PSEB 6th Class Agriculture Solutions Chapter 9 मुख्य फूल और पौधे

Punjab State Board PSEB 6th Class Agriculture Book Solutions Chapter 9 मुख्य फूल और पौधे Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Agriculture Chapter 9 मुख्य फूल और पौधे

PSEB 6th Class Agriculture Guide मुख्य फूल और पौधे Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो शब्दों में दो-

प्रश्न 1.
वर्षा ऋतु के फूल किस महीने में लगाए जाते हैं ?
उत्तर-
जुलाई में।

प्रश्न 2.
पतझड़ में लगाए जाने वाले पौधे का नाम लिखो।
उत्तर-
गुलदौदी।

प्रश्न 3.
कोई दो लाल रंग वाले फूलों के नाम लिखो।
उत्तर-
गुलमोहर, बोतल ब्रश।

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प्रश्न 4.
गुलाब के पौधे किस मौसम में लगाए जाते हैं ?
उत्तर-
नवंबर से मार्च तक।

प्रश्न 5.
किस फूल को पतझड़ की रानी कहा जाता है ?
उत्तर-
गुलदौदी को।

प्रश्न 6.
गुलदौदी के फूल किस महीने में निकलते हैं ?
उत्तर-
नवंबर-दिसंबर में।

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प्रश्न 7.
देसी गुलाब के फूलों की पत्तियों से क्या तैयार किया जाता है ?
उत्तर-
गुलकंद।

प्रश्न 8.
पेड़ किस विधि (तकनीक)द्वारा हवा में नमी की मात्रा बढ़ाकर वातावरण को ठंडा करते हैं ?
उत्तर-
वाष्पीकरण द्वारा।

प्रश्न 9.
वर्षा ऋतु के फलों के नाम लिखो।
उत्तर-
कुक्कड़ कलगा तथा बालसम।

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प्रश्न 10.
पौधे हवा में कौन-सी गैस छोड़ते हैं ?
उत्तर-
ऑक्सीजन।

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-दो वाक्यों में दो-

प्रश्न 1.
लताओं के कौन-से भाग उनको दीवारों पर चढ़ने में मदद करते हैं ? उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
लताओं पर लगे कांटे, रसदार पदार्थ, टैंडरिल आदि इन की दीवारों पर चढ़ने में सहायता करते हैं, जैसे-वोगनविलिया में कांटे, छिपकली लता में रसदार पदार्थ, गोल्डन शावर में टैंडरिल।

प्रश्न 2.
सर्दी में लगाए जाने वाले फूलों के नाम लिखो तथा इन्हें किस महीने में लगाया जाता है ?
उत्तर-
कुत्ता फूल, फ्लाक्स, वरबीना, गेंदा, गेंदी, स्वीट पीज आदि सर्दी के फूल हैं। इन को अक्तूबर-नवंबर में पनीरी तैयार करके लगाया जाता है।

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प्रश्न 3.
पतझड़ वाले पौधे किस महीने में लगाए जाते हैं तथा किन्हीं दो पतझड़ में लगाए जाने वाले पौधों के नाम लिखो।
उत्तर-
पतझड़ वाले पौधे हैं-क्वीन फ्लावर, सावनी, शहतूत। इनको अर्घ दिसम्बरजनवरी में लगाया जाता है।

प्रश्न 4.
सुंदर पत्तों वाली झाड़ियों के नाम लिखो तथा इनका चयन किस आधार पर किया जाता है ?
उत्तर-
गोल्डन शावर, लस्सन लता, पर्दा लता आदि सुंदर पत्तों वाली झाड़ियां हैं। इनको इनके कद के अनुसार लगाया जाता है।

प्रश्न 5.
फैलाव के आधार पर पेड़ों को कितनी श्रेणियों में बाँटा जा सकता है ?
उत्तर-
पेड़ों को गोल छाता (मोलसरी), फैलाव आकार (गुलमोहर), सीधे जाने वाली (सिल्वर ओक), झुकी शाखा वाले (बोतल ब्रश) आदि।

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(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर पाँच-छः वाक्यों में दो-

प्रश्न 1.
“फूल हमारे जीवन में अहम भूमिका निभाते हैं।” तथ्य की पुष्टि करो।
उत्तर-
फूलों का प्रयोग मनुष्य अपने जीवन में प्रत्येक सोपान पर करता है। जन्मदिन, विवाह, पाठ-पूजा, मन्दिर, मृत्यु आदि सारे अवसरों पर फूलों का प्रयोग किया जाता है। फूलों से हमें प्यार तथा संतोष का संदेश भी प्राप्त होता है। फूलों के रंग तथा सुगंध से हमारे मन को शांति मिलती है। फूलों के गुलदस्ते प्रदान करके शुभकामनाएं दी जाती हैं तथा स्वागत किया जाता है। फूलों को घरों की सजावट में प्रयोग किया जाता है। फूलों का तेल निकाल कर सुगंध वाली वस्तुएं भी तैयार की जाती हैं। गुलाब के फूल की पत्तियों से गुलकंद बनाया जाता है। इस प्रकार कई अन्य फूलों का प्रयोग हर्बल दवाइयों में भी होता है। इस तरह फूल हमारी ज़िन्दगी का अहम भाग हैं।

प्रश्न 2.
वातावरण को स्वच्छ रखने में पौधों का क्या योगदान है ?
उत्तर-
पौधे आस-पास को सुंदर बनाने का काम करते हैं तथा साथ ही वे वातावरण में से कार्बन डाइआक्साइड को सोखते हैं तथा ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इस तरह वातावरण शुद्ध होता है। ये हवा में से मिट्टी के कणों, हानिकारक गैसों तथा पदार्थों को अपने में समा लेते हैं। पौधे हवा में से नमी की मात्रा भी बढ़ाते हैं तथा वातावरण को ठण्डा रखते हैं। पौधे ध्वनि प्रदूषण को भी रोकते हैं। इस तरह पौधे वातावरण को साफ रखने में योगदान देते हैं।

प्रश्न 3.
आकार के आधार पर पेड़ों को कितनी श्रेणियों में बाँटा जा सकता है ? उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
पेड़ों को कद तथा छतरी के आधार पर बड़े, मध्यम तथा छोटे वृक्षों में बाँटा जा सकता है। कम फैलाव वाला पेड़ है अशोका। पेड़ों को आकार के आधार पर भी बांटा जा सकता है। जैसे मोलसरी की गोल छतरी, गुलमोहर का फैलाव आकार है, सिल्वर ओक सीधे जाने वाला पेड़ है, बोतल ब्रश की शाखाएं झुकी होती हैं।

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प्रश्न 4.
पेड़ों तथा झाड़ियों को लगाने का ढंग विस्तृत रूप में लिखिए।
उत्तर-
पेड़ तथा झाड़ियां लगाने के लिए एक से तीन फुट गहरा गड्ढा खोदा जाता है। इसमें दो भाग मिट्टी तथा एक भाग गली-सड़ी रूड़ी खाद मिला दी जाती है। इनमें समय के अनुसार पेड़, झाड़ियां आदि को लगाना चाहिए। पेड़ तथा झाड़ियों की हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ये वातावरण को शुद्ध करने का कार्य भी करते हैं। इन्हें काफ़ी संख्या में लगाना चाहिए तथा लगे हुए पेड़ों की अच्छी संभाल करनी चाहिए।

प्रश्न 5.
गुलदौदी के फूलों के बारे में आप क्या जानते हैं ? विस्तृत रूप में लिखिए।
उत्तर-
गुलदौदी को पतझड़ की रानी भी कहा जाता है। इस की जड़ों वाले टुसे जुलाई-अगस्त में लगाए जाते हैं। इस को फूल नवंबर-दिसंबर में लगते हैं तथा जनवरी तक खिलते रहते हैं। ये फूल देखने में बहुत सुंदर तथा मनमोहक होते हैं। इनको क्यारियों में लगाया जाता है।

प्रश्न 6.
कौन-से फूलों का तेल निकाल कर उसे खुशबू की वस्तुओं में प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
गुलाब, जैसमीन, रजनीगंधा, मोतिया आदि का तेल निकाल कर उसे खुशबू वाली वस्तुओं में प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 7.
व्यापारिक पक्ष से सजावटी फूल कैसे लाभदायक हो सकते हैं ?
उत्तर-
फूलों का व्यापार करके अच्छी कमाई की जा सकती है। पंजाब में गेंदा, गेंदी तथा ग्लैडिऑल्स आदि की कृषि व्यापारिक स्तर पर की जाती है। जरवरा तथा गुलाब की उच्च स्तर पर पैदावार की जाती है। इनको प्लास्टिक के ग्रीन हाऊस बना कर उगाया जाता है। इस तरह मौसमी फूलों के बीज तैयार करके अमेरिका, कनाडा, जर्मनी आदि भेजे जाते हैं।

प्रश्न 8.
पेड़ झाड़ियाँ, लताएं आदि लगाने का उचित समय कौन-सा होता
उत्तर-
पेड़, झाड़ियां, लताएं आदि लगाने का उचित समय बरसात का मौसम जुलाई-अगस्त तथा वसंत ऋतु के फरवरी-मार्च के महीने हैं।

Agriculture Guide for Class 6 PSEB पमुख्य फूल और पौधे Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
फूल हमें क्या संदेश देते हैं ?
उत्तर-
प्यार तथा संतोष का।

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प्रश्न 2.
कौन से फूलों का तेल निकाल कर सुगंधित वस्तुएं बनाई जाती हैं ?
उत्तर-
गुलाब, जैसमीन, रजनीगंधा, मोतिया।

प्रश्न 3.
पौधे हवा में से कौन-सी गैस खींचते हैं ?
उत्तर-
कार्बन डाइऑक्साइड।

प्रश्न 4.
फ्लाक्स, वरबीना, गेंदा आदि को कब लगाया जाता है ?
उत्तर-
अक्तूबर-नवंबर में पनीरी तैयार करके।

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प्रश्न 5.
बालसम तथा कुक्कड़ कलगा कौन से मौसम के फूल हैं ?
उत्तर-
बरसात के मौसम के।

प्रश्न 6.
पंजाब में कौन-से फूलों की काश्त व्यापारिक स्तर पर होती है ?
उत्तर-
गेंदा, गेंदी, ग्लैडिऑल्स।

प्रश्न 7.
फूलों की पनीरी कब लगाई जाती है ?
उत्तर-
साधारणतः शाम को।

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प्रश्न 8.
अशोका को घरों में क्यों लगाया जाता है ?
उत्तर-
इसका फैलाव कम होने के कारण।

प्रश्न 9.
पतझड़ी पौधों के उदाहरण दें।
उत्तर-
क्वीन फ्लावर, सावनी, शहतूत।

प्रश्न 10.
पीले फूलों वाले पौधे बताएं।
उत्तर-
अमलतास।

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प्रश्न 11.
जामुनी फूलों वाले पौधे बताएं।
उत्तर-
नीली मोहर, क्वीन फ्लावर।

प्रश्न 12.
गुलाबी फूल वाले पौधे बताएं।
उत्तर-
गुलाबी मोहर।

प्रश्न 13.
गमले में सजावट के लिए लगाए जाने वाले पौधों के नाम बताएं।
उत्तर-
पालम, मनी प्लांट, रबड़ प्लांट आदि।

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छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
फूलों की पनीरी लगाने के बारे में तथा गुडाई के बारे में बताएं।
उत्तर-
फूलों की पनीरी शाम के समय लगाई जाती है तथा पानी लगा दिया जाता है। इस तरह ये पौधे मुरझाते नहीं। क्यारियों में समय-समय पर गुडाई करते रहना चाहिए इससे रोग तथा कीड़ों की रोकथाम हो जाती है।

प्रश्न 2.
व्यापारिक स्तर पर फूलों की काश्त के बारे में बताएं।
उत्तर-
फूलों का व्यापार करके अच्छा लाभ लिया जा सकता है। पंजाब में गेंदा, गेंदी तथा ग्लैडिऑल्स आदि की काश्त व्यापारिक स्तर पर होती है। जरवरा तथा गुलाब की उच्च स्तर पर पैदावार होती है। इनको प्लास्टिक के ग्रीन हाऊस बना कर उगाया जाता है। इसी तरह मौसमी फूलों के बीज तैयार करके अमेरिका, कनाडा, जर्मनी आदि में भेजे जाते हैं।

बड़े उत्तर वाला प्रश्न

प्रश्न-
पेड़ों तथा झाड़ियों को लगाने का ढंग लिखें तथा फूलों के नाम लिखें, जिन का तेल निकाल कर खुशबू की वस्तुओं में प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
स्वयं करें।

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मुख्य फूल और पौधे PSEB 6th Class Agriculture Notes

  1. फूल हमारी ज़िन्दगी का ज़रूरी भाग हैं। ये प्यार तथा संतोष का संदेश देते हैं।
  2. फूल कई रंगों के तथा सुगंध वाले होते हैं।
  3. मौसमी फूलों को क्यारियों में लगाया जाता है; जैसे-गुलाब, गेंदा, ग्लैडीऑल्स आदि।
  4. कुछ फूलों का तेल सुगंध की वस्तुओं में प्रयोग किया जाता है; जैसे-जैसमीन, रजनीगंधा आदि।
  5. पेड़, झाड़ियां, लताएं आदि वातावरण को शुद्ध रखने का काम करती हैं।
  6. गुलाब के फूल दिसंबर से अप्रैल तक लगते हैं।
  7. गुलदौदी को पतझड़ की रानी कहा जाता है।
  8. सर्दियों के फूल हैं-कुत्ता फूल, फ्लाक्स, वरबीना, गेंदा, स्वीट पीज़ आदि।
  9. गर्मी के फूल हैं-जीनीया, सूर्यमुखी (सजावटी), गमफरीना आदि।
  10. बरसात के फूल हैं-कुक्कड़ कलगा, वालसम।
  11. पंजाब में गेंदा, गेंदी, ग्लैडीऑल्स आदि की काश्त व्यापारिक स्तर पर की जाती है।
  12. पतझड़ी पौधे हैं-क्वीन फ्लावर, शहतूत, सावनी।
  13. पेड़ों को आकार के आधार पर बाँट सकते हैं-गोल छतरी (मोलसरी), फैलाव आकार (गुलमोहर), सीधे जाने वाले (सिल्वर ओक), झुकी हुई शाखाएँ (बोतल ब्रश) आदि।
  14. फूलों के रंग के आधार पर पीला (अमलतास), जामुनी (नीली मोहर, क्वीन फ्लावर), गुलाबी (गुलाबी मोहर), लाल (गुलमोहर, बोतल ब्रश) आदि।
  15. कुछ झाड़ियां हैं-चाँदनी, मोतिया, पीली कनेर, जटरोफा, सावनी आदि।
  16. कुछ लताएं हैं-गोल्डन शावर, लस्सन लता, पर्दा लता आदि।।
  17. कुछ लताएं; जैसे वोगनविलिया, छिपकली लता आदि पर लगे कांटे इन को दीवारों पर चढ़ने में सहायता करते हैं।
  18. वृक्ष, झाड़ियां तथा लताएं लगाने के लिए एक से तीन फुट गहरा गड्ढा खोदा जाता है।

 

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

Punjab State Board PSEB 11th Class Physical Education Book Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Physical Education Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

PSEB 11th Class Physical Education Guide खेल मनोविज्ञान Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
खेल मनोविज्ञान शब्द कौन-से तीन शब्दों के मेल से बना है? (What are the three words combines Sports Psychology ?)
उत्तर-
‘खेल मनोविज्ञान’ शब्द तीन शब्दों का मेल है, खेल + मन + विज्ञान। खेल’ से भाव है ‘खेल और खिलाड़ी’ मन से ‘भाव है व्यवहार या मानसिक प्रक्रिया और ‘विज्ञान’ से भाव है अध्ययन करना अर्थात् खेल और खिलाड़ियों की हरकतों के व्यवहारों का प्रत्यक्ष रूप में अध्ययन करना, खेल मनोविज्ञान कहलाता है।

प्रश्न 2.
खेल मनोविज्ञान की परिभाषा लिखें। (Write definition of Sports Psychology.)
उत्तर-
ब्राउन और मैहोनी के अनुसार, “खेलों और शारीरिक सरगर्मियों में हर स्तर पर निपुणता बढ़ाने के लिए मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग करना ही खेल मनोविज्ञान है।”
(According to Brown and Mahoney “The sports psychology is the application of psychological principles sports and physical activity, at all levels’.)
खेल मनोविज्ञान का यूरोपियन संघ के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान खेलों के मानसिक आधार, कार्य और प्रभाव का अध्ययन है।”
(According to European Union of Sports psychology “Sports psychology is the study of the psychological oasis processed and effect of sports.)
आर० एन० सिंगर के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान शिक्षा और प्रयोगी क्रियाओं द्वारा, एथलैटिक, शारीरिक शिक्षा मनोरंजन और व्यायाम से सम्बन्धित लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाती है।” – (According to R.N. Singer, “Sports Psychology is encompossing scholarly education and practical activities associated with the understanding and influencing of related behaviour of people in Athletics, Physical Educations vigorous recreational activities and exercise.”)

मि० के० एम० बर्नस के अनुसार, “खेल मनोविज्ञान शारीरिक शिक्षा के लिए मनोविज्ञान की वह शाखा है जो व्यक्ति शारीरिक योग्यता को बढ़ावा देती है खेल-कूद में भाग लेने से।”
(According to Mr. K.M. Burns, “Sports psychology for physical education is that branch of psychology which deals with Physical Fitness of an individual through his participation in games and sports.”)
खेल मनोविज्ञान का अर्थ (Meaning of Sports Psychology)-मनोविज्ञान एक विशाल विषय है। यह मनुष्य के ज्ञान की सभी शाखाओं पर लागू होता है। हमारी प्रत्येक क्रिया मनोविज्ञान द्वारा निर्धारित होती है। यह मनुष्य के शरीर को स्वस्थ रखने में सहायता करता है, परन्तु खेल मनोविज्ञान शारीरिक शिक्षा में मनुष्य की शारीरिक योग्यता पर प्रकाश डालता है। खेल मनोविज्ञान इस बात पर जोर डालता है कि शारीरिक और मानसिक योग्यता खेल-कूद के द्वारा हासिल की जा सकती है। इसलिए खेल मनोविज्ञान की शारीरिक शिक्षा में बहुत बड़ा रोल है जिससे व्यक्ति का बहुमुखी विकास हो सके इसलिए हमें खेल मनोविज्ञान को अवश्य जानना चाहिए।

मनोविज्ञान मनुष्य के व्यवहार का ज्ञान है औ केल मनोविज्ञान खिलाड़ियों के व्यवहार जब वह खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। उस समय के व्यवहार के अध्ययन को खेल मनोविज्ञान कहते हैं। खेल मनोविज्ञान मनोविज्ञान की वह शाखा है जो खेल के मैदान में खिलाड़ियों के व्यवहार से सम्बन्धित है।
खेल मनोविज्ञान का खेल-कूद में बड़ा योगदान है। इसके द्वारा हम खिलाड़ियों का भिन्न-भिन्न स्थानों पर उनके मानसिक व्यवहार को देख सकते हैं।
करैटी के अनुसार-खेल मनोविज्ञान तीन भागों में बांटा जा सकता है—

  1. प्रयोगी खेल मनोविज्ञान (Experiment Sports Psychology)
  2. शिक्षक खेल मनोविज्ञान (Educational Sports Psychology)
  3. क्लीनिकल खेल मनोविज्ञान (Clinical Sports Psychology)।

प्रयोगी खेल मनोविज्ञान के खिलाड़ियों के खेल स्तर को उन्नत करने के लिए खोज की जाती है। शिक्षक मनोविज्ञान में आपसी सम्बन्ध और तालमेल के बारे में जाना जाता है जिससे टीम के प्रदर्शन को बढ़ावा मिल सके क्लीनिकल खेल मनोविज्ञान में खिलाड़ियों की उन कठिनाइयों का हल ढूँढा जाता है जो उनके प्रदर्शन में रुकावट डालती है।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 3.
खेल मनोविज्ञान का आधुनिक युग में क्या महत्त्व है ? (What is the importance of Sports Psychology in today’s scenario ?)
उत्तर-
खेल मनोविज्ञान का आधुनिक युग में महत्त्व—
1. सरल से कठिन की ओर का सिद्धान्त (Principles of progression)—खिलाड़ी के खेल में भाग लेने से पहले उसको अपने शरीर को इस ढंग से गर्म करना चाहिए कि उसके लिए गर्म होने से पहले व्यायाम सरल होने चाहिए, क्योंकि पहले व्यायाम उसको शुरू में ही इतने मुश्किल दें तो मांसपेशियों में कई तरह के नुक्सान पैदा हो जाएंगे। इसलिए गर्म होने के लिए सरल से कठिन वाले सिद्धान्त हम हमेशा अपने सामने रखते हैं। इसी विषयानुसार खिलाड़ी को गर्म होने के समय उस द्वारा उठाए जाने वाले भार हम धीरे-धीरे बढ़ाते हैं।

2. स्वास्थ्य (Health)—एथलीट या खिलाड़ी को गर्म होने से पहले अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। उसके स्वास्थ्य के अनुसार ही हमें उसको व्यायाम देने चाहिए। यदि किसी कमज़ोर स्वास्थ्य वाले खिलाड़ी के शरीर को अच्छी तरह गर्म करने के लिए कोई कठिन व्यायाम दे दें तो शरीर के अच्छी तरह गर्म होने के स्थान पर उसके शरीर की अलग-अलग प्रणालियों में नुक्स पड़ जाएगा। इनसे बचने के लिए हमें खिलाड़ी के शरीर को उसके स्वास्थ्य के अनुकूल गर्म करना चाहिए।

3. व्यक्ति की क्षमता या प्रशिक्षण अवस्था (Capacity or training of individual)—किसी भी खिलाड़ी या एथलीट को गर्म होने से पहले यह देखना चाहिए कि आका प्रशिक्षण किस अवस्था में चल रहा है या वह कितने सालों से प्रशिक्षण ले रहा है। किस खेल का प्रशिक्षण है और उसका उद्देश्य क्या है ? उसकी व्यक्तिगत अवस्था किस तरह की है, इसके प्रशिक्षण का जो कार्यक्रम चल रहा है, इन सारी बातों को सामने रखकर उसको गर्म करने वाले व्यायाम देने चाहिए।

4. क्रमवार (Systematic)—किसी भी खिलाड़ी या ऐथलीट को गर्म करने वाले व्यायाम इस तरह के देने चाहिएं कि उस ऐथलीट या खिलाड़ी के शरीर के सभी अंगों का तापमान और रक्त संचार ठीक ढंग से कार्य करें। उसके शरीर का कौन-सा भाग अधिक गर्म चाहिए। इसलिए उसको गर्म होने वाले व्यायाम क्रमवार देने चाहिएं।

5. जलवायु सम्बन्धी अवस्थाएं (Climate conditions)—किसी भी खिलाड़ी या ऐथलीट को गर्म करने वाले व्यायाम देने से पहले यह देखना चाहिए कि जिस स्थान पर खिलाड़ी को गर्म करने वाले व्यायाम दे रहे हैं। वहां का वातावरण कैसा है, वहां अधिक गर्मी है या अधिक सर्दी तो नहीं। खेल खुले मैदान के अन्दर हो रही है या जिम्नेजियम के अन्दर, दिन का समय है या रात का। सूर्य की धूप है या बरसात का मौसम। इन सभी बातों को सामने रखकर ही खिलाड़ियों को गर्म करने वाले व्यायाम देने चाहिएं।

6. भिन्नता (Variety)-खिलाड़ी को गर्म करने से पहले यह देखना चाहिए कि उसने किस खेल में कितनी देर भाग लेना है और खेल में उसका ज़ोर कितना लगता है। इन तरह खिलाड़ी को गर्म होने वाले व्यायाम उसकी खेल के अनुरूप ही देने चाहिएं।

7. भार, ऊंचाई, उम्र, शरीर की किस्म (Weight, height, age, body type)—खिलाड़ी को गर्म होने से पहले उसका भार, उसकी ऊंचाई, उसके शरीर की बनावट किस तह की है, यह देख लेना चाहिए। एक पांच साल के खिलाड़ी को यह व्यायाम नहीं दिया जा सकता, जो कि पच्चीस साल के खिलाड़ी को दिए हैं। एक लड़की को यह व्यायाम नहीं दिया जा सकता जो कि एक लड़के दो दिया जाता है क्योंकि लड़की और लड़के की बनावट में बहुत अन्तर है।

8. मुकाबला और काम करने की तीव्रता (According to competition and intensity of work)—खेल के मुकाबले को प्रमुख रखते हुए ही हमें खिलाड़ी को गर्म करने वाले व्यायाम देने चाहिए। मुकाबले को देखते हुए यह भी देखना पड़ता है कि कितनी देर पहले गर्म होना चाहिए, जिस से खिलाड़ी अपने खेल का अच्छा प्रदर्शन कर सके। एक सौ मीटर दौड़ में भाग लेने वाले ऐथलीट को गर्म होने वाले वे व्यायाम नहीं दिए जा सकते जो कि गोला फेंकने वाले या दस हज़ार मीटर दौड़ दौड़ने वाले या एक फुटबॉल का मैच खेलने वाले खिलाड़ी को दिया जाता है। इसलिए खिलाड़ी को मुकाबले के अनुसार ही गर्म होना चाहिए।

9. सभी शारीरिक अंगों से सम्बन्धित व्यायाम (Exercises pertaining to all parts of body)—गर्म होने वाले व्यायामों को इस ढंग से करना चाहिए कि खिलाड़ी के शरीर के सभी अंग गर्म हो जाएं। पैरों की अंगुलियों से लेकर सिर तक सभी अंग अच्छी तरह व्यायाम में लगे हुए हों, चार सौ मीटर की दौड़ दौड़ने के लिए भुजाओं को गर्म करने वाले व्यायाम उतने ही ज़रूरी हैं जितने व्यायाम टांगों के होने चाहिएं। इस तरह किसी भी खेल में भाग लेने से पहले शरीर के सभी अंगों को गर्म करना चाहिए।

10. क्रियाशीलता के लिए विशेष अभ्यास (Special exercises for activities)—अलग-अलग क्रियाशीलता के लिए विशेष गर्म होने के व्यायाम करवाने चाहिएं।

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प्रश्न 4.
प्रेरणा क्या है ? प्रेरणा के स्त्रोतों की व्याख्या कीजिए। (What is Motivation ? Explain its sources in detail.)
उत्तर-
प्रेरणा का अर्थ (Meaning of Motivation)—प्रेरणा का अर्थ विद्यार्थियों की सीखने की क्रियाओं में चि पैदा करना और उनको उत्साह देना है। प्रेरणा से विद्यार्थी अपनी पढ़ाई में रूचि लेता है। खिलाड़ी खेलने में रुचि लेता है। मज़दूर फैक्टरी में अपने काम में रुचि लेता है और किसान अपने खेतों के कार्यों में रुचि लेता है। सच तो यह है कि प्रेरणा में इस तरह की चल शक्ति (Motive Force) है। यह एक ऐसी शक्ति है जो मनुष्य को काम करने के लिए उत्साहित करती है। इस शक्ति के द्वारा मनुष्य अपनी मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने का लगातार प्रयास करता है और अन्त में उसकी पूर्ति करने में सफलता प्राप्त करता है।

प्रेरणा की परिभाषाएं (Definitions of Motivation) मारगन और किंग के अनुसार, “प्रेरणा मनुष्य अथवा जानवर की उस स्थिति को दर्शाती है, जो उसके व्यवहार द्वारा अंतिम लक्ष्य की ओर बढ़ता है।”
(According to Margan and King “Motivation refers to take within a person or animal that derives behaviour towards some goal.”)
करूक और स्टेन के अनुसार, “प्रेरणा को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है। जिन हालतों द्वारा हमें कार्य करने के लिए दिशा और शक्ति मिलती है। उसे प्रेरणा कहते हैं।”
(According to Crooks and Stain, Motivation defined as, “Any condition that might energize . and direct our action.”)

क्रो और क्रो के अनुसार, “प्रेरणा सीखने में रुचि पैदा करने के साथ सम्बन्धित है और यह सीखने के लिए ज़रूरी है।”
According to Crow and Crow, “Motivation means inculcating in students the interest in activities of learning and motivating them in this regard. It is essential for learning.”
कैली के अनुसार, “सीखने की प्रक्रिया की प्रभावशाली व्यवस्था में प्रेरणा एक केन्द्रीय तत्व है। हर प्रकार सीखने में कोई-न-कोई प्रेरणा अवश्य होती है।”
(According to Kelly. Motivation is the central factor in the effective management of the process of learning, some type of motivation must be present in learning.”)
मुरैए के अनुसार “प्रेरणा एक आन्तरिक तत्व है जो कि व्यक्ति के व्यवहार को उकसाती है, दिशा देती है और एकसुर बनाती है।”
एलिजाबेथ और डेफी के अनुसार, “प्रेरणा व्यवहार की दिशा और तीव्रता को कहा जाता है।” (According to Rlizabeth and Duffy, “Motivation is direction and intensity of behaviour.”)
प्रेरणा की किस्में (Types of Motivation) प्रेरणा मुख्य तौर पर निम्नलिखित दो प्रकार की होती है –
(क) आंतरिक प्रेरणा (Intrinsic Motivation)
(ख) बाहरी प्रेरणा (Extrinsic Motivation) इनका संक्षिप्त वर्णन इस तरह है

(क) आंतरिक प्रेरणा (Intrinsic Motivation)—यह प्रेरणा व्यक्ति की प्राकृतिक इच्छा, आवश्यकता और प्रवृत्तियों के साथ सम्बन्धित होती है। इसलिए इसको प्राकृतिक प्रेरणा (Natural Motivation) कहते हैं। एक प्रेरित व्यक्ति किसी काम को इसलिए करता है क्योंकि काम करने से उसे खुशी अनुभव होती है। जब कोई विद्यार्थी किसी रोचक उपन्यास या किसी अच्छी कविता को पढ़ कर खुशी प्राप्त करता है तो वह आंतरिक रूप में प्रेरित (Motivated) होता है। ऐसी अवस्था में खुशी का स्रोत उसकी क्रियाओं में छिपा रहता है। (The source of happiness implied in actions) शिक्षा के स्रोत में आंतरिक प्रेरणा विशेष महत्त्व रखती है क्योंकि इसमें स्वाभाविक रुचि पैदा होती है और अंत तक भी रहती है।

(ख) बाहरी प्रेरणा (Extrinsic Motivation)-बाहरी प्रेरणा में खुशी का स्रोत क्रियाओं में नहीं होता। इसमें व्यक्ति जो भी काम करता है उसका उद्देश्य किसी मनोरथ को प्राप्त करना या पुरस्कार प्राप्त करना होता है। खुशी प्राप्त करने के लिए काम नहीं करता। अपनी आजीविका प्राप्त करने के लिए काम सीखना, प्रशंसा प्राप्ति के लिए काम करना, पदोन्नति के लिए काम करना आदि सभी इस प्रेरणा की श्रेणी में आते हैं। बाहरी प्रेरणा के स्थान पर आंतरिक प्रेरणा उत्साह एवं उत्तेजना का साधन है। इसलिए जहां तक सम्भव हो सके आंतरिक प्रेरणा का प्रयोग होना चाहिए।

1. प्राकृतिक अथवा आंतरिक प्रेरणा (Natural or Instrinsic Motivation)—प्राकृतिक प्रेरणा इस तरह की प्रेरणा होती है जोकि खिलाड़ी के भीतर पैदा होने के समय भी मौजूद होती है। कुछ प्राकृतिक प्रेरणाएं निम्नलिखित हो सकती हैं—

  • शारीरिक प्रेरणा (Physical Motivation) भूख, प्यास, काम आदि।
  • आंतरिक प्रेरणा (Internal Motivation) शौक, इच्छा आदि।
  • भावनात्मक प्रेरणा (Emotional Motivation) प्यार, सफलता, सुरक्षा व अपनापन।
  • सामाजिक प्रेरणा (Social Motivation) सामाजिक प्रगति व सामाजिक आवश्यकताएं इत्यादि।
  • प्राकृतिक प्रेरणा (Natural Motivation) आत्म-सम्मान, नेतृत्व व विश्वास इत्यादि।
  • नकल करने की प्रेरणा (Imitative Motivation) अच्छे खिलाड़ियों की नकल करना इत्यादि।

2. अप्राकृतिक अथवा कृत्रिम अथवा बाहरी प्रेरणा (Unnatural or Artificial or External Motivation) कृत्रिम प्रकार की प्रेरणा का भी खेलों की निपुणता में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। शारीरिक शिक्षा के अध्यापक व कोच इत्यादि कृत्रिम प्रेरणा के द्वारा ही खिलाड़ियों में खेल निपुणता लाने के लिए अक्सर बहुत सफल हो सकते हैं और खिलाड़ी प्रेरणा के द्वारा खेल मन लगा कर करते हैं। कृत्रिम प्रेरणा कुछ इस तरह की होती है—

  • पुरस्कार (Reward)-आर्थिक वस्तुओं (Material Reward) जैसे, बाल पैन, बैग, अटैची, तौलिए इत्यादि।
  • सामाजिक पुरस्कार (Social Reward)–तरक्की, नौकरी, कप, प्रमाण-पत्र इत्यादि।
  • सज़ा (Punishment)-इस तरह की प्रेरणा को नकारात्मक प्रेरणा कहा जाता है जैसे भय, जुर्माना, शारीरिक सज़ा इत्यादि। जहां तक हो सके इस तरह की प्रेरणा का कम-से कम प्रयोग होना चाहिए।
  • मुकाबले (Competition)-टूर्नामेंट, इंटराम्यूरल व एकस्ट्रा म्यूरल इत्यादि।
  • परीक्षाएं (Examination)-खेलों का मूल्यांकन नम्बर विजेता का स्थान देकर करना।
  • श्रवण-दृश्य सहायक सामग्री (Audio-Visual Aids)-जैसे फिल्में, तस्वीरें, आंखें, देख-भाल इत्यादि।
  • कोच व खिलाड़ी रिश्ता (Coach and Player Relationship)-अच्छा व्यवहार खिलाड़ी के भावों और उसकी ज़रूरतों का अहसास।
  • सहयोग (Cooperation)—आपसी सहयोग, अधिकारियों के साथ सहयोग इत्यादि।
  • लक्ष्य (Goal)-जीत, पुरस्कार, पदोन्नति, प्रशंसा इत्यादि।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 5.
खेल मनोविज्ञान की शाखाओं के नाम लिखिए। (Explain the various branches of Sports Psychology.)
उत्तर-
खेल मनोविज्ञान की शाखाएँ—

  1. खेल संगठन मनोविज्ञान (Sports Organization Psychology)
  2. शिक्षा मनोविज्ञान (Educational Psychology)
  3. स्वास्थ्य मनोविज्ञान (Health Psychology)
  4. चिकित्सा और क्लीनिक मनोविज्ञान (Medical and Clinical Psychology)
  5. विकसित मनोविज्ञान (Development Psychology)
  6. व्यायाम मनोविज्ञान (Exercise Psychology)
  7. समाज और ग्रुप मनोविज्ञान (Social and Group Psychology)

प्रश्न 6.
खेल प्रदर्शन को प्रभावित करने वाले मनोवेज्ञानिक तत्वों की विस्तारपूर्वक जानकारी दीजिए। (Explain in detail the factors that affects the Sports Performance.)
उत्तर-
खेल कुशलता को प्रभावित करने वाले मनोवैज्ञानिक तत्व (Psychological factors affecting the performance in game and sports)—प्रत्येक खिलाड़ी की अपने खेल को आगे बढ़ाने की इच्छा होती है। वह इसको बढ़ाने के लिए पूरी कोशिश करता है और खेल का ध्यान के साथ अभ्यास करता है ताकि वह उस खेल में अपना नाम बाकी खिलाड़ियों की तरह चांद की तरह चमका सके और अपने खेल जगत को सही लक्ष्य पर पहुंचाने में सफलता प्राप्त कर सके और अपना, अपने माता-पिता, स्कूल-कॉलेज, अपने जिले, राज्य और देश का नाम रौशन कर सके और अन्तर्राष्ट्रीय खेल मुकाबलों में अपने देश के झंडे को ऊंचा कर सके।

1. दिशा (Direction)-दिशाहीन व्यक्ति अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच सकता है। किसी कार्य की पूर्ति के लिए उसकी दिशा, उद्देश्य या निशाने का अवश्य पता होना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में यदि विद्यार्थी और खिलाडियों को दिशा का पता नहीं है तो उनका प्रशिक्षण अर्थहीन है। यदि मनुष्य को प्रशिक्षण लेना हो तो उसको अपना उद्देश्य और मंजिल मालूम होनी चाहिए। समुद्र में आए तूफ़ान में किश्ती किनारे की तरफ तब ही जा सकती है जब नाविक को किनारे की दिशा का ज्ञान हो। इसलिए यदि प्रशिक्षण लेने वाले को प्रशिक्षण की दिशा का ज्ञान हो तो सिखलाई में बहुत आसानी हो जाती है।

2. सीखने का समय (Learning Time)-कहावत के अनुसार समय पर आरम्भ किया हुआ काम अवश्य मंज़िल हासिल कर लेता है। इस कहावत में बुद्धिमान लोगों की बुद्धिमत्ता स्पष्ट नज़र आती है। इसके अनुसार ही मनुष्य अपनी शिक्षा के लिए उचित समय का निर्णय करता है। यदि समय अनुकूल हो और सीखने के कार्य में रुचि हो तो काम आसान हो जाता है। देखने में आता है कि बच्चे शीघ्र सो जाते हैं। यदि उसके मातापिता चाहें कि उनके बच्चे रात को ही अपनी पढ़ाई करें तो यह बच्चों के अनुकूल न होकर रास्ते में रुकावट डालने का काम होगा। इसी प्रकार शारीरिक शिक्षा के विद्यार्थियों को सायंकाल के समय खेल के मैदान में रोका जाए और ग़लत समय पर उनको शारीरिक शिक्षा की क्रियाएं करने को कहा जाए तो उन विद्यार्थियों द्वारा अच्छे नतीजे प्राप्त नहीं किए जा सकेंगे क्योंकि प्रत्येक कार्य अपने उचित समय पर ही शोभा देता है और शिक्षा में सहायक होता है।

3. शारीरिक योग्यता (Physical Fitness) शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में शारीरिक क्रियाओं के प्रशिक्षण में शारीरिक योग्यता बहुत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। यदि व्यक्ति रोगी, सुस्त अथवा आलसी और और उसमें शारीरिक योग्यता की कमी हो तो हृदय, दिमाग़ और शारीरिक अंग किसी भी क्रिया को सीखने के लिए कठिनाई अनुभव करेंगे। इससे अधिक यदि मनुष्य किसी क्रिया को सीखने के लिए शारीरिक तौर पर ही स्वस्थ नहीं हो उसको अधिक कार्य करना पड़ेगा जिसके वह योग्य नहीं है। इस प्रकार वह प्रशिक्षण पूरा नहीं कर सकेगा। इसलिए शारीरिक योग्यता बहुत ही आवश्यक और महत्त्वपूर्ण है। उस मनुष्य के लिए भी और महत्त्वपूर्ण है जो व्यक्ति शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में प्रशिक्षण लेना चाहता है।

4. अभ्यास और दोहराना (Practice and Revision)-केवल मौखिक ज्ञान से प्रशिक्षण पूरा नही होता। इसलिए अभ्यास अति आवश्यक है। शारीरिक शिक्षा में अभ्यास का बहुत महत्त्व है। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक अपने विद्यार्थियों को भिन्न-भिन्न तत्त्वों का ज्ञान देता है और नई-नई तकनीकें सिखाता है वहां उसे अभ्यास करने के लिए भी प्रेरणा देता है क्योंकि वह जानता है कि अभ्यास और दोहराई के बिना प्रशिक्षण का कार्य पूरा नहीं हो सकता है। अभ्यास और दोहराई द्वारा ही मनुष्य में आत्मविश्वास और कुशलता आती है, जो प्रशिक्षण में सहायक है।

5. व्यक्तिगत भिन्नताएं (Individual difference)—मनुष्यों, पक्षियों और सभी जीवधारी प्राणियों में सोचने, समझने और महसूस करने की भिन्नता होती है। इस प्रकार एक व्यक्ति दूसरे से भिन्न है। इसलिए एक व्यक्ति कम बुद्धिमान है तो दूसरा बुद्धि वाला है। इन भिन्नताओं का ही प्रशिक्षण पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। एक विद्यार्थी किसी चीज़ को शीघ्र सीख लेता है, जब कि दूसरा उस क्रिया को अधिक समय में भी सीख नहीं पाता है। इसका आधारभूत कारण विद्यार्थियों की व्यक्तिगत भिन्नता है। शारीरिक शिक्षा में यह भिन्नता बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। एक शारीरिक शिक्षा के अध्यापक को इन भिन्नताओं का विशेष ज्ञान होना अति आवश्यक है क्योंकि इन भिन्नताओं के ज्ञान के बिना विद्यार्थियों को कुछ भी सिखाना मुमकिन नहीं है।

6. उचित समय पर सुधार (Correction at Proper Time)-प्रशिक्षण का कार्य उस समय तक अधूरा रहता है जब तक सीखने वाले व्यक्ति को अपनी ग़लती का एहसास न हो जो वह किसी वस्तु को सीखने के लिए कर रहा है उस ग़लती को उचित समय पर सुधारा न जा सके क्योंकि बार-बार ग़लती करने पर उसको आदत पड़ जाती है और उसे सुधारा नहीं जा सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि किसी वस्तु को सीखने के लिए उसकी ग़लती और कमियों को उचित समय पर सुधार लेना चाहिए जिससे प्रशिक्षण में कोई कमी महसूस न हो।

7. आवश्यक ज्ञान (Adequate Knowledge) किसी वस्तु को सीखने के लिए जब तक उसके बारे में पूर्ण रूप से ज्ञान प्राप्त नहीं होता उस समय तक सीखने की क्रिया में पूर्णता प्राप्त नहीं होती। इस कमी से उससे बार-बार ग़लती होती है। इससे मनुष्य में हीन भावना आ जाती है। इसलिए सीखने वाले को उन वस्तुओं का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेना बहुत आवश्यक है जिसके बिना प्रशिक्षण अधूरा रह जाता है।

8. शिक्षा के लिए सुविधाएं (Facilities for learning)-प्रशिक्षण के कार्य में सुविधाओं की बड़ी भूमिका होती है। विशेष तौर पर शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थियों की शारीरिक शिक्षा की क्रियाओं को सीखने में सहायता मिलती है। आज कल हॉकी के अन्तर्राष्ट्रीय मैच ऎसरोटर्क अथवा पोलीग्रास के मैदानों पर खेले जाने लगे हैं और भारतीय टीम को इन मैदानों की कमी के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए भारत में भी इस प्रकार की सुविधाएं प्रदान की जाने लगी हैं जिससे भारतीय खिलाड़ियों का प्रशिक्षण ठीक ढंग से हो सकें।

9. संतोष (Satisfaction) व्यक्ति कोई भी चीज़ तब ही सीखना चाहता है ताकि सीखने से उसे प्रसन्नता प्राप्त हो और उसे संतोष की भावना मिले जो वस्तु मनुष्य के भीतर इस प्रकार की भावना जागृत करने के काबिल होती है उनको कोई भी सीखने वाला आसानी से सीख सकता है और प्रसन्नता प्राप्त करता है। शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में जिस प्रकार एक जिमनास्टिक के खिलाड़ी को अपने शरीर को लचकीला बनाकर उस तकनीक का प्रदर्शन लोगों के सामने करके अति प्रसन्नता होती है जो उसको अधिक सीखने के लिए प्रेरित करती है।

10. देखने-सुनने की सुविधाएँ (Audi-Visual Aids)-आज शिक्षा प्रणाली में देखने-सुनने की सुविधाओं को बहुत महत्त्व दिया जाने लगा है क्योंकि इन सुविधाओं द्वारा विद्यार्थियों के दिमाग पर अति शीघ्र प्रभाव पड़ता है उनको कठिन-कठिन क्रिया भी आसानी से सिखाई जा सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में फिल्में, टैलीविज़न, रेडियो, चार्ट, नक्शे, मॉडल आदि आते हैं। जिनकी सहायता से प्रशिक्षण का काम और आसान हो गया है। शारीरिक शिक्षा की क्रियाओं के लिए देखने-सुनने की सुविधाओं का अपनाया जाना अति आवश्यक है। इनकी सहायता द्वारा संसार की बड़ी-से-बड़ी हस्ती को भी अंदाज में दिखाया जा सकता है जो आम लोगों के लिए उनको देख पाना अति कठिन होता है। इन सुविधाओं द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में बहुत लाभ पहुंचा है।

11. पूर्ण विधि का महत्त्व (Importance of Whole Method) कोई भी कार्य सीखने के लिए पूर्ण विधि का प्रयोग आवश्यक है जिससे सिखाने वाले को कोई परेशानी नहीं आती है। यदि शारीरिक शिक्षा की किसी क्रिया को पूरी तरह प्रदर्शन करके दिखा दिया जाए तो विद्यार्थियों के सामने उनकी पूरी तस्वीर खिंच जाती है। इस प्रकार इस पूर्ण विधि से सीखना अधूरी विधि से सीखने से अधिक लाभकारी होता है। जब तक हाथी को पूर्ण रूप से नहीं दिखाया जाता है उसके भिन्न-भिन्न भागों को दिखाकर उसकी स्थिति को नहीं समझाया जा सकता है क्योंकि (Whole is somthing more than the parts.)

