बहादुर वज़ीर खाँ द्वारा गुरु गोबिंद सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों को दीवार में जिंदा चिनवा दिए जाने का बदला लेना चाहता थे।
  3. वजीर खाँ चप्पड़चिड़ी में सिखों के साथ मुकाबला करते हुए मारा गया था।
  4. 1710 ई०।
  5. चप्पड़चिड़ी की लड़ाई में सिख विजयी रहे।

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3
बंदा सिंह बहादुर के अधीन पंजाब में बढ़ रही सिखों की शक्ति को रोकने के लिए मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर ने अब्दुस समद ख़ाँ को लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया। उसको सिखों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करने के निर्देश दिए गए। उसने अप्रैल, 1715 ई० में एक विशाल सेना के साथ बंदा सिंह बहादुर को गुरदास नंगल के स्थान पर घेर लिया। बंदा सिंह बहादुर तथा उसके साथी सिखों ने दुनी चंद की हवेली में इस मुग़ल सेना से मुकाबला जारी रखा। यह घेरा आठ महीने तक चलता रहा। धीरे-धीरे खान-पान की सामग्री समाप्त होने पर सिखों की स्थिति बड़ी दयनीय हो गई। ऐसे समय में बाबा बिनोद सिंह ने बंदा बहादुर को हवेली से भाग निकलने का परामर्श दिया पर बंदा सिंह बहादुर ने इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप बिनोद सिंह अपने साथियों को साथ लेकर गढ़ी छोड़कर भाग निकला। अंत में विवश होकर 7 दिसंबर, 1715 ई० को बंदा सिंह बहादुर को अपनी पराजय को स्वीकार करना पड़ा।

  1. अब्दुस समद खाँ कौन था ?
  2. गुरदास नंगल में बंदा सिंह बहादुर ने किस हवेली से मुग़ल सेना का मुकाबला किया ?
  3. गुरदास नंगल की लड़ाई कितनी देर तक चली ?
  4. गुरदास नंगल की लड़ाई में उसका कौन-सा साथी उसका साथ छोड़ गया था ?
  5. बंदा बहादर को कब गिरफ्तार किया गया था ?
    • 1705 ई०
    • 1710 ई०
    • 1711 ई०
    • 1715 ई०।

उत्तर-

  1. अब्दुस समद खाँ लाहौर का सूबेदार था।
  2. गुरदास नंगल में बंदा सिंह बहादुर ने दुनी चंद की हवेली से मुग़ल सेना का मुकाबला किया।
  3. गुरदास नंगल की लड़ाई 8 महीनों तक चली।
  4. गुरदास नंगल की लड़ाई में बंदा सिंह बहादुर का साथी बाबा बिनोद सिंह उसका साथ छोड़ गया था।
  5. 1715 ई०।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 10 दिल्ली सल्तनत

Punjab State Board PSEB 7th Class Social Science Book Solutions History Chapter 10 दिल्ली सल्तनत Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Social Science History Chapter 10 दिल्ली सल्तनत

SST Guide for Class 7 PSEB दिल्ली सल्तनत Textbook Questions and Answers

(क) निम्न प्रश्नों के उत्तर लिखें

प्रश्न 1.
दिल्ली सल्तनत के मुख्य ऐतिहासिक स्रोतों के नाम लिखें।
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत की जानकारी के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं –
1. विदेशी यात्रियों के लेख-इब्नबतूता और मार्को पोलो आदि यात्रियों ने सल्तनत काल में भारत की यात्रा की। उन्होंने दिल्ली के सुल्तानों के व्यक्तित्व और विभिन्न क्षेत्रों की जानकारी सम्बन्धी लेख लिखे।

2. शाही वृत्तान्त-तुग़लकनामा, तारीख ए-इलाही, तारीख-ए-फिरोज़शाही, फतुहात-ए-फ़िरोजशाही, तारीख-एमुबारकशाही और मखज़ारी-ए-अफ़गान आदि शाही वृत्तान्तों से हमें दिल्ली के सुल्तानों और प्रमुख घटनाओं के सम्बन्ध में जानकारी मिलती है।

3. ऐतिहासिक भवन-दिल्ली सल्तनत के काल के ऐतिहासिक भवनों, जैसे कि कुवैत-उल-इस्लाम मस्जिद, इलाही दरवाज़ा, तुग़लकाबाद, हौज़ खास, लोधी गुंबद, फिरोजशाह कोटला आदि से हमें दिल्ली के सुल्तानों की कलात्मक रुचियों के बारे में जानकारी मिलती है।

प्रश्न 2.
दिल्ली सल्तनत के इतिहास के निर्माण में ऐतिहासिक इमारतों का क्या योगदान था?
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के मुख्य ऐतिहासिक भवन हैं-कुवैत-उल-इस्लाम मस्जिद, इलाही (अलाई) दरवाजा, तुग़लकाबाद, हौज़ खास, लोधी गुंबद, फ़िरोजशाह कोटला आदि। इन भवनों से हमें दिल्ली के सुल्तानों की कलात्मक रुचियों की जानकारी मिलती है।

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प्रश्न 3.
बलबन ने सल्तनत का संगठन कैसे किया ?
उत्तर-
बलबन 1266 ई० में दिल्ली का सुल्तान बना। वह दिल्ली सल्तनत का महान् शासक था। उसने सुल्तान की सर्वोच्चता को स्थापित किया।

  1. उसने दिल्ली के पास मेवातियों द्वारा फैलाई गई अशान्ति और दोआबा के लुटेरों पर काबू पाया।
  2. उसने बंगाल में तुग़रिल खां के विद्रोह को कुचला। दोषियों को कठोर दंड दिये गए।
  3. सेना का पुनर्गठन किया गया। मंगोल आक्रमणों से राज्य की रक्षा करने के लिए उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती प्रान्तों में विशेष सेना रखी गई।
  4. बलबन ने मंगोलों के विरुद्ध कठोर नीति अपनाई। जिसे ‘लहू और लोहे की नीति’ कहा जाता है।
  5. उसने शासन प्रबन्ध में भी सुधार किये और प्रजा को न्याय दिया।
    1286 ई० में बलबन की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 4.
मुहम्मद बिन तुग़लक ने अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिठी क्यों बदली थी ?
उत्तर-
मुहम्मद-बिन-तुग़लक के पास एक विशाल साम्राज्य था। वह अपनी राजधानी उस स्थान पर बनाना चाहता था, जो राज्य के केन्द्र में स्थित हो। इसलिए 1327 ई० में उसने साम्राज्य की राजधानी दिल्ली से देवगिरी (दौलताबाद) बदलने का निर्णय किया। इस के दो कारण थे –
(1) सुल्तान का विश्वास था कि ऐसा करने से साम्राज्य की मंगोलों के आक्रमणों से रक्षा की जा सकती है।
(2) उसने अनुभव किया कि वह साम्राज्य के शासन प्रबन्ध को दिल्ली की अपेक्षा देवगिरी से अच्छी प्रकार चला सकेगा।

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प्रश्न 5.
मुहम्मद-बिन-तुगलक की योजनाओं के क्या परिणाम निकले थे ?
उत्तर-
मुहम्मद-बिन-तुग़लक (1325-1351 ई०) के राजनीतिक उद्देश्य बहुत ऊंचे थे। उसने कई राजनीतिक योजनाएं बनाईं। परन्तु ये सभी योजनाएं असफल रहीं। उसकी इन योजनाओं तथा उनके परिणामों का वर्णन इस प्रकार हैं –
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1. राजधानी बदलना-1327 ई० में मुहम्मद-बिन-तुग़लक ने दिल्ली के स्थान पर दक्षिण में देवगिरी को अपनी राजधानी बनाया। उसने इस नई राजधानी का नाम दौलताबाद रखा और अपने सभी कर्मचारियों को वहां जाने की आज्ञा दी। उसने दिल्ली के लोगों को भी देवगिरी जाने के लिए कहा। अनेक लोग लम्बी यात्रा के कारण मर गए। उत्तरी भारत में शासन की व्यवस्था भी बिगड़ गई। विवश होकर मुहम्मद-बिन-तुग़लक ने फिर दिल्ली को ही राजधानी बना लिया। लोगों को फिर से दिल्ली जाने की आज्ञा दी गई। इस प्रकार जान-माल की बहुत हानि हुई।

2. दोआब में कर बढ़ाना-मुहम्मद-बिन-तुग़लक को अपनी सेना के लिए धम की आवश्यकता थीं। इसलिए उसने दोआब में कर बढ़ा दिया, परन्तु उस साल वर्षा नहीं हुई और दोआब में अकाल. पड़ गया। किसानों की दशा बहुत बिगड़ गई। उनके पास लगान देने के लिए धन न रहा। लगान इकट्ठा करने वाले कर्मचारी उनके साथ कठोर व्यवहार करने लगे। तंग आकर कई किसान जंगलों में भाग गए। बाद में सुल्तान को अपनी गलती का पता चला। उसने उन किसानों की सहायता की।

3. तांबे के सिक्के चलाना-1330 ई० में मुहम्मद-बिन-तुग़लक ने सोने तथा चांदी के सिक्कों के स्थान पर तांबे के सिक्के चलाए। अतः कई लोगों ने घरों में नकली सिक्के बनाने आरम्भ कर दिए और वे भूमि का लगान तथा अन्य कर इन्हीं सिक्कों से चुकाने लगे, जिससे सरकार को बहुत हानि हुई। इसलिए सुल्तान ने तांबे के सिक्के बन्द कर दिए। लोगों को इनके बदले में चांदी के सिक्के दिए गए। कई लोगों ने नकली सिक्के बनाकर सरकार से चांदी के असली सिक्के प्राप्त किए। इस प्रकार राज्य के कोष को बहुत हानि पहुंची।

4. खुरासान को जीतने की योजना-मुहम्मद तुगलक एक महान् शासक बनना चाहता था। अतः उसने खुरासान (इरान) को जीतने का निर्णय किया। उसने एक बड़ी सेना एकत्रित की। इन सैनिकों को एक साल तक वेतन दिया गया। उनके प्रशिक्षण पर और शस्त्रों पर भी बहुत धन खर्च किया गया। परन्तु एक साल बाद सुल्तान ने खुरासान को जीतने का विचार त्याग दिया और सैनिकों को हटा दिया। बेरोज़गार सैनिकों ने राज्य में अशान्ति फैला दी। क्योंकि सुल्तान ने साधारण जनता का विश्वास खो दिया था, इसलिए राज्यों में विद्रोह हो गये और बहुत से प्रान्तों ने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। सुल्तान का अपने साम्राज्य पर नियंत्रण न रहा। 1351 ई० में उस की मृत्यु हो गई।

(ख) निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति करो

  1. कुतुबुद्दीन ऐबक ………….. का संस्थापक था।
  2. रजिया सुल्ताना …………… की बेटी थी।
  3. इल्तुतमिश ……………. ई० में शासक बना।
  4. इल्तुतमिश ने ………….. को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
  5. मलिक काफूर …………….. का सेनापति था।
  6. मुहम्मद-बिन-तुग़लक ने अपनी राजधानी ……….. से बदलकर देवगिरी करने का निर्णय किया।
  7. तैमूर ने ……………. वंश के शासकों के राज्यकाल में भारत पर आक्रमण किया।

उत्तर-

  1. दास वंश
  2. इल्तुतमिश
  3. 1211
  4. रजिया सुल्ताना
  5. अलाउद्दीन खिलजी
  6. दिल्ली
  7. तुग़लक।

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(ग) निम्नलिखित प्रत्येक कथन के आगे ठीक (✓) अथवा गलत (✗) का चिह्न लगाएं

  1. इल्तुतमिश कुतुबुद्दीन ऐबक का दास था।
  2. बलबन दास वंश का संस्थापक था।
  3. अलाउद्दीन खिलजी ने बाज़ार नियन्त्रण नीति को प्रचलित किया।
  4. लोधियों को सैय्यदों ने पराजित किया।
  5. सिकन्दर लोधी तथा बाबर का पानीपत की प्रथम लड़ाई में सामना हुआ था।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✗)
  3. (✓)
  4. (✗)
  5. (✗)

PSEB 7th Class Social Science Guide दिल्ली सल्तनत Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
भारत में सल्तनत काल कब से कब तक रहा ?
उत्तर-
भारत में सल्तनत काल 1206 ई० से 1526 ई० तक रहा।

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प्रश्न 2.
सल्तनत में दिल्ली पर कौन-कौन से राजवंशों ने शासन किया ?
उत्तर–
दास वंश, खिलजी वंश, तुग़लक वंश, सैय्यद वंश तथा लोधी वंश ने।

प्रश्न 3.
सल्तनत वंश के कुछ महान् सुल्तानों के नाम बताओ।
उत्तर-
इल्तुतमिश, बलबन, अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद-बिन-तुग़लक तथा फिरोजशाह तुग़लक।

प्रश्न 4.
कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु कब और कैसे हुई ?
उत्तर-
कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु 1210 ई० में घोड़े से गिरने से हुई।

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प्रश्न 5.
आराम शाह कौन था ?
उत्तर-
आराम शाह कुतुबुद्दीन ऐबक का पुत्र था जो उसके बाद दिल्ली का सुल्तान बना। वह एक अयोग्य शासक था। अतः उसे इल्तुतमिश ने बंदी बना लिया और बाद में उसका वध कर दिया।

प्रश्न 6.
चालीसा क्या था ?
उत्तर-
इल्तुतमिश ने शासन-प्रबन्ध चलाने के लिए 40 अमीरों की नियुक्ति की थी। इन्हें चालीसा कहा जाता था।
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प्रश्न 7.
रजिया सुल्ताना कौन थी ?
उत्तर-
रजिया सुल्ताना इल्तुतमिश की पुत्री थी। इल्तुतमिश के बाद वह दिल्ली की शासक बनी। उसने 1236 ई० से 1240 ई० तक शासन किया। उसने प्रादेशिक राज्यपालों के विद्रोह को कुचला। परन्तु अमीर और सेनापति उसकी आज्ञा का पालन नहीं करते थे। उसे 1240 ई० में मार दिया गया।

