PSEB 12th Class History Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

मिसलों की उत्पत्ति तथा विकास (Origin and Development of Misls)

प्रश्न 1.
पंजाब में सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास का विवरण दीजिए।
(Trace the origin and development of Sikh Misls in the Punjab)
अथवा
‘मिसल’ शब्द का आप क्या अर्थ समझते हैं ? सिख मिसलों की उत्पत्ति का वर्णन कीजिए।
(What do you understand by the term ‘Misl? ? Describe the origin of the Sikh Misls.)
अथवा
मिसल की परिभाषा दीजिए। आप सिख मिसलों की उत्पत्ति और विकास के विषय में क्या जानते हैं ?
(Define Misl. What do you know about the origin and growth of Sikh Misls ?)
अथवा
‘मिसल’ शब्द से आपका क्या अभिप्राय है ? प्रमुख सिख मिसलों के इतिहास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
(What do you understand by the term ‘Misl’ ? Give an account of the history of the important Sikh Misls.)
अथवा
‘मिसल’ शब्द से क्या भाव है ? सिख मिसलों की उत्पत्ति और विकास का वर्णन करें।
(What do you mean by word Misl ? Describe the origin and growth of Sikh Misls.)
उत्तर-
शताब्दी में पंजाब में सिख मिसलों की स्थापना यहाँ के इतिहास के लिए एक नया मोड़ प्रमाणित हुई।
(क) सिख मिसल से अभिप्राय (The Meaning of the Sikh Misl)-मिसल अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है एक समान या बराबर। 18वीं शताब्दी के दूसरे मध्य में पंजाब में सिखों ने 12 मिसलें स्थापित कर ली थीं। प्रत्येक मिसल का सरदार दूसरी मिसल के सरदारों के साथ एक जैसा व्यवहार करता था परंतु वे अपना आंतरिक शासन चलाने में पूर्ण रूप से स्वतंत्र थे। सिख जत्थों की इस सामान्य विशेषता के कारण उनको मिसलें कहा जाता था।

(ख) सिख मिसलों की उत्पत्ति (Origin of the Sikh Misls)—मुग़लों के सिखों पर बढ़ रहे अत्याचारों और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण को देखते हुए नवाब कपूर सिंह ने सिखों में एकता की कमी अनुभव की। इस उद्देश्य से 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में वैशाखी के दिन दल खालसा की स्थापना की गई। दल खालसा के अधीन 12 जत्थे गठित किए गए। प्रत्येक जत्थे का अपना अलग सरदार और झंडा था। इन जत्थों को ही मिसल कहा जाता था। इन मिसलों ने सन् 1767 ई० से 1799 ई० के दौरान पंजाब के विभिन्न भागों में अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए थे।

(ग) सिख मिसलों का विकास (Growth of the Sikh Misls)-1767 ई० से लेकर 1799 ई० के दौरान जमुना और सिंध नदियों के बीच के क्षेत्रों में सिखों ने 12 स्वतंत्र मिसलें स्थापित की। इन मिसलों के विकास और उनके इतिहास संबंधी संक्षेप जानकारी निम्नलिखित अनुसार है—
1. फैजलपुरिया मिसल (Faizalpuria Misl)-इस मिसल का संस्थापक नवाब कपूर सिंह था। उसने सर्वप्रथम अमृतसर के समीप फैज़लपुर नामक गाँव पर अधिकार किया था। इसलिए इस मिसल का नाम फैज़लपुरिया मिसल पड़ गया था। नवाब कपूर सिंह अपनी वीरता के कारण सिखों में बहुत प्रख्यात था। फैजलपुरिया मिसल के अधीन जालंधर, लुधियाना, पट्टी, नूरपुर तथा बहिरामपुर आदि प्रदेश सम्मिलित थे। 1753 ई० में नवाब कपूर सिंह की मृत्यु के उपरांत खुशहाल सिंह तथा बुद्ध सिंह ने इस मिसल का नेतृत्व किया।

2. भंगी मिसल (Bhangi Misl) भंगी मिसल की स्थापना यद्यपि सरदार छज्जा सिंह ने की थी परंतु सरदार हरी सिंह को इस मिसल का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। झंडा सिंह एवं गंडा सिंह इस मिसल के अन्य प्रसिद्ध नेता थे। इस मिसल का लाहौर, अमृतसर, गुजरात एवं स्यालकोट आदि प्रदेशों पर अधिकार था। क्योंकि इस मिसल के नेताओं को भंग पीने की बहुत आदत थी इसलिए इस मिसल का नाम भंगी मिसल पड़ा। .

3. आहलूवालिया मिसल (Ahluwalia Misl) आहलूवालिया मिसल की स्थापना सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने की थी। क्योंकि वह लाहौर के निकट आहलू गाँव का निवासी था इसलिए इस मिसल का नाम आलहूवालिया पड़ा। वह एक महान् नेता था। उसे 1748 ई० में दल खालसा का प्रधान सेनापति बनाया गया था। उसने लाहौर, कसूर एवं सरहिंद पर अधिकार करके अपनी वीरता का प्रमाण दिया। उसे सुल्तान-उल-कौम की उपाधि से सम्मानित किया गया था। आहलूवालिया मिसल की राजधानी का नाम कपूरथला था। 1783 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया की मृत्यु के पश्चात् भाग सिंह तथा फतेह सिंह आहलूवालिया ने इस मिसल का नेतृत्व किया।

4. रामगढ़िया मिसल (Ramgarhia Misl)-रामगढ़िया मिसल का संस्थापक खुशहाल सिंह था। इस मिसल का सबसे प्रख्यात नेता सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया था। उसने दीपालपुर, कलानौर, बटाला, उड़मुड़ टांडा, हरिपुर एवं करतारपुर नामक प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया था। इस मिसल की राजधानी का नाम श्री हरगोबिंदपुर था। 1803 ई० में जस्सा सिंह रामगढ़िया की मृत्यु के उपरांत सरदार जोध सिंह ने इस मिसल का नेतृत्व किया। .

5. शुकरचकिया मिसल (Sukarchakiya Misl)-शुकरचकिया मिसल का संस्थापक सरदार चढ़त सिंह था। क्योंकि उसके पुरखे शुकरचक गाँव से संबंधित थे इसलिए इस मिसल का नाम शुकरचकिया मिसल पड़ा। वह एक साहसी योद्धा था। उसने ऐमनाबाद, गुजराँवाला, स्यालकोट, वजीराबाद, चकवाल, जलालपुर तथा रसूलपुर
आदि प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया था। शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम गुजराँवाला था। चढ़त सिंह के पश्चात् महा सिंह तथा रणजीत सिंह ने शुकरचकिया मिसल का कार्यभार संभाला। 1799 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर पर अधिकार कर लिया था तथा यह विजय पंजाब के इतिहास में एक नया मोड़ प्रमाणित हुई।

6. कन्हैया मिसल (Kanahiya Misl) कन्हैया मिसल का संस्थापक जय सिंह था। क्योंकि वह कान्हा गाँव का निवासी था इसलिए इस मिसल का नाम कन्हैया मिसल पड़ा। जय सिंह काफी बहादुर था। उसने मुकेरियाँ, गुरदासपुर, पठानकोट तथा काँगड़ा के क्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया था। 1798 ई० में जय सिंह की मृत्यु के पश्चात् सदा कौर इस मिसल की नेता बनी। वह महाराजा रणजीत सिंह की सास थी तथा बहुत महत्त्वाकांक्षी थी।

7. फूलकियाँ मिसल (Phulkian Misl)-फूलकियाँ मिसल की स्थापना चौधरी फूल नामक एक जाट ने की थी। इसमें पटियाला, नाभा तथा जींद के प्रदेश शामिल थे। पटियाला के प्रख्यात फूलकियाँ सरदार बाबा आला सिंह, अमर सिंह तथा साहिब सिंह, नाभा के हमीर सिंह एवं जसवंत सिंह तथा जींद के गजपत सिंह एवं भाग सिंह थे।

8. डल्लेवालिया मिसल (Dallewalia Misl)–डल्लेवालिया मिसल का संस्थापक गुलाब सिंह था। तारा सिंह घेबा इस मिसल का प्रख्यात सरदार था। इस मिसल का फिल्लौर, राहों, नकोदर, बद्दोवाल आदि प्रदेशों पर अधिकार था।

9. नकई मिसल (Nakkai Misl)—नकई मिसल का संस्थापक सरदार हीरा सिंह था। उसने नक्का, चुनियाँ, दीपालपुर, कंगनपुर, शेरगढ़, फरीदाबाद आदि प्रदेशों पर अधिकार करके नकई मिसल का विस्तार किया। रण सिंह नकई सरदारों में से सबसे अधिक प्रसिद्ध था। उसने कोट कमालिया तथा शकरपुर के प्रदेशों पर अधिकार करके नकई मिसल में शामिल किया।

10. निशानवालिया मिसल (Nishanwalia Misl)-इस मिसल का संस्थापक सरदार संगत सिंह था। इस मिसल के सरदार दल खालसा का झंडा या निशान उठाकर चलते थे, जिस कारण इस मिसल का नाम निशानवालिया मिसल पड़ गया। संगत सिंह ने अंबाला, शाहबाद, सिंघवाला, साहनेवाल, दोराहा आदि प्रदेशों पर कब्जा करके अपनी मिसंल का विस्तार किया। उसने सिंघवाला को अपनी राजधानी बनाया। 1774 ई० में संगत सिंह की मृत्यु के बाद उसका भाई मोहन सिंह इस मिसल का सरदार बना।

11. शहीद मिसल (Shahid Misl) शहीद मिसल का संस्थापक सरदार सुधा सिंह था। क्योंकि इस मिसल के सरदार अफ़गानों के साथ हुई लड़ाइयों में शहीद हो गए थे इस कारण इस मिसल को शहीद मिसल कहा जाने लगा। बाबा दीप सिंह जी, इस मिसल के सबसे लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने 1757 ई० में अमृतसर में अफ़गानों से लड़ते हुए शहीदी प्राप्त की थी। कर्म सिंह और गुरबख्श सिंह इस मिसल के दो अन्य दो अन्य ख्याति प्राप्त नेता थे। इस मिसल में सहारनपुर, शहजादपुर और केसनी नाम के क्षेत्र शामिल थे। इस मिसल के अधिकतर लोग निहंग थे जो नीले वस्त्र पहनते थे। इसलिए शहीद मिसल को निहंग मिसल भी कहा जाता है।

12. करोड़सिंधिया मिसल (Krorsinghia Misl)—इस मिसल का संस्थापक करोड़ा सिंह था जिस कारण इसका नाम करोड़सिंघिया मिसल पड़ गया। क्योंकि करोड़ा सिंह पंजगड़िया गाँव का रहने वाला था इसलिए इस मिसल को पंजगड़िया मिसल भी कहा जाता है। 1764 ई० में करोड़ा सिंह की मृत्यु के पश्चात् बघेल सिंह इस मिसल का मुखिया बना। वह करोड़सिंघिया मिसल के मुखियों में से सबसे अधिक प्रसिद्ध था। उसने करनाल के निकट स्थित चलोदी को अपनी राजधानी बनाया। उसने नवांशहर और बंगा के क्षेत्रों को अपनी मिसल में सम्मिलित किया। बघेल सिंह की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र जोध सिंह मिसल का सरदार बना। उसने मालवा के कई प्रदेशों पर कब्जा कर लिया था।

सिख मिसलों के शासक अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप में शासन करते थे, परंत उनकी विशेष बात यह थी कि वे समस्त सिख जाति के साथ संबंधित मामलों पर विचार करने के लिए विशेष अवसरों पर अकाल तख्त साहिब अमृतसर में एकत्र होते थे। यहाँ वे गुरु ग्रंथ साहिब की उपस्थिति में प्रस्ताव पास करते थे। इन्हें गुरमता कहा जाता था। इन गुरमतों का सभी सिख सम्मान करते थे। इस कारण उनमें आपसी संबंध बने रहे।

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मिसल का राज्य प्रबंध (Administration of the Misls)

प्रश्न 2.
सिख मिसलों के संगठन पर एक नोट लिखें। (Write a note on the Organisation of the Sikh Misls.)
अथवा
मिसलों के संगठन की प्रकृति का वर्णन कीजिए। (Discuss the nature of the Organisation of Misls.)
अथवा
सिख मिसलों के राज प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ लिखिए। (Bring out the main features of the Administration of the Sikh Misls.)
अथवा
मिसलों के नागरिक तथा सैनिक प्रबंध का विवरण दें। (Give an account of Civil and Military Administration of the Misls.)
अथवा
सिख मिसलों की उत्पत्ति और विकास के विषय में आप क्या जानते हो ? (What do you know about the origin and growth of the Sikh Misls ?)
अथवा
मिसलों के अंदरूनी शासन प्रबन्ध की व्याख्या करो।
(Describe the internal administration system of the Misls.)
उत्तर-
सिख मिसलों के संगठन का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—
I. गुरमता (Gurmata)
गुरमता सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था थी। इसका शाब्दिक अर्थ है, “गुरु का मत या निर्णय”। दूसरे शब्दों में गुरु ग्रंथ साहिब जी की उपस्थिति में सरबत खालसा द्वारा जो निर्णय स्वीकार किए जाते हैं उनको गुरमता कहते हैं। सरबत खालसा के सम्मेलनों में सिख पंथ के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक मामलों से संबंधित गुरमते पास किए जाते थे। सभी सिख इन गुरमतों को गुरु की आज्ञा मान कर पालना करते थे।

II. मिसलों का आंतरिक संगठन (Internal Organisation of the Misls)
1. सरदार और मिसलदार (Sardar and Misldar)-प्रत्येक मिसल के मुखिया को सरदार कहा जाता था और प्रत्येक सरदार के अधीन कई मिसलदार होते थे। सरदार की तरह मिसलदारों के पास भी अपनी सेना होती थी। सरदार जीते हुए क्षेत्रों में से कुछ भाग अपने अधीन मिसलदारों को दे देता था। प्रारंभ में सरदार का पद पैतृक नहीं होता था। धीरे-धीरे सरदार का पद पैतृक हो गया। चाहे सरदार निरंकुश थे पर वे अत्याचारी नहीं थे। वे प्रजा से अपने परिवार की तरह प्यार करते थे।

2. जिले (Districts) मिसलों को कई जिलों में बाँटा गया था। प्रत्येक जिले के मुखिया को कारदार कहा जाता था। वह ज़िले का शासन प्रबंध चलाने के लिए ज़िम्मेदार होता था।

3. गाँव (Villages)-मिसल प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। गाँव का प्रबंध पंचायत के हाथों में होता था। गाँव के लगभग सारे मामले पंचायत द्वारा ही हल कर लिए जाते थे। लंबरदार, पटवारी और चौकीदार गाँव के महत्त्वपूर्ण कर्मचारी थे।

III. मिसलों का आर्थिक प्रबंध (Financial Administration of the Misls)
1. लगान प्रबंध (Land Revenue Administration) मिसलों के समय आमदनी का मुख्य साधन भूमि का लगान था। इसकी दर भूमि की उपजाऊ शक्ति के आधार पर भिन्न-भिन्न होती थी। यह प्रायः कुल उपज का 1/3 से 1/4 भाग होता था। यह लगान वर्ष में दो बार रबी और खरीफ फसलों के तैयार होने के समय लिया जाता था। लगान एकत्रित करने के लिए बटाई प्रणाली प्रचलित थी। लगान अनाज या नकदी किसी भी रूप में दिया जा सकता था। मिसल काल में भूमि अधिकार संबंधी चार प्रथाएँ–पट्टीदारी, मिसलदारी, जागीरदारी तथा ताबेदारी प्रचलित थीं।

2. राखी प्रथा (Rakhi System)-पंजाब के लोगों को विदेशी हमलावरों तथा सरकारी कर्मचारियों से सदैव लूटमार का भय लगा रहता था। इसलिए अनेक गाँवों ने अपनी रक्षा के लिए मिसलों की शरण ली। मिसल सरदार उनकी शरण में आने वाले गाँवों को सरकारी कर्मचारियों तथा विदेशी आक्रमणकारियों की लूट-पाट से बचाते थे। इस रक्षा के बदले उस गाँव के लोग अपनी उपज का पाँचवां भाग वर्ष में दो बार मिसल के सरदार को देते थे। इस तरह यह राखी कर मिसलों की आय का एक अच्छा साधन था।

3. आय के अन्य साधन (Other Sources of Income)—इसके अतिरिक्त मिसल सरदारों को चुंगी कर, _ भेंटों और युद्ध के समय की गई लूटमार से भी कुछ आय प्राप्त हो जाती थी।

4. व्यय (Expenditure)-मिसल सरदार अपनी आय का एक बड़ा भाग सेना, घोड़े, शस्त्रों, नए किलों के निर्माण और पुराने किलों की मुरम्मत पर व्यय करता था। इसके अतिरिक्त मिसल सरदार गुरुद्वारों और मंदिरों को दान भी देते थे और निर्धन लोगों के लिए लंगर भी लगाते थे।

IV. न्याय प्रबंध (Judicial Administration)
1. पंचायत (Panchayat) मिसलों के समय पंचायत न्याय प्रबंध की सबसे छोटी अदालत होती थी। पंचायत प्रत्येक गाँव में होती थी। गाँव में अधिकतर मुकद्दमों का फैसला पंचायतों द्वारा ही किया जाता था। लोग पंचायत को परमेश्वर का रूप समझकर उसका फैसला स्वीकार कर लेते थे।

2. सरदार की अदालत (Sardar’s Court)—प्रत्येक मिसल का सरदार अपनी अलग अदालत लगाता था। इसमें वह दीवानी और फौजदारी दोनों तरह के मुकद्दमों का निर्णय करता था। वह किसी भी अपराधी को मृत्यु का दंड देने का भी अधिकार रखता था परंतु वे आम तौर पर अपराधियों को नर्म सज़ाएँ ही देते थे।

3. सरबत खालसा (Sarbat Khalsa)-सरबत खालसा को सिखों की सर्वोच्च अदालत माना जाता था। मिसलदारों के आपसी झगड़ों और सिख कौम से संबंधित मामलों की सुनवाई सरबत खालसा द्वारा की जाती थी। सरबत खालसा मुकद्दमों का फैसला करने के लिए अकाल तख्त अमृतसर में एकत्रित होता था। उस द्वारा पास किए गए गुरमत्तों की सभी सिख पालना करते थे।

4. कानून और सजाएँ (Laws and Punishments) सिख मिसलों के समय न्याय प्रबंध बिल्कुल साधारण था। कानून लिखित नहीं था। मुकद्दमों के फैसले प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार किये जाते थे। उस काल की सज़ाएँ कड़ी नहीं थीं। अधिकतर अपराधियों से जुर्माना वसूल किया जाता था।

V. सैनिक प्रबंध (Military Administration)
1. घुड़सवार सेना (Cavalry)-घुड़सवार सेना मिसलों की सेना का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग था। सिख बहुत निपुण घुड़सवार थे। सिखों के तीव्र गति से दौड़ने वाले घोड़े उनकी गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के संचालन में बहुत सहायक सिद्ध हुए।

2. पैदल सैनिक (Infantry)-मिसलों के समय पैदल सेना को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता था। पैदल सैनिक किलों में पहरा देते, संदेश पहुँचाते और स्त्रियों और बच्चों की देखभाल करते थे।

3. भर्ती (Recruitment)-मिसल सेना में भर्ती होने के लिए किसी को भी विवश नहीं किया जाता था। सैनिकों को कोई नियमित प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता था। उनको नकद वेतन के स्थान पर युद्ध के दौरान की गई लूटमार से हिस्सा मिलता था।

4. सैनिकों के शस्त्र और सामान (Weapons and Equipment of the Soldiers)-सिख सैनिक युद्ध के समय तलवारों, तीर-कमानों, खंजरों, ढालों और बौँ का प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त वे बंदूकों का प्रयोग भी करते थे।

5. लड़ाई का ढंग (Mode of Fighting)–मिसलों के समय सैनिक छापामार ढंग से अपने शत्रुओं का मुकाबला करते थे। इसका कारण यह था कि दुश्मनों के मुकाबले सिख सैनिकों के साधन बहुत सीमित थे। मारो और भागो इस युद्ध नीति का प्रमुख आधार था। सिखों की लड़ाई का यह ढंग उनकी सफलता का एक प्रमुख कारण बना।

6. मिसलों की कुल सेना (Total Strength of the Misls)-मिसल सैनिकों की कुल संख्या के संबंध में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। बी० सी० ह्यगल के अनुसार मिसलों के समय सिख सैनिकों की संख्या 69,500 थी। फ्रोस्टर के अनुसार मिसल सैनिकों की कुल संख्या दो लाख के लगभग थी। आधुनिक इतिहासकारों डॉ० हरी राम गुप्ता और एस० एस० गाँधी आदि के अनुसार यह संख्या लगभग एक लाख थी।
अंत में हम एस० एस० गाँधी के इन शब्दों से सहमत हैं,
“मिसल संगठन बिना शक बेढंगा था, परंतु यह उस समय के अनुरूप था। इसकी अपनी ही सफलताएँ और महान् प्राप्तियाँ थीं।”1

1. “The Misl organisation was undoubtedly. crude but it suited the times. It had its triumphs and grand achievements to its credit.” S.S. Gandhi, Struggle of the Sikhs for Sovereignty (Delhi : 1980) p. 300.

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संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
मिसल शब्द से क्या अभिप्राय है ? मिसलों की उत्पत्ति कैसे हुई ? (What do you mean by the word Misl ? How did the Misls originate ?)
अथवा
मिसलों की उत्पत्ति का संक्षिप्त वर्णन करें। (Explain in brief about the origin of Misls.) (P.S.E.B. Mar. 2007, July 09)
अथवा
मिसलों से आपका क्या अभिप्राय है ? संक्षेप में उनकी उत्पत्ति के बारे में लिखें। (What do you understand by Misls ? Describe in brief about their origin.)
उत्तर-
मिसल से अभिप्राय फाइल से है जिसमें मिसलों के विवरण दर्ज किए जाते थे। बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के पश्चात् पंजाब के मुग़ल सूबेदारों ने सिखों पर घोर अत्याचार किए। परिणामस्वरूप सिखों ने पहाड़ों और जंगलों में जाकर शरण ली। मुग़लों और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों का मुकाबला करने के लिए 29 मार्च, 1748 ई० को अमृतसर में दल खालसा की स्थापना की गई। दल खालसा के अधीन 12 जत्थे गठित किए गए। कालांतर में इन जत्थों ने पंजाब में 12 स्वतंत्र सिख मिसलें स्थापित की।

प्रश्न 2.
मिसलों के संगठन के स्वरूप पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the nature of Misl organisation.)
उत्तर-
सिख मिसलों के संगठन के स्वरूप के बारे में इतिहासकारों ने भिन्न-भिन्न मत प्रकट किए हैं। इसका कारण यह था कि मिसलों का राज्य प्रबंध किसी निश्चित शासन प्रणाली के अनुसार नहीं चलाया जाता था। अलगअलग सरदारों ने शासन प्रबंध चलाने के लिए आवश्यकतानुसार अपने-अपने नियम बना लिए थे। जे० डी० कनिंघम के विचारानुसार, सिख मिसलों के संगठन का स्वरूप धर्मतांत्रिक, संघात्मक और सामंतवादी.था। डॉ० ए० सी० बैनर्जी के विचारानुसार, “मिसलों का संगठन बनावट में प्रजातंत्रीय और एकता प्रदान करने वाले सिद्धांतों में धार्मिक था।”

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प्रश्न 3.
नवाब कपूर सिंह पर एक संक्षेप नोट लिखें। (Write a short note on Nawab Kapoor Singh.)
अथवा
नवाब कूपर सिंह के जीवन का संक्षिप्त में वर्णन करें।
(Give a brief account of the life of Nawab Kapoor Singh.)
अथवा
नवाब कूपर सिंह कौन थे। उनकी सफलताओं का वर्णन करो। (Who was Nawab Kapoor Singh ? Describe his achievements.)
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह फैज़लपुरिया मिसल के संस्थापक थे। 1733 ई० में पंजाब के मुग़ल सूबेदार जकरिया खाँ ने उन्हें नवाब का पद तथा एक लाख वार्षिक आय वाली जागीर दी। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिखों को दो जत्थों-बुड्डा दल और तरुणा दल में गठित किया। उन्होंने बड़ी योग्यता और सूझ-बूझ के साथ इन दोनों दलों का नेतृत्व किया। 1748 ई० में उन्होंने दल खालसा की स्थापना की। उन्होंने सिख पंथ का घोर कठिनाइयों के समय नेतृत्व किया। उनकी 1753 ई० में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 4.
जस्सा सिंह आहलूवालिया की सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Give a brief account of the achievements of Jassa Singh Ahluwalia.)
अथवा
जस्सा सिंह आहलूवालिया के विषय में आप क्या जानते हैं ? लिखें। (Write, what do you know about Jassa Singh Ahluwalia ?)
अथवा
जस्सा सिंह आहलूवालिया पर एक नोट लिखें।
(Write a note on Jassa Singh Ahluwalia.)
उत्तर-
जस्सा सिंह आहलूवालिया मिसल के संस्थापक थे। 1748 ई० में दल खालसा की स्थापना के समय जस्सा सिंह आहलूवालिया को सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया गया। 1761 ई० में जस्सा सिंह ने लाहौर पर विजय प्राप्त की। 1762 ई० में बड़े घल्लूघारे के समय जस्सा सिंह ने अहमद शाह अब्दाली की सेना से डट कर मुकाबला किया। 1764 ई० में जस्सा सिंह ने सरहिंद पर अधिकार कर लिया। जस्सा सिंह ने कपूरथला पर कब्जा कर उसे आहलूवालिया मिसल की राजधानी घोषित किया। 1783 ई० में वह हम से सदा के लिए बिछुड़ गए।

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प्रश्न 5.
जस्सा सिंह रामगढ़िया कौन था ? उसकी सफ़लताओं का संक्षेप वर्णन करें। (Who was Jassa Singh Ramgarhia ? Write a short note on his achievements.)
अथवा
जस्सा सिंह रामगढ़िया के बारे में आप क्या जानते हैं ? लिखें। (Write, what do you know about Jassa Singh Ramgarhia ?)
उत्तर-
जस्सा सिंह रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता था। मीर मन्नू की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में फैली अराजकता का लाभ उठाकर जस्सा सिंह ने कलानौर, बटाला, हरगोबिंदपुर, कादियाँ, टाँडा, करतारपुर और हरिपुर इत्यादि पर अधिकार करके रामगढ़िया मिसल का खूब विस्तार किया। उसके नेतृत्व में यह मिसल उन्नति के शिखर पर पहुँच गई थी। उसने श्री हरगोबिंदपुर को रामगढ़िया मिसल की राजधानी घोषित किया। जस्सा सिंह की 1803 ई० में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 6.
महा सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Mahan Singh.)
उत्तर-
1774 ई० में महा सिंह शुकरचकिया मिसल का नया मुखिया बना। महा सिंह ने शुकरचकिया मिसल के प्रदेशों का विस्तार प्रारंभ किया। उसने सबसे पहले रोहतास पर अधिकार किया। इसके पश्चात् रसूल नगर और अलीपुर प्रदेशों पर अधिकार किया। महां सिंह ने सभी सरदारों से मुलतान, बहावलपुर, साहीवाल आदि प्रदेशों को भी जीत लिया। बटाला के निकट हुए युद्ध में जय सिंह का पुत्र गुरबख्श सिंह मारा गया। कुछ समय पश्चात् शुकरचकिया और कन्हैया मिसलों में मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित हो गए। 1792 ई० में महा सिंह की मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 7.
फुलकियाँ मिसल पर एक संक्षेप नोट लिखें। (Wrie a short note on Phulkian Misl.)
उत्तर-
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक चौधरी फूल था। उसके वंश ने पटियाला, नाभा तथा जींद के प्रदेशों पर अपना राज्य स्थापित किया। पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक आला सिंह था। वह बहुत बहादुर था। उसने अनेकों प्रदेशों पर कब्जा किया तथा बरनाला को अपनी राजधानी बनाया। उसने 1765 ई० में अहमद शाह
अब्दाली से समझौता किया। नाभा में फुलकियाँ मिसल की स्थापना हमीर सिंह ने की थी। उसने 1755 ई० से 1783 ई० तक शासन किया। जींद में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक गजपत सिंह था। उसने अपनी सुपुत्री राज कौर की शादी महा सिंह से की। 1809 ई० में फुलकियाँ मिसल अंग्रेजों के संरक्षण में चली गई थी।

प्रश्न 8.
आला सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Ala Singh.)
उत्तर-
आला सिंह पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक था। उसने 1748 ई० में अहमद शाह अब्दाली के प्रथम आक्रमण के दौरान मुग़लों की सहायता की। शीघ्र ही आला सिंह ने बुढलाडा, टोहाना, भटनेर और जैमलपुर के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। 1765 ई० में अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को सरहिंद का सूबेदार नियुक्त कर दिया। अब्दाली के साथ समझौते के कारण दल खालसा के सदस्यों ने आला सिंह को अब्दाली से अपने संबंध तोड़ने का निर्देश दिया, परंतु शीघ्र ही वह इस संसार से कूच कर गए।

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प्रश्न 9.
खालसा के विषय में आप क्या जानते हैं ? (What do you understand by Sarbat Khalsa ?)
अथवा
सरबत खालसा के बारे में नोट लिखें। (Write a note on Sarbat Khalsa.)
उत्तर-
सरबत खालसा का आयोजन सिख पंथ से संबंधित विषयों पर विचार के लिए हर वर्ष दीवाली और बैसाखी के अवसर पर अकाल तख्त साहिब अमृतसर में किया जाता था। सारे सिख गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष माथा टेक कर बैठ जाते थे। इसके पश्चात् कीर्तन होता था फिर अरदास की जाती थी। इसके बाद कोई एक सिख खड़ा होकर संबंधित समस्या के बारे सरबत खालसा को बताता था। निर्णय सर्वसम्मति से लिया जाता था।

प्रश्न 10.
गुरमता से क्या अभिप्राय है ? गुरमता के कार्यों की संक्षेप जानकारी दें।
(What is meant by Gurmata ? Give a brief account of its functions.)
अथवा
गुरमता पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए। (Write a brief note on Gurmata.)
अथवा
गुरमता के बारे में आप क्या जानते हो?
(What do you know about Gurmata ?)
अथवा
गुरमता से क्या भाव है ? गुरमता के तीन विशेष कार्य बताएँ। (What is meant by Gurmata ? Discuss about the three main works of Gurmata.)
उत्तर-
गुरमता सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था थी। गुरमता गुरु और मता के मेल से बना है-जिसके शाब्दिक अर्थ हैं, ‘गुर का मत या निर्णय’। दूसरे शब्दों में, गुरु ग्रंथ साहिब जी की उपस्थिति में सरबत खालसा द्वारा जो निर्णय लिए जाते थे उनको गुरमता कहा जाता था। इन गुरमतों का सभी सिख पालन करते थे। गुरमता के महत्त्वपूर्ण कार्य थे-सिखों की नीति तैयार करना, दल खालसा के नेता का चुनाव करना, शत्रुओं के विरुद्ध सैनिक योजनाओं को अंतिम रूप देना, सिख सरदारों के झगड़ों का निपटारा करना और सिख धर्म का प्रचार का प्रबंध करना।

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प्रश्न 11.
मिसलों के आंतरिक संगठन की कोई तीन विशेषताएँ बताओ। (Mention any three features of internal organisation of Sikh Misls.)
अथवा
सिख मिसलों का अंदरूनी संगठन कैसा था ? व्याख्या करें।
(Describe the internal organisation of Sikh Misls.)
अथवा
मिसल प्रबंध की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
(Describe the main features of Misl Administration.)
अथवा
मिसलों के आंतरिक संगठन की कोई पाँच विशेषताएँ बताएँ। (Write five features of internal organisation of the Sikh Misls.)
उत्तर-
मिसल का प्रधान सरदार कहलाता था। सरदार अपनी प्रजा से स्नेह रखते थे। मिसल प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। गाँव का प्रबंध पंचायत के हाथों में था। मिसलों का न्याय प्रबंध साधारण था। कानून लिखित नहीं थे। मुकद्दमों का फैसला प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाता था। सज़ाएँ अधिक सख्त नहीं थीं। आमतौर पर जुर्माना ही वसूल किया जाता था। मिसलों की आमदनी का मुख्य साधन भूमि का लगान था। सरदार गाँव के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते थे।

प्रश्न 12.
राखी प्रणाली पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Rakhi system.)
अथवा
राखी प्रणाली क्या है ? संक्षिप्त व्याख्या करें। (What is Rakhi system ? Explain in brief.)
अथवा
‘राखी व्यवस्था’ के विषय में आप क्या जानते हैं ? संक्षेप में लिखिए।
(What do you know about Rakhi system ? Write in brief.)
अथवा
राखी प्रणाली क्या है ? इसका आरंभ कैसे हुआ ? (What is Rakhi system ? Explain its origin.)
अथवा
राखी व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about ‘Rakhi system’ ?)
उत्तर-
बंदा सिंह बहादुर की शहीदी के पश्चात् पंजाब में राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बन गया। लोगों को सदैव लूटमार का भय लगा रहता था। इसलिए बहुत-से गाँवों ने अपनी रक्षा के लिए मिसलों की शरण ली। सिसल सरदार उनकी शरण में आने वाले गाँवों को सरकारी कर्मचारियों तथा विदेशी आक्रमणकारियों की लूटपाट से बचाते थे। इसके अतिरिक्त वे स्वयं भी इन गाँवों पर कभी आक्रमण नहीं करते थे। राखी प्रणाली से लोगों का जीवन सुरक्षित हुआ।

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प्रश्न 13.
मिसल काल के वित्तीय प्रबंध के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the financial administration of Misl period ?)
अथवा
मिसल शासन की अर्थ-व्यवस्था पर नोट लिखें। (Write a short note on economy under the Misls.)
उत्तर-
मिसल काल में मिसलों की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था। यह भूमि की उपजाऊ शक्ति के आधार पर भिन्न-भिन्न होता था। यह प्रायः कुल उपज का 1/3 से 1/4 भाग तक होता था। भू-राजस्व के बाद मिसलों की आय का दूसरा मुख्य साधन राखी प्रथा था। मिसल सरदार अपनी आय का एक बड़ा भाग सेना, घोड़ों तथा हथियारों पर खर्च करते थे। वे गुरुद्वारों तथा मंदिरों को दान भी देते थे।

प्रश्न 14.
मिसलों की न्याय व्यवस्था पर नोट लिखें।
(Write a note on the Judicial system of Misls.)
उत्तर-
सिख मिसलों के समय न्याय प्रबंध बिल्कुल साधारण था। कानून लिखित नहीं थे। मुकद्दमों के फैसले उस समय के प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार किए जाते थे। उस समय सजाएँ सख्त नहीं थीं। किसी भी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया जाता था। अधिकतर अपराधियों से जुर्माना वसूल किया जाता था। गाँव में अधिकतर मुकद्दमों का फैसला पंचायतों द्वारा ही किया जाता था। लोग पंचायत को परमेश्वर समझ कर उसका फैसला स्वीकार करते थे। प्रत्येक मिसल के सरदार की अपनी अलग अदालत होती थी।

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प्रश्न 15.
सिख मिसलों के सैनिकों प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
(Describe the main features of military administratidn of Sikh Misls.)
अथवा
सिख मिसलों के सैनिक प्रबंध की मुख्य तीन विशेषताएँ लिखिए। (Write three main features of military administration of Sikh Misls.)
उत्तर-

  1. मिसलों के काल में घुड़सवार सेना को सेना का महत्त्वपूर्ण अंग माना जाता था।
  2. लोग अपनी इच्छा से सेना में भर्ती होते थे।
  3. इन सैनिकों को कोई नियमित प्रशिक्षण नहीं दिया जाता था तथा उन्हें नकद वेतन भी नहीं दिया जाता था।
  4. उस समय सैनिकों का कोई विवरण नहीं रखा जाता था।
  5. सिख सैनिक सीमित साधनों के कारण छापामार ढंग से दुश्मन का मुकाबला करते थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
मिसल शब्द से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
मिसल शब्द का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
समान।

प्रश्न 2.
मिसल किस भाषा का शब्द है ?
उत्तर-
अरबी।

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प्रश्न 3.
मिसलों की कुल संख्या कितनी थी ?
उत्तर-
12.

प्रश्न 4.
पंजाब में सिख मिसलें किस शताब्दी में स्थापित हुईं ?
उत्तर-
18वीं शताब्दी।

प्रश्न 5.
किसी एक प्रमुख मिसल का नाम लिखें।
उत्तर-
आहलूवालिया मिसल।

प्रश्न 6.
फैजलपुरिया मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह।

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प्रश्न 7.
फैज़लपुरिया मिसल के सबसे प्रसिद्ध नेता का नाम बताएँ।
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह।

प्रश्न 8.
नवाब कपूर सिंह कौन था ?
उत्तर-
फैज़लपुरिया मिसल का संस्थापक।

प्रश्न 9.
नवाब कपूर सिंह ने किस मिसल की स्थापना की?
उत्तर-
फैज़लपुरिया मिसल।

प्रश्न 10.
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
जस्सा सिंह आहलूवालिया।

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प्रश्न 11.
आहलूवालिया मिसल का यह नाम क्यों पड़ा ?
उत्तर-
क्योंकि जस्सा सिंद्र लाहौर के नज़दीक स्थित आहलू गाँव से संबंधित था।

प्रश्न 12.
आहलूवालिया मिसल की राजधानी का नाम क्या था ?
उत्तर-
कपूरथला।

प्रश्न 13.
जस्सा सिंह आहलूवालिया कौन था ?
उत्तर-
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक।

प्रश्न 14.
रामगढ़िया मिसल की राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-
श्री हरगोबिंदपुर।

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प्रश्न 15.
रामगढ़िया मिसल के किसी एक सर्वाधिक प्रसिद्ध नेता का नाम बताएँ ।
उत्तर-
जस्सा सिंह रामगढ़िया।

प्रश्न 16.
जस्सा सिंह रामगढ़िया कौन था ?
उत्तर-
रामगढ़िया मिसल का सबसे शक्तिशाली सरदार।

प्रश्न 17.
भंगी मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
छज्जा सिंह।

प्रश्न 18.
भंगी मिसल का यह नाम क्यों पड़ा ?
उत्तर-
क्योंकि इस मिसल के नेताओं को भांग पीने की बहुत आदत थी।

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प्रश्न 19.
सिख मिसलों में सबसे शक्तिशाली मिसल कौन-सी थी ?
उत्तर-
शुकरचकिया मिसल।

प्रश्न 20.
शुकरचकिया मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
चढ़त सिंह।

प्रश्न 21.
शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम बताएँ।
उत्तर-
गुजराँवाला।

प्रश्न 22.
महा सिंह कौन था ?
उत्तर-
महा सिंह 1774 ई० में शुकरचकिया मिसल का नेता बना।

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प्रश्न 23.
कन्हैया मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
जय सिंह।

प्रश्न 24.
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
चौधरी फूल।

प्रश्न 25.
बाबा आला सिंह कौन था ?
उत्तर-
पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक।

प्रश्न 26.
बाबा आला सिंह की राजधानी का नाम क्या था ?
उत्तर-
बरनाला।

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प्रश्न 27.
अहमद शाह अब्दाली ने किसे राजा की उपाधि से सम्मानित किया था ?
उत्तर-
बाबा आला सिंह को।

प्रश्न 28.
डल्लेवालिया मिसल का सबसे योग्य नेता कौन था ?
उत्तर-
तारा सिंह घेबा।

प्रश्न 29.
शहीद मिसल का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-
सरदार सुधा सिंह।

प्रश्न 30.
शहीद मिसल का यह नाम क्यों पड़ा ?
उत्तर-
इस मिसल के नेताओं द्वारा दी गई शहीदियों के कारण ।

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प्रश्न 31.
सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था कौन-सी थी ?
अथवा
सिखों की केंद्रीय संस्था का क्या नाम था ?
उत्तर-
गुरमता।

प्रश्न 32.
गुरमता से क्या भाव है ?
उत्तर-
गुरु का फैसला।

प्रश्न 33.
गुरुमता के पीछे कौन-सी शक्ति काम करती थी ?
उत्तर-
धार्मिक।

प्रश्न 34.
सरबत खालसा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
अकाल तख्त साहिब, अमृतसर में आयोजित किया जाने वाला सिख सम्मेलन।।

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प्रश्न 35.
सरबत खालसा की सभाएँ कहाँ बुलाई जाती थीं ?
उत्तर-
अमृतसर।

प्रश्न 36.
सिख मिसलों के मुखिया को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-
सरदार।

प्रश्न 37.
सिख मिसलों के प्रशासन की कोई एक विशेषता बताएँ।
उत्तर-
सिख मिसलों के सरदार अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करते थे।

प्रश्न 38.
राखी प्रणाली से क्या भाव है ?
अथवा
राखी प्रथा क्या है ?
उत्तर-
राखी प्रणाली के अंतर्गत आने वाले गाँवों को सिख सुरक्षा प्रदान करते थे।

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प्रश्न 39.
मिसल सेना की लड़ने की विधि कौन सी थी ?
उत्तर-
गुरिल्ला विधि।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
18वीं शताब्दी में पंजाब में…….स्वतंत्र सिख मिसलें स्थापित हुईं।
उत्तर-
(12)

प्रश्न 2.
नवाब कपूर सिंह……मिसल का संस्थापक था।
उत्तर-
(फैजलपुरिया)

प्रश्न 3.
नवाब कपूर सिंह ने…….में दल खालसा की स्थापना की थी।
उत्तर-
(1748 ई०)

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प्रश्न 4.
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक……..था।
उत्तर-
(जस्सा सिंह आहलूवालिया)

प्रश्न 5.
जस्सा सिंह आहलूवालिया ने ………….को अपनी राजधानी बनाया।
उत्तर-
(कपूरथला)

प्रश्न 6.
रामगढ़िया मिसल का संस्थापक……….था।
उत्तर-
(खुशहाल सिंह)

प्रश्न 7.
रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता………था।
उत्तर-
(जस्सा सिंह रामगढ़िया)

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प्रश्न 8.
जस्सा सिंह रामगढ़िया की राजधानी का नाम………था।
उत्तर-
(श्री हरिगोबिंद पुर)

प्रश्न 9.
झंडा सिंह……….मिसल का एक प्रसिद्ध नेता था।
उत्तर-
(भंगी)

प्रश्न 10.
शुकरचकिया मिसल का संस्थापक………था।
उत्तर-
(चढ़त सिंह)

प्रश्न 11.
1774 ई० में………शुकरचकिया मिसल का नया नेता बना।
उत्तर-
(महा सिंह)

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प्रश्न 12.
शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम……….था।
उत्तर-
(गुजराँवाला)

प्रश्न 13.
बाबा दीप सिंह जी …………. मिसल के साथ संबंध रखते थे।
उत्तर-
(शहीद)

प्रश्न 14.
महाराजा रणजीत सिंह ने………में शुकरचकिया मिसल की बागडोर संभाली।
उत्तर-
(1792 ई०)

प्रश्न 15.
कन्हैया मिसल का संस्थापक………….था।
उत्तर-
(जय सिंह)

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प्रश्न 16.
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक………था।
उत्तर-
(चौधरी फूल)

प्रश्न 17.
पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक……….था।
उत्तर
(बाबा आला सिंह)

प्रश्न 18.
बाबा आला सिंह ने…………को अपनी राजधानी बनाया। .
उत्तर-
(बरनाला)

प्रश्न 19.
डल्लेवालिया मिसल के सबसे प्रसिद्ध नेता का नाम……….था।
उत्तर
(तारा सिंह घेबा)

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प्रश्न 20.
शहीद मिसल का संस्थापक………….था।
उत्तर-
(सुधा सिंह)

प्रश्न 21.
बाबा दीप सिंह जी का संबंध………मिसल के साथ था।
उत्तर-
(शहीद)

प्रश्न 22.
सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था का नाम……….था।
उत्तर-
(गुरमता)

प्रश्न 23.
मिसल काल में मिसल के मुखिया को…………..कहा जाता था। .
उत्तर-
(सरदार)

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प्रश्न 24.
सिख मिसलों के समय आमदन का मुख्य स्रोत………..था।
उत्तर-
(भूमि लगान)

प्रश्न 25.
राखी प्रथा पंजाब में………….शताब्दी में प्रचलित हुई।
उत्तर-
(18वीं)

प्रश्न 26.
मिसल काल में अपराधियों से अधिकतर………….वसूल किया जाता था।
उत्तर-
(जुर्माना)

प्रश्न 27.
सिख मिसलों के समय सैनिक……….से अपने दुश्मनों का सामना करते थे।
उत्तर-
(छापामार ढंग)

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(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
18वीं सदी में पंजाब में 12 स्वतंत्र सिख मिसलों की स्थापना हुई।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 2.
मिसल अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है बराबर।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 3.
नवाब कपूर सिंह फैज़लपुरिया मिसल का संस्थापक था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 4.
फैजलपुरिया मिसल को आहलूवालिया मिसल भी कहा जाता है। .
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 5.
नवाब कपूर सिंह ने 1734 ई० में दल खालसा की स्थापना की थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 6.
नवाब कपूर सिंह दल खालसा का प्रधान सेनापति था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 7.
नवाब कपूर सिंह की मृत्य 1753 ई० में हुई थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 8.
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक जस्सा सिंह रामगढ़िया था।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 9.
1748 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया को दल खालसा का सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया। गया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 10.
जस्सा सिंह आहलूवालिया को सुल्तान-उल-कौम की उपाधि से सम्मानित किया गया था ।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 11.
जस्सा सिंह आहलूवालिया ने कपूरथला को अपनी राजधानी बनाया था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता जस्सा सिंह रामगढ़िया था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 13.
जस्सा सिंह रामगढ़िया ने करतारपुर को अपनी राजधानी बनाया।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 14.
भंगी मिसल का यह नाम इसके नेताओं द्वारा भांग पीने के कारण पड़ा।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 15.
शुकरचकिया मिसल का संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 16.
शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम लाहौर था।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 17.
1792 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने शुकरचकिया मिसल की बागडोर संभाली।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 18.
जय सिंह कन्हैया मिसल का संस्थापक था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 19.
रानी जिंदा कन्हैया मिसल की आगू थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 20.
डल्लेवालिया मिसल के सब से प्रसिद्ध नेता बाबा दीप सिंह जी थे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 21.
बाबा आला सिंह ने बरनाला को अपनी राजधानी बनाया था। .
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 22.
बाबा आला सिंह की मृत्यु 1762 ई० में हुई थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 23.
1765 ई० में अहमद सिंह पटियाला की गद्दी पर बैठा था। . .
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 24.
अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को ‘राजा-ए-राजगान बहादुर’ की उपाधि से सम्मानित किया था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 25.
निशानवालिया मिसल का संस्थापक हमीर सिंह था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 26.
सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था का नाम गुरमता था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 27.
मिसल के मुखिया को मिसलदार कहा जाता था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 28.
18वीं सदी में पंजाब में राखी प्रथा का प्रचलन हुआ।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 29.
मिसल काल में सरबत खालसा को सिखों की सर्वोच्च अदालत कहा जाता था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 30.
सिख मिसलों के सैनिक अपने दुश्मनों का मुकाबला छापामार ढंग से करते थे।
उत्तर-
ठीक

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
पंजाब में स्थापित मिसलों की कुल संख्या कितनी थी ?
(i) 5
(ii) 10
(iii) 12
(iv) 15
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 2.
नवाब कपूर सिंह कौन था ?
(i) फैजलपुरिया मिसल का संस्थापक
(ii) जालंधर का फ़ौजदार
(iii) पंजाब का सूबेदार
(iv) आहलूवालिया मिसल का नेता।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 3.
मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) जस्सा सिंह
(ii) भाग सिंह
(iii) फ़तह सिंह
(iv) खुशहाल सिंह।
उत्तर-(i)

प्रश्न 4.
आहलूवालिया मिसल की राजधानी कौन-सी थी ?
(i) अमृतसर
(ii) कपूरथला
(iii) लाहौर
(iv) श्री हरगोबिंदपुर।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 5.
रामगढ़िया मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) जस्सा सिंह रामगढ़िया
(ii) खुशहाल सिंह
(iii) जोध सिंह
(iv) भाग सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 6.
रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता कौन था ?
(i) जस्सा सिंह रामगढ़िया
(ii) नंद सिंह
(iii) खुशहाल सिंह
(iv) जोध सिंह।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 7.
रामगढ़िया मिसल की राजधानी का क्या नाम था ?
(i) कपूरथला
(ii) श्री हरगोबिंदपुर
(iii) लाहौर
(iv) बरनाला।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 8.
भंगी मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) हरी सिंह
(ii) छज्जा सिंह
(iii) गुलाब सिंह
(iv) भीम सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 9.
भंगी मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता कौन था ?
(i) हरी सिंह
(ii) झंडा सिंह
(iii) गंडा सिंह
(iv) भीम सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 10.
सिख मिसलों में सबसे शक्तिशाली मिसल कौन-सी थी ?
(i) शुकरचकिया मिसल
(ii) भंगी मिसल
(iii) कन्हैया मिसल
(iv) फुलकियाँ मिसल।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 11.
शुकरचकिया मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) खुशहाल सिंह
(ii) नवाब कपूर सिंह
(iii) छज्जा सिंह
(iv) चढ़त सिंह।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 12.
शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम बताएँ ।
(i) अमृतसर
(ii) लाहौर
(iii) गुजराँवाला
(iv) बरनाला।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में से किस नगर पर चढ़त सिंह ने अधिकार नहीं किया था ?
(i) स्यालकोट
(ii) चकवाल
(iii) गुजराँवाला
(iv) अलीपुर
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 14.
महा सिंह की मृत्यु कब हुई ?
अथवा
रणजीत सिंह कब शुकरचकिया मिसल का नेता बना ?
(i) 1770 ई० में
(ii) 1780 ई० में
(iii) 1782 ई० में
(iv) 1792 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 15.
कन्हैया मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) जय सिंह
(ii) सदा कौर
(iii) बाबा आला सिंह
(iv) जस्सा सिंह आहलूवालिया।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 16.
सदा कौर कौन थी ?
(i) कन्हैया मिसल की नेता
(i) महा सिंह की सास
(iii) भंगी मिसल की नेता
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 17.
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक कौन था ?
(i) चौधरी फूल
(ii) छज्जा सिंह
(iii) नवाब कपूर सिंह
(iv) गंडा सिंह।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 18.
पटियाला रियासत का संस्थापक कौन था ?
(i) अमर सिंह
(ii) बाबा आला सिंह
(ii) हमीर सिंह
(iv) गजपत सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 19.
बाबा आला सिंह ने किसको पटियाला रियासत की राजधानी बनाया ?
(i) कपूरथला
(ii) श्री हरगोबिंदपुर
(iii) बरनाला
(iv) गुजरांवाला।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 20.
डल्लेवालिया मिसल का सबसे प्रसिद्ध सरदार कौन था ?
(i) गुलाब सिंह
(ii) तारा सिंह घेबा
(iii) जय सिंह
(iv) बाबा आला सिंह।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 21.
शहीद मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता कौन था ?
(i) सुधा सिंह
(ii) बाबा दीप सिंह जी
(iii) कर्म सिंह
(iv) गुरबख्श सिंह।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 22.
नकई मिसल का संस्थापक कौन था?
(i) नाहर सिंह
(ii) हीरा सिंह
(iii) राम सिंह
(iv) काहन सिंह ।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 23.
सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था कौन-सी थी ?
(i) राखी प्रथा
(ii) जागीरदारी
(iii) गुरमता
(iv) मिसल।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 24.
मिसल काल में जिले के मुखिया को क्या कहा जाता था ?
(i) ज़िलेदार
(ii) कारदार
(iii) थानेदार
(iv) सरदार।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 25.
राखी प्रथा क्या थी ?
(i) विदेशी आक्रमणकारियों से गाँव की रक्षा करनी
(ii) फसलों की देखभाल करनी
(iii) स्त्रियों की रक्षा करनी
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 26.
मिसल काल में सबसे महत्त्वपूर्ण किस सेना को माना जाता था ?
(i) घुड़सवार सेना को
(ii) पैदल सेना को
(iii) रथ सेना को
(iv) नौसेना को।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 3.
पंजाब की किन्हीं छ: मिसलों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Explain briefly any six Misls of Punjab.) a
उत्तर-
1. फैजलपुरिया मिसल-इस मिसल का संस्थापक नवाब कपूर सिंह था। उसने सर्वप्रथम अमृतसर के समीप फैजलपुर नामक गाँव पर अधिकार किया था। इसलिए इस मिसल का नाम फैजलपुरिया मिसल पड़ गया था। नवाब कपूर सिंह अपनी वीरता के कारण सिखों में बहुत प्रख्यात था। 1753 ई० में नवाब कपूर सिंह की मृत्यु के उपरांत खुशहाल सिंह तथा बुद्ध सिंह ने इस मिसल का नेतृत्व किया।

2. भंगी मिसल-भंगी मिसल की स्थापना यद्यपि सरदार छज्जा सिंह ने की थी परंतु सरदार हरी सिंह को इस मिसल का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। झंडा सिंह एवं गंडा सिंह इस मिसल के अन्य प्रसिद्ध नेता थे। क्योंकि इस मिसल के नेताओं को भंग पीने की बहुत आदत थी इसलिए इस मिसल का नाम भंगी मिसल पड़ा।

3. रामगढ़िया मिसल-रामगढ़िया मिसल का संस्थापक खुशहाल सिंह था। इस मिसल का सबसे प्रख्यात नेता सरदार जस्सा सिंह रामगढ़िया था। इस मिसल की राजधानी का नाम श्री हरगोबिंदपुर था। 1803 ई० में जस्सा सिंह रामगढ़िया की मृत्यु के उपरांत सरदार जोध सिंह ने इस मिसल का नेतृत्व किया।

4. शुकरचकिया मिसल-शुकरचकिया मिसल का संस्थापक सरदार चढ़त सिंह था। क्योंकि उसके पुरखे शुकरचक गाँव से संबंधित थे इसलिए इस मिसल का नाम शुकरचकिया मिसल पड़ा। वह एक साहसी योद्धा था। शुकरचकिया मिसल की राजधानी का नाम गुजराँवाला था। चढ़त सिंह के पश्चात् महा सिंह तथा रणजीत सिंह ने शुकरचकिया मिसल का कार्यभार संभाला। 1799 ई० में महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर पर अधिकार कर लिया था तथा यह विजय पंजाब के इतिहास में एक नया मोड़ प्रमाणित हुई।

5. कन्हैया मिसल-कन्हैया मिसल का संस्थापक जय सिंह था। क्योंकि वह कान्हा गाँव का निवासी था इसलिए इस मिसल का नाम कन्हैया मिसल पड़ा। जय सिंह काफ़ी बहादुर था। 1798 ई० में जय सिंह की मृत्यु के पश्चात् सदा कौर इस मिसल की नेता बनी। वह महाराजा रणजीत सिंह की सास थी तथा बहुत महत्त्वाकांक्षी थी।

6. आहलूवालिया मिसल-आहलूवालिया मिसल का संस्थापक सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया था। उसने जालंधर दोआब तथा बारी दोआब के इलाकों पर कब्जा करके अपनी वीरता का परिचय दिया। उसे सुल्तानउल-कौम की उपाधि से सम्मानित किया गया। आहलूवालिया मिसल की राजधानी का नाम कपूरथला था। 1783 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया की मृत्यु के पश्चात् भाग सिंह तथा फतेह सिंह ने शासन किया।

