PSEB 11th Class Practical Geography Chapter 1 नक्शे

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Practical Geography Chapter 1 नक्शे.

PSEB 11th Class Practical Geography Chapter 1 नक्शे

प्रश्न 1.
नक्शे से क्या अभिप्राय है ? इसकी विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर-
नक्शा (Map)-धरती या उसके किसी भाग के ऊपर से दिखाई देने वाले स्वरूप को समतल कागज़ पर चित्रण को नक्शा कहते हैं (A map is the conventional representation of the earth or a part of it as seen from the above.)। किसी भी क्षेत्र के लक्षणों को स्पष्ट करने के लिए नक्शे बनाए जाते हैं । नक्शा या मानचित्र (Map) शब्द लातीनी भाषा के शब्द मप्पा (Mappa) से लिया गया है। नक्शे की विशेषताएँ-

  1. नक्शे समतल कागज़ पर बनाए जाते हैं, जिनमें लंबाई और चौड़ाई भी दिखाई जा सकती है।
  2. नक्शे एक निश्चित पैमाने पर ही बनाए जाते हैं।
  3. प्राकृतिक और सांस्कृतिक लक्षणों को रूढ़ चिन्हों द्वारा दिखाया जाता है। नक्शे अक्षांश और देशांतर रेखाओं की मदद से बनाए जाते हैं।

प्रश्न 2.
नक्शे के आवश्यक तत्त्व बताएँ।
उत्तर-
नक्शे के आवश्यक तत्त्व-किसी भाग का ठीक वर्णन देने के लिए नक्शों पर नीचे लिखे तत्त्व ज़रूर दिखाए जाते हैं

  1. नक्शे का शीर्षक
  2. पैमाना
  3. दिशा
  4. संकेत
  5. अक्षांश और देशांतर रेखाएँ।

PSEB 11th Class Geography Practical Chapter 1 नक्शे

प्रश्न 3.
मानचित्र कला की परिभाषा दें।
उत्तर-
मानचित्र कला-नक्शा बनाने की कला को मानचित्र कला या नक्शाकशी की कला (Cartography) कहा जाता है। इसमें धरातलीय नक्शे, हवाई फोटो नक्शे आदि बनाए जाते हैं।

प्रश्न 4.
चार्ट (Chart) और प्लान (Plan) में अंतर बताएँ।
उत्तर-
चार्ट (Chart) और (Plan)—चार्ट शब्द फ्रांसीसी भाषा के शब्द कार्टे (Carte) से लिया गया है। चार्ट शब्द का अर्थ नक्शा होता है। वास्तव में चार्ट अलग-अलग आंकड़ों का रेखाचित्र होता है। इन चार्टों पर समुद्री जहाज़ों के मार्ग भी दिखाए जाते हैं।
‘प्लान’ शब्द भवनों के नक्शों के लिए प्रयोग होता है। इसका पैमाना 6″ : 1 मील से बड़ा होता है। इससे किसी जायदाद या भूमि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है।

PSEB 11th Class Geography Practical Chapter 1 नक्शे

प्रश्न 5.
नक्शों की क्या ज़रूरत होती है ?
उत्तर-
नक्शों की ज़रूरत-पृथ्वी एक गोला है। यह केवल ग्लोब के साथ ही सही रूप में दिखाई जा सकती है। ग्लोब पृथ्वी का एक छोटा-सा प्रतिरूप या नमूना है। परंतु कई बार ग्लोब के प्रयोग में मुश्किलें आती हैं, जिसके लिए नक्शों का प्रयोग ज़रूरी हो जाता है।

  1. ग्लोब पर पूरी पृथ्वी का एक समय में अध्ययन नहीं हो सकता।
  2. ग्लोब पर किसी क्षेत्र को विस्तारपूर्वक दिखाया नहीं जा सकता।
  3. ग्लोब पर दो स्थानों की दूरी मापनी मुश्किल होती है।
  4. ग्लोब पर दो क्षेत्रों का तुलनात्मक अध्ययन संभव नहीं है।
    यही कारण है कि नक्शों के प्रयोग को आवश्यक समझा जाता है। पृथ्वी या उसके किसी भाग को एक समतल कागज़ पर दिखाया जा सकता है।

प्रश्न 6.
नक्शों के महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर-
नक्शों का महत्त्व-नक्शे भौगोलिक अध्ययन के लिए ज़रूरी उपकरण (Tools) हैं। आज के युग में नक्शों . का महत्त्व बहुत बढ़ गया है। वास्तव में नक्शे ही भूगोल की कुंजी होते हैं। ये भूगोल के विद्यार्थियों के लिए एक संकेत लिपि (Short Hand) का काम करते हैं। नक्शों का महत्त्व कई क्षेत्रों में बढ़ता जा रहा है।

  1. भूगोल-प्रयोगात्मक भूगोल के लिए नक्शे आवश्यक होते हैं। इनके बिना भूगोल का विद्यार्थी एक ऐसे सिपाही के समान होता है, जिसके पास हथियार नहीं हों।
  2. युद्धों में प्रयोग-आज के युग में युद्ध नक्शों के सहारे ही लड़े जाते हैं। दूसरे विश्वयुद्ध में कई करोड़ नक्शे तैयार किए गए थे। हिटलर के शब्दों में “Give me a detailed map of a country and I shall conquer it.”
  3. यात्रियों के लिए-नक्शे यात्रियों और पर्यटकों के लिए ज़रूरी होते हैं। ये मार्ग-प्रदर्शन में सहायता करते हैं।
  4. प्रबंधकों के लिए-नक्शों के द्वारा ही अलग-अलग प्रांतों का राज्य-प्रबंध चलाया जाता है।
  5. आवागमन के साधनों के लिए-नक्शे रेल, सड़क, समुद्री और हवाई मार्गों की जानकारी के लिए प्रयोग किए जाते हैं।
  6. नक्शे विद्यार्थियों, अध्यापकों, उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों, इतिहासकारों और इंजीनियरों के लिए लाभदायक होते हैं।

PSEB 11th Class Geography Practical Chapter 1 नक्शे

प्रश्न 7.
नक्शों का वर्गीकरण करें।
उत्तर-
नक्शों का वर्गीकरण-नक्शाकशी की कला बड़ी प्राचीन है। आज से लगभग चार हजार वर्ष पहले भी नक्शे बनाए जाते थे। प्राचीन समय में भारतीय, यूनानी, रोमन आदि जातियों को इस कला की जानकारी थी। नक्शे कई प्रकार के होते हैं। इनका वर्गीकरण दो प्रकार से किया जा सकता है-

  1. पैमाने के आधार पर (According to Scale)
  2. उद्देश्य के आधार पर (According to Purpose)

1. पैमाने के आधार पर नक्शे (According to Scale)-
पैमाने के आधार पर नक्शे दो प्रकार के होते हैं1. छोटे पैमाने के नक्शे (Small Scale Maps)—ये नक्शे छोटे पैमाने पर बनाए जाते हैं। इनमें पैमाना – 1 इंच : 16 मील से छोटा होता है। संसार के नक्शे, एटलस नक्शे और दीवारी नक्शे इस प्रकार के हो सकते हैं।
2. बड़े पैमाने के नक्शे (Large Scale Maps)—इन नक्शों पर भवनों और संपत्ति का अधिक विस्तृत वर्णन दिखाया जाता है। यह आमतौर पर 6″ : 1 मील पैमाने पर होता है। इस प्रकार पैमाने के आधार पर चार प्रकार के नक्शे होते हैं-

  • सीमावर्ती नक्शे (Cadastral Maps) ये बड़े पैमाने के नक्शे होते हैं, जिनमें जायदाद संबंधी विषय दिखाए जाते हैं। इनका प्रयोग पटवारी और नगरपालिकाएँ करती हैं।
  • स्थल-आकृतिक नक्शे (Topographical Maps)-1″ : 1 मील के पैमाने से बने नक्शे किसी क्षेत्र के प्राकृतिक और सांस्कृतिक लक्षणों को दिखाते हैं। जिस प्रकार सर्वे विभाग के नक्शे।
  • दीवारी नक्शे (Wall Maps)-शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग किए जाने वाले नक्शे छोटे पैमाने के होते हैं।
  • एटलस नक्शे (Atlas Maps)-ये छोटे पैमाने के नक्शे होते हैं। कई प्रकार के नक्शों को पुस्तकीय आकार देकर मान-चित्रावली तैयार की जाती है।

2. उद्देश्य के आधार पर नक्शे (Maps According to Purpose)-
उद्देश्य को आधार मानकर नीचे लिखे प्रकार के भौतिक और सांस्कृतिक नक्शे बनाए जाते हैं-

  • धरातलीय नक्शे (Relief Maps)—इसमें किसी क्षेत्र के धरातल, जल-प्रवाह, मिट्टी आदि का विभाजन दिखाया जाता है।
  • भू-गर्भीय नक्शे (Geological Maps)-इनमें अलग-अलग प्रकार की चट्टानों आदि का विभाजन दिखाया जाता है।
  • मौसमी नक्शे (Weather Maps)—वायुमंडल की दशाओं को दिखाने वाले नक्शों को मौसमी नक्शे कहा जाता है। भारत में ये नक्शे पुणे (Pune) में तैयार किए जाते हैं।
  • वनस्पति नक्शे (Vegetation Maps)-इन नक्शों में भूमि के प्रयोग और विभाजन दिखाए जाते हैं।
  • भूमि-प्रयोग के नक्शे (Land use Maps)-इन नक्शों में भूमि के प्रयोग और विभाजन दिखाए जाते हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय नक्शे (International Maps)—ये नक्शे 1/1000000 के पैमाने पर बनाए जाते हैं।
  • राजनीतिक नक्शे (Political Maps)—इन नक्शों पर राजनीतिक सीमाएँ, देश, नगर और राजधानियाँ दिखाई जाती हैं।
  • आबादी के नक्शे (Population Maps)—इन नक्शों पर आबादी का विभाजन और घनत्व दिखाए जाते हैं।
  • परिवहन नक्शे (Transport Maps)-इन नक्शों पर सड़कों, रेलों, समुद्री और हवाई मार्गों के नक्शे दिखाए जाते हैं।
  • आर्थिक नक्शे (Economic Maps)—इन नक्शों पर कृषि, पशु-पालन उद्योग, व्यापार आदि कारकों का वर्णन किया जाता है।
  • भाषा संबंधी नक्शे (Linguistic Maps)—अलग-अलग प्रदेशों में बोली जाने वाली भाषाओं का विभाजन इन नक्शों पर दिखाया जाता है।
    मानव-जाति के नक्शे (Ethnographic Maps)—इन नक्शों पर अलग-अलग प्रदेशों में रहने वाली मानव-जातियों का विभाजन दिखाया जाता है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 10 मछली पालन

Punjab State Board PSEB 11th Class Agriculture Book Solutions Chapter 10 मछली पालन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Agriculture Chapter 10 मछली पालन

PSEB 11th Class Agriculture Guide मछली पालन Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
दो विदेशी किस्म की मछलियों के नाम बताओ।
उत्तर-
कॉमन क्रॉप, सिल्वर क्रॉप विदेशी जातियां हैं।

प्रश्न 2.
मछलियां पालने वाला जौहड़ कितना गहरा होना चाहिए ?
उत्तर-
इसकी गहराई 6-7 फुट होनी चाहिए।

प्रश्न 3.
मछली पालन के उपयोग किए जाने वाले पानी की पी०एच० कितनी होनी चाहिए ?
उत्तर-
इसकी पी०एच० अंक 7-9 के मध्य होना चाहिए।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 10 मछली पालन

प्रश्न 4.
मछली पालन के लिए तैयार जौहड़ में कौन-कौन सी रासायनिक खादों का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर-
जौहड़ के लिए यूरिया खाद तथा सुपरफास्फेट का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 5.
प्रति एकड़ में कितने बच्च तालाब में छोड़े जाते हैं ?
उत्तर-
प्रति एकड़ में बच्च की संख्या 4000 होनी चाहिए।

प्रश्न 6.
मछलियों का बच्च कहां से प्राप्त होता है ?
उत्तर-
मछलियों का बच्च गुरु अंगद देव वैटरनरी तथा एनीमल साइंसज विश्वविद्यालय, लुधियाना के मछली कॉलेज या पंजाब सरकार के मछली बच्च फार्म से प्राप्त किए जा सकते हैं।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 10 मछली पालन

प्रश्न 7.
दो भारतीय मछलियों के नाम लिखो।
उत्तर-
कतला, रोहू।

प्रश्न 8.
मछलियों के छप्पड़ वाली जमा की मिट्टी किस तरह की होनी चाहिए ?
उत्तर-
चिकनी या चिकनी मैरा।

प्रश्न 9.
व्यापारिक स्तर या मछली पालन के लिए छप्पड़ का क्या आकार होना चाहिए ?
उत्तर-
क्षेत्रफल 1 से 5 एकड़ तथा गहराई 6-7 फुट होनी चाहिए।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 10 मछली पालन

प्रश्न 10.
किसी भी मांसाहारी मछली का नाम लिखो।
उत्तर-
सिंघाड़ा, मल्ली।

(ख) एक-दो वाक्यों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
मछली पालन के लिए पाली जाने वाली भारतीय और विदेशी मछलियों के नाम बताओ।
उत्तर-
भारतीय मछलियां-कतला, रोहू तथा मरीगल। विदेशी मछलियां-कॉमन क्रॉप, सिल्वर क्रॉप, ग्लास क्रॉप।।

प्रश्न 2.
मछली पालन के लिए तैयार किए जाने वाले जौहड़ के डिज़ाइन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
जौहड़ का डिज़ाइन तथा खुदाई-व्यापारिक स्तर पर मछलियां पालने के लिए जौहड़ का क्षेत्रफल 1 से 5 एकड़ तथा गहराई 6-7 फुट होनी चाहिए। जौहड़ का तल समतल तथा किनारे ढलानदार होने चाहिएं। पानी डालने तथा निकालने का पूरा प्रबन्ध होना चाहिए। इसके लिए पाइपों पर वाल्व लगे होने चाहिएं। खुदाई फरवरी के मास में करनी चाहिए ताकि मार्च-अप्रैल में मछलियों के बच्चे तालाब में छोड़े जा सकें। एक एकड़ के तालाब में बच्चे रखने के लिए एक कनाल (500 वर्ग मीटर) का नर्सरी तालाब अवश्य बनाओ जिसमें बच्चे रखे जा सकें। कम भूमि पर भी छोटे तालाब आदि बनाए जा सकते हैं जहां मछलियां पाली जा सकती हैं।

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प्रश्न 3.
मछली पालन के लिए उपयोग किए जाने वाले पानी के स्तर के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
पानी में घुली हुई ऑक्सीजन तथा इसका तेजाबीपन जोकि पी०एच० अंक से पता चलता है बहुत महत्त्वपूर्ण है। मछलियों के जीवित रहने तथा वृद्धि विकास के लिए ये बातें बहुत प्रभाव डालती हैं। पी०एच० अंक 7-9 के मध्य होना चाहिए। 7 से कम पी०एच० अंक बढ़ाने के लिए बारीक पिसा हुआ चूना (80-100 किलो प्रति एकड़) पानी में घोल कर ठण्डा करने के पश्चात् तालाब में छिटक देना चाहिए।

प्रश्न 4.
मछली पालन के व्यवसाय के लिए भिन्न-भिन्न किस्म की मछलियों के बच्च में क्या अनुपात होता है ?
उत्तर-
विभिन्न प्रकार की मछलियों के बच्चों का अनुपात निम्नलिखित अनुसार है(i) कतला 20%, रोहू 30%, ग्रास क्रॉप 10%, सिल्वर क्रॉप 10%, मरीगल 10%, कॉमन क्रॉप 20%। (ii) कतला 25%, कॉमन क्रॉप 20%, मरीगल 20%, रोहू 35%।

प्रश्न 5.
मछली तालाब में खरपतवार की समाप्ति के तरीके बताओ।
उत्तर-
पुराने तालाबों में खरपतवार न उग सकें। इसके लिए पानी का स्तर 5-6 फुट होना चाहिए। खरपतवार को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित ढंग हैं-

  • भौतिक साधन-तालाब का पानी निकाल कर इसे खाली करके खरपतवार को कंटीली तार से निकाला जा सकता है।
  • जैविक साधन-ग्रास कार्प मछलियां कई खरपतवारों (स्पाईरोडैला, हाईड्रिला, वुल्फीया, वेलीसनेरिया, लेमना) को खा जाती हैं। सिल्वर कार्प मछलियां, काई, पुष्पपुंज (एल्गल ब्लूमज़) को कंट्रोल करने में सहायक हैं।

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प्रश्न 6.
जौहड़ में नहरी पानी के उपयोग के समय कौन-सी सावधानी ध्यान रखनी चाहिए ?
उत्तर-
नहरी पानी का प्रयोग करते समय खाल के मुंह पर लोहे की बारीक जाली लगानी चाहिए। ऐसा मांसाहारी तथा नदीन मछली को तालाब में जाने से रोकने के लिए करना आवश्यक है।

प्रश्न 7.
जौहड़ में मछली के दुश्मनों के बारे में बताओ।
उत्तर-
मांसाहारी मछलियां (मल्ली, सिंगाड़ा), नदीन मछलियां (शीशा, पुट्ठी कंघी), मेंढक, सांप आदि मछली के दुश्मन हैं।

प्रश्न 8.
मछलियों को खुराक कैसे दी जाती है ?
उत्तर-
मछलियों को 25% प्रोटीन वाली खुराक देनी चाहिए। बारीक पिसी हुई खुराक को 3-4 घण्टे तक भिगो कर रखना चाहिए। फिर इस भोजन के पेड़े बनाकर पानी के तल से 2-3 फुट नीचे रखी ट्रे अथवा टोकरियों अथवा छेदों वाले प्लास्टिक के थैलों में डालकर मछलियों को खाने के लिए देना चाहिए।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 10 मछली पालन

प्रश्न 9.
मछलियों को रोगों से बचाने के उपाय बताओ।
उत्तर-
मछलियों को बीमारियों से बचाने के लिए पूंग को लाल दवाई के घोल (100 ग्राम प्रति लीटर) में डुबो देने के पश्चात् तालाब में छोड़ो। लगभग प्रत्येक 15 दिन के अन्तर के पश्चात् मछलियों के स्वास्थ्य की जांच करनी चाहिए। बीमार मछलियों के उपचार के लिए सिफ़ारिश किये गये ढंगों का प्रयोग करो अथवा विशेषज्ञों के साथ सम्पर्क करो।

प्रश्न 10.
मछली पालन बारे प्रशिक्षण कहां से लिया जा सकता है ?
उत्तर-
मछली पालन बारे में प्रशिक्षण जिला मछली पालन अफ़सर, कृषि विज्ञान केन्द्र या फिर गुरु अंगद देव वैटनरी तथा एनीमल साईंसज विश्वविद्यालय लुधियाना से प्राप्त किया जा सकता है।

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(ग) पांच-छः वाक्यों में उत्तर दें-

प्रश्न 1.
मछली पालन के लिए जौहड़ बनाने के लिए जगह का चुनाव और उनके डिजाइन व खुदाई के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
जौहड़ बनाने के लिए स्थान का चुनाव-चिकनी अथवा चिकनी मैरा मिट्टी वाली भूमि जौहड़ बनाने के लिए ठीक रहती है क्योंकि इसमें पानी सम्भालने की शक्ति अधिक होती है। पानी खड़ा करने के लिए हल्की (रेतीली)भूमि में कद्दू किया जा सकता है। पानी का साधन अथवा स्रोत भी निकट ही होना चाहिए ताकि जौहड़ को सरलता से भरा जा सके तथा समय-समय पर सूखे के कारण जौहड़ में पानी की कमी को पूरा किया जा सके। इसके लिए नहरी पानी का प्रयोग भी किया जा सकता है। इसके लिए नाली के मुंह पर लोहे की बारीक जाली लगा देनी चाहिए ताकि मांसाहारी तथा खरपतवार आदि मछलियां नहरी पानी द्वारा जौहड़ में न मिल जाएं।

जौहड़ का डिजाइन तथा खुदाई-व्यापारिक स्तर पर मछलियां पालने के लिए जौहड़ का क्षेत्रफल 1 से 5 एकड़ तथा गहराई 6-7 फुट होनी चाहिए। जौहड़ का तल समतल तथा किनारे ढलानदार होने चाहिएं। पानी डालने तथा निकालने का पूरा प्रबन्ध होना चाहिए। इसके लिए पाइपों पर वाल्व लगे होने चाहिएं। खुदाई फरवरी के महीने में करनी चाहिए ताकि मार्च-अप्रैल में मछलियों का पूंग तालाब में छोड़ा जा सके। एक एकड़ के जौहड़ में पूंग रखने के लिए एक कनाल (500 वर्ग मीटर) का नर्सरी जौहड़ अवश्य बनवाओ जिसमें पूंग रखा जा सके।

प्रश्न 2.
पुराने जौहड़ों को मछली पालन के योग्य कैसे बनाया जाए ?
उत्तर-
पुराने जौहड़ में नदीन न पनप सके इसके लिए पानी का स्तर 5-6 फुट होना चाहिए। नदीनों को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित ढंग हैं –

  • भौतिक विधि-जौहड़ का पानी निकाल कर इसे खाली करके नदीनों को कंटीली तार से निकाला जा सकता है।
  • जैविक विधि-ग्रास कार्प मछलियां कई खरपतवारों (स्पाइरो डैला, हाइड्रिला, वुल्फीया, वेलिसनेरिया, लैमना) को खा जाती हैं। सिल्वर कार्प मछलियां काई, पुष्पपुंज (एल्गल ब्लूमज) को कंट्रोल करने में सहायक हैं।

पुराने जौहड़ों में से मछली के शत्रुओं की समाप्ति-पुराने तालाबों में पाई जाने वाली मांसाहारी मछलियां डौला, सिंगाड़ा, मल्ली तथा नदीन मछलियां। शीशा, पुट्ठी कंघी, मेंढक तथा सांपों को बार-बार जाल लगाकर तालाब में से निकालते रहना चाहिए। सांपों को बड़ी सावधानी से मार दो।

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प्रश्न 3.
पुराने जौहड़ों में से खरपतवार की समाप्ति कैसे करेंगे ?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दो।

प्रश्न 4.
मछली पालन के समय जौहड़ों में कौन-सी खादें डाली जाती हैं ?
उत्तर-
नये खोदे गये तालाब में मछली का प्राकृतिक भोजन (प्लैंकटन) की लगातार उपज होती रहे। इसके लिए खादों का प्रयोग किया जा सकता है। तालाब में पूंग छोड़ने से 15 दिन पहले खाद डालनी चाहिए। पुराने तालाब में खाद डालने की दर उसके पानी की क्वालिटी तथा प्लैंकटन की उपज पर निर्भर करती है।

दूसरी किश्त पहली किश्त के 15 दिन पश्चात् तथा रासायनिक खाद की दूसरी किश्त एक मास के पश्चात् डालो।
प्लैंकटन की लगातार पैदावार के लिए गोबर की खाद, मुर्गियों की खाद, बायोगैस सल्लरी, यूरिया, सुपरफॉस्फेट आदि खादों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 5.
मछली पालन व्यवसाय के विकास में मछली पालन विभाग और वेटरनरी यूनिवर्सिटी की क्या भूमिका है ?
उत्तर-
मछली पालन का व्यवसाय प्रारम्भ करने से पहले मछली पालन विभाग, पंजाब से प्रशिक्षण प्राप्त कर लेना चाहिए। इस विभाग की ओर से प्रत्येक जिले में प्रति मास पांच दिन की ट्रेनिंग दी जाती है।

प्रशिक्षण प्राप्त करने के पश्चात् यह विभाग मछली पालन के व्यवसाय के लिए तालाब के निर्माण तथा पुराने तालाब को ठीक करने अथवा सुधार के लिए सहायता भी देता है।
मछली पालन का प्रशिक्षण वेटरनरी यूनिवर्सिटी से प्राप्त किया जा सकता है।

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Agriculture Guide for Class 11 PSEB मछली पालन Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मछली कितने ग्राम की होने पर बेचने योग्य हो जाती है ?
उत्तर-
500 ग्राम।

प्रश्न 2.
एक खरपतवार मछली का नाम बताओ।
उत्तर-
पुट्ठी कंघी।

प्रश्न 3.
मछली का प्राकृतिक भोजन क्या है ?
उत्तर-
प्लैंकटन।

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प्रश्न 4.
मछलियां पालने वाला छप्पड़ कितना गहरा होना चाहिए ?
उत्तर-
6-7 फुट।

प्रश्न 5.
डौला——–किस्म की मछली है।
उत्तर-
मांसाहारी।

प्रश्न 6.
जौहड़ बनाने के लिए कैसी मिट्टी वाली भूमि का चुनाव करना चाहिए ?
उत्तर-
उसके लिए चिकनी अथवा चिकनी मैरा मिट्टी वाली भूमि चुनो।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 10 मछली पालन

प्रश्न 7.
चिकनी अथवा चिकनी मैरा मिट्टी वाली भूमि ही क्यों जौहड़ के लिए चुनी जाती है ?
उत्तर-
क्योंकि ऐसी मिट्टी में पानी सम्भालने की शक्ति अधिक होती है।

प्रश्न 8.
जौहड़ की खुदाई किस मास में करनी चाहिए ?
उत्तर-
जौहड़ की खुदाई फरवरी मास में करनी चाहिए।

प्रश्न 9.
खरपतवार को कौन-सी मछलियां खा लेती हैं ?
उत्तर-
ग्रास क्रॉप तथा सिल्वर क्रॉप।

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प्रश्न 10.
खरपतवार मछलियों के नाम बताओ।
उत्तर-
शीशा तथा पुट्ठी कंघी।

प्रश्न 11.
मांसाहारी मछलियों के नाम बताओ।
उत्तर-
सिंघाड़ा, मल्ली, डौला।।

प्रश्न 12.
यदि पानी का पी० एच० अंक 7 से कम हो जाए तो क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
बारीक पिसा हुआ चूना पानी में घोल कर ठण्डा करके तालाब में 80-100 किलो प्रति एकड़ की दर से छिड़क दो।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न-
मछलियां पकड़ने तथा पूंग छोड़ने के बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
जब मछलियां 500 ग्राम की हो जाएं तो वह बेचने योग्य हो जाती हैं। मछलियां जिस प्रकार की निकाली जाएं उतना ही उस प्रकार का मछलियों का पूंग नर्सरी तालाब में से निकाल कर तालाब में छोड़ देना चाहिए।

मछली पालन PSEB 11th Class Agriculture Notes

  • वैज्ञानिक विधि से मछलियां पालने से वर्ष में लाभ कृषि से भी अधिक हो जाता
  • मछलियों की भारतीय किस्में हैं-कतला, रोहू तथा मरीगल ।
  • मछलियों की विदेशी किस्में हैं-कॉमन क्रॉप, सिल्वर क्रॉप तथा ग्रास क्रॉप।
  • जौहड़ (छप्पड़) बनाने के लिए चिकनी अथवा चिकनी मैरा मिट्टी वाली भूमि का प्रयोग करना चाहिए।
  • जौहड़ (छप्पड़) 1-5 एकड़ क्षेत्रफल के तथा 6-7 फुट गहरा होना चाहिए।
  • पानी की गहराई 5-6 फुट होनी चाहिए।
  • पानी का पी०एच० अंक 7-9 के मध्य होना चाहिए। यदि 7 से कम हो तो चूने के प्रयोग से बढ़ाया जा सकता है।
  • जौहड़ में 1-2 इंच आकार के 4000 प्रति एकड़ के हिसाब से डालो।
  • बच्चे का अनुपात इस प्रकार हो सकता है
    (i) कतला 20%, कॉमन क्रॉप 20%, मरीगल 10%, ग्रास क्रॉप 10%, रोहू 30%, सिल्वर क्रॉप 10% ।
    (ii) कतला 25%, मरीगल 20%, रोहू 35%, कॉमन क्रॉप 20% ।
  • मछलियों को 25% प्रोटीन वाला सहायक भोजन दो।
  • 500 ग्राम की मछली को बेचा जा सकता है।
  • विभिन्न संस्थाओं से मछली पालन के व्यवसाय के लिए प्रशिक्षण लेना चाहिए।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 महात्मा गान्धी के राजनीतिक विचार

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 7 महात्मा गान्धी के राजनीतिक विचार Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 7 महात्मा गान्धी के राजनीतिक विचार

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
गान्धी जी के राजनीतिक विचारों की व्याख्या करो।
(Explain the Political ideas of Gandhi Ji.)
अथवा
महात्मा गान्धी जी के राजनीतिक विचारों का विस्तार सहित वर्णन करो।
(Describe Political ideas of Mahatama Gandhi Ji in detail.)
अथवा
महात्मा गान्धी के मुख्य राजनीतिक विचारों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। (Explain briefly the main Political Ideas of Mahatma Gandhi.)
उत्तर-
गान्धी जी वह महान् आत्मा थे जिन्होंने भारत की आत्मा को जगाया। उन्होंने अपने उच्च सिद्धान्तों, उद्देश्यों और आदर्श जीवन द्वारा राजनीतिक जीवन को नया मार्ग दिखाया। गान्धी जी के उन विचारों को, जोकि वे समय-समय पर राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक ढांचे के बारे में प्रकट करते रहे, उनको इकट्ठा करके लोगों ने गान्धीवाद का नाम दिया। गान्धीवाद सिद्धान्तों, मतों, नियमों तथा आदर्शों का समूह नहीं, बल्कि यह एक जीवन युक्ति है। हम इसे एक जीवन मार्ग भी कह सकते हैं।
गान्धी जी के राजनीतिक विचार इस प्रकार हैं-

1. राजनीति का अध्यात्मीकरण (Spiritualisation of Politics)-गोपाल कृष्ण गोखले के समानं गान्धी जी राजनीति का अध्यात्मीकरण करना चाहते थे। उन्होंने राजनीति के प्रचलित मूल्यों को अस्वीकार किया और राजनीति में शुद्ध धार्मिक तथा अध्यात्मिक मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए पूरा प्रयास किया। गान्धी जी राजनीति को धर्म की आधारशिला पर खड़ा करना चाहते थे और उन्होंने घोषणा की कि धर्म के बिना राजनीति पाप है। गान्धी जी का कहना था कि धर्म राजनीति का अभिन्न अंग है और राजनीति को धर्म से पृथक् नहीं किया जा सकता। वे चाहते थे कि राजनीतिक अनैतिकता से दूर रहे। राजनीति उनकी दृष्टि में धर्म और नैतिकता की एक शाखा थी। धर्म से अलग होकर राजनीति एक मृत देह के समान है जिसको जला देना ही उचित है। गान्धी जी का कहना है, “बहुत-से धार्मिक व्यक्ति जिनसे मैं मिला हूँ, छुपे हुए राजनीतिज्ञ हैं परन्तु मैं तो राजनीतिज्ञ दिखाई देता हूँ, वास्त में धार्मिक हूँ।” गान्धी जी का राजनीति के अध्यात्मीकरण का केवल विचारही नहीं रहा बल्कि उन्होंने तो इसका अपने जीवनकाल में भी प्रयोग करके दिखाया।

2. अहिंसा सम्बन्धी विचार (Views about Non-Violence)-गान्धी जी अहिंसा के पुजारी थे और उन्होंने अहिंसा को अपने जीवन के कार्यक्रम का एक अंग बनाया हुआ था।
गान्धी जी ने अहिंसा को आत्मिक और ईश्वरीय शक्ति बताया है। अहिंसा का अर्थ कायरता या हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहना नहीं है। अत्याचार को चुपचाप सहन करना भी अहिंसा नहीं कहा जा सकता। अहिंसा आत्म-बलिदान करने, कठिनाइयां सहने और दुःख उठाने के बाद भी सत्य और न्याय पर डटे रहने को ही कहा जा सकता है। यह नकारात्मक शक्ति नहीं है। यह एक सकारात्मक शक्ति है जो बिजली से भी अधिक तेज़ और ईथर से भी अधिक शक्तिशाली है। बड़ी-से-बड़ी हिंसा का विरोध भी बड़ी-से-बड़ी अहिंसा से किया जा रहा है।’

3. साधनों की पवित्रता पर विश्वास (Faith in the Purity of Means)—व्यक्ति तथा समाज को सदाचार के सांचे में ढालने के लिए गान्धी जी ने मानवीय आचरण को ऊंचा उठाने के लिए सत्य, अहिंसा और साधनों की पवित्रता पर जोर दिया। यह सारे सिद्धान्त एक-दूसरे में शामिल हैं और एक-दूसरे के सहायक तथा पूरक हैं। समाज में परिवर्तन लाने के लिए उन्होंने साधन की पवित्रता पर जोर दिया। अच्छे नतीजों की प्राप्ति के लिए वह नैतिक साधनों का प्रचार करते रहे। उनका विश्वास था कि यदि कोई साधनों का ध्यान रखे तो उद्देश्य अपना ध्यान स्वयं रख लेगा।

4. सत्याग्रह (Satyagraha)-अहिंसा के साधनों के प्रयोग द्वारा सच्चे आदर्शों की प्राप्ति के प्रयासों को सत्याग्रह कहा जाता है या दूसरे शब्दों में सत्य और अहिंसा के संगठन द्वारा बुराई का विरोध करना तथा अन्याय को दूर करवाने का नाम सत्याग्रह है। सत्याग्रह का अर्थ है ‘सत्य के साथ चिपटे रहना’ अर्थात् ‘सत्य की शक्ति’ । गान्धी जी का विश्वास इस आत्मिक शक्ति की श्रेष्ठता को सिद्ध करता है। सत्याग्रही मारने की अपेक्षा मरना अच्छा समझता है। उनका विश्वास था कि कायरता और अहिंसा इकट्ठे नहीं रह सकते। एक कायर खतरे से दूर दौड़ता है। गान्धी जी ने एक बार बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा था कि यदि उन्हें कायरता और अहिंसा में से चुनाव करना हो तो अवश्य ही अहिंसा को चुनेंगे। असहयोग, हड़ताल, धरना, भूख-हड़ताल या व्रत सत्याग्रह के विभिन्न रूप हैं।

5. राज्य सम्बन्धी विचार (Views about State)-गान्धी जी को प्रायः अराजकतावादी दार्शनिक कहा गया है। उनके विचार अनुसार जो आज्ञा देता है और जो कुछ आज्ञा के रूप में किया जाता है, उसकी कोई नैतिक कीमत नहीं हो सकती। केवल स्वतन्त्र इच्छा से किया गया काम ही नैतिक कहला सकता है। राज्य संगठित तथा एकत्रित हिंसा का प्रतिनिधि है। व्यक्ति तो आत्मा का स्वामी है, परन्तु राज्य एक आत्म-रहित मशीन है। हिंसा को राज्य से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि राज्य इसके बल पर ही कायम है। गान्धी जी का कहना था कि राज्य द्वारा पुलिस, न्यायालय और सैनिक शक्ति के माध्यम से व्यक्तियों पर अपनी इच्छा थोपी जाती है। गान्धी जी ने राज्य को अनावश्यक बुराई इसलिए भी बताया क्योंकि उनके विचारानुसार राज्य एक बाध्यकारी शक्ति है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास को कुण्ठित करती है।

6. गान्धी जी राज्य को साध्य न मान कर साधन मानते हैं (State is not end but a means)-आदर्शवादी राज्य को साध्य और व्यक्ति को साधन मानते हैं परन्तु गान्धीवाद राज्य को साधन और व्यक्ति को साध्य मानता है। राज्य की उत्पत्ति मनुष्य के लिए हुई है न कि मनुष्य की राज्य के लिए। गान्धीवादी दर्शन राज्य की उत्पत्ति तथा अस्तित्व में कोई रहस्यात्मक पवित्रता स्वतन्त्रता हीगल की भान्ति नहीं देखता। गान्धी जी राज्य को जन-कल्याण का एक साधन मानते थे। गान्धीवादी दर्शन राज्य का स्वतन्त्र तथा उच्च स्तर व्यक्तित्व स्वीकार नहीं करता। गान्धी जी ने राज्य को अनावश्यक बुराई कहा है।

7. राज्य का कार्यक्षेत्र (Sphere of State-Activity)-व्यक्तिवादियों की तरह गान्धीवादी भी राज्य को कमसे-कम कार्य सौंपना चाहते हैं । गान्धी जी के अनुसार राज्य को व्यक्ति के कामों में न्यूनतम हस्तक्षेप करने का अधिकार होना चाहिए। फ्रीमैन की भान्ति गान्धी जी का भी यह विचार था कि सर्वोत्तम सरकार वह है जो सबसे कम शासन करती है।

8. साध्य और साधन दोनों ही श्रेष्ठ होने चाहिएं (Both ends and means Should be good)-आदर्शवादी दर्शन साध्य को महत्त्व देता है और साधन ही नाम-मात्र भी चिन्ता नहीं करता। प्रायः सभी भौतिकवादी दर्शन साध्य पर ही जोर देते हैं; परन्तु गान्धी जी केवल साध्य की महानता से ही सन्तुष्ट नहीं थे। गान्धी जी ने साध्य और साधन दोनों के महत्त्व पर बल दिया है। उनके अनुसार, बुरे साधनों द्वारा अच्छे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती। साधनों का पवित्र होना अति आवश्यक है।

9. व्यक्ति की नैतिक पवित्रता पर बल (Stress on the moral purity of the individual)-गान्धी जी के अनुसार मनुष्य की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक समस्याएं मूल रूप में नैतिक समस्याएं ही हैं और इनका हल भी नैतिक साधनों द्वारा होना चाहिए। जब तक मनुष्य स्वार्थ भावना से ऊपर नहीं उठता तब तक उसका नैतिक विकास नहीं हो सकता। नैतिक विकास के लिए व्यक्ति का सच्चरित्र होना आवश्यक है। इसीलिए गान्धी जी कहा करते थे कि चरित्र की महानता बुद्धि की महानता से अधिक है।

10. स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार (Views about Freedom)—गान्धी जी के हृदय में नैतिक तथा आध्यात्मिक स्वतन्त्रताओं के प्रति अगाध श्रद्धा थी। वे व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को राष्ट्रीय स्वतन्त्रता से अधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे। उनके अनुसार जब तक कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से स्वतन्त्र नहीं है तो उसके लिए राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का कोई लाभ नहीं है। गान्धी जी के अनुसार, “व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का बलिदान करके किसी समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता।” (“No Society can possibly be built on a denial of individual freedom.”) परन्तु वे राजनीतिक स्वतन्त्रता को भी आवश्यक मानते थे। गान्धी जी राज्य को सत्य, जिसको वह ईश्वर मानते थे, का ही अंश मानते थे। उनके विचारानुसार राजनीतिक स्वतन्त्रता कठिन परिश्रम करने तथा दुःख उठाने के पश्चात् ही प्राप्त हो सकती है।

11. स्वतन्त्रता का उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है (Sole Object of liberty is all round development of the individual)-गान्धी जी के अनुसार स्वतन्त्रता का एकमात्र उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा नैतिक, चारों प्रकार की स्वतन्त्रताएं मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास करती हैं। व्यक्तिवादियों की भान्ति गान्धी जी निर्बाध स्वतन्त्रता में विश्वास नहीं करते और न ही वे आदर्शवादियों की भान्ति व्यक्ति की सच्ची स्वतन्त्रता राजकीय आज्ञाओं का पालन करने में मानते हैं। गान्धीवादी दर्शन को स्वतन्त्रता व्यक्तिवाद और आदर्शवाद के बीच की वस्तु है।

12. राष्ट्रीयता तथा अन्तर्राष्ट्रीयता में कोई संघर्ष नहीं (No Clash between Nationalism and Internationalism)—आदर्शवादी, फासीवादी और नाजीवादी अन्तर्राष्ट्रीयता में विश्वास नहीं करते थे। वे राष्ट्र को अन्तिम लक्ष्य मानते हैं, परन्तु गान्धी जी अन्तर्राष्ट्रीयता के अन्य विचारकों के विचारों से भिन्न है। अन्य अन्तर्राष्ट्रीयवादी राष्ट्र और अन्तर्राष्ट्रीयता में विरोध मानते हैं। उनके अनुसार अन्तर्राष्ट्रीयता के रास्ते में राष्ट्रीयता एक महान् बाधक है, परन्तु गान्धी जी राष्ट्रीयता को एक बाधा नहीं समझते। गान्धी जी के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीयता के लिए राष्ट्रीयता आधार अन्तर्राष्ट्रीयता का पहला कदम राष्ट्रीयता है। यदि इन दोनों में संघर्ष होता है तो इसका कारण यह है कि हम राष्ट्रीयता का अर्थ संकुचित रूप में लेते हैं। गान्धी जी देश भक्ति में विश्वास करते हैं, परन्तु वे अपने राष्ट्र के हित के लिए दूसरे राष्ट्र का अहित करने के पक्ष में नहीं हैं।

13. विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था (Decentralised Economy)-गान्धी जी के अनुसार पूंजीवाद के दोषों से बचने का सबसे अच्छा उपाय आर्थिक विकेन्द्रीकरण है। विकेन्द्रीकरण में गांवों की जनता को अधिक लाभ होगा। आर्थिक क्षेत्र में प्रत्येक गाँव एक आर्थिक इकाई के रूप में कार्य करेगा। प्रत्येक इकाई अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुओं का उत्पादन कर सकेगी। इसीलिए गान्धीवाद कुटीर उद्योग के पक्ष में है। गान्धी जी स्वदेशी खद्दर के पक्ष में थे। खद्दर उद्योग के द्वारा ग़रीबों को काम मिलता है और पैसा भी विदेशों में नहीं जाता। इसलिए गान्धी जी ने स्वदेशी आन्दोलन चलाया।

14. साम्राज्यवादी नीति के विरुद्ध (Against the Policy of Imperialism-गान्धी जी साम्राज्यवाद के विरुद्ध थे। साम्राज्यवाद मानवता का विरोधी है। विश्व-युद्धों का एकमात्र कारण साम्राज्यवाद है। साम्राज्यवादी हिंसावादी हैं। गान्धी जी साम्राज्यवाद के समर्थकों को आर्थिक राक्षस मानते हैं। अतः गान्धी जी साम्राज्यवाद के विरुद्ध थे।

15. पूंजीवाद को पूर्ण रूप से नष्ट करने के पक्ष में नहीं (Not in favour of fully abolishing Capitalism)-गान्धीवाद पूंजीवादी को पूर्ण रूप से नष्ट करने के पक्ष में नहीं है। पूंजीवाद का स्वरूप समाप्त करने से उद्योग-धन्धे बन्द हो जाएंगे, एक क्रान्ति उत्पन्न हो जाएगी, अनावश्यक रक्त बहेगा। पूंजीपतियों को समाजोपयोगी बनाया जा सकता है। समाज के ट्रस्टी के रूप में वे कार्य कर सकते हैं। गान्धी जी के शब्दों में, “प्रत्येक पूंजी दोष नहीं है। पूंजी की किसी-न-किसी रूप में सदैव आवश्यकता रहेगी।”

16. अधिकारों की अपेक्षा कर्त्तव्यों पर अधिक बल (More stress on duties than the Rights)-गान्धी जी अधिकारों की अपेक्षा कर्त्तव्यों पर अधिक ज़ोर देते हैं। कर्त्तव्य पालन से अधिकारों की प्राप्ति होती है। गान्धी जी के शब्दों में, “जो कर्तव्यों का पालन करता है अधिकार उसे स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं। वास्तव में अपने कर्तव्यों का पालन करने का अधिकार ही केवल एक ऐसा अधिकार है जो मृत्यु और जीवित रहने के योग्य है।”

17. वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त में विश्वास नहीं (No faith in the theory of class struggle)-साम्यवादियों की तरह गान्धी जी वर्ग-संघर्ष में विश्वास नहीं करते। गान्धी जी के विचारानुसार, वर्ग-संघर्ष हिंसात्मक है। श्रमिकों को उद्योगों के प्रबन्ध में हिस्सेदार बनना चाहिए। यदि व्यक्ति अमीरों के सम्पर्क में रहेगा तो उनकी बुद्धि का लाभ उठा सकेगा। गान्धी जी का विचार है कि श्रमिक वर्ग पूंजीपतियों से पृथक् रहने की अपेक्षा उनके साथ रहने से अधिक लाभ उठा सकता है।

18. बहुमत के सिद्धान्त का विरोध (Opposed to the principle of majority) गान्धी जी लोकतन्त्र में विश्वास रखते हैं, परन्तु वे लोकतन्त्र के बहुमत के सिद्धान्त को नहीं मानते। गान्धी जी के अनुसार बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों के सहयोग से शासन चलाना चाहिए। बहुमत वर्ग को अन्य वर्गों के विचारों का सम्मान करना चाहिए। यह आवश्यक नहीं है कि बहुमत का निर्णय सदैव ठीक हो। लोकतन्त्र का अर्थ है, सबका हित न कि किसी विशेष वर्ग का हित।

