PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 6 मकान सम्बन्धी सामाजिक और आर्थिक तत्त्व

Punjab State Board PSEB 7th Class Home Science Book Solutions Chapter 6 मकान सम्बन्धी सामाजिक और आर्थिक तत्त्व Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Home Science Chapter 6 मकान सम्बन्धी सामाजिक और आर्थिक तत्त्व

PSEB 7th Class Home Science Guide मकान सम्बन्धी सामाजिक और आर्थिक तत्त्व Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मकान बनाने के लिए सबसे पहले किस चीज़ का अनुमान लगाना चाहिए?
उत्तर-
आर्थिक स्थिति का।

प्रश्न 2.
मकान बनाने के लिए धन के अतिरिक्त और किस चीज़ की ज़रूरत है?
उत्तर-
बुद्धि की।

प्रश्न 3.
घर कैसी जगहों के पास और कैसी जगहों से दूर होना चाहिए?
उत्तर-
स्टेशन, शमशान घाट, गंदी बस्तियां, कूड़ा-कर्कट के ढेर आदि से दूर होना चाहिए।
काम का स्थान, बैंक डाक्टर, स्कूल, बाज़ार आदि घर के पास होना चाहिए।

PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 6 मकान सम्बन्धी सामाजिक और आर्थिक तत्त्व

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
सरकार, बैंक या बीमा कम्पनियाँ मकान बनाने में कैसे मदद करती है?
उत्तर-
सरकार, बैंक या बीमा कम्पनियाँ मकान बनाने में सस्ते ब्याज पर कर्ज देकर मदद करती हैं।

प्रश्न 2.
गन्दी बस्तियों का बच्चों के विकास पर क्या असर पड़ता है?
उत्तर-
गन्दी बस्तियों में रहने वाले बच्चों की न केवल सेहत ही खराब होती है, बल्कि उनके आचरण पर भी खराब असर पड़ता है। उसमें अपराध की प्रवृत्ति भी बढ़ जाती है।

प्रश्न 3.
बहुत अमीर पड़ोस में रहने से बच्चों की मानसिक स्थिति पर क्या असर पड़ता है?
उत्तर-
जिस गली या मुहल्ले में बच्चों को रहना हो, वहाँ के निवासियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बच्चों के आर्थिक और सामाजिक स्थिति के अनुसार होनी चाहिए। अगर बाकी लोग अमीर हों तो बच्चों के मन में ईर्ष्या की भावना जाग जाती है और अपने को छोटा महसूस करने की भावना आ जाती है जिससे बच्चों की मानसिक स्थिति पर खराब असर पड़ता है।

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
हरित क्रान्ति और जमींदारों का ज़मीनों की कीमतों और मकानों के किराये पर क्या असर पड़ा है?
उत्तर-
हरित क्रान्ति के बाद कुछ ज़मींदार परिवारों के पास बहुत पैसा आ गया है। इन्होंने घरों पर बहुत पैसे खर्च किए हैं। आलीशान बंगले बनाए हैं। इससे दूसरे लोगों में ईर्ष्या और रोष की भावना जागी है। नकल करके कुछ लोगों ने जिनके पास बहुत धन नहीं है उन्होंने भी मकानों पर बहुत धन खर्च करके अपने आर्थिक सन्तुलन को खराब किया है। अब शहरों में मकान बनाने के लिए जमीन बहुत महंगी हो गई है। बड़े शहरों में मकान बनाना केवल अमीर लोगों के बस की बात है। किराये भी बहुत बढ़ गए हैं जिससे आम आदमी पर खराब असर पड़ा है।

प्रश्न 2.
मकान बनाते समय अपनी अर्थिक स्थिति का जायज़ा लेना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
मकान बनाने के लिए सबसे पहले अपनी आर्थिक स्थिति का जायजा लेना चाहिए। बहुत बार ऐसा होता है कि मकान बनाने की धुन में कई परिवार अपनी दूसरी ज़िम्मेदारियों को भूल जाते हैं, और वे सरकार, बैंक या बीमा कम्पनियों से कर्ज़ लेकर मकान बनाना शुरू कर देते हैं, लेकिन पैसे की कमी के कारण घर की खुराक, बच्चों की पढ़ाई और परिवार के सारे विकास पर बुरा असर पड़ता है।

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प्रश्न 3.
मकान बनाते समय या किराये पर लेते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर-
मकान बनाते समय या किराये पर लेते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान रखना चाहिए

  1. मकान परिवार की जरूरतों के अनुसार ही बनाना चाहिए।
  2. मकान ऐसी जगह बनाना चाहिए जहाँ दैनिक प्रयोग में आने वाली वस्तुएँ शीघ्र तथा सुगमता से प्राप्त हो सकती हों।।
  3. नौकरी वाले लोगों के लिए नौकरी का स्थान तथा दकान समीप होनी चाहिए।
  4. अस्पताल तथा बाजार भी घर से बहत दूर नहीं होने चाहिएं।
  5. बच्चों के लिए स्कूल और कॉलेज नज़दीक होना चाहिए।
  6. डाकघर तथा बैंक भी नज़दीक होना चाहिए।

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अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मकान की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर-
वर्षा, धूप, ठण्ड, आँधी-तूफान, जीव-जन्तु व आकस्मिक घटनाओं आदि से बचने के लिए।

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प्रश्न 2.
आदि काल में मनुष्य कहाँ रहते थे?
उत्तर-
गुफ़ाओं में।

प्रश्न 3.
प्राणी में जन्मजात चेतना क्या होती है?
उत्तर-
प्राणी अपने विकास के लिए ऐसे ठौर का निर्माण करना चाहता है जहाँ उसे सुख-शान्ति प्राप्त हो सके। यही जन्मजात चेतना होती है।

प्रश्न 4.
समय, श्रम व धन की बचत के लिए मकान कहाँ होना चाहिए?
उत्तर-
समय, श्रम व धन की बचत के लिए मकान, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, दफ्तर, बाजार आदि के निकट होना चाहिए।

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छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मकान में व्यक्ति को कौन-कौन सी सुविधाएँ मिलती हैं?
उत्तर-
मकान में व्यक्ति को निम्न सुविधाएँ मिलती हैं

  1. सुरक्षात्मक सुविधाएँ
  2. कार्य करने की सुविधा
  3. शारीरिक सुख
  4. मानसिक शान्ति
  5. विकास एवं वृद्धि की सुविधा।

प्रश्न 2.
हमारा मकान कैसा होना चाहिए?
उत्तर-
हमारा मकान ऐसा होना चाहिए जहाँ

  1. परिवार के सभी सदस्यों के पूर्ण विकास व वृद्धि का ध्यान रखा जाए।
  2. सदा प्रत्येक सदस्य की कार्य क्षमता को प्रोत्साहन दिया जाए।
  3. एक-दूसरे के प्रति सद्भावना व प्रेम से व्यवहार किया जाए।
  4. परिवार की आर्थिक स्थिति में पूर्ण योगदान दिया जाए।

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प्रश्न 3.
मकान की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर-

  1. वर्षा, धूप, ठण्ड, आँधी, तूफ़ान आदि से बचने के लिए।
  2. जीव-जन्तुओं, चोरों तथा आकस्मिक घटनाओं से अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए।
  3. शान्तिपूर्वक, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्यप्रद जीवन व्यतीत करने के लिए।
  4. अपना तथा बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए।

प्रश्न 4.
घर की दिशा के सम्बन्ध में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
घर का मुख पूर्व की तरफ होना चाहिए। इस प्रकार सूर्य का प्रकाश तथा ताज़ा हवा सरलता से आ जा सकती है।

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बड़े उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
सुन्दर, सुरक्षाजनक व सुदृढ़ मकान बनाने के लिए कौन-कौन सी बातें ध्यान में रखनी चाहिएं?
उत्तर-
मकान बनाने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए
1. स्थिति (वातावरण)-स्वास्थ्यकर मकान के चुनाव में वातावरण का विशेष महत्त्व है। वातावरण पर ही घर का स्वास्थ्य निर्भर करता है। गन्दे और दूषित वातावरण में बने अच्छे से अच्छे मकान भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। वातावरण की दृष्टि से निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

2. रेलवे स्टेशन, कारखाने, भीड़ वाले बाज़ार, शमशान घाट, कसाईखाना, तालाब, नदी, गन्दे नाले, सार्वजनिक शौचालय आदि के पास मकान नहीं बनवाना चाहिए।

  1. मकान सीलन भरी अंधेरी और तंग गलियों में नहीं बनवाना या लेना चाहिए।
  2. मकान अन्य घरों से बिल्कुल लगा हुआ नहीं होना चाहिए। मकानों में आपस में उचित दूरी होनी चाहिए।
  3. मकान ऊँचे स्थान पर होना चाहिए। पास के मकान बहुत ऊंचे नहीं होने चाहिएं।
  4. मकान खुली जगह पर होना चाहिए जिससे शुद्ध वायु एवं सूर्य का प्रकाश उचित मात्रा में मिल सकें।
  5. मकान जहाँ बनाया जाए वहाँ शुद्ध पेयजल सुगमता से प्राप्त हो सकें।
  6. घर से थोड़ी दूर पर कुछ वृक्ष हों तो वे लाभप्रद होते हैं। वे भूमि को सुखी रखते हैं तथा उनसे शुद्ध व ताजी वायु भी प्राप्त होती है।
  7. भूमि-भूमि इस प्रकार की होनी चाहिए कि वह पानी सोख सके। चिकनी मिट्टी मकान के लिए उपयुक्त नहीं होती क्योंकि उसमें पानी सोखने की क्षमता नहीं होती और उस पर बनाए गए मकान में सदैव सीलन बनी रहती है। ऐसी भूमि में कई प्रकार के रोग होने का भय रहता है। इसके अतिरिक्त मकान के चारों ओर पानी एकत्र हो जाने से उसकी नींव कमजोर पड़ जाती है। रेतीली भूमि गर्मियों में गर्म तथा सर्दियों में ठण्डी होती है। इसके साथ ही ऐसी भूमि पर बना हुआ मकान मज़बूत नहीं होता। कंकरीली भूमि मकान के लिए सबसे उत्तम रहती है क्योंकि ऐसी भूमि में नीव अधिक दृढ़ रहती है।

3. घर की दिशा-घर का मुख पूरब की ओर होना चाहिए। इससे सूर्य का प्रकाश व ताज़ी हवा आसानी से आ जा सकती है।

4. नींव-मकान को बनवाते समय यह भी अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि मकान की नींव गहरी हो। इसकी गहराई मकान की ऊँचाई पर निर्भर करती है। जितना मंजली व ऊँचा मकान होगा उतना ही अधिक भार नींव के ऊपर पड़ेगा, अत: उसी के अनुसार उसकी गहराई रखी जानी चाहिए। नींव के लिए जमीन को प्रायः तीन फुट गहरा खोदना चाहिए। इस नींव को दृढ़ बनाने के लिए इसको काफ़ी ऊँचाई तक कंकरीट और सीमेंट से भरा जाना चाहिए। मज़बूत नींव पर ही एक अच्छे मकान का निर्माण सम्भव है।

5. बनावट-मकान बनाने के लिए नक्शे व योग्य कारीगर का चयन करना चाहिए, जिससे मकान सुन्दर, सुविधाजनक व सुदृढ़ बने। मकान बनाते समय नींव के अलावा दीवारों, खिड़कियों, रोशनदानों, अलमारियों व छत आदि पर विशेष ध्यान देना चाहिए जिससे उचित व टिकाऊ मकान बने। मकान के फर्श पर भी अत्यधिक ध्यान देना चाहिए ताकि समय-समय पर उसे साफ़ करने व धोने में कोई कठिनाई न हो।

6. वायु आवागमन का प्रबन्ध-दूषित वायु की हानियों से बचने तथा शुद्ध वायु प्राप्त करने के लिए कमरों में वायु के आवागमन का उचित प्रबन्ध होना अत्यन्त आवश्यक है। कमरों में वायु के आवागमन के लिए यह उचित है कि दरवाज़े और खिड़कियों की संख्या अधिक हो और वे आमने-सामने हों जिससे कमरों में दूषित वायु रुकने न पाये। छत के समीप दीवार में रोशनदान का होना ज़रूरी है।

7. प्रकाश का प्रबन्ध-हवा के साथ घर में प्रकाश का भी उचित प्रबन्ध होना चाहिए। दिन के समय सूर्य के प्रकाश का कमरों में आना अत्यन्त आवश्यक है। सूर्य का प्रकाश अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। धूप हानिकारक कीटाणुओं का नाश करके वायु को शुद्ध करती है। यदि अन्धेरे कमरों में बहुत से लोग इकट्ठे रहते हों तो छूत के रोग, जैसे-खाँसी, जुकाम, निमोनिया, तपेदिक आदि होने की सम्भावना बढ़ जाती है। अतः मकानों में वायु के आवागमन, प्रकाश और धूप का उचित प्रबन्ध होना चाहिए।
सूर्य के प्रकाश के साथ-साथ हमें रात्रि के लिए भी प्रकाश का प्रबन्ध करना चाहिए। इसके लिए उस इलाके में बिजली की उपलब्धि भी होनी चाहिए।

आवश्यकताओं के साधन केन्द्र-मकान ऐसे स्थान पर होना चाहिए कि जीवन की दैनिक आवश्यकताओं के साधन-केन्द्र उस स्थान से अधिक दूरी पर न हों। विद्यालय, भी बैंक, कॉलेज, बाजार, डाकघर, अस्पताल अथवा डॉक्टर आदि अधिक दूर होने से समय तथा धन दोनों को अधिक व्यय होता है। मकान ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहाँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने में सुविधा हो। मलमूत्र तथा गन्दे पानी का निकास-घरों में कमरों के धोने पर पानी के बाहर निकलने का उचित प्रबन्ध होना चाहिए, विशेषकर रसोई, स्नानागार तथा शौचालय में तो नालियों का प्रबन्ध होना अनिवार्य ही है। नालियाँ पक्की हों तथा ढलवी हो जिससे पानी आसानी से बह जाए। ये नालियाँ ढकी हुई होनी चाहिएं तथा उनमें फिनायल आदि डालते रहना चाहिए। नालियों में और दीवार पर कुछ ऊँचाई तक सीमेंट का प्रयोग अति आवश्यक है।

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एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
सरकार अपने कर्मचारियों को उनके वेतन का कितने प्रतिशत किराए के लिए भत्ते के रूप में देती है?
उत्तर-
10-15%

प्रश्न 2.
मित्र ……………. करके नहीं बनाए जा सकते।
उत्तर-
फैसला।

प्रश्न 3.
अच्छा पड़ोस जीवन में ……………….. के लिए आवश्यक है।
उत्तर-
खुशी!

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प्रश्न 4.
…………. के बाद कुछ ज़मींदार परिवारों के पास बहुत पैसा आ गया है।
उत्तर-
हरित क्रान्ति।

प्रश्न 5.
घर का मुख किस तरफ होना चाहिए?
उत्तर-
पूर्व की तरफ।

प्रश्न 6.
………….. भूमि मकान के लिए उत्तम रहती है।
उत्तर-
पथरीली।

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मकान सम्बन्धी सामाजिक और आर्थिक तत्त्व PSEB 7th Class Home Science Notes

  • मकान बनाने के लिए सबसे पहले अपनी आर्थिक स्थिति का जायजा लेना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आमदनी से बचत करना ज़रूरी है।
  • बड़े शहरों में आमदनी का बहुत बड़ा भाग किराये पर खर्च हो जाता है।
  • मकान अपनी सामर्थ्य और सामाजिक स्तर के अनुसार बनाना चाहिए।
  • जिस गली या मुहल्ले में रहना हो, वहाँ के निवासियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति आपकी स्थिति के अनुसार होनी चाहिए।
  • अच्छा पड़ोस न केवल आपके जीवन की खुशी के लिए ज़रूरी है बल्कि आजकल के जीवन में आपकी सुरक्षा के लिए भी ज़रूरी है।
  • अच्छा मकान बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मकान परिवार की जरूरतों के अनुसार ही बने।
  • अधिक भीड़ वाले इलाकों, गन्दी बस्तियों में रह रहे लोगों की न केवल सेहत . ही खराब होगी बल्कि उसके आचरण पर भी खराब असर पड़ेगा।
  • उनमें अपराध की प्रवृत्ति भी बढ़ेगी।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 7 पौष्टिक घरेलू बगीचा

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PSEB Solutions for Class 7 Agriculture Chapter 7 पौष्टिक घरेलू बगीचा

PSEB 7th Class Agriculture Guide पौष्टिक घरेलू बगीचा Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दें :

प्रश्न 1.
भारतीय स्वास्थ्य अनुसंधान के अनुसार सेहतमंद व्यक्ति को प्रतिदिन कितनी सब्जी खानी चाहिए ?
उत्तर-
280-300 ग्राम सब्जी।

प्रश्न 2.
भारतीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन कितने फलों का सेवन करना चाहिए ?
उत्तर-
50 ग्राम फल।

प्रश्न 3.
विटामिन ए की कमी से होने वाले रोग का नाम बताएं।
उत्तर-
अन्धराता।

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प्रश्न 4.
मानव शरीर में लोहे की कमी के कारण होने वाले रोग का नाम बताएं।
उत्तर-
अनीमिया।

प्रश्न 5.
घरेलू बगीचे का मॉडल किस कृषि विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया है ?
उत्तर-
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना।

प्रश्न 6.
कद जाति की कोई दो सब्जियों के नाम लिखो।
उत्तर-
कद्, तोरी, करेला, टिंडा।

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प्रश्न 7.
घरेलू बगीचे में उगाए जा सकने वाले कोई दो फलदार पौधों के नाम लिखो।
उत्तर-
अमरूद, पपीता, नाशपाती, अंगूर।

प्रश्न 8.
घरेलू बगीचे में उगाए जा सकने वाले कोई दो जड़ी-बूटियों वाले पौधों के नाम लिखो।
उत्तर-
पुदीना, तुलसी, सौंफ, अजवायन।

प्रश्न 9.
संतुलित भोजन की पूर्ति के लिए आठ पारिवारिक सदस्यों को कितने क्षेत्र पर घरेलू बगीचा बनाना चाहिए ?
उत्तर-
तीन कनाल।

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प्रश्न 10.
घरेलू बगीचा कहाँ बनाना चाहिए ?
उत्तर-
घर के नज़दीक।

(ख) एक-दो वाक्यों में उत्तर दें :

प्रश्न 1.
संतुलित भोजन में कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्व विद्यमान होते हैं ?
उत्तर-
संतुलित भोजन में सारे आवश्यक तत्त्व उचित मात्रा में होते हैं; जैसेकार्बोहाइड्रेट्स, खनिज, प्रोटीन, वसा, विटामिन, धातुएं आदि।

प्रश्न 2.
भारतीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान की स्वस्थ मनुष्य के लिए भोजन संबंधी सिफ़ारिशें क्या हैं ?
उत्तर-
भारतीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान के द्वारा स्वस्थ मनुष्य के लिए प्रतिदिन के आहार में 280-300 ग्राम सब्जियां, 50 ग्राम फल तथा 80 ग्राम दालों की सिफ़ारिश की गई है।

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प्रश्न 3.
घरेलू बगीचा घर के निकट क्यों बनाना चाहिए ?
उत्तर-
घरेलू बगीचा घर के निकट इसलिए बनाना चाहिए ताकि खाली समय में घर का कोई भी सदस्य बगीचे में काम कर सकता है।

प्रश्न 4.
मानव के भोजन में सब्जियों और फलों की क्या महत्ता है ?
उत्तर-
मानव के भोजन में सब्जियों तथा फलों का बहुत महत्त्व है क्योंकि इनमें कुछ ऐसे पोषक तत्त्व पाए जाते हैं जो अन्य भोजन पदार्थों में नहीं मिलते।

प्रश्न 5.
घरेलू बगीचे में कीड़े-मकौड़ों की रोकथाम के लिए कौन-से तरीके अपनाने चाहिएं ?
उत्तर-
गैर-रासायनिक तरीकों का उपयोग करके कीड़े-मकौड़ों की रोकथाम की जाती है।

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प्रश्न 6.
घरेलू बगीचे में किस प्रकार की खाद का प्रयोग करना चाहिए ?
उत्तर-
घरेलू बगीचे में रूड़ी खाद तथा घर के अपशिष्ट से तैयार कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 7.
घरेलू बगीचे में उगाई जा सकने वाली दालों के नाम लिखो।
उत्तर-
चने, मसूर, मूंगी, उड़द आदि।

प्रश्न 8.
फल-सब्जियों की बहुलता होने पर उनसे कौन-कौन से पदार्थ बनाए जा सकते हैं ?
उत्तर-
फलों, सब्जियों की बहुलता होने पर शर्बत, जैम, आचार, मुरब्बे आदि बनाए जा सकते हैं।

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प्रश्न 9.
घरेलू बगीचे के लिए स्थान के चुनाव के समय कौन-सी बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
स्थान का चुनाव, सब्जियों का चयन तथा योजना, खादों का प्रयोग, खरपतवार, कीटों तथा बीमारियों से रोकथाम, सब्जियों की तुड़ाई, जड़ी-बूटियां उगाना आदि को ध्यान में रखना चाहिए।

प्रश्न 10.
सब्जियों से मिलने वाले रेशे मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार लाभदायक हैं ?
उत्तर-
सब्जियों से मिलने वाले रेशे मनुष्य की पाचन क्रिया को ठीक रखते हैं।

(ग) पाँच-छ: वाक्यों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
संतुलित भोजन से क्या अभिप्रायः है ?
उत्तर-
संतुलित भोजन में भिन्न-भिन्न आहारीय तत्त्व उचित मात्रा में होने चाहिएं, ताकि सभी पोषक तत्त्व; जैसे-कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, चर्बी, विटामिन, खनिज उचित मात्रा में मनुष्य को मिल सकें। इसलिए संतुलित आहार में अनाज, सब्जियां, दालें, दूध, फल, अण्डे, मीट, मछली आदि सारे आहारीय पदार्थ उचित मात्रा में होने चाहिएं। भारतीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान की सिफारिशों के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन अपने भोजन में 280-300 ग्राम सब्जियां, 50 ग्राम फल तथा 80 ग्राम दालें शामिल करना आवश्यक है।

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प्रश्न 2.
घरेलू बगीचे का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
घरेलू बगीचे की महत्ता तथा लाभ इस प्रकार हैं—

  1. संतुलित आहार की पूर्ति-घरेलू बगीचे में से आवश्यकता अनुसार सब्जियां, फल तथा दालों की पूर्ति हो जाती है।
  2. रसायनों से मुक्त आहार की प्राप्ति-घरेलू बगीचे में जो भी फसल उगाई जाती है उसमें रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता। इस तरह रसायनों से मुक्त आहार की प्राप्ति होती है।
  3. समय का उचित प्रयोग-घर के सदस्य जब भी खाली समय मिले, अपने समय का उचित प्रयोग कर सकते हैं।
  4. खर्च में कमी-घरेलू बगीचे में से प्राप्त फल, सब्जियां आदि बाज़ार से सस्ती पड़ती हैं।

प्रश्न 3.
घरेलू बगीचे में कीट और बीमारियों की रोकथाम कैसे की जा सकती है ?
उत्तर-
घरेलू बगीचे में खरपतवारनाशक तथा कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग बहुत ही कम किया जाता है तथा कम ही करना चाहिए। खरपतवारों की रोकथाम गुडाई द्वारा करनी चाहिए। कीड़े-मकौड़ों को पैदा होते ही हाथ से ही पकड़ कर मार देना चाहिए। बीज प्रमाणित किस्म के होने चाहिएं। यदि कीड़ों या बीमारी का हमला हो तो कृषि विशेषज्ञों की सिफ़ारिश के अनुसार उचित मात्रा में रसायनों का प्रयोग करें। सुरक्षित रसायनों का ही प्रयोग करना चाहिए जो कोई अपशिष्ट न छोड़ें। यदि रसायनों का प्रयोग किया हो तो तुड़ाई इसका प्रभाव समाप्त होने पर ही करें।

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प्रश्न 4.
घरेलू बगीचा बनाते समय किस प्रकार की ज़रूरी बातें ध्यान में रखनी चाहिएं ?
उत्तर-
घरेलू बगीचा बनाते समय आवश्यक बातें :
1. स्थान का चयन-घरेलू बगीचा घर के निकट ही होना चाहिए ताकि घर का कोई भी सदस्य जब खाली समय मिले बगीचे में काम कर सके। इस तरह घर के फालतू पानी का निकास भी बगीचे में किया जा सकता है।

2. सब्जियों का चयन तथा योजनाबंदी-घरेलू बगीचे में परिवार द्वारा पसंद की जाने वाली सब्जियों को पहल देनी चाहिए। कद्दू जाति की सब्जियों को बगीचे की बाहरी पंक्तियों में लगाया जाना चाहिए ताकि इनको वृक्षों या झाड़ियों पर चढ़ाया जा सके। ताज़ा प्रयोग होने वाली सब्जियां; जैसे—मूली, शलगम आदि को 15-15 दिनों के अंतर पर बोना चाहिए।

3. खादों का प्रयोग–रूड़ी खाद तथा घर में अपशिष्ट से बनी कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करना चाहिए।

4. खरपतवार, कीट तथा बीमारियों की रोकथाम-घरेलू बगीचे में रसायनों का प्रयोग न के बराबर ही करना चाहिए। शुरू में कीटों को हाथ से पकड़ कर ही मार दें।
खरपतवार समाप्त करने के लिए गुडाई करें तथा प्रमाणित किस्म के बीज ही बोने चाहिएं। आवश्यकतानुसार विशेषज्ञों द्वारा सिफ़ारिश किए रसायन ही उचित मात्रा में प्रयोग करें।

5. सब्जियों की तुड़ाई-सब्जियों की तुड़ाई समय पर करते रहना चाहिए। अधिक मात्रा में होने पर जैम, आचार, मुरब्बे आदि बना लेने चाहिएं।

6. जड़ी-बूटियां लगाना-घरेलू बगीचे में तुलसी, पुदीना, अजवायन, सौंफ, नीम, कड़ी पत्ता आदि भी लगाने चाहिएं।

प्रश्न 5.
संतुलित भोजन की पूर्ति के लिए तीन कनाल पर विकसित किये गये घरेलू बगीचे के मॉडल का रेखाचित्र तैयार करो।
उत्तर-
स्वयं करें।

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Agriculture Guide for Class 7 PSEB पौष्टिक घरेलू बगीचा Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
तीन कनाल में कितने वर्ग मीटर होते हैं ?
उत्तर-
1500 वर्ग मीटर।

प्रश्न 2.
फरवरी माह में बोई जाने वाली कोई सब्जी बताओ।
उत्तर-
करेला, घीया, तोरी।

प्रश्न 3.
अगस्त में बोई जाने वाली कोई सब्जी बताओ।
उत्तर-
धनिया, छोटे बैंगन।

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प्रश्न 4.
तीन कनाल घरेलू बगीचे में एक कनाल किस काम के लिए है ?
उत्तर-
एक कनाल सब्जी बोने के लिए है।

प्रश्न 5.
घरेलू बगीचे में कौन-सी दिशा में फलदार पौधे लगाने चाहिएं।
उत्तर-
उत्तर-दिशा की तरफ।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
घरेलू बगीचे में फलदार पौधे उत्तर दिशा में क्यों लगाए जाने चाहिएं ?
उत्तर-
इस तरह करने से उनकी छाया का बुरा प्रभाव सब्जियों की पैदावार पर नहीं पड़ता।

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प्रश्न 2.
घरेलू बगीचे में कौन-सी सब्जियों को पहल देनी चाहिए ?
उत्तर-
घरेलू बगीचे में परिवार द्वारा पसंद की जाने वाली सब्जियों को पहल देनी चाहिए।

प्रश्न 3.
कम समय लेने वाली सब्जियों को घरेलू बगीचे में कहां बोना चाहिए ?
उत्तर-
कम समय लेने वाली सब्जियों को लम्बा समय लेने वाली सब्जियों के बीच खाली जगह पर बोना चाहिए।

प्रश्न 4.
कम समय लेने वाली सब्ज़ियां तथा लम्बा समय लेने वाली सब्जियां जो घरेलू बगीचे में होती हैं। कौन सी हैं ?
उत्तर-
कम समय वाली सब्जियां हैं-मूली, पालक, शलगम आदि तथा लम्बा समय लेने वाली सब्जियां हैं-टमाटर, बैंगन, भिंडी आदि।

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बड़े उत्तर वाला प्रश्न

प्रश्न-
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा तैयार घरेलू बगीचे के मॉडल की जानकारी दें।
उत्तर-
यह मॉडल पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना द्वारा तीन कनाल स्थान के लिए तैयार किया गया है। इस मॉडल के अनुसार एक परिवार के आठ सदस्यों के लिए आवश्यक दालें, सब्जियां तथा फल पैदा किए जा सकते हैं। इस मॉडल के अनुसार एक कनाल क्षेत्रफल में सब्जियां तथा दो कनाल में दालों की पैदावार की जाती है। घरेलू बगीचे में बिना ज़हर वाली ताज़ी पैदावार मिल जाती है। रबी (आषाढ़ी) में चने, मसूर तथा खरीफ (सावनी) में मूंगी, उड़द आदि की कृषि की जा सकती है। बगीचे में उत्तर दिशा की तरफ दो पंक्तियों में फलदार पौधे लगा कर फलों की आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 7 पौष्टिक घरेलू बगीचा 1
चित्र-घरेलू बगीचा

पौष्टिक घरेलू बगीचा PSEB 7th Class Agriculture Notes

  • अच्छी सेहत के लिए संतुलित आहार बहुत आवश्यक है।
  • फलों तथा सब्जियों में ऐसे पौष्टिक तत्त्व होते हैं जो अन्य भोजन पदार्थों में नहीं होते।
  • स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन 280-300 ग्राम सब्जियां, 50 ग्राम फल तथा 80 ग्राम दालों की आवश्यकता होती है।
  • वर्तमान समय में सब्जियों तथा फलों के ऊपर आवश्यकता से अधिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जा रहा है।
  • घरेलू बगीचा मनोरंजन का साधन भी बन सकता है।
  • घरेलू बगीचे में पैदा सब्जियां तथा फल बाज़ार से सस्ते पड़ते हैं।
  • पी०ए०यू० लुधियाना द्वारा घरेलू बगीचे का मॉडल तैयार किया गया है जिस के अनुसार एक परिवार के आठ सदस्यों के लिए तीन कनाल क्षेत्रफल में से दालें, सब्जियां तथा फल पैदा किए जा सकते हैं।
  • घरेलू बगीचा घर के पास ही होना चाहिए।
  • कदू जाति की सब्जियां हैं-घीया कद्दू, तोरी, करेले, टिंडे, खरबूजे आदि।
  • मूली, पालक, शलगम आदि कम समय में तैयार होने वाली सब्जियां हैं।
  • घरेलू बगीचे में रूड़ी की खाद का प्रयोग किया जाता है।
  • घरेलू बगीचे में खरपतवार की रोकथाम गुडाई करके करनी चाहिए।
  • सब्जियों की तुड़ाई समय पर करते रहना चाहिए।
  • घरेलू बगीचे में जड़ी-बूटी; जैसे-पुदीना, सौंफ, अजवायन, तुलसी, कड़ी-पत्ता – आदि बोई जा सकती हैं।

PSEB 6th Class Home Science Practical अण्डा उबालना

Punjab State Board PSEB 6th Class Home Science Book Solutions Practical अण्डा उबालना Notes.

PSEB 6th Class Home Science Practical अण्डा उबालना

पूरा अण्डा उबालना—

सामग्री—

  1. पानी — 2 कप
  2. अण्डा —एक

विधि—पानी को साफ़ बर्तन में उबाले। जब पानी उबलने लग जाए तो पानी में अण्डा रख दें और तीन से चार मिनट तक उबालें।
उबालने के पश्चात् 15 सेकिण्ड के लिए ठण्डे पानी में रख दें। ठण्डे पानी से अण्डा निकालकर इसे छील लें। लम्बाई की तरफ़ से काटकर नमक तथा काली मिर्च लगाकर परोसें।

PSEB 6th Class Home Science Practical अण्डा उबालना

2. आधा उबला अण्डा—

उपरोक्त विधि में सिर्फ उबालने का समय एक से डेढ मिन्ट तक का रखा जाता है। उबले अण्डे को पूरा न छील कर कम छीला जाता है तथा इसमें नमक, काली मिर्च डाल कर चम्मच से खाया जाता है।
नोट-

  1.  बहुत हल्का उबालने के लिए एक मिनट उबालना ठीक रहता है।
  2. बर्तन में इतना पानी लें कि अण्डा डूब जाए।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 नौकरशाही

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 8 नौकरशाही Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 8 नौकरशाही

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
नौकरशाही की परिभाषा लिखो। इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो।
(Define Bureaucracy.-Write main characteristics of Bureaucracy.)
अथवा
नौकरशाही की विशेषताओं का वर्णन कीजिए। (Explain the characteristics of Bureaucracy.)
उत्तर-
नौकरशाही अथवा ब्यूरोक्रेसी (Bureaucracy) फ्रांसीसी भाषा के शब्द ‘ब्यूरो’ (Bureau) से बना है जिसका अर्थ है डैस्क या लिखने की मेज़। अतः इस शब्द का अर्थ हुआ ‘डैस्क सरकार।’ इस प्रकार नौकरशाही (Bureaucracy) का अर्थ है-डैस्क पर बैठ कर काम करने वाले अधिकारियों के शासन से है। दूसरे शब्दों में, नौकरशाही का अर्थ है प्रशासनिक अधिकारियों का शासन। इस शब्द का अर्थ कालान्तर में बदलता रहता है। यह शब्द काफ़ी बदनाम हो गया है तथा इस शब्द का अर्थ स्वेच्छाचारिता (Arbitrariness), अपव्यय (Wastefulness), कार्यालय की कार्यवाही (Officiousness) तथा तानाशाही (Regimentation) आदि के रूप में किया जाता है।।

नौकरशाही की बदनामी के बावजूद प्रजातन्त्र तथा लोक हितकारी राज्य में इनका महत्त्व बहुत अधिक हो गया है। नौकरशाही शब्द का अधिकाधिक प्रयोग लोक सेवा के प्रभाव को जताने के लिए किया जाता है। प्रायः सभी आधुनिक राज्यों में सरकार का कार्य उन अधिकारियों द्वारा किया जाता है जिन्हें प्रशासनिक समस्याओं की पूरी जानकारी तथा क्षमता रहती है। अधिकारियों के ऐसे निकाय को नौकरशाही के रूप में जाना जाता है। नौकरशाही सरकारी गतिविधियों के समूह द्वारा उत्पन्न गतिविधि है। नौकरशाही की विभिन्न परिभाषाएं इस प्रकार हैं-

1. विलोबी (Willoughby) के अनुसार, “नौकरशाही के दो अर्थ हैं, विस्तृत अर्थों में यह एक सेवी वर्ग प्रणाली है जिसके द्वारा कर्मचारियों को विभिन्न वर्गीय पद सोपानों जैसे सैक्शन, डिवीजन, ब्यूरो तथा डिपार्टमैण्ट में बांटा जाता (“It is to describe any personnel system of administration composed of a hierarchy of sections, divisions, bureaus and departments.”)

संकुचित अर्थ में “यह सरकारी कर्मचारियों के संगठन की पद-सोपान प्रणाली है जिस पर बाहरी प्रभावी लोक नियन्त्रण सम्भव नहीं।”
(“A body of public servants organised in a hierarchical system which stands outside the sphere of effective public control.”)

2. मार्शल ई० डीमॉक (Marshall E. Dimock) के अनुसार, “नौकरशाही का अर्थ है विशेषीकृत पद सोपान एवं संचार की लम्बी रेखाएं।”
(“Bureaucracy means specialised hierarchies and long lines of communication.”)

3. फाइनर (Finer) के अनुसार, “नौकरशाही ऐसा शासन है जिसे मुख्यतः ऐसे कार्यालयों द्वारा चलाया जाता है जिसकी अध्यक्षता अधिकारियों के प्रशिक्षित वर्ग के पास होती है। ये अधिकारीगण स्थायी, वेतन-भोगी एवं कुशल होते हैं।

4. मैक्स वैबर (Max Weber) के अनुसार, “नौकरशाही प्रशासन की ऐसी व्यवस्था है, जिसकी विशेषताविशेषज्ञता, निष्पक्षता तथा मानवता का अभाव होता है।”
(“A System of administration characterized by expertness, impartiality and the absence of humanity.”)

5. ग्लैडन (Gladden) के अनुसार, “नौकरशाही का अर्थ अन्तर्सम्बन्धित कार्यालयों का नियमित प्रशासनिक व्यवस्था में संगठन है।”
(“The term Bureaucracy means of regulated administrative system organised as a series of inter-related offices.”)

6. पाल एप्लबी (Paul Appleby) के अनुसार, “यह तकनीकी दृष्टि से कुशल व्यक्तियों का एक व्यावसायिक वर्ग है जो क्रमबद्ध संगठित होते हैं और निष्पक्ष रूप से राज्य की सेवा करते हैं।”
(“It is a professional class of technically skilled persons who are organised in an hierarchical way and serve the state in and impartial manner.”).

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 नौकरशाही

प्रश्न 2.
आधुनिक लोकतन्त्रीय राज्य में नौकरशाही के महत्त्व का वर्णन करें। (Explain the importance of Bureaucracy in a Modern Democratic State.)
उत्तर-
आधुनिक लोकतन्त्रात्मक राज्य में नौकरशाही का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। आधुनिक राज्य में नौकरशाही का होना अनिवार्य है। प्रशासन की कार्यकुशलता और सफलता योग्य, निष्पक्ष और ईमानदारी नौकरशाही पर निर्भर करती है। किसी भी तरह की शासन प्रणाली क्यों न हो, नौकरशाही एक ऐसी धुरी है जिसके इर्द-गिर्द प्रशासन घूमता रहता है। वास्तव में शासन नौकरशाही द्वारा ही चलाया जाता है और इसीलिए कई बार कहा जाता है कि आजकल नौकरशाही की सरकार स्थापित हो चुकी है। नौकरशाही का महत्त्व अग्रलिखित है-

1. शासन व्यवस्था का आधार (Basis of Government)-आधुनिक युग में शासन के कार्य बहुत विस्तृत हो गए हैं। शासन के कार्य पहले की अपेक्षा अधिक जटिल हैं। शासन के जटिल कार्यों को राजनीतिक कार्यपालिका नहीं कर पाती क्योंकि मन्त्रियों की नियुक्ति राजनीतिक आधार पर होती है। मन्त्री के लिए यह आवश्यक नहीं होता है कि व जिस विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया जाता है, उसके बारे में उसे पूरी जानकारी प्राप्त हो। परन्तु असैनिक अधिकारी योग्यता के आधार पर नियुक्त किए जाते हैं और उन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है। अत: शासन के जटिल कार्यों को योग्य कर्मचारी ही करते हैं। शासन की नीतियों को वास्तव में असैनिक अधिकारियों के द्वारा ही लागू किया जाता है। इसलिए नौकरशाही को शासन का आधार माना जाता है।

2. मन्त्री शासन चलाने के लिए नौकरशाही पर निर्भर करते हैं (Ministers depend upon bureaucracy for administration)—सभी लोकतन्त्रीय देशों में मन्त्री बनने के लिए कोई शैक्षिक योग्यताएं निश्चित नहीं की जातीं। मन्त्रियों की नियुक्ति राजनीतिक आधार पर होती है। किसी भी व्यक्ति को मन्त्री बनाया जा सकता है, चाहे वह अनपढ़ क्यों न हो। अतः मन्त्री प्रशासन चलाने के लिए असैनिक अधिकारियों पर निर्भर करते हैं क्योंकि वे शासन में योग्य होते हैं।
असैनिक कर्मचारी विशेषज्ञ होते हैं जिसके कारण मन्त्री उन पर निर्भर रहते हैं और विभाग का प्रशासन लोक सेवकों द्वारा ही चलाया जाता है।

3. शासन प्रबन्ध में निरन्तरता प्रदान करते हैं (Provide Continuity of Administration)-सरकारों का निर्माण राजनीतिक आधार पर किया जाता है, जिस कारण सरकारों में परिवर्तन होते रहते हैं। सरकारें बनती और टूटती रहती हैं। कभी किसी दल की सरकार होती है, तो कभी किसी दल की। मन्त्री आते और जाते रहते हैं, परन्तु असैनिक अधिकारी अपने पदों पर बने रहते हैं और सरकार में परिवर्तन होने पर प्रशासकीय अधिकारी त्याग-पत्र नहीं देते। प्रशासकीय अधिकारी स्थायी होते हैं। कई बार सरकार बनाने में कुछ समय भी लग जाता है। इन सब परिस्थितियों में असैनिक अधिकारी प्रशासन चलाते रहते हैं और इस तरह वे शासन प्रबन्ध में निरन्तरता प्रदान करते हैं।

4. मन्त्रियों के पास समय का अभाव (Lack of time with Ministers)-मन्त्री केवल अपने विभाग का अध्यक्ष नहीं होता है, बल्कि वह संसद् का सदस्य तथा अपने दल का महत्त्वपूर्ण सदस्य होता है और वह अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है। अतः मन्त्री को अपने विभाग की देखभाल करने के साथ और भी बहुत से काम करने पड़ते हैं जैसे कि संसद् की बैठकों में भाग लेना, बिलों को पास करवाना, विरोधी दल की आलोचना का उत्तर देना तथा जनता के साथ सम्पर्क बनाए रखना। इसलिए किसी भी मन्त्री के पास इतना समय नहीं रहता कि वह अपने विभाग की पूरी जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करे और केवल स्थायी कर्मचारियों की सलाह पर निर्भर न रहकर अपनी इच्छानुसार स्थायी कर्मचारियों से काम ले सके। अतः असैनिक अधिकारियों की सहायता के बिना मन्त्री कार्यों को पूरा नहीं कर सकते।

5. शासन प्रबन्ध को गतिशीलता प्रदान करते हैं (Provide dynamism to administration) राजनीतिक कार्यपालिका जब शासन सम्बन्धी नीतियों का निर्माण करती है तो समस्त शासन की एक ही नीति बनाई जाती है। परन्तु कई बार शासन की नीतियां सभी स्थानों और सभी परिस्थितियों के लिए अनुकूल नहीं होती। असैनिक अधिकारी इन नीतियों को लागू करते समय परिस्थितियों के अनुसार इनमें थोड़ा-बहुत परिवर्तन कर लेते हैं और इस तरह शासन प्रबन्ध को गतिशीलता प्रदान करते हैं।

6. लोगों की शिकायतों को दूर करते हैं (Redress the grievances of the peoples)-लोगों की सरकार से अनेक प्रकार की शिकायतें होती हैं, परन्तु आम जनता के लिए मन्त्रियों से मिल पाना आसान नहीं होता है। अतः जनता अपनी शिकायतें लोक सेवकों तक पहुंचाती है और कई बार लोक सेवकों को जनता के रोष का भी सामना करना पड़ता है। असैनिक अधिकारी जनता की शिकायतों को सुनते हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं। जो शिकायतें उनके स्तर पर दूर नहीं हो सकतीं, उनको मन्त्रियों के पास भेजते हैं।

7. संसदीय शासन में महत्त्व (Importance in Parliamentary Govt.) संसदीय शासन प्रणाली में नौकरशाही का अत्यधिक महत्त्व है। संसदीय शासन प्रणाली में राजनीतिक कार्यपालिका तथा असैनिक अधिकारियों में बहुत समीप का सम्बन्ध पाया जाता है और असैनिक अधिकारी बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं। देश का समस्त शासन मन्त्रिमण्डल के द्वारा चलाया जाता है और प्रत्येक मन्त्री किसी-न-किसी विभाग का अध्यक्ष होता है। मन्त्रियों को अपने विभाग के बारे में बहुत कम ज्ञान होता है। कई बार मन्त्रियों को ऐसे विभाग भी मिल जाते हैं जिनके बारे में उन्हें बिल्कुल ज्ञान नहीं होता। अनुभवहीन होने के कारण मन्त्री नौकरशाही के सदस्यों पर निर्भर करते हैं और उनकी इच्छानुसार कार्य करते हैं।

संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रियों को अपने समस्त कार्यों के लिए संसद् के प्रति उतरदायी रहना पड़ता है। संसद् के सदस्य मन्त्रियों से कोई भी प्रश्न पूछ सकते हैं। मन्त्रियों को इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए स्थायी कर्मचारियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वास्तविकता तो यह है कि मन्त्रियों के प्रश्न के उत्तर स्थायी कर्मचारियों द्वारा तैयार किए जाते हैं जिनको मन्त्री संसद् में पढ़ देते हैं।

संसदीय शासन प्रणाली में जैसे कि भारत में 90 प्रतिशत से अधिक बिल मन्त्रियों द्वारा संसद् में पेश किए जाते हैं परन्तु इन बिलों को स्थायी कर्मचारी ही तैयार करते हैं। वास्तव में मन्त्री नौकरशाही पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं। हरबर्ट मौरिसन (Herbert Morrison) के शब्दों में, “नौकरशाही संसदीय लोकतन्त्र की कीमत है।” (Bureaucracy is the price of parliamentary democracy.”) लॉस्की (Laski) ने तो यहां तक कह दिया है, “संसद्, मन्त्रियों के हाथ में तथा मन्त्री नौकरशाही के हाथ में खिलौना होते हैं।”

8. कल्याणकारी राज्य में महत्त्व (Importance in a Welfare State)-आधुनिक राज्य कल्याणकारी राज्य है, जिस कारण राज्य के कार्यों में बहुत वृद्धि हो गई है। राज्य को लोगों के कल्याण के लिए सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक कार्य करने पड़ते हैं। कल्याणकारी राज्य में ऐसा कोई कार्य नहीं है जो राज्य द्वारा नहीं किया जाता और कल्याणकारी राज्य में सभी कार्यों को कुशलता और ईमानदारी से लागू करना नौकरशाही पर निर्भर करता है। अतः कल्याणकारी राज्य में नौकरशाही का महत्त्व बहुत अधिक हो गया है।

9. निष्पक्षता (Neutrality)-नौकरशाही का महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि यह निष्पक्ष होकर कार्य करती है जबकि मन्त्री अपने दलों के प्रति वफ़दार होते हैं तथा उसी के हितों के लिए अधिकतर कार्य करते हैं। इसके लिए वे प्रशासनिक नियमों-विनियमों की भी परवाह न करते हुए उसमें हस्तक्षेप करते हैं। जबकि असैनिक अधिकारी किसी दल के प्रति वफादार न होकर निष्पक्ष रहते हैं तथा मन्त्रियों को कोई ऐसा कार्य नहीं करने देते जो राजनीति से प्रेरित हो। नौकरशाही में बिना भेदभाव तथा निष्पक्ष व्यवहार के कारण ही प्रशासन को कुशलता से चलाया जा सकता है। इसीलिए प्रशासन के संचालन में नौकरशाही अधिक महत्त्वपूर्ण है।

असैनिक कर्मचारियों के महत्त्व का वर्णन करते हुए जौसेफ चैम्बरलेन (Joseph Chamberlain) ने लिखा है, “मुझे सन्देह है कि आप लोग (Civil Servants) हम लोगों (Ministers) के बिना विभाग का प्रशासन कर सकते हैं। किन्तु मुझे इस बात का पूर्ण विश्वास है कि हम लोग आप लोगों के बिना विभाग का कार्य नहीं कर सकेंगे।” निःसन्देह असैनिक अधिकारियों का महत्त्व बहुत अधिक है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 नौकरशाही

प्रश्न 3.
लोक सेवाओं की भर्ती पर लेख लिखो। (Write an essay on the Recruitment of Civil Services.)
उत्तर-
प्रशासन की सफलता एवं कार्य-कुशलता लोक सेवाओं पर निर्भर करती है। कुशल तथा योग्य कर्मचारी के बिना अच्छे शासन की कल्पना नहीं की जा सकती। परन्तु ईमानदार, योग्य, परिश्रमी और कुशल कर्मचारी प्राप्त करना आसान नहीं है। इसीलिए प्रायः सभी देशों में उचित भर्ती एक समस्या बना चुकी है।

भर्ती का अर्थ- भर्ती का अर्थ केवल रिक्त स्थानों की पूर्ति करना नहीं है बल्कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा योग्य व्यक्तियों को रिक्त स्थानों के लिए आकर्षित करना होता है। डॉ० एम० पी० शर्मा के अनुसार, “भर्ती शब्द का अर्थ किसी पद के लिए योग्य तथा उपयुक्त परिवार के उम्मीदवारों को रिक्त स्थानों के लिए आकर्षित करना है।”

किंग्सले (Kingsley) के अनुसार, “सार्वजनिक भर्ती की व्याख्या यह है कि यह वह परीक्षा है जिसके द्वारा लोक सेवाओं के लिए प्रार्थियों को प्रतियोगितात्मक रूप में आकर्षित किया जा सकता है। यह व्यापक प्रक्रिया का आन्तरिक भाग है। नियुक्ति में प्रक्रिया एवं प्रमाण सम्बन्धी प्रक्रियाएं भी सम्मिलित हैं।”

नकारात्मक तथा सकारात्मक भर्ती (Negative and Positive Recruitment)-लोक सेवाओं की भर्ती को मोटे रूप में दो भागों में बांट सकते हैं-नकारात्मक तथा सकारात्मक।

नकारात्मक भर्ती का उद्देश्य सरकारी पदों से अयोग्य एवं चालाक व्यक्तियों को दूर रखना होता है। इस प्रक्रिया में भर्तीकर्ता कुछ ऐसे नियम बना देता है जिनके आधार पर केवल योग्य व्यक्तियों को ही उम्मीदवार बनने का अवसर प्राप्त हो सके और चालाक तथा बेईमान व्यक्तियों को लोक सेवाओं से बाहर रखा जा सके।

सकारात्मक भर्ती का उद्देश्य विभिन्न सरकारी पदों के लिए उचित और योग्य व्यक्तियों को आकर्षित करना है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 नौकरशाही

प्रश्न 4.
नौकरशाही के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या करते हुए लोकतंत्र में नौकरशाही की भूमिका/कार्यों का चार पक्षों में वर्णन करें।
(Explain the verbal meaning of word ‘Bureaucracy’ ? Explain its role/functions from four aspects in democracy.)
अथवा
नौकरशाही की परिभाषा दें, तथा इसकी भूमिका की चर्चा करें। (Define Bureaucracy and discuss its role.)
उत्तर-
नौकरशाही का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें।
नौकरशाही की भूमिका एवं कार्य-नौकरशाही का शासन पर बहुत प्रभाव बढ़ गया है। बिना नौकरशाही के शासन चलाना और देश का विकास करना अति कठिन कार्य है। नौकरशाही का महत्त्व इसलिए बढ़ गया है कि आधुनिक राज्य एक कल्याणकारी राज्य है। कल्याणकारी राज्य होने के कारण राज्य के कार्य इतने बढ़ गए हैं कि सब कार्य मन्त्री नहीं कर सकते। मन्त्रियों को कार्य चलाने के लिए स्थायी कर्मचारियों अर्थात् नौकरशाही की आवश्यकता पड़ती है। इसके अतिरिक्त मन्त्रियों के पास वैसे भी समय कम होता है, जिसके कारण वे प्रत्येक सूचना स्वयं प्राप्त नहीं कर पाते। आधुनिक राज्य में नौकरशाही की भूमिका का वर्णन हम निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कर सकते हैं-

1. प्रशासकीय कार्य (Administrative Functions or Role)-प्रशासकीय कार्य नौकरशाही का महत्त्वपूर्ण कार्य है। मन्त्री का कार्य नीति बनाना है और नीति को लागू करने की जिम्मेदारी नौकरशाही की है। नौकरशाही के सदस्य चाहे किसी नीति से सहमत हो या न हों, उनका महत्त्वपूर्ण कार्य नीतियों को लागू करना है। पर एक अच्छी नीति भी बेकार साबित हो जाती है, यदि उसे प्रभावशाली ढंग से लागू न किया जाए और यह कार्य नौकरशाही का ही है।

2. नीति को प्रभावित करना (To Influence Policy)-नि:सन्देह नीति-निर्माण राजनीतिक कार्यपालिका का कार्य है। परन्तु प्रशासनिक योग्यता के कारण नीति-निर्माण में नौकरशाही का महत्त्वपूर्ण योगदान है। नीति-निर्माण के लिए मन्त्रियों को आंकड़ों की आवश्यकता होती है और ये आंकड़े स्थायी कर्मचारी मन्त्रियों को देते हैं। इसके अतिरिक्त नौकरशाही नीति को लागू करते समय नीति को एक नया मोड़ दे देती है।

3. सलाहकारी कार्य (Advisory Functions or Role)–नौकरशाही राजनीतिक कार्यपालिका को सलाह देने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मन्त्री नीतियों को निर्धारित करते समय काफ़ी हद तक असैनिक कर्मचारियों के परामर्श पर निर्भर करते हैं क्योंकि जनता के सम्बन्ध में कर्मचारियों को काफ़ी अनुभव होता है। मन्त्री योग्यता के आधार पर नियुक्त न होकर राजनीति के आधार पर नियुक्त किए जाते हैं। मन्त्रियों को प्रायः अपने विभाग की तकनीकी बारीकियों का कोई ज्ञान नहीं होता। अतः मन्त्रियों को विभाग का प्रशासन चलाने के लिए स्थायी कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। सर जोसुआ स्टेम्प ने कहा, “मैं अपने मस्तिष्क में बिल्कुल स्पष्ट हूँ कि पदाधिकारी को नवीन समाज का मूल स्रोत होना चाहिए और उसे सोपान पर सलाह, उन्नति की बात कहनी चाहिए।”

4. वैधानिक कार्य (Legislative Functions or Role)-नौकरशाही कानून निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। संसदीय शासन प्रणाली वाले देशों में जैसे कि भारत और इंग्लैण्ड में संसद् में अधिकांश बिल मन्त्रियों द्वारा ही प्रस्तुत किए जाते हैं। मन्त्रियों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले बिलों की रूप रेखा स्थायी कर्मचारियों द्वारा ही तैयार की जाती है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याओं का हल करने के लिए किस प्रकार के नए कानूनों की आवश्यकता है इसका सुझाव भी स्थायी कर्मचारियों द्वारा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त संसद् कानून का ढांचा तैयार कर देती है और कानून का विस्तार करने के लिए नौकरशाही को नियम उप-नियम बनाने की शक्ति प्रदान कर देती है। नियम व उप-नियम बनाने को प्रदत्त व्यवस्थापन (Delegated Legislation) कहा जाता है।

मन्त्रियों को संसद् के सदस्यों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देना होता है, परन्तु इन प्रश्नों के उत्तर स्थायी कर्मचारियों द्वारा तैयार किए जाते हैं। स्थायी कर्मचारी संसद् में पूछे जा सकने वाले पूरक प्रश्नों (Supplementary Questions) का पूर्वानुमान करके उनके उत्तर भी तैयार करके मन्त्री को देते हैं।

5. नियोजन (Planning)-व्यापक रूप से नियोजन का कार्यक्रम तैयार करना राजनीतिक कार्यपालिका की जिम्मेवारी है, परन्तु नियोजन की सफलता काफ़ी हद तक लोक सेवकों पर निर्भर करती है। राजनीतिक कार्यपालिका को नियोजन बनाने के लिए तथ्यों एवं आंकड़ों की आवश्यकता होती है, जिनकी पूर्ति स्थायी कर्मचारियों द्वारा की जाती है। मन्त्रिमण्डल के विभिन्न लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए योजनाएं देने तथा कार्यक्रम और उचित साधनों की खोज करने की जिम्मेवारी कर्मचारियों की होती है। ए० डी० गोरवाला (A.D. Gorwala) के शब्दों में, “लोकतन्त्र में स्वच्छ, कुशल और निष्पक्ष प्रशासन के बिना कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती।”

6. वित्तीय कार्य (Financial Functions or Role) शासन के वित्तीय क्षेत्र में भी नौकरशाही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। संसद् प्रतिवर्ष बजट पास करती है और संसदीय शासन प्रणाली वाले देशों में बजट वित्तमन्त्री संसद् में पेश करता है। यद्यपि बजट तैयारी के सम्बन्ध में नीति मन्त्रिमण्डल द्वारा बनाई जाती है तथापि बजट की रूप-रेखा तैयार करना और सरकार की आर्थिक स्थिति का विवरण पेश करना नौकरशाही का कार्य है। करों को इकट्ठा करना, बजट के अनुसार खर्च करना, इन सबका लेखा-परीक्षण आदि करना स्थायी कर्मचारियों का कार्य है।

7. समन्वय करना (Co-ordination)-शासन की कुशलता विभिन्न विभागों के समन्वय पर निर्भर करती है। विभिन्न विभागों के बीच तथा सरकारी कर्मचारियों के बीच समन्वय स्थापित करना प्रशासनिक अधिकारियों का कार्य है।

8. न्यायिक कार्य (Judicial Functions or Role)-आधुनिक युग में न्याय सम्बन्धी कार्य न्यायपालिका के द्वारा ही नहीं किए जाते बल्कि कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य प्रशासकीय न्यायाधिकरणों (Administrative Tribunals) के द्वारा भी किए जाते हैं। इसका कारण यह है कि वर्तमान समय में प्रशासकीय कानून तथा प्रशासकीय अधिनिर्णय (Administrative Laws and Administrative Adjudication) की संख्या काफ़ी बढ़ गई है। अतः प्रशासक न केवल शासन करते हैं बल्कि न्याय भी करते हैं।

9. जन-सम्बन्धी कार्य (Public Relation Functions)-नौकरशाही अपनी नीतियों की सफलता के लिए जनता से सहयोग प्राप्त करने हेतु वर्तमान युग में कई तरीकों से लोक सम्बन्ध बनाए रखते हैं।

10. विदेशी सम्बन्धों में स्थायित्व (Stability in Foreign Relations) विदेशी सम्बन्धों में नौकरशाही की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। नौकरशाही के कारण विदेशी सम्बन्धों एवं नीतियों में स्थिरता आती है।

11. लोगों की शिकायतों को दूर करना (To redress the grievances of the people)-लोगों को प्रशासन से कई तरह की शिकायतें होती हैं। लोग अपनी शिकायतें असैनिक अधिकारियों के सामने प्रस्तुत करते हैं। असैनिक अधिकारी इन शिकायतों को दूर करने का प्रयास करते हैं। जनता अपनी शिकायतें मन्त्रियों को भी भेजती है और मन्त्री ऐसी शिकायतों को दूर करने के लिए असैनिक अधिकारियों को आदेश देते हैं।

12. उत्पादन सम्बन्धी कार्य (Productive Functions)-लोक सेवाओं का मुख्य कार्य सेवा करना है और उत्पादन उसी का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। सड़क-निर्माण, भवन-निर्माण तथा अन्य इस प्रकार के कार्य उत्पादन से सम्बन्धित हैं। उत्पादन की मात्रा से स्थायी कर्मचारियों की कार्य-कुशलता का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है। उत्पादन के आधार पर ही उसे राजनीतिक कार्यपालिका तथा जनता दोनों से प्रशंसा या घृणा प्राप्त होती है। प्रत्येक कर्मचारी किसी-न-किसी बात अथवा वस्तु के उत्पादन के लिए उत्तरदायी होता है। यदि यातायात के साधनों से जनता की सुखसुविधाओं में वृद्धि होती है तो जनता स्थायी कर्मचारियों की प्रशंसा करती है। इसी प्रकार यदि शिक्षा का स्तर गिरता है तो उसके लिए भी शिक्षकों को उत्तरदायी ठहराया जाता है। यदि प्रशासन का स्तर गिरता है, तो उसके लिए असैनिक अधिकारियों को जिम्मेवार ठहराया जाता है।

13. नौकरशाही विवेकहीन प्रयोगों को प्रोत्साहित नहीं करती (Bureaucracy does not courage rash experiments)—नौकरशाही सरकारी सेवाओं में विवेकहीन कार्यों को प्रोत्साहित नहीं करती। मन्त्रियों द्वारा कई बार लोगों को प्रसन्न करने के लिए जल्दबाज़ी में विवेकहीन कार्य किये जाते हैं, परन्तु नौकरशाही इस प्रकार के कार्यों को प्रोत्साहित नहीं करती तथा देश हित को ध्यान में रख कर ही निर्णय लेती है। नौकरशाही अधिकांशतः गम्भीर एवं रूढ़िवादी होती है, तथा जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों को काफ़ी सोच-विचार कर ही लागू करती है।

संक्षेप में, आधुनिक कल्याणकारी राज्य में नौकरशाही का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। सभी क्षेत्रों में नौकरशाही का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। राज्य को लोक हित के अनेक कार्य करने पड़ते हैं और इन कार्यों का सफ़ल होना या न होना नौकरशाही की कुशलता पर निर्भर करता है।

नौकरशाही की भूमिका के सम्बन्ध में डॉ० जेनिंग्स (Dr. Jennings) ने ठीक ही लिखा है, “असैनिक कर्मचारियों का कार्य है कि सलाह दें, चेतावनी दें, स्मृति-पत्र लिखें तथा भाषण तैयार करें जिनमें सरकार की नीति निर्देशित हो फिर उस नीति के फलस्वरूप निर्णय करें। साथ ही उन कठिनाइयों की ओर ध्यान आकर्षित करें जो निर्धारित नीति पर चलने में आ सकती है। साधारणतया असैनिक कर्मचारियों का कर्त्तव्य हो जाता है कि वे शासन का कार्य उसी प्रकार चलाएं जिस प्रकार मन्त्री द्वारा नीति निर्धारित की गई है।”.