12. नेतृत्व की भावना (Sense of Leadership) यदि व्यक्ति के भीतर नेतृत्व की भावना हो उसकी यह विशेषता प्रशिक्षण में अधिक सहायक है क्योंकि उसके अन्दर लोगों को आकर्षित करने की भावना होती है। जिससे प्रत्येक वस्तु को शीघ्र सीख कर लोगों के सामने मिसाल बन कर नेतृत्व करना चाहता है। इस गुण के द्वारा ही लोगों से सहयोग और परस्पर प्रेम प्राप्त करके शिक्षा की आवश्यकता को पूरा कर सकता है।

13. आन्तरिक निरीक्षण (Introspection) आन्तरिक निरीक्षण द्वारा ही प्रशिक्षण में बहुत-सी कमियों का ज्ञान हो जाता है और इन कमियों को सुधारने के लिए प्रेरणा मिलती है और शिक्षा प्राप्त कर उसे संतोष प्राप्त होता है जिससे प्रशिक्षण अधिक रोचक और आसान क्रिया बन जाती है. क्योंकि प्रत्येक क्रिया के अच्छे और बुरे पहलू को आन्तरिक निरीक्षण द्वारा जांचा जाता है।

14. अधिक भार (Over Load)-व्यक्ति की समर्था और योग्यता के मुताबिक उस पर अधिक भार डालकर प्रशिक्षण के काम को तेज़ किया जा सकता है। यदि खिलाड़ी किसी तकनीक को विशेष तरीके से प्रदर्शन करने में सफल नहीं हो पा रहा तो उसके प्रशिक्षण के ढंग को बदल दिया जाता है जिससे उस पर अधिक बोझ पड़ जाता है। उसका शरीर अधिक भार सहने की आदत प्राप्त कर लेता है और इस प्रकार प्रशिक्षण आसान होकर उसकी मंज़िल तक पहुँचने में सहायता करता है। उपरोक्त दिए हुए तत्त्व शिक्षा के कार्य में बहुत ही सहायक होते हैं जिनके द्वारा ही मनुष्य की शिक्षा का प्रोग्राम पूरा होता है। यह तत्त्व प्रशिक्षण में बहुत सहायता प्रदान करते हैं।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

Physical Education Guide for Class 11 PSEB खेल मनोविज्ञान Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
(1) सहयोग
(2) वजीफे
(3) प्रशांशा
(4) अच्छा वातावरण और खेल सहुलता। यह किस प्रेरणा के भाग हैं ?
उत्तर-
बाहरी प्रेरणा।

प्रश्न 2.
(1) शारीरिक प्रेरणा
(2) सामाजिक प्रेरणा
(3) भावनात्मक प्रेरणा
(4) कुदरती प्रेरणा, यह किस प्रेरणा का भाग हैं ?
उत्तर-
अन्दरूनी प्रेरणा।

प्रश्न 3.
खेल मनोविज्ञान कितने शब्दों का बना है ?
(a) तीन
(b) चार
(c) पांच
(d) आठ।
उत्तर-
(a) तीन।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 4.
प्रेरणा कितने प्रकार की होती है ?
(a) दो
(b) तीन
(c) चार
(d) छः।
उत्तर-
(a) दो।

प्रश्न 5.
खेल मनोविज्ञान की शाखाएं हैं ?
(a) सात
(b) छः
(c) पांच
(d) चार।
उत्तर-
(a) सात।

प्रश्न 6.
“खेलों और शारीरिक सरगर्मियों में हर स्तर पर निपुणता बढ़ाने के लिए मनोविज्ञान सिद्धान्तों का प्रयोग करना ही खेल मनोविज्ञान है।” यह किसका कथन है?
उत्तर-
ब्राउन और मैहोनी।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 7.
“मनोविज्ञान व्यक्ति के वातावरण के साथ जुड़ा उसकी क्रियाओं का अध्ययन करता है।” किसका कथन है ?
उत्तर-
बडबर्ड।

प्रश्न 8.
“मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार और मनुष्य सम्बन्धों का अध्ययन है”-किसका कथन है।”
उत्तर-
क्रो और क्रो।

प्रश्न 9.
“खेल मनोविज्ञान शारीरिक शिक्षा के लिए मनोविज्ञान की वह शाखा है जो मनुष्य की शारीरिक योग्यता को खेलकूद में भाग लेना बढ़ाती है।” किसका कथन है ?
उत्तर-
के० एस० बन०।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 10.
मनोविज्ञान का अर्थ लिखो।
उत्तर-
व्यक्ति के व्यवहार, उसकी प्रतिक्रियां, तरीके और सीखने के तरीकों के अध्ययन को मनोविज्ञान कहते हैं।

प्रश्न 11.
क्रो एंड क्रो की मनोविज्ञान की परिभाषा लिखो।
उत्तर-
“मनोविज्ञान व्यक्ति के व्यवहार और मानव सम्बन्ध का अध्ययन है।”

प्रश्न 12.
बडबर्ड की परिभाषा लिखो ?
उत्तर-
“मनोविज्ञान व्यक्ति के वातावरण के साथ जुड़ी उस क्रिया का अध्ययन है।”

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 13.
“खेलों और शारीरिक सरगर्मियों में हर स्तर पर निपुणता बढ़ाने के लिए मनोविज्ञान सिद्धान्तों का प्रयोग करना ही खेल मनोविज्ञान है।”, यह किसका कथन है।
उत्तर-
ब्राउन और मैहोनी।

प्रश्न 14.
“खेल मनोविज्ञान खेलों के मानसिक आधार, कार्य और प्रभाव का अध्ययन है।” यह किसका कथन है ?
उत्तर-
खेल मनोविज्ञान का यूरोपियन संघ।

अति छोटे उत्तरों वाले प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
खेल मनोविज्ञान क्या है ?
उत्तर-
खेल मनोविज्ञान शिक्षा और प्रयोगी क्रिया एथलेटिकस शारीरिक शिक्षा, मनोरंजन और कसरत के साथ सम्बन्धित लोगों के व्यवहार में परिवर्तन ले आती है।।

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प्रश्न 2.
मनोविज्ञान का अर्थ लिखो।
उत्तर-
व्यक्ति का व्यवहार उसकी प्रतिक्रियाएं तरीके और सीखने के तरीके के अध्ययन को मनोविज्ञान कहते हैं।

प्रश्न 3.
मि० के० एम० बर्नस की परिभाषा लिखो।
उत्तर-
“खेल मनोविज्ञान शारीरिक शिक्षा के लिए मनोविज्ञान की वह शाखा है, जो व्यक्ति शारीरिक योग्यता को बढ़ावा देती है खेल-कूद में भाग लेने से।”

प्रश्न 4.
प्रेरणा कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर-
प्रेरणा दो तरह की होती है :

  1. अन्दरूनी प्रेरणा
  2. बाहरी प्रेरणा।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 6 खेल मनोविज्ञान

प्रश्न 5.
करूक और स्टेन के अनुसार प्रेरणा की परिभाषा लिखें।
उत्तर-
“प्रेरणा को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है-जिन हालतों द्वारा हमें कार्य करने के लिए दिशा और शक्ति मिलती है। उसे प्रेरणा कहते हैं।”

प्रश्न 6.
मनोविज्ञान की कोई चार शाखाओं के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. खेल संगठन मनोविज्ञान
  2. विकसित मनोविज्ञान
  3. स्वास्थ्य मनोविज्ञान
  4. शिक्षा मनोविज्ञान।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
खेल मनोविज्ञान का अर्थ लिखो।
उत्तर-
‘खेल मनोविज्ञान’ शब्द तीन शब्दों का मेल है। “खेल+मनो+विज्ञान खेल से भाव है।” खेल और खिलाड़ी, मनो तो भाव ‘व्यवहार’ मानसिक प्रक्रिया और विज्ञान से भाव ‘अध्ययन करना’ भाव खेल और खिलाड़ियों के व्यवहार का अध्ययन करना है।

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प्रश्न 2.
आर० एन० सिंगर के अनुसार, “मनोविज्ञान की परिभाषा लिखो।”
उत्तर-
“खेल मनोविज्ञान शिक्षा और प्रयोगी क्रियाओं द्वारा एथलैटिक शारीरिक शिक्षा, मनोरंजन और व्यायाम से सम्बन्धित लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाती है।”

प्रश्न 3.
मनोविज्ञान के कोई दो महत्त्व लिखें।
उत्तर-
खेल मनोविज्ञान रीढ़ की हड्डी की तरह खिलाड़ी की प्रफोरमैंस को सफल बनाने के लिए दिशा निर्देश देता है। खेल मनोविज्ञान का सम्बन्ध बाइउमैकनिकस, किनज़ियालोजी, स्पोर्टस, फिज़िआलोजी स्पोटर्स मैडिसन विषयों के साथ है, जिसके साथ खिलाड़ियों के खेल कौशल और खेल व्यवहार में शोध करके खिलाड़ी की शारीरिक और मानसिक तन्दरुस्ती को बढ़ाया जाता है।

प्रश्न 4.
प्रेरणा की किस्में लिखो।
उत्तर-
(1) अन्दरूनी प्रेरणा या कुदरती प्रेरणा
(2) बाहरी या बनावटी प्रेरणा

1. अन्दरूनी या कुदरती प्रेरणा—

  • शारीरिक प्रेरणा
  • सामाजिक प्रेरणा
  • भावनात्मक प्रेरणा
  • कुदरती प्रेरणा।

2. बाहरी या बनावटी प्रेरणा।

  • ईनाम
  • सज़ा
  • मुकाबले
  • इम्तिहान

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बड़े उत्तर वाला प्रश्न (Long Answer Type Question)

प्रश्न-
प्रेरणा का अर्थ, परिभाषा तथा महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर-
प्रेरणा का अर्थ (Meaning of Motivation)-प्रेरणा का अर्थ विद्यार्थियों की सीखने की क्रियाओं में रुचि पैदा करना और उनको उत्साह देना है। प्रेरणा से विद्यार्थी अपनी पढ़ाई में रूचि लेता है। खिलाड़ी खेलने में रुचि लेता है। मज़दूर फ़ैक्टरी में अपने काम में रुचि लेता है और किसान अपने खेतों के कार्यों में रुचि लेता है। सच तो यह है कि प्रेरणा में इस तरह की चल शक्ति (Motive Force) है। यह एक ऐसी शक्ति है जो मनुष्य को काम करने के लिए उत्साहित करती है। इस शक्ति के द्वारा मनुष्य अपनी मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने का लगातार प्रयास करता है और अन्त में उसकी पूर्ति करने में सफलता प्राप्त करता है।

परिभाषा (Definition)—
करूक और स्टेन के अनुसार, “प्रेरणा को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है। जिन हालतों द्वारा हमें कार्य करने के लिए दिशा और शक्ति मिलती है। उसे प्रेरणा कहते हैं।”
क्रो और क्रो के अनुसार, “प्रेरणा सीखने में रुचि पैदा करने के साथ सम्बन्धित है और यह सीखने के लिए ज़रूरी है।”

कैली के अनुसार, “सीखने की प्रक्रिया की प्रभावशाली व्यवस्था में प्रेरणा एक केन्द्रीय तत्व है। हर प्रकार सीखने में कोई-न-कोई प्रेरणा अवश्य होती है।”
महत्त्व (Importance)-खेल निपुणता में प्रेरणा का बहुत ही आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण स्थान माना जा सकता है। खिलाड़ी जितनी देर तक प्रेरित नहीं होता तब तक वह कुछ सीखने के योग्य नहीं हो सकता तथा न ही उसमें कुछ सीखने के लिए रुचि ही पैदा होती है। खेलों के प्रति बच्चों में प्रेम पैदा करने के लिए प्रेरणा बहुत मूल्य योगदान देती है। यह खिलाड़ियों के अन्दर कई प्रकार की भावनाओं को जाग्रित करती है। इन मंजिलों अथवा आदर्शों की प्राप्ति के .. लिये खिलाड़ी तरह-तरह की मुश्किलों तथा कठिनाईयों को बर्दाशत करता है।

हाँसला, बहादुरी, निडरता तथा स्वयं कुर्बान होना आदि के गुण व्यक्ति अथवा खिलाड़ी के अन्दर किसी न किसी विशेष प्रेरणा द्वारा ही आते हैं तथा उनके अन्दर छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब आदि किसी किस्म का भेदभाव पैदा नहीं होता। मन की शान्ति तथा उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए खिलाड़ी प्रेरणा के इन स्त्रोतों का भरपूर उपयोग करता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि खेल निपुणता के लिए प्रेरणा की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण, आवश्यक तथा लाभदायक है।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 11th Class Physical Education Book Solutions बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules.

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules – PSEB 11th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें (TIPS TO REMEMBER)

  1. बॉस्केट बाल कोर्ट की लम्बाई और चौड़ाई = 28 × 15 मीटर
  2. बॉस्केट बाल टीम के खिलाड़ी = 12 खिलाड़ी खेलते हैं, सात बदलवें खिलाड़ी
  3. कोर्ट के केन्द्रीय चक्र का अर्धव्यास = 1.80 मीटर
  4. रेखाओं की चौड़ाई = 5 मीटर
  5. बोर्ड की मोटाई = 3 सैं० मी०
  6. बोर्ड की ज़मीन से निचले भाग की ऊंचाई = 2.90 मीटर
  7. बोर्ड का आकार = 180 × 120 मीटर
  8. बाल का घेरा = 75 से 78 सै० मी०
  9. बाल का भार = 600 से 650 ग्राम
  10. बोर्ड के आयात का साइज़ = 49 × 45 ग्राम
  11. पोलों की दूरी = 2 मीटर
  12. खेल का समय = 40 मिनट के चार क्वाटर 10-2-10 (10) 10-2-10
  13. बास्केट बाल के अधिकारी = 1 रेफरी, 2 अम्पायर, 1-स्कोरर, 1-सहायक स्कोरर, 1 समय कीपर, 1 सोर्ट क्लॉक ऑपरेटर
  14. मैच खेलने वाले खिलाड़ियों की संख्या = 05 खिलाड़ी
  15. वैकल्पिक खिलाडी = 07 खिलाड़ी
  16. बॉल की परिधि (पुरुषों के लिए) (महिलाओं के लिए) = 74.9 सेंटीमीटर से 78 सेंटीमीटर 72.4 सेंटीमीटर से 37.7 सेंटीमीटर
  17. बाल का वजन (पुरुषों के लिए) (महिलाओं के लिए) = 567 ग्राम से 650 ग्राम 510 ग्राम से 567 ग्राम
  18. टाइम आऊट (30 सैकिण्ड) = पहले हाफ में 2 टाइम आऊट, दूसरे हाफ में 3 टाइम आऊट, अतिरिक्ति समय में 1 टाईम आऊट

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

बास्केट बाल खेल की संक्षेप रूप-रेखा (Brief outline of the Basket-Ball)

  1. बॉस्केट बाल का मैच दो टीमों के मध्य होता है। प्रत्येक टीम में पाँच-पाँच खिलाड़ी होते हैं। इसके अतिरिक्त सात अतिरिक्त खिलाड़ी होते हैं जिन्हें हम बदलवें खिलाड़ी (Substitutes) कहते हैं।
  2. प्रत्येक टीम चाहती है कि वह विरोधी टीम की बॉस्केट में गेंद डाल दे तथा विरोधी टीम को न ही गेंद मिले और न ही प्वाईंट।
  3. बॉस्केट बाल खेल का मैदान आयताकार होता है। मैदान की लम्बाई 28 मीटर तथा चौड़ाई 15 मीटर होती है।
  4. टीम के प्रत्येक खिलाड़ी की बनियान के सामने और पीछे नम्बर लगे होते हैं। एक टीम के दो खिलाड़ी एक ही नम्बर नहीं डाल सकते।
  5. जब तक मध्यान्तर (Interval) न हो या अधिकारी आज्ञा न दे कोई भी खिलाड़ी मैदान से बाहर नहीं जा सकता।
  6. खेल 10 – 2 – 10, 10, 10 – 2- 10 की चार अवधियों की होती है तथा दो अवधियों के पश्चात् 10 मिनट का विश्राम होता है।
  7. बॉस्केट बाल के खेल में खिलाड़ियों को जितनी बार चाहे बदला जा सकता है।
  8. जब कोई टीम 4 फ़ाऊल कर जाती है तो विरोधी टीम को 2 या 3 फ्री-थ्रोज़ हालात अनुसार दी जाती हैं।
  9. किसी टीम का एक खिलाड़ी यदि 5 फ़ाऊल कर दे तो उसे मैच में से बाहर निकाल दिया जाता है।
  10. खेल के मध्य किसी समय भी कोई खिलाड़ी बदला जा सकता है परन्तु शर्त यह है कि थ्रो उस टीम की हो।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

PSEB 11th Class Physical Education Guide बॉस्केट बाल (Basket Ball) Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
बॉस्कट बाल कोर्ट की लम्बाई लिखें।
उत्तर-
28 मीटर।

प्रश्न 2.
बॉस्कट बाल कोर्ट की चौड़ाई लिखें।
उत्तर-
15 मीटर।

प्रश्न 3.
इस मैच में बदले जाने वाले खिलाड़ियों की संख्या लिखें।
उत्तर-
7 खिलाड़ी।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 4.
बॉस्कटबाल का घेरा पुरुषों के लिये कितना होता है ?
उत्तर-
74.9 सैं.मी. से 78 सें. मी.।

प्रश्न 5.
बॉस्कटबाल के मैच में कितने अधिकारी होते हैं ?
उत्तर-
रैफरी = 1, अम्पायर = 2, स्कोरर = 1, सहायक स्कोरर = 1, टाइम कीपर = 1, सोर्ट ब्लॉक आपरेटर -1.

प्रश्न 6.
बॉस्कट बाल खेल का समय लिखें।
उत्तर-
40 मिनट के चार क्वाटर 10-2-10 (10) 10-2-10.

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 7.
बॉस्कट बाल खेल के कोई तीन फाऊल लिखें।
उत्तर-

  1. अधिकारी को अपमानजनक ढंग से सम्बोधित करना या मिलना।
  2. असभ्य व्यवहार करना।
  3. विरोधी खिलाड़ी को तंग करना या उसकी आंखों के आगे हाथ करके उसे देखने में रुकावट डालना।

Physical Education Guide for Class 11 PSEB बॉस्केट बाल (Basket Ball) Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
बॉस्केट बाल का संक्षिप्त परिचय दीजिए। रैस्ट्रिक्टेड एरिया से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-
खेल-बॉस्केट बाल खेल दो टीमों के बीच खेला जाता है। प्रत्येक टीम में पाँच-पाँच खिलाड़ी होते हैं। प्रत्येक टीम का यह लक्ष्य होता है कि वह विरोधी टीम की बॉस्केट में गेंद फेंक दे, न विरोधी टीम के हाथ गेंद लगने दे और न ही अंक प्राप्त करने दे।

कोर्ट-बॉस्केट बाल कोर्ट 28 मीटर लम्बा और 15 मीटर चौड़ा होगा। यह आयताकार और ठोस धरातल वाला होगा। यदि खेल हाल कमरे में हो तो हाल की छत की ऊंचाई कम-से-कम 7 मीटर होनी चाहिए। सम्बन्धित अधिकारी दो मीटर की लम्बाई और दो मीटर चौड़ाई की सीमा के अन्दर परिवर्तन (यह परिवर्तन एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं) की आज्ञा दे सकता है। फिर भी फीबा (FIBA-International Amateur Basketball Federation) की बड़ी सरकारी प्रतियोगिताओं के लिए निर्णित लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार नई कोर्ट (Court) बनाई जाएगी। कोर्ट में पर्याप्त मात्रा में एक-सा प्रकाश रहना चाहिए। – सीमा-रेखाएं-कोर्ट की परिधि स्पष्ट रेखाओं द्वारा अंकित की जाएगी जो प्रत्येक स्थान से बाधाओं से कम-से- . कम 2 मीटर की दूरी पर होगी। इन रेखाओं और दर्शकों के बीच दूरी कम-से-कम 3 मीटर की होगी।

केन्द्रीय वृत्त-कोर्ट के मध्य में एक वृत्त अंकित किया जाएगा। उसका अर्द्धव्यास 1.80 मीटर होगा। इसे केन्द्रीय वृत्त कहा जाता है।
केन्द्रीय रेखा-अन्त रेखाओं के समानान्तर केन्द्रीय रेखा खींची जाएगी जो कोर्ट को आगे वाली कोर्ट और पीछे वाली कोर्ट में विभक्त करेगी। यह रेखा 15 सम बाहर दोनों तरफ होगी।
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तीन अंक मैदानी गोल-क्षेत्र-एक नई मार्किंग “तीन अंक मैदानी गोल क्षेत्र” की जाती है। यह दो सीमित चा होती हैं जिनमें से प्रत्येक का बाहरी किनारों से अर्द्धव्यास 6.25 मीटर होता है। केन्द्र फर्श पर बिन्दु होता है, टोकरी के केन्द्र के ठीक लम्ब रूप होता है और किनारे वाली लकीरों पर समाप्त होती हुई पार्श्व रेखाओं के समानान्तर रहती है। केन्द्र अन्तिम लकीर के केन्द्रीय बिन्दु से 1.20 मीटर 0.225 मीटर + 0.10 मीटर + 1.525 मीटर होता है।
नोट-यह चाप केवल अर्द्ध वृत्त तक ही है और इसके पश्चात् पार्श्व रेखा के समानान्तर है (देखो चित्र)

फ्री-थो रेखाएं-प्रत्येक अन्त-रेखा के समानान्तर एक फ्री-थ्रो रेखा खींची जाएगी जो अन्त-रेखा के भीतर किनारे से 5.80 मीटर दूर होगी। इसकी लम्बाई 3.60 मीटर होगी तथा केन्द्र बिन्दु दोनों अन्त-रेखाओं के मध्य बिन्दुओं को जोड़ने वाली रेखा पर होगा।

प्रतिबद्ध क्षेत्र (रिस्ट्रिकटेड एरिया) तथा फ्री-थो रेखाएं-ये स्थान जिन पर परिधि अन्त-रेखाओं, फ्री-थ्रो रेखाओं से निकलने वाली रेखाओं से निर्धारित होती है, उन्हें प्रतिबद्ध क्षेत्र कहते हैं। सिरों की ओर फ्री-थ्रो रेखाएं इसके अर्द्धव्यास को अंकित करती हैं। इन रेखाओं का बाहरी किनारा अन्त-रेखाओं के मध्य बिन्दु से 3 मीटर होगा और फ्रीथ्रो रेखाओं के सिरों पर आकर समाप्त हो जाएगा।
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फ्री-थ्रो रेखाएं वे प्रतिबद्ध स्थान हैं जो कोर्ट में 1.80 मीटर के अर्द्धव्यास वाले अर्द्ध-वृत्त में फैले होते हैं। . पहली रेखा सिरे वाली रेखा के भीतरी किनारे में 1.75 मीटर है। पहली गली के स्थान से आगे एक उदासीन क्षेत्र (Neutral Zone) होगा जिसकी चौड़ाई 30 सैंटीमीटर होगी। दूसरी गली का स्थान 85 सैंटीमीटर चौड़ा होगा और उदासीन क्षेत्र के साथ लगता होगा। तीसरी गली का स्थान दूसरी गली के साथ लगता है और इसकी चौड़ाई 85 सेंटीमीटर होगी। जहां तक टूटे हुए अर्द्ध वृत्त का सम्बन्ध है, प्रत्येक अंकित क्षेत्र की लम्बाई 35 सैंटीमीटर होगी और दोनों भागों के बीच की दूरी 40 सम होगी।

पिछले बोर्ड का आकार, पदार्थ और स्थिति (Back Board-Size, Material and Position)-पीछे वाले बोर्ड कठोर लकड़ी के बनाए जाएंगे या फाइबर ग्लास के भी हो सकते हैं जिनकी मोटाई 3 सम होगी। ये टेढ़े रुख 1.80 मीटर तथा खड़े रुख में 1.20 मीटर होंगे। यहां रिंग लगता है, उसके पीछे बोर्ड पर 59 सैंटीमीटर × 45 सेंटीमीटर की आयत बनाई जाती है। किनारा रिंग की सतह के बराबर होगा। बोर्ड की सीमाएं 5 सैंटीमीटर चौड़ी रेखाओं द्वारा अंकित की जाएंगी।

यह बोर्ड के रंग के उलट वाले रंग की होगी। बोर्ड का निचला किनारा ज़मीन से 2.75 मीटर ऊंचा होगा। पीछे बोर्ड के आधार स्तम्भ सीमा के बाहरी क्षेत्र में अन्त-रेखाओं के बाह्य किनारे से कम-से-कम 1.00 मीटर दूर गाड़े जाएंगे।

बॉस्केट-बॉस्केट छल्लों और जाली की बनी होती है। बॉस्केट नारंगी रंग वाले अन्दर से 45 सैंटीमीटर व्यास के लोहे के घेरे होते हैं। घेरे की धातु 20 मिलीमीटर मोटी होगी। जाल सफ़ेद रस्सी का बना होता है जोकि छल्लों से लटकता है। यह छल्ले इस प्रकार के बने होते हैं कि जब गेंद इनसे गुज़रती है, वह इसे थोड़ी देर के लिए रोक लेते हैं।
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गेंद-गेंद गोलाकार होगी। यह चमड़े की बनी होगी और इसके अन्दर का ब्लैडर रबड़ का होगा। इसकी परिधि 75 सम से 78 सम होगी। इसका भार 600 ग्राम से 650 ग्राम होगा।

अब नियम यह आज्ञा देता है कि प्रयुक्त गेंद भी प्रयोग की जा सकती है। फिर भी गेंद के विषय में रैफरी ने सहमति प्रकट की हो। रैफरी प्रयुक्त गेंद चुन सकता है। जब गेंद एक बार चुन ली गई हो तो कोई भी टीम खेल की गेंद का प्रयोग नहीं करती। यदि उचित पुरानी गेंद न मिल सकती हो तो नई गेंद प्रयुक्त की जा सकती है।

बॉस्केट बॉल का इतिहास
(History of Basket Ball)
बॉस्केट बॉल एक उत्तेजना पूर्ण खेल है तथा इसका मूल स्थान अमेरिका है। इसका आविष्कार “अन्तर्राष्ट्रीय YMCA” के शिक्षक डॉ. स्मिथ (Dr. Smith) ने सन् 1891 में स्प्रिंगफील्ड मैसाशसटस (Springfiled Massa Chussets U.S.A.) में किया था। इसके नियम बाद में संशोधित (Revised) किए गए, जिनके अन्तर्गत ‘गोल’ (Goals) को कोर्ट (Court) के ठीक बाहर रखा गया, शारीरिक सम्पर्क (Body Contact) को स्वीकृति नहीं दी गई तथा गेंद के साथ-साथ दौड़ने को ‘फाऊल’ (Foul) घोषित कर दिया गया। अनुभवहीन खिलाड़ियों को खेल में शामिल करने के प्रयोजन से खेल को अधिक सरल बनाया गया। डॉ. स्मिथ ने खेल क्षेत्र के दोनों ओर दो बाक्स (Reach Baskets) दोनों ओर एक-एक, एक निश्चित ऊंचाई पर टांग दिए तथा खिलाड़ियों को स्कोर के लिए गेंद उन बाक्सों में फेंकनी पड़ती थी।
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अब गेंद के बाक्स से वापस आने की समस्या थी इसलिए ‘बाक्स’ के स्थान पर आज की तरह के ‘गोल’ प्रयोग किए गए। इस प्रकार यह खेल अमेरिका में शुरू हुआ तथा इसके नियमों को सन् 1934 में मानक (Standardised) रूप दिया गया।

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प्रश्न 2.
बॉस्केट बाल खेल में तकनीकी उपकरण (सामान) क्या-क्या होते हैं ?
उत्तर-
तकनीकी उपकरण (सामान)
(क)

  1. खेल की घड़ी (गेम-वाच)
  2. टाइम-आऊट के लिए घड़ी (टाइम-आऊट वाच)-एक
  3. स्टाप घड़ियां (स्टाप वाचिज़)-(क) टाइम कीपर के पास कम-से-कम दो घड़ियां होनी चाहिएं और खेल घड़ी मेज़ पर रखी जाएगी।

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(ख) स्कोर-शीट
(ग) कम-से-कम 20 सम × 10 सम आकार के एक से पांच तक अंक-एक से चार तक के काले रंग के अंक तथा पांच के लिए लाल रंग के अंक। .
(घ) 24 सैकिंड नियम के प्रबन्ध के लिए एक योग्य यन्त्र जिसको खिलाड़ी और दर्शक देख सकें।
(ङ) सब को दिखाई देने वाला एक खेल अंक बोर्ड स्कोर बोर्ड होगा जिस पर दोनों टीमों के खेल अंक लिखे जाएंगे।
(च) स्कोरर के पास दो लाल झण्डे दोनों टीमों के फाऊल मार्कर के हाथ में होंगे। इसे आठ फाऊल एक अवधि में होने की अवस्था में इस टीम की तरफ लिया जाएगा तथा खिलाड़ियों, कोच साहिब और खेल अधिकारियों को दिखाई दे सकेगा।
टीमें-प्रत्येक टीम में दस खिलाड़ी होंगे और सात खिलाड़ी प्रतिस्थापन के लिए होते हैं। प्रत्येक खिलाड़ी की कमीज़ के सामने और पिछली ओर कमीज़ के रंग से अलग नम्बर लगे होते हैं। यह नम्बर 4 से 15 तक होते हैं।

एक टीम के सभी खिलाड़ी ऐसी कमीजें पहनेंगे जिनका रंग आगे और पीछे की ओर एक जैसा होगा।
खिलाड़ी द्वारा कोर्ट छोड़ना-जब तक मध्यान्तर (Interval) न हो जाए अथवा नियम स्वीकृति न दे कोई भी खिलाड़ी बिना अधिकारियों की आज्ञा के कोर्ट छोड़ कर बाहर नहीं जा सकता।

कप्तान-इसके अधिकार और कर्तव्य-केवल कप्तान की सूचना लेने के लिए या किसी तरह की व्याख्या के लिए अधिकारी से बातचीत कर सकता है। खिलाड़ी बदलने का अधिकार कोच या कोच के स्थान पर काम कर रहे अधिकारी का होता है।

खेल की अवधि-खेल 10-2-10-10-2-10 मिनट की चार अवधियों में खेला जाएगा। इन दोनों अवधियों में 10 मिनट का अवकाश होगा।
खेल का आरम्भ-खेल का आरम्भ रैफरी द्वारा किया जाएगा। वह दोनों विरोधियों के बीच केन्द्र में गेंद को ऊपर उछालेगा। खेल उस समय तक आरम्भ नहीं होगा जब तक एक टीम पांच खिलाड़ियों सहित मैदान में खेलने के लिए प्रस्तुत न हो जाए। यदि खेल आरम्भ होने के समय तक कोई अनुपस्थित टीम मैदान में नहीं पहुंचती तो उसकी विरोधी टीम को वॉक ओवर मिल जाता है, अर्थात् उसे बिना खेल के ही विजयी घोषित कर दिया जाता है।

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प्रश्न 3.
जम्प बाल और जम्प बाल के समय फाऊल बताएं।
उत्तर-
जम्प बाल-जम्प बाल के समय दो कूदने वाले अर्द्ध-वृत्त के अन्दर पांव रख कर अपनी-अपनी बॉस्केट के समीप खड़े होंगे तथा उनका एक पांव बीच में पड़ी रेखा के केन्द्र के पास होगा। उस समय कोई अधिकारी गेंद को इतनी ऊंचाई से ऊपर फैंकेगा कि उनमें से कोई खिलाड़ी उछल कर गेंद न पकड़ सके और गेंद उन दोनों के मध्य में गिरे। कोई खिलाड़ी गेंद को उस समय तक थपथपाने का यत्न नहीं करेगा जब तक उसने अधिकतम ऊंचाई प्राप्त न कर ली हो। कूदने वाला खिलाड़ी केवल दो बार ही गेंद को थपथपा सकता है।
जिस समय जम्प बाल (Jump Ball) में नियम तोड़ा जाता है इसके दण्ड-स्वरूप पार्श्व रेखा (Side line) पर से थ्रो-इन (Throw-in) दी जाती है। यह अपने विरोधियों के लिए केन्द्र बिन्दु होता है।

कोच (Coach) खेल के आरम्भ होने के निश्चित समय से लगभग 20 मिनट पहले कोच (Coach) फलांकन कर्ता (Scorer) को उन खिलाड़ियों के नाम और गिनती जिन्होंने खेल में खेलना है, के अतिरिक्त कप्तान, कोच और सहायक कोच के नाम देगा।

खेल के आरम्भ होने से स्कोर शीट (Score-Sheet) पर यह हस्ताक्षर करके खिलाड़ियों के नाम और गिनती से अपनी सहमति प्रकट करेंगे और उसी समय पांच खिलाड़ियों के नाम बताएंगे जिन्होंने खेल आरम्भ करना है।
ए (A) टीम का कोच यह जानकारी पहले देगा।

नोट-ऐसा न करने पर और जिससे खेल आरम्भ होने में देरी हो, कोच पर तकनीकी फाऊल (Technical Foul) का दोष लग सकता है और खेल दो फ्री-थ्रो (Free Throws) करने के पश्चात् आरम्भ होगा।

गोल-जब गेंद बास्केट में ऊपर से जाकर रुक जाए या निकल जाए तब गोल बन जाता है। रेखा के क्षेत्र से किए गए गोल के दो अंक तथा फ्री-थ्रो द्वारा किए गए गोल का एक अंक होता है। बिन्दु रेखा से परे फील्ड गोल लगाने के लिए प्रयत्न करने के तीन अंक दिए जाएंगे।

आक्रमण के समय बाधा उत्पन्न करना-जिस समय गेंद बॉस्केट के समतल के ऊपर से नीचे की ओर आती है तो कोई खिलाड़ी अपने सीमित क्षेत्र में न तो गेंद को छू सकता है और न ही वह इसे पकड़ सकता है चाहे वह गोल बनाने की कोशिश में हो।

प्रतिरक्षा के समय गेंद में बाधा-जब विरोधी खिलाड़ी गोल करने के लिए गेंद फेंकता है तथा सारी गेंद बॉस्केट के घेरे की सतह के ऊपर हो, उस समय जैसे ही गेंद नीचे आना शुरू करे, प्रतिरक्षा खिलाड़ी उसको छूने की बिल्कुल कोशिश नहीं करेगा। उल्लंघन होने पर गेंद मृत (Dead) हो जाती है। यदि फ्री-थ्रो के समय उल्लंघन हो तो फेंकने वाले के पक्ष में एक अंक यदि गोल की चेष्टा के समय हो तो फेंकने वाले के पक्ष में जोड़ दिए जाते हैं।

गोल के पश्चात् गेंद खेल में-गोल बनाने के 5 सैकिंड बाद विरोधी टीम का कोई खिलाड़ी, कोर्ट के अन्त में, परिधि से बाहर किसी भी बिन्दु से, जहां गोल बना था, गेंद खेल में डालेगा।

पिवटिंग
(Pivoting)
जब गेंद पकड़े हुए कोई खिलाड़ी एक ही पैर से एक बार या अधिक बार किसी दिशा में बढ़ता (घूमता) है तो इसे “पिवटिंग” (Pivoting) कहते हैं। खिलाड़ी के दूसरे पैर को जो जमीन के साथ सम्पर्क में रहता है—’पिवट’ कहा जाता है।
बॉस्केट बॉल में पिवटिंग निम्नलिखित तीन प्रकार की होती है—
1. स्थित पिवट (Stationary Pivot)—इस पिवट में—

  • एक खिलाड़ी दोनों पैरों को ज़मीन पर टिकाए हुए गेंद प्राप्त करता है।
  • यह रिबाउण्ड (Rebound) लेता है।
  • हवा में पास (Pass) देता है तथा दोनों पैरों को एक साथ ही भूमि पर टिकाते हुए वापस आता है। चाहे पैर एक-दूसरे के समान्तर हैं अथवा एक पैर दूसरे के सामने है। खिलाड़ी किसी भी पैर का प्रयोग करते हुए पिवट (रिवर्स अथवा रेयर पिवट) ले सकता है। यदि कोई खिलाड़ी ड्रिबलिंग (Dribbling) कर रहा है अर्थात् वह गतिशील है तो वह गेंद प्राप्त करके एक पैर को दूसरे पैर के सामने रखते हुए तथा सामने वाले पैर को किसी भी दिशा में गतिशील करते हुए स्ट्राइड स्टॉप (Stride Stop) में आ जाता है। इस पिवट का प्रयोग विपक्ष के खिलाड़ी से दूर जाने तथा अपने ही किसी साथी को खेल में लाने के लिए किया जाता है।

सामने या भीतरी पिवट
(Front or Inside Pivot)
इसकी तकनीक वही है जो रेयर पिवट (Rare Pivot) की है किन्तु इसमें अपने सामने के विपक्षी खिलाड़ी की तरफ टर्न (Turn) लिया जाता है अर्थात् गेंद पकड़े हुए खिलाड़ी एक पैर को आगे रख कर खड़ा होता है तथा दूरवर्ती पैर को विपक्षी खिलाड़ी के लगभग निकट रखते हुए अपने सामने के पैर पर पिवट लेता है।