19. प्रतिनिधि प्रणाली, संसदीय व्यवस्था आदि पर विचार (Viws about Representative System, Parliamentary System etc.)-गान्धी जी प्रतिनिधित्व लोकतन्त्रात्मक प्रणाली के पक्ष में है। गान्धी जी चुनावों के विरुद्ध नहीं थे। उनके अनुसार-जनता को उन्हीं उम्मीदवारों को चुनना चाहिए जो योग्य, अनुभवी, नि:स्वार्थी तथा ईमानदार हों। गान्धी जी वयस्क मताधिकार के समर्थक थे, परन्तु उनका कहना था कि उसी नागरिक को वोट का अधिकार होना चाहिए जो अपनी रोजी स्वयं कमाता हो। दूसरे शब्दों में गान्धी जी श्रमिक मताधिकार के पक्ष में थे।

20. पुलिस तथा फ़ौज (Police and Military)-गान्धी जी के आदर्श राज्य में पुलिस और फ़ौज का कोई स्थान नहीं है, परन्तु वर्तमान राज्य में गान्धीवादी पुलिस और फ़ौज की आवश्यकता महसूस करते हैं। गान्धीवादियों के अनुसार पुलिस और फ़ौज के कर्मचारी अहिंसावादी होंगे, उनके पास हथियार होंगे, पर उनका प्रयोग बहुत कम किया जाएगा। पुलिस और फ़ौज में बदले की भावना नहीं होगी और इसका मुख्य उद्देश्य जनता का कल्याण होगा।

21. न्याय और जेल (Justice and Jails)-गान्धी जी के अनुसार न्याय शीघ्र और सस्ता होना चाहिए। राजसत्ता की भान्ति न्याय का भी विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। पंचायत को न्याय करने का अधिकार होना चाहिए। गान्धी जी न्यायाधीश और वकीलों के तिरस्कार की दृष्टि से देखा करते थे। गान्धी जी दण्ड को एक आवश्यक बुराई मानते थे। उनके अनुसार दण्ड के दो उद्देश्य हैं-प्रथम यह कि दण्ड अपराधी को दोबारा अपराध करने से रोके और द्वितीय, भविष्य में उस प्रकार के अपराधों को रोकना है। गान्धी जी के अनुसार अपराधियों को घृणा की नज़र से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि उनके प्रति सहानुभूति और प्रेम करना चाहिए। जेलों को अस्पताल और जेल के कर्मचारियों को अपराधियों से डॉक्टर तथा नौं जैसा बर्ताव करना चाहिए। अपराधियों को अच्छे जीवन की सुरक्षा देनी चाहिए, ताकि अपराधी सज़ा समाप्त होने के पश्चात् अच्छा नागरिक बन सके। गान्धी जी जेलों को सुधार घर बनाने के पक्ष में थे।

22. आदर्श समाज की कल्पना-गान्धी जी एक आदर्श समाज की स्थापना करने के पक्ष में हैं। गान्धी जी का आदर्श समाज राम राज्य था। उनकी कल्पना के समाज में सत्य का साम्राज्य होना चाहिए। जनता का जीवन नैतिक तथा आध्यात्मिक आधार पर होना चाहिए। उनके आदर्श समाज की नींव प्रेम, आपसी सहयोग, स्वेच्छा से काम और कर्त्तव्य का पालन था। ऐसे समाज में प्रत्येक व्यक्ति सत्याग्रही, सत्य का खोजी तथा अहिंसक होना चाहिए। इस तरह के समाज की कल्पना में कुछ मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं-

(i) राज्य की कम-से-कम शक्ति-राज्य प्रकृति से ही अत्याचारी और निजी आज़ादी का नाशक है। गान्धी जी के आदर्श समाज में राज्य को न्यूनतम शक्तियां प्राप्त होनी चाहिएं। आदर्श समाज में सरकार ग्राम-पंचायतों को अधिक अधिकार देगी। पुलिस शक्ति होगी तो सही, परन्तु पुलिस के सिपाही जनता के सेवक होंगे, स्वामी नहीं, दण्ड-सुधारक होंगे। जेलों को सुधार-गृहों में बदल दिया जाएगा, जहां अपराधियों का सुधार चिकित्सा तथा शिक्षा होगी।।

(ii) न्यूनतम ज़रूरतमन्द वाला समाज-जहां तक हो सके मनुष्य को अपनी ज़रूरतों को कम करना चाहिए और सत्य के साक्षात्कार करने के सर्वोत्तम उद्देश्य को सामने रखकर न्यूनतम ज़रूरत से ही सन्तुष्ट रहना चाहिए। सभ्यता का वास्तविक अर्थ जरूरतों की वृद्धि, बल्कि उन्हें इच्छापूर्वक काम करना है।

(iii) समान अवसर-गान्धी जी प्रत्येक व्यक्ति को उन्नति करने के समान अवसर देना चाहते थे। वे धन की असमान बांट को समाप्त करना ज़रूरी समझते थे। जरूरत से अधिक धन को समाज की अमानत समझा जाना चाहिए और उसे जनकल्याण के लिए प्रयोग में लाना चाहिए।

(iv) गान्धी जी प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक श्रम करने के लिए कहते थे और वे ग्रामीण आर्थिकता में विश्वास करते थे। उनकी नज़र में मशीन तथा ऊंचे स्तर का उत्पादन ही संसार में दुःख तथा शोषण के कारण हैं।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 महात्मा गान्धी के राजनीतिक विचार

प्रश्न 2.
महात्मा गांधी जी की सत्याग्रह की विधियों का वर्णन करो।
(Describe methods of Satyagraha of Mahatama Gandhi Ji.)
अथवा
महात्मा गांधी जी के सत्याग्रह के विभिन्न ढंगों का वर्णन कीजिए। (Discuss Mahatma Gandhiji’s Various methods of Satyagraha.)
उत्तर-
आधुनिक भारत के सामाजिक तथा राजनीतिक चिन्तकों में गान्धी जी का स्थान बहुत ऊंचा है। उन्होंने समस्त विश्व के लिए लाभदायक सिद्ध हुआ। यह उनका सत्याग्रह का सिद्धान्त था। इस सिद्धान्त का गांधी जी ने स्वयं स्वतन्त्रता आन्दोलन में प्रयोग किया। गांधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन का समस्त विश्व पर प्रभाव पड़ा और इसका प्रयोग अफ्रीका तथा अमेरिका में भी किया गया। आधुनिक युग वैज्ञानिक युग है। जहां एक ओर परमाणु बमों का आविष्कार किया गया है और वहां दूसरी ओर गान्धी जी ने लड़ने के लिए सत्याग्रह का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इसकी शक्ति भौतिक न होकर नैतिक है और गान्धी जी ने इसी शक्ति द्वारा भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति दिलाई। गान्धी जी का कहना था कि “सत्याग्रह मानव आत्म की शक्ति की राजनीतिक एवं आर्थिक प्रभुत्व के विरुद्ध दृढ़ोक्ति है।”

सत्याग्रह के स्रोत (Sources of Satyagrah)—गान्धी जी का प्रारम्भ से ही झुकाव सत्य की खोज की तरफ था। उन्होंने सभी धर्मों पर गहरा अध्ययन किया और सत्याग्रह का सिद्धान्त निकाला। वे गीता और बाइबिल से अत्यधिक प्रभावित हुए थे। उन्हें ईसा मसीह का यह उपदेश कि, “यदि कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर चांटा मारे तो अपना बायां गाल भी उसके सामने कर दो”, अहिंसा का पवित्र मन्त्र प्रतीत हुआ था। गान्धी जी ने जे० जे० डोके (J. J. Doke) को बताया कि “न्यू टेस्टामैंट और विशेषकर सरमन ऑन दी माउण्ट (Sermon on the Mount) ने उन्हें सत्याग्रह की शुद्धता और उसके महत्त्व के प्रति जागृत किया।” गान्धी जी का कहना था कि ईसा मसीह सबसे उच्चकोटि के सत्याग्रही थे।

गान्धी जी ने अफ्रीका में जब अंग्रेजों के अत्याचार को भारतीय जनता के ऊपर होते देखा तो उनके मन में पहली बार सत्याग्रह का विचार आया। उन्होंने वहां की जनता को अहिंसात्मक ढंग से आन्दोलन करने के लिए तैयार किया। उन्हीं दिनों गान्धी जी ने एच० डी० थ्यूरी का ‘सविनय अवज्ञा’ (Civil Disobedience) का एक लेख पढ़ा और वह इस लेख से बहुत प्रभावित हुए तथा उन्होंने लिखा, “इस पुस्तक ने मेरी सत्याग्रह की धारणा को वैज्ञानिक विश्लेषण प्रदान किया है।”

सत्याग्रह का अर्थ (Meaning of Satyagrah)-सत्याग्रह का वास्तविक अर्थ अहिंसा में अटूट विश्वास रखने वाले मनुष्य का सत्य के प्रति आग्रह है। अहिंसा के साथ सत्य को मिला देने से एक नई स्थिति पैदा हो जाती है। सत्याग्रह में सब कुछ सत्य के लिए किया जाता है। दूसरों को तनिक भी कष्ट या पीड़ा पहुंचाना उसका उद्देश्य नहीं होता। लेकिन सत्याग्रह में बड़ी से बड़ी हिंसक शक्ति को झुकाने की सामर्थ्य होती है। सत्याग्रह स्वयं ही सहन करने की इच्छा का नाम है। इसलिए इसमें वैर-भावना नहीं होती। गान्धी जी के शब्दों में, “सत्याग्रह का अर्थ है विरोधी को पीड़ा देकर नहीं, बल्कि स्वयं तकलीफ उठाकर सत्य की रक्षा करना। (Satyagrah is the vindication of truth, not by the infliction of suffering on the opponent buton one’s own self.”) “यह सच्चाई के लिए तपस्या है।”

(“Satyagrah is nothing but Tapasya for truth.”) गान्धी जी कहते थे कि “मैंने इसे प्रेम शक्ति या आत्म शक्ति (Soul force) भी कहा है। सत्याग्रह प्रयोग की प्रारम्भिक अवस्थाओं में मैंने यह अनुभव किया कि सत्य मार्ग का अनुसरण विरोधी पर हिंसा-प्रयोग की स्वीकृति नहीं देता है। सत्याग्रह ही अपने विरोधी को कभी कष्ट नहीं पहुंचाता और हमेशा कोमल तर्क द्वारा या तो उसकी बुद्धि को प्रेरित करता है या आत्म-बलिदान द्वारा उनके हृदय को। सत्याग्रह दोहरा वरदान है, यह उसके लिए भी वरदान है जो इसका आचरण करता है और उसके लिए भी जिसके विरुद्ध इसका प्रयोग किया जाए। सत्याग्रही हारना तो जानता ही नहीं क्योंकि बिना थके-हारे सत्य के लिए लड़ता है। इस संग्राम में सत्य मोक्ष होता है और कारागृह स्वतन्त्रता का द्वार।” डॉ० पट्टाभि सीतारमैया ने सत्याग्रह की रचनात्मक भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा था, “सत्याग्रह एक विधेयात्मक एवं अप्रतिहत शक्ति के रूप में कार्य करता है। इसका प्रभाव अनुभव सिद्ध है।” संक्षेप में, सत्याग्रह सत्य व निरापद खोज है और गान्धी जी राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं को भी इस अस्त्र के द्वारा तय करना चाहते थे।

गान्धी जी का सत्याग्रह का शस्त्र कितना महान् था इसे समझने के लिए हमें सत्याग्रह का अर्थ बराबर ध्यान में रखना चाहिए। ‘सत्य’ का अर्थ सच्चाई और ‘आग्रह’ का अर्थ किसी वस्तु को मज़बूती से पकड़ लेने का है। अतः सत्याग्रह का अर्थ है सच्चाई पर अड़े रहना और उसे कभी न छोड़ना चाहे उसके लिए हमें कितनी भी तकलीफें या मुसीबतें क्यों न उठानी पड़ें।

सत्याग्रह निर्बलों का शस्त्र नहीं (Satyagrah not a weapon of the weak)—गान्धी जी के अनुसार, “सत्याग्रह कमज़ोरों का शस्त्र नहीं है।” सत्याग्रह के नाम पर अपनी कायरता छिपानी अनुचित है। सत्याग्रह एक शक्तिशाली के द्वारा किया जा सकता है और शक्ति निर्भीकता में निहित है न कि मनुष्य के मांस और पट्टों में। सत्याग्रह वीरों का शस्त्र है। महात्मा गांधी कहते थे कि “कायरता और अहिंसा इसी तरह इकट्ठी नहीं चल सकती जैसा कि पानी और आग।” (“Satyagrah, is a quality of the brave. Cowardice and Ahimsa do not go together any more than water and fire.”)

सत्याग्रही के लिए नियम (Rules for Satyagrahi)-सत्याग्रह के इस गांधीवादी दर्शन में किसी भी आन्दोलन के प्रतिफल उस आन्दोलन में ही छिपे रहते हैं। एक सच्चा सत्याग्रहीं समझौते के किसी भी अवसर को खोता नहीं है और वह सदा विनम्र बना रहता है। ऐसे सत्याग्रही को निराशा कभी नहीं मिलती और आखिर में वह सबल एवं शक्तिशाली बन जाता है। जिस तरह सूर्य का पूरी तरह वर्णन नहीं किया जा सकता वैसी ही स्थिति एक सच्चे सत्याग्रही की है। सत्याग्रह सत्य और प्रेम पर टिका हुआ है और दरअसल सत्याग्रह की सम्पूर्ण पद्धति पारिवारिक जीवन का राजनीतिक क्षेत्र में विस्तार कर देती है जिसमें प्रत्येक समस्या का हल आपसी सद्भाव द्वारा निकाला जाता है। यह पद्धति आत्म निर्भर होने के साथ-साथ मानव जाति के सन्तुलित विकास और सभ्यता की प्रगति के लिए बहुत ज़रूरी है। इसका प्रयोग कर पाना कुछ लोगों की बपौती नहीं है बल्कि सभी लोग सत्याग्रह के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं बशर्ते कि वे सत्य और अहिंसा की शक्ति में विश्वास करते हों। यह संघर्ष का ऐसा तरीका है जिसका प्रयोग अचानक नहीं किया जाता। जब अन्य सभी उपाय नाकामयाब हो जाते हैं तभी इसका सहारा समाज में सामूहिक हित के लिए लिया जाता है। व्यक्तिगत लाभ के लिए इसका प्रयोग नहीं किया जाता। ईश्वर के प्रति अटूट निष्ठा रखनी ज़रूरी है हालांकि संख्या बल का कोई विचार इसकी सफलता के लिए आवश्यक नहीं है। सत्याग्रह प्रयोग करने वाले और जिसके विरुद्ध इसका प्रयोग किया जा रहा हो दोनों का ही भला करता है।

सत्याग्रही में सत्याग्रह के सिद्धान्त का पालन करने के लिए कुछ विशेषताएं होनी चाहिएं। इन विशेषताओं के होने पर ही कोई व्यक्ति सच्चा सत्याग्रही बन सकता है। ये विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • सत्याग्रही को क्रोध नहीं करना चाहिए।
  • उसे अपने विरोधी के क्रोध को सहन करना चाहिए।
  • उसे दण्ड के भय से झुकना नहीं चाहिए। उसे निडर होना चाहिए।
  • यदि कोई सरकारी अधिकारी सत्याग्रही को गिरफ्तार करना चाहे तो सत्याग्रही स्वेच्छा से गिरफ्तार हो जाए।
  • यदि किसी सत्याग्रही के पास कोई ट्रस्ट की सम्पत्ति है तो उसके लिए बलिदान देने के लिए तैयार होना चाहिए।
  • सत्याग्रही न मारेगा, न कसम खाएगा और न गाली देगा।
  • सत्याग्रही अपने विरोधी का अपमान नहीं करेगा और न वह ऐसे नारे लगाएगा जिससे हिंसा की बू आती हो।

सत्याग्रहियों के लिए योग्यताएं (Qualifications for the Satyagrahis)-1930 में गांधी जी ने सत्याग्रही के लिए 9 नियम बताए थे जिनका पालन करना उसके लिए बहुत आवश्यक था-

  • सत्याग्रही को ईश्वर में अटल विश्वास होना चाहिए।
  • सत्याग्रही को सत्य तथा अहिंसा में पूर्ण विश्वास होना चाहिए।
  • वह शुद्ध जीवन बिताने वाला हो अर्थात् उसमें आन्तरिक शुद्धि हो तथा वह खुशी से अपनी सम्पत्ति तथा जीवन को उद्देश्य की प्राप्ति के लिए त्याग करने वाले होना चाहिए।
  • सत्याग्रही सद्भाव वाला तथा खद्दर पहनने वाले और सूत कातने वाला होना चाहिए।
  • वह नशीली वस्तुओं से दूर रहे जिनसे इसकी बुद्धि चंचल होती है।
  • अनुशासन के नियमों का पालन करना चाहिए।
  • उसे जेल के नियमों का भी तब तक पालन करना चाहिए जब तक वे उसके सम्मान को भंग न करें।
  • शत्रु के प्रति मन, वचन तथा कर्म से हिंसा का भाव नहीं होना चाहिए।
  • उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बलिदान देने वाला हो।

सत्याग्रह की विशेषताएं (Characteristics of Satyagraha)-गांधी जी के अनुसार सत्याग्रह की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-

  • सत्याग्रह व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है (Satyagraha is the birth right of Everyone)-गांधी जी के अनुसार भ्रष्टाचारी एवं असंवैधानिक सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह करना. प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है।
  • सत्याग्रह दूसरों को प्रार्थना द्वारा बदलने की विधि (Satyagraha is a method to change the opponent through an appear)-गान्धी जी के अनुसार सत्याग्रह, का उद्देश्य दूसरों को क्षति पहुंचाना नहीं होता, बल्कि प्रार्थना द्वारा उसको प्रभावित करना तथा सही रास्ते पर लाना है।
  • स्वयं कष्ट सहना (Self Suffering)-गान्धी जी के अनुसार स्वयं कष्ट सहना सत्याग्रह का एक महत्त्वपूर्ण भाग है इसके द्वारा दूसरों की आत्मा को सुधारा जा सकता है।
  • सत्याग्रह का आधार नैतिक शक्ति है (Moral Power is the basis of Satyagraha)—गान्धी जी के अनुसार सत्याग्रह का आधार नैतिक शक्ति है। एक सच्चा सत्याग्रही नैतिक शक्ति के आधार पर सभी बाधाओं को पार कर जाता है।
  • सामाजिक कल्याण (Social Welfare)गान्धी जी के अनुसार सत्याग्रह का उद्देश्य सामाजिक कल्याण होता है। गांधी जी का मानना है कि एक व्यक्ति का कल्याण निजी स्वार्थों से प्रेरित होता है, जबकि सामाजिक कल्याण सामूहिक कल्याण की भावना से प्रेरित होता है।
  • हिंसा का विरोध (Opoose to Violence)-गान्धी जी हिंसा का विरोध करते हैं। उनके अनुसार हिंसा तथा सत्याग्रह परस्पर विरोधी है। गान्धी जी के अनुसार हिंसा द्वारा किसी भी समस्या का हल नहीं निकल सकता।
  • सत्याग्रह का व्यापक प्रयोग (Wider use of Satyagraha)-गान्धी जी के अनुसार सत्याग्रह एक ऐसी आत्मशक्ति है, जिसका प्रयोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में किया जा सकता है।
  • पारदर्शिता (Transperacy)-गान्धी जी के अनुसार सत्याग्रह में पारदर्शिता पाई जाती है। गान्धी जी के अनुसार जो कार्य चोरी छिप किये जाते हैं वे कार्य प्रायः उचित नहीं होते। इसलिए गान्धी जी सत्याग्रह के माध्यम से प्रत्येक गतिविधि खुले रूप में करने का समर्थन करते हैं।

सत्याग्रह के स्वरूप (Forms of Satyagrah)-सत्याग्रह के विभिन्न स्वरूप निम्नलिखित हैं –

(1) बातचीत (Negotiations)
(2) आत्मपीड़न (Self-suffering)
(3) असहयोग (Non-co-operation)
(4) सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience)
(5) हड़ताल (Strike)
(6) उपवास या व्रत (Fasting)
(7) धरना (Picketing)
(8) सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott)
(9) स्वेच्छा से पलायन (Hijrat)

1. बातचीत का सिद्धान्त (Principle of Negotiation)-सत्याग्रही को किसी व्यक्ति का विरोध करने से पहले उसे यह अच्छी प्रकार समझा देना चाहिए कि वह गलती पर है। हो सकता है कि उस व्यक्ति ने वह गलती निजी स्वार्थ या अज्ञानता के कारण की हो। यदि विरोधी फिर भी न समझे तो किसी मध्यस्थ के द्वारा समझा-बुझा कर सही रास्ते पर लाना चाहिए। गान्धी जी कहते हैं “यदि समझाने बुझाने से वह न माने तो सत्याग्रही को कोई कठोर पग उठाना चाहिए।”

2. आत्म-पीड़न (Self-suffering)-महात्मा गांधी के अनुसार यदि विरोधी किसी मध्यस्थ द्वारा भी समझौते के लिए तैयार नहीं होता और अपना गलत रास्ता नहीं छोड़ता तो सत्याग्रही को उसके विरुद्ध कोई ठोस कदम उठाना चाहिए। ठोस कदम से गान्धी जी का अभिप्राय यह नहीं कि सत्याग्रही को अपने विरोधी के विरुद्ध हिंसा का प्रयोग करना चाहिए या उसे हानि पहुंचानी चाहिए बल्कि इसका अर्थ है स्वयं कष्ट सहना चाहिए। आत्म-पीड़न (अपने आपको कष्ट देने से है) विरोधी के हृदय में दया और सद्भावना जागृत करती है।

3. असहयोग Non-co-operation)-गान्धी जी के मतानुसार जो, लोग अन्याय करते हों या दूसरों को अनुचित तरीकों से दबाते हों, उनके साथ किसी भी तरह का सहयोग नहीं करना चाहिए और उन्हें यह अनुभव कराना चाहिए कि वे अकेले हैं। इस प्रकार के हालातों में ही अन्यायी और दमन करने वाला व्यक्ति आन्दोलनकारियों की उचित मांगों को सुनने के लिए तैयार होता है। लेकिन असहयोग का सहारा लेने के लिए, साहस और आत्म बलिदान की ज़रूरत होती है जिसके बिना असहयोगी अपने लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकता।

4. सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) शक्तिशाली शत्रु के खिलाफ़ लड़ने के लिए सविनय अवज्ञा भी गान्धी जी की दृष्टि में एक अनोखा तरीका था। वे सशस्त्र प्रतिरोध (Armed Resistance) के विरोधी थे पर उनका मत था कि मनुष्यों को सामूहिक सामाजिक कल्याण के विरुद्ध लागू होने वाले नियमों और अन्यायपूर्ण कानूनों को नहीं मानना चाहिए।

5. हड़ताल (Strike)-गांधी जी के अनुसार दमनकर्ता या अन्याय करने वाले के विरुद्ध लड़ने का एक तरीका हड़ताल भी है। प्रत्येक कारखाने में मजदूरों को उद्योगपतियों के विरुद्ध लड़ने के लिए संगठित होना ज़रूरी है। पर मजदूरों को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि ऐसे साधनों का उद्देश्य मज़दूरों के उचित अधिकारों को प्राप्त करना और श्रम की गरिमा स्थापित करना है। इसी तरह हड़तालें पूरी तरह अहिंसक होनी चाहिएं।

6. उपवास या व्रत (Fasting)-गांधी जी के जीवन में विशुद्ध सात्विकता का प्रवेश जिस रूप में हुआ है, उसे उपवास जैसे विलक्षण साधनों ने और भी अधिक शक्ति प्रदान की है। गांधी जी के अनुसार उपवास, सत्याग्रह का ही एक रूप है। उपवास आत्म-शुद्धि का एक साधन है। उनके मतानुसार जब उपवास सामूहिक मांगों को मनवाने के लिए किया जाए तो केवल उसी समय किया जाना चाहिए जब कि अन्य साधन समाप्त हो चुके हों।

7. सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott)-सामाजिक बहिष्कार का प्रयोग अहिंसात्मक ढंग से होना चाहिए। इसका प्रयोग या तो उन लोगों के विरुद्ध होना चाहिए जो जनमत की अवहेलना करते हैं या फिर सरकार के पिहुओं के विरुद्ध।

8. धरना (Picketing)-धरना बहिष्कार का एक ढंग है। इसका प्रयोग अहिंसात्मक ढंग से होना चाहिए। जो लोग शराब, अफीम, अन्य नशीली वस्तुएं तथा विदेशी कपड़ा बेचते थे गांधी जी उनके विरुद्ध धरने की आज्ञा देते हैं।

9. हिज़रत (Hijrat)–गांधी जी के मतानुसार यदि मनुष्य अन्याय सहन नहीं कर पाता और वह भी जानता है कि वह एक अच्छा सत्याग्रही नहीं बन सकता तो उसके लिए अपने पूर्वजों के उस स्थान को छोड़ देना या हिज़रत कर जाना ही सबसे अच्छा तरीका है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 महात्मा गान्धी के राजनीतिक विचार

प्रश्न 3.
गान्धी जी के आदर्श राज्य की विशेषताएं लिखो। (Write down the characteristics of the ideal state of Gandhiji.)
अथवा
महात्मा गांधी जी के आदर्श राज्य की विशेषताओं का वर्णन करो। (Write down the feature of Mahatama Gandhiji’s Ideal State.)
अथवा
गांधी जी के आदर्श राज्य की मुख्य विशेषताएं लिखो। (Write down the feature of Gandhiji’s Ideal State.)
उत्तर-
जब हम गान्धी जी के धार्मिक और आध्यात्मिक विश्वासों के आधार पर नए समाज के विषय में विचार करने बैठते हैं तो एक अत्यन्त कठिन समस्या हमारे सामने उपस्थित होती है। इसका कारण यह है कि वे एक कर्मयोगी थे। अतः अपने आदर्श राज्य की स्थापना का विस्तार से वर्णन उन्होंने कभी नहीं किया। जब कभी कोई उनसे उनके नवीन समाज की बात करता तो वे चुप हो जाते थे। एक बार न्यूमैन से उन्होंने कहा था-“मैं दूरस्थ लक्ष्य देखने की कामना नहीं करता। मेरे लिए तो एक कदम काफ़ी है।” (“I do not ask to see the distant scence ; one step is enough for me.”) इस विषय में 11 फरवरी, 1933 के ‘हरिजन’ में उन्होंने लिखा था –

“अहिंसा पर टिके हुए समाज में राज्य और सरकार की रूप-रेखा क्या होगी ? उनकी चर्चा मैं जानबूझ कर नहीं करता रहा हूँ।……जब समाज का निर्माण अहिंसा के नियमों के अनुसार किया जाएगा तो उसका रूप आज के समाज के मूलरूप से भिन्न होगा। मैं पहले से ही यह नहीं कह सकता कि पूरी तरह से अहिंसा पर आधारित आदर्श राज्य या सरकार का स्वरूप क्या होगा।

इस प्रकार गांधी जी अपने नवीन समाज की कोई स्पष्ट रूप-रेखा प्रस्तुत न कर सके। यह काम उन्होंने जनता पर छोड़ दिया। स्वतन्त्रता के पश्चात् जिस संविधान सभा का निर्माण हुआ, उसमें गान्धी जी ने भाग नहीं लिया। यदि वे भाग ले भी लेते तो वे संविधान सभा द्वारा अहिंसात्मक सरकार की स्थापना करने में सफल न होते क्योंकि संविधान सभा के कई सदस्य अहिंसा में पूर्ण विश्वास नहीं रखते थे।

गान्धी जी के नवीन समाज की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

1. राज्य विहीन व्यवस्था-महात्मा गांधी हिंसा को जड़ से काट डालना चाहते थे। वह हिंसा को किसी क्षेत्र में भी पनपने देना नहीं चाहते थे। वे राज्य की सत्ता को हिंसा का प्रतीक समझते थे। गान्धी जी अहिंसा के पुजारी हैं, वे राज्य का विरोध इसलिए करते हैं कि यह हिंसा मूलक है। राज्य का विरोध करते हुए गान्धी जी कहते हैं-“मुझे जो बात ना पसन्द है, वह है बल के आधार पर बना हुआ संगठन, राज्य ऐसा ही संगठन है।” गान्धी जी की दृष्टि में राज्य हिंसा का प्रतीक होने के बावजूद व्यक्ति की अपूर्णता का द्योतक है। इसलिए वह ऐसी व्यवस्था की कल्पना करते हैं जब राज्य अपने आप समाप्त हो जाएगा।

2. आदर्श समाज या राज्यविहीन लोकतन्त्र स्वशासी तथा सत्याग्रही ग्रामों का संघ होगा (The ideal society or stateless democracy will be a federation of mover or les self-suffering and self-governing Satyagrahi Village Communities) गान्धी जी का राज्यविहीन समाज आपसी सहयोग पर आधारित गणराज्य होगा अथवा अनेकों पंचायतों का एक समूह या संघ होगा। ऐसे राज्य की अपनी कोई केन्द्रित शक्ति नहीं होगी, बल्कि उनकी शक्ति इन पंचायतों में बिखरी रहेगी। इस प्रकार का संघ लोगों की स्वतन्त्र इच्छा पर आधारित होगा।

3. व्यक्ति और समाज के आपसी सम्बन्ध (Relationship between the Individual and the State)गान्धीवादी व्यवस्था में व्यक्ति को साध्य माना गया है। समाज के सभी क्रिया-कलापों का केन्द्र व्यक्ति ही होगा। राज्य एक साधन माना गया है। राज्य व्यक्ति का सेवक होगा, स्वामी नहीं। पर समाज की प्रगति की ज़रूरतों के अनुसार मनुष्य को भी अपने आपको बनाना पड़ेगा। व्यक्ति को स्वतन्त्रता देने के बावजूद भी वह यह नहीं भूलते कि वह एक सामाजिक प्राणी है।

गान्धी जी के अनुसार व्यक्ति की आजादी और समाज के कर्तव्यों के बीच संघर्ष का असली कारण राज्य का अहिंसा पर आधारित स्वरूप है। उसमें लोगों का शोषण करने का अवसर कुछ व्यक्तियों को मिल जाता है। यहां पर ध्यान देने की बात यह है कि जितना ही लोग अहिंसा, सत्य और प्रेम को हृदयंगम करेंगे और आपसी सेवा एवं सहयोग के लिए तत्पर रहेगे उतना ही ऐसे संघर्ष समाप्त हो जाएंगे।

4. विकेन्द्रीकरण (Decentralisation)-गान्धी जी का अहिंसात्मक राम राज्य राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से विकेन्द्रित होगा। राज्य के केन्द्रीकृत होने से व्यक्ति की आज़ादी नहीं रह जाती और व्यक्ति की आज़ादी के बिना अहिंसा पंगु बन कर रह जाएगी।

आर्थिक विकेन्द्रीकरण के क्षेत्र में बड़े स्तर के उद्योग-धन्धों को प्रोत्साहन नहीं दिया जाएगा। बल्कि कुटीर उद्योग घर-घर स्थापित किए जाएंगे। इससे सामाजिक और आर्थिक समता स्थापित करने में मदद मिलेगी। आधुनिक जगत् से जहां कहीं हिंसा की बातें दिखाई पड़ती हैं उनका मुख्य कारण राज्यों का बहुत अधिक केन्द्रीकृत और सशक्त होना है। आर्थिक विकेन्द्रीकरण से मज़दूरों का शोषण भी नहीं होगा क्योंकि उत्पादन के साधनों और उत्पादित धन के स्वामी वे स्वयं होंगे।

5. वर्ण-व्यवस्था-गान्धी जी के आदर्श राज्य में वर्ण-व्यवस्था के आधार पर काम किया जाएगा। प्रत्येक मनुष्य पुरखों से चला आ रहा काम करेगा जिससे इस व्यवस्था को कोई नुकसान न पहुंचे। इससे समाज के जीवन में होड़ की भावना नहीं उठेगी क्योंकि लोग अपना धन्धा कुछ मर्यादाओं के अन्दर रहकर करेंगे। गान्धी जी के अनुसार वर्ण के नियम ने विशेष प्रकार की योग्यता वाले मनुष्यों के लिए कार्य क्षेत्र स्थापित कर दिया। इससे अनुचित प्रतियोगिता (Unworthy Competition) दूर हो गई। वर्ण नियम ने मनुष्यों की मर्यादाओं को तो माना किन्तु ऊंच-नीच को स्थान न दिया।

गान्धी जी की वर्ण व्यवस्था में सभी उद्योगों को समानता दी जाएगी। ऊंच-नीच के भेदभाव नहीं होंगे1 दूसरी बात यह है कि पुरखों से चले आ रहे काम केवल जीविका चलाने और सामाजिक हित की भावना से ही किए जाएंगे। लाभ कमाना उनका लक्ष्य न होगा।

6. अपरिग्रह (Non-possession)-गान्धीवाद राज्य की एक अन्य विशेषता अस्तेय है। इस व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति ज़रूरत से अधिक वस्तु अपने पास नहीं रखेगा। स्वयं गान्धी जी ने वस्तुएं कभी भी इकट्ठी नहीं की। उनका कहना था कि जो व्यक्ति भविष्य के लिए अपने पास चीजें इकट्ठी करता है उसे ईश्वर पर विश्वास नहीं है। अगर हमें ईश्वर पर भरोसा है तो वह हमारी सन्तुष्टि के लिए हमें वस्तुएं अवश्य देगा।

7. न्यासी (Trusteeship)-गान्धीवादी राज्य में जब लोग अपनी ज़रूरत से अधिक किसी वस्तु का संग्रह नहीं करेंगे तो सभी लोग सुख और शान्ति से रह सकेंगे। गान्धी जी का कहना था कि सम्पत्ति का उत्पादन किया जाए और उसके उत्पादन में काम करने वालों को समान हिस्सा मिले। किसी के पास कितनी भी सम्पत्ति क्यों न हो वह समाज की न्यास सम्पत्ति (Trust) समझी जाए। गान्धी जी का कहना था कि ट्रस्टीशिप सिद्धान्त में आपस के झगड़े समाप्त हो जाएंगे।

8. जीविका के लिए श्रम (Bread-labour)-गान्धी जी का विचार था कि प्रत्येक स्वस्थ मनुष्य को अपनी जीविका कमाने के लिए शारीरिक श्रम करना ज़रूरी है। वे तो कहा करते थे कि बौद्धिक काम करने वालों को भी शारीरिक श्रम अवश्य करना चाहिए। इससे श्रम को आदर मिलेगा और समाज में ऊंच-नीच की भावना का विकास नहीं होगा।

9. आदर्श समाज कृषि प्रधान होगा (Ideal Society will be predominantly agricultural)-गान्धी जी के अनुसार, “ जो समाज अपरिग्रह और शारीरिक श्रम के आदर्शों पर स्थापित किया जाएगा, वह कृषि प्रदान होगा और ग्रामीण सभ्यता को अपनाएगा। आर्थिक जीवन में पूंजीवादी व्यवस्था समाप्त हो जाएगी और मालिक नौकर के बनावटी सम्बन्धों का अन्त हो जाएगा। उत्पादन ग्रामीण उद्योग-धन्धों द्वारा होगा।” यद्यपि गान्धी जी सभी प्रकार की मशीनों के विरुद्ध नहीं थे परन्तु उनका विचार था मुनाफे के लिए लगाए जाने वाले बड़े-बड़े मिल-कारखानों के साथ-साथ सत्याग्रही सभ्यता का विकास असम्भव है।

10. आदर्श समाज में खेती सहकारी ढंग से होगी (Agriculture will be an Co-operative basis in an ideal Society)—गान्धी जी के अनुसार, “खेती स्वेच्छा पर आधारित पद्धति से होनी चाहिए। महात्मा गान्धी की सहकारिता की धारणा यह भी थी कि ज़मीन किसानों के सहकारी स्वामित्व में हो और जुताई तथा खेती सहकारी नीति से हो। इससे श्रम, पूंजी और औज़ारों आदि की बचत होगी। भूमि के स्वामी सहकारिता से कार्य करेंगे और पूंजी,
औज़ार, पशु, बीज इत्यादि के सहकारी स्वामी होंगे। उनकी धारणा थी कि सहकारी कृषि देश का रूप बदल देगी और किसानों के बीच से निर्धनता और आलस्य को दूर कर देगी।”

11. आदर्श समाज में यातायात के भारी साधन, बड़े नगर, वकील और अदालतें नहीं होंगी (No heavy transport, big cities, courts and lawyers in an Ideal society)— it oft otot farari e forti, “आदर्श समाज में न तो यातायात के भारी साधन होंगे, न वकील और कचहरियां होंगी, न आजकल डॉक्टर और दवाइयां होंगी और न बड़े नगर होंगे।”

12. आदर्श समाज में प्राकृतिक चिकित्सा पर बल दिया जाएगा (Emphasis on natural treatment will be put in ideal society)—गान्धी जी के आदर्श समाज में पेशेवर डॉक्टर नहीं होंगे और न ही दवाइयों का बड़ा उत्पादन होगा बल्कि प्राकृतिक चिकित्सा पर बल दिया जाएगा।

13. धर्म-निरपेक्षता (Secularism)-गान्धीवाद धर्म-निरपेक्षता में विश्वास करता है। गान्धी जी के अनुसार राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होना चाहिए। इसके साथ-साथ सभी नागरिकों को कोई भी धर्म अपनाने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए।

14. अपराध, सजा एवं न्याय (Crime, Punishment and Justice)-गान्धीवाद के अनुसार अपराध समाज में एक बीमारी के समान है और इस बीमारी से हमें छुटकारा तभी मिल सकता है, जब हम अपराधियों के प्रति घृणा एवं बदले की भावना न रखें तथा उन्हें सुधारने का प्रयास करें।

निष्कर्ष (Conclusion)-अब प्रश्न उठता है कि क्या गान्धीवादी राज्य की स्थापना कर पाना सम्भव है? इस बारे में बहुत-से आलोचकों का कहना यह है कि गान्धी जी के राज्य व्यवस्था के सम्बन्धी विचार प्लेटो के काल्पनिक विचारों की तरह ही हैं। उन्हें व्यवहार में नहीं लाया जा सकता। वस्तुतः सच्चाई यह है कि लोग ऐसा कहते हैं वे मनुष्य को एक दैनिक प्राणी न मान कर एक बर्बर प्राणी ही समझते हैं जो जंगलीपन से ऊपर नहीं उठ सकता। इसके विपरीत गान्धी जी का दृष्टिकोण यह था कि मनुष्य में दैवी अंश मौजूद है। अतः उनका जीवन कानून, सत्य, प्रेम और अहिंसा के आधार पर चलना चाहिए किन्तु जिन लोगों का दृष्टिकोण भौतिक है और आत्मा एवं परमात्मा की सत्ता में जिन्हें विश्वास ही नहीं है उनको इन सिद्धान्तों के विषय में विश्वास दिला पाना बहुत अधिक कठिन है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
गांधी जी के धर्म और राजनीति के सम्बन्धों के बारे में मौलिक दृष्टिकोण का वर्णन कीजिए।
अथवा
गांधी जी के अनुसार “धर्म तथा राजनीति का परस्पर सम्बन्ध है।” वर्णन कीजिए।
उत्तर-
गांधी जी राजनीति को धर्म की आधारशिला पर खड़ा करना चाहते थे। गांधी जी का विश्वास था कि धर्म राजनीति का अभिन्न अंग है और राजनीति को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता है। गांधी जी चाहते थे कि राजनीति अनैतिकता से दूर रहे। उनकी नज़र में राजनीति, धर्म और नैतिकता की शाखा थी। धर्म से अलग होने पर राजनीति एक शव की भान्ति है जिसको जला देना चाहिए। गांधी जी के शब्दों में, “बहुत सारे धार्मिक व्यक्ति जिनसे मैं मिलता हूँ वह छुपे हुए राजनीतिज्ञ होते हैं, परन्तु मैं जो एक राजनीतिज्ञ दिखाई देता हूँ वास्तव में धार्मिक हूँ।”

प्रश्न 2.
गांधी जी के अनुसार सत्याग्रह से क्या अभिप्राय है?
अथवा
सत्याग्रह से गांधी जी का क्या भाव है ? सत्याग्रह की विधियों का नाम बताएं।
उत्तर-
गांधी जी ने सार्वजनिक विरोध के लिए सत्याग्रह के सिद्धान्त का आविष्कार किया। सत्याग्रह का अर्थ है अहिंसा में अटूट विश्वास रखने वाले मनुष्य का सत्य के प्रति आग्रह । सत्याग्रह में सब कुछ सत्य के लिए किया जाता है, दूसरों को तनिक भी कष्ट या पीड़ा पहुंचाना उसका उद्देश्य नहीं होता। गांधी जी के शब्दों में, “सत्याग्रह का अर्थ है विरोधी को पीड़ा देकर नहीं, बल्कि स्वयं तकलीफ उठा कर सत्य की रक्षा करना।” यह सच्चाई के लिए तपस्या है। गांधी जी के अनुसार सत्याग्रह कमज़ोरों का शस्त्र नहीं है। सत्याग्रह वीरों का शस्त्र है। इस सिद्धान्त का गांधी जी ने स्वयं स्वतन्त्रता आन्दोलन में प्रयोग किया। एक सच्चा सत्याग्रही समझौते के किसी भी अवसर को खोता नहीं है और वह सदा विनम्र बना रहता है। व्यक्तिगत लाभ के लिए इसका प्रयोग नहीं किया जाता।

सत्याग्रह की विधियां-

  1. असहयोग (Non-Co-Operation)-गांधी जी के मतानुसार जो लोग अन्याय करते हों या दूसरों को अनुचित तरीकों से दबाते हों तो उनके साथ किसी भी तरह का सहयोग नहीं करना चाहिए।
  2. सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience)-शक्तिशाली शत्रु के ख़िलाफ लड़ने के लिए गांधी जी ने सविनय अवज्ञा के तरीके पर जोर दिया है। गांधी जी सशस्त्र प्रतिरोध के विरोधी थे पर उनका मत था कि मनुष्यों को सामूहिक सामाजिक कल्याण के विरुद्ध लागू होने वाले नियमों और अन्यायपूर्ण कानूनों को नहीं मानना चाहिए।
  3. हड़ताल (Strike)-गांधी जी के अनुसार दमन कर्ता या अन्याय करने वाले के विरुद्ध लड़ने का एक तरीका हड़ताल है।
  4. उपवास या व्रत-गांधी जी के अनुसार सत्याग्रह का एक तरीका उपवास या व्रत रखना है। प

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प्रश्न 3.
सत्याग्रह की चार विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  • असहयोग (Non-Co-Operation)-गांधी जी के मतानुसार जो लोग अन्याय करते हों या दूसरों को अनुचित तरीकों से दबाते हों तो उनके साथ किसी भी तरह का सहयोग नहीं करना चाहिए।
  • सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience)-शक्तिशाली शत्रु के ख़िलाफ लड़ने के लिए गांधी जी ने सविनय अवज्ञा के तरीके पर जोर दिया है। गांधी जी सशस्त्र प्रतिरोध के विरोधी थे पर उनका मत था कि मनुष्यों को सामूहिक सामाजिक कल्याण के विरुद्ध लागू होने वाले नियमों और अन्यायपूर्ण कानूनों को नहीं मानना चाहिए।
  • हड़ताल (Strike)-गांधी जी के अनुसार दमन कर्ता या अन्याय करने वाले के विरुद्ध लड़ने का एक तरीका हड़ताल है।
  • उपवास या व्रत-गांधी जी के अनुसार सत्याग्रह का एक तरीका उपवास या व्रत रखना है।

प्रश्न 4.
गांधी जी के चार महत्त्वपूर्ण विचार लिखो।
उत्तर-

  • अहिंसा सम्बन्धी विचार-गांधी जी अहिंसा के पुजारी थे। गांधी जी ने अहिंसा को आत्मिक तथा ईश्वरीय शक्ति बताया है। अहिंसा, आत्म बलिदान करने, कठिनाइयां सहने और दुःख भोगने के बाद भी सत्य और न्याय पर डटे रहने को ही कहा जा सकता है। सत्य, प्रेम, निर्भीकता, व्रत, नि:स्वार्थ भावना, आन्तरिक पवित्रता आदि अहिंसा के आधार हैं।
  • साधनों की पवित्रता पर विश्वास-व्यक्ति तथा समाज को सदाचार के सांचे में ढालने के लिए गांधी जी ने मानवीय आचरण को ऊंचा उठाने के लिए सत्य, अहिंसा और साधनों की पवित्रता पर जोर दिया। समाज में परिवर्तन लाने के लिए उन्होंने साधन की पवित्रता पर जोर दिया। गांधी जी का विश्वास था कि यदि कोई साधन का ध्यान रखे तो उद्देश्य अपना ध्यान स्वयं रख लेगा।
  • राज्य का कार्य क्षेत्र-गांधी जी के अनुसार राज्य को व्यक्ति के कार्यों में न्यूनतम हस्तक्षेप करने का अधिकार होना चाहिए। सर्वोत्तम सरकार वह है जो सबसे कम शासन करे। गांधी जी राज्य को कम-से-कम कार्य सौंपना चाहते थे।
  • गांधी जी ने व्यक्ति की नैतिक पवित्रता पर बल दिया है।