प्रश्न 4.
नवाब कपूर सिंह पर एक संक्षेप नोट लिखें।
(Write a short note on Nawab Kapoor Singh.)
अथवा
नवाब कपूर सिंह के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Nawab Kapoor Singh ?)..
उत्तर-
नवाब कपूर सिंह सिखों के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थे। वह फैजलपुरिया मिसल के संस्थापक थे। उनका जन्म 1697 ई० में कालोके नामक गाँव में हुआ था। उसके पिता का नाम दलीप सिंह था और वह जाट परिवार से संबंध रखते थे। कपूर सिंह शीघ्र ही सिखों के प्रसिद्ध मुखिया बन गए। 1733 ई० में उन्होंने पंजाब के मुग़ल सूबेदार जकरिया खाँ से नवाब का पद. तथा एक लाख वार्षिक आय वाली जागीर प्राप्त की। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिख शक्ति को संगठित करने के उद्देश्य से उनको दो जत्थों बुड्डा दल और तरुणा दल में गठित किया। उन्होंने बड़ी योग्यता और सूझ-बूझ के साथ इन दोनों दलों का नेतृत्व किया। जकरिया खाँ सिखों की बढ़ती हुई शक्ति को सहन करने को तैयार नहीं था। इसलिए उसने 1735 ई० में सिखों को दी गई जागीर को वापस ले लिया। उसने सिखों पर घोर अत्याचार आरंभ कर दिए। नवाब कपूर सिंह के नेतृत्व में खालसा ने इतने भयानक कष्टों को खुशी-खुशी सहन किया किंतु उन्होंने जकरिया खाँ के प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया। नवाब कपूर सिंह ने 1736 ई० में सरहिंद में भयंकर लूटमार की। नवाब कपूर सिंह ने 1739 ई० में नादिरशाह को दिन में तारे दिखा दिए थे। उसने 1748 ई० में अमृतसर को अपने अधीन कर लिया था। 1748 ई० में उन्होंने दल खालसा की स्थापना करके सिख पंथ के लिए महान कार्य किया। नवाब कपूर सिंह न केवल एक वीर योद्धा था अपितु वह सिख पंथ का एक महान् प्रचारक भी था। उसने बड़ी संख्या में लोगों को सिख धर्म में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया। निस्संदेह सिख पंथ के विकास तथा उसको संगठित करने के लिए नवाब कपूर सिंह ने बहुमूल्य योगदान दिया। उनकी 1753 ई० में मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 5.
जस्सा सिंह आहलूवालिया की सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। (Give a brief account of the achievements of Jassa Singh Ahluwalia.)
अथवा
जस्सा सिंह आहलूवालिया के विषय में आप क्या जानते हैं ? लिखें। (Write, what do you know about Jassa Singh Ahluwalia ?)
अथवा
जस्सा सिंह आहलूवालिया पर एक नोट लिखें। (Write a note on Jassa Singh Ahluwalia.)
उत्तर-
जस्सा सिंह आहलूवालिया 18वीं शताब्दी में सिखों का एक योग्य एवं वीर नेता था। वह आहलूवालिया मिसल का संस्थापक था। उसका जन्म 1718 ई० में लाहौर के निकट स्थित आहलू नामक गाँव में हुआ था। आप के पिता का नाम बदर सिंह था। जस्सा सिंह अभी छोटे ही थे कि उनके पिता का देहांत हो गया। नवाब कपूर सिंह ने जस्सा सिंह आहलूवालिया को अपने पुत्र की तरह पालन-पोषण किया। 1739 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया के नेतृत्व में सिखों ने नादिरशाह की सेना पर आक्रमण करके बहुत-सा धन लूट लिया था। निस्संदेह यह एक अत्यंत साहसी कार्य था। 1746 ई० में छोटे घल्लूघारे के समय इन्होंने वीरता के वे जौहर दिखाए कि उनकी ख्याति दूरदूर तक फैल गई। 1747 ई० में अमृतसर के फ़ौजदार सलाबत खाँ ने दरबार साहिब में सिखों के प्रवेश पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए थे। परिणामस्वरूप जस्सा सिंह आहलूवालिया ने कुछ सिखों को साथ लेकर अमृतसर पर आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण में सलाबत खाँ मारा गया एवं सिखों का अमृतसर पर अधिकार हो गया। जस्सा सिंह आहलूवालिया अपनी वीरता एवं प्रतिभा के कारण शीघ्र ही सिखों के प्रसिद्ध नेता बन गए। 1748 ई० में उन्हें दल खालसा का सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया गया। उन्होंने दल खालसा का कुशलतापूर्वक नेतृत्व करके सिख पंथ की महान सेवा की। 1761 ई० में जस्सा सिंह के नेतृत्व में सिखों ने लाहौर पर विजय प्राप्त की। 1762 ई० में बड़े घल्लूघारे समय भी जस्सा सिंह आहलूवालिया ने अहमदशाह अब्दाली की सेना का बड़ी बहादुरी से सामना किया। 1764 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया ने सरहिंद पर अधिकार कर लिया। 1778 ई० में जस्सा सिंह आहलूवालिया ने कपूरथला पर कब्जा कर लिया और इसको आहलूवालिया मिसल की राजधानी बना दिया। इस प्रकार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने सिख पंथ के लिए महान् उपलब्धियाँ प्राप्त की। 1783 ई० में इस महान् नेता की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 6.
जस्सा सिंह रामगढ़िया कौन था ? उसकी सफलताओं का संक्षेप वर्णन करें। (Who was Jassa Singh Ramgarhia ? Write a short note on his achievements.)
अथवा
जस्सा सिंह रामगढ़िया के बारे में आप क्या जानते हैं ? लिखें। (Write, what do you know about Jassa Singh Ramgarhia ?)
उत्तर-
जस्सा सिंह रामगढ़िया मिसल का सबसे महान् नेता था। उसने सिख पंथ में बहुत कठिन परिस्थितियों में योग्य नेतृत्व किया था। उनका जन्म 1723 ई० में लाहौर के निकट स्थित गाँव इच्छोगिल में सरदार भगवान सिंह के घर हुआ था। आपको सिख पंथ की सेवा करना विरासत में प्राप्त हुआ था। उनके नेतृत्व में रामगढ़िया मिसल ने अद्वितीय उन्नति की। जस्सा सिंह रामगढ़िया पहले जालंधर के फ़ौजदार अदीना बेग़ के अधीन नौकरी करता था। अक्तूबर, 1748 ई० में मीर मन्नू और अदीना बेग की सेनाओं ने 500 सिखों को अचानक रामरौणी के किले में घेर लिया था। जस्सा सिंह रामगढ़िया इसे सहन न कर सका। वह तुरंत उनकी सहायता के लिए पहुँचा। उसके इस सहयोग के कारण 300 सिखों की जानें बच गईं। इससे प्रसन्न होकर रामरौणी का किला सिखों ने जस्सा सिंह रामगढ़िया के हवाले कर दिया। जस्सा सिंह रामगढ़िया ने इस किले का नाम रामगढ़ रखा। 1753 ई० में मीर मन्नू की मृत्यु की पश्चात् पंजाब में अराजकता फैल गई। इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाकर जस्सा सिंह रामगढिया ने कलानौर, बटाला, हरगोबिंदपुर, कादियाँ, उड़मुड़ टांडा, दीपालपुर, करतारपुर और हरिपुर इत्यादि प्रदेशों पर अधिकार करके रामगढ़िया मिसल का खूब विस्तार किया। उसने श्री हरगोबिंदपुर को रामगढ़िया मिसल की राजधानी घोषित किया। जस्सा सिंह रामगढ़िया के आहलूवालिया और शुकरचकिया मिसलों के साथ संबंध अच्छे नहीं थे। 1803 ई० में जस्सा सिंह रामगढ़िया ने सदैव के लिए हमसे अलविदा ले ली। उनका जीवन आने वाले सिख नेताओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत रहा।

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प्रश्न 7.
महा सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Maha Singh.).
उत्तर-
चढ़त सिंह की मृत्यु के पश्चात् 1774 ई० में उसका पुत्र महा सिंह शुकरचकिया मिसल का नया मुखिया बमा। उस समय महा सिंह की आयु केवल दस वर्ष की थी। इसलिए उसकी माँ देसाँ ने कुछ समय के लिए बड़ी समझदारी से मिसल का नेतृत्व किया। शीघ्र ही महा सिंह ने शुकरचकिया मिसल के प्रदेशों का विस्तार प्रारंभ किया। उसने सबसे पहले रोहतास पर अधिकार किया। इसके पश्चात् रसूल नगर और अलीपुर प्रदेशों पर अधिकार किया। महा सिंह ने रसूलपुर नगर का नाम बदल कर रामनगर और अलीपुर का नाम बदल कर अकालगढ़ रख दिया। महा सिंह ने भंगी सरदारों से मुलतान, बहावलपुर, साहीवाल आदि प्रदेशों को भी जीत लिया। महा सिंह की बढ़ती हुई शक्ति के कारण जय सिंह कन्हैया उससे बड़ी ईर्ष्या करने लग पड़ा। इसलिए उसको सबक सिखाने के लिए महा सिंह ने जस्सा सिंह रामगढ़िया के साथ मिलकर कन्हैया मिसल पर आक्रमण कर दिया। बटाला के निकट हुए युद्ध में जय सिंह का पुत्र गुरबख्श सिंह मारा गया। कुछ समय पश्चात् शुकरचकिया और कन्हैया मिसलों में मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित हो गए। जय सिंह ने अपनी पौत्री मेहताब कौर की सगाई महा सिंह के पुत्र रणजीत सिंह के साथ कर दी। 1792 ई० में महा सिंह की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 8.
फुलकियाँ मिसल पर एक संक्षेप नोट लिखें। (Write a short note on Phulkian Misl.)
उत्तर-
फुलकियाँ मिसल का संस्थापक चौधरी फूल था। उसके वंश ने पटियाला, नाभा तथा जींद के प्रदेशों पर अपना राज्य स्थापित किया। पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक आला सिंह था। वह बहुत बहादुर था। उसने अनेकों प्रदेशों पर कब्जा किया तथा बरनाला को अपनी राजधानी बनाया। 1764 ई० में उसने सरहिंद पर विजय प्राप्त की। 1764 ई० में उसने अहमद शाह अब्दाली से समझौता किया। 1765 ई० में आला सिंह के पश्चात् अमर सिंह तथा साहब सिंह ने शासन किया। नाभा में फुलकियाँ मिसल की स्थापना हमीर सिंह ने की थी। उसने 1755 ई० से 1783 ई० तक शासन किया। उसके पश्चात् उसका बेटा जसवंत सिंह गद्दी पर बैठा। जींद में फलकियाँ मिसल का संस्थापक गजपत सिंह था। उसने पानीपत तथा करनाल के प्रदेशों को विजय किया था। उसने अपनी सुपुत्री राज कौर की शादी महा सिंह से की। 1809 ई० में फुलकियाँ मिसल अंग्रेजों के संरक्षण में चली गई थी।

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प्रश्न 9.
आला सिंह पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on Ala Singh.)
उत्तर-
पटियाला में फुलकियाँ मिसल का संस्थापक आला सिंह था। वह बड़ा बहादुर था। उसने बरनाला को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। 1768 ई० में अहमद शाह अब्दाली के प्रथम आक्रमण के दौरान आला सिंह ने उसके विरुद्ध मुग़लों की सहायता की थी। उसकी सेवाओं के दृष्टिगत मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला ने एक खिलत भेट की। इससे आला सिंह की प्रसिद्धि बुहत बढ़ गई। शीघ्र ही आला सिंह ने बुडलाडा, टोहाना, भटनेर और जैमलपुर के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। 1762 ई० में अपने छठे,आक्रमण के दौरान अब्दाली ने बरनाला पर आक्रमण किया और आला सिंह को गिरफ्तार कर लिया। आला सिंह ने अब्दाली को भारी राशि देकर अपनी जान बचाई। 1765 ई० में अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को सरहिंद का सूबेदार नियुक्त कर दिया। अब्दाली के साथ समझौते के कारण दल खालसा के सदस्य उससे रुष्ट हो गए और उसे अब्दाली से अपने संबंध तोड़ने हेत कहा, परंतु शीघ्र ही आला सिंह की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 10.
सरबत खालसा तथा गुरमता के विषय में आप क्या जानते हैं ?, (What do you understand by Sarbat Khalsa and Gurmata ?)
अथवा
‘सरबत खालसा’ और ‘गुरमता’ के बारे में अपने विचार लिखें। (Write your views on ‘Sarbat Khalsa’ and ‘Gurmata’.)
उत्तर-
1. सरबत खालसा-सिख पंथ से संबंधित विषयों पर विचार करने के लिए वर्ष में दो बार दीवाली और वैशाखी के अवसर पर सरबत खालसा का समागम अकाल तख्त साहिब अमृतसर में बुलाया जाता था। सारे सिख गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष माथा टेक कर बैठ जाते थे। इसके पश्चात् गुरुवाणी का कीर्तन होता था फिर अरदास की जाती थी। इसके बाद कोई एक सिख खड़ा होकर संबंधित समस्या के बारे सरबत खालसा को जानकारी देता था। इस समस्या के बारे विचार-विमर्श करने के लिए प्रत्येक पुरुष व स्त्री को पूरी छूट होती थी। कोई भी निर्णय सर्वसम्मति से लिया जाता था।

2. गुरमता-गुरमता सिख मिसलों की केंद्रीय संस्था थी। गुरमता पंजाबी के दो शब्दों गुरु और मता के मेल से बना है-जिसके शाब्दिक अर्थ हैं, ‘गुरु का मत या निर्णय’। दूसरे शब्दों में, गुरु ग्रंथ साहिब जी की उपस्थिति में सरबत खालसा द्वारा जो निर्णय स्वीकार किए जाते थे उनको गुरमता कहा जाता था। इन गुरमतों का सारे सिख बड़े सत्कार से पालन करते थे। गुरमता के कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य ये थे-दल खालसा के नेता का चुनाव करना, सिखों की विशेष नीति तैयार करना, सांझे शत्रुओं के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही के लिए योजनाओं को अंतिम रूप देना, सिख सरदारों के आपसी झगड़ों का निपटारा करना और सिख धर्म के प्रचार के लिए प्रबंध करना।

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प्रश्न 11.
गुरमता से क्या अभिप्राय है ? गुरमता के कार्यों की संक्षेप जानकारी दें। (What is meant by Gurmata ? Give a brief account of its functions.)
अथवा
गुरमता पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए। (Write a brief note on Gurmata.)
अथवा
गुरमता बारे आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Gurmata ?)
उत्तर-
गुरमता एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी। इसके द्वारा अनेक राजनीतिक, सैनिक, धार्मिक तथा न्याय संबंधी कार्य किए जाते थे।

  1. इसका सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य दल खालसा के सर्वोच्च सेनापति की नियुक्ति करना था।
  2. इसके द्वारा सिखों की विदेश नीति को तैयार किया जाता था।
  3. इसके द्वारा सिखों के सांझे शत्रुओं के विरुद्ध सैनिक कार्रवाई को अंतिम रूप दिया जाता था।
  4. यह सिख मिसलों के सरदारों के आपसी झगड़ों का निपटारा करता था।
  5. इसमें सिख धर्म के प्रचार तथा सिख धर्म से संबंधित अन्य समस्याओं से संबंधित विचार किया जाता था तथा कार्यक्रम तैयार किया जाता था।
  6. इसके द्वारा विभिन्न मिसल सरदारों के अथवा व्यक्तिगत सिखों के झगड़ों का निपटारा किया जाता था। इसके अतिरिक्त इसके द्वारा सिख मिसलों के उत्तराधिकार एवं सीमा संबंधी झगड़ों का निर्णय भी किया जाता था।

सिख पंथ से संबंधित विषयों पर विचार करने के लिए वर्ष में दो बार बैसाखी और दीवाली के अवसरों पर अकाल तख्त में सरबत खालसा का आयोजन किया जाता था। वे अकाल तख्त साहिब के प्रांगण में रखे गए गुरु ग्रंथ साहिब जी को माथा टेक कर स्थान ग्रहण करते थे। उनके पीछे उनके अनुयायी तथा अन्य सिख संगत होती थी। आयोजन का आरंभ कीर्तन द्वारा किया जाता था। इसके पश्चात् अरदास की जाती थी। इसके पश्चात् ग्रंथी खड़ा होकर संबंधित समस्या के बारे में सरबत खालसा को जानकारी देता था। इस समस्या के बारे में विचार-विमर्श करने के लिए सरबत खालसा के सभी सदस्यों को पूर्ण स्वतंत्रता होती थी।

प्रश्न 12.
मिसलों के आंतरिक संगठन की कोई छः विशेषताएँ बताओ। (Mention any six features of internal organisation of Sikh Misls.)
अथवा
सिख मिसलों का अंदरूनी संगठन कैसा था ? व्याख्या करें। (Describe the internal organisation of Sikh Misls.)
अथवा
मिसल प्रबंध की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें। (Describe the main features of Misl Administration.)
उत्तर-
प्रत्येक मिसल के मुखिया को सरदार कहा जाता था और प्रत्येक सरदार के अधीन कई मिसलदार होते थे। सरदार विजित किए हुए क्षेत्रों में से कुछ भाग अपने अधीन मिसलदारों को दे देता था। कई बार मिसलदार सरदार से अलग होकर अपनी स्वतंत्र मिसल स्थापित कर लेते थे। सरदार अपनी प्रजा से अपने परिवार की तरह प्यार करते थे। मिसल प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। गाँव का प्रबंध पंचायत के हाथों में था। गाँव के लगभग सभी मसले पंचायत द्वारा ही हल कर लिए जाते थे। लोग पंचायत का बड़ा आदर करते थे। सिख मिसलों का न्याय प्रबंध बिल्कुल साधारण था। कानून लिखित नहीं थे। मुकद्दमों का फैसला उस समय के प्रचलित रीतिरिवाजों के अनुसार किया जाता था। अपराधियों को सख्त सज़ाएँ नहीं दी जाती थीं। उनसे आमतौर पर जुर्माना ही वसूल किया जाता था। मिसलों के समय आमदनी का मुख्य साधन भूमि का लगान था। यह भूमि की उपजाऊ शक्ति के आधार पर भिन्न-भिन्न रहता था। यह आमतौर पर 1/3 से 1/4 भाग होता था। यह लगान वर्ष में दो बार वसूल किया जाता था। लगान अनाज या नकदी किसी भी रूप में दिया जा सकता था।

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प्रश्न 13.
राखी प्रणाली पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on Rakhi System.)
अथवा
राखी प्रणाली क्या है ? संक्षिप्त व्याख्या करें। (What is Rakhi System ? Explain in brief.)
अथवा
‘राखी व्यवस्था’ के विषय में आप क्या जानते हैं ? संक्षेप में लिखिए। (What do you know about Rakhi System ? Write in brief.)
अथवा
राखी प्रणाली क्या है ? इसका आरंभ कैसे हुआ ? व्याख्या करें। (What is Rakhi System ? Explain its origin.)
अथवा
राखी व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about ‘Rakhi System’ ?)
अथवा
मिसल प्रशासन में राखी प्रणाली का क्या महत्त्व था? (What was the importance of Rakhi System under the Misl Administration ?)
उत्तर-
18वीं शताब्दी पंजाब में जिन महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना हुई उनमें से राखी प्रणाली सबसे महत्त्वपूर्ण थी। —
1. राखी प्रणाली से अभिप्राय-राखी शब्द से अभिप्राय है रक्षा करना। वे गाँव जो अपनी इच्छा से सिखों की रक्षा के अधीन आ जाते थे उन्हें बाह्य आक्रमणों के समय तथा सिखों की लूटमार से सुरक्षा की गारंटी दी जाती थी। इस सुरक्षा के बदले उन्हें अपनी उपज का पाँचवां भाग सिखों को देना पड़ता था।

2. राखी प्रणाली का आरंभ-पंजाब में मुग़ल सूबेदारों की दमनकारी नीति, नादिरशाह तथा अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों के कारण पंजाब में अराजकता फैल गई थी। पंजाब में कोई स्थिर सरकार भी नहीं थी। इस वातावरण के कारण पंजाब में कृषि, उद्योग तथा व्यापार को काफ़ी हानि पहुँची। पंजाब के स्थानीय अधिकारी तथा ज़मींदार किसानों का बहुत शोषण करते थे तथा वे जब चाहते तलवार के बल पर लोगों की संपत्ति आदि लूट लेते थे। ऐसे अराजकता के वातावरण में दल खालसा ने राखी प्रणाली का आरंभ किया।

3. राखी प्रणाली की विशेषताएँ-राखी प्रणाली के अनुसार जो गाँव स्वयं को सरकारी अधिकारियों, ज़मींदारों, चोर-डाकुओं तथा विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा करना चाहते थे वे सिखों की शरण में आ जाते थे। सिखों की शरण में आने वाले गाँवों को इन सभी की लूटमार से बचाया जाता था। इस सुरक्षा के कारण प्रत्येक गाँव को वर्ष में दो बार अपनी कुल उपज का 1/5वां भाग दल खालसा को देना पड़ता था।

4. राखी प्रणाली की महत्ता-18वीं शताब्दी में पंजाब में राखी प्रणाली की स्थापना अनेक पक्षों से लाभदायक सिद्ध हुई। प्रथम, इसने पंजाब में सिखों की राजनीतिक शक्ति के उत्थान की ओर प्रथम महान् पग उठाया। दूसरा, इस कारण पंजाब के लोगों को सदियों बाद सुख का साँस मिला। वे अत्याचारी जागीरदारों तथा भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचारों से बच गए। तीसरा, उन्हें विदेशी आक्रमणकारियों की लूटमार का भय भी ने रहा। चौथा, पंजाब में शाँति स्थापित होने के कारण यहाँ की कृषि, उद्योग तथा व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 14.
मिसल काल के वित्तीय प्रबंध के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the financial administration of Misl period ?)
अथवा
मिसल शासन की अर्थ-व्यवस्था पर एक नोट लिखें। (Write a short note on economy under the Misls.)
उत्तर-
मिसल काल के वित्तीय प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—
1. लगान प्रबंध-मिसलों के समय आमदनी का मुख्य साधन भूमि का लगान था। इसकी दर भूमि की उपजाऊ शक्ति के आधार पर भिन्न-भिन्न होती थी। यह प्रायः कुल उपज का 1/3 से 1/4 भाग होता था। यह लगान वर्ष में दो बार रबी और खरीफ फसलों के तैयार होने के समय लिया जाता था। लगान एकत्रित करने के लिए बटाई प्रणाली प्रचलित थी। लगान अनाज या नकदी किसी भी रूप में दिया जा सकता था। मिसल काल में भूमि अधिकार संबंधी चार प्रथाएँ-पट्टीदारी, मिसलदारी, जागीरदारी तथा ताबेदारी प्रचलित थीं।

2. राखी प्रथा-पंजाब के लोगों को विदेशी हमलावरों तथा सरकारी कर्मचारियों से सदैव लूटमार का भय लगा रहता था। इसलिए अनेक गाँवों ने अपनी रक्षा के लिए मिसलों की शरण ली। मिसल सरदार उनकी शरण में आने वाले गाँवों को सरकारी कर्मचारियों तथा विदेशी आक्रमणकारियों की लूट-पाट से बचाते थे। इस रक्षा के बदले उस गाँव के लोग अपनी उपज का पाँचवां भाग वर्ष में दो बार मिसल के सरदार को देते थे। इस तरह यह राखी कर मिसलों की आय का एक अच्छा साधन था।

3. आय के अन्य साधन-इसके अतिरिक्त मिसल सरदारों को चुंगी कर, भेंटों से और युद्ध के समय की गई लूटमार से भी कुछ आय प्राप्त हो जाती थी।

4. व्यय-मिसल सरदार अपनी आय का एक बहुत बड़ा भाग सेना, घोड़ों, शस्त्रों, नए किलों के निर्माण और पुराने किलों की मुरम्मत पर व्यय करता था। इसके अतिरिक्त मिसल सरदार गुरुद्वारों और मंदिरों को दान भी देते थे और निर्धन लोगों के लिए लंगर भी लगाते थे।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

प्रश्न 15.
मिसलों की न्याय व्यवस्था पर नोट लिखें। (Write a note on the Judicial system of Misls.)
उत्तर-
सिख मिसलों के समय न्याय प्रबंध बिल्कुल साधारण था। कानून लिखित नहीं थे। मुकद्दमों के फैसले उस समय के प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार किए जाते थे। उस समय सज़ाएँ सख्त नहीं थीं। किसी भी अपराधी को मृत्यु दंड नहीं दिया जाता था। अधिकतर अपराधियों से जुर्माना वसूल किया जाता था। बार-बार अपराध करने वाले अपराधी के शरीर का कोई अंग काट दिया जाता था। मिसलों के समय पंचायत न्याय प्रबंध की सबसे छोटी अदालत होती थी। गाँव में अधिकतर मुकद्दमों का फैसला पंचायतों द्वारा ही किया जाता था। लोग पंचायत को परमेश्वर समझ कर उसका फैसला स्वीकार करते थे। प्रत्येक मिसल के सरदार की अपनी अलग अदालत होती थी। इसमें दीवानी और फ़ौजदारी दोनों तरह के मुकद्दमों का निर्णय किया जाता था। वह पंचायत के फैसलों के विरुद्ध भी अपीलें सुनता था। सरबत खालसा सिखों की सर्वोच्च अदालत थी। इसमें मिसल सरदारों के आपसी झगड़ों तथा सिख कौम से संबंधित मामलों की सुनवाई की जाती थी तथा इनका निर्णय गुरमतों द्वारा किया जाता था।

प्रश्न 16.
सिख मिसलों के सैनिक प्रबंध की मुख्य विशेषताएँ बताएँ। (Describe the main features of military administration of Sikh Misls.)
उत्तर-
1. घुड़सवार सेना-घुड़सवार सेना मिसलों की सेना का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग था। सिख बहुत निपुण घुड़सवार थे। सिखों के तीव्र गति से दौड़ने वाले घोड़े उनकी गुरिल्ला युद्ध प्रणाली के संचालन में बहुत सहायक सिद्ध हुए।

2. पैदल सैनिक–मिसलों के समय पैदल सेना को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता था। पैदल सैनिक किलों में पहरा देते, संदेश पहुँचाते और स्त्रियों और बच्चों की देखभाल करते थे।

3. भर्ती-मिसल सेना में भर्ती होने के लिए किसी को भी विवश नहीं किया जाता था। सैनिकों को कोई नियमित प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता था। उनको नकद वेतन के स्थान पर युद्ध के दौरान की गई लूटमार से हिस्सा मिलता था।

4. सैनिकों के शस्त्र और सामान–सिख सैनिक युद्ध के समय तलवारों, तीर-कमानों, खंजरों, ढालों और बों का प्रयोग करते थे। इसके अतिरिक्त वे बंदूकों का प्रयोग भी करते थे।

5. लड़ाई का ढंग-मिसलों के समय सैनिक छापामार ढंग से अपने शत्रुओं का मुकाबला करते थे। इसका कारण यह था कि दुश्मनों के मुकाबले सिख सैनिकों के साधन बहुत सीमित थे। मारो और भागो इस युद्ध नीति का प्रमुख आधार था। सिखों की लड़ाई का यह ढंग उनकी सफलता का एक प्रमुख कारण बना।

6. मिसलों की कुल सेना–मिसल सैनिकों की कुल संख्या के संबंध में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। आधुनिक इतिहासकारों डॉ० हरी राम गुप्ता और एस० एस० गाँधी आदि के अनुसार यह संख्या लगभग एक लाख थी।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।
1
नवाब कपूर सिंह फैजलपुरिया मिसल का संस्थापक था। उसने सबसे पहले अमृतसर के निकट फैजलपुर नामक गाँव पर अधिकार किया। इस गाँव का नाम बदल कर सिंघपुर रखा गया। इसी कारण फैजलपुरिया मिसल को सिंघपुरिया मिसल भी कहा जाता है। सरदार कपूर सिंह का जन्म 1697 ई० में कालोके नामक गाँव में हुआ था। उसके पिता का नाम दलीप सिंह था और वह जाट परिवार से संबंध रखते थे। कपूर सिंह बाल्यकाल से ही अत्यंत वीर और निडर थे। उन्होंने भाई मनी सिंह से अमृत छका था। शीघ्र ही वह सिखों के प्रसिद्ध मुखिया बन गए। 1733 ई० में उन्होंने पंजाब के मुग़ल सूबेदार जकरिया खाँ से नवाब का पद तथा एक लाख वार्षिक आय वाली जागीर प्राप्त की। 1734 ई० में नवाब कपूर सिंह ने सिख शक्ति को संगठित करने के उद्देश्य से उनको दो जत्थों बुड्डा दल और तरुणा दल के रूप में गठित किया। उन्होंने बड़ी योग्यता और सूझ-बूझ के साथ इन दोनों दलों का नेतृत्व किया। 1748 ई० में उन्होंने दल खालसा की स्थापना करके सिख पंथ के लिए महान् कार्य किया। वास्तव में सिख पंथ के विकास तथा उसको संगठित करने के लिए नवाब कपूर सिंह का योगदान बड़ा प्रशंसनीय था। उनकी 1753 ई० में मृत्यु हो गई।

  1. फैज़लपुरिया मिसल के संस्थापक कौन थे ?
  2. फैज़लपुरिया को अन्य किस नाम से जाना जाता था ?
  3. सरदार कपूर सिंह ने कब तथा किससे नवाब का दर्जा प्राप्त किया था ?
  4. नवाब कपूर सिंह की कोई एक सफलता के बारे में बताएँ।
  5. दल खालसा की स्थापना ……….. में की गई।

उत्तर-

  1. फैजलपुरिया मिसल के संस्थापक नवाव कपूर सिंह थे।
  2. फैज़लपुरिया को सिंघपुरिया मिसल के नाम से जाना जाता था।
  3. सरदार कपूर सिंह ने 1733 ई० में पंजाब के मुग़ल सूबेदार जकरिया खाँ से नवाब का दर्जा प्राप्त किया था।
  4. उन्होंने 1734 ई० में बुड्डा दल तथा तरुणा दल का गठन किया।
  5. 1748 ई०।

2
आहलूवालिया मिसल का संस्थापक सरदार जस्सा सिंह था। वह लाहौर के निकट स्थित गाँव आहलू का निवासी था। इस कारण इस मिसल का नाम आहलूवालिया मिसल पड़ गया। जस्सा सिंह अपने गुणों के कारण शीघ्र ही सिखों के प्रसिद्ध नेता बन गए। 1739 ई० में जस्सा सिंह के नेतृत्व में सिखों ने नादिर शाह की सेना पर आक्रमण करके बहुत-सा धन लूट लिया था। 1746 ई० में छोटे घल्लूघारे के समय इन्होंने वीरता के बड़े जौहर दिखाए। परिणामस्वरूप उनका नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया। 1748 ई० में दल खालसा की स्थापना के समय जस्सा सिंह आहलूवालिया को सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया गया। उन्होंने दल खालसा का नेतृत्व करके सिख पंथ की महान् सेवा की। 1761 ई० में जस्सा सिंह के नेतृत्व में सिखों ने लाहौर पर जीत प्राप्त की। यह सिखों की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विजय थी। 1762 ई० में बड़े घल्लूघारे के समय भी जस्सा सिंह ने अहमद शाह अब्दाली की फ़ौजों का बड़ी वीरता के साथ मुकाबला किया। 1764 ई० में जस्सा सिंह ने सरहिंद पर अधिकार कर लिया और इसके शासक जैन खाँ को मौत के घाट उतार दिया। 1778 ई० में जस्सा सिंह ने कपूरथला पर कब्जा कर लिया और इसको आहलूवालिया मिसल की राजधानी बना दिया।

  1. जस्सा सिंह आहलूवालिया कौन था ?
  2. आहलूवालिया मिसल का यह नाम क्यों पड़ा ?
  3. जस्सा सिंह आहलूवालिया की राजधानी का नाम क्या था ?
  4. जस्सा सिंह आहलूवालिया की कोई एक सफलता लिखें।
  5. जस्सा सिंह आहलूवालिया ने कपूरथला पर कब कब्जा किया ?
    • 1761 ई०
    • 1768 ई०
    • 1778 ई०
    • 1782 ई०।

उत्तर-

  1. जस्सा सिंह आहलूवालिया, आहलूवालिया मिसल के संस्थापक थे।
  2. क्योंकि जस्सा सिंह आहलूवालिया आहलू गाँव का निवासी था।.
  3. जस्सा सिंह आहलूवालिया की राजधानी का नाम कपूरथला था।
  4. उन्होंने 1761 ई० में लाहौर में विजय प्राप्त की।
  5. 1778 ई०।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 16 सिख मिसलों की उत्पत्ति एवं विकास तथा उनके संगठन का स्वरूप

3
जस्सा सिंह रामगढ़िया मिसल का सबसे प्रसिद्ध नेता था। उसके नेतृत्व में यह मिसल अपनी उन्नति के शिखर पर पहुँच गई थी। जस्सा सिंह पहले जालंधर के फ़ौजदार अदीना बेग के अधीन नौकरी करता था। अक्तूबर, 1748 ई० में मीर मन्नू और अदीना बेग की सेनाओं ने 500 सिखों को अचानक रामरौणी के किले में घेर लिया था। अपने भाइयों पर आए इस संकट को देखकर जस्सा सिंह के खून ने जोश मारा। वह अदीना बेग की नौकरी छोड़कर सिखों की सहायता के लिए पहुँचा। उसके इस सहयोग के कारण 300 सिखों की जानें बच गईं। इससे प्रसन्न होकर रामरौणी का किला सिखों ने जस्सा सिंह के सुपुर्द कर दिया। जस्सा सिंह ने इस किले का नाम रामगढ़ रखा। इससे ही उसकी मिसल का नाम रामगढ़िया पड़ गया। 1753 ई० में मीर मन्नू की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में फैली अराजकता का लाभ उठाकर जस्सा सिंह ने कलानौर, बटाला, हरगोबिंदपुर, कादियाँ, उड़मुड़ टांडा, दीपालपुर, करतारपुर और हरिपुर इत्यादि प्रदेशों पर अधिकार करके रामगढ़िया मिसल का खूब विस्तार किया। उसने श्री हरगोबिंदपुर को रामगढ़िया मिसल की राजधानी घोषित किया। जस्सा सिंह के आहलूवालिया और शुकरचकिया मिसलों के साथ संबंध अच्छे नहीं थे। जस्सा सिंह की 1803 ई० में मृत्यु हो गई।

  1. जस्सा सिंह रामगढ़िया कौन था ?
  2. जस्सा सिंह रामगढ़िया ने रामरौणी किले का क्या नाम रखा ?
  3. जस्सा सिंह रामगढ़िया की राजधानी का नाम क्या था ?
  4. जस्सा सिंह रामगढ़िया की कोई एक सफलता लिखें।
  5. ………. में मीर मन्नू की मृत्यु हुई।

उत्तर-

  1. जस्सा सिंह रामगढ़िया, रामगढ़िया मिसल के सबसे प्रसिद्ध नेता थे।
  2. जस्सा सिंह रामगढ़िया ने रामरौणी किले का नाम बदलकर रामगढ़ रखा।
  3. जस्सा सिंह रामगढ़िया की राजधानी का नाम श्री हरगोबिंदपुर था।
  4. उसने सिखों को रामरौणी किले में मुग़लों के घेरे से बचाया था।
  5. 1753 ई०।

4
पटियाला में फुलकिया मिसल का संस्थापक आला सिंह था। वह बड़ा बहादुर था। उसने 1731 ई० में जालंधर दोआब के और मालेरकोटला के फ़ौजदारों की संयुक्त सेना को करारी हार दी थी। आला सिंह ने बरनाला को अपनी सरगर्मियों का केंद्र बनाया। उसने लौंगोवाल, छजली, दिरबा और शेरों नाम के गाँवों की स्थापना की। 1748 ई० में अहमद शाह अब्दाली के प्रथम आक्रमण के दौरान आला सिंह ने उसके विरुद्ध मुग़लों की सहायता की। उसकी सेवाओं के दृष्टिगत मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला ने एक खिलत भेंट की। इससे आला सिंह की प्रसिद्धि बढ़ गई। शीघ्र ही आला सिंह ने भट्टी भाइयों जोकि उसके कट्टर शत्रु थे, को हरा कर बुडलाडा, टोहाना, भटनेर और जैमलपुर के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। 1761 ई० में आला सिंह ने अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध मराठों की मदद की थी। इसलिए 1762 ई० में अपने छठे आक्रमण के दौरान अब्दाली ने बरनाला पर आक्रमण किया और आला सिंह को गिरफ्तार कर लिया। आला सिंह ने अब्दाली को भारी राशि देकर अपनी जान बचाई। 1764 ई० में आला सिंह ने दल खालसा के अन्य सरदारों के साथ मिलकर सरहिंद पर आक्रमण कर इसके सूबेदार जैन खाँ को यमलोक पहँचा दिया था। इसी वर्ष अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को सरहिंद का सूबेदार नियुक्त कर दिया एवं उसे राजा की उपाधि से सम्मानित किया।

  1. आला सिंह कौन था ?
  2. आला सिंह की राजधानी का क्या नाम था ?
  3. अहमद शाह अब्दाली ने कब आला सिंह को गिरफ्तार कर लिया था ?
  4. अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को कहाँ का सूबेदार नियुक्त किया था ?
  5. आला सिंह को कब सरहिंद का सूबेदार नियुक्त किया गया ?
    • 1748 ई०
    • 1761 ई०
    • 1762 ई०
    • 1764 ई०।

उत्तर-

  1. आला सिंह पटियाला में फुलकिया मिसल का संस्थापक था।
  2. आला सिंह की राजधानी का नाम बरनाला था।
  3. अहमद शाह अब्दाली ने 1762 ई० में आला सिंह को गिरफ्तार कर लिया था।
  4. अहमद शाह अब्दाली ने आला सिंह को सरहिंद का सूबेदार नियुक्त किया था।
  5. 1764 ई०।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

Punjab State Board PSEB 6th Class Social Science Book Solutions History Chapter 13 मौर्य और शुंग काल Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Social Science History Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

SST Guide for Class 6 PSEB मौर्य और शुंग काल Textbook Questions and Answers

I. निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दें –

प्रश्न 1.
सिकन्दर के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
सिकन्दर मकदूनिया के राजा फिलिप का पुत्र था। वह अपने पिता की मृत्यु के बाद मकदूनिया का शासक बना। उसकी इच्छा सारे संसार को जीतने की थी। इसलिए राज- गद्दी पर बैठते ही उसने संसार को जीतने का कार्य शुरू कर दिया। पहले दो वर्ष उसने मकदूनिया के आस-पास के प्रदेशों पर विजय प्राप्त की। फिर वह विशाल सेना को लेकर फारस (ईरान) को जीतने के लिए चल पड़ा। उसने एशिया माइनर, सीरिया, मिस्र तथा अफ़गानिस्तान को भी जीत लिया।

326 ई० पू० में सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया तथा ब्यास नदी तक पंजाब में उत्तर-पश्चिम के कई राजाओं को हरा दिया। पहले उसने तक्षशिला के राजा अंभी तथा फिर जेहलम तथा चिनाब नदी के मध्य के प्रदेश के शासक पोरस को हराया। पोरस ने सिकन्दर का डट कर मुकाबला किया था। सिकन्दर के सैनिक पंजाब के लोगों की वीरता को देखकर डर गए थे। वे लगातार युद्ध तथा यात्रा करने से भी थक गए थे। इस कारण सिकन्दर को ब्यास नदी से ही वापिस जाना पड़ा। लेकिन वह अपने देश में न पहुंच सका। रास्ते में ही बुखार के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 2.
कौटिल्य के बारे में एक नोट लिखें।
उत्तर-
कौटिल्य को चाणक्य भी कहा जाता है। वह एक महान् विद्वान् तथा तक्षशिला विश्वविद्यालय में अध्यापक था। चन्द्रगुप्त मौर्य उसे अपना गुरु मानता था। उसकी सहायता से ही चन्द्रगुप्त मौर्य नन्द वंश को समाप्त करके मौर्य साम्राज्य स्थापित करने में सफल हुआ था। चन्द्रगुप्त के सम्राट् बनने के बाद कौटिल्य मौर्य साम्राज्य का प्रधानमन्त्री बन गया। कौटिल्य एक महान् लेखक भी था। उसकी पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ मौर्य शासन की जानकारी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

प्रश्न 3.
अशोक को ‘महान’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर-
अशोक को केवल भारत का ही नहीं, बल्कि संसार का एक महान् सम्राट माना जाता है। वह एक शक्तिशाली तथा महान् विजेता होते हुए भी शान्ति का पुजारी, मानवता प्रेमी तथा बेसहारों का मसीहा था। उसकी महानता उसके निम्नलिखित गुणों पर आधारित थी –

1. 261 ई० पू० में अशोक ने कलिंग (उड़ीसा) को जीता। इस लड़ाई में लाखों लोग मारे गए तथा अनेक घायल हुए। बहुत-से लोगों को कैद कर लिया गया। इस खून-खराबे से अशोक को बहुत दुःख हुआ। उसने हमेशा के लिए युद्ध करना छोड़ दिया तथा बौद्ध धर्म को अपना लिया।

2. कलिंग के युद्ध के बाद अशोक ने अपना शेष जीवन मानवता की भलाई में व्यतीत किया। उसने यात्रियों के लिए सड़कें तथा सरायें बनवाईं, कुएं खुदवाए तथा मनुष्यों एवं पशुओं के लिए अस्पताल खोले।

3. उसने शिकार करना छोड़ दिया तथा पशु-पक्षियों के मारने पर रोक लगा दी।

4. उसने अपनी प्रजा को अहिंसा का पालन करने, बड़ों का आदर करने तथा अपने से छोटों, नौकरों और सभी जीव-जन्तुओं के साथ प्रेम करने तथा दया का भाव रखने का सन्देश दिया।

5. उसने अपनी प्रजा को ग़रीबों को दान देने तथा सभी धर्मों का सम्मान करने का सन्देश दिया।

6. उसने अपने सन्देश चट्टानों और पत्थर के स्तम्भों पर खुदवा दिए तथा लोगों को उनका पालन करने के लिए कहा।

7. उसने लोगों में जन-कल्याण का सन्देश फैलाने के लिए विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की।

प्रश्न 4.
मौर्य कला के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर-
मौर्य शासक कला प्रेमी थे तथा उन्होंने कला के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनके इस योगदान का वर्णन इस प्रकार है –
(1) चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल राजमहल बनवाया। यह राजमहल बहुत सुन्दर था तथा अनेक स्तम्भों पर खड़ा था। अशोक का महल भी बहुत शानदार था।
(2) चन्द्रगुप्त मौर्य ने गुजरात में सुदर्शन नामक एक विशाल झील का निर्माण करवाया था।
(3) अशोक ने बहुत-से स्तूपों का निर्माण करवाया। मध्य प्रदेश में सांची का स्तूप बहुत प्रसिद्ध है।
(4) अशोक ने श्रीनगर तथा ललित पाटन नामक दो नए नगर बसाए।
(5) अशोक ने भिक्षुओं तथा निर्ग्रन्थों के लिए बिहार के नागार्जुनी तथा बारबरा की पहाड़ियों में सुन्दर गुफ़ाएं बनवाईं।
(6) अशोक ने पत्थर के बड़े-बड़े स्तम्भ बनवाए। ये स्तम्भ 34 फुट ऊंचे हैं। इन पर बहुत बढ़िया पालिश की हुई है, जो शीशे की तरह चमकती है। इन स्तम्भों पर अशोक ने अपने लेख खुदवाए।
7) अशोक ने अपने स्तम्भों पर बैल, हाथी, शेर आदि की मूर्तियां लगवाईं। एक मूर्ति में चार शेर पीठ के साथ पीठ लगाकर बैठे दिखाए गए हैं। यह मूर्ति सारनाथ (उत्तर प्रदेश) से प्राप्त हुई है। यही मूर्ति हमारा राष्ट्रीय चिन्ह है।
(8) मौर्य काल में यक्ष-यक्षियों की सुन्दर मूर्तियां भी बनवाई गईं थीं। ऐसी एक मूर्ति पटना के समीप दीदारगंज से प्राप्त हुई है।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

II. रिक्त स्थानों की पर्ति करें

  1. सिकंदर के सैनिक पंजाब के लोगों की …………… से भयभीत हो गए।
  2. चंद्रगुप्त ने …………… ई० पू० तक राज्य किया।
  3. ……………. सैल्यूकस का यूनानी राजदूत था।
  4. कौटिल्य के ……….. तथा मैगस्थनीज़ की ……….. पुस्तक से हमें मौर्य साम्राज्य के राज्य प्रबंध की जानकारी मिलती है।
  5. मध्य प्रदेश में ……………. का स्तूप बहुत प्रसिद्ध है।

उत्तर-

  1. बहादुरी (वीरता)
  2. 297
  3. मैगस्थनीज़
  4. अर्थशास्त्र, इण्डिका
  5. सांची।

III. सही जोड़े बनायें

(1) मैगस्थनीज़ – (क) अर्थशास्त्र
(2) कौटिल्य – (ख) स्तूप
(3) साँची – (ग) मन्त्री
(4) अमात्य – (घ) इण्डिका।
उत्तर-
सही जोड़े
(1) मैगस्थनीज़ – इण्डिका
(2) कौटिल्य – अर्थशास्त्र
(3) साँची – स्तूप
(4) अमात्य – मन्त्री।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

IV. सही (✓) अथवा ग़लत (✗) बताएं

  1. सैल्यूकस ने चन्द्रगुप्त मौर्य को पराजित किया।
  2. अशोक ने लोहे के विशाल स्तम्भ बनवाए।
  3. महामात्र सिकन्दर के अफ़सर थे।
  4. अशोक ने कलिंग-युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपनाया।
  5. चन्द्रगुप्त ने सुदर्शन झील का निर्माण करवाया।

उत्तर-

  1. (✗)
  2. (✗)
  3. (✗)
  4. (✓)
  5. (✓)

PSEB 6th Class Social Science Guide मौर्य और शुंग काल Important Questions and Answers

कम से कम शब्दों में उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
सिकंदर मकदूनिया का एक महान् यूनानी विजेता था। उसने भारत पर कब आक्रमण किया ?
उत्तर-
326 ई० पू० में।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

प्रश्न 2.
महान् सम्राट अशोक किसका पुत्र था ?
उत्तर-
बिंदुसार का।

प्रश्न 3.
अशोक भारत का पहला सम्राट् था जिसने एक युद्ध के पश्चात् सदा के लिए युद्ध करने का त्याग कर दिया। बताएं कि वह कौन-सा युद्ध था ?
उत्तर-
कलिंग का युद्ध।

बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अंतिम मौर्य सम्राट् बृहद्रथ का वध उसके सेनापति ने किया था। निम्न में से वह सेनापति कौन था ?
(क) पुण्यमित्र शुंग
(ख) शैल्युकस निकातोर
(ग) मिनांडर।
उत्तर-
(क) पुण्यमित्र शुंग

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

प्रश्न 2.
किस मौर्य सम्राट् ने लोगों में नैतिक मूल्यों के प्रचार के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त किए ?
(क) चन्द्रगुप्त मौर्य
(ख) बिंदुसार
(ग) अशोक।
उत्तर-
(ग) अशोक

प्रश्न 3.
नीचे तीन चित्र क, ख, तथा ग दिए गए हैं। इनमें से कौन-सा चित्र हमारा राष्ट्र चिह्न है?
PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 12 मौर्य और शुंग काल 1
उत्तर-
(ग)

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण क्यों किया?
उत्तर-
सिकन्दर सम्पूर्ण संसार का राजा बनना चाहता था। इसलिए उसने कई प्रदेश जीतने के पश्चात् भारत पर आक्रमण कर दिया।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

प्रश्न 2.
तक्षशिला के राजा का क्या नाम था?
उत्तर-
तक्षशिला के राजा का नाम अंभी था।

प्रश्न 3.
कौन-से राजा ने सिकन्दर का डटकर मुकाबला किया?
उत्तर-
पोरस ने सिकन्दर का डटकर मुकाबला किया।

प्रश्न 4.
सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध का राजा कौन था?
उत्तर-
सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध का राजा महापदमनंद था।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

प्रश्न 5.
मौर्य साम्राज्य की जानकारी देने वाले दो स्रोतों के नाम लिखें।
उत्तर-
यूनानी यात्री मैगस्थनीज़ की इंडिका तथा चाणक्य का अर्थशास्त्र।

प्रश्न 6.
चन्द्रगुप्त द्वारा मगध की विजय के समय नन्द वंश का राजा कौन था?
उत्तर-
चन्द्रगुप्त द्वारा मगध की विजय के समय नन्द वंश का राजा धनानन्द था।

प्रश्न 7.
चन्द्रगुप्त मौर्य का राजतिलक कब हुआ?
उत्तर-
चन्द्रगुप्त मौर्य का राजतिलक 321 ई० पू० में हुआ।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

प्रश्न 8.
चन्द्रगुप्त मौर्य को सैल्युकस को पराजित करने के पश्चात् कौन-से चार प्रान्त मिले?
उत्तर-
सैल्युकस को पराजित करने के पश्चात् चन्द्रगुप्त मौर्य को काबुल, कंधार, हैरात तथा बलुचिस्तान के प्रान्त मिले।

प्रश्न 9.
चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्यकाल बताएँ।
उत्तर-
चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्यकाल 321 ई० पूर्व से 297 ई० पू० तक था।

प्रश्न 10.
अशोक का राजतिलक कब हुआ?
उत्तर-
अशोक का राजतिलक 269 ई० पू० में हुआ।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

प्रश्न 11.
अशोक ने कलिंग पर आक्रमण क्यों किया?
उत्तर-
अशोक को विरासत में प्राप्त विशाल साम्राज्य में कलिंग का प्रदेश शामिल नहीं था। इसलिए उसने 261 ई० पू० में कलिंग पर आक्रमण कर दिया।

प्रश्न 12.
अशोक के धर्म के कोई दो सिद्धान्त लिखें।
उत्तर-
अशोक के धर्म के दो सिद्धान्त थे –

  1. बड़ों का आदर तथा छोटों से प्यार करो,
  2. सदा सत्य बोलो।

प्रश्न 13.
अशोक का राज्यकाल बताएं।
उत्तर-
अशोक का राज्यकाल 269 ई० पूर्व से 232 ई० पूर्व तक था।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मौर्य राज्य की जानकारी देने वाले स्त्रोतों के नाम बताएं।
उत्तर-
मौर्य राज्य की जानकारी हमें निम्नलिखित स्रोतों से मिलती है –
(1) यूनानी यात्री मैगस्थनीज़ की इण्डिका,
(2) चाणक्य का अर्थशास्त्र,
(3) विशाखदत्त का नाटक मुद्राराक्षस,
(4) जैन तथा बौद्ध धर्म के ग्रन्थ,
(5) पुराण तथा अभिलेख,
(6) मूर्तियां, स्मारक, खण्डहर तथा सिक्के।

प्रश्न 2.
चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन की जानकारी दीजिए।
उत्तर-
चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई० पूर्व में हुआ। उसके जीवन के सम्बन्ध में कई विचारधाराएं हैं। कई इतिहासकारों का विचार है कि चन्द्रगुप्त की माँ मुरा एक शूद्र घराने की थी। उसके नाम पर मौर्य शब्द का प्रयोग किया गया। लेकिन जैन परम्पराओं के अनुसार चन्द्रगुप्त की माँ मोर पालने वाले गांव के मुखिया की बेटी थी। कुछ इतिहासकार चन्द्रगुप्त का सम्बन्ध नन्द वंश के साथ जोड़ते हैं।

प्रश्न 3.
चन्द्रगुप्त मौर्य की पंजाब विजय के समय पंजाब की राजनीतिक दशा कैसी थी?
उत्तर-
चन्द्रगुप्त मौर्य की पंजाब विजय से पहले सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था। इस आक्रमण के कारण पंजाब की राजनीतिक दशा बहुत कमजोर हो चुकी थी। सिकन्दर यहां अपना राज्य स्थापित करके, अपने प्रतिनिधि को गवर्नर बनाकर छोड़ गया था। परन्तु पंजाब के लोग विदेशी राज्य के विरुद्ध थे। परिणामस्वरूप पंजाब में अराजकता फैल गई।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 13 मौर्य और शुंग काल

प्रश्न 4.
चन्द्रगुप्त मौर्य की मगध विजय के बारे में लिखें।
उत्तर-
पंजाब पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् चन्द्रगुप्त ने चाणक्य की नीति के अनुसार मगध पर आक्रमण कर दिया। मगध का राजा धनानंद अत्याचारी था। इसलिए मगध की जनता उससे घृणा करती थी। चाणक्य भी नन्द राजा से अपने अपमान का बदला लेना चाहता था। चन्द्रगुप्त को इस स्थिति का बहुत लाभ हुआ। इसलिए उसने 321 ई० पू० में मगध पर अपना अधिकार कर लिया।

प्रश्न 5.
अशोक ने राजगद्दी कैसे प्राप्त की?
उत्तर-
अशोक मौर्य शासक बिन्दुसार का पुत्र था। बिन्दुसार की 273 ई० पू० में मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि अशोक ने अपने 99 भाइयों को मारकर मौर्य साम्राज्य की राजगद्दी प्राप्त की। अशोक का राजतिलक 269 ई० पू० में हुआ। हो सकता है कि 273 ई० पू० से 269 ई० पू० के बीच के समय में राजगद्दी के लिए गृह-युद्ध हुआ हो।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
चन्द्रगुप्त मौर्य की विजयों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर-
चन्द्रगुप्त मौर्य की विजयों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –
1. मगध पर विजय-चन्द्रगुप्त ने मगध पर एक बड़ी सेना सहित आक्रमण कर दिया। उस समय मगध पर धनानन्द राज्य करता था। युद्ध में धनानन्द हार गया तथा मगध के राज्य पर चन्द्रगुप्त मौर्य का अधिकार हो गया। इस प्रकार चन्द्रगुप्त लगभग सारे उत्तरी भारत का मालिक बन गया। मगध की राजधानी पाटलिपुत्र उसके राज्य की राजधानी बनी।

2. सैल्यूकस के साथ युद्ध-सैल्यूकस सिकन्दर का सेनापति था। सिकन्दर की मृत्यु के पश्चात् वह काबुल, कन्धार, बलख तथा बुखारा का शासक बन बैठा था। उसने पंजाब के पश्चिमी भाग पर आक्रमण कर दिया। इन क्षेत्रों पर चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्य था। उसने सैल्यूकस को बुरी तरह हराया। सैल्युकस ने चन्द्रगुप्त मौर्य को काबुल, कन्धार तथा बलुचिस्तान के क्षेत्र दे दिए।

3. अन्य विजयें-उत्तरी भारत पर अधिकार करने के पश्चात् चन्द्रगुप्त ने गुजरातकाठियावाड़ पर हमला करके उसे अपने राज्य में मिलाया। दक्षिण के कुछ भागों पर भी चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

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प्रश्न 2.
चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य प्रबन्ध की जानकारी दीजिए।
उत्तर-
चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्य प्रबन्ध उच्चकोटि का था। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं –

1. केन्द्रीय शासन-राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी था। उसकी शक्तियां असीमित थीं। वह सेना का मुखिया तथा न्याय का अन्तिम न्यायालय था। उसकी सहायता के लिए कई मन्त्री होते थे। उसके कुछ अन्य अधिकारी प्रधान, अमात्य, महामात्र आदि थे।

2. प्रान्त का शासन-सम्पूर्ण साम्राज्य प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त का प्रबन्ध राज परिवार का कोई राजकुमार करता था। उसका कर्तव्य प्रान्त में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखना था। प्रान्त जिलों में बंटे हुए थे। जिले के मुखिया को स्थानिक कहते थे।

3. बड़े नगरों का प्रबन्ध-पाटलिपुत्र, तक्षशिला तथा उज्जैन जैसे बड़े-बड़े नगरों के प्रबन्ध के लिए समितियां स्थापित की गई थीं। प्रत्येक समिति में 30 सदस्य होते थे। समितियां पांच-पांच सदस्यों के छ: बोर्डों में बंटी हुई थीं।

4. न्याय-न्याय का सर्वोच्च अधिकारी राजा स्वयं था। न्याय सम्बन्धी सभी अन्तिम अपीलें वह स्वयं ही सुनता था। सभी को उचित न्याय मिलता था। दण्ड काफ़ी कठोर थे। लोग शान्तिप्रिय थे। अपराध काफ़ी कम होते थे।

5. प्रजा की भलाई के कार्य-चन्द्रगुप्त मौर्य प्रजा की भलाई का विशेष ध्यान रखता था। उसने कृषि की उन्नति के लिए सिंचाई की उचित व्यवस्था की हुई थी। यात्रियों की सुविधा तथा व्यापार की उन्नति के लिए सभी राज्यों में सड़कों का जाल बिछा हुआ था। इसके अतिरिक्त उसने सड़क के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाए, धर्मशालाएं बनवाईं तथा कुएं खुदवाए।

6. आय-सरकार को आय करों से प्राप्त होती थी। भूमि कर आमतौर पर उपज का 1/6 भाग लिया जाता था। जन्म तथा मृत्यु कर, उत्पादन कर तथा बिक्री कर सरकार की आय के मुख्य साधन थे।

प्रश्न 3.
अशोक की कलिंग विजय का वर्णन करें।
उत्तर-
अशोक के दादा चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण विजय अधूरी रह गई थी क्योंकि कलिंग का राज्य अभी तक स्वतन्त्र था। इसलिए अशोक ने कलिंग पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया तथा 261 ई० पू० में एक विशाल सेना के साथ कलिंग पर आक्रमण कर दिया। कलिंग के राजा के पास भी एक विशाल सेना थी। अशोक तथा कलिंग के राजा के बीच बहुत घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में अशोक की जीत हुई। अशोक के एक अभिलेख से पता चलता है कि इस युद्ध में लगभग एक लाख व्यक्ति मारे गए तथा उससे भी कहीं अधिक घायल हुए थे। कई लोग लापता हो गए। कलिंग युद्ध में हुए रक्तपात को देखकर अशोक का जीवन ही बदल गया। उसने युद्धों का हमेशा के लिए त्याग करके धर्म विजय की नीति अपनाई। इसी कारण वह बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया।

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प्रश्न 4.
अशोक के धर्म के सिद्धान्तों के बारे में लिखें। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए क्या किया?
उत्तर-
कलिंग के युद्ध के पश्चात् अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। परन्तु जो धर्म उसने जनता के सामने रखा, वह बौद्ध धर्म नहीं था। उसने सभी धर्मों की अच्छी बातें अपने धर्म में शामिल की। उसके धर्म की शिक्षाएं इस प्रकार थीं –

  1. बड़ों का आदर करो तथा छोटों से प्रेम करो।
  2. गुरुओं का आदर करो।
  3. पापों से दूर रहो तथा पवित्र जीवन व्यतीत करो।
  4. हमेशा सत्य बोलो। अन्त में सत्य की ही जीत होती है।
  5. अहिंसा में विश्वास रखो तथा किसी जीव की हत्या न करो।
  6. अपने सामर्थ्य के अनुसार साधुओं, विद्वानों तथा ग़रीबों को दान दो।
  7. अपने धर्म का पालन करो, लेकिन किसी दूसरे धर्म की निन्दा न करो।

अशोक द्वारा बौद्ध धर्म का प्रचार-अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए निम्नलिखित कार्य किए –

  1. उसने बौद्ध धर्म के नियमों को पत्थर के स्तम्भों तथा शिलाओं पर खुदवाया। ये नियम आम बोलचाल की भाषा में खुदवाए गए ताकि साधारण लोग भी इन्हें पढ़ सकें।
  2. उसने अनेक स्तूप तथा विहार बनवाए, जो बौद्ध धर्म के प्रचार का केन्द्र बने।
  3. उसने बौद्ध भिक्षुओं को आर्थिक सहायता दी।
  4. उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए विदेशों में प्रचारक भेजे।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(ii) ग्लेशियर के अनावृत्तिकरण कार्य

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 3(ii) ग्लेशियर के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 3(ii) ग्लेशियर के अनावृत्तिकरण कार्य

PSEB 11th Class Geography Guide ग्लेशियर के अनावृत्तिकरण कार्य Textbook Questions and Answers

1. उत्तर एक-दो वाक्यों में दें-

प्रश्न (क)
भारत का सबसे बड़ा ग्लेशियर कौन-सा है ?
उत्तर-
भारत का सबसे बड़ा ग्लेशियर सियाचिन है।

प्रश्न (ख)
विश्व का सबसे बड़ा ग्लेशियर कौन-सा है ?
उत्तर-
विश्व का सबसे बड़ा ग्लेशियर हुब्बार्ड ग्लेशियर (अलास्का) है।

प्रश्न (ग)
हिमालय के कुल क्षेत्रफल में से कितना भाग बर्फ से ढका हुआ है ?
उत्तर-
हिमालय के कुल क्षेत्रफल में से 33000 वर्ग कि०मी० भाग बर्फ से ढका है।

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प्रश्न (घ)
इंदिरा कोल/पास कहाँ स्थित है ?
उत्तर-
इंदिरा कोल/पास उत्तर-पश्चिम हिमालय में स्थित है।

प्रश्न (ङ)
अंटार्कटिका का तापमान हर दस साल बाद कितना बढ़ता है ?
उत्तर-
अंटार्कटिका का तापमान हर दस साल बाद 0.12°C बढ़ता है।

2. निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट करो-

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में अन्तर स्पष्ट कीजिए-
(क) बगली मोरेन-प्रतिसारी हिमोढ़/मोरेन
(ख) ड्रमलिन-ऐस्कर
(ग) सिरक-यू-आकार की घाटी।
उत्तर-
(क) बगली मोरेन (Lateral Moraine)-
पिघलती हुई हिमनदी अपने किनारों पर चट्टानों के ढेर बना कर सैंकड़ों फुट ऊँची दीवार बना देती है, इसे बगली मोरेन कहते हैं।

प्रतिसारी हिमोढ़/मोरेन (Recessional Moraine) –
जब हिमनदी पीछे हटती है और पिघलती है, तो उसके अंतिम सिरे पर एक गोल आकार की श्रेणी बन जाती है, जिसे प्रतिसारी मोरेन कहते हैं।

(ख) ड्रमलिन (Drumlin)-
आधे अंडे अथवा उलटी नाव के आकार जैसे टीलों को ड्रमलिन कहते हैं।

ऐस्कर (Eskar)-
हिमनदी के अगले भाग में हिम की एक गुफा बनती है, जिसमें हिमनदी का जल-प्रवाह होता है और एक टेढ़ीमेढ़ी श्रेणी बन जाती है।

(ग) सिरक अथवा बर्फ़ कुंड (Cirque)-
पर्वत की ढलान पर हिम से ढका एक कुंड बन जाता है जिसे सिरक कहते हैं। बर्फ के पिघलने से यहाँ एक झील बन जाती है।

यू-आकार की घाटी (U-Shaped Valley)-
जब यू-आकार की घाटी में हिम सरकती है, तो उसके दोनों सिरे तीखी ढलान वाले बन जाते हैं। यह घाटी अंग्रेजी भाषा के U-आकार जैसी बन जाती है।

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3. निम्नलिखित का उत्तर विस्तार सहित दो-

प्रश्न (क)
ग्लेशियर किसे कहते हैं ? इसको कितने भागों में बाँटा जा सकता है ?
उत्तर-
जब किसी हिम क्षेत्र में हिम बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो यह नीचे की ओर खिसकती है। खिसकते हुए हिम पिंड को हिमनदी कहते है। (A Glacier is a large mass of moving ice.) कई विद्वानों ने हिम नदी को ‘बर्फ की नदी’ माना है। (Glacier are rivers of ice.)