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 नौकरशाही

प्रश्न 5.
राजनीतिक कार्यपालिका और स्थायी कार्यपालिका का अर्थ स्पष्ट करते हुए विस्तारपूर्वक दोनों में अन्तर बताएं।
(Write down the meaning of Political Executive and Permanent Executive and explain in detail the differences between the two.)
अथवा
राजनीतिक कार्यपालिका और स्थाई कार्यपालिका में मुख्य अन्तर लिखो।
(Describe main differences between Political Executive and Permanent Executive.)
उत्तर-
राजनीतिक कार्यपालिका का अर्थ (Meaning of Political Executive)-कार्यपालिका के अनेक रूपों में से एक को राजनीतिक कार्यपालिका कहा जाता है। कार्यपालिका के साथ राजनीतिक शब्द के प्रयोग से यह स्पष्ट है कि ऐसी कार्यपालिका की नियुक्ति राजनीतिक आधार पर होती है। राजनीतिक कार्यपालिका का गठन करने में राजनीतिक दलों की विशेष भूमिका होती है। राजनीतिक कार्यपालिका की एक अन्य विशेषता यह है कि कुछ वर्षों के लिए निश्चित कार्य काल से पूर्व भी इसको हटाने की व्यवस्था की जाती है। संसदीय प्रणाली में राजनीतिक कार्यपालिका को विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी बनाया जाता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि राजनीतिक कार्यपालिका की नियुक्ति राजनीतिक आधारों पर कुछ वर्षों के निश्चित कार्य-काल के लिए की जाती है तथा ऐसी कार्यपालिका राजनीतिक स्वरूप की होती है तथा इसका गठन करने में राजनीतिक दलों की विशेष भूमिका होती है।

(Meaning of Permanent Executive or Administrator)-अधिकारी वर्ग अथवा नौकरशाही का दूसरा नाम स्थायी कार्यपालिका अथवा प्रशासक है। स्थायी कार्यपालिका में नौकरशाही अथवा असैनिक अधिकारी सम्मिलित हैं। स्थायी कार्यपालिका की नियुक्ति राजनीतिक अधिकारों से मुक्त अर्थात् स्वतन्त्र होती है। स्थायी कार्यपालिका का चुनाव अथवा नियुक्ति सम्बन्धी राजनीतिक दलों की कोई भूमिका नहीं होती। स्थायी कार्यपालिका के सदस्यों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर की जाती है। इस कार्यपालिका को इस कारण स्थायी कहा जाता है, क्योंकि इसके सदस्यों का कार्य काल सेवा निवृत्त होने की निश्चित आयु तक स्थायी होता है। राजनीतिक कार्यपालिका में परिवर्तन आने के बावजूद भी स्थायी कार्यपालिका में कोई परिवर्तन नहीं आता। स्थायी कार्यपालिका का मुख्य कार्य राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा निर्धारित की गई नीतियों के अनुसार निष्पक्ष रूप से प्रशासन का प्रबन्ध करना है।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
नौकरशाही का अर्थ लिखें।
अथवा
नौकरशाही’ शब्द के अर्थ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
नौकरशाही अथवा ब्यूरोक्रेसी फ्रांसीसी भाषा के शब्द ब्यूरो से बना है जिसका अर्थ है-डेस्क या लिखने की मेज़। अब इस शब्द का अर्थ हुआ डेस्क सरकार। इस प्रकार नौकरशाही का अर्थ डेस्क पर बैठकर काम करने वाले अधिकारियों के शासन से है। दूसरे शब्दों में, नौकरशाही का अर्थ है प्रशासनिक अधिकारियों का शासन । नौकरशाही शब्द का अधिकाधिक प्रयोग लोक सेवा के प्रभाव को जताने के लिए किया जाता है। प्रायः सभी आधुनिक राज्यों में सरकार का कार्य उन अधिकारियों द्वारा किया जाता है जिन्हें प्रशासनिक समस्याओं की पूरी जानकारी तथा क्षमता रहती है। अधिकारियों के ऐसे निकाय को नौकरशाही के रूप में जाना जाता है। नौकरशाही सरकारी गतिविधियों के समूह द्वारा सम्पन्न गतिविधि है। नौकरशाही की विभिन्न परिभाषाएं अग्रलिखित हैं

  • मार्शल ई० डीमॉक के अनुसार, “नौकरशाही का अर्थ है विशेषीकृत पद सोपान एवं संचार की लम्बी रेखाएं।”
  • फाइनर के अनुसार, “नौकरशाही ऐसा शासन है जिसे मुख्यतः ऐसे कार्यालयों द्वारा चलाया जाता है जिनकी अध्यक्षता अधिकारियों के प्रशिक्षित वर्ग के पास होती है। ये अधिकारीगण स्थायी, वेतन-भोगी एवं कुशल होते हैं।”
  • मैक्स वेबर के अनुसार, “नौकरशाही प्रशासन की ऐसी व्यवस्था है जिसकी विशेषता-विशेषज्ञ, निष्पक्षता तथा मानवता का अभाव होता है।”

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प्रश्न 2.
नौकरशाही की चार मुख्य विशेषताओं को लिखें।
अथवा
नौकरशाही की मुख्य विशेषताएं कौन-सी हैं ?
उत्तर-
नौकरशाही की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
1. निश्चित अवधि-नौकरशाही का कार्यकाल निश्चित होता है। सरकार के बदलने पर नौकरशाही पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मन्त्री आते हैं और चले जाते हैं परन्तु नौकरशाही के सदस्य अपने पद पर बने रहते हैं। लोक सेवक निश्चित आयु तक पहुंचने पर ही रिटायर होते हैं। रिटायर होने की आयु से पूर्व भी लोक सेवकों को भ्रष्टाचार, अकुशलता आदि आरोपों के आधार पर निश्चित कानूनी विधि के अनुसार हटाया जा सकता है।

2. निर्धारित वेतन तथा भत्ते-नौकरशाही के सदस्यों को निर्धारित वेतन तथा भत्ते दिए जाते हैं। पदोन्नति के साथ उनके वेतन में भी वृद्धि होती रहती है। अवकाश की प्राप्ति के पश्चात् नौकरशाही के सदस्यों को पेंशन मिलती है।

3. राजनीतिक तटस्थता, नौकरशाही में कर्मचारी के व्यक्तिगत या राजनीतिक विचारों का कोई स्थान नहीं है। नौकरशाही को राजनीतिक दृष्टि से तटस्थ रहना पड़ता है। वे न तो किसी राजनीतिक दल के सदस्य होते हैं और न ही इनका राजनीतिक दलों से सम्बन्ध होता है। सरकार किसी भी दल की क्यों न बने, उनका कार्य अपनी योग्यतानुसार प्रशासन की सेवा करना है।

4. तकनीकी विशेषता-तकनीकी विशेषता नौकरशाही की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

प्रश्न 3.
अच्छी नौकरशाही के चार कार्य लिखो।
अथवा
नौकरशाही के किन्हीं चार कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
आधुनिक राज्य में नौकरशाही की भूमिका का वर्णन हम निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत कर सकते हैं-
1. प्रशासकीय कार्य-प्रशासकीय कार्य नौकरशाही का महत्त्वपूर्ण कार्य है। मन्त्री का कार्य नीति बनाना है और नीति को लागू करने की ज़िम्मेदारी नौकरशाही की है। नौकरशाही के सदस्य चाहे किसी नीति से सहमत हों अथवा न हों, उनका महत्त्वपूर्ण कार्य नीतियों को लागू करना है। एक अच्छी नीति भी बेकार साबित हो जाती है यदि उसे प्रभावशाली ढंग से लागू न किया जाए।

2. नीति को प्रभावित करना-नि:सन्देह नीति निर्माण राजनीतिक कार्यपालिका का कार्य है। परन्तु प्रशासनिक योग्यता के कारण नीति निर्माण में नौकरशाही का महत्त्वपूर्ण योगदान है। नीति निर्माण के लिए मन्त्रियों को आंकड़ों की आवश्यकता होती है और ये आंकड़े स्थायी कर्मचारी मन्त्रियों को देते हैं। इसके अतिरिक्त नौकरशाही नीति को लागू करते समय नीति को एक नया मोड़ दे देते हैं।

3. सलाहकारी कार्य-नौकरशाही राजनीतिक कार्यपालिका को सलाह देने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मन्त्री नीतियों को निर्धारित करते समय काफ़ी हद तक असैनिक कर्मचारियों के परामर्श पर निर्भर करते हैं, क्योंकि जनता के सम्बन्ध में कर्मचारियों को काफ़ी अनुभव होता है।

4. वैधानिक कार्य-नौकरशाही कानून निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मंत्रियों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले बिलों की रूप रेखा नौकरशाही द्वारा ही तैयार की जाती है।

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प्रश्न 4.
राजनीतिक कार्यपालिका किसे कहते हैं ?
अथवा
राजनीतिक कार्यपालिका का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
राजनीतिक कार्यपालिका में राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, मन्त्री, उपमन्त्री, संसदीय सचिव आदि सम्मिलित होते हैं और ये एक निश्चित विधि द्वारा निश्चित अवधि के लिए चुने जाते हैं। राजनीतिक कार्यपालिका का चयन राजनीति के आधार पर किया जाता है। राजनीतिक कार्यपालिका असैनिक सेवाओं अथवा नौकरशाही की सहायता से कार्य करती है। इसका प्रमुख कार्य जनता की इच्छाओं के अनुरूप नीति निर्माण करना होता है। राजनीतिक कार्यपालिका अपने समस्त कार्यों के लिए संसद् और जनता के प्रति उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 5.
स्थायी कार्यपालिका से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
असैनिक सेवाओं अथवा नौकरशाही को ही स्थायी कार्यपालिका कहा जाता है। इनकी नियुक्ति राजनीतिक कार्यपालिका की नियुक्ति की अपेक्षा योग्यताओं के आधार पर प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर की जाती है। इनका वेतन, भत्ते तथा कार्यकाल निश्चित होता है। इनका मुख्य कार्य नीति-निर्माण में मदद तथा उसे लागू करना होता है। लोक सेवक राजनीति में भाग नहीं लेते। वे दलगत राजनीति से दूर रहते हैं। राजनीतिक परिवर्तन होने से स्थायी कार्यपालिका में परिवर्तन नहीं होता।

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प्रश्न 6.
राजनीतिक कार्यपालिका और स्थायी कार्यपालिका में चार अन्तर लिखो।
अथवा
राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
राजनीतिक कार्यपालिका तथा स्थायी कार्यपालिका में निम्नलिखित अन्तर पाए जाते हैं
1. दोनों की नियुक्ति में अन्तर-राजनीतिक कार्यपालिका की नियुक्ति का चयन जनता द्वारा होता है। स्थायी कार्यपालिका को प्रशासकीय सेवा या लोक सेवा भी कहा जाता है और इसका चयन योग्यता के आधार पर किया जाता है। योग्यता की जांच करने के लिए प्रतियोगिता परीक्षा ली जाती है।

2. राजनीति के आधार पर अन्तर-राजनीतिक कार्यपालिका का चयन ही राजनीति के आधार पर होता है। संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल बहुमत दल का होता है और मन्त्रिमण्डल में राजनीतिक एकरूपता पाई जाती है। राजनीतिक कार्यपालिका प्रायः सभी समस्याओं को राजनीतिक दृष्टि से देखती है। राजनीतिक कार्यपालिका के विपरीत लोक सेवक राजनीति में भाग नहीं लेते। वे दलगत राजनीति से दूर रहते हैं।

3. अवधि के आधार पर अन्तर-राजनीतिक कार्यपालिका में राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ परिवर्तन होता रहता है। राजनीतिक कार्यपालिका के विपरीत लोक सेवक एक निश्चित आयु तक अपने पद पर बने रहते हैं। राजनीतिक कार्यपालिका में परिवर्तन होने पर प्रशासकीय कर्मचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

4. आकार से सम्बन्धित अन्तर-राजनीतिक कार्यपालिका का आकार छोटा होता है, जबकि स्थायी कार्यपालिका का आकार बड़ा होता है।

प्रश्न 7.
अच्छी नौकरशाही के गुण लिखिए।
अथवा
अच्छी नौकरशाही के कोई चार गुण लिखें।
उत्तर-
अच्छी नौकरशाही के मुख्य गुण निम्नलिखित होते हैं-

  • नौकरशाही की नियुक्ति योग्यता के आधार पर होनी चाहिए। अतः अच्छी नौकरशाही योग्य तथा अनुभवी होनी चाहिए।
  • अच्छी नौकरशाही का एक महत्त्वपूर्ण गुण ईमानदारी है। अत: नौकरशाही ईमानदार होनी चाहिए।
  • नौकरशाही कुशल होनी चाहिए। लोक सेवक अपने कार्यों में कुशल होने चाहिए और उन्हें शासन चलाने की आधुनिक तकनीकों की जानकारी होनी चाहिए।
  • राजनीतिक निष्पक्षता अच्छी नौकरशाही का एक महत्त्वपूर्ण गुण है।

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प्रश्न 8.
राजनीतिक कार्यपालिका से आपका क्या तात्पर्य है ? इसके चार कार्यों का विवरण कीजिए।
उत्तर-
राजनीतिक कार्यपालिका का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 4 देखें।
राजनीतिक कार्यपालिका के कार्य-आधुनिक राज्य, पुलिस राज्य न होकर कल्याणकारी राज्य है। आधुनिक राज्य में राजनीतिक कार्यपालिका के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं-
1. कानून लागू करना और शान्ति व्यवस्था बनाए रखना-राजनीतिक कार्यपालिका का प्रथम कार्य विधानमण्डल के बनाए कानूनों को लागू करना तथा देश में शान्ति व्यवस्था को बनाए रखना होता है। पुलिस उन व्यक्तियों को, जो कानून तोड़ते हैं गिरफ्तार करती है और उन पर मुकद्दमा चलाती है।

2. नीति निर्धारण-राजनीतिक कार्यपालिका का महत्त्वपूर्ण कार्य नीति निर्धारण करना है। राजनीतिक कार्यपालिका ही देश की आन्तरिक तथा विदेश नीति को निर्धारित करती है और उस नीति के आधार पर ही अपना शासन चलाती है। नीतियों को लागू करने के लिए शासन को कई विभागों में बांटा जाता है और प्रत्येक विभाग का एक अध्यक्ष होता है।

3. नियुक्ति करने और हटाने की शक्ति-राजनीतिक कार्यपालिका को देश का शासन चलाने के लिए अनेक कर्मचारियों की नियुक्ति करनी पड़ती है। जो अधिकारी राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, उनको राजनीतिक कार्यपालिका हटा भी सकती है।

4. विदेश सम्बन्धी कार्य-देश की विदेश नीति को कार्यपालिका निश्चित करती है। दूसरे देशों से जैसे सम्बन्ध होंगे, यह राजनीतिक कार्यपालिका ही निश्चित करती है। राजनीतिक कार्यपालिका अपने देश के राजदूतों को दूसरे देश में भेजती है और दूसरे देश के राजदूतों को अपने देश में रहने की अनुमति देती है।

प्रश्न 9.
नौकरशाही के पदों के क्रम के संगठन का क्या अर्थ है ?
अथवा
नौकरशाही के तरतीबवार संगठन से क्या भाव है ?
उत्तर-
सम्पूर्ण नौकरशाही व्यवस्था पदसोपान (Hierarchy) के आधार पर निर्मित होती है। एम०पी० शर्मा के अनुसार, “पदसोपान का अभिप्राय एक ऐसे संगठन से होता है, जो पदों के लिए उत्तरोत्तर क्रम अनुसार अथवा सीढ़ी की भान्ति संगठित किया जाए। इस उत्तरोत्तर क्रम में प्रत्येक निचला पद अथवा स्तर ऊपर के पद के तथा उस पद के माध्यम से उससे ऊपर के तथा इसी प्रकार सबसे ऊपर के पद अथवा पदों के अधीन होता है।” इसमें नौकरशाही का आधार विस्तृत होता है और शीर्ष संकुचित होता है। विभिन्न स्तरों पर सदस्यों के बीच उच्च व अधीनस्थ (Senior and Subordinate) का सम्बन्ध होता है। आदेश के सूत्र ऊपर से नीचे और उत्तरदायित्व नीचे से ऊपर जाता है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक कार्य उचित मार्ग द्वारा (Through Proper Channel) ही होता है। इस व्यवस्था में नौकरशाही के प्रत्येक स्तर पर नियुक्त सदस्य को अपने कार्यों व उत्तरदायित्व का स्पष्ट रूप से पता होता है। इस प्रकार यदि नौकरशाही व्यवस्था में श्रेणीवार या पदसोपान के सिद्धान्त को न अपनाया जाए तो संगठन बिखर जाता है।

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प्रश्न 10.
लोकतन्त्रीय राज्य में नौकरशाही की महत्ता बताइए।
अथवा
नौकरशाही को प्रशासन की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है ? क्यों ?
उत्तर-
प्रजातन्त्रीय राज्य में प्रशासन चलाने में नौकरशाही का विशेष महत्त्व है। इस कथन में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि नौकरशाही के बिना राजनीतिज्ञ शासन का संचालन कर ही नहीं सकते। मन्त्रियों के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता निश्चित नहीं होती। उन्हें अपने विभाग की बारीकियों का कम ही ज्ञान होता है। मन्त्री राजनीतिज्ञ होते हैं और राजनीति का खेल उनका पर्याप्त समय ले लेता है। अतः मन्त्रियों के पास समय का अभाव भी रहता है। असैनिक अधिकारी राजनीतिक रूप में निष्पक्ष होते हैं । राजनीतिक दलों की सरकारें बदलती रहती हैं, परन्तु ये अधिकारी अपने पदों पर स्थिर रहते हैं। इस प्रकार असैनिक अधिकारी जहां प्रशासन को राजनीतिक प्रभावों से मुक्त रखने में सहायक सिद्ध होते हैं, वहां उनका स्थायी कार्यकाल प्रशासन को निरन्तरता प्रदान करने का कार्य भी करता है। प्रदत्त विधि विधान की प्रथा ने नौकरशाही के महत्त्व में और वृद्धि कर दी है, क्योंकि असैनिक अधिकारियों के बिना प्रदत्त विधि विधान का कार्य उचित रूप में पूर्ण नहीं हो सकता।
नौकरशाही के महत्त्व को देखते हुए यह उचित ही कहा गया है कि नौकरशाही प्रशासन की रीढ़ की हड्डी है।

प्रश्न 11.
नौकरशाही की निष्पक्षता से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
लोक सेवक का परम्परागत गुण तटस्थता रहा है। तटस्थता का अर्थ है लोक सेवकों को भी राजनीतिक गतिविधियों से दूर करना चाहिए और उन्हें निष्पक्षता से सरकार की नीतियों को लागू करना चाहिए। लोक सेवकों को सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए। अमेरिका में संघीय कानून के अनुसार संघीय कर्मचारी राजनीतिक अभियानों में सक्रिय भाग नहीं ले सकते हैं। भारत में लोक सेवक के आचरण नियमों के अनुसार किसी भी सरकारी कर्मचारी को किसी भी राजनीतिक संगठन का सदस्य होने अथवा किसी भी राजनीतिक आन्दोलन या कार्य में भाग लेने या उसके लिए चन्दा देने या उसे किसी भी प्रकार की सहायता देने का अधिकार प्राप्त नहीं है। सरकारी कर्मचारी संसद् और विधान मण्डलों के चुनाव नहीं लड़ सकते। उन्हें केवल वोट देने का अधिकार प्राप्त है। इंग्लैण्ड में उच्च अधिकारियों को केवल वोट डालने तथा दल का सदस्य बनने का अधिकार प्राप्त है, परन्तु उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार नहीं।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
‘नौकरशाही, शब्द के अर्थ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
नौकरशाही अथवा ब्यूरोक्रेसी फ्रांसीसी भाषा के शब्द ब्यूरो से बना है जिसका अर्थ है-डेस्क या लिखने की मेज़। अतः इस शब्द का अर्थ हुआ डेस्क सरकार। इस प्रकार नौकरशाही का अर्थ डेस्क पर बैठकर काम करने वाले अधिकारियों के शासन से है। दूसरे शब्दों में, नौकरशाही का अर्थ है प्रशासनिक अधिकारियों का शासन। नौकरशाही शब्द का अधिकाधिक प्रयोग लोक सेवा के प्रभाव को जताने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 2.
नौकरशाही की दो परिभाषाएं दें।
उत्तर-

  1. मार्शल ई० डीमॉक (Marshall E. Dimock) के अनुसार, “नौकरशाही का अर्थ है विशेषीकृत पद सोपान एवं संचार की लम्बी रेखाएं।”
  2. मैक्स वेबर (Max Weber) के अनुसार, “नौकरशाही प्रशासन की ऐसी व्यवस्था है जिसकी विशेषताविशेषज्ञ, निष्पक्षता तथा मानवता का अभाव होता है।”

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प्रश्न 3.
नौकरशाही के कोई दो और नाम बताएं।
उत्तर-

  1. दफ्तरशाही
  2. अफसरशाही।

प्रश्न 4.
नौकरशाही की दो मुख्य विशेषताओं को लिखो।
उत्तर-

  1. निश्चित अवधि-नौकरशाही का कार्यकाल निश्चित होता है। सरकार के बदलने पर नौकरशाही पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मन्त्री आते हैं और चले जाते हैं, परन्तु नौकरशाही के सदस्य अपने पद पर बने रहते हैं। लोक सेवक निश्चित आयु पर पहुंचने पर ही रिटायर होते हैं।
  2. निर्धारित वेतन तथा भत्ते-नौकरशाही के सदस्यों को निर्धारित वेतन तथा भत्ते दिए जाते हैं। पदोन्नति के साथ उनके वेतन में भी वृद्धि होती रहती है। अवकाश की प्राप्ति के पश्चात् नौकरशाही के सदस्यों को पेन्शन मिलती है।

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प्रश्न 5.
नौकरशाही के किन्हीं दो कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  1. प्रशासकीय कार्य (Administrative Functions)—प्रशासकीय कार्य नौकरशाही का महत्त्वपूर्ण कार्य है। मन्त्री का कार्य नीति बनाना है और नीति को लागू करने की ज़िम्मेदारी नौकरशाही की है। .
  2. नीति को प्रभावित करना (To Influence the Policy)—प्रशासनिक योग्यता के कारण नीति निर्माण में नौकरशाही का महत्त्वपूर्ण योगदान है। .

प्रश्न 6.
राजनीतिक कार्यपालिका किसे कहते हैं ?
उत्तर-
राजनीतिक कार्यपालिका में राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, मन्त्री, उपमन्त्री, संसदीय सचिव आदि सम्मिलित होते हैं और ये एक निश्चित विधि द्वारा निश्चित अवधि के लिए चुने जाते हैं। राजनीतिक कार्यपालिका का चयन राजनीति के आधार पर किया जाता है। राजनीतिक कार्यपालिका अपने समस्त कार्यों के लिए संसद् और जनता के प्रति उत्तरदायी होती है।

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प्रश्न 7.
स्थायी कार्यपालिका से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
असैनिक सेवाओं अथवा नौकरशाही को ही स्थायी कार्यपालिका कहा जाता है। इनकी नियुक्ति राजनीतिक कार्यपालिका की नियुक्ति की अपेक्षा योग्यताओं के आधार पर प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर की जाती है। इनका वेतन, भत्ते तथा कार्यकाल निश्चित होता है। इनका मुख्य कार्य नीति-निर्माण में मदद तथा उसे लागू करना होता है।

प्रश्न 8.
राजनीतिक कार्यपालिका और स्थाई कार्यपालिका में दो अन्तर लिखो।
उत्तर-

  1. दोनों की नियुक्ति में अन्तर-राजनीतिक कार्यपालिका की नियुक्ति या चयन जनता द्वारा होता है। स्थायी कार्यपालिका को प्रशासकीय सेवा या लोक सेवा भी कहा जाता है और इसका चयन योग्यता के आधार पर किया जाता है। योग्यता की जांच करने के लिए प्रतियोगिता परीक्षा ली जाती है।
  2. राजनीति के आधार पर अन्तर-राजनीतिक कार्यपालिका का चयन ही राजनीति के आधार पर होता है। राजनीतिक कार्यपालिका के विपरीत लोक सेवक राजनीति में भाग नहीं लेते। वे दलगत राजनीति से दूर रहते हैं।

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प्रश्न 9.
अच्छी व शिक्षित नौकरशाही की कोई दो विशेषताएं अथवा गुण लिखें।
उत्तर-

  1. अच्छी नौकरशाही का एक महत्त्वपूर्ण गुण ईमानदारी है। अत: नौकरशाही ईमानदार होनी चाहिए।
  2. राजनीतिक निष्पक्षता अच्छी नौकरशाही का एक महत्त्वपूर्ण गुण है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
नौकरशाही का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
नौकरशाही शासन के उस रूप को कहा जाता है, जिसमें प्रशासन के कार्य-कुर्सी मेज़ पर कार्य करने वाले असैनिक अथवा प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किए जाते हैं।

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प्रश्न 2.
नौकरशाही की कोई एक परिभाषा लिखें।
उत्तर-
ऐप्लबी के अनुसार, “नौकरशाही तकनीकी पक्ष से शिक्षित उन व्यक्तियों का पेशेवर वर्ग है, जो क्रमानुसार संगठित होते हैं और निष्पक्ष रूप में राज्य की सेवा करते हैं।”

प्रश्न 3.
नौकरशाही की एक विशेषता लिखें।
अथवा
नौकरशाही की कोई दो विशेषताएं लिखिए।
उत्तर-

  1. नौकरशाही पदसोपान के आधार पर संगठित होती है।
  2. नौकरशाही में तकनीकी विशेषता पाई जाती है।

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प्रश्न 4.
नौकरशाही के कोई दो कार्य लिखिए।
अथवा
आदर्श नौकरशाही का एक मुख्य कार्य लिखें।
उत्तर-

  1. मन्त्रियों को सहयोग देना।
  2. नीतियों को लागू करना।

प्रश्न 5.
राजनीतिक कार्यपालिका के अर्थ लिखो।
उत्तर-
राजनीतिक कार्यपालिका का चुनाव प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में लोगों द्वारा होता है।

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प्रश्न 6.
स्थायी कार्यपालिका के अर्थ लिखें।
उत्तर-
स्थायी कार्यपालिका को राजनीतिक आधार पर निर्वाचित नहीं किया जाता, बल्कि योग्यता के आधार पर नियुक्ति की जाती है।

प्रश्न 7.
राजनीतिक कार्यपालिका एवं स्थायी कार्यपालिका में कोई एक अन्तर बताएं।
उत्तर-
राजनीतिक कार्यपालिका का मूल आधार राजनीतिक होता है, जबकि राजनीतिक निरपेक्षता स्थायी कार्यपालिका की मुख्य विशेषता होती है।

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प्रश्न 8.
नौकरशाही के दो गुणों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. अच्छी नौकरशाही का प्रथम गुण यह है, कि उनकी नियुक्ति योग्यता के आधार पर की जाती है।
  2. नौकरशाही प्रशासन में स्थिरता पैदा करती है।

प्रश्न 9.
वास्तविक कार्यपालिका से क्या अभिप्राय है ? ।
उत्तर-
संविधान में दी गई शक्तियों का जो वास्तव में प्रयोग करता है, उसे वास्तविक कार्यपालिका कहते हैं। उदाहरण के लिए भारत में मंत्रिमण्डल (प्रधानमंत्री) एवं अमेरिका में राष्ट्रपति वास्तविक कार्यपालिका हैं।

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प्रश्न 10.
नौकरशाही की किस प्रकार की भर्ती को खराब ढांचा (Spoil System) कहा जाता है ?
उत्तर-
राजनीतिक आधार पर की जाने वाली भर्ती को खराब ढांचा कहा जाता है।

प्रश्न 11.
लोक सेवा का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
लोक सेवा का अर्थ असैनिक सेवा है।

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प्रश्न 12.
प्रत्यक्ष भर्ती का एक गुण लिखो।
अथवा
नौकरशाही की सीधी भर्ती का कोई एक गुण बताएं।
उत्तर-
इस पद्धति से नवयुवकों को लोक सेवाओं में प्रवेश करने का अवसर मिलता है।

प्रश्न 13.
प्रत्यक्ष भर्ती का कोई एक अवगुण लिखें।
उत्तर-
प्रत्यक्ष भर्ती से प्रशासन में अनुभवहीन व्यक्ति आ जाते हैं।

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प्रश्न 14.
प्रत्यक्ष भर्ती से क्या अभिप्राय है ? ।
उत्तर-
प्रत्यक्ष भर्ती के अन्तर्गत उम्मीदवारों का चयन खुले तौर पर किया जाता है।

प्रश्न 15.
राजनीतिक कार्यपालिका की कोई एक विशेषता लिखो।
उत्तर-
राजनीतिक कार्यपालिका की नियुक्ति निर्वाचन द्वारा होती है।

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प्रश्न 16.
भर्ती के अर्थ लिखो।
उत्तर-
भर्ती एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा योग्य व्यक्तियों को रिक्त स्थानों के लिए आकर्षित किया जाता है।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. नौकरशाही शब्द को अंग्रेज़ी में ……….. कहा जाता है।
2. Bureaucracy शब्द फ्रांसीसी भाषा के शब्द ………… से बना है।
3. ब्यूरो का अर्थ है ………. या लिखने की मेज़।
4. मार्शल ई० डीमॉक के अनुसार नौकरशाही का अर्थ है विशेषीकृत ……….. एवं संचार की लम्बी रेखाएं।
5. नौकरशाही की मुख्य विशेषता कार्यों का तर्कपूर्ण . …….. है।
उत्तर-

  1. Bureaucracy
  2. ब्यूरो
  3. डेस्क
  4. पदसोपान
  5. विभाजन।

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. लोक सेवाओं की भर्ती को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जाता है-नकारात्मक एवं सकारात्मक।
2. नकारात्मक भर्ती का उद्देश्य सरकारी पदों से योग्य व्यक्तियों को दूर रखना है।
3. लोक सेवा का परम्परागत गुण तटस्थता है।
4. तटस्थता का अर्थ है, कि लोक सेवाओं को राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना है।
5. नौकरशाही नीति-निर्माण का कार्य करती है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. ग़लत।

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प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
नौकरशाही का दोष है-
(क) कागजों की हेरा-फेरी
(ख) लाल फीताशाही
(ग) जन साधारण की मांगों की उपेक्षा
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
लूट प्रणाली (Spoils System) पाई जाती थी-
(क) भारत में
(ख) इंग्लैण्ड में
(ग) अमेरिका में
(घ) जापान में।
उत्तर-
(ग) अमेरिका में

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प्रश्न 3.
राजनीतिक तथा स्थायी कार्यपालिका में क्या अन्तर पाया जाता है ?
(क) नियुक्ति के आधार पर अन्तर
(ख) योग्यता के आधार पर अन्तर
(ग) कार्यकाल के आधार पर अन्तर
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 4.
“नौकरशाही” शब्द की उत्पत्ति निम्नलिखित में से किस वर्ष हुई ?
(क) 1888
(ख) 1940
(ग) 1745
(घ) 1668.
उत्तर-
(ग) 1745

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प्रश्न 5.
किस भाषा से ‘ब्यूरोक्रेसी’ शब्द लिया गया है ?
(क) ब्यूरो से
(ख) पोलिस से
(ग) स्टेटस से
(घ) सावरेनिटी से।
उत्तर-
(क) ब्यूरो से

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 21 राजनीतिक जागृति तथा अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध राजनीतिक आन्दोलन

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 21 राजनीतिक जागृति तथा अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध राजनीतिक आन्दोलन Textbook Exercise Questions and Answers.

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अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
1885 से 1916 ई० तक स्वतन्त्रता आन्दोलन की मुख्य घटनाओं की चर्चा करें।
उत्तर-
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई० में हुई। इसके संस्थापक एक सेवा-मुक्त अंग्रेज अधिकारी श्री ए० ओ० ह्यूम थे। कांग्रेस का पहला अधिवेशन बम्बई (मुम्बई) में हुआ। जिसका सभापतित्व श्री वोमेश चन्द्र जी ने किया। अगले वर्ष यह सौभाग्य दादा भाई नौरोजी को प्राप्त हुआ। आरम्भ में अंग्रेजों ने इस संस्था का स्वागत किया। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन ने इसके सदस्यों को भोज भी दिया। उन्होंने यह विचार व्यक्त किए कि कांग्रेस की स्थापना से सरकार तथा जनता का आपसी मेल बढ़ेगा और सरकार को अपनी नीति निर्धारित करने में आसानी रहेगी। वास्तव में कांग्रेस का आरम्भिक उद्देश्य भी सरकार तथा जनता को निकट लाना था। अतः शुरू-शुरू में कांग्रेस प्रस्ताव पास करके सरकार के सामने प्रस्तुत करती थी। कांग्रेस हर वर्ष यह मांग करती कि भारत में संवैधानिक सुधार किए जाएं, भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाए, कर कम किए जाएं तथा शिक्षा के लिए उचित पग उठाए जाएं। उसके प्रस्तावों की भाषा में विनम्रता होती थी और ये सदा एक प्रार्थना के रूप में सरकार के सम्मुख रखे जाते थे। अपने अधिवेशनों में भी कांग्रेसी नेता सरकार की निन्दा नहीं करते थे।

सरकार द्वारा कांग्रेस का विरोध-धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस एक-दूसरे से दूर होने लगे। आरम्भ में जिस संस्था को अंग्रेज़ लोग भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए रक्षा नली (Safety Valve) कहा करते थे, अब उसी संस्था को सन्देह की दृष्टि से देखा जाने लगा। अंग्रेजों को यह विश्वास होने लगा कि कांग्रेस के विकास से राष्ट्रीय भावना तेजी से फैल रही है। अत: लॉर्ड डफरिन ने एक भोज के अवसर पर कहा-“अब कांग्रेस राजद्रोह की ओर झुक रही है।” अंग्रेज़ी समाचारपत्रों ने खुलेआम कांग्रेस की निन्दा करनी शुरू कर दी। 1892 ई० में सरकार ने एक अधिनियम पास किया। इस अधिनियम से कांग्रेस सन्तुष्ट नहीं थी। अतः इसके रवैये में परिवर्तन आया और इसके नेताओं ने सरकार की गलत नीतियों की निन्दा करनी शुरू कर दी। परन्तु अभी भी उनके प्रस्तावों की भाषा में नम्रता बनी रही। 1897-98 ई० में भारत अकाल तथा प्लेग की लपेट में आ गया। हजारों लोग मरने लगे, परन्तु सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। सरकार की इस उदासीनता ने जनता के दिल में रोष पैदा कर दिया। जनता को विश्वास हो गया कि उनके कष्टों का अन्त केवल स्वतन्त्रता प्राप्ति में ही है। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय जैसे नेताओं ने कांग्रेस की नर्म नीति की निन्दा की।

बंगाल का विभाजन-1905 ई० में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर दिया। यह कदम हिन्दू तथा मुसलमान जनता में फूट डालने के लिए उठाया गया था। सारे भारत में रोष की लहर दौड़ गई। इससे लोकमान्य तिलक के विचारों को बहुत बल मिला। कांग्रेस में भी दो विचारधाराएं बन गईं। उस समय मुख्य नेता थे-गोपाल कृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी, फिरोज़शाह मेहता, लाला लाजपतराय, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक तथा विपिन चन्द्र पाल। आखिरी तीन नेता लाल, बाल तथा पाल के नाम से प्रसिद्ध थे। ये तीनों नेता सरकार की ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहते थे। उनके विचार थे कि अंग्रेज़ी सरकार प्यार की भाषा नहीं समझती। अतः केवल उग्रवादी कदम ही उसे झुकने के लिए विवश कर सकते हैं। इसके विपरीत गोखले आदि का विचार था कि अंग्रेजों के साथ संवैधानिक साधनों से ही निपटना चाहिए। कांग्रेस में यह आपसी भेद-भाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। ऐसा लगता था कि यह दो दल शीघ्र ही अलग-अलग हो जाएंगे।

सूरत की फूट-कांग्रेस ने अपने 1906 ई० के कलकत्ता (कोलकाता) अधिवेशन में ‘स्वराज्य’ की मांग की। दोनों दलों ने स्वराज्य शब्द की व्याख्या अपने-अपने ढंग से की। तिलक स्वराज्य का अर्थ पूर्ण स्वतन्त्रता से लेते थे। उनके अनुसार आज़ादी को प्राप्त करने के लिए केवल संवैधानिक ढंग काम नहीं दे सकता। तिलक का मूलमन्त्र था-‘Militancy, not Mendicancy’ । इसके विपरीत गोखले के अनुसार स्वराज्य का अभिप्रायः ‘उत्तरदायी सरकार’ से था और वे इसे शान्तिपूर्ण तथा संवैधानिक साधनों से प्राप्त करना चाहते थे। आखिर 1907 में सूरत के कांग्रेस अधिवेशन में दोनों दलों में खूब झगड़ा हुआ। तिलक अपने विचारों पर दृढ़ रहे। इस तरह कांग्रेस में दो दल बन गए। तिलक तथा उनके साथियों को गर्म दल का नाम दिया और गोखले के अनुयायियों को नर्म दल कहा जाने लगा।

क्रान्तिकारी आन्दोलन-गर्म दल के समर्थकों में से ही बाद में कुछ क्रान्तिकारी बन गए। उन्होंने देश में आतंक का वातावरण उत्पन्न कर दिया। पूना के कलैक्टर तथा प्लेग कमिश्नर मि० रैण्ड का चापेकर बन्धुओं ने वध कर दिया। इसके अतिरिक्त बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर मि० कैनेडी पर खुदी राम बोस और उसके एक साथी ने बम फेंका किन्तु उसकी जगह उनकी पत्नी मारी गई। सरकार ने क्रान्तिकारियों को दबाने के लिए सख्ती से काम लिया। कई क्रान्तिकारी फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिए गए। खुदीराम बोस को भी फांसी दी गई। कुछ लोगों को काले पानी का दण्ड मिला। तिलक को 15 मास के लिए जेल में डाल दिया गया। लाला लाजपत राय तथा सरदार अजीत सिंह को देश से निर्वासित कर दिया गया। सरकार ने क्रान्तिकारियों का प्रभुत्व समाप्त करने के लिए नर्म दल वालों का समर्थन भी प्राप्त किया।

मुस्लिम लीग की स्थापना-मुस्लिम लीग की स्थापना ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को तीव्र किया। इस संस्था की स्थापना 1906 में हुई। मुस्लिम नेता कांग्रेस को हिन्दुओं की संस्था समझते थे। उनका विश्वास था कि मुसलमानों के हितों की रक्षा कांग्रेस नहीं बल्कि मुस्लिम लीग ही कर सकती है। अंग्रेज़ी सरकार ने भी मुस्लिम लीग को खूब प्रोत्साहन दिया क्योंकि वे इस संस्था की सहायता करके हिन्दुओं तथा मुसलमानों में फूट डाल सकते थे। मुस्लिम लीग के नेता कई बार वायसराय से मिले और उन्होंने मुसलमानों के हितों की रक्षा की मांग की। अंग्रेज़ी सरकार तो पहले ही उन्हें खुश करना चाहती थी। अतः 1909 ई० के सुधार कानून में उन्होंने मुसलमानों के लिए ‘पृथक् प्रतिनिधित्व’ की मांग को स्वीकार कर लिया।

मिण्टो-मार्ले सुधार-मिण्टो-मार्ले सुधार अथवा 1909 ई० के अधिनियम के अनुसार कार्यकारिणी तथा विधानमण्डलों के सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई। इसके अतिरिक्त मुसलमानों को पृथक् प्रतिनिधित्व दिया गया। पृथक् प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त ने दो राष्ट्रों के सिद्धान्त को जन्म दिया जिसके कारण आगे चलकर पाकिस्तान का निर्माण हुआ। 1909 के एक्ट के अनुसार अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव होने लगे। परन्तु इन सब सुधारों से भारतीय सन्तुष्ट न हुए। वे समझ गए कि अंग्रेज़ लोग हिन्दुओं तथा मुसलमानों में फूट डालना चाहते हैं। कांग्रेस के गर्म दल तथा नर्म दल दोनों ने सरकार का विरोध किया। सरकार ने नर्म दल वालों को प्रसन्न करने के लिए 1911 ई० में बंगाल विभाजन रद्द कर दिया।

लखनऊ पैक्ट-लोकमान्य तिलक माण्डले जेल से छूट कर आ चुके थे। 1915 ई० में उन्होंने स्वराज्य की मांग को पुनः सरकार के सामने रखा। उन्होंने कहा, “स्वराज्य हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर ही रहेंगे।” इधर नर्म दल के प्रमुख नेता मर चुके थे। अतः दोनों दलों के पुनः एक हो जाने की सम्भावनाएं बढ़ गईं। आखिर 1915 ई० में दोनों दल मिल गए। उसी समय यूरोप में युद्ध चल रहा था। टर्की पर आक्रमण करने के कारण मुसलमान भी अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए थे। अतः 1916 ई० के लखनऊ पैक्ट के अनुसार कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने मिलकर सरकार का विरोध करने का निर्णय किया।

होमरूल आन्दोलन-लखनऊ पैक्ट के बाद कांग्रेस के दोनों दलों तथा मुस्लिम लीग ने मिलकर भारत के लिए ‘होमरूल’ की मांग की। लोकमान्य तिलक तथा श्रीमती ऐनी बेसेन्ट ने ‘होमरूल लीग’ की स्थापना की। सारे देश में लोगों ने सरकार के विरुद्ध सभाएं कीं और होमरूल को प्राप्त करने के लिए प्रतिज्ञा की। श्रीमती ऐनी बेसेन्ट को मद्रास सरकार ने बन्दी बना लिया जिससे सारे देश में हाहाकार मच गया। सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा। इसी बीच प्रथम महायुद्ध में सरकार को भारतीयों के सहयोग की आवश्यकता पड़ी। अतः भारत सचिव माण्टेग्यू ने घोषणा की कि सरकार भारत में उत्तरदायी शासन स्थापित करने के लिए उचित पग उठाएगी। फलस्वरूप होमरूल आन्दोलन समाप्त हो गया। इस प्रकार 1885 में डाले गए बीज (कांग्रेस) ने 1919 तक एक महान् वृक्ष का रूप धारण कर लिया। कांग्रेस को शक्तिशाली रूप देने का श्रेय श्री गोपालकृष्ण गोखले, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय आदि अनेक नेताओं को प्राप्त है।

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प्रश्न 2.
महात्मा गांधी के योगदान के संदर्भ में 1919 से 1922 तक के स्वतन्त्रता आन्दोलन की मुख्य घटनाओं की चर्चा करें।
उत्तर-
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की वास्तविक कहानी 1919 ई० से आरम्भ होती है। यही वह वर्ष था जब भारत की राजनीति में महात्मा गांधी ने प्रवेश किया। वे 1915 में दक्षिणी अफ्रीका से भारत वापस आए। तीन वर्ष तक उन्होंने इस देश के राजनीतिक वातावरण का अध्ययन किया। उन्होंने प्रथम महायुद्ध में अंग्रेज़ी सरकार को नैतिक समर्थन भी प्रदान किया। परन्तु 1919 में सारी स्थिति बदल गई। इस संकट के समय में महात्मा गांधी स्वतन्त्रता सेनानी बनकर हमारे सामने आए और उन्होंने सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेज़ी साम्राज्य की जड़ें खोखली कर दीं। 1919 से 1922 तक महात्मा गांधी जी खूब सक्रिय रहे। इस समय की प्रमुख घटनाएं इस प्रकार हैं :-

रौलेट एक्ट तथा जलियांवाला बाग की दुर्घटना-प्रथम महायुद्ध के समाप्त होने पर भारतीयों को प्रसन्न करने के लिए माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित की गई। भारतीयों ने युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की थी। उन्हें विश्वास था कि युद्ध में विजयी होने के पश्चात् सरकार उन्हें पर्याप्त अधिकार देगी। परन्तु इस रिपोर्ट से भारतीय निराश हो गए। सरकार भी भयभीत हो गई कि अवश्य कोई नया आन्दोलन आरम्भ होने वाला है। अतः स्थिति पर नियन्त्रण पाने के लिए सरकार ने रौलेट एक्ट पास कर दिया। इस एक्ट के अनुसार वह किसी भी व्यक्ति को बिना वकील, बिना दलील, बिना अपील बन्दी बना सकती थी। इस काले कानून का विरोध करने के लिए महात्मा गांधी आगे बढ़े। उन्होंने जनता को शान्तिमय ढंग से इसका विरोध करने के लिए कहा। इस शान्तिमय विरोध को उन्होंने सत्याग्रह का नाम दिया। स्थान-स्थान पर सभाएं बुलाई गईं और जलूस निकाले गए। कांग्रेस का आन्दोलन जनता. का आन्दोलन बन गया। पहली बार भारत की जनता ने संगठित होकर अंग्रेज़ों का विरोध किया। 6 अगस्त, 1919 ई० को सारे भारत में हड़ताल की गई। महात्मा गांधी ने लोगों को शान्तिमय विरोध करने के लिए कहा था। फिर भी कहीं-कहीं अप्रिय घटनाएं हुईं।

13 अप्रैल, 1919 ई० को जलियांवाला बाग की दुःखद घटना से भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ आया। पंजाब के लोकप्रिय नेता डॉ० सत्यपाल तथा डॉ० किचलू को सरकार ने बन्दी बना लिया था। अमृतसर की जनता विरोध प्रकट करने के लिए बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में एकत्रित हुई। नगर में मार्शल-ला लगा हुआ था। जनरल डायर ने लोगों को चेतावनी दिए बिना ही एकत्रित लोगों पर गोली चलाने का आदेश दिया। हज़ारों निर्दोष स्त्री-पुरुष मारे गए। इससे सारे भारत में रोष की लहर दौड़ गई।

असहयोग आन्दोलन-इन्हीं दिनों मुसलमानों ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध खिलाफ़त आन्दोलन छेड़ा हुआ था। जनता पहले से ही भड़की हुई थी। गांधी जी ने इस अवसर का लाभ उठाया और असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया। इस प्रकार हिन्दुओं तथा मुसलमानों ने मिल कर अंग्रेजी सरकार का विरोध किया। छात्रों ने सरकारी स्कूलों तथा कॉलेजों का बहिष्कार कर दिया। वकीलों ने अदालतों में जाना बन्द कर दिया। कई लोगों ने अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रदान की गई उपाधियों को त्याग दिया। लोगों ने अंग्रेज़ी कपड़े का बहिष्कार किया तथा हाथ का बुना कपड़ा पहनना आरम्भ कर दिया। गांधी जी इस आन्दोलन को शान्तिमय ढंग से चलाना चाहते थे, परन्तु 1922 में उत्तर प्रदेश के एक गांव चौरी-चौरा में एक पुलिस चौकी को सिपाहियों सहित जला दिया गया। गांधी जी को इस घटना से बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने असहयोग आन्दोलन की समाप्ति की घोषणा कर दी। उनके इस कार्य से अनेक नेता गांधी जी से रुष्ट हो गए तथा उन्होंने ‘स्वराज्य पार्टी’ नामक एक नये दल की स्थापना की। अंग्रेज़ सरकार ने गांधी जी को बन्दी बना लिया और छः वर्ष के कारावास का दण्ड दिया।
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महात्मा गांधी महात्मा गांधी जी ने कुछ देर शांत रहने के बाद 1927 में एक बार फिर भारतीय राजनीति को गरिमा प्रदान की।

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

1. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
1857 की क्रांति में किस महिला शासक ने महत्त्वपूर्ण भाग लिया?
उत्तर-
रानी लक्ष्मी बाई ने।

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प्रश्न 2.
कांग्रेस की स्थापना किसने की?
उत्तर-
कांग्रेस की स्थापना मिस्टर ए० ओ० ह्यूम ने की।

प्रश्न 3.
गरम दल के प्रतिष्ठाता कौन थे?
उत्तर-
बाल गंगाधर तिलक।

प्रश्न 4.
गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित करने का निश्चय क्यों किया?
उत्तर-
चौरी-चौरा की हिंसात्मक घटना के कारण।

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प्रश्न 5.
आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना किसने की ?
उत्तर-
आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना सुभाषचन्द्र बोस ने की।

प्रश्न 6.
1947 ई० क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर-
इस वर्ष (15 अगस्त, 1947 को) भारत को स्वतन्त्रता मिली थी।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति

(i) जलियांवाला बाग में अंग्रेज़ कमाण्डर ……………. ने गोली चलाई थी।
(ii) साईमन कमीशन …………………. में भारत आया।
(iii) सिविल अवज्ञा आन्दोलन …………… ई० में चला।
(iv) पूर्ण स्वराज्य की घोषणा 1929 ई० में कांग्रेस के ………. अधिवेशन में हुई।
(v) गांधी-इर्विन समझौता ………………. ई० में हुआ।
उत्तर-
(i) जनरल डायर
(ii) 1928
(iii) 1929
(iv) लाहौर
(v) 1931.

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3. सही/ग़लत कथन

(i) सन् 1905 ई० में बंगाल का विभाजन हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच फूट डालने के लिए किया गया। — (√)
(ii) स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत गांधी जी ने सन् 1905 ई० में की। — (×)
(iii) सन् 1909 ई० के एक्ट से भारतीयों की आशाएं पूरी नहीं हुई। — (√)
(iv) मुस्लिम लीग की स्थापना सन् 1906 ई० में हुई। — (√)
(v) होम रूल लीगों की स्थापना प्रथम महायुद्ध के दौरान हुई। — (√)
(vi) पहली बार सन् 1910 ई० में कांग्रेस ने स्वराज्य को अपना लक्ष्य बनाया। — (×)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य लखनऊ समझौता कब हुआ?
(A) 1916 ई० में
(B) 1906 ई० में
(C) 1917 ई० में
(D) 1915 ई० में।
उत्तर-
(A) 1916 ई० में

प्रश्न (ii)
गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन कब चलाया ?
(A) 1921 ई० में
(B) 1927 ई० में
(C) 1920 ई० में
(D) 1922 ई० में।
उत्तर-
(C) 1920 ई० में

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प्रश्न (iii)
अंग्रेजों ने दिल्ली को भारत की राजधानी कब बनाया?
(A) 1911 ई० में
(B) 1907 ई० में
(C) 1890 ई० में
(D) 1892 ई० में।
उत्तर-
(A) 1911 ई० में

प्रश्न (iv)
कानपुर में 1857 ई० के विद्रोह का नेतृत्व किया-
(A) कुंवर सिंह
(B) नाना साहिब
(C) बेग़म हज़रत महल
(D) बहादुर शाह।
उत्तर-
(B) नाना साहिब

प्रश्न (v)
बाल गंगाधर तिलक ने कौन-सा पत्र निकाला?
(A) पंजाब केसरी
(B) केसरी
(C) हिन्दू
(D) नवभारत।
उत्तर-
(B) केसरी

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II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष के इतिहास के स्रोतों के चार प्रकारों के नाम बताएं।
उत्तर-
भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष के इतिहास की जानकारी के चार प्रकार के स्रोत हैं : अंग्रेज़ अधिकारियों की रिपोर्ट, लैजिस्लेटिव असैम्बली बहस के रिकार्ड, ब्रिटिश संसद् के रिकार्ड तथा भारतीय समाचार-पत्र।

प्रश्न 2.
बाल गंगाधर तिलक तथा महात्मा गांधी ने कौन-से अखबार निकाले ?
उत्तर-
बाल गंगाधर तिलक ने केसरी तथा मराठा अखबार निकाले। महात्मा गांधी ने ‘हरिजन’ नामक अखबार निकाली।

प्रश्न 3.
सरदार दयाल सिंह मजीठिया तथा लाला लाजपत राय ने कौन-से अखबार निकाले ?
उत्तर-
सरदार दयाल सिंह मजीठिया ने ‘ट्रिब्यून’ तथा लाला लाजपत राय ने ‘पंजाबी’ नामक अखबार निकाले।

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प्रश्न 4.
भारतीयों के आरम्भिक राजनीतिक संगठनों में सबसे महत्त्वपूर्ण कौन-सा संगठन था तथा इसको किसने, कब और कहां स्थापित किया ?
उत्तर-
भारतीयों के आरम्भिक राजनीतिक संगठनों में सबसे महत्त्वपूर्ण संगठन ‘इण्डियन एसोसिएशन’ था। इसे 1876 में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने कलकत्ता (कोलकाता) में स्थापित किया।

प्रश्न 5.
इण्डियन एसोसिएशन की दो मांगें कौन-सी थीं ?
उत्तर-
इण्डियन एसोसिएशन की दो मांगें थीं : इण्डियन सिविल सर्विस के नियमों को बदलना और प्रेस को स्वतन्त्रता देना।

प्रश्न 6.
इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कब हुई तथा इसमें किस अंग्रेज अफसर का काफी हाथ था ?
उत्तर-
इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई। कांग्रेस की स्थापना में अंग्रेज़ अफसर ह्यूम का काफी हाथ था।

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प्रश्न 7.
कांग्रेस का पहला अधिवेशन कहां और किसके सभापतित्व में हुआ तथा इसमें कितने प्रतिनिधियों ने भाग लिया ?
उत्तर-
कांग्रेस का पहला अधिवेशन बम्बई (मुम्बई) में वोमेशचन्द्र बैनर्जी के सभापतित्व में हुआ। इसमें 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

प्रश्न 8.
कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन किसके सभापतित्व में तथा कहां हुआ तथा इसमें कितने प्रतिनिधियों ने भाग लिया?
उत्तर-
कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन दादा भाई नौरोजी के सभापतित्व में कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ। इसमें 400 से भी अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

प्रश्न 9.
आरम्भ में कांग्रेस के सदस्य अधिकतर कौन-से चार व्यवसायों से सम्बन्धित थे ?
उत्तर-
आरम्भ में कांग्रेसी सदस्य मुख्यतया कारखानेदार, व्यापारी, मध्यवर्गीय शिक्षित, डॉक्टर और वकील थे।

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प्रश्न 10.
1905 तक कांग्रेस के तीन पुराने नेताओं के नाम बताएं।
उत्तर-
1905 तक कांग्रेस के तीन पुराने नेता सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोज़शाह मेहता थे।

प्रश्न 11.
1905 तक कांग्रेस के तीन नये नेताओं के नाम बताएं।
उत्तर-
1905 तक कांग्रेस के तीन नये नेता बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपत राय थे।

प्रश्न 12.
रूस को किस एशियाई देश ने तथा कब हराया था ?
उत्तर-
रूस को एशिया के देश जापान ने 1905 ई० में हराया था।

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प्रश्न 13.
बंगाल का विभाजन कब तथा किस वायसराय के समय हुआ तथा इस समय बंगाल प्रान्त में कौन-से तीन प्रदेश शामिल थे ?
उत्तर-
बंगाल का विभाजन 1905 में वायसराय लॉर्ड कर्जन के समय हुआ। इस समय बंगाल प्रान्त में बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा के प्रदेश शामिल थे।

प्रश्न 14.
बंगाल के विभाजन के सिलसिले में कौन-सा आन्दोलन चलाया गया तथा इसमें किन वस्तुओं के बहिष्कार पर बल दिया गया ?
उत्तर-
बंगाल के विभाजन के सिलसिले में स्वदेशी आन्दोलन चलाया गया। इसमें इंग्लैण्ड में निर्मित कपड़े और चीनी के बहिष्कार पर बल दिया गया।

प्रश्न 15.
1906 में कांग्रेस अधिवेशन कहां हुआ तथा इसमें पास होने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव कौन-सा था ?
उत्तर-
1906 में कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ। इसमें ‘स्वदेशी और बायकॉट’ का अति महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पास हुआ।

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प्रश्न 16.
1907 में कांग्रेस का अधिवेशन कहां हुआ तथा इसमें कांग्रेस किन दो दलों में बंट गई ?
उत्तर-
1907 में कांग्रेस का अधिवेशन सूरत में हुआ। इसमें कांग्रेस नर्म दल और गर्म दल नामक दो दलों में बंट गई।

प्रश्न 17.
बंगाल तथा महाराष्ट्र में कौन-कौन-से तीन आतंकवादी संगठन स्थापित किए गए ?
उत्तर-
बंगाल में अनुशीलन समितियां तथा युगान्तर ग्रुप और महाराष्ट्र में अभिनव भारत नामक आतंकवादी संगठन स्थापित किए गए।

प्रश्न 18.
आतंकवादी संगठनों पर किन तीन व्यक्तियों की विचारधारा का प्रभाव था ?
उत्तर-
आतंकवादी संगठनों पर बंकिम चन्द्र चैटर्जी, अरविंद घोष और वी० डी० सावरकर की विचारधारा का प्रभाव था।

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प्रश्न 19.
बीसवीं सदी के पहले दशक के तीन क्रान्तिकारी आतंकवादियों के नाम बताएं।
उत्तर-
बीसवीं सदी के पहले दशक के तीन क्रान्तिकारी आतंकवादी थे : खुदी राम बोस, प्रफुल्ल चाकी और मदन लाल ढींगरा।

प्रश्न 20.
मदन लाल ढींगरा कहां का रहने वाला था तथा इसने कब और कहां किस अंग्रेज़ अफसर को गोली मारी थी ?
उत्तर-
मदन लाल ढींगरा अमृतसर जिले का रहने वाला था। उसने 1909 में लंदन में कर्जन वायली नामक अंग्रेज़ अफसर को गोली मारी थी।

प्रश्न 21.
1907 में पंजाब में 1857 की पचासवीं वर्षगांठ पर विद्रोह करने का प्रचार किसने किया तथा इनको क्या सज़ा मिली थी ?
उत्तर-
1907 में पंजाब में 1857 की पचासवीं वर्षगांठ पर अजीत सिंह ने सरकार के खिलाफ विद्रोह का प्रचार किया। इन्हें देश निकाला की सज़ा मिली थी।

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प्रश्न 22.
मुस्लिम लीग की स्थापना कब हुई तथा उसका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर-
मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 में हुई। इसका उद्देश्य सरकार के साथ सहयोग करके मुसलमानों के लाभ के लिए काम करना था।

प्रश्न 23.
पृथक् प्रतिनिधित्व की मांग किस राजनीतिक दल ने किस गवर्नर-जनरल के समय में की तथा 1947 तक इसका सबसे महत्त्वपूर्ण नेता कौन था ?
उत्तर-
पृथक् प्रतिनिधित्व की मांग मुस्लिम लीग ने गवर्नर-जनरल मिण्टो के समय में की। 1947 तक इस दल का सबसे महत्त्वपूर्ण नेता मुहम्मद अली जिन्नाह था।

प्रश्न 24.
कौन-से दो मुस्लिम संगठन अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध रहे ?
उत्तर-
अहरार तथा देवबंदी उलेमा के संगठन सरकार के विरुद्ध रहे।

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प्रश्न 25.
चार मुस्लिम नेताओं के नाम बताएं।
उत्तर-
चार मुस्लिम नेताओं के नाम हैं-मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल खां, डॉ० अंसारी और शौकत अली।