अधिकारिक संकेत
(Official Signals)

  1. जब स्वतन्त्र थ्रो की संख्या का संकेत देता हो तो उंगलियों को अपने चेहरे की ऊंचाई पर रख कर कलाई से नीचे की ओर बार-बार गति दी जाती है।
  2. टाइम चार्ज (Charged Time Out) के लिए अधिकारी अपनी हथेली पर उंगलियों से T का चिह्न बनाता
  3. जम्प बॉल (Jump Ball) के संकेत के लिए अधिकारी अपने दोनों अंगूठे ऊपर करते हैं।
  4. त्रुटिपूर्ण ड्रिबल (Illegal dribble) के लिए वह Patting motion देता है।
  5. तीन सैकेण्ड के नियम (Three second rule) का उल्लंघन होने पर अधिकारी अपनी तीन उंगलियों (अंगूठा सहित) को साइड की तरफ करके संकेत करता है।
  6. किसी क्षेपण को निरस्त (Cancellation of a throw) करने के लिए अधिकारी अपने बाजुओं को अपने शरीर पर स्थानान्तरित करता है।
  7. स्टैपिंग (Stepping or travelling) के संकेत के लिए अधिकारी अपनी मुट्ठी घुमाता है।
  8. व्यक्तिगत फाऊल के लिए रैफरी बन्द मुट्ठी (Close fist) द्वारा संकेत करता है।
  9. व्यक्तिगत फाऊल की स्थिति में. यदि कोई स्वतन्त्र क्षेपण न देता हो तो अधिकारी अपनी उंगली को साइड रेखा की तरफ कर देता है।
  10. किसी तकनीकी फाऊल का संकेत देने के लिए अधिकारी खुली हथेली से ‘T’ बनाता है तथा उसे दूसरी हथेली पर दिखाता है।
  11. दोहरे फाऊल के संकेत के लिए वह अपनी बन्द मुट्टियों को अपने सिर के ऊपर हिलाता है।
  12. जानबूझ कर किए गए फाऊल के लिए रैफरी अपनी मुट्ठियों को बन्द रखते हुए अपनी कलाई को पकड़ कर संकेत करता है।
  13. धकेलने तथा चार्जिंग के संकेत के लिए रैफरी धकेलने जैसी नकल करता है।
  14. सीमाओं के उल्लंघन के लिए रैफरी हाथ हिला कर सीमा के बाहर संकेत करता है तत्पश्चात् उस टीम की बॉस्केट की तरफ संकेत करता है-जिसे “आऊट ऑफ़ बाऊण्ड-बॉल” दी गई है।
  15. टाइम आऊट के लिए अधिकारी सिर के ऊपर खुली हथेली से संकेत करता है।

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प्रश्न 4.
बॉस्केट बाल खेल के विभिन्न पासों के विषय में लिखें ।
उत्तर-
पास के प्रकार
(Types of Passes)
पासिंग (Passing)-बॉस्केट बॉल के खिलाड़ी को उन सभी प्रकार के पास (Passes) देने में निपुण होना चाहिए जिनका प्रयोग गेंद को अपने साथी को देने के लिए विपक्षी खिलाड़ी के ऊपर से, नीचे से अथवा उसके पास से फेंका जाता है।

पास देने के लिए आवश्यक बातें
(Some Essentials of Passing)
पास देने के लिए कुछ आवश्यक बातें निम्नलिखित हैं—

  1. पास देने से पहले सामने देखने की आदत बनाओ।
  2. पास प्राप्त करने वाले साथी की दूरी का अनुमान लगाना तथा साथ ही यह अनुमान भी लगाना कि कितने समय में गेंद उसके पास पहुंचेगी।
  3. पास करने से पहले विपक्षी खिलाड़ी की स्थिति का अनुमान लगाना।
  4. “पास” सही तथा शीघ्र होना चाहिए।

दो हाथ का छाती वाला या पश पास
(Two Handed Chest Pass or Push Pass)
बॉस्केट बॉल में यह सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाला पास है। कम या मध्यम दूरियों के लिए इस पास का प्रयोग होता है तथा इसमें कलाई द्वारा अतिरिक्त शक्ति लगाई जाती है। गेंद को छाती की ऊंचाई पर लाना चाहिए ताकि इसे सरलता से प्राप्त (Catch) किया जा सके। पास देने के लिए गेंद को छाती के सामने दोनों हाथों में पकड़ा जाता है, कोहनियां काफ़ी दूर होती हैं ताकि गति में अवरोध न हो। इस स्थिति में खिलाड़ी गेंद को पास, शूट या स्टार्ट (Pass, Shoot or Start) कर सकता है। भुजाओं को फैला कर तथा हथेली को पास की दिशा में घुमाकर गेंद को शक्ति के साथ आगे की ओर धकेलना चाहिए।

दो हाथ का बाउन्स पास (Two Handed Bounce Pass)—यह पास भी लगभग “Chest Pass” की तरह ही है। इसमें गेंद को ठीक पहले की तरह ही फेंका जाता है किन्तु इसे ज़मीन की तरफ प्राप्तकर्ता खिलाड़ी के यथासम्भव निकट फेंकते हैं ताकि वह गेंद को घुटनों तथा कमर के बीच किसी ऊंचाई पर प्राप्त करके ले। “बाउन्स पास” का प्रयोग साधारणतया छोटी दूरियों के लिए किया जाता है। बाउन्स पास देने के लिए गेंद को अपनी छाती या कमर की ऊंचाई पर दोनों हाथों में पकड़े कोहनियों को सीधा करें तथा हथेली से शक्ति के साथ गेंद को ज़मीन की तरफ इस प्रकार फेंको कि विपक्षी के पास से होकर जैसे ही गेंद ज़मीन को छुए, वह उछल कर प्राप्तकर्ता के हाथ में गिरे।

दो हाथों का अण्डर हैण्ड पास
(Two Handed Under Hand Pass)
इसे शौवल पास (Shoval Pass) भी कहते हैं। यह तब प्रयोग किया जाता है जब खिलाड़ी (Passer) अपने साथी खिलाड़ी के निकट ही हो। गेंद शीघ्र देने के लिए यह एक छोटा पास है। यह पास देने के लिए कोहनियों को बाहर की तरफ़ मोड़ते हुए दाएं या बाएं तरफ से दोनों हाथों का प्रयोग करो। दाईं साइड के पास के लिए बायां तथा बाईं साइड के पास के लिए तुम्हें दायां पैर आगे धकेलना चाहिए।

बेस बॉल पास
(Base Ball Pass) यह पास बहुत प्रभावशाली है। इसका प्रयोग गेंद को पिवट खिलाड़ी (Pivot Player) को देने अथवा लम्बा पास देने के लिए होता है। सुविधा के अनुसार दायां या बायां हाथ प्रयोग किया जा सकता है। पास को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए गेंद को अपने कन्धों के ऊपर तथा दाएं कान के निकट रखो। अब गेंद को पूरी शक्ति के साथ आगे फेंको। इस पूरी क्रिया में तुम्हारा दायां हाथ पीछे रहना चाहिए। इस पास में देखने की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गेंद को कलाई (न कि बाजुओं) की मदद से कितनी शक्ति से धकेला जाता है।

दो हाथों वाला साइड पास
(Two Handed Side Pass)
सिवाय हाथों की स्थिति के, यह पास “बेस बॉल पास” की तरह ही है। इसमें हाथों को गेंद के दोनों तरफ फैलाना चाहिए। इसे हुक के दाएं या बाएं किसी तरफ से भी खेला जा सकता है।

बैक पास
(Back Pass) अपने असुरक्षित साथी (Unguarded) को गेंद देने के लिए यह सर्वोत्तम पास है। इसमें गेंद को पीछे से, कलाई से तथा उंगलियों की मदद से पास किया जाता है। क्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए कूल्हों (Hips) को थोड़ा हिलाया जा सकता है। किसी भी हाथ से यह पास प्रभावशाली ढंग से दिया जा सकता है।

एक हाथ का बाऊन्स पास
(One Handed Bounce Pass)
यह दाएं या बाएं हाथ से दिया जाता है। इसका प्रयोग दो स्थितियों में किया जाता है।

  1. जब “गार्ड” खिलाड़ी (Guard Player) पासर खिलाड़ी (Passer Player) को बहुत निकट से गार्ड कर रहा
  2. जब गतिशील प्राप्तकर्ता खिलाड़ी बहुत निकट से गार्ड किया जा रहा हो।

इस ‘पास’ की तकनीक स्थिति के साथ बदलती रहती है। पहली स्थिति में पास को प्रभावशाली बनाने के लिए इसे शीघ्रता से तथा अकस्मात् (Suddenness and Surprise) किया जाता है। इसकी साधारण विधि में इसे शुरू करके आवश्यकतानुसार किसी भी साइड में शीघ्रता से हट जाना होता है। ठीक उसी समय गार्ड खिलाड़ी से बचने के लिए बाजू को कदम की दिशा में बढ़ा कर गेंद प्राप्तकर्ता की तरफ आवश्यकतानुसार स्विग (Swing) के साथ उछाल दिया जाता है। दूसरे प्रकार का ‘एक हाथ वाला पास’ तब आवश्यक होता है जब दौड़ता हुआ प्राप्तकर्ता (Receiver) खिलाड़ी बहुत निकट से गार्ड हो रहा हो। इस स्थिति में ‘गार्ड’ द्वारा इसी प्रकार का सीधा पुश पास प्रयोग करना सम्भावित है। इस पास (Pass) को फेंकने के लिए गेंद को थोड़ा-सा कन्धों के ऊपर कानों के पास रखा जाता है। इसके बाद बाजू को आगे तथा नीचे की तरफ इस तरह फैलाया जाता है कि गेंद को सामने स्विग किया जा सके परन्तु गेंद ‘गार्ड’ (जो प्राप्तकर्ता को कवर किए हैं) की पहुंच के बाहर होनी चाहिए।

फ्लिप पास
(Flip Pass)
‘फ्लिप पास’ का प्रयोग गेंद को निकट से ‘पास’ के लिए किया जाता है। यह आवश्यकतानुसार दोनों हाथों से या एक हाथ से किया जा सकता है। थोड़ी दूरी पर खड़े खिलाड़ी को गेंद फ्लिप करने के लिए झुकी हुई कलाई (Flexed Wrist) का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि यह एक छोटा ‘पास’ है गेंद को केवल कलाई द्वारा ही ‘फ्लिप’ किया जाता है ताकि गेंद को केवल इतना बल ही मिले कि प्राप्तकर्ता इसे सरलता से तथा निश्चित रूप से दबोच सके। क्योंकि दूरी कम होती है इसलिए प्रतिपक्षी खिलाड़ी इसे रोक नहीं सकता तथा प्राप्तकर्ता इसे सरलता से पकड़ लेता है।

एक हाथ का साइड पास
(One Handed Side Pass)
जब अधिक शुद्धता (Accuracy) तथा गति (Speed) की आवश्यकता न हो तो उस स्थिति में यह ‘पास’ प्रयोग किया जाता है। इस पास की तकनीक इस प्रकार है—
गेंद को अपने हाथों में पकड़ो, हाथों की उंगलियां अच्छी तरह फैली हुई हों ताकि पूरे गेंद को ढक सकें। अपने शरीर को थोड़ा-सा घुमाते हुए गेंद को दाएं कान के पास ले जाओ। कोहनियों को खोलते हुए तथा उसी समय बाएं पैर को आगे बढ़ाओ। कोहनी को नीचे की तरफ खोलते हुए दाएं हाथ से गेंद को आगे की ओर फेंको। विश्राम सहित (Relaxed) शरीर तथा कलाई द्वारा इसका पीछा करो। पास देते समय बाईं भुजा, दाईं भुजा की मदद करती है। परन्तु बाईं कोहनी छाती की ऊंचाई पर मुड़ी रहती है।

टिप अर्थात् वॉली पास
(Tip or Volley Pass)
किसी दिशा में भी एक कदम लेकर फ्रन्ट लाइन की स्थिति से यह पास दिया जा सकता है। गेंद पकड़ते समय एक हाथ गेंद के नीचे तथा दूसरा उसकी मदद करते हुए होता है। गेंद को उंगलियों के सिरों से या कलाई द्वारा फ्लिप करके थोड़ी दूर पर खड़े अपने साथी खिलाड़ी को लुढ़का दिया जाता है।

पासिंग क्रिया की आवश्यक बातें
(Some Hints on Passing Strategy)

  1. ‘पासर’ खिलाड़ी को प्राप्तकर्ता खिलाड़ी की स्थिति तथा उसके द्वारा की जाने वाली सम्भावित कार्यवाही का . पूर्व अनुमान लगा लेना चाहिए।
  2. पास देते समय शीघ्रता नहीं करनी चाहिए विशेषकर जब उसका साथी विपक्षी खिलाड़ियों से घिरा हआ हो।
  3. टीम का आफैन्स (Offence) मुख्य रूप से छोटे पासों (Short Passes) पर निर्भर होता है।

बॉस्केटबाल में प्रयुक्त शब्दावली
पिछला कोर्ट-कोर्ट का आधा भाग जहां से आक्रामक टीम आती है। अन्य शब्दों में, वह अर्द्ध भाग है जिसमें कि बॉस्केट होती है जिसको उन्होंने बचाना होता है।
ब्लाईंड पास-एक दिशा में देखते हुए बाल को पृथक् दिशा का प्रयोग करते हुए दूसरी दिशा में पास देना।
स्पष्ट शॉट-यह शॉट जो बोर्डों या रिंग को बिना छुए सीधा बॉस्केट में जाता है।

क्षेत्र से क्षेत्र की प्रतिरक्षा (Zone to Zone defence)—यह एक प्रकार की प्रतिरक्षा प्रणाली है जिसमें खिलाड़ी किसी क्षेत्र की केवल प्रतिरक्षा के ज़िम्मेदार होते हैं। इनका ध्यान केवल गेंद की तरफ होता है, प्रतिपक्षी खिलाड़ी की तरफ नहीं।

खिलाड़ी से खिलाड़ी की प्रतिरक्षा (Man to Man defence)—यह वह प्रतिरक्षा प्रणाली है जिसमें प्रत्येक खिलाड़ी की ज़िम्मेदारी किसी विशेष शत्रु खिलाड़ी से प्रतिरक्षा की होती है।
मिश्रित प्रतिरक्षा (Combined defence)—यह प्रतिरक्षा प्रणाली दोनों प्रणालियों ‘क्षेत्र से क्षेत्र’ तथा ‘खिलाड़ी से खिलाड़ी’ का मिश्रण है।

कट इन (Cut in)-किसी खिलाड़ी का दो या अधिक शत्रु खिलाड़ियों के मध्य से होकर गेंद प्राप्त करने के लिए किसी बॉस्केट की ओर तेज़ी से भागना ‘कट इन’ कहलाता है।

चार्जिंग (Charging)-किसी खिलाड़ी के साथ अनावश्यक शारीरिक सम्पर्क। किसी खिलाड़ी के बीच से निकलना तथा उससे बचने की कोशिश करना।

फाऊल आऊट (Fouled Out)-पांच फाऊलों के बाद खिलाड़ी को क्षेत्र से बाहर कर दिया जाता है। इसे फाऊल आऊट कहते हैं।
फ्रीज या हैल्ड गेंद (Freeze or Held bal)—गेंद को बजाय खेलने की कोशिश करने के उसे अपने पास ही रख लेना।

ओवर लोडिंग (Over Loading)—’क्षेत्र से क्षेत्र प्रतिरक्षा’ के विरुद्ध विरोधी खिलाड़ियों की आक्रामक प्रणाली। इस हेतु एक ही तरफ अधिक आक्रामक खिलाड़ियों को खड़े करने की प्रणाली को ओवरलोडिंग कहा जाता है।
पोस्ट खिलाड़ी (Post Player)—स्वतन्त्र थ्रो के क्षेत्र में खड़े आक्रामक खिलाड़ी को पोस्ट खिलाड़ी कहते हैं।
स्क्रीन (Screen)-जब कोई खिलाड़ी अपने साथी की रक्षा के लिए उसके गार्ड के मार्ग में स्वयं को खड़ा कर लेता है।

खेल का निर्णय-खेल में अधिक अंक प्राप्त करने वाली टीम को विजयी घोषित किया जाएगा।
खेल का अधिकार छिन जाना—मध्यान्तर या टाइम-आऊट के पश्चात् यदि कोई टीम रैफरी के बुलाने के बाद एक मिनट के अन्दर खेल के लिए मैदान में नहीं उतरती तो गेंद खेल में लाई जाएगी और अनुपस्थित टीम खेल अधिकार खो देगी। यदि खेल के दौरान किसी टीम के खिलाड़ियों की संख्या दो से कम रह जाए तो खेल समाप्त हो जाएगा और टीम भी खेल अधिकार खो देगी।

स्कोर तथा अतिरिक्त समय–यदि दूसरे खेल अर्द्धक की समाप्ति तक दोनों टीमों के अंक बराबर हों तो पांच मिनटों की अधिक अवधि दी जाएगी और ऐसी अवधि जब तक खेल का फैसला न हो, दी जाएगी। अतिरिक्त समय में बॉस्केट के चुनाव के लिए टॉस होगा और उसके बाद प्रत्येक अतिरिक्त समय के लिए बॉस्केट बदल लिया जाएंगे।

टाइम-आऊट-मध्यान्तर तक प्रत्येक टीम को दो टाइम-आऊट मिल सकते हैं तथा अतिरिक्त समय में एक टाइमआऊट मिल सकता है। किसी खिलाड़ी को चोट लगने की दशा में एक मिनट का टाइम-आऊट मिलता है। यदि इस बीच घायल खिलाड़ी ठीक नहीं होता तो उसकी जगह नया खिलाड़ी ले लिया जाता है।

खेल की समाप्ति-टाइम कीपर द्वारा खेल की समाप्ति की सूचना दिए जाने पर खेल समाप्त कर दिया जाएगा।
खिलाड़ी का बदलना-स्थानापन्न खिलाड़ी (Substitute Player) मैदान में उतरने से पहले स्कोरर के पास रिपोर्ट करेगा और तुरन्त खेलने के लिए प्रस्तुत रहेगा। अधिकारी का संकेत पाते ही मैदान में तुरन्त उतरेगा। स्थानापन्न को मैदान में उतरने के लिए 20 सैकिंड से अधिक समय नहीं लगना चाहिए। यदि उसे अधिक समय लगता है तो टाइम-आऊट माना जाएगा और विरोधी दल के विरुद्ध अंकित कर दिया जाएगा।

मृत गेंद (Dead Ball)—गेंद उस समय भी मृत होती है जब गेंद जो पहले ही गोल के लिए शॉट (Shot) के लिए उड़ान में होती है और खिलाड़ी के द्वारा उस समय के पश्चात् छुई जाती है जब बाधा या फाऊल समय पूरा हो चुका होता है या जब फाऊल बुलाया जा चुका होता है। (ऊपर की ओर उड़ान में जब गेंद को छुआ जाता है, बॉस्केट यदि असफल हो, नहीं गिनी जाती।)

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 5.
बास्केट बाल खेल में तीन सैकिण्ड, पांच सैकिण्ड, आठ सैकिण्ड और चौबीस सैकिण्ड नियम क्या
उत्तर-
तीन सैकिण्ड नियम-जब गेंद किसी टीम के अधिकार में हो तो उस टीम का कोई भी खिलाडी विरोधी टीम के प्रतिबद्ध क्षेत्र में तीन सैकिण्ड से अधिक नहीं रहेगा।
पांच सैकिण्ड नियम -जब पास का कोई रक्षक खिलाड़ी गेंद को खेलने से रोकता है और वह पांच सैकिण्ड के अन्दर गेंद को खेल में डालने की कोई सामान्य कोशिश नहीं करता तो वह ब्लॉकिंग कहलाता है।

आठ सैकिण्ड नियम -जब किसी टीम को मैदान के पिछले भाग में गेंद प्राप्त हो जाता है तो उसे आठ सैकिण्ड के अन्दर गेंद को अगले भाग में डालना पड़ता है।
चौबीस सैकिण्ड नियम-नये नियम के अनुसार पार्श्व रेखा (Side line) पर आऊट ऑफ बाऊंड्ज़ (Out of bounds) से थ्रो-इन के पश्चात् एक नई चौबीस (26) सैकिण्ड की अवधि तब तक आरम्भ नहीं होती जब तक—

  • गेंद आऊट ऑफ बाऊंड्ज़ (Out of bounds) नहीं जाती है और उसी टीम के खिलाड़ी के द्वारा थ्रो-इन नहीं ली जाती।
  • अधिकारी (Officials) ने किसी आहत को बचाने के लिए खेल को रोक (Suspend) कर दिया हो और आहत खिलाड़ी वाली टीम के खिलाड़ी ने थ्रो-इन (Throw-in) ली हो।

24 सैकिण्ड आप्रेटर (Operator) उस समय से घड़ी को रोके हुए समय से चलाये जब तक वह टीम थ्रो-इन (Throw-in) किये जाने के पश्चात् पुनः काबू पा लेती है।
फाऊल के बाद गेंद खेल में-जब गेंद किसी फाऊल के साथ खेल से बाहर हो जाए तो इस स्थिर गेंद को—

  1. बाहर से थ्रो करके, या
  2. किसी एक वृत्त में जम्प बाल द्वारा, या
  3. एक या अधिक फ्री-थ्रो द्वारा फिर खेल में लाया जाएगा।

थ्रो-इन-जब किसी नियम का उल्लंघन हो जाए तो गेंद स्थिर समझी जाती है और विरोधी टीम को साइड-लाइन के समीपवर्ती बिन्दु से थ्रो-इन के लिए दी जाती है।

अब नियम उस खिलाड़ी को आज्ञा देता है जिसने थ्रो-इन (Throw-in) करना है कि वह समाप्ति रेखा (End line) को छुए और यह नियम का उल्लंघन नहीं है।

फ्री-थ्रो-जिस खिलाड़ी पर फाऊल किया गया हो वह फ्री-थ्रो लेता है परन्तु किसी तकनीकी फाऊल होने की दशा में कोई भी खिलाड़ी फ्री-थ्रो ले सकता है। जब फ्री-थ्री ली जाती है, तो खिलाड़ियों की स्थिति इस प्रकार होती है—

  1. विरोधी टीम के दो खिलाड़ी बॉस्केट के समीप खड़े होंगे।
  2. अन्य खिलाड़ी भिन्न-भिन्न पोजीशन लेंगे।
  3. बाकी के खिलाड़ी कोई भी और पोजीशन ले सकते हैं परन्तु वे फ्री-थ्रो के समय बाधक नहीं बनने चाहिएं।

फ्री-थ्रो के उल्लंघन-फ्री-थ्रो करने वाले सैकिण्ड खिलाड़ी के अधिकार में गेंद देने के पश्चात्

  • इन पांच सैकिण्ड के अन्दर गेंद को इस तरह फेंकेगा कि खिलाड़ी द्वारा छुए जाने से पहले गेंद बॉस्केट में चली जाए या घेरे का स्पर्श कर ले।
  • गेंद के बॉस्केट की ओर जाते समय या अन्दर पहुंचने पर न तो वह और न ही कोई दूसरा खिलाड़ी गेंद या बॉस्केट को छुएगा।
  • वह फ्री-थ्रो लाइन या उसके परे भूमि को छुएगा और न ही किसी टीम का कोई दूसरा खिलाड़ी फ्री-थ्रो लाइन को छुएगा या फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी को बाधा पहुंचाएगा।

खेल को प्रतिबन्धित करना (Game to be Forefeited)-नये नियम के अनुसार रैफरी को अब यह आवश्यक नहीं है कि वह गेंद को उस विधि से खेल में रखे जैसे कि दोनों टीमें फर्श पर खेलने के लिए और खेल को प्रतिबन्धित करने के लिए तैयार हों। अब रैफरी के खेल में बुलाने के पश्चात् यदि एक टीम खेलने से इन्कार कर देती है तो खेल प्रतिबन्धित हो जाता है।

गेंद का पिछली कोर्ट को वापिस जाना (Ball Return to Back Court) नये नियम के अनुसार गेंद को टीम ए (A) को पिछली कोर्ट की ओर भेजा जाता है, शर्त यह है कि इसको टीम ए (A) का एक खिलाड़ी छूता है जबकि टीम ‘A’ सामने की कोर्ट में गेंद को नियन्त्रित रखती है। इसके अनुसार A, खिलाड़ी को छूना जबकि गेंद टीम ए के सामने की कोर्ट में टीम बी (B) के नियन्त्रण में है। यदि गेंद टीम ए (A) के सामने की कोर्ट में जाता है उसको ऐसा नहीं समझा जाता है कि पिछली कोर्ट में जाने दिया जाए।

इसके आगे केन्द्र (Mid-Point) से थ्रो-इन (Throw-in) के बीच अधिकारी (Official) यह निश्चित बताएगा कि खिलाड़ी बढ़ाई गई पार्श्व रेखा (Side-line) के दोनों ओर एक पैर रख कर पोजीशन स्थापित करता है।

आऊट आफ बाऊंड खेल पर नियम का उल्लंघन (Violation on Out of bounds play) यह नियम को तोड़ना नहीं है जबकि थ्रो-इन (Throw-in) दी गई है, खिलाड़ी गेंद को छोड़ते समय लकीर पर पांव रखता है।
दण्ड—
1. फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी द्वारा उल्लंघन होने पर कोई अंक रिकार्ड न होगा। फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी के विपक्षी की गेंद फ्री-थ्रो लाइन के सामने दे दी जाएगी।

2. फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी को टीम के अन्य खिलाड़ी द्वारा नियम का उल्लंघन होने पर भी अंक रिकार्ड होगा। यदि नियम (ख) का उल्लंघन दोनों टीमों द्वारा होता है तो कोई अंक दर्ज नहीं होगा और फ्री-थ्रो लाइन पर जम्प बाल द्वारा खेल जारी किया जाएगा।

3. यदि नियम (ग) का उल्लंघन फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी के साथी द्वारा होता है तथा फ्री-थ्रो सफल हो जाती है तो उल्लंघन की उपेक्षा करके गोल गिन लिया जाएगा और उसका दण्ड दिया जाएगा।

4. यदि (ग) नियम का उल्लंघन फ्री-थ्रो करने वाले खिलाड़ी के विरोधियों से होता है तो फ्री-थ्रो सफल होने पर उल्लंघन की उपेक्षा करके गोल गिना जाएगा।

5. यदि नियम (ग) का उल्लंघन दोनों टीमों द्वारा होता है और फ्री-थ्रो सफल हो जाती है तो उल्लंघन की उपेक्षा करके गोल गिना जाएगा। फ्री-थ्रो सफल न होने की दशा में फ्री-थ्रो लाइन पर जम्प बाल के साथ खेल पुनः जारी किया जाएगा।

बॉस्केट बाल (Basket Ball) Game Rules - PSEB 11th Class Physical Education

प्रश्न 6.
बॉस्केट बाल खेल में खिलाड़ी के तकनीकी फाऊल लिखें।
उत्तर-
खिलाड़ी द्वारा तकनीकी फाऊल-कोई भी खिलाड़ी अधिकारियों द्वारा दी गई चेतावनी की अवहेलना नहीं करेगा और न ही ऐसा व्यवहार करेगा जो एक खिलाड़ी को शोभा न दे, जैसे—

  1. अधिकारी को अपमानजनक ढंग से सम्बोधित करना या मिलना।
  2. असभ्य व्यवहार करना।
  3. विरोधी खिलाड़ी को तंग करना या उसकी आंखों के आगे हाथ करके उसे देखने में रुकावट डालना।
  4. खेल को अनुसूचित ढंग से विलम्बित करना।
  5. फाऊल का संकेत मिलने पर ठीक ढंग से बाजू न उठाना।
  6. स्कोरर या रैफरी को बिना सूचित किए अपना नम्बर बदलना।।
  7. स्कोरर को सूचित किए बिना स्थानापन्न (Substitute) की तरह कोर्ट में प्रवेश करना।

दण्ड-प्रत्येक अपराध को एक फाऊल माना जाएगा और प्रत्येक फाऊल के लिए विरोधी को दो फ्री-थ्रो दी जाएंगी। इस नियम का बार-बार उल्लंघन किए जाने पर खिलाड़ी को अयोग्य घोषित करके खेल से निकाल दिया जाएगा।

कोच का स्थानापन्न (Substitute) द्वारा तकनीकी फाऊल-कोई कोच या स्थानापन्न बिना अधिकारी की आज्ञा के कोर्ट में दाखिल नहीं हो सकता, न ही कोर्ट के कार्यों को जानने के लिए अपना स्थान छोड़ सकता है और न ही किसी अधिकारी या विरोधी को अपमानजक ढंग से बुला सकता है।

दण्ड-कोच द्वारा इस नियम का उल्लंघन करने पर उसके नाम फाऊल दर्ज किया जाएगा। प्रत्येक अपराध के लिए एक फ्री-थ्रो दी जाएगी और बाल उसी टीम को केन्द्रीय रेखा पर थ्रो-इन करने के लिए मिलेगा। इस नियम के बारबार उल्लंघन किए जाने पर कोच को क्षेत्र की सीमाओं से बाहर निकाला जा सकता है।

निजी फाऊल-निजी फाऊल उस खिलाड़ी का होता है तो विरोधी खिलाड़ी को ब्लॉक करता है, पकड़ता है, धक्का देता है तथा उस पर आक्रमण करता है।
दण्ड-यदि शूटिंग करते समय खिलाड़ी पर फाऊल देता है तो—

  1. यदि गोल हो जाता है तो उसकी गिनती की जाएगी और एक फ्री-थ्रो दी जाएगी।
  2. यदि गोल (2 अंक) असफल हो, दो फ्री-थ्रो (Free Throw) दिए जाएंगे।
  3. यदि गोल (Goal) के लिए शाट (Shot) असफल होता है तो तीन फ्री-थ्रो (Free Throws) दिये जाएंगे।

जानबूझ कर (साभिप्राय ) फाऊल-यह वह शारीरिक फाऊल है जो किसी खिलाड़ी द्वारा जानबूझ कर दिया जाता है। जो खिलाड़ी बार-बार साभिप्राय फाऊल करता है उसे अयोग्य करार देकर खेल से निकाला जा सकता है।

दण्ड-अपराधी पर शारीरिक फाऊल का दोष लगाया जाएगा और दो फ्री-थ्रो दिए जाएंगे। यदि यह फाऊल ऐसे खिलाड़ी पर होता है तो गोल बनाता है तो यह गोल माना जाएगा और एक अतिरिक्त फ्री-थ्रो दी जाएगी।

डबल फाऊल-डबल फाऊल उस स्थिति में होता है जब दो खिलाड़ी एक-दूसरे के प्रति लगभग एक ही समय फाऊल करते हैं। डबल फाऊल होने पर निकटतम वृत्त से जम्प बाल द्वारा खेल पुनः शुरू करवा दी जाएगी।

बहुपक्षीय (Multiple) फाऊल-बहुपक्षीय फाऊल उस समय होता है जब एक टीम के दो या तीन खिलाड़ी एक ही विरोधी खिलाड़ी पर निजी फाऊल कर देते हैं।

इस स्थिति में प्रत्येक अपराधी खिलाड़ी पर एक फाऊल लगेगा और जिस खिलाड़ी के प्रति अपराध हुआ है उसे दो फ्री-थ्रो दी जाएगी। यदि फेंकने की प्रक्रिया में किसी खिलाड़ी के प्रति फाऊल हुआ है तो गोल बनने पर किया जाएगा और एक फ्री-थ्रो दी जाएगी।
पांच फाऊल-यदि कोई खिलाड़ी पांच फाऊल (निजी या तकनीकी) करता है तो उसे नियमानुसार बाहर निकाल देना चाहिए।

तीन और दो नियम (Three for two Rule)-जब खिलाड़ी गोल करने लगा हो तो उस पर विरोधी टीम का खिलाड़ी फाऊल कर दे और यदि गोल बन जाए तो एक और फ्री-थ्रो मिलेगा। गोल न होने की अवस्था में दोनों फ्रीथ्रो में से एक भी न होने पर अतिरिक्त फ्री-थ्रो मिलेगा।

चयन का अधिकार (Right of Option) केन्द्र बिन्दु (Mid Point) से थ्रो-इन के लिए चयन का अधिकार एक, दो और तीन थ्रो की दशा में लागू होता है। चयन करने से पहले कप्तान को कोच के साथ संक्षिप्त परामर्श करने की आज्ञा होती है।

टीम के द्वारा चार फाऊल (Four fouls by the Team)-जब टीम किसी अवधि में चार खिलाड़ियों का फ़ाऊल (निजी और तकनीकी) कर चुकती है, इस अवधि समय में सभी बाद के खिलाड़ियों को फाऊल होने पर दो फ्री-थ्रो मिलती है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र पर एक नोट लिखें। (Write a note on U.N.)
उत्तर-
द्वितीय महायुद्ध की तबाही को देखकर संसार के सभी भागों में यह इच्छा होने लगी थी कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की स्थापना के लिए कोई शक्तिशाली अन्तर्राष्ट्रीय मशीनरी बनाई जाए। अत: 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई। आरम्भ में इसके 51 देश सदस्य थे जबकि आजकल 193 देश इसके सदस्य हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व का सबसे बड़ा अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इसका मुख्यालय न्यूयार्क (अमेरिका) में है।

संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य (Aims of the United Nations)-संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावना में ही इस संगठन के उद्देश्यों का वर्णन किया गया है। प्रस्तावना में कहा गया है, कि “हम संयुक्त राष्ट्र के लोग…..लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हमेशा सहयोग करेंगे।”
सानफ्रांसिस्को में आयोजित सम्मेलन में इस संगठन के चार उद्देश्य बताए गए(1) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना और अन्तर्राष्ट्रीय खतरों का सामूहिक मुकाबला करना।

(2) विभिन्न राष्ट्रों के मध्य समान अधिकार, स्वाभिमान तथा जनता में आत्म-निर्णय के अधिकार के आधार पर सम्बन्धों की स्थापना और विश्व शान्ति को सुदृढ़ करने के उपाय करना। ।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना।
(4) उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न राज्यों के मध्य सहयोग करने के लिए एक केन्द्र की भूमिका निभाना।

संयुक्त राष्ट्र के अंग (PRINCIPAL ORGANS OF THE UNITED NATIONS)

संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुसार छह प्रमुख अंग हैं जिनके द्वारा यह अपने बहुमुखी कार्य करता है। इन छह अंगों का वर्णन इस प्रकार है

I. महासभा (The General Assembly)-महासभा को संयुक्त राष्ट्र की संसद् भी कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश महासभा के भी सदस्य होते हैं। संयुक्त राष्ट्र का प्रत्येक सदस्य देश महासभा में 5 प्रतिनिधि भेज सकता है। महासभा का अधिवेशन प्रतिवर्ष सितम्बर मास के तीसरे मंगलवार को होता है। महासभा हर वर्ष अपना एक अध्यक्ष चुनती है। महासभा में प्रत्येक सदस्य देश को एक मत देने का अधिकार प्राप्त है। महासभा की शक्तियां अथवा कार्य इस प्रकार हैं-

(1) सुरक्षा परिषद् के 10 अस्थायी सदस्यों का 2/3 बहुमत से चुनाव करना।
(2) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 न्यायाधीशों का चुनाव करना।
(3) चार्टर के अधीन सारे विषयों पर विचार करना।
(4) संयुक्त राष्ट्र के अन्य अंगों व एजेन्सियों पर नियन्त्रण करना।
(5) संयुक्त राष्ट्र का बजट तैयार करना।
(6) संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन करना।
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II. सुरक्षा परिषद् (The Security Council)-सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका के समान है। सुरक्षा परिषद् एक छोटा लेकिन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। इसके कुल 15 सदस्य हैं। इनमें से पाँच स्थायी हैं
ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, रूस और चीन। इसके अलावा दस अस्थायी सदस्य 2 वर्षों के लिए महासभा द्वारा चुने जाते हैं। स्थायी सदस्यों को निषेधाधिकार (veto) प्राप्त है। सुरक्षा परिषद् के मुख्य कार्य तथा शक्तियाँ इस प्रकार हैं
(1) ऐसे मामले पर विचार करना जिससे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा भंग होने का भय हो।
(2) महासभा अपने अनेक चुनाव सम्बन्धी कार्य सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर ही करती है।
(3) चार्टर में संशोधन सुरक्षा परिषद् की सहमति से ही हो सकता है।

III. आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् (The Economic and Social Council)-विश्व की सामाजिक, आर्थिक व मानवीय समस्याओं के हल के लिए संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक व सामाजिक परिषद् की स्थापना की गई। प्रारम्भ में इस परिषद् के 18 सदस्य थे, लेकिन आजकल इसकी सदस्य संख्या 54 है। ये सदस्य महासभा द्वारा 2/3 बहुमत से तीन वर्ष के लिए चुने जाते हैं और 1/3 सदस्य प्रति वर्ष रिटायर हो जाते हैं। आर्थिक और सामाजिक परिषद् की एक वर्ष में कम-से-कम तीन बैठकें होती हैं। इस परिषद् के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं
(1) सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना।
(2) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याओं का हल निकालना।
(3) बिना किसी भेदभाव के मानवाधिकारों को लागू करवाना।
(4) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य सम्बन्धी मामलों का अध्ययन करना और रिपोर्ट तैयार करना।
(5) संयुक्त राष्ट्र की अन्य विशिष्ट एजेन्सियों से रिपोर्ट प्राप्त करना।

IV. ट्रस्टीशिप कौंसिल (The Trusteeship Council)-ट्रस्टीशिप कौंसिल का उद्देश्य पिछड़े हुए देशों को विकसित देशों के नेतृत्व में उन्नति दिलाना है ताकि वे शीघ्रता से स्वशासन के योग्य हो जाएं। ट्रस्टीशिप कौंसिल में सुरक्षा परिषद् के सारे स्थायी सदस्य होते हैं। इनके अलावा सुरक्षित प्रदेशों का प्रबन्ध चलाने वाले देश भी इसके सदस्य होते हैं। इस परिषद् की साल में दो बैठकें होती हैं और इसके निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं। ट्रस्टीशिप कौंसिल के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं-

(1) प्रबन्धक राज्यों से हर वर्ष वहां की जनता के सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक विषयों के बारे में रिपोर्ट लेना।
(2) सुरक्षित प्रदेशों की जनता से अपीलें सुनना।
(3) निरीक्षक मण्डलों को न्यास प्रदेशों का दौरा करने के लिए भेजना।

V. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice)-अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 न्यायाधीश होते हैं जिन्हें महासभा तथा सुरक्षा परिषद् अलग-अलग स्वतन्त्र तौर पर चुनती है। न्यायाधीश 9 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। 1/3 न्यायाधीश प्रत्येक पाँच वर्ष पश्चात् रिटायर हो जाते हैं और उनकी जगह नए न्यायाधीश नियुक्त किए जाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में स्थित है। इस न्यायालय का क्षेत्राधिकार इस प्रकार है

1. अनिवार्य क्षेत्राधिकार-सन्धियों की व्याख्या करना अन्तर्राष्ट्रीय कानून से सम्बन्धित विवाद, अन्तर्राष्ट्रीय दायित्व को भंग करने वाले तथ्यों की स्थिति तथा किसी अन्तर्राष्ट्रीय दायित्व के उल्लंघन किए जाने पर दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की मात्रा और स्वरूप।
2. ऐच्छिक क्षेत्राधिकार- अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय उन विवादों को भी सुनता है तथा निर्णय देता है जो राज्य स्वयं इसके सम्मुख लाते हैं।
3. सलाहकारी कार्य-चार्टर की धारा 96 के अनुसार महासभा और सुरक्षा परिषद् अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय से कानून प्रश्नों पर सलाह ले सकती है।