हिम नदी के कारण-हिम नदी हिम क्षेत्रों से जन्म लेती है। लगातार हिमपात के कारण हिमखंडों का भार बढ़ जाता है। यह हिम समूह निचली ढलान की ओर एक जीभ (Tongue) के रूप में खिसकने लगता है। इसे हिम नदी कहते हैं।

हिम नदी के खिसकने के कई कारण हैं –

  1. हिम का अधिक भार (Pressure)
  2. ढलान (Slope)
  3. गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravity)

सबसे तेज़ चलने वाली हिम नदियाँ ग्रीनलैंड में मिलती हैं, जो गर्मियों में 18 मीटर प्रतिदिन चलती हैं। हिम नदियाँ तेज़ ढलान पर और अधिक ताप वाले प्रदेशों में अधिक गति से चलती हैं, पर कम ढलान और ठंडे प्रदेशों में धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं। ये हिम नदियाँ हिम क्षेत्रों से सरक कर मैदानों में आकर पिघल जाती हैं और कई नदियों के पानी का स्रोत बनती हैं, जिस प्रकार भारत में गंगा नदी गंगोत्री हिम नदी से जन्म लेती है।

हिम नदी के प्रकार (Types of Glaciers)-स्थिति और आकार के आधार पर हिम नदियाँ तीन प्रकार की होती हैं-

1. घाटी ग्लेशियर (Valley Glaciers)—इसे पर्वतीय हिम नदी (Mountain Glaciers) भी कहते हैं। यह हिम नदी ऊंचे पहाड़ों की चोटियों से उतर कर घाटियों में बहती है। यह हिमनदी एक चौड़े और गहरे बेसिन (Basin) की रचना करती है। सबसे पहले अल्पस (Alps) पहाड़ में मिलने के कारण इसे अल्पाइन (Alpine) हिमनदी भी कहते हैं। हिमालय पर्वत पर इस प्रकार की कई हिम नदियाँ भी हैं, जिस प्रकार गंगोत्री हिम नदी जो कि 25 कि०मी० लंबी है। भारत में सबसे बड़ी हिम नदी काराकोरम पर्वत में सियाचिन (Siachin) है, जोकि 72 कि०मी० लंबी है। अलास्का में संसार की सबसे बड़ी हिम नदी हुब्बार्ड है, जोकि
128 कि०मी० लंबी है।

2. महाद्वीपीय ग्लेशियर (Continental Glaciers)-बड़े क्षेत्रों में फैली हुई हिम नदियों को महाद्वीपीय हिम नदी अथवा हिम चादर (Ice Sheets) कहते हैं। इस प्रकार की हिम चादरें ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Areas) में मिलती हैं। लगातार हिमपात, निम्न तापमान और कम वाष्पीकरण के कारण हिम पिघलती नहीं है। संसार की सबसे बड़ी हिम चादर अंटार्कटिका (Antarctica) में 130 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 1500 मीटर मोटी है। ग्रीनलैंड (Greenland) में ऐसी ही एक हिम चादर का क्षेत्रफल 17 लाख वर्ग किलोमीटर है। आज से लगभग 25 हज़ार वर्ष पहले हिम युग (Ice Age) में धरती का 1/3 भाग हिम चादरों से ढका हुआ था।

3. पीडमांट ग्लेशियर (Piedmont Glaciers)—ये हिम नदियाँ पर्वतों के निचले भागों में होती हैं। वादी हिम नदियाँ जब पर्वतों के आगे कम ढलान वाली भूमि पर फैल जाती हैं और इनमें अनेक हिम नदियाँ आकर मिल जाती हैं, तो ये एक विशाल रूप बना लेती हैं। ऐसी हिमनदी को पर्वत-धारा हिमनदी या पीडमांट हिमनदी कहते हैं। ऐसी हिम नदियाँ अलास्का में बहुत मिल जाती हैं। यहां की मैलास्पीन (Melaspine) हिमनदी पीडमांट हिमनदी है। हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी में मोम (Mom) हिमनदी इसका एक अन्य उदाहरण है।

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प्रश्न (ख)
ग्लेशियर अनावृत्तिकरण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है, कैसे ?
उत्तर-
ग्लेशियरों द्वारा अनावृत्तिकरण-ग्लेशियर अनावृत्तिकरण का महत्त्वपूर्ण साधन है
प्राचीन समय से अनावृत्तिकरण-यदि पृथ्वी का इतिहास देखा जाए, तो कई हज़ार साल पहले बर्फ़ युग (Ice Age) में धरती का 20% हिस्सा ग्लेशियरों के अधीन था, परंतु आज यह भाग केवल 10% तक ही सीमित रह गया है। ऐसा वैश्विक जलवायु (Global Climate) में बदलाव आने से हुआ है।

ग्लेशियरों का विस्तार-अंटार्कटिक और ग्रीनलैंड में, विश्व के ग्लेशियरों का 96% भाग है। अंटार्कटिक में तो इस बर्फ की तह की मोटाई (Thickness) कई स्थानों पर 1500 मीटर और कई स्थानों पर 4000 मीटर तक भी है।

ग्लेशियर और तापमान-अमेरिकी अंतरिक्ष खोज एजेंसी (NASA) की एक खोज के अनुसार पिछले 50 वर्षों में अंटार्कटिक का तापमान 0.12° प्रति दशक (Per Decade) गर्म हो रहा है, जिसके फलस्वरूप बर्फ की परतों के तल (Ice Sheets) टूटते जा रहे हैं और समुद्र (Sea Level) 73 मीटर तक ऊँचा उठ गया है।

ग्लेशियर और हिमपात (Snowfall)—ग्लेशियर केवल पहाड़ों, उच्च अक्षांशों अथवा ध्रुवों के पास ही मिलते हैं क्योंकि इन स्थानों पर तापमान हिमांक से भी नीचे होता है। पृथ्वी के इन क्षेत्रों में बर्फ रूपी वर्षा होती है। बर्फ की वर्षा में बर्फ रुई के समान कोमल होती है। लगातार बर्फ की वर्षा होने से और तापमान बहुत ही कम होने के कारण बर्फ की निचली परतें जमती रहती हैं और बर्फ ठोस रूप धारण कर लेती है। इसे ग्लेशियर कहते हैं। बर्फ की वर्षा अधिकांश क्षेत्रों में सर्दी के मौसम में ही होती है, जबकि गर्मी बर्फ को पिघलाने का काम करती है।

ग्लेशियरों का सरकना-धरती की ढलान और गर्मी के कारण जिस समय बर्फ धीरे-धीरे खिसकना शुरू कर देती है, तो इसे ग्लेशियर का सरकना या खिसकना कहा जाता है। 1834 में Lious Agassiz ने सिद्ध किया था कि ग्लेशियर के चलने की दर मध्य में सबसे अधिक और किनारों की ओर कम होती जाती है।

मैदानों की रचना- ग्लेशियर रेत, बजरी आदि के निक्षेप से मैदानों की रचना करते हैं, जो उपजाऊ क्षेत्र होते हैं।
पानी के भंडार-ग्लेशियर पिघलने के बाद पूरा वर्ष पानी प्रदान करते हैं।
झरने-कई स्थानों पर झरने बनते हैं, जो बिजली पैदा करने में मदद करते हैं।
झीलें-ग्लेशियर कई झीलों का निर्माण करते हैं, जैसे-Great Lake.

प्रश्न (ग)
ग्लेशियर के जलोढ़ निक्षेप क्या है ? विस्तार सहित व्याख्या करो।
उत्तर-
ग्लेशियर का निक्षेपण कार्य (Depositional Work of Glacier)-
पर्वतों के निचले भाग में आकर जब हिमनदी पिघलना आरंभ कर देती है, तो इसके द्वारा प्रवाहित चट्टानें, पत्थर, कंकर आदि निक्षेप हो जाते हैं। हिम के पिघलने से बनी जल धाराओं द्वारा भी इन पदार्थों को ढोने में सहायता मिलती है। हिमनदी द्वारा किए गए निक्षेप नीचे लिखे दो प्रकार के होते हैं

  1. ड्रिफ्ट (Drift)
  2. टिल्ल (Till).

हिम नदी द्वारा बहाकर लाए गए पत्थर, चट्टानी टुकड़े, कंकर आदि को हिमनदी ढेर कहा जाता है। यह सामग्री अलग-अलग स्थितियों में कटकों (Ridges) के रूप में जमा हो जाती है। इन कटकों को मोरेन (Moraine) कहा जाता है। मोरेन के अलग-अलग रूप नीचे लिखे हैं –

1. बगली मोरेन (Lateral Moraine) पिघलती हई हिम नदी जो पदार्थ अपने किनारों पर जमा करती है, वे एक कटक के रूप में एकत्र हो जाते हैं। इन्हें बगली मोरेन कहा जाता है। ये लगभग 30 मीटर ऊँचे होते हैं।

2. मध्यवर्ती अथवा सांझे मोरेन (Medial Moraine)-जब दो हिम नदियाँ आपस में मिलती हैं और वे संयुक्त रूप में आगे बढ़ती हैं तो उनके संगम के भीतरी किनारों की तरफ आधे चाँद जैसे मोरेन भी मिलकर आगे बढ़ते हैं। इन्हें मध्यवर्ती या सांझे मोरेन कहते हैं।

3. तल के मोरेन (Ground Moraine)-हिम नदी के तल पर बड़े चट्टानी टुकड़े और भारी पत्थर होते हैं, जो साथ-साथ तल को घिसाते हुए आगे बढ़ते हैं। हिम नदी के पिघलने पर ये भारी चट्टानें तल पर एकत्र होकर कटक का रूप धारण कर लेती हैं। ऐसे कटकों को तल के मोरेन कहते हैं। इस मोरेन में अधिकतर चट्टानी टुकड़े, पत्थर और चिकनी मिट्टी होती है। इसे बोल्डर क्ले या टिल्ल (Boulder Clay or Till) कहते हैं।

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4. अंतिम मोरेन (Terminal Moraine)-हिम नदी द्वारा कुछ पत्थर इसके अगले भाग में धकेल दिए जाते हैं। हिम नदी के पिघलने के बाद यह इसके अगले भाग में ही एकत्र होकर एक चट्टान का रूप धारण कर लेते हैं। इसे अंतिम मोरेन कहते हैं।

5. मोरेन झील (Moraine Lake)-हिम नदी के अगले भाग में कुछ बर्फ पिघल जाती है। यदि वहाँ अंतिम मोरेन हों तो इस जल का बहाव रुक जाता है और वहाँ एक झील बन जाती है, जिसे मोरेन झील कहते हैं।

6. केतलीनुमा सुराख (Kettle Holes)—जब ग्लेशियर चलता है, तो इसके ऊपर पत्थर या चट्टानों के टुकड़े गिर जाते हैं और कुछ समय बाद बर्फ पिघलती है, तो ग्लेशियर के अंदर छोटे-बड़े सुराख बन जाते हैं, जिन्हें केतलीनुमा सुराख कहते हैं। इसे नॉब और बेसिन भू-आकृति (Knob and Basin Topography) कहते हैं।

7. विस्थापित चट्टानी खंड (Erratic Blocks)-हिम नदी बड़े चट्टानी खंडों और भारी पत्थरों को प्रवाहित करके पर्वत के निचले भाग में ले जाती है और पिघलने पर उनका वहाँ निक्षेपण हो जाता है। ये चट्टानी खंड रचना में निकटवर्ती भूमि की चट्टानों के समान नहीं होते। इन्हें विस्थापित चट्टानी खंड कहते हैं।

8. हिमोढ़ी टीले (Drumlins)-हिम नदी तल पर हिमोढ़ को कई बार छोटे-छोटे गोल टीलों (Mounds) के रूप में इस तरह जमाकर देती है कि वे आधे अंडे अथवा उलटी नाव के समान दिखाई देते हैं। इन्हें हिमोढ़ी टीले (Drumlins) कहते हैं। दूर से देखने पर ये अंडे की टोकरी के समान प्रतीत होते हैं, इसलिए इस आकार वाली भूमि को अंडों की टोकरी वाली भू-आकृति (Basket of Eggs Topography) कहते हैं।

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प्रश्न (घ)
ग्लेशियर (हिम नदी) की अपघर्षण की क्रिया से कौन-कौन-सी रूप रेखाएँ बनती हैं, वर्णन करें।
उत्तर-
हिम नदी का अपरदन कार्य (Erosional Work of Glacier)-

पर्वतीय ढलानों से चट्टानी टुकड़े, पत्थर, कंकर आदि गुरुत्वाशक्ति के प्रभाव से घाटी हिम नदी के तल पर गिरते रहते हैं। कुछ समय बाद ये पत्थर आदि दिन के समय गर्म हो जाते हैं और बर्फ़ को पिघलाकर हिम नदी के तल (bed) पर पहुंच जाते हैं और हिम नदी के साथ-साथ चलते हैं। हिम नदी पर ये उपकरण बनकर अपरदन का काम करते हैं।

हिम नदी का अपघर्षण/अपरदन (Glacier Erosion)-

पानी के समान हिम नदी भी अपघर्षण/अपरदन, ढोने और जमा करने के तीन काम करती है। हिम नदी पहाड़ी प्रदेशों में अपघर्षण का काम, मैदानों में जमा करने और पठारों में रक्षात्मक काम करती है।

अपघर्षण (Erosion)-हिम नदी अनेक क्रियाओं द्वारा अपघर्षण का काम करती है-

  1. तोड़ने की क्रिया (Plucking or Quarrying)
  2. खड्डे बनाना (Grooving)
  3. अपघर्षण (Abrasion)
  4. पीसना (Grinding)
  5. चमकाना (Polishing)

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हिम नदी के कार्य हिम नदी अपने रास्ते के बड़े-बड़े पत्थरों को खोदकर खड्डे पैदा कर देती है। हिम-स्खलन (Avalanche) और भू-स्खलन (Land Slide) के कारण कई चट्टानी पत्थर हिम नदी के साथ मिल जाते हैं। ये पत्थर चट्टानों के साथ रगड़ते और घिसते हुए चलते हैं और हिम नदी के तल और किनारों को चिकना बनाते हैं। पहाड़ी प्रदेशों का रूप ही बदल जाता है। घाटी का तल चमकीला और चिकना हो जाता है। हिम नदी का अपघर्षण कई तत्त्वों पर निर्भर करता है

  1. हिम की मोटाई (Amount of Ice)-अधिक हिम के कारण कटाव भी अधिक होता है।
  2. चट्टानों की रचना (Nature of Rocks)-कठोर चट्टानों पर कम और नर्म चट्टानों पर अधिक कटाव होता है।
  3. हिम नदी की गति (Movement of Glaciers)-तेज़ गति वाली हिम नदियाँ शक्तिशाली होती हैं और अधिक कटाव करती हैं।
  4. भूमि की ढलान (Slope of Land)–धरातल की तेज़ ढलान अधिक अपरदन करने में सहायक होती है।

हिम नदी के अपघर्षण द्वारा बनी भू-आकृतियाँ (Land forms Produced by Glacier Erosion) –

हिम नदी के अपरदन क्रिया द्वारा पर्वतों में नीचे लिखी भू-आकृतियाँ बनती हैं-

1. बर्फ कुंड अथवा सिरक (Cirque or Corrie or CWM)-सूर्य-ताप के कारण दिन के समय कुछ मात्रा में हिम पिघल कर जल के रूप में दरारों में प्रवेश कर जाती है। रात के समय अधिक सर्दी होने के कारण यह जल फिर हिम में बदल जाता है और फैल जाता है फलस्वरूप यह चट्टानों पर दबाव डालकर उन्हें तोड़

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देता है। इस क्रिया में नियमित रूप में चलते रहने के फलस्वरूप पर्वत की ढलान पर खड्डा बन जाता है। सामान्य रूप से यह बर्फ से भरा रहता है और धीरे-धीरे तुषारचीरन (Frost Wedging) की क्रिया से एक विशाल कुंड का रूप धारण कर लेता है। इसे हिमगार भी कहा जाता है। इसे फ्रांस में सिरक (Cirque), स्कॉटलैंड में कोरी (Corrie), जर्मनी में कैरन (Karren) और इंग्लैंड में वेल्ज़ (Wales of England) के कूम (CWM) कहते हैं। हिमगार की बर्फ़ जब पिघल जाती है, तो इसमें पानी भरा रहता है, इसे गिरिताल (Tarn Lake) कहते हैं। इसी प्रकार पर्वतीय ढलानों पर अर्धगोले के आकार के खड्डों को हिम कुंड कहते हैं (Cirques are Semi-circular hollow on the side of a mountain)। इनका आकार आरामकुर्सी (Arm chair) अथवा कटोरे के समान होता है।

2. दर्रा अथवा कोल (Pass or Col) कई बार पर्वत की विपरीत ढलानों की एक समान ऊँचाई पर हिमगार कारण पर्वत का वह भाग बाकी भागों की अपेक्षा नीचा हो जाता है। पर्वत के इस निचले भाग को दर्रा (Saddle) कहते हैं। कनाडा का रेल मार्ग कोल क्षेत्रों में से निकलता है।

3. कंघीदार श्रृंखला (Comb Ridge)-कई बार पर्वत माला की एक श्रृंखला (Ridge) के विपरीत ढलानों पर कई हिमगार बन जाते हैं और श्रृंखला कई स्थानों से नीची हो जाती है, जिसके फलस्वरूप श्रृंखला कंघी के आकार की प्रतीत होती है और इसके चट्टानी खंभे (Rock-Pillars) दिखाई देते हैं। कुछ समय के बाद जब ये खंभे नष्ट हो जाते हैं तो श्रृंखला उस्तरे जैसी तीखी धार वाली (Rajor-edged) बन जाती है। तब इस श्रृंखला को एरैटी या तीखी श्रृंखला (Arete) कहते हैं।

4. पर्वत या गिरि श्रृंग (Horn)-कई बार किसी पर्वत के दो-तीन या चारों तरफ एक जैसी ऊँचाई पर हिमगारों का निर्माण हो जाता है। कुछ समय के बाद उनकी पिछली तरफ के शिखर के कटाव के कारण ये अंदर ही अंदर आपस में मिल जाते हैं, जिसके फलस्वरूप इनके मध्य में एक ठोस पिरामिड (Pyramid) आकार का शिखर बाकी रह जाता है।

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इस शिखर को पर्वत-श्रृंग कहते हैं। स्विट्ज़रलैंड (Switzerland) का मैटरहॉर्न (Matterhorn) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके अतिरिक्त कश्मीर घाटी पहलगाम (Pahalgam) से 25 किलोमीटर ऊपर की ओर कोलहाई (Kholhai) हिम नदी के स्रोत पर ऐसा ही एक पर्वत श्रृंग है।

5. भेड़ पहाड़ या रोशे मुताने (Sheep Rocks or Roche Muttonne)-हिम नदी के मार्ग में अनेक छोटी छोटी रुकावटें आती हैं, जिन्हें वह अपने प्रवाह के दबाव के साथ उखाड़ देती है। परंतु कई बार बड़ी रुकावटों जैसे पर्वतीय टीलों आदि को उखाड़ने में वह असमर्थ रहती है। परिणामस्वरूप इसे उन रुकावटों के ऊपर से होकर निकलना पड़ता है। हिम नदी के सामने वाली ढलान हिमनदी संघर्षण क्रिया द्वारा घिसकर

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चिकनी और नर्म (Smooth) हो जाती है। हिमनदी जब टीले की दूसरी तरफ उतरती है, तो यह अपनी उखाड़ने की शक्ति (Plucking) द्वारा चट्टानों को उखाड़ देती है। इससे दूसरी तरफ की ढलान ऊबड़-खाबड़ हो जाती है। ये टीले दूर से ऐसे लगते हैं, जैसे भेड़ की पीठ हो, इसलिए इसे भेड़-पीठ कहते हैं। ‘Roche Muttonne’ फ्रांसीसी (French) भाषा के दो शब्द हैं, जिनका अर्थ भेड़-दुम चट्टान होता है।

6. यू-आकार की घाटी (U-Shaped Valley)-हिमनदी सदा पहले से बनी घाटी में बहती है। जिस घाटी में हिम नदी चलती है, उसे अपनी घर्षण और उखाड़ने की क्रिया द्वारा नीचे से और दोनों तरफ से तीखी ढलान वाली बना देती है, जिसके कारण हिम नदी घाटी अंग्रेजी भाषा के अक्षर ‘U’ आकार की बन जाती है। नदी द्वारा बनी V- आकार की घाटियाँ हिम नदी की अपरदन क्रिया द्वारा U- आकार की हो जाती हैं। इसका तल समतल और चौकोर होता है। इसके किनारे खड़ी ढलान वाले होते हैं। समुद्र में डूबी हुई यू-आकार की घाटियों को फियॉर्ड (Fiord) कहते हैं। उदाहरण-उत्तरी अमेरिका में सेंट लारेंस घाटी।

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7. लटकती घाटी (Hanging Valley)–एक बड़ी हिमनदी में कई छोटी हिम नदियाँ आकर मिलती हैं। ये मुख्य हिम नदी की सहायक (Tributaries) कहलाती हैं। मुख्य हिम नदी सहायक हिम नदियों के मुकाबले में अधिक अपरदन करती है, जिसके कारण मुख्य हिम नदी घाटी का तल, सहायक हिम नदी के तल की तुलना में अधिक नीचा हो जाता है। कुछ समय के बाद, जब हिम नदियाँ पिघल जाती हैं, तो सहायक नदियों की घाटियाँ मुख्य नदी की घाटी पर लटकती हुई दिखाई देती हैं और वहाँ जल झरने बन जाते हैं। इस प्रकार यह लटकती घाटियाँ मुख्य हिम नदी और सहायक हिम नदी की घाटियों में अपरदन की भिन्नता के कारण बनती हैं।

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Geography Guide for Class 11 PSEB ग्लेशियर के अनावृत्तिकरण कार्य Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
भारत की किसी एक हिमनदी का नाम बताएँ।
उत्तर-
सियाचिन।

प्रश्न 2.
हिमनदी शृंग का एक उदाहरण दें।
उत्तर-
मैटर हॉर्न।

प्रश्न 3.
विश्व के कितने क्षेत्र में ग्लेशियर हैं ?
उत्तर-
10 प्रतिशत।

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प्रश्न 4.
अंटार्कटिका में हिम की मोटाई बताएँ।
उत्तर-
4000 मीटर।

प्रश्न 5.
उस विद्वान का नाम बताएँ, जिसने पुष्टि की थी कि हिम नदी की गति होती है।
उत्तर-
लुईस अगासीज़।

प्रश्न 6.
हिमालय पर्वत की हिम रेखा की ऊँचाई बताएँ।
उत्तर-
5000 मीटर।

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प्रश्न 7.
अलास्का के पीडमांट ग्लेशियर का नाम बताएँ।
उत्तर-
मैलास्पीना।

प्रश्न 8.
सिरक के अन्य नाम बताएँ।
उत्तर-
कोरी, कैरन।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1.
हिम क्षेत्र से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
हिम क्षेत्र (Snow field) हिम रेखा से ऊपर सदैव बर्फ से ढके प्रदेशों को हिम क्षेत्र कहते हैं।

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प्रश्न 2.
हिम रेखा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
हिम रेखा (Snow line)—यह वह ऊँचाई है, जिसके ऊपर सारा साल हिम जमी रहती है।

प्रश्न 3.
घाटी हिम नदी क्या है ?
उत्तर-
घाटी हिम नदी (Valley Glacier)—पर्वतों से खिसककर घाटी में उतरने वाली हिम नदी को घाटी हिम नदी कहते हैं।

प्रश्न 4.
महाद्वीपीय हिम नदी क्या है ?
उत्तर-
महाद्वीपीय हिम नदी (Continental Glacier) ध्रुवीय क्षेत्रों के बड़े क्षेत्रों पर हिम चादर को महाद्वीपीय नदी कहते हैं।

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प्रश्न 5.
हिमकुंड की परिभाषा दें।
उत्तर-
हिमकुंड (Cirque)-पर्वतीय ढलानों पर अर्धगोले के आकार के गड्ढों को हिमकुंड कहते हैं।

प्रश्न 6.
हिम रेखा की ऊँचाई किन तत्वों पर निर्भर करती है ?
उत्तर-

  1. अक्षांश
  2. हिम की मात्रा
  3. पवनों
  4. ढलान।

प्रश्न 7.
हिमालय पर्वत पर हिमरेखा की ऊँचाई बताएँ।
उत्तर-
5000 मीटर।

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प्रश्न 8.
ध्रुवों पर हिमरेखा की ऊँचाई बताएँ।
उत्तर-
समुद्र तल।

प्रश्न 9.
हिम नदी किसे कहते हैं ?
उत्तर-
हिम क्षेत्रों से नीचे की ओर खिसकते हुए हिमकुंड को हिम नदी कहते हैं।

प्रश्न 10.
भारत में सबसे बड़ी हिम नदी कौन-सी है ?
उत्तर-
सियाचिन।

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प्रश्न 11.
गंगा नदी किस हिमनदी से जन्म लेती है ?
उत्तर-
गंगोत्री।

प्रश्न 12.
हिम नदियों के तीन मुख्य प्रकार बताएँ।
उत्तर-
घाटी हिम नदी, पीडमांट हिम नदी, हिम चादर (महाद्वीपीय हिम नदी)

प्रश्न 13.
हिम-स्खलन (Avalanche) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
नीचे की ओर खिसकती बर्फ पर्वतीय ढलानों से चट्टानी टुकड़े उखाड़ लेती है, इन्हें हिम-स्खलन (Avalanche) कहते हैं।

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प्रश्न 14.
महाद्वीपीय हिम नदी से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जब कोई हिम नदी एक विशाल क्षेत्र को घेर लेती है, जैसे कि एक महाद्वीप, तब उसे हिम चादर या महाद्वीपीय हिम नदी कहते हैं।

प्रश्न 15.
हिम नदी के अपरदन के रूप बताएँ।
उत्तर-

  1. उखाड़ना (Plucking)
  2. खड्डे बनाना (Grooving),
  3. अपघर्षण (Abrasion),
  4. पीसना (Grinding)

प्रश्न 16.
सिरक (Cirque) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
पर्वतीय ढलानों पर अर्धगोले के आकार के खड्डों को हिमकुंड या सिरक कहते हैं।

प्रश्न 17.
टार्न झील (गिरिताल) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसी सिरक में बर्फ के पिघलने के बाद एक झील बन जाती है, जिसे टार्न झील या गिरिताल कहते हैं।

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प्रश्न 18.
पर्वतश्रृंग (Horn) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
किसी पहाड़ी के पीछे के कटाव के कारण नुकीली चोटियाँ बनती हैं, जिन्हें Horn कहते हैं।

प्रश्न 19.
कोल या दर्रा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
किसी-पहाड़ी के दोनों तरफ के सिरक आपस में मिलने से एक दर्रा बनता है, जिसे कोल (Col) या दर्रा (Pass) कहते हैं।

प्रश्न 20.
फियॉर्ड से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
तटों पर डूबी हुई यू-आकार की घाटियों को फियॉर्ड कहते हैं।

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प्रश्न 21.
हिमोढ़ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
हिम नदी अपने भार को एक टीले के रूप में जमा करती है, जिसे हिमोढ़ कहते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
हिम रेखा किसे कहते हैं ? इसकी ऊँचाई किन तत्त्वों पर निर्भर करती है ?
उत्तर-
हिम रेखा (Snow line) स्थायी हिम क्षेत्रों की निचली सीमा को हिम रेखा कहते हैं। इस स्थल पर सबसे कम ऊँचाई होती है, जहाँ सदा हिम जमी रहती है। यह वह ऊंचाई है, जिसके ऊपर हिम पिघल नहीं सकती और सारा साल हिम रहती है। धरती के अलग-अलग भागों में हिम रेखा की ऊँचाई अलग-अलग होती है, जैसे हिमालय पर 5000 मीटर, अल्पस पहाड़ पर 2000 मीटर है। हिमरेखा की ऊँचाई पर कई तत्त्वों का प्रभाव पड़ता है-

  1. अक्षांश (Latitude)—ऊँचे अक्षांशों पर कम तापमान होने के कारण, हिम रेखा की ऊँचाई कम होती है, परंतु निचले अक्षांशों में हिम रेखा की अधिक ऊँचाई मिलती है। ध्रुवों पर हिम रेखा समुद्री तल पर मिलती है। भूमध्य रेखा पर हिम क्षेत्र 5500 मीटर की ऊँचाई पर मिलते हैं।
  2. हिम की मात्रा (Amount of Snow)-अधिक हिम वाले क्षेत्रों में हिम रेखा नीचे होती है, परंतु कम हिम वाले क्षेत्रों में हिमरेखा ऊँची होती है।
  3. पवनें (Winds)—शुष्क हवा के कारण ऊँची और नम हवा के कारण निचली हिम रेखा मिलती है। 4. ढलान (Slope)-तीव्र ढलान पर ऊँची और मध्यम ढलान पर निचली हिम रेखा मिलती है।

प्रश्न 2.
घाटी हिम नदी पर एक नोट लिखें।
उत्तर-
घाटी हिम नदी (Valley Glaciers)—इन्हें पर्वतीय हिम नदी (Mountain Glaciers) भी कहते हैं। ये हिम नदी ऊँचे पहाड़ों की चोटियों से उतर कर घाटियों में बहती है। यह हिम नदी एक चौड़े और गहरे बेसिन (Basin) की रचना करती है। सबसे पहले अल्पस पहाड़ (Alps) में मिलने के कारण इन्हें एल्पाइन (Alpine) हिम नदी भी कहते हैं। हिमालय पहाड़ पर इस प्रकार की कई हिम नदियाँ भी हैं, जैसे गंगोत्री हिम नदी, जोकि 25 कि०मी० लंबी है। भारत में सबसे बड़ी हिमनदी काराकोरम पर्वत में सियाचिन (Siachin) है, जोकि 72 कि०मी० लंबी है। अलास्का में संसार की सबसे बड़ी हिमनदी हुब्बार्ड है, जोकि 128 कि०मी० लंबी है।

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प्रश्न 3.
महाद्वीपीय हिम नदियों का विस्तार बताएँ।
उत्तर-
महाद्वीपीय हिम नदियाँ (Continental) Glaciers)-बड़े क्षेत्रों में फैली हुई हिम नदियों को महाद्वीपीय हिमनदी या हिम चादर (Ice Sheets) कहते हैं। इसी प्रकार की हिम चादरें ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Areas) में मिलती हैं। लगातार हिमपात, कम तापक्रम और कम वाष्पीकरण के कारण हिम पिघलती नहीं है। संसार की सबसे बड़ी हिम चादर अंटार्कटिका (Antarctica) में 130 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 1500 मीटर मोटी है। ग्रीनलैंड (Greenland) में ऐसी ही एक हिमचादर का क्षेत्रफल 17 लाख वर्ग कि०मी० है।

प्रश्न 4.
हिम नदी के अपरदन का कार्य किन कारकों पर निर्भर करता है ?
उत्तर-

  1. हिम की मोटाई (Amount of Ice)-अधिक हिम के कारण अधिक कटाव होता है।
  2. चट्टानों की रचना (Nature of Rocks)-कठोर चट्टानों पर कम और नर्म चट्टानों पर अधिक कटाव होता
  3. हिमनदी की गति (Movement of Glaciers)—तेज़ गति वाली हिम नदियाँ शक्तिशाली होती हैं और अधिक कटाव करती हैं।
  4. भूमि की ढलान (Slope of Land)–धरातल की तेज़ ढलान अधिक अपरदन में सहायक होती है।

प्रश्न 5.
मोरेन (हिमोढ़) कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
निक्षेपण के स्थान के आधार पर मोरेन चार प्रकार के होते हैं-

  1. बगली मोरेन (Lateral Moraines) हिमनदी के किनारों के साथ-साथ बने लंबे और कम चौड़े मोरेन को बगली मोरेन कहते हैं। ये मोरेन एक लंबी श्रेणी (Ridge) के रूप में लगभग 30 मीटर ऊँचे होते हैं।
  2. मध्यवर्ती (सांझे) मोरेन (Medial Moraines)—दो हिम नदियों के संगम के कारण उनके भीतरी किनारे वाले अर्ध-चंद्र के आकार के टीले मिलकर एक हो जाते हैं। इसे मध्यवर्ती या सांझे मोरेन कहते हैं। ये मोरेन नदी के बीच दिखाई देते हैं।
  3. अंतिम मोरेन (Terminal Moraines) हिमनदी के पिघल जाने पर इसके अंतिम किनारे पर बने मोरेन को अंतिम मोरेन कहते हैं। ये मोरेन अर्ध चंद्रमा के आकार जैसे और ऊँचे-नीचे होते हैं।
  4. तल के मोरेन (Ground Moraines)-हिम नदी के तल या आधार पर जमे हुए पदार्थों के ढेर को तल के मोरेन कहते हैं।

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प्रश्न 6.
हिमपात या बर्फबारी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
हिमपात या बर्फबारी (Snowfalls)-उच्च अक्षांशों के प्रदेशों और ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में बादलों से पानी के स्थान पर बर्फ (Snow) गिरती है। इसे हिमपात या बर्फबारी कहते हैं। इसका मूल कारण वहाँ की अति ठंडी जलवायु है। ये प्रदेश सदा बर्फ से ढके रहते हैं।

ध्रुवीय और ऊँचे पर्वत सदा बर्फ से ढके रहते हैं। इन प्रदेशों में सारा साल वर्षा, बर्फबारी (Snowfall) के रूप में होती है। लगातार बर्फ गिरने के कारण यह जमकर ठोस हो जाती है और हिम (Ice) बन जाती है। ऊंचे पहाड़ों पर गर्मी की ऋतु में ही हिमनदी पिघलती है। ऐसे हिम के साथ सदा ढके रहने वाले क्षेत्रों को हिमक्षेत्र (Snow fields) या नेवे (Neves) कहते हैं। संसार के सबसे ऊँचे क्षेत्रों पर हिम-क्षेत्र मिलते हैं। हिमक्षेत्र हिमरेखा से ऊँचे स्थित होते हैं। हिमक्षेत्र ऑस्ट्रेलिया को छोड़कर सभी महाद्वीपों में मिलते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
हिम नदी किसे कहते हैं ? इसका जन्म कैसे होता है ? इसके प्रमुख प्रकार बताएँ।
उत्तर-
हिम नदी (Glacier) –

जब किसी हिमक्षेत्र में हिम बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो यह नीचे को ओर खिसकती है। खिसकते हुए हिमपिंड को हिम नदी कहते हैं। (A Glacier is a large mass of moving ice.) कई विद्वानों ने हिम नदी को ‘बर्फ की नदी’ माना है। (Glaciers are rivers of ice)

हिमनदी के कारण-हिम नदी हिम क्षेत्रों से जन्म लेती है। लगातार हिमपात के कारण हिम खडों का भार बढ़ जाता है। ये हिम समूह निचली ढलान की ओर एक जीभ (Tongue) के रूप में खिसकने लगता है। इसे हिम नदी कहते हैं। हिम नदी के खिसकने के कई कारण हैं

  1. हिम का अधिक भार (Pressure)
  2. ढलान (Slope)
  3. गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravity)

सबसे तेज़ चलने वाली हिम नदियाँ ग्रीनलैंड में मिलती हैं, जो गर्मियों में 18 मीटर प्रति दिन चलती हैं। हिम नदियाँ तेज़ ढलान पर और अधिक ताप वाले प्रदेशों में अधिक गति के साथ चलती हैं। परंतु कम ढलान और ठंडे प्रदेशों में धीरे-धीरे आगे बढ़ती हैं। ये हिमनदियाँ हिम-क्षेत्रों से सरककर मैदानों में आकर पिघल जाती हैं और कई नदियों के पानी का स्रोत बनती हैं, जैसे भारत में गंगा गंगोत्री हिमनदी से जन्म लेती है।

हिम नदी के प्रकार (Types of Glaciers)-स्थिति और आकार की दृष्टि से हिम नदियाँ दो प्रकार की होती हैं-

1. घाटी हिम नदी (Valley Glaciers)—इन्हें पर्वतीय हिमनदी (Mountain Glaciers) भी कहते हैं। यह हिमनदी ऊँचे पहाड़ों की चोटियों से उतर कर घाटियों में बहती है। यह हिम नदी एक चौड़े और गहरे बेसिन (Basin) की रचना करती है। सबसे पहले अल्पस (Alps) पर्वत में मिलने के कारण इन्हें एल्पाइन (Alpine) हिमनदी भी कहते हैं। हिमालय पर्वत पर इस प्रकार की कई हिम नदियाँ भी हैं, जैसे गंगोत्री हिमनदी, जो कि 25 कि०मी० लंबी है। भारत में सबसे बड़ी हिम नदी काराकोरम पर्वत में सियाचिन (Siachin) है, जोकि 72 कि०मी० लंबी है। अलास्का में संसार की सबसे बड़ी हिमनदी हुब्बार्ड है, जोकि 128 कि०मी० लंबी है।

2. महाद्वीपीय हिमनदी (Continental Glaciers)-बड़े क्षेत्रों में फैली हुई हिमनदियों को महाद्वीपीय हिमनदी या हिमचादर (Ice-Sheets) कहते हैं। इसी प्रकार की हिम-चादरें ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Areas) में मिलती है। लगातार हिमपात, निम्न तापमान और कम वाष्पीकरण के कारण हिम पिघलती नहीं है। संसार की सबसे बड़ी हिम-चादर अंटार्कटिका (Antarctica) में 130 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 1500 मीटर मोटी है। ग्रीनलैंड (Greenland) में ऐसी ही एक हिम-चादर का क्षेत्रफल 17 लाख वर्ग कि०मी० है। आज से लगभग 25 हज़ार वर्ष पहले हिम युग (Ice age) में धरती का 1/3 भाग हिम-चादरों से ढका हुआ था।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(ii) ग्लेशियर के अनावृत्तिकरण कार्य

प्रश्न 2.
हिम नदी जल प्रवाह के निक्षेप से बनने वाले भू-आकारों के बारे में बताएँ।
उत्तर-
हिम नदी जल-प्रवाह के निक्षेप से उत्पन्न भू-आकृतियाँ (Landforms Produced by Glacio-fluvial Deposites)-

जब हिम नदी पिघलती है, तो उसके अगले भाग से पानी की अनेक धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। ये धाराएँ अपने बारीक पदार्थों-रेत, मिट्टी आदि को बहाकर ले जाती हैं और कुछ दूर जाकर उन्हें एक स्थान पर ढेरी कर देती हैं।
जल प्रवाह का निक्षेप नदी के पिघल जाने के बाद होता है। उससे उत्पन्न भू-आकृतियाँ नीचे लिखी हैं- .

1. एस्कर या हिमोढ़ी टीला (Eskar)-Snout की बारीक सामग्री को जल धाराएँ बहाकर ले जाती हैं और भारी पत्थर, कंकर आदि का ढेर साँप के समान बल खाती एक लंबी श्रृंखला के समान बन जाता है। चिकने पत्थर, कंकर आदि की साँप के समान बल खाती श्रृंखला को हिमोढ़ी टीला या एस्कर कहते हैं। एस्कर आइरिश भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 3(ii) ग्लेशियर के अनावृत्तिकरण कार्य 8

2. कंकड़-पहाड़ या केम (Kame)-हिमनदी के अगले भाग से निकली कुछ धाराएँ रेत और छोटे पत्थर, कंकर आदि को टीलों के रूप में ढेरी कर देती हैं। इन्हें कंकड़-पहाड़ भी कहा जाता है।

3. ग्लेशियर नदी मैदान (Outward Plain or Outwash Plain)-हिम नदी द्वारा उत्पन्न जल धाराओं द्वारा निक्षेप की गई सामग्री से एक मैदान का निर्माण हो जाता है। इसे ग्लेशियर नदी मैदान कहते हैं।

4. घाटी मोरेन (Valley Moraines)-हिम नदी के पिघलने पर जल धाराएं अपने साथ तल के अंतिम मोरेन के नुकीले पदार्थो को निचले भागों में पंक्तियों में निक्षेप कर देती हैं। इन निक्षेपों को घाटी मोरेन कहते हैं।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 20 राज्य-सरकार

Punjab State Board PSEB 7th Class Social Science Book Solutions Civics Chapter 20 राज्य-सरकार Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Social Science Civics Chapter 20 राज्य-सरकार

SST Guide for Class 7 PSEB राज्य-सरकार Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दो

प्रश्न 1.
भारत के उन पांच राज्यों के नाम बताओ जहां दो-सदनीय विधानपालिका है।
उत्तर-
बिहार, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र।
नोट-इन राज्यों के अतिरिक्त कुछ अन्य राज्यों में भी दो सदनीय विधानपालिका है।

प्रश्न 2.
विधायक चुने जाने के लिए कौन-सी दो योग्यताएं आवश्यक हैं ?
उत्तर-
विधायक चुने जाने के लिए एक व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिएं –

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 25 वर्ष से कम न हो।

प्रश्न 3.
राज्यपाल चुने जाने के लिए कौन-सी योग्यताएं आवश्यक हैं ?
उत्तर-
किसी भी राज्य का राज्यपाल बनने के लिए आवश्यक है कि वह व्यक्ति –

  1. भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 35 वर्ष या इससे अधिक हो।
  3. वह मानसिक एवं शारीरिक रूप से ठीक हो।
  4. वह राज्य या केंद्रीय विधानपालिका का सदस्य या सरकारी अधिकारी न हो।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 20 राज्य-सरकार

प्रश्न 4.
एक सरकारी विभाग का सरकारी मुखिया कौन होता है ?
उत्तर-
एक सरकारी विभाग का सरकारी मुखिया विभागीय सचिव होता है ।

प्रश्न 5.
आपके राज्य के मुख्यमन्त्री एवं राज्यपाल कौन हैं ?
उत्तर-
अपने अध्यापक महोदय से वर्तमान स्थिति की जानकारी प्राप्त करें।

प्रश्न 6.
राज्य का कार्यकारी मुखिया कौन होता है ?
उत्तर-
राज्य का कार्यकारी मुखिया राज्यपाल होता है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 20 राज्य-सरकार

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर 50-60 शब्दों में दो

प्रश्न 1.
राज्य के राज्यपाल के कार्यों के बारे में बताओ।
उत्तर-
केन्द्र में राष्ट्रपति के समान राज्यपाल राज्य का नाम मात्र मुखिया होता है। राज्य के प्रशासन की वास्तविक शक्ति मुख्यमन्त्री एवं मन्त्रिपरिषद् के पास होती है। राज्यपाल की शक्तियां भी राष्ट्रपति के समान ही हैं। परन्तु जब कभी राज्य की मशीनरी ठीक प्रकार से न चलने के कारण राज्य का शासन राष्ट्रपति अपने हाथ में ले लेता है, तो राज्यपाल राज्य का वास्तविक प्रमुख बन जाता है। राज्यपाल की मुख्य शक्तियां नीचे दी गई हैं –
कार्यकारी शक्तियां –

  1. राज्यपाल राज्य का कार्यकारी मुखिया होता है। राज्य का शासन उसी के नाम पर चलाया जाता है।
  2. वह मुख्यमन्त्री और मन्त्रिपरिषद् के अन्य सभी मन्त्रियों की नियुक्ति करता है।
  3. राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय वह राष्ट्रपति को परामर्श देता है।

वैधानिक शक्तियां –

  1. विधानमण्डल द्वारा पास किए गए कानूनों को राज्यपाल की स्वीकृति मिलना आवश्यक है।
  2. यदि विधानमण्डल का अधिवेशन न चल रहा हो और कानून की आवश्यकता पड़ जाये तो राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है।
  3. कोई भी वित्त बिल राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति से ही विधानसभा में पेश किया जा सकता है।
  4. वह राज्य विधानमण्डल की बैठक बुलाता है।
  5. प्रत्येक वर्ष विधानमण्डल का पहला अधिवेशन राज्यपाल के भाषण से ही आरम्भ होता है।
  6. जिन राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं, वहां राज्यपाल कुछ सदस्यों को विधान परिषद् के लिए मनोनीत करता है।
  7. राज्यपाल मुख्यमन्त्री की सलाह पर विधानसभा को निश्चित अवधि से पहले भी भंग कर सकता है।

ऐच्छिक शक्तियां-राज्यपाल को कुछ ऐसी शक्तियां प्राप्त हैं जिनका प्रयोग करते समय वह अपनी बुद्धि या इच्छा का प्रयोग कर सकता है। ये राज्यपाल की ऐच्छिक शक्तियां कहलाती हैं। ये अग्रलिखित हैं –

  1. जब विधानसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो तो राज्यपाल अपनी सूझ-बूझ से किसी को भी मुख्यमन्त्री नियुक्त कर सकता है।
  2. यदि राज्यपाल यह अनुभव करे कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा रहा तो वह इसकी रिपोर्ट राष्ट्रपति को देता है। राज्यपाल की रिपोर्ट पर राष्ट्रपति उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करता है।
  3. राज्यपाल स्थिति के अनुसार विधानसभा को भंग करने का निर्णय कर सकता है। इस सम्बन्ध में उसके लिए मुख्यमन्त्री के परामर्श को मानना आवश्यक नहीं है।
  4. राज्यपाल किसी भी बिल (विधेयक) को पुनः विचार के लिए विधानसभा में वापस भेज सकता है। वह किसी भी बिल को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित भी रख सकता है।

प्रश्न 2.
राज्य के मुख्यमन्त्री के कार्यों तथा शक्तियों का वर्णन करो।\
उत्तर-
मुख्यमन्त्री राज्य का वास्तविक प्रमुख होता है। उसके कार्य एवं शक्तियों का वर्णन इस प्रकार है –

  1. मन्त्रिपरिषद् का निर्माण मुख्यमन्त्री के परामर्श से किया जाता है। वह अपने साथियों की सूची तैयार करता है। राज्यपाल उसी सूची में अंकित सभी व्यक्तियों को मन्त्री नियुक्त करता है।
  2. मुख्यमन्त्री मन्त्रियों में विभागों का बंटवारा करता है। वह उनके विभाग बदल भी सकता है।
  3. मुख्यमन्त्री मन्त्रिपरिषद् को भंग करके नया मन्त्रिपरिषद् बना सकता है।
  4. मुख्यमन्त्री मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
  5. मुख्यमन्त्री राज्यपाल को राज्य विधानसभा भंग करने का परामर्श दे सकता है।
  6. राज्यपाल राज्य में सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर की जाने वाली नियुक्तियां मुख्यमन्त्री के परामर्श से ही करता है।
  7. मुख्यमन्त्री राज्य विधानमण्डल का नेतृत्व करता है।
  8. वह राज्यपाल तथा मन्त्रिपरिषद् के बीच कड़ी का काम करता है।
  9. राज्य विधानपालिका और मन्त्रिपरिषद् का प्रमुख होने के कारण सुख्यमन्त्री राज्य सरकार की ओर से केन्द्रीय सरकार के प्रति उत्तरदायी होता है। वह केन्द्रीय सरकार के साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने का और उन्हें दृढ़ बनाने का प्रयत्न करता है।

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प्रश्न 3.
राज्य विधानसभा/विधानपरिषद के चुनाव सम्बन्धी संक्षेप में लिखो।
उत्तर-
प्रत्येक राज्य की विधानपालिका में एक या दो सदन होते हैं। राज्य विधानपालिका के निचले सदन को विधानसभा और उच्च सदन को विधानपरिषद् कहा जाता है। निचला सदन विधानसभा सभी राज्यों में होता है।

राज्य विधानसभा का चुनाव-राज्य विधानसभा के सदस्यों को एम० एल० ए० कहा जाता है। ये सदस्य सीधे (directly) लोगों द्वारा वयस्क मताधिकार और गुप्त मतदान के माध्यम से चुने जाते हैं। विधानसभा के चुनाव के समय विधानसभा के प्रत्येक चुनावी हलके में से एक-एक सदस्य चुना जाता है। विभिन्न राज्यों में विधानसभाओं के सदस्यों की संख्या कम-से-कम 60 और अधिक-से-अधिक 500 तक हो सकती है।

विधानपरिषद् का चुनाव-विधानपरिषद् के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष (indirect) ढंग से किया जाता है। इसके 5/6 सदस्यों का चुनाव अध्यापकों, स्थानीय संस्थाओं के सदस्यों, विधानसभा के सदस्यों तथा स्नातकों द्वारा किया जाता है। शेष 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किये जाते हैं।

प्रश्न 4.
राज्यपाल की स्वैच्छिक शक्तियां कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर-
राज्यपाल के पास कुछ ऐच्छिक शक्तियां भी होती हैं। इनका प्रयोग वह बिना मन्त्रिपरिषद् की सलाह के अपनी इच्छानुसार कर सकता है। ये शक्तियां हैं –

  1. राज्य विधानसभा में किसी भी दल को बहुमत न प्राप्त होने पर वह अपनी इच्छानुसार मुख्यमन्त्री की नियुक्ति कर सकता है।
  2. राज्य की मशीनरी ठीक न चलने की स्थिति में वह राज्य की कार्यपालिका को भंग करने के लिए राष्ट्रपति को सलाह दे सकता है।

प्रश्न 5.
राज्य के प्रबन्धकीय कार्य कौन-कौन से सिविल अधिकारी चलाते हैं ?
उत्तर-
राज्य में शिक्षा, सिंचाई, परिवहन, स्वास्थ्य तथा सफ़ाई आदि विभाग होते हैं। सरकारी अधिकारी इन अलग-अलग विभागों के काम सम्बन्धित मन्त्रियों के नेतृत्व में चलाते हैं। प्रत्येक विभाग के सरकारी अधिकारी (अफ़सरशाही) को सचिव कहा जाता है। उसे प्रायः भारतीय प्रशासकीय सेवा विभाग से संघीय सेवा आयोग द्वारा नियुक्त किया जाता है। सचिव अपने विभाग की महत्त्वपूर्ण नीतियों और प्रबन्धकीय मामलों में मन्त्री का मुख्य सलाहकार होता है। विभिन्न विभागों के सचिवों के काम की देखभाल के लिए एक मुख्य सचिव होता है।
सचिव के कार्यालय को सचिवालय कहा जाता है।

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प्रश्न 6.
मन्त्रिपरिषद् तथा राज्य विधानपालिका के कार्यकाल के संबंध में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
मन्त्रिपरिषद्-मन्त्रिपरिषद् का कार्यकाल विधानसभा जितना ही अर्थात् 5 वर्ष होता है। कभी-कभी मुख्यमन्त्री द्वारा त्याग-पत्र देने पर या उसकी मृत्यु हो जाने पर सारी मन्त्रिपरिषद् भंग हो जाती है। मन्त्रिपरिषद् को विधानसभा भी अविश्वास का प्रस्ताव पास करके भंग कर सकती है।

राज्य विधानपालिका-विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। परन्तु कई बार राज्यपाल पहले भी इसे भंग कर सकता है। संकटकाल के समय राष्ट्रपति द्वारा इसके कार्यकाल को 6 मास बढ़ाया भी जा सकता है।

विधानपरिषद् का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। प्रत्येक 2 वर्ष के बाद इसके 1/3 सदस्य सेवा-निवृत्त हो जाते हैं और उनके स्थान पर नये सदस्य चुने जाते हैं। परन्तु विधानसभा की भान्ति विधानपरिषद् को भंग नहीं किया जा सकता। यह राज्य-सभा के समान स्थिर है।

प्रश्न 7.
सड़क दुर्घटनाओं के कोई पांच कारण बताओ।
उत्तर-
सड़क दुर्घटनाएं प्रायः सड़कों पर बढ़ती हुई भीड़ तथा वाहन चालकों की लापरवाही से होती हैं। परन्तु इन दुर्घटनाओं के कुछ अन्य कारण भी हैं। सड़क दुर्घटनाओं के पांच मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

1. तेज़ गति से वाहन चलाना-अधिकतर वाहन चालक प्रायः तेज़ गति से वाहन चलाते हैं। यदि सड़क खराब हो, मौसम खराब हो या सड़क पर वाहनों की भीड़ हो तो किसी भी समय दुर्घटना हो सकती है।

2. एकाएक लेन बदलना-नियम के अनुसार सभी वाहन चालकों को अपनी लेन पर ही चलना पड़ता है। परन्तु कुछ वाहन चालक आगे निकलने के प्रयास में एकाएक लेन बदल लेते हैं और संकेत भी नहीं देते हैं। परिणामस्वरूप दुर्घटना हो जाती है।

3. यातायात बत्तियों की ओर ध्यान न देना-कुछ वाहन चालक यातायात बत्तियों की परवाह नहीं करते। वे लाल .. बत्ती हो जाने के भय से अपना वाहन तेजी से आगे निकाल लेते हैं जिससे दुर्घटना हो जाती है।

4. गलत ढंग से आगे निकलना-कई वाहन चालक किसी अन्य वाहन से ग़लत ढंग से आगे निकलने का प्रयास करते हैं जिससे वाहन आपस में टकरा जाते हैं।

5. शराब पीकर गाड़ी चलाना-कुछ वाहन चालक शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं। वे वाहन पर अपना नियंत्रण खो बैठते हैं और दुर्घटना हो जाती है।

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(ग) खाली स्थान भरें

  1. विधानसभा के सदस्यों की अधिक-से-अधिक संख्या ……………. होती है।
  2. विधान परिषद् के सदस्यों की कम-से-कम संख्या …………….. हो सकती है।
  3. पंजाब राज्य के राज्यपाल …………….. हैं।
  4. पंजाब विधानपालिका ………………. है।
  5. वित्तीय बिल राज्य की विधानपालिका के ………….. सदन में प्रस्तुत किया जाता है।
  6. राज्य में किसी भी बिल का कानून बनाने के लिए अन्तिम स्वीकृति ………. द्वारा दी जाती है।
  7. राज्य विधानपालिका के …………… सदन की सभा की अध्यक्षता स्पीकर करता है।
  8. …………… राज्य का संवैधानिक मुखिया है।
  9. मन्त्री परिषद् का कार्यकाल …………….. होता है।
  10. विधान परिषद् के ……………. सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।

उत्तर-

  1. 500
  2. 60
  3. कृपया स्वयं करें
  4. एक सदन वाली
  5. नीचे के
  6. राज्यपाल
  7. नीचे के
  8. राज्यपाल
  9. पाँच वर्ष
  10. 1/6

(घ) निम्नलिखित वाक्यों में ठीक (✓) या गलत (✗) का निशान लगाओ

  1. भारत में एक केन्द्रीय सरकार, 28 राज्य सरकारें तथा 8 केन्द्रीय शासित क्षेत्र हैं।
  2. राज्य विधानपालिका के नीचे के सदन को विधानपरिषद् कहा जाता है।
  3. पंजाब विधानपालिका दो-सदनीय विधानपालिका है।
  4. राज्य की मुख्य कार्यों की वास्तविक शक्ति राज्यपाल के पास होती है।
  5. सम्पत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार है।

संकेत-

1. (✓)
2. (✗)
3. (✗)
4. (✗)
5. (✗)

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(ङ) बहु-वैकल्पिक प्रश्नोत्तर-

प्रश्न 1.
भारत में कितने राज्य हैं ?
(क) 21
(ख) 25
(ग) 29
उत्तर-
(ग) 29

प्रश्न 2.
पंजाब विधानसभा के सदस्यों की कुल गिनती बताइये।
(क) 117
(ख) 60
(ग) 105
उत्तर-
(क) 117

प्रश्न 3.
मुख्यमंत्री की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है?
(क) राष्ट्रपति द्वारा
(ख) राज्यपाल द्वारा
(ग) स्पीकर द्वारा।
उत्तर-
(ख) राज्यपाल द्वारा।

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PSEB 7th Class Social Science Guide राज्य-सरकार Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
भारत में कितने राज्य और कितनी राज्य सरकारें हैं ?
उत्तर-
भारत में 29 राज्य तथा 29 राज्य सरकारें हैं।

प्रश्न 2.
केन्द्रीय/राज्य सरकार के कौन-कौन से तीन अंग हैं ?
उत्तर-
विधानपालिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका।

प्रश्न 3.
सरकार के तीन अंगों के मुख्य कार्य क्या हैं ?
उत्तर-

  1. विधानपालिका कानून बनाती है।
  2. कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है।
  3. न्यायपालिका कानूनों का उल्लंघन करने वालों को दंड देती है।

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प्रश्न 4.
केन्द्रीय सूची तथा राज्य सूची में क्या अन्तर है ? साझी सूची क्या है ?
उत्तर-
संविधान के अनुसार-केन्द्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है। देश के सभी महत्त्वपूर्ण विषय केन्द्रीय सूची में तथा राज्य के महत्त्वपूर्ण विषय राज्य सूची में रखे गए हैं। कुछ साझे विषय साझी सूची में दिये गये हैं। राज्य सरकार राज्य-सूची के विषयों पर कानून बनाती है और उन्हें अपने राज्य में लागू करती है। राज्यसूची के मुख्य विषय कृषि, भूमि कर, पुलिस और शिक्षा आदि हैं।

प्रश्न 5.
राज्य में कोई बिल कानून कैसे बनता है ?
उत्तर-
कोई साधारण बिल पास होने के लिए दोनों सदनों में रखा जा सकता है, जबकि बजट (वित्त बिल) केवल विधानसभा में ही रखा जा सकता है। कोई भी बिल दोनों सदनों में पास हो जाने के बाद राज्यपाल की स्वीकृति पर कानून बन जाता है। राज्य विधानपालिका राज्य की आवश्यकताओं के अनुसार राज्य-सूची में दिये गये विषयों पर कानून बनाती है। यह साझी (समवर्ती) सूची पर दिए गए विषयों पर भी कानून बना सकती है।

प्रश्न 6.
राज्य-विधानपालिका की शक्तियों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
राज्य विधानपालिका निम्नलिखित कार्य करती है –

  1. राज्य-सूची में दिये गए विषयों पर कानून बनाना, परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार का कानून इसके विरुद्ध हो तो केन्द्रीय कानून ही लागू होता है।
  2. विधानपालिका के सदस्य विभिन्न विभागों के सदस्यों से प्रश्न पूछ सकते हैं जिन का उत्तर मन्त्रिपरिषद् को देना पड़ता है।
  3. इसके सदस्य सरकार के विरुद्ध अविश्वास का मत भी पास कर सकते हैं।

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प्रश्न 7.
विधानसभा के स्पीकर के क्या कार्य होते हैं ?
उत्तर-विधानसभा का स्पीकर सदन की बैठकों की प्रधानता करता है।

  1. वह बिल प्रस्तुत करने की स्वीकृति देता है।
  2. वह सदन में अनुशासन बनाए रखता है और मन्त्रियों को बोलने की आज्ञा देता है।

प्रश्न 8.
राज्यपाल की नियुक्ति किसके द्वारा और कितने समय के लिए होती है ?
उत्तर-
राज्यपाल की नियुक्ति प्रधानमन्त्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। परन्तु वह राष्ट्रपति की इच्छा पर ही अपने पद पर बना रह सकता है। राष्ट्रपति राज्यपाल को उसके कार्यकाल में किसी दूसरे राज्य में भी बदल सकता है।

प्रश्न 9.
मुख्यमन्त्री तथा उसकी मन्त्रिपरिषद की नियुक्ति कैसे होती है ?
उत्तर-
विधानसभा के चुनाव के बाद बहुमत प्राप्त दल के नेता को राज्य का राज्यपाल मुख्यमन्त्री नियुक्त करता है। फिर उसकी सहायता से राज्यपाल शेष मन्त्रियों की सूची तैयार करता है, जिन्हें वह मन्त्री नियुक्ति देता है। कई बार चुनाव में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता, तब एक से अधिक दलों के सदस्य आपस में मिलकर अपना नेता चुनते हैं जिसे मुख्यमन्त्री बनाया जाता है। ऐसी स्थिति में मन्त्रिपरिषद् कई दलों के सहयोग से बनता है। इस प्रकार की सरकार को मिली-जुली सरकार कहा जाता है। मन्त्रिपरिषद् में कई बार ऐसा भी मन्त्री चुना जाता है जो विधानपालिका का सदस्य नहीं होता, उसे 6 मास के भीतर विधानपालिका के किसी सदन का सदस्य बनना पड़ता है।

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प्रश्न 10.
राज्य की मन्त्रिपरिषद् की बनावट तथा कार्य प्रणाली सम्बन्धी एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
बनावट-राज्य की मन्त्रिपरिषद् में तीन प्रकार के मन्त्री होते हैं –

  1. कैबिनेट मन्त्री,
  2. राज्य-मन्त्री,
  3. उप-मन्त्री

इनमें से कैबिनेट मन्त्री कैबिनेट के सदस्य होते हैं, जिन के समूह को मन्त्रिमण्डल कहा जाता है। कैबिनेट मन्त्रियों के पास अलग-अलग विभाग होते हैं। राज्य मन्त्री एवं उप-मन्त्री कैबिनेट मन्त्रियों की सहायता करते हैं।

कार्य प्रणाली-राज्य मंत्रिपरिषद् एक टीम के रूप में काम करती है। कहा जाता है कि परिषद् के सभी मन्त्री एक साथ डूबते हैं और एक साथ तैरते हैं, इसका कारण यह है कि किसी एक मन्त्री के विरुद्ध अविश्वास मत पास होने पर पूरी मन्त्रि परिषद् को त्याग-पत्र देना पड़ता है। वे अपनी नीतियों के लिए सामूहिक रूप से विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यदि मुख्यमन्त्री त्याग-पत्र देता है तो उसे पूरी मन्त्रिपरिषद् का त्याग-पत्र माना जाता है।

सही जोड़े बनाइर:

  1. विधानसभा – राज्य विधानपालिका का ऊपरी सदन
  2. विधान परिषद् – राज्य सरकार का वास्तविक प्रधान
  3. राज्यपाल – राज्य विधानपालिका का निचला सदन
  4. मुख्यमन्त्री – राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति

उत्तर-

  1. विधानसभा – राज्य विधानपालिका का निचला सदन
  2. विधान परिषद् – राज्य विधानपालिका का ऊपरी सदन
  3. राज्यपाल – राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति
  4. मुख्यमन्त्री – राज्य सरकार का वास्तविक प्रधान

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules.