प्रश्न 26.
पंजाब के दो राष्ट्रवादी मुस्लिम कांग्रेसी नेताओं के नाम बताएं।
उत्तर-
पंजाब के दो राष्ट्रवादी मुस्लिम कांग्रेसी नेता डॉ० सैफुद्दीन किचलू तथा डॉ० मुहम्मद आलम थे।

प्रश्न 27.
1909 के एक्ट को किस नाम से जाना जाता है तथा इसमें मुसलमानों की कौन-सी मांग शामिल कर ली गई थी ?
उत्तर-
1909 के एक्ट को मिन्टो मार्ले सुधार के नाम से जाना जाता है। इसमें मुसलमानों की पृथक् प्रतिनिधित्व की मांग शामिल कर ली गई थी।

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प्रश्न 28.
1909 के एक्ट में लैजिस्लेटिव कौंसिल में कितने सदस्य बना दिए गए तथा इसमें कितने निर्वाचित सदस्य थे ?
उत्तर-
1909 के एक्ट में लैजिस्लेटिव कौंसिल में 60 सदस्य बना दिए गए। इनमें से 27 निर्वाचित सदस्य थे।

प्रश्न 29.
हिन्दुस्तान गदर पार्टी की स्थापना कब हुई तथा इसके अखबार और संस्थापक का नाम क्या था ?
उत्तर-
‘हिन्दुस्तान गदर पार्टी’ की स्थापना 1913 में हुई। इसके अखबार का नाम ‘गदर’ और संस्थापक का नाम लाला हरदयाल था।

प्रश्न 30.
गदर पार्टी की शाखाएं भारत से बाहर कौन-से चार देशों अथवा क्षेत्रों में थीं ?
उत्तर-
गदर पार्टी की शाखाएं भारत से बाहर कनाडा, अमेरिका, यूरोप तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया के देशों में थीं।

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प्रश्न 31.
गदर पार्टी के चार कार्यकर्ताओं तथा नेताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
गदर पार्टी के चार कार्यकर्ता तथा नेता सोहन सिंह भकना, मुहम्मद बरकत उल्ला, करतार सिंह सराभा तथा भाई परमानन्द थे।

प्रश्न 32.
होमरूल आन्दोलन किस लिए चलाया गया तथा इसके दो नेताओं के नाम बताएं।
उत्तर-
होमरूल आन्दोलन स्वराज्य की मांग के लिए चलाया गया। इसके दो मुख्य नेता श्रीमती एनी बेसेन्ट तथा बाल गंगाधर तिलक थे।

प्रश्न 33.
कांग्रेस में नर्म दल तथा गर्म दल किसके यत्नों से तथा कब फिर से इकट्ठे हो गए ?
उत्तर-
नर्म दल तथा गर्म दल श्रीमती एनी बेसेन्ट के यत्नों से 1915 में फिर से इकट्ठे हो गए।

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प्रश्न 34.
‘लखनऊ पैक्ट’ कब और किन दो राजनीतिक दलों के बीच में हुआ ?
उत्तर-
लखनऊ पैक्ट’ 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच में हुआ।

प्रश्न 35.
कांग्रेस ने धर्म के आधार पर पृथक् प्रतिनिधित्व का सिद्धान्त कब और किस समझौते के द्वारा स्वीकार कर लिया ?
उत्तर-
कांग्रेस ने धर्म के आधार पर पृथक् प्रतिनिधित्व का सिद्धान्त 1916 में लखनऊ समझौते के अनुसार स्वीकार किया।

प्रश्न 36.
रौलेट एक्ट कब कानून बना तथा इसको इस नाम से क्यों जाना जाता है ?
उत्तर-
रौलेट एक्ट 1919 में कानून बना। यह एक्ट जस्टिस रौलेट के सुझाव पर बना होने के कारण रौलेट एक्ट के नाम से जाना जाता है।

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प्रश्न 37.
मोती लाल नेहरू ने रौलेट एक्ट की व्याख्या किन शब्दों में की ?
उत्तर-
मोती लाल नेहरू ने रौलेट एक्ट की व्याख्या इन शब्दों में की-‘न वकीर दलील, न अपील’।

प्रश्न 38.
महात्मा गांधी किस देश से तथा कब भारत लौटे तथा विदेश में उन्होंने किस नीति के विरुद्ध सत्याग्रह किया था ?
उत्तर-
महात्मा गांधी 1915 में अफ्रीका से लौटे। विदेश (अफ्रीका) में उन्होंने रंगभेद की नीति के विरुद्ध सत्याग्रह किया था।

प्रश्न 39.
महात्मा गांधी ने भारत वापस आ कर किस इलाके के कौन-से किसानों की सहायता की ?
उत्तर-
महात्मा गांधी ने भारत वापस आ कर, बिहार में चम्पारन के इलाके में नील की खेती करने वाले किसानों की सहायता की।

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प्रश्न 40.
जलियांवाला बाग कांड कब और कहां हुआ तथा इसके लिए उत्तरदायी अंग्रेज़ अफसर का नाम बताएं।
उत्तर-
जलियांवाला बाग का कांड 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में हुआ। इसके लिए जनरल डायर उत्तरदायी था।

प्रश्न 41.
जलियांवाला बाग में कितने लोग मारे गए तथा कितने घायल हुए ?
उत्तर-
जलियांवाला बाग में 500 से अधिक लोग मारे गए और 1500 से अधिक लोग घायल हुए।

प्रश्न 42.
‘मांटेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार’ का विधान कब पास हुआ तथा कब लागू किया गया ?
उत्तर-
मांटेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार 1918-19 में पास हुआ तथा मार्च, 1920 में लागू किया गया।

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प्रश्न 43.
1919 के विधान में केन्द्र के पास कौन-से विभाग थे ?
उत्तर-
1919 के विधान में केन्द्र के पास सेना, विदेशी मामले, संचार के साधन, व्यापार तथा चुंगी के विभाग थे।

प्रश्न 44.
1919 के विधान के अनुसार प्रान्तीय प्रशासन को किन दो भागों में बांटा गया ?
उत्तर-
इस विधान के अनुसार प्रान्तीय प्रशासन को इन दो भागों में बांटा गया :

  1. गवर्नर एवं उसकी परिषद् और
  2. निर्वाचित मंत्री।

प्रश्न 45.
1919 के विधान में प्रान्तीय गवर्नर के पास कौन-से विभाग थे ?
उत्तर-
1919 के विधान में प्रान्तीय गवर्नर के पास लगान, कानून, न्याय, पुलिस, सिंचाई और मजदूरों के मामलों से सम्बन्धित विभाग थे।

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प्रश्न 46.
1919 के विधान में निर्वाचित मन्त्रियों के पास कौन-से विभाग थे ?
उत्तर-
1919 के विधान के अनुसार निर्वाचित मन्त्रियों के पास नगरपालिकाएं, ज़िला बोर्ड, शिक्षा, पब्लिक हैल्थ, पब्लिक वर्क्स, कृषि तथा सहकारी संस्थाओं के विभाग थे।

प्रश्न 47.
‘डायारकी’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
‘डायारकी’ से अभिप्राय उस दोहरे शासन से है जो मांटेग्यू चैम्सफोर्ड विधान के अन्तर्गत प्रान्तों में स्थापित किया गया। इसके अनुसार शासन के दो भाग कर दिए गए जिनमें से एक भाग पर गवर्नर और उसकी परिषद् का अधिकार रहा, जबकि दूसरा भाग निर्वाचित मन्त्रियों को सौंप दिया गया।

प्रश्न 48.
1919 मे किन चार प्रदेशों को ‘प्रान्तों’ का दर्जा दे दिया गया ?
उत्तर-
1919 में यू० पी०, पंजाब, बिहार और उड़ीसा को प्रान्त का दर्जा दिया गया।

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प्रश्न 49.
1919 के विधान अनुसार आम मतदाताओं के प्रतिनिधि किस आधार पर चुने जाते थे ?
उत्तर-
इस विधान के अनुसार आम मतदाताओं के प्रतिनिधि साम्प्रदायिक विभाजन के आधार पर चुने जाते थे।

प्रश्न 50.
भारतीय नेताओं की 1919 के विधान पर कौन-सी दो मुख्य आपत्तियाँ थीं ?
उत्तर-
भारतीय नेताओं की दो मुख्य आपत्तियां थीं-धर्म के आधार पर पृथक् प्रतिनिधित्व दिया जाना और इसका ‘स्वराज्य’ के अधिकार से दूर होना।

प्रश्न 51.
खिलाफत आन्दोलन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
खिलाफत आन्दोलन से अभिप्राय उस आन्दोलन से है जो भारतीय मुसलमानों ने अपने खलीफा अर्थात् तुर्की के सुल्तान के पक्ष में अंग्रेज़ी सरकार के विरुद्ध चलाया।

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प्रश्न 52.
खिलाफत आन्दोलन के चार नेताओं के नाम बताएं।
उत्तर-
खिलाफत आन्दोलन के चार नेता मुहम्मद अली, शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद तथा हकीम अजमल खां थे।

प्रश्न 53.
खिलाफत कमेटी ने असहयोग आन्दोलन शुरू करने की घोषणा कब की तथा इसमें सबसे पहले कौन शामिल हुए ?
उत्तर-
खिलाफत कमेटी ने असहयोग आन्दोलन शुरू करने की घोषणा 31 अगस्त, 1920 को की। महात्मा गांधी इसमें सबसे पहले शामिल हुए।

प्रश्न 54.
असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम में किन चीज़ों का बहिष्कार शामिल था ?
उत्तर-
असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम में छुआछूत तथा शराब का बहिष्कार शामिल था।

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प्रश्न 55.
असहयोग आन्दोलन के रचनात्मक पक्ष कौन-से थे ?
उत्तर-
असहयोग आन्दोलन के रचनात्मक पक्ष थे-पंचायतों, राष्ट्रीय स्कूलों तथा कॉलेजों की स्थापना करना और स्वदेशी वस्तुओं (विशेषकर खादी) का प्रचार करना।

प्रश्न 56.
असहयोग आन्दोलन किस पर आधारित था तथा इसके कौन-से दो प्रतीक बन गए ?
उत्तर-
यह आन्दोलन पूर्ण रूप से अहिंसा पर आधारित था। चर्खा तथा खद्दर इस आन्दोलन के प्रतीक बन गए।

प्रश्न 57.
असहयोग आन्दोलन के अन्तर्गत वकालत छोड़ने वाले तीन व्यक्तियों के नाम बताएं।
उत्तर-
असहयोग आन्दोलन के अन्तर्गत वकालत छोड़ने वालों में पंडित मोती लाल नेहरू, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद तथा लाला लाजपत राय शामिल थे।

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प्रश्न 58.
असहयोग आन्दोलन द्वारा पहली बार समाज के कौन-से दो हिस्से राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हुए ?
उत्तर-
असहयोग आन्दोलन द्वारा पहली बार समाज के साधारण लोग तथा स्त्रियां राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हुईं।

प्रश्न 59.
असहयोग आन्दोलन कब वापिस लिया गया तथा इसका क्या कारण था ?
उत्तर-
असहयोग आन्दोलन 1922 में वापस लिया गया। इसका कारण था-उत्तर प्रदेश में चौरी-चौरा के स्थान पर हुई हिंसात्मक घटना।

प्रश्न 60.
भारत से बाहर कब व किस घटना के बाद खिलाफत प्रश्न समाप्त हो गया ?
उत्तर-
भारत से बाहर 1929 में खिलाफत प्रश्न समाप्त हुआ। यह प्रश्न तुर्की के सुल्तान के बहाल होने के बाद समाप्त हुआ।

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III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 की क्रान्ति के सामाजिक कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का मुख्य कारण सामाजिक असन्तोष था। निम्नलिखित चार बातों से यह तथ्य प्रमाणित हो जाता है:
1. अंग्रेज़ भारत में सती-प्रथा को समाप्त करना तथा कुछ अन्य सामाजिक परिवर्तन लाना चाहते थे। भारतीयों ने इन सभी परिवर्तनों को हिन्दू धर्म के विरुद्ध समझा और वे अंग्रेजों के घोर विरोधी हो गये।

2. अंग्रेज़ शिक्षा संस्थाओं में ईसाई धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करते थे जिसके कारण भी भारतीय अंग्रेजों से नाराज़ थे।

3. ईसाई पादरी भारतीय रीति-रिवाजों की कड़ी निन्दा करते थे। भारतीय इसे सहन न कर सके और वे अंग्रेजों को भारत से निकालने के लिये तैयार हो गये।

4. रेलों के आरम्भ होने से लोगों को विश्वास हो गया कि वे शीघ्रता से भारतीयों को अपने प्रभाव में लेना चाहते थे। इस असन्तोष के कारण भारतीय जनता ने अपने राजाओं को सहयोग दिया और वे क्रान्ति के लिये तैयार हो गये।

प्रश्न 2.
प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के धार्मिक कारणों का वर्णन करो।
उत्तर-
प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के धार्मिक कारण निम्नलिखित थे :
1. धर्म परिवर्तन-ईसाई पादरी भारतीयों को लालच देकर उन्हें ईसाई बना रहे थे। इस कारण भारतवासी अंग्रेज़ों के विरुद्ध हो गये।

2. विलियम बैंटिंक के सुधार-विलियम बैंटिंक ने अनेक समाज सुधार किये थे। कुछ हिन्दुओं ने इन सुधारों को अपने धर्म में हस्तक्षेप समझा।

3. अंग्रेज़ी शिक्षा-अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रसार के कारण भी भारतवासियों में असन्तोष फैल गया।

4. हिन्दू ग्रन्थों की निन्दा-ईसाई प्रचारक अपने धर्म का प्रचार करने के साथ-साथ हिन्दू धर्म के ग्रन्थों की घोर निन्दा करते थे। इस बात से भी भारतवासी भड़क उठे।

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प्रश्न 3.
सन् 1857 की क्रान्ति के लिए भारतीयों का आर्थिक शोषण कहाँ तक उत्तरदायी था ?
अथवा
स्वतन्त्रता संग्राम के आर्थिक कारण कौन-कौन से थे ?
उत्तर-
स्वतन्त्रता संग्राम के आर्थिक कारण निम्नलिखित थे :
1. औद्योगिक क्रान्ति के कारण इंग्लैण्ड का बना मशीनी माल सस्ता हो गया। परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी माल अधिक बिकने लगा और भारतीय उद्योग लगभग ठप्प हो गये।

2. भारतीय माल को इंग्लैण्ड पहुँचने पर भारी शुल्क देना पड़ता था। इस तरह भारतीय माल काफी महंगा पड़ता था। परिणामस्वरूप भारतीय माल की विदेशों में मांग घटने लगी और भारतीय व्यापार लगभग ठप्प हो गया।

3. अंग्रेजों के शासनकाल में कृषि और कृषक् की दशा भी खराब हो गई थी। ज़मींदारों को भूमि का स्वामी मान लिया गया था। वे एक निश्चित कर सरकारी खज़ाने में जमा कराते थे और किसानों से मनचाहा कर वसूल करते थे। किसान इन अत्याचारों से मुक्ति पाना चाहते थे।

4. भारतीय जनता पर भारी कर लगा दिये गये थे। तंग आकर उन्होंने विद्रोह का मार्ग अपनाया।

प्रश्न 4.
सन् 1857 के विद्रोह का तात्कालिक कारण क्या था ?
उत्तर-
1857 की क्रान्ति का तात्कालिक कारण चर्बी वाले कारतूस थे। 1856 ई० में सरकार ने सैनिकों से पुरानी बन्दूकें वापस लेकर उन्हें ‘एन्फील्ड राइफलें’ दीं। इन राइफलों में गाय और सूअर की चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग होता था और कारतूसों को राइफलों में भरने के लिए इन्हें मुंह से छीलना पड़ता था। कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी की बात सुनकर भारतीय सैनिक भड़क उठे और इन कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार करने लगे। यही क्रान्ति का तात्कालिक कारण सिद्ध हुआ। कारतूसों के प्रयोग से इंकार करते हुए, बंगाल की छावनी बैरकपुर में मंगल पाण्डे नामक एक सैनिक ने क्रान्ति का झंडा फहराया और दो बड़े अंग्रेज़ अधिकारियों को गोली से उड़ा दिया। उसे फांसी दे दी गई। इस घटना के कुछ दिन बाद मेरठ में क्रान्ति की आग भड़क उठी।

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प्रश्न 5.
प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम क्यों असफल रहा ?
उत्तर-
प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम (1857 ई०) अनेक बातों के कारण असफल रहा : –
1. संग्राम 31 मई को आरम्भ किया जाना था। परन्तु मेरठ के सैनिकों ने इसे समय से पहले ही आरम्भ कर दिया। . फलस्वरूप भारतीयों में एकता न रह सकी।

2. सभी क्रान्तिकारी स्वतन्त्रता प्राप्ति के उद्देश्य से नहीं लड़े।

3. अंग्रेजों के अत्याचार के भय से साधारण जनता ने क्रान्ति में भाग लेना छोड़ दिया।

4. क्रान्तिकारी प्रशिक्षित सैनिक नहीं थे। उनके पास अच्छे शस्त्रों का भी अभाव था।

5. यह संग्राम केवल उत्तरी भारत में ही फैला। दक्षिण के लोगों ने इसमें कोई भाग न लिया। अतः एकता के अभाव में यह संग्राम असफल रहा।

प्रश्न 6.
भारत में राष्ट्रीयता के उदय के चार कारण बताएं।
उत्तर-
भारत में राष्ट्रीयता के उदय के निम्नलिखित कारण थे :
1. अंग्रेज़ भारत से अधिक-से-अधिक धन कमाना चाहते थे। अत: उन्होंने भारत का खूब आर्थिक शोषण किया। इसके परिणामस्वरूप भारतीय उद्योग ठप्प पड़ गये। देश में बेरोज़गारी बढ़ने लगी और लोगों में असन्तोष फैल गया।

2. देश में डाक-तार व्यवस्था आरम्भ होने से लोगों में आपसी मेल-जोल बढ़ने लगा। इससे लोगों में एकता आई जो राष्ट्रीयता के उदय में सहायक सिद्ध हुई।

3. अंग्रेजी भाषा के माध्यम से भारतीय एक-दूसरे के निकट आ गए। पश्चिमी साहित्य के अध्ययन के कारण उनमें राष्ट्रीयता की भावना प्रबल हो गई।

4. भारतीय समाचार-पत्रों ने भी लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को जागृत किया।

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प्रश्न 7.
1857 ई० के विद्रोह के राजनीतिक कारणों का वर्णन करें।
उत्तर-
1857 के विद्रोह के मुख्य राजनीतिक कारण निम्नलिखित थे :-

  • लॉर्ड वैलेज़ली की सहायक सन्धि और डल्हौज़ी की लैप्स की नीति से भारतीय शासकों में असन्तोष फैला हुआ था।
  • नाना साहब की पेन्शन बन्द कर दी गई थी। इसलिए वह अंग्रेजों के विरुद्ध था।
  • अवध, सतारा तथा नागपुर की रियासतें अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला ली गई थीं। इसलिए वहां के शासक अंग्रेजों के शत्रु बन गए।
  • ज़मींदार तथा सरदार भी अंग्रेजों के विरुद्ध थे क्योंकि उनकी भूमि छीन ली गई थी।
  • अंग्रेजों ने मुग़ल सम्राट् बहादुरशाह का निरादर किया। उन्होंने उसके राजमहल तथा उसकी पदवी छीनने की योजना बनाई। इससे जनता भड़क उठी।
  • ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाए गए देशी राज्यों के बहुत-से सैनिक तथा कर्मचारी बेरोज़गार हो गए। अत: उनमें असन्तोष व्याप्त था।

प्रश्न 8.
1857 के विद्रोह की मुख्य घटनाओं का वर्णन करो।
उत्तर-
1857 के विद्रोह की मुख्य घटनाओं का वर्णन इस प्रकार है-
1. 1857 के विद्रोह का आरम्भ बैरकपुर (बंगाल) से 29 मार्च को हुआ। वहां भारतीय सैनिकों ने चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग करने से इन्कार कर दिया।

2. 9 मई, 1857 ई० को मेरठ में विद्रोह हो गया और सैनिकों को बन्दी बना लिया गया। परन्तु अगले ही दिन क्रान्तिकारी उन्हें रिहा करा कर दिल्ली की ओर चल पड़े।

3. 12 मई, 1857 को क्रान्तिकारियों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और मुग़ल सम्राट् बहादुरशाह को भारत सम्राट घोषित कर दिया।

4. कानपुर में नाना साहिब ने अपने आपको पेशवा घोषित कर दिया। परन्तु वह अंग्रेजों द्वारा पराजित हुआ। तात्या टोपे ने वहाँ पुनः अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया, परन्तु वह सफल न हो सका।

5. जून 1857 में लखनऊ, बनारस तथा इलाहाबाद में विद्रोह हुआ।

6. झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई ने क्रान्ति का नेतृत्व किया। तात्या टोपे भी उसके साथ आ मिला। परन्तु वह लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुई।
इस प्रकार क्रान्ति की ज्वाला शान्त हो गयी और प्रत्येक स्थान पर फिर से अंग्रेज़ी झण्डा फहराने लगा।

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प्रश्न 9.
1857 ई० के विद्रोह के क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर-
1857 के विद्रोह के मुख्य प्रभाव निम्नलिखित थे-
1. कम्पनी के शासन का अन्त-1857 ई० के विद्रोह के परिणामस्वरूप भारत में कम्पनी का शासन समाप्त हो गया। भारत का शासन अब सीधा इंग्लैण्ड की सरकार के अधीन हो गया।

2. देशी राज्यों के प्रति नई नीति-1857 ई० के विद्रोह के पश्चात् अंग्रेजों ने देशी रियासतों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने की नीति छोड़ दी और उन्हें पुत्र गोद लेने का अधिकार भी दे दिया।

3. सेना में यूरोपियन सैनिकों की वृद्धि-सेना में भारतीयों की संख्या घटा दी गई और युरोपियन सैनिकों की संख्या बढा दी गई। तोपखाना, गोला-बारूद आदि सारी युद्ध-सामग्री यूरोपियनों के हाथों में सौंप दी गई।

4. भारतीय सेना का पुनर्गठन-विद्रोह के पश्चात् भारतीय सेना का पुनर्गठन किया गया। अब सभी जातियों तथा धर्मों के सैनिकों को अलग-अलग रखा जाने लगा। इस प्रकार राष्ट्रीयता की भावना को पनपने से रोका गया।

प्रश्न 10.
1857 ई० की क्रान्ति के स्वरूप का वर्णन करो।
अथवा
क्या 1857 ई० की क्रान्ति एक सैनिक विद्रोह था या प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम ?
उत्तर-
1857 ई० का विद्रोह कोरा सैनिक विद्रोह नहीं था। यह निश्चित रूप से ही भारतीयों द्वारा स्वतन्त्रता के लिए लड़ा गया प्रथम संग्राम था। इन तथ्यों से यह बात स्पष्ट हो जाएगी-
1. 1857 की क्रान्ति में जनता ने भाग लिया, चाहे इन लोगों की संख्या कम ही थी।

2. जनता तथा शासक अंग्रेजों के विरुद्ध थे और वे उनसे छुटकारा पाना चाहते थे।

3. सैनिकों ने विद्रोह अवश्य किया, परन्तु उनका निशाना भी रियायतें लेना नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों को भारत से बाहर निकालना था।

4. देश के कुछ भागों में क्रान्ति नहीं हुई। वे शान्त रहे। उनके शान्त रहने का अर्थ यह नहीं लिया जा सकता कि उन्हें आजादी पसन्द नहीं थी। वे किसी बात के कारण खामोश अवश्य थे, परन्तु अंग्रेजी शासन उन्हें भी पसन्द नहीं था।

5. इसमें हिन्दुओं तथा मुसलमानों ने मिल कर संघर्ष किया। अतः स्पष्ट है कि लोग अंग्रेजी सत्ता से तंग थे और उन्होंने इस सत्ता को भारत में समाप्त करने के लिए शस्त्र उठाए। ऐसा महान् कार्य स्वतन्त्रता संग्राम के लिए ही हो सकता है। अतः यह सैनिक विद्रोह नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आन्दोलन था।

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प्रश्न 11.
पहले दो दशकों में इण्डियन नेशनल कांग्रेस की मांगें क्या थी ?
उत्तर-
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1885 में स्थापित की गई। 1905 ई० तक यह संस्था उदार विचारों से प्रभावित रही। अतः इसकी मांगें भी साधारण ही थीं। इसकी ये मांगें थीं-

  • विधान परिषदों के अधिकार बढ़ाये जाएं।
  • इनमें चुने हुए सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए।
  • प्रशासन में भारतीयों को उच्च पद दिए जाएं।
  • सेना तथा प्रशासन का खर्च कम किया जाए।
  • बोलने और लिखने की स्वतन्त्रता से प्रतिबन्ध हटाया जाए।
  • शिक्षा तथा लोक भलाई के कार्यक्रमों का विस्तार किया जाए। कांग्रेस के नेता यह समझते थे कि उनकी मांगें उचित भी हैं और बहुत बड़ी भी नहीं हैं। इसलिए उनका विचार था कि सरकार इन्हें आसानी से मान लेगी। परन्तु सरकार ने उनकी मांगों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। इसीलिए बाद में अनुदार विचारों के नेताओं का कांग्रेस पर प्रभुत्व बढ़ गया।

प्रश्न 12.
सरकार के प्रति कांग्रेस के रवैये में परिवर्तन किन कारणों से हुआ ?
उत्तर-
कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई। सरकार ने इस संस्था का स्वागत किया। परन्तु आरम्भ में सरकार का रुख दिखावे के लिए मैत्रीपूर्ण था। शीघ्र ही सरकार ने कांग्रेस के कार्यक्रमों का खुले रूप में विरोध करना आरम्भ कर दिया। सरकारी कर्मचारियों को अधिवेशनों में भाग लेने से रोक दिया गया। उच्च वर्ग के मुसलमानों को भी सुझाव देना आरम्भ कर दिया कि वे कांग्रेस के साथ सम्बन्ध न रखें। सरकार का तर्क यह था कि कांग्रेस लोगों की प्रतिनिधि संस्था नहीं थी। दूसरे, सरकार को विश्वास था कि कांग्रेस सरकार की नीतियों का समर्थन करेगी। परन्तु कांग्रेस के नर्म विचार भी सरकार को अखरने लगे। हर वर्ष कांग्रेस के द्वारा पास प्रस्ताव सरकार के पास पहुंचते। सरकार इन्हें पूरा करने में असमर्थ होती। अतः धीरे-धीरे सरकार का रवैया कांग्रेस के विरुद्ध हो गया।

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प्रश्न 13.
स्वतन्त्रता आन्दोलन पर बंगाल के विभाजन का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-
स्वतन्त्रता आन्दोलन को उदार रूप से उग्र रूप देने में सबसे अधिक योगदान बंगाल के विभाजन का था। जुलाई, 1905 में वायसराय कर्जन ने पूर्वी बंगाल और आसाम को जोड़ कर एक नया प्रान्त बनाने की घोषणा कर दी। अक्तूबर में यह प्रान्त अस्तित्व में आ गया। इस निर्णय के विरुद्ध स्थान-स्थान पर सभायें हुईं। इनमें नर्म दल वाले भी थे और गर्म दल वाले भी थे। सब की मांग अब एक ही थी कि बंगाल का विभाजन न किया जाये। इस सम्बन्ध में उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन आरम्भ कर दिया। इसके अन्तर्गत विदेशी वस्तुओं के ‘बॉयकाट’ अथवा बहिष्कार पर बल दिया गया। इसका उद्देश्य यह था कि विदेशी कपड़ा और चीनी आदि न खरीदने से अंग्रेजों को आर्थिक हानि होगी और सरकार नेताओं की मांग को स्वीकार कर लेगी। इस आन्दोलन का प्रभाव कांग्रेस की नीति पर भी पड़ा। नर्म दल वाले यह चाहते थे कि ‘स्वदेशी’ और ‘बॉयकाट’. का ढंग सीमित उद्देश्यों के लिए काम में लिया जाये। गर्म दल वाले इस शस्त्र का प्रयोग विस्तार से करना चाहते थे। सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का ‘बायकाट’ भी उनके कार्यक्रम में सम्मिलित था। सच तो यह है कि बंगाल विभाजन के कारण स्वतन्त्रता आन्दोलन में गर्म दल की नीतियां आरम्भ हुईं।

प्रश्न 14.
मुस्लिम लीग की स्थापना के क्या कारण थे ?
उत्तर-
मुस्लिम लीग की स्थापना 1906 में हुई थी। इसकी स्थापना के कारण ये थे :-

  • अरब राष्ट्रों में ‘वहाबी आन्दोलन’ आरम्भ होने के कारण भारत में साम्प्रदायिकता की भावना को बढ़ावा मिला।
  • अंग्रेजों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति भी मुस्लिम लीग की स्थापना का एक कारण थी।
  • सर सैय्यद अहमद खां ने भारत में साम्प्रदायिकता का प्रचार किया।
  • प्रिंसिपल बेक ने साम्प्रदायिकता की आग को भड़काने वाले लेख लिखे।
  • प्रिंसिपल बेक ने कांग्रेस को हिन्दुओं की संस्था के नाम से पुकारा। इस से भी साम्प्रदायिकता को काफी बल मिला।
  • लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल के विभाजन ने साम्प्रदायिकता की भावना को और भी अधिक भड़का दिया।
  • लॉर्ड मिण्टो ने साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए प्रोत्साहन दिया। वास्तव में ये सभी कारण मुस्लिम लीग की स्थापना के कारण बने।

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प्रश्न 15.
गदर आन्दोलन का क्या उद्देश्य था तथा भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में इसका क्या महत्व था ?
उत्तर-
गदर आन्दोलन 1915 ई० में पंजाब में आरम्भ हुआ। इस आन्दोलन के सदस्यों का उद्देश्य 1857 ई० के गदर के ढंग पर सशस्त्र विद्रोह करना था। इस आन्दोलन ने सरकार के प्रति सिक्खों का रवैया बदल दिया। गदर पार्टी के सदस्यों में से कुछ बाद में गुरुद्वारा सुधार आन्दोलन तथा बब्बर अकालियों में शामिल हो गए। कुछ ने किसान मज़दूरों की ‘कीर्ति-किसान पार्टी’ स्थापित करने में बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वास्तव में गदर आन्दोलन भारतीयों का एक धर्म-निरपेक्ष क्रान्तिकारी आन्दोलन था।

प्रश्न 16.
स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में ‘रौलेट एक्ट’ तथा ‘जलियांवाला बाग’ का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में रौलेट एक्ट तथा जलियांवाला बाग का विशेष महत्त्व है। रौलेट एक्ट के अनुसार किसी भी मुकद्दमे का फैसला बिना ‘ज्यूरी’ के किया जा सकता था तथा किसी भी व्यक्ति को मुकद्दमा चलाये बिना नज़रबन्द रखा जा सकता था। इस एक्ट के कारण भारतीय लोग भड़क उठे। उन्होंने इस का कड़ा विरोध किया और स्वतन्त्रता आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। गांधी जी ने इस एक्ट के विरुद्ध अहिंसात्मक हड़ताल की घोषणा कर दी। स्थान-स्थान पर दंगे-फसाद हुए। जलियांवाला बाग में शहर के लोगों ने एक सभा का प्रबन्ध किया। स्वतन्त्रता आन्दोलन को दबाने के लिए जनरल डायर ने सभा में एकत्रित लोगों पर गोली चला दी जिसके कारण बहुत-से लोग मारे गए अथवा घायल हो गए। इस घटना से भारत के लोग और भी अधिक भड़क उठे। उन्होंने अंग्रेजों से स्वतन्त्रता प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। इस घटना से अंग्रेज़ शासकों तथा भारतीय नेताओं के बीच एक अमिट दरार पड़ गई।

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प्रश्न 17.
असहयोग आन्दोलन के उद्देश्य व कार्यक्रम के बारे में बताएं।
उत्तर-
असहयोग आन्दोलन गांधी जी ने 1920 ई० में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध चलाया। इसका उद्देश्य यह था कि हमें सरकार से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए। इस आन्दोलन की घोषणा कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में की गई। गांधी जी ने जनता से अपील की कि वह किसी भी तरह सरकार को सहयोग न दें। एक निश्चित कार्यक्रम भी तैयार किया गया जिस में कहा गया कि विदेशी माल का बहिष्कार करके स्वदेशी माल का प्रयोग किया जाए। ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई उपाधियों तथा अवैतनिक पद छोड़ दिए जाएं । स्थानीय संस्थाओं में मनोनीत भारतीय सदस्यों द्वारा त्याग-पत्र दे दिए जाएं। सरकारी स्कूलों तथा सरकार से अनुदान प्राप्त स्कूलों में बच्चों को पढ़ने के लिए न भेजा जाए। ब्रिटिश अदालतों तथा वकीलों का धीरे-धीरे बहिष्कार किया जाए। सैनिक, क्लर्क तथा श्रमिक विदेशों में अपनी सेवाएं अर्पित करने से इन्कार कर दें।

प्रश्न 18.
तुम बाल, पाल, लाल के बारे में जो जानते हो, लिखो।
उत्तर-
बाल, पाल, लाल’ भारत के तीन महान् व्यक्तियों के नामों का छोटा रूप है। बाल से अभिप्राय बाल गंगाधर तिलक, पाल से अभिप्राय विपिन चन्द्र पाल और लाल से अभिप्राय लाला लाजपत राय से है। ये तीनों नेता कांग्रेस में ऐसी विचारधारा के समर्थक थे जो इतिहास में उग्रवाद के नाम से प्रसिद्ध है। ये तीनों स्वराज्य की प्राप्ति के पक्ष में थे और अंग्रेजों से संवैधानिक साधनों द्वारा न्याय पाने की आशा नहीं रखते थे। वे न तो अंग्रेजों से प्रार्थना करने के पक्ष में थे और न ही इस बात के पक्ष में थे कि अंग्रेजों के पास शिष्टमण्डल भेजे जाएं। ये अंग्रेजों से संघर्ष करना चाहते थे और संघर्ष द्वारा स्वराज्य प्राप्त करना चाहते थे। देश की जनता ने इनकी विचारधारा का समर्थन किया और ये तीनों नेता देश में अत्यन्त लोकप्रिय हुए।

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प्रश्न 19.
मिण्टो-मार्ले सुधार की मुख्य धाराएं बताओ।
उत्तर-
मिण्टो-मार्ले सुधार 1909 ई० में पास हुआ। इन सुधारों की मुख्य धाराएं ये थीं-
1. केन्द्रीय तथा प्रान्तीय विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई। केन्द्रीय विधान परिषद् के सदस्यों की संख्या 16 से बढ़ा कर 60 कर दी गई। इसी तरह मद्रास (चेन्नई), बम्बई (मुम्बई) तथा बंगाल की विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या 20 से बढ़ा कर 50 और उत्तर प्रदेश में 15 से बढ़ा कर 60 कर दी गई।

2. केन्द्रीय विधान परिषद् में सरकारी सदस्यों का बहुमत रहा। इसमें 69 सदस्य होते थे जिनमें से 36 सदस्य सरकारी होते थे।

3. प्रान्तीय विधान परिषदों के सदस्यों का चुनाव मुसलमानों, ज़मींदारों, व्यापार-मण्डलों, नगर पालिकाओं तथा ज़िला बोर्डों द्वारा किया जाने लगा।

4. इसके अनुसार पृथक् निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की गई। हिन्दू प्रतिनिधियों का चुनाव हिन्दू तथा मुस्लिम प्रतिनिधियों का चुनाव मुसलमान ही करते थे।

प्रश्न 20.
होमरूल आन्दोलन के विषय में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर-
होमरूल आन्दोलन 1916 ई० में आरम्भ हुआ। इसे आरम्भ करने का श्रेय श्रीमती ऐनी बेसेन्ट तथा लोकमान्य तिलक को जाता है। इस आन्दोलन का उद्देश्य भारतवासियों के लिए स्वराज्य प्राप्त करना था। लगभग सारे देश में होमरूल लीग की शाखाएं खोली गईं। यह आन्दोलन इतना लोकप्रिय हुआ कि सरकार घबरा गई। सरकार ने श्रीमती ऐनी बेसेन्ट को नजरबन्द कर दिया। परिणामस्वरूप जनता में असन्तोष फैल गया और यह आन्दोलन पहले से भी अधिक तीव्र हो गया। होमरूल आन्दोलन के मुख्य उद्देश्य ये थे-

  • शान्तिमय उपायों द्वारा भारत के लिए स्वराज्य प्राप्त करना
  • अंग्रेज़ों को सन्तुष्ट करके ऐसी परिस्थितियों को जन्म देना जिससे प्रभावित होकर वह स्वयं ही भारत को स्वराज्य प्रदान करने का तैयार हो जाएं।
  • उग्रवादियों (Extremists) तथा उदारवादियों (Moderates) का परस्पर मेल करवाकर उग्रवादियों को क्रान्तिकारियों के साथ मिल जाने से रोकना।
  • ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं आदि में स्वराज्य की स्थापना करना।
  • ब्रिटिश पार्लियामैंट में अन्य ब्रिटिश स्वशासित उपनिवेशों की भान्ति भारत से भी प्रतिनिधि भेजने का अधिकार प्राप्त करना।

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प्रश्न 21.
खिलाफत आन्दोलन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
प्रथम विश्व-युद्ध के समाप्त होने पर ब्रिटिश सरकार तथा कुछ अन्य शक्तियों ने तुर्की के कुछ क्षेत्र इसके सुल्तान से ले लेने का निर्णय कर लिया था। तुर्की के सुल्तान को मुसलमानों का खलीफा अथवा धार्मिक नेता माना जाता था। इसलिए भारत के मुसलमानों में भी सुल्तान के समर्थन में गतिविधियां आरम्भ हुई। इसके खिलाफत आन्दोलन’ का नाम दिया गया। इसके नेता थे मुहम्मद अली और शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम आजाद, हसरत मोहानी तथा हकीम अजमल खां। इन्होंने इसके नेतृत्व के लिए खिलाफ़त कमेटी बनाई तथा नवम्बर 1919 में आल इंडिया कान्फ्रेंस बुलाई। महात्मा गांधी खिलाफत के प्रश्न पर भारतीय मुसलमानों को अंग्रेज़ी सरकार के विरुद्ध सक्रिय करना चाहते थे। उन्होंने इस सम्बन्ध में असहयोग आन्दोलन चलाने का प्रस्ताव रखा। 31 अगस्त, 1920 को खिलाफत कमेटी ने असहयोग आन्दोलन आरम्भ करने की घोषणा की। इसमें सम्मिलित होने वालों में महात्मा गांधी सबसे पहले व्यक्ति थे। उन्होंने अंग्रेज़-सरकार से प्राप्त ‘केसरेहिन्द’ की पदवी वापिस कर दी। इस तरह खिलाफत आन्दोलन असहयोग आन्दोलन का भाग बन कर उभरा।

प्रश्न 22.
1919 ई० के एक्ट के अनुसार कौन-कौन से महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए गए ?
उत्तर-
भारतीय 1909 ई० के अधिनियम से सन्तुष्ट नहीं थे। अतः ब्रिटिश पार्लियामैंट ने प्रथम महायुद्ध के पश्चात् एक एक्ट पास किया जिसे 1919 ई० का गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट अथवा मांटेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार कहा जाता है। इस एक्ट के अनुसार ये परिवर्तन किए गए-

  • वायसराय की विधान परिषद् के दो सदन बना दिए गए-राज्य परिषद् तथा विधान सभा।
  • राज्य परिषद् के सदस्यों की संख्या 60 रखी गई, जिनमें 33 सदस्यों का चुनाव किया जाता था और शेष सदस्य मनोनीत किए जाते थे। विधान सभा की सदस्य संख्या 140 निश्चित की गई जिसे बाद में बढ़ा कर 145 कर दिया गया। इनमें से 105 सदस्यों का निर्वाचन होता था और 40 सदस्य मनोनीत किए जाते थे।
  • वायसराय को दोनों सदनों को बुलाने, संगठित करने, विघटित करने तथा सम्बोधित करने का अधिकार दिया गया।
  • प्रान्तीय विधान परिषदों का एक ही सदन होता था जिसे विधान सभा कहते थे। इसके सदस्यों की संख्या प्रत्येक प्रान्त में भिन्न-भिन्न थी। इसकी अवधि तीन वर्ष थी।

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IV. निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
1857 ई० की भारतीय क्रान्ति के प्रमुख कारणों पर एक विस्तारपूर्वक प्रस्ताव लिखो। (M. Imp.)
अथवा
1857 की भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के राजनीतिक तथा सैनिक कारणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
1857 की क्रांति के सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक कारणों की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
1857 ई० में भारतीयों ने पहली बार अंग्रेज़ों का विरोध किया। वे उन्हें अपने देश से बाहर निकालना चाहते थे। इस संघर्ष को प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का नाम दिया जाता है।
कारण-

1. राजनीतिक कारण-

  • लॉर्ड वैल्ज़ली की सहायक सन्धि और डल्हौज़ी की लैप्स नीति से भारतीय शासकों में असन्तोष फैला हुआ था।
  • नाना साहिब की पेंशन बन्द कर दी गई थी। इसलिए वह अंग्रेजों के विरुद्ध थे।
  • झांसी की रानी को पुत्र गोद लेने की आज्ञा न मिली। अत: वह अंग्रेजों के विरुद्ध थी।
  • सतारा तथा नागपुर की रियासतें अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला ली गई थीं। इसलिए वहां के शासक अंग्रेजों के शत्रु बन गए।
  • ज़मींदार तथा सरदार भी अंग्रेजों के विरुद्ध थे क्योंकि उनकी जागीरें छीन ली गई थीं। इस प्रकार अनेक शासक, ज़मींदार तथा सरदार अंग्रेजों के रुष्ट थे और उनसे बदला लेने के लिए किसी अवसर की खोज में थे।

2. आर्थिक कारण-
1. औद्योगिक क्रान्ति के कारण इंग्लैण्ड का बना मशीनी माल सस्ता हो गया। परिणाम यह हुआ कि भारत में अंग्रेजी माल अधिक बिकने लगा और भारतीय उद्योग लगभग ठप्प हो गए। भारतीय कारीगरों की रोज़ी का साधन छिन गया और वे अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए।

2. अंग्रेजों की व्यापारिक नीति के कारण भारत का व्यापार भी लगभग समाप्त हो गया। भारत के माल पर इंग्लैण्ड पहुंचने पर भारतीय शुल्क देना पड़ता था जिससे भारतीय माल काफी महंगा पड़ता था। परिणामस्वरूप विदेशों में भारतीय माल की मांग घटने लगी और भारतीय व्यापार लगभग ठप्प हो गया।

3. अंग्रेजों के शासनकाल में कृषि और कृषक की दशा भी खराब हो गई थी। ज़मींदारों को भूमि का स्वामी मान लिया गया था। वे एक निश्चित कर सरकारी खजाने में जमा कराते थे और किसानों से मन चाहा कर वसूल करते थे। परिणामस्वरूप किसान लगातार पिस रहे थे। वे भी इस अत्याचार से मुक्ति पाना चाहते थे।

4. भारतीय जनता पर भारी कर लगा दिए गए थे। कर इतने अधिक थे कि लोगों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी कठिन हो गया था। तंग आकर लोगों ने विद्रोह का मार्ग अपनाया।

3. सामाजिक तथा धार्मिक कारण-
1. ईसाई पादरी भारतवासियों को लालच देकर इन्हें ईसाई बना रहे थे। इस कारण भारतवासी अंग्रेज़ों के विरुद्ध हो गए।

2. विलियम बैंटिंक ने अनेक सामाजिक सुधार किए थे। उसने सती-प्रथा और बालविवाह पर रोक लगा दी थी। हिन्दुओं ने इन सब बातों को अपने धर्म के विरुद्ध समझा

3. अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रसार के कारण भी भारतवासियों में असन्तोष फैल गया। उन्हें विश्वास हो गया कि अंग्रेज़ उन्हें अवश्य ही ईसाई बनाना चाहते हैं।

4. ईसाई प्रचारक अपने धर्म का प्रचार करने के साथ हिन्दू धर्म का प्रचार करने के साथ हिन्दू धर्म के ग्रन्थों की घोर निन्दा करते थे। इस बात से भारतवासी भड़क उठे।

4. सैनिक कारण-
1. 1856 ई० में एक ऐसा सैनिक कानून पास किया गया जिसके अनुसार सैनिकों को लड़ने के लिए समुद्र पार भेजा जा सकता था, परन्तु हिन्दू सैनिक समुद्र पार जाना अपने धर्म के विरुद्ध समझते थे।

2. परेड के समय भारतीय सैनिकों के साथ अभद्र व्यवहार किया जाता था। भारतीय सैनिक इस अपमान को अधिक देर तक सहन नहीं कर सकते थे।

3. भारतीय सैनिकों को अंग्रेज़ सैनिकों की अपेक्षा बहुत कम वेतन दिया जाता था। इस कारण उनमें असन्तोष फैला हुआ था।

4. अंग्रेज़ अधिकारी भारतीय सैनिकों के सामने ही उनकी सभ्यता तथा संस्कृति का मज़ाक उड़ाया करते थे। भारतीय सैनिक अंग्रेजों से इस अपमान का बदला लेना चाहते थे।

5. सैनिकों को नए कारतूस प्रयोग करने के लिए दिए गए। इन कारतूसों पर सूअर या गाय की चर्बी लगी हुई थी। अतः बैरकपुर छावनी के कुछ सैनिकों ने इनका प्रयोग करने से इन्कार कर दिया। मंगल पाण्डे नामक एक सैनिक ने तो क्रोध में आकर तीन अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या कर दी। इस आरोप में उसे फांसी दे दी गई। अन्य भारतीय सैनिक इस घटना से क्रोधित हो उठे और उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

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प्रश्न 2.
1857 ई० की क्रान्ति के राजनीतिक तथा संवैधानिक प्रभावों का वर्णन करो।
उत्तर-
1857 की क्रान्ति असफल रही। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह क्रान्ति असफल हुई, परन्तु निष्फल नहीं हुई। इसके परिणामस्वरूप लोगों में एक ऐसी राजनीतिक जागृति आई जिसने राष्ट्रीय आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। इस क्रान्ति के प्रमुख राजनीतिक तथा संवैधानिक प्रभावों का वर्णन इस प्रकार है-

1. कम्पनी राज्य की समाप्ति-1857 ई० की क्रान्ति का सबसे बड़ा परिणाम भारत में कम्पनी राज्य की समाप्ति था। भारत का सारा प्रशासन सीधा ब्रिटिश राज्य के अधीन हो गया। 1 नवम्बर, 1858 ई० को महारानी विक्टोरिया की घोषणा अनुसार कम्पनी की सरकार समाप्त हो गई तथा बोर्ड ऑफ़ कन्ट्रोल एवं बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्ज़ तोड़ दिए गए। उनके स्थान पर एक भारतीय मन्त्री (Secretary of State for India) की नियुक्ति कर दी गई। यह बर्तानिया की संसद् का सदस्य होता था। उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक कौंसिल बनाई गई। ब्रिटिश संसद् ने प्रशासन के काम पर नियन्त्रण रखने के लिए भारत मन्त्री को यह कहा कि वह प्रति वर्ष भारत की आय-व्यय का ब्यौरा संसद् के सामने रखे।

2. गवर्नर जनरल की उपाधि में परिवर्तन-कम्पनी राज्य की समाप्ति के साथ ही गवर्नर-जनरल की पदवी में भी परिवर्तन किया गया। अब वह ब्रिटिश ताज का प्रतिनिधि था। उसकी इस स्थिति का ध्यान रखते हुए उसे वायसराय की उपाधि दी गई।

3. भारतीय राजाओं के प्रतिनिधि-भारतीय राजाओं को प्रसन्न करने के लिए अंग्रेज़ सरकार ने उदार नीति को अपनाया। उन्हें विश्वास दिलाया गया कि उनके राज्यों को कभी भी अंग्रेज़ साम्राज्य में मिलाया नहीं जाएगा। लैप्स के सिद्धान्त के अनुसार किसी भी रियासत को अंग्रेज़ी राज्य में मिलाने की नीति को त्याग दिया गया। भारतीय राजाओं को सन्तान न होने पर, बच्चा गोद लेने तथा उसे अपना उत्तराधिकारी निश्चित करने का अधिकार भी दे दिया गया। जिन राजाओं ने विद्रोह दबाने के लिए अंग्रेजों की सहायता की, उनको पारितोषिक तथा उपाधियां दी गईं। इसके साथ-साथ राजाओं पर कुछ प्रतिबन्ध भी लगाए गए। वे अंग्रेज़ी सरकार की आज्ञा के बिना किसी देशी अथवा विदेशी शक्ति के साथ सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकते थे। शासन व्यवस्था खराब होने की दशा में उनके राज्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार भी अंग्रेज़ सरकार के पास था।

4. मुगल सम्राट् तथा पेशवा की उपाधि की समाप्ति-नाना साहब ने विद्रोह में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। जब नाना साहब को विजय की आशा न रही, तो वह नेपाल की ओर भाग गया। अब भारत में पेशवा पद के लिए कोई उत्तरदायी नहीं रहा था। इसलिए अंग्रेजों ने पेशवा की उपाधि समाप्त कर दी। मुग़ल सम्राट् बहादुरशाह ने भी विद्रोह में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया था। उनको आजन्म कारावास का दण्ड तथा देश निकाला देकर रंगून भेज दिया गया। उसकी मृत्यु के पश्चात् मुग़ल सम्राट् की पदवी भी समाप्त कर दी गई।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय चेतना के जागृत होने के क्या कारण थे ?
अथवा
19वीं शताब्दी में भारत में राजनीतिक चेतना की उत्पत्ति के कोई पांच कारण लिखिए।
उत्तर-
भारत की राष्ट्रीय चेतना का उदय 19वीं शताब्दी में हुआ। इस चेतना के उत्पन्न होने के निम्नलिखित प्रमुख कारण थे :-

1. भारत तथा यूरोप का सम्पर्क-19वीं शताब्दी यूरोप के इतिहास में राष्ट्रवाद का युग मानी जाती है। 1789 ई० की फ्रांसीसी क्रान्ति और नेपोलियन बोनापार्ट की शक्तिशाली प्रचार लहरों के कारण राष्ट्रीयता के सिद्धान्त को बड़ा बल मिला। इस सिद्धान्त से यूरोप के लगभग सभी देश प्रभावित हुए और वहां राष्ट्रीयता का एक आन्दोलन-सा चल पड़ा। उस समय भारत अंग्रेजी साम्राज्य के अधीन था, इसलिए यूरोप के राष्ट्रवाद का भारत पर भी प्रभाव पड़ा।

2. पश्चिमी विद्वानों के प्रयत्न-कुछ पश्चिमी विद्वानों ने भारत के प्राचीन साहित्य का अध्ययन किया। इन विद्वानों में मैक्समूलर, विलियम जोन्स, विल्सन, कोलब्रुक, कीथ आदि प्रमुख थे। इनके प्रयत्नों से भारत की प्राचीन सभ्यता प्रकाश में आई और लोगों को पता चला कि उनकी पुरानी सभ्यता कितनी महान् थी। परिणामस्वरूप लोगों के मन में स्वाभिमान जागा जिससे राजनीतिक चेतना जागृत हुई।

3. अंग्रेजी भाषा-अंग्रेज़ी सरकार ने कुछ कारणों से अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बना दिया था। इस भाषा के प्रचार से लोगों को एक सांझी भाषा मिल गई। फलस्वरूप यह सम्भव हो गया कि देश के अलग-अलग तथा दूर-दूर स्थित क्षेत्रों के नेता आपस में इकट्ठे हो कर आवश्यक समस्याओं पर विचार-विमर्श कर सकें।

4. अंग्रेजों तथा भारतीयों में अविश्वास-1857 ई० के आन्दोलन के कारण अंग्रेज़ों का भारत के लोगों पर विश्वास न रहा। वे प्रत्येक भारतीय को सन्देह की दृष्टि से देखने लगे। दूसरी ओर भारतीय भी अंग्रेजों को अत्याचारी और दमनकारी समझने लगे। धीरे-धीरे भारतीयों के मन में यह बात बैठ गई कि उन्हें अंग्रेज़ों से न्याय नहीं मिल सकता। इन बातों ने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को जागृत किया।

5. भारतीयों के साथ अन्याय-अंग्रेज़ किसी भी दशा में भारतीयों को समान अधिकार देने को तैयार नहीं थे। सभी बड़े-बड़े सरकारी पदों पर यूरोपियनों को ही नियुक्त किया जाता था। परन्तु देश में शिक्षित भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही थी। जब उनको किसी ओर से नौकरी की आशा न रही तो उन्होंने सरकार की आलोचना करनी आरम्भ कर दी। फलस्वरूप राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।

6. समाचार-पत्रों का योगदान-भारतीयों में राष्ट्रीय भावना जागृत करने में भारतीय समाचार-पत्रों ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। अंग्रेजी समाचार-पत्र प्रायः सरकार की नीतियों के समर्थक ही थे। इसके विपरीत भारतीय भाषाओं में निकलने वाले सामचार-पत्र जनता का पक्ष लेते थे और सरकार की ग़लत नीतियों का विरोध करते थे। अंग्रेज़ी सरकार ने भारतीय समाचार-पत्रों को कुचलने के लिए कानून पास किया। भारतीयों ने इसका कड़ा विरोध किया। अतः सरकार को यह कानून रद्द करना पड़ा। इसके फलस्वरूप समाचार-पत्रों का उत्साह बढ़ गया तथा वे फिर से सरकार की ग़लत नीतियों की आलोचना करने लगे। इन समाचार-पत्रों ने बढ़ रही बेकारी की ओर भी सरकार का ध्यान दिलाने का प्रयत्न किया। इन समाचार-पत्रों को पढ़ कर भारतीयों के मन में राष्ट्रीय भाव जागृत हुए।

7. भारत की आर्थिक दशा-अंग्रेज़ी सरकार ने भारत में ऐसी नीतियां अपनाईं जिनके कारण भारत की आर्थिक दशा बिल्कुल खराब हो गई और लोग निर्धन हो गए। वे जानते थे कि उनकी निर्धनता का एकमात्र कारण अंग्रेज़ी राज्य है। फलस्वरूप वे अंग्रेज़ी राज्य को समाप्त करना चारते थे। यह बात राजनीतिक चेतना की ही प्रतीक थी।

8. देश का एकीकरण-भारतीय राष्ट्रीयता के विकास में देश के एकीकरण ने काफी योगदान दिया। सारे देश में एक ही कानून प्रणाली प्रचलित की गई जिससे सारा देश एक ही प्रबन्धकीय ढांचे के अधीन आ गया। इससे जहां देश का एकीकरण हुआ, वहां भारतीयों में भाईचारे की भावना भी बढ़ी। टेलीफोन, टेलीग्राफ, डाक-प्रबन्ध तथा रेलों के प्रसार से भारतीयों की एक अन्य बड़ी कठिनाई दूर हो गई। अब वे इकट्ठे होकर बैठ सकते थे और एक-दूसरे के दुःख दर्द समझ सकते थे। इन बातों के कारण भी देश में राष्ट्रीयता की भावना का जन्म हुआ।

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प्रश्न 4.
कांग्रेस की स्थापना, आरंभिक उद्देश्यों तथा नीतियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
कांग्रेस की स्थापना 1885 ई० में एक रिटायर्ड अंग्रेज़ अधिकारी श्री ए० ओ० हयूम के प्रयत्नों से हुई थी। उन्होंने कांग्रेस की स्थापना इसलिए की थी ताकि भारतीय नेताओं का असन्तोष विचारों के रूप में बाहर निकलता रहे और वह किसी भयंकर विद्रोह का रूप धारण न करे। मि० ह्यूम काफी सीमा तक अपने उद्देश्यों में सफल भी रहे, परन्तु धीरे-धीरे यह संस्था जनता में काफी लोकप्रिय होने लगी और भारतीय नेताओं की मांगें बढ़ने लगीं। इस संस्था के आरम्भिक उद्देश्यों तथा नीतियों का वर्णन इस प्रकार है :

उद्देश्य-आरम्भ में (1905 ई० तक) कांग्रेस के सभी नेता उदारवादी विचारों के थे। इनके मुख्य उद्देश्य ये थे:

  • देश के हित के लिए काम करने वालों में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना।
  • देशवासियों में जातीयता, प्रान्तीयता तथा धार्मिक भेद-भाव की भावना समाप्त करके राष्ट्रीयता का बीज बोना।
  • सामाजिक समस्याओं सम्बन्धी सुलझे विचारों को इकट्ठा करके अंकित करना।
  • आने वाले 12 महीनों में यह कार्यक्रम तैयार करना कि देश सेवा किस प्रकार की जाए।

नीतियां-कांग्रेस की आरम्भिक नीति देश को स्वतन्त्रता दिलाना नहीं थी। इस समय तक उसकी नीतियां बड़ी साधारण थीं, जिनका वर्णन इस प्रकार है:-

  • भारतीयों को उनकी योग्यता के अनुसार ऊंचे पदों पर नौकरियां दिलवाना।
  • सरकार का ध्यान देश में जन-कल्याण के कार्यों की ओर दिलाना।
  • कृषि की उन्नति के लिए सरकार को प्रेरित करना।
  • किसानों की दशा में सुधार लाना।
  • देश में करों की कमी करवाना।
  • लोगों का आर्थिक स्तर ऊंचा करना।
  • लोगों का नैतिक उत्थान करना।
  • देश में प्राइमरी तथा तकनीकी शिक्षा का प्रसार करना।

प्रश्न 5.
गर्म पन्थ का उदय क्यों हुआ तथा उन्होंने किस प्रणाली को अपनाया ?
उत्तर-
भारतीय राजनीति में गर्म दल के उदय के निम्नलिखित कारण थे :

  • उदारवादी नेता उस गति से नहीं चल रहे थे, जिस गति से देश में राजनीतिक चेतना बढ़ रही थी।
  • अंग्रेजी सरकार राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति संतोषजनक रुख नहीं अपना रही थी।
  • बंगाल के विभाजन ने सारे देश में राष्ट्रीय जागृति पैदा कर दी। पूरे देश में इसका विरोध हुआ, जिसके कारण उग्रवादी भावना को बढ़ावा मिला।
  • भारत से बाहर की घटनाओं ने भी लोगों का झुकाव उग्रवाद की ओर किया। 1896 में इटली को इथोपिया ने और 1905 में रूस को जापान ने हराया था। इससे भी भारतीयों का मनोबल बढ़ा। 1905 की रूसी क्रान्ति और आयरलैण्ड में चल रहे स्वतन्त्रता आन्दोलन ने भी भारतीयों को प्रेरित किया।

गर्म दल की उन्नति-गर्म दल की सही उन्नति 1905 ई० से आरम्भ हुई। लाल-बाल-पाल अर्थात् लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक एवं विपिन चन्द्र पाल ने गर्म दल का नेतृत्व सम्भाला। तिलक ने नारा दिया “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।” सारा देश ‘वन्दे मातरम्’ के नारों से गूंज उठा। स्वदेशी आन्दोलन का सूत्रपात भी हुआ। लोगों ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया और उनकी होली जलाई।

1907 तक उदारवाद तथा उग्रवाद की विचारधारा में स्पष्ट अन्तर दिखाई देने लगा। इसी वर्ष कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में दोनों गुटों में खुला झगड़ा हुआ। अधिवेशन में जूते और लाठियां तक चलीं। सरकार ने उदारवादियों को खुश करने के लिए 1909 का एक्ट पास किया परन्तु इससे उदारवादी तथा उग्रवादी दोनों ही असन्तुष्ट हुए।

गर्म दल की कार्य-प्रणाली-गर्म दल की कार्य-प्रणाली क्हणी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं :

  • गरमपंथी ब्रिटिश शासन में कोई विश्वास नहीं रखते थे। इस सम्बन्ध में ये नरमपंथियों की आलोचना करते थे।
  • गरमपंथी पश्चिमी संस्कृति के आलोचक थे। उनका उद्देश्य लोगों को भारतीय संस्कृति पर गर्व करना सिखाना था।
  • गरमपंथियों का मानना था कि राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के लिए लड़ना पड़ता है और भारी दबाव डालकर ही इन्हें प्राप्त किया जा सकता है।
  • गरमपंथियों द्वारा पेश की गई मांगें राष्ट्रीय थीं और जनसाधारण से सम्बन्ध रखती थीं।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 21 राजनीतिक जागृति तथा अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध राजनीतिक आन्दोलन

