वालीबाल (Volleyball) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 11th Class Physical Education Book Solutions वालीबाल (Volleyball) Game Rules.

वालीबाल (Volleyball) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें (TIPS TO REMEMBER)

  1. वालीबाल मैदान की लम्बाई चौड़ाई = 18 × 9 मीटर
  2. नैट के ऊपरली पट्टी की चौड़ाई = 7 सैं० मी०
  3. एनटीनों की संख्या = 2
  4. एनटीना की लम्बाई = 1.80 मीटर
  5. एनटीने का घेरा = 10 मि॰मी
  6. पोल की साइज रेखा से दूरी = 1 मीटर
  7. नैट की लम्बाई और चौड़ाई = 9.50 मीटर × 1 मीटर
  8. जाल के छेदों का आकार = 10 सैं० मी०
  9. पुरुषों के लिए नैट की ऊंचाई = 2.43 मीटर
  10. स्त्रियों के लिए नैट की ऊंचाई = 2.24 मीटर
  11. गेंद की परिधि = 65 से 67 सैं० मी०
  12. गेंद का रंग = कई रंगों वाला
  13. गेंद का भार = 260 ग्राम से 280 ग्राम
  14. टीम के खिलाड़ियों की गिनती = 12 (6 खेलने वाले, 6 बदलवें)
  15. मैच के अधिकारी = दो रैफरी, स्कोरर, लाइन मैन 2 अथवा 4
  16. पीठ पर लेग नम्बरों का आकार = लम्बाई = 15 सैं० मी०, चौड़ाई = 2 सैं० मी०, पीठ पर 20 सैं०मी०
  17. रेखाओं की चौड़ाई = 5 सैंमी
  18. मैदान को बाँटने वाली रेखा = केन्द्रीय रेखा
  19. सर्विस रेखा की लम्बाई = 9 मीटर

वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

वालीबाल खेल की संक्षेप रूप-रेखा (Brief outline of the Volley Ball)

  1. वालीबाल की खेल में 12 खिलाड़ी भाग लेते हैं जिनमें से 6 खेलते हैं तथा 6 बदलवे (Substitutes) होते हैं।
  2. भाग लेने वाली दो टीमों में से, प्रत्येक टीम में छः खिलाड़ी होते हैं।
  3. ये खिलाडी अपने कोर्ट में खडे होकर बाल को नैट से पार करते हैं।
  4. जिस टीम के कोर्ट में गेंद गिर जाए उसके विरुद्ध प्वाइंट दे दिया जाता है। यह प्वाइंट टेबल टेनिस खेल की तरह होते हैं।
  5. वालीबाल के खेल में कोई समय नहीं होत बल्कि बैस्ट ऑफ़ थ्री या बैस्ट ऑफ़ फ़ाइव की गेम लगती है।
  6. नैट के नीचे अब रस्सी नहीं डाली जाती।
  7. जो टीम टॉस जीतती है वह सर्विस या साइड ले सकती है।
  8. वालीबाल के खेल में दो खिलाड़ी बदले जा सकते हैं।
  9. यदि सर्विस नैट से 5 से 6 इंच ऊंची आती है तो विरोधी टीम का खिलाड़ी बाल ब्लॉक कर सकता है।
  10. यदि कोई टीम समय पर नहीं आती तो 15 मिनट तक इन्तज़ार किया जा सकता है। बाद में टीम को स्करैच किया जा सकता है।
  11. एक गेम 25 प्डवाइंट की होती है।
  12. लिबरो खिलाड़ी कभी भी बदला जा सकता है परन्तु वह खेल में आक्रमण नहीं कर सकता।
  13. एनटीने की लम्बाई 1.80 मीटर होती है।
  14. खिलाड़ी बाल को किक लगा कर अथवा शरीर के किसी दूसरे भाग से हिट करके विरोधी पाले में भेज सकता
  15. यदि सर्विस करते समय बाल नैट को छू जाए और विरोधी पाले में चला जाए तो सर्विस ठीक मानी जाएगी।

PSEB 11th Class Physical Education Guide वालीबाल (Volleyball) Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
वालीबाल के मैदान की लम्बाई तथा चौड़ाई लिखें।
उत्तर-
वालीबाल मैदान की लम्बाई व चौड़ाई = 18 × 9 मीटर।

वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 2.
वालीबाल की बाल का भार कितना होता है ?
उत्तर-
260 ग्राम से 280 ग्राम।

प्रश्न 3.
वालीबाल के मैच में कुल कितने अधिकारी होते हैं ?
उत्तर-
रैफरी = 2, स्कोरर = 1, लाइनमैन = 2

प्रश्न 4.
वालीबाल खेल में कोई चार फाऊल लिखें।
उत्तर-

  1. जब गेम चल रही हो तो खिलाड़ी नैट को हाथ न लगायें। ऐसा करना फाऊल होता है।
  2. घुटनों के ऊपर एक टच वीक समझा जाता है।
  3. यदि बाल तीन बार से अधिक छू लिया जाए तो फ़ाऊल होता है।
  4. एक ही खिलाड़ी जब लगातार दो बार हाथ लगाता है तो फ़ाऊल होता है।

वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 5.
वालीबाल खेल में कुल कितने खिलाड़ी होते हैं ?
उत्तर-
12 (6 खेलने वाले, 6 बदलवें)।

प्रश्न 6.
वालीबाल खेल में कितने खिलाड़ी बदले जा सकते हैं ?
उत्तर-
6 खिलाड़ी।

वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

Physical Education Guide for Class 11 PSEB वालीबाल (Volleyball) Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
बालीबाल खेल का मैदान, जाल, गेंद, आक्रमण का क्षेत्र के विषय में लिखें।
उत्तर-
वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 1
खेल का मैदान

1. वालीबाल के खेल के मैदान की लम्बाई 18 मीटर तथा चौड़ाई 9 मीटर होगी। प्रांगण से कम-सेकम 7 मीटर ऊपर तक के स्थान पर किसी भी प्रकार कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। मैदान में 5 सैंटीमीटर चौड़ा रेखाओं द्वारा अंकित होगा। ये रेखाएं सभी बाधाओं से कम-से-कम दो मीटर दूर होंगी। जाल के नीचे की केन्द्रीय रेखा मैदान को दो बराबर भागों में बांटेगी।

2. आक्रमण क्षेत्र-मैदान के प्रत्येक अर्द्ध भाग में केन्द्रीय रेखा के समानान्तर 3 मीटर दूर 5 सैंटीमीटर की रेखा (आक्रमण क्षेत्र) खींची जाएगी। इसकी चौड़ाई तीन मीटर में शामिल होगी।

3. आकार व रचना-जाल 9.50 मीटर लम्बा और 3 मीटर चौड़ा होगा। इसके छिद्र 10 सेंटीमीटर चौकोर होने चाहिएं। इसके ऊपरी भाग में 5 सैंटीमीटर चौड़ा सफ़ेद कैनवस का फीता इस प्रकार खींचा जाना चाहिए कि इसके भीतर एक लचीला तार जा सके।

4. पुरुषों के लिए जाल की ऊंचाई केन्द्र में भूमि से 2 मीटर 43 सैंटीमीटर तथा स्त्रियों के लिए 2 मीटर 24 सैंटीमीटर होनी चाहिए।

पक्षों के चिन्ह-एक अस्थिर गतिशील 5 सैंटीमीटर चौड़ी सफ़ेद पट्टी जाल के अन्तिम सिरों पर लगाई जाती है। दोनों खम्भों के निशान कम-से-कम 50 सेंटीमीटर दूर होंगे।
गेंद
गेंद गोलाकार तथा नर्म चमड़े की बनी होनी चाहिए। इसके अन्दर रबड़ या किसी ऐसी ही वस्तु का बना हुआ ब्लैडर हो। इसकी परिधि 65 सैंटीमीटर से लेकर 67 सैंटीमीटर होनी चाहिए। इसका भार 260 ग्राम से लेकर 280 ग्राम तक होना चाहिए। गेंद में हवा का दबाव 0.48 और 0.52 कि० ग्राम cm2 के बीच होना चाहिए।

प्रश्न 2.
वालीबाल खेल में खिलाड़ियों और कोचों के आचरण के विषय में बताएं
उत्तर-
खिलाड़ियों तथा कोचों का आचरण

  1. प्रत्येक खिलाड़ी को खेल के नियमों की जानकारी होनी चाहिए तथा उसे दृढ़ता से इनका पालन करना चाहिए।
  2. खेल के दौरान कोई खिलाड़ी अपने कप्तान के माध्यम से ही रैफरी से बात कर सकता है। इस प्रकार कप्तान ही रैफरी से बात कर सकता है।
  3. निम्नलिखित सभी अपराधों के लिए दण्ड दिया जाएगा,
    • अधिकारियों से उनके निर्णयों के विषय में बार-बार प्रश्न पूछना।
    • अधिकारियों के लिए अपशब्द कहना।
    • अधिकारियों के निर्णयों को प्रभावित करने के उद्देश्य से अनुचित हरकतें करना।
    • विरोधी खिलाड़ी को अपशब्द कहना या उसके साथ अभद्र व्यवहार करना।
    • मैदान के बाहर से खिलाड़ियों को कोचिंग देना।
    • रैफरी की अनुमति के बिना मैदान को छोड़ कर जाना।
    • गेंद का स्पर्श होते ही, विशेष कर सर्विस प्राप्त करते समय खिलाड़ियों का ताली बजाना या चिल्लाना।

दण्ड-

  1. मामूली अपराध के लिए साधारण चेतावनी। अपराध के दोहराए जाने पर खिलाड़ी को व्यक्तिगत चेतावनी (लाल कार्ड) मिलेगी। इससे उसका दल सर्विस का अधिकार या एक अंक खोएगा।
  2. गम्भीर अपराध की दशा में स्कोर शीट पर चेतावनी दर्ज की जाती है। इससे एक अंक या सर्विस का अधिकार खोना पड़ता है। यदि अपराध फिर भी दोहराया जाता है तो रैफरी खिलाड़ी को एक सैट या पूरे खेल के लिए अयोग्य घोषित कर सकता है।

खिलाड़ी की पोशाक

  1. खिलाड़ी जर्सी, पैंट, हल्के जूते (रबड़ या चमड़े के) पहनेगा। वह सिर पर पगड़ी, टोपी, किसी प्रकार का आभूषण (रत्न, पिन, कंगन आदि) तथा कोई ऐसी वस्तु नहीं पहनेगा जिससे अन्य खिलाड़ियों को चोट लगने की सम्भावना हो।
  2. खिलाड़ी को अपनी जर्सी की छाती तथा पीठ पर 8 से 15 सैंटीमीटर ऊंचे नम्बर धारण करना होगा। संख्या सांकेतिक करने वाली पट्टी की चौड़ाई 2 सैंटीमीटर होगी।

खिलाड़ियों की संख्या तथा स्थानापन्न

  1. खिलाड़ियों की संख्या सभी परिस्थितियों में 6 होगी। स्थानापन्नों (Substitutes) सहित पूरी टीम में 12 से अधिक खिलाड़ी नहीं होंगे।।
  2. स्थानापन्न तथा प्रशिक्षक रैफरी के सामने मैदान में बैठेंगे।
  3. खिलाड़ी बदलने के लिए टीम का कप्तान या प्रशिक्षक रैफरी से प्रार्थना करेगा। एक खेल में अधिक-से-अधिक 6 खिलाड़ी बदलने की अनुमति होती है। खेल में प्रविष्ट होने से पहले स्थानापन्न खिलाड़ी स्कोरर के सामने उसी पोशाक में जाएगा और अनुमति मिलने के तुरन्त पश्चात् अपना स्थान ग्रहण करेगा।
  4. जब प्रत्येक खिलाड़ी प्रतिस्थापन्न के रूप में बदला जाता है तो वह फिर उसी सैट में प्रवेश कर सकता है। परन्तु ऐसा केवल एक बार ही किया जा सकता है। उसके पश्चात् केवल जो खिलाड़ी बाहर गया हो, वही प्रतिस्थापन्न के रूप में आ सकता है।

खिलाड़ियों की स्थिति
सर्विस होने के पश्चात् दोनों टीमों के खिलाड़ी अपने-अपने क्षेत्र में खड़े होते हैं । यह कोई आवश्यक नहीं कि लाइनें सीधी ही हों। खिलाड़ी जाल के समानान्तर दायें से बायें इस प्रकार स्थान ग्रहण करते हैं—
वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 2
सर्विस के पश्चात् खिलाड़ी अपने क्षेत्र के किसी भाग को रोक सकता है। स्कोर शीट में अंकित रोटेशन के अनुसार उसे सैट के अन्त तक प्रयोग में लाना होगा। रोटेशन में किसी त्रुटि के पता चलने पर खेल रोक दिया जाता है और त्रुटि को ठीक किया जाता है। त्रुटि करने वाली टीम द्वारा लिये गये प्वाईंट (त्रुटि के समय) रद्द कर दिए जाते हैं। विरोधी टीम द्वारा प्राप्त (प्वाइंट) स्थिर रहते हैं। यदि त्रुटि का ठीक पता न चले तो अपराधी दल उपयुक्त स्थान पर लौट आएगा और स्थिति के अनुसार सर्विस या एक अंक (प्वाइंट) खोएगा।
अधिकारी-खेल की व्यवस्था के लिए निम्नलिखित अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं—

  1. रैफरी (1)
  2. अम्पायर (1)
  3. स्कोरर (1)
  4. लाइनमैन (2 से 4)।

वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 3.
वालीबाल खेल के नियमों के विषय में लिखें।
उत्तर-
खेल के नियम

  1. प्रत्येक टीम से खिलाड़ियों की संख्या 6 होती है।
  2. सभी अन्तर्राष्ट्रीय मैचों में पांच जीतने वाले सैट खेले जाते हैं।
  3. सर्विस या क्षेत्र के चुनाव के लिए दोनों टीमों के कप्तान टॉस करेंगे। सर्विस का निर्णय भी टॉस द्वारा किया जाएगा।
  4. प्रत्येक खेल के पश्चात् टीम अपना क्षेत्र बदलेगी। जब दो टीमों के अन्तिम सैट में प्वाइंट हों तो टीमें अवश्य दिशाएं बदलेंगी परन्तु सर्विस वही टीम करेगी जो दिशा परिवर्तन के समय कर रही थी।
  5. कोई टीम छ: खिलाड़ियों से कम खिलाड़ी होने से मैच खेल सकती।

टाइम आऊट—

  1. रैफरी या अम्पायर केवल गेंद मृत होने पर ही टाइम-आऊट देगा।
  2. टीम के कप्तान या कोच को विश्राम तथा प्रतिस्थापन्न के लिए टाइम-आऊट मांगने का अधिकार है।
  3. टाइम-आऊट के दौरान खिलाड़ी क्षेत्र छोड़ कर किसी से बात नहीं कर सकते। वे केवल अपने प्रशिक्षक से परामर्श ले सकते हैं।
  4. प्रत्येक टीम विश्राम के लिए दो टाइम-आऊट ले सकती है। विश्राम की यह अवधि 30 सैकिंड से अधिक नहीं होती। लगातार दो टाइम आऊट भी लिए जा सकते हैं।
  5. यदि दो टाइम-आऊट लेने के पश्चात् कोई टीम तीसरी बार विश्राम के लिए टाइम-आऊट का अनुरोध करती है तो रैफरी सम्बन्धित कप्तान या प्रशिक्षक को चेतावनी देगा। यदि इसके पश्चात् भी टाइम-आऊट का अनुरोध किया जाता है तो सम्बन्धित टीम को अंक (प्वाइंट) खोने या सर्विस खोने का दण्ड दिया जाएगा।
  6. खिलाड़ी के स्थानापन्न आते ही खेल शीघ्र आरम्भ किया जाएगा।
  7. किसी खिलाड़ी के घायल हो जाने की अवस्था में तीन मिनट का काल स्थगन किया जाएगा। यह तभी दिया जाएगा यदि घायल खिलाड़ी बदला न जा सकता हो।
  8. प्रत्येक सैट के बीच में अधिक-से-अधिक दो मिनट का अवकाश होगा परन्तु चौथे और पांचवें सैट के बीच में 5 मिनट का अवकाश होगा।

खेल में विन
यदि किसी कारणवश खेल में विघ्न पड़ जाए और मैच समाप्त न हो सके तो इस समस्या का हल इस प्रकार किया जाएगा—
(1) खेल उसी क्षेत्र में जारी किया जाएगा और खेल के रुकने के समय के परिणाम रखे जाएंगे।
(2) यदि खेल में बाधा 4 घण्टे से अधिक न हो तो मैच निश्चित स्थान पर पुनः खेला जाएगा।
(3) मैच के किसी अन्य क्षेत्र या स्टेडियम में आरम्भ किए जाने की दशा में रुके हुए खेल के सैट को रद्द समझा जाएगा, किन्तु खेले हुए सैट के परिणाम ज्यों-के-त्यों लागू होंगे।

(क) सर्विस-सर्विस से अभिप्राय है कि पीछे से दायें पक्ष के खिलाड़ी द्वारा गेंद खेल में डालने। वह अपनी खुली या बन्द मुट्ठी बांधे हुए हाथ से या भुजा के किसी भाग से गेंद को इस प्रकार मारता है कि वह जाल के ऊपर से होती हुई विपक्षी टीम के अर्द्धक में पहुंच जाए। सर्विस निर्धारित स्थान से ही की जाने पर मान्य समझी जाएगी। गेंद को हाथ से पकड़ कर मारना मना है। सर्विस करने के पश्चात् खिलाड़ी अपने अर्द्ध-क्षेत्र या इसकी सीमा रेखा पर भी रह सकता यदि हवा में उछाली हुई गेंद बिना किसी खिलाड़ी द्वारा छुए ज़मीन पर गिर जाए तो सर्विस दोबारा की जाएगी। यदि सर्विस की गेंद बिना जाल को छुए ऊपर क्षेत्र की चौड़ाई प्रकट करने वाले जाल पर दोनों सिरों के फीतों में से निकल जाती है तो सर्विस ठीक मानी जाती है। रैफरी के सीटी बजाते ही फौरन सर्विस कर देनी चाहिए। यदि सीटी बजने से पहले सर्विस की जाती है तो यह सर्विस पुनः की जाएगी।
खिलाड़ी तब तक सर्विस करता रहेगा जब तक उसकी टीम का कोई खिलाड़ी त्रुटि नहीं कर देता।

(ख) सर्विस की त्रुटियां-यदि निम्नलिखित में से कोई त्रुटि होती है तो रैफरी सर्विस बदलने के लिए सीटी बजाएगा

  1. जब गेंद जाल से छू जाए।
  2. जब गेंद जाल के नीचे से निकल जाए।
  3. जब गेंद फीतों का स्पर्श कर ले या पूरी तरह जाल को पार न कर सके।
  4. जब गेंद विपक्षी के क्षेत्र में पहुंचने से पहले किसी खिलाड़ी या वस्तु को छू ले।
  5. जब गेंद विपक्षी के अर्द्धक के बाहर जा गिरे।।

(ग) दूसरी तथा उत्तरवर्ती सर्विस-प्रत्येक नए सैट में वह टीम सर्विस करेगी जिसने इससे पहले सैट में सर्विस न की हो। अन्तिम निर्णायक सैट में सर्विस टॉस द्वारा निश्चित की जाएगी।

(घ) खेल में बाधा-यदि रैफरी के मतानुसार कोई खिलाड़ी जान-बूझ कर खेल में बाधा पहुंचाता है तो उसे दण्ड दिया जाता है।
सर्विस में परिवर्तन-जब सर्विस करने वाली टीम कोई त्रुटि करती है तो सर्विस में परिवर्तन होता है। जब गेंद साइड आऊट होती है तो सर्विस में परिवर्तन होता है।

  1. सर्विस परिवर्तन पर सर्विस करने वाली टीम के खिलाड़ी सर्विस से पहले घड़ी की सूईयों की दिशा में अपना स्थान बदलेंगे।
  2. नए सेट के आरम्भ में टीमें नए खिलाड़ी लाकर अपने पहले स्थानों में परिवर्तन कर सकती हैं, परन्तु खेल आरम्भ होने से पहले इस विषय में स्कोरर को अवश्य सूचित करना चाहिए।

वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 4.
बालीबाल गेंद को हिट मारना, ब्लॉकिंग, जाल पर खेल क्या है ?
उत्तर-
गेंद को हिट मारना

  1. प्रत्येक टीम विपक्षी टीम के अर्द्धक में गेंद पहुंचाने के लिए तीन सम्पर्क कर सकती है।
  2. गेंद पर कमर के ऊपर शरीर के किसी भाग से प्रहार किया जा सकता है।
  3. गेंद कमर के ऊपर के कई अंगों को छू कर आ सकती है, परन्तु छूने का काम एक ही समय हो और गेंद पकड़ी न जाए बल्कि ज़ोर से उछले।
  4. यदि गेंद खिलाड़ी की बाहों या हाथों में कुछ क्षण के लिए रुक जाती है तो उसे गेंद पकड़ना माना जाएगा। गेंद को लुढ़काना, ठेलना या घसीटना ‘पकड़’ माना जाएगा। गेंद को नीचे से दोनों हाथों से एक साथ स्पष्ट रूप से प्रहार करना नियमानुसार है।
  5. दोहरा प्रहार या स्पर्श-यदि कोई खिलाड़ी एक से अधिक बार अपने शरीर के किसी अंग द्वारा गेंद को छूता है जबकि किसी अन्य खिलाड़ी ने उसे स्पर्श नहीं किया तो वह दोहरा प्रहार या स्पर्श माना जाएगा।

ब्लॉकिंग
ब्लॉकिंग वह प्रक्रिया है जिससे गेंद के जाल पर गुज़रते ही पेट के ऊपर के शरीर के किसी भाग द्वारा तुरन्त विरोधी के आक्रमण को रोकने की कोशिश की जाती है।

ब्लॉकिंग केवल आगे वाली पंक्ति में खड़े खिलाड़ी ही करते हैं। पिछली पंक्ति में खड़े खिलाड़ियों को ब्लॉकिंग की आज्ञा नहीं होती।
ब्लॉकिंग के पश्चात् ब्लॉकिंग में भाग लेने वाला कोई भी खिलाड़ी गेंद प्राप्त कर सकता है, परन्तु ब्लॉक के बाद स्मैश या प्लेसिंग नहीं की जा सकती।
जाल का स्वरूप
(DESIGN OF THE NET)
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  1. जब खेल के दौरान गेंद (सर्विस के अतिरिक्त) जाल को छूती हुई जाती है तो ठीक मानी जाती है।
  2. बाहर के चिन्हों के बीच से जब गेंद को जाल पार करती है तो भी गेंद ठीक मानी जाती है।
  3. जाल में लगी गेंद खेली जा सकती है। यदि टीम द्वारा गेंद तीन बार खेली गई है और गेंद चौथी बार जाल को लगती है या भूमि पर गिरती है तो रैफरी नियम भंग के लिए सीटी बजाएगा।
    वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education 4
    VOLLEY-BALL
  4. यदि गेंद जाल में इतनी ज़ोर से लगती है कि जाल किसी विरोधी खिलाड़ी को छू ले तो इस स्पर्श के लिए विरोधी खिलाड़ी दोषी नहीं माना जाएगा।
  5. यदि दो विरोधी खिलाड़ी एक साथ जाल को छूते हैं तो दोहरी त्रुटि माना जाएगा।

जाल के ऊपर से हाथ पार करना

  1. ब्लॉकिंग के दौरान जाल के ऊपर से हाथ पार करके विरोधी के क्षेत्र में गेंद का स्पर्श करना त्रुटि नहीं माना जाता किन्तु उस समय गेंद का स्पर्श स्मैश के बाद हुआ हो।
  2. आक्रमण के पश्चात् हाथ जाल पर से पार ले जाना त्रुटि नहीं।

केन्द्रीय रेखा पार करना

  1. यदि खेल के दौरान खिलाड़ी के शरीर का कोई भाग विरोधी क्षेत्र में चला जाता है तो वह त्रुटि होगी।
  2. जाल के नीचे से पार होना, विरोधी खिलाड़ी का ध्यान खींचने के लिए जाल के नीचे भूमि को शरीर के किसी भाग द्वारा पारित करना त्रुटि माना जाएगा।
  3. रैफरी की सीटी से पहले विरोधी क्षेत्र में घुसना त्रुटि मानी जाएगी।

खेल के बाहर गेंद

  1. यदि चिन्हों या फीतों के बाहर गेंद से स्पर्श करती है तो यह त्रुटि होगी।
  2. यदि गेंद भूमि की किसी वस्तु या मैदान की परिधि से बाहर ज़मीन छू लेती है तो आऊट माना जाएगा। रेखा स्पर्श करने वाली गेंद ठीक मानी जाएगी।
  3. रैफरी की सीटी के साथ खेल समाप्त हो जाएगी और गेंद मृत हो जाएगी।

स्कोर तथा खेल का परिणाम
अन्तर्राष्ट्रीय वालीबाल फैडरेशन (FIVB) के क्रीड़ा नियम आयोग (R.G.C.) ने 27 तथा 28 फरवरी, 1988 को बैहवैन में हुई सभा में वालीबाल की नवीन पद्धति को स्वीकृति दी। यह सियोल ओलम्पिक खेल 1988 के पश्चात् लागू हो गई।
नये नियमों के अनुसार, पहले चार सैटों में सर्व करने वाली टीम एक अंक प्राप्त करेगी। सैट की विजेता टीम वह होगी जो विरोधी टीम पर कम-से-कम दो अंकों का लाभ ले और सर्वप्रथम 25 अंक प्राप्त करे।

R.G.C. ने यह भी निर्णय किया कि सैटों के बीच अधिक-से-अधिक 3 मिनट की अवधि मिलेगी। इस समय सीमा में कोर्टों को बदलना और आरम्भिक Line ups का पंजीकरण स्कोर शीट पर किया जाएगा।
वालीबाल खेल में कार्य करने वाले कर्मचारी (Officials)—

  1. कोच तथा मैनेजर-कोच खिलाड़ियों को खेल सिखलाता है जबकि मैनेजर का कार्य खेल प्रबन्ध करना होता
  2. कप्तान–प्रत्येक टीम का कप्तान होता है जो अपनी टीम का नियन्त्रण करता है। वह खिलाड़ियों के खेलने का स्थान निश्चित करता है और टाइम आऊट लेता है।
  3. रैफरी-यह इस बात का ध्यान रखता है कि खिलाड़ी नियम के अन्तर्गत खेल रहा है या नहीं। यह खेल पर नियन्त्रण रखता है और उसका निर्णय अन्तिम होता है। यदि कोई नियमों का उल्लंघन करे तो उसको रोक देता है अथवा उचित दण्ड भी दे सकता है।
  4. अम्पायर-यह खिलाड़ियों को बदलता है। इसके अतिरिक्त रेखाएं पार करना, टाइम आऊट करना और रेखा को छू जाने पर सिगनल देना होता है। वह कप्तान के अनुरोध पर खिलाड़ी बदलने की अनुमति देता है। रैफरी की भी सहायता करता है तथा खिलाड़ियों को बारी-बारी स्थानों पर लगाता है।

पास (Passes)
1. अण्डर हैंड पास (Under Hand Pass)—यह तकनीक आजकल बहुत उपयोगी मानी गई है। इस प्रकार कठिन-से-कठिन सर्विस सुगमता से दी जाती है। इसमें बाएं हाथ की मुट्ठी बंद कर दी जाती है। दाएं हाथ की मुट्ठी पर बाल इस तरह रखा जाए कि अंगूठे समानान्तर हों। अण्डर हैंड बाल तब लिया जाता है जब बाल बहुत नीचा हो।

2. बैक पास (Back Pass)-जब किसी विरोधी खिलाड़ी को धोखा देना हो तो बैक पास प्रयोग में लाते हैं। पास बनाने वाला सिर की पिछली ओर बाल लेता है। वाली मारने वाला वाली मारता है।

3. बैक रोलिंग के साथ अण्डर हैंड पास (Under Hand Pass with Back Rolling)—जिस समय गेंद नैट के पास होता है तब अंगुलियां खोल कर और छलांग लगा कर गेंद को अंगुलियां सख्त करके चोट लगानी चाहिए।

4. साइड रोलिंग के साथ अण्डर हैंड पास (Under Hand Pass with Side Rolling)-जब गेंद खिलाड़ी के एक ओर होता है, जिस ओर गेंद होता है उस तरफ हाथ खोल लिया जाता है। साइड रोलिंग करके गेंद को लिया जाता है।

5. एक हाथ से अण्डर हैंड पास बनाना (Under Hand Pass with the Hand)—इस ढंग से गेंद को वापस मोड़ने के लिए तब करते हैं जब वह खिलाड़ी के एक ओर होता है, जिस तरफ गेंद लेना होता है। टांग को थोड़ा-सा झुका कर और बाजू खोल कर मुट्ठी बंद करके गेंद लिया जाता है।

6. नैट के साथ टकराया हुआ बाल देना (Taking the Ball Struck with the Net)—यह बाल प्रायः अण्डर हैंड से लेते हैं नहीं तो अपने साथियों की ओर निकलना चाहिए ताकि बहुत सावधानी से गेंद पार किया जा सके।

सर्विस (Service)-खेल का आरम्भ सर्विस से किया जाता है। कई अच्छी टीमें अनजान टीमों को अपनी अच्छी सर्विस से Upset कर देती हैं। सर्विस भी पांच प्रकार की होती है—

  1. अपर हैंड साइड सर्विस।
  2. टेनिस सर्विस।
  3. ग्राऊंड सर्विस।
  4. भोंदू सर्विस।
  5. हाई स्पिन सर्विस।

वाली मारना—

  1. प्लेसिंग स्मैश-खेल में Point लेने के लिए यह स्मैश प्रयोग में लाते हैं।
  2. ग्राऊंड आर्म स्मैश-जिस समय गेंद वाली से पीछे होता है। इसमें गेंद घुमा कर मारते हैं। यह भी बहुत बलशाली होता है।

1. ब्लॉक (Block) ब्लॉक वाली को रोकने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। यह बचाव का अच्छा ढंग है। यह तीन प्रकार का होता है, जो निम्नलिखित हैं—

  • इकहरा ब्लॉक (Single Block)-जब ब्लॉक करने का कार्य एक खिलाड़ी करे तो उसे इकहरा ब्लॉक कहते
  • दोहरा ब्लॉक (Double Block)-जब ब्लॉक रोकने का कार्य दो खिलाड़ी करें तो दोहरा ब्लॉक कहते हैं।
  • तेहरा ब्लॉक (Triple Block)-जब वाली मारने वाला बहुत शक्तिशाली होता हो तो तेहरे ब्लॉक की आवश्यकता पड़ती है। यह कार्य तीन खिलाड़ी मिल कर करते हैं। इस ढंग का प्रयोग प्रायः किया जाता है।

वालीबाल (Volleyball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 5.
बालीबाल खेल के फाऊल बताओ।
उत्तर-
वालीबाल के फ़ाऊल
(Fouls in Volleyball)
नीचे वालीबाल के फाऊल दिए जाते हैं—

  1. जब गेम चल रही हो तो खिलाड़ी नैट को हाथ न लगायें। ऐसा करना फाऊल होता है।
  2. केन्द्रीय रेखा को छूना फाऊल होता है।
  3. सर्विस करने से पूर्व रेखा काटना फ़ाऊल होता है।
  4. घुटनों के ऊपर एक टच वीक समझा जाता है।
  5. गेंद लेते समय आवाज़ उत्पन्न हो।
  6. होल्डिंग फ़ाऊल होता है।
  7. यदि बाल तीन बार से अधिक छू लिया जाए तो फ़ाऊल होता है।
  8. एक ही खिलाड़ी जब लगातार दो बार हाथ लगाता है तो फ़ाऊल होता है।
  9. सर्विस के समय यदि उस तरफ का पीछा ग़लत स्थिति में किया जाए।
  10. यदि रोटेशन ग़लत हो।
  11. यदि गेंद साइड पार कर दिया जाए।
  12. यदि बाल नैट के नीचे से होकर जाए।
  13. जब सर्विस एरिया से सर्विस न की जाए।
  14. यदि सर्विस ठीक न हो तो भी फ़ाऊल होता है।
  15. यदि सर्विस का बाल अपनी तरफ के खिलाड़ी ने पार कर लिया हो।
  16. सर्विस करते समय ग्रुप का बनाना फ़ाऊल होता है।
  17. विसल से पहले सर्विस करने से फ़ाऊल होता है।

यदि इन फाऊलों में से कोई भी फाऊल हो जाए तो रैफरी सर्विस बदल देता है। वह किसी भी खिलाड़ी को चेतावनी दे सकता है या उसको बाहर भी निकाल सकता है।
खेल के स्कोर (Score)—

1. जब कोई टीम दो सैटों से आगे होती है उसको विजेता घोषित किया जाता है। एक सैट 25 प्वाइंटों का होता है। यदि स्कोर 24-24 से बराबर हो जाए तो खेल 26-24, पर समाप्त होगा।

2. यदि रैफरी के कथन पर कोई टीम मैदान में नहीं आती तो वह खेल को गंवा देती है। 15 मिनट तक किसी टीम का इन्तज़ार किया जा सकता है। खेल में जख्मी हो जाने पर यह छूट दी जाती है। पांचवें सैट का स्कोर रैली के अन्त में गिना जाता है। प्रत्येक टीम जो ग़लती करती है उसके विरोधी को अंक मिल जाता है। Deciding Set में अंकों का अन्तर दो या तीन हो सकता है

3. यदि कोई टीम बाल को ठीक ढंग से विरोधी कोर्ट में नहीं पहुंचा सकती तो प्वाईंट विरोधी टीम को दे दिया जाता है।

निर्णय (Decision)—

  1. अधिकारियों के फैसले अन्तिम होते हैं।
  2. टीम का कप्तान केवल प्रौटैस्ट ही कर सकता है।
  3. यदि रैफरी का निर्णय उचित न हो तो खेल प्रोटैस्ट में खेली जाती है और प्रोटैस्ट अधिकारियों को भेज दिया जाता है।

PSEB 6th Class Social Science Solutions Chapter 14 भारत 200 ई. पू. से 300 ई. तक

Punjab State Board PSEB 6th Class Social Science Book Solutions History Chapter 14 भारत 200 ई. पू. से 300 ई. तक Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Social Science History Chapter 14 भारत 200 ई. पू. से 300 ई. तक

SST Guide for Class 6 PSEB भारत 200 ई. पू. से 300 ई. तक Textbook Questions and Answers

I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखें

प्रश्न 1.
सातवाहनों के प्रशासन के बारे में लिखें।
उत्तर-
सातवाहनों ने दक्कन में लगभग 300 वर्षों तक राज्य किया। इनका प्रशासन बहुत उत्तम था, जिस कारण राज्य में सुख-शान्ति तथा समृद्धि थी। इनके प्रशासन का वर्णन इस प्रकार है –

  1. राजा-सातवाहन साम्राज्य में राजा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। उसे धर्म का रक्षक तथा दैवी शक्तियों का मालिक माना जाता था। चाहे राजा निरंकुश था, फिर भी स्थानीय संस्थाओं को पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त थी।
  2. अधिकारी-अमात्य तथा महामात्र आदि अधिकारी शासन चलाने में राजा की सहायता करते थे।
  3. प्रान्त-साम्राज्य प्रान्तों में बंटा हुआ था। प्रान्त का प्रशासन सेनापति द्वारा चलाया जाता था।
  4. जिले-प्रान्तों को जिलों में बांटा हुआ था। ज़िलों को अहारास कहा जाता था।
  5. गांवों का प्रशासन-गांवों का प्रशासन गांव के मुखिया द्वारा चलाया जाता था जो ‘गोलमिकास’ कहलाता था।
  6. न्याय तथा सेना-सातवाहनों की न्याय व्यवस्था कठोर थी। सेना में घोड़ों, पैदल सैनिकों, रथों, हाथियों तथा नौकाओं का प्रयोग किया जाता था।
  7. आय के साधन-सातवाहनों की आय का मुख्य साधन शायद भूमिकर था।

प्रश्न 2.
प्रथम महान् चोल शासक कौन था तथा उसकी प्राप्तियां कौन-सी थीं?
उत्तर-
प्रथम् महान् चोल शासक कारीकल था।
प्राप्तियां-

  1. कारीकल ने अपने पड़ोसी चेर तथा पांड्य राजाओं को बुरी तरह से हराया।
  2. उसने श्रीलंका पर आक्रमण किया।
  3. उसने जंगलों को साफ़ करके भूमि को कृषि योग्य बनाया और सिंचाई के लिए नहरों तथा तालाबों का प्रबन्ध किया।
  4. उसने बाढ़ों को रोकने के लिए कावेरी नदी पर बांध बनवाया।

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प्रश्न 3.
200 ई० पू० से 300 ई० तक दक्षिण भारत के लोगों के जीवन बारे में लिखें।
उत्तर-
200 ई० पू० से 300 ई० तक दक्षिण भारत के लोगों का जीवन बहुत साधारण था। अधिकतर लोग किसान थे तथा गांवों में रहते थे।

  1. लेकिन शाही घराने के लोग तथा अमीर लोग शहरों के भीतरी भागों में रहते थे।
  2. बहुत-से व्यापारी तथा कारीगर समुद्री तटों के साथ लगते शहरों में बसे हए थे ताकि उन्हें व्यापार करने में आसानी रहे।
  3. लोग परिवार में मिल-जुल कर रहते थे। दिन भर काम करने के पश्चात् लोग अपना मनोरंजन करने के लिए संगीत, नृत्य, कविता-पाठ तथा जुआ आदि मनोरंजन के साधनों का प्रयोग करते थे।
  4. संगीत-यन्त्रों के रूप में वीणा, बांसुरी, तारों के तरंग वाले यन्त्रों तथा ढोल का प्रयोग किया जाता था। संगीत बहुत विकसित था। लोग रात तथा दिन के लिए अलगअलग राग बजाते-गाते थे।
  5. किसान, व्यापारी, पशु-पालक तथा कारीगर सरकार को टैक्स देते थे।

प्रश्न 4.
महापाषाण संस्कृति के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
दक्षिणी भारत में महापाषाण संस्कृति लगभग 1000 ई० पू० अस्तित्व में आई थी। इस भाग में वे लोग निवास करते थे, जिन्हें महापाषाण-निर्माता कहा जाता है। किसी विशाल पत्थर को महापाषाण कहते हैं। इस संस्कृति के लोग अपनी कब्रों को बड़े-बड़े पत्थरों के टुकड़ों से घेर देते थे। इसी कारण उनकी संस्कृति को महापाषाण संस्कृति का नाम दिया गया है।

महापाषाण संस्कृति की जानकारी हमें महाराष्ट्र में इनामगांव, तकलाघाट, म्यूरभाटी तथा दक्षिणी भारत में मास्की, कोपब्ल तथा ब्रह्मगिरि आदि स्थानों से मिले खण्डहरों से प्राप्त होती है। इन खण्डहरों से पता चलता है कि महापाषाण संस्कृति के लोग काले तथा लाल रंग के मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। इन बर्तनों में भिन्न-भिन्न प्रकार के मटके तथा अन्य बर्तन शामिल होते थे। कई बर्तन चाक पर बनाए जाते थे।

लोग कृषि तथा शिकार, दोनों प्रकार के व्यवसाय करते थे। कृषि का व्यवसाय काफ़ी उन्नत था, परन्तु अधिकतर लोग शिकार करना पसन्द करते थे।

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प्रश्न 5.
महापाषाण संस्कृति के दफ़नाने के ढंग सम्बन्धी लिखें।
उत्तर-
महापाषाण संस्कृति के लोग मृतकों को दफनाने के लिए एक विशेष रिवाज का पालन करते थे। वे मृतकों को दफ़नाकर उनके चारों ओर बड़े-बड़े पत्थरों का एक घेरा बनाते थे। इसके अतिरिक्त वे लोग मृतकों के बर्तन, औज़ार तथा हथियार आदि उनके साथ ही दफ़ना देते थे। शायद उन लोगों को विश्वास था कि मृत्यु के पश्चात् मनुष्य दूसरे संसार में चला जाता है तथा उसे वहाँ भी अपनी वस्तुओं की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 6.
डिमिट्रियस तथा मिनेन्द्र कौन थे?
उत्तर-
1. डिमिट्रियस-डिमिट्रियस पहला हिन्द-यूनानी हमलावर था जिसने मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत पर हमला करके अफ़गानिस्तान, पंजाब तथा सिन्ध के एक बड़े भाग पर कब्जा कर लिया था। लेकिन डिमिट्रियस को मध्य एशिया के बलख प्रान्त से हाथ धोने पड़े थे क्योंकि वहां यूकेटाइस ने सफल विद्रोह किया था।

2. मिनेन्द्र-मिनेन्द्र हिन्द-यूनानियों का एक महान् शासक था। उसने बौद्ध धर्म अपना लिया था। बौद्ध साहित्य में यह मिलिन्द के नाम से प्रसिद्ध है। वह बहुत योग्य तथा वीर शासक था। उसने पुष्यमित्र शुंग के काल में भारत पर आक्रमण करके पंजाब (आधुनिक पाकिस्तान सहित) तथा कश्मीर के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया।

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प्रश्न 7.
शकों (सिथियन्ज) के बारे में आप क्या जानते हो?
उत्तर-
सिथियन्ज़ अथवा शक अथवा मध्य एशिया के मूल निवासी थे। ये 200 ई० पू० के मध्य में भारत में आक्रमणकारी के रूप में आए थे तथा यहां ही स्थायी रूप में रहने लग पड़े। आरम्भ में इन लोगों की बस्तियां उत्तर-पश्चिमी पंजाब, उत्तर प्रदेश में मथुरा तथा मध्य भारत में थीं। परन्तु बाद में पश्चिमी भारत का गुजरात तथा मध्य प्रदेश का उज्जैन क्षेत्र उनकी शक्ति के केन्द्र बन गए। रुद्रदमन प्रथम, सिथियन्ज़ वंश का बहुत प्रसिद्ध शासक था, जिसने 200 ई० में राज्य किया। चौथी शताब्दी के अन्त में गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (चन्द्रगुप्त द्वितीय) ने सिथियन्ज़ को हरा कर उनके शासन का अन्त कर दिया।

प्रश्न 8.
कनिष्क पर एक नोट लिखें।
उत्तर-
कनिष्क कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उसने 78 ई० से 102 ई० तक शासन किया। वीरता की दृष्टि से उसकी तुलना समुद्रगुप्त के साथ की जाती है।
राज्य का विस्तार-कनिष्क के शासन काल में कुषाण राज्य का सबसे अधिक विस्तार हुआ। उसका राज्य बिहार तक फैला हुआ था, जिसमें मध्य भारत, गुजरात, सिन्ध, पंजाब, अफ़गानिस्तान तथा बलख शामिल थे। उसने चीनी सेनापति पान चाओ से भी युद्ध किया था।

बौद्ध धर्म तथा कनिष्क-बौद्ध धर्म के अनुयायी के रूप में कनिष्क की तुलना सम्राट अशोक से की जाती है। उसने बौद्ध धर्म के मठों तथा विहारों की मरम्मत करवाई तथा कई नवीन मठों तथा विहारों का निर्माण करवाया। उसने कश्मीर में बौद्ध धर्म के विद्वानों की एक सभा बुलाई थी, जिसे चतुर्थ बौद्ध सभा कहा जाता है। उसने अश्वघोष, नागार्जुन तथा वसुमित्र जैसे बौद्ध विद्वानों को आश्रय दिया।

कला-प्रेमी-कनिष्क एक महान् कला-प्रेमी था। उसके समय में महात्मा बुद्ध की अनेक सुन्दर मूर्तियां बनाई गईं। उसके काल में गंधार कला के अलावा मथुरा कला का भी विकास हुआ। उसने बहुत-से सोने-चांदी के सिक्के भी चलाए।

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

  1. गौतमीपुत्र शातकर्णी ने ……….. से ………….. तक राज्य किया।
  2. सातवाहनों ने नगरों तथा गाँवों को जोड़ने के लिए …………. बनवाई।
  3. सातवाहन शासक ………….. के अनुयायी थे।
  4. पाण्डेय राज्य की राजधानी …………. थी।
  5. पल्लव जिन्हें अंग्रेज़ी में ………….. कहते थे, ईरान से भारत आने वाला एक विदेशी कबीला था।
  6. कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा …………… था।

उत्तर-

  1. 106 ई०, 130
  2. सड़कें
  3. हिंदू धर्म
  4. मदुरै
  5. पार्थियन
  6. कनिष्क।

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III. निम्नलिखित के ठीक जोड़े बनायें

  1. गौतमीपुत्र शातकर्णी का उत्तराधिकारी – (क) यज्ञश्री शातकर्णी
  2. सातवाहनों का अन्तिम महान् शासक – (ख) वशिष्ठीपुत्र पुलमावि
  3. काले तथा लाल बर्तन – (ग) कुम्हार का काम
  4. दरांती और कस्सी – (घ) कुषाण शासक
  5. मिनेन्द्र – (ङ) चीनी सेनापति
  6. कुजुल कैडफिसिज़ – (च) हिन्द-यूनानी आक्रमणकारी
  7. पान चाओ – (छ) बौद्ध विद्वान्
  8. अश्वघोष – (ज) औज़ार

उत्तर-
सही जोड़े

  1. गौतमीपुत्र शातकर्णी का उत्तराधिकारी – वशिष्ठीपुत्र पुलमावि
  2. सातवाहनों का अन्तिम महान् शासक – यज्ञश्री शतकर्णी
  3. काले तथा लाल बर्तन – कुम्हार का काम
  4. दरांती तथा कस्सी – औज़ार
  5. मिनेन्द्र – हिन्द-यूनानी आक्रमणकारी
  6. कुजुल कैडफिसिज़ – कुषाण शासक
  7. पान चाओ – चीनी सेनापति
  8. अश्वघोष – बौद्ध विद्वान्।

IV. सही (✓) अथवा ग़लत (✗) बताएं

  1. दक्कन में पाण्डेय मौर्यों के प्रसिद्ध उत्तराधिकारी थे।
  2. गौतमीपुत्र शातकर्णी ने 106 ई० से 131 ई० तक राज्य किया।
  3. संगीत, नाच, कविता-उच्चारण तथा जुआ आदि मनोरंजन की प्रसिद्ध किस्में थीं।
  4. शकों को चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने पराजित नहीं किया था।
  5. गोडोफ़र्नीज़ एक सिथियन शासक था।
  6. कनिष्क ने चौथी बौद्ध-सभा बुलाई थी।
  7. हुविष्क एक पार्थियन शासक था।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✗)
  3. (✓)
  4. (✗)
  5. (✗)
  6. (✓)
  7. (✗)

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कम से कम शब्दों में उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
गौतमी पुत्र शातकर्णी दक्कन राजवंश का एक प्रसिद्ध शासक था। उस वंश का नाम बताएं।
उत्तर-
सातवाहन।

प्रश्न 2.
सातवाहन शासक हिन्दू धर्म के अनुयायी थे। परंतु उनका व्यापारी वर्ग . एक अन्य धर्म को मानता था। वह धर्म कौन-सा था?
उत्तर-
बौद्ध धर्म।

प्रश्न 3.
भारत का प्रसिद्ध यूनानी शासक मिनेंद्र बौद्ध साहित्य में किस नाम से प्रसिद्ध है? .
उत्तर-
सम्राट् मिलिन्द।

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बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कुषाण शासक कनिष्क ने निम्न में से किस चीनी सेनापति से युद्ध किया?
(क) पान चाओ
(ख) चिन पिंग
(ग) पिंग चिन।
उत्तर-
(क) पान चाओ

प्रश्न 2.
गांधार कला शैली किन दो कला शैलियों का मिश्रण थी?
(क) यूनानी तथा ईरानी
(ख) यूनानी तथा भारतीय
(ग). मथुरा तथा द्रविड़।
उत्तर-
(ख) यूनानी तथा भारतीय

प्रश्न 3.
अश्वघोष एक प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान था। बताएं कि निम्न में से वह किस शासक का दरबारी था?
(क) हुविष्क
(ख) मिनेंद्र
(ग) कनिष्क।
उत्तर-
(ग) कनिष्क

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सातवाहन वंश का संस्थापक कौन था?
उत्तर-
सातवाहन वंश का संस्थापक सिमुक था।

प्रश्न 2.
गौतमीपुत्र शतकर्णी का राज्यकाल लिखें।
उत्तर–
गौतमीपुत्र शतकर्णी ने 106 ई० से 130 ई० तक राज्य किया।

प्रश्न 3.
चोल वंश का प्रथम राजा कौन था?
उत्तर-
चोल वंश का प्रथम राजा कारीकल था।

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प्रश्न 4.
नेडूनचयशान किस वंश का प्रसिद्ध राजा था?
उत्तर-
पांड्य वंश का।

प्रश्न 5.
पल्लव शासक अंग्रेज़ी में किस नाम से जाने जाते हैं?
उत्तर-
पार्थियन।

प्रश्न 6.
क्षत्रप का क्या अर्थ है?
उत्तर-
शक जाति के कुछ लोग पल्लव राजाओं के अधीन प्रान्तों के मवर्नर बन गए थे। इन गवर्नरों को क्षत्रप कहा जाता था।

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प्रश्न 7.
कुषाण वंश का संस्थापक कौन था?
उत्तर-
कुषाण वंश का संस्थापक कुजुल कैडफीसिज़ था।

प्रश्न 8.
कनिष्क की राजधानी का नाम बताएं।
उत्तर-
कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) थी।

प्रश्न 9.
कनिष्क किस बौद्ध विद्वान् के प्रभावाधीन बौद्ध धर्म का अनुयायी बना?
उत्तर-
कनिष्क बौद्ध विद्वान् अश्वघोष के प्रभावाधीन बौद्ध धर्म का अनुयायी बना।

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प्रश्न 10.
कनिष्क ने कौन-सा नगर बसाया?
उत्तर-
कनिष्क ने बारामूला के निकट कनिष्कपुर नगर बसाया।

प्रश्न 11.
कनिष्क ने चौथी बौद्ध सभा का आयोजन कहां किया?
उत्तर-
कनिष्क ने चौथी बौद्ध सभा का आयोजन कश्मीर में किया।

प्रश्न 12.
अश्वघोष की पुस्तक का नाम बताएं।
उत्तर-
अश्वघोष की पुस्तक बुद्धचरित्रम् थी।