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

खेल सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण जानकारी

  1. ऐथलैटिक्स प्रतियोगिताओं में कोई भी खिलाड़ी नशीली चीज़ों या दवाइयों का प्रयोग करके भाग नहीं ले सकता।
  2. जो खिलाड़ी अन्य खिलाड़ियों के लिए किसी प्रकार की बाधा प्रस्तुत करे, उसे अयोग्य घोषित किया जाता है। जो खिलाड़ी दौड़ते हुए अपनी इच्छा से ट्रैक को छोड़ता है, वह पुनः दौड़ जारी नहीं कर सकता।
  3. फील्ड इवेंट्स में दो तरह के इवेंट्स आते हैं-जम्पिंग इवेंट्स और थ्रो इवेंटस। ट्रैक इवेंट्स में वह दौड़ आती हैं जो ट्रैक में दौड़ी जाती हैं।
  4. 200 मीटर ट्रैक की लम्बाई 40 मीटर तथा चौड़ाई 38.18 मीटर होती है, 400 मीटर ट्रैक की लम्बाई 77 मीटर तथा चौड़ाई 67 मीटर होती है।
  5. जैवलिन थ्रो का भार 805 से 825 ग्राम होता है और लड़कियों के लिए चौड़ाई 605 से 620 ग्राम तक होता है। डिसक्स का भार लड़कों के लिए 2 कि० ग्राम होता है। गोला, हैमर या डिसक्स थ्रो के समय यह आवश्यक है कि 40° के सैक्टर में लैंड करे। गोला फेंकने का भार 7 किलोग्राम निश्चित किया गया है।

प्रश्न 1.
ऐथलैटिक्स प्रतियोगिता करवाने के लिए कौन-कौन से अधिकारियों की आवश्यकता होती है ?
उत्तर-
ऐथलैटिक्स प्रतियोगिता करवाने के लिए आगे लिखे अधिकारियों की आवश्यकता होती है—

ऐथलैटिक्स के लिए अधिकारी
(Officials for the meet)

  1. रैफ़री ट्रैक के लिए (Referee for Track Events)
  2. रैफ़री फील्ड इवेंट्स के लिए (Referee for Field Events)
  3. रैफ़री वाकिंग इवेंट्स (Referee for Walking Events)
  4. जज ट्रैक इवेंट्स (Judge for Track Events)
  5. जज फील्ड इवेंट्स (Judge for Field Events)
  6. जज वाकिंग इवेंट्स (Judge for Walking Events)
  7. अम्पायर (Umpire)
  8. टाइम कीपर (Time Keeper)
  9. स्टार्टर (Starter)
  10. सहायक स्टाटर (Asst. Starter)
  11. मार्क मैन (Markman)
  12. लैप स्कोरर (Lap Scorer)
  13. रिकॉर्डर (Recorder)
  14. मार्शल (Marshall)

दूसरे अधिकारी
(Additional Officials)

  1. अनाउंसर (Announcer)
  2. आफिशल सर्वेयर (Official Surveyer)
  3. डॉक्टर (Doctor)
  4. सटुअरडज (Stewards)

ट्रैक इवेंट्स पुरुषों के लिए

100 — मीटर रेस
200 — मीटर रेस
400 — मीटर रेस
800 — मीटर रेस
1500 — मीटर रेस
3,000 — मीटर दौड़
5,000 — मीटर दौड़
10,000 — मीटर दौड़
42,195 — मीटर या 26 मील दौड़
3,000 — मीटर स्टीपल चेज़
20,000 — मीटर वाकिंग
30,000 — मीटर वाकिंग
50,000 — मीटर वाकिंग

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

महिलाओं के लिए ट्रैक इवेंट्स

100 — मीटर रेस
200 — मीटर रेस
400 — मीटर रेस
800 — मीटर रेस
1500 — मीटर रेस

हरडल दौड़ें पुरुषों के लिए

110 — मीटर हर्डल दौड
200 — मीटर हर्डल दौड़
400 — मीटर हर्डल दौड़

महिलाओं के लिए हरडल दौड़

100 — मीटर हर्डल दौड़
200 — मीटर हर्डल दौड़

रीले दौड़ें पुरुषों के लिए

4 × 100 — मीटर
4 × 200 — मीटर
4 × 400 — मीटर
4 × 800 — मीटर
4 × 1500 — मीटर

महिलाओं के लिए रिले दौड़

4 × 100 — मीटर
4 × 200 — मीटर
4 × 400 — मीटर

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

मैडल रिले रेस

800 × 200 × 200 × 400
6. 110 मीटर हर्डल्ज़ लड़कों के लिए हर्डलों की ऊंचाई 1.06 मीटर होती है। जूनियर लड़कियों के लिए 1.00 मीटर हर्डल्ज़ की ऊंचाई, 0.76, मीटर और सीनियर लड़कियों के लिए 0.89 मीटर होती है।

प्रश्न 2.
ट्रैक इवेंट्स के लिए एथलीटों के लिए निर्धारित नियमों के बारे लिखें।
ऐथलैटिक्स
(Athletics)
ऐथलैटिक्स ऐसी खेलें हैं जिनमें दौड़ना (Running), कूदना (Jumping) और फेंकना (Throwing) आदि इवेंट्स (Events) सम्मिलित होते हैं। एथलीट ऐसा धावक है जो दौडने वाले, कदने वाले और फेंकने वाले इवेंट्स में भाग ले। (An athlete is one who takes part in running events, jumping events and throwing etc. or one who takes part in tracks and field events.)

प्रश्न 3.
ट्रैक इवेंट्स में कितने इवेंट्स होते हैं ?
उत्तर-
ऐथलैटिक्स दो प्रकार की होती है-Track Events और Field Events | भाव कुछ एथलीट Track Events में भाग लेते हैं और कुछ Field Events में। . ट्रैक इवेंट्स में छोटी दौड़ें (Sprint or Short Distance Races), मध्य दूरी वाली दौड़ें (Middle Distance Races) और लम्बी दौड़ें (Long Distance Races) आती हैं। फील्ड इवेंट्स में कूदने वाली इवेंट्स जैसे लम्बी छलांग (Long Jump), ऊंची छलांग (High Jump), पोल वाल्ट जम्प (Pole Vault Jump) और ट्रिपल्ल जम्प (Triple Jump) और फेंकने वाले इवेंट्स जैसे गोला फेंकना (Short put or Putting the Shot), पाथी फेंकना (Discuss Throw), भाला फेंकना (Javelin Throw) और हैमर फैंकना (Hammer Throw) आदि सम्मिलित हैं।

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

ट्रैक
(TRACK)

ट्रैक दो प्रकार के होते हैं- एक 400 मीटर वाला ट्रैक और दूसरा 200 मीटर का ट्रैक। Standard ट्रैक का नाम 400 मीटर वाले ट्रैक को ही दिया जा सकता है। इस ट्रैक में कमसे-कम 6 लेन (Lanes) और अधिक-से-अधिक 8 लेन (Lanes) होती हैं।
Track Events Races : Short Middle and Long
SPRINTING
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
स्प्रिंटिंग (Sprinting)–स्प्रिंट वह रेस होती है जो प्रायः पूरी शक्ति और पूरी गति से दौड़ी जाती है। इसमें 100 मीटर और 200 मीटर की दौड़ें आती हैं। आजकल तो 400 मीटर रेस को भी इसमें गिना जाने लगा है। इस प्रकार की दौड़ों में प्रतिक्रिया (Reaction), टाइम और गति (Speed) का बहुत महत्त्व है।

  1. स्टार्ट्स (Starts) कम दूरी की दौड़ों में प्रायः निम्नलिखित प्रकार के तीन स्टार्ट लिये जाते हैं
  2. बंच स्टार्ट (Bunch Start)
  3. मीडियम स्टार्ट (Medium Start)
  4. इलोंगेटेड स्टार्ट (Elongated Start)

बंच स्टार्ट (Bunch Start)-इस प्रकार के स्टार्ट के लिए ब्लाकों के बीच दूरी 8 इंच से 10 इंच के बीच होनी चाहिए और आगे वाला स्टार्ट स्टार्टिंग लाइन से लगभग 19 इंच के करीब होना चाहिए। एथलीट इस प्रकार ब्लाक में आगे को झुकता है कि पिछले पांव की टो और अगले पांव की एड़ी एक-दूसरे के समान स्थित हों। हाथ स्टार्टिंग लाइन पर ब्रिज बनाए हुए हों और स्टार्टिंग लाइन से पीछे हों। इस प्रकार के स्टार्ट में जब Set Position का आदेश होता है, Hips को ऊंचा ले जाया जाता है। यह स्टार्ट सबसे अधिक अस्थिर होता है।

मीडियम स्टार्ट (Medium Start)-इस प्रकार के स्टार्ट में ब्लाकों के बीच की दूरी 10 से 13 इंच के बीच होती है और स्टार्टिंग लाइन से पहले ब्लाक की दूरी लगभग 15 इंच के बीच होती है। प्रायः एथलीट इस प्रकार के स्टार्ट का प्रयोग करते हैं। इसमें पिछले पांव का घुटना और अगले पांव का बीच वाला भाग एक सीध में होते हैं और Set Position पर Hips तथा कंधे लगभग एक-सी ऊंचाई पर ही होते हैं।

इलोंगेटेड स्टार्ट (Elongated Start)-इस प्रकार का स्टार्ट बहुत कम लोग लेते हैं। इसमें ब्लाकों (Starting Block) के बीच की दूरी 25 से 28 इंच के बीच होती है। पिछले पांव का घुटना लगभग अगले पांव की एड़ी के सामने होता है।
स्टार्ट लेना (Start)-जब किसी भी रेस के लिए स्टार्ट लिया जाता है तो तीन प्रकार के आदेशों पर कार्य करना पड़ता है।

  1. आन यूअर मार्क (On Your Mark)
  2. सैट पोजीशन (Set Position)
  3. पिस्तौल की आवाज़ पर जाना (Go)

दौड़ का अन्त (Finish of the Race)-दौड़ का अन्त बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। आमतौर पर खिलाड़ी तीन प्रकार से दौड़ को समाप्त करते हैं। ये इस प्रकार हैं—

  1. दौड़ कर सीधा आगे निकल जाना (Run Through)
  2. आगे को झुकना (Lunge)
  3. कन्धा आगे करना (The shoulders String)

मध्यम दरी की दौड़ें (Middle Distance Races)-ट्रैक इवेंटों में कुछ दौड़ें मध्यम दूरी की होती हैं। आमतौर पर उन दौड़ों को, जो 400 गज़ के ऊपर और 1000 गज़ से नीचे की होती हैं, इस श्रेणी में गिना जाता है। ये दौड़ें 400 मीटर और 800 मीटर की होती हैं। इन दौड़ों में गति और सहनशीलता दोनों की आवश्यकता होती है, और वही एथलीट इसमें सफल होता है जिसके पास ये दोनों चीजें हों। इस प्रकार की दौड़ों में आमतौर पर एक-जैसी गति बनाए रखी जाती है और अन्त में पूरा जोर लगा कर दौड़ को जीता जाता है। 400 मीटर का स्टार्ट तो स्प्रिंग की तरह ही लिया जाता है जबकि 800 मीटर का स्टार्ट केवल खड़े होकर ही लिया जा सकता है। जहां तक हो सके इस दौड़ में कदम (Strides) बड़े होने चाहिएं।

लम्बी दूरी की दौड़ें (Long Distance Races)-लम्बी दूरी की दौड़ों जैसे कि नाम से ही मालूम होता है, दूरी बहुत अधिक होती है और प्रायः ये दौड़ें एक मील से ऊपर की होती हैं। 1500 मीटर, 3000 मीटर और 5000 मीटर दूरी वाली दौड़ें लम्बी दूरी वाली रेसें हैं। इनमें एथलीट की सहनशीलता (Endurance) का अधिक योगदान है। लम्बी दूरी की दौड़ों में एथलीट को अपनी शक्ति और सामर्थ्य का प्रयोग एक योजनाबद्ध ढंग से करना होता है और जो एथलीट इस कला को प्राप्त कर जाते हैं वे लम्बी दूरी की दौड़ों में सफल हो जाते हैं।

इस प्रकार की दौड़ों में दौड़ के आरम्भ को छोड़ कर सारी दौड़ में एथलीट का शरीर सीधा और आगे की और कुछ झुका रहता है तथा सिर सीधा रखते हुए ध्यान ट्रैक की ओर रखा जाता है। बाजू ढीली सी आगे की ओर लटकी होती है जबकि कोहनियों के पास से बाजू मुड़े होते हैं और हाथ बिना किसी तनाव के थोड़े से बन्द होते हैं। बाजू और टांगों के एक्शन जहां तक हो सके बिना किसी अधिक शक्ति व प्रयत्न के होने चाहिएं। दौड़ते समय पांव का आगे वाला भाग धरती पर आना चाहिए और एड़ी भी मैदान को छूती है, परन्तु अधिक पुश (Push) टो से ही ली जाती है। इस प्रकार की दौड़ों में कदम (Strides) छोटे और अपने आप बिना अधिक बढ़ाए होने चाहिएं। सारी दौड़ में शरीर बहुत Relaxed होना चाहिए।

इस प्रकार की दौड़ को समाप्त करते समय शरीर में इतना बल (Stamina) और गति होनी चाहिए कि एथलीट अपनी रेस को लगभग फिनिश लाइन से पांच-सात गज़ आगे तक समाप्त करने का इरादा रखे तो ही अच्छे परिणामों की आशा की जा सकती है।
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ट्रैक इवेंट्स
(TRACK EVENTS)
ट्रैक इवेंट्स में 100, 200, 400 तथा 800 मीटर तक की दौड़ आती है।

प्रश्न 4.
200 मीटर और 400 मीटर के ट्रैक की चित्र के साथ बनावट लिखें।
उत्तर-
200 मीटर के ट्रैक की बनावट
(Track for 200 Metre)
200 मीटर के ट्रैक की लम्बाई 94 मीटर तथा चौड़ाई 53 मीटर होती है। इसकी बनावट का विवरण नीचे दिया गया है—
ट्रैक की कुल दूरी = 200 मीटर
दिशाओं की लम्बाई = 40 मीटर
दिशाओं द्वारा रोकी गई दूरी = 40 × 2 = 80 मीटर
कोनों में रोकी जाने वाली दूरी = 120 मीटर
व्यास 120 मीटर ÷ 2r = 19.09 मीटर
दौड़ने वाली दूरी का व्यास = 19.09 मीटर
प्रतिफल मार्किंग व्यास. = 18.79 मीटर
1.22 मीटर (4 फुट) चौड़ी लाइनों के लिए स्टैगर्ज
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लेन मीटर
पहली 0.00
दूसरी 3.52
तीसरी 7.35
चौथी 11.19
पांचवीं 15.02
छठी 18.86
सातवीं 26.52
आठवीं 26.52

 

400 मीटर ट्रैक की बनावट
कम-से-कम माप = 170.40 × 90.40 मीटर
ट्रैक की कुल दूरी = 600 मीटर
सीधी लम्बाई = 80 मीटर
दोनों दिशाओं की दूरी = 80 × 2 = 160 मीटर
वक्रों (Curves) की दूरी = 240 मीटर
व्यास 240 मीटर ÷ 2r = 38.18 मीटर
छोड़ने वाली दूरी का अर्द्धव्यास = 38.18 मीटर
मार्किंग अर्द्धव्यास = 37.88 मीटर
(i) 400 मीटर लेन [चौड़ाई 1.22 (4 फुट)] के लिए स्टैगर्ज

लेन मीटर
पहली 0.00
दूसरी 7.04
तीसरी 14.71
चौथी 22.38
पांचवीं 30.05
छठी 37.72
सातवीं 45.39
आठवीं 53.06

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प्रश्न 5.
हर्डल दौड़ों के विषय में आप संक्षेप में लिखें।
उत्तर-
100 मीटर बाधा महिला दौड़
(100 Metre Women Hurdle)
100 मी० बाधा दौड़ 1968 से प्रारम्भ की गई है। सामान्यत: महिला धाविका 13 मीटर दूर स्थित प्रथम बाधा तक की दूरी 8 डगों में पूरी कर लेती है। उछाल 1.95 मीटर से लेकर बाधा को पार कर 11 मीटर की दूरी पर उनके ये डग पूरे होते हैं। बाधा के बीच तीन डग पूरे करने पर पुन: उछाल 200 मी० की दूरी से लिया जाता है। इस प्रकार वे 8.50 मी० की दूरी तय करती है।
बाधा पार करते समय महिला धाविकाओं को अपने शरीर के ऊपरी भाग को आगे की ओर अधिक नहीं झुकाना चाहिए और न ही उछाल के समय अपने घुटने को अधिक ऊंचा उठाना चाहिए। बाधा को पार करने की विधि वही अपनानी चाहिए जो 400 मी० हर्डल में अपनायी जाती है।

भिन्न-भिन्न प्रतियोगिता के लिए हर्डल की गिनती, ऊंचाई और दूरी निम्नलिखित हैं—
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110 मीटर बाधा दौड़
(110 Metre Hurdle Race)
सामान्यत: बाधा दौड़ के धावक (Runner) पहली बाधा तक पहुंचने में 8 कदम लेते हैं। प्रारम्भ स्थल (Starting Block) पर बैठते समय अधिक शक्ति वाले पैर (Take off Foot) को आगे रखा जाता है। धावक यदि लम्बा है और अधिक तेज़ दौड़ सकने की क्षमता रखता है तो उस स्थिति में यह दूरी उसके लिए कम पड़ सकती है। उस दशा में थोड़ा अन्तर होने पर प्रारम्भ स्थल की दूरी के बीच की दूरी कम करके तालमेल बैठाने का प्रयास होना चाहिए, किन्तु ऐसा करने पर यदि धावक असुविधा अनुभव करता है तो बाधा को मात्र कदमों में ही पार कर लेना चाहिए। ऐसी स्थिति में शक्तिशाली पैर पीछे के प्रशल (Block) पर रख कर धावक दौड़ेगा। अतः शक्तिशाली पैर बाधा से लगभग 2 मीटर पाछे आयेगा। आरम्भ में धावक को उसे 5 कदम तक अपनी दृष्टि नीचे रखनी चाहिए और बाद में हर्डिल पर ही दृष्टि केन्द्रित होनी चाहिए। आरम्भ से अन्त तक कदमों के बीच का अन्तर निरन्तर बढ़ता ही जायेगा। किन्तु अन्तिम कदम उछाल कदम से लगभग 6 इंच (10 सैं० मी०) छोटा ही रहेगा।
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सामान्य दौड़ों की तुलना में बाधा दौड़ में दौड़ते समय धावक के घुटने अपेक्षाकृत अधिक ऊपर आयेंगे और ज़मीन पर पूरा पैर न रख कर केवल पैर के
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बाधा को पार करते समय उछाल पैर को सीधा रखना चाहिए तथा आगे के पैर को घुटने से ऊपर उठाना चाहिए। पैर का पंजा ज़मीन की ओर नीचे की ओर झुका हुआ रखना चाहिए, आगे के पैर को एक साथ सीधा करते हुए बाधा के ऊपर से लाना चाहिए, और शरीर का ऊपर का भाग आगे की ओर झुका हुआ रखना चाहिए। हर्डिल को पार करते ही अगले पैर की जांघ को नीचे दबाते रहना चाहिए कि जिस से बाधा पार हो जाने के बाद पंजा बाधा से अधिक दूरी पर न पड़ कर उसके पास ही ज़मीन पर पड़े। इसके साथ ही पीछे के पैर को घुटने से झुका कर बाधा के ऊपर से ज़मीन के समानान्तर रख कर घुटने को सीने के पास से आगे लाना चाहिए। इस प्रकार पैर आगे आते ही धावक तेज़ दौड़ने के लिए तत्पर रहेगा।

बाधा पार करने के उपरान्त पहला डग (कदम) 1.55 से 1.60 मीटर की दूरी पर, दूसरा 2.10 मीटर का तथा तीसरा लगभग 2.20 मीटर के अन्तर पर पड़ना चाहिए। (13.72 मी०, 9.14 मी०, 14.20 मी०)
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400 मीटर बाधा (पुरुष तथा महिला)
(400 Metres Hurdles Men and Women)
सामान्यतः धावक को इस दौड़ में सर्वाधिक असुविधा अपने डगों के बीच तालमेल बैठाने में होती है। प्रारम्भ में प्रथम बाधा के बीच की दूरी को लोग सामान्यत: 21 से 23 डगों में पूरा कर लेते हैं और बाधा के बीच में 13-15 अथवा 17 डग रखते हैं। कुछ धावक प्रारम्भ में 14 और बाद में 16 कदमों में इस दूरी को पूरा कर लेते हैं। दाहिने पैर से उछाल लेने से लाभ होने की अधिक सम्भावना होती है। सामान्यतः उछाल 2.00 मीटर से लिया जाता है और पहला डग बाधा को पार कर जो ज़मीन पर पड़ता है, वह 1.20 मीटर का होता है। इसकी तकनीक 110 व 100 मीटर बाधाओं की ही भान्ति होती है। 400 मीटर दौड़ के समय से (सैकण्ड) 2-5 से 3-5 से 400 मीटर बाधा का समय अधिक आता है। 200 मीटर तथा प्रथम (220-2-5 से) = 25-5 से हर्डिल का समय।
200 मीटर दूसरा भाग (24-5-3-0 से) = 27-5 से = 52-00 में 400 मीटर हिर्डिल का समय।
अभ्यास के समय प्रत्येक हर्डिल पर समय लेकर पूरी दौड़ का समय निकालने की विधि।

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प्रश्न 6.
फील्ड इवेंट्स में कौन-कौन से इवेंट्स होते हैं ? संक्षेप में लिखें।
उत्तर-
लम्बी कूद
(Long Jump)

  1. रनवे की लम्बाई = 40 मीटर से 45 मीटर
  2. रनवे की चौड़ाई = 1.22 मीटर
  3. पिट की लम्बाई = 10 मीटर
  4. पिट की चौड़ाई = 2.75 से 3 मीटर
  5. टेक ऑफ बोर्ड की लम्बाई = 1.22 मीटर
  6. टेक ऑफ बोर्ड की चौड़ाई = 20 सैंटी मीटर
  7. टेक ऑफ बोर्ड की गहराई = 10 सैंटी मीटर।

लम्बी कूद की विधि
(Method of Long Jump)

  1. कूदने वाले पैर को मालूम करने के लिए लम्बी कूद में उसी प्रकार से करेंगे जैसे ऊंची कूद में किया गया था।
    सर्वप्रथम कूदने वाले पैर को आगे सीधा रखेंगे और स्वतन्त्र पैर को इसके पीछे। यदि आप का कूदने वाला पैर बायां है तो बाएं पैर को आगे और दायें पैर को पीछे रख कर दायें घुटने से झुका कर ऊपर की ओर ले जायेंगे। और इसके साथ ही दायें हाथ को कुहनी से झुका कर रखेंगे। विधि उसी प्रकार से होगी जैसे कि तेज़ दौड़ने वाले करते हैं।
    इस क्रिया को पहले खड़े होकर और बाद में चार-पांच कदम चल कर करेंगे। जब यह क्रिया ठीक प्रकार से होने लगे तब थोड़ा दौड़ते हुए यही क्रिया करनी चाहिए। इस समय ऊपर जाते समय ज़मीन को छोड़ देना चाहिए।
    Long Jump
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  2. छ: या सात कदम दौड़ कर आगे आयेंगे और ऊपर जा कर कूदने वाले पैर पर ही नीचे जमीन पर आयेंगे। इसमें शरीर का भाग सीधा रहेगा जैसे कि ऊंची कूद में रहता है। अगले स्वतन्त्र पैर ज़मीन पर आयेंगे। इस क्रिया को कई बार दुहराने के बाद ज़मीन पर आते समय कूदने वाले पैर को भी स्वतन्त्र पैर के साथ ही ज़मीन पर ले आएंगे।
  3. ऊपर की क्रिया को कई बार करने के पश्चात् एक रूमाल लकड़ी में बांध कर कूदने वाले स्थान से थोड़ी ऊंचाई पर लगाएंगे और कूदने वाले बालकों को रूमाल को छूने को कहेंगे। ऐसा करने से एथलीट (Athlete) ऊपर जाना तथा शरीर के ऊपरी भाग को सीधा रखना सीख जाएगा।

अखाड़े में गिरने की विधि (लैंडिंग)
(Method of Landing)

  1. दोनों पैरों को एक साथ करके एथलीट पिट (Pit) के किनारे पर खड़े हो जाएंगे। भुजाओं को आगे-पीछे की ओर हिलाएंगे और (Swing) करेंगे। साथ में घुटने भी झुकाएंगे
    और भुजाओं को एक साथ पीछे ले जाएंगे। इसके पश्चात् घुटने को थोड़ा अधिक झुका कर भुजाओं को तेजी के साथ आगे और ऊपर की ओर ले जाएंगे और दोनों पैरों के साथ अखाड़े (Pit) में जम्प करेंगे। इस समय इस बात का ध्यान रहे कि पैर गिरते समय जहां तक सम्भव हो, सीधे रखने चाहिएं और इसके साथ ही पुट्ठों को आगे धकेलना चाहिए जिससे कि शरीर में पीछे झुकाव (Arc) बन सके जो कि हैंग स्टाइल (Hang Style) के लिए बहुत ही आवश्यक है।
  2. एथलीट्स (Athietes) को सात कदम कूदने को कहेंगे। कूदते समय स्वतन्त्र पैर के घुटने को हिप (Hip) के बराबर लाएंगे। जैसे ही एथलीट (Athlete) हवा में थोड़ी ऊंचाई लेगा, स्वतन्त्र पैर को पीछे की ओर तथा नीचे की ओर लाएंगे जिससे वह कूदने वाले पैर के साथ मिल सके। कूदने वाला पैर घुटने से जुड़ा होगा और शरीर का ऊपरी भाग सीधा होगा। दोनों भुजाओं को पीछे की और तथा ऊपर की ओर गोलाई में ले जाएंगे। जब खिलाड़ी हवा में ऊंचाई लेता है, उस समय उसके दोनों घुटनों से झुके हुए पैर जांघ की सीध में होंगे। दोनों भुजाएं सिर की बगल में ओर ऊपर की ओर होंगी। शरीर पीछे की ओर गिरती हुई दशा में होगा तथा जैसे ही एथलीट्स (Athletes) अखाड़े (Pit) में गिरने को होंगे, वे स्वतन्त्र पैर घुटने से झुका कर आगे को तथा ऊपर को ले जाएंगे, पेट के नीचे की ओर लाएंगे तथा पैरों को सीधा करके ऊपर की दशा में हवा में रोकने का प्रयास करेंगे।
    ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 10

हिच किक की विधि
(Method of Hitch Kick)

  1. जम्प करने के पश्चात् Split हवा में, पैरों को आगे-पीछे करके, स्वतन्त्र पैर पर लैंडिंग (Landing) करना, परन्तु ऊपरी भाग तथा सिर सीधा रहेगा, पीछे की ओर नहीं आएगा।
  2. इस बार हवा में स्वतन्त्र पैर को रखेंगे और कूदने वाले पैर को आगे ले जाकर लैंडिंग (Landing) करेंगे।
  3. अन्य सभी विधियां उसी प्रकार से होंगी जैसे कि ऊपर बताया गया है। केवल स्वतन्त्र पैर को लैंडिंग (Landing) करते समय टेक ऑफ पैर के साथ ले जाएंगे और दोनों पैरों पर एक साथ ज़मीन पर आएंगे। अन्य सभी शेष विधियां उसी प्रकार से होंगी जैसे कि हैंग (Hang) में दर्शाया गया है। एथलीट्स (Athletes) को दौड़ने का पथ (Approach . run) धीरे-धीरे बढ़ाते रहना चाहिए।
  4. ऊपर की क्रिया को कई बार करने के पश्चात् इस क्रिया को स्प्रिंग बोर्ड (Spring Board) की सहायता से करना चाहिए जैसा कि जिमनास्टिक (Gymnastic) वाले करते हैं। स्प्रिंग बोर्ड (Spring-Board) के अभाव में इस क्रिया को किसी अन्य ऊंचे स्थान से भी किया जा सकता है जिससे एथलीट्स को हवा में सही क्रिया विधि करने का अभ्यास हो जाए।

ट्रिपल जम्प
(Triple Jump)
अप्रोच रन (Approach Run)-लम्बी कूद की भान्ति इसमें भी अप्रोच रन लिया जाएगा, परन्तु स्पीड (Speed) न अधिक तेज़ और न अधिक धीमी होगी।
अप्रोच रन की लम्बाई (Length of Approach Run)-ट्रिपल जम्प में 18 से 22 कदम या 40 से 45 मीटर के लगभग अप्रोच रन लिया जाता है। यह कूदने वाले पर निर्भर करता है कि उसके दौड़ने की गति कैसी है। धीमी गति वाला लम्बा अप्रोच लेगा जबकि अधिक गति वाला छोटा अप्रोच लेगा। दोनों पैरों को एक साथ रखकर दौड़ना प्रारम्भ करेंगे तथा दौड़ने की गति को सामान्य रखेंगे। शरीर का ऊपरी भाग सीधा रहेगा।

  1. रनवे की लम्बाई । = 40 मी० से 45 मीटर
  2. रनवे की चौड़ाई = 1.22 मीटर
  3. पिट की लम्बाई = टेक आफ बोर्ड से पिट समेत 21 मीटर
  4. पिट की चौड़ाई = 2.75 मीटर से 3 मीटर
  5. टेक ऑफ बोर्ड से पिट तक लम्बाई = 11 मीटर से 13 मीटर
  6. टेक ऑफ बोर्ड की लम्बाई = 1.22 मीटर
  7. टेक ऑफ बोर्ड की चौड़ाई = 20 सैंटी मीटर
  8. टेक ऑफ बोर्ड की गहराई = 10 सैंटी मीटर।

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TRIPLE JUMP
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टेक ऑफ (Take off) लेते समय घुटना लम्बी कूद की अपेक्षा इसमें कम झुका होगा। शरीर का भार टेक ऑफ एवं होप स्टेप (Hop, Step) लेते समय पीछे रहेगा तथा दोनों बाजू भी पीछे रहेंगे। दूसरी टांग तेज़ी से हवा में आकर सप्लिट पोजीशन (Split Position) बनाएगी। ट्रिपल जम्प में मुख्यतया तीन प्रकार की तकनीक (Technique) प्रचलित है—

  1. फ्लैट तकनीक
  2. स्टीप तकनीक
  3. मिक्सड तकनीक।

ऊंची कूद
(High Jump)

  1. रनवे की लम्बाई = 15 मी० से 25 मी०
  2. तिकोनी क्रॉस बार की प्रत्येक भुजा = 130 मि०मी०
  3. क्रॉस बार की लम्बाई = 3.98 मी० से 4.02 मी०
  4. क्रॉस बार का वज़न = 2 कि० ग्राम०
  5. पिट की लम्बाई = 5 मी०
  6. पिट की चौड़ाई = 4 मी०
  7.  पिट की ऊंचाई = 60 सैं०मी०

(1) समस्त प्रतियोगियों को पहले दोनों पैरों पर एक साथ अपने स्थान पर ही कूदने को कहेंगे। कुछ समय उपरान्त एक पैर पर कूदने के आदेश देंगे। ऊपर उछलते समय यह ध्यान रहे कि शरीर का ऊपरी भाग सीधा रहे एवं दस बार ही कूदा जाए। इस तरह जिस पैर पर कूदने पर आसानी प्रतीत हो उसी को उछाल (उठना) पैर (Take off foot) मान । कर प्रशिक्षक को निम्नलिखित दो भागों में बांट देना चाहिए—

  1. बायें पैर पर कूदने वाले तथा
  2. दायें पैर पर कूदने वाले।

(2) दो रेखाओं में प्रतियोगी अपने उछाल पैर (Take off Foot) को आगे रख कर दूसरे पैर को पीछे रखेंगे। दोनों भुजाओं को एक साथ पीछे से आगे, कुहनियों से मोड़ करके आगे, ऊपर की ओर तेज़ी से जाएंगे। इसके साथ ही पीछे रखे पैर को भी ऊपर किक (Kick) करेंगे, और ज़मीन से उछाल कर पुन: अपने स्थान पर वापस उसी पैर पर आएंगे।
इस समय उछाल पैर (Take off Foot) वाले पैर का घुटना भी ऊपर उठते समय थोड़ा मुड़ा होगा। परन्तु शरीर का ऊपरी भाग सीधा रहेगा, एवं आगे न जा कर ऊपर उठेगा तथा उसी स्थान पर वापस आयेगा। ऊपर जाते समय कमर तथा आगे का पैर सीधा रखने का प्रयास किया जाए।

(3) प्रतियोगियों को 45° पर बायें पैर वाले बाएं और दायें पैर से कूदने वाले दायीं ओर खड़े होकर क्रॉस छड़ (Cross bar) को लगभग दो फुट (60 सम) की ऊंचाई पर रख कर आगे चलते हुए ऊपर की भान्ति ही उछाल कर क्रॉस छड़ (Cross bar) को पार करेंगे और ऊपर जाकर नीचे आते समय उसी उछाल पैर (Take off Foot) पर वापिस आएंगे। केवल भिन्नता इतनी होगी कि अपने स्थान पर वापस न आकर आगे क्रॉस छड़ को पार करके गिरेंगे तथा दूसरा पैर पहले पैर के आने के उपरान्त आगे 10 या 12 इंच (25 सम) पर आएगा तथा आगे चलते जाएंगे, परन्तु यह ध्यान रखा जाए कि किक करते समय घुटना झुका हो। शरीर का ऊपरी भाग सीधा रखने का प्रयास किया जाए तथा दोनों भुजाओं को तेज़ी से ऊपर ले जाएंगे, परन्तु जब दोनों हाथ कंधों की सीध में पहुंचेंगे तो उसी स्थान पर वापिस गिरना होगा।
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HIGH JUMP
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MEASURE TO THE UPPER OF THE BAR

(4) क्रॉस बार (Cross Bar) की ऊंचाई को बढ़ाएंगे तथा प्रशिक्षकों को टेक ऑफ़ (take off) पर आते समय टेक ऑफ़ फुट (Take off Foot) को लम्बा करने को कहेंगे, परन्तु यह ध्यान में रखेंगे कि इस समय एड़ी पहले ज़मीन पर आये। दोनों भुजाएं कुहनियों से मुड़ी हुई हों।
कूदते समय ध्यान क्रॉस बार (Cross Bar) पर होगा। सिर शरीर से कुछ पीछे की ओर झुका होगा तथा पीछे के पैर को ऊपर करते समय पैर का पंजा ऊपर की ओर कर सीधा होगा।
इस समय क्रॉस बार (Cross Bar) को प्रशिक्षक के सिर से दो फुट (60 से०मी०) ऊंचा रखेंगे तथा प्रत्येक को ऊपर बताई गई क्रिया के अनुसार क्रॉस बार को अपनी फ्री लैग (Free Leg) से किक (Kick) करने को कहेंगे।
इसमें निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखेंगे—

  1. दोनों भुजाओं को एक साथ तेज़ी से ऊपर ले जाएगा।
  2. टेक ऑफ़ फुट (Take off Foot) उस समय ज़मीन छोड़ेगा जबकि फ्री लैग अपनी पूर्ण ऊंचाई तक पहुंच जाएगी।
  3. ऊपर बताई गई प्रक्रिया को जोगिंग (Jogging) के साथ भी किया जाएगा।

(5) क्रॉस बार (Cross bar) को दो फुट (60 सेमी०) के ऊपर रख कर खिलाड़ी को नं० 3 की भान्ति क्रॉस छड़ (Cross bar) पार करने को कहेंगे। केवल इतना अन्तर होगा कि क्रॉस बार पार करने के उपरान्त अखाड़े में आते समय हवा में 90 डिग्री पर घूमेंगे। बायें पैर से टेक ऑफ़ (Take off) लेने वाले बायीं तरफ घूमेंगे तथा दायें पैर पर टेक ऑफ़ (Take off) लेने वाले दायीं तरफ घूमेंगे।
इसमें निम्नलिखित दो बातों का विशेष ध्यान रखा जाएगा—

  1. खिलाड़ी उछाल (Take Off) लेते समय ही न घूमें तथा
  2. पूर्ण ऊंचाई प्राप्त करने से पहले घूमें।

स्ट्रैडल रोल
(Straddle Roll)
(6) टेक ऑफ़ फुट (Take off Foot) को आगे रख कर खड़े होंगे, पर यह ध्यान रहे कि शरीर का भार एड़ी पर होना चाहिए तथा फ्री लैग को पीछे रखेंगे। दोनों हाथों को एक साथ तेज़ी से आगे लायेंगे और फ्री लैग (Free Leg) को ऊपर की ओर किक (Kick) करेंगे जिससे शरीर का समस्त भाग ज़मीन से ऊपर उठ जाये।

(7) ज़मीन पर चूने की समानान्तर रेखा डालेंगे। एथलीट इस चूने की रेखा के दाहिनी ओर खड़े होकर उपर्युक्त प्रक्रिया को करेंगे। ऊपर हवा में पहुंचते ही बायीं ओर टेक ऑफ़ (Take off) को घुमायेंगे, चेहरा नीचे करेंगे तथा पिछले पैर को किक (Kick) पर उठायेंगे।
इसमें मुख्यतः यह ध्यान रखा जाए कि फ्री लैग (Free Leg) को सीधी किक (kick) किया जाए। टेक ऑफ़ लैग (Take off Leg) को सीधा किक करके घुटना मोड़ (Bend) पर ऊपर ले जायेंगे। खिलाड़ी क्रॉस बार (Cross bar) पार करने के उपरान्त अखाड़े में रोज़ अभ्यास कर सकते हैं क्योंकि टेक ऑफ़ किक (Take off Kick) तेज़ होने के कारण सन्तुलन भी बिगड़ सकता है।

(8) तीन कदम आगे आ कर जम्प करना (Jumping from Three Steps) क्रॉस बार के समानान्तर डेढ़ फुट से 2 फुट (45 सम से 60 सम) की दूरी पर रेखा खींचेंगे।
इस रेखा से 30° पर दोनों पैर रख कर खड़े होंगे तथा टेक ऑफ़ फुट (Take off Foot) को आगे निकालते हुए मध्यम गति से आगे को भागेंगे। जहां पर तीसरा पैर आये वहां निशान लगा दें और अब उस स्थान पर दोनों पैर रख कर क्रॉस बार (Cross bar) की ओर चलेंगे और ऊपर बताई गई प्रक्रिया को दोहरायेंगे। क्रॉस बार की ऊंचाई एथलीट की सुविधा के अनुसार बढ़ाते जायेंगे।

बांस कूद
(Pole Vault)

  1. रनवे की लम्बाई = 40 से 45 मीटर
  2. रनवे की चौड़ाई = 1.22 मीटर
  3. लैडिंग ऐरिया = 5 × 5 मी०
  4. तिकोनी क्रास बार की लम्बाई = 4.48 मीटर से 4.52 मीटर
  5. तिकोनी क्रास बार प्रत्येक भुजा = 3.14 मीटर
  6. क्रास बार का वजन = 2.25 किलो ग्राम
  7. लैडिंग एरिया की ऊचाई = 6 सैं०मी० से १ सैं०मी०
  8. बाक्स की लम्बाई = 1.08 मी०
  9. बाक्स की चौडाई रनवे की तरफ से = 60 सैं०मी०

ऐथलैटिक्स में बांस कूद (Pole Vault) बहुत ही उलझा हुआ इवेंट है। किसी भी इवेंट में टेक ऑफ़ (Take off) से अखाड़े में आते समय तक इतनी क्रियाओं की आवश्यकता नहीं होती, जितनी कि पोल वाल्ट में। इसलिए इस इवेंट को पढ़ाने तथा सिखाने दोनों में ही परेशानी होती है।

बांस कूद के लिए एथलीट का चयन
(Selection of Athlete for Pole Vault)
अच्छा बांस कूदक एक सर्वांग (आल राऊण्डर) खिलाड़ी ही हो सकता है। क्योंकि यह . ऐसी स्पर्धा (Event) है जोकि सभी प्रकार से शरीर की क्षमता को बनाये रखती है, जैसे कि गति (Speed), शक्ति (Strength), सहनशीलता (Endurance) तथा तालमेल (Coordination) । अच्छे बांस कूदक का एक अच्छा जिमनास्ट भी होना आवश्यक है। जिससे वह सभी क्रियाओं को एक साथ कर सके।

पोल की पकड़ तथा लेकर चलना
(Holding and Carrying the Pole)
बहुधा बायें हाथ से शरीर के सामने हथेली को जमीन की ओर रखते हुए पोल को पकड़ते हैं । दायां हाथ शरीर के पीछे पुढे (Hip) के पास दायीं ओर बांस (pole) के अन्तिम सिरे की ओर होता है।
बांस को पकड़ते समय बायां बाजू कुहनी से 100 अंश का कोण बनाता है तथा शरीर से दूर कलाई को सीधा रखते हुए बांस को पकड़ते हैं। दायां हाथ, जो कि बांस के अन्तिम सिरे की ओर होता है, बांस को अंगूठे के अन्दरूनी भाग और तर्जनी अंगुली के बीच में ऊपर से नीचे को दबाते हुए पकड़ते हैं। दोनों कुहनियां 100 अंश के कोण बनाए हुई होती हैं। हाथों के बीच की दूरी 24 इंच (60 सैं० मी०) से 36 इंच (80 सें. मी०) तक होती है। यह बांस कूदक के शरीर की बनावट पर और पोल को लेकर दौड़ते समय जिसमें उसको आराम अनुभव हो, उस पर निर्भर करता है।

पोल के साथ दौड़ने की विधियां
(Running with the Pole)

  1. बांस को सिर के ऊपर रख कर चलना (Walking with Pole keeping over head)—इसमें बांस को बाक्स के पास लाते समय अधिक समय लगता है। इसलिए यह विधि अधिक उपयुक्त नहीं है।
  2. बांस को सिर के बराबर रख कर चलना (Walking with pole keeping at the level of head) विश्व के अधिकतर बांस कूदक इसी विधि को अपनाते हैं। इसमें चलते समय बांस का सिरा सिर के बराबर और बायें कंधे की सीध में होता है।
    दायें से बायें-इसमें कंधे तथा बाजू साधारण अवस्था में रहते हैं।
  3. बांस को सिर से नीचे लेकर चलना (Walking with pole keeping below the head)-इस अवस्था में बाजुओं पर अधिक ताकत पड़ती है, जिसके कारण बाक्स तक आते समय शरीर थक जाता है। बहुत ही कम संख्या में लोग इसको काम में लाते हैं। अप्रोच रन (Approach run) एथलीट को अपने ऊपर विश्वास तब होता है जबकि उस का अप्रोच रन सही आना शुरू होता है। आगे की क्रिया पर इसके बाद ही विचार किया जा सकता है। इसके लिए सबसे अच्छी विधि (The best method) यह है कि एक चूने की लाइन लगा कर एथलीट को पोल के साथ लगभग 150 फुट (50 मी०) तक भागने को कहना। इस क्रिया को कई दिन तक करने से एथलीट का पैर एक स्थान पर ठीक आने लगेगा। उस समय आप उस दूरी को फीते से नाप लें, फिर बांस कूद के रन-वे (Runway) पर काम करें। पैरों को तेज़ी के साथ अप्रोच रन को भी घटाना बढ़ाना पड़ता है।
    बांस कूद के अप्रोच रन में केवल एक ही चिह्न होना चाहिए। अधिक चिह्न होने से कूदने वाला अपने स्टाइल (Style) को न सोच कर चेक मार्क (Check Mark) को सोचता रहता है। अप्रोच रन (Approach Run) की लम्बाई 40 से 45 मी० के लगभग होनी चाहिए और अन्तिम 4 या 6 कदम में अधिक तेज़ी होनी चाहिए।

पोल प्लाण्ट
(Pole Plant)
यह सम्भव नहीं कि आप पूरी तेजी के साथ पोल (Pole) को प्लांट (Plant) कर सकें उसके लिए गति को सीमित करना पड़ता है। स्टील पोल (Steel Pole) में प्लांट जल्दी होना चाहिए तथा फाइबर ग्लास (Fibre Glass) में देरी से। स्टील पोल में प्लांट करते समय एथलीट को “एक और दो” गिनना चाहिए। एक के कहने पर बायां पैर आगे टेक ऑफ़ के लिए आयेगा और दायें पैर का घुटना ऊपर की ओर जायेगा। दो कहने पर शरीर की स्विग (Swing) शुरू हो जाती है। इस समय वाल्टर (Vaulter) को अपनी दायीं टांग को स्वतन्त्र छोड़ देना चाहिए जिससे कि वह बायीं टांग के साथ मिल सके। इस विधि से अच्छी स्विग लेने में सुविधा होती है।

टेक ऑफ़
(Take Off)
टेक ऑफ़ के समय दायां घुटना आगे आना चाहिए। इससे शरीर को ऊपर पोल की ओर ले जाते हैं तथा सीने को पोल की ओर खींचते हैं। पोल को सीने के सामने रखते हैं। स्विग (Swing) के समय दायीं टांग शरीर के आगे ऊपर की ओर उठेगी।
नोट-पोल करते समय एथलीट अपने हिप को ऊंचा ले जाते हैं, जबकि टांगों को ऊपर आना चाहिए व हिप को नीचे रखना चाहिए। पोल वाल्टरों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जब तक पोल सीधा नहीं होता, उनको पोल के साथ ही रहना चाहिए। पोल छोड़ते समय नीचे का हाथ पहले छोड़ना चाहिए। यह देखा गया है कि बहुत ही नये पोल वाल्टर अपनी पीठ को क्रास बार के ऊपर से ले जाते हैं। यह केवल ऊपर के हाथ को पहले छोड़ने से होता है।
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 16
POLE VAULT
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ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न-थ्रो इवेंट्स कौन-कौन से होते हैं ? इनकी तकनीक और नियमों के बारे में लिखें।
उत्तर—

  1. गोले का भार = 7.260 कि०ग्राम ± 5 ग्राम पुरुषों के लिए 4 कि० ± 5 ग्राम स्त्रियों के लिए
  2. थरोईंग सैक्टर का कोना = 34.92°
  3. सर्कल का व्यास = 2.135 मी० ± 5 मि०मी०
  4. स्टॉप बोर्ड की लम्बाई = 1.21 मी० से 1.23 मी०
  5. स्टॉप बोर्ड की चौड़ाई = 112 मि०मी० से 200 मि०मी०
  6. स्टॉप बोर्ड की ऊँचाई = 98 मि०मी० से 102 मि०मी०
  7. गोले का व्यास = 110 मि०मी० से 130 मि०मी०
  8. गोले का व्यास स्त्रियों के लिए = 95 मि०मी० से 110 मि०मी०

शाट पुट-पैरी ओवरेइन विधि
(Shot Put-Peri Oberrain Method)
1. प्रारम्भिक स्थिति (Initial Position)-थ्रोअर गोला फेंकने की दशा में अपनी पीठ करके खड़ा होगा। शरीर का भार दायें पैर पर होगा। शरीर के ऊपरी भाग को नीचे
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 18
लाते समय दायें पैर की एडी ऊपर उठेगी तथा बाएं पैर को घुटने से मुडी दशा में पीछे ऊपर जाकर तुरन्त पैर के पास पुन: लायेंगे। दोनों पैर मुड़े होंगे तथा ऊपरी भाग आगे को झुका होगा।

2. ग्लाइड (Glide)-दायां पैर सीधा करेंगे तथा दायें पैर के पंजे बाईं एड़ी से पीछे आयेंगे। बायां पैर स्टॉप बोर्ड (Stop Board) की ओर तेजी से किक करेंगे। बैठी हुई अवस्था में पुट्ठों को पीछे व नीचे की ओर गिरायेंगे। दायां पैर ज़मीन से ऊपर उठेगा तथा शरीर के नीचे ला कर बायीं ओर को पंजा मोड़ कर रखेंगे। बायां पैर इसी के लगभग साथ ही स्टॉप बोर्ड (Stop Board) पर थोड़ा दायीं ओर ज़मीन पर लगेगा। दोनों पैरों के पंजों को ज़मीन पर गोली दोनों कन्धे पीछे की ओर झुके होंगे। शरीर का समस्त भार दायें पैर पर होगा।

3. अन्तिम चरण (Final Phase)-दायें पैर के पंजे एवं घुटने को एक साथ बायीं ओर घुमायेंगे तथा दोनों पैरों को सीधा करेंगे। पुट्ठों को भी आगे बढ़ायेंगे। शरीर का भार दोनों पैरों पर होगा। बायां कन्धा सामने को खुलेगा। दायां कन्धा दायीं तरफ को ऊपर उठेगा तथा घूमेगा। पेट की स्थिति धनुष के आकार की तरह पीछे को झुकी हुई होगी।
SHOT PUT
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 19

4. गोला फेंकना/थ्रो करना (Putting throwing the Shot)-दायां कन्धा एवं दायीं भुजा को गोले के आगे की ओर ले जायेंगे। बायां कन्धा आगे को बढ़ता रहेगा। शरीर का समस्त भार बायें पैर पर होगा जोकि पूर्ण रूप से सीधा होगा। जैसे ही दाहिने हाथ द्वारा गोले को आगे फेंका जायेगा, दोनों पैरों की स्थिति भी बदलेगी। बायां पैर पीछे आयेगा तथा दायां पैर आगे आयेगा। शरीर का भार दायें पैर पर होगा। ऊपरी भाग एवं दायां पैर दोनों आगे को झुके होंगे।
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 20

घूम कर गोला फेंकना या चक्के की भान्ति फेंकना
(Throwing the Shot by rotating or like a Discus)

1. प्रारम्भिक स्थिति (Initial Position)—प्रारम्भ करने के लिए गोले के दूसरे भाग पर गोला फेंकने की दशा में पीठ करके खड़े होंगे। बायां पैर मध्य रेखा पर तथा दायां भाग दायीं ओर होगा। दायां पैर लोहे की रिम (Rim) से 5 से 8 से०मी० पीछे रखेंगे जिससे कि वे घूमते समय फाउल (Foul) न हो। गोला गर्दन के नीचे भाग में होगा, कोहनी ऊपर उठी होगी। प्रारम्भ करने से पहले कन्धा, पेट, बायां बाजू, गोला सभी पहले बायीं तरफ को घूमेंगे तथा बाद में दायीं तरफ जायेगा। ऐसा करते समय दोनों घुटने झुके होंगे।
2. घूमना (Rotation)-दोनों पैरों पर शरीर का भार होगा तथा ऊपर की स्थिति से केवल एक स्विंग लेने के उपरान्त घूमना प्रारम्भ हो जायेगा। कन्धा एवं धड़ दायें को पूर्ण रूप से घूमते शरीर का भाग भी दायें पैर पर चला जायेगा। इस स्थिति में बायीं तरफ भुजा को ज़मीन के समानान्तर रखते हुए बायें पैर के पंजे पर शरीर का भार लाते हुए दोनों घुटने घूमेंगे। दायें पैर के पंजे पर भी 90 अंश तक घूमेंगे। दायें पैर को घुटने से झुकी हुई अवस्था में बायें पैर के टखने के ऊपर से गोले के बीच में पहुंचने पर लायेंगे।
बायें पैर पर घूमते समय चक्र समाप्त होने पर हवा में दोनों पैर होंगे तथा कमर को घुमाएंगे। दायां पैर केन्द्र में दाएं पैर के पंजे पर आएगा। दाएं पैर के पंजे की स्थिति उसी प्रकार से होगी जैसी कि घड़ी में 2 बजे की दशा में सुई होती है। बहादुर सिंह का पैर 10 बजे की स्थिति में आता है। वह हवा में ही कमर को मोड़ लेता है। 2 बजे की स्थिति में बायां पैर टो बोर्ड पर कुछ विलम्ब से आयेगा। परन्तु ऊपरी भाग को केन्द्र में रखा जा सकता है। 10 बजे की स्थिति में बायां पैर ज़मीन पर तेजी से आयेगा तथा अधिकतर यह सम्भावना रहती है कि शरीर का ऊपरी भाग शीघ्र ऊपर आ जाता है।
निम्नलिखित बातों का ध्यान रखेंगे—