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प्रश्न 5.
राज्य सम्बन्धी गांधी जी के विचार लिखिए।
उत्तर-
गांधी जी के अनुसार राज्य संगठित तथा एकत्रित हिंसा का प्रतिनिधि हैं। व्यक्ति तो आत्मा का स्वामी है, परन्तु राज्य एक आत्मा रहित मशीन है। हिंसा को राज्य से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि राज्य इसके बल पर ही कायम है। गांधी जी का कहना था कि राज्य द्वारा पुलिस, न्यायालय और सैनिक शक्ति के माध्यम से व्यक्तियों पर अपनी इच्छा थोपी जाती है। गांधी जी ने राज्य को अनावश्यक बुराई इसलिए भी बताया, क्योंकि उनके विचारानुसार राज्य एक बाध्यकारी शक्ति है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास को कुण्ठित करती है। राज्य के विरोध में गांधी जी का यह भी तर्क था कि अहिंसा पर आधारित किसी भी आदर्श समाज में राज्य अनावश्यक है। अतः गांधी जी राज्य की शक्ति का अन्त करना चाहते थे, परन्तु वह राज्य की व्यवस्था का तुरन्त अन्त करने के पक्ष में नहीं थे।

प्रश्न 6.
महात्मा गांधी जी के अहिंसा सम्बन्धी विचारों पर विस्तार से वर्णन करें। (P.B. 2017)
अथवा
गांधी जी के अनुसार अहिंसा का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
गांधी जी पूरे संसार में अहिंसा के लिए प्रसिद्ध है। गांधी जी का अहिंसा से अभिप्राय है-“सृष्टि पर सब प्राणियों को मन, वाणी और कर्म से किसी प्रकार की कोई हानि न पहुंचाई जाए।” गांधी जी के अनुसार, अहिंसा का अर्थ है कि किसी को क्रोध में अथवा निजी स्वार्थ के लिए उसको चोट पहुंचाने के इरादे से दुःख न दिया जाए और न ही हत्या की जाए। अहिंसा से अभिप्राय सत्य के आग्रह से है। अहिंसा का अर्थ खतरे के समय कायरता दिखाना या हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहना नहीं है। गांधी जी के अनुसार अहिंसा ऐसी शक्ति है जो बिजली से भी अधिक तेज़ है और ईश्वर से भी अधिक शक्तिशाली है। भीषण से भीषण हिंसा का सामना ऊंची से ऊंची अहिंसा द्वारा किया जा सकता है। गांधी जी के अनुसार अहिंसा उन व्यक्तियों का शस्त्र है जो भौतिक रूप से कमज़ोर, परन्तु नैतिक रूप से बलवान् हैं। अहिंसा का मूल आधार सत्य है। प्रेम, आन्तरिक पवित्रता, व्रत, निर्भीकता, अपरिग्रह इत्यादि अहिंसा के महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं।

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प्रश्न 7.
गांधी जी के आदर्श राज्य (राम राज्य) की चार विशेषताएं लिखिए।
अथवा
गाँधी जी के आदर्श राज्य की चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
महात्मा गांधी के आदर्श राज्य के सिद्धांत की व्याख्या करो।
उत्तर-
1. विकेन्द्रीकरण-गांधी जी का अहिंसात्मक राम राज्य राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से विकेन्द्रित होगा। राज्य के केन्द्रीयकृत होने से व्यक्ति की आज़ादी नहीं रह जाती और व्यक्ति की आज़ादी के बिना अहिंसा पंगु बनकर रह जाएगी। गांधी जी आर्थिक व राजनीतिक शक्ति के विकेन्द्रीकरण के महान् समर्थक रहे हैं।

2. अपरिग्रह-गांधीवादी राज्य की एक अन्य विशेषता अस्तेय है। इस व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति ज़रूरत से अधिक वस्तु अपने पास नहीं रखेगा। उनका कहना था कि जो व्यक्ति भविष्य के लिए अपने पास चीजें इकट्ठी करता है उसे ईश्वर पर विश्वास नहीं है।

3. आदर्श समाज कृषि प्रधान होगा-गांधी जी के अनुसार, “जो समाज अपरिग्रह और शारीरिक श्रम के आदर्शों पर स्थापित किया जाएगा, वह खेती प्रधान होगा और ग्रामीण सभ्यता को अपनाएगा।” किन्तु गांधी जी ऐसे सादे औज़ारों और मशीनों का स्वागत करते थे जो बिना बेकारी बढ़ाए लाखों ग्रामीणों के बोझ को हल्का करते हैं। 4. धर्म-निरपेक्षता-गांधी जी के अनुसार राज्य धर्म-निरपेक्ष होना चाहिए।

प्रश्न 8.
गांधी जी का अमानती सिद्धात क्या है ?
अथवा
अमानतदारी प्रणाली किसे कहते हैं ?
उत्तर-
गांधी जी ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त समाज की वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था को समता व्यवस्था में बदलने का एक साधन है। यह पूंजीवाद को बढ़ावा नहीं देता तथा पूंजीपतियों को अपना सुधार करने का अवसर देता है। वह सम्पत्ति के व्यक्तिगत स्वामी बनने के सिद्धान्त को अस्वीकार करता है। उसके अनुसार देश की सारी भूमि, सम्पत्ति व उत्पादन के साधन सारे राष्ट्र अथवा समाज के हैं। यद्यपि उन पर बड़े-बड़े ज़मींदारों तथा पूंजीपतियों का नियन्त्रण है, परन्तु वे केवल उस सम्पत्ति के संरक्षक हैं। वे अपनी निजी साधारण आवश्यकता के अनुसार अपने लिए थोड़ी-सी सम्पत्ति का प्रयोग कर सकते हैं। इस प्रकार इस व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति अपनी सम्पत्ति को समाज के हितों को ध्यान में रखे बिना अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग करने में स्वतन्त्र नहीं होगा। जिस प्रकार लोगों के लिए न्यूनतम वेतन निश्चित करने का प्रस्ताव है उसी प्रकार लोगों की अधिकतम आय की सीमा भी निर्धारित करनी होगी। न्यूनतम और अधिकतम आय का भेद उचित न्याय पर आधारित होगा और समय-समय पर बदलता रहेगा।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 महात्मा गान्धी के राजनीतिक विचार

प्रश्न 9.
महात्मा गांधी कौन थे ?
उत्तर-
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी वास्तव में एक युग पुरुष थे। गांधी जी के नेतृत्व में भारत ने अपनी स्वतन्त्रता की लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ी तथा अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। महात्मा गांधी का असली नाम मोहनदास था। उनका जन्म 2 अक्तूबर, 1869 को आधुनिक गुजरात राज्य में स्थित पोरबन्दर नामक रियासत में हुआ। मोहनदास के पिता का नाम कर्मचन्द था तथा उनकी माता का नाम पुतली बाई था।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीयों ने असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन तथा भारत छोड़ो आन्दोलन चलाकर भारत को अंग्रेज़ों के चंगुल से आज़ाद कराया।

प्रश्न 10.
सविनय अवज्ञा आन्दोलन सम्बन्धी गांधी जी के विचारों का वर्णन कीजिए।
अथवा
गांधी जी के अनुसार सिविल अवज्ञा का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
शक्तिशाली शत्रु के खिलाफ लड़ने के लिए सविनय अवज्ञा भी गांधी जी की दृष्टि में एक अनोखा तरीका था। वे सशस्त्र प्रतिरोध (Armed Resistance) के विरोधी थे पर उनका मत था कि मनुष्यों को सामूहिक सामाजिक कल्याण के विरुद्ध लागू होने वाले नियमों और अन्यायपूर्ण कानूनों को नहीं मानना चाहिए। लोगों में ऐसे बुरे और अन्यायी कानूनों को बुरा बताने का साहस होना ज़रूरी है। उन्हें ऐसे सभी कानूनों को अमान्य कर जो भी कष्ट या दण्ड उन्हें दिया जाए, उसे सहने के लिए उस समय तक तैयार रहना चाहिए, जब तक कि उन कानूनों को रद्द न कर दिया जाए। गांधी जी के शब्दों में, “मेरा यह निश्चित मत है कि हमारा पहला कर्त्तव्य यह है कि हम स्वेच्छा से कानूनों का पालन करें पर ऐसा करते समय मैं इस नतीजे पर भी पहुंचा हूं कि जो कानून असत्य और अन्याय को बढ़ावा देते हों उनको तोड़ना भी हमारा आवश्यक कर्त्तव्य है।”

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 महात्मा गान्धी के राजनीतिक विचार

प्रश्न 11.
‘हिजरत’ से गांधी जी का क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
हिज़रत गांधी जी द्वारा प्रस्तुत सत्याग्रह के अनेक रूपों में से एक है। गांधी जी के मतानुसार यदि मनुष्य अन्याय सहन नहीं कर पाता और यह भी जानता है कि वह एक अच्छा सत्याग्रही नहीं बन सकता तो उसके लिए अपने पूर्वजों के उस स्थान को छोड़ देना या हिज़रत कर जाना ही सबसे अच्छा तरीका है। पर इसके इस्तेमाल करने वाले में भी बहुत साहस की ज़रूरत होती है। उसकी वजह यह है कि अपने पूर्वजों के स्थान पर जहां उसका जन्म हुआ, पल कर बड़ा हुआ, अपनी उस मातृभूमि के प्रति अत्यधिक लगाव की भावना उसमें पैदा हो जाती है। अतः अपने देश, रिश्तेदारों और दोस्तों आदि.से सम्बन्ध तोड़ कर दूर जाने का निश्चय करना अत्यन्त साहस की बात है। पर इसका सहारा भी बहुत सोच-समझ कर लेना चाहिए और जो ऐसा करें, उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
‘नौकरशाही, शब्द के अर्थ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
नौकरशाही अथवा ब्यूरोक्रेसी फ्रांसीसी भाषा के शब्द ब्यूरो से बना है जिसका अर्थ है-डेस्क या लिखने की मेज़। अतः इस शब्द का अर्थ हुआ डेस्क सरकार। इस प्रकार नौकरशाही का अर्थ डेस्क पर बैठकर काम करने वाले अधिकारियों के शासन से है।

दूसरे शब्दों में, नौकरशाही का अर्थ है प्रशासनिक अधिकारियों का शासन। नौकरशाही शब्द का अधिकाधिक प्रयोग लोक सेवा के प्रभाव को जताने के लिए किया जाता है।

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प्रश्न 2.
नौकरशाही की दो परिभाषाएं दें।
उत्तर-

  1. मार्शल ई० डीमॉक (Marshall E. Dimock) के अनुसार, “नौकरशाही का अर्थ है विशेषीकृत पद सोपान एवं संचार की लम्बी रेखाएं।”
  2. मैक्स वेबर (Max Weber) के अनुसार, “नौकरशाही प्रशासन की ऐसी व्यवस्था है जिसकी विशेषताविशेषज्ञ, निष्पक्षता तथा मानवता का अभाव होता है।”

प्रश्न 3.
नौकरशाही के कोई दो और नाम बताएं।
उत्तर-

  1. दफ्तरशाही
  2. अफसरशाही।

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प्रश्न 4.
नौकरशाही की दो मुख्य विशेषताओं को लिखो।
उत्तर-

  • निश्चित अवधि-नौकरशाही का कार्यकाल निश्चित होता है। सरकार के बदलने पर नौकरशाही पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मन्त्री आते हैं और चले जाते हैं, परन्तु नौकरशाही के सदस्य अपने पद पर बने रहते हैं। लोक सेवक निश्चित आयु पर पहुंचने पर ही रिटायर होते हैं।
  • निर्धारित वेतन तथा भत्ते-नौकरशाही के सदस्यों को निर्धारित वेतन तथा भत्ते दिए जाते हैं। पदोन्नति के साथ उनके वेतन में भी वृद्धि होती रहती है। अवकाश की प्राप्ति के पश्चात् नौकरशाही के सदस्यों को पेन्शन मिलती है।

प्रश्न 5.
नौकरशाही के किन्हीं दो कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
1. प्रशासकीय कार्य (Administrative Functions)—प्रशासकीय कार्य नौकरशाही का महत्त्वपूर्ण कार्य है। मन्त्री का कार्य नीति बनाना है और नीति को लागू करने की ज़िम्मेदारी नौकरशाही की है।

2. अपरिग्रह-गांधीवादी राज्य की एक अन्य विशेषता अस्तेय है। इस व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति ज़रूरत से अधिक वस्तु अपने पास नहीं रखेगा। उनका कहना था कि जो व्यक्ति भविष्य के लिए अपने पास चीज़ इकट्ठी करता है उसे ईश्वर पर विश्वास नहीं है।

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प्रश्न 7.
अमानतदारी प्रणाली (न्यासिता सिद्धान्त) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
गांधी जी ने आर्थिक विषमता को दूर करने और समाज में भाईचारे की भावना बनाए रखने के लिए ट्रस्टीशिप (अमानतदारी) का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उसके अनुसार उत्पादन एवं सम्पत्ति पर बड़े-बड़े ज़मींदारों तथा पूंजीपतियों का नियन्त्रण है, परन्तु वे केवल उस सम्पत्ति के संरक्षक हैं। वे अपनी निजी साधारण आवश्यकता के अनुसार अपने लिए थोड़ी-सी सम्पत्ति का प्रयोग कर सकते हैं। जिस प्रकार लोगों के लिए न्यूनतम वेतन निश्चित करने का प्रस्ताव है. उसी प्रकार लोगों की अधिकतम आय की सीमा भी निर्धारित करनी होगी। न्यूनतम और अधिकतम आय का भेद उचित न्याय पर आधारित होगा और समय-समय पर बदलता रहेगा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1.
महात्मा गांधी का जन्म कहां हुआ था ?
उत्तर-
महात्मा गांधी का जन्म गुजरात में हुआ।

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प्रश्न 2.
महात्मा गांधी जी को महात्मा की उपाधि किसने दी ?
उत्तर-
महात्मा गांधी जी को महात्मा की उपाधि रविन्द्र नाथ टैगोर ने दी।

प्रश्न 3.
सत्याग्रह की कोई एक विधि लिखें।
उत्तर-
सत्याग्रह की एक विधि असहयोग है।

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प्रश्न 4.
महात्मा गांधी जी के जीवन पर प्रभाव डालने वाले दो धार्मिक ग्रन्थों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. गीता
  2. बाइबल।

प्रश्न 5.
महात्मा गांधी जी का आदर्श राज्य किस प्रकार का है ?
उत्तर-
महात्मा गांधी जी का आदर्श राज्य राम राज्य जैसा है।

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प्रश्न 6.
महात्मा गांधी का जन्म कब हुआ ?
उत्तर-
महात्मा गांधी जी का जन्म 2 अक्तूबर, 1869 को हुआ।

प्रश्न 7.
गांधी जी के अहिंसा के बारे में विचार लिखो।
उत्तर-
गांधी जी के अनुसार अहिंसा सकारात्मक एवं गतिशील अवधारणा है, जोकि सभी प्राणियों के प्रति प्रेम, दया एवं सद्भावना की अभिव्यक्ति है।

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प्रश्न 8.
सिविल-ना-फरमानी से गांधी जी का क्या भाव था ?
उत्तर-
ब्रिटिश सरकार के गलत कानूनों को सामूहिक रूप से मानने से इन्कार करना।

प्रश्न 9.
हिज़रत से गांधी जी का क्या भाव है ?
उत्तर-
गांधी जी के अनुसार यदि मनुष्य अन्याय सहन नहीं कर पाता और वह भी जानता है कि वह एक अच्छा सत्याग्रही नहीं बन सकता तो उसके लिए अपने पूर्वजों के उस स्थान को छोड़ देना या हिज़रत कर जाना ही अच्छा है।

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प्रश्न 10.
गांधी जी किस विद्वान् को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे?
उत्तर-
महात्मा गांधी जी गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

प्रश्न 11.
महात्मा गांधी जी की सत्याग्रह की दो विधियों के नाम लिखो।
अथवा
सत्याग्रह की कोई एक विधि लिखो।
उत्तर-

  1. असहयोग
  2. धरना देना।

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प्रश्न 12.
महात्मा गांधी जी को राष्ट्रपिता का खिताब किसने दिया था ?
उत्तर-
महात्मा गांधी जी को राष्ट्रपिता का खिताब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने दिया था।

प्रश्न 13.
गांधी जी के आदर्श राज्य की एक विशेषता लिखो। .
उत्तर-
गांधी जी का आदर्श राज्य राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से विकेन्द्रित होगा।

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प्रश्न 14.
गांधी जी किस व्यक्ति से प्रभावित थे ?
उत्तर-
गांधी जी रस्किन, टॉलस्टाय तथा थ्योरो से अत्यधिक प्रभावित थे।

प्रश्न 15.
गांधी जी किस विद्वान् को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे?
उत्तर-
गांधी जी गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

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प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. महात्मा गांधी को भारत का ……………….. कहा जाता है।
2. महात्मा गांधी का जन्म ……………….. 1869 को हुआ।
3. महात्मा गांधी की पत्नी का नाम ..
था। 4. महात्मा गांधी एक मुकद्दमे की पैरवी करने के लिए सन् 1893 में ………………. गए।
5. महात्मा गांधी सन् ……… में दक्षिण अफ्रीका से भारत वापिस आए।
उत्तर-

  1. राष्ट्रपिता
  2. 2 अक्तूबर
  3. कस्तूरबा गांधी
  4. दक्षिण अफ्रीका
  5. 1915

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें

1. गांधी जी साधनों की पवित्रता पर विश्वास करते थे।
2. गांधी जी राज्य को साधन न मानकर साध्य मानते थे।
3. गांधी जी व्यक्ति की नैतिक पवित्रता पर बल देते थे।
4. गांधी जी केन्द्रीयकृत अर्थव्यवस्था में विश्वास रखते थे।
5. गांधी जी साम्राज्यवाद के विरुद्ध थे।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. ग़लत
  5. सही।

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प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
गांधी जी के अनुसार सत्याग्रह के स्वरूप हैं
(क) बातचीत
(ख) आत्मपीड़न
(ग) असहयोग
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ)

प्रश्न 2.
गांधी जी का राजनीतिक गुरु कौन था ?
(क) फिरोज़ शाह मेहता
(ख) गोपाल कृष्ण गोखले
(ग) दादा भाई नौरोजी
(घ) मौलाना अबुल कलाम।
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 3.
चम्पारण सत्याग्रह कब शुरू हुआ ?
(क) 1916 में
(ख) 1917 में
(ग) 1919 में
(घ) 1914 में ।
उत्तर-
(ख)

प्रश्न 4.
निर्धन ग्रामीणों के उत्थान के लिए गांधी जी ने कौन-सा विचार दिया था ?
(क) सर्वोदय
(ख) अन्त्योदय
(ग) निर्धनता उन्मूलन
(घ) इनमें से कोई भी नहीं।
उत्तर-
(ख)

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प्रश्न 5.
गांधी जी के अनुसार लोकतन्त्र की क्या विशेषता है ?
(क) विकेन्द्रित लोकतन्त्र
(ख) अहिंसावादी लोकतन्त्र
(ग) जनता वास्तविक सत्ता की स्वामी
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ)

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 4 महासागर

Punjab State Board PSEB 7th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 4 महासागर Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Social Science Geography Chapter 4 महासागर

SST Guide for Class 7 PSEB महासागर Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 1-15 शब्दों में दो

प्रश्न 1.
सागर का जल खारा क्यों होता है?
उत्तर-
सागर के जल में कई लवण घुले होते हैं। इसी कारण सागरीय जल खारा होता है।

प्रश्न 2.
न्यूफाऊण्डलैंड के पास हर समय घनी धुन्ध क्यों रहती है?
उत्तर-
न्यूफाऊण्डलैंड के पास खाड़ी की ऊष्ण धारा तथा लेब्राडोर की शीत धारा आपस में मिलती है। इसी कारण वहां सदा सघन धुन्ध रहती है।

प्रश्न 3.
दक्षिणी अन्ध महासागरीय चक्र की मुख्य धाराओं के नाम बताओ।
उत्तर-
दक्षिणी अन्ध महासागर की प्रमुख धाराएं हैं-फाकलैंड की धारा तथा बैंगुएला की धारा।

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प्रश्न 4.
खाड़ी की धारा के मार्ग का वर्णन करो।
उत्तर-
खाड़ी की धारा मैक्सिको खाड़ी से प्रारम्भ होकर न्यूफाऊण्डलैंड के टापुओं तक पहुंचती है।

प्रश्न 5.
उत्तरी शान्त महासागरीय चक्र की मुख्य धाराओं के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. उत्तरी भूमध्य रेखा की धारा
  2. कुरोश्विो की धारा
  3. उत्तरी प्रशान्त महासागरीय धारा
  4. कैलिफोर्निया की धारा।

प्रश्न 6.
सुनामी से क्या भाव है?
उत्तर-
सुनामी एक जापानी शब्द है जो कि दो शब्दों TSO (अर्थात् किनारा) और NAMI (अर्थात् पानी की ऊंची और लम्बी छड़ी) के मेल से बना है। इस प्रकार सुनामी का अर्थ है समुद्र के तटों पर टकराने वाली लम्बी ऊँची समुद्री लहरें।

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(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 50-60 शब्दों में दें

प्रश्न 1.
बड़े ज्वार-भाटे तथा लघु ज्वार-भाटे में क्या अन्तर है?
उत्तर-
बड़ा ज्वार-भाटा-जब सागर के जल की ऊंचाई सबसे अधिक होती है तो उसे बड़ा ज्वार-भाटा कहा जाता है। बड़ा ज्वार-भाटा केवल अमावस और पूर्णिमा को आता है। अमावस तथा पूर्णिमा को सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी एक सीधी रेखा में होते हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों मिल कर सागर के जल को अपनी ओर खींचते हैं।
लघु (छोटा) ज्वार-भाटा-लघु (छोटा) ज्वार भाटा चन्द्रमा की सातवीं तथा इक्कीसवीं तिथि को आता है। यह नीचा होता है।

इन तिथियों को सूर्य तथा चन्द्रमा पृथ्वी के साथ 90° का कोण बनाते हैं और दोनों ही अपनी शक्ति से जल को अपनी ओर खींचते हैं। क्योंकि चन्द्रमा जल के अधिक निकट होता है, इसलिए जल चन्द्रमा की ओर ही उछलता है। सूर्य का आकर्षण दूसरी दिशा में होने के कारण जल का उछाल अधिक ऊंचा नहीं होता।

प्रश्न 2.
गर्म धारा और ठण्डी धारा में क्या अन्तर है?
उत्तर-
(1) भूमध्य रेखा की ओर से आने वाली धाराएं गर्म होती हैं और भूमध्य रेखा की ओर आने वाली धाराएं सदा ठण्डी होती हैं।

(2) ऊष्ण (गर्म) जलधारा का जल इतना अधिक गर्म नहीं होता। इसी प्रकार शीत (ठण्डी) जलधारा का जल अधिक शीत नहीं होता। यह केवल अपने समीप के जल की तुलना में अधिक गर्म या ठण्डा लगता है।

(3) गर्म जलधारा जल के ऊपरी भाग में तथा ठण्डी धारा जल के नीचे प्रवाहित होती है।
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प्रश्न 3.
हिन्द महासागर की धाराएं इतनी निश्चित तथा नियमित क्यों नहीं?
उत्तर-
इसमें कोई सन्देह नहीं कि हिन्द महासागर में बहने वाली धाराएं नियमित तथा निश्चित नहीं हैं। इसका मुख्य कारण हिन्द महासागर में चलने वाली मौसमी पवनें हैं। ये पवनें गर्मी में दक्षिणी-पश्चिमी दिशा में परन्तु सर्दी में उत्तरपूर्व दिशा में चलती हैं। इस परिवर्तन के कारण सागरीय धाराएं भी ऋतु के अनुसार अपनी दिशा बदल लेती हैं। अतः स्पष्ट है कि ये धाराएं निश्चित एवं नियमित नहीं हो सकती।

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प्रश्न 4.
“बर्तानिया की पश्चिमी बन्दरगाहें सर्दी की ऋतु में भी खुली रहती हैं, जबकि इन्हीं अक्षांशों पर स्थित उत्तरी अमेरिका की पूर्वी बन्दरगाहें इस ऋतु में बर्फ जमने के कारण बन्द पड़ी रहती हैं।” कारण बताओ।
उत्तर-
धाराओं का किसी देश की जलवायु पर गहरा प्रभाव पड़ता है। शीत ऋतु में बर्तानिया के उत्तर-पश्चिम में सर्दी पड़ती है परन्तु उत्तरी अन्ध महासागरीय धारा पश्चिमी पवनों के प्रभावाधीन पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाती है। यह उष्ण धारा बर्तानिया के उत्तर-पश्चिम से होती हुई सुदूर नार्वे, स्वीडन के ठण्डे देशों तक पहुंचती हैं। अपने उष्ण प्रभाव के कारण सर्दी की ऋतु में भी बर्तानिया की पश्चिमी बन्दरगाहें खुली रहती हैं। परन्तु ऐसा वातावरण न मिलने के कारण उत्तरी अमेरिका की पूर्वी बन्दरगाहों में बर्फ जम जाती है और वे बन्द हो जाती हैं।

प्रश्न 5.
‘ज्वार-भाटा जहाजों के लिए बड़ा लाभदायक सिद्ध होता है।’ कैसे?
उत्तर-
1. ज्वार-भाटा के कारण नदियों के मुहानों में से कीचड़ तथा मिट्टी बहती रहती है। परिणामस्वरूप इन तटों पर स्थित बन्दरगाहों पर मिट्टी नहीं जमती और जहाज़ दूर अन्दर तक आ-जा सकते हैं।

2. बड़े तथा भारी जहाज़ दूर गहरे समुद्र में खड़े ज्वार-भाटों की प्रतीक्षा करते हैं। जब जल में चढ़ाव आता है तो जहाज़ भी उसके साथ बन्दरगाहों तक पहुंच जाते हैं। बन्दरगाहों पर माल उतार कर वे फिर ज्वार-भाटों की प्रतीक्षा करते हैं ताकि सागर की ओर सुगमता से वापिस जाया जा सके। कोलकाता तथा लन्दन की बन्दरगाहें इसके अच्छे उदाहरण हैं।

प्रश्न 6.
बड़ा ज्वार-भाटा पूर्णिमा तथा अमावस को क्यों आता है?
उत्तर-
बड़ा ज्वार-भाटा के समय सागरीय पानी का चढ़ाव अधिक होता है। यह सदा पूर्णिमा तथा अमावस के दिन ही होता है। इसका कारण यह है कि इन दोनों तिथियों को सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी एक ही सीध में आ जाते हैं। इस तिथि को सूर्य और चन्द्रमा मिलकर महासागरीय जल को अपनी ओर खींचते हैं। इस दोहरे आकर्षण के कारण लहरों का उछाल बढ़ जाता है जिसे बड़ा ज्वार-भाटा कहते हैं।

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प्रश्न 7.
खाड़ी की धारा यूरोप की जलवायु पर क्या प्रभाव डालती है?
उत्तर-
खाड़ी की धारा को अंग्रेज़ी में गल्फ स्ट्रीम कहते हैं। यह संसार की सबसे महत्त्वपूर्ण उष्ण जलधारा है। इसकी चौड़ाई लगभग 400 किलोमीटर तक है। इसका जल 5 किलोमीटर प्रति घण्टा के वेग से बहता है। न्यूफाऊण्डलैंड के समीप इस धारा में लैब्राडोर की शीत धारा आ मिलती है। परिणामस्वरूप यहां गहन धुन्ध छाई रहती है। यहां मछलियां भी अधिक मात्रा में मिलती हैं। इसके बाद यह यूरोप की ओर मुड़ जाती हैं। इसके कारण उत्तर-पश्चिमी यूरोप में शीत ऋतु अधिक ठण्डी नहीं होती। इसके अतिरिक्त यूरोप के तटीय भागों में वर्षा होती है।

प्रश्न 8.
सारागासो सागर क्या है तथा कैसे बनता है?
उत्तर-
उत्तरी अन्ध महासागर की धाराएं भूमध्य रेखा से आरम्भ होकर उत्तर की ओर जाती हैं। जाते हुए यह अमेरिका के तट के साथ-साथ आगे बढ़ती हैं और लौटते समय यूरोप के तट के साथ होते हुए फिर से भूमध्य रेखा की धारा के साथ मिल कर चक्र पूरा कर लेती हैं। इस प्रकार यह धारा चक्र घड़ीवत् दिशा में ही चलता है। महासागरों का जो भाग इस चक्र के बीच आ जाता है, उसे सारागासो सागर कहा जाता है।

प्रश्न 9.
सागरी लहरों तथा धाराओं में क्या अन्तर है?
उत्तर-
सागर का पानी सदा ऊंचा-नीचा होता रहता है। ऋतु की दशानुसार यह गति कभी तेज़ हो जाती है, कभी मन्द जिससे लहरें या तरंगें पैदा होती हैं। जल-कण ऊपर नीचे दौड़ते हैं जिससे सागर में सिलवटें पड़ी हुई दिखाई देती हैं।

जब सागर का जल किसी निश्चित दिशा की ओर चल पड़ता है तो उसे महासागरीय धारा कहा जाता है। महासागर में बड़े नियमित ढंग से जल एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान की ओर चलता रहता है। प्रायः धारा की गति 2 कि० मी० प्रति घण्टा से 10 कि० मी० प्रति घण्टा तक हो सकती है।

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प्रश्न 10.
सुनामी से सम्बन्धित किसी स्थान का वृत्तांत लिखो।
उत्तर-
26 दिसम्बर, 2004 को हिन्द महासागर में ज़बरदस्त सुनामी लहरें आईं। ये समुद्र के तल पर 9.0 के रिचर पैमाने पर आए भूकम्प के कारण उत्पन्न हुईं। इस भूकम्प का अधिकेन्द्र इण्डोनेशिया का पश्चिमी तट था। कुछ घण्टों में ही इन समुद्री लहरों ने 11 हिन्द महासागरीय देशों में भारी विनाश ला दिया। इनके कारण. कितने ही लोग बह गए और कितने ही घर डूब गए। इनके कारण समुद्री तट पर अफ्रीका से लेकर थाईलैंड तक अनेक देश बुरी तरह से प्रभावित हुए।

भारत सरकार के अनुमान के अनुसार लगभग 5322 करोड़ की जान-माल की हानि हुई। भारत में सबसे अधिक विनाश तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र प्रदेश तथा पाण्डेचेरी में हुआ। इसमें दो लाख से भी अधिक लोग मारे गए और इससे कई गुणा लोग बेघर हो गए।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125-130 शब्दों में दें

प्रश्न 1.
महासागरीय धाराएं क्यों चलती हैं? इनका किसी देश की जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
किसी निश्चित दिशा में बहने वाले महासागरीय जल को महासागरीय धारा कहते हैं। ये वास्तव में समुद्र के अन्दर बहने वाली गर्म और ठण्डे जल की नदियां होती हैं जिनके किनारों का जल स्थिर होता है।
चलने के कारण-महासागर धाराओं के चलने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

1. प्रचलित पवनें-प्रचलित पवनें सदा एक ही दिशा में चलती रहती हैं। ये समुद्र के जल को भी अपने साथ बहा कर ले जाती हैं। इस तरह धाराएं उत्पन्न होती हैं।

2. तापमान में अन्तर-भूमध्य रेखीय प्रदेशों में तापमान अधिक होता है। इस कारण वहां सागर का जल फैलता है और फैल कर ध्रुवों की ओर बढ़ता है। दूसरी ओर ध्रुवों पर तापमान कम होता है और वहां का जल भीतर-ही-भीतर भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने लगता है। इस प्रकार जल-धाराओं का जन्म होता है।

3. लवणों में अन्तर-समुद्र के जल में अनेक लवण घुले होते हैं। जिस जल में लवण अधिक होते हैं, वह जल भारी होकर नीचे बैठ जाता है। इसका स्थान लेने के लिए कम लवण वाला हल्का जल इसकी ओर बहने लगता है। इस कारण धारा उत्पन्न हो जाती है।

4. महाद्वीपीय तटों की बनावट-जल धाराएं महाद्वीपों के तटों के साथ-साथ बहती हैं। अतः महाद्वीपों के तटों की बनावट धाराओं को नई दिशा देती है। दिशा परिवर्तन के साथ ही एक नई धारा का जन्म होता है।

प्रभाव-समुद्री धाराएं अपने आस-पास के क्षेत्रों की जलवायु पर गहरा प्रभाव डालती हैं। गर्म धारा अपने पास के प्रदेशों की जलवायु को गर्म और ठण्डी धारा ठण्डा बना देती है। दूसरे, जिन देशों के पास से गर्म धाराएं गुज़रती हैं, वहां भारी वर्षा होती है, परन्तु जिन-जिन स्थानों के निकट से शीत धाराएं गुज़रती हैं, वहां कम वर्षा होती है और वे स्थान मरुस्थल बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त जहां उष्ण और शीत धाराएं आपस में मिलती हैं, वहां गहरी धुन्ध छा जाती है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 4 महासागर

प्रश्न 2.
अन्ध महासागरीय धाराओं का वर्णन विश्व के मानचित्र में दर्शा कर करें।
उत्तर-
अन्ध महासागर की धाराओं के दो निश्चित चक्र हैं-(1) उत्तरी चक्र तथा (2) दक्षिणी चक्र।
I. उत्तरी चक्र
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 4 महासागर 2

1. उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा-भूमध्य रेखा के उत्तर में समुद्र का जल व्यापारिक पवनों के कारण पूर्व से पश्चिम की ओर बहने लगता है। इस धारा को उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा कहते हैं। यह गर्म पानी की धारा है।

2. गल्फ स्ट्रीम अथवा खाड़ी की धारा-उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा अफ्रीका की ओर से अमेरिका की ओर बहती है। जब यह धारा अमेरिका के पूर्वी तट के साथ-साथ उत्तर-पश्चिम की ओर जाती है, तो इसका नाम खाड़ी की धारा पड़ जाता है। अंग्रेज़ी में इसे गल्फ स्ट्रीम कहते हैं। यह धारा मैक्सिको से प्रारम्भ होकर न्यूफाऊण्डलैंड के टापुओं तक पहुंचती है।

3. लैब्राडोर की धारा-यह शीत धारा है। यह उत्तर की ओर से आकर न्यूफाउण्डलैंड के टापुओं के पास खाड़ी की धारा में आ मिलती है।

4. उत्तरी महासागरीय धारा-न्यूफाऊण्डलैंड के पश्चात् खाड़ी की धारा पश्चिमी पवनों के प्रभाव में पूर्व की ओर हो जाती है। यहां इसे उत्तरी महासागरीय धारा कहते हैं।

5. कनेरी की धारा-उत्तरी महासागर की धारा यूरोप के पश्चिमी तट के साथ टकराती है जिससे इसके दो भाग हो जाते हैं। इसका एक भाग दक्षिण की ओर प्रवाहित होता है, जिसे कनेरी की धारा कहते हैं। यह शीत जल की धारा है। यह धारा अन्ततः भूमध्य रेखा की धारा में मिलकर उत्तरी चक्र को पूरा कर देती है।

II. दक्षिणी चक्र

यह चक्र घड़ी की विपरीत दिशा से चलता है।
1. दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा-यह गर्म पानी की धारा है। भूमध्य रेखा के दक्षिण में व्यापारिक पवनों के प्रभाव के कारण समुद्र का जल पूर्व से पश्चिम की ओर बहने लगता है। इसे दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा कहते हैं।

2. ब्राज़ील की धारा–भूमध्य रेखा की दक्षिणी धारा जब ब्राज़ील के तट के साथ टकराती है तो इसके दो भाग हो जाते हैं। इसका जो भाग ब्राजील के तट के साथ दक्षिण की ओर बहता है, उसे ब्राज़ील की धारा कहते हैं।

3. फाकलैंड की धारा-ब्राज़ील की धारा में दक्षिण की ओर से शीतल जल की धारा आकर मिल जाती है। इसी धारा को फाकलैंड की धारा कहते हैं। फिर यह धारा पश्चिमी पवनों के प्रभाव में आकर पूर्व की ओर मुड़ जाती है। इसे पश्चिमी पवनों का झाल कहा जाता है।
उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा तथा दक्षिणी भूमध्य रेखीय धारा के बीच विरोधी भूमध्य रेखीय धारा बहती है। यह पश्चिम से पूर्व की ओर चलती है।

4. बेंगुएला की धारा-यह ठण्डे पानी की धारा है। इसकी उत्पत्ति पश्चिमी पवनों के झाल से होती है। यह दक्षिणी अफ्रीका के पश्चिमी तट के साथ-साथ उत्तर की ओर बहती है।

प्रश्न 3.
शांत (प्रशान्त ) महासागर की धाराओं का वर्णन विश्व के मानचित्र में दर्शा कर करें।
उत्तर-
प्रशान्त महासागर संसार का सबसे बड़ा और गहरा महासागर है। इसकी धाराओं को क्रमश: दो मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है-1. उत्तरी चक्र
2. दक्षिणी चक्र।
I. उत्तरी चक्र

1. उत्तरी भूमध्य रेखा की धारा-प्रशान्त महासागर के उत्तरी भाग में व्यापारिक पवनें चलती रहती हैं। इन पवनों के प्रभाव के कारण महासागर में पूर्व से पश्चिम की ओर एक जल धारा बहने लगती है। इस धारा को उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा कहते हैं, जो गर्म पानी की धारा है।

2. कुरोशीवो की धारा-उत्तरी भूमध्य रेखा की धारा पूर्वी द्वीप के पास पहुँच कर उत्तर की ओर बहती है। यहां इसका नाम कुरोशीवो की धारा है।

3. उत्तरी प्रशान्त महासागरीय धारा-कुरोशीवो की धारा जब एशिया के पूर्वी तटों से टकराती है तो यह उत्तरपूर्व की ओर बहने लगती है। इसे उत्तरी प्रशान्त महासागरीय धारा कहते हैं।

4. कैलीफोर्निया की धारा-उत्तरी प्रशान्त महासागरीय धारा उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट के साथ टकराती है। यहां इसके दो भाग हो जाते हैं। इसका एक भाग अलास्का की धारा तथा दूसरा भाग कैलीफोर्निया की धारा कहलाता है क्योंकि कैलीफोर्निया की धारा ध्रुवों की ओर से आती है इसलिए यह शीत धारा है।

II. दक्षिणी चक्र
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1. भूमध्य रेखा की दक्षिणी धारा-भूमध्य रेखा के दक्षिण में समुद्र का जल व्यापारिक पवनों के प्रभाव के कारण पूर्व से पश्चिम की ओर बहने लगता है। इसे भूमध्य रेखा की दक्षिणी धारा कहते हैं जो गर्म पानी की धारा है।

2. पूर्वी आस्ट्रेलिया की धारा-यह भी गर्म पानी की धारा है। भूमध्य रेखा की दक्षिणी धारा पूर्वी-द्वीप समूह में पहुंच कर दक्षिण की ओर मुड़ जाती है और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के पास से बहने लगती है। इसे पूर्वी आस्ट्रेलिया की धारा कहते हैं।

3. दक्षिणी प्रशान्त महासागरीय धारा-यह गर्म पानी की धारा है। पूर्वी आस्ट्रेलिया की धारा पश्चिमी पवनों के कारण पूर्व की ओर बहने लगती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में होने के कारण यह धारा पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। इसे दक्षिणी प्रशान्त महासागरीय धारा कहते हैं।

4. पीरू की धारा-यह ठण्डे पानी की धारा है। दक्षिणी प्रशान्त महासागरीय धारा का एक भाग दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट से टकराता है और दक्षिण से उत्तर की ओर बहने लगता है। इसे पीरू की धारा कहते हैं। यह धारा भूमध्य रेखा की धारा में मिल कर प्रशांत महासागर की धाराओं के चक्र को पूरा कर देती है।

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प्रश्न 4.
ज्वार भाटा कैसे उत्पन्न होता है? चित्र बनाकर स्पष्ट करें।
उत्तर-
ज्वार-भाटा-समुद्र का पानी दिन में दो बार तट की ओर चढ़ता है तथा दो बार नीचे उतरता है। समुद्र के पानी के इसी उतार-चढ़ाव को ज्वार-भाटा कहते हैं।

ज्वार-भाटा आने का कारण-ज्वार-भाटा सूर्य और चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण आता है। यूं तो सूर्य की आकर्षण शक्ति चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से कई गुना अधिक है, परन्तु चन्द्रमा के पृथ्वी के अधिक निकट होने के कारण सागरीय जल पर इसकी आकर्षण शक्ति का अधिक प्रभाव पड़ता है। इसलिए चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति को ही ज्वार-भाटे का मुख्य कारण माना जा सकता है।
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बड़ा ज्वार-भाटा-बड़े ज्वार-भाटे से अभिप्राय लहरों के अत्यधिक ऊंचा उठने से है। ऐसा उस समय होता है जब सूर्य तथा चन्द्रमा दोनों मिल कर सगार के जल को अपनी ओर खींचते हैं। बड़ा ज्वार-भाटा केवल अमावस्या तथा पूर्णिमा को ही आता है। इन दोनों दिनों में सूर्य, चन्द्रमा तथा पृथ्वी एक सीधी रेखा में स्थित होते हैं। अतः चन्द्रमा और सूर्य मिल कर सागर के जल को अपनी ओर खींचते हैं। इसलिए सागर के जल की ऊंचाई अन्य दिनों की तुलना में अधिक होती है। इसे बड़ा ज्वार-भाटा कहते हैं।

छोटा ज्वार-भाटा-चन्द्रमा की सातवीं तथा इक्कीसवीं तिथि को चन्द्रमा और सूर्य दोनों ही पृथ्वी के साथ समकोण (90°) बनाते हैं। अतः वे दोनों ही सागर के जल को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं। क्योंकि चन्द्रमा सूर्य की अपेक्षा पृथ्वी के निकट है इसलिए सागर का जल चन्द्रमा की ओर से ही उछलता है। परन्तु जल में सूर्य के खिंचाव के कारण चन्द्रमा
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की आकर्षण शक्ति इतनी कम रह जाती है कि सागर का जल एक साधारण लहर से अधिक ऊंचा नहीं उठ पाता। इसे छोटा ज्वार-भाटा कहते हैं।

प्रश्न 5.
जलधारा (महासागरीय धारा) क्या है? इनकी उत्पत्ति के क्या कारण हैं?
उत्तर-
समुद्र के पानी का वह भाग जो निश्चित क्रम से एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर निश्चित दिशा में चलता है, उसे जलधारा अथवा महासागरीय धारा कहते हैं। ये वास्तव में समुद्र के अन्दर बहने वाली गर्म और ठण्डे जल की नदियां होती हैं जिनके किनारे स्थिर पानी के बने होते हैं।
चलने के कारण-महासागरीय धाराओं के चलने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

1. प्रचलित पवनें-प्रचलित पवनें सदा एक ही दिशा में चलती रहती हैं। ये समुद्र के जल को भी अपने साथ बहा कर ले जाती हैं। इस तरह धाराएं उत्पन्न होती हैं।

2. तापमान में अन्तर-भूमध्य रेखीय प्रदेशों में तापमान अधिक होता है। इस कारण वहां सागर का जल फैलता है और ध्रुवों की ओर बढ़ता है। दूसरी ओर ध्रुवों पर तापमान कम होता है और वहां का जल भीतर-ही-भीतर भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने लगता है। इस प्रकार जल-धाराओं का जन्म होता है।

3. लवणों में अन्तर-समुद्र के जल में अनेक लवण घुले होते हैं। जिस जल में लवण अधिक होते हैं, वह जल भारी होकर नीचे बैठ जाता है। इसका स्थान लेने के लिए कम लवण वाला हल्का जल इसकी ओर बहने लगता है। इस कारण धारा उत्पन्न हो जाती है।

4. महाद्वीपीय तटों की बनावट-जल धाराएं महाद्वीपों के तटों के साथ-साथ बहती हैं। अत: महाद्वीपों के तटों की बनावट धाराओं को नई दिशा देती है। दिशा परिवर्तन के साथ ही एक नई धारा का जन्म होता है।