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प्रश्न 13.
200 ई० पू० से 300 ई० तक भारत में कला की कौन-सी दो शैलियों का आरम्भ हुआ?
उत्तर-
गन्धार शैली तथा मथुरा शैली का आरम्भ हुआ।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शक जाति के आक्रमण के बारे में बताएँ।
उत्तर-
शक जाति मध्य एशिया की रहने वाली थी। लगभग 165 ई० पूर्व में चीन के उत्तर-पश्चिमी भाग में रहने वाली यू-ची जाति ने शक जाति को मध्य एशिया से खदेड़ दिया। अत: शकों ने मध्य एशिया से निकलकर कई यूनानी प्रदेशों को विजित कर लिया। इन्होंने अपने छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए।

प्रश्न 2.
कनिष्क की दो विजयों के बारे में बताएं।
उत्तर-
कनिष्क की दो विजयों का वर्णन इस प्रकार है –
1. कश्मीर की विजय-कश्मीर की विजय कनिष्क की प्रसिद्ध विजय थी। वहां उसने कई नये नगरों की स्थापना की। वर्तमान बारामूला के निकट स्थित कनिष्कपुर इन नगरों में से एक था।
2. मगध से युद्ध-उसने मगध के शासक के साथ भी युद्ध किया। वहां से वह पाटलिपुत्र के प्रसिद्ध भिक्षु अश्वघोष को अपने साथ ले आया।

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प्रश्न 3.
विदेशी आक्रमणों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तरा-
विदेशी आक्रमणों के कारण भारत के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा।

  1. शक, हिन्द-यूनानी, पल्लव, कुषाण आदि अनेक विदेशी जातियों के लोग भारतीय समाज में शामिल हो गए। वे हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करने लगे।
  2. अनेक विदेशी लोगों ने भारतीयों के साथ विवाह सम्बन्ध स्थापित करके भारतीय संस्कृति को अपना लिया।
  3. कनिष्क आदि विदेशी राजाओं ने बौद्ध धर्म को अपनाया और इसका विदेशों में प्रचार करवाया।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सातवाहनों का इतिहास लिखें।
उत्तर-
सातवाहनों की जानकारी वैदिक साहित्य से भी मिलती है। सातवाहनों ने कृष्णा नदी तथा गोदावरी नदी के बीच का प्रदेश (आंध्र) जीत लिया। इसलिए सातवाहनों को आन्ध्र भी कहा जाता है। सातवाहन ब्राह्मण जाति के थे।
1. सिमुक तथा कृष्ण-सिमुक सातवाहन वंश का संस्थापक था। सिमुक के बाद उसका छोटा भाई कान्हा या कृष्ण राजगद्दी पर बैठा।

2. शातकर्णी प्रथम-शातकर्णी प्रथम कृष्ण का पुत्र था। वह एक महान् विजेता था। उसने मध्य भारत में मालवा तथा बरार को जीत लिया और हैदराबाद को भी अपने साम्राज्य में मिलाया। उसने अश्वमेध यज्ञ भी किया तथा कई उपाधियां धारण कीं। शातकर्णी के राज्य की सीमाएं सौराष्ट्र, मालवा, बरार, उत्तरी कोंकण, पूना तथा नासिक तक फैली हुई थीं।

3. गौतमीपुत्र शातकर्णी-गौतमीपुत्र शातकर्णी सातवाहनों का बहुत ही शक्तिशाली राजा था। उसने 106 ई० से 130 ई० तक राज्य किया। उसने शक, यूनानी तथा पार्थियन्ज़ जाति की विदेशी शक्तियों का मुकाबला किया।

4. यज्ञश्री शातकर्णी-यज्ञश्री शातकर्णी सातवाहनों का अन्तिम महान् राजा था। उसके समय में शक जाति के बार-बार हमलों के कारण सातवाहनों की शक्ति को भारी हानि पहुंची।

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प्रश्न 2.
कनिष्क की प्रमुख विजयों के बारे में लिखें।
उत्तर-
कनिष्क कुषाण जाति का सबसे प्रसिद्ध राजा था। वह 78 ई० के लगभग राजगद्दी पर बैठा। उसने पुरुषपुर (पेशावर) को अपनी राजधानी बनाया। उसने अनेक प्रदेश जीते, जिनका वर्णन इस प्रकार है –

  1. शक क्षत्रपों पर विजय-उसने उज्जैन, मथुरा तथा पंजाब के शक क्षत्रपों को हराया तथा उनका राज्य अपने राज्य में मिला लिया।
  2. कश्मीर की जीत-कश्मीर कनिष्क की प्रसिद्ध विजय थी। वहां पर उसने कई नगरों की स्थापना की।
  3. मगध से युद्ध-उसने मगध के शासक के साथ भी युद्ध किया। वहां से वह पाटलिपुत्र के प्रसिद्ध भिक्षु अश्वघोष को अपने साथ ले आया।
  4. चीन की जीत-कनिष्क ने चीन पर दो बार आक्रमण किया। उसे दूसरी बार सफलता मिली। इस प्रकार उसे काश्गर, यारकन्द तथा खोतान प्रदेश चीन से मिल गए।

प्रश्न 3.
गंधार कला तथा मथुरा कला शैलियों के बारे लिखें।
उत्तर-
गंधार कला तथा मथुरा कला शैलियों का जन्म 200 ई० पूर्व से 300 ई० के बीच के समय में हुआ। इन शैलियों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है –

1. गंधार कला-इस कला का जन्म गंधार में हुआ, इसलिए इसका नाम गंधार कला रखा गया। इस कला का विकास कुषाण युग में हुआ। इस कला में मूर्तियों का विषय भारतीय था जबकि मूर्तियां बनाने का ढंग यूनानी था। गंधार शैली में मुख्य रूप से महात्मा बुद्ध की मूर्तियां बनाई गई थीं। इन मूर्तियों में चेहरे के भावों को बहुत ही आकर्षक रूप से दर्शाया गया है। उदाहरण के लिए, बुद्ध की मूर्ति के चेहरे पर शान्त भावों को आसानी से पढ़ा जा सकता है।

2. मथुरा शैली-कनिष्क के समय मथुरा में कुछ भारतीय कलाकार रहते थे। उन्होंने एक नवीन कला शैली को जन्म दिया, जिसे मथुरा शैली कहते हैं। यह शुद्ध भारतीय कला थी। इस पर विदेशी कला का कोई प्रभाव नहीं था। इसमें अधिकतर मूर्तियां महात्मा बुद्ध की बनाई जाती थीं।

PSEB 10th Class Agriculture Solutions Chapter 1 कृषि सहयोगी संस्थाएं

Punjab State Board PSEB 10th Class Agriculture Book Solutions Chapter 1 कृषि सहयोगी संस्थाएं Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Agriculture Chapter 1 कृषि सहयोगी संस्थाएं

PSEB 10th Class Agriculture Guide कृषि सहयोगी संस्थाएं Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के एक – दो शब्दों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
पंजाब राज्य स्तर पर कृषि उत्पादों की खरीद कौन-सी केन्द्रीय संस्था करती है ?
उत्तर-
पंजाब कृषि उद्योग निगम, भारतीय खाद्य निगम।

प्रश्न 2.
कृषि उत्पादों का निर्यात किस निगम की ओर से किया जाता है ?
उत्तर-
पंजाब एग्री एक्सपोर्ट कार्पोरेशन लिमिटेड (PAGREXCO)।

प्रश्न 3.
पंजाब कृषि उद्योग निगम तथा पंजाब मंडी बोर्ड की बराबर की भागीदारी से स्थापित की गई संस्था का नाम बताइए।
उत्तर-
पंजाब एग्री एक्सपोर्ट कार्पोरेशन लिमिटेड (PAGREXCO)।

प्रश्न 4.
पंजाब बागवानी विभाग कब अस्तित्व में आया ?
उत्तर-
यह विभाग 1979-80 में स्थापित किया गया।

प्रश्न 5.
राज्य में पशु पालन, मछली पालन आदि खोज, शिक्षा तथा प्रसार का काम कौन करता है ?
उत्तर-
गुरु अंगद देव वेटरनरी तथा एनीमल साईंसज़ यूनिवर्सिटी।

प्रश्न 6.
सहकारिता क्षेत्र में खादों में सबसे बड़ी तथा अग्रणी संस्था कौन-सी
उत्तर-
इंडियन फार्मरज़ फर्टीलाइज़र कोआपरेटिव लिमिटेड (IFFCO)।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय बागवानी मिशन की स्कीमें किस संस्था की ओर से लागू की जाती हैं ?
उत्तर-
बागवानी विभाग।

प्रश्न 8.
बीज की गुणवत्ता की परख करने के लिए एन०एस०सी० की कितनी बीज परीक्षण प्रयोगशालाएं हैं ?
उत्तर-
पांच प्रयोगशालाएं।

प्रश्न 9.
किसानों को बीज उत्पादन में भागीदार बनाने वाले निगम का नाम लिखिए।
उत्तर-
पंजाब राज्य बीज निगम लिमिटेड (PUNSEED)।

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प्रश्न 10.
दूध की खरीद तथा मंडीकरण के लिए सहकारी संस्था का नाम बताइए।
उत्तर-
मिल्कफैड।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के एक – दो वाक्यों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
पंजाब एग्री एक्सपोर्ट कार्पोरेशन लिमिटेड कौन-से कृषि उत्पादों का मुख्य तौर पर निर्यात करती है ?
उत्तर-
पंजाब एग्री एक्सपोर्ट कार्पोरेशन लिमिटेड मुख्य रूप से निम्नलिखित कृषि उत्पादों का निर्यात करती है

  • ताज़ा तथा डिब्बाबंद फल।
  • सब्जियों तथा फूलों का निर्यात।

प्रश्न 2.
इफको की ओर से किसानों को कौन-कौन सी सुविधाएं दी जाती हैं ?
उत्तर-
यह संस्था कृषकों का आर्थिक स्तर ऊंचा उठाने का कार्य करती है। यह उर्वरकों के मण्डीकरण के साथ-साथ कई तरह की प्रसार विधियों द्वारा कृषकों तक नई कृषि तकनीकों को पहुंचाता है।

प्रश्न 3.
पंजाब कृषि उद्योग निगम के मुख्य कार्य बताइए।
उत्तर-
पंजाब कृषि उद्योग निगम के मुख्य कार्य हैं-कृषि संबंधी वस्तुओं का मण्डीकरण, कृषि उत्पादों की खरीद तथा इकरारनामे की कृषि द्वारा कृषि विभिन्नता लाने में सहायता करना। यह संस्था भारतीय खाद्य निगम के लिए गेहूं-चावल की खरीद के लिए भी कार्य करती है।

प्रश्न 4.
सहकारिता विभाग, पंजाब की ओर से चलाई जा रहीं कोई दो गतिविधियां लिखिए।
उत्तर-
सहकारिता विभाग, पंजाब द्वारा चलाई जा रही गतिविधियां हैं –

  • माई भागो स्त्री सशक्तिकरण योजना के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्र की औरतों के लिए स्व-रोज़गार के अवसर प्रदान करना।
  • ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सहकारिता सभाओं द्वारा आवश्यक घरेलू वस्तुओं की पूर्ति करना।

प्रश्न 5.
मार्कफैड किसानों की किस तरह सेवा कर रहा है ?
उत्तर-
मार्कफैड द्वारा पंजाब के कृषकों को सस्ते दामों पर कृषि बीज, खाद, कीटनाशक दवाएं आदि उपलब्ध करवाई जाती हैं तथा कृषि उपज के मंडीकरण तथा प्रोसेसिंग का कार्य किया जाता है।

प्रश्न 6.
पंजाब कृषि विद्यालय कौन-कौन से मुख्य तीन कार्य करती है ?
उत्तर-
पंजाब कृषि विद्यालय द्वारा निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं-कृषि तथा कृषि संबंधी विषयों पर खोज, कृषि से संबंधित विषयों की पढ़ाई तथा प्रसार।

प्रश्न 7.
फूड एण्ड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन (FAO) के बारे में संक्षेप में बताइए।
उत्तर-
इस संस्था की संस्थापना 1943 में की गई। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व में से भूखमरी को समाप्त करने के लिए बनाया गया। इसका मुख्य कार्यालय रोम (ईटली) में है। विश्व में प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनाज सुरक्षा को विश्वसनीय बनाना इसका मुख्य उद्देश्य है। प्राकृतिक स्रोतों की संभाल भी इसी का कार्य है।

प्रश्न 8.
विश्व व्यापार संस्था (WTO) को बनाने का मुख्य उद्देश्य क्या है ?
उत्तर-
WTO को बनाने का मुख्य उद्देश्य इस तरह है –

  • कृषि नियमों की बिक्री पर लगी पाबंदी को समाप्त करना।
  • कृषि उत्पादों के निर्यात पर मिलने वाली सुविधाओं को कम करना।
  • किसानों को कृषि आवश्यकताओं के लिए दिए अनुदान अथवा रियायतों को कम करना या बिल्कुल बंद करना।
  • निर्यात कोटा प्रणाली समाप्त करके निर्यात संबंधी सुचारु नीति अपनाना।

प्रश्न 9.
एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी (ATMA) का गठन क्यों किया गया ?
उत्तर-
जिले में कृषि तथा कृषि से संबंधित भिन्न-भिन्न विभागों की कृषि विकास तथा प्रसार से संबंधित गतिविधियों के तालमेल के लिए कृषि विभाग के अन्तर्गत कृषि टैकनोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी (ATMA) का गठन किया गया है।

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प्रश्न 10.
पंजाब खादी तथा ग्राम उद्योग बोर्ड बनाने का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर-
इस संस्था का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण उद्योगों तथा अन्य रोज़गार शुरू करने के लिए सहायता प्रदान करना है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के पांच-छः वाक्यों में उत्तर दीजिए-

प्रश्न 1.
डेयरी विकास के बारे में संक्षेप में जानकारी दीजिए।
उत्तर-
पंजाब में डेयरी विकास के सर्वपक्षीय विकास के लिए डेयरी विकास विभाग की स्थापना की गई है। इस विभाग के प्रमुख को डायरैक्टर डेयरी विकास कहा जाता है तथा जिला स्तर पर डिप्टी डायरैक्टर डेयरी विकास कहा जाता है। इस विभाग द्वारा डेयरी प्रशिक्षण, डेयरी फार्मिंग का विस्तार तथा विकास आदि के कार्य किए जाते हैं। इस विभाग द्वारा पंजाब में आठ डेयरी प्रशिक्षण तथा विस्तार केन्द्र चलाए जाते हैं। भिन्न-भिन्न डेयरी संबंधी कार्यों के लिए दो सप्ताह, छ: सप्ताह की मुफ्त ट्रेनिंग दी जाती है। गांव में कैम्प लगाकर डेयरी फार्मिंग के लाभ बताए जाते हैं तथा किसानों को डेयरी फार्मिंग का व्यवसाय अपनाने की प्रेरणा दी जाती है। शहरों में कैम्प लगाकर दूध उपभोक्ताओं को दूध की गुणवत्ता तथा इसमें मिलावटों संबंधी जानकारी दी जाती है। प्रशिक्षण प्राप्त लाभार्थी को बैंक से ऋण दिलवाया जाता है तथा तकनीकी जानकारी तथा अनुदान भी उपलब्ध करवाया जाता है।

प्रश्न 2.
पंजाब कृषक आयोग के अस्तित्व में आने के मुख्य उद्देश्य बताइए।
उत्तर-
पंजाब कृषक आयोग के अस्तित्व में आने का मुख्य उद्देश्य इस प्रकार है-

  • राज्य में कृषि तथा कृषि संबंधित क्षेत्रों की जांच तथा उनकी वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन करना है।
  • राज्य की कृषि को पक्के रूप से टिकाऊ तथा आर्थिक पक्ष से मज़बूत करने के लिए सुझाव देना भी है।
  • कृषि उत्पादन में वृद्धि करना, कटाई के बाद उत्पाद की संभाल तथा प्रोसेसिंग के लिए कम लागत वाली नई तकनीकों को विकसित करके लागू करने के लिए मार्गदर्शन करना।
  • ग्रामीण क्षेत्र के सामाजिक तथा आर्थिक मुद्दों-जैसे कि बढ़ते हुए ऋण, आत्महत्या की घटनाएं, गांव में बढ़ती बेरोज़गारी आदि की खोज के लिए आर्थिक सहायता देना है तथा इस आधार पर सरकार को उचित नीतियां बनाकर सिफारिश करना है।
  • किसानों की भिन्न-भिन्न सभाओं तथा संगठनों के प्रतिनिधियों को मिलकर उनकी समस्याओं, कठिनाइयों तथा मांगों को समझ कर, हल करने के लिए योग्य नीतियों की सिफ़ारिश करना।

प्रश्न 3.
पंजाब एग्रो औद्योगिक कार्पोरेशन के मुख्य उद्देश्य बताइए।
उत्तर-
पंजाब एग्रो औद्योगिक कार्पोरेशन (पंजाब कृषि उद्योग निगम-PAIC) को पंजाब सरकार द्वारा वर्ष 2002 में स्थापित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य इस प्रकार है-

  • कृषि लागत वस्तुओं का मंडीकरण।
  • कृषि उत्पादों की खरीद तथा इकरारनामे की कृषि द्वारा कृषि विभिन्नता लाने में सहायता करना।
  • भारतीय खाद्य निगम के लिए गेहूँ चावल की खरीद के लिए कार्य करना।

प्रश्न 4.
गुरु अंगद देव वेटरिनरी विश्वविद्यालय पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर-
गुरु अंगद देव वेटरिनरी तथा एनीमल साईंसज़ विश्वविद्यालय (GADVASU) की स्थापना 2005 में की गई। इसका कार्य पशु, सुअर, खरगोश, मुर्गी, भेड़ बकरी, घोड़े तथा मछली पालन के लिए खोज, शिक्षा तथा प्रसार करना है। यहां बड़े-छो जानवरों के लिए उच्च स्तरीय अस्पताल हैं जहां 24 घंटे पशुओं का इलाज किया जाता है। यहां पशुओं के डॉक्टरों की शिक्षा/पढ़ाई करवाई जाती है।

वैटरिनरी विश्वविद्यालय में वेटरनरी कॉलेज, डेयरी साईंस तथा तकनालाजी कॉलेज, मछली पालन कॉलेज, वैटरिनरी पालीटेकनिक नाम के 4 कालेज खोले गए हैं। वैटरिनरी कालेज में आई०सी०ए०आर० द्वारा सर्जरी तथा गायनाकालजी के दो विभाग भी कार्य कर रहे हैं। पंजाब में कालझरानी (बठिंडा), बुह (तरनतारण) तथा तलवाड़ा (होशियारपुर) में तीन क्षेत्रीय खोज तथा प्रशिक्षण केन्द्र भी स्थापित किए गए हैं। यह विश्वविद्यालय पंजाब में वैटरिनरी तथा पशु-पालन के लिए प्रत्येक प्रकार की सुझाव देने के लिए एक सर्वोत्तम संस्था है।

प्रश्न 5.
डेयरी विकास विभाग की ओर से डेयरी के विकास के लिए कौन-कौन सी सुविधाएं दी जाती हैं ?
उत्तर-
डेयरी विकास विभाग द्वारा डेयरी से संबंधित कार्यों तथा गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है तथा लाभार्थियों को बैंकों से ऋण दिलाया जाता है तथा भिन्न-भिन्न कार्यों के लिए अनुदान भी दिया जाता है जो निम्नलिखित अनुसार है-

  • शैड बनाने के लिए तकनीकी जानकारी के साथ-साथ 25% अनुदान राशि उपलब्ध करवाई जाती है।
  • दूध देने वाले पशु खरीदने के लिए सहायता तथा तीन वर्ष के बीमे की लागत का 75% लाभार्थी को वापिस जाता है।
  • बड़े दूध कूलर की खरीद पर 50% अनुदान राशि।
  • मिल्किंग मशीन तथा चारा काटने तथा कुतरने वाली मशीनों की खरीद पर 50% अनुदान राशि।
  • आटोमैटिक डिसपैंसिंग मशीन, टोटल मिक्स राशन वैगन (TMR wagon) तथा किराए पर मशीन देने के लिए डेयरी सर्विस सैंटर स्थापित करने के लिए 50% अनुदान राशि दी जाती है।

Agriculture Guide for Class 10 PSEB कृषि सहयोगी संस्थाएं Important Questions and Answers

I. बहु-विकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
एगमार्क प्रयोगशाला में ……… की गुणवत्ता की जांच होती है।
(क) हल्दी
(ख) शहद
(ग) मिर्च
(घ) सभी ठीक।
उत्तर-
(घ) सभी ठीक।

प्रश्न 2.
भारत कैसा देश है?
(क) कृषि प्रधान
(ख) खेल प्रधान
(ग) उद्योग आधारित
(घ) सभी गलत।
उत्तर-
(क) कृषि प्रधान

प्रश्न 3.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
(क) 1962 में
(ख) 1971 में
(ग) 1950 में
(घ) 1990 में।
उत्तर-
(क) 1962 में

प्रश्न 4.
WTO द्वारा मान्य अनुदान राशि की दर कितनी है?
(क) 5%
(ख) 25%
(ग) 10%
(घ) 19%.
उत्तर-
(ग) 10%

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प्रश्न 5.
गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (GADVASU) कौन-से शहर में स्थित है ?
(क) लुधियाना
(ख) बठिंडा
(ग) पटियाला
(घ) जालंधर।
उत्तर-
(क) लुधियाना

प्रश्न 6.
पंजाब में दूध की खरीद व विपणन के लिए स्थापित की गई सहकारी संस्था का नाम बताओ।
(क) मार्कफेड
(ख) हाऊसफेड
(ग) मिल्कफेड
(घ) शुगरफेड।
उत्तर-
(ग) मिल्कफेड

प्रश्न 7.
पंजांब डेयरी विकास बोर्ड की वेबसाइट का नाम क्या है ?
(क) www.gadvasu.in
(ख) www.pddb.in
(ग) www.ndri.res.in
(घ) www.pau.edu.
उत्तर-
(ख) www.pddb.in

प्रश्न 8.
गुरु अंगद देव वेटनरी एवं एनीमल साईंसेज़ यूनिवर्सिटी की वेबसाइट का नाम क्या है ?
(क) www.gadvasu.in
(ख) www.pddb.in
(ग) www.ndri.res.in
(घ) www.pau.edu.
उत्तर-
(क) www.gadvasu.in

प्रश्न 9.
मिल्कफेड के द्वारा गाँवों में से किस पदार्थ की खरीद की जाती है-
(क) गेहूँ
(ख) नरमा
(ग) दूध
(घ) फल।
उत्तर-
(ग) दूध

प्रश्न 10.
हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय कौन से शहर में स्थित है?
(क) लुधियाना
(ख) पालमपुर
(ग) हिसार
(घ) करनाल।
उत्तर-
(ग) हिसार

प्रश्न 11.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय कौन से शहर में स्थित है ?
(क) लुधियाना
(ख) पालमपुर
(ग) हिसार
(घ) करनाल।
उत्तर-
(क) लुधियाना

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प्रश्न 12.
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय कौन से शहर में स्थित है?
(क) लुधियाना
(ख) चंडीगढ़
(ग) हिसार
(घ) पटियाला।
उत्तर-
(ग) हिसार

II. ठीक/गलत बताएं-

1. कृषि विभाग के अधीन आतमा (ATMA) का भी गठन किया गया।
2. गडवासु में 24 घण्टे पशुओं का इलाज होता है।
3. गडवासु की वैवसाइट www.gadvasu.in है।
4. पंजाब में भिन्न-भिन्न स्थानों पर आठ डेयरी शिक्षण तथा विस्तार केन्द्र हैं।
5. पंजाब राज्य बीज निगम लिमिटेड की स्थापना 1990 में की गई।
उत्तर-

  1. ठीक
  2. ठीक
  3. ठीक
  4. ठीक
  5. गलत।

III. रिक्त स्थान भरें-

1. डॉ० जी० एस० कालकट की प्रधानता में ………………. आयोग का गठन किया गया।
2. कृभको संस्था की स्थापना वर्ष ………………. में की गई।
3. FAO का मुख्य कार्यालय …………………. में है।
4. राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना वर्ष ……………… में की गई।
5. भूमि तथा जल संरक्षण विभाग की स्थापना ………….. में की गई।
6. W.T.O. द्वारा तय की गई सब्सिडी की दर ………….. है।
उत्तर-

  1. पंजाब राज्य कृषक
  2. 1980
  3. रोम (इटली)
  4. 1963
  5. 1969.
  6. 6.10%.

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत कैसा देश है ?
उत्तर-
भारत कृषि प्रधान देश है।

प्रश्न 2.
कृषि विभाग का प्रमुख कौन होता है ?
उत्तर-
डायरैक्टर कृषि विभाग।

प्रश्न 3.
कृषि विभाग द्वारा शहद, हल्दी, मिर्च आदि की गुणवत्ता की जांच करने के लिए प्रयोगशाला बताओ।
उत्तर-
एगमार्क प्रयोगशाला।

प्रश्न 4.
कृषि विभाग का प्रमुख तथा जिले का प्रमुख कौन है ?
उत्तर-
विभाग का प्रमुख डायरैक्टर कृषि तथा जिले में प्रमुख कृषि अधिकारी होता है।

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प्रश्न 5.
जिले में कृषि तथा कृषि से संबंधित भिन्न-भिन्न विभागों की कृषि विकास तथा प्रसार से संबंधित गतिविधियों के तालमेल के लिए कृषि विभाग द्वारा किसका गठन किया गया है ?
उत्तर-
आतमा (ATMA-Agriculture Technology Management Agency) का गठन किया गया है।

प्रश्न 6.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई ?
उत्तर-
वर्ष 1962 में।

प्रश्न 7.
पी०ए०यू० की स्थापना कौन-से कालेज के आधार पर की गई ?
उत्तर-
अमेरिका के लैंड ग्रांट्स कॉलेजों के आधार पर।

प्रश्न 8.
वैटरनरी विश्वविद्यालय में पशुओं का इलाज कितने घंटे तक उपलब्ध है ?
उत्तर-
24 घंटे के लिए।

प्रश्न 9.
वैटरनरी विश्वविद्यालय के कितने कॉलेज हैं ?
उत्तर-
चार।

प्रश्न 10.
वैटरनरी कॉलेज में 15 वर्षों से आई०सी०ए०आर० द्वारा कौन से दो विभाग अत्याधुनिक ट्रेनिंग केन्द्र घोषित किए गए हैं ?
उत्तर-
सर्जरी तथा गायनाकालाजी विभाग।

प्रश्न 11.
बागवानी विभाग कब अस्तित्व में आया ?
उत्तर-
वर्ष 1979-80 में।

प्रश्न 12.
बागवानी विभाग का एक उद्देश्य बताओ।
उत्तर-
बागवानी फसलों के तहत क्षेत्रफल बढ़ाना।।

प्रश्न 13.
बागवानी विभाग द्वारा राष्ट्रीय बागवानी मिशन कब से चलाया जा रहा
उत्तर-
वर्ष 2005-06 से।

प्रश्न 14.
डेयरी विकास विभाग द्वारा पंजाब में कितने डेयरी प्रशिक्षण तथा विस्तार केन्द्र चलाए जाते हैं ?
उत्तर-
आठ केन्द्र।

प्रश्न 15.
डेयरी विकास विभाग द्वारा स्व:रोज़गार के लिए कितने सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जाता है ?
उत्तर-
दो सप्ताह की।

प्रश्न 16.
खरीदे हुए दूध वाले पशुओं के तीन वर्ष के बीमे की लागत का कितना प्रतिशत लाभार्थी को वापिस किया जाता है ?
उत्तर-
75%.

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प्रश्न 17.
मिल्किंग मशीन तथा चारा काटने तथा कुतरने वाली मशीन की खरीद पर कितने प्रतिशत अनुदान राशि दी जाती है ?
उत्तर-
50%.

प्रश्न 18.
मछली पालन को उत्साहित करने के लिए मछली पालक विकास एजेंसीज़ फिश फार्मर्ज़ डिवैलपमैंट एजेंसीज़ कब बनाई गई ?
उत्तर-वर्ष 1975 में।

प्रश्न 19.
मछली पालन विभाग द्वारा प्रत्येक माह जिला स्तर पर मुफ्त मछली पालन ट्रेनिंग कितने दिनों की दी जाती है ?
उत्तर-पांच दिनों की।

प्रश्न: 20:
भूमि तथा जल संभाल विभाग कब स्थापित किया गया ?
उत्तर-
वर्ष 1969 में।

प्रश्न 21.
भूमि तथा जल संभाल विभाग के प्रमुख को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
भूमि पाल, पंजाब तथा ब्लॉक स्तर पर भूमि रक्षक अफसर।

प्रश्न 22.
सहकारिता विभाग की स्थापना कब तथा कौन-सा एक्ट बनने से हुई ?
उत्तर-
सहकारिता विभाग की स्थापना 1904 में सहकारिता एक्ट बनने से हुई।

प्रश्न 23.
भाई घनैया स्वास्थ्य योजना के अन्तर्गत मुफ्त इलाज की सुविधा कौन से विभाग द्वारा चलाई गई है ?
उत्तर-
सहकारिता विभाग द्वारा।

प्रश्न 24.
ग्रामीण क्षेत्र में दूध की पैदावार की खरीद, प्रोसैसिंग तथा शहरी क्षेत्र में इसके मंडीकरण का प्रबंध किस द्वारा किया जाता है ?
उत्तर-
मिल्कफैड द्वारा।

प्रश्न 25.
IFFCO का पूरा नाम लिखें।
उत्तर-
इंडियन फारमर्ज फर्टीलाइज़र कोआपरेटिव लिमिटेड।

प्रश्न 26.
KRIBCO का पूर्ण नाम लिखें।
उत्तर-
कृषक भारतीय कोआपरेटिव लिमिटेड।

प्रश्न 27.
NFL का पूरा नाम लिखें।
उत्तर-
नैशनल फर्टीलाइज़र लिमिटेड।

प्रश्न 28.
पंजाब राज्य किसान कमीशन का गठन किसकी अध्यक्षता में हुआ ?
उत्तर-
डॉ० जी० एस० कालकट।

प्रश्न 29.
पंजाब राज्य बीज निगम लिमिटेड कब स्थापित हुआ ?
उत्तर-
1976 में।

प्रश्न 30.
राष्ट्रीय बीज निगम की स्थापना कब की गई ?
उत्तर-
1963 में।

प्रश्न 31.
राष्ट्रीय बीज निगम लगभग कितनी फसलों के कितनी प्रकार के प्रमाणित बीजों का उत्पादन कर रही है ?
उत्तर-
60 फसलों के 600 किस्मों के प्रमाणित बीजों का।

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प्रश्न 32.
NSC ने बीज की गुणवत्ता की जांच के लिए कितनी प्रयोगशालाएं स्थापित की हैं ?
उत्तर-
पांच जांच प्रयोगशालाएं।

प्रश्न 33.
पौधों के टिशु कल्चर का काम कौन-सी संस्था द्वारा किया जाता है ?
उत्तर-
राष्ट्रीय बीज निगम द्वारा।

प्रश्न 34.
कौन-सी संस्था भारतीय खाद्य निगम (FCI) के लिए गेहूँ चावल की खरीद का कार्य करती है ?
उत्तर-
पंजाब कृषि उद्योग निगम।

प्रश्न 35.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (ICAR) का मुख्य कार्यालय कहां
उत्तर-
दिल्ली में।

प्रश्न 36.
भारतीय खोज संस्था की लगभग कितनी संस्थाएं हैं तथा कितने कृषि विश्वविद्यालय हैं ?
उत्तर-
भारतीय खोज संस्था की 101 संस्थाएं हैं तथा 71 कृषि विश्वविद्यालय हैं।

प्रश्न 37.
नैशनल बैंक आफ एग्रीकल्चरल एंड रूरल डिवैलपमैंट (NABARD) की स्थापना कब की गई ?
उत्तर-
1982 में।

प्रश्न 38.
नावार्ड का मुख्य कार्यालय कहां है ?
उत्तर-
मुम्बई में।

प्रश्न 39.
GATT कब बनाई गई ?
उत्तर-
वर्ष 1948 में।

प्रश्न 40.
GATT के कितने सदस्य थे तथा अब कितने हैं ?
उत्तर-
आरंभ में 23 सदस्य थे तथा अब 164 हैं।

प्रश्न 41.
GATT का पूरा नाम बताएं।
उत्तर-
जनरल एग्रीमैंटस आन टैरिफ एंड ट्रेड (General Agreements on Tarrift and Trade)|

प्रश्न 42.
GATT का नाम बदल कर क्या रखा गया ?
उत्तर-
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार संस्था (World Trade Organisation).

प्रश्न 43.
WTO द्वारा अनुदान राशि की दर कितनी है ?
उत्तर-
10%.

प्रश्न 44.
FAO का पूरा नाम बताएं।
उत्तर-
फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन।

प्रश्न 45.
FAO की स्थापना कब की गई ?
उत्तर-
वर्ष 1943 में।

प्रश्न 46.
FAO का मुख्य कार्यालय कहां है ?
उत्तर-
रोम (इटली) में।

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प्रश्न 47.
I.C.A.R. का पूरा नाम लिखो।
उत्तर-
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्।

प्रश्न 48.
W.T.O. का पूरा नाम लिखें।
उत्तर-
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संस्था।

प्रश्न 49.
डेयरी विकास विभाग की ओर से दूध निकालने वाली (मिल्किग) मशीन की खरीद पर कितने प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है ?
उत्तर-
50%.

लघ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कृषि विभाग के बारे में संक्षेप में जानकारी दें।
उत्तर-
कृषि विभाग की स्थापना 1881 में की गई तथा इस विभाग की पंजाब के कृषि विकास में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यह विभाग कृषि वैज्ञानिकों तथा कृषकों के बीच कड़ी का कार्य करता है। कृषि से संबंधित सभी सरकारी योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए यह संस्था उत्तरदायी है। इस विभाग द्वारा मिट्टी, बीज, खादों, खाने वाले पदार्थों की जांच के लिए प्रयोगशालाएं भी स्थापित की गई हैं। कृषि विकास तथा प्रसार के लिए संबंधित गतिविधियों में तालमेल के लिए विभाग के अन्तर्गत ATMA का गठन किया गया है।

प्रश्न 2.
बागवानी विभाग के मुख्य उद्देश्य बताओ।
अथवा
बागवानी विभाग, पंजाब की ओर से किए जाने वाले कोई चार कार्य लिखें।
उत्तर-
बागवानी विभाग के मुख्य उद्देश्य अथवा कार्य इस प्रकार हैं –

  • बागवानी फसलों का क्षेत्रफल बढ़ाना।
  • उच्च स्तरीय बढ़िया गुणवत्ता वाली सब्जियों के बीज तथा फलों की पनीरी आदि उपलब्ध करवाना।
  • बागवानी फसलों का तकनीकी ज्ञान किसानों तक पहुंचाना।
  • सब्जियों के प्रदर्शनी प्लांटों के लिए आर्थिक सहायता देना।

प्रश्न 3.
गडवासु के चार कॉलेज कौन-से हैं ?
उत्तर-
गडवासु के चार कॉलेज हैं-वैटरनरी कॉलेज, डेयरी साईंसज़ तथा टैक्नालॉजी साईंस, मछली पालन कालेज, वैटरनरी पॉलिटेकनीक।

प्रश्न 4.
बागवानी विभाग द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय बागवानी मिशन के बारे में क्या जानते हो ?
उत्तर-
बागवानी विभाग द्वारा वर्ष 2005-06 से एक राष्ट्रीय बागवानी मिशन शुरू किया गया है। इस मिशन द्वारा किसानों को पैक हाऊस, नैट हाऊस, पोली हाऊस बनाने, कोल्ड स्टोरेज़ बनाने, सब्जियों तथा फलों को पकाने के लिए चैंबर स्थापित करना, विक्रय मूल्य में वृद्धि करने के लिए प्रोसैसिंग इकाइयों की स्थापना करना, किसानों को प्रशिक्षित करना आदि कई कार्य किए जाते हैं।

प्रश्न 5.
पशु पालन विभाग के कुछ उद्देश्य बताओ।
उत्तर-

  • पशु पालन प्रबन्ध तथा खाद्य में सुधार।
  • पशुओं की पैदावार समर्था बढ़ाने तथा नस्ल सुधार का कार्य करना।
  • प्रसार सेवाएं प्रदान करना।

प्रश्न 6.
मार्कफैड की ओर से किसानों को क्या-क्या सुविधाएं दी जाती हैं?
उत्तर-
मार्कफैड द्वारा पंजाब के किसानों को सस्ते दामों पर कृषि बीज, उर्वरक, कीट नाशक दवाइयां आदि उपलब्ध की जाती हैं तथा कृषि उत्पाद के मण्डीकरण तथा प्रोसैसिंग का कार्य किया जाता है।

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प्रश्न 7.
पंजाब राज्य बीज निगम लिमिटेड का मुख्य उद्देश्य क्या है ? इसकी स्थापना कब हुई ?
उत्तर-
इस संस्था की स्थापना 1976 में हुई तथा इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को गुणवत्ता वाले बीज सस्ती दरों पर उपलब्ध करवाना तथा बीज पैदावार तथा देख-रेख का ढांचा तैयार करना है ताकि बीज़ों की बढ़ रही मांग को पूरा किया जा सके।

प्रश्न 8.
सहकारिता विभाग पंजाब की ओर से किसानों को क्या-क्या सुविधाएं दी जाती हैं ?
उत्तर-
सहकारिता विभाग द्वारा स्थापित संस्थाओं द्वारा बीजों, खादों तथा ऋण के वितरण में सहायता की जाती है। कृषि उपज का मण्डीकरण, दूध की पैदावार की खरीद, प्रोसैसिंग तथा शहरी क्षेत्र में मण्डीकरण आदि में योगदान दिया जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मछली पालन विभाग के बारे में आप क्या जानते हो ?
उत्तर-
मछली पालन विभाग पंजाब में सबसे पुराने विभागों में से एक है। इस विभाग का मुख्य उद्देश्य नदियों, झीलों, नहरों तथा नोटीफाइड वाटर वॉडीज में मछलियों की संभाल करना है। इस विभाग का उत्तरदायित्व सहायक डायरैक्टर फिशरी के पास होता है। आमदन पैदा करने के लिए विभाग इन स्रोतों को ठेके पर देता है। मछली पालने को उत्साहित करने के लिए 1975 में मछली पालन एजेंसी की स्थापना की गई तथा नए मछली उत्पत्ति फार्म बनाए गए। इस प्रकार राज्य में मछली पालन में क्रान्ति आई। मछली पालन विभाग द्वारा हर माह जिला स्तर पर पांच दिनों की मुफ्त मछली पालन ट्रेनिंग दी जाती है। यह विभाग मछली पालकों को ऋण सबसिडी तथा प्रसार सेवाएं भी देता है।

प्रश्न 2.
कृषि से संबंधित दस सहयोगी संस्थाओं के नाम लिखो।
उत्तर-

  • कृषि विभाग
  • पशुपालन विभाग
  • डेयरी विकास विभाग
  • बागवानी विभाग
  • मछली पालन विभाग
  • सहकारिता विभाग
  • पंजाब कृषि उद्योग निगम
  • पंजाब राज्य बीज निगम लिमिटेड
  • भारतीय कृषि अनुसंधान संस्था
  • राष्ट्रीय बीज निगम।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन की सम्भाल

Punjab State Board PSEB 8th Class Home Science Book Solutions Chapter 3 भोजन की सम्भाल Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Home Science Chapter 3 भोजन की सम्भाल

PSEB 8th Class Home Science Guide भोजन की सम्भाल Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
बैक्टीरिया भोजन को कैसा बना देता है?
उत्तर-
बैक्टीरिया भोजन को कड़वा और ज़हरीला बना देता है।

प्रश्न 2.
फफूंदी कौन-से खाद्य पदार्थों को लगती है ?
उत्तर-
फफूंदी नमी वाले भोज्य पदार्थों में लगती है।

प्रश्न 3.
ताप को बढ़ाकर खाद्य-पदार्थों को सुरक्षित रखने की किसी एक विधि का नाम लिखें।
उत्तर-

  1. पास्चुरीकरण, तथा
  2. अनुर्वरीकरण (स्टेरीलाइजेशन)

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन की सम्भाल

प्रश्न 4.
मक्खन और घी को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है?
उत्तर-
मक्खन, घी की खटाई दूर करके, ठण्डी जगह में रखना चाहिए।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
मांस, मछली, सब्जियों को फलों की टोकरी में डालकर ज़मीन पर क्यों नहीं रखना चाहिए? इन्हें धोकर क्यों प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर-
मांस, मछली, सब्जियों को फलों की टोकरी में डालकर ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए क्योंकि रोग के कीटाणु इन पर बहुत जल्दी हमला करते हैं और अपने प्रभाव से इनको हानिकारक बना देते हैं। इनको धोकर प्रयोग में लाना चाहिए क्योंकि बिना धोए मांस, मछली, सब्जियाँ और फल खाने से कई बार कीड़े हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं और इससे हैजा, टाइफाइड और पेचिश जैसी बीमारियाँ हो जाती हैं।

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प्रश्न 2.
दूध बीमारियाँ कैसे फैलाता है और उनसे कैसे बचाव किया जा सकता है?
उत्तर-
दूध बीमारियाँ बैक्टीरिया से फैलाता है जिससे पेचिश, टाइफाइड आदि रोग .फैलने का खतरा रहता है।
बचाव-

  1. दूध को एक मिनट तक उबालकर बैक्टीरिया को मार देना चाहिए।
  2. उबलने के बाद दूध को छान लेना चाहिए।
  3. उबलने के बाद सघन जाली या मलमल के कपड़े से ढक देना चाहिए ताकि मिट्टी या मक्खी से बचाया जा सके।

प्रश्न 3.
फ्रिज़ के क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
फ्रिज़ से निम्नलिखित लाभ हैं-

  1. यह कच्ची-पक्की सब्जी, दूध, दही, मक्खन, पनीर, अण्डा, मांस, मछली और फलों को सुरक्षित रखते हैं।
  2. गर्मी से खराब होने वाले पदार्थ इसमें रखे जाते हैं।
  3. इसमें भोज्य पदार्थ ठंडे रहते हैं।
  4. भोजन फ्रिज में रखने से फफूंदी नहीं होती।

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प्रश्न 4.
भोजन की नमी दूर करने से वह कैसे सुरक्षित हो जाते हैं ?
उत्तर-
नमी वाले भोजनों में फफूंदी लग जाती है उसमें खमीर उठ जाता है। इसलिए भोजन को सुरक्षित रखने के लिए भोजन की नमी दूर कर दी जाती है, जिससे भोजन सुरक्षित हो जाता है।

प्रश्न 5.
खाद्य पदार्थों की खुशबू तेज़ करने से वे कैसे सुरक्षित हो जाते हैं ?
उत्तर-
खाद्य पदार्थों की खुशबू तेज़ करने से फफूंदी, खमीर और बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं, जिससे खाद्य पदार्थ सुरक्षित हो जाते हैं।

प्रश्न 6.
कम तापमान या फ्रिज़ आदि के प्रयोग से भोजन पदार्थ कैसे सुरक्षित हो जाते हैं ?
उत्तर-
कम तापमान या फ्रिज़ आदि के प्रयोग से भोजन में बैक्टीरिया उत्पन्न नहीं हो पाते हैं जिससे भोजन पदार्थ सुरक्षित हो जाते हैं।

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प्रश्न 7.
कच्चा दूध जल्दी खराब हो जाता है जबकि उबाला हुआ देर से क्यों?
उत्तर-
कच्चे दूध में बैक्टीरिया जल्दी उत्पन्न हो जाता है जिससे दूध शीघ्र खराब हो जाता है, जबकि उबले हुए दूध में बैक्टीरिया नष्ट हो जाता है इसलिए वह देरी से खराब होता है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन खराब होने के क्या कारण हैं ?
अथवा
भोजन खराब होने के कोई तीन कारण लिखिए।
उत्तर-
(1) सूक्ष्म जीव-जीवाणु, फफूंद तथा कवक।
(2) अवयव।
(3) भोजन के अंश।
PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन की सम्भाल 1
चित्र 3.1 खमीर फफूंदी तथा कीटाणु भोजन खराब करने वाले तत्त्व

  1. जीवाणु-ये मांस, अण्डे, मछली एवं दूध को खराब कर देते हैं।
  2. फफूंद-ये गर्म एवं नम मौसम से मुरब्बे आदि पर भूरी सी रोंएदार तह बना देते हैं।
  3. खमीर-यह शर्करा युक्त पदार्थों को खराब करते हैं।
  4. अवयव-सूक्ष्म जीवों के साथ-साथ ये सब्जियों, फलों तथा अन्य भोज्य पदार्थों को सड़ा देते हैं।
  5. भोजन के अंश-कई परिस्थितियों में फलों तथा सब्जियों की रासायनिक रचना भी उनमें सड़न का कारण बनती है।

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प्रश्न 2.
भोजन को ठीक ढंग से संग्रह करने के घरेलू तरीके बताओ।
उत्तर-
भोजन को ठीक ढंग से संग्रह करने के घरेलू तरीके निम्नलिखित हैं-
1. दूध-दूध में बैक्टीरिया जल्दी हो जाती है। इससे पेचिश, टाइफाइड आदि फैलने का खतरा रहता है। इसलिए दूध को एक मिनट तक उबालकर बैक्टीरिया मार देते हैं। उबालने से पहले दूध छान लेना चाहिए। उबलने के बाद सघन जाली या मलमल के कपड़े से ढाँप देना चाहिए ताकि मिट्टी या मक्खी से बचाया जा सके।

2. मक्खन और घी-मक्खन और घी में से खटाई निकाल लेनी चाहिए और गीली मलमल से ढककर रखना चाहिए ताकि ये ठंडा रहकर सुरक्षित रह सकें। कीड़े-मकोड़ों से बचाने के लिए पानी के बर्तन में मक्खन तथा शहद को भी जाली में रखना चाहिए।

3. सब्ज़ियाँ और फल-बिना धोए सब्जियाँ और फल खाने से कई बार कीड़े हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं। इसलिए सब्जी को कच्चा खाना हो या पत्तेदार सब्जियों का सलाद के रूप में इस्तेमाल करना हो तो हमेशा लाल दवाई से धोकर खानी चाहिए। पानी इतना लेना चाहिए कि सब्जी अच्छी तरह डूब जाए। दो किलो पानी में चुटकी भर दवाई काफ़ी होती है। खास कर हैज़ा, टाइफाइट और पेचिश की बीमारियों के मौसम में लाल दवाई का इस्तेमाल अवश्य करना चाहिए।

4. अनाज और दालें-अनाज की बोरी या टीन के बड़े बर्तन में डालकर उसको अच्छी तरह बन्द कर देना चाहिए। गेहूँ भरते समय मेथी या नीम के पत्ते सुखाकर तथा पीसकर बीच में मिला देने चाहिए और बोरी के आस-पास भूसा डाल देना चाहिए। अगर गेहूँ अधिक समय के लिए रखनी हो तो डी० टी० टी० के कपड़े की पोटली में बांधकर गेहूँ के बीच में रखना चाहिए। दालों को समय-समय पर धूप में सुखा देना चाहिए।

5. मांस और मछली-मांस और मछली पर रोग के कीटाणु बहुत जल्दी हमला करते हैं और अपने प्रभाव से इसको हानिकारक बना देते हैं। इनको छोटे लटकाने वाले बर्तनों में रखकर ठंडी जगह पर लटकाना चाहिए।

प्रश्न 3.
भोजन को सुरक्षित रखने के सिद्धान्तों के बारे में बताओ।
अथवा
भोजन को सुरक्षित रखने के किन्हीं तीन सिद्धान्तों के बारे में लिखें।
उत्तर-
भोजन को सुरक्षित रखने के निम्नलिखित सिद्धान्त हैं-
1. फफूंदी, खमीर और बैक्टीरिया को रोकने के लिए पदार्थों की खुशबू तेज़ कर लेनी चाहिए। इसलिए आचार में मसाले डाले जाते हैं। तेल, सिरका, चीनी, शक्कर और नमक इस काम के लिए इस्तेमाल में लाए जाते हैं।

2. भोजन को सुरक्षित करने के लिए भोजन की नमी दूर करनी चाहिए। सब्ज़ियाँ और फल अच्छी तरह सुखाकर ही इकट्ठे करने चाहिएँ। दालों और अनाज को भी समयसमय पर धूप और हवा लगवा लेना चाहिए।

3. बैक्टीरिया उस भोजन में होते हैं जिसका तापमान शारीरिक खून के तापमान के बराबर होता है। इसलिए भोजन का तापमान बढ़ा देना चाहिए या कम कर देना चाहिए। इसलिए उबला हुआ दूध कच्चे दूध से अधिक सुरक्षित रहता है। अगर भोजन को 0°C तापमान में रखा जाए तो बैक्टीरिया बढ़ नहीं पाते हैं।

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Home Science Guide for Class 8 PSEB भोजन की सम्भाल Important Questions and Answers

I. बहुविकल्पी प्रश्न

प्रश्न 1.
कौन-सा तथ्य ठीक है ?
(क) भोजन फ्रिज में रखने से उल्ली नहीं लगती
(ख) दूध उबालने से बैक्टीरिया मर जाते हैं
(ग) उल्ली नमी वाले पदार्थ में लगती है
(घ) सभी ठीक
उत्तर-
(घ) सभी ठीक

प्रश्न 2.
जीवाणु भोजन को कैसा बना देते हैं ?
(क) मीठा
(ख) स्वाद
(ग) कड़वा तथा ज़हरीला
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(ग) कड़वा तथा ज़हरीला

प्रश्न 3.
भोजन खराब करने वाले जीवाणुओं के लिए उचित तापमान है-
(क) 30-40°C
(ख) 0-5°C
(ग) 70-80°C
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) 30-40°C

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प्रश्न 4.
भोजन पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए पदार्थ हैं
(क) नमक
(ख) चीनी
(ग) सिरका
(घ) सभी ठीक
उत्तर-
(घ) सभी ठीक

प्रश्न 5.
निम्न में ग़लत तथ्य है
(क) खमीर शक्कर वाले पदार्थों को खराब करते हैं
(ख) कच्चा दूध लम्बे समय तक खराब नहीं होता
(ग) कम तापमान पर बैक्टीरिया पैदा नहीं होते।
(घ) सभी ग़लत।
उत्तर-
(ख) कच्चा दूध लम्बे समय तक खराब नहीं होता

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II. ठीक/गलत बताएं

  1. दालों को समय-समय पर धूप में सुखा लेना चाहिए।
  2. आचार में सरसों का तेल डाल कर सुरक्षित किया जाता है।
  3. खमीर स्टार्च वाले भोजन पदार्थों को अल्कोहल में तथा कार्बन डायाक्साइड में बदल देता है।
  4. फ्रिज में रखा भोजन खराब हो जाता है।
  5. गेहूँ को स्टोर करते समय मेथी तथा नीम के पत्तों का प्रयोग किया जाता है।