VI. सचिवालय (The Secretariate)-संयुक्त राष्ट्र का प्रबन्धक काम चलाने के लिए चार्टर के अनुसार सचिवालय स्थापित किया गया है, जिसमें संगठन की ज़रूरत के अनुसार कर्मचारी होते हैं। महासचिव सचिवालय का मुखिया होता है। महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर महासभा 5 वर्ष के लिए करती है। सचिवालय संयुक्त राष्ट्र के सारे अंगों की कार्यवाही लिखता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों को प्रकाशित करता है।
निष्कर्ष (Conclusion)-संयुक्त राष्ट्र ने आगामी पीढ़ियों को अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध की विभीषिका से बचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भले ही राजनीतिक क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियां कम रही हों, परन्तु सामाजिक व आर्थिक विकास के क्षेत्र में इसने अद्वितीय भूमिका निभाई है। आज बढ़ते हुए आतंकवाद, निर्धनता और आर्थिक समस्याओं के कारण संयुक्त राष्ट्र की गैर-राजनीतिक भूमिका पहले से भी अधिक बढ़ गई है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र में भारत की भूमिका का वर्णन करें। (Describe India’s role in United Nations.)
अथवा
भारत ने विश्व शांति की स्थापना में सयुक्त राष्ट्र संघ में क्या भूमिका निभाई है ? (What is India’s role in the United Nations in the maintaining World Peace ?)
अथवा
भारत ने विश्व शान्ति की स्थापना में क्या भूमिका निभाई है? (What role India has played in the establishment of world peace ?)
उत्तर-
द्वितीय महायुद्ध की भयानक तबाही देखकर संसार के सभी भागों में प्रत्येक मनुष्य सोचने लग गया कि यदि एक ऐसा युद्ध और हुआ तो विश्व का तथा मानव जाति का सर्वनाश हो जाएगा। अतः हमारी यह लालसा बढ़ती गई कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्ति स्थापित करने के लिए कोई अन्तर्राष्ट्रीय मशीनरी स्थापित की जाए। आने वाली पीढ़ियों को युद्ध से बचाने के लिए 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई। संयुक्त राष्ट्र संघ का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन-समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्मनिर्णय के सिद्धान्त पर आश्रित मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना, आर्थिक, सामाजिक अथवा मानवतावादी स्वरूप सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना तथा इस सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को समन्वय करने के लिए निमित्त एक केन्द्र का कार्य करना है। संयुक्त राष्ट्र संघ के आरम्भ में 51 सदस्य थे और वर्तमान सदस्य संख्या 193 है। भारत संयुक्त राष्ट्र का प्रारम्भिक सदस्य है और इसे विश्व शान्ति के लिए एक महत्त्वपूर्ण संस्था मानता है। 1946 में ही पं० जवाहर लाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग करने और इसके चार्टर में पूरी तरह आस्था व्यक्त की। जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो भारत को स्वतन्त्र विदेश नीति का निर्माण करने का अवसर मिला। भारत की विदेश नीति के कर्णधार पं० जवाहर लाल नेहरू ने गुट-निरपेक्षता, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वतन्त्रता की प्राप्ति तथा रक्षा के लिए लड़ने वाले देशों को नैतिक सहायता देने और विश्व-शान्ति स्थापित करने की नीति को अपनाया। संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भारत के योगदान का वर्णन इस प्रकार से किया जा सकता है

1. भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना-भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के लिए सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और चार्टर पर हस्ताक्षर करके वह संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक सदस्य बना। सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि श्री ए. रामास्वामी मुदालियर ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध को रोकने के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय का महत्त्व सर्वाधिक होना चाहिए। भारत की सिफ़ारिश पर चार्टर में मानव अधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं के बिना किसी भेदभाव के प्रोत्साहित करने का उद्देश्य जोड़ा गया।

2. संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण विश्वास (Full Faith in United Nations)-भारत संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों व उद्देश्यों में पूर्ण विश्वास रखता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के प्रथम अधिवेशन में भारत के प्रतिनिधि ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि भारत की संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों और उद्देश्यों में पूर्ण आस्था है तथा भारत संयुक्त राष्ट्र को पूरा सहयोग देता रहेगा। 3 नवम्बर, 1945 को पं० जवाहर लाल नेहरू ने महासभा को सम्बोधित करते हुए स्पष्ट कहा था,

“इस महासभा को मैं अपने देश के लोगों और अपमी सरकार की ओर से कहूँगा कि हम संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों और उद्देश्यों का पूर्णतः पालन करते हैं और उनकी पूर्ति के लिए तथा अपनी योग्यता सहित प्रयत्न करेंगे।

3. संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य तथा भारत की विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्त एक समान (Objectives of the U.N. at the basic Principle of Indian Foreign Policy are Indentical)—संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य और भारत की विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्त एक समान हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बनाये रखना, राष्ट्रों के बीच सहयोग को बढ़ाना, अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना तथा मानव अधिकारों के लिए सम्मान विकसित करना आदि है। संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों से मेल खाते हुए सिद्धान्तों का वर्णन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में नीति-निर्देशक सिद्धान्तों के अन्तर्गत विदेश नीति से सम्बन्धित सिद्धान्तों में किया गया है, जो इस प्रकार

(1) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
(2) दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना तथा
(3) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्ति से हल करना इत्यादि।

4. संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता बढ़ाने में भारत की भूमिका-भारत की सदा ही यह नीति रही है कि विश्व शान्ति को बनाए रखने के लिए संसार के सभी देशों को, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों में विश्वास रखते हैं, सदस्य बनना चाहिए। इसलिए 1950 से लेकर अगले 20 वर्षों तक लगातार जब भी संयुक्त राष्ट्र संघ में साम्यवादी चीन को सदस्य बनाने का प्रश्न आया, भारत ने सदैव इसका समर्थन किया। परन्तु अमेरिका सुरक्षा परिषद् में चीन की सदस्यता के प्रस्ताव पर वीटो का प्रयोग करता रहा। 1972 में अमेरिका का चीन के प्रति दृष्टिकोण बदलने पर ही चीन सयुंक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बना। बंगला देश को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनवाने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

5. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंगों में भारत का स्थान-संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंगों और विशेष एजेन्सियों में भारत को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त रहा है। 1954 में भारत की श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित महासभा (General Assembly) की अध्यक्षा निर्वाचित हुई। 1956 में डॉ० राधाकृष्णन यूनेस्को के प्रधान चुने गए। भारत सात बार सुरक्षा परिषद् का सदस्य रह चुका है। सामाजिक और आर्थिक परिषद् का भारत लंगभग निरन्तर सदस्य चला आ रहा है। भारत के डॉ० नगेन्द्र सिंह को 1973 और 1982 में पुनः अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुना गया। फरवरी 1985 में उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश चुना गया। 1989 में न्यायमूर्ति आर० एस० पाठक को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश बनने का गौरव प्राप्त हुआ। फरवरी, 2003 में भारत की प्रथम महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी को संयुक्त राष्ट्र नागरिक पुलिस सलाहकार नियुक्त किया गया। वे इस प्रतिष्ठत पद पर नियुक्त होने वाली न केवल प्रथम भारतीय अपितु विश्व की प्रथम महिला अधिकारी हैं।

6. भारत और संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट एजेन्सियां (India and Specialized Agencies of U.N.)-भारत संयुक्त राष्ट्र की सभी विशिष्ट एजेन्सियों का सदस्य है तथा इसने इन एजेन्सियों के कार्यों व गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत कृषि प्रधान देश है। अत: भारत खाद्य व कृषि संगठन (FAO) का सदस्य है और भारत ने इसके सम्मेलनों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है तथा खाद्य पदार्थों के उत्पादन की वृद्धि और कृषि के विकास के लिए तकनीकी विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत यूनेस्को का महत्त्वपूर्ण सदस्य है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सहायता से भारत के गांवों में स्वास्थ्य, गांवों की सफ़ाई, पीने के पानी की व्यवस्था, परिवार और बाल कल्याण के अनेक कल्याणकारी कार्य चल रहे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक ने भारत के विकास के लिए अनेक योजनाओं के लिए व्यापक ऋण दिए हैं।

7. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा की दृष्टि से भारत का योगदान-संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य विश्व में शान्ति एवं सुरक्षा बनाए रखना है। भारत ने विश्व शान्ति सुरक्षा को बनाये रखने में संयुक्त राष्ट्र संघ में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका वर्णन हम इस प्रकार कर सकते हैं-

(i) कोरिया की समस्या-1950 में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने युद्ध को रोकने के लिए 16 राष्ट्रों की सेनाएं उत्तरी कोरिया के प्रतिरोध के लिए भेजीं। भारत के सैनिकों ने भी इस कार्यवाही में भाग लिया। भारत ने इस युद्ध को समाप्त कराने तथा युद्ध बन्दियों के आदान-प्रदान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत को तटस्थ राष्ट्र आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।

(ii) स्वेज़ नहर की समस्या-जुलाई, 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड, फ्रांस और इज़राइल ने मिलकर मिस्र पर आक्रमण कर दिया। भारत ने इन देशों की निन्दा की और महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का समर्थन किया जिसमें यह कहा गया कि युद्ध को तुरन्त बन्द कर दिया जाए। स्वेज़ नहर समस्या को हल करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(ii) कांगो समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्त करने पर कांगो में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई। इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए बेल्जियम ने कांगो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। लुम्बा ने संयुक्त राष्ट्र से सैनिक सहायता की अपील की। संयुक्त राष्ट्र संघ की अपील पर भारत ने अपनी सेना कांगो भेजी। वास्तव में संयुक्त राष्ट्र सेना में सबसे बड़ी एक टुकड़ी भारतीय बटालियन की थी।

(iv) अरब-इजराइल विवाद-1967 में अरब-इज़राइल युद्ध में इज़राइल ने अरब क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। भारत की नीति यह रही है कि इज़राइल को अरब क्षेत्र खाली करने चाहिएं और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित सभी प्रस्तावों को मानना चाहिए।

(v) सोमालिया के लिए भारतीय सहायता- भारत ने सोमालिया में शान्ति स्थापित करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र की अपील पर 2500 सैनिक भेजे। भारत के विदेश राज्य मन्त्री एडुआर्दो फैलोरियो ने स्वयं सोमालिया जाकर स्थिति का जायजा लिया और भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को सोमालिया के लिए नियुक्त विशेष प्रतिनिधि को 2.50 लाख डालर का अंशदान दिया।

(vi) युगांडा में शान्ति अभियान-रुआंडा और युगांडा के राष्ट्रपतियों की एक हवाई दुर्घटना में मृत्यु होने के बाद वहां अराजकता फैल गई। वहां के स्थानीय कबीलों में सत्ता प्राप्ति के लिए खूनी संघर्ष आरम्भ हो गया जिसमें लाखों नागरिक मारे गए। संयुक्त राष्ट्र संघ ने युगांडा में शान्ति स्थापना के लिए और खूनी संघर्ष को रोकने के लिए एक शान्ति योजना बनाई जिसके अन्तर्गत भारत को अपने सैनिक युगांडा में भेजने का आग्रह किया गया। भारत ने अक्तूबर, 1994 को अपने 2000 सैनिक युगांडा भेजे।
उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त भारत ने अन्य समस्याओं को सुलझाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

8. उपनिवेशवाद का विरोधी-भारत उपनिवेशवाद का सदा ही विरोधी रहा है और भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ उपनिवेशवाद के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द की। बंगला देश को स्वतन्त्र करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिन उपनिवेशों को स्वतन्त्रता दिलाने का प्रयत्न किया है, भारत ने उसका समर्थन किया है। भारत ने उपनिवेशवाद के खिलाफ नवीन शक्ति सहित प्रबल संघर्ष छेड़े जाने का आह्वान किया है। सितम्बर, 1986 में भारत के विदेश मन्त्री शिवशंकर ने नामीबिया के संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष अधिवेशन में नामीबिया को दक्षिणी अफ्रीका से मुक्त करवाने के लिए दस सूत्रीय कार्यवाही योजना का प्रस्ताव रखा। इस अवसर पर श्री शिवशंकर ने प्रधानमन्त्री राजीव गांधी के इस संकल्प को दोहराया कि नामीबिया नागरिकों को आजादी दिलाने की हर सम्भव कोशिश की जाएगी।

9. रंग-भेद के विरुद्ध संघर्ष- भारत ने रंग-भेद की नीति को विश्व शान्ति के लिए खतरा माना है। रंग-भेद पक्षपात की सबसे व्यापक, अभ्यस्त तथा भ्रष्टाचार प्रदर्शित उदाहरण एशिया तथा अफ्रीका के काले वर्गों के प्रति गोरों की धारणा थी। रंग-भेद की नीति में दक्षिणी अफ्रीकी सरकार सबसे आगे है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में कई बार रंग-भेद की नीति के विरुद्ध आवाज़ उठाई और विश्व जनमत तैयार किया जिसके फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने अनेक प्रस्ताव पारित किए। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने रंगभेद की नीति को मानवता के नाम पर कलंक बताते हुए कहा है कि दक्षिणी अफ्रीका में रंगभेद की नीति को समाप्त करने के लिए विश्व समुदाय तत्काल व्यापक व समयबद्ध कार्यक्रम प्रारम्भ करे। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी के मतानुसार रंग भेद को समाप्त करने का सबसे प्रभावी तरीका दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार के खिलाफ़ व्यापक और अनिवार्य आर्थिक प्रतिबन्ध लगाना है। श्री राजीव गांधी ने विश्व समुदाय को आह्वान किया कि प्रिटोरिया शासन का समर्थन करने वाली मात्र आधा दर्जन सरकारों को पीछे धकेल कर दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध कठोर कदम उठाए और उसे मजबूर करे कि वह अश्वेतों से बातचीत करें और रंगभेद की नीति समाप्त करे। भारत के निरन्तर प्रयासों के कारण 27 अप्रैल, 1994 को दक्षिण अफ्रीका में पहली बार बहु-जातीय चुनाव हुए जिसके कारण दक्षिण अफ्रीका से रंगभेद, जातीय भेदभाव आदि को समाप्त कर दिया गया है।

10. निःशस्त्रीकरण के प्रयासों में भारत का सहयोग-संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में महासभा और सुरक्षा परिषद् दोनों के ऊपर यह ज़िम्मेदारी डाली गई है कि वे निःशस्त्रीकरण के लिए कार्य करें। भारत की नीति यही रही है कि निःशस्त्रीकरण के द्वारा ही विश्व शान्ति को बनाए रखा जा सकता है और अणु शक्ति का प्रयोग केवल मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कई बार स्पष्ट शब्दों में कहा है कि नि:शस्त्रीकरण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वे सामूहिक विध्वंस करने वाले परमाणु हथियारों पर पाबन्दी लगाने के पक्ष में है। अक्तूबर, 1987 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह प्रस्ताव रखा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा परमाणु हथियार वाले सभी देशों को इन हथियारों का प्रसार रोकने के लिए सहमत कराए और साथ ही इन हथियारों का उत्पादन पूरी तरह रोकना चाहिए तथा हथियारों को बनाने के लिए काम आने वाले विस्फोटक पदार्थ के उत्पादन में भी पूरी तरह कटौती करनी चाहिए। जून, 1988 में स्वर्गीय प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने नि:शस्त्रीकरण पर संयुक्त राष्ट्र के तीसरे विशेष सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए आगामी 22 वर्ष के भीतर विश्व के सभी तरह के परमाणु हथियार हटाने के लिए तीन चरणों में समयवद्ध कार्य योजना का सुझाव दिया तथा संयुक्त राष्ट्र से इस योजना को तत्काल एक कार्यक्रम के रूप में आरम्भ करने का आग्रह किया है। 11वें गुट-निरपेक्ष देशों के सम्मेलन (अक्तूबर, 1995) में भारत ने विश्व से पूर्ण परमाणु नि:शस्त्रीकरण के पक्ष में सहयोग देने की बात कही। भारत पूर्ण नि:शस्त्रीकरण के पक्ष में है।

11. मानव अधिकारों की रक्षा-भारत मानव अधिकारों का महान् समर्थक है और भारत ने सदा यह कोशिश की है कि संयुक्त राष्ट्र संघ मानव अधिकारों की रक्षा के लिए उचित कार्यवाही करे।

12. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन-भारत गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक है और इस आन्दोलन ने शीत युद्ध को कम किया है और संयुक्त राष्ट्र संघ को पूरी तरह से गुटों में विभक्त होने से बचाया है।

13. आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को हल करने में भारत की भूमिका- भारत का सदा से ही यह विचार रहा है कि विश्व-शान्ति की स्थायी स्थापना तभी हो सकती है यदि आर्थिक और सामाजिक अन्याय को समाप्त किया जाए। भारत ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। भारत ने आर्थिक व पिछड़े देशों के विकास पर विशेष बल दिया है और विकसित देशों को अविकसित देशों की अधिक-से-अधिक सहायता करने के लिए कहा है। राष्ट्र संघ औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO) का तीसरा अधिवेशन जनवरी, 1980 में नई दिल्ली में हुआ। 24 अक्तूबर, 1985 को महासभा को सम्बोधित करते हुए स्वर्गीय प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का आह्वान किया कि वे शान्ति के प्रति अपने को समर्पित कर दुनिया से भुखमरी दूर करने के लिए संघर्ष करें।

14. भारत संयुक्त राष्ट्र की अन्तरिक्ष समिति में (India on Space Committee of U.N.)–भारत संयुक्त राष्ट्र की अन्तरिक्ष समिति का सदस्य है। भारत ने सदा इस बात पर जोर दिया है कि अन्तरिक्ष का प्रयोग शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष-भारत विश्व-शान्ति व सुरक्षा को बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ सहयोग देता रहा है और भारत का अटल विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व-शान्ति को बनाये रखने का महत्त्वपूर्ण यन्त्र है। पं० जवाहर लाल नेहरू ने एक बार कहा था, “हम संयुक्त राष्ट्र संघ के बिना विश्व की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।” भारत संयुक्त राष्ट्र संघ को विश्व-शान्ति की स्थापना का माध्यम मानता है। भारत को आशा है कि जैसे राष्ट्र व्यक्तियों के लिए है, राष्ट्रों के लिए संयुक्त राष्ट्र भी वैसा ही बन जाएगा।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ का क्या अर्थ है ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ क्या है?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ का अपना संविधान है जिसे चार्टर (Charter) कहा जाता है और यह चार्टर सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में तैयार किया गया था। संयुक्त राष्ट्र का मुख्य कार्यालय अमेरिका के प्रसिद्ध नगर न्यूयार्क में स्थित है। आरम्भ में संयुक्त राष्ट्र के 51 सदस्य थे, परन्तु आजकल इसकी सदस्य संख्या 193 है। भारत इसके आरम्भिक सदस्यों में से है। संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म निर्णय के सिद्धान्त पर आश्रित मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना और इन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को चलाने के लिए एक केन्द्र का कार्य करना है।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र के मुख्य उद्देश्य लिखो।
(उत्तर-

  • संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना है तथा युद्धों को रोकना और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा हल करना है।
  • भिन्न-भिन्न राज्यों के बीच समान अधिकारों के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना करना है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना।
  •  उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न राज्यों के मध्य सहयोग करने के लिए एक केन्द्र की भूमिका निभाना।

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प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र के पांच देशों के नाम लिखो, जिन्हें वीटो शक्ति प्राप्त है ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में वीटो शक्ति मानने वाले 5 महान् देशों के नाम लिखो।
उत्तर-
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका है। सुरक्षा परिषद् की कुल संख्या 15 है। इनमें 10 अस्थायी सदस्य तथा 5 स्थायी सदस्य हैं। 5 स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद् में वीटो का अधिकार दिया गया है। ये देश हैंअमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, रूस तथा साम्यवादी चीन।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना कब हुई इसके अंगों के नाम लिखो।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र के चार अंगों के नाम लिखो।।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थीं। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुसार इसके 6 मुख्य अंग हैं जिनके द्वारा यह अपने बहुमुखी कर्त्तव्यों को पूरा करता है-

  • महासभा-महासभा संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा अंग है। इसके 193 सदस्य हैं। इसका मुख्य कार्य चार्टर के क्षेत्र में हर विषय पर विचार-विमर्श करना है।
  • सुरक्षा परिषद्-चार्टर के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा करने की जिम्मेवारी सुरक्षा परिषद् की है। इसके कुल 15 सदस्य हैं जिनमें पांच राष्ट्र अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और साम्यवादी चीन स्थायी सदस्य हैं और 10 राष्ट्र अस्थायी सदस्य हैं।
  • आर्थिक तथा सामाजिक परिषद्-संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुसार इसका मुख्य मनोरथ आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समस्याओं को सुलझाना तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग लाना है।
  • ट्रस्टीशिप कौंसिल-इसका उद्देश्य पिछड़े हुए देशों को विकसित देशों के नेतृत्व में उन्नति दिलाना है ताकि वे शीघ्रता से स्वशासन के लिए तैयार हो सकें। ट्रस्टीशिप कौंसिल में सुरक्षा परिषद् से सारे स्थायी सदस्य होते हैं।
  • अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय-विभिन्न राष्ट्रों के मध्य विभिन्न विवादों को हल करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की व्यवस्था की गई है। इसके 15 जज होते हैं जिन्हें महासभा तथा सुरक्षा परिषद् अलग-अलग स्वतन्त्र तौर पर चुनती है।
  • सचिवालय-संयुक्त राष्ट्र का प्रबन्ध कार्य चलाने के लिए चार्टर के अनुसार सचिवालय स्थापित किया गया है। सचिवालय का मुखिया महासचिव होता है जिसकी नियुक्ति महासभा सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर करती है। सचिवालय में दुनिया के अनेक देशों के नागरिक काम करते हैं।

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प्रश्न 5.
भारत का संयुक्त राष्ट्र के चार क्षेत्रों में दिए गए योगदान का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भारत अनेक बार संयुक्त राष्ट्र संघ के भिन्न-भिन्न अंगों का सदस्य रह चुका है, जैसे कि

  • भारत सुरक्षा परिषद् का सात बार अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत ने सुरक्षा परिषद् के सदस्य के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • भारत सामाजिक तथा आर्थिक परिषद् का सदस्य अनेक बार रह चुका है और अब पिछले कुछ वर्षों से भारत इस परिषद् का निरन्तर सदस्य चला आ रहा है।
  • 1956 में भारत की श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित महासभा की अध्यक्षा चुनी गई।
  • भारत ने सदा ही यह कोशिश की है, कि संयुक्त राष्ट्र संघ मानवधिकारों की रक्षा के लिए उचित कार्यवाही करे।

प्रश्न 6.
संयुक्त राष्ट्र में वीटो शक्ति क्या है ? यह शक्ति किन देशों के पास है ? नाम लिखो।
उत्तर-
निषेधाधिकार या वीटो सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की महत्त्वपूर्ण शक्ति है। निषेधाधिकार का अर्थ है स्थायी सदस्यों द्वारा संयुक्त राष्ट्र में किसी प्रस्ताव को पास होने से रोकना। इसका अभिप्राय यह है कि यदि पांच स्थायी सदस्यों में से कोई भी एक सदस्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में रखे गए प्रस्ताव के विरोध में वोट डाल दे तो वह प्रस्ताव पास नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि सुरक्षा परिषद् में यदि कोई सदस्य अनुपस्थित रहता है तो उसको निषेधाधिकार का प्रयोग नहीं माना जाएगा। वीटो शक्ति अमेरिका, चीन, इंग्लैण्ड, रूस तथा फ्रांस के पास है।

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प्रश्न 7.
भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य कब बना ?
अथवा
यह क्यों कहा जाता है कि भारत संयुक्त राष्ट्र का मौलिक मेम्बर है ?
उत्तर-
यद्यपि 1945 में भारत एक स्वतन्त्र देश नहीं था, परन्तु फिर भी उसने 26 जून, 1945 में हुए सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर पर हस्ताक्षर किए। इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व ए० आर० मुदालियार, फिरोजखान नून और कृष्माचारी ने किया। इस प्रकार भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक/मौलिक सदस्य बन गया।

प्रश्न 8.
विश्व शान्ति की स्थापना में भारत की संयुक्त राष्ट्र में क्या भूमिका है ?
अथवा
विश्व शान्ति की स्थापना में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में क्या भूमिका निभाई है?
उत्तर-
भारत ने विश्व-शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र संघ में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है

  • कोरिया समस्या-1950 में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने युद्ध को रोकने के लिए 16 राष्ट्रों की सेनाएं उत्तरी कोरिया के विरुद्ध भेजीं। भारत के सैनिकों ने भी इस कार्यवाही में भाग लिया।
  • स्वेज़ नहर की समस्या-जुलाई, 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा इज़राइल ने मिलकर मिस्र पर आक्रमण कर दिया। भारत ने इन देशों की निन्दा की और महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का समर्थन किया जिसमें कहा गया कि युद्ध को तुरन्त बन्द कर दिया जाए।
  • कांगो समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्त करने पर कांगो में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई। लुमुम्बा ने संयुक्त राष्ट्र से सैनिक सहायता की अपील की। संयुक्त राष्ट्र संघ की अपील पर भारत ने अपनी सेना कांगो में भेजी।
  • भारत ने सोमालिया में शान्ति स्थापित करने के उद्देश्यों से संयुक्त राष्ट्र की अपील पर 2500 सैनिक भेजे थे।

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प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र की महत्त्वपूर्ण विशिष्ट एजेन्सियों के नाम लिखो।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र की चार विशिष्ट एजेन्सियों के नाम लिखो।
उत्तर-

  • अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ (I.L.O.)
  • संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)
  • विश्व स्वास्थ्य संघ (W.H.O.)
  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (I.M.F.)
  • अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (I.B.R.D.)
  • खाद्य और खेतीबाड़ी संघ (F.A.O.)।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ क्या है ?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थी। आजकल इसकी सदस्य संख्या 193 है। भारत इसके आरम्भिक सदस्यों में से है। संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन-समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म-निर्णय के सिद्धान्त पर आश्रित मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना और इन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को चलाने के लिए एक केन्द्र का कार्य करना है।

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प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र के पांच देशों के नाम लिखो, जिन्हें वीटो शक्ति प्राप्त है ?
उत्तर-
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका है। सुरक्षा परिषद् की कुल सदस्य संख्या 15 है। इनमें 10 अस्थायी सदस्य तथा 5 स्थायी सदस्य हैं। 5 स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद् में वीटो का अधिकार दिया गया है। ये देश हैं-अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस तथा साम्यवादी चीन।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अंगों के नाम लिखो।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र के 6 अंग हैं-(1) महासभा, (2) सुरक्षा परिषद्, (3) आर्थिक एवं सामाजिक परिषद्, (4) न्यास परिषद्, (5) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय तथा (6) सचिवालय।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र की चार विशिष्ट एजेन्सियों के नाम लिखें।
उत्तर-

  • अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ (I.L.O.)
  • संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)
  • विश्व स्वास्थ्य संघ (W.H.O.)
  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (I.M.F.)

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प्रश्न 5.
यह क्यों कहा जाता है कि भारत संयुक्त राष्ट्र का मौलिक मेम्बर है?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई तथा इसके कुल कितने मौलिक सदस्य थे ? (P.B. 2017)
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है जिसकी स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को सान फ्रांसिस्को सम्मेलन के परिणामस्वरूप हुई थी। इस सम्मेलन में 51 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें से 50 देशों ने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर किए। इन सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र का मौलिक सदस्य कहा जाता है। भारत भी इन देशों में से एक था जिसने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे। इस प्रकार भारत को संयुक्त राष्ट्र का मौलिक सदस्य कहा जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का उद्देश्य बताएं।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना विश्व में युद्धों को रोकने तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा के उद्देश्य से की गई थी।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र का कोई एक मूलभूत सिद्धान्त बताएं।
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र का एक मूलभूत सिद्धान्त यह है कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना सदस्य राष्ट्रों की समानता के आधार पर की गई है।

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प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र संघ की दो एजेन्सियों के पूरे नाम लिखें।
उत्तर-

  1. विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.)
  2. अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (I.L.O.)

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब की गई थी ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई।

प्रश्न 5.
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में ‘वीटो’ शक्ति का प्रयोग करने वाले देशों के नाम बताइये।
उत्तर-
5 स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद् में वीटो अधिकार प्राप्त है। ये देश हैं-अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस तथा चीन।

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प्रश्न 6.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव की नियुक्ति कैसे की जाती है ?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर महासभा करती है।

प्रश्न 7.
भारत संयुक्त राष्ट्र का मैम्बर कब बना था ?
उत्तर-
भारत सन् 1945 में ही संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बन गया था।

प्रश्न 8.
संयुक्त राष्ट्र में कार्य कर चुके किसी एक भारतीय का नाम लिखो।
उत्तर-
श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षा रह चुकी है।

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प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र के दो मुख्य अंगों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. महासभा
  2. सुरक्षा परिषद् ।

प्रश्न 10.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव का क्या नाम है ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र का वर्तमान सेक्रेटरी जनरल कौन है ?
उत्तर-
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव का नाम श्री एन्टोनियो गुटेरेश है।

प्रश्न 11.
संयुक्त राष्ट्र की एक महत्त्वपूर्ण विशिष्ट एजेन्सी का नाम लिखो।
उत्तर-
अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (I.L.O.)।

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प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. एन्टोनियो गुटेरेश संयुक्त राष्ट्र का नौवां ……… है। वह …….. का नागरिक है।
2. संयुक्त राष्ट्र संघ में ………. मूल संस्थापक सदस्य हैं।
3. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना ……….. 1945 को हुई।
4. भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का …….. देश है। 5. संयुक्त राष्ट्र संघ के ………. अंग हैं।
उत्तर-

  1. महासचिव, पुर्तगाल
  2. 51
  3. 24 अक्तूबर
  4. संस्थापक
  5. 6।

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही या ग़लत का चुनाव करें

1. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई।
2. संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य प्रभुसत्ता सम्पन्न हैं।
3. वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र की सदस्य संख्या 190 है।
4. संयुक्त राष्ट्र संघ के कुल 7 अंग हैं।
5. संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य महासभा के सदस्य हैं।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. ग़लत
  4. ग़लत
  5. सही।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना कब हुई ?
(क) 24 अक्तूबर, 1945
(ख) 24 अक्तूबर, 1940
(ग) 24 अक्तूबर, 1943
(घ) 24 अक्तूबर, 1944.
उत्तर-
(क) 24 अक्तूबर, 1945

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कितने अनुच्छेद हैं ?
(क) 110
(ख) 111
(ग) 120
(घ) 151
उत्तर-
(ख) 111

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन-सा देश संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारंभिक सदस्य है ?
(क) पाकिस्तान
(ख) बंगला देश
(ग) भारत
(घ) नेपाल।
उत्तर-
(ग) भारत

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 19 भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय स्थित है ?
(क) न्यूयार्क में ।
(ख) लंदन में
(ग) नई दिल्ली में
(घ) पैरिस में।
उत्तर-
(क) न्यूयार्क में ।

प्रश्न 5.
प्रारंभ में संयुक्त राष्ट्र संघ के कितने सदस्य थे ?
(क) 45
(ख) 48
(ग) 51
(घ) 55.
उत्तर-
(ग) 51

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 2 भारतीय आर्य

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 2 भारतीय आर्य Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 2 भारतीय आर्य

अध्याय का विस्तृत अध्ययन ।

(विषय-सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
कृषि तथा नगरों के विकास के सन्दर्भ में भारत में आर्यों के प्रसार की चर्चा करें।
उत्तर-
भारतीय आर्य सम्भवतः मध्य एशिया से भारत में आये थे। आरम्भ में ये सप्त सिन्धु प्रदेश में आकर बसे और लगभग 500 वर्षों तक यहीं टिके रहे। ये मूलतः पशु-पालक थे और विशाल चरागाहों को अधिक महत्त्व देते थे। परन्तु धीरेधीरे वे कृषि के महत्त्व को समझने लगे। अधिक कृषि उत्पादन की खपत के लिए नगरों का विकास भी होने लगा। फलस्वरूप आर्य लोग एक विशाल क्षेत्र में फैलते गए। इस प्रकार कृषि तथा नगरों के विकास ने आर्यों के प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ अन्य तत्त्वों ने भी उनके प्रसार में सहायता पहुंचाई। इन सब बातों का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है :-

आर्यों के प्रसार की तीव्र गति के कारण- भारत में आर्यों का अधिकतर विस्तार 9वीं सदी ई० पू० से हुआ। इसके कई कारण थे-

(1) अब तक सिन्धु घाटी के अनेक लोग दास बना लिए गए थे। इनसे कृषि के लिए जंगल साफ करने का काम लिया जा सकता था।

(2) आर्यों ने लोहे का प्रयोग भी सीख लिया। लोहे से बने औजार पत्थर, तांबे या कांसे की कुल्हाड़ी से कहीं अधिक बेहतर थे। लोहे के प्रयोग द्वारा ही आर्य गंगा के मैदान के घने जंगलों को काटने में सफल हुए।

(3) सिन्धु घाटी सभ्यता की सीमा से बाहर बड़े पैमाने पर कोई अन्य संगठित समाज नहीं था। इसीलिए आर्यों को किसी लम्बे या शक्तिशाली विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। 600 ई० पू० से पहले ही आधुनिक उत्तर प्रदेश का क्षेत्र आर्य सभ्यता का केन्द्र बन चुका था। बिहार और पश्चिम बंगाल में भी इन्होंने बस्तियां स्थापित कर ली थीं। ब्राहाण ग्रन्थों में दो समुद्रों का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त विंध्य पर्वत तथा हिमालय का भी उल्लेख हुआ है। इससे स्पष्ट है कि आर्य लोग 600 ई० पू० तक सारे उत्तर भारत से परिचित हो गए थे। अतः यह कहा जा सकता है कि 900 ई० पू० से 600 ई० पू० तक की तीन सदियों में आर्य बस्तियों का विस्तार बड़े पैमाने पर हुआ।

कृषि का विकास तथा आर्यों का प्रसार-आर्यों का उत्तरी भारत में प्रसार वास्तव में एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इसके । फलस्वरूप एक नई सभ्यता अस्तित्व में आई। आरम्भ में आर्यों ने अपने पशुओं के लिए खुले चरागाह पाने के लिए उन बांधों को नष्ट किया जो सिन्धु घाटी के लोगों ने बाढ़ द्वारा सिंचाई करने के उद्देश्य से बनाए थे। ऋग्वेद में इन्द्र की स्तुति इसीलिए की गई है कि उसने उन नदियों को स्वतन्त्र किया जो ‘कृत्रिम’ रुकावटों द्वारा ‘स्थिर’ कर दी गई थीं। नदियों के स्वतन्त्र हो जाने पर पंजाब की धरती पर विशाल चरागाह बन गई जिसमें नगरों के स्थान पर गांव थे। परन्तु समय पाकर आर्य लोग कृषि के उपयोग तथा महत्त्व को समझने लगे। कृषि के विस्तार के लिए ऋग्वेद में एक प्रार्थना भी मिलती है। इसमें कहा गया है कि गेहूं, जौ, चावल, तिल, मोठ, मसूर, बाजरे आदि की फसलें बढ़ें और कृषि का विस्तार एवं विकास हो। गंगा के मैदान में वे शीघ्र ही लोहे का हल तथा सिंचाई और खाद के प्रयोग से परिचित हो गए। इसके फलस्वरूप पहले से कहीं अधिक विस्तृत प्रदेश कृषि के अधीन हो गया।

नगरों का विकास तथा आर्यों का प्रसार-कृषि से प्राप्त अधिक अन्न की खपत के लिए नगरों के विकास की सम्भावना उत्पन्न हुई। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के पतन के पश्चात् एक बार फिर भारत में हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ, कौशाम्भी और काशी जैसे नगर अस्तित्व में आए। समय पाकर नगरों की संख्या बढ़ती गई। उनकी संख्या में वृद्धि के साथ-साथ व्यापार की सम्भावनाएं भी बढ़ीं। ऋग्वैदिक आर्यों के समाज में रथ बनाने वाले से लेकर साधारण बढ़ई तथा धातु और चमड़े के कारीगर भी थे। आरम्भ में वे जिन धातुओं का प्रयोग करते थे, उनमें सोना, तांबा और कांसा मुख्य थे। परन्तु ऋग्वेद के बाद के काल में रांगे (कली), सीसे और लोहे का प्रयोग भी किया जाने लगा।

ऋग्वेद के बाद की रचनाओं में व्यापार के साथ-साथ कहीं अधिक संख्या में दूसरे धन्धों का उल्लेख मिलता है, जैसेशिकारी, मछुआरे, पशु-सेवक, जेवर बनाने वाले, लोहा पिघलाने वाले, टोकरियां बुनने वाले, धोबी, रंगरेज़, रथ बनाने वाले, जुलाहे, कसाई, सुनार, रसोइये, कमान बनाने वाले, सूखी मछलियां बेचने वाले, लकड़ियां इकट्ठी करने वाले, द्वारपाल, प्यादे, सन्देशवाहक, मांस को काटने और मसालेदार भोजन बनाने वाले, कुम्हार, धातु का काम करने वाले, रस्से बनाने वाले, नाविक, बाजीगर, ढोल और बांसुरी वादक आदि। इनके अतिरिक्त व्यापारी तथा ब्याज लेने वाले साहूकार भी थे। नगरों के उदय तथा उद्योग-धन्धों में वृद्धि के कारण आर्यों के प्रसार की गति और भी तीव्र हो गई।

राज्यों (जनपद) की स्थापना-उत्तरी भारत में पूर्ण रूप से फैल जाने के पश्चात् आर्यों ने कुछ बड़े-बड़े राज्य स्थापित किए। लगभग 600 ई० पू० तक उत्तरी भारत में कई राज्य स्थापित हो चुके थे। इनकी संख्या सोलह बताई जाती है। कम्बोज और गान्धार राज्य उत्तर-पश्चिम में स्थित थे। सतलुज और यमुना के मध्य कुरू का राज्य विस्तृत था। यमुना और चम्बल के मध्य शूरसेन राज्य था। शूरसेन के नीचे मत्स्य और मध्य भारत में चेदि राज्य था। नर्मदा नदी के ऊपरी भाग में अवन्ति और महाराष्ट्र में गोदावरी के ऊपरी घेरे में अशमक था। इसी प्रकार गंगा में मैदान में भी कई राज्य थे जिनमें पांचाल, कोशल, मल्ल, वत्स, काशी, वज्जि, मगध और अंग का नाम लिया जा सकता है। इस प्रकार आधे से अधिक मुख्य राज्य गंगा के मैदान में ही स्थित थे। 800 ई० पू० के पश्चात् आर्यों के प्रभाव अधीन क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ। परन्तु पुराने प्रदेशों की तुलना में नए प्रदेशों में आर्यों की जनसंख्या बहुत कम थी।

ऊपर दिए गये विवरण से स्पष्ट है कि आर्यों ने कुछ ही समय में पूरे उत्तरी भारत में अपना विस्तार कर लिया। कृषि नगरों तथा विभिन्न उद्योग-धन्धों के विस्तार ने उनके प्रसार की गति को तीव्र किया और उनकी शक्ति में वृद्धि की। यह उनके प्रसार का ही परिणाम था कि वे भारत में 16 बड़े-बड़े राज्य (जनपद) स्थापित करने में सफल रहे। उनके द्वारा स्थापित यही जनपद आगे चल कर विशाल साम्राज्य की स्थापना का आधार बने।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 2 भारतीय आर्य

प्रश्न 2.
आर्यों की सामाजिक संस्थाओं तथा धर्म पर लेख लिखें।
उत्तर-
आर्यों ने भारतीय समाज एवं धर्म को नया रूप प्रदान किया। उन्होंने परिवार, जाति, वर्ण आदि सामाजिक संस्थाओं का गठन किया और उन्हें स्थायी रूप प्रदान किया। धर्म के क्षेत्र में भी वे अत्यन्त विकसित विचारधारा लिए हुए थे। प्राकृतिक शक्तियों की उपासना के साथ-साथ उन्होंने धर्म में आवागमन तथा कर्म-सिद्धान्त जैसे अत्यन्त गहन विचारों का समावेश किया। उनकी आदर्श सामाजिक संस्थाओं तथा धर्म के विभिन्न पक्षों का वर्णन इस प्रकार है :

I. सामाजिक संस्थाएं

1. वर्ण-व्यवस्था-वर्ण व्यवस्था आर्यों की महत्त्वपूर्ण संस्था थी। आर्यों का पूरा समाज इससे प्रभावित था। इस संस्था का विकास बहुत धीरे-धीरे हुआ। आरम्भ में आर्यों का समाज तीन वर्गों में बंटा हुआ था। युद्ध लड़ने वाले योद्धा ‘क्षत्रिय’ कहलाते थे तथा कबीले के साधारण लोगों को ‘वैश्य’ कहा जाता था। उस समय पुरोहित भी थे, परन्तु अभी पुरोहित वर्ग अस्तित्व में नहीं आया था। आरम्भ में इस सामाजिक विभाजन का उद्देश्य केवल सामाजिक तथा आर्थिक संगठन को सुदृढ़ बनाना था। यहां एक बात और भी ध्यान देने योग्य है कि समाज के इन वर्गों को अभी तक कोई ठोस रूप नहीं दिया गया था।

समय बीतने पर आर्य लोगों ने कुछ दासों (युद्ध बन्दियों) को अपने अधीन कर लिया। फलस्वरूप उन्हें समाज में कोई स्थान देने की समस्या उत्पन्न हो गई। यह समस्या उन्हें समाज में सबसे निम्न स्थान देकर सुलझाई गई। इसके अतिरिक्त वैदिक संस्कारों का महत्त्व भी बढ़ने लगा। इन संस्कारों को सम्पन्न करने का कार्य पुरोहितों ने सम्भाल लिया। धीरे-धीरे उन्होंने एक पृथक् वर्ग का रूप धारण कर लिया। धीरे-धीरे आर्यों का समाज चार वर्गों में बंट गया। इन चार वर्गों में योद्धा वर्ग ‘क्षत्रिय’ तथा पुरोहित वर्ग ‘ब्राह्मण’ कहलाया। समृद्ध ज़मींदार तथा व्यापारी वैश्य तथा साधारण किसान ‘शूद्र’ कहलाने लगे। इस प्रकार वर्ण-व्यवस्था ने स्पष्ट रूप धारण कर लिया।

