PSEB 11th Class History Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न.

PSEB 11th Class History Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न

Unit 1

(1)

नीचे दिए गए उद्धरणों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर सावधानीपूर्वक लिखिए।
सिन्धु घाटी की सभ्यता से हमारा अभिप्राय उस प्राचीन सभ्यता से है जो सिन्धु नदी की घाटी में फली-फूली। इस सभ्यता के लोगों ने नगर योजना, तकनीकी विज्ञान, कृषि तथा व्यापार के क्षेत्र में पर्याप्त प्रतिभा का परिचय दिया।
श्री के० एम० पानिक्कर के शब्दों में “सैंधव लोगों ने उच्चकोटि की सभ्यता का विकास कर लिया था।” (“A very high state of civilization had been reached by the people of the Indus.”)
यदि गहनता से सिन्धु घाटी की सभ्यता का अध्ययन किया जाए तो इतिहास की अनेक गुत्थियां सुलझाई जा सकती हैं। सिन्धु घाटी का धर्म आज के हिन्दू धर्म से मेल खाता है। उनकी कला-कृतियां उत्कृष्टता लिए हुए थीं। उनकी लिपि अभी तक पढ़ी नहीं गई। इसे पढ़े जाने पर सिन्धु घाटी का चित्र अधिक स्पष्ट हो जाएगा।

1. केवल मोहनजोदड़ो से प्राप्त मोहरों की संख्या बताएं। इन मोहरों का प्रयोग किस लिए किया जाता था ?
2. भारतीय सभ्यता को हड़प्पा संस्कृति की क्या देन है ?
उत्तर-
1. मोहनजोदड़ो से 1200 से अधिक मोहरें प्राप्त हुई हैं। इनका प्रयोग सामान के गट्ठरों या भरे बर्तनों की सुरक्षा अथवा उन पर ‘सील’ लगाने के लिए किया जाता था।
2. सिन्धु घाटी की सभ्यता के निम्नलिखित चार तत्त्व आज भी भारतीय जीवन में देखे जा सकते हैं :

  • नगर योजना-सिन्धु घाटी के नगर एक योजना के अनुसार बसाए गए थे। नगर में चौड़ी-चौड़ी सड़कें और गलियां थीं। यह विशेषता आज के नगरों में देखी जा सकती है।
  • निवास स्थान-सिन्धु घाटी के मकानों में आज की भान्ति खिड़कियां और दरवाज़े थे। हर घर में एक आंगन, स्नान गृह तथा छत पर जाने के लिए सीढ़ियां थीं।।
  • आभूषण एवं श्रृंगार-आज की स्त्रियों की भान्ति सिन्धु घाटी की स्त्रियां भी श्रृंगार का चाव रखती थीं। वे सुर्थी तथा पाऊडर का प्रयोग करती थीं और विभिन्न प्रकार के आभूषण पहनती थीं। उन्हें बालियां, कड़े तथा । गले का हार पहनने का बहुत शौक था।
  • धार्मिक समानता-सिन्धु घाटी के लोगों का धर्म आज के हिन्दू धर्म से बहुत हद तक मेल खाता है। वे शिव, मातृ देवी तथा अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते थे। आज भी हिन्दू लोगों में उनकी पूजा प्रचलित है।

(2)

मोहरें प्राचीन शिल्पकला को सिन्धु घाटी की विशिष्ट देन समझी जाती है। केवल मोहनजोदड़ो से ही 1200 से अधिक मोहरें प्राप्त हुई हैं। ये कृतियां भले ही छोटी हैं फिर भी इन की कला इतनी श्रेष्ठ है कि इनके चित्रों में शक्ति और ओज झलकता है। इनका प्रयोग सामान के गट्ठरों या भरे बर्तनों की सुरक्षा के लिए किया जाता था। ऐसा भी विश्वास किया जाता है कि मोहरों का प्रयोग एक प्रकार का प्रतिरोधक (taboo) लगाने के लिए होता था। इन मोहरों से ऐसा भी प्रतीत होता है कि सिन्धु घाटी के समाज में विभिन्न पदवियों और उपाधियों की व्यवस्था प्रचलित थी। इन मोहरों पर पशुओं तथा मनुष्यों की आकृतियां बनी हुई हैं। पशुओं से सम्बन्धित आकृतियां बड़ी कलात्मक हैं। परन्तु मोहरों पर बनी मानवीय आकृतियां उतनी कलात्मकता से नहीं बनी हुई हैं। मोहरों के अधिकांश नमूने उनकी किसी धार्मिक महत्ता के सूचक हैं। एक आकृति के दाईं तरफ हाथी और चीता हैं, बाईं ओर गैंडा और भैंसा हैं। उनके नीचे दो बारहसिंगे या बकरियां हैं। इन ‘पशुओं के स्वामी’ को शिव का पशुपति रूप समझा जाता है। मोहरों पर पीपल के वृक्ष के बहुत चित्र मिले हैं।

1. सिन्धु घाटी की सभ्यता के धर्म की विशेषताएं क्या थी ?
2. सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि के बारे में अब तक क्या पता चल सका है ?
उत्तर-1. खुदाई में एक मोहर मिली है जिस पर एक देवता की मूर्ति बनी हुई है। देवता के चारों ओर कुछ पशु दिखाए गए हैं। इनमें से एक बैल भी है। सर जॉन मार्शल का कहना है कि यह पशुपति महादेव की मूर्ति है और लोग इसकी पूजा करते थे। खुदाई में मिली एक अन्य मोहर पर एक नारी की मूर्ति बनी हुई है। इसने विशेष प्रकार के वस्त्र पहने हुए हैं। विद्वानों का मत है कि यह धरती माता (मातृ देवी) की मूर्ति है और हड़प्पा संस्कृति के लोगों में इसकी पूजा प्रचलित थी। लोग पशु-पक्षियों, वृक्षों तथा लिंग की पूजा में भी विश्वास रखते थे। वे जिन पशुओं की पूजा करते थे, उनमें से कूबड़ वाला बैल, सांप तथा बकरा प्रमुख थे। उनका मुख्य पूजनीय वृक्ष पीपल था। खुदाई में कुछ तावीज़ इस बात का प्रमाण हैं कि सिन्धु घाटी के लोग अन्धविश्वासी थे और जादू-टोनों में विश्वास रखते थे।

2. सिन्धु घाटी के लोगों ने एक विशेष प्रकार की लिपि का आविष्कार किया जो चित्रमय थी। यह लिपि खुदाई में मिली मोहरों पर अंकित है। यह लिपि बर्तनों तथा दीवारों पर लिखी हुई भी पाई गई है। इनमें 270 के लगभग वर्ण हैं। इसे बाईं से दाईं ओर लिखा जाता है। यह लिपि आजकल की तथा अन्य ज्ञात लिपियों से काफ़ी भिन्न है, इसलिए इसे पढ़ना बहुत ही कठिन है। भले ही विद्वानों ने इसे पढ़ने के लिए अथक प्रयत्न किए हैं तो भी वे अब तक इसे पूरी तरह पढ़ नहीं पाए हैं। आज भी इसे पढ़ने के प्रयत्न जारी हैं। अतः जैसे ही इस लिपि को पढ़ लिया जाएगा, सिन्धु घाटी की सभ्यता के अनेक नए तत्त्व प्रकाश में आएंगे।

(3)

भारतीय आर्य सम्भवतः मध्य एशिया से भारत में आये थे। आरम्भ में ये सप्त सिन्धु प्रदेश में आकर बसे और लगभग 500 वर्षों तक यहीं टिके रहे। ये मूलतः पशु-पालक थे और विशाल चरागाहों को अधिक महत्त्व देते थे। परन्तु धीरे-धीरे वे कृषि के महत्त्व को समझने लगे। अधिक कृषि उत्पादन की खपत के लिए नगरों का विकास भी होने लगा। फलस्वरूप आर्य लोग एक विशाल क्षेत्र में फैलते गए। इस प्रकार कृषि तथा नगरों के विकास ने आर्यों के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ अन्य तत्त्वों ने भी उनके प्रसार में सहायता पहुंचाई।

1. भारतीय आर्यों की आदिभूमि के बारे में कौन-से क्षेत्र बताए जाते हैं ?
2. आर्य लोग यमुना नदी की पूर्वी दिशा में कब बढ़े ? उनके इस दिशा में विस्तार के क्या कारण थे ?
उत्तर-
1. भारतीय आर्यों की आदिभूमि के बारे में मुख्य रूप से मध्य एशिया अथवा सप्त सिन्धु प्रदेश, उत्तरी ध्रुव तथा मध्य एशिया के क्षेत्र बताए जाते हैं। मध्य प्रदेश तथा सप्त सिन्धु प्रदेश का सम्बन्ध प्राचीन भारत से है।
2. आर्य लोग लगभग 500 वर्ष तक सप्त सिन्धु प्रदेश में रहने के पश्चात् यमुना नदी के पूर्व की ओर बढ़े। इस दिशा में उनके विस्तार के मुख्य कारण ये थे। इस समय तक आर्यों ने सप्त सिन्धु के अनेक लोगों को दास बना रखा था। इन दासों से वे जंगलों को साफ करने के लिए भेजते थे। जहां कहीं जंगल साफ हो जाते वहां वे खेती करने लगते थे। उस समय आर्य लोहे के प्रयोग से भी परिचित हो गए। लोहे से बने औजार तांबे अथवा कांसे के औज़ारों की अपेक्षा अधिक मज़बूत और तेज थे। इन औज़ारों की सहायता से वनों को बड़ी संख्या में साफ किया जाता था। आर्यों के तीव्र विस्तार का एक अन्य कारण यह था कि सिन्धु घाटी का सभ्यता की सीमाओं के पार कोई शक्तिशाली राज्य अथवा कबीला नहीं था। परिणाम स्वरूप आर्यों को किसी विरोधी का सामना न करना पड़ा और वे बिना किसी बाधा विस्तार करते गए।

(4)

आर्यों के धर्म में यज्ञों को बड़ा महत्त्व प्राप्त था। सबसे छोटा यज्ञ घर में ही किया जाता था। समय-समय पर बड़े-बड़े यज्ञ भी होते थे जिनमें सारा गांव या कबीला भाग लेता था। बड़े यज्ञों के रीति-संस्कार अत्यन्त जटिल थे और इनके लिए काफ़ी समय पहले से तैयारी करनी पड़ती थी। इन यज्ञों में अनेक पुरोहित भाग लेते थे। इनमें अनेक जानवरों की बलि दी जाती थी। यह बलि देवताओं को प्रसन्न करने के उद्देश्य से दी जाती थी। आर्यों का विश्वास था कि यदि इन्द्र देवता प्रसन्न हो जाएं तो वे युद्ध में विजय दिलाते हैं, आयु बढ़ाते हैं और सन्तान तथा धन में वृद्धि करते हैं। बाद में एक और उद्देश्य से भी यज्ञ किए जाने लगे। वह यह था कि प्रत्येक यज्ञ से संसार पुनः एक नया रूप धारण करेगा, क्योंकि संसार की उत्पत्ति यज्ञ द्वारा हुई मानी गई थी।

1. राजसूय यज्ञ का क्या महत्त्व था ?
2. आर्यों के मुख्य देवताओं के बारे में बताएं।
उत्तर-
1. राजसूय यज्ञ राज्य में दैवी शक्ति का संचार करने के लिए किया जाता था। इससे स्पष्ट है कि राजपद को दैवी देन माना जाने लगा था।
2. ऋग्वेद के अध्ययन से पता चलता है आर्य लोग प्रकृति के पुजारी थे। अपनी समृद्धि के लिए वे सूर्य, वर्षा, पृथ्वी आदि की पूजा करते थे। वे अग्नि, आंधी, तूफान आदि की भी स्तुति करते थे ताकि वे उनके प्रकोपों से बचे रहें। कालान्तर में आर्य लोग प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को देवता मान कर पूजने लगे। वरुण उनका प्रमुख देवता था। उसे आकाश का देवता माना जाता था। आर्यों के अनुसार वरुण समस्त जगत् का पथ-प्रदर्शन करता है। आर्य सैनिकों के लिए इन्द्र देवता अधिक महत्त्वपूर्ण था। उसे युद्ध तथा ऋतुओं का देवता माना जाता था। युद्ध में विजय के लिए इन्द्र की ही उपासना की जाती थी। इन्द्र के अतिरिक्त वे रुद्र, अग्नि, पृथ्वी, वायु, सोम आदि देवताओं की उपासना भी करते थे।

(5)

जैन धर्म और बौद्ध धर्म का उदय छठी शताब्दी ई० पू० में हुआ। इस समय तक देश के राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में नए विचार उभर रहे थे। देश में कुछ बड़े-बड़े राज्य स्थापित हो चुके थे। इनमें शासक नवीन विचारों के पनपने का कोई विरोध नहीं कर रहे थे। इसी प्रकार सामाजिक एवं धार्मिक वातावरण भी नवीन धार्मिक आन्दोलनों के उदय के अनुकूल था। वैदिक धर्म में अनेक कुरीतियां आ गई थीं। व्यर्थ के रीति-रिवाजों, महंगे यज्ञों और ब्राह्मणों के झूठे प्रचार के कारण यह धर्म अपनी लोकप्रियता खो चुका था। इन सब कुरीतियों का अन्त करने के लिए देश में लगभग 63 नये धार्मिक आन्दोलन चले जिनका नेतृत्व विद्वान् हिन्दू कर रहे थे। परन्तु ये सभी धर्म लोकप्रिय न हो सके। केवल दो धर्मों को छोड़कर शेष सभी समाप्त हो गये। ये दो धर्म थे-जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म।

1. महात्मा बुद्ध के जन्म और मृत्यु से सम्बन्धित स्थानों के नाम बताएं।
2. महात्मा बुद्ध अथवा बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1. महात्मा बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी वाटिका में हुआ। उनकी मृत्यु कुशीनगर के स्थान पर हुई।
2. महात्मा बुद्ध ने लोगों को जीवन का सरल मार्ग सिखाया। उन्होंने लोगों को बताया कि संसार दुःखों का घर है। दुःखों का कारण तृष्णा है। निर्वाण प्राप्त करके ही मनुष्य जन्म-मरण के चक्कर से छूट सकता है। निर्वाण-प्राप्ति के लिए महात्मा बुद्ध ने लोगों को अष्ट मार्ग पर चलने का उपदेश दिया। उन्होंने लोगों को अहिंसा, नेक काम तथा सदाचार पर चलने के लिए कहा। सच तो यह है कि बौद्ध धर्म ने व्यर्थ के रीति-रिवाजों यज्ञों तथा कर्मकाण्डों को त्यागने पर बल दिया।

(6)

जैनियों ने अपने तीर्थंकरों की याद में विशाल मंदिर तथा मठ बनवाए। ये मंदिर अपने प्रवेश द्वारों तथा सुन्दर मूर्तियों के कारण प्रसिद्ध थे। दिलवाड़ा का जैन मन्दिर ताजमहल को लजाता है। कहते हैं कि मैसूर में बनी जैन धर्म की सुन्दर मूर्तियां दर्शकों को आश्चर्य में डाल देती हैं। इसी प्रकार आबू पर्वत का जैन-मन्दिर, एलोरा की गुफाएं तथा खुजराहो के जैन मन्दिर कला के उत्कृष्ट नमूने हैं। जैन धर्म में इस महान् योगदान की अपेक्षा नहीं की जा सकती। जैन धर्म के अनुयायियों ने लोक भाषाओं का प्रचार किया। उनका अधिकांश साहित्य संस्कृत की बजाय स्थानीय भाषाओं में लिखा गया। यही कारण है कि कन्नड़ साहित्य आज भी अपने उत्कृष्ट साहित्य के लिए जैन धर्म का आभारी है। इसके अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं के साहित्य में खूब योगदान दिया।

1. सबसे अधिक प्रभावशाली जैन मन्दिर कौन-से दो स्थानों पर हैं ?
2. महावीर की शिक्षाओं का साधारण मनुष्य के जीवन के लिए क्या महत्त्व था ?
उत्तर-
1. सबसे अधिक प्रभावशाली जैन मन्दिर राजस्थान में आबू पर्वत पर तथा मैसूर में श्रावणवेलगोला में हैं।
2. महावीर की शिक्षाओं का साधारण मनुष्य के जीवन में बड़ा महत्त्व था। इसका वर्णन इस प्रकार है-

  • उन्होंने जाति-प्रथा का घोर विरोध किया। इससे भारतीय समाज में लोगों का आपसी मेल-जोल बढ़ने लगा। भेदभाव का स्थान सहकारिता ने ले लिया। ऊंच-नीच की भावना समाप्त होने लगी और समाज प्यार और भाईचारे की भावनाओं से ओत-प्रोत हो गया।
  • महावीर ने लोगों को समाज-सेवा का उपदेश दिया। अतः लोगों की भलाई के लिए जैनियों ने अनेक संस्थाएं स्थापित की। इससे न केवल जनता का ही भला हुआ बल्कि दूसरे धर्मों के अनुयायियों को भी समाज सेवा के कार्य करने का प्रोत्साहन मिला।
  • जैन धर्म की बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखकर ब्राह्मणों ने भी पशु-बलि, कर्म-काण्ड तथा अन्य कुरीतियों का त्याग करना शुरू कर दिया। इस प्रकार वैदिक धर्म भी काफ़ी सरल बन गया।
  • इसके अतिरिक्त महावीर ने अहिंसा पर बल दिया। अहिंसा के सिद्धान्त को अपना कर लोग मांसाहारी से शाकाहारी बन गए। उनका जीवन सरल तथा संयमी बना।

(7)

जय देवानांपिय पिपदरसी ने अपने शासन के आठ वर्ष पूरे किए तो उन्होंने कलिंग (आधुनिक तटवर्ती ओडिशा) पर विजय प्राप्त की। डेढ़ लाख पुरुषों को निष्काषित किया गया। एक लाख मारे गए और इससे भी ज्यादा की मृत्यु हुई। कलिंग पर शासन स्थापित करने के बाद देवानांपिय धम्म के गहन अध्ययन, धम्म के स्नेह और धम्म के उपदेश में डूब गए हैं। यही देवानांपिय के लिए कलिंग की विजय का पश्चात्ताप है। देवानांपिय के लिए यह बहुत वेदनादायी और निदनीय है कि जब कोई किसी राज्य पर विजय प्राप्त करता है तो पराजित राज्य का हनन होता है, वहां लोग मारे जाते हैं, निष्कासित किए जाते हैं।

1. ‘देवानांपिप पियदरसी’ किसे पुकारते थे ? उनका संक्षेप में वर्णन कीजिए।
2. अशोक पर कलिंग युद्ध के पड़े प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
1. ‘देवानांपिय पियदरसी’ सम्राट असोक (अशोक) को पुकारते हैं। उन्होनें कलिंग (आधुनिक तटवर्ती ओडिशा) पर विजय प्राप्त की थी।
2. कलिंग युद्ध के अशोक पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े

  • उन्होंने युद्धों का सदा के लिए त्याग कर दिया।
  • वह धम्म के अध्ययन, धम्म के स्नेह तथा धम्म के उपदेश में डूब गए।
  • वह प्रजा-हितकारी शासक बन गए।

(8)

यह प्रयाग प्रशस्ति का एक अंश है :
धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। अनेक गुणों और शुभकार्यों में संपन्न उन्होनें पैर के तलबे से अन्य राजाओं के यश को मिटा दिया है। वे परमात्मा पुरुष हैं, साधु (भले) की समृद्धि और असाधु (बुरे) के विनाश के कारण हैं। वे अज्ञेय हैं। उनके कोमल हृदय को भक्ति और विनय से ही वश में किया जा सकता है। वे करुणा से भरे हुए हैं। वे अनेक सहस्त्र गांवों के दाता है। उनके मस्तिष्क की दीक्षा दीन-दुखियों, विरहणियों और पीड़ितों के उद्धार के लिए की गई है। वे मानवता के लिए दिव्यमान उदारता की प्रतिमूर्ति है। वे देवताओं के कुबेर (धन-देव), वरुण (समुद्र-देव), इंद्र (वर्षा के देवता) और यम (मृत्यु-देव) के तुल्य हैं।

1. समुद्रगुप्त कौन था ? उनकी तुलना किन देवताओं से की गई है ?
2. लेखक ने समुद्रगुप्त के किन गुणों अथवा सफलताओं का उल्लेख किया है ? कोई चार बताइए।
उत्तर-
1. समुद्र गुप्त संभवतः सबसे शक्तिशाली गुप्त सम्राट था। उसकी तुलना धन-देव कुबेर, समुद्र-देव वरुण, वर्षा के देवता
इंद्र तथा मृत्यु-देव यम से की गई है।
2. हरिषेण के अनुसार-

  • धरती पर समुद्रगुप्त का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। उन्होंने अपने पैर के तलबे से अन्य राजाओं के यश को मिटा दिया था।
  • वह परमात्मा पुरुष थे-साधु (भले) की समृद्धि तथा असाधु (बुरे) के विनाश कारण।
  • वह अजेय थे।
  • उनके कोमल मन को भक्ति और विनय से ही वश में किया जा सकता था।

(9)

गुप्त काल में गणित, ज्योतिष तथा चिकित्सा विज्ञान में काफ़ी प्रगति हुई-
आर्यभट्ट गुप्त युग का महान् गणितज्ञ तथा ज्योतिषी था। उसने ‘आर्यभट्टीय’ नामक ग्रन्थ की रचना की। यह अंकगणित, रेखागणित तथा बीजगणित के विषयों पर प्रकाश डालता है। उसने गणित को स्वतन्त्र विषय के रूप में स्वीकार करवाया। संसार को ‘बिन्दु’ का सिद्धान्त भी उसी ने दिया। आर्यभट्ट पहला व्यक्ति था जिसने यह घोषणा की कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उसने सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण के वास्तविक कारणों पर भी प्रकाश डाला।

गुप्त युग का दूसरा महान् ज्योतिषी अथवा नक्षत्र-वैज्ञानिक वराहमिहिर था। उसने ‘पंच सिद्धान्तिका’, ‘बृहत् संहिता’ तथा ‘योग-यात्रा’ आदि ग्रन्थों की रचना की। ब्रह्मगुप्त एक महान् ज्योतिषी तथा गणितज्ञ था। उसने न्यूटन से भी बहुत पहले गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त को स्पष्ट किया। वाग्यभट्ट इस युग का महान् चिकित्सक था। उसका ‘अष्टांग संग्रह’ नामक ग्रन्थ चिकित्सा जगत् के लिए अमूल्य निधि है। इसमें चरक तथा सुश्रुत नामक महान् चिकित्सकों की संहिताओं का सार दिया गया है। इस काल में पाल-काव्य ने ‘हस्त्यायुर्वेद’ की रचना की। इस ग्रन्थ का सम्बन्ध पशु चिकित्सा से है। लोगों को उस समय रसायनशास्त्र तथा धातु विज्ञान का भी ज्ञान था।

1. चिकित्सा के क्षेत्र में दो प्रसिद्ध गुप्तकालीन विद्वानों के नाम बताओ।
2. आर्यभट्ट का खगोल विज्ञान में क्या योगदान था ?
उत्तर-
1. चिकित्सा के क्षेत्र में दो प्रसिद्ध गुप्तकालीन विद्वान् थे-चरक और सुश्रुत।
2. आर्यभट्ट गुप्त काल का एक महान् वैज्ञानिक एवं खगोलशास्त्री था। उसने अपनी नवीन खोजों द्वारा खगोलशास्त्र को काफ़ी समृद्ध बनाया। ‘आर्य भट्टीय’ उसका प्रसिद्ध ग्रन्थ है। उसने यह सिद्ध किया कि सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण, राहू और केतू नामक राक्षसों के कारण नहीं लगते बल्कि जब चन्द्रमा कार्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है तो चन्द्रग्रहण होता है। आर्यभट्ट ने स्पष्ट रूप में यह लिख दिया था कि सूर्य नहीं घूमता बल्कि पृथ्वी ही अपनी धुरी के चारों ओर घूमती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि खगोल विज्ञान में आर्यभट्ट ने महान् योगदान दिया।

(10)

गप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत की राजनीतिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई थी। देश में अनेक छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्य उभर आये थे। इनमें से एक थानेश्वर का वर्धन राज्य भी था। प्रभाकर वर्धन के समय में यह काफ़ी शक्तिशाली था। उसकी मृत्यु के बाद 606 ई० में हर्षवर्धन राजगद्दी पर बैठा। राजगद्दी पर बैठते समय वह चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ था। शत्रुओं से छुटकारा पाने के लिए उसे अनेक युद्ध करने पड़े। वैसे भी हर्ष अपने राज्य की सीमाओं में वृद्धि करना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने अनेक सैनिक अभियान किए। कुछ ही वर्षों में लगभग सारे उत्तरी भारत पर उसका अधिकार हो गया। इस प्रकार उसने देश में राजनीतिक एकता की स्थापना की और देश को अच्छा शासन प्रदान किया।

1. हर्षवर्धन के राज्यकाल में आने वाले चीनी यात्री का नाम बताओ और यह कब से कब तक भारत में रहा ?
2. हर्षवर्धन के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर-
1. हर्षवर्धन के राज्यकाल में आने वाला चीनी यात्री ह्यनसांग था। वह 629 से 645 ई० तक भारत में रहा।
2. हर्षवर्धन एक महान् चरित्र का स्वामी था। उसे अपने परिवार से बड़ा प्रेम था। अपनी बहन राज्यश्री को मुक्त करवाने और उसे ढूंढने के लिए वह जंगलों की खाक छानता फिरा। वह एक सफल विजेता तथा कुशल प्रशासक था। उसने थानेश्वर के छोटे से राज्य को उत्तरी भारत के विशाल राज्य का रूप दिया। वह प्रजाहितैषी और कर्तव्यपरायण शासक था। यूनसांग ने उसके शासन प्रबन्ध की बड़ी प्रशंसा की है। उसके अधीन प्रजा सुखी और समृद्ध थी। हर्ष धर्मपरायण और सहनशील भी था। उसने बौद्ध धर्म को अपनाया और सच्चे मन से इसकी सेवा की। उसने अन्य धर्मों का समान आदर किया। दानशीलता उसका एक अन्य बड़ा गुण था। वह इतना दानी था कि प्रयाग की एक सभा में उसने अपने वस्त्र भी दान में दे दिए थे और अपना तन ढांपने के लिए अपनी बहन से एक वस्त्र लिया था। हर्ष स्वयं एक उच्चकोटि का विद्वान् था और उसने कला और विद्या को संरक्षण प्रदान किया।

Unit 2

नीचे दिए गए उद्धरणों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर सावधानीपूर्वक लिखिए

(1)

आठवीं और नौवीं शताब्दी में उत्तरी भारत में होने वाला संघर्ष त्रिदलीय संघर्ष के नाम से प्रसिद्ध है। यह संघर्ष राष्ट्रकूटों, प्रतिहारों तथा पालों के बीच कन्नौज को प्राप्त करने के लिए ही हुआ। कन्नौज उत्तरी भारत का प्रसिद्ध नगर था। यह नगर हर्षवर्धन की राजधानी था। उत्तरी भारत में इस नगर की स्थिति बहुत अच्छी थी। क्योंकि इस नगर पर अधिकार करने वाला शासक गंगा के मैदान पर अधिकार कर सकता था, इसलिए इस पर अधिकार करने के लिए कई लड़ाइयां लड़ी गईं। इस संघर्ष में राष्ट्रकूट, प्रतिहार तथा पाल नामक तीन प्रमुख राजवंश भाग ले रहे थे। इन राजवंशों ने बारी-बारी कन्नौज पर अधिकार किया। राष्ट्रकूट, प्रतिहार तथा पाल तीनों राज्यों के लिए संघर्ष के घातक परिणाम निकले। वे काफी समय तक युद्धों में उलझे रहे। धीरे-धीरे उनकी सैन्य शक्ति कम हो गई और राजनीतिक ढांचा अस्त-व्यस्त हो गया। फलस्वरूप सौ वर्षों के अन्दर तीनों राज्यों का पतन हो गया। राष्ट्रकूटों पर उत्तरकालीन चालुक्यों ने अधिकार कर लिया। प्रतिहार राज्य छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया और पाल वंश की शक्ति को चोलों ने समाप्त कर दिया।

1. कन्नौज के लिए संघर्ष करने वाले तीन प्रमुख राजवंशों के नाम बताएं।
2. राजपूतों के शासन काल में भारतीय समाज में क्या कमियां थीं ?
उत्तर-
1. कन्नौज के लिए संघर्ष करने वाले तीन प्रमुख राजवंशों के नाम थे-पालवंश, प्रतिहार वंश तथा राष्ट्रकूट वंश।
2. राजपूतों के शासन काल में भारतीय समाज में ये कमियां थी-

  • राजपूतों में आपसी ईष्या और द्वेष बहुत अधिक था। इसी कारण वे सदा आपस में लड़ते रहे। विदेशी आक्रमणकारियों का सामना करते हुए उन्होंने कभी एकता का प्रदर्शन नहीं किया।
  • राजपूतों को सुरा, सुन्दरी तथा संगीत का बड़ा चाव था। किसी भी युद्ध के पश्चात् राजपूत रास-रंग में डूब जाते थे।
  • राजपूत समय में संकीर्णता का बोल-बाला था। उनमें सती-प्रथा, बाल-विवाह तथा पर्दा प्रथा प्रचलित थी। वे तन्त्रवाद में विश्वास रखते थे जिनके कारण वे अन्ध-विश्वासी हो गये थे।
  • राजपूत समाज एक सामन्ती समाज था। सामन्त लोग अपने-अपने प्रदेश के शासक थे। अत: लोग अपने सामन्त या सरदार के लिए लड़ते थे; देश के लिए नहीं।

(2)

नैतिक दृष्टिकोण से समस्त मुस्लिम जगत का धार्मिक नेता खलीफा माना जाता था। वह बगदाद में निवास करता था। परन्तु सुल्तान खलीफा का नाममात्र का प्रभुत्व स्वीकार करते थे। यद्यपि कुछ सुल्तान खलीफा के नाम से खुतबा पढ़वाते थे और सिक्कों पर भी उसका नाम अंकित करवाते थे, परन्तु यह प्रभुत्व केवल दिखावा मात्र था। वास्तविक सत्ता सुल्तान के हाथ में ही थी। वह केवल अपने पद को सुदृढ़ बनाने के लिए खलीफा से स्वीकृति प्राप्त कर लेते थे। सुल्तान की शक्तियां असीम थीं। उसकी इच्छा ही कानून थी। वह सेना का प्रधान और न्याय का मुखिया होता था। वास्तव में वह पृथ्वी पर भगवान् का प्रतिनिधि समझा जाता था।

1. दिल्ली सल्तनत की जानकारी के लिए स्रोतों के चार प्रमुख प्रकार बताएं।
2. क्या दिल्ली सल्तनत को एक धर्म-तन्त्र कहना उपयुक्त होगा ?
उत्तर-
1. दिल्ली सल्तनत की जानकारी के लिए स्रोतों के चार प्रमुख प्रकार हैं-समकालीन दरबारी इतिहासकारों के वृत्तान्त, कवियों की रचनाएं, विदेशी यात्रियों के वृत्तान्त तथा सिक्के।
2. धर्म-तन्त्र से हमारा अभिप्राय पूर्ण रूप से धर्म द्वारा संचालित राज्य से है। दिल्ली सल्तनत के कई सुल्तान खलीफा के नाम पर राज्य करते थे और कुछ ने तो अपने समय के खलीफा से मान्यता-पत्र भी लिया था। परन्तु वास्तव में खलीफा की मान्यता का सुल्तान की शक्ति का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता था। सुल्तान से शरीअत (इस्लामी कानून) के अनुसार कार्य करने की अपेक्षा की जाती थी। परन्तु उसकी नीति एवं कार्य प्रायः उस समय की परिस्थितियों पर निर्भर करते थे। कभी-कभी शरीअत के कारण कुछ जटिल समस्याएं भी उत्पन्न हो जाती थीं। ऐसे समय सुल्तान जानबूझ कर अनदेखी कर देते थे। वास्तव में जब कोई सुल्तान शरीअत की दुहाई देता था तो यह साधारणतः उसकी शासक के रूप में कमजोरी का चिन्ह माना जाता था। इसलिए दिल्ली सल्तनत को एक धर्म-तन्त्र समझना उचित नहीं होगा।

(3)

बलबन ने दिल्ली सल्तनत को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक कार्य किए। सबसे पहले उसने ‘लौह और रक्त नीति’ द्वारा आन्तरिक विद्रोहों का दमन किया और राज्य में शान्ति स्थापित की। बलबन ने दोआब क्षेत्र के सभी लुटेरों और डाकुओं का वध करवा दिया। उसने मंगोलों से राज्य की सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण सैनिक सुधार किये। पुराने सिपाहियों के स्थान पर नये योग्य सिपाहियों को भर्ती किया गया। सीमावर्ती किलों को भी सुदृढ़ बनाया गया। उसने बंगाल के विद्रोही सरदार तुगरिल खां को भी बुरी तरह पराजित किया। बलबन ने राज दरबार में कड़ा अनुशासन स्थापित किया। उसने सभी शक्तिशाली सरदारों से शक्ति छीन ली ताकि वे कोई विद्रोह न कर सकें। उसने अपने राज्य में गुप्तचरों का जाल-सा बिछा दिया। इस प्रकार के कार्यों से उसने दिल्ली सल्तनत को आन्तरिक विद्रोहों और बाहरी आक्रमणों से पूरी तरह सुरक्षित बनाया। इसी कारण ही बलबन को दास वंश का महान् शासक कहा जाता है।

1. बलबन ने कौन-से चार प्रदेशों में विद्रोहों को दबाया ?
2. मंगोलों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए दिल्ली के सुल्तानों ने क्या पग उठाए ?
उत्तर-
1. बलबन ने बंगाल, दिल्ली, गंगा-यमुना दोआब, अवध एवं कोहर के प्रदेशों में विद्रोहों को दबाया।
2. मंगोलों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए दिल्ली के सुल्तानों ने अनेक पग उठाए। इस सम्बन्ध में बलबन तथा अलाऊद्दीन खिलजी की भूमिका विशेष महत्त्वपूर्ण रही जिसका वर्णन इस प्रकार है-

  • उन्होंने सीमावर्ती प्रदेशों में नए दुर्ग बनवाए और पुराने दुर्गों की मुरम्मत करवाई। इन सभी दुर्गों में योग्य सैनिक अधिकारी नियुक्त किए गए।
  • उन्होंने मंगोलों का सामना करने के लिए अपने सेना का पुनर्गठन किया। वृद्ध तथा अयोग्य सैनिकों के स्थान पर युवा सैनिकों की भर्ती की गई। सैनिकों की संख्या में भी वृद्धि की गई।
  • सुल्तानों ने द्वितीय रक्षा-पंक्ति की भी व्यवस्था की। इसके अनुसार मुल्तान, दीपालपुर आदि प्रान्तों में विशेष सैनिक टुकड़ियां रखी गईं और विश्वासपात्र अधिकारी नियुक्त किए। अत: यदि मंगोल सीमा से आगे बढ़ भी आते तो यहां उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ता।
  • सुल्तानों ने मंगोलों को पराजित करने के पश्चात् कड़े दण्ड दिए। इसका उद्देश्य उन्हें सुल्तान की शक्ति के आतंकित करके आगे बढ़ने से रोकना ही था।

(4)
विजयनगर के सबसे प्रसिद्ध शासक कृष्णदेव राय (शासनकाल 1509-29) ने शासनकाल के विषय में अमुक्तमल्यद नामक तेलुगु भाषा में एक कृति लिखी। व्यापारियों के विषय में उसने लिखा :

एक राजा को अपने बंदरगाहों की सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात किया जा सके……..उसे प्रबंध करना चाहिए कि उन विदेशी नाविकों जिन्हें तूफानों, बीमारी या थकान के कारण उनके देश में उतरना पड़ता है, की भली-भांति देखभाल की जा सके…..सुदूर देशों के व्यापारियों, जो हाथियों और अच्छे घोड़ों का आयात करते है, को रोज़ बैठक में बुलाकर, तोहफ़े देकर तथा उचित मुनाफे की स्वीकृति देकर अपने साथ संबद्ध करना चाहिए ऐसा करने पर ये वस्तुएं कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुंचेगी।

1. विजयनगर का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन था ? उसकी कृति का नाम तथा भाषा बताओ।
2. वह व्यापार एवं वाणिज्य की वृद्धि के लिए क्या-क्या पग उठाना चाहता था ? कोई तीन बिंदु लिखिए। इसका क्या उद्देश्य था ?
उत्तर-
1. विजयनगर का सबसे प्रसिद्ध शासक कृष्णदेव राय था। उसकी कृति का नाम ‘अमुक्तमल्यद’ है जो तेलुगु भाषा में है।
2. व्यापार एवं वाणिज्य की वृद्धि के लिए वह

  • बंदरगाहों को सुधारना चाहता था।
  • घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती आदि वस्तुओं के आयात को प्रोत्साहन देना चाहता था।
  • राज्य में आने वाले विदेशी नाविकों की उचित देखभाल करना चाहता था। इन सबका उद्देश्य यह था कि वे वस्तुएं शत्रु के हाथ में पहुंच पाएं।

(5)
सन्त लहर के प्रचारक अवतारवाद में बिल्कुल विश्वास नहीं रखते थे। वे मूर्ति-पूजा के भी विरुद्ध थे। उनका विश्वास था कि ईश्वर एक है और वह मनुष्य के मन में निवास करता है। अतः परमात्मा को पाने के लिए मनुष्य को अपनी अन्तरात्मा की गहराइयों में डूब जाना चाहिए। अन्तरात्मा से परमात्मा को खोज निकालने का नाम ही मुक्ति है। इस अनुभव से मनुष्य की आत्मा पूर्ण रूप से परमात्मा में विलीन हो जाती है। सन्तों के अनुसार सच्चा गुरु परमात्मा तुल्य है। जिस किसी को भी सच्चा गुरु मिल जाता है, उसके लिए परमात्मा को पा लेना कठिन नहीं है। संत जाति-प्रथा के भेदभाव के विरुद्ध थे। कुछ प्रमुख सन्तों के नाम इस प्रकार हैं-कबीर, नामदेव, सधना, रविदास, धन्ना तथा सैन जी। श्री गुरु नानक देव जी भी अपने समय के महान् सन्त हुए हैं।

1. गुरु ग्रन्थ साहिब में जिन भक्तों तथा सन्तों की रचनाएं सम्मिलित की गई हैं, उनमें से किन्हीं चार का नाम बताएं।
2. सन्त कौन थे ?
उत्तर-
1. गुरु ग्रन्थ साहिब में जिन भक्तों तथा सन्तों की रचनाएं सम्मिलित की गई हैं, उनमें से चार के नाम हैं-भक्त कबीर, नामदेव जी, रामानन्द जी तथा घनानन्द जी।
2. सन्त भक्ति-लहर के प्रचारक थे। उन्होंने 14वीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी के मध्य भारत के भिन्न-भिन्न भागों में भक्ति लहर का प्रचार किया। लगभग सभी भक्ति प्रचारकों के सिद्धान्त काफ़ी सीमा तक एक समान थे। परन्तु कुछ एक प्रचारकों ने विष्णु अथवा शिव के अवतारों की पूजा को स्वीकार न किया। उन्होंने मूर्ति पूजा का भी खण्डन किया। उन्होंने वेद, कुरान, मुल्ला, पण्डित, तीर्थ स्थान आदि में से किसी को भी महत्त्व न दिया। वे निर्गुण ईश्वर में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि परमात्मा निराकार है। ऐसे सभी प्रचारकों को ही प्रायः सन्त कहा जाता है। वे प्रायः जनसाधारण की भाषा में अपने विचारों का प्रचार करते थे।

(6)
यह रचना कबीर की मानी जाती है :
हे भाई यह बताओ, किस तरह हो सकता है
कि संसार में एक नहीं दो स्वामी हों ?
किसने तुम्हें भनित किया है ?
ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है : जैसे-अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत ।
विभिन्नताएं तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।
कबीर कहते हैं दोनों ही भुलावे में है।
इनमें से कोई एक नाम को प्राप्त नहीं कर सकता
एक बकरे को मारता है और दूसरा गाय को।
वे पूरा जीवन विवादों में ही गंवा देते हैं।

1. कबीर जी के अनुसार संसार में कितने स्वामी (ईश्वर) हैं ? लोग ईश्वर को कौन-कौन से नामों से पुकारते हैं ? ये नाम कहां से लिए गए ?
2. कबीर जी के अनुसार हिंदू तथा मूसलमान दोनों ही ईश्वर को नहीं पा सकते ? क्यों ?
उत्तर-
1. कबीर जी के अनुसार संसार का स्वामी एक ही है। लोग उसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि, हज़रत आदि नामों से पुकारते हैं। ये सभी नाम मनुष्य के अपने ही बनाए हुए हैं।
2. कबीर जी के अनुसार हिंदू और मुसलमान दोनों ही ईश्वर को नहीं पा सकते क्योंकि वे विवादों में घिरे हुए है। दोनों ही पापी है। वे निर्दोष पशुओं का वध करते हैं।

(7)
श्री गुरु नानक देव जी सिक्ख धर्म के प्रवर्तक थे। इतिहास में उन्हें महान् स्थान प्राप्त है। उन्होंने अपने जीवन में भटके लोगों को सत्य का मार्ग दिखाया और धर्मान्धता से पीड़ित समाज को राहत दिलाई। जिस समय श्री गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ, उस समय पंजाब का सामाजिक तथा धार्मिक वातावरण अन्धकार में लिप्त था। लोग अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे। हिन्दू और मुसलमानों में बड़ा भेदभाव था। श्री गुरु नानक देव जी ने इन सभी बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने ‘सत्यनाम’ का उपदेश दिया और लोगों को धर्म का सच्चा मार्ग दिखाया।

1. गुरु नानक देव जी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
2. गुरु नानक देव जी के सन्देश के सामाजिक अर्थ क्या थे ?
उत्तर-
1. गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 ई० में तलवण्डी नामक स्थान पर हुआ।
2. गुरु नानक देव जी के सन्देश के सामाजिक अर्थ बड़े महत्त्वपूर्ण थे। उनका सन्देश सभी के लिए था। प्रत्येक स्त्री पुरुष उनके बताये मार्ग को अपना सकता था। इसमें जाति-पाति या धर्म का कोई भेदभाव न था। उन्होंने सभी के लिए मुक्ति का मार्ग खोलकर सभी नर-नारियों के मन में एकता का भाव दृढ़ किया। इस प्रकार वर्ण-व्यवस्था के जटिल बन्धन टूटने लगे और लोगों में समानता की भावना का संचार हुआ। उनके अनुयायियों में समानता के विचार को वास्तविक रूप संगत और लंगर की संस्थाओं में मिला। इसलिए यह समझना कठिन नहीं है कि गुरु नानक साहिब ने जात-पात पर आधारित भेदभावों का बड़े स्पष्ट शब्दों में खण्डन क्यों किया। उन्होंने अपने आपको जनसाधारण के साथ सम्बन्धित किया। इस स्थिति में उन्होंने अपने समय के शासकों में प्रचलित अन्याय, दमन और भ्रष्टाचार का बड़ा ज़ोरदार खण्डन किया। फलस्वरूप समाज अनेक कुरीतियों से मुक्त हो गया।

(8)
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी से महत्त्वपूर्ण प्रतिक्रिया हुई : (1) गुरु अर्जन देव जी ने अपनी शहीदी से पहले अपने पुत्र हरगोबिन्द के नाम यह सन्देश छोड़ा, “वह समय बड़ी तेजी से आ रहा है, जब भलाई और बुराई की शक्तियों की टक्कर होगी। अतः मेरे पुत्र तैयार हो जा, आप शस्त्र पहन और अपने अनुयायियों को शस्त्र पहना। अत्याचारी का सामना तब तक करो जब तक कि वह अपने आपको सुधार न ले।” गुरु जी के इन अन्तिम शब्दों ने सिक्खों में सैनिक भावना को जागृत कर दिया। (2) गुरु जी की शहीदी ने सिक्खों की धार्मिक भावनाओं को भड़का दिया और उनके मन में मुस्लिम राज्य के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई। (3) इस शहीदी से सिक्ख धर्म को लोकप्रियता मिली। सिक्ख अब अपने धर्म के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तैयार हो गए। निःसन्देह गुरु अर्जन देव जी की शहीदी सिक्ख इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई।

1. आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन किन्होंने और कब सम्पूर्ण किया ?
2. गुरु अर्जन देव जी की शहीदी ने सिक्ख पंथ के इतिहास पर क्या प्रभाव डाला ?
उत्तर-
1. आदि ग्रन्थ साहिब का संकलन गुरु अर्जन देव जी ने 1604 ई० में सम्पूर्ण किया।
2. गुरु अर्जन देव जी की शहीदी सिक्ख पंथ के इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई।

  • गुरु अर्जन देव जी ने अपनी शहीदी से पहले अपने पुत्र हरगोबिन्द के नाम यह सन्देश छोड़ा, “वह समय बड़ी तेजी से आ रहा है जब भलाई और बुराई की शक्तियों की टक्कर होगी। अत: मेरे पुत्र तैयार हो जा, आप शस्त्र पहन और अपने अनुयायियों को शस्त्र पहना। अत्याचारी का सामना तब तक करो जब तक कि वह अपने आपको सुधार न ले।” गुरु जी की शहीदी ने इन अन्तिम शब्दों ने सिक्खों में सैनिक भावना को जागृत कर दिया।
  • शहीदी ने सिक्खों के मन में मुग़ल राज्य के प्रति घृणा उत्पन्न कर दी।
  • इस शहीदी से सिक्ख धर्म को लोकप्रियता मिली। सिक्ख अब अपने धर्म के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए तैयार हो गए।

(9)
गुरु जी ने पांच प्यारों का चुनाव करने के पश्चात् पांच प्यारों को अमृतपान करवाया जिसे ‘खण्डे का पाहुल’ कहा जाता है। गुरु जी ने इन्हें आपस में मिलते समय ‘श्री वाहिगुरु जी का खालसा, श्री वाहिगुरु जी की फतेह’ कहने का आदेश दिया। इसी समय गुरु जी ने बारी-बारी पांचों प्यारों की आंखों तथा केशों पर अमृत के छींटे डाले और उन्हें (प्रत्येक प्यारे को) ‘खालसा’ का नाम दिया। सभी प्यारों के नाम के पीछे ‘सिंह’ शब्द जोड़ दिया गया। फिर गुरु जी ने पांच प्यारों के हाथ से स्वयं अमृत ग्रहण किया। इस प्रकार ‘खालसा’ का जन्म हुआ। गुरु जी का कथन था कि उन्होंने यह सब ईश्वर के आदेश से किया है। खालसा की स्थापना के अवसर पर गुरु जी ने ये शब्द कहे-“खालसा गुरु है और गुरु खालसा है। तुम्हारे और मेरे बीच अब कोई अन्तर नहीं है।”

1. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने कौन-से वर्ष, किस दिन और कहां पर खालसा की साजना की ?
2. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सिक्ख पंथ में साम्प्रदायिक विभाजन तथा बाहरी खतरे की समस्या को कैसे हल किया ?
उत्तर-
1. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने 1699 ई० में वैसाखी के दिन आनन्दपुर साहिब में खालसा की साजना की।
2. गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सिक्ख धर्म में विद्यमान् अनेक सम्प्रदायों की तथा बाहरी खतरों की समस्या को भी बड़ी
कुशलता से निपटाया। सर्वप्रथम गुरु जी ने पहाड़ी राजाओं से अनेक युद्ध किए और उन्हें पराजित किया। उन्होंने अत्याचारी मुग़लों का भी सफल विरोध किया। 1699 ई० में गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा की स्थापना करके अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए एक और महत्त्वपूर्ण पग उठाया। खालसा की स्थापना के परिणामस्वरूप सिक्खों ने शस्त्रधारी का रूप धारण कर लिया। खालसा की स्थापना से गुरु जी को सिक्ख धर्म में विद्यमान् विभिन्न सम्प्रदायों से निपटने का अवसर भी मिला। गुरु जी ने घोषणा की कि सभी सिक्ख ‘खालसा’ का रूप हैं और उनके साथ जुड़े हुए हैं। इस प्रकार मसन्दों का महत्त्व समाप्त हो गया और सिक्ख धर्म के विभिन्न सम्प्रदाय खालसा में विलीन हो गए।