उत्तर-

III. रिक्त स्थान भरें

  1. उल्ली ………… वाले पदार्थों को लगती है। (From Board M.Q.P.)
  2. सब्जियों आदि को कच्चा खाना हो तो ……………… दवाई में धो लें।
  3. गेहूँ में ……………. के पत्ते डाल कर रखें।
  4. खराब अण्डे पानी में ……………… हैं।

उत्तर-

  1. नमी
  2. लाल
  3. नीम
  4. तैरते

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IV. एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
भोजन पदार्थों को सुरक्षित रखने का एक साधन बताओ।
उत्तर-
फ्रिज़।

प्रश्न 2.
गेहूँ को भण्डार करते समय कौन-से पत्ते प्रयोग करते हैं ?
उत्तर-
मेथी तथा नीम के।

प्रश्न 3.
फफूंदी कौन-सी वस्तुओं को लगती है ?
उत्तर-
नमीयुक्त।

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प्रश्न 4.
एक क्विटल चावल को संग्रह करने के लिए कितने नमक का प्रयोग करते हैं ?
उत्तर-
ढाई किलोग्राम।

प्रश्न 5.
फफूंदी से बचाने के लिए भोजन को कैसे स्थान पर रखना चाहिए?
उत्तर-
शुष्क स्थान पर।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फफूंदी तथा खमीर भोजन को किस प्रकार खराब कर देते हैं ?
उत्तर-
फफूंदी नमी युक्त पदार्थों में लगती है। खमीर शक्कर वाले पदार्थों को खराब करते हैं।

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प्रश्न 2.
सुरक्षित रखने के लिए भोजन को कहाँ रखते हैं ?
उत्तर-
सुरक्षित रखने के लिए भोजन को ठंडी जगह या फ्रिज में रखते हैं।

प्रश्न 3.
भोजन खराब करने वाले जीवाणुओं के लिए सबसे उपयुक्त तापमान कौन-सा है?
उत्तर-
30° से 40°C तक।

प्रश्न 4.
बिना उबाला दूध, उबाले हुए दूध की अपेक्षा जल्दी खराब क्यों हो जाता है?
उत्तर-
बिना उबाले दूध में उपस्थित जीवाणु तेजी से पनपते हैं जबकि दूध को उबालने से उसमें उपस्थित जीवाणु मर जाते हैं।

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प्रश्न 5.
जीवाणु भोजन को कैसा बना देते हैं ?
उत्तर-
जीवाणु भोजन को कड़वा तथा विषैला बना देते हैं।

प्रश्न 6.
खमीर स्टार्च वाले भोजन को किसमें बदल देता है ?
उत्तर-
खमीर स्टार्च वाले भोजन को एल्कोहल और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल देता है।

प्रश्न 7.
घर मे पकाए हुए भोज्य पदार्थ किस प्रकार सुरक्षित रखे जाते हैं ?
उत्तर-
ठण्डी जगह, जैसे फ्रिज़ आदि में रखकर।

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प्रश्न 8.
खाद्य पदार्थों के संरक्षण के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात क्या है ?
उत्तर-
जीवाणुओं की वृद्धि तथा प्रकिण्वों (एन्जाइमों) की क्रियाशीलता को रोका जाए।

प्रश्न 9.
खाद्य पदार्थों को सुखाकर सुरक्षित रखने की कौन-कौन सी विधियाँ हैं ?
उत्तर-

  1. जीवाणुओं को दूर रखना,
  2. दबाव के साथ फिल्टर द्वारा,
  3. किण्वन द्वारा,
  4. ताप संसाधन द्वारा,
  5. रसायनों का उपयोग करके,
  6. सुखाकर,
  7. किरणों द्वारा,
  8. प्रतिजीवियों द्वारा।।

प्रश्न 10.
धूप में सुखाकर सुरक्षित रखे जाने वाले कुछ खाद्य पदार्थों के नाम बताएँ।
उत्तर-
आलू, गोभी, मटर, मेथी, शलगम, सरसों-चने का साग आदि।

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प्रश्न 11.
फल तथा सब्ज़ियों को ऑवन में सुखाने के क्या लाभ हैं?
उत्तर-

  1. फल व सब्ज़ियाँ जल्दी सूखती हैं,
  2. मक्खी व धूल-मिट्टी से संदूषण का खतरा नहीं रहता।

प्रश्न 12.
पास्चुरीकरण क्रिया क्या है?
उत्तर-
इस प्रक्रिया में खाद्य-पदार्थों को पहले गर्म करके फिर ठण्डा किया जाता है।

प्रश्न 13.
पास्चुरीकरण विधि किन खाद्य-पदार्थों के संरक्षण में प्रयोग में लाई जाती
उत्तर-
दूध, फलों के रस, सिरका।

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प्रश्न 14.
अनुर्वरीकरण विधि कब प्रयोग में लाते हैं ?
उत्तर-
जब खाद्य-पदार्थों को बोतलों अथवा डिब्बों में सीलबन्द करते हैं।

प्रश्न 15.
संरक्षणीय पदार्थ क्या होते हैं?
उत्तर-
ये पदार्थ किसी खाद्य-पदार्थ में मिला देने से उस खाद्य-पदार्थ की सुरक्षा की जाती है।

प्रश्न 16.
कुछ घरेलू संरक्षणीय पदार्थों के नाम बताएँ। (पंजाब बोर्ड, 2004)
उत्तर-
नमक, चीनी, नींबू का रस, सिरका, टारटेरिक अम्ल, सिट्रिक अम्ल, मसाले, तेल।

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प्रश्न 17.
खाद्य-पदार्थों की सुरक्षा में नमक का प्रयोग कब किया जाता है?
उत्तर-
अचार, चटनी, साँस, फलों तथा सब्जियों की बोतलबन्दी तथा डिब्बाबन्दी के समय।

प्रश्न 18.
खाद्य-पदार्थों के संरक्षण में नमक किस प्रकार सहायता करता है?
उत्तर-

  1. खाद्य-पदार्थों की नमी कम करना,
  2. खाद्य-पदार्थों में वातावरण की ऑक्सीजन न मिलने देना,
  3. क्लोराइड आयन मिलने में खाद्य संरक्षण में सहायता करना,
  4. प्रकिण्वों की क्रियाशीलता को मन्द करना।

प्रश्न 19.
चीनी का प्रयोग किन खाद्य-पदार्थों के संरक्षण के लिए किया जाता है ?
उत्तर-
जैम, जैली, मार्मलेड, मुरब्बा, कैण्डी, स्क्वैश, शर्बत, चटनी आदि।

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प्रश्न 20.
तेल, अचार का संरक्षण किस प्रकार करता है?
उत्तर-
तेल खाद्य-पदार्थों का ऑक्सीजन से सम्पर्क तोड़ देता है और इस प्रकार उसे खराब नहीं होने देता।

प्रश्न 21.
पोटेशियम मेटाबाइसल्फाइट का प्रयोग किन खाद्य-पदार्थों के संरक्षण
उत्तर-
सन्तरा, नींबू, लीची, अनानास, आम आदि हल्के रंग वाले फलों तथा सब्जियों के संरक्षण के लिए।

प्रश्न 22.
अनाज तथा दालों को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है?
उत्तर-
अनाज को सुखाकर बोरी या टीन के बड़े ढोल में डाल कर अच्छी तरह बन्द करके खा जाता है। गेहूँ को संभालते समय उस में नीम या मेथी के सूखे पीसे हुए पत्ते मिला देने चाहिए फिर डी० डी० टी० की पोटली बना कर इस में रखें। एक किलो चावलों के लिए अढाई किलो पीस कर मिला दें। दालों को समय-समय पर धूप लगाते रहना चाहिए।

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प्रश्न 23.
बैक्टीरिया और खमीर भोजन को किस प्रकार खराब कर देते हैं ?
उत्तर-
स्वयं करें।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन संरक्षण के लाभ लिखिए।
उत्तर-
भोज्य पदार्थों के संरक्षण के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं-

  1. खाद्य पदार्थों को नष्ट होने से बचाया जा सकता है।
  2. खाद्य पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से ले जाया जा सकता है।
  3. आपत्ति, अकाल आदि के समय सुरक्षित खाद्य पदार्थों का उपयोग होता है।
  4. युद्ध में, पर्वतारोहण में, समुद्र यात्रा में तथा ध्रुवीय अभियात्रा में सुरक्षित भोज्य पदार्थ ही लाभदायक सिद्ध होते हैं।
  5. बेमौसम सब्जी, फल आदि प्राप्त हो सकते हैं।
  6. फ़सलों का आवश्यकता से अधिक उत्पादन होने पर उन्हें संरक्षित कर सड़ने से बचाया जा सकता है और उन्हें अन्य देशों को भेजा जा सकता है।
  7. संरक्षण से भोज्य पदार्थ का वास्तविक स्वाद और सुगन्ध बनी रहती है।
  8. भोजन में विविधता लाई जा सकती है।

प्रश्न 2.
भोजन के संरक्षण के उपाय किन सिद्धान्तों पर आधारित है?
उत्तर-
1. सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा होने वाले विश्लेषण को रोकना और विलम्बित करना-भोजन को सुरक्षित करने के लिए सूक्ष्म जीवों को नष्ट या उनको निकालने के उपाय करने पड़ते हैं। इसके अलावा यदि सूक्ष्म जीवों की बढ़ोत्तरी शुरू हो चुकी है तो इसको रोकना पड़ता है। ऐसा जीवाणुओं को दूर रखकर अथवा जीवाणुओं को फिल्टर द्वारा निकालकर किया जाता है। इनकी बढ़ोत्तरी नमी सुखाकर, इनका वायु से सम्पर्क हकर तथा रासायनिक पदार्थों का प्रयोग करके रोकी जा सकती है।

2. भोजन में स्वयं विश्लेषण को रोकना या विलम्बित करना-भोजन में पाए जाने वाले पदार्थ को ताप द्वारा खत्म करने से या निष्क्रिय करने से उसमें होने वाले स्वयं विश्लेषण को नष्ट किया जा सकता है।

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प्रश्न 3.
क्या भोजन को खराब होने से बचाया जा सकता है?
उत्तर-
भोजन को खराब होने से निम्न तरीकों से बचाया जा सकता है-
1. फफूंदी, खमीर और बैक्टीरिया को रोकने के लिए पदार्थों की खुशबू तेज़ कर लेनी चाहिए। इसलिहाकार में मसाले डाले जाते हैं। तेल, सिरका, चीनी, शक्कर और नमक इस काम के लिए इस्तेमाल में लाते हैं। इस तरह पदार्थ स्वादिष्ट और सुरक्षित रहता है।

2. नमी युक्त पदार्थों में फफूंदी लग जाती है या खमीर उठ जाता है। इसलिए भोजन को सुरक्षित करने के लिए भोजन की नमी दूर करनी चाहिए। सब्जियाँ और फल अच्छी तरह सुखाकर ही इकट्ठे करने चाहिएँ। दालों और अनाज को भी समय-समय पर धूप और हवा में सुखाना चाहिए।

3. बैक्टीरिया उस भोजन में होते हैं जिसका तापमान शारीरिक खून के तापमान के बराबर होता है। इसलिए भोजन का तापमान बढ़ा देना चाहिए या कम कर देना चाहिए। इसलिए उबला हुआ दूध कच्चे दूध से अधिक सुरक्षित होता है। अगर भोजन को 0°C तापमान में रखा जाए तो बैक्टीरिया बढ़ते नहीं है। इसलिए फ्रिज़ और बर्फ के बॉक्स का इस्तेमाल किया जाता है।

प्रश्न 4.
दूध उबालना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर-
दूध में बैक्टीरिया जल्दी पलते हैं, इसलिए दूध उबालना ज़रूरी है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन को संरक्षित करने का क्या अभिप्राय है? किन-किन विधियों से भोजन को सुरक्षित रखा जा सकता है?
उत्तर-
बहुत से खाद्य-पदार्थों जैसे-ताजे फल, सब्जियाँ, मांस, मछली, अण्डा आदि अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रखे जा सकते। मौसमी खाद्य पदार्थ मौसम में बहुत अधिक मात्रा में उत्पादित होते हैं अत: उन्हें अन्य स्थानों पर पहुँचाना होता है। इस प्रकार खाद्य पदार्थों की अधिक मात्रा को देश के विभिन्न भागों में पहुँचाने तथा सही उपयोग के लिए ऐसी विधियों से गुज़ारा जाता है जिससे वे सड़ने से बचे रहें। इसी को भोजन का संरक्षण कहते हैं। भोजन को संरक्षित करने की आवश्यकता निम्न प्रकार बताई जा सकती है-

  1. खाद्य पदार्थों को नष्ट होने से बचाने के लिए।
  2. खाद्य पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाने-ले-जाने के लिए जिससे वे रास्ते में खराब न हों और लाने-ले-जाने में असुविधा न हो।
  3. सुरक्षा द्वारा खाद्य पदार्थों के संग्रह करने के लिए।
  4. विभिन्न खाद्य पदार्थों को बिना मौसम के तथा सारे साल आसान उपलब्धि के लिए।
  5. समय और श्रम की बचत के लिए।
  6. भोजन के रंग, रूप, स्वाद में विभिन्नता लाने के लिए।
  7. आधुनिक जीवन की बढ़ती हुई आवश्यकताओं को किसी हद तक पूरा करने के लिए भी भोजन की सुरक्षा आवश्यक होती है

भोजन को निम्नलिखित विधियों से सुरक्षित रखा जा सकता है-
1. जीवाणुओं को दूर रखकर- भोजन को खराब करने वाले जीवाणु वायु में उपस्थित होते हैं। अत: यदि भोजन को वायु से बचाकर रखा जाए तो वह सुरक्षित रहता है। सबसे भोजन की सम्भाल पहले खाद्य पदार्थ को गर्म करके उसमें उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। फिर इन्हें चौड़े मुँह की बोतलों या डिब्बों में भरकर पानी के तसले में रखकर गर्म करते हैं। ऐसा करने में खाद्य सामग्री से उपस्थित या प्रविष्ट हुई वायु निकल जाती है। अब तुरन्त ही ढक्कनों को वायुरोधक ढंग से बन्द कर देते हैं। बाहर के देशों में अधिकतर खाद्य पदार्थ इसी प्रकार बन्द डिब्बों में बिकते हैं। अचार, मुरब्बे, शर्बत, फल-सब्जियाँ, मांस, मछली आदि खाने की अनेक वस्तुएँ इस विधि से सुरक्षित रखी जा सकती है।

2. दबाव के साथ फिल्टर द्वारा-इस विधि से तरल भोज्य पदार्थों, जैसे–फलों का रस, बीयर, वाइन तथा पानी आदि को सुरक्षित किया जा सकता है। इन तरल पदार्थों को कम या अधिक दबाव से जीवाणु फिल्टरों में से फिल्टर कर लिया जाता है।

3. खमीरीकरण द्वारा-जीवाणु द्वारा पैदा किए गए कार्बोनिक अम्ल से भोजन संरक्षित हो जाता है। संरक्षीकरण में एल्कोहल, एसिटिक अम्ल तथा लेक्टिक अम्ल द्वारा किया गया खमीरीकरण महत्त्वपूर्ण है। वाइन, बीयर, फलों के सिरके आदि पेय पदार्थों को इसी विधि से तैयार किया जाता है। इस प्रकार से संरक्षित खाद्य पदार्थों को सावधानी से सीलबन्द करके रखने से उनमें अवांछित खमीरीकरण नहीं हो पाता।

4. ताप संसाधन विधि द्वारा-इस विधि से जीवाणुओं तथा अवयवों को नष्ट किया जाता है। यह विधि तीन प्रकार से प्रयोग की जाती है-
i) पास्चुरीकरण-इस विधि में भोज्य पदार्थ को गर्म करके ठण्डा किया जाता है। ऐसे में जीवाणु इस बदलते हुए ताप को सहन नहीं कर पाते और जल्दी ही नष्ट हो जाते हैं। इस विधि में अधिकांश जीवाणु तो नष्ट हो जाते हैं फिर भी कुछ रह जाते हैं। यह विधि मुख्य रूप से दूध (Milk) के लिए उपयोग में लाई जाती है। भोज्य पदार्थों का पास्चुरीकरण निम्नलिखित उद्देश्यों से किया जाता है

ii) दूध का पास्चुरीकरण करने से रोग उत्पन्न करने वाले सभी जीवाणुओं को नष्ट किया जा सकता है।

iii)  लेक्टिक अम्ल की उपस्थिति से दूध खड़ा हो जाता है। इस अम्ल को उत्पन्न करने वाले बहुत से जीवाणु दूध के पास्चुरीकरणं से नष्ट हो जाते हैं। इससे दूध खट्टा नहीं होता।

iv) इस क्रिया द्वारा स्वाद बिगाड़ने वाले और दुर्गन्ध उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं को भी नष्ट कर दिया जाता है। पास्चुरीकरण की निम्न तीन विधियाँ हैं

  •  होल्डिंग विधि- इस विधि में खाद्य पदार्थ को 62.67°C या 145°F पर 30 मिनट तक रखने के बाद ठण्डा होने दिया जाता है।
  • फ्लैश विधि-इस विधि में खाद्य पदार्थ को 71°C या 161°F पर 15 सेकिण्ड के लिए रखकर एकदम से ठण्डा कर दिया जाता है।
  • अत्यधिक ताप की विधि-इस विधि में खाद्य-पदार्थ को 90°C या 194°F या इससे भी अधिक ताप पर एक सेकिण्ड के लिए रखकर एकदम ठण्डा किया जाता है। यह विधि अधिक सुरक्षित है तथा इसमें बहुत कम समय लगता है।

5. ठण्डे स्थान में रखकर- भोजन को खराब करने वाले जीवों की वृद्धि के लिए 30°C से 40°C का तापमान उचित रहता है। 30°C से तापमान जितना कम होगा उतना ही सूक्ष्म जीव नहीं पनप सकेंगे। इसी प्रकार गर्मियों की अपेक्षा सर्दियों में भोजन अधिक देर तक सुरक्षित रहता है।

इस प्रकार खाद्य पदार्थों को बहुत कम तापमान में रखकर उन्हें खराब होने से बचाया जा सकता है। घर में भोजन को जैसे दूध, दही, सब्जियों, फल आदि को रेफ्रीजरेटर में रखकर । सुरक्षित रखा जा सकता है। आइस बॉक्स भी कुछ समय के लिए रेफ्रीजरेटर के समान ही कार्य करता है।

बड़े स्तर पर फल तथा सब्जियों आदि को शून्य डिग्री तापमान में शीत संग्रहागार (कोल्ड स्टोरेज) में सुरक्षित रखा जाता है।
PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन की सम्भाल 2
चित्र 3.2 भोजन को सुरक्षित
चित्र 3.3 आइस-बॉक्स रखने का साधन रेफ्रिजरेटर
6. सुखाकर-जीवाणुओं व अन्य सूक्ष्म जीवों को अपनी वृद्धि के लिए नमी की आवश्यकता होती है। नमी के अभाव में ये पनप नहीं सकते। यदि खाद्य पदार्थों को सुखाकर उनकी नमी समाप्त कर दी जाए तो उन्हें खराब होने से बचाया जा सकता है। घरों में मेथी, पोदीना, धनिया, मटर, गोभी, शलगम, प्याज, भिंडी, लाल मिर्च आदि को छाया में सुखाकर अधिक समय तक सुरक्षित रखा जाता है।

बड़े पैमाने पर खाद्य पदार्थों को मशीनों द्वारा गरम हवा के वातावरण में सुखाया जाता है। इस प्रकार सुखाए गए खाद्य पदार्थ धूप में सुखाए गए खाद्य पदार्थों की अपेक्षा अधिक अच्छी प्रकार तथा अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं।

7. जीवाणुनाशक वस्तुओं के प्रयोग से-जीवाणु प्राकृतिक पदार्थों तथा कम सान्द्रता वाली खाद्य सामग्री पर अच्छी प्रकार पनपते हैं। शक्कर, नमक, सिरका, राई, तेल आदि भोजन की सम्भाल जीवाणुओं की बाढ़ को रोककर खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखते हैं। इसी विधि से अचार को तेल से, मुरब्बे को चीनी से, चटनी को नमक से, मछली को धुआँ देकर सुरक्षित रखा जा सकता

8. रसायनों की सहायता से-पोटैशियम मेटा बाइसल्फाइट, सोडियम बेंजोएट, सोडियम मेटा बाइसल्फाइट, टाटरी, बोरिक अम्ल, सल्फर डाइऑक्साइड आदि कई रासायनिक पदार्थ जीवाणुओं की संख्या वृद्धि में रुकावट डालते हैं। इस विधि में खाद्य पदार्थ, मुरब्बे, चटनी, शर्बत आदि की बोतलों अथवा डिब्बों में बन्द करने से पहले थोड़ी मात्रा में इनमें से किसी रसायन का प्रयोग किया जाता है।

9. उबालकर-जीवाणु-फफूंद तथा खमीर आदि भोजन खराब करने वाले तत्त्वों की वृद्धि बढ़े हुए तापमान पर रुक जाती है। इसलिए कुछ खाद्य-पदार्थ जैसे दूध को उबालकर अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

10. किरणों द्वारा-भोज्य पदार्थों के संरक्षण की इस विधि में रेडियो-एक्टिव किरणों के प्रयोग से सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर दिया जाता है। इन किरणों का भिन्न-भिन्न मात्रा से परिरक्षित खाद्य पदार्थों का प्रयोग हमारे शरीर व स्वास्थ्य पर कितना व कैसा विपरीत प्रभाव डाल सकता है, इस पर अभी और जानकारी प्राप्त की जानी आवश्यक है।

11. एण्टीबायोटिक्स का प्रयोग-खाद्य पदार्थों के परिरक्षण में एण्टीबायोटिक्स का सीमित प्रयोग ही किया जाता है। अधिकांश ऐसे एण्टीबायोटिक्स ही प्रयोग में लाए जाते हैं जो विशेष हानिकारक नहीं होते। इनका प्रयोग बहुत सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।
भोजन को सुरक्षित रखने के उपायों के अलावा खाद्य पदार्थों की सुरक्षा के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. भोजन बनाते समय पूर्ण स्वच्छता का पालन करना चाहिए।
  2. चर्म रोग से पीड़ित गृहणियों को जहाँ तक हो सके, भोजन नहीं बनाना चाहिए।
  3. पकाये हुए भोजन को भली प्रकार ढककर जालीदार अलमारी में रखना चाहिए।
  4. अनाज, दालों आदि खाद्य पदार्थों को ढककर रखना चाहिए, ताकि चूहे, गिलहरी आदि के सम्पर्क से भोजन दृषित न हो।

PSEB 8th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन की सम्भाल

प्रश्न 2.
भोजन को सुरक्षित रखने के दो (तीन) ढंग बारे लिखो।
उत्तर-
स्वयं करो।

भोजन की सम्भाल PSEB 8th Class Home Science Notes

  • यदि मांस, मछली, अण्डे और दूध आदि में बैक्टीरिया या कीटाणु पैदा हो जाएँ तो ये खराब हो जाते हैं।
  • फफूंदी से भी आचार, जैम, जैली खराब हो जाते हैं। फफूंदी उन खाने वाली चीज़ों को लगती है जिनमें नमी हो।
  • खमीर स्टार्च को शक्कर में बदलकर और शक्कर को एल्कोहल में बदलकर कार्बन हाइऑक्साइड में बदल देता है।
  • फफूंदी, खमीर और बैक्टीरिया को रोकने के लिए पदार्थों की खुशबू तेज़ कर लेनी चाहिए।
  • दूध में बैक्टीरिया जल्दी हो जाते हैं। इससे पेचिश, टाइफाइड आदि फैलने का खतरा रहता है।
  • मक्खन और घी में से खटाई निकाल लेनी चाहिए और नमी युक्त मलमल से ढककर रखना चाहिए ताकि ठंडा रहकर सुरक्षित रहे।
  • बिना धोए सब्ज़ियाँ और फल खाने से कई बार कीड़े हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं।
  • अगर गेहूँ अधिक समय के लिए रखनी हों तो डी० टी० टी० को कपड़े की पोटली में बाँधकर गेहूँ के बीच में रखना चाहिए।
  • रोग के कीटाणु मांस और मछली पर बहुत जल्दी हमला करते हैं और अपने प्रभाव से इनको हानिकारक बना देते हैं।
  • रेफरिजरेटर कच्ची-पक्की सब्जी, दूध, दही, मक्खन, पनीर, अण्डा, मांस, मछली और फलों को सुरक्षित रखने का आधुनिक यंत्र है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

Punjab State Board PSEB 7th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Social Science Geography Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

SST Guide for Class 7 PSEB वायुमण्डल तथा तापमान Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 1-15 शब्दों में दो

प्रश्न 1.
वायुमण्डल किसे कहते हैं ?
उत्तर-
पृथ्वी के इर्द-गिर्द वायु का एक घेरा अथवा गिलाफ़ बना हुआ है। इस घेरे को वायुमण्डल कहते हैं। यह घेरा 1600 कि०मी० की ऊँचाई तक है। परन्तु अधिकतर (90%) वायु 32 कि० मी० के घेरे में ही है।

प्रश्न 2.
भूगोल में हम वायुमण्डल का अध्ययन क्यों करते हैं ?
उत्तर-
भूगोल में वायुमण्डल का अध्ययन इसलिए किया जाता है क्योंकि वायुमण्डल पृथ्वी पर हर प्रकार के जीवन को अत्यधिक प्रभावित करता है।

प्रश्न 3.
वायुमण्डल की पर्तों ( सतहों) के नाम लिखो।
उत्तर-
वायुमण्डल की चार मुख्य पर्ते हैं –

  1. अशान्ति (अशान्त) मण्डल (Troposphere)
  2. समताप मण्डल (Stratosphere)
  3. मध्यवर्ती मण्डल (Mososphere)
  4. तापमण्डल (Thermosphere)।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

प्रश्न 4.
समताप सीमा किसे कहते हैं ?
उत्तर-
समताप मण्डल की ऊपरी सीमा को समताप सीमा कहते हैं।

प्रश्न 5.
बाहरी (बाह्य) मण्डल से क्या भाव है ?
उत्तर-
वायुमण्डल की बाहरी परत को बाह्य (बाहरी) मण्डल (Exosphere) कहते हैं। इसके विषय में अधिक जानकारी नहीं है, फिर भी निश्चित है कि इस परत में बहुत कम घनत्व वाली गैसें हाइड्रोजन और हीलियम हैं।

प्रश्न 6.
वायुमण्डल में गैसों के अतिरिक्त और कौन-कौन से अंश पाये जाते हैं ?
उत्तर-
वायुमण्डल में गैसों के अतिरिक्त जल वाष्प तथा धूलिकण पाये जाते हैं।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

प्रश्न 7.
हवा (वायु) का प्रदूषण किसे कहते हैं ?
उत्तर-
वायुमण्डल में मनुष्य द्वारा पैदा की गई इस स्थूलता को वायु का प्रदूषण कहते हैं। यह स्थूलता दो प्रकार की होती है-ठोस और गैस।

प्रश्न 8.
तापमान क्या होता है, और इसको मापने के लिए कौन-से पैमाने प्रयोग किये जाते हैं ?
उत्तर-
किसी वस्तु या जीव के अंदर की गर्मी को उसका तापमान कहते हैं। तापमान को मापने के लिए दो पैमानों का प्रयोग किया जाता है –

  1. सेल्सियस पैमाना
  2. फार्नहीट पैमाना।

प्रश्न 9.
भू-मध्य रेखा पर तापमान अधिक क्यों होता है ?
उत्तर-
भू-मध्य रेखा पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। इसलिए यहां अधिक तापमान होता है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

प्रश्न 10.
दिन और रात के तापमान में अन्तर क्यों होता है ?
उत्तर-
दिन के समय पृथ्वी सूर्य से गर्मी प्राप्त करती है और रात के समय छोड़ती है। इसलिए दिन के समय तापमान अधिक होता है और रात के समय कम।

प्रश्न 11.
शिमला का तापमान चण्डीगढ़ से कम क्यों रहता है ?
उत्तर-
इसका कारण यह है कि शिमला चण्डीगढ़ की अपेक्षा अधिक ऊंचाई पर स्थित है। ऊंचाई पर जाते हुए तापमान कम होता जाता है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 50-60 शब्दों में दो

प्रश्न 1.
हवा (वायु) के प्रदूषण के मुख्य कारकों की संक्षेप में जानकारी दो।
उत्तर-
वायु प्रदूषण के मुख्य कारकों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –
1. ठोस कारक –

  1. ज्वालामुखी वायु को धूलिकणों द्वारा प्रदूषित करते हैं।
  2. नगरों में मानवीय गतिविधियां बहुत सी ठोस गंदगी वायु में छोड़ती हैं।
  3. ईंधन के जलने के बाद कार्बन के कण धुएं के रूप में वायु में जमा हो जाते हैं।
  4. कल-कारखाने भी वायु में धूलि-कण छोड़ते हैं जिनमें ऐस्बेस्टास प्रदूषण का बहुत ही खतरनाक स्रोत है।

2. गैसीय कारक –

  1. मोटर-गाड़ियों द्वारा निकला हुआ धुआं एक भयानक गैसीय प्रदूषण है।
  2. अत्यधिक यातायात वाले स्थानों पर वाहन वायुमण्डल में कार्बन मोनोक्साइड गैस छोड़ते हैं। यह बहुत विषैली गैस होती है।
  3. स्मॉग (Smog) वायु का एक अन्य गैसीय प्रदूषक है। यह धुन्ध और धुएं का मिश्रण होता है। यह प्रदूषक स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होता है।
  4. वायु के प्रदूषण का एक और मुख्य कारण वायु में ओज़ोन की कम मात्रा है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

प्रश्न 2.
वायुमण्डल की नीचे की सतह को क्या कहते हैं ? इसके बारे में जानकारी दो।
उत्तर-
वायुमण्डल की निचली परत अशान्ति अथवा अशान्त मण्डल है। यह वायुमण्डल की सबसे घनी परत है। इसे क्षोभ मण्डल भी कहते हैं। पृथ्वी के गिर्द इसका आकार अण्डे जैसा होता है। इसकी औसत ऊँचाई 12 कि० मी० है। भूमध्य रेखा पर इसकी मोटाई 16-18 कि० मी० तथा ध्रुवों पर 6-8 कि० मी० होती है। वायुमण्डल की यह परत सदैव अशान्त रहती है क्योंकि मौसम से सम्बद्ध हर प्रकार की क्रियाएँ जैसे कि वर्षा, आँधी, बादल, तूफान इत्यादि इसी पस्त में ही होती हैं। जलकणों की अधिकांश मात्रा भी अशान्त मण्डल में ही होती है। सम्पूर्ण वायुमण्डल की 75% वायु इसी परत में पायी जाती है। इस परत में ऊपर जाने से तापमान कम होता जाता है और तापमान के कम होने की दर 6.5° सेंटीग्रेड प्रति किलोमीटर है।

प्रश्न 3.
हवा (वायु) के बीच की मुख्य गैसों के मिश्रण के बारे में लिखो।
उत्तर-
हवा गैसों का एक मिश्रण है। हवा की प्रमुख गैसें नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण गैसें आर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा हाइड्रोजन हैं। हवा में नाइट्रोजन की मात्रा 78.03%, ऑक्सीजन 20.99%, आर्गन 0.94%, कार्बन डाइऑक्साइड 0.03% तथा हाइड्रोजन की मात्रा 0.01% है। सम्पूर्ण वायुमण्डल में इन गैसों की मात्रा लगभग स्थिर रहती है। परन्तु ऊँचाई में वृद्धि के साथ इनकी प्रतिशत मात्रा में अन्तर आता जाता है।

प्रश्न 4.
वायुमण्डल में ओज़ोन गैस कहाँ पाई जाती है तथा इसका क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
वायुमण्डल में ओज़ोन गैस समताप मण्डल में पायी जाती है।
महत्त्व-ओज़ोन गैस एक अति महत्त्वपूर्ण गैस है। यह गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को, जोकि जीवजगत् के लिये हानिकारक होती हैं। अपने भीतर समा लेती है। ओज़ोन गैस के कारण ही सूर्य से आने वाली गर्मी समताप मण्डल में ही रह जाती है। इसीलिए पृथ्वी पर तापमान बहुत अधिक नहीं बढ़ता।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लगभग 125-130 शब्दों में लिखो।

प्रश्न 1.
वायुमण्डल की सतहों (परतों) का वर्णन करो।
उत्तर-
अनुमान है कि वायुमण्डल लगभग 1600 किलोमीटर की ऊंचाई तक फैला हुआ है। इसे चार मुख्य परतों में बाँटा जा सकता है जिनका वर्णन इस प्रकार है –
PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान 1

1. अशान्त मण्डल अथवा क्षोभ मण्डल-वायुमण्डल की सबसे निचली परत को क्षोभ मण्डल कहते हैं। पृथ्वी की सतह से इसकी औसत ऊँचाई 12 किलोमीटर के लगभग है। यह ऊँचाई भूमध्य रेखा पर सबसे अधिक (16-18 किलोमीटर) तथा ध्रुवों पर सबसे कम (6-8 किलोमीटर) है। पूरे वायुमण्डल की 75% वायु इसी परत में पाई जाती है। इस परत में ऊपर की ओर जाते हुए तापमान 6.5° से० प्रति कि० मी० की दर से कम होता जाता है। तीव्र मौसमी परिवर्तन इस परत की सबसे बड़ी विशेषता है। ये परिवर्तन इसमें पाए जाने वाले धूलि-कणों तथा जल-वाष्पों के कारण होते हैं। भौगोलिक दृष्टि से मनुष्य के लिए यही परत सबसे महत्त्वपूर्ण है।

2. समताप मण्डल-यह क्षोभ मण्डल के ऊपर की परत है। इस परत में तापमान कम होता है और सदा स्थिर रहता है। तापमान में समानता के कारण ही इस परत को समताप मंडल कहा जाता है। इसमें वायु भी पतली होती है। इसमें न तो धूलि-कण हैं और न ही जल-वाष्प। यह परत लगभग 50 से 55 कि० मी० तक फैली हुई है। भू-मध्य रेखा से इसकी ऊंचाई लगभग 15 कि० मी० है। इसकी ऊपरी सीमा को समताप सीमा कहते हैं।

3. मध्यवर्ती मण्डल-समताप सीमा से ऊपर वायुमण्डल की परत को मध्यवर्ती मण्डल कहते हैं। इस परत में ऊँचाई के बढ़ने पर तापमान कम होता जाता है। लगभग 80 किलोमीटर की ऊँचाई पर तापमान-90° सेंटीग्रेड हो जाता है।

मध्यवर्ती मंडल की ऊपर की सीमा को मध्यवर्ती सीमा कहा जाता है। इस सीमा से आगे तापमान फिर बढ़ना आरम्भ हो जाता है।
मध्यवर्ती सीमा से ऊपर तापमान बढ़ने लगता है। अतः इस परत को तापमण्डल में गैसों की मात्रा कम होती है।

4. आयन मण्डल-वायुमण्डल की सबसे निचली परत आयन मण्डल कहलाती है। इसे तापमण्डलं भी कहते हैं। इसकी ऊँचाई लगभग 300 कि०मी० तक है। 100 कि०मी० से ऊँचाई की ओर जाते हुए इस मण्डल में अनेक विद्युत् कण (आयन) पाए जाते हैं जो कि रेडियो तरंगों (Radio Waves) को धरती पर लौटने में सहायता करते हैं। इन के आधार पर वायरलैस संचार (Wireless चित्र-वायुमण्डल की परतें Communication) प्रणाली काम करती है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

प्रश्न 2.
किसी स्थान के तापमान को निर्धारित करने वाले तत्त्वों की व्याख्या करो।
उत्तर-
तापमान कभी भी स्थिर नहीं रहता। समय तथा स्थान के अनुसार यह घटता-बढ़ता रहता है। वास्तव में किसी स्थान के तापमान को अनेक तत्त्व प्रभावित करते हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है –

1. भू-मध्य रेखा से दूरी-भू-मध्य रेखा पर सूर्य की किरणें सारा साल सीधी पड़ती हैं। परन्तु ज्यों-ज्यों हम ध्रुवों की ओर जाते हैं, किरणें तिरछी होती जाती हैं। सीधी किरणें तिरछी किरणों से अधिक गर्म होती हैं। इसलिए जो स्थान भूमध्य रेखा के निकट स्थित हैं उन स्थानों का तापमान अधिक रहता है। परन्तु भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाते हुए तापमान कम होता जाता है।

2. समुद्र तल से ऊँचाई-जो स्थान समुद्र तल से जितना ऊँचा होता है, उसका तापमान उतना ही कम होता है। इसका कारण यह है कि समुद्र तल के निकट वायु घनी होती है, परन्तु ऊंचाई की ओर जाते हुए यह पतली होती जाती है। क्योंकि पहले वायु की निचली परत गर्म होती है, इसलिए हम ज्यों-ज्यों ऊपर की ओर जाते हैं वायु कम गर्म होती है। इसी कारण ऊँचाई पर स्थित स्थानों का तापमान कम रहता है। उदाहरण के लिए शिमला, चण्डीगढ़ की अपेक्षा समुद्र तल से अधिक ऊँचाई पर स्थित है। इसलिए शिमला का तापमान चण्डीगढ़ के तापमान से कम रहता है।

3. समुद्र से दूरी-स्थल की अपेक्षा जल देर से गर्म होता है और देर से ठण्डा होता है। इसलिए जो स्थान समुद्र के निकट होते हैं, उनका तापमान न तो अधिक बढ़ता है और न ही अधिक कम होता है। परन्तु जो स्थान समुद्र से दूर होते हैं, वहां का तापमान सर्दियों में बहुत कम और गर्मियों में अधिक रहता है। उदाहरण के लिए मुम्बई समुद्र के निकट स्थित है, इसलिए वहां तापमान लगभग समान रहता है। इसके विपरीत समुद्र से दूर होने के कारण अमृतसर के वार्षिक तापमान में काफ़ी अन्तर पाया जाता है।

4. समुद्री धाराएँ-समुद्र में जल की जो नदियाँ बहती हैं, उन्हें धाराएँ कहते हैं। ये दो प्रकार की होती हैं-गर्म तथा ठण्डी। जहां से गर्म धाराएं गुज़रती हैं, वहां का तापमान बढ़ जाता है। परन्तु जहां से ठण्डी धाराएँ गुज़रती हैं, वहां का तापमान कम हो जाता है।

5. पवनें-जो पवनें समुद्र की ओर से आती हैं, वे जल-कणों से भरी होती हैं और वर्षा करती हैं। इन पवनों के प्रभाव में आने वाले स्थानों का तापमान कुछ कम हो जाता है। परन्तु शुष्क प्रदेशों से आने वाली पवनें अपने प्रभाव में आने वाले स्थानों का तापमान बढ़ा देती हैं।

6. पर्वतों की दिशा-जो पर्वत पवनों की दिशा के विपरीत स्थित होते हैं, वे पवनों को रोक कर वर्षा लाने में सहायता करते हैं और तापमान को घटाते हैं। परन्तु जो पर्वत पवनों के समानान्तर होते हैं वे पवनों को रोक नहीं पाते। उदाहरण के लिए हिमालय पर्वत समुद्र से आने वाली मानसून पवनों को रोकता है, परन्तु अरावली पर्वत इन्हें रोक नहीं पाता।

7. पर्वतों की ढलान-पर्वतों की जो ढलाने सूर्य के सामने होती हैं उनका तापमान अधिक होता है। परन्तु जो ढलाने सूर्य से परे होती हैं, उनका तापमान कम होता है।

8. मिट्टी के प्रकार-रेतीली मिट्टी चिकनी मिट्टी की तुलना में जल्दी गर्म और जल्दी ठण्डी होती है। इसलिए रेतीले प्रदेशों में दिन में तापमान अधिक और रात में कम हो जाता है।

9. बादल और वर्षा-जिन प्रदेशों में बादल अधिक रहते हैं और वर्षा भी अधिक होती है वहां तापमान प्रायः कम रहता है। वास्तव में बादल पृथ्वी पर सीधी धूप को पड़ने से रोकते हैं जिससे तापमान अधिक नहीं बढ़ता। इसी प्रकार वर्षा के कारण भी तापमान में कमी आ जाती है।

(घ) निम्नलिखित में रिक्त स्थान भरो

  1. जैसे-जैसे पर्वतों के ऊपर चढ़ते जाते हैं, तापमान …………… जाता है।
  2. धरती पर तापमान के मुख्य स्रोत …………….. तथा …………….. हैं।
  3. ओज़ोन गैस …………….. किरणों को अपने में समा लेती है।
  4. बिजली के अणु (विद्युत् कण) …………….. मण्डल में पाए जाते हैं।
  5. वायरलैस संचार …………….. तरंगों के आधार पर कार्य करता है।
  6. वायुमण्डल में सबसे अधिक मात्रा …………. गैस की होती है।

उत्तर-

  1. घटता,
  2. सूर्य, धरती के आन्तरिक भाग,
  3. पराबैंगनी,
  4. आयन अथवा ताप,
  5. रेडियो,
  6. नाइट्रोजन।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

PSEB 7th Class Social Science Guide वायुमण्डल तथा तापमान Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
वायुमण्डल के तत्त्वों (अंशों) के नाम बताओ।
उत्तर-
वायुमण्डल के मुख्य तत्त्व अथवा अंश-हवा, तापमान, नमी, वायु-दबाव (हवा का भार) आदि हैं।

प्रश्न 2.
तापमान किसे कहते हैं ?
उत्तर-
वायु में वर्तमान गर्मी के अंश को उसका तापमान कहा जाता है। वायु के तापमान की तरह किसी वस्तु या जीव के अन्दर वर्तमान गर्मी के अंश को भी तापमान कहते हैं। तापमान कम या अधिक होता रहता है।

प्रश्न 3.
वायुमण्डल की निम्नलिखित गैसों का महत्त्व बताओ –
नाइट्रोजन, ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड।
उत्तर-

  1. नाइट्रोजन-नाइट्रोजन अधिकतर वायुमण्डल की निचली तहों में पाई जाती है। यह गैस पेड़-पौधों को मरने से बचाती है।
  2. ऑक्सीजन-ऑक्सीजन जीव-जन्तुओं की रक्षा करती है। इसके बिना जीव-जन्तु जीवित नहीं रह सकते।
  3. कार्बन डाइऑक्साइड-कार्बन डाइऑक्साइड गैस पेड़-पौधों का उसी प्रकार पालन करती है जिस प्रकार ऑक्सीजन जीव-जन्तुओं का। यह धरती के चारों ओर एक कम्बल का काम करती है और वायुमण्डल की गर्मी को बाहर नहीं जाने देती।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

प्रश्न 4.
वायुमण्डल में जलकणों का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
वायुमण्डल में जल-कणों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये जलवायु में परिवर्तन लाने में बहुत काम करते हैं।

प्रश्न 5.
संवहन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
वायु गरम होकर फैलती है और हल्की होकर ऊपर उठने लगती है। ठण्डी हवा भारी होने के कारण नीचे बैठ जाती है। इस प्रकार ऊपर उठती हुई गर्म हवा का स्थान ठण्डी हवा ग्रहण कर लेती है। इस वायु चक्र को संवहन कहते हैं।

प्रश्न 6.
जैसे-जैसे हम पर्वतों पर चढ़ते हैं, तापमान घटता जाता है। क्यों ?
उत्तर-
जैसे-जैसे हम ऊपर की ओर जाते हैं, तापमान कम होता जाता है। ऊँचाई के साथ तापमान के कम होने का कारण यह है कि सूर्य से प्राप्त होने वाली गर्मी पहले पृथ्वी को गर्म करती है और फिर वायुमण्डल गर्म होता है। इसलिए पृथ्वी की सतह के पास का वायुमण्डल अधिक गर्म हो जाता है और ऊपर वाला कम गर्म होता है। यही कारण है कि ज्यों-ज्यों हम पर्वतों पर चढ़ते हैं तो तापमान घटता जाता है।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

प्रश्न 7.
तापमान के मुख्य स्रोत क्या हैं ?
उत्तर-
सूर्य तथा पृथ्वी का आन्तरिक भाग, तापमान के दो मुख्य स्रोत हैं। परन्तु इनमें से सूर्य को तापमान का मुख्य स्रोत माना जाता है। जितनी गर्मी और ताप सूर्य में है, उतनी गर्मी और ताप किसी अन्य स्रोत में नहीं है। सूर्य के बाहरी सिरों का तापमान 6000° सेंटीग्रेड के लगभग है। इसके केन्द्र में तापमान और भी अधिक है। पृथ्वी पर समस्त जीवन सूर्य के तापमान (गर्मी) के कारण ही है, जबकि पृथ्वी को इस गर्मी का केवल थोड़ा-सा अंश (2 अरबवां भाग) ही प्राप्त होता है। इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि सूर्य में कितनी अधिक गर्मी होगी।

प्रश्न 8.
सेल्सियस और फार्नहीट में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
तापमान मापने के लिए दो पैमाने प्रयोग में लाए जाते हैं-सेल्सियस तथा फार्नहीट –

  1. सेल्सियस पैमाने के अनुसार पानी 0° पर जम जाता है परन्तु फॉर्नहीट पैमाने के अनुसार यह 32° पर जमता है।
  2. सेल्सियस के अनुसार पानी 100° पर उबलता है जबकि फार्नहीट के अनुसार 212° पर उबलता है।

(क) सही कथनों पर (✓) तथा ग़लत कथनों पर (✗) का चिन्ह लगाएं :

  1. वायुमण्डल के सबसे निचले भाग को अशान्त मण्डल कहते हैं।
  2. वायुमण्डल में जलकणों का कोई महत्त्व नहीं है।
  3. किसी स्थान पर मौसम लम्बे समय तक एक जैसा रहता है।
  4. समुद्र के निकट स्थित स्थानों पर तापमान सम (एक समान) रहता है।

उत्तर-

1. (✓)
2. (✗)
3. (✗)
4. (✓)

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 3 वायुमण्डल तथा तापमान

(ख) सही जोड़े बनाएं:

  1. भूमध्य रेखा – कम तापमान
  2. ऊंचे स्थान – वायु का प्रदूषण
  3. समोग – वायु चक्र
  4. संवहन – अधिक तापमान

उत्तर-

  1. भूमध्य रेखा – अधिक तापमान
  2. ऊंचे स्थान – कम तापमान
  3. समोग – वायु का प्रदूषण
  4. संवहन – वायु चक्र

(ग) सही उत्तर चुनिए :

प्रश्न 1.
धरती के गिर्द एक गैस कम्बल का काम करती है ? क्या आप इसका नाम बता सकते हैं?
(i) ऑक्सीजन
(ii) नाइट्रोजन
(iii) कार्बनडाइआक्साइड।
उत्तर-
(iii) कार्बनडाइआक्साइड।

प्रश्न 2.
वायुमण्डल की किस सतह में मौसमी क्रियाएं होती हैं ?
(i) समताप मण्डल
(ii) अशान्ति मण्डल
(iii) मध्य मण्डल।
उत्तर-
(ii) अशान्ति मण्डल।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित में से किस भू-भाग में तापमान सम रहता है ?
(i) पर्वतीय प्रदेश .
(ii) मैदानी भाग
(iii) समुद्र तटीय प्रदेश।
उत्तर-
(iii) समुद्र तटीय प्रदेश।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 7 राजपूत और उनका काल

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 7 राजपूत और उनका काल Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 7 राजपूत और उनका काल

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
कन्नौज के लिए संघर्ष तथा दक्षिण में राजनीतिक परिवर्तनों से सम्बन्धित घटनाओं की रूपरेखा बताएं।
उत्तर-
आठवीं और नौवीं शताब्दी में उत्तरी भारत में होने वाला संघर्ष त्रिदलीय संघर्ष के नाम से प्रसिद्ध है। यह संघर्ष राष्ट्रकूटों, प्रतिहारों तथा पालों के बीच कन्नौज को प्राप्त करने के लिए ही हुआ। कन्नौज उत्तरी भारत का प्रसिद्ध नगर था। यह नगर हर्षवर्धन की राजधानी था। उत्तरी भारत में इस नगर की स्थिति बहुत अच्छी थी। क्योंकि इस नगर पर अधिकार करने वाला शासक गंगा के मैदान पर अधिकार कर सकता था, इसलिए इस पर अधिकार करने के लिए कई लड़ाइयां लड़ी गईं। इस संघर्ष में राष्ट्रकूट, प्रतिहार तथा पाल नामक तीन प्रमुख राजवंश भाग ले रहे थे। इन राजवंशों ने बारी-बारी कन्नौज पर अधिकार किया। राष्ट्रकूट, प्रतिहार तथा पाल तीनों राज्यों के लिए संघर्ष के घातक परिणाम निकले। वे काफी समय तक युद्धों में उलझे रहे। धीरे-धीरे उनकी सैन्य शक्ति कम हो गई और राजनीतिक ढांचा अस्त-व्यस्त हो गया। फलस्वरूप सौ वर्षों के अन्दर तीनों राज्यों का पतन हो गया। राष्ट्रकूटों पर उत्तरकालीन चालुक्यों ने अधिकार कर लिया। प्रतिहार राज्य छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया और पाल वंश की शक्ति को चोलों ने समाप्त कर दिया।

दक्षिण में राजनीतिक परिवर्तन-

दक्षिण में 10वीं , 11वीं तथा 12वीं शताब्दी के दो महत्त्वपूर्ण राज्य उत्तरकालीन चालुक्य तथा चोल थे। इन दोनों राजवंशों के आपसी सम्बन्ध बड़े ही संघर्षमय थे। इन राज्यों का अलग-अलग अध्ययन करने से इनके आपसी सम्बन्ध स्पष्ट हो जायेंगे। उत्तरकालीन चालुक्यों की दो शाखाएं थीं-कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य तथा मैगी के पूर्वी चालुक्य । कल्याणी के चालुक्य की शाखा की स्थापना तैलप द्वितीय ने की थी। उसने चोलों, गुर्जर, जाटों आदि के विरुद्ध अनेक विजयें प्राप्त की। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र सत्याश्रय ने उत्तरी कोंकण के राजा तथा गुर्जर को पराजित किया, परन्तु उस समय राजेन्द्र चोल ने चालुक्य शक्ति को काफी हानि पहंचाई। बैंगी के पूर्वी चालुक्यों की शाखा का संस्थापक पुलकेशिन द्वितीय का भाई विष्णुवर्धन द्वितीय था।