समय के साथ-साथ वर्ण-व्यवस्था जटिल होने लगी। यदि एक वर्ग के लोग अपना व्यवसाय बदल भी लेते थे, तो उन्हें नए वर्ग का अंग नहीं माना जाता था। दूसरे वर्ण-व्यवस्था में मुख्य रूप से आर्य लोग ही शामिल थे। शूद्रों को जोकि प्रायः आर्य नहीं थे, वैदिक संस्कार करने की आज्ञा नहीं थी। वे अपने ही देवी-देवताओं की पूजा करते थे और उनके धार्मिक संस्कार आर्यों से अलग थे। बाद में ब्राह्मणों ने वर्ण-व्यवस्था को धार्मिक ढांचे में ढाल दिया। वर्ण-व्यवस्था के इस नए संगठन में ब्राह्मणों को पहला, क्षत्रियों को दूसरा, वैश्यों को तीसरा और शूद्रों को चौथा स्थान प्राप्त था। यह बात ऋग्वेद के मन्त्र ‘पुरुष सूक्त’ से स्पष्ट हो जाती है। उसमें कहा गया है कि एक बलि-संस्कार में पुरुष के मुंह से ब्राह्मण, बाजुओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पैरों से शद्रों की उत्पत्ति हई थी। वर्ण-व्यवस्था काफ़ी समय तक अपने इस रूप में संगठित रही।

2. जाति-1000 ई० पू० के पश्चात् कस्बों तथा उद्योग-धन्धों की संख्या बढ़ जाने के कारण वर्ण-व्यवस्था में विविधता आने लगी और इसके स्थान पर ‘जाति’ व्यवस्था का महत्त्व बढ़ने लगा। ‘जाति’ एक ही व्यवसाय से सम्बन्धित लोगों के समूह को कहा जाता था। धीरे-धीरे चार वर्णों की तरह नवीन जातियों का स्थान भी समाज में निश्चित कर दिया गया। सभी जातियों के लोग अपना पैतृक व्यवसाय अपनाते थे। उनके विवाह-सम्बन्धी नियम भी बड़े जटिल थे। एक जाति के लोगों को दूसरी जाति के लोगों के साथ मिलकर खाने-पीने की मनाही थी। एक जाति के लोग अपना व्यवसाय बदल कर समाज में ऊंचा दर्जा प्राप्त कर सकते थे। परन्तु जब केवल एक ही व्यक्ति अपना व्यवसाय बदलता था, उसे समाज में तब तक ऊंचा स्थान नहीं मिलता था जब तक कि वह किसी ऐसे धार्मिक समूह का अंग न बन जाता जिसका वर्ण-व्यवस्था में कोई विश्वास न हो।

3. परिवार-परिवार भी आर्यों के सामाजिक जीवन की एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी। परिवार पितृ प्रधान होते थे। पिता अर्थात् परिवार में सबसे अधिक आयु का व्यक्ति परिवार का मुखिया होता था। पिता अपनी सन्तान से दया तथा प्रेम का व्यवहार करता था। पिता के अधिकार काफ़ी अधिक थे और वह परिवार में अनुशासन को बड़ा महत्त्व देता था। पुत्र तथा पुत्री के विवाह में पिता का पूरा हाथ होता था। पिता परिवार की सम्पत्ति का भी स्वामी होता था। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र उस सम्पत्ति का स्वामी होता था। उन दिनों पुत्र गोद लेने की प्रथा भी प्रचलित थी। परिवार में स्त्री का सम्मान होता था। परन्तु सम्पत्ति में उसे हिस्सा नहीं दिया जाता था।

II. धर्म

ऋग्वैदिक आर्यों के देवी-देवता-ऋग्वेद के अध्ययन से पता चलता है कि आर्य लोग प्रकृति के पुजारी थे। वे उन सभी प्राकृतिक शक्तियों की उपासना करते थे जो उनके लिए वरदान अथवा अभिशाप थीं। अपनी समृद्धि के लिए वे सूर्य, वर्षा, पृथ्वी आदि की पूजा करते थे। वे अग्नि, आंधी और तूफान आदि की भी स्तुति करते थे ताकि वे उनके प्रकोपों से बचे रहें। कालान्तर में आर्य प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को देवता मान कर पूजने लगे। वरुण उनका प्रमुख देवता था। उसे आकाश का देवता माना जाता था। आर्यों के अनुसार वरुण समस्त जगत् का पथ-प्रदर्शन करता है।

आर्य सैनिकों के लिए इन्द्र देवता अधिक महत्त्वपूर्ण था। उसे युद्ध तथा ऋतुओं का देवता माना जाता था। ऋग्वेद में इन्द्र का वर्णन यूं किया गया है-“हे पुरुषो ! इन्द्र वह है जिसको आकाश और पृथ्वी नमस्कार करते हैं, जिसकी श्वास से पर्वत भयभीत हो जाते हैं।” युद्ध में विजय के लिए इन्द्र की उपासना की जाती थी। आर्यों का एक अन्य देवता रुद्र था। उसकी पूजा प्रायः विपत्तियों के निवारण के लिए की जाती थी। आर्यों में अग्नि देवता की भी पूजा प्रचलित थी। उसे मनुष्य तथा देवताओं के बीच दूत माना जाता था। इन देवताओं के साथ-साथ आर्य लोग पृथ्वी, वायु, सोम आदि अनेक देवी-देवताओं की उपासना भी करते थे।

यज्ञों का उद्देश्य और महत्त्व-आर्यों के धर्म में यज्ञों को बड़ा महत्त्व प्राप्त था। सबसे छोटा यज्ञ घर में ही किया जाता था। समय-समय पर बड़े-बड़े यज्ञ भी होते थे जिनमें सारा गांव या कबीला भाग लेता था। बड़े यज्ञों के रीति-संस्कार अत्यन्त जटिल थे और इनके लिए काफ़ी समय पहले से तैयारी करनी पड़ती थी। इन यज्ञों में अनेक पुरोहित भाग लेते थे। इनमें अनेक जानवरों की बलि दी जाती थी। यह बलि देवताओं को प्रसन्न करने के उद्देश्य से दी जाती थी। आर्यों का विश्वास था कि यदि इन्द्र देवता प्रसन्न हो जाएं तो वे युद्ध में विजय दिलाते हैं, आयु बढ़ाते हैं और सन्तान तथा धन में वृद्धि करते हैं। बाद में एक और उद्देश्य से भी यज्ञ किए जाने लगे। वह यह था कि प्रत्येक यज्ञ से संसार पुनः एक नया रूप धारण करेगा, क्योंकि संसार की उत्पत्ति यज्ञ द्वारा हुई मानी गई थी।

उत्तर वैदिक धर्म-ऋग्वेद के बाद भारतीय आर्यों (उत्तर वैदिक आर्यों) के धर्म का रूप निखरने लगा। अब रुद्र और विष्णु जैसे नए देवता आर्यों में अधिक प्रिय हो गए। ऋग्वैदिक काल में विष्णु को सूर्य का एक रूप समझा जाता था। परन्तु अब उसकी पूजा एक स्वतन्त्र देवता के रूप में की जाने लगी। अब अनेक प्रकार के यज्ञ होने लगे। सूत्र यज्ञ’ कई-कई वर्षों तक चलते रहते थे। ब्राह्मण ग्रन्थों में पूरी शताब्दी तक चलने वाले यज्ञों का उल्लेख भी मिलता है। इन यज्ञों को लोग स्वयं नहीं कर सकते थे अपितु उन्हें ब्राह्मणों को बुलाना पड़ता था। फलस्वरूप ब्राह्मण वर्ग समाज पर पूरी तरह छा गया था। अब लोग कर्म सिद्धान्त में विश्वास रखने लगे थे। उनके अनुसार जो मनुष्य अपने जीवन काल में ईश्वर को प्राप्त कर लेता था वह मोक्ष प्राप्त करता था। मोक्ष से आत्मा मरती नहीं अपितु अमर हो जाती है। जो व्यक्ति नेक कार्य तो करता है, परन्तु ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाता, वह सीधा चन्द्र लोक में जाता है। कुछ समय पश्चात् वह मनुष्य के रूप में पुनः जन्म लेता है। प्रत्येक मनुष्य का भाग्य अपने पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार निश्चित होता है।

सच तो यह है कि ऋग्वैदिक समाज बड़ा उच्च तथा सभ्य समाज था। सफल पारिवारिक जीवन, नारी का गौरवमय स्थान, अध्यात्मवाद का प्रचार आदि सभी बातें एक उन्नत समाज का संकेत देती हैं। हमें एक ऐसे विकसित समाज के दर्शन होते हैं जहां पाप-पुण्य में भेद समझा जाता था और जहां लोगों को बुरे-भले की पहचान थी।

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महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
आर्यों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
उत्तर-
आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशु-पालन तथा कृषि करना था।

प्रश्न 2.
आर्य भारत में कब आकर बसे ?
उत्तर-
आर्य भारत में लगभग 1500 ई० पूर्व में आकर बसे।

प्रश्न 3.
भारतीय आर्यों ने किस प्रदेश को सबसे पहले अपना निवास-स्थान बनाया ?
उत्तर-
उत्तर-पश्चिमी प्रदेश सप्त सिन्धु को।

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प्रश्न 4.
आर्यों के किन्हीं चार देवी-देवताओं के नाम बताओ।
उत्तर-
सूर्य, इन्द्र, वायु और ऊषा आर्यों के मुख्य देवी-देवता थे।

प्रश्न 5.
सांख्य दर्शन की रचना किसने की थी ?
उत्तर-
सांख्य दर्शन की रचना कपिल ने की थी।

प्रश्न 6.
योग दर्शन का लेखक कौन था ?
उत्तर-
योग दर्शन का लेखक पातंजलि था।

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प्रश्न 7.
ऋग्वैदिक काल की दो विदुषियों के नाम बताओ।
उत्तर-
गार्गी और विश्वारा।

प्रश्न 8.
आर्य लोग किस पशु को पवित्र मानते थे ?
उत्तर-
आर्य लोग गाय को पवित्र मानते थे।

प्रश्न 9.
ऋग्वैदिक काल के राजा की शक्तियों पर रोक लगाने वाली दो संस्थाओं के नाम बताओ।
उत्तर-
‘सभा और समिति’।

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प्रश्न 10.
श्रीकृष्ण ने किस स्थान पर अर्जुन को गीता का उपदेश दिया ?
उत्तर-
श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया।

प्रश्न 11.
“भगवद्गीता” का शाब्दिक अर्थ क्या है ?
उत्तर-
“भगवद्गीता” का शाब्दिक अर्थ भगवान का गीत है।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति-

(i) वैदिक आर्यों की मूल भाषा ……… थी।
(ii) आर्यों के मूल स्थान के विषय में सर्वमान्य सिद्धान्त ……… का सिद्धान्त है।
(iii) आर्यों का सबसे प्राचीन ग्रंथ ……… है।
(iv) ऋग्वैदिक काल में पंजाब को ………… प्रदेश कहा जाता था।
(v) वैदिक काल में ………… शासन प्रणाली थी। .
उत्तर-
(i) संस्कृत
(ii) मध्य एशिया
(iii) ऋग्वेद
(iv) सप्तसिंधु
(v) राजतंत्रीय।

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3. सही/ग़लत कथन-

(i) इन्द्र आर्यों का वर्षा का देवता था।– (√)
(ii) वैदिक समाज में स्त्री को निम्न स्थान प्राप्त था।– (×)
(iii) मुख्य वेद संख्या में 6 हैं।– (×)
(iv) वरुण आर्यों का एक देवता था।– (√)
(v) आयुर्वेद एक चिकित्सा शास्त्र है।– (√)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
वैदिक समाज कितने वर्षों में बंटा हुआ था ?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) छः।
उत्तर-
(C) चार

प्रश्न (ii)
दस्यु कौन थे ?
(A) आर्यों से पहले समाज में रहने वाले लोग
(B) आर्यों को हराने वाले लोग।
(C) आर्यों के समाज में सबसे उच्च स्थान रखने वाले लोग
(D) व्यापारी तथा दस्तकार के रूप में काम करने वाले लोग।
उत्तर-
(A) आर्यों से पहले समाज में रहने वाले लोग

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प्रश्न (iii)
आर्यों के समाज में सर्वोच्च स्थान पर थे-
(A) क्षत्रिय
(B) ब्राह्मण
(C) वैश्य
(D) शूद्र।
उत्तर-
(D) उपनिषदों में।

प्रश्न (iv)
आर्य विचारकों के दार्शनिक विचार मिलते हैं-
(A) वेदांगों में
(B) उपवेदों में
(C) श्रुतियों में
(D) उपनिषदों में।
उत्तर-
(D) उपनिषदों में।

प्रश्न (v)
निम्न में से कौन-सा आर्यों का देवता नहीं था ?
(A) मातंग
(B) सूर्य.
(C) वायु
(D) वरूण।
उत्तर-
(A) मातंग

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II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय आर्यों की आदिभूमि के बारे में कौन-से क्षेत्र बताए जाते हैं ?
उत्तर-
भारतीय आर्यों की आदिभूमि के बारे में मुख्य रूप से मध्य एशिया अथवा सप्त सिन्धु प्रदेश, उत्तरी ध्रुव तथा मध्य एशिया के क्षेत्र बताए जाते हैं। मध्य प्रदेश तथा सप्त सिन्धु प्रदेश का सम्बन्ध प्राचीन भारत से है।

प्रश्न 2.
आर्यों की मूल भाषा में से कौन-सी दो यूरोपीय भाषायें निकली ?
उत्तर-
आर्यों की मूल भाषा में से निकलने वाली दो यूरोपीय भाषाएं थीं-यूनानी तथा लातीनी।

प्रश्न 3.
आरम्भ में आर्यों का मुख्य धन्धा तथा उनकी सम्पत्ति का माप क्या था ?
उत्तर-
आरम्भ में आर्यों का मुख्य धन्धा पशु चराना था। पशु ही उनकी सम्पत्ति का माप थे।

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प्रश्न 4.
आर्यों का मुख्य वाहन कौन-सा पशु था और यह किस प्रकार के रथों में जोता जाता था ?
उत्तर-
आर्यों का मुख्य वाहन पशु घोड़ा था। इसे हल्के रथों में जोता जाता था।

प्रश्न 5.
चार वेदों के क्या नाम हैं ?
उत्तर-
चार वेदों के नाम हैं : ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद।

प्रश्न 6.
600 ई० पू० के लगभग कौन-से दो धार्मिक ग्रन्थों की रचना हुई थी ?
उत्तर-
600 ई० पू० के लगभग ब्राह्मण ग्रन्थों तथा उपनिषदों की रचना हुई।

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प्रश्न 7.
1000 से 700 ई० पू० की घटनाएं कौन-से दो महाकाव्यों में बताई गई हैं ?
उत्तर-
1000 से 700 ई० पू० तक की घटनाएं महाभारत तथा रामायण नामक दो महाकाव्यों में बताई गई हैं।

प्रश्न 8.
ऋग्वेद में दी गई किन्हीं चार नदियों के नाम बताओ।
उत्तर-
ऋग्वेद में दी गई चार नदियों के नाम हैं-काबुल, स्वात, कुर्रम और गोमल।

प्रश्न 9.
‘पणि’ शब्द से क्या भाव था ?
उत्तर-
‘पणि’ शब्द से भाव सम्भवतः सिन्धु घाटी के व्यापारी वर्ग से था। ऋग्वेद में इन लोगों को पशु चोर बताया गया है और आर्य लोग इन्हें अपना शत्रु समझते थे।

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प्रश्न 10.
ऋग्वेद में दिए गए दस राजाओं के युद्ध का सामाजिक महत्त्व क्या है ?
उत्तर-
दस राजाओं का युद्ध इस बात का प्रतीक है कि ऋग्वैदिक काल में सामाजिक एकीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी।

प्रश्न 11.
राजा सुदास कौन-से कबीले से था और इसकी चर्चा किस सन्दर्भ में आती है ?
उत्तर-
राजा सुदास का सम्बन्ध ‘भरत’ कबीले से था। उसकी चर्चा दस राजाओं के संघ को हराने के सन्दर्भ में आती है।

प्रश्न 12.
राजसूय यज्ञ का क्या महत्त्व था ?
उत्तर-
राजसूय यज्ञ राज्य में दैवी शक्ति का संचार करने के लिए किया जाता था। इससे स्पष्ट है कि राजपद को दैवी देन माना जाने लगा था।

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प्रश्न 13.
ब्राह्मण ग्रन्थों में किन दो पर्वतों का उल्लेख मिलता है ?
उत्तर-
ब्राह्मण ग्रन्थों में विन्ध्य पर्वत तथा हिमालय का उल्लेख मिलता है।

प्रश्न 14.
सबसे अधिक गौरव का स्थान किस यज्ञ को प्राप्त था और इसमें किस पशु की बलि दी जाती थी ?
उत्तर-
सबसे अधिक गौरव अश्वमेध यज्ञ को प्राप्त था। इस यज्ञ में घोड़े (अश्व) की बलि दी जाती थी।

प्रश्न 15.
600 ई० पू० के लगभग उत्तर-पश्चिम में तथा सतलुज एवं यमुना नदियों के मध्य में कौन-से तीन राज्य थे ?
उत्तर-
इस काल में देश के उत्तर-पश्चिम में कम्बोज तथा गान्धार राज्य स्थित थे। सतलुज और यमुना नदियों के मध्य कुरू राज्य था।

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प्रश्न 16.
700 ई० पू० के लगभग कोई चार गणराज्यों के नाम बतायें।
उत्तर-
700 ई० पू० के लगभग चार गणराज्य थे-शाक्य, मल्ल, वज्जि तथा यादव।

प्रश्न 17.
भारत में विकसित होने वाले चार आरम्भिक नगरों के नाम बताएं।
उत्तर-
भारत में विकसित होने वाले चार आरम्भिक नगरों के नाम थे-हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ, कौशाम्भी और काशी।

प्रश्न 18.
‘वर्ण’ का शाब्दिक अर्थ बताएं। इस शब्द का आरम्भ में व्यवहार किस परिस्थिति में हुआ ?
उत्तर-
वर्ण का शाब्दिक अर्थ है-रंग। आरम्भ में इस शब्द का व्यवहार उस समय हुआ जब आर्य स्वयं को पराजित दासों से भिन्न रखने के लिए रंग भेद को महत्त्व देने लगे थे।

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प्रश्न 19.
वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत चार वर्णों के नाम बताएं।
उत्तर-
वर्ण-व्यवस्था के अनुसार चार वर्णों के नाम थे-क्षत्रिय (योद्धा वर्ग), ब्राह्मण (पुरोहित लोग), वैश्य (धनी व्यापारी एवं ज़मींदार) और शूद्र (साधारण किसान आदि)।

प्रश्न 20.
आर्यों के समय परिवार का प्रधान कौन-सा सदस्य होता था ? तब सम्बन्धित परिवारों के समूह को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-
परिवार का प्रधान परिवार में सबसे बड़ी आयु वाला सदस्य होता था। सम्बन्धित परिवारों के समूह को ‘ग्राम’ कहा जाता था।

प्रश्न 21.
ऋग्वेद में कौन-सी चार देवियों का उल्लेख आता है ? .
उत्तर-
ऋग्वेद में प्रात:काल की देवी उषा, रात की देवी रात्रि, वन की देवी अरण्यी तथा धरती की देवी पृथ्वी का उल्लेख आता है।

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प्रश्न 22.
आर्यों के समय किन दो संस्कारों में अग्नि देवता का सम्बन्ध था ?
उत्तर-
अग्नि देवता का सम्बन्ध मुख्यतः ‘विवाह संस्कार’ तथा ‘दाह संस्कार’ के साथ था।

प्रश्न 23.
आर्यों में इन्द्र किन चीज़ों का देवता होता था ?
उत्तर-
आर्यों में इन्द्र युद्ध तथा वर्षा का देवता होता था।

प्रश्न 24.
साधारण जीवन के चार आश्रम कौन-से थे ?
उत्तर-
साधारण जीवन के चार आश्रम थे-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास।

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प्रश्न 25.
‘द्विज’ से क्या भाव था और कौन-से तीन वर्गों को यह स्थान प्राप्त था ?
उत्तर-
‘द्विज’ से भाव था-‘दूसरा जन्म’। यह स्थान क्षत्रियों, ब्राह्मणों तथा वैश्यों को प्राप्त था।

II. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
आर्य लोग भारत में कब और कैसे आये ?
उत्तर-
आर्यों का भारत-आगमन एक उलझा हुआ प्रश्न है। इस विषय में प्रत्येक विद्वान् अपना पृथक् दृष्टिकोण रखता है। तिलक और जैकोबी ने आर्यों के भारत में आने का समय 6000 ई० पू० से 4000 ई० पू० बताया है। प्रो० मैक्समूलर के विचार में आर्य लोगों ने 1200 से 1000 ई० पू० के मध्य में भारत में प्रवेश किया। डॉ० आर० के० मुखर्जी के अनुसार आर्य लोग सबसे पहले 2500 ई० पू० में भारत में आए तथा लगभग 1900 ई० पू० तक वे लगातार आते रहे। आज यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि आर्य लोग भारत में एक साथ नहीं आए। वे धीरे-धीरे यहां आते रहे और बसते रहे। अतः डॉ० आर० के० मुखर्जी का मत अधिक मान्य जान पड़ता है।

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प्रश्न 2.
ऋग्वैदिक काल में आर्य लोगों की बस्तियां मुख्य रूप से कहां केन्द्रित थी ?
उत्तर-
ऋग्वैदिक काल से अभिप्राय उस काल से है जिस काल में आर्य लोगों ने ऋग्वेद की रचना की। ये लोग अफगानिस्तान के मार्ग से भारत आए थे और यहां आकर बस गए थे। आरम्भ में ये 500 वर्षों तक उसी क्षेत्र में बसे जिसमें सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोग रहते थे। इस प्रदेश में मुख्यत: सिन्धु नदी तथा प्राचीन पंजाब की पांच नदियों (सिन्धु नदी की सहायक नदियों) का प्रदेश सम्मिलित था। बाद में वे पूर्व दिशा में आगे की ओर बढ़े। धीरे-धीरे उन्होंने सतलुज तथा यमुना नदियों के बीच के प्रदेश और दिल्ली के आस-पास के प्रदेशों में अपनी बस्तियां बसा लीं। आर्यों के ये सभी क्षेत्र सामूहिक रूप से सप्त सिन्धु प्रदेश के नाम से प्रसिद्ध हैं। अतः हम यूं भी कह सकते हैं कि ऋग्वैदिक काल में आर्यों की बस्तियां मुख्य रूप से सप्त सिन्धु प्रदेश में ही केन्द्रित थीं।

प्रश्न 3.
आर्य लोग यमुना नदी की पूर्वी दिशा में कब बढ़े ? उनके इस दिशा में विस्तार के क्या कारण थे ?
उत्तर-
आर्य लोग लगभग 500 वर्ष तक सप्त सिन्धु प्रदेश में रहने के पश्चात् यमुना नदी के पूर्व की ओर बढ़े। इस दिशा में उनके विस्तार के मुख्य कारण ये थे :-

1. इस समय तक आर्यों ने सप्त सिन्धु के अनेक लोगों को दास बना लिया था। इन दासों से वे जंगलों को साफ करने का काम लेते थे। जहां कहीं जंगल साफ हो जाते, वहां वे खेती करने लगते थे।

2. इसी समय आर्य लोहे के प्रयोग से भी परिचित हो गए। लोहे से बने औज़ार तांबे अथवा कांसे के औज़ारों की अपेक्षा अधिक मजबूत और तेज़ थे। इन औजारों की सहायता से वनों को बड़ी तेजी से साफ किया जाता था।

3. आर्यों के तीव्र विस्तार का एक अन्य कारण यह था कि सिन्धु घाटी की सभ्यता की सीमाओं के पार कोई शक्तिशाली संगठन अथवा कबीला नहीं था। परिणामस्वरूप आर्यों को किसी विरोधी का सामना न करना पड़ा और वे बिना किसी बाधा के आगे बढ़ते गए।

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प्रश्न 4.
जाति-प्रथा के क्या लाभ हुए ?
उत्तर-

  • जाति-प्रथा के कारण भारतीयों ने विदेशियों से अधिक मेल-जोल न बढ़ाया। परिणामस्वरूप भारतीय संस्कृति विदेशी प्रभाव से सुरक्षित रही।
  • जाति-प्रथा के कारण लोग केवल अपनी ही जाति में विवाह करते थे। इस प्रकार रक्त की पवित्रता बनी रही।
  • जाति-प्रथा के कारण लोग बचपन से ही अपने पिता के व्यवसाय में जुट जाते थे। फलस्वरूप बड़े होकर वे निपुण कारीगर सिद्ध होते थे।
  • जाति-प्रथा के कारण प्रत्येक जाति के लोगों को अपनी जाति का व्यवसाय अपनाना पड़ता था। अतः लोगों को रोज़ी का कोई अन्य साधन ढूंढ़ने की चिन्ता नहीं रहती थी।
  • जाति-प्रथा के अनुसार ब्राह्मणों का कार्य शिक्षा देना था। वे निःशुल्क शिक्षा प्रदान करते थे।
  • शुद्धि द्वारा अन्य जातियों के लोग हिन्दू बन सकते थे। अतः शक, हूण, यूनानी आदि भारत पर आक्रमण करने वाली अनेक जातियां हिन्दू समाज का अंग बन गईं।

प्रश्न 5.
जाति-प्रथा से भारतीय समाज को क्या हानि पहुंची ?
उत्तर-

  • जाति-प्रथा के कारण राष्ट्रीयता की भावना को गहरा आघात पहुंचा। लोग राष्ट्रीय हितों को भूलकर केवल अपनी जाति के बारे में सोचने लगे।
  • जाति-प्रथा के कारण केवल क्षत्रिय ही सैनिक शिक्षा प्राप्त करते थे। फलस्वरूप देश में सैनिक शिक्षा सीमित रही।
  • जाति-प्रथा के कारण लोगों के लिए पैतृक धन्धा बदलना बड़ा कठिन होता था। फलस्वरूप लोगों का व्यक्तिगत विकास रुक गया।
  • ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य जाति के लोग शूद्रों को अपने से नीचा समझते थे और उनसे घृणा करते थे। परिणामस्वरूप समाज में छुआछूत की भावना बढ़ी।
  • ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए अनेक प्रथाएं प्रचलित की जिनसे उन्हें अधिक-से-अधिक लाभ पहुंचे। इस प्रकार अनेक सामाजिक कुरीतियां प्रचलित हुईं।

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प्रश्न 6.
ऋग्वेद से दासों की स्थिति के बारे में क्या पता चलता है ?
उत्तर-
ऋग्वेद में ‘आर्यों के दासों’ के साथ हुए सशस्त्र संघर्षों का बार-बार उल्लेख मिलता है। दास काले वर्ण के, मोटे होठों एवं चपटी नाक वाले थे। वास्तव में यहां ‘दास’ से भाव सिन्धु घाटी के कृषक समाज से है। ये लोग भूमि पर अच्छी तरह बसे हुए थे जबकि आर्य लोग अभी भी अधिकांशत: पशु-पालन अवस्था में थे। अन्ततः आर्यों ने दासों को अपने अधीन कर लिया। इस तथ्य की जानकारी संस्कृत के ‘दास’ शब्द से होती है। यह शब्द जो अब अधीनस्थ अथवा ‘गुलाम’ का अर्थ देने लगा था। ‘गुलाम स्त्रियों’ के लिए संस्कृत शब्द ‘दासी’ प्रचलित हो गया। कुछ दासों की स्थिति बड़ी उन्नत थी। ऋग्वेद में एक दास मुखिया का उल्लेख मिलता है। सच तो यह है कि दास वर्ग धीरे-धीरे आर्यों के साथ मिलकर रहने लगा था।

प्रश्न 7.
आर्यों के समय में कृषि व्यवस्था की विशेषताएं क्या थी ?
उत्तर-
आर्य लोग मूल रूप से पशु-पालक थे। परन्तु समय पाकर वे कृषि के उपयोग तथा महत्त्व को समझने लगे। उन्होंने जंगलों को साफ किया और कृषि आरम्भ कर दी। लोहे के औज़ारों के कारण जहां उनके लिए जंगल साफ करने सरल हो गए थे, वहां कृषि की दशा भी उन्नत हो गई। लोहे के हल के अतिरिक्त उन्होंने सिंचाई व्यवस्था को भी उत्तम बनाया। वे खाद का प्रयोग भी करने लगे। वे मुख्य रूप से गेहूं, जौ, चावल, तिल, मोठ, मसूर, बाजरा आदि की कृषि करते थे।

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प्रश्न 8.
प्रमुख गणराज्य कौन-से थे तथा उनकी राज्य व्यवस्था किस प्रकार की थी ?
उत्तर-
आर्यों द्वारा स्थापित सभी जनपदों में राजतन्त्रीय प्रशासन नहीं था। इनमें से कुछ गणराज्य भी थे जो विशेषकर पंजाब में और गंगा नदी तथा हिमालय के बीच के क्षेत्र में विस्तृत थे। कुछ गणराज्य अकेले कबीलों ने स्थापित किए, जैसे-शाक्य, कौशल और मल्ल। अन्य गणराज्य एक से अधिक कबीलों के संघ थे। वज्जि और यादव इसी प्रकार के गणराज्य थे। इन गणराज्यों में कबीलों की परम्परा के कई अंशों के अनुसार शासन होता था। शासन का कार्यभार एक समिति के पास था। इस समिति की अध्यक्षता सरदारों में से एक प्रतिनिधि करता था। वह राजा कहलाता था। अतः स्पष्ट है कि राजा का पद निर्वाचित होता था। यह पद वंशागत नहीं था। समिति में राज्य के सभी महत्त्वपूर्ण मामलों पर विचार-विमर्श होता था। सदस्यों को अपना मत देने का अधिकार था। प्रशासन में राजा की सहायता सेनानी और कोषाध्यक्ष करते थे।

प्रश्न 9.
आर्यों की परिवार की संस्था की विशेषताएं क्या थीं ?
उत्तर-
‘परिवार’ आर्यों की एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था थी। परिवार पितृ-प्रधान था अर्थात् परिवार का मुखिया पिता (या सबसे बड़ी आयु का व्यक्ति) होता था। पिता की मृत्यु के पश्चात् परिवार का सबसे बड़ी आयु का पुरुष उसका स्थान लेता था। परिवार का गठन प्रायः तीन पीढ़ियों पर आधारित था। परिवार में सम्पत्ति के अधिकारी केवल पुरुष सदस्य ही होते थे। इसलिए पुत्र का पैदा होना शुभ माना जाता था। कई धार्मिक अनुष्ठान भी ऐसे थे जिन्हें पुत्र ही कर सकता था। कई रीतियों में भी उसकी उपस्थिति आवश्यक समझी जाती थी। भले ही आर्य बहु-विवाह की प्रथा से परिचति थे फिर भी मान्यता केवल एक विवाह पद्धति को ही प्राप्त थी। बाद की कुछ रचनाओं में बहुपति प्रथा का भी उल्लेख मिलता है। उदाहरण के लिए, महाभारत की द्रौपदी पांच पाण्डवों की पत्नी थी। विधवा स्त्री का विवाह प्रायः उसके मृत पति के भाई से कर दिया जाता था। सती-प्रथा प्रचलित नहीं थी। स्त्रियों के साथ प्रायः अच्छा व्यवहार होता था।

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प्रश्न 10.
आर्यों के मुख्य देवताओं के बारे में बताएं।
उत्तर-
ऋग्वेद के अध्ययन से पता चलता है आर्य लोग प्रकृति के पुजारी थे। अपनी समृद्धि के लिए वे सूर्य, वर्षा, पृथ्वी आदि की पूजा करते थे। वे अग्नि, आंधी, तूफान आदि की भी स्तुति करते थे ताकि वे उनके प्रकोपों से बचे रहें। कालान्तर में आर्य लोग प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को देवता मान कर पूजने लगे। वरुण उनका प्रमुख देवता था। उसे आकाश का देवता माना जाता था। आर्यों के अनुसार वरुण समस्त जगत् का पथ-प्रदर्शन करता है। आर्य सैनिकों के लिए इन्द्र देवता अधिक महत्त्वपूर्ण था। उसे युद्ध तथा ऋतुओं का देवता माना जाता था। युद्ध में विजय के लिए इन्द्र की ही उपासना की जाती थी। इन्द्र के अतिरिक्त वे रुद्र, अग्नि, पृथ्वी, वायु, सोम आदि देवताओं की उपासना भी करते थे।

प्रश्न 11.
आवागमन तथा कर्म-सिद्धान्त से क्या भाव है ?
उत्तर-
आवागमन तथा कर्म-सिद्धान्त एक-दूसरे के पूरक हैं। आवागमन के अनुसार आत्मा एक जन्म से दूसरे जन्म में निरन्तर चक्कर लगाती रहती है। यह चक्कर अनन्तकाल तक जारी रहता है और कभी समाप्त नहीं होता। कर्म-सिद्धान्त से भाव मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार उनके जन्म के निर्धारण से है। ऋग्वेद में कहा गया है कि मरने के पश्चात् मनुष्य का परलोक में स्थान निश्चित हो जाता है। बुरे कर्म करने वाले व्यक्ति को दण्ड के रूप में ‘मिट्टी के घर’ में रहना पड़ता है जबकि अच्छे कर्मों वाले मनुष्य को पुरस्कार के रूप में ‘पुरखों की दुनिया में स्थान दिया जाता है। परन्तु उपनिषदों में ऐसा कुछ नहीं कहा गया जिसका अर्थ यह है कि मानव आत्मायें अपने पूर्वजन्म के अच्छे-बुरे कर्मों के अनुरूप सुख या दुःख भोगने के लिए पुनर्जन्म लेती हैं। इस प्रकार पुनर्जन्म व कर्म-सिद्धान्त एक-दूसरे के पूरक हैं।

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प्रश्न 12.
आर्यों की सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था में यज्ञ का क्या महत्त्व था ?
उत्तर-
आर्यों की सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था में यज्ञों को बड़ा महत्त्व प्राप्त था। सबसे छोटा यज्ञ घर में ही किया जाता था। समय-समय पर बड़े-बड़े यज्ञ होते थे जिनमें सारा गांव या सारा कबीला भाग लेता था। बड़े यज्ञों की रीति-संस्कार अत्यन्त जटिल थे और इनके लिए काफ़ी समय पहले से तैयारी करनी पड़ती थी। इन यज्ञों में अनेक पुरोहित भाग लेते थे और इनमें अनेक जानवरों की बलि दी जाती थी। यह बलि देवताओं को प्रसन्न करने के उद्देश्य से दी जाती थी। आर्यों का विश्वास था कि यदि देवता प्रसन्न हो जाएं तो वे युद्ध में विजय दिलाते हैं, आयु बढ़ाते हैं और सन्तान प्रथा धन में वृद्धि करते हैं। बाद में एक और उद्देश्य से भी यज्ञ किए जाने लगे। वह यह था कि प्रत्येक यज्ञ से संसार पुनः एक नया रूप धारण करेगा, क्योंकि संसार की उत्पत्ति यज्ञ द्वारा ही मानी गई थी।

प्रश्न 13.
आर्यों की भारतीय सभ्यता को क्या देन थी ?
उत्तर-
आर्यों ने भारतीय सभ्यता को काफ़ी समृद्ध बनाया। उन्होंने वैदिक साहित्य की रचना की और संस्कृत भाषा का प्रचलन किया। उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान सामाजिक संस्थाओं एवं धर्म के क्षेत्र में था। भारत में जाति भेद पर आधारित समाज की परम्परा दो हजार वर्षों से अधिक समय तक चलती रही है। आर्यों द्वारा रचित उपनिषदों का आध्यात्मिक चिन्तन बाद में कई दर्शनों का आधार बना। आर्य लोगों ने जंगलों को साफ करके देश के विशाल क्षेत्र को कृषि अधीन किया। यह भी कोई कम प्रभावशाली कार्य नहीं था। कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था की प्रगति के कारण ही उत्तरी भारत में शक्तिशाली राज्य विकसित हुए जो कई शताब्दियों तक बने रहे। वर्ण-व्यवस्था एवं बलि संस्कारों के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप जैन तथा बौद्ध धर्म सहित कुछ शक्तिशाली धार्मिक आन्दोलन उभरे। इन्हें भी भारतीय आर्यों की एक महत्त्वपूर्ण देन कहा जा सकता

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प्रश्न 14.
वैदिक तथा सिन्धु घाटी की सभ्यता की चार असमानताएं बताओ।
उत्तर-
सिन्धु घाटी की सभ्यता-

  • यह सभ्यता आज से लगभग 5,000 वर्ष पुरानी है।
  • इस सभ्यता की जानकारी हमें हड़प्पा और मोहनजोदड़ो|  आदि की खुदाई से मिली है।
  • यह एक नागरिक सभ्यता थी। यहां के अधिकतर निवासी नगरों में रहते थे।
  • सिन्धु घाटी के लोग मूर्ति-पूजा में विश्वास रखते थे। वे लिंग, योनि तथा पीपल की पूजा करते थे।

वैदिक सभ्यता-

  • यह सभ्यता लगभग 3,000 वर्ष पुरानी है।
  • इस सभ्यता की जानकारी हमें वेदों से मिली है।
  • यह सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता थी। यहां के अधिकतर निवासी गाँवों में रहते थे।
  • आर्य लोग मूर्ति-पूजा में विश्वास नहीं रखते थे। वे अपने देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते थे।

प्रश्न 15.
वैदिक तथा सिन्धु घाटी की सभ्यता की चार समानताएं बताओ।
उत्तर-
वैदिक तथा सिन्धु घाटी सभ्यता की चार मुख्य समानताओं का वर्णन इस प्रकार है :

  • भोजन में समानता-दोनों सभ्यताओं के लोगों का भोजन पौष्टिक था। गेहूं, दूध, चावल, फल आदि उनके भोजन के मुख्य अंग थे।
  • व्यवसायों में समानता-दोनों सभ्यताओं के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि करना था। वैदिक काल में तो स्वयं राजा लोग भी हल चलाया करते थे। इन दोनों सभ्यताओं के लोग पशुओं के महत्त्व को समझते थे। इसलिए वे पशु पालते थे। गाय, बैल, भेड़-बकरी आदि उनके मुख्य पालतू पशु थे।
  • मनोरंजन के साधनों में समानता-दोनों सभ्यताओं के लोगों के मनोरंजन के कुछ साधन समान थे। वे प्रायः नाचगानों द्वारा तथा शिकार खेल कर अपना मन बहलाते थे।
  • धार्मिक समानता-दोनों सभ्यताओं के लोग धार्मिक प्रवृत्ति के थे। आर्यों का धर्म भले ही सिन्धु घाटी के लोगों के धर्म से अधिक विकसित था, तो भी अग्नि की पूजा दोनों ही सभ्यताओं में प्रचलित थी।

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प्रश्न 16.
उत्तर वैदिक काल में आर्यों के धर्म का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
उत्तर वैदिक काल में आर्यों के धार्मिक रीति-रिवाजों तथा धार्मिक विचारों में काफ़ी परिवर्तन आया। ऋग्वैदिक काल के कई देवताओं की पूजा अब भी की जाती थी, परन्तु उनका महत्त्व पहले से काफ़ी कम हो गया। इस काल में इन्द्र, वरुण तथा सूर्य की बजाय शिव-विष्णु की पूजा पर अधिक बल दिया जाने लगा। आत्मा-परमात्मा तथा जन्म-मृत्यु के विषय में अनेक नए सिद्धान्त धर्म में शामिल हो गए। यज्ञ तो अब भी होते थे, परन्तु अब उनमें काफ़ी धन खर्च करना पड़ता था। यज्ञों के लिए ब्राह्मणों की आवश्यकता होती थी। कर्म, मोक्ष तथा माया सम्बन्धी सिद्धान्तों ने धर्म को और भी अधिक जटिल बना दिया। इस काल में लोग अनेक प्रकार के जादू-टोनों में भी विश्वास रखने लगे थे।

प्रश्न 17.
ऋग्वैदिक काल तधा उतर वैदिक काल में अन्तर स्पष्ट करने तथ्यों का वर्णन करो
उत्तर-

  • ऋग्वैदिक काल में राजा की शक्तियां सीमित थीं। उसे प्रचलित प्रथाओं के नियम के अनुसार शासन चलाना पड़ता था, परन्तु उत्तर वैदिक काल में राजा की शक्तियां बहुत बढ़ गईं।
  • ऋग्वैदिक काल में कबीले न तो अधिक विशाल थे और न ही अधिक शक्तिशाली, परन्तु उत्तर वैदिक काल में बड़े बड़े शक्तिशाली साम्राज्यों का उदय हुआ।
  • ऋग्वैदिक काल में नारी का बड़ा आदर था। वह प्रत्येक धार्मिक कार्यों में भाग लेती थी। उसे शासन कार्यों में भी भाग लेने का अधिकार था। इसके विपरीत उत्तर वैदिक काल में नारी का सम्मान कम हो गया।
  • ऋग्वैदिक काल में धर्म बड़ा सरल था। यज्ञों पर अधिक व्यय नहीं होता था, परन्तु उत्तर वैदिक काल में धर्म जटिल हो गया। धर्म में अनेक व्यर्थ के कर्म-काण्ड शामिल हो गए। यज्ञ इतने महंगे हो गए कि साधारण लोगों के लिए यज्ञ करना असम्भव हो गया।