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PSEB 7th Class Social Science Guide महासागर Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
महासागर किसे कहते हैं? महासागर की कोई एक विशेषता बताओ।
उत्तर-
धरातल पर जल के कुछ विशाल भण्डार (खण्ड) पाए जाते हैं। इन्हीं विशाल जल खण्डों को महासागर कहते हैं। इनका जल खारा होता है।

प्रश्न 2.
ज्वार-भाटा किसे कहते हैं?
उत्तर-
समुद्र का पानी दिन में दो बार तट की ओर ऊपर चढ़ता है और नीचे उतरता है। समुद्र के पानी के इस उतार-चढ़ाव को ज्वार-भाटा कहते हैं।

प्रश्न 3.
बड़ा ज्वार-भाटा पूर्णिमा तथा अमावस्या को क्यों आता है?
उत्तर-
पूर्णिमा और अमावस्या को चन्द्रमा के साथ सूर्य का आकर्षण भी मिल जाता है। इस दोहरे आकर्षण के कारण ज्वार-भाटा की ऊंचाई बढ़ जाती है जिसे- बड़ा ज्वार-भाटा कहते हैं।

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प्रश्न 4.
महासागरीय जल की कितनी गतियां हैं और कौन-कौन सी हैं?
उत्तर-
महासागरीय जल की तीन गतियां हैं। इनके नाम हैं-लहरें, सागरीय धाराएं तथा ज्वार-भाटा।

प्रश्न 5.
लहर और सागरीय धारा में कोई एक अन्तर बताओ।
उत्तर-
लहर में जल ऊंचा-नीचा होता रहता है, परन्तु यह गति नहीं करता। इसके विपरीत सागरीय धारा में जल एक दिशा से दूसरी दिशा की ओर गति करता रहता है।

प्रश्न 6.
हमारी पृथ्वी पर कितने महासागर हैं? इनके नाम तथा मुख्य विशेषता बताओ।
उत्तर-हमारी पृथ्वी पर पांच महासागर हैं। इनके नाम हैं –

  1. प्रशान्त महासागर
  2. अन्ध महासागर
  3. हिन्द महासागर
  4. उत्तरी ध्रुव हिम (आर्कटिक) महासागर
  5. दक्षिणी ध्रुव हिम (अंटार्कटिक) महासागर। ये सभी महासागर एक-दूसरे से जुड़े हैं। इनका पानी एक-दूसरे में मिलता रहता है।

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प्रश्न 7.
किन्हीं चार महासागरों का क्षेत्रफल बताओ।
उत्तर-
महासागर – क्षेत्रफल (करोड़ वर्ग कि० मी०)

  1. प्रशान्त महासागर – 16.6
  2. अन्ध महासागर – 8.2
  3. हिन्द महासागर – 7.3
  4. उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक) हिम महासागर – 1.3

प्रश्न 8.
ताजे पानी और नमकीन पानी में क्या अन्तर होता है?
उत्तर-
ताज़ा पानी-वर्षा, पिघलती बर्फ, नदियों, नहरों, नल-कूपों आदि द्वारा लाया गया पानी ताज़ा पानी होता है।
नमकीन पानी-झीलों, बन्द सागरों और खुले समुद्रों का पानी नमकीन होता है। सबसे अधिक नमक की मात्रा मृत सागर में है। यह सागर सभी ओर से स्थल से घिरा हुआ है।

प्रश्न 9.
संसार की सबसे महत्त्वपूर्ण उष्ण जलधारा कौन-सी है? यह कहां से कहां तक चलती है?
उत्तर-
संसार की सबसे महत्त्वपूर्ण उष्ण जलधारा खाड़ी की धारा है। यह मैक्सिको की खाड़ी से प्रारम्भ होकर न्यूफाऊण्डलैंड के टापुओं तक पहुंचती है।

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प्रश्न 10.
नार्वे के मछुआरे समुद्र में दूर तक मछलियां पकड़ने क्यों चले जाते हैं?
उत्तर-
नार्वे के समीप से होकर उत्तरी महासागरीय उष्ण धारा बहती है। इसके उष्ण प्रभाव के फलस्वरूप ही नार्वे के मछेरे दूर तक मछलियां पकड़ने चले जाते हैं।

प्रश्न 11.
पश्चिमी यूरोपीय देशों की पश्चिमी बन्दरगाहें सर्दी की ऋतु में भी क्यों खुली रहती हैं?
उत्तर-
उत्तरी महासागरीय धारा के उष्ण प्रभाव के कारण पश्चिमी यूरोपीय देशों की पश्चिमी बन्दरगाहें सर्दियों में भी खुली रहती हैं। उष्ण प्रभाव के कारण ये जमती नहीं हैं।

प्रश्न 12.
“शीत धाराओं के निकटवर्ती प्रदेशों में मरुस्थल पाए जाते हैं।” क्यों?
उत्तर-
जब कोई पवन शीत धारा के ऊपर से गुज़रती है तो यह ठण्डी और शुष्क हो जाती है। अतः शीत धाराओं के निकटवर्ती प्रदेशों में मरुस्थल बन जाते हैं।

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प्रश्न 13.
महासागरीय धाराएं जहाज़रानी पर क्या प्रभाव डालती हैं?
उत्तर-
सागरीय बेड़े प्रायः धाराओं की दिशा में चलते हैं। इससे उनकी गति बढ़ जाती है और ईंधन भी कम लगता है।

प्रश्न 14.
समुद्री धाराओं के पैदा होने के कोई दो कारण लिखो।
उत्तर-
समुद्री धाराओं के पैदा होने के दो कारण हैं –

  1. प्रचलित पवनें महासागरों के जल को अपनी दिशा में बहाकर ले जाती हैं।
  2. महासागरों के जल के तापमान में अन्तर के कारण भी जल में गति उत्पन्न होती है।

प्रश्न 15.
महासागरीय धाराओं का किसी देश की जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
(1) महासागरीय धाराओं का अपने पड़ोसी देशों की जलवायु पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। गर्म धाराएं अपने निकटवर्ती क्षेत्रों के तापमान को बढ़ा देती हैं। दूसरी ओर, ठण्डी धाराएं अपने निकट के स्थानों को ठण्डा बना देती हैं।

(2) गर्म धाराओं के ऊपर से गुजरने वाली पवनें नमी सोख लेती हैं और तटवर्ती प्रदेशों में वर्षा करती हैं। परन्तु शीत धारा के ऊपर से गुजरने वाली पवनें ठण्डी और शुष्क हो जाती हैं।

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प्रश्न 16.
महासागर तथा सागर में क्या अन्तर है?
उत्तर-
महासागर तथा सागर दोनों का सम्बन्ध पृथ्वी के जल भाग से है। जल के सबसे बड़े खण्ड महासागर कहलाते हैं। प्रत्येक महासागर फिर कई छोटे-छोटे खण्डों में बंटा हुआ है। इस छोटे खण्ड को सागर कहते हैं। प्रत्येक सागर किसी-न-किसी महासागर का ही भाग होता है। उदाहरण के लिए हिन्द महासागर में दो भाग हैं-अरब सागर तथा खाड़ी बंगाल।

प्रश्न 17.
लहर किसे कहते हैं? इसकी उत्पत्ति कैसे होती है?
उत्तर-
सागर का पानी सदा ऊंचा-नीचा होता रहता है। इसके साथ जल-कण ऊपर-नीचे होते रहते हैं। इस प्रकार सागर के जल में सिलवटें पड़ी हुई दिखाई देती हैं। इसी को लहर कहते हैं। लहरों का जन्म पवन की गति के कारण होता है। जब पवन समुद्र के ऊपर से गुज़रती है तो यह समुद्र के पानी को हिला देती है। पानी के हिलने पर लहरें उत्पन्न हो जाती हैं।

प्रश्न 18.
क्या कारण है कि उत्तर-पश्चिमी यूरोप में दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट की अपेक्षा अधिक वर्षा होती है?
उत्तर-
यूरोप के उत्तर-पश्चिमी तट के साथ-साथ उत्तरी अन्ध महासागर की गर्म धारा बहती है। गर्म धारा अपने निकटवर्ती प्रदेशों में वर्षा लाने में सहायक होती है। अतः इस धारा के कारण यूरोप के इस भाग में काफी वर्षा होती है। इसके विपरीत दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट के साथ पीरू की धारा बहती है। इस ठण्डी धारा के कारण अमेरिका के पश्चिमी तट के निकटवर्ती भागों में बहुत कम वर्षा होती है।

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प्रश्न 19.
उत्तरी हिन्द महासागर की धाराएं शीत तथा ग्रीष्म ऋतुओं में एक-दूसरे की विपरीत दिशा में क्यों बहती हैं?
उत्तर-
धाराओं की दिशा पर सबसे अधिक प्रभाव प्रचलित पवनों का होता है। पवनें जिस दिशा में लम्बे समय के लिए चलती हैं, वे समुद्र के जल को भी उसी दिशा में बहा कर ले जाती हैं। उत्तरी हिन्द महासागर में मौसमी पवनें शीत तथा ग्रीष्म ऋतुओं में विपरीत दिशा में चलती हैं। फलस्वरूप इस सागर की धाराएं भी विपरीत दिशा में बहने लगती

प्रश्न 20.
छोटा ज्वार-भाटा चन्द्रमा की सातवीं तथा इक्कीसवीं तिथि को ही क्यों आता है? कारण बताओ।
उत्तर-
चन्द्रमा की सातवीं तथा इक्कीसवीं तिथि को चन्द्रमा और सूर्य पृथ्वी के साथ समकोण (90°) बनाते हैं। परिणामस्वरूप चन्द्रमा और सूर्य सागर के जल को विपरीत दिशाओं में खींचने हैं। चूंकि चन्द्रमा पृथ्वी के अधिक निकट है, इसलिए सागर का जल चन्द्रमा की ओर ही उछलता है। परन्तु इस उछाल की ऊंचाई एक साधारण लहर से भी कम होती है। इसी को छोटा ज्वार-भाटा कहते हैं।

प्रश्न 21.
हिन्द महासागर की धाराओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करो। इन्हें मानचित्र पर भी दिखाओ।
उत्तर-
हिन्द महासागर की धाराओं का चक्र इतना निश्चित तथा नियमित नहीं है जितना कि प्रशान्त महासागर की धाराओं का। इसका मुख्य कारण इस महासागर की मौसमी पवनें हैं। ये पवनें ऋतु परिवर्तन के साथ अपनी दिशा बदल देती हैं। इसके साथ-साथ हिन्द महासागर की धाराओं की दिशा भी बदलती रहती है। इन धाराओं को दो मुख्य भागों में बांट सकते हैं –
(1) उत्तरी चक्र
(2) दक्षिणी चक्र

1. उत्तरी चक्र

1. दक्षिणी-पश्चिमी मानसून धारा-दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पवनों के प्रभाव के कारण हिन्द महासागर का जल पश्चिम से पूर्व की ओर बहने लगता है। इसे दक्षिणी-पश्चिमी मानसून धारा कहते हैं।

2. उत्तरी भूमध्य रेखी धारा-भूमध्य रेखा के उत्तर में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून धारा की दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर होती है। इसे उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा कहते हैं। यह गर्म पानी की धारा है।

3. उत्तरी-पूर्वी मानसून धारा-उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा का जल भूमध्य रेखा के उत्तर में पूर्व से पश्चिम की ओर बहने लगता है। इसे उत्तरी-पूर्वी मानसून धारा कहते हैं। यह गर्म पानी की धारा है।
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2. दक्षिणी चक्र

दक्षिणी गोलार्द्ध में धाराओं का चक्र अधिकतर निश्चित है जिसका वर्णन इस प्रकार है –
1. भूमध्य रेखा की दक्षिणी धारा-उष्ण जल की धारा पवनों के प्रभाव के कारण भूमध्य रेखा के दक्षिण में पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।

2. मौज़म्बीक की धारा-यह धारा भूमध्य रेखा की दक्षिणी धारा का ही एक भाग है। भूमध्य रेखा की दक्षिणी धारा जब अफ्रीका के पूर्वी तट के साथ टकराती है तो इसका पानी दक्षिण की ओर बहने लगता है। यह पानी दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट के पास से गुज़रता है। यहां इसे मौज़म्बीक की धारा कहते हैं। यह धारा गर्म पानी की धारा है।

3. अगुलहास की धारा-मैलागासी टापू के पूर्व से एक शाखा दक्षिण की ओर बहती है। इसे अगुलहास की धारा कहते हैं।

4. पश्चिमी आस्ट्रेलिया की धारा-दक्षिणी हिन्द महासागर की धारा आस्ट्रेलियां के दक्षिणी-पश्चिमी तटं के साथ टकराती है और इसका एक भाग उत्तर की ओर मुड़ जाता है। इसे पश्चिमी आस्ट्रेलिया की धारा कहते हैं। यह शीत धारा अन्त में उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा से जा मिलती है।

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(क) रिक्त स्थान भरो:

  1. ……………….. सबसे बड़ा तथा गहरा महासागर है।
  2. समुद्रों का पानी स्वाद में …………… होता है।
  3. भूमध्य रेखा की ओर जाने वाली जल धाराएं सदा …………… होती हैं।
  4. …………. ज्वारभाटा सदैव पूर्णिमा या अमावस के दिन ही आता है।

उत्तर-

  1. प्रशान्त महासागर,
  2. नमकीन,
  3. ठण्डी,
  4. बड़ा।

(ख) सही जोड़े बनाझर :

  1. चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति – अंध महासागर
  2. मौज़म्बीक की धारा – समुद्री धाराओं की उत्पत्ति
  3. खाड़ी की धारा – ज्वारभाटा की उत्पत्ति
  4. पवन की गति – हिन्द महासागर

उत्तर-

  1. चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति – ज्वारभाटा की उत्पत्ति
  2. मौज़म्बीक की धारा – हिन्द महासागर
  3. खाड़ी की धारा – अंध महासागर
  4. पवन की गति – समुद्री धाराओं की उत्पत्ति।

(ग) सही उत्तर चुनिए :

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर छोटे-बड़े पांच महासागर हैं। बताइए कि निम्नलिखित में से सबसे छोटा महासागर कौन-सा है?
(i) हिम (आर्कटिक) महासागर
(ii) अन्ध महासागर
(iii) हिन्द महासागर।
उत्तर-
(i) हिम (आर्कटिक) महासागर।

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प्रश्न 2.
दिए चित्र में क्या दर्शाया गया है?
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(i) महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति
(ii) ज्वरभाटा की उत्पत्ति
(iii) पृथ्वी पर जल और थल का वितरण।
उत्तर-
(iii) पृथ्वी पर जल और थल का वितरण।

प्रश्न 3.
संसार की सबसे महत्त्वपूर्ण उष्ण जल धारा कौन-सी है?
(i) ब्राजील की धारा
(ii) न्यूफाऊंडलैण्ड की धारा
(ii) खाड़ी की धारा।
उत्तर-
(iii) खाड़ी की धारा।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम

Punjab State Board PSEB 8th Class Home Science Book Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Home Science Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम

PSEB 8th Class Home Science Guide घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
मक्खी से कौन-से रोग फैलते हैं ?
उत्तर-
मक्खी से हैजा रोग फैलता है।

प्रश्न 2.
चूहे के पिस्सू से कौन-सी बीमारी फैलती है?
उत्तर-
चूहे के पिस्सू से प्लेग की बीमारी फैलती है।

प्रश्न 3.
मलेरिया किस मच्छर के काटने से होता है?
उत्तर-
मादा एनोफिलीज़ मच्छर के काटने से।

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प्रश्न 4.
मच्छरों को कैसे नष्ट किया सकता है?
उत्तर-
मच्छरों को डी० डी० टी० से नष्ट किया जाता है।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
कीड़े-मकौड़े कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
कीड़े-मकौड़े तीन प्रकार के होते हैंउत्तर-

  1. खून चूसने वाले-मच्छर, खटमल।
  2. भोजन को जहरीला बनाने वाले-मक्खी , चींटी।
  3. घर के सामान को हानि पहुंचाने वाले–काक्रोच, दीमक।

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प्रश्न 2.
मक्खी, मच्छर से बचने के लिए क्या करोगे ? इनसे क्या नुकसान हैं ?
अथवा
मक्खियों से कौन-से रोग फैलते हैं ? इनकी रोकथाम के ढंग लिखें।
उत्तर-
मक्खियों से बचने के उपाय

  1. घर के आस-पास मक्खियों के अण्डे देने और मक्खी पैदा होने के स्थान नष्ट कर देने चाहिए।
  2. गन्दगी वाले स्थान पर डी० डी० टी० के घोल का छिडकाव करना चाहिए। (3) कड़ेदान ढके होने चाहिए और उसके कूड़े का नियमित विसर्जन होना चाहिए।
  3. खाने की वस्तुओं को खुला नहीं छोड़ना चाहिए। उन्हें तार की जाली या मलमल के कपड़े से ढककर रखना चाहिए।
  4. दरवाज़े एवं खिड़कियों पर जाली लगवानी चाहिए।
  5. जब मक्खियाँ बहुतायत में हों तो मक्खीमार कागज़ तथा मक्खीमार दवा का इस्तेमाल करना चाहिए।
  6. मक्खियों के अण्डे, लारवा तथा प्यूपा को नष्ट करने के लिए क्रिसोल, तूतिया या सुहागे के घोल का छिड़काव कूड़ा-करकट वाले तथा अन्य ग़न्दे स्थानों पर करना चाहिए।
  7. नालियों में फिनायल का छिड़काव करना चाहिए।
  8. घर में स्वच्छता की ओर ध्यान देना चाहिए।

मक्खियों से नुकसान-मक्खी मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु है । यह अनेक रोगों, जैसे– हैंजा, पेचिस, तपेदिक, अतिसार आदि रोगों को फैलाने का कार्य करती है।

मक्खी उन गन्दे पदार्थों की ओर आकर्षित होती हैं जिनमें रोगों के रोगाणु या जीवाणु उपस्थित रहते हैं। जब यह गन्दगी पर बैठती है तो इसके रोंयेदार शरीर तथा चिपचिपे पैरों में गन्दगी व रोगों के जीवाणु लग जाते हैं। भोजन तथा कटे फलों आदि पर बैठकर यह रोगों के जीवाणुओं को वहाँ छोड़ देती है। इन रोगाणुयुक्त पदार्थों का सेवन करने से स्वस्थ व्यक्ति भी रोगों का शिकार हो जाता है।
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चित्र 6.1

मक्खी मच्छरों से बचने के उपाय

  1. घर के आँगन में या आस-पास पानी रुकने नहीं देना चाहिए।
  2. मच्छर शाम को काफी चुस्त होता है अतः शाम होते ही दरवाज़े व खिड़कियाँ बन्द कर देनी चाहिए।
  3. रात को सोने के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करना चाहिए।
  4. मच्छर मारने के लिए फ्लिट का छिड़काव खासतौर पर मोटे पर्दो व अलमारियों के पीछे तथा अन्धेरे कोनों में करना चाहिए।
  5. कमरे में रात को तम्बाकू, धूप, नीम की पत्ती, अगरबत्ती व गन्धक की धूनी देनी चाहिए।
    PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम 2
    चित्र 6.2 मच्छर
  6. सोने से पूर्व शरीर पर सरसों का तेल या ओडोमास क्रीम लगानी चाहिए।
  7. घर के आस-पास कूड़ा-करकट इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए। घर और आसपास की जगह साफ़ रखनी चाहिए।

मच्छरों से नुकसान

  1. मलेरिया-मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से।
  2. डेंगू बुखार-एडिस एजेप्टी मच्छर के काटने से।
  3. फाइलेरिया-मादा क्यूलेक्स मच्छर के काटने से।
  4. मस्तिष्क ज्वर-क्यूलेक्स की जाति के कारण।
  5. पीत ज्वर-एडिस मच्छर के काटने से।

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प्रश्न 3.
कॉकरोच को कैसे ख़त्म करोगे? यह क्या खराब करता है?
उत्तर-
कॉकरोच एक हानिकारक घरेलू कीट है। यह नमी वाले स्थानों पर होता है। इसलिए यह प्रायः शौचालय, रसोईघर व भण्डारगृह में अधिक मिलता है। यह भोजन और घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम अन्य सामान को खराब करता है। यह लगभग हर चीज़ को खा जाता है, जैसे-कूड़ा, पुराने कागज़, किताबें, चमड़ा, सब्जियों और फलों के छिलके और खाने की अन्य वस्तुएँ।
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चित्र 6.3 कॉकरोच
सेकथाम व नष्ट करने के उपाय

  1. सीलन वाले स्थानों की सफ़ाई जल्दीजल्दी करनी चाहिए।
  2. रसोई का फर्श बिल्कुल साफ़ रहना चाहिए।
  3. रसोईघर की तथा मकान की अन्य नालियों में सप्ताह में कम-से-कम एक बार मिट्टी का तेल या अन्य कीटनाशक दवा डालनी चाहिए। इसके बाद उबलता हुआ पानी नालियों में डालना चाहिए। इससे अण्डे देने के स्थान भी साफ़ हो जाते हैं।
  4. तिलचट्टों को मारने के विशेष अभियान में 10% डी०डी०टी० और 40% गैमेक्सीन या पाइरेथ्रम का छिड़काव करना चाहिए।
  5. पाइरेथ्रम पाउडर जलाने से ये बेहोश हो जाते हैं और फिर इन्हें झाड़ के साथ मारकर फेंक देना चाहिए।

प्रश्न 4.
किताबों के और कपड़ों के कीड़े से क्या नुकसान हैं ?
उत्तर–
किताबों के और कपड़ों के कीड़े से निम्नलिखित नुकसान हैं-

  1. ये पुस्तकों, तस्वीरों और गलीचे जो काफी दिनों तक बॉक्स में बंद रहते हैं उनको नुकसान पहुंचाते हैं।
  2. ये कीड़े रेशम के कपड़े और ऊनी कपड़ों को खाते हैं।
  3. ये कीड़े जो ऊनी कपड़ों में अण्डे होते हैं उनसे लारवा निकलते हैं। ये कपड़ों को खाते हैं जिनमें छेद हो जाते हैं।

प्रश्न 5.
कुछ ऐसे प्रतिकारक बताओ जिनको सब कीड़ों-मकौड़ों से बचाव के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
उत्तर-
कुछ मिले-जुले प्रतिकारक निम्नलिखित हैं-

  1. नींबू, तम्बाकू व तुलसी के पौधे।
  2. नीम, तम्बाकू आदि के पत्ते।
  3. चील काफूर की लकड़ी।
  4. यूक्लिप्टस की लकड़ी, पत्तियाँ व तेल।
  5. नैष्थलीन की गोलियाँ।।
  6. गन्धक, पाइरेथ्रम, बोरिक एसिड।
  7. साबुन का चूरा, फिटकरी या काली मिर्च का पाउडर।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम

प्रश्न 6.
खून चूसने वाले चार कीड़ों के नाम बताओ।
उत्तर-
मच्छर, खटमल, पिस्स, सैंड-फ्लाई।

प्रश्न 7.
पुस्तकों को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों का नाम बताओ।
उत्तर-
पुस्तकों को हानि पहुँचाने वाले कीड़े कॉकरोच, दीमक और झींगुर हैं।

प्रश्न 8.
भोजन वाली डोली के पाए पानी में क्यों रखने चाहिए?
उत्तर-
चींटियों से बचने के लिए भोजन वाली डोली के पाए पानी में रखने चाहिए।

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प्रश्न 9.
सैंडफ्लाई कैसा कीड़ा है और यह क्या नुकसान पहुँचाता है ?
उत्तर-
यह बहुत छोटा कीट है जो मच्छरदानी में भी पहुँच जाता है। विशेषकर रात को टखने और गुट पर काटता है। इससे बुखार भी हो जाता है।

प्रश्न 10.
खटमल कहाँ रहते हैं ? इनकी रोकथाम के ढंग लिखो।
उत्तर-
खटमल गन्दे फर्श, दरी या टूटे फर्श की दरार और खाट के सिरों में रहते हैं।
रोकथाम के ढंग-

  1. खटमल को नष्ट करने के लिए मिट्टी और तारपीन का तेल छिड़कना चाहिए।
  2. फर्श पर उबलता पानी डालना चाहिए इससे खटमल मर जाता है।
  3. खिड़की की चुगाठ को मिट्टी के तेल से साफ करना चाहिए।
  4. जहाँ खटमल हों वहाँ गंधक की धूनी करनी चाहिए।

प्रश्न 11.
मक्खीमार कागज़ कैसे तैयार किया जा सकता है?
उत्तर-
मक्खीमार कागज़ तैयार करने के लिए पाँच भाग अरंडी का तेल और आठ भाग रेजिन पाउडर लेकर गर्म करते हैं और उसे सूखने से पहले गर्म ही किसी कागज़ पर लगाते हैं। इस प्रकार मक्खी मार कागज़ तैयार हो जाता है।

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प्रश्न 12.
दीमक और झींगुर किस वस्तु की हानि करते हैं ?
उत्तर-
दीमक और झींगुर कागज़, लकड़ी और कपड़ों को नुकसान करते हैं।

प्रश्न 13.
घरेलू जीव-जन्तु कौन-कौन से हैं ? यह क्या नुकसान पहुंचाते हैं और इनसे कैसे बचा जा सकता है ?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कुछ ऐसे प्रतिकारक बताओ जिनको सब कीड़ों-मकौड़ों से बचाव के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
उत्तर-
कुछ मिले-जुले प्रतिकारक अग्रलिखित हैं-

  1. नींबू, तम्बाकू व तुलसी के पौधे।
  2. नीम, तम्बाकू आदि के पत्ते।
  3. चील काफूर की लकड़ी।
  4. यूक्लिप्टस की लकड़ी, पत्तियाँ व तेल।
  5. नैथलीन की गोलियाँ।
  6. गन्धक, पाइरेथ्रम, बोरिक एसिड।
  7. साबुन का चूरा, फिटकरी या काली मिर्च का पाउडर।

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प्रश्न 2.
सैंडफ्लाई, पिस्सू, खटमल को मारने के लिए क्या प्रयोग करोगे?
उत्तर-
1. सैंडफ्लाई-
यह बहुत छोटा कीड़ा है। यह मच्छरदानी में भी दाखिल हो जाता है। यह विशेषकर रात को टखने और मुँह पर काटता है। इससे बचने के लिए निम्न उपाय करने चाहिए
PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम 4
चित्र 6.4 सैंड फ्लाई

  1. कुर्सियों, मेज़ और चारपाई के नीचे मच्छरमार तेल छिड़कना चाहिए।
  2. रात को मच्छरमार धूप जलानी चाहिए।
  3. बहुत बारीक मच्छरदानी का प्रयोग करना चाहिए।
  4. घर के आस-पास की गीली जगहों पर फिनाइल छिड़कना चाहिए।

2. पिस्सूप्लेग बीमारी का कारण चूहे के पिस्सू होते हैं। पिस्सू छोटे और भूरे रंग के होते हैं। इनको मारने के निम्न उपाय करने चाहिए
PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम 5
चित्र 6.5 पिस्सू

  1. घर में पाले कुत्ते को कार्बोलिक साबुन से नहलाना चाहिए और नहलाने के पानी में कार्बोलिक अम्ल डालना चाहिए।
  2. जहाँ भी पिस्सू की सम्भावना हो, मिट्टी का तेल या तारपीन का तेल छिड़कना चाहिए।
  3. चूहों के द्वारा भी पिस्सू फैलते हैं अतः पिस्सू को नष्ट करने से पहले चूहों को नष्ट करना चाहिए।
  4. दीवार तथा फर्श की दरारों को सीमेंट से भर देना चाहिए।
  5. भूमि पर नमक अथवा चूना छिड़क देना चाहिए।
  6. सूर्य की तेज़ किरणों के प्रभाव से पिस्सुओं के लारवा मर जाते हैं।
  7. जीवाणुनाशक पाऊडर का प्रयोग करना चाहिए जिससे पिस्सुओं द्वारा प्लेग न फैले।

3. खटमल-खटमल गन्दे फर्श, दरी या टूटे फर्श की दरार और खाट के सिरों में रहते हैं। खटमल लाल भूरे रंग का कीड़ा होता है। यह 1/6 इंच से 1/7 इंच तक लम्बा होता है।
खटमल मारने के उपाय
PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम 6
चित्र 6.6 खटमल

  1. खटमल को नष्ट करने के लिए मिट्टी और तारपीन का तेल मिलाकर छिड़कना चाहिए।
  2. फर्श पर उबलता पानी डालना चाहिए इससे भी खटमल मर जाता है।
  3. जहाँ खटमल हो वहाँ गंधक की धूनी करनी चाहिए। इससे खटमल मर जाता है।

प्रश्न 3.
चूहे के घर में होने से क्या हानि होती है ? बचाव के उपाय बताओ।
उत्तर-
चूहे घर की खाद्य सामग्री तथा कपड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। ये भण्डार घर में अधिक पलते हैं।
चूहों पर प्लेग के कीट पिस्सू रहते हैं और चूहों के द्वारा ही वे मनुष्य तक पहुँचते हैं। ऐसे चूहे जिन व्यक्तियों को काटते हैं वे प्लेग के रोगी हो जाते हैं। इस प्रकार चूहे पिस्सुओं को आश्रय देकर बीमारियाँ फैलाते हैं। ‘
चूहों से बचाव के उपाय-

  1. चूहों के बिलों को काँच से या सीमेंट से भरकर अच्छी तरह बन्द कर देना चाहिए।
  2. चूहे मारने की दवा आटे में मिलाकर उनके बिल के पास डाल देने से चूहे उसे खाकर मर जाते हैं।
  3. भण्डारघर व रसोईघर में सभी खाद्य सामग्री को बन्द पीपों या डिब्बों में रखना चाहिए।
  4. भण्डारघर में से कुछ भी खाद्य सामग्री निकालते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि कुछ भी ज़मीन पर न बिखरे।
  5. सब्जियाँ तथा फलों को तारों वाली टोकरी में ऊँची जगह पर टाँगना चाहिए।
  6. घर साफ-सुथरा रखना चाहिए। कोई भी खाने की चीज़ इधर-उधर नहीं बिखरनी चाहिए।
  7. इनको पकड़ने के लिए पिंजड़े (चूहेदानी) का प्रयोग करना चाहिए।
  8. चूहों को पकड़ने पर उन्हें अपने स्थान से बहुत दूर छोड़कर आना चाहिए।

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प्रश्न 4.
छिपकली और मकड़ी से छुटकारा पाने के ढंग बताओ।
उत्तर-
छिपकली से छुटकारा पाने के ढंग

  1. घर की दीवारों एवं छिद्रों में तथा फर्नीचरों में फ्लिट या डी० डी० टी० छिड़कते रहना चाहिए क्योंकि ऐसी जगहों पर ये अपना बिल बना लेती हैं।
  2. घर के भोज्य पदार्थों को ढककर रखना चाहिए।
  3. घर को साफ़ एवं कीटरहित रखना चाहिए क्योंकि कीट ही छिपकली का भोजन है। घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम

मकड़ी से छुटकारा पाने के ढंग-

  1. घर को सदा साफ़ रखना चाहिए।
  2. फ्लिट तथा डी० डी० टी० पाउडर घर की दीवारों पर छिड़कना चाहिए।
  3. मकड़ी के जालों को साफ करते रहना चाहिए।

प्रश्न 5.
कीड़े और जीव-जन्तु मारने के लिए कौन-कौन सी कीटाणुनाशक दवाइयों का प्रयोग किया जा सकता है?
उत्तर-
कीड़े और जीव-जन्तु मारने के लिए निम्नलिखित कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग किया जा सकता है

  1. चूना-कच्चा तथा बुझा हुआ।
  2. पोटेशियम परमैंगनेट (लाल दवाई)।
  3. साबुन।
  4. डी० डी० टी०
  5. नीला तूतिया (कॉपर सल्फेट)
  6. कार्बोलिक अम्ल-कार्बोलिक साबुन तथा घोल के रूप में।
  7. डेटोल।
  8. फ़ार्मेलिन।
  9. लाईसोल।
  10. फिनाइल।
  11. क्रिसोल।
  12. क्लोरीन गैस।
  13. गन्धक का धुआँ।
  14. फार्मेल्डिहाइड गैस के रूप में।

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प्रश्न 6.
जुएँ कहाँ तथा क्यों पड़ जाती हैं ? इसकी रोकथाम के उपाय बताओ।
उत्तर-
जुएँ मनुष्य के सिर में तथा शरीर पर हो जाती हैं। सिर की जुएँ सिर के बालों में रहती हैं। यहाँ वे अण्डे देती हैं जिन्हें लीख कहते हैं। दूसरे प्रकार की जुएँ गन्दे कपड़ों व शरीर की त्वचा पर रहती हैं जुएँ बड़ी आसानी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँच जाती हैं।
जुएँ गन्दी होती हैं। इनसे टाइफस बुखार तथा त्वचा के रोग हो जाते
जुओं की रोकथाम के ढंग-
PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम 7
चित्र 6.7 जूं

  1. जूं के मिलते ही उसे मार देना चाहिए।
  2. सिर में जुएँ होने पर बाज़ार में उपलब्ध जूं मार रसायन को। लगाकर कुछ घण्टों के बाद सिर धो लेना चाहिए।
  3. सिर में यदि जुएँ अधिक संख्या में हों तो बाल कटवा देने चाहिए।
  4. नारियल के तेल में मुश्क-कपूर डालकर सिर में मलने से भी जुएँ मर जाती हैं।
  5. शरीर में जुएँ होने पर बुने हुए कपड़ों को फर्श पर रखकर ऊपर खूब गर्म पानी डालना चाहिए। व्यक्ति को गर्म पानी व साबुन से मल-मलकर नहाना चाहिए।
  6. मैले कपड़ों को उबलते पानी में डालकर धोना चाहिए।
  7. बिस्तर की चादरों आदि की सफ़ाई रखनी भी आवश्यक है।

Home Science Guide for Class 8 PSEB घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम Important Questions and Answers

I. बहुविकल्पी प्रश्न

प्रश्न 1.
रक्त चूसने वाला कीट है
(क) मच्छर
(ख) मक्खी
(ग) काकरोच
(घ) दीमक।
उत्तर-
(क) मच्छर

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प्रश्न 2.
प्लेग की बिमारी किस से फैलती है ?
(क) मच्छर
(ख) चूहा
(ग) चींटी
(घ) सभी।
उत्तर-
(ख) चूहा

प्रश्न 3.
घर के सामान को हानि पहुँचाने वाला कीट है
(क) चींटी
(ख) खटमल
(ग) दीमक
(घ) मच्छर
उत्तर-
(ग) दीमक

प्रश्न 4.
………… कपड़ों तथा पुस्तकों को नष्ट करता है।
(क) झींगुर
(ख) मच्छर
(ग) खटमल
(घ) काकरोच।
उत्तर-
(क) झींगुर

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प्रश्न 5.
मक्खी से रोग फैलते हैं
(क) हैजा
(ख) पेचिश
(ग) तपैदिक
(घ) सभी ठीक
उत्तर-
(घ) सभी ठीक

प्रश्न 6.
मलेरिया के इलाज के लिए कौन-सी दवाई का प्रयोग होता है ?
(क) दाल चीनी
(ख) कुनीन
(ग) सौंफ
(घ) अजवाइन।
उत्तर-
(ख) कुनीन

प्रश्न 7.
ठीक तथ्य है
(क) मलेरिया एनाफलीज़ मच्छर के कारण होता है।
(ख) फाइलेरिया, मादा क्यूलैक्स की जाती के कारण होता है।
(ग) चूहे के पिस्सू से प्लेग की बिमारी फैलती है।
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक

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II. ठीक/गलत बताएं

  1. मच्छर भोजन को ज़हरीला बना देता है।
  2. सैंड फलाई छोटा कीट है जो मच्छरदानी में भी दाखिल हो जाता है।
  3. नेवला तथा बिल्ली पालने से सांप से बचाव होता है।
  4. दीमक लाभदायक कीट है।
  5. मादा एनाफलीज़ मच्छर के काटने से मलेरिया होता है।
  6. डेंगू बुखार ऐडीज एजेपटी मच्छर के कारण होता है।

उत्तर-

III. रिक्त स्थान भरें

  1. एनाफलीज मच्छर से ………… हो जाता है। (From Board M.O.P.)
  2. कीड़े-मकौड़ों को ………….. श्रेणियों में बांटा गया है।
  3. ……………… कपड़ों तथा पुस्तकों को नष्ट करती हैं।
  4. चूहे ……………….. के पिस्सू पैदा करते हैं।
  5. खटमल से ……………. ज्वर हो जाता है।

उत्तर-

  1. मलेरिया,
  2. तीन
  3. झींगुर,
  4. प्लेग,
  5. काला।

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IV. एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
बाल-पक्षाघात रोग किस अवस्था में होता है ?
उत्तर-
बच्चों में 5-7 वर्ष की अवस्था में।

प्रश्न 2.
मलेरिया के उपचार के लिए किस औषधि का प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर-
कुनीन।

प्रश्न 3.
मच्छरों से कौन-सा बुखार फैलता है?
उत्तर-
मलेरिया।

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प्रश्न 4.
प्लेग की बीमारी किससे फैलती है ?
उत्तर-
चूहे के पिस्सू से ।

प्रश्न 5.
मक्खी से कौन-से रोग फैलते हैं ?
उत्तर-
हैजा रोग।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चूहे हानिकारक हैं, कैसे?
उत्तर-
क्योंकि इससे रोग के कीटाणु फैलते हैं।

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प्रश्न 2.
खटमल से कौन-से रोग फैलते हैं ?
उत्तर-
खटमल से काला ज्वर और चर्म रोग फैलते हैं।

प्रश्न 3.
कीड़ों द्वारा फैलने वाले रोगों के उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
मलेरिया, डेंगू, ज्वर, प्लेग, रिलेप्सिंग ज्वर

प्रश्न 4.
मलेरिया के प्रमुख लक्षण क्या हैं ?
उत्तर-
जी घबराना, सिर दर्द, ठण्ड व कंपकपी के साथ ज्वर चढ़ना।

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प्रश्न 5.
प्लेग रोग किन कीटों के काटने से होता है?
उत्तर-
पिस्सुओं के काटने से।

प्रश्न 6.
प्लेग के प्रमुख लक्षण क्या हैं?
उत्तर-
105°-107°F तक ज्वर, कभी-कभी उल्टियाँ तथा दस्त लगना, बगल तथा जाँघ में गिल्टियाँ निकलना।

प्रश्न 7.
डेंगू ज्वर किस मच्छर के काटने से होता है ?
उत्तर-
एडिस ऐजेप्टी।

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प्रश्न 8.
डेंगू ज्वर के क्या लक्षण हैं ?
उत्तर-
ज्वर, पीठ तथा अन्य अंगों में पीड़ा, भूख व नींद मर जाना तथा कमज़ोरी।

प्रश्न 9.
पुनराक्रमण ज्वर (रिलेप्सिंग ज्वर) किन कीटों द्वारा होता है ?
उत्तर-
नँ और खटमल के द्वारा रक्त चूसने से।

प्रश्न 10.
पुनराक्रमण ज्वर के मुख्य लक्षण क्या हैं ?
उत्तर-
ज्वर 104° फा० तक, शरीर पर गुलाबी रंग के दाने, कभी-कभी उल्टी व चक्कर।

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प्रश्न 11.
तपेदिक या क्षय रोग के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
बाल-विवाह, अपूर्ण खुराक, कमज़ोरी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
चींटियों से क्या नुकसान होता है ? इनसे बचाव के उपाय लिखो।
उत्तर-
चींटियाँ मृत जीव-जन्तु और गन्दगी की सफ़ाई करती हैं परन्तु ये काटकर नुकसान भी पहुंचाती हैं। चींटियाँ अगर खाने में पड़ जाती हैं तो खाना दूषित तथा थोड़ा विषैला हो जाता है।
PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम 8
चित्र 6.8 चींटी
चींटियों से बचाव के उपाय-

  1. ये मीठे पदार्थों पर शीघ्र चढ़ती हैं अत: शहद व मुरब्बे आदि की शीशियों को पानी में रखना चाहिए।
  2. भोजन वाली डोली (अलमारी) के पाए पानी में रखने चाहिए।
  3. चींटियों की खुड्डों में बोरेक्स या हल्दी डाल देनी चाहिए।

प्रश्न 2.
मकड़ी से क्या हानि है ?
उत्तर-
मकड़ी गन्दे स्थानों पर पाई जाती है। यह घरेलू कीड़ेमकोड़े खाती है। यदि इसके मुँह से निकलने वाला लसलसा पदार्थ शरीर के किसी भी स्थान पर पड़ जाए तो वहाँ फफोले पड़ जाते हैं।
PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम 9
चित्र 6.9 मकड़ी

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प्रश्न 3.
झींगुरों से बचाव के उपाय लिखो।
उत्तर-
झींगुर कागज़ व सूती कपड़े खाते हैं। आमतौर पर ये दिन में अन्धेरे कोनों में छिपे रहकर रात में बाहर आते हैं। झींगुरों से बचाव के उपाय निम्न हैं-
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चित्र 6.10 झींगुर

  1. वस्त्रों में नैप्थलीन की गोलियाँ रखनी चाहिए।
  2. इनके स्थानों पर सुहागे, पाइरेथ्रम या गन्धक का प्रयोग मददगार होता है।
  3. समय-समय पर कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव इस कीट को नाश करने में सहायक होता है।
  4. इनकी संख्या बढ़ जाने पर बन्द कमरे में पाइरेथ्रम पाउडर को जलाकर उसके धुएँ से इन्हें मारा जाता है।
  5. इनकी रोकथाम का सर्वोत्तम उपाय घरों की सफ़ाई करते रहना है।

प्रश्न 4.
कपड़ों के कीड़े ( पतंगों) की रोकथाम के उपाय बताओ।
उत्तर-
कपड़ों के पतंगों के लारवा गर्म कपड़ों और बुनी पोषाकों को नष्ट करते हैं। अण्डे जो ऊनी कपड़ों में दिए जाते हैं, उनसे लारवा निकलते हैं। ये कपड़ों को खाते हैं जिनसे उनमें छेद हो जाते हैं। इनकी रोकथाम के उपाय निम्न हैं—

  1. कपड़ों को जल्दी-जल्दी धूप दिखाते रहने से इनके लारवा मर जाते हैं।
  2. ऊनी कपड़ों को अख़बार में लपेटकर टिन के हवाबन्द बक्स में रखना चाहिए। अख़बारों की मुद्रण स्याही से ये पतंगें दूर भागते हैं।
  3. कपूर और नैष्थलीन की गोलियाँ भी कपड़ों में रखने से बचाव होता है।

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प्रश्न 5.
दीमक की रोकथाम और नष्ट करने के उपाय बताओ।
उत्तर-
दीमक मनुष्य के शरीर को हानि नहीं पहुँचाती, परन्तु घर में फर्नीचरों, छतों, दरवाज़ों, अन्य लकड़ी के सामान, पुस्तकों, वस्त्रों आदि को नष्ट कर देती है। लकड़ी इनका मुख्य भोजन है। इनसे बचाव के निम्नलिखित उपाय करने चाहिए
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चित्र 6.11 दीमक

  1. लकड़ी के समान, पुस्तकें आदि को सीलन से बचाना चाहिए।।
  2. लकड़ी की वस्तुओं में जो दरारें हों, उन्हें या तो भर देना | चाहिए या उनमें मिट्टी के तेल का छिड़काव करना चाहिए।
  3. जिन वस्तुओं में दीमक जल्दी लग जाती है उन्हें सप्ताह में एक बार धूप में रखना चाहिए।
  4. दीमक की सम्भावना वाले सामान पर डी० डी० टी० छिड़कते रहना चाहिए।

प्रश्न 6.
सिल्वर फिश किन चीज़ों को नुकसान पहुँचाती है ? इसकी रोकथाम के उपाय बताओ।
उत्तर-
यह घरों में तस्वीरों के फ्रेम के पीछे के गत्ते, किताबों और कपड़ों को खाती है। यह कृत्रिम रेशम, माँडी लगे कपड़े, कागज़ और लुगदी पर निर्भर होती है। इसकी रोकथाम के उपाय निम्नलिखित हैं

  1. अलमारियों, दराज़ों और बक्सों को अच्छी तरह साफ़ रखना चाहिए।
  2. कागज़ के टुकड़ों जैसे अनावश्यक पदार्थों को घर में इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए।
  3. किताबों की समय-समय पर देखभाल की जानी चाहिए।
  4. पाइरेथ्रम का पाउडर छिड़कना चाहिए।
  5. पाइरेथ्रम तथा गन्धक का धुआँ भी सिल्वर फिश का नाश करता है।

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प्रश्न 7.
मच्छर से बचने के उपाय बताओ।
उत्तर-
मक्खी मच्छरों से बचने के उपाय