पुलकेशिन ने उसे 621 ई० में चालुक्य राज्य का गवर्नर नियुक्त किया था । परन्तु कुछ ही समय पश्चात् उसने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। उसके द्वारा स्थापित राजवंश ने लगभग 500 वर्ष तक राज्य किया। जयसिंह प्रथम, इन्द्रवर्मन और विष्णुवर्मन तृतीय, विजयादित्य प्रथम द्वितीय, भीम प्रथम, कुल्लोतुंग प्रथम विजयादित्य इस वंश के प्रतापी राजा थे। इन राजाओं ने पल्लवों तथा राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष किया। अन्त में कुल्लोतुंग प्रथम ने चोल तथा चालुक्य राज्यों को एक संगठित राज्य घोषित कर दिया। उसने अपने चाचा विजयादित्य सप्तम को बैंगी का गर्वनर नियुक्त किया।

चोल दक्षिण भारत की प्रसिद्ध जाति थी। प्राचीन काल में वे दक्षिण भारत की सभ्य जातियों में गिने जाते थे। अशोक के राज्यादेशों तथा मैगस्थनीज़ के लेखों में उनका उल्लेख आता है। चीनी लेखकों, अरब यात्रियों तथा मुस्लिम इतिहासकारों ने भी उनका वर्णन किया है। काफी समय तक आन्ध्र और पल्लव जातियां उन पर शासन करती रहीं। परन्तु नौवीं शताब्दी में वे अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने में सफल हुए। इस वंश के शासकों ने लगभग चार शताब्दियों तक दक्षिणी भारत में राज्य किया। उनके राज्य में आधुनिक तमिलनाडु, आधुनिक कर्नाटक तथा कोरोमण्डल के प्रदेश सम्मिलित थे। चोल राज्य का संस्थापक कारीकल था। परन्तु इस वंश का पहला प्रसिद्ध राजा विजयालय था। उसने पल्लवों को पराजित किया था। इस वंश के अन्य प्रसिद्ध राजा आदित्य प्रथम प्रान्तक (907-957 ई०), राजराजा महान् (985-1014 ई०), राजेन्द्र चोल (10141044 ई०), कुल्लोतुंग इत्यादि थे। इनमें से राजराजा महान् तथा राजेन्द्र चोल ने शक्ति को बढ़ाने में विशेष योगदान दिया। उन्होंने कला और साहित्य के विकास में भी योगदान दिया।

चोल वंश का पतन और दक्षिण में नई शक्तियों का उदय-राजेन्द्र चोल के उत्तराधिकारियों को बैंगी के चालक्यों तथा कल्याणी के विरुद्ध एक लम्बा संघर्ष करना पड़ा। चोल राजा कुल्लोतुंग के शासन काल (1070-1118 ई०) में वैंगी के चालुक्यों का राज्य चोलों के अधिकार में आ गया। परन्तु कल्याणी के चालुक्यों के साथ उनका संघर्ष कुछ धीमा हो गया। इसका कारण यह था कि कुल्लोतुंग की मां एक चालुक्य राजकुमारी थी। 12वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में चोल शक्ति का पतन होने लगा जो मुख्यतः उनके चालुक्यों के साथ संघर्ष का ही परिणाम था। इस संघर्ष के कारण चोल शक्ति काफी क्षीण हो गई और उनके सामन्त शक्तिशाली हो गए। अन्ततः उनके होयसाल सामन्तों ने उनकी सत्ता का अन्त कर दिया। इस प्रकार 13वीं शताब्दी के आरम्भ में दक्षिण में चालुक्य तथा चोल, राज्यों के स्थान पर कुछ नवीन शक्तियों का उदय हुआ। इन शक्तियों में देवगिरी के यादव, वारंगल के काकतीय, द्वारसमुद्र के होयसाल तथा मदुराई के पाण्डेय प्रमुख थे।

प्रश्न 2.
राजपूत काल में धर्म, कला तथा साहित्य के क्षेत्र में हुए महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों की चर्चा करें।
उत्तर-
राजपूत काल 7वीं तथा 13वीं शताब्दी का मध्यकाल है। इस काल में धार्मिक परिवर्तन हुए तथा कला एवं साहित्य के क्षेत्र में बड़ा विकास हुआ। इन सबका वर्णन इस प्रकार है-

I. धर्म-

(1) 7वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक धर्म का आधार वही देवी-देवता व रीति-रिवाज ही रहे, जो काफी समय से चले आ रहे थे। परन्तु धार्मिक परम्पराओं को अब नया रूप दिया गया। इस काल में बौद्ध धर्म का पतन बहुत तेजी से होने लगा। जैन धर्म को कुछ राजपूत शासकों ने समर्थन अवश्य प्रदान किया परन्तु यह धर्म अधिक लोकप्रिय न हो सका। केवल हिन्दू धर्म ही ऐसा धर्म था जिसमें कुछ परिवर्तन आये। अब अवतारवाद को अधिक शक्ति मिली तथा विशेष रूप से कृष्णवासुदेव का अवतार रूप में पूजन होने लगा। देवी-माता की भी कात्यायनी, भवानी, चंडिका, अम्बिका आदि भिन्न-भिन्न रूपों में पूजा प्रचलित थी। इस काल के सभी मतों के अनुयायियों ने अपने-अपने इष्ट देव के लिए मन्दिर बनवाए जो इस काल के धर्मों की बहुत बड़ी विशेषता है।

(2) हिन्दू धर्म में मुख्य रूप से दो विचारधाराएं ही अधिक प्रचलित हुईं-वैष्णव मत तथा शैवमत। शैवमत के कई रूप थे तथा यह दक्षिणी भारत में अधिक प्रचलित था। कुछ शैव सम्प्रदाय सामाजिक दृष्टि से परस्पर विरोधी भी थे। जैसे कि कपालिक, कालमुख तथा पशुपति। लोगों का जादू-टोनों में विश्वास पहले से अधिक बढ़ने लगा। 12वीं शताब्दी में वासवराज ने शैवमत की एक नवीन लहर चलाई । इसके अनुयायी लिंगायत या वीर शैव कहलाए। वे लोग शिव की लिंग रूप में पूजा करते थे तथा पूर्ण विश्वास के साथ प्रभु-भक्ति में आस्था रखते थे। इन लोगों ने बाल-विवाह का विरोध करके और विधवाविवाह का सर्मथन करके बाह्मण रूढ़िवाद पर गम्भीर चोट की। दक्षिणी भारत में शिव की लिंग रूप के साथ-साथ नटराज के रूप में भी पूजा काफी प्रचलित थी। उन्होंने शिव के नटराज रूप को धातु की सुन्दर मूर्तियों के रूप में ढाला । इन मूर्तियों में चोल शासकों के काल में बनी कांसे की नटराज की मूर्ति प्रमुख है।

(3) राजपूत काल के धर्म की एक अन्य विशेषता वैष्णव मत में भक्ति तथा श्रद्धा का सम्मिश्रण था। इस विचारधारा के मुख्य प्रवर्तक रामानुज थे। उसका जन्म तिरुपति में हुआ था। 12वीं शताब्दी में उसने श्रीरंगम में कई वर्षों तक लोगों को धर्म की शिक्षा दी। उनके विचार प्रसिद्ध हिन्दू प्रचारक शंकराचार्य से बिल्कुल भिन्न थे। वह अद्धैतवाद में बिल्कुल विश्वास नहीं रखता था। वह विष्णु को सर्वोच्च इष्ट मानता था। उसका कहना था कि विष्णु एक मानवीय देवता है। उसने मुक्ति के तीन मार्ग-ज्ञान, धर्म तथा भक्ति में से भक्ति पर अधिक बल दिया। इसी कारण उसे सामान्यतः भक्ति लहर का प्रवर्तक माना जाता है। परन्तु उसने भक्ति की प्रचलित लहर को वैष्णव धर्मशास्त्र के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया।

(4) राजपूतकालीन धर्म में लहर की स्थिति अत्यधिक महत्त्वपूर्ण थी। रामानुज का भक्ति मार्ग जनता में काफी लोकप्रिय हुआ। शैव सम्प्रदाय में भी भक्ति को काफी महत्त्व दिया जाता था। लोगों में यह विश्वास बढ़ गया कि मुक्ति का एकमात्र मार्ग सच्चे मन से की गई प्रभु भक्ति ही है। वे अपना सब कुछ प्रभु के भरोसे छोड़कर उसकी भक्ति के पक्ष में थे।

II. कला-

राजपूत काल में भवन निर्माण का बड़ा विकास हुआ। उन्होंने भव्य महलों तथा दुर्गों का निर्माण किया। जयपुर तथा उदयपुर केराजमहल, चितौड़ तथा ग्वालियर के दुर्ग राजपूती भवन निर्माण कला के शानदार नमूने हैं। इसके अतिरिक्त पर्वत की चोटी पर बने जोधपुर के दुर्ग की अपनी ही सुन्दरता है। कहा जाता है कि उसकी सुन्दरता देखकर बाबर भी आश्चर्य में पड़ गया था।

राजपूत काल मन्दिरों के निर्माण का सर्वोत्कृष्ट समय था। इस वास्तुकला के प्रभावशाली नमूने आज भी देश के कई भागों में सुरक्षित हैं। मन्दिरों का निर्माण केवल शैवमत या वैष्णव मत तक ही सीमित नहीं था। माऊंट आबू में जैन मन्दिर भी मिलते हैं। ये मन्दिर सफेद संगमरमर तथा अन्य पत्थरों के बने हुए हैं। ये मन्दिर उत्कृष्ट मूर्तियों से सजे हुए हैं। अतः ये वास्तुकला और मूर्तिकला के मेल के बहुत सुन्दर नमूने हैं।

राजपूत काल में बने सूर्य मन्दिर बहुत प्रसिद्ध हैं। परन्तु सर्वाधिक प्रसिद्ध उड़ीसा में कोणार्क का सूर्य मन्दिर है। आधुनिक मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड के इलाके में स्थित खजुराहो के अधिकतर मन्दिर शिव को समर्पित हैं।

इस समय शिव को समर्पित बड़े-बड़े शानदार मन्दिरों के अतिरिक्त शिव के नटराज रूप को भी धातु की अनेकों मूर्तियों में ढाला गया। इन मूर्तियों के कई छोटे और बड़े नमूने देखे जा सकते हैं। इनमें चोल शासकों के समय का बना सुप्रसिद्ध कांसे का नटराज एक महान् कला कृति है।

III. साहित्य तथा शिक्षा-

राजपूत काल में साहित्य का भी पर्याप्त विकास हुआ। पृथ्वीराज चौहान तथा राजा भोज स्वयं उच्चकोटि के विद्वान् थे। राजपूत राजाओं ने अपने दरबार में साहित्यकारों को संरक्षण प्रदान किया हुआ था। कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ नामक ग्रन्थ की रचना की। चन्दर बरदाई पृथ्वीराज का राजकवि था। उसने ‘पृथ्वी रासो’ नामक ग्रन्थ की रचना की। जयदेव बंगाल का राजकवि था। उसने ‘गीत गोबिन्द’ नामक ग्रन्थ की रचना की। राजशेखर भी इसी काल का एक माना हुआ विद्वान् था। राजपूतों ने शिक्षा के प्रसार को ओर काफी ध्यान दिया। आरम्भिक शिक्षा का प्रबन्ध मन्दिरों तथा पाठशालाओं में किया जाता था। उच्च शिक्षा के लिए नालन्दा, काशी, तक्षशिला, उज्जैन, विक्रमशिला आदि अनेक विश्वविद्यालय थे।
सच तो यह है कि राजपूत काल में धर्म के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन हुए और कला तथा साहित्य के क्षेत्र में बड़ा विकास हुआ। इस काल की कृतियों तथा साहित्यिक रचनाओं पर आज भी देश को गर्व है।

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महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक-

प्रश्न 1.
कन्नौज की त्रिपक्षीय लड़ाई के समय बंगाल-बिहार का राजा कौन था ?
उत्तर-
धर्मपाल।

प्रश्न 2.
हर्षवर्धन के बाद कन्नौज का राजा कौन बना ?
उत्तर-
यशोवर्मन।

प्रश्न 3.
पृथ्वीराज चौहान की जानकारी हमें किस स्त्रोत से मिलती है तथा
(ii) उसका लेखक कौन है ?
उत्तर-
(i) पृथ्वीराज रासो नामक ग्रन्थ से
(ii) चन्दरबरदाई।

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प्रश्न 4.
महमूद गज़नवी ने भारत पर कितनी बार आक्रमण किया?
उत्तर-
महमूद गज़नवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किये।

प्रश्न 5.
(i) महमूद गज़नवी के साथ कौन-सा इतिहासकार भारत आया तथा
(ii) उसने कौन-सी पुस्तक की रचना की ?
उत्तर-
(i) अल्बरूनी
(ii) ‘किताब-उल-हिन्द’।

प्रश्न 6.
(i) तन्जौर के शिव मन्दिर का निर्माण किसने करवाया तथा
(ii) इस मन्दिर का क्या नाम था ?
उत्तर-
(i) तन्जौर के शिव मन्दिर का निर्माण चोल शासक राजराजा प्रथम ने करवाया।
(ii) इस मन्दिर का नाम राजराजेश्वर मन्दिर था।

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प्रश्न 7.
चोल शासन प्रबन्ध में प्रांतों को किस नाम से पुकारा जाता था ?
उत्तर-
‘मंडलम’।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति-

(i) राजपूतों का प्रमुख देवता ……………. था।
(ii) ………… पृथ्वीराज चौहान का दरबारी कवि था।
(iii) ‘कर्पूरमंजरी’ का लेखक ……………. था।
(iv) परमार वंश की राजधानी ……………… थी।
(v) चंदेल वंश का प्रथम प्रतापी राजा ………….. था।
उत्तर-
(i) शिव
(ii) चन्द्रबरदाई
(iii) राजशेखर
(iv) धारा नगरी
(v) यशोवर्मन।

3. सही/ग़लत कथन-

(i) अरबों ने 712 ई० में सिंध पर आक्रमण किया। — (√)
(ii) तराइन की पहली लड़ाई (1191) में मुहम्मद गौरी की विजय हुई। — (×)
(iii) तराइन की दूसरी लड़ाई महमूद ग़जनवी तथा मुहम्मद गौरी के बीच हुई। — (×)
(iv) परमार वंश का प्रथम महान् शासक मुंज था। — (√)
(v) जयचंद राठौर की राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान से शत्रुता थी। — (√)

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4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
मुहम्मद गौरी ने किसे हरा कर दिल्ली पर अधिकार किया ?
(A) जयचंद राठौर
(B) पृथ्वीराज चौहान
(C) अनंगपाल
(D) जयपाल।
उत्तर-
(B) पृथ्वीराज चौहान

प्रश्न (ii)
राजपूत काल का सबसे सुंदर दुर्ग है-
(A) जयपुर का
(B) बीकानेर का
(C) जोधपुर का
(D) दिल्ली का।
उत्तर-
(C) जोधपुर का

प्रश्न (iii)
‘जौहर’ की प्रथा प्रचलित थी-
(A) राजपूतों में
(B) सिक्खों में
(C) मुसलमानों में
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(A) राजपूतों में

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प्रश्न (iv)
मुहम्मद गौरी ने अपने भारतीय प्रदेश का वायसराय किसे नियुक्त किया ?
(A) जलालुद्दीन खलजी
(B) महमूद ग़जनवी
(C) नासिरुद्दीन कुबाचा
(D) कुतुबुद्दीन ऐबक।
उत्तर-
(D) कुतुबुद्दीन ऐबक।

प्रश्न (v)
धारानगरी में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की ?
(A) धर्मपाल
(B) राजा भोज
(C) हर्षवर्धन
(D) गोपाल।
उत्तर-
(B) राजा भोज

II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजपूत काल में पंजाब की पहाड़ियों में किन नये राज्यों का उदय हुआ ?
उत्तर-
राजपूत काल में पंजाब की पहाड़ियों में जम्मू, चम्बा, कुल्लू तथा कांगड़ा नामक राज्यों का उदय हुआ।

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प्रश्न 2.
राजपूत काल में कामरूप किन तीन देशों के बीच व्यापार की कड़ी था ?
उत्तर-
इस काल में कामरूप पूर्वी भारत, तिब्बत तथा चीन के मध्य व्यापार की कड़ी था।

प्रश्न 3.
सिन्ध पर अरबों के आक्रमण का तात्कालिक कारण क्या था ?
उत्तर-
सिन्ध पर अरबों के आक्रमण का तात्कालिक कारण सिन्ध में स्थित कराची के निकट देवल की बंदरगाह पर खलीफा के लिए उपहार ले जाते हुए जहाज़ का लूटा जाना था।

प्रश्न 4.
अरबों के आक्रमण के समय सिन्ध के शासक का नाम क्या था और यह आक्रमण कब हुआ ?
उत्तर-
अरबों ने सिन्ध पर 711 ई० में आक्रमण किया। उस समय सिन्ध में राजा दाहिर का राज्य था।

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प्रश्न 5.
अरबों द्वारा जीता हुआ क्षेत्र कौन-से दो राज्यों में बंट गया ?
उत्तर-
अरबों द्वारा जीता हुआ क्षेत्र मंसूरा तथा मुलतान नामक दो राज्यों में बंट गया।

प्रश्न 6.
हिन्दूशाही वंश के चार शासकों के नाम बताएं।
उत्तर-
हिन्दूशाही वंश के चार शासक थे-कल्लार, भीमदेव, जयपाल, आनन्दपाल ।

प्रश्न 7.
गज़नी के राज्य के तीन शासकों के नाम बतायें।
उत्तर-
गज़नी राज्य के तीन शासक थे- अल्पतगीन, सुबुक्तगीन तथा महमूद गज़नवी।

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प्रश्न 8.
गज़नी और हिन्दूशाही वंश के शासकों में संघर्ष का आरम्भ किस वर्ष में हुआ और यह कब तक चला ?
उत्तर-
गज़नी और हिन्दूशाही वंश के शासकों में आपसी संघर्ष 960 ई० से 1021 ई० तक चला।

प्रश्न 9.
1008-09 में महमूद गजनवी के विरुद्ध सैनिक गठजोड़ में भाग लेने वाले उत्तर भारत के किन्हीं चार राज्यों के नाम बताएं ।
उत्तर-
महमूद गज़नवी के विरुद्ध सैनिक गठजोड़ (1008-09) में उज्जैन, ग्वालियर, कालिंजर तथा कन्नौज राज्य शामिल थे।

प्रश्न 10.
शाही राजाओं के विरुद्ध गज़नी के शासकों की विजय का मुख्य कारण क्या था?
उत्तर-
शाही राजाओं के विरुद्ध गज़नी के शासकों की विजय का मुख्य कारण उनका विशिष्ट सेनापतित्व था।

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प्रश्न 11.
महमूद गजनवी ने धन प्राप्त करने के लिए उत्तर भारत के किन चार नगरों पर आक्रमण किये ?
उत्तर-
महमूद गजनवी ने धन प्राप्त करने के लिए उत्तरी भारत के नगरकोट, थानेश्वर, मथुरा तथा कन्नौज के नगरों पर आक्रमण किये।

प्रश्न 12.
महमूद गज़नवी के भारतीय आक्रमणों का मुख्य उद्देश्य अब क्या समझा जाता है?
उत्तर-
महमूद गज़नवी के भारतीय आक्रमणों का मुख्य उद्देश्य अब यह समझा जाता है कि उसे अपने मध्य एशिया साम्राज्य का विस्तार करना और इसके लिए धन प्राप्त करना था।

प्रश्न 13.
महमूद गजनवी के साथ भारत आये विद्वान् तथा उसकी पुस्तक का नाम बताएँ।
उत्तर-
महमूद गज़नवी के साथ भारत में जो विद्वान् आया, उसका नाम अलबेरूनी था। उसके द्वारा लिखी पुस्तक का नाम ‘किताब-उल-हिन्द’ था ।

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प्रश्न 14.
महमूद गज़नवी के भारतीय आक्रमणों का मुख्य परिणाम क्या हुआ?
उत्तर-
महमूद गजनवी के भारतीय आक्रमणों का मुख्य परिणाम यह हुआ कि पंजाब को गजनी साम्राज्य में मिला लिया।

प्रश्न 15.
कन्नौज के लिए संघर्ष करने वाले तीन प्रमुख राजवंशों के नाम बताएं।
उत्तर-
कन्नौज के लिए संघर्ष करने वाले तीन प्रमुख राजवंशों के नाम थे-पालवंश, प्रतिहार वंश तथा राष्ट्रकूट वंश।

प्रश्न 16.
प्रतिहार वंश के राजाओं को गुर्जर-प्रतिहार क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
प्रतिहार पश्चिमी राजस्थान के गुर्जरों में से थे। इसीलिए उन्हें गुर्जर प्रतिहार भी कहा जाता है।

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प्रश्न 17.
प्रतिहार वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन था तथा उसका राज्यकाल क्या था ?
उत्तर-
प्रतिहार वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक राजा भोज था। उसका राज्यकाल 836 ई० से 885 ई० तक था।

प्रश्न 18.
प्रतिहार वंश के सबसे प्रसिद्ध चार शासक कौन थे ?
उत्तर-
नागभट्ट, वत्सराज, मिहिरभोज तथा महेन्द्रपाल प्रतिहार वंश के सबसे प्रसिद्ध चार शासक थे।

प्रश्न 19.
राष्ट्रकूट वंश का संस्थापक कौन था और राष्ट्रकूट राज्य का साम्राज्य में परिवर्तन किस शासक के समय में हुआ?
उत्तर-
राष्ट्रकूट वंश का संस्थापक दन्तीदुर्ग था। राष्ट्रकूट राज्य का साम्राज्य में परिवर्तन ध्रुव के समय में हुआ।

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प्रश्न 20.
राष्ट्रकूट राज्य की राजधानी कौन-सी थी और इस वंश के दो सबसे शक्तिशाली शासक कौन थे ?
उत्तर-
राष्ट्रकूट राज्य की राजधानी मालखेद या मान्यखेत थी। इन्द्र तृतीय तथा कृष्णा तृतीय इस वंश के सबसे शक्तिशाली शासक थे।

प्रश्न 21.
पाल वंश का सबसे शक्तिशाली राजा कौन था और बंगाल में पाल राजाओं का स्थान किस वंश ने लिया ?
उत्तर-
धर्मपाल पाल वंश का सब से शक्तिशाली शासक था। बंगाल में पाल राजाओं का स्थान सेन वंश ने लिया।

प्रश्न 22.
अग्निकुल राजपूतों से क्या भाव है एवं इनके चार कुलों के नाम बताएं।
उत्तर-
अग्निकुल राजपूतों से भाव उन चार वंशों से है जिनकी उत्त्पति आबू पर्वत पर हुए यज्ञ की अग्नि से हुई । ये वंश थे-परिहार, परमार, चौहान तथा चालुक्य।

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प्रश्न 23.
राजपूत काल में गुजरात में कौन-से वंश का राज्य था तथा इनकी राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-
राजपूत काल में गुजरात में सोलंकी वंश का राज्य था। इनकी राजधानी अनहिलवाड़ा में थी ।

प्रश्न 24.
मालवा में किस वंश का राज्य था ?
उत्तर-
मालवा में परमार वंश का राज्य था।

प्रश्न 25.
परिहार राजा आरम्भ में किन के सामन्त थे तथा ये किस प्रदेश में शासन कर रहे थे ?
उत्तर-
परिहार राजा आरम्भ में प्रतिहारों के सामान्त थे। वे मालवा में शासन करते थे।

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प्रश्न 26.
अग्निकुल राजपूतों में सबसे प्रसिद्ध वंश कौन-सा था और इनका राज्य किन दो प्रदेशों पर था ?
उत्तर-
अग्निकुल राजपूतों में सब से प्रसिद्ध वंश चौहान वंश था। इनका राज्य गुजरात और राजस्थान में था ।

प्रश्न 27.
तराइन की लड़ाइयाँ कौन-से वर्षों में हुईं और इनमें लड़ने वाला राजपूत शासक कौन था ?
उत्तर-
तराइन की लड़ाइयाँ 1191 ई० तथा 1192 ई० में हुईं । इनमें लड़ने वाला राजपूत शासक पृथ्वीराज चौहान था।

प्रश्न 28.
कन्नौज में प्रतिहारों के बाद किस वंश का राज्य स्थापित हुआ तथा इसका अन्तिम शासक कौन था ?
उत्तर-
कन्नौज में प्रतिहारों के बाद राठौर वंश का राज्य स्थापित हुआ। इस वंश का अन्तिम शासक जयचन्द था।

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प्रश्न 29.
दिल्ली का आरम्भिक नाम क्या था और इसकी नींव कब रखी गई ?
उत्तर-
दिल्ली का आरम्भिक नाम ढिल्लीका था। इसकी नींव 736 ई० में रखी गई थी ।

प्रश्न 30.
राजपूतों का सबसे पुराना कुल कौन-सा था तथा इसकी राजधानी कौन-सी थी?
उत्तर-
राजपूतों का सबसे पुराना कुल गुहिला था। इसकी राजधानी चित्तौड़ थी।

प्रश्न 31.
कछवाहा तथा कलचुरी राजवंशों की राजधानियों के नाम बताएं ।
उत्तर-
कछवाहा तथा कलचुरी राजवंशों की राजधानियों के नाम थे-गोपगिरी तथा त्रिपुरी।

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प्रश्न 32.
चंदेलों ने किस प्रदेश में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की तथा उनकी राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-
चंदेलों ने जैजाक भुक्ति में स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की। खजुराहो उनकी राजधानी थी।

प्रश्न 33.
बंगाल में सेन वंश की स्थापना किसने की तथा इस वंश का अन्तिम राजा कौन था ?
उत्तर-
बंगाल में सेन वंश की स्थापना विद्यासेन ने की थी। इस वंश का अन्तिम राजा लक्ष्मण सेन था।

प्रश्न 34.
उड़ीसा में पूर्वी गंग राजवंश का सबसे महत्त्वपूर्ण राजा कौन था तथा इसने कौन-सा प्रसिद्ध मंदिर बनवाया था?
उत्तर-
गंग राजवंश का सबसे महत्त्वपूर्ण राजा अनन्तवर्मन था। उसने जगन्नाथपुरी का प्रसिद्ध मन्दिर बनवाया था।

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प्रश्न 35.
दक्कन में परवर्ती चालुक्यों के राज्य का संस्थापक कौन था तथा इनकी राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-
दक्कन में परवर्ती चालुक्यों के राज्य का संस्थापक तैल था। इनकी राजधानी कल्याणी थी।

प्रश्न 36.
11वीं सदी में परवर्ती चालक्यों की किन चार पड़ोसी राज्यों के साथ लड़ाई रही ?
उत्तर-
11वीं सदी में परवर्ती चालुक्यों की सोलंकी, चोल, परमार, कलचुरी राज्यों के साथ लड़ाई रही।

प्रश्न 37.
परवर्ती चालुक्य वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा कौन था ? उसके बारे में किस लेखक की कौन-सी रचना से पता चलता है।
उत्तर-
परवर्ती चालुक्य वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य छठा था। उसके बारे में हमें बिल्हण की रचना – ‘विक्रमंकदेवचरित्’, से पता चलता है ।

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प्रश्न 38.
परवर्ती चालुक्यों की सबसे भयंकर टक्कर किस राजवंश से हुई और इस झगड़े का कारण कौन- सा । प्रदेश था?
उत्तर-
परवर्ती चालुक्य की सब से भयंकर टक्कर चोल राजवंश से हुई। उनके झगड़े का कारण गी प्रदेश था ।

प्रश्न 39.
चोल वंश के सबसे प्रसिद्ध दो शासकों के नाम तथा उनका राज्यकाल बताएं ।
उत्तर-
चोलवंश के दो प्रसिद्ध शासक राजराजा और राजेन्द्र थे। राजराजा ने 985 ई० से 1014 ई० तक तथा राजेन्द्र ने 1014 ई० से 1044 ई० तक राज्य किया ।

प्रश्न 40.
किस चोल शासक का समय चीन तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया के साथ व्यापार की वृद्धि के लिए प्रसिद्ध है? उस शासक का राज्यकाल भी बताएं ।
उत्तर-
कुलोतुंग का राज्यकाल चीन तथा दक्षिणी-पूर्वी एशिया के साथ व्यापार की वृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। उसने 1070 ई० से 1118 ई० तक राज्य किया ।

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प्रश्न 41.
चोल राज्य के पतन के बाद दक्षिण में किन चार स्वतन्त्र राज्यों का उदय हुआ ?
उत्तर-
चोल राज्य के पतन का पश्चात् दक्षिण में देवगिरी के यादव, वारंगल के काकतीय, द्वारसमुद्र के होयसाल और मुदराई के पाण्डेय नामक स्वतन्त्र राज्यों का उदय हुआ ।

प्रश्न 42.
अधीन राजाओं के लिए सामन्त शब्द का प्रयोग किस काल में आरम्भ हुआ और किस काल में यह प्रवृत्ति अपने शिखर पर पहुँची?
उत्तर-
‘सामान्त’ शब्द का प्रयोग कनिष्क के काल में अधीन राजाओं के लिए किया जाता था। यह प्रवृत्ति राजपूतों के काल में अपनी चरम-सीमा पर पहुंची।

प्रश्न 43.
राजपूत काल में पारस्परिक झगड़े किस आदर्श से प्रेरित थे और यह कब से चला आ रहा था ?
उत्तर-
राजपूत काल में पारस्परिक झगड़े चक्रवर्तिन के आदर्श से प्रेरित थे। यह झगड़ा सातवीं शताब्दी के आरम्भ से चला आ रहा था।

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प्रश्न 44.
धार्मिक अनुदान लेने वालों को क्या अधिकार प्राप्त था ?
उत्तर-
धार्मिक अनुदान लेने वालों को केवल लगान इकट्ठा करने का ही नहीं बल्कि कई अन्य कर तथा जुर्माने वसूल करने का भी अधिकार प्राप्त था ।

प्रश्न 45.
राजपूत काल में गांव में बिरादरी का स्थान किस संस्था ने लिया तथा इसका क्या कार्य था ?
उत्तर-
राजपूत काल में गाँव में बिरादरी का स्थान गाँव के प्रतिनिधियों की एक छोटी संस्था ने ले लिया ।

प्रश्न 46.
प्रादेशिक अभिव्यक्ति के उदाहरण में दो ऐतिहासिक रचनाओं तथा उनके लेखकों के नाम बताएँ ।
उत्तर-
प्रादेशिक अभिव्यक्ति के उदाहरण में दो ऐतिहासिक रचनाओं तथा उनके लेखकों के नाम हैं-बिल्हण की रचना विक्रमंकदेवचरित् तथा चन्दरबरदाई की रचना पृथ्वीराजरासो ।

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प्रश्न 47.
राजपूत काल में उत्तर भारत में कौन से चार प्रदेशों में प्रादेशिक भाषाओं में साहित्य रचना आरम्भ हो गई थी ?
उत्तर-
राजपूत काल में उत्तर भारत में गुजरात, बंगाल, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में प्रादेशिक भाषाओं में साहित्य रचना आरम्भ हो गई थी।

प्रश्न 48.
राजपूत काल में नई भाषाओं के लिए कौन-से शब्द का प्रयोग किया जाता था और इसका क्या अर्थ था ?
उत्तर-
राजपूत काल में नई भाषाओं के लिए ‘अपभ्रंश’ शब्द का प्रयोग किया जाता था । इस का अर्थ ‘भ्रष्ट होना’ हैं ।

प्रश्न 49.
राजस्थान में किन चार देवताओं के समर्पित मन्दिर मिलते हैं ?
उत्तर-
राजस्थान में ब्रह्मा, सूर्य, हरिहर और त्रिपुरुष देवताओं के समर्पित मन्दिर मिलते हैं।

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प्रश्न 50.
मातृदेवी की पूजा से सम्बन्धित चार देवियों के नाम बताएं ।
उत्तर-
भवानी, चण्डिका, अम्बिका और कौशिकी।

प्रश्न 51.
शैवमत से सम्बन्धित चार सम्प्रदायों के नाम बताएं ।
उत्तर-
कापालिका, कालमुख, पशुपति तथा लिंगायत नामक शैवमत से सम्बन्धित चार सम्प्रदाय थे।

प्रश्न 52.
रामानुज किस प्रदेश के रहने वाले थे और इनका जन्म किस स्थान पर हुआ ?
उत्तर-
रामानुज तनिलनाडु के रहने वाले थे। इनका जन्म तिरुपति में हुआ था ।

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प्रश्न 53.
राजपूत काल में प्रचलित विश्वास के अनुसार मुक्ति प्राप्त करने के कौन-से तीन मुख्य साधन थे ?
उत्तर-
राजपूत काल में प्रचलित विश्वास के अनुसार मुक्ति प्राप्त करने के तीन साधन ज्ञान, कर्म और भक्ति थे।

प्रश्न 54.
शंकराचार्य के विपरीत रामानुज ने सबसे अधिक महत्त्व किसको दिया और इनका इष्ट कौन था ?
उत्तर-
शंकराचार्य के विपरीत रामानुज ने सब से अधिक महत्त्व भक्ति को दिया। उन का इष्ट विष्णु था ।

प्रश्न 55.
किन चार प्रकार के लोग तंजौर के मन्दिर से सम्बन्धित थे ?
उत्तर-
तंजौर के मन्दिर से ब्राह्मण पुजारी, देव दासियाँ, संगीतकार तथा सेवक सम्बन्धित थे।

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प्रश्न 56.
राजस्थान में सबसे सुन्दर जैन मन्दिर किस स्थान पर मिलते हैं तथा इनमें से किसी एक मन्दिर का नाम बताएँ।
उत्तर-
राजस्थान में सब से सुन्दर जैन मन्दिर माऊंट आबू में मिलते हैं । इन में से एक मन्दिर का नाम सूर्य मन्दिर है।

प्रश्न 57.
कोणार्क का मन्दिर वर्तमान भारत के किस राज्य में है तथा यह किस देवता को समर्पित है ?
उत्तर-
कोणार्क का मन्दिर उड़ीसा राज्य में है । यह सूर्य देवता को समर्पित है।

प्रश्न 58.
खजुराहो के अधिकांश मन्दिर किस देवता को समर्पित हैं तथा इनमें से प्रसिद्ध एक मन्दिर का नाम बताएं।
उत्तर-
खजुराहो के अधिकांश मन्दिर शिव को समर्पित हैं। इन में नटराज मन्दिर सब से प्रसिद्ध है।

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प्रश्न 59.
भुवनेश्वर वर्तमान भारत के किस राज्य में है तथा इसके सबसे प्रसिद्ध मन्दिर का नाम बताएं ।
उत्तर-
भुवनेश्वर वर्तमान भारत के उड़ीसा राज्य में है। इसका सबसे अधिक प्रसिद्ध मन्दिर नटराज मन्दिर है ।

प्रश्न 60.
शिव के नटराज रूप की मूर्तियां किस राजवंश के समय में बनाई जाती थीं और ये किस धातु में हैं ?
उत्तर-
शिव के नटराज रूप की मूर्तियां चोल राजवंश के समय में बनाई जाती थीं। ये कांसे से बनी हुई हैं।

III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
सिन्ध और मुल्तान में अरब शासन के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
अरबों ने 711-12 ई० में सिन्ध पर आक्रमण किया। मुहमद-बिन-कासिम 712 ई० में देवल पहुँचा। सिन्ध के शासक दाहिर के भतीजे ने उसका सामना किया, परन्तु वह पराजित हुआ। इसके पश्चात् कासिम ने निसन और सहवान पर विजय प्राप्त की। अब वह सिन्ध के सबसे बड़े दुर्ग ब्रह्मणाबाद की विजय के लिए चल पड़ा। रावर के स्थान पर राजा दाहिर ने उससे ज़ोरदार टक्कर ली, परन्तु कासिम विजयी रहा। कुछ ही समय पश्चात् कासिम ब्रह्मणाबाद जा पहुंचा। यहां दाहिर के पुत्र जयसिंह ने उसका सामना किया। एक भयंकर युद्ध के पश्चात् कासिम को विजय प्राप्त हुई। उसने राजा दाहिर की दो सुन्दर कन्याओं को पकड़ लिया और उन्हें भेंट के रूप में खलीफा के पास भेज दिया। इस विजय के पश्चात् कासिम ने एलौर पर भी अपना अधिकार कर लिया। इस प्रकार 712 ई० तक लगभग सारा सिन्ध अरबों के अधिकार में आ गया।

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प्रश्न 2.
भारत के उत्तर-पश्चिमी में 8वीं से 12वीं शताब्दी तक कौन-कौन से महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए ?
उत्तर-
8वीं से 12वीं शताब्दी तक उत्तर-पश्चिमी भारत में हुए कुछ मुख्य परिवर्तन ये थे :
(1) उत्तर-पश्चिमी भारत में अनेक छोटे-बड़े राजपूत राज्य स्थापित हो गए। इनमें केन्द्रीय सत्ता का अभाव था।

(2) 8वीं शताब्दी के आरम्भ में ही अरबों ने सिन्ध और मुल्तान पर आक्रमण किया। उन्होंने वहां के राजा दाहिर को पराजित करके इन प्रदेशों में अरब शासन की स्थापना की।

(3) 9वीं शताब्दी के आरम्भ में कल्लार नामक एक ब्राह्मण ने गान्धार में साही वंश की नींव रखी। यह राज्य धीरे-धीरे पंजाब के बहुत बड़े भाग पर फैल गया। इस राज्य के अन्तिम शासकों को पहले सुबुक्तगीन और फिर महमूद गज़नवी के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। फलस्वरूप पंजाब गज़नी साम्राज्य का अंग बन गया।

(4) बारहवीं शताब्दी में मुहम्मद गौरी ने राजपूतों को पराजित करके भारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना की।

प्रश्न 3.
आठवीं और नौवीं शताब्दियों में उत्तरी भारत में अपना प्रभुत्व स्थापित करने लिए जिन तीन राज्यों के बीच संघर्ष हुआ, उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर-
आठवीं और नौवीं शताब्दी में उत्तरी भारत में होने वाला संघर्ष त्रिदलीय संघर्ष के नाम से प्रसिद्ध है। यह संघर्ष राष्ट्रकूटों, प्रतिहारों तथा पालों के बीच कन्नौज को प्राप्त करने के लिए ही हुआ। कन्नौज उत्तरी भारत का प्रसिद्ध नगर था। इस नगर पर अधिकार करने वाला शासक गंगा पर अधिकार कर सकता था, इसलिए इस पर अधिकार करने के लिए कई लड़ाइयां लड़ी गईं। इस संघर्ष में राष्ट्रकूट, प्रतिहार तथा पाल नामक तीन प्रमुख राजवंश भाग ले रहे थे । इन राजवशों ने बारीबारी कन्नौज पर अधिकार किया। राष्ट्रकूट, प्रतिहार तथा पाल तीनों राज्यों के लिए इस संघर्ष के घातक परिणाम निकले। वे काफ़ी समय तक युद्धों में उलझे रहे। धीरे-धीरे उनकी सैनिक शक्ति कम हो गई और राजनीतिक ढांचा अस्त-व्यस्त हो गया। फलस्वरूप सौ वर्षों के अन्दर इन तीन राज्यों का पतन हो गया।

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प्रश्न 4.
राष्ट्रकूट शासकों की सफलताओं का संक्षेप में वर्णन करो।
उत्तर-
राष्ट्रकूट वंश की मुख्य शाखा को मानरवेट के नाम से जाना जाता है। इस शाखा का पहला शासक इन्द्र प्रथम था। उसने इस वंश की सत्ता को काफ़ी दृढ़ बनाया। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र दंती दुर्ग सिंहासन पर बैठा। दंती दुर्ग की मृत्यु के पश्चात् उसका चाचा कृष्ण प्रथम सिंहासन पर बैठा। उसने 758 ई० में कीर्तिवर्मन को परास्त करके चालुक्य राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लिया। कृष्ण प्रथम बड़ा कला प्रेमी था। 773 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। कृष्ण प्रथम के पश्चात् क्रमशः गोविन्द द्वितीय और ध्रुव सिंहासन पर बैठे। ध्रुव ने गंगवती के शासक को परास्त करके गंगवती को अपने साम्राज्य में मिला लिया। उसने उज्जैन पर भी आक्रमण किया। 793 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। ध्रुव के बाद गोविन्द तृतीय सिंहासन पर बैठा। उसने उत्तरी भारत में कई शासकों को अपने अधीन कर लिया। गोविन्द तृतीय के पश्चात् उसका पुत्र अमोघवर्ष गद्दी पर बैठा। 973 ई० में राष्ट्रकूट वंश का अन्त हो गया।

प्रश्न 5.
प्रतिहार शासकों की प्रमुख सफलताओं का वर्णन करो।
उत्तर-
प्रतिहार वंश की नींव नौवीं शताब्दी में नागभट्ट प्रथम ने रखी थी। इस वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक मिहिर भोज था। उसने 836 ई० से 885 ई० तक राज्य किया। उसने अनेक विजयें प्राप्त की। पंजाब, आगरा, ग्वालियर, अवध, अयोध्या, कन्नौज, मालवा तथा राजपूताना का अधिकांश भाग उसके राज्य में सम्मिलित था। मिहिर भोज के पश्चात् उसका पुत्र महेन्द्रपाल राजगद्दी पर बैठा। उसने अपने पिता द्वारा स्थापित सदृढ़ साम्राज्य को स्थिर रखा। उसने लगभग 20 वर्षों तक राज्य किया। महेन्द्रपाल के पश्चात् इस वंश के कर्णधार महिपाल, देवपाल, विजयपाल तथा राज्यपाल बने। इन शासकों की अयोग्यता तथा दुर्बलता के कारण प्रतिहार वंश पतनोन्मुख हुआ। राज्यपाल ने महमूद गज़नवी की अधीनता स्वीकार कर ली। इससे क्रोधित होकर बाद में आस-पास के राजाओं ने उस पर आक्रमण कर दिया और उसे मार डाला। इस तरह प्रतिहार वंश का अन्त हो गया।

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प्रश्न 6.
परमार शासकों की उपलब्धियों का विवेचन करो।
अथवा
परमार वंश के राजा भोज की प्रमुख उपलब्धियां बताइये।
उत्तर-
परमारों ने मालवा में 10वीं शताब्दी में अपनी सत्ता स्थापित की। इस वंश का संस्थापक कृष्णराज था। धारा नगरी इस राज्य की राजधानी थी। परमार वंश का प्रथम महान् शासक मुंज था। उसने 974 ई० से 995 ई० तक राज्य किया। वह वास्तुकला का बड़ा प्रेमी था। धनंजय तथा धनिक नामक दो विद्वान् उसके दरबार की महान् विभूतियां थीं। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा भोज था। वह संस्कृत का महान पण्डित था। उसने धारा नगरी में एक संस्कृत विश्वविद्यालय की नींव रखी। उसके शासन काल में अनेक सुन्दर मन्दिरों का निर्माण हुआ। भोपाल के समीप भोजपुर’ नामक झील का निर्माण भी उसी ने करवाया था। उसने शिक्षा और साहित्य को भी संरक्षण प्रदान किया। 1018 ई० से 1060 ई० तक मालवा राज्य की बागडोर उसी के हाथ में रही। उसकी मृत्यु के पश्चात् कुछ ही वर्षों में परमार वंश का पतन हो गया।

प्रश्न 7.
राजपूतों के शासन काल में भारतीय समाज में क्या कमियां थीं ?
उत्तर-
राजपूतों के शासन काल में भारतीय समाज में ये कमियां थी-

  • राजपूतों में आपसी ईष्या और द्वेष बहुत अधिक था। इसी कारण वे सदा आपस में लड़ते रहे। विदेशी आक्रमणकारियों का सामना करते हुए उन्होंने कभी एकता का प्रदर्शन नहीं किया।
  • राजपूतों को सुरा, सुन्दरी तथा संगीत का बड़ा चाव था। किसी भी युद्ध के पश्चात् राजपूत रास-रंग में डूब जाते थे।
  • राजपूत समय में संकीर्णता का बोल-बाला था। उनमें सती-प्रथा, बाल-विवाह तथा पर्दा प्रथा प्रचलित थी। वे तन्त्रवाद में विश्वास रखते थे जिनके कारण वे अन्ध-विश्वासी हो गये थे।
  • राजपूत समाज एक सामन्ती समाज था। सामन्त लोग अपने-अपने प्रदेश के शासक थे। अतः लोग अपने सामन्त या सरदार के लिए लड़ते थे; देश के लिए नहीं।

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प्रश्न 8.
चौहान वंश के उत्थान-पतन की कहानी का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
चौहान वंश की नींव गुवक्त ने रखी। 11वीं शताब्दी में इस वंश के शासक अजयदेव ने अजमेर और फिर 12वीं शताब्दी में बीसलदेव ने दिल्ली को जीत लिया। इस प्रकार दिल्ली तथा अजमेर चौहान वंश के अधीन हो गए। चौहान वंश का राजा बीसलदेव बड़ा ही साहित्य-प्रेमी था। परन्तु इस वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा पृथ्वीराज चौहान था। उसकी कन्नौज के राजा जयचन्द से भारी शत्रुता थी। इसका कारण यह था कि उसने बलपूर्वक जयचन्द की पुत्री संयोगिता से विवाह कर लिया था। पृथ्वीराज बड़ा ही वीर तथा पराक्रमी शासक था। 1191 ई० में उसने मुहम्मद गौरी को तराइन के प्रथम युद्ध में हराया। 1192 ई० में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज पर फिर आक्रमण किया। इस बार पृथ्वीराज पराजित हुआ। इस प्रकार चौहान राज्य का अन्त हो गया।

प्रश्न 9.
चन्देल शासकों के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
चन्देलों ने 9वीं शताब्दी में गंगा तथा नर्मदा के बीच के प्रदेश पर अपना शासन स्थापित किया। इसका संस्थापक सम्भवत: नानक चन्देल था। इस वंश का प्रथम प्रतापी राजा यशोवर्मन था। उसने चेदियों को पराजित करके कालिंजर के किले पर विजय प्राप्त की। ऐसा विश्वास किया जाता है कि उसने प्रतिहार वंश के शासक देवपाल को भी परास्त किया। यशोवर्मन के पश्चात् इस राज्य के कर्णदार धंग, गंड तथा कीर्तिवर्मन बने। धंग नामक शासक ने खजुराहो में एक मन्दिर बनवाया। गंड ने कन्नौज के शासक राज्यपाल का वध किया। उसने महमूद गज़नवी के साथ भी युद्ध किया। ‘कीरत सागर’ नामक तालाब बनवाने का श्रेय इसी वंश के राजा कीर्तिवर्मन को प्राप्त है। इस वंश का अन्तिम शासक परमाल था। उसे कुतुबद्दीन ऐबक से युद्ध करना पड़ा। युद्ध में परमाल पराजित हुआ। इस प्रकार बुन्देलखण्ड मुस्लिम साम्राज्य का अंग बन गया।

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प्रश्न 10.
सामन्तवाद के अधीन किस प्रकार की राज्य व्यवस्था थी ?
उत्तर-
सामन्तवादी व्यवस्था का प्रारम्भ राजपूत शासकों ने किया था। उन्होंने कुछ भूमि का प्रबन्ध सीधे, अपने हाथों में रख कर शेष भूमि सामन्तों में बांट दी। ये सामन्त शासकों को अपना स्वामी मानते थे तथा युद्ध के समय उन्हें सैनिक सहायता देते थे। सामन्त अपने-अपने प्रदेशों में लगभग राजाओं के समान ही रहते थे। कछ सामन्त अपने-आप को महासामन्त अथवा महाराजा भी कहते थे। वे अपने कर्मचारियों को सेवाओं के बदले उसी प्रकार कर-मुक्त भूमि देते थे जिस प्रकार शासक अपने सामन्तों को देते थे। नकद वेतन देने की व्यवस्था लगभग समाप्त हो गई थी। इसलिए शायद ही किसी राजपूत राजवंश ने सिक्के (मुद्रा) जारी किए हों। ये तथ्य सामन्तवाद की मुख्य विशेषताएं थीं।

प्रश्न 11.
महमूद गज़नवी के आक्रमणों के क्या कारण थे ?
उत्तर-
महमूद गज़नवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया और बार-बार विजय प्राप्त की। उसके भारत पर आक्रमण के मुख्य कारण ये थे-

  • उन दिनों भारत एक धनी देश था। महमूद भारत का धन लूटना चाहता था।
  • कुछ विद्वानों के अनुसार महमूद भारत में इस्लाम धर्म फैलाना चाहता था।
  • कुछ विद्वानों का यह भी कहना है कि महमूद एक महान् योद्धा था और उसे युद्ध में वीरता दिखाने में आनन्द आता था। उसने अपनी युद्ध-पिपासा को बुझाने के लिए ही भारत पर आक्रमण किया। परन्तु यदि इन उद्देश्यों का आलोचनात्मक अध्ययन किया जाए तो हमें पता चलेगा कि उसने केवल धन लूटने के उद्देश्य से ही भारत पर आक्रमण किये और अपने इस उद्देश्य में वह पूरी तरह सफल रहा।

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प्रश्न 12.
भारत पर महमूद गज़नवी के आक्रमणों के क्या परिणाम निकले ?
उत्तर-
1. महमूद के आक्रमणों से संसार को पता चल गया कि भारतीय राजाओं में आपसी फूट है। अतः भारत को विजय करना कठिन नहीं है। इसी बात से प्रेरित होकर बाद में मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किए और यहां मुस्लिम राज्य की स्थापना की।

2. महमूद के आक्रमणों के कारण पंजाब गज़नी साम्राज्य का अंग बन गया। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों ने पंजाब को 150 वर्षों तक अपने अधीन रखा।

3. महमूद के आक्रमणों के कारण भारत को जनधन की भारी हानि उठानी पड़ी। वह भारत का काफ़ी सारा धन लूटकर गज़नी ले गया। इसके अतिरिक्त उसके आक्रमणों में अनेक लोगों की जानें गईं।

4. महमूद के आक्रमण के समय उसके साथ अनेक सूफी सन्त भारत आए। उनके उच्च चरित्र से अनेक भारतीय प्रभावित हुए। इससे इस्लाम के प्रसार को काफ़ी प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 13.
हिन्दूशाही शासकों के साथ महमूद गज़नवी के संघर्ष में उसकी विजय के क्या कारण थे ?
उत्तर-
हिन्दूशाही शासकों के विरुद्ध संघर्ष में महमूद गज़नवी की विजय के मुख्य कारण ये थे-

  • मुसलमान सैनिकों में धार्मिक जोश था। परन्तु राजपूतों में ऐसे उत्साह का अभाव था।
  • हिन्दूशाही शासकों को अकेले ही महमूद का सामना करना पड़ा। आपसी फूट के कारण अन्य राजपूत शासकों ने उनका साथ न दिया।
  • महमूद गज़नवी में हिन्दूशाही राजपूतों की अपेक्षा कहीं अधिक सैनिक गुण थे।
  • हिन्दूशाही शासक युद्ध में हाथियों पर अधिक निर्भर रहते थे। भयभीत हो जाने पर हाथी कभी-कभी अपने ही सैनिकों को कुचल डालते थे।
  • राजपूत बड़े आदर्शवादी थे। वे घायल अथवा पीछे मुड़ते हुए शत्रु पर वार नहीं करते थे। इसके विपरीत महमूद का उद्देश्य केवल विजय प्राप्त करना था, भले ही अनुचित ढंग से ही क्यों न हो।