  1. प्रारम्भ में सन्तुलन ठीक बनाकर चलेंगे, बायां पैर नीचे रखेंगे।
  2. दाएं पैर से पूरी ग्लाइड (Glide) लेंगे, जम्प नहीं करेंगे। शरीर के ऊपरी भाग को ऊपर नहीं उठायेंगे।
  3. दायां पैर केन्द्र में आते समय अन्दर को घूम जाएगा।
  4. बायें कन्धे एवं पुढे को जल्दी ऊपर नहीं लाना है।
  5. बायीं भुजा को शरीर के पास रखेंगे।
  6. बायां पैर ज़मीन पर न शीघ्र लगेगा और न अधिक विलम्ब से।

सामान्य नियम
(General Rules)

  1. पुरुष वर्ग में 7.26 कि०ग्रा०, महिला में 4.00 कि०ग्रा० । गोले के व्यास पुरुष वर्ग में 110 से 130 व महिलाओं में 95 से 110 पैंटीमीटर।
  2. गोला व तारगोला को 2.135 मीटर के चक्र से फेंका जाता है। अन्दर का भाग पक्का होगा, बाहरी मैदान से 25 मिलीमीटर नीचा होगा। स्टॉप बोर्ड (Stop Board) 1.22 मीटर लम्बा, 114 मिलीमीटर चौड़ा और 100 मिलीमीटर ऊंचा होगा।
    ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 21
  3. सैक्टर 40 अंश का गोला, तार गोला एवं चक्का होगा। केन्द्र से एक रेखा सीधी 20 मीटर की खींचेंगे। इस रेखा के 18.84 पर एक बिन्दु लगाएंगे, इस बिन्दु से दोनों ओर 6.84 की दूरी पर दो बिन्दु डाल देंगे तथा इन्हीं दो बिन्दुओं से सीधी रेखायें खींचने पर 40 अंश का कोण बनेगा।
    गोला फेंकते समय शरीर का सन्तुलन होना चाहिए, गोला फेंक कर गोला जमीन पर गिरने के उपरान्त 75 सेंटीमीटर की दोनों रेखायें जो कि गोला फेंकने के क्षेत्र को दो भागों में विभाजित करती हैं, उसके पीछे के भाग से बाहर आयेंगे। गोला एक हाथ से फेंक दिया जाएगा। गोला कन्धे के पीछे नहीं आयेगा, केवल गर्दन के पास रहेगा। सही पुट उसी को मानेंगे जो कि सैक्टर के अन्दर हो। सैक्टर की रेखाओं को काटने पर फाऊल (Foul) माना जायेगा। यदि आठ प्रतियोगी (Competitors) हैं, तब सभी को 6 अवसर देंगे अन्यथा टाइ पड़ने पर 9 भी हो सकते हैं।

चक्का फेंकने का प्रारम्भ
(Initial Stance of Discus Throw)

  1. चक्के का वजन = 2 कि० ग्राम पुरुषों के लिए 1 कि० ग्राम स्त्रियों के लिए
  2. सर्कल का व्यास = 2.5 मी० + 5 मि०मी०
  3. थ्रोईंग सैक्टर का कोण = 34.92°
    चक्के का ऊपर का व्यास = 219 मि०मी० से 2.21 मि० मी० पुरुषों के लिए

180 से 182 स्त्रियों के लिए चक्का फेंकने की दिशा के विरुद्ध पीठ करके छल्ले (Ring) के पास चक्र में खड़े होंगे। दायीं भुजा को घुमाते हुए एक या दो स्विग (Swing) भुजा तथा धड़ को भी साथ में घुमाते हुए लेंगे। ऐसा करते समय शरीर का भार भी एक पैर से दूसरे पैर पर जायेगा जिस से पैरों की एड़ियां मैदान के ऊपर उठेगी। जब चक्का दाईं ओर होगा तथा शरीर का ऊपरी भाग भी दाईं ओर मुड़ा होगा यहां से चक्र का प्रारम्भ होगा। चक्र का प्रारम्भ शरीर के नीचे के भाग से होगा, बायें पैर को बायीं ओर झुकाएंगे। शरीर का भार इसी के ऊपर आयेगा। दायां घुटना भी साथ ही घूमेगा, दायां पैर भी घूमेगा, साथ ही कमर, पेट भी घूमेगा जाकि दायीं बाजू एवं चक्के को भी साथ में लायेगा।

इस स्थिति में गोले को पार करने की क्रिया प्रारम्भ होगी। सबसे पहले बायां पैर जमीन को छोड़ेगा। इसके उपरान्त बायां पैर चक्का फेंकने की दशा में आगे बढ़ेगा। दायां पैर घुटने से मुड़ा हुआ अर्ध चक्र की दशा में बायीं से दायीं ओर आगे को चलेगा। घूमते समय दोनों पुढे कन्धों से आगे होंगे जिससे शरीर के ऊपरी भाग तथा नीचे के भाग में मोड़ उत्पन्न होगा। दायीं भुजा जिसमें चक्का होगा, सिर कोहनी से सीधा होगा, बायीं भुजा कोहनी से मुड़ी हुई सीने के सम्मुख होगी। सिर सीधा रहेगा। दायें पैर के पंजे पर ज़मीन से थोड़ा ऊपर रख कर गोले को पार करेंगे तथा दायें पैर के पंजे ज़मीन पर आयेंगे। यह पैर लगभग केन्द्र में आयेगा। पंजा बाईं ओर को मुड़ा होगा।

विधियां
(Methods)
DISCUS THROW
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इसमें मुख्यत: निम्नलिखित तीन प्रकार की विधियां हैं—

  1. प्रारम्भ करते समय भी जो नये फेंकने वाले होते हैं वे अपना दायां पैर केन्द्र की रेखा पर एवं बायां पैर 10 से०मी० छल्ले (Ring) के पीछे रखते हैं।
  2. दूसरी विधि जिसमें सामान्य फेंकने वाले केन्द्रीय रेखा को दोनों पैरों के मध्य रखते हैं।
  3. तीसरे वे फेंकने वाले हैं जो बायें पैर को केन्द्रीय रेखा पर रखते हैं।

इसी प्रकार गोले के मध्य में आते समय तीन प्रकार से पैर को रखते हैं। पहले 3 बजे की स्थिति में, दूसरे 10 बजे की स्थिति में, तीसरे 12 बजे की स्थिति में, जिसमें 12 बजे की स्थिति सर्वोत्तम मानी गयी है क्योंकि इसमें दायें पैर पर कम घूमना पड़ता है तथा बायें कन्धे को खुलने से रोका जा सकता है।
दायां पैर ज़मीन पर आने के उपरान्त भी निरन्तर घूमता रहेगा और बायां पैर गोले के केन्द्र की रेखा से थोड़ा बायीं ओर पंजे एवं अन्दर के भाग को ज़मीन पर लगा देगा।
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 23

अन्तिम चरण (Last Step)
इस समय पैर जमीन पर होंगे, कमर घूमती हई दिशा में पीछे को झकी होगी, बायां पैर सीधा होगा, दायां पैर घुटने से मुड़ा हुआ, दायां घुटना एवं पुढे बायीं ओर घूमते हुए होंगे। बायीं भुजा ऊपर की ओर खुलेगी, दायीं भुजा को शरीर से दूर रखते हुए आगे एवं ऊपर की दशा में लायेंगे।

फेंकना (Throwing)
दोनों पैर जो कि घूम कर आगे आ रहे थे, इस समय घुटने से सीधे होंगे। पुढे आगे को बढ़ेंगे, कन्धे तथा धड़ अपना घूमना आगे की दशा में समाप्त कर चुके होंगे। बायीं भुजा तथा कन्धा आगे घूमना बन्द करके एक स्थान पर रुक जायेंगे। दायीं भुजा एवं कन्धा आगे तथा ऊपर बढ़ेगा। दोनों पैरों के पंजों पर शरीर का भार होगा तथा दोनों पैर सीधे होंगे। अन्त में बायां पैर पीछे आयेगा तथा दायां पैर आगे जा कर घुटने से मुड़ेगा। शरीर का ऊपरी भाग भी आगे को झुका होगा। ऐसा शरीर का सन्तुलन बनाये रखने के लिए किया जाता है।

साधारण नियम (General Rules)
चक्के (Discus) का भार पुरुष वर्ग हेतु 2 कि०ग्रा०, महिला वर्ग हेतु 1 कि०ग्रा० होता है। वृत्त का व्यास 2.50 होता है। वर्तमान समय के चक्के के गोले के बाहर लोहे की केज
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 24
LAY OUT OF DISCUS CIRCLE
(Cage) बनाई जाती है ताकि चक्के से किसी को चोट न पहुंचे। सम्मुख 6 मीटर, अन्य 7 मीटर अंग्रेजी के ‘E’ के आकार की होती है। इसकी ऊंचाई 3.35 मीटर होती है।
सैक्टर-40° का इसी प्रकार बनायेंगे जैसे गोले के लिए, अन्य समस्त नियम गोले की भान्ति ही इसमें काम आयेंगे।

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न-जैवलिन थ्रो के नियम लिखें।
उत्तर—

  1. जैवलिन का भार = 800 ग्राम पुरुषों के लिए 600 ग्राम स्त्रियों के लिए
  2. रनवे की लम्बाई = 30 मी० 36.5 मी०
  3. रनवे की चौड़ाई जैवलिन की लम्बाई = 4 मीटर – 250 सें०मी० से 270 सें०मी० पुरुषों के लिए 220 सें०मी० के 230 सें०मी० स्त्रियों के लिए
  4. जैवलिन के थ्रोईंग सैक्टर का कोण = 28.950

भाला फेंकना (Javelin Throw)
भाले की सिर के बराबर ऊंचाई पर कान के पास, भुजा को कोहनी से झुकी हुई,
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 25
कोहनी एवं जैवलिन दोनों का मुख सामने की ओर होगा। हाथ की हथेली का रुख ऊपर की ओर होगा–ज़मीन के समानान्तर । सम्पूर्ण लम्बाई 30 से 35 मी० होगी। 3/4 दौड़ पथ में सीधे दौड़ेंगे। 1/3 अन्तिम के पांच कदम के लगभग क्रॉस स्टैप (Cross Step) लेंगे। अन्तिम चरण में जब बायां पैर जांच चिह्न (Check Mark) पर आएगा दायां कन्धा धीमी
JAVELIN THROW
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 26
गति से दायीं ओर मुड़ना प्रारम्भ करेगा तथा दायीं भुजा भी पीछे आना प्रारम्भ करेगी। कदमों के बीच की दूरी बढ़ने लगेगी। दायां हाथ एवं कन्धा बराबर पीछे को आयेंगे एवं दाईं तरफ खुलते जायेंगे। कमर एवं शरीर का ऊपरी भाग पीछे को झुकता जायेगा। ऊपरी एवं नीचे के भाग में मोड़ उत्पन्न होगा, क्योंकि ऊपरी भाग दायीं ओर खुलेगा तथा नीचे का भाग सीधा आगे को चलेगा। आंखें आगे की ओर देखती हुई होंगी।

अन्त में दायां पैर घुटने से झुकी दशा में ज़मीन पर क्रॉस स्टैप (Cross Step) के अन्त में आयेगा। जैसे ही घुटना आगे बढ़ेगा, दायें पैर की एड़ी ज़मीन से ऊपर उठना प्रारम्भ हो जायेगी। इस प्रकार यह बायें पैर को अधिक दूरी पर जाने में सहायता करती है, जिससे कि दोनों पैरों के बीच अधिक-से-अधिक दूरी हो सके। बायां पैर थोड़ा बायीं ओर ज़मीन पर आएगा। कन्धे दायीं ओर को होंगे। भाला कन्धे की सीध में होगा। मुट्ठी बन्द तथा हथेली ऊपर की ओर, कलाई सीधी, कलाई नीचे की ओर होने से भाले का अन्तिम सिरा ज़मीन पर लगेगा। इस स्थिति के समय बाईं भुजा मुड़ी हुई सीने के ऊपर होगी।

अन्तिम फेस (Last Phase)-थ्रो करने की स्थिति में जब बायां पैर ज़मीन पर आयेगा, कूल्हा (Hip) आगे बढ़ना प्रारम्भ कर देगा। दायां पैर एवं घुटना अन्दर को घूमेगा तथा सीधा होकर टांग को सीधा करेगा। बायां कन्धा भी साथ में खुलेगा, दायीं कुहनी बाहर की ओर घूमेगी एवं ऊपर को भाला कन्धा एवं भुजा के ऊपर सीध में होगा। बायें पैर का रुकना, दायें पैर को अन्दर घुमाना तथा सीधा करना इन सबसे शरीर का ऊपरी भाग धनुष की भान्ति पीछे को झुकेगा तथा सीना एवं पेट की मांसपेशियों में तनाव उत्पन्न होगा।

फेंकने के बाद फाऊल (Foul) बचाने के लिए तथा शरीर के भार को नियन्त्रण में रखने के लिए कदमों में परिवर्तन लायेंगे। दायां पैर आगे आकर घुटने से मुड़ेगा तथा पंजा बायीं ओर को झुकेगा। शरीर का ऊपरी भाग दायें पैर पर आगे को झुक कर सन्तुलन बनाएगा। दायां पैर अपने स्थान से उठ कर कुछ आगे भी जा सकता है।

साधारण नियम (General Rules)

  1. पुरुष भाले की लम्बाई 2.60 मी० से 2.70 मी०, महिला 2.20 मी० से 2.30 मी०।
  2. भाला फेंकने के लिए कम-से-कम 30 मी०, अधिकतम 36.50 मी० लम्बा एवं 4 मी० चौड़ा मार्ग चाहिए। सामने 70 मि०मी० की चाप वक्राकार सफेद लोहे की पट्टी होगी जो कि दोनों ओर 75 सें.मी० निकली होगी। इसको सफेद लेन से भी बनाया जा सकता है। यह रेखा 8 मी० सेण्टर से खींची जा सकती है।
  3. भाले का सैक्टर 29° का होता है जहां वक्राकार रेखा मिलती है वहीं निशान लगा देते हैं। पूर्ण रूप से सही कोण के लिए 40 मी० की दूरी पर दोनों भुजाओं के बीच की दूरी 20 मीटर होगी, 60 मी० की दूरी पर 30 मी० होगी।
    JAVELIN RUNWAY THROWING
    ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 27
  4. भाला केवल बीच में पकड़ने के स्थान (Grip) से ही पकड़ कर फेंकेंगे। भाले का अगला भाग ज़मीन पर पहले लगना चाहिए। शरीर के किसी भी भाग से 50 सें०मी० चौड़ी दोनों ओर की रेखाओं को या आगे 70 सें०मी० चौड़ी रेखा को स्पर्श करने को फाऊल थ्रो (Foul Throw) मानेंगे।
  5. प्रारम्भ करने से अन्त तक भाला फेंकने की दशा में रहेगा। भाले को चक्र काट कर नहीं फेंकेंगे, केवल कन्धे के ऊपर से फेंक सकते हैं।
  6. 3 + 3 गोला एवं चक्के की भान्ति अवसर मिलेंगे।

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न-रिले दौड़ों के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर—
रिले दौड़ें
(Relay Races)
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 28
पेडले रिले दौड़ (Medley Relay Race)—
800 × 200 × 200 × 400 मीटर
बैटन (Baton)—सभी वृत्ताकार रिले दौड़ों में बैटन को ले जाना होता है। बैटन एक खोखली नली का होना चाहिए और इसकी लम्बाई 30 सें०मी० से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसकी परिधि 12 सेंटीमीटर होनी चाहिए और भार 40 ग्राम होना चाहिए।
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 29
रिले धावन पथ (Relay. Race Track)-रिले धावन पथ पूरे चक्र के लिए, गलियारों में विभाजित या अंकित होना चाहिए। यदि ऐसा सम्भव नहीं है, तो कम-से-कम बैटन विनिमय क्षेत्र गलियारों में होना चाहिए।
रिले दौड़ का प्रारम्भ (Start of Relay-Race)-दौड़ के प्रारम्भ में बैटन का कोई भी भाग रेखा से आगे निकल सकता है, किन्तु बैटन रेखा या आगे की ज़मीन को स्पर्श नहीं करना चाहिए।
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 30
बैटन लेना (Taking the Baton)-बैटन लेने के लिए भी क्षेत्र निर्धारित होता है। यह क्षेत्र दौड़ की निर्धारित दूरी रेखा के दोनों ओर 10 मीटर लम्बी प्रतिबन्ध रेखा खींच कर चिह्नित किया जाता है। 4 × 200 मीटर तक की रिले दौड़ों में पहले धावक के अतिरिक्त टीम के अन्य सदस्य बैटन लेने के लिए निर्धारित क्षेत्र के बाहर, किन्तु 10 मीटर से कम दूरी से दौड़ना आरम्भ करते हैं।

वैटन विनिमय (Exchange of Baters)—बैटन विनिमय निर्धारित क्षेत्र के अन्दर ही होना चाहिए। धकेलने या किसी प्रकार से सहायता करने की अनुमति नहीं है। धावक एक-दूसरे को बैटन नहीं फेंक सकते यदि बैटन गिर जाता है, तो गिराने वाला धावक ही उठाएगा।
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PSEB 10th Class Physical Education Practical ऐथलैटिक्स (Athletics)

प्रश्न 1.
एथलैटिक्स संयोगों को मुख्य रूप से कितने भागों में बांट सकते हैं ?
उत्तर-
एथलैटिक्स संयोगों को हम अग्रलिखित दो भागों में बांट सकते हैं—

  1. ट्रैक संयोग-इनमें सभी दौड़ें आ जाती हैं।
  2. क्षेत्रीय संयोग (फील्ड इवेंट्स)-इसमें सब प्रकार की छलांगें और थ्रोज़ आ जाती

ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 2.
सीनियर लड़के और जूनियर लड़कों के कौन-कौन से इवेंट्स होते
उत्तर-
सीनियर लड़के—

  1. 100 मीटर
  2. 200 मीटर
  3. 400 मीटर
  4. 800 मीटर
  5. 1500 मीटर
  6. 5000 मीटर
  7. 110 मीटर हर्डल
  8. लम्बी छलांग
  9. तेहरी छलांग
  10. पोल वाल्ट
  11. शॉटपुट
  12. जैवलिन थ्रो
  13. डिस्कस थ्रो
  14. हैमर थ्रो
  15. ऊंची छलांग
  16. 4 × 100 मीटर रिले दौड़
  17. 4 × 400 मीटर रिले दौड़

जूनियर लड़के—

  1. 100 मीटर
  2. 400 मीटर
  3. 800 मीटर
  4. 3000 मीटर
  5. 100 मीटर
  6. ऊंची छलांग
  7. लम्बी छलांग
  8. शॉट पुट
  9. डिस्कस थ्रो
  10. जैवलिन थ्रो
  11. 4 × 100 मीटर रिले दौड़।

प्रश्न 3.
सीनियर लड़कियों और जूनियर लड़कियों के इवेंट्स के बारे में विस्तारपूर्वक लिखो।
उत्तर-
ऐथलैटिक्स (Athletics) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 32

प्रश्न 4.
एथलैटिक्स इवेंट्स को हम कितने भागों में बांट सकते हैं ?
उत्तर-
दौड़ें-100, 200, 400, 800, 1500, 5000, 10,000 मीटर दौड़। 4 × 100, 4 × 400 मीटर रिले दौड़। थो-डिस्कस थ्रो, हैमर थ्रो, शॉट पुट, गोला फेंकना। उछलना-हाई जम्प, लम्बी छलांग, ट्रिपल जम्प, पोल वाल्ट।

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प्रश्न 5.
स्परिट्स या तेज़ दौड़ें किसे कहते हैं ?
उत्तर-
स्परिट्स या तेज़ दौड़ें उन्हें कहते हैं जो दौड़ने वाला थोड़ी दूरी को बिजली की तेज़ी से पूरा कर ले। तेज़ दौड़ें इस प्रकार हैं-100, 200, 400, 4 x 100, 4 x 400 मीटर रिले दौड़ें इत्यादि।

प्रश्न 6.
मध्यम दर्जे की दौड़ें कौन-कौन सी होती हैं ?
उत्तर-
मध्यम दर्जे की दौड़ें (Middle Distance Races) उन्हें कहते हैं जिन में धावक तेज़ दौड़ सकता हो और पूरी दूरी के लिए स्पीड या गति को कायम रख सकता हो। जैसे 800, 1500 मीटर की दौड़ आदि।

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प्रश्न 7.
रिले दौड़ें (Relay Races) किसे कहते हैं ?
उत्तर-
रिले दौड़ें (Relay Races)-रिले दौड़ें एक टीम का संयोग है जिनमें टीम का हर मैम्बर एक जैसी दूरी दौड़ता है। छोटी दूरी की रिले दौड़ों में धावकों को स्परिट की तरह दौड़ना पड़ता है। रिले दौड़ों में 4 मैम्बर होते हैं और बैटन (Baton) एक मैम्बर से दूसरे मैम्बर को पकड़ाया जाता है।

प्रश्न 8.
दौड़ों के मुख्य नियम कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
दौड़ों के लिए आम नियम-

  1. तेज़ दौड़ें (स्परिट्स) 4′ की चौड़ी लेनों में दौड़ी जाती हैं ताकि धावकों को दौड़ने में रुकावट न पड़े।
  2. लेन्ज़ का चुनाव पर्चियों द्वारा किया जाता है।
  3. स्टार्टर के स्थान लो की आज्ञा मिलने पर धावक अपनी-अपनी लेन की आरम्भिक रेखा के पीछे पोजीशन ले लेते हैं। तैयारी की आज्ञा मिलने पर वे तैयार हो जाते हैं। बन्दूक या पिस्तौल चलने के उपरान्त दौड़ पड़ते हैं। यदि कोई धावक बन्दूक की आवाज़ या पिस्तौल चलने से पहले दौड़ पड़ता है तो वह स्टार्ट रद्द कर दिया जाता है। पहले दौड़ने वाले धावक को ताड़ना कर दी जाती है। यदि वह ऐसी ग़लती फिर करता है तो उस धावक को उस दौड़ मुकाबले में भाग लेने के अयोग्य करार दिया जाता है।
  4. जो धावक अपनी लेन को छोड़ कर दूसरी लेन में चला जाता है, वह भी अयोग्य करार दिया जाता है।
  5. लम्बी दौड़ें 1500, 5000 मीटर दौड़ अलग-अलग लेनों में दौड़ी जाती हैं। यदि किसी एथलीट ने अपने से आगे दौड़ रहे धावक को काट कर आगे बढ़ना हो तो वह दाईं ओर से आगे बढ़ेगा।

प्रश्न 9.
थ्रो के लिए क्या-क्या नियम हैं ?
उत्तर-
थ्रो के लिए नियम-

  1. गोला, डिस्कस और हैमर थ्रो चक्करों में खड़े होकर फेंके जाते हैं।
  2. थ्री से पहले या बाद शरीर का कोई भाग चक्कर से बाहर नहीं स्पर्श करना चाहिए।
  3. थ्रो के बाद चक्कर के पिछले आधे भाग में से बाहर जाना आवश्यक है। अगले भाग में से बाहर जाना फाऊल माना जाता है।
  4. निश्चित किए गए सैक्टर में गिरे हुए थ्री ही ठीक माने जाते हैं।
  5. यदि मुकाबलों में भाग लेने वालों की संख्या मे 8 से अधिक है तो इनको तीनतीन चांस दिए जाते हैं। फिर उनमें से अधिक फेंकने वाले 8 एथलीट चुन लिए जाते हैं
    और फिर दोबारा तीन चांस और दिए जाते हैं। जो एथलीट अधिक थ्रो फेंकेगा उसको पहला स्थान दिया जाएगा।
  6. थ्री इवेंट्स में जब हम इम्पलीमैंट (Implement) को चक्कर के अन्दर ले जाते हैं तो उसको दोबारा बैक साइड पर नहीं फेंक सकते।
  7. गोला, हैमर या डिस्कस थ्रो के समय यह ज़रूरी है कि वह 40° के सैंटर में गिरे।
  8. हरेक थ्रो का माप गिरी हुई वस्तु की समीपता दूरी से चक्कर के अन्दर से सीधी रेखा द्वारा लिया जाता है।
  9. माप के समय अंगुलियों का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
  10. जब तक गोले, डिस्कस या किसी और वस्तु ने भूमि को स्पर्श न कर लिया हो, खिलाड़ी चक्कर में से बाहर नहीं आ सकता।

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प्रश्न 10.
दौड़ों में चैम्पियनशिप निकालने के लिए अंक कैसे लगाए जाते हैं ?
उत्तर-
दौड़ों के लिए निम्नलिखित ढंग से अंक लगाए जाते हैं—

पोजीशन अंक
(1) पहली पोजीशन 5
(2) दूसरी पोजीशन 3
(3) तीसरी पोजीशन 1
यदि रिले दौड़ें हों तो इस प्रकार हैं
(1) पहली पोजीशन 10
(2) दूसरी पोजीशन 6
(3) तीसरी पोजीशन 2

 

प्रश्न 11.
गोला, डिस्कस, हैमर थ्रो चक्कर के कोण कितने डिग्री के होते हैं ?
उत्तर-
गोला, डिस्कस, हैमर थ्रो चक्कर के कोण 40° के होते हैं।

प्रश्न 12.
100 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर दौड़ की लाइनों की चौड़ाई कितनी होती है ?
उत्तर-
लाइनों की दूरी 1.25 मीटर या 4’—1′ चौड़ाई होती है।

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प्रश्न 13.
स्टैंडर्ड ट्रैक किसे कहते हैं ?
उत्तर-
स्टैंडर्ड ट्रैक उसे कहते हैं जिसमें 8 लाइनें होती हैं, परन्तु आम तौर पर 6 लाइनों वाला ट्रैक ही प्रयोग में लाया जाता है।

प्रश्न 14.
स्टार्ट कैसे लिया जाता है ?
उत्तर-
स्टार्ट निम्नलिखित ढंग से लिया जाता है—
On Your marks.
Set
Whistle

प्रश्न 15.
ट्रैक इवेंट्स में कौन-कौन सी दौड़ें आती हैं ?
उत्तर-
ट्रैक इवेंट्स में 100, 200, 400, 800, 1500, 5000, 10000 मीटर की दौड़ें आ जाती हैं। (इसका चित्र सहित पूरा वर्णन खेलों वाले भाग में देखो)

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प्रश्न 16.
100, 200, 400 मीटर की दौड़ दौड़ने वाले एथलीटों को कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
कुछ ज़रूरी बातें (Some Important Tips)—
100, 200, 400 मीटर दौड़ दौड़ने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए’

  1. सांस प्राकृतिक ढंग से लेनी चाहिए।
  2. तैयार की आज्ञा मिलने पर अपने सांस को रोक लो और पिस्तौल की गोली चलने पर भागना शुरू करो।
  3. दौड़ समाप्त हो जाने के बाद बैठना या रुकना नहीं चाहिए।
  4. दौड़ आरम्भ होने की स्थिति में खिलाड़ी को अपनी स्पर्श स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए ताकि वह पहले चार, पांच या छः कदम बिल्कुल सीधी रेखा में दौड सके।
  5. अभ्यास के लिए पहले दो-चार स्टार्ट धीरे-धीरे लेने चाहिएं।
  6. हर पारी आरम्भ होने से पहले 35 मीटर या 40 मीटर तक दौड़ने का अभ्यास करना चाहिए।
  7. स्टार्ट लेने के लिए प्रतिदिन 10-15 स्टार्ट लेने चाहिएं।

प्रश्न 17.
कितने फाऊल स्टार्ट के पश्चात् एथलीट को दौड़ से बाहर निकाला जा सकता है ?
उत्तर-
यदि कोई एथलीट दो फाऊल स्टार्ट ले ले तो उसको दौड़ से बाहर निकाल दिया जाता है। पटैथलोन और डिकैथलिन में तीन फाऊल स्टार्ट ले ले तो उसे बाहर निकाल दिया जाता

प्रश्न 18.
ट्रैक इवेंट्स के लिए खिलाड़ियों के लिए क्या-क्या नियम होने चाहिएं ?
उत्तर-
ट्रैक इवेंट्स के खिलाड़ियों के लिए निम्नलिखित नियम हैं—

  1. खिलाड़ी ऐसे वस्त्र पहने जो किसी प्रकार की आपत्ति योग्य न हों तथा वे साफ़ भी हों।
  2. एथलीट नंगे पांव या जूते पहन कर भाग ले सकता है।
  3. जो खिलाड़ी अन्य खिलाड़ियों के लिए किसी तरह की रुकावट पैदा करता है या प्रगति के मार्ग में रुकावट बनता है, उसको अयोग्य ठहराया जाता है।
  4. हरेक एथलीट अपने आगे और पीछे बड़े स्पष्ट रूप से अंक धारण करेगा।
  5. लेन्ज (Lanes) में दौड़ी जाने वाली दौड़ों में खिलाड़ी को शुरू से अन्त तक अपनी लेन में ही रहना होगा।
  6. यदि कोई खिलाड़ी जानबूझ कर अपनी लेन से बाहर दौड़ता है तो उसे अयोग्य ठहराया जाता है।
  7. यदि कोई एथलीट जानबूझ कर ट्रैक को छोड़ता है तो उसको दोबारा दौड़ जारी रखने का अधिकार नहीं होता।
  8. यदि ट्रैक और फील्ड के इवेंट्स एक बार शुरू हो चुके हों तो जज उसको अलगअलग ढंग से हिस्सा लेने की आज्ञा दे सकता है।
  9. खिलाड़ियों को दवाइयों और नशीली वस्तुओं के सेवन की आज्ञा नहीं है। न ही खेल के समय वह अपने पास रख सकता है। यदि कोई ऐसी वस्तुओं का प्रयोग करता है तो उसे अयोग्य करार दिया जाता है।
  10. 800 मीटर दौड़ (800 Meter Race) का स्टार्टर अपनी ही भाषा में कहेगा “On Your Marks” इस के बाद व्हिसल दे कर स्टार्ट दे दिया जाता है। .
  11. खिलाड़ी को “On Your Marks” की स्थिति में अपने सामने वाली ग्राऊंड को या आरम्भ रेखा (Start Line) को हाथ या पैर द्वारा स्पर्श नहीं करना चाहिए।
  12. दो बार फाऊल स्टार्ट होने पर एथलीट को दौड़ में भाग लेने की आज्ञा नहीं होती।
  13. एथलीट का फैसला पोजीशन की अन्तिम रेखा पर होता है। जिस खिलाड़ी के शरीर का हिस्सा अन्तिम रेखा को पहले स्पर्श कर जाए तो उसको पहले पहुंचा माना जाता है।
  14. हर्डल दौड़ में यदि कोई एथलीट जानबूझ कर हाथों या टांगों को फैलाकर हर्डल फेंकता है या रैफ़री के मतानुसार हर्डल को जानबूझ कर हाथों या पाँवों पर गिराता है तो उसे भी अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
  15. यदि Throw Events में भाग लेने वालों की संख्या अधिक हो जाए तो रैफ़री निर्धारित स्थान (Qualifying Marks) रख देता है और अन्त में चान्स दिए जाते हैं।

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प्रश्न 19.
हर्डल दौड़ें कितने प्रकार की होती हैं ? संक्षेप में वर्णन करो।
उत्तर-
हर्डल दौड़ें निम्नलिखित प्रकार की होती हैं जो इस प्रकार हैं—
(1) 110 मीटर हर्डल (110 Metres Hurdle)
(2) 200 मीटर हर्डल (200 Metres Hurdle)
(3) 400 मीटर हर्डल (400 Metres Hurdle)

  1. 110 मीटर हर्डल (110 Metres Hurdle)-इसमें 10 हर्डलें होती हैं। पहली. हर्डल 10.72 मीटर दूरी पर होती हैं। बाकी हर्डलों की दूरी 9.14 और अन्तिम हर्डल 14.02 मीटर दूरी पर होती है। हर्डलों की ऊंचाई लड़कियों के लिए 1.06 सैं० मीटर होती है और सीनियर लड़कियों के लिए 100 मीटर हर्डलज़ की ऊंचाई 89 सैं० मीटर और जूनियर लड़कियों के लिए 76 सैं० मीटर होती है।
  2. 200 मीटर हर्डल (200 Metres Hurdle)-इसमें भी 10 हर्डलें होती हैं। स्टार्ट रेखा से पहली हर्डल 18.29 मीटर और अन्तिम हर्डल 17.10 मीटर होती है।
  3. 400 मीटर हर्डल (400 Metres Hurdle)—इसमें भी 10 हर्डल होती हैं। पहली हर्डल स्टार्ट रेखा से 45 मीटर और बाकी 35 मीटर और अन्तिम 40 मीटर होती है।

प्रश्न 20.
गोला फेंकना, हैमर थ्रो, डिस्कस थ्रो के चक्करों का माप बताओ।
उत्तर-

  1. गोले का चक्कर 2.135 M.
  2. हैमर थ्रो 2.135 M.
  3. डिस्कस थ्रो 2.50 M.M.

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प्रश्न 21.
पटैथलोन और डिकेथलिन इवेंट्स का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. पटैथलोन के इवेंट्स-
    • लम्बी छलांग (Long Jump)
    • जैवलिन थ्रो (Javelin Throw)
    • 200 मीटर दौड़ (200 Metres Race)
    • डिस्कस थ्रो (Discus Throw)
    • 100 मीटर हर्डल (100 Metres Hurdle)
  2. डिकेथलिन इवेंट्स—
    • 100 मीटर दौड़ (100 Metres Race)
    • लम्बी छलांग (Long Jump)
    • पुटिंग शाट (Putting Shot)
    • ऊंची छलांग (High Jump)
    • 400 मीटर दौड़ (400 Metres Race)
    • 110 मीटर हर्डल (110 Metres Hurdle)
    • डिस्कस थ्रो (Discus Throw)
    • पोल वाल्ट (Pole Vault)
    • जैवलिन थ्रो (Javelin Throw)
    • 1500 मीटर दौड़ (1500 Metres Race)

प्रश्न 22.
लड़के और लड़कियों के लिए जैवलिन का भार और लम्बाई बताओ।
उत्तर-

  1. जैवलिन लड़कों के लिए 800 ग्राम। लड़कियों के लिए 605 से 625 ग्राम।
  2. लड़कों के लिए लम्बाई अधिक-से-अधिक 2.30 मीटर और कम-से-कम 2.60 मीटर।
  3. लड़कियों के लिए लम्बाई अधिक-से-अधिक 2.30 मीटर और कम-से-कम 2.20 मीटर होगी।

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प्रश्न 23.
गोले का भार लड़कों और लड़कियों के लिए वर्णन करो।
उत्तर-

  1. गोले का भार लड़कों के लिए 6 किलोग्राम होगा।
  2. गोले का भार लड़कियों के लिए 4 किलोग्राम होगा।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 7 सूती कपड़ों की धुलाई

Punjab State Board PSEB 6th Class Home Science Book Solutions Chapter 7 सूती कपड़ों की धुलाई Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Home Science Chapter 7 सूती कपड़ों की धुलाई

PSEB 6th Class Home Science Guide सूती कपड़ों की धुलाई Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
धोने से पहले वस्त्रों की छंटाई का क्या कारण है ?
उत्तर-
इससे रंगदार कपड़ों का रंग सफेद कपड़ों में न लग जाए तथा अधिक गन्दे तथा कम गन्दे कपड़े भी अलग कर लिए जाते हैं।

प्रश्न 2.
गन्दे वस्त्र पहनने से क्या हानि होती है ?
उत्तर-
गन्दे वस्त्रों में रोगों के जीवाणु वास करते हैं। गन्दे वस्त्र पहनने से रोगों का संक्रमण हमारे शरीर पर हो सकता है।

प्रश्न 3.
वस्त्र धोने से पहले दाग-धब्बे क्यों छुड़ा लेने चाहिएं ?
उत्तर-
दाग-धब्बे का वस्त्र की धुलाई की विधि में और अधिक पक्का होने का भय रहता है।

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प्रश्न 4.
वस्त्रों की धुलाई के लिए पानी कैसा होना चाहिए ?
उत्तर-
मृदु।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
कपड़े को भिगोना क्यों चाहिए ?
उत्तर-
सफ़ेद सूती कपड़ों को यदि रात को भिगो कर रख दिया जाए तो मेहनत, समय तथा साबुन की बचत होती है। भिगोने से ऊपर की मैल भी नरम हो जाती है, जिससे उसे साफ़ करना सरल हो जाता है। कई तरह के दाग तथा माया भी साफ़ हो जाती है। कपड़ों को साफ़ प्लास्टिक के टब या बाल्टी में भिगोना चाहिए। लोहे की बाल्टी में जंग लगने का डर रहता है। बाल्टी या टब इतना बड़ा होना चाहिए कि इसमें सारे कपड़े तथा पानी अच्छी तरह समा जाने चाहिए। रसोई के कपड़े तथा दूसरे झाड़न तथा मोटरग्रीज़ वाले एप्रिनों को पानी में सोडा मिलाकर भिगोना चाहिए। इन्हें दूसरे कपड़ों से अलग ही भिगोना चाहिए। बिस्तरों तथा पहनने वाले कपड़ों को भी अलग-अलग भिगोना चाहिए। ज़्यादा गन्दे कपड़ों को काफ़ी नीचे तथा साफ़ कपड़ों को ऊपर रखना चाहिए। ज्यादा गन्दे भागों को साबुन लगाकर भिगोना चाहिए। कपड़ों को 24 घण्टे से अधिक समय तक एक ही पानी में नहीं भिगोना चाहिए, क्योंकि कपड़ों में बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते हैं जो कपड़ों को हानि पहुँचाते हैं।

प्रश्न 2.
सफ़ेद कपड़े पीले या स्लेटी रंग के क्यों हो जाते हैं ? इस दोष को कैसे दूर किया जा सकता है ?
उत्तर-
कई बार जब सफ़ेद कपड़े पुराने हो जाते हैं या धोने वाले साबुन में ज़्यादा क्षार होती है तो कपड़े पीले दिखाई देने लगते हैं। कपड़ों को धोने के बाद यदि उनसे अच्छी तरह साबुन न निकाला जाए या ज्यादा नील लग जाए तो कपड़े स्लेटी रंग के हो जाते हैं। इस दोष को दूर करने के लिए कपड़ों को 20 मिनटों के लिए पानी में उबालते हैं। उबालने के बाद हल्के गर्म पानी में कई बार खंगालते हैं, इसके बाद नील लगाकर धूप में सुखाते है।

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प्रश्न 3.
कपड़ों को नील कैसे तथा क्यों लगाई जाती है ?
उत्तर-
सफ़ेद सूती कपड़ों की नील लगाने के लिए इसका घोल बनाया जाता है। कपड़े को निचोड़ने के बाद इसे घोल में डालते हैं तथा हाथों से दबाते हैं। इसके बाद निचोड़कर धूप में सुखाते हैं। नील से कपड़ों में चमक आ जाती है जिससे व्यक्ति स्मार्ट लगने लगता है और उसके व्यक्तित्व में निखार आ जाता है।

प्रश्न 4.
कपड़ों को कलफ कैसे तथा क्यों लगाई जाती है ?
उत्तर-
माया का घोल बना लिया जाता है। कपड़े को निचोड़कर इसे घोल में डालते हैं तथा दोनों हाथों से दबाया जाता है। इसके बाद धूप में सुखाते हैं। इससे कपड़े में चमक आ जाती है तथा रेशा मज़बूत हो जाता है तथा सिलवटें भी नहीं पड़ती हैं।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कपड़ों को धोने से पहले उनकी क्या तैयारी करोगे ?
उत्तर-
कपड़ों को धोने से पहले तैयारी –

  1. सभी कपड़ों की अच्छी तरह जाँच करनी चाहिए।
  2. कोई भी कपड़ा कहीं से फटा या उधड़ा हों तो उसे ठीक कर लेना चाहिए।
  3. कपड़ों के बटन या हुक टूटे हुए हों तो उन्हें धोने के बाद तथा प्रेस करने से पहले ठीक कर लेना चाहिए।
  4. कपड़े धोने से पहले जेबों को देख लेना चाहिए। उनमें कोई कागज़, पैसे या कुछ और चीजें हों तो उसे निकाल लेना चाहिएं।
  5. कपड़े पर कोई ऐसे बटन या बक्कल आदि हों जिनका पानी से खराब होने का डर हो तो उन्हें उतार कर रख लेना चाहिए।
  6. कपड़ों पर कोई ऐसे दाग हों जो कि पानी तथा साबुन से न उतर सकते हों तो उन्हें पहले ही उसके विशेष प्रतिकारक से साफ़ कर लेना चाहिए।

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प्रश्न 2.
सफ़ेद कपड़ों को नील तथा माया कैसे लगाओगे ?
उत्तर-
सफ़ेद सूती कपड़ों को नील तथा माया एक साथ ही लगाए जाते हैं। माया का घोल बनाकर उसमें ही नील भी अच्छी तरह मिलाना चाहिए। कपड़े को निचोड़ने के बाद इसे घोल में डाल देना चाहिए तथा हाथों से दबाना चाहिए। इसके बाद निचोड़कर धूप में सुखा देना चाहिए।
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प्रश्न 3.
प्रैस करने के क्या नियम हैं ?
उत्तर–
प्रेस करने के निम्नलिखित नियम हैं –
1. प्रेस करने के लिए ऐसी मेज़ लेनी चाहिए जो न बहुत ऊँची, न बहुत नीची हो और हिलती भी न हो। उस पर कोई पुराना कम्बल या खेस बिछाना चाहिए तथा उसके ऊपर साफ़ चादर बिछा देनी चाहिए। चादर को मेज़ के पायों से बाँध देना चाहिए ताकि वह हिले नहीं।

2. पानी का प्याला तथा मलमल का कपड़ा बाईं ओर ऊपर से रखना चाहिए तथा प्रैस रखने के लिए पत्थर दाईं ओर नीचे की तरफ़ रखना चाहिए। पानी के छींटे मारने के लिए छिद्रों वाले ढक्कन वाला डिब्बा या बोतल भी इस्तेमाल की जा सकती है।

3. कपड़े ठीक तरह नमी युक्त होने चाहिएं। यदि कपड़े कम नमी वाले रह जाएंगे तो कपड़ों पर सिलवटें रह जाएंगी और अधिक ज़्यादा गीले हो जाने पर समय तथा ईंधन अधिक लगेगा।

4. प्रैस को गर्म कर लेना चाहिए। प्रैस सफ़ेद कपड़ों के लिए अधिक गर्म तथा रंगदार के लिए कम गर्म होनी चाहिए।

5. सफ़ेद या हल्के रंग के कपड़ों को सीधी ओर तथा गाढ़े रंग के कपड़ों को उल्टी ओर प्रैस करना चाहिए। सिलाइयों को पहले उल्टी ओर से प्रैस करना चाहिए।

6. कपड़े इकहरे प्रेस करना चाहिए तथा प्रैस को सदा सीधी रेखा में नीचे से ऊपर की ओर या दाईं ओर से बाईं ओर फेरना चाहिए।
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7. कढ़ाई वाले कपड़े को फलालेन के कपड़े पर उल्टा रखकर प्रेस करना चाहिए।

8. कपड़ों को प्रेस करने के बाद कुछ देर हवा में रखना चाहिए ताकि वे पूरी तरह सूख जाएँ।

9. इलास्टिक वाले भागों पर प्रैस नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 4.
किन-किन बातों का ध्यान रखकर कपड़ों को छांटना चाहिए ?
उत्तर-
कपड़ों को छाँटते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए –

  1. सबसे पहले रंगदार कपड़े तथा सफ़ेद कपड़ों को अलग-अलग छाँटना चाहिए। इसमें से जिन कपड़ों के रंग कच्चे हों, उनको सबसे पहले या सबसे बाद में दूसरे कपड़ों से अलग करके धोना चाहिए ताकि दूसरे कपड़ों को रंग न लगे।
  2. मुलायम कपड़े जैसे-चंदेरी, आरकण्डी, रूबिया, मलमल आदि।
  3. बाहर पहनने वाले कपड़े-सलवार, कमीज़, पैंट, फ्रॉक आदि।
  4. अन्दर पहनने वाले कपड़े-कच्छे, बनियान आदि।
  5. बिस्तरों और घर के अन्य कपड़े-चादरें, सिरहाने के गिलाफ, तौलिए, मेज़पोश, टेबल, मैटस, झाड़न नैपकिन्स आदि।
  6. छोटे बच्चों के लंगोट।
  7. रूमाल-खासकर जुकाम के लिए इस्तेमाल किए गए रूमालों को अलग धोना चाहिए।
  8. एप्रिन, रसोई के और अन्य झाड़न।

Home Science Guide for Class 6 PSEB सूती कपड़ों की धुलाई Important Questions and Answers

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हमारे वस्त्र गन्दे क्यों हो जाते हैं ?
उत्तर-
धूल व अन्य बाहरी अशुद्धियाँ तथा पसीने के सम्पर्क से।

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प्रश्न 2.
धोने से पूर्व वस्त्रों की छंटाई का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
वस्त्रों को उनकी प्रकृति एवं अवस्था के अनुसार छाँट कर अलग-अलग धोना, जैसे सफ़ेद व रंगीन वस्त्रों को अलग-अलग धोना।

प्रश्न 3.
वस्त्रों को धोने से पूर्व उनकी मरम्मत क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
फटे हुए, सिलाई हुई, उधड़े हुए या छेद हुए वस्त्रों को धोने से पूर्व उनकी मरम्मत इसलिए आवश्यक है कि वे और अधिक न फटे या न उधड़े या छेद और बड़ा न हो।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
वस्त्रों में कलफ लगाने से क्या लाभ होता है ?
उत्तर-
वस्त्रों में कलफ लगाने से निम्नलिखित लाभ होते हैं –

  1. वस्त्रों में कलफ लगाने से चमक और नवीनता आ जाती है।
  2. कपड़े में कलफ रहने से कपड़े में कड़ापन आ जाता है।
  3. कल्फ लगे वस्त्रों पर धूल नहीं जमती क्योंकि यह धागों के बीच के रिक्त स्थानों की पूर्ति करती है।
  4. वस्त्रों पर सिलवटें नहीं पड़ती हैं। वस्त्रों का आकार ठीक लगता है।
  5. कलफ लगे वस्त्र पहनने पर व्यक्ति स्मार्ट लगता है, उसके व्यक्तित्व में निखार आ जाता है। कलफ सूती वस्त्र, लिनन के वस्त्र व रेशमी वस्त्र पर किया जाता है।

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प्रश्न 2.
सूती वस्त्रों की धुलाई हम कैसे कर सकते हैं ?
उत्तर-
सूती वस्त्रों की धुलाई के लिए दो विधियाँ काम में लाई जाती हैं –
(अ) रगड़, (ब) हल्का दबाव।
रगड़कर वस्त्र धोने की विधि में साबुन, गर्म पानी, रगड़ने वाला तख्ता तथा ब्रुश की आवश्यकता होती है। इस विधि से वे वस्त्र धोए जाते हैं जो मज़बूत और टिकाऊ धागों से बने होते हैं। पानी में भिगोकर, साबुन लगाकर, रगड़ने वाले तख्ते पर ब्रश से वस्त्र को तब तक रगड़ा जाता है जब तक कि मैल पूरी तरह से दूर न हो जाए।

रंगीन तथा कोमल वस्त्रों को हल्के दबाव की विधि से धोया जाता है। टब में गुनगुना पानी लेकर उसमें साबुन का चूरा या डिटरजेन्ट पाउडर आदि घोलकर उसमें वस्त्र डाल दिए जाते हैं। बाद में हाथों द्वारा हल्के दबाव में मसलकर वस्त्रों को साफ़ किया जाता है।

वस्त्रों की धुलाई में अच्छे साबुन का प्रयोग करना चाहिए। धोते समय वस्त्रों को अधिक पीटने से उनके तन्तु कमज़ोर हो जाते हैं।

प्रश्न 3.
सूती वस्त्रों की विशेषताएं बताइए।
उत्तर-

  1. ये अत्यधिक शक्तिशाली तथा मजबूत होते हैं।
  2. इन्हें रगड़ने तथा पीटने से कोई भी हानिकारक प्रभाव नहीं होते हैं।
  3. ये ग्रीष्म ऋतु के लिए अति उत्तम होते हैं।
  4. इनमें सिलवटें शीघ्र पड़ जाती हैं।
  5. सूती वस्त्र नमी को जल्दी सोखते हैं।
  6. इन्हें धोने में किसी प्रकार की विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं होती।
  7. इनमें ताप-सहन क्षमता सबसे अधिक होती है।
  8. इन पर अम्ल का बुरा प्रभाव पड़ता है और क्षार का बुरा प्रभाव नहीं पड़ता।

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प्रश्न 4.
सूती वस्त्रों पर इस्तरी करने से क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
सूती वस्त्रों पर इस्तरी करने से निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. वस्त्रों पर चमक आ जाती है।
  2. वस्त्रों में सुन्दरता तथा निखार आ जाता है।
  3. सिलवटें समाप्त हो जाती हैं।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
भारत में सबसे अधिक कौन-से कपड़े का प्रयोग होता है ?
उत्तर-
सूती कपड़े का।

प्रश्न 2.
रंगदार कपड़ों को कहां सुखाना चाहिए?
उत्तर-
छाया में।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 7 सूती कपड़ों की धुलाई

प्रश्न 3.
कपड़े के कौन-से भाग में प्रेस नहीं करना चाहिए ?
उत्तर-
इलास्टिक वाले भाग में।

प्रश्न 4.
कढ़ाई वाले कपड़े को …………………. के कपड़े पर उल्टा रख कर प्रैस करें।
उत्तर-
फ्लालेन।

प्रश्न 5.
अधिक नील लगने से कपड़े का रंग कैसा हो जाता है ?
उत्तर-
स्लेटी।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 7 सूती कपड़ों की धुलाई

प्रश्न 6.
कौन से पानी में साबुन की झाग नहीं बनती ?
उत्तर-
भारे पानी में।

सूती कपड़ों की धुलाई PSEB 6th Class Home Science Notes

  • भारत में सबसे अधिक सूती कपड़ों को ही प्रयोग में लाया जाता है क्योंकि ये सस्ते तथा अधिक समय तक चलने वाले होते हैं।
  • सूती कपड़े धोते समय नीचे लिखी बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है –
    1. कपड़े की बनावट
    2. कपड़े का रंग (कच्चा या पक्का)
    3. कपड़े की परिसज्जा।
  • कपड़ों को छाँटते समय सबसे पहले रंगदार कपड़े तथा सफ़ेद कपड़ों को अलग-अलग कर लेना चाहिए।
  • सफ़ेद सूती कपड़ों को यदि रातभर भिगोकर रख दिया जाए तो मेहनत, समय तथा साबुन की बचत होती है।
  • रसोई के झाड़न तथा मोटर ग्रीज़ वाले एप्रिनों को पानी में सोडा मिलाकर भिगोना चाहिए।
  • बिस्तरों तथा पहनने वाले कपड़ों को भी अलग-अलग भिगोना चाहिए।
  • कपड़ों को 24 घण्टे से अधिक समय तक एक ही पानी में नहीं भिगोना चाहिए क्योंकि कपड़ों में बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते हैं जो कपड़ों को हानि पहुँचाते है।
  • सभी सफ़ेद कपड़ों को धोने के बाद खंगालना चाहिए।
  • सफ़ेद कपड़ों को धूप में सुखाना चाहिए। इससे कपड़ों में सफ़ेदी तथा ताज़गी आती है।
  • रंगदार कपड़ों को छाँव में सुखाना चाहिए ताकि उनका रंग खराब न हो।
  • सफ़ेद या हल्के रंग के कपड़ों को सीधी ओर तथा गाढ़े रंग के कपड़ों को उल्टी ओर प्रैस करना चाहिए।
  • कपड़ों को प्रेस करने के बाद कुछ देर हवा में रखना चाहिए ताकि वे पूरी तरह सूख जाएँ।

कुश्तियां : फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन (Wrestling : Free Style and Greeco Roman) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions कुश्तियां : फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन (Wrestling : Free Style and Greeco Roman) Game Rules.