  1. घर के आँगन में या आस-पास पानी रुकने नहीं देना चाहिए।
  2. मच्छर शाम को काफी चुस्त होता है अतः शाम होते ही दरवाज़े व खिड़कियाँ बन्द कर देनी चाहिए।
  3. रात को सोने के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करना चाहिए।
  4. मच्छर मारने के लिए फ्लिट का छिड़काव खासतौर पर मोटे पर्दो व अलमारियों के पीछे तथा अन्धेरे कोनों में करना चाहिए।
  5. कमरे में रात को तम्बाकू, धूप, नीम की पत्ती, अगरबत्ती व गन्धक की धूनी देनी चाहिए।
    PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम 2
    चित्र 6.2 मच्छर
  6. सोने से पूर्व शरीर पर सरसों का तेल या ओडोमास क्रीम लगानी चाहिए।
  7. घर के आस-पास कूड़ा-करकट इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए। घर और आसपास की जगह साफ़ रखनी चाहिए।

प्रश्न 8.
कीड़े-मकौड़ों को हम कितनी श्रेणियों में बांट सकते हैं ? प्रत्येक का उदाहरण दें।
उत्तर-
कीड़े-मकौड़ों को हम तीन श्रेणियों में बांट सकते हैं-

  1. खून-चूसने वाले-मच्छर,
  2. भोजन को ज़हरीला बनाने वाले-कीड़े,
  3. घर के सामान के नुक्सान पहुंचाने वाले-दीमक।

प्रश्न 9.
पिस्सू और खटमल को मारने के लिए क्या करेंगे ?
उत्तर-
देखें प्रश्न 7 (अभ्यास का) का उत्तर।।

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प्रश्न 10.
मच्छरों से क्या हानि है ? इसकी रोक-थाम कैसे करोगे ?
उत्तर-
मच्छरों से नुकसान

  1. मलेरिया-मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से।
  2. डेंगू बुखार-एडिस एजेप्टी मच्छर के काटने से।
  3. फाइलेरिया-मादा क्यूलेक्स मच्छर के काटने से।
  4. मस्तिष्क ज्वर-क्यूलेक्स की जाति के कारण।
  5. पीत ज्वर-एडिस मच्छर के काटने से।

प्रश्न 11.
मक्खियों के बचाव के लिए आप क्या करेंगे तथा इनका क्या नुक्सान है ?
उत्तर-
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 12.
(क) नीम, तम्बाकू या तुलसी का पौधा घर में क्यों लगाना चाहिए?
(ख) साँप बिच्छ्र से बचने के लिए क्या करोगे?
उत्तर-
नीम, तम्बाकू व तुलसी के पौधे घरों में दुर्गन्धनाशक, कीटनाशक व कीट प्रतिकारक होते हैं।
नीम की पत्तियों को अनाजों के बीच रखकर अनाजों को कीटों से सुरक्षित रखा जाता है। नीम की पत्तियाँ ऊनी कपड़ों को सुरक्षित रखती हैं।
तम्बाकू की पत्तियों का धुआँ कीटनाशक होता है। तम्बाकू की धूल से खमीरा बनाया जाता है जिसके धुएँ से कीट मर जाते हैं। इससे एक कीटनाशक औषधि निकोटीन सल्फेट भी बनाई जाती है।
तुलसी का पौधा साँप के काटे में विषमारक के रूप में काम आता है। साँप से बचने के उपाय

  1. घर के निकट की झाड़ियाँ काट देनी चाहिए।
  2. घर के आस-पास की ज़मीन, घर की दरारों और छेदों में फिनाइल डालनी चाहिए।
  3. तम्बाकू के पत्ते उबालकर छिड़कना चाहिए।
  4. नेवला व बिल्ली पालने से भी साँप से बचाव होता है।

बिच्छू से बचने के उपाय-

  1. कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल कर सभी कीटों को मार देना चाहिए।
  2. घर के सभी, खासकर अन्धेरे स्थानों को नियमित रूप से साफ़ करना चाहिए।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 6 घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम

घरेलू कीड़ों और जीव-जन्तुओं की रोकथाम PSEB 8th Class Home Science Notes

  • कीड़े-मकौड़ों को हम तीन श्रेणियों में बाँट सकते हैं
    • खून चूसने वाले,
    • भोजन को ज़हरीला बनाने वाले,
    • घर के सामान को नुकसान पहुँचाने वाले।
  • एनोफेलीज़ जाति के मच्छर की मादाओं के काटने से मलेरिया रोग फैलता है।
  • क्यूलेक्स जाति के मच्छरों के काटने से भी यह रोग होता है।
  • मच्छर मारने के लिए फ्लिट छिड़कना चाहिए ।
  • अगर मच्छर काट ले और दर्द हो तो थोड़ा अमोनिया लगा लेना चाहिए।
  • खटमल गन्दे फर्श, दरी या टूटे फर्श की दरार और खाट के सिरों में रहते हैं।
  • खटमल लाल भूरे रंग का कीड़ा होता है।
  • चूहे के पिस्सू प्लेग की बीमारी फैलाते हैं।
  • कॉकरोच और तिलचट्टा भोजन और सामान दोनों चीज़ों को खराब करता है।
  • दीमक कागज़, लकड़ी आदि को नष्ट करती है। यह लकड़ी को अन्दर खाकर खोखला कर देती है।
  • झींगुर कपड़ों और पुस्तकों को नष्ट करती है।
  • कपड़े के कीड़े रेशम के कपड़े और ऊनी कपड़ों को खाते हैं।
  • चूहे प्लेग के पिस्सू पैदा करते हैं।
  • छिपकली छोटे-छोटे कीड़े-मकौड़े खाकर नुकसान की बजाए हमारी मदद करती है।

PSEB 6th Class Physical Education Solutions Chapter 1 स्वास्थ्य

Punjab State Board PSEB 6th Class Physical Education Book Solutions Chapter 1 स्वास्थ्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Physical Education Chapter 1 स्वास्थ्य

PSEB 6th Class Physical Education Guide स्वास्थ्य Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य कितने प्रकार का होता है ?
उत्तर-
स्वास्थ्य (Health)-आमतौर पर रोगों से बचने वाले आदमी को स्वस्थ माना जाता है पर यह पूरी तरह ठीक नहीं। वर्ल्ड हैल्थ ओरगनाइस के अनुसार स्वास्थ्य मनुष्य के शरीर के साथ ही सीमित नहीं है। स्वास्थ्य का सम्बन्ध आदमी के मन, समाज और भावना के साथ जुड़ा है। स्वास्थ्य शिक्षा का वह भाग है जिसके साथ मनुष्य सारी जगह से वातावरण के साथ सुमेल कायम करके शारीरिक और मानसिक विकास कायम कर सके और उसका विकास कर सके। एक व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य उतना ही ज़रूरी है जितनी कि फूल के लिए खुशबू। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार “स्वास्थ्य से भाव व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और सामाजिक की तरफ से स्वस्थ होना है। रोग या कमजोरी रहित होना ही स्वास्थ्य की निशानी नहीं है।”

According to W.H.O. “Health is a state of complete physical, mental and social well being, and not merely the absence of disease or infirmity.”
स्वस्थ व्यक्ति वह होता है जो अपने जीवन में शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक आदि सारे पहलुओं में सन्तुलन रखता है।

स्वास्थ्य की किस्में
यह चार प्रकार की होती हैं –

  1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health)
  2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health)
  3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social Health)
  4. भावनात्मक स्वास्थ्य (Emotional Health)

1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health) शारीरिक स्वास्थ्य से भाव व्यक्ति के सभी अंग ठीक ढंग से काम करते हैं। शरीर फुर्तीला और तंदुरुस्त और हर रोज़ क्रियाएं करने के लिए तैयार रहना चाहिए। स्वस्थ व्यक्ति का शारीरिक ढांचा सुडौल, मज़बूत और सुन्दर होना चाहिए। उसकी सभी कार्य प्रणाली जैसे-सांस प्रणाली, पाचन प्रणाली, रक्त प्रणाली, अपना-अपना काम ठीक ढंग से करते हैं।

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) इसका मतलब मनुष्य दिमागी तौर से सही और समय से फैसला लेता है और हमेशा ही अपने विश्वास को कायम रखता है। मानसिक तौर पर व्यक्ति हालात के साथ अपने-आप को ढाल लेता है।

3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social Health) इससे भाव व्यक्ति अपने समाज के साथ सम्बन्धित है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जिसको अपने हर रोज़ के कामों की पूर्ति के लिए परिवार और समाज के साथ चलना पड़ता है। मिलनसार व्यक्ति की समाज में इज्जत होती है।

4. भावनात्मक स्वास्थ्य (Emotional Health)-हमारे मन में अलग-अलग तरह की भावनाएँ जैसे-डर, खुशी, गुस्सा, ईर्ष्या आदि पैदा होती हैं। यह सारी भावनाओं को संतुलित करना ज़रूरी है। जिसके साथ हम अपना जीवन अच्छी तरह गुजार सकते हैं।

निजी स्वास्थ्य विज्ञान (Personal Hygiene)–शरीर की रक्षा को निजी शरीर सुरक्षा (Personal Hygiene) कहते हैं। यह दो शब्दों के मेल से बना है । Personal और Hygiene । ‘Personal’ अंग्रेजी का शब्द है जिसका अर्थ है निजी या व्यक्तिगत ‘Hygiene’ यूनानी भाषा के शब्द Hygeinous से बना है, जिसका भाव है आरोग्यता की देवी। आजकल Hygiene का अर्थ जीवन जांच से लिया जाता है। आरोग्यता कायम रखने के लिए शरीर विज्ञान प्राप्त करना ज़रूरी है।

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प्रश्न 2.
बच्चों को किस तरह का भोजन करना चाहिए ?
उत्तर-

  1. बच्चों को संतुलित एवं साफ़-सुथरा भोजन खाना चाहिए। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेटस, चिकनाई, खनिज लवण, विटामिन और पानी जैसे सारे तत्व होने चाहिए।
  2. खाना खाने से पहले हाथ और मुँह साबुन के साथ अच्छी तरह से धो लेना चाहिए।
  3. ज़रूरत से ज़्यादा गर्म या ठंडा भोजन नहीं करना चाहिए।
  4. कम्प्यूटर या टी०वी० देखते हुए खाना नहीं खाना चाहिए।
  5. खाना सीधे बैठकर खाना चाहिए और लेटकर नहीं खाना चाहिए।
  6. फास्टफूड जैसे पीज़ा, बर्गर, न्यूडल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। बच्चों को ज़्यादातर घर का बना खाना ही खाना चाहिए।
  7. भोजन को मिट्टी, धूल और मक्खियों से बचाव के लिए ढक कर रखना चाहिए।
  8. फल हमेशा धोकर खाने चाहिए।

प्रश्न 3.
हमें स्वस्थ रहने के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर-
1. डाक्टरी जांच-

  • बच्चों को अपने शरीर की जांच समय पर करवानी चाहिए और समय पर टीके भी लगवाते रहना चाहिए।
  •  किसी तरह की चोट लगने पर इलाज ज़रूर करवाना चाहिए।

2. स्वभाव-

  • बच्चों को हर समय खुश रहना चाहिए।
  • चिड़चिड़ा स्वभाव स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है।
  • अच्छा स्वभाव स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है।

3 आदतें-

  • समय पर उठना, खाना, पढ़ना और खेलना और आराम करना।
  • अपने शरीर और आस-पास की सफाई रखना।
  • पढ़ते समय रोशनी का उचित प्रबन्ध करना। कम रोशनी में पढ़ने से आँखें कमज़ोर हो जाती हैं।
  • बैठने और सोने के लिए ठीक तरह का फर्नीचर होना ज़रूरी है।

4. कसरत, खेलें और योगा-

  • अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कसरत या योगा करना ज़रूरी है।
  • कसरत अथवा योगा हमेशा खाली पेट करना चाहिए।
  • कसरत अथवा योगा के लिए खुला वातावरण होना ज़रूरी है।
  • बच्चों को ज्यादा से ज्यादा खेलों में भाग लेना चाहिए और पहले शरीर को गर्माना उचित होता है।

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प्रश्न 4.
भोजन खाने के समय कौन-सी बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-

  • भोजन खाने से पहले हाथ अच्छी तरह साबुन के साथ धोने चाहिए।
  • साफ़-सुथरा और संतुलित भोजन खाना चाहिए।
  • फास्टफूड से हमेशा बचना चाहिए और घर का बना भोजन ही खाना चाहिए।
  • बहुत गर्म या बहुत ठंडा भोजन नहीं खाना चाहिए।
  • भोजन ज़रूरत के अनुसार ही खाना चाहिए। भोजन अच्छी तरह चबा कर खाना चाहिए।
  • कम्प्यूटर या टी०वी० देखते हुए खाना नहीं खाना चाहिए।
  • खाना कभी भी लेटकर नहीं खाना चाहिए।
  • फल अच्छी तरह धोकर खाने चाहिए।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पर नोट लिखें
(क) चमड़ी की सफ़ाई, (ख) बालों की सफ़ाई, (ग) आंखों की सफ़ाई, (घ) कानों की सफाई, (ङ) नाक की सफ़ाई, (च) दांतों की सफ़ाई, (छ) नाखूनों की सफ़ाई।
उत्तर-
(क) चमड़ी की सफ़ाई (Cleanliness of Skin)-चमड़ी की दो परतें होती हैं। बाहरी परत (EPIDERMIS) और अन्दरूनी परत (DERMIS) बाहरी परत में न तो खून की नालियां होती हैं और न ही परतें और गिल्टियां तन्तु (Glands) होते हैं। अन्दरूनी परत जुड़वां तन्तुओं की बनी होती है। इसमें रक्त की नालियां होती हैं। यह नालियां चमड़ी को खुराक पहुंचाने का काम करती हैं।

चमड़ी शरीर के अन्दरूनी अंगों को ढक कर रखती है। जहरीले पदार्थों को बाहर निकालती है और शरीर के तापमान को ठीक रखती है। त्वचा हमारे शरीर को सुन्दरता प्रदान करती है। इसलिए हमें अपनी चमड़ी की सफ़ाई खूब अच्छी तरह करनी चाहिए। त्वचा की सफ़ाई का सबसे अच्छा ढंग नहाना है। नहाते समय हमें नीचे लिखी बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए –

  • प्रतिदिन प्रातः साफ़ पानी से नहाना चाहिए।
  • नहाने से पहले पेट साफ़ और खाली होना चाहिए।
  • भोजन करने के तुरन्त बाद नहीं नहाना चाहिए।
  • व्यायाम (कसरत) करने या काम की थकावट के तुरन्त बाद भी नहीं नहाना चाहिए।
  • सर्दियों में नहाने से पहले धूप में बैठकर शरीर की अच्छी तरह मालिश करनी चाहिए।
  • साबुन के साथ नहाने की बजाए बेसन तथा संगतरे के छिलके से बने ऊबटन का प्रयोग करना चाहिए।
  • नहाने के बाद शरीर को साफ़ तथा खुरदरे तौलिए के साथ पोंछना चाहिए।
  • नहाने के बाद मौसम के अनुसार साफ़-सुथरे कपड़े पहनने चाहिएं।

चमड़ी की सफ़ाई के लाभ (Advantages of Cleanliness of Skin) चमड़ी की सफ़ाई के निम्नलिखित लाभ हैं –

  • चमड़ी हमारे शरीर को सुन्दरता प्रदान करती है।
  • यह हमारे शरीर के आन्तरिक भागों को ढांप कर रखती है तथा इनकी रक्षा करती है।
  • चमड़ी के द्वारा शरीर से पसीना तथा अन्य दुर्गन्ध वाली चीज़ों का निकास होता है।
  • यह हमारे शरीर के तापमान को ठीक रखती है।
  • इसको छूने से किसी चीज़ का गुण पता चलता है।

(ख) बालों की सफाई (Cleanliness of Hair) बाल हमारे शरीर और व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाते हैं। बालों की सुन्दरता उनके घने, मज़बूत और चमकदार होने में छुपी होती है।
बालों की सफाई और सम्भाल-बालों की सफ़ाई और सम्भाल अग्रलिखित ढंग से करनी चाहिए-

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  • बालों को साबुन, रीठे, आंवले, अण्डे की जर्दी या किसी बढ़िया शैम्पू के साथ धोना चाहिए।
  • रात्रि को सोने से पहले बालों में कंघी या ब्रुश करना चाहिए। सारा दिन बाल जिस ओर रहे हों इसकी उलट और बालों की जड़ों से लेकर अन्त तक कंघी करनी चाहिए।
  • खाली समय में सिर में सूखे हाथों से मालिश करनी चाहिए।
  • प्रात: उठकर बालों को कंघी करके संवारना चाहिए।
  • बालों को न ही अधिक खुश्क और न ही अधिक चिकना रखना चाहिए।
  • बालों में तीखी पिनें नहीं लगानी चाहिए। नहाने के बाद बालों को तौलिए के साथ रगड़ कर साफ करना चाहिए।
  • अच्छी खुराक जिसमें मक्खन, पनीर, सलाद, हरी सब्जियां तथा फलों आदि का प्रयोग करना चाहिए।
  • बालों में खुशबूदार तेल नहीं लगाना चाहिए। सिर की कभी-कभी मालिश करनी चाहिए।

(ग) आंखों की सफ़ाई (Cleanliness of Eyes)—आंखें मानव शरीर का कोमल तथा महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इनसे हम देखते हैं। इनके बिना संसार अन्धेरा और जीवन बोझ बन जाता है। किसी ने ठीक ही कहा है कि आंखें गईं तो जहान गया। इसलिए हमें आंखों की सफ़ाई और देखभाल की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि आंखों की सफ़ाई न रखी जाए तो आंखों के कई प्रकार के रोग हो सकते हैं। जैसे आंखों का फ्लू, कुकरे, आंखों में जलन आदि।
PSEB 6th Class Physical Education Solutions Chapter 1 स्वास्थ्य 2

आंखों की सफाई और सम्भाल के लिए हमें निम्नलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

  • बहुत तेज़ या बहुत कम रोशनी में आंखों से काम नहीं लेना चाहिए, नंगी आंखों से सूर्य ग्रहण नहीं देखना चाहिए।
  • लेट कर या बहुत नीचे झुक कर पुस्तक नहीं पढ़नी चाहिए।
  • पढ़ते समय पुस्तक को आंखों से कम-से-कम 30 सेंटीमीटर दूर रखना चाहिए।
  • आंखों को गन्दे रूमाल या कपड़े से साफ नहीं करना चाहिए।
  • किसी एक स्थान पर नज़र टिका कर नहीं रखनी चाहिए।
  • आंख में मच्छर आदि पड़ जाने पर आंख को मलना नहीं चाहिए। इसे साफ़ रूमाल से आंखों में से निकालना चाहिए या आंखों में ताजे पानी के छींटे मारने चाहिएं।
  • आंखों में पसीना नहीं गिरने देना चाहिए।
  • पढ़ते समय अपने कद के अनुसार कुर्सी और मेज़ का प्रयोग करना चाहिए।
  • खट्टी चीज़, तेल, शराब, तम्बाकू, चाय, लाल मिर्च, अफीम आदि चीज़ों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • आंखों की बीमारी होने पर किसी योग्य आंखों के चिकित्सक को दिखाना चाहिए।
  • एक ही अंगुली या सलाई के साथ आंखों में दवाई या काजल नहीं डालना चाहिए।
  • चलती हुई गाड़ी या बस में या पैदल चलते हुए पुस्तक नहीं पढ़नी चाहिए।
  • सिनेमा या टेलीविज़न दूर से देखना चाहिए।
  • प्रतिदिन आंखों को साफ़ पानी के छींटे मारने चाहिए।

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(घ) कानों की सफ़ाई (Cleanliness of Ear)-कानों के द्वारा हम सुनते हैं। कान का पर्दा बहुत नाजुक होता है। यदि इसमें कोई नोकीली चीज़ लग जाए तो वह फट जाता है तथा मनुष्य की सुनने की शक्ति नष्ट हो जाती है। हमें कानों की सफ़ाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

यदि कानों की सफ़ाई करनी हो तो किसी मोटे तिनके पर सख्त रूई लपेटो। इसे हाइड्रोजन परॉक्साइड में भिगोकर कान में फेरो। इससे कान साफ़ हो जाएगा। ऐसा सप्ताह में एक या दो बार करो।

यदि कानों में से पीव बह रही हो तो एक ग्राम बोरिक एसिड को दो ग्राम ग्लिसरीन में घोलो। रात्रि को सोते समय इस घोल की दो बूंदें कानों में डालो। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन नहाने के बाद कान के बाहर के भाग को पानी से साफ़ करके अच्छी तरह पोंछो।

  • कानों में कोई तीखी या नोकदार वस्तु नहीं घुमानी चाहिए। इस तरह करने से कान का पर्दा फट जाता है और अच्छा भला मनुष्य बहरा हो सकता है।
  • कान में फिन्सी होने से कान में पीव बहने लगती है। इस अवस्था में कानों के डॉक्टर की मदद लेनी चाहिए।
  • कानों की सफ़ाई कानों के डॉक्टर से ही करवानी चाहिए।
  • यदि कान बहने लग जाए तो छप्पर, तालाबों आदि में नहाना नहीं चाहिए।
  • अधिक शोर वाले स्थान पर काम नहीं करना चाहिए।
  • कान पर जोरदार चोट जैसे मुक्का आदि नहीं मारना चाहिए।
  • किसी बीमारी के कारण यदि कान भारी लगे तो डॉक्टर की सलाह अनुसार ही दवाई डालनी चाहिए।

(ङ) नाक की सफ़ाई (Cleanliness of Nose)-प्रतिदिन प्रात:काल और सायंकाल नाक को पानी से साफ़ करना चाहिए। एक नासिका में से जल अन्दर ले जाकर दूसरी नासिका द्वारा बाहर निकाल देना चाहिए।

(च) दांतों की सफ़ाई (Clean-liness of Teeth)-दांत भोजन के खाने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। अच्छी तरह से चबा कर खाया भोजन शीघ्र हजम हो जाता है। जब बच्चा पैदा होता है तो कुछ महीने के बाद उसके दांत निकलने आरम्भ हो जाते हैं। ये दांत स्थायी नहीं होते। कुछ वर्षों के बाद दांत टूट जाते हैं। इनको दूध के दांत कहा जाता है। 6 से 12 वर्ष की आयु तक पक्के या स्थायी दांत निकल आते हैं। दांत भी हमारे शरीर का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। किसी ने ठीक ही कहा है, ‘दांत गए तो स्वाद गया।’ दांतों के खराब होने से दिल का रोग भी हो सकता है और मौत भी हो सकती है। इसके अतिरिक्त मुंह से दुर्गन्ध आती रहती है और स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो जाता है। यदि दांतों को साफ़ न रखा जाए तो पायोरिया नामक दांतों का रोग लग जाता है। इसलिए दांतों की सम्भाल की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

दांतों की सफाई तथा देखभाल इस प्रकार की जानी चाहिए –

  • प्रतिदिन प्रात: उठकर और रात को सोने से पहले दांतों को ब्रुश से साफ़ करना चाहिए। भोजन करने के बाद कुल्ला करना चाहिए।
  • गर्म दूध या चाय नहीं पीनी चाहिए तथा न ही बर्फ और ठण्डी चीज़ों का प्रयोग करना चाहिए।
  • दांतों में पिन आदि कोई तीखी चीज़ नहीं मारनी चाहिए।
  • दांतों के साथ न ही किसी शीशी का ढक्कन खोलना चाहिए तथा न ही बादाम या अखरोट जैसी कठोर चीज़ तोड़नी चाहिए।
  • ब्रुश मसूड़ों के एक ओर से दूसरी ओर करना चाहिए।
  • बिल्कुल खराब दांतों को निकलवा देना चाहिए।
  • भुने हुए दाने, गाजर, मूली आदि चीजें खानी चाहिएं। गन्ना चूसना भी दांतों के लिए लाभदायक है।
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  • दूध का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
  • दांत खराब होने पर किसी योग्य दांतों के डॉक्टर से इलाज करवाना चाहिए।
  • मिठाइयां, टॉफियां तथा चीनी नहीं खानी चाहिए।

(छ) नाखूनों की सफ़ाई (Cleanliness of Nails) शरीर के बाकी अंगों की सफ़ाई की तरह ही नाखून की सफ़ाई की भी बहुत आवश्यकता है। नाखूनों की सफ़ाई न रखने का अभिप्राय कई रोगों को निमन्त्रण देना है। नाखून की सफ़ाई के लिए निम्नलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए

(1) नाखून बढ़ाने नहीं चाहिए। (2) भोजन खाने के पहले और बाद में हाथों को अच्छी तरह धोना चाहिए। (3) नाखूनों को दांतों से नहीं काटना चाहिए। नाखूनों को नेल कटर से काटना चाहिए। (4) नाखूनों को सोडियम कार्बोनेट तथा पानी के घोल में डुबोना चाहिए। (5) हाथों के साथ-साथ पैरों के नाखून भी काटने चाहिएं।

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प्रश्न 6.
स्वास्थ्य की दृष्टि से कोई पांच अच्छी आदतों के बारे में लिखिए।
उत्तर-

  • हमेशा साफ़ सुथरा और संतुलित भोजन करना चाहिए।
  • शरीर के अंदरूनी अंग (जैसे : दिल, फेफड़े आदि) और बाहरी अंग (हाथ, पैर, आंखें आदि) के बारे जानकारी हासिल करनी और इसकी संभाल करनी चाहिये।
  • आपनी उम्र अनुसार ही संभाल करनी चाहिये।
  • समय-समय पर शरीर की डॉक्टरी जांच करवानी चाहिये।
  • शरीर की ज़रूरत और उम्र अनुसार सैर या कसरत करनी चाहिये।
  • हमेशा नाक से सांस लेनी चाहिए।
  • खुली हवा में रहना चाहिये।
  • ऋतु और मौसम के अनुसार कपड़े पहनने चाहिये।
  • हमेशा खुश रहना चाहिये।
  • हमेशा ठीक तरीके के साथ खड़े होना, बैठना और चलना चाहिये।
  • घर के कपड़ों की सफाई रखनी चाहिये।

Physical Education Guide for Class 6 PSEB स्वास्थ्य Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
विज्ञान की उस शाखा को क्या कहते हैं जो हमें स्वस्थ रहने की शिक्षा देती है ?
उत्तर-
व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान।

प्रश्न 2.
स्वस्थ मन का किस स्थान पर निवास होता है ?
उत्तर-
स्वस्थ शरीर में।

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प्रश्न 3.
यदि चमड़ी (त्वचा) की सफ़ाई न रखी जाए तो कौन-से रोग लग सकते हैं ?
उत्तर-
अन्दरूनी व बाहरी रोग।

प्रश्न 4.
आंखों को शरीर का कैसा अंग माना जाता है ?
उत्तर-
कोमल और कीमती।

प्रश्न 5.
आंखों की सफाई के लिए दिन में कई बार क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
ताज़े पानी के छींटे मारने चाहिए।

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प्रश्न 6.
दांतों की सफाई के लिए हमें प्रतिदिन क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
दातुन अथवा मंजन।

प्रश्न 7.
पढ़ते समय हमें पुस्तक को आंखों से कितनी दूरी पर रखना चाहिए ?
उत्तर-
30 सेंटीमीटर अथवा एक फुट।

प्रश्न 8.
दांतों की सफ़ाई न करने से कौन-सा रोग लग सकता है ?
उत्तर–
पाइरिया।

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प्रश्न 9.
बालों की सफ़ाई न रखने से सिर में क्या पड़ जाता है ?
उत्तर-
जुएं और सीकरी।

प्रश्न 10.
चमड़ी की सफ़ाई के लिए हमें हर रोज़ क्या करना चाहिए?
उत्तर-
नहाना चाहिए।

प्रश्न 11.
नहाने के पश्चात् हमें कैसे कपड़े पहनने चाहिए ?
उत्तर-
साफ़-सुथरे।

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प्रश्न 12.
क्या हमें चलती गाड़ी या बस में बैठ कर पुस्तक आदि पढ़नी चाहिए ?
उत्तर-
नहीं।

प्रश्न 13.
हमें अपने कानों को कैसी वस्तु से साफ़ करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए ?
उत्तर-
पिन अथवा किसी नुकीली तीली से।

प्रश्न 14.
यदि आंख में कोई वस्तु पड़ जाए तो हमें क्या नहीं करना चाहिए ?
उत्तर-
आंखों को मलना नहीं चाहिए।

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प्रश्न 15.
कौन-से पोस्चर में पढ़ना हानिकारक है ?
उत्तर-
लेट कर या नीचे झुक कर।

प्रश्न 16.
कौन-से रोग होने से विशेष ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
खसरा और छोटी माता (चेचक)।

प्रश्न 17.
हमें श्वास मुख अथवा नाक द्वारा लेना चाहिए।
उत्तर-
नाकं द्वारा।

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प्रश्न 18.
दांतों के गिरने के बाद कौन-सी वस्तु चली जाती है ?
उत्तर-
स्वाद।

प्रश्न 19.
कौन-सी आयु में बच्चों के दूध के दांत गिर कर स्थायी दांत आते
उत्तर-
6 से 12 वर्ष तक।

प्रश्न 20.
यदि कानों में मैल जम जाए तो किस वस्तु का प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर-
हाइड्रोजन परॉक्साइड।

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प्रश्न 21.
नाखूनों को कौन-सी वस्तु से नहीं काटना चाहिए ?
उत्तर-
मुख से।

प्रश्न 22.
यदि कानों में पीव बहने लगे तो कानों में कौन-से घोल की बूंदें डालनी चाहिए ?
उत्तर-
बोरिक ऐसिड और ग्लिसरीन।

प्रश्न 23.
बढ़े हुए नाखूनों को कैसे काटना चाहिए ?
उत्तर-
नेल कटर के साथ।

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प्रश्न 24.
नाक में छोटे-छोटे बाल कौन-सी वस्तु का काम धूल के लिए करते ।
उत्तर-
जाली का।

प्रश्न 25.
सुन्दर बाल मनुष्य के व्यक्तित्व को कैसा बनाते हैं ?
उत्तर-
अच्छा और प्रभावशाली।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वस्थ रहने के लिए कोई पांच नियम लिखें।
अथवा
व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान के कोई पांच नियम लिखें।
उत्तर-

  1. साफ़-सुथरा व सन्तुलित भोजन खाना चाहिए।
  2. श्वास हमेशा नाक द्वारा लेना चाहिए।
  3. आयु अनुसार नींद लेनी चाहिए।
  4. हमेशा खुश रहना चाहिए।
  5. समय-समय पर डॉक्टरी परीक्षण करवाते रहना चाहिए।

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प्रश्न 2.
हमें हमेशा नाक द्वारा श्वास क्यों लेना चाहिए ?
उत्तर-
हमें हमेशा नाक द्वारा श्वास लेना चाहिए। इसका कारण है कि नाक में छोटेछोटे बाल होते हैं। वायु में रोग कीटाणु और धूल कण इनमें अटक जाते हैं और शुद्ध वायु अन्दर जाती है। यदि हम नाक की बजाए मुंह द्वारा श्वास लेंगे तो रोग के कीटाणु हमारे शरीर में प्रवेश करके हमें रोगी बना देंगे। इसलिए हमें नाक द्वारा श्वास लेना चाहिए।

प्रश्न 3.
चमड़ी की सफ़ाई न करने से हमें क्या नुकसान हो सकते हैं ?
उत्तर-
चमड़ी हमारे शरीर के अन्दरूनी अंगों की रक्षा करती है। यदि चमड़ी की सफ़ाई न की जाए तो पसीना और इसकी बदबूदार वस्तुएं शरीर में जमा हो जाएंगी जिनके कारण अन्दरूनी और बाहरी रोग हो जाते हैं। इसलिए चमड़ी की सफ़ाई रखनी बहुत ज़रूरी है।

प्रश्न 4.
यदि आप के सिर में सीकरी पड़ जाए तो आप उसका क्या उपाय करेंगे ?
उत्तर-
सीकरी का इलाज-यदि सिर में सीकरी पड़ जाए तो 250 ग्राम पानी में एक चम्मच बोरिक पाऊडर डालकर सिर धोना चाहिए। नहाने से पहले बालों में नारियल का तेल लगाना चाहिए। ग्लिसरीन और नींबू लगाकर भी सीकरी से छुटकारा पाया जा सकता है। शिकाकाई और आंवलों को भिगोकर बने घोल के प्रयोग से भी सीकरी समाप्त हो जाती है।

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प्रश्न 5.
दांतों की सफ़ाई हमारे लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
दांत हमारे शरीर का महत्त्वपूर्ण भाग हैं। दांतों के खराब होने से हृदय रोग हो सकता है और मृत्यु भी हो सकती है। इसके अलावा मुंह से बदबू आने लगती है और मनुष्य चिड़चिड़ा हो जाता है। दांतों की सफ़ाई न रखने से पाइरिया रोग नाम की बीमारी लग जाती है। इसलिए दांतों की सफ़ाई ज़रूरी है।

प्रश्न 6.
कपड़ों की सफ़ाई किस तरह की जा सकती है ? इसके क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
कपड़ों की सफ़ाई साबुन, सोडा, सर्फ़ तथा अन्य डिटर्जेंट पाऊडरों से की जा सकती है।
लाभ-कपड़ों की सफ़ाई हो तो मैल के कीटाणु हमारे शरीर से नहीं चिपकते जिससे कि हमारे शरीर के मुसाम बन्द नहीं होते। इस तरह शरीर अपने व्यर्थ पदार्थों का कुछ भाग पसीने आदि से निकालता रहता है, जिससे शरीर निरोग रहता है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान किसे कहते हैं ?
उत्तर—
Personal Hygiene शरीर की रक्षा को निजी शरीर सुरक्षा (Personal Hygiene) कहते हैं। यह दो शब्दों के मेल से बना है। Personal और Hygiene | ‘Personal’ अंग्रेज़ी का शब्द है जिसका अर्थ है निजी या व्यक्तिगत । ‘Hygiene’ यूनानी भाषा के शब्द Hygeineous से पैदा हुआ है। जिसका भाव है आरोग्यता की देवी। आजकल Hygiene का अर्थ जीवन जांच से लिया जाता है। आरोग्यता कायम रखने के लिए शरीर विज्ञान का ज्ञान प्राप्त करना ज़रूरी है।

“निजी स्वास्थ्य, स्वास्थ्य शिक्षा का वह भाग है जिससे मनुष्य सारे पक्षों से वातावरण के साथ सुमेल कायम करके शारीरिक और मानसिक विकास कायम कर सके और उनका विकास कर सके।” एक व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य उतना ही आवश्यक है जितनी कि पुष्प (फूल) के लिए सुगन्ध । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। हमें स्वस्थ रहने में व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान बहुत सहायता देता है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जो हमें नीरोग रहने के नियमों के बारे में जानकारी देती है। सत्य तो यह है कि इसमें व्यक्तिगत नीरोगता की वह अमृत धारा है जिसके नियमों का पालन करके मनुष्य स्वस्थ रह सकता है।

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प्रश्न 2.
व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए ?
उत्तर-
व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए हमें निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए –

  • सदा साफ-सुथरा और सन्तुलित भोजन करना चाहिए।
  • शरीर के आन्तरिक अंगों (जैसे दिल, फेफड़े आदि) तथा बाह्य अंगों (हाथ, पैर, आंखें आदि) के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए तथा इनकी संभाल करनी चाहिए।
  • अपनी आयु के अनुसार पूरी नींद लेनी चाहिए।
  • समय-समय पर शरीर की डॉक्टरी परीक्षा करवानी चाहिए।
  • शरीर की आवश्यकता तथा आयु के अनुसार सैर या व्यायाम (कसरत) करनी चाहिए।
  • सदा नाक के द्वारा ही सांस लेनी चाहिए।
  • खुली हवा में रहना चाहिए।
  • ऋतु और मौसम के अनुसार वस्त्र पहनने चाहिए।
  • सदा प्रसन्न रहना चाहिए।
  • सदा ठीक प्रकार से खड़े होना, बैठना तथा चलना चाहिए।
  • घर और कपड़ों की सफ़ाई रखनी चाहिए।

प्रश्न 3.
बालों को साफ़ न रखने से क्या हानियां होती हैं ?
उत्तर-
बालों को साफ़ न रखने से हानियां-यदि बालों को अच्छी तरह साफ़ न. रखा जाए तो कई प्रकार के बालों और त्वचा के रोग लग जाते हैं। ये रोग नीचे लिखे हैं
1. सिकरी (Dandruf)-सिकरी खुश्क त्वचा के मरे हुए अंश होते हैं। इन अंशों में साबुन और मिट्टी इकट्ठे हो जाते हैं। सिकरी से सिर की त्वचा में रोगाणु पैदा हो जाते हैं।

इलाज (Treatment)-सिर में सिकरी अधिक होने की दशा में 250 ग्राम पानी में एक चम्मच बोरिक पाऊडर डालकर सिर को धोना चाहिए। नहाने से पहले बालों में नारियल का तेल लगाना चाहिए। नींबू तथा ग्लिसरीन लगाकर भी सिकरी से छुटकारा पाया जा सकता है। शिकाकाई और ओलों को भिगोकर बने घोल के प्रयोग से भी सिकरी समाप्त हो जाती है।

2. जुएं पैदा होना (Lice) बालों की सफ़ाई न रखने पर सिर में जुएं पैदा हो जाती हैं। एक जूं एक बार कोई 300 अंडे देती है। दो सप्ताहों के बाद ये जुएं और अण्डे देने के योग्य हो जाती हैं। दैनिक सफ़ाई के अतिरिक्त नीचे लिखी बातों का ध्यान रखने से सिर में जुएं नहीं पैदा होंगी –

  • किसी दूसरे व्यक्ति की कंघी, ब्रुश, सिर की जाली, रूमाल, पगड़ी, टोपी आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • बस की सीट या सिनेमा हाल की कुर्सी की पीठ के साथ अपना सिर लगा कर नहीं बैठना चाहिए।
  • बालों को कंघी करने के बाद कंघी,को किसी ऐसी जगह रखना चाहिए जहां मिट्टी न पड़े।

3. बालों का गिरना (Felling of Hair) बालों की सफ़ाई न रखने से बाल कमज़ोर होकर गिरने लगते हैं। बालों के गिरने की रोकथाम के लिए प्रतिदिन बालों की सफ़ाई रखनी चाहिए तथा साथ ही अच्छा भोजन खाना चाहिए। इसके अतिरिक्त सख्त साबुन या सुगन्धित तेल का कम प्रयोग करना चाहिए।

4. बालों का सफ़ेद होना (Change in Colour)-जुकाम या अच्छी खुराक की कमी के कारण बाल जल्दी ही सफ़ेद हो जाते हैं। इसलिए बालों को सफ़ेद होने से रोकने के लिए सन्तुलित और पौष्टिक भोजन करना चाहिए। रोज़ शारीरिक सफ़ाई रखनी चाहिए।

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प्रश्न 4.
नाक के बालों के क्या लाभ हैं और नाक की सफ़ाई कैसे की जाती है ?
उत्तर-
नाक के बालों के लाभ (Advantages of Hair in Nostril)-हम नाक द्वारा श्वास लेते हैं। नाक में छोटे-छोटे बाल होते हैं। इन बालों के अधिक लाभ होते हैं। ये बाल धूल आदि के लिए जाली का काम करते हैं। वायु में धूल कण और बीमारी के जर्म होते हैं। जब हम नाक द्वारा सांस लेते हैं तो यह धूल, कण और जर्म नाक के बालों में अटक जाते हैं और हमारे भीतर शुद्ध वायु प्रवेश करती है। यदि नाक में यह बाल न हों तो वायु में मिली धूलकण और जर्म हमारे भीतर चले जाएंगे जिस से हमें कई प्रकार के रोग लग सकते हैं। इसलिए नाक के बालों को काटना या उखाड़ना नहीं चाहिए।

नाक की सफाई (Cleanliness of Nose)-प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल नाक को पानी से साफ़ करना चाहिए। एक नासिका में से जल अन्दर ले जाकर दूसरी नासिका द्वारा बाहर निकाल देना चाहिए।

प्रश्न 5.
पैरों की सफाई कैसे की जाती है ?
उत्तर-
पैरों की सफाई (Cleanliness of Feet)

  • पैरों की सफाई की तरफ़ भी विशेष ध्यान रखना चाहिए जैसे हम अपने शरीर के दूसरे अंगों की सफाई की तरफ ध्यान देते हैं। सुबह नहाते समय पैरों को और उंगलियों के बीच स्थान को अच्छी तरह साफ़ कर लेना चाहिए।
  • रात को सोने से पहले भी पैरों को धो कर अच्छी तरह साफ़ कर लेना चाहिए।
  • पैरों के लिए बूट या चप्पल लेते समय पैरों की बनावट और माप का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जूती या बूट आरामदायक और ठीक साइज़ के खुले होने चाहिए।
  • यदि पैरों में खारिश, दाद, चंबल आदि के रोग लगे हों तो नाइलोन की जुराबें नहीं पहननी चाहिए।
  • नंगे पांव कभी घूमना नहीं चाहिए।
  • पांवों के नाखून भी समय समय काटते रहना चाहिए।
  • पांवों के नीचे और ऊपर ग्लिसरीन अथवा सरसों के तेल का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 6.
हाथों की सफ़ाई कैसे रखी जा सकती है ?
उत्तर-
हाथों की सफ़ाई (Clealiness of Hands)

  • हाथों को साबुन और पानी के साथ दो बार धोकर भोजन खाना चाहिए।
  • हाथों को सदा नर्म और मुलायम रखने का यत्न करना चाहिए।
  • हाथों या उंगलियों में लाइनों या खुरदरेपन को ग्लेसरीन या किसी अच्छी किस्म की क्रीम से दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।
  • हाथों को साबुन और साफ़ पानी से धोना चाहिए जिस से छूत की बीमारियों जैसे टाइफाइड, पेचिश और हैज़ा आदि हाथों से न फैल सकें। अगर हाथ साफ़ न किए जाएं तो हाथों की मैल जिसमें कई तरह के कीटाणु होते हैं, पेट में चले जाते हैं।

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रिक्त स्थानों की पूर्ति-

प्रश्न-
निम्नलिखित वाक्यों में दिए गए खाली स्थानों की कोष्ठक (ब्रैकट) में दिए शब्दों में से उचित शब्द चुन कर भरो –

(1) आंखों की सफ़ाई के लिए हमें दिन में कई बार ……. के छींटे मारने चाहिएं। . (ठण्डे पानी, कोसे पानी)
(2) पढ़ते समय पुस्तक को आंखों से कम-से-कम …….. दूर रखना चाहिए। (45 सेंटीमीटर, 30 सेंटीमीटर)
(3) हमें सदा …….. द्वारा सांस लेनी चाहिए। (मुंह, नाक)
(4) कानों में जमी हुई मैल को निकालने के लिए …….. का प्रयोग करना चाहिए। (सोडियम क्लोराइड, हाइड्रोजन परॉक्साइड)
(5) नाखूनों को ……… काटना नहीं चाहिए। (मुंह से, नेल कटर से)
(6) ……… की आयु तक के बच्चों के दूध के दांत गिर जाते हैं। (3 साल से, 5 साल से, 6 साल से, 12 साल)
(7) हमें कभी भी ………. नहीं पढ़ना चाहिए। (बैठ कर, लेट कर)
(8) नाक के बीच वाले छोटे-छोटे बाल ………. का काम करते हैं। (नाली, जाली)
(9) दांतों की सफ़ाई न रखने पर ………. नामक रोग हो जाता है। (हिस्टीरिया, पाइरिया)
(10) नहाने के बाद हमें ………. कपड़े से पहनने चाहिएं। (गन्दे, साफ़-सुथरे)
उत्तर-

  1. ठण्डे पानी
  2. 30 सेंटीमीटर
  3. नाक
  4. हाइड्रोजन परॉक्साइड
  5. मुंह से
  6. 6 साल से 12 साल
  7. लेट कर
  8. जाली
  9. पाइरिया
  10. साफ़ सुथरे

जूडो (Judo) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions जूडो (Judo) Game Rules.