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प्रश्न 14.
राजराजा की मुख्य उपलब्धियां क्या थी ?
उत्तर-
राजराजा ने 985 ई० से 1014 ई० तक शासन किया। अपने शासन काल में उसने अनेक सफलताएं प्राप्त की। उसने केरल नरेश तथा पाण्डेय नरेश को पराजित किया। उसने लंका के उत्तरी भाग पर विजय प्राप्त की और यह प्रदेश अपने राज्य में मिला लिया। उसने लंका के प्रसिद्ध नगर अनुराधापुर को भी लूटा। उसने पश्चिमी चालुक्यों और गी के पूर्वी चालुक्यों का सफलतापूर्वक विरोध किया। राजराजा ने मालदीव पर भी विजय प्राप्त की। राजराजा एक कला प्रेमी सम्राट् था। उसे मन्दिर बनवाने का बड़ा चाव था। तंजौर का प्रसिद्ध राजेश्वर मन्दिर उसने ही बनवाया था। यह मन्दिर भवन-निर्माण कला का उत्तम नमूना है।

प्रश्न 15.
राजेन्द्र चोल की सफलताओं की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
राजेन्द्र चोल एक शक्तिशाली राजा था। उसने 1014 ई० से 1044 ई० तक राज्य किया। वह अपने पिता के साथ अनेक युद्धों में गया था, इसलिए वह युद्ध कला में विशेष रूप से निपुण था। वह भी एक साम्राज्यवादी शासक था। उसने मैसूर के गंग लोगों को और पाण्डयों को परास्त किया। उसने अपनी विजय पताका गोंडवाना राज्य की दीवारों पर फहरा दी! उसने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के शासकों के विरुद्ध भी संघर्ष किए और सफलता प्राप्त की। उसकी अति महत्त्वपूर्ण विजयें अण्डमान निकोबार तथा मलाया की विजयें थीं। महान् विजेता होने के साथ-साथ वह कुशल शासन प्रबन्धक भी था। उसने कला और साहित्य को भी प्रोत्साहन दिया। उसने गंगइकोंड चोलपुरम् में अपनी नई राजधानी की स्थापना की। इस नगर को उसने अनेक भवनों तथा मन्दिरों से सुसज्जित करवाया। शिक्षा के प्रचार के लिए उसने एक वैदिक कॉलेज की स्थापना की। उसकी इन महान् सफलताओं के कारण उसके शासन को चोल वंश का स्वर्ण युग माना जाता है।

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प्रश्न 16.
राजपूत काल में शैव मत किन रूपों में लोकप्रिय था ?
उत्तर-
राजपूत काल में हिन्दू धर्म में मुख्य रूप से दो विचारधाराएं ही अधिक प्रचलित हुईं-वैष्णव मत तथा शैवमत। शैवमत के कई रूप थे तथा यह दक्षिणी भारत में अधिक प्रचलित था। कुछ शैव सम्प्रदाय सामाजिक दृष्टि से परस्पर विरोधी भी थे, जैसे कि कपालिक, कालमुख तथा पशुपति। 12वीं शताब्दी में वासवराज ने शैवमत की एक नवीन लहर चलाई। इसके अनुयायी लिंगायत या वीर शैव कहलाए। ये लोग शिव की लिंग रूप में पूजा करते थे तथा पूर्ण विश्वास के साथ प्रभु-भक्ति में आस्था रखते थे। इन लोगों ने बाल-विवाह का विरोध करके और विधवा-विवाह का समर्थन करके ब्राह्मण रूढ़िवाद पर गम्भीर चोट की। दक्षिणी भारत में शिव के लिंग रूप के साथ-साथ नटराज के रूप में भी पूजा काफ़ी प्रचलित थी। वहां के लोगों ने शिव के नटराज रूप को धातु की सुन्दर मूर्तियों में ढाला।

प्रश्न 17.
राजपूत काल में मन्दिरों का क्या महत्त्व था ?
उत्तर-
राजपूत काल में मन्दिरों का महत्त्व बढ़ गया था। दक्षिणी भारत में इनका महत्त्व उत्तरी भारत की अपेक्षा अधिक था। वह उस समय के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के मुख्य केन्द्र थे। राजाओं से लेकर व्यापारियों तक सभी ने मन्दिरों के निर्माण में रुचि ली। राजाओं ने अनेक विशाल मन्दिर बनवाए। ऐसे मन्दिरों की देख-रेख का कार्य भी बड़े स्तर पर होता था। उदाहरणार्थ तंजौर के मन्दिर में 400 देवदासियां, 57 संगीतकार, 212 सेवादार तथा सैंकड़ों ब्राह्मण पुजारी थे। राजा तथा अधीनस्थ लोग मन्दिरों को दिल खोल कर दान देते थे, जिनकी समस्त आय मन्दिरों में जाती थी। इस प्रकार लगभग सभी मन्दिर बहुत धनी थे। तंजौर के मन्दिर में सैंकड़ों मन सोना, चांदी तथा बहुमूल्य पत्थर जड़े हुए थे।

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प्रश्न 18.
क्या राजपूत काल को अन्धकाल कहना उचित होगा ?
उत्तर-
कुछ इतिहासकार राजपूत काल को ‘अन्धकाल’ कहते हैं। वास्तव में इस काल में कुछ ऐसे तथ्य विद्यमान थे जो ‘अन्धकाल’ के सूचक हैं। उदारहण के लिए यह राजनीतिक विघटन का युग था। देश में राजनीतिक एकता बिल्कुल समाप्त हो गई थी। देश छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हआ था। यहां के सरदार स्वतन्त्र शासक थे। इसके अतिरिक्त राजपूत काल में विज्ञान तथा व्यापार को भी क्षति पहुंची। इन सभी बातों के आधार पर ही इतिहासकार राजपूत काल को ‘अन्धकाल’ कहते हैं। परन्तु राजपूत काल की उपलब्धियों की अवहेलना भी नहीं की जा सकती। इस काल में देश में अनेक सुन्दर मन्दिर बने, जिन्हें आकर्षक मूर्तियों से सजाया गया। इसके अतिरिक्त देश के भिन्न-भिन्न राज्यों में भारतीय संस्कृति पुनः फैलने लगी। सबसे बड़ी बात यह थी कि राजपूत बड़े वीर तथा साहसी थे। इस प्रकार राजपूत युग की उपलब्धियां इस काल में कमजोर पक्ष से अधिक महान् थों। इसलिए इस युग को ‘अन्धकाल’ कहना उचित नहीं है।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
राजपूत कौन थे ? उनकी उत्पत्ति के विषय में अपने विचार लिखिए।
उत्तर-
राजपूत लोग कौन थे ? इस विषय में इतिहासकारों में बड़ा मतभेद है। वे उनकी उत्पत्ति के बारे में कई सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं। इनमें से कुछ मुख्य सिद्धान्त ये हैं-

1. विदेशियों से उत्पत्ति का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त को कर्नल टॉड ने प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार राजपूत हूण, शक तथा कुषाण आदि विदेशी जातियों के वंशज हैं। इन विदेशी जातियों के लोगों ने भारतीयों के साथ विवाह-सम्बन्ध जोड़े और स्वयं भारत में बस गए। इन्हीं लोगों की सन्तान राजपूत कहलाई। कर्नल टॉड का कहना है कि प्राचीन इतिहास में ‘राजपूत’ नाम के शब्द का प्रयोग कही नहीं मिलता। अत: वे अवश्य ही विदेशियों के वंशज हैं।

2. क्षत्रियों से उत्पत्ति का सिद्धान्त-यह सिद्धान्त वेद व्यास ने प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि राजपूत क्षत्रियों के वंशज हैं और ‘राजपूत’ शब्द ‘राजपुत्र’ (क्षत्रिय) का बिगड़ा हुआ रूप है। इसके अतिरिक्त राजपूतों के रीति-रिवाज वैदिक क्षत्रियों से मेल खाते हैं।

3. मूल निवासियों से उत्पत्ति का सिद्धान्त-कुछ इतिहासकारों का मत है कि राजपूत विदेशी न होकर भारत के मूल निवासियों के वंशज हैं। इस सिद्धान्त के पक्ष में कहा जाता है कि चन्देल राजपूतों का सम्बन्ध भारत की गौंड जाति से है। परन्तु अधिकतर इतिहासकार इस सिद्धान्त को सत्य नहीं मानते।

4. अग्निकुण्ड का सिद्धान्त-इस सिद्धान्त का वर्णन चन्दबरदाई ने अपनी पुस्तक ‘पृथ्वी-राजरासो’ में किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार राजपूत यज्ञ की अग्नि से जन्मे थे। कहा जाता है कि परशुराम ने सभी क्षत्रियों का नाश कर दिया था जिसके कारण क्षत्रियों की रक्षा करने वाला कोई वीर धरती पर न रहा था। अत: उन्होंने मिल कर आबू पर्वत पर यज्ञ किया। यज्ञ की अग्नि से चार वीर पुरुष निकले, जिन्होंने चार महान् राजपूत वंशों-परिहार, परमार, चौहान तथा चालुक्य की नींव रखी। परन्तु अधिकतर इतिहासकार इस सिद्धान्त को कल्पना मात्र मानते हैं।

5. मिश्रित उत्पत्ति का सिद्धान्त-यह सिद्धान्त डॉ० वी० ए० स्मिथ (Dr. V.A. Smith) ने प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि राजपूत न तो पूर्णतया विदेशियों की सन्तान हैं और न ही भारतीयों की। राजपूत वास्तव में एक मिली-जुली जाति है। उनके अनुसार कुछ राजपूतों की उत्पत्ति शक, हूण, कुषाण आदि विदेशी जातियों से हुई थी और कुछ राजपूत भारत के मूल निवासियों तथा प्राचीन क्षत्रियों से उत्पन्न हुए थे।

6. उनका विचार है कि आबू पर्वत पर किया गया यज्ञ राजपूतों की शुद्धि के लिए किया गया था न कि वहां से राजपूतों की उत्पत्ति हुई थी। इन सभी सिद्धान्तों में हमें डॉ० स्मिथ का ‘मिश्रित उत्पत्ति’ का सिद्धान्त काफ़ी सीमा तक ठीक जान पड़ता है। उनके इस सिद्धान्त को अन्य अनेक विद्वानों ने भी स्वीकार कर लिया है।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 7 राजपूत और उनका काल

प्रश्न 2.
राजपूतों (उत्तर भारत) के सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन का विवरण दीजिए।
अथवा
राजपूतों के अधीन उत्तर भारत के राजनीतिक जीवन की मुख्य विशेषताएं बताइए।
उत्तर-
647 ई० से लेकर 1192 ई० तक उत्तरी भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्य थे। इन राज्यों के शासक ‘राजपूत’ थे। इसलिए भारतीय इतिहास में यह युग ‘राजपूत काल’ के नाम से जाना जाता है। इस समय में उत्तरी भारत में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन का वर्णन इस प्रकार है

1. राजनीतिक जीवन-राजपूतों में राजनीतिक एकता का अभाव था। सभी राजपूत राजा अलग-अलग राज्यों पर शासन करते थे। वे अपने-अपने प्रदेश के शासक थे। उन्होंने किसी प्रकार की केन्द्रीय व्यवस्था नहीं की हुई थी। राजपूत राज्य का मुखिया राजा होता था। राज्य की सभी शक्तियाँ उसी के हाथ में थीं। वह मुख्य सेनापति था। न्याय का मुख्य स्रोत भी वह स्वयं था। कुछ राजपूत राज्यों में युवराज और पटरानियाँ भी शासन कार्यों में राजा की सहायता करती थीं। राजा की सहायता के लिए मन्त्री होते थे। इनकी नियुक्ति राजा द्वारा होती थी। इन मन्त्रियों का मुखिया महामन्त्री अथवा महामात्यं कहलाता था। सेनापति को दण्डनायक कहते थे। राजपूतों की राजनीतिक प्रणाली की आधारशिला सामन्त प्रथा थी। राजा बड़ी-बड़ी जागीरें सामन्तों में बाँट देता था। इसके बदले में सामन्त राजा को सैनिक सेवाएँ प्रदान करता था। राज्य की आय के मुख्य साधन भूमिकर, चुंगी-कर, युद्ध-कर, उपहार तथा जुर्माने आदि थे। राजा स्वयं न्याय का सर्वोच्च अधिकारी था। वह स्मृति के नियमों के अनुसार न्याय करता था। दण्ड कठोर थे। राजपूतों का सैनिक संगठन अच्छा था। उनकी सेना में पैदल, घुड़सवार तथा हाथी होते थे। युद्ध में भालों, तलवारों आदि का प्रयोग होता था। किलों की विशेष व्यवस्था की जाती थी।

2. सामाजिक जीवन-राजपूतों में जाति बन्धन बड़े कठोर थे। उनके यहाँ ऊंचे गोत्र वाले नीचे गोत्र में विवाह नहीं करते थे। राजपूत समाज में स्त्री का मान था। स्त्रियां युद्ध में भाग लेती थीं। उनमें पर्दे की प्रथा नहीं थी। वे शिक्षित थीं। उच्च कुल की कन्याएँ स्वयंवर द्वारा अपना वर चुनती थीं। राजपूत बड़े वीर तथा साहसी थे। वे कायरों से घृणा करते थे। परन्तु उनमें कुछ अवगुण थी थे। वे भाँग, शराब तथा अफीम का सेवन करते थे। वे नाच-गाने का भी बड़ा चाव रखते थे।

3. धार्मिक जीवन-राजपूत हिन्दू देवी-देवताओं में विश्वास रखते थे। वे राम तथा कृष्ण को अवतार मानकर उनकी पूजा करते थे। उनमें शिव की पूजा सबसे अधिक प्रचलित थी। राजपूतों में मूर्ति पूजा भी प्रचलित थी। उन्होंने अपने देवताओं के मन्दिर बनवाए हुए थे। इनमें अनेक देवी-देवताओं की मूतियाँ स्थापित की जाती थीं। वेद, रामायण तथा महाभारत उनके प्रिय ग्रन्थ थे। वे प्रतिदिन इनका पाठ करते थे। राजपूत बड़े अन्धविश्वासी थे। वे जादू-टोनों में बड़ा विश्वास रखते थे।

4. सांस्कृतिक जीवन-राजपूतों ने विशाल दुर्ग तथा सुन्दर महल बनवाये। चित्तौड़ का किला राजपूत भवन-निर्माण कला का एक सुन्दर उदाहरण है। जयपुर और उदयपुर के राजमहल भी कला की दृष्टि से उत्तम माने जाते हैं। उनके द्वारा बनवाये गए भुवनेश्वर तथा खजुराहो के मन्दिर उनकी भवन-निर्माण कला के उत्कृष्ट नमूने हैं।

राजपूत युग में साहित्य ने भी बड़ी उन्नति की। मुंज, भोज तथा पृथ्वीराज आदि राजपूत राजा बहुत विद्वान् थे। उन्होंने साहित्य के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ तथा जयदेव की ‘गीत गोविन्द’ इस काल की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक रचनाएँ हैं।

प्रश्न 3.
महमूद गज़नवी के प्रमुख आक्रमणों का वर्णन करो।
उत्तर-
महमूद गज़नवी गज़नी के शासक सुबुक्तगीन का पुत्र था। 997 ई० में उसके पिता की मृत्यु हो गई और वह गज़नी का शासक बना। वह एक वीर योद्धा तथा कुशल सेनानायक था। उसने 1000 ई० से लेकर 1027 ई० तक भारत पर 17 आक्रमण किए और प्रत्येक आक्रमण में विजय प्राप्त की।
महमूद गज़नवी के प्रमुख आक्रमण-महमूद गज़नवी के कुछ प्रमुख आक्रमणों का वर्णन इस प्रकार हैं-

1. जयपाल से युद्ध-महमूद गज़नवी ने 1001 ई० में पंजाब के शासक जयपाल से युद्ध किया। यह युद्ध पेशावर के निकट हुआ। इसमें जयपाल की हार हुई और और उसने महमूद को 25 हज़ार सोने की मोहरें देकर अपनी जान बचाई। परन्तु जयपाल की प्रजा ने इसे अपना अपमान समझा और उसे अपना राजा मानने से इन्कार कर दिया। अत: जयपाल जीवित जल मरा।।

2. आनन्दपाल से युद्ध-आनन्दपाल जयपाल का पुत्र था। महमूद गजनवी ने 1008 ई० में उसके साथ युद्ध किया। यह युद्ध भी पेशावर के निकट हुआ। इस युद्ध में अनेक राजपूतों ने आनन्दपाल की सहायता की। उसकी सेना ने बड़ी वीरता से महमूद का सामना किया। परन्तु अचानक बारूद फट जाने से आनन्दपाल का हाथी युद्ध क्षेत्र से भाग निकला और उसकी जीत हार में बदल गई। इस प्रकार पंजाब पर महमूद गज़नवी का अधिकार हो गया।

3. नगरकोट पर आक्रमण-1009 ई० में महमूद गजनवी ने नगरकोट (कांगड़ा) पर आक्रमण किया। यहां के विशाल मन्दिरों में अपार धन-सम्पदा थी। महमूद ने यहां के धन को खूब लूटा। फरिश्ता के अनुसार, यहां से 7 लाख स्वर्ण दीनार, 700 मन सोने-चांदी के बर्तन तथा 20 मन हीरे-जवाहरात महमूद के हाथ लगे। इसके कुछ समय पश्चात् महमूद ने थानेश्वर और मथुरा के मन्दिरों का भी बहुत सारा धन लूट लिया और मन्दिरों को तोड़फोड़ डाला।

4. कालिंजर के चन्देलों से युद्ध-राजपूत शासक राज्यपाल ने 1019 ई० में महमूद गज़नवी की अधीनता स्वीकार कर ली थी। यह बात अन्य राजपूत शासकों को अच्छी न लगी। अतः कालिंजर के चन्देल शासक ने राज्यपाल पर आक्रमण कर दिया और उसे मार डाला। महमूद गज़नवी ने राज्यपाल की हार को अपनी हार समझा और इसका बदला लेने के लिए 1021 ई० में उसने कालिंजर पर आक्रमण कर दिया। चन्देल शासक डर के मारे भाग निकला। इस विजय से भी महमूद के हाथ काफी सारा धन लगा।

5. सोमनाथ पर आक्रमण-सोमनाथ का मन्दिर भारत का एक विशाल मन्दिर था। इस मन्दिर में अपार धन भरा पड़ा था। इस मन्दिर की छत जिन स्तम्भों के सहारे खड़ी थी, उनमें 56 रत्न जड़े हुए थे। इस मन्दिर की सबसे बड़ी विशेषता सोमनाथ की मूर्ति थी। यहाँ का धन लूटने के लिए महमूद गजनवी ने 1025 में सोमनाथ पर आक्रमण कर दिया। कुछ ही समय में वह इस मन्दिर की सारी सम्पत्ति लूट कर चलता बना।
सोमनाथ के आक्रमण के पांच वर्ष पश्चात् 1030 ई० में महमूद की मृत्यु हो गई।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 7 राजपूत और उनका काल

प्रश्न 4.
महमूद गज़नवी के आक्रमणों के उद्देश्यों और प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
महमूद गज़नवी एक महान् योद्धा था। उसने 17 बार भारत पर आक्रमण किया। उसने अनेक राज्यों में भयंकर लूटमार की। मन्दिरों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। संक्षेप में उसके आक्रमणों के उद्देश्यों और प्रभावों का वर्णन इस प्रकार है
उद्देश्य-

1. धन सम्पत्ति को लूटना-महमूद के आक्रमणों का मुख्य उद्देश्य भारत का धन लूटना था। भारत के मन्दिरों में अपार धन राशि थी। महमूद की आँखें इस धन पर लगी हुई थीं। यही कारण था कि उसने केवल उन्हीं स्थानों पर आक्रमण किया जहां से उसे अधिक-से-अधिक धन प्राप्त हो सकता था।

2. इस्लाम धर्म का प्रचार-कुछ इतिहासकारों का कहना है कि महमूद भारत में इस्लाम धर्म का प्रसार करना चाहता था। भारत के हिन्दू मन्दिरों और उनकी मूर्तियों को तोड़ना महमूद की धार्मिक कट्टरता का प्रमाण है। उसने इस्लाम धर्म स्वीकार न करने वाले अनेक लोगों की हत्या कर दी।

3. युद्ध लिप्सा-महमूद एक महान् सैनिक योद्धा था। उसे युद्ध करके अपना शौर्य दिखाने में आनन्द आता था। अतः कुछ विद्वानों का कहना है कि उसने अपनी युद्ध लिप्सा के कारण ही भारत पर आक्रमण किये।

प्रभाव-
1. भारत की राजनीतिक दुर्बलता का भेद खुलना-भारतीय राजाओं को महमूद ने बुरी तरह परास्त किया। इससे भारत की राजनीतिक दुर्बलता का पर्दा उठ गया। महमूद के बाद आक्रमणकारियों ने भारतीय राजाओं की फूट का भरपूर लाभ उठाया। उन्होंने भारत पर अनेक आक्रमण किए। उन्हें इन आक्रमणों में भारी सफलता मिली।

2. मुस्लिम राज्य की स्थापना में सुगमता-महमूद के आक्रमणों के बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों का रास्ता साफ हो गया। उन्हें भारतीय राजाओं को हराकर भारत में मुस्लिम राज्य स्थापित करने में किसी विशेष बाधा का सामना नहीं करना पड़ा।

3. जन-धन की अपार हानि-महमूद ने भारत में खूब रक्तपात किया। उसने मन्दिरों को लूटा और बहुत-सा सोना-चांदी तथा हीरे-जवाहरात ऊंटों पर लाद कर अपने साथ ले गया। इस तरह भारत को जन-धन की भारी हानि उठानी पड़ी।

4. इस्लाम धर्म का प्रसार-महमूद ने इस्लाम धर्म स्वीकार न करने वालों की हत्या कर दी। इससे भयभीत होकर भारत के हज़ारों लोगों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया।

5. भारतीय संस्कृति को आघात-महमूद ने अनेक भारतीय मन्दिरों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इस तरह भारतीय कला की अनेक सुन्दर इमारतें नष्ट हो गईं। परिणामस्वरूप भारतीय संस्कृति को काफी आघात पहुंचा।

6. पंजाब को गज़नवी साम्राज्य में मिलना-महमूद ने भारत पर कई आक्रमण किये परन्तु उसने केवल पंजाब को ही गज़नी राज्य में मिलाया। वह इसी प्रदेश को आधार बनाकर भारत में अन्य प्रदेशों पर आक्रमण करना चाहता था और वहां के धन को लूटना चाहता था। सच तो यह है कि महमूद के आक्रमणों के कारण इस देश में धन-जन की हानि हुई, इस्लाम धर्म फैला तथा हमारी संस्कृति को हानि पहुंची। किसी ने सच ही कहा है, “महमूद एक अमानवीय अत्याचारी था जिसने हमारे धार्मिक स्थानों को ध्वस्त किया।

प्रश्न 5.
राजूपतों की सामन्त व्यवस्था के मुख्य पहलुओं पर प्रकाश डालिए। विशेष रूप से इसके सामाजिक तथा आर्थिक परिणामों की चर्चा कीजिए।
अथवा
राजूपतों की सामंतवादी प्रथा का क्या महत्त्व था ?
उत्तर-
सामन्तवादी व्यवस्था वह व्यवस्था थी जिसका प्रारम्भ राजपूत शासकों ने किया था। उन्होंने कुछ भूमि का प्रबन्ध सीधे अपने हाथों में रख कर शेष भूमि सामन्तों में बांट दी। ये सामन्त शासकों को अपना स्वामी मानते थे तथा युद्ध के समय उसे सैनिक सहायता देते थे। सामन्त अपने-अपने प्रदेशों में लगभग राजाओं के समान ही रहते थे। कुछ सामन्त अपने-आप को महासामन्त अथवा महाराजा भी कहते थे। वे अपने कर्मचारियों को सेवाओं के बदले उसी प्रकार कर-मुक्त भूमि देते थे, जिस प्रकार शासक अपने सामन्तों को देते थे। नकद वेतन देने की व्यवस्था लगभग समाप्त हो गई थी। इसलिए शायद ही किसी राजपूत राजवंश ने सिक्के (मुद्रा) जारी किए हों।

सामाजिक तथा आर्थिक परिणाम-सामन्तवादी व्यवस्था के कुछ महत्त्वपूर्ण सामाजिक तथा आर्थिक परिणाम निकले-
1. राज्य का किसानों से कोई सीधा सम्पर्क नहीं था। उनके मध्य दावेदारों की संख्या काफ़ी बढ़ गई थी।

2. किसानों की दशा पहले की अपेक्षा अधिक खराब हो गई। उन्हें भूमि से किसी भी समय बेदखल किया जा सकता था। उनसे बेगार ली जाती थी।

3. इस व्यवस्था के कारण स्थानीय आत्म-निर्भरता पर आधारित अर्थव्यवस्था आरम्भ हुई। इसका अर्थ यह था कि प्रत्येक राज्य केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही वस्तुओं का उत्पादन करता था। परिणामस्वरूप व्यापार को बहुत चोट पहुंची।

4. इस व्यवस्था के कारण भूमि के निजी स्वामित्व की प्रथा आरम्भ हई। इससे सामन्तों तथा राजाओं को काफ़ी लाभ पहुंचा क्योंकि समस्त भूमि के मालिक वे स्वयं थे।

5. भूमि का स्वामित्व मिलने पर राजाओं ने सरकारी कर्मचारियों तथा पूरोहितों को बड़ी-बड़ी जागीरें दान में देनी शुरू कर दीं।

6. भूमि के विभाजन से राज्यों की शक्ति घटने लगी जब कि जागीरदार दिन-प्रतिदिन शक्तिशाली होते गए। ये बात राजा के हितों के विरुद्ध थी।

सामन्तवाद का महत्त्व-सामन्तवाद प्रथा का बड़ा महत्त्व है जिसका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है-
1. भूमि के स्वामित्व से सामाजिक सद्भाव को ठेस पहुंची। इससे ग्राम सभा की स्थिति महत्त्वपूर्ण हो गई तथा उसका स्थान पंचायत ने ले लिया। इसमें सरकार द्वारा मनोनीत व्यक्ति होते थे तथा वे गांव के विवादों में सरकारी कर्मचारियों की सहायता करते थे।

2. युद्ध को आवश्यक समझा जाने लगा। इसके फलस्वरूप लोगों में सैन्य गुणों का विकास हुआ और वीर सैनिकों का महत्त्व बढ़ने लगा। महिलाएं भी वीरांगनाओं के रूप में उभरने लगीं। जौहर की प्रथा उनकी वीरता का बहुत बड़ा प्रमाण है।

3. सामन्तवादी व्यवस्था के कारण कृषि का विकास हुआ। भूमि अनुदान देने वाले लोगों ने अपने अधीनस्थ किसानों की सहायता से बहुत-सी वीरान भूमि को कृषि योग्य बना लिया।

4. कई नए कबीलों को भी कृषि-कार्य सिखाया गया। इन नए किसानों ने धीरे-धीरे ब्राह्मण संस्कृति को अपना लिया प्रससे हिन्दुओं की संख्या में वृद्धि हुई।

5. सामन्तवादी व्यवस्था की एक अन्य उपलब्धि यह थी कि इससे लोगों में प्रादेशिक रुचि बढ़ी। फलस्वरूप प्रादेशिक
तथा प्रादेशिक भाषाओं का विकास हुआ। बिल्हण ने ‘विक्रमंकदेवचरित्’ की रचना की। इस पुस्तक में चालुक्य राजा “दत्य चतुर्थ का जीवन वृत्तान्त है। चन्दरबरदाई ने ‘पृथ्वीराजरासो’ में पृथ्वीराज चौहान की सफलताओं का वर्णन किया हण ने ‘राजतरंगिणी’ में कश्मीर का इतिहास लिखा।

6. इसी प्रकार कुछ नई भाषाओं का भी उदय हुआ। इन भाषाओं का विकास मुख्यत: गुजरात, बंगाल, महाराष्ट्र तथा संस्कृति में ” श में हुआ। कन्नड़ तथा तमिल भाषाओं का विकास पहले ही हो गया था। इन भाषाओं के आधार पर बाद में प्रादेशिक का विकास हुआ। जो यह है कि सामन्तवाद जहां राजाओं के हितों के विरुद्ध था, वहां समाज तथा संस्कृति के लिए एक अदृश्य वरदान सिद्ध हुआ |

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 7 राजपूत और उनका काल

प्रश्न 6.
राजपूतों के विरुद्ध तुर्की सफलता के कारणों का विवेचन कीजिए। कोई पांच कारण लिखिए।
उत्तर-
राजपूतों की हार का कोई एक कारण नहीं था। उनकी असफलता का कारण उनके अपने अवगुण तथा मुसलमानों के गुण थे। तुर्क (मुस्लिम आक्रमणकारी) धार्मिक जोश से लड़े। उनमें धार्मिक एकता थी। राजपूतों में बहुत मतभेद थे। राजपूतों के लड़ने का ढंग मुसलमानों के मुकाबले में बहुत अच्छा नहीं था। इस तरह की अनेक बातों के कारण राजपूतों को असफलता का मुंह देखना पड़ा और मुस्लिम आक्रमणकारी सफल हुए। इन कारणों का वर्णन इस प्रकार है-

1. राजनीतिक एकता का अभाव-ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में भारत की राजनीतिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई थी। उस समय देश छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। इन राज्यों के शासक प्रायः आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। मुहम्मद गौरी ने जब पृथ्वीराज पर आक्रमण किया तो जयचन्द ने पृथ्वीराज की कोई सहायता नहीं की। यही दशा शेष राजाओं की थी। ऐसी स्थिति में राजपूतों का पराजित होना निश्चित ही था। सी० बी० वैद्य के शब्दों में, “चौहान, चन्देल, राठौर तथा चालुक्य वंश के राजा राजनीतिक एकता के आदर्श को भूल कर पृथक्-पृथक् लड़े और मुसलमानों के हाथों मार खा गए।”

2. राजपूत शासकों में दूरदर्शिता की कमी-राजपूत शासक वीर और साहसी तो थे, परन्तु उनमें दूरदर्शिता की कमी थी। उन्होंने भारतीय सीमाओं को सुदृढ़ करने का कभी प्रयास न किया और न ही शत्रु को सीमा पर रोकने के लिए कोई उचित पग उठाया। अतः राजपूतों में दूरदर्शिता की कमी उनकी पराजय का एक प्रमुख कारण बनी।

3. स्थायी सेना का अभाव-राजपूत शासकों के पास कोई स्थायी सेना नहीं थी। वे आक्रमण के समय अपने जागीरदारों (सामन्तों) से सैनिक सहायता लिया करते थे। इसमें सबसे बड़ा दोष यह था कि भिन्न-भिन्न जागीरदारों द्वारा भेजे गए सैनिकों का लड़ने का ढंग भी भिन्न होता था। ऐसी दशा में सैनिकों में अनुशासन नहीं रह सकता था। अनुशासनहीन सेना की पराजय . निश्चित थी।

4. युद्ध-प्रणाली में अन्तर-राजपूतों की युद्ध-प्रणाली पुरानी तथा घटिया किस्म की थी। उन्हें अपने हाथियों पर बड़ा विश्वास था, परन्तु मुस्लिम घुड़सवारों के सामने उनके हाथी टिक न सके। घोड़े युद्ध में हाथियों की अपेक्षा काफ़ी तेज़ गति से दौड़ते थे।

5. मुसलमानों का कुशल सैनिक संगठन-राजपूत राजा युद्ध करते समय अपनी सेना को तीन भागों में बांटते थे जबकि मुसलमानों की सेना पांच भागों में बंटी होती थी। इनमें से ‘अंगरक्षक’ तथा ‘पृथक् रक्षित’ सैनिक बहुत महत्त्वपूर्ण थे। ये टुकड़ियां पहले तो युद्ध से अलग रहती थीं, परन्तु जब शत्रु सैनिक थक जाते थे तो ये अचानक ही उन पर टूट पड़ती थीं। इस प्रकार थकी हुई राजपूत सेना के लिए उनका सामना करना कठिन हो जाता था।

6. राजपूतों के घातक आदर्श-राजपूत युद्ध में निहत्थे शत्रु पर वार करना कायरता समझते थे। वे युद्ध में छल-कपट में विश्वास नहीं करते थे। उनके ये घातक आदर्श उनकी पराजय का कारण बने।

7. हिन्दुओं में जाति-पाति का भेदभाव-हिन्दू समाज अनेक जातियों में विभक्त था। सभी जातियों को अपना पैतृक धन्धा ही अपनाना पड़ता था। रक्षा का भार केवल क्षत्रियों के कन्धों पर था। अन्य जातियों के लोग विदेशी आक्रमणों के समय भी अपने-अपने कार्यों में लगे रहते थे। दूसरी ओर मुसलमानों की सेना में सभी जातियों के लोग शामिल होते थे। इन परिस्थितियों में राजपूतों का पराजित होना निश्चित था।

8. मुसलमानों में धार्मिक जोश-मुसलमान सैनिकों में धार्मिक जोश था। वे हिन्दुओं से लड़ना अपना परम कर्तव्य मानते थे। हिन्दुओं के विरुद्ध वे अपने युद्धों को धर्म-युद्ध अथवा ‘जिहाद’ का नाम देते थे। जीतना या मर मिटना उनका एकमात्र उद्देश्य था। ऐसी दशा में हिन्दुओं का पराजित होना निश्चित ही था। .. सच तो यह है कि मुसलमान अनेक बातों में राजपूतों से आगे थे। उनके कुशल सैनिक संगठन तथा उनकी ‘ भावनाओं का सामना करना राजपूतों के लिए बड़ा कठिन था। यहां तक कि राजपूतों को उनकी अपनी जनता का सहर न मिला। एक इतिहासकार के शब्दों में, “जनता ने अपने सरदारों तथा सैनिकों को सहयोग न दिया जिसके परिणाम राजपूत पराजित हुए।

PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच

Punjab State Board PSEB 10th Class Welcome Life Book Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Welcome Life Chapter 5 रचनात्मक सोच

PSEB 10th Class Welcome Life Guide रचनात्मक सोच Textbook Questions and Answers

नोट-इस अध्याय के पाठ संबंधी प्रश्न नहीं हैं।

पाठ पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 1.
स्कूल के पेड़ के हिस्से कौन हैं?
उत्तर-
प्रिंसीपल, शिक्षक, चपरासी, क्लर्क, छात्र, प्रबंधन सभी स्कूल के पेड़ के हिस्से हैं।

प्रश्न 2.
इस परिवार रूपी वृक्ष के फूल कौन होते हैं?
उत्तर-
इस परिवार रूपी वृक्ष के फूल विद्यार्थी होते हैं, जिनसे स्कूल रूपी वृक्ष सुंदर लगता है।

प्रश्न 3.
स्कूल के पेड़ के फूल दुनिया में अपनी खुशबू कैसे फैलाते हैं?
उत्तर-
यह फूल अच्छी शिक्षा प्राप्त करके, व्यक्तिगत प्रगति कर, अच्छे अंक प्राप्त कर इत्यादि से पूरी दुनिया में अपनी खुशबू फैला सकते हैं।

PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच

प्रश्न 4.
क्या आप अपने परिवार के पेड़ को प्यार, सम्मान, समय और सहयोग से खींचते हैं? यदि हाँ तो कैसे सहयोग देते हो?
हाँ PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच 1 नहीं PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच 1 यदि हाँ, तो कैसे ………….

उत्तर-
हाँ, हम अपने परिवार के पेड़ को प्यार, सम्मान, समय और सहयोग के साथ खींचते हैं। हम परिवार के सदस्यों को प्यार देते हैं और लेते हैं। हम बड़ों का सम्मान करते हैं और छोटों को भी सम्मान देते हैं। हमने एक-दूसरे के साथ समय बिताया, उनकी समस्याओं को सुना, ऐसी समस्याओं से छुटकारा पाया। हम हमेशा अपना काम करने के लिए माता-पिता का सहयोग करते हैं। जिसमें सभी कार्य जल्दी पूर्ण हो जाते हैं। एकल परिवार, संयुक्त परिवार को दिए गए और लिए गए सहयोग का विस्तार।
PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच 2
नोट- यह विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 5.
क्या आप ‘स्कूल परिवार’ के साथ सहयोग देते हो?
हाँ PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच 1 नहीं PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच 1 यदि हाँ, तो विस्तार से बताएं ……..
PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच 3
उत्तर-
यह विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 6.
जब ज़रूरत पड़ने पर आपकी कोई मदद करता है तो आप कैसा महसूस करते हो?
उत्तर-
बहुत अच्छा लगता है जब कोई हमारी संकट में मदद करता है क्योंकि उस समय हमारी हालत अच्छी नहीं होती। उस समय तिनके का सहारा बहुत होता है। उस व्यक्ति ने तो हमारी बहुत मदद की होती है क्योंकि उसकी मदद से हम मुसीबत से बाहर निकल आते हैं इसलिए हमें बहुत अच्छा लगता है और हम इस बात को भूलते नहीं।

इनके लिए आप कैसे सहयोग करेंगे इनके लिए आप कैसे काम करेंगे
परिवार कक्षा
बुजुर्गों स्कूल
युवाओं सहपाठियों से
समाज ज़रूरतमंद

उत्तर-विद्यार्थी स्वयं करें।

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आइए ! आनन्द मान

  1. सहयोगी बनें सबके, सहयोगी बनें सबके,
    ज़रूरतमंद की ताकत बनो, यदि बंदे हो रब्ब के।
  2. ताकत किसी की यदि है अपूर्ण, ताकत किसी की यदि है अपूर्ण,
    साथ खड़े हो जाओ आप, फिर हो जाएगी संपूर्ण ।
  3. रीत वैर की पाओ न, रीत वैर की पाओ ना,
    मिल-जुल कर रहो सदा, बुरा किसी का चाहो ना।
  4. अलग से चूल्हा यदि जलाएंगा, अलग से चूल्हा यदि जलाएंगा,
    हाथ में कुछ नहीं आना, अपनी जिंदगी गलाएंगा।
  5. यदि अलग से बीन बजाएंगा, यदि अलग से बीन बजाएंगा,
    वैरी हल्ला बोलेगा, फिर पीछे पछताएंगा।
  6. काम आओ! वारो वारी जी, काम आओ! वारो वारी जी,
    आपसी सहयोग हो तो, कभी बाज़ी नहीं हारी जी।
  7. गाड़ी चले जैसे तारों से, गाड़ी चले जैसे तारों से,
    वैसे ही समाज चले, सहयोगी परिवारों से।
  8. मुट्ठी की ताकत सदैव जीतती, मुट्ठी की ताकत सदैव जीतती,
    कर लीजिए एकता सारे, सारी दुनिया यही बताती।

आओ! देखें हमने क्या पड़ा? इससे क्या सीखा?

प्रश्न 1.
यह काव्य पंक्तियाँ हमें क्या बताती हैं?
उत्तर-
यह काव्य पंक्तियाँ हमें सहयोग के महत्त्व को बताती हैं कि सहयोग के बिना समाज में कुछ भी संभव नहीं है। यदि सभी एक-दूसरे का सहयोग नहीं करेंगे तो परिवार और समाज आसानी से नहीं चल सकते। एक व्यक्ति . अकेले कुछ नहीं कर सकता उसे हर प्रकार के कार्य करने के लिए दूसरों के सहयोग की आवश्यकता होती है।

PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच

प्रश्न 2.
हम उनके अभाव को दो गुना कैसे करते हैं?
उत्तर-
यदि हम एक अकेले व्यक्ति के साथ खड़े होते हैं, तो उसकी ताकत दोगुनी हो जाती है। इसका अर्थ है कि यदि हम किसी भी तरह से किसी की मदद या सहयोग करते हैं तो किसी व्यक्ति की ताकत दोगुनी हो जाती है।

प्रश्न 3.
यदि हम मिल-जुल कर नहीं रहेंगे तो हमारे क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं?
उत्तर-

  1. यदि हम एक साथ नहीं रहते हैं, तो किसी के हाथ में कुछ भी नहीं आएगा।
  2. हर कोई अपना काम करेगा, दूसरों का सहयोग नहीं करेगा और अंत में समाज प्रगति नहीं करेगा।
  3. हो सकता है कि दुश्मन उस अकेले पर हमला करेगा और उसे बाद में पछताना पड़ेगा।

प्रश्न 4.
समाज को कौन चलाता है?
उत्तर-
समाज सहयोग और सहयोगी परिवारों के साथ चलता है। यदि सहयोगी परिवार नहीं होंगे, तो समाज सुचारु रूप से नहीं चलेगा।

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प्रश्न 5.
किसने शर्त कभी नहीं हारी?
उत्तर-
दूसरों का सहयोग करने वालों की कभी हार नहीं होती।

Welcome Life Guide for Class 10 PSEB रचनात्मक सोच Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

(क) बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुनिया की सुंदरता देखने के लिए
(a) दुनिया पर निर्भर करता है
(b) व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है
(c) समाज पर निर्भर करता है
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(b) व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है।

प्रश्न 2.
हम दूसरों से क्या उम्मीद करते हैं?
(a) उन्हें हमारा सम्मान करना चाहिए।
(b) उन्हें हमारी दोस्ती को स्वीकार करना चाहिए
(c) उन्हें मुझसे बात करने को तैयार होना चाहिए
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(d) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 3.
हम परिवार के पेड़ को कैसे बढ़ा सकते हैं?
(a) सहयोग द्वारा
(b) सम्मान देकर
(c) समय देकर
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(d) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 4.
स्कूल का प्रमुख कौन होता है?
(a) प्रबंधन
(b) प्रिंसीपल
(c) एच० ओ० डी०
(d) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(b) प्रिंसीपल।

प्रश्न 5.
……. के बिना जीवन अधूरा है।
(a) समझदारी
(b) लालच
(c) ईर्ष्या
(d) द्वेष।
उत्तर-
(a) समझदारी।

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प्रश्न 6.
रचनात्मक प्रकृति का अर्थ है
(a) कुछ नया करने के लिए
(b) कुछ विशेष बनाने के लिए
(c) कुछ बुनियादी करने के लिए
(d) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(d) उपरोक्त सभी।

(ख) खाली स्थान भरें

  1. एक रचनात्मक दिमाग वाला व्यक्ति …………. करता है।
  2. जीवन …………. के बिना अधूरा है।
  3. …………. के बिना समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
  4. हमें अपने बुजुर्गों को ………. और …………. देना चाहिए।
  5. हम दूसरों से कुछ …………….. रखते हैं।

उत्तर-

  1. आत्म विकास,
  2. समझ,
  3. सहयोग,
  4. सम्मान, समय
  5. अपेक्षाएँ।

(ग) सही/ग़लत चुनें

  1. हमें दूसरों से अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए।
  2. मैं चाहता हूँ कि सभी मेरा सम्मान करें।
  3. शिक्षक छात्रों को प्रेरित करते हैं।
  4. हमें अपने आप को झगड़े से दूर रखना चाहिए।
  5. हमें पसंद नहीं है जब कोई हमारी मदद करता है।

उत्तर-

  1. ग़लत,
  2. सही,
  3. सही,
  4. सही,
  5. ग़लत।

(घ) कॉलम से मेल करें

कॉलम-I — कॉलम-II
(a) एक जुट रहना — (i) नए बनाने की गुणवत्ता
(b) गुस्सा — (ii) मूड
(c) कल्पना — (iii) इकट्ठे रहना
(d) रचनात्मक सोच — (iv) डांटना
(e) फीलिंग उत्तर — (v) किसी के बारे में सोचना।
उत्तर-
कॉलम-I — कॉलम-II
(a) एक जुट रहना — (iii) इकट्ठे रहना
(b) गुस्सा — (iv) डांटना
(c) कल्पना — (v) किसी के बारे में सोचना
(d) रचनात्मक सोच — (i) नए बनाने की गुणवत्ता
(e) फीलिंग उत्तर — (ii) मूड।

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अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुनिया की सुंदरता देखना किस पर निर्भर करता है?
उत्तर-
यह किसी के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

प्रश्न 2.
हम दुनिया में सब कुछ अच्छा कब पा सकते हैं?
उत्तर-
जब हम अच्छाई की तलाश शुरू करते हैं तो हम दुनिया में सब कुछ अच्छा पाते हैं।

प्रश्न 3.
आदमी को किस तरह की सोच रखनी चाहिए?
उत्तर-
उनकी सोच रचनात्मक प्रकृति की होनी चाहिए।

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प्रश्न 4.
हमें क्या करना चाहिए ताकि हम पूरी दुनिया को पसंद करें?
उत्तर-
हमें हर चीज़ में खुशी और सुंदरता खोजने की कोशिश करनी चाहिए।

प्रश्न 5.
एक अपेक्षा बताइए जो मैं दूसरों से रखता हूँ।
उत्तर-
हम चाहते हैं कि वे हमारी बात मानें और हमें इंकार न करें।

प्रश्न 6.
क्या आप दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरते हैं?
उत्तर-
हाँ, जब भी उन्हें आवश्यकता होती है, हम उनकी मदद करते हैं।

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प्रश्न 7.
हम दुनिया में कैसे बेहतर हो सकते हैं?
उत्तर-
यदि हम दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करते हैं, तो हम निश्चित रूप से दुनिया में बेहतर होंगे।

प्रश्न 8.
हमें दूसरों में क्या देखना चाहिए?
उत्तर-
हमें दूसरों में अच्छे गुणों की तलाश करनी चाहिए।

प्रश्न 9.
एक परिवार कैसे प्रगति कर सकता है?
उत्तर-
परिवार के सदस्यों को समय, सहयोग और प्यार देकर परिवार उन्नति कर सकता है।

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प्रश्न 10.
हम बड़ों को कैसे खुश रख सकते हैं?
उत्तर-
उनके साथ समय बिताकर और सम्मान देकर हम अपने बड़ों को खुश रख सकते हैं।

प्रश्न 11.
कौन-सी वस्तु के बिना जीवन अधूरा है?
उत्तर-
समझ के बिना जीवन अधूरा है।

प्रश्न 12.
मंगत को कैसे चोट लगी?
उत्तर-
मंगत को एक सड़क दुर्घटना में चोट लगी।

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प्रश्न 13.
रचनात्मक सोच से क्या मतलब है?
उत्तर-
रचनात्मक सोच का अर्थ कुछ नया या विशेष बनाने की जिज्ञासा होना है।

प्रश्न 14.
एक रचनात्मक दिमाग को सामाजिक सम्मान कब मिल सकता है?
उत्तर-
जब वह कुछ नया बनाता है और आत्म प्रगति करता है तो उसे सामाजिक सम्मान मिलता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
दुनिया कैसे अच्छी लगती है?
उत्तर-
यह दुनिया काफी खूबसूरत है और यह किसी के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि वह इस सुंदरता को कैसे देखता है। यदि हम दुनिया में अच्छी चीज़ों की तलाश करते हैं, तो हम उन्हें ज़रूर खोज लेंगे, लेकिन यदि हम बुरे की तलाश करेंगे तो हमें बुरा ही नज़र आएगा। इसीलिए यदि हमें अच्छा करना है, वो हमें हर चीज़ में सुंदरता और खुशी खोजने की ज़रूरत है। इससे सब कुछ अच्छा लगता है।

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प्रश्न 2.
एक छात्र दूसरों से क्या उम्मीद करता है?
उत्तर-

  1. वह अपेक्षा करता है कि दूसरों को उसका सम्मान करना चाहिए।
  2. वह चाहता है कि सभी में उससे बात करने की इच्छा हो।
  3. वह चाहता है कि उसके दोस्त उसकी बात माने।
  4. वह अच्छे अंक प्राप्त करना चाहता है।
  5. वह अपने दोस्तों के साथ घूमना चाहता है।

प्रश्न 3.
हमारे जीवन में अपेक्षाओं की क्या भूमिका है?
उत्तर-
हमारे जीवन में अपेक्षाओं की बड़ी भूमिका है। हम दूसरों से बहुत-सी अपेक्षाएं रखते हैं और उन अपेक्षाओं को पूरा करने की अपेक्षा भी करते हैं। यदि वे इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर रहे हैं, तो हमारा रिश्ता खतरे में है। इसलिए, हमें यह समझना चाहिए कि यदि हम अपनी अपेक्षाओं को पूरा करना चाहते हैं, तो यह हमारे लिए भी ज़रूरी है कि हम औरों की अपेक्षाओं को भी पूरा करें। इस तरह एक-दूसरे की अपेक्षाओं को पूरा करके, हम दुनिया में खुशी पा सकते हैं और इसे रहने के लिए एक खुशहाल जगह बना सकते हैं।

प्रश्न 4.
हमारे जीवन में सहयोग का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
इस तथ्य से कोई इंकार नहीं है कि जीवन दूसरों के सहयोग के बिना एक दिन भी नहीं चला सकता। जीवन में हम दूसरों का सहयोग करते हैं और वे हमारा भी सहयोग करते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को पालने के लिए परिवार में सहयोग करते हैं। सभी शिक्षक और छात्र बेहतर शिक्षा प्रदान करने के लिए स्कूल में सहयोग करते हैं। इस तरह हमारे जीवन के हर हिस्से में सहयोग मौजूद है। इसके अभाव में जीवन एक दिन भी नहीं चल सकता। इस तरह दूसरों के साथ सहयोग एक अच्छे जीवन के लिए होना चाहिए।

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प्रश्न 5.
समझ की कला क्या है?
उत्तर-
समझ के बिना जीवन पूरा नहीं हो सकता। किसी भी काम को पूरा करने के लिए बेहतर समझ की कला होनी चाहिए। जीवन जीने के लिए अपने आप को समझना, खेल खेलने के नियमों को समझना, माता-पिता के क्रोध से पहले उनके प्यार को समझना, दोस्तों के व्यवहार को समझना आदि कुछ ऐसे पहलू हैं, जिनका हम जीवन में पालन कर सकते हैं। यदि हमारे जीवन में समझ का कोई पहलू नहीं होगा तो हम जीवन में कुछ भी नहीं कर पाएंगे। जिन्हें हम समझने की क्षमता नहीं रखते, वे जीवन में कुछ नहीं कर सकते। दूसरी ओर समझ क्षमता वाले लोग जीवन में बहुत प्रगति करते हैं। इस को सभी के जीवन में समझने की कला कहते हैं।