कुश्तियां : फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन (Wrestling : Free Style and Greeco Roman) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. कुश्ती के मैट का आकार = गोल
  2. मैट का साइज = 4.50 अर्ध व्यास
  3. घेरे का रंग = लाल
  4. प्लेटफार्म से मैट की ऊंचाई = 1.10 मीटर
  5. कार्नर के रंग = लाल और नीला
  6. कुश्ती का समय = 6 मिनट (2, 2, 2 मिनट के तीन हाफ)
  7. पुरुषों के कुल भार = 9, तीन आफ
  8. स्त्रियों के कुल भार = 7
  9. जुनियर के भार = 10
  10. अधिकारी = मैट लेयर मैच, 2 रैफरी, 3 जज
  11. मैट के आस-पास का खाली स्थान = 1.50 मीटर
  12. राऊण्ड के पश्चात् आराम का समय = 30 सैकेण्ड

फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन कुश्तियों की संक्षेप रूपरेखा
(Brief outline of Free Style and Greeco Roman Wrestling

  1. कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लेने वाला प्रतियोगी पूर्ण रूप से स्वस्थ होना चाहिए। वह किसी छूत की बीमारी का शिकार नहीं होना चाहिए।
  2. कुश्तियों में भाग लेने वालों के नाखून अच्छी तरह से कटे होने चाहिएं। वे अपने शरीर पर तेल आदि चिकने पदार्थ नहीं मल सकते।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय मैचों के लिए 4.50 मीटर अर्द्ध-व्यास मैट का घेरा होता है।
  4. ओलम्पिक खेलों तथा विश्व चैम्पियनशिप मैचों के लिए मैट का आकार 4.50 मीटर अर्द्ध-व्यास मैट का घेरा होता है।
  5. कुश्ती का समय 6 मिनट होता है।
  6. कुश्ती करते समय विरोधी खिलाड़ी के बाल, मांस, कान या गुप्त अंगों को खींचना फाऊल है।
  7. मैट का मुखिया ‘विनर कलर’ को ऊंचा उठाकर विजेता की घोषणा करता है।
  8. यदि रैफरी किसी खिलाड़ी को तीन बार चेतावनी दे दे तो उसे हारा हुआ माना जाता है।
  9. कुश्ती लड़ने वाले खिलाड़ी की दाढ़ी कटी हुई या शेव ताज़ी होनी चाहिए।
  10. कुश्ती लड़ने वाला कड़ा या अंगूठी नहीं पहन सकता।
  11. कुश्तियों के मध्य किसी भी अधिकारी को बदला नहीं जा सकता है।

कुश्तियां : फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन (Wrestling : Free Style and Greeco Roman) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
स्कूल स्तर पर विभिन्न भारों के कुश्ती मुकाबलों का वर्णन करें।
उत्तर-
स्कूल स्तर पर प्रतियोगिताएं (Competitions at School Level)—
स्कूल स्तर पर निम्नलिखित भारों के आधार पर प्रतियोगिताएं करवाई जाती हैं—
प्रत्येक प्रतियोगी प्रतियोगिता में अपने शरीर के भार अनुरूप वाले वर्ग में भाग ले सकता है।
आयुवर्ग
(Age Group)

  1. स्कूली लड़के = 14-15 वर्ष
  2. कैडेट = 16-17 वर्ष
  3. जूनियर = 18-20 वर्ष
  4. सीनियर = 19-20 वर्ष

20 वर्ष से अधिक आयु के लिए
कुश्तियां फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 1
कुश्तियां फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 2

17 वर्ष से 20 की आयु के लिए
कुश्तियां फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 3

15 वर्ष से 16 वर्ष की आयु के लिए
कुश्तियां फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 4

13 वर्ष से 14 वर्ष की आयु के लिए सब-जूनियर लड़के
कुश्तियां फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 5

प्रत्येक प्रतियोगी प्रतियोगिता में अपने शरीर के भार अनुसार वाले वर्ग में भाग ले सकता है।
फ्री स्टाइल कुश्तियां (Free Style Wrestling) —फ्री स्टाइल कुश्तियों में शरीर के किसी भी भाग से पकड़ा जा सकता है और कोई भी तकनीक लगाई जा सकती है परन्तु बाल, कान और लंगोटा पकड़ना मना है।

ग्रीको रोमन कुश्तियां (Greeco Roman Wrestling) ग्रीको रोमन कुश्तियों में टांगों का प्रयोग वर्जित है। शरीर के ऊपरी भाग (Waist Line) से ऊपर किसी भी प्रकार की तकनीक लगाई जा सकती है परन्तु इन कुश्तियों में भी बाल, कान और लंगोटा आदि पकड़ना मना है। शेष सभी नियम फ्री स्टाइल वाले ही होते हैं।

कुश्तियां : फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन (Wrestling : Free Style and Greeco Roman) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लेने वालों के लिए भार तोलने सम्बन्धित नियमों और उनके युगल बनाने की विधि का वर्णन करो।
उत्तर-
भार तोलना (Weighing)—

  1. प्रतियोगी निर्वस्त्र होकर भार देंगे। तोल से पूर्व उनका डॉक्टरी परीक्षण किया जाएगा, किसी छूत के रोग से ग्रस्त प्रतियोगी को डॉक्टर कुश्ती में भाग लेने से रोक देगा।
  2. खिलाड़ियों की शारीरिक दशा सन्तोषजनक होनी चाहिए। उनके नाखून खूब अच्छी तरह कटे होने चाहिएं।
  3. भार तोलने का काम पहले दिन कुश्तियां आरम्भ होने से कम-से-कम एक दिन पहले आरम्भ होगा।
  4. आगामी दिनों में भार तोलने का काम कम-से-कम दो घण्टे पहले आरम्भ होगा और पहली कुश्ती से एक घण्टा पहले समाप्त हो जाएगा।
  5. यदि जोड़े बनाते समय एक स्थान के दो-दो खिलाड़ी जोड़े में आ जाएं तो वे पहले राऊण्ड में एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ेंगे।

पोशाक (Costume)—प्रतियोगी अखाड़े में एक टुकड़े वाली बनियान, जांघिया या जर्सी (लाल या नीली) में उतरेंगे और उसके नीचे वे एक लंगोटी या पेटी पहनेंगे। खिलाड़ी स्पोर्ट जूते पहनेंगे जो टखनों से अच्छी तरह बंधे होंगे। वे ऐड़ी वाले या कीलों से जड़े तले वाले जूते नहीं पहन सकते। प्रतियोगियों की दाढ़ी ताज़ी मुंडी हो या कई महीनों की बढ़ी हुई हो। निम्नलिखित बातें वर्जित हैं—

  1. बिना किसी चोट के कलाई, भुजाओं या टखनों पर पट्टियां लपेटना।
  2. कलाई घड़ी बांधना
  3. शरीर पर किसी चिकनी चीज़ का मलना।
  4. पसीने से तर होकर अखाड़े में उतरना।
  5. अंगूठी, हार, कड़ा आदि पहनना।

मैट (Mat)-मैट का आकार 4.50 मीटर अर्द्ध व्यास के गोल घेरा का होगा जिसके बाहर 50 सें०मी० का गोल घेरा लाल रंग की रेखा से अंकित होगा। दुर्घटना से बचने के लिए मैट के इर्द-गिर्द 2-2 मीटर जगह छोड़नी चाहिए। मैट को 1.10 मीटर ऊंचे प्लेटफार्म पर बिछाया जाएगा। मैट के कोने लाल या नीले रंग से चिन्हित होंगे तथा मैट के मध्य में वृत्त अंकित किया जाएगा।
कुश्तियां फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 6

कुश्ती का आरम्भ और अवधि
(Start and Duration of Wrestling Bout)

  1. प्रत्येक कुश्ती का कुल समय 5 मिनट होता है।
  2. कुश्ती उस समय तक जारी रहेगी जब तक कोई एक खिलाड़ी गिर नहीं जाता या फिर यह 5 मिनट तक जारी रहेगी।

यदि कोई खिलाड़ी अपना नाम पुकारे जाने के पश्चात् 5 मिनटों के अन्दर-अन्दर मैट पर नहीं पहुंचता तो उसे गिरा हुआ माना जाएगा और मुकाबले से बाहर निकाला हुआ माना जाएगा।

कुश्ती की समाप्ति
(End of Bout)
घंटी बजने पर कुश्ती समाप्त हो जाएगी। रैफरी की सीटी पर भी कुश्ती रुक जाती है, घंटी बजने और रैफरी की सीटी के बीच कोई भी कार्य उचित नहीं माना जाता है। मैट का मुखिया विनिंग कलर दिखा कर विजेता की सूचना देता है। रैफरी विजेता का बाजू खड़ा करके फैसला बताता है। यदि कुश्ती बराबर हो तो तीन मिनट का समय और दिया जाता है: कुश्ती कभी भी बरबर नहीं रहती। यदि आठ मिनट में अंक बराबर रहे तो मैट चेयरमैन और जज ठीक लड़ने वाले पहलवान को विजेता करार दे देते हैं अथवा जिस पहलवान को कम चेतावनी दी गई हो उसे विजयी घोषित किया जाता है।

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प्रश्न
कुश्ती में फाऊल पकड़े कौन-कौन सी होती हैं ?
उत्तर-
फाऊल पकड़ें
(Foul Holds)
निम्नलिखित फाऊल पकड़े हैं—

  1. बालों या मांस, कान, पोशाक इत्यादि को खींचना।
  2. अंगुलियों को मरोड़ना, लड़ाई-झगड़ा करना, धक्का देना।
  3. इस तरह पकड़ करनी कि वह विरोधी खिलाड़ी के लिए जान का भय बन जाए या यह भय हो कि विरोधी खिलाड़ी के अंगों पर चोट लग जाएगी अथवा उसे कष्ट दे, पीड़ा करें ताकि दूसरा खिलाड़ी विवश होकर खेल छोड़ जाए।
  4. विरोधी खिलाड़ी के पांवों पर अपने पांव रखना।
  5. विरोधी खिलाड़ी के चेहरे (आंखों की भवों से लेकर ठोड़ी तक) को स्पर्श करना।
  6. गले से पकड़ना।
  7. खड़ी स्थिति में पकड़ करनी।
  8. विरोधी को उठाना जबकि वह ‘ब्रिज़-पोजीशन’ में हो और फिर उसे मैट पर गिराना।
  9. सिर की ओर से धक्का देकर ब्रिज को तोड़ना।
  10. विरोधी खिलाड़ी के बाजू को 90° के कोण से अधिक मोड़ देना।
  11. दोनों हाथों से सिर को पकड़ना।
  12. कोहनी या घुटने को विरोधी खिलाड़ी के पेट में धकेलना।
  13. विरोधी के बाजू को पीछे की ओर मोड़ना और दबाना।
  14. किसी तरह से सिर को काबू करना।
  15. शरीर को या सिर को टांगों द्वारा कैंची मारना।
  16. मैट को पकड़े रखना।
  17. एक-दूसरे से बातें करनी और हानिकारक आक्रमण करना या गिराना।

चेतावनियां (Precautions) निम्नलिखित स्थिति में चेतावनी दी जा सकती है—
(क) स्थायी रुकावटें
(ख) फाऊल पकड़ें
(ग) कुश्ती समय अनुशासनहीनता
(घ) नियमों का उल्लंघन।

  1. ये चेतावनियां खेल के समय किए गए दूसरे फाऊलों के साथ गिनी जाएंगी।
  2. तीन सावधानियों अथवा चेतावनियों के बाद बिना कारण बताए खिलाड़ी को . पराजित घोषित किया जा सकता है।
  3. किसी बड़े उल्लंघन करने के दोष में किसी खिलाड़ी को खेल से निकाला जा सकता है।

स्थायी रुकावटें(Permanent Obstacles)—

  1. पेट के बल लेटे रहना।
  2. जान-बूझ कर मैट से बाहर जाना।
  3. विरोधी के दोनों हाथ पकड़े रखना ताकि वह खेल न सके।
  4. मैट के बाहर जाने की दशा में खिलाड़ी को चेतावनी दी जा सकती है।

कुश्तियों में रुकावट (Obstacles in Bout)
नाक में खून बहने, सिर के बाल गिरने या किसी अन्य कारण से अधिक-से-अधिक पांच मिनटों के लिए खेल को रोका जा सकता है। खेल की यह रुकावट एक या दो अवधियों में अधिक-से-अधिक पांच मिनट के लिए प्रत्येक खिलाड़ी के लिए हो सकती है।

प्रश्न
कुश्ती में स्कोर की गणना किस प्रकार होती है और निर्णय किस प्रकार दिया जाता है ?
उत्तर-
स्कोर (Score)

  1. एक अंक (प्वाइंट)-
    • उस खिलाड़ी को जो विरोधी खिलाड़ी को मैट पर गिराता है और उस पर नियन्त्रण स्थापित कर लेता है।
    • उस खिलाड़ी को जोकि नीचे से निकल कर ऊपर आ जाता है और विरोधी खिलाड़ी पर नियन्त्रण स्थापित करता है।
    • जो खिलाड़ी ठीक पकड़ लगाता है और विरोधी खिलाड़ी के सिर और कन्धों को मैट पर नहीं लगने देता।
    • एक चेतावनी का विरोधी के लिए एक प्वाऊंट होगा।
  2. दो अंक (प्वाइंट)-
    • उस खिलाड़ी को, जो ठीक पकड़ करता है और विरोधी खिलाड़ी को कुछ समय के लिए अपने अधीन रखता है (5 सैकिण्ड से कम समय के लिए)।
    • उस खिलाड़ी को, जिसका विरोधी शीघ्र ही गिर जाता है या लुढ़कता हुआ गिर जाता है।
      कुश्तियां फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education 7
  3. तीन अंक (प्वाइंट)-
    • जो खिलाड़ी अपने विरोधी को खतरे में रखता है (कंधे मैट से पांच सैकिण्ड तक 90° से कम कोण बनाते हों।)
    • कई बार लुढ़कते हुए गिर जाने की स्थिति या 5 सैकिण्ड निरन्तर तीन की संख्या तक ब्रिज की स्थिति।

निर्णय (Decision)-जब विरोधी खिलाड़ियों का अन्तर एक अंक (प्वाइंट) से कम हो तो मैच बराबर रहता है, यदि कोई भी अंक न बना हुआ हो या अंक बराबर हों तो भी कुश्ती बराबर हो जाएगी। यदि एक से अधिक नम्बरों का अन्तर हो तो अधिक नम्बरों वाला खिलाड़ी विजयी होगा।
गिरना (Fall)

  1. पूरी तरह गिर जाने के लिए खिलाड़ी के कंधे और मैट का सम्पर्क ही पर्याप्त है।
  2. मैट के किनारे पर ठीक गिर जाने के लिए इतना ही काफ़ी है कि गिरने पर सिर और कंधे मैट को छू जाएं।
  3. यदि जज कोई आपत्ति न करे तो गिर जाना ठीक माना जाता है।

अंकों (प्वाइंटों) पर जीतना—
यदि 5 मिनटों में फाऊल न हो तो फैसला अंकों (प्लाइंटों) पर किया जाता हो, अधिक अंक प्राप्त करने वाला खिलाड़ी विजयी होगा।

फाइनल के लिए नियम
(Rules of Final)

  1. फाइनल दो खिलाड़ियों में होगा।
  2. जब तीन खिलाड़ी 6 पैनेल्टी अंक से फाइनल में पहुंच जाएं तो प्राप्त किए अंक समाप्त हो जाते हैं।
  3. यदि पहलवान पहले मुकाबला कर चुके हो तो फिर कुश्ती नहीं होती।
  4. फाइनल में खेलने वाले तीन खिलाड़ियों के पैनल्टी अंकों की गणना अवश्य ध्यान में रखी जाएगी।
  5. यदि तीन में से प्रत्येक खिलाड़ी ने पहले ही 6 पैनल्टी अंक प्राप्त कर लिए हों तो वे पहले लिखे अनुसार अंक खो देंगे।
  6. यदि फाइनल में पहुंचे तीनों खिलाड़ियों ने पहले ही 6 अंक लिए हों तो उसे तीसरा स्थान प्राप्त होगा, शेष दो प्रथम स्थिति के लिए कुश्ती करेंगे और पहले पैनल्टी प्वाइंट खो देते हैं।
  7. विजयी वह होगा जो अन्तिम तीनों कुश्तियों के समय कम-से-कम पैनल्टी अंक प्राप्त करें।
  8. यदि फाइनल के खिलाड़ियों के पैनल्टी अंक बराबर हों तो उनकी स्थिति इस तरह होगी। कुश्ती लड़ने पर इन्कार करने वाले पहलवान को काशन दिया जाता है और विरोधी पहलवान को एक अंक।

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PSEB 10th Class Physical Education Practical कुश्तियां : फ्री स्टाइल एवं ग्रीको रोमन (Wrestling : Free Style and Greeco Roman)

प्रश्न 1.
कुश्तियों के भारों का वर्णन करो।
उत्तर-
कुश्तियों के भार निम्नलिखित हैं—
WRESTLING WEIGHT CATEGORIES WOMEN

MEN WOMEN JUNIOR
50 kg 44 kg 42 kg
54 kg 48 kg 46 kg
58 kg 52 kg 50 kg
63 kg 56 kg 54 kg
69 kg 61 kg 58 kg
76 kg 66 kg 63 kg
85 kg +66 kg 69 kg
97 kg 76 kg
130 kg 85 kg
100 kg

Men = Total of Nine Categories
Women = Total of Seven Categories
Junior = Total of Ten Categories

प्रश्न 2.
कुश्तियों का समय बताइए।
उत्तर-
कुश्तियों का समय 6 मिनट होता है।

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प्रश्न 3.
कुश्तियों के मैट की लम्बाई-चौड़ाई बताओ।
उत्तर-
कुश्तियों के मैट 4.50 अर्द्धव्यास मीटर के होने चाहिएं। ओलिम्पिक खेलों में विश्व चैम्पियनशिप मैचों में मैट का आकार 4.50 अर्द्धव्यास मीटर होता है।

प्रश्न 4.
रैफ़री एक खिलाड़ी को किनती बार चेतावनी दे सकता है ?
उत्तर-
यदि रैफ़री किसी खिलाड़ी को तीन बारी चेतावनी दे दे तो उसको हारा हुआ माना जाता है।

प्रश्न 5.
कुश्ती लड़ने वाले खिलाड़ी के लिए किस तरह का पहरावा होना चाहिए ?
उत्तर-
कुश्ती लड़ने वाले खिलाड़ी के लिए एक पीस का लाल या पीले रंग का पटका होना चाहिए। पोशाक शरीर के साथ चिपकी हुई होनी चाहिए। खिलाड़ी एड़ी और कीलों वाले बूट नहीं पहन सकता।

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प्रश्न 6.
कुश्ती में हार-जीत का निर्णय किस प्रकार होता है ?
उत्तर-
कुश्तियों में गिर जाने पर या अधिक अंक ले जाने वाले को विजयी करार दिया जाता है।

प्रश्न 7.
कश्तियों में स्कोर कैसे गिने जाते हैं ?
उत्तर-

  1. प्वाईंट स्कोर (Point Score)—यह उस खिलाड़ी को दिया जाता है – अपने विरोधी खिलाड़ी को मैट पर गिराकर उस पर अपना पूरा अधिकार कर लेता है। उस खिलाड़ी को भी जो दूसरे खिलाड़ी के नीचे से निकल कर ऊपर आकर उस पर अधिक प्राप्त कर लेता है।
    उस खिलाड़ी को भी जो कि ठीक पकड़ करता है, सावधानी (Caution) का एक प्वाईंट विरोधी को दिया जाता है।
  2. Points-उस खिलाड़ी को जो अपने विरोधी को ठीक पकड़ द्वारा कुछ समय (पांच सैकिंड) के लिए विकट स्थिति में रखता है।
  3. Points-उस खिलाड़ी को जो अपने विरोधी को (मैट के साथ) कंधों से 90° से कम कोण बनाते हुए, विकट स्थिति (In danger) में पांच सैंकिंड तक रखता है।

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प्रश्न 8.
कुश्तियों का निर्णय किस प्रकार होता है ?
उत्तर-
निर्णय (Decision) जब दो विरोधी खिलाड़ियों के स्कोर का अन्तर एक प्वाईंट से कम हो तो कुश्ती को बराबर घोषित (Declare a draw) किया जाता है।
जब एक बार या एक से अधिक प्वाईंट (Points) का अन्तर हो तो अधिक प्वाईंट प्राप्त करने वाले खिलाड़ी को विजयी घोषित किया जाएगा।
यदि स्कोर शीट पर कोई भी प्वाईंट दर्ज न हो या दोनों खिलाड़ियों के प्वाईंट बराबर हों तो कुश्ती को बराबर घोषित किया जाएगा।

प्रश्न 9.
कुश्तियों के अधिकारियों के बारे में बताओ।
उत्तर-
कुश्तियों में जितनी भी प्रतियोगिताएं होती हैं, उनमें तीन अधिकारी होते हैं।

  1. मैट चेयरमैन (Mat Chairman)
  2. रैफरी (Referee)
  3. जज (Judge)

कुश्ती के मध्य किसी भी अधिकारी को बदला नहीं जा सकता है।

प्रश्न 10.
कुश्तियों के भार तोलने सम्बन्धी कुछ नियम बताओ।
उत्तर-

  1. भार तोलने का काम कुश्तियों के मुकाबले के आरम्भ होने के चार घण्टे पहले शुरू किया जाएगा।
  2. प्रत्येक प्रतियोगी (Competitor) अपने बराबर भार वाले के साथ कुश्ती लड़ सकता है।
  3. प्रतियोगी (Competitor) किसी छूत की बीमारी का रोगी नहीं होना चाहिए। वह पूरी तरह स्वस्थ होना चाहिए।
  4. प्रतियोगी (Competitors) नंगे तोले जाएंगे।
  5. उनके नाखून (Nails) छोटे काटे हुए होने चाहिएं। यह भार तोलते समय चैक किए जाएंगे।

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प्रश्न 11.
कुश्तियों में फाऊल पकड़ें कौन-कौन सी होती हैं ?
उत्तर-
फाऊल पकड़ें (Foul Holds)—

  1. बाल, मांस, कान और गुप्त अंगों को खींचना।
  2. अंगुलियां मरोड़ना, गल दबाना और जीवन के लिए घातक दूसरी तरह की पकड़ें।
  3. अपने विरोधी के बाजू को 90° के कोण से अधिक मोड़ना।
  4. कैंची (Scissors grip) मार कर सिर या शरीर को पकड़ना।
  5. विरोधी के जांघिए (कपड़े) को पकड़ना।
  6. कुश्ती करने वालों का आपस में बातचीत करना।

PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन समूह और सन्तुलित भोजन

Punjab State Board PSEB 7th Class Home Science Book Solutions Chapter 3 भोजन समूह और सन्तुलित भोजन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Home Science Chapter 3 भोजन समूह और सन्तुलित भोजन

PSEB 7th Class Home Science Guide भोजन समूह और सन्तुलित भोजन Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
अनाज से कौन-सा पोषक तत्त्व प्रमुख रूप से प्राप्त होता है?
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट।

प्रश्न 2.
दालों में सबसे अधिक कौन-सा पौष्टिक तत्त्व पाया जाता है?
उत्तर-
प्रोटीन।

प्रश्न 3.
फलों से कौन-से पौष्टिक तत्त्व प्राप्त होते हैं?
उत्तर-
फलों से विटामिन तथा खनिज लवण तथा मीठे फलों से कार्बोहाइड्रेट।

PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन समूह और सन्तुलित भोजन

प्रश्न 4.
दूध में कौन-से पोषक तत्त्व नहीं पाये जाते?
उत्तर-
दूध में लोहा और विटामिन ‘सी’ तत्त्व नहीं पाए जाते हैं।

प्रश्न 5.
सूखे मेवों में से हमें कौन-से मुख्य पौष्टिक तत्त्व मिलते हैं?
उत्तर-
प्रोटीन, लोहा तथा विटामिन ‘बी’।

प्रश्न 6.
हरी मिर्च से कौन-सा पौष्टिक तत्त्व मिलता है?
उत्तर-
विटामिन ‘सी’।

PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन समूह और सन्तुलित भोजन

प्रश्न 7.
सोयाबीन किस पौष्टिक तत्त्व का मुख्य साधन है?
उत्तर-
प्रोटीन का।

प्रश्न 8.
गुड़, शक्कर और चीनी से कौन-सा पोषक तत्व प्राप्त होता है?
उत्तर-
ये हमें कार्बोहाइड्रेट देते हैं।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन को कौन-कौन से भोजन समूहों में बाँटा जा सकता है?
उत्तर-
भोजन के सात समूह हैं-

  1. कई प्रकार के अनाज,
  2. कई प्रकार की दालें और सूखे मेवे,
  3. भांति-भांति की सब्जियाँ,
  4. ताजे फल,
  5. दूध और दूध से बनी वस्तुएं,
  6. मांस समूह,
  7. गुड़, चीनी, तेल और तेलों के बीज।

PSEB 7th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन समूह और सन्तुलित भोजन

प्रश्न 2.
सन्तुलित भोजन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-
विभिन्न भोज्य पदाथों के मिश्रण से बना वह आहार जो हमारे शरीर को सभी पौष्टिक तत्त्व हमारी शारीरिक आवश्यकतानुसार, उचित मात्रा में प्रदान करता है, सन्तुलित भोजन (Balanced food) कहलाता है।

प्रश्न 3.
ताजी सब्जियाँ और फल हमारे लिए क्यों आवश्यक हैं?
उत्तर-
ताजी सब्जियाँ-इस समूह में पत्ते वाली और बिना पत्ते वाली सभी सब्जियाँ शामिल हैं। इसमें हमें विटामिन और खनिज लवण मिलते हैं। हरे मटर, लोबिये की फलियों आदि से काफ़ी मात्रा में प्रोटीन मिलती है। फल-फलों में ग्लूकोज़ होता है जो बड़ी आसानी से पच जाता है। फलों में प्रोटीन और वसा (चिकनाई) नहीं होती, परन्तु विटामिन ‘ए’, ‘सी’, और लोहा काफ़ी मात्रा में होता है। कुछ मात्रा में विटामिन ‘बी’ भी मिलते हैं।

प्रश्न 4.
सोयाबीन का दूध और दही कैसे बनाते हैं?
उत्तर-
सोयाबीन का दूध बनाने के लिए उसे 3-4 घण्टे तक पानी में भिगोते हैं। अब धूप में सुखाकर उसका छिलका उतार लेते हैं। अब रातभर पानी में भिगोकर रगड़ते हैं जिससे छिलका साफ़ हो जाए। इसके बाद इसे 10 मिनट तक सोडियम बाइकार्बोनेट के गरम घोल में गिो देते हैं। इस मिश्रण को 15 मिनट तक उबालकर ठण्डा करते हैं। अब इसे छान लेते और इस प्रकार सोयाबीन का दूध तैयार हो जाता है। इसका दही बनाने के लिए दूध में थोड़ी चीनी या शहद मिलाकर और थोड़ा खट्टा मिलाकर दूध को जमा देते हैं।

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प्रश्न 5.
चावल को पकाते समय इनके पौष्टिक तत्त्वों को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है?
उत्तर-
चावलों को पकाते समय इसके पौष्टिक तत्त्वों को मॉड़ नहीं निकालकर सुरक्षित रखा जा सकता है।

प्रश्न 6.
सबसे बढ़िया दाल कौन-सी है और क्यों?
उत्तर-
सबसे बढ़िया दाल सोयाबीन की है, क्योंकि इसमें प्रोटीन और विटामिन ‘बी’ की अधिक मात्रा होती है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एक साधारण काम करने वाले व्यक्ति को कितने भोजन की ज़रूरत होती है ?
उत्तर-
साधारण काम करने वाले व्यक्ति का भोजन –
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प्रश्न 2.
नीचे लिखे भोजनों से हमें क्या-क्या मिलता है दूध, मीट, गेहूँ, सोयाबीन।
उत्तर-
दूध से-प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा (चिकनाई), विटामिन ‘ए’, ‘बी’, ‘डी’, चूना और फॉस्फोरस।
मीट से-प्रोटीन, लोहा, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, ‘ए’ और ‘बी’।
गेहूँ से- प्रोटीन, विटामिन और खनिज लवण। – सोयाबीन-प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेटस, लोहा, कैल्शियम, विटामिन ‘बी’ आदि।

प्रश्न 3.
क्या गेहूँ सम्पूर्ण आहार है ? इसे सम्पूर्ण आहार कैसे बनाया जा सकता है।
उत्तर-
हाँ, गेहूँ सम्पूर्ण भोजन है क्योंकि इसमें अन्य अनाज़ों की अपेक्षा प्रोटीन अधिक और अच्छी किस्म का होता है। इसके अतिरिक्त इसमें विटामिन और खनिज लवण भी होते हैं। अन्य अनाजों की तरह इसमें अधिकतर कार्बोहाइड्रेट होते हैं। क्योंकि ज़्यादातर इसके पौष्टिक तत्त्व छिलके के पास ही होते हैं, इसलिए आटा अगर मशीन से बारीक पीसा जाए या मैदा बना लिया जाए तो पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं और मैदा में केवल कार्बोहाइड्रेट ही रह जाते हैं। इसे सम्पूर्ण भोजन बनाने के लिए दालें, दूध, सब्जियाँ और दूसरे आहारों का भी इस्तेमाल किया जाता है।

प्रश्न 4.
गेहूँ और मक्की के पौष्टिक तत्त्वों की तुलना करो।
उत्तर-
गेहूँ के छिलके के पास अधिक पौष्टिक तत्व होते हैं यदि इसे बारीक पीस दिया जाए तो इसके अत्यधिक पौष्टिक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसलिए गेहूँ और मक्का के आटे को बारीक नहीं पीसना चाहिए।

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प्रश्न 5.
अपने लिए एक दिन के सन्तुलित भोजन की सूची बनाओ।
उत्तर-
अपने लिए एक दिन के सन्तुलित भोजन की सूची –

मांसाहारी नाश्ता शाकाहारी नाश्ता
आमलेट पौष्टिक परांठे
दूध दही
मक्खन वाले टोस्ट चाय
अमरूद
मांसाहारी दोपहर का खाना शाकाहारी दोपहर का खाना
दाल दाल
आलू गोभी आलू फलियां
रायता रायता
फुलके फुलके
सन्तरा सन्तरा
शाम की चाय शाम की चाय
चाय चाय
मैदे के मटर बिस्कुट
रात का खाना रात का खाना
पालक मीट सरसों का साग
चावल मक्की की रोटी
सलाद सलाद
कोई मीठी चीज़ खीर।

Home Science Guide for Class 7 PSEB भोजन समूह और सन्तुलित भोजन Important Questions and Answers

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
हरी साग-सब्जियों में कौन-कौन से पोषक तत्त्व मिलते हैं?
उत्तर-
कैल्शियम, लोहा, विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘सी’ तथा अन्य खनिज लवण।

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प्रश्न 2.
किन व्यक्तियों के लिए भोजन में हरी स! जयों का समावेश अति आवश्यक है?
उत्तर-
बच्चों, गर्भवती तथा स्तनपान करवाने वाली महिलाओं के लिए।

प्रश्न 3.
विटामिन ‘ए’ किन फलों से अधिक मिलता है?
उत्तर-
पपीता, आम तथा दूसरे पीले रंग के फलों से।

प्रश्न 4.
आहार में मसालों का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
मसाले भोजन को सुगन्धित, आकर्षक, स्वादिष्ट तथा सुपाच्य बनाते हैं।

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प्रश्न 5.
कितने प्रतिशत लोग कार्बोहाइड्रेट्स की पूर्ति अनाज से करते हैं?
उत्तर-
लगभग 70 से 80% लोग।

प्रश्न 6.
सोयाबीन व मूंगफली के दूध में कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्व होते हैं?
उत्तर-
प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, लोहा, कैल्शियम, विटामिन ‘बी’ आदि।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
जन्तुओं से प्राप्त होने वाले भोज्य-पदार्थों के नाम बताओ।
उत्तर-
जन्तुओं से प्राप्त होने वाले भोज्य-पदार्थ निम्नलिखित हैं

  1. दूध तथा दूध से बनी वस्तुएँ-दूध से बनी वस्तुआ में प्रमुख हैं-क्रीम, दही, मक्खन, मट्ठा, घी, पनीर।
  2. मांस।
  3. मछली।
  4. अण्डे।
  5. जन्तुओं से प्राप्त होने वाले वसा एवं तेल।

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प्रश्न 2.
मांस, मछली तथा अण्डों से मिलने वाले भोजन की क्या विशेषताएं हैं?
उत्तर-
मांस, मछली, मुर्गा आदि में उत्तम किस्म की प्रोटीन व विटामिन ‘बी’ उचित मात्रा में पाए जाते हैं। इनमें विटामिन ‘ए’ नहीं होता। मछलियों में कैल्शियम होता है।
अण्डे में विटामिन ‘सी’ को छोड़कर सभी पौष्टिक तत्त्व पाए जाते हैं।

प्रश्न 3.
मूंगफली का दूध किस प्रकार तैयार किया जाता है?
उत्तर-
मूंगफली का दूध बनाने के लिए उत्तम किस्म की मूंगफली का प्रयोग किया जाता है। सबसे पहले मूंगफली का छिलका उतार कर दानों को तीन घण्टे के लिए पानी में भिगो देते हैं। अब उन्हें सिल पर या मिक्सी में पीस कर लुगदी बना लेते हैं। किलोग्राम लुगदी में 30 कप पानी मिलाकर उसमें 1/2 कप चूने का स्वच्छ पानी मिला देते हैं। घोल को छानकर 25 मिनट तक उबालते हैं। इसमें चीनी मिलाते हैं। दूध तैयार हो जाता है।

प्रश्न 4.
फलों के रस उपयोगी पेय हैं, क्यों?
उत्तर-

  1. इनमें प्रोटीन, शर्करा, खनिज लवण तथा विटामिन आदि पोषक तत्त्व पाए जाते हैं।
  2. ये मानव शरीर की गर्मी शान्त करते हैं।
  3. ये प्यास बुझाने के साथ-साथ मस्तिष्क को शीतल एवं बलिष्ठ बनाते हैं।
  4. ये स्वादिष्ट तथा पौष्टिक पेय होते हैं।

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प्रश्न 5.
चाय का मानव शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है, क्यों?
उत्तर-
चाय के अधिक सेवन से निम्न हानिकारक प्रभाव होते हैं

  1. दिल की धड़कन तेज़ होकर रक्त-प्रवाह की गति तेज़ हो जाती है।
  2. पसीना अधिक बनता है।
  3. टैनिक अम्ल पाचन क्रिया को कमजोर बनाता है तथा कब्ज की शिकायत रहने लगती है।
  4. अनिद्रा रोग हो जाता है।
  5. भूख नहीं लगती।

प्रश्न 6.
हरी शाक-सब्जियों व जड़ों वाली सब्जियों की विशेषताएं बताइए।
उत्तर-
हरी शाक सब्जियों जैसे-पालक, बथुआ, चौलाई, धनिया और दूसरी पत्तेदार सब्जियाँ प्रत्येक व्यक्ति के लिए ज़रूरी हैं। इन सबसे हमें कैल्शियम, लोहा, विटामिन “ए” और “सी” तथा अन्य खनिज लवण मिलते हैं। गर्भवती तथा स्तनपान करवाने वाली महिलाओं तथा बच्चों के लिए भोजन में इन हरी सब्जियों का होना जरूरी होता है।

प्रश्न 7.
वनस्पति दूध की क्या विशेषता है?
उत्तर-
वनस्पति दूध-यह वनस्पति पदार्थ सोयाबीन व मूंगफली से प्राप्त होता है। इनसे प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, लोहा, कैल्शियम, विटामिन “बी” इत्यादि सभी प्रकार के पोषक पदार्थ अधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 8.
मक्की में पौष्टिक तत्वों के बारे में बताएं।
उत्तर-
इसमें प्रोटीन, चिकनाई, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन ए होता है। प्रोटीन अच्छी किस्म का नहीं है तथा विटामिन ‘बी’ कम होता है।

प्रश्न 9.
गेहूँ और मक्की के पौष्टिक तत्त्वों की तुलना करो।
उत्तर-

गेहूँ में पौष्टिक तत्त्व मक्की में पौष्टिक तत्त्व
गेहूँ में प्रोटीन अन्न अनाजों से अच्छी किस्म का होता है। इसमें खनिज लवण, कार्बोहाइड्रेट, लोहा, विटामिन ‘बी’ होते । इसमें पौष्टिक तत्त्व गेहूँ जितने ही होते हैं। इसमें गेहूँ से अधिक चिकनाई (वसा) और साथ में विटामिन ‘ए’ भी होता है। लेकिन इसकी प्रोटीन अच्छी किस्म की नहीं होती, न ही इसमें विटामिन ‘बी’ होती है।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
उच्च स्तर का कार्बोहाइड्रेट किस अनाज से प्राप्त होता है?
उत्तर-
चावल से।

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प्रश्न 2.
रॉगी में कौन-सा खनिज लवण पाया जाता ह?
उत्तर-
कैल्शियम।।

प्रश्न 3.
दालों को अनाज के साथ मिलाकर खाने से क्या लाभ होता है?
उत्तर-
भोजन की पौष्टिकता बढ़ जाती है।

प्रश्न 4.
अंकरित दालें किस विटामिन का उत्तम स्त्रोत होती हैं?
उत्तर-
विटामिन ‘सी’ का।

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प्रश्न 5.
जड़ों वाली सब्जियों में मुख्य रूप से कौन-सा पोषक तत्त्व प्राप्त होता है?
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट।

प्रश्न 6.
विटामिन ‘सी’ का मुख्य स्रोत क्या है?
उत्तर-
आंवला।

प्रश्न 7.
भोजन के कितने समूह हैं?
उत्तर-
सात।

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प्रश्न 8.
गेहूँ ……………. आहार है।
उत्तर-
सम्पूर्ण।

प्रश्न 9.
जड़ वाली सब्जियों में ……… अधिक मिलता है।
उत्तर-
कार्बोहाइड्रेट्स।

प्रश्न 10.
चीनी से क्या मिलता है?
उत्तर-
ऊर्जा (कार्बोज)।

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प्रश्न 11.
मक्की में कौन-सा विटामिन कम होता है?
उत्तर-
विटामिन ‘बी’।

भोजन समूह और सन्तुलित भोजन PSEB 7th Class Home Science Notes

  • हमारा शरीर कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, गन्धक, फॉस्फोरस, चूना, लोहा तथा अन्य कई रासायनिक तत्त्वों से मिलकर बना है।
  • गेहूँ सभी अनाजों से उत्तम माना जाता है।
  • भोजन में विटामिन ‘बी’ वाले और कोई खाद्य-पदार्थ शामिल न हों तो बेरी बेरी नामक रोग होने का भय रहता है।
  • गेहूँ एक सम्पूर्ण आहार नहीं है। इसलिए इसके साथ-साथ दालें, दूध, सब्जियाँ और दूसरे आहारों का भी प्रयोग करना चाहिए।
  • छिलके वाली और साबुत दालों का प्रयोग अधिक करना चाहिए क्योंकि इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है।
  • जड़ वाली सब्जियाँ-इनमें अधिक कार्बोहाइड्रेट मिलते हैं। ताजी सब्ज़ियाँ-इनमें हमें विटामिन और खनिज लवण मिलते हैं।
  • पत्ते वाली सब्जियाँ- इनमें लोहा, सोडियम, फॉस्फोरस, चूना, आयोडीन और गन्धक होता है। जितने गहरे रंग के पत्ते हों उतना ही ज़्यादा विटामिन ‘ए’ होता है।
  • आँवला, नींबू और टमाटर में विटामिन
  • ‘सी’ काफ़ी अधिक होता है। सभी फलों की अपेक्षा अमरूद में विटामिन ‘सी’ ज़्यादा होता है।
  • पपीता में शक्कर और विटामिन ‘ए’ काफ़ी मात्रा में होते हैं।
  • शाकाहारी लोगों को दूध, दही और पनीर का प्रयोग अधिक करना चाहिए।
  • दूध को फटा कर पनीर तैयार किया जाता है।
  • भारत में अधिकतर भेड़ों और बकरों का मीट खाया जाता है।
  • मांस दो प्रकार के होते हैं-(i) पट्टे का मांस, (ii) खास अंगों का मांस जैसे कलेजी, गुर्दा, मगज आदि।
  • सन्तुलित भोजन उसे कहते हैं जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन और खनिज की ठीक मात्रा शामिल हो।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 19 अंग्रेजी साम्राज्य के समय में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 19 अंग्रेजी साम्राज्य के समय में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 19 अंग्रेजी साम्राज्य के समय में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
अंग्रेजी साम्राज्य की व्यापारिक, औद्योगिक तथा लगान सम्बन्धी नीतियों का भारत की अर्थ-व्यवस्था तथा समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-
भारत मे ब्रिटिश राज्य की व्यापारिक, औद्योगिक तथा लगान सम्बन्धी नीतियों का भारत के सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र पर बहुत प्रभाव पड़ा। भारत जो कि कृषि प्रधान देश था, कई बार अकाल का शिकार हुआ। किसानों की दशा दिन-प्रतिदिन बिगड़ने लगी। ब्रिटिश सरकार ने कृषक तथा कृषि की ओर कोई ध्यान न दिया। देश में जो थोड़े बहुत कुटीर-उद्योग थे, उन्हें भी इंग्लैंड की औद्योगिक उन्नति के लिए नष्ट कर दिया गया। ब्रिटिश राज्य में भारत आर्थिक रूप से ऐसा पिछड़ा कि आज तक भी नहीं सम्भल सका। भारतीय अर्थ-व्यवस्था पर ब्रिटिश राज्य का प्रभाव निम्नलिखित बातों से जाना जा सकता है

I. कृषि पर प्रभाव –

1. भूमि का स्वामित्व-अंग्रेज़ों से पूर्व भारत में भूमि आजीविका कमाने का साधन था । इसे न तो खरीदा जा सकता था और न बेचा जा सकता था। भूमि पर कृषि करने वाले उपज का एक निश्चित भाग भूमि-कर के रूप में सरकार को दे दिया करते थे, परन्तु अंग्रेजों ने इस आदर्श प्रणाली को समाप्त कर दिया। लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल में भूमि का स्थायी बन्दोबस्त किया। इसके अनुसार भूमि सदा के लिए ज़मींदारों को दे दी गई। उन्हें सरकारी खज़ानों में निश्चित कर जमा करना होता था। वे यह ज़मीन अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यक्ति को दे सकते थे। इस तरह भूमि पर कृषि करने वालों का दर्जा एक नौकर के समान हो गया। स्वामी सेवक बन गए और भूमि-कर उगाहने वाले सेवक स्वामी बन गए।

2. कृषकों का शोषण- अंग्रेजी शासन के अधीन भूमि की पट्टेदारी की तीन विधियां आरम्भ की गईं-स्थायी प्रबन्ध, रैय्यतवाड़ी प्रबन्ध तथा महलवाड़ी प्रबन्ध । इन तीनों विधियों के अन्तर्गत किसानों को ऐसे अनेक कष्ट सहने पड़े। भूमि का स्वामी किसानों को जब चाहे भूमि से बेदखल कर सकता था। इस नियम का सहारा लेकर वह किसानों से मनमानी रकम ऐंठने लगा। भूमि की सारी अतिरिक्त उपज वह स्वयं हड़प जाते थे। किसानों के पास इतना अनाज भी नहीं बचा था कि उन्हें पेट भर भोजन मिल सके। रैयतवाड़ी प्रथा के अनुसार तो किसानों को और भी अधिक कष्ट उठाने पड़े। किसान भूमि के स्वामी तो मान लिए गए, परन्तु कर की दर इतनी अधिक थी कि इनके लिए कर चुकाना भी कठिन था। कर चुकाने के लिए किसान साहूकारों से ऋण ले लिया करते थे और सदा के लिए साहूकार के चंगुल में फंस जाते थे। वास्तव में वह किसान जो भूस्वामी हुआ करता था, अंग्रेज़ी राज्य की छाया में मजदूर बन कर रह गया।

3. कृषि का पिछड़ापन- अंग्रेज़ी शासन के अधीन कृषक के साथ-साथ कृषि की दशा भी बिगड़ने लगी। कृषक पर भारी कर लगा दिए गए। ज़मींदार उससे बड़ी निर्दयता से रकम ऐंठता था। ज़मीदार स्वयं तो शहरों में रहते थे । उनके मध्यस्थ किसानों की उपज का अधिकतर भाग ले जाते थे। ज़मींदार की दिलचस्पी पैसा कमाने में थी। वह भूमि सुधारने में विश्वास नहीं रखता था। इधर किसान दिन-प्रतिदिन निर्धन तथा निर्बल होता जा रहा था। अत: वह भूमि में धन तथा श्रम दोनों ही नहीं लगा पा रहा था। उसे एक और भी हानि हुई। इंग्लैंड का मशीनी माल आ जाने से ग्रामीण उद्योग-धन्धे नष्ट हो गए। अतः खाली समय में वह इन उद्योगों द्वारा जो पैसे कमाया करता था, अब बन्द हो गया। अब मुकद्दमेबाज़ी उसके जीवन का अंग बन गई । इन मुकद्दमों पर उसका समय तथा धन दोनों ही नष्ट होने लगे और कृषि पिछड़ने लगी। संक्षेप में, अंग्रेज़ों की भूराजनीति ने कृषक के उत्साह को बड़ी ठेस पहुंचाई जो कृषि के लिए हानिकारक सिद्ध हुई।

II. उद्योगों पर प्रभाव-

1. भारतीय सूती कपड़े के उद्योग का विनाश- अंग्रेजी राज्य स्थापित होने से पूर्व भारतीय सूती कपड़ा उद्योग उन्नति की चरम सीमा पर पंहुचा हुआ था। भारत में बने सूती कपड़े की इंग्लैंड में बड़ी मांग थी। इंग्लैंड की स्त्रियां भारत के बेलबूटेदार वस्त्रों को बहुत पसन्द करती थीं। कम्पनी ने आरम्भिक अवस्था में कपड़े का निर्यात करके खूब पैसा कमाया। परन्तु 1760 तक इंग्लैंड ने ऐसे कानून पास कर दिए जिनके अनुसार रंगे कपड़े पहनने की मनाही कर दी गई। इंग्लैंड की एक महिला को केवल इसलिए 200 पौंड जुर्माना किया गया था क्योंकि उसके पास विदेशी रूमाल पाया गया था। इंग्लैंड का व्यापारी तथा औद्योगिक वर्ग कम्पनी की व्यापारिक नीति की निन्दा करने लगा। विवश होकर कम्पनी को वे विशेषज्ञ इंग्लैंड वापस भेजने पड़े जो भारतीय जुलाहों को अंग्रेजों की मांगों तथा रुचियों से परिचित करवाते थे। इंग्लैंड की सरकार ने भारतीय कपड़े पर आयात कर बढ़ा दिया और कम्पनी की कपड़ा सम्बन्धी आयात नीति पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए। इन सब बातों के परिणामस्वरूप भारत के सूती वस्त्र उद्योग को भारी क्षति पहुंची।

2. निर्धनता, बेकारी तथा अकाल- अंग्रेजी राज्य की स्थापना से भारत में निर्धनता का अध्याय आरम्भ हुआ। किसान भारी करों के बोझ तले दबने लगे। उनके गाढ़े पसीने की कमाई ज़मींदार, साहूकार तथा सरकार लूटने लगी। उन्हें पेट भर रोटी नसीब नहीं होती थी। इधर आर्थिक शोषण, करों की ऊंची दर तथा भारतीय धन की निकासी के कारण भी निर्धनता बढ़ने लगी। गरीबी की चरम सीमा उस समय देखने को मिली जब भारत 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अकालों की लपेट में आ गया। उत्तर प्रदेश के अकाल (1860-61 ई०) में 2 लाख लोग मरे। पूर्वी प्रान्तों में फैले अकाल (1865-66 ई०) में 20 लाख लोगों की जानें गईं। दस लाख लोग केवल उड़ीसा राज्य में मरे। राजपूताना की रियासतों की जनसंख्या का तीसरा या चौथा भाग अकाल की भेंट चढ़ गया। 1876-78 ई० के अकाल ने तो त्राहि-त्राहि मचा दी। इस अकाल के कारण महाराष्ट्र के आठ लाख, मद्रास के तैंतीस लाख तथा मैसूर के लगभग 20 % लोग मृत्यु का ग्रास बने। ब्रिटिश राज्य में इन भयानक-दृश्यों के साथ-साथ बेकारी का दौर भी जारी रहा। अनेक कारीगर बेकार थे। व्यापारियों का व्यापार नष्ट हो चुका था। लाखों किसान अपनी ज़मीनें छोड़ कर भाग गए थे।

3. ग्रामीण उद्योगों का विनाश- अंग्रेजी राज्य स्थापित होने से अंग्रेजी माल भारतीय गांवों में पहुंचने लगा। यह माल बढ़िया तथा सस्ता होता था। परिणामस्वरूप ग्रामीण उद्योगों को बड़ा धक्का लगा। ग्रामीण कारीगरों के हाथों से ग्राहक निकलने लगे और वे (कारीगर) अपना धंधा छोड़ काश्तकार के रूप में मजदूरी करने लगे। 19वीं शताब्दी के पहले 50 वर्षों में ऐसे दृश्य आम देखे जाते थे कि कैसे एक जुलाहा अपनी खड्डी छोड़कर हल धारण कर रहा है। यह परिवर्तन उन लोगों के लिए कितना दुःखदायी होगा जिनकी पीढ़ियां इन उद्योगों को अर्पित हो गई थीं। श्री ताराचन्द लिखते हैं, “उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यहां के गांवों के श्रमिक समाज में उजड़े हुए किसानों के बाद बुनकरों तथा गांव के अन्य कारीगरों का स्थान सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण था।” यह सब अंग्रेजी शासन का ही प्रभाव था।

III. व्यापार पर प्रभाव-

अंग्रेज़ी राज्य स्थापित होने से कृषि तथा उद्योगों के साथ-साथ भारतीय व्यापार को भी हानि पहुंची। कम्पनी ने भारतीय व्यापार पर पूरा नियन्त्रण कर लिया। भारतीय तथा विदेशी व्यापारियों को विधिवत् रूप से व्यापार करने से रोक दिया गया। सारा व्यापार कम्पनी के हाथ में आ गया। कम्पनी के बड़े-बड़े कर्मचारियों ने अपने अलग व्यापारिक संस्थान खोल लिए और उनका देश के उत्पादित माल पर पूर्ण अधिकार हो गया। इस व्यापार का सारा लाभ कम्पनी के कर्मचारियों की जेब में जाता था। कम्पनी के बड़े-बड़े कर्मचारी मालामाल हो गए थे। गवर्नर-जनरल तक भी खूब हाथ रंगते थे। इस व्यापारिक धांधली के कारण न केवल भारतीयों को आन्तरिक व्यापार से बाहर ही निकाल दिया गया,बल्कि उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों के साथ छल भी किया गया। उन्हें सस्ते दामों पर कच्चा माल बेच कर महंगे दामों पर तैयार माल खरीदने के लिए बाध्य किया । व्यापार के इसी एकाधिकारपूर्ण नियम के कारण बंगाल अकाल की लपेट में आ गया। भारतीय माल पर करों की दर बढ़ा दी गई ताकि कोई विदेशी या भारतीय व्यापारी भारतीय माल का व्यापार न कर सके। इस प्रकार अंग्रेज़ी शासन के अधीन भारतीय व्यापार बिल्कुल नष्ट हो गया।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 19 अंग्रेजी साम्राज्य के समय में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन

प्रश्न 2.
इंग्लैंड में नई विचारधारा के संदर्भ में भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के अधीन सामाजिक सुधार तथा शिक्षा के विकास की चर्चा करें।
उत्तर-
इंग्लैंड में नवीन विचारधारा के कारण यह विश्वास दृढ़ हो गया कि भारत के परम्परावादी सामाजिक ढांचे में परिवर्तन होना चाहिए। इस संदर्भ में भारतीय समाज में अनेक परिवर्तन हुए और शिक्षा में पाश्चात्य विचारों का समावेश हुआ। इस तरह देश के सामाजिक तथा शिक्षा के क्षेत्र में नवीन परिवर्तन हुए जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. सती प्रथा का अन्त- सती-प्रथा हिन्दू समाज में प्रचलित एक बहुत बुरी प्रथा थी। हिन्दू स्त्रियां पति की मृत्यु पर उसके साथ ही जीवित जल जाया करती थीं। राजा राममोहन राय ने इस कुप्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उनकी प्रार्थना पर विलियम बैंटिंक ने इस कुप्रथा का अन्त करने के लिए 1829 ई० में एक कानून बनाया। इस प्रकार सती-प्रथा को कानून के विरुद्ध घोषित कर दिया गया।

2. बाल हत्या पर रोक-कुछ हिन्दू जातियां अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपने बच्चों को बलि चढ़ा दिया करती थीं। 1802 ई० में वैल्जेली ने इस प्रथा के विरुद्ध एक कानून पास किया। इसके अनुसार बाल-हत्या पर रोक लगा दी गई।

3. विधवा-विवाह- भारत में विधवाओं की दशा बड़ी खराब थी। उन्हें पुनः विवाह की आज्ञा नहीं थी। अतः अनेक युवा विधवाओं को दुःख और कठिनाई भरा जीवन व्यतीत करना पड़ता था । उनकी दुर्दशा को देखते हुए राजा राममोहन राय, महात्मा फूले, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर तथा महर्षि कर्वे ने विधवा-विवाह के पक्ष में जोरदार आवाज़ उठाई। फलस्वरूप 1856 में विधवा-विवाह वैध घोषित कर दिया गया।

4. दास प्रथा का अन्त- भारत में ज़मींदारी प्रथा के कारण किसान बहुत ही निर्धन हो गए थे। इन किसानों को दास बना कर ब्रिटिश उपनिवेशों में भेजा जाने लगा। इसके अतिरिक्त कुछ अंग्रेज़ भी भारतीयों से दासों जैसा व्यवहार करते थे और उनसे बेगार लेते थे। 1843 ई० में कानून द्वारा इस प्रथा का अन्त कर दिया गया। .

5. स्त्री शिक्षा का विकास- स्त्री-शिक्षा के लिए भारतीय महापुरुषों ने विशेष प्रयत्न किए। उनके प्रयत्नों से स्त्रियां कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने लगीं। फलस्वरूप देश में शिक्षित स्त्रियों की संख्या बढ़ने लगी।

6. जाति बन्धन में ढील- अंग्रेजी शिक्षा तथा ईसाई पादरियों के प्रचार के कारण भारत में जाति बन्धन टूटने लगे। ईसाई पादरी ऊंच-नीच की परवाह नहीं करते थे। इससे प्रभावित होकर निम्न जातियों के लोग ईसाई धर्म स्वीकार करने लगे। यह बात हिन्दू समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गई। अतः उस समय के समाज-सुधारकों ने जाति-प्रथा की निन्दा की। परिणामस्वरूप जाति बन्धन काफ़ी ढीले हो गए।

भारत में अंग्रेजी शिक्षा का विकास- भारत में अंग्रेजी शिक्षा के विस्तार की वास्तविक कहानी 1813 ई० से आरम्भ होती है। इससे पहले कम्पनी ने इस दिशा में कोई कार्य नहीं किया। यदि कुछ कार्य हुए भी तो वे ईसाई पादरियों की ओर से हुए, परन्तु 1813 ई० में शिक्षा का विकास विधिवत् रूप से होने लगा। 1813 ई० में चार्टर एक्ट पास हुआ। इसमें कहा गया कि भारतीयों की शिक्षा पर हर वर्ष एक लाख रुपया खर्च किया जाएगा। यह भी कहा गया कि 50 वर्ष के अन्दर -अन्दर पूरे भारत में शिक्षा के प्रसार का कार्य सुचारू रूप से होने लगेगा। देश में कुछ स्कूल तथा कॉलेज भी खोले गए। परन्तु शीघ्र ही यह विवाद उठ खड़ा हुआ कि यह धन किस शिक्षा पर व्यय किया जाए-भारतीय भाषाओं की शिक्षा पर अथवा अंग्रेज़ी शिक्षा पर।

शिक्षा के माध्यम का विवाद धीरे-धीरे गम्भीर रूप धारण कर गया। कुछ लोग अंग्रेज़ी को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहते थे जबकि दूसरे लोग देशी भाषाओं को ही माध्यम बनाने के पक्ष में थे। आखिर अंग्रेजी माध्यम का पक्ष भारी रहा और इसे ही स्वीकार कर लिया गया। 1854 ई० में चार्ल्स वुड समिति बनाई गई। इस समिति ने शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लाने के लिए ये सुझाव दिए-

(i) भारत में लन्दन विश्वविद्यालय के ढंग पर विश्वविद्यालय खोले जाएं।
(ii) विश्वविद्यालय के अधीन कॉलेज खोले जाएं।

(iii) प्रत्येक प्रान्त में एक शिक्षा-विभाग खोला जाए। वुड समिति की इन सिफ़ारिशों के कारण शिक्षा प्रणाली में महत्त्वपूर्ण उन्नति हुई। 1882 ई० में हण्टर आयोग की नियुक्ति की गई। इस आयोग ने बड़े अच्छे सुझाव दिए। सरकार ने हण्टर आयोग की सभी सिफ़ारिशों को स्वीकार कर लिया। देश में नए-नए कॉलेज तथा स्कूल खुलने लगे। 1882 ई० में पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना की गई।

लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियन्त्रण बढ़ गया। विश्वविद्यालयों के क्षेत्र नियत कर दिए गए। अध्यापकों आदि की नियुक्ति का काम भी विश्वविद्यालयों को सौंप दिया गया। लॉर्ड कर्जन के इस एक्ट की भारतीयों ने बड़ी निन्दा की। 1917 ई० में भारत सरकार ने शिक्षा सुधार के लिए एक और आयोग नियुक्त किया जिसके अध्यक्ष मि० सैडलर थे। इस आयोग ने ये सिफ़ारिशें की-

(i) विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियन्त्रण कम कर दिया जाए।
(ii) माध्यमिक तथा इन्टरमीडियेट शिक्षा विद्यालय के नियन्त्रण में नहीं रहनी चाहिए।

(iii) कॉलेजों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी होना चाहिए। इस प्रकार इस आयोग की सिफ़ारिशों के कारण देश में अनेक विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। मैसूर, उस्मानिया, अलीगढ़, दिल्ली, नागपुर आदि नगरों में विश्वविद्यालय खोले गए। इसके अतिरिक्त शिक्षा के प्रसार के लिए और कई पग उठाए गए। 1928 ई० में हरयेग कमेटी नियुक्त की गई। 1944 ई० में सार्जेन्ट योजना पर अमल किया गया। इस प्रकार भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार होने लगा।

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महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
भारत में पहली तार लाइन कब स्थापित की गई?
उत्तर-
1833 ई० में।

प्रश्न 2.
जी० टी० रोड का आधुनिक नाम क्या है?
उत्तर-
शेरशाह सूरी मार्ग।

प्रश्न 3.
भारत में कॉफी के बाग़ कब लगाने शुरू हुए?
उत्तर-
1860 ई० के पश्चात्।

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प्रश्न 4.
कलकत्ता मदरसा किस अंग्रेज़ गवर्नर-जनरल ने स्थापित किया?
उत्तर-
लार्ड हेस्टिग्ज ने।

प्रश्न 5.
सती प्रथा को किसने अवैध घोषित किया?
उत्तर-
लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति

(i) लाहौर में गवर्नमेंट कॉलेज की स्थापना …………. ई० में हुई।
(ii) भारत में ईसाई मिशनरियों द्वारा स्थापित स्कूलों में …………. ढंग की शिक्षा दी जाती थी।
(iii) बंगाल में स्थायी बंदोबस्त …………….. में लागू हुआ।
(iv) सती प्रथा के विरुद्ध कानून ………………. के प्रभाव अधीन बना।
(v) भारत में पहली आधुनिक जहाज़रानी कम्पनी ………….. ई० में खोली गई।
उत्तर-
(i) 1864
(ii) अंग्रेजी
(iii) 1793
(iv) ईसाई मिशनरियों
(v) 1919.