जूडो (Judo) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. जूडो मैदान का आकार = वर्गाकार
  2. जूडो मैदान की एक भुजा की लम्बाई = 10 मीटर
  3. अधिकारियों की संख्या = तीन (1 रैफ़री, 2 जज, 1 स्कोरर)
  4. पोशाक का नाम = जुडोगी
  5. जूडो के भारों की गिनती = 8 पुरुषों के लिए
  6. जूडो के भारों की गिनती = 7 स्त्रियों के लिए
  7. जूडो के भारो की गिनती = 8 जूनियर के लिए
  8. जूडो खेल का समय = 10 ओर 20 मिनट
  9. जूडो के मैदान का नाम = सिआइजो
  10. प्लेटफार्म को कवर करने के लिए टुकड़ों की गिनती = 50, कम-से-कम 16 × 16 मी०
  11. मैदान का कुल क्षेत्र = अधिक-से-अधिक 14 × 14 मी० 128 मैट, कम से कम 98 मैट
  12. प्रत्येक मैट के टुकड़े का आकार = 1 × 2 मीटर
  13. जूडो खिलाड़ियों को एक-दूसरे से खड़े होने की दूरी = 4 मीटर
  14. खतरनाक ज़ोन = 1 मीटर

ऐम बी डी स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा जूडो खेल की संक्षेप रूप-रेखा
(Brief outline of the Judo Game)

  1. जूडो प्रतियोगिता रैफरी के Hajime शब्द कहने से आरम्भ होती है।
  2. खिलाड़ी अंगूठी, कड़ा आदि नहीं पहन सकते और न ही उनके पैरों तथा हाथों के नाखून बढ़े होने चाहिएं।
  3. रैफरी के ‘ओसाई कोमी तोकेता’ कहने से पकड़ हट जाती है।
  4. यदि कभी जज रैफरी के निर्णय से सहमत न हो तो वह रैफरी को अपना सुझाव दे सकता है। रैफरी ठीक समझे तो वह जज के फैसले को मान सकता है।
  5. जूडो प्रतियोगिता की अवधि 3 मिनट से 20 मिनट हो सकती है।
  6. जूडो प्रतियोगिता में पेट का दबाना या सिर या गर्दन को सीधा टांगों से दबाना फाऊल है।
  7. जूडो प्रतियोगिता में यदि कोई खिलाड़ी भाग लेने से इन्कार कर देता है उसके विरोधी खिलाड़ी की त्रुटि के कारण (By Fusangachi) विजयी घोषित किया जाता है।
  8. यदि कोई खिलाड़ी मुकाबले में अपने विरोधी खिलाड़ी की ग़लती से घायल हो जाए तो घायल को विजयी घोषित किया जाता है।

जूडो (Judo) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
जूडो खेल का क्रीडा क्षेत्र, पोशाक, अधिकारी और खेल के मुख्य नियम लिखें।
उत्तर-
क्रीड़ा क्षेत्र (Play Ground) जूडो के क्रीड़ा क्षेत्र को शिआाजो कहते हैं। यह एक वर्गाकार प्लेटफार्म होता है। इसकी प्रत्येक भुजा 30 फुट होती है। यह प्लेटफार्म भूमि से कुछ ऊंचाई पर होता है। इसको टाट के 50 टुकड़ों या कैनवस से ढका जाता है। प्रत्येक टुकड़े का आकार 3 इंच × 6 इंच होता है।
जूडो (Judo) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
अधिकारी (Officials)-जूडो में प्राय: तीन अधिकारी होते हैं। इनमें से एक रैफ़री और दो जज होते हैं। बाऊट (Bout) को रैफरी आयोजित करता है। उसका निर्णय अन्तिम होता है। इसके विरुद्ध अपील नहीं हो सकती, वह प्रतियोगिता क्षेत्र में रह कर खेल प्रगति का ध्यान रखता है।
जूडो (Judo) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 2
पोशाक (Costume)खिलाड़ी की पोशाक को जूडोगी कहते हैं जूडोगी में एक जैकेट, पायजामा तथा एक पेटी होती है। जूडोगी न होने की अवस्था में खिलाड़ी ऐसी पोशाक धारण कर सकता है जिसकी पेटी इतनी लम्बी हो कि शरीर के गिर्द दो बार आ सके तथा वर्गाकार गांठ (Knot) लगाने के पश्चात् 3″ के सिरे बच जाएं। जैकेट भी इतनी लम्बी हो जिसके साथ पेटी बांधने के पश्चात् भी कूल्हे (Hip) ढके जा सकें। इसके बाजू खुले होने चाहिएं। कफ तथा बाजुओं के मध्य 11/4 का फासला होना चाहिए तथा ये आधी भुजा तक लटकनी चाहिए। पायजामा भी काफी खुला होना चाहिए। खिलाड़ी अंगूठी, हार, मालाएं आदि नहीं पहन सकते क्योंकि इससे चोट लगने का भय रहता है। खिलाड़ियों के हाथों की अंगुलियों के नाखून कटे होने चाहिएं।
प्रतियोगिता की अवधि (Duration of the Competition) मैच के लिए समय की अवधि 3 मिनट से 20 मिनट तक हो सकती है। विशेष दशाओं में इस अवधि में कमी या वृद्धि की जा सकती है।

प्रश्न
जडो प्रतियोगिता का आरम्भ कैसे किया जाता है ? जडो प्रतियोगिता के भिन्न-भिन्न नियमों का वर्णन करें।
उत्तर-
जूडो प्रतियोगिता का आरम्भ (Starting of Judo Competition)प्रतियोगी खिलाड़ी एक-दूसरे से 12 फुट की दूरी पर खड़े होने चाहिएं। उनके मुंह एकदूसरे के सामने होने चाहिएं। वे एक-दूसरे को खड़े ही खड़े झुक कर सलाम (Salute) कहते हैं। इसके पश्चात् रैफरी “हाजीमै” (Hajime) शब्द कह कर बाऊट आरम्भ करवा देता है। हाजीमै का अर्थ है, शुरू करो।
जूडो की विधियां (Judo Techniqes)—जूडो में अग्रलिखित दो विधियां अपनाई जाती हैं—

  1. नागेबाज़ा (गिराने की तकनीक)
  2. काटनेबाज़ा (ग्राऊंड वर्क की तकनीक)

निर्णय देते समय इन दोनों प्रकार की तकनीकों को ध्यान में रखा जाता है। प्रायः निर्णय एक ‘ज्ञप्पन’ अंक से अधिक नहीं दिया जाता।

  1. फेंकने की तकनीक में कुछ प्रगति करने के पश्चात् खिलाड़ी बेझिझक लेटने की स्थिति ग्रहण कर सकता है तथा इस प्रकार वह Offensive में आ जाता है।
  2. फेंकने की तकनीक अपनाते हुए जब कोई प्रतियोगी पड़ता है या प्रतियोगी Offensive ले लेता है तथा जब विरोधी खिलाड़ी गिर पड़ता है तो भी खिलाड़ी लेटने की स्थिति ले सकता है।
  3. खड़े होने की दशा में ग्राऊंड-वर्क तकनीकी अपनाने के पश्चात् जब खिलाड़ी कुछ प्रगति कर लेता है तो वह भी बिना झिझक लेटवीं स्थिति ग्रहण करके Offensive पर आ सकता है।
  4. जब एक या दोनों खिलाड़ी प्रतियोगिता क्षेत्र से बाहर हों तो कोई भी प्रयोग की गई तकनीक निष्फल एवं अवैध घोषित की जाती है।
  5. फेंकने की तकनीक उसी समय पर वैध होती है जब तक फेंकने वाले तथा उसके विरोधी का अधिक-से-अधिक शरीर प्रतियोगिता क्षेत्र में रहता है।
  6. खिलाड़ियों के प्रतियोगिता के क्षेत्र से बाहर चले जाने पर और पकड़ लिए जाने पर रैफ़री ‘सोनोमाना’ शब्द कहता है। सोनोमाना का अर्थ है ‘ठहर जाओ’। रैफरी उन्हें खींच कर प्रतियोगिता क्षेत्र में ले आता है, उनकी स्थिति लगभग वही रहती है, खेल पुनः आरम्भ करने के लिए रैफ़री योशी कहता है, सोनोमाना और योशी के बीच का समय काट लिया जाता है।
  7. किसी खिलाड़ी के फेंकने या ग्राऊंड-वर्क की तकनीक में सफल होने पर इसे ‘इप्पन’ (एक प्वांइट) दिया जाता है और मुकाबला बन्द कर दिया जाता है। रैफ़री विजेता का हाथ ऊंचा उठा कर निर्णय देता है।
  8. जब प्वाइंट बनता दिखाई देता है तो रैफ़री “वाजाअरी” शब्द का उच्चारण करता है, यदि फिर वही खिलाड़ी ‘वाजाअरी’ प्राप्त कर ले तो रैफ़री ‘वाजाअरी’ आवासेत इप्पन (अर्थात् एक प्वाइंट दो तकनीकों से) कहता है और उस खिलाड़ी को विजयी घोषित कर दिया जाता है।
  9. जब रैफ़री ‘ओसाइकोमी’ अर्थात् पकड़ की घोषणा करता है और पकड़ छूट जाती है तो वह ओसाइकोमी तोकेता’ शब्द का उच्चारण करता है। इसका अर्थ है कि पकड़ टूट गई है।
  10. यदि जज रैफरी से निर्णय के असहमत हो तो वह रैफरी को अपना सुझाव भेज सकता है। रैफ़री यदि उचित समझे तो जज के सुझाव को स्वीकार कर सकता है परन्तु रैफ़री का निर्णय अन्तिम होता है।
  11. जब कोई मुकाबला अनिर्णीत रह जाए और समय समाप्त हो जाए तो रैफ़री कहता है SOREMADE इसका अर्थ है ‘बस’।
  12. मुकाबला समाप्त होने पर दोनों जजों का निर्णय लिया जाता है। रैफ़री दोनों जजों के बहु-समर्थन से अपना निर्णय घोषित करता है, वह Yuseigachi (विजय श्रेष्ठता के कारण) या Hikiwake (बराबर) कहता है।
  13. मैच के अन्त में दोनों खिलाड़ी अपनी पहली स्थिति ग्रहण कर लेते हैं तथा रैफ़री द्वारा विहसल बजाने पर एक-दूसरे की ओर मुंह करके खड़े हो जाते हैं।

कुछ अनुचित कार्य (Some Donts)—

  1. पेट को भींचना या सिर या गर्दन को टांगों के बीच लेकर मरोड़ना ‘Do jime’ ।
  2. Kasetsue Waza तकनीक से जोड़ों के ऊपर कुहनी के अतिरिक्त उतारना।
  3. कोई निश्चित तकनीक अपनाए बिना विरोधी खिलाड़ी को लेटवीं स्थिति में धकेलना।
  4. जिस टांग पर आक्रामक खिलाड़ी खड़ा है उसे कैंची मारना।
  5. जो खिलाड़ी पीठ के बल लेटा हो उसे उठा कर मैट पर फेंकना।
  6. विरोधी खिलाड़ी की टांग को खड़े होने की स्थिति में खींचना ताकि लेटवीं स्थिति में हो सके।
  7. विरोधी खिलाड़ी की कमीज़ के बाजुओं या पायजामे में अंगुलियां डाल कर उन्हें पकड़ना।
  8. पीछे से चिपके हुए विरोधी खिलाड़ी पर जानबूझ कर पीछे की ओर गिरना।
  9. लेटे हुए खिलाड़ी द्वारा खड़े खिलाड़ी की गर्दन पर कैंची मारना, पीठ तथा बगलों को मरोड़ना या फिर जोड़ों को लॉक लगाने वाली तकनीकी Kansetsuewaza अपनाना।
  10. कोई ऐसा कार्य करना जिससे विरोधी खिलाड़ी को हानि पुहंचे या भय का कारण बने।
  11. जानबूझ कर स्पर्श या पकड़ से बचने की चेष्टा करना, यदि कोई काम सिरे न चढ़ सके।
  12. पराजित होते समय सुरक्षा का आसन (Posture) धारण करना।
  13. विरोधी के मुंह की ओर हाथ या पैर सीधे रूप से बढ़ाना।
  14. ऐसी पकड़ या लॉक लगाना जिससे विरोधी खिलाड़ी की रीढ़ की हड्डी के लिए संकट पैदा हो जाए।
  15. जानबूझ कर प्रतियोगिता क्षेत्र से बाहर निकलना या अकारण ही विरोधी को बाहर की ओर धकेलना।
  16. रैफ़री की अनुमति के बिना बैल्ट या जैकेट के बाजू पकड़ना।
  17. विरोधी खिलाड़ी की बैल्ट या जैकेट के बाजू पकड़ना।
  18. अनावश्यक इशारे करने, आवाजें करना या चीखना।
  19. ऐसे ढंग से खेलना जिससे जूडो खेल की समूची आत्मा को ठेस पहुंचे।
  20. निरन्तर काफ़ी समय तक अंगुलियां फंसा कर खड़े रहना।

विशेष निर्णय (Special Decisions)—

  1. जब कोई खिलाड़ी प्रतियोगिता में भाग लेने से इन्कार कर देता है तो विरोधी खिलाड़ी को Fusen Sho (Win by Default) अर्थात् त्रुटि के कारण विजयी माना जाता है।
  2. जब कोई खिलाड़ी रैफरी चेतावनी का बार-बार उल्लंघन करता है अथवा चेतावनी के पश्चात् भी वर्जित कार्य को बार-बार करता है उसे Honsakumake अर्थात् नियम उल्लंघन के कारण पराजित माना जाता है।
  3. घायल होने की अवस्था में यदि कोई खिलाड़ी प्रतियोगिता में भाग लेने में समर्थ नहीं रहता तो निर्णय इस प्रकार दिया जाता है
    • यदि कोई खिलाड़ी विरोधी खिलाड़ी की ग़लती के कारण घायल हुआ है तो घायल खिलाड़ी को विजयी घोषित किया जाता है।
    • यदि कोई अपनी ही ग़लती से घायल हुआ हो तो विरोधी खिलाड़ी को विजयी घोषित किया जाता है।
      JUDO WEIGHT CATEGORIES
      जूडो (Judo) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 3
      Men = Total of Eight Categories
      Women = Total of Seven Categories
      Junior = Total of Eight Categories

जूडो (Judo) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

PSEB 10th Class Physical Education Practical जूडो (Judo)

प्रश्न 1.
जूडो के क्रीडा क्षेत्र को क्या कहा जाता है?
उत्तर–
शियागो।

प्रश्न 2.
जूडो का खेल कैसे आरम्भ होता है?
उत्तर-
रैफ़री के Hafione शब्द कहने से खेल आरम्भ होती है।

प्रश्न 3.
जूडो प्रतियोगिता की अवधि कितनी होती है ?
उत्तर-
3 से 20 मिनट तक हो सकती है।

जूडो (Judo) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 4.
जूडो प्लेटफार्म का आकार कैसा होता है ?
उत्तर-
वर्गाकार।

प्रश्न 5.
जूडो प्लेटफार्म की प्रत्येक भुजा की लम्बाई कितनी होती है ?
उत्तर-
30 फुट।

प्रश्न 6.
प्लेटफार्म को ढकने वाले मैट के टुकड़ों की संख्या तथा आकार क्या होता है ?
उत्तर-
मैट के टुकड़ों की संख्या 50 तथा आकार 3′ × 6′ होता है।

जूडो (Judo) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 7.
जूडो प्रतियोगिता में कितने अधिकारी होते हैं ?
उत्तर-
रैफ़री-1, जज-2.

प्रश्न 8.
जूडो प्रतियोगिता में भारों का वर्णन करो।
उत्तर-
जूडो प्रतियोगिता में निम्नलिखित भार होते हैं—

Men Women
upto 50 Kg upto 44 Kg
upto 55 Kg upto 48 Kg
upto 60 Kg upto 52 Kg
upto 65 Kg upto 56 Kg
upto 71 Kg upto 61 Kg
upto 78 Kg upto 66 Kg
upto 86 Kg upto + 66 Kg
upto + 86 Kg

Men = Total of Eight Categories
Women = Total of Seven Categories

PSEB 6th Class Home Science Practical विभिन्न प्रकार के चूल्हे

Punjab State Board PSEB 6th Class Home Science Book Solutions Practical विभिन्न प्रकार के चूल्हे Notes.

PSEB 6th Class Home Science Practical विभिन्न प्रकार के चूल्हे

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
चूल्हा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
कोई भी ऐसी चीज़ जिसमें आग जलाकर भोजन पकाया जाए, उसको चूल्हा कहते हैं।

प्रश्न 2.
अंगीठी कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर-
अंगीठी दो प्रकार की होती है।

प्रश्न 3.
हैदराबादी या धुआँ रहित चूल्हा की खोज किसने की ?
उत्तर-
डॉक्टर राजू ने।

PSEB 6th Class Home Science Practical विभिन्न प्रकार के चूल्हे

प्रश्न 4.
ठोस ईंधन के अन्तर्गत कौन-कौन से ईंधन आते हैं ?
उत्तर-
लकड़ी, उपलें, लकड़ी का कोयला, पत्थर का कोयला (कोक)।

प्रश्न 5.
गाँवों में अधिकतर किस प्रकार के ईंधन का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर-
लकड़ी तथा उपलों का।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हैदराबादी या धुआँ रहित चूल्हा के बारे में तुम क्या जानते हो? सचित्र वर्णन करो।
उत्तर-
हैदाराबादी चूल्हे में लकड़ी या पत्थर का कोयला प्रयोग करते हैं। इसमें ईंधन कम खर्च होता है, क्योंकि थोड़ा-सा सेंक भी व्यर्थ नहीं जाता है। यह चूल्हा हैदराबाद के डॉ० राजू की खोज है। इसीलिए इसको हैदराबादी या डॉ० राजू का धुआँ रहित चूल्हा कहते हैं। इसका धुआँ चिमनी के रास्ते बाहर निकलता है। इसकी आकृति अंग्रेज़ी के अक्षर L की तरह होती है।
PSEB 6th Class Home Science Practical विभिन्न प्रकार के चूल्हे 1
चित्र 1.1. हैदराबादी चूल्हा

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प्रश्न 2.
देसी चूल्हा क्या है? इसके जलाने की विधि एवं सावधानी लिखो।
उत्तर-
गाँव के प्रत्येक घर में ईंट और मिट्टी का बना चूल्हा खाना बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। इसे देसी चूल्हा कहते हैं।
जलाने की विधि-किसी पुराने फटे कपड़े, फूस के कागज़ को आग लगाकर चूल्हे में रखकर ऊपर पतली लकड़ियाँ रखकर आग लगाई जाती है।
सावधानी-

  1. कपड़ा या कागज़ हाथ में पकड़कर आग लगाते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि हाथ जल न जाए।
  2. लकड़ियों पर ज़्यादा मिट्टी का तेल नहीं डालना चाहिए।

प्रश्न 3.
पम्प वाले स्टोव के बारे में तुम क्या जानते हो लिखो। सावधानियाँ बताओ।
उत्तर-
पम्प वाले स्टोव भी तेल से जलाये जाते हैं। इसमें तेल डालने के लिए एक टंकी होती है जिसमें तेल भर दिया जाता है। टंकी के बीच में ऊपर से एक बरनर लगा रहता है तथा पम्प के द्वारा हवा भर दी जाती है। हवा भरने में तेल की गैस बनकर एक छोटे से छिद्र के द्वारा बाहर निकलती है। ताप को नियन्त्रित करने के लिए बरनर के ऊपर एक कटोरी लगी होती है। स्टोव में तीन स्टैंड होते हैं जिसके ऊपर एक जाली जैसा तवा रहता है।
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चित्र 1.2. पम्प वाला स्टोव
सावधानियाँ-

  1. हवा भरते समय पम्प सावधानी से प्रयोग करना चाहिए।
  2. स्टोव जलाते समय लाइटर के साथ बरनर को गर्म करने के बाद ही पम्प से हवा भरनी चाहिए।
  3. यदि पम्प करते समय छेद बन्द हो तो पिन मारकर छेद को खोल लेना चाहिए।
  4. स्टोव प्रत्येक दिन साफ़ करना चाहिए।
  5. हमेशा मिट्टी के साफ़ तेल का प्रयोग करना चाहिए।

PSEB 6th Class Home Science Practical विभिन्न प्रकार के चूल्हे

प्रश्न 4.
ईंधन के रूप में उपले जलाने से लाभ तथा हानियों का उल्लेख करो।
उत्तर-
उपलों से लाभ यह है कि ये अन्य ईंधन से सस्ते पड़ते हैं तथा इनको बनाने के लिए ज़्यादा परिश्रम भी नहीं करना पड़ता।
उपलों से हानि यह है कि ये लकड़ी के समान ही धुआँ देते हैं जो रसोई में फैल जाता है। बर्तन तथा रसोई इसके कारण काले हो जाते हैं। इनको इकट्ठा करके रखना स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होता है, क्योंकि बरसात के दिनों में इनसे मच्छर उत्पन्न हो जाते हैं जो मलेरिया रोग फैलाते हैं।

प्रश्न 5.
ईंधन के रूप में लकड़ी जलाने से लाभ तथा हानियाँ बताओ।
उत्तर-
लकड़ी जलाने से लाभ-लकड़ी जलाने से एक लाभ यह है कि यह अन्य ईंधन की अपेक्षा सस्ती मिलती है और इसलिए अधिकतर घरों में जलायी जाती है। यह ताप उत्पन्न करने का उपयोगी एवं सुविधाजनक साधन है।

लकड़ी जलाने से हानियाँ-लकड़ी जलाने से रसोई में धुआँ फैलता है। बर्तन धुएँ के कारण काले हो जाते हैं। धुएँ के कारण दम घुटने लगता है। आँखों से पानी बहने लगता है। धुआँ होने से रसोई की दीवारें आदि खराब हो जाती है। अतः धुएँ से बचने के लिए चूल्हे के ऊपर चिमनी की व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रश्न 6.
लकड़ी के कोयले को ईंधन के रूप में प्रयोग करने से क्या लाभ तथा क्या हानियाँ हैं?
उत्तर-
लकड़ी के कोयले पर खाना पकाने से धुएँ की हानियों से बचा जा सकता है और बर्तन भी ज्यादा काले नहीं होते।
लकड़ी के कोयले से हानि यह है कि जल्दी ही इसकी राख बन जाती है और इसका उपयोग लकड़ी की अपेक्षा अधिक महँगा है।

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प्रश्न 7.
पत्थर के कोयले को ईंधन के रूप में प्रयोग करने से लाभ तथा हानि बताओ।
उत्तर-
पत्थर के कोयले से लाभ यह है कि ये देर तक सुलगते हैं तथा जल जाने के बाद धुआँ भी नहीं देते और इसके ताप से बर्तन भी काले नहीं होते।

इससे हानि यह है कि यह कोयला जलकर कार्बन मोनोऑक्साइड (Carbon monoxide) गैस उत्पन्न करता है। दरवाजे, खिड़कियाँ यदि बन्द रह जाएँ तो इस गैस का ज़हरीला प्रभाव पड़ता है और गैस से दम घुटने लगता है। यहाँ तक कि कभी-कभी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने की सम्भावना भी रहती है। अतः इसे जलाकर खिड़की व दरवाज़ों को खोलकर रखना चाहिए जिससे गैस का निकास हो सके।

प्रश्न 8.
स्टोव के प्रयोग से क्या लाभ तथा हानियाँ हैं?
उत्तर-
बिना बत्ती वाले अर्थात् गैस के स्टोव से लाभ यह है कि यह अधिक ताप देता है तथा भोजन जल्दी पक जाता है। यह तेल की बदबू एवं धुआँ नहीं देता। इसमें तेल कम खर्च होता है तथा श्रम की बचत होती है।
PSEB 6th Class Home Science Practical विभिन्न प्रकार के चूल्हे 3
चित्र 1.3. बत्ती वाला स्टोव
इससे हानि यह है कि गैस का दबाव बढ़ने से कभी-कभी इसके फटने का डर रहता है। बत्ती वाले स्टोव से लाभ यह है कि इसे जलाने में आसानी रहती है। लेकिन यह स्टोव तेल की बदबू एवं धुआँ देता है। यदि इसे असावधानी से प्रयोग किया जाये तो इसके खराब होने का डर रहता है। अतः इसकी बत्तियों को समय-समय पर काटते रहना चाहिए। तेल को छानकर टंकी में डालना चाहिए। टंकी में तेल भरा रहना चाहिए। बत्तियाँ छोटी-छोटी हो गई हों या बरनर खराब हो गया हो तो बदलते रहना चाहिए। स्टोव में तेल भर कर उसे बाहर से पोंछ देना चाहिए तथा इसकी समय-समय पर सफ़ाई करवाते रहना चाहिए।

प्रश्न 9.
ईंधन के रूप में गैस का प्रयोग किस प्रकार लाभदायक है ? इससे क्या हानि होती है?
उत्तर-
गैस से लाभ यह है कि ईंधन का यह एक सुविधाजनक साधन है, इससे धुआँ नहीं फैलता, श्रम एवं समय की बचत होती है, रसोई गन्दी नहीं होती तथा इसे जलाने तथा इसमें खाना बनाने में अधिक समय खर्च नहीं होता।
इससे हानि यह है कि ज़रा सी असावधानी से गैस के सिलिन्डर फटने का डर रहता है। परन्तु अब ऐसे प्रबन्ध किए गए हैं कि गैस सिलिन्डर अधिक सुरक्षित हैं।

PSEB 6th Class Home Science Practical विभिन्न प्रकार के चूल्हे

विभिन्न प्रकार के चूल्हे PSEB 6th Class Home Science Notes

  • कोई भी ऐसी चीज़ जिसमें आग जलाकर भोजन पकाया जाए, उसको चूल्हा कहते |
  • अंगीठी दो प्रकार की होती है
    • कोयले वाली
    • बूरे वाली (बुरादे वाली)।
  • हैदराबादी या धुआँ रहित चूल्हा की खोज डॉक्टर राजू ने की।
  • तेल के स्टोव भी दो प्रकार हैं-
    • पम्प वाला
    • एक या अधिक बत्तियों वाला।
  • स्टोव जलाते समय लाइटर के साथ बरनर को गर्म करने के बाद ही पम्प से हवा । भरनी चाहिए। |
  • रोटी बनाते समय ढीले-ढाले और आरामदायक कपड़े पहनना चाहिए।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त

Punjab State Board PSEB 10th Class Home Science Book Solutions Chapter 4 डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Home Science Chapter 4 डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त

PSEB 10th Class Home Science Guide डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
डिज़ाइन के मूल अंश कौन-कौन से हैं? नाम बताएं।
उत्तर-
जब कोई भी वस्तु बनाई जाती है तो उसका नमूना भाव डिज़ाइन बनता है। यद्यपि यह वस्तु कुर्सी, मेज़ हो या मकान। एक अच्छा डिज़ाइन बनाने के लिए इसके मूल तत्त्वों का ज्ञान और कला के मूल सिद्धान्तों की जानकारी होना आवश्यक है। इन मूल सिद्धान्तों में रेखाएं, रूप और आकार, रंग और ढांचा (Texture) महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 2.
डिज़ाइन में एकसारता (सुस्वरता) का क्या अर्थ है?
उत्तर-
डिज़ाइन बनाने के लिए लकीरों, आकार, रंग और रचना की आवश्यकता पड़ती है। एक तरह की दो वस्तुओं जैसे एक रंग, एक तरह की लाइनें या आकार से डिज़ाइन में एकसारता लाई जा सकती है। परन्तु यदि प्रत्येक वस्तु अलग प्रकार की हो तो वह परेशानी का अहसास दिलाती है। जब डिज़ाइन के सभी अंशों में एकसारता हो और वह एक डिज़ाइन लगे न कि भिन्न-भिन्न अंशों का बेतुका जोड़, उसको अच्छा डिज़ाइन समझा जाता है।

प्रश्न 3.
डिज़ाइन में सन्तुलन कितनी प्रकार का हो सकता है और कौन-कौन सा?
उत्तर-
डिज़ाइन में सन्तुलन दो तरह का होता है

  1. औपचारिक सन्तुलन (Formal Balance) औपचारिक सन्तुलन को सिमट्रीकल सन्तुलन के नाम से भी जाना जाता है। जब एक केन्द्र बिन्दु के सभी ओर की वस्तुएं हर पक्ष से एक जैसी हों तो इसको औपचारिक सन्तुलन कहा जाता है।
  2. अनौपचारिक सन्तुलन (Informal Balance)-जब वस्तुएं इस प्रकार रखी जाएं कि बड़ी वस्तु केन्द्र बिन्दु के पास हो और छोटी वस्तु को केन्द्र बिन्दु से थोड़ा दूर रखा जाए तो इसको अनौपचारिक सन्तुलन कहा जाता है। यह सन्तुलन बनाना थोड़ा मुश्किल है यदि ठीक अनौपचारिक सन्तुलन बन जाए तो औपचारिक सन्तुलन से बहुत सुन्दर लगता है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त

प्रश्न 4.
डिज़ाइन में बल से आप क्या समझते हो?
उत्तर-
बल से अभिप्राय किसी एक रुचिकर बिन्दु पर अधिक बल देना भाव उसको अधिक आकर्षित बनाना और अरुचिकर वस्तुओं पर कम बल देना है। जब कोई डिज़ाइन पूरा सन्तुलित हो, उसमें पूर्ण अनुरूपता हो, परन्तु फिर भी फीका और अरुचिकर लगे तो मतलब कि उस डिज़ाइन में कोई विशेष बिन्दु नहीं है जहां ध्यान केन्द्रित हो सके। ऐसे डिज़ाइन में बल की कमी है। बल कला का एक सिद्धान्त है। विरोधी रंग का प्रयोग करके भी बल पैदा किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
डिज़ाइन में अनुपात होना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
डिज़ाइन में अनुपात से अभिप्राय कमरा और उसके सामान का आपस में सम्बन्ध है। यदि कमरा बड़ा है तो उसका सामान, फर्नीचर भी बड़ा ही अच्छा लगता है, परन्तु बड़ा फर्नीचर छोटे कमरे में रखा जाए तो बुरा लगता है। एक बड़े कमरे में गहरे रंग के बड़े डिज़ाइन वाले पर्दे और भारा और बड़ा फर्नीचर प्रयोग करना चाहिए। इसके विपरीत छोटे कमरे में फीके रंग के पर्दे और हल्का फर्नीचर जैसे बैंत, एल्यूमीनियम या लकड़ी का सादा डिज़ाइन वाला रखना चाहिए जिससे कमरा खुला-खुला लगता है। इसलिए घर का ढांचा या नमूना और उसमें रखा हुआ सामान घर के कमरों के अनुपात में ही होना चाहिए तभी घर सुन्दर नज़र आएगा नहीं तो घर और वस्तुओं पर लगाया गया धन भी बेकार ही लगता है यदि सामान घर के अनुपात में न हो तो।

प्रश्न 6.
डिज़ाइन में लय कैसे उत्पन्न की जा सकती है?
उत्तर-
किसी भी डिज़ाइन में लय निम्नलिखित ढंगों से पैदा की जा सकती है

  1. दोहराने से (Repetition) — डिज़ाइन में लय पैदा करने के लिए रंग, रेखाओं या आकार को दोहराया जाता है, इससे उस वस्तु या जगह के भिन्न-भिन्न भागों में तालमेल पैदा होता है।
  2. दर्जाबन्दी (Gradation) — जब भिन्न-भिन्न वस्तुओं को आकार के हिसाब से एक क्रम में रखा जाए तो भी लय पैदा होती है।
  3. प्रतिकूलता (Opposition) — डिजाइन में लय प्रतिकूलता से भी लाई जाती है ताकि रेखाएं एक दूसरे से सही कोणों पर आएं। वर्गाकार और आयताकार फर्नीचर इसकी एक उदाहरण है।
  4. रेडिएशन (Radiation) — जब रेखाएं एक केन्द्रीय बिन्दु से बाहर आएं तो इसको रेडिएशन कहा जाता है।

PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त

प्रश्न 7.
प्राथमिक या पहले दर्जे के रंग कौन-से हैं?
उत्तर-
प्राथमिक या पहले दर्जे के रंग-पीला, नीला और लाल हैं। ये तीनों रंग अन्य रंगों को मिला कर नहीं बनते। इसलिए इनको प्राथमिक या पहले दर्जे के रंग कहा जाता है।

प्रश्न 8.
उदासीन रंग कौन से हैं?
उत्तर-
काला, स्लेटी, सफेद उदासीन रंग हैं। इनको किसी भी रंग में मिलाया जा सकते हैं।

प्रश्न 9.
विरोधी रंग योजना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
विरोधी रंग योजना में एक दूसरे के विपरीत रंग प्रयोग किए जाते हैं। जैसे रंग चक्र में दिखाया गया है। जैसे लाल और हरा, पीला और जामनी या संतरी और नीला आदि।
PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त 1

प्रश्न 10.
सम्बन्धित योजना से आप क्या समझते हो?
उत्तर-
जब रंगों के चक्र के साथ लगते रंगों का चुनाव किया जाए तो इसको सम्बन्धित योजना कहा जाता है। इस योजना से अधिक-से-अधिक तीन रंग प्रयोग किए जाते हैं जैसे कि नीला, हरा नीला और नीला बैंगनी। इसकी एकसारता को तोड़ने के लिए भी रंग चक्र के दूसरी ओर के रंग जैसे-संतरी या संतरी पीला छोटी वस्तुओं के लिए प्रयोग किए जा सकते हैं।

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छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 11.
डिज़ाइन के मूल अंश कौन-से हैं? रूप और आकार डिज़ाइन को कैसे प्रभावित करते हैं? वर्णन करो।
उत्तर-
कोई भी मकान या वस्तु बनाने के लिए पहले उसका डिज़ाइन तैयार किया जाता है और प्रत्येक डिज़ाइन तैयार करने के लिए उसके मूल तत्त्वों का पता होना चाहिए जैसे

  1. रेखाओं-सीधी रेखाएं, लेटी रेखाएं, टेढ़ी रेखाएं और गोल रेखाएं।
  2. रूप और आकार
  3. रंग
  4. ढांचा।

रूप और आकार (Shape and Size) — रूप और आकार का आपस में गहरा सम्बन्ध है, रेखाओं को मिलाकर ही किसी वस्तु को रूप और आकार दिया जाता है। रेखाएं अपने आप में इकाई हैं जिनके मिलाप से कोई वस्तु बनाई जाती है। घर की इमारत या उसकी अन्दरूनी सजावट में रूप और आकार नज़र आता है। आजकल कमरों को बड़ा दिखाने के लिए बड़ी-बड़ी खिड़कियां रखी जाती हैं ताकि अन्दर और बाहर मिलते नज़र आएं। कमरे का आकार, उसकी छत की ऊँचाई और उसके दरवाजे और खिड़कियां कमरे में रखने वाले फर्नीचर को प्रभावित करते हैं। कमरे के फर्नीचर, पर्दे, कालीन और अन्य सामान सारे कमरे को छोटा करते हैं। यदि किसी कमरे को उसके काम के अनुसार विभाजित किया जाए जैसे कि एक भाग बैठने का, एक खाना खाने का और एक पढ़ने का तो कमरा छोटा लगने लग जाता है। यदि कमरे को बड़ा दिखाना चाहते हो तो इसके कम-से-कम भाग करो। इसके अतिरिक्त कमरे को बड़ा दिखाने के लिए छोटा और हल्का फर्नीचर, कम सजावट का सामान और हल्के रंग प्रयोग करो। पतली टांगों वाले फर्नीचर से कमरा बड़ा लगता है क्योंकि इससे फर्नीचर के नीचे फर्श का अधिक भाग दिखाई देता रहता है।

प्रश्न 12.
रेखाएं कैसी हो सकती हैं और ये डिजाइन को कैसे प्रभावित करती हैं?
उत्तर-
प्रत्येक डिज़ाइन में लाइनें कई तरह की बनी होती हैं, परन्तु इनमें कुछ अधिक उभरी होती हैं जिससे डिजाइन में भिन्नता आती है। रेखाएं कई तरह की होती हैं जैसे सीधी, लेटवी, टेढ़ी, गोल और कोण।

किसी भी फर्नीचर के डिज़ाइन या सजावट के सामान के डिज़ाइन या तस्वीरों को दीवारों पर लगाने का ढंग या कमरे में फर्नीचर रखने के डिज़ाइन को रेखाएं प्रभावित करती हैं। परन्तु इन लाइनों का प्रभाव वहीं पड़ना चाहिए जो आप चाहते हैं। यदि आप कमरे को आरामदायक बनाना चाहते हैं तो लेटवीं लाइनों का प्रयोग करना चाहिए और कमरे की छत को ऊँचा दिखाना है तो सीधी लम्बी लाइनों वाले पर्यों का प्रयोग करना चाहिए। गोल लाइनों का प्रयोग प्रसन्नता और जश्न प्रगटाती हैं जबकि कोण वाली रेखाएं उत्तेजित करने वाली होती हैं।

प्रश्न 13.
प्रांग की रंग प्रणाली क्या है?
उत्तर-
प्रांग के अनुसार सभी रंग प्रारम्भिक तीन रंगों-पीला, नीला और लाल से बनते हैं। यह तीन रंग अन्य रंगों को मिलाकर नहीं बनाए जा सकते। इसलिए इनको प्राथमिक (पहले) दर्जे के रंग कहा जाता है। जब दो प्राथमिक रंगों को एक जितनी मात्रा में मिलाया जाए तो तीन दूसरे दर्जे के रंग बनते हैं। जैसे कि
पीला + नीला = हरा,
नीला + लाल = जामनी,
लाल + पीला = संतरी।
इन छ: रंगों को आधार रंग कहा जाता है। एक प्राथमिक और उसके साथ लगते एक दूसरे दर्जे के रंग को मिलाकर जो रंग बनते हैं उनको तीसरे दर्जे के रंग कहा जाता है जैसे कि
पीला + हरा = पीला हरा,
नीला + हरा = नीला हरा,
नीला + जामनी = नीला जामनी,
लाल + जामनी = लाल जामनी,
लाल + संतरी = लाल संतरी,
पीला + संतरी = पीला संतरी।
इस प्रकार तीन (3) प्राथमिक, तीन (3) दूसरे दर्जे के और छः (6) तीसरे दर्जे के रंग होते हैं। इन रंगों का आपसी अनुपात बढ़ा घटा कर अनेकों रंग बनाए जा सकते हैं। इन रंगों में सफ़ेद रंग मिलाने से हल्के रंग बनते हैं जैसे कि
लाल + सफ़ेद = गुलाबी
नीला + सफ़ेद = आसमानी गुलाबी और आसमानी लाल और नीले रंग का भाग है। किसी भी रंग में काला रंग मिलाने से उस रंग में गहराई आ जाती है जैसे कि
लाल + काला = लाखा। काला, सलेटी (ग्रे) और सफ़ेद को उदासीन (Neutral) रंग कहा जाता है। क्योंकि इनको किसी भी रंग से मिलाया जा सकता है।

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प्रश्न 14.
घरों में रंगों के सम्बन्ध में कैसी योजना बनाई जा सकती है?
उत्तर-
घर में प्रायः रंगों से तीन तरह की योजना बनाई जा सकती है

  1. एक रंग की योजना -इस योजना में एक ही रंग प्रयोग किया जाता है। भाव यह कि एक रंग के भिन्न-भिन्न गहरे/फीके रंग प्रयोग किए जाते हैं। जैसे नीला या लाल के गहरे और हल्के रंग प्रयोग किए जा सकते हैं। इस रंग में प्रिंट भी प्रयोग किया जा सकता है। रंग की समरूपता को तोड़ने के लिए कुशन कवर या लैम्प शेड आदि पीले, हरे या भूरे रंग के प्रयोग किए जा सकते हैं।
  2. विरोधी रंग योजना-यह रंग योजना काफ़ी प्रचलित है। इसमें रंग चक्र के आमने-सामने वाले रंग प्रयोग किए जाते हैं जैसे पीला और जामनी या लाल और हरा या संतरी और नीला आदि।
  3. सम्बन्धित रंग योजना-जब रंग चक्र के साथ-साथ रंग प्रयोग किए जाएं तो इसको सम्बन्धित योजना कहते हैं। इसमें अधिक-से-अधिक तीन रंग प्रयोग किए जाते हैं जैसे कि नीला, हरा नीला, जामनी नीला। परन्तु रंग की समरूपता को तोड़ने के लिए रंग चक्र के दूसरी ओर के रंग जैसे कि संतरी और संतरी पीला कुछ छोटी वस्तुएँ जैसे कुशन या लैम्प शेड के लिए प्रयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 15.
(i) औपचारिक और अनौपचारिक सन्तुलन में क्या अन्तर है और कैसे उत्पन्न किया जा सकता है?
(ii) डिज़ाइन में सन्तुलन क्या होता है तथा कितने प्रकार का होता है?
उत्तर-
(i) औपचारिक सन्तुलन को समिट्रीकल अर्थात् बराबर का सन्तुलन भी कहा जाता है। जब किसी डिज़ाइन या किसी कमरे में रेखा, रंग और स्थान एक जैसे लगें तो दोनों भागों में से कोई भी भाग काल्पनिक बिन्दु प्रतीत हो तो औपचारिक सन्तुलन होता है। यह सन्तुलन शान्ति की भावना पैदा करता है, परन्तु कभी-कभी इस तरह सजाया हुआ कमरा अखरता भी है।

इस सन्तुलन को सी-साअ (See Saw) झूले के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है। इसमें एक जैसे भार के दो बच्चे केन्द्र से बराबर दूरी पर बैठे हों तो यह औपचारिक सन्तुलन की एक उदाहरण है। जैसे खाने वाले मेज़ के आस-पास एक ही डिज़ाइन की कुर्सियां एक जैसे फासले पर रखने से। अनौपचारिक सन्तुलन असमिट्रीकल सन्तुलन के नाम से भी जाना जाता है। यह सन्तुलन वस्तुओं की बनावट के अतिरिक्त उनके रंग, नमूने और केन्द्र बिन्दु से दूर या निकट रखकर भी पैदा किया जाता है। यह सन्तुलन पैदा करना मुश्किल है, परन्तु यदि ठीक हो तो औपचारिक सन्तुलन से बढ़िया लगता है साथ ही कुदरती दिखाई देता है।
(ii) देखें भाग (i)

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 16.
डिज़ाइन के मूल सिद्धान्त कौन-से हैं? इनके बारे में ज्ञान होना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
जब भी कोई वस्तु बनाई जाती है, चाहे मकान हो, फर्नीचर या घर का अन्य सामान हो उस का एक नमूना तैयार किया जाता है, जिसको डिजाइन कहा जाता है। डिज़ाइन में यह ध्यान रखा जाता है कि नमूने के तत्त्वों का एक दूसरे से तालमेल हो। जैसे कि घर में एक कमरे का दूसरे कमरे से दीवारों, छतों, खिड़कियों और दरवाज़ों का आपस में। इस तरह फनी वर में आकार, रेखाएं, रंग आदि एक जैसे होने चाहिएं जैसे कि लकड़ी का रंग, कपड़े का रंग, बैंत का रंग और उसकी बनावट आदि आपस में मिलते होने चाहिएं। यदि एक करे का साज-सामान आपस में मेल खाता हो तो तभी बढ़िया डिज़ाइन होगा जोकि देखने में सुन्दर लगता है। इसलिए एक अच्छा डिज़ाइन बनाने के लिए उसके मूल सिद्धान्तों की जानकारी होनी बहुत आवश्यक है। यह मूल सिद्धान्त निम्नलिखित हैं

  1. अनुरूपता (Harmony)
  2. अनुपात (Proportion)
  3. सन्तुलन (Balance)
  4. लय (Rhythm)
  5. बल (Emphasis)।

1. अनुरूपता (Harmony) — किसी भी डिजाइन में एक जैसी वस्तुओं जैसे एक रंग, एक तरह की लाइनें, आकार या रचना का प्रयोग करके अनुरूपता लाई जा सकती है। परन्तु यदि एक कमरे में सभी वस्तुएं एक ही रंग, आकार या रचना की हों तो भी वह बहुत अच्छा नहीं लगता। इसलिए भिन्न-भिन्न तरह की वस्तुओं का प्रयोग आवश्यक है। परन्तु यदि प्रत्येक वस्तु भिन्न हो तो भी वह परेशानी का अहसास दिलाती है। जब डिज़ाइन के सर्भः अंशों में अनुरूपता हो ताकि वह एक अच्छा डिज़ाइन लगे न कि भिन्नभिन्न अंशों का बेढंगा जोड़ तो उसको अच्छा डिज़ाइन समझा जाता है। कई बार भिन्नभिन्न रेखाओं या रंगों के प्रयोग से भी अच्छा डिज़ाइन बनाया जा सकता है।