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प्रश्न 8.
कुतुबुद्दीन ऐबक के शासनकाल का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। .
उत्तर-
कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में तुर्क राज्य का वास्तविक संस्थापक था। वह दिल्ली सल्तनत का प्रथम शासक था। राजगद्दी पर बैठने के समय उसे बहुत-सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसने गज़नी के शासक यल्दौज के पंजाब पर आक्रमण को रोकने के लिए पंजाब पर अधिकार कर लिया। उसने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। ऐबक एक महान् कला-प्रेमी था। उसने दिल्ली और अजमेर में मस्जिदें बनवाईं। उसने कुतुबुमीनार का निर्माण कार्य भी आरम्भ करवाया था। 1210 ई० में अचानक घोड़े से गिर जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 9.
अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिणी विजयों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-
अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत की विजय के लिए अपने सेनापति मलिक काफूर के अधीन एक बहुत बड़ी सेना भेजी। मलिक काफूर ने देवगिरी, वारंगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरै के प्रदेश जीत लिए। परन्तु अलाउद्दीन खिलजी ने इन प्रदेशों को अपने राज्य में नहीं मिलाया।

प्रश्न 10.
इल्तुतमिश की सफ़लताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
इल्तुतमिश कुतुबुद्दीन ऐबक का दास था और बाद में उसका दामाद बन गया। ऐबक की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र आराम शाह दिल्ली का सुल्तान बना, जो एक अयोग्य सुल्तान था। इल्तुतमिश ने आरामशाह को हराया और उसे बन्दी बना लिया और बाद में उसे मार दिया गया। इस प्रकार 1211 ई० में इल्तुतमिश अपने परिश्रम और योग्यता के कारण शासक बन गया।
सफलताएं-इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक प्रयास किए –

  1. उसने अमीरों पर काबू पाया जो दिल्ली सल्तनत के विरोधी थे।
  2. उसने गज़नी के ताजुद्दीन यल्दौज और मुलतान के नसीर-उद्-दीन कुबाचा को पराजित किया।
  3. उसने रणथम्भौर, ग्वालियर और उज्जैन आदि राजपूत किलों पर अधिकार कर लिया।
  4. उसने बंगाल के विद्रोह को कुचल दिया और उस पर दोबारा अधिकार कर लिया।
  5. 1221 ई० में उसने चंगेज़ खान के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण से भारत की रक्षा की।
  6. उसने राज्य का शासन प्रबन्ध चलाने के लिए 40 अमीरों की नियुक्ति की, जिन्हें चालीसा कहा जाता था।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 10 दिल्ली सल्तनत

प्रश्न 11.
जलालुद्दीन खिलजी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
जलालुद्दीन खिलजी खिलजी वंश का संस्थापक था। उसने 1290 ई० से 1296 ई० तक शासन किया। उसके समय में दरबार षड्यन्त्रों का अड्डा बन गया था। 1296 ई० में जलालुद्दीन खिलजी का वध करके उस का भतीजा एवं दामाद अलाउद्दीन खिलजी राजगद्दी पर बैठा।

प्रश्न 12.
अलाउद्दीन खिलजी की विजयों तथा सुधारों की जानकारी दीजिए।
उत्तर-
अलाउद्दीन खिलजी खिलजी वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उसने 1296 ई० से 1316 ई० तक शासन किया। वह एक आशावादी शासक था। वह भारत में एक साम्राज्य स्थापित करना चाहता था।
विजयें-
(1) 1299 ई० में अलाउद्दीन ने गुजरात पर जीत प्राप्त की।
(2) 1301 ई० में उसने रणथम्भौर पर अधिकार कर लिया।
(3) 1303 ई० में उसने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया।
(4) इसके बाद उसने अपने सेनापति मलिक काफूर के नेतृत्व में एक बड़ी सेना दक्षिण भारत में भेजी। मलिक काफूर ने देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र और मदुरै के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। परन्तु अलाउद्दीन खिलजी ने इन क्षेत्रों को दिल्ली सल्तनत में शामिल नहीं किया।
अलाउद्दीन खिलजी के सुधार
1. आर्थिक सुधार-अलाउद्दीन खिलजी ने सभी आवश्यक वस्तुओं के मूल्य बहुत कम कर दिए। मूल्यों पर नियन्त्रण रखने के लिए उसने मण्डी-अधिकारियों को नियुक्त किया। जो दुकानदार नियमों का उल्लंघन करता था, उसे कठोर दण्ड दिया जाता था।
2. सैनिक सुधार-अलाउद्दीन खिलजी ने सैनिकों का हुलिया लिखने और घोड़ों को दागने की प्रथा आरम्भ की। उसने सैनिकों को नकद वेतन देना आरम्भ किया। उसने साम्राज्य के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में गुप्तचरों को भी नियुक्त किया।

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प्रश्न 13.
फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल के बारे में लिखो।
उत्तर-
फिरोज़ तुग़लक मुहम्मद तुग़लक की मृत्यु के बाद दिल्ली का सुल्तान बना। उसने अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए –

  1. उसने कृषि की उन्नति के लिए नहरें बनवाईं और सिंचाई का प्रबन्ध किया।
  2. उसने हिसार, फिरोज़ा, जौनपुर, फिरोज़ाबाद आदि नए नगर बसाए। उसने कई बांधों, महलों, स्कूलों, मस्जिदों आदि का निर्माण भी करवाया।
  3. उसने निर्धनों की सहायता के लिए दीवान-ए-खैरात नामक विभाग की स्थापना की।
  4. फिरोज तुग़लक ने अपने दासों पर बहुत ही अधिक धन व्यय किया। इससे राजकोष खाली हो गया।

प्रश्न 14.
इब्राहीम लोधी के राज्यकाल के बारे में लिखो।
उत्तर-
इब्राहीम लोधी अपने वंश का अन्तिम शासक था। उसने 1517 ई० से 1526 ई० तक शासन किया। वह अपने केन्द्रीय शासन को शक्तिशाली बनाना चाहता था। परन्तु उसको अफ़गान सरदार पसन्द नहीं करते थे। उन्होंने उसके लिए अनेक कठिनाइयां उत्पन्न की। वास्तव में इब्राहीम लोधी बहुत दूरदर्शी शासक नहीं था। वह अपने अमीरों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करके उनका मन जीत सकता था। परन्तु अपने हठी स्वभाव के कारण इब्राहीम लोधी ने उन्हें अपना शत्र बना लिया। परिणामस्वरूप उन्होंने दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह करने आरम्भ कर दिए। 1526 ई० में इब्राहीम लोधी (पानीपत की पहली लड़ाई में) बाबर के विरुद्ध युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया।

प्रश्न 15.
भारत पर तैमूर के आक्रमण का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
तैमूर मध्य एशिया में बलख़ का शासक था। 1398 ई० में उसने भारत पर आक्रमण कर दिया और दिल्ली में भारी लूट-मार की। अनेक लोग मारे गए। वह लूट मार करके मध्य एशिया लौट गया। तैमूर के वापिस जाने के बाद पंजाब, मालवा, मेवाड़, जौनपुर, खानदेश, गुजरात आदि प्रान्तों ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया।

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प्रश्न 16.
सैय्यद वंश (1414 ई०-1451 ई०) पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
तैमूर ने दिल्ली छोड़ने से पहले खिज़र खान को मुल्तान, लाहौर और दीपालपुर का राज्यपाल नियुक्त किया था। 1414 ई० में ख़िजरखान ने दिल्ली को जीत लिया और सैय्यद वंश की स्थापना की। इस वंश ने 1414 ई० से 1451 ई० तक शासन किया। इस वंश का अन्तिम शासक अलाउद्दीन आलम शाह लाहौर के राज्यपाल बहलोल लोधी से पराजित हुआ था।

प्रश्न 17.
बहलोल लोधी तथा सिकन्दर लोधी का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर-
बहलोल लोधी-बहलोल लोधी लोधी वंश का संस्थापक और प्रथम शासक था। उसने दिल्ली सल्तनत के गौरव को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। उसने देश में शान्ति और कानून व्यवस्था स्थापित की। 1488 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। उसका पुत्र सिकन्दर लोधी उसका उत्तराधिकारी बना।

सिकन्दर लोधी-सिकन्दर लोधी (1488 ई०-1517 ई०) लोधी वंश का बहुत ही शक्तिशाली शासक था। वह अच्छा शासन-प्रबन्धक था। उसने लोगों के कल्याण के लिए कई काम किये। उदाहरण के लिए उसने खेतीबाड़ी में सुधार किया और आवश्यक वस्तुओं के मूल्य कम कर दिए। 1503 ई० में उसने आगरा नगर की स्थापना की और इसे अपनी राजधानी बनाया। 1517 ई० उसकी मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 18.
दिल्ली सल्तनत के दौरान राजनीतिक संस्थाओं के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के समय राजनीतिक संस्थाओं के विकास का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –
I. केन्द्रीय सरकार-सुल्तान निरंकुश शासक था और उसके पास बहुत शक्तियां थीं। वह मन्त्रियों की सहायता से शासन प्रबन्ध चलाता था। सुल्तान द्वारा सभी महत्त्वपूर्ण विभागों के नियुक्त मन्त्री सुल्तान के आदेश अनुसार ही अपने विभागों का शासन प्रबन्ध चलाते थे। दिल्ली सल्तनत का शासन-प्रबन्ध मुख्य रूप से इस्लामी कानूनों पर आधारित था। सरकार के अनेक विभाग थे। हर विभाग की देख-भाल किसी मन्त्री या अधिकारी द्वारा की जाती थी।

1. वज़ीर-वज़ीर राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण मन्त्री था। वह वित्त और लगान (कर) विभाग का प्रमुख था। उसकी सहायता के लिए बहुत से अधिकारी नियुक्त किये जाते थे। इन में से ‘मुशरिफ़-ए-ममालिक’ (महालेखाकार) और ‘मुस्तोफी-ए-ममालिक’ (महालेखा निरीक्षक) महत्त्वपूर्ण थे।

2. आरिज़-ए-मामलिक : यह सेना का मन्त्री था।
3. दीवान-ए-इंशाह : यह गुप्तचर विभाग का मन्त्री था।
4. दीवान-ए-रिसालत : यह विदेशी विभाग का मन्त्री था।
5. सदर-ए-सादूर : यह धार्मिक शिक्षा मामलों का मन्त्री था।

II. प्रान्तीय प्रबन्ध-शासन प्रबन्ध की सुविधा के लिए साम्राज्य को कई प्रान्तों में बाँटा गया था। प्रान्तीय शासन चलाने के लिए कई राज्यपाल व गवर्नर नियुक्त किये गए थे। उन्हें सूबेदार, मुफती या वली कहा जाता था। प्रान्तों को आगे परगनों में बांटा गया था। ग्रामों के एक समूह को मिला कर एक परगना बनता था। आमिल परगने का मुख्य अधिकारी होता था। ग्राम के प्रमुख को मुकद्दम कहा जाता था।

III. सैनिक नियन्त्रण के ढंग-सुल्तान की शक्ति उस की सेना पर निर्भर करती थी। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने अपनी-अपनी सेना की सहायता से भारत के बहुत से भागों पर अधिकार कर लिया था। उन्होंने सेना की सहायता से विदेशी आक्रमणों को रोका। सेना की सहायता से ही उन्होंने अपने राज्यों में कानूनी व्यवस्था स्थापित की। विद्रोहों को दबाने के लिए भी सैनिक शक्ति का होना अत्यावश्यक था। शक्तिशाली सेना के बिना वे अपने अस्तित्व के बारे सोच भी नहीं सकते थे। अतः दिल्ली के सुल्तानों ने सैनिक नियन्त्रण के सभी साधनों का प्रयोग किया।

प्रश्न 19.
दिल्ली सल्तनत के संदर्भ में निम्न पर संक्षिप्त लेख लिखिए –
1. शाही दरबार
2. कुलीन वर्ग
3. भूमि-सुधार
4. लगान के अस्थिर स्रोत।
उत्तर-
1. शाही दरबार-दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों ने अपने-अपने दरबार की स्थापना की। राजकुमारों को आगे वाली सीटें (स्थान) दी गईं। मन्त्री, विभाग प्रमुख, अन्य अधिकारियों और विदेशी राजदूतों को स्थायी स्थान प्रदान किये गये। सुलतान द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने के लिए विभाग-प्रमुख हमेशा उपस्थित रहते थे।

2. कुलीन वर्ग-दिल्ली सल्तनत के सुल्तान पूर्ण रूप से निरंकुश थे। वे कुलीन वर्ग की सहायता से शासन प्रबन्ध करते थे। उनमें से बहुत से कुलीन, तुर्क या अफ़गान परिवारों से सम्बन्ध रखते थे। परन्तु अलाउद्दीन खिलजी के राज्यकाल के पश्चात् मुसलमानों और हिन्दुओं को भी अधिकारी नियुक्त किया जाने लगा था। इस प्रकार उन्होंने भी कुलीन वर्ग की रचना की। केन्द्रीय मन्त्री, प्रान्तों के गवर्नर तथा सेना के प्रमुख कुलीन वर्ग में सम्मिलित थे।

3. भूमि-सुधार-भूमि कर सल्तनत की आय का प्रमुख साधन था। उस समय भूमि-कर निश्चित करने के लिए तीन विधियां प्रचलित थीं। ये बटाई, कानकूत और भूमि के माप पर आधारित थीं। भूमि कर नकद अथवा किसी अन्य रूप में एकत्रित किया जाता था। अलाउद्दीन खिलजी ने भूमि-सुधार की तरफ विशेष ध्यान दिया। उसने कृषि योग्य भूमि का माप करवाया तथा खेतीबाड़ी की देख-भाल करने के लिए ‘दीवान-ए-मस्त-ख़राज़’ नामक विभाग की स्थापना की। उस समय भूमि कर की दर बहुत ऊंची थी। फ़िरोज़शाह तुग़लक ने भी खेतीबाड़ी को प्रोत्साहन दिया। उसने सिंचाई के लिए बहुत-सी नहरें खुदवाईं। उसने भूमि कर की दर कम और किसानों के कर्जे माफ़ कर दिए।