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प्रश्न 18.
सभा और समिति का अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
पूर्व वैदिक युग में सभा तथा समिति ने लोक संस्थाओं का रूप धारण कर लिया था। सभा का आकार समिति से छोटा होता था। यह केवल वृद्धों की संस्था थी। इसका मुख्य कार्य न्याय करना था। सभा और समिति शासन के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों पर अपने विचार प्रकट करती थी जिसे राजा को मानना पड़ता था। कुछ समय के पश्चात् सभा गुरु सभा में बदल गई तथा समिति ने राज्य की केन्द्रीय संस्था का रूप ले लिया जिसका अध्यक्ष राजा होता था। इसका कार्य क्षेत्र नीति का निर्णय तथा कानून का निर्माण करना था।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न-

प्रश्न 1.
ऋग्वैदिक काल के आर्यों की सभ्यता की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
ऋग्वैदिक काल की राजनीतिक तथा आर्थिक दशा की जानकारी दीजिए।
अथवा
ऋग्वेद में वर्णित आर्यों की सामाजिक एवं धार्मिक अवस्था पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
ऋग्वैदिक काल की सभ्यता के विषय में जानकारी का एकमात्र स्रोत ऋग्वेद है। यह आर्यों का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। ऋग्वेद के अध्ययन से आर्यों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक दशा के बारे में हमें निम्नलिखित बातों का पता चलता है :

1. राजनीतिक अवस्था-आर्यों ने एक आदर्श शासन प्रणाली की नींव रखी। शासन की सबसे छोटी इकाई परिवार थी। कुछ परिवारों के मेल से एक गांव बनता था। कुछ गाँवों के समूह को ‘विश’ कहते थे। विशों का समूह ‘जन’ कहलाता था। प्रत्येक ‘जन’ एक राजा के अधीन था। राजा का मुख्य कार्य जन के लोगों की भलाई करना तथा युद्ध के समय उनका नेतृत्व करना था। राजा की शक्तियों पर रोक लगाने के लिए सभा समिति नामक दो संस्थाएं थीं। राजा की सहायता के लिए पुरोहित, सेनानी, दूत आदि अनेक अधिकारी होते थे।

2. आर्थिक अवस्था अथवा भौतिक जीवन-ऋग्वैदिक काल में लोगों की आर्थिक दशा काफ़ी अच्छी थी। वे मुख्य रूप से पशु-पालक थे। पालतू पशुओं में गाय, बैल, भेड़, बकरी आदि प्रमुख थे। वे लकड़ी के फालों के साथ खेती करते थे। उन्हें खेती सम्बन्धी कई बातों, जैसे-कटाई, बुआई आदि की काफ़ी जानकारी थी। कुछ अन्य लोग छोटे-छोटे उद्योगधन्धों में भी लगे हुए थे। इनमें से बढ़ई, कुम्हार, लुहार, बुनकर, चर्मकार आदि मुख्य थे।

3. सामाजिक अवस्था-ऋग्वैदिक काल के सामाजिक जीवन का आधार परिवार था जो पितृ-प्रधान था। परिवार में सबसे बड़ी आयु का व्यक्ति परिवार का मुखिया होता था। अन्य सभी सदस्यों को उनकी आज्ञा का पालन करना पड़ता था। इस काल में समाज चार वर्गों-योद्धा, पुरोहित, जनसाधारण तथा शूद्रों में बंटा हुआ था। शूद्र वे लोग थे जिन्हें युद्ध में पराजित करके दास बनाया जाता था। काम के आधार पर भी समाज का बंटवारा शुरू हो गया था, परन्तु यह बंटवारा अभी पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं था। समाज में नारी का बड़ा आदर था। उसे पुरुष की अर्धांगिनी समझा जाता था। वह पुरुष के साथ यज्ञों में भाग लेती थी। उसे शासन कार्यों में भाग लेने का भी अधिकार था। लोगों का मुख्य गेहूं, जौ, घी और दूध था। विशेष अवसरों पर लोग सोमरस भी पीते थे। लोगों के मनोरंजन के मुख्य साधन रथ-दौड़, शिकार करना तथा जुआ खेलना थे।

4. धार्मिक अवस्था-ऋग्वैदिक आर्य सन्तान, पशु, अन्न, धन, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति के लिए अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते थे। उनके देवताओं में सोम, अग्नि, वायु, इन्द्र, द्यौस, ऊषा, वरुण तथा सूर्य प्रमुख थे। इन्द्र उनका सबसे बड़ा देवता था। युद्ध से पहले विजय पाने के लिए प्रायः इन्द्र की पूजा की जाती थी। उनकी मुख्य देवी उषा थी। आर्य लोगों के धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते हुए भी एक ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते थे।

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प्रश्न 2.
उत्तर वैदिक कालीन आर्यों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक अवस्था के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
1000 ई० पू० में ऋग्वैदिक काल की समाप्ति हो गई। इस समय से लेकर लगभग 600 ई० पू० के काल को इतिहासकार उत्तर वैदिक काल का नाम देते हैं। इन दिनों आर्य लोग गंगा की घाटी में आ बसे थे। यहां उन्होंने सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रन्थों की रचना की। इन्हीं ग्रन्थों के अध्ययन से ही हमें उत्तर वैदिक आर्यों की सभ्यता का पता चलता है। इस सभ्यता की मुख्य विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है :-

1. राजनीतिक जीवन-उत्तर वैदिक काल में बड़े-बड़े साम्राज्य स्थापित हो गए। राजा की शक्तियां बढ़ गईं। शासन कार्यों में राजा की सहायता के लिए सेनानी, पुरोहित, संगृहित्री आदि अनेक अधिकारी थे। परन्तु राजा के लिए उनके निर्णय को मानना आवश्यक नहीं था शासन कार्यों के व्यय के लिए वह प्रजा से कर और दक्षिणा लेता था।

2. सामाजिक जीवन-उत्तर वैदिक काल में समाज चार जातियों में बंटा हुआ था। वे जातियां थीं-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य .. तथा शूद्र। ब्राह्मणों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। इस काल की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता आश्रम व्यवस्था थी। जीवन को 100 वर्ष मान कर इसे चार आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास में बांट दिया गया।

3. आर्थिक अथवा भौतिक जीवन-इस काल के आर्यों का मुख्य व्यवसाय कृषि करना था, परन्तु अब वे लोग बड़ेबड़े हलों का प्रयोग करने लगे थे। राजा और राजकुमार स्वयं भी हल चलाते थे। इस काल में कौशाम्बी, विदेह, काशी आदि बड़े-बड़े नगरों का उदय हुआ। ये नगर व्यापार और उद्योग-धन्धों के प्रमुख केन्द्र बने। उस समय विदेशी व्यापार भी होता था।

4. धार्मिक अवस्था-उत्तर वैदिक काल में आर्यों के धार्मिक रीति-रिवाज तथा धार्मिक विचारों में काफ़ी परिवर्तन आया। इस काल में इन्द्र, वरुण तथा सूर्य की बजाय शिव-विष्णु की पूजा पर अधिक बल दिया जाने लगा। आत्मा, परमात्मा तथा जन्म-मृत्यु के विषय में अनेक नये सिद्धान्त धर्म में शामिल हो गए। कर्म, मोक्ष तथा माया सम्बन्धी सिद्धान्तों ने धर्म को और भी अधिक जटिल बना दिया। इस काल में लोग अनेक प्रकार के जादू-टोनों में भी विश्वास रखने लगे थे।
सच तो यह है कि उत्तर वैदिक काल में आर्यों के राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन में अनेक परिवर्तन आए।

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प्रश्न 3.
जाति-प्रथा के विषय में आप क्या जानते हैं ? इसके (क) लाभ तथा (ख) हानियों का वर्णन करो।
उत्तर-
जाति-प्रथा से अभिप्राय उन श्रेणियों से हैं जिनमें हमारा प्राचीन समाज बंटा हुआ था। हर जाति की अपनी अलग प्रथाएँ थीं। जाति के प्रत्येक सदस्य को उनका पालन करना पड़ता था। आरम्भ में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र नामक चार जातियां थीं, परन्तु धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती गई। आजकल भारत में लगभग तीन हज़ार जातियां हैं।

(क) जाति-प्रथा के लाभ-

  • जाति-प्रथा के कारण भारतीय संस्कृति विदेशी प्रभाव से सुरक्षित रही।
  • जाति-प्रथा के कारण रक्त की पवित्रता बनी रही।
  • जाति-प्रथा के कारण लोग बचपन से ही अपने पिता के व्यवसाय में जुट जाते थे। फलस्वरूप बड़े होकर वे निपुण कारीगर सिद्ध होते थे।
  • जाति-प्रथा के अनुसार बुरा काम करने वाले लोगों को जाति से निकाल दिया जाता था। इस भय से लोग कोई बुरा काम नहीं करते थे।
  • प्रत्येक जाति के लोग अपनी जाति के निर्धन तथा रोगी व्यक्तियों की सेवा तथा सहायता करते थे। इस प्रकार लोगों के मन में समाज-सेवा और त्याग की भावना बढी।
  • जाति-प्रथा के कारण प्रत्येक जाति के लोगों को अपनी जाति का व्यवसाय अपनाना पड़ता था। अतः लोगों को रोज़ी का कोई अन्य साधन ढूंढ़ने की चिन्ता नहीं रहती थी।
  • जाति-प्रथा के अनुसार ब्राह्मणों का कार्य शिक्षा देना था। वह निःशुल्क शिक्षा प्रदान करते थे।
  • शुद्धि तथा अन्य जातियों के लोग हिन्दू बन जाते थे। अतः शक, हूण, यूनानी आदि भारत पर आक्रमण करने वाली अनेक जातियां हिन्दू समाज का अंग बन गईं। .

(ख) जाति-प्रथा की हानियां –

  • जाति-प्रथा के कारण राष्ट्रीयता की भावना को गहरा आघात पहुंचा।
  • जाति-प्रथा के कारण देश में सैनिक शिक्षा सीमित रही।
  • जाति-प्रथा के कारण लोगों के लिए पैतृक धन्धा बदलना बड़ा कठिन होता था। फलस्वरूप लोगों का व्यक्तिगत विकास रुक गया।
  • इस प्रथा के कारण समाज में छुआछूत की भावना बढ़ी।
  • ब्राह्मण तथा क्षत्रिय स्वयं को सभी जातियों से श्रेष्ठ समझते थे। इस प्रकार जातियों में आपसी द्वेष उत्पन्न हो गया।
  • ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के लिए अनेक ऐसी कुप्रथाएं चलाईं जिससे उन्हें अधिक से अधिक लाभ पहुंचे। इस प्रकार अनेक सामाजिक कुरीतियां प्रचलित हुईं। सच तो यह है कि जाति-प्रथा से भारत को आरम्भ में अवश्य कुछ लाभ पहुंचे, परन्तु धीरे-धीरे यह प्रथा भारत के लिए अभिशाप बन गई। वास्तव में यह एक कुप्रथा है जो हिन्दू समाज को अन्दर से खोखला करती रही है।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 5 नशों तथा डोपिंग के घातक प्रभाव

Punjab State Board PSEB 11th Class Physical Education Book Solutions Chapter 5 नशों तथा डोपिंग के घातक प्रभाव Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Physical Education Chapter 5 नशों तथा डोपिंग के घातक प्रभाव

PSEB 11th Class Physical Education Guide नशों तथा डोपिंग के घातक प्रभाव Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
समाज में आम प्रचलित कौन-कौन से नशे हैं ?
(Which Drugs are commonly used by the people in the society ?)
उत्तर-

  1. शराब
  2. अफीम
  3. तम्बाकू
  4. भांग
  5. हशीश
  6. नस्वार
  7. कोकीन
  8. ऐडरनवीन
  9. नार्कोटिक्स
  10. ऐनाबोलिक स्टीराइडस।

प्रश्न 2.
नशे क्या होते हैं ? (What are Drugs ?)
उत्तर-
नशा एक ऐसा पदार्थ है जिसका इस्तेमाल करने से शरीर में किसी न किसी तरह की उत्तेजना या आलस्यपन आ जाता है। मनुष्य के नाड़ी प्रबन्ध पर सभी नशीली वस्तुओं का बहुत बुरा असर पड़ता है जिसके कारण कई तरह के विचार, कल्पना तथा व्यक्ति को कोई सुध नहीं रहती और बुरी भावनाएं पैदा होती हैं। वह अपना, अपने परिवार तथा समाज के लोगों का नुकसान करता है।

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प्रश्न 3.
नशों की किस्में लिखें। (Write the types of Drugs.)
उत्तर-
नशे कई प्रकार के होते हैं ; जैसे-शराब, तम्बाकू, अफ़ीम, भांग, चरस, कैफीन तथा मैडीकल नशे या नशीली दवाइयां आदि।
1. शराब-शराब का सेहत पर प्रभाव (Effect of Alcohol on Health) शराब एक नशीला तरल पदार्थ है। शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बाज़ार में बेचने से पहले प्रत्येक शराब की बोतल पर यह लिखना ज़रूरी है। फिर भी बहुत से लोगों को इसकी लत (आदत) लगी हुई है जिससे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। शरीर को कई तरह के रोग लग जाते हैं। फेफड़े कमजोर हो जाते हैं और व्यक्ति की आयु घट जाती है। ये शरीर के सभी अंगों पर बुरा प्रभाव डालती है। पहले तो व्यक्ति शराब को पीता है कुछ समय के बाद शराब आदमी को पीने लग जाती है। भाव शराब शरीर के अंगों को नुकसान पहुंचाने लग जाती है।
शराब पीने की हानियाँ निम्नलिखित हैं—

  • शराब का असर दिमाग पर होता है। नाड़ी प्रबन्ध बिगड़ जाता है और दिमाग कमजोर हो जाता है। मनुष्य के सोचने की शक्ति घट जाती है।
  • शरीर में गुर्दे कमजोर हो जाते हैं।
  • शराब पीने से पाचन रस कम पैदा होना शुरू हो जाता है जिससे पेट खराब रहने लग जाता है।
  • श्वास की गति तेज़ और सांस की अन्य बीमारियां लग जाती हैं।
  • शराब पीने से रक्त की नाड़ियां फूल जाती हैं। दिल को अधिक काम करना पड़ता है और दिल के दौरे का डर बना रहता है।
  • लगातार शराब पीने से मांसपेशियों की शक्ति घट जाती है। शरीर बीमारियों का मुकाबला करने के योग्य नहीं रहता।
  • आविष्कारों से पता लगता है कि शराब पीने वाला मनुष्य शराब न पीने वाले व्यक्ति से काम कम करता है। शराब पीने वाले व्यक्ति को बीमारियां भी जल्दी लगती हैं।
  • शराब से घर, स्वास्थ्य, पैसा आदि बर्बाद होता है और यह एक सामाजिक बुराई है।

2. तम्बाकू-तम्बाकू पीना-खाना एक बहुत बुरी आदत बन चुका है। तम्बाकू पीने के अलग-अलग ढंग हैं, जैसे बीड़ी, सिगरेट पीना, सिगार पीना, हुक्का पीना, चिल्म पीना आदि। इसी तरह खाने के ढंग भी अलग हैं, जैसे तम्बाक चूने में मिला कर सीधे मुंह में रख कर खाना, या रगने में रखकर खाना, या गले में रखकर खाना आदि। तम्बाकू में खतरनाक ज़हर निकोटीन (Nicotine) होता है। इसके अलावा कार्बन-डाइऑक्साइड आदि भी होता है। निकोटीन का बुरा प्रभाव पड़ता है जिससे सिर चकराने लग जाता है और फिर दिल पर प्रभाव करता है।

3. अफ़ीम-अफ़ीम पैपेबर सोनिफेरस नामक पौधे से प्राप्त किया जाता है, जो एक काले रंग का कसैला मादक पदार्थ है और जिसका प्रयोग नशे के रूप में किया जाता है।

4. चरस-यह भांग से बना नशीला पदार्थ होता है जिसके प्रयोग से आलस्य, नींद, उत्तेजना, बिमारी आदि महसूस होने लगती है। यह सोच शक्ति पर बुरा असर डालती है।

5. कोकीन-कोकीन कोका नामक पत्तियों से प्राप्त होने वाला नशीला पदार्थ है। इससे चिड़चिड़ापन आ जाता है। इसका प्रयोग करने से दिल का दौरा पड़ सकता है, दिल फेल भी हो सकता है।

6. नशीली दवाइयां-स्वास्थ्य संस्थानों में प्रयोग की जाने वाली कई प्रकार की दर्द निवारक दवाएँ होती हैं, जो किसी भयानक बिमारी या ऑप्रेशन के समय दर्द से राहत के लिए दी जाती हैं।

परन्तु आज कल ये दर्द निवारक दवाइयां डॉक्टरी सलाह के बिना नौजवान और खिलाड़ी वर्ग इनका आम जिंदगी में प्रयोग कर रहे हैं। इस तरह की दवाओं में कई तरह की नशीली गोलियां, पीने वाली दवाईयां, टीके, कैप्सूल आदि शामिल हैं। जैसे-डायाजेपाम, नेबूटाल, सेकोनाल, आदि।

प्रश्न 4.
तम्बाकू पर नोट लिखें। (Write a note on Tobacco.)
उत्तर-
हमारे देश में तम्बाकू पीना-खाना एक बहुत बुरी आदत बन चुका है। तम्बाकू निकोटीन के पौधों के पत्तों से प्राप्त नशीला पदार्थ होता है। तम्बाकू पीने के अलग-अलग ढंग हैं, जैसे बीड़ी, सिगरेट पीना, सिगार पीना, हुक्का पीना, चिल्म पीना आदि। इसी तरह खाने के ढंग भी अलग हैं, जैसे तम्बाकू चूने में मिला कर सीधे मुंह में रख कर खाना, या रगने में रखकर खाना, या गले में रखकर खाना आदि। तम्बाकू में खतरनाक ज़हर निकोटीन (Nicotine) होता है। इसके अलावा कार्बन-डाइऑक्साइड आदि भी होता है। निकोटीन का बुरा प्रभाव पड़ता है जिससे सिर चकराने लग जाता है और फिर दिल पर प्रभाव करता है।
तम्बाकू के नुकसान इस तरह हैं—

  1. तम्बाकू खाने या पीने से नज़र कमजोर हो जाती है।
  2. इससे दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है। दिल का रोग लग जाता है जो कि मृत्यु का कारण बन सकता है।
  3. आविष्कारों से पता लगा है कि तम्बाकू पीने या खाने से रक्त की नाड़ियां सिकुड़ जाती हैं।
  4. तम्बाकू शरीर के तन्तुओं को उत्तेजित रखता है, जिससे नींद नहीं आती और नींद न आने की हालत में बीमारी लग जाती है।
  5. तम्बाकू के प्रयोग से पेट खराब रहने लग जाता है।
  6. तम्बाकू के प्रयोग से खांसी लग जाती है जिससे फेफड़ों की टी० बी० होने का खतरा बढ़ जाता है।
  7. तम्बाकू से कैंसर की बीमारी का डर बढ़ जाता है। विशेष कर छाती का कैंसर और गले का कैंसर।
  8. तम्बाकू के प्रयोग से खुराक नली, मुंह के कैंसर का डर भी रहता है।

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प्रश्न 5.
अफ़ीम के शरीर पर पड़ने वाले कुप्रभाव लिखें। (Write about the fatal effects of using opium on our body.)
उत्तर-
अफ़ीम के शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावः

  1. हल्का-हल्का सिरदर्द महसूस होता रहता है।
  2. दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है।
  3. कोई भी निर्णय लेने की योग्यता कम हो जाती है।
  4. डर, घबराहट और बीमारी हालत महसूस होती है।
  5. वातावरण या हवा में अनावश्यक नमी या ठंड महसूस होती है।
  6. छाती में दर्द महसूस होता रहता है।
  7. होंठ और हाथों के नाखुन नीले हो जाते हैं।
  8. आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ जाती है और कोई भी वस्तु साफ दिखाई नहीं देती।
  9. व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में भी उतावलापन महसूस करता है।

प्रश्न 6.
नशे करने के क्या कारण हैं ? (What are the reasons of taking drugs ?)
उत्तर-
1. मीडिया-मीडिया द्वारा वैसे तो नौजवानों को नशे न करने के प्रति जागरुक किया जाता है। परन्तु विद्यार्थी गीतों, फिल्मों तथा नाटकों आदि में किए जाने वाले नशों के प्रयोग को फैशन या स्टेट्स समझने की भूल कर बैठते हैं।

2. अपना अस्तित्व दिखाना-कई बार माता-पिता द्वारा या समाज द्वारा विद्यार्थी या खिलाड़ी को अनदेखा किया जाता है। बच्चे या खिलाड़ी को लगता है कि उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा, इसलिए वह दूसरों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए ऐसे गलत तरीकों का प्रयोग करते हैं।

3. अपने आपको बड़ा साबित करना-कई बार दोस्तों मित्रों या माता-पिता द्वारा विद्यार्थी को अनजान या . छोटा कहकर कोई विशेष काम करने से रोक दिया जाता है। तब वह गुस्से में या अपने आपको बड़ा साबित करने के लिए ऐसे ग़लत तरीके का प्रयोग करता है।

4. बेरोज़गारी-बेरोज़गारी भी नशों के बढ़ रहे रुझान का बड़ा कारण है। जब किसी अधिक पढ़े-लिखे नौजवान या खिलाड़ी को समय पर नौकरी नहीं मिलती तो वह धीरे-धीरे निराशा का शिकार हो जाता है और अपने तनाव को घटाने के लिए नशों का प्रयोग करने लग जाता है।

5. मौज मस्ती के लिए—जवान लड़के और लड़कियों द्वारा पार्टी को मज़ेदार बनाने या अपनी मौज-मस्ती के लिए इन नशों का प्रयोग किया जाता है, जो धीरे-धीरे उनकी आदत बन जाती है।

6. मानसिक दबाव-कुछ नौजवान मानसिक दबाव के कारण जैसे पढ़ाई का बोझ, किसी समस्या का सामना न कर पाने की हालत में डिप्रेशन में चले जाते हैं, ऐसी हालत में से निकलने के लिए वे नशे का सहारा लेते

7. जानने की इच्छा-नौजवान उम्र के विद्यार्थी के भीतर हर एक नयी चीज़ के बारे में जानने की इच्छा होती है। अगर घर में किसी सदस्य द्वारा किसी नशे का प्रयोग किया जाता है तो बच्चे में भी उसको जानने की इच्छा पैदा होती है। वे पहले घर वालों से चोरी यह गलती करते हैं और धीरे-धीरे नशों की जकड़ में आ जाते हैं।

8. मानसिक दबाव-कुछ नौजवान मानसिक दबाव के कारण जैसे पढ़ाई का बोझ, किसी समस्या का सामना न कर पाने की हालत में डिप्रेशन में चले जाते हैं, ऐसी हालत में से निकलने के लिए वे नशे का सहारा लेते हैं।

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प्रश्न 7.
नशों का खिलाड़ी, परिवार, समाज तथा देश पर क्या प्रभाव पड़ता है ? (What are the bad effects of using drugs on a player, family, society and country ?)
उत्तर-
नशीले पदार्थों का शरीर, परिवार और समाज पर बुरा प्रभाव (Effects of Intoxicants on Individual, Family and Society And Their Abuses)—मनुष्य प्राचीन काल से ही नशीली वस्तुओं का प्रयोग करता आ रहा है। उसका विश्वास था कि इनके प्रयोग से रोग दूर होते हैं तथा मन ताज़ा होता है। परन्तु बाद में इनके कुप्रभाव भी देखने में आए हैं। आज के वैज्ञानिक युग में अनेक नई-नई नशीली वस्तुओं का आविष्कार हुआ है जिसके कारण क्रीड़ा जगत् दुविधा में पड़ गया है। इन नशीली वस्तुओं के सेवन से भले ही कुछ समय के लिए अधिक काम लिया जा सकता है, परन्तु नशे और अधिक काम से मानव रोग का शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त करता है। इन घातक नशों में से कुछ नशे तो कोढ़ के रोग से भी बुरे हैं। शराब, तम्बाकू, अफीम, भांग, हशीश, ऐडरनविन तथा निकोटीन ऐसी नशीली वस्तुएं हैं जिनका सेवन स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है।

प्रत्येक व्यक्ति अपने मनोरंजन के लिए किसी-न-किसी खेल में भाग लेता है। वह अपने साथियों तथा पड़ोसियों के साथ मेल-मिलाप तथा सद्भावना की भावना रखता है। इसके विपरीत एक नशे का गुलाम व्यक्ति दूसरों की सहायता करना तो दूर रहा, अपना बुरा-भला भी नहीं सोच सकता। ऐसा व्यक्ति समाज के लिए बोझ होता है। वह दूसरों के लिए सिर दर्दी बन जाता है। परिवार में कलेश रहने के कारण बच्चों के विकास पर भी असर पड़ता है। वह पारिवारिक कार्यों तथा फैसलों में अपना कोई योगदान नहीं देता। समाज और परिवार में उसके कोई पास नहीं आता। वह न केवल अपने जीवन को दु:खद बनाता है, बल्कि अपने परिवार और सम्बन्धियों के जीवन को भी नरक बना देता है। सच तो यह है कि नशीली वस्तुओं का सेवन स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव डालता है। इससे ज्ञान शक्ति, पाचन शक्ति, दिल, रक्त, फेफड़ों आदि से सम्बन्धित अनेक रोग लग जाते हैं।
नशीली वस्तुओं का प्रयोग करना खिलाड़ियों के लिए ठीक नहीं होता।
नशीली वस्तुओं के दोष (Harms of Intoxicants)-जो खिलाड़ी नशीली वस्तुओं का प्रयोग करते हैं उनके दोष निम्नलिखित हैं—

  1. चेहरा पीला पड़ जाता है।
  2. कदम लड़खड़ाते हैं।
  3. मानसिक सन्तुलन खराब हो जाता है।
  4. खेल का मैदान लड़ाई का मैदान बन जाता है।
  5. पाचन शक्ति खराब हो जाती है।
  6. तेज़ाबी अंश आमाशय की शक्ति को कम करते हैं।
  7. पेट के कई प्रकार के रोग लग जाते हैं।
  8. पेशियों के काम करने की शक्ति कम हो जाती है।
  9. खेल के मैदान में खिलाड़ी खेल का अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकता।
  10. कैंसर और दमे की बीमारियां लग जाती हैं।
  11. खिलाड़ियों की स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है।
  12. नशे में डूबे खिलाड़ी खेल की परिवर्तित अवस्थाओं को नहीं समझ सकते और अपनी टीम की पराजय का कारण बन जाते हैं।
  13. नशे वाला खिलाड़ी लापरवाह हो जाता है।
  14. शरीर में समन्वय नहीं होता।
  15. नशे वाले खिलाड़ी के पैरों का तापमान सामान्य शक्ति के तापमान से 1.8° सैंटीग्रेड कम होता है।

नशीली वस्तुओं के सेवन का खिलाड़ियों तथा खेल पर बुरा प्रभाव पड़ता है जो कि इस प्रकार है—
1. शारीरिक समन्वय एवं स्फूर्ति का अभाव-नशे करने वाले खिलाड़ी में शारीरिक तालमेल तथा स्फूर्ति नहीं रहती। अच्छे खेल के लिये इनका होना बहुत जरूरी है। हॉकी, फुटबॉल, वॉलीबॉल आदि ऐसी खेलें हैं।

2. मन के सन्तुलन और एकाग्रचित्त का प्रभाव-किसी खिलाड़ी की मामूली-सी सुस्ती खेल का पासा पलट देती है। इतना ही नहीं नशे में धुत्त खिलाड़ी एकाग्रचित्त नहीं हो सकता। इसलिए वह खेल के दौरान ऐसी गलतियां कर देता है जिसके फलस्वरूप उसकी टीम को पराजय का मुंह देखना पड़ता है।

3. लापरवाही तथा बेफिक्री-नशे से ग्रस्त खिलाड़ी बहुत लापरवाह और बेफिक्र होता है। वह अपनी शक्ति तथा दक्षता का उचित अनुमान नहीं लगा सकता। कई बार जोश में आकर वह ऐसी चोट खा जाता है जिससे उसे आयु पर्यन्त पछताना पड़ता है।

4. खेल भावना का अन्त-नशे में रहने से खिलाड़ी की खेल भावना का अन्त हो जाता है। नशा करने वाले खिलाड़ी की स्थिति अर्द्ध-बेहोशी की होती है। उसके मन का सन्तुलन बिगड़ जाता है। वह खेल में अपनी ही हांकता है और साथी खिलाड़ी की बात नहीं सुनता।

5. सोचने का अभाव-वह रैफरी या अम्पायर के उचित निर्णयों के प्रति असहमति व्यक्त करता है। सहनशीलता की शक्ति की कमी हो जाती है।

6. नियमों की अवहेलना-वह खेल के नियमों की अवहेलना करता है।

7. मैदान लड़ाई का अखाड़ा बन जाना-नशे में रहने वाला खिलाड़ी खेल के मैदान को लड़ाई का अखाड़ा बना देता है।

अन्तर्राष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी ने खेल के दौरान नशीली वस्तुओं के प्रयोग पर पाबन्दी लगा दी है। यदि खेल के दौरान कोई नशे की दशा में पकड़ा जाता है तो उसका जीता हुआ इनाम वापस ले लिया जाता है। इसलिए खिलाड़ियों को चाहिए कि वे स्वयं को हर प्रकार की नशीली वस्तुओं के सेवन से दूर रखें और सर्वोत्तम खेल का प्रदर्शन करके अपने और अपने देश के नाम को चार चांद लगायें।

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प्रश्न 8.
अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति पर नोट लिखें। (Write a note on the International Olympic Committee.)
उतर-
आधुनिक युग में प्रत्येक खिलाड़ी खेल की दुनिया में अपना नाम चमकाना चाहता है। परन्तु कुछ ऐसे भी खिलाड़ी होते हैं जो बिना मेहनत किए अपना नाम चमकाने के लालच में कुछ गल्त दवाईयों का सहारा ले लेते है। ऐसी दवाईयां न सिर्फ खेल भावना को नुक्सान पहुंचाती हैं बल्कि उनकी सेहत को भी खराब करती हैं ! इसी को देखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी समिति बनाई गई है जो खिलाड़ियों को ऐसी दवाईयों का प्रयोग नहीं करने देती।

अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति द्वारा ऐसे मादक पदार्थों पर पाबंदी लगायी हुई है, जो खिलाड़ियों का प्रदर्शन बढ़ाने . के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इन दवाओं का प्रयोग करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाती है। उनसे जीते हुए मैडल वापिस ले लिए जाते हैं और उनके खेलने पर पाबन्दी लगा दी जाती है। समिति द्वारा लंदन 2012 ओलंपिक खेलों में 1001 डोप टेस्ट किये गये और इन टेस्टों से पता चला कि 100 खिलाड़ियों ने पाबन्दी वाली दवा का प्रयोग किया हुआ था। इनमें अल्बेनियन वेटलिफ्टर हसन पूलाकू वह खिलाड़ी था, जिसके टेस्ट में ‘ऐनाबोलिक स्टीराईड’ पायी गयी।

Physical Education Guide for Class 11 PSEB नशों तथा डोपिंग के घातक प्रभाव Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
पैपेबर सोनिफेरस पौधे से कौन-सा नशीला पदार्थ मिलता है ?
उत्तर-
पैपेबर सोनिफेरस पौधे से अफीम मिलता है।

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प्रश्न 2.
शराब, तम्बाकू और अफीम क्या है ?
उत्तर-
शराब, तम्बाकू और अफीम नशीले पदार्थ हैं।

प्रश्न 3.
Central Nervous System को कौन प्रभावित करता है ?
उत्तर-
Central Nervous System को नशीली वस्तुएं प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 4.
निकोटीआना कुल के पौधों और पत्तों से कौन-सा नशा प्राप्त किया जाता है ?
उत्तर-
निकोटीआना कुल के पौधों और पत्तों से तम्बाकू प्राप्त किया जाता है।

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प्रश्न 5.
ऐमसेटेमिन, कैफीन, कोकीन, नारकोटिक कौन-सी दवाइयां हैं ?
उत्तर-
खिलाड़ियों को उत्तेजित करने की।

प्रश्न 6.
पाबंदीशुदा दवाई खिलाड़ियों का भार कम करने वाली कौन-सी है ?
उत्तर-
डिऊरैटिकस दवाई खिलाड़ियों का भार घटाने वाली है।

प्रश्न 7.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक कमेटी के क्या कार्य हैं ?
(a) ओलम्पिक में भाग लेने वाले खिलाड़ियों की जांच करनी।
(b) नशों की जांच करनी।
(c) खिलाड़ियों को उत्साहित करना।
(d) खिलाड़ियों को इनाम देने।
उत्तर-
(a) ओलम्पिक में भाग लेने वाले खिलाड़ियों की जांच करनी।

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प्रश्न 8.
ओलम्पिक कमेटी पाबंदी लगाती है ?
(a) नशीले पदार्थ
(b) पीने वाले पदार्थ
(c) खाने वाली ताकत वाली चीजें
(d) उपरोक्त को भी नहीं।
उत्तर-
(a) नशीले पदार्थ।

प्रश्न 9.
कोई तीन नशीले पदार्थों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. शराब,
  2. अफीम,
  3. तम्बाकू।

प्रश्न 10.
ओलम्पिक कमेटी ने खिलाड़ियों के कौन-कौन सी नशीली वस्तुओं पर पाबंदी लगाई।
उत्तर-
ऐमफेटेमिन, कैफीन, कोकीन, नार्कोटिक।

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प्रश्न 11.
अंतर्राष्ट्रीय कमेटी को कोई दो नाम लिखो।
उत्तर-

  1. नशों की जानकारी
  2. विजेता खिलाड़ियों को इनाम देने।

प्रश्न 12.
नशों से व्यक्ति की सेहत पर क्या असर होता है ?
उत्तर-
नाड़ी प्रबंध बिगड़ जाता है और दिमाग कमजोर हो जाता है।

प्रश्न 13.
नशीली वस्तुओं का खिलाड़ियों और खेल पर क्या असर पड़ता है ?
उत्तर-
खेल भावना का अन्त, नियम के विरुध जाना तथा मैदान लड़ाई का अखाड़ा बन जाता है।

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प्रश्न 14.
शराब से व्यक्ति की सेहत पर क्या असर पड़ता है.?
उत्तर-
नाड़ी प्रबंध बिगड़ जाता है, दिमाग कमजोर हो जाता है।

प्रश्न 15.
तम्बाकू से क्या नुक्सान होता है ?
उत्तर-
तम्बाकू खाने या पीने से नजर कमजोर हो जाती है और कैंसर की बीमारी का डर बढ़ जाता है।

प्रश्न 16.
शराब पीने से किस विटामिन की कमी होती है ?
उत्तर-
शराब पीने से विटामिन ‘B’ की कमी होती है।

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प्रश्न 17.
शराब पीने से कौन-सा रोग होता है ?
उत्तर-
शराब पीने से सबसे बड़ा रोग ‘जिगर’ का हो जाता है।

प्रश्न 18.
सिगरेट, बीड़ी, नसवार और सिगार किस नशाखोरी के साथ संबंधित है ?
उत्तर-
तम्बाकू पीने से संबंधित है।

प्रश्न 19.
सिगरेट पीने से कौन-सा जहरीला पदार्थ मिलता है ?
उत्तर-
निकोटिन पदार्थ मिलता है।

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प्रश्न 20.
तम्बाकू पीने से मनुष्य का खून का दबाव कितना बढ़ जाता है ?
उत्तर-
20 mg खून का दबाव बढ़ जाता है।

अति छोटे उत्तरों वाले प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
अगर खिलाड़ी ओलम्पिक में नशीली दवाइयों का सेवन करता पकड़ा जाए तो उसको क्या जुर्माना पड़ता है ?
उत्तर-
अगर खिलाड़ी ने कोई मैडल जीता हो तो वह वापिस ले लिया जाता है और उससे नकद जुर्माना भी लिया जाता है।

प्रश्न 2.
नशीली वस्तुओं के कोई दो दोष लिखो।
उत्तर-
नशीली वस्तुओं के दोष निम्नलिखित हैं—

  1. चेहरा पीला हो जाता है।
  2. मानसिक संतुलन खराब हो जाता है।

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प्रश्न 3.
नशीली वस्तुओं के खिलाड़ियों पर कोई दो बुरे प्रभाव लिखो।
उत्तर-
नशीली वस्तुओं के खिलाड़ियों पर पड़ने वाले दो बुरे प्रभाव निम्नलिखित हैं—

  1. फुर्ती कम हो जाती है।
  2. मानसिक संतुलन की एकाग्रता कम हो जाती है।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
नशीली वस्तुओं के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. शराब
  2. अफ़ीम
  3. तम्बाकू
  4. भंग
  5. नारकोटिक्स
  6. हशीश
  7. नसवार
  8. कैफ़ीन
  9. ऐडग्वीन
  10. ऐनाबोलिक सटीराइड।

प्रश्न 2.
शराब का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है ?
उत्तर-

  1. श्वास की गति तेज हो जाती है और श्वास की दूसरी बीमारियाँ भी लग जाती है।
  2. शराब का असर पहले दिमाग पर होता है। नाड़ी प्रबंध बिगड़ जाता है और दिमाग कमजोर हो जाता है। मनुष्य की सोचने की शक्ति कम हो जाती है।
  3. शराब पीने से पाचक रस कम पैदा होना शुरू हो जाता है। जिसके कारण पेट खराब होने लगता है।
  4. शराब से गुर्दे कमजोर हो जाते हैं।

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प्रश्न 3.
तम्बाकू पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
हमारे देश में तम्बाकू पीना और तम्बाकू खाना एक बहुत बुरी आदत बन चुकी है। तम्बाकू पीने के अलगअलग ढंग होते हैं। जैसे-बीड़ी पीना, सिगार पीना, चिलम पीना आदि। इस तरह खाने के ढंग भी अलग होते हैं, जैसेतम्बाकू में मिलाकर सीधा मुंह में रख कर खाना या पान में रख कर खाना। तम्बाकू में खतरनाक जहरीला निकोटीन (Nicotine) होता है। इसके अलावा अमोनिया कार्बनडाइआक्साइड आदि भी होती है। निकोटीन का बुरा असर सिर पर पड़ता है। जिसके साथ सिर चकराने लगता है और फिर दिल पर असर होता है।

प्रश्न 4.
अफ़ीम से शरीर पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव बताओ।
उत्तर-

  1. पाचन शक्ति खराब हो जाती है।
  2. चेहरा पीला पड़ जाता है।
  3. खेल का मैदान लड़ाई का मैदान बन जाता है।
  4. कदम लड़खड़ाते हैं।

प्रश्न 5.
नशे करने के दो कारण लिखो।
उत्तर-

  1. बेरोज़गारी-बेरोज़गारी भी नशों के बढ़ रहे शौक का बड़ा कारण है। जब खिलाड़ी को नौकरी नहीं मिलती और फिर उसका झुकाव नशों की तरफ चला जाता है।
  2. दोस्तो की तरफ से मज़बूर करना-खिलाड़ी को उसके साथियों द्वारा नशे की एक दो दफा नशा करने के लिए मजबूर करना और नशे को मज़ेदार चीज़ बता कर उसको नशा करवाया जाता है।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 5 नशों तथा डोपिंग के घातक प्रभाव

प्रश्न 6.
नशों का खिलाड़ी, परिवार, समाज और देश पर प्रभाव लिखो।
उत्तर-
नशा एक ऐसी लाइलाज लत है। जिसको करने से व्यक्ति अपना धैर्य खो बैठता है। वह स्वास्थ्य तो खराब करता ही है, बल्कि अपने परिवार का जीना भी मुश्किल कर देता है। वह अपने नशे की जरूरत के लिए हर गलत तरीका अपनाता है। जिस कारण परिवार में कलेश रहता है। जिसका बुरा प्रभाव बच्चों की वृद्धि और विकास पर प्रभाव पड़ता है। समाज में व्यक्ति की इज्जत खत्म हो जाती है। हर कोई ऐसे नशेड़ी व्यक्ति से दूर रहता है।

बड़े उत्तरों वाले प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
नशीली वस्तुओं के शरीर पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों के बारे में वर्णन करें।
उत्तर-
शराब, अफीम, तम्बाकू, हशीश आदि नशीली वस्तुएं हैं। इनके सेवन से भले ही कुछ समय के लिए अधिक काम लिया जा सकता है, परन्तु नशे और अधिक काम से मानव रोग का शिकार होकर मृत्यु को प्राप्त करता है। इन घातक नशों में से कुछ नशे तो कोढ़ के रोग से भी बुरे हैं। शराब, तम्बाकू, अफीम, भांग, हशीश, ऐडरनविन तथा निकोटीन ऐसी नशीली वस्तुएं हैं जिनका सेवन स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक है।
नशीली वस्तुओं के शरीर पर बुरे प्रभाव :—

  1. चेहरा पीला पड़ जाता है।
  2. कदम लड़खड़ाते हैं।
  3. मानसिक सन्तुलन खराब हो जाता है।
  4. खेल का मैदान लड़ाई का मैदान बन जाता है।
  5. पाचन शक्ति खराब हो जाती है।
  6. तेज़ाबी अंश आमाशय की शक्ति को कम करते हैं।
  7. पेट के कई प्रकार के रोग लग जाते हैं।
  8. पेशियों के काम करने की शक्ति कम हो जाती है।
  9. खेल के मैदान में खिलाड़ी खेल का अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकता।
  10. कैंसर और दमे की बीमारियां लग जाती हैं।
  11. खिलाड़ियों की स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है।
  12. नशे में डूबे खिलाड़ी खेल की परिवर्तित अवस्थाओं को नहीं समझ सकते और अपनी टीम की पराजय का कारण बन जाते हैं।
  13. नशे वाला खिलाड़ी लापरवाह हो जाता है।
  14. शरीर में समन्वय नहीं होता।
  15. नशे वाले खिलाड़ी के पैरों का तापमान सामान्य शक्ति के तापमान से 1.8° सैंटीग्रेड कम होता है।