Unit 3

नीचे दिए गए उद्धरणों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर सावधानीपूर्वक लिखिए।

(1)
औरंगज़ेब एक महत्त्वाकांक्षी सम्राट् था और वह सारे भारत पर मुग़ल पताका फहराना चाहता था। इसके अतिरिक्त उसे दक्षिण में शिया रियासतों का अस्तित्व भी पसन्द नहीं था। दक्षिण के मराठे भी काफ़ी शक्तिशाली होते जा रहे थे। वह उनकी शक्ति को कुचल देना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने दक्षिण को विजय करने का निश्चय किया। उसने बीजापुर राज्य पर कई आक्रमण किए। कुछ असफल अभियानों के बाद 1686 ई० में वह इस पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा। अगले ही वर्ष उसने रिश्वत और धोखेबाजी से बीजापुर राज्य को भी अपने अधीन कर लिया। परन्तु इन दो राज्यों की विजय उसकी निर्णायक सफलता नहीं थी बल्कि उसकी कठिनाइयों का आरम्भ थी। अब उसे शक्तिशाली मराठों से सीधी टक्कर लेनी पड़ी। इससे पूर्व उसने वीर मराठा सरदार शिवाजी को दबाने के अनेक प्रयत्न किए थे, परन्तु उसे कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी। अब मराठों का नेतृत्व शिवाजी के पुत्र शंभू जी के हाथ में था। 1689 ई० में औरंगजेब ने उसे पकड़ लिया और उसका वध कर दिया। औरंगज़ेब की यह सफलता भी एक भ्रम मात्र थी। मराठे शीघ्र ही पुनः स्वतन्त्र हो गए। इसके विपरीत औरंगजेब का बहुत-सा धन और समय दक्षिण के अभियानों में व्यर्थ नष्ट हो गया। यहां तक कि 1707 ई० में दक्षिण में अहमदनगर के स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार ‘दक्षिण’ औरंगज़ेब और मुग़ल साम्राज्य दोनों के लिए कब्र सिद्ध हुआ।

1. औरंगजेब दक्कन में किस वर्ष से किस वर्ष तक रहा ?
2. औरंगजेब की दक्षिण नीति की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
1. औरंगज़ेब दक्कन में 1682 ई० से 1707 ई० तक रहा।
2. औरंगज़ेब को दक्षिण की शिया रिसायतों का अस्तित्व पसन्द नहीं था। वह मराठों की शक्ति को भी कुचल देना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने दक्षिण को विजय करने का निश्चय किया। उसने गोलकुण्डा राज्य पर कई आक्रमण किए। कुछ असफल अभियानों के बाद 1687 ई० में वह इस राज्य पर विजय प्राप्त करने में सफल रहा। अगले ही वर्ष उसने रिश्वत और धोखेबाजी से बीजापुर राज्य को अपने अधीन कर लिया। दक्षिण में मराठों का नेतृत्व शिवाजी के पुत्र शम्भा जी के हाथ में था। 1689 ई० में औरंगजेब ने उसे पकड़ लिया और उसका वध कर दिया। औरंगजेब की यह सफलता एक भ्रम मात्र थी। मराठे शीघ्र ही पुनः स्वतन्त्र हो गए। 1707 ई० में दक्षिण में अहमदनगर के स्थान पर उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार ‘दक्षिण’ औरंगजेब और मुग़ल साम्राज्य दोनों के लिए कब्र सिद्ध हुआ।

(2)
आइने में वर्गीकरण मापदंड की निम्नलिखित सूची दी गई है :
अकबर बादशाह ने अपनी गहरी दूरदर्शिता के साथ ज़मीनों का वर्गीकरण किया और हरेक (वर्ग की ज़मीन) के लिए अलग-अलग राजस्व निर्धारित किया। पोलज़ वह जमीन है जिसमें एक के बाद एक हर फसल की सालाना खेती होती है और जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता है। परोती वह ज़मीन है जिस पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती है ताकि वह अपनी खोई ताकत वापस पा सके। छछर वह ज़मीन है जो तीन या चार वर्षों तक खाली रहती है। बंजर वह ज़मीन है जिस पर पांच या उससे ज्यादा वर्षों से खेती नहीं की गई है। पहले दो प्रकार की ज़मीन की तीन किस्में है। अच्छी मध्यम और खराब वे हर किस्म की ज़मीन के उत्पाद को जोड़ देते है और इसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता है। जिसका एक तिहाई हिस्साशाही शुल्क माना जाता है।

1. भूमि के वर्गीकरण की यह सूची किस ग्रंथ से ली गई है ? इसका लेखक कौन था ?
2. किन्हीं तीन प्रकार की ज़मीनों की संक्षिप्त जानकारी दीजिए
उत्तर-
1. भूमि के वर्गीकरण की यह सूची आईन से ली गई है। इसका लेखक अबुल फजल था।
2. (i) पोलज़-यह वह जमीन थी जिसमें एक के बाद एक हर फसल की खेती होती थी। इसे खाली नहीं छोड़ा जाती था।
(ii) परोती-इस ज़मीन को कुछ समय के लिए खाली छोड़ दिया जाता था ताकि वह अपनी खोई हुई उपजाऊ शक्ति फिर से प्राप्त कर ले।
(iii) छछर-इस भूमि को तीन-चार वर्षों तक खाली रखा जाता था।

(3)
जोवान्नी कारेरी के लेख (वर्नियर के लेख पर आधारित) के निम्नलिखित अंश से हमें पता चलता है कि मुग़ल साम्राज्य में कितनी भारी मात्रा में बाहर से धन आ रहा था-
(मुग़ल) साम्राज्य की धन-संपत्ति का अंदाजा लगाने के लिए पाठक इस बात पर गौर करें कि दुनिया भर में विचरने वाला सारा सोना-चांदी आखिकार यहीं पहुंच जाता है। ये सब जानते हैं कि इसका बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता है, और यूरोप में कई राज्यों से होते हुए (इसका) थोड़ा-सा हिस्सा कई तरह की वस्तुओं के लिए तुर्की में जाता है, और थोड़ा-सा हिस्सा रेशम के लिए स्मिरना होते हुए फारस पहुंचता है। अब चूंकि तुर्की लोग कॉफी से अलग नहीं रह सकते, जो कि ओमान और अरबिया से आती है…..(और) न ही फारस, अरबिया और तुर्की (के लोग) भारत की वस्तुओं के बिना रह सकते हैं। (वे) मुद्रा की विशाल मात्रा लाल सागर पर केवल महेल के पास स्थित मोचा भेजते हैं। (इसी तरह वे ये मुद्राएं) फारस की खाड़ी पर स्थित पराग भेजते हैं…..बाद में ये (सारी सपत्ति) जहाजों में इंदोस्तान (हिंदुस्तान) भेज दी जाती है। भारतीय जहाजों के अलावा जो डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ पर साल इंदोस्तान की वस्तुएं लेकर पेंगू, तानस्सेरी (म्यांमार के हिस्से) स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका)….मालद्वीप के टापू, मोज़बीक और अन्य जगहों पर ले जाते हैं। (इन्हीं जहाज़ों को) निश्चित तौर पर बहुत सारा सोना-चांदी इन देशों से लेकर वहां (हिंदूस्तान) पहुंचाना पड़ता है। वो सब कुछ तो डच लोग जापान की खानों से हासिल करते है, देर-सवेर इंदोस्तान (को) चला जाता है, और यहां से यूरोप को जाने वाली सारी वस्तुएं, चाहे वो फ्रांस जाएं या इंग्लैंड या पुर्तगाल, सभी नकद में खरीदी जाती हैं, जो (नकद) वहीं (हिंदुस्तान) रह जाता है।

1. वर्नियर कौन था ?
2. मुग़ल-काल में विश्व भर में विचरने वाला सारा सोना-चांदी अंततः कहां और कैसे पहुंचता था ?
उत्तर-
1. वर्नियर एक विदेशी यात्री था जो फ्रांस में आया था।
2. मुग़लकाल में विश्व भर में विचरने वाला सारा सोना-चांदी अंततः भारत में पहुंचता था। इसका एक बहुत बड़ा भाग अमेरिका में जाता था। इसका एक थोड़ा-सा हिस्सा यूरोप के राज्यों से होते हुए तुर्की तथा एक और हिस्सा स्मिरना के रास्ते फारस पहुंचता था। परंतु तुर्की तथा फारस भारत की वस्तुओं के बिना नहीं रह सकते थे। अतः वहां पहुंचने वाला सोना-चांदी भी इन वस्तुओं के बदले भारत आ जाता था।

(4)
शिवाजी ने उच्चकोटि के शासन-प्रबन्ध द्वारा भी मराठों को एकता के सूत्र में बांधा। केन्द्रीय शासन का मुखिया छत्रपति (शिवाजी) स्वयं था। राज्य की सभी शक्तियां उसके हाथ में थीं। छत्रपति को शासन कार्यों में सलाह देने के लिए आठ मन्त्रियों का एक मन्त्रिमण्डल था। इसे अष्ट-प्रधान कहते थे। प्रत्येक मन्त्री के पास एक अलग विभाग था। शिवाजी ने अपने राज्य को तीन प्रान्तों में बांटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त एक सूबेदार के अधीन था। प्रान्त आगे चलकर परगनों अथवा तर्कों में बंटे हुए थे। शासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी।

शिवाजी की न्याय-प्रणाली बड़ी साधारण थी। परन्तु यह लोगों की आवश्यकता के अनुरूप थी। मुकद्दमों का निर्णय प्रायः हिन्दू धर्म की प्राचीन परम्पराओं के अनुसार ही किया जाता था। राज्य की आय के मुख्य साधन भूमि-कर, चौथ तथा सरदेशमुखी थे। शिवाजी ने एक शक्तिशाली सेना का संगठन किया। उनकी सेना में घुड़सवार तथा पैदल सैनिक शामिल थे। उनके पास एक शक्तिशाली समुद्री बेड़ा, हाथी तथा तोपें भी थीं। सैनिकों को नकद वेतन दिया जाता था। उनकी सेना की सबसे बड़ी विशेषता अनुशासन थी। शिवाजी एक उच्च चरित्र के स्वामी थे। वह एक आदर्श पुरुष, वीर योद्धा, सफल विजेता तथा उच्च कोटि के शासन प्रबन्धक थे। धार्मिक सहनशीलता तथा देश-प्रेम उनके चरित्र के विशेष गुण थे। देश-प्रेम से प्रेरित होकर उन्होंने मराठा जाति को संगठित किया और एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना की।

1. चौथ तथा सरदेशमुखी लगान के कौन-से भाग थे ?
2. शिवाजी के राज्य प्रबन्ध की मुख्य विशेषताएं बताएं।
उत्तर-
1. चौथ लगान का चौथा भाग तथा सरदेशमुखी लगान का दसवां भाग होता था।
2. शिवाजी का राज्य प्रबन्ध प्राचीन हिन्दू नियमों पर आधारित था। शासन के मुखिया वह स्वयं थे। उनकी सहायता तथा परामर्श के लिए 8 मन्त्रियों की राजसभा थी, जिसे अष्ट-प्रधान कहते थे। इसका मुखिया ‘पेशवा’ कहलाता था। प्रत्येक मन्त्री के अधीन अलग-अलग विभाग थे। प्रशासन की सुविधा के लिए राज्य को चार प्रान्तों में बांटा गया था। प्रत्येक प्रान्त एक सूबेदार के अधीन था। प्रान्त परगनों में बंटे हुए थे। शासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी। इसका प्रबन्ध ‘पाटिल’ करते थे। शिवाजी के राज्य की आय का सबसे बड़ा साधन भूमिकर था। भूमि-कर के अतिरिक्तः चौथ, सरदेशमुखी तथा कुछ अन्य कर भी राज्य की आय के मुख्य साधन थे। न्याय के लिए पंचायातों की व्यवस्था थी। शिवाजी ने एक शक्तिशाली सेना का संगठन भी किया। उन्होंने घुड़सवार सेना भी तैयार की। घुड़सवार सिपाही पहाड़ी प्रदेशों में लड़ने में फुर्तीले होते थे। शिवाजी के पास एक समुद्री बेड़ा भी था।

(5)
1716 ई० में बन्दा बहादुर की शहीदी के पश्चात् सिक्खों के लिए अन्धकार युग आ गया। इस युग में मुग़लों ने सिक्खों का अस्तित्व मिटा देने का प्रयत्न किया। परन्तु सिक्ख अपनी वीरता और साहस के बल पर अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल रहे। 1716 से 1752 तक लाहौर के पांच मुग़ल सूबेदारों ने सिक्खों को दबाने के प्रयत्न किए। इनमें से पहले गवर्नर । अब्दुल समद को लाहौर से मुल्तान भेज दिया गया और उसके पुत्र जकरिया खां को लाहौर का सूबेदार बनाया गया। उसे हर प्रकार से सिक्खों को दबाने के आदेश दिए गए। उसने कुछ वर्षों तक तो अपने सैनिक बल द्वारा सिक्खों को दबाने के प्रयत्न किए। परन्तु जब उसे भी कोई सफलता मिलती दिखाई न दी तो उसने अमृतसर के निकट सिक्खों को एक बहुत बड़ी जागीर देकर उन्हें शान्त करने का प्रयत्न किया। उसने मुग़ल सम्राट् से स्वीकृति भी ले ली थी कि सिक्ख नेता को नवाब की उपाधि दी जाए। यह उपाधि कपूर सिंह को मिली और वह नवाब कपूर सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। फलस्वरूप कुछ समय तक सिक्ख शान्त रहे और उन्होंने अपने-अपने जत्थों को शक्तिशाली बनाया। इसी बीच कुछ जत्थेदारों ने फिर से मुग़लों का विरोध करना और सरकारी खजानों को लूटना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार धीरे-धीरे मुग़लों और सिक्खों में फिर जोरदार संघर्ष छिड़ गया।

1. 1716 से 1752 तक लाहौर के किन्हीं चार मुगल सूबेदारों के नाम बताएं।
2. सिक्खों की शक्ति को कुचलने में मीर मन्नू की असफलता के कोई चार कारण बताओ ।
उत्तर-
1. 1716 से 1752 तक लाहौर के चार सूबेदार थे-अब्दुल समद खां, जकरिया खां, याहिया खां तथा मीर मन्नू।
2. सिक्खों की शक्ति को कुचलने में मीर मन्नू की असफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

  • दल खालसा की स्थापना-मीर मन्नू के अत्याचारों के समय तक सिक्खों ने अपनी शक्ति को दल खालसा के रूप में संगठित कर लिया । इसके सदस्यों ने देश, जाति तथा पन्थ के हितों की रक्षा के लिए प्राणों तक की बलि देने का प्रण कर रखा था।
  • दीवान कौड़ामल की सिक्खों से सहानूभूति-मीर मन्नू के दीवान कौड़ामल को सिक्खों से विशेष सहानुभूति थी। अतः जब कभी भी मीर मन्नू सिक्खों के विरुद्ध कठोर कदम उठाता, कौड़ामल उसकी कठोरता को कम कर देता था।
  • अदीना बेग की दोहरी नीति-जालन्धर-दोआब के फ़ौजदार अदीना बेग ने दोहरी नीति अपनाई हुई थी।
    उसने सिक्खों से गुप्त सन्धि कर रखी थी तथा दिखावे के लिए एक-दो अभियानों के बाद वह ढीला पड़ जाता था।
  • सिक्खों की गुरिल्ला युद्ध नीति-सिक्खों ने अपने सीमित साधनों को दृष्टि में रखते हुए गुरिल्ला युद्ध की नीति को अपनाया। अवसर पाते ही वे शाही सेनाओं पर टूट पड़ते और लूट-मार करके फिर जंगलों की ओर भाग जाते।

(6)
महाराजा रणजीत सिंह को शक्तिशाली सेना के महत्त्व का पूरा ज्ञान था। वह जानता था कि सेना को शक्तिशाली बनाए बिना राज्य को सुदृढ़ बनाना असम्भव है। इसलिए महाराजा ने अपनी सेना की ओर विशेष ध्यान दिया। उसने अंग्रेज़ कम्पनी से भागे हुए सैनिकों को अपनी सेना में भर्ती कर लिया। सैनिकों को यूरोपियन ढंग से संगठित करने के लिए सेना में यूरोपीय अफसरों को भी नौकरी दी गई। उनकी सहायता से पैदल तथा घुड़सवार सेना और तोपखाने को मजबूत बनाया गया। पैदल सेना में बटालियन, घुड़सवारों में रेजीमैंट और तोपखाने में बैटरी नामक इकाइयां बनाईं गईं। इसके अतिक्ति महाराजा प्रतिदिन अपनी सेना का स्वयं निरीक्षण करता था। उसने सेना में हुलिया और दाग की प्रथा भी अपनाई ताकि सैनिक अधिकारियों तथा जागीरदारों के अधीन निश्चित संख्या में सैनिक तथा घोड़े प्रशिक्षण पाते रहें। सेना को अच्छे शस्त्र जुटाने के लिए कुछ कारखाने स्थापित किए गए जिनमें तोपें, बन्दूकें तथा अन्य हथियार बनाए जाते थे। महाराजा की इस सुदृढ़ सेना से साम्राज्य भी सुदृढ़ हुआ।

1. यूरोपीय अफसरों की सहायता से महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी सेना के कौन-से तीन अंगों को सशक्त बनाया ?
2. महाराजा रणजीत सिंह को ‘शेरे पंजाब’ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
1. उसने यूरोपीय अफसरों की सहायता से सेना के पैदल, घुड़सवार तथा तोपखाना नामक अंगों को सशक्त बनाया।
2. महाराजा रणजीत सिंह एक सफल विजेता व कुशल शासक था। उसने पंजाब को एक दृढ़ शासन प्रदान किया। उसने सिक्खों को एक सूत्र में पिरो दिया। उसके राज्य में प्रजा सुखी तथा समृद्ध थी। महाराजा रणजीत सिंह कट्टर धर्मी नहीं था। उसके दरबार में सिक्ख, मुसलमान आदि सभी धर्मों के लोग थे। सरकारी नौकरियां योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। वह बड़ा दूरदर्शी था। उसने जीवन भर अंग्रेजों से मित्रता बनाए रखी। इस तरह उसने राज्य को शक्तिशाली अंग्रेजों से सुरक्षित रखा। इन्हीं गुणों के कारण महाराजा रणजीत सिंह की गणना इतिहास के महान् शासकों में की जाती है और उसे ‘शेरे पंजाब’ के नाम से याद किया जाता है।

(7)
पुर्तगालियों, डचों तथा अंग्रेजों को भारत के साथ व्यापार करता देखकर फ्रांसीसियों के मन में भी इस व्यापार से लाभ उठाने की लालसा जागी। अतः उन्होंने भी 1664 ई० में अपनी व्यापारिक कम्पनी स्थापित कर ली। इस कम्पनी ने सूरत और मसौलीपट्टम में अपनी व्यापारिक बस्तियां बसा लीं। उन्होंने भारत के पूर्वी तट पर पांडीचेरी नगर बसाया और उसे अपनी राजधानी बना लिया। उन्होंने बंगाल में चन्द्रनगर की नींव रखी। 1721 ई० में मारीशस तथा माही पर उनका अधिकार हो गया। इस प्रकार फ्रांसीसियों ने पश्चिमी तट, पूर्वी तट तथा बंगाल में अपने पांव अच्छी तरह जमा लिए और वे अंग्रेजों के प्रतिद्वन्द्वी बन गए।

1741 ई० में डुप्ले भारत में फ्रांसीसी क्षेत्रों का गवर्नर जनरल बनकर आया। वह बड़ा कुशल व्यक्ति था और भारत में फ्रांसीसी राज्य स्थापित करना चाहता था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अंग्रेजों तथा फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष होना आवश्यक था। अत: 1744 ई० से 1764 ई० तक के बीस वर्षों में भारत में फ्रांसीसियों और अंग्रेज़ों के बीच युद्ध छिड़ गया। यह संघर्ष कर्नाटक के युद्धों के नाम से प्रसिद्ध है। इन युद्धों में अन्तिम विजय अंग्रेजों की हुई। फ्रांसीसियों के पास केवल पांच बस्तियां-पांडिचेरी, चन्द्रनगर, माही, थनाओ तथा मारीशस ही रह गईं। इन बस्तियों में वे अब केवल व्यापार ही कर सकते थे।

1. फ्रांसीसियों की मुख्य दो फैक्टरियां कौन-सी थीं तथा ये कब स्थापित की गईं ?
2. फ्रांसीसी कम्पनी के विरुद्ध अंग्रेजी कम्पनी की सफलता के क्या कारण थे ?
उत्तर-
1. फ्रांसीसियों ने अपनी दो मुख्य फैक्टरियां 1674 में पांडिचेरी में तथा 1690 में चन्द्रनगर में स्थापित की।
2. फ्रांसीसी कम्पनी के विरूद्ध अंग्रेज़ी कम्पनी की सफलता के मुख्य कारण ये थे
(i) अंग्रेजों के पास फ्रांसीसियों से अधिक शक्तिशाली जहाज़ी बेड़ा था।
(ii) इंग्लैण्ड की सरकार अंग्रेजी कम्पनी की धन से सहायता करती थी। परन्तु फ्रांसीसी सरकार फ्रांसीसियों की सहायता नहीं करती थी।
(iii) अंग्रेजी कम्पनी की आर्थिक दशा फ्रांसीसी कम्पनी से काफ़ी अच्छी थी। अंग्रेज़ कर्मचारी बड़े मेहनती थे और
आपस में मिल-जुल कर काम करते थे। राजनीति में भाग लेते हुए भी अंग्रेजों ने व्यापार का पतन न होने दिया। इसके विपरीत फ्रांसीसी एक-दूसरे के साथ द्वेष रखते थे तथा राजनीति में ही अपना समय नष्ट कर देते थे।
(iv) प्लासी की लड़ाई (1756 ई०) के बाद बंगाल का धनी प्रदेश अंग्रेजों के प्रभाव में आ गया था। यहां के अपार धन से अंग्रेज़ अपनी सेना को खूब शक्तिशाली बना सकते थे।

UNIT-4

नीचे दिए गए उद्धरणों को ध्यानपूर्वक पढ़िये और अंत में दिए गए प्रश्नों के उत्तर सावधानीपूर्वक लिखिए।

(1)
1839 ई० में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् सिक्खों का नेतृत्व करने वाला कोई योग्य नेता न रहा। शासन की सारी शक्ति सेना के हाथ में आ गई। अंग्रेजों ने इस अवसर का लाभ उठाया और सिक्ख सेना के प्रमुख अधिकारियों को लालच देकर अपने साथ मिला लिया। इसके साथ-साथ उन्होंने पंजाब के आस-पास के इलाकों में अपनी सेनाओं की संख्या बढ़ानी आरम्भ कर दी और सिक्खों के विरुद्ध युद्ध की तैयारी करने लगे। उन्होंने सिक्खों से युद्ध किये, दोनों युद्धों में सिक्ख सैनिक बड़ी वीरता से लड़े। परन्तु अपने अधिकारियों की गद्दारी के कारण वे पराजित हुए। प्रथम युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने पंजाब का केवल कुछ भाग अंग्रेज़ी राज्य में मिलाया और वहाँ सिक्ख सेना के स्थान पर अंग्रेज सैनिक रख दिये गये। परन्तु 1849 ई० में दूसरे सिक्ख दूसरे युद्ध की समाप्ति पर लॉर्ड डल्हौजी ने पूरे पंजाब को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया।

1. ‘लैप्स के सिद्धान्त’ से क्या अभिप्राय था ?
2. भारत में अंग्रेजी राज्य के विस्तार में सहायक सन्धि का क्या योगदान रहा ?
उत्तर-
1. लैप्स के सिद्धान्त से अभिप्राय डल्हौज़ी के उस सिद्धान्त से था जिस के अन्तर्गत सन्तानहीन शासकों के राज्य अंग्रेजी राज्य में मिला लिए जाते थे। वे पुत्र गोद लेकर अंग्रेजों की अनुमति के बिना उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं कर सकते थे।
2. भारत में अंग्रेजी राज्य के विस्तार में सहायक सन्धि का बड़ा सक्रिय योगदान रहा। इस नीति का मुख्य आधार अंग्रेज़ी शक्ति के प्रभाव को भारतीय राज्यों में बढ़ावा देना था। सबल भारतीय शक्तियां निर्बल राज्यों को हड़पने में लगी हुई थीं। इन कमज़ोर राज्यों को संरक्षण की आवश्यकता थी। वे मिटने की बजाए अर्द्ध-स्वतन्त्रता स्वीकार करने के लिए तैयार थे। सहायक सन्धि उनके उद्देश्यों को पूरा कर सकती थी। उनकी बाहरी आक्रमण और भीतरी गड़बड़ से सुरक्षा के लिए अंग्रेजी सरकार वचनबद्ध होती थी। अत: इस नीति को अनेक भारतीय राजाओं ने स्वीकार कर लिया जिनमें हैदराबाद, अवध, मैसूर, अनेक राजपूत राजा तथा मराठा प्रमुख थे। परन्तु इसके अनुसार सन्धि स्वीकार करने वाले राजा को अपने व्यय पर एक अंग्रेजी सेना रखनी पड़ती थी। परिणामस्वरूप उनकी विदेश नीति अंग्रेजों के अधीन आ जाती थी। परिणामस्वरूप भारत में अंग्रेजी राज्य का खूब विस्तार हुआ।

(2)
अंग्रेजी राज्य स्थापित होने से पूर्व भारतीय सूती कपड़ा उद्योग उन्नति की चरम सीमा पर पंहुचा हुआ था। भारत में बने सूती कपड़े की इंग्लैंड में बड़ी मांग थी। इंग्लैंड की स्त्रियां भारत के बेल-बूटेदार वस्त्रों को बहुत पसन्द करती थीं। कम्पनी ने आरम्भिक अवस्था में कपड़े का निर्यात करके खूब पैसा कमाया। परन्तु 1760 तक इंग्लैंड ने ऐसे कानून पास कर दिए जिनके अनुसार रंगे कपड़े पहनने की मनाही कर दी गई। इंग्लैंड की एक महिला को केवल इसलिए 200 पौंड जुर्माना किया गया था क्योंकि उसके पास विदेशी रूमाल पाया गया था। इंग्लैंड का व्यापारी तथा औद्योगिक वर्ग कम्पनी की व्यापारिक नीति की निन्दा करने लगा। विवश होकर कम्पनी को वे विशेषज्ञ इंग्लैंड वापस भेजने पड़े जो भारतीय जुलाहों को अंग्रेजों की मांगों तथा रुचियों से परिचित करवाते थे। इंग्लैंड की सरकार ने भारतीय कपड़े पर आयात कर बढ़ा दिया और कम्पनी की कपड़ा सम्बन्धी आयात नीति पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए। इन सब बातों के परिणामस्वरूप भारत के सूती वस्त्र उद्योग को भारी क्षति पहुंची।

1. भारत में पहली कपड़ा मिल कब, किसने और कहां लगवाई ?
2. भारत में धन की निकासी किन तरीकों से होती थी ?
उत्तर-
1. कपड़े की पहली मिल मुम्बई में कावासजी नानाबाई ने 1853 में स्थापित की।
2. अंग्रेजों की आर्थिक नीति के कारण भारत को बहुत हानि हुई। देश का धन देश के काम आने के स्थान पर विदेशियों के काम आने लगा। 1757 के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा इसके कर्मचारियों ने भारत से प्राप्त धन को इंग्लैण्ड भेजना आरम्भ कर दिया। कहते हैं कि 1756 ई० से 1765 तक लगभग 60 लाख पौंड की राशि भारत से बाहर गई।
और तो और लगान आदि से प्राप्त राशि भी भारतीय माल खरीदने में व्यय की गई। अतिरिक्त सिविल सर्विस और सेना के उच्च अफसरों के वेतन का पैसा भी देश से बाहर जाता था। औद्योगिक विकास का भी अधिक लाभ विदेशियों को ही हुआ। विदेशी पूंजीपति इस देश पर धन लगाते थे और लाभ की रकम इंग्लैण्ड में ले जाते थे। इस तरह भारत का धन कई प्रकार से विदेशों में जाने लगा।

(3)
धार्मिक और सामाजिक आन्दोलनों ने मुख्य रूप से दो महत्त्वपूर्ण सामाजिक समस्याओं पर बल दिया : स्त्रियों की भलाई तथा जाति भेद को समाप्त करना। इन कार्यक्रमों का आधार मानवीय समानता की विचारधारा थी। परन्तु समानता की यह विचारधारा केवल धर्म के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं थी। इसका राजनीतिक महत्त्व भी था। अंग्रेजों के राज्य में कानूनी रूप से तो सभी भारतीय समान थे, परन्तु सामाजिक या राजनीतिक रूप से नहीं थे। . भारत में स्त्रियों की संख्या देश की जनसंख्या से लगभग आधी थी। विश्व के अन्य समाजों की भान्ति भारत में भी स्त्री पुरुष के अधीन थी। धर्म और कानून की व्यवस्था भी उसके पक्ष में नहीं थी। पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह आदि कुप्रथाएं इसी असमानता का परिणाम थीं। धार्मिक और सामाजिक आन्दोलनों ने स्त्रियों की भलाई पर बल दिया। उनके प्रयासों का परिणाम भी अच्छा निकला। धीरे-धीरे स्त्रियों ने राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक आन्दोलनों में स्वयं भाग लेना आरम्भ कर दिया। उन्होंने समानता की मांग की। देश के प्रमुख नेताओं ने इसका जोरदार समर्थन किया। परिणामस्वरूप स्त्रीपुरुष की समानता का आदर्श स्वीकार कर लिया गया।

1. ‘रिवाइवलिज़म’ से क्या अभिप्राय है ?
2. भारतीय नारी की दशा सुधारने के लिए आधुनिक सुधारकों द्वारा किए गए कोई चार कार्य लिखिए।
उत्तर-
1. धर्म के नाम पर तथा बीते समय का हवाला देते हुए लोगों में जागृति लाने के प्रयास को रिवाइवलिज़म का नाम दिया जाता है।
2. (i) सती-प्रथा के कारण स्त्री को अपने पति की मृत्यु पर उसके साथ जीवित ही चिता में जल जाना पड़ता था। आधुनिक समाज-सुधारकों के प्रयत्नों से इस अमानवीय प्रथा का अन्त हो गया।
(ii) विधवाओं को पुनः विवाह करने की आज्ञा नहीं थी। समाज-सुधारकों के प्रयत्नों से उन्हें दोबारा विवाह करने की आज्ञा मिल गई।
(iii) आधुनिक सुधारकों का विश्वास था कि पर्दे में बन्द रहकर नारी कभी उन्नति नहीं कर सकती, इसलिए उन्होंने स्त्रियों को पर्दा न करने के लिए प्रेरित किया।
(iv) स्त्रियों को ऊंचा उठाने के लिए समाज-सुधारकों ने स्त्री शिक्षा पर विशेष बल दिया।

(4)
प्रथम महायुद्ध के समाप्त होने पर भारतीयों को प्रसन्न करने के लिए माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित की गई। भारतीयों .. ने युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की थी। उन्हें विश्वास था कि युद्ध में विजयी होने के पश्चात् सरकार उन्हें पर्याप्त अधिकार देगी। परन्तु इस रिपोर्ट से भारतीय निराश हो गए। सरकार भी भयभीत हो गई कि अवश्य कोई नया आन्दोलन आरम्भ होने वाला है। अत: स्थिति पर नियन्त्रण पाने के लिए सरकार ने रौलेट एक्ट पास कर दिया। इस एक्ट के अनुसार वह किसी भी व्यक्ति को बिना वकील, बिना दलील, बिना अपील बन्दी बना सकती थी। इस काले कानून का विरोध करने के लिए महात्मा गांधी आगे बढ़े। उन्होंने जस्ता को शान्तिमय ढंग से इसका विरोध करने के लिए कहा। इस शान्तिमय विरोध को उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया ! स्थान-स्थान पर सभाएं बुलाई गईं और जलूस निकाले गए। कांग्रेस का आन्दोलन जनता का आन्दोलन बन गया। पहली बार भारत की जनता ने संगठित होकर अंग्रेज़ों का विरोध किया। 6 अगस्त, 1919 ई० को सारे भारत में हड़ताल की गई। महात्मा गांधी ने लोगों को शान्तिमय विरोध करने के लिए कहा था। फिर भी कहीं-कहीं अप्रिय घटनाएं हुईं। 13 अप्रैल, 1919 ई० को जलियांवाला बाग की दुःखद घटना से भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ आया। पंजाब के लोकप्रिय नेता डॉ० सत्यपाल तथा डॉ० किचलू को सरकार ने बन्दी बना लिया था। अमृतसर की जनता विरोध प्रकट करने के लिए बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में एकत्रित हुई। नगर में मार्शल-ला लगा हुआ था। जनरल डायर ने लोगों को चेतावनी दिए बिना ही एकत्रित लोगों पर गोली चलाने का आदेश दिया। हजारों निर्दोष स्त्री-पुरुष मारे गए। इससे सारे भारत में रोष की लहर दौड़ गई।

1. जलियांवाला बाग कांड कब और कहां हुआ तथा इसके लिए उत्तरदायी अंग्रेज़ अफसर का नाम बताएं।
2. स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में ‘रौलेट एक्ट’ तथा ‘जलियांवाला बाग’ का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
1. जलियांवाला बाग का कांड 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में हुआ। इसके लिए जनरल डायर उत्तरदायी था।
2. स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में रौलेट एक्ट तथा जलियांवाला बाग का विशेष महत्त्व है। रौलेट एक्ट के अनुसार किसी भी मुकद्दमे का फैसला बिना ‘ज्यूरी’ के किया जा सकता था तथा किसी भी व्यक्ति को मुकद्दमा चलाये बिना नज़रबन्द रखा जा सकता था। इस एक्ट के कारण भारतीय लोग भड़क उठे। उन्होंने इसका कड़ा विरोध किया और स्वतन्त्रता आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। गांधी जी ने इस एक्ट के विरुद्ध अहिंसात्मक हड़ताल की घोषणा कर दी। स्थान-स्थान पर दंगे-फसाद हुए। जलियांवाला बाग में शहर के लोगों ने एक सभा का प्रबन्ध किया। स्वतन्त्रता आन्दोलन को दबाने के लिए जनरल डायर ने सभा में एकत्रित लोगों पर गोली चला दी जिसके कारण बहुत-से लोग मारे गए अथवा घायल हो गए। इस घटना से भारत के लोग और भी अधिक भड़क उठे। उन्होंने अंग्रेज़ों से स्वतन्त्रता प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। इस घटना से अंग्रेज़ शासकों तथा भारतीय नेताओं के बीच एक अमिट दरार पड़ गई।

(5)
साइमन कमीशन का प्रत्येक स्थान पर भारी विरोध किया गया था। परन्तु कमीशन ने विरोध के बावजूद अपनी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी। साइमन कमीशन की रिपोर्ट को भारत के किसी भी राजनीतिक दल ने स्वीकार नहीं किया। अतः अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों को सर्वसम्मति से अपना संविधान तैयार करने की चुनौती दी। इस विषय में भारतीयों ने अगस्त, 1928 ई० में नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत की, परन्तु अंग्रेज़ी सरकार ने इस रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप भारतीयों की निराशा और अधिक बढ़ गई।

1929 ई० में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में हुआ। यह अधिवेशन भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। पण्डित जवाहर लाल नेहरू इस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये। गांधी जी ने ‘पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव पेश किया जो पास कर दिया गया। 31 दिसम्बर की आधी रात को नेहरू जी ने रावी नदी के किनारे स्वतन्त्रता का तिरंगा झण्डा फहराया। यह भी निश्चित हुआ कि हर वर्ष 26 जनवरी को स्वतन्त्रता दिवस मनाया जाये। 26 जनवरी, 1930 को यह दिन’ सारे भारत में बड़े जोश के साथ मनाया गया और लोगों ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने की प्रतिज्ञा की। अपने उद्देश्य की पर्ति के लिए उन्होंने सरकारी कानूनों तथा संस्थाओं का बहिष्कार करने की नीति अपनाई।

1. भारतीयों ने ‘साइमन कमीशन’ का विरोध क्यों किया तथा पंजाब के कौन-से नेता इस विरोध में घायल हुए तथा उनका देहान्त कब हुआ ?
2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन का वर्णन कीजिए। इसका हमारे स्वतन्त्रता संग्राम पर क्या प्रभाव पड़ा ।
उत्तर-
1. भारतीयों ने साइमन कमीशन का विरोध इसलिए किया क्योंकि कोई भी भारतीय इस कमीशन का सदस्य नहीं था।
लाला लाजपतराय इस विरोध में घायल हुए और 1928 में उनकी मृत्यु हो गई।
2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1930 ई० में चलाया गया। इस आन्दोलन का उद्देश्य सरकारी कानूनों को भंग करके सरकार के विरुद्ध रोष प्रकट करना था। आन्दोलन का आरम्भ गान्धी जी ने अपनी डांडी यात्रा से किया। 12 मार्च,1930 ई० को उन्होंने साबरमती आश्रम से अपनी यात्रा आरम्भ की। मार्ग में अनेक लोग उनके साथ मिल गये। 24 दिन की कठिन यात्रा के बाद वे समुद्र तट पर पहुंचे और उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाकर नमक कानून भंग किया। इसके बाद देश में लोगों ने सरकारी कानून को भंग करना आरम्भ कर दिया। इस आन्दोलन को दबाने के लिए सरकार ने बड़ी कठोरता से काम लिया। हज़ारों देशभक्तों को जेल में डाल दिया गया। गान्धी जी को भी बन्दी बना लिया गया। यह आन्दोलन फिर भी काफी समय तक चलता रहा। इस प्रकार इस आन्दोलन का हमारे स्वतन्त्रता संग्राम पर गहरा प्रभाव पड़ा। अब देश की जनता इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगी।

(6)
विद्रोही सिपाहियों की एक अर्जी जो बच गई-
एक सदी पहले अंग्रेज़ हिंदुस्तान आए और धीरे-धीरे फ़ौजी टुकड़ियां बनाने लगे। इसके बाद वे हर राज्य के मालिक बन बैठे। हमारे पुरुखों ने सदा उनकी सेवा की है और हम भी उनकी नौकरी में आए। ईश्वर की कृपा से हमारी सहायता में अंग्रेजो ने जो चाहा वो इलाका जांच लिया। उनके लिए हमारे जैसे हजारों हिंदुस्तानी जवानों को अपनी कुर्बानी देनी पड़ी लेकिन न हमने कभी पैर खींचे और न कोई बहाना बनाया और न ही कभी बग़ावत के रास्ते पर चले।

लेकिन सन् 1857 में अग्रेजों ने ये हुक्म जारी कर दिया कि अब सिपाहियों को इंगलैंड से नए कारतूस और बंदूकें दी जाएंगी। इन कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी मिली हुई है और गेहूं के आटे में हड्डियों का चूरा मिलाया जा रहा है। ये चीजें पैदल-सेना, घुड़सवारों और गोलअंदाज फ़ौज को हर रेजीमेंट में पहुंचा दी गई हैं।

उन्होंने ये कारतूस थर्ड लाइट केवेलरी के सवारों (घुड़सवार सैनिक) को दिए और उन्हें दांतों से खींचने के लिए कहा। सिपाहियों ने इस हुक्म का विरोध किया और कहा कि वे ऐसा कभी नहीं करेंगे क्योंकि अगर उन्होंने ऐसा किया तो उनका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। इस पर अंग्रेज़ अफ़सरों ने तीन रेजीमेंटों के जवानों को परेड करवा दी। 1400 अंग्रेज़ सिपाही, यूरोपीय सैनिकों की दूसरी बटालियनें और घुड़सवार गोलअंदाज फौज को तैयार कर भारतीय सैनिकों को घेर लिया गया। हर पैदल रैजीमेंट के सामने छरों से भरी छह-छह तोपें तैनात कर दी गईं और 84 नए सिपाहियों को गिरफ्तार करके, बेड़ियां डालकर, जेल में बंद कर दिया गया। छावनी के सवारों को इसलिए जेल में डाला गया ताकि हम डर कर नए कारतूसों को दांतों से खींचने लगें। इसी कारण हम और हमारे सारे सहोदर इकट्ठा होकर अपनी आस्था की रक्षा के लिए अंग्रेज़ों से लड़े…. । हमें दो साल तक युद्ध जारी रखने पर मजबूर किया गया। धर्म व आस्था के सवाल पर हमारे साथ खड़े राजा और मुखिया अभी भी हमारे साथ हैं और उन्होंने भी सारी मुसीबतें झेली हैं। हम दो साल तक इसलिए लड़े ताकि हमारा अकायद (आस्था) और मज़हब दूषित न हों। अगर एक हिंदू या मुसलमान का धर्म ही नष्ट हो गया तो दुनिया में बचेगा क्या ?

1. इन सिपाहियों का संबंध किस विद्रोह से है ?
2. भारतीय जवानों ने अंग्रेजों की सहायता किस प्रकार की ?
3. 1857 में भारतीय सैनिकों में अंग्रेजों के किस आदेश से रोष फैला ?
4. सिपाहियों द्वारा नए कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार करने पर उनके साथ कैसा व्यवहार किया गया ?
उत्तर-
1. इन सिपाहियों क संबंध 1857 के विद्रोह से है।
2. भारतीय जवानों ने अंग्रेजों के लिए अनेक प्रदेश जीते। इसके लिए अनेक कुर्बानियों देनी पड़ीं। परंतु वे कभी पीछे नहीं हटे।
3. 1857 में अंग्रेजों ने ये आदेश जारी किया कि अब सिपाहियों को इंग्लैंड से नए कारतूस और बंदूकें दी जाएंगी।
सिपाहियों का कहना था कि वे कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी मिली हुई है और गेहूं के आटे में हड्डियों का चूरा मिलाकर खिलाया जा रहा है। ये चीजें पैदल-सेना, घुड़सवारों और गोलअंदाज फ़ौज की हर रेजीमेंट में पहुंचा दी गई हैं। इस बात से उनमें रोष फैला।
4. सिपाहियों द्वारा नए कारतूसों का प्रयोग करने से इनकार करने पर उनके साथ कठोर व्यवहार किया गया। उन्हें ब्रिटिश जवानों द्वारा घेर लिया गया। प्रत्येक पैदल रेजीमेंट के सामने छरों से भरी छह-छह तोपें तैनात कर दी गईं। 84 नए सिपाहियों को गिरफ्तार करके, बेड़ियां डाल दी गईं और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया।

(7)
5 अप्रैल, 1930 को महात्मा गांधी ने दांडी में कहा था-
जब मैं अपने साथियों के साथ दांडी के इस समुद्रतटीय टोले की तरफ चला था तो मुझे यकीन नहीं था कि हमें यहां तक आने दिया जाएगा। जब मैं साबरमती में था तब भी यह अफवाह थी कि मुझे गिरफ़तार किया जा सकता है। तब मैंने सोचा था कि सरकार मेरे साथियों को तो दांडी तक आने देगी लेकिन मुझे निश्चित ही यह छूट नहीं मिलेगी। यदि कोई यह कहता है कि इससे मेरे हृदय में अपूर्ण आस्था का संकेत मिलता है तो मैं इस आरोप को नकारने वाला नहीं हूं। मैं यहां तक पहुंचा हूं, इसमें शांति और अहिंसा का कम हाथ नहीं है। इस सत्ता को सब महसूस करते हैं। अगर सरकार चाहे तो वह अपने इस आचरण के लिए अपनी पीठ थपथपा सकती है क्योंकि सरकार चाहती वो हम में से प्रत्येक को गिरफ्तार कर सकती थी। जब सरकार यह कहती है कि उसके पास शांति की सेना को गिरफ्तार करने का साहस नहीं था तो हम उसकी प्रशंसा करते है। सरकार को ऐसी सेना की गिरफ्तारी में शर्म महसूस होती है। अगर कोई व्यक्ति ऐसा काम करने में शर्म महसूस करता है जो . उसके पड़ोसियों को भी रास नहीं आ सकता, तो वह एक शिष्ट-सभ्य व्यक्ति है। सरकार को हमें ऐसा करने के लिए बधाई दी जानी चाहिए भले ही उसने विश्व जनमत का ख्याल करके ही यह फैसला क्यों न लिया हो।
कल हम नमक-कर कानून तोडेंगे। सरकार उसको बर्दाश्त करती है कि नहीं यह सवाल अलग है। हो सकता है सरकार हमें ऐसा करने दे लेकिन उसने हमारे जत्थे के बारे मुख्य धैर्य और सहिष्णुता दिखायी है उसके लिए वह अभिनंदन की पात्र है …..।

यदि मुझे और गुजरात व देश भर के सारे मुख्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाता है तो क्या होगा ? यह आंदोलन इस विश्वास पर आधारित है कि जब एक पूरा राष्ट्र उठ खड़ा होता है और आगे बढ़ने लगता है तो उसे नेता की ज़रूरत नहीं रह जाती।

1. गांधीजी ने दांडी मार्च की शरूआत क्यों की ?
2. नमक यात्रा उल्लेखनीय क्यों थी ?
3. शांति और अहिंसा को सब महसूस करते हैं ? गांधी जी ने ऐसा क्यों कहा ?
उत्तर-
1. नमक कानून के अनुसार नमक के उत्पादन और विक्रय पर राज्य का एकाधिकार था। प्रत्येक भारतीय घर में नमक का प्रयोग होता था, परन्तु उन्हें घरेलू प्रयोग के लिए भी नमक बनाने से रोका गया था। इस प्रकार उन्हें दुकानों से ऊंचे दाम पर नमक खरीदने के लिए बाध्य किया गया। अत: नमक कानून के विरुद्ध जनता में काफी असंतोष था। गांधी जी भी नमक कानून को सबसे घृणित कानून मानते थे। स्वतन्त्रता संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन गया। गांधी जी इस कानून को तोड़कर जनता में व्याप्त असंतोष को अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध एकजुट करना चाहते थे। इसी नमक कानून को तोड़ने के उद्देश्य से ही गांधी जी ने दांडी मार्च शुरू किया।

2. नमक यात्रा कम-से-कम निम्नलिखित तीन कारणों से उल्लेखनीय थी।-

  • इसके चलते महात्मा गांधी दुनिया की नज़र में आए। इस यात्रा को यूरोप और अमेरिकी प्रेस ने व्यापक रूप से जाना।
  • यह पहली राष्ट्रवादी गतिविधि थी जिसमें औरतों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। समाजवादी कार्यकारी
    कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने गांधी को समझाया था कि वे अपने आंदोलन को पुरुषों तक ही सीमित न रखें। कमलादेवी स्वयं उन असंख्य औरतों में से एक थी जिन्होंने नमक या शराब कानूनों का उल्लंघन करते हुए सामूहिक गिरफ्तारी दी थी।
  • सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि नमक यात्रा के कारण ही अंग्रेजों को यह अभास हुआ था कि अब उनका
    राज बहुत दिन नहीं टिक सकेगा और उन्हें भारतीयों को भी सत्ता में भागीदार बनाना पड़ेगा।

3. गांधी जी शांति के पुजारी थे और सत्य एवं अहिंसा में बहुत अधिक विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि अहिंसा पर आधारित शांतिपूर्ण आंदोलन को बड़ी-से-बड़ी शक्ति भी नहीं दबा सकती। इसलिए उन्होंने यह कहा कि शांति और अहिंसा (की ताकत) को सभी महसूस करते है।

(8)
महात्मा गांधी जानते थे कि उनकी स्थिति “बीहड़ में एक आवाज़” जैसी है लेकिन फिर भी वे विभाजन की सोच का विरोध करते रहे-
किंतु आज हम कैसे दुखद परिवर्तन देख रहे हैं। मैं फिर वह दिन देखना चाहता हूं जब हिंदू और मुसलमान आपसी सलाह के बिना कोई काम नहीं करेंगे। मैं दिन-रात इसी आग में जला जा रहा हूं कि उस दिन को जल्दी-जल्दी साकार करने के लिए क्या करू। लोगों से मेरी गुजारिश है कि वे किसी भी भारतीय को अपना शत्रु न मानें….। हिंदू और मुसलमान दोनों एक ही मिट्टी से उपजे हैं। उनका खून एक है, वे एक जैसा भोजन करते हैं, एक ही पानी पीते हैं, और एक ही जबान बोलते हैं।
प्रार्थना सभा में भाषण, 7 सितंबर, 1946, कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गांधी, खंड 92, पृ० 139.

लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की जो मांग उठायी है वह पूरी तरह गैर-इस्लामिक है और मुझे इसको पापपूर्ण कृत्य करने से कोई संकोच नहीं है। इस्लाम मानवता की एकता और भाईचारे का समर्थक है न कि मानव परिवार की एकजुटता को तोड़ने का। जो तत्त्व भारत को एक-दूसरे के खून के प्यासे टुकड़ों में बांट देना चाहते हैं वे भारत और इस्लाम, दोनों के शत्रु हैं। भले ही वे मेरी देह के टुकड़े-टुकड़े कर दें, परंतु मुझसे ऐसी बात नहीं मनवा सकते जिसे मैं ग़लत मानता हूँ।

1. महात्मा गांधी पुनः क्या देखना चाहते थे ? व्याख्या कीजिए।
2. पाकिस्तान की मांग किस प्रकार गैर-इस्लामिक थी ? स्पष्ट कीजिए।
3. महात्मा गांधी ने ऐसा क्यों कहा कि उनकी आवाज़ बीहड़ में एक आवाज़ थी ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
1. महात्मा गांधी हिंदुओं तथा मुसलमानों को फिर से एक होता देखना चाहते थे। वे चाहते थे हिंदू तथा मुसलमान आपसी . सलाह के बिना कोई काम न करें। वास्तव में वह विभाजन की स्थिति को रोकना चाहते थे।
2. महात्मा गांधी का कहना था कि-

  • मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की जो मांग उठायी है वह पूरी तरह गैर-इस्लामिक है। इस्लाम मानवता की एकता और भाईचारे का समर्थक है न कि मानव परिवार को तोड़ने का।
  • जो तत्त्व भारत को एक-दूसरे के खून के प्यासे टुकड़ों में बांट देना चाहते हैं और वे भारत और इस्लाम दोनों का शत्रु हैं।

3. विभाजन की बढ़ती हुई सोच के कारण देश का वातावरण विषैला हो चुका था ऐसा लगता था पूरा देश दूर-दूर तक एक वीरान जंगल की तरह फैला है जिसमें किसी की आवाज़ सुनाई नहीं दे सकती। इसलिए वह यह महसूस कर रहे थे-उनकी आवाज़ बीहड़ में एक आवाज़ के समान है।

PSEB 10th Class SST Solutions Civics Chapter 3 राज्य सरकार

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Civics Chapter 3 राज्य सरकार Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science Civics Chapter 3 राज्य सरकार

SST Guide for Class 10 PSEB राज्य सरकार Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर एक शब्द/एक पंक्ति (1-15 शब्दों) में दें

प्रश्न 1.
राज्य विधानमण्डल के कितने सदन होते हैं?
उत्तर-
दो सदन-विधानसभा तथा विधानपरिषद्।

प्रश्न 2.
राज्य विधानसभा के बारे में निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें
(i) सदस्य बनने के लिए क्या योग्यताएं हैं?
(ii) इसके कम-से-कम या अधिक-से-अधिक कितने सदस्य हो सकते हैं?
(iii) साधारण विधेयक को कानून बनने के लिए किन चरणों या पड़ावों में से गुजरना पड़ता है?
(iv) विधानसभा का सदस्य बनने के लिए कम-से-कम आयु कितनी है?
(v) अध्यक्ष का चुनाव कैसे होता है?
उत्तर-
(i) राज्य विधानसभा का सदस्य बनने की योग्यताएं

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु कम-से-कम 25 वर्ष हो।
  3. वह पागल या दिवालिया न हो।
  4. वह केन्द्र सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभप्रद पद पर न हो। (कोई एक लिखो)

(ii) सदस्य संख्या-मूल संविधान के अनुसार राज्य विधानसभा के अधिक-से-अधिक 500 और कम-से-कम 60 सदस्य हो सकते हैं।
(iii) साधारण विधेयक के चरण-

  1. प्रस्तुति और परिचय
  2. विधेयक की प्रत्येक धारा पर बहस
  3. विधेयक पर समग्र रूप से मतदान
  4. विधेयक दूसरे सदन में।

(iv) विधानसभा सदस्य बनने के लिए कम-से-कम आयु-25 वर्ष।
(v) अध्यक्ष का चुनाव-विधानसभा के अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा के सदस्य अपने में से करते हैं।

प्रश्न 3.
राज्य की विधान परिषद् के बारे में निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें (i) विधान परिषद् के कितने सदस्य हो सकते हैं? (ii) विधान परिषद् का कार्यकाल कितना है ?
उत्तर-
(i) विधान परिषद् की सदस्य संख्या-विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या राज्य विधानसभा के एक तिहाई सदस्यों से अधिक नहीं होनी चाहिए और कम-से-कम संख्या 40 होनी चाहिए।
(ii) विधान परिषद् का कार्यकाल-विधान परिषद् के प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल छः वर्ष होता है।

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प्रश्न 4.
राज्य विधानमण्डल की चार शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. मन्त्रिपरिषद् पर नियन्त्रण रखना।
  2. कर लगाने, कर संशोधन करने या बजट पास करने का अधिकार।
  3. राज्य सूची तथा समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाना।
  4. सदन की मर्यादा भंग करने वालों को दण्ड देने का अधिकार। (कोई एक लिखें)

प्रश्न 5.
राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति कैसे होती है?
उत्तर-
राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा पांच वर्ष के लिए की जाती है।

प्रश्न 6.
मुख्यमन्त्री की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है?
उत्तर-
मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है।

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प्रश्न 7.
संवैधानिक संकट के समय राज्यपाल की क्या स्थिति होती है?
उत्तर-
संवैधानिक संकट के समय राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाता है और राज्यपाल राज्य का वास्तविक कार्याध्यक्ष बन जाता है।

प्रश्न 8.
राज्यपाल का कार्यकाल कितना है?
उत्तर-
राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें

(i) उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल कितना है?
(ii) इसकी योग्यताएं क्या हैं?
(ii) उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या कितनी होती है?
(iv) लोक अदालतों से आप क्या समझते हैं ?
(v) क्या आपके राज्य में दो सदनी विधानपालिका है?
उत्तर-
(i) उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल-उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रह सकते हैं।
(ii) उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यताएं-

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह दस वर्ष तक किसी अधीनस्थ न्यायालय में न्यायाधीश रह चुका हो।
  3. उसने दस वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय में वकालत की हो।

(iii) उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या-उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा कुछ अन्य न्यायाधीश होते हैं। इनकी संख्या निश्चित नहीं होती है। इनकी संख्या राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर है।
(iv) लोक अदालतें-निर्धन और शोषित लोगों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए कुछ समय पूर्व देश में लोक अदालतें स्थापित की गईं। 6 अक्तूबर, 1985 को पहली लोक अदालत दिल्ली में बैठी थी। इसमें 150 दुर्घटना सम्बन्धी विवादों को निपटाया गया था।
(v) नहीं। हमारे राज्य पंजाब में दो सदनी विधानपालिका नहीं है।

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(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 50-60 शब्दों में दें

प्रश्न 1.
राज्यपाल की प्रशासनिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
राज्यपाल की प्रशासनिक शक्तियां निम्नलिखित हैं

  1. राज्य का सारा शासन प्रबन्ध उसी के नाम पर चलता है।
  2. राज्य में शान्ति एवं सुरक्षा बनाए रखना उसका उत्तरदायित्व है। इसमें उसकी सहायता करने तथा परामर्श देने के लिए मुख्यमन्त्री सहित मन्त्रिपरिषद् का प्रावधान है।
  3. वह विधानसभा में बहुमत दल के नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त करता है। मुख्यमन्त्री के परामर्श पर वह अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।
  4. वह राज्य के समस्त उच्च पदाधिकारियों को नियुक्त करता है। वह राज्य के महाधिवक्ता तथा राज्य सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों को नियुक्त करता है।
  5. वह उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में राष्ट्रपति को परामर्श देता है। (कोई तीन लिखें!)

प्रश्न 2.
मुख्यमंत्री, मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति का वर्णन करें।
उत्तर-
केन्द्र की भान्ति राज्यों में भी शासन की संसदीय प्रणाली अपनाई गई है। राज्यपाल नाममात्र का अध्यक्ष होता है। इसकी सहायता एवं परामर्श के लिए मुख्यमन्त्री एवं उसका मन्त्रिमण्डल होता है। मन्त्रिमण्डल राज्य की वास्तविक कार्यपालिका होती है। राज्यपाल विधानसभा के बहुमत दल के नेता को मुख्यमन्त्री नियुक्त करता है। मुख्यमन्त्री के परामर्श पर वह अन्य मन्त्रियों को नियुक्त करता है। राज्यपाल मुख्यमन्त्री द्वारा दी गई सूची में न तो अपनी इच्छा से कोई नाम जोड़ सकता है और न ही सूची में दिए गए नामों में से किसी नाम को काट सकता है।

प्रश्न 3.
विधानमण्डल की चार शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
विधानमण्डल की शक्तियों का वर्णन इस प्रकार है

  1. वैधानिक शक्तियां-विधानमण्डल राज्य सूची तथा समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बना सकती है।
  2. कार्यपालिका शक्तियां-
    1. राज्य की मन्त्रिपरिषद् विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होती है।
    2. वह राज्य मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास करके उसे हटा सकता है।
    3. इसके सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं।
    4. इसके सदस्य विभिन्न प्रस्ताव पेश करके भी मन्त्रिपरिषद् पर नियन्त्रण रखते हैं।
  3. वित्तीय शक्तियां-विधानमण्डल राज्य के आय-व्यय पर नियन्त्रण रखता है। वह राज्य का वार्षिक बजट पास करता है। इसकी स्वीकृति के बिना न तो कोई कर लगाया जा सकता है और न ही कुछ व्यय किया जा सकता है।
  4. विविध शक्तियां-
    1. विधानमण्डल के निम्न सदन (विधानसभा) के चुने हुए सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं।
    2. विधानसभा के सदस्य विधान परिषद् के 1/3 सदस्यों का निर्वाचन करते हैं।
    3. विधानसभा राज्य में विधानपरिषद् की स्थापना अथवा समाप्ति का प्रस्ताव पास करती है।

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प्रश्न 4.
राज्यपाल की ऐच्छिक शक्तियों का वर्णन करें।
उत्तर-
राज्यपाल की स्थिति वैसी नहीं है जैसी केन्द्र में राष्ट्रपति की है। केन्द्र में यह संवैधानिक प्रावधान है कि राष्ट्रपति को मन्त्रिपरिषद् के परामर्श के अनुसार ही कार्य करना पड़ता है। इसके विपरीत राज्यपाल कुछ परिस्थितियों में अपने विवेक के अनुसार कार्य कर सकता है। राज्यपाल की इस शक्ति को स्व-विवेक की शक्ति अथवा ऐच्छिक शक्ति कहते हैं।
राज्यपाल निम्नलिखित परिस्थितियों में अपने स्वविवेक से कार्य कर सकता है

  1. यदि विधानसभा में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो तो वह स्वविवेक से मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कर सकता है।
  2. वह राष्ट्रपति को संवैधानिक यन्त्र के विफल हो जाने पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर सकता है।
  3. राज्य में अनुसूचित जातियों के हितों की रक्षा करने के लिए।
  4. राज्य विधानमण्डल द्वारा पास किए गए किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखने के लिए।

प्रश्न 5.
मन्त्रिमण्डल के चार कार्यों की व्याख्या करें।
उत्तर-
मन्त्रिमण्डल के तीन कार्यों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. नीति-निर्माण-राज्य मन्त्रिमण्डल का मुख्य कर्त्तव्य राज्य के लोगों की समस्याओं का समाधान करना होता है। इसके लिए वह आर्थिक, सामाजिक, औद्योगिक तथा कृषि सम्बन्धी नीति का निर्माण करता है।
  2. प्रशासन-प्रत्येक मन्त्री राज्य के किसी विभाग का अध्यक्ष होता है। वह विभाग में काम करने वाले कर्मचारियों की सहायता से अपने विभाग का प्रशासन चलाता है।
  3. वैधानिक शक्तियां-राज्य विधानमण्डल में अधिकतर बिल मन्त्रियों द्वारा पेश किए जाते हैं। मन्त्रिपरिषद् की इच्छा के विरुद्ध कोई भी बिल पास नहीं हो सकता। राज्य विधानमण्डल की बैठकें राज्यपाल मन्त्रिमण्डल की सलाह से ही बुलाता है। मन्त्रिमण्डल की सलाह से ही वह विधानसभा को भंग कर सकता है तथा अध्यादेश जारी करता है।
  4. वित्तीय शक्तियां-राज्य का वार्षिक बजट मन्त्रिमण्डल तैयार करता है। वित्तमन्त्री इसे विधानमण्डल में प्रस्तुत करता है। मन्त्रिमण्डल ही यह निर्णय करता है कि कौन-से नए कर लगाए जायें, किन करों को घटाया या बढ़ाया जाए तथा धन का प्रयोग किस प्रकार से किया जाए। (कोई तीन लिखें)

प्रश्न 6.
संवैधानिक संकट की घोषणा का राज्य प्रशासन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
राज्य में संवैधानिक संकट की स्थिति में राज्यपाल की सलाह पर राष्ट्रपति राज्य में संवैधानिक आपात्काल की घोषणा कर सकता है। इसका परिणाम यह होता है कि सम्बद्ध राज्य की विधानसभा को भंग अथवा निलम्बित कर दिया जाता है। राज्य की मन्त्रिपरिषद् को भी भंग कर दिया जाता है। राज्य का शासन राष्ट्रपति अपने हाथ में ले लेता है। इसका अर्थ यह है कि कुछ समय के लिए राज्य का शासन केन्द्र चलाता है। व्यवहार में राष्ट्रपति राज्यपाल को राज्य का प्रशासन चलाने की वास्तविक शक्तियां सौंप देता है। विधानमण्डल की समस्त शक्तियां अस्थाई रूप से केन्द्रीय संसद् को प्राप्त हो जाती हैं।

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प्रश्न 7.
लोक अदालतों के कार्यों/शक्तियों की व्याख्या करें।
उत्तर-
लोक अदालतें न्याय करने के लिए बिल्कुल नवीन व्यवस्था है। इसके जनक न्यायमूर्ति पी० एन० भगवती माने जाते हैं। इसका मुख्य कार्य निर्धन और शोषित लोगों को शीघ्र न्याय दिलाना है। हमारे न्यायालयों में काम का बड़ा बोझ है। लाखों विवाद फाइलों में बन्द पड़े हैं। लोक अदालतों में आपसी सहमति द्वारा सैंकड़ों अभियोगों का निपटारा किया जाता है। अत: लोक अदालतों में लम्बे समय से लम्बित पड़े मुकद्दमे शीघ्रता से निपट जाएंगे और न्यायालयों का कार्य भार हल्का हो जाएगा। 1987 में लोक अदालतों को कानूनी मान्यता प्राप्त हो गई।

PSEB 10th Class Social Science Guide राज्य सरकार Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

I. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
भारतीय संघ में कितने प्रकार की इकाइयां हैं? नाम बताइए।
उत्तर-
भारतीय संघ में दो प्रकार की इकाइयां हैं-राज्य तथा केन्द्र शासित क्षेत्र।

प्रश्न 2.
(i) राज्यों का वर्गीकरण किस आधार पर किया गया है?
(ii) राज्यों को भाषायी राज्य क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
(i) भारत में राज्यों का वर्गीकरण भाषा के आधार पर किया गया है।
(ii) राज्यों का गठन भाषा के आधार पर होने के कारण इन्हें भाषायी राज्य कहा जाता है।

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प्रश्न 3.
केन्द्र शासित प्रदेश किसे कहते हैं?
उत्तर-
केन्द्र शासित प्रदेश वह प्रशासनिक इकाई है जिसका शासन केन्द्र सरकार के अधीन होता है।

प्रश्न 4.
दो केन्द्र शासित प्रदेशों के नाम लिखो।
उत्तर-
पाण्डिचेरी और चण्डीगढ़।

प्रश्न 5.
(i) राज्य सरकार किस सूची के विषयों पर कानून बना सकती है?
(ii) राज्य सूची में कौन-कौन से विषय हैं?
उत्तर-
(i) राज्य सरकार राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है।
(ii) कृषि, भूमि, सिंचाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य आदि राज्य सूची के विषय हैं।

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प्रश्न 6.
(i) धन सम्बन्धी विधेयक राज्य विधानमण्डल के किस सदन में पेश किए जा सकते हैं?
(ii) विधानसभा द्वारा भेजे गए विधेयक को विधान परिषद कितने समय तक रोक सकती है?
उत्तर-
(i) धन सम्बन्धी विधेयक विधानसभा में पेश किए जा सकते हैं।
(ii) विधानसभा द्वारा परामर्श के लिए भेजे गए विधेयक को विधान परिषद् अधिक-से-अधिक 14 दिनों तक रोक सकती है।

प्रश्न 7.
(i) राज्य सरकार का वास्तविक प्रधान (कार्याध्यक्ष) कौन होता है?
(ii) मुख्यमन्त्री की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है?
उत्तर-
(i) राज्य सरकार का वास्तविक प्रधान मुख्यमन्त्री होता है।
(ii) मुख्यमन्त्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।

प्रश्न 8.
राज्यपाल के पद के लिए कम-से-कम कितनी आयु होनी चाहिए?
उत्तर-
35 वर्ष।

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प्रश्न 9.
(i) राज्य विधानसभा के एक वर्ष में कितने अधिवेशन होना आवश्यक है?
(ii) राज्य विधानमण्डल के दो अधिवेशनों में कम-से-कम कितने समय का अन्तर होना चाहिए?
उत्तर-
(i) राज्य विधानमण्डल के एक वर्ष में दो अधिवेशन होना आवश्यक है।
(ii) राज्य विधानमण्डल के दो अधिवेशनों में 6 मास से अधिक का अन्तर नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 10.
राज्यपाल का प्रमुख परामर्शदाता कौन होता है?
उत्तर-
राज्यपाल का प्रमुख परामर्शदाता मुख्यमन्त्री होता है।

प्रश्न 11.
भारत में कितने राज्य (राज्य सरकारें) हैं?
उत्तर-
28.

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प्रश्न 12.
भारत में कितने संघीय क्षेत्र हैं?
उत्तर-
8.

प्रश्न 13.
दो राज्यों के नाम बताओ जहां द्विसदनीय विधानमण्डल हैं।
उत्तर-
महाराष्ट्र तथा कर्नाटक।

प्रश्न 14.
पंजाब में कितने सदनीय विधानमण्डल/विधानपालिका हैं?
उत्तर-
एक सदनीय।

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प्रश्न 15.
विधानपरिषद् के सदस्यों की कम-से-कम कितनी संख्या निश्चित की गई है?
उत्तर-
40.

प्रश्न 16.
विधानसभा का सदस्य बनने के लिए नागरिक की कम-से-कम कितनी आयु होनी चाहिए?
उत्तर-
25 वर्ष।

प्रश्न 17.
विधानपरिषद् का सदस्य बनने के लिए नागरिक की कम-से-कम कितनी आयु होनी चाहिए?
उत्तर-
30 वर्ष।

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प्रश्न 18.
विधानपरिषद् के प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल कितना होता है?
उत्तर-
6 वर्ष।

प्रश्न 19.
विधानपरिषद् में राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्यों की संख्या कितनी होती है?
उत्तर-
12.

प्रश्न 20.
राज्य का संवैधानिक मुखिया कौन होता है?
उत्तर-
राज्यपाल।

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प्रश्न 21.
राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर-
राष्ट्रपति।

प्रश्न 22.
राज्य में अध्यादेश कौन जारी कर सकता है?
उत्तर-
राज्यपाल।

प्रश्न 23.
राज्यपाल अपनी कौन-सी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार कर सकता है?
उत्तर-
विवेकशील।

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प्रश्न 24.
राज्य में राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य की वैधानिक शक्तियां किसे प्राप्त हो जाती हैं?
उत्तर-
संसद् को।

प्रश्न 25.
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या कितनी है?
उत्तर-
26.

प्रश्न 26.
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश कितनी आयु तक अपने पद पर रह सकता है?
अथवा
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का कार्यकाल कितना होता है?
उत्तर-
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक अपने पद पर रह सकते हैं।

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प्रश्न 27.
पंजाब और हरियाणा का संयुक्त उच्च न्यायालय कहां स्थित है?
उत्तर-
चंडीगढ़ में।

प्रश्न 28.
जिला न्यायाधीश की नियुक्ति कौन करता है?
उत्तर-
राज्यपाल।

प्रश्न 29.
लोक अदालतों की धारणा का जनक किसे माना जाता है?
उत्तर-
पी० एन० भगवती को।

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प्रश्न 30.
संघ सूची में कितने विषय शामिल हैं?
उत्तर-
97.

प्रश्न 31.
राज्य सूची में कितने विषय शामिल हैं?
उत्तर-
66.

प्रश्न 32.
समवर्ती सूची में कितने विषय शामिल हैं?
उत्तर-
47.

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प्रश्न 33.
संघ सूची के कोई दो विषय बताओ।
उत्तर-
रेलवे तथा रक्षा।

प्रश्न 34.
समवर्ती सूची का कोई एक विषय बताइए।
उत्तर-
मजदूर कल्याण।

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. भारत में ……….. राज्य हैं।
  2. भारत में …………… संघीय (केंद्र शासित) क्षेत्र हैं।
  3. पंजाब में ……………. सदनीय विधानमंडल है।
  4. विधानसभा का सदस्य बनने के लिए कम-से-कम ……….. वर्ष की आयु होनी चाहिए।
  5. संवैधानिक संकट के समय …………. राज्य का वास्तविक कार्याध्यक्ष बन जाता है।
  6. राज्य के सबसे बड़े न्यायालय को ……….. न्यायालय कहते हैं।
  7. राज्यपाल अपनी ………….. शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छा से कर सकता है।
  8. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश …………. वर्ष की आयु तक अपने पद पर रह सकते हैं।
  9. राज्यपाल की नियुक्ति ………… करता है।।
  10. विधान परिषद् में ………….. सदस्य राज्यपाल मनोनीत करता है।

उत्तर-

  1. 28,
  2. 8,
  3. एक,
  4. 25,
  5. राज्यपाल,
  6. उच्च,
  7. विवेकशील,
  8. 62
  9. राष्ट्रपति,
  10. 1/6.

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III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न राज्य में द्वि-सदनीय विधान मंडल है
(A) बिहार
(B) महाराष्ट्र
(C) उत्तर प्रदेश
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
निम्न राज्य में द्वि-सदनीय विधानमंडल/विधान परिषद् नहीं है
(A) पंजाब/हरियाणा
(B) झारखंड
(C) जम्मू और कश्मीर
(D) कर्नाटक।
उत्तर-
(A) पंजाब/हरियाणा

प्रश्न 3.
विधानसभा के अध्यक्ष का चुनाव होता है
(A) राज्यपाल द्वारा
(B) विधानसभा के सदस्यों द्वारा
(C) मुख्यमन्त्री द्वारा
(D) विधान परिषद् के सदस्यों द्वारा।
उत्तर-
(B) विधानसभा के सदस्यों द्वारा

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प्रश्न 4.
निम्न में से कौन-सा केंद्र शासित (संघीय) क्षेत्र नहीं है?
(A) राजस्थान
(B) दिल्ली
(C) चंडीगढ़
(D) पांडिचेरी।
उत्तर-
(A) राजस्थान

प्रश्न 5.
राज्य विधानमंडल के कौन-कौन से दो सदन होते हैं?
(A) लोकसभा तथा विधानसभा
(B) विधानसभा तथा राज्यसभा
(C) विधानसभा तथा विधान परिषद
(D) लोकसभा तथा राज्यसभा।
उत्तर-
(C) विधानसभा तथा विधान परिषद

प्रश्न 6.
राज्य में राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य की वैधानिक शक्तियां किसे प्राप्त होती हैं?
(A) विधानपरिषद् को
(B) संसद् को
(C) प्रधानमन्त्री को
(D) राज्यसभा को।
उत्तर-
(B) संसद् को

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प्रश्न 7.
शक्तियों के बंटवारे के संबंध में निम्न में से कौन-सा कथन सही है?
(A) संघ सूची 47 विषय; राज्य सूची 97 विषय; समवर्ती सूची 66 विषय
(B) संघ सूची 66 विषय; राज्य सूची 47 विषय; समवर्ती सूची 97 विषय
(C) संघ सूची 97 विषय; राज्य सूची 66 विषय; समवर्ती सूची 47 विषय
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(C) संघ सूची 97 विषय; राज्य सूची 66 विषय; समवर्ती सूची 47 विषय

प्रश्न 8.
राज्य का संवैधानिक मुखिया कौन होता है?
(A) राज्यपाल
(B) मुख्यमन्त्री
(C) विधानसभा अध्यक्ष
(D) राष्ट्रपति।
उत्तर-
(A) राज्यपाल

IV. सत्य-असत्य कथन

प्रश्न-सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/ग़लत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं

  1. विधानसभा के अध्यक्ष का चुनाव विधानसभा के सदस्य अपने में से करते हैं।
  2. विधान परिषद् के प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल छः वर्ष होता है।
  3. मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है।
  4. पंजाब तथा हरियाणा केंद्र शासित प्रदेश हैं।
  5. राज्य में मुख्यमंत्री ही अध्यादेश जारी कर सकता है।

उत्तर-

  1. (✓),
  2. (✓),
  3. (✓),
  4. (✗),
  5. (✗).

PSEB 10th Class SST Solutions Civics Chapter 3 राज्य सरकार

V. उचित मिलान

  1. मुख्यमन्त्री द्वि-सदनीय विधानमंडल
  2. राज्यपाल एक सदनीय विधानमंडल
  3. पंजाब राज्य सरकार का वास्तविक प्रधान
  4. बिहार राज्य का संवैधानिक मुखिया

उत्तर-

  1. मुख्यमन्त्री-राज्य सरकार का वास्तविक प्रधान,
  2. राज्यपाल-राज्य का संवैधानिक मुखिया,
  3. पंजाबएक सदनीय विधानमंडल,
  4. बिहार-द्वि-सदनीय विधानमंडल।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
विधानसभा की रचना का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
विधानसभा के सदस्यों की संख्या राज्य के आकार तथा वहां की जनसंख्या पर निर्भर करती है। परन्तु संविधान के अनुसार किसी राज्य की विधानसभा में अधिक-से-अधिक 500 सदस्य हो सकते हैं। इनका चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष रूप से लोगों द्वारा किया जाता है। विधानसभा का सदस्य बनने के लिए किसी व्यक्ति की आयु 25 वर्ष या इससे अधिक होनी चाहिए। विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
विधानसभा की कार्यवाही का संचालन करने के लिए एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष होता है। इनका चुनाव विधानसभा के सदस्य अपने में से ही करते हैं।

प्रश्न 2.
विधान परिषद् की रचना कैसी होती है?
उत्तर-
किसी राज्य की विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों के एक-तिहाई भाग से अधिक नहीं हो सकती। इस सदन की रचना इस प्रकार होती है —

  1. इसके एक-तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं।
  2. इसके अन्य एक-तिहाई सदस्य राज्य की विधानसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित होते हैं।
  3. सदस्य संख्या का बारहवां भाग स्नातकों द्वारा निर्वाचित होता है।
  4. एक अन्य बारहवां भाग सैकेण्डरी स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के अध्यापकों द्वारा चुना जाता है।
  5. शेष 1/6 सदस्यों को राज्य का राज्यपाल मनोनीत करता है। ये सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आन्दोलन या सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त होते हैं।

विधान परिषद् के प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। प्रत्येक दो वर्ष के पश्चात् इसके एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त हो जाते हैं और उनके स्थान पर नये सदस्य चुन लिए जाते हैं। इस प्रकार विधान परिषद् एक स्थायी सदन है।

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प्रश्न 3.
केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्यपाल की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
राज्यपाल राज्य सरकार का सर्वोच्च अधिकारी होता है, परन्तु वह केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में अपना कार्य करता है। निम्नलिखित तथ्य इसकी पुष्टि करते हैं —

  1. वह केन्द्र तथा राज्य सरकार के बीच कड़ी (Link) का काम करता है। वह विधायिका द्वारा पारित किसी बिल को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है।
  2. राज्यपाल द्वारा राज्य में संवैधानिक तन्त्र की असफलता की सूचना मिलने पर राष्ट्रपति सम्बन्धित राज्य में ‘राष्ट्रपति शासन’ लागू कर सकता है। ऐसी स्थिति में राज्य की विधानसभा तथा मन्त्रिपरिषद् को भंग अथवा स्थगित कर दिया जाता है और राज्य का प्रशासन राज्यपाल के अधीन हो जाता है। ऐसे समय पर राज्यपाल राष्ट्रपति का व्यावहारिक प्रतिनिधि बन जाता है। वह राज्य का प्रशासन कुछ सलाहकारों की सहायता से चलाता है।

प्रश्न 4.
जिन आधारों पर राज्यपाल अपने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर सकता है, उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर-
राज्यपाल निम्नलिखित आधारों पर अपने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर सकता है —

  1. जब राज्य का शासन संविधान के अनुसार चलाने में बाधा पड़ रही हो।
  2. जब राज्यपाल के लिए यह निश्चित करना कठिन हो जाए कि विधानसभा में किस राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त है।

प्रश्न 5.
केन्द्र शासित क्षेत्र पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
भारत में 8 केन्द्र शासित क्षेत्र हैं। ये जनसंख्या और क्षेत्रफल की दृष्टि से छोटे प्रदेश हैं। इसीलिए उन्हें पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान नहीं किया गया है। वे स्वायत्त नहीं हैं। इन क्षेत्रों का प्रशासन केन्द्र के अधीन है तथा इन्हें उसके नियन्त्रण में चलाया जाता है। केन्द्र शासित क्षेत्र के प्रशासन का प्रधान उप-राज्यपाल, मुख्य आयुक्त अथवा प्रशासक होता है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। संसद् कानून बना कर किसी क्षेत्र के लिए विधानसभा की स्थापना भी कर सकती है। ऐसे क्षेत्र का शासन मुख्यमन्त्री तथा उसकी मन्त्रिपरिषद् चलाती है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में यही व्यवस्था है।

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प्रश्न 6.
केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच रचना सम्बन्धी तीन प्रमुख समानताएं बताइए।
उत्तर-
भारत में केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच रचना सम्बन्धी तीन प्रमुख समानताएं निम्नलिखित हैं —

  1. केन्द्र तथा राज्य दोनों संसदीय कार्यपालिकाएं हैं।
  2. केन्द्र और राज्यों में स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका है।
  3. केन्द्र में विधानमण्डल (संसद्) के दो सदन हैं। इसी प्रकार कुछ राज्यों के विधानमण्डलों में भी दो-दो सदन हैं।

प्रश्न 7.
केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच रचना सम्बन्धी तीन प्रमुख विषमताएं बताइए।
उत्तर-
केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच रचना सम्बन्धी तीन विषमताएं निम्नलिखित हैं —

  1. केन्द्र में निर्वाचित राष्ट्रपति होता है जबकि राज्यों में मनोनीत राज्यपाल होते हैं।
  2. केन्द्र की संसद् के दो सदन हैं, परन्तु अधिकांश राज्यों में एक सदनीय विधानमण्डल है।
  3. राज्य में भारत के उप-राष्ट्रपति के समान स्तर का कोई पद नहीं है।

प्रश्न 8.
राज्य विधानमण्डलों के चार गैर-विधायी कार्य बताइए।
उत्तर-
राज्य विधानमण्डलों के निम्नलिखित चार गैर-विधायी कार्य हैं

  1. विधानमण्डल के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं।
  2. विधानमण्डल राज्य के मन्त्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास के प्रस्ताव पर विचार करता है।
  3. राज्य विधानमण्डल के निर्वाचित सदस्य राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव करते हैं।
  4. विधानमण्डल का प्रत्येक सदन अपने अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का चुनाव करता है।

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प्रश्न 9.
राज्यपाल की तीन प्रमुख विधायी शक्तियां बताइए।
उत्तर-
राज्यपाल की तीन विधायी शक्तियां निम्नलिखित हैं

  1. वह राज्य विधानमण्डल की बैठक बुला सकता है और उसे सम्बोधित कर सकता है।
  2. वह राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित किए गए विधेयकों को स्वीकार कर सकता है, पुनर्विचार के लिए वापस कर सकता है अथवा राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है।
  3. वह राज्य विधानमण्डल के अवकाश काल में अध्यादेश जारी कर सकता है।

प्रश्न 10.
राज्यपाल की तीन प्रमुख कार्यकारी शक्तियां बताएं।
उत्तर-
राज्यपाल की तीन प्रमुख कार्यकारी शक्तियां निम्नलिखित हैं —

  1. वह मुख्यमंत्री का चयन करता है तथा मुख्यमन्त्री की सलाह से राज्य मन्त्रिपरिषद् के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है।
  2. वह राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों तथा एडवोकेट जनरल की नियुक्ति करता है।
  3. वह अपने राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकता है।

प्रश्न 11.
राज्य सरकारों के चार प्रमुख कार्य बताइए।
उत्तर-
मान्य सरकारें चार प्रमुख कार्य करती हैं —

  1. वे अपने राज्य में कानून और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कानून बनाती हैं और उन्हें लागू करती हैं।
  2. वे अपने राज्य में आवश्यक वस्तुएं लोगों को लगातार उपलब्ध करने के कार्य करती हैं।
  3. वे अपने राज्य में शिक्षा का प्रसार तथा अन्य कल्याणकारी कार्य करती हैं।
  4. वे अपने राज्य में कृषि को प्रोत्साहन देती हैं।

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प्रश्न 12.
मुख्यमन्त्री की चार शक्तियों तथा स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
मुख्यमन्त्री की शक्तियां-मुख्यमन्त्री की शक्तियां निम्नलिखित हैं —

  1. मन्त्रियों की नियुक्ति-मुख्यमन्त्री अपने मन्त्रियों की सूची तैयार करके राज्यपाल को भेजता है। राज्यपाल उन्हीं सदस्यों को मन्त्री पद की शपथ दिलाता है।
  2. विभागों का बंटवारा-मुख्यमन्त्री मन्त्रियों में विभाग बांटता है।
  3. मन्त्रियों को हटाना-वह किसी भी मन्त्री से त्याग-पत्र मांग सकता है। यदि वह त्याग-पत्र देने से इन्कार कर दे तो मुख्यमन्त्री उसे राज्यपाल से कह कर हटा सकता है।
  4. मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष-मुख्यमन्त्री मन्त्रिपरिषद् की बैठक का कार्यक्रम निश्चित करता है तथा इसकी बैठकों की अध्यक्षता करता है।

मुख्यमन्त्री की स्थिति-सच तो यह है कि मुख्यमन्त्री राज्य का एक महत्त्वपूर्ण तथा शक्तिशाली अधिकारी है। राज्य प्रशासन का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं होता जिस पर उसका नियन्त्रण न हो। कोई भी मन्त्री मुख्यमन्त्री की इच्छा के बिना मन्त्री पद पर नहीं रह सकता। वह ऐसी धुरी है जिसके चारों ओर राज्य का प्रशासन चक्कर काटता है।

प्रश्न 13.
उच्च न्यायालय के अपील सम्बन्धी क्षेत्राधिकार का वर्णन करो।
उत्तर-
मूल रूप से उच्च न्यायालय एक अपीलें सुनने वाला न्यायालय होता है। यह अपने अधीनस्थ न्यायालयों के विरुद्ध विभिन्न दीवानी और फ़ौजदारी मामलों में अपीलें सुन सकता है। उदाहरण के लिए किसी अपराधी को तब तक फांसी नहीं लगाई जा सकती. जब तक कि सैशन न्यायालय द्वारा दिये गये फांसी के निर्णय का उच्च न्यायालय अनुमोदन नहीं करता। यदि उच्च न्यायालय फांसी के दण्ड को उचित घोषित करता है, तभी मृत्यु दण्ड दिया जा सकता है।

प्रश्न 14.
उच्च न्यायालय के प्रशासकीय क्षेत्राधिकार का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
उच्च न्यायालय को निम्नलिखित प्रशासकीय अधिकार प्राप्त हैं —
(क) अधीनस्थ न्यायालयों का निरीक्षण करना तथा उन पर नियन्त्रण रखना।
(ख) जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति में राज्यपाल को परामर्श देना।
(ग) न्यायाधीशों की पदोन्नति इत्यादि के मामले।

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प्रश्न 15.
जिला न्यायालय पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
न्यायिक प्रशासन के लिए प्रत्येक राज्य को विभिन्न जिलों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक जिला एक जिला न्यायाधीश के अधीन कार्य करता है। जिला न्यायालयों के न्यायाधीशों को राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के परामर्श से राज्यपाल नियुक्त करता है, उन्हीं व्यक्तियों को जिला न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया जा सकता है जो कि कम-से-कम सात वर्ष तक वकील के रूप में कार्य कर चुके हों या जो कि संघ या राज्य सरकार की सेवा में अधिकारी के रूप में कार्य कर चुके हों। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि जज स्वतन्त्रतापूर्वक न्याय कर सकें और जनता का न्यायपालिका में विश्वास दृढ़ हो।

प्रश्न 16.
भारतीय संघ की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?
उत्तर-
भारतीय संघ में संघीय ढांचे की भान्ति केन्द्रीय तथा राज्य स्तर पर अलग सरकारें हैं। शक्तियों का विभाजन : भी तीन सूचियों-संघ, राज्य तथा समवर्ती में किया गया है। स्वतन्त्र न्यायालय की भी व्यवस्था है, परन्तु भारतीय संघ में केन्द्र अधिक शक्तिशाली बनाया गया है। सभी महत्त्वपूर्ण विषय केन्द्रीय-सची में रखे गए हैं। केन्द्र साझी सूची पर भी कानून बना सकता है। आपात्काल में इसे राज्य-सूची के विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार है। इस देश में सभी को इकहरी नागरिकता प्राप्त है। भारतीय संघ अमेरिका की भान्ति एक संघ नहीं है।

प्रश्न 17.
संघ और राज्य के मध्य वैधानिक अधिकारों का विभाजन किस प्रकार किया गया है?
उत्तर-
संघीय शासन से हमारा अभिप्राय ऐसे शासन से है जिसमें शक्तियां संघ तथा उसकी इकाइयों में बांट दी जाती है। संक्षेप में शक्तियों का बंटवारा इस प्रकार होता है —

  1. संघीय-सूची-संघीय सरकार को उन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है जो राष्ट्रीय महत्त्व के होते हैं। सुरक्षा, डाक-तार, मुद्रा आदि सभी संघीय विषय होते हैं।
  2. राज्य-सूची-राज्य-सूची में वे विषय होते हैं जिन पर केवल राज्य विधानमण्डलों को कानून बनाने का अधिकार होता है। बिक्री-कर, राज्य-वित्त, कृषि आदि राज्य सूची के विषय हैं। यदि कोई राज्य-सूची का विषय राष्ट्रीय महत्त्व धारण कर ले तो एक विशेष प्रक्रिया द्वारा संघीय सरकार को उस विशेष विषय पर कानून बनाने के अधिकार प्राप्त हो जाते हैं।
  3. समवर्ती-सूची-इस सूची में दिए गए विषयों पर राज्य सरकार तथा केन्द्र सरकार दोनों ही कानून बना सकती हैं, परन्तु यदि किसी एक ही विषय पर राज्य तथा केन्द्र द्वारा बनाए गए कानून में विरोध हो तो केन्द्र द्वारा बनाए गए कानून को ही मान्य समझा जाता है।

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प्रश्न 18.
राज्यपाल और मन्त्रिपरिषद् का सम्बन्ध बतलाओ।
उत्तर-
राज्यपाल भारतीय संघ में राज्य का मुखिया होता है, परन्तु वह नाममात्र का ही मुखिया है। उसे राज्य की मन्त्रिपरिषद् के परामर्श से कार्य करना पड़ता है। फिर भी कुछ विशेष परिस्थितियों में वह राज्य का वास्तविक मुखिया भी होता है। वह राज्य के मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करता है। अन्य मन्त्री भी उसी के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। वह राज्य मन्त्रिपरिषद् के निर्णयों के विषय में मुख्यमन्त्री से पूछताछ कर सकता है, परन्तु मुख्यमन्त्री तथा अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति करते समय राज्यपाल अपनी इच्छा से काम नहीं ले सकता है। वह केवल राज्य विधानसभा के बहुमत दल के नेता को ही मुख्यमन्त्री नियुक्त कर सकता है। अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति वह मुख्यमन्त्री के परामर्श से करता है।

प्रश्न 19.
राज्यपाल के क्या अधिकार हैं?
उत्तर-
राज्यपाल को अनेक वैधानिक, कार्यकारी, धन सम्बन्धी तथा न्यायिक अधिकार प्राप्त हैं।

  1. वह मन्त्रिपरिषद् का गठन करता है तथा राज्य लोक-सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति करता है।
  2. वह राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित बिलों को स्वीकृति दे कर कानून बनाता है तथा अप्रैल से पूर्व वित्तमन्त्री से बजट पेश करवाता है।
  3. वह उच्च न्यायालयों के जजों की नियुक्ति में राष्ट्रपति को सलाह देता है।
  4. वह अपने विवेकानुसार किसी बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित रख सकता है।
  5. वह राष्ट्रपति को राज्य में शासन-तन्त्र की विफलता की सूचना अपने विवेकानुसार दे सकता है।

प्रश्न 20.
राज्य की व्यवस्थापिका में वित्तीय-विधेयक किस प्रकार पारित होता है?
उत्तर-
वित्तीय विधेयक मन्त्रियों द्वारा रखे जाते हैं। ये विधेयक केवल विधानसभा में पेश किए जा सकते हैं। जिन राज्यों में दो सदन होते हैं, वहां विधानसभा से पारित होने के बाद विधेयक विधान परिषद् में भेजा जाता है। विधान परिषद् इसे चौदह दिन तक रोक सकती है। तत्पश्चात् यह विधेयक को विधानसभा को सुझावों या बिना सुझावों के भेज देती है। विधानसभा इन सुझावों को अस्वीकार भी कर सकती है। इस प्रकार पारित विधेयक राज्यपाल की अनुमति के लिए भेजा जाता है। राज्यपाल की अनुमति मिलने पर विधेयक कानून बन जाता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(i) ज्वालामुखी

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 5(i) ज्वालामुखी Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 5(i) ज्वालामुखी

PSEB 11th Class Geography Guide ज्वालामुखी Textbook Questions and Answers

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
ज्वालामुखी की परिभाषा दें।
उत्तर-
यह धरातल पर एक गहरा छेद होता है, जिसके द्वारा धरती के नीचे से गर्म गैसें, तरल और ठोस पदार्थ बाहर. . निकलते हैं।

प्रश्न 2.
ज्वालामुखी क्रियाओं के क्या कारण हैं ?
उत्तर-

  1. भू-गर्भ में उच्च-ताप
  2. भीतरी लावे के भंडार।

प्रश्न 3.
ज्वालामुखी कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-

  • सक्रिय ज्वालामुखी
  • शांत ज्वालामुखी
  • मृत ज्वालामुखी।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(i) ज्वालामुखी

प्रश्न 4.
ज्वालामुखी करेटर क्या होता है ? इसका निर्माण कैसे होता है ?
उत्तर-
ज्वालामुखी के मुँह के ऊपर बने हुए खड्डे को करेटर कहते हैं। यह कटोरे के समान कीप आकार का होता है। लगातार विस्फोट के कारण इसका आकार बड़ा हो जाता है।

प्रश्न 5.
कैलडरा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
विशाल करेटर को कैलडरा कहते हैं।

प्रश्न 6.
बैथोलिथ और लैकोलिथ में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
बैथोलिथ का अर्थ है-लावे का भंडार। ये धनुष के आकार के होते हैं। इसे छत्र भी कहते हैं। जब काफी गहराई पर लावा एक गुंबद आकार में जम जाता है, तो उसे बैथोलिथ कहते हैं। एक-दूसरे के समानांतर जमाव को लैकोलिथ कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(i) ज्वालामुखी

प्रश्न 7.
गीज़र और वाष्प द्वार (Fumards) में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर-
फव्वारे के समान उछलकर अपने-आप निकलने वाले गर्म पानी के चश्मे को गीज़र (Geyser) कहते हैं। धरती की पपड़ी के सुराख में से धुआँ, गैस और जल वाष्प के बाहर निकलने को वाष्प द्वार (Fumarols) कहते हैं।

प्रश्न 8.
विस्फोट के समय की सीमा के आधार पर ज्वालामुखियों को कितने भागों में बाँटा जा सकता है ?
उत्तर-

  • हवाईयन विस्फोट
  • सटरोंबोलीयन विस्फोट
  • वोलकेनीयन विस्फोट
  • पेलीनीयन विस्फोट।

प्रश्न 9.
ज्वालामुखी विस्फोट के समय निकलने वाले पदार्थों के नाम लिखें।
उत्तर-

  • जल वाष्प और गैसें।
  • मैगमा और लावा।
  • ठोस पदार्थ-राख, धूल कण, लैपीली।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(i) ज्वालामुखी

प्रश्न 10.
विश्व में ज्वालामुखियों के क्षेत्रीय विभाजन का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. विश्व के अधिकतर ज्वालामुखी पेटियों (Belts) में मिलते हैं।
  2. अधिकतर ज्वालामुखी कमज़ोर क्षेत्रों में मिलते हैं।
  3. ज्वालामुखी आमतौर पर भूकंप की पेटियों के साथ-साथ मिलते हैं।
  4. अधिकतर ज्वालामुखी समुद्र के निकट या द्वीपों पर मिलते हैं।
  5. ज्वालामुखी मोड़दार पहाड़ी प्रदेशों में या दरारों के निकट मिलते हैं।

विश्व के ज्वालामुखी क्षेत्र (Volcanic Zones of the world) – विश्व में भूकंप कुछ विशेष क्षेत्रों में ही आते हैं। अधिकतर भूकंप उन क्षेत्रों में आते हैं, जहाँ नवीन बलदार पर्वत मिलते हैं। इसके अतिरिक्त ज्वालामुखी क्षेत्रों में भी भूकंप उत्पन्न होते हैं। भूकंप-क्षेत्र अग्रलिखित हैं-

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(i) ज्वालामुखी 1

1. प्रति-प्रशांत महासागर तटीय पेटी (Circum Pacific Belt)–यह पेटी प्रशांत महासागर के चारों तरफ के तटीय भागों में फैली हुई है। यह ज्वालामुखी क्षेत्रों की प्रमुख पेटी है, जिसे प्रशांत महासागर का अग्निचक्र (Pacific Ring of Fire) कहते हैं। इस पेटी में विश्व के लगभग दो-तिहाई भूकंप उत्पन्न होते हैं। जापान, अलास्का (Alaska), कैलीफोर्निया (California), मैक्सिको और चिली (Chile) इसके प्रमुख क्षेत्र हैं। जापान में वर्ष-भर में लगभग 1500 भूकंप आते हैं।