4. लगान के अस्थिर स्त्रोत-दिल्ली सल्तनत के लगान का स्थिर स्रोत भूमि कर था। परंतु लगान के कई अस्थिर स्रोत भी थे; जैसे-खराज़, खमस, जकात और जजिया । खराज गैर-मुस्लिमों से वसूल किया जाता था। यह कर कुल उपज का 10% से 50% तक होता था। खमस युद्ध में लूटे गए माल का 1/5 भाग होता था। इस पर सुल्तान का अधिकार होता था। लूट के माल का शेष 4/5 भाग सेना में बांट दिया जाता था। जकात एक धार्मिक कर था, जो मुसलमानों पर लगाया जाता था। यह कर उनकी सम्पत्ति का 2.5% होता था। जजिया कर गैर-मुसलमानों पर लगाया जाता था। कहा जाता है कि महिलाओं, बच्चों और ग़रीब लोगों पर यह कर नहीं लगाया जाता था। इस कर की वसूली आय के आधार पर 10 से 40 टका तक की जाती थी।

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(क) सही जोड़े बनाइए :

  1. इल्तुतमिश – सैनिकों का हुलिया
  2. अलाउद्दीन खिलजी – पानीपत की पहली लड़ाई
  3. मुहम्मद-बिन-तुग़लक – चालीस अमीरों की नियुक्ति
  4. इब्राहिम लोधी – बुद्धिमान मूर्ख

उत्तर-

  1. इल्तुतमिश – चालीस अमीरों की नियुक्ति
  2. अलाउद्दीन खिलजी – सैनिकों का हुलिया
  3. मुहम्मद बिन तुग़लक – विद्वान मूर्ख
  4. इब्राहिम लोधी – पानीपत की पहली लड़ाई

(ख) सही उत्तर चुनिए :

प्रश्न 1.
दास वंश के किस शासक की मृत्यु घोड़े से गिर जाने के कारण हुई थी?
(i) कुतुबुद्दीन ऐबक
(ii) इल्तुतमिश
(iii) बलबन।
उत्तर-
(i) कुतुबुद्दीन ऐबक।

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प्रश्न 2.
क्या आप अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिणी भारत की विजयों का नेतृत्व करने वाले जनरल का नाम बता सकते हैं?
(i) मुबारकशाह
(ii) मलिक काफूर
(iii) जलालुद्दीन ख़िलजी।
उत्तर-
(ii) मलिक काफूर।

प्रश्न 3.
चित्र में दिखाया गया व्यक्ति 1526 ई० में बाबर के हाथों एक लड़ाई में पराजित हुआ था। वह लड़ाई कौन-सी थी?
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 10 दिल्ली सल्तनत 3
(i) पानीपत की पहली लड़ाई
(ii) पानीपत की दूसरी लड़ाई
(iii) पानीपत की तीसरी लड़ाई।
उत्तर-
(i) पानीपत की पहली लड़ाई।

कबड्डी (Kabbadi) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 11th Class Physical Education Book Solutions कबड्डी (Kabbadi) Game Rules.

कबड्डी (Kabbadi) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें (TIPS TO REMEMBER)

  1. पुरुषों के लिए कबड्डी के मैदान की लम्बाई = 13 मीटर
  2.  कबड्डी के मैदान की चौड़ाई = 10 मीटर
  3. महिलाओं के लिए मैदान की लं. और चौ. = 12 मीटर, 8 मीटर
  4. जूनियर लड़के और लड़कियों के लिए मैदान = 11 × 8 मीटर
  5. मैच का समय पुरुषों के लिए = 20-5-20 मिनट
  6. महिलाओं के लिए मैच का समय = 15-5-15 मिनट
  7. विश्राम का समय = 5 मिनट
  8. टीम के कुल खिलाड़ी = 12
  9. बॉक रेखा की मध्य रेखा से = 3.75 मीटर दूरी (पुरुषों के लिए)
  10. बॉक रेखा की मध्य रेखा से = 3 मीटर दूरी (महिलाओं के लिए)
  11. बोनस का अंक = कम से कम 6 खिलाड़ियों के होने पर
  12. मैच के अधिकारी = 1 रेफरी, 2 अम्पायर, 1 स्कोरर, 1 टाइम कीपर 2 लाइन मैन
  13. मध्यान्तर का समय = पांच मिनट

कबड्डी खेल की संक्षेप रूप-रेखा (Brief outline of the Kabaddi Game)

  1. प्रत्येक टीम में 12 खिलाड़ी होंगे परन्तु एक समय सात खिलाड़ी ही मैदान में उतरेंगे तथा 5 खिलाड़ी स्थानापन्न (Substitutes) होते हैं।
  2. टॉस जीतने वाली टीम अपनी पसन्द का क्षेत्र चुनती है तथा आक्रमण करने का अवसर प्राप्त करती है।
  3. खेल का समय 20-5-20 मिनटों का होता है तथा स्त्रियों और जूनियरों के लिए 15-5-15 का होता है जिसमें 5 मिनट का समय आराम का होता है।
  4. यदि कोई खिलाड़ी खेल के दौरान मैदान में से बाहर चला जाता है तो वह आऊट माना जाएगा।
  5. यदि किसी खिलाड़ी का कोई अंग सीमा के बाहरी भाग को छू जाए तो वह आऊट माना जाएगा।
  6. यदि किसी कारणवश मैच पूरा नहीं खेला जाता तो मैच दोबारा खेला जाएगा।
  7. खिलाड़ी अपने शरीर पर तेल या कोई और चिकनाहट वाली चीज़ नहीं मल सकता।
  8. खेल के समय कोई खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी को कैंची (Scissors grip) नहीं मार सकता।
  9. खिलाड़ी को चोट लगने की दशा में दूसरा खिलाड़ी उसके स्थान पर आ सकता है।
  10. ग्राऊंड से बाहर खड़े होकर खिलाड़ी को पानी दिया जा सकता है, ग्राऊंड के अन्दर आकर देना फाऊल है।
  11. कैप्टन रैफरी के परामर्श से टाइम आऊट ले सकता है, परन्तु टाउम-आऊट का समय दो मिनट से अधिक नहीं होना चाहिए।
  12. एक टीम तीन खिलाड़ी बदल सकती है।
  13. यदि कोई टीम दूसरी टीम से लोना ले जाती है तो उस टीम को दो नम्बर और दिए जाते हैं।
  14. बदले हुए खिलाड़ियों को दोबारा नहीं बदला जा सकता।

कबड्डी (Kabbadi) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

PSEB 11th Class Physical Education Guide कबड्डी (Kabbadi) Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कबड्डी के मैदान की लम्बाई तथा चौड़ाई लिखें।
उत्तर-
लम्बाई = 13 मी., चौड़ाई = 10 मी.

प्रश्न 2.
कबड्डी के मैच में पुरुषों के लिये खेल का कितना समय होता है ?
उत्तर-
20-5-20 मिनट।

प्रश्न 3.
कबड्डी के मैच में आधा समय कितने मिनट का होता है ?
उत्तर-
पांच मिनट का।

कबड्डी (Kabbadi) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 4.
कबड्डी के मैच में पुरषों के लिये बॉक लाइन की मध्य लाइन से दूरी कितनी होती है ?
उत्तर-
3.75 मीटर।

प्रश्न 5.
कबड्डी के इतिहास के विषय में लिखें।
उत्तर-
कबड्डी खेल का जन्म हमारे भारत में हुआ था। इसलिए इसको भारत का मूल खेल कहा जाता है। कबड्डी खेल की जड़ें भारतीय ज़मीन में लगीं, बढ़ीं और विकसित हुई हैं। यह खेल भारत के हर शहर में खेला जाता है। अलग-अलग राज्यों में इस खेल को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। कई राज्यों में इसे हु-तू-हु, कौड़ी, सादुकुड़ा आदि के नाम से जाना जाता है। कबड्डी का खेल भारत के गांवों में अधिक प्रसिद्ध है। क्योंकि इस खेल के नियम बहुत साधारण हैं और इस खेल के लिए किसी विशेष सामान की भी ज़रूरत नहीं होती। सन् 1920 में दक्षिण जिमखाना में कबड्डी की नई किस्म के नये नियम बनाये गये। 1935 में सर्व महाराष्ट्र शारीरिक परिषद् में कबड्डी के नियमों को संशोधित किया गया। सन् 1936 में बर्लिन ओलम्पिक खेलों में इसका प्रदर्शनी मैच करवाया गया। सन् 1982 में इस खेल का प्रदर्शनी मैच एशियन गेमों में, जो नई दिल्ली में हुईं, में करवाया गया। सन् 1951 में राष्ट्रीय कबड्डी का गठन किया गया और 1990 में एशियन खेलों में कबड्डी खेल को अपना स्थान मिला जबकि अब तक ओलम्पिक में यह अपना स्थान प्राप्त नहीं कर सकी है। कबड्डी खेल पाकिस्तान, श्रीलंका, वर्मा, मलेशिया, कोरिया और सिंगापुर में खेला जाता है। हमारे देश में फैडरेशन ऑफ़ इंडिया कबड्डी के नियमों को देखती है और उसके अनुकूल काम करती है।

प्रश्न 6.
कबड्डी के मैच में गैलरी क्या होती है ?
उत्तर-
कबड्डी के मैच में सिटिंग बॉक्स को गैलरी कहते हैं।

कबड्डी (Kabbadi) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 7.
कबड्डी के मैच में बॉक लाइन क्या होती है ?
उत्तर-
अन्तिम तथा मध्य रेखा के बीच में बाक रेखा लगाई जाती है। रेडर को यह रेखा पार करनी आवश्यक होती है। यदि रेडर विरोधी टीम के खिलाड़ी को नहीं छूता तथा यह रेखा भी पार नहीं करता तो वह आऊट हो जाता है। विरोधी टीम को इसका अंक मिल जाता है। पुरुषों के लिये मध्य रेखा से दूरी 3.75 मी. और महिलाओं के लिये 3 मी. होती है।

कबड्डी (Kabbadi) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

Physical Education Guide for Class 11 PSEB कबड्डी (Kabbadi) Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
कबड्डी के खेल के मैदान, खेल अधिकारी तथा खेल के प्रमुख नियमों का वर्णन करें।
उत्तर-
खेल का मैदान (Play Ground) खेल का मैदान समतल तथा नर्म होगा। यह मिट्टी, खाद तथा बुरादे का होना चाहिए। पुरुषों के लिए मैदान का आकार 13 मीटर × 10 मीटर होगा। केन्द्रीय रेखा इसे दो समान भागों में बांटेगी। प्रत्येक भाग 10 मीटर × 161/4 मीटर होगा। स्त्रियों तथा जूनियर्ज़ के लिए मैदान का नाप 11 मीटर × 8 मीटर होगा। मैदान के दोनों ओर एक मीटर चौड़ी पट्टी होगी जिसे लॉबी (Lobby) कहते हैं। प्रत्येक क्षेत्र में केन्द्रीय रेखा से तीन मीटर दूर उसके समानान्तर मैदान की पूरी चौड़ाई के बराबर रेखायें खींची जाएंगी। इन रेखाओं को बॉक रेखाएं (Baulk Lines) कहते हैं। केन्द्रीय रेखा स्पष्ट रूप से अंकित की जानी चाहिएं। केन्द्रीय रेखा तथा अन्य रेखाओं की अधिकतम चौड़ाई 5 सैंटीमीटर या 2 इंच होनी चाहिए।
बोनस रेखा (Bonus Lines)—

  1. यह रेखा से 10 सें० मी० के अन्तर पर होती है और सीनियर के लिए बॉक रेखा से एक मीटर के अन्तर पर होती है।
  2. जब रेडर रेखा को पार के पश्चात् यदि कोई रेडर पकड़ा जाता है तो उसे अंक दिया जाता है।
  3. बोनस रेखा को पार करने के पश्चात् यदि कोई रेडर पकड़ा जाता है तो विरोधी टीम को उसका अंक दिया जाता है।
  4. यदि कोई रेडर बोनस रेखा पार करने के पश्चात् खिलाड़ी को हाथ भी लगाकर आता है तो उसे बोनस के अतिरिक्त एक अंक अधिक मिलता है।

खेल के नियम
(Rules of Game)
1. टॉस जीतने वाली टीम या तो अपनी पसन्द का क्षेत्र ले सकती या पहले आक्रमण करने का अवसर प्राप्त कर सकती है। मध्यान्तर के पश्चात् क्षेत्र या कोर्ट बदल लिए जाते हैं।

2. खेल के दौरान में मैदान से बाहर जाने वाला खिलाड़ी आऊट हो जाएगा।

3. खिलाड़ी आऊट हो जाता है।

  • यदि किसी खिलाड़ी के शरीर का कोई भी भाग मैदान की सीमा के बाहर के भाग को स्पर्श कर ले।
  • संघर्ष करते समय खिलाड़ी आऊट नहीं होगा यदि उसके शरीर का कोई अंग या तो सीधे मैदान को छुए या उस खिलाड़ी को छुए जो सीमा के अन्दर है (शरीर का कोई न कोई भाग सीमा के बीच होना चाहिए।)

4. संघर्ष आरम्भ होने पर लॉबी का क्षेत्र भी मैदान में सम्मिलित माना जाता है। संघर्ष की समाप्ति पर वे खिलाड़ी जो संघर्ष में सम्मिलित थे, लॉबी से होते हुए अपने-अपने क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं।
यदि बचाव करने वाली टीम के किसी खिलाड़ी का पैर पीछे वाली लाइन को छू जाता है तो वह आऊट नहीं है जब तक पैर लाइन से बाहर न निकले।

5. आक्रामक खिलाड़ी ‘कबड्डी’ शब्द का लगातार उच्चारण करता रहेगा। यदि वह ऐसा नहीं करता तो अम्पायर , उसे अपने क्षेत्र में वापिस जाने का और विपक्षी खिलाड़ी को आक्रमण करने का आदेश दे सकता है। इस स्थिति में उस खिलाड़ी का पीछा नहीं किया जाएगा।
KABADDI GROUND
कबड्डी (Kabbadi) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 1

6. आक्रामक खिलाड़ी को ‘कबड्डी’ शब्द बोलते हुए विपक्षी कोर्ट में प्रविष्ट होना चाहिए। यदि वह विपक्षी के कोर्ट में प्रविष्ट होने के पश्चात् ‘कबड्डी’ शब्द का उच्चारण करता है तो अम्पायर उसे वापिस भेज देगा और विपक्षी खिलाड़ी को आक्रमण का अवसर दिया जाएगा। इस स्थिति में आक्रामक खिलाड़ी का पीछा नहीं किया जाएगा।

7. यदि सचेत किए जाने पर कोई भी आक्रामक नियम नं० 6 का उल्लंघन करता है तो निर्णायक उसकी बारी समाप्त कर देगा और विपक्षी को एक अंक देगा, परन्तु उसे आऊट नहीं किया जाएगा।