प्रश्न 6.
रचनात्मकता के विकास की व्याख्या करो।
उत्तर-
रचनात्मकता का अर्थ कुछ नया, अनोखा और मौलिक बनाना या करना है। रचनात्मकता दिमाग वाले लोग, हमेशा नए विचारों के बारे में सोचते हैं और वे हमेशा ऐसे विचारों को अनोखे तरीके से व्यक्त करने की कोशिश करते हैं। विभिन्न व्यक्तियों के अलग-अलग गुण और लक्षण होते हैं। रचनात्मक दिमाग वाला व्यक्ति इस गुण का इस्तेमाल खुद को विकसित करने के लिए करता है और इसीलिए उसे सामाजिक सम्मान प्राप्त होता है। इस प्रकार की सोच किसी भी क्षेत्र यानि कला, साहित्य, विज्ञान इत्यादि से जुड़ी हो सकती है। यदि छात्रों में इस तरह की सक्रियता विकसित की जाएगी, तो हम नए विचारों को बनाने के लिए उनकी ऊर्जा का सही उपयोग कर सकते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अध्याय में दी गई कहानी का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर-
एक बार मंगत नाम का एक व्यक्ति एक दुर्घटना में बुरी तरह से घायल हो गए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। वह न तो दाएं-बाएं देख सकता था और न ही हिल-जुल सकता था। अस्पताल में अगले बिस्तर पर विशाल नाम का एक और मरीज था। मंगत रोज़ विशाल की बातें सुनने लगा। वह मंगत को इसके अलावा खिड़की के माध्यम से देखा जाने वाला प्रकृति का सौंदर्य बताता था। मंगत ने उसकी बात सुनी और खिड़की से परे प्रकृति की सुंदरता की कल्पना करना शुरू कर दिया। जल्द ही, वह एक महीने में दुर्घटना से उबरने लगा। अंत में उसे थोड़ा हिलने दिया गया और उसे दूसरे बिस्तर पर ले जाया गया, जिस पर विशाल लेटा हुआ था। अब वह खिड़की से देखने की स्थिति में था। अस्पताल के अधिकारियों ने उन्हें बताया कि विशाल का कल रात निधन हो गया। जब उसने खिडकी से देखने की कोशिश की, तो उस दीवार पर कोई खिडकी नहीं थी। अधिकारियों ने उन्हें यह भी बताया कि विशाल अंधा था। उन्होंने हमेशा मंगत को उम्मीद दी कि वह जल्द ही ठीक हो जाएगा। इसके बाद मंगत ने महसूस किया कि मददगार व्यक्ति उनकी मदद करने और उन्हें बेहतर बनाने के लिए दूसरों का समर्थन करते हैं। अपने स्वयं के दुखों के बावजूद वे खुशी फैलाने की कोशिश करते हैं।

PSEB 10th Class Welcome Life Solutions Chapter 5 रचनात्मक सोच

रचनात्मक सोच PSEB 10th Class Welcome Life Notes

  • यह दुनिया बहुत सुंदर है, लेकिन यह देखने वाले पर निर्भर करता है कि वह किसी विशेष चीज़ को कैसे देखता है। यदि हम अच्छाई खोजना चाहते हैं, तो सब कुछ अच्छा है या यदि हम बुरा खोजना चाहते हैं, तो सब कुछ बुरा है।
  • हम दूसरों से बहुत उम्मीदें रखते हैं और सोचते हैं कि हमारी उम्मीदों को पूरा करेंगे। यदि उम्मीद अच्छी है, तो यह निश्चित रूप से पूरी होगी। इस तरह हम एक-दूसरे की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे और खुश रहेंगे।
  • हमें एक-दूसरे का सहयोग करना चाहिए। हमें दूसरों के साथ अच्छा समय बिताना चाहिए और हर संभव तरीके से सहयोग करना चाहिए। इससे प्यार और सहयोग बढ़ेगा और हम खुशी से काम कर सकते हैं।
  • परिवार, स्कूल और समाज सदैव सदस्यों के आपसी सहयोग से आगे बढ़ते हैं। यदि उनके सदस्य एक दूसरे की मदद नहीं करेंगे तो वे प्रगति नहीं करेंगे और विनाश के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे।
  • हमें अपने बड़ों का सम्मान करना चाहिए और उन्हें समय देना चाहिए। इससे वह अकेलापन महसूस नहीं करेंगे। हमें उनके पिछले अनुभवों को सुनना चाहिए ताकि हम उन गलतियों को न दोहराएं जो उन्होंने शायद की थीं।
  • हर किसी में चीज़ों को समझने की क्षमता होती है। समझ के बिना जीवन पूरा नहीं हो सकता। खेल खेलने के लिए दूसरों के साथ संवाद करने के लिए समाज में रहने के लिए, हमें समझ की आवश्यकता है।
  • रचनात्मक मानसिकता होना भी ज़रूरी है। इसका अर्थ है कि एक व्यक्ति के भीतर कुछ नया करने की इच्छा। जिनके पास ऐसी क्षमता है, वे सामाजिक प्रगति में योगदान करते हैं। यह स्वयं के विकास में मदद करता है और व्यक्ति के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा भी लाता है।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 7 गुरु हरगोबिंद जी और सिख पंथ का रूपांतरण

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 7 गुरु हरगोबिंद जी और सिख पंथ का रूपांतरण Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 7 गुरु हरगोबिंद जी और सिख पंथ का रूपांतरण

निबंधात्मक प्रश्न – (Essay Type Questions)

गुरु हरगोबिंद जी का जीवन (Life of Guru Hargobind Ji)

प्रश्न 1.
गुरु हरगोबिंद जी के जीवन के बारे में विस्तृत नोट लिखो। (Write a detailed note on the life of Guru Hargobind Ji.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी के जीवन का वर्णन करें।
(Describe the life of Guru Hargobind Ji.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी सिखों के छठे गुरु थे। वे 1606 ई० से लेकर 1645 ई० तक गुरुगद्दी पर विराजमान रहे। इस काल का सिख पंथ के इतिहास में विशेष महत्त्व है। गुरु हरगोबिंद जी ने नई नीति अपना कर न केवल सिख लहर के स्वरूप को ही बदला अपितु सिखों में स्वाभिमान की भावना भी उत्पन्न की। परिणामस्वरूप उनके समय में सिख पंथ का न केवल रूपांतरण ही हुआ अपितु इसका अद्वितीय विकास भी हुआ। उनके जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—
1. जन्म तथा माता-पिता (Birth and Parentage)-गुरु हरगोबिंद जी का जन्म 14 जून, 1595 ई० को जिला अमृतसर के गाँव वडाली में हुआ था। वह गुरु अर्जन देव जी के एक मात्र पुत्र थे। आप की माता जी का नाम गंगा देवी था।

2. बाल्यकाल तथा विवाह (Childhood and Marriage)-गुरु हरगोबिंद जी बाल्यकाल से ही बहुत होनहार थे। आप ने पंजाबी, संस्कृत तथा प्राकृत भाषाओं के साहित्य का गहन अध्ययन किया था। बाबा बुड्डा जी ने आपको न केवल धार्मिक शिक्षाएँ ही दीं अपितु घुड़सवारी तथा शस्त्र-विद्या में भी प्रवीण कर दिया। इतिहासकारों का विचार है कि हरगोबिंद जी के तीन विवाह हुए थे। आप के घर पाँच पुत्रों-गुरदित्ता, अणि राय, सूरज मल, अटल राय तथा तेग बहादुर जी और एक पुत्री बीबी वीरो ने जन्म लिया।

3. गुरुगद्दी की प्राप्ति (Assumption of Guruship)-1606 ई० में गुरु अर्जन देव जी ने लाहौर जाने से पूर्व, जहाँ उन्होंने अपना बलिदान दिया था, हरगोबिंद जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उस समय हरगोबिंद जी की आयु केवल 11 वर्ष थी। इस प्रकार हरगोबिंद जी सिखों के छठे गुरु बने। वह 1606 ई० से लेकर 1645 ई० तक गुरुगद्दी पर विराजमान रहे।

4. गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति (New Policy of Guru Hargobind Ji)-नोट-इस भाग के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं० 2 का उत्तर देखें।

5. गुरु हरगोबिंद जी के मुगलों के साथ संबंध (Relations of Guru Hargobind Ji with the Mughals)-नोट-इस भाग के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं० 3 का उत्तर देखें।

गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति (New Policy of Guru Hargobind Ji)

प्रश्न 2.
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति का निरीक्षण करें।
(Examine the New Policy of Guru Hargobind Ji.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की न वीन नीति के बारे में आप क्या जानते हैं ? इसकी मुख्य विशेषताओं तथा इसके सिख धर्म के रूपांतरण संबंधी महत्त्व का वर्णन करें।
(What do you know about the New Policy of Guru Hargobind ? Describe its main features and significance of the transformation of Sikhism.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति के बारे में आप क्या जानते हैं ? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
(What do you know about New Policy of Guru Hargobind Ji ? Explain in brief its main features.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति पर एक आलोचनात्मक टिप्पणी लिखिए। (Write a critical note on the New Policy of Guru Hargobind Ji.)
अथवा
उन परिस्थितियों का उल्लेख करें जिनके कारण गुरु हरगोबिंद जी को नई नीति धारण करनी पड़ी। इस नीति की मुख्य विशेषताएँ क्या थी ?
(Describe the circumstances leading to the adoptation of New Policy by Guru Hargobind. What were the main features of this policy ?)
अथवा
मीरी और पीरी से आपका क्या तात्पर्य है ? इस नीति की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
(What do you understand by Miri and Piri ? Explain its main features.)
अथवा
मीरी तथा पीरी की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें। (Explain the main features of Miri and Piri.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की ‘मीरी’ और ‘पीरी’ की नीति की चर्चा करो। (Discuss the policy of ‘Miri’ and ‘Piri’ of Guru Hargobind Ji.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति की क्या विशेषताएँ थीं ? (What were the features of New Policy of Guru Hargobind Ji ?)
अथवा
मीरी और पीरी से क्या अभिप्राय है? इसकी क्या विशेषताएँ थीं? (What is meant by Miri and Piri ? What was its importance ?)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी ने सिखों को संत सिपाही के रूप में कैसे बदला ? (How Guru Hargobind Ji changed the Sikhs into Sant Sipahis ?)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी द्वारा 1606 ई० में गुरुगद्दी पर बैठने के साथ ही सिख पंथ में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। गुरु अर्जन देव जी के बलिदान के कारण सिखों तथा मुग़लों के मध्य संबंध तनावपूर्ण हो गए थे। ऐसी स्थिति में गुरु हरगोबिंद जी ने यह निष्कर्ष निकाला कि सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत करने तथा अपने धर्म की रक्षा के लिए सिखों को शस्त्र उठाने होंगे। अतः गुरु साहिब ने सिखों को संत सिपाही बनाने की नवीन नीति धारण की। इस नीति को अपनाने के प्रमुख कारण निम्न प्रकार थे—
1. मुग़लों की धार्मिक नीति में परिवर्तन (Change in the Religious Policy of the Mughals)जहाँगीर से पूर्व के शासकों के साथ सिखों के संबंध मधुर थे। बाबर ने गुरु नानक देव जी के प्रति सम्मान प्रकट किया था। हुमायूँ ने राज-गद्दी की. पुनः प्राप्ति के लिए गुरु अंगद देव जी से आशीर्वाद प्राप्त किया। मुग़ल बादशाह अकबर ने गुरु अमरदास जी के समय स्वयं गोइंदवाल साहिब में आकर लंगर छका था। उसने गुरु रामदास जी को 500 बीघे भूमि दान में दी तथा पंजाब के किसानों का एक वर्ष का लगान माफ कर दिया था। परंतु 1605 ई० में बादशाह बना जहाँगीर बहुत कट्टर सुन्नी मुसलमान था। वह इस्लाम के सिवाय किसी अन्य धर्म को विकसित होते नहीं देख सकता था। अतः इन बदली हुई परिस्थितियों में गुरु साहिब को भी नई नीति अपनानी पड़ी।

2. गुरु अर्जन देव जी का बलिदान (Martyrdom of Guru Arjan Dev Ji)-जहाँगीर के लिए सिखों की बढ़ती लोकप्रियता असहनीय थी। इस लहर के दमन के लिए उसने 1606 ई० में गुरु अर्जन देव जी को शहीद कर दिया। गुरु अर्जन देव जी के बलिदान ने सिखों को स्पष्ट कर दिया था यदि वे जीवित रहना चाहते हैं तो उन्हें शस्त्रधारी बनकर मुग़लों से टक्कर लेनी होगी। इस प्रकार गुरु अर्जन देव जी का बलिदान गुरु हरगोबिंद जी द्वारा नई नीति धारण करने के लिए काफी सीमा तक उत्तरदायी था।

3. गुरु अर्जन देव जी का अंतिम संदेश (Last Message of Guru Arjan Dev Ji)-गुरु अर्जन देव जी ने अपने बलिदान से पूर्व अपने पुत्र हरगोबिंद जी को यह संदेश भेजा कि, “उसे पूरी तरह शस्त्रों से सुसज्जित होकर गद्दी पर बैठना चाहिए। अपनी पूर्ण योग्यता के अनुसार सेना रखनी चाहिए।” अतः गुरु साहिब के इन शब्दों को व्यावहारिक रूप देने का गुरु हरगोबिंद जी ने निश्चय किया।
PSEB 12th Class History Solutions Chapter 7 गुरु हरगोबिंद जी और सिख पंथ का रूपांतरण 1
AKAL TAKHT SAHIB : AMRITSAR

नई नीति की मुख्य विशेषताएँ (Main Features of the New Policy)
1. मीरी तथा पीरी तलवारें धारण करना (Wearing of Miri and Piri Swords)-गुरु हरगोबिंद जी ने गुरुगद्दी पर विराजमान होते समय मीरी तथा पीरी नामक दो तलवारें धारण की। मीरी तलवार सांसारिक सत्ता की प्रतीक थी और पीरी तलवार धार्मिक नेतृत्व की प्रतीक थी। गुरु हरगोबिंद जी ने एक ओर सिखों को सतनाम का जाप करने तथा दूसरी ओर शस्त्र धारण करने का संदेश दिया। इस प्रकार गुरु साहिब ने सिखों को संत सिपाही बना दिया। गुरु हरगोबिंद जी द्वारा अपनाई गई इस मीरी तथा पीरी नीति का सिख इतिहास पर बहुत गहन प्रभाव पड़ा।

2. सेना का संगठन (Organisation of Army)-गुरु हरगोबिंद जी द्वारा सिख पंथ की रक्षा के लिए सेना का संगठन करने का भी निर्णय किया गया। उन्होंने सिखों को यह आदेश दिया कि वे गुरु साहिब की सेना में भर्ती हों। फलस्वरूप 500 योद्धा आपकी सेना में भर्ती हुए। इन सैनिकों को सौ-सौ के पाँच जत्थों में विभाजित किया मया। प्रत्येक जत्था एक जत्थेदार के अधीन रखा गया था। इनके अतिरिक्त गुरु साहिब ने 52 अंगरक्षक भी भर्ती किए। धीरे-धीरे गुरु साहिब की सेना की संख्या बढ़कर 2500 हो गई। गुरु जी की सेना में पठानों की एक अलग रैजमैंट बनाई गई। इसका सेनापति पँदा खाँ को नियुक्त किया गया।

3. शस्त्र तथा घोड़े एकत्र करना (Collection of Arms and Horses)—गुरु हरगोबिंद जी ने मसंदों को यह आदेश दिया कि वे सिखों से धन की अपेक्षा शस्त्र एवं घोड़े एकत्रित करें। सिखों से भी कहा कि वे मसंदों को शस्त्र एवं घोड़े भेंट करें। गुरु जी के इस आदेश का मसंदों और सिखों ने बड़े उत्साह से स्वागत किया। फलस्वरूप गुरु जी की सैन्य-शक्ति अधिक दृढ़ हो गई।

4. अकाल तख्त साहिब का निर्माण (Construction of Akal Takhat Sahib)-गुरु हरगोबिंद जी द्वारा अकाल तख्त साहिब का निर्माण उनकी नई नीति का ही महत्त्वपूर्ण भाग था। अकाल तख्त साहिब का निर्माण गुरु हरगोबिंद जी ने हरिमंदिर साहिब के सामने करवाया था। इसके भीतर एक 12 फीट ऊँचे चबूतरे का निर्माण किया जो एक तख्त के समान था। इस तख्त पर बैठकर गुरु हरगोबिंद जी सिखों को सैनिक प्रशिक्षण देते, उनके सैनिक कारनामे देखते, मसंदों से घोड़े और शस्त्र स्वीकार करते, ढाडी वीर-रस की वारें सुनाते तथा सिखों के परस्पर झगड़ों का भी निपटारा करते थे। एच० एस० भाटिया एवं एस० आर० बख्शी के अनुसार,
“अकाल तख्त सिखों की सबसे पवित्र संस्था है। इसने सिख समुदाय के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।”1

5. राजनीतिक प्रतीकों को अपनाना (Adoption of Royal Symbols)—गुरु हरगोबिंद जी अपनी नई नीति के अंतर्गत राजसी ठाठ-बाठ से रहने लगे। उन्होंने अब सेली (ऊन की माला) के स्थान पर कमर में दो तलवारें धारण कीं। एक शानदार दरबार की स्थापना की गई। उन्होंने अब राजाओं की भाँति दस्तार के ऊपर कल्गी सुशोभित करनी आरंभ कर दी। उन्होंने ‘सच्चा पातशाह’ की उपाधि धारण की। गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने अब बहुमूल्य वस्त्र धारण करने आरंभ कर दिए। वे अपने अंगरक्षकों के साथ चलते थे।

6. अमृतसर की किलाबंदी (Fortification of Amritsar)-अमृतसर न केवल सिखों का सर्वाधिक पावन धार्मिक स्थान ही था, अपितु यह उनका विख्यात सैनिक प्रशिक्षण केंद्र भी था। इसलिए गुरु जी ने इस महत्त्वपूर्ण स्थान की सुरक्षा के लिए अमृतसर शहर के चारों ओर एक दीवार बनवा दी। इसके अतिरिक्त यहाँ पर एक दुर्ग का निर्माण भी करवाया गया जिसका नाम लोहगढ़ रखा गया।

7. गुरु जी के प्रतिदिन के जीवन में परिवर्तन (Changes in the daily life of the Guru)—अपनी नवीन नीति के कारण गुरु हरगोबिंद जी के प्रतिदिन के जीवन में भी कई परिवर्तन आ गए थे। उन्होंने अपने दरबार में अब्दुला तथा नत्था मल को वीर-रस से परिपूर्ण वारें गाने के लिए भर्ती किया। एक विशेष संगीत मंडली की स्थापना की गई जो रात्रि को ऊँची आवाज़ में जोशीले शब्द माती हुई हरिमंदिर साहिब की परिक्रमा करती थी। गुरु साहिब ने अपने जीवन में ये परिवर्तन केवल सिखों में वीरता की भावना उत्पन्न करने के लिए किए थे।

1. “Sri Akal Takhat is one of the most sacred institutions of Sikhism. It has played historic role in the socio-political transformation of the Sikh community.” H.S. Bhatia and S.R. Bakshi, Encyclopaedic History of the Sikhs and Sikhism (New Delhi : 1999) Vol. 1, p. 140.

नई नीति का आलोचनात्मक मूल्याँकन (Critical Estimate of the New Policy)

आरंभ में जब गरु हरगोबिंद जी ने नई नीति अपनाई तो इस नीति ने कई संदेह उत्पन्न कर दिए। वास्तव में गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति का गलत आँकलन किया गया है। गुरु साहिब ने पुरानी सिख परंपरा का त्याग नहीं किया था। उन्होंने सिख धर्म के प्रचार के लिए पंजाब के भिन्न-भिन्न स्थानों में अपने प्रचारक भेजे। यदि गुरु साहिब ने अपने प्रतिदिन के जीवन में कुछ परिवर्तन किए तो उसका उद्देश्य केवल सिखों में एक नया जोश उत्पन्न करना था। समय के साथ-साथ गुरु साहिब की सिखों की नई नीति के संबंध में उत्पन्न हुई शंकाएँ दूर होनी आरंभ हो गई थीं। भाई गुरदास जी गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति की प्रशंसा करते हैं। उनका कथन है कि जिस प्रकार मणि को प्राप्त करने के लिए साँप को मारना आवश्यक है। कस्तूरी प्राप्त करने के लिए हिरन को मारना ज़रूरी है। गिरी को प्राप्त करने के लिए नारियल को तोड़ना पड़ता है। बाग़ की सुरक्षा के लिए काँटेदार झाड़ियाँ लगाने की आवश्यकता होती है। ठीक इसी प्रकार गुरु नानक देव जी द्वारा स्थापित सिख पंथ की सुरक्षा के लिए गुरु हरगोबिंद जी द्वारा नई नीति को अपनाना बहुत जरूरी था। वास्तव में गुरु हरगोबिंद जी ने गुरु नानक देव जी के उपदेशों को ही वास्तविक रूप दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार एच० एस० भाटिया एवं एस० आर० बक्शी के शब्दों में,
“यद्यपि बाहरी रूप में ऐसा लगता था कि गुरु हरगोबिंद जी ने गुरु नानक जी के उद्देश्यों को परिपूर्ण करने में भिन्न मार्ग अपनाया, किंतु यह मुख्य तौर पर गुरु नानक जी के आदर्शों पर ही आधारित था।”2

नई नीति का महत्त्व (Importance of the New Policy).
गुरु हरगोबिंद जी द्वारा अपनाई गई नई नीति के महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। सिख अब संत सिपाही बन गए। वे ईश्वर की भक्ति के साथ-साथ शस्त्रों का भी प्रयोग करने लग पड़े। इस नीति के अभाव में सिखों का पावन भ्रातृत्व समाप्त हो गया होता अथवा फिर वे फकीरों और संतों की एक श्रेणी बनकर रह जाते। गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति के परिणामस्वरूप पंजाब के जाट अधिक संख्या में सिख पंथ में सम्मिलित हुए। इस नई नीति के कारण सिखों एवं मुग़लों के संबंधों में आपसी तनाव और बढ़ गया। शाहजहाँ के समय गुरु साहिब को मुग़लों के साथ चार युद्ध लड़ने पड़े। इन युद्धों में सिखों की विजय से मुग़ल साम्राज्य के गौरव को धक्का लगा। अंत में हम के० एस० दुग्गल के इन शब्दों से सहमत हैं,
“गुरु हरगोबिंद जी का सबसे महान् योगदान सिखों के जीवन मार्ग को एक नई दिशा देना था। उसने संतों को सिपाही बना दिया किंतु फिर भी परमात्मा के भक्त रहे।”3

2. “Though outwardly, it may appear that Guru Hargobind persued a slightly different course for fulfilling the mission of Guru Nanak, yet basically, it was Guru Nanak’s ideals that he preached.” H.S. Bhatia and S.R. Bakshi op. cit. Vol. 1, p. 24.
3. “Guru Hargobind’s greatest contribution is that he gave a new turn to the Sikh way of life. He turned saints into soldiers and yet remained a man of God.” K.S. Duggal, Sikh Gurus : Their Lives and Teachings (New Delhi : 1993) p. 164.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 7 गुरु हरगोबिंद जी और सिख पंथ का रूपांतरण

गुरु हरगोबिंद जी के मुग़लों के साथ संबंध (Guru Hargobind Ji’s Relations with the Mughals)

प्रश्न 3.
गुरु हरगोबिंद जी के जहाँगीर तथा शाहजहाँ के साथ संबंधों का संक्षिप्त विवरण दें।
(Describe briefly the relationship of Guru Hargobind Ji with Jahangir and Shah Jahan.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी एवं मुगलों के संबंधों पर एक विस्तृत लेख लिखो। (Write a detailed note on relations between Guru Hargobind Ji and the Mughals.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी के मुग़लों के साथ संबंधों की चर्चा करें। (Explain the relations of Guru Hargobind Ji with the Mughals.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी 1606 ई० से 1645 ई० तक गुरुगद्दी पर रहे। उनके गुरुगद्दी के काल के दौरान उनके मुग़लों के साथ संबंधों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है

I. प्रथम काल 1606-27 ई०
(First Period 1606—27 A.D.)
1. गरु हरगोबिंद जी ग्वालियर में बंदी (Imprisonment of Guru Hargobind Ji at Gwalior)गुरु हरगोबिंद जी के गुरुगद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद ही वह मुग़ल सम्राट् जहाँगीर द्वारा बंदी बनाकर ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिए गए। गुरु साहिब को बंदी क्यों बनाया गया, इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि इसके लिए चंदू शाह का षड्यंत्र उत्तरदायी था। गुरु जी द्वारा उसकी पुत्री के साथ विवाह करने से पुनः इंकार करने पर उसने जहाँगीर को गुरु साहिब के विरुद्ध भड़काया। परिणामस्वरूप जहाँगीर ने उन्हें बंदी बना लिया। दूसरी ओर अधिकाँश इतिहासकार इस मत से सहमत हैं कि जहाँगीर ने गुरु साहिब को उनके द्वारा अपनाई गई नई नीति के कारण बंदी बनाया। इस नीति से उसके मन में अनेक शंकाएँ उत्पन्न हो गई थीं तथा गुरु साहिब के विरोधियों ने भी जहाँगीर के कान भरे कि गुरु जी विद्रोह करने की तैयारियाँ कर रहे हैं।

2. कारावास की अवधि (Period of Imprisonment)—इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं कि गुरु हरगोबिंद जी ग्वालियर के दुर्ग में कितना समय बंदी रहे। दाबिस्तान-ए-मजाहिब के लेखक के अनुसार गुरु साहिब 12 वर्ष कारागृह में रहे। डॉक्टर इंदू भूषण बैनर्जी यह समय पाँच वर्ष, तेजा सिंह एवं गंडा सिंह दो वर्ष और सिख साखीकार यह समय चालीस दिन बताते हैं। अधिकाँश इतिहासकारों का कहना है कि गुरु साहिब 1606 ई० से 1608 ई० तक दो वर्ष ग्वालियर में बंदी रहे।

3. गुरु हरगोबिंद जी की रिहाई (Release of the Guru Hargobind Ji)-गुरु हरगोबिंद जी की रिहाई के संबंध में भी इतिहासकारों ने कई मत प्रकट किए हैं। सिख साखीकारों का कहना है कि गुरु जी को बंदी बनाने के बाद जहाँगीर बहुत बेचैन रहने लग पड़ा था। भाई जेठा जी ने जहाँगीर को पूर्णतः ठीक कर दिया। उनके ही निवेदन पर जहाँगीर ने गुरु साहिब को रिहा कर दिया। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि जहाँगीर ने यह निर्णय सूफी संत मीयाँ मीर के निवेदन पर लिया था। कुछ अन्य इतिहासकारों के विचारानुसार जहाँगीर गुरु साहिब के बंदी काल के दौरान सिखों की गुरु जी के प्रति श्रद्धा देखकर बहुत प्रभावित हुआ। फलस्वरूप जहाँगीर ने गुरु साहिब की रिहाई का आदेश दिया। गुरु जी की जिद्द पर ग्वालियर के दुर्ग में ही बंदी 52 अन्य राजाओं को भी रिहा करना पड़ा। इसके कारण गुरु हरगोबिंद जी को ‘बंदी छोड़ बाबा’ भी कहा जाने लगा।

4. जहाँगीर के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध (Friendly Relations with Jahangir)-शीघ्र ही जहाँगीर को यह विश्वास हो गया था कि गुरु साहिब निर्दोष थे और गुरु साहिब के कष्टों के पीछे चंदू शाह का बड़ा हाथ था। इसलिए जहाँगीर ने चंदू शाह को दंड देने के लिए सिखों के सुपुर्द कर दिया। यहाँ तक कि जहाँगीर ने अकाल तख्त साहिब के निर्माण कार्य के लिए सारा खर्चा देने की पेशकश की, परंतु गुरु जी ने इंकार कर दिया। इस प्रकार गुरु जी की ग्वालियर की रिहाई के पश्चात् तथा जहाँगीर की मृत्यु तक जहाँगीर एवं गुरु जी के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध रहे।

II. द्वितीय काल 1628-35 ई०
(Second Period 1628-35 A.D.)

1628 ई० में शाहजहाँ मग़लों का नया बादशाह बना। उसके शासनकाल में एक बार फिर सिखों और मुग़लों में निम्नलिखित कारणों से संबंध बिगड़ गए—
1. शाहजहाँ की धार्मिक कट्टरता (Shah Jahan’s Fanaticism)—शाहजहाँ बड़ा कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने हिंदुओं के कई मंदिरों को नष्ट करवा दिया। उसने गुरु अर्जन देव जी द्वारा लाहौर में बनवाई गई बाऊली के स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण करवा दिया था। फलस्वरूप सिखों में उसके प्रति अत्यधिक रोष उत्पन्न हो गया था।

2. नक्शबंदियों का विरोध (Opposition of Naqashbandis)-नक्शबंदी कट्टर सुन्नी मुसलमानों का एक संप्रदाय था। गुरु अर्जन देव जी को शहीद करवाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। शाहजहाँ के सिंहासन पर बैठने के पश्चात् एक बार फिर नक्शबंदियों ने शाहजहाँ को गुरु जी के विरुद्ध भड़काया। परिणामस्वरूप शाहजहाँ गुरु साहिब के विरुद्ध हो गया।

3. गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति (New Policy of Guru Hargobind Ji)-गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति भी सिखों तथा मुग़लों के मध्य संबंधों को बिगाड़ने का एक प्रमुख कारण बनी। इस नीति के कारण गुरु साहिब ने सैन्य शक्ति का संगठन कर लिया था। सिख श्रद्धालुओं ने उन्हें ‘सच्चा.पातशाह’ कहकर संबोधित करना आरंभ कर दिया था। शाहजहाँ इस नीति को मुग़ल साम्राज्य के लिए गंभीर खतरा समझता था। इसलिए उसने गुरु साहिब के विरुद्ध कार्यवाही करने का निर्णय किया।

4. कौलाँ का मामला (Kaulan’s Affair)-गुरु साहिब और शाहजहाँ के बीच कौलाँ के मामले के कारण तनाव में और वृद्धि हुई। कौलाँ लाहौर के काज़ी रुस्तम खाँ की पुत्री थी। वह गुरु अर्जन देव जी की वाणी को बहुत चाव से पढ़ती थी। काज़ी भला यह कैसे सहन कर सकता था। फलस्वरूप उसने अपनी बेटी पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए। कौला तंग आकर गुरु साहिब की शरण में चली गई। जब काजी को इस संबंध में ज्ञात हुआ तो उसने गुरु साहिब के विरुद्ध शाहजहाँ के खूब कान भरे।

सिखों और मुग़लों की लड़ाइयाँ
(Battles Between the Sikhs and Mughals)
मुग़लों और सिखों के बीच 1634-35 ई० में हुई चार लड़ाइयों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है—
1. अमृतसर की लड़ाई 1634 ई० (Battle of Amritsar 1634 A.D.)-1634 ई० में अमृतसर में मुग़लों और सिखों के बीच प्रथम लड़ाई हुई। शाहजहाँ अपने सैनिकों सहित अमृतसर के निकट शिकार खेल रहा था। शिकार खेलते समय शाहजहाँ का एक विशेष बाज़ उड़ गया। सिखों ने इस बाज़ को पकड़ लिया। मुग़ल सैनिकों ने बाज़ वापस करने की माँग की। सिखों के इंकार करने पर दोनों पक्षों में लड़ाई हो गई। इसमें कुछ मुग़ल सैनिक मारे गए। क्रोधित होकर शाहजहाँ ने लाहौर से मुखलिस खाँ के नेतृत्व में 7,000 सैनिकों की एक टुकड़ी अमृतसर भेजी। इस लड़ाई में गुरु साहिब के अतिरिक्त पैंदे खाँ ने अपनी वीरता प्रदर्शित की। मुखलिस खाँ गुरु साहिब से लड़ता हुआ मारा गया। परिणामस्वरूप मुग़ल सैनिकों में भगदड़ मच गई। इस लड़ाई में विजय के कारण सिख सेनाओं का साहस बहुत बढ़ गया। इस लड़ाई के संबंध में लिखते हुए प्रो० हरबंस सिंह का कहना है,
“अमृतसर की लड़ाई यद्यपि एक छोटी घटना थी किंतु इसके दूरगामी परिणाम निकले।”4

2. लहरा की लड़ाई 1634 ई० (Battle of Lahira 1634 A.D.)-शीघ्र ही मुग़लों तथा सिखों के मध्य लहरा (भटिंडा के निकट) नामक स्थान पर दूसरी लड़ाई हुई। इस लड़ाई के कारण दो घोड़े थे जिनके नाम दिलबाग तथा गुलबाग थे। इन दोनों घोड़ों को बखत मल और तारा चंद नामक दो मसंद काबुल से गुरु साहिब को भेंट करने के लिए ला रहे थे। मार्ग में ये दोनों घोड़े मुग़लों ने छीन लिए। गुरु साहिब का एक सिख भाई बिधी चंद भेष बदलकर दोनों घोड़े शाही घुड़साल से निकाल लाया। शाहजहाँ ने क्रोधित होकर तुरंत लल्ला बेग तथा कमर बेग के नेतृत्व में एक भारी सेना सिखों के दमन के लिए भेजी। लहरा नामक स्थान पर भयंकर लड़ाई हुई। इस लड़ाई में मुग़लों के दोनों सेनापति लल्ला बेग तथा कमर बेग मारे गए। इस लड़ाई में भाई जेठा जी भी शहीद हो गए। अंत में सिख विजयी रहे।

3. करतारपुर की लड़ाई 1635 ई० (Battle of Kartarpur 1635 A.D.)-मुग़लों तथा सिखों के मध्य तीसरी लड़ाई 1635 ई० में करतारपुर में हुई। यह लड़ाई पैंदा खाँ के कारण हुई। वह हरगोबिंद जी की सेना में पठान टुकड़ी का सेनापति था। उसने गुरु साहिब का एक बाज़ चोरी करके अपने दामाद को दे दिया। गुरु साहिब के पूछने पर उसने इस बात से इंकार कर दिया। जब गुरु जी को पैंदा खाँ के झूठ का पता चला तो उन्होंने उसे नौकरी से निकाल दिया। पैंदा खाँ मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की शरण में चला गया। पैंदा खाँ के उकसाने पर शाहजहाँ ने पैंदा खाँ और काले खाँ के नेतृत्व में एक विशाल सेना सिखों के विरुद्ध भेजी। करतारपुर में दोनों सेनाओं के मध्य भयंकर लड़ाई हुई। इस लड़ाई में तेग़ बहादुर जी ने अपने शौर्य का खूब प्रदर्शन किया। इस लड़ाई में गुरु साहिब से लड़ते हुए काले खाँ, पैंदा खाँ और उसका पुत्र कुतब खाँ मारे गए। इस प्रकार गुरु जी को एक शानदार विजय प्राप्त हुई।

4. फगवाड़ा की लड़ाई 1635 ई० (Battle of Phagwara 1635 A.D.)-करतारपुर की लड़ाई के पश्चात् गुरु हरगोबिंद जी कुछ समय के लिए फगवाड़ा आ गए। यहाँ अहमद खाँ के नेतृत्व में कुछ मुग़ल सैनिकों ने गुरु जी पर आक्रमण कर दिया। चूंकि मुग़ल सैनिकों की संख्या बहुत कम थी इसलिए फगवाड़ा में दोनों सेनाओं में मामूली झड़प हुई। फगवाड़ा की लड़ाई गुरु हरगोबिंद जी के समय में मुग़लों तथा सिखों के मध्य लड़ी गई अंतिम लड़ाई थी।

III. लड़ाइयों का महत्त्व (Importance of the Battles)
गुरु हरगोबिंद जी के काल में मुग़लों तथा सिखों के मध्य लड़ी गई विभिन्न लड़ाइयों का सिख इतिहास में विशेष महत्त्व है। इन लड़ाइयों में सिख विजयी रहे थे। इन लड़ाइयों में विजय के कारण सिखों का साहस बहुत बढ़ गया था। सिखों ने अपने सीमित साधनों के बलबूते पर इन लड़ाइयों में विजय प्राप्त की थी। अतः गुरु जी की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। बहुत-से लोग सिख धर्म में सम्मिलित हो गए। परिणामस्वरूप सिख पंथ का बड़ी तीव्रता से विकास होने लगा। प्रसिद्ध इतिहासकार पतवंत सिंह के अनुसार__ “इन लड़ाइयों का ऐतिहासिक महत्त्व इस बात में नहीं था कि ये कितनी बड़ी थीं अपितु इस बात में था कि इन्होंने आक्रमणकारियों के वेग को रोका तथा उनकी शक्ति को चुनौती दी। इसने मुग़लों के विरुद्ध चेतना का संचार किया तथा दूसरों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत की।”5

4. “This Amritsar action was a small incident but its implications were Far-reaching.” Prof. Harbans Singh, The Heritage of the Sikhs (Delhi : 1994)p.49.
5. “The historical importance of these battles did not lie in their scale, but in the fact that the aggressor’s writ was rejected and his power scorned. A mood of defience was generated agains the Mughals and an example set for others.” Patwant Singh, The Sikhs (New Delhi : 1999) p. 42.

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सिख पंथ के रूपांतरण में गुरु हरगोबिंद साहिब ने क्या योगदान दिया ?
(What contribution was made by Guru Hargobind Sahib in transformation of Sikhism ?)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी के गुरु काल की सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन करें। (Briefly describe the achievements of Guru Hargobind Ji’s pontificate.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी 1606 ई० से 1645 ई० तक गुरुगद्दी पर आसीन रहे। उन्होंने मीरी और पीरी नामक दो तलवारें धारण की। गुरु जी ने मुग़ल अत्याचारियों का सामना करने के लिए एक सेना का गठन किया। उन्होंने अमृतसर की रक्षा के लिए लोहगढ़ नामक एक दुर्ग का निर्माण करवाया। सिखों का सांसारिक मामलों में निर्देशन करने के लिए गुरु हरगोबिंद जी ने हरिमंदिर साहिब के सामने अकाल तख्त साहिब का निर्माण आरंभ करवाया। गुरु हरगोबिंद जी ने शाहजहाँ के समय में मुग़लों के साथ चार लड़ाइयाँ लड़ी जिनमें गुरु साहिब को विजय प्राप्त हुई।

प्रश्न 2.
गुरु हरगोबिंद जी ने नई नीति अथवा मीरी एवं पीरी नीति को क्यों धारण किया ?
(What were the main causes of the adoption of New Policy or Miri and Piri by Guru Hargobind Ji ?)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी ने नई नीति क्यों धारण की ? (Why did Guru Hargobind Ji adopt the ‘New Policy’ ?) ।
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी ने नई नीति क्यों धारण की ? कोई तीन कारण बताएँ। (Why did Guru Hargobind Ji adopt the New Policy ? Give any three reasons.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी द्वारा नई नीति अपनाने के कोई तीन कारण बताओ। (Describe any three causes of adoption of New Policy by Guru Hargobind Ji.)
उत्तर-

  1. मुग़ल बादशाह जहाँगीर बहुत कट्टर सुन्नी मुसलमान था। वह इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म को नहीं देख सकता था। इस बदली हुई स्थिति में गुरु साहिब को नई नीति अपनानी पड़ी।
  2. 1606 ई० में जहाँगीर ने गुरु अर्जन देव जी को लाहौर में शहीद कर दिया। गुरु हरगोबिंद जी ने मुग़लों के अत्याचारों का सामना करने के उद्देश्य से सिखों को हथियार-बंद करने का फैसला किया।
  3. गुरु अर्जन देव जी ने अपनी शहीदी से पूर्व अपने पुत्र हरगोबिंद जी को यह संदेश भेजा कि वह हथियारों से सुसज्जित होकर गुरुगद्दी पर बैठे तथा अपनी योग्यता के अनुसार सेना भी रखे।

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प्रश्न 3.
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं ?
(What were the main features of Guru Hargobind Ji’s New Policy ?)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति अथवा मीरी एवं पीरी के संबंध में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the New Policy or Miri and Piri of Guru Hargobind Ji ?)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की ‘नई नीति’ क्या थी ? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
(What was the ‘New Policy’ of Guru Hargobind Ji ? Explain its main features.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति की कोई तीन विशेषताएँ बताएँ। (Mention any three features of New Policy of Guru Hargobind Ji.)
उत्तर-

  1. गुरु हरगोबिंद जी बहुत शान-शौकत से गुरुगद्दी पर बैठे। उन्होंने मीरी तथा पीरी नामक दो तलवारें धारण की।
  2. सिख पंथ की रक्षा के लिए गुरु साहिब ने एक सेना का गठन किया।
  3. गुरु साहिब ने यह घोषणा की कि सिख उन्हें धन के स्थान पर शस्त्र और घोड़ें भेंट करें।

प्रश्न 4.
मीरी और पीरी के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about Miri and Piri ?)
अथवा
मीरी और पीरी से क्या भाव है ? इसकी ऐतिहासिक महत्ता बताएँ।
(What is Miri and Piri ? Describe its historical importance.)
अथवा
मीरी और पीरी से क्या भाव है ?
(What is meant by Miri and Piri ?)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति के महत्त्व का संक्षेप में वर्णन करें।
(Briefly describe the importance of the New Policy of Guru Hargobind Ji.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी ने गुरुगद्दी पर विराजमान होने के समय मीरी एवं पीरी नामक दो तलवारें धारण कीं। मीरी तलवार सांसारिक सत्ता की प्रतीक थी जबकि पीरी तलवार धार्मिक सत्ता की प्रतीक थी। इस प्रकार गुरु हरगोबिंद जी ने सिखों को संत सिपाही बना दिया। इसके कारण प्रथम, सिखों में जोशीली भावना का संचार हुआ। दूसरा, अब उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने का निर्णय किया। तीसरा, गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस नीति का अनुसरण करते हुए खालसा पंथ का सृजन किया।

प्रश्न 5.
गुरु हरगोबिंद जी के ग्वालियर में बंदी बनाए जाने पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on the imprisonment of Guru Hargobind Ji at Gwalior.)
अथवा
जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को बंदी क्यों बनाया ?
(Why did Jahangir arrest Guru Hargobind Ji ?)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी के गुरुगद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद ही वह मुग़ल सम्राट् जहाँगीर द्वारा बंदी बनाकर ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिए गए। गुरु साहिब को बंदी क्यों बनाया गया, इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि इसके लिए चंदू शाह का षड्यंत्र उत्तरदायी था। दूसरी ओर अधिकाँश इतिहासकार इस मत से सहमत हैं कि जहाँगीर ने गुरु साहिब को उनके द्वारा अपनाई गई नीति के कारण बंदी बनाया। अधिकाँश इतिहासकारों का कहना है कि गुरु साहिब 1606 ई० से 1608 ई० तक दो वर्ष ग्वालियर में बंदी रहे।

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प्रश्न 6.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़ल सम्राट् जहाँगीर के संबंधों पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on relations between Guru Hargobind Ji and Mughal emperor Jahangir.)
उत्तर-
1605 ई० में मुग़ल सम्राट् जहाँगीर के सिंहासन पर बैठने के साथ ही मुग़ल-सिख संबंधों में एक नया मोड़ आया। जहाँगीर बड़ा कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने गुरु अर्जन देव जी को शहीद करवा दिया था। मुग़ल अत्याचारों का मुकाबला करने के उद्देश्य के साथ गुरु हरगोबिंद जी ने नई नीति धारण की। परिणामस्वरूप जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद साहिब को बंदी बना कर ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया। बाद में जहाँगीर ने गुरु जी को रिहा करने का आदेश दिया। इसके बाद गुरु हरगोबिंद जी तथा जहाँगीर के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हो गए।

प्रश्न 7.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुगलों के बीच लड़ाइयों के क्या कारण थे ?
(What were the causes of battles between Guru Hargobind Ji and the Mughals.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी और मुगलों के बीच लड़ाइयों के कोई तीन कारण लिखो। (Write any three causes of battles between Guru Hargobind Ji and the Mughals.)
उत्तर-

  1. मुग़ल सम्राट शाहजहाँ एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने गुरु अर्जन देव जी द्वारा लाहौर में बनवाई गई बाऊली को गंदगी से भरवा दिया था।
  2. शाहजहाँ के समय नक्शबंदियों के नेता शेख मासूम ने सम्राट को सिखों के विरुद्ध कड़ी-से-कड़ी कार्यवाही करने के लिए भड़काया।
  3. गुरु हरगोबिंद जी ने अपनी सेना में बहुत-से मुग़ल सेना के भगौड़ों को भर्ती कर लिया था।
  4. सिख श्रद्धालु गुरु जी को ‘सच्चा पातशाह’ कहने लगे थे।
  5. लाहौर के काज़ी रुस्तम खाँ की पुत्री कौलां के गुरु जी का शिष्य बनने को शाहजहाँ सहन करने को तैयार नहीं था।

प्रश्न 8.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुगलों के मध्य हुई अमृतसर की लड़ाई का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
(Give a brief account of the battle of Amritsar fought between Guru Hargobind Ji and the Mughals.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी और मुग़लों के मध्य अमृतसर में प्रथम लड़ाई 1634 ई० में हुई। इस लड़ाई का मुख्य कारण एक बाज़ था। उस समय मुग़ल बादशाह शाहजहाँ एक विशेष बाज़ उड़ गया। सिखों ने उसको पकड़ लिया। फलस्वरूप शाहजहाँ ने सिखों को सबक सिखाने के लिए मुखलिस खाँ के नेतृत्व में 7000 सैनिक भेजे। सिखों ने मुग़ल सैनिकों का डटकर मुकाबला किया। इस लड़ाई में मुखलिस खाँ मारा गया। परिणामस्वरूप मुग़ल सैनिकों में भगदड़ मच गई। इस प्रकार मुग़लों और सिखों के मध्य हुई इस प्रथम लड़ाई में सिख विजयी रहे।

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प्रश्न 9.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुगलों के बीच हुई करतारपुर की लड़ाई के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the battle of Kartarpur fought between Guru Hargobind Ji and the Mughals ?)
उत्तर-
1635 ई० में मुग़लों तथा सिखों के मध्य करतारपुर में लड़ाई हुई। यह लड़ाई पैंदा खाँ के कारण हुई। गुरु हरगोबिंद जी ने उसके अहंकारी होने के कारण उसे अपनी फ़ौज में से निकाल दिया था। पैंदा खाँ ने इस अपमान का बदला लेने के लिए शाहजहाँ को गुरु जी के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के लिए खूब भड़काया। परिणामस्वरूप शाहजहाँ ने एक सेना गुरु हरगोबिंद जी के विरुद्ध भेजी। करतारपुर में दोनों सेनाओं के मध्य भयंकर लड़ाई हुई। इस लड़ाई में मुग़ल सेना को अंत में पराजय का सामना करना पड़ा।

प्रश्न 10.
गुरु हरगोबिंद जी की मुग़लों के साथ हुई लड़ाइयों का वर्णन करें तथा उनका ऐतिहासिक महत्त्व भी बताएँ।
(Write briefly Guru Hargobind Ji’s battles with the Mughals. What is their significance in Sikh History ?)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी की मुग़लों (शाहजहाँ के समय) के साथ 1634-35 ई० में चार लड़ाइयाँ हुईं। प्रथम लड़ाई 1634 ई० में अमृतसर में हुई। इसी वर्ष मुग़लों एवं सिखों में लहरा नामक लड़ाई हुई। 1635 ई० में गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़लों के मध्य तीसरी लड़ाई करतारपुर में हुई। इस लड़ाई में गुरु साहिब के दो पुत्रों गुरुदित्ता जी तथा तेग़ बहादुर जी ने वीरता के जौहर दिखाए। इसी वर्ष फगवाड़ा में मुग़लों तथा गुरु हरगोबिंद जी के मध्य अंतिम लड़ाई हुई। इन लड़ाइयों में सिख अपने सीमित साधनों के बावजूद सफल रहे।

प्रश्न 11.
गुरु हरगोबिंद जी को ‘बंदी छोड़ बाबा’ क्यों कहा जाता है ?
(Why is Guru Hargobind Ji known as ‘Bandi Chhor Baba’ ?)
उत्तर-
मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को बंदी बनाकर उन्हें ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया। उस समय इस दुर्ग में 52 अन्य राजा भी बंदी बनाए हुए थे। ये सभी राजा गुरु जी के विचारों से बहुत प्रभावित हुए। गुरु साहिब की मौजूदगी में वे अपने कष्ट भूल गए। जब जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को रिहा करने का निर्देश दिया तो गुरु जी ने कहा कि वे तब तक रिहा नहीं होंगे जब तक 52 राजाओं को नहीं छोड़ा जाता। अंततः मजबूर होकर जहाँगीर ने इन राजाओं को भी रिहा कर दिया। इसी कारण गुरु हरगोबिंद साहिब को ‘बंदी छोड़ बाबा’ कहा जाने लगा।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 7 गुरु हरगोबिंद जी और सिख पंथ का रूपांतरण

प्रश्न 12.
अकाल तख्त साहिब पर एक नोट लिखें।
(Write a note on Akal Takht Sahib.)
अथवा
अकाल तख्त साहिब के निर्माण एवं महत्त्व के बारे में लिखें।
Explain briefly about the construction and importance of Akal Takht Sahib.)
उत्तर-
अकाल तख्त साहिब का निर्माण गुरु हरगोबिंद जी का महान् कार्य था। सिखों के राजनीतिक तथा सांसारिक पथ-प्रदर्शन के लिए उन्होंने अकाल तख्त साहिब की नींव रखी। अकाल तख्त साहिब का निर्माण कार्य गुरु हरगोबिंद जी ने हरिमंदिर साहिब के सामने 1606 ई० में आरंभ करवाया था। यह कार्य 1609 ई० में संपूर्ण .. हुआ। इस तख्त पर बैठकर गुरु हरगोबिंद साहिब जी सिखों के राजनीतिक एवं सैनिक मामलों का नेतृत्व करते थे। यहाँ वह सैनिकों को प्रशिक्षण भी देते थे।

प्रश्न 13.
गुरु हरगोबिंद जी के मुगल बादशाह शाहजहाँ के साथ संबंधों का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Give a brief account of the relations of Guru Hargobind Ji with the Mughal Emperor Shah Jahan.)
उत्तर-
शाहजहाँ बहुत कट्टर सुन्नी बादशाह था। उसने गुरु अर्जन देव जी द्वारा लाहौर में बनाई गई बाऊली को गंदगी से भरवा दिया था। दूसरा, गुरु हरगोबिंद जी द्वारा सैना तैयार किए जाने तथा उनके अनुयायियों द्वारा उन्हें ‘सच्चा पातशाह’ कह कर संबोधन करना एक आँख नहीं भाता था। 1634-35 ई० के समय के दौरान सिखों तथा मुसलमानों के मध्य अमृतसर, लहरा, करतारपुर तथा फगवाड़ा नामक लड़ाइयाँ हुईं। इन लड़ाइयों में सिख विजयी रहे तथा मुग़लों को पराजय का सामना करना पड़ा।