2. मध्यवर्ती विश्व-पेटी (Mid-World Belt)-यह पेटी यूरोप और एशिया की पश्चिम-पूर्व दिशा में बलदार पर्वतों में स्थित है। इस पेटी के अंतर्गत अल्पस (Alps), कॉकेसस (Caucasus), हिमालय पर्वतमाला और पूर्वी द्वीप समूह आते हैं।

Geography Guide for Class 11 PSEB ज्वालामुखी Important Questions and Answers

लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
ज्वालामुखी क्रियाओं के कारण बताएँ।
उत्तर-
ज्वालामुखी क्रियाओं के कारण (Causes of Volcanic Activity) ज्वालामुखी क्रिया एक रहस्यमयी घटना है। ज्वालामुखी का संबंध धरती के भीतरी भाग (Interior) से है। इसकी कार्यशीलता के कई कारण हैं-

1. धरती के भू-गर्भ में बढ़ता तापमान-धरती के भीतरी भाग की ओर जाने पर प्रति 32 मीटर के बाद 1°C तापमान बढ़ जाता है। 90 कि०मी० की गहराई पर तापमान इतना बढ़ जाता है कि चट्टानें ठोस अवस्था में नहीं रह सकतीं। अनेक रेडियो-एक्टिव (Radio-active) खनिजों के कारण भी तापमान अधिक होता है। इतने अधिक तापमान के कारण चट्टानें अति गर्म (Super heated) हो जाती हैं, परन्तु बाहरी भू-तल के दबाव के कारण वे पिघलती नहीं। जैसे ही ऊपरी दबाव कम होता है, चट्टानें पिघलकर द्रव्य रूप (Lava) में बदल जाती हैं और यह लावा बाहर की ओर बढ़ने लगता है।

2. लावे का भंडार-धरती के नीचे लावे का एक भंडार है, जिससे लावे की प्राप्ति होती है।

3. भीतरी वाष्प-धरती के नीचे का पानी भाप बन जाता है और वह वाष्प और गैसों के ज़ोर से चट्टानों को तोडकर बाहर निकलता है। जिस प्रकार सोडा-वाटर की बोतल खोलते ही गैस के साथ-साथ कुछ सोडा-वाटर भी बाहर निकल आता है। समुद्र के निकट यह क्रिया अधिक होती है।

4. कमजोर भू-भागों का होना-कमज़ोर भू-भागों में किसी भीतरी हलचल से चट्टानें आसानी से टूट जाती हैं और विस्फोट होता है। हलचल के कारण दबाव कम होता है और लावा ऊपर उठता है और बाहर निकलता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(i) ज्वालामुखी

प्रश्न 2.
ज्वालामुखी विस्फोट से निकलने वाले पदार्थ बताएँ।
उत्तर-
ज्वालामुखी विस्फोट के समय तीन प्रकार के पदार्थ-ठोस, तरल और गैसीय-बाहर निकलते हैं।

1. ठोस पदार्थ (Solid Material) ज्वालामुखी विस्फोट के समय बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े बाहर निकलते हैं। लावे के ठोस पिंडों को ज्वालामुखी बम (Bomb) कहते हैं। छोटे टुकड़ों को बरेसिया (Breccia) और लैपीली (Lapilli) कहते हैं। इसके अतिरिक्त बारीक राख (Cinder, ash, Pumice, tuff) भी बड़ी मात्रा में निकलती है।

2. तरल पदार्थ (Liquid Material)—ज्वालामुखी से निकलने वाला महत्त्वपूर्ण तरल पदार्थ लावा (Lava) होता है। यह सिलिका की मात्रा के आधार पर दो प्रकार का होता है-

i) तेजाबी लावा (Acid Lava)-इसमें सिलिका (Silica) की मात्रा 75% से अधिक होती है। यह गाढ़ा होता है और अधिक तापमान पर पिघलता है। यह धीरे-धीरे और थोड़ी दूरी तक बहता है। यह पीले रंग का होता है।

ii) बेसिक लावा (Basic Lava) इसमें सिलिका की मात्रा 60% से कम होती है। यह जल्दी ही पिघल जाता है और दूर तक फैल जाता है। हवाई द्वीप (Hawai islands) के ज्वालामुखी से बेसिक लावा निकलता है। यह काले रंग का होता है।

3. गैसीय पदार्थ (Gaseous Material) ज्वालामुखी से बाहर निकलने वाले गैसीय पदार्थों में जल वाष्प, भाप (Steam), सल्फर, हाइड्रोजन, कार्बन-डाइऑक्साइड, क्लोरीन आदि गैसें मिलती हैं। जलवाष्प के वायुमंडल के संपर्क में आने पर बहुत ज़ोर से वर्षा होती है। इन गैसों के कारण लपटें निकलती हैं। अलास्का को दस हज़ार ज्वालाओं की घाटी (Valley of Ten thousand smokes) कहते हैं।

प्रश्न 3.
ज्वालामुखी के अलग-अलग प्रकारों का वर्णन करें।
उत्तर-
ज्वालामुखी के प्रकार (Types of Volcanoes) विश्व में अनेक प्रकार के ज्वालामुखी मिलते हैं। अलग-अलग पदार्थों के कारण इनके आकार भी भिन्न बन जाते हैं। विस्फोट के आधार पर ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं-

1. सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcanoes)—ये वे ज्वालामुखी हैं, जिनमें समय-समय पर विस्फोट होता रहता है। विश्व में लगभग 600 सक्रिय ज्वालामुखी हैं। सिसली द्वीप में ऐटना (Etna) ज्वालामुखी 2500 वर्षों से सक्रिय है। खाड़ी बंगाल में अंडमान द्वीप के पूर्व में बैरन द्वीप (Barren Island) ही केवल एक सक्रिय ज्वालामुखी है। इस ज्वालामुखी का व्यास 2 कि०मी० और ऊँचाई 27 मीटर है। इसके मुख से गंधक और गैसें निकलती हैं। हवाई द्वीप का मेना लोआ सबसे अधिक सक्रिय ज्वालामुखी है।

2. शांत ज्वालामुखी (Dormant Volcanoes)—ये ऐसे ज्वालामुखी हैं, जो लंबे समय तक शांत रहने के बाद अचानक सक्रिय हो जाते हैं। इटली में वैसुवीयस (Vesuvious) ज्वालामुखी कई वर्षों तक शांत रहने के बाद सन् 1976 में अचानक फूट पड़ा। इसमें पोंपअई (Pompeii), हरक्यूलेनियम (Herculaneum) आदि नगर लावे के नीचे दब गए। इसी प्रकार कराकटोआ ज्वालामुखी सन् 1833 में अचानक फूट पड़ा।

3. मृत ज्वालामुखी (Extinct Volcanoes)—ये ऐसे ज्वालामुखी हैं, जो पूरी तरह से ठंडे हो चुके हैं। इनका मुख मिट्टी, लावा आदि के जमाव से बंद हो गया है। आमतौर पर इनके मुख पर झीलें होती हैं। म्याँमार का पोपा (Popa) और ईरान का कोह सुल्तान (Koh Sultan) ज्वालामुखी इसी प्रकार के हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(i) ज्वालामुखी

प्रश्न 4.
ज्वालामुखी विस्फोट के प्रकार बताएँ।
उत्तर-
ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)-ज्वालामुखी विस्फोट दो प्रकार का होता है-
1. केंद्रीय विस्फोट (Central Eruption)—यह विस्फोट किसी केंद्रीय छेद के द्वारा धमाके और गड़गड़ाहट के साथ होता है। शिलाखंडों की बौछार के साथ लावा बाहर निकलता है। जापान का फ्यूज़ीयामा और इटली का वैसुवीयस इसके उदाहरण हैं।

2. दरारी विस्फोट (Fissure Eruption)-जब लावा धरातल पर पड़ी अनेक दरारों से निकलकर चारों तरफ फैल जाता है, तो यह विस्फोट होता है। ये विस्फोट आमतौर पर शांत होते हैं। ये विस्फोट पठारों का निर्माण करते हैं जैसे भारत का लावा प्रदेश और आइसलैंड में लाकी (Laki) प्रदेश।

प्रश्न 5.
ज्वालामुखी के लाभ बताएँ।
उत्तर-
ज्वालामुखी के लाभ (Advantages of Volcanoes)-ज्वालामुखी विस्फोटों से कई लाभ होते हैं और अनेक हानियाँ भी होती हैं। आज के समय में ज्वालामुखियों को प्रकृति के सुरक्षा वाल्व (Safety valves of nature) कहते हैं।

लाभ (Advantages)-

  1. ज्वालामुखी के कारण धरातल पर नए पर्वतों और नए पठारों का जन्म होता है।
  2. ज्वालामुखी के लावे से बनी मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है, जैसे भारत में काली मिट्टी का प्रदेश कपास की खेती के लिए आदर्श है।
  3. ज्वालामुखी विस्फोट से कई खनिज प्राप्त होते हैं, जैसे गंधक, चांदी आदि।
  4. ज्वालामुखी प्रदेशों में गर्म पानी के चश्मों में स्नान करने से त्वचा के कई रोग दूर हो जाते हैं।
  5. ज्वालामुखी के गढों (craters) में झीलें बन जाती हैं, जिनमें से कई नदियाँ निकलती हैं।
  6. लावा के जमाव से बनी चट्टानें भवन-निर्माण के लिए उपयोगी होती हैं।
  7. ज्वालामुखी क्षेत्रों में देखने योग्य दृश्य बन जाते हैं।
  8. ज्वालामुखी से धरती की भीतरी हालत का पता चलता है।
  9. आइसलैंड के गर्म चश्मों के पानी से खाना बनाने और कपड़े धोने का काम लिया जाता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 5(i) ज्वालामुखी

निबंधात्मक प्रश्न । (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
ज्वालामुखियों का वर्गीकरण करें। विस्फोट के समय की सीमा के आधार पर ज्वालामुखियों को। कितने भागों में बाँटा जा सकता है ?
उत्तर
ज्वालामुखियों का वर्गीकरण (Classification of Volcanoes)-
केंद्रीय प्रकार के विस्फोट के समय निकला लावा, राख आदि शंकु आकार (Conical) ज्वालामुखियों की रचना करते हैं। ये ज्वालामुखी अनेक प्रकार के होते हैं। ज्वालामुखियों का वर्गीकरण (Classification) क्रियाशीलता और विस्फोट के आधार पर किया जाता है, जिनका उल्लेख आगे किया गया है

I. क्रियाशीलता पर आधारित वर्गीकरण (Classification Based on Activity)-
क्रियाशीलता के आधार पर ज्वालामुखी नीचे लिखे तीन प्रकार के होते हैं-

1. सक्रिय ज्वालामुखी (Active Volcanoes)—इन ज्वालामुखियों में विस्फोट थोड़े-थोड़े समय के बाद होता रहता है अर्थात् समय-समय पर इनमें से लावा, गैसें आदि निकलती रहती हैं। इन्हें सक्रिय ज्वालामुखी कहकर पुकारा जाता है। दक्षिणी अमेरिका के देश एक्वाडोर (Ecuador) का कोटोपैक्सी (Cotopaxi) ज्वालामुखी सर्वोच्च सक्रिय ज्वालामुखी है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 600 मीटर है। सिसली (Sicily) का ऐटना (Etna) ज्वालामुखी पिछले कई वर्षों से सक्रिय है।

2. शांत ज्वालामुखी (Dormant Volcanoes) जो ज्वालामुखी अधिक समय तक शांत रहने के बाद अचानक जागृत हो जाते हैं, उन्हें शांत ज्वालामुखी कहते हैं। इस प्रकार के ज्वालामुखियों के विस्फोट में अक्सर लंबे समय का अंतर रहता है। इटली का वैसुवीयस (Vesuvius) ज्वालामुखी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। 79 ई० में इस ज्वालामुखी के विस्फोट के फलस्वरूप उस समय के दो प्रसिद्ध नगर पोंपञई (Pompei) और हरक्यूलेनियम (Herculaneum) इसकी गर्म राख के नीचे दबकर पूर्ण रूप से नष्ट हो गए थे। उस समय यह ज्वालामुखी पिछले सात सौ वर्षों से शांत था।

3. मृत ज्वालामुखी (Extinct Volcanoes)—कुछ ऐसे ज्वालामुखी भी हैं, जो पहले कभी एक-दो बार फटे थे, परंतु उसके बाद से वे पूर्ण रूप से शांत हैं। अब उनके विस्फोट की कोई संभावना नहीं है। इन्हें मृत ज्वालामुखी कहते हैं। बर्मा (म्यांमार) का माऊंट पोपा (Mount Popa) इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

II. विस्फोट के आधार पर वर्गीकरण (Classification Based on Nature of Eruptions)-

ज्वालामुखियों का वर्गीकरण विस्फोट के स्वभाव के आधार पर नीचे दिया गया है-

1. हवाईयन प्रकार (Hawaian Type)-इस प्रकार के ज्वालामुखियों में जोरदार विस्फोट कम ही होते हैं। इनमें से पतला लावा शांतमयी ढंग से धीरे-धीरे निकलता है, जोकि एक विस्तृत क्षेत्र में फैल जाता है। लावे के निकलने के समय, कभी-कभी तीव्र गति से प्रवाहित होती हुई हवा लावे को धागों के रूप में उड़ाती है। धागे के समान इन पतली लावा आकृतियों को हवाई की अग्नि देवी पैले (Pele) के नाम पर पैले के बाल (Pele’s Hair) कह कर संबोधित किया जाता है। हवाई द्वीप के प्रमुख ज्वालामुखी मोना लोआ (Mauna Loa) और किलाओ (Kilauea) इसके सबसे उत्तम उदाहरण हैं।

2. सटरोंबोलीयन प्रकार (Strombolian Type)-इस प्रकार के ज्वालामुखियों का नामकरण भू-मध्य सागर में सिसली द्वीप के उत्तर में स्थित लीपेरी द्वीप समूह (Lipari Islands) के सटरोंबोलीयन ज्वालामुखी के नाम पर किया गया है। विस्फोट के बाद इसमें से लेपीली (Lapilli), प्यूमिका (Pumica), एकोरिया (Acoria), बम (Bomb) आदि पदार्थ बाहर निकलते हैं। सटरोंबोली जैसे ज्वालामुखियों में से निरंतर रूप में निकास होता रहता है। इसी कारण सटरोंबोली ज्वालामुखी को रोम सागर का प्रकाश गृह (Light house of Mediterranean) के नाम से संबोधित करते हैं।

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3. वोलकेनीयन प्रकार (Volcanian Type)-
इस प्रकार के ज्वालामुखियों का नाम सटरोंबोलीयन के निकट स्थित वोलकेनो के नाम पर रखा गया है। इसमें से निकलने वाला लावा बहुत गाढ़ा होता है। ज्वालामुखी के ऊपर भाप के घने बादल छा जाते हैं जो कि गोभी के फूल (like Cauliflower) की आकृति धारण कर लेते हैं। पेलीनियन प्रकार (Palenean Type)-पेले पश्चिमी द्वीप समूह (West Indies) का ज्वालामुखी है। इसमें भयंकर प्रकार के विस्फोट होते हैं। विस्फोट के समय बड़ी मात्रा में शिलाखंड, राख और गैसें बाहर निकलती हैं, जिससे आकाश अत्यंत धूलमय हो जाता है। इस तरह के ज्वालामुखियों में इतना भयंकर विस्फोट होता है कि आरंभिक ज्वालामुखी (craters) नष्ट हो जाते हैं और विस्फोट के स्थान पर केलडेरा (Caldera) बन जाते हैं।

5. वैसवीयस प्रकार (Vesuvius Type)-इस प्रकार के ज्वालामुखियों में निकलने वाला लावा अधिक गैस युक्त होता है जिससे विस्फोट होता है। ऊँची उठती हुई गैसों के साथ मिट्टी, राख, विखंडित शिलाओं के टुकड़े आदि भी प्रमुख मात्रा में ऊपर उठते हैं। इंडोनेशिया के क्राकटोआ (Krakatoa) ज्वालामुखी का जो विस्फोट सन् 1883 ई० में हुआ था, उसमें से निकली राख आकाश के ऊपर लगभग 6 महीने तक लटकती अवस्था में पड़ी रही।

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प्रश्न 2.
ज्वालामुखी विस्फोट के समय निकलने वाले पदार्थों के नाम लिखें।
उत्तर-
ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)—ज्वालामुखी विस्फोट दो प्रकार का होता है-
1. केंद्रीय विस्फोट (Central Eruption)—यह विस्फोट किसी केंद्रीय छेद के द्वारा धमाके और गड़गड़ाहट से होता है। शिलाखंडों की बौछार के साथ लावा बाहर निकलता है। जापान का फ्यूज़ीयामा और इटली का वैसुवीयस विस्फोट इस प्रकार के उदाहरण हैं।

2. दरारी विस्फोट (Fissure Eruption) जब लावा धरती पर पड़ी अनेक दरारों से निकलकर चारों तरफ फैल जाता है, तो इस विस्फोट को दरारी विस्फोट कहते हैं। ये विस्फोट आमतौर पर शांत होते हैं। ये विस्फोट पठारों का निर्माण करते हैं, जैसे भारत का लावा प्रदेश और आईसलैंड में लाकी (Laki) प्रदेश।

ज्वालामुखी विस्फोट से निकलने वाले पदार्थ (Materials of Volcanic Eruptions)-

ज्वालामुखी विस्फोट के समय भू-गर्भ से जो गर्म चट्टानें और गैसें बाहर निकलती हैं, इनका सांझा नाम मैगमा (Magma) है। ज्यों-ज्यों मैगमा भू-तल की ओर आता है, तो गैसें अलग हो जाती हैं, बाकी भाग को लावा (Lava) कहते हैं। विस्फोट के समय तीन प्रकार के पदार्थ बाहर निकलते हैं-ठोस, तरल और गैसीय।

1. ठोस पदार्थ (Solid Material)-ज्वालामुखी विस्फोट के समय बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े बाहर निकलते हैं। लावे के ठोस पिंडों को ज्वालामुखी बम (Bomb) कहते हैं, जो बंदूक की गोली के समान नीचे गिरते हैं। ये लावे के जम जाने के कारण बनते हैं। छोटे टुकड़ों को बरेसिया (Breceia) और लैपीली (Lapilli) कहते हैं। इसके अतिरिक्त बारीक राख (Cinder, ash, Pumice, tuff) भी बड़ी मात्रा में निकलती है। 27 अगस्त, 1883 को क्राकटोआ (Krakatoa) द्वीप के विस्फोट के समय निकलने वाली राख (Dust) तीन साल तक वायुमंडल में रही और इसने धरती के तीन चक्कर लगाए और वायुमंडल में 25 किलोमीटर की ऊँचाई तक पहुँची।

2. तरल पदार्थ (Liquid Material)-ज्वालामुखी से निकलने वाला महत्त्वपूर्ण तरल पदार्थ लावा (Lava) होता है। यह सिलीका की मात्रा के आधार पर दो प्रकार का होता है-

1. तेजाबी लावा (Acid Lava) इसमें सिलीका (Silica) की मात्रा 75% से अधिक होती है। यह गाढ़ा होता है और अधिक तापमान पर पिघलता है। यह धीरे-धीरे और थोड़ी दूरी तक बहता है। यह पीले रंग का होता है।

2. बेसिक लावा (Basic Lava)—इसमें सिलीका की मात्रा 60% से कम होती है। यह जल्दी ही पिघल जाता है और दूर तक फैल जाता है। हवाई द्वीप (Hawai Island) के ज्वालामुखी से बेसिक लावा निकलता है। यह काले रंग का होता है।

3. गैसीय पदार्थ (Gaseous Material)-दूर से ऐसा लगता है, जैसे ज्वालामुखी से आग की लपटें (ज्वाला) निकलती हों, इसीलिए इसे ज्वालामुखी कहते हैं। ज्वालामुखी से बाहर निकलने वाले गैसीय पदार्थों में जलवाष्प, भाप (Steam), सल्फर, हाइड्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, क्लोरीन आदि गैसें मिलती हैं। जलवाष्प के वायुमंडल के संपर्क में आने से बहुत ज़ोर से वर्षा होती है। इन गैसों के कारण लपटें निकलती हैं। फटने के समय लपटें उठती हुई दिखाई देती हैं। अलास्का को दस हज़ार ज्वालाओं की घाटी (Valley of Ten thousand smokes) कहते हैं। जावा (Java) में जहरीली गैसों की एक घाटी है, जिसे मौत की घाटी (Valley of Death) कहते हैं। बहुत तेज़ वर्षा के बाद ज्वालामुखी से कीचड़ (Mud) भी निकलता है।

प्रश्न 3.
विश्व में ज्वालामुखियों के क्षेत्रीय विभाजन का वर्णन करें।
उत्तर-
ज्वालामुखियों का विभाजन (Distribution of Volcanoes)-

  1. विश्व के अधिकतर ज्वालामुखी पेटियों (Belts) में मिलते हैं।
  2. अधिकतर ज्वालामुखी कमज़ोर क्षेत्रों में मिलते हैं।
  3. ज्वालामुखी आमतौर पर भूकंप की पेटियों के साथ-साथ मिलते हैं।
  4. अधिकतर ज्वालामुखी समुद्र के निकट या द्वीपों पर मिलते हैं।
  5. ज्वालामुखी मोड़दार पहाड़ी प्रदेशों में या दरारों के निकट मिलते हैं।

विश्व के ज्वालामुखी क्षेत्र (Volcanic Zones of the world) – विश्व में भूकंप कुछ विशेष क्षेत्रों में ही आते हैं। अधिकतर भूकंप उन क्षेत्रों में आते हैं, जहाँ नवीन बलदार पर्वत मिलते हैं। इसके अतिरिक्त ज्वालामुखी क्षेत्रों में भी भूकंप उत्पन्न होते हैं। भूकंप-क्षेत्र अग्रलिखित हैं-

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1. प्रति-प्रशांत महासागर तटीय पेटी (Circum Pacific Belt)–यह पेटी प्रशांत महासागर के चारों तरफ के तटीय भागों में फैली हुई है। यह ज्वालामुखी क्षेत्रों की प्रमुख पेटी है, जिसे प्रशांत महासागर का अग्निचक्र (Pacific Ring of Fire) कहते हैं। इस पेटी में विश्व के लगभग दो-तिहाई भूकंप उत्पन्न होते हैं। जापान, अलास्का (Alaska), कैलीफोर्निया (California), मैक्सिको और चिली (Chile) इसके प्रमुख क्षेत्र हैं। जापान में वर्ष-भर में लगभग 1500 भूकंप आते हैं।

2. मध्यवर्ती विश्व-पेटी (Mid-World Belt)-यह पेटी यूरोप और एशिया की पश्चिम-पूर्व दिशा में बलदार पर्वतों में स्थित है। इस पेटी के अंतर्गत अल्पस (Alps), कॉकेसस (Caucasus), हिमालय पर्वतमाला और पूर्वी द्वीप समूह आते हैं।

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प्रश्न 4.
ज्वालामुखी की परिभाषा दें। इसके कारण बताएँ।
उत्तर-
ज्वालामुखी (Volcanoes)-भू-पटल में वह छेद (Vent), जिसमें से द्रव्य, लावा, गैस, चट्टानीय टुकडे, राख आदि पदार्थ भू-तल पर प्रकट होते हैं, उसे ज्वालामुखी (Volcanoes) कहते हैं।

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ज्वालामुखी (Volcano)–धरातल पर एक गहरा छेद होता है, जिसके द्वारा धरती के नीचे से गर्म गैसें, तरल और ठोस पदार्थ बाहर निकलते हैं। अंग्रेजी भाषा का ‘Volcano’ शब्द रोमन शब्द ‘Vulcan’ से बना है, जिसका अर्थ है’अग्नि देवता’। यही कारण है कि आज भी जापान में फ्यूज़ीयामा ज्वालामुखी की पूजा की जाती है। हिमाचल में भी ज्वालामुखी स्थल को पवित्र मानकर लोग उसकी पूजा करते हैं। ज्वालामुखी के तीन भाग होते हैं-

  1. छेद (Vent)
  2. ज्वालामुखी नली (Volcanic Pipe)
  3. ज्वालामुखी कुंड (Crater)

ज्वालामुखी की रचना (Formation of a Volcano)—पहले भीतरी हलचल के कारण धरती की किसी कमज़ोर परत के एक छेद के द्वारा बाहर निकलने वाले पदार्थ आस-पास जम जाते हैं और एक शंकु (Cone) का निर्माण करते हैं। इसकी ऊँचाई जमाव के कारण निरंतर बढ़ती जाती है। ऐसे भू-आकार को ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic Mountain) कहते हैं।

ज्वालामुखी क्रियाओं के कारण (Causes of Volcanic Activities)–ज्वालामुखी क्रिया एक रहस्यमयी घटना है। ज्वालामुखी का संबंध धरती के भीतरी भाग (Interior) से है। इसकी कार्यशीलता के कई कारण हैं

1. धरती के भू-गर्भ में तापमान की अधिकता (Increase in temperature of Inner Earth)-धरती के भीतरी भाग की ओर जाने से प्रति 32 मीटर 1°C तापमान बढ़ जाता है। 90 कि०मी० की गहराई पर तापमान इतना बढ़ जाता है कि चट्टानें ठोस हालत में नहीं रह सकतीं। अनेकों रेडियो-एक्टिव (Radio Active) खनिजों के कारण भी ताप बढ़ जाता है। इतने अधिक ताप के कारण चट्टानें अति गर्म (Super heated) हो जाती हैं, परंतु बाहरी भूमि तल के दबाव के कारण वे पिघलती नहीं। जैसे ही ऊपरी दबाव कम होता है, चट्टानें पिघलकर द्रव्य रूप (Lava) में बदल जाती हैं और यह लावा बाहर की ओर बढ़ने लगता है।

2. भू-पटल के भीतर दबाव की कमी होना (Decrease in Pressure upon the Interior of Earth’s crust)-भू-पटल की ऊपरी परतों के दबाव के कारण भीतरी पदार्थ पूर्ण रूप से द्रव्य नहीं होते क्योंकि यह दबाव इन पदार्थों का द्रव्य-अंक (Melting Point) ऊँचा कर देता है। पर जब कभी दरारों (Faulting) और अपरदन से ऊपरी परतों का दबाव कम हो जाता है, तो भीतरी पदार्थ द्रव्य बनकर बाहर निकलने का यत्न करते हैं जिसके कारण ज्वालामुखी विस्फोट होता है।

3. गैसों का दबाव (Pressure of Gases)-भूमिगत जल प्रवाह की अधिकता के कारण वाष्प अधिक मात्रा में बनती है। यह क्रिया अधिकतर सागरों के निकट होती है। यह वाष्प लावे पर दबाव डालती है, फलस्वरूप लावा बाहर निकलना प्रारंभ हो जाता है। कई बार वाष्प अपना दबाव डालकर भू-पटल के कमज़ोर भागों से धमाका करके बाहर निकल आती है, जिस कारण द्रव्य लावे को भू-तल पर प्रकट होने के लिए मार्ग मिल जाता है।

प्रश्न 5.
ज्वालामुखी के बाहरी स्वरूप का वर्णन करें।
उत्तर-
ज्वालामुखी स्वरूप : बहिर्वेधी (Volcanic Forms : Extrusive) –
वे सभी क्रियाएँ, जो भू-गर्भ से निकलने वाले लावे और उसके द्वारा बनी भू-आकृतियों से संबंध रखती हैं, ज्वालामुखी क्रियाएँ (Volcanicity) कहलाती हैं। जब भू-गर्भ के पदार्थ भू-तल पर आकर अलग-अलग स्वरूपों में प्रकट होते हैं, तो इस क्रिया को बाहरी क्रिया कहा जाता है। इस क्रिया के स्वरूप आगे लिखे हैं-

1. ज्वालामुखी या लावा पठार (Volcanic or Lava Plateau)-ज्वालामुखी विस्फोट के समय जब इसमें से निकलने वाले लावे में यदि सिलीका की मात्रा कम हो, तो यह पतला होता है, परिणामस्वरूप वह दूरदूर तक फैल जाता है। इससे इसका आधार विस्तृत और ऊँचाई कम होती है। इसे लावा पठार कहते हैं, जैसे प्रायद्वीप भारत का दक्कन ट्रैप (Decean Trap)।

2. ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic Mountain)-जिस छेद से लावा, गैसें आदि भू-तल पर प्रकट होती हैं, तो उस ज्वालामुखी छेद के चारों तरफ अंदर से निकलने वाले गाढ़े (Thick) पदार्थ के एकत्र होने से एक शंकु (Cone) बन जाता है, जो कुछ समय बाद बड़ा होकर पर्वत का रूप धारण कर लेता है। इसे ज्वालामुखी पर्वत कहते हैं। अफ्रीका का किलीमंजारो, जापान का फ्यूज़ीयामा, दक्षिणी अमेरिका का ऐकोंकागुआ (Aconcagua) ऐसे ही पर्वत हैं।

3. फिशर प्रवाह (Fissure Flow)-इसमें लावे का निकास किसी एक मुख से नहीं होता, बल्कि भू-तल की लंबी दरार में से होता है और लावा एक विस्तृत क्षेत्र में फैल जाता है। 1783 में आईसलैंड का लाकी (Laki) विस्फोट और 1986 में न्यूजीलैंड का तारानेरा (Taranera) विस्फोट इसके विशेष उदाहरण हैं। लाकी में लगभग 30 किलोमीटर और तारानेरा में लगभग 15 किलोमीटर लंबी दरार थी।

4. ऊष्ण चश्मे (Hot Springs)–जब भूमिगत जल पृथ्वी की काफी गहराई में पहुँच जाता है, तो वहाँ बहुत अधिक ऊष्णता के होने के कारण वह जल गर्म हो जाता है और चट्टानों की चौड़ी दरारों से होता हुआ भूतल पर आ जाता है। इसे ऊष्ण स्रोत या चश्मा कहते हैं। हिमाचल प्रदेश में मनाली के निकट ऊष्ण चश्मे और पार्वती घाटी में परिगंगा ऊष्ण स्रोत इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

5. गीज़र (Geyser)—यह भू-तल पर ऊष्ण जल का एक फव्वारा होता है। इसमें जल रुक-रुक कर उछलता है। गीज़र भू-पटल के भीतरी भाग में स्थित किसी जल-भंडार से संबंधित होता है। भू-गर्भ की अत्यधिक गर्मी के कारण इस जल-भंडार का जल बहुत गर्म हो जाता है और उबलने लग जाता है। फलस्वरूप यह फैलता है। फैलने के लिए खुला स्थान न होने के कारण यह भू-पटल की ओर बढ़ता है और फव्वारे के समान ऊपर आकाश की ओर उछलता है। इसे उछाल चश्मा या गीज़र कहा जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में यैलोस्टोन पार्क में दो सौ से अधिक गीज़र हैं।

6. क्रेटर झील (Crater Lake) ज्वालामुखी के ठंडे हो जाने पर कभी-कभी इसके मुख में जल भर जाता है और इस प्रकार वहाँ एक झील बन जाती है। इसे क्रेटर झील कहते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के यैलोस्टोन पार्क की क्रेटर झील इसका प्रमुख उदाहरण है। भारत में महाराष्ट्र की लोनार झील (Lonar Lake) भी इसी प्रकार की झील है।

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7. ज्वालामुखी कुंड या कैलडरा (Caldera)-सक्रिय ज्वालामुखी जब शांत होने लगता है, तो उसके कीप आकार के मार्ग में लावा ठोस हो जाता है, जिसे ज्वालामुखी प्लग (Volcanic Plug) कहते हैं। कुछ समय के बाद जब ज्वालामुखी फिर से सक्रिय होने लगता है, तो उसके कीप आकार के मार्ग के प्लग द्वारा बंद होने के कारण, लावा प्लग सहित ज्वालामुखी के मुख में विस्फोट करके उसे उड़ा देता है। फलस्वरूप नवीन मुख बड़े आकार का बनता है, इसे ज्वालामुखी कुंड कहते हैं। इसका व्यास कई किलोमीटर तक होता है। उदाहरण के तौर पर जापान के कैलडरा को Volcano of Hundred Villages कहते हैं।

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प्रश्न 6.
ज्वालामुखी के भीतरी स्वरूपों का वर्णन करें।
उत्तर-
ज्वालामुखी स्वरूप : अंतर्वेधी (Volcanic Forms : Intrusive)-
भू-गर्भ से भू-तल की ओर आता लावा कभी-कभी मार्ग में ठोस हो जाता है और बाहर नहीं पहुंचता। इससे अंतर्वेधी या पाताली चट्टानों (Intrusive or Plutonic Rocks) का निर्माण होता है। जब लावा मार्ग में ही भू-तल के समानांतर अवस्था में ठोस हो जाता है, तो उसे लावा-चौखट (Sill) और जब लावा लंब और कुछ तिरछी दिशा में ठोस होता है, तो उसे लावा-भित्ती (Dyke) कहते हैं।

ज्वालामुखी की अंतर्वेधी क्रियाओं के कारण नीचे लिखी आकृतियाँ बनती हैं –

1. लैकोलिथ (Lacoliths)-लैकोलिथ शब्द की रचना ‘Laccas’ और ‘Lithas’ के मेल से हुई है। ‘Laccas’ का अर्थ है-भंडार और ‘Lithas’ का अर्थ है-पत्थर। इस प्रकार ‘Laccolith’ का अर्थ है-‘पत्थर के भंडार’। मैगमा से आता हुआ द्रव्य लावा भू-पटल के मध्यवर्ती भागों में अलग-अलग प्रकार की चट्टानों की परतों में प्रवेश कर जाता है और चित्र-लैकोलिथ अपने ऊपर की परतों के दबाव से आधे धनुष के आकार में मोड़ देता है। इसे लैकोलिथ कहा जाता है।

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2. बैथोलिथ (Batholiths)—भू-गर्भ से द्रव्य अवस्था में लावा भू-तल पर आने का यत्न करता है, परन्तु मार्ग न मिलने के कारण भीतरी खाली भागों में भर जाता है और ठोस चट्टानों का रूप धारण कर लेता है। लावा आयतन (Volume) में यदि बड़ा हो, तो इन खोखले स्थानों को द्रवित करके उन्हें बड़े आकार का बना देता है। भू-गर्भ में बने हुए लावे के सबसे चित्र-बैथोलिथ लावा चट्टान बड़े रूप को बैथोलिथ कहा जाता है। यह गुंबद के आकार के होते हैं। इनके किनारे खड़ी ढलान वाले (Steep slope) और नीचे की ओर असीम गहराई तक विस्तृत होते हैं। इनका आधार कभी दिखाई नहीं देता। यह आमतौर पर ग्रेनाइट द्वारा बने होते हैं। भू-पटल के ऊपर की अन्य चट्टानों के अनावरण द्वारा घिसकर समाप्त हो जाने के बाद ये भू-पटल पर दिखाई देते हैं।

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3. राख शंकु (Ash Cone)—ये कम ऊँचे शंकु होते हैं जिनकी रचना धूल और राख से होती है। इनके किनारे अवतल (Concave) ढलान वाले होते हैं। ऐसे शंकु हवाई द्वीप में मिलते हैं। उन्हें Cinder cone भी कहते हैं।

4. शील्ड शंकु (Shield Cones)—इनका निर्माण बेसिक लावा (Basic Lava) से होता है। बेसिक लावा हल्का और पतला होता है। इसमें सिलीका की मात्रा कम होती है। यह लावा दूर तक फैल जाता है। इस प्रकार लंबे और कम ऊँचे शंकु का निर्माण होता है। हवाई द्वीप का मौना लोआ (Mauna Loa) का आधार 112 किलोमीटर चौड़ा है।

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5. गुंबद शंकु (Lava Dome)—इनका निर्माण तेज़ाबी लावे से होता है। यह लावा काफी घना और चिपचिपा होता है। इसमें सिलीका की मात्रा अधिक होती है। यह मुख के निकट ही जल्दी जमकर गुंबद बन जाता है। इस प्रकार तेज़ ढलान वाले ऊँचे शंकु का निर्माण होता है। फ्रांस में पाई-द-डोम (Puy-de-Dome) 1500 मीटर ऊँचा है।

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6. लावा प्लग (Volcanic Plug)-जब शंकु पूरी तरह से नष्ट हो जाता है, तो नली और छेद ठोस लावे से भर जाते हैं। यह नली एक प्लग (Plug) के समान दिखाई देती है; जैसे-संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) में लौसन चोटी ALTH (Lossen Peak).

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7. मिश्रित शंकु (Composite Cone)-ये सबसे ऊँचे और बड़े शंकुओं में गिने जाते हैं। इनका निर्माण लावा, राख और दूसरे पदार्थों की विभिन्न परतों के जमने से होता है। यह जमाव समानांतर परतों में होता है। इटली का सटरोंबोली (Stromboli) इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें हर घंटे के बाद ज्वाला निकलती है। इसे रोम सागर का प्रकाश-गृह (light house of the Mediterranean) भी कहते हैं। जापान का फ्यूज़ीयामा इसका सुंदर उदाहरण है। ढलानों पर बनने वाले छोटे-छोटे | शंकुओं को परजीवी शंकु (Parasitic Cones) कहते हैं। इन्हें छोटे शंकु (Secondary Cones) भी कहते हैं।

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ज्वालामुखी विस्फोट (Volcanic Eruption)–ज्वालामुखी विस्फोट दो प्रकार का होता है-
1. केंद्रीय विस्फोट (Central Eruptions)—यह विस्फोट किसी केंद्रीय छेद के द्वारा धमाके और गड़गड़ाहट से होता है। शिलाखंडों की बौछार के साथ लावा बाहर निकलता है। जापान का फ्यूज़ीयामा और इटली का – वैसुवीयस विस्फोट इसके उदाहरण हैं।

2. दरारी विस्फोट (Fissure Eruption)-जब लावा धरातल पर पड़ी अनेक दरारों से निकलकर चारों ओर फैल जाता है तब यह विस्फोट होता है। ये विस्फोट आम तौर पर शांत होते हैं। ये विस्फोट पठारों का निर्माण करते हैं, जैसे भारत का लावा प्रदेश और आईसलैंड में लाकी (Laki) प्रदेश।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 22 स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 22 स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 22 स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
1924 से 1934 तक के स्वतन्त्रता संघर्ष की मुख्य घटनाओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
1922 में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। श्री चितरंजन दास ने अधिवेशन में यह योजना रखी कि कांग्रेस को परिषदों के चुनावों में भाग लेना चाहिए और सरकार का विरोध करना चाहिए। लेकिन गांधी जी और उनके साथियों के विरोध के कारण यह योजना रद्द कर दी गई। परिणामस्वरूप श्री चितरंजन दास ने कांग्रेस से त्याग-पत्र दे दिया। उन्होंने परिषदों के चुनावों में भाग लेने के लिए एक पृथक् दल की स्थापना की। उस दल का नाम था-स्वराज्य पार्टी। पं० मोती लाल नेहरू ने भी इस . पार्टी के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

1. स्वराज्य पार्टी की गतिविधियां-1919 ई० के एक्ट के अन्तर्गत 1923 ई० में दूसरे चुनाव हुए। स्वराज्य दल ने भी इसमें भाग लिया। उन्होंने विधानसभा की 145 में से 45 सीटें प्राप्त की। इस प्रकार विधानसभा में उनका स्पष्ट बहुमत स्थापित हो गया। चुनावों के पश्चात् स्वराज्य दल ने परिषदों में प्रवेश किया। उन्होंने दोहरी शासन प्रणाली के अन्तर्गत प्रशासन करना असम्भव बना दिया। 21 फरवरी, 1924 ई० को श्री चितरंजन दास ने यह घोषणा की कि वह जब तक बंगाल में अपना मन्त्रिमण्डल नहीं बनायेंगे तब तक संविधान में परिवर्तन नहीं किया जाएगा। इसी प्रकार दूसरे प्रान्तों में भी स्वराज्य दल ने अपनी मांगें जारी रखीं। अन्त में फरवरी, 1924 ई० में एक कमेटी (मुद्दीमेन कमेटी) स्थापित की गई। इस कमेटी का उद्देश्य दोहरे शासन में आई कमियों को दूर करना था।

स्वराज्य पार्टी ने 1924-25 ई० में केन्द्रीय विधानसभा में वित्तीय बिल अस्वीकार कर दिया। इसमें गवर्नर-जनरल को अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करना पड़ा। इसके पश्चात् 1925-26 ई० में उन्होंने कुछ राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग की परन्तु सरकार ने उनकी मांगों की ओर कोई ध्यान न दिया। 1925 ई० के पश्चात् स्वराज्य पार्टी अवनति की ओर जाने लगी। 1926 ई० के चुनावों में स्वराज्यवादियों को अधिक सीटें न मिल सकीं। परिणामस्वरूप स्वराज्य दल का महत्त्व कम होने लगा। अन्ततः स्वराज्य दल और कांग्रेस के अन्य नेता एक बार फिर एक हो गए।

2. साइमन कमीशन-माण्टेग्यू फोर्ड सुधारों (1919) की एक धारा यह भी थी कि 10 वर्ष के पश्चात् यह जांच की जाएगी कि इस अधिनियम के अनुसार शासन ने कितनी प्रगति की है। यह कार्य 1929 में होना था, परन्तु भारतीय जनता तथा नेताओं की बढ़ती हुई बेचैनी को दूर करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने, 1928 में ही एक कमीशन की नियुक्ति कर दी जो अगले वर्ष भारत आया। इस कमशीन को ‘साइमन कमीशन’ कहा जाता है। इस कमीशन में सात सदस्य थे, परन्तु उनमें कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था। इस लिये गान्धी जी तथा कांग्रेस के अन्य नेताओं ने इसका बॉयकाट किया। हर नगर में कमीशन के विरुद्ध जलूस निकाले गये। स्थान-स्थान पर इसे काले झण्डे दिखाए गए और ‘साइमन वापस जाओ’ के नारे लगाए गए। लाहौर में जलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। पुलिस ने इस पर खूब लाठियां बरसाईं। उन्हें काफी चोटें आईं जिसके कारण कुछ ही दिनों पश्चात् उनकी मृत्यु हो गई। क्रान्तिकारी नवयुवकों ने मि० सांडर्स को गोली से उड़ाकर उनकी मृत्यु का बदला लिया। इन क्रान्तिकारियों में भगत सिंह, राजगुरु आदि प्रमुख थे।

3. पूर्ण स्वराज्य की मांग-साइमन कमीशन का प्रत्येक स्थान पर भारी विरोध किया गया था। परन्तु कमीशन ने विरोध के बावजूद अपनी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी। साइमन कमीशन की रिपोर्ट को भारत के किसी भी राजनीतिक दल ने स्वीकार नहीं किया। अत: अंग्रेज़ी सरकार ने भारतीयों को सर्वसम्मति से अपना संविधान तैयार करने की चुनौती दी। इस विषय में भारतीयों ने अगस्त, 1928 ई० में नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत की, परन्तु अंग्रेजी सरकार ने इस रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप भारतीयों की निराशा और अधिक बढ़ गई।

1929 ई० में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में हुआ। यह अधिवेशन भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। पण्डित जवाहर लाल नेहरू इस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये। गांधी जी ने ‘पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव पेश किया जो पास कर दिया गया। 31 दिसम्बर की आधी रात को नेहरू जी ने रावी नदी के किनारे स्वतन्त्रता का तिरंगा झण्डा फहराया। यह भी निश्चित हुआ कि हर वर्ष 26 जनवरी को स्वतन्त्रता दिवस मनाया जाये। 26 जनवरी, 1930 को यह दिन सारे भारत में बड़े जोश के साथ मनाया गया और लोगों ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने की प्रतिज्ञा की। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने सरकारी कानूनों तथा संस्थाओं का बहिष्कार करने की नीति अपनाई।

4. सविनय अवज्ञा आन्दोलन-सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1930 में चलाया गया। इस आन्दोलन का उद्देश्य सरकारी कानूनों को भंग करके सरकार के विरुद्ध रोष प्रकट करना था। आन्दोलन का आरम्भ गान्धी जी ने डांडी यात्रा से किया। 12 मार्च, 1930 ई० को उन्होंने साबरमती आश्रम से अपनी यात्रा आरम्भ की। मार्ग में अनेक लोग साथ मिल गये। 24 दिन की कठिन यात्रा के बाद वे समुद्र तट पर पहुंचे और उन्होंने समुद्र से नमक लाकर नमक कानून भंग किया। इसके बाद सारे देश में लोगों ने सरकारी कानूनों को भंग करना आरम्भ कर दिया। इस आन्दोलन को दबाने के लिए सरकार ने बड़ी कठोरता से काम लिया। हजारों देशभक्तों को जेल में डाल दिया गया। गान्धी जी को भी बन्दी बना लिया गया। यह आन्दोलन फिर भी काफी समय तक चलता रहा। गांधी इरविन समझौते (1931) के बाद गान्धी जी ने दूसरी गोलमेज़ कांफ्रेंस में भाग लिया। परन्तु वापसी पर उन्हें बन्दी बना लिया गया। इस तरह देश में 1934 तक सविनय अवज्ञा आन्दोलन जारी रहा।

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प्रश्न 2.
1935 से 1947 तक के स्वतन्त्रता संघर्ष की मुख्य घटनाओं की चर्चा करें।
उत्तर-
1935 के एक्ट के पश्चात् देश की राजनीति ने नया मोड़ लिया। 1937 में प्रान्तों में चुनाव हुए। कांग्रेस ने 11 में से 8 प्रान्तों में सरकारें स्थापित की। परन्तु द्वितीय महायुद्ध के आरम्भ ने सारी स्थिति ही बदल डाली।

दूसरे महायुद्ध का प्रभाव-1939 में दूसरा महायुद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेजी सरकार ने भारतीय नेताओं से पूछे बिना ही जर्मनी के विरुद्ध भारत के युद्ध में भाग लेने की घोषणा कर दी। इसके विरोध में सभी कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने त्याग-पत्र दे दिए और गांधी जी ने ‘सत्याग्रह’ आरम्भ कर दिया। उन्होंने जनता से कहा-“न दो भाई, न दो पाई।” गांधी जी के इन शब्दों का अर्थ है कि कोई भी भारतीय इस युद्ध में अंग्रेज़ी साम्राज्य की सहायता नहीं करेगा। कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों के त्यागपत्र देने से मुस्लिम लीग के नेता मिस्टर जिन्नाह बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने 22 दिसम्बर, 1939 का दिन ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाया। 1940 में उन्होंने पाकिस्तान की मांग की। दूसरे महायुद्ध में अंग्रेजों की दशा शोचनीय होती चली जा रही थी।

जापान बर्मा तक बढ़ आया था। भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के लिए सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा गया। उन्होंने भारतीय नेताओं से बातचीत की और भारत को ‘डोमीनियन स्टेट्स’ देने की सिफारिश की। यह बात कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों को स्वीकार नहीं थी। कांग्रेस देश की स्वतन्त्रता तुरन्त चाहती थी, परन्तु क्रिप्स के सुझाव में अधिराज्य की व्यवस्था (Dominion Status) थी और वह भी युद्ध के बाद दिया जाना था। अतः गान्धी जी ने इस सुझाव की तुलना एक ऐसे चैक से की जिस पर बाद की तिथि पड़ी हुई है और ऐसे बैंक के नाम पर है जो फेल होने वाला है।