8. खेल के अन्त तक प्रत्येक पक्ष अपने आक्रामक बारी-बारी से भेजता रहेगा।

9. यदि विपक्षियों द्वारा पकड़ा हुआ कोई आक्रामक उनसे बच कर अपने कोर्ट में सुरक्षित पहुंच जाता है तो उसका पीछा नहीं किया जाएगा।

10. एक बारी में केवल एक ही आक्रामक विपक्षी कोर्ट में जाएगा। यदि एक साथ एक से अधिक आक्रामक विपक्षी कोर्ट में जाते हैं तो निर्णायक या अम्पायर उन्हें वापस जाने का आदेश देगा और उनकी बारी समाप्त कर दी जाएगी। इन आक्रामकों द्वारा छुए गए विपक्षी आऊट नहीं माने जाएंगे। विपक्षी इन आक्रामकों का पीछा नहीं करेंगे।

11. जो भी पक्ष एक समय में एक से अधिक खिलाड़ी विपक्षी कोर्ट में भेजता है उसे चेतावनी दी जाएगी। यदि चेतावनी देने के पश्चात् भी वह ऐसा करता है तो पहले आक्रामक के अतिरिक्त शेष सभी को आऊट किया जाएगा।

12. यदि कोई आक्रामक विपक्षी कोर्ट में सांस तोड़ देता है तो उसे आऊट माना जाएगा।

13. किसी आक्रामक के पकड़े जाने पर विपक्षी खिलाड़ी जान-बूझ कर उसका मुंह बंद करके सांस रोकने या चोट लगने वाले ढंग से पकड़ने, कैंची या अनुचित साधनों का प्रयोग नहीं करेंगे। ऐसा किए जाने पर अम्पायर उस आक्रामक को अपने क्षेत्र में सुरक्षित लौटा हुआ घोषित करेगा।

14. कोई भी आक्रामक या विपक्षी एक दूसरे को सीमा से बाहर धक्का नहीं मारेगा। जो पहले धक्का देगा उसे आऊट घोषित किया जाएगा। यदि धक्का मार कर आक्रामक को सीमा से बाहर निकाला जाता है तो उसे अपने कोर्ट से सुरक्षित लौटा हुआ घोषित किया जाएगा।

15. जब तक आक्रामक विपक्षी कोर्ट में रहेगा तब तक कोई भी विपक्षी खिलाड़ी केन्द्रीय रेखा से पार आक्रामक के अंग को अपने शरीर के किसी भाग से नहीं छुएगा। यदि वह ऐसा करता है उसे आऊट घोषित किया जाएगा।

16. यदि नियम 15 का उल्लंघन करते हुए कोई आऊट हुआ विपक्षी आक्रामक को पकड़ता है या उसे पकड़े जाने में सहायता पहुंचाते हुए या आक्रामक को पकड़े हुए नियम का उल्लंघन करता है तो आक्रामक अपने कोर्ट में सुरक्षित लौटा घोषित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त संघर्ष दल के सभी विपक्षी सदस्य आऊट हो जाएंगे। जब कोई आक्रामक विरोधी टीम की ओर नम्बर ले कर आता है तो उसका नम्बर तब माना जाएगा यदि उसके शरीर के किसी भी अंग ने मध्य रेखा को पूरा पार किया हो।

17. यदि कोई आक्रामक बिना अपनी बारी के जाता है तो अम्पायर उसे वापिस लौटने का आदेश देगा। यदि यह बार-बार ऐसा करता है तो उसके पक्ष को एक बार चेतावनी देने के पश्चात् विपक्षियों को एक अंक दे दिया जाएगा।

18. नये नियमों के अनुसार बाहर से पकड़ कर पानी पीना फाऊल नहीं है।

19. जब एक दल विपक्षी दल के सभी खिलाड़ियों को निष्कासित करने में सफल हो जाए तो उन्हें ‘लोना’ मिलता है। लोने के दो अंक अतिरिक्त होते हैं। इसके पश्चात् खेल पुनः शुरू होगा।

20. आक्रामक को यदि अपने पक्ष के खिलाड़ी द्वारा विपक्षी के प्रति चेतावनी दी जाती है तो उसके विरुद्ध 1 अंक दिया जाएगा।

21. किसी भी आक्रामक या विपक्षी को कमर या हाथ-पांव के अतिरिक्त शरीर के किसी भाग से नहीं पकड़ सकता। उस नियम का उल्लंघन करने वाला आऊट घोषित किया जाएगा।

22. खेल के दौरान यदि एक या दो खिलाड़ी रह जाएं तथा विरोधी दल का कप्तान अपनी टीम को खेल में लाने के लिए उन्हें आऊट घोषित कर दे तो विपक्षियों को इस घोषणा से पहले शेष खिलाड़ियों की संख्या के बराबर अंकों के अतिरिक्त ‘लोना’ के दो अंक और प्राप्त होंगे।

23. विपक्षी के आऊट होने पर आऊट खिलाड़ी उसी क्रम में जीवित किया जाएगा जिसमें वह आऊट हुआ था।

24. यदि किसी चोट के कारण मैच 20 मिनट रुका रहे तो हम मैच re-play करवा सकते हैं।

25. 5 खिलाड़ियों के साथ भी मैच आरम्भ किया जा सकता है परन्तु जब 5 खिलाड़ी आऊट हो जाएं तो हम पूरा लोना अर्थात् 5 + 2 अंक (खिलाड़ियों 1, 5 अंक और 2 अंक लोने के) देते हैं। जब दो खिलाड़ी आ जाएं तो वे टीम में डाले जा सकते हैं।

26. लोना के दो अंक होते हैं।

कबड्डी (Kabbadi) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 2.
कबड्डी मैच के नियम बताएं।
उत्तर-
मैच के नियम
(Rules of Match)

  1. प्रत्येक पक्ष में खिलाड़ियों की संख्या बारह (12) होगी। एक साथ मैदान में सात खिलाड़ी उतरेंगे।
  2. खेल की अवधि पुरुषों के लिए 20 मिनट तथा स्त्रियों व जूनियरों के लिए 15 मिनट की दो अवधियां होंगी। इन दोनों अवधियों के बीच 5 मिनट का मध्यान्तर होगा।
  3. प्रत्येक आऊट होने वाले विपक्षी के लिए दूसरे पक्ष को एक अंक मिलेगा। लोना’ प्राप्त करने वाले पक्ष को दो अंक मिलेंगे।
  4. खेल की समाप्ति पर सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाले पक्ष को विजयी घोषित किया जाता है।
  5. कबड्डी का खेल बराबर रहने पर प्रत्येक टीम को पांच-पांच रेड क्रमानुसार दिये जाते हैं। सभी सात खिलाड़ी रेड के समय मैदान में रहेंगे। उस समय बॉक रेखा सभी तरह के फैसलों के लिए बोनस रेखा मानी जाएगी। इस खेल में खिलाड़ी को बॉक रेखा पार कर लेने पर एक अंकं मिलेगा। रेडर बोनस रेखा जो बॉक रेखा में परिवर्तित हुई है, उसे पार कर लेता है और किसी विरोधी खिलाड़ी को हाथ भी लगा देता है तो उसे बोनस रेखा पार करने का एक अंक अधिक मिलेगा। इस अवसर पर कोई भी खिलाड़ी आऊट होने पर मैदान से बाहर नहीं जा सकता।

रेड डालने से पहले दोनों टीमें अपने खिलाड़ियों के नम्बर और नाम क्रमानुसार रेड डालने के लिए रैफरी को देंगे और रैफरी के बुलाने पर दोनों टीमों के खिलाड़ी बारी-बारी रेड डालेंगे। उस समय टास नहीं होगा। पहले टास जीतने वाली टीम ही पहले रेड डालेगी। यद्यपि पांच-पांच रेड लाने पर भी मैच बराबर रहता है तो मैच का फैसला ‘अचानक मृत्यु’ (Sudden Death) के आधार पर होगा।

अचानक मृत्यु (Sudden Death)-इस अवसर पर दोनों टीमों का एक-एक रेड डालने का अवसर मिलेगा। जो भी टीम रेड डालते समय अंक बना लेती है उसे विजयी घोषित किया जाता है। इस तरह रेड डालने का सिलसिला उस समय तक चलता रहेगा, जब तक कोई एक टीम विजयी अंक प्राप्त नहीं कर लेती।

लोना (Lona)—जब एक टीम के सारे खिलाड़ी आऊट हो जाएं तो विरोधी टीम को 2 अंक अधिक मिलते हैं। उसे हम लोना कहते हैं।
टूर्नामैंट निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं—
1. नाक आऊट (Knock Out)—इस में जो टीम हार जाती है, वह प्रतियोगिता से बाहर हो जाती है।

2. लीग (League)—इस में यदि कोई टीम हार जाती है, वह टीम बाहर नहीं होगी। उसे अपने ग्रुप के सारे मैच खेलने पड़ते हैं। जो टीम मैच जीतती है उसे दो अंक दिये जाते हैं। मैच बराबर होने पर दोनों टीमों को एक-एक अंक दिया जाएगा। हारने वाली टीम को शून्य (Zero) अंक मिलेगा।

यदि दोनों टीमों का मैच बराबर रहता है और अतिरिक्त समय भी दिया जाता है या जिस टीम ने खेल आरम्भ होने से पहले अंक लिया होगा वह विजेता घोषित की जाएगी। यदि दोनों टीमों का स्कोर शून्य (Zero) है तो जिस टीम ने टॉस जीता हो वह विजेता घोषित की जाएगी।

3. किसी कारणवश मैच न होने की दशा में मैच पुनः खेला जाएगा। दोबारा किसी और दिन खेले जाने वाले मैच में दूसरे खिलाड़ी बदले भी जा सकते हैं, परन्तु यदि मैच उसी दिन खेला जाए तो उसमें वही खिलाडी खेलेंगे जो पहले खेले

4. यदि किसी खिलाड़ी को चोट लग जाए तो उस पक्ष का कप्तान ‘समय आराम’ (Time Out) पुकारेगा, परन्तु ‘समय आराम’ की अवधि दो मिनट से अधिक नहीं होगी तथा चोट लगने वाला खिलाड़ी बदला जा सकता है। खेल की दूसरी पारी शुरू होने से पहले दो खिलाड़ी बदले जा सकते हैं। एक या दो से कम खिलाड़ियों से खेल शुरू हो सकता है। जो खिलाड़ी खेल शुरू होने के समय उपस्थित नहीं होते, खेल के दौरान किसी भी समय मिल सकते हैं। रैफरी को सूचित करना ज़रूरी है। यदि चोट गम्भीर हो तो उसकी जगह दूसरा खिलाड़ी खेल सकता है। प्रथम खेल के अन्त तक केवल दो खिलाड़ी बदले जा सकते हैं।

5. किसी भी टीम में पांच खिलाड़ियों से कम होने की दशा में खेल शुरू किया जा सकता है, परन्तु—

  • टीम के सभी खिलाड़ी आऊट होने पर अनुपस्थित खिलाड़ी भी आऊट हो जाएंगे और विपक्षी टीम को ‘लोना’ दिया जाएगा।
  • यदि अनुपस्थित खिलाड़ी आ जाएं तो वे रैफरी की आज्ञा से खेल में भाग ले सकते हैं।
  • अनुपस्थित खिलाड़ियों के स्थानापन्न कभी भी लिए जा सकते हैं परन्तु जब वे इस प्रकार लिए जाते हैं तो मैच के अन्त तक किसी भी खिलाड़ी को बदला जा सकता है।
  • मैच पुनः खेले जाने पर किसी भी खिलाड़ी को बदला जा सकता है।

6. प्रलेपन की अनुमति नहीं। खिलाड़ियों के नाखून खूब अच्छी तरह कटे होने चाहिएं। खिलाड़ियों की पीठ तथा सामने की ओर कम-से-कम चार इंच लम्बा नम्बर लगाया जाएगा। खिलाड़ी के कम-से-कम वस्त्र बनियान, जांघिया या लंगोट सहित निक्कर होंगे। शरीर पर तेल आदि चिकने पदार्थ का मलना मना है। खिलाड़ी धातु की कोई वस्तु धारण नहीं करेंगे।

7. खेल के दौरान कप्तान या नेता के अतिरिक्त कोई भी खिलाड़ी आदेश नहीं देगा। कप्तान अपने अर्द्धक में ही आदेश दे सकता है।

8. यदि खिलाड़ी ‘कबड्डी’ शब्द का उच्चारण ठीक प्रकार से नहीं करता तथा रैफरी (Referee) द्वारा एक बार चेतावनी दिए जाने पर वह बार-बार ऐसा करता है तो दूसरी टीम को एक प्वाईंट दे दिया जाएगा, परन्तु वह खिलाड़ी बैठेगा नहीं।

9. यदि कोई खिलाड़ी आक्रमण (Raid) करने जा रहा है और उसकी टीम का कोच या अन्य अधिकारी ऐसा करता है तो रैफरी दूसरी टीम को उसके विरुद्ध एक प्वाईंट (अंक) दे देगा।

कबड्डी (Kabbadi) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 3.
कबड्डी खेल में अधिकारी व खेल में त्रुटियों का वर्णन करें।
उत्तर-
अधिकारी व उनके अधिकार
(क)

  1. रैफरी (एक)
  2. निर्णायक या अम्पायर (दो)
  3. रेखा निरीक्षक (दो)
  4. स्कोरर (एक)

(ख) आमतौर पर निर्णायक का निर्णय अन्तिम होगा। विशेष दशाओं में रैफ़री इसे बदल भी सकता है भले ही दोनों अम्पायरों में मतभेद हो।
(ग) निर्णेता (रैफरी) किसी भी खिलाड़ी को त्रुटि करने पर चेतावनी दे सकता है, उसके विरुद्ध अंक दे सकता है या मैच के लिए अयोग्य घोषित कर सकता है। ये त्रुटियां इस प्रकार की हो सकती हैं—

  1. निर्णय के बारे में अधिकारियों को बार-बार कहना,
  2. अधिकारियों को अपमानजनक शब्द कहना,
  3. अधिकारियों के प्रति अभद्र व्यवहार करना या उनके निर्णय को प्रभावित करने के लिए प्रक्रिया,
  4. पक्षी को अपमानजनक बातें कहना।

त्रुटियां
(Fouls)

  1. आक्रामक का मुंह बन्द करके या गला दबा कर उसकी सांस तोड़ने की कोशिश करना।
  2. हिंसात्मक ढंग का प्रयोग।
  3. कैंची मार कर आक्रामक को पकड़ना।
  4. आक्रामक भेजने में पांच सैकिण्ड से अधिक समय लगाना।
  5. मैदान के बारे खिलाड़ी या कोच द्वारा कोचिंग देना। इस नियम के उल्लंघन पर अम्पायर अंक दे सकता है।
  6. ऐसे व्यक्तियों को निर्णायक या रैफ़री नम्बर दे कर बाहर निकाल सकता है। आक्रमण जारी रहने पर सीटी बजाई जाएगी।
  7. जानबूझ कर बालों से या कपड़े से पकड़ना फाऊल है।
  8. जानबूझ कर आक्रामक को धक्का देना फाऊल है।

फाऊल
(Foul)
अधिकारी फ़ाऊल (Foul) खेलने पर खिलाड़ियों को तीन प्रकार के कार्ड दिखा सकता है, जो निम्नलिखित हैं—
हरा कार्ड (Green Card)
यह कार्ड खिलाड़ी को किसी भी नियम का जानबूझ कर उल्लंघन करने पर चेतावनी के आधार पर दिखाया जा सकता है।
पीला कार्ड (Yellow Card)
यह कार्ड खिलाड़ी को दो मिनट के लिए मैदान से बाहर निकालने के लिए दिखाया जाता है।
लाल कार्ड (Red Card)
यह कार्ड मैच अथवा टूर्नामैंट से बाहर निकालने के लिए दिखाया जाता है।

PSEB 7th Class Home Science Practical बच्चों के लिए बिब बनाना

Punjab State Board PSEB 7th Class Home Science Book Solutions Practical बच्चों के लिए बिब बनाना Notes.