प्रश्न 14.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़ल सम्राटों के संबंधों का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Write a brief note on the relations between Guru Hargobind Ji and the Mughal Emperors.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी के दो समकालीन मुग़ल बादशाह जहाँगीर तथा शाहजहाँ थे। ये दोनों बादशाह बहुत कट्टर विचारों के थे। इस कारण गुरु हरगोबिंद जी ने मुग़ल अत्याचारों का मुकाबला करने के लिए मीरी तथा पीरी की नीति धारण की। कुछ समय के लिए जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को ग्वालियर के दुर्ग में कैद कर लिया। बाद में जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी से मित्रता स्थापित कर ली। 1634-35 ई० के समय में शाहजहाँ के शासन काल में मुग़लों तथा सिखों के मध्य चार लड़ाइयाँ-अमृतसर, लहरा, करतारपुर तथा फगवाड़ा-लड़ी गईं। इनमें गुरु हरगोबिंद साहिब विजयी रहे।

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प्रश्न 15.
गुरु हरगोबिंद जी ने कीरतपुर में निवास करने का निर्णय क्यों किया? (Why did Guru Hargobind Ji Choose to settle down at Kiratpur ?)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी ने कीरतपुर में निवास करने का निर्णय निम्नलिखित कारणों में किया।

  1. यह प्रदेश मुग़ल अधिकारियों के सीधे अधिकार क्षेत्र में नहीं था।
  2. यह प्रदेश शिवालिक की पहाड़ियों से घिरा होने के कारण अधिक सुरक्षित था।
  3. इस प्रदेश में गुरु साहिब शांति के साथ रह सकते थे तथा वह अपना समय सिख धर्म के प्रचार में व्यतीत कर सकते थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
सिखों के छठे गुरु कौन थे ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद साहिब जी।

प्रश्न 2.
गुरु हरगोबिंद जी का गुरुकाल बताएँ।
उत्तर-
1606 ई० से 1645 ई०।

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प्रश्न 3.
गुरु हरगोबिंद जी कब गरुगद्दी पर बैठे थे ?
उत्तर-
1606 ई०।

प्रश्न 4.
गुरु हरगोबिंद जी के पिता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी।

प्रश्न 5.
गुरु हरगोबिंद जी की माता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-
गँगा देवी जी।

प्रश्न 6.
बीबी वीरो जी कौन थी ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी की सुपुत्री।

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प्रश्न 7.
गुरु हरगोबिंद जी के सबसे बड़े पुत्र का क्या नाम था ?
उत्तर-
बाबा गुरदित्ता जी।।

प्रश्न 8.
बाबा गुरदित्ता जी किसके पुत्र थे ?
अथवा
सूरज मल जी किसके पुत्र थे ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी के।

प्रश्न 9.
बाबा अटल राय जी किसके पुत्र थे ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी के।

प्रश्न 10.
बाबा अटल राय जी का गुरुद्वारा कहाँ स्थित है ?
उत्तर-
अमृतसर में।

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प्रश्न 11.
गुरु हरगोबिंद जी द्वारा नई नीति अपनाने का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर-
गुरु अर्जन देव जी की शहीदी।

प्रश्न 12.
मीरी और पीरी की प्रथा किस गुरु साहिब ने आरंभ की ?
अथवा
किस गुरु साहिब ने दो तलवारें धारण की ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद साहिब।

प्रश्न 13.
‘मीरी’ और ‘पीरी’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
मीरी सांसारिक सत्ता तथा पीरी आध्यात्मिक सत्ता की प्रतीक थी।

प्रश्न 14.
अकाल तख्त साहिब का निर्माण कहाँ किया गया?
उत्तर-
अमृतसर।

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प्रश्न 15.
अकाल तख्त साहिब का निर्माण किस गुरु साहिब ने करवाया ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी।

प्रश्न 16.
अकाल तख्त साहिब का निर्माण गुरु हरगोबिंद साहिब ने कब आरंभ किया था ?
उत्तर-
1606 ई०।

प्रश्न 17.
अकाल तख्त साहिब से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
ईश्वर की गद्दी।

प्रश्न 18.
अकाल तख्त साहिब किस ऐतिहासिक तथ्य पर प्रकाश डालता है ?
उत्तर-
सिख धर्म तथा सिख राजनीति का समावेश।

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प्रश्न 19.
लोहगढ़ का किला किसने बनवाया ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी ने।

प्रश्न 20.
गुरु हरगोबिंद जी ने लोहगढ़ किले का निर्माण कहां किया था ?
उत्तर-
अमृतसर।

प्रश्न 21.
गुरु हरगोबिंद जी की पठानों की सैनिक टुकड़ी का सेनानायक कौन था?
उत्तर-
पैंदा खाँ।

प्रश्न 22.
गुरु हरगोबिंद जी को किस मुग़ल सम्राट् ने बंदी बनाया ?
उत्तर-
जहाँगीर ने।

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प्रश्न 23.
जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को कहाँ बंदी बनाया था ?
उत्तर-
ग्वालियर के दुर्ग में।

प्रश्न 24.
‘बंदी छोड़ बाबा’ किसे कहा जाता है ?
अथवा
सिखों के किस गुरु को ‘बंदी छोड़ बाबा’ कहा जाता है ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी।

प्रश्न 25.
शाहजहाँ तथा सिखों में संबंध बिगड़ने का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर-
शाहजहाँ का धार्मिक कट्टरपन।

प्रश्न 26.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़लों के मध्य प्रथम लड़ाई कहाँ हुई ?
उत्तर-
अमृतसर।

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प्रश्न 27.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़लों में अमृतसर की लड़ाई कब हुई ?
उत्तर-
1634 ई०।

प्रश्न 28.
उन दो घोड़ों के नाम बताओ जो लहरा के युद्ध का कारण बने।
उत्तर-
दिलबाग तथा गुलबाग।

प्रश्न 29.
गुलबाग किसका नाम था ?
उत्तर-
गुलबाग गुरु हरगोबिंद जी को भेंट किए गए एक प्रसिद्ध घोड़े का नाम था।

प्रश्न 30.
दिलबाग किसका नाम था ?
उत्तर-
दिलबाग गुरु हरगोबिंद जी को भेंट किए गए एक प्रसिद्ध घोड़े का नाम था।

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प्रश्न 31.
बिधि चंद जी कौन थे ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी के एक अनुयायी।

प्रश्न 32.
कौलां कौन थी ?
उत्तर-
काज़ी रुस्तम खाँ की पुत्री।

प्रश्न 33.
दल भंजन गुर सूरमा किस गुरु साहिब को कहा जाता है ?
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी को।

प्रश्न 34.
करतारपुर की लड़ाई कब हुई ?
उत्तर-
1635 ई०।

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प्रश्न 35.
करतारपुर की लड़ाई में किस गुरु साहिब ने बहादुरी के जौहर दिखाए ?
उत्तर-
गुरु तेग़ बहादुर जी।

प्रश्न 36.
गुरु हरगोबिंद जी ने किस नगर की स्थापना की थी ?
उत्तर-
कीरतपुर साहिब।

प्रश्न 37.
गुरु हरगोबिंद जी ने अपने अंतिम दस वर्ष कहाँ व्यतीत किए ?
उत्तर-
कीरतपुर साहिब।

प्रश्न 38.
गुरु हरगोबिंद जी कब ज्योति-जोत समाए थे ?
उत्तर-
1645 ई०।

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प्रश्न 39.
गुरु हरगोबिंद जी कहाँ ज्योति-जोत समाए थे ?
उत्तर-
कीरतपुर साहिब।

(ii) रिक्त स्थान भरें – (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
गुरु हरगोबिंद जी का जन्म …………… में हुआ।
उत्तर-
(1595 ई०)

प्रश्न 2.
गुरु हरगोबिंद जी के पिता जी का नाम…………था।
उत्तर-
(गुरु अर्जन देव जी)

प्रश्न 3.
बाबा गुरदित्ता जी के पिता जी का नाम ………….. था।
उत्तर-
(गुरु हरगोबिंद जी)

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प्रश्न 4.
गुरु हरगोबिंद जी …………….. में गुरुगद्दी पर बैठे।
उत्तर-
(1606 ई०)

प्रश्न 5.
गुरु हरगोबिंद जी की पुत्री का नाम ……….. था।
उत्तर-
(बीबी वीरो जी)

प्रश्न 6.
गुरुगद्दी पर बैठते समय गुरु हरगोबिंद जी की आयु ………….. वर्ष की थी।
उत्तर-
(11)

प्रश्न 7.
गुरु हरगोबिंद जी ने ………. तलवारें धारण की।
उत्तर-
(मीरी एवं पीरी)

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प्रश्न 8.
अकाल तख्त साहिब का निर्माण …………… ने करवाया था।
उत्तर-
(गुरु हरगोबिंद जी)

प्रश्न 8.
………. में अकाल तख्त साहिब का निर्माण आरंभ किया गया था।
उत्तर-
(1606 ई०)

प्रश्न 10.
जहाँगीर की मृत्यु के बाद मुग़ल बादशाह ……. बना था।
उत्तर-
(शाहजहाँ)

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प्रश्न 11.
……………..को बंदी छोड़ बाबा कहा जाता है।
उत्तर-
(गुरु हरगोबिंद साहिब)

प्रश्न 12.
अमृतसर की लड़ाई ………….. में हुई।
उत्तर-
(1634 ई०)

प्रश्न 13.
लहरा की लड़ाई का मुख्य कारण …………और …………. नामक दो घोड़े थे।
उत्तर-
(दिलबाग, गुलबाग)

प्रश्न 14.
गुरु हरगोबिंद जी ने ………….. नामक नगर की स्थापना की।
उत्तर-
(कीरतपुर साहिब)

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प्रश्न 15.
गुरु हरगोबिंद जी ने …………….. को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
उत्तर-
(गुरु हर राय जी)

प्रश्न 16.
गुरु हरगोबिंद जी ……. में ज्योति-जोत समाये।
उत्तर-
(1645 ई०)

(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चनें—

प्रश्न 1.
गुरु हरगोबिंद जी सिखों के सातवें गुरु थे।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
गुरु हरगोबिंद जी का जन्म 1595 ई० में हुआ था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 3.
गुरु हरगोबिंद जी के पिता जी का नाम गुरु अर्जन देव जी था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 4.
गुरु हरगोबिंद जी के सबसे बड़े पुत्र का नाम बाबा गुरुदित्ता जी था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 5.
गुरु हरगोबिंद जी की पुत्री का नाम बीबी वीरो था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 6.
गुरु हरगोबिंद जी 1606 ई० में गुरुगद्दी पर बिराजमान हुए।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 7.
गुरु हरगोबिंद जी ने नई नीति का प्रचलन किया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 8.
गुरु हरगोबिंद जी ने मीरी और पीरी नीति का प्रचलन किया।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 9.
गुरु अर्जन देव जी ने अकाल तख्त के निर्माण का कार्य किया।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 10.
मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को ग्वालियर के किले में बंदी बना लिया था।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 11.
गुरु हरगोबिंद जी को ‘बंदी छोड़ बाबा’ कहा जाता है।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
शाहजहाँ 1628 ई० में मुगलों का नया बादशाह बना।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 13.
सिखों और मुग़लों के मध्य पहली लड़ाई अमृतसर में 1634 ई० में हुई।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 14.
गुरु हरगोबिंद जी ने कीरतपुर साहिब नामक एक नगर की स्थापना की थी।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 15.
गुरु हरगोबिंद जी 1635 ई० में ज्योति-ज्योत समाए।
उत्तर-
गलत

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
सिखों के छठे गुरु कौन थे ?
(i) गुरु अर्जन देव जी
(ii) गुरु हरगोबिंद जी
(iii) गुरु हर राय जी
(iv) गुरु हर कृष्ण जी।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 2.
गुरु हरगोबिंद जी का जन्म कब हुआ ?
(i) 1590 ई० में
(ii) 1593 ई० में
(iii) 1595 ई० में
(iv) 1597 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 3.
गुरु हरगोबिंद जी के पिता जी का क्या नाम था ?
(i) गुरु अर्जन देव जी
(ii) गुरु रामदास जी
(iii) गुरु हर राय जी
(iv) गुरु अमरदास जी।’
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 4.
गुरु हरगोबिंद जी की माता जी का क्या नाम था ?
(i) लक्ष्मी देवी जी
(ii) गंगा देवी जी
(ii) सुलक्खनी जी
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 5.
बीबी वीरो जी कौन थी ?
(i) गुरु हरगोबिंद जी की पत्नी
(ii) गुरु हरगोबिंद जी की सुपुत्री
(iii) गुरु हर राय जी की सुपुत्री
(iv) बाबा गुरदित्ता जी की पत्नी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 6.
गुरु हरगोबिंद जी गुरुगद्दी पर कब बैठे ?
(i) 1506 ई० में
(ii) 1556 ई० में
(iii) 1605 ई० में
(iv) 1606 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 7.
मीरी और पीरी की प्रथा किस गुरु साहिब ने आरंभ की ?
(i) गुरु अर्जन देव जी ने
(ii) गुरु हरगोबिंद जी ने
(iii) गुरु तेग़ बहादुर जी ने
(iv) गुरु गोबिंद सिंह जी ने।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 8.
अकाल तख्त साहिब का निर्माण किस गुरु साहिब ने करवाया था ?
(i) गुरु अमरदास जी ने
(ii) गुरु अर्जन देव जी ने
(iii) गुरु हरगोबिंद जी ने
(iv) गुरु तेग़ बहादुर जी ने।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 9.
अकाल तख्त का निर्माण कब संपूर्ण हुआ था ?
(i) 1606 ई० में
(ii) 1607 ई० में
(iii) 1609 ई० में
(iv) 1611 ई० में।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 10.
‘बंदी छोड़ बाबा’ किसको कहा जाता है ?
(i) बंदा सिंह बहादुर को
(ii) भाई मनी सिंह जी को
(iii) गुरु हरगोबिंद जी को
(iv) गुरु तेग़ बहादुर जी को।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 11.
गुरु हरगोबिंद जी और मुगलों में लड़ी गई पहली लड़ाई कौन-सी थी ?
(i) फगवाड़ा
(ii) अमृतसर
(iii) करतारपुर
(iv) लहरा।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 12.
गुरु हरगोबिंद जी और मुग़लों में लड़ी गई अमृतसर की लड़ाई कब हुई थी ?
(i) 1606 ई० में
(i) 1624 ई० में
(ii) 1630 ई० में
(iv) 1634 ई० में।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 13.
गुरु तेग़ बहादुर जी ने निम्नलिखित में से किस लड़ाई में वीरता का प्रदर्शन किया ?
(i) अमृतसर
(ii) लहरा
(iii) करतारपुर
(iv) फगवाड़ा।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 14.
गुरु हरगोबिंद जी ने किस नगर की स्थापना की थी ?
(i) करतारपुर
(ii) कीरतपुर साहिब
(iii) अमृतसर
(iv) तरन तारन।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 15.
गुरु हरगोबिंद जी ने अपना उत्तराधिकारी किसको नियुक्त किया ?
(i) हर राय जी को
(ii) हर कृष्ण जी को
(iii) तेग़ बहादुर जी को
(iv) गोबिंद राय जी को।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 16.
गुरु हरगोबिंद जी कब ज्योति-जोत समाए थे ?
(i) 1628 ई० में
(ii) 1635 ई० में
(iii) 1638 ई० में
(iv) 1645 ई० में।
उत्तर-
(iv)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
सिख पंथ के रूपांतरण में गुरु हरगोबिंद जी ने क्या योगदान दिया ?.
(What contribution was made by Guru Hargobind Ji in transformation of Sikhism ?)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी के गुरु काल की सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन करें। (Briefly describe the achievements of Guru Hargobind Ji’s pontificate.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी 1606 ई० से 1645 ई० तक गुरुगद्दी पर आसीन रहे। सिख पंथ के रूपांतरण में गुरु हरगोबिंद जी ने उल्लेखनीय योगदान दिया। वह बहुत शानो-शौकत से गुरुगद्दी पर बैठे। उन्होंने सच्चा पातशाह की उपाधि तथा मीरी और पीरी नामक दो तलवारें धारण की। मीरी तलवार सांसारिक सत्ता की और पीरी तलवार धार्मिक सत्ता की प्रतीक थी। गुरु जी ने मुग़लों से सिख पंथ की सुरक्षा के लिए सेना का गठन करने का निर्णय किया। उन्होंने सिखों को सिख सेना में भर्ती होने, घोड़े और शस्त्र भेट करने के लिए हुक्मनामे जारी किए। अमृतसर की रक्षा के लिए गुरु साहिब ने लोहगढ़ नामक एक दुर्ग का निर्माण करवाया। सिखों का सांसारिक मामलों में निर्देशन करने के लिए गुरु हरगोबिंद जी ने हरिमंदिर साहिब के सामने अकाल तख्त साहिब का निर्माण करवाया। गुरु साहिब के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर जहाँगीर ने उन्हें कुछ समय के लिए ग्वालियर के दुर्ग में बंदी बना लिया था। बाद में जहाँगीर ने गुरु साहिब की रिहाई का आदेश दिया। गुरु साहिब ने तब तक रिहा होने से इंकार कर दिया जब तक ग्वालियर के दुर्ग में बन्दी अन्य राजाओं को भी रिहा नहीं कर दिया जाता। परिणामस्वरूप जहाँगीर ने इन 52 राजाओं को भी रिहा कर दिया। इस कारण गुरु हरगोबिंद जी को बंदी छोड़ बाबा कहा जाने लगा। 1628 ई० में शाहजहाँ मुग़लों का नया बादशाह बना। वह बहुत कट्टर विचारों का था। शाहजहाँ के समय में गुरु हरगोबिंद जी ने मुग़लों के साथ चार लड़ाइयाँ-अमृतसर, लहरा, करतारपुर एवं फगवाड़ा में लड़ीं। इनमें गुरु साहिब को विजय प्राप्त हुई। गुरु जी ने कीरतपुर साहिब नामक एक नए नगर की स्थापना की। यहाँ रहते हुए गुरु हरगोबिंद जी ने सिख धर्म के प्रचार के लिए उल्लेखनीय कदम उठाए।

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प्रश्न 2.
गुरु हरगोबिंद जी ने नई नीति अथवा मीरी एवं पीरी नीति को क्यों धारण किया ?
(What were the main causes of the adoption of New Policy or Miri and Piri by Guru Hargobind Ji ?)
उत्तर-
1. मग़लों की धार्मिक नीति में परिवर्तन–जहाँगीर से पूर्व के शासकों के साथ सिखों के संबंध मधुर थे। बाबर ने गुरु नानक देव जी के प्रति सम्मान प्रकट किया था। हुमायूँ ने सिंहासन की पुनः प्राप्ति के लिए गुरु अंगद देव जी से आशीर्वाद प्राप्त किया। मुग़ल बादशाह अकबर ने गुरु अमरदास जी के समय स्वयं गोइंदवाल साहिब में आकर लंगर छका था। उसने गुरु रामदास जी को 500 बीघे भूमि दान में दी तथा पंजाब के किसानों का एक वर्ष का लगान माफ कर दिया था। परंतु 1605 ई० में बादशाह बना जहाँगीर बहुत कट्टर सुन्नी मुसलमान था। वह इस्लाम के सिवाय किसी अन्य धर्म को विकसित होते नहीं देख सकता था। अतः इन बदली हुई परिस्थितियों में गुरु साहिब को भी नई नीति अपनानी पड़ी।

2. गुरु अर्जन देव जी का बलिदान–जहाँगीर के लिए सिखों की बढ़ती लोकप्रियता असहनीय थी। इस लहर के दमन के लिए उसने 1606 ई० में गुरु अर्जन देव जी को शहीद कर दिया। गुरु अर्जन देव जी के बलिदान ने सिखों को स्पष्ट कर दिया था यदि वे जीवित रहना चाहते हैं तो उन्हें शस्त्रधारी बनकर मुगलों से टक्कर लेनी होगी। इस प्रकार गुरु अर्जन देव जी का बलिदान गुरु हरगोबिंद जी द्वारा नई नीति धारण करने के लिए काफ़ी सीमा तक उत्तरदायी था।

3. गुरु अर्जन देव जी का अंतिम संदेश—गुरु अर्जन देव जी ने अपने बलिदान से पूर्व अपने पुत्र हरगोबिंद जी को यह संदेश भेजा कि, “उसे पूरी तरह शस्त्रों से सुसज्जित होकर गद्दी पर बैठना चाहिए। अपनी पूर्ण योग्यता के अनुसार सेना रखनी चाहिए।” अतः गुरु साहिब के इन शब्दों को व्यावहारिक रूप देने का गुरु हरगोबिंद जी ने निश्चय किया।

प्रश्न 3.
गुरु हरगोबिंद जी द्वारा अपनाई गई नई नीति की विशेषताओं की व्याख्या करें।
(Explain the features of New Policy adopted by Guru Hargobind Ji)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी द्वारा अपनाई गई नई नीति कौन-सी थी ? उसकी विशेषताओं के बारे में जानकारी दें।
(WŁ t do you know about the New Policy of Guru Hargobind Ji ? Explain its features.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति अथवा मीरी एवं पीरी के संबंध में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the New Policy or Miri and Piri of Guru Hargobind Ji ?)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति की विशेषताएँ बताएँ। (Tell the features of New Policy of Guru Hargobind Ji.)
उत्तर-
1. मीरी तथा पीरी तलवारें धारण करना—गुरु हरगोबिंद साहिब ने गुरुगद्दी पर विराजमान होते समय मीरी तथा पीरी नामक दो तलवारें धारण की। मीरी तलवार सांसारिक सत्ता और पीरी तलवार धार्मिक नेतृत्व की प्रतीक थी। गुरु हरगोबिंद साहिब ने एक ओर सिखों को सतनाम का जाप करने तथा दूसरी ओर शस्त्र धारण करने का संदेश दिया। इस प्रकार गुरु साहिब ने सिखों को संत सिपाही बना दिया।

2. सेना का संगठन-गुरु हरगोबिंद साहिब द्वास सिख पंथ की रक्षा के लिए सेना का संगठन करने का भी निर्णय किया गया। उन्होंने सिखों को यह आदेश दिया कि वे गुरु साहिब की सेना में भर्ती हों। फलस्वरूप 500 योद्धा आपकी सेना में भर्ती हुए। धीरे-धीरे गुरु साहिब की सेना की संख्या बढ़कर 2500 हो गई। गुरु जी की सेना में पठानों की एक अलग सैनिक टुकड़ी बनाई गई। इसका सेनापति पैंदा खाँ को नियुक्त किया गया।

3. शस्त्र तथा घोड़े एकत्र करना-गुरु हरगोबिंद जी ने मसंदों को यह आदेश दिया कि वे सिखों से धन की अपेक्षा शस्त्र एवं घोड़े एकत्रित करें। सिखों से भी कहा कि वे मसंदों को शस्त्र एवं घोड़े भेंट करें। गुरु जी के इस आदेश का मसंदों और सिखों ने बड़े उत्साह से स्वागत किया। फलस्वरूप गुरु जी की सैन्य-शक्ति अधिक दृढ़ हो गई।

4. अकाल तख्त साहिब का निर्माण—गुरु हरगोबिंद जी द्वारा अकाल तख्त साहिब का निर्माण उनकी नई नीति का ही महत्त्वपूर्ण भाग था। अकाल तख्त साहिब का निर्माण गुरु हरगोबिंद साहिब ने हरिमंदिर साहिब के सामने करवाया था। इस तख्त पर बैठकर गुरु हरगोबिंद साहिब जी सिखों को सैनिक प्रशिक्षण देते, उनके सैनिक कारनामे देखते, मसंदों से घोड़े और शस्त्र स्वीकार करते, ढाडी वीर-रस की वारें सुनाते तथा सिखों के परस्पर झगड़ों का भी निपटारा करते थे।

5. राजनीतिक प्रतीकों को अपनाना-गुरु हरगोबिंद जी अपनी नई नीति के अंतर्गत राजसी ठाठ-बाठं से रहने लगे। उन्होंने अब सेली (ऊन की माला) के स्थान पर कमर में दो तलवारें धारण कीं। एक शानदार दरबार की स्थापना की गई। उन्होंने अब राजाओं की भाँति दस्तार के ऊपर कलगी सुशोभित करनी आरंभ कर दी। उन्होंने ‘सच्चा पातशाह’ की उपाधि धारण की।

6. अमृतसर की किलाबंदी-गुरु हरगोबिंद जी अमृतसर के महत्त्व से भली-भाँति परिचित थे। इसलिए इस महत्त्वपूर्ण स्थान की सुरक्षा के लिए अमृतसर शहर के चारों ओर एक दीवार बनवा दी। इसके अतिरिक्त यहाँ पर 1609 ई० में एक दुर्ग का निर्माण भी करवाया गया। जिसका नाम लोहगढ़ रखा गया। इस दुर्ग के निर्माण से सिखों का साहस बहुत बढ़ गया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 7 गुरु हरगोबिंद जी और सिख पंथ का रूपांतरण

प्रश्न 4.
गुरु हरगोबिंद साहिब जी की नई नीति क्या थी ? इस नई नीति को धारण करने के क्या कारण थे ?
(What was the New Policy of Guru Hargobind Sahib Ji ? What were the causes of adoption of New Policy ?)
उत्तर-
(i) गुरु हरगोबिंद साहिब जी की नई नीति—
1. मीरी तथा पीरी तलवारें धारण करना—गुरु हरगोबिंद साहिब ने गुरुगद्दी पर विराजमान होते समय मीरी तथा पीरी नामक दो तलवारें धारण की। मीरी तलवार सांसारिक सत्ता और पीरी तलवार धार्मिक नेतृत्व की प्रतीक थी। गुरु हरगोबिंद साहिब ने एक ओर सिखों को सतनाम का जाप करने तथा दूसरी ओर शस्त्र धारण करने का संदेश दिया। इस प्रकार गुरु साहिब ने सिखों को संत सिपाही बना दिया।

2. सेना का संगठन-गुरु हरगोबिंद साहिब द्वास सिख पंथ की रक्षा के लिए सेना का संगठन करने का भी निर्णय किया गया। उन्होंने सिखों को यह आदेश दिया कि वे गुरु साहिब की सेना में भर्ती हों। फलस्वरूप 500 योद्धा आपकी सेना में भर्ती हुए। धीरे-धीरे गुरु साहिब की सेना की संख्या बढ़कर 2500 हो गई। गुरु जी की सेना में पठानों की एक अलग सैनिक टुकड़ी बनाई गई। इसका सेनापति पैंदा खाँ को नियुक्त किया गया।

3. शस्त्र तथा घोड़े एकत्र करना-गुरु हरगोबिंद जी ने मसंदों को यह आदेश दिया कि वे सिखों से धन की अपेक्षा शस्त्र एवं घोड़े एकत्रित करें। सिखों से भी कहा कि वे मसंदों को शस्त्र एवं घोड़े भेंट करें। गुरु जी के इस आदेश का मसंदों और सिखों ने बड़े उत्साह से स्वागत किया। फलस्वरूप गुरु जी की सैन्य-शक्ति अधिक दृढ़ हो गई।

4. अकाल तख्त साहिब का निर्माण—गुरु हरगोबिंद जी द्वारा अकाल तख्त साहिब का निर्माण उनकी नई नीति का ही महत्त्वपूर्ण भाग था। अकाल तख्त साहिब का निर्माण गुरु हरगोबिंद साहिब ने हरिमंदिर साहिब के सामने करवाया था। इस तख्त पर बैठकर गुरु हरगोबिंद साहिब जी सिखों को सैनिक प्रशिक्षण देते, उनके सैनिक कारनामे देखते, मसंदों से घोड़े और शस्त्र स्वीकार करते, ढाडी वीर-रस की वारें सुनाते तथा सिखों के परस्पर झगड़ों का भी निपटारा करते थे।

5. राजनीतिक प्रतीकों को अपनाना-गुरु हरगोबिंद जी अपनी नई नीति के अंतर्गत राजसी ठाठ-बाठं से रहने लगे। उन्होंने अब सेली (ऊन की माला) के स्थान पर कमर में दो तलवारें धारण कीं। एक शानदार दरबार की स्थापना की गई। उन्होंने अब राजाओं की भाँति दस्तार के ऊपर कलगी सुशोभित करनी आरंभ कर दी। उन्होंने ‘सच्चा पातशाह’ की उपाधि धारण की।

6. अमृतसर की किलाबंदी-गुरु हरगोबिंद जी अमृतसर के महत्त्व से भली-भाँति परिचित थे। इसलिए इस महत्त्वपूर्ण स्थान की सुरक्षा के लिए अमृतसर शहर के चारों ओर एक दीवार बनवा दी। इसके अतिरिक्त यहाँ पर 1609 ई० में एक दुर्ग का निर्माण भी करवाया गया। जिसका नाम लोहगढ़ रखा गया। इस दुर्ग के निर्माण से सिखों
का साहस बहुत बढ़ गया।

(ii) नई नीति को धारण करने के कारण—
1. मग़लों की धार्मिक नीति में परिवर्तन–जहाँगीर से पूर्व के शासकों के साथ सिखों के संबंध मधुर थे। बाबर ने गुरु नानक देव जी के प्रति सम्मान प्रकट किया था। हुमायूँ ने सिंहासन की पुनः प्राप्ति के लिए गुरु अंगद देव जी से आशीर्वाद प्राप्त किया। मुग़ल बादशाह अकबर ने गुरु अमरदास जी के समय स्वयं गोइंदवाल साहिब में आकर लंगर छका था। उसने गुरु रामदास जी को 500 बीघे भूमि दान में दी तथा पंजाब के किसानों का एक वर्ष का लगान माफ कर दिया था। परंतु 1605 ई० में बादशाह बना जहाँगीर बहुत कट्टर सुन्नी मुसलमान था। वह इस्लाम के सिवाय किसी अन्य धर्म को विकसित होते नहीं देख सकता था। अतः इन बदली हुई परिस्थितियों में गुरु साहिब को भी नई नीति अपनानी पड़ी।

2. गुरु अर्जन देव जी का बलिदान–जहाँगीर के लिए सिखों की बढ़ती लोकप्रियता असहनीय थी। इस लहर के दमन के लिए उसने 1606 ई० में गुरु अर्जन देव जी को शहीद कर दिया। गुरु अर्जन देव जी के बलिदान ने सिखों को स्पष्ट कर दिया था यदि वे जीवित रहना चाहते हैं तो उन्हें शस्त्रधारी बनकर मुगलों से टक्कर लेनी होगी। इस प्रकार गुरु अर्जन देव जी का बलिदान गुरु हरगोबिंद जी द्वारा नई नीति धारण करने के लिए काफ़ी सीमा तक उत्तरदायी था।

3. गुरु अर्जन देव जी का अंतिम संदेश—गुरु अर्जन देव जी ने अपने बलिदान से पूर्व अपने पुत्र हरगोबिंद जी को यह संदेश भेजा कि, “उसे पूरी तरह शस्त्रों से सुसज्जित होकर गद्दी पर बैठना चाहिए। अपनी पूर्ण योग्यता के अनुसार सेना रखनी चाहिए।” अतः गुरु साहिब के इन शब्दों को व्यावहारिक रूप देने का गुरु हरगोबिंद जी ने निश्चय किया।

प्रश्न 5.
मीरी और पीरी के विषय में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Miri and Piri ?)
अथवा
मीरी और पीरी से क्या भाव है ? इसकी ऐतिहासिक महत्ता बताएँ। (What is Miri and Piri ? Describe its historical importance.)
अथवा
गुरु हरगोबिंद जी की नई नीति के महत्त्व का संक्षेप में वर्णन करें। (Briefly describe the importance of the New Policy of Guru Hargobind Ji.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी ने गुरुगद्दी पर बैठने के समय बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए मीरी एवं पीरी नामक दो तलवारें धारण करने का निर्णय किया। मीरी तलवार सांसारिक सत्ता की प्रतीक थी जबकि पीरी तलवार धार्मिक सत्ता की प्रतीक थी। गुरु साहिब द्वारा ये दोनों तलवारें धारण करने से अभिप्राय यह था कि आगे से वे अपने अनुयायियों का धार्मिक नेतृत्व करने के अतिरिक्त सांसारिक मामलों में भी नेतृत्व करेंगे। गुरु हरगोबिंद साहिब ने एक ओर सिखों को सतनाम का जाप करने और दूसरी ओर अपनी रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने का आदेश दिया। इस प्रकार गुरु हरगोबिंद जी ने सिखों को संत सिपाही बना दिया। गुरु हरगोबिंद जी द्वारा अपनाई गई इस मीरी और पीरी की नीति का सिख इतिहास पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। इसके कारण सर्वप्रथम सिखों में एक नया जोश उत्पन्न हुआ। दूसरा, अब उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने का निर्णय किया। तीसरा, गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस नीति का अनुसरण करते हुए खालसा पंथ का सृजन किया। चौथा, इस नीति के कारण सिखों और मुग़लों और अफ़गानों के बीच एक लंबा संघर्ष आरंभ हुआ जिसमें अंततः सिख विजयी रहे।

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प्रश्न 6.
गुरु हरगोबिंद जी के ग्वालियर में बंदी बनाए जाने पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the imprisonment of Guru Hargobind Ji at Gwalior.)
अथवा
जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को बंदी क्यों बनाया ? (Why did Jahangir arrest Guru Hargobind Ji ?)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी के गुरुगद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद ही वह मुग़ल सम्राट् जहाँगीर द्वारा बंदी बनाकर ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिए गए। गुरु साहिब को बंदी क्यों बनाया गया, इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि इसके लिए चंदू शाह का षड्यंत्र उत्तरदायी था। गुरु जी द्वारा उसकी पुत्री के साथ विवाह करने से पुनः इंकार करने पर उसने जहाँगीर को गुरु साहिब के विरुद्ध भड़काया। परिणामस्वरूप जहाँगीर ने उन्हें बंदी बना लिया। दूसरी ओर अधिकाँश इतिहासकार इस मत से सहमत हैं कि जहाँगीर ने गुरु साहिब को उनके द्वारा अपनाई गई नई नीति के कारण बंदी बनाया। इस नीति से उसके मन में अनेक शंकाएँ उत्पन्न हो गई थीं तथा गुरु साहिब के विरोधियों ने भी जहाँगीर के कान भरे कि गुरु जी विद्रोह करने की तैयारियाँ कर रहे हैं। इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है कि गुरु हरगोबिंद साहिब ग्वालियर के दुर्ग में कितना समय बंदी रहे। अधिकाँश इतिहासकारों का कहना है कि गुरु साहिब 1606 ई० से 1608 ई० तक दो वर्ष ग्वालियर में बंदी रहे।

प्रश्न 7.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़ल सम्राट् जहाँगीर के संबंधों पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on relations between Guru Hargobind Ji and Mughal emperor Jahangir.)
उत्तर-
1606 ई० में मुग़ल सम्राट् जहाँगीर के सिंहासन पर बैठने के साथ ही मुग़ल-सिख संबंधों में एक नया मोड़ आया। जहाँगीर बड़ा कट्टर सुन्नी मुसलमान था। सिंहासन पर बैठने के तुरंत पश्चात् उसने गुरु अर्जन देव जी को शहीद करवा दिया था। इस कारण मुग़ल-सिख संबंधों में तनाव पैदा हो गया। मुगल अत्याचारों का मुकाबला करने के उद्देश्य के साथ गुरु हरगोबिंद जी ने नई नीति धारण की। उन्होंने अपनी योग्यता के अनुसार कुछ सेना भी रखी। जहाँगीर यह सहन करने के लिए तैयार न था। चंदू शाह ने भी गुरु हरगोबिंद साहिब के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए जहाँगीर को भड़काया। परिणामस्वरूप जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद साहिब को बंदी बना कर ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया। गुरु साहिब ग्वालियर के दुर्ग में कितना समय बंदी रहे इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। भाई जेठा जी तथा सफ़ी संत मीयाँ मीर के कहने पर जहाँगीर ने गुरु जी को रिहा करने का आदेश दिया। गुरु जी के कहने पर जहाँगीर ने ग्वालियर के दुर्ग में बंदी बनाए 52 अन्य राजाओं को भी रिहा करने का आदेश दिया। इस कारण गुरु हरगोबिंद साहिब को ‘बंदी छोड़ बाबा’ कहा जाने लगा। इसके बाद गुरु हरगोबिंद साहिब तथा जहाँगीर के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हो गए।

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प्रश्न 8.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़लों के बीच लड़ाइयों के क्या कारण थे ? (What were the causes of battles between Guru Hargobind Ji and the Mughals ?)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़लों (शाहजहाँ) के मध्य लड़ाइयों के मुख्य कारण निम्नलिखित थे—

  1. मुग़ल सम्राट शाहजहाँ एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने गुरु अर्जन देव जी द्वारा लाहौर में बनवाई गई बाऊली को गंदगी से भरवा दिया था। सिख इस अपमान को किसी हालत में सहन करने को तैयार नहीं थे।
  2. शाहजहाँ के समय नक्शबंदियों के नेता शेख मासूम ने सम्राट को सिखों के विरुद्ध कड़ी-से-कड़ी कार्यवाही करने के लिए भड़काया।
  3. गुरु जी ने अपनी सेना में बहुत-से मुग़ल सेना के भगौड़ों को भर्ती कर लिया था। इसके अतिरिक्त गुरु जी ने कई राजसी चिह्नों को धारण कर लिया था। सिख श्रद्धालु गुरु जी को ‘सच्चा पादशाह’ कहने लगे थे। निस्संदेह शाहजहाँ भला यह कैसे सहन करता।
  4. कौलाँ लाहौर के काजी रुस्तम खाँ की बेटी थी। वह गुरु अर्जन देव जी की वाणी से प्रभावित होकर गुरु जी की शरण में चली गई थी। इस काजी द्वारा भड़काने पर शाहजहाँ ने गुरु जी के विरुद्ध कार्यवाही करने का निर्णय किया।

प्रश्न 9.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़लों के मध्य हुई अमृतसर की लड़ाई का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
(Give a brief account of the battle of Amritsar fought between Guru Hargobind Ji and the Mughals.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद साहिब जी के समय में मुग़लों और सिखों के मध्य अमृतसर में 1634 ई० में प्रथम लड़ाई हुई थी। इस लड़ाई का मुख्य कारण एक बाज़ था। कहा जाता है कि उस समय मुग़ल बादशाह शाहजहाँ अपने कुछ सैनिकों सहित अमृतसर के निकट एक वन में शिकार खेल रहा था। दूसरी ओर गुरु हरगोबिंद साहिब और उनके कुछ सिख भी उसी वन में शिकार खेल रहे थे। शिकार खेलते समय शाहजहाँ का एक विशेष बाज़ जो उसे ईरान के सम्राट ने भेट किया था, उड़ गया। सिखों ने इस को पकड़ लिया। उन्होंने यह बाज़ मुग़लों को लौटाने से इंकार कर दिया। फलस्वरूप शाहजहाँ ने सिखों को सबक सिखाने के उद्देश्य से मुखलिस खाँ के नेतृत्व में 7000 सैनिक भेजे। सिख सैनिकों ने मुग़ल सैनिकों का डटकर सामना किया। इस लड़ाई में मुखलिस खाँ मारा गया। इस कारण मुग़ल सैनिकों में भगदड़ मच गई। इस प्रकार मुगलों और सिखों के मध्य हुई इस प्रथम लड़ाई में सिख विजयी रहे। इस विजय के कारण सिखों के हौसले बुलंद हो गए।

प्रश्न 10.
गुरु हरगोबिंद जी के समय हुई लहरा की लड़ाई पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (Write a short note on the battle of Lahira fought in the times of Guru Hargobind Ji.)
उत्तर-
अमृतसर की लड़ाई के शीघ्र पश्चात् मुग़लों तथा सिखों के मध्य लहरा (भटिंडा के निकट) नामक स्थान पर दूसरी लड़ाई हुई। इस लड़ाई का कारण दो घोड़े थे जिनके नाम दिलबाग तथा गुलबाग थे। इन दोनों घोड़ों को, जो कि बहुत बढ़िया नस्ल के थे बखत मल और तारा चंद नामक दो मसंद काबुल से गुरु साहिब को भेट करने के लिए ला रहे थे। मार्ग में ये दोनों घोड़े मुग़लों ने छीन लिए और उन्हें शाही घुड़साल में पहुँचा दिया। यह बात गुरु साहिब का एक सिख भाई बिधी चंद सहन न कर सका। वह भेष बदल कर दोनों घोड़े शाही घुड़साल से निकाल लाया और गुरु साहिब के पास पहुँचा दिया। जब शाहजहाँ को यह सूचना मिली तो वह क्रोधित हो उठा। उसने तुरंत लल्ला बेग तथा कमर बेग के नेतृत्व में एक भारी सेना सिखों के दमन के लिए भेजी। लहरा नामक स्थान पर मुग़लों तथा सिखों के मध्य भयंकर लड़ाई हुई। इस लड़ाई में मुग़लों की भारी प्राण हानि हुई और उनके दोनों सेनापति लल्ला बेग तथा कमर बेग भी मारे गए। इस लड़ाई में भाई जेठा जी भी शहीद हो गए। इस लड़ाई में सिख विजयी रहे।

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प्रश्न 11.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुगलों के बीच हुई करतारपुर की लड़ाई के बारे में आप क्या जानते हैं ?
(What do you know about the battle of Kartarpur fought between Guru Hargobind Ji and the Mughals ?)
उत्तर-
1635 ई० में मुग़लों तथा सिखों के मध्य करतारपुर में तीसरी लड़ाई हुई। यह लड़ाई पैंदा खाँ के कारण हुई। वह गुरु हरगोबिंद जी की सेना में पठान टुकड़ी का सेनापति था। अमृतसर की लड़ाई में उसने वीरता का प्रमाण दिया, परंतु अब वह बहुत अहंकारी हो गया था। उसने गुरु साहिब का एक बाज़ चोरी करके अपने दामाद को दे दिया। गुरु साहिब के पूछने पर उसने इस बात से इंकार कर दिया कि उसे बाज़ के संबंध में कुछ पता है। तत्पश्चात् जब गुरु जी को पैंदा खाँ के झूठ का पता चला तो उन्होंने उसे नौकरी से निकाल दिया। पैंदा खाँ ने इस अपमान का बदला लेने का निर्णय किया। वह मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की शरण में चला गया। उसने शाहजहाँ को गुरु जी के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने के लिए खूब भड़काया। परिणामस्वरूप शाहजहाँ ने पैंदा खाँ और काले खाँ के नेतृत्व में एक विशाल सेना गुरु हरगोबिंद जी के विरुद्ध भेजी। करतारपुर में दोनों सेनाओं के मध्य भयंकर लड़ाई हुई। इस लड़ाई में गुरु जी के दो पुत्रों भाई गुरदित्ता तथा तेग़ बहादुर जी ने अपनी वीरता का प्रदर्शन किया। इस लड़ाई में गुरु साहिब से लड़ते हुए काले खाँ, पैंदा खाँ और उसका पुत्र कुतब खाँ मारे गए। मुग़ल सेना को भारी जन हानि हुई। इस प्रकार गुरु जी को एक और शानदार विजय प्राप्त हुई।

प्रश्न 12.
गुरु हरगोबिंद जी की मुग़लों के साथ हुई लड़ाइयों का वर्णन करें तथा उनका ऐतिहासिक महत्त्व भी बताएँ।
(Write briefly Guru Hargobind’s battles with the Mughals. What is their significance in Sikh History ?)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी की मुग़लों (शाहजहाँ के समय) के साथ 1634-35 ई० में चार लड़ाइयां हुईं। प्रथम लड़ाई 1634 ई० में अमृतसर में हुई। एक शाही बाज़ इस लड़ाई का तात्कालिक कारण सिद्ध हुआ। इस बाज़ को सिखों ने पकड़ लिया था तथा उसे मुग़लों को वापस करने से इंकार कर दिया था। शाहजहाँ ने मुखलिस खाँ के अधीन एक विशाल सेना सिखों को सबक सिखाने के लिए अमृतसर भेजी। इस लड़ाई में सिख बहुत बहादुरी से लड़े तथा अंत में विजयी रहे। दूसरी लड़ाई 1634 ई० में लहरा में हुई। इस लड़ाई का कारण दो घोड़े थे, जिनके नाम दिलबाग तथा गुलबाग थे। इस लड़ाई में मुग़लों का जान-माल का बहुत नुकसान हुआ। 1635 ई० में गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़लों के मध्य तीसरी लड़ाई हुई। इस लड़ाई में गुरु साहिब के दो पुत्रों गुरुदित्ता जी तथा तेग़ बहादुर जी ने वीरता के जौहर दिखाए। इसी वर्ष फगवाड़ा में मुग़लों तथा गुरु हरगोबिंद जी के मध्य अंतिम लड़ाई हुई। इन लड़ाइयों में सिख अपने सीमित साधनों के बावजूद सफल रहे जिस कारण उनकी प्रसिद्धि बहुत बढ़ गई। बड़ी संख्या में लोग सिख धर्म में सम्मिलित होने आरंभ हो गए।

प्रश्न 13.
गुरु हरगोबिंद जी को बंदी छोड़ बाबा’ क्यों कहा जाता है ? (Why is Guru Hargobind Ji known as ‘Bandi Chhor Baba’ ?)
उत्तर-
1605 ई० में मुग़ल सम्राट् जहाँगीर के सिंहासन पर बैठने के साथ ही मुग़ल-सिख संबंधों में एक नया मोड़ आया। जहाँगीर बड़ा कट्टर सुन्नी मुसलमान था। सिंहासन पर बैठने के तुरंत पश्चात् उसने गुरु अर्जन देव जी को शहीद करवा दिया था। इस कारण मुग़ल-सिख संबंधों में तनाव पैदा हो गया। मुग़ल अत्याचारों का मुकाबला करने के उद्देश्य के साथ गुरु हरगोबिंद जी ने नई नीति धारण की। उन्होंने अपनी योग्यता के अनुसार कुछ सेना भी रखी। जहाँगीर भला इसे कैसे सहन करता। इसके अतिरिक्त चंदू शाह ने भी गुरु हरगोबिंद जी के विरुद्ध कार्यवाई करने के लिए जहाँगीर के कानों में विष घोला। परिणामस्वरूप जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को बंदी बना कर ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया। गुरु साहिब ग्वालियर के दुर्ग में कितना समय बंदी रहे इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है। भाई जेठा जी तथा सफ़ी संत मियाँ मीर जी के कहने पर जहाँगीर ने गुरु जी को रिहा करने का आदेश दिया। मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने ग्वालियर के दुर्ग में 52 राजा राजनैतिक कारणों से बंदी बनाए हुए थे। ये सभी राजा गुरु जी के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए। गुरु साहिब की मौजूदगी में वे अपने सभी कष्ट भूल गए। पर जब जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को रिहा करने का निर्देश दिया तो दुर्ग में बंदी दूसरे राजाओं को बहुत निराशा हुई। क्योंकि गुरु साहिब को इन राजाओं से काफ़ी हमदर्दी हो गई थी इसलिए गुरु साहिब ने जहाँगीर को यह संदेश भेजा कि वह तब तक रिहा नहीं होंगे जब तक उनके साथ बंदी 52 राजाओं को भी रिहा नहीं कर दिया जाता। अंततः मजबूर होकर जहाँगीर ने इन राजाओं की रिहाई का निर्देश जारी कर दिया। इसी कारण गुरु हरगोबिंद जी को ‘बंदी छोड़ बाबा’ कहा जाने लगा।

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प्रश्न 14.
अकाल तख्त साहिब के बारे में संक्षिप्त लिखें।
(Write a short note on Akal Takht Sahib.)
अथवा
अकाल तख्त साहिब के निर्माण का सिख इतिहास में क्या महत्त्व है ? (What is the importance of building Sri Akal Takht Sahib in Sikh History ?)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी द्वारा अपनाई गई नई नीति के विकास में अकाल तख्त साहिब का निर्माण बहुत सहायक सिद्ध हुआ। वास्तव में यह गुरु साहिब का एक महान् कार्य था। अकाल तख्त (ईश्वर की गद्दी) साहिब का निर्माण कार्य गुरु हरगोबिंद जी ने हरिमंदिर साहिब के सामने 1606 ई० में आरम्भ करवाया था। यह कार्य 1609 ई० में संपूर्ण हुआ। इसकी नींव गुरु हरगोबिंद जी ने रखी थी। इसके निर्माण कार्य में बाबा बुड्वा जी एवं भाई गुरदास जी ने गुरु हरगोबिंद जी को सहयोग दिया। इसके भीतर एक 12 फीट ऊँचे चबूतरे का निर्माण किया गया जो एक तख्त के समान था। इस तख्त पर बैठकर गुरु हरगोबिंद जी सिखों के राजनीतिक एवं सांसारिक मामलों का नेतृत्व करते थे। यहाँ वे सिखों को सैनिक प्रशिक्षण देते थे तथा उनके मल्ल युद्ध तथा अन्य सैनिक कारनामे देखते थे। यहीं पर वे मसंदों से घोड़े और शस्त्र स्वीकार करते थे। सिखों में जोश उत्पन्न करने के लिए यहाँ ढाडी वीर-रस की वारें सुनाते थे। यहाँ पर बैठकर ही गुरु हरगोबिंद जी सिखों के परस्पर झगड़ों का भी निपटारा करते थे। यहाँ पर बैठकर ही गुरु जी सिखों को ईनाम भी देते थे तथा दंड भी। यहाँ से ही गुरु जी ने सिख संगत के नाम अपना प्रथम हुक्मनामा जारी किया था। इसमें गुरु जी ने सिखों को घोड़े एवं शस्त्र भेंट करने के लिए कहा था। बाद में यहाँ से हुक्मनामे जारी करने की प्रथा आरंभ हो गई। इस प्रकार गुरु हरगोबिंद जी ने अकाल तख्त साहिब का निर्माण करके सिखों की जीवन शैली में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया। शीघ्र ही अकाल तख्त साहिब सिखों की राजनीतिक गतिविधियों का एक प्रसिद्ध केंद्र बन गया।

प्रश्न 15.
गुरु हरगोबिंद जी के मुगल बादशाह शाहजहाँ के साथ संबंध कैसे थे ? संक्षिप्त वर्णन करें।
(Give a brief account of the relations of Guru Hargobind Ji with the Mughal Emperor Shah Jahan.)
उत्तर-
शाहजहाँ 1628 ई० में मुग़लों का नया बादशाह बना। उसके शासन काल में कई कारणों से मुग़ल-सिख संबंधों में तनाव पैदा हो गया। प्रथम, शाहजहाँ बहुत कट्टर सुन्नी बादशाह था। उसने गुरु अर्जन देव जी द्वारा लाहौर में बनाई गई बावली को गंदगी से भरवा दिया था तथा लंगर के लिए बनाए गए भवन को मस्जिद में परिवर्तित कर दिया था। दूसरा, नक्शबंदियों ने सिखों के विरुद्ध शाहजहाँ को भड़काने में कोई प्रयास शेष न छोड़ा। तीसरा, गुरु हरगोबिंद जी द्वारा सेना तैयार किए जाने तथा उनके अनुयायियों द्वारा उन्हें ‘सच्चा पादशाह’ कह कर संबोधन करना एक आँख नहीं भाता था। चौथा, लाहौर के एक काज़ी की लड़की जिसका नाम कौलाँ था, गुरु जी की शिष्या बन गई थी। इस कारण उस काज़ी ने शाहजहाँ को सिखों के विरुद्ध सख्त कदम उठाने के लिए उत्तेजित किया। 163435 ई० के समय के दौरान सिखों तथा मुग़लों के मध्य अमृतसर, लहरा, करतारपुर तथा फगवाड़ा नामक लड़ाइयाँ हुईं। इन लड़ाइयों में सिख विजयी रहे तथा मुग़लों को पराजय का सामना करना पड़ा। परिणामस्वरूप गुरु जी की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।

प्रश्न 16.
गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़ल सम्राटों के संबंधों का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Write a brief note on the relations between Guru Hargobind Ji and the Mughal Emperors.)
उत्तर-
गुरु हरगोबिंद जी के दो समकालीन मुग़ल बादशाह जहाँगीर तथा शाहजहाँ थे। ये दोनों बादशाह बहुत कट्टर विचारों के थे। 1606 ई० में जहाँगीर द्वारा गुरु हरगोबिंद जी के पिता गुरु अर्जन देव जी को लाहौर में शहीद करवा दिया गया था। अत: मुग़लों तथा सिखों के संबंधों में एक दरार आ गई थी। गुरु हरगोबिंद साहिब ने मुगल अत्याचारों का मुकाबला करने के लिए मीरी तथा पीरी की नीति धारण की। बहुत जल्द जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद साहिब को ग्वालियर के दुर्ग में कैद कर लिया। गुरु जी को क्यों कैद किया गया तथा कितनी अवधि के लिए कारावास में रखा गया इन विषयों पर इतिहासकारों में मतभेद हैं। बाद में जहाँगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को रिहा कर दिया तथा उनसे मित्रता स्थापित कर ली। 1628 ई० में शाहजहाँ मुग़लों का नया बादशाह बना। क्योंकि वह बहुत कट्टर विचारों का था इसलिए एक बार पुनः मुगलों तथा सिखों के संबंधों के मध्य दरार बढ़ गई। परिणामस्वरूप शाहजहाँ के शासन काल में मुग़लों तथा सिखों के मध्य चार लड़ाइयाँ-अमृतसर, लहरा, करतारपुर तथा फगवाड़ा-लड़ी गईं। इनमें गुरु हरगोबिंद जी विजयी रहे। इन विजयों के कारण सिखों का उत्साह बहुत बढ़ गया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 7 गुरु हरगोबिंद जी और सिख पंथ का रूपांतरण

Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।

1
गुरु हरगोबिंद साहिब ने गुरुगद्दी पर बैठते समय मीरी तथा पीरी नामक दो तलवारें धारण करने का निर्णय किया। मीरी तलवार सांसारिक सत्ता की प्रतीक थी और पीरी तलवार धार्मिक नेतृत्व की प्रतीक थी। इससे अभिप्राय यह था कि आगे से गुरु साहिब अपने श्रद्धालुओं का धार्मिक नेतृत्व करने के अतिरिक्त सांसारिक मामलों में भी पथ प्रदर्शन करेंगे। गुरु हरगोबिंद साहिब ने एक ओर सिखों को सतनाम का जाप करने और दूसरी ओर अपनी रक्षा के लिए शस्त्र धारण करने का संदेश दिया। उनका कथन था कि जहाँ दीन-दुःखियों की सहायता के लिए ‘देग’ होगी वहीं अत्याचारियों को यमलोक पहुँचाने के लिए तेग’ भी होगी। इस प्रकार गुरु साहिब ने सिखों को संत सिपाही बना दिया। गुरु हरगोबिंद साहिब द्वारा अपनाई गई इस मीरी तथा पीरी नीति का सिख इतिहास पर बहुत गहन प्रभाव पड़ा।

  1. गुरु हरगोबिंद जी गुरुगद्दी पर कब बैठे थे ?
  2. गुरु हरगोबिंद जी ने कौन-सी उपाधि धारण की थी ?
  3. मीरी तलवार किस सत्ता की प्रतीक थी ?
  4. पीरी तलवार …………….. सत्ता की प्रतीक थी।
  5. किस गुरु साहिबान ने सिखों को संत सिपाही बना दिया ?