प्रश्न 6.
(क) बंगाल को विभाजित करने के पीछे ब्रिटिश लोगों के क्या उद्देश्य थे ?
(ख) राष्ट्रीय आन्दोलन पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ? स्वदेशी तथा बहिष्कार आन्दोलनों का बंगाल-विभाजन से क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर-
(क) बंगाल का विभाजन 1905 ई० में लॉर्ड कर्जन ने किया था। उसने बंगाल और असम को साथ मिलाकर इस सारे प्रदेश के दो भाग कर दिये। उसका कहना था कि बंगाल एक बहुत बड़ा प्रान्त है और सरकार को इसका शासन चलाने में कठिनाई आती है, परन्तु यह अंग्रेजों का एक बहाना मात्र था। वास्तव में बंगाल के विभाजन से उनके कुछ और भी उद्देश्य थे।

उद्देश्य-अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन निम्नलिखित उद्देश्यों से किया :
1. राष्ट्रीयता को आघात पहुंचाना-बंगाल भारत में एक ऐसा प्रान्त था जहां के लोगों में देश के अन्य प्रान्तों की अपेक्षा राष्ट्रीयता की भावना अधिक थी। देश में उठने वाली प्रत्येक राष्ट्रीय लहर का प्रारम्भ इसी प्रान्त से होता था। इस बात से अंग्रेजों को चिन्ता हुई। उन्होंने यहां की राष्ट्रीय भावना को आघात पहुंचाने के लिए इस प्रान्त का विभाजन कर दिया।

2. बंगाल के नेताओं के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना-बंगाल के नेताओं का देश में प्रभाव बढ़ रहा था। वे देश की जनता को अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रेरित कर रहे थे और उग्रवादी साधनों पर बल दे रहे थे। सरकार बंगाल का विभाजन करके उनके बढ़ते हुए प्रभाव को समाप्त कर देना चाहती थी।

3. मुसलमानों का समर्थन-अंग्रेजी सरकार मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करना चाहती थी और उन्हें हिन्दुओं के विरुद्ध भड़काना चाहती थी। इसी उद्देश्य से उसने बंगाल का विभाजन कर दिया और पूर्वी बंगाल नामक एक प्रान्त बना दिया। उस प्रान्त में मुसलमानों का बहुमत था।

(ख) राष्ट्रीय आन्दोलन पर प्रभाव-
1. बंगाल विभाजन से भारतीयों में असन्तोष फैल गया। फलस्वरूप देश में बंगभंग के विरुद्ध एक जबरदस्त आन्दोलन छिड़ गया। 16 अक्तबूर का दिन सारे देश में शोक-दिवस के रूप में मनाया गया।

2. आन्दोलन के कार्यक्रम के अनुसार लोगों ने स्थान-स्थान पर विदेशी माल की होली जलायी और स्वयं स्वदेशी माल का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया। स्वदेशी के प्रचार से भारत के देशी उद्योग फिर से उन्नति करने लगे।

3. भारतीयों ने बहिष्कार की नीति अपनायी। उन्होंने सरकारी नौकरियों तथा पदवियों का त्याग कर दिया। यहां तक कि विद्यार्थियों ने भी सरकारी स्कूलों में जाना छोड़ दिया।

4. सरकार ने इस आन्दोलन के दमन के लिए लोगों पर जितने अधिक अत्याचार किये, उनके विचार उतने ही अधिक गर्म होते गये। इस प्रकार देश में गर्म दल का उदय हुआ।

5. कुछ समय के पश्चात् भारतीयों ने सरकारी अत्याचारों का सामना करने के लिए हिंसात्मक और क्रान्तिकारी साधन अपनाने आरम्भ कर दिये। परिणामस्वरूप देश में एक जबरदस्त क्रान्तिकारी आन्दोलन आरम्भ हो गया। क्रान्तिकारी युवकों ने अनेक अंग्रेजों का वध कर दिया।

6. बंगाल विभाजन का देशव्यापी प्रभाव पड़ा। लगभग पूरा भारत इस विभाजन के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ था। फलस्वरूप राष्ट्रीय एकता को बल मिला।

स्वदेशी तथा बहिष्कार (बॉयकाट) आन्दोलन-स्वदेशी तथा बॉयकाट अथवा बहिष्कार आन्दोलन बंगाल-विभाजन के विरुद्ध रोष प्रकट करने के लिए चलाए गए। इनके अनुसार स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर बल दिया गया और अंग्रेज़ी माल का बहिष्कार कर दिया गया। अनेक नेताओं ने स्थान-स्थान पर जाकर इस आन्दोलन का प्रचार किया। अत: लोगों ने अधिक से अधिक भारतीय माल का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया और विदेशी माल खरीदना बन्द कर दिया। परिणामस्वरूप भारतीय उद्योगों को काफी प्रोत्साहन मिला। इस आन्दोलन में विद्यार्थियों तथा महिलाओं ने भी प्रशंसनीय काम किया। कुछ मुसलमान नेता भी इसमें शामिल हुए। बम्बई, मद्रास तथा उत्तरी भारत के अनेक भागों में इस आन्दोलन का बड़े पैमाने पर प्रचार हुआ।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 21 राजनीतिक जागृति तथा अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध राजनीतिक आन्दोलन

प्रश्न 7.
असहयोग आन्दोलन के बारे में विस्तारपूर्वक लिखें।
अथवा
असहयोग आन्दोलन क्यों चलाया गया ? इसके कार्यक्रम एवं उद्देश्य का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
महात्मा गांधी आरम्भ में अंग्रेज़ी शासन के पक्ष में थे। परन्तु प्रथम महायुद्ध की समाप्ति पर वह अंग्रेजी शासन के विरोधी बन गए और उन्होंने इसके विरुद्ध असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया।

कारण-
1. भारतीयों ने प्रथम महायुद्ध में अंग्रेज़ों को पूरा सहयोग दिया था, परन्तु महायुद्ध की समाप्ति पर अंग्रेज़ों ने भारतीय जनता का खूब शोषण किया।

2. प्रथम महायुद्ध के दौरान भारत में प्लेग आदि महामारियां फूट पड़ीं। परन्तु अंग्रेज़ी सरकार ने उसकी ओर कोई ध्यान न दिया।

3. गांधी जी ने प्रथम महायुद्ध में अंग्रेजों की सहायता करने का प्रचार इस आशा से किया था कि वे भारत को स्वराज्य प्रदान करेंगे। परन्तु  युद्ध की समाप्ति पर ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी की आशाओं पर पानी फेर दिया।

4. 1919 ई० में ब्रिटिश सरकार ने रौलेट एक्ट पास कर दिया। इस काले कानून के कारण जनता में रोष फैल गया।

5. रौलेट एक्ट के विरुद्ध प्रदर्शन के लिए अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक विशाल जनसभा हुई। अंग्रेजों ने एकत्रित भीड़ पर गोली चलाई जिससे सैंकड़ों लोग मारे गए।

6. सितम्बर, 1920 ई० में कांग्रेस ने अपना अधिवेशन कलकत्ता (कोलकाता) में बुलाया। इस अधिवेशन में ‘असहयोग आन्दोलन’ का प्रस्ताव रखा गया, जिसे बहुमत से पास कर दिया गया।

असहयोग आन्दोलन का कार्यक्रम अथवा उद्देश्य-असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम की रूपरेखा इस प्रकार है-

  • विदेशी माल का बहिष्कार करके स्वदेशी माल का प्रयोग किया जाए।
  • ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई उपाधियां तथा अवैतनिक पद छोड़ दिये जाएं।
  • स्थानीय संस्थानों में मनोनीत भारतीय सदस्यों द्वारा त्याग-पत्र दे दिए जाएं।
  • सरकारी स्कूलों तथा सरकार से अनुदान प्राप्त स्कूलों में बच्चों को पढ़ने के लिए न भेजा जाए।
  • ब्रिटिश अदालतों तथा वकीलों का धीरे-धीरे बहिष्कार किया जाए।
  • सैनिक, क्लर्क तथा श्रमिक विदेशों में अपनी सेवाएं अर्पित करने से इन्कार कर दें।

आन्दोलन की प्रगति तथा अन्त-असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम को जनता तक पहुंचाने के लिए महात्मा गांधी तथा मुस्लिम नेता डॉ० अंसारी, मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद तथा अली बन्धुओं ने सारे देश का भ्रमण किया। परिणामस्वरूप शीघ्र ही यह आन्दोलन बल पकड़ गया। जनता ने सरकारी विद्यालयों का बहिष्कार कर दिया। बीच चौराहों पर विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘सर’ की उपाधि तथा गांधी जी ने ‘केसरे हिन्द’ की उपाधि का त्याग कर दिया। इसी बीच उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा नामक स्थान पर उत्तेजित भीड़ ने एक पुलिस थाने को आग लगा दी। इस हिंसात्मक घटना के कारण गांधी जी ने असहयोग आन्दोलन की समाप्ति की घोषणा कर दी।

महत्व-

  • असहयोग आन्दोलन के कारण कांग्रेस ने सरकार से सीधी टक्कर ली।
  • भारत के इतिहास में पहली बार जनता ने इस आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
  • असहयोग आन्दोलन में ‘स्वदेशी’ का खूब प्रचार किया गया था। फलस्वरूप देश में उद्योग-धन्धों का विकास हुआ।

सच तो यह है कि गांधी जी द्वारा चलाये गये असहयोग आन्दोलन ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम को एक नई दिशा प्रदान की।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 2 मानवीय संसाधन-जनसंख्या और इसमें परिवर्तन

Punjab State Board PSEB 12th Class Geography Book Solutions Chapter 2 मानवीय संसाधन-जनसंख्या और इसमें परिवर्तन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Geography Chapter 2 मानवीय संसाधन-जनसंख्या और इसमें परिवर्तन

PSEB 12th Class Geography Guide मानवीय संसाधन-जनसंख्या और इसमें परिवर्तन Textbook Questions and Answers

प्रश्न I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक वाक्य में दें :

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर आर्थिक क्रियाओं का धुरा किसे कहा जा सकता है ?
उत्तर-
मानव को पृथ्वी पर आर्थिक क्रियाओं का धुरा कहा जाता है।

प्रश्न 2.
2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या घनत्व का कितना है ?
उत्तर-
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है।

प्रश्न 3.
अरुणाचल प्रदेश राज्य किस जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र में आता है ?
उत्तर-
अरुणाचल प्रदेश राज्य कम जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र में आता है।

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प्रश्न 4.
विश्व जनसंख्या दिवस कब मनाया जाता है ?
उत्तर-
हर साल 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है।

प्रश्न 5.
भारत की ज्यादा जनसंख्या किस आयु समूह के साथ सम्बन्धित है ?
उत्तर-
भारत की ज्यादा जनसंख्या 0-14 साल और 60 साल के आयु समूह से सम्बन्धित है।

प्रश्न 6.
2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब का लिंग अनुपात कितना है ?
उत्तर-
2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब का लिंगानुपात सिर्फ 893 है।

प्रश्न 7.
भारत में पहले दर्जे के शहरों की कम से कम जनसंख्या कितनी है ?
उत्तर-
भारत में पहले दर्जे के शहरों में कम से कम जनसंख्या 1 लाख अथवा इससे अधिक वाले शहर आते हैं।

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प्रश्न 8.
जनसंख्या की स्थान परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कोई दो कारक बताओ।
उत्तर-
जनसंख्या की स्थान परिवर्तन की प्रभावित करने वाले कारक हैं—

  1. आर्थिक कारक,
    • अच्छी कृषि योग्य भूमि का होना
    • रोजगार के अवसरों की उपलब्धता।
  2. सामाजिक कारक
    • धार्मिक स्वतन्त्रता
    • निजी स्वतन्त्रता।

प्रश्न 9.
सबसे अधिक भारतीय किन मध्य पूर्वी देशों में रहते हैं ?..
उत्तर-
सबसे अधिक भारतीय यू०एस०ए०, साऊदी अरब, इंग्लैंड, कैनेडा, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, यूरोप, न्यूजीलैंड इत्यादि देशों में रहते हैं।

प्रश्न 10.
2011 की जनगणना के अनुसार पुरुषों और औरतों की साक्षरता दर क्या है ?
उत्तर-
2011 की जनगणना के अनुसार पुरुषों की साक्षरता दर 80% और औरतों की साक्षरता दर 65.46% थी।

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प्रश्न 11.
नीचे दिए गए संसार के जनसंख्या के आंकड़ों को मिलाएँ—
1. पाकिस्तान — (क) 134.10 करोड़
2. बंगलादेश — (ख) 121.01 करोड़
3. चीन — (ग) 18.48 करोड़
4. भारत — (घ) 16.44 करोड़।
उत्तर-

  1. ग,
  2. घ,
  3. क,
  4. ख।

प्रश्न 12.
नीचे दिए गए किस राज्य की साक्षरता दर सबसे ज्यादा है ?
(i) मिजोरम,
(ii) मेघालय,
(iii) मणिपुर,
(iv) महाराष्ट्र।
उत्तर-
(iii) मणिपुर।

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प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर चार पंक्तियों में दें :

प्रश्न 1.
अलग-अलग जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों के नाम बताओ।
उत्तर-
जनसंख्या घनत्व का विश्लेषण करने के लिए भारत को तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है—

  1. अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र- इस श्रेणी में 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से अधिक जनसंख्या घनत्व वाले राज्य शामिल हैं जैसे बिहार, पश्चिमी बंगाल, उत्तर प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पंजाब, झारखण्ड, दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, पुडुचेरी, दमन, दीऊ और लक्षद्वीप इत्यादि केंद्र शासित प्रदेश इस वर्ग में शामिल
  2. साधारण घनत्व वाले प्रदेश-इस वर्ग में असम, गोआ, त्रिपुरा, कर्नाटक इत्यादि प्रमुख हैं। 3. कम घनत्व वाले प्रदेश-इस वर्ग में जम्मू कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश इत्यादि शामिल हैं।

प्रश्न 2.
जनसंख्या घनत्व को प्रभावित करने वाले चार कारक बताओ।
उत्तर-
जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करने वाले चार कारक हैं—

  1. धरातल-जिस जगह का धरातल समतल होता है वहाँ कृषि करनी आसान होती है। इसलिए लोग ऐसे स्थानों पर रहना अधिक पसंद करते हैं।
  2. खनिज पदार्थ और प्राकृतिक साधनों की उपलब्धि-जिस स्थान पर अच्छे खनिज पदार्थ और प्राकृतिक स्रोत मिलते हैं उन स्रोतों को प्राप्त करके मनुष्य अपनी आय बढ़ा सकते हैं। इसलिए ऐसे क्षेत्रों की जनसंख्या ज्यादा होगी।
  3. जलवायु-अधिक ठंडे या ज्यादा गर्म क्षेत्रों में लोग रहना पसंद नहीं करते। जहां पर जलवायु समान होती है इसलिए वहां जनसंख्या अधिक होगी।
  4. सामाजिक कारक-जहां लोग फिजूल के रीति रिवाजों को मानते हैं वहाँ पर लोग कम रहना पसंद करते हैं और जहां पर पढ़े-लिखे.और सकारात्मक सोच वाले लोग रहते हों वहाँ पर अधिक जनसंख्या होगी।

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प्रश्न 3.
दस साल में जनसंख्या वृद्धि निकालने का फार्मूला बताओ।
उत्तर-
भारत में हर दस सालों के बाद जनगणना होती है। दस सालों में कुल जनसंख्या में जो परिवर्तन होता है उसे जनसंख्या की वृद्धि कहते हैं। इलाके में जनसंख्या वृद्धि निकालने का फार्मूला है—
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प्रश्न 4.
अधिक जनसंख्या से होने वाली कोई चार समस्याएँ बताओ।
उत्तर-
अधिक जनसंख्या से होने वाली समस्याएँ हैं—

  1. स्थान की समस्या और मकानों की कमी
  2. पीने वाले जल की कमी
  3. अपराधों की संख्या का बढ़ना
  4. प्रदूषण की समस्या।

प्रश्न 5.
जनसंख्या परिवर्तन के निर्णायक तत्व क्या हैं ?
उत्तर-
किसी देश की जनसंख्या समान नहीं होती। समय-समय पर उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन आते रहते हैं। जनसंख्या परिवर्तन के मुख्य निर्णायक तत्व नीचे लिखे अनुसार हैं—

  1. जन्म दर-जिस क्षेत्र और स्थान की जन्म दर अधिक होती है वहाँ जनसंख्या अधिक होगी। जहां जन्म दर कम होगी वहां जनसंख्या कम होगी।
  2. मृत्यु दर-मृत्यु दर में वृद्धि के साथ जनसंख्या में कमी हो जाती है और कमी के साथ जनसंख्या में वृद्धि हो जाती है।
  3. प्रवास-स्थान बदली स्थाई और अस्थाई दो प्रकार की होती है। जब लोग शादी और किसी रोज़गार को ढूँढ़ने के लिए किसी अन्य जगह पर चले जाते हैं तब वहाँ पर जनसंख्या बढ़ जाती है स्थायी प्रवास कहते हैं परन्तु जब लोग अस्थाई रूप अर्थात् घूमने के लिए जाते हैं और वापिस अपने शहर लौट आते हैं उसे अस्थाई प्रवास कहते हैं।

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प्रश्न 6.
साक्षरता का अर्थ क्या है ?
उत्तर-
शब्दकोष अनुसार साक्षरता का अर्थ है-पढ़ने और लिखने की क्षमता। पर भारत की जनगणना की परिभाषा के अनुसार किसी भी भाषा में पढ़-लिख और समझ लेने की क्षमता को साक्षरता कहते हैं। इसलिए एक मनुष्य जो एक भाषा लिख और पढ़ सकता है और उसे समझ सकता है और उसकी आयु सात साल की है उसे शिक्षित कहते हैं। साक्षरता किसी देश के मानव विकास का एक प्रमाण चिन्ह होता है। साक्षरता किसी व्यक्ति के समझ के घेरे को और अधिक वृद्धि देती है। सारक्षता को किसी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास का मुख्य बिंदु माना जाता है।

प्रश्न 7.
साक्षरता दर निकालने का फार्मूला क्या है?
उत्तर-
साक्षरता दर निकालने का फार्मूला है—
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प्रश्न III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 10-12 पंक्तियों में दें :

प्रश्न 1.
किसी क्षेत्र में जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले राजनीतिक कारक कौन से हैं ?
उत्तर-
किसी क्षेत्र में जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले राजनीतिक कारक हैं—

  1. अगर कोई सरकार लोगों की ज़रूरतों और उम्मीदों को पूरा करने योग्य होती है, वहाँ पर लोग रहना पसंद करते हैं पर जिस क्षेत्र की सरकार लोगों की उम्मीदों को पूरा नहीं कर सकती लोग वहाँ पर रहना पसंद नहीं करते जहां किसी विशेष धर्म की पक्षपूर्ति हो वहां लोग रहना कम पसंद करते हैं।
  2. जिस जगह पर पेंशन इत्यादि की और बालिगों के कई अच्छे कानून बनाये गए हों, वहाँ लोग रहना पसंद करते हैं।
  3. जिस स्थान पर लोगों के लिए बढ़िया रोज़गार के मौके सरकार की तरफ से दिए जाते हैं लोग वहाँ पर रहना ज्यादा पसंद करते हैं।
  4. जिस स्थान पर हर राष्ट्रीय मुद्दे को सरकारी स्तर पर सूझ-बूझ के साथ निपटाया जाता है और क्षेत्र में शांति स्थापित की जाती है, वहां पर लोग रहना अधिक पसंद करते हैं।

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प्रश्न 2.
क्या शहरी क्षेत्रों को जनसंख्या के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है, और कैसे ?
उत्तर-
शहरी क्षेत्रों को जनसंख्या के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों के अनुसार भारत के जनगणना विभाग ने शहरों को नीचे लिखी श्रेणियों में विभाजित किया है—

  1. प्रथम दर्जे के शहर-जिन शहरों में जनसंख्या 1 लाख और इससे अधिक होती हैं-वे प्रथम दर्जे के शहरों के अन्तर्गत आते हैं।
  2. द्वितीय दर्जे के शहर-जिन शहरों की जनसंख्या 50,000 से 99,999 तक होती है, उन्हें द्वितीय दर्जे के शहरों में आंका जाता है।
  3. तृतीय दर्जे के शहर-जिन शहरों की जनसंख्या 20,000 से 49,999 तक होती है, उन्हें तृतीय दर्जे के शहर कहते हैं।
  4. चतुर्थ दर्जे के शहर-जिन शहरों की जनसंख्या 10,000 से 19,999 तक होती है, उन्हें चतुर्थ दर्जे के शहर कहते हैं।
  5. पंचम दर्जे के शहर-जिन शहरों की जनसंख्या 5,000 से 9,999 तक होती है उन्हें पंचम दर्जे के शहरों में आंका जाता है।
  6. छठे दर्जे के शहर-जिन शहरों की जनंसख्या 5,000 से कम होती है उन्हें छठे दर्जे के शहर कहते हैं।

प्रश्न 3.
प्रवास (Migration) के पर्यावरणीय परिणाम कौन-से हैं ?
उत्तर-
प्रवास के पर्यावरणीय नतीजे नीचे लिखे अनुसार हैं—

  1. गाँवों के लोग बेहतर सुविधा के लिए शहरों की तरफ अधिक आकर्षित होते हैं जिसके कारण अधिक संख्या में गाँव के लोग शहरों की तरफ प्रवास कर रहे हैं। इस कारण शहर अधिक जनसंख्या वाले बनते जा रहे हैं।
  2. प्रवास के कारण अप्रवास (Immigration) वाले क्षेत्रों की मूल संरचना पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ता है।
  3. शहरी क्षेत्रों में अधिक से अधिक प्रवास के कारण शहरों में गैर आयोजन और असंतुलित विकास के निष्कर्ष निकलते हैं।
  4. जब शहरी जनसंख्या बढ़ जाती है तब रहने के लिए जगह की कमी हो जाती है जिस कारण बस्तियां गंदी हो जाती हैं।
  5. शहरों में जनसंख्या के वृद्धि के कारण, क्योंकि मनुष्यों की जनसंख्या बढ़ जाती है कई तरह की समस्याएँ, जैसे कि सफाई की, जल की कमी इत्यादि आ जाती हैं।

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प्रश्न 4.
क्या साक्षरता मानवीय विकास सूचक का मापक है ?
उत्तर-
साक्षरता किसी देश के मानवीय विकास सूचक (HDI) का मापक है। साक्षरता के कारण व्यक्ति की सूझबूझ का घेरा बढ़ जाता है। अधिक साक्षरता किसी देश के सामाजिक, आर्थिक अथवा राजनीतिक विकास में योगदान डालती है और स्पष्ट शब्दों में हम कह सकते हैं कि साक्षरता लोगों के विकास का आधार है। अनपढ़ और अशिक्षित लोग विकास का अनिवार्य स्तर हासिल नहीं कर पाते। साक्षरता के कारण लोगों के रहन-सहन और बोलचाल के ढंग में सुधार आता है। स्त्रियों की सामाजिक दशा में सुधार आता है। मनुष्य की रूढ़िवादी सोच बदल जाती है और स्त्रीपुरुष का भेद कम हो जाता है। यह देश के सामाजिक और आर्थिक विकास का कारण भी है अथवा नतीजा भी। जिन देशों की साक्षरता दर कम होती है उन देशों में अधिकतर पर आर्थिक और सामाजिक विकास की कमी भी देखने को मिलती है और जिस जगह की साक्षरता दर ज्यादा होती है उस देश का आर्थिक, सामाजिक विकास भी ज्यादा होता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि साक्षरता मानवीय विकास सूचक का मापक है।

प्रश्न 5.
जनसंख्या की प्रवास के प्रतिकर्ष और अपकर्ष करने वाले कारकों का वर्णन करो।
उत्तर-
जनसंख्या की प्रवास के प्रतिकर्ष और अपकर्ष करने वाले कारकों का वर्णन नीचे लिखे अनुसार है—

प्रतिकर्ष कारक  (Pull Factor) अपकर्ष कारक (Push Factors)
1. जिस स्थान पर लोगों के लिए कोई काम न हो, बेरोजगारी हो, वहाँ से लोग किसी और स्थान की तरफ जाना शुरू कर देते हैं। 1. जिस स्थान पर रोजगार के अच्छे मौके मिल रहेहों लोग उस तरफ को आकर्षित होते हैं।
2. बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण लोग अपना क्षेत्र छोड़कर चले जाते हैं। 2. जिस स्थान पर प्राकृतिक आपदाओं का संकट न हो, लोग वहाँ चले जाते हैं। ।
3. युद्ध और लड़ाई के डर के कारण लोग अपने स्थान को छोड़ देते हैं। 3. राजनीतिक और सामाजिक सुरक्षा क्षेत्र भी मनुष्य को आकर्षित करते हैं।
4. जिस स्थान की जमीन उपजाऊ नहीं होती, फ़सल करती है। 4. उपजाऊ भूमि वाली जगह भी लोगों को आकर्षित अच्छी नहीं होती, लोग उस जगह को छोड़ देते हैं।
5. किसी स्थान पर सेवा और सुविधाएँ कम होने के कारण लोग उस स्थान को छोड़ देते हैं। 5. किसी स्थान पर अच्छी सेवा और सुविधा के कारण लोग वहाँ पर चले जाते हैं।

 

प्रश्न 6.
भारतीयों के संसार में फैलाव पर नोट लिखो।
उत्तर-
भारतीयों के संसार में फैलाव का इतिहास बहुत पुराना है। बस्तीवादी काल के दौरान गुलाम मजदूरों को अंग्रेजों ने काम करने के लिए एशिया के दूसरे देशों में भेजा। इन मजदूरों की अधिक संख्या पश्चिमी बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल तथा उड़ीसा इत्यादि से थी जिनको इग्लैंड की बस्तियों, अफ्रीका, दक्षिण पूर्वी एशिया जैसे देशों में काम के लिए भेजा गया। इन मजदूरों को अधिकतर पर जहाँ चीनी मिल, कपास की खेती, चाय के बाग और रेलमार्ग निर्माण इत्यादि के कामों के लिए भेजा जाता था। अधिकतर मध्यवर्ग के लोगों ने दूसरे देशों में प्रवास किया। इनमें साक्षर और निरक्षर दोनों तरह के मज़दूर मौजूद थे। पंजाब के दोआबा क्षेत्र के इलाकों में बहुत सारे लोगों ने इंग्लैंड, कनाडा, यू०एस०ए०, आस्ट्रेलिया इत्यादि देशों की तरफ प्रवास किया। आज के समय में लगभग हर देश में भारतीयों का फैलाव देखा जा सकता है। आजकल पढ़े-लिखे लोग भी बढ़िया नौकरी की तलाश में या फिर बेहतर साक्षरता के लिए दूसरे देशों की तरफ जा रहे हैं। भारतीयों ने विकसित देशों में अपना अहम स्थान बना रखा है।

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प्रश्न III. नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर 20 वाक्यों में दें—

प्रश्न 1.
जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक कौन से हैं ?
उत्तर-
जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक नीचे दिए अनुसार हैं—
1. जलवायु-जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों में जलवायु सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कारक है। जिस स्थान का जलवायु अधिक गर्म तथा अधिक ठंडा होता है लोग वहाँ पर रहना पसंद नहीं करते, पर जिस स्थान का जलवायु औसत दर्जे का होता है लोग वहाँ पर अधिक रहना पसंद करते हैं।

2. धरातल और मिट्टी की किस्म-क्योंकि कृषि मनुष्य की कमाई का मुख्य स्रोत है इसलिए जिस स्थान की मिट्टी ज्यादा उपजाऊ होती है तथा समतल होती है वह स्थान कृषि के लिए उत्तम होता है। लोग वहां पर रहना पसंद करते हैं। यही कारण है कि अधिक तेज ढलान वाले क्षेत्रों में लोग कम रहते हैं।

3. जल, खनिज पदार्थ तथा प्राकृतिक साधनों की उपलब्धि-जल मनुष्य की पहली जरूरत है। खारे तथा पीने योग्य पानी की कमी वाले क्षेत्रों में जनसंख्या की कमी होती है। खनिज पदार्थ और प्राकृतिक साधनों की उपलब्धि किसी देश के आर्थिक विकास की कुंजी है। मानव का विकास सीधे रूप में आर्थिक विकास के ऊपर निर्भर करता है।

4. यातायात और संचार के साधन-यातायात के विकास के साथ मनुष्य को यातायात के साधनों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना आसान होता है तथा संचार के साधनों के विकास के साथ देश का आर्थिक विकास होता है। इसलिए जिस स्थान पर यातायात और संचार के साधनों की उपलब्धि होती है लोग वहाँ पर रहना पसंद करते हैं।

5. ऊर्जा की उपलब्धि-मानवीय साधनों के विकास के लिए बिजली ऊर्जा शक्ति अति आवश्यक है। इसलिए जिस स्थान पर सस्ती ऊर्जा की उपलब्धि होती है वहाँ लोग अधिक रहना पसंद करते हैं।

6. राजनैतिक तथा सामाजिक सुरक्षा-जिस स्थान पर लड़ाई तथा युद्ध का डर होता है वहाँ लोग कम रहते हैं पर जिस देश की सरकार ने सामाजिक सुरक्षा का भरोसा दिलाया होता है उस स्थान की जनसंख्या अधिक होगी।

7. रोज़गार के अवसरों की उपलब्धि- इसके कारण ही बहुत सारे लोग गाँव को छोड़ कर शहरों की तरफ आकर्षित होते हैं।

प्रश्न 2.
वह कौन-सी समस्याएँ हैं जिनका सामना पहले दर्जे के शहरों के नागरिक, छठे दर्जे के शहरों के नागरिकों से भी अधिक करते हैं ?
उत्तर-
जिन स्थानों की जनसंख्या 1 लाख अथवा इससे अधिक होती है, वे पहले दर्जे के क्षेत्र हैं तथा जिनकी जनसंख्या 5000 से कम होती है, वे छठे दर्जे के क्षेत्रों में आते हैं। कुछ समस्याएँ जिनका सामना पहले दर्जे के शहरों के नागरिक छठे दर्जे के शहरों के नागरिकों से अधिक करते हैं, इस प्रकार हैं—

  1. जनसंख्या विस्फोट असहनीय-जब लोग बेहतरीन अवसरों की खोज में अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर में जाकर निवास करते हैं तब उन शहरों की जनसंख्या बढ़ जाती है जिसके कारण रहने के स्थान की कमी हो जाती है, जो आजकल हमारे पहले दर्जे के शहर सहन कर रहे हैं। इसके कारण लोगों को गंदगी वाली हालात में मजबूरी के कारण रहना पड़ता है।
  2. गंदी बस्तियों का जन्म-पहले दर्जे के शहरों में जनसंख्या की वृद्धि के कारण बस्तियों का प्राकृतिक पर्यावरण बिगड़ने लगता है। अधिक भीड़ के कारण गंदगी फैलती है और बस्तियाँ गंदी होनी शुरू हो जाती हैं।
  3. पीने वाले पानी की समस्या-अधिक जनसंख्या के कारण पीने वाले पानी की समस्या बढ़ जाती है।
  4. प्रदूषण की समस्या-जनसंख्या के बढ़ाव के कारण अधिक-से-अधिक उद्योग विकसित होते हैं तथा अधिक-से-अधिक वाहन आने शुरू होते हैं। इसके कारण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न है।
  5. अपराधों की संख्या में बढ़ाव-जिन लोगों को काम के लिए अच्छे अवसर नहीं मिलते वे गलत रास्ते अपना लेते हैं जिसके कारण अपराधों की संख्या बढ़ जाती है।

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प्रश्न 3.
जनसंख्या प्रवास (Migration) के कारण कौन से हैं ?
उत्तर-
किसी क्षेत्र की जनसंख्या की तबदीली को जनसंख्या प्रवास बहुत प्रभावित करती है। प्रवास स्थाई या अस्थाई दो रूप में हो सकती है। जनसंख्या प्रवास के मुख्य कारण नीचे दिए अनुसार हैं—

  1. आर्थिक कारण-आर्थिक कारण स्थान बदली के लिए जिम्मेदार कारणों में सबसे अधिक प्रमुख हैं। जैसे कि—
    • क्षेत्र की आर्थिक दशा कैसी है और क्षेत्र के औद्योगिक विकास का परिदृश्य किस प्रकार का है।
    • क्षेत्र का धरातल तथा मिट्टी की किस्म खेती योग्य है या नहीं।
    • भूमि पर मानव के स्वामित्व का आकार।
    • रोज़गार के अवसर क्षेत्र में कैसे हैं।
    • क्षेत्र में यातायात तथा संचार के साधन किस प्रकार के हैं।
  2. सामाजिक कारण-सामाजिक कारण भी प्रवास में अहम भूमिका निभाते हैं जैसे कि
    • शादी के बाद औरतें अपने माता-पिता का घर छोड़कर पति के घर चली जाती हैं।
    • बढ़िया और उच्च शिक्षा के लिए बच्चे एक से दूसरे स्थान पर चले जाते हैं।
    • जिस स्थान पर धार्मिक आजादी होती है, लोग वहाँ अधिक जाते हैं।
    • सरकारी नीति भी एक बड़ा सामाजिक कारण है।
  3. जनांकण कारण-जनांकण एक महत्त्वपूर्ण कारक है, जैसे कि आयु कारक, स्थान बदली करने वाले लोगों की उम्र (आयु) कितनी है।
  4. राजनैतिक कारण-जिस क्षेत्र की सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरी उतरती है, उस स्थान पर लोग अधिक रहना पसंद करेंगे।
  5. ऐतिहासिक कारण-कई प्रकार के ऐतिहासिक कारक भी लोगों की प्रवास पर प्रभाव डालते हैं। लोग अपने धर्म के साथ सम्बन्धित स्थान अथवा ऐतिहासिक महत्त्व वाले स्थानों पर रहना पसंद करते हैं।

प्रश्न 4.
जनांकण परिवर्तन सिद्धान्त के अलग-अलग चरणों की चर्चा करो।
उत्तर-
जनांकण परिवर्तन सिद्धान्त डब्ल्यू० एस० थोपसन और फ्रैंक नोटसटीन द्वारा पेश किया गया। जनांकण परिवर्तन सिद्धान्त के अलग-अलग चरणों का वर्णन नीचे दिए अनुसार है—

1. पहला चरण-इस चरण में जनसंख्या कम होती है तथा आ तौर पर जनसंख्या स्थिर रहती है। दोनों ही जन्म दर तथा मृत्यु दर अधिक होती हैं, पर कई बार देश में खुशहाली के कारण मृत्यु दर कम हो जाती है। पर इसके विपरीत कई बार मृत्यु दर लगातार प्राकृतिक आपदाओं के कारण बढ़ जाती है। लोगों का मुख्य रोज़गार कृषि है। जनसंख्या की वृद्धि कम या नकारात्मक होती है। लोगों के पास तकनीकी ज्ञान की कमी होती है, अधिकतर लोग अशिक्षित होते हैं।

2. दूसरा चरण-उद्योगों के विकास के कारण लोगों का स्वास्थ्य और रहन-सहन अच्छा हो गया है। खास तौर पर जिन शहरों में सफाई और स्वास्थ्य के विकास के तरफ अधिक ध्यान दिया जाता है, वहाँ लोगों का रहनसहन ज्यादा सुधर गया है। इस धारणा का महत्त्व यह है कि उपर्युक्त सेवाएँ, भोजन सुविधा, सफाई प्रबंध इत्यादि के कारण मृत्यु दर में कमी आती है। इस तरह जन्म दर और मृत्यु दर के बीच फासला बढ़ने के कारण जनसंख्या में तेजी के साथ वृद्धि होती है।

3. तीसरा चरण-तीसरा और आखिरी चरण वह चरण है, जहाँ जन्म दर अथवा मृत्यु दर दोनों ही कम हो जाती हैं। जनसंख्या वृद्धि या तो स्थिर होती है या फिर बहुत ज्यादा कम हो जाती है। इस चरण में साक्षरता दर काफी ऊँची हो जाती है। औद्योगिक विकास के कारण शहरीकरण में वृद्धि होती है। यू० एस० ए०, कनाडा, यूरोप इत्यादि देश इस चरण पर हैं। पर भारत के लिए इस चरण को प्राप्त करना एक अन्तिम उद्देश्य है। इस चरण में क्योंकि लोग शिक्षित और सूझवान हैं, मृत्यु दर और जन्म दर दोनों ही कम होने के कारण जनसंख्या भी । कम होनी शुरू हो जाती है।

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प्रश्न 5.
साक्षरता दर क्या है ? इस पक्ष से हमारे राज्यों की स्थिति कितनी अच्छी है ?
उत्तर-
साक्षरता-एक व्यक्ति जो लिख और पढ़ सकता है और उसकी उम्र 7 साल है, उसे साक्षर माना जाता है। शब्दकोष के अनुसार, किसी भी भाषा में पढ़, लिख तथा समझ लेने की योग्यता को साक्षरता कहते हैं। किसी देश के मानव विकास का मापक साक्षरता है। साक्षरता के कारण ही मानव की सूझ-बूझ का विकास होता है।
साक्षरता के अनुसार दुनिया के पहले दस देश निम्नलिखित हैं—

देश साक्षरता दर (प्रतिशत) युवा साक्षरता दर (आयु 15-24)
चीन 94.4% 99.7%
श्री लंका 92.6% 98.8%
म्यांमार 93.1% 96.3%
भारत 74.04% 90.2%
नेपाल 64.7% 86.9%
पाकिस्तान 60.00% 74.8%
बंगला देश 61.5% 83.2%

भारत में सबसे अधिक साक्षरता दर केरल (94%) में है। इसके बाद क्रमवार मिजोरम (91.3%), गोआ (88.70%) आदि हैं और बिहार में (61.80%) सबसे कम साक्षरता दर है। पंजाब की साक्षरता दर 75.8% है।

Geography Guide for Class 12 PSEB मानवीय संसाधन-जनसंख्या और इसमें परिवर्तन Important Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Objective Type Question Answers)

A. बहु-विकल्पी प्रश्न :

प्रश्न 1.
21वीं सदी की शुरुआत में संसार की जनसंख्या कितनी थी ?
(A) 4 बिलियन
(B) 6 बिलियन
(C) 8 बिलियन
(D) 10 बिलियन।
उत्तर-
(B)

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प्रश्न 2.
सन् 2011 के आंकड़ों के मुताबिक भारत का जनसंख्या घनत्व कितना है ?
(A) 77 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०
(B) 322 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०
(C) 382 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०
(D) 383 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०।
उत्तर-
(C)

प्रश्न 3.
किस देश का जनसंख्या घनत्व सबसे अधिक हैं ?
(A) चीन
(B) भारत
(C) सिंगापुर
(D) इण्डोनेशिया।
उत्तर-
(C)

प्रश्न 4.
हर साल देश की जनसंख्या में कितने लोग शामिल होते हैं ?
(A) 6 करोड़
(B) 7 करोड़
(C) 8 करोड़
(D) 10 करोड़।
उत्तर-
(C)

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प्रश्न 5.
विश्व जनसंख्या दिवस कब मनाया जाता है ?
(A)7 जुलाई
(B) 11 जुलाई ,
(C) 5 मई
(D) 10 फरवरी।
उत्तर-
(B)

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन-सा जनसंख्या तबदीली निर्धारक नहीं है ?
(A) जन्म दर
(B) मृत्यु दर
(C) स्थान बदली
(D) मध्य काल।
उत्तर-
(D)

प्रश्न 7.
निम्नलिखित महाद्वीपों में किस महाद्वीप में लिंगानुपात कम हैं ?
(A) यूरोप
(B) एशिया
(C) अमेरिका
(D) ऑस्ट्रेलिया।
उत्तर-
(C)

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प्रश्न 8.
संसार का औसत लिंगानुपात कितना है ?
(A) 970
(B) 980
(C) 990
(D) 910
उत्तर-
(B)

प्रश्न 9.
2011 की जनांकिकी के अनुसार भारत की कुल साक्षरता दर कितनी है ?
(A) 70%
(B) 73%
(C) 72%
(D) 71%
उत्तर-
(B)

प्रश्न 10.
पहले दर्जे के शहर कौन-से हैं ?
(A) जहां जनसंख्या 1 लाख से ज्यादा हो
(B) जहां जनसंख्या 50,000 तक हो
(C) जहां जनसंख्या 99,000 तक हो
(D) जहां जनसंख्या 5,000 है।
उत्तर-
(A)

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प्रश्न 11.
बुढ़ापा जनसंख्या की आयु किससे अधिक है ?
(A) 40 साल
(B) 50 साल
(C) 45 साल
(D) 60 साल।
उत्तर-
(D)

प्रश्न 12.
भारत में काम किस आयु वर्ग के साथ सम्बन्धित है ?
(A) 17-20
(B) 0-15
(C) 0-14
(D) 15-59.
उत्तर-
(D)

B. खाली स्थान भरें :

  1. ………… पृथ्वी पर सभी आर्थिक क्रियाओं का धुरा माना जाता है।
  2. केवल उत्तर प्रदेश में भारत की ………. जनसंख्या निवास करती है।
  3. 1947 में ……….. के विभाजन के कारण जनसंख्या की वृद्धि कम हो गई।
  4. संसार की साक्षरता दर ……… है।
  5. ………….. से कम जनसंख्या वाले शहर छठे दर्जे के शहर हैं।

उत्तर-

  1. मानव,
  2. 16.4%,
  3. भारत और पाकिस्तान,
  4. 86.3%
  5. 5,000.

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C. निम्नलिखित कथन सही (✓) हैं या गलत (✗):

  1. अरुणाचल प्रदेश की जनसंख्या का घनत्व 110 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है।
  2. मृत्यु दर में तबदीली किसी स्थान की जनसंख्या में तबदीली हो सकती है।
  3. ऊर्जा की उपलब्धि किसी स्थान की जनसंख्या को प्रभावित नहीं करती।
  4. शहरी क्षेत्रों में बड़े दर्जे पर स्थान बदली गैर योजनाबंदी तथा असंतुलित विकास का कारण बनती है।
  5. पंजाब का लिंग अनुपात 893 है।

उत्तर-

  1. गलत,
  2. सही,
  3. गलत,
  4. सही,
  5. सही।

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्नोत्तर (One Word/Line Question Answers) :

प्रश्न 1.
किस साधन को देश का कीमती स्त्रोत माना जाता है ?
उत्तर-
मनुष्य को।

प्रश्न 2.
2011 की जनांकिकी के अनुसार भारत की औसत जनसंख्या कितनी है ?
उत्तर-
121.02 करोड़।

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प्रश्न 3.
जनसंख्या और क्षेत्र के आधार पर भारत देश का कौन-सा स्थान है ?
उत्तर-
क्षेत्र के आधार पर सातवां और जनसंख्या के आधार पर दूसरा स्थान है।

प्रश्न 4.
सबसे पहली बार भारत में (जनगणना) जनांकिकी कब शुरू हुई ?
उत्तर-
1881 में।

प्रश्न 5.
भारत की जनसंख्या का घनत्व क्या है ?
उत्तर-
382 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०

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प्रश्न 6.
भारत में गाँवों की संख्या कितनी है ?
उत्तर-
2011 की जनगणना के अनुसार 650,244 गाँव भारत में हैं।

प्रश्न 7.
भारत में किस राज्य की सबसे अधिक जनसंख्या तथा किस राज्य की जनसंख्या कम है ?
उत्तर-
उत्तर प्रदेश में अधिक तथा सिक्किम में कम जनसंख्या है।

प्रश्न 8.
जनसंख्या वृद्धि से आपका क्या अर्थ है ?
उत्तर-
कुछ कारणों के कारण जब किसी स्थान की जनसंख्या में वृद्धि हो जाती है, उसे जनसंख्या की वृद्धि कहते हैं।

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प्रश्न 9.
भारत में लिंग अनुपात का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
एक हजार पुरुषों के पीछे औरतों की संख्या को लिंग अनुपात कहा जाता है।

प्रश्न 10.
भारत के किस राज्य में अधिक तथा किस राज्य में कम लिंग अनुपात है ?
उत्तर-
अधिक केरल में और कम हरियाणा में।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
देश में जनसंख्या का विभाजन एक समान नहीं है, इस कथन की व्याख्या करो।
उत्तर-
प्राकृतिक, आर्थिक तथा सामाजिक भेद के कारण देश की 90% जनसंख्या देश के सिर्फ 10% क्षेत्र में रहती हैं। देश की सबसे अधिक जनसंख्या वाले पहले 10 देशों में 60% तक की देश की जनसंख्या समाई हुई है। इसलिए हम कह सकते हैं कि देश की जनसंख्या का विभाजन एक समान नहीं है।

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प्रश्न 2.
जनसंख्या के घनत्व से क्या अभिप्राय है ? इसको किस तरह मापा जा सकता है ?
उत्तर-
जनसंख्या घनत्व-किसी प्रदेश की जनसंख्या और भूमि के क्षेत्रफल के अनुपात को जनसंख्या घनत्व कहते हैं। यह घनत्व प्रति वर्ग मील या प्रति वर्ग किलोमीटर द्वारा प्रकट किया जाता है।
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प्रश्न 3.
जनसंख्या घनत्व का विश्लेषण करने के लिए भारत को किन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर-
जनसंख्या घनत्व का विश्लेषण करने के लिए भारत को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है—

  1. अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र
  2. मध्यम जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र
  3. कम जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र।

प्रश्न 4.
जनसंख्या वृद्धि से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जनसंख्या वृद्धि का अर्थ है किसी खास क्षेत्र में, किसी खास समय में जब जनसंख्या में वृद्धि होती है, उसे जनसंख्या की वृद्धि कहते हैं।

प्रश्न 5.
कच्ची जन्म दर क्या है ?
उत्तर-
जब किसी स्थान की जन्म दर ऊंची होती है, तब जनसंख्या में वृद्धि हो जाती है। इसे जन्म दर की कच्ची जन्म दर कहते हैं। इसको इस प्रकार मापा जाता है—
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प्रश्न 6.
कच्ची मृत्यु दर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जब किसी स्थान की मृत्यु दर ऊँची हो जाती है, तब जनसंख्या में कमी हो जाती है। मृत्यु दर को कच्ची मृत्यु दर भी कहते हैं। इसे इस प्रकार मापा जाता है—
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प्रश्न 7.
लिंग अनुपात से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
भारत में लिंग अनुपात का अर्थ है कि 1000 मर्दो के पीछे कितनी औरतों की संख्या है। इसको नीचे दिए गए अनुसार निकाला जाता है।
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प्रश्न 8.
जनसंख्या की बनावट से आपका क्या अर्थ है ?
उत्तर-
जनसंख्या की बनावट का अर्थ है जनांकन की संरचना। इसमें आयु, लिंग, साक्षरता, रोजगार, जीवनकाल इत्यादि शामिल हैं।

प्रश्न 9.
आयु संरचना का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
जनसंख्या में कौन-कौन से आयु वर्ग के लोग हैं, को आयु संरचना कहते हैं। यह जनसंख्या बनावट का बड़ा महत्त्वपूर्ण अंग है। इस प्रकार हम किसी स्थान में काम करने वाले लोगों की संख्या कितनी है, के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस द्वारा हम भविष्य में होने वाली जनसंख्या का भी अंदाजा लगा सकते हैं।

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प्रश्न 10.
भारत में अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र कौन-से हैं ? अधिक जनसंख्या का कोई एक कारण बताओ।
उत्तर-
भारत में कुल 650,244 गाँव हैं। भारत में हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, उड़ीसा, बिहार, उत्तर प्रदेश में 80% ग्रामीण जनसंख्या रहती है। उस जनसंख्या का मुख्य कारण यह है कि इन लोगों का मुख्य रोज़गार कृषि है।

प्रश्न 11.
भारत की जनसंख्या में बहुत असमानता है ? उदाहरण देकर इस कथन को समझाओ।
उत्तर-
भारत की जनसंख्या में बहुत असमानता है, क्योंकि—

  1. भारत के लोग मुख्य रूप में कृषि पर आश्रित हैं इसलिए समतल क्षेत्रों में अधिक लोग रहते हैं। मरुस्थली तथा जंगली क्षेत्रों में जनसंख्या कम है।
  2. बड़े राज्यों में जनसंख्या अधिक है।
  3. नदियों के नज़दीक क्योंकि फसलों के लिए पानी आसानी के साथ मिल जाता है, लोग यहां पर अधिक रहते हैं।

प्रश्न 12.
भारत के उन क्षेत्रों के नाम बताओ जिनमें जनसंख्या कम है और इसके क्या कारण हैं ?
उत्तर-
जिस स्थान पर जनसंख्या घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि० मी० है, वहां पर जनसंख्या कम होती है। ये स्थान हैं—

  1. राजस्थान
  2. मध्य प्रदेश
  3. आंध्र प्रदेश
  4. पूर्वी कर्नाटक
  5. पश्चिमी उड़ीसा
  6. छत्तीसगढ़।

कारण-कम जनसंख्या के कारण हैं—

  1. कम-उपजाऊ भूमि
  2. कम वर्षा वाले क्षेत्र
  3. मरुस्थली क्षेत्र
  4. पानी की कमी इत्यादि।

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प्रश्न 13.
पतिकर्ष कारक (Push Factors) कौन-से हैं ?
उत्तर-
जिन कारकों के कारण लोग अपने स्थानों को छोड़कर कहीं और चले जाते हैं उन्हें प्रतिकर्ष कारक कहते हैं। जैसे कि गरीबी, रोज़गार का न होना, जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक संकट, शादी, सुरक्षित पर्यावरण, चिकित्सा सुविधा इत्यादि।

प्रश्न 14.
अपकर्ष कारक (Pull Factors) कौन से हैं ?
उत्तर-
जिन कारकों के कारण लोग किसी अच्छे रोज़गार की तलाश में, चिकित्सा सुविधा, उपजाऊ भूमि, सुरक्षित पर्यावरण इत्यादि से प्रभावित होकर चले जाएं, उन्हें अपकर्ष कारक कहते हैं।

प्रश्न 15.
लिंग अनुपात के कम होने के मुख्य कारण क्या हैं ?
उत्तर-
लिंग अनुपात के कम होने के मुख्य कारण नीचे दिए अनुसार हैं—

  1. लड़कियों के मुकाबले लड़कों की जन्म दर ज्यादा है।
  2. लड़कियों को पेट में ही खत्म करवा दिया जाता है।
  3. लड़के को प्राप्त करने की इच्छा।
  4. लिंग के बारे में पहले जांच करवाना।

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प्रश्न 16.
जनसंख्या की वृद्धि दर (Growth Rate) से आपका क्या अर्थ है ?
उत्तर-
जनसंख्या की वृद्धि असल संख्या में या प्रतिशत में दिखाई जाती है तथा जब जनसंख्या की वृद्धि प्रतिशत में दिखाई जाती हो तब उसे जनसंख्या की वृद्धि दर (Growth Rate) कहते हैं।

प्रश्न 17.
भारत के मिलियन कस्बों (Million Towns) के नाम बताओ।
उत्तर-
कोलकाता, मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, बंगलौर, अहमदाबाद, हैदराबाद, पूणे, कानपुर, नागपुर, लखनऊ।

लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
अधिक जनसंख्या, कम जनसंख्या तथा साधारण जनसंख्या वाले क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व कितना मिलता है ? हर श्रेणी की एक-एक उदाहरण दो।
उत्तर-
हमारे संसार में जनसंख्या का वितरण समान नहीं है। कई क्षेत्र ऐसे हैं यहाँ जनसंख्या बहुत अधिक है तथा दूसरे तरफ कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ पर जनसंख्या साधारण है और कुछ ऐसे भी हैं जो क्षेत्र खाली हैं।

  1. अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र-इन क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० है। इन क्षेत्रों में बिहार, पश्चिमी बंगाल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, झारखंड इत्यादि आ जाते हैं।
  2. साधारण जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र-इन क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व 200 से 400 व्यक्ति प्रतिवर्ग कि०मी० है। जैसे कि असम, गोआ, त्रिपुरा, कर्नाटक इत्यादि।
  3. कम जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्र-इन क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० है। जैसे ‘कि अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश इत्यादि।

प्रश्न 2.
जनसंख्या वृद्धि तथा जनसंख्या घनत्व में क्या फर्क है ?
उत्तर-
जनसंख्या वृद्धि-जनसंख्या वृद्धि का अर्थ है कि किसी खास समय में किसी क्षेत्र के लोगों की संख्या कितनी बढ़ गई है। यह किसी देश के विकास में योगदान डालती है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1,21,01,93,422 थी।
जनसंख्या घनत्व-यह प्रतिशत में पेश की जाती है। किसी क्षेत्र के एक वर्ग कि०मी० में कितने लोग मिलते हैं, उसको जनसंख्या घनत्व कहते हैं। 2011 के आंकड़ों के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० था। यह किसी क्षेत्र के जनांकन के गुणों को प्रभावित करता है।

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प्रश्न 3.
जनसंख्या की वृद्धि क्या है ? इसकी किस्में बताओ तथा इसको किस प्रकार संयोजित किया जा सकता है ?
उत्तर-
जनसंख्या की वृद्धि-किसी क्षेत्र में जनसंख्या की वृद्धि और जनसंख्या में हुई तबदीली को जनसंख्या की वृद्धि कहते हैं। इसको संयोजित निम्नलिखितानुसार किया जाता है—
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जनसंख्या जनसंख्या की वृद्धि को तीन प्रकार विभाजित किया जा सकता है—

  1. प्राकृतिक जनसंख्या की वृद्धि-किसी क्षेत्र में किसी खास समय पर हुए जन्म तथा मृत्यु में आपसी असमानता को जनसंख्या की प्राकृतिक वृद्धि कहते हैं।
  2. सकारात्मक जनसंख्या की वृद्धि-अगर किसी स्थान की जन्म दर उस स्थान की मृत्यु दर से अधिक है या कुछ लोग किसी और स्थान से आकर प्रवास करते हैं तो उसे सकारात्मक जनसंख्या की वृद्धि कहते हैं।
  3. नकारात्मक जनसंख्या की वृद्धि-अगर किसी स्थान की मृत्यु दर उस स्थान की जन्म दर से अधिक हो जाए तथा वहाँ पर कुछ लोग प्रवास कर गए हों उसे नकारात्मक जनसंख्या की वृद्धि कहते हैं।

प्रश्न 4.
किस प्रकार के स्थानों पर लिंग अनुपात नकारात्मक है। इसके कोई चार कारण बताओ।
उत्तर-
जिन क्षेत्रों में लिंग को लेकर भेदभाव व्यापक है, उन क्षेत्रों में लिंग अनुपात नकारात्मक है। इसके कारण निम्नलिखित अनुसार हैं—

  1. शिशु हत्या
  2. भ्रूण हत्या
  3. औरत के खिलाफ घरेलू हिंसा
  4. औरत का निम्न सामाजिक-आर्थिक स्तर।

प्रश्न 5.
संसार में भारत का जनसंख्या के आकार तथा घनत्व के तौर पर क्या स्थान है ?
उत्तर-
भारत संसार के अधिक जनसंख्या वाले देशों में एक है। इसकी जनसंख्या 175 प्रतिशत है तथा आकार के अनुसार भारत दुनिया का सातवां बड़ा देश है। यह संसार के कुल क्षेत्रफल का 2.4% हिस्सा है।
भारत की जनसंख्या उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या से दोगुणी है। इससे पता चलता है कि भारत की जनसंख्या बहुत अधिक है।

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प्रश्न 6.
साक्षरता दर क्या है ? देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों में साक्षरता दरों में भिन्नता क्यों पाई जाती है ?
उत्तर-
साक्षरता दर-सात साल की आयु तक के निवासी जो लिख तथा पढ़ सकते हैं की संख्या या प्रतिशत जनसंख्या को साक्षरता दर कहते हैं। देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों में साक्षरता दरों में भिन्नता आर्थिक विकास, शहरीकरण तथा लोगों के रहने के ढंग-तरीकों के कारण होती है। अशिक्षित तथा अनपढ़ लोगों से देश के विकास का आवश्यक स्तर प्राप्त नहीं हो सकता तथा उसे साक्षरता दर भी कम होती है।

प्रश्न 7.
संसार की जनसंख्या में रहने के स्थान के आधार पर दो हिस्सों में विभाजन करके बताओ कि दोनों हिस्सों का रहन-सहन एक-दूसरे से क्यों अलग है ?
उत्तर-
संसार की जनसंख्या को निवास के आधार पर दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है—

  1. ग्रामीण जनसंख्या
  2. शहरी जनसंख्या

ग्रामीण अथवा शहरी जनसंख्या में भिन्नतायें—

  1. सामाजिक हालातों में रहन-सहन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों का अलग होता है।
  2. ग्रामीण जनसंख्या की आरंभिक गतिविधियां जैसे कि कृषि इत्यादि में लगी होती हैं तथा शहरी जनसंख्या टरशरी गतिविधियों इत्यादि में लगी होती है।
  3. ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व कम होता है तथा शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है।

प्रश्न 8.
जनसंख्या अथवा विकास के आपसी संबंध को बयान करो।
उत्तर-
जनसंख्या अथवा विकास चिंतन बहुत आवश्यक है। जब किसी स्थान पर जनसंख्या की वृद्धि होती है तो उस स्थान की भूमि और खान-पान के पदार्थों पर दबाव अधिक बढ़ जाता है। जनसंख्या वृद्धि विकास के लिए एक नकारात्मक घटक है क्योंकि यह इसकी गुणवत्ता पर आधारित है। जनसंख्या की वृद्धि अन्य स्रोतों में एक असंतुलन बना देती है तथा साधन जैसे कि तकनीक, शिल्प विज्ञान इस संतुलन को प्रभावित करते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि विकास सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी तथा राजनीतिक कारकों पर निर्भर करता है। एक नया मापक मानव विकास सूचक (HDI) इसको मापने के लिए लाया गया है।

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प्रश्न 9.
उम्र संरचना क्या है ? इसका वितरण किस प्रकार किया जाता है ?
उत्तर-
किसी देश, शहर, इलाके, क्षेत्र में हर उम्र के लोग रहते हैं। कह सकते हैं कि 0 से 100 साल तक के लोग किसी देश में रहते हैं इसको खास वर्गों में विभाजित किया गया है जिसको आयु संरचना कहते हैं। यह वितरण निम्नलिखित अनुसार है—

  1. 0-14 साल-बच्चे जो स्कूल पढ़ते है और सम्पूर्ण रूप से अपने माता-पिता पर निर्भर करते हैं।
  2. 15-59 साल-जनसंख्या में वे लोग जो कोई-न-कोई काम करते हैं और यह संख्या मज़दूरों में आती है।
  3. 60 या 60 साल से ऊपर-इस जनसंख्या में बूढ़े लोग आते हैं जो अपने बच्चों पर निर्भर करते हैं।

प्रश्न 10.
शहरीकरण क्या है ? शहरीकरण द्वारा मुख्य समस्या कौन-सी सामने आ रही है ?
उत्तर-
गाँव के अधिकतर लोग रोज़गार के अवसरों की तलाश में या अच्छी सुविधाओं की तलाश में शहरों की तरफ आकर्षित होते हैं। स्पष्ट शब्दों में जब गाँव या छोटे कस्बों के लोग बेहतरीन अवसरों की तलाश में किसी जगह रहना शुरू करते हैं तथा धीरे-धीरे उस जगह पूरा विकास हो जाता है, उसे शहरीकरण कहते हैं। शहरीकरण के कारण लोगों को शहरों में नीचे लिखी समस्याओं का सामना करना पड़ता है :

  1. स्थान तथा मकानों की कमी की समस्या, जिस कारण गंदी बस्ती का जन्म होता है।
  2. प्रदूषण की समस्या आम बन जाती है।
  3. पीने के लिए शुद्ध पानी की कमी पड़ जाती है।
  4. यातायात की समस्या।

प्रश्न 11.
शहरी योजनाबंदी से आपका क्या अर्थ है ?
उत्तर-
शहरों में रोज़गार के बढ़िया मौके, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं तथा शिक्षा के साधनों के कारण गाँव तथा छोटे कस्बों के लोगों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जिस कारण शहरों में समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इस समस्या पर कंट्रोल करने के लिए सरकारी की तरफ से कुछ मुख्य योजनाओं की आवश्यकता है। इसलिए किसी नए तथा पुराने शहर के विकास के लिए शहरों को जो सुविधायें दी जा रही हैं वह शहर योजनाबंदी के लिए उठाया गया एक अच्छा कदम है। इस तरह से सही योजनाबंदी के कारण शहरों के लोगों के लिए ज़रूरी सुविधायें उपलब्ध करवाई जा सकती हैं।