PSEB 7th Class Home Science Practical बच्चों के लिए बिब बनाना

आय-जन्म से एक वर्ष तक माप-छाती = 18”
कागज़ का नाप (पहले कागज़ को| दोहरा कर लें)
बिब की चौड़ाई = छाती का 1/6 + 1/36 = 3 1/2″
बिब की चौड़ाई = छाती

  • का \(7 \frac{1}{2}\),
  • उ अ = इ स \(3 \frac{1}{2}\)
  • उ इ = अ स = \(7 \frac{1}{2}\)
  • उ ग = उ च = \(\frac{1}{2}\)
  • ग ह = ह ख = \(1 \frac{1}{2}\)
  • ह क = \(\frac{1}{12}\)
  • छाती = \(1 \frac{1}{2}\)“

PSEB 7th Class Home Science Practical बच्चों के लिए बिब बनाना 1
चित्र 5.1
ग, च को सीधी लाइन से मिलाते हैं। प, घ, इ को गोलाई से मिलाते हैं। इसी तरह ख, क तथा ग को गोलाई से मिलाते हैं। बिब को ग, च, घ, इ. ख, क, ग लाइनों पर काट लेते हैं।

सिलाई-सभी ओर बारीक-बारीक मोड़कर तुरपाई कर लेते हैं। \(\frac{1}{2}\) चौड़ी लेस सब किनारों पर रन एण्ड टाँके से लगाते हैं। बिब के साथ का वस्त्र लेकर \(\frac{3}{8}\) चौड़ी तथा 6” लम्बी दो तनियाँ (डोरे) बनाकर बाद में लगा देते हैं।
कपड़ा-25 × 25 सेंटीमीटर, तौलिए वाला कपड़ा या 25 × 50 सेंटीमीटर पापलीन।

नोट-यदि पापलीन इस्तेमाल में लाई जाए तो दो बिब कटते हैं, सब ओर \(\frac{1}{4}\) सिलाई का हक रखो तथा दोनों भागों को मिलाकर अन्दर की सिलाई करते हैं। सीधा करके लेस लगाते हैं।

PSEB 7th Class Home Science Practical बच्चों के लिए बिब बनाना

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

Punjab State Board PSEB 6th Class Agriculture Book Solutions Chapter 5 खादें Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Agriculture Chapter 5 खादें

PSEB 6th Class Agriculture Guide खादें Textbook Questions and Answers

(क) इन प्रश्नों के उत्तर एक-दो शब्दों में दीजिए-

प्रश्न 1.
पौधे को फलने-फूलने और अपना भोजन तैयार करने के लिए कितने प्रकार के पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है ?
उत्तर-
17 पोषक तत्त्वों की।

प्रश्न 2.
खादों को मुख्यतः कौन-कौन से भागों में विभाजित किया जा सकता
उत्तर-
प्राकृतिक खाद, रासायनिक खाद।

प्रश्न 3.
कौन-सी फसलें वायुमण्डल से नाइट्रोजन लेकर अपनी जड़ों में जमा करती हैं ?
उत्तर-
फलीदार फसलें जैसे मटर, दालें, सोयाबीन आदि।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 4.
नाइट्रोजन खाद के अधिक प्रयोग से भूमि में कौन-सा मादा बढ़ जाता
उत्तर-
खारा मादा।

प्रश्न 5.
कितने प्रतिशत नाइट्रोजन गैस के रूप में वायुमण्डल में पाई जाती है ?
उत्तर-
78 प्रतिशत।

प्रश्न 6.
100 किलोग्राम डाईअमोनियम फास्फेट खाद में कितने किलोग्राम फास्फोरस होता है ?
उत्तर-
46 किलोग्राम।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 7.
फास्फोरस तत्त्व कौन-सी खाद में मिलता है ?
उत्तर-
सिंगल सुपरफास्फेट तथा डी० ए० पी० ।

प्रश्न 8.
रूड़ी की 100 किलो खाद में कौन-से तत्त्व होते हैं ?
उत्तर-
1 किलो यूरिया के बराबर नाइट्रोजन तथा 1.5 किलो सुपरफास्फेट के बराबर फास्फोरस।

प्रश्न 9.
पोटॉश तत्त्व विशेषकर कौन-सी फसल के लिए प्रयुक्त किया जाता है ?
उत्तर-
यह तत्त्व विशेषतः आलू की फसल के लिए प्रयोग होता है।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 10.
100 किलोग्राम यूरिया में कितने किलोग्राम नाइट्रोजन तत्त्व होता है ?
उत्तर-
46 किलोग्राम।

(ख) इन प्रश्नों के उत्तर एक या दो वाक्यों में दीजिए –

प्रश्न 1.
प्राकृतिक खादें किसे कहते हैं ?
उत्तर-
ये खादें फसलों के अवशेषों तथा जीव-जन्तुओं के व्यर्थ पदार्थों से बनती हैं। रूड़ी खाद, हरी खाद आदि इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 2.
हरी खाद किसे कहते हैं ?
उत्तर-
किसी फलीदार फसल जैसे–चा को खेत में उगाकर तथा जब यह हरी होती है खेत में ही जोत दिया जाता है, इसे हरी खाद कहा जाता है।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 3.
प्राकृतिक खादें किस प्रकार भूमि की उपजाऊ शक्ति को कायम रखती
उत्तर-
ये खादें भूमि में मिट्टी के कणों की जुड़ने की शक्ति तथा भूमि के पानी को सम्भालने की सामर्थ्या को बढ़ाती है। मिट्टी में जैविक मादा भी बढ़ता है तथा उपजाऊ शक्ति बनी रहती है।

प्रश्न 4.
कौन-सी मुख्य रासायनिक खादों का प्रयोग अधिक किया जाता है ?
उत्तर-
नाइट्रोजन वाली, फास्फोरस वाली तथा पोटाश वाली खादें।

प्रश्न 5.
यूरिया खाद कैसे बनाई जाती है ?
उत्तर-
हवा में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन गैस रूप में होती है, इससे ही यूरिया खाद बनाई जाती है।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 6.
फॉस्फोरस तत्त्व कहाँ से लाया जाता है ?
उत्तर-
यह तत्व फॉस्फोरस वाली खादें जैसे डी० ए० पी० से मिलता है तथा ये खादें एक फास्फेट नाम के खनिज पदार्थ से बनती हैं।

प्रश्न 7.
रूड़ी की खाद कौन-सी भूमि के लिए लाभदायक है ?
उत्तर-
रूड़ी खाद सभी प्रकार की भूमियों के लिए लाभदायक है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अनेक अहारीय तत्व भी होते हैं और यह ज़मीन के भौतिक गुणों पर भी अच्छा प्रभाव डालती है।

प्रश्न 8.
नाइट्रोजन की कमी के कारण पौधों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
नाइट्रोजन की कमी के कारण सबसे पहले पौधों के पुराने पत्ते पीले पड़ने लगते हैं, फिर यह पीलापन धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़ने लगता है तथा धीरे-धीरे सारा पौधा पीला हो जाता है।

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प्रश्न 9.
रासायनिक खादें फसलों के लिए कैसे लाभदायक होती हैं ?
उत्तर-
रासायनिक खादों का प्रयोग पौधों के पोषक तत्त्वों की पूर्ति के लिए किया जाता है, मिट्टी में जिन पोषक तत्त्वों की कमी हो जाए उन तत्त्वों वाली रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाता है। यह खादें पानी में घुलनशील हैं तथा पौधों को पोषक तत्वों की प्राप्ति जल्दी हो जाती है।

प्रश्न 10.
केंचुआ खाद कैसे बनती है ?
उत्तर-
पौधों के अवशेष तथा गोबर को एक स्थान पर इकट्ठा करके इसमें केंचुए छोड़ दिए जाते हैं तथा कुछ दिनों बाद केंचुआ खाद प्राप्त हो जाती है।

(ग) इन प्रश्नों के उत्तर पाँच या छः वाक्यों में दीजिए-

प्रश्न 1.
खादों से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
पौधे बढ़ने-फूलने के लिए अपनी आवश्यकताओं को भूमि में से पूरा करते हैं। ये अपनी आवश्यकताओं वाले 17 से भी अधिक भिन्न-भिन्न प्रकार के पोषक तत्वों को भूमि से प्राप्त करते हैं। ऐसे तत्त्व जो पौधों को बढ़ने-फूलने तथा भोजन तैयार करने के लिए चाहिए तथा इनकी पूर्ति बनावटी रूप से बाहर से की जाती है, को खाद कहा जाता है।
खादों को प्राकृतिक रूप से तथा कारखानों में रासायनिक खादों के रूप में तैयार किया जाता है। उदाहरण-रूड़ी खाद, यूरिया खाद।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 2.
रासायनिक खादें किसे कहते हैं ?
उत्तर-
रासायनिक खादें पौधों के लिए पोषक तत्त्व प्रदान करती हैं तथा इनको कारखानों में तैयार किया जाता है। मुख्य रूप से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश वाली खादों की अधिक आवश्यकता पड़ती है। ये तत्त्व यूरिया, डी० ए० पी०, एन० पी० के०, म्यूरेट ऑफ पोटाश आदि खादों से प्राप्त होते हैं। प्राय: यह रासायनिक खादें पानी में घुलनशील होती हैं तथा इसलिए पौधों को सरलता से उपलब्ध हो जाती हैं। हरित क्रांति के बाद इन खादों की मांग बहुत बढ़ गई है।

प्रश्न 3.
रासायनिक खादों के दुष्प्रभाव के बारे में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
रासायनिक खादों की सहायता से जहां उपज में वृद्धि हुई है वहीं इनके प्रयोग से हानिकारक प्रभाव भी हुए हैं। इनका प्रयोग मिट्टी की जांच के बाद आवश्यकतानुसार तथा केवल कमी वाले तत्त्वों वाली खादों का ही प्रयोग करना चाहिए। यदि खादों का अनावश्यक तथा नादानीपूर्ण ढंग से प्रयोग किया जाएगा तो ये हानिकारक सिद्ध होंगी।

नाइट्रोजन वाली खादों के अधिक प्रयोग से भूमि में खारा मादा बढ़ जाता है। ये खादें पानी में घुलनशील होने के कारण पानी में घुलकर धरती के पानी को भी प्रदूषित करती हैं।

इनके अनावश्यक प्रयोग से पैसे की बर्बादी होती है। फसलों में ये तत्त्व बढ़ जाते हैं तथा मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

प्रश्न 4.
मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को कायम रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
मिट्टी की भूमि का फसल उगाने में बहुत महत्त्वपूर्ण तथा सबसे अधिक है। यदि मिट्टी की उपजाऊ शक्ति अधिक होगी तो ही फसल बढ़िया होगी तथा उपज भी अधिक मिलेगी। एक खेत में बार-बार एक ही प्रकार की फसलें प्राप्त करने से इसकी उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। इस की उपजाऊ शक्ति कायम रखने के लिए खेत में फसल चक्र बदलते रहना चाहिए। खेत में मल्लड़ की मात्रा बढ़ाने के लिए रूड़ी खाद, केंचुआ खाद आदि का प्रयोग करना चाहिए। रासायनिक खादों का प्रयोग मिट्टी की जांच के बाद तत्त्वों की कमी के अनुसार आवश्यक मात्रा में करना चाहिए। रासायनिक तथा प्राकृतिक खादों का संतुलन बना कर रखना चाहिए।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 5.
रूड़ी की खाद की उपयोगिता बताइए।
उत्तर-
पशुओं के गोबर, पेशाब तथा पराली आदि को तकनीकी ढंग से सम्भाल कर गलने-सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। जब यह अच्छी तरह गल-सड़ जाता है तो इस को रूड़ी खाद कहा जाता है। रूड़ी खाद खेतों में जैविक मादे में वृद्धि करती है तथा इस में वे सारे आवश्यक तत्त्व होते हैं जोकि किसी फसल के लिए आवश्यक होते हैं। इसके प्रयोग से भूमि के भौतिक गुणों में अच्छा प्रभाव देखने को मिलता है। 100 किलो रूड़ी खाद में 1 किलो यूरिया के बराबर नाइट्रोजन तथा 1.5 किलो सुपरफास्फेट के बराबर फास्फोरस तत्त्व होता है तथा पोटॉश तत्त्व तथा अन्य आवश्यक तत्त्व भी होते हैं।

Agriculture Guide for Class 6 PSEB खादें Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
किसी जैविक खाद की उदाहरण दें।
उत्तर-
रूड़ी खाद।