2. अनुपात (Proportion) — किसी भी कमरे में पड़ी वस्तुएं कमरे के क्षेत्रफल के अनुसार होनी चाहिएं। सभी वस्तुओं का आपस में और कमरे के अनुसार अनुपात ठीक होना चाहिए। एक बड़े कमरे में भारी फर्नीचर या गहरे रंग या बड़े डिजाइन के पर्दे या कालीन का प्रयोग किया जा सकता है, परन्तु यदि कमरा छोटा हो तो उसमें हल्के रंग, छोटा डिज़ाइन और हल्का फर्नीचर प्रयोग करना चाहिए। बड़े कमरे में छोटा या हल्का फर्नीचर जैसे कि लकड़ी की बैंत की कुर्सियां या बांस का फर्नीचर या एल्यूमीनियम की कुर्सियां रखने से कमरा और भी बड़ा और खाली लगेगा।
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3. सन्तुलन (Balance) — यह सिद्धान्त डिजाइन में उसके भागों की सन्तोषजनक व्यवस्था द्वारा पूर्ण स्थिरता लाता है। इसमें आकारों, रंगों और बनावट को एक केन्द्र बिन्दु के चारों ओर एक प्रकार का समूह बनाकर प्राप्त किया जाता है ताकि केन्द्र के हर तरफ एक-सा आकर्षण रहे। सन्तुलन दो तरह का होता है-
(क) औपचारिक सन्तुलन (ख) अनौपचारिक सन्तुलन।
(क) औपचारिक सन्तुलन — जब एक केन्द्र बिन्दु के सभी ओर की वस्तुएं प्रत्येक पक्ष से एक सी हों जैसे कि खाने वाले मेज़ के आस-पास एक सी कुर्सियां, मेज़ के गिर्द समान दूरी से या एक बड़े सोफे के आस-पास या छोटे सोफे या तिपाइयों का होना। परन्तु इस तरह सजाया बैठने वाला कमरा कुछ अलग प्रतीत होता है परन्तु बड़ा कमरा अच्छा लगता है।
PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त 3
(ख) अनौपचारिक सन्तुलन — निश्चित सन्तुलन को सुधारने के लिए सन्तुलन वस्तुओं की बनावट के अतिरिक्त उनके रंग या नमूने से या वस्तुओं को केन्द्र बिन्दु के नज़दीक या दूर रखकर भी पैदा किया जा सकता है। अनिश्चित सन्तुलन करना अधिक मुश्किल है। परन्तु यदि अच्छी तरह किया जाए तो यह निश्चित सन्तुलन से अधिक अच्छा लगता है। इस तरह का सन्तुलन प्राकृतिक लगता है और इस में रचनात्मक कला का प्रदर्शन भी होता है।
PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त 4
4. लय (Rhythm) — जब आप किसी कमरे के अन्दर जाते हैं तो आप की नज़र एक जगह से दूसरी जगह तक जाती है। जब कोई डिज़ाइन के भिन्न-भिन्न अंशों में अधिक भिन्नता न हो और हमारी नज़र एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से घूमे तो उस डिज़ाइन में लय होती है। लय कई प्रकार से प्राप्त की जा सकती है।

(क) एक तरह की रेखाएं-एक ही कमरे में कई तरह की रेखाएं होती हैं, परन्तु उनमें एक तरह की रेखाओं को अधिक महत्त्व देना चाहिए, यह देखने में अधिक आरामदायक प्रतीत होती हैं।

(ख) प्रतिलिपि (Repetition) या दोहराना-रंग, रेखा, रचना या आकार को बार-बार दोहराने से भी लय पैदा की जा सकती है। एक आकार की वस्तुओं से भी लय उत्पन्न होती है जैसे कि भिन्न-भिन्न तरह की तस्वीरों को एक से फ्रेम में जुड़वा कर एक केन्द्र बिन्दु के आस-पास लगाना।

5. बल (Emphasis) — बल से अभिप्राय किसी एक रुचिकर बिन्दु पर अधिक बल देना भाव उसको अधिक आकर्षित बनाना और अरुचिकर वस्तुओं पर कम बल देना। जब कोई डिज़ाइन पूरा सन्तुलित हो, उसमें पूर्ण अनुरूपता हो परन्तु फिर भी फीका और अरुचिकर लगे। उस डिज़ाइन में कोई विशेष बिन्दु नहीं है जहां ध्यान केन्द्रित हो सके ऐसे डिजाइन में बल की कमी है। बल कला का एक सिद्धान्त है कि कमरे में जाते ही, जहां आप का सब से पहले ध्यान जाए और फिर महत्त्व के क्रमानुसार और कहीं टिकता है।

प्रश्न 17.
(i) डिज़ाइन के मूल अंश कौन-से हैं ? यह डिज़ाइन को कैसे प्रभावित करते हैं?
(ii) सीधी रेखाएं क्या होती हैं?
(iii) डिज़ाइन में गोल रेखाओं का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
(i) जब भी कोई वस्तु बनाई जाती है तो उसका नमूना या डिज़ाइन बनता है। यह वस्तु यद्यपि कुर्सी, मेज़ हो तथा मकान या कोई शहर। कोई भी वस्तु बनाई जाए उसके भिन्न-भिन्न भागों का आपस में तालमेल आवश्यक है जैसे कि कुर्सी की लकड़ी, उसकी पॉलिश का रंग, उसकी रचना, उसकी बैंत की बनावट या उस पर पड़े कपड़े का रंग, नमूना या बनावट सभी मिल कर एक डिज़ाइन बनाते हैं। घर में भिन्न-भिन्न कमरे’ मिलकर एक डिज़ाइन बनाते हैं। इस तरह एक कमरे में भिन्न-भिन्न तरह का सामान रखकर एक डिज़ाइन बनाया जाता है। यदि एक कमरे की सभी वस्तुओं का आपसी तालमेल ठीक हो तभी एक अच्छा डिज़ाइन बनेगा। रेखा, आकार, रंग, रूप और बनावट की व्यवस्था के साथ ही कोई डिज़ाइन बनता है। इसलिए अच्छा डिज़ाइन बनाने के लिए इसके मूल तत्त्वों का ज्ञान और इनको सहजवादी और कलात्मक ढंग से शामिल करना है।
डिज़ाइन के मूल अंश (Elements of Design)
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1. रेखाएं (Lines) — प्रत्येक डिज़ाइन में कई तरह की रेखाएं शामिल होती हैं, परन्तु इनमें कुछ रेखाएं अधिक उभरी हुई होती हैं जिससे उस डिज़ाइन में विभिन्नता आती है। रेखाएं हमारी भावनाओं को प्रभावित करती हैं इसलिए इनको चुनते समय सावधानी रखनी चाहिए। रेखाएं कई प्रकार की हो सकती हैं

  1. सीधी रेखाएं — सीधी रेखाएं दृढ़ता और सादगी की प्रतीक होती हैं। सीधी रेखाओं का अधिक प्रयोग गिरजा घरों में किया जाता है। घर की सजावट में यदि कमरे की छत नीची हो तो दरवाजे और खिड़कियों पर सीधी रेखाओं वाले पर्दे लगा कर अधिक ऊँचाई का एहसास दिलाया जा सकता है।
  2. लेटवीं रेखाएं — ये रेखाएं शान्ति और आराम की प्रतीक होती हैं। इनको थकावट दूर करने वाली समझा जाता है। यह किसी वस्तु के आकार को नीचा दिखाने का भ्रम पैदा करती हैं। इसलिए जिन कमरों की छत अधिक ऊँची हो उनमें दरवाजों और खिड़कियों के पर्दो में लेटवीं रेखाओं का प्रयोग किया जा सकता है।
    चित्र-सीधी तथा लेटवीं रेखाओं का प्रभाव
  3. टेढ़ी रेखाएं — टेढी रेखाओं का प्रभाव उनके कोण से प्रभावित होता है। यदि यह सीधी रेखा के निकट हो तो दृढ़ और यदि लेटवीं रेखा के निकट हो तो शान्ति की प्रतीक होती हैं। इन रेखाओं के अधिक प्रयोग से अनुशासन की कमी लगती हैं, बनावटीपन लगता है और देखने में अधिक सुन्दर नहीं लगता।
  4. गोल रेखाएं — गोल रेखाएं हमारी भावनाओं को दर्शाने के लिए मदद करती हैं। इनमें कई भिन्न-भिन्न रूप हो सकते हैं। पूरी गोलाई वाली लाइनें प्रसन्नता और जशन का एहसास दिलाती हैं जैसे कि किसी खुशी के अवसर पर गुब्बारे पर किसी तरह के ग्लोब का प्रयोग करना, बच्चों की टोपियों पर गोल फूंदे या जौकरों की टोपियां और पोल का डिज़ाइन आदि का इस्तेमाल करना। कम गोलाई वाली रेखाएं जैसे कि “S” सुन्दरता और निखार की प्रतीक होती हैं।
    PSEB 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त 6
  5. कोण — कोण वाली रेखाएं भी कई प्रकार की होती हैं जिनका प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होता है। यह दृढ़, अशान्त या हलचल पैदा करने वाली हो सकती हैं। ये उत्तेजित करने वाली भी हो सकती हैं।
    दीवार पर लगाई गई एक सी तस्वीरें सीधी, लेटवीं और टेढी रेखा में लगाने पर भिन्नभिन्न प्रभाव देती हैं।
    किसी भी फर्नीचर के डिज़ाइन या सजावट के अन्य सामान के डिजाइन में या जिस ढंग से ये वस्तुएं किसी भी कमरे में रखी जाती हैं, उनमें रेखाओं का इस ढंग से प्रयोग करना चाहिए ताकि वह ही प्रभाव पड़ता हो जो आप चाहते हैं। जिस कमरे को आप आरामदायक बनाना चाहते हों उसमें लेटवीं रेखाओं का अधिक प्रयोग होना चाहिए।

2. रूप और आकार (Shape and Size) — रूप और आकार का आपस में गहरा सम्बन्ध है, रेखाओं को मिलाकर ही किसी वस्तु को रूप और आकार दिया जाता है। रेखाएं अपने आप में इकाई हैं जिनके मिलाप से कोई वस्तु बनाई जाती है। घर की इमारत या उसकी अन्दरूनी सजावट में रूप और आकार नज़र आता है। आजकल कमरों को बड़ा दिखाने के लिए बड़ी-बड़ी खिड़कियां रखी जाती हैं ताकि अन्दर और बाहर मिलते नज़र आएं। कमरे का आकार, उसकी छत की ऊँचाई और उसके दरवाजे और खिड़कियां कमरे में रखने वाले फर्नीचर को प्रभावित करते हैं। कमरे के फर्नीचर, पर्दे, कालीन और अन्य सामान सारे कमरे को छोटा करते हैं। यदि किसी कमरे को उसके काम के अनुसार । विभाजित किया जाए जैसे कि एक भाग बैठने का, एक खाना खाने का और एक पढ़ने का तो कमरा छोटा लगने लग जाता है। यदि कमरे को बड़ा दिखाना चाहते हो तो इसके कम-से-कम भाग करो। इसके अतिरिक्त कमरे को बड़ा दिखाने के लिए छोटा और हल्का फर्नीचर, कम सजावट का सामान और हल्के रंग प्रयोग करो। पतली टांगों वाले फर्नीचर से कमरा बड़ा लगता है क्योंकि इससे फर्नीचर के बीच फर्श का अधिक भाग दिखाई देता रहता है।

3. रंग (Colour) — आजकल आदमियों ने रंगों के महत्त्व को पहचाना है। रंगों का प्रभाव हमारी भावनाओं और हमारे काम करने के ढंग पर पड़ता है। आज से कुछ वर्ष पहले कारों के रंग सिर्फ सफ़ेद, काला, ग्रे आदि होते थे। इस तरह टाइपराइटर, टेलीफोन और सिलाई मशीन काले रंग की और फ्रिज और कुकिंग रेंज केवल सफ़ेद ही होते थे। परन्तु आजकल यह सभी वस्तुएं भिन्न-भिन्न रंगों में मिलने लगी हैं। खाना खाने वाली प्लेटों आदि के रंग का प्रभाव हमारी भूख पर पड़ता है। खाने वाली वस्तुओं का रंग यदि प्रिय हो तो भूख लगती है और खाना हज़म भी जल्दी हो जाता है।
परेंग के अनुसार सभी रंग प्रारम्भिक तीन रंगों-पीला, नीला और लाल से बनते हैं। यह तीन रंग अन्य रंगों को मिलाकर नहीं बनाए जा सकते। इसलिए इनको प्राथमिक (पहले) दर्जे के रंग कहा जाता है। जब दो प्राथमिक रंगों को एक जितनी मात्रा में मिलाया जाए तो तीन दूसरे दर्जे के रंग बनते हैं। जैसे कि
पीला + नीला = हरा
नीला + लाल = जामनी
लाल + पीला = संतरी
इन छ: रंगों को आधार रंग कहा जाता है। एक प्राथमिक और उसके साथ लगते एक दूसरे दर्जे के रंग को मिला कर जो रंग बनते हैं उनको तीसरे दर्जे के रंग कहा जाता है जैसे कि
पीला + हरा = पीला हरा
नीला + हरा = नीला हरा
नीला + जामनी = नीला जामनी
लाल + जामनी = लाल जामनी
लाल + संतरी = लाल संतरी
पीला + संतरी = पीला संतरी।
इस प्रकार तीन (3) प्राथमिक, तीन (3) दूसरे दर्जे के और छः (6). तीसरे दर्जे के रंग होते हैं। इन रंगों का आपसी अनुपात बढ़ा घटा कर अनेकों रंग बनाए जा सकते हैं। इन रंगों में सफ़ेद रंग मिलाने से हल्के रंग बनते हैं जैसे कि
लाल + सफेद = गुलाबी
नीला + सफ़ेद = आसमानी
गुलाबी और आसमानी लाल और नीले रंग का भाग है। किसी रंग में काला रंग मिलाने से उस रंग में गहराई आ जाती है जैसे कि
लाल + काला = लाखा।
काला, सलेटी (ग्रे) और सफ़ेद को उदासीन (Neutral) रंग कहा जाता है क्योंकि इनको किसी भी रंग से मिलाया जा सकता है।
यदि रंगों में चक्र को देखा जाए तो इसके आधे भाग पर रंग ठण्डे हैं जैसे कि हरा और नीला, यह अधिक आरामदायक होते हैं। इनको पीछे हटाने वाले (receding) रंग भी कहा जाता है क्योंकि यह पीछे की ओर को जाते प्रतीत होते हैं जिस कारण कमरा बड़ा लगता है।
रंगों के चक्र की दूसरी ओर के रंग लाल, संतरी और पीला गर्म रंग कहलाते हैं। यह रंग भड़कीले और उत्तेजित करने वाले होते हैं। यदि इनका प्रयोग अधिक किया जाए तो झंझलाहट पैदा करते हैं। इनको (advancing) रंग भी कहा जाता है क्योंकि इनके प्रयोग से वस्तुएं आगे-आगे नज़र आती हैं और कमरे का आकार छोटा लगता है। जामनी रंग से यदि लाल अधिक हो तो गर्म और यदि नीला अधिक हो
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घर में प्रायः तीन तरह से रंगों की योजना बनाई जा सकती है
(क) एक रंग — इस तरह की योजना में एक ही रंग प्रयोग किया जाता है। परन्तु इस का अर्थ यह नहीं कि एक ही थान से पर्दे, कुशन, कवर और सोफों के कपड़े आदि बनाए जाएं। भिन्न-भिन्न वस्तुओं के लिए एक ही रंग जैसे कि नीला या हरे के गहरे या हल्के रंग प्रयोग किए जा सकते हैं। किसी वस्तु में प्रिंट भी प्रयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त छोटी वस्तुओं में जैसे कि कुशन कवर या लैंप शेड आदि में लाल, संतरी या पीला प्रयोग किए जा सकते हैं, ताकि अनुरूपता को तोड़ा जा सके।
(ख) आपस में टकराने वाले रंग (विरोधी रंग योजना) (Contrasting Colours) — इस प्रकार की रंग योजना काफ़ी प्रचलित है। रंग के चक्र के सामने वाले रंग प्रयोग किए जाते हैं जैसे कि संतरी और नीला या पीला जामनी या लाल और हरा।
(ग) सम्बन्धित योजना — जब रंगों के चक्र के साथ-साथ लगते रंगों का चुनाव किया जाए तो उसको सम्बन्धित योजना कहा जाता है। इसमें अधिक-से-अधिक तीन रंग प्रयोग किए जाते हैं जैसे कि नीला, हरा, पीला और नीला जामनी। इसकी अनुरूपता को तोड़ने के लिए भी रंग चक्र के दूसरी ओर के रंग जैसे कि संतरी या संतरी पीला भी कुछ छोटी वस्तुओं के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

4. रचना/बनावट (Texture)-कुछ वस्तुएं मुलायम होती हैं और कुछ खुरदरी, कुछ सख्त और कुछ नरम, कुछ मद्धम (तेज़हीन)। जिस तरह रेखाएं, आकार और रंग किसी भावना या प्रवृत्ति के प्रतीक होते हैं उसी प्रकार खुरदरी वस्तु भी देखने को सख्त और मज़बूत लगती है। जिन वस्तुओं की रचना कोमल या नाजुक हो वह अधिक शानदार और व्यवस्थित लगती हैं। जिस कमरे में ज़री या शनील का प्रयोग किया गया हो वहां यदि साथ ही पीतल के लैंप शेड या लोहे या चीनी मिट्टी के फूलदान या एश-ट्रे रखी जाए तो अच्छी नहीं लगेगी। अखरोट की लकड़ी के साथ टाहली की लकड़ी का फर्नीचर भी भद्दा लगेगा। लाल, सुनहरी, जामनी, नीला और हरा रंग अधिक भड़कीले लगते हैं पर भूरा, बादामी, मोतिया, हल्का नीला और हरा तेजहीन रंग हैं, रंगों के अतिरिक्त कपड़े की बनावट का भी कमरे पर प्रभाव पड़ता है जैसे कि हल्के नीले रंग की सिल्क या साटन अधिक चमकदार लगेगी जबकि उसी रंग की केसमैंट या खद्दर कम चमकीली होगी।
(ii) देखें भाग (i)
(iii) देखें भाग (i)

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प्रश्न 3.
रंग डिज़ाइन का महत्त्वपूर्ण तत्त्व (अंश) है, कैसे?
उत्तर-
प्रत्येक डिज़ाइन के मूल अंश रेखाएं, आकार, बनावट के अतिरिक्त रंग भी एक महत्त्वपूर्ण अंश है। रंग मनुष्य की मानसिकता को प्रभावित करते हैं। रंग उत्तेजित और हल्के भी हो सकते हैं। सभी रंग प्रकाश से उत्पन्न होते हैं। रंगों की अपनी विशेषताएं हैं जिनके आधार पर इनका प्रयोग किया जाता है। यह निम्नलिखित दी गई हैं
पीला-गर्म, धूप वाला,, चमकदार, खुशी देने वाला (Cheerful) लाल-गरम, उत्तेजनशील (Stimulating), साहसी, तेजस्वी। सन्तरी-सजीव, रुचिकर, खुशी देने वाला, गरम। हरा-ठण्डा, शान्त, चमक और आरामदायक। नीला-सब रंगों से अधिक ठण्डा, कठोर, शान्तिपूर्ण निश्चेष्ठ या स्थिर। बैंगनी-भड़कीला, शाही, ओजस्वी, प्रभावशाली, क्रियाशील। . सफ़ेद-शुद्ध, श्वेत, ठण्डा। काला-निशतबद्धता, मृतक, गम्भीर, गर्म।
किसी भी फर्नीचर के डिज़ाइन या सजावट के अन्य सामान के डिजाइन में रंग की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। फर्नीचर का रंग कमरे के रंग और अन्य सामान के रंग के अनुसार हल्का या गहरा होना चाहिए। रंग का प्रयोग कमरे के आकार, फैशन, मौसम और कमरे के प्रयोग पर आधारित हो। जिन कमरों में अधिक समय व्यतीत करना हो वहां की रंग योजना शान्तिपूर्ण होनी चाहिए। इस योजना के लिए हल्के रंगों का प्रयोग किया जाता है। मौसम का भी रंगों पर बहुत प्रभाव होता है। गर्मी के मौसम में हल्के और ठण्डे रंग अच्छे लगते हैं जबकि सर्दियों में गहरे और गर्म रंग ठीक रहते हैं।
किसी घर, फर्नीचर या अन्य सामान का डिज़ाइन तैयार करते समय बाकी सामान के अनुसार रंग का चुनाव किया जाता है।

Home Science Guide for Class 10 PSEB डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डिज़ाइन के मूल अंश बताओ।
उत्तर-
रेखाएं, रूप तथा आकार, रंग, बनावट।

प्रश्न 2.
डिज़ाइन के मूल सिद्धान्त ……….. हैं।
उत्तर-
पांच।

प्रश्न 3.
डिज़ाइन के पांच मूल सिद्धान्त कौन-से हैं?
उत्तर-
एकसारता, अनुपात, सन्तुलन, लय तथा बल।

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प्रश्न 4.
प्राथमिक या प्रथम दर्जे के रंग कौन-से हैं?
उत्तर-
लाल, पीला, नीला।

प्रश्न 5.
प्रार्थी कि रंग कितने हैं?
उत्तर-
तीन।

प्रश्न 6.
दो प्रारम्भिक रंग मिलाकर जो रंग बनते हैं उन्हें क्या कहते हैं?
उत्तर-
दूसरे दर्जे के रंग।

प्रश्न 7.
दूसरे दर्जे के कितने रंग हैं?
उत्तर-
तीन।

प्रश्न 8.
तीसरे दर्जे के कितने रंग हैं?
उत्तर-
छः।

प्रश्न 9.
रंग योजनाओं के नाम बताओ।
उत्तर-
सम्बन्धित रंग योजना, विरोधी रंग योजना, एक रंग योजना आदि।

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प्रश्न 10.
ठण्डे रंग की उदाहरण दें।
अथवा
ठण्डे रंग कौन-से हैं?
उत्तर-
हरा, नीला, सफ़ेद।

प्रश्न 11.
गर्म रंग कौन-से हैं?
उत्तर-
लाल, काला, पीला।

प्रश्न 12.
सन्तुलन कितने प्रकार का है, नाम बताओ।
अथवा
संतुलन की किस्मों के नाम बताओ।
उत्तर-
औपचारिक, सन्तुलन, अनौपचारिक सन्तुलन।

प्रश्न 13.
यदि रेखाएं एक केन्द्रीय बिन्दु से बाहर आएं तो इसे क्या कहते हैं?
उत्तर-
रेडिएशन।

प्रश्न 14.
लाल + पीला = ?
उत्तर-
संतरी।

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प्रश्न 15.
नीला + लाल = ?
उत्तर-
जामुनी।

प्रश्न 16.
कौन-से छः रंगों को आधार रंग कहते हैं?
उत्तर-
लाल, पीला, नीला, संतरी, जामुनी तथा हरा।

प्रश्न 17.
लाखा रंग कैसे पैदा करोगे?
उत्तर-
लाल + काला = लाखा।

प्रश्न 18.
उदासीन रंग कौन-से हैं?
उत्तर-
काला, स्लेटी।

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प्रश्न 19.
विरोधी रंग योजना की कोई उदाहरण दें।
उत्तर-
पीला तथा जामुनी, लाल तथा हरा।

प्रश्न 20.
सीधी रेखाएं किस की प्रतीक हैं?
उत्तर-
दृढ़ता तथा सादगी।

प्रश्न 21.
प्रसन्नता तथा जश्न का अहसास करवाने वाली कौन-सी रेखाएं होती हैं?
उत्तर-
पूरी गोलार्द्ध वाली रेखाएं।

प्रश्न 22.
सफ़ेद रंग की विशेषताएं बताएं।
उत्तर-
शुद्ध, ठण्डा।

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प्रश्न 23.
लाल रंग की विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
गर्म, साहसी, तेजस्वी।

प्रश्न 24.
बैंगनी रंग के गुण बताओ।
उत्तर-
भड़कीला, शाही, ओजस्वी, क्रियाशील।

प्रश्न 25.
काला और स्लेटी कैसे रंग हैं?
उत्तर-
उदासीन रंग।

प्रश्न 26.
लाल, पीला तथा नीला कैसे रंग हैं?
उत्तर-
प्राथमिक रंग।

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प्रश्न 27.
डिज़ाइन में एकसुरता से क्या भाव है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 28.
किसी दो डिजाइन के तत्त्वों के नाम लिखो।
उत्तर-
रेखाएं, रंग।

प्रश्न 29.
माध्यमिक (दूसरे) दर्जे के रंग कौन-से हैं?
उत्तर-
हरा, जामुनी, संतरी।

प्रश्न 30.
तीसरे (तृतीयक) दर्जे के रंग कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
पीला-हरा, नीला-हरा, नीला-जामुनी, लाल-जामुनी, पीला-संतरी, लाल-संतरी।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डिज़ाइन में सन्तुलन तथा लय का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
देखें प्रश्न 16 का उत्तर।

प्रश्न 2.
सीधी और लेटी हुई रेखाओं के बारे में बताएं।
उत्तर-
देखें प्रश्न 17 का उत्तर।

प्रश्न 3.
सन्तुलन से क्या भाव है? यह कितनी प्रकार का होता है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 4.
रेखाएं कितनी प्रकार की होती हैं? विस्तार से लिखें।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

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प्रश्न 5.
उपचारिक तथा अनौपचारिक संतुलन में क्या अन्तर है?
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्न में।

प्रश्न 6.
डिजाइन में लय से आप क्या समझते हो?
उत्तर-
डिज़ाइन में लय से भाव है कि जब आप किसी कमरे में जाएं तो आपकी नज़र पहले एक जगह पर जाती है और फिर धीरे-धीरे अन्य वस्तुओं पर जाती है। यह नज़र की गति यदि लय में हो तो डिज़ाइन लय में है। डिजाइन में लय रंग, आकार. या रेखा के किसी भी क्रम में आपस में जुड़े हुए उस मार्ग से है जिसको आँखें एक गति में देखती जाती हैं।

प्रश्न 7.
आधार रंग कौन-कौन से हैं?
अथवा
दूसरे दर्जे के रंग कौन-से हैं?
उत्तर-
जब दो प्राथमिक रंगों को एक जितनी मात्रा में मिलाया जाए तो तीन दूसरे दर्जे के रंग बनते हैं जैसे
लाल + पीला = संतरी
पीला + नीला = हरा
नीला + लाल = जामनी
इसलिए इन छ: रंगों (लाल, पीला, नीला, संतरी, जामनी और हरा) को आधार रंग कहा जाता है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डिज़ाइन में भिन्न-भिन्न रंग योजनाएं क्या हैं तथा रंगों के मिलावट के बारे में बताएं।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 2.
डिज़ाइन के मूल अंश कौन-कौन से हैं? वर्णन करें।
उत्तर-
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

I. रिक्त स्थान भरें

  1. डिज़ाइन के मूल सिद्धान्त ………………. हैं।
  2. लाल, पीला तथा नीला रंग ………. रंग हैं।
  3. सीधी रेखाएं ………………. की प्रतीक हैं।
  4. दो प्राथमिक रंगों को मिला कर ……………….. के रंग बनते हैं।
  5. पीला + नीला = ……………….. रंग।

उत्तर-

  1. पांच,
  2. प्राथमिक,
  3. दृढ़ता तथा सादगी,
  4. दूसरे दर्जे,
  5. हरा।

II. ठीक/ग़लत बताएं

  1. पीला, नीला तथा लाल पहले दर्जे के रंग हैं।
  2. नीला रंग + सफ़ेद रंग = गुलाबी।
  3. दूसरे दर्जे के छः रंग हैं।
  4. एकसुरता, अनुपात, सन्तुलन, लय तथा बल डिज़ाइन के मूल सिद्धान्त हैं।
  5. काला, स्लेटी उदासीन रंग हैं।
  6. सफ़ेद रंग शुद्ध तथा ठण्डा होता है।

उत्तर-

  1. ठीक,
  2. ग़लत,
  3. ग़लत,
  4. ठीक,
  5. ठीक,
  6. ठीक।

III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लाल + काला =
(क) लाखा
(ख) स्लेटी
(ग) जामुनी
(घ) संतरी।
उत्तर-
(क) लाखा

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प्रश्न 2.
पीला + नीला = ………..
(क) जामुनी
(ख) हरा
(ग) संतरी
(घ) गुलाबी।
उत्तर-
(ख) हरा

प्रश्न 3.
दूसरे दर्जे के कितने रंग हैं?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) पांच
(घ) छः।
उत्तर-
(ख) तीन

प्रश्न 4.
निम्न में गर्म रंग है
(क) लाल
(ख) काला
(ग) पीला
(घ) सभी।
उत्तर-
(घ) सभी।

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डिज़ाइन के मूल तत्त्व और सिद्धान्त PSEB 10th Class Home Science Notes

  1. डिज़ाइन के मूल अंश किसी वस्तु को सुन्दर बनाते हैं।
  2. डिज़ाइन के मूल अंश रेखाएं, रूप और आकार, रंग और बनावट हैं।
  3. डिज़ाइन के पाँच मूल सिद्धान्त हैं-समरूपता, अनुपात, संतुलन, लय और बल।
  4. जब कोई फर्नीचर, घर का नक्शा या अन्य सजावट का सामान बनाया जाता है तो इन मूल अंशों को ध्यान में रखा जाता है।
  5. रंग प्रकाश की किरणों से उत्पन्न होते हैं।
  6. लाल, नीला और पीला प्रारम्भिक रंग हैं।
  7. दो प्रारम्भिक रंग मिलाकर जो रंग बनते हैं उनको दूसरे दर्जे के रंग कहा जाता है।
  8. डिज़ाइन में लय लाने के लिए रंग या रेखाओं या आकार को दोहराया, दर्जा बन्दी प्रतिकूलता, समानान्तर या रेडिएशन किया जाता है।
  9. रंगों से विभिन्न रंग योजनाएं जैसे सम्बन्धित रंग योजना, विरोधी रंग योजना और एक रंग योजना तैयार की जाती है।
  10. हरा, नीला और सफ़ेद ठण्डे रंग होते हैं और लाल, काला, पीला गरम रंग होते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसका घर सुन्दर हो। एक साधारण घर को भी सजा कर आकर्षक बनाया जा सकता है। इसलिए धन के अतिरिक्त कला का होना भी बहुत आवश्यक है। घर का सामान खरीदने से पहले सजावटी ढंगों के बारे में जानकारी होनी आवश्यक है। इस जानकारी से कम पैसे खर्च कर घर , को अधिक सुन्दर बनाया जा सकता है। जब कोई वस्तु बनाई या खरीदी जाती है तो उसका एक नमूना या डिजाइन बनाया जाता है जो कमरे, घर और अन्य वस्तुओं के अनुसार होना चाहिए। घर में जो भी वस्तु बनाई जाती है यद्यपि घर ही हो या फिर कोई फर्नीचर पहले उसका नमूना तैयार किया जाता है। यदि कमरे की सभी वस्तुओं का आपसी समन्वय ठीक हो तभी एक बढ़िया डिज़ाइन बनेगा। डिज़ाइन के मूल तत्त्व रेखा रंग, रूप और ढांचा आदि हैं।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 20 सामाजिक/धार्मिक सुधार

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 20 सामाजिक/धार्मिक सुधार Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 20 सामाजिक/धार्मिक सुधार

महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
राजा राममोहन राम की मृत्यु के बाद ब्रह्म समाज का पुनर्गठन किसने किया?
उत्तर-
देवेंद्रनाथ टैगोर ने।

प्रश्न 2.
कलकत्ता में पहला विधवा विवाह कब हुआ?
उत्तर-
1856 में।

प्रश्न 3.
स्वामी दयानंद का देहांत कब हुआ?
उत्तर-
1883 ई० में।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 20 सामाजिक/धार्मिक सुधार

प्रश्न 4.
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद का संबंध किस प्रदेश से था?
उत्तर-
गुजरात से।

प्रश्न 5.
सर सैय्यद अहमद खां को ‘सर’ की उपाधि कब मिली?
उत्तर-
1888 ई० में।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति

(i) सर सैय्यद अहमद खां का देहांत … ………….. में हुआ।
(ii) आजकल निरंकारियों का मुख्यालय ……………….. में है।
(iii) सिंह सभा लहर के प्रयत्नों से 1892 ई० में …………….. में खालसा कॉलेज की स्थापना हुई।
(iv) नामधारियों को ………….. भी कहा जाता है।
(v) बाबा दयाल का देहांत 1855 ई० में ……………. में हुआ।
उत्तर-
(i) 1898 ई०
(ii) चण्डीगढ़
(iii) अमृतसर
(iv) कूका
(v) रावलपिंडी।

3. सही गलत कथन

(i) प्रार्थना समाज की स्थापना महादेव गोबिंद रानाडे ने की। — (✓)
(ii) रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी रामकृष्ण थे। — (✗)
(iii) मोहम्मडन ऐंग्लो-ओरियंटल कॉलेज की स्थापना अलीगढ़ में हुई। — (✓)
(iv) वहाबी आन्दोलन का आरम्भ सर सैय्यद अहमद खां ने किया था। — (✗)
(v) कूका आन्दोलन को 1872 ई० में दबा दिया गया। — (✓)

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 20 सामाजिक/धार्मिक सुधार

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
कादियां निम्न में से किस लहर का केंद्र था?
(A) कूका
(B) नामधारी
(C) निरंकारी
(D) अहमदिया।
उत्तर-
(B) नामधारी

प्रश्न (ii)
निरंकारी सम्प्रदाय के संस्थापक थे-
(A) बाबा दयाल
(B) दरबारा सिंह जी
(C) बाबा रामसिंह जी
(D) हुक्म सिंह जी।
उत्तर-
(D) हुक्म सिंह जी।

प्रश्न (iii)
‘सत्यार्थ प्रकाश’ किस संस्था की प्रसिद्ध पुस्तक है?
(A) रामकृष्ण मिशन
(B) आर्य समाज
(C) ब्रह्म समाज
(D) प्रार्थना समाज।
उत्तर-
(A) रामकृष्ण मिशन

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 20 सामाजिक/धार्मिक सुधार

प्रश्न (iv)
भारत में पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित पहले मुस्लिम समाज सुधारक थे-
(A) गुलाम कादरी
(B) सर सैय्यद अहमद खां
(C) आगा खां
(D) मिर्जा गुलाम अहमद।
उत्तर-
(C) आगा खां

प्रश्न (v)
रामकृष्ण मिशन किस नाम से प्रसिद्ध हुआ।
(A) कांची मठ
(B) पुरी मठ
(C) वैलूर मठ
(D) श्रृंगेरी मठ।
उत्तर-
(B) पुरी मठ

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में पहला धार्मिक-सामाजिक आन्दोलन किस प्रान्त में तथा किस विचारधारा के अधीन हुआ ?
उत्तर-
भारत में पहला धार्मिक-सामाजिक आन्दोलन बंगाल में हुआ। यह पश्चिमी विचारधारा के अधीन हुआ।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 20 सामाजिक/धार्मिक सुधार

प्रश्न 2.
‘रिवाइवलिजम’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
धर्म के नाम पर तथा बीते समय का हवाला देते हुए लोगों में जागृति लाने के प्रयास को रिवाइवलिज़म का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 3.
ब्रह्म समाज की स्थापना कब, कहां और किसने की ?
उत्तर-
ब्रह्म समाज की स्थापना 1829 में, कलकत्ता (कोलकाता) में राजा राम मोहन राय ने की।

प्रश्न 4.
राजा राममोहन राय का जन्म कब और कहां हुआ तथा इन्होंने किन तीन भाषाओं में पुस्तकें लिखीं तथा पत्रिकायें निकाली ?
उत्तर-
राजा राममोहन राय का जन्म बंगाल में 1772 में हुआ। इन्होंने फारसी, अंग्रेज़ी तथा बंगाली भाषाओं में पुस्तकें लिखीं तथा पत्रिकायें निकाली।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 20 सामाजिक/धार्मिक सुधार

प्रश्न 5.
स्त्रियों की दशा सुधारने के सन्दर्भ में राजा राममोहन राय ने किन दो बातों पर जोर दिया ?
उत्तर-
राजा राममोहन राय ने बाल-विवाह तथा सती प्रथा को समाप्त करने पर जोर दिया।

प्रश्न 6.
ब्रह्म समाज के कार्यक्रम का धार्मिक उद्देश्य क्या था ?
उत्तर-
ब्रह्म समाज के कार्यक्रम का धार्मिक उद्देश्य एक परमात्मा की उपासना पर बल देना और वेदों और उपनिषदों की तर्कसंगत व्याख्या करना था।

प्रश्न 7.
राजा राममोहन राय का देहान्त कब हुआ तथा इसके बाद ब्रह्म समाज का पुनर्गठन किसने किया ?
उत्तर-
राजा राममोहन राय का देहान्त 1833 में हुआ। इसके बाद ब्रह्म समाज का पुनर्गठन देवेन्द्र नाथ टैगोर ने किया।

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प्रश्न 8.
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने किस प्रान्त में तथा किन सुधारों का प्रचार किया ?
उत्तर-
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने बंगाल में विधवा विवाह के पक्ष में प्रचार किया।

प्रश्न 9.
विधवा विवाह के पक्ष में कानून कब पास हुआ तथा कलकत्ता (कोलकाता) में पहला विधवा विवाह कब हुआ?
उत्तर-
विधवा विवाह के पक्ष में कानून 1855 में पास हुआ। कलकत्ता (कोलकाता) में पहला विधवा विवाह 1856 में हुआ:

प्रश्न 10.
1865 तक ब्रह्म समाज की बंगाल में शाखाओं की संख्या क्या थी तथा इस समय बंगाल से बाहर किन तीन प्रान्तों में उनके केन्द्र थे ?
उत्तर-
1865 तक ब्रह्म समाज की बंगाल में शाखाओं की संख्या 50 थी। इस समय बंगाल से बाहर इसके केन्द्र उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु तथा पंजाब में थे।

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प्रश्न 11.
ब्रह्म समाज दो भागों में कब विभक्त हुआ तथा इनके नेता कौन थे ?
उत्तर-
ब्रह्म समाज 1865 में दो भागों में विभक्त हुआ। इनके नेता देवेन्द्र नाथ टैगोर तथा केशवचन्द्र सेन थे।

प्रश्न 12.
रामकृष्ण मिशन की स्थापना कब और कहां हुई तथा किस नाम से प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तर-
रामकृष्ण मिशन की स्थापना सन् 1896 में कलकत्ता (कोलकाता) में हुई। यह वैलूर मठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

प्रश्न 13.
रामकृष्ण मिशन का संस्थापक कौन था तथा यह किस नाम से प्रसिद्ध हुआ ?
उत्तर-
रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानन्द थे। यह मिशन वैलूर मठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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प्रश्न 14.
रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द का देहान्त कब हुआ ?
उत्तर-
रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानन्द का देहान्त क्रमश: 1886 तथा 1902 में हुआ।

प्रश्न 15.
स्वामी विवेकानन्द ने किन चार बातों का खण्डन किया ?
उत्तर-
स्वामी विवेकानन्द ने जाति-पाति, कर्मकाण्ड, व्यर्थ की रीतियों तथा अन्धविश्वासों का खण्डन किया।

प्रश्न 16.
स्वामी विवेकानन्द ने भारत से बाहर किन दो महाद्वीपों में अपने विचारों का प्रचार किया ?
उत्तर-
स्वामी विवेकानन्द ने भारत से बाहर अमेरिका तथा यूरोप महाद्वीपों में अपने विचारों का प्रचार किया।

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प्रश्न 17.
सामाजिक सुधार और सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन ने कौन-सी चार प्रकार की संस्थाएं बनाईं ?
उत्तर-
सामाजिक सुधार और सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन ने स्कूल स्थापित किए, अस्पतालों का निर्माण करवाया, अनाथ आश्रम बनवाये तथा पुस्तकालय खोले।

प्रश्न 18.
महाराष्ट्र में धार्मिक तथा सामाजिक सुधार के लिए पहला संगठन कौन-सा था तथा यह कब स्थापित हुआ ?
उत्तर-
महाराष्ट्र में धार्मिक तथा सामाजिक सुधार के लिए पहला संगठन ‘परमहंस सभा’ था। यह 1849 ई० में स्थापित हुआ।

प्रश्न 19.
ज्योतिबा फूले स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए किन दो बातों के पक्ष में थे ?
उत्तर-
ज्योतिबा फुले स्त्रियों को शिक्षा दिलाने तथा विधवा विवाह के पक्ष में थे।

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प्रश्न 20.
महाराष्ट्र में प्रार्थना सभा’ की स्थापना कब हुई तथा इसके दो प्रमुख नेता कौन थे ?
उत्तर-
महाराष्ट्र में ‘प्रार्थना सभा’ की स्थापना 1867 में हुई। इसके दो प्रमुख नेता जस्टिस महादेव रानाडे तथा रामकृष्ण गोपाल थे।

प्रश्न 21.
महाराष्ट्र में धार्मिक-सामाजिक आन्दोलन के चार नेताओं के नाम बताएं तथा इन्होंने अपने विचारों का प्रचार अधिकतर कौन-सी भाषा में किया ?
उत्तर-
महाराष्ट्र में धार्मिक-सामाजिक आन्दोलनों के चार नेता ज्योतिबा फूले, महादेव गोविन्द रानाडे, गोपाल भण्डारकर तथा गोपाल हरि देश गुरु थे। इन्होंने अपने विचारों का प्रचार अधिकतर मराठी भाषा में किया।

प्रश्न 22.
आर्य समाज के संस्थापक कौन थे तथा यह किस प्रदेश से थे ?
उत्तर-
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द थे। यह गुजरात प्रदेश से थे।

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प्रश्न 23.
आर्य समाज की स्थापना कब तथा कहां हुई तथा यह पंजाब में कब आया ?
उत्तर-
आर्य समाज की स्थापना 1875 में बम्बई (मुम्बई) में हुई तथा यह पंजाब में 1877 में आया।

प्रश्न 24.
स्वामी दयानन्द की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम क्या था तथा यह किस वर्ष में प्रकाशित हुई ?
उत्तर-
स्वामी दयानन्द की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘सत्यार्थ प्रकाश’ था। यह 1874 में प्रकाशित हुई।

प्रश्न 25.
स्वामी दयानन्द ने किन चार बातों का विरोध किया ?
उत्तर-
स्वामी दयानन्द ने मूर्ति-पूजा, जाति-पाति, पुरोहितों की प्रभुसत्ता तथा तीर्थ यात्रा का विरोध किया।

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प्रश्न 26.
स्वामी दयानन्द का देहान्त कब हुआ तथा 1911 तक आर्य समाजियों की संख्या कितनी हो गई ?
उत्तर-
स्वामी दयानन्द का देहान्त 1883 में हुआ। 1911 तक आर्य समाजियों की संख्या 24 लाख तक पहुंच गई थी।

प्रश्न 27.
पंजाब में सबसे पहले ऐंग्लो-वैदिक स्कूल तथा कॉलेज कब और कहां स्थापित हुए ?
उत्तर-
पंजाब में सबसे पहले ‘एंग्लो-वैदिक’ स्कूल तथा कॉलेज 1886 में लाहौर में स्थापित हुए।

प्रश्न 28.
सैय्यद अहमद बरेलवी ने कौन-सा अभियान चलाया तथा बाद में यह पंजाब के किस शासक के विरुद्ध हो गया?
उत्तर-
सैय्यद अहमद बरेलवी ने वहाबी अभियान चलाया। बाद में यह पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिंह के विरुद्ध हो गया।

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प्रश्न 29.
1886 के बाद वहाबी प्रभाव अधीन पंजाब के मुसलमानों में कौन-सी दो धार्मिक लहरों का उदय हुआ ?
उत्तर-
1886 के बाद वहाबी प्रभाव अधीन पंजाब के मुसलमानों में दो धार्मिक सुधारों अहले-कुरान तथा अहले हदीस की लहरें आईं।

प्रश्न 30.
भारत में पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित पहले मुस्लिम समाज सुधारक कौन थे तथा उनका जन्म कहां हुआ ?
उत्तर-
भारत में पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित पहले मुस्लिम समाज सुधारक सैय्यद अहमद खां थे। उनका जन्म दिल्ली में हुआ।

प्रश्न 31.
सर सैय्यद खां को सर की उपाधि कब मिली और उनका देहान्त कब हुआ ?
उत्तर-
सर सैय्यद अहमद खां को सर की उपाधि 1888 ई० में मिली तथा उनका देहान्त 1898 ई० में हुआ।

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प्रश्न 32.
‘मोहम्मडन ओरिएन्टल’ कॉलेज की स्थापना कब और कहां हुई तथा यह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कब परिवर्तित हो गया ?
उत्तर-
‘मोहम्मडन ओरिएन्टल’ कॉलेज की स्थापना 1875 ई० में हुई। यह 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में परिवर्तित हुआ।

प्रश्न 33.
अलीगढ़ आन्दोलन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
अलीगढ़ आन्दोलन से अभिप्राय उस सामाजिक आन्दोलन से है जिसका आरम्भ सर सैय्यद अहमद खां के नेतृत्व में मुस्लिम समाज में सुधार लाने के लिए हुआ था।

प्रश्न 34.
सर सैय्यद अहमद खां के अतिरिक्त अलीगढ़ आन्दोलन के चार नेताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
सर सैय्यद अहमद खां के अतिरिक्त अलीगढ़ आन्दोलन के चार नेता-मौलवी नजीर अहमद, जकाउल्ला, अलताफ हुसैन हाली तथा शिबली नोमानी थे।