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प्रश्न 12.
उन कारणों के बारे में बताओ जिनके कारण किसी इलाके का जनसंख्या घनत्व कम होता है।
या
किसी इलाके का जनसंख्या घनत्व कम होने के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
किसी इलाके की जनसंख्या घनत्व कम होने के निम्नलिखित कारण हैं—

  1. किसी जगह पर बहुत ठंडा या बहुत गर्म मौसम।
  2. ध्रुवीय क्षेत्रों में जमा हुआ कोहरा।
  3. खनिज पदार्थों तथा कारखानों की कमी।
  4. यातायात तथा संचार के साधनों की कमी।
  5. रेतली तथा पथरीली मिट्टी।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रश्न 1.
जनसंख्या घनत्व का क्या अर्थ है ? जनसंख्या घनत्व कौन-कौन से तत्त्वों पर निर्भर करता है ? उदाहरण दो।
उत्तर-
जनसंख्या घनत्व (Density of Population)-किसी स्थान की जनसंख्या तथा भूमि के क्षेत्रफल के अनुपात को जनसंख्या का घनत्व कहते हैं। इससे पता चलता है कि किसी स्थान में लोगों की संख्या कितनी घनी है। इसको प्रति वर्ग कि०मी० द्वारा प्रकट किया जाता है। किसी स्थान में एक वर्ग कि०मी० के दायरे में कितने लोग रहते हैं इसे जनसंख्या का घनत्व कहते हैं। जब हमें किन्हीं दो देशों की जनसंख्या की तुलना करनी होती है तब वह जनसंख्या के घनत्व की सहायता से ही की जाती है। इसका एक मुख्य कारण यह है कि कुछ क्षेत्रफल में पर्वतीय भाग, दलदल, जंगली प्रदेश और मरुस्थल भी शामिल कर लिए जाते हैं, चाहे इन प्रदेशों में मनुष्य निवास बिल्कुल संभव न हो।
जनसंख्या का घनत्व अक्सर बेहतर सेवाओं तथा सुविधाओं पर निर्भर है। प्रकृति की तरफ से प्राप्त सुविधा मुख्य स्थान रखती है पर इसके अतिरिक्त भौतिक, सामाजिक, राजनैतिक तथा ऐतिहासिक कारण भी जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करते हैं।
(A) भौतिक कारक (Natural Factors)—

1. धरातल (Land)–धरातल जनसंख्या के घनत्व पर प्रभाव डालता है। धरातल को आगे मरुस्थल, पर्वत, मैदान, पठार, समतल इत्यादि भागों में विभाजित किया जाता है। पर्वतीय, मरुथलीय भागों में जलवायु सख्त, उपजाऊ धरती की कमी तथा यातायात के साधनों की कमी होती है जिस कारण वहां पर जनसंख्या का घनत्व कम होता है। मैदानी तथो समतल क्षेत्रों में कृषि, जल सिंचाई, यातायात इत्यादि सुविधा होने के कारण जनसंख्या बढ़ जाती है। हमारे देश की आबादी मुख्य रूप में कृषि पर निर्भर है। इसलिए 50% जनसंख्या संसार के मैदानी क्षेत्रों में रहती है। भारत के गंगा के मैदान, चीन के हवांग हो मैदान विश्व में घनी जनसंख्या के घनत्व वाले क्षेत्र हैं। पर अमेजन घाटी में दलदल भूमि के कारण कम जनसंख्या है।

2. जलवायु (Climate)-तापमान तथा वर्षा जनसंख्या के घनत्व पर स्पष्ट प्रभाव डालते हैं। अधिक ठण्डे या अधिक गर्म क्षेत्रों में कम जनसंख्या होती है। इसीलिए संसार के उष्ण तथा शीत मरुस्थल व ध्रुवीय प्रदेश लगभग खाली हैं। सहारा मरुस्थल, अंटार्कटिका महाद्वीप तथा टुण्ड्रा प्रदेश में कम जनसंख्या मिलती है। सम-शीतोष्ण तथा मानसूनी जलवायु के प्रदेशों में घनी जनसंख्या मिलती है। यहां पर्याप्त वर्षा फसलों के उपयुक्त होती है। पश्चिमी यूरोप तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया में उत्तम जलवायु के कारण जनसंख्या का भारी केन्द्रीयकरण हुआ है। मध्य अक्षांशों में शीत उष्ण जलवायु के कारण ही संसार की कुल जनसंख्या का 4/5 भाग निवास करता है।

3. मिट्टी (Soil)–भारत की आबादी कृषि पर अधिक आधारित है। कृषि के लिए उपजाऊ मिट्टी का होना अधिक ज़रूरी है। मानसूनी एशिया की नदी घाटियों की तटीय मिट्टी में चावल का अधिक उत्पादन होने के कारण अधिक जनसंख्या मिलती है।

4. खनिज पदार्थ (Minerals)—बहुत से उद्योगों को चलाने के लिए तथा उनके विकास के लिए खनिज पदार्थ को महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए जिस जगह पर कोयला, लोहा, तेल, सोना इत्यादि खनिज पदार्थ मिलते हैं वहाँ पर जनसंख्या का घनत्व अधिक होगा। भारत में दामोदर घाटी में खनिजों के विशाल भण्डार के कारण घनी जनसंख्या है।

5. शक्ति के साधन (Power Resources)-जिन क्षेत्रों में शक्ति से चलने वाले साधनों का विकास होता है उस स्थान पर घनत्व अधिक होता है।

6. नदियां अथवा जल प्राप्ति (Rivers and Water Supply)-प्राचीन काल से ही नदियों का जल सभ्यताओं के विकास की मुख्य कड़ी रहा है। इन्हें पीने का जल, सिंचाई के लिए, उद्योग आदि में प्रयोग में लाया जाता है। यही कारण है कि कोलकाता, दिल्ली, आगरा तथा इलाहाबाद नदियों के किनारे ही स्थित हैं।

7. ऐतिहासिक कारण (Historical Factors) कई बार ऐतिहासिक महत्त्व के स्थान जनसंख्या के केन्द्र बन जाते हैं। गंगा के मैदान में, सिन्धु के मैदान में तथा चीन में प्राचीन सभ्यता के कई केन्द्रों में जनसंख्या अधिक है। नील घाटी में जनसंख्या का अधिक घनत्व ऐतिहासिक कारणों से ही है।

8. राजनैतिक कारण (Political Factors)-सीमावर्ती प्रदेशों में तथा युद्ध क्षेत्रों के निकट सुरक्षा के अभाव के कारण कम जनसंख्या होती है। इसीलिए उत्तर-पूर्वी भारत, वियतमान तथा अरब देशों में जनसंख्या कम है। सरकारी नीतियां जिस क्षेत्र के लोगों की उम्मीदों पर खरी उतरती हैं और लोगों के हित अनुसार होती हैं, वहां पर जनसंख्या घनत्व अधिक होता है।

9. धार्मिक तथा सामाजिक कारण (Religious and Social Factors)-सामाजिक रीति-रिवाजों तथा धार्मिक विश्वासों का जनसंख्या के वितरण पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। इस्लाम धर्म में चार विवाह की आज्ञा, चीन तथा भारत में बाल विवाह जनसंख्या की वृद्धि के कारण हैं। कई तीर्थ-स्थान अधिक जनसंख्या के केन्द्र बन जाते हैं। परिवार कल्याण अपनाने वाले देशों में जनसंख्या की वृद्धि दर कम होती है। यहूदी लोग भी आर्थिक अत्याचारों से तंग आकर इज़राइल देश में जा बसे हैं।

10. आर्थिक कारण (Economic Factors)—

i) कृषि (Agriculture)—क्योंकि देश में अधिक लोग कृषि पर निर्भर करते हैं, अधिक कृषि उत्पादन वाले क्षेत्रों में अधिक भोजन प्राप्ति के कारण घनी जनसंख्या होती है। चावल उत्पन्न करने वाले क्षेत्रों में साल में तीन-तीन फसलों के कारण अधिक लोगों का निर्वाह हो सकता है। इसीलिए मानसूनी एशिया में अधिक जनसंख्या है।

ii) उद्योग (Industries)—औद्योगिक विकास से अधिक लोगों को रोजगार मिलता है। औद्योगिक नगरों के निकट बहुत सी बस्तियां बस जाती हैं तथा जनसंख्या अधिक हो जाती है। यूरोप, जापान में औद्योगिक विकास के कारण ही अधिक जनसंख्या है। इन क्षेत्रों में अधिक व्यापार के कारण भी घनी जनसंख्या होती है।

iii) यातायात के साधनों की सुविधा (Easy Means of Transportation)—यातायात के साधनों की सुविधाओं के कारण उद्योगों, कृषि तथा व्यापार का विकास होता है। तटीय क्षेत्रों में जल-मार्ग की सुविधा के कारण संसार की अधिकतर जनसंख्या निवास करती है। पर्वतीय भागों तथा कई भीतरी प्रदेशों में यातायात के साधनों की कमी के कारण कम जनसंख्या होती है, जैसे–पश्चिमी चीन में।

iv) नगरीय विकास (Urban Development) किसी नगर के विकास के कारण उद्योग, व्यापार तथा परिवहन का विकास हो जाता है। शिक्षा, मनोरंजन इत्यादि सुविधाओं के कारण नगरों में तेजी से जनसंख्या बढ़ जाती है।

v) विदेशी आय का आकर्षण (Attraction of Foreign Money)-कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में कई विदेशी कम्पनियां अधिक वेतन देकर तकनीकी श्रमिकों को रोजगार प्रदान करती हैं। इसलिए भारत और पाकिस्तान इत्यादि कई एशियाई देशों से लोग यहां आकर बस गए हैं।

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प्रश्न 2.
प्रवास (Migration) से आपका क्या भाव है ? इसके क्या कारण हैं ? इसकी किस्में बताओ।
या
प्रवास का क्या अर्थ है ? इसकी किस्में और कारण बताओ।
उत्तर-
प्रवास (Migration)—जनसंख्या तबदीली के निर्णायक कारकों में यह तीसरा मुख्य कारण है। यह एक अच्छी कोशिश है जो लोगों द्वारा जनसंख्या तथा साधनों के बीच एक संतुलन बनाने के लिए की जाती है। यह स्थिर तथा अस्थिर दो प्रकार की होती है। अस्थाई रूप का अर्थ है अगर मौसम खराब होने के कारण, सालाना या कम समय के लिए कोई मनुष्य अपना स्थान छोड़ कर चला जाए पर अगर कोई मनुष्य शादी के बाद, रोज़गार के लिए पूरी तरह से किसी स्थान को छोड़ कर किसी और स्थान पर रहने के लिए चला जाए तो इसे स्थिर प्रवास कहते हैं।
प्रवास की किस्में-जनसंख्या की स्थानीय गति मुख्य रूप में गाँव से गाँव की तरफ, गाँव से शहरों की तरफ, शहर से शहर की तरफ, शहर से गाँव की तरफ प्रवास होती है। प्रवास की मुख्य किस्में इस प्रकार हैं—

1. मौसमी प्रवास (Seasonal Migration)—प्रवास मुख्य रूप में स्थाई और अस्थाई होती है। अस्थाई स्थान बदली मौसमी स्थान बदली होती है। ये कृषि के लिए काम करने वाले श्रमिक होते हैं जो उन स्थानों पर आ जाते हैं जहाँ खेती की कटाई, बिनाई के लिए श्रमिकों की जरूरत होती है। ये श्रमिक एक खास समय के लिए आते हैं जैसे कि यू०पी० और बिहार से पंजाब में खरीफ़ और रबी की फसलों के समय आते हैं।

2. अंतर्राष्ट्रीय प्रवास (International Migration)-एक देश और महाद्वीप के बीच के प्रवास को अंतर्राष्ट्रीय प्रवास कहते हैं। कुछ समय के अंदर ही इस तरह की प्रवास के कारण महाद्वीपों के जनसंख्या घनत्व में फर्क आने लग जाता है। आज के दौर में अंतर्राष्ट्रीय प्रवास ने तेज गति हासिल की है, क्योंकि कुछ महाद्वीपों के बीच खास रोज़गार के मौके लोगों को आकर्षित करते हैं। 21वीं सदी की शुरूआत में यू० एन० के एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 120 मिलियन लोग पूरे देश के अंदर, नज़दीक के देशों में चले गए हैं।

3. अंतरमुखी प्रवास (Internal Migration)—यह जनांकन का एक बहुत ज़रूरी तत्त्व है। इससे लोग अपने क्षेत्र छोड़कर दूसरे क्षेत्र में चले जाते हैं और दूसरे क्षेत्र की जनसंख्या घनत्व बढ़ा देते हैं। जैसे कि विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए शहरों में चले जाते हैं। पंजाब में ही पटियाला शहर के व्यक्ति राजपुरा जा कर रहने लगे हैं। यह अंतरमुखी प्रवास है।

4. ग्रामीण प्रवास (Rural Migration)—जब बढ़िया और उपजाऊ भूमि के कारण गाँव के लोग उपजाऊ भूमि वाले क्षेत्र में चले जाते हैं, उसे ग्रामीण प्रवास कहते हैं।

प्रवास के कारण-प्रवास के कारणों में प्रतिकर्ष तथा अपकर्ष कारक खास स्थान रखते हैं। प्रवास के कारण निम्नलिखितानुसार हैं—
I. आर्थिक कारण (Economic Reasons) आर्थिक कारण प्रवास के कारणों में सबसे अधिक भूमिका निभाते हैं। कुछ आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं—

  1. उपजाऊ जमीन जिस पर कृषि निर्भर करती है।
  2. खेती के लिए आदर्श हालात।
  3. उद्योगों की बहुतायत जो किसी स्थान के विकास की खास कड़ी है।
  4. रोजगार के अवसरों का होना जिसके साथ व्यक्ति का भविष्य जुड़ा है।
  5. यातायात और संचार के साधन इत्यादि।

II. सामाजिक कारण (Social Reasons) सामाजिक कारण भी स्थान बदली के लिए समान रूप में ज़रूरी हैं। जैसे कि शादी एक सामाजिक प्रथा है और शादी के बाद लड़कियों को पति के घर रहना पड़ता है। स्थान बदली के मुख्य सामाजिक कारण निम्नलिखित हैं—

  1. लोगों की धार्मिक सोच और धार्मिक स्थानों पर रहने की लोगों की इच्छा।
  2. निजी और सार्वजनिक तत्त्व और सामाजिक उत्थान।
  3. बेहतरीन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बहुतायत।
  4. सरकार की जनता की भलाई के लिए बनाई नीतियां। ‘
  5. लोगों की निजी आज़ादी।

III. जनांकन कारण (Demographic Reasons)-कुछ जनांकन कारण नीचे लिखे अनुसार हैं—

  1. आयु सरंचना (Age Composition)-प्रवास में लोगों की आयु भी खास भूमिका निभाती है।
  2. क्षेत्रीय असमानता (Regional Difference)-जनसंख्या के घनत्व में क्षेत्रीय असमानता होती है। प्रवास कई क्षेत्रीय सीमाओं पर भी निर्भर करती है जैसे कि राज्य के अंदर का प्रवास।
  3. राज्य की अंदरूनी प्रवास (Interstate Migration)-जब प्रवास राज्य के अंदर-अंदर ही होता है उसे राज्य के अंदर प्रवास कहते हैं।
  4. अंतर राज्य प्रवास (Intra State Migration)-जब प्रवास एक राज्य से दूसरे राज्य में होती हैं उसे अंतर राज्य प्रवास कहते हैं।
  5. अंतर्राष्ट्रीय प्रवास (International Migration)-जब लोग एक देश को छोड़कर दूसरे देश में चले जाते हैं उसे अंतर्राष्ट्रीय प्रवास कहते हैं।

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प्रश्न 3.
आज़ादी के बाद के संदर्भ की उदाहरण देकर भारत में शहरीकरण के दौर के बारे में चर्चा करो।
उत्तर-
भारत की बहुत जनसंख्या गाँवों में रहती है और उनका मुख्य काम कृषि है। पर कुछ लोग बेहतर सुविधा के कारण शहरों में रहना पसंद करते हैं। शहरों में स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा के बेहतरीन अवसर और रोजगार के अच्छे अवसर उपलब्ध होते हैं इसलिए गाँवों के लोग शहरों की तरफ आकर्षित होते जा रहे हैं। आज से लगभग 200 साल पहले संसार के सिर्फ 2.5% लोग ही थे जो शहरों में रहते थे पर आज के समय में 40% से अधिक लोग हैं जो शहरों में रहते हैं। 2011 की हुई जनगणना के अनुसार यह प्रतिशत 31.20% तक पहुँच चुका है। जनगणना के अनुसार जनसंख्या को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है—

  1. शहरी जनसंख्या,
  2. ग्रामीण जनसंख्या।

जो लोग शहर में रहते हैं, वे शहरी जनसंख्या के अधीन आते हैं। स्थानीय स्तर पर गाँवों का प्रबंध पंचायत संभालती हैं और शहरों का प्रबंध नगर कौंसिल संभालती है। माना जाता है कि देश के अधिकतर लोग खेतीबाड़ी के कामों में लगे हुए हैं।
भारत एक कृषि उत्पादन वाला देश है। अधिकतर लोग गाँव में रहते हैं। भारत के सांस्कृतिक विकास की गाँव एक मुख्य इकाई है। भारत में शहरी जनसंख्या भी काफी है। 2011 की जनगणना के अनुसार 31.20% लोग शहरों में रहते हैं। भारत में देश के सारे शहरी क्षेत्रों से ज्यादा शहरीकरण है। पर भारत में शहरीकरण की मात्रा बाकी देशों से कम है।

देश शहरी जनसंख्या (%) प्रतिशत
यू० एस० ए० 70
ब्राजील 68
इजिप्ट 44
पाकिस्तान 29
भारत 27.8

शहरी जनसंख्या में वृद्धि-जनसंख्या के विस्फोट के कारण शहरी जनसंख्या की वृद्धि की गति में काफी तेजी आई है। पिछले 100 सालों में भारत की कुल जनसंख्या तीन गुणा से अधिक हो चुकी है। पर शहरी जनसंख्या ग्यारह गुणा बढ़ गई है।
ग्रामीण और शहरी जनसंख्या
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शहरी जनसंख्या की वृद्धि साल 1901-61 के बीच धीरे थी। पर 1961-81 के समय में जाकर यह वृद्धि बहुत तेज हो गई।
इस समय दौरान शहरी जनसंख्या 7.8 करोड़ से 15.6 करोड़ तक बढ़ गई। बड़े शहरों के कारण शहरीकरण की गति काफी तेज़ हो गई। बहुत सारे औद्योगिक कस्बों का बनना शुरू हो गया। भारतीय कस्बों को मुख्य रूप में नीचे लिखी 6 श्रेणियों में बाँटा जाता है—

  1. पहले दर्जे के शहर-1 लाख से अधिक जनसंख्या
  2. दूसरे दर्जे के शहर-50,000 से 99,999 तक जनसंख्या
  3. तीसरे दर्जे के शहर-20,000 से 49,999 तक जनसंख्या
  4. चौथे दर्जे से शहर-10,000 से 19,999 तक जनसंख्या
  5. पांचवें दर्जे के शहर-5,000 से 9,999 तक जनसंख्या
  6. छठे दर्जे के शहर-5000 से कम जनसंख्या।

आज़ादी के बाद बड़े शहरों की संख्या बढ़ गई जबकि छोटे शहरों की संख्या कम हो गई। शहरों के जीवन, सुविधा, ज़रूरतें तथा लाभ के कारण लोग शहरों की तरफ आकर्षित होने लगे जिस कारण शहरों की जनसंख्या में वृद्धि हो गई। शहरीकरण की सुविधाएं तथा आकर्षित करने वाले कारणों के सिवाय अब शहरों में शहरी लोगों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। जैसे कि—

  1. जनसंख्या की वृद्धि के कारण रहने के लिए स्थान तथा मकान दोनों की कमी पैदा हुई तथा मुंबई जैसे शहरों में चॉल (Chawl) इत्यादि में लोगों ने रहना शुरू कर दिया।
  2. इन स्थानों का पर्यावरण शुद्ध न होने के कारण गंदी बस्तियों का जन्म हुआ।
  3. साधनों की बहुलता के कारण प्रदूषण की समस्या आगे आई।
  4. शहरों में अपराधों की संख्या बढ़नी शुरू हो गई।
  5. यातायात और संचार के साधनों में कमी पड़ गई।
  6. पीने के लिए शुद्ध जल की कमी शहरों में आम देखने को मिलने लगी।

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प्रश्न 4.
भारत में जनसंख्या वितरण की विभिन्नता तथा इसके कारणों का वर्णन करो।
उत्तर-
जनसंख्या का वितरण (Distribution of Population)-भारत क्षेत्रफल के आधार पर संसार में सातवां बड़ा देश है परन्तु जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में दूसरा स्थान है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121 करोड़ थी तथा जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० था। भारत में जनसंख्या का वितरण बहुत असमान है। देश में प्राकृतिक तथा आर्थिक दशाओं की विभिन्नता के कारण जनसंख्या के वितरण तथा घनत्व में बहुत विभिन्नता है। गंगा-सतलुज के उपजाऊ मैदान में देश के 23% क्षेत्र में 52% जनसंख्या का संकेन्द्रण है जबकि हिमालय के पर्वतीय भाग में 13% क्षेत्र में केवल 2% जनसंख्या निवास करती है। केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली में जनसंख्या का घनत्व 11297 है जबकि अरुणाचल प्रदेश में केवल 10 है। सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश है जहां 20 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं।

भारत में जनसंख्या घनत्व, धरातल, मिट्टी के उपजाऊपन, वर्षा की मात्रा तथा जल सिंचाई पर निर्भर करता है। भारत मूलतः कृषि प्रधान देश है। इसलिए अधिक घनत्व उन प्रदेशों में पाया जाता है जहां भूमि की कृषि उत्पादन क्षमता अधिक है। जनसंख्या का घनत्व वर्षा की मात्रा पर निर्भर करता है। पिछले कुछ वर्षों में औद्योगिक क्षेत्रों में भी जनसंख्या घनत्व बढ़ता जा रहा है।

जनसंख्या का घनत्व (Density of Population)—किसी प्रदेश की जनसंख्या तथा भूमि के क्षेत्रफल के अनुपात को जनसंख्या घनत्व कहते हैं। इसे निम्न प्रकार से प्रकट किया जाता है कि एक वर्ग कि०मी० में औसत रूप से कितने व्यक्ति रहते हैं।
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उदाहरण के लिए भारत का कुल क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग कि०मी० है तथा जनसंख्या 121 करोड़ है। इस प्रकार भारत की औसत जनसंख्या
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भारत को जनसंख्या के घनत्व के आधार पर क्रमशः तीन भागों में विभाजित किया जाता है।
1. अधिक घनत्व वाले भाग (Densely Populated Areas)-इस भाग में वे राज्य शामिल हैं जहां जनसंख्या घनत्व 500 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० से अधिक है। अधिक घनत्व वाले क्षेत्र प्रायद्वीपीय भारत के चारों ओर एक मेखला बनाते हैं। पंजाब से लेकर गंगा के डेल्टा तक जनसंख्या का घनत्व अधिक है। एक अनुमान हैं कि इस भाग के 17% क्षेत्रफल में 43% जनसंख्या निवास करती है।
जनसंख्या घनत्व-व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०

राज्य घनत्व राज्य घनत्व
पश्चिमी बंगाल 1029 उत्तर प्रदेश 828
केरल 859 तमिलनाडु 555
बिहार 1102 पंजाब 550

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(i) पश्चिमी तटीय मैदान-इस भाग में केरल प्रदेश में घनत्व 859 व्यक्ति प्रतिवर्ग कि०मी० है।
कारण—

  1. अधिक वर्षा
  2. मैदानी भाग तथा उपजाऊ मिट्टी
  3. चावल की अधिक उपज
  4. उद्योगों के लिए जल विद्युत्
  5. उत्तम बन्दरगाहों का होना
  6. जलवायु पर समुद्र का समकारी प्रभाव।

(ii) पश्चिमी बंगाल-इस भाग में घनत्व 1029 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० है।
कारण—

  1. गंगा नदी का उपजाऊ डेल्टा
  2. अधिक वर्षा
  3. चावल की वर्ष में तीन फसलें
  4. कोयले के भण्डार
  5. प्रमुख उद्योगों का स्थित होना।

(iii) उत्तरी मैदान-इस भाग में विभिन्न प्रदेशों के घनत्व-बिहार (1102), उत्तर प्रदेश (828), पंजाब (550),
व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०।
कारण—

  1. सतलुज, गंगा आदि नदियों के उपजाऊ मैदान
  2. पर्याप्त वर्षा तथा स्वास्थ्यप्रद जलवायु
  3. जल सिंचाई की सुविधाएं
  4. कृषि के लिए आदर्श दशाएं
  5. व्यापार, यातायात तथा उद्योगों का विकास
  6. नगरों का अधिक होना।

(iv) पूर्वी तट- इस भाग में तमिलनाडु प्रदेश में घनत्व 555 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० है।
कारण—

  1. नदियों के उपजाऊ डेल्टा
  2. उद्योगों की अधिकता
  3. गर्म आर्द्र जलवायु
  4. चावल का अधिक उत्पादन
  5. दोनों ऋतुओं में वर्षा
  6. जल सिंचाई की सुविधा।

2. साधारण घनत्व वाला भाग (Moderately Populated Area)—इस भाग में वे राज्य शामिल हैं जिनका घनत्व 200 से 500 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० है। मुख्य रूप से ये प्रदेश पूर्वी तथा पश्चिमी घाट, अरावली पर्वत तथा गंगा के मैदान की सीमाओं के अन्तर्गत स्थित हैं।
जनसंख्या घनत्व-व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०

राज्य घनत्व राज्य घनत्व
हरियाणा 573 आन्ध्र प्रदेश 308
गोआ 399 कर्नाटक 319
असम 397 गुजरात 308
महाराष्ट्र 365 उड़ीसा 269
त्रिपुरा 350

कारण—

  1. इन भागों में पथरीली या रेतीली धरातल होने के कारण कृषि उन्नत नहीं है।
  2. कृषि के लिए वर्षा पर्याप्त नहीं है।
  3. उद्योग उन्नत नहीं हैं।
  4. यातायात के साधन उन्नत नहीं हैं।
  5. परन्तु जल सिंचाई, लावा मिट्टी तथा खनिज पदार्थों के कारण साधारण जनसंख्या मिलती है।

3. कम घनत्व वाला भाग (Sparsely Populated Area)-इस भाग में वे प्रान्त शामिल हैं जिनका घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० से कम है।
(i) उत्तर-पूर्वी भारत-इस भाग में मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश तथा मिज़ोरम शामिल हैं।
जनसंख्या घनत्व-व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी०

राज्य घनत्व राज्य घनत्व
मणिपुर 122 सिक्किम 86
मेघालय 132 मिजोरम 52
नागालैंड 119 अरुणाचल प्रदेश 17

कारण—

  1. असमतल तथा पर्वतीय धरातल
  2. वन प्रदेश की अधिकता
  3. मलेरिया का प्रकोप
  4. उद्योगों का पिछड़ापन
  5. यातायात के साधनों की कमी
  6. ब्रह्मपुत्र नदी की भयानक बाढ़ों से हानि।

(ii) कच्छ तथा राजस्थान प्रदेश-इस भाग में राजस्थान का थार का मरुस्थल तथा खाड़ी कच्छ के प्रदेश शामिल हैं।
कारण—

1. कम वर्षा
2. कठोर जलवायु
3. मरुस्थलीय भूमि के कारण कृषि का अभाव
4. खनिज तथा उद्योगों की कमी
5. जल सिंचाई के साधनों की कमी
6. गुजरात की खाड़ी तथा कच्छ क्षेत्र का दलदली होना।

(iii) जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश-हिमाचल पर्वत के पहाड़ी क्षेत्र में जनसंख्या बहुत कम है। हिमाचल प्रदेश में प्रति वर्ग कि० मी० 123 घनत्व है तथा जम्मू कश्मीर में प्रति वर्ग कि० मी० घनत्व 124 है।
कारण—

1. शीतकाल में अधिक सर्दी
2. बर्फ से ढके प्रदेश का होना
3. पथरीली धरातल के कारण कम कृषि क्षेत्र
4. यातायात के साधनों की कमी
5. वनों का अधिक विस्तार
6. सीमान्त प्रदेश का होना
7. उद्योगों की कमी।

(iv) मध्य प्रदेश- इस प्रान्त में कुछ भागों में बहुत कम जनसंख्या है। मध्य प्रदेश में जनसंख्या घनत्व प्रति वर्ग कि० मी० 196 है।

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प्रश्न 5.
लिंग अनुपात से आपका क्या अर्थ है ? जनसंख्या के अध्ययन में इसका क्या योगदान है ? भारत में लिंग अनुपात कम होने के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
लिंग अनुपात-लिंग अनुपात किसी समाज में औरतों की स्थिति का महत्त्वपूर्ण मापदंड है। भारत में लिंग अनुपात का अर्थ है कि 1000 पुरुषों पीछे स्त्रियों की संख्या कितनी है जैसे कि—
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इसमें अगर लिंग अनुपात 1000 हो तो इसका अर्थ है कि स्त्रियों और पुरुषों की जनसंख्या बराबर है अगर 1000 से ज्यादा हो तो स्त्रियों की संख्या ज्यादा होगी और 1000 से कम है तो स्त्रियों की संख्या कम होगी।

जनसंख्या के अध्ययन में लिंग अनुपात का योगदान-किसी देश की जनसंख्या के अध्ययन में लिंग अनुपात का असर सिर्फ जनांकन को भी प्रभावित नहीं करता बल्कि इसके सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्वरूप को भी प्रभावित करता है। यह जन्म दर और मृत्यु दर को भी प्रभावित करता है। अंतर्मुखी और बाहरमुखी स्थान बदली भी लिंग अनुपात द्वारा प्रभावित होती है। सामाजिक भलाई में, सामाजिक सेवाएं जैसे कि मां और बच्चे, बूढों के लिए यह सब कुछ लिंग अनुपात पर ही आधारित है। अगर किसी देश के विकास के बारे प्रोग्राम का स्वरूप तैयार करना होता है। उस समय उस के लिंग अनुपात के बारे में पता लगाना बहुत ज़रूरी है। जनसंख्या का रिकॉर्ड लिंग अनुपात और आयु संरचना के आधार पर बनाया जाता है।
Sex Ratio (Females per 1000 males) India 1901—2001

Year Sex Ratio Sex Ratio in Children (0-6 years)
1901 972
1911 964
1921 955
1931 950
1941 945
1951 946
1961 941 976
1971 930 964
1981 934 962
1991 929 945
2001 933 927

 

लिंग अनुपात बहुत महत्त्व रखता है क्योंकि यह सामाजिक विकास का स्पष्ट, निर्विवादी और सुविधाजनक सूचक है। हर व्यक्ति का समाज में अपना एक खास महत्त्व है। इस प्रकार परिवार और समाज में उसका स्थान लिंग अनुपात द्वारा दिखाया जा सकता है। जैसे कि हिन्दू परिवार में व्यक्तियों की संख्या स्त्रियों से अधिक होती है। पश्चिम की तरफ औद्योगिक विकास के कारण इन क्षेत्रों में स्त्रियों परिवार संभालने तथा पुरुष खेती इत्यादि का काम करते हैं। आज के समय में स्त्री पुरुष के बराबर घर के बाहर काम कर रही है पर पुरुष घर संभालने का काम आज भी बहुत कम कर रहे हैं।

सन् 1901 से लोकर 2011 तक भारत में लिंग अनुपात हमेशा कम रहा है। सन् 2011 की जनगणना आंकड़ों के अनुसार भारत में पुरुषों और स्त्रियों की संख्या क्रमश: 62.37 करोड़ और 58.64 करोड़ थी जबकि भारत की कुल जनसंख्या 121.00 करोड़ थी।

केरल का लिंग अनुपात 1084 है जबकि पंजाब की स्थिति बहुत ही चिंताजनक है यहां यह लिंग अनुपात सिर्फ 893 है। सन् 2001 का पंजाब का लिंग अनुपात 876 था और सन् 2011 में लिंग अनुपात (893) में कुछ सुधार आया है।

भारत में लिंग अनुपात कम होने के कारण-पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश तथा गुजरात (800 लड़कियों के पीछे 1000 लड़के) इसके अतिरिक्त दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली, जो कि देश का एक खुशहाल कस्बा माना जाता है, लिंग अनुपात में समानता नहीं है।
भारत लिंग अनुपात की समस्या के साथ लड़ रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लिंग अनुपात 940 था। इसके लिए बहुत सारे कारक जिम्मेदार हैं जो इस प्रकार हैं—

1. सामाजिक कारक (Social Factors)–पुरुष प्रधान समाज में सब से अधिक महत्त्व पुरुष को दिया जाता है। पुराने विचारों के अनुसार अगर बच्चा लड़का होता हो तो इसके साथ परिवार का कुल आगे बढ़ता है।
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साक्षरता की कमी के कारण उनकी यह पुरानी सोच भी लिंग अनुपात के कम होने का कारण है। उनकी सोच है कि शादी के बाद लड़की अपना घर छोड़ कर ससुराल में चली जाती है जिसके कारण बुढ़ापे में माता-पिता का ख्याल नहीं रख सकती और उनका लड़का बुढ़ापे में लाठी के समान है।

2. तकनीकी कारण (Technological Factors) तकनीकी विकास के कारण अल्ट्रासोनीग्राफी द्वारा लिंग की जांच करवा ली जाती है जिस कारण लड़की पता लगने पर उसे पेट में ही कत्ल करवा दिया जाता है।

3. जागरुकता की कमी (Lack of Awareness) आर्थिक विकास में स्त्रियों का योगदान कम रहा है। इसके कारण स्त्रियों को पुरुष के बराबर महत्त्व समाज में नहीं दिया जाता। कुछ खास चीजें और जरूरतें भी स्त्रियों को प्रदान नहीं की जाती।

4. आर्थिक कारण (Economic Factors)-कई समाजिक बुराइयां जैसे कि दहेज जो समाज में लिंग अनुपात पर असर डालती है। दहेज माता-पिता के ऊपर फालतू बोझ होता है। इसलिए परिवार में एक लड़का चाहिए जो कि भविष्य में परिवार की आमदनी में योगदान डालता है यह माना जाता है।

5. सुरक्षा निर्गमन (Security Issues)—आजकल के समय में स्त्रियों के साथ बलात्कार जैसे संगीन अपराध काफी देखने में आ रहे हैं। इस कारण उन्हें ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा की ज़रूरत है।

प्रश्न 6.
संसार की जनसंख्या के मुख्य तत्त्वों का वर्णन करें। पृथ्वी पर जनसंख्या के वितरण का वर्णन करो।
उत्तर-
मानवीय भूगोल के अध्ययन में मनुष्य का केन्द्रीय स्थान है। मनुष्य अपने प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक वातावरण से प्रभावित होता है और उसमें परिवर्तन करता है। पृथ्वी पर जनसंख्या के वितरण में लगातार परिवर्तन होता । चला आया है। इस समय जनसंख्या के वितरण में बहुत असमानता है। इस असमानता के प्रमुख कारण विश्वव्यापी हैं।
मुख्य तत्त्व (Main Factors)—

  1. सन् 1650 से 2000 तक संसार की जनसंख्या 50 करोड़ से बढ़ कर 700 करोड़ तक हो गई। इस प्रकार यह आठ गुना हो गई।
  2. वर्तमान में बढ़ाव की दर के साथ यह जनसंख्या सन् 2100 तक दोगुनी हो जाने की उम्मीद है।
  3. धरती पर लगभग 14.5 करोड़ वर्ग कि०मी० थल भाग में 700 करोड़ की जनसंख्या रहती है।
  4. संसार में जनसंख्या का औसत घनत्व 41 व्यक्ति प्रतिवर्ग कि०मी० है।
  5. संसार में सबसे ज्यादा आबादी एशिया महाद्वीप में 430 करोड़ है।
  6. संसार में सबसे अधिक आबादी चीन में लगभग 127 करोड़ है।
  7. संसार में सबसे अधिक आबादी घनत्व बांग्लादेश में 805 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० है।
  8. संसार में 90% आबादी थल के 10% भाग में केन्द्रित है।
  9. संसार की कुल जनसंख्या का 2 भाग 20°N से 40°N अक्षांश के बीच केन्द्रित है। कुल जनसंख्या का 4/5 भाग 20° से 60°N अक्षांश में निवास करता है।

जनसंख्या का वितरण (Distribution of Population)-पृथ्वी पर जनसंख्या का वितरण बड़ा असमान है। पृथ्वी पर थोड़े से भाग घने बसे हुए हैं जबकि अधिक भाग खाली पड़े हैं। विश्व की 50% जनसंख्या केवल 5% स्थल भाग पर निवास करती है। जबकि 50% स्थल भाग पर केवल 5% लोग रहते हैं। जनसंख्या के घनत्व के आधार पर पृथ्वी को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है—
1. अधिक घनत्व वाले प्रदेश (Areas of High Density)-इन क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व 200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० से अधिक है। इस अधिक घनत्व के दो आधार हैं—
(i) कृषि प्रधान देश-पूर्वी एशिया तथा दक्षिणी एशिया में।
(ii) औद्योगिक प्रदेश-पश्चिमी यूरोप तथा उत्तर पूर्वी अमेरिका में।

  1. दक्षिणी तथा पूर्वी एशिया-पूर्वी एशिया में चीन, जापान, फिलीपाइन द्वीप तथा ताइवान में घनी . जनसंख्या मिलती है। दक्षिणी एशिया में भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में जनसंख्या का घनत्व अधिक है। इसके अतिरिक्त जाव द्वीप नील नदी घाटी में भी घनी जनसंख्या मिलती है। चीन में संसार की लगभग एक चौथाई जनसंख्या निवास करती है। ह्वांग हो, यंगसी तथा सिकियांग घाटी घनी जनसंख्या वाले क्षेत्र हैं। भारत में गंगा के मैदान तथा पूर्वी तटीय मैदान में जनसंख्या का अधिक महत्त्व है। जापान में क्वांटो मैदान (Kwanto Plain), बांग्लादेश में गंगा-ब्रह्मापुत्र डेल्टा, बर्मा में इरावदी डेल्टा, पाकिस्तान में सिन्धु घाटी अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र हैं। बांग्लादेश में संसार का सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व 16 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर में मिलते हैं।
  2. पश्चिमी यूरोप तथा उत्तरी-पूर्वी अमेरिका-पश्चिमी यूरोप में इंग्लिश चैनल से लेकर रूस से यूक्रेन क्षेत्र तक 50° उत्तरी अक्षांशों के साथ-साथ घनी जनसंख्या मिलती है। यूरोप में 50° अक्षांश को जनसंख्या की धुरी (Axis of Population) कहते हैं। इस क्षेत्र में इंग्लैंड, जर्मनी में रुहर घाटी, इटली में पो डेल्टा, फ्रांस में पेरिस बेसिन, रूस में मास्को-यूक्रेन क्षेत्र अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश हैं। उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग में अटलांटिक तट, सैट लारेंस घाटी तथा महान् झीलों के क्षेत्र में अधिक
    जनसंख्या घनत्व है। इन सब प्रदेशों में जनसंख्या का आधार उद्योग है।

अधिक घनत्व के कारण—

  1. निर्माण उद्योगों का अधिक होना।
  2. सम शीतोष्ण जलवायु।।
  3. समुद्री मार्गी तथा व्यापार का अधिक उन्नत होना।
  4. मिश्रित कृषि के कारण अधिक उत्पादन।
  5. खनिज क्षेत्रों में विशाल भण्डार।
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  6. तटीय स्थिति।
  7. लोगों का उच्च जीवन स्तर।
  8. वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान में अधिक वृद्धि।
  9. नगरीकरण के कारण बड़े-बड़े नगरों का विकास।

2. मध्यम घनत्व वाले प्रदेश (Areas of Moderate Density)-इन प्रदेशों में 25 से 200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर घनत्व मिलता है। इस भाग में निम्नलिखित प्रदेश शामिल हैं। उत्तरी अमेरिका में प्रेयरीज़ का मध्य मैदान, अफ्रीका का पश्चिमी भाग, यूरोप में पूर्वी यूरोप तथा पूर्वी रूस, दक्षिणी अमेरिका में उत्तर-पूर्वी ब्राज़ील, मध्य चिली, मैक्सिको का पठार, एशिया में भारत का दक्षिणी पठार, पश्चिमी चीन तथा हिन्द चीन, पूर्वी ऑस्ट्रेलिया।

3. कम घनत्व वाले प्रदेश (Areas of Low Density)—इन प्रदेशों में जनसंख्या घनत्व 25 व्यक्ति प्रति वर्ग
किलोमीटर से कम है। लगभग 5% क्षेत्र में जनसंख्या घनत्व केवल 2 से 3 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। यह लगभग निर्जन प्रदेश है। इस भाग में ऊँचे पर्वतीय तथा पठारी प्रदेश, शुष्क मरुस्थल, उष्ण-आर्द्र घने वन तथा टुण्ड्रा जलवायु के ठण्डे प्रदेश शामिल हैं। जैसे उच्च पर्वतीय भाग, मरुस्थल घने वन, टुण्ड्रा प्रदेश इत्यादि।
कम घनत्व के कारण—इन प्रदेशों में मानवीय जीवन के लिए बहुत कम सुविधाएँ प्राप्त हैं तथा लोग कठिनाइयों भरा जीवन व्यतीत करते हैं। इन प्रदेशों को सतत् कठिनाइयों के प्रदेश भी कहा जाता है।

  1. पर्वतीय भागों में समतल भूमि की कमी।
  2. पथरीली तथा रेतीली मिट्टी।
  3. ठण्डे प्रदेशों में कठोर शीत जलवायु
  4. पानी की कमी तथा छोटे उपज काल के कारण कृषि का अभाव।
  5. टुण्ड्रा प्रदेशों में स्थायी बर्फ।
  6. परिवहन के साधनों की कमी।
  7. घातक कीड़ों तथा बीमारियों के कारण कम जनसंख्या।
  8. खनिज पदार्थों तथा उद्योगों का अभाव।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 2 मानवीय संसाधन-जनसंख्या और इसमें परिवर्तन

मानवीय संसाधन-जनसंख्या और इसमें परिवर्तन PSEB 12th Class Geography Notes

  • पथ्वी पर बहत सारे प्राकृतिक स्रोत मिलते हैं। किसी देश के विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का होना अति । आवश्यक है। मनुष्य अपनी तकनीक अथवा हुनर का उपयोग करके प्राकृतिक स्रोतों का तेज गति के साथ उपयोग कर रहा है। इसलिए कह सकते हैं कि संसार का सबसे कीमती स्रोत मनुष्य है। किसी देश का मनुष्य उस देश । का भविष्य होता है। इसलिए जनसंख्या की वृद्धि दर, घनत्व इत्यादि के बारे में पढ़ना अति आवश्यक है।
  • जनसंख्या की दृष्टि से भारत दूसरा स्थान रखता है। साल 2011 के अंत तक संसार की जनसंख्या 700 करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है। भारत दुनिया का सातवां बड़ा देश है और यह संसार के कुल क्षेत्र । का सिर्फ 2.4% भाग है। रूस, कैनेडा, यू०एस०ए०, ब्राज़ील और आस्ट्रेलिया जैसे देश हमारे देश से बहुत । बड़े देश हैं पर इनकी आबादी भारत के मुकाबले बहुत कम है।
  • जनसंख्या का घनत्व कई प्राकृतिक कारणों के कारण बढ़ता अथवा कम होता जाता है। जनसंख्या घनत्व किसी देश अथवा क्षेत्र की आबादी की औसत होती है। इसके घनत्व को जलवायु, यातायात अथवा संचार के स्रोत, धर्म, प्राकृतिक स्रोतों की बहुतायत इत्यादि कारक काफी हद तक प्रभावित करते हैं। जब आरम्भिक जनसंख्या की गिनती बढ़ती है तो उसको जनसंख्या की वृद्धि कहते हैं। भारत में प्रत्येक 10 सालों के बाद जनगणना होती है और 10 सालों बाद जो परिवर्तन आबादी में आता है उसे जनसंख्या में वृद्धि कहते हैं। जनसंख्या के परिवर्तन को मुख्य रूप में जन्म दर, मृत्यु दर, स्थान परिवर्तन इत्यादि तत्व प्रभावित करते हैं। स्थान परिवर्तन हर जगह पर प्रभाव डालते हैं। जिस जगह को लोग छोड़ कर चले गये उस पर भी, जहाँ पर जाकर लोगों ने रहना शुरू किया वहाँ पर भी प्रभाव पड़ता है। स्थान बदली के कई तरह के कारक हैं। मुख्य रूप में इन्हें दो हिस्सों प्रतिकर्ष कारक और अपकर्ष कारक के रूप में बाँटा जाता है। किसी देश की जनसंख्या में अलग-अलग आयु वर्ग के लोग रहते हैं। आयु के अनुसार से इन्हें वर्गों , में बाँटा जाता है जैसे कि (0-14) साल जो अपने माता-पिता पर निर्भर करते हैं, (60 साल) जो अपने बच्चों पर निर्भर करते हैं और (15-59) जो कमाते हैं। इस आयु वर्ग के अनुसार ही देश में आर्थिक स्तर को निर्धारित किया जाता है। किसी देश की जनसंख्या के अध्ययन में लिंग अनुपात और साक्षरता का बहुत । महत्त्व होता है। इस द्वारा देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्वरूप का पता लगाया जा सकता है।
  • कुल जनसंख्या-सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 121.02 करोड़ है, जो कि संसार की कुल जनसंख्या का 17.5% है।
  • चीन के बाद जनसंख्या के आधार पर भारत का दूसरा स्थान है।
  • जनसंख्या घनत्व-जनसंख्या घनत्व किसी देश की जनसंख्या और इलाके का अनुपात होता है। साधारणतया पर इसे व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
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  • भारत का जनसंख्या घनत्व-2011 के आंकड़ों के अनुसार भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है।
  • जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करने वाले कारक-जनसंख्या के घनत्व को प्रभावित करने वाले कारक जलवायु, मिट्टी की किस्म, धरातल, जल, खनिज पदार्थ और प्राकृतिक स्रोत इत्यादि की उपलब्धि। इसके अतिरिक्त कई सामाजिक कारक जैसे रीति-रिवाज, सोच इत्यादि अति आवश्यक कारक हैं।
  • हर साल 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है।
  • जनसंख्या परिवर्तन के निर्णायक तत्व-जनसंख्या तबदीली के मुख्य निर्णायक तत्व हैं-जन्म दर, मृत्यु दर और प्रवास।
  • जन्म दर-किसी एक साल के दौरान जीवित जन्म अथवा मध्य सालों की जनसंख्या के अनुपात को जन्म दर कहते हैं।
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  • लिंगानुपात-लिंगानुपात का अर्थ है एक हजार पुरुषों के पीछे औरतों की गिनती।
  • एशिया की जनसंख्या संसार की सबसे अधिक जनसंख्या है।

PSEB 6th Class Home Science Practical चाय बनाना और परोसना

Punjab State Board PSEB 6th Class Home Science Book Solutions Practical चाय बनाना और परोसना Notes.

PSEB 6th Class Home Science Practical चाय बनाना और परोसना

सामग्री—

  1. चाय की पत्ती — 3/4 छोटी चम्मच
  2. चीनी — 1 छोटी चम्मच
  3. दूध — 2-3 बड़े चम्मच
  4. पानी — 1 कप

विधि—पहले केतली में उबलता हुआ थोड़ा-सा पानी डालकर, केतली में चारों ओर हिलाकर, निकाल दें ताकि वह गर्म हो जाए। अब उसमें चाय की पत्ती डाल दें। ऊपर से उबलता हुआ पानी डालकर इसे पाँच मिनट ढक कर रख दें। इसे गर्म दूध और चीनी के साथ परोसें।

PSEB 6th Class Home Science Practical चाय बनाना और परोसना

नोट-

  1. जितने कप चाय बनानी हो उसी हिसाब से सामग्री की मात्रा लें।
  2. दूध, चाय और चीनी की मात्रा स्वादानुसार घटाई-बढ़ाई जा सकती है।
  3. चाय बनाकर देने के लिए प्याले में चीनी और केतली से चाय (गर्म पानी में पत्ती मिली हुई) डालें। प्याला थोड़ा खाली रखें और उसमें दूध मिलायें। चाय तैयार हो जायेगी। इसे बर्तन में डालकर गर्म-गर्म परोस दें।

कुल मात्रा—1 व्यक्ति के लिए।

PSEB 6th Class Physical Education Solutions Chapter 2 सफ़ाई तथा सांभ-सम्भाल

Punjab State Board PSEB 6th Class Physical Education Book Solutions Chapter 2 सफ़ाई तथा सांभ-सम्भाल Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Physical Education Chapter 2 सफ़ाई तथा सांभ-सम्भाल

PSEB 6th Class Physical Education Guide सफ़ाई तथा सांभ-सम्भाल Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
सफ़ाई हमारे घर के लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
सफ़ाई (Cleanliness) हमारा शरीर अनोखी मशीन की तरह है। जैसे दूसरी मशीनों की सफ़ाई न की जाए तो वे खराब हो जाती है। इसी तरह शरीर की सफ़ाई की जानी भी ज़रूरी है। जैसे मोटरकार को चलाने के लिए पैट्रोल आदि की ज़रूरत पड़ती है, उसी तरह शरीर को चलाने के लिए अच्छी खुराक, पानी और हवा की ज़रूरत है। शारीरिक सफ़ाई, चोटों व बीमारी आदि से रक्षा करना मनुष्य की आदतों से सम्बन्धित है। अगर हम शरीर पर उचित ध्यान न दें, हमारे लिए. मानसिक, शारीरिक और आत्मिक उन्नति करना सम्भव नहीं होगा। गन्दगी ही हर तरह के रोगों का मूल कारण है। इसलिए यह जरूरी है कि शरीर के सारे अंगों की सफ़ाई की जाए। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे व्यक्तिगत सफ़ाई के साथ-साथ अपने घर तथा आस-पास की सफ़ाई की बहुत आवश्यकता होती है। सफ़ाई स्वास्थ्य की निशानी है। सफ़ाई के बिना स्वस्थ जीवन की कल्पना भी की नहीं जा सकती। व्यक्तिगत सफ़ाई तो स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है ही, परन्तु घर, स्कूल तथा आस-पास की सफ़ाई भी स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए बहुत आवश्यक है। यदि हम अपने घर तथा आस-पास की सफ़ाई नहीं रखते तो कई प्रकार की बीमारियां फैल जाएंगी। बहुत-से लोग इन बीमारियों के शिकार हो जाएंगे। इससे हमारा देश तथा समाज कमज़ोर हो जाएगा। इसलिए देश तथा समाज की भलाई के लिए सफ़ाई आवश्यक है।

प्रश्न 2.
घर की सफ़ाई किस तरह रखी जा सकती है ?
उत्तर-
घर की सफ़ाई के ढंग (Methods of Cleanliness of a House)हमें अपने घर की सफाई रखने के लिए। निम्नलिखित ढंग अपनाने चाहिएं –
PSEB 6th Class Physical Education Solutions Chapter 2 सफ़ाई तथा सांभ-सम्भाल 1

  • फलों, सब्जियों के छिलके और कूड़ाकर्कट ढक्कनदार ढोल में डालना चाहिए। इस ढोल को प्रतिदिन खाली करने की व्यवस्था होनी चाहिए। ढोल के कूड़े-कर्कट को किसी गड्ढे में दबा देना चाहिए। इस प्रकार यह खाद बन जाएगा।
  • घर की रसोई, स्नान घर और पाखाने के पानी के निकास का उचित प्रबन्ध करना चाहिए।
  • पशुओं के गोबर एवं मल-मूत्र को बाहर दूर किसी गड्ढे में एकत्र करते रहना चाहिए। इस प्रकार कुछ दिनों के पश्चात् अच्छी खाद बन जाएगी।
  • घर के सभी सदस्यों को सफ़ाई के नियमों का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।

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प्रश्न 3.
घर के आस-पास की सफ़ाई में कौन-कौन सी बातें ध्यान देने योग्य हैं ?
उत्तर-
घर के आस-पास की सफ़ाई (Cleanliness of Surrounding of a House)-घर की सफाई के साथ-साथ इसके आस-पास की सफाई की भी बहुत आवश्यकता है। यदि घर साफ़-सुथरा है, परन्तु इसके इर्द-गिर्द गन्दगी के ढेर लगे हुए हैं तो इसका घर वालों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए घर के आस-पास की सफ़ाई की ओर भी विशेष ध्यान देना चाहिए
घर के आस-पास की सफ़ाई के लिए नीचे लिखी बातों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है –

  1. घर के बाहर की नालियां और सड़कें खुली तथा साफ़-सुथरी होनी चाहिएं।
  2. घर के बाहर की नालियां गन्दी नहीं होनी चाहिए।
  3. घर के बाहर गलियों में तथा सड़कों पर पशु नहीं बांधने चाहिए।
  4. घर से बाहर गलियों तथा सड़कों पर कूड़ा-कर्कट नहीं फेंकना चाहिए। इसे या तो दबा देना चाहिए या जला देना चाहिए।
  5. घरों के आगे पानी खड़ा होने नहीं देना चाहिए। घरों के निकट गड्ढों में खड़े हुए पानी में डी० डी० टी० या मिट्टी का तेल डाल देना चाहिए।
  6. गलियों में तथा सड़कों पर चलते समय जगह-जगह नहीं थूकना चाहिए।
  7. इधर-उधर खड़े होकर पेशाब नहीं करना चाहिए। पेशाब केवल पेशाबखानों में ही करना चाहिए।

प्रश्न 4.
स्कूल की सफ़ाई रखने में विद्यार्थियों की क्या भूमिका हो सकती है ?
उत्तर-
स्कूल की सफ़ाई (Cleanliness of aSchool)-स्कूल विद्या का.मन्दिर है। व्यक्तिगत सफ़ाई के साथ-साथ स्कूल की सफ़ाई भी अवश्य रखनी चाहिए। स्कूल एक ऐसा स्थान है जहां बच्चे दिन का काफ़ी समय व्यतीत करते हैं। यदि स्कूल का वातावरण साफ़ और शुद्ध नहीं होगा तो बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। वे कई प्रकार की बीमारियों का शिकार हो जाएंगे। इसलिए स्कूल की सफ़ाई रखना बहुत ही आवश्यक है।

स्कूल को साफ़-सुथरा रखने के लिए निम्नलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए –

  • स्कूल के आंगन में कागज़ आदि के टुकड़े नहीं फेंकने चाहिए। इन्हें कूड़ेदानों में फेंकना चाहिए।
  • स्कूल के सभी कमरों, डैस्कों तथा बैंचों को प्रतिदिन अच्छी तरह साफ़ करना चाहिए।
  • स्कूल में घूमते हुए इधर-उधर थूकना नहीं चाहिए।
  • स्कूल के पाखानों तथा मूत्रालयों (पेशाब-घरों) की सफ़ाई की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। इन्हें प्रतिदिन फिनाइल के साथ धोना चाहिए।
  • स्कूल में पानी पीने वाले स्थान साफ़-सुथरे रहने चाहिएं।
  • दोपहर का खाना खाने के बाद बच्चों को बचा-खुचा खाना, कागज़ आदि स्कूल के भिन्न-भिन्न स्थानों पर पड़े कूड़ेदानों में फेंकना चाहिए।
  • स्कूल के खेल के मैदानों, घास के मैदानों तथा बगीचों को कूड़ा-कर्कट तथा कंकर फेंक कर गन्दा नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 5.
घर की वस्तुओं की सम्भाल किस तरह की जा सकती है ?
उत्तर-
घर की सम्भाल हमें आस-पड़ोस और स्कूल की सफाई के साथ-साथ इन स्थानों पर प्रयोग की जाने वाली वस्तुओं को सम्भाल अवश्य करनी चाहिए। – घर का सारा सामान अपने निश्चित स्थान पर रखना चाहिए। ताकि ढूंढते समय कोई मुश्किल न आए। अपने निश्चित स्थान पर रखा हुआ सामान ढूंढ़ने में आसानी होती है और टूटने से बचा रहता है।

घर में मौसम अनुसार सर्दी में गर्मियों के कपड़े और गर्मी में सर्दियों के कपड़ों को सम्भाल कर रखना चाहिए।
घर में बने लकड़ी के फर्नीचर, खिड़कियां, दरवाज़े आदि को दीमक से बचाने के लिए समय पर दीमक नाशक दवाई का छिड़काव करना अच्छा होता है। लोहे को जंग लगने वाला सामान को समय-समय पेंट करवा लेना चाहिए। घर में इस्तेमाल करने वाले कांच के सामान चाकू, कैंची, पेचकस, सूई, नेलकटर, ब्लेड और कनक को बचाने और दूसरी दवाइयां फिनाइल और तेजाब की बोतल आदि सुरक्षा वाली जगह पर रखने चाहिए जिसके साथ यह चीजें छोटे बच्चों की पहुंच से दूर रहे।

प्रश्न 6.
स्कूल के सामान की सम्भाल के लिए बच्चों को कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
स्कूल और स्कूल के सामान की सम्भाल-हरेक विद्यार्थी को स्कूल और उसके सामान का ध्यान रखना चाहिए। विद्यार्थियों को स्कूल की दीवार पर पैन या पैंसिल के साथ लाइनें नहीं मारनी चाहिए। क्लास में रखे सामान जैसे-फर्नीचर आदि को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। क्लास में लगे पंखे, ट्यूब लाईट आदि को नहीं तोड़ना चाहिए। क्लास के बाहर जाने के समय बिजली के बटनों को बंद कर देना चाहिए। पानी पीने के पश्चात् विद्यार्थियों को नल को बंद कर देना चाहिए। स्कूल में लगे हुए बगीचे में से पौधे और फूल नहीं तोड़ने चाहिए। बल्कि उनके बचाव रखने से स्कूल की सुंदरता में बढ़ोतरी करनी चाहिए। स्कूल लाईब्रेरी की किताबें अच्छे ढंग से अपने निश्चित स्थान पर रखनी चाहिए। लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ते समय शांति बनाये रखनी चाहिए। इसके इलावा खेल का सामान एन०सी०सी० बैंड, स्कूल की अलग-अलग प्रयोगशाला के सामान आदि को भी उसके स्थान पर रखना चाहिए।

Physical Education Guide for Class 6 PSEB सफ़ाई तथा सांभ-सम्भाल Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यक्तिगत सफ़ाई के साथ-साथ और किस वस्तु की सफ़ाई ज़रूरी है ?
उत्तर-
आस-पड़ोस की सफ़ाई।

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प्रश्न 2.
घर कैसे स्थान पर बनवाना चाहिए ?
उत्तर-
पक्के और ऊंचे स्थान पर।

प्रश्न 3.
गन्दे घर में रहने से क्या होता है ?
उत्तर-
कई तरह के रोग लग जाते हैं।

प्रश्न 4.
घर बनाते समय उस की नींव कैसी होनी चाहिए ?
उत्तर-
चौड़ी, गहरी और मज़बूत।

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प्रश्न 5.
कमरों में किस वस्तु का प्रबंन्ध होना चाहिए ?
उत्तर-
रोशनी और हवा का।

प्रश्न 6.
गन्दे, बिना रोशनी और सींकरे घरों में रहने से क्या होता है ?
उत्तर-
मनुष्य का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता।

प्रश्न 7.
घर किन-किन से दूर होना चाहिए ?
उत्तर-
बाज़ार और रेलवे स्टेशन से।

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प्रश्न 8.
घर के कूड़ा-कर्कट को किसमें फेंकना चाहिए ?
उत्तर-
ढक्कनदार ढोल में।

प्रश्न 9.
घर में गन्दे पानी के निकास के लिए किसकी व्यवस्था होनी चाहिए ?
उत्तर-
ढकी हुई नालियों की।

प्रश्न 10.
घर में कूड़े-कर्कट को कैसे ठिकाने लगाना चाहिए ?
उत्तर-
गड्ढे में।

PSEB 6th Class Physical Education Solutions Chapter 2 सफ़ाई तथा सांभ-सम्भाल

प्रश्न 11.
पशुओं को किस स्थान पर नहीं बांधना चाहिए ?
उत्तर-
गलियों में।

प्रश्न 12.
पानी को शुद्ध करने के लिए इसमें क्या मिलाना चाहिए ?
उत्तर-
लाल दवाई (पोटाशियम परमैगनेट)।