प्रश्न 2.
रूड़ी खाद के 100 किलोग्राम में कितनी नाइट्रोजन होती है ?
उत्तर-
1 किलो यूरिया के बराबर ।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 3.
रूड़ी खाद के 100 किलोग्राम में कितनी फास्फोरस होती है ?
उत्तर-
1.5 किलोग्राम सुपरफॉस्फेट के बराबर।

प्रश्न 4.
जंतर की फसल को खेत में जोतने को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
हरी खाद।

प्रश्न 5.
पोटाश तत्त्व की प्राप्ति के लिए कौन-सी रासायनिक खाद प्रयोग की जाती है ?
उत्तर-
म्यूरेट ऑफ पोटाश।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 6.
म्यूरेट ऑफ पोटाश में कितना पोटाश तत्त्व होता है ?
उत्तर-
60 प्रतिशत।

प्रश्न 7.
पंजाब में कितनी ज़मीनों में पोटाश तत्त्व की कमी है ?
उत्तर-
केवल 5-10 प्रतिशत भूमि में।

प्रश्न 8.
डी० ए० पी० का पूरा नाम बताओ।
उत्तर-
डायअमोनियम फास्फेट।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 9.
सिंगल सुपरफास्फेट में कितना फास्फोरस तत्त्व होता है ?
उत्तर-
16 प्रतिशत।

प्रश्न 10.
डी० ए० पी० में कितना फास्फोरस तत्त्व होता है ?
उत्तर-
46 प्रतिशत।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
खादों का प्रयोग किस समय किया जाता है ?
उत्तर-
कई खादों का प्रयोग बुवाई से पहले तथा कई खादों का प्रयोग बुवाई के बाद किया जाता है।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 2.
हवा में से नाइट्रोजन को कौन-से पौधे प्रयोग कर सकते हैं तथा कौनसे नहीं ?
उत्तर-
हवा में से नाइट्रोजन गैस को फलीदार फसलें प्राप्त कर सकती हैं तथा दूसरे पौधे प्राप्त नहीं कर सकते।

प्रश्न 3.
पौधों के लिए पोटाश तत्त्व की आवश्यकता के बारे में बताओ।
उत्तर-
पौधों को विकसित होने के लिए पोटॉश तत्त्व की उतनी ही मात्रा में आवश्यकता होती है जितनी कि नाइट्रोजन तत्त्व की परन्तु पंजाब की भूमि में प्रायः इस तत्त्व की काफ़ी मात्रा होती है तथा केवल 5-10 प्रतिशत भूमियों में ही इसकी कमी है।

प्रश्न 4.
कौन-सी फसल के लिए पोटाश तत्व की अधिक आवश्यकता है ?
उत्तर-
इस तत्त्व की आलू की फसल के लिए अधिक आवश्यकता पड़ती है। इसको रासायनिक खाद म्यूरेट ऑफ पोटाश से प्राप्त किया जाता है परन्तु इसकी कुछ मात्रा रूड़ी खाद में होती है।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 5.
खाद किसे कहते हैं ?
उत्तर-
भूमि में पौधों के पोषक तत्त्वों की कमी को पूरा करने के लिए जिस पदार्थ का प्रयोग किया जाता हैं उसको खाद कहते हैं।

प्रश्न 6.
रासायनिक खाद से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
यह वे खादें हैं जिनको कारखानों में बनाया जाता है। यह रसायनों से बनती हैं। जैसे-यूरिया, जिंक सल्फेट आदि इन खादों के उदाहरण हैं।।

प्रश्न 7.
नाइट्रोजन की कमी का पौधों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
नाइट्रोजन की कमी से पौधों के पुराने पत्ते पीले पड़ने लगते हैं बाद में यह पीलापन धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ने लगता है। अधिक कमी होने पर सारा पौधा पीला हो जाता है।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 8.
डाया किस खाद को कहते हैं ? इसका पोषक तत्त्व बताओ।
उत्तर-
डायअमोनियम फास्फेट खाद को कहा जाता है। इसके 100 किलोग्राम में 46 किलोग्राम फास्फोरस होती है।

प्रश्न 9.
पंजाब में पोटाश खादों की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ती ?
उत्तर-
पंजाब की भूमि में यह तत्त्व अधिक मात्रा में मौजूद हैं। इसलिए इसकी खादों की आवश्यकता कम पड़ती है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राकृतिक खादों के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
प्राकृतिक खादों को जैविक खादें भी कहा जाता है। इनको जैविक मादे से तैयार किया जाता है। यह खादें हैं-रूढ़ी खाद, केंचुआ खाद, हरी खाद आदि।

पशुओं के गोबर, मूत्र, पराली आदि को तकनीकी ढंग से गलने-सड़ने के लिए कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है तथा इस तरह रूढ़ी खाद तैयार होती है। इस तरह पौधों के अवशेष तथा गोबर में केंचुए छोड़ दिए जाते हैं तथा कुछ दिनों बाद केंचुआ खाद बन जाती है। लैंचा, जंतर आदि की फसल को खेतों में उगा कर, जब यह हरी अवस्था में होती है, तो इसे खेत में जोत दिया जाता है। इसको हरी खाद कहते हैं।

प्राकृतिक खादों में पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व होते हैं तथा इन का प्रयोग भूमि में जैविक मादा बढ़ाने में सहायक होता है। यह भूमि में मिट्टी के कणों की जुड़ने की शक्ति तथा भूमि की पानी सम्भालने की शक्ति बढ़ाती है।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 2.
खाद से क्या अभिप्राय है ? यह कितने प्रकार की होती है ? प्रत्येक की परिभाषा दें।
उत्तर-खादें, वे पदार्थ हैं जिनसे पौधे अपने आवश्यक पोषक तत्वों को प्राप्त करते हैं। यह दो प्रकार की होती हैं
(i) जैविक खादें
(ii) रासायनिक खादें

(i) जैविक खादें-ये ऐसी खादें हैं जो जीवों के प्रत्येक प्रकार के अवशेषों से बनाई जाती हैं। इसको फसलों तथा सब्जियों के अवशेषों या पशुओं के मल मूत्र से तैयार किया जाता है, जैसे रूड़ी खाद या फिर फसलें उगाकर फूल आने से पहले ही उसको भूमि में दबा कर हरी खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है।

(ii) रासायनिक खाद-इन खादों को फैक्ट्रियों में भिन्न-भिन्न रसायनों से बनाया जाता है ; जैसे-यूरिया, सुपरफास्फेट, म्यूरेट ऑफ पोटाश, जिंक सल्फेट आदि।

प्रश्न 3.
रूड़ी खाद से क्या भाव है ? इसके पौधों को क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
यह खाद सब्जियों के बचे हुए अवशेष, पशुओं के मल-मूत्र, कई अन्य तरह के जैविक पदार्थों को गड्डों में गलने-सड़ने से बनाई जाती है। यह बहुत ही गुणकारी खाद है तथा इसमें पौधे की वृद्धि के लिए आवश्यक लगभग सारे तत्त्व मौजूद होते हैं । इस खाद का पोषक तत्त्वों के अतिरिक्त भूमि के भौतिक गुणों पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है। रूड़ी की खाद रेतीली, चिकनी, कल्लराठी आदि सभी भूमियों के लिए लाभदायक होती है। इसके उपयोग से भूमि में हवा तथा पानी का संचार अच्छा होने में सहायता मिलती है। रूड़ी की 100 किलो खाद में 1 किलो यूरिया के बराबर नाइट्रोजन तथा 1.5 किलो सुपरफास्फेट के बराबर फास्फोरस तत्त्व होता है। इसके अतिरिक्त पोटॉश तथा पौधे को मिलने वाले अन्य पोषक तत्त्व भी होते हैं।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 5 खादें

प्रश्न 4.
रूढ़ी की खाद की सम्भाल कैसे की जा सकती है ?
उत्तर-
रूढ़ी खाद की संभाल के लिए 1 मीटर गहरा, 2 मीटर चौड़ाई वाला तथा पशुओं की संख्या के अनुसार तथा जगह के अनुसार 3-4 मीटर लम्बा गड्ढा खोदा जाता है। गड्ढे में एक तरफ से रूढ़ी की खाद भरनी शुरू करें तथा गड्ढे को भूमि से 6 इंच ऊंचाई तक भर दें। सारा गड्ढा भर जाने के बाद उसके ऊपर 3 इंच मोटी मिट्टी की तह बिछा दें। गड्ढे की लम्बाई जगह के अनुसार बढ़ाई जा सकती है। रूड़ी 3 माह में उपयोग के लिए अच्छी तरह तैयार हो जाती है। इस तरह गड्ढे में रखी रूढ़ी से पोषक तत्त्वों का नुकसान नहीं होता तथा जो खरपतवार के बीज पशुओं के गोबर में या चारे से आते हैं, उनके उगने की शक्ति भी समाप्त हो जाती है। खेत में डाली रूड़ी से खरपतवार नहीं उग सकते।

प्रश्न 5.
खादों की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर-
प्रत्येक जानदार वस्तु के लिए आहार की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार मनुष्य, पशुओं तथा जानवरों को विकास तथा वृद्धि के लिए आहार की आवश्यकता होती है, इसी तरह पौधों को विकसित होने के लिए भी आहार की आवश्यकता होती है। पौधे अपना आहार धरती से लेते हैं। एक ही भूमि में बार-बार फसल उगाने से भूमि में पोषक तत्त्वों की कमी हो जाती है तथा भूमि से फसलों को पूरा पोषण नहीं मिलता। इसलिए भूमि में तत्त्वों की कमी को पूरा करने के लिए खादों के प्रयोग की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 6.
नाइट्रोजन तत्त्व की पूर्ति, कमी तथा इसकी खादों के बारे में जानकारी दें।
उत्तर-
हवा में 79 प्रतिशत नाइट्रोजन, गैस के रूप में होती है। इसको केवल फलीदार फसलें ही सीधे रूप में हवा में से अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त कर सकती हैं, अन्य फसलें नहीं। हवा में से नाइट्रोजन गैस से ही रासायनिक खादें बनाई जाती हैं, जैसे यूरिया। हवा में से नाइट्रोजन तथा तरल पदार्थों में से हाइड्रोजन तथा कार्बन लेकर इनके मेल से यूरिया खाद बनती है। यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है, अर्थात् 100 किलोग्राम यूरिया में 46 किलोग्राम वाला तत्त्व नाइट्रोजन है।

यह तत्त्व पौधों के लिए बहुत आवश्यक है। इसकी कमी से सबसे पहले पौधों के पुराने पत्ते पीले पड़ने लगते हैं तथा धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़ना शुरू हो जाता है। यदि फसल में इस तत्त्व की कमी हो जाए तो सारा पौधा पीला हो जाता है।

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प्रश्न 7.
पौधे फास्फोरस तत्त्व कहां से प्राप्त करते हैं ? इसकी खादों के बारे में बताएं।
उत्तर-
यह पौधों के लिए दूसरा महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व है। इसकी कमी का आषाढ़ी की फसलों पर बहुत अधिक प्रभाव होता है। यह तत्त्व खानों में रॉक फास्फेट नाम के खनिज पदार्थ से लिया जाता है। इसको साफ करके नाइट्रोजन के साथ मिलाकर डायअमोनियम फास्फेट खाद बनाई जाती है, जिसको डाया कहा जाता है, 100 किलोग्राम डायअमोनियम फास्फेट खाद में 46 किलोग्राम फास्फोरस तत्त्व होता है।

प्रश्न 8.
पोटॉश तत्त्व के बारे में जानकारी दें।
उत्तर-
पौधे के विकसित होने के लिए पोटॉश तत्त्व भी बहुत आवश्यक है। इसको पौधे उतनी ही मात्रा में लेते हैं, जितनी मात्रा में नाइट्रोजन परन्तु पंजाब की भूमियों में इस तत्त्व की काफ़ी मात्रा मिलती है, इसलिए हमें इस खाद का उपयोग करने की आमतौर पर आवश्यकता नहीं पड़ती। पंजाब में केवल 5-10 प्रतिशत भूमियाँ ही ऐसी हैं जिनमें इस तत्त्व की आवश्यकता हो सकती है। यह तत्त्व विशेषत: आलू की फसल के लिए ही प्रयोग होता है। इस तत्त्व को म्यूरेट ऑफ पोटाश नाम की खाद से प्राप्त किया जाता है तथा यह खाद सारी की सारी विदेशों से मंगवाई जाती है। इस खाद में पोटाश तत्व 60 प्रतिशत होता है।

प्रश्न 9.
नाइट्रोजन की कमी का पौधों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
नाइट्रोजन एक बहुत आवश्यक तत्त्व है जोकि हवा में लगभग 78 प्रतिशत होता है। इसका प्रयोग सभी पौधों के लिए आवश्यक है। इसकी कमी के कारण पौधों पर कई बुरे प्रभाव भी देखने को मिलते हैं।

इस तत्त्व की कमी के कारण सबसे पहले पौधे के पुराने पत्ते पीले पड़ने लगते हैं तथा फिर यह पीलापन धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़ना शुरू हो जाता है तथा धीरे-धीरे सारा पौधा ही पीला हो जाता है।

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खादें PSEB 6th Class Agriculture Notes

  • पौधों को विभिन्न प्रकार के 17 पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है।
  • भूमि में पोषक तत्त्वों की कमी को पूरा करने के लिए बाहर से कुछ वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। इन बाहर से डाली जाने वाली वस्तुओं को खादें कहा जाता है।
  • खादें दो प्रकार की हैं-प्राकृतिक तथा रासायनिक खादें।
  • प्राकृतिक खादों को जैविक खादें भी कहा जाता है।
  • जीव-जन्तुओं के अपशिष्ट, व्यर्थ पदार्थों से केंचुओं द्वारा तैयार खाद को केंचुआ खाद कहा जाता है।
  • फलीदार फसलों को खेत में उगा कर तथा उसे खेत में जोतने को हरी खाद कहते है।
  • 100 किलो रूड़ी खाद में 1 किलो यूरिया के बराबर नाइट्रोजन तथा डेढ़ किलो सुपर फास्फेट के बराबर फास्फोरस होती है।
  • रासायनिक खादें मनुष्य द्वारा कारखानों में तैयार की जाती हैं।
  • प्रायः उपयोग में आने वाली रासायनिक खादें हैं-यूरिया, डी० ए० पी०, एन० पी० के० तथा म्यूरेट ऑफ पोटाश।
  • हवा में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन गैस के रूप में होती है।
  • यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है।
  • नाइट्रोजन की कमी का पता पुराने पत्तों के पीले पड़ने से चलता है।
  • फास्फोरस की पूर्ति के लिए सिंगल सुपरफास्फेट तथा डी० ए० पी० का प्रयोग किया जाता है।
  • डी० ए० पी० में 46 प्रतिशत फास्फोरस होती है।
  • म्यूरेट ऑफ पोटाश खाद में 60 प्रतिशत पोटाश तत्त्व होता है, परन्तु इसकी आवश्यकता पंजाब में कम पड़ती है।

PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना

Punjab State Board PSEB 7th Class Home Science Book Solutions Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना Notes.

PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
कढ़ाई क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
वस्त्रों को अत्यधिक सुन्दर और आकर्षक बनाने के लिए।

प्रश्न 2.
घर में प्रयोग किए जाने वाले कढ़ाई किए हुए कुछ वस्त्रों के उदाहरण दो।
उत्तर-
मेज़पोश, कुशन कवर, पलंगपोश, नेपकिन, पर्दे आदि।

प्रश्न 3.
कढ़ाई के लिए प्रयोग किए जाने वाले टाँकों के नाम बताओ।
उत्तर-
कढ़ाई के लिए अक्सर निम्नलिखित दस प्रकार के टाँके काम में लाए जाते हैं

  1. सादा या खड़ा टाँका,
  2. बखिया,
  3. भराई के टाँके (साटिन स्टिच), कश्मीरी टाँका (लोंग एण्ड शीर्ट स्टिच:
  4. जंजीरी टाँका, (चेन स्टिच),
  5. काज का टाँका (बटन होल स्टिच),
  6. लेजी-डेजी टाँका (लेजी-डेजी स्टिच),
  7. मछली टाँका,
  8. चोप का टाँका,
  9. फूलकारी का टाँका,
  10. दसूती टाँका।

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प्रश्न 4.
डंडी टाँके का प्रयोग कहाँ किया जाता है ?
उत्तर-
फूलों की डंडियाँ भरने में।

प्रश्न 5.
साड़ी, दुपट्टे आदि पर पीको क्यों किया जाता है ?
उत्तर-
जिससे वस्त्र के धागे न निकलें।

प्रश्न 6.
कढ़ाई में गाँठों का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए?
उत्तर-
गाँठों के प्रयोग से कढ़ाई सुन्दर नहीं लगती।

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प्रश्न 7.
कढ़ाई किस प्रकार की जाती है?
उत्तर-
कढ़ाई रंग-बिरंगे टाँकों द्वारा की जाती है।

प्रश्न 8.
कपड़ों पर नमूना उतारने की कौन-कौन सी विधियां हैं?
उत्तर-
तीन-

  1. कार्बन पेपर द्वारा,
  2. ठप्पों द्वारा,
  3. बटर पेपर द्वारा।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
कढ़ाई के लिए कौन-कौन से सामान की आवश्यकता होती है?
उत्तर-
कढ़ाई करने के लिए निम्नलिखित सामान की आवश्यकता होती है-

  1. सूई–महीन नोक की, बिना जंग लगी, पक्की धातु की तथा चिकनी।
  2. डोरे—सभी रंगों की रेशमी लच्छियां तथा सती डोरे।
    PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 1
    चित्र 4.1 कढ़ाई के लिए प्रयोग में आने वाला सामान
  3. कैंची-तेज़ धार वाली नुकीली।
  4. फ्रेम-विभिन्न नाप के लकड़ी, लोहे अथवा प्लास्टिक के।
  5. पेंसिल-नमूना उतारने के लिए, पक्के सिक्के की कड़ी।
  6. कार्बन पेपर-नमूना उतारने के लिए।
  7. आलपिन तथा रबड़।

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प्रश्न 2.
ट्रे का कवर कैसे बनाया जाता है ? सचित्र वर्णन करो।
उत्तर-
ट्रे में खाना परोसकर एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाया जाता है। यदि ट्रे के ऊपर का कपड़ा बिछा दिया जाए तो इससे ट्रे को दाग नहीं लगते हैं। ट्रे में कपड़ा बिछाने से परोसा हुआ भोजन आकर्षक भी लगता है तथा खाने को मन भी करता है। ट्रे का कपड़ा मोटा होना चाहिए। इसके लिए खद्दर, दसूती या केसमेंट लिए जा सकते हैं। इसका रंग बहुत गाढ़ा नहीं होना चाहिए। ट्रे के कपड़े के लिए हल्का नीला, बादामी या मोतिया रंग लेना चाहिए। कपड़े का आकार तथा शक्ल ट्रे के आधार तथा शक्ल के अनुसार होना चाहिए। साधारण ट्रे के कपड़े की लम्बाई 16″ तथा चौड़ाई 12″ होनी चाहिए। लम्बाई और चौड़ाई दोनों ओर से ट्रे से दो इंच अधिक होनी चाहिए। बीडिंग करने से कपड़े का आकार छोटा हो जाता है।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 2
चित्र 4.2. ट्रे कवर का नमूना

प्रश्न 3.
कढ़ाई के लिए धागों के रंगों का चयन किन बातों पर आधारित होना चाहिए?
उत्तर-
कढ़ाई करने के लिए धागों के रंगों का चयन करते समय हमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. बच्चों के वस्त्रों पर बनाए जाने वाले नमूनों पर चटकीले एवं विरोधी संगति की योजनानुसार धागों का प्रयोग करना चाहिए।
  2. गाढ़े रंग के कपड़ों पर हल्के रंग के धागों एवं हल्के रंग के कपड़ों पर गाढ़े रंग के धागों का चुनाव करना चाहिए।
  3. बड़े व्यक्ति के कपड़ों पर कढ़ाई के आलेखन में सहयोगी रंगों का प्रयोग करना चाहिए, जैसे-पीले रंग के साथ नारंगी रंग।

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बड़े उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
कढ़ाई के प्रमुख टाँकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1. भराई का टाँका या साटिन स्विच-इस टाँके को गोल कढ़ाई भी कहा जाता है। इसके द्वारा छोटे-छोटे गोल फूल तथा पत्तियाँ बनती हैं। आजकल एप्लीक कार्य भी इसी टाँके से तैयार किया जाता है। कट वर्क, नेट वर्क भी इसी टाँके द्वारा बनाये जाते हैं। छोटेछोटे पक्षी आदि भी इसी टाँके से बहुत सुन्दर लगते हैं। इसे फैन्सी टाँका भी कहा जाता है। इसमें ज़्यादा छोटी फूल-पत्तियाँ (जो गोल होती हैं) का इस्तेमाल होता है। यह टाँका भी दाहिनी ओर से बाई ओर लगाया जाता है। रेखा के ऊपर जहाँ से नमूना आरम्भ करना है, सूई वहीं लगनी चाहिए और दूसरे से सटे हुए टाँके लगाये जाने चाहिएं। रेखाओं पर उल्टी बखिया की कढ़ाई कर देनी चाहिएं। यह टाँका देखने में दोनों ओर से एक समान होता है।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 3
चित्र 4.3. भराई का टाँका

2. जंजीर टाँका-इस टाँके को प्रत्येक स्थान पर प्रयोग कर लिया जाता है। इसे डंडियों, पत्तियों, फूलों तथा पक्षियों आदि सभी में प्रयोग किया जाता है। ऐसे टाँके दाहिनी ओर से बाई ओर या बाई और से दाहिनी ओर लगाये जाते हैं। कपड़े पर सूई एक बिन्दु से निकालकर सूई पर एक धागा लपेटते हुए दोबारा उसी स्थान पर सूई लगाकर आगे की ओर एक लपेट देते हुए यह टाँका लगाया जाता है। इस प्रकार क्रम से एक गोलाई में दूसरी गोलाई बनाते हुए आगे की ओर टाँका लगाते जाना चाहिए।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 4
चित्र 4.4 जंजीर टाँका

3. लेजी-डेजी टाँका-इस टाँके का उपयोग छोटे-छोटे फूल तथा बारीक पत्ती की हल्की कढ़ाई के लिए किया जाता है। ये टाँके एक-दूसरे से क्रम में गुँथे नहीं रहते बल्कि अलग-अलग रहते हैं। फूल के बीच में धागा निकालकर सूई उसी स्थान पर डालते हैं। इस प्रकार गोल पत्ती-सी बन जाती है। पत्ती को अपनी जगह स्थिर करने के लिए दूसरी ओर गाँठ डाल देते हैं।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 5
चित्र 4.5 लेजी-डेजी टाँका

4. हेम स्टिच (बीडिंग)-इस प्रकार के टाँके मेज़पोश आदि काढ़ने के काम में आते हैं। यह किनारों पर फुदने बनाने के लिए अति उत्तम प्रकार के टाँके हैं। इनके लिए मोटा सूती कपड़ा प्रयुक्त किया जाता है। सर्वप्रथम जितने चौड़े किनारे बनाने होते हैं, उतनी चौड़ाई से लगे कपड़े के धागे खींच लिए जाते हैं। धागे निकालने से शेष धागे कमज़ोर हो जाते हैं, इसलिए कई धागों को मिलाकर बाँध देते हैं। इस टाँके से बीडिंग भी की जा सकती है।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 6
चित्र 4.6 हेम स्टिच

5. ब्लैंकेट (कंबल) टाँके-इस टाँके में डोरा नीचे की रेखा पर निकाला जाता है और सूई को ऊपर की रेखा से नीचे की ओर।
6. काज टाँका-कढ़ाई में इसका उपयोग फूल-पत्तियों के सिरे भरने, पेच लगाने, छोटे फूलों को भरने तथा कटवर्क में किया जाता है। इससे किनारे पक्के हो जाते हैं।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 7
चित्र 4.7 काज टाँका

7. उल्टी बखिया-यह टाँका फूल पत्ती की डंडी बनाने के काम आता है। यह बाहरी रेखा बनाने में भी प्रयोग किया जाता है। ये टाँके कुछ तिरछे-से दाहिनी ओर मिले हुए लगाये जाते हैं। एक टाँका जहाँ समाप्त होता है, वहीं दूसरा टाँका लगाया जाता है। एक टाँका केवल एक ही बार लगाया जाता है। टाँका सीधी रेखा में ही लगाना चाहिए।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 8
चित्र 4.8 उल्टी बखिया

8. दसूती टाँका-यह टाँका ऐसे कपड़े पर ही बन सकता है जिसकी बनाई खुली होती है ताकि कढ़ाई करते समय धागे सुगमता से गिने जा सकें। यदि तंग बुनाई वाले वस्त्र पर यह कढ़ाई करनी हो तो कपड़े पर पहले नमूना छाप लेना चाहिए फिर नमूने के ऊपरऊपर ही बिना कपड़े के धागे गिनकर कढ़ाई करना चाहिए। यह टाँका दो बारियों में बनाया जाता है। पहली बारी में इकहरा टाँका बनाया जाता है ताकि टेढ़े (/) टाँकों की एक पंक्ति बन जाए तथा दूसरी बार इस लाइन के टाँकों पर दूसरी पंक्ति बनाई जाती है। इस तरह दसूती टाँका (×) बन जाता है। सूई को दाएँ हाथ के कोने की ओर से टाँके के निचले सिरे से निकालते हैं। उसी टाँके के ऊपर के बाएँ कोने में डालते हैं तथा दूसरे टाँके के निचले दाएं कोने से निकलते हैं। इस तरह करते जाते हैं ताकि पूरी पंक्ति टाँकों की बन जाए।

अब सूई अन्तिम टाँके के बाईं ओर वाले निचले कोने से निकाली हुई होनी चाहिए। अब सूई दाएँ ऊपर के कोने से डालो तथा अगले टाँके के निचले बाएँ कोने से सूई को उसी टाँके से निकालें ताकि (×) पूरा बन जाए।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 9
चित्र 4.9 दसूती टाँका

9. दोहरी बीडिंग-इसे करने के लिए पहले ऊपर लिखे ढंग के अनुसार एक ओर तथा फिर उसी ढंग से वस्त्र के धागे निकली हुई जगह के दूसरी ओर से बीडिंग करें।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 10
चित्र 4.10 दोहरी बीडिंग

10. तिरछी बीडिंग-धागे निकाली जगह के एक ओर सादा बीडिंग करना चाहिए। उठाए गए धागों की संख्या समान होनी चाहिए। अब धागे निकाली जगह के दूसरी ओर बीडिंग करो, लेकिन धागे सूई पर उठाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि आधे धागे एक दूसरे टाँके के उठाए जाएं ताकि एक दूसरे से फँसे हुए टाँके बनें।
PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना 11
चित्र 4.11 तिरछी बीडिंग

PSEB 7th Class Home Science Practical कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना

कढ़ाई के टाँकों से ट्रे कवर बनाना PSEB 7th Class Home Science Notes

  • ट्रे के कपड़े के लिए मोटा कपड़ा होना चाहिए।
  • ट्रे के कपड़े के लिए हल्का, नीला, बादामी या मोतिया रंग लेना चाहिए।
  • ट्रे के कपड़े का आकार तथा शक्ल ट्रे के आधार तथा शक्ल के अनुसार होना चाहिए।
  • दसूती टाँका ऐसे कपड़े पर ही बन सकता है जिसकी बुनाई खुली हो ताकि
  • कढ़ाई करते समय धागे सुगमता से गिने जा सकें। बीडिंग साधारणत: मेज़पोश, चादरों, ट्रे कवर आदि के किनारों को आकर्षक बनाने के लिए की जाती है।
  • बीडिंग का टाँका कपड़े के उल्टी ओर से बनाया जाता है। इसे दाईं ओर से शुरू करके बाईं ओर लाया जाता है।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 2 शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ

Punjab State Board PSEB 7th Class Physical Education Book Solutions Chapter 2 शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Physical Education Chapter 2 शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ

PSEB 7th Class Physical Education Guide शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ Textbook Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न 1.
शारीरिक क्षमता से क्या अभिप्राय है ? शारीरिक क्षमता की परिभाषा दीजिए।
उत्तर-
शारीरिक शक्ति वह गुण है जिससे व्यक्ति अपने प्रतिदिन के कार्य आसानी से कठिनाई के बिना कर सकता है। व्यक्ति के अधिक-से-अधिक शारीरिक कार्य करने के योग्यता को शारीरिक शक्ति कहते हैं।
“शारीरिक शक्ति व्यक्ति की योग्यता है जिसके साथ वह किसी विशेष कार्य को अपने पूर्ण प्रयास से पूरा कर सकता है।