PSEB 11th Class Physical Education Solutions Chapter 5 नशों तथा डोपिंग के घातक प्रभाव

प्रश्न 2.
डोपिंग किसे कहते हैं ? ब्लॅड डोपिंग तथा जीन डोपिंग के बारे में लिखें।
उत्तर-
डोपिंग से भाव है कुछ ऐसी मादक दवाओं या तरीकों का प्रयोग करना जिसके साथ खेल प्रदर्शन को बढ़ाया जाता है। डोपिंग दो तरह की होती है—

  1. शारीरिक विधि द्वारा
  2. दवाओं द्वारा

शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव—

  1. कई बार जल्दवाजी में दूसरे व्यक्ति के खून को मैच नहीं किया जाता, जिसके परिणामस्वरुप संक्रमण द्वार खिलाड़ी की मृत्यु भी हो सकती है।
  2. दूसरे व्यक्ति से किसी भी भयानक बीमारी के कीटाणु खिलाड़ी के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
  3. कई बार अपनी ओर से रखे गए खून में भी संक्रमण हो सकता है। जिसके साथ व्यक्ति को भयानक बीमारियाँ लग सकती हैं या खिलाड़ी की मौत भी हो सकती है।

ब्लॅड डोपिंग-इस तरह की विधि खिलाड़ी की हिमोग्लोबिन की तीव्रता को बढ़ाया जाता है। जिसके साथ मांसपेशियों को ज्यादा ऑक्सीजन मिलती है। इसके साथ खिलाड़ी की कारगुजारी बढ़ती है। लम्बी दूरी की दौड़ों में एथलीट्स द्वारा यह विधि ज्यादा प्रयोग की जाती है।
जीन डोपिंग-जीन डोपिंग में अपने शरीर की सामर्थ्य बढ़ाने के लिए अपने ही जीन को बदला जाता है। इस डोपिंग से मांसपेशियों की वृद्धि होती है, शरीर की सहनशक्ति, ज्यादा दर्द सहन करने की शक्ति आदि बढ़ जाती है।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

सामाजिक स्थिति (Social Condition)

प्रश्न 1.
मुगलों के अधीन पंजाब के लोगों की सामाजिक अवस्था का अध्ययन कीजिए।
(Study the social condition of the people of the Punjab under the Mughals.)
अथवा
मुग़लों के अधीन पंजाब के लोगों की सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या थी ?
(What were the main features of social life of the people of Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लों के समय पंजाब.के लोगों की सामाजिक दशा का वर्णन करो ? (Give a brief account of the social condition of the Punjab Under the Mughals.)
उत्तर-
मुगलों ने पंजाब में 1526 ई० से 1752 ई० तक शासन किया। मुग़लकालीन पंजाब की सामाजिक दशा कोई विशेष अच्छी न थी। मुग़लकालीन पंजाब का समाज मुख्य रूप से दो वर्गों-मुसलमान तथा हिंदुओं में बँटा हुआ था। सिखों को उस समय हिंदू समाज का ही अंग माना जाता था। मुग़लकालीन पंजाब के लोगों के सामाजिक जीवन का विवरण निम्नलिखित है—
1. मुसलमानों की तीन श्रेणियाँ (Three Classes of the Muslims)-पंजाब का मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों में बँटा हुआ था

i) उच्च श्रेणी (The Upper Class)-मुसलमानों की उच्च श्रेणी में बड़े-बड़े मनसबदार, सूबेदार, जागीरदार और रईस लोग सम्मिलित थे। इस श्रेणी के लोग बड़े भव्य महलों में रहते थे। वे बहुमूल्य वस्त्र पहनते थे। उनकी सेवा के लिए बहुसंख्या में नौकर होते थे।

ii) मध्यम श्रेणी (The Middle Class)—इस श्रेणी में व्यापारी, किसान, सैनिक और छोटे दर्जे के सरकारी कर्मचारी शामिल थे। उच्च श्रेणी की अपेक्षा इनका जीवन स्तर कुछ निम्न तो था, परंतु खुशहाल था।

iii) निम्न श्रेणी (The Lower Class)—इस श्रेणी की संख्या सबसे अधिक थी। इस श्रेणी में लोहार, जुलाहे, दस्तकार, बढ़ई, छोटे-छोटे दुकानदार, घरेलू नौकर, मज़दूर और दास आदि आते थे। उनकी दशा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं थी। निर्धन होने के कारण वे गंदी झोपड़ियों में रहते थे। वे फटे-पुराने वस्त्र पहनते थे। गुलामों की संख्या बहुत अधिक थी। बी० एन० लुनिया के अनुसार,
“दासी अपने स्वामी के हाथों में एक खिलौने की तरह थी।”1

2. हिंदुओं की जाति प्रथा (Caste system of the Hindus)—पंजाब की अधिकतर जनसंख्या हिंदू थी। हिंदू समाज कई जातियों तथा उपजातियों में बँटा हुआ था। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। निम्न जाति के लोगों को उच्च जाति के लोगों के साथ मेलजोल करने, वेद पढ़ने, मंदिरों में जाने तथा कुओं और तालाबों में जल भरने की आज्ञा नहीं थी। जाति नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को बिरादरी से निकाल दिया जाता था।

3. स्त्रियों की स्थिति (Condition of Women). मुग़लकालीन पंजाब के समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय स्त्री समाज में प्रचलित बुराइयों जैसे लड़कियों की हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, बहु-विवाह तथा पर्दा प्रथा आदि ने समाज में उनकी स्थिति अत्यंत शोचनीय बना दी थी।

4. खान-पान (Diet)-उच्च श्रेणी के लोग माँस, पूरी और हलवा खाने के अत्यंत शौकीन थे। वे मक्खन, मलाई, ताज़े फलों और शुष्क मेवों का भी बहुत प्रयोग करते थे। हिंदू अधिकतर शाकाहारी होते थे। उस समय लस्सी पीने का बहुत रिवाज था। गर्मियों में ठंडे शरबतों का बहुत प्रयोग किया जाता था।

5. वेशभूषा तथा गहने (Dress and Ornaments)-मुग़लकालीन पंजाब के लोग सूती और रेशमी वस्त्र पहनते थे। उच्च वर्ग में पुरुषों की वेशभूषा खुला कुर्ता, तंग पाजामा या सलवार तथा पगड़ी होती थी। स्त्रियों में कमीज़ और सलवार का रिवाज आम था। हिंदू स्त्रियाँ साड़ियाँ पहनती थीं तथा अपने सिर को चादर या दुपट्टे से ढाँपती थीं। उस समय स्त्रियाँ और पुरुष दोनों गहने पहनने के बहुत शौकीन थे। स्त्रियाँ तो शरीर के प्रत्येक अंग में गहने पहनती थीं जैसे कानों में काँटे, नाक में नथनी, बाँहों में चूड़ियाँ और गले में हार इत्यादि।

6. मनोरंजन के साधन (Means of Entertainment)-मुग़लकालीन पंजाब में लोग कई ढंगों से अपना मनोरंजन करते थे। लोग अपना मनोरंजन शिकार करके, रथों की दौड़ में भाग लेकर, कबूतरबाज़ी करके, मुर्गों की लड़ाई देखकर, शतरंज और चौपड़ खेलकर, संगीत, कुश्तियाँ और ताश खेलकर करते थे। इसके अतिरिक्त लोग त्योहारों और मेलों में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे।

7. शिक्षा (Education)—उस समय लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदू अपनी प्राथमिक शिक्षा मंदिरों में तथा मुसलमान मस्जिदों में प्राप्त करते थे। मुसलमानों के मुकाबले हिंदू शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, जालंधर, सुल्तानपुर, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।

1. “A female slave was toy of her master.” B.N. Luniya, Life and Culture in Medieval India (Indore : 1978) p. 190.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

आर्थिक स्थिति (Economic Condition)

प्रश्न 2.
मुगलों के अधीन पंजाब की आर्थिक दशा का वर्णन कीजिए। (P.S.E.B. Mar. 2008) (Describe the economic condition of the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोग आर्थिक रूप से समृद्ध थे। वस्तुओं की कीमतें सस्ती थीं अतैव ग़रीब लोगों का गुज़ारा भी अच्छा हो जाता था। कृषि, उद्योग तथा व्यापार उन्नत अवस्था में था। लाहौर तथा मुलतान व्यापारिक पक्ष से सबसे प्रसिद्ध नगर थे। उस काल के पंजाब के लोगों की आर्थिक दशा का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है—
1. खेती बाड़ी (Agriculture)—पंजाब के लगभग 80 प्रतिशत लोग खेती बाड़ी का व्यवसाय करते थे। इसका मुख्य कारण यह था कि यहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ थी और सिंचाई साधनों की कोई कमी नहीं थी। पंजाब में जब्ती प्रणाली लागू थी। अत: भूमि को उसकी उपजाऊ शक्ति के आधार पर चार वर्गों—पोलज, परोती, छछर और बंजर भूमि में बाँटा हुआ था। सरकार अपना लगान भूमि की उपजाऊ शक्ति को ध्यान में रखकर निर्धारित करती थी। यह कुल फसल का 1/3 हिस्सा हुआ करता था। सरकार किसानों की सुविधानुसार अपना लगान अनाज अथवा नकदी के रूप में एकत्रित करती थी। अकाल पड़ने या कम फसल होने की स्थिति में लगान कम या माफ कर दिया जाता था। सरकारी कर्मचारियों को यह कड़े आदेश थे कि वे किसी प्रकार से किसानों से अधिक वसूली न करें। इन सभी प्रयत्नों के परिणामस्वरूप पंजाब में फसलों की भरपूर पैदावार होती थी। पंजाब की प्रमुख फसलें गेहूँ, चावल, गन्ना, कपास, मक्की , चने और जौ थीं।

2. उद्योग (Industries)-पंजाब के लोगों का दूसरा मुख्य धंधा उद्योगों से संबंधित था। उस समय के प्रमुख उद्योगों का वर्णन निम्नलिखित है—

i) सूती वस्त्र उद्योग (Cotton Industry)-मुग़लकाल में सूती वस्त्र उद्योग पंजाब का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्योग था। लाहौर, मुलतान, गुजरात, बजवाड़ा और अमृतसर इस उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र थे। लाहौर में कई प्रकार का सूती कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान बढ़िया दरियाँ, चादरें और गलीचे बनाने के लिए प्रसिद्ध था। समाना में बहुत ही उत्तम प्रकार का कपड़ा तैयार किया जाता था।

ii) रेशमी वस्त्र उद्योग (Silk Industry)-मुगलकाल में रेशम उद्योग पंजाब का दूसरा प्रमुख उद्योग था। इस उद्योग के प्रमुख केंद्र मुलतान, कश्मीर तथा अमृतसर थे। मुलतान के रेशमी वस्त्रों की बहुत माँग थी। लाहौर में गुलबदन और दरियाई नाम के रेशमी वस्त्र तैयार किए जाते थे।

iii) ऊनी वस्त्र उद्योग (Woollen Industry)-पंजाब में ऊनी वस्त्र उद्योग के दो प्रसिद्ध केंद्र कश्मीर और अमृतसर थे। कश्मीर शालों के उद्योग के लिए संसार-भर में प्रसिद्ध था। अमृतसर में कंबल और लोइयाँ बहुत उच्चकोटि की तैयार की जाती थीं।

iv) चमड़ा उद्योग (Leather Industry)-मुगलकाल के पंजाब के चमड़ा उद्योग की गणना प्रसिद्ध उद्योगों में की जाती थी। चमड़े से बहुत-सी वस्तुएँ जैसे घोड़ों की काठियाँ, चप्पलें, दस्ताने और पानी लाने और ले जाने वाली मशके आदि तैयार की जाती थीं। इस उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र होशियारपुर, पेशावर और मुलतान थे।

3. पशु-पालन (Animal Rearing)—पंजाब में पशु-पालन भी एक प्रमुख व्यवसाय था। बैल, भैंसे और ऊँट खेती बाड़ी के लिए प्रयोग किए जाते थे। घोड़े और ऊँट सवारी के काम आते थे। गाय, भैंसें, भेड़ें, बकरियाँ दूध प्राप्त करने के लिए पाली जाती थीं। भेड़ों से ऊन भी प्राप्त की जाती थी। इन पशुओं के व्यापार के लिए अनेक स्थानों पर मंडियाँ लगाई जाती थीं।

4. खनिज पदार्थ (Minerals)-मुग़लकालीन पंजाब में खनिज पदार्थों की मात्रा काफ़ी कम थी। मंडी के पहाड़ी प्रदेशों में ताँबा मिलता था। जम्मू में जिस्त की खानें थीं। खिऊड़ा, नूरपुर और कालाबाग में नमक की खानें थीं। पंजाब की नदियों की रेत छान कर कुछ सोना भी प्राप्त किया जाता था।

5. व्यापार (Trade)—मुग़लकालीन पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार बहुत उन्नत था। व्यापार का काम खत्री, बनिए, महाजनों, बोहरों और खोजों के हाथ में था। पंजाब का विदेशी व्यापार—अरब देशों, अफ़गानिस्तान, ईरान, तिब्बत, भूटान, सीरिया, चीन और यूरोपीय देशों से चलता था। पंजाब इन देशों को सूती और रेशमी वस्त्र, शालें, कंबल, अनाज, नील और नमक आदि का निर्यात करता था। दूसरी ओर इन देशों से बढ़िया नस्ल के घोड़े, सूखे मेवे, ऐश्वर्य की वस्तुएँ, कालीन, रेशम, बहुमूल्य पत्थरों आदि का आयात किया जाता था। यह व्यापार स्थल और जल दोनों मार्गों से होता था।

6. प्रसिद्ध व्यापारिक नगर (Famous Commercial Towns)—पंजाब के सबसे प्रसिद्ध व्यापारिक नगर लाहौर और मुलतान थे। इनके अतिरिक्त अमृतसर, जालंधर, बजवाड़ा, बटाला, पानीपत, सुल्तानपुर, करतारपुर आदि नगर भी बहुत प्रसिद्ध थे।

7. कीमतें (Prices)—मुग़लों के समय पंजाब में वस्तुएँ काफ़ी सस्ती थीं। अकबर के समय एक मन गेहूँ का मूल्य 12 दाम, एक मन चावल का मूल्य 20 दाम, एक मन चने का मूल्य 16 दाम, एक मन दूध का मूल्य 25 दाम और एक मन चीनी का मूल्य 6 दाम था। अकबर के बाद भी वस्तुओं का मूल्य लगभग यही रहा। अतः कम कीमतों के कारण ग़रीब लोग भी अपना निर्वाह अच्छी तरह से कर लेते थे।

प्रश्न 3.
मुग़लों के अधीन पंजाब के लोगों की आर्थिक व सामाजिक जीवन की क्या विशेषताएँ थीं ?
(What were the main features of the social and economic life of the people of the – Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Give a brief account of the social and economic conditions of the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुगलों ने पंजाब में 1526 ई० से 1752 ई० तक शासन किया। मुग़लकालीन पंजाब की सामाजिक दशा कोई विशेष अच्छी न थी। मुग़लकालीन पंजाब का समाज मुख्य रूप से दो वर्गों-मुसलमान तथा हिंदुओं में बँटा हुआ था। सिखों को उस समय हिंदू समाज का ही अंग माना जाता था। मुग़लकालीन पंजाब के लोगों के सामाजिक जीवन का विवरण निम्नलिखित है—
1. मुसलमानों की तीन श्रेणियाँ (Three Classes of the Muslims)-पंजाब का मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों में बँटा हुआ था

i) उच्च श्रेणी (The Upper Class)-मुसलमानों की उच्च श्रेणी में बड़े-बड़े मनसबदार, सूबेदार, जागीरदार और रईस लोग सम्मिलित थे। इस श्रेणी के लोग बड़े भव्य महलों में रहते थे। वे बहुमूल्य वस्त्र पहनते थे। उनकी सेवा के लिए बहुसंख्या में नौकर होते थे।

ii) मध्यम श्रेणी (The Middle Class)—इस श्रेणी में व्यापारी, किसान, सैनिक और छोटे दर्जे के सरकारी कर्मचारी शामिल थे। उच्च श्रेणी की अपेक्षा इनका जीवन स्तर कुछ निम्न तो था, परंतु खुशहाल था।

iii) निम्न श्रेणी (The Lower Class)—इस श्रेणी की संख्या सबसे अधिक थी। इस श्रेणी में लोहार, जुलाहे, दस्तकार, बढ़ई, छोटे-छोटे दुकानदार, घरेलू नौकर, मज़दूर और दास आदि आते थे। उनकी दशा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं थी। निर्धन होने के कारण वे गंदी झोपड़ियों में रहते थे। वे फटे-पुराने वस्त्र पहनते थे। गुलामों की संख्या बहुत अधिक थी। बी० एन० लुनिया के अनुसार,
“दासी अपने स्वामी के हाथों में एक खिलौने की तरह थी।”1

2. हिंदुओं की जाति प्रथा (Caste system of the Hindus)—पंजाब की अधिकतर जनसंख्या हिंदू थी। हिंदू समाज कई जातियों तथा उपजातियों में बँटा हुआ था। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। निम्न जाति के लोगों को उच्च जाति के लोगों के साथ मेलजोल करने, वेद पढ़ने, मंदिरों में जाने तथा कुओं और तालाबों में जल भरने की आज्ञा नहीं थी। जाति नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को बिरादरी से निकाल दिया जाता था।

3. स्त्रियों की स्थिति (Condition of Women). मुग़लकालीन पंजाब के समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय स्त्री समाज में प्रचलित बुराइयों जैसे लड़कियों की हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, बहु-विवाह तथा पर्दा प्रथा आदि ने समाज में उनकी स्थिति अत्यंत शोचनीय बना दी थी।

4. खान-पान (Diet)-उच्च श्रेणी के लोग माँस, पूरी और हलवा खाने के अत्यंत शौकीन थे। वे मक्खन, मलाई, ताज़े फलों और शुष्क मेवों का भी बहुत प्रयोग करते थे। हिंदू अधिकतर शाकाहारी होते थे। उस समय लस्सी पीने का बहुत रिवाज था। गर्मियों में ठंडे शरबतों का बहुत प्रयोग किया जाता था।

5. वेशभूषा तथा गहने (Dress and Ornaments)-मुग़लकालीन पंजाब के लोग सूती और रेशमी वस्त्र पहनते थे। उच्च वर्ग में पुरुषों की वेशभूषा खुला कुर्ता, तंग पाजामा या सलवार तथा पगड़ी होती थी। स्त्रियों में कमीज़ और सलवार का रिवाज आम था। हिंदू स्त्रियाँ साड़ियाँ पहनती थीं तथा अपने सिर को चादर या दुपट्टे से ढाँपती थीं। उस समय स्त्रियाँ और पुरुष दोनों गहने पहनने के बहुत शौकीन थे। स्त्रियाँ तो शरीर के प्रत्येक अंग में गहने पहनती थीं जैसे कानों में काँटे, नाक में नथनी, बाँहों में चूड़ियाँ और गले में हार इत्यादि।

6. मनोरंजन के साधन (Means of Entertainment)-मुग़लकालीन पंजाब में लोग कई ढंगों से अपना मनोरंजन करते थे। लोग अपना मनोरंजन शिकार करके, रथों की दौड़ में भाग लेकर, कबूतरबाज़ी करके, मुर्गों की लड़ाई देखकर, शतरंज और चौपड़ खेलकर, संगीत, कुश्तियाँ और ताश खेलकर करते थे। इसके अतिरिक्त लोग त्योहारों और मेलों में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे।

7. शिक्षा (Education)—उस समय लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदू अपनी प्राथमिक शिक्षा मंदिरों में तथा मुसलमान मस्जिदों में प्राप्त करते थे। मुसलमानों के मुकाबले हिंदू शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, जालंधर, सुल्तानपुर, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।

1. “A female slave was toy of her master.” B.N. Luniya, Life and Culture in Medieval India (Indore : 1978) p. 190.

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धार्मिक स्थिति (Religious Condition)

प्रश्न 4.
मुग़ल काल में पंजाब के लोगों की धार्मिक अवस्था पर आलोचनात्मक नोट लिखें।
(Write a critical note on the religious condition of the people of Punjab during the Mughal period.)
अथवा
मुग़ल काल में लोगों की धार्मिक अवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन करें।
(What do you know about the religious condition of the people of Punjab under the Mughals ? Explain.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में हिंदू मत तथा इस्लाम के साथ-साथ सिख मत भी प्रचलित हो चुका था। उस समय पंजाब में बौद्ध मत लगभग लुप्त हो चुका था तथा जैन मत केवल नगरों के व्यापारी वर्ग तक ही सीमित था। इस काल में पंजाब में ईसाई मत का प्रचार भी आरंभ हो चुका था। इस काल के लोग अंध-विश्वासों तथा धर्म के बाह्याडंबरों पर अधिक बल देते थे। अधिकतर लोग धर्म की वास्तविकता को भूल चुके थे। पंजाब में सिख गुरुओं ने लोगों को धर्म का वास्तविक मार्ग दिखाने का महान् कार्य किया।—

1. हिंदू धर्म (Hinduism)-हिंदू धर्म की गणना भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में की जाती है। इस धर्म के अनुयायी राम, विष्णु, कृष्ण, शिव, हनुमान, दुर्गा, काली तथा लक्ष्मी आदि देवी-देवताओं की पूजा करते थे। इन देवी-देवताओं की स्मृति में अति संदर मंदिरों का निर्माण किया जाता था। इनमें आकर्षक मर्तियाँ रखी जाती थीं। हिंदू धर्म के सभी रीति-रिवाजों में ब्राह्मणों का शामिल होना अनिवार्य समझा जाता था। हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथों में वेदों, रामायण तथा गीता को मुख्य स्थान प्राप्त था। हिंदू ब्राह्मण तथा गाय का विशेष सत्कार करते थे। मुग़ल सम्राट अकबर ने अपनी धार्मिक सहनशीलता की नीति के कारण धार्मिक क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात किया था। उसने हिंदुओं को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की तथा उन पर लगे तीर्थ यात्रा कर तथा जजिया कर को हटा दिया था। औरंगज़ेब एक कट्टर सुन्नी सम्राट् था। उसने हिंदुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया। उनके मंदिरों तथा मूर्तियों को तोड़ दिया गया। उन पर बहुत-से प्रतिबंध लगा दिए गए। परिणामस्वरूप, हिंदू मुग़ल राज्य के कट्टर शत्रु बन गए।

2. इस्लाम (Islam) भारत में इस्लाम का सबसे अधिक प्रसार पंजाब में हुआ था। इसका मुख्य कारण यह था कि मुस्लिम आक्रमणकारी भारत में सबसे पहले पंजाब में स्थायी रूप में बसे थे। इस धर्म के अनुयायी एक अल्लाह में विश्वास रखते थे। वे हज़रत मुहम्मद साहिब को अल्लाह का पैगंबर समझते थे। वे दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे। वे रमजान के महीने में रोज़े रखते थे। वे हज यात्रा करना अनिवार्य समझते थे। वे जकात (दान) देते थे। वे मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे। दिल्ली के सुल्तान तथा मुग़ल बादशाह मुसलमान थे इसलिए उनके शासनकाल में इस्लाम का तीव्र गति से प्रसार होने लगा। मुसलमानों को सरकार की ओर से विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं इसलिए पंजाब की निम्न जातियों के बहुत-से लोग इस्लाम में शामिल हो गए। मुगल बादशाह औरंगजेब ने तलवार की नोक पर बहुत-से लोगों को बलपूर्वक इस्लाम में शामिल किया।

3. सूफ़ी मत (Sufism)—सूफी मत इस्लाम का ही एक संप्रदाय था। इस धर्म के लोग धार्मिक सहनशीलता की नीति में विश्वास रखते थे। उनका मुख्य संदेश परस्पर भ्रातृत्व तथा लोगों की सेवा करना था। वे संगीत में बुराइयों के विरुद्ध आवाज़ उठाई। मुग़लकाल में पंजाब में चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरी तथा नक्शबंदी नामक सूफ़ी सिलसिले प्रसिद्ध थे। सूफ़ी सभी जातियों के लोगों के साथ स्नेह करते थे इसलिए बहुत-से लोग सूफ़ी मत में शामिल हुए। सूफ़ी सिलसिलों में केवल नक्शबंदी सिलसिला कट्टर विचारों का था। नक्शबंदियों ने गुरु अर्जन देव जी तथा गुरु तेग़ बहादुर जी को शहीद करवाने के लिए मुग़ल बादशाहों को भड़काया था।

4. सिख धर्म (Sikhism)—मुग़लकाल में पंजाब में सिख धर्म का जन्म हुआ। इस धर्म की स्थापना गुरु नानक देव जी ने 15वीं शताब्दी में की थी। गुरु नानक साहिब जी ने उस समय समाज में प्रचलित सामाजिक तथा धार्मिक बुराइयों का खंडन किया। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा तथा आपसी भ्रातृत्व का संदेश दिया। उन्होंने संगत तथा पंगत संस्थाओं की नींव रखी। उनके धर्म के द्वार प्रत्येक जाति तथा वर्ग के लोगों के लिए खुले थे। उन्होंने अंधकार में भटक रही मानवता को ज्ञान का नया मार्ग दिखाया। गुरु जी के संदेश को उनके नौ उत्तराधिकारियों ने जारी रखा। मुग़ल सम्राट अकबर की धार्मिक सहनशीलता की नीति के कारण पंजाब में सिख धर्म को प्रफुल्लित होने का स्वर्ण अवसर मिला। सम्राट् जहाँगीर के सिंहासन पर बैठते ही मुग़ल-सिख संबंधों में तनाव आ गया। 1606 ई० में गुरु अर्जन साहिब जी की शहीदी तथा 1675 ई० में गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी के कारण सिख भड़क उठे। मुग़ल अत्याचारों को कड़ा उत्तर देने के लिए 1699 ई० में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ का सृजन किया। खालसा की सृजना पंजाब के इतिहास में एक नया पड़ाव प्रमाणित हुई।

5. अन्य धर्म (Other Religions)-ऊपरलिखित धर्मों के अतिरिक्त मुगलकालीन पंजाब में बौद्ध मत तथा जैन मत भी प्रचलित थे। इन धर्मों के अनुयायियों की संख्या बहुत कम थी। मुग़ल सम्राट अकबर के शासनकाल में पंजाब में ईसाई मत का प्रचार भी होने लग पड़ा था। अकबर ने ईसाइयों को लाहौर में अपना गिरजाघर बनाने की आज्ञा दी थी। इस धर्म को पंजाब में कोई खास प्रोत्साहन न मिला।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
मुगलकालीन पंजाब में मुस्लिम समाज की स्थिति कैसी थी ?
(What was the condition of Muslims under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति कैसी थी ?
(What was the condition of Muslim society under the Mughal period in Punjab ?)
अथवा
मुग़लकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज पर एक नोट लिखें।
(Write a note on the Muslim society of the Punjab during the Mughal times.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति बहुत अच्छी थी। शासक वर्ग से संबंधित होने के कारण उनको समाज में कुछ विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं। मुसलमान तीन श्रेणियों में विभाजित थे। उच्च श्रेणी के लोग वे शानो-शौकत का जीवन व्यतीत करते थे। सुरा एवं सुंदरी उनके मनोरंजन के मुख्य साधन थे। मध्य वर्ग के लोगों का जीवन स्तर उच्च श्रेणी के मुकाबले में कुछ कम था परंतु खुशहाल था। निम्न श्रेणी के लोगों की स्थिति बड़ी शोचनीय थी। उनका जीवन-निर्वाह करना अत्यंत कठिन होता था।

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प्रश्न 2.
मुगलकालीन पंजाब के समाज में हिंदुओं की स्थिति कैसी थी ? (What was the condition of Hindus in the society of Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लों के अधीन पंजाब के हिंदुओं की स्थिति का संक्षेप में अध्ययन करें। (Study in brief the condition of Hindu society in the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के समाज में हिंदुओं की स्थिति बहुत खराब थी। यद्यपि हिंदू बहु-संख्या में थे फिर भी उन्हें उच्च पदों से वंचित रखा जाता था। उनको काफिर कहकर संबोधित किया जाता था। उनको इस्लाम स्वीकार करने के लिए विवश किया जाता था। हिंदू समाज कई जातियों. तथा उपजातियों में बँटा हुआ था। जाति संबंधी नियम बहुत अधिक कठोर थे। उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों पर घोर अत्याचार करते थे। इसके अतिरिक्त उन पर अनेक पाबंदियाँ लगाई गई थीं।

प्रश्न 3.
मुग़लों के अधीन पंजाब में स्त्रियों की स्थिति कैसी थी ?
(What was the position of women in Punjab under the Mughals ?) .
अथवा
मुग़लकालीन पंजाब में स्त्रियों में प्रचलित किन्हीं तीन बुराइयों का संक्षिप्त विवरण दें। (Describe any three evils prevalent among women in the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय लड़कियों का विवाह अल्पायु में ही कर दिया जाता था। लड़कियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। समाज में सती प्रथा भी प्रचलित थी। विधवा का जीवन बहुत दयनीय था। मुस्लिम और हिंदू स्त्रियों में पर्दे की प्रथा प्रचलित थी।

प्रश्न 4.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों के मनोरंजन के क्या साधन थे ?
(What were the main sources of entertainment of the people of Pnjab under the Mughals ?)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों के मनोरंजन के कई साधन थे। उच्च श्रेणी के लोग अपना मनोरंजन शिकार, चौगान खेलकर, कबूतरबाजी करके, मुर्गों की लड़ाई देखकर, शतरंज और चौपड़ खेलकर और महफ़िलों में भाग लेकर करते थे! आम लोग अपना मनोरंजन संगीत, नाच, कुश्तियाँ करके, दौड़ों में भाग लेकर, मदारियों के खेल द्वारा करते थे। लोग त्योहारों तथा मेलों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। हिंदुओं के प्रमुख त्योहार दीवाली, दशहरा, लोहड़ी, होली, शिवरात्रि और राम नवमी आदि थे। मुसलमानों के मुख्य त्योहार ईद, शबे-बारात और नौरोज थे।

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प्रश्न 5.
मुग़लों के अधीन पंजाब में शिक्षा के प्रबंध पर एक नोट लिखें।
(Write a note about prevalent education in Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़ल काल में लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदु अपनी प्रारंभिक शिक्षा मंदिरों में और मुसलमान अपनी शिक्षा मस्जिदों में प्राप्त करते थे। ये संस्थान लोगों द्वारा दिए गए दान पर चलते थे। मुसलमानों की अपेक्षा हिंदु शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात् गुरु को कुछ दक्षिणा दिया करते थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, स्यालकोट, जालंधर, सुल्तानपुर, बटाला, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।

प्रश्न 6.
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों की सामाजिक स्थिति की मुख्य विशेषताएँ बताएँ। (
(Mention the main salient features of social condition of people of the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति बहुत अच्छी थी। उनको समाज में कुछ विशेष अधिकार प्राप्त थे। मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों-उच्च, मध्य एवं निम्न श्रेणी में बँटा हुआ था। उच्च श्रेणी के लोग बड़े ऐश्वर्य और शानो-शौकत का जीवन व्यतीत करते थे। निम्न श्रेणी के लोगों की स्थिति बहुत ही दयनीय थी। हिंदुओं की जो कि पंजाब की बहसंख्यक श्रेणी से संबंधित थे, स्थिति अच्छी नहीं थी। उनको बहुत-से अधिकारों से वंचित रखा जाता था। मुसलमान उनसे बहुत घृणा करते थे। हिंदू समाज कई जातियों और उपजातियों में बँटा हुआ था। समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी।

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प्रश्न 7.
मुगलकालीन पंजाब में खेती की क्या दशा थी ?
(What was the condition of agriculture in Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुगलकालीन पंजाबियों का मुख्य व्यवसाय क्या था ? (What was the main occupation of Punjabis under the Mughals ?)
उत्तर-
पंजाब की भूमि अत्यधिक उपजाऊ थी। मुग़लकालीन पंजाब में लोगों का मुख्य व्यवसाय खेतीबाड़ी था। पंजाब के 80% लोग इस व्यवसाय से जुड़े हुए थे। इसलिए मुग़ल सरकार ने खेतीबाड़ी को उत्साहित करने के लिए विशेष ध्यान दिया। नई भूमि को खेती के अधीन लाने वाले किसानों को विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं। लगान, भूमि की उपजाऊ शक्ति और सिंचाई की सुविधाओं के अनुसार निश्चित किया गया था। उस समय पंजाब की प्रमुख फसलें गेहूँ, चने, चावल, मक्की , गन्ना, कपास और जौ थीं।

प्रश्न 8.
मुगलकालीन पंजाब में प्रचलित कपड़ा उद्योग संबंधी जानकारी दें। (Write a brief note on textile industry of Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में प्रचलित उद्योगों में कपड़ा उद्योग सबसे अधिक महत्तवपूर्ण था। अमृतसर, लाहौर, मुलतान और गुजरात में बढ़िया प्रकार का कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान बढ़िया दरियों, मेजपोशों तथा चादरों के लिए प्रसिद्ध था। पेशावर में सुंदर लुंगियाँ तैयार की जाती थीं। मुलतान, लाहौर और अमृतसर में पायजामे और सलवारें तैयार की जाती थीं। गुजरात में शिफोन का कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान, कश्मीर और अमृतसर रेशमी कपड़ा उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र थे।

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प्रश्न 9.
मुग़लकालीन पंजाब के व्यापार के संबंध में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about trade in Punjab under the Mughals ?)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार बहुत उन्नत था। पंजाब का विदेशी व्यापार अरब देशों, अफ़गानिस्तान, ईरान, तिब्बत, भूटान, सीरिया, चीन और यूरोपीय देशों के साथ चलता था। पंजाब इन देशों को सूती और रेशमी कपड़े, शालें, कंबल, अनाज, चीनी, नील और नमक आदि का निर्यात करता था। इनके बदले पंजाब इन देशों से बढ़िया नस्ल के घोड़े, खुश्क मेवे, ऐश्वर्य की चीजें, रेशम, बहुमूल्य पत्थरों इत्यादि का आयात करता था।

प्रश्न 10.
मुग़लों के अधीन पंजाब की आर्थिक दशा का संक्षेप में वर्णन करो।
(Write a short note on the economic condition of Punjab during the Mughal rule.)
अथवा
मुगलकालीन पंजाबियों की आर्थिक अवस्था पर एक नोट लिखें। .
(Write a note on economic condition of Punjabis during the Mughal rule.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों की आर्थिक स्थिति उच्च दर्जे की थी। उस समय कृषि 80% लोगों का मुख्य व्यवसाय था। भूमि के उपजाऊ तथा सरकार द्वारा पूर्ण सहायता प्रदान किए जाने के कारण कृषि काफ़ी उन्नत थी। मुग़लकालीन पंजाब के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय उद्योग था। कपड़ा उद्योग उस समय पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग था। पंजाब के कुछ लोग पशु-पालन का कार्य करते थे। कुछ लोग खानों में कार्य करते थे। उस समय पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार भी उन्नत था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
मुग़लकाल में पंजाबी समाज किन दो वर्गों में बँटा हुआ था ?
उत्तर-
मुसलमान तथा हिंदू।

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प्रश्न 2.
पंजाब में मुस्लिम समाज को कितने वर्गों में बँटा हुआ था ?
अथवा
मुग़ल काल में मुसलमानों की तीन श्रेणियों के नाम बताओ।
अथवा
मुगलकालीन समाज में मुसलमानों की तीन श्रेणियाँ कौन-सी थीं ?
उत्तर-
उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग।

प्रश्न 3.
मुगलकालीन पंजाब में मुसलमानों के समाज की कितनी श्रेणियाँ थीं ?
उत्तर-
तीन।

प्रश्न 4.
मुग़लकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की उच्च श्रेणी के लोग कैसा जीवन व्यतीत करते थे ?
उत्तर-
बहुत ऐश्वर्यपूर्ण।

प्रश्न 5.
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की निम्न श्रेणी में सम्मिलित कोई एक वर्ग बताएँ।
उत्तर-
दास।

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प्रश्न 6.
मुग़लकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज के निम्न वर्ग के लोगों की दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत दयनीय।

प्रश्न 7.
मुगलकालीन पंजाब के हिंदू समाज में कितनी जातियाँ प्रचलित थीं ?
उत्तर-
चार।

प्रश्न 8.
मुग़लकालीन पंजाब के समाज में स्त्रियों की दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत दयनीय।

प्रश्न 9.
मुगलकालीन पंजाब के स्त्री समाज की कोई एक बुराई कौन-सी थी ?
उत्तर-
सती प्रथा।

प्रश्न 10.
क्या मुग़लकालीन पंजाब में दास प्रथा प्रचलित थी ?
उत्तर-
हां।

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प्रश्न 11.
मुग़लकालीन में पंजाब में उच्च शिक्षा के लिए प्रसिद्ध कोई एक केंद्र बताएँ।
उत्तर-
लाहौर।

प्रश्न 12.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों की आर्थिक दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत अच्छी

प्रश्न 13.
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
उत्तर-
कृषि।

प्रश्न 14.
मुग़लकालीन पंजाब का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्योग कौन-सा था ?
उत्तर-
सूती कपड़ा उद्योग।

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प्रश्न 15.
मुगलकालीन पंजाब में रेशम उद्योग के किसी एक विख्यात केंद्र का नाम लिखें।
उत्तर-
कश्मीर।

प्रश्न 16.
मुगलकालीन पंजाब में व्यापार की दशा कैसी थी ?
उत्तर-
बहुत उन्नत।

प्रश्न 17.
मुगलकालीन पंजाब के दो सर्वाधिक विख्यात व्यापारिक नगर कौन-से थे ?
उत्तर-
लाहौर तथा मुलतान।

प्रश्न 18.
मुगलकालीन पंजाब के किसी एक प्रसिद्ध नगर का नाम लिखिए।
उत्तर-
लाहौर।

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प्रश्न 19.
मुगलकालीन पंजाब में कौन-सा सिक्का सर्वाधिक प्रचलित था ?
उत्तर-
दाम।

प्रश्न 20.
मुग़लकाल में प्रचलति सिक्का दाम किस धातु का बना हुआ था ?
उत्तर-
ताँबे का।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
मुग़लों के अधीन पंजाब का मुस्लिम समाज…….श्रेणियों में बँटा हुआ था।
उत्तर-
(तीन)

प्रश्न 2.
मुसलमानों की निम्न श्रेणी में सबसे अधिक संख्या…….की थी।
उत्तर-
(गुलामों)

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प्रश्न 3.
मुग़लकालीन पंजाब के हिंदू समाज में…….को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
उत्तर-
(ब्राह्मणों)

प्रश्न 4.
मुग़लकालीन पंजाब के समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत…..थी।
उत्तर-
(शोचनीय)

प्रश्न 5.
मुग़लकालीन पंजाब में……….और……..उच्च शिक्षा के सबसे प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
(लाहौर, मुलतान)

प्रश्न 6.
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय…….था।
उत्तर-
(कृषि)

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प्रश्न 7.
मुग़लकालीन पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग……..था।
उत्तर-
(सूती कपड़ा उद्योग)

प्रश्न 8.
मुग़ल काल में ……….शालों के उद्योग के लिए संसार में प्रसिद्ध था।
उत्तर-
(कश्मीर)

प्रश्न 9.
मुग़ल काल में सूती कपड़ा उद्योग के लिए……और…..प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
(लाहौर, मुलतान)

प्रश्न 10.
मुग़ल काल में पंजाब के…….और……नगर व्यापारिक पक्ष से सब से महत्त्वपूर्ण हैं।
उत्तर-
(लाहौर, मुलतान)

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प्रश्न 11.
अकबर ने हिंदुओं पर लगे तीर्थ यात्रा कर को……..में हटा दिया था।
उत्तर-
(1563 ई०)

प्रश्न 12.
अकबर ने 1564 ई० में हिंदुओं पर लगे……..को हटा दिया था।
उत्तर-
(जज़िया कर)

प्रश्न 13.
औरंगजेब ने……….में हिंदुओं पर पुन: जजिया कर को लगा दिया था।
उत्तर-
(1679 ई०)

प्रश्न 14.
मुग़ल काल में भारत में सबसे अधिक इस्लाम का प्रसार…..में हुआ था।
उत्तर-
(पंजाब)

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प्रश्न 15.
मुग़ल काल में पंजाब में……..धर्म का जन्म हुआ।
उत्तर-
(सिख)

प्रश्न 16.
मध्यकालीन पंजाब के लोगों का मुख्य धर्म …………. था।
उत्तर-
(हिंदू)