प्रश्न 13.
पाखानों और मूत्रालयों को किस चीज़ से साफ करना चाहिए ?
उत्तर-
फीनाइल से।

PSEB 6th Class Physical Education Solutions Chapter 2 सफ़ाई तथा सांभ-सम्भाल

प्रश्न 14.
घरों के पास पानी से भरे गड्ढों में क्या डालना चाहिए ?
उत्तर-
डी० डी० टी०।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
घर के आसपास की सफ़ाई के लिए किन पांच बातों की तरफ ध्यान देना चाहिए ?
उत्तर-
घर के आसपास की सफ़ाई के लिए निम्नलिखित बातों की तरफ ध्यान देना चाहिए –

  • गलियों और सड़कों में कूड़ा-कर्कट नहीं फेंकना चाहिए।
  • घर के बाहर गलियों में पशु नहीं बांधने चाहिएं।
  • घर के सामने पानी खड़ा नहीं होने देना चाहिए।
  • घरों का कूड़ा-कर्कट गली में रखे ढक्कनदार ढोल में डालना चाहिए।
  • स्थान-स्थान पर थूकना नहीं चाहिए।

प्रश्न 2.
घरों की सफ़ाई के लिए पांच बातें लिखो।
उत्तर-
घर की सफाई के लिए विशेष बातें इस प्रकार हैं –

  • घर के कूड़े-कर्कट और गन्दे पानी के निकास का उचित प्रबन्ध करना चाहिए।
  • घर के सभी कमरों को प्रतिदिन साफ़ करना चाहिए।
  • घर के कूड़े-कर्कट को ढक्कनदार ढोल में डालना चाहिए।
  • मक्खियों और मच्छरों से बचाव के लिए घर में फलीट अथवा फिनाइल का छिड़काव करना चाहिए।
  • घर की प्रत्येक वस्तु को उचित स्थान पर रखना चाहिए।

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प्रश्न 3.
स्कूल की सफ़ाई रखने के लिए कोई पांच बातें बताएं।
उत्तर-
स्कूल की सफाई रखने के लिए पांच बातें –

  • स्कूल के बैंचों और डैस्कों को साफ़ रखना चाहिए।
  • स्कूल के आंगन को कूड़ा-कर्कट फेंक कर गन्दा नहीं करना चाहिए।
  • लिखते समय स्याही फ़र्श पर नहीं गिरानी चाहिए।
  • स्कूल के कमरों की प्रतिदिन सफ़ाई करनी चाहिए।
  • पाखानों की सफ़ाई फिनाइल डाल कर करनी चाहिए।

प्रश्न 4.
घर में गन्दगी होने के कारण बताएं।
उत्तर-
घर में गन्दगी होने के कारण –

  • फलों, सब्जियों के छिलके और घर का कूड़ा-कर्कट आदि के रखने के लिए उचित स्थान का न होना।
  • रसोई, पाखाने और स्नानागृह के पानी के निकास का उचित प्रबन्ध न होना।
  • पशुओं के गोबर एवं मल-मूत्र का उचित प्रबन्ध न होना।
  • घर में रहने वालों को सफ़ाई के नियमों का उचित ज्ञान न होना।
  • छोटे घर में अधिक जीवों का रहना।
  • घर में अधिक जीवों के रहने पर घर की सफाई का उचित प्रबन्ध न करना।

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प्रश्न 5.
घर में अधिक व्यक्तियों के होने से घर की सफ़ाई पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वर्णन करो।
उत्तर-
घर में अधिक व्यक्तियों के होने से घर की सफ़ाई पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यदि घर में अधिक व्यक्ति होंगे तो घर की सफ़ाई ठीक प्रकार से नहीं रखी जा सकती। बच्चे घर की वस्तुओं को इधर-उधर बिखेर देते हैं। वे कागज़ के टुकड़े आदि घर में इधर-उधर फेंक देते हैं। एक व्यक्ति घर में झाड़ देता रहेगा और बच्चे घर में गन्दगी फैलाते रहेंगे। इतना ही नहीं, एक घर में अधिक व्यक्तियों के आते-जाते रहने से बाहर से पांवों से मिट्टी लग कर घर में आ जाएगी। फलत: घर का फ़र्श गन्दा हो जाएगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि घर में अधिक व्यक्तियों के रहने से सफ़ाई अच्छी तरह नहीं रह सकेगी।

प्रश्न 6.
शरीर की सफाई के नियम बताओ।
उत्तर-
शरीर की सफ़ाई के मुख्य नियम निम्नलिखित हैं-

  • हमें प्रतिदिन ताज़े और साफ़ पानी से नहाना चाहिए।
  • नहाने के बाद शरीर को साफ़ तौलिये से अच्छी तरह पोंछना चाहिए।
  • बालों को अच्छी तरह सुखा करके कंघी करनी चाहिए।
  • नहाने के बाद मौसम के अनुसार साफ़-सुथरे कपड़े पहनने चाहिएं।
  • बालों की सफाई की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। गर्मियों में सप्ताह में कमसे-कम दो बार और सर्दियों में एक बार किसी बढ़िया साबुन, शैंपू, रीठे, आंवले, दही या नींबू से धोना चाहिए।
  • आंखों की सफाई के लिए आंखों पर ठण्डे पानी के छींटे मारने चाहिएं।
  • दांतों की सफाई के लिए प्रतिदिन सवेरे उठने के बाद और रात को सोने से पहले ब्रुश करना चाहिए। इसके अतिरिक्त हर बार खाना खाने के बाद कुल्ला करना चाहिए।
  • शरीर के अन्य बाहरी अंगों (हाथ, नाक, कान, पैर आदि) की सफ़ाई की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

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प्रश्न 7.
घर में गन्दगी फैलने के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
घर में गन्दगी होने के कारण (Causes of Dirtness)

  • फलों, सब्जियों, पत्तों और घर के कूड़े-कर्कट के लिए उचित स्थान न होना।
  • रसोई, स्नान घर तथा पाखाने के गन्दे पानी के निकास की ठीक व्यवस्था न होना।
  • गोबर और मल-मूत्र आदि के लिए उचित व्यवस्था न होना।
  • घर वालों को सफ़ाई के नियमों का ज्ञान न होना।
  • छोटे घरों में अधिक सदस्यों का रहना।
  • घर में अधिक सदस्यों के कारण घर की सफ़ाई पर बुरा प्रभाव पड़ना।

प्रश्न 8.
एक अच्छा घर बनाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
अच्छा घर बनाने के लिए आवश्यक बातें-एक अच्छा घर बनाने के लिए हमें निम्नलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए
(क) घर की स्थिति (Situation of a House) –

  • घर खुश्क, सख्त तथा ऊंची भूमि पर बनाना चाहिए।
  • घर मण्डी, कारखाने, रेलवे स्टेशन तथा श्मशान घाट से दूर बनाना चाहिए।
  • घर तक पहुंचने का रास्ता साफ़, पक्का तथा खुला होना चाहिए।
  • घर में रोशनी तथा हवा काफ़ी मात्रा में आनी चाहिए। इसके लिए खिड़कियों और रोशनदानों की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
  • पड़ोसी अच्छे तथा मेल-मिलाप वाले होने चाहिएं। अच्छे पड़ोसी ही सुखदुःख के भागीदार होते हैं।

(ख) घर की बनावट (Construction of a House) –

  • घर की नींव गहरी, चौड़ी और दृढ़ होनी चाहिए।
  • घर भूमि या सड़क से काफ़ी ऊंचाई पर होना चाहिए ताकि वर्षा का पानी अन्दर न आ सके।
  • घर का फर्श पक्का एवं दृढ़ होना चाहिए। यह न तो अधिक खुरदरा हो और न ही अधिक फिसलने वाला हो। फ़र्श की ढलान भी उचित होनी चाहिए।
  • घर के दरवाजों और खिड़कियों पर जालियां लगवानी चाहिएं ताकि मक्खीमच्छर अन्दर न आ सकें।
  • मकान पक्के बनवाने चाहिएं। कच्चे घरों में सफ़ाई ठीक ढंग से नहीं हो सकती।
  • पाखाना, स्नान घर और रसोई घर एक-दूसरे कमरों से दूर बनाने चाहिएं।
  • रसोई, स्नान घर और पाखाना बनाते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। इनमें प्रकाश, हवा और पानी की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए।
  • गन्दे पानी के निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। रसोई में धुआं बाहर निकालने के लिए चिमनी आदि का प्रबन्ध होना चाहिए।

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निम्नलिखित वाक्यों में दिए गए खाली स्थानों को कोष्ठक में दिए गए उचित शब्द चुन कर भरो-

  1. हमें घर ……………. के निकट नहीं बनाना चाहिए। (स्कूल, रेलवे स्टेशन)
  2. घर …………… भूमि पर बनाना चाहिए।(सख्त और ऊंची, नरम और नीची)
  3. पानी को साफ़ करने के लिए ………….. का प्रयोग करना चाहिए। (नीली दवाई, लाल दवाई)
  4. पाखानों और मूत्रालय (पेशाबखानों) को प्रतिदिन …………. के साथ धोना चाहिए। (डी० डी० टी०, फिनाइल)
  5. हमें अपने पशुओं को ………….. में बांधना चाहिए। (गलियों, घरों)

उत्तर-

  1. रेलवे स्टेशन
  2. सख्त और ऊंची
  3. लाल दवाई
  4. फिनाइल
  5. घरों।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(iv) भू-गर्भ जल के अनावृत्तिकरण कार्य

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 3(iv) भू-गर्भ जल के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 3(iv) भू-गर्भ जल के अनावृत्तिकरण कार्य

PSEB 11th Class Geography Guide भू-गर्भ जल के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक या दो शब्दों में दीजिए :

प्रश्न (क)
फ्रांस में किस राज्य में पहले आरटेजीयन कुआँ लगाया गया ?
उत्तर-
अरटोइस (Artois) राज्य में।

प्रश्न (ख)
कुल्लू घाटी के गर्म चश्मों के नाम बताएँ।
उत्तर-
मनीकरण, गर्म (तत्ता) पानी, ज्वालामुखी।

प्रश्न (ग)
किस देश में पुराना गीज़र (Old Faithful Geyser) स्थित है ?
उत्तर-
संयुक्त राज्य अमेरिका में Yellow Stone Park में।

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प्रश्न (घ)
ठंडे पानी के चश्मे भारत में किस स्थान पर मिलते हैं ?
उत्तर-
हिमालय, पश्चिमी घाट और छोटा नागपुर पहाड़ियों में।

प्रश्न (ङ)
2014 में पंजाब की मानसून वर्षा की मात्रा क्या थी ?
उत्तर-
600 मि०मी० की वार्षिक वर्षा।

2. निम्नलिखित के उत्तर विस्तार सहित दो :

प्रश्न 1.
भू-गर्भ जल अनावृत्तिकरण का साधन है, कैसे ? विस्तार सहित लिखें।
उत्तर
भू-गर्भ जल का अपरदन कार्य (Erosional Work of Underground Water)-
भू-गर्भ जल द्वारा पर्वतीय ढलानों पर भू-स्खलन (Landslide) होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप चट्टानें टूटती हैं। भूगर्भ जल का अपरदन कार्य मुख्य रूप में चूने वाले क्षेत्रों में होता है। इसका कारण यह है कि वर्षा जलवायु से कार्बनडाइऑक्साइड गैस लेकर चूने की चट्टानों को घुलनशील (Soluble) बना देती है, जिससे चूने के प्रदेशों में अलग-अलग प्रकार की भू-आकृतियों की रचना होती है। चूने के प्रदेशों को काट प्रदेश (Karst Region) कहते हैं। यह नाम यूगोस्लाविया देश के ऐडरीआटिक समुद्र (Adriatic sea) के किनारे पर स्थित कार्ट प्रदेश के नाम पर रखा है। कार्ट प्रदेश में उत्पन्न भू-आकृतियों को कार्ट धरातल (Karst Topography) कहते हैं। ऐसे प्रदेश संयुक्त राज्य अमेरिका में फ्लोरिडा, मैक्सिको और भारत में खासी और जबलपुर हैं।

अपरदन (Erosion)-भूमि के भीतरी पानी के कारण हुए भू-स्खलन द्वारा अपरदन का काम होता है। जब झुके हुए धरातल की भूमि पानी में संतृप्त हो जाती है, तो ऊँचे भागों से नीचे सरकने लगती है। इसे भू-स्खलन (Landslide) कहते हैं। पहाड़ी भागों में जब हिम पिघलती है, तो उस पानी के कारण चट्टानी भाग सरक के नीचे गिरते हैं। इन्हें हिमस्खलन (Avalanche) कहते हैं। इनसे पहाड़ी प्रदेशों में मार्ग बंद हो जाते हैं और बहुत नुकसान होता है।

अपरदन के रूप (Kinds of Erosion)-भूमि के भीतर के पानी द्वारा अपरदन के कई रूप हैं-

  1. घुलने की क्रिया (Solution)
  2. पानी दबाव क्रिया (Hydraulic action)
  3. अपघर्षण (Abrasion)

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प्रश्न 2.
भू-गर्भ जल का जमा करने का कार्य क्या है और इससे कौन-सी रूप-रेखाएँ अस्तित्व में आती हैं ? चित्र बनाकर उत्तर स्पष्ट करें।
उत्तर-
भू-गर्भ जल का निक्षेपण कार्य (Depositional Work of Underground Water)-

भू-गर्भ जल अपनी घुलनशक्ति द्वारा चूने को प्रभावित करता है। इस जल में जब चूने की मात्रा अधिक हो जाती है, तो उसकी परिवहन शक्ति नष्ट हो जाती है, फलस्वरूप चूने का निक्षेप होना आरंभ हो जाता है। भू-पटल की भीतरी उष्णता के कारण जल का वाष्पीकरण हो जाता है, जिसके कारण चूना बाकी रह जाता है।

भू-गर्भ जल निक्षेपण द्वारा भू-आकृतियों की उत्पत्ति (Landforms Produced by Deposition of Underground Water)-
भू-गर्भ जल द्वारा किए गए निक्षेपण से नीचे लिखी भू-आकृतियाँ अस्तित्व में आती हैं-

1. स्टैलक्टाइट (Stalactite)-चूने के प्रदेशों में भूमिगत गुफाओं की छतों से चूना मिले जल की बूंदें टपकती रहती हैं। वाष्पीकरण के कारण इनका जल सूख जाता है, परंतु चूना छतों के साथ लटकता रहता है। इस चूने में अनेक बँदें आकर मिलती रहती हैं। इस क्रिया के निरंतर होते रहने से कुछ समय बाद छत से लटकते हुए नुकीले चूने के स्तंभ बन जाते हैं। इन्हें स्टैलक्टाइट कहते हैं। ये स्तंभ छत की ओर से पतले होते हैं।

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2. स्टैलगमाइट (Stalagmite)-चूना प्रदेशों में भूमिगत गुफाओं की छत से चूना मिला हुआ पानी तल पर
भी टपकता रहता है। जल के वाष्पीकरण के बाद गुफाओं के तल से ऊपर की ओर चूने के स्तंभ बन जाते हैं। इन्हें स्टैलगमाइट कहते हैं। ये स्तंभ तल की ओर से मोटे और ऊपर की ओर से पतले होते जाते हैं। कई बार स्टैलक्टाइट और स्टैलगमाइट मिलकर एक पूर्ण स्तंभ का रूप धारण कर लेते हैं। इन्हें गुफ़ा-स्तंभ (Cave Pillars) का नाम दिया जाता है।

3. निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट करो :

निम्नलिखित में अंतर स्पष्ट करें-
(i) लैपिज़ – डोलाइन
(ii) स्टैलक्टाइट – स्टैलगमाइट
(iii) युवाला – पोनार
(iv) साधारण कुआँ -आरटेजीयन कुआँ
(v) गीज़र – चश्मे।
उत्तर-
(i) लैपिज़ (Lapies)- चूने के प्रदेश में घुलनशील क्रिया से जोड़ चौड़े हो जाते हैं और लंबवर्ती दीवारें बन जाती हैं। इन्हें Karren भी कहते हैं।
डोलाइन (Doline)- जब जल के सुराख बहुत चौड़े हो जाते हैं, तो इन्हें डोलाइन कहते हैं। ये भूमि के नीचे धंस जाने के कारण बनते हैं।

(ii) स्टैलक्टाइट (Stalactite)-

  1. कार्ट प्रदेशों में गुफ़ाओं की छत से लटकते हुए चूने के निक्षेप से बने स्तंभों को स्टैलक्टाइट कहते हैं।
  2. ये पतले और नुकीले स्तंभ होते हैं।
  3. ये चूने से घुले पानी की टपकती बूंदों से बनते हैं।

स्टैलगमाइट (Stalegmite)-

  1. कार्ट प्रदेशों में गुफाओं के धरातल से ऊपर उठे हुए चूने के निक्षेप से बने स्तंभों को स्टैलगमाइट कहते हैं।
  2. ये मोटे और बेलनाकार स्तंभ होते हैं।
  3. ये चूने से घुले पानी के फ़र्श पर बने निक्षेप से बनते हैं।

(iii) यूवाला (Uvala)- कार्ट प्रदेश में सुरंग की छत नष्ट होने से कई कुंड आपस में मिल जाते हैं। इन्हें यूवाला कहते हैं।
पोनार (Ponar)- पोनार का अर्थ है-सुरंग। यह जल-कुंड को गुफ़ा के साथ मिलाती है। यह लंबवत् दिशा में होती है।

(iv) साधारण कुआँ (Ordinary Well)-

  1. भूतल पर खोदे गए किसी सुराख को कुआँ कहते हैं जिसमें से किसी शक्ति का प्रयोग कर पानी बाहर निकाला जाता है।
  2. इसे स्थायी भू-जल स्तर पानी प्रदान करता है।
  3. इसमें किसी शक्ति का प्रयोग करके पानी निकालना पड़ता है।
  4. भारत के उत्तरी मैदान में सबसे अधिक कुएँ मिलते हैं।

आरटेजीयन कुआँ (Artesian Well)-

  1. जब भूमिगत जल एक सुराख से अपने-आप लगातार बाहर निकलता रहता है, तो उसे आरटेजीयन कुआँ कहते हैं।
  2. इसमें एक अप्रवेशी परत में पानी का भंडार होता है।
  3. इसमें एक सुराख में से पानी दबाव-शक्ति से बाहर निकलता है।
  4. ऑस्ट्रेलिया के क्वीनज़लैंड प्रदेश में सबसे अधिक आरटेज़ीयन कुएँ मिलते हैं।

(v) गीज़र (Geysers)-

  1. फव्वारे के समान उछलकर अपने-आप निकलने वाले गर्म पानी के चश्मे को गीज़र कहते हैं।
  2. गीज़र रुक-रुककर एक निश्चित समय के अंतर पर बाहर निकलता है।
  3. भाप के साथ उबलता हुआ पानी एक प्रकार की पाइप से बाहर निकलता है।
  4. यू०एस०ए० में ओल्ड फेथफुल प्रसिद्ध गीज़र है।

चश्मे (Springs)-

  1. जब भूमि का भीतरी पानी अपने-आप एक धारा के रूप में बाहर निकलता है, तो उसे गर्म पानी का चश्मा कहते हैं।
  2. यह जल लगातार बहता रहता है।
  3. यह धरातल की ढलान के अनुसार किसी प्राकृतिक सुराख से बाहर निकलता है।
  4. हिमाचल प्रदेश में मनीकरण में गर्म पानी के चश्मे हैं।

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Geography Guide for Class 11 PSEB भू-गर्भ जल के अनावृत्तिकरण कार्य Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
भू-गर्भ जल या भूमिगत जल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जो जल मुसामदार चट्टानों के नीचे चला जाता है।

प्रश्न 2.
भू-गर्भ जल का कार्य किन चट्टानों पर अधिक होता है ?
उत्तर-
चूना पत्थर, चॉक, डोलोमाइट।

प्रश्न 3.
जल के प्रयोग के कोई दो कार्य बताएँ।
उत्तर-
कृषि, घरेलू ज़रूरतें।

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प्रश्न 4.
गर्म जल के चश्मे का एक उदाहरण दें।
उत्तर-
मनीकरण।

प्रश्न 5.
गीज़र क्या है ?
उत्तर-
जब पानी भाप के फव्वारे के समान उछलता है।

प्रश्न 6.
भारत में एक ताप-ऊर्जा के प्लांट का नाम बताएँ।
उत्तर-
मनीकरण (हिमाचल प्रदेश)।

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प्रश्न 7.
Aonifer का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
जल प्रदान करना।

प्रश्न 8.
सबसे अधिक आरटेजीयन कुएँ कहाँ हैं ?
उत्तर-
ऑस्ट्रेलिया में Great Artesian Basin.

प्रश्न 9.
भारत में गुफाओं के दो क्षेत्र बताएँ।
उत्तर-
छत्तीसगढ़ और चेरापूंजी।

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प्रश्न 10.
पंजाब में कितने प्रतिशत भाग में भूमिगत जल से सिंचाई होती है ?
उत्तर-
73%.

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1.
भू-गर्भ जल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
धरती के ठोस तल के नीचे चट्टानों और दरारों में मिलने वाले पानी को भू-गर्भ या भूमिगत जल कहते हैं।

प्रश्न 2.
भू-गर्भ जल के दो मुख्य स्रोत बताएँ।
उत्तर-

  • आकाशीय जल
  • मैगमा से प्राप्त जल
  • खनिज पदार्थों से प्राप्त जल
  • हिम के पिघलने से प्राप्त जल।

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प्रश्न 3.
जल-चक्र से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
समुद्र, वायुमंडल और स्थल पर पानी के चक्र में घूमने की क्रिया को जल-चक्र कहते हैं।

प्रश्न 4.
पारगामी और अपारगामी चट्टानों में क्या अंतर है ?
उत्तर-
जिन चट्टानों में पानी प्रवेश कर जाता है, उन्हें पारगामी चट्टानें कहते हैं। जिन चट्टानों में पानी प्रवेश नहीं कर सकता, उन्हें अपारगामी चट्टानें कहते हैं।

प्रश्न 5.
भू-जल स्तर किसे कहते हैं ?
उत्तर-
भूमिगत जल की ऊपरी परत को भू-जल स्तर कहते हैं।

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प्रश्न 6.
भू-जल-स्तर किन तत्त्वों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-

  • चट्टानों की पारगमता
  • वर्षा की मात्रा
  • चट्टानों की बनावट।

प्रश्न 7.
आरटेज़ीयन कुआँ क्या होता है ?
उत्तर-
यह एक विशेष प्रकार का कुआँ होता है, जिसमें पानी एक सुराख (Bore) के द्वारा अपने आप लगातार निकलता रहता है।

प्रश्न 8.
ग्रेट आरटेज़ीयन बेसिन कहाँ स्थित है ?
उत्तर-
ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी क्षेत्र में।

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प्रश्न 9.
गीज़र से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
फव्वारे के समान उछलकर अपने आप निकलने वाले गर्म पानी के चश्मे को गीज़र कहते हैं।

प्रश्न 10.
कार्ट प्रदेश से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
चूने के पत्थर की चट्टानों से बने प्रदेश को कार्ट प्रदेश कहते हैं।

प्रश्न 11.
भू-गर्भ जल के अपरदन की क्रियाएँ बताएँ।
उत्तर-

  • घुलन क्रिया
  • अपघर्षण
  • जल-दबाव क्रिया।

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प्रश्न 12.
विश्व में सबसे प्रसिद्ध गीज़र कहाँ है ?
उत्तर-
संयुक्त राज्य अमेरिका में Old faithful गीज़र।

प्रश्न 13.
लैपीज़ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
कार्ट क्षेत्रों में समानांतर नुकीली पहाड़ियों को लैपीज़ कहते हैं।

प्रश्न 14.
डोलाइन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
वे चौड़े सुराख, जिनमें से नदियाँ नीचे चली जाती हैं, डोलाइन कहते हैं।

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प्रश्न 15.
भूमिगत गुफाएँ कैसे बनती हैं ?
उत्तर-
चूने के पत्थर की चट्टानों के घुल जाने से गुफाएँ बन जाती हैं।

प्रश्न 16.
स्टैलक्टाइट से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
कार्ट प्रदेशों में गुफ़ा की छत से लटकते, पतले, नुकीले चूने के स्तंभों को स्टैलक्टाइट कहते हैं।

प्रश्न 17.
स्टैलगमाइट किसे कहते हैं ?
उत्तर-
कार्ट क्षेत्रों में गुफा के फ़र्श से ऊपर की ओर जाते मोटे और बेलनाकार स्तंभों को स्टैलगमाइट कहते हैं।

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लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
जल-चक्र से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जल-चक्र (Hydrologic Cycle)-समुद्र, वायुमंडल और स्थल पर पानी के चक्र में घूमने की क्रिया को जल-चक्र (Hydrologic Cycle) कहते हैं।

समुद्र का पानी वाष्प बनकर स्थल पर वर्षा का साधन बनता है। वर्षा के पानी का कुछ भाग वाष्प बनकर उड़ जाता है। कुछ भाग नदियों के रूप में बह (Run Off) जाता है

और कुछ भाग चट्टानों और दरारों में से होकर धरती के नीचे चला जाता है। इस प्रकार यह पानी नदियों, भूमिगत जल आदि साधनों द्वारा अंत में समुद्र में पहुँचता है। पानी का यह चक्र सदा चलता रहता है।

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प्रश्न 2.
भू-जल स्तर की स्थिति किन तत्त्वों पर निर्भर करती है ?
उत्तर-
भू-जल-स्तर की स्थिति (Position of Water Table)-अलग-अलग स्थानों पर जल स्तर की ऊँचाई भिन्न होती है।

  • नदियों और झीलों के किनारे पर जल-स्तर ऊँचा होता है।
  • मैदानों में जल-स्तर ऊँचा होता है।
  • मरुस्थलों में कम वर्षा के कारण, जल-स्तर सैंकड़ों मीटर नीचे होता है।
  • जल-स्तर वर्षा ऋतु में ऊँचा और शुष्क ऋतु में नीचे हो जाता है।
  • अधिक नमी वाले प्रदेशों में जल-स्तर ऊँचा होता है।

इस प्रकार भू-जल-स्तर की स्थिति नीचे लिखे तत्त्वों पर निर्भर करती है-

  1. चट्टानों की पारगमता
  2. वर्षा की मात्रा
  3. चट्टानों की मुसामदार रचना
  4. चट्टानों की बनावट।

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प्रश्न 3.
भूमि जल-स्तर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
भूमि जल स्तर अथवा संतृप्त तल (Water Table or Saturation Level)-भूमिगत जल के ऊपरी स्तर को भूमि जल-स्तर कहा जाता है। इसके नीचे चट्टानें जल-तृप्त रहती हैं। वर्षा ऋतु में भूमि जल-स्तर ऊँचा और शुष्क ऋतु में नीचे चला जाता है। भू-गर्भ भिन्नताओं और चट्टानों की पारगमता में परिवर्तन के कारण किसी भी क्षेत्र में अलग-अलग जल-स्तर पाए जाते हैं। एक स्थान पर पारगामी चट्टानों के नीचे यदि अपारगामी चट्टानें हों, तो जल का नीचे रिसना रुक जाता है और वहाँ एकत्र होकर जल-स्तर की रचना करता है। जल-स्तर के ऊंचा-नीचा होने को नीचे लिखे तत्त्व नियंत्रित करते हैं-

  1. चट्टानों की पारगमता (Permeability of Rocks)
  2. चट्टानों की मुसामदारी (Porosity of Rocks)
  3. चट्टानों की संरचना (Structure of the Rocks)
  4. चट्टान जोड़ (Rock Joints)
  5. वर्षा की मात्रा (Amount of Rainfall)

प्रश्न 4.
चूने के पत्थर की चट्टानों के क्षेत्र में गुफाएँ किस प्रकार बनती हैं ?
उत्तर-
गुफाएँ (Caves)-घुलनशील क्रिया से भूमि के निचले भाग खोखले हो जाते हैं। धरातल पर कठोर भाग छत के रूप में खड़े रहते हैं। इस प्रकार भूमि के अंदर ही कई मील लंबी गुफाएँ बन जाती हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के केन्द्रीय प्रदेश की मैमथ गुफाएँ (Mammoth Caves) पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं, जोकि 48 कि०मी० लंबी हैं। भारत में मध्य प्रदेश के बस्तर जिले में कुटुमसर (Kutumsar) की गुफाएँ प्रसिद्ध हैं, जिसका बड़ा कक्ष (Chamber) 100 मीटर लंबा और 12 मीटर ऊँचा है।

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प्रश्न 5.
आरटेजीयन कुएँ किस प्रकार बनते हैं ?
उत्तर-
आरटेज़ीयन कुएँ (Artesian Wells)-ये विशेष प्रकार के कुएँ होते हैं। इनमें पानी एक सुराख (Bore) के द्वारा अपने-आप ही लगातार बाहर निकलता रहता है। इस प्रकार के कुएँ सबसे पहले फ्रांस में अरटोइस (Artois) प्रदेश में खोदे गए, इसीलिए इन्हें आरटेजीयन कुएँ (Artesian Wells) कहते हैं।

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रचना (Formation)-आरटेजीयन कुओं की रचना नीचे लिखी परिस्थितियों में होती है-

  • दो अप्रवेशी चट्टानों (Impermeable Rocks) के बीच एक प्रवेशी चट्टान (Permeable Rock) हो।
  • प्रवेशी चट्टान पानी वाली होती है। इसे एक्वीफर (Aquifer) कहते हैं। इसके दोनों सिरे ऊँचे और खुले हों, जहाँ वर्षा अधिक हो।
  • इन चट्टानों का आकार एक तश्तरी (Saucer) के रूप में हो।
  • दोनों ढलानों से पानी नीचे वाले भाग में भर जाए।
  • अप्रवेशी चट्टानों में सुराख करके कुआँ खोदा जाता है।
  • पानी के दबाव की शक्ति (Hydraulic Pressure) से पानी तेज़ी से बाहर निकलता हो।

प्रदेश (Areas)-

  1. ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी भाग में 172 लाख वर्ग कि०मी० क्षेत्र में लगभग 5 लाख आरटेजीयन कुएँ हैं।
  2. भारत में गुजरात राज्य, पांडिचेरी, तमिलनाडु के अरकाट क्षेत्र में और तराई क्षेत्रों में आरटेजीयन कुएँ मिलते हैं।

महत्त्व (Importance)-इन कुओं की शुष्क प्रदेशों और मरुस्थलों में पानी की प्राप्ति के लिए विशेष महानता है। ऑस्ट्रेलिया में इनकी महानता पशु-पालन के लिए है।

प्रश्न 6.
गीज़र किस प्रकार बनते हैं ?
उत्तर-
गीज़र (Geyser)-फव्वारे के समान उछलकर अपने आप निकलने वाले गर्म पानी के स्रोतों को गीज़र (Geyser) कहते हैं। (A Geyser means jumping water.)

रचना (Formation)-

  1. भूमि के नीचे अधिक ताप के कारण गर्म पानी का भंडार (Rescrvoir) होता है।
  2. गर्म पानी एक टेढ़ी-मेढ़ी नली (Pipe) के द्वारा ऊपर आता है।
  3. अधिक ताप के कारण पानी भाप बन जाता है।
  4. भाप के साथ उबलता हुआ पानी बाहर निकलता है।
  5. दुबारा पानी के उबलने में कुछ समय लगता है, इसलिए गीज़र रुक-रुककर पानी उछालते हैं।

प्रदेश (Areas)-

  1. गीज़र साधारण रूप में ज्वालामुखी प्रदेशों में होते हैं।
  2. प्रमुख गीज़र संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) के Yellow Stone Park में, आइसलैंड (Iceland) और न्यूज़ीलैंड के उत्तरी द्वीप में मिलते हैं।
  3. संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) में Old Faithful गीज़र कई सालों से प्रति 65 मिनट के अंतर से 100 मीटर ऊपर तक पानी फेंक रहा है।

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प्रश्न 7.
कार्ट भू-रचना से क्या अभिप्राय है ? ..
उत्तर-
कार्ट प्रदेश (Karst Regions)-भूमि के निचले पानी का महत्त्वपूर्ण कार्य चूने के प्रदेश में होता है। भूमि के अंदर का पानी ऐसे विशेष प्रकार की भू-रचना का निर्माण करता है। ऐसे प्रदेश पत्थरों के रेगिस्तान, वनस्पति रहित और असमतल होते हैं। पानी को वायुमंडल से कार्बन-डाईऑक्साइड मिल जाती है। इसमें चूने का पत्थर घुल जाता है। ‘कार्ट’ शब्द यूगोस्लाविया के चूने की चट्टानों के प्रदेश से लिया गया है। इस प्रकार चूने की चट्टानों के प्रदेश की भू-रचना को काट भू-रचना कहते हैं। ऐसे प्रदेश फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका में फ्लोरिडा और केंटकी प्रदेश, मैक्सिको में यूकाटन प्रदेश और भारत में खासी और जबलपुर क्षेत्र हैं।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
भू-गर्भ जल के अपरदनों का वर्णन करें।
उत्तर-
भू-गर्भ जल के अपरदन को नियंत्रित करने वाले कारक (Factors Controlling the Erosion of Underground Water)-

चूना क्षेत्रों में चट्टानों में मुसाम और उनकी पारगमता के कारण नदियाँ भूमिगत होकर लुप्त हो जाती हैं। इन आकृतियों के विकास के लिए निम्नलिखित परिस्थितियाँ ज़रूरी हैं :

  1. असंगठित चूने के कणों के समतल प्रदेश ताकि जल जल्दी प्रवाहित न हो जाए।
  2. काफी मात्रा में वर्षा।
  3. चट्टानों में मुसाम और पारगमता।

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प्रश्न 2.
भू-गर्भ जल के अपरदन से कौन-सी आकृतियाँ बनती हैं ?
उत्तर-
भू-गर्भ जल के अपरदन द्वारा उत्पन्न भू-आकृतियाँ (Land forms Produced by Erosion of Underground Water)-

भू-गर्भ जल के अपरदन द्वारा नीचे लिखी भू-आकृतियाँ उत्पन्न होती हैं-

1. लैपीज़ (Lapies)—साधारण तौर पर चूने की चट्टानों में जोड़ होते हैं, जिनमें पानी प्रवेश कर जाता है और चूने को घोल देता है, जिसके फलस्वरूप ये जोड़ चौड़े हो जाते हैं। इनकी दीवारें लंबवर्ती और एक-दूसरे के समानांतर नुकीली हो जाती हैं। इन्हें फ्रांसीसी भाषा में लैपीज़ (Lapies) या जर्मन भाषा में केरन (Carren) या क्लिट (Clint) कहते हैं।

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2. गहरे सुराख (Sink Holes)—कार्बन-युक्त पानी जब अपनी घुलनशील क्रिया द्वारा लैपीज़ को बहुत अधिक चौड़ा कर देता है, तब बड़े-बड़े खड्डे बन जाते हैं जिन्हें गहरे सुराख कहते हैं।

3. बड़े सुराख (Swallow Holes)-धीरे-धीरे गहरे सुराख जल की घुलनशील क्रिया द्वारा चौड़े हो जाते हैं और नदियाँ इनमें प्रवेश करके भूमिगत हो जाती हैं और पानी अलोप हो जाता है। इन्हें बड़े सुराख कहते हैं।

4. पोनार (Ponar)-सर्बियन (Serbian) भाषा के इस शब्द पोनार (Ponar) का अर्थ है-सुरंग। वह सुरंग, जो बड़े सुराखों को भूमिगत केंद्रों से मिलाती है, सुरंग या पोनार कहलाती है। यह सुरंग आम तौर पर लंबवत् या थोड़ी झुकी होती है।

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5. डोलाइन (Doline)-घुलनशील क्रिया के कारण कभी-कभी बड़े सुराखों की भूमि अचानक नीचे फँस जाती है। इस प्रकार बड़े और गहरे सुराखों को डोलाइन कहते हैं।

6. युवाला (Uvalas)-कभी-कभी कार्ट प्रदेशों में सुरंगों की छत टूटकर नष्ट हो जाती है और कई कुंड आपस में मिल जाते हैं, जिसके फलस्वरूप विस्तृत खड्डे बन जाते हैं। इन्हें युवाला या कुंड-समूह कहते हैं।

7. भूमिगत गुफाएँ (Underground Caves)—वर्षा का पानी सुरंगों के द्वारा भूमिगत होता हुआ अप्रवेशी चट्टानों की परत तक पहुंच जाता है। धीरे-धीरे ऊपरी प्रवेशी चट्टानों को घोलकर लंबे मार्ग में ढलान के अनुसार जल-धारा बहने लगती है, फलस्वरूप अप्रवेशी चट्टान के ऊपर प्रवेशी चट्टान में भूमिगत जलधारा बहने लगती है। जल-धारा के क्षेत्र को भूमिगत गुफा कहते हैं। इन गुफाओं का अगला भाग जब टूटकर नष्ट हो जाता है, तो जल-धारा दोबारा प्रकट हो जाती है।

उदाहरण-(क) संयुक्त राज्य अमेरिका के केंटकी प्रदेश में मैमथ गुफाएँ (Mammoth Caves) बहुत प्रसिद्ध हैं।
(ख) भारत में छत्तीसगढ़ राज्य के कोतामसर (Kotamsar) की गुफाएँ प्रसिद्ध हैं।

8. प्राकृतिक पुल (Natural Bridge)-भूमिगत गुफाओं की छत अपने-आप कहीं-न-कहीं से टूटती रहती है। बीच का भाग पुल के समान खड़ा रहता है। इसे प्राकृतिक पुल कहते हैं।

9. राजकुंड और चूरनकूट (Poljes and Hums)-चूने के प्रदेश की छतें धीरे-धीरे टूटकर नष्ट होती रहती हैं। इसके फलस्वरूप यह प्रदेश मैदानी रूप में विशाल गर्त का रूप धारण कर लेता है। इसे राजकुंड कहते हैं। गुफाओं की छतों की चट्टानें राजकुंड के तल पर गिरकर ढेरों के रूप में एकत्र हो जाती हैं। इन ढेरों को चूरनकूट कहते हैं।

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प्रश्न 3.
चश्मे की रचना, प्रकार और प्रदेशों के बारे में बताएँ।
उत्तर-
चश्मे (Springs)-
कई बार प्रवेशी चट्टानों की परतों के नीचे अप्रवेशी चट्टानें होती हैं। वर्षा का जल प्रवेशी चट्टानों को संतृप्त कर देता है और अप्रवेशी चट्टानों तक पहुंच जाता है और फिर अप्रवेशी चट्टानों की ढलान की दिशा में धीरे-धीरे बहता हुआ किसी दरार आदि से बाहर प्रकट हो जाता है। इसे जल का रिसना (Seepage) कहते हैं। यदि जल की मात्रा अधिक हो और जल तेज़ी से बाहर आए, तो उसे स्रोत या चश्मा कहा जाता है। आम तौर पर ये स्रोत दो प्रकार के होते हैं। एक स्थायी और दूसरा अस्थायी। जिनमें जल कभी नहीं सूखता, उन्हें स्थायी और जिनमें कुछ समय के लिए जल प्रकट होता है, उन्हें अस्थायी कहते हैं। रिसने की क्रिया से बनी झीलें कभी-कभी नदियों का स्रोत बन जाती हैं। कश्मीर घाटी में वैरीनाग (Verinag) इसी प्रकार की झील झेलम नदी का स्रोत है।

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चश्मे के प्रकार (Types of Springs)-

  1. साधारण चश्मे (Simple Springs)—इनमें साफ़ और मीठा पानी होता है।
  2. गर्म पानी के चश्मे (Hot Springs)-इनमें अधिक गहराई में गर्म पानी होता है।
  3. खनिज चश्मे (Mineral Springs)—इनमें गंधक, नमक आदि खनिज होते हैं।

भारत में पानी के चश्मों का वितरण (Distribution of Springs in India)-

  1. कुल्लू घाटी में – मनीकरण (Manikaran)
  2. कांगड़ा में – calciat (Jawalamukhi) .
  3. पटना में – राजगिरि (Raigiri)
  4. मुंघेर में – सीताकुंड (Sitakund)
  5. उत्तर प्रदेश में – गंगोत्री और यमुनोत्री (Gangotri and Yamunotri)

गीज़र (Geyser)—फव्वारे के समान उछलकर अपने आप निकलने वाले गर्म पानी के स्रोत को गीज़र (Geyser) कहते हैं। (A Geyser means jumping water.)
रचना (Formation)-

  1. भूमि के नीचे अधिक ताप के कारण गर्म पानी का भंडार होता है।
  2. गर्म पानी एक टेढ़ी-मेढ़ी नली (Pipe) के द्वारा ऊपर आता है।
  3. अधिक ताप के कारण पानी भाप बन जाता है।
  4. भाप के साथ उबलता हुआ पानी बाहर निकलता है।
  5. पानी को दोबारा उबलने में कुछ समय लगता है, इसलिए गीज़र रुक-रुककर पानी को उछालते हैं।

प्रदेश (Areas)-

  1. गीज़र आमतौर पर ज्वालामुखी प्रदेशों में होते हैं।
  2. प्रमुख गीज़र संयुक्त राज्य अमेरिका, न्यूज़ीलैंड और आइसलैंड में हैं।
  3. संयुक्त राज्य अमेरिका में Old Faithful कई वर्षों से प्रति 65 मिनट के अंतर से 100 मीटर पानी उछालता है।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 8 दिल्ली सल्तनत

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 8 दिल्ली सल्तनत Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 8 दिल्ली सल्तनत

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
दिल्ली सल्तनत की स्थापना, आरम्भिक संगठन तथा विस्तार में इल्तुतमिश, बलबन तथा अलाऊद्दीन खिलजी के योगदान की चर्चा करें।
उत्तर-
1206 ई० से 1290 ई० के काल को दिल्ली सल्तनत की स्थापना तथा आरम्भिक संगठन का काल समझा जाता है। यह शिशु सल्तनत बड़ी अस्थिर तथा असंगठित थी। राज्य को आंतरिक तथा बाहरी शत्रुओं का सामना करना पड़ रहा था। इस कठिन स्थिति को पहले इल्तुतमिश ने और बाद में बलबन ने सम्भाला। फिर अलाऊद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत का खूब विस्तार किया। इन सब के योगदान का वर्णन इस प्रकार है :

I. आरम्भिक संगठन इल्तुतमिश (1211-1236)-

(i) कुतुबुद्दीन ऐबक के पश्चात् 1211 ई० में इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बना। इल्तुतमिश ने 25 वर्ष तक राज्य किया। उसने ऐबक के अधूरे छोड़े हुए कार्य को पूरा किया तथा दिल्ली सल्तनत के प्रशासक की रूपरेखा तैयार की।

(ii) इल्तुतमिश ने गज़नी के पुराने तथा नये शासकों के आक्रमणों से अपने राज्य की रक्षा की। उसने अपने प्रतिद्वंद्वियों अर्थात् ताजुद्दीन यल्दौज़ तथा नासिरुद्दीन कुबाचा का सफाया किया और राजपूत शासकों के विरुद्ध लम्बा संघर्ष किया। उसने फिर से बंगाल पर दिल्ली का आधिपत्य स्थापित किया। उसने मंगोल विजेता चंगेज़ खां के विनाशकारी आक्रमण को अपनी सूझबूझ से टाला। इल्तुतमिश के यत्नों के फलस्वरूप दिल्ली सल्तनत का शासन पंजाब, सिंध, गंगा-यमुना दोआब तथा बंगाल में पहले से अधिक सुदृढ़ हो गया।

(iii) (क) इल्तुतमिश ने सल्तनत के लिए केन्द्रीय, प्रान्तीय तथा न्याय प्रबन्ध की व्यवस्था की। यही व्यवस्था भविष्य में शासन की आधारशिला बनी।

(ख) उसने केन्द्र में स्थायी सेना की व्यवस्था की तथा तुर्क अमीरों पर नियन्त्रण स्थापित किया। इल्तुतमिश द्वारा संगठित किये गये तुर्क अमीरों को बाद में ‘चालीसा’ का नाम दिया गया।

(ग) उसने ‘टका’ तथा ‘जीतल’ नाम के चाँदी और तांबे के सिक्के चलाये।
(घ) इल्तुतमिश ने दिल्ली शहर की भव्यता और सुल्तान की मान-मर्यादा को बढ़ाया।

(ङ) उसने बगदाद के खलीफा से सम्मान के वस्त्र तथा राज्याभिषेक का पत्र प्राप्त किया। खलीफ़ा को इस्लामी जगत् का नेता समझा जाता था। इससे इल्तुतमिश खलीफा की सत्ता को मानने वाले सभी लोगों की दृष्टि में दिल्ली का वास्तविक शासक होने के साथ-साथ कानूनी शासक भी बन गया।

ग्यासुद्दीन बलबन (1266-1287 ई०)-
1236 ई० से 1266 ई० तक इल्तुतमिश के उत्तराधिकारियों ने शासन किया। परन्तु 1240 के बाद वास्तविक सत्ता बलबन नामक सरदार के हाथ में आ गई। वह 1266 ई० में स्वयं सुल्तान बन गया। इल्तुतमिश के उत्तराधिकारियों के समय अमीरों ने सुल्तान को एक कठपुतली अथवा खिलौना मात्र बना लिया था। इससे सुल्तान की प्रतिष्ठा को भी बहुत आघात पहुंचा था और प्रान्तीय तथा राजपूत राजाओं को भी सिर-उठाने का अवसर मिल गया था। इधर 20 वर्षों में उत्तर-पश्चिम की ओर से मंगोलों का दबाव भी बढ़ रहा था। इन परिस्थितियों को देखते हुए बलबन ने किसी नई विजय का विचार त्याग दिया तथा दिल्ली सल्तनत को सुदृढ करने के लिए ‘लौह तथा रक्त’ नीत अपनाई-

(क) सबसे पहले बलबन ने तुर्क अमीरों को सुल्तान की सर्वोच्चता मानने के लिए बाध्य किया। उसने सुल्तान के दैवी अधिकार के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। इससे अभिप्राय यह था कि सुल्तान को राज्य करने का अधिकार ईश्वर से मिला है। गुप्तचरों द्वारा अमीरों पर हर समय कड़ी नज़र रखी जाती थी।

(ख) बलबन ने बंगाल के तुर्क गवर्नर तुगरिल खां के विद्रोह को बड़ी क्रूरता से दबाया। उसने दिल्ली के निकट मेवातियों तथा गंगा-यमुना दोआब, अवध एवं कटेहर के प्रदेशों में राजपूतों के विद्रोह को भी सख्ती से कुचला।

(ग) बलबन ने अपनी सेना तथा प्रशासन को संगठित किया। उसने मंगोल आक्रमणों को रोकने के लिए विशेष सेना संगठित की और उसे मुल्तान, सुनाम और समाना आदि सीमावर्ती क्षेत्रों में रखा। इस तरह बलबन ने शिशु दिल्ली सल्तनत को आंतरिक तथा बाहरी सीमावर्ती शत्रुओं से बचाया।

II. दिल्ली सल्तनत का विस्तार अलाऊद्दीन खिलजी–

बलबन की संगठन नीति ने दिल्ली सल्तनत के विस्तार का मार्ग खोल दिया था। अगले 40 वर्षों में खिलजी तथा तुग़लक वंश के सुल्तानों के अधीन दिल्ली का राज्य लगभग पूरे भारत में फैल गया। खिलजी वंश के दूसरे शासक अलाऊद्दीन (12961316 ई०)
उत्तरी तथा दक्षिणी भारत में अपनी विजयों के लिए विख्यात हैं :- उत्तरी भारत की विजयें-

(क) अलाऊद्दीन सिकन्दर की तरह बहुत बड़ा विजेता बनना चाहता था। उसने अपनी सेना का संगठन किया तथा सैनिक अभियानों के लिये योग्य और विश्वासपात्र सेनापतियों का चुनाव किया। इनमें से अल्प खाँ, नुसरत खाँ, ज़फर खाँ तथा उलुग खाँ प्रसिद्ध सेनापति थे।

(ख) अलाऊद्दीन ने 1296-97 ई० में मुल्तान तथा सिन्ध के प्रदेश विजित किया। ये प्रदेश जलालुद्दीन के पुत्रों के अधिकार में चले गये थे।

(ग) अलाऊद्दीन ने 1299 ई० में गुजरात के उपजाऊ तथा धनी प्रदेश की ओर अपनी सेनाएं भेजीं। गुजरात अपने समुद्री व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। गुजरात का शासक राय करण भाग गया।

(घ) दिल्ली तथा गुजरात के बीच राजस्थान की मरुभूमि थी। इसमें कई शक्तिशाली दुर्ग थे। इनको जीते बिना गुजरात का मार्ग नहीं खुल सकता था। अलाऊद्दीन ने पहले 1300-01 में रणथम्भौर के किले को घेर लिया। काफ़ी प्रयत्नों के बाद इसे जीत लिया।

(ड) मेवाड़ में चितौड़ का शक्तिशाली किला भी दिल्ली से गुजरात के रास्ते पर था। एक लम्बे घेरे के बाद उसने 1303 ई० में चितौड़ को भी विजय कर लिया।

(च) अब सुल्तान ने मध्य भारत में मालवा तथा अन्य प्रदेशों के विरुद्ध सेना भेजी। 1305-06 ई० तक उसने माण्डू, धार, उज्जैन तथा चन्देरी पर अधिकार कर लिया।

(छ) 1308 ई० से 1311 ई० के बीच अलाऊद्दीन ने राजस्थान में सिवाना तथा जालौर के किलों को भी जीत लिया।

दक्षिण में विजयें-दक्षिण में अलाऊद्दीन की नीति उसकी उत्तरी भारत में विजय की नीति के विपरीत थी। वह दिल्ली से दक्षिण के राजाओं पर नियन्त्रण रखने की कठिनाइयों को समझता था। इस कारण वह दक्षिण में केवल दिल्ली की प्रभुसत्ता स्थापित करना चाहता था और वहां से धन प्राप्त करना चाहता था। परन्तु वह उत्तर-पश्चिम की ओर से होने वाले मंगोलों के निरन्तर आक्रमणों के कारण दक्षिण की ओर ध्यान न दे सका। 1297 ई० से लेकर 1306 ई० तक मंगोलों ने इस देश पर छ: बार बड़े भयंकर आक्रमण किये। वे दो बार दिल्ली तक भी पहुंच गए थे। अलाऊद्दीन ने उनका सामना करने के लिए एक विशाल सेना तैयार की थी। 1306 ई० में मध्य एशिया के मंगोल शासक की मृत्यु के बाद यह आक्रमण रुक गए। अब अलाऊद्दीन ने इस सेना का प्रयोग दक्षिण की विजयों के लिए किया। उसने अपने योग्य दास तथा सेनानायक मलिक काफूर को दक्षिण की ओर भेजा। इसे गुजरात की विजय के समय एक हज़ार दीनार अर्थात् सोने के सिक्के देकर खरीदा गया था।
विन्ध्य पर्वत के दक्षिण में इस समय चार राज्य थे-सबसे निकट देवगिरि तथा उसके पूर्व में वारंगल, दक्षिण में द्वारसमुद्र तथा सुदूर दक्षिण में मदुरै का राज्य था।

  • सबसे पहले 1307-08 में देवगिरि के राजा रामचन्द्र देव पर आक्रमण किया गया। उसने अलाऊद्दीन की अधीनता स्वीकार कर ली। सुल्तान ने देवगिरि के प्रदेश को अपनी शेष विजयों के लिए आधार के रूप में प्रयोग किया।
  • अगले दो वर्षों में मलिक काफूर ने वारंगल तथा द्वारसमुद्र के राजाओं को नज़राना देने के लिए बाध्य किया तथा माबर अथवा मदुरै के प्रदेश को लूटा।

इस प्रकार दिल्ली सल्तनत इल्तुतमिश तथा बलबन के काल में संगठित हुई और अलाऊद्दीन के काल में विकसित हुई। अलाऊद्दीन ने शासक के रूप को निखारा और सल्तनत को सशक्त बनाने का प्रयास किया।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 8 दिल्ली सल्तनत

प्रश्न 2.
तुग़लक सुल्तानों की नीतियों के सन्दर्भ में दिल्ली सल्तनत के पतन के कारणों एवं विघटन की चर्चा करें।
उत्तर-
दिल्ली में खिलजी वंश के पश्चात् तुगलक वंश के राज्य की स्थापना हुई। तुर्क अमीर गाज़ी मलिक ने 1320 ई० में बलबन के उत्तराधिकारियों का वध किया और सल्तनत का स्वामी बन गया। वह ग्यासुद्दीन तुग़लक (1320-1324 ई०) के नाम से गद्दी पर बैठा। उसके वंशज 1412 ई० तक शासन करते रहे। इस वंश का सबसे महत्त्वपूर्ण शासक मुहम्मद-बिन-तुग़लक था।

  • ग्यासुद्दीन तुगलक ने पूर्वी भारत में बंगाल को फिर से विजय करके दिल्ली सल्तनत में सम्मिलित किया। उसने तिरहुत अथवा उत्तरी बिहार को भी विजय किया।
  • 1323 ई० में उसके पुत्र मुहम्मद तुगलक ने वारंगल के राज्य को जीत कर दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।
  • उसने माबर भी जीत लिया था। उसके राज्यकाल में द्वारसमुद्र का राज्य भी दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।
  • इस प्रकार मुहम्मद-बिन-तुगलक के अधीन दिल्ली सल्तनत उत्तर में पंजाब से लेकर सुदूर दक्षिण में माबर तक तथा पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक फैल गई।

पतन के कारण

मुहम्मद-बिन-तुग़लक के राज्यकाल में ही दिल्ली सल्तनत के विस्तार का दौर रुक गया था। यही नहीं बल्कि साम्राज्य का विघटन भी आरम्भ हो गया था। दिल्ली सल्तनत का पतन अकस्मात् नहीं हुआ। पतन की यह प्रक्रिया लम्बे समय तक चलती रही। इसमें विभिन्न सुल्तानों विशेषकर तुग़लक सुल्तानों की नीतियों तथा प्रशासनिक प्रयोगों ने योगदान दिया था, जिसका वर्णन इस प्रकार है।

(i) मुहम्मद तुगलक की दक्षिण नीति-दिल्ली सल्तनत के पतन का आधारभूत कारण इसका दक्षिण में सीधा प्रशासन स्थापित करना था। ग्यासुद्दीन तुगलक के समय में उनका साम्राज्य देवगिरि से लेकर माबर तक फैल जाने के कारण बहुत बड़ा हो गया था। इस विशाल साम्राज्य को दिल्ली से नियन्त्रित करना लगभग असम्भव ही था।

(ii) मुहम्मद-बिन-तुगलक के प्रशासनिक प्रयोग-

(क) साम्राज्य की विशालता के कारण पैदा होने वाली समस्याओं से निपटने के लिए मुहम्मद-बिन-तुग़लक ने 1328-29 ई० में दक्षिण में देवगिरि को सल्तनत की दूसरी राजधानी बना दिया। इसका नाम दौलताबाद रखा गया। यह पहले से ही उत्तर तथा दक्षिण में एक पुल का काम दे रहा था। नवीन राजधानी दूर थी। इससे सुल्तान का उत्तरी भाग पर नियन्त्रण ढीला हो गया। उधर सुल्तान ने कई अमीरों तथा धार्मिक व्यक्तियों को दिल्ली छोड़कर दौलताबाद जाने के लिए बाध्य किया था। उन सब में बड़ा असन्तोष फैल गया था। बाद में सुल्तान ने जब इनको दिल्ली लौट जाने के लिए कहा तो ये और भी अधिक नाराज हो गए।

(ख) मुहम्मद तुग़लक ने योग्यता के आधार पर बड़ी संख्या में विदेशियों, गैर-तुर्कों तथा गैर-मुसलमानों को शासक वर्ग एवं सेना में उच्च पदों पर नियुक्त किया था। उसके पुराने तुर्क परिवारों का उच्च पदों पर से एकाधिकार समाप्त हो गया। यह बात उनके लिए असहनीय थी।

(ग) उलेमा लोग (अर्थात् इस्लाम धर्म के विद्वान्) सुल्तान के उद्धार धार्मिक विचारों के विरुद्ध थे। वे अन्य धर्मों विशेषकर शैव तथा जैन मत को दिए गए राजकीय संरक्षण के कारण सुल्तानों से रुष्ट थे।

(घ) सुल्तान द्वारा चलाई गई सांकेतिक मुद्रा ने भी उसके विरुद्ध बढ़ते असन्तोष में वृद्धि की। सांकेतिक मुद्रा के कारण कांसे के सिक्के पर चांदी के टके का मूल्य अंकित था। सुनारों तथा साधारण कारीगरों ने बड़ी संख्या में जाली सिक्के बनाने आरम्भ कर दिए। अन्त में सुल्तान ने शाही टकसालों से जारी किए गये सिक्के वापस लेकर बदले में चांदी तथा सोने के सिक्के दे दिये। इससे सरकार को हानि हुई और सुल्तान की प्रतिष्ठा को भी धक्का लगा।

(ङ) मुहम्मद-बिन-तुगलक के विरुद्ध कई अन्य बातों के कारण भी असन्तोष बढ़ा। उसने गंगा-यमुना दोआब में लगान बढ़ाया तथा खुरासान की विजय के लिए तैयार की गई सेना को भंग कर दिया तथा कराचिल अथवा कुल्लू की पहाड़ियों में भेजी गई सेना को भारी क्षति पहुंची।

(च) सुल्तान ने अमीरों तथा उलेमा लोगों को सज़ाएं देकर तथा बल प्रयोग से दबाने का प्रयत्न किया। परिणामस्वरूप साम्राज्य में कई स्थानों पर विद्रोह होने लगे। यह विद्रोह दूर दक्षिण में माबर तथा कम्पिली से लेकर लाहौर और सिन्ध तथा गुजरात से लेकर बंगाल तक फैल गये। सुल्तान के राज्यकाल के अन्त तक इनकी संख्या 22 हो गई थी।

(छ) दक्षिण में विद्रोहियों को दबाने के लिए सुल्तान ने सेना भेजी। इस सेना में महामारी फैल गई। सेना को भारी हानि पहुंची। इस प्रकार दक्षिण के प्रान्तों को स्वतन्त्र होने का अवसर मिल गया।

फिरोज़ तुग़लक की नीतियां-

  • मुहम्मद तुग़लक के उत्तराधिकारी फिरोज़शाह (1351-1357 ई०) के राज्यकाल में सल्तनत का शासन उत्तरी भारत तक ही सीमित हो गया।
  • फिरोज़ ने विद्रोहों के भय से अमीरों तथा उलेमा लोगों के प्रति नरम नीति अपनाई। उनके वेतन और जागीरों में वृद्धि की तथा इनको वंशानुगत बना दिया गया।
  • मुहम्मद-बिन-तुग़लक के समय की सख्त सज़ाएं देने की प्रथा बन्द कर दी गई।
  • सैनिकों की नौकरी भी वंशानुगत बना दी गई। उनको नकद वेतन के स्थान पर भूमि के किसी एक भाग का लगान दिया जाने लगा।

फ़िरोज़ तुग़लक की इन नीतियों के कारण भ्रष्टाचार बढ़ गया तथा सेना कमज़ोर हो गई। दिल्ली सल्तनत अन्दर से खोखली पड़ गई। कुछ इतिहासकार फिरोज़ तुग़लक की धार्मिक कट्टरता को भी सल्तनत के पतन के लिए उत्तरदायी मानते हैं। उसने उलेमा लोगों को प्रसन्न करने के लिए अपने राज्यकाल के अन्तिम वर्षों में गैर सुन्नी मुसलमानों तथा कुछ ब्राह्मणों के साथ सख्ती का व्यवहार किया था। अतः इन सब बातों के कारण दिल्ली सल्तनत के पतन की प्रक्रिया आरम्भ हो गई। यह प्रक्रिया उसके उत्तराधिकारियों के काल में तीव्र हो गई।