उत्तर-

  1. गुरु हरगोबिंद जी 1606 ई० में गुरुगद्दी पर बैठे थे।
  2. गुरु हरगोबिंद जी ने सच्चा पातशाह की उपाधि धारण की।
  3. मीरी तलवार सांसारिक सत्ता की प्रतीक थी।
  4. धार्मिक सत्ता।
  5. गुरु हरगोबिंद जी ने सिखों को संत सिपाही बना दिया।

2
गुरु हरगोबिंद साहिब द्वारा अपनाई गई नई नीति के विकास में अकाल तख्त साहिब का निर्माण बहुत सहायक सिद्ध हुआ। वास्तव में यह गुरु साहिब का महान् कार्य था। अकाल तख्त (ईश्वर की गद्दी) साहिब का निर्माण कार्य गुरु हरगोबिंद साहिब ने हरिमंदिर साहिब के सामने 1606 ई० में आरंभ करवाया था। यह कार्य 1609 ई० में संपूर्ण हुआ।
इसके भीतर एक 12 फीट ऊँचे चबूतरे का निर्माण किया गया जो एक तख्त के समान था। इस तख्त पर बैठकर गुरु हरगोबिंद साहिब जी सिखों के राजनीतिक एवं सांसारिक मामलों का नेतृत्व करते थे। वहाँ वे सिखों को सैनिक प्रशिक्षण देते थे तथा उनके मल्ल युद्ध तथा अन्य सैनिक कारनामे देखते थे। यहीं पर वे मसंदों से घोड़े और शस्त्र स्वीकार करते थे। सिखों में जोश उत्पन्न करने के लिए यहाँ ढाडी वीर-रस की वारें सुनाते थे। यहाँ पर बैठकर ही गुरु हरगोबिंद जी सिखों के परस्पर झगड़ों का भी निपटारा करते थे।

  1. अकाल तख्त से क्या भाव है ?
  2. अकाल तख्त साहिब का निर्माण किस शहर में किया गया था ?
  3. अकाल तख्त साहिब का निर्माण क्यों किया गया था ?
  4. गुरु हरगोबिंद जी अकाल तख्त साहिब में कौन-से कार्य करते थे ?
  5. अकाल तख्त साहिब का निर्माण कब आरंभ किया गया था ?
    • 1605 ई०
    • 1606 ई०
    • 1607 ई०
    • 1609 ई०।

उत्तर-

  1. अकाल तख्त से भाव है-परमात्मा की गद्दी।
  2. अकाल तख्त साहिब का निर्माण अमृतसर में किया गया था।
  3. अकाल तख्त साहिब का निर्माण सिखो के राजनीतिक तथा संसारिक मामलों के नेतृत्व के लिए किया गया था।
  4. गुरु हरगोबिंद जी यहाँ सिखों को सैनिक शिक्षा देते थे।
  5. 1606 ई०

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 7 गुरु हरगोबिंद जी और सिख पंथ का रूपांतरण

3
अमृतसर की लड़ाई के शीघ्र पश्चात् मुग़लों तथा सिखों के मध्य लहरा (भटिंडा के निकट) नामक स्थान पर दूसरी लड़ाई हुई। इस लड़ाई का कारण दो घोड़े थे जिनके नाम दिलबाग तथा गुलबाग थे। इन दोनों घोड़ों को, जो कि बहुत बढ़िया नस्ल के थे बखत मल और तारा चंद नामक दो मसंद काबुल से गुरु साहिब को भेट करने के लिए ला रहे थे। मार्ग में ये दोनों घोड़े मुग़लों ने छीन लिए और उन्हें शाही घुड़साल में पहुँचा दिया। यह बात गुरु साहिब का एक सिख भाई बिधी चंद जी सहन न कर सका। वह भेष बदल कर दोनों घोड़े शाही घुड़साल से निकाल लाया और गुरु साहिब के पास पहुँचा दिया। जब शाहजहाँ को यह सूचना मिली तो वह क्रोधित हो उठा। उसने तुरंत लल्ला बेग तथा कमर बेग के नेतृत्व में एक भारी सेना सिखों के दमन के लिए भेजी। लहरा नामक स्थान पर मुग़लों तथा सिखों के मध्य भयंकर लड़ाई हुई। इस लड़ाई में मुग़लों का बहुत नुकसान हुआ।

  1. गुरु हरगोबिंद जी तथा मुगलों के मध्य लहरा की लड़ाई कब हुई थी ?
  2. उन दो घोड़ों के नाम लिखें जिस कारण लहरा की लड़ाई हुई थी ?
  3. कौन-सा सिख श्रद्धालु शाही अस्तबल में से घोड़ों को निकाल कर लाया था ?
  4. लहरा की लड़ाई में मुगलों के कौन-से सेनापति मारे गए थे ?
  5. लहरा की लड़ाई में मुग़लों का बहुत ……….. हुआ।

उत्तर-

  1. गुरु हरगोबिंद जी तथा मुग़लों के मध्य लहरा की लड़ाई 1634 ई० में हुई थी।
  2. उन दो घोड़ों के नाम दिलबाग तथा गुलबाग थे जिस कारण लहरा की लड़ाई हुई थी।
  3. भाई बिधी चंद जी वह सिख श्रद्धालु थे जो शाही अस्तबल में से घोड़ों को निकाल कर लाए थे।
  4. लहरा की लड़ाई में मुग़लों के मारे गए दो सेनापतियों के नाम लल्ला बेग तथा कमर बेग थे।
  5. नुकसान।

PSEB 7th Class Social Science Solutions Chapter 21 जनसंचार माध्यम तथा लोकतन्त्र

Punjab State Board PSEB 7th Class Social Science Book Solutions Civics Chapter 21 जनसंचार माध्यम तथा लोकतन्त्र Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Social Science Civics Chapter 21 जनसंचार माध्यम तथा लोकतन्त्र

SST Guide for Class 7 PSEB जनसंचार माध्यम तथा लोकतन्त्र Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में लिखो

प्रश्न 1.
जन संचार माध्यमों (मीडिया) तथा लोकतन्त्र में क्या सम्बन्ध है?
उत्तर-
जन संचार माध्यमों (मीडिया) और लोकतन्त्र में गहरा सम्बन्ध है। यह लोगों को लोकतान्त्रिक देश में हो रही घटनाओं की जानकारी देता है। यह उन्हें सरकार के कार्यों के प्रति सचेत करता है। यह लोकतन्त्र को आगे बढ़ाता है जो लोकतन्त्र की आत्मा है। इसलिए मीडिया को लोकतन्त्र का प्रकाश स्तम्भ भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
जन संचार के आधुनिक साधनों के नाम लिखो।
उत्तर-
समाचार-पत्र, रेडियो, टेलीविज़न तथा कम्प्यूटर जनसंचार के मुख्य आधुनिक साधन हैं। इनसे अशिक्षित लोगों को भी सरकार की गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है जिसके आधार पर वे अपने मत का निर्माण कर सकते हैं।

प्रश्न 3.
सूचना/जानकारी प्राप्त करने सम्बन्धी अधिकार से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
सूचना के अधिकार के अनुसार लोग कोई भी ऐसी सूचना प्राप्त कर सकते हैं जिसका उन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है। यह किसी भी अधिकारी के ग़लत कार्यों पर रोक लगाने अथवा निजी स्तर पर पूछताछ करने का अधिकार है।

प्रश्न 4.
विज्ञापन से आपका क्या भाव है?
उत्तर-
प्रत्येक उत्पादक अपनी वस्तु को अधिक-से-अधिक बेचना चाहता है। इसलिए वह लोगों का ध्यान अपने उत्पाद की ओर आकर्षित करने का प्रयास करता है। इसके लिए वह जो साधन अपनाता है, उसे विज्ञापन कहते हैं।

प्रश्न 5.
विज्ञापन कितनी प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
विज्ञापन मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं –

  1. व्यापारिक विज्ञापन
  2. सामाजिक विज्ञापन

व्यापारिक विज्ञापन किसी वस्तु की मांग को बढ़ाते हैं, जबकि सामाजिक विज्ञापन समाज-सेवा को प्रोत्साहन देते हैं और सामाजिक बुराइयों को दूर करने में सहायता पहुंचाते हैं।

प्रश्न 6.
विज्ञापन के मुख्य उद्देश्य कौन-से हैं?
उत्तर-
विज्ञापन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  1. किसी विशेष वस्तु बारे सूचना देना अर्थात् यह जानकारी देना कि किसी वस्तु को कहां से खरीदना है और कैसे उपयोग में लाना है।
  2. लोगों को उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित करना।
  3. सम्बन्धित संस्था को लोगों की नज़रों में लाना।

प्रश्न 7.
सामाजिक विज्ञापन से क्या भाव है?
उत्तर-
सामाजिक विज्ञापन उस विज्ञापन को कहा जाता है जिसके द्वारा समाज-कल्याण के लिए प्रयोग होने वाली सेवाओं का विज्ञापन किया जाता है। ऐसे विज्ञापन लोगों को विभिन्न बीमारियों, आपदाओं तथा सामाजिक बुराइयों के प्रति सचेत करते हैं और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देते हैं। दूसरे शब्दों में सामाजिक विज्ञापनों से भाव समाज-कल्याण के विज्ञापनों से है।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 50-60 शब्दों में लिखो

प्रश्न 1.
व्यापारिक विज्ञापन में क्या कुछ होता है?
उत्तर-
व्यापारिक विज्ञापन खरीददार या उपभोक्ता से जुड़ा हुआ होता है। उपभोक्ताओं में अधिकतर उपभोग की वस्तुओं के खरीदार शामिल हैं। वे अपने उपयोग के लिए या घर के लिए वस्तुएं खरीदते हैं। इन वस्तुओं में मुख्यतः खाद्य पदार्थ, राशन-पानी, कपड़े और विद्युत् से चलने वाली वस्तुएं (रेडियो, टी०वी०, फ्रिज़ आदि) शामिल हैं। लाखों की संख्या में खरीदारों को आकृष्ट करने के लिए विक्रेता कई प्रकार के ढंग अपनाते हैं। वे समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं (मैगजीनों) टेलीविज़न, रेडियो द्वारा अपने सामान का विज्ञापन करते हैं। वस्तुओं को बेचने का सबसे पुराना ढंग गलियों में आवाज़ देकर फेरी करना है। यह ढंग आज भी सब्जियां, फल तथा अन्य कई वस्तुएं बेचने वाले करते हैं। ये विज्ञापन खरीदारों से सीधी अपील करके वस्तुओं की बिक्री में वृद्धि करते हैं। ऐसे विज्ञापन को उपभोक्ता विज्ञापन भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
विज्ञापनकर्ता अपनी वस्तुओं के प्रति लोगों का व्यवहार परिवर्तित करने के लिए कौन-से ढंग अपनाते हैं ?
उत्तर-
विज्ञापनकर्ता अपनी वस्तुओं के प्रति लोगों का दृष्टिकोण बदलने के लिए निम्नलिखित माध्यमों से विज्ञापन करते हैं –

  1. गलियों में फेरी लगाकर
  2. अखबारों, पत्रिकाओं आदि में अपने इश्तिहार देकर
  3. रेडियो, टेलीविज़न पर अपने विज्ञापन देकर।

प्रश्न 3.
सार्वजनिक सेवाओं के साथ सम्बन्धित दो विज्ञापनों के नाम बताओ ।
उत्तर-
सार्वजनिक सेवाओं के मुख्य विज्ञापन निम्नलिखित विषयों से सम्बन्धित होते हैं –

  1. सामाजिक मुद्दे
  2. परिवार नियोजन
  3. पोलियो उन्मूलन
  4. कैंसर से बचाव
  5. एड्स के प्रति जागरूकता
  6. भ्रूण हत्या को रोकना
  7. सामुदायिक मेल-मिलाप
  8. राष्ट्रीय एकता
  9. प्राकृतिक आपदाएं
  10. रक्तदान
  11. सड़क सुरक्षा इत्यादि।

प्रश्न 4.
विज्ञापन सम्बन्धी अधिनियमों की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर-
विज्ञापन अपने आप में न अच्छा है न बुरा, परन्तु यह एक ऐसा साधन है जिसका प्रयोग अच्छे या बुरे ढंग से किया जाता है क्योंकि इसका समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए बुरी वस्तु को बढ़ावा देने वाली वस्तुओं के विज्ञापनों पर रोक लगाना ज़रूरी है। इन पर विशेष अधिनियम बनाकर ही रोक लगाई जा सकती है। उदाहरण के लिए अमेरिका में तम्बाकू के विज्ञापन पर कानूनी रोक लगा दी गई है। अतः हम कह सकते हैं कि विज्ञापन सम्बन्धी अधिनियम बहुत ज़रूरी हैं, ताकि बुरी वस्तुओं से बचा जा सके।

प्रश्न 5.
उन नैतिक नियमों का विवरण दो जिन्हें जन संचार माध्यमों (मीडिया) द्वारा अपनाना आवश्यक है।
उत्तर-
मीडिया द्वारा निम्नलिखित नैतिक नियमों का अपनाया जाना ज़रूरी है –

  1. स्वतन्त्र रहकर लोगों तक सही एवं सच्ची सूचना पहुंचाना।
  2. लोक कल्याण को बढ़ावा देना।
  3. लोगों में जागरूकता पैदा करना ताकि वे स्वशासन चलाने योग्य नागरिक बन सकें।
  4. साम्प्रदायिक तनाव पैदा न होने देना।
  5. लोकतन्त्र को मज़बूत बनाने वाली सूचना का संचार करना।
  6. सामाजिक उत्तरदायित्व को सही ढंग से निभाना।

(ग) खाली स्थान भरो

  1. जन संचार माध्यम (मीडिया) आधुनिक शासन प्रणाली की कमियां बताने के लिए एक ………….. साधन है।
  2. जन संचार माध्यमों (मीडिया) की मुख्य भूमिका …………… प्रदान करना है।
  3. …………….. से भाव है कि अपने दायित्वों को ठीक ढंग से निभाना।
  4. विज्ञापन अपने …………….. के आधार पर अलग-अलग हैं।
  5. किसी वस्तु की ………………. को बढ़ाना विज्ञापन का मुख्य उद्देश्य है।
  6. प्रत्याशियों तथा राजनीतिक दलों के पक्ष में …………….. विज्ञापन होता है।

उत्तर-

  1. शक्तिशाली एवं सीधा
  2. सही सूचना
  3. सदाचार
  4. उद्देश्य
  5. बिक्री अथवा मांग
  6. राजनीतिक।

(घ) निम्नलिखित वाक्यों में ठीक (✓) या गलत (✗) का निशान लगाओ

  1. लोगों के समूह के साथ सम्पर्क करने को जनसंचार माध्यम कहा जाता है।
  2. प्रकाशन के साधन को लोकतन्त्र का प्रकाश स्तम्भ कहा जाता है।
  3. विज्ञापन के मुख्य प्रकार-व्यापारिक विज्ञापन व सामाजिक विज्ञापन हैं।

संकेत-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✓)

(ङ) बहु-वैकल्पिक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
जनसंचार के इलेक्ट्रॉनिक साधन का नाम लिखें।
(क) अखबार
(ख) मैगज़ीन
(ग) टेलीविज़न।
उत्तर-
(ग) टेलीविज़न

प्रश्न 2.
विज्ञापन की मुख्य किस्में कितनी हैं ?
(क) दो
(ख) चार
(ग) छः।
उत्तर-
(क) दो

प्रश्न 3.
किस देश में प्रेस या छपाई के साधनों को लोकतन्त्र का प्रकाश स्तम्भ कहा जाता है?
(क) अफगानिस्तान
(ख) भारत
(ग) चीन।
उत्तर-
(ख) भारत

PSEB 7th Class Social Science Guide जनसंचार माध्यम तथा लोकतन्त्र Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
मीडिया किसे कहते हैं?
उत्तर-
लोगों के समूह के साथ-साथ सम्पर्क करने के अलग-अलग ढंगों को मीडिया कहते हैं।

प्रश्न 2.
मीडिया के कुछ उदाहरण दो।
उत्तर-
समाचार-पत्र, रेडियो, टेलीविज़न, सिनेमा, प्रैस, राजनीतिक दल, चुनाव आदि।

प्रश्न 3.
सबसे महत्त्वपूर्ण मीडिया कौन-सा है?
उत्तर-
प्रैस जिसमें समाचार-पत्र, मैगजीन, पुस्तकें आदि शामिल हैं।

प्रश्न 4.
प्रेस का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
प्रैस लोकतान्त्रिक राज्य में लोकमत का निर्माण करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम है। इसमें समाचारपत्र, मैगज़ीन (पत्रिकाएं) आदि शामिल हैं। दैनिक समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएं लोगों को राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की सूचनाएं प्रदान करती हैं। ये लोगों को विभिन्न राजनीतिक दलों की विचारधारा, संगठन-जातियों एवं सरकारी कार्यक्रमों के बारे में भी जानकारी देती हैं।

प्रश्न 5.
मीडिया के रूप में राजनीतिक दलों का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
राजनीतिक दल मीटिंगों, धरनों और चुनाव घोषणा-पत्रों द्वारा देश के नागरिकों को सरकार के कार्यों और कमजोरियों के सम्बन्ध में शिक्षित करते हैं। वे लोगों को सामाजिक समस्याओं की जानकारी देते हैं। इस प्रकार राजनीतिक दल लोकमत का निर्माण करने तथा उसे व्यक्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

प्रश्न 6.
चुनाव सन्तुलित लोकमत बनाने में कैसे सहायता करते हैं ?
उत्तर-
चुनाव के समय सभी राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए लोगों को अपनी सफलताओं और अन्य दलों की विफलताओं के बारे में बता कर शिक्षित करते हैं। अतः लोग विभिन्न दलों के विचार सुनकर अपना सन्तुलित मत बनाते हैं।

प्रश्न 7.
सूचना अधिकार सम्बन्धी अधिनियम किन-किन राज्यों में बनाए गए हैं?
उत्तर-
सूचना अधिकार सम्बन्धी नियम कई राज्यों ने बनाया है। सबसे पहले ऐसा अधिनियम राजस्थान सरकार द्वारा 2000 में पास किया गया था। इसके अधीन जनता सरकार के शासन सम्बन्धी हर तथ्य के बारे में सूचना प्राप्त कर सकती है। 2000 के बाद ऐसे अधिनियम महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गोआ तथा पंजाब राज्यों द्वारा भी पास किये गये हैं।

प्रश्न 8.
सूचना अधिकार नियम का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
सूचना अधिकार नियम भ्रष्ट अधिकारियों के ग़लत कार्यों पर रोक लगाने का महत्त्वपूर्ण हथियार है। अत: इससे भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी।

प्रश्न 9.
मानव विकास की प्रक्रिया में विज्ञापन के योगदान के बारे में लिखें।
उत्तर-
मानव विकास की प्रक्रिया में विज्ञापन अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समाज-कल्याण और समाजसुधार के क्षेत्र में विज्ञापन का बड़ा योगदान है। यह लोगों को ऐसे कामों के लिए उत्साहित और प्रेरित करता है जिनसे उनका अपना तथा पूरे समाज का भला होता है।

सही जोड़े बनाइए:

  1. पत्रकारिता (प्रेस) – बिजली का जनसंचार माध्यम
  2. टेलिविज़न – खरीददारों को आकर्षित करना
  3. व्यापारिक विज्ञापन – सड़क सुरक्षा, रक्तदान आदि के विज्ञापन।
  4. सामाजिक विज्ञापन – मुद्रित जनसंचार माध्यम

उत्तर-

  1. पत्रकारिता (प्रेस) – मुद्रित जनसंचार माध्यम
  2. टेलिविज़न – बिजली का जनसंचार माध्यम
  3. व्यापारिक विज्ञापन – खरीददारों को आकर्षित करना
  4. सामाजिक विज्ञापन – सड़क सुरक्षा, रक्तदान आदि के विज्ञापन।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

Punjab State Board PSEB 7th Class Agriculture Book Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 7 Agriculture Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

PSEB 7th Class Agriculture Guide फसलों के कीट और बीमारियाँ Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दें:

प्रश्न 1.
धान की फसल की किस बीमारी से बंगाल में अकाल पड़ा ?
उत्तर-
भूरी चित्ती की बीमारी।

प्रश्न 2.
पंजाब में कपास की फसल का 1996-2002 तक किस कीट ने सबसे अधिक नुकसान किया ?
उत्तर-
अमरीकन सुंडी।

प्रश्न 3.
उन फसलों को क्या कहते हैं, जिनमें किसी अन्य जीव/जंतु के जीन जाते हैं ?
उत्तर-
ट्रांसजेनिक।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 4.
क्या रासायनिक दवाइयाँ मनुष्य के लिए हानिकारक हैं ?
उत्तर-
रासायनिक दवाइयां मनुष्य के लिए हानिकारक हैं क्योंकि यह ज़हर होती हैं।

प्रश्न 5.
किसी एक फसल के जीवाणु रोग का नाम लिखो।
उत्तर-
तने का गलना।

प्रश्न 6.
किसी एक फसल के विषाणु रोग का नाम लिखो।
उत्तर-
ठुठ्ठी रोग।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 7.
कोई दो रस चूसने वाले कीटों के नाम लिखो।
उत्तर-
तेला, चेपा।

प्रश्न 8.
कोई दो फल और तना छेदक कीटों के नाम लिखो।
उत्तर-
गन्ने का कीट, चितकबरी सुंडी, बैंगन की सुंडी, मक्की की फसल की शाख की मक्खी ।

प्रश्न 9.
पौधों की बीमारियों का फैलाव कैसे होता है ?
उत्तर-
बीमारी वाले बीज, बामारी वाले खेत, वर्षा तथा तेज़ हवा के कारण।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 10.
क्या एक कीट कई फसलों का नुकसान कर सकता है ? उदाहरण दें।
उत्तर-
हां, कर सकता है, जैसे-तेला, कपास, मक्की, धान आदि को हानि पहुंचाता

(ख) एक-दो वाक्यों में उत्तर दें :

प्रश्न 1.
पौध-संरक्षण के कौन-कौन से ढंग हैं ?
उत्तर-
पौध संरक्षण के ढंग हैं-रासायनिक दवाइयां, रोग सहन करने वाली किस्में, भिन्न कीटनाशकों का प्रयोग, फसल की काश्त संबंधी व्यवस्थित तरीके; जैसे-बिजाई का समय, सिंचाई और खाद प्रबन्धन आदि कई मकैनिकल तरीके।

प्रश्न 2.
ट्रांसजेनिक विधि क्या होती है ?
उत्तर-
यह पौध संरक्षण का आधुनिक ढंग है। इस विधि में किसी भी जीव-जंतु से आवश्यक जीन फसलों में डाल कर पौध संरक्षण किया जा सकता है।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 3.
पौध-संरक्षण के असफल होने से कैसी स्थिति पैदा हो जाती है ?
उत्तर-
पौध संरक्षण के फेल होने से अकाल जैसी स्थिति पैदा हो जाती है।

प्रश्न 4.
अलग-अलग फसलों के रस चूसने वाले कीट कौन-से हैं ?
उत्तर-

रस चूसने वाला कीट फसल का नाम
1. तेला कपास, भिंडी, आम आदि
2. चेपा तेल बीज, गेहूँ, आड़ आदि
3. सफेद मक्खी कपास, टमाटर, पपीता आदि
4. मिली बग्ग कपास, आम, नींबू जाति के फल आदि।।

 

प्रश्न 5.
विषाणु रोग का फैलाव कैसे होता है और रोकथाम कैसे की जा सकती है ?
उत्तर-
पौधों में कीड़े-मकौड़ों द्वारा विषाणु रोग फैलते हैं। इनकी प्रभावशाली तरीके से रोकथाम मुश्किल है।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 6.
फंगस से होने वाली फसलों की मुख्य बीमारियाँ कौन-सी हैं ?
उत्तर-
फंगस या फंफूद से होने वाली बीमारियां हैं-झुलस रोग, बीज गलन रोग, कंगियारी, चिटों रोग।

प्रश्न 7.
कीड़े-मकौड़ों की कौन-सी मुख्य विशेषताएं हैं, जिनके कारण वह धरती पर अधिक संख्या में विद्यमान हैं ?
उत्तर-
शारीरिक बनावट, फलने-फूलने का ढंग, भिन्न-भिन्न भोजन पदार्थों की खाने की समर्था, फुर्तीलापन आदि ऐसे गुण हैं।

प्रश्न 8.
तना छेदक और फल छेदक कीट फसल का कैसे नुकसान करते हैं ?
उत्तर-
ये कीट पौधे के भिन्न-भिन्न भागों के अन्दर जाकर नुकसान करते हैं; जैसेतने में छेद करते हैं, सब्जियों तथा फलों के अन्दर जाते हैं।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 9.
पत्ते खाने वाले कीट फसल का कैसे नुकसान करते हैं ?
उत्तर-
यह कीट पत्तों को खाकर पौधे की प्रकाश संश्लेषण की समर्था को कम कर देते हैं।

प्रश्न 10.
रासायनिक दवाइयों के प्रयोग के लिए किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है ?
उत्तर-
रासायनिक दवाइयों को बच्चों की पहुंच से दूर रखना चाहिए। प्रयोग के समय पूरी सावधानी रखनी चाहिए, यदि ये जहर चढ़ जाए तो तुरंत डॉक्टर को बुला लेना चाहिए।

(ग) पाँच-छ: वाक्यों में उत्तर दें :

प्रश्न 1.
हानिकारक कीट फसलों को किन-किन तरीकों से नुकसान पहुँचाते
उत्तर-
हानिकारक कीट फसलों को अलग-अलग ढंग से हानि पहुंचाते हैं—
1. कई कीट ; जैसे-तेला, चेपा, सफेद मक्खी , मिली बग्ग आदि पत्तों में से रस चूस कर इनमें से हरा मादा तथा खनिज पदार्थों की कमी कर देते हैं। इस तरह पत्ते पीले पड़ जाते हैं तथा पौधे की वृद्धि रुक जाती है।
PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ 1
चित्र-फसल रस चूसने वाले कीट
चित्र-रस चूसने वाले कीट
PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ 2
चित्र-कपास की फसल पर टींडे की सुंडी का हमला
चित्र-तना छेदक कीट का हमला
चित्र-पत्ते को काट कर खाने वाली स्लेटी सुंडी

2. कुछ कीट पौधों के फलों तथा तनों आदि में जाकर नुकसान करते हैं; जैसे-गन्ने का कीट, मक्की की फसल में शाख की मक्खी, कपास की अमरीकन सुंडी आदि।

3. कुछ कीट पत्तों को खाकर प्रकाश संश्लेषण की समर्था कम कर देते हैं। यह या तो पत्तों को किनारों से मुख्य नाड़ी की तरफ खा जाते हैं या पत्तों का हरा मादा खा जाते हैं तथा पत्ते को छननी जैसा बना देते हैं। यह हैं-टिड्डे, सैनिक सुंडी, कंबल कीड़ा, हड्डा भंग आदि।

4. कुछ कीट जैसे दीमक, सफेद सुंडी ज़मीन के नीचे वाले भाग, जैसे-जडें, तना आदि को खा जाते हैं तथा पौधा मर जाता है।

PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ

प्रश्न 2.
फसलों की बीमारियों के मुख्य रूप से क्या-क्या कारण हैं ?
उत्तर-
फसलों को भिन्न-भिन्न अवस्था में फंगस, जीवाणु, विषाणु आदि से कई प्रकार की बीमारियां लग जाती हैं। पौधे की बीमारियां मुख्य रूप से बीमारी वाले बीजों, बीमारी वाले खेतों, वर्षा तथा तेज़ हवा के कारण एक खेत से दूसरे खेत में फैलती हैं।
फंगस से होने वाली बीमारियां—
फफूंद से होने वाली बीमारियां हैं—
झुलस रोग, बीज गलन रोग, कंगियारी, चिंटो रोग।
जीवाणुओं से होने वाली बीमारियां-तने का गलना, पत्तों का धब्बा रोग आदि। विषाणुओं से होने वाले रोग-जैसे ठुठ्ठी रोग, चितकबरा रोग।
PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ 3
चित्र-बीज गलन रोग
चित्र-मूंगी का चितकबरा रोग
PSEB 7th Class Agriculture Solutions Chapter 6 फसलों के कीट और बीमारियाँ 4
चित्र-कपास का ठूठी रोग

प्रश्न 3.
फसल-संरक्षण की क्या महत्ता है ?
उत्तर-
कृषि के क्षेत्र में बहुत उन्नति हुई है। बहुत उन्नत किस्में तथा नई तकनीकें खोज ली गई हैं परन्तु अधिक पैदावार लेने के लिए कीटों तथा रोगों से फसल का बचाव करना भी बहुत आवश्यक है। प्रत्येक वर्ष कीटों तथा रोगों के कारण एक तिहाई पैदावार का नुकसान हो जाता है। यह बचाव ही पौध संरक्षण है या फसल सुरक्षा है। यदि फसल की रोगों तथा कीटों के हमले से सुरक्षा नहीं की जाएगी तो अकाल पड़ सकता है, जैसे कि 1943 में बंगाल में धान को भूरी चित्ती के रोग के कारण हुआ था तथा 1996-2002 के दौरान पंजाब में कपास पर अमरीकन सुंडी के हमले के कारण सारी फसल ही नष्ट होने की कगार पर पहुंच गई थी। इसलिए फसल को सुरक्षित रख कर ही अधिक पैदावार तथा अधिक लाभ लिया जा सकता है।

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प्रश्न 4.
बीमारी या कीट के हमले से पहले पौध-संरक्षण के लिए कौन-से ढंग और सावधानियां अपनानी चाहिएं ?
उत्तर-
बीमारी या कीट के हमले से पहले अपनाए जाने वाले ढंग और सावधानियां इस प्रकार हैं—

  1. ऐसी किस्मों का चयन करें जो रोग सहने की समर्था रखती हों।
  2. बीजों की सुधाई करके बोना चाहिए।
  3. कुछ बीमारियों तथा कीटों से बचाव, खेतों को धूप में खुला रख कर किया जा सकता है।
  4. सिंचाई, खादें तथा दवाइयों का प्रयोग सही मात्रा में करना चाहिए, अनावश्यक नहीं ।
  5. खेतों के आस-पास मेडों पर खरपतवार को समाप्त करने से कीटों का हमला कम होता है।

प्रश्न 5.
बीमारी या कीट के हमले के बाद पौध-संरक्षण के लिए कौन-से ढंग और सावधानियां अपनानी चाहिएं ?
उत्तर-
बीमारी या कीटों का हमला होने के बाद प्रयोग किए जाने वाले ढंग इस प्रकार

  1. सबसे पहले बीमारी कौन-सी है, इसका कारण क्या है पता लगाएं। इसी प्रकार कीटों की पहचान करना भी आवश्यक है। इसके बाद इनकी रोकथाम की योजना तैयार करनी चाहिए। जैसे विषाणु रोग में इसको फैलाने वाले कीटों की रोकथाम करनी आवश्यक है।
  2. शुरू में ही जब बीमारी या कीटों का हमला कम होता है। ऐसे पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए।
  3. कीट या बीमारी के कारण हुए नुकसान के लिए दिए गए चेतावनी वाले स्तर पर ही रासायनिक कीटनाशकों/फंफूदी नाशकों का प्रयोग करना चाहिए।
  4. रासायनिक दवाइयों का चुनाव कीट के स्वभाव, हमले की निशानियां तथा बीमारी के कारण के अनुसार ही करना चाहिए।
  5. रासायनिक दवाइयों का सही मात्रा तथा सही समय का ध्यान रख कर ही प्रयोग करना चाहिए।

योग्यता विस्तार–अलग-अलग फसलों/सब्जियों पर बीमारियों के हमले वाले नमूने इकट्ठे करके एक फाइल तैयार करो।

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Agriculture Guide for Class 7 PSEB फसलों के कीट और बीमारियाँ Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
तेला कौन-सी फसलों को नुकसान पहुंचाता है ?
उत्तर-
कपास, भिण्डी, मक्का, आम आदि।

प्रश्न 2.
चेपा कौन-सी फसलों को हानि करता है ?
उत्तर-
गेहूं, तेल बीज, गाजरी पौधे, आडू

प्रश्न 3.
सफेद मक्खी कौन-सी फसलों को हानि पहुंचाती है ?
उत्तर-
नरमा, दालें, टमाटर, पपीता आदि।

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प्रश्न 4.
मिली बग्ग कौन-सी फसलों को हानि पहुंचाता है ?
उत्तर-
नरमा, आम, नींबू जाति के फल, पपीता आदि।

प्रश्न 5.
किसी तना छेदक कीट का नाम बताएं।
उत्तर-
मक्की की फसल में शाख की मक्खी, कमाद का कीट।

प्रश्न 6.
फल छेदक कीट की पहचान कैसे की जाती है ?
उत्तर-
कीट द्वारा छोड़े गए मल-मूत्र से।

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प्रश्न 7.
फल छेदक कीट का उदाहरण दें।
उत्तर-
अमरीकन सुंडी, बैंगन की सुंडी।

प्रश्न 8.
पत्तों को काटकर खाने वाले कीट पत्ते को कैसे खाते हैं ?
उत्तर-
यह पत्तों को किनारों से मुख्य नाड़ी की तरफ खाते हैं।

प्रश्न 9.
पत्तों को काट कर खाने वाले कीटों का उदाहरण दें।
उत्तर-
टिड्डे, सैनिक सुंडी, स्लेटी सुंडी, लाल सुंडी, भुंग आदि।

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प्रश्न 10.
पत्तों को छननी बनाने वाले कीट पत्तों का कैसे नुकसान करते हैं ?
उत्तर-
यह पत्तों का हरा मादा खा जाते हैं परन्तु पत्तों की नाड़ियों को नुकसान नहीं करते जिस कारण पत्ते छननी जैसे हो जाते हैं।

प्रश्न 11.
पत्तों को छननी जैसा बनाने वाले कीटों के नाम बताओ।
उत्तर-
हड्डा भुंग, कंबल कीड़ा, गोभी की तितली।

प्रश्न 12.
जड़ को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों के नाम बताओ।
उत्तर-
दीमक, सफेद सुंडी।

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प्रश्न 13.
झुलस रोग के लक्षण बताओ।
उत्तर-
पानी रिसते धब्बे पत्तों तथा तनों पर बनते हैं। सफेद फंफूद पत्तों के निचली ओर दिखाई देती है।

प्रश्न 14.
बीज गलन रोग के लक्षण बताओ।
उत्तर-
ज़मीन के अन्दर ही बीज गल जाता है।

प्रश्न 15.
कंगियारी के लक्षण बताओ।
उत्तर-
इसमें दानों के स्थान पर काला धुड़ा बन जाता है।

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प्रश्न 16.
चिटों रोग कौन-सी फसल को लगते हैं ?
उत्तर-
बेर, मटर, आदि।

प्रश्न 17.
विषाणु रोग कैसे फैलते हैं ?
उत्तर-
विषाणु रोग कीड़े-मकौड़ों द्वारा फैलते हैं।

प्रश्न 18.
नरमे (कपास) में सफेद मक्खी कौन-सा रोग फैलाती है ?
उत्तर-
ठुठ्ठी रोग।

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प्रश्न 19.
क्या विषाणु रोगों की रोकथाम आसानी से हो जाती है ?
उत्तर-
नहीं, इनकी रोकथाम मुश्किल है।

प्रश्न 20.
ठुठ्ठी रोग के लक्षण बताओ।
उत्तर-
पत्ते किनारों से अन्दर की ओर मुड जाते हैं।

प्रश्न 21.
चितकबरा रोग के लक्षण बताओ।
उत्तर-
पत्तों पर बिना क्रम के पीले तथा हरे धब्बे पड़ जाते हैं।

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प्रश्न 22.
पपीते को लगने वाला एक विषाणु रोग बताओ।
उत्तर-
ठुठ्ठी रोग।

प्रश्न 23.
मूंगी को लगने वाला एक विषाणु रोग बताओ।
उत्तर-
चितकबरा रोग।

प्रश्न 24.
कीटों तथा बीमारियों की उचित रोकथाम को कितने भागों में बांट सकते हैं ?
उत्तर-
दो भागों में।

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प्रश्न 25.
कीटों या बीमारियों को समाप्त करने के लिए रसायनों का चुनाव किस अनुसार करना चाहिए ?
उत्तर-
कीट के स्वभाव, हमले की निशानियां तथा बीमारी के कारण के अनुसार।

प्रश्न 26.
यदि किसी को जहर चढ़ जाए तो क्या पिला कर उल्टी करवानी चाहिए ?
उत्तर-
नमक वाला पानी पिला कर।

प्रश्न 27.
उल्टी किस स्थिति में नहीं करवानी चाहिए ?
उत्तर-
जब मरीज़ बेहोश हो जाए।

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छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
यदि कीटनाशक दवाइयां किसी की आंखों में पड़ जाएं तो क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
आंखों की पलकें खुली रखें और डॉक्टर के आने तक पानी से धोते रहें। डॉक्टर के बिना बताए कोई भी दवाई आँखों में न डालें।

प्रश्न 2.
कीटों का फसलों के विकास से क्या सम्बन्ध है ?
उत्तर-
कई कीट फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं जिससे उपज कम हो जाती है। कुछ कीट लाभकारी होते हैं; जैसे-मधुमक्खियां जो परागण क्रिया द्वारा फसलों की उपज बढ़ाने में सहायता करती हैं।

प्रश्न 3.
कीटनाशक दवाइयों की खाली बोतलों और डिब्बों को क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
खाली बोतलों और डिब्बों को जलाने की बजाय भूमि में दबा देना चाहिए।

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प्रश्न 4.
कृषि ज़हर छिड़काव करने वाले के खाने-पीने के बारे में बताएं।
उत्तर-
भूखे पेट छिड़काव न करें तथा छिड़काव के दौरान कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए। पहले ही पेट भरकर खाना खा लेना चाहिए।

प्रश्न 5.
सांस द्वारा अंदर गए जहर से बचाव के बारे में बताएं।
उत्तर-
रोगी को शीघ्र खुली हवा में ले जाएं तथा बंद कमरे की सभी खिड़कियां तथा दरवाजे खोल दें। रोगी के कपड़ों को ढीला कर दें। यदि सांस बंद हो रही हो या चाल में परिवर्तन नज़र आए तो उसे बनावटी सांस दें, परन्तु छाती पर भार न डालें। रोगी को सर्दी न लगने दें उसे कंबल आदि दें। रोगी को बोलने न दें। रोगी को घबराहट हो तो उसे अन्धेरे कमरे में रखें। वहां शोर आदि न करें।

प्रश्न 6.
रोमों द्वारा अंदर गए जहर से बचाव के बारे में बताएं।
उत्तर–
पानी से शरीर को गीला करें तथा रोगी के सारे कपड़े उतारकर शरीर पर लगातार पानी डालें। शरीर को पानी से लगातार साफ़ करें। शरीर को जल्दी धो लें, क्योंकि इससे काफ़ी फर्क पड़ता है।

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प्रश्न 7.
जहरीली दवाई आंख में पड़ जाने पर क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
ऐसी हालत में निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए—

  1. आंखों की पलकें खुली रखें।
  2. बहते पानी से जितनी जल्दी हो आंखों को धीरे-धीरे धोएं।
  3. डॉक्टर के आने तक आंखों को धोते रहें।
  4. किसी दवाई का प्रयोग डॉक्टर की सलाह के बिना न करें। ग़लत दवाई हानिकारक हो सकती है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
कृषि जहर से बचाव के आम साधन बताएं।
उत्तर-
रोगी को ठंड से बचाने के लिए हल्के कंबल का प्रयोग करें। इस काम के लिए गर्म पानी वाली बोतल का प्रयोग न करें। रोगी का बिस्तर पांव की तरफ से ऊंचा रखें तथा टांग और बाजुओं को फीतों से बांध दें। रोगी को चुस्ती के लिए हाइपोडरमिक टीके जैसे कैफीन तथा एपाइनाफ्रिन लगाएं। डेक्सटरोज 5% का घोल नाड़ी से शरीर में भेजें। रोगी को खून या प्लाज़मा भी दें। रोगी को तेज़ तथा ज्यादा दवाइयां देकर न थकाएं।

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प्रश्न 2.
कृषि ज़हरों के उचित प्रयोग का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
कृषि ज़हरों के उचित प्रयोग के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है, जो इस प्रकार हैं—

  1. पहले कीड़े, बीमारी तथा नदीनों की पहचान करके ही बताए गए ज़हर को उचित मात्रा में प्रयोग करें। हर कीड़े, बीमारी तथा नदीन के लिए अलग-अलग ज़हर अलग-अलग मात्रा में प्रयोग किया जाता है।
  2. दुकानदार की ग़लत राय न मानें बल्कि कृषि विशेषज्ञों से विचार-विमर्श करें।
  3. कभी भी कीटनाशक और नदीननाशकों को कृषि विशेषज्ञों से विचार-विमर्श किए बगैर मिलाकर न छिड़कें।
  4. कृषि ज़हरों का छिड़काव जिस दिन हवा न चल रही हो या कम हवा चलने के दौरान ही किया जाना चाहिए। छिड़काव करने वाले व्यक्ति का मुँह भी हवा की दिशा से उल्टा होना चाहिए।
  5. यदि छिड़काव करने के 24 घंटे के भीतर वर्षा हो जाए तो दोबारा छिड़काव करें।

प्रश्न 3.
कृषि ज़हरों के सुरक्षित प्रयोग के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर-
इनके सुरक्षित प्रयोग के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए—

  1. घरों में इन कीटनाशकों को खाने-पीने की वस्तुओं तथा दवाइयों से दूर रखें।
  2. कृषि ज़हर की शीशी या डिब्बे पर लिखे निर्देशों को ध्यान से पढ़कर ही उसे प्रयोग में लाएं।
  3. कीटनाशक दवाइयों वाली बोतलों और डिब्बों का दोबारा प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  4. कृषि ज़हरों को घर में हमेशा बच्चों की पहुंच से दूर रखें।
  5. यदि छिड़काव करते समय नोजल बंद हो जाए तो कभी भी मुँह से फूंक मारकर इसे खोलने की कोशिश न करें।
  6. छिड़काव करने से पहले ही पेट भर खाना खा लेना चाहिए। कभी भी खाली पेट छिड़काव न करें। खाने-पीने से पहले अच्छी तरह साबुन से हाथ धो लें।
  7. छिड़काव करने वाले व्यक्ति को दिन में 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करना चाहिए।
  8. कीटनाशक दवाइयों को पानी में घोलते समय छींटा वगैरह नहीं पड़ने देना चाहिए।
  9. तेज़ हवा वाले दिन छिड़काव न करें।
  10. छिड़काव का काम खत्म करके पहने हुए कपड़े बदलकर साबुन से अच्छी तरह धो लें।
  11. दवाई वाले खाली डिब्बों को न जलाएं बल्कि इन्हें भूमि में दबा दें।

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प्रश्न 4.
निगली हुई कीटनाशक दवाई से बचाव के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर-
यदि कृषि ज़हर निगल लिया हो तो उल्टी करवानी चाहिए। इसके लिए एक चम्मच नमक गर्म पानी में घोलकर रोगी को दें तथा तब तक देते रहें जब तक उल्टी न हो जाए। गले को उंगली से धीरे-धीरे टटोलें या चम्मच की पिछली तरफ को गले में रखने से जब पेट नमकीन पानी से भर जाए तो उल्टी आसानी से होगी।

यदि रोगी पहले ही उल्टी कर दे तो उसे बिना नमक के गर्म पानी ज्यादा मात्रा में दें। साथ बताए गए निर्देशों का पालन करें। यदि रोगी बेहोश हो जाए तो उल्टी की दवाई न दें।

फसलों के कीट और बीमारियाँ PSEB 7th Class Agriculture Notes

  • फसलों की अधिक पैदावार के लिए फसलों की कीटों तथा बीमारियों से सुरक्षा बहुत आवश्यक है।
  • प्रत्येक वर्ष बीमारियों तथा कीटों के कारण एक तिहाई पैदावार का नुकसान हो जाता है।
  • बंगाल में 1943 में धान में भूरी चित्ती की बीमारी के कारण अकाल पड़ गया था।
  • पंजाब में 1996 से 2002 तक अमरीकन सुंडी के हमले के कारण कपास की फसल तबाह हो गई थी।
  • कीड़े-मकौड़ों की जातियां अन्य सभी प्राणियों से अधिक हैं। ये अपने आप को प्रत्येक वातावरण में ढाल लेते हैं।
  • फसल को मुख्य रूप से चार प्रकार के कीट नुकसान पहुँचाते हैं।
  • रस चूसने वाले कीट हैं-तेला, चेपा, सफेद मक्खी आदि।
  • फल और तना छेदक कीट हैं-गन्ने का कीट, गुलाबी सुंडी, शाख की मक्खी, अमरीकन तथा चितकबरी सुंडी, बैंगन की सुंडी आदि।
  • पत्तों को खाने वाले कीट-टिड्डे, सैनिक सुंडी, लाल भंग, स्लेटी भंग आदि।
  • पत्तों को छननी बनाने वाले कीट हैं-हड्डा भंग, कंबल कीड़ा, गोभी की तितली आदि।
  • जड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट-दीमक, सफेद सुंडी आदि।
  • फसलों को बीमारियां, फंगस, जीवाणु, विषाणु आदि से लगती हैं।
  • फफूंद से लगने वाली बीमारियां हैं-झुलस रोग, बीज गलन रोग, कंगियारी, चिंटो रोग।
  • विषाणुओं से लगने वाले रोग हैं-ठुठ्ठी रोग, चितकबरा रोग।