जिन लोगों को शक्ति का सही ज्ञान नहीं उनके लिए शारीरिक शक्ति की ज़रूरत केवल किसान मज़दूर, सैनिक आदि को होती है जो अधिक शारीरिक कार्य करते हैं। शारीरिक शक्ति को खिलाड़ियों के साथ जोड़ा जाता है जिन्होंने कठोर परिश्रम करके खेलों में अपना नाम कमाना और पुरस्कार जीतने होते हैं। शारीरिक शक्ति प्रत्येक के लिए आवश्यक है। कार्य भारी हो या हल्का शारीरिक शक्ति उचित ढंग से कार्य करने के लिए आवश्यक है।

शारीरिक शक्ति का स्तर मनुष्यों से भिन्न होता है। यह मनुष्य के व्यायाम और आजीविका पर निर्भर करता है। आजीविका का शारीरिक शक्ति के साथ सम्बन्ध है। दफ्तर में बैठकर कार्य करने वालों की शारीरिक शक्ति, श्रमिक की शारीरिक शक्ति से कम होती है। इसलिए भिन्न-भिन्न खेलें खेलने वाली खिलाड़ियों की शारीरिक शक्ति भी भिन्न-भिन्न होगी। एक फुटबाल खिलाड़ी की शारीरिक शक्ति और कबड्डी खिलाड़ी की शारीरिक शक्ति में फर्क होगा। योग्यता के इन्हीं गुणों को श्रेष्ठ बनाने के लिए जितना अधिक परिश्रम किया जाएगा उतनी ही शारीरिक शक्ति अधिक होगी।

प्रश्न 2.
शारीरिक क्षमता के गुणों के नाम लिखें।
उत्तर-
शारीरिक शक्ति के गुण—

  1. गति
  2. शक्ति
  3. साहस
  4. लचकता
  5. संयोजन।
    PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 2 शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ 1

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 2 शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ

प्रश्न 3.
गति किसे कहा जाता है ?
उत्तर-
गति (Speed) शारीरिक शक्ति का पहला गुण गति है किसी कार्य के कमसे-कम समय में पूरा करने की योग्यता को गति कहते हैं। गति शारीरिक शक्ति का बड़ा गुण है जिसका हर खेल में महत्त्वपूर्ण योगदान है। जिस खिलाड़ी की गति अधिक होगी उसे ही गुणी माना जाएगा।

प्रश्न 4.
संयोजन से क्या अभिप्राय है? खिलाड़ी के लिए संयोजन का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
संयोजन (Co-ordination) संयोजन भी शक्ति का महत्त्वपूर्ण गुण है। संयोजन का अर्थ खिलाड़ी के शरीर एवं मस्तिष्क के आपसी तालमेल से है। अगर । खिलाड़ी के मस्तिष्क से मिलने वाले निर्देशों को ठीक से प्राप्त करता है और शीघ्र पूरा करता है तो कार्य में गलतियां नहीं होंगी। मस्तिष्क व शरीर के संयोजन के बिना कोई कार्य नहीं हो सकता।
शारीरिक शक्ति व्यक्ति को ठीक प्रकार से कार्य करने के योग्य बनाती है।

प्रश्न 5.
शारीरिक शक्ति के महत्त्व के बारे में विस्तृत नोट लिखें।
उत्तर-

  1. शारीरिक शक्ति से मांसपेशियां ठीक ढंग से कार्य करती हैं और सभी शारीरिक प्रणालियां ठीक प्रकार से कार्य करने के योग्य बनती हैं।
  2. शारीरिक शक्ति रखने वाले को दिल और फेफड़ों के रोग जैसे रक्तचाप, हृदय आघात, दमा, श्वास सम्बन्धी रोग कम होते हैं।
  3. शारीरिक शक्ति रखने वाले मनुष्य का शरीर स्वस्थ और सुन्दर होता है। उसके शरीर की वृद्धि व विकास ठीक मात्रा में होता है।
  4. शारीरिक शक्ति से व्यक्ति का अपने शरीर पर नियन्त्रण बना रहता है। उसके मस्तिष्क और मांसपेशियों के संयोजन में सुचारु होता रहता है।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 2 शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ

प्रश्न 6.
व्यायाम से क्या अभिप्राय है? व्यायाम के लाभ लिखिए।
उत्तर-
चलना, कूदना, दौड़ना, फैंकना आदि इन कुशलताओं को बेहतर बनाने के लिए तीव्र क्रियाएं की जाती हैं जिन्हें व्यायाम अथवा कसरत कहते हैं। कसरत या व्यायाम का अर्थ रक्त के प्रवाह को तीव्र करना है।
व्यायाम और स्वास्थ्य का अधिक सम्बन्ध है। शरीर के लिए व्यायाम के लाभ इस प्रकार हैं—

  1. व्यायाम करने से शरीर की मांसपेशियां मज़बूत और लचकदार बनती हैं जिससे शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है।
  2. व्यायाम करते समय फेफड़ों को ज़ोर से फैलना और सिकुड़ना पड़ता है। सिकुड़ने और फैलने से अधिक मात्रा में कार्बनडाइआक्साइड (CO) शरीर से बाहर निकलती है और अधिक आक्सीजन शरीर में प्रवेश करती है जिससे हमारा रक्त साफ होता रहता है।
  3. प्रतिदिन व्यायाम करने से हृदय स्वस्थ रहता है और हृदय की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
  4. व्यायाम करने वाले व्यक्ति को हृदयाघात नहीं होते।
  5. व्यायाम करने से व्यक्ति की पाचन प्रणाली ठीक रहती है और लगातार भूख लगती है।
  6. व्यायाम करने से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है जिससे पसीना आता है और सभी विषैले द्रव बाहर निकल जाते हैं।
  7. व्यायाम से शारीरिक ढांचे की कुरूपताएं ठीक हो जाती हैं।
  8. व्यायाम करने से शरीर में नई कोशिकाएं बनती हैं, नया रक्त बनता है। रक्त में श्वेत रक्तकण की मात्रा बढ़ जाती है। शरीर रोगों से लड़ने से पक्षम बनता है।
  9. व्यायाम से मनुष्य की आयु बढ़ती है और उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है।
  10. व्यायाम करने वाला व्यक्ति गलत विचारधारा में नहीं पड़ता। खाली समय का उचित प्रयोग करता है।
  11. व्यायाम से शरीर की फालतू चर्बी नष्ट हो जाती है जिससे व्यक्ति का शरीर स्वास्थ्य, आकर्षक, सुन्दर और फुर्तीला रहता है।

Physical Education Guide for Class 7 PSEB शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हमारे चलने, फिरने, कूदने, दौड़ने आदि से क्या होता है ?
उत्तर-
कसरत (व्यायाम)

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प्रश्न 2.
शरीर में से कार्बनडाइआक्साइड कौन-सा अंग बाहर निकालता है ?
उत्तर-
फेफड़े।

प्रश्न 3.
शारीरिक शक्ति किस वस्तु से बनती है ?
उत्तर-
लगातार कसरत से और संतुलित भोजन खाने से।

प्रश्न 4.
हमारे शरीर की मांसपेशियां किससे मज़बूत और लचकदार होती है ?
उत्तर-
कसरत करने से।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 2 शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ

प्रश्न 5.
पसीना आने से क्या होता है ?
उत्तर-
शरीर से व्यर्थ पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और मुसाम खुल जाते हैं।

प्रश्न 6.
शारीरिक शक्ति क्या है ?
उत्तर-
शारीरिक शक्ति व्यक्ति की योग्यता है जिसके साथ वह किसी विशेष कार्य को अपने पूर्ण प्रयास से पूरा कर सकता है।

प्रश्न 7.
शारीरिक शक्ति के गुणों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. गति
  2. शक्ति
  3. साहस (क्षमता)
  4. लचकता
  5. संयोजन।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 2 शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ

प्रश्न 8.
शारीरिक शक्ति के कोई दो महत्त्व लिखें।
उत्तर-

  1. शारीरिक शक्ति से शरीर स्वस्थ और सुन्दर रहता है।
  2. शारीरिक शक्ति से व्यक्ति का अपने शरीर पर नियंत्रण बना रहता है।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रतिदिन शरीर के सभी अंगों की निरन्तर कसरत करने से क्या होता है ?
उत्तर-
प्रतिदिन ठीक ढंग से शरीर के सभी अंगों की कसरत करने से शरीर ताकतवर हो जाता है। लगातार कसरत करते रहने से मनुष्य में अधिक कार्य करने की शक्ति आ जाती है। पाचन क्रिया ठीक हो जाती है। समय पर भूख लगती है।

प्रश्न 2.
कसरत करने से कोई तीन लाभ बताओ।
उत्तर-

  1. कसरत करने से बहुत-से रोग दूर हो जाते हैं। कसरत करने से पसीना अधिक आता है तथा मुसाम खुल जाते हैं।
  2. व्यर्थ पदार्थ शरीर से बाहर निकल जाता है तथा त्वचा की सफाई हो जाती है।
  3. कसरत करने से मनुष्य की आयु लम्बी हो जाती है।

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प्रश्न 3.
कसरत करने से फेफड़ों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
कसरत से फेफड़ों को अधिक ज़ोर से सिकुड़ने और फैलना पड़ता है जिससे कार्बन-डॉइआक्साइड बाहर निकलती है और आक्सीजन शरीर के भीतर जाती है। इस तरह रक्त साफ होता रहता है और फेफड़ों की शक्ति में वृद्धि होती है।

प्रश्न 4.
कार्य की कसरत का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर-
कार्य की कसरतें सर्वांगी नहीं होतीं। इससे हमारे शरीर के कुछ अंग अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और कुछ अधिक कमज़ोर हो जाते हैं जैसे लोहार की बांहें टांगों से अधिक ताकतवर हो जाती है। एक नाचने वाले के शरीर का निचला भाग अधिक ताकतवर और ऊपरी भाग कमज़ोर हो जाता है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
खिलाड़ियों की खेलों के क्षेत्र में क्या-क्या उपलब्धियां हैं ?
उत्तर-
खेलों में खिलाड़ी नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं और खेलों के क्षेत्र में अपने राष्ट्र का नाम चमका रहे हैं। पहले खेलें मात्र मनोरंजन और रुचि तक ही सीमित थीं। परन्तु अब खेलों से खिलाड़ी नाम और धन कमा रहे हैं जिससे जीतने के लिए कठोर परिश्रम करते हैं और शरीर को जीतने के लिए सक्षम बनाते हैं। एक विश्व रिकार्ड अथवा ओलम्पिक खेलों में मात्र उपलब्धि के कारण खिलाड़ी रातों-रात विश्व का सितारा बन जाते हैं और धनी हो जाते हैं। प्रत्येक खिलाड़ी यह चाहता है कि वह विश्व रिकार्ड बना सके। इसके लिए खिलाड़ियों को कठिन परिश्रम करना पड़ता है और उसे कई पहलुओं पर ध्यान रखना पड़ता है जैसे प्रशिक्षण, ठीक मात्रा में समय, अत्याधुनिक खेल सामग्री, अनुभवी कोच खिलाड़ी में खेल क्षमता पैदा करता है जिससे खिलाड़ी का शरीर प्रशिक्षण व खेल के लिए पूरी तरह प्यार हो जाए। यदि खिलाड़ी में शारीरिक शिक्षा की कमी होती है तो विरोधी खिलाड़ी का मुकाबला नहीं कर पाएगा। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में शक्ति का होना ज़रूरी है।

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प्रश्न 2.
शारीरिक शक्ति के गुण विस्तार से लिखें।
उत्तर-
शारीरिक शक्ति के गुण—
(1) गति
(2) शक्ति
(3) साहस
(4) लचकता
(5) संयोजन।
PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 2 शारीरिक शक्ति एवं व्यायाम के लाभ 2
1. गति (Speed) शारीरिक शक्ति का पहला गुण गति है किसी कार्य के कम-सेकम समय में पूरा करने की योग्यता को गति कहते हैं। गति शारीरिक शक्ति का बड़ा गुण है जिसका हर खेल में महत्त्वपूर्ण योगदान है। जिस खिलाड़ी की गति अधिक होगी उसे ही गुणी माना जाएगा।

2. शक्ति (Strength) शारीरिक मांसपोशियों द्वारा मिलकर कार्य किया गया शक्ति कहलाता है। कार्य हल्का या भारी हो शारीरिक शक्ति के बिना कार्य पूरा करना मुश्किल है। शक्तिशाली व्यक्ति कठिन-से-कठिन कार्य भी आसानी से कर सकता है।

3. साहस (क्षमता) (Endurance)-लगातार लम्बे समय तक किसी कार्य को करते रहने के सामर्थ्य को साहस अथवा क्षमता कहते हैं। साहस शारीरिक शक्ति का महत्त्वपूर्ण गुण है। दीर्घकाल तक चलने वाली क्रियाएं इस गुण के बिना पूरी नहीं हो सकती। जिस व्यक्ति में अधिक दम (साहस) क्षमता होगी वह अन्य व्यक्तियों की उपेक्षा अधिक कार्य करने में कामयाब हो जाएगा।

4. लचकता (Flexibility) खिलाड़ी का प्रदर्शन उसकी लचकता पर निर्भर करता है। लचक से भाव व्यक्ति के शारीरिक जोड़ों की हिलजुल से है। व्यक्ति जितना अधिक अपने जोड़ों को मोड़ सकता है उसकी लचकता उतनी अधिक होगी। लचकता से हम शरीर को किसी तरफ भी मोड़ सकते हैं जिससे हम कार्य आसानी से कर सकते हैं।

5. संयोजन (Co-ordination -संयोजन भी शक्ति का महत्त्वपूर्ण गुण है। संयोजन का अर्थ खिलाड़ी के शरीर एवं मस्तिष्क के आपसी तालमेल से है। अगर खिलाड़ी के मस्तिष्क से मिलने वाले निर्देशों को ठीक से प्राप्त करता है और शीघ्र पूरा करता है तो कार्य में गलतियां नहीं होंगी। मस्तिष्क व शरीर के संयोजन के बिना कोई कार्य नहीं हो सकता।

शारीरिक शक्ति व्यक्ति को ठीक प्रकार से कार्य करने के योग्य बनाती है।