फिरोज तुग़लक के उत्तराधिकारी-फिरोज़ तुग़लक की मृत्यु के बाद तुग़लक वंश के छः सुल्तान गद्दी पर बैठे। उनमें प्रायः गृह-युद्ध होते थे। इनमें शासक वर्ग तथा फिरोज़ तुग़लक के दास बड़े सक्रिय थे। इससे प्रशासन और भी कमज़ोर पड़ गया। इससे प्रान्तीय गवर्नरों को स्वतन्त्र होने का अवसर मिल गया। इन परिस्थितियों में 1398-99 ई० में मध्य एशिया से मंगोल विजेता चंगेज़ खां के वंशज तैमूर के आक्रमण ने तुग़लक वंश की प्रतिष्ठा को भारी क्षति पहुँचाई। अन्तिम तुग़लक सुल्तान महमूद का छोटा-सा राज्य भी 1412 ई० में समाप्त हो गया।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 8 दिल्ली सल्तनत

प्रश्न 3.
केन्द्रीय, प्रान्तीय तथा स्थानीय स्तर पर दिल्ली सल्तनत के शासन प्रबन्ध की चर्चा करते हुए यह भी बताएं कि सुल्तानों ने किस प्रकार के भवन बनवाए।
उत्तर-
1206 ई० से 1526 ई० तक का युग भारतीय इतिहास में ‘सल्तनत युग’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस युग में पांच प्रमुख राजवंशों ने राज्य किया। इन सभी राजवंशों की सामूहिक शासन-व्यवस्था का वर्णन इस प्रकार है–

I. केन्द्रीय शासन

1. खलीफा तथा सुल्तान-नैतिक दृष्टिकोण से समस्त मुस्लिम जगत् का धार्मिक नेता खलीफा माना जाता था। वह बगदाद में निवास करता था। परन्तु सुल्तान खलीफा का नाममात्र का प्रभुत्व स्वीकार करते थे। यद्यपि कुछ सुल्तान खलीफा के नाम से खुतबा पढ़वाते थे और सिक्कों पर भी उसका नाम अंकित करवाते थे, परन्तु यह प्रभुत्व केवल दिखावा मात्र था।

वास्तविक सत्ता सुल्तान के हाथ में ही थी। वह केवल अपने पद को सुदृढ़ बनाने के लिए खलीफा से स्वीकृति प्राप्त कर लेते थे। सुल्तान की शक्तियां असीम थीं। उसकी इच्छा ही कानून थी। वह सेना का प्रधान और न्याय का मुखिया होता था। वास्तव में वह पृथ्वी पर भगवान् का प्रतिनिधि समझा जाता था।

2. मन्त्रिपरिषद् तथा वजीर-सुल्तान का सबसे महत्त्वपूर्ण मन्त्री वित्तीय व्यवस्था तथा लगान का मंत्री था जिसे वज़ीर कहा जाता था। उसकी सहायता के लिए एक महालेखाकार (मुशरिफ) तथा एक महालेखापरीक्षक (मुस्तौफी) होते थे। सैनिक संगठन के मन्त्री को ‘आरिज़-ए-मुमालिक’ कहा जाता था। शाही पत्र-व्यवहार के मन्त्री को ‘दरबार-ए-खास’ तथा गुप्तचर विभाग के मन्त्री को बरीद-ए-खास’ कहा जाता था। अन्य सभी मामलों के मन्त्री ‘वजीर’ से कम महत्त्वपूर्ण तथा शक्तिशाली थे। यहां तक कि धार्मिक मामलों तथा न्याय के मन्त्री ‘शेख-अल-इस्लाम’ का पद भी वज़ीर जितना महत्त्वपूर्ण नहीं था। इन मंत्रियों के अतिरिक्त सुल्तान के महलों तथा उसके दरबार की देख-रेख करने के लिए भी अधिकारी होते थे। इनमें ‘वकील-ए-दर’ (महलों तथा शाही कारखानों के लिए) तथा ‘अमीर-ए-हाजिब’ (दरबार के लिए) मुख्य थे। सुल्तान अपनी इच्छा से किसी भी मन्त्री को हटा सकता था। कभी-कभी सुल्तान शासन-कार्यों में मुल्लाओं से भी सलाह लिया करता था।

3. केन्द्रीय विभाग-
(i) राजस्व विभाग-इस विभाग का मुखिया दीवान-ए-हजरत होता था। यह विभाग अधिकतर प्रधानमन्त्री अथवा वज़ीर को सौंपा जाता था। कर वसूल करने वाले समस्त अधिकारी इसी विभाग में रहते थे। कृषि कर निर्धारण का भार भी इसी विभाग पर था।

(ii) सैन्य विभाग-इसका मुखिया दीवान-ए-अर्ज़ अथवा आरिज-ए-मुमालिक होता था। राज्य की सेना पर आधारित होने के कारण यह विभाग भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था।

(iii) दीवान-ए-इन्शाप्रान्तीय सूबेदारों तथा दूर स्थित प्रदेशों के अन्य उच्च पदाधिकारियों के साथ सुल्तान का पत्र-व्यवहार करने का भार दीवानए-इन्शा पर होता था।

(iv) दीवान-ए-अमीर-ए-कोही-यह विभाग बाज़ार पर नियन्त्रण रखता था और कृषि की सुव्यवस्था के लिए कार्य सम्भालता था। इसका प्रधान दीवान-ए-अमीर-ए-कोही होता था।

(v) काजी-उल-कुजात-न्याय विभाग का मुखिया काजी-उल कुजात होता था। वह केन्द्र में रहते हुए प्रान्तों के काज़ियों पर नियन्त्रण रखता था। इन विभागों के अतिरिक्व शाही परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पृथक् विभाग होता था, जिसका प्रधान वकील-ए-दर कहलाता था।

4. सैनिक व्यवस्था-सुल्तान ने विशाल स्थायी सेना का संगठन किया। इसका प्रधान दीवान-ए-अर्ज़ होता था। केन्द्रीय सेना के अतिरिक्त प्रान्तीय सूबेदार भी अपने पास सेना रखते थे। वे समय पड़ने पर सुल्तान की सहायता करते थे। केन्द्र की सेना अस्त्रों-शस्त्रों से सुसज्जित होती थी। सेना के चार प्रमुख अंग थे, जिनमें सबसे प्रमुख घुड़सवार सेना थी। युद्ध में हाथियों का भी प्रयोग होता था जो सेना का दूसरा अंग था। तीसरा अंग पैदल सेना थी। अस्त्रों-शस्त्रों में तलवार, बी, भाले तथा धनुष-बाणों का प्रयोग किया जाता था। सुल्तान का सैनिक संगठन दाशमिक प्रणाली पर आधारित था। 10 घुड़सवारों पर सरेखैल नामक अधिकारी होता था और 10 सरेखैल पर एक सिपहसालार होता था। इसी प्रकार 10 सिपहसालारों पर एक अमीर होता था। 10 अमीरों पर एक मलिक और दस मलिकों पर एक खान होता था। सेना का आकार समय-समय पर परिवर्तित होता रहता था। अलाऊद्दीन के पास 4 लाख 75 हजार घुड़सवार थे, जबकि फिरोज़ तुग़लक के पास केवल 90 हज़ार घुड़सवार थे।

II. प्रान्तीय प्रशासन : सुल्तानों का साम्राज्य प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रान्तीय गवर्नर का कार्य अपने प्रान्त में शान्ति बनाए रखना था। परन्तु उसका मुख्य दायित्व लगान तथा अन्य कर इकट्ठा करके उनको राजकोष में भेजना था। वह प्रान्तों के अधीन सामन्तों पर भी नियन्त्रण रखता था। परन्तु सामन्तों का स्थानीय प्रशासन में कोई हाथ नहीं था। वह एक ओर तो केन्द्र एवं सामन्तों के बीच कड़ी का काम करता था तथा दूसरी ओर केन्द्रीय प्रशासन एवं स्थानीय प्रबन्ध को जोड़ता था। गवर्नर को ‘मुक्ती’, ‘सूबेदार’ अथवा ‘वली’ कहा जाता था। प्रत्येक प्रान्त में कई परगने थे। कुछ प्रान्तों में परगने से ऊपर एक अन्य प्रशासनिक इकाई भी थी जिसे ‘शिक’ कहा जाता था।

III. स्थानीय शासन स्थानीय शासन परगने से आरम्भ होता था। कई गांवों के समूह को परगना कहते थे। प्रत्येक परगने का मुख्य अधिकारी ‘आमिल’ था। वह भूमि की उपज से सरकारी आय (लगान) एकत्रित करता था और उसका हिसाब-किताब रखता था। लगान इकट्ठा करने में फोतदार अर्थात् खजान्ची और कुछ अन्य कर्मचारी उसकी सहायता करते थे। कानूनगो परगने की ज़मीन तथा लगान से सम्बन्धित सारा रिकार्ड रखता था। एक ही गोत्र से सम्बन्धित कई गांवों में फैले हुए किसान प्रायः किसी एक प्रभावशाली व्यक्ति को सब का साझा प्रधान मान लेते थे। इसको ‘चौधरी’ कहा जाता था। परगने के अधिकारी किसानों अथवा उनके मुखिया के साथ ‘चौधरी’ के माध्यम से निपट सकते थे। प्राचीनकाल की तरह दिल्ली सल्तनत के समय में भी गांव सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई बना रहा। परन्तु अब गांव के मुखिया को मुकद्दम कहा जाता था। गांव की कृषि अधीन भूमि तथा लगान से सम्बन्धित सारे मामलों का रिकार्ड पटवारी रखता था। पटवारी, मुकद्दम, चौधरी तथा कानूनगो के पद वंशानुगत होते थे। इन्हें राज्य की सेवा के बदले लगान का एक भाग दिया जाता था।

सुल्तानों द्वारा बनवाये गए भवन-

दास वंशीय सुल्तानों द्वारा निर्मित भवन-कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली के समीप रायपिथोरा का किला बनवाया। इसके समीप ही ‘कुव्वत-उल-इस्लाम’ नाम की मस्जिद बनवाई गई। कुतुबमीनार दास वंश का सबसे उत्तम उपहार है। इसकी नींव कुतुबुद्दीन ने ही रखी थी, परन्तु इस भवन के पूरा होने से पूर्व ही वह चल बसा था। इसे उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने पूरा करवाया। एक इतिहासकार के अनुसार “इससे अधिक भव्य कोई अन्य मीनार विश्व में नहीं है।” ऐबक ने अजमेर में एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। इसे ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा’ कहते हैं। इल्तुतमिश ने अपने बड़े लड़के नासिरुद्दीन महमूद का एक मकबरा बनवाया था। यह भवन कुतुबमीनार से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर बनवाया गया था। भारत के पुराने मकबरों में इसे विशेष स्थान प्राप्त है। इल्तुतमिश ने दिल्ली में एक ‘ईदगाह’ तथा जामा मस्जिद का भी निर्माण करवाया था।

खिलजी सुल्तानों द्वारा निर्मित भवन-इल्तुतमिश की मृत्यु से लेकर अलाऊद्दीन के आगमन तक भवन निर्माण कला का विकास रुका रहा। अलाऊद्दीन के आगमन से भवन निर्माण कला में नए दौर का आरम्भ हुआ। उसने कुतुबुद्दीन ऐबक के समय की मस्जिद का बहुत सुन्दर तथा प्रभावशाली द्वार बनवाया, जिसे ‘अलाई दरवाज़ा’ के नाम से पुकारा जाता है। यह लाल पत्थर का बना है, परन्तु कहीं-कहीं इसमें संगमरमर का भी प्रयोग किया गया है। अलाऊद्दीन ने कुतुबमीनार से तीन मील की दूरी पर ‘सिरी’ नामक दुर्ग बनवाया था। उसने ‘हज़ार सूतन’ नामक एक अन्य भवन का निर्माण भी करवाया।

तुगलक वंश के सुल्तानों द्वारा निर्मित भवन-तुगलक वंश के शासन काल में अनेक भवनों का निर्माण हुआ। इनमें खिलजी काल के भवनों की सी सजावट का अभाव है। ये सादगी तथा विशालता लिए हुए हैं । ग्यासुद्दीन तुग़लक ने कुतुबमीनार के पूर्व में ‘तुग़लकाबाद’ नामक दुर्ग बनवाया था। इस दुर्ग में अनेक भवन भी बनवाए गए थे। संगमरमर का बना ग्यासुद्दीन का ‘मकबरा’ इन भवनों की स्मृति मात्र रह गया है। मुहम्मद तुग़लक ने आदिलाबाद नामक दुर्ग का निर्माण करवाया जो तुग़लकाबाद के पास स्थित है। फिरोज़ तुग़लक को भवन बनवाने का बड़ा चाव था। उसके शासनकाल में अनेक शहरों में से फतेहाबाद, हिसार फिरोजा, जौनपुर आदि प्रसिद्ध थे। फरिश्ता के अनुसार, “सुलतान ने 200 नगर, 20 महल, 30 पाठशालाएं, 40 मस्जिदें, 100 अस्पताल, 100 स्नानगृह, 5 मकबरे और 150 पुल बनवाए।”

सैय्यद तथा लोधी वंश के शासकों द्वारा निर्मित भवन-तैमूर के आक्रमण के कारण दिल्ली सल्तनत की आर्थिक दशा काफी शोचनीय हो गई। परिणामस्वरूप सैय्यद तथा लोधी वंश के शासकों ने भवन निर्माण कला में अधिक रुचि न दिखाई। सैय्यद वंश में प्रथम दो शासकों ने खिज़राबाद और मुबारिकाबाद नाम के दो नगर बसाए। दुर्भाग्यवश इन दोनों नगरों के अवशेष उपलब्ध नहीं हैं। इस काल में मुबारिक शाह सैय्यद, मुहम्मद शाह सैय्यद और सिकन्दर लोधी से सम्बन्धित मस्जिदें तथा मकबरे ही उपलब्ध हैं। लोधी काल में कुछ मस्जिदों का निर्माण हुआ। इसमें सिकन्दर लोधी के प्रधानमन्त्री द्वारा निर्मित ‘मोट की मस्जिद’ उल्लेखनीय है।

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महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
दिल्ली के प्रथम तथा अंतिम सल्तान कौन-कौन थे?
उत्तर-
दिल्ली का प्रथम सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक तथा अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी था।

प्रश्न 2.
पठान सुल्तानों ने दिल्ली पर कब से कब तक राज्य किया?
उत्तर-
पठान सुल्तानों ने दिल्ली पर 1206 ई० से 1526 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 3.
तैमूर ने भारत पर कब आक्रमण किया?
उत्तर-
तैमूर ने 1398 ई० में भारत पर आक्रमण किया।

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प्रश्न 4.
सूफ़ी मत के एक सन्त का नाम बताओ।
उत्तर-
बाबा फरीद।

प्रश्न 5.
सिक्ख धर्म के संस्थापक कौन थे?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी सिक्ख धर्म के संस्थापक थे।

प्रश्न 6.
सैयद वंश की नींव किसने डाली थी?
उत्तर-
सैयद वंश की नींव तैमूर के प्रतिनिधि खिजर खाँ ने डाली थी।

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प्रश्न 7.
खिजर खाँ ने गुजरात पर अधिकार कब किया?
उत्तर-
खिजर खाँ ने 1412 ई० में गुजरात पर अधिकार किया।

प्रश्न 8.
खिजर खाँ की मृत्यु के पश्चात् दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठा?
उत्तर-
खिजर खाँ की मृत्यु के पश्चात् मुबारक शाह दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

प्रश्न 9.
लोदी वंश की स्थापना कब हुई?
उत्तर-
लोदी वंश की स्थापना 1451 ई० में हुई।

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प्रश्न 10.
लोदी वंश के उस शासक का नाम बताओ जो सर्वप्रथम दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
उत्तर-
बहलोल लोदी।

प्रश्न 11.
लोदी वंश का अंतिम सुल्तान कौन था ?
उत्तर-
इब्राहिम लोदी ।

प्रश्न 12.
“तबकाते नासरी” नामक पुस्तक का लेखक कौन था?
उत्तर-
मिनहाज सिराज “तबकाते नासरी” नामक पुस्तक का लेखक था।

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प्रश्न 13.
“अलाई दरवाजा” दिल्ली के किस सुल्तान ने बनवाया ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन खिलजी ने।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति-

(i) कुतुबुद्दीन ऐबक…………..ई० में दिल्ली का सुल्तान बना।
(ii) ………..दिल्ली की पहली मुस्लिम शासिका थी।
(iii) …………अपनी ‘रक्त और लौह’ नीति के लिए विख्यात है।
(iv) मलिक काफूर………………का दास सेनानायक था।
(v) ………………को इतिहास में पढ़ा-लिखा मूर्ख सुल्तान’ कहते हैं।
उत्तर-
(i) 1206
(ii) रजिया
(iii) बलबन
(iv) अलाऊद्दीन खिलजी
(v) मुहम्मद तुग़लक ।

3. सही / ग़लत कथन

(i) बलबन एक शक्तिशाली और पक्के इरादे वाला शासक था। — (√)
(ii) गुलाम (दास) वंश के शासकों के बाद सन् 1290 ई० में दिल्ली में तुग़लक वंश का नया राज्य स्थापित हुआ। — (×)
(iii) खिलजी वंश का अन्तिम शासक मार डाला गया और दिल्ली पर सैय्यद वंश का शासन शुरू हुआ। — (×)
(iv) मुहम्मद-बिन-तुग़लक ने पीतल और ताँबे के सांकेतिक सिक्के चलाए जिन्हें राजकोष से चाँदी-सोने के सिक्कों से बदला जा सकता था। — (√)
(v) अलाऊद्दीन के एक अधिकारी हसन गंगू ने बहमनी राज्य की नींव डाली — (√)

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4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
दिल्ली सल्तनत के शुरू के शासक थे-
(A) तुर्क
(B) अफ़गान
(C) मंगोल
(D) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर-
(B) अफ़गान

प्रश्न (ii)
अलाऊद्दीन खिलजी के लिए दक्षिणी प्रदेश जीते
(A) बलबन ने
(B) ताजुद्दीन यल्दौज ने
(C) नालिरुद्दीन कुबाचा ने
(D) कुतुबुद्दीन ऐबक ने
उत्तर-
(C) नालिरुद्दीन कुबाचा ने

प्रश्न (iii)
निम्न सुल्तान अपने आर्थिक सुधारों (बाज़ार नीति) के लिए विख्यात है-
(A) बलबन
(B) अलाऊद्दीन खिलजी
(C) फिरोज़ तुगलक
(D) इल्तुतमिश।
उत्तर-
(A) बलबन

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प्रश्न (iv)
निम्न सुल्तान ने कृषि की उन्नति के लिए सिंचाई की विशेष व्यवस्था की-
(A) इल्तुतमिश
(B) मुहम्मद तुगलक
(C) फिरोज़ तुग़लक
(D) कुतुबुदीन ऐबक।
उत्तर-
(D) कुतुबुदीन ऐबक।

प्रश्न (v)
‘जकात’ नामक कर किससे प्राप्त किया जाता था?
(A) अमीर मुसलमानों से
(B) अमीर हिंदुओं से
(C) सभी हिंदुओं से
(D) गैर-मुसलमानों से
उत्तर-
(B) अमीर हिंदुओं से

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
दिल्ली सल्तनत की जानकारी के लिए स्रोतों के चार प्रमुख प्रकार बताएं।
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत की जानकारी के लिए स्रोतों के चार प्रमुख प्रकार हैं-समकालीन दरबारी इतिहासकारों के वृत्तान्त, कवियों की रचनाएं, विदेशी यात्रियों के वृत्तान्त तथा सिक्के।

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प्रश्न 2.
अमीर खुसरो की रचनाएं किन तीन सुल्तानों के राज्यकाल पर प्रकाश डालती हैं ?
उत्तर-
अमीर खुसरो की रचनाएं बलबन, अलाऊद्दीन खिलजी तथा ग्यासुद्दीन तुग़लक के राज्यकाल पर प्रकाश डालती हैं।

प्रश्न 3.
मुहम्मद गौरी ने मुल्तान, लाहौर तथा दिल्ली की विजयें किन वर्षों में प्राप्त की ?
उत्तर-
मुहम्मद गौरी ने 1175 ई० में मुल्तान, 1186 ई० में लाहौर तथा 1192 ई० में दिल्ली पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 4.
मुहम्मद गौरी के साम्राज्य में उत्तरी भारत के कौन से चार प्रमुख राज्य सम्मिलित थे ?
उत्तर-
मुहम्मद गौरी के साम्राज्य में उत्तरी भारत का पंजाब का भूतपूर्व गज़नी राज्य, दिल्ली, अजमेर का चौहान राज्य, कन्नौज का गहड़वाल और राठौर राज्य तथा बंगाल का सेन राज्य सम्मिलित था।

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प्रश्न 5.
तराइन का दूसरा युद्ध कब हुआ और इसमें पृथ्वीराज के अधीन लड़ने वाले सामन्तों की संख्या क्या थी ?
उत्तर-
तराइन का दूसरा युद्ध 1192 ई० में हुआ। इस में पृथ्वीराज के अधीन लड़ने वाले सामन्तों की संख्या 150 थी।

प्रश्न 6.
मुहम्मद गौरी के चार दास सेनानियों के नाम बताएं।
उत्तर-
ताजुद्दीन यल्दौज, नासिरुद्दीन कुबाचा, कुतुबुद्दीन ऐबक तथा बख्यितार खिलजी मुहम्मद गौरी के चार दास सेनानी

प्रश्न 7.
यल्दौज़ कहाँ का शासक था और उसे रोकने के लिए ऐबक ने दिल्ली के स्थान पर कौन से नगर को अपनी राजधानी बनाया ?
उत्तर-
यल्दौज गज़नी का शासक था। उसे रोकने के लिए ऐबक ने दिल्ली के स्थान पर लाहौर को अपनी राजधानी बनाया।

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प्रश्न 8.
ऐबक की मृत्यु कब और कैसे हुई ?
उत्तर-
ऐबक की मृत्यु 1210 ई० में घोड़े से गिर जाने के कारण हुई।

प्रश्न 9.
इल्तुतमिश ने किस मंगोल विजेता के आक्रमण को टाला तथा उसके किस शत्रु को दिल्ली में शरण देने से इन्कार किया था ?
उत्तर-
इल्तुतमिश ने मंगोल विजेता चंगेज़ खां के आक्रमण को बड़ी सूझ-बूझ से टाला। उसने चंगेज़ खां के शत्रु ख्वारिज्म के शहज़ादे को दिल्ली में शरण देने से इन्कार कर दिया।

प्रश्न 10.
इल्तुतमिश के तुर्क अमीरों के लिए बाद में किस नाम का प्रयोग किया जाने लगा ?
उत्तर-
इल्तुतमिश के तुर्क अमीरों के लिए बाद में ‘चहलगनी’ नाम का प्रयोग किया जाने लगा।

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प्रश्न 11.
इल्तुतमिश ने कौन से दो सिक्के चलाए ?
उत्तर-
इल्तुतमिश ने ‘जीतल’ तथा ‘टका’ नाम के दो सिक्के चलाए।

प्रश्न 12.
इस्लामी जगत् के नेता को क्या कहा जाता था और इल्तुतमिश ने उससे क्या प्राप्त किया ?
उत्तर-
इस्लामी जगत् के नेता को ‘खलीफा’ कहा जाता था। इल्तुतमिश ने उससे सम्मान के वस्त्र तथा राज्याभिषेक का पत्र प्राप्त किया।

प्रश्न 13.
इल्तुतमिश के किन्हीं दो उत्तराधिकारियों के नाम बताएं।
उत्तर-
रज़िया तथा नासिरुद्दीन महमूद इतुतमिश के दो उत्तराधिकारी थे।

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प्रश्न 14.
सुल्तान के दैवी-अधिकार से क्या भाव था ?
उत्तर-
सुल्तान के दैवी-अधिकार से भाव यह था कि सुल्तान को राज्य करने का अधिकार ईश्वर से मिला है।

प्रश्न 15.
बलबन ने कौन से चार प्रदेशों में विद्रोहों को दबाया ?
उत्तर-
बलबन ने बंगाल, दिल्ली, गंगा-यमुना दोआब, अवध एवं कटेहर के प्रदेशों में विद्रोहों को दबाया।

प्रश्न 16.
बलबन ने मंगोलों के आक्रमण रोकने के लिए विशेष सेनाएं किन तीन स्थानों पर तैनात की ?
उत्तर-
बलबन ने मंगोलों के आक्रमण को रोकने के लिए विशेष सेनाओं को ‘मुल्तान’, ‘सुनाम’ और ‘समाना’ के स्थानों पर तैनात किया।

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प्रश्न 17.
खिलजी वंश की स्थापना किसने और कब की ?
उत्तर-
खिलजी वंश की स्थापना 1290 में जलालुद्दीन खिलजी ने की।

प्रश्न 18.
दिल्ली सल्तनत के विस्तार के लिए कौन से सुल्तान का काल सबसे महत्त्वपूर्ण है ? इसने कब से कब तक राज्य किया ?
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के विस्तार के लिए अलाऊद्दीन खिलजी का काल सबसे महत्त्वपूर्ण है। उसने 1296-1316 ई० तक राज्य 1 किया।

प्रश्न 19.
अलाऊद्दीन खिलजी के चार सेनापतियों के नाम बताएं।
उत्तर-
अलाऊद्दीन खिलजी के चार सेनापतियों के नाम थे-अल्प खाँ, नुसरत खाँ, जफर खाँ तथा उलुग खाँ।

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प्रश्न 20.
अलाऊद्दीन द्वारा विजित उत्तर भारत के चार प्रदेशों के नाम बताएं।
उत्तर-
अलाऊद्दीन द्वारा विजित उत्तर भारत के चार प्रदेश रणथम्भौर, मेवाड़, मालवा तथा गुजरात थे।

प्रश्न 21.
अलाऊद्दीन ने राजस्थान में कौन से चार किले जीते थे ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन ने राजस्थान में रणथम्भौर, चित्तौड़, शिवाना तथा जालौर के किलों पर विजय प्राप्त की थी।

प्रश्न 22.
अलाऊद्दीन के समय में मालवा के कौन से चार नगर जीते गए ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन के समय में मालवा के माण्डू, धार, उज्जैन तथा चन्देरी नगर जीते गए।

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प्रश्न 23.
अलाऊद्दीन की चित्तौड़ विजय के साथ कौन-सी लोक-गाथा सम्बन्धित है ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन की चित्तौड़ विजय से सम्बन्धित लोक-गाथा यह है कि अलाऊद्दीन चित्तौड़ के राणा की सुन्दर पत्नी पद्मिनी को प्राप्त करना चाहता था।

प्रश्न 24.
अलाऊद्दीन की दक्षिण विजय के दो उद्देश्य क्या थे ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन की दक्षिण विजय के दो. उद्देश्य थे-दिल्ली की प्रभुसत्ता स्थापित करना तथा वहाँ से धन प्राप्त करना।

प्रश्न 25.
अलाऊद्दीन के समय में मंगोल आक्रमण कब आरम्भ तथा समाप्त हुए तथा इनकी संख्या क्या थी ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन के समय में मंगोल आक्रमण 1297 ई० से 1306 ई० तक हुए। इन आक्रमणों की संख्या छः थी।

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प्रश्न 26.
अलाऊद्दीन ने दक्षिण के किन राज्यों पर अपनी प्रभुत्ता स्थापित की ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन ने दक्षिण भारत के देवगिरी, वारंगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरा राज्यों पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 27.
अलाऊद्दीन की दक्षिण की विजयें किस सेनापति के अधीन की गईं ? इसे कहाँ और कितना धन देकर खरीदा गया था ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन ने दक्षिण की विजयें अपने सेनापति मलिक काफूर के अधीन की। उसे गुजरात से एक हज़ार दीनार दे कर खरीदा गया था ?

प्रश्न 28.
तुगलक वंश के पहले दो शासकों के नाम तथा राज्यकाल बताएं।
उत्तर-
तुग़लक वंश के पहले दो शासक ग्यासुद्दीन तुग़लक तथा मुहम्मद-बिन-तुगलक थे। इन का शासन काल 1320 ई० से 1351 ई० तक था।

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प्रश्न 29.
ग्यासुद्दीन तुगलक के समय में जीते गए चार प्रदेशों के नाम बताएँ।
उत्तर-
ग्यासुद्दीन तुग़लक के समय में जीते गए चार प्रदेशों के नाम हैं –तिरहुत, वारंगल, माबर, द्वारसमुद्र।

प्रश्न 30.
मुहम्मद-बिन-तुग़लक के समय दिल्ली सल्तनत उत्तर, दक्षिण, पूर्व तथा पश्चिम में किन प्रदेशों तक फैल गई थी ?
उत्तर-
मुहम्मद-बिन-तुग़लक के समय में दिल्ली सल्तनत उत्तर में पंजाब से लेकर सुदूर दक्षिण में मिबर तक तथा पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में बंगाल तक फैल गई थी।

प्रश्न 31.
दिल्ली सल्तनत के पतन का आधारभूत कारण क्या था ?
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के पतन का आधारभूत कारण दक्षिण में सीधा प्रशासन स्थापित करना था।

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प्रश्न 32.
मुहम्मद-बिन-तुगलक ने दक्षिण में कौन से नगर को अपनी दूसरी राजधानी बनाया और इसका क्या नाम रखा ?
उत्तर-
मुहम्मद-बिन-तुग़लक ने ‘देवगिरि’ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। उसने इसका नाम ‘दौलताबाद’ रखा।

प्रश्न 33.
शासक वर्ग में किस प्रकार के लोगों के शामिल होने के कारण तुर्क अमीर मुहम्मद-बिन-तुगलक से नाराज़ थे ?
उत्तर-
मुहम्मद-बिन-तुग़लक ने बड़ी संख्या में विदेशियों, गैर-तुर्कों और गैर-मुसलमानों को शासक वर्ग में उच्च पद दे दिये थे। इससे तुर्क अमीर उससे नाराज़ हो गये।

प्रश्न 34.
उलेमा लोग सुल्तान से क्यों नाराज थे ?
उत्तर-
उलेमा लोग सुल्तान के उदार धार्मिक विचारों के कारण उस से नाराज़ थे।

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प्रश्न 35.
मुहम्मद-बिन-तुगलक ने कौन से सिक्के के स्थान पर सांकेतिक मुद्रा चलाई और यह किस धातु में थी ?
उत्तर-
मुहम्मद-बिन-तुग़लक ने चाँदी के सिक्कों के स्थान पर सांकेतिक मुद्रा चलाई। यह कांसे की थी।

प्रश्न 36.
मुहम्मद-बिन-तुगलक के राज्यकाल में हुए विद्रोहों की संख्या क्या थी तथा इनसे प्रभावित किन्हीं चार प्रदेशों के नाम बताएं।
उत्तर-
मुहम्मद-बिन-तुग़लक के राज्यकाल में हुए विद्रोहों की संख्या 22 थी। इनसे प्रभावित चार प्रदेशों के नाम हैंबिआबर, सिन्ध, गुजरात तथा बंगाल।

प्रश्न 37.
फिरोज़ तुगलक ने अमीरों को प्रसन्न करने के लिए क्या किया ?
उत्तर-
फिरोज़ तुलगक ने अमीरों को प्रसन्न करने के लिए उनके वेतन और जागीरें बढ़ा दीं।

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प्रश्न 38.
फिरोज़ तुगलक के समय में सैनिकों को वेतन किस रूप में दिया जाता था ?
उत्तर-
फिरोज तुग़लक के समय में सैनिकों को वेतन नकद देने के स्थान पर भूमि के एक भाग का लगान दिया जाने लगा।

प्रश्न 39.
तुगलक काल के अन्त में आने वाले विदेशी आक्रमणकारी का नाम तथा उसके आक्रमण का वर्ष बताएं।
उत्तर-
तुगलक काल के अन्त में आने वाले विदेशी आक्रमणकारी का नाम तैमूर था। उस के आक्रमण का वर्ष 139899 ई० था।

प्रश्न 40.
अन्तिम तुगलक सुल्तान का क्या नाम था तथा इसका राज्य कब समाप्त हुआ ?
उत्तर-
अन्तिम तुग़लक सुल्तान का नाम नासिरुद्दीन महमूद शाह था। उस का राज्य 1412 ई० में समाप्त हो गया।

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प्रश्न 41.
फिरोज़ तुग़लक की मृत्यु के बाद कौन-से चार नये राज्य स्थापित हुए ?
उत्तर-
फिरोज़ तुग़लक की मृत्यु के पश्चात् जौनपुर, मालवा, गुजरात तथा खानदेश नये राज्य स्थापित हुए।

प्रश्न 42.
दिल्ली सल्तनत के वित्त तथा लगान सम्बन्धी मन्त्री को क्या कहा जाता था तथा उसकी सहायता के लिए कौन से दो अधिकारी थे ?
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के वित्त तथा लगान सम्बन्धी मन्त्री को ‘वजीर’ कहा जाता था। उसकी सहायता के लिए ‘महालेखाकार’ तथा ‘महालेखा परीक्षक’ नामक अधिकारी होते थे।

प्रश्न 43.
दिल्ली सल्तनत के अधीन सेना, शाही पत्र-व्यवहार, गुप्तचर विभाग, धार्मिक मामलों तथा न्याय के मन्त्री को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के अधीन सैनिक संगठन के मन्त्री को आरिज-ए-मुमालिक, पत्र व्यवहार के मन्त्री को दरबारए-खास, गुप्तचर विभाग के मन्त्री को बरीद-ए-खास, धार्मिक मामलों तथा न्याय के मन्त्री को शेख-अल-इस्लाम कहते थे।

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प्रश्न 44.
सुल्तानों के महलों तथा दरबार की देख-रेख करने वाले दो अधिकारियों के नाम बताएं।
उत्तर-
सुल्तानों के महलों तथा दरबार की देख-रेख करने वाले दो अधिकारियों के नाम थे-‘वकील-ए-दर’ तथा ‘अमीर-ए-हाजिब’।

प्रश्न 45.
न्याय प्रबन्ध के अन्तर्गत कौन से मामलों में प्रत्येक व्यक्ति राज्य के कानून के सामने बराबर था और कौन से अधिकारी की अदालत में जा सकता था ?
उत्तर-
सम्पत्ति से सम्बन्धित सब बातों में किसी भी धर्म का व्यक्ति इस्लामी कानून के सम्मुख बराबर था। ऐसे मामलों में वह काज़ी की अदालत में जा सकता था।

प्रश्न 46.
सल्तनत की ओर से दिए जाने वाले संरक्षण का अधिकांश भाग किन चार प्रकार की संस्थाओं और व्यक्तियों को मिलता था ?
उत्तर-
सल्तनत की ओर से दिये जाने वाले संरक्षण का अधिकांश भाग प्रायः मस्जिदों, मदरसों, खानकाहों और ऐसे मुसलमानों को जाता था, जिनकी धर्म-परायणता विख्यात थी।

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प्रश्न 47.
अलाऊद्दीन खिलजी की सेना की संख्या कितनी मानी जाती है और एक घुड़सवार को कितना वेतन मिलता था ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन खिलजी की सेना की संख्या 4,75,000 मानी जाती है। एक घुड़सवार को 234 टके वेतन मिलता था। ।

प्रश्न 48.
सल्तनत की सेना में कौन से तीन अंग थे तथा इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण कौन सा था ?
उत्तर-
सल्तनत की सेना में घुड़सवार, हाथी तथा पैदल शामिल थे। घुड़सवार सेना का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भाग थे।

प्रश्न 49.
बाज़ार नियन्त्रण किस सुल्तान ने किया तथा किन्हीं चार वस्तुओं के नाम बताएं जिनके मूल्य॑ इसके वर्गत नियत किए गए।
उत्तर-
बाजार नियन्त्रण अलाऊद्दीन खिलजी ने किया था। इसके अन्तर्गत अनाज, घी, तेल, कपड़ा आदि वस्तुओं के मूल्य 1यत किये गए।

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प्रश्न 50.
दिल्ली सल्तनत के अधीन प्रान्तीय गवर्नरों के लिए कौन से तीन नामों का प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के अधीन गवर्नरों को ‘मुक्ती’, ‘सूबेदार’ अथवा ‘वली’ कहा जाता था।

प्रश्न 51.
परगने का मुख्य अधिकारी कौन था ? उसका क्या कार्य था ?
उत्तर-
परगने का मुख्य अधिकारी ‘आमिल’ होता था। उसका मुख्य कार्य लगान उगाहना तथा हिसाब-किताब रखना था।

प्रश्न 52.
कानूनगो किस स्तर पर और क्या काम करता था ?
उत्तर-
कानूननो परगने की ज़मीन तथा लगान से सम्बन्धित सारा रिकार्ड रखता था।

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प्रश्न 53.
चौधरी किस व्यक्ति को माना जाता था ?
उत्तर-
एक प्रभावशाली व्यक्ति को चौधरी माना जाता था।

प्रश्न 54.
स्थानीय स्तर पर चार अधिकारियों के नाम बतायें जिनके पद वंशानुगत होते थे।
उत्तर–
पटवारी, मुकद्दम, चौधरी तथा कानूनगो के पद वंशानुगत होते थे।

प्रश्न 55.
सल्तनत की आय का मुख्य स्रोत क्या था तथा एवं इसको निर्धारित करने की तीन प्रमुख विधियां कौन सी थीं ?
उत्तर-
सल्तनत की आय का प्रमुख स्रोत भूमि से प्राप्त लगान था। लगान निर्धारित करने की तीन विधियां थीं-बटाई, कनकूत तथा भूमि की पैमाइश।

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प्रश्न 56.
बटाई से क्या भाव था ?
उत्तर-
बटाई से भाव कटी हुई फसल को सरकार तथा किसान के बीच बाँटना था।

प्रश्न 57.
कनकूत से क्या भाव था ?
उत्तर-
कनकूत में लगभग तैयार फसल के आधार पर लगान का अनुमान लगाया जाता था।

प्रश्न 58.
कौन से सुल्तान के समय में लगान की दर सबसे अधिक और कितनी थी ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन खिलजी के समय में लगान की दर सबसे अधिक थी। लगान की दर उपज का 1/2 भाग थी।

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प्रश्न 59.
लगान की वसूली किन दो रूपों में की जाती थी ?
उत्तर-
लगान की वसूली गल्ले तथा नकदी में की जाती थी।

प्रश्न 60.
इक्ता से क्या भाव था ?
उत्तर-
सरकार के अधिकतर कर्मचारियों को नकद वेतन देने के स्थान पर लगान इकट्ठा करने का अधिकार दे दिया जाता था। इस प्रकार इकट्ठा किये जाने वाले लगान को इक्ता कहा जाता था।

प्रश्न 61.
दिल्ली सल्तनत के शासक वर्ग में सम्मिलित लोग कौन से चार विभिन्न जातीय मलों के थे ?
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के शासक वर्ग में सम्मिलित लोग तुर्क, ईरानी, अरब तथा पठान जाति से थे।

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प्रश्न 62.
सुल्तानों द्वारा बनवाए गए चार भवनों के चार प्रकार बताओ।
उत्तर-
सुल्तानों द्वारा बनवाए गए चार प्रकार के भवन थे-मस्जिदें, मकबरे, किले, महल तथा मीनार।

प्रश्न 63.
सल्तनत काल में बनी किन्हीं चार मस्जिदों के नाम बताएं।
उत्तर-
जौनपुर की अटाला और जामा मस्जिद, दिल्ली की कुव्वत-अल-इस्लाम मस्जिद तथा अजमेर की अढ़ाई-दिनका झोपड़ा मस्जिद दिल्ली सल्तनत काल में बनाई गई थीं।

प्रश्न 64.
सल्तनत काल में कौन-सी चार प्रादेशिक सल्तनतों के भवनों के प्रभावशाली नमूने मिले हैं ?
उत्तर-
प्रादेशिक सल्तनतों के भवनों में प्रभावशाली नमूने बंगाल, जौनपुर, मालवा और गुजरात में मिले हैं।

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प्रश्न 65.
कुव्वत-अल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण किसने आरम्भ किया और इसे क्यों महत्त्व दिया जाता है ?
उत्तर-
कुव्वत-अल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण ऐबक ने कराया था। इसके आंगन में कुतुबमीनार होने से इसे महत्त्व दिया, जाता है।

प्रश्न 66.
कुतुबमीनार कहाँ है तथा इसकी कितनी मंज़िलें हैं ?
उत्तर-
कुतुबमीनार दिल्ली के समीप महरौली के स्थान पर स्थित है। इसकी पाँच मंजिलें हैं।

प्रश्न 67.
दिल्ली में किन चार वंशों के सुल्तानों के मकबरे मिलते हैं?
उत्तर-
दिल्ली में खिलजी, तुग़लक, सैय्यद तथा लोधी वंश के सुल्तानों के मकबरे मिलते हैं।

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प्रश्न 68.
सल्तनत काल में बनवाए गए किन्हीं दो नगरों के नाम तथा उनको बनवाने वाले सुल्तानों के नाम बताएं।
उत्तर-
सल्तनत काल में अलाऊद्दीन खिलजी ने सीरी नगर तथा फिरोजशाह कोटला नगर बसाये।

प्रश्न 69.
सल्तनत काल के बड़े दरवाजों के दो सबसे बढ़िया नमूने कौन से हैं और ये कहाँ मिलते हैं ? .
उत्तर-
सल्तनत काल के बड़े दरवाजों के दो सबसे बढ़िया नमूने गौड़ का दाखली दरवाज़ा तथा कुतुबमीनार के निकट अलाई दरवाज़ा है।

प्रश्न 70.
राजपूतों की विधार्मिक भवन निर्माण कला के दो प्रभावशाली उदाहरण कौन से हैं ?
उत्तर-
राजपूतों की विधार्मिक भवन निर्माण कला के दो प्रभावशाली उदाहरण हैं-ग्वालियर में राजा मानसिंह का महल और चित्तौड़ में राणा कुम्भा का विजय स्तम्भ।

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III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना में क्या भूमिका निभाई ?
उत्तर-
कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गौरी का एक दास था। उसकी योग्यता से प्रभावित होकर 1192 ई० में मुहम्मद गौरी ने उसे भारत में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया था। उसने मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि के रूप में 1206 ई० तक अनेक प्रदेश जीते। उसने अजमेर तथा मेरठ के विद्रोहों का दमन किया और दिल्ली पर अपना अधिकार कर लिया। उसने अजमेर के मेढ़ों तथा बुन्देलखण्ड के चन्देलों को भी हराया। शीघ्र ही उसने कालपी और बदायूं पर विजय प्राप्त की। 1206 ई० में मुहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद वह दिल्ली का स्वतन्त्र शासक बन गया। स्वतन्त्र शासक के रूप में उसने हिन्दू सरदारों का दमन किया और दासता से मुक्ति प्राप्त करके दिल्ली सल्तनत की नींव को सुदृढ़ किया। 1210 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 2.
इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तन को किस प्रकार संगठित किया ?
उत्तर-
इल्तुतमिश 1211 ई० में दिल्ली का सुल्तान बना। सिंहासनारोहण के समय उसकी अनेक कठिनाइयां थीं जिन पर उसने बड़ी सूझ-बूझ से नियन्त्रण पाया। सर्वप्रथम उसने पहले कुतुबी सरदारों को हराया। इन सरदारों ने उसे सुल्तान मानने से इन्कार कर दिया था। उसके मार्ग में ताजुद्दीन यल्दौज़ भी बाधा बना हुआ था। इल्तुतमिश ने उसे तराईन (तरावड़ी) के मैदान में करारी हार दी। मुल्तान में नासिरुद्दीन कुबाचा और बंगाल, बिहार में अलीमर्दान ने भी अपने आपको स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया था। इल्तुतमिश ने इन दोनों के विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन कर दिया। उसकी सफलताओं से प्रसन्न होकर बगदाद के खलीफा ने उसे सम्मान प्रदान किया, जिससे उसकी स्थिति काफ़ी दृढ़ हो गई। अब उसने गुजरात, मालवा और भीलसा के राजपूतों की शक्ति को कुचला और भारत में सल्तनत राज्य की नींव को पक्का किया।

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प्रश्न 3.
सल्तनत काल में भारत की शिक्षा प्रणाली का वर्णन करो।
उत्तर-
सल्तनतकालीन भारत शिक्षा के क्षेत्र में अपना प्राचीन वैभव खो चुका था। इस युग में नालन्दा, तक्षशिला जैसे उच्चकोटि के विश्वविद्यालय नहीं थे। सुल्तान सदा संघर्षों में उलझे रहे। अतः उनके काल में फिरोज़ तुग़लक को छोड़कर किसी ने शिक्षा के प्रसार की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। प्रायः मस्जिदें तथा मन्दिर ही शिक्षा के केन्द्र होते थे। मुसलमानों के बच्चे उर्दू, फारसी तथा कुरान की शिक्षा ग्रहण करते थे। फिरोज़ तुगलक ने मुसलमानों की शिक्षा के लिए अलग स्कूल भी खुलवाए। जौनपुर उन दिनों शिक्षा का एक बहुत बड़ा केन्द्र माना जाता था। फिरोज़ तुग़लक के पश्चात् यदि किसी मुस्लिम शासक ने शिक्षा के क्षेत्र में उत्साह दिखाया, तो वह था अकबर। उसने अनेक मदरसे खुलवाए तथा प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को इनाम तथा वज़ीफे देने की व्यवस्था की।

प्रश्न 4.
दिल्ली सल्तनत के केन्द्रीय शासन का वर्णन करो।
उत्तर-
केन्द्रीय शासन का मुखिया सुल्तान स्वयं था। इसकी सहायता के लिए कई मन्त्री थे। सबसे महत्त्वपूर्ण मन्त्री वित्तीय व्यवस्था तथा लगान का मन्त्री था। इस को ‘वजीर’ कहा जाता था। उसकी सहायता के लिए एक महालेखाकार (मुशरिफ) तथा एक महालेखापरीक्षक (मुस्तौफी) थे। सैनिक संगठन के मन्त्री को ‘आरिज़-ए-मुमालिक’ कहते थे। शाही पत्र-व्यवहार के मन्त्री को ‘दबीर-ए-खास’ तथा गुप्तचर विभाग के मन्त्री को ‘बरीद-ए-खास’ कहा जाता था। अन्य विषयों के मन्त्री ‘वजीर’ से कम महत्त्वपूर्ण तथा कम शक्तिशाली थे। यहां तक कि धार्मिक मामलों तथा न्याय का मन्त्री भी (जिसको ‘शेखअल-इस्लाम’ कहते थे) ‘वजीर’ जितना महत्त्वपूर्ण नहीं था। इनके अतिरिक्त, सुल्तान के महलों तथा उसके दरबारों की देखरेख करने के लिए भी अधिकारी थे। इनमें महलों तथा शाही कारखानों के लिए ‘वकील-ए-दर’ तथा दरबार के लिए ‘अमीरए-हाजिब’ मुख्य थे।

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प्रश्न 5.
दिल्ली सल्तनत के सैनिक प्रबन्ध के विषय में लिखो।
उत्तर-
सुल्तानों ने विशाल स्थायी सेना का संगठन किया। इसका प्रधान दीवान-ए-अर्ज होता था। केन्द्रीय सेना के अतिरिक्त प्रान्तीय सूबेदार भी अपने पास सेना रखते थे। वे समय पड़ने पर सुल्तान की सहायता करते थे। सेना के चार प्रमुख अंग थे जिनमें सबसे प्रमुख घुड़सवार सेना थी। युद्ध में हाथियों का भी प्रयोग होता था जो सेना का दूसरा अंग था। तीसरा अंग पैदल सेना थी। अस्त्रों-शस्त्रों में तलवार, बर्छा, भाले तथा धनुष बाणों का प्रयोग किया जाता था। सुल्तानों का सैनिक संगठन दाशमिक प्रणाली पर आधारित था। 10 घुड़सवारों पर सरेखैल नामक अधिकारी होता था और 10 सरेखैल पर एक सिपाहसालार होता था। इसी प्रकार 10 सिपाहसालारों पर एक अमीर होता था, 10 अमीरों पर एक मालिक और 10 मालिकों पर एक खान होता था। सेना का आकार समय-समय पर परिवर्तित होता रहता था।

प्रश्न 6.
रजिया सुल्तान में एक शासक के सभी गुण विद्यमान् थे, परन्तु फिर भी वह असफल रही। उसकी असफलता के क्या कारण थे ?
उत्तर-
इसमें कोई सन्देह नहीं कि रज़िया एक सर्वगुण सम्पन्न शासिका थी। वह मरदाने कपड़े पहनकर खुले दरबार में बैठती थी। वह अच्छा न्याय करती थी और प्रजा की उन्नति का ध्यान रखती थी। फिर भी अन्त में उसके शत्रुओं की विजय हुई। इसके कई कारण थे : –

1. रज़िया की सबसे बड़ी दुर्बलता यह थी कि वह एक स्त्री थी। एल्फन्स्टोन लिखता है, “रज़िया स्त्री थी। उसकी इस दुर्बलता ने उसके और सभी गुणों को ढांप लिया था।”

2. रज़िया ने अपने प्रेम-सम्बन्धों द्वारा अपना पक्ष कमज़ोर कर लिया। जलालुद्दीन याकूब नामक हब्शी दास पर उसकी विशेष कृपा थी। इसलिए अनेक सरदार तथा अमीर रज़िया के विरुद्ध हो गए और षड्यन्त्र रचने लगे।

3. सरदार तथा अमीर किसी स्त्री के अधीन रहना पसन्द नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने रज़िया से छुटकारा पाने के लिए अनेक योजनाएं बनाई और अन्त में उसका वध कर दिया।

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प्रश्न 7.
दक्षिण में अलाऊद्दीन खिलजी की सफलता के क्या कारण थे ?
उत्तर-
दक्षिण में अलाऊद्दीन खिलजी की सफलता के मुख्य कारण ये थे

1. अलाऊद्दीन खिलजी की दक्षिण के विषय में व्यक्तिगत जानकारी-सुल्तान बनने से पूर्व ही अलाऊद्दीन दक्षिण में देवगिरि पर आक्रमण कर चुका था। अपने व्यक्तित्व अनुभव के आधार पर उसने काफूर को उचित आदेश दिए जिसके कारण वह विजयी रहा।

2. मलिक काफूर की सैनिक योग्यता-काफूर योग्य सेनानायक सिद्ध हुआ। वह एक प्रदेश विजय करने के पश्चात् दूसरा प्रदेश विजय करने के लिए आगे बढ़ता गया। उसके सैनिक कारनामों की सूचनाएं दक्षिण के राजाओं को पहले से ही मिल जाती थीं और वे उससे लड़ने का साहस खो बैठते थे।

3. दक्षिण के राजाओं में फूट-दक्षिण के राजा अलाऊद्दीन की सेनाओं से मिलकर न लड़े। परिणामस्वरूप मलिक काफूर के लिए उन्हें अलग-अलग पराजित करना सरल हो गया।

4. धार्मिक जोश-मुसलमानों में धार्मिक जोश था। मलिक काफूर और उसके सैनिक इस्लाम के नाम पर लड़े। उन्होंने कई लोगों को मुसलमान बनाया और दक्षिण में मस्जिदें बनाईं।

प्रश्न 8.
अलाऊद्दीन खिलजी की बाज़ार-नियन्त्रण नीति की विवेचना कीजिए।
अथवा
अलाऊद्दीन खिलजी के आधुनिक सुधारों का वर्णन करो।
उत्तर-
अलाऊद्दीन खिलजी एक सफल राजनीतिज्ञ और महान् अर्थशास्त्री था। अतः उसने बाजारों पर नियन्त्रण स्थापित करने का प्रयास किया। इस उद्देश्य से उसने तीन प्रकार के बाजारों की स्थापना की-एक खाद्यान्न के लिए, दूसरा घोड़ों, दासों तथा गाय-बैलों के लिए, तीसरा आयात की गई मूल्यवान् वस्तुओं के लिए। उसने इन सभी वस्तुओं के बाजार मूल्य निश्चित कर दिये। सभी दुकानदारों के लिए यह भी आवश्यक था कि वे दुकानों पर मूल्य सूची लगायें। अलाऊद्दीन खिलजी ने वस्तुओं के एकत्रीकरण और वितरण की भी उचित व्यवस्था की। वस्तुओं को एकत्रित करने के लिए मुल्तानी सौदागर तथा बंजारे नियुक्त किए गए। वस्तुओं के उचित वितरण के लिए राशम-प्रणाली आरम्भ की गई। राशन व्यवस्था तथा मण्डियों के उचित प्रबन्ध के लिए अलग विभाग की स्थापना की गई जिसे ‘दीवान-ए-रियासत’ कहते थे।

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प्रश्न 9.
अलाऊद्दीन खिलजी की कृषि-नीति का वर्णन करो।
उत्तर-
अलाऊद्दीन खिलजी को मंगोलों के आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना करने तथा साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने के लिए बहुत से धन की आवश्यकता थी। अत: उसने कृषि की ओर विशेष ध्यान दिया ताकि राज्य को अधिक-से-अधिक लगान प्राप्त हो। उसने लगान-प्रणाली में भी कई सुधार किये। राज्य की सारी भूमि की पैमाइश करवाई कई तथा उपज का आधा भाग भूमि कर के रूप में निश्चित किया गया। अपनी भूमि-कर प्रणाली को सफल बनाने के लिए उसने ये पग उठाये थे(1) राजस्व अधिकारियों को रिश्वतखोरी तथा भ्रष्टाचार से बचाने के लिए उनके वेतन बढ़ा दिए गए। (2) किसानों से बचा हुआ भूमिकर उगाहने के लिए अलाऊद्दीन ने मस्तराज नामक अधिकारी की नियुक्ति की। (3) किसान भूमि-कर नकदी अथवा उपज के रूप में दे सकते थे। सुल्तान तो चाहता था किसान नकदी के स्थान पर उपज का ही कुछ भाग कर के रूप में दिया करें।

प्रश्न 10.
अपने शासन को सुदृढ़ करने के लिए अलाऊद्दीन खिलजी ने क्या कार्य किए ?
उत्तर-
अलाऊद्दीन खिलजी ने अपने शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए मुख्य रूप से ये चार कार्य किए-

  • उसने बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा के लिए एक विशाल तथा शक्तिशाली सेना का संगठन किया।
  • अलाऊद्दीन खिलजी के समय मंगोल दिल्ली सल्तनत के लिए बहुत बड़ा खतरा बने हुए थे। अलाऊद्दीन ने इन्हें इतनी बुरी तरह पराजित किया कि वे एक लम्बे समय तक दिल्ली राज्य पर आक्रमण करने का साहस न कर सके।
  • अलाऊद्दीन ने सेना तथा गुप्तचरों की सहायता से आन्तरिक विद्रोही तत्त्वों को बुरी तरह कुचला। उसने बाज़ार-नियमों को भी लागू किया ताकि लोगों को सस्ता तथा उचित भोजन मिल सके।
  • अलाऊद्दीन खिलजी ने शासन पर मुल्लाओं के प्रभाव को समाप्त कर दिया। फलस्वरूप सुल्तान की शक्ति एवं प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और वह स्वतन्त्र रूप से शासन चलाने लगा।

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प्रश्न 11.
मुहम्मद तुगलक की योजनाओं (प्रयोगों) की असफलता के क्या कारण थे ?
उत्तर-
मुहम्मद तुग़लक की योजनाओं की असफलता के मुख्य कारण ये थे-
1. मुहम्मद तुग़लक किसी योजना पर अडिग नहीं रहता था। उसने दिल्ली के स्थान पर देवगिरि को राजधानी बनाया और फिर दिल्ली को ही राजधानी बना लिया। उसने सांकेतिक मुद्रा चलाई और फिर उसे वापिस लेने का निश्चय कर लिया। इस अस्थिर स्वभाव के कारण उसकी योजनाएं असफल रहीं।

2. मुहम्मद तुग़लक तथा उसके अधिकारी बड़ी सख्ती का व्यवहार करते थे। दिल्ली की जनता को विवश करके देवगिरि ले जाया गया। किसानों से अकाल की स्थिति में भी कर उगाहने का प्रयत्न किया गया। अतः उसकी योजनाओं को असफल होना स्वाभाविक ही था।

3. मुहम्मद तुग़लक जी खोलकर दान दिया करता था। इसके अतिरिक्त उसकी योजनाओं पर बहुत अधिक व्यय हुआ। इन सब के कारण राजकोष खाली हो गया।

4. मुहम्मद तुग़लक के दरबारी स्वामिभक्त नहीं थे। उनमें आपसी तालमेल का अभाव था। इस तथ्य ने भी उसकी असफलता के बीज बोये।

प्रश्न 12.
फिरोज़ तुगलक के प्रशासनिक कार्यों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
फिरोज़ तुग़लक ने सभी अनुचित करों को समाप्त कर दिया। उसने केवल वही चार कर रहने दिए जिनकी कुरान अनुमति देता था। उसने कृषि को उन्नति के लिए स्थान-स्थान पर नहरें तथा कुएं खुदवाए। अतिरिक्त भूमि को हल के नीचे लाया गया। फिरोज़ तुग़लक ने अपराधियों को दिए जाने वाले अमानवीय दण्ड कम कर दिए। उसने राज्य में कई नए सिक्के चलाए। निर्धन व्यक्तियों के लिए छोटे सिक्के बनाए गए। उसने प्रजा की भलाई के लिए ‘दीवान-ए-खैरात’ नामक एक अलग विभाग की स्थापना की। परन्तु उसने कुछ दोषपूर्ण कार्य भी किए। उसने जागीरदारी की प्रथा फिर से आरम्भ कर दी। यह प्रथा शासन के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हुई। उसे दास रखने का बड़ा चाव था। उसके पास एक लाख अस्सी हज़ार दास थे। इन दासों पर धन पानी की तरह बहाया जाता था। इससे राजकोष पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। सबसे बढ़कर उसने हिन्दू जाति पर बहुत अत्याचार किए।

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प्रश्न 13.
15वीं शताब्दी में उदय होने वाले राज्यों का वर्णन करो।
उत्तर-
15वीं शताब्दी में उभरने वाले प्रमुख प्रान्तीय राज्य ये थे-

  1. शर्की वंश का राज्य-इस राज्य की स्थापना 1394 ई० में हुई थी। यह राज्य पूर्वी भारत में था। इस वंश के शासकों के अन्तर्गत जौनपुर कला और साहित्य का प्रसिद्ध केन्द्र बना। इसे पूर्व का ‘शीराज़’ कहा जाने लगा।
  2. बंगाल-दूसरा प्रमुख राज्य बंगाल का था। यूं तो बंगाल पर दिल्ली के सुल्तान कभी पूर्ण रूप से अधिकार न कर पाए परन्तु इस काल में बंगाल पूरी तरह स्वतन्त्र हो गया। यहां के शासकों के अधीन बंगला साहित्य और भाषा की बड़ी उन्नति
  3. मालवा-तीसरा स्वतन्त्र राज्य मालवा था। वहां के शासकों ने संगीत को काफ़ी प्रोत्साहन दिया।
  4. गुजरात -चौथा स्वतन्त्र राज्य गुजरात का था। इस राज्य का प्रमुख शासक अहमदशाह (1411-1442 ई०) था। उसने अहमदाबाद नामक नगर की स्थापना की और उसे अपने राज्य की राजधानी बनाया।

प्रश्न 14.
बलबन ने दिल्ली सल्तनत को किस प्रकार संगठित किया ?
अथवा
बलबन को दास वंश का महान् शासक क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
बलबन ने दिल्ली सल्तनत को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक कार्य किए। सबसे पहले उसने ‘लौह और रक्त नीति’ द्वारा आन्तरिक विद्रोहों का दमन किया और राज्य में शान्ति स्थापित की। बलबन ने दोआब क्षेत्र के सभी लुटेरों और डाकुओं का वध करवा दिया। उसने मंगोलों से राज्य की सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण सैनिक सुधार किये। पुराने सिपाहियों के स्थान पर नये योग्य सिपाहियों को भर्ती किया गया। सीमावर्ती किलों को भी सुदृढ़ बनाया गया। उसने बंगाल के विद्रोही सरदार तुगरिल खां को भी बुरी तरह पराजित किया। बलबन ने राज दरबार में कड़ा अनुशासन स्थापित किया। उसने सभी शक्तिशाली सरदारों से शक्ति छीन ली ताकि वे कोई विद्रोह न कर सकें। उसने अपने राज्य में गुप्तचरों का जाल-सा बिछा दिया। इस प्रकार के कार्यों से उसने दिल्ली सल्तनत को आन्तरिक विद्रोहों और बाहरी आक्रमणों से पूरी तरह सुरक्षित बनाया। इसी कारण ही बलबन को दास वंश का महान् शासक कहा जाता है।