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3. सही/गलत कथन

(i) पंजाब यूनिवर्सिटी 1888 में बनी। — (√)
(ii) बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लॉर्ड कार्नवालिस ने लागू किया। — (√)
(iii) भारत में पहली रेलवे लाइन की लंबाई 121 मील थी। — (×)
(iv) इंग्लैंड से बहुत-सा धन भारत लाया गया। — (×)
(v) भारत में सीमेंट तथा शीशा बनाने के उद्योग 1930 के बाद विकसित हुए। — (√)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
1791 में संस्कृत कॉलेज की स्थापना की गई
(A) कलकत्ता में
(B) बनारस में
(C) बम्बई में
(D) मद्रास में।
उत्तर-
(B) बनारस में

प्रश्न (ii)
1857 में किस नगर में विश्वविद्यालय स्थापित हुआ?
(A) मद्रास
(B) बंबई
(C) कलकत्ता
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न (iii)
निम्न स्थान भूमि के स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत नहीं आता था-
(A) मद्रास
(B) उड़ीसा
(C) उत्तरी सरकार
(D) बनारस।
उत्तर-
(A) मद्रास

प्रश्न (iv)
1857 ई० में इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित किया गया-
(A) रिवाड़ी में
(B) दिल्ली में
(C) रुड़की में
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(C) रुड़की में

प्रश्न (v)
अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया गया-
(A) 1935
(B) 1835
(C) 1857
(D) 1891.
उत्तर-
(B) 1835

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II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रान्ति किन दो वर्षों के मध्य प्रफुल्लित हुई ?
उत्तर-
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रान्ति सन् 1760 से 1830 के मध्य प्रफुल्लित हुई।

प्रश्न 2.
बर्तानिया के उद्योगपतियों को भारत में बिना कर व्यापार करने की छूट किस वर्ष में मिली तथा इस वर्ष कितने लाख-पौंड मूल्य का अंग्रेजी मशीनी कपड़ा भारत में आया ।
उत्तर-
बर्तानिया के उद्योगपतियों को भारत में बिना कर व्यापार करने की छूट 1813 में मिली। उस वर्ष 11 लाख पौंड का अंग्रेजी मशीनी कपडा भारत में आया।

प्रश्न 3.
1856 में बर्तानिया की मिलों में बना हुआ किस मूल्य का कपड़ा भारत में आया तथा किस मूल्य का कपड़ा भारत से बाहर भेजा गया ?
उत्तर-
1856 में साठ लाख पौंड का कपड़ा भारत आया और 8 लाख पौंड मूल्य का कपड़ा बाहर भेजा गया।

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प्रश्न 4.
1856 में कितने मूल्य की कपास तथा अनाज भारत से बाहर भेजे गए ?
उत्तर-
1856 में 43 लाख पौंड की कपास भारत से बाहर भेजी गई। 29 लाख पौंड का अनाज भी भारत से बाहर भेजा गया।

प्रश्न 5.
भारत में पहली कपड़ा मिल कब, किसने और कहां लगवाई? .
उत्तर-
कपड़े की पहली मिल मुम्बई में कावासजी नानाबाई ने 1853 में स्थापित की।

प्रश्न 6.
1880 तक भारत में कितनी कपड़ा मिलें थीं तथा उनमें कितने मजदूर काम करते थे ?
उत्तर-
1880 तक भारत में 56 कपड़ा मिलें थीं । इनमें 43 हजार मजदूर काम करते थे ।

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प्रश्न 7.
पटसन (जूट) के सबसे अधिक कारखाने भारत के किस प्रान्त में थे तथा बीसवीं सदी के शुरू में इनकी गिनती कितनी हो गई ?
उत्तर-
पटसन (जूट) के सब से अधिक कारखाने बंगाल प्रान्त में थे। बीसवीं सदी के आरम्भ में इन की गिनती 36 हो गई।

प्रश्न 8.
बीसवीं सदी में कौन से चार प्रकार के उद्योग भारत में विकसित हुए ?
उत्तर-
बीसवीं सदी में भारत में ऊनी कपड़ा बनाने का उद्योग, कागज़ बनाने का उद्योग, चीनी बनाने का उद्योग तथा सूती धागा बनाने का उद्योग विकसित हुए।

प्रश्न 9.
1930 के बाद विकसित होने वाले दो उद्योगों के नाम बताएं।
उत्तर-
1930 के पश्चात् भारत में सीमेंट तथा शीशा बनाने के उद्योग विकसित हुए।

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प्रश्न 10.
भारत में नील की खेती कब शुरू हुई तथा यह किसके हाथों में थी ?
उत्तर-
भारत में नील की खेती 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में आरम्भ हुई। यह विदेशियों के हाथों में थी।

प्रश्न 11.
1825 में भारत में नील की खेती के अधीन कुल क्षेत्र कितना था तथा 1915 में नील की खेती लगभग कितने क्षेत्र में सीमित रह गई थी एवं इसके कम होने का क्या कारण था ?
उत्तर-
1825 में 35 लाख बीघा भूमि नील उत्पादन के अन्तर्गत थी और 1915 में नील की खेती तीन चार लाख बीघे तक सीमित रह गई। इस का कारण भूमि की कमी थी।

प्रश्न 12.
अंग्रेज़ी कम्पनी का चीन की चाय का एकाधिकार कब समाप्त हुआ तथा ‘आसाम टी कम्पनी’ कब बनाई गई ?
उत्तर-
अंग्रेज़ी कम्पनी का चीन की चाय का एकाधिकार 1833 में समाप्त हो गया। 1839 में आसाम टी कम्पनी बनाई गई।

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प्रश्न 13.
1920 तक कितनी भूमि चाय की खेती के अधीन थी तथा कितने मूल्य की चाय भारत से बाहर भेजी जाती थी ?
उत्तर-
1920 तक 7 लाख एकड़ भूमि चाय की खेती के अधीन थी। उस समय तक 34 करोड़ पौंड मूल्य की चाय भारत से बाहर भेजी जाती थी ।

प्रश्न 14.
कॉफी के बाग कब लगने शुरू हुए तथा किस देश की कॉफी मण्डी में आने से भारत को नुकसान हुआ ?
उत्तर-
कॉफी के बाग 1860 के पश्चात् लगने आरम्भ हुए। ब्राजील की कॉफी मण्डी में आने से भारत को नुकसान पहुंचा।

प्रश्न 15.
भारत में पहली तार लाइन कब और किन दो नगरों के बीच स्थापित की गई ?
उत्तर-
पहली तार लाइन कलकत्ता (कोलकाता) से आगरा के बीच 1853 में स्थापित की गई ।

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प्रश्न 16.
किस गवर्नर जनरल ने एक ही मूल्य का डाक टिकट शुरू किया तथा इसका मूल्य क्या था ?
उत्तर-
लॉर्ड डल्हौजी ने एक ही मूल्य का डाक टिकट आरम्भ किया था। इस टिकट का मूल्य आधा आना था।

प्रश्न 17.
जी० टी० रोड किन दो शहरों को जोड़ती थी तथा इसका आधुनिक नाम क्या है ?
उत्तर-
जी० टी० रोड पेशावर (पाकिस्तान) तथा कलकत्ता (कोलकाता) को जोड़ती थी। इस का आधुनिक नाम शेरशाह सूरी मार्ग है ।

प्रश्न 18.
जी० टी० रोड किन वर्षों में पक्की की गई तथा 1947 में भारत में सड़कों की कुल लम्बाई कितनी थी ?
उत्तर-
जी० टी० रोड 1839 से लेकर 1864 तक के समय के बीच पक्की की गई। 1947 में भारत में सड़कों की कुल लम्बाई 2,96,000 मील थी ।

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प्रश्न 19.
भारत में पहली आधुनिक जहाजरानी कम्पनी कब खोली गई ?
उत्तर-
भारत में पहली आधुनिक जहाजरानी कम्पनी 1919 में खोली गई ।

प्रश्न 20.
भारत में हवाई यातायात की ओर कब ध्यान देना आरम्भ किया गया ? इससे पहले हवाई जहाजों का प्रयोग किस लिए किया जाता था ?
उत्तर-
भारत में हवाई यायायात की ओर 1930 के बाद ध्यान दिया गया । इससे पहले हवाई जहाज़ों का प्रयोग अधिकतर डाक तथा सामान ले जाने के लिए किया जाता था।

प्रश्न 21.
भारत में पहली रेलवे लाइन किन दो शहरों के बीच एवं कब बनी तथा इसकी लम्बाई कितनी थी ?
उत्तर-
भारत में पहली रेलवे लाइन 1853 में मुम्बई तथा थाना के बीच बनी इसकी लम्बाई 21 मील थी ।।

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प्रश्न 22.
1947 में भारत में रेलवे लाइन की कुल लम्बाई कितनी थी तथा रेलवे के कारण किन दो प्रकार के माल के निर्यात तथा आयात में तेजी से वृद्धि हुई ?
उत्तर-
1947 में भारत में रेलवे लाइन की कुल लम्बाई 40,000 मील थी। रेलों के कारण कच्चे माल के निर्यात तथा मशीनी चीजों के आयात में तेजी से वृद्धि हुई ।

प्रश्न 23.
किस वर्ष में भारत से धन की निकासी शुरू हुई तथा दादा भाई नौरोजी के अनुसार देश से हर वर्ष कितनी धन राशि इंग्लैंड भेजी जाती थी ?
उत्तर-
1757 से धन की निकासी आरम्भ हो गई। दादा भाई नौरोजी के अनुसार प्रति वर्ष 3-4 करोड़ पौंड की राशि भारत से इंग्लैंड भेजी जाती थी ।

प्रश्न 24.
स्थायी बन्दोबस्त किसने शुरू किया तथा यह कब और किस वर्ग के साथ किया गया ?
उत्तर-
स्थायी बन्दोबस्त लार्ड कार्नवालिस ने 1793 में शुरू किया। यह बन्दोबस्त मध्यवर्ती ज़मींदार वर्ग के साथ किया गया।

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प्रश्न 25.
स्थायी बन्दोबस्त के अन्तर्गत इलाकों के नाम बताएं।
उत्तर-
स्थायी बन्दोबस्त के अन्तर्गत उड़ीसा, उत्तरी सरकार तथा बनारस थे।

प्रश्न 26.
रैय्यतवाड़ी प्रबन्ध किन दो प्रान्तों में तथा किस वर्ग पर लागू किया गया तथा उससे सम्बन्धित अंग्रेज़ अफसर का नाम क्या था?
उत्तर-
रैय्यतवाड़ी प्रबन्ध मद्रास तथा महाराष्ट्र में किसानों पर लागू किया गया। इसे अंग्रेज अफसर मुनरो ने लागू किया था।

प्रश्न 27.
महलवाड़ी प्रबन्ध कौन से तीन क्षेत्रों में लागू किया गया तथा इसके अन्तर्गत लगान उगाहने की इकाई कौन-सी थी ?
उत्तर-
महलवाड़ी प्रबन्ध वर्तमान उत्तर प्रदेश में लागू किया गया । इसमें लगान उगाहने की इकाई ‘महल’ थी।

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प्रश्न 28.
अंग्रेजों के अधीन लगान प्रबन्ध की सभी व्यवस्थाओं से भारत के किस वर्ग को विशेष लाभ हुआ ?
उत्तर-
अंग्रेजों के अधीन लगान प्रबन्ध की सभी व्यवस्थाओं से भारत के ज़मींदार वर्ग को विशेष लाभ हुआ ।

प्रश्न 29.
1905 तक सरकार ने रेलों तथा सिंचाई के विकास पर कितना धन खर्च किया था ?
उत्तर-
1905 तक सरकार ने रेलों तथा सिंचाई के विकास पर 360 करोड़ रुपये खर्च किये।

प्रश्न 30.
1951 तक भारत में किन दो प्रकार के हल प्रचलित थे तथा इनमें से किसका प्रयोग बहुत अधिक किया जाता था ?
उत्तर-
1951 तक भारत में लकड़ी तथा लोहे के फाले वाले हल प्रचलित थे। इन में से लोहे के फाले वाले हलों का प्रयोग बहुत अधिक किया जाता था ।

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प्रश्न 31.
1939 में भारत में कितने कृषि कॉलेज थे तथा उनमें विद्यार्थियों की कुल संख्या कितनी थी ?
उत्तर-
1939 में भारत में केवल छः कृषि कॉलेज थे। उनमें विद्यार्थियों की कुल संख्या 1300 के लगभग थी।

प्रश्न 32.
भारत में ईसाई मिशनरियों को अपने केन्द्र स्थापित करने की छूट कब मिली तथा इनके स्कूल-कॉलेज में किस ढंग की शिक्षा दी जाती थी ?
उत्तर-
1813 में ईसाई मिशनरियों को अपने केन्द्र स्थापित करने की छूट मिल गई। इनके स्कूल-कॉलेज में अंग्रेज़ी ढंग की शिक्षा दी जाती थी।

प्रश्न 33.
मिशनरियों के प्रभाव अधीन कौन-सा कानून बना ?
उत्तर-
मिशनरियों के प्रभाव अधीन सती प्रथा का अन्त करने का कानून बना ।।

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प्रश्न 34.
भारत में सती प्रथा को कब और किस गवर्नर-जनरल ने गैर कानूनी घोषित किया ?
उत्तर-
भारत में सती प्रथा को 1829 में गवर्नर-जनरल विलियम बैंटिंक ने गैर कानूनी घोषित किया।

प्रश्न 35.
सती प्रथा का प्रचलन कौन से वर्ग तथा जातियों में था ?
उत्तर-
सती प्रथा का प्रचलन राजघरानों, उच्च वर्गों अथवा ब्राह्मणों में था ।

प्रश्न 36.
“कलकत्ता (कोलकाता) मदरसा” कब और किसने स्थापित किया ?
उत्तर-
कलकत्ता (कोलकाता) मदरसा 1781 में गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्ज़ ने स्थापित किया ।

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प्रश्न 37.
संस्कृत कॉलेज की स्थापना कब और कहां की गई ?
उत्तर-
संस्कृत कॉलेज की स्थापना 1791 में बनारस में की गई ।

प्रश्न 38.
1835 में शिक्षा सम्बन्धी क्या फैसला किया गया तथा इससे सम्बन्धित अंग्रेज अधिकारी का नाम क्या था ?
उत्तर-
1835 में शिक्षा सम्बन्धी यह निर्णय किया गया कि सरकार विज्ञान तथा पश्चिमी ढंग की शिक्षा अंग्रेज़ी भाषा में देने के लिये धन खर्च करेगी। इससे सम्बन्धित अंग्रेज़ अधिकारी का नाम ‘मैकाले’ था ।

प्रश्न 39.
1857 में किन तीन नगरों में विश्वविद्यालय स्थापित हुए ?
उत्तर-
1857 में बम्बई (मुम्बई), कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) में विश्वविद्यालय स्थापित हुए ।

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प्रश्न 40.
1857 में मैडिकल कॉलेज कौन से तीन नगरों में थे तथा इंजीनियरिंग कॉलेज किस स्थान पर स्थापित किया गया ?
उत्तर-
1857 में मैडिकल कॉलेज बम्बई (मुम्बई), कलकत्ता (कोलकाता) तथा मद्रास, (चेन्नई) में थे। इंजीनियरिंग कॉलेज रुड़की में स्थापित किया गया।

प्रश्न 41.
लाहौर में गवर्नमैंट कॉलेज तथा पंजाब यूनिवर्सिटी किन वर्षों में बने ?
उत्तर-
लाहौर में गवर्नमेंट कॉलेज 1864 में तथा पंजाब यूनिवर्सिटी 1888 में बने।

प्रश्न 42.
अंग्रेजी साम्राज्य का सबसे अधिक लाभ किस नये वर्ग को हुआ तथा इस वर्ग से सम्बन्धित चार व्यवसायों के नाम बताएं।
उत्तर-
अंग्रेज़ी साम्राज्य का सबसे अधिक लाभ मध्य वर्ग को हुआ इस वर्ग से सम्बन्धित चार व्यवसायों के नाम थेसाहूकार, डॉक्टर, अध्यापक तथा वकील ।

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III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
अंग्रेजी साम्राज्य ने भारत में विदेशी पूंजीपतियों की सहायता किस प्रकार की ?
उत्तर-
भारत में अंग्रेजी साम्राज्य ने विदेशी पूंजीपतियों की बड़ी सहायता की। देशी उद्योगों को नष्ट किया गया। इनके स्थान पर विदेशी पूंजीपतियों को प्रोत्साहित किया गया । इंग्लैंड की औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् इंग्लैंड के पूंजीपतियों ने यहां कारखाने लगाए। उन्हें यहां सस्ते मज़दूर मिलते थे और सरकार से पूरा सहयोग मिलता था। विदेशी पूंजीपतियों ने यहां रेलवे लाइनों में भी खूब पूंजी लगाई। वैसे भी उद्योग स्थापित करने की सुविधाएं भी उन्हें ही दी जाती थीं। कर की व्यवस्था भी उन के पक्ष में थी। विदेशी माल पर कर नहीं लगता था जबकि भारतीय माल पर शुल्क की दर बढ़ा दी गई थी। रेलों की स्थापना भी विदेशी व्यापार को सुविधा पहुंचाने के लिए की गई थी । सच तो यह है कि अंग्रेजी साम्राज्य ने विदेशी पूंजीपतियों की खूब सहायता की ।

प्रश्न 2.
भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के अधीन रेलों के विस्तार के कारण तथा उनका महत्त्व बताएं ।
उत्तर-
भारत में पहली रेलवे लाइन (1853) में डल्हौजी के समय में मुम्बई से थाना तक आरम्भ की गई । इसकी लम्बाई 21 मील थी। 1905 ई० तक लगभग 28,000 मील लम्बी रेलवे लाइन बनकर तैयार हो गई थी। रेलें यातायात का महत्त्वपूर्ण साधन सिद्ध हुईं । रेलों के कारण अन्तरिक सुरक्षा मजबूत हुई । सेना को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने में सुविधा हो गई। रेलों के कारण कच्चा माल बन्दरगाहों से कारखानों तक सफलतापूर्वक ले जाया जाने लगा और तैयार माल कारखानों से विभिन्न मण्डियों में भेजा जाने लगा। रेलों के कारण मशीनी चीजों के आयात में वृद्धि हुई । उदाहरण के लिए कपास का निर्यात पहले से तीन गुणा अधिक होने लगा और कपड़े का आयात पहले से दो गुणा ज्यादा हो गया । सच तो यह है कि रेलों के और पूंजीपतियों को हुआ।

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प्रश्न 3.
भारत में धन की निकासी किन तरीकों से होती थी ?
उत्तर-
अंग्रेजों की आर्थिक नीति के कारण भारत को बहुत हानि हुई। देश का धन देश के काम आने के स्थान पर विदेशियों के काम आने लगा। 1757 के पश्चात् ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा इसके कर्मचारियों ने भारत से प्राप्त धन को इंग्लैण्ड भेजना आरम्भ कर दिया। कहते हैं कि 1756 ई० से 1765 तक लगभग 60 लाख पौंड की राशि भारत से बाहर गई। और तो और लगान आदि से प्राप्त राशि भी भारतीय माल खरीदने में व्यय की गई। अतिरिक्त सिविल सर्विस और सेना के उच्च अफसरों के वेतन का पैसा भी देश से बाहर जाता था। औद्योगिक विकास का भी अधिक लाभ विदेशियों को ही हुआ। विदेशी पूंजीपति इस देश पर धन लगाते थे और लाभ की रकम इंग्लैण्ड में ले जाते थे। इस तरह भारत का धन कई प्रकार से विदेशों में जाने लगा।

प्रश्न 4.
स्थायी बन्दोबस्त क्या था तथा उसके क्या आर्थिक प्रभाव थे ?
उत्तर-
अंग्रेज़ शासक कृषि के क्षेत्र में भी भूमि से अधिक से अधिक आय प्राप्त करना चाहते थे। इसी उद्देश्य को सामने रख कर लगान व्यवस्था का पुनर्गठन किया गया। कार्नवालिस ने 1793 में बंगाल और बिहार में ‘परमानेंट सेटलमैंट’ अथवा स्थायी व्यवस्था की। इसके अन्तर्गत लगान वसूल करने वाले ज़मींदार भूमि के स्वामी बना दिये गये। इस व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव पड़े। इस प्रकार सरकार की वार्षिक आय भी निश्चित हो गई जिस से बजट बनाना सरल हो गया। परन्तु किसानों की स्थिति केवल मुज़ारों की ही बन कर रह गई। ज़मींदार उन के साथ जैसा चाहे व्यवहार कर सकता था। सभी ज़मींदारों के लिए निश्चित लगान देना इतना सुगम सिद्ध न हुआ। बहुत से ज़मींदारों को अपनी भूमि बेचनी पड़ी। ये भूमि व्यापारी वर्ग के धनी साहूकारों ने खरीद ली। ये नये ज़मींदार शहरों में रहते थे तथा इनके गुमाश्ते किसानों के साथ दुर्व्यवहार करते थे। भूमि से उपज कम होने लगी। परिणामस्वरूप कृषि और कृषक की दशा खराब हो गई।

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प्रश्न 5.
कौन-से नए विचारों के प्रभावाधीन भारत में सामाजिक सुधार लाने के प्रयास किए गए ?
उत्तर-
आरम्भ में कम्पनी के शासकों ने भारतीय समाज के प्रति विशेष रुचि न दिखाई। उनमें से अधिकांश का विचार था कि एक पुरानी सभ्यता होने के कारण भारतीय सभ्यता में परिवर्तन नहीं होना चाहिये। परन्तु 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में एक नई विचारधारा बल पकड़ने लगी। विज्ञान और यान्त्रिकी की उन्नति के साथ लोगों के विचारों और सामाजिक मूल्यों पर भी प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप यह रुचि बढ़ने लगी कि समाज को बदला जाये। ऐसे कानून बनाये जायें जिनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति न्याय प्राप्त करने में बराबर का अधिकारी हो। ऐसी आर्थिक नीतियां अपनाई जाएं जिनसे आर्थिक प्रगति हो और जनसाधारण जीवन की आरम्भिक आवश्यकताओं का आनन्द भोग सकें। ऐसे रीति-रिवाजों का अन्त किया जाये जो अन्धविश्वासों पर आधारित थे। इसके साथ इंग्लैण्ड में ईसाई मत के प्रचार के समर्थक भी इस बात पर जोर देते थे कि भारतीय समाज को नवीन रंग में रंगा जाये।

प्रश्न 6.
भारत में अंग्रेजों ने शिक्षा सम्बन्धी क्या नीति अपनाई ?
उत्तर-
1813 में यह निर्णय किया गया कि भारतीयों को विज्ञान की शिक्षा भी दी जाये। बीस वर्ष तक यह विवाद चलता रहा कि अंग्रेजी साम्राज्य में शिक्षा भारतीय संस्कृति के अनुसार दी जाये अथवा पश्चिमी संस्कृति के आधार पर। 1835 में यह निर्णय हुआ कि पश्चिमी ढंग की शिक्षा अंग्रेजी भाषा के माध्यम द्वारा उच्च स्तर पर दी जाये। इसी नीति के आधार पर 1857 में बम्बई (मुम्बई), कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) में विश्वविद्यालय स्थापित किये गये। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य शहरों में भी विश्वविद्यालय और कॉलेज स्थापित हुए। नवीन शिक्षा नीति अपनाये जाने के अनेक कारण थे –

  • अंग्रेज़ अफसरों की बहुसंख्या इस बात में विश्वास रखती थी कि आधुनिक यूरोपीय सभ्यता विश्व की अन्य सभ्यताओं की तुलना में उत्तम है।
  • सरकारी कार्यों के लिए शिक्षित भारतीयों की आवश्यकता थी।
  • ईसाई पादरियों का विचार था कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् भारतीय जल्दी ही ईसाई बन जायेंगे।
  • कुछ का विश्वास था कि भारतीय अंग्रेज़ी रहन-सहन अपना लेंगे तो वे इंग्लैण्ड में बनी वस्तुओं का अधिक प्रयोग करेंगे और इस प्रकार अंग्रेजों के व्यापार में भी वृद्धि होगी।
  • बहुत-से भारतीय भी यह मांग करने लगे थे कि अंग्रेजी भाषा के द्वारा ही विज्ञान और साहित्य की शिक्षा दी जाये।

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प्रश्न 7.
अंग्रेजी साम्राज्य ने भारत में मध्य वर्ग के उत्थान में क्या योगदान दिया ?
उत्तर-
अंग्रेजी साम्राज्य की समृद्धि के कारण भारत में मध्य वर्ग का जन्म हुआ। कम्पनी को अपने व्यापार की वृद्धि के लिये भारतीय व्यापारियों की सहायता की आवश्यकता थी। इसलिए जैसे-जैसे अंग्रेज़ी व्यापार का विकास हुआ, भारतीय व्यापारी भी धनी बने और उन का महत्त्व भी बढ़ा। इन्हीं व्यापरियों ने साहूकारी शुरू कर ऋण दिये। इन्होंने ही भूमि खरीदने की ओर ध्यान दिया। अधिक धनी साहूकारों ने निजी उद्योग स्थापित किये। इनमें से बहुत से लोग अंग्रेज़ी शिक्षा के पक्ष में थे। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के बाद सरकारी नौकरियों में भी उनकी संख्या में वृद्धि हुई। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी शिक्षा पाकर मध्य वर्गों के लोग डॉक्टर, अध्यापक और वकील बने। इस प्रकार मध्य वर्ग का प्रभाव बढ़ता गया।

प्रश्न 8.
अंग्रेजी साम्राज्य में सामाजिक सुधारों का वर्णन करो।
अथवा
अंग्रेजी साम्राज्य में भारत में किस प्रकार के सामाजिक परिवर्तन हुए ?
उत्तर-
अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी के आरम्भ में समाज सुधार की ओर ध्यान दिया। उन्होंने 1829 ई० में सती-प्रथा पर रोक लगा दी। उस समय राजपूत लोग लड़कियों को पैदा होते ही मार देते थे। इसी तरह कुछ अन्य लोग देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपने बच्चों की बलि दे देते थे। अतः पहले लॉर्ड विलियम बैंटिंक और फिर लॉर्ड हार्डिंग ने बाल हत्या पर रोक लगी दी। उस समय विधवाओं को समाज में घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। उन्हें पुनः विवाह करने की आज्ञा नहीं थी। अतः 1856 ई० में लॉर्ड डल्हौज़ी ने एक कानून द्वारा विधवाओं को पुनः विवाह करने की आज्ञा दे दी। अंग्रेज़ों का विचार था कि भारतीय समाज की गिरी हुई दशा को केवल पश्चिमी शिक्षा के प्रसार से ही सुधारा जा सकता है। अतः भारत में अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बना दिया गया। अंग्रेजों के प्रयत्नों से भारत में स्त्री शिक्षा का प्रसार भी हुआ।

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प्रश्न 9.
रैय्यतवाड़ी लगान व्यवस्था की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
1820 ई० में थामस मुनरो मद्रास का गवर्नर नियुक्त हुआ। उसने भूमि का प्रबन्ध एक नए ढंग से किया जिसे रैय्यतवाड़ी प्रथा के नाम से पुकारा जाता है। यह प्रबन्ध पहले-पहल दक्षिण के प्रान्तों में लागू किया। सरकार ने भूमि-कर उन लोगों से लेने का निश्चय किया जो अपने हाथों से कृषि करते थे। अतः सरकार तथा कृषकों के बीच जितने भी मध्यस्थ थे उन्हें हटा दिया। यह प्रबन्ध स्थायी प्रबन्ध की अपेक्षा अधिक लाभदायक था क्योंकि इससे कृषकों के अधिकार बढ़ गए तथा सरकारी आय में वृद्धि हुई। इस प्रथा में कुछ दोष भी थे-जो भूमि कृषि के बिना रह जाती थी उसे सरकारी भूमि समझा जाता था। ऐसी भूमि में कृषि करने का अधिकार किसी भी किसान को न था। फलस्वरूप यह भूमि प्रायः खाली पड़ी रहती थी। इस प्रथा के कारण गांव का भाई-चारा समाप्त होने लगा। गांव की पंचायतों का महत्त्व भी कम हो गया। प्रत्येक किसान एक पृथक् व्यक्तित्व बन कर रह गया।

प्रश्न 10.
महलवाड़ी भूमि-प्रबन्ध की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
रैय्यतवाड़ी प्रथा के दोषों को दूर करने के लिए उत्तर-पश्चिमी प्रान्त में एक और नया प्रयोग किया गया जिसे महलवाड़ी प्रबन्ध कहा जाता है। इस प्रबन्ध की विशेषता यह थी कि इसके द्वारा भूमि का सम्बन्ध न तो किसी बड़े ज़मींदार के साथ जोड़ा जाता था और न ही किसी कृषक के साथ। यह प्रबन्ध वास्तव में गांव के समूचे भाई-चारे के साथ होता था। यदि कोई किसान अपना भाग नहीं देता था तो उसकी वसूली गांव के भाई-चारे से की जाती थी। ऐसे प्रबन्ध के कारण सरकार को कभी हानि नहीं होती थी। प्रत्येक गांव में जो भूमि अविभाजित रह जाती थी, उसे भाई-चारे की संयुक्त सम्पत्ति माना जाता था। ऐसी भूमि को ‘शामलात भूमि’ कहते थे। इस प्रबन्ध को सबसे अच्छा प्रबन्ध माना जाता है क्योंकि इसमें पहले के दोनों प्रबन्धों के गुण विद्यमान थे। इस प्रबन्ध में केवल एक ही दोष था। वह यह था कि इसके अनुसार लोगों को बहुत अधिक भूमि-कर देना पड़ता था।

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प्रश्न 11.
ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय किसानों की निर्धनता के क्या कारण थे ?
उत्तर-
ब्रिटिश शासनकाल में किसानों की दशा बड़ी ही शोचनीय थी। उनकी निर्धनता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। उनकी निर्धनता के कारणों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. ब्रिटिश शासन काल में ज़मींदारी प्रथा प्रचलित थी। भूमि के स्वामी बड़े-बड़े ज़मींदार होते थे जो किसानों का बहुत शोषण करते थे। वे उनसे बेगार भी लेते थे।
  2. किसानों के खेती करने के ढंग बहुत पुराने थे। कृषि के लिए अच्छे बीज तथा खाद की कोई व्यवस्था नहीं थी। सिंचाई के उपयुक्त साधन उपलब्ध न होने के कारण किसानों को केवल वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था।
  3. ब्रिटिश सरकार ने किसानों की दशा सुधारने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया।
  4. किसान प्रायः साहूकारों से ऋण लेता था जिस पर उसे भारी ब्याज देना पड़ता था। सरकार की ओर से उन्हें ऋण देने का कोई प्रबन्ध नहीं था।
  5. किसानों को बहुत अधिक भूमि-कर देना पड़ता था। यह भी उनकी निर्धनता का एक बहुत बड़ा कारण था।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अंग्रेजी कम्पनी की व्यापारिक नीति कैसी थी और भारत पर इसका क्या आर्थिक प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-
अंग्रेजों की व्यापारिक नीति से अभिप्राय उस नीति से है जो उन्होंने भारत के देशी तथा विदेशी व्यापार के प्रति अपनाई। आरम्भ में अंग्रेजी ईस्ट इण्डिया कम्पनी का मुख्य ध्येय भारतीय कपड़े को सस्ते दामों पर खरीद कर विदेशी मण्डियों में महंगे दामों पर बेचना था। परन्तु जब कम्पनी की लाभ नीति इंग्लैण्ड के उद्योगों के लिए घातक सिद्ध हुई, तो कम्पनी को अपनी नीति में परिवर्तन लाना पड़ा। औद्योगिक क्रान्ति के कारण इंग्लैण्ड में मशीनों द्वारा अधिक से अधिक माल तैयार होने लगा। इस सारे माल की खपत के लिए इंग्लैण्ड के व्यापारियों को अधिक से अधिक मण्डियों की आवश्यकता थी। अतः वहां के व्यापारी वर्ग ने इंग्लैण्ड की सरकार पर ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त करने के लिए दबाव डालना आरम्भ कर दिया। फलस्वरूप 1813 ई० में कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार छीन लिए गए और भारत को एक स्वतन्त्र व्यापार क्षेत्र घोषित कर दिया। भारत के द्वार विदेशी वस्तुओं के लिए खोल दिये गये। उधर ब्रिटेन ने भारत के बने माल पर प्रतिवर्ष कर बढ़ाने आरम्भ कर दिये। 1824 ई० में भारतीय कैलिको पर 65\(\frac{1}{2}\)% और भारतीय मलमल पर 37\(\frac{1}{2}\)% शुल्क देना पड़ता था। भारतीय चीनी पर उसकी लागत से तीन गुणा अधिक कर देना पड़ता था। ऐसी भी कुछ भारतीय वस्तुएं थीं जिन पर इंग्लैण्ड ने 400% शुल्क लगा दिया। स्पष्ट है कि स्वतन्त्र व्यापारिक नीति ने भारत के व्यापारिक हितों को बड़ी हानि पहुंचाई।

नीति का आर्थिक प्रभाव-अंग्रेजी कम्पनी की व्यापारिक नीति का भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। भारत के देशी उद्योग नष्ट हो गये। भारतीय मजदूर तथा कारीगर बेकार हो गए और वे निर्धनता में अपना जीवन व्यतीत करने लगे। अधिक आयात के कारण भारत धन का भुगतान करने में असमर्थ हो गया। भारत के व्यापारिक असन्तुलन के कारण अनेक अंग्रेज़ उद्योगपतियों को अपनी पूंजी भारत में लगाने के लिए प्रेरित किया गया। परिणामस्वरूप देश में रेलों तथा सड़कों का जाल बिछ गया। परन्तु इससे भी अंग्रेजों को ही लाभ पहुंचा।

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प्रश्न 2.
अंग्रेजी साम्राज्य की व्यापारिक, औद्योगिक और भूमि-कर सम्बन्धी नीतियों का भारत की अर्थ-व्यवस्था तथा समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर-
अंग्रेजी साम्राज्य की व्यापारिक, औद्योगिक तथा भूमि-कर सम्बन्धी नीतियों का भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके अधीन भूमि का क्रय-विक्रय आरम्भ हो गया। अंग्रेजों ने भारत में भूमि की पट्टेदारी नए ढंग से आरम्भ की। बंगाल के स्थायी बन्दोबस्त द्वारा ज़मींदारों को भूमि का स्वामी स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार सरकार को लगान देने वाले ठेकेदार भूमि के स्वामी बन गए। पट्टेदारी की प्रचलित सभी विधियां किसानों के हितों के विरुद्ध थीं। जमींदार किसी भी समय कृषकों को बेदखल कर सकता था। इस नियम की आड़ में वे कृषकों से मनचाही रकम बटोरने लगे। रैय्यतवाड़ी प्रथा के अनुसार यद्यपि भूमि का स्वामी किसान को मान लिया गया तथापि कर की दर इतनी अधिक थी कि किसानों को साहूकारों से धन ब्याज पर लेना पड़ता था। अंग्रेज़ी शासन का भारत की कृषि पर भी बहुत प्रभाव पड़ा। ज़मींदार किसानों से पैसा तो खूब ऐंठते थे, परन्तु भूमि सुधार की ओर ज़रा भी ध्यान नहीं देते थे। किसान के पास इतना भी धन नहीं रह पाता था कि वह स्वयं भूमि का सुधार कर सके। फलस्वरूप भारतीय कृषि पिछड़ने लगी।

अंग्रेजी शासन के अधीन भारतीय उद्योग-धन्धे भी नष्ट हो गए। भारत का सूती कपड़ा उद्योग बिल्कुल ठप्प हो गया। भारत में बने सूती कपड़े की इंग्लैण्ड में बड़ी मांग थी। परन्तु इंग्लैण्ड की सरकार ने भारतीय कपड़े पर आयात कर बढ़ा दिया और कम्पनी की कपड़ा सम्बन्धी आयात नीति पर अनेक प्रतिबन्ध लगा दिए। धीरे-धीरे इंग्लैण्ड की सरकार ने ऐसे नियम बना दिए कि भारत का माल इंग्लैंड में बिकने की बजाय इंग्लैंड का माल भारत में बिकने लगा। इंग्लैण्ड में औद्योगिक विकास के कारण इंग्लैंड की आयात-निर्यात की नीति में भारी परिवर्तन आया। भारत से कच्चा माल आयात करना तथा तैयार माल का निर्यात करना उनका उद्देश्य बन गया। अंग्रेजी शासन के कारण भारत का काफ़ी सारा धन प्रति-वर्ष इंग्लैण्ड जाने लगा। अंग्रेजी राज्य के अधीन भारत में बेकारी और निर्धनता का वातावरण पैदा हो गया। कृषकों पर अधिक करों तथा भारतीय उद्योग-धन्धों की समाप्ति के कारण अनेक लोग बेकार हो गए। अंग्रेज़ी शासन के कारण भारतीय व्यापार भी ठप्प हो गया। कम्पनी ने भारतीय व्यापार पर पूरी तरह अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया।

प्रश्न 3.
ब्रिटिश काल में उद्योगों के विकास की कमजोरियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
अंग्रेज़ी शासन के अधीन औद्योगिक विकास के मार्ग की किन्हीं पांच बाधाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
ब्रिटिश शासन के आरम्भ के साथ उद्योगों में तीन बातें घटित हुईं। पहली यह कि उन्होंने भारतीय कुटीर उद्योगों को नष्ट कर दिया। दूसरे, इस देश को इंग्लैण्ड के औद्योगिक माल की मण्डी बना दिया। तीसरे, इस देश में कुछ नए उद्योग आरम्भ किए गए। अब देखना यह है कि इस औद्योगिक विकास की कमजोरियां क्या थीं-

1. भारी उद्योगों का अभाव-अंग्रेजों ने भारत में मूल उद्योग आरम्भ न किए। यदि ऐसा होता तो भारत में औद्योगिक विकास की आधारशिला तैयार हो जाती। परन्तु अंग्रेज़ भारत को उन्नत औद्योगिक राष्ट्र के रूप में देखना ही नहीं चाहते थे।

2. कम्पनी की आवश्यकताओं को प्राथमिकता-अंग्रेजों ने भारत में केवल वही उद्योग स्थापित किए जिनके उत्पादों की उन्हें आवश्यकता थी।

3. उद्योगों का एकाधिकार-सभी बड़े-बड़े उद्योगों का स्वामित्व अंग्रेजों को दिया गया। बहुत कम भारतीयों को उद्योग स्थापित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

4 उद्योगों का असमान वितरण-अंग्रेज़ों ने भारत के कुछ ही भागों में उद्योग स्थापित किए। शेष भाग उद्योगों से वंचित रहे।

5. कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन न देना-अंग्रेजों ने भारत में छोटे तथा कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन न दिया। ऐसे उद्योगों द्वारा ही भारत की अधिकांश जनता को लाभ पहुँच सकता था।

6. कच्चे माल का निर्यात-अंग्रेज़ इंग्लैण्ड के हित में काम करते थे। वे इस देश से कच्चा माल इंग्लैण्ड को सस्ते दामों पर निर्यात करते थे और फिर तैयार माल लाकर भारत में महँगे दामों पर बेचते थे।

7. प्रशिक्षण का अभाव-अंग्रेजों ने न अधिक इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित किए और न ही श्रमिकों के प्रशिक्षण के लिए ही कोई प्रबन्ध किया। ऐसी अवस्था में उद्योगों का पूर्ण विकास नहीं हो सकता था।

8. दूषित कर-प्रणाली-अंग्रेजों ने कर प्रणाली भी इंग्लैण्ड के पक्ष में ही स्थापित की। उन्होंने इंग्लैण्ड से आने वाले माल पर कस्टम ड्यूटी माफ कर दी। इसके विपरीत भारतीय माल पर इंग्लैण्ड में भारी कर लगा दिए। परिणामस्वरूप पहले भारतीय उद्योगों का विनाश हुआ और बाद में भारत इंग्लैण्ड के तैयार माल की मण्डी बन गया।

सच तो यह है कि अंग्रेजों ने भारत में औद्योगिक विकास की दृष्टि से उद्योग स्थापित न किए थे। उनका मुख्य उद्देश्य इंग्लैण्ड को लाभ पहुँचाना था।

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प्रश्न 4.
18वीं तथा 19वीं शताब्दी में भारत के आर्थिक शोषण की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
ईस्ट इण्डिया कम्पनी की आर्थिक नीति की विवेचना कीजिए जिसके फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था की बरबादी हुई।
उत्तर-
18वीं शताब्दी में भारत का शासन ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथ में आ गया। कम्पनी सरकार ने अपने स्वार्थ तथा इंग्लैण्ड के हितों को बढ़ावा देने के लिए भारत तथा भारतीयों का खूब आर्थिक शोषण किया। इस उद्देश्य से अंग्रेज़ों ने निम्नलिखित कार्य किए-

1. ग्रामीण कपड़ा उद्योगों का विनाश-अंग्रेजी सरकार अपने गुमाश्तों द्वारा भारतीय जुलाहों से कपड़े का सस्ते दामों पर जबरदस्ती सौदा कर लेती थी। सौदा करने के लिए जुलाहों को पेशगी राशि दे दी जाती थी। यदि वे पेशगी लेने से इन्कार करते तो उन्हें पीटा जाता था और कोड़े लगाए जाते थे। इस प्रकार जुलाहे अपना माल कम्पनी को छोड़कर किसी के पास नहीं बेच सकते थे, भले ही उन्हें वहाँ से कितनी ही अधिक राशि क्यों न मिलती हो। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे भारतीय जुलाहों की कपड़ा उद्योग में रुचि समाप्त हो गई और भारतीय कपड़ा उद्योग समाप्त हो गया।

2. इंग्लैण्ड में भारतीय माल पर अधिक कर-इंग्लैण्ड में भारतीय कपड़े की बड़ी माँग थी। परन्तु इंग्लैण्ड की सरकार ने भारतीय कपड़े पर भारी आयात कर लगा दिया। फलस्वरूप इंग्लैण्ड पहुँचते-पहुँचते भारतीय कपड़ा इतना महँगा हो जाता था कि वहां के लोग इसे खरीदने से भी डरने लगे। अतः इंग्लैण्ड में भारतीय कपड़े की माँग बिल्कुल समाप्त हो गई।

3. भारत का मण्डी के रूप में प्रयोग-इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति के बाद अनेक कारखाने खुल गए और भारी मात्रा में उत्पादन होने लगा। इन कारखानों को कच्चा माल जुटाने तथा वहाँ के तैयार माल को बेचने के लिए अंग्रेजों ने भारत को एक मण्डी बना दिया। वे यहाँ का सारा कच्चा माल सस्ते दामों पर खरीद कर इंग्लैण्ड भेजने लगे। इंग्लैण्ड का तैयार माल भारत में बिना रोक-टोक आने लगा और यहाँ उसे महँगे दामों पर बेचा जाने लगा। परिणामस्वरूप भारत का धन निरन्तर इंग्लैण्ड पहुँचने लगा।

4. व्यापार पर एकाधिकार-अंग्रेजी कम्पनी ने भारतीय व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया। एक ओर तो वे भारतीय जुलाहों से सस्ते दामों पर कपड़े का सौदा कर लेते थे, दूसरी ओर सारा कच्चा माल पहले से ही खरीदकर अपने गोदामों में भर लेते थे। विवश होकर भारतीय जुलाहों को किया गया सौदा पूरा करने के लिए महंगे दामों पर अंग्रेजों से कच्चा माल खरीदना पड़ता था। परिणामस्वरूप देखते ही देखते देश में निर्धनता और बेकारी फैल गई।

5. इंग्लैण्ड के हित में नए उद्योग-अंग्रेजों ने भारत में कुछ नए उद्योग भी लगाए। परन्तु इनका उद्देश्य भी भारत का आर्थिक शोषण करना ही था। उदाहरण के लिए, इंग्लैण्ड में चाय की माँग थी तो भारत में बड़े पैमाने पर चाय के बागान लगाए गए। इसी प्रकार कपास तथा पटसन आदि की खेती, नील उद्योग आदि सभी इंग्लैण्ड के हितों की ही पूर्ति करते थे। इन उद्योगों के आरम्भ से भारत आवश्यक उद्योगों में पिछड़ गया।
सच तो यह है कि अंग्रेज़ी सरकार ने अपनी प्रत्येक नीति भारत का धन हड़पने के लिए ही निर्धारित की।

प्रश्न 5.
अंग्रेजों के अधीन भारत के सामाजिक जीवन में क्या-क्या परिवर्तन हुए ? किन्हीं पांच परिवर्तनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
अंग्रेज़ इस देश में व्यापारी तथा शासक के रूप में लगभग 350 वर्ष तक रहे। उन्होंने लगभग 200 वर्ष तक यहां शासन भी किया। इस देश में उनका मुख्य उद्देश्य अंग्रेज़ी सत्ता को दृढ़ करना था। इसलिए उन्होंने हमारे सामाजिक क्षेत्रों में काफी परिवर्तन किए। इन परिवर्तनों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

1. आधुनिक शिक्षा का आरम्भ-आधुनिक शिक्षा प्रणाली अंग्रेजों की देन है। 1835 ई० में यह निर्णय लिया गया कि भारत में शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी होगा। 1854 ई० में वुड डिस्पैच तथा 1882 ई० में हण्टर आयोग के सुझावों को स्वीकार किया गया। इनके अनुसार देश में शिक्षा विभाग की स्थापना हुई, विश्वविद्यालय खोले गए तथा अनेक स्कूलों तथा कॉलेजों की व्यवस्था की गई। प्राइवेट स्कूलों को अनुदान देने की प्रणाली आरम्भ की गई। अध्यापकों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। इस प्रकार भारत में शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी उन्नति हुई।

2. जाति बन्धन में ढील तथा सती प्रथा का अन्त-अंग्रेजी शिक्षा तथा ईसाई पादरियों के प्रचार के कारण भारत में जाति बन्धन टूटने लगे। ईसाई पादरी ऊंच-नीच की परवाह नहीं करते थे। इससे प्रभावित होकर निम्न जातियों के लोग ईसाई धर्म स्वीकार करने लगे। यह बात हिन्दू समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गई। इस खतरे को टालने के लिए उस समय के समाज-सुधारकों ने जाति-प्रथा की निन्दा की। परिणामस्वरूप जाति बन्धन काफ़ी ढीले हो गए। उस समय हिन्दू समाज में सती-प्रथा भी प्रचलित थी। इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने दिसम्बर, 1829 में एक कानून पास किया और सती-प्रथा को कानून के विरुद्ध घोषित कर दिया।

3. बाल-हत्या तथा नर-बलि पर रोक, विधवा विवाह की आज्ञा-मध्य भारत की कुछ जातियां दहेज आदि की कठिनाई से बचने के लिए कन्याओं को पैदा होते ही मार डालती थीं। इस पर रोक लगाने के लिए लॉर्ड वैल्ज़ली ने 1802 में एक कानून पास किया। इसके अनुसार बाल-हत्या पर रोक लगा दी गई। भारत के कुछ भागों में देवताओं को प्रसन्न करने के लिए नर-बलि दी जाती थी। यह प्रथा मद्रास में विशेष रूप से प्रचलित थी। विलियम बैंटिंक ने इस क्रूर प्रथा का भी अन्त कर दिया। विधवाओं की स्थिति सुधारने के लिए जुलाई, 1856 ई० में सरकार ने विधवा-विवाह को कानून द्वारा वैध घोषित कर दिया।

4. स्त्री शिक्षा का प्रसार-राजा राम मोहन राय, जगन्नाथ शंकर सेठ, रानाडे, महात्मा फूले तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रयत्नों के फलस्वरूप स्त्रियों को ये सुविधाएं मिलीं-

  1. उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने की आज्ञा दे दी गई,
  2. उनके लिए अलग कॉलेजों की व्यवस्था की गई,
  3. उन्हें विश्वविद्यालयों में भी प्रवेश पाने की आज्ञा दे दी गई।

5. साम्प्रदायिकता का आरम्भ-अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को दृढ़ बनाए रखने के लिए “फूट डालो और राज्य करो” की नीति अपनाई। इस नीति से देश में साम्प्रदायिकता का विष फैलने लगा।

6. भारतीय सभ्यता और संस्कृति का ह्रास-भारत में अंग्रेज़ी शासन स्थापित होने से भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति को भारी धक्का लगा। अंग्रेजों ने इस बात का प्रचार किया कि भारतीय असभ्य हैं और अंग्रेज़ उन्हें सभ्यता का पाठ पढ़ाने आए हैं। अत: भारतीय उनकी सभ्यता को उच्च मानकर उसी के प्रभाव में बहने लगे। इस प्रकार एक लम्बे समय तक भारतीय सभ्यता और संस्कृति का विकास रुका रहा।

7. भारतीय मध्यम वर्ग का उदय-अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना से भारत में मध्यम वर्ग का उदय हुआ। नवीन भूमि कानूनों के कारण ज़मींदार, महाजन तथा व्यापारी लोग अस्तित्व में आये। यही लोग बीसवीं शताब्दी में भारत की मध्यम श्रेणी के रूप में उभरे। पैसा अधिक होने के कारण इस श्रेणी के लोगों ने पाश्चात्य शिक्षा ग्रहण की और राष्ट्रीय आन्दोलन में लोगों का नेतृत्व किया।

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प्रश्न 6.
अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत की कृषि की क्या दशा थी ? अंग्रेज़ी राज्य में इसमें कौन-कौन से परिवर्तन आए ? कोई पांच परिवर्तन लिखिए।
उत्तर-
अंग्रेजों के आगमन से पूर्व कृषि की दशा-अंग्रेजों के आगमन से पूर्व खेती-बाड़ी की दशा अधिक अच्छी नहीं थी। कृषि का उद्देश्य केवल किसानों की आवश्यकताओं को पूरा करना था। किसान को जिस चीज़ की जितनी मात्रा में आवश्यकता होती, वह केवल उतनी ही वस्तु का उत्पादन करता था। वह खाने के लिए अनाज, तेल के लिए सरसों, तोरिया, तिल, तारामीरा आदि तथा मीठे के लिए गन्ना उगा लेता था। वह वस्त्रों के लिए कपास और अपने पशुओं के लिए आवश्यक चारा भी उगा लेता था। अपनी आवश्यकता से अधिक वह किसी भी चीज़ का उत्पादन नहीं करता था।

उस समय की खेती में कुछ अन्य त्रुटियां भी थीं। खेती करने का ढंग पुराना था। सिंचाई के साधन भी अधिक विकसित नहीं थे। किसानों को सिंचाई के लिए अधिकतर वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था। यदि वर्षा ठीक समय पर उचित मात्रा में हो जाती तो उपज अच्छी हो जाती थी। इसके विपरीत वर्षा कम होने पर सूखा पड़ जाता और अधिक होने पर बाढ़ आ जाती थी। परिणामस्वरूप फसलें नष्ट हो जाती थीं और लोगों को भयंकर अकाल का सामना करना पड़ता था।

अंग्रेजी राज्य में कृषि में परिवर्तन-18वीं शताब्दी में इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति आई और वहां अनेक कारखाने खुल गए। इन कारखानों को चलाने के लिए अंग्रेजों को कच्चे माल की आवश्यकता थी। यह कच्चा माल भारतीय कृषि से मिल सकता था। इसलिए उन्होंने भारत की कृषि को उन्नत करने में रुचि ली और इसमें निम्नलिखित परिवर्तन किए-

1. यातायात के साधनों का विकास-उन्होंने यातायात के साधनों का विकास किया। उन्होंने किसान को अधिक उत्पादन करने के लिए प्रेरित किया ताकि वे अतिरिक्त उपज को बेच कर अधिक धन कमा सकें। कमाई के अच्छे अवसर देखकर किसान अपनी कृषि में सुधार लाने लगे।

2. आदर्श कृषि फार्म-देश में बड़े-बड़े फार्म खोले गए जिनमें नमूने की (आदर्श) खेती की जाती थी। इन्हें देखकर किसान भी अपनी खेती में सुधार लाने का प्रयत्न करने लगे।

3. सिंचाई के साधनों का विकास-सिंचाई के लिए देश के विभिन्न भागों में नहरें तथा कुएं खोदे गए। देश के दक्षिणी भागों में वर्षा का पानी इकट्ठा करके अथवा नदियों से पानी लेकर सिंचाई के लिए बड़े-बड़े तालाब बनाए गए।

4. नई फसलों का उत्पादन सरकार ने ऐसी फसलों के उत्पादन पर अधिक बल दिया जिनका प्रयोग कच्चे माल के रूप में हो सकता था। उन्होंने बाहर से भी कुछ नई फसलें लाकर भारत में बोई। इन फसलों में अमेरिकन कपास, आलू, सिनकोना आदि प्रमुख थीं।

5. नये कृषि यन्त्र-कृषि के औजारों में परिवर्तन किया गया। अब लकड़ी के पुराने हलों के स्थान पर लोहे के नये हल चलाए गए।

6. उत्तम प्रकार के बीज-उत्तम प्रकार के बीज पैदा करने के लिए पूना में एक अनुसंधान विभाग खोला गया।

7. ऋण संस्थाएं-किसानों की सहायता के लिए कुछ संस्थाएं खोली गईं ताकि किसान धनवान महाजनों के चंगुल से बचें।

प्रश्न 7.
व्याख्या सहित बताओ कि अंग्रेजी शासन ने ग्रामों की आर्थिकता में कौन-कौन से परिवर्तन किए ?
उत्तर-
अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के समय भारत की लगभग 95 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में ही रहती थी। उस समय प्रत्येक गांव अपने आप में एक इकाई था। ग्रामीण आर्थिकता का आधार आत्म-निर्भरता थी। गांव के किसान खेती करते थे और अन्य लोग उनकी खेती सम्बन्धी तथा अन्य आवश्यकताओं को पूरा करते थे। उदाहरण के लिए जुलाहे उनके लिए कपड़ा बुनते थे, कुम्हार उन्हें बर्तन आदि देते थे और बढ़ई तथा लुहार उनके लिए हल, पंजालियां आदि बनाते थे। इसके बदले में किसान केवल वही वस्तुएं उगाते थे जिनकी उन्हें या गांववासियों को आवश्यकता होती थी। आवश्यकता से अधिक किसी भी वस्तु का उत्पादन नहीं किया जाता था। देश में अंग्रेजी राज्य स्थापित होने के कारण ग्रामों की आर्थिकता में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए जिनका वर्णन इस प्रकार है-

1. व्यापारिक उपजों पर बल-इंग्लैंड के कारखानों को चलाने के लिए अधिक मात्रा में कच्चे माल की आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त इंग्लैण्ड में अधिक अन्न भी चाहिए था। अंग्रेजों ने यह कच्चा माल और अनाज भारत से प्राप्त करने का प्रयत्न किया। उन्होंने सबसे पहले सड़कों, रेलों तथा भाप से चलने वाले जहाजों में सुधार किया ताकि देश के भिन्न-भिन्न भागों से माल को इंग्लैंड तक आसानी से पहुंचाया जा सके। इसके साथ ही भारतीय किसानों को व्यापारिक फसलें उगाने के लिए प्रेरित किया गया ताकि इंग्लैंड में उनकी मांग को पूरा किया जा सके। फलस्वरूप गांवों में व्यापारिक फसलों की खेती होने लगी।

2. सिक्के का प्रसार-व्यापार आरम्भ होने से सिक्के का प्रसार बढ़ गया। अब किसान अपनी उपज बेचकर धन कमाने लगे और गांव में कई सेवाओं के बदले वे अनाज के स्थान पर नकद पैसे देने लगे। गांवों से कई लोग अधिक धन कमाने की इच्छा से नगरों में आकर भी काम करने लगे।

3. नए भूमि-प्रबन्ध-ग्रामों की आर्थिकता में सबसे बड़ा परिवर्तन नए भूमि-प्रबन्ध आरम्भ होने से आया। बंगाल, बिहार और उड़ीसा में भूमि का स्थायी बन्दोबस्त लागू किया गया। इसमें बड़े-बड़े ज़मींदारों को भूमि का स्वामी बना दिया गया और सदियों से भूमि पर खेती करने वाले किसान भूमि-हीन हो गए। वे अपने ज़मींदारों की इच्छा के दास थे। फलस्वरूप उनके मन में खेती के प्रति उत्साह कम हो गया। नए भूमि-प्रबन्ध के कारण ग्रामों की आर्थिकता पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा।

4. नई न्याय प्रणाली-गांवों की आर्थिकता में पंचायतों का बड़ा महत्त्व था। प्रत्येक गांव में झगड़ों का निपटारा पंचायतें ही करती थीं और सभी को उसका निर्णय मानना पड़ता था। इसलिए झगड़ों के निपटारे पर अधिक धन और समय नष्ट नहीं होता था, परन्तु अंग्रेजों ने एक नई न्याय-प्रणाली आरम्भ की। इसके अनुसार अब गांव के झगड़ों का निपटारा पंचायतें नहीं कर सकती थीं। फलस्वरूप गांव के लोगों को भारी हानि उठानी पड़ी।

सच तो यह है कि अंग्रेजों के शासन काल में ग्रामीण आर्थिकता का रूप बिल्कुल बदल गया।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल और इसकी शाखाएं

Punjab State Board PSEB 12th Class Geography Book Solutions Chapter 1 मानव भूगोल और इसकी शाखाएं Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Geography Chapter 1 मानव भूगोल और इसकी शाखाएं

PSEB 12th Class Geography Guide मानव भूगोल और इसकी शाखाएं Textbook Questions and Answers

प्रश्न I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक वाक्य में दें:

(क) शब्द ‘मानवीय भूगोल’ का विस्तृत अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर-
मानवीय भूगोल मनुष्य को अपने आस-पास के प्राकृतिक पर्यावरण से सर्वपक्षीय समानता का अध्ययन है।

(ख) पृथ्वी कौन-से मुख्य तत्त्वों से बनी है ?
उत्तर-
प्रकृति (भौतिक) प्राकृतिक पर्यावरण और जीवन के रूप।

(ग) मानवीय भूगोल के अन्तर्गत आने वाले प्रसंगों (Themes) के नाम बताओ।
उत्तर-
मानवीय भूगोल के अन्तर्गत वर्गों, आबादी का बढ़ना, प्रवास की बनावट इत्यादि प्रसंगों का अध्ययन किया जाता है।

(घ) भूगोल के उद्देश्य बताने वाले तीन दर्शन (फलस्फे) कौन-से हैं ?
उत्तर-
भूगोल के मुख्य उद्देश्य पृथ्वी को मनुष्य के घर के रूप में देखना, मानना और समझना है।

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(ङ) कोई दो विश्व प्रसिद्ध भौगोलिक वेत्ताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
कार्ल रिटर, पौल विडाल डी, ला ब्लांश।

(च) निम्नलिखित का मिलान करें :
(i) राजनीतिक भूगोल — (क) जन-अंकण विज्ञान
(ii) आर्थिक भूगोल — (ख) चुनाव-विश्लेषण विज्ञान
(iii) जनसंख्या भूगोल — (ग) ग्राम योजनाबंदी
(iv) बस्ती भूगोल — (घ) राष्ट्रीय व्यापार।
उत्तर-

  1. (ख),
  2. (घ),
  3. (क),
  4. (ग)।

(छ) निम्नलिखित भौगोलिक कालों का मिलान करें।
(i) बस्तीवाद युग — (क) उत्तर आधुनिकतावाद
(ii) 1930s — (ख) मूलवाद/रैडीकल भूगोल
(iii) 1970s — (ग) क्षेत्रीय विश्लेषण
(iv) 1990s — (घ) इलाकाई विभिन्नता।
उत्तर-

  1. (ग),
  2. (घ),
  3. (ख),
  4. (क)।

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प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर चार पंक्तियों में दें:

(क) पेंगुइन शब्दकोश के अनुसार स्थानीय बँटवारे की परिभाषा क्या है ?
उत्तर-
पेंगुइन शब्दकोश के अनुसार स्थानीय बँटवारा (Spatial Distribution)-का अर्थ है, पृथ्वी की सतह पर, विभिन्न स्थानों और खास वितरण या विशेषता के महत्त्व, कद्रों-कीमतों या व्यवहार को प्रदर्शित करने वाले भौगोलिक मापदंडों या निरीक्षणों का समूह है।

(ख) भौगोलिक क्रियाओं के लिए प्रयोग किए जाने वाले कोई चार मानवीय अंगों के नाम बताओ।
उत्तर-
चेहरा (पृथ्वी का चेहरा), मुख (दरिया का मुख) नाक (हिमनदी का नाक), गर्दन (थल डमरू की गर्दन)।

(ग) कौन-कौन से विषय निम्नलिखित अध्ययनों की व्याख्या करते हैं ?
उत्तर-

  1. धरती का अंतरीव-भू-विज्ञान का सम्बन्ध पृथ्वी की पपड़ी की बनावट के आन्तरिक हिस्से से सम्बन्धित है।
  2. मानवीय जनसंख्या-जनांकन विज्ञान का सम्बन्ध मानवीय जनसंख्या से है।
  3. प्राणी जगत्-प्राणी जगत् जानवरों से सम्बन्धित है।
  4. वनस्पति जगत्-वनस्पति जगत् वनस्पति विज्ञान से सम्बन्धित है।

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(घ) भौगोलिक धारणाओं से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
भौगोलिक धारणाओं का अर्थ है किसी विशेष समय, स्थान के संदर्भ में भौगोलिक ज्ञान के विकास को समझना होता है।

प्रश्न III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 10-12 पंक्तियों में दें:

(क) भूगोल को अलैग्जेंडर वों हमबोल्ट की देन पर नोट लिखें।
उत्तर-
हमबोल्ट का जन्म 14 सितम्बर, 1769 ई० में हुआ। उन्होंने ज्ञान की कई शाखाएँ जैसे वनस्पति विज्ञान, शारीरिक विज्ञान, भू-विज्ञान, जलवायु विज्ञान, परिस्थिति विज्ञान में अहम् योगदान दिया है। उन्होंने अपनी पुस्तकों (Cosmos, Essay on the Geography of Plants) के माध्यम से आधुनिक भूगोल के लिए महत्त्वपूर्ण मॉडल पेश किये हैं। उन्होंने फसलों की वैज्ञानिक व्याख्या पेश की है और व्यापारिक कृषि पर समुद्र तल ऊंचाई, तापमान और वनस्पति के प्रभाव आदि के सिद्धांत पेश किए हैं। कम वायु दबाव का मनुष्य पर प्रभाव भी हमबोल्ट की ही देन है और पेरू की धारणा का अध्ययन करने वाला माहिर भी हमबोल्ट है।