भारत छोड़ो आन्दोलन-जापान के आक्रमण का भय दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। वह हिन्द-चीन को जीत चुका था। उसका अगला निशाना भारत ही था। जापानी लोग अंग्रेजों के कारण ही भारत पर आक्रमण करना चाहते थे। अतः महात्मा गान्धी ने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने का सुझाव दिया और कहा कि हम जापान से अपनी रक्षा स्वयं कर लेंगे। 8 अगस्त, 1942 को बम्बई (मुम्बई) में कांग्रेस ने ‘अंग्रेज़ो ! भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव पास कर दिया। प्रस्ताव की व्याख्या करते हुए गांधी जी ने जनता को ‘करो या मरो’ की बात कही। अगले दिन सरकार ने गांधी जी तथा अन्य नेताओं को बन्दी बना लिया। देश भर में आन्दोलन बड़ी तेज़ी से चला। दुकानदारों, किसानों, मज़दूरों, छात्रों सभी ने जलूस निकाले । सरकारी इमारतों पर तिरंगे झण्ड़े लहरा दिए गए। ‘अंग्रेज़ो, भारत छोड़ो’, ‘गान्धी जी की जय’, ‘टोडी बच्चा हाय हाय’ के नारे से भारत का नगर-नगर गूंज उठा। तोड़-फोड़ भी हुई। आन्दोलन को कुचलने के लिए सरकार ने पूरा जोर लगाया। लाखों लोगों को जेलों में ढूंस दिया गया। सैंकड़ों को गोली से भून दिया गया। लोगों को मार्ग दिखाने वाला कोई भी नेता बाहर नहीं था। फलस्वरूप आन्दोलन शिथिल पड़ गया।

आज़ाद हिन्द फ़ौज-इसी बीच नेता जी सुभाषचन्द्र बोस अंग्रेज़ी सरकार की नज़रों से बचकर भारत से भाग निकले। वे जर्मनी गये और वहां से जापान पहुंचे। वहां उन्होंने जापान द्वारा कैद किए गए भारतीय कैदियों को संगठित किया और आज़ाद हिन्द फ़ौज की कमान सम्भाली। नेता जी इस सेना के बल पर भारत को स्वतन्त्र कराना चाहते थे। उन्होंने भारत पर आक्रमण किया और इम्फाल का प्रदेश जीत लिया, लेकिन इसी बीच जापान की हार हुई जिससे आज़ाद हिन्द फ़ौज की शक्ति भी कम हो गई। कुछ ही समय बाद नेता जी का एक हवाई दुर्घटना में देहान्त हो गया। ब्रिटिश सरकार ने दस हज़ार आज़ाद हिन्द सैनिकों को रंगून में बन्दी बनाया।

सेना के तीन उच्चाधिकारियों शाह नवाज़ खां, प्रेम कुमार सहगल तथा गुरबख्श सिंह ढिल्लों पर राजद्रोह का आरोप लगा कर लाल किले में मुकद्दमा चलाया गया। पण्डित जवाहर लाल नेहरू, भोला शंकर देसाई तथा तेज बहादुर सप्रू ने इनकी वकालत की। 1857 ई० में बहादुरशाह के बाद राजद्रोह के आरोप में चलाया गया यह भारतीय इतिहास का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण मुकद्दमा था। सैनिक अदालत ने अभियुक्तों को आजन्म कारावास की सजा सुनाई। निर्णय सुनते ही जनता में रोष फैल गया और सरकार के विरुद्ध भारी प्रदर्शन हुए। उन दिनों बच्चे-बच्चे की जुबान पर ये शब्द थे’लाल किले से आई आवाज़-सहगल, ढिल्लों शाहनवाज़।” भारतीय सेना में भी विद्रोह की भावना फैल गई। फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और तीनों अभियुक्त छोड़ दिए गए।

कैबिनेट मिशन-दूसरे विश्वयुद्ध के कारण इंग्लैण्ड की आर्थिक दशा काफी खराब हो गई। साथ ही इंग्लैण्ड की सत्ता ‘लेबर पार्टी’ के हाथ में आ गई। नये प्रधानमन्त्री एटली की भारत से काफी सहानुभूति थी। उसने सितम्बर, 1945 में एक ऐतिहासिक घोषणा की जिसमें भारत के स्वाधीनता के अधिकार को स्वीकार किया गया। भारतीयों को सन्तुष्ट करने के लिए ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल के तीन सदस्यों का एक दल भारत आया। इसे ‘कैबिनेट मिशन’ कहा जाता है। इसने भारत को स्वतन्त्रता के लिए योजना पेश की जिसमें यह कहा गया कि भारत एक संघ राज्य रहेगा और सारा देश एक केन्द्र के अधीन तीन खण्डों में बांटा जायेगा। केन्द्र में 14 मन्त्री होंगे जिसमें 6 कांग्रेसी, 5 मुस्लिम लीग के और 3 अन्य होंगे। सभी दलों ने इसे मान लिया। इसी योजना के अनुसार देश भर में संविधान सभा के चुनाव हुए जिसमें 296 सीटों में से मुस्लिम लीग को केवल 73 स्थान प्राप्त हुए। इस चुनाव को देख कर मि० जिन्नाह ने कैबिनेट मिशन योजना अस्वीकार कर दी।

मुस्लिम लीग की सीधी कार्यवाही तथा भारत की स्वतन्त्रता-मुस्लिम लीग ने अपनी पाकिस्तान की मांग दोहराई और सीधी कार्यवाही करने की धमकी दी। 16 अगस्त, 1946 को देश भर में सीधी कार्यवाही दिवस मनाया गया। स्थान-स्थान पर जलूस निकाले गए जिन में यह नारा लगाया गया-मारेंगे, मर जाएंगे पाकिस्तान बनाएंगे। कलकत्ता (कोलकाता) में हज़ारों हिन्दू कत्ल कर दिए गए। हिन्दुओं ने बिहार में मुसलमानों की हत्याएं कीं। यह देश का दुर्भाग्य था कि हिन्दू-मुसलमान इकट्ठे मिलकर न रह सके और सारे देश में साम्प्रदायिक दंगे फैल गए। इन परिस्थितियों में देश के विभाजन का वातावरण तैयार हो गया। ब्रिटिश सरकार ने यह समझ लिया कि कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में समझौता नहीं हो सकता।

नये वायसराय लॉर्ड माऊंटबेटन ने गांधी जी, नेहरू,पटेल और मौलाना आज़ाद से बातचीत की और उन्हें यह समझाया कि साम्प्रदायिक झगड़ों को रोकने के लिए भारत का विभाजन आवश्यक है। नेताओं ने भी देश के वातावरण को देख कर भारत का बंटवारा मान लिया। आखिर 3 जून, 1947 को लॉर्ड माऊंटबेटन ने पाकिस्तान बनाये जाने की घोषणा कर दी। जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद् ने भारत स्वतन्त्रता कानून पास कर दिया। इसके अनुसार 14 अगस्त को पाकिस्तान बन गया और 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हो गया।

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महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

नोट : ये प्रश्न अध्याय 21 में ही दे दिए गए हैं।

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
1921 में पंजाब में कौन-से राजनीतिक दल ने चनाव जीता तथा इसके दो नेताओं के नाम बताएं।
उत्तर-
1921 में पंजाब में सर फज़ल-ए-हुसैन तथा सर छोटू राम के नेतृत्व में यूनियनिस्ट पार्टी ने चुनाव जीता।

प्रश्न 2.
स्वराज्य पार्टी का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर-
स्वराज्य पार्टी का मुख्य उद्देश्य था-चुनाव में भाग लेना तथा कौंसिलों में रहकर स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करना।

प्रश्न 3.
स्वराज्य पार्टी के दो नेताओं के नाम बताएं।
उत्तर-
पण्डित मोती लाल नेहरू और देशबन्धु चितरंजन दास स्वराज्य पार्टी के नेता थे।

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प्रश्न 4.
स्वराज्य पार्टी के प्रभाव अधीन कौन-से दो एक्ट स्थगित हो गए ?
उत्तर-
स्वराज्य पार्टी के प्रभाव अधीन रौलेट एक्ट और प्रेस एक्ट स्थगित हो गए।

प्रश्न 5.
1920 में गुरुद्वारा सुधार के लिए कौन-से दो संगठन अस्तित्व में आए ?
उत्तर-
1920 में गुरुद्वारा सुधार के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी और शिरोमणि अकाली दल अस्तित्व में आए।

प्रश्न 6.
गुरुद्वारा सुधार के लिए दो महत्त्वपूर्ण मोर्चों के नाम तथा वर्ष बताइए।
उत्तर-
इनमें गुरु का बाग (1921) तथा जैतो (1923) के मोर्चे प्रसिद्ध हैं।

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प्रश्न 7.
गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन में लगभग कितने लोग मारे गए तथा कितने घायल हुए ?
उत्तर-
इस दौरान लगभग 400 लोग मारे गए तथा 2,000 लोग घायल हुए।

प्रश्न 8.
‘गुरुद्वारा एक्ट’ कब पास हुआ तथा इसके द्वारा गुरुद्वारे कौन-सी संस्था के नियन्त्रण में आ गए थे ?
उत्तर-
गुरुद्वारा एक्ट 1925 में पास हुआ तथा इसके द्वारा सब गुरुद्वारे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के नियन्त्रण में आ गए।

प्रश्न 9.
1922 में चल रहे कौन-से दो आन्दोलन अहिंसा पर आधारित थे ?
उत्तर-
असहयोग आन्दोलन और खिलाफत आन्दोलन अहिंसा पर आधारित थे।

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प्रश्न 10.
‘बब्बर अकाली’ किस प्रकार के संघर्ष में विश्वास रखते थे तथा इनका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर-
बब्बर अकाली हिंसात्मक संघर्ष में विश्वास रखते थे तथा इनका उद्देश्य स्वराज्य प्राप्त करना था।।

प्रश्न 11.
किन वर्षों में तथा कौन-सा इलाका बब्बर अकालियों की सरगर्मियों का गढ़ रहा ?
उत्तर-
1922 से 1924 तक जालन्धर दोआब इनका गढ़ रहा।

प्रश्न 12.
‘नौजवान भारत सभा’ की नींव कब और कौन-से प्रान्त में रखी गई ?
उत्तर-
नौजवान भारत सभा की नींव 1926 में लाहौर प्रान्त में रखी गई।

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प्रश्न 13.
जिन दो क्रान्तिकारी संगठनों की स्थापना में भगत सिंह ने योगदान दिया था, उनके नाम बताएं।
उत्तर-
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन और हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में भगत सिंह ने योगदान दिया था।

प्रश्न 14.
‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के साथ सम्बन्धित दो क्रान्तिकारियों के नाम बताएं।
उत्तर-
चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ सम्बन्धित थे।

प्रश्न 15.
1929 में केन्द्रीय असैम्बली में बम फेंकने वाले दो क्रान्तिकारी कौन थे तथा इनका क्या मन्तव्य था ?
उत्तर-
1929 में केन्द्रीय असैम्बली में बम फेंकने वाले भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त थे तथा उनका मन्तव्य किसी को मारना नहीं बल्कि अंग्रेज़ सरकार के प्रति भारतीयों का रोष प्रकट करना था।

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प्रश्न 16.
भगत सिंह को किस पुलिस अफसर को मारने के अपराध में तथा कब फांसी दी गई ?
उत्तर-
भगत सिंह को सान्डर्स को मारने के अपराध में 23 मार्च, 1931 को फांसी दी गई।

प्रश्न 17.
भगत सिंह के साथ किन दो अन्य क्रान्तिकारियों को फांसी हुई ?
उत्तर-
सुखदेव और राजगुरु को भगत सिंह के साथ फांसी हुई।

प्रश्न 18.
चन्द्रशेखर आजाद ने कौन-से क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना करने में योगदान दिया तथा वह कब मारा गया ?
उत्तर-
चन्द्रशेखर आजाद ने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट-रिपब्लिकन एसोसिएशन के संगठन की स्थापना करने में योगदान दिया और वे 1931 में मारे गए।

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प्रश्न 19.
ऊधम सिंह ने कब, कहां और किस अंग्रेज़ को गोली मारी थी ?
उत्तर-
ऊधम सिंह ने 1940 में लन्दन में माइकल ओडवायर को गोली मारी थी।

प्रश्न 20.
साइमन कमीशन कब तथा किस उद्देश्य से नियुक्त किया गया ?
उत्तर-
1927 में साइमन कमीशन नियुक्त किया गया था जिस का उद्देश्य था कि यह मांटेग्यू चैम्सफोर्ड विधान की कारवाई की रिपोर्ट दे और भविष्य में किए जाने वाले परिवर्तनों के बारे में सुझाव दे।

प्रश्न 21.
भारतीयों ने ‘साइमन कमीशन’ का विरोध क्यों किया तथा पंजाब के कौन-से नेता इस विरोध में घायल हुए तथा उनका देहान्त कब हुआ ?
उत्तर-
भारतीयों ने साइमन कमीशन का विरोध इसलिए किया क्योंकि कोई भी भारतीय इस कमीशन का सदस्य नहीं था। लाला लाजपतराय इस विरोध में घायल हुए और 1928 में उनकी मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 22.
1929 में कांग्रेस का अधिवेशन कहां हुआ ? इसका सबसे महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव क्या था तथा इसको किसने प्रस्तुत किया ?
उत्तर-
1929 में कांग्रेस का अधिवेशन लाहौर में हुआ। इसका महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव था जिसे जवाहर लाल ने पेश किया था।

प्रश्न 23.
1929 के कांग्रेस के अधिवेशन में कौन-सा झण्डा लहराया गया तथा कौन-सा दिन स्वतन्त्रता दिवस निश्चित हुआ ?
उत्तर-
1929 के कांग्रेस के अधिवेशन में तिरंगा झण्डा लहराया गया तथा 26 जनवरी, 1930 को स्वतन्त्रता दिवस निश्चित हुआ।

प्रश्न 24.
महात्मा गान्धी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आरम्भ किस स्थान से, कब तथा किस तरह किया ?
उत्तर-
महात्मा गान्धी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आरम्भ 6 अप्रैल, 1930 ई० को समुद्र तट पर नमक बना कर किया।

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प्रश्न 25.
खान अब्दुल गफ्फार खां किस नाम से प्रसिद्ध हुए तथा उन्होंने कौन-सी संस्था का संगठन किया ?
उत्तर-
खान अब्दुल गफ्फार खाँ सीमान्त गांधी के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने खुदाई खिदमतगारों की संस्था का संगठन किया।

प्रश्न 26.
पहली गोलमेज़ कांफ्रैंस कब, कहां तथा किस लिए बुलाई गई ?
उत्तर-
पहली गोलमेज़ कांफ्रैंस 1930 ई० में लन्दन में बुलाई गई। यह कांफ्रैंस साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए बुलाई गई।

प्रश्न 27.
महात्मा गान्धी ने कब और कौन-सी गोलमेज़ कांफ्रेंस में हिस्सा लिया ?
उत्तर-
महात्मा गान्धी ने 1931 में दूसरी गोलमेज़ कांफ्रेंस में हिस्सा लिया।

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प्रश्न 28.
सविनय अवज्ञा आन्दोलन कब आरम्भ हुआ तथा इसमें कितने सत्याग्रही गिरफ्तार हुए ?
उत्तर-
सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1930 ई० में आरम्भ हुआ। इसमें महात्मा गान्धी सहित 90 हज़ार सत्याग्रही गिरफ्तार हुए।

प्रश्न 29.
पंजाब के चार नगरों के नाम बताएं जिनमें सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान नमक का कानून तोड़ा गया ?
उत्तर-
पंजाब में लाहौर, अमृतसर, लायलपुर तथा लुधियाना में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान नमक कानून तोड़ा गया।

प्रश्न 30.
तीसरी गोलमेज़ कांफ्रैंस कब बुलाई गई तथा इसमें किस अधिनियम का ढांचा तैयार किया गया ?
उत्तर-
नवम्बर, 1932 में तीसरी गोलमेज़ कांफ्रैंस बुलाई गई तथा इसमें 1935 के अधिनियम का ढांचा तैयार किया गया।

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प्रश्न 31.
1935 के एक्ट में केन्द्र में कौन-सी चार संस्थाएं स्थापित करने का फैसला किया गया ?
उत्तर-
1935 के एक्ट में केन्द्र में विधानसभा और परिषद् के अतिरिक्त एक संघीय अथवा फैडरल तथा फैडरल पब्लिक सर्विस कमीशन कोर्ट स्थापित करने का फैसला किया गया।

प्रश्न 32.
1935 के एक्ट के अधीन प्रान्तों में चुनाव कब हुए तथा कितने प्रान्तों में कांग्रेस के मन्त्रिमण्डल बने ?
उत्तर-
1935 के एक्ट के अधीन प्रान्तों के चुनाव 1937 में हुए और सात प्रान्तों में कांग्रेस के मन्त्रिमण्डल बने।

प्रश्न 33.
1937 में किन दो प्रान्तों में कांग्रेस की सरकार नहीं बनी थी ?
उत्तर-
सिंध एवं पंजाब में कांग्रेस की सरकार नहीं बनी थी।

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प्रश्न 34.
स्वतन्त्रता से पूर्व भारत की दो साम्प्रदायिक राजनीतिक पार्टियों के नाम बताएं।
उत्तर-
भारत की दो साम्प्रदायिक राजनीतिक पार्टियों के नाम थे : मुस्लिम लीग तथा हिन्दू महासभा।

प्रश्न 35.
पाकिस्तान की मांग कब की गई तथा यह किस सिद्धान्त पर आधारित थी ?
उत्तर-
पाकिस्तान की मांग 1940 में की गई। यह मांग ‘दो राष्ट्रों के सिद्धान्त’ पर आधारित थी।

प्रश्न 36.
‘आल इण्डिया स्टेट्ज़ पीपुल्स कांफ्रैंस’ की स्थापना कब हुई तथा जवाहर लाल नेहरू इसके अध्यक्ष कब चुने गए ?
उत्तर-
आल इण्डिया स्टेज़ पीपुल्स कांफ्रैंस की स्थापना 1927 में हुई। 1939 में जवाहर लाल नेहरू इसके अध्यक्ष चुने गए।

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प्रश्न 37.
दूसरा विश्व युद्ध कब हुआ और कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने त्याग-पत्र कब दिए ?
उत्तर-
दूसरा विश्व युद्ध सितम्बर, 1939 में शुरू हुआ था। 1940 में कांग्रेस के सभी मन्त्रिमण्डलों ने त्याग-पत्र दे दिए।

प्रश्न 38.
1942 में जापानियों की कौन-सी विजय के पश्चात् अंग्रेज़ सरकार ने किस मन्त्री को भारत भेजा ?
उत्तर-
1942 में जापानियों ने रंगून पर अधिकार कर लिया तो अंग्रेज़ सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा।

प्रश्न 39.
भारत छोड़ो प्रस्ताव कब पास हुआ तथा इस आन्दोलन में कितने लोग मारे गए ? ।
उत्तर-
भारत छोड़ो प्रस्ताव 8 अगस्त, 1942 को बम्बई (मुम्बई) में पास हुआ तथा इस आंदोलन में 10,000 से अधिक लोग मारे गये।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 22 स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष

प्रश्न 40.
पंजाब में कौन-से चार नगरों में ‘भारत-छोड़ो’ आन्दोलन के समय लोगों ने विरोध प्रकट किया ?
उत्तर-
पंजाब में लाहौर, अमृतसर, लुधियाना तथा लायलपुर में लोगों ने विरोध प्रकट किया।

प्रश्न 41.
सुभाषचन्द्र बोस ने कौन-से दो संगठन बनाये थे ?
उत्तर-
सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फ़ौज और फारवर्ड ब्लाक नाम के दो संगठन बनाए थे।

प्रश्न 42.
दूसरे विश्व-युद्ध के समाप्त होने पर ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ के किन तीन अफसरों पर मुकदमा चलाया गया तथा इसकी पैरवी किसने की ? ।
उत्तर-
दूसरे विश्व युद्ध के समाप्त होने पर आज़ाद हिन्द फ़ौज के जनरल शाहनवाज, जनरल गुरदियाल सिंह ढिल्लों और जनरल प्रेम सहगल पर मुकद्दमा चलाया गया। उनके मुकद्दमे की पैरवी पंडित जवाहर लाल ने की।

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प्रश्न 43.
दूसरे विश्व-युद्ध के बाद कौन-सा राजनीतिक दल ब्रिटेन में सत्ता में आया तथा विश्व के कौन-से दो बड़े देश भारत की स्वतन्त्रता के समर्थक थे ?
उत्तर-
दूसरे विश्व युद्ध के बाद लेबर पार्टी सत्ता में आ गई। अमेरिका और रूस भारत की स्वतन्त्रता के समर्थक थे।

प्रश्न 44.
1946 के चुनावों में कौन-से दो मुख्य राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया ?
उत्तर-
1946 के चुनावों में राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने हिस्सा लिया।

प्रश्न 45.
ब्रिटिश सरकार ने ‘कैबिनेट मिशन’ को कब भारत भेजा तथा उसको क्या आदेश था ?
उत्तर-
ब्रिटिश सरकार ने ‘कैबिनेट मिशन’ को 1946 में भारत भेजा। इसको आदेश था कि एक ऐसा विधान तैयार किया जाए जिसमें भारत की एकता को बनाये रखते हुए स्थानीय स्वायत्तता को भी स्थान दिया जाए।

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प्रश्न 46.
‘इंटेरियम कैबिनेट’ कब बनाई गई तथा इसके प्रधानमन्त्री कौन थे ? ।
उत्तर-
इंटेरियम कैबिनेट सितम्बर, 1946 में बनाई गई तथा इसके प्रधानमन्त्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे।।

प्रश्न 47.
1946-47 में भारत में कौन-से चार प्रान्तों में साम्प्रदायिक दंगे-फसाद हुए ?
उत्तर-
1946-47 में भारत में बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र तथा उत्तर प्रदेश (वर्तमान) में साम्प्रदायिक दंगे-फसाद हुए।

प्रश्न 48.
किस गवर्नर-जनरल ने तथा कब देश के विभाजन की रूपरेखा की घोषणा की ?
उत्तर-
3 जून, 1947 को गवर्नर-जनरल माऊंटबेटन ने देश के विभाजन की रूपरेखा की घोषणा की।

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प्रश्न 49.
विभाजन का प्रभाव भारत के किन चार प्रान्तों पर पड़ा ?
उत्तर-
विभाजन का प्रभाव भारत के बंगाल, पंजाब, सिंध तथा उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्तों पर पड़ा।

प्रश्न 50.
बांटे जाने वाले क्षेत्रों (भारत विभाजन सम्बन्धी) को निश्चित करने के लिए कौन-सा ‘कमीशन’ बनाया गया तथा पंजाब में इसकी अध्यक्षता किसने की ?
उत्तर-
बांटे जाने वाले क्षेत्रों को निश्चित करने के लिए सीमा कमीशन बनाया गया तथा इसकी अध्यक्षता रैडक्लिफ ने की।

प्रश्न 51.
कितनी देशी रियासतों ने तथा किसके प्रयत्नों से भारत में मिलने का निर्णय किया ?
उत्तर-
500 से अधिक रियासतों ने भारत में सम्मिलित होने का निर्णय किया। यह निर्णय सरदार वल्लभभाई पटेल के यत्नों से हुआ।

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प्रश्न 52.
भारत में शामिल होने वाली उत्तर तथा दक्षिण की दो प्रमुख देशी रियासतों के नाम बताएं।
उत्तर-
भारत में शामिल होने वाली उत्तर की प्रमुख देशी रियासत जम्मू-कश्मीर तथा दक्षिण की प्रमुख रियासत हैदराबाद थीं।

प्रश्न 53.
स्वतन्त्र भारत तथा पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरलों के नाम बताएं।
उत्तर-
स्वतन्त्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल लॉर्ड माऊंटबेटन थे। पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरल का नाम मुहम्मद अली जिन्नाह था।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
माण्टेग्यू चैम्सफोर्ड विधान की क्या कार्यवाही थी? महात्मा गांधी ने इसका बहिष्कार क्यों किया ?
उत्तर-
माण्टेग्यू चैम्सफोर्ड विधान अशुभ परिस्थितियों में लागू हुआ। इस विधान के अन्तर्गत हुए चुनावों का कांग्रेस ने बहिष्कार किया। परन्तु कुछ भारतीय नेताओं ने स्वराज्य पार्टी की स्थापना की और चुनावों में भाग लिया। उनका विश्वास था कि वे कौंसिलों में रहकर भारतीय हितों की अच्छी प्रकार रक्षा कर सकते हैं। वे अपने उद्देश्य में काफी सीमा तक सफल रहे। उनके प्रयत्नों से 1910 ई का प्रेस एक्ट और 1919 ई० का रौलेट एक्ट रद्द कर दिए गए। सेना में अधिक संख्या में भारतीय अधिकारियों को लेने का निश्चय किया गया। यह भी निर्णय हुआ कि सिविल सर्विस के उच्च पदों पर कम-से-कम आधे अधिकारी भारतीय होने चाहिएं। शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार हुए।

महात्मा गांधी ने माण्टेग्यू चैम्सफोर्ड विधान का विरोध इसलिए किया क्योंकि इसकी चुनाव व्यवस्था साम्प्रदायिकता पर आधारित थी। दूसरे, भारतीय नेता ‘स्वराज्य’ चाहते थे। परन्तु यह विधान उससे कोसों दूर था।

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प्रश्न 2.
भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में क्रान्तिकारियों की भूमिका का विवेचन करो।
उत्तर-
स्वतन्त्रता आन्दोलन में क्रान्तिकारियों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इनका उदय 20वीं शताब्दी के पहले दशक में हुआ था। इनके मुख्य कार्य-क्षेत्र बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब थे। उन्होंने गुप्त रूप से अपना आपसी सम्पर्क स्थापित किया हुआ था। जब ब्रिटिश सरकार ने अनेक राष्ट्रीय नेताओं को कारावास में डाल दिया तो इन क्रान्तिकारियों ने अपनी गतिविधियों को तेज़ कर दिया । क्रान्तिकारियों ने बदनाम पुलिस अधिकारियों, मैजिस्ट्रेटों तथा सरकारी गवाहों की हत्या की। धन और शस्त्र एकत्र करने के लिए उन्होंने विभिन्न स्थानों पर डाके डाले। इसके अतिरिक्त उन्होंने दो वायसरायों मिन्टो और हार्डिंग की हत्या करने का भी प्रयत्न किया। यद्यपि क्रान्तिकारी भारत से ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने में सफल न हुए, तो भी उनकी वीरता और आत्म-बलिदान से अनेक भारतीयों को प्रेरणा मिली। केवल इतना ही नहीं, क्रान्तिकारियों के कारण जनसाधारण में राष्ट्रीय भावना का विकास हुआ। देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन में क्रान्तिकारियों ने जो भूमिका निभाई, उसे कभी भी नहीं भुलाया जा सकता।

प्रश्न 3.
साइमन कमीशन की नियुक्ति किस उद्देश्य से की गई थी ? इसके प्रति महात्मा गांधी का क्या दृष्टिकोण था और इसका क्या परिणाम निकला ?
अथवा
साइमन कमीशन के बारे में विस्तार से लिखो।
उत्तर-
ब्रिटिश सरकार ने 1927 ई० में भारत में साइमन कमीशन भेजने का निश्चय किया। साइमन कमीश्न इस उद्देश्य से नियुक्त किया था कि यह माण्टेग्यू-चैम्सफोर्ड विधान की कारवाई की जांच-पड़ताल के आधार पर रिपोर्ट दे। साथ में भविष्य के लिये किये जाने वाले परिवर्तनों के बारे में भी सुझाव दे। इस कमीशन का कोई भारतीय सदस्य नहीं बनाया गया था। इसलिये भारतीय नेताओं ने इस कमीशन का विरोध किया। देश भर में जुलूस निकाले गये और हड़तालें हुईं। कमीशन को काली झंडियां दिखाई गईं। प्रत्येक स्थान पर ‘साइमन गो बैक’ के नारे लगाये गये। सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर सख्ती की। लाहौर में ऐसे ही प्रदर्शन में लाला लाजपतराय भी पुलिस की लाठियों से घायल हुए और उनका देहान्त हो गया। ऐसे विरोध के बावजूद भी कमीशन ने भारत का भ्रमण किया और इंग्लैण्ड की सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश कर दी।

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प्रश्न 4.
पूर्ण स्वराज्य की मांग किन परिस्थितियों में की गई और इसके लिए संघर्ष के ढंग में क्या परिवर्तन आया ?
उत्तर-
1928 ई० में साइमन कमीशन भारत आया था । इस कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था, इसलिए भारत में प्रत्येक स्थान पर इसका भारी विरोध किया गया। परन्तु कमीशन की रिपोर्ट को भारत के किसी भी राजनीतिक दल ने स्वीकार नहीं किया था। अत: अंग्रेज़ी सरकार ने भारतीयों को सर्वसम्मति से अपना संविधान तैयार करने की चुनौती दी। इस विषय में भारतीयों ने अगस्त, 1928 ई० में नेहरू रिपोर्ट प्रस्तुत की, परन्तु अंग्रेज़ी सरकार ने इस रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। परिणाम यह हुआ कि भारतीयों की निराशा और अधिक बढ़ गई।

1929 ई० में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में हुआ। यह अधिवेशन भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। पण्डित जवाहर लाल नेहरू इस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये। गान्धी जी ने ‘पूर्ण स्वराज्य’ का प्रस्ताव पेश किया जो पास कर दिया गया। 31 दिसम्बर की आधी रात को नेहरू जी ने रावी नदी के किनारे स्वतन्त्रता का तिरंगा झण्डा फहराया। यह भी निश्चित हुआ कि हर वर्ष 26 जनवरी को स्वतन्त्रता दिवस मनाया जाये। 26 जनवरी, 1930 ई० को यह दिन सारे भारत में बड़े जोश के साथ मनाया गया और लोगों ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने की प्रतिज्ञा की। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने सरकारी कानूनों तथा संस्थाओं का बहिष्कार करने की नीति अपनाई।

प्रश्न 5.
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का वर्णन कीजिए। इसका हमारे स्वतन्त्रता संग्राम पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-
सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1930 ई० में चलाया गया। इस आन्दोलन का उद्देश्य सरकारी कानूनों को भंग करके सरकार के विरुद्ध रोष प्रकट करना था। आन्दोलन का आरम्भ गान्धी जी ने अपनी डांडी यात्रा से किया। 12 मार्च,1930 ई० को उन्होंने साबरमती आश्रम से अपनी यात्रा आरम्भ की। मार्ग में अनेक लोग उनके साथ मिल गये। 24 दिन की कठिन यात्रा के बाद वे समुद्र तट पर पहुंचे और उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाकर नमक कानून भंग किया। इसके बाद देश में लोगों ने सरकारी कानून को भंग करना आरम्भ कर दिया। इस आन्दोलन को दबाने के लिए सरकार ने बड़ी कठोरता से काम लिया। हज़ारों देशभक्तों को जेल में डाल दिया गया। गान्धी जी को भी बन्दी बना लिया गया। यह आन्दोलन फिर भी काफी समय तक चलता रहा। इस प्रकार इस आन्दोलन का हमारे स्वतन्त्रता संग्राम पर गहरा प्रभाव पड़ा। अब देश की जनता इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगी।

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प्रश्न 6.
दूसरे विश्व-युद्ध का भारतीय आन्दोलन पर प्रभाव लिखो।
उत्तर-
दूसरे विश्व युद्ध से पूर्व ‘1935 के एक्ट’ के अनुसार देश में चुनाव हुए थे। कांग्रेस 11 प्रान्तों में से 8 प्रान्तों में अपनी सरकार बनाने मे सफल हुई थी। 1939 में दूसरा महायुद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज़ी सरकार ने भारतीय नेताओं से पूछे बिना ही जर्मनी के विरुद्ध भारत के युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी। इसके विरोध में सभी कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों ने त्याग-पत्र दे दिए और गान्धी जी ने ‘सत्याग्रह’ आरम्भ कर दिया। उन्होंने जनता से कहा कि युद्ध के लिए सरकार को सहयोग न दिया जाये। उन्होंने यह नारा लगाया ‘न दो भाई, न दो पाई’। इस सत्याग्रह में लगभग 25 हज़ार लोग जेलों में गए। इतिहास में इसे ‘व्यक्तिगत सत्याग्रह’ कहा जाता है। कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों के त्याग-पत्र देने से मुस्लिम लीग के नेता मिस्टर जिन्नाह बहुत प्रसन्न हुए, क्योंकि उनका विचार था कि कांग्रेसी राज्य में मुसलमानों के साथ न्याय नहीं हुआ है। उन्होंने 22 दिसम्बर,1939 का दिन ‘मुक्ति दिवस’ के रूप में मनाया। मि० जिन्नाह के इस कार्य से कांग्रेस और मुस्लिम लीग में कटुता आ गई। 1940 ई० में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग की। इस प्रकार देश के बंटवारे की स्थिति उत्पन्न हो गई।

प्रश्न 7.
क्रिप्स मिशन भारत क्यों आया ? इसका क्या परिणाम हुआ ?
उत्तर-
दूसरे महायुद्ध में इंग्लैण्ड की स्थिति बड़ी खराब हो गई थी । इसलिए उसे भारतीयों के सहयोग की आवश्यकता थी। परन्तु अंग्रेजों की ग़लत नीतियों के कारण भारतीय उनसे नाराज़ थे और उन्हें किसी प्रकार का कोई सहयोग देने को तैयार नहीं थे। इस समस्या को सुलझाने के लिए ही ब्रिटिश सरकार ने सर स्टेफोर्ड क्रिप्स को 1942 ई० में भारत भेजा। उसने भारतीय नेताओं के सामने अपनी योजना रखी। इसमें कहा गया था कि भारतीय दूसरे महायुद्ध में अंग्रेज़ों का साथ दें तो उन्हें युद्ध के बाद ‘अधिराज्य’ दिया जायेगा। गान्धी जी ने इस योजना की तुलना एक ऐसे चैक से की जिस पर बाद की तिथि पड़ी हुई हो और जो ऐसे बैंक के नाम हो जो फेल होने वाला हो। इस प्रकार सभी भारतीय नेताओं ने क्रिप्स की योजना को स्वीकार न किया । क्रिप्स महोदय को निराश होकर वापस लौटना पड़ा।

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प्रश्न 8.
भारत छोड़ो आन्दोलन का वर्णन करो।
उत्तर-
भारत छोड़ो आन्दोलन 1942 ई० में चलाया गया। इस आन्दोलन का नेतृत्व गान्धी जी ने किया। कांग्रेस ने 9 अगस्त, 1942 ई० को आन्दोलन चलाने का प्रस्ताव पास किया और अंग्रेजों को भारत छोड़ देने के लिए ललकारा। सारा देश ‘भारत छोड़ो’ के नारों से गूंज उठा। अंग्रेजों ने इस आन्दोलन को दबाने के लिए बड़ी कठोरता से काम लिया । प्रस्ताव पास होने के दूसरे ही दिन सारे नेता बन्दी बना लिए गए। परिणामस्वरूप जनता भड़क उठी। लोगों ने सरकारी दफ्तरों, रेलवे स्टेशनों तथा डाकघरों को लूटना और जलाना आरम्भ कर दिया। सरकार ने अपनी नीति को और भी कठोर कर दिया और असंख्य लोगों को जेलों में डाल दिया गया। सारा देश एक जेलखाने के समान दिखाई देने लगा। इतने बड़े आन्दोलन के कारण ब्रिटिश सरकार की नींव हिल गई।

प्रश्न 9.
आज़ाद हिन्द फ़ौज (सेना) की स्थापना तथा कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर-
आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना श्री सुभाषचन्द्र ने की थी। उन्होंने इस फ़ौज की स्थापना जापान और जर्मनी की सहायता से की थी। इस फ़ौज का उद्देश्य भारत को स्वतन्त्र कराना था। सुभाष चन्द्र बोस ने अपने सैनिकों में राष्ट्रीयता की भावनाएं कूट-कूट कर भर दीं। फलस्वरूप इस सेना ने कई स्थानों पर विजय भी प्राप्त की। जर्मनी और जापान की दूसरे महायुद्ध में पराजय होने के कारण यह सेना बिखर गई। अंग्रेजों ने इस सेना के कुछ बड़े-बड़े अफसरों को पकड़ लिया और उन पर राजद्रोह का मुकद्दमा चलाया। परन्तु बाद में जनता के दबाव के कारण अंग्रेज़ी सरकार ने इन अफसरों को छोड़ दिया।

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प्रश्न 10.
देशी रियासतों में राजनीतक जागृति लाने के बारे में क्या प्रयास किये गये ?
उत्तर-
1935 के अधिनियम में एक व्यवस्था यह भी थी कि भारतीय संघ में देशी रियासतें शामिल की जायें । इसलिए भारतीय रियासतों में भी राजनीतिक जागृति लाने का प्रयास आवश्यक हो गया । इस सम्बन्ध में कांग्रेस नेता विशेष रूप से जवाहर लाल नेहरू ने, काफी प्रयत्न किये। दूसरे असहयोग आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रभाव भी देशी रियासतों की जनता पर पड़ा। उनको तो साम्राज्य के सीधे प्रशासित क्षेत्रों में मिलने वाली सुविधायें एवं अधिकार भी प्राप्त नहीं हुए थे। तीसरे 1927 में ‘ऑल इण्डिया स्टेट्ज़ पीपुल्ज़ कान्स’ की स्थापना हो चुकी थी। चौथे कांग्रेस के 1938 के अधिवेशन में की जाने वाली पूर्ण स्वतन्त्रता की व्याख्या में देशी रियासतों को भी शामिल कर लिया था। 1939 में जवाहर लाल नेहरू ‘ऑल इण्डिया स्टेट्ज़ पीपुल्ज़ कान्फ्रेंस’ के अध्यक्ष चुने गए। यद्यपि 1935 का नियम रियासतों पर लागू नहीं हुआ था, तो भी वहां की जनता जागरूक हुई और उन्होंने स्वतन्त्रता के लिए प्रयास तीव्र कर दिए।

प्रश्न 11.
कामागाटामारू की घटना का वर्णन करें।
उत्तर-
कामागाटामारू एक जहाज़ का नाम था। इस जहाज़ को एक पंजाबी वीर नायक बाबा गुरदित्त सिंह ने किराये पर ले लिया। बाबा गुरदित्त सिंह के साथ कुछ और भारतीय भी इस जहाज़ में बैठकर कनाडा पहुंचे। परन्तु उन्हें न तो वहां उतरने दिया गया और न ही वापसी पर किसी नगर हांगकांग, शंघाई, सिंगापुर आदि में उतरने दिया। कलकत्ता(कोलकाता) पहुंचने पर यात्रियों ने जुलूस निकाला। जुलूस के लोगों पर पुलिस ने गोली चला दी जिससे 18 व्यक्ति शहीद हो गए और 25 घायल हो गए। इस घटना से विद्रोहियों को विश्वास हो गया कि राजनीतिक क्रान्ति ला कर ही देश का उद्धार हो सकता है। इसीलिए उन्होंने गदर नाम की पार्टी बनाई और क्रान्तिकारी आन्दोलन आरम्भ किया।

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प्रश्न 12.
गुरुद्वारों से सम्बन्धित सिक्खों तथा अंग्रेजों में बढ़ते रोष पर नोट लिखो।
उत्तर-
अंग्रेज़ गुरुद्वारों के महन्तों को प्रोत्साहन देते थे। यह बात सिक्खों को प्रिय नहीं थी। महंत सेवादार के रूप में गुरुद्वारों में प्रविष्ट हुए थे। परन्तु अंग्रेजी राज्य में वे यहां के स्थायी अधिकारी बन गए। वे गुरुद्वारों की आय को व्यक्तिगत सम्पत्ति समझने लगे। महन्तों को अंग्रेजों का आशीर्वाद प्राप्त था। इसलिए उन्हें विश्वास था कि उनकी गद्दी सुरक्षित है। अतः वे ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे थे। सिक्ख इस बात को सहन नहीं कर सकते थे।

प्रश्न 13.
गुरु के बाग के मोर्चे की घटना का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरुद्वारा ‘गुरु का बाग’ अमृतसर से लगभग 13 मील दूर अजनाला तहसील में स्थित है। यह गुरुद्वारा महन्त सुन्दरदास के पास था जो एक चरित्रहीन व्यक्ति था। शिरोमणि कमेटी ने इस गुरुद्वारे को अपने हाथों में लेने के लिए 23 अगस्त, 1921 ई० में दान सिंह के नेतृत्व में एक जत्था भेजा। अंग्रेजों ने इस जत्थे के सदस्यों को बन्दी बना लिया। इस घटना से सिक्ख भड़क उठे। सिक्खों ने कई और जत्थे भेजे जिन के साथ अंग्रेजों ने बहुत बुरा व्यवहार किया। सारे देश के राजनीतिक दलों ने सरकार की इस कार्यवाही की कड़ी निन्दा की।

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प्रश्न 14.
‘जैतों के मोर्चे की घटना पर प्रकाश डालिये।
उत्तर-
जुलाई, 1923 में अंग्रेजों ने नाभा के महाराजा रिपुदमन सिंह को बिना किसी दोष के गद्दी से हटा दिया। शिरोमणि कमेटी तथा अन्य सभी देश-भक्त सिक्खों ने सरकार के इस कार्य की निन्दा की और 21 फरवरी, 1924 को पांच सौ अकालियों का एक जत्था गुरुद्वारा गंगसर (जैतों) के लिए चल पड़ा। नाभा की रियासत में पहुंचने पर उनका सामना अंग्रेज़ी सेना से हुआ। इस संघर्ष में अनेक सिक्ख मारे गए तथा घायल हुए। अन्त में सिक्खों ने सरकार को अपनी मांग स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया।

प्रश्न 15.
स्वराज्य पार्टी के उद्देश्य तथा योगदान के बारे में बताएं ।
उत्तर-
असहयोग आन्दोलन के समाप्त होने के पश्चात् पंडित मोती लाल नेहरू और देश-बन्धु चितरंजन दास ने स्वराज्य पार्टी नामक एक नई राजनीतिक पार्टी स्थापित की। इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य था-चुनाव में भाग लेना तथा कौंसिलों में रहकर स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करना। इस पार्टी को 1924 के चुनावों में भारी सफलता मिली। इसका इतना प्रभाव हुआ कि केन्द्रीय विधान सभा तथा प्रान्तीय परिषदों के सदस्य कोई ऐसा काम नहीं होने देते थे जो देश के हितों के विपरीत हो। परिणामस्वरूप कई अच्छे काम भी हुए जैसे रौलेट एक्ट और 1910 के प्रेस एक्ट का स्थगित होना। सेना में भी अधिक भारतीय अफसरों को लेने का निर्णय किया गया। सरकार द्वारा नियुक्त ‘ली कमीश्न’ ने सिफारिश की कि सिविल सर्विस के उच्च पदों के लिए कम-से-कम आधे भारतीय अफसरों को नियुक्त किया जाये। कुछ ऐसे कानून भी बनाये गये जिनसे खानों और कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को भी काफी लाभ हुआ।

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प्रश्न 16.
गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन के बारे में बताएं।
उत्तर-
गुरुद्वारा सुधार लहर 20वीं शताब्दी में अकालियों ने चलाई। इस समय तक गुरुद्वारों का वातावरण बड़ा दूषित हो चुका था। इनमें रहने वाले महन्त बड़े ठाठ-बाठ से रहते थे। उन्होंने गुरुद्वारों को भोग-विलास, शराब तथा जुएबाजी का अड्डा बना रखा था। अंग्रेज़ इन महंतों को संरक्षण देते थे क्योंकि वे सिक्खों और महन्तों में लड़ाई करवा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते थे। सिक्खों के विरोध करने पर भी महंतों के चरित्र में कोई सुधार न आया। वे अपनी इच्छा से अपने ही किसी सम्बन्धी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर देते थे। सिक्ख इस बात को सहन न कर सके और उन्होंने गुरुद्वारों का प्रबन्ध अपने हाथों में लेने का निश्चय कर लिया। अन्त में उनके बलिदान रंग लाये और गुरुद्वारों का प्रबन्ध उनके अपने हाथ में आ गया।

प्रश्न 17.
भगत सिंह आदि क्रान्तिकारियों की गतिविधियां बंगाल तथा महाराष्ट्र के आतंकवादियों से किस प्रकार भिन्न थीं ?
उत्तर-
भगत सिंह आदि क्रान्तिकारियों की गतिविधियां बंगाल तथा महाराष्ट्र के आतंकवादियों से काफी भिन्न थीं। भगत सिंह आदि क्रान्तिकारी धर्म के नाम का अथवा धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग नहीं करते थे। वे अंग्रेज़ अफसरों की हत्या करने में भी अधिक विश्वास नहीं रखते थे। भगत सिंह और उसके साथी भारत के लोगों में जागृति उत्पन्न करना अति आवश्यक समझते थे। भविष्य के विषय में इनकी विचारधारा तथा रूपरेखा बिल्कुल स्पष्ट थी। वे ब्रिटिश सरकार को स्पष्ट रूप से बता देना चाहते थे कि भारत के नौजवान किसी प्रकार भी विदेशी साम्राज्य को सहन नहीं करेंगे।

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प्रश्न 18.
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का कार्यक्रम क्या था ?
उत्तर-
लाहौर के अधिवेशन में निर्णय किया गया कि सरकार से अपनी मांगों को मनवाने के लिए सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया जाए। इस कार्य का दायित्व महात्मा गान्धी को सौंपा गया। महात्मा गान्धी ने इस आन्दोलन को चलाने का एक अत्यन्त कारगर उपाय ढूंढा। उन्होंने निर्णय लिया कि वह अपने साबरमती आश्रम से पैदल चल कर समुद्र तट पर स्थित डांडी नामक गांव में जाएंगे और स्वयं नमक बनायेंगे। उस समय नमक तैयार करना सरकारी कानून के विरुद्ध था। गान्धी जी का अनुसरण करते हुए शीघ्र ही देश के प्रत्येक भाग में लोगों ने नमक तैयार करना आरम्भ कर दिया। इस आन्दोलन का प्रभाव देश के कोने-कोने में अर्थात् मालाबार के मोपनों तक, असम के नागाओं तक और सीमान्त सूबे के पठानों तक भी पहुंच गया। पठानों में खान अब्दुल गफ्फार खां ने ‘खुदाई खिदमतगारों’ का संगठन किया और वह सीमान्त गान्धी के नाम से प्रसिद्ध हुए।

प्रश्न 19.
किन परिस्थितियों में ब्रिटेन की सरकार ने भारत को स्वतन्त्रता देने का फैसला कर लिया ?
उत्तर-
ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने भारत में संवैधानिक असैम्बली बनाने के लिए चुनाव करवाए और 1946 ई० में कैबिनेट मिशन को भारत भेजा। भारत में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में इन्टेरिम कैबिनेट बनाई गई। मुस्लिम लीग ने इस कैबिनेट में शामिल होना तो स्वीकार कर लिया परन्तु संवैधानिक असैम्बली का बहिष्कार किया। मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन करने का निर्णय किया । इसके परिणामस्वरुप बंगाल तथा बिहार में दंगे हुए जिन में बहुत से हिन्दू तथा मुसलमान मारे गए। इन दंगों के कारण कांग्रेस के नेताओं ने दो राज्य स्थापित करने की बात मान ली। 3 जून, 1947 ई० को गवर्नर-जनरल माऊंटबेटन ने घोषणा की कि अगस्त में भारत और पाकिस्तान दो स्वतन्त्र देश बना दिए जाएंगे।