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प्रश्न 15.
13वीं शताब्दी के दिल्ली सल्तनत के काल के लिए सबसे उपयुक्त नाम क्या है और क्यों ? .
उत्तर-
13वी शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के लिये उपयुक्त नाम दास वंश या गुलाम वंश है। इसका कारण यह है कि इस शताब्दी के सभी सुल्तान या तो स्वयं दास थे या दासों की सन्तान थे। कुतुबुद्दीन ऐबक गौरी का दास था, इल्तुतमिश कुतुबुद्दीन ऐबक का दास था और बलबन इल्तुतमिश का दास था। निस्सन्देह ये सभी दास शासक शक्तिशाली सुल्तान थे। इतिहासकार दास वंश की जगह इन दास शासकों को इलबरी तुर्क भी कहते हैं। परन्तु ये दास शासक एक परिवार से सम्बन्धित नहीं हैं। इलबरी तुर्कों को एक राजवंश का सदस्य नहीं कहा जा सकता। अतः उन्हें दास वंश का नाम देना अधिक उपयुक्त

प्रश्न 16.
दक्षिण भारत की विजयों के लिए अलाऊद्दीन ने किस प्रकार की नीति अपनाई ? (M. Imp.)
उत्तर-
अलाऊद्दीन खिलजी प्रथम मुस्लिम सुल्तान था, जिसने दक्षिणी भारत के प्रदेशों को भी विजय करने की योजना बनाई और इसका कार्यभार उसने अपने सेनापति मलिक काफूर को सौंपा। दक्षिण में उसने कुल मिलाकर चार राज्य जीते। इनके नाम थे-देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र तथा मदुरै। उसने दक्षिण में विजित इन राज्यों के प्रति एक विशेष नीति अपनाई। उसने इन राज्यों के शासकों से केवल अपनी अधीनता स्वीकार करवाई और उनसे धन प्राप्त किया। उसने दक्षिण के इन प्रदेशों को अपने साम्राज्य में न मिलाया। वह इस बात को भली-भांति जानता था कि दक्षिण के सुदूर प्रदेशों पर नियन्त्रण रखना उसके लिए बहुत कठिन होगा। वास्तव में उसके अधिक से अधिक धन प्राप्त करने के लिए ही दक्षिण को अपना निशाना बनाया था। अपने इस उद्देश्य में उसे पूरी तरह सफलता मिली।

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प्रश्न 17.
मुहम्मद-बिन-तुगलक के किन प्रशासनिक प्रयोगों के कारण लोगों में असन्तोष फैला ?
उत्तर-
मुहम्मद-बिन-तुग़लक के निम्नलिखित प्रशासनिक प्रयोगों के कारण लोगों में असन्तोष फैल गया(1) उसने धन-प्राप्ति के लिए दोआब के उपजाऊ प्रदेश में किसानों पर भारी कर लगा दिए। अकाल के कारण किसान इन करों को देने में असमर्थ थे, इसलिए वे अपनी जमीनें छोड़कर भाग गए। (2) 1328-29 ई० में मुहम्मद तुग़लक ने अपनी राजधानी दिल्ली की बजाए दौलताबाद में बनाई। दिल्ली की जनता को भी दौलताबाद जाने के लिए विवश किया गया परन्तु थोड़े ही समय में उसने फिर उन लोगों को दिल्ली चलने का आदेश दिया। (3) इसी बीच तारमशीरी खां के नेतृत्व में मंगोलों ने भारत पर आक्रमण कर दिया। मुहम्मद तुग़लक उनका सामना करने के स्थान पर उन्हें धन देकर वापस भेजने लगा। (4) मुहम्मद तुग़लक ने सोने-चांदी के सिक्कों के स्थान पर तांबे के सिक्के भी चलाए। परन्तु लोगों ने अपने घरों में ही ये सिक्के बनाने आरम्भ कर दिए। अतः यह योजना भी असफल रही।

प्रश्न 18.
फिरोज़ तुगलक की कौन-सी नीतियों ने सल्तनत के पतन में योगदान दिया ?
उत्तर-
फिरोज़ तगलक एक कट्टर मुसलमान था। उसने हिन्दुओं पर अनेक अत्याचार किए। उनके मन्दिरों और पवित्र मूर्तियों को बड़ी निर्दयता से तोड़ा गया। हिन्दुओं को उच्च पदों से वंचित कर दिया गया। उन पर जजिया भी लगा दिया गया। इससे हिन्दू उसके विरुद्ध हो गए। इसके अतिरिक्त उसकी सैनिक अयोग्यता के कारण साम्राज्य कमजोर हो गया। देश षड्यंत्रों, और विद्रोहियों का गढ़ बन गया। उसने दण्ड विधान को नर्म बना दिया। इससे भी विद्रोहियों और अपराधियों को बहुत सहारा मिला। दासों के प्रति अत्यधिक प्रेम, उन पर राजकोष का अपव्यय, दानशीलता और सामन्त प्रथा ने साम्राज्य को खोखला कर दिया। फिरोज़ तुग़लक की इन्हीं नीतियों ने सल्तनत के पतन में योगदान दिया।

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प्रश्न 19.
क्या दिल्ली सल्तनत को एक धर्म-तन्त्र कहना उपयुक्त होगा ?
उत्तर-
धर्म-तन्त्र से हमारा अभिप्राय पूर्ण रूप से धर्म द्वारा संचालित राज्य से है। दिल्ली सल्तनत के कई सुल्तान खलीफा के नाम पर राज्य करते थे और कुछ ने तो अपने समय के खलीफा से मान्यता-पत्र भी लिया था। परन्तु वास्तव में खलीफा की मान्यता का सुल्तान की शक्ति का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता था। सुल्तान से शरीअत (इस्लामी कानून) के अनुसार कार्य करने की अपेक्षा की जाती थी। परन्तु उसकी नीति एवं कार्य प्रायः उस समय की परिस्थितियों पर निर्भर करते थे। कभीकभी शरीअत के कारण कुछ जटिल समस्याएं भी उत्पन्न हो जाती थीं। ऐसे समय सुल्तान जानबूझ कर अनदेखी कर देते थे। वास्तव में जब कोई सुल्तान शरीअत की दुहाई देता था तो यह साधारणत: उसकी शासक के रूप में कमजोरी का चिन्ह माना जाता था। इसलिए दिल्ली सल्तनत को एक धर्म-तन्त्र समझना उचित नहीं होगा।

प्रश्न 20.
दिल्ली सल्तनत के अधीन ‘इक्ता’ व्यवस्था के बारे में बताएं।
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के अधीन अधिकांश कर्मचारियों को नकद वेतन देने की बजाए भूमि से लगान इकट्ठा करने का
गांवों या परगनों का लगान दिया जाता था। इस प्रकार एकत्रित किए गए लगान को ‘इक्ता’ कहा जाता था। इसका अर्थ थाभूमि से उपज का एक हिस्सा। इसका कुछ भाग उच्च अधिकारी अपने अधीन कर्मचारियों तथा सैनिकों को वेतन के रूप में दे सकते थे। इस व्यवस्था के अन्तर्गत एक साधारण घुडसवार सैनिक को भी वेतन भूमि के लगान के रूप में दिया जा सकता था। यह व्यवस्था फिरोज तुग़लक तथा बाद में लोधी सुल्तानों के काल में अधिक प्रचलित हो गई। समय बीतने पर इक्ता प्रणाली को ‘जागीरदारी प्रबन्ध’ कहा जाने लगा। अब लगान एकत्रित करने के लिए दी गई भूमि को जागीर तथा जागीरदार की उपमा दी गई।

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प्रश्न 21.
दिल्ली के सुल्तानों के शासक वर्ग के साथ किस प्रकार के सम्बन्ध थे ?
उत्तर-
सल्तनत काल में शासक वर्ग में मुख्यत: बड़े-बड़े अमीरों तथा सरदारों की गणना होती थी। सुल्तान और अमीरों के आपसी सम्बन्ध प्रशासनिक दृष्टिकोण से बड़े महत्त्वपूर्ण थे। इन सम्बन्धों में कभी-कभी तनाव भी रहता था। इल्तुतमिश के समय में यह सम्बन्ध अच्छे थे। परन्तु उसके उत्तराधिकारियों के समय में अमीर बहुत शक्तिशाली हो गए थे। बलबन ने सुल्तान की शक्ति बढ़ाने के लिए अमीरों की शक्ति का दमन कर दिया था। अलाऊद्दीन खिलजी के समय में तो सुल्तान का दबदबा चरम सीमा तक पहुंच गया। अन्तिम सुल्तान इब्राहिम लोधी ने पठान अमीरों को दबाने का असफल प्रयत्न किया, जिसके परिणामस्वरूप सल्तनत भीतर ही भीतर कमजोर हो गई। यहां तक कि पंजाब के लोधी सूबेदार दौलत खां ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का सुझाव देने से भी संकोच न किया।

प्रश्न 22.
सल्तनत काल की भवन निर्माण कला की मुख्य विशेषताएं क्या थीं।
उत्तर-
सल्तनत काल की भवन निर्माण कला की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं-
1. सल्तनत काल के सबसे प्रभावशाली स्मारक मस्जिदें हैं। उदाहरण के लिए गौड़ की अदीना और तांतीपाड़ा मस्जिद, जौनपुर की अटाला और जामा मस्जिद तथा अहमदाबाद और चम्पानेर की मस्जिदें बड़ी प्रभावशाली हैं। दिल्ली की कुव्वतअल-इस्लाम मस्जिद अन्यों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध है। अजमेर की अढ़ाई दिन का झोंपड़ा मस्जिद भी बड़ी प्रभावशाली है।

2. कुतुबमीनार इस काल का विशेष उल्लेखनीय भवन है। इसका निर्माण कार्य भी ऐबक ने आरम्भ किया था तथा इल्तुतमिश ने इसे पूरा किया था।

3. इस काल की वास्तुकला में मस्जिदों के पश्चात् सुल्तानों के मकबरों का महत्त्व है। इनमें विशेष उल्लेखनीय मकबरे दिल्ली, अहमदाबाद और माण्डू में स्थित हैं।

4. उत्तरी भारत में केवल राजस्थान ही ऐसा प्रदेश था जहां प्रभावशाली मन्दिरों का निर्माण होता रहा। चित्तौड़ में राणा कुम्भा का बनवाया चौमुखा मन्दिर, ग्वालियर में राजा मानसिंह का महल और चित्तौड़ में राणा कुम्भा का विजय स्तम्भ मन्दिर कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

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प्रश्न 23.
मंगोलों को आगे बढ़ने के लिए दिल्ली के सुल्तानों में क्या पग उठाए ?
उत्तर-
मंगोलों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए दिल्ली के सुल्तानों ने अनेक पग उठाए। इस सम्बन्ध में बलबन तथा अलाऊद्दीन खिलजी की भूमिका विशेष महत्त्वपूर्ण रही जिसका वर्णन इस प्रकार है

1. उन्होंने सीमावर्ती प्रदेशों में नए दुर्ग बनवाए और पुराने दुर्गों की मुरम्मत करवाई। इन सभी दुर्गों में योग्य सैनिक अधिकारी नियुक्त किए गए।

2. उन्होंने मंगोलों का सामना करने के लिए अपने सेना का पुनर्गठन किया। वृद्ध तथा अयोग्य सैनिकों के स्थान पर युवा सैनिकों की भर्ती की गई। सैनिकों की संख्या में भी वृद्धि की गई।

3. सुल्तानों ने द्वितीय रक्षा-पंक्ति की भी व्यवस्था की। इसके अनुसार मुल्तान, दीपालपुर आदि प्रान्तों में विशेष सैनिक टुकड़ियां रखी गईं और विश्वासपात्र अधिकारी नियुक्त किए। अतः यदि मंगोल सीमा से आगे बढ़ भी आते तो यहां उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ता।

4. सुल्तानों ने मंगोलों को पराजित करने के पश्चात् कड़े दण्ड दिए। इसका उद्देश्य उन्हें सुल्तान की शक्ति के आंतकित करके आगे बढ़ने से रोकना ही था।

प्रश्न 24.
दिल्ली सल्तनत के पतन के कोई चार कारण बताओ।
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के पतन के अनेक कारण थे। इनमें से चार कारणों का वर्णन इस प्रकार है-
1. धार्मिक पक्षपात-दिल्ली के सुल्तानों ने धार्मिक पक्षपात की नीति अपनायी। उन्होंने हिन्दुओं पर अनेक अत्याचार किए। परिणामस्वरूप हिन्दू दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध हो गए। वह बात दिल्ली सल्तनत के पतन का मुख्य कारण बनी।

2. उत्तराधिकार के नियम का अभाव-दिल्ली के सुल्तानों में उत्तराधिकार का कोई उचित नियम नहीं था। फलस्वरूप
अधिकतर सुल्तानों ने अपने से पहले सुल्तान का वध करके राजगद्दी प्राप्त की। इन षड्यन्त्रों और हत्याओं के कारण दिल्ली सल्तनत की शक्ति दिन-प्रतिदिन कम हो गई।

3. निरंकुश शासन-दिल्ली के सुल्तानों का शासन निरंकुश था। शासन की सारी शक्तियां सुल्तान में ही केन्द्रित थीं। अत: शासन केवल तभी स्थिर रह सकता था जब केन्द्र में कोई शक्तिशाली शासक हो, परन्तु फिरोज तुग़लक की मृत्यु के पश्चात् दिल्ली के सभी सुल्तान निर्बल सिद्ध हुए। परिणामस्वरूप केन्द्रीय शक्ति शिथिल पड़ गई।

4. तैमूर का आक्रमण-1398 ई० में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया। उस के आक्रमण से दिल्ली सल्तनत को जनधन की भारी हानि उठानी पड़ी। इसके अतिरिक्त उसने सल्तनत राज्य की राजनीतिक शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया।

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IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मुहम्मद गौरी के भारतीय सैनिक अभियानों का वर्णन कीजिए। इनके क्या प्रभाव पड़े।
अथिवा
तराइन की पहली तथा दूसरी लड़ाई का वर्णन करते हुए मुहम्मद गौरी के किन्हीं पांच भारतीय सैनिक अभियानों की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
मुहम्मद गौरी एक महान् योद्धा तथा कुशल सेनानायक था। वह 1173 ई० में गजनी का शासक बना। 1175 ई० से 1206 ई० तक उसने भारत पर अनेक आक्रमण किये और इस देश में मुस्लिम राज्य की स्थापना की। उसके मुख्य आक्रमणों का वर्णन इस प्रकार है-

1. मुल्तान तथा उच्च की विजय-मुहम्मद गौरी ने भारत का पहला आक्रमण 1175-76 ई० में किया। उसने मुल्तान के कारमाथी कबीले को परास्त किया और मुल्तान पर अधिकार कर लिया। मुल्तान विजय के पश्चात् उसने उच्च के दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया।

2. अनहिलवाड़ा पर आक्रमण-अनहिलवाड़ा में उन दिनों भीमदेव द्वितीय का शासन था। उसने गौरी को करारी पराजय दी और उसे अपमानित होकर स्वदेश लौटना पड़ा।

3. लाहौर पर आक्रमण-अब मुहम्मद गौरी ने अपना ध्यान पंजाब की ओर लगाया। पंजाब में महमूद गज़नवी के प्रतिनिधि मलिक खुसरो का शासन था। 1179 ई० में गौरी ने पंजाब पर आक्रमण करके यहाँ के बहुत-से प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। 1186 ई० में उसने एक बार फिर खुसरो पर आक्रमण किया। इस युद्ध में गौरी ने धोखे से खुसरो को बन्दी बना लिया और उसकी हत्या करवा दी।

4. तराइन का पहला युद्ध-पंजाब विजय के बाद मुहम्मद गौरी दिल्ली की ओर बढ़ा। उसने 1191 ई० में वहाँ के शासक पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर दिया। परन्तु तराइन के स्थान पर पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को बुरी तरह हराया।

5. तराइन का दूसरा युद्ध-अपनी पराजय का बदला लेने के लिए गौरी ने अगले वर्ष (1192 ई० में) पुनः दिल्ली के राज्य पर आक्रमण किया। इस बार कन्नौज के राजा जयचन्द ने भी उसका साथ दिया। तराइन के स्थान पर गौरी और पृथ्वीराज की सेनाओं में एक बार फिर युद्ध हुआ। इस बार मुहम्मद गौरी विजय रहा। पृथ्वीराज को बन्दी बनाकर उसका वध कर दिया गया।

6. कन्नौज पर आक्रमण-1194 ई० में मुहम्मद गौरी ने कन्नौज पर आक्रमण किया। छिंदवाड़ा के स्थान पर उसकी तथा जयचन्द की सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। राजपूत असाधारण वीरता से लड़े, पर भाग्य ने गौरी का साथ दिया। इस युद्ध में जयचन्द की पराजय हुई और गौरी को अपार धन प्राप्त हुआ।

7. अजमेर, अनहिलवाड़ा, हाँसी तथा कालिंजर पर अधिकार-कन्नौज विजय के बाद गौरी पुनः गज़नी लौट गया। उसकी अनुपस्थिति में उसके प्रतिनिधि कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपने अभियान जारी रखे। उसने अजमेर, अनहिलवाड़ा, हाँसी और कालिंजर पर अधिकार कर लिया।

8. बिहार और बंगाल की विजय-कुतुबुद्दीन के सेना नायक बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आक्रमण करके वहाँ के राजा इन्द्रदमन को परास्त किया। उसने यहाँ बहुत लूटमार की और अनेक बौद्ध भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया। इसके पश्चात् बख्तियार खिलजी ने बंगाल के राजा लक्ष्मण सेन को हराकर वहाँ भी अपना अधिकार जमा लिया।

9. खोखरों का दमन-जेहलम और चिनाब के बीच के क्षेत्र के खोखरों ने गौरी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। परन्तु गौरी ने धैर्य न छोड़ा और अपने स्वामिभक्त दास ऐबक के सहयोग से खोखरों को बुरी तरह कुचल डाला।

मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के प्रभाव-

  • मुहम्मद गौरी के आक्रमणों के परिणामस्वरूप भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना हुई।
  • मुहम्मद गौरी ने भारत में दिल्ली, अजमेर, रणथम्भौर तथा कुछ अन्य राजपूत राजाओं को पराजित किया। फलस्वरूप राजपूत शक्ति को भारी क्षति पहुंची।
  • उसके आक्रमणों का भारत के आर्थिक जीवन पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।
  • मुहम्मद गौरी ने भारत में अनेक मन्दिरों, विहारों तथा पुस्तकालयों को नष्ट कर दिया। इसके अतिरिक्त मुसलमान सैनिकों ने अनके धार्मिक तथा ऐतिहासिक ग्रन्थों को जला दिया। फलस्वरूप भारतीय संस्कृति के अनेक स्मारक नष्ट हो गए।

प्रश्न 2.
कुतुबुद्दीन ऐबक के जीवन तथा सफलताओं का वर्णन करो।
अथवा
(क) मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि के रूप में तथा स्वतंत्र शासक के रूप में कुतुबुद्दीन ऐबक की सफलताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
कुतुबुद्दीन ऐबक का जन्म एक तुर्क परिवार में हुआ। बचपन में ही वह अपने माता-पिता से अलग हो गया और उसे निशानपुर के काजी ने खरीद लिया। काजी की कृपा-दृष्टि से ऐबक ने उसके पुत्रों के साथ लिखना-पढ़ना, तीर चलाना तथा घुड़सवारी सीख ली। काजी की मृत्यु पर उसके पुत्रों ने ऐबक को एक व्यापारी के पास बेच दिया। यह व्यापारी उसे गज़नी ले गया जहां उसे गौरी ने खरीद लिया। इससे उसके जीवन में एक नया अध्याय आरम्भ हुआ और वह अन्त में दिल्ली का शासक बना।

कुतुबुद्दीन ऐबक की सफलताएं-कुतुबुद्दीन ऐबक की सफलताओं को दो भागों में बांटा जा सकता है-

I. मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि के रूप में-1192 ई० से लेकर 1206 ई० तक ऐबक भारत में गौरी के प्रतिनिधि के रूप में शासन करता रहा। इन 14 वर्षों में कुतुबुद्दीन ऐबक ने निम्नलिखित सफलताएं प्राप्त की-

1. अजमेर, मेरठ तथा कोइल के विद्रोहों का दमन-1192 ई० में ऐबक ने अपने स्वामी मुहम्मद गौरी की अनुपस्थिति में अजमेर और मेरठ के विद्रोहों का दमन किया। उसने दिल्ली, कन्नौज और कोइल (अलीगढ़) पर भी अधिकार कर लिया।

2. अजमेर के विद्रोह का पुनः दमन-कोइल विजय के पश्चात् ऐबक पुनः अजमेर पहुंचा, जहां चौहानों ने फिर विद्रोह कर दिया। ऐबक ने इस विद्रोह को दबा दिया। उसने रणथम्भौर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

3. अजमेर में मेढ़ों का दमन तथा अनहिलवाड़ा की लूट-1195 ई० में अजमेर प्रान्त के मेढ़ों ने तुर्की साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। ऐबक ने मेढ़ों को सफलतापूर्वक दबा दिया। इसी वर्ष उसने गुजरात के शासक भीमदेव को भी हराया और अनहिलवाड़ा में भारी लूटमार की।

4. कालिंजर दुर्ग पर अधिकार-1202 ई० में कुतुबुद्दीन ऐबक ने बुन्देलखण्ड के चन्देल शासक को पराजित करके वहां के प्रसिद्ध दुर्ग कालिंजर पर अधिकार कर लिया।

5. अन्य विजयें-मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि के रूप में विजय प्राप्त करते हुए ऐबक ने कालपी और बदायूं को भी अपने अधिकार में ले लिया।

II. स्वतन्त्र शासक के रूप में-1206 ई० में दमयक के स्थान पर मुहम्मद गौरी का वध कर दिया गया। उसकी मृत्यु के बाद ऐबक ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। इस तरह वह एक स्वतन्त्र शासक बन गया। स्वतन्त्र शासक के रूप में उसकी सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है-

1. ताजुद्दीन यलदौज़ से टक्कर-यल्दौज़ गौरी का सेनानायक था और उसने गौरी की मृत्यु के पश्चात् गज़नी की राजगद्दी पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया था। ऐबक ने नासिरुद्दीन कुबाचा को साथ मिलकर उसे मार भगाया, परन्तु जल्दी ही वह दिल्ली लौट आया। उसके वापस आते ही यल्दौज़ ने गज़नी पर अधिकार कर लिया, किन्तु इसके पश्चात् उसने कभी भी कुबाचा अथवा ऐबक को परेशान नहीं किया।

2. दास्ता से मुक्ति-कुतुबुद्दीन ने गज़नी में रह कर गौरी के उत्तराधिकारियों से मुक्ति-पत्र प्राप्त कर लिया। इस प्रकार उसने अपनी दासता के कलंक को धो दिया।

3. बंगाल की अधीनता-कुतुबुद्दीन ने बंगाल को पूरी तरह से अपने अधीन करने का प्रयास किया। वहां अली मर्दान नामक सरदार ने कब्जा कर लिया था। खिलजी सरदारों ने उसे पकड़ कर जेल में डाल दिया। परन्तु वह किसी तरह बच निकला और ऐबक की शरण में आ पहुंचा। ऐबक ने खिलजी सरदारों से बातचीत की। उन्होंने ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली जिससे बंगाल ऐबक के अधीन हो गया।

4. मध्य एशिया की राजनीति से पृथक्कता-कुतुबुद्दीन ऐबक की एक बड़ी सफलता यह थी कि उसने स्वयं को मध्य . एशिया की राजनीति से पृथक् रखा।

5. हिन्दू सरदारों का दमन-कुतुबुद्दीन ने भारत में हिन्दू सरदारों से भी बड़ी सूझ-बूझ से मुक्ति पाई। उसने ऐसे सभी हिन्दू सरदारों की शक्ति को कुचल डाला जो उसकी सत्ता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।

6. प्रशासनिक सफलताएं-कुतुबुद्दीन ऐबक का शासन शुद्ध सैनिक शासन था। उसने राजधानी में एक विशाल सेना रखी हुई थी। वह बड़ा न्यायप्रिय शासक था। उसकी न्यायप्रियता की प्रशंसा करते हुए मिनहास सिराज लिखता है, “उसके राज्य में शेर और बकरी एक घाट पर पानी पीते थे।”1 कुतुबुद्दीन ऐबक को कला से भी प्रेम था। कुतुबमीनार का निर्माण कार्य उसी ने आरम्भ करवाया था।

मृत्यु-कुतुबुद्दीन ऐबक चार वर्ष ही शासन कर पाया। वह 1210 ई० में चौगान खेलते समय घोड़े से गिर पड़ा और वहीं उसकी मृत्यु हो गई।

सच तो यह है कि कुतुबुद्दीन ऐबक एक महान् सेनानायक तथा कुशल शासन प्रबन्धक था। उसके कार्यों को देखते हुए डॉ० ए० एल० श्रीवास्तव लिखते हैं, “कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में तुर्क साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक था।”2

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प्रश्न 3.
अल्तमश (इल्तुतमिश) के आरम्भिक जीवन और कठिनाइयों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। उसने इन कठिनाइयों पर किस प्रकार काबू पाया ?
अथवा
अल्तमश के आरम्भिक जीवन और सफलताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
I. आरम्भिक जीवन –
अल्तमश (इल्तुतमिश) अलबारी कबीले के एक तुर्क परिवार से सम्बन्ध रखता था। उसका पूरा नाम शम्स-उद्दीनइल्तुतमिश था। वह कई व्यक्तियों के पास दास के रूप में रहा और अन्त में ऐबक ने उसे खरीद लिया। ऐबक के अधीन रहकर अल्तमश ने अपनी योग्यता का परिचय दिया। उसकी योग्यता से प्रसन्न होकर ऐबक ने उसे दासता से मुक्त कर दिया और अपनी पुत्री का विवाह भी उसी के साथ कर दिया। 1196 ई० में ऐबक ने उसे ग्वालियर का गवर्नर बना दिया। कुछ समय बाद बर्न और बदायूं का शासन-प्रबन्ध भी उसके हाथों में आ गया। इस प्रकार अल्तमश थोड़े से ही वर्षों में राज्य का महत्त्वपूर्ण अधिकारी बन गया।

कुतुबुद्दीन की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र आरामशाह सिंहासन पर बैठा। वह एक अयोग्य शासक था। अत: दिल्ली के सरदारों ने अल्तमश को राज्य सम्भालने का निमन्त्रण भेजा। उसने शीघ्र ही दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। आते ही उसने आरामशाह को कैद कर लिया और स्वयं सुल्तान बन बैठा।

II. कठिनाइयां तथा सफलताएं
1. कुतुबी सरदारों का दमन-कुछ कुतुबी सरदारों ने अल्तमश को ऐबक का उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया। उसने ‘जड़’ के रणक्षेत्र में इन सरदारों को बुरी तरह हराया।

2. ताजुद्दीन यल्दौज़ का दमन-गज़नी के शासक ताजुद्दीन यल्दौज़ ने अल्तमश को भारत का सुल्तान स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। अल्तमश ने तराइन के युद्ध में यल्दौज़ को बुरी तरह हराया और अपने मार्ग की एक और बाधा दूर की।

3. नासिरुद्दीन कुबाचा का दमन-ऐबक की मृत्यु के पश्चात् सिन्ध और मुल्तान से नासिरुद्दीन कुबाचा ने अपने आप को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। अल्तमश ने उसके विरुद्ध कई बार सेनाएं भेजी और उसकी शक्ति का अन्त किया

4. अली मर्दान का दमन-बंगाल और बिहार के प्रदेश ऐबक के अधीन थे, परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् वहां के शासअली मर्दान ने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। अल्तमश ने 1226 ई० तक अली मर्दान के विरुद्ध तीन बार सेनाएं भेज अन्त में वह उसका दमन करने में सफल हुआ।

III. अन्य सफलताएं –
1. खलीफा द्वारा सम्मान-अल्तमश की सफलताओं से प्रभावित होकर बगदाद के खलीफा ने 1228 ई० में अल्तम के सम्मान के लिए ‘खिल्लत’ तथा एक नियोजन पत्र भेजा। खलीफा द्वारा सम्मान पा लेने के कारण उसके सभी विरोधी शान्त हो गए।

2. राजपूतों से युद्ध-अल्तमश ने 1232 ई० में राजपूतों का दमन करने का निश्चय किया। उसने शीघ्र ही गुजरात, मालवा तथा भील्सा के राजपूतों पर विजय प्राप्त कर ली।

3. मंगोलों के आक्रमण से बचाव-अल्तमश ने खारिज्म के शासक जलालुद्दीन को शरण देने से इन्कार कर दिया था। जलालुद्दीन ने अल्तमश से शरण मांगी परन्तु उसने जलालुद्दीन को शरण न देकर अपने राज्य को मंगोलों के आक्रमण से बचा लिया।

4. कला तथा विद्या को प्रोत्साहन-अल्तमश एक कला प्रेम सुल्तान था। उसने अपने गुरु ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार की यादगार में कुतुबमीनार बनवाई। शिक्षा के प्रसार के लिए उसने कई मस्जिदें बनवाईं।

5. सच तो यह है कि अल्तमश एक योग्य तथा बुद्धिमान् शासक था। एक दास होकर सम्राट् पद प्राप्त करना अल्तमश की योग्यता का ही परिणाम था। डॉ० दत्ता ने ठीक कहा है, “अल्तमश दिल्ली सल्तनत के आरम्भिक सुल्तानों में सबसे महान् था।”

प्रश्न 4.
बलबन ने दिल्ली सल्तनत को सुदृढ़ करने के लिए कौन-कौन से कार्य किए ?
अथवा
दिल्ली सल्तनत को सुदृढ़ बनाने में बलबन के योगदान की किन्हीं पांच बिंदुओं के आधार पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-
प्रधानमन्त्री और शासक के रूप में बलवन ने दिल्ली सल्तनत को सुदृढ़ करने के लिए अनेक कार्य किए जिनका वर्णन इस प्रकार है
1. खोखर जाति का दमन-खोखर जाति झेलम और चिनाब के बीच के क्षेत्र में रहती थी। ये लोग बड़े उपद्रवी थे। बलबन ने एक विशाल सेना लेकर उनको कुचल डाला। उसने हज़ारों खोखरों को मौत के घाट उतार दिया।

2. दोआबा के हिन्दू राजाओं के विद्रोहों का दमन-दोआब के हिन्दू राजाओं तथा सामन्तों ने अपनी खोई हुई राजसत्ता को पुनः प्राप्त करने के लिए विद्रोह कर दिया था। बलबन एक शक्तिशाली सेना के साथ उनके विरुद्ध बढ़ा और उनका बुरी तरह से दमन किया।

3. राजपूतों के विरुद्ध अभियान-बलबन ने ग्वालियर, चन्देरी, कालिंजर तथा मालवा के विद्रोही राजपूत शासकों को पराजित करके उनके प्रदेश दिल्ली राज्य में मिला लिए।

4. मेवातियों के विद्रोहों का दमन-दिल्ली के आस-पास के प्रदेश में मेवाती सरदारों तथा डाकुओं ने आतंक फैला रखा था। 1248 ई० में बलबन ने मेवातियों के प्रदेश पर आक्रमण करके उन्हें जान और माल की भारी हानि पहुंचाई। 1259 ई० में उसने मेवात पर पुनः एक ज़ोरदार आक्रमण किया और उसने लगभग 12,000 मेवातियों को मौत के घाट उतार दिया।

5. कुतलुग खां के विद्रोह का दमन-अवध के गवर्नर कुतलुग खां ने जो बलबन का कट्टर विरोधी था, 1255 ई० में रिहान से मिलकर दिल्ली पर आक्रमण करने की योजना बनाई परन्तु वह बलबन द्वारा पराजित हुआ।

6. किश्लू खां का विद्रोह-बलबन का भाई किश्लू खां मुल्तान तथा उच्च का गवर्नर था। वह बलबन के विरुद्ध मंगोल नेता हलाकू खां से जा मिला। उसने मंगोलों से सैनिक सहायता लेकर 1257 ई० में पंजाब पर आक्रमण कर दिया। लेकिन बलबन ने उसे बुरी तरह पराजित किया।

7. मेवातियों का पुनः विद्रोह और उनका दमन-मेवात के विद्रोही एक बार फिर उत्पात मचाने लगे थे। बलबन ने एक बार फिर उन पर आक्रमण किया और उनके रक्त की नदियां बहा दीं।

8. कटेहर के हिन्दू सरदारों का दमन-मेवातियों के विद्रोह से प्रेरित होकर कटेहर (रुहेलखण्ड) के हिन्दू सरदारों ने भी विद्रोह कर दिया। परन्तु बलबन ने इन विद्रोहियों को कुचल डाला।

9. मंगोलों के आक्रमणों से देश का बचाव-उसने दिल्ली राज्य की मंगोलों के आक्रमणों से रक्षा करने के लिए उत्तरीपश्चिमी सीमा को सुदृढ़ बनाया। उसने सीमावर्ती प्रान्तों में दुर्गों और चौकियों की मुरम्मत करवाई तथा वहाँ नए किलों का निर्माण करवाया। 1279 ई० में उसने मंगोलों को इतनी बुरी तरह से परास्त किया कि वे भविष्य में बहुत समय तक भारत पर आक्रमण करने का सहस न कर सके।

10. बंगाल के विद्रोह का दमन-इसी बीच बंगाल के शासक तुगरिल खाँ ने अपने आप को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। बलबन ने एक भारी सेना लेकर उस पर आक्रमण किया तो तुगरिल खाँ भाग निकला। परन्तु बलबन के सिपाहियों ने किसी तरह ढूँढ निकाला और उसका वध कर दिया।

प्रशासनिक सुधार-बलबन ने सल्तनत को सुदृढ़ करने के लिए अनेक सुधार भी किए-

  • पैदल तथा घुड़सवार सेना का नए ढंग से संगठन किया गया।
  • सेना का उचित संचालन करने के लिए अनुभवी तथा स्वामीभक्त सरदारों को नियुक्त किया गया।
  • बलबन ने राजपद की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए अनेक कठोर नियम बनाए। अब राजा की आज्ञा के बिना दरबार में कोई भी व्यक्ति किसी प्रकार की बात नहीं कर सकता था। उसने शराब पीना तथा रंगरलियां मनाना बन्द कर दिया। दरबार का अनुशासन भंग करने वाले दरबारी को कठोर दण्ड दिया जाता था। सच तो यह है कि, “उसने शासन व्यवस्था में नया जीवन डाल दिया और राज्य की शक्ति को नष्ट होने से बचा लिया।”

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प्रश्न 5.
अलाऊद्दीन खिलजी के प्रशासनिक, सैनिक, सामाजिक तथा आर्थिक सुधारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
अलाऊद्दीन खिजली सफल विजेता होने के साथ-साथ कुशल शासन प्रबन्धक भी था। उसके प्रमुख सुधारों का वर्णन इस प्रकार है-

I. प्रशासनिक सुधार-

1. सरदारों की शक्ति कुचलना-अलाऊद्दीन ने सरदारों की शक्ति को कुचलने के लिए निम्नलिखित पग उठाए :

  • उसने अमीरों तथा सरदारों की शक्ति कम करने के लिए सबकी जागीरें छीन लीं।
  • सुल्तान ने अनेक योग्य गुप्तचरों की नियुक्ति की। वे सरकारी अधिकारियों के कार्यों पर कड़ी निगरानी रखते थे।
  • अलाऊद्दीन ने सरदारों के आपसी मेलजोल पर भी रोक लगा दी। उसने यह आदेश जारी किया कि सुल्तान की आज्ञा के बिना सरदार किसी दावत में एकत्रित नहीं हो सकते।

2. भूमि सुधार-अलाऊद्दीन खिलजी ने सारी भूमि की पैमाइश करवायी तथा उपज का आधा भाग भूमि-कर के रूप में निश्चित किया। उसने भूमि-कर प्रणाली को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित पग उठाए :

  • राजस्व अधिकारियों को रिश्वतखोरी तथा भ्रष्टाचार से बचाने के लिए उनके वेतन बढ़ा दिए गए।
  • किसानों से बचा हुआ भूमि-कर उगाहने के लिए ‘मस्तकराज’ नामक अधिकारी की नियुक्ति की गई।
  • किसान भूमि-कर नकदी अथवा उपज के रूप में दे सकते थे।

3. उचित न्याय प्रणाली-अलाऊद्दीन एक न्यायप्रिय शासक था। न्याय का मुख्य स्रोत सुल्तान स्वयं था। सभी बड़े-बड़े अभियोगों का निर्णय वह स्वयं करता था। दण्ड बहुत कठोर थे। धनी से धनी व्यक्ति भी अपराधी सिद्ध होने पर कानून के पंजे से नहीं बच सकता था।

II. सैनिक सुधार-

  • अच्छा सैनिक संगठन-अलाऊद्दीन ने एक विशाल तथा सुदृढ़ सेना का संगठन किया। उसकी सेना में 4,75,000 घुड़सवार थे। उसके अतिरिक्त उसकी सेना में पैदल सैनिक तथा हाथी भी थे।
  • दाग तथा हुलिया प्रथा-अलाऊद्दीन ने सेना में ‘दाग’ तथा ‘हुलिया’ के नियम आरम्भ किये। दाग के अनुसार प्रत्येक सरकारी घोड़े को दागा जाता था। ‘हुलिया’ के अनुसार प्रत्येक सैनिक का हुलिया दर्ज कर लिया जाता था।
  • दुर्गों का निर्माण-अलाऊद्दीन ने उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रदेशों में नवीन दुर्गों का निर्माण करवाया तथा सभी पुराने किलों की मुरम्मत करवाई।
  • नौजवान सैनिकों की नियुक्ति-अलाऊद्दीन खिलजी ने सभी निर्बल सैनिकों को हटाकर उनके स्थान पर नवयुवक सैनिकों की भर्ती की।

III. सामाजिक सुधार-

  • शराब पीने पर रोक-अलाऊद्दीन ने शाही आदेश के द्वारा शराब पर रोक लगा दी। शराब बेचने वाले तथा शराब पीने वाले को गन्दे कुओं में फेंकने का दण्ड निश्चित किया गया। उसने स्वयं भी शराब पीनी बन्द कर दी।
  • वेश्यावृत्ति पर रोक-अलाऊद्दीन ने वेश्यावृत्ति पर रोक लगा दी। अनुचित सम्बन्ध रखने वाले स्त्री-पुरुष के लिए कठोर दण्ड निश्चित कर दिये गये।
  • जुआ खेलने पर रोक-अलाऊद्दीन ने जुआ खेलने पर रोक लगा दी। यदि कोई जुआ खेलते पकड़ा जाता था तो उसे कुएँ में फेंक दिया जाता था।

IV. आर्थिक सुधार-

  • आवश्यक वस्तुओं के मूल्य निर्धारित करना-सुल्तान ने सभी आवश्यक वस्तुओं के मूल्य निश्चित कर दिए। वस्तुओं के मूल्यों की सूचियाँ तैयार की गईं तथा दुकानदारों को यह आदेश दिया गया कि वे निर्धारित भावों से अधिक मूल्य पर कोई भी वस्तु न बेचें।
  • वस्तुएँ एकत्रित करना-वस्तुओं को एकत्रित करने के लिए मुल्तानी सौदागर तथा बंजारे नियुक्त किए गए। ये सभी कर्मचारी अपने चारों ओर सौ-सौ कोस की दूरी तक रहने वाले कृषकों से अनाज एकत्रित करते थे।
  • राशनिंग व्यवस्था-अलाऊद्दीन ने अपने राज्य में राशन-प्रणाली चलाई। अकाल के समय राशन-प्रणाली शुरू कर दी जाती थी।
  • अलग विभाग की स्थापना-राशन तथा मण्डियों की उचित व्यवस्था के लिए एक अलग विभाग की स्थापना की गई जिसे ‘दिवान-ए-रियासत’ कहते थे।

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प्रश्न 6.
मुहम्मद तुगलक की हवाई योजनाओं का वर्णन करो।
उत्तर-
मुहम्मद तुग़लक का वास्तविक नाम जूना खाँ था। उसके राजनैतिक उद्देश्य बहुत ऊँचे थे। उसने कई नई योजनाएँ बनाईं, परन्तु सभी असफल रहीं। उसकी प्रमुख योजनाओं का वर्णन इस प्रकार है-

1. राजधानी बदलना-1327 ई० में मुहम्मद तुग़लक ने दिल्ली के स्थान पर दक्षिण में देवगिरि को अपनी राजधानी बनाया। देवगिरि उसके राज्य के केन्द्र में स्थित थी। उसने इस नयी राजधानी का नाम दौलताबाद रखा और अपने सभी कर्मचारियों को वहाँ जाने की आज्ञा दी। उसने दिल्ली के लोगों को भी देवगिरि जाने के लिए कहा। अनेक लोग लम्बी यात्रा के कारण मर गए। उत्तरी भारत में शासन की व्यवस्था बिगड़ गई। विवश होकर मुहम्मद तुग़लक ने फिर से दिल्ली को राजधानी बना लिया। लोगों को फिर दिल्ली जाने की आज्ञा दी गई। इस प्रकार जान-माल की बहुत हानि हुई।

2. दोआब में कर बढ़ाना-मुहम्मद तुग़लक को अपनी सेना के लिए धन की आवश्यकता थी। इसीलिए उसने 1330 ई० में दोआब में कर बढ़ा दिया, परन्तु उस साल वर्षा न हुई और दोआब में अकाल पड़ गया। किसानों की दशा बहुत बिगड़ गई। उनके पास लगान देने के लिए धन न रहा, परन्तु लगान इकट्ठा करने वाले कर्मचारी उनसे कठोर व्यवहार करने लगे। तंग आकर कई किसान जंगलों में भाग गए। बाद में सुल्तान को अपनी गलती का अनुभव हुआ तो उसने उन किसानों की सहायता की।

3. ताँबे के सिक्के चलाना-कुछ समय बाद मुहम्मद तुग़लक ने सोने तथा चाँदी के सिक्कों के स्थान पर ताँबे के सिक्के आरम्भ कर दिए। अतः लोगों के घरों में जाली सिक्के बनाने आरम्भ कर दिए और भूमि का लगान तथा अन्य कर इन्हीं सिक्कों में चुकाए, जिससे सरकार को बहुत हानि हुई।

विदेशी व्यापारियों ने भी ताँबे के सिक्के लेना अस्वीकार कर दिया। इसलिए सुल्तान ने ताँबे के सिक्के बन्द कर दिये। लोगों को इन सिक्कों के बदले चाँदी के सिक्के दिए गए। कई लोगों ने जाली सिक्के बनाकर सरकार से चाँदी के असली सिक्के लिए। इस प्रकार राज्य के कोष को बहुत हानि हुई।

4. मंगोलों को धन देना-सुल्तान जब अपनी नई राजधानी दौलताबाद ले गया तो उत्तर-पश्चिमी सीमा की ओर उसका ध्यान कम हो गया। मंगोलों ने इसका लाभ उठाया तथा उन्होंने मुल्तान तथा लाहौर में लूट-मार की। सुल्तान ने उनके आक्रमणों को रोकने के लिए मंगोल सरदार को बहुत सारा धन दिया, परन्तु मंगोलों ने धन के लालच में आ कर और अधिक आक्रमण करने आरम्भ कर दिए।

5. खुरासान पर आक्रमण की योजना-मुहम्मद तुग़लक ने खुरासान को जीतने के लिए भी एक योजना बनाई। इसलिए उसने एक विशाल सेना तैयार की। एक वर्ष तक इस सेना को वेतन भी मिलता रहा। अन्त में सुल्तान ने खुरासान पर आक्रमण करने का विचार त्याग दिया। इस योजना के कारण राज-कोष पर बहुत बोझ पड़ा।

प्रश्न 7.
फिरोज तुगलक के प्रशासन का वर्णन करो। दिल्ली सल्तनत के पतन के लिए वह कहां तक उत्तरदायी है ?
अथवा
फिरोज़ तुगलक के त्रुटिपूर्ण/दोषपूर्ण कार्यों की चर्चा करते हुए यह बताइए कि उन कार्यों ने दिल्ली सल्तनत के पतन की भूमिका किस प्रकार तैयार की ?
उत्तर-
फिरोज़ तुग़लक एक योग्य शासक था। उसने अनेक प्रशासनिक सुधार किए। परन्तु उसने कुछ बुरे कार्य भी किए। इन सब कार्यों का वर्णन इस प्रकार है :

अच्छे कार्य-
1. अनुचित करों का अन्त-फिरोज़ तुग़लक ने सभी अनुचित करों का अन्त कर दिया। व्यापारी वर्ग पर लगे अनुचित करों का अन्त कर दिया गया। इस प्रकार कृषि तथा वाणिज्य की उन्नति हुई।

2. कृषि को प्रोत्साहन-फिरोज़ तुग़लक ने कृषि को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक नहरें तथा कुएं खुदवाए। अतिरिक्त भूमि को हल तले लाया गया। इस प्रकार प्राप्त भूमि-कर से सरकार की आय में वृद्धि हुई।

3. प्रजा हितार्थ कार्य-फिरोज़ तुग़लक ने अपनी प्रजा की भलाई के लिए भी बहुत से कार्य किए। उसने ‘दीवान-एखैरात’ नामक एक अलग विभाग की स्थापना की। इसके दो भाग थे-(1) रोजगार विभाग (2) विवाह विभाग। कोतवाल हर नगर के बेरोज़गार लोगों के नाम दर्ज कर लेता था। सुल्तान इतना दयालु था कि वह बेरोज़गार तथा ज़रूरतमन्द लोगों के लिए नई-नई नौकरियों पैदा कर देता था। विवाह विभाग का काम उन व्यक्तियों की सूची तैयार करना था जिन्हें अपनी पुत्रियों के विवाह के लिए शाही सहायता की आवश्यकता होती थी।

4. दण्ड विधान में सुधार-फिरोज़ तुगलक ने अपराधियों को दी जाने वाली यातनाओं-जैसे अंगों का काटना और मृत्यु-दण्ड पर रोक लगा दी। परन्तु दण्ड विधान सम्बन्धी सुधारों का लाभ केवल मुसलमान प्रजा को ही हुआ।

5. मुद्रा सुधार-सुल्तान ने मुद्रा प्रणाली में भी कई सुधार किये। उसने कई नवीन सिक्कों को प्रचलित किया। ये सिक्के तांबे तथा चांदी को मिला कर बनाए जाते थे ताकि लोग नकली सिक्के बना कर लाभ न उठा सकें।

दोषपूर्ण कार्य-
1. जागीरदारी प्रथा का पुनः आरम्भ-सुल्तान ने जागीरदारी प्रथा पुनः प्रचलित की। उसने सैनिक अधिकारियों तथा अन्य अधिकारियों को वेतन के स्थान पर जागीरें देना आरम्भ कर दिया। यह प्रथा शासन के लिए घातक सिद्ध हुई।

2. त्रुटिपूर्ण सैन्य संगठन-फिरोज़ तुग़लक का सैन्य संगठन भी काफ़ी त्रुटिपूर्ण था। इन त्रुटियों के कारण उसका साम्राज्य विद्रोहों का अड्डा बन कर रहा गया।

3. धार्मिक असहनशीलता-फिरोज़ तुग़लक एक कट्टर मुसलमान था। उसने हिन्दुओं पर अनेक अत्याचार किए। उनके मन्दिरों और पवित्र मूर्तियों को बड़ी निर्दयता से तोड़ा गया। हिन्दुओं को उच्च पदों से वंचित कर दिया गया। उन पर जज़िया भी लगा दिया गया।

4. दासों पर धन का अपव्यय-सुल्तान को अधिक-से-अधिक दास रखने का चाव था। कहते हैं कि सुल्तान के पास लगभग एक लाख अस्सी हज़ार दास थे। इन दासों के लिए धन पानी की तरह बहाया जाता था।

सल्तनत के पतन में फिरोज़ तुगलक का दायित्व-फिरोज़ तुग़लक एक कट्टर मुसलमान था। उसने हिन्दुओं पर बहुत अत्याचार किये। इससे हिन्दू उसके विरुद्ध हो गए। इसके अतिरिक्त उसकी सैनिक अयोग्यता के कारण साम्राज्य कमज़ोर हो गया। देश षड्यन्त्रों और विद्रोहियों का गढ़ बन गया। उसने दण्ड विधान नर्म बना दिया। इससे भी विद्रोहियों और अपराधियों को बहुत सहारा मिला। दासों के प्रति अत्यधिक प्रेम, उन पर राजकोष का अपव्यय, दानशीलता और सामन्ती प्रथा ने साम्राज्य को खोखला कर दिया। परिणामस्वरूप सल्तनत का पतन आरम्भ हो गया।

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प्रश्न 8.
दिल्ली सल्तनत के पतन के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
दिल्ली सल्तनत के पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे-
1. धार्मिक पक्षपात-दिल्ली के सुल्तानों ने धार्मिक पक्षपात की नीति अपनाई। उन्होंने हिन्दुओं पर अनेक अत्याचार किए। परिणामस्वरूप हिन्दू दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध हो गए। यह बात दिल्ली साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण बनी।

2. विस्तृत साम्राज्य-मुहम्मद तुग़लक ने अपनी राजनीतिक अयोग्यता का प्रमाण दिया। उसने दक्षिण के विभिन्न राज्यों को सीधे सल्तनत में मिला लिया। उसकी इस नीति से सल्तनत साम्राज्य का विस्तार इतना बढ़ गया कि उस पर नियन्त्रण रखना कठिन हो गया। फलस्वरूप चारों ओर विद्रोह होने लगे और अनेक सरदारों ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली।

3. निरंकुश शासन-दिल्ली के सुल्तानों का शासन निरंकुश था। शासन की सारी शक्तियाँ सुल्तान में ही केन्द्रित थीं। अतः शासन केवल तभी स्थिर रह सकता था जब केन्द्र में कोई शक्तिशाली शासक होता। परन्तु फिरोज़ तुग़लक की मृत्यु के पश्चात् दिल्ली के सभी सुल्तान निर्बल सिद्ध हुए। परिणामस्वरूप केन्द्रीय शक्ति शिथिल पड़ गई।

4. फिरोज़ तुग़लक के अयोग्य उत्तराधिकारी-फिरोज़ तुग़लक के उत्तराधिकारी दुर्बल और अयोग्य सिद्ध हुए। उन्होंने अपना अधिकांश समय विलासिता और आपसी झगड़ों में व्यतीत किया। इसका दिल्ली सल्तनत पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा।

5. सैनिक दुर्बलता-दिल्ली सल्तनत की राजसत्ता का आधार सैनिक शक्ति था। परन्तु फिरोज़ तुग़लक ने सामन्त प्रथा ६.. फिर से आरम्भ कर दिया। इस प्रथा के कारण सामन्तों की शक्ति बढ़ने लगी और उन्होंने विद्रोह करने आरम्भ कर दिए। परिणामस्वरूप साम्राज्य सुरक्षित न रह सका।

6. मुसलमानों का नैतिक पतन-मुस्लिम सैनिक, अमीर तथा अधिकारी आलसी तथा विलासप्रिय हो गए थे। इस कारण उनका शारीरिक बल शिथिल पड़ गया।

7. आर्थिक दुर्बलता-तुग़लक सुल्तानों के विवेकहीन कार्यों से शाही खज़ाना खाली हो गया। धन के बिना सल्तनत साम्राज्य का स्थिर रहना असम्भव था।

8. तैमूर का आक्रमण-तैमूर ने 1398 ई० में भारत पर आक्रमण कर दिया। उसके आक्रमण से दिल्ली साम्राज्य को जनधन की भारी हानि उठानी पड़ी। इसके अतिरिक्त उसने सल्तनत राज्य की राजनीतिक शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया।

सच तो यह है कि कई बातों के कारण दिल्ली सल्तनत का पतन हुआ। अन्ततः पानीपत की पहली लड़ाई के कारण तो इसका अस्तित्व ही मिट गया। किसी ने ठीक ही कहा है, “पानीपत का युद्ध दिल्ली के अफ़गानों के लिए कब्र बन गया।”

प्रश्न 9.
दिल्ली के सुल्तानों के अधीन मध्यकालीन भारत में लोगों की (क) सामाजिक तथा (ख) आर्थिक अवस्था का वर्णन करो।
उत्तर-
1206 ई० से 1526 ई० तक भारत सुल्तानों के अधीन रहा। यह काल इतिहास में सल्तनत काल के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस समय के भारत की सामाजिक तथा आर्थिक दशा का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है :

(क) सामाजिक दशा-
सल्तनत काल में भारतीय समाज मुख्य रूप से दो भागों में बंटा हुआ था-मुस्लिम समाज और हिन्दू समाज।
(क) मुस्लिम समाज-यह समाज शासक वर्ग से सम्बन्धित था। अतः मुसलमानों को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। शासन के सभी उच्च पदों पर मुसलमानों को ही नियुक्त किया जाता था, परन्तु केवल जन्मजात मुसलमान ही उच्च पद के योग्य समझे जाते थे। मुस्लिम समाज में स्त्रियों की शिक्षा तथा सम्मान का ध्यान रखा जाता था। परन्तु पर्दा प्रथा उनके विकास के मार्ग में बाधा बनी हुई थी। बहु-पत्नी प्रथा भी प्रचलित थी। तलाक की प्रथा आम थी। स्त्रियां राजनैतिक कार्यों में भाग नहीं लेती थीं। केवल रजिया सुल्तान ही इसका अपवाद है। मुसलमानों में दास प्रथा काफ़ी ज़ोरों पर थी। सरदारों तथा शासकों को दास रखने का बड़ा चाव था। फिरोज़ तुगलक के पास एक लाख अस्सी हज़ार दास थे। दास-प्रथा के कारण उद्योगों की उन्नति हुई जिसके फलस्वरूप कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश तथा बलबन जैसे सुल्तान इतिहास में उभरे।

(ख) हिन्दू समाज-हिन्दू समाज मुसलमानों से पराजित हो चुका था। उसकी बड़ी शोचनीय थी। प्रत्येक हिन्दू को शंका की दृष्टि से देखा जाता था। उन्हें उच्च सरकारी पद नहीं मिलते थे, उन्हें काफिर समझा जाता था। हिन्दू कृषकों से अधिक कर लिया जाता था। इस युग में हिन्दू नारी की दशा दयनीय हो चुकी थी। राजपूत शासक भी स्त्री को विलास की सामग्री मानने लगे थे। समाज में कई कुप्रथाएँ थीं। जैसे-सती प्रथा, बाल विवाह, बहु-विवाह तथा पर्दा प्रथा। इसके कारण सम्पूर्ण हिन्दू समाज की दशा शोचनीय हो चुकी थी।

(ख) आर्थिक दशा-

सल्तनत काल में मुस्लिम जनता समृद्ध थी। उन्हें नाम मात्र के कर देने पड़ते थे। इसके विरपीत हिन्दू जनता की आर्थिक दशा बड़ी दयनीय थी। संक्षेप में, सल्तनत युग में लोगों की आर्थिक दशा का विवरण इस प्रकार है-

  • कृषि-उन दिनों लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। सिंचाई कुओं तथा नहरों द्वारा की जाती थी। हिन्दू किसानों का जीवन सुखी नहीं था।
  • उद्योग-उद्योग विकसित थे। उन दिनों के उद्योगों में कपड़ा, चीनी, धातु की वस्तुएँ तैयार करना तथा कागज़ बनाना प्रम्ख थे।
  • व्यापार-उन दिनों में विदेशी व्यापार जोरों पर था। भारत का मलाया, चीन, मध्य एशिया, अफ़गानिस्तान तथा ईरान के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित था।
  • रहन-सहन का स्तर-धनी और निर्धन व्यक्तियों के रहन-सहन के स्तर में बड़ा अन्तर था। धनी और अधिकारी लोग बड़े ठाट-बाठ का जीवन व्यतीत करते थे। वे करों से भी मुक्त थे। इसके विपरीत निर्धन वर्ग की दशा बड़ी शोचनीय थी।
    सच तो यह है कि सल्तनत काल में मुसलमानों की दशा अच्छी और हिन्दुओं की दशा शोचनीय थी। दोनों के जीवन में वही अन्तर था जो शासक तथा शासित वर्ग में होता है।

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प्रश्न 10.
सुल्तान काल में कला एवं साहित्य की प्रगति का वर्णन करो।
उत्तर-
कला-दिल्ली के सुल्तानों के समय भारत में ललित कलाओं का बहुत विकास हुआ। सूफी सन्तों, भक्तों और राजदरबारियों के कारण संगीत में उन्नति हुई। कहा जाता है कि सुल्तान सिकन्दर लोधी के समय में अनेक प्रसिद्ध गायक हुए। इस काल में चित्र कला अधिक उन्नत नहीं थी। फिर भी ग्वालियर के मान मन्दिर तथा एलौरा के मन्दिरों की दीवारों पर चित्रकला के कुछ नमूने दिखाई देते हैं।

इस काल में अनेक इमारतें बनीं। इसमें मन्दिर-मस्जिद तथा दुर्ग उल्लेखनीय हैं। कुछ स्थानों पर ‘विजय स्तम्भ’ भी बनाए गए। इस काल में हिन्दू मन्दिरों की तीन प्रमुख शैलियाँ प्रचलित थीं। उत्तर भारत में बने मन्दिरों में शिखर एक बड़े स्तम्भ के रूप में बनाया जाता था और वह वह ऊपर की ओर तंग होता जाता था। इस शैली के मन्दिर भुवनेश्वर, खजुराहो, ग्वालियर तथा गुजरात में देखे जा सकते हैं। दक्षिण भारत के मन्दिरों में शिखर का निर्माण अनेक सीढ़ियों के रूप में किया जाता था। द्राविड़ शैली के मन्दिर तंजौर, मदुरा और श्रीरंगम् आदि स्थानों पर विद्यमान हैं।

इस काल में बने प्रमुख दुर्ग ग्वालियर, रणथम्भौर, कालिंजर, चित्तौड़, देवगिरि तथा वारंगल में हैं। ये दुर्ग काफ़ी मज़बूत हैं। इस काल में अनेक मस्जिदें भी बनीं। इस समय की इमारतों में कुतुबमीनार प्रमुख हैं। इसे कुतुबुद्दीन ने बनवाना आरम्भ किया था। परन्तु इसको इल्तुतमिश ने पूरा किया। अलाऊद्दीन खिलजी भी एक महान् भवन निर्माता था। उसने ‘अलाई दरवाज़ा’ बनवाया जो बहुत ही सुन्दर तथा आकर्षक है।

ग्यासुद्दीन तुग़लक ने दिल्ली में तुगलकाबाद की नींव रखी। इस नगर के खण्डहर आज भी देखे जा सकते हैं। फिरोज़ तुग़लक भवन बनवाने में रुचि रखता था। उसने अनेक नगरों, मस्जिदों, मकबरों आदि का निर्माण करवाया। फतेहाबाद, हिसार फिरोजा और जौनपुर नगर उसी के काल में बनाए गए।

साहित्य-सल्तनत युग में साहित्य पर भी इस्लाम का काफ़ी प्रभाव पड़ा। बहुत-से हिन्दुओं ने फारसी में ग्रन्थ लिखे और काफ़ी मुसलमानों ने हिन्दी साहित्य में अपना योगदान दिया। इस काल की साहित्यिक कृतियों का वर्णन इस प्रकार है-

  • अलबेरूनी द्वारा रचित ‘तहकीके हिन्द’ इस काल की कृति है। इसमें ग्यारहवीं शताब्दी के भारत का चित्र प्रस्तुत किया गया है।
  • गुलाम वंश का इतिहास हमें सिराज के ‘तबकाते नासरी’ से पता चलता है।
  • बर्नी की तारीख-ए-फिरोजशाही इस काल की शोभा है। ‘फरिश्ता’ भी इसी युग का प्रसिद्ध इतिहासकार था।
  • अमीर खुसरो ने फारसी के अतिरिक्त हिन्दी साहित्य में भी योगदान दिया। उसने विभिन्न विषयों पर फारसी में पुस्तकें लिखीं।
  • सिकन्दर लोधी ने आयुर्वेद का फारसी में अनुवाद करवाया।
  • इसके अतिरिक्त कल्हण की ‘राजतरंगिणी’, जयदेव का ‘गीत गोविन्द’, कबीर की ‘साखी’ तथा मीरा के ‘गीत’ इस काल की उत्तम साहित्यिक रचनाएँ हैं।
    सच तो यह है कि कला तथा साहित्य की दृष्टि से सल्तनत युग बड़ा ही भाग्यशाली था।