(ख) आर्थिक भूगोल के उप-विषयों से सम्बन्धित विषय कौन-से हैं ?
उत्तर-
आर्थिक भूगोल के उप-विषयों से सम्बन्धित विषय हैं :

आर्थिक भूगोल के उप-विषय अन्य सम्बन्धित विषय
1. साधनों का भूगोल (Geography of Resources) 1. (i) अर्थ–शास्त्र

(ii) साधनों का अर्थशास्त्र

2. कृषि भूगोल (Geography of Agriculture) 2. कृषि विज्ञान
3. उद्योग का या व्यापारिक भूगोल (Industrial Geography) 3. व्यापारिक अर्थशास्त्र (Industrial Economics)

 

4. बाजारीकरण या बिक्री का भूगोल (Geography of Marketing) 4. व्यापार अध्ययन, अर्थशास्त्र, कामर्स (Trade, Economics, Commerce)
5. पर्यटन भूगोल (Geography of Tourism) 5. पर्यटन और यात्रा प्रबन्धन
6. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों का भूगोल (Geography of International Relation) 6. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार।

 

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(ग) विद्वानों ने भौगोलिक प्रक्रियाओं को मनुष्य अंगों और क्रियाओं के नाम किस प्रकार दिए हैं ?
उत्तर-
यह जानना बहुत रोमांचक है कि प्राकृतिक/भौतिक और मानवीय घटनाओं की व्याख्या के लिए प्रयोग किए रूपक भी मानवीय अंग विज्ञान के चिन्ह होते हैं। हम हमेशा ही यह बात करते हैं कि धरती का चेहरा (Face of the Earth), तूफ़ान की आँख, नदी का मुँह, हिमनदी का नाक, थल डमरू की गर्दन, मिट्टी की रूप रेखा। जैसे ही भूगोल में क्षेत्रीय कस्बों और गाँवों आदि का वर्णन जीवों के तौर पर किया जाता है। जर्मनी के प्रसिद्ध भूगोल शास्त्री ने राज्य या देश को जीवित जीव के रूप में समझा है। सड़कें, रेल तथा जल मार्गों को यातायात की धमनियां कहकर प्रकट किया जाता है। प्रकृति को एक हस्ती के रूप में जीवित करने में चार्ल्स डारविन की बहुत अहम् भूमिका है।

(घ) प्राचीन काल में मानव भूगोल का केन्द्रीय विषय (Thrust) क्या था ?
उत्तर-
प्राचीन काल में मानव भूगोल का केन्द्रीय विषय नक्शे बनाना था और वह खगोलीय माप करते थे। पुराने अभिलेखों के मुताबिक विद्वानों की रुचि पृथ्वी के नक्शे बनाकर, खगोल की नपाई करके, धरती के भौतिक, प्राकृतिक ज्ञान को समझने की थी। यूनानी विद्वानों को प्रथम भूगोलवेत्ता होने का गर्व प्राप्त है। होमर, हैरोडोटस, थेलज, अरस्तु और ऐरेटोसथीनज इनमें से प्रसिद्ध है।

प्रश्न IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 20 पंक्तियों में दो :

(क) मानव भूगोल का विषय-क्षेत्र क्या है ?
उत्तर-
हर विज्ञान की अपनी एक अलग धारणा, दर्शन और विषय-क्षेत्र होता है। जैसे कि अर्थशास्त्र में हम व्यापार उत्पादन आदि के बारे में पढ़ते हैं। वनस्पति विज्ञान में हम पौधों आदि के बारे में पढ़ते हैं। उसी प्रकार मानव विज्ञान का अपना एक विषय-क्षेत्र होता है। मानव विज्ञान में अध्ययन का मुख्य विषय मानवीय समाज उनके निवास स्थान और विकास स्थानों का प्रसार है। यह भी कहा जाता है कि इसमें मानवीय समाज का क्षेत्रीय विभाजन किया जाता है। इसीलिए हम कह सकते हैं कि मानव भूगोल का विषय बहुत ही विशाल है।
फ्रेडरिक रैंटजेल के अनुसार मानवीय भूगोल मानवीय समाज और पृथ्वी की सतह के आपसी सम्बन्धों का संगठित/ संश्लेषणात्मक अध्ययन है।

मानव भूगोल के माध्यम से मानवीय जाति वर्गों का अध्ययन, संसार के अलग-अलग हिस्सों में जनसंख्या का बढ़ना, वितरण और घनत्व का अध्ययन, जनांकन की विशेषताओं का अध्ययन, स्थान बदली का अध्ययन, आयु संरचना का अध्ययन, लिंग अनुपात का अध्ययन, मानवीय समूहों, आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन और सांस्कृतिक मतभेदों का अध्ययन किया जाता है। यह मानव और उसके प्राकृतिक पर्यावरण के केंद्रीय सम्बन्धों का अध्ययन करता है। मानव भूगोल सांस्कृतिक, धर्म, रीति-रिवाज, गाँवों में रहने की दिशा, शहरी बस्तियाँ, आकार और प्रसार की बढ़ौतरी, कामकाजी वर्ग विभाजन को भी अपने अध्ययन के क्षेत्र में ले लेता है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि किसी क्षेत्र में रहने वालों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक क्रियाओं और प्राकृतिक/भौतिक पर्यावरण के प्रभावों का अध्ययन मानव भूगोल में किया जाता है। मानव का उसके भौगोलिक पर्यावरण पर पड़ रहा प्रभाव भी आजकल लगातार बढ़ रहे महत्त्व का विषय है। मानव, भूगोल संसार में जैसे और कैसे हो सकता है से सम्बन्ध स्थापित करता है।
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(ख) नियतिवाद और नव-नियतिवाद क्या है ?
उत्तर-
नियतिवाद और नव-नियतिवाद की परिभाषा निम्नलिखित हैनियतिवाद (Determinism) नियतिवाद एक बहुत प्रसिद्ध विचार है कि वातावरण मनुष्य के कामों को प्रभावित करता है या फिर हम कह सकते हैं कि संसार में से मानवीय व्यवहार के मतभेदों को संसार में प्राकृतिक वातावरण के मतभेदों के पक्ष से ही समझा जा सकता है। जो विषय, दर्शन, विधियाँ, सिद्धांत वातावरण में से उपजते हैं उन्हें वातावरणीय नियतिवाद कहा जाता है। मनुष्य और प्राकृतिक वातावरण दोनों में नज़दीक के सम्बन्ध हैं। प्रकृति के भौतिक तत्त्व धरती, मौसम, मिट्टी, खनिज, पानी और वनस्पति मनुष्य समूह पर असर/प्रभाव डालते हैं। यह मानव की आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव डालते हैं। प्रकृति मनुष्य के कामों और जीवन दोनों को प्रभावित करती है इसे नियतिवाद का सिद्धांत कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर अरस्तु का विचार था कि ठंडे देशों के लोग बहादुर होते हैं। उनके राजनैतिक संगठनों में पड़ोसी देशों पर राज करने की क्षमता होती है और एशिया के लोगों में हिम्मत की कमी होती है। ऐसे विचारों को समर्थक हैं-अरस्तु सट्रैम्बो, कार्ल रिटर, डब्ल्यू० एम० डेविस और ऐलन चर्चिल सैंपल।

नव-नियतिवाद (Neo-Determinism) नव-नियतिवाद का सिद्धान्त ग्रिफिन टेलर ने 1920 के दशक में दिया। ग्रिफिन टेलर द्वारा दिए इस सिद्धांत में वातावरणीय नियतिवाद और सम्भववाद के आपसी रास्ते को अपनाया गया। टेलर ने इस सिंद्धात को रुको और जाओ नियतिवाद का नाम भी दिया और कहा कि आप में से जो शहरों में रहते हैं या कभी शहर गए हैं, ने देखा होगा कि चौकों में यातायात साधनों को रंगीन बत्तियों द्वारा संचालित किया जाता है। लाल-बत्ती का अर्थ है रुको, पीली जो कि लाल और हरी के बीच में है, तैयार रहने के लिए कहती है और हरी बत्ती जाने के लिए। यह सिद्धांत बताता है कि न कोई स्थिति संपूर्ण भौतिक बंधनों की है न कोई सम्पूर्ण आजादी जैसे हालात हैं। मनुष्य कुछ हद तक प्रकृति को बदल सकता है परन्तु उसे खुद की प्रकृति को बदलना पड़ता है। मनुष्य और प्रकृति दोनों मिल कर काम करते हैं। जैसे कि प्रकृति मनुष्य को कई तरह के लक्ष्य देती है ताकि वह विकास कर सके और इनकी सीमा निर्धारित होती है। अगर मनुष्य किसी की सीमाओं को पार करता है तो यह साबित करता है कि उसकी दोबारा वहाँ वापसी नहीं होगी। टेलर ने इस बात पर जोर दिया है कि भूगोलवेत्ता का मुख्य और अहम् काम है यह एक सलाहकार होना चाहिए और उसे प्रकृति के रेखा-चित्र में कोई दख़ल अंदाजी नहीं करनी चाहिए।

इसीलिए हम कह सकते हैं कि मनुष्य को प्रकृति के नियमों में बाँध कर उसे जीतना चाहिए। यह सिद्धांत मुख्य रूप में संतुलन लाने में और उसका द्वेष ख़त्म करने की कोशिश करता है।

Geography Guide for Class 12 PSEB मानव भूगोल और इसकी शाखाएं Important Questions and Answers

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Objective Type Question Answers)

A. बहु-विकल्पी प्रश्न :

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा भौगोलिक वेत्ता फ्रांस से सम्बन्धित है ?
(A) सैंपल
(B) विडाल डी ला ब्लांश
(C) ट्रीवार्था
(D) हिटलर।
उत्तर-
(B)

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प्रश्न 2.
इनमें से भूगोल की कौन-सी शाखा मानव भूगोल से सम्बन्धित नहीं है ?
(A) जनसंख्या भूगोल
(B) आर्थिक भूगोल
(C) सामाजिक भूगोल
(D) भौतिक भूगोल।
उत्तर-
(D)

प्रश्न 3.
नव-नियतिवाद का सिद्धांत किसने दिया ?
(A) ग्रीफिन टेलर
(B) ब्लांश
(C) रिटर
(D) ट्रिवार्था।
उत्तर-
(A)

प्रश्न 4.
जनांकिकी विज्ञान (Demography) भूगोल की एक उप-शाखा से संबंधित है।
(A) सांस्कृतिक भूगोल
(B) आर्थिक भूगोल
(C) जन-अंकन भूगोल
(D) राजनीतिक भूगोल।
उत्तर-
(C)

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प्रश्न 5.
ऐलन सी० सैंपल कौन-से देश से सम्बन्धित हैं ?
(A) यू०एस०ए०
(B) फ्रांस
(C) जर्मनी
(D) इंग्लैंड।
उत्तर-
(A)

प्रश्न 6.
विडाल डी० ला ब्लांश निम्नलिखित में से किस प्रस्ताव का समर्थन करते हैं ?
(A) नियतिवाद
(B) सम्भवतावाद
(C) नव-नियतिवाद
(D) रैडीकल।
उत्तर-
(B)

प्रश्न 7.
Influence of Geographic Environment किसकी पुस्तक है ?
(A) ब्लांश
(B) श्रीमति सैंपल
(C) कार्ल रिटर
(D) ट्रीवार्था ।
उत्तर-
(B)

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प्रश्न 8.
आरंभिक काल में मानव भूगोल का कार्य क्षेत्र कौन-सा था?
(A) खोज यात्राएँ
(B) क्षेत्र विश्लेषण
(C) नक्शे बनाना
(D) क्षेत्रीय विभिन्नता।
उत्तर-
(A)

प्रश्न 9.
बस्ती का भूगोल निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है ?
(A) गाँव योजनाबन्दी
(B) उद्योग
(C) परिवार नियोजन
(D) पर्यटन।
उत्तर-
(A)

प्रश्न 10.
‘सम्भावनाओं के अमल का प्रयोग असल और एक मात्र भौगोलिक समस्या है।’ यह विचार किसने दिया ?
(A) फैबल
(B) रिटर
(C) अरैटीस्थीन
(D) सैम्पल।
उत्तर-
(A)

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B. खाली स्थान भरें :

  1. फ्रेडरिक रैंटज़ल ने अपने अध्ययन में ………………… पर ज्यादा जोर दिया है।
  2. ………………… का विचार है कि ठंडे देशों के लोग हिम्मती होते हैं।
  3. …………….. मूल सिद्धांत तक तबदील कर देने वाली सोच रखने वाला विचार है।
  4. चुनाव का भूगोल ……………….. भूगोल की उप-शाखा है।
  5. कृषि विज्ञान ………………… भूगोल से सम्बन्धित विषय है।

उत्तर-

  1. संश्लेषण,
  2. अरस्तु,
  3. रैडीकल,
  4. राजनीतिक,
  5. आर्थिक भूगोल।

C. निम्नलिखित कथन सही (✓) हैं या गलत (✗):

  1. विषय के तौर पर भूगोल अला!-अलग धारणाओं का शिकार हो रहा है।
  2. स्थानिक विश्लेषण में परिवर्तनशील तत्त्वों की श्रृंखला के ढांचे पर जोर दिया है।
  3. प्राणी विज्ञान पौधों के अध्ययन से सम्बन्धित है।
  4. मानव विज्ञान में अध्ययन का केंद्र धरातल है।
  5. मानव भूगोल, संसार से जैसे है, जैसे हो सकता है, से सम्बन्धित है।

उत्तर-

  1. सही,
  2. सही,
  3. गलत,
  4. गलत,
  5. सही।

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II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्नोत्तर (One Word/Line Question Answers) :

प्रश्न 1.
कौन-से दो ग्रीक शब्दों से भूगोल बना है ?
उत्तर-
भू + गोल (Geo + Graphy).

प्रश्न 2.
पहली बार भू-गोल शब्द का प्रयोग किसने किया ?
उत्तर-
इरैटोस्थीन्स।

प्रश्न 3.
धरती के कोई दो भागों के नाम लिखो।
उत्तर-
भौतिक वातावरण और जीवन के रूप।

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प्रश्न 4.
मानव वातावरण के मुख्य तत्त्वों के नाम लिखो।
उत्तर-
घर, गाँव, शहर, उद्योग, रेल-मार्ग इत्यादि।

प्रश्न 5.
भौतिक वातावरण के मुख्य तत्त्वों के नाम लिखो।
उत्तर-
मिट्टी, मौसम, पानी, वनस्पति, जीव-जन्तु, धरातल इत्यादि।

प्रश्न 6.
तकनीक का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
तकनीक का अर्थ है कि स्रोत और तकनीक का प्रयोग करके कुछ नया बनाना।

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प्रश्न 7.
सामाजिक भूगोल के कोई पाँच उप-क्षेत्र और अन्य सम्बन्धित विषयों के बारे में बताएँ।
उत्तर-
सामाजिक भूगोल के उप-क्षेत्र और अन्य सम्बन्धित विषय हैं :

उप-क्षेत्र सम्बन्धित विषय
1. व्यवहार का भूगोल 1. मनोविज्ञान (Psychology)
2. समाज की भलाई का भूगोल 2. भलाई का अर्थशास्त्र
3. Geography of leisure 3. समाजशास्त्र (Sociology)
4. संस्कृति का भूगोल 4. मानवशास्त्र (Anthropology)
5. चिकित्सा भूगोल (Medical Geography) 5. महामारी से सम्बन्धित इलाज शास्त्र।

 

प्रश्न 8.
राजनीतिक भूगोल के अन्तर्गत आने वाले उप-क्षेत्र कौन-से हैं ?
उत्तर-
चुनाव भूगोल, सैनिक भूगोल।

प्रश्न 9.
नव-नियतिवाद का सिद्धान्त किसने और कब दिया ?
उत्तर-
1920 में टेलर ने नव-नियतिवाद का सिद्धान्त दिया।

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प्रश्न 10.
नियतिवाद विचारों के समर्थकों के नाम बताएं।
उत्तर-
अरस्तु, स्ट्रैबो, कार्ल रिटर, डब्ल्यू, एम० डेविस, ऐलन चर्चिल सैम्पल।

अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
भूगोल क्या है ?
उत्तर-
भूगोल शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्द ‘Geo’ जिसका अर्थ है ‘पृथ्वी’ और ‘Graphy’ जिसका अर्थ है ‘वर्णन’ से बना है। भूगोल पृथ्वी को मनुष्य का निवास मानकर इसका अध्ययन करता है और इसका वर्णन करता है।

प्रश्न 2.
भूगोल को सभी विज्ञानों की माँ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
भूगोल में भौतिक और मानवीय दोनों ही विषयों का अध्ययन किया जाता है और इनके अध्ययन अन्तर्गत आने वाली शाखाओं और उप-शाखाओं का अध्ययन भूगोल विषय में किया जाता है। इसलिए हम कहते हैं कि भूगोल सभी विज्ञानों की माँ है।

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प्रश्न 3.
भूगोल को ज्ञान का शरीर क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
प्राचीन काल में भूगोल का उद्देश्य धरती से सम्बन्धित ज्ञान एकत्रित करना है। यह ज्ञान यात्रियों, व्यापारियों, योद्धों, शूरवीरों पर आधारित था। भूगोल में पृथ्वी की शक्ल, आकार, अक्षांश, देशांतर, सूर्य मंडल इत्यादि का ज्ञान भी शामिल है। भूगोल विषय हर विषय के बारे में ज्ञान भी देता है। इसलिए भूगोल को ज्ञान का शरीर भी कहा जाता है।

प्रश्न 4.
मानव भूगोल क्या है ?
उत्तर-
एक परिभाषा के अनुसार मानव भूगोल मनुष्य की अपने आस-पास के प्राकृतिक वातावरण से पारस्परिक समानता का अध्ययन है।

प्रश्न 5.
मानव भूगोल का मुख्य उद्देश्य क्या है ?
उत्तर-
मानव भूगोल का उद्देश्य किसी स्थान के प्राकृतिक साधनों और जनसंख्या का अध्ययन करना है ताकि इनके प्राकृतिक स्रोतों को मानव के विकास और भलाई के लिए प्रयोग किया जा सके। यह पर्यावरण के मनुष्य पर पड़ रहे प्रभाव का अध्ययन करता है। यह मनुष्य द्वारा मानव भूगोल, मानव पर्यावरण और अर्थशास्त्र का परस्पर अध्ययन है।

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प्रश्न 6.
‘मनुष्य मानव विज्ञान का धुरा है’ कथन की व्याख्या करें।
उत्तर-
हमारे आस-पास जहाँ मनुष्य रहता है उसको पर्यावरण कहते हैं। मनुष्य एक सरगर्म भौगोलिक प्राणी है। मनुष्य पृथ्वी के स्रोतों का प्रयोग करता है और अपने लिए भोजन पैदा करता है। वह अपना भोजन मछलियों, गायभैसों, भेड़ों इत्यादि से प्राप्त करता है। मनुष्य ने पानी से बिजली उत्पन्न की और कोयले का प्रयोग उद्योगों की चलाने के लिए किया। इसलिए मनुष्य को मानव विज्ञान का धुरा कहा जाता है क्योंकि सभी भौतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ उसके इर्द-गिर्द ही घूमती हैं।

प्रश्न 7.
नियतिवाद की परिभाषा दें।
उत्तर-
संसार में मनुष्य के रहन-सहन के मतभेदों को संसार के भौतिक/प्राकृतिक पर्यावरण के मतभेदों के पक्ष से ही समझा जा सकता है। जो उद्देश्य, धारणा या पहुँच, विधियाँ पर्यावरण से उपजते हैं, उन्हें नियतिवाद कहा जाता है।

प्रश्न 8.
मनुष्य प्रकृति दोनों का एक नज़दीकी सम्बन्ध है।
उत्तर-
प्रकृति के भौतिक तत्त्व पृथ्वी, मौसम, मिट्टी, खनिज, पानी और वनस्पति मनुष्य जीवन पर प्रभाव डालते हैं। यह मनुष्य की आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव डालते हैं। प्रकृति मनुष्य के कार्य और जीवन पर भी प्रभाव डालती है। इस सिद्धान्त को नियतिवाद कहते हैं। मनुष्य कुछ हद तक प्रकृति को बदल सकता है परन्तु उसको अपने आप को पर्यावरण के अनुकूल बदलना होता है। मनुष्य और प्रकृति एक साथ काम करते हैं।

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प्रश्न 9.
पैंगुइन डिक्शनरी के अनुसार स्थानीय विभाजन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
मानव भूगोल की पैंगुइन डिक्शनरी के अनुसार स्थानीय विभाजन का अर्थ है कि धरती की सतह पर अलगअलग स्थानों पर किसी खास व्यवहार या विशेषता के महत्त्व, कद्रों-कीमतों या व्यवहार को प्रदर्शित करने वाले भौगोलिक मापदण्डों या निरीक्षण का समूह है।

प्रश्न 10.
मानव भूगोल की प्रकृति पर नोट लिखो।
उत्तर-
मानव भूगोल अपने भौगोलिक पक्षों के विस्तार के अलावा प्राकृतिक भौतिक पर्यावरण से सीधे तौर से सम्बन्ध रखता है। तीन संदर्भ इसकी व्याख्या करते हैं :—

  1. स्थानीय विश्लेषण-इसमें जो तत्त्व परिवर्तनशील हैं उनकी श्रृंखला के ढांचे पर जोर दिया जाता है।
  2. मानवीय भूगोल और उसके पर्यावरण के आपसी सम्बन्धों का सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरण अध्ययन है।
  3. क्षेत्रीय संश्लेषण या संगठन-इसमें पहले दोनों ही सन्दर्भो को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 11.
भूगोल को एकीकरण का विज्ञान क्यों कहा जाता है ? व्याख्या करें।
उत्तर-
भूगोल विषय का दूसरे विषयों से नज़दीक का सम्बन्ध है। अलग-अलग विषय अच्छी जानकारी देते हैं। परन्तु सिर्फ वही भाग पढ़े जा सकते हैं जो भूगोल के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करते हैं। भूगोल में कई बहु-विषयक (Interdisciplinary) विषयों का अध्ययन किया जाता है, इसलिए इसे एकीकरण का विज्ञान कहा जाता है।

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प्रश्न 12.
रैटज़ल के अनुसार मानव भूगोल क्या है ? उसने अधिक किस चीज़ पर जोर दिया है ?
उत्तर-
फ्रेडरिक रैटजल के अनुसार, “मानव भूगोल मनुष्य के समाज और पृथ्वी की सतह की सतह के आपसी संबंधों का संगठित/संश्लेषणात्मक अध्ययन है। इस परिभाषा में सब से अधिक बल संश्लेषण पर दिया गया है।

प्रश्न 13.
भूगोल एक बहुत ही व्यापक विषय है ? क्यों? कोई दो दृष्टिकोण दें।
उत्तर-

  1. भूगोल का स्वभाव विश्वव्यापी है। यह पृथ्वी का अध्ययन करता है।
  2. यह भौतिक पर्यावरण और सांस्कृतिक गतिविधियों दोनों का ही अध्ययन है।

प्रश्न 14.
भूगोल प्राकृतिक विज्ञान भी है और सामाजिक भी। कैसे ?
उत्तर-
भूगोल संश्लेषण का विज्ञान है। यह किसी क्षेत्र के भौतिक और मानवीय स्वरूप का अध्ययन कर उस क्षेत्र की पूर्ण तस्वीर पेश करता है। इसके अन्तर्गत पदार्थ विज्ञान, रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान इत्यादि प्राकृतिक पर्यावरण का अध्ययन करते हैं। समाज विज्ञान मानवीय गतिविधियों, कृषि इत्यादि का अध्ययन करता है। इस तरह भूगोल भौतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान दोनों का अध्ययन करता है।

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प्रश्न 15.
आर्थिक भूगोल की मुख्य शाखाएं कौन-सी हैं ?
उत्तर-

  1. कृषि भूगोल
  2. औद्योगिक भूगोल
  3. व्यापार भूगोल।

लघु उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
प्राकृतिक गतिविधियां सांस्कृतिक भूदृश्य पेश करती हैं। उदाहरण देकर स्पष्ट करें।
उत्तर-
कुशल और अच्छी तकनीक का प्रयोग कर मनुष्य भौतिक पर्यावरण के स्रोतों का प्रयोग करता है। मनुष्य स्रोतों के साथ संभावनाएं बनाता है और ऐसा करके स्रोतों को प्राप्त करता है। प्रकृति मनुष्य को अवसर प्रदान करती है और वह इन अवसरों का प्रयोग करता है। इसको संभवतावाद भी कहा जाता है। मानवीय गतिविधियों की छाप हर जगह बनाई गई है : जैसे—

  1. पहाड़ी, पर्वतीय स्थानों पर स्वास्थ्य घर।
  2. शहरी क्षेत्रों का फैलाव।
  3. बाग, खेत, चरागाह समतल इलाकों में।
  4. समुद्री तटीय क्षेत्रों में बन्दरगाहें।

प्रश्न 2.
भौतिक पर्यावरण और सांस्कृतिक पर्यावरण में क्या अंतर है ?
उत्तर-
मानव भूगोल का विषय बहुत विशाल है। मानव भूगोल में पृथ्वी और मानव के आपसी संबंध के बारे में अध्ययन किया जाता है। एक प्रसिद्ध अमेरिकन भूगोलवेत्ता Finch और Trewartha ने मानव भूगोल का दो भागों में बाँटा है। भौतिक/प्राकृतिक वातावरण और सांस्कृतिक/मानवीय पर्यावरण।

  1. भौतिक/प्राकृतिक पर्यावरण-भौतिक पर्यावरण में मौसम, जलवायु, धरातल, प्राकृतिक स्रोत, वनस्पति, मिट्टी, खनिज पदार्थ, जंगल, स्थिति इत्यादि का अध्ययन किया जाता है।
  2. सांस्कृतिक/मानवीय पर्यावरण-सांस्कृतिक वातावरण में कई मानवीय कार्य भी शामिल हैं ; जैसे जनसंख्या, मानवीय रहन-सहन और मनुष्य से संबंधित कई कार्य जैसे-कृषि, निर्माण उद्योग, यातायात आदि के साधन इस वातावरण में शामिल हैं।

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प्रश्न 3.
भूगोल क्या है ? इसकी कोई तीन विशेषताएँ बतायें।
उत्तर-
भूगोल दो शब्दों से मिलकर बना है। Geo शब्द का अर्थ है पृथ्वी और Graphy शब्द का अर्थ है वर्णन। इसलिए भूगोल पृथ्वी को मनुष्य का निवास मान कर इसका अध्ययन करता है और इसका वर्णन करता है। हार्टशान के अनुसार, “भूगोल पृथ्वी तल पर एक स्थान से दूसरे तक मिलने वाले मतभेदों का वास्तविक और क्रमबद्ध वर्णन और व्याख्या है।”
विशेषताएँ-इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  1. पृथ्वी और मनुष्य संबंधी सिद्धांत बनाने वाला विज्ञान है।
  2. मानवीय संबंधों के बारे में भाषायी विशेषताएँ पेश करता है।
  3. भूगोल क्रमबद्ध अध्ययन करता है।

प्रश्न 4.
संभवतावाद के सिद्धांत की उदाहरण सहित व्याख्या करो।
उत्तर-
एक विचार बताता है कि प्रकृति मनुष्य पर अपना नियंत्रण रखती है। कई भूगोलवेत्ताओं ने यह विचार मानने से इन्कार किया है। उन्होंने अधिक ज़ोर इस बात पर दिया है कि मनुष्य कोई भी चीज़ चुनने के लिए पूरी तरह आजाद है। जब मनुष्य को एक सक्रिम शक्ति के रूप में देखा जाए न कि किसी उदासीन शक्ति के रूप में इस सिद्धांत को संभवतावाद का सिद्धान्त कहा जाता है। फैंवर ने इसको संभवतावाद का नाम दिया है और उसने लिखा है संभवतावाद के कार्यान्वयन का उपयोग ही एकमात्र भौगोलिक समस्या है। विडाल डी ला ब्लांश भी संभवतावाद के सिद्धांत का समर्थन करते हैं। उनका भी यह विचार था कि सीमाएँ तय करते हुए मानवीय बस्तियों के लिए कुछ संभावनाएँ पेश करती हैं परंतु मनुष्य अपने परम्परागत ढंग के अनुसार इनके प्रति क्रिया करता है। प्रकृति केवल सलाहकार है। इससे अधिक और कुछ भी नहीं। यहाँ कोई सीमा नहीं बल्कि कई संभावनाएं मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त जे०जे० बुर्नेश आदि ने भी इस धारणा को अपनाया है।

प्रश्न 5.
मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र पर नोट लिखो।।
उत्तर-
मानव भूगोल का अपना एक विषय-क्षेत्र, दर्शन, धारणा है। जैसे कि अर्थ-शास्त्र का विषय-क्षेत्र उपज, उत्पादन, प्रयोग और गतिशीलता से संबंधित है। राजनीतिक भूगोल का विषय क्षेत्र चुनाव प्रणाली, सैनिक भूगोल आदि का अध्ययन करता है। इस तरह ही मानव भूगोल में हम मानवीय समाज, मानव के निवास स्थान और विकास स्थानों के विकास के बारे में अध्ययन करते हैं। मानव भूगोल के अंतर्गत अलग-अलग (भिन्न-भिन्न) जाति वर्ग संसार के भिन्न-भिन्न इलाकों की जनसंख्या और उसकी बढ़ोत्तरी, विभाजन और घनत्व जैसे तत्त्वों का अध्ययन किया जाता है। यह मानवीय समूह और संस्कृति दोनों ही मतभेदों का अध्ययन करता है। मानव भूगोल अपने विषय-क्षेत्र में संस्कृति, नस्ल, भाषा, धर्म, तकनीक, सामाजिक संगठन, वित्तीय संस्थाएँ, राजनैतिक प्रबंध, संगीत, गाँव और रिहायशी स्थान इत्यादि को शामिल कर लेता है।

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प्रश्न 6.
मानव भूगोल की शाखाओं और उपशाखाओं पर नोट लिखो।
उत्तर-

शाखाएँ उप-शाखाएँ
1. सामाजिक भूगोल (i) व्यवहार का भूगोल (ii) समाज कल्याण भूगोल (iii) सांस्कृतिक भूगोल (iv) चिकित्सा भूगोल।
2. राजनीतिक भूगोल (i) चुनाव भूगोल (ii) सैनिक भूगोल
3. जनसंख्या भूगोल (i) मानवीय आबादी भूगोल
4. बस्तीवाद भूगोल शहरी और गाँव योजनाबंदी
5. आर्थिक भूगोल (i) कृषि भूगोल, (ii) साधनों का भूगोल, (iii) उद्योग भूगोल, (iv) बाजारीकरण या बिक्री भूगोल, (v) पर्यटन भूगोल, (vi) राष्ट्रीय साधनों का भूगोल।

 

प्रश्न 7.
भूगोल को एलन चर्चिल सैंपल की क्या देन है ?
उत्तर-
एलन चर्चिल सैंपल (8 जनवरी, 1863-8 मई, 1932) एक अमेरिकन भूगोलवेत्ता थे और Association of American Geographers की पहली महिला प्रधान बनी। वह नियतिवाद की समर्थक थीं। उनकी पुस्तकें American History and its Geographic conditions, Influence of Geographic Environment, Geography of Mediterrian Region. भूगोल को एक बहुत बड़ी देन है। उनका मुख्य विषय नियतिवाद था। नियति के समर्थक इस भूगोलवेत्ता के अनुसार मानव पृथ्वी की सतह का उत्पादन है और सिर्फ इसका बच्चा ही नहीं, धूल भी है। पृथ्वी ने उसको सिर्फ जन्म ही नहीं बल्कि भोजन भी दिया, कुछ काम करने को भी दिया, विचार दिये, मुश्किलों से अवगत करवाया, शारीरिक ताकत दी, बुद्धि दी, रास्ते ढूंढ़ने और सिंचाई जैसी मुश्किलें पेश करके उनके हल तक भी पहुँचाया। भूगोल को श्रीमती सैंपल अमेरिकी भूगोलवेत्ता की महत्त्वपूर्ण देन पर्यावरणीय नियतिवाद का सिद्धांत है।

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प्रश्न 8.
नव-नियतिवाद के सिद्धांत पर नोट लिखो।
उत्तर-
टेलर द्वारा 1920 के दशक में जो पर्यावरणीय नियतिवाद और संभवतावाद के बीच का रास्ता अपनाया, उसको नव-नियतिवाद का सिद्धांत दिया गया है। जैसे कि प्रकृति मनुष्य को विकास के कई तरह के लक्ष्य देती है और इसके अन्तर्गत कई सीमाएँ निर्धारित करती हैं। अगर कोई मनुष्य इन सीमाओं को पार करता है तो इसका भाव है कि (No Return) उसकी दोबारा वापसी नहीं होती। इस तरह संभवतावाद के सिद्धांत ने ही कई आलोचकों को निमंत्रण दिया। ग्रीफिन टेलर का एक नया सिद्धांत नव-नियतिवाद इस समय पेश किया जिसमें उसने इस बात पर जोर दिया कि भूगोलवेत्ता का मुख्य और कार्य यह है कि भूगोलवेत्ता एक सलाहकार होना चाहिए और उसको प्रकृति के रेखाचित्र में कोई दखल-अंदाजी नहीं करनी चाहिए। इस सिद्धांत के बारे में यह भी कहा गया कि रुको और नियतिवाद की ओर जाओ। यह नियतिवाद और संभवतावाद के बीच का रास्ता है। इसमें यह कहा गया है कि न तो कोई स्थिति पूरी तरह महत्त्वपूर्ण भौतिक बंधन की है, न ही कोई पूर्णतया स्वतन्त्र हालात हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि मनुष्य को प्राकृतिक नियमों में रहकर काम करना चाहिए।

प्रश्न 9.
शिल्प विज्ञान समाज के सांस्कृतिक विकास को स्पष्ट करती है। इसके पक्ष में तीन उदाहरण पेश करो।
उत्तर-
शिल्प विज्ञान का अर्थ है कि कुछ तकनीक और औजार के प्रयोग से कोई चीज़ तैयार की जाए। यह किसी प्राकृतिक पर्यावरण के महत्त्व को और अधिक बढ़ा देती है जैसे कि पेड़ की लकड़ी एक प्राकृतिक स्रोत है जब शिल्प विज्ञान की मदद से इससे फर्नीचर बना लिया जाता है तब इसका महत्त्व पहले से बढ़ जाता है। मनुष्य प्राकृतिक नियमों को समझता है और कुछ कला और तकनीकी ज्ञान का प्रयोग कर किसी चीज़ का निर्माण करता है। इस तरह शिल्प विज्ञान के सांस्कृतिक विकास के स्तर को स्पष्ट करता है।
उदाहरण—

  1. घर्षण और ताप के सिद्धांतों को समझने के बाद मनुष्य ने आग की खोज की।
  2. DNA और आनुवंशिकी (Genetics) के गुप्त रूप को समझने के बाद कई बीमारियों के ईलाज का पता चला।
  3. प्रकृति के बारे में ज्ञान ने मनुष्य को शिल्प विज्ञान के विकास करने की शिक्षा दी।

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प्रश्न 10.
भूगोल में दुविधा से आप क्या समझते हैं ? इसकी तीन उदाहरणे दें।
उत्तर-
दुविधा का अर्थ है जब हम एक ही जगह या किसी एक विषय में भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों का अध्ययन करें जैसे कि भूगोल विषय में इसके दो विचार हैं एक वातावरण और दूसरा मानव भूगोल के महत्त्व का।
—इसी तरह इसके एक, प्रादेशिक और दूसरा नियमबद्ध भूगोल के बारे में चिंतन करता है।
—यहाँ मानव भूगोल और भौतिक भूगोल में द्विविभाजन होता है।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रश्न 1.
मानवी भूगोल से आप क्या समझते हैं ? अलग-अलग भूगोलवेत्ताओं का उदाहरण देकर इसकी व्याख्या करें।
उत्तर-
मनुष्य पृथ्वी पर एक भौगोलिक प्रतिनिधि है। मनुष्य पर्यावरण का एक सक्रिय हिस्सा है। मनुष्य अपनी मूलभूत-आवश्यकताओं जैसे कि खाना, रहना और कपड़ा इत्यादि की पूर्ति प्राकृतिक स्रोतों के प्रयोग करके करता है। मनुष्य प्रकृति का गुलाम नहीं है, परंतु उसकी अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इसके अनुसार चलना पड़ता है। कई बार मनुष्य को अपने आपको प्राकृतिक पर्यावरण के अनुसार चलना पड़ता है। पर्यावरण के मतभेदों के कारण किसी क्षेत्र के लोगों के रहन-सहन में मतभेद होता है। खाना, पहरावा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, परंपरा, सामाजिक-आर्थिक हालात, धार्मिक कार्यकुशलता सीधे रूप में पर्यावरण से संबंधित हैं और उस पर निर्भर हैं। जैसे कि जहाँ मानसून द्वारा वर्षा अधिक होती है वहाँ लोग अधिकतर कृषि का ही काम करते हैं। समशीतोष्ण उष्ण जलवायु में रहने वाले लोग अधिकतर, पशुपालन इत्यादि का काम करते हैं। मानवीय प्राकृतिक पर्यावरण के अनुसार अपने कार्य प्रणाली, रहन-सहन इत्यादि को बदल लेते हैं।

मानवीय भूगोल-बहुत सारी सांस्कृतिक आकृतियाँ मनुष्य और प्रकृति के आपसी संबंधों के कारण पैदा होती हैं। इनमें बस्तियां, कस्बे, सड़कें, उद्योग, इमारतें इत्यादि शामिल हैं। इस तरह मानवीय भूगोल मनुष्य की अपने आस-पास के प्राकृतिक पर्यावरण से एक प्रकार की समानता का अध्ययन है। मानव भूगोल अपने भौगोलिक तत्वों के बिना भौतिक/प्राकृतिक पर्यावरण से सीधे तौर से संबंधित है। प्रत्येक प्राकृतिक, भौतिक, जीव और सामाजिक, आर्थिक विज्ञान का अपना विषय क्षेत्र है। मानवी भूगोल से हम मानवीय जाति वर्ग, जनसंख्या की बढ़ोत्तरी, घनत्व, जनाकंन की विशेषताएँ, प्रवास की बनावट, मानवीय समूह और आर्थिक क्रियाओं में भौतिक और सांस्कृतिक भिन्नता का अध्ययन किया जाता है। मानवीय भूगोल नस्ल, भाषा, धर्म, तकनीक, सामाजिक संगठन, वित्तीय संस्थाएँ, राजनैतिक प्रबंध, मानसिक बहाव, यातायात, व्यापार, उद्योग, संचार साधनों को अपने अध्ययन क्षेत्र अधीन समेट लेता है।
मानवीय भूगोल की उदाहरणे समय के साथ-साथ बदलती रहती हैं। कोई भी एक उदाहरण पूर्णव्यापी नहीं मानी जाती। मानवीय भूगोल के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं—

  1. मानवीय भूगोल की एक सरल परिभाषा के अनुसार, “मानवीय भूगोल मनुष्य की अपने आस-पास के प्राकृतिक पर्यावरण से सर्वव्यापी समानता का अध्ययन है।”
  2. फ्रेडरिक रैटज़ल के अनुसार, “मानवीय भूगोल, मानवीय समाज और पृथ्वी की सतह के आपसी संबंधों का संगठित/संश्लेषणात्मक अध्ययन है।” (इस परिभाषा में ज्यादा ज़ोर संश्लेषण पर दिया गया है)
  3. पाल विडाल डी ला ब्लांश के अनुसार, “मानवीय, भूगोल प्रकृति और मनुष्य के आपसी संबंधों का अध्ययन है।”
  4. मानवीय भूगोल की पैंगुइन डिक्शनरी के अनुसार, “स्थानीय विभाजन से भाव है, पृथ्वी की सतह पर, अलग अलग स्थानों पर किसी विशेष व्यवहार या विशेषता के महत्त्व, मूल्य या व्यवहार को प्रदर्शित करने वाले भौगोलिक मापदंडों या निरीक्षकों का समूह है।”

इन उदाहरणों में काफी अंतर हैं पर सारे भूगोलवेत्ता एक बात से सहमत हैं कि मानवीय भूगोल उन समस्याओं का अध्ययन करती है जो मनुष्य और पर्यावरण के आपसी संबंधों से पैदा होती हैं। मानवीय भूगोल मनुष्य का पर्यावरण से संगम का अध्ययन है। पर्यावरण से सम-तुलना और पर्यावरण में कुछ रूप परिवर्तन मनुष्य द्वारा किया जाता है।

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प्रश्न 2.
मानवी भूगोल की प्रकृति और विषय-क्षेत्र पर नोट लिखें।
उत्तर-
मानवीय भूगोल की प्रकृति-मानवीय भूगोल का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी पर जीवन की क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन करना होता है। अलग-अलग स्थानों पर रंग, कुशलता, रहन-सहन, रीति-रिवाज़, धर्म, सामाजिक, आर्थिक हालात में काफी भिन्नता देखने को मिलती है। यह भिन्नताएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में प्राकृतिक पर्यावरण से प्रभावित होती है। मनुष्य और पर्यावरण के आपसी संबंध के कारण सांस्कृतिक प्राकृतिक, छवि पेश करते हैं। ट्रीवार्था के अनुसार, “मनुष्य और सांस्कृतिक गतिविधियां मानवीय भूगोल का मुख्य विषय है। इस तरह मानव भूगोल जनसंख्या, प्राकृतिक स्रोत, सांस्कृतिक भूदृश्यों के आपसी संबंधों का अध्ययन करता है।”

मानवीय भूगोल मनुष्य के उसके पर्यावरण से आपसी संबंधों का सामाजिक, आर्थिक, प्राकृतिक अध्ययन करता है। मानवीय भूगोल का अध्ययन मानव पर्यावरण का एक व्यापक अध्ययन है। यह मनुष्य की प्राकृतिक पर्यावरण से समानता का अध्ययन करता है। मानवीय भूगोल सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक विकास इत्यादि का अध्ययन करता है। यह पर्यावरण अनुकूलन, क्षेत्रीय अनुकूलन, स्थानीय, संगठन का विश्लेषण करता है।

मनुष्य एक सक्रिय प्रतिनिधि है पर यह प्रकृति का हिस्सा नहीं है। मनुष्य एक सांस्कृतिक भूदृश बनाता है भौतिक पर्यावरण को अपने अनुकूल बनाकर। इस प्रकार मानवीय भूगोल मनुष्य की अपने आस-पास के प्राकृतिक पर्यावरण से सर्वव्यापक समानता का अध्ययन करता है।

विषय क्षेत्र-मानवीय भूगोल का विषय-क्षेत्र बहुत विशाल है पर भूगोलवेत्ताओं के विचार में विषय-क्षेत्र को लेकर काफी भिन्नता पाई जाती है। मानवीय भूगोल पृथ्वी की सतह पर मिलने वाले अलग-अलग मानवीय जातिवर्ग का अध्ययन है। मानवीय भूगोल की विषय सामग्री प्रकृति, मनुष्य और पर्यावरण के आपसी संबंध है।
मानवीय भूगोल के विषय क्षेत्र के मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं—

  1. मानवीय भूगोल के अधीन मानवीय जनसंख्या, मानवीय विभाजन और जनसंख्या के घनत्व का अध्ययन किया जाता है।
  2. मानवीय भूगोल के अंतर्गत किसी स्थान के प्राकृतिक स्रोतों, मनुष्य द्वारा प्रयोग किये जाने वाले साधनों और प्राकृतिक स्रोतों से कई प्रयोग योग्य बनाए उपयोगी साधनों इत्यादि का अध्ययन किया जाता है।
  3. मानवीय भूगोल अधीन सांस्कृतिक तत्व जैसे भाषा, धर्म, रीति-रिवाज और परंपराएं, ग्रामीण, शहरी जनसंख्या इत्यादि का अध्ययन किया जाता है।
  4. मानवीय भूगोल के अधीन भौगोलिक और मानवीय रिश्तों का अध्ययन करके किसी स्थान पर मनुष्य और प्राकृतिक पर्यावरण के आपसी संबंधों के बारे जानकारी हासिल की जाती है।
  5. सामयिक विकास के बारे में अध्ययन प्राप्त किया जाता है।
  6. कई आर्थिक क्रियाएँ, उद्योग, व्यापार, यातायात के साधन, संचार के साधनों के स्थानीय विभाजन भी मानवीय भूगोल के विषय-क्षेत्र के अधीन आता है।

प्रश्न 3.
मानवीय भूगोल की शाखाओं और उप-शाखाओं पर नोट लिखो।।
उत्तर-
मानवीय भूगोल मानवीय जीवन के संपूर्ण तत्व और जीवन स्थान के बीच के रिश्तों की व्याख्या करता है। यह विषय पृथ्वी की सतह पर मानवीय तत्वों को समझने और व्याख्या करने के लिए सामाजिक विज्ञान से संबंधित और विषयों से भी महत्त्वपूर्ण और अर्थ-भरपूर संबंध रखता है। मानवीय भूगोल मानव पर पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन है। मानवीय भूगोल निम्नलिखित शाखाओं और उप-शाखाओं को अपने विषय-क्षेत्र में लेता है।

1. सामाजिक भूगोल (Social Geography)—इस शाखा के अंतर्गत सांस्कृतिक क्रियाएँ जैसे रहन-सहन,
भोजन, नस्ल, पहरावा, भाषा, धर्म, तकनीक, सामाजिक संगठनों इत्यादि का अध्ययन शामिल है। भूगोलवेत्ता ने इस शाखा को सामाजिक भूगोल का नाम दिया है। इस शाखा के अंतर्गत आने वाली मुख्य शाखाएँ हैं और उनके अंतर्गत आने वाले सामूहिक विषय—

  1. व्यवहार का भूगोल-और सामूहिक क्षेत्र
  2. समाज भलाई भूगोल-भलाई का अर्थशास्त्र
  3. कार्यनिवृति का भूगोल-समाजशास्त्र
  4. सांस्कृतिक भूगोल-मानव शास्त्र, महिलायों से संबंधित शास्त्र
  5. चिकित्सा भूगोल-महामारियों से सम्बन्धित इलाज शास्त्र।

2. आर्थिक भूगोल (Economic Geography)-आर्थिक भूगोल आर्थिक मनुष्य की गतिविधियों का अध्ययन करता है। यह प्राकृतिक स्रोतों का प्रयोग, वाणिज्य, व्यापार प्रयोग इत्यादि का अध्ययन करता है। यह किसी स्थान और औद्योगिक विकास का अध्ययन भी करता है। इसी उप-शाखाएँ और सामूहिक क्षेत्र अग्रलिखित हैं।

उप शाखाएँ सामूहिक विषय
1. साधनों का भूगोल (i) अर्थशास्त्र

(ii) साधनों का अर्थशास्त्र

2. कृषि और जरायति भूगोल कृषि विज्ञान
3. उद्योगों का भूगोल उद्योग अर्थशास्त्र
4. बाजारीकरण या बिक्री भूगोल

 

(i) व्यापार अध्ययन,

(ii) अर्थशास्त्र वाणिज्य

5. पर्यटन भूगोल (i) पर्यटन

(ii) यात्रा व्यापार

6. राष्ट्रीय सम्बन्धों का भूगोल राष्ट्रीय व्यापार

 

3. जनसंख्या भूगोल (Population Geography)-जनांकन भूगोल में संसार के अलग-अलग भाग की आबादी वृद्धि, विभाजन और घनत्व जैसे तत्वों का अध्ययन किया जाता है। इसमें मृत्यु दर, जन्म दर, लिंग अनुपात, आयु संरचना का अध्ययन भी शामिल है। यह उप शाखा जनांकन विज्ञान है।
4. राजनीतिक भूगोल (Political Geography)—इसमें राजनीतिक मामलों चुनाव, सैनिक, राजनीति आदि का अध्ययन किया जाता है। इसमें राजनीतिक सीमाएँ, राजधानी, स्थानीय सरकार, अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों इत्यादि के बारे में भी अध्ययन किया जाता है। इसकी उप-शाखाएँ और समान क्षेत्र निम्नलिखित हैं—

उपशाखाएँ सामूहिक क्षेत्र
(i) चुनाव भूगोल राजनीतिक शास्त्र
(ii) सैनिक भूगोल चुनाव विश्लेषण अध्ययन, सैनिक विज्ञान।

 

5. बस्तीवादी भूगोल (Settlement Geography)-इसमें मानव के रहन-सहन, रीति-रिवाजों इत्यादि का अध्ययन किया जाता है। इसकी उपशाखाएँ हैं—

  1. शहरी योजनाबंदी
  2. ग्रामीण योजनाबंदी।

6. ऐतिहासिक भूगोल (Historical Geography)—एक प्राचीन समय के मुकाबले कितना भौगोलिक विकास हुआ है इस अध्ययन क्षेत्र के अधीन आता है।

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प्रश्न 4.
मानव भूगोल के मुख्य पड़ाव और उद्देश्य का विस्तृत विभाजन करें।
उत्तर-
मानव भूगोल मनुष्य को अपने आस-पास के प्राकृतिक पर्यावरण से सर्वव्यापी समानता का अध्ययन करता है। ऐतिहासिक तथ्य को देखते हुए पता चलता है कि मानवीय भूगोल कई पड़ावों से गुजर कर हम तक पहुँचा है और इन पड़ावों के कुछ उद्देश्य भी रहे हैं। मानव भूगोल के मुख्य पड़ाव और उनके उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
1. आरम्भिक बस्तीवाद काल-इस काल में भूगोलवेत्ताओं का काम खोज करना और यात्राएँ करना था, और उनके बाद इनकी यात्राओं के दौरान की गई खोजों का रिकार्ड एकत्र करना था। जैसे-जैसे राजनीतिक मुद्दों और व्यापारिक, चिंतन में वृद्धि होती गई वैसे-वैसे अलग-अलग स्थानों पर भूगोलवेत्ता और विद्वानों ने ज्यादा खोज यात्राएँ शुरू की ताकि व्यापार इत्यादि को उत्साहित करने के लिए नये-नये तरीके ढूढ़े जाएँ।

2. प्राचीन काल-प्राचीन काल में भूगोलवेत्ताओं का मुख्य कार्य निपुण बनाना था। वह नक्शे बनाते थे और खगोलीय नपाई करते थे। पुरातन प्रमाणों के अनुसार पता चलता है कि पुराने विद्वानों की मुख्य रुचि नक्शे को बनाने में थी वह नक्शे बनाकर खगोल की नपाई करते थे। सब से पहले भूगोलवेत्ताओं का खिताब यूनानी विद्वानों को जाता है। इनमें से मुख्य यूनानी भूगोलवेत्ता थे-होमर, हैरोडोटस, थेलज, अरस्तु और ऐरोटोस्थीनज।

3. बस्तीवादी काल का प्रारंम्भिक दौर-इस काल में विद्वानों का मुख्य कार्य विश्लेषण करना रहा है। इस काल में हर क्षेत्र के सभी पक्षों का विस्तृत अध्ययन और बाद में उसका वर्णन किया जाता था। इस समय और सोच का मुख्य विचार था कि सभी क्षेत्र मिल कर पूरी पृथ्वी बनाते हैं जिसका पूर्ण तौर पर अध्ययन ही सभी अध्ययन का रास्ता खोल देता है।

4. 1930 और दूसरे युद्ध के बीच का काल-इस काल का मुख्य कार्य क्षेत्रीय अलगाव करना है। इस क्षेत्र का मुख्य उद्देश्य किसी भी नवीनपन की पहचान करना होता था और पहचान करके फिर यह जानना था कि क्षेत्र किसी दूसरे क्षेत्र से कितना प्राकृतिक और मानवीय कारणों की वजह से अलग है।

5. 1950 से आखिर के 1960 तक-इस काल का मुख्य कार्य स्थानीय संगठन था। यह काल कंप्यूटर और उच्च तकनीक विज्ञान का प्रयोग काल था। इसमें मानवीय काम और विकास क्षेत्र के नक्शे तैयार किये जाते थे और विश्लेषण के नियमों का प्रयोग किया जाता था।

6. 1970 में-1970 के काल के दौरान भूगोलवेत्ता का मुख्य कार्य मानववादी, प्रगतिवादी और व्यवहारवादी सोच प्रक्रियाओं का उभार करना था। मात्रात्मक क्रांति से असंतुष्ट और भूगोल संबंधी अमानवीय और हिंसक चीजों और दंगों-तरीकों से मानवीय भूगोल में अलग-अलग सोच का जन्म हुआ।

7. 1980 में-इस दशक में भूगोल का मुख्य कार्य मानवीय भूगोल के सामाजिक राजनीतिक असंबंधी मानवीय प्रसंगों का अध्ययन किया जाता था।

8. 1990 में-इस दौरान भूगोलवेत्ताओं का मुख्य कार्य उत्तर आधुनिकतावाद था। अब मानवीय क्रियाओं की व्याख्या करने वाले सिद्धांतों पर सवाल उठना और आलोचना शुरू हो गई। हर प्रबन्ध की एक नई सोच सामने आई और एक नई सोच के महत्त्व पर अब जोर केंद्रित किया गया। अमेरिकी भूगोलवेत्ताओं और भौगोलिक धाराणाओं में एक समय में अन्य विषयों को ज्ञान प्रदान करने का प्रयोग लगातार शुरू हो रहा था।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल और इसकी शाखाएं

मानव भूगोल और इसकी शाखाएं PSEB 12th Class Geography Notes

  • भूगोल न सिर्फ कई विषयों का सुमेल है, बल्कि अनुभव किया जाने वाला एक उपयोगी विषय है। ।
  • भूगोल को मुख्य रूप में दो हिस्सों-भौतिक भूगोल और मानव भूगोल में विभाजित किया जाता है। भौतिक भूगोल में हम स्थिति, धरातल, पर्यावरण, जल प्रवाह, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टी, खनिज पदार्थों के बारे में अध्ययन करते हैं। मानव विज्ञान में हम संस्कृति, प्रजाति, धर्म, भाषा, तकनीक, सामाजिक । संगठन, वित्तीय संस्थाएँ, राजनीतिक प्रबंध इत्यादि के बारे में ज्ञान हासिल करते हैं। इस तरह से भौगोलिक या सम्पूर्ण पर्यावरण बनता है।
  • मानव भूगोल साधारण शब्दों में मनुष्य की अपने आस-पास के प्राकृतिक पर्यावरण के साथ सर्वपक्षीय समानता का अध्ययन है।
  • मानव भूगोल, भूगोल का एक अहम् हिस्सा है, जिसमें हम पृथ्वी पर मानव होड़ और उसकी गतिविधियों के बारे में पढ़ते हैं।
  • भूगोल दो मुख्य भागों क्षेत्रीय और क्रमबद्धता में विभाजित है और मानव और मानव भूगोल क्रमबद्ध भूगोल का ही एक हिस्सा हैं।
  •  मानवीय भूगोल प्राकृतिक/भौतिक पर्यावरण से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित है। मानव भूगोल में मानव और ! उसके पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक अध्ययन किया जाता है।
  • मानव भूगोल के हर विषय की अपनी एक अध्ययन प्रणाली और विषय क्षेत्र होता है। जैसे कि अर्थशास्त्र में हम वस्तुओं के उत्पादन, उपभोग इत्यादि के बारे में पूछते हैं। भू-गर्भ विज्ञान में धरती की पपड़ी (Crust) की बनावट, वनस्पति विज्ञान में जानवरों और पौधों के बारे में।
  • इस तरह मानव विज्ञान का विषय असीमित है। इसमें हम जाति और वर्ग का अध्ययन करते हैं। इसमें आबादी के बारे में, विभाजन और घनत्व, जनांकन, प्रवास की बनावट, संस्कृति, अलगाव, आर्थिक क्रियाओं के बारे में पढ़ते हैं।
  • भौगोलिक धारणाएँ उस समय और सिद्धांत का अध्ययन है जिसके आधार पर भूगोल को एक विषय का .रुत्बा प्राप्त हुआ है। भूगोल विषय में भौगोलिक धारणाओं का अर्थ है कि किसी खास स्थान और संदर्भ में भौगोलिक ज्ञान और विकास को समझना है।
  • जो आदर्श , पहुँच, विधियों और सैद्धांतिक पर्यावरण में संबंधित सरकारों में से निकलते हैं। उन्हें नियतिवाद कहते हैं।
  • मानव-मानव प्रकृति का एक गुणी प्रतिनिधि है।
  • पर्यावरण-पर्यावरण का अर्थ है-हमारे आस-पास का दायरा जिसमें मनुष्य रहते हैं और काम करते हैं। यह मुख्य रूप में दो तरह का होता है-भौगोलिक वातावरण और सांस्कृतिक वातावरण (पर्यावरण)।
  • मानवीय भूगोल-मानव भूगोल, मनुष्य के अपने आस-पास पर्यावरण के प्राकृतिक वातावरण से सर्वपक्षीय साझ का अध्ययन है।
  • मानवीय भूगोल का उद्देश्य-इसका मुख्य उद्देश्य मानव और प्रकृति के परिवर्तन का अध्ययन करना है।
  • भूगोल का विषय-क्षेत्र
    • भूगोल सांस्कृतिक भूदृश्य का अध्ययन करना है।
    • संसाधन उपयोग
    • पर्यावरण अनुकूलन (समायोजन)
  • मानवीय भूगोल की उप-शाखाएँ-मानव भूगोल की शाखाएँ निम्नलिखित हैं
    • सांस्कृतिक भूगोल
    • सामाजिक भूगोल
    • राजनीतिक भूगोल
    • जनसंख्या भूगोल
    • बस्ती भूगोल
    • आर्थिक भूगोल।
  • भौतिक वातावरण के मुख्य तत्त्व-मिट्टी, जलवायु, धरातल, पानी, प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु आदि।
  • सांस्कृतिक भूगोल के मुख्य तत्त्व-घर, गाँव, शहर, सड़क, रेलमार्ग, उद्योग, बंदरगाह, खेत आदि।
  • मुख्य मानव भूगोलवेत्ता-रैट्ज़ेल, विडाल डी, ला ब्लाँश, ऐनल चर्चिल सैंपल, कार्ल रिटर, हमबोल्ट, टेलर, ट्रीवार्था इत्यादि।
  • Ozone Layer. प्रारम्भिक ग्रामीण कार्यों के कारण खराब हो रही है।