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प्रश्न 35.
अलीगढ़ आन्दोलन के अन्तर्गत स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए कौन-सी तीन सामाजिक कमजोरियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई गई ?
उत्तर-
अलीगढ़ आन्दोलन के अन्तर्गत स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए पर्दा प्रथा, बहुविवाह तथा तुरन्त तलाक जैसी सामाजिक कमजोरियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई गई।

प्रश्न 36.
पंजाब में मुसलमानों में धार्मिक तथा सामाजिक सुधार के लिए बनी संस्थाओं को क्या कहा जाता था तथा 1890 तक इनकी संख्या क्या थी ?
उत्तर-
पंजाब में मुसलमानों में धार्मिक तथा सामाजिक सुधार के लिए बनी संस्थाओं को ‘अन्जुमन-इस्लामिया’ कहा जाता था। 1890 तक इनकी संख्या 60 से अधिक थी।

प्रश्न 37.
मिर्जा गुलाम अहमद का सम्बन्ध किस धार्मिक लहर से है तथा इनका जन्म पंजाब में कब और कहां हुआ ?
उत्तर-
मिर्जा गुलाम अहमद का सम्बन्ध अहमदिया लहर से है तथा उनका जन्म 1835 ई० में जिला गुरदासपुर के कादियां नामक स्थान पर हुआ।

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प्रश्न 38.
मिर्जा गुलाम अहमद ने अपने अनुयायी बनाने कब शुरू किए तथा अपने आपको पैगम्बर कब कहना आरम्भ किया ?
उत्तर-
मिर्जा गुलाम अहमद ने 1890 ई० में अपने अनुयायी बनाने शुरू किये। 1900 ई० में उन्होंने अपने आपको पैगम्बर कहना आरम्भ कर दिया।

प्रश्न 39.
अहमदिया लहर में दो सम्प्रदाय कब बन गए तथा उसके केन्द्र कहां थे ?
उत्तर-
अहमदिया लहर में दो सम्प्रदाय 1914 ई० में बने तथा उसके केन्द्र कादियां तथा लाहौर में थे।

प्रश्न 40.
अहमदिया लोगों ने भारत से बाहर अपने मत का प्रचार कौन-से तीन महाद्वीपों में किया ?
उत्तर-
अहमदिया लोगों ने भारत से बाहर अपने मत का प्रचार अफ्रीका, यूरोप तथा अमेरिका में किया।

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प्रश्न 41.
निरंकारी सम्प्रदाय के संस्थापक कौन थे तथा इनका जन्म कहां और कौन-से परिवार में हुआ ?
उत्तर-
निरंकारी सम्प्रदाय के संस्थापक बाबा दयाल थे। इनका जन्म पेशावर के एक खत्री सर्राफ के घर हुआ।

प्रश्न 42.
बाबा दयाल ने गुरु ग्रन्थ साहिब की मर्यादा के अनुसार साधारण जीवन के कौन-से चार अवसरों के लिए नीतियां चलाईं ?
उत्तर-
बाबा दयाल ने गुरु ग्रन्थ साहिब की मर्यादा के अनुसार जन्म, नामकरण, विवाह तथा मरण से सम्बन्धित अवसरों पर रीतियां चलाईं।

प्रश्न 43.
बाबा दयाल का देहान्त कब और कहां हुआ तथा दयालसर किस स्थान को कहा जाता है ?
उत्तर-
बाबा दयाल का देहान्त 1855 ई० में रावलपिंडी में हुआ। जिस स्थान पर उनकी देह को नदी में समर्पित किया गया, वहां उनके नाम पर बाद में दयालसर बना।

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प्रश्न 44.
बाबा दयाल के उत्तराधिकारी का नाम लिखो तथा उन्होंने किस दोआब में अपने विचारों का प्रचार किया ?
उत्तर-
बाबा दयाल के उत्तराधिकारी का नाम बाबा दरबारा सिंह था। उन्होंने सिन्ध सागर में अपने विचारों का प्रचार किया।

प्रश्न 45.
बाबा दरबारा सिंह का देहान्त कब हुआ तथा उनके दो उत्तराधिकारियों के नाम बताएं।
उत्तर-
बाबा दरबारा सिंह का देहान्त 1870 ई० में हुआ। उनके दो उत्तराधिकारी साहिब रत्ता जी तथा बाबा गुरदित्तौ सिंह थे।

प्रश्न 46.
1947 ई० से पहले पंजाब के किस दोआब में निरंकारियों ने अपने मत का प्रचार किया तथा आजकल उनका मुख्यालय कौन-सा है ?
उत्तर-
1947 ई० से पहले पंजाब के सिन्ध सागर दोआब में निरंकारियों ने अपने मत का प्रचार किया। आजकल इनका मुख्यालय चण्डीगढ़ में है।

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प्रश्न 47.
नामधारी लहर के संस्थापक कौन थे तथा उन्होंने अपने धार्मिक विचारों का प्रचार पंजाब के कौन-से दोआब में किया ?
उत्तर-
नामधारी लहर के संस्थापक बाबा बालक सिंह थे। इन्होंने अपने धार्मिक विचारों का प्रचार पंजाब के सिन्ध सागर दोआब में किया।

प्रश्न 48.
बाबा बालक सिंह का देहान्त कब हुआ तथा उनके श्रद्धालुओं को ‘नामधारी’ क्यों कहा जाता था ?
उत्तर-
बाबा बालक सिंह का देहान्त 1862 ई० में हुआ। ‘नाम’ स्मरण पर विशेष बल देने के कारण उनके श्रद्धालुओं को ‘नामधारी’ कहा जाता था।

प्रश्न 49.
नामधारी लहर को पंजाब के केन्द्रीय जिलों में किसने फैलाया तथा ये किस जिले के रहने वाले थे ?
उत्तर-
नामधारी लहर को पंजाब के केन्द्रीय जिलों में बाबा राम सिंह ने फैलाया। यह लुधियाना जिले (भैनी गांव) के रहने वाले थे।

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प्रश्न 50.
नामधारियों के पहरावे की चार विशेषताएं क्या थी ?
उत्तर-
नामधारी सफेद खद्दर का कुर्ता तथा कछहरा पहनते थे। वे सीधी पगड़ी बांधते थे तथा गले में सफेद ऊन की माला डालते थे।

प्रश्न 51.
नामधारियों में बहुसंख्या समाज के कौन-से तीन वर्गों की थी तथा बाबा राम सिंह का पारिवारिक व्यवसाय क्या था ?
उत्तर-
नामधारियों में बहुसंख्या तरखानों, जाटों तथा मजहबी सिक्खों की थी। बाबा राम सिंह का पारिवारिक व्यवसाय बढ़ईगिरी था।

प्रश्न 52.
बाबा राम सिंह ने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए कौन-सी दो बातों पर बल दिया ?
उत्तर-
बाबा राम सिंह ने लड़कियों को पैदा होते ही मार देने की प्रथा का विरोध किया। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया।

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प्रश्न 53.
लोग नामधारियों को कूका क्यों कहने लग गए ?
उत्तर-
नामधारी लोग शब्द बाणी पढ़ते समय ऊंची आवाज़ में बोलने या चीख (कूक) मारने लगते थे। इसलिए उन्हें कूका कहा जाने लगा।

प्रश्न 54.
बाबा राम सिंह ने अपने श्रद्धालुओं के साथ सम्पर्क रखने के लिए कौन-सी दो विधियां अपनाईं ?
उत्तर-
बाबा राम सिंह ने अपने श्रद्धालुओं के साथ सम्पर्क रखने के लिए विभिन्न जिलों में अपने प्रतिनिधि या सूबे नियुक्त किए। उन्होंने अपनी डाक व्यवस्था भी बना ली।

प्रश्न 55.
1871 ई० में नामधारियों ने किन दो स्थानों पर कसाइयों को मारा था तथा उन्हें क्या सजा दी गई ?
उत्तर-
1871 ई० में नामधारियों ने अमृतसर तथा रायकोट में कसाइयों को मारा था। उन्हें फांसी की सजा दी गई।

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प्रश्न 56.
नामधारियों ने मालेरकोटला पर हमला कब किया तथा उन्हें क्या सज़ा दी गई ?
उत्तर-
नामधारियों ने मालेरकोटला पर 1872 ई० में हमला किया। इस कारण उन्हें गिरफ्तार करके तोपों से उड़ा दिया गया।

प्रश्न 57.
बाबा राम सिंह को रंगून कब भेजा गया तथा उन्हें क्या सज़ा दी गई ?
उत्तर-
बाबा राम सिंह को 1872 ई० में रंगून भेजा गया। उन्हें देश निकाला मिला था।

प्रश्न 58.
बाबा राम सिंह के बाद नामधारियों का नेतृत्व करने वाले दो गुरु कौन थे ?
उत्तर-
बाबा राम सिंह के बाद नामधारियों का नेतृत्व करने वाले दो गुरु-बाबा हरि सिंह और बाबा प्रताप सिंह थे।

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प्रश्न 59.
सब से पहले दो सिंह सभायें कब तथा कहां स्थापित की गई ?
उत्तर-
पहली सिंह सभा 1873 ई० में अमृतसर और दूसरी 1879 में लाहौर में स्थापित की गई।

प्रश्न 60.
19वीं सदी में सिंह सभाओं की संख्या कितनी हो गई तथा इनका सदस्य कौन बन सकता था ?
उत्तर-
19वीं सदी में सिंह सभाओं की संख्या 120 हो गई। कोई भी सिक्ख इनका सदस्य बन सकता था।

प्रश्न 61.
सिंह सभाओं में कौन-से चार वर्गों के लोग शामिल थे ?
उत्तर-
सिंह सभाओं में उच्च वर्ग के ज़मींदार, साधारण किसान, नौकरी पेशा तथा व्यापारी शामिल थे ।

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प्रश्न 62.
‘चीफ खालसा दीवान’ कब स्थापित हुआ तथा इसने क्या भूमिका निभाई ?
उत्तर-
चीफ खालसा दीवान 1902 में स्थापित हुआ। इसने सिंह सभा लहर का नेतृत्व किया तथा सिक्खों के प्रतिनिधि की भूमिका निभाई।

प्रश्न 63.
‘खालसा ट्रस्ट सोसाइटी’ कब स्थापित हुई तथा इसका क्या उद्देश्य था ?
उत्तर-
खालसा ट्रस्ट सोसाइटी 1894 ई० में स्थापित हुई। उसका उद्देश्य पंजाबी भाषा तथा गुरुमुखी लिपि में नए विचारों का प्रचार करना था।

प्रश्न 64.
सिंह सभा लहर के प्रभाव अधीन निकाली जाने वाली दो पत्रिकाओं के नाम बताएं।
उत्तर-
सिंह सभा लहर के प्रभाव अधीन निकाली जाने वाली दो पत्रिकाएं खालसा समाचार’ तथा ‘खालसा एडवोकेट’ थीं।

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प्रश्न 65.
सिंह सभाओं ने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए किन दो बातों पर जोर दिया ?
उत्तर-
सिंह सभा ने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए लड़कियों की शिक्षा तथा स्त्री-पुरुष समानता पर बल दिया।

प्रश्न 66.
सिंह सभा लहर के शिक्षा के कार्यक्रम का क्या प्रयोजन था ?
उत्तर-
सिंह सभा लहर के शिक्षा के कार्यक्रम का प्रयोजन विज्ञान तथा अंग्रेज़ी को नैतिक और धार्मिक शिक्षा के साथ जोड़ना था।

प्रश्न 67.
सिंह सभा लहर के प्रयत्नों से बनी सबसे महत्त्वपूर्ण शिक्षा संस्था कब तथा कहां स्थापित हुई ?
उत्तर-
सिंह सभा लहर के प्रयत्नों से 1892 ई० में अमृतसर में खालसा कॉलेज की स्थापना हुई ।

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प्रश्न 68.
सिक्ख एजुकेशनल कान्फ्रेंस कब स्थापित की गई तथा उसका क्या उद्देश्य था ?
उत्तर-
सिक्ख एजुकेशनल कान्फ्रेंस 1908 ई० में स्थापित की गई। इसका उद्देश्य शिक्षा सम्बन्धी विचार-विमर्श करना तथा शिक्षा के क्षेत्र का विस्तार करना था। .

प्रश्न 69.
सिंह सभा लहर के चार नेताओं के नाम बताएं।
उत्तर-
सिंह सभा लहर के चार नेता बाबा खेम सिंह बेदी, सरदार ठाकुर सिंह संधावालिया, प्रो० गुरुमुख सिंह और ज्ञानी . दित्त सिंह थे।

प्रश्न 70.
बीसवीं सदी के पहले दो दशकों में सभाओं ने गुरुद्वारों के सुधार के लिए कौन-से दो प्रकार के यत्न किए ?
उत्तर-
बीसवीं सदी के पहले दो दशकों में सभाओं के प्रयत्नों से हरमंदर साहिब के बाहरी हिस्सों से मूर्तियों को उठा लिया गया। सिंह सभाओं ने इन्हीं गुरुद्वारों से महन्तों को निकलवाने के लिए सरकार से भी टक्कर ली।

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II. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
किस विचारधारा के प्रभाव अधीन ब्रह्म समाज की स्थापना हुई तथा इसका क्या उद्देश्य था ?
उत्तर-
ब्रह्म समाज की स्थापना पश्चिमी विचारधारा तथा भारतीय विचारधारा के संगम के कारण हुई। ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय पश्चिमी विज्ञान तथा तकनीकी को भारतीयता का रंग देना चाहते थे। इसी बात से प्रेरित हो कर उन्होंने ब्रह्म समाज की 1829 ई० में स्थापना की। इस सभा का उद्देश्य एक परमात्मा की उपासना पर बल देना और वेदों एवं उपनिषदों की तर्कसंगत व्याख्या करना था। मूर्ति-पूजा और सामाजिक त्रुटियों का विरोध करना भी इसका एक उद्देश्य था। जाति-पाति के भेद-भाव समाप्त करना भी सभा का महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था। स्त्रियों की पुरुषों के साथ समानता भी इसके आदर्शों में सम्मिलित था। अतः राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 2.
रामकृष्ण मिशन की विचारधारा तथा कार्यक्रम बताएं।
उत्तर-
रामकृष्ण मिशन की स्थापना सन् 1896 में स्वामी विवेकानन्द ने कलकत्ता (कोलकाता) में की। यह मिशन विवेकानन्द ने अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस के नाम पर चलाया था। रामकृष्ण की रुचि विशेष रूप से धार्मिक सुधार में थी। स्वामी विवेकानन्द का विचार था कि मुक्ति प्राप्त करने के बहुत से मार्ग हैं। वे मुसलमानों और ईसाइयों के साथ भी सम्पर्क रखते थे। उनका यह भी विचार था कि मनुष्य की सेवा करना परमात्मा की सेवा है। स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु के विचारों का प्रचार करने के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि धर्म के द्वारा ही समाज का पुनर्निर्माण हो सकता है। वे वेदान्त के पक्ष में थे। उन्होंने जाति-पाति का जोरदार खण्डन किया। वे कर्मकाण्ड की व्यर्थ रीतियों और अन्ध-विश्वासों का भी सख्ती से विरोध करते थे। रामकृष्ण मिशन स्थापित करने के छः वर्ष पश्चात् स्वामी विवेकानन्द का देहान्त हो गया। परन्तु तब तक भारत के बहुत-से नगरों में इसको केन्द्र खुल चुके थे। समाज-सुधार और सेवा के क्षेत्र में रामकृष्ण मिशन ने बहुत से स्कूल स्थापित किये, अस्पताल खोले, अनाथ आश्रम चलाये और पुस्तकालय खोले।

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प्रश्न 3.
महाराष्ट्र में समाज सुधारकों ने किस बात पर जोर दिया ?
उत्तर-
महाराष्ट्र में सुधार लहर के उद्देश्य लगभग अन्य सुधारकों से मेल खाते थे। 1849 ई० में ‘परमहंस सभा’ स्थापित हुई। इसका उद्देश्य परमात्मा की एकता का प्रचार करना और जाति-पाति का विरोध करना था। ज्योतिबा फूले ने स्त्री शिक्षा पर बल दिया। वे विधवा-विवाह के पक्ष में भी थे। कुछ समय पश्चात् एक ‘विधवा पुनर्विवाह सभा’ स्थापित हुई। इसी तरह गोपाल हरि देशमुख ने अपने प्रगतिशील विचारों द्वारा सामाजिक त्रुटियों का खण्डन किया।

महाराष्ट्र में सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था 1867 में ‘प्रार्थना सभा’ के नाम से स्थापित हुई। इसके प्रतिनिधि धार्मिक सुधार की अपेक्षा सामाजिक सुधार में अधिक रुचि रखते थे। जस्टिस महादेव गोविन्द रानाडे और रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ने इस सभा द्वारा समाज की सेवा की। अनाथों के लिए आश्रम खोले गए। सामाजिक सुधार और सेवा की यह रुचि 20वीं सदी के आरम्भ तक चलती रही।

प्रश्न 4.
स्वामी दयानन्द के सामाजिक तथा धार्मिक विचार क्या थे ?
उत्तर-
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती थे। उन्होंने समाज का सुधार करने के लिए 1875 ई० में आर्य समाज की स्थापना की। थोड़े ही समय पश्चात् सारे देश में इसकी शाखाओं का जाल-सा बिछ गया। स्वामी दयानन्द के अपने स्वतन्त्र विचार थे जिनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है

  • ईश्वर एक है। वह सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् है। उसका कोई आकार नहीं है। अतः उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करना व्यर्थ है।
  • वेद सत्य हैं। वेद ईश्वर की वाणी हैं। वेद ही हमें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिला सकते हैं।
  • ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान के अन्धकार का नाश करना चाहिए।
  • शुद्धि द्वारा प्रत्येक धर्म का अनुयायी हिन्दू बन सकता है।
  • पूर्वजों के श्राद्ध, बाल-विवाह तथा छूतछात के भेदभाव वैदिक धर्म के विपरीत हैं। इस संस्था ने पंजाब के साथ-साथ पूरे देश में धार्मिक तथा सामाजिक उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किए।

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प्रश्न 5.
‘अलीगढ़ आन्दोलन’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
अलीगढ़ आन्दोलन एक मुस्लिम आन्दोलन था। यह आन्दोलन सर सैय्यद अहमद खां ने मुसलमानों में जागृति पैदा करने के लिए चलाया। उस समय मुसलमान काफ़ी पिछड़े हुए थे। वे अरबी और फारसी को छोड़कर अन्य किसी भी भाषा की शिक्षा प्राप्त करना अपने धर्म के विरुद्ध समझते थे। इसलिए वे सरकारी नौकरियों से वंचित थे। ऐसी दशा में सर सैय्यद अहमद खां ने मुसलमानों को ऊंचा उठाने का निश्चय किया। उन्होंने मुसलमानों को अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा दी। मुस्लिम समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए उन्होंने ‘तहजीब-उल-अकल’ नामक एक पत्रिका निकालनी आरम्भ की। 1875 ई० में उन्होंने अलीगढ़ में ऐंग्लो-ओरियण्टल कॉलेज की स्थापना की। यह कॉलेज 1920 ई० में मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। इस विश्वविद्यालय ने अनेक विचारकों को जन्म दिया।

प्रश्न 6.
बाबा राम सिंह की शिक्षाएं क्या थी ?
उत्तर-
बाबा राम सिंह प्रमुख नामधारी नेता थे। उनकी शिक्षाएं बड़ी सरल एवं प्रभावशाली थीं। वह जाति प्रथा के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को अपना शिष्य बनाया। हिन्दू-मुसलमान आदि सभी लोग कूका मत में सम्मिलित हो सकते थे। वे ब्राह्मणों, महन्तों तथा बेदियों के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने मूर्ति पूजा का भारी विरोध किया। उन्होंने अन्तर्जातीय विवाह तथा विधवा विवाह पर बल दिया। बाबा रामसिंह जी ने लोगों को उच्च नैतिक जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने शिष्यों को आडम्बर, झूठ तथा धोखेबाज़ी से दूर रहने का आदेश दिया। उन्होंने ब्राह्मणों के धार्मिक पाखण्डों के विरुद्ध आवाज़ उठाई तथा सती-प्रथा बन्द करवाने का प्रयास किया। वह बाल-विवाह, कन्या-वध तथा लड़कियों के विक्रय के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने अपने शिष्यों में विवाह की आनन्द कारज प्रथा प्रचलित की। फलस्वरूप विवाह सादा और कम खर्चीला हो गया। कूका लोगों को पवित्र स्थानों पर नंगे सिर जाने की आज्ञा नहीं थी। गुरु राम सिंह ने नामधारियों के लिए दोहरी पगड़ी पहनना आवश्यक बताया। उन्होंने अपने अनुयायियों को दसवें गुरु गोबिन्द सिंह द्वारा रचित ‘ग्रन्थ साहिब’ के अध्ययन करने की प्रेरणा दी।

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प्रश्न 7.
सिंह सभा लहर के उद्देश्य तथा कार्यक्रम के बारे में बताएं।
उत्तर-
सिंह सभा लहर का आरम्भ 1873 ई० में हुआ। 1890 ई० तक 120 स्थानों पर सिंह सभाएं स्थापित हो चुकी थीं। इस लहर का मुख्य उद्देश्य प्राचीन सिक्ख परम्पराओं और खालसा आचरण को फिर से लागू करना था। इनका दूसरा उद्देश्य पंजाबी भाषा तथा गुरुमुखी लिपि का प्रचार करना था। शिक्षा का प्रसार करना भी इस लहर का एक उद्देश्य था।

इस लहर को संगठित करने के लिए 1902 में ‘चीफ खालसा दीवान’ बनाया गया। पंजाबी भाषा के विकास के लिए ‘खालसा ट्रैक्ट सोसाइटी’ स्थापित की गई। अमृतसर में खालसा कॉलेज की स्थापना हुई। 1908 में सिक्ख एजूकेशनल कांफ्रैंस का गठन हुआ। इस तरह सिंह सभा लहर ने गुरुद्वारों को महन्तों से आजाद कराया और सिक्खों में सामाजिक तथा राजनीतिक जागृति पैदा की।

प्रश्न 8.
अहमदिया लहर का धार्मिक पक्ष क्या था ?
उत्तर-
अहमदिया लहर को कादियानी लहर भी कहा जाता है। इसके संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद थे। उनका जन्म 1835 ई० में गुरदासपुर जिले के कादियां नामक स्थान पर हुआ था। उसे देश में प्रचलित सभी धार्मिक लहरों के विषय में पूरी-पूरी जानकारी थी। वह भी देश में अपने ही ढंग से धर्म-सुधार करना चाहता था। वह यह भी चाहता था, कि देश में ईसाई मिशनरियों तथा आर्य समाज के बढ़ते हुए प्रभाव को रोका जाये। अतः उसने लोगों के सामने इस्लाम की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की। कुरान के महत्त्व पर अत्यधिक बल दिया और इसकी व्याख्या करना उचित ठहराया। उसकी यही विचारधारा अहमदिया लहर के नाम से प्रसिद्ध हुई। 1890 ई० में अनेक लोग उसके अनुयायी बन गये। उसका प्रभाव इतना बढ़ गया कि 1900 ई० में उसने अपने आपको मसीहा तथा पैगम्बर कहना आरम्भ कर दिया। 1908 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। परन्तु उसके उत्तराधिकारियों ने इस आन्दोलन को जारी रखा। 1914 ई० में यह आन्दोलन दो शाखाओं में बंट गया। एक का केन्द्र कादियां में रहा और दूसरी शाखा ने लाहौर में अपना केन्द्र स्थापित किया।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 20 सामाजिक/धार्मिक सुधार

प्रश्न 9.
धार्मिक और सामाजिक आन्दोलनों ने मुख्य रूप से किन दो विषयों पर बल दिया ?
उत्तर-
धार्मिक और सामाजिक आन्दोलनों ने मुख्य रूप से दो महत्त्वपूर्ण सामाजिक समस्याओं पर बल दिया : स्त्रियों की भलाई तथा जाति भेद को समाप्त करना। इन कार्यक्रमों का आधार मानवीय समानता की विचारधारा थी। परन्तु समानता की यह विचारधारा केवल धर्म के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं थी। इसका राजनीतिक महत्त्व भी था। अंग्रेजों के राज्य में कानूनी रूप से तो सभी भारतीय समान थे, परन्तु सामाजिक या राजनीतिक रूप से नहीं थे।

भारत में स्त्रियों की संख्या देश की जनसंख्या से लगभग आधी थी। विश्व के अन्य समाजों की भान्ति भारत में भी स्त्री पुरुष के अधीन थी। धर्म और कानून की व्यवस्था भी उसके पक्ष में नहीं थी। पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह आदि कुप्रथाएं इसी असमानता का परिणाम थीं। धार्मिक और सामाजिक आन्दोलनों ने स्त्रियों की भलाई पर बल दिया। उनके प्रयासों का परिणाम भी अच्छा निकला। धीरे-धीरे स्त्रियों ने राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक आन्दोलनों में स्वयं भाग लेना आरम्भ कर दिया। उन्होंने समानता की मांग की। देश के प्रमुख नेताओं ने इसका जोरदार समर्थन किया। परिणामस्वरूप स्त्रीपुरुष की समानता का आदर्श स्वीकार कर लिया गया।

प्रश्न 10.
आर्य समाज के संस्थापक कौन थे ? इस संस्था द्वारा किए गए किन्हीं चार धार्मिक तथा सामाजिक सुधारों का वर्णन कीजिए।
अथवा
19वीं शताब्दी में समाज-सुधार के क्षेत्र में आर्य समाज की क्या भूमिका रही ?
उत्तर-
आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने की थी। इस संस्था द्वारा किए गए चार धार्मिक तथा सामाजिक सुधारों का वर्णन निम्नलिखित है–

  1. इस संस्था ने जाति-प्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाई और भाईचारे की भावना पर बल दिया।
  2. इस संस्था ने सती-प्रथा, बाल-विवाह तथा कन्या-वध आदि सामाजिक कुप्रथाओं का विरोध किया।
  3. इसने विधवाओं को पुनः विवाह करने की अनुमति देने तथा स्त्री शिक्षा के प्रसार पर जोर दिया।
  4. इस संस्था ने समाज में प्रचलित मूर्ति-पूजा तथा अन्ध-विश्वास का खण्डन किया।

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प्रश्न 11.
मुसलमानों में जागृति लाने के लिए सर सैय्यद अहमद खां ने क्या-क्या कार्य किए ?
उत्तर-
सर सैय्यद अहमद खां ने मुसलमानों में जागृति लाने के लिए निम्नलिखित कार्य किए-
1. उनका विश्वास था कि मुसलमानों में केवल पश्चिमी शिक्षा के प्रसार द्वारा ही जागृति लाई जा सकती है, इसलिए उन्होंने मुसलमानों को पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने और पश्चिमी साहित्य का अध्ययन करने की प्रेरणा दी।

2. उन्होंने अलीगढ़ में एम० ए० ओ० कॉलेज की स्थापना की। यहां मुसलमान विद्यार्थियों को पश्चिमी ढंग से शिक्षा दी जाती थी।

3. उनका विचार था कि मुसलमानों के उत्थान के लिए अंग्रेजों की सहानुभूति प्राप्त करना आवश्यक है, इसलिए उन्होंने मुसलमानों को अंग्रेजों के प्रति वफ़ादार रहने की प्रेरणा दी।

4. उन्होंने मुसलमानों के दृष्टिकोण को आधुनिक बनाने के लिए कुरान की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की।

प्रश्न 12.
भारतीय नारी की दशा सुधारने के लिए आधुनिक सुधारकों द्वारा किए गए कोई चार कार्य लिखिए।
उत्तर-
1. सती-प्रथा के कारण स्त्री को अपने पति की मृत्यु पर उसके साथ जीवित ही चिता में जल जाना पड़ता था। आधुनिक समाज-सुधारकों के प्रयत्नों से इस अमानवीय प्रथा का अन्त हो गया।

2. विधवाओं को पुनः विवाह करने की आज्ञा नहीं थी। समाज-सुधारकों के प्रयत्नों से उन्हें दोबारा विवाह करने की आज्ञा मिल गई।

3. आधुनिक सुधारकों का विश्वास था कि पर्दे में बन्द रहकर नारी कभी उन्नति नहीं कर सकती, इसलिए उन्होंने स्त्रियों को पर्दा न करने के लिए प्रेरित किया।

4. स्त्रियों को ऊंचा उठाने के लिए समाज-सुधारकों ने स्त्री शिक्षा पर विशेष बल दिया।

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प्रश्न 13.
ब्रह्म समाज की सामाजिक उपलब्धियों पर नोट लिखें।
उत्तर-
ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 ई० में राजा राममोहन राय ने की। इस संस्था की सामाजिक उपलब्धियों का वर्णन इस प्रकार है-
1. राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का अन्त करने का प्रयास किया। उनके प्रयत्नों से लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1829 ई० में एक कानून पास करके सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया।

2. ब्रह्म समाज ने जातीय भेद-भाव, छुआछूत, मानव-बलि, बहु-पत्नी विवाह तथा अन्य अनेक सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई।

3. ब्रह्म समाज ने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए स्त्री-शिक्षा पर विशेष बल दिया।

4. ब्रह्म समाज ने देश में पश्चिमी शिक्षा और पश्चिमी सभ्यता के प्रसार पर बल दिया। 1817 ई० में राजा राममोहन राय ने कलकत्ता (कोलकाता) में एक अंग्रेजी स्कूल का संचालन किया। उन्होंने 1825 ई० में एक वेदान्त कॉलेज की स्थापना की जहां पश्चिमी ढंग से शिक्षा का प्रसार होता था।

प्रश्न 14.
आर्य समाज की राजनीतिक उपलब्धियों के बारे में लिखें।
उत्तर-
राजनीतिक क्षेत्र में भी आर्य समाज का योगदान बड़ा ही महत्त्वपूर्ण था। स्वामी दयानन्द पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने ‘स्वराज्य’ शब्द का प्रयोग किया। स्वामी जी ने लोगों को कहा कि वे विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करें। साथ ही उन्होंने लोगों को स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग के लिए प्रेरणा दी। उन्होंने हिन्दी को राज्यभाषा का पद दिलाने की पहल की। स्वतन्त्रता आन्दोलन में कांग्रेस का नेतृत्व करने वाले कुछ व्यक्ति भी आर्य समाज से प्रभावित थे। इस आन्दोलन में भाग लेने वाले लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय, स्वामी श्रद्धानन्द, रामभज आदि व्यक्ति आर्य समाज से ही सम्बन्ध रखते थे। इसके अतिरिक्त क्रान्तिकारी आन्दोलन में आर्य समाज ने काफ़ी योगदान दिया।

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IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ब्रह्म समाज की उपलब्धियों का वर्णन करें।
उत्तर-
ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय थे। वह एक उच्चकोटि के समाज सुधारक थे। उन्होंने हिन्दू समाज में से न केवल प्रचलित कुप्रथाओं का ही अन्त किया, बल्कि उसे इसाई धर्म के प्रभाव से भी बचाया। उन्होंने सबसे पहले आत्मीय सभा की स्थापना की। इसके पश्चात् 1828 ई० में उन्होंने ब्रह्म समाज की नींव डाली। उन्होंने ब्रह्म समाज के माध्यम से समाज में प्रचलित अनेक कुप्रथाओं का विरोध किया। उन्होंने लोगों का ध्यान वेदों तथा उपनिषदों की महानता की ओर दिलाया और उनसे वेदों द्वारा बताये गये मार्ग पर चलने को कहा।

राजा राममोहन राय की मृत्यु के पश्चात् ब्रह्म समाज दो शाखाओं में बंट गया। पहली शाखा आदि समाज की थी जिसका नेतृत्व देवेन्द्रनाथ टैगोर ने किया। दूसरी शाखा साधारण समाज की थी जिसका नेतृत्व केशवचन्द्र सेन ने किया। ब्रह्म समाज अथवा राजा राममोहन राय की उपलब्धियों का वर्णन इस प्रकार है-

1. सामाजिक जागृति-

  1. राजा राममोहन राय ने सती-प्रथा का अन्त करने का प्रयास किया। उनके प्रयत्नों से 1829 ई० में लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने एक कानून पास करके सती-प्रथा को अवैध घोषित कर दिया। यह राजा राममोहन राय तथा ब्रह्म समाज की बहुत बड़ी विजय थी।
  2. उन्होंने जातीय भेद-भाव, छुआछूत, मानव बलि तथा अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई।
  3. उन्होंने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए स्त्री-शिक्षा पर विशेष बल दिया।

2. धार्मिक जागृति-

  1. उन्होंने मूर्ति-पूजा तथा अन्ध-विश्वासों का जोरदार खण्डन किया।
  2. उन्होंने लोगों को एक ही ईश्वर में विश्वास रखने के लिए प्रेरित किया।
  3. उन्होंने लोगों को पापों से दूर रहने और अच्छे कर्म करने का उपदेश दिया। उनका कहना था कि ईश्वर की भक्ति ही मोक्ष-प्राप्ति का एकमात्र साधन है।

3. सांस्कृतिक जागृति-राजा राममोहन राय ने देश में पश्चिमी शिक्षा और पश्चिमी सभ्यता के प्रसार पर बल दिया। उनका कहना था कि पश्चिमी विचारों के प्रसार से सामाजिक कुरीतियाँ अपने-आप दूर हो जाएंगी। शिक्षा के प्रसार के लिए उन्होंने 1817 ई० में कलकत्ता (कोलकाता) में एक अंग्रेजी स्कूल का संचालन किया। ब्रह्म समाज ने 1825 ई० में एक वेदान्त कॉलेज की स्थापना की जहां पश्चिमी ढंग से शिक्षा का प्रसार किया जाता था। .. सच तो यह है कि राजा राममोहन राय ने भारतीय समाज को कई कुरीतियों से मुक्त कराने में महान् कार्य किया। इसलिए उन्हें नये युग का अग्रदूत और भारतीय राष्ट्रवाद का पिता कहा जाता है। मिस कोलिट के अनुसार, “उन्होंने भारत को उसके अतीत से आधुनिक युग में लाने के लिए एक पुल का कार्य किया।”

प्रश्न 2.
आर्य समाज पर एक विस्तृत नोट लिखो।
उत्तर-
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द जी थे। उन्होंने 1875 ई० में बम्बई (मुम्बई) के स्थान पर आर्य समाज की स्थापना की। लाहौर में आर्य समाज की स्थापना अप्रैल, 1877 में हुई। शीघ्र ही लाहौर आर्य समाज का मुख्य केन्द्र बन गया।

उद्देश्य तथा आदर्श-आर्य समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य वेदों का प्रचार करना तथा मूर्ति पूजा और खोखले रीतिरिवाजों का खण्डन करना था। स्वामी जी ने कर्म व मोक्ष पर भी बल दिया। उन्होंने लोगों को “पुनः वेदों की ओर चलो” का आदेश दिया। उनके द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश में वेदों का ज्ञान भण्डार छिपा है।

उन्होंने स्त्री व पुरुष की समानता पर बल दिया। इसलिए उन्होंने कन्या वध तथा सती प्रथा जैसी कुरीतियों का विरोध किया। वह विधवा विवाह के पक्ष में थे। स्वामी जी ने जाति-पाति का भी कड़ा विरोध किया।

उन्होंने समाज में अज्ञानता को दूर करने के लिए अनिवार्य शिक्षा का समर्थन किया। वह स्त्री शिक्षा के भी समर्थक थे। उन्होंने हिन्दी भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने का तर्क प्रस्तुत किया।

30 अक्तूबर, 1883 ई० को स्वामी दयानन्द का देहान्त हो गया। उनके पश्चात् भी उनके अनुयायियों ने आर्य समाज के कार्य का प्रसार किया।

धार्मिक कार्य-धार्मिक क्षेत्र में आर्य समाज ने मूर्ति पूजा व कर्मकाण्डों का त्याग करने की शिक्षा दी।।
सामाजिक कार्य-

(i) आर्य समाज ने जाति-पाति की कड़ी आलोचना की। निम्न वर्ग का स्तर ऊँचा उठाने के लिए शिक्षा तथा आर्थिक सहायता का प्रबन्ध किया। इस दिशा में उनका दूसरा प्रयास शुद्धि आन्दोलन था।

(ii) समाज ने अनाथ बच्चों के लिए अनाथालय स्थापित किए।

(iii) विधवा स्त्रियों की सहायता के लिए विधवा आश्रम स्थापित किए गए। शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा के क्षेत्र में आर्य समाज का बहुमूल्य योगदान है। स्वामी जी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए उनके अनुयायियों ने 1886 ई० में दयानन्द ऐंग्लो वैदिक (D.A.V.) के नाम पर शिक्षण संस्थाएं स्थापित की।

राजनीतिक क्षेत्र में स्वामी जी की स्वराज्य की प्राथमिकता ने इनके अनुयायियों को देश प्रेम से ओत-प्रोत कर दिया। लाला लाजपत राय, स्वामी हंसराज, स्वामी श्रद्धानन्द, मदन मोहन मालवीय तथा रामभज जैसे बहुत से आर्य समाजियों ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।।

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प्रश्न 3.
नामधारी (कूका) आन्दोलन पर विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर-
नामधारी आन्दोलन का आरम्भ-नामधारी लहर का आरम्भ 1857 ई० में हुआ। इस वर्ष वैशाखी के दिन बाबा रामसिंह ने एक सम्प्रदाय की स्थापना की, जिसे ‘नामधारी’ सम्प्रदाय कहा जाता है। ‘नामधारी’ लोग मन्त्रों को मस्ती में उच्च स्वर में गाते थे। ऊंचे स्वर में गाए जाने वाले गीत अथवा कूक के कारण उन्हें कूका कहा जाने लगा और उनके प्रचार कार्य को ‘कूका आन्दोलन’ का नाम दिया गया। इस लहर का प्रमुख केन्द्र भैणी गांव था जोकि ज़िला लुधियाना में स्थित है। बाबा रामसिंह जी स्वयं भी यहीं के रहने वाले थे।
नामधारी आन्दोलन के सिद्धान्त अथवा शिक्षाएं-इस आन्दोलन के प्रमुख सिद्धान्त और शिक्षाएं निम्नलिखित थी-

  1. एक ईश्वर में श्रद्धा।
  2. श्वेत वस्त्र तथा श्वेत ऊन के मनकों की माला पहनना और सीधी पगड़ी पहनना।
  3. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब पर अटल विश्वास रखना तथा इसका पाठ करना।
  4. गुरु गोबिन्द सिंह को अपना गुरु मानना।
  5. बाल विवाह, कन्या वध, गो हत्या, दहेज तथा जाति-पाति का विरोध करना।
  6. सादा जीवन, नशीली वस्तुओं का निषेध, पुरोहित वाद, मूर्ति पूजा का खण्डन तथा अन्धविश्वासों का विरोध करना।
  7. पांच ककार धारण करना।

बाबा रामसिंह अंग्रेज़ विरोधी थे तथा स्वदेशी को महत्त्व देते थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को अंग्रेज़ सरकार की नौकरी अस्वीकार करने के लिए कहा। यहां तक कि उन्होंने लोगों को रेल, सरकारी विद्यालय, नौकरियां, कार्यालय, अदालतें, सरकारी डाक-तार आदि का बहिष्कार करने के लिए भी कहा। बाबा राम सिंह ने लोगों को विदेशी वस्तुओं तथा कपड़े का भी बहिष्कार करने की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को चर्खे पर बने खद्दर का प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया।

अंग्रेजी सरकार से टकराव-नामधारी सिक्खों ने शीघ्र ही शस्त्र धारण कर लिए। फलस्वरूप अंग्रेजों के साथ उनकी सीधी टक्कर आरम्भ हो गई। उस समय अनेक इसाई मिशनरी सिक्खों के विरुद्ध प्रचार करते थे और अंग्रेजों की ओर से ‘गो हत्या’ की भी खुली छूट थी। नामधारी सिक्ख इन बातों को सहन न कर सके और उन्होंने रायकोट के बूचड़खाने पर आक्रमण करके अनेक गो-हत्यारों को मार डाला। इस आरोप में 66 नामधारियों को तोपों से उड़ा दिया गया। बाबा रामसिंह जी को भी देश-निकाला देकर रंगून भेज दिया गया। यहीं पर 1885 ई० में उनका देहान्त हो गया। इसके बाद भी कुछ नामधारियों ने अपना धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम जारी रखा।

प्रश्न 4.
सिंह सभा लहर क्या थी और यह किस प्रकार अस्तित्व में आई ?
उत्तर-
पंजाब में नामधारी आन्दोलन की गति धीमी होने के बाद सिक्खों में एक अन्य लहर चली। यह लहर थी-सिंह सभा लहर। यह लहर बड़ी ही महत्त्वपूर्ण थी। इस लहर का राजनीति से इतना सम्बन्ध नहीं था जितना कि सिक्खों की सामाजिक तथा धार्मिक गतिविधियों से था। सिंह सभा आन्दोलन का आरम्भ सिक्खों ने अपनी कौमी सुरक्षा के लिए किया।

पहली सिंह सभा की स्थापना 1873 ई० को हुई। खेम सिंह बेदी, विक्रम सिंह आहलूवालिया और ठाकुर सिंह संधावालिया को इस सभा का प्रधान चुन लिया गया। 1879 ई० में लाहौर में एक और सभा की स्थापना की गई। इस सभा के सदस्य मध्यवर्गीय पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। पंजाब का गवर्नर सर रॉबर्ट इजर्टन भी इस सभा का सदस्य बन गया और उसने उस समय के वायसराय लॉर्ड लैंसडाऊन को सभा की सहायता करने के लिए कहा। अप्रैल, 1880 ई० को दोनों सभाओं की संयुक्त बैठक हुई परन्तु मामला सुलझ न सका। – 1892-93 ई० में सरदार सुन्दर सिंह मजीठिया नेता के रूप में उभरे। उनका ‘अमृतसर खालसा दीवान’ तथा ‘लाहौर खालसा दीवान’ में समान प्रभाव था। उन्होंने 11 नवम्बर, 1901 ई० को कुछ प्रसिद्ध सिक्ख नेताओं की अमृतसर में सभा बुलाई। इस सभा में एकमत से यह प्रस्ताव पास किया गया कि सिक्खों को एक सर्व-सिक्ख सभा की आवश्यकता है जो उनके हितों की रक्षा करे। लाहौर के खालसा दीवान को भी इसमें शामिल होने के लिए कहा गया जिसने यह बात सहर्ष स्वीकार कर ली। अतः 30 अक्तूबर, 1902 ई० को ‘चीफ खालसा दीवान’ की स्थापना हुई। चीफ खालसा दीवान के उद्देश्य थे-

  1. उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए खालसा कॉलेज को दृढ़ करना और उसका विकास करना
  2. सिक्खों में शिक्षा आन्दोलन को संगठित करना तथा स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना करना।
  3. पंजाबी साहित्य को सुधारना।

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प्रश्न 5.
सिंह सभा लहर की उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
सिंह सभा की सफलताओं का वर्णन इस प्रकार है-
(1) अमृतसर में एक खालसा कॉलेज की स्थापना की गई। यह कॉलेज शीघ्र ही पंजाबी साहित्य का एक मुख्य केन्द्र बन गया। पंजाब के बहुत से नगरों में खालसा स्कूल खोले गए। इन स्कूलों में बच्चों को गुरुमुखी भाषा में शिक्षा दी जाने लगी।

(2) 1908 ई० के पश्चात् प्रान्त के अनेक भागों में वार्षिक शिक्षा सभाओं का आयोजन किया गया। इसके परिणामस्वरूप कई नई सिक्ख संस्थाओं की स्थापना हुई। इसमें गुजरांवाला का खालसा कॉलेज तथा फिरोज़पुर में सिक्ख कन्या महाविद्यालय प्रमुख थे।

(3) सिंह सभा ने सिक्ख धर्म के प्रचार की ओर भी पूरा ध्यान दिया। साहबसिंह बेदी, अतरसिंह, खेमसिंह बेदी तथा संगत सिंह ने धर्म प्रचार का बड़ा सराहनीय कार्य किया। इसके परिणामस्वरूप बहुत से हिन्दू सिक्ख धर्म में शामिल हो गए।

(4) भाई वीर सिंह ने ‘खालसा ट्रैक्ट सोसायटी’ की स्थापना की। उन्होंने खालसा समाचार नाम का समाचार-पत्र भी आरम्भ किया। भाई काहन सिंह जी ने इसमें अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने सिक्ख धर्म तथा संस्कृति पर विश्व कोष लिखा। भाई दित्त सिंह . तथा अन्य अनेक कवियों तथा गद्य लेखकों ने पंजाब के साहित्य को समृद्ध बनाया।