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प्रश्न 20.
देश का विभाजन किन परिस्थितियों में हुआ तथा इसका पंजाब पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-
मुस्लिम लीग मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र चाहती थी। अतः उस ने सीधी कार्यवाही अथवा ‘डायरेक्ट एक्शन’ करने का निर्णय किया। इस के कारण बंगाल तथा बिहार में दंगे फसाद हुए। इन दंगों में बहुत से हिन्दू तथा मुसलमान मारे गए। अब सभी यह चाहते थे कि देश में इस प्रकार के दंगे न हों। अतः कांग्रेस के नेताओं ने देश को दो भागों में बांटने की बात मान ली। अतः सरकार ने 3 जून,1947 ई० को यह घोषणा कर दी कि अगस्त में भारत तथा पाकिस्तान नामक स्वतन्त्र राज्य बना दिए जाएंगे। इस प्रकार देश का विभाजन कर दिया गया। इस विभाजन का सब से बुरा प्रभाव पंजाब पर पड़ा। पंजाब दो भागों में बंट गया। पंजाब का जो भाग पाकिस्तान में गया, वहां हिन्दुओं की हत्या की जाने लगी। इसके परिणामस्वरूप लाखों लोग शरणार्थी के रूप में भारत आए। इन सभी लोगों को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
1935 ई० के बाद साम्प्रदायिक गतिविधियों में वृद्धि कैसे हुई ?
उत्तर-
1935 ई० के अधिनियम में साम्प्रदायिक विचारधारा को मान्यता दी गई थी। इसके कारण साम्प्रदायिक राजनीति और भी बल पकड़ गई। चुनाव में असफलता से मुस्लिम लीग का आक्रोश बढ़ गया। मुहम्मद अली जिन्नाह के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने यह प्रचार करना आरम्भ कर दिया कि कांग्रेस एक हिन्दू समुदाय है। धीरे-धीरे यह भी कहा जाने लगा कि भारत में वास्तव में दो राष्ट्र हैं, एक हिन्दू और दूसरा मुसलमान और इन दोनों में कोई सांझ नहीं हो सकती। हिन्दुओं की बहुसंख्या होने के कारण साधारण मुसलमानों को भी इस विचार ने आकर्षित किया। इसका एक कारण यह भी था कि हिन्दू महासभा जैसी कुछ राजनीतिक पार्टियां भी स्थापित हो चुकी थीं जोकि भारतीय राष्ट्र के स्थान पर हिन्दू राष्ट्र का नारा लगाती थीं। परिणाम यह निकला कि 1940 ई० में मुस्लिम लीग ने यह प्रस्ताव पास कर दिया कि भारत में एक नहीं दो स्वतन्त्र राज्य स्थापित होन चाहिएं। इस प्रकार मुसलमानों के राज्य के तौर पर पाकिस्तान की मांग अस्तित्व में आई।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 22 स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष

प्रश्न 2.
पंजाब में गुरुद्वारा सुधार के लिए अकालियों द्वारा किए गए संघर्ष पर एक निबन्ध लिखिए।
अथवा
अकाली आन्दोलन किन कारणों से आरम्भ हुआ ? इसके किन्हीं तीन बड़े-बड़े मोर्चों का संक्षेप में वर्णन करो।
अथवा
अकाली आन्दोलन से जुड़े किन्हीं पांच मोर्चों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
गदर आन्दोलन के बाद पंजाब में अकाली आन्दोलन चला। यह 1921 ई० में आरम्भ हुआ और 1925 ई० तक चलता रहा। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

  • गुरुद्वारों का प्रबन्ध महन्तों के हाथ में था। वे गुरुद्वारों की आय को ऐश्वर्य में उड़ा रहे थे। इस कारण सिक्खों में रोष था।
  • महन्तों को अंग्रेज़ों का आश्रय प्राप्त था। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने गदर सदस्यों पर बड़े अत्याचार ढाए थे। इनमें से 99% सिक्ख थे। इसलिए सिक्ख अंग्रेजी सरकार के भी विरुद्ध थे।
  • 1919 ई० के कानून से भी सिक्ख असन्तुष्ट थे। इसमें जो कुछ उन्हें दिया गया वह उनकी आशा से बहुत कम था।

प्रमुख घटनाएं अथवा मोर्चे

1. ननकाना साहिब की घटना-ननकाना साहिब का महंत नारायण दास बड़ा ही चरित्रहीन व्यक्ति था। उसे गुरुद्वारे से निकालने के लिए 20 फरवरी, 1921 ई० के दिन एक शान्तिमय जत्था ननकाना साहिब पहुंचा। महंत ने जत्थे के साथ बड़ा बुरा व्यवहार किया। उसके पाले हुए गुण्डों ने जत्थे पर आक्रमण कर दिया। जत्थे के नेता भाई लक्ष्मणदास तथा उसके साथियों को जीवित जला दिया गया।

2. हरिमंदर साहिब के कोष की चाबियों की समस्या-हरिमंदर साहिब के कोष की चाबियां अंग्रेजों के पास थीं। शिरोमणि कमेटी ने उनसे गुरुद्वारे की चाबियां माँगी, परन्तु उन्होंने चाबियां देने से इन्कार कर दिया। अंग्रेजों के इस कार्य के विरुद्ध सिक्खों ने बहुत-से प्रदर्शन किए। अंग्रेजों ने अनेक सिखों को बन्दी बना लिया। कांग्रेस तथा खिलाफत कमेटी ने भी सिक्खों का समर्थन किया। विवश होकर अंग्रेजों ने कोष की चाबियां शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी को सौंप दीं।

3. ‘गुरु का बाग’ का मोर्चा-गुरुद्वारा ‘गुरु का बाग’ अमृतसर से लगभग 13 मील दूर अजनाला तहसील में स्थित है। यह गुरुद्वारा महंत सुन्दरदास के पास था जो एक चरित्रहीन व्यक्ति था। शिरोमणि कमेटी ने इस गुरुद्वारे को अपने हाथों में लेने के लिए 23 अगस्त, 1921 ई० को दान सिंह के नेतृत्व में एक जत्था भेजा। अंग्रेजों ने इस जत्थे के सदस्यों को बन्दी बना लिया। इस घटना से सिक्ख और भी भड़क उठे। उन्होंने और अधिक संख्या में जत्थे भेजने आरम्भ कर दिए। इन जत्थों के साथ बुरा व्यवहार किया गया। अंत में सिक्खों ने यह मोर्चा शान्तिपूर्ण ढंग से जीत लिया।

4. पंजा साहिब की घटना-‘गुरु का बाग’ गुरुद्वारा आन्दोलन में भाग लेने वाले एक जत्थे को अंग्रेज़ों ने रेलगाड़ी द्वारा अटक जेल में भेजने का निर्णय किया। पंजा साहिब के सिक्खों ने सरकार से प्रार्थना की कि रेलगाड़ी को पंजा साहिब में रोका जाए ताकि वे जत्थे के सदस्यों को भोजन दे सकें। परन्तु सरकार ने जब सिक्खों की इस प्रार्थना को स्वीकार न किया तो भाई कर्म सिंह तथा भाई प्रताप सिंह नामक दो सिक्ख रेलगाड़ी के आगे लेट गए और शहीदी को प्राप्त हुए। यह घटना 30 अक्तूबर, 1922 ई० की है।

5. जैतों का मोर्चा-जुलाई 1923 ई० में अंग्रेजों ने नाभा के महाराज रिपुदमन सिंह को बिना किसी दोष के गद्दी से हटा दिया। शिरोमणि अकाली कमेटी तथा अन्य सभी देश-भक्त सिक्खों ने सरकार के विरुद्ध गुरुद्वारा गंगसर (जैतों) में बड़ा भारी जलसा करने का निर्णय किया। 21 फरवरी, 1924 ई० को पाँच सौ अकालियों का एक जत्था गुरुद्वारा गंगसर के लिए चल पड़ा। नाभा की रियासत में पहुंचने पर उसका सामना अंग्रेजी सेना से हुआ। सिक्ख निहत्थे थे। फलस्वरूप 100 से भी अधिक सिक्ख शहीदी को प्राप्त हुए और 200 के लगभग सिक्ख घायल हुए।

6. सिक्ख गुरुद्वारा अधिनियम-1925 ई० में पंजाब सरकार ने सिक्ख गुरुद्वारा कानून पास कर दिया। इसके अनुसार गुरुद्वारों का प्रबन्ध और उनकी देखभाल सिक्खों के हाथ में आ गई। धीरे-धीरे बन्दी सिक्खों को मुक्त कर दिया गया।

इस प्रकार अकाली आन्दोलन के अन्तर्गत सिक्खों ने महान् बलिदान दिए। एक ओर तो उन्होंने गुरुद्वारे जैसे पवित्र स्थानों से अंग्रेजों के पिट्ठ महंतों को बाहर निकाला और दूसरी ओर सरकार के विरुद्ध एक ऐसी अग्नि भड़काई जो स्वतन्त्रता प्राप्ति तक जलती रही।

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प्रश्न 2.
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
सविनय अवज्ञा आन्दोलन का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है
कारण-

  • 1928 ई० में ‘साइमन कमीशन’ भारत आया। इस कमीशन ने भारतीयों के विरोध के बावजूद भी अपनी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी। इससे भारतीयों में असन्तोष फैल गया।
  • सरकार ने नेहरू रिपोर्ट की शर्तों को स्वीकार न किया।
  • बारदौली के किसान आन्दोलन की सफलता ने गाँधी जी को सरकार के विरुद्ध आन्दोलन चलाने के लिए प्रेरित किया।
  • गाँधी जी ने सरकार के सामने कुछ शर्ते रखीं। परन्तु वायसराय ने इन शर्तों को स्वीकार न किया। इन परिस्थितियों में गाँधी जी ने सरकार के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ कर दिया।

आन्दोलन की प्रगति (1930-1931 ई०)-सविनय अवज्ञा आन्दोलन गाँधी जी की डाँडी यात्रा से आरम्भ हुआ। उन्होंने साबरमती आश्रम से पैदल यात्रा आरम्भ की और वह डाँडी के निकट समुद्र के तट पर पहुँचे। 6 अप्रैल, 1930 को वहाँ उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाया और नमक कानून भंग किया। वहीं से यह आन्दोलन सारे देश में फैल गया। अनेक स्थानों पर लोगों ने सरकारी कानूनों का उल्लंघन किया। सरकार ने इस आन्दोलन को दबाने के लिए दमन-चक्र आरम्भ कर दिया। गांधी जी सहित अनेक आन्दोलनकारियों को जेलों में बन्द कर दिया गया। परन्तु आन्दोलन की गति में कोई अन्तर न आया। इसी बीच गांधी जी और तत्कालीन वायसराय में एक समझौता हुआ। समझौते के अनुसार गाँधी जी ने दूसरी गोलमेज़ परिषद् में भाग लेना तथा आन्दोलन बन्द करना स्वीकार कर लिया। इस तरह 1931 ई० में सविनय अवज्ञा आन्दोलन कुछ समय के लिए रुक गया।

आन्दोलन की प्रगति ( 1930-33) तथा अन्त-1931 ई० में लन्दन में दूसरी गोलमेज परिषद् बुलाई गई। इसमें कांग्रेस की ओर से गाँधी जी ने भाग लिया, परन्तु इस परिषद् में भी भारतीय प्रशासन के लिए कोई उचित हल न निकल सका। गाँधी जी निराश होकर लौट आये और उन्होंने अपना आन्दोलन फिर से आरम्भ कर दिया। सरकार ने आन्दोलन का दमन करने के लिए आन्दोलनकारियों पर फिर से अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। सरकार के इन अत्याचारों से आन्दोलन की गति कुछ धीमी पड़ गई। अन्त में कांग्रेस ने 1933 ई० में इस आन्दोलन को बन्द कर दिया।

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प्रश्न 3.
भारत छोड़ो आन्दोलन का विवरण दीजिए।
अथवा
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के आरम्भ होने के कारणों तथा महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
आन्दोलन प्रारम्भ होने का कारण-भारत छोड़ो आन्दोलन 9 अगस्त, 1942 ई० को आरम्भ हुआ। इसके आरम्भ होने का कारण यह था कि दूसरे महायुद्ध में जापान ने बर्मा पर अधिकार कर लिया था। इससे यह भय उत्पन्न होने लगा कि जापान अंग्रेजों को हानि पहुँचाने के लिये भारत पर भी आक्रमण करेगा। इस समय कांग्रेस ने गाँधी जी के नेतृत्व में भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पास किया। यह प्रस्ताव इसलिए पास किया गया क्योंकि महात्मा गाँधी तथा अन्य नेताओं का यह विचार था कि यदि अंग्रेज़ भारत छोड़ जायें तो जापान भारत पर आक्रमण नहीं करेगा। प्रस्ताव पास करने के अतिरिक्त कांग्रेस की बैठक में यह निश्चय किया गया कि भारतीय पूर्ण स्वतन्त्रता से कम कोई चीज़ स्वीकार नहीं करेंगे।

आन्दोलन का आरम्भ तथा प्रगति-9 अगस्त, 1942 ई० को यह आन्दोलन आरम्भ हो गया जिसका नेतृत्व गाँधी जी ने किया। उन्होंने अंग्रेजों को भारत छोड़ देने के लिए ललकारा। सारा देश भारत छोड़ो’ के नारों से गूंज उठा। अंग्रेजों ने इस आन्दोलन को दबाने के लिए बड़ी कठोरता से काम लिया। प्रस्ताव पास होने के दूसरे ही दिन सारे नेता बन्दी बना लिये गये। परिणामस्वरूप जनता भी भड़क उठी। लोगों ने सरकारी दफ्तरों, रेलवे स्टेशनों तथा डाकघरों को लूटना और जलाना आरम्भ कर दिया। सरकार ने अपनी नीति को और भी कठोर कर दिया और असंख्य लोगों को जेलों में डाल दिया गया।.सारा देश एक जेलखाने के समान दिखाई देने लगा।

फरवरी 1943 ई० तक ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ बड़ी सफलता से चलता रहा। परन्तु कुछ समय पश्चात् सरकार की दमन नीति के कारण यह आन्दोलन शिथिल पड़ गया और धीरे-धीरे यह बिल्कुल समाप्त हो गया।

आन्दोलन का महत्त्व-‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के कारण ब्रिटिश सरकार यह बात भली-भान्ति जान गई कि जनता में असन्तोष कितना व्यापक है। सरकार समझ गई कि भारतीय जनता अंग्रेज़ी शासन से मुक्ति चाहती है और वह इसे प्राप्त करके ही रहेगी। सरकार ने निःसन्देह आन्दोलन को कुचल दिया, परन्तु वह स्वतन्त्रता की भावनाओं को न कुचल सकी। परिणामस्वरूप आन्दोलन की समाप्ति के तीन वर्षों बाद ही उन्हें भारत को स्वतन्त्र कर देना पड़ा।

प्रश्न 4.
स्वतन्त्रता आन्दोलन में गाँधी के योगदान की विवेचना कीजिए।
अथवा
महात्मा गाँधी के आरम्भिक जीवन तथा कार्यों का वर्णन करो।
अथवा
गांधी जी द्वारा चलाए गए तीन प्रमुख जन-आन्दोलनों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
आधुनिक आरम्भिक भारत के इतिहास में महात्मा गाँधी को सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त है। भारत को स्वतन्त्र कराने में सबसे अधिक योगदान उन्हीं का रहा। उनके आगमन से ही राष्ट्रीय आन्दोलन को ऐसा मार्ग मिला जो सीधा स्वतन्त्रता की मंज़िल पर ले गया। उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह के द्वारा शक्तिशाली अंग्रेजी साम्राज्य से टक्कर ली और अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। भारत के इस महान् स्वतन्त्रता सेनानी के जीवन तथा कार्यों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है जन्म तथा शिक्षा-महात्मा गाँधी जी का बचपन का नाम मोहनदास था। उनका जन्म 2 अक्तूबर, 1869 ई० को काठियावाड़ में पोरबन्दर नामक स्थान पर हुआ। इनके पिता का नाम कर्मचन्द गांधी था जो पोरबन्दर के दीवान थे। गाँधी जी ने अपनी आरम्भिक शिक्षा भारत में ही प्राप्त की। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें इंग्लैण्ड भेजा गया। वहाँ से उन्होंने वकालत पास की और फिर लौट आये।

राजनीतिक जीवन-गाँधी जी के राजनीतिक जीवन का आरम्भ दक्षिणी अफ्रीका से हुआ। उन्होंने इंग्लैण्ड से आने के बाद कुछ समय तक भारत में वकील के रूप में कार्य किया। परन्तु फिर वह दक्षिण अफ्रीका चले गए।

गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका में-गाँधी जी जिस समय दक्षिणी अफ्रीका पहुँचे, उस समय वहाँ भारतीयों की दशा बड़ी बुरी थी। वहाँ की गोरी सरकार भारतीयों के साथ बहुत बुरा व्यवहार करती थी। गाँधी जी इस बात को सहन न कर सके। उन्होंने वहाँ की सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह आन्दोलन चलाया और भारतीयों को उनके अधिकार दिलवाये।

गाँधी जी भारत में-1914 ई० गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उस समय प्रथम विश्व-युद्ध छिड़ा हुआ था। अंग्रेजी सरकार इस युद्ध में उलझी हुई थी। उसे धन और जन की काफी आवश्यकता थी। अत: गाँधी जी ने भारतीयों से अपील की कि वे अंग्रेज़ों को सहयोग दें। वह अंग्रेजी सरकार की सहायता करके उसका मन जीत लेना चाहते थे। उनका विश्वास था कि अंग्रेजी सरकार युद्ध जीतने के बाद भारत को स्वतन्त्र कर देगी, परन्तु अंग्रेज़ी सरकार ने युद्ध में विजय पाने के बाद भारत को कुछ न दिया। इसके विपरीत उन्होंने भारत में रौलेट एक्ट लागू कर दिया। इस काले कानून के कारण गाँधी जी को बड़ी ठेस पहुंची और उन्होंने अंग्रेज़ी सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन चलाने का निश्चय कर लिया।

असहयोग आन्दोलन-1920 ई० में गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया। जनता ने गाँधी जी का पूरापूरा साथ दिया। सरकार को गाँधी जी के इस आन्दोलन के सामने झुकना पड़ा। परन्तु कुछ हिंसक घटनाएँ हो जाने के कारण गाँधी जी को अपना आन्दोलन वापस लेना पड़ा।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन-1930 ई० में गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ कर दिया। उन्होंने डांडी यात्रा की और नमक के कानून को भंग कर दिया। सरकार घबरा गई। उसने भारतवासियों को नमक बनाने का अधिकार दे दिया। 1935 ई० में सरकार ने एक महत्त्वपूर्ण एक्ट भी पास किया।

भारत छोड़ो आन्दोलन-गाँधी जी का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत को स्वतन्त्र कराना था। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने 1942 ई० में भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया। भारत के लाखों नर-नारी गाँधी जी के साथ हो गये। इतने विशाल जनआन्दोलन से अंग्रेजी सरकार घबरा गई और उसने भारत छोड़ने का निश्चय कर लिया। आखिर 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत स्वतन्त्र हुआ। इस स्वतन्त्रता का वास्तविक श्रेय गाँधी जी को ही जाता है।

अन्य कार्य-गाँधी जी ने भारतवासियों के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए अनेक काम किये। भारत से गरीबी दूर करने के लिए उन्होंने लोगों को खादी पहनने का सन्देश दिया। अछूतों के उद्धार के लिए गाँधी जी ने उन्हें ‘हरिजन’ का नाम दिया। देश में साम्प्रदायिक दंगों को समाप्त करने के लिए गाँधी जी ने गाँव-गाँव में घूमकर लोगों को भाईचारे का सन्देश दिया।

देहान्त-30 जनवरी, 1948 ई० की संध्या को गाँधी जी को एक युवक ने गोली का निशाना बना दिया। उन्होंने तीन बार ‘हे राम’ कहा और अपने प्राण त्याग दिए। उनकी मृत्यु पर सारे देश में शोक छा गया। भारतवासी गाँधी जी की सेवाओं को नहीं भुला सकते। आज भी उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ के नाम से याद किया जाता है।

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प्रश्न 5.
1935 के भारत सरकार के अधिनियम की क्या मुख्य विशेषताएं थीं ? इसके किन प्रावधानों को नहीं लागू किया गया और क्यों ?
अथवा
1935 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा किए गए केंद्रीय अथवा प्रांतीय परिवर्तनों की जानकारी दीजिए।
उत्तर-
1935 के भारत सरकार अधिनियम की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं। केन्द्रीय सरकार में परिवर्तन-

1. केन्द्र में एक संघात्मक सरकार की स्थापना की गई। इस संघ में प्रान्तों का सम्मिलित होना आवश्यक था, जबकि रियासतों का सम्मिलित होना उनकी इच्छा पर निर्भर था।

2. संघीय विधान मण्डल के ‘राज्य परिषद्’ और ‘संघीय सभा’ दो सदन बनाये गये। राज्य परिषद् में प्रान्तों के सदस्यों की संख्या 156 और रियासतों की संख्या 140 निश्चित की गई। संघीय सभा में प्रान्तों के सदस्यों की संख्या 250 और रियासतों की संख्या 125 निश्चित की गई।

3. यह भी निश्चित किया गया कि प्रान्तों के प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने जायें और रियासतों के प्रतिनिधि राजाओं के द्वारा मनोनीत हों।

4. केन्द्र के विषयों को रक्षित (Reserved) और प्रदत्त (Transferred) दो भागों में बाँटकर दोहरा शासन स्थापित किया गया। रक्षित विषय गवर्नर-जनरल के अधीन थे, जबकि प्रदत्त विषय मन्त्रियों को सौंपे गये। मन्त्रियों को विधान मण्डल के सामने उत्तरदायी ठहराया गया।

5. विधान मण्डल को बजट के 20 प्रतिशत भाग पर मत देने का अधिकार दिया गया।

6. गवर्नर-जनरल को कुछ विशेषाधिकार दिये गये।

7. जब तक भारतीय संघात्मक सरकार की स्थापना नहीं हो जाती तब तक केन्द्र का शासन 1919 ई० के एक्ट में किये गये संशोधन के अनुसार चलाया जायेगा।

प्रान्तीय सरकारों में परिवर्तन-

  • बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया। इसके अतिरिक्त उड़ीसा और सिन्ध के दो नये प्रान्त बनाये गये।
  • बंगाल, बिहार, असम, बम्बई (मुम्बई), मद्रास (चेन्नई) और उत्तर प्रदेश में विधानमण्डल में दो सदनों की व्यवस्था की गई और शेष प्रान्तों में एक ही सदन बनाया गया। उच्च सदन का नाम विधान परिषद् और निम्न सदन का विधान सभा रखा गया।
  • विधान परिषद् के कुछ सदस्य गवर्नर द्वारा मनोनीत किये जाते थे और विधान सभा के सदस्यों का चुनाव जनता द्वारा किया जाता था।
  • प्रान्तों में मत देने का अधिकार स्त्रियों, परिगणित जातियों और मजदूरों को भी दे दिया गया।
  • प्रान्तों से दोहरे शासन को सदा के लिए समाप्त कर दिया और उनके स्थान पर स्वायत्त शासन (Autonomy) की स्थापना की गई। सभी प्रान्तीय विषय एक मन्त्रिमण्डल को सौंप दिये गये। मन्त्रियों का चुनाव बहुमत प्राप्त राजनीतिक दल में से किया जाता था। प्रधानमन्त्री शासन विभाग का कार्य मन्त्रियों में बाँट देता था। मन्त्रिमण्डल विधानमण्डल के सामने उत्तरदायी था।
  • प्रान्तों के गवर्नरों को विशेष अधिकार दिये गये।
  • प्रान्त में विशेष परिस्थिति उत्पन्न होने पर गवर्नर विधान सभा को भंग करके प्रान्त का शासन अपने हाथ में ले सकता था।
  • गवर्नरों को अध्यादेश तथा गवर्नरी एक्ट जारी करने का भी अधिकार था।

इण्डिया कौंसिल में परिवर्तन-इण्डिया कौंसिल भंग कर दी गई। भारतमन्त्री को कम-से-कम तीन और अधिक-सेअधिक 6 सलाहकारों को नियुक्त करने का अधिकार दिया गया।

अन्य परिवर्तन-

  • उच्च न्यायालयों के विरुद्ध अपील सुनने के लिए दिल्ली में फैडरल कोर्ट (Federal Court) की स्थापना की गई।
  • शासन के विषयों को केन्द्रीय और प्रान्तीय विषयों में बाँट दिया गया और कुछ विषयों की एक साँझी सूची तैयार की गई। वे प्रावधान जिन्हें लागू नहीं किया गया-1935 के अधिनियम के संघीय पक्ष को कभी लागू नहीं किया गया। परन्तु प्रान्तीय पक्ष को शीघ्र लागू कर दिया गया। प्रान्तों में हुए चुनावों ने यह सिद्ध कर दिया कि देश की अधिकांश जनता कांग्रेस के साथ है। क्योंकि कांग्रेस ने 1935 के अधिनियम का कड़ा विरोध किया था, इसलिए सरकार इस अधिनियम के संघीय पक्ष को लागू करने का साहस न कर सकी।

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प्रश्न 6.
भारत को दो भागों में क्यों बांटा गया ? इसके लिए उत्तरदायी किन्हीं पांच कारणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
भारत 15 अगस्त, 1947 ई० को स्वतन्त्र हुआ। स्वतन्त्रता के समय भारत को दो भागों में बांट दिया गया-भारत तथा पाकिस्तान। यह विभाजन निम्नलिखित कारणों से हुआ-

1. ‘फूट डालो और राज्य करो’ की नीति-1857 ई० के विद्रोह के पश्चात् अंग्रेजों ने भारत में ‘फूट डालो और राज्य करो’ की नीति अपना ली। उन्होंने भारत के विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे के प्रति खूब लड़ाया। उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों को एक-दूसरे के विरुद्ध भड़काया। इसका परिणाम यह हुआ कि वे एक-दूसरे से घृणा करने लगे।

2. मुस्लिम लीग के प्रयत्न-1906 ई० में मुसलमानों ने मुस्लिम लीग नामक संस्था की स्थापना भी कर ली। फलस्वरूप हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव बढ़ने लगा। मुस्लिम लीग ने मुस्लिम समाज में साम्प्रदायिकता फैलानी आरम्भ कर दी। 1940 ई० तक हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव इतने बढ़ गए कि मुसलमानों ने अपने लाहौर प्रस्ताव में पाकिस्तान की मांग की।

3. कांग्रेस की कमजोर नीति-मुस्लिम लीग की मांगें दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थीं और कांग्रेस इन्हें स्वीकार करती रही। 1916 ई० के लखनऊ समझौते के अनुसार कांग्रेस ने साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली को स्वीकार कर लिया। कांग्रेस की इस . कमज़ोर नीति का लाभ उठाते हुए मुसलमानों ने देश के विभाजन की मांग करनी आरम्भ कर दी।

4. साम्प्रदायिक दंगे-पाकिस्तान की मांग मनवाने के लिए मुस्लिम लीग ने ‘सीधी कार्यवाही’ आरम्भ कर दी और सारे देश में साम्प्रदायिक दंगे होने लगे। इन घटनाओं को केवल भारत विभाजन द्वारा ही रोका जा सकता था।

5. अन्तरिम सरकार की असफलता-1946 में बनी अन्तरिम सरकार में कांग्रेस और मुस्लिम लीग को साथ-साथ कार्य करने का अवसर मिला, परन्तु लीग कांग्रेस के प्रत्येक कार्य में कोई-न-कोई रोड़ा अटका देती थी। परिणामस्वरूप अन्तरिम सरकार असफल रही। इससे यह स्पष्ट हो गया कि हिन्दू और मुसलमान एक होकर शासन नहीं चला सकते।

6. इंग्लैण्ड द्वारा भारत छोड़ने की घोषणा-20 फरवरी, 1947 को इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री एटली ने जून, 1948 ई० तक भारत को छोड़ देने की घोषणा की। घोषणा में यह भी कहा गया कि अंग्रेज़ केवल उसी दशा में भारत छोड़ेंगे जब मुस्लिम लीग और कांग्रेस में समझौता हो जाएगा, परन्तु मुस्लिम लीग पाकिस्तान प्राप्त किए बिना किसी समझौते पर तैयार न हुई। फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने भारत विभाजन की योजना बनानी आरम्भ कर दी।

7. भारत का विभाजन-भारत विभाजन के उद्देश्य से लॉर्ड माऊंटबेटन को भारत का वायसराय बनाकर भारत भेजा गया। उन्होंने अपनी सूझ-बूझ से एक ही मास में नेहरू और पटेल को विभाजन के लिए तैयार कर लिया। आखिर 1947 में भारत को दो भागों में बांट दिया गया।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर

Punjab State Board PSEB 7th Class Physical Education Book Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Physical Education Chapter 1 मनुष्य का शरीर

PSEB 7th Class Physical Education Guide मनुष्य का शरीर Textbook Questions and Answers

अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न 1.
मानव के शरीर के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
मानव का शरीर मांसपेशियों, हड्डियों तथा बहुत-से छोटे तथा बड़े अंगों जैसे दिल, फेफड़े, जिगर, गुदा आदि से बना है। जब दर्शक कबड्डी आदि खेलों में भाग लेने से पूर्व शरीर को गर्माते हुए खेल के मैदान में प्रवेश करते हैं तो उनके आकर्षक, सुन्दर हृष्टपुष्ट शरीर को देखते हैं तो उनके मन में भी उसी प्रकार का सुन्दर और आकर्षक शरीर पाने की मन में इच्छा होती है। खिलाड़ियों को अपने शरीर को आकर्षक और शक्तिशाली बनाने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। प्रत्येक खेल में शरीर का स्वस्थ व शक्तिशाली होना आवश्यक है। खेलों में खिलाड़ी की उन्नति उसके शरीर की क्षमता पर निर्भर करती है। शरीर को स्वस्थ और मेहनती बनाने के लिए खिलाड़ी को शारीरिक जानकारी होना अति आवश्यक है। अगर खिलाड़ी को शरीर के सभी अंगों, उनकी कार्यक्षमता व कार्यप्रणाली की जानकारी नहीं होगी तो उसे शारीरिक व्यायाम करते समय चोट लग सकती है अथवा चोट लगने का भय बना रहता है और उसकी शारीरिक क्षमता में वृद्धि नहीं हो सकती।

प्रश्न 2.
मानव शरीर को समझने के लिए कौन से दो भागों में बांटा जा सकता है ?
उत्तर-

  1. शारीरिक ढांचा
  2. शारीरिक क्रियाएं।

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प्रश्न 3.
हमारे शरीर में कुल कितनी हड्डियां होती हैं ?
उत्तर-
206 हड्डियां होती हैं।

प्रश्न 4.
रक्त प्रवाह प्रणाली के मुख्य अंग कौन से हैं ?
उत्तर-

  1. दिल
  2. धमनियां
  3. शिराएं
  4. कोशिकाएं।

प्रश्न 5.
ज्ञानेन्द्रियों के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
ज्ञानेन्द्रियों में आंख, कान, जिह्वा, नाक और त्वचा शामिल है। इन ज्ञानेन्द्रियों से हमें अपने आस-पास की सभी जानकारी मिलती है। आंख से हम सभी वस्तुओं को देखते हैं। नाक से संघकर सुगंध और दुर्गंध में अन्तर मालूम होता है। कानों के द्वारा हम सुनते हैं। जिह्वा से खाने-पीने की वस्तुओं के स्वाद के बारे में पता चलता है। त्वचा द्वारा स्पर्श से गर्मी-सर्दी का पता चलता है। इन ज्ञानेन्द्रियों का हमारे मस्तिष्क से सीधा सम्बन्ध होता है।

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प्रश्न 6.
मानव शरीर में मल त्याग प्रणाली का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
मल-विसर्जन प्रणाली-जो भोजन हम खाते हैं उसका कुछ भाग ही शरीर में इस्तेमाल होता है, शेष भोजन व्यर्थ पदार्थ के रूप में बच जाता है। इसी तरह जब हम कार्य करते हैं तो शरीर में ऊर्जा का प्रयोग होता है जिससे कई व्यर्थ पदार्थ शरीर में बच जाते हैं। इन व्यर्थ पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना आवश्यक है यदि यह व्यर्थ पदार्थ शरीर से बाहर न निकलें तो कई रोग लग जाते हैं। मल त्याग प्रणाली इन हानिकारक पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने का कार्य करती है। त्वचा और गुर्दे इस प्रणाली का मुख्य अंग है जो पसीने और मूत्र द्वारा इन व्यर्थ पदार्थों को शरीर से बाहर निकालते हैं।

प्रश्न 7.
शारीरिक ढांचे के प्रमुख कार्य कौन से हैं ?
उत्तर-
हमारा शारीरिक ढांचा कई प्रकार के कार्य करता है जो निम्नलिखित हैं
1. सुरक्षा-हमारे शरीर में कई कोमल अंग हैं जैसे हृदय, फेफड़े, मस्तिष्क आदि इन पर हल्की सी चोटें भी खतरनाक हो सकती हैं। हमारा शारीरिक ढांचा इन कोमल अंगों को हड्डियों और पसलियों से ढककर सुरक्षा देता है जैसे खोपड़ी की हड्डियां हमारे दिमाग और पसलियां हृदय और फेफड़ों को सुरक्षा देते हैं।

2. आकार-शारीरिक ढाँचा हमारे शरीर को आकार देता है। यदि हमारे शरीर में हड्डियां न हों तो शरीर मांस का लोथड़ा बनकर रह जाएगा और इसे किसी प्रकार का आकार प्रदान नहीं हो सकता।

3. गतिशीलता-शारीरिक ढाँचा शरीर को गतिशील बनाता है। हमारी मांसपेशियां शारीरिक ढाँचे से जुड़ी होती हैं। मांसपेशियों के सिकुड़ने और फैलने से हडियों में गति होती है जिससे हम चलने, कूदने और दौड़ सकते हैं।

4. खनिज भण्डार-हमारे शरीर की हड्डियां खनिज भण्डार का काम भी करती हैं। हड्डियों में बड़ी मात्रा में कैल्शियम और फास्फोरस होता है जिनसे हमारे शरीर की वृद्धि और विकास होता रहता है। इन खनिजों के लिए संतुलित भोजन खाना चाहिए। यदि शरीर में इन तत्त्वों की कमी हो जाए तो हड्डियां इसकी पूर्ति करती हैं।

Physical Education Guide for Class 7 PSEB मनुष्य का शरीर Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य का शरीर किस वस्तु का बना है ?
उत्तर-
मांसपेशियों, हड्डियों तथा बहुत-से छोटे और बड़े अंगों का।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर

प्रश्न 2.
मानव शरीर में तीन महत्त्वपूर्ण अंगों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. दिल (हृदय)
  2. फेफड़े
  3. गुर्दे।

प्रश्न 3.
शरीर के कोमल अंगों को चोट से कौन रक्षा करता है ?
उत्तर-
कोमल अंगों को हड्डियां व पसलियां ढककर सुरक्षा प्रदान करती हैं।

प्रश्न 4.
खोपड़ी की हड्डियां किस शरीर के अंग की रक्षा करती हैं ?
उत्तर-
दिमाग की (मस्तिष्क)।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर

प्रश्न 5.
हमारे शरीर को आकार कौन प्रदान करता है ?
उत्तर-
शारीरिक ढांचा मानव शरीर को आकार प्रदान करता है।

प्रश्न 6.
यदि हमारे शरीर में हड्डियां न होती तो क्या होता ?
उत्तर-
हमारा शरीर मांस का लोथड़ा बन जाता।

प्रश्न 7.
शरीर को गतिशीलता कैसे मिलती हैं ?
उत्तर-
मांसपेशियां शरीर में गति पैदा करती हैं।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर

प्रश्न 8.
खनिज भण्डार का कार्य कौन करता है ?
उत्तर-
हड्डियां खनिज भण्डार का कार्य करती हैं।

प्रश्न 9.
हमारे शरीर में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कौन-कौन सी प्रणालियां हैं ?
उत्तर-

  1. रक्त प्रवाह प्रणाली
  2. श्वास क्रिया प्रणाली

प्रश्न 10.
हमारे शरीर को चलने, फिरने, दौड़ने, कूदने में कौन-सी प्रणाली कार्य करती है ?
उत्तर-
मांसपेशी प्रणाली।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर

प्रश्न 11.
श्वास प्रणाली के मुख्य अंग कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
नाक, श्वासनली और फेफड़े हैं।

प्रश्न 12.
हमारे शरीर को ऊर्जा कौन-सी प्रणाली देती है ?
उत्तर-
पाचन प्रणाली।

प्रश्न 13.
मल विसर्जन प्रणाली के मुख्य दो अंग लिखें।
उत्तर-

  1. त्वचा (चमड़ी)
  2. गुर्दे।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर

प्रश्न 14.
स्नायु तंत्र प्रणाली के कार्य लिखें।
उत्तर-
मस्तिष्क के संदेशों को शारीरिक अंगों में होने वाली क्रियाओं को मस्तिष्क से मांसपेशियों द्वारा संदेश पहुंचाता है।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
खिलाड़ियों को अपना शरीर सुन्दर और आकर्षक बनाने के लिए क्या करना पड़ता है ?
उत्तर-
खिलाड़ी अपने शरीर को गर्माते हुए खेल के मैदान में चाहे वह कबड्डी खेल हो या कोई दूसरा खेल प्रवेश करते हैं तो उनके सुन्दर और आकर्षक शरीर को देखकर हैरानी होती है। खिलाड़ियों को अपने शरीर को आकर्षक और शक्तिशाली बनाने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है।

प्रश्न 2.
खिलाड़ी की उन्नति के लिए उसे क्या-क्या जानना जरूरी है ?
उत्तर-
खिलाड़ी की उन्नति उसके शरीर की क्षमता पर निर्भर करती है। खिलाड़ी को शरीर के अंगों, उनकी कार्य प्रणाली और कार्यक्षमता का ज्ञान होना आवश्यक है।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर

प्रश्न 3.
हड्डियों में कौन-सा खनिज भण्डार होता है ?
उत्तर-
हड्डियों में कैल्शियम और फॉसफोरस जमा होता है जो हमारे शरीर की वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक है। हमारे शरीर में आवश्यक तत्त्वों की कमी हो जाए तो हमारी हड्डियां इसकी पूर्ति करती हैं।

प्रश्न 4.
हमारे शरीर को ऊर्जा कैसे प्राप्त होती है ?
उत्तर-
यह ऊर्जा हमें भोजन से मिलती है। हम जो भोजन खाते हैं उसके कई रासायनिक क्रियाओं के पश्चात् शरीर के योग्य बनता है। भोजन-प्रणाली से हमें पता चलता है कि शरीर द्वारा भोजन कैसे पचता है और उससे ऊर्जा का प्रयोग कैसे होता है ?

प्रश्न 5.
मानव शरीर किसकी भांति लगता है ?
उत्तर-
मानव शरीर मशीन जैसा है। मशीन के ठीक कार्य करने के लिए उसके सभी पुों का अच्छे ढंग से कार्य करना ज़रूरी है। उसी प्रकार शरीर की क्रिया प्रणालियां है। यदि शरीर की किसी प्रणाली में खराबी आती है तो इसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है और व्यक्ति रोगी हो जाता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शरीर सम्बन्धी पूर्ण जानकारी ज़रूरी है।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर

प्रश्न 6.
धमनियों और शिराओं में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
धमनियां वे नलियां हैं जो रक्त को दिल से शरीर के प्रत्येक भाग में पहुंचाती हैं। यह धीरे-धीरे बारीक शिराओं में बंट जाती हैं जिन्हें कोशिकाएं कहते हैं। शिराएं वे नलियां हैं जो रक्त को फेफड़ों और शरीर के दूसरे भागों से हृदय में पहुँचाती हैं।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मनुष्य को शारीरिक क्रियाओं का ज्ञान क्यों जरूरी है ?
उत्तर-
हमारे शरीर में कई कार्य प्रणालियाँ हैं जो मिलकर भिन्न कार्य करती हैं। इन प्रणालियों का ठीक प्रकार से काम करना ज़रूरी है। यदि इनमें एक प्रणाली भी ठीक कार्य करना बंद कर दे तो सारे शरीर पर उसका बुरा प्रभाव पड़ेगा और शरीर में रोग आ जाता है।
मानव शरीर की कार्य प्रणालियां इस प्रकार हैं :

1. मांसपेशी प्रणाली-इस प्रणाली से मांसपेशियों के बारे में जानकारी मिलती है। मांसपेशियों द्वारा हम चलने, फिरने, कूदने और दौड़ने के काबिल होते हैं। हमारे शरीर में होने वाली गतिशीलता मांसपेशियों के कारण ही सम्भव है।

2. रक्तप्रवाह प्रणाली-हमारे शरीर में रक्त प्रवाह लगातार हमेशा चलता रहता है। रक्त प्रवाह प्रणाली के मुख्य अंग हृदय, धमनियां, शिराएं और कोशिकाएं हैं। दिल की आकृति बंद मुट्ठी के बराबर की होती है। दिल हमारा धड़कता रहता है। रक्त धमनियों द्वारा सारे शरीर में पहुंचता है। हम अपने हाथ के ऊपरी भाग में नीले रंग की शिराएं देख सकते हैं जो रक्त को हृदय की ओर ले जाती हैं।

3. श्वासक्रिया प्रणाली-मनुष्य को जीवित रहने के लिए हर समय आक्सीजन की ज़रूरत होती है। ऑक्सीजन श्वास द्वारा शरीर में प्रवेश करती है और कार्बन-डाइआक्साइड बाहर निकालते हैं। नाक, श्वासनली और फेफड़े इस श्वास प्रणाली के मुख्य अंग हैं।

4. पाचन प्रणाली-शरीर को कार्य करने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत होती है जो ऊर्जा हमें भोजन से मिलती है जो भोजन हम खाते हैं। कई रासायनिक क्रियाओं के पश्चात् शरीर में कार्य करने के योग्य बनता है। इस प्रणाली से हमें मालूम पड़ता है शरीर में भोजन कैसे पचता है और पैदा होने वाली ऊर्जा का प्रयोग कैसे होता है ?

5. मल-विसर्जन प्रणाली-जो भोजन हम खाते हैं उसका कुछ भाग ही शरीर में इस्तेमाल होता है, शेष भोजन व्यर्थ पदार्थ के रूप में बच जाता है। इसी तरह जब हम कार्य करते हैं तो शरीर में ऊर्जा का प्रयोग होता है जिससे कई व्यर्थ पदार्थ शरीर में बच जाते हैं। इन व्यर्थ पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना आवश्यक है यदि यह व्यर्थ पदार्थ शरीर से बाहर न निकलें तो कई रोग लग जाते हैं। मल त्याग प्रणाली इन हानिकारक पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने का कार्य करती है। त्वचा और गुर्दे इस प्रणाली का मुख्य अंग है जो पसीने और मूत्र द्वारा इन व्यर्थ पदार्थों को शरीर से बाहर निकालते हैं।

6. स्नायु तंत्र प्रणाली-हमारी सभी क्रियाएं मस्तिष्क द्वारा संचालित होती हैं। हमारे शरीर में स्नायु तंत्र का जाल-सा बना हुआ है, जो मस्तिष्क के संदेशों को शारीरिक अंगों तथा शारीरिक अंगों की क्रियाओं को मस्तिष्क तक संदेशों को लाने और ले जाने का कार्य करते हैं। रीढ़ की हड्डी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। सारे संदेश इसके द्वारा आगे पहुंचते हैं।

7. ज्ञानेन्द्रियां-इस प्रणाली में आंख, कान, जिह्वा, नाक और त्वचा शामिल है। इन ज्ञानेन्द्रियों से हमें अपने आस-पास की सभी जानकारी मिलती है। आंख से हम सभी वस्तुओं को देखते हैं। नाक से सूंघकर सुगंध और दुर्गंध में अन्तर मालूम होता है। कानों के द्वारा हम सुनते हैं। जिह्वा से खाने-पीने की वस्तुओं के स्वाद के बारे में पता चलता है। त्वचा द्वारा स्पर्श से गर्मी-सर्दी का पता चलता है। इन ज्ञानेन्द्रियों का हमारे मस्तिष्क से सीधा सम्बन्ध होता है।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 1 मनुष्य का शरीर

प्रश्न 2.
शारीरिक कार्य प्रणालियों का महत्त्व लिखें।
उत्तर-
सारी शारीरिक प्रणालियों का मानव शरीर के लिए बहुत महत्त्व है। इनमें रक्त प्रवाह प्रणाली और श्वास क्रिया प्रणाली बहुत महत्त्वपूर्ण है। इन प्रणालियों में अगर कोई प्रणाली अपना कार्य न करे तो मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। किसी भी व्यक्ति को ज़िन्दा रहने के लिए शरीर में रक्त और ऑक्सीजन का मिलना अति आवश्यक है।

मानव शरीर एक मशीन की भांति ही कार्य करता है और सभी क्रिया प्रणालियां इस मशीन के भिन्न-भिन्न पुर्जे (अंग) हैं। मशीन को अच्छी प्रकार काम करने के लिए उसके सभी पुर्जी का ठीक कार्य करना आवश्यक है। अगर शरीर की किसी प्रणाली में कोई खराबी आ जाती है तो उसका असर सारे शरीर पर पड़ता है और मनुष्य बीमार हो जाता है। इसलिए हमें स्वस्थ रहने के लिए शरीर की पूरी जानकारी ज़रूरी है।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

Punjab State Board PSEB 6th Class Physical Education Book Solutions Physical Education Objective Questions and Answers.

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

पाठ-1 : स्वास्थ्य

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य की किस्में बताएं
(क) शारीरिक स्वास्थ्य
(ख) मानसिक स्वास्थ्य
(ग) सामाजिक स्वास्थ्य
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
बच्चों को किस प्रकार का भोजन करना चाहिए
(क) बच्चों को संतुलित भोजन करना चाहिए।
(ख) खाने से पहले हाथ अच्छी तरह धो लेने चाहिए।
(ग) आवश्यकता अनुसार अधिक गर्म या ठण्डा भोजन नहीं करना चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3.
हमें स्वस्थ रहने के लिए कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
(क) डॉक्टरी जांच
(ख) अच्छी आदतें
(ग) व्यायाम, खेलें और योग
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 4.
त्वचा की सफ़ाई कैसे करनी चाहिए
(क) प्रतिदिन सुबह साफ पानी से स्नान करना चाहिए।
(ख) स्नान करने से पहले पेट साफ़ करना चाहिए।
(ग) खाने के पश्चात् स्नान नहीं करना चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 5.
दांतों की सफ़ाई कैसे करनी होती है
(क) प्रतिदिन सुबह और रात को सोने से पहले दांतों को ब्रुश से साफ़ करना।
(ख) गर्म दूध अथवा चाय नहीं पीनी चाहिए।
(ग) दांतों में पिन आदि नहीं मारनी चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 6.
स्वास्थ्य विज्ञान के नियम लिखें
(क) साफ़ और संतुलित भोजन खाना चाहिए।
(ख) श्वास हमेशा नाक द्वारा लेना चाहिए।
(ग) हमेशा खुश रहना चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 7.
सिकरी होने पर आप क्या करोगे ?
(क) सिकरी होने पर 250 ग्राम पानी में एक चम्मच बोरिक पाउडर डालकर सिर धोएं।
(ख) नारियल का तेल बालों में लगाएं
(ग) ग्लिसरीन में नींबू डालकर सिर धोना चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

पाठ-2 : सफाई तथा सांभ-सम्भाल

प्रश्न 1.
घर की सफ़ाई रखने के लिए विशेष ध्यान रखने योग्य बातें
(क) घर के कूड़े-कर्कट और गन्दे पानी के निकास का उचित प्रबन्ध
(ख) घर के सभी कमरों में झाड़ लगाना।
(ग) घर के कूड़े को ढक्कनदार ढोल में रखना।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
स्कूल की सफ़ाई रखने के लिए अच्छी बातें
(क) स्कूल के बैंच और डैस्क साफ़ रखने चाहिए।
(ख) स्कूल के कमरे में कूड़ा नहीं फैलाना चाहिए।
(ग) लिखते समय फर्श पर स्याही नहीं छिड़कनी चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 3.
घर में गन्दगी के कारण
(क) घर के कूड़े का योग्य स्थान पर प्रबन्ध करना चाहिए।
(ख) घर, रसोई और पाखाने के गन्दे पानी के निकास का प्रबन्ध करना चाहिए।
(ग) मल-मूत्र का ठीक प्रबन्ध करना चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 4.
एक अच्छा घर बनाते समय कौन-सी बातों का ध्यान रखोगे ?
(क) घर खुश्क, सख्त तथा ऊंचे स्थान पर बनाना चाहिए।
(ख) घर बाजार, कारखाने, रेलवे स्टेशन तथा शमशान घाट से दूर बनाना चाहिए।
(ग) घर में वायु और रोशनी पर्याप्त मात्रा में आनी चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 5.
शरीर की सफाई के नियम लिखें।
(क) हमें प्रतिदिन साफ़ पानी का इस्तेमाल करना चाहिए।
(ख) स्नान करने के पश्चात् तौलिए से शरीर को अच्छी तरह साफ़ करना चाहिए।
(ग) बालों को सुका कर कंघी करनी चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

पाठ-3 : हॉकी का जादूगर-मेजर ध्यानचंद

प्रश्न 1.
मेजर ध्यानचंद का जन्म कब हुआ ?
(क) 1905
(ख) 1910
(ग) 1912
(घ) 1915.
उत्तर-
(क) 1905

प्रश्न 2.
भारतीय हॉकी टीम ने पहली बार ओलम्पिक खेलों में कब भाग लिया ?
(क) 1926
(ख) 1932
(ग) 1936
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) 1926

प्रश्न 3.
मेजर ध्यानचंद ने पहला अन्तर्राष्ट्रीय मैच कब खेला ?
(क) 1926
(ख) 1928
(ग) 1932
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) 1926

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 4.
मेजर ध्यानचंद जी का बुत किस देश में लगा हुआ है
(क) ऑस्ट्रेलिया के शहर वियाना में
(ख) अमेरिका में
(ग) न्यूज़ीलैण्ड में
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) ऑस्ट्रेलिया के शहर वियाना में

प्रश्न 5.
भारत सरकार की तरफ से मेजर ध्यानचंद जी को क्या-क्या सम्मान दिए गए ?
(क) 1956 ई० में पद्म भूषण
(ख) भारतीय डाक विभाग ने उनकी याद में एक डाक टिकट जारी किया।
(ग) भारत सरकार ने दिल्ली में अन्तर्राष्ट्रीय खेल स्टेडियम उनके नाम पर बनाया।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 6.
मेजर ध्यानचंद किस खेल से सम्बन्धित थे ?
(क) फुटबॉल
(ख) हॉकी
(ग) क्रिकेट
(घ) बैडमिंटन।
उत्तर-
(ख) हॉकी

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 7.
मेजर ध्यानचंद जी ने हॉकी खेलना कहां आरम्भ किया ?
(क) घर में
(ख) स्कूल में
(ग) कॉलेज में
(घ) फौज में।
उत्तर-
(घ) फौज में।

प्राठ-4 : पंजाब की लोक वेलें

प्रश्न 1.
पुगने के कितने तरीके हैं ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पांच।
उत्तर-
(ख) तीन

प्रश्न 2.
किसी मनपसन्द खेल का नाम लिखें।
(क) बन्दर किल्ला
(ख) कोटला छपाकी
(ग) रस्सी कूदना
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) बन्दर किल्ला

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 3.
बड़ी दो खेलों के नाम लिखो।
(क) हॉकी
(ख) फुटबॉल
(ग) क्रिकेट
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(क) हॉकी, (ख) फुटबॉल

प्रश्न 4.
लोक खेलों में से किसी दो के नाम लिखें।
(क) बन्दर किल्ला और कोटला छपाकी
(ख) चोर सिपाही
(ग) रस्सी कूदना
(घ) खो-खो।
उत्तर-
(क) बन्दर किल्ला और कोटला छपाकी

प्रश्न 5.
लोक खेलों का महत्त्व लिखें।
(क) शारीरिक बल बढ़ता है
(ख) फुर्ती
(ग) चुस्ती
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

पाठ-5 : सुरक्षा शिक्षा

प्रश्न 1.
सुरक्षा शिक्षा की क्या आवश्यकता है ?
(क) प्रतिदिन होने वाली दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है।
(ख) सुरक्षा के ज्ञान के कारण हम अपने बाएं हाथ पर सड़क पर चलते हैं।
(ग) सुरक्षा शिक्षा के ज्ञान द्वारा ही हम चौराहे पर खड़े सिपाही के इशारों को समझ सकते हैं।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
सुरक्षा शिक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी है ?
(क) माता-पिता की
(ख) अध्यापकों की
(ग) नगरपालिका की
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3.
सुरक्षा के लिए कौन-कौन से अदारे (संस्थाएं) सहायक हो सकते हैं ?
(क) स्कूल और कॉलेज
(ख) नगरपालिका
(ग) समाज और सरकार
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 4.
कौन-सी शिक्षा हमें दुर्घटनाओं से बचाना सिखाती है ? उसे क्या कहते हैं ?
(क) सुरक्षा शिक्षा
(ख) खेल शिक्षा
(ग) मनोरंजन शिक्षा
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।

प्रश्न 5.
दुर्घटनाओं से बचने के लिए लोगों को किस वस्तु का ध्यान रखना चाहिए ?
(क) ट्रैफिक नियमों का
(ख) घर के नियमों का
(ग) स्कूल और कॉलेज के नियमों का
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।

प्रश्न 6.
सड़कों पर दुर्घटनाएं होने के कारण लिखें।
(क) शराब पीकर गाड़ी चलाना
(ख) चौराहे पर खड़े सिपाही के इशारों पर ध्यान न देना
(ग) मोड़ काटते समय ठीक इशारों का प्रयोग न करना
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

पाठ-6 : राष्ट्रीय ध्वज

प्रश्न 1.
हमारे झण्डे में कितने रंग हैं ?
(क) तीन
(ख) चार
(ग) पांच
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) तीन

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय झण्डा कब लहराया जाता है ?
(क) गणतन्त्र दिवस पर
(ख) स्वतन्त्रता दिवस पर
(ग) गांधी जयन्ती पर
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय झण्डा लहराते समय क्या सावधानी प्रयोग में लानी चाहिए ?
(क) केसरी रंग सबसे ऊपर हो
(ख) जुलूस में झण्डा दायें कन्धे पर रखना चाहिए
(ग) जलसों और उत्सवों में झण्डा स्टेज के आगे दायें हाथ की तरफ लगाना चाहिए।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 4.
किसी देश का झण्डा किस बात का प्रतीक है ?
(क) सभ्याचार का
(ख) मान का
(ग) शान का
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 5.
हमारे राष्ट्रीय झण्डे में कौन-कौन से रंग हैं ?
(क) केसरी
(ख) सफ़ेद
(ग) हरा
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय झण्डे में चक्र का निशान कहां से लिया गया है ?
(क) अशोक के सारनाथ से
(ख) तीर कमान से
(ग) आसमान से
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) अशोक के सारनाथ से

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

पाठ-7 : राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय गान की धुन कौन-कौन से अवसरों पर बजाई जाती है ?
(क) 15 अगस्त को
(ख) 26 जनवरी को
(ग) राष्ट्रपति और राज्यपाल को सलामी देते समय
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
हमारा राष्ट्रीय गान कौन-सा है ?
(क) जन-गण-मन और ‘वन्दे मातरम’
(ख) जन-गण-मन
(ग) वन्दे मातरम्
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(ख) जन-गण-मन

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय गीत की रचना किसने की ?
(क) रवीन्द्रनाथ टैगोर ने
(ख) बंकिम चन्द्र चटर्जी ने
(ग) गांधी जी ने
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(ख) बंकिम चन्द्र चटर्जी ने

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय गान जन-गण-मन सबसे पहले कब गाया गया ?
(क) 27 दिसम्बर 1911 ई० को
(ख) 27 दिसम्बर 1920 ई० को
(ग) 27 दिसम्बर, 1921 ई० को
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) 27 दिसम्बर 1911 ई० को

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् सबसे पहले किस वर्ष कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया ?
(क) 1896 ई० में
(ख) 1900 ई० में
(ग) 1920 ई० में
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर-
(क) 1896 ई० में

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय गान अथवा इसकी धुन के समय कौन-सी सावधानियां रखनी चाहिए ?
(क) हमें सावधान अवस्था में खड़े रहना चाहिए
(ख) हिले-डुले नहीं और न ही अपना स्थान छोड़ना चाहिए
(ग) बातें नहीं करनी चाहिए ।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

पाठ-8 : नशा-एक श्राप

प्रश्न 1.
नशीले पदार्थ का नाम बताएं।
(क) शराब
(ख) तम्बाकू
(ग) भांग और अफीम
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
कोई दो प्रणालियों के नाम बताएं जिन पर नशीले पदार्थों का प्रभाव होता है।
(क) पाचन प्रणाली
(ख) रक्त संचार प्रणाली
(ग) मानसिक प्रणाली
(घ) हड्डी प्रणाली।
उत्तर-
(क) पाचन प्रणाली, (ख) रक्त संचार प्रणाली

प्रश्न 3.
खिलाड़ी पर नशीले पदार्थों से होने वाले दुष्प्रभाव.
(क) बेफिक्र
(ख) गैर-जिम्मेदार
(ग) सिरदर्द
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) बेफिक्र, (ख) गैर-जिम्मेदार

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 4.
नशीले पदार्थों से छुटकारा पाने के ढंग लिखें
(क) प्रेरणा
(ख) कान्फ्रेंस
(ग) मनोवैज्ञानिक ढंग
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 5.
तम्बाक पीने के बरे प्रभाव
(क) कैंसर का खतरा बढ़ जाता है
(ख) तम्बाकू से टी०बी० हो सकती है
(ग) पेट खराब रहता है
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 6th Class Physical Education Objective Questions and Answers

प्रश्न 6.
शराब के हमारे स्वास्थ्य पर कुप्रभाव
(क) दिमाग़ पर बुरा प्रभाव पड़ता है
(ख) गुर्दे खराब हो सकते हैं
(ग) पाचन प्रणाली खराब हो जाती है
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 2 ख़रीफ़ की सब्ज़ियाँ

Punjab State Board PSEB 11th Class Agriculture Book Solutions Chapter 2 ख़रीफ़ की सब्ज़ियाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

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PSEB 11th Class Agriculture Guide ख़रीफ़ की सब्ज़ियाँ Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
मिर्च की दो उन्नत किस्मों के नाम बताओ।
उत्तर-
पंजाब गुच्छेदार, चिल्ली हाईब्रिड-1.

प्रश्न 2.
अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन कितनी सब्जी खानी चाहिए ?
उत्तर-
284 ग्राम।

प्रश्न 3.
टमाटर की दो उन्नत किस्मों के नाम बताओ।
उत्तर-
पंजाब वर्षा बहार-1, पंजाब वर्षा बहार-2.

प्रश्न 4.
फरवरी में भिण्डी की बुआई के लिए कितने बीज की आवश्यकता होती
उत्तर-
15 किलो प्रति एकड़।

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प्रश्न 5.
बैंगन की फसल में मेढ़ों की आपसी दूरी कितनी होती है ?
उत्तर-
60 सैं०मी०।

प्रश्न 6.
करेले की दो किस्मों के नाम बताओ।
उत्तर-
पंजाब-14, पंजाब करेली-1.

प्रश्न 7.
घीया कद्दू की बुआई कब करनी चाहिए ?
उत्तर-
फरवरी-मार्च, जून-जुलाई, नवम्बर-दिसम्बर।

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प्रश्न 8.
खीरे की बुआई के लिए प्रति एकड़ कितने बीज को आवश्यकता होती है ?
उत्तर-
एक किलो प्रति एकड़।

प्रश्न 9.
खरबूजे की बुआई के लिए प्रति एकड़ कितने बीज की आवश्यकता होती है ?
उत्तर-
400 ग्राम।

प्रश्न 10.
घीया तोरी की बुआई कब करनी चाहिए ?
उत्तर-
मध्य मई से जुलाई।

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(ख) एक-दो वाक्य में उत्तर दो

प्रश्न 1.
सब्जी से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
सब्जी पौधे का वह नर्म भाग है जिसको कच्चा सलाद के रूप में खाया जाता है; जैसे–तना, पत्ते, फूल, फल आदि।

प्रश्न 2.
टमाटर की एक एकड़ की पनीरी तैयार करने के लिए कितने बीज की कितनी जगह पर बुआई करनी चाहिए ?
उत्तर-
एक एकड़ की पनीरी के लिए 100 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है। इसको 2 मरले की क्यारियों में बोया जाता है।

प्रश्न 3.
मिर्च की फसल के लिए कौन-कौन सी खाद उपयोग करनी चाहिए ?
उत्तर-
10-15 टन गले सड़े गोबर की खाद, 25 किलो नाइट्रोजन, 12 किलो फॉस्फोरस और 12 किलो पोटाश का प्रयोग किया जाता है। यह मात्रा एक एकड़ के लिए है।

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प्रश्न 4.
बैंगन की साल में चार फसलें कैसे ली जा सकती हैं ?
उत्तर-
बैंगन की चार फसलें अक्तूबर-नवम्बर, फरवरी-मार्च और जुलाई में पनीरी लगा कर लगाई जा सकती हैं।

प्रश्न 5.
भिण्डी की बुआई का समय और बीज की मात्रा के बारे में बताओ।
उत्तर-
भिण्डी की बुआई बहार ऋतु में फरवरी-मार्च और बरसात में जून-जुलाई में की जाती है। बीज की मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से 15 किलो (फरवरी), 8-10 किलो (मार्च), 5-6 किलो (जून-जुलाई) की ज़रूरत होती है।

प्रश्न 6.
हमारे देश में प्रति व्यक्ति कम सब्जी मिलने के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
(i) हमारे देश में तेजी से बढ़ती जनसंख्या।
(ii) तुड़ाई के बाद लगभग तीसरा भाग सब्जियों का खराब हो जाना।

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प्रश्न 7.
टमाटर की फसल की बुआई और पनीरी कब लगानी चाहिए ?
उत्तर-
टमाटर की पनीरी की बुआई जुलाई के दूसरे पखवाड़े में कर देनी चाहिए और पनीरी को खेतों में अगस्त के दूसरे पखवाड़े में लगाना शुरू कर देनी चाहिए।

प्रश्न 8.
करेले की तुड़ाई बुआई से कितने दिनों के बाद की जाती है ?
उत्तर-
बुआई से लगभग 55-60 दिनों के बाद करेले को तोड़ना चाहिए।

प्रश्न 9.
खरबूजे की 2 उन्नत किस्मों और बुआई का समय बताओ।
उत्तर-
पंजाब हाईब्रिड, हरा मधु तथा पंजाब सुनहरी उन्नत किस्में हैं और इसकी बुआई फरवरी-मार्च में की जाती है।

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प्रश्न 10.
खीरे की अग्रिम और अधिक पैदावार कैसे ली जा सकती है ?
उत्तर-
खीरे की अग्रिम और अधिक पैदावार लेने के लिए इसकी खेती छोटी सुरंगों में की जाती है।

(ग) पाँच-छ: वाक्य में उत्तर दो –

प्रश्न 1.
गर्मी की सब्जियां कौन-कौन सी हैं और किसी एक के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दो।
उत्तर-
गर्मियों की सब्जियां हैं-टमाटर, बैंगन, घीया कद्दू, तोरी, करेला, मिर्च, भिण्डी, चप्पन कद्, खीरा, ककड़ी, टिण्डा आदि।
किस्में-पंजाब वर्षा बहार-1, पंजाब वर्षा बहार-2.
बीज की मात्रा-एक एकड़ की पनीरी तैयार करने के लिए 100 ग्राम बीज 2 मरले की क्यारियों में बीजना चाहिए।
पनीरी की बुवाई का समय-पनीरी की बुवाई जुलाई के दूसरे पखवाड़े में करनी चाहिए।
पनीरी लगाने का समय-अगस्त का दूसरा पखवाड़ा। कतारों में फासले-120-150 सैं०मी०। नदीनों की रोकथाम-सटौंप या सैनकोर का छिड़काव करें। पौधों में फासलें-30 सैं० मी०। सिंचाई-पहला पानी पनीरी खेतों में लगाने के तुरंत बाद और फिर 6-7 दिनों के बाद पानी लगाया जाता है।

प्रश्न 2.
भिण्डी की उन्नत किस्मों के नाम, बुआई का समय, प्रति एकड़ बीज की मात्रा और खरपतवार की रोकथाम के बारे में संक्षेप में जानकारी दो।
उत्तर-
भिण्डी की कृषिउन्नत किस्में-पंजाब-7, पंजाब-8, पंजाब पदमनी। बुआई का समय-भिण्डी की बुआई बहार ऋतु में फरवरी-मार्च तथा बरसात में जून-जुलाई में की जाती है।

बीज की मात्रा-बीज की मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से 15 किलो (फरवरी), 8-10 किलो (मार्च), 5-6 किलो (जून-जुलाई) में आवश्यकता है।
नदीनों की रोकथाम-इसके लिए 3-4 गुड़ाइयों की आवश्यकता होती है या सटोप का छिड़काव किया जाता है।

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प्रश्न 3.
सब्जियों का मनुष्य के भोजन में क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
सब्जियों का मनुष्य के आहार में बहुत महत्त्व है। सब्जियों में कई आहारीय तत्त्व होते हैं। जैसे कार्बोहाइड्रेटस, धातु, प्रोटीन, विटामिन आदि होते हैं। इन तत्वों की मनुष्य के शरीर को बहुत आवश्यकता होती है। हमारे देश में अधिक जनसंख्या शाकाहारी है। इसलिए सब्जियों का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। एक अनुसंधान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 284 ग्राम सब्जी खानी चाहिए तथा भोजन में पत्ते वाली सब्जियां (पालक, मेथी, सलाद, साग आदि), फूल (गोभी), फल (टमाटर, बैंगन), अन्य (आलू) तथा जड़ों वाली सब्जियां (गाजर, मूली, शलगम) आदि का शामिल होना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
घीया कद्ध की खेती के बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
घीया कद्दू की खेती1. उन्नत किस्में-पंजाब बरकत, पंजाब कोमल। 2. बुआई का समय-फरवरी-मार्च, जून-जुलाई, नवम्बर-दिसम्बर। 3. तुड़ाई-बुआई से 60-70 दिनों बाद कद्रू उतरने लगते हैं।

प्रश्न 5.
पेठे की सफल खेती कैसे की जा सकती है ?
उत्तर-
किस्म-पी०ए०जी०-3. बुआई का समय-फरवरी-मार्च, जून-जुलाई। बीज की मात्रा-2 किलो प्रति एकड़।
बुआई का ढंग–3 मीटर चौड़ाई वाली खालें बनाकर 70-90 सैं०मी० तथा खाल के एक तरफ कम-से-कम दो बीज बोने चाहिए।

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Agriculture Guide for Class 11 PSEB ख़रीफ़ की सब्ज़ियाँ Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मिर्च के लिए बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
एक एकड़ के लिए 200 ग्राम।

प्रश्न 2.
मिर्च की पनीरी बोने का समय बताओ।
उत्तर-
अन्त अक्तूबर से मध्य नवम्बर।

प्रश्न 3.
मिर्च की पनीरी खेत में लगाने का समय बताओ।
उत्तर-
फरवरी-मार्च।

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प्रश्न 4.
मिर्च के लिए मेढ़ों में अन्तर बताओ।
उत्तर-
75 सैं०मी०।

प्रश्न 5.
मिर्च के लिए पौधों में फासला बताओ।
उत्तर-
45 सैं०मी०।

प्रश्न 6.
टमाटर की किस्में बताओ ।
उत्तर-
पंजाब वर्षा बहार-1, पंजाब वर्षा बहार-2.

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प्रश्न 7.
टमाटर के लिए बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
100 ग्राम प्रति एकड़।

प्रश्न 8.
टमाटर की पनीरी की बुवाई का समय बताओ।
उत्तर-
जुलाई का दूसरा पखवाड़ा।

प्रश्न 9.
टमाटर की पनीरी को खेत में लगाने का समय बताओ।
उत्तर-
अगस्त का दूसरा पखवाड़ा।

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प्रश्न 10.
टमाटर के लिए पंक्तियों का फासला बताओ।
उत्तर-
120-150 सैं०मी० ।

प्रश्न 11.
टमाटर के लिए पौधों में फासला बताओ।
उत्तर-
30 सैं०मी०।

प्रश्न 12.
टमाटर में नदीनों की रोकथाम के लिए दवाई बताओ।
उत्तर-
सटोंप, सैनकोर।

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प्रश्न 13.
बैंगन की किस्में बताओ।
उत्तर-
पंजाब नीलम (गोल), बी०एच०-2 (लम्बे), पी०बी०एच०-3 (छोटे)।

प्रश्न 14.
बैंगन के बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
एक एकड़ के लिए 300-400 ग्राम।

प्रश्न 15.
बैंगन के लिए पंक्तियों में फासला बताओ।
उत्तर-
60 सैं०मी०।

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प्रश्न 16.
बैंगन के लिए पौधों में फासला बताओ।
उत्तर-
30-40 सैं०मी०।

प्रश्न 17.
भिण्डी की बुआई कैसे की जाती है ?
उत्तर-
सीधी बुआई की जाती है।

प्रश्न 18.
भिण्डी की किस्में बताओ।
उत्तर-
पंजाब-7, पंजाब-8, पंजाब पदमनी।

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प्रश्न 19.
भिण्डी की फरवरी मार्च के लिए फसल कहां बोई जाती है ?
उत्तर-
मेढ़ों पर।

प्रश्न 20.
भिण्डी की जून-जुलाई की फसल किस प्रकार बोई जाती है ?
उत्तर-
समतल भूमि पर।

प्रश्न 21.
भिण्डी की फसल के लिए पंक्तियों में फासला बताओ।
उत्तर-
45 सैं०मी०।

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प्रश्न 22.
भिण्डी की कृषि के लिए पौधों में आपसी फासला बताओ।
उत्तर-
15 सैंमी०।

प्रश्न 23.
भिण्डी की तुड़ाई कब की जाती है ?
उत्तर-
बुवाई से 45-50 दिनों में।

प्रश्न 24.
चप्पन कद् की उन्नत किस्में बताओ।
उत्तर-
पंजाब चप्पन कदू।

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प्रश्न 25.
चप्पन कद्दू की बुवाई का समय बताओ।
उत्तर-
मध्य जनवरी से मार्च तथा अक्तूबर-नवम्बर।

प्रश्न 26.
चप्पन कद्दू के बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
2 किलो प्रति एकड़।

प्रश्न 27.
चप्पन कद्दू के एक स्थान पर कितने बीज बोये जाते हैं ?
उत्तर-
एक स्थान पर दो बीज।

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प्रश्न 28.
चप्पन कद्दू कब तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं ?
उत्तर-
60 दिनों में।

प्रश्न 29.
घीया कदद की किस्में बताओ।
उत्तर-
पंजाब बरकत, पंजाब कोमल।

प्रश्न 30.
घीया कद् की बुवाई का समय बताओ।
उत्तर–
फरवरी-मार्च, जून-जुलाई, नवम्बर-दिसम्बर।

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प्रश्न 31.
घीया कद्दू कितने दिनों बाद उतरने लगते हैं ?
उत्तर-
बुवाई के 60-70 दिनों में।

प्रश्न 32.
करेले की किस्में बताओ।
उत्तर-
पंजाब-14, पंजाब करेली-1.

प्रश्न 33.
करेले की बुवाई का समय बताओ।
उत्तर-
फरवरी-मार्च, जून-जुलाई।।

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प्रश्न 34.
करेले के लिए बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
2 किलो प्रति एकड़।

प्रश्न 35.
करेले के लिए पौधे से पौधे का फासला बताओ।
उत्तर-
45 सैंमी।

प्रश्न 36.
करेले के लिए क्यारियों में बुवाई किस तरह की जाती है ?
उत्तर-
क्यारियों के दोनों ओर।

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प्रश्न 37.
घीया तोरी की किस्में बताओ।
उत्तर-
पूसा चिकनी, पंजाब काली तोरी-9.

प्रश्न 38.
घीया तोरी की बुवाई का समय बताओ।
उत्तर-
मध्य फरवरी से मार्च।

प्रश्न 39.
घीया तोरी के लिए बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
2 किलो बीज प्रति एकड़।

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प्रश्न 40.
घीया तोरी की तुड़ाई कितने दिनों बाद की जाती है ?
उत्तर-
बुवाई से 70-80 दिनों बाद।

प्रश्न 41.
पेठे की किस्म बताओ।
उत्तर-
पी०ए०जी०-3.

प्रश्न 42.
पेठे की बुवाई का समय बताओ।
उत्तर-
फरवरी-मार्च, जून-जुलाई।

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प्रश्न 43.
पेठे के लिए बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
2 किलो प्रति एकड़।

प्रश्न 44.
खीरे की किस्में बताओ।
उत्तर-
पंजाब नवीन।

प्रश्न 45.
खीरे के लिए बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
एक किलो प्रति एकड़।

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प्रश्न 46.
ककड़ी की किस्म बताओ।
उत्तर-
पंजाब लोंग मैलन।

प्रश्न 47.
ककड़ी की बुवाई का समय बताओ।
उत्तर-
फरवरी-मार्च।

प्रश्न 48.
ककड़ी के लिए बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
एक किलो बीज प्रति एकड़।

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प्रश्न 49.
ककड़ी की तुड़ाई के बारे में बताओ।
उत्तर-
बुवाई से 60-70 दिनों बाद।

प्रश्न 50.
टिण्डा की किस्में बताओ।
उत्तर-
टिण्डा-48.

प्रश्न 51.
टिण्डा की बुवाई का समय बताओ।
उत्तर-
फरवरी-मार्च, जून-जुलाई।

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प्रश्न 52.
टिण्डे की बुवाई के लिए बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
1.5 किलो बीज प्रति एकड़।

प्रश्न 53.
टिण्डे कितने दिनों बाद तुड़ाई के योग्य हो जाते हैं ?
उत्तर-
60 दिनों बाद।

प्रश्न 54.
खरबूजा फल है या सब्जी ?
उत्तर-
खरबूजा सब्जी है।

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प्रश्न 55.
खरबूजे की बुवाई का समय बताओ।
उत्तर-
फरवरी-मार्च।

प्रश्न 56.
खरबूजे के लिए बीज की मात्रा बताओ।
उत्तर-
400 ग्राम प्रति एकड़।

प्रश्न 57.
खरबूजे की बुवाई के लिए पौधे से पौधे का फासला बताओ।
उत्तर-
60 सैं०मी०।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सब्जियों में तत्वों की जानकारी दो।
उत्तर-
सब्जियों में कार्बोहाइड्रेटस, प्रोटीन, धातु, विटामिन आदि पौष्टिक तत्व होते

प्रश्न 2.
मिर्च के लिए खादों का विवरण दें।
उत्तर-
एक एकड़ के हिसाब से 10-15 टन गली सड़ी गोबर की खाद, 25 किलो नाइट्रोजन, 12 किलो फॉस्फोरस तथा 12 किलो पोटाश डालनी चाहिए।

प्रश्न 3.
मिर्च के लिए सिंचाई के बारे में बताओ।
उत्तर-
पहला पानी पनीरी तथा खेत में लगाने के तुरन्त बाद लगाया जाता है। गर्मियों में पानी 7-10 दिनों के अन्दर लगाया जाता है।

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प्रश्न 4.
टमाटर के लिए सिंचाई के बारे में बताओ।
उत्तर-
पहला पानी पनीरी तथा खेत में लगाने के तुरन्त बाद लगाया जाता है। गर्मियों में पानी 6-7 दिनों के अन्दर लगाया जाता है।

प्रश्न 5.
बैंगन की बुवाई के ढंग के बारे में बताओ।
उत्तर-
बैंगन की बुवाई 10-15 सैं०मी० ऊँची एक मरले की क्यारियों में की जाती है।

प्रश्न 6.
चप्पन कद् की बुवाई का ढंग बताओ।
उत्तर-
1.25 मीटर चौड़ाई वाली खाइयों में पौधों का फासला 45 सैं०मी० रखकर एक स्थान पर 2-2 बीज बोये जाते हैं।

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प्रश्न 7.
खीरे की कृषि के बारे में बताओ। उन्नत किस्में, बुवाई का समय, बीज की मात्रा।
उत्तर-
उन्नत किस्में-पंजाब नवीन। बुवाई का समय-फरवरी-मार्च। बीज की मात्रा-एक किलो प्रति एकड़।

प्रश्न 8.
ककड़ी की कृषि का विवरण दो।
उत्तर-
उन्नत किस्में-पंजाब लोंग मैलन।
बुवाई का समय-फरवरी-मार्च।
बीज की मात्रा-एक किलो बीज प्रति एकड़।
तुड़ाई-बुवाई से 60-70 दिनों बाद।

प्रश्न 9.
टिण्डे की कृषि का विवरण दें।
उत्तर-
उन्नत किस्में-टिण्डा-48.
बुआई का समय-फरवरी-मार्च, जून-जुलाई।
बीज की मात्रा-1.5 किलो बीज प्रति एकड़।
बुआई का ढंग-1.5 मीटर चौड़ी खाइयों के दोनों ओर 45 सैं०मी० फासले पर बीज बोने चाहिए।
तुड़ाई-बुआई से 60 दिनों के बाद तुड़ाई योग्य हो जाते हैं।

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प्रश्न 10.
घीया तोरी की कृषि के बारे में बताओ।
उत्तर-
किस्म-पूसा चिकनी, पंजाब काली तोरी-9.
बुआई का समय-मध्य फरवरी से मार्च, मध्य मई से जुलाई।
बुआई का ढंग-तीन मीटर चौड़ी खाइयों में 75 से 90 सैं०मी० दूरी पर बोया जाता
बीज की मात्रा-2 किलो बीज प्रति एकड़।
तुड़ाई-बुआई से 70-80 दिनों के बाद।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
खरबूजे की कृषि का विवरण दें।
उत्तर-
खरबूजा वैज्ञानिक आधार पर सब्जी है परन्तु हम इसको फल की तरह प्रयोग करते हैं।
किस्में-पंजाब हाइब्रिड, हरा मधु, पंजाब सुनहरी।
बुवाई का समय-फरवरी-मार्च।
बीज की मात्रा-400 ग्राम बीज प्रति एकड़।
बुवाई का ढंग-बुवाई 3-4 मी० चौड़ी खाइयों में की जाती है, पौधे से पौधे का फासला 60 सैं०मी०।
सिंचाई-गर्मियों में प्रत्येक सप्ताह, फल पकने के समय हल्का पानी दें। पानी फल को नहीं लगना चाहिए नहीं तो फल गलने लगता है।

प्रश्न 2.
मिर्च की कृषि का विवरण दें।
उत्तर-
किस्में-पंजाब सुर्ख, पंजाब गुच्छेदार, चिली हाइब्रिड-1.
बीज की मात्रा-एक एकड़ के लिए 200 ग्राम।
पनीरी बोना-एक एकड़ के लिए एक मरला में पनीरी बोई जाती है। अंत अक्तूबर से मध्य नवम्बर तक पनीरी बोई जाती है।
पनीरी लगाना-फरवरी-मार्च में खेतों में लगायें।

फासला-मेढ़ों के बीच 75 सैं०मी० तथा पौधों में 45 सैं०मी० ।
खाद-10-15 टन गली सड़ी गोबर की खाद, 25 किलो नाइट्रोजन, 12 किलो फॉस्फोरस, 12 किलो पोटाश की आवश्यकता है।
सिंचाई-पहला पानी पनीरी को खेत में लगाने के तुरन्त बाद लगाएं। गर्मियों में 7-10 दिनों के अन्तर पर पानी लगाएं।

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प्रश्न 3.
बैंगन की कृषि के बारे में बताओ।
उत्तर-

  • किस्में-पंजाब नीलम (गोल), बी०एच०-2 (लम्बा), पी०बी०एच०-3 (छोटे)।
  • बीज की मात्रा-एक एकड़ के लिए 300-400 ग्राम।
  • बुवाई का ढंग-10-15 सैं०मी० ऊंची एक मरले की क्यारियों में बोना चाहिए।
  • बैंगन की फसलें-बैंगन की वर्ष में चार फसलें अक्तूबर, नवम्बर, फरवरी, मार्च तथा जुलाई में पनीरी बो कर ली जा सकती है।
  • फासला-पंक्तियों में 60 सैं०मी० तथा पौधों में 30-45 सैं०मी० ।
  • सिंचाई-पहला पानी पनीरी को खेत में लगाने के तुरन्त बाद तथा फिर 6-7 दिनों के अन्तर पर लगायें।

ख़रीफ़ की सब्ज़ियाँ PSEB 11th Class Agriculture Notes

  • पौधे का नर्म भाग जैसे कि-फल, पत्ते, जड़ें, तना आदि को सलाद के रूप में कच्चा खाया जाता है, सब्जी कहलाता है।
  • सब्जियों में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, धातु, विटामिन आदि तत्त्व होते हैं।
  • खाद्य विशेषज्ञों के अनुसार अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 284 ग्राम सब्जियां खानी चाहिए।
  • पत्तों वाली सब्जियां हैं-पालक, मेथी, सलाद और साग।
  • जड़ों वाली सब्जियां हैं-गाजर, मूली, शलगम।
  • हमारे देश में प्रति व्यक्ति को कम सब्जियां मिलने का कारण है-अधिक जनसंख्या की तेजी से वृद्धि और तुड़ाई के बाद सब्जियों के तीसरे हिस्से का खराब हो जाना।
  • ख़रीफ की सब्जियां हैं-मिर्च, बैंगन, भिण्डी, करेला, चप्पन कद्दू, टमाटर, तोरी, घीया कद, टीण्डा, ककड़ी, खीरा आदि।
  • मिर्च की किस्में हैं-पंजाब सुर्ख, पंजाब गुच्छेदार, चिल्ली हाईब्रिड-1
  • मिर्च के लिए एक मरले की पनीरी के लिए 200 ग्राम बीज की आवश्यकता है।
  • टमाटर की किस्में हैं-पंजाब बरखा बहार-1, पंजाब बरखा बहार-2.
  • टमाटर की एक एकड़ पनीरी के लिए 100 ग्राम बीज 2 मरले की क्यारियों में बोने चाहिए।
  • बैंगन की किस्में हैं -पंजाब नीलम (गोल), बी०एच०-2 (लम्बे), पी०बी०एच०-3 (छोटे)।
  • बैंगन की पनीरी के लिए 300-400 ग्राम बीज प्रति एकड़ की आवश्यकता होती
  • पंजाब-7, पंजाब-8 और पंजाब पदमनी भिण्डी की किस्में हैं।
  • भिण्डी के बीज की मात्रा प्रति एकड़ इस तरह है-15 किलो (फरवरी), 8-10 किलो (मार्च), 5-6 किलो (जून-जुलाई)।
  • कदू जाति की सब्जियां हैं-चप्पन कद्, घीया कद्दू, करेला, घीया तोरी, पेठा, खीरा, ककड़ी, टिण्डा, खरबूजा आदि।
  • चप्पन कद्दू की किस्में हैं-पंजाब चप्पन कदू।
  • घीया कद्दू की किस्में हैं–पंजाब बरकत, पंजाब कोमल।
  • करेले की उन्नत किस्में हैं-पंजाब-14, पंजाब करेली-1.
  • करेले के लिए बीज की मात्रा 2 किलो प्रति एकड़ है।
  • घीया तोरी की किस्में हैं-पूसा चिकनी, पंजाब काली तोरी-9.
  • पेठे की किस्में हैं-पी०ए०जी०-3.
  • चप्पन कद्, करेला, घीया तोरी, पेठा सभी के लिए बीज की मात्रा 2 किलो प्रति एकड़ की आवश्यकता है।
  • खीरे की किस्में हैं-पंजाब नवीन खीरा।
  • बीज की मात्रा खीरे के लिए एक किलो प्रति एकड़ है।
  • ककड़ी की किस्म है-पंजाब लोंग मैलन।
  • ककड़ी के लिए बीज की मात्रा है-एक किलो प्रति एकड़।
  • टिण्डे की किस्म है-टिण्डा-48.
  • टिण्डे के लिए बीज की मात्रा है-1.5 किलो प्रति एकड़।
  • खरबूजा वैज्ञानिक दृष्टि से सब्जी है।
  • खरबूजे की किस्में हैं-पंजाब हाईब्रिड, हरा मधु, पंजाब सुनहरी।
  • खरबूजे के लिए बीज की मात्रा 400 ग्राम की आवश्यकता है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 9 दक्षिणी भारत में राजनीतिक विकास (700-1200 ई० तक)

Punjab State Board PSEB 7th Class Social Science Book Solutions History Chapter 9 दक्षिणी भारत में राजनीतिक विकास (700-1200 ई० तक) Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Social Science History Chapter 9 दक्षिणी भारत में राजनीतिक विकास (700-1200 ई० तक)

SST Guide for Class 7 PSEB दक्षिणी भारत में राजनीतिक विकास (700-1200 ई० तक) Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखें

प्रश्न 1.
चोल वंश के किन शासकों ने चोल राज्य की दोबारा स्थापना की?
उत्तर-
राजराज प्रथम चोल तथा राजेन्द्र चोल शासकों ने चोल राज्य को दोबारा स्थापित किया।

प्रश्न 2.
राजराज प्रथम नै किन राजाओं (राज्यों) को पराजित करके उनके क्षेत्रों पर कब्जा किया?
उत्तर-
राजराज प्रथम ने चेर, पांड्य एवं श्रीलंका के राजाओं को हराकर उनके बहुत से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

प्रश्न 3.
राजेन्द्र चोल शासक की महत्त्वपूर्ण विजय के विषय मैं लिखो।
उत्तर-
राजेन्द्र चोल ने पांड्य, चेर एवं श्रीलंका के शासकों को हराकर उनके क्षेत्र अपने राज्य में मिला लिये, जिस कारण उसने ‘गंगईकोंडा चोलपुरम्’ की उपाधि धारण की।

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प्रश्न 4.
चोल राज्य की रूप-रेखा के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
चोल राज्य की रूप-रेखा का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –
1. राजा-चोल राजा बहुत ही शक्तिशाली होता था। वह केन्द्रीय सरकार का प्रमुख था। उसके पास बहुत-सी शक्तियां होती थीं। परन्तु वह सरकारी मामलों में मन्त्रिमण्डल की सलाह लेता था। वह राज्य प्रबन्ध की निगरानी करता था, न्याय करता था तथा युद्ध में सैनिक दल भेजता था।

2. प्रान्त-चोल राज्य प्रान्तों में विभक्त था। प्रान्तों को ‘मंडलम्’ कहा जाता था। मंडलम् आगे ‘वलनाडु’ में विभक्त था। प्रत्येक वलनाडु में कई गांव शामिल थे।

3. नाडू-चोल राज्य प्रबन्ध की सबसे छोटी इकाई ग्राम या नाडू थी। प्रत्येक ग्राम की दो सभाएं थीं-उर एवं सभा। उर के सदस्य साधारण ग्रामीण थे। सभा वयस्क पुरुषों का समूह थी। ग्राम के सभी कार्य जैसे कि झगड़ों का निपटारा करना, पानी का वितरण तथा कर एकत्रित करना आदि की देखभाल, छोटी कमेटियों द्वारा किये जाते थे।

4. सेना-चोल शासकों के पास एक शक्तिशाली सेना थी। सेना में हाथी, घुड़सवार सेना तथा पैदल सेना सम्मिलित थी। जल-सेना चोल सेना का एक शक्तिशाली भाग था।

5. आय के साधन-चोलों की आय के दो प्रमुख साधन भूमि लगान एवं व्यापार थे। उस समय दूसरे देशों के साथ भी व्यापार होता था।

प्रश्न 5.
तमिलनाडू में किस प्रकार की सिंचाई व्यवस्था का विकास हुआ?
उत्तर-
चोल शासकों ने तमिलनाडू में सिंचाई व्यवस्था की ओर विशेष ध्यान दिया। सिंचाई के लिए लगभग सभी नदियों का, विशेषकर कावेरी नदी का उपयोग किया गया। इसके अतिरिक्त बहुत से तालाब भी बनवाये। उन्होंने खेतों में पानी का वितरण करने के लिए एक तालाब कमेटी भी बनाई।

प्रश्न 6.
चोल शासन काल दौरान किन भाषाओं का विकास हुआ?
उत्तर-
चोल राज्यकाल में संस्कृत तथा क्षेत्रीय भाषाओं-तमिल, तेलुगु एवं कन्नड़ का विकास हुआ।

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प्रश्न 7.
चोल शासन काल दौरान में कौन-सा धर्म अधिक प्रसिद्ध था?
उत्तर-
चोल शासन काल में हिन्दू धर्म अधिक प्रसिद्ध था। बौद्ध तथा जैन धर्म इत्यादि भी अस्तित्व में थे।

(ख) निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

  1. पल्लव शासकों ने ………….. को अपनी राजधानी बनाया।
  2. मार्को पोलो ने ………….. राज्य की यात्रा की।
  3. राजेन्द्र चोल ने ………….. की उपाधि धारण की।
  4. चोल शासनकाल दौरान स्त्रियों का भी ……… किया जाता था।
  5. ननियाह तथा तिकना तेलुगू विद्वानों ने …………. का तेलुगू भाषा में अनुवाद किया।

उत्तर-

  1. कांची,
  2. पाण्डेय
  3. गंगईकोण्डा चोलपुरम्,
  4. विशेष सम्मान,
  5. महाभारत।

(ग) निम्नलिखित के सही जोड़े बनाएं

क – (ख)

  1. बासव – अद्वैत मत
  2. शंकराचार्य – लिंगायत मत
  3. रामानुज – भक्ति लहर
  4. माधव – भक्ति लहर

उत्तर-

  1. बासव-लिंगायत मत,
  2. शंकराचार्य-अद्वैत मत,
  3. रामानुज-भक्ति लहर,
  4. माधव-भक्ति लहर।

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(घ) निम्नलिखित प्रत्येक कथन के सामने ठीक (✓) अथवा गलत (✗) का चिह्न लगाएं-

  1. कंबन विद्वान् ने रामायण का तमिल भाषा में अनुवाद किया।
  2. मदुरै चोल शासकों की राजधानी थी।
  3. चोल शासकों के पास शक्तिशाली जल सेना थी।
  4. महेन्द्र वर्मन ने गंगईकोण्डा चोलपुरम् नगर को स्थापित किया।
  5. चोल राज्य प्रांतों में बँटा हुआ था।

उत्तर-

1. (✓),
2. (✗),
3. (✗),
4. (✗),
5. (✓)

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प्रश्न 1.
मध्यकालीन युग के दक्षिण भारत के तीन शक्तिशाली राज्यों के नाम बताओ।
उत्तर-
पल्लव, पांड्य तथा चोल।

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प्रश्न 2.
पांड्य राज्य की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।
उत्तर-
पांड्य राज्य तमिलनाडु के दक्षिणी भागों में स्थापित था। पांड्य शासकों की राजधानी को मदुरा या मुदरा कहा जाता था। यह शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। मार्को पोलो ने इस राज्य की यात्रा की और एक वृत्तान्त लिखा। 14वीं सदी में पांड्य राज्य का पतन हो गया।

प्रश्न 3.
पल्लव कब शक्तिशाली बने? उनकी सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
पल्लव 5वीं तथा छठी शताब्दी में सातवाहनों के पतन के बाद शक्तिशाली शासक बने। महेन्द्र वर्मन प्रथम एवं नरसिंह वर्मन प्रथम पल्लव वंश के दो प्रमुख शासक थे। उन्होंने अपने राज्य का बहुत विस्तार किया। उन्होंने कांची को अपनी राजधानी बनाया।

पल्लव शासकों ने कला एवं भवन-निर्माण कला को संरक्षण दिया। उन्होंने महाबलिपुरम् में शोर (तट) मन्दिर एवं रथ मन्दिर बनवाया। उन्होंने कांची में कैलाश नाथ मन्दिर भी बनवाया। 9वीं शताब्दी में चोल शासकों ने पल्लवों को हरा दिया।

प्रश्न 4.
आरम्भिक चोल राज्य की स्थापना एवं पतन का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
चोल शासकों ने दक्षिण भारत में एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की। इस राज्य के आरम्भिक शासकों का वर्णन इस प्रकार है :–
1. विजयालय-विजयालय चोल वंश का संस्थापक था। उसने पल्लवों से तंजौर जीत लिया और उसे अपनी राजधानी बनाया।

2. प्रान्तक प्रथम-प्रान्तक प्रथम चोल राज्य का एक शक्तिशाली शासक था। उसने पांड्य शासक को हराकर उसकी राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् वह 949 ई० में तकोलम की लड़ाई में राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय से हार गया। परिणामस्वरूप चोल शासक शक्तिशाली हो गये।

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प्रश्न 5.
प्रान्तक प्रथम के पश्चात् किन दो शासकों ने दक्षिण में चोल राज्य को पुनः शक्तिशाली बनाया?
उत्तर-
प्रान्तक प्रथम के पश्चात् राजराजा प्रथम तथा राजेन्द्र चोल, चोल राज्य को पुनः अस्तित्व में लाये और इसे दक्षिण भारत की महाशक्ति बनाया।

प्रश्न 6.
राजराजा प्रथम की दो प्रशासनिक सफलताएं बताओ।
उत्तर-

  1. राजराजा प्रथम ने अपनी समुद्री शक्ति का आधुनिकीकरण किया।
  2. वह शैव मत का अनुयायी था, परन्तु अन्य धर्मों के प्रति भी उदार था।

प्रश्न 7.
चोल राज्य का अन्त कैसे हुआ?
उत्तर-
राजेन्द्र चोल के उत्तराधिकारी अपने पड़ोसी शासकों के साथ लड़ते रहते थे। इस कारण चोल शासक शक्तिहीन हो गये। परिणामस्वरूप चोल राज्य का अन्त हो गया।

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प्रश्न 8.
700-1200 ई० तक दक्षिणी भारत के समाज पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
700-1200 ई० तक दक्षिण भारत के समाज में कुलीन वर्ग, ब्राह्मणों तथा व्यापारियों का भी बहत सम्मान किया जाता था। समान उद्देश्य की पूर्ति के लिए समाज के भिन्न-भिन्न वर्ग एक-दूसरे को सहयोग देते थे। नारी का भी समाज में बहुत सम्मान था। उन्हें उच्च शिक्षा दिलाई जाती थी। किसान एवं मज़दूर कामगार वर्ग से सम्बन्ध रखते थे। वे बहुत निर्धन होते थे और बहुत कठिन जीवन व्यतीत करते थे।

प्रश्न 9.
700-1200 ई० तक दक्षिणी भारत के धर्म की मुख्य विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
700-1200 ई० तक दक्षिणी भारत के धर्म की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं :–
1. हिन्दू धर्म-हिन्दू धर्म बहुत ही लोकप्रिय था। हिन्दू देवताओं-जैसे कि विष्णु और शिव की पूजा की जाती थी।
2. बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म-उस समय बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म भी अस्तित्व में थे।
3. धार्मिक लहरें-इस समय अनेक धार्मिक लहरों का जन्म हुआ।
(i) बासव ने लिंगायत मत की स्थापना की।
(ii) शंकराचार्य ने अद्वैत मत का प्रचार किया।
(iii) रामानुज तथा माधव भक्ति लहर के अन्य महान् प्रचारक थे। उन्होंने ईश्वर की भक्ति करने पर बल दिया। उन्होंने लोगों को शिक्षा दी कि मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र साधन, ईश्वर के साथ सच्चे मन से प्रेम करना है। वे जाति तथा वर्ग के भेदभाव के विरुद्ध थे। लोग उनकी शिक्षाओं से बहुत प्रभावित हुए।

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प्रश्न 10.
चोल वंश के उत्थान-पतन की कहानी लिखो।
उत्तर-
चोल वंश दक्षिणी भारत का सबसे प्रसिद्ध राज्य था। इस वंश के शासकों ने लगभग 400 वर्षों तक शासन किया। इनके राज्य में आधुनिक तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश तथा कर्नाटक का एक बहुत बड़ा भाग सम्मिलित था।
प्रमुख राजा-चोल वंश के निम्नलिखित प्रमुख राजा हुए –

1. विजयालय-विजयालय पहला प्रसिद्ध चोल शासक था। उसने 846 ई० से 871 ई० तक शासन किया। उसने तंजौर पर विजय प्राप्त की थी।

परांतक प्रथम-परांतक प्रथम 907 ई० में राजगद्दी पर बैठा और उसने 955 ई० तक शासन किया। उसने पाण्ड्य राज्य को जीता और मदुराई कोंडा की उपाधि धारण की। अपने राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिए उसने राज्य में कृषि की उन्नति की ओर विशेष ध्यान दिया।

2. राजराजा प्रथम-राजराजा प्रथम (985-1014 ई०) चोल वंश का एक अन्य प्रसिद्ध राजा था। उसने अपने वंश के झगड़ों को समाप्त किया और विजयों द्वारा अपने राज्य का विस्तार किया। उसने चेरों, वेंगी के चालुक्यों और पाण्ड्य शासकों को भी पराजित किया। कहते हैं कि उसने लंका तक के प्रदेशों पर विजय पाई थी।

3. राजेन्द्र चोल-राजेन्द्र चोल (1014-1044 ई०) राजराजा प्रथम का पुत्र था। उसने बंगाल के पाल वंश के राजाओं के साथ युद्ध किया। उसका दूसरा प्रसिद्ध

4. युद्ध दक्षिणी-पूर्वी एशिया में श्रीविजय के विरुद्ध था। इस युद्ध में श्रीविजय पराजित हुआ और भारतीय द्वीपों पर चोलों का अधिकार हो गया।

चोलों का पतन-चोल वंश का अन्तिम शासक राजाधिराज था। वह चालुक्यों के साथ लड़ता हुआ मारा गया। उसकी मृत्यु के साथ ही चोल वंश का पतन होना आरम्भ हो गया।

प्रश्न 11.
चोल शासकों की मुख्य विशेषताएं क्या थी?
उत्तर-
चोल शासक अपनी प्रजा की सुविधाओं का बहुत ध्यान रखते थे। उन्होंने अपने राज्य की उन्नति के लिए अनेक कार्य किए। उन्होंने उत्तम शासन प्रबन्ध की व्यवस्था की हुई थी। उन्होंने गांवों के लोगों को यह सुविधा दे रखी थी कि वे अपना शासन चलाएं। वे मन्दिरों के निर्माण में बड़ी रुचि लेते थे। उन्होंने कई भव्य मन्दिर बनवाये थे। उन्होंने अनेक शिलालेख संस्कृत और तमिल दोनों भाषाओं में लिखवाए। इस प्रक्चर चोल शासनकाल का भारतीय संस्कृति को अच्छा योगदान रहा।

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प्रश्न 12.
राजराजा प्रथम तथा राजेन्द्र चोल की सैनिक उपलब्धियों का वर्णन करो।
उत्तर-
1. राजराजा प्रथम (985-1014 ई०)-राजराजा प्रथम को राजराजा चोल भी कहा जाता था। वह चोल वंश का महान् शक्तिशाली शासक था। उसने चेर, पांड्य एवं श्रीलंका के राजाओं को हराकर उनके बहुत से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र अपने अधीन कर लिये।

2. राजेन्द्र चोल (1014-1044 ई०)-राजेन्द्र चोल अपने पिता राजराजा प्रथम के समान बहुत ही वीर था। उसने चोल राज्य का काफ़ी विस्तार किया।

(i) उसने पांड्य, चेर एवं श्रीलंका के शासकों को हराकर उनके क्षेत्र जीत लिये थे, जिस कारण उसने ‘गंगईकोंडा चोलपुरम्’ की उपाधि धारण की।

(ii) दक्षिण-पूर्वी एशिया में उसने अंडमान-निकोबार, मलाया, सुमात्रा तथा जावा पर महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त की।

प्रश्न 13.
चोल शासकों की कला तथा भवन उसारी कला का वर्णन करो।
उत्तर-
चोल शासक कला प्रेमी थे। उनके अधीन कला एवं भवन उसारी कला में बहुत अधिक उन्नति हुई :

  1. राजराजा प्रथम ने तंजौर का प्रसिद्ध राजराजेश्वर मन्दिर बनवाया। यह द्रविड़ शैली में बना है।
  2. राजेन्द्र चोल ने गंगईकोंड चोलपुरम् नामक नगर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
  3. चोल काल में कांस्य की अनेक मूर्तियां बनाई गईं। तंजौर की नटराज मूर्तियां इस काल की उत्कृष्ठ कांस्य मूर्तियां हैं।

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प्रश्न 14.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त नोट लिखें –
(अ) तमिलनाडु में ज़मींदारा विस्तार।
उत्तर-
(i) चोल शासकों ने तमिलनाडु में कृषि के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने घुमक्कड़ कबीलों की सहायता से जंगलों को साफ कराकर भूमि को कृषि योग्य बनाया। परिणामस्वरूप वहां ज़मींदारी का बहुत विस्तार हुआ।

(ii) चोल शासकों ने सिंचाई प्रबन्ध की ओर भी विशेष ध्यान दिया। सिंचाई के लिए लगभग सभी नदियों का, विशेषकर कावेरी नदी का उपयोग किया गया। जहां नदी का पानी ले जाना सम्भव नहीं था, वहां उन्होंने सिंचाई के लिए बहुत से तालाब बनवाये। उन्होंने खेतों में पानी का वितरण करने के लिए एक तालाब कमेटी भी बनाई।

(iii) चोल शासक राज्य में भारी वर्षा या सूखा पड़ जाने के कारण नष्ट हुई फसलों पर भूमि-लगान नहीं लेते थे। वे संकट काल में कृषकों को ऋण भी देते थे।

(आ) शिक्षा तथा साहित्य।
उत्तर-
मध्यकालीन भारत में चोल शासकों के अधीन शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में बहुत उन्नति हुई। उन्होंने व्याकरण, दर्शन शास्त्र, कला, विज्ञान एवं भूगोल-विज्ञान आदि अनेक विषयों को प्रोत्साहन दिया। शिक्षा का माध्यम संस्कृत तथा तमिल भाषाएं थीं। शिक्षा मन्दिरों के परिसरों में दी जाती थी।

चोल राज्य में संस्कृत तथा क्षेत्रीय भाषाओं-तमिल, तेलुगु एवं कन्नड़ का विकास हुआ। संस्कृत की अनेक पुस्तकों का इन भाषाओं में अनुवाद किया गया। उदाहरण के लिए विद्वान् कम्बन ने रामायण का तमिल में अनुवाद किया। नन्नयया एवं तिकना आदि तेलुगु विद्वानों ने महाभारत का तेलुगु भाषा में अनुवाद किया।
रामायण तथा महाभारत महाकाव्यों से हमें दक्षिण भारत के आरम्भिक एवं उत्तर मध्यकालीन युग के इतिहास बारे जानकारी मिलती है।

सही उत्तर चुनिए :

प्रश्न 1.
पाण्डेय दक्षिण भारत का एक राज्य था। क्या आप इस राज्य की राजधानी का नाम बता सकते हैं?
(i) कांचीपुरम्
(ii) महाबलिपुरम्
(ii) मदुरै।
उत्तर-
(iii) मदुरै।

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प्रश्न 2.
गंगईकोण्डा चोलपुरम् उपाधि किस चोल शासक ने धारण की?
(i) राजेन्द्र चोल
(ii) राजराज चोल
(iii) कृष्ण तृतीय।
उत्तर-
(i) राजेन्द्र चोल।

प्रश्न 3.
कैलाशनाथ मंदिर (कांचीपुरम्) किस राजवंश के शासकों ने बनवाया?
(i) पाल
(ii) राष्ट्रकूट
(iii) पल्लव।
उत्तर-
(iii) पल्लव।

प्रश्न 4.
चित्र में दिखाए गए रथ मंदिर कहां स्थित हैं?
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(i) कांचीपुरम्
(ii) महाबलिपुरम्
(iii) चोलपुरम्।
उत्तर-
(ii) महाबलिपुरम्।

PSEB 10th Class Welcome Life Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न

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PSEB Solutions for Class 10 Welcome Life उद्धरण संबंधी प्रश्न

स्रोत आधास्त प्रश्न

(1)

दिए गए स्रोत को पढ़ें और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें —
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। जैसा कि कहा जाता है कि ‘बहता पानी कभी वापिस नहीं होता। मानव का स्वभाव भी उसी की तरह है। यदि किसी व्यक्ति का दृष्टिकोण विशाल नहीं है, तो वह समय के साथ खुद को कभी भी अनुकूलित नहीं कर सकता। संकीर्ण सोच वाला व्यक्ति कभी खुश नहीं रहता। ऐसा व्यक्ति चारों ओर विषाक्त हो जाता है और नकारात्मकता फैलाता है। इसके बिना वह व्यक्ति दूसरों के साथ संबंध बनाए रखने में विफल रहता है क्योंकि वह दूसरों की विचारधारा, दृष्टिकोण और, आलोचना का स्वागत करने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए, एक लचीला दृष्टिकोण व्यक्तिगत रूप से विकसित करना बहुत ही आवश्यक लक्षण है।
प्रश्न-

  1. मानव स्वभाव क्या है?
  2. संकीर्ण मानसिकता का नुकसान क्या है?
  3. एक संकीर्ण दिमाग वाला व्यक्ति कैसे रिश्ता बनाए रखता है?
  4. हमें किस प्रकार की सोच रखनी चाहिए?
  5. लचीले दृष्टिकोण की क्या आवश्यकता है?

उत्तर-

  1. मानव स्वभाव परिवर्तनशील है जो समय के साथ बदलता रहता है।
  2. संकीर्ण मानसिकता वाला व्यक्ति हर जगह नकारात्मकता फैलाता है और कभी भी खुश नहीं रहता।
  3. एक संकीर्ण सोच वाला व्यक्ति रिश्ते को अच्छी तरह से नहीं निभा सकता और दूसरों के विचारों को मानने के लिए तैयार नहीं होता।
  4. उसे संकीर्ण विचारधारा के साथ नहीं रहना चाहिए बल्कि सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ जीना
    चाहिए।
  5. लचीले दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति दूसरों के साथ स्वस्थ समायोजन करते हैं और उनके साथ कभी-कभी भी खट्टे-मीठे रिश्ते नहीं रखते।

PSEB 10th Class Welcome Life Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न

(2)

आधुनिक सूचना क्रांति के युग में संचार के साधनों और उनकी भूमिका में अत्यधिक वृद्धि हुई है। सूचना, ज्ञान और मनोरंजन इन माध्यमों से प्राप्त होते हैं। लेकिन इन संसाधनों को चलाने वाली अधिकांश कंपनियों, संस्थानों या संगठनों का मुख्य उद्देश्य भी पैसा कमाना है। ऐसी स्थिति में वह सभी प्रकार की सामग्री प्रदान करवा रहे हैं भले ही यह मानवता की भलाई के लिए है या नहीं। वर्तमान युग में प्रत्येक मनुष्य के पास इंटरनेट और संचार के साधनों का प्रयोग करने की क्षमता है। इसलिए हमारा यह कर्त्तव्य है कि हम अपने ज्ञान को विकसित करने के लिए इन संसाधनों का उचित प्रयोग करें। बच्चों में सही/ग़लत खोजने की क्षमता कम होती है और इसलिए यह डर इंटरनेट या संचार के अन्य साधनों के दुरुप्रयोग के कारण बना रहता है। इस गतिविधि आधारित पाठ का मुख्य उद्देश्य है छात्रों में अभिरूचि का विकास करना ताकि समझ सके कि इन उपकरणों का सही प्रयोग कैसे किया जाए।
प्रश्न-

  1. किस प्रकार का युग वर्तमान युग है और क्यों?
  2. आधुनिक युग में किसका महत्त्व बढ़ गया है?
  3. संचार के साधन चलाने वालों का मुख्य उद्देश्य क्या है?
  4. हमारा कर्त्तव्य क्या है?
  5. गतिविधि आधारित पाठ्यों का क्या लाभ है?

उत्तर-

  1. वर्तमान युग को सूचना क्रांति के युग के रूप में जाना जाता है क्योंकि उन्होंने दुनिया में दूरी को काफी कम कर दिया है।
  2. आधुनिक युग में सूचना प्रौद्योगिकी का महत्त्व बढ़ गया है।
  3. संचार के साधन चलाने वालों का मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना और लाभ कमाना है।
  4. संचार के साधनों का समुचित उपयोग करना और अपने ज्ञान का विकास करना हमारा कर्तव्य है।
  5. यह छात्रों को यह समझने में मदद करता है कि औज़ारों का सही तरीके से उपयोग कैसे किया जाए और समझने के लिए उनमें एक आदत विकसित की जाए।

(3)

मैडम कमला ने लड़कियों की बताया कि उनके मन में बहुत सी गलत धारणाएं हैं जिनसे बचने की ज़रूरत है। जैसा कि कुछ लोग रात तक जागने के लिए दवा लेते हैं। कुछ अपने शरीर को और अधिक शक्तिशाली और सुडौल बनाने के लिए खतरनाक उत्पाद ले रहे हैं। सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट युवा पीढ़ी को गुमराह कर रहे हैं। दरअसल यह विज्ञापन जो कंपनियों द्वारा प्रचारित किए जाते हैं और वह टी०वी० चैनल का हिस्सा नहीं होते हैं। उन पर डिस्कलेमर विज्ञापन लिखा हुआ होता है। इसीलिए हमें आँख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए। इस तरह के विज्ञापन के बारे में हमें गंभीर रूप से सोचना चाहिए। इसलिए संक्षेप में हमें कड़ी मेहनत और घर के बने स्वस्थ आहार पर विश्वास करना चाहिए जो सरल और संतुलित आहार होना चाहिए। मैडम ने मिल्खा सिंह, पी.टी उषा, दीपिका करमाकर, लिएंडर पेस, मैरीकॉम और कई अन्य खिलाड़ियों की उदाहरणे दी जिन्होंने साधारण या ग़रीब परिवार से उठकर और दुनिया में अच्छी तरह से नाम कमाया।
प्रश्न-

  1. लोग किस प्रकार की गलत धारणाएं बनाते हैं?
  2. क्या हमें कंपनियों के विज्ञापनों पर भरोसा करना होगा?
  3. खेल व्यक्तियों के कुछ उदाहरण दें जिन्होंने केवल कड़ी मेहनत के साथ महान ऊंचाइयों को प्राप्त किया है।
  4. महान ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
  5. विज्ञापनों पर डिस्कलेमर क्यों लिखा जाता है?

उत्तर-

  1. लोग गलत धारणा बनाते हैं कि दवा और टॉनिक के सेवन से हम स्वस्थ और मज़बूत बन सकते हैं।
  2. हमें कंपनी के विज्ञापनों पर आंख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए। हमें इसके बारे में गंभीर रूप से सोचना चाहिए।
  3. मिल्खा सिंह, पी.टी. उषा, दीपिका करमाकर, लिंएडर पेस, मैरीकॉम और अन्य खिलाड़ियों ने कड़ी मेहनत के साथ महान ऊँचाईयों को हासिल किया।
  4. ऊँचाइयों को प्राप्त करने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी चाहिए और दवा और टॉनिक का सेवन नहीं करना चाहिए।
  5. क्योंकि टी०वी० चैनल केवल निर्माता की ओर से विज्ञापन दिखा रहे हैं। विनिर्माण या दोषपूर्ण उत्पादों से उनका कोई लेना देना नहीं है।

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(4)

हमारे संबंधों के बारे में कुछ सामाजिक सीमाएं है। वह हमें बताते हैं कि हमें अपने संबंधों को किस सीमा तक रखना चाहिए। हमें इन सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। हमारे परिवार या पड़ोसी, स्कूल, कॉलेज के शिक्षक, छात्र, दोस्त, दुनिया में लगभग हर व्यक्ति हमें जीवन के हर चरण में सामाजिक रूप से अच्छी प्रकार से परिभाषित सीमाओं और रिश्तों की सीमाओं का एहसास कराता है। इसलिए हमें तार्किक दृष्टिकोण के साथ उनका पालन करना चाहिए। हमें ऐसी सीमा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए अन्यथा हमें किसी अन्य रिश्ते की हत्या करनी पड़ सकती है। तो एक सीमा है जो एक सामाजिक अनुग्रह का प्रतीक है। जैसा कि कुछ संबंधों को घर पर रखा जाता है। दूसरी ओर कुछ हमारे कार्यालय या किसी अन्य कार्यस्थल तक सीमित हैं। इसलिए हमारे बाहरी रिश्तों (कार्यस्थल संबंधों या पेशेवर संबंधों) को हमारे घर पर लाना और इसके विपरीत करना बुद्धिमानी नहीं है। कुछ रिश्ते रक्त से संबंधित हैं जो हमारे बहुत करीब से जाने जाते हैं लेकिन यह हमेशा एक जैसा नहीं होता है। कभीकभी, एक रिश्ता जो रक्त से संबंधित नहीं है, हमारी अधिक मदद करता है और रक्त संबंधों की तुलना में हमारे करीब है।
प्रश्न-

  1. हमारे रिश्तों की सीमा कौन-तय करता है?
  2. हमें सामाजिक सीमाओं के साथ क्या करना चाहिए?
  3. हम करीबी और दूर के रिश्तों की पहचान कैसे कर सकते हैं?
  4. रिश्तों की सीमा क्या है?
  5. बाहरी रिश्तों को हमारे घर में लाना बुद्धिमानी क्यों नहीं है?

उत्तर-

  1. समाज हमारे रिश्तों की सीमा को तय करता है कि हमें किसी भी रिश्ते में कितनी दूर जाने की ज़रूरत है।
  2. हमें एक तार्किक दृष्टिकोण के साथ उनका पालन और निरीक्षण करना चाहिए। हमें सामाजिक सीमाओं के भीतर रहना चाहिए।
  3. करीबी और दूर के रिश्तों को हमारी सरलता, स्वाभाविकता और संवेदनशीलता से पहचाना जा सकता है।
  4. हमेशा हर रिश्ते की सीमा होती है कि हमें हर रिश्ते में कितनी दूर जाने की ज़रूरत हैं। इसलिए हमें आपकी सीमा को समझना चाहिए और बेहतर जीवन जीना चाहिए।
  5. हमें अपने घर में बाहरी या अधिकारी संबंधों को नहीं लाना चाहिए क्योंकि यह हमारे अन्य रिश्तों में समस्याएं पैदा कर सकता है। परिवार के सदस्य इसका विरोध कर सकते हैं और हमारे घरेलू रिश्तों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

(5)

जीवन में हर व्यक्ति कई रिश्तों के साथ रहता है। कुछ रिश्ते लंबे होते हैं। लेकिन कुछ को काट दिया जाता है या कुछ रिश्ते समय और परिस्थितियों के प्रभाव से टूट जाते हैं। तो यह जीवन भर हमारे मन के किसी भी कोने में एक स्मृति के रूप में अच्छा या बुरा रहता है। दूर जाने के कारण, गुस्से-शिकवे बढ़ने के कारण, नए सिरे से जीवन लड़ी शुरू करने के चक्कर में या परिवार, समाज किसी की तरफ से रोक लगाने पर कई बार हमें कोई रिश्ता छोड़ना पड़ता है। कभी-कभी हमें लगता है कि हम किसी और के साथ लंबे समय तक नहीं रह सकते, इसलिए हमें अपना रिश्ता तोड़ रचनात्मक रूप से समाप्त करना चाहिए। कई रिश्ते छोड़ने के बाद हम दोबारा फिर से उनको नहीं मिलते परंतु बिछड़ने का सलीका होना चाहिए।
प्रश्न-

  1. क्या सभी रिश्ते जीवन भर चलते हैं?
  2. हमें रिश्तों को क्यों छोड़ना पड़ता है?
  3. हमें रिश्ते कैसे छोड़ने चाहिएं?
  4. रिश्ते याददाशत में क्यों रहते हैं?
  5. हम क्यों महसूस करते हैं कि कुछ रिश्ते लंबे समय तक नहीं रह सकते?

उत्तर-

  1. नहीं, सभी रिश्ते जीवन भर नहीं रहते।
  2. कुछ रिश्तों को बीच में ही छोड़ दिया जाना चाहिए। क्रोध, सामाजिक प्रतिबंधों के डर से या किसी अन्य स्थान पर एक नया जीवन शुरू करने के लिए कुछ रिश्तों को छोड़ना पड़ता है।
  3. अगर हमें कोई रिश्ता छोड़ने की आवश्यकता है, तो हमें रचनात्मक और सुंदर तरीके से समाप्त करने की आवश्यकता है। ताकि यदि उसे दोबारा जोड़ना पड़े तो जोड़ सकें।
  4. हम एक विशेष संबंध को खत्म कर देते हैं लेकिन वह किसी अच्छे या बुरे क्षण के कारण स्मृति में बने रहते हैं।
  5. क्योंकि जीवन के एक पड़ाव पर, हमें यह एहसास होने लगता है कि ऐसे रिश्ते वफादार नहीं होते हैं और लंबे समय तक निभाने के बजाय उस रिश्ते को खत्म करना बेहतर होता है।

PSEB 10th Class Welcome Life Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न

(6)

यदि हम सभी के साथ उचित तरीके से व्यवहार करना चाहते हैं तो समझो कि हमारे अंदर संवेदनशीलता का गुण है। हमें सभी को इसे प्रेम और सम्मान के साथ समानता की नज़र से देखना होगा। इसलिए लड़कों और लड़कियों, पुरुषों और महिलाओं को एक-दूसरे के साथ उचित और समानता का व्यवहार करना होगा। जिस प्रकार, ‘दर्द’ शब्द का अर्थ सीमित है,-किसी का अपना दर्द। उसी प्रकार ‘संवेदना का अर्थ है-सभी के सामूहिक दर्द को समझना। अगर हम अपने घर को देखें तो भाई-बहनों को अक्सर यह शिकायत होती है कि उनके माता-पिता अपनी बहनों और भाइयों से बेहतर व्यवहार करते हैं। स्कूल में भी लड़के अक्सर इस बात की शिकायत करते हैं कि लड़कियों को क्लास का मॉनिटर क्यों बनाया जाता है? इस लिए इस तरह के मुद्दे वास्तव में हमारी लैंगिक संवेदनशीलता की कमी का संकेत हैं।
प्रश्न-

  1. संवेदनशील का गुण कौन-सा है?
  2. दर्द और संवेदना का क्या अर्थ है?
  3. घर में हमें अपने भाई-बहनों से क्या शिकायत है?
  4. हम कैसे ठीक से व्यवहार करना चाहिए?
  5. हमें दूसरों का आदर क्यों करना चाहिए?

उत्तर-

  1. समाज में रहते हुए हम सभी के साथ उचित और सम्मानजनक तरीके से पेश आते हैं। यह संवेदनशीलता का गुण है।
  2. दर्द का सीमित अर्थ है किसी का अपना दर्द और सहानुभूति का अर्थ है सभी के सामूहिक दर्द को समझना।
  3. हमें अक्सर भाई बहनों के बारे में शिकायत होती है कि माता-पिता उनसे ज्यादा प्यार करते हैं और हमसे कम प्यार करते हैं।
  4. हमें सभी को सम्मान देना चाहिए और उनके साथ समान व्यवहार करना चाहिए।

(7)

प्रिय छात्रो ज़रूरतों और इच्छाओं का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है, लेकिन उन्हें अपनी सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए। वह इतने अधिक नहीं होने चाहिए कि हमारी सभ्य सामाजिक सीमा को पार कर जाएं। जीवन जीने के लिए भोजन, कपड़ा और मकान बुनियादी जरूरतें है, उसी प्रकार एक अच्छी जीवन शैली का भी उतना ही महत्त्व है। आइए हम देखें कि हमारी ज़रूरतें और इच्छाएं किस प्रकार की हैं ? क्या वे सीमित हैं या बहुत अधिक हैं और सभी साधनों और स्रोतों से अधिक हैं ? क्या ये हमारे माता-पिता को तंग कर रहें हैं या नहीं?
प्रश्न-

  1. जीवन जीने के लिए क्या आवश्यक है?
  2. किस हद तक इच्छाओं को रखा जाना चाहिए?
  3. जीवन जीने के लिए कौन-सी चीजें आवश्यक हैं?
  4. इच्छाओं को रखते हुए हमें क्या ध्यान रखना चाहिए?
  5. जीवन में ज़रूरतें और इच्छाएं क्यों ज़रूरी हैं?

उत्तर-

  1. ज़रूरतें और इच्छाएं जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं। हम इनके बिना नहीं रह सकते।
  2. इच्छाओं को सामाजिक सीमा में रखा जाना चाहिए ताकि वह आसानी से पूरी हो सकें।
  3. जीवन जीने के लिए भोजन, वस्त्र और आश्रय की आवश्यकता होती है क्योंकि हम उनके बिना नहीं रह सकते।
  4. इच्छा रखने के दौरान हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि वह हमारे माता-पिता को तंग न करें। इस मामले में, वह हमारे माता-पिता पर बोझ बन जाएंगे।
  5. क्योंकि हर किसी को जीवन जीने के लिए कुछ चीज़ों की आवश्यकता होती है जो एक खुशहाल जीवन जीने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

PSEB 10th Class Welcome Life Solutions उद्धरण संबंधी प्रश्न

(8)

दुनिया का हर इंसान अलग है। हम उसी प्रकार कई मायनों में एक-दूसरे से अलग है। जैसे कि हर किसी का एक अलग व्यक्तित्व होता है। आपसी सम्मान के लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम एक-दूसरे के साथ एक ही प्रकार से व्यवहार करें। स्वीकार करें कि उनका व्यक्तित्व रिश्ते के लिए अलग है जो एक आशीर्वाद है। हम अक्सर देखते हैं कि दो अच्छे दोस्तों के व्यक्तित्व अक्सर अलग होते हैं। एक वक्ता और दूसरा श्रोता, इस प्रकार से, हमारी विविधता एक-दूसरे की पूरक है। जब हम एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं तो हम उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। अगर हम खुद को सही मानते हैं और दूसरों को गलत मानते हैं, तो हम अकेले रह जाएंगे। विद्यार्थी जीवन में मित्रता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण होती है। मित्र को उसके पूर्ण रूप में स्वीकार करो। इस स्थिति में हर किसी की प्रतिक्रिया अलग-अलग होती है। जब कक्षा में एक छात्र को अध्यापक द्वारा टोका जाता है, तो उसे अपने तरीकों में बदलाव करना चाहिए। कोई और गुस्से में आ जाता है और जानबूझकर गलत व्यवहार करता है जबकि कोई पूरी तरह से चुप रहता हैं। हमारी समस्या यह है कि हम चाहते हैं कि हर कोई बदल जाए। यह ठीक नहीं है। सभी अलग तरीके से व्यवहार करते हैं।
प्रश्न-

  1. विद्यार्थी जीवन में क्या बहुत महत्त्व रखता है?
  2. दुनिया में हर कोई एक-दूसरे से अलग कैसे है?
  3. आपसी अच्छे संबंधों के लिए क्या आवश्यक है?
  4. हमारे जीवन में विभिन्नताओं का क्या महत्त्व है?
  5. दो अच्छे दोस्तों का व्यक्तित्व एक-दूसरे से अलग क्यों है?

उत्तर-

  1. विद्यार्थी जीवन में दोस्ती का बहुत महत्त्व हैं क्योंकि वह बिना किसी स्वार्थ के हमारे साथ बने रहते हैं और हम उन्हें जीवन भर याद रखते हैं।
  2. हर कोई शारीरिक दृष्टिकोण से एक-दूसरे से अलग है। उनकी आदतें, व्यक्तित्व और क्षमताएं भी अलग-अलग होती हैं। इसलिए हर कोई एक-दूसरे से अलग है।
  3. आपसी अच्छे संबंधों के लिए, यह होना चाहिए कि हम दूसरों को वैसा ही स्वीकार करें जैसे वे हैं और उनका व्यक्तित्व है। यह समानता के संबंधों को बनाए रखने में मदद करता हैं।
  4. विभिन्नताओं का बहुत महत्त्व है। हर कोई एक-दूसरे से अलग है और हम स्वीकार करते हैं। वह जैसे भी हैं, कई मतभेद होने के बाद भी, हम उनके साथ भेदभाव नहीं करते हैं।
  5. हालांकि वह अच्छे दोस्त हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण, विचार, आदतें, जीने के तरीके एक-दूसरे से अलग हैं। इसलिए उनके व्यक्तित्व भी अलग हैं।

(9)

रचनात्मक सोच का अर्थ है कि हमारे पास कुछ नया, अनूठा और मूल करने की प्रवृत्ति है। रचनात्मक मानसिकता वाले इंसान में हमेशा नए विचार आते हैं और उन विचारों को व्यक्त करने का तरीका भी अनोखा होता है। विभिन्न मनुष्यों में अलग-अलग लक्षण और गुण होते हैं। एक रचनात्मक मानसिकता वाला व्यक्ति इस गुण का उपयोग खुद को विकसित करने के लिए करता है और सामाजिक सम्मान भी प्राप्त करता है। रचनात्मक ध्यान न केवल कला या साहित्य के क्षेत्र में बल्कि किसी भी क्षेत्र से जुड़े लोगों में भी पाया जा सकता है। छात्रों में इस दृष्टिकोण को विकसित करके, उनके व्यक्तित्व को परिष्कृत किया जाना चाहिए और उनकी प्रकृति को उनकी ऊर्जा का उचित उपयोग करके रचनात्मक बनाया जाना चाहिए।
प्रश्न-

  1. रचनात्मक सोच का क्या अर्थ है?
  2. रचनात्मक सोच का क्या फायदा है?
  3. क्या यह रचनात्मक सोच किसी भी क्षेत्र में हो सकती है?
  4. छात्रों में रचनात्मक सोच विकसित करने से क्या फायदा है?
  5. सभी को रचनात्मक सोच क्यों रखनी चाहिए?

उत्तर-

  1. रचनात्मक सोच का अर्थ है कि हमारे पास कुछ नया, अनूठा और मूल करने की प्रवृत्ति है।
  2. रचनात्मक सोच के साथ एक व्यक्ति खुद का विकास करता है और सामाजिक सम्मान हासिल करता हैं। वह कुछ नया करने की कोशिश करता है।
  3. हाँ, रचनात्मक सोच कला, साहित्य, विज्ञान, इत्यादि किसी भी क्षेत्र में हो सकती है।
  4. छात्रों में रचनात्मक सोच विकसित करके उनके व्यक्तित्व का विकास किया जा सकता है। उनकी ऊर्जा का उचित प्रयोग करके उनके स्वभाव को रचनात्मक बनाया जा सकता हैं।
  5. हर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अधिक रचनात्मक है। वह हमेशा कुछ अनोखा बनाना चाहता है। कुछ अनोखा बनाने के लिए रचनात्मक सोच बहुत आवश्यक है।

(10)

यदि हम कभी-कभी दुखी, डरे हुए, घबराए हुए, बेचैन, क्रोधित, ईष्यालु या परेशान महसूस करते हैं तो यह सामान्य है, लेकिन अगर ऐसा अक्सर होता है, तो इन भावनाओं पर नियंत्रण करना आवश्यक हो जाता है। यदि हमारी भावनाएं नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, तो यह हानिकारक साबित हो सकती हैं और हमारे शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए हमें अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए सीखना चाहिए कि अत्यधितः भावनात्मक होने और फिर बाद में पछतावा होने पर गलतियों से बचने के लिए हम अपनी भावनाओं का आत्मनिरीक्षण और विश्लेषण करते हैं। इनको अच्छी प्रकार से समझदार और इन पर सही तरीके से अमल करके, उज्ज्वल और सफल छात्र हो सकते हैं क्योंकि भावनाओं का संतुलन हमारे जीवन में हमारे शारीरिक कल्याण, मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक संबंधों के रूप में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। सभी भावनात्मक संतुलन से जुड़े हैं। भावनाओं को संतुलित करने का अर्थ है कि हमें कब और कितना व्यक्त करना है, इसके बारे में पूरी तरह से जागरूक होना चाहिए। हमें एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए कि हम अपनी भावनाओं को कैसे व्यक्त कर सकते हैं।
प्रश्न-

  1. हमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण क्यों रखना चाहिए?
  2. हम कैसे सफल छात्र बन सकते हैं?
  3. भावनाओं के संतुलन से क्या अभिप्राय है?
  4. भावनाओं को काबू में रखने के बारे में हमें क्यों सीखना चाहिए?
  5. जब हम उदास, घबराए हुए, गुस्सा इत्यादि महसूस करते हैं, तो यह सामान्य क्यों है?

उत्तर-

  1. हमें अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने की आवश्यकता है जैसे कि क्रोध, ईर्ष्या, डर नहीं तो यह हमारे लिए कई समस्याएं पैदा कर सकता है।
  2. हम अपनी भावनाओं का आत्मनिरीक्षण और विश्लेषण करके, इनको ठीक से समझकर और इन्हें सही तरीके से समझकर सफल छात्र बन सकते हैं।
  3. भावनाओं को संतुलित करने का मतलब यह है कि हमें कब और कितना व्यक्त करना है, इसके बारे में पूरी तरह से जागरूक होना चाहिए।
  4. हमें भावनाओं को नियंत्रण में रखने के बारे में सीखना चाहिए ताकि भावनाओं के प्रभाव में हम कोई गलती कर बैठें जो बाद में एक समस्या बन सकती है।
  5. यह मानव स्वभाव के कारण है जो अलग-अलग समय पर महसूस होता है। दुखी, घबराया हुआ, क्रोधित, ईर्ष्या या हमेशा के लिए परेशान। यह हमारे मन पर भी निर्भर करता है जिसके अनुसार हमारे भीतर विभिन्न भावनाएं होती हैं।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 4 पानी का कृषि में महत्त्व

Punjab State Board PSEB 6th Class Agriculture Book Solutions Chapter 4 पानी का कृषि में महत्त्व Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Agriculture Chapter 4 पानी का कृषि में महत्त्व

PSEB 6th Class Agriculture Guide पानी का कृषि में महत्त्व Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों का एक-दो शब्दों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
पौधों में पानी की मात्रा कितने प्रतिशत होती है ?
उत्तर-
90 प्रतिशत।

प्रश्न 2.
फसलों को बनावटी तरीके से पानी देने की प्रक्रिया को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
सिंचाई।

प्रश्न 3.
पानी की सबसे अधिक बचत करने में समर्थ सिंचाई की कोई दो विधियां लिखो।
उत्तर-
फुव्वारा सिंचाई, टपक सिंचाई।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 4 पानी का कृषि में महत्त्व

प्रश्न 4.
कौन-से पदार्थ पानी द्वारा पौधों में विलय करते हैं ?
उत्तर-
खनिज पदार्थ तथा खाद्य तत्त्व।।

प्रश्न 5.
भारत में कुल पानी में से कितना पानी कृषि के लिए प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
70 प्रतिशत।

प्रश्न 6.
कदू करना किसे कहते हैं ?
उत्तर-
खड़े पानी में खेत को जोतने को कद्दू करना कहते हैं।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 4 पानी का कृषि में महत्त्व

प्रश्न 7.
कौन-सी फसल को कद् करके लगाया जाता है ?
उत्तर-
धान को।

प्रश्न 8.
पंजाब में सिंचाई के मुख्य साधन कौन-से हैं ?
उत्तर-
टयूबवेल तथा नहरें।

प्रश्न 9.
फसल को अधिक लू व कोहरे से बचाने के लिए कौन-सी विधि का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर-
सिंचाई का।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 4 पानी का कृषि में महत्त्व

प्रश्न 10.
पानी की कमी वाले क्षेत्रों में सिंचाई की कौन-सी विधि लाभदायक है ?
उत्तर-
टपक सिंचाई।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों का एक या दो पंक्तियों में उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1.
सिंचाई किसे कहते हैं ?
उत्तर-
कई बार फसलों की आवश्यकता वर्षा के पानी से पूरी नहीं होती तथा फसलों को बनावटी ढंग से पानी दिया जाता है, इसको सिंचाई कहते हैं।

प्रश्न 2.
फसल में रौनी का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
बुवाई के समय मिट्टी में उचित मात्रा में नमी होनी चाहिए, इसलिए खेत में भर के पानी लगाया जाता है जिसको रौनी कहते हैं। इस तरह रौनी का महत्त्व फसल उगने में सहायता करना होता है।

PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 4 पानी का कृषि में महत्त्व

प्रश्न 3.
सिंचाई के विभिन्न साधन कौन-से हैं ?
उत्तर-
सिंचाई के भिन्न-भिन्न साधन हैं-ट्यूबवेल, कुआँ, नदी, तालाब, डैम, नहर आदि।

प्रश्न 4.
सिंचाई की संख्या फसलों पर कैसे निर्भर करती है ?
उत्तर-
कई फसलें जैसे ; गेहूँ, तेल बीज फसलों, दालों आदि को कम सिंचाई की आवश्यकता होती है तथा कई फसलों जैसे धान, मक्का आदि को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसलिए सिंचाई की संख्या फसल पर निर्भर करती है।

प्रश्न 5.
धान में कद् क्यों किया जाता है ?
उत्तर-
धान की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए धान की बुवाई के लिए खेत में पानी खड़ा करके जुताई की जाती है, इसको कद्रू करना कहते हैं। इस तरह खेत में ज़्यादा पानी खड़ा किया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
मिट्टी में नमी का होना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
बीज को अंकुरित होकर पौधे में बदलने के लिए मिट्टी में ठीक मात्रा में नमी होनी चाहिए, इसलिए मिट्टी में नमी का होना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
रेतीली मिट्टी में अधिक व चिकनी मिट्टी में कम सिंचाई की आवश्यकता क्यों पड़ती है ?
उत्तर-
रेतीली मिट्टी में पानी बहुत जल्दी समा जाता है जबकि चिकनी मिट्टी में धीमी गति से समाता है। इसलिए रेतीली मिट्टी में सिंचाई की अधिक आवश्यकता है।

प्रश्न 8.
पंजाब में सैंट्रीफ्यूगल पम्पों का स्थान सबमरसीबल पम्पों ने क्यों ले लिया
उत्तर-
भूमिगत जल का स्तर नीचे गिरता जा रहा है, जिस कारण सेंट्रीफ्यूगल पम्प (पंखे वाले) पानी निकालने में फेल हो गए हैं। इसलिए अब मछली मोटर अर्थात् सबमरसीबल पम्पों के प्रयोग से पानी निकाला जाता है।

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प्रश्न 9.
गर्मी के मौसम में फसलों को अधिक पानी की आवश्यकता क्यों पड़ती
उत्तर-
गर्मी के दिनों में मिट्टी तथा पत्तों में से वाष्पीकरण अधिक मात्रा में होता है, इसलिए गर्मियों में अधिकतर फसलों को अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 10.
पानी उठाने वाले पम्पों की ऊर्जा कहां से प्राप्त की जा सकती है ?
उत्तर-
पम्पों के लिए ऊर्जा डीज़ल, बायोगैस, बिजली तथा सौर ऊर्जा से प्राप्त की जा सकती है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के चार-पाँच पंक्तियों में उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1.
पौधों के जीवन में पानी का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
बीज को अंकुरित होने के लिए नमी की आवश्यकता होती है, इसलिए मिट्टी में नमी का होना बहुत आवश्यक है। पानी पौधों के बढ़ने-फूलने तथा फूल, फल और बीज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पानी द्वारा मिट्टी में से खनिज, लवण तथा खाद्य पदार्थ पौधों को प्राप्त होते हैं : पानी में घुल कर तत्त्व पौधे के सारे भागों तक पहुंच जाते हैं। पानी लू तथा कोहरे से भी पौधों की रक्षा करता है।

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प्रश्न 2.
सिंचाई की संख्या किस पर निर्भर करती है और कैसे ?
उत्तर-
सिंचाइयों की संख्या फसल की किस्म, मौसम तथा मिट्टी की किस्म पर निर्भर करती है। गेहूँ, तेल बीज फसल, दालों आदि को कम सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। परन्तु धान, गन्ने, मक्की आदि को अधिक सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। सर्दियों में फसलों को कम सिंचाइयों की तथा गर्मियों में फसलों को अधिक सिंचाइयों की आवश्यकता होती है, क्योंकि गर्मी में मिट्टी तथा पत्तों में पानी का वाष्पीकरण बहुत तेज़ी से तथा अधिक मात्रा में होता है। हल्की मिट्टी (रेतीली) में अधिक तथा भारी (चिकनी) मिट्टी में कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। हल्की भूमि में पानी जल्दी समा जाता है जबकि भारी भूमि में धीरे-धीरे समाता है।

प्रश्न 3.
सिंचाई की विभिन्न विधियाँ कौन-सी हैं ? फुव्वारा सिंचाई के बारे में विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर-
सिंचाई की विभिन्न विधियाँ हैं-धरातली सिंचाई, उप-धरातली सिंचाई, फुव्वारा सिंचाई, टपक सिंचाई आदि।
फव्वारा सिंचाई-इस विधि में फसल या भूमि पर फुव्वारे द्वारा पानी का छिड़काव किया जाता है। यह पानी भूमि की सोखने की शक्ति से सदा कम होता है तथा पौधों की आवश्यकता को ही पूरा करता है। ऊँचे-नीचे क्षेत्रों में यह तकनीक बहुत कारगर सिद्ध हुई है। फसल को लू तथा कोहरे से बचाने के लिए यह विधि उचित है।

प्रश्न 4.
टपक सिंचाई द्वारा कैसे पानी की बचत होती है ?
उत्तर-
पानी एक प्राकृतिक स्रोत है, इसकी बचत करने की भी बहुत आवश्यकता है। कृषि में भारत के कुल पानी का 70 प्रतिशत प्रयोग होता है। इसलिए पानी की बचत करने के लिए टपक सिंचाई का तरीका बहुत कारगर सिद्ध हुआ है।

इस विधि में पौधों की जड़ों में बूंद-बूंद करके पानी डाला जाता है। इस तरह इस पानी का प्रयोग केवल पौधों की आवश्यकता को ही पूरा करता है तथा मिट्टी में समा जाने के लिए बचता ही नहीं है तथा इस तरह पानी बिल्कुल बर्बाद नहीं होता। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में यह तरीका बहुत ही लाभदायक है।

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प्रश्न 5.
धरातली सिंचाई का प्रयोग विभिन्न फसलों में किस प्रकार किया जाता
उत्तर-
बढ़िया उपज लेने के लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसलिए भिन्नभिन्न तरीके से सिंचाई की जाती है इनमें से एक विधि है धरातली सिंचाई।

इस तरीके में खेत में क्यारे बना कर खालों द्वारा पानी लगाया जाता है। इस ढंग से गेहूँ, दालों आदि को पानी लगाया जाता है। फलदार पौधों के आस पास मेढ़ें बना कर पानी भर दिया जाता है। कई फसलों को मेढ़ों पर उगाया जाता है तथा खालियों द्वारा पानी दिया जाता है; जैसे-गन्ना, मक्की, आलू आदि। ।

Agriculture Guide for Class 6 PSEB पानी का कृषि में महत्त्व Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में कुल पानी का लगभग कितने प्रतिशत पानी घरेलू आवश्यकता के लिए प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
8 प्रतिशत।

प्रश्न 2.
धान की बुवाई के लिए खेत को क्या किया जाता है ?
उत्तर-
कद्रू।

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प्रश्न 3.
पंजाब में सिंचाई का मुख्य साधन क्या है ?
उत्तर-
ट्यूबवेल तथा नहरें।

प्रश्न 4.
हल्की मिट्टी कौन-सी है ?
उत्तर-
रेतीली मिट्टी।

प्रश्न 5.
भारी भूमि कौन-सी है ?
उत्तर-
चिकनी मिट्टी।

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प्रश्न 6.
कौन-सी ज़मीन में पानी जल्दी सोखा जाता है ?
उत्तर-
रेतीली (हल्की) ज़मीन में।

प्रश्न 7.
तालाब से पानी निकालने के लिए किस का प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
पशुओं का।

प्रश्न 8.
मछली मोटर किस को कहते हैं ?
उत्तर-
सबमरसीबल पम्प।

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प्रश्न 9.
डल झील पर सब्जियां उगाने के लिए कौन-सी सिंचाई का प्रयोग होता
उत्तर-
उप-धरातली सिंचाई।

प्रश्न 10.
टपक सिंचाई कौन-से क्षेत्रों के लिए बहुत लाभदायक है ?
उत्तर-
पानी की कमी वाले क्षेत्रों के लिए।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में पानी की लागत के बारे बताओ।
उत्तर-
भारत में कुल पानी का 70 प्रतिशत पानी कृषि, 20-22 प्रतिशत पानी कारखानों तथा लगभग 8 प्रतिशत पानी घरेलू आवश्यकताओं के लिए प्रयोग होता है।

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प्रश्न 2.
कौन-सी फसलों को कम सिंचाई तथा किन को अधिक सिंचाई की आवश्यकता है ?
उत्तर-
गेहूँ, तेल बीज फसलें, दालों आदि को कम सिंचाई तथा धान, मक्की, गन्ना आदि को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 3.
अब पानी उठाने के लिए किस विधि का प्रयोग होता है तथा किस ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
अब पानी उठाने के लिए पम्पों का प्रयोग किया जाता है। जैसे-पंखा पम्प, मछली मोटर आदि तथा डीज़ल, बायोगैस, बिजली तथा सौर ऊर्जा का प्रयोग करके इन पम्पों को चलाया जाता है।

प्रश्न 4.
उप-धरातली सिंचाई के बारे में क्या जानते हो ?
उत्तर-
कई स्थानों पर पानी ज़मीन के निकट होने के कारण जमीन में से पानी ले लेते हैं, जैसे-कश्मीर में डल झील पर सब्जियां उगाई जाती हैं।

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बड़े उत्तर वाला प्रश्न

प्रश्न-
सिंचाई के साधनों के बारे में क्या जानते हो ?
उत्तर-
सिंचाई के कई साधन उपलब्ध हैं। यह हैं कुआँ, ट्यूबवेल, तालाब, डैम, नहर, नदी आदि। पुरातन समय में कुआँ, तालाब में से पानी निकालने के लिए पशुओं का प्रयोग किया जाता था। यह कार्य अधिक समय लेने वाला तथा बढ़िया ढंग नहीं है।

आजकल पानी उठाने के लिए पम्पों का प्रयोग होता है। यह पम्प बिजली, बायोगैस, डीज़ल तथा सौर ऊर्जा आदि से चलते हैं। पंजाब में सिंचाई के लिए मुख्य तौर पर नहरों तथा ट्यूबवेल का प्रयोग होता है। पंजाब में लगभग 13 लाख ट्यूबवेल हैं। पानी के अधिक प्रयोग के कारण धरती के नीचे पानी का स्तर नीचे गिर रहा है। इसलिए पानी निकालने के लिए सैंट्रफ्यूिगल पम्प (पंखे वाले) फेल हो गए हैं तथा अब पानी निकालने के सबमरसीबल पम्प (मछली पम्पों) का प्रयोग हो रहा है पर इनके प्रयोग से बिजली की खपत भी बढ़ गई है।

पानी का कृषि में महत्त्व PSEB 6th Class Agriculture Notes

  • पानी के बिना कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता।
  • भारत में कुल पानी का लगभग 70 प्रतिशत कृषि में, 20-22 प्रतिशत, उद्योगों में तथा लगभग 8 प्रतिशत पानी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  • पौधों में लगभग 90 प्रतिशत पानी होता है।
  • पानी फसल को लू तथा कोहरे दोनों से बचाता है।
  • बनावटी ढंग से फसलों को पानी देने को सिंचाई कहते हैं।
  • हल्की (रेतीली) मिट्टी में अधिक तथा भारी (चिकनी) मिट्टी में कम सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।
  • खेत में भर कर पानी लगाया जाता है, जिसको रौनी कहते हैं।
  • धान के अलावा सभी फसलों को रौनी करके बोया जाता है।
  • धान की फसल को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए इसको कद्दू करके बोया जाता है।
  • सिंचाई के साधन हैं-कुआं, ट्यूबवेल, तालाब, दरिया, नहरें, बाँध आदि।
  • ट्यूबवेलों की संख्या 1980 में 6 लाख से बढ़कर अब 13 लाख से भी अधिक हो गई है।
  • सिंचाई के ढंग हैं-धरातली सिंचाई, उप-धरातली सिंचाई, फुव्वारा सिंचाई, टपक सिंचाई।