(iii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें—

प्रश्न 1.
मुग़ल काल में पंजाब का मुस्लिम समाज दो श्रेणियों में बँटा हुआ था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 2.
मुसलमानों की उच्च श्रेणी में मनसबदार और सूबेदार शामिल थे।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 3.
मुसलमानों की मध्य श्रेणी में दास शामिल थे।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 4.
मुसलमानों की निम्न श्रेणी की संख्या सबसे अधिक थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 5.
मुग़ल काल में पंजाब का हिंदू समाज कई जातियों और उपजातियों में बँटा हुआ था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 6.
मुग़ल काल के हिंदू समाज में लोग शूद्रों से घृणा करते थे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 7.
मुग़लकालीन पंजाब के हिंदू समाज में स्त्रियों की दशा बहुत शोचनीय थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 8.
मुग़ल काल में अधिकतर हिंदू शाकाहारी थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 9.
मुग़ल काल में हिंदू स्त्रियाँ साड़ियाँ पहनती थीं।।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 10.
मुग़ल काल में लाहौर और मुलतान उच्च शिक्षा के दो प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 11.
मुग़लकालीन पंजाब में शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र लाहौर था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
मुग़ल काल में स्त्रियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 13.
मुग़ल काल में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 14.
पंजाब में जब्ती प्रणाली 1581 ई० में शुरू की गई थी।
उत्तर-
ठीक

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प्रश्न 15.
जब्ती प्रणाली के अधीन ज़मीन को पाँच वर्गों में बांटा हुआ था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 16.
मुग़ल काल में चमड़ा उद्योग पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 17.
मुग़ल काल में लाहौर और अमृतसर सूती कपड़ा उद्योग के दो प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 18.
मुग़ल काल में कश्मीर और लाहौर रेशमी उद्योग के दो प्रसिद्ध केंद्र थे।
उत्तर-
गलत

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प्रश्न 19.
मुग़ल काल में कश्मीर शालों के उद्योग के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 20.
दाम ताँबे की धातु का बना होता था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 21.
मुग़लकालीन पंजाब में सिख धर्म का जन्म हुआ।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 22.
मुग़ल काल में चिश्ती सिलसिला बहुत प्रसिद्ध था।
उत्तर-
ठीक

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(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए—

प्रश्न 1.
मुग़लकाल में पंजाब का समाज कितने मुख्य वर्गों में बँटा हुआ था ?
(i) दो
(ii) तीन
(iii) चार
(iv) पाँच।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 2.
मुगलकाल में पंजाब का मुस्लिम समाज कितने वर्गों में बँटा हुआ था ?
(i) तीन
(ii) चार
(iii) पाँच
(iv) सात।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 3.
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की उच्च श्रेणी में कौन शामिल नहीं थे ?
(i) जागीरदार
(ii) मनसबदार
(iii) व्यापारी
(iv) सूबेदार।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 4.
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की मध्य श्रेणी में कौन शामिल नहीं थे ?
(i) व्यापारी
(ii) किसान
(iii) सैनिक
(iv) मज़दूर।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 5.
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज की निम्न श्रेणी में कौन शामिल था ?
(i) दास
(ii) मजदूर
(iii) नौकर
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 6.
मुग़लकालीन स्त्री समाज में किस बुराई का प्रचलन था ?
(i) कन्या वध
(ii) बाल विवाह
(iii) सती प्रथा
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 7.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों का मनोरंजन का मुख्य साधन क्या था ?
(i) शिकार
(ii) शतरंज
(iii) नृत्य-संगीत
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 8.
मुगलकालीन में पंजाब में उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र कौन-सा था ?
(i) लाहौर
(ii) मुलतान
(iii) सरहिंद
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 9.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
(i) कृषि
(ii) व्यापार
(iii) उद्योग
(iv) पशु-पालन।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 10.
मुगलकालीन पंजाब की प्रमुख फ़सल कौन-सी थी ?
(i) गेहूँ
(ii) गन्ना
(iii) कपास
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 11.
मुगलकालीन पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग कौन-सा था ?
(i) सूती कपड़ा उद्योग
(ii) चमड़ा उद्योग
(iii) खंड उद्योग
(iv) लकड़ी उद्योग।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 12.
मुगलकालीन पंजाब में निम्नलिखित में से कौन-सा केंद्र ऊनी वस्त्र के उद्योग के लिए सबसे प्रसिद्ध था ?
(i) कश्मीर
(ii) गुजरात
(iii) लाहौर
(iv) स्यालकोट।
उत्तर-
(i)

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प्रश्न 13.
मुगलकालीन पंजाब के लोग किस वस्तु का निर्यात नहीं करते थे ?
(i) घोडे
(ii) कपड़ा
(iii) चीनी
(iv) कंबल।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 14.
मुगलकालीन पंजाब का कौन-सा नगर व्यापार के लिए सबसे प्रसिद्ध था ?
(i) अमृतसर
(ii) कश्मीर
(iii) लाहौर
(iv) पानीपत।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 15.
मुगलकाल में सर्वाधिक प्रचलित दाम नाम का सिक्का किस धातु का बना था ?
(i) सोना
(ii) चाँदी
(iii) लोहा
(iv) ताँबा।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 16.
मुगलकालीन पंजाब में चाँदी के सिक्के को क्या कहा जाता था ?
(i) दाम
(ii) सिक्का
(iii) रुपया
(iv) मुद्रा।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 17.
मुगलकाल में किस धर्म का जन्म हुआ ?
(i) इस्लाम
(ii) हिंदू धर्म
(iii) सिख धर्म
(iv) ईसाई धर्म।
उत्तर-
(iii)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
मुगलकालीन पंजाब में मुस्लिम समाज की स्थिति कैसी थी ? (What was the condition of Muslims under the Mughals ?)
अथवा
मुगलकालीन पंजाब के मुस्लिम समाज पर एक नोट लिखें। (Write a note on the Muslim society of the Punjab during the Mughal times.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति बहुत अच्छी थी। शासक वर्ग से संबंधित होने के कारण उनको समाज में कुछ विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं। राज्य के उच्च पदों पर मुसलमानों को नियुक्त किया जाता था। उस समय मुसलमान तीन श्रेणियों में विभाजित थे। उच्च श्रेणी जिसमें बड़े-बड़े मनसबदार, सूबेदार, जागीरदार आदि शामिल थे; वे बड़ा आरामदायक एवं शानो-शौकत का जीवन व्यतीत करते थे। सुरा एवं सुंदरी उनके मनोरंजन के मुख्य साधन थे। उनकी सेवा के लिए बड़ी संख्या में नौकर होते थे। मध्य वर्ग में किसान, दुकानदार और छोटे दर्जे के सरकारी कर्मचारी शामिल थे। उच्च श्रेणी के मुकाबले में उनका जीवन स्तर चाहे कुछ नीचा था पर फिर भी उनका जीवन खुशहाल था। निम्न श्रेणी में घरेलू नौकर, श्रमिक, दास, छोटे दुकानदार आदि शामिल थे। उनकी स्थिति बड़ी शोचनीय थी। निर्धन होने के कारण उनका जीवन-निर्वाह करना अत्यंत कठिन होता था।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 14 मुगलों के अधीन पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्थिति

प्रश्न 2.
मुगलकालीन पंजाब के समाज में हिंदुओं की स्थिति कैसी थी ? (What was the condition of Hindus in the society of Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुगलों के अधीन पंजाब के हिंदुओं की स्थिति का संक्षेप में अध्ययन करें। (Study in brief the condition of Hindu society in the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के समाज में हिंदुओं की स्थिति अच्छी नहीं थी। समाज में चाहे हिंदुओं की संख्या अधिक थी, परंतु उन्हें उच्च पदों से वंचित रखा जाता था। मुसलमान उनको काफिर कहते थे। उनका बहुत अपमान किया जाता था। उनको इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए विवश किया जाता था। उस समय हिंदू समाज कई जातियों तथा उपजातियों में बंटा हुआ था। जाति संबंधी नियम पहले से अधिक कठोर हो गए थे। उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों से घृणा करते थे। उन पर घोर अत्याचार किए जाते थे। इसके अतिरिक्त उन पर अनेक पाबंदियाँ लगाई गई थीं। समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति के अनुसार कार्य करता था। जाति संबंधी नियमों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार किया जाता था। हिंदुओं की यह जाति प्रथा उनके लिए बड़ी हानिकारक सिद्ध हुई।

प्रश्न 3.
मग़लों के अधीन पंजाब में स्त्रियों की हालत कैसी थी ? (What was the position of women in Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुग़लकालीन पंजाब में स्त्रियों में प्रचलित किन्हीं छः बुराइयों का संक्षिप्त विवरण दें। (Describe any six evils prevalent among women in the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी।

  1. उस समय लड़कियों का विवाह अल्पायु में ही कर दिया जाता था।
  2. लड़कियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।
  3. पति की मृत्यु हो जाने पर पत्नी को पति के साथ जीवित जला दिया जाता था। इस प्रथा को सती प्रथा कहा जाता था।
  4. जो स्त्रियाँ सती नहीं होती थीं उनको विधवा का जीवन व्यतीत करना पड़ता था। विधवा को पुनर्विवाह की आज्ञा नहीं थी।
  5. मुस्लिम और हिंदू स्त्रियों में पर्दे की प्रथा प्रचलित थी।
  6. समाज में स्त्रियों का स्थान पुरुषों के बराबर नहीं समझा जाता था।

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प्रश्न 4.
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों के मनोरंजन के क्या मुख्य साधन थे ?
(What were the main sources of entertainment of the people of Punjab under the Mughals ?)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोग कई ढंगों से अपना मनोरंजन करते थे। उच्च श्रेणी के लोग अपना मनोरंजन शिकार, रथों की दौड़ में भाग लेकर, चौगान खेलकर, कबूतरबाज़ी करके, मुर्गों की लड़ाई देखकर, तैराकी करके, शतरंज और चौपड़ खेल कर और महिफ़लों में भाग लेकर करते थे। आम लोग अपना मनोरंजन संगीत, नाच-भंगड़े, कुश्तियाँ करके, दौड़ों में भाग लेकर, जादूगरों तथा मदारियों के खेल देख कर तथा ताश खेल कर करते थे। इनके अतिरिक्त लोग त्योहारों तथा मेलों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। हिंदुओं के प्रमुख त्योहार दीवाली, दशहरा, वैशाखी, लोहड़ी, होली, शिवरात्रि और राम नवमी आदि थे। मुसलमानों के मुख्य त्योहार. ईद, शबे-बारात और नौरोज थे। इनके अतिरिक्त सूफ़ी-संतों की मजारों पर भी भारी मेले लगते थे। सिख वैशाखी तथा दीवाली के अवसरों पर हरिमंदिर साहिब अमृतसर में बहुत उत्साह के साथ इकट्ठे होते थे।

प्रश्न 5.
मुग़लों के अधीन पंजाब में शिक्षा का क्या प्रबंध था ? (Write a note about prevalent education in Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़ल काल में लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदू अपनी प्रारंभिक शिक्षा मंदिरों में और मुसलमान अपनी शिक्षा मस्जिदों में प्राप्त करते थे। ये लोगों द्वारा दिए गए दान पर चलते थे। यहाँ विद्यार्थियों को अपने-अपने धर्मों के बारे में भी शिक्षा दी जाती थी। मुसलमानों की अपेक्षा हिंदू शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी। वे अपनी पढ़ाई पूरी करने के पश्चात् गुरु को कुछ दक्षिणा दिया करते थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, स्यालकोट, जालंधर, सुल्तानपुर, बटाला, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। सरकार इनको आर्थिक सहायता देती थी। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। केवल उच्च घराने की कुछ स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त करती थीं। इनकी शिक्षा का प्रबंध घरों में ही निजी तौर पर किया जाता था।

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प्रश्न 6.
मुगलकालीन पंजाब के लोगों की सामाजिक स्थिति की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
(Mention the main salient features of social condition of people of the Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब में मुसलमानों की स्थिति बहुत अच्छी थी। उनको समाज में कुछ विशेष अधिकार प्राप्त थे। मुस्लिम समाज तीन श्रेणियों-उच्च, मध्य एवं निम्न श्रेणी में बंटा हुआ था। उच्च श्रेणी के लोग बड़े ऐश्वर्य और शानो-शौकत का जीवन व्यतीत करते थे। निम्न श्रेणी के लोगों की स्थिति बहुत ही दयनीय थी। हिंदुओं की जो कि पंजाब की बहुसंख्यक श्रेणी से संबंधित थे, स्थिति अच्छी नहीं थी। उनको बहुत-से अधिकारों से वंचित रखा जाता था। मुसलमान उनसे बहुत घृणा करते थे। हिंदू समाज कई जातियों और उपजातियों में बंटा हुआ था। जाति संबंधी नियम पहले से बहुत कठोर हो चुके थे। समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। उस समय लोग सूती और रेशमी कपड़े पहनते थे। उच्च वर्ग के लोगों की पोशाकें बहुत कीमती हुआ करती थीं जबकि आम लोगों की पोशाक बिल्कुल सादा होती थी। उस समय स्त्रियाँ और पुरुष दोनों गहने पहनने के बड़े शौकीन थे।

प्रश्न 7.
मग़लकालीन पंजाब की खेती-बाड़ी संबंधी स्थिति पर संक्षिप्त प्रकाश डालें। (Give an account of agriculture of Punjab under the Mughals.)
अथवा
मुगलकालीन पंजाब में सरकार ने खेती-बाडी संबंधी कौन-सी नीति अपनाई ?
(What policy did the government adopt regarding agriculture in Punjab under the Mughals ?)
अथवा
मुगलकालीन पंजाबियों का मुख्य व्यवसाय क्या था ? (What was the main occupation of Punjabis under the Mughals ?)
उत्तर-
मुगलकालीन पंजाब में लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती-बाड़ी था। पंजाब के 80% लोग इस व्यवसाय से जुड़े हुए थे। इसलिए मुग़ल सरकार ने खेती-बाड़ी को उत्साहित करने के लिए विशेष ध्यान दिया। नई भूमि को खेती के अधीन लाने वाले किसानों को विशेष सुविधाएँ दी जाती थीं। सिंचाई साधनों को उन्नत करने के लिए सरकार किसानों को तकावी ऋण बाँटती थी। लगान, भूमि की उपजाऊ शक्ति और सिंचाई की सुविधाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग निश्चित किया गया था। अकाल के दिनों में भूमि का लगान माफ कर दिया जाता था। लगान एकत्रित करने वाले कर्मचारियों को राज्य की ओर से कड़े निर्देश थे कि वे किसी प्रकार भी कृषकों का शोषण न करें। खादों के प्रयोग को उत्साहित किया जाता था। इन सभी प्रयत्नों के परिणामस्वरूप मुग़लों के समय फसलों की भरपूर पैदावार प्राप्त की जाती थी। उस समय पंजाब की प्रमुख फसलें गेहूँ, चने, चावल, मक्की , गन्ना, कपास और जौ थीं। इनके अतिरिक्त उस समय तिलहन, अफ़ीम और कई प्रकार के फलों की भी खेती की जाती थी।

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प्रश्न 8.
मुगलकालीन पंजाब में प्रचलित कपड़ा उद्योग संबंधी जानकारी दें। (Write a brief note on textile industry of Punjab under the Mughals.)
उत्तर-
मुगलकालीन पंजाब में प्रचलित उद्योगों में सूती कपड़ा उद्योग सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण था। अमृतसर, लाहौर, मुलतान और गुजरात में बढ़िया प्रकार का कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान बढ़िया दरियों, मेज़पोशों तथा चादरों के लिए प्रसिद्ध था। पेशावर में सुंदर लुंगियाँ तैयार की जाती थीं। मुलतान, लाहौर और अमृतसर में पायजामे और सलवारें तैयार की जाती थीं। गुजरात में शिफोन का कपड़ा तैयार किया जाता था। मुलतान, कश्मीर और अमृतसर रेशमी कपड़ा उद्योग के प्रसिद्ध केंद्र थे। उस समय पंजाब में गुलबदन, दरियाई और धूप-छाँव नाम के रेशमी वस्त्र तैयार किये जाते थे। उस समय रेशमी कपड़े की लाहौर राज्य के उच्च घरानों में बड़ी माँग, थी। ऊनी कपड़ा उद्योग के लिए कश्मीर और अमृतसर के केंद्र प्रसिद्ध थे। कश्मीर शालों के उद्योग के लिए संसार भर में प्रसिद्ध था। शालें तैयार करने के लिए विदेशों से भी ऊन मंगवाई जाती थी। अमृतसर में शालें, कंबल और लोइयाँ बनाई जाती थीं। यहाँ के कंबल और लोइयाँ बहुत प्रसिद्ध थीं।

प्रश्न 9.
मुगलकालीन पंजाब के व्यापार के संबंध में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about trade in Punjab under the Mughals ?)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार बहुत उन्नत था। इसके कई कारण थे। पहला, पंजाब की भौगोलिक स्थिति व्यापारिक पक्ष से बहुत महत्त्वपूर्ण थी। दूसरे, यहाँ के यातायात के साधन उन्नत थे। तीसरे, यहाँ फसलों की भरपूर पैदावार होती थी और उद्योग-धंधे भी उन्नत थे। व्यापार का कार्य क्षत्रियों, बनियों, महाजनों, अरोड़ों, बोहरों और खोजों के हाथ में था। पंजाब का विदेशी व्यापार अरब देशों, अफ़गानिस्तान, ईरान, तिब्बत, भूटान, सीरिया, चीन और यूरोपीय देशों के साथ चलता था। पंजाब इन देशों को सूती और रेशमी कपड़े, शालें, कंबल, अनाज, चीनी, नील और नमक आदि का निर्यात करता था। इनके बदले पंजाब इन देशों से बढ़िया नस्ल के घोड़े, खुश्क मेवे, ऐश्वर्य की चीजें, रेशम, बहुमूल्य पत्थरों इत्यादि का आयात करता था। सामान को ढोने के लिए बैल-गाड़ियों, ऊँटों, खच्चरों, घोड़ों और बैलों का प्रयोग किया जाता था। इसके अतिरिक्त जल मार्ग से सामान ले जाने के लिए नावों का प्रयोग भी किया जाता था।

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प्रश्न 10.
मुग़लों के अधीन पंजाब की आर्थिक दशा का संक्षेप में वर्णन करो। (Write a short note on the economic condition of Punjab during the Mughal rule.)
अथवा
मुगलकालीन पंजाबियों की आर्थिक अवस्था पर एक नोट लिखें। (Write a note on the economic condition of Punjabis during the Mughal rule.)
अथवा
मुगलकालीन पंजाब की आर्थिक हालत के ऊपर प्रकाश डालें। (Throw light on the economic condition of Punjab under the Mughal rule.)
उत्तर-
मुग़लकालीन पंजाब के लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। कृषि उस समय के लोगों का मुख्य व्यवसाय था। भूमि के उपजाऊ होने के कारण, उत्तम सिंचाई साधनों तथा सरकार द्वारा विशेष सुविधाएँ दिए जाने के कारण इस धंधे को बहुत प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप उस समय फसलों की भरपूर पैदावार प्राप्त की जाती थी। पंजाब की मुख्य फसलें गेहूँ, चावल, गन्ना, कपास, मक्की, चना और जौ थीं। पंजाब के लोगों का दूसरा मुख्य व्यवसाय उद्योग थे। कपड़ा उद्योग उस समय पंजाब का सबसे प्रसिद्ध उद्योग था। इसके अतिरिक्त चमड़ा उद्योग, चीनी उद्योग, शस्त्र उद्योग और लकड़ी उद्योग भी प्रसिद्ध थे। उस समय पंजाब का आंतरिक और विदेशी व्यापार भी उन्नत था। पंजाब का विदेशी व्यापार अरब देशों, अफ़गानिस्तान, ईरान, तिब्बत और यूरोपीय देशों के साथ चलता था। पंजाब से इन देशों को सूती और रेशमी कपड़े, शालें, कंबल, अनाज, चीनी, नील इत्यादि का निर्यात किया जाता था। इनके बदले पंजाब विदेशों से बहुमूल्य पत्थर, रेशम, खुश्क मेवे तथा बढ़िया नस्ल के घोड़ों आदि का निर्यात करता था। मुग़लकालीन पंजाब में वस्तुओं की कीमतें बहुत कम थीं। परिणामस्वरूप निर्धन लोगों का निर्वाह भी अच्छे ढंग से हो जाता था।

Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।

1
मुग़ल काल में लोगों को शिक्षा देना सरकार की जिम्मेवारी नहीं थी। हिंदू अपनी प्राथमिक शिक्षा मंदिरों में तथा मुसलमान मस्जिदों में प्राप्त करते थे। ये लोगों द्वारा दिए गए दान पर चलते थे। यहाँ विद्यार्थियों को अपने-अपने धर्मों के बारे में शिक्षा दी जाती थी। मुसलमानों के मुकाबले हिंदू शिक्षा में अधिक रुचि लेते थे। विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी। वे अपनी पढ़ाई पूरी करके गुरुं को कुछ दक्षिणा दे देते थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंजाब में लाहौर, मुलतान, स्यालकोट, जालंधर, सुल्तानपुर, बटाला, अंबाला, सरहिंद आदि स्थानों पर मदरसे बने हुए थे। सरकार इन मदरसों को आर्थिक सहायता देती थी। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। केवल उच्च घराने की कुछ स्त्रियाँ शिक्षा प्राप्त करती थीं। इनकी शिक्षा का प्रबंध घरों में प्राइवेट तौर पर किया जाता था।

  1. मुग़ल काल में शिक्षा विकसित क्यों नहीं थी ?
  2. मुग़ल काल में मुसलमान अपनी आरंभिक शिक्षा कहाँ से प्राप्त करते थे ?
  3. मुग़ल काल में प्रचलित शिक्षा की कोई एक विशेषता लिखें।
  4. मुग़ल काल में स्त्रियों की शिक्षा कैसी थी ?
  5. मुग़ल काल में विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पूरी करके गुरु को कुछ ……….. देते थे।

उत्तर-

  1. क्योंकि मुग़ल काल में शिक्षा देने की जिम्मेवारी सरकार की नहीं थी।
  2. मुग़ल काल में मुसलमान अपनी आरंभिक शिक्षा मस्जिदों से प्राप्त करते थे।
  3. उस समय विद्यार्थियों से कोई फीस नहीं ली जाती थी।
  4. मुग़ल काल में स्त्रियों की शिक्षा की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था।
  5. दक्षिणा।

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2
मुग़ल काल में पंजाब के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती-बाड़ी था। पंजाब की कुल जनसंख्या के 80 प्रतिशत लोग इस व्यवसाय से जुड़े हुए थे। इसका मुख्य कारण यह था कि यहाँ की भूमि बहुत उपजाऊ थी और सिंचाई साधनों की कोई कमी नहीं थी। मुग़ल बादशाह इस बात से भली-भाँति परिचित थे कि साम्राज्य की खुशहाली किसानों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती है। इसलिए उन्होंने खेती-बाड़ी को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष ध्यान दिया। 1581 ई० में पंजाब में ज़ब्ती प्रणाली लागू की गई थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत पंजाब में खेती योग्य सारी भूमि की पैमाइश की गई। इस भूमि को उसकी उपजाऊ शक्ति के आधार पर चार वर्गों पोलज, परोती, छछर और बंजर भूमि में बाँटा गया। सरकार अपना लगान भूमि की उपजाऊ शक्ति, सिंचाई की सुविधाओं तथा पिछले दस वर्ष की औसत उपज को ध्यान में रखकर निर्धारित करती थी। यह कुल फसल का 1/3 हिस्सा हुआ करता था। सरकार किसानों की सुविधानुसार अपना लगान अनाज अथवा नकदी के रूप में एकत्रित करती थी। ”

  1. मुगल काल में लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
  2. मुग़ल काल में कितने प्रतिशत लोग कृषि के व्यवसाय से जुड़े हुए थे ? ।
    • 50%
    • 60%
    • 70%
    • 80%.
  3. जब्ती प्रणाली से क्या भाव है ?
  4. मुग़ल काल में खेतीबाड़ी की कोई एक विशेषता लिखें।
  5. मुग़ल काल में सरकार किसानों से किस रूप में अपना लगान इकट्ठा करते थे ?

उत्तर-

  1. मुग़ल काल में लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।
  2. 80%
  3. ज़ब्ती प्रणाली से भाव कृषि योग्य भूमि की पैमाइश से है।
  4. सरकार अपना लगान भूमि की उपजाऊ शक्ति, सिंचाई की सुविधाओं तथा पिछले दस सालों की औसत उपज को ध्यान में रखकर निश्चित करती थी।
  5. मुग़ल काल में सरकार किसानों से अनाज एवं नकदी के रूप में लगान एकत्रित करती थी।

3
मुग़ल काल में पंजाब में सिख धर्म का जन्म हुआ। इस धर्म की स्थापना गुरु नानक देव जी ने 15वीं शताब्दी में की थी। गुरु नानक देव जी ने उस समय समाज में प्रचलित सामाजिक तथा धार्मिक बुराइयों का खंडन किया। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा तथा आपसी भ्रातृत्व का संदेश दिया। उन्होंने संगत तथा पंगत संस्थाओं की नींव रखी। उनके धर्म के द्वार प्रत्येक जाति तथा वर्ग के लोगों के लिए खुले थे। उन्होंने अंधकार में भटक रही मानवता को ज्ञान का नया मार्ग दिखाया। गुरु जी के संदेश को उनके नौ उत्तराधिकारियों ने जारी रखा। मुग़ल सम्राट अकबर की धार्मिक सहनशीलता की नीति के कारण पंजाब में सिख धर्म को प्रफुल्लित होने का स्वर्ण अवसर मिला। सम्राट् जहाँगीर के सिंहासन पर बैठते ही मुग़ल सिख संबंधों में तनाव आ गया। 1606 ई० में गुरु अर्जन साहिब की शहीदी तथा 1675 ई० में गुरु तेग़ बहादुर जी की शहीदी के कारण सिख भड़क उठे। मुग़ल अत्याचारों का कड़ा उत्तर देने के लिए 1699 ई० में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ का सृजन किया। खालसा की स्थापना कारण पंजाब के इतिहास में एक नए युग का आरंभ हुआ।

  1. सिख धर्म का जन्म किस काल में हुआ ?
  2. सिख धर्म के संस्थापक कौन थे ?
  3. संगत व पंगत से क्या भाव है ?
  4. गुरु तेग़ बहादुर जी को कब शहीद किया गया था ?
    • 1605 ई०
    • 1606 ई०
    • 1665 ई०
    • 1675 ई०
  5. खालसा पंथ की स्थापना किसने की थी ?

उत्तर-

  1. सिख धर्म का जन्म मुग़ल काल में हुआ।
  2. सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी थे।
    • संगत से भाव उस समूह से है जो इकट्ठे मिलकर गुरु जी के उपदेश सुनते थे।
    • पंगत से भाव कतारों में बैठकर लंगर छकने से है।
  3. 1675 ई०।
  4. खालसा पंथ की स्थापना गुरु गोबिंद सिंह जी ने की थी।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

Punjab State Board PSEB 12th Class History Book Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 History Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

गुरु नानक देव जी का जीवन (Life of Guru Nanak Dev Ji)

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी के जीवन का संक्षिप्त वर्णन करें । (Give a brief account of the life of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-
सिख पंथ के संस्थापक गुरु नानक देव जी की गणना विश्व के महापुरुषों में की जाती है। गुरु नानक साहिब ने अज्ञानता के अंधकार में भटक रही मानवता को ज्ञान का मार्ग दिखाया। उन्होंने लोगों को सत्यनाम और भ्रातृत्व का संदेश दिया। गुरु नानक देव जी के महान् जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. जन्म और माता-पिता (Birth and Parentage)-गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल, 1469 ई० को पूर्णिमा के दिन राय भोय की तलवंडी में हुआ। यह स्थान अब पाकिस्तान के शेखूपुरा जिला में स्थित है। इस पवित्र स्थान को आजकल ननकाणा साहिब कहा जाता है। गुरु नानक देव जी के पिता जी का नाम मेहता काल
और माता जी का नाम तृप्ता जी था। उनकी एक बहन थी जिसका नाम बेबे नानकी था। सिख परंपराओं के अनुसार गुरु साहिब के जन्म के समय अनेक चमत्कार हुए। भाई गुरदास जी लिखते हैं-
सतगुरु नानक प्रगटिया मिटी धुंध जग चानण होया।
जिओ कर सूरज निकलिया तारे छपे अंधेर पलोया॥

2. बचपन और शिक्षा (Childhood and Education)-गुरु नानक देव जी बचपन से ही बहुत गंभीर और विचारशील स्वभाव के थे। उनका झुकाव खेलों की ओर कम और प्रभु-भक्ति की ओर अधिक था। गुरु साहिब जब सात वर्ष के हुए तो उन्हें पंडित गोपाल की पाठशाला में आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा गया। इसके पश्चात् गुरु साहिब ने पंडित बृजनाथ से संस्कृत तथा मौलवी कुतुबुद्दीन से फ़ारसी और अरबी का ज्ञान प्राप्त किया। जब गुरु नानक देव जी 9 वर्ष के हुए तो पुरोहित हरिदयाल को उन्हें जनेऊ पहनाने के लिए बुलाया गया। परंतु उन्होंने स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि वे केवल दया, संतोष, जत और सत से निर्मित जनेऊ पहनेंगे जो न टूटे, न जले और न ही मलिन हो पाये।

3. भिन्न-भिन्न व्यवसायों में (In Various occupations)-गुरु नानक देव जी को अपने विचारों में मगन देखकर उनके पिता जी ने उन्हें किसी कार्य में लगाने का यत्न किया। सर्वप्रथम गुरु नानक देव जी को भैंसें चराने का कार्य सौंपा गया परंतु गुरु नानक देव जी ने कोई रुचि न दिखाई। फलस्वरूप अब गुरु साहिब को व्यापार में लगाने का निर्णय किया गया। गुरु जी को 20 रुपये दिए गए और मंडी भेजा गया। मार्ग में गुरु साहिब को भूखे साधुओं की टोली मिली। गुरु नानक देव जी ने अपने सारे रुपये इन साधुओं को भोजन खिलाने में व्यय कर दिए और खाली हाथ लौट आए। यह घटना इतिहास में ‘सच्चा सौदा’ के नाम से जानी जाती है।

4. विवाह (Marriage)-गुरु नानक देव जी का विवाह बटाला निवासी मूल चंद की सुपुत्री सुलक्खनी जी से कर दिया गया। उस समय आपकी आयु 14 वर्ष थी। समय के साथ आपके घर दो पुत्रों श्री चंद और लखमी दास ने जन्म लिया।

5. सुल्तानपुर लोधी में नौकरी (Service at Sultanpur Lodhi)—जब गुरु नानक देव जी 20 वर्ष के हुए तो मेहता कालू जी ने आपको सुल्तानपुर लोधी में अपने जंवाई जयराम के पास भेज दिया। उनकी सिफ़ारिश पर नानक जी को मोदीखाना अन्न भंडार में नौकरी मिल गई। गुरु साहिब ने यह कार्य बड़ी योग्यता से किया।

6. ज्ञान प्राप्ति (Enlightenment)-गुरु नानक देव जी सुल्तानपुर लोधी में रहते हुए प्रतिदिन सुबह बेईं नदी में स्नान करने के लिए जाते थे। एक दिन वे स्नान करने गए और तीन दिनों तक लुप्त रहे। इस समय उन्हें सत्य ज्ञान की प्राप्ति हुई । उस समय गुरु नानक देव जी की आयु 30 वर्ष थी। ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् गुरु साहिब ने सर्वप्रथम “न को हिंदू, न को मुसलमान” शब्द कहे।

7. उदासियाँ (Travels)-1499 ई० में ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् गुरु जी ने देश तथा विदेश की यात्राएँ कीं। इन यात्राओं को उदासियाँ भी कहा जाता है। इन यात्राओं का उद्देश्य लोगों में फैली अज्ञानता एवं अंध-विश्वास को दूर करना था तथा परस्पर भ्रातृभाव व एक ईश्वर का प्रचार करना था। भारत में गुरु नानक देव जी ने उत्तर में कैलाश पर्वत से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक तथा पश्चिम में पाकपटन से लेकर पूर्व में आसाम तक की यात्रा की। गुरु साहिब भारत से बाहर मक्का, मदीना, बगदाद तथा लंका भी गए। गुरु साहिब की यात्राओं के बारे में हमें उनकी बाणी से महत्त्वपूर्ण संकेत मिलते हैं। गुरु नानक साहिब ने अपने जीवन के लगभग 21 वर्ष इन यात्राओं में बिताए। इन यात्राओं के दौरान गुरु नानक देव जी लोगों में फैले अंध-विश्वास को काफी सीमा तक दूर करने में सफल हुए तथा उन्होंने नाम के चक्र को चारों दिशाओं में फैलाया।

8. करतारपुर में निवास (Settled at Kartarpur)-गुरु नानक देव जी ने 1521 ई० में रावी नदी के तट पर करतारपुर नामक नगर की स्थापना की। यहाँ गुरु साहिब ने अपने परिवार के साथ जीवन के अंतिम 18 वर्ष व्यतीत किए। इस समय के मध्य गुरु साहिब ने ‘संगत’ और ‘पंगत’ नामक संस्थाओं की स्थापना की। इनके अतिरिक्त गुरु जी ने 976 शब्दों की रचना की। गुरु साहिब का यह कार्य सिख पंथ के विकास के लिए एक मील पत्थर सिद्ध हुआ। गुरु नानक देव जी की प्रमुख वाणियों के नाम जपुजी साहिब, वार माझ, आसा दी वार, सिद्ध गोष्टि, वार मल्हार, बारह माह और पट्टी इत्यादि हैं।

9. उत्तराधिकारी की नियुक्ति (Nomination of the Successor)-1539 ई० में ज्योति-जोत समाने से पूर्व गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गुरु नानक देव जी ने एक नारियल और पाँच पैसे भाई लहणा जी के सम्मुख रखकर अपना शीश झुकाया। इस प्रकार भाई लहणा जी गुरु अंगद देव जी बने। इस प्रकार गुरु नानक साहिब ने एक ऐसा पौधा लगाया जो गुरु गोबिंद सिंह जी के समय एक घने वृक्ष का रूप धारण कर गया। डॉक्टर हरी राम गुप्ता के अनुसार,
“गुरु अंगद देव जी की नियुक्ति एक बहुत ही दूरदर्शिता वाला कार्य था।”1

10. ज्योति-जोत समाना (Immersed in Eternal Light)-गुरु नानक देव जी 22 सितंबर, 1539 ई० को ज्योति-जोत समा गए।

1. “The appointment of Angad was a step of far-reaching significance.” Dr. H.R. Gupta, History of Sikh Gururs (New Delhi : 1973) p. 81.

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ 1
GURDWARA NANKANA SAHIB : PAKISTAN

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

गुरु नानक देव जी की उदासियाँ (Udasis of Guru Nanak Dev Ji)

प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी की उदासियों का वर्णन करें। इनका क्या उद्देश्य था ?
(Write a note on the Udasis of Guru Nanak Dev Ji. What was the aim of these Udasis ?) ·
अथवा
उदासियों से क्या भाव है ? गुरु नानक देव जी की उदासियों का संक्षिप्त वर्णन करें। (What is meant by Udasis ? Give a brief account of the Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
संक्षेप में गुरु नानक देव जी की उदासियों का वर्णन करें। उनका क्या उद्देश्य था ?
(Briefly discuss the travels (Udasis) of Guru Nanak Dev Ji. What was their aim ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की उदासियों का वर्णन करें। (Give an account of the Udasis (travels) of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
‘ गुरु नानक देव जी की उदासियों का संक्षिप्त वर्णन करें। इन उदासियों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ा ?
(Describe briefly the Udasis of Guru Nanak Dev Ji. What was their impact on society ?)
उत्तर-
1499 ई० में ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् गुरु नानक देव जी देश और विदेशों की लंबी यात्रा के लिए निकल पड़े। गुरु नानक देव जी ने लगभग 21 वर्ष इन यात्राओं में व्यतीत किए। गुरु नानक साहिब की इन यात्राओं को उदासियाँ भी कहा जाता है क्योंकि गुरु साहिब इस समय के दौरान घर-द्वार त्याग कर एक उदासी की भाँति भ्रमण करते रहे। गुरु नानक देव जी ने कुल कितनी उदासियाँ की, इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। आधुनिक खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि गुरु नानक देव जी की उदासियों की संख्या तीन थी।

उदासियों का उद्देश्य (Objects of the Udasis)
गुरु नानक देव जी की उदासियों का प्रमुख उद्देश्य लोगों में फैली अज्ञानता और अंध-विश्वासों को दूर करना था। उस समय हिंदू और मुसलमान दोनों ही धर्म के मार्ग से भटक चुके थे। हिंदू ब्राह्मण और योगी जिनका प्रमुख कार्य भटके हुए लोगों को सही मार्ग दिखाना था, वे स्वयं ही भ्रष्ट और आचरणहीन हो चुके थे। लोगों ने असंख्य देवी-देवताओं, कब्रों, वृक्षों, सर्पो और पत्थरों इत्यादि की आराधना आरंभ कर दी थी। मुसलमानों के धार्मिक नेता भी चरित्रहीन हो चुके थे। उस समय अधिकाँश मुसलमान भोग-विलास का जीवन व्यतीत करते थे। समाज कई जातियों और उपजातियों में विभाजित था। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। समाज में स्त्रियों की दशा बहुत ही दयनीय थी। गुरु नानक देव जी ने अज्ञानता में भटक रहे इन लोगों को प्रकाश का एक नया मार्ग बताने के लिए यात्राएँ कीं।
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ० एस० एस० कोहली के अनुसार,
“इस महापुरुष ने अपने मिशन को इस देश तक सीमित नहीं रखा। उसने सारी मानवता की जागृति के लिए दूर-दूर के देशों की यात्राएँ कीं।”2

प्रथम उदासी
(First Udasi)
गुरु नानक देव जी ने 1499 ई० के अंत में अपनी पहली यात्रा आरंभ की। इन यात्राओं के समय भाई मरदाना उनके साथ रहा। इस यात्रा को गुरु नानक देव जी ने 12 वर्ष में संपूर्ण किया और वह पूर्व से दक्षिण की ओर गए। इस यात्रा के दौरान गुरु जी ने निम्नलिखित प्रमुख स्थानों की यात्रा की—

1. सैदपुर (Saidpur)-गुरु नानक देव जी अपनी प्रथम उदासी के दौरान सर्वप्रथम सैदपुर (ऐमनाबाद) पहुँचे। . यहाँ पहुँचने पर मलिक भागो ने गुरु साहिब को एक ब्रह्मभोज पर निमंत्रण दिया, परंतु गुरु साहिब एक निर्धन बढ़ई भाई लालो के घर ठहरे। जब इस संबंध में मलिक भागो ने गुरु नानक साहिब से पूछा तो उन्होंने एक हाथ में मलिक भागो के भोज और दूसरे हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी लेकर ज़ोर से दबाया। मलिक भागो के भोज से खून और भाई लालो की रोटी में से दूध निकला। इस प्रकार गुरु साहिब ने उसे बताया कि हमें श्रम तथा ईमानदारी की कमाई करनी चाहिए।

2. तालुंबा (Talumba) गुरु नानक देव जी की तालुंबा में भेंट सज्जन ठग से हुई। उसने यात्रियों के लिए अपनी हवेली में एक मंदिर और मस्जिद बनाई हुई थी। वह दिन के समय तो यात्रियों की खूब सेवा करता किंतु रात के समय उन्हें लूटकर कुएँ में फैंक देता था। वह गुरु नानक देव जी और मरदाना के साथ भी कुछ ऐसा ही करने की योजनाएँ बना रहा था। रात्रि के समय जब गुरु नानक देव जी ने वाणी पढ़ी तो सज्जन ठग गुरु साहिब के चरणों में गिर पड़ा। गुरु नानक देव जी ने उसे क्षमा कर दिया। इस घटना के पश्चात् सज्जन ने अपना शेष जीवन सिख धर्म का प्रचार करने में व्यतीत किया। के० एस० दुग्गल के अनुसार, “सज्जन की सराय जो कि एक वधस्थल था, एक धर्मशाला में परिवर्तित हो गया।”3

3. कुरुक्षेत्र (Kurukshetra)-गुरु नानक देव जी सूर्य ग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र पहुँचे। इस अवसर पर हज़ारों ब्राह्मण और साधु एकत्रित हुए थे। गुरु नानक देव जी ने ब्राह्मणों को समझाया कि हमें सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। गुरु जी के विचारों से प्रभावित होकर अनेक लोग उनके अनुयायी बन गए।

4. दिल्ली (Delhi) दिल्ली में गुरु नानक देव जी मजनूं का टिल्ला में रुके। गुरु नानक देव जी के उपदेशों का वहाँ की संगत पर गहरा प्रभाव पड़ा।

5. हरिद्वार (Haridwar)-गुरु नानक देव जी जब हरिद्वार पहुँचे तो वहाँ बड़ी संख्या में हिंदू स्नान करते हुए पूर्व की ओर मुँह करके सूर्य और पितरों को पानी दे रहे थे। ऐसा देखकर गुरु साहिब ने पश्चिम की ओर मुँह करके पानी देना आरंभ कर दिया। यह देखकर लोग गुरु जी से पूछने लगे कि वे क्या कर रहे हैं। गुरु जी ने कहा कि वे करतारपुर में अपने खेतों को पानी दे रहे हैं। यह उत्तर सुनकर लोग हंस पड़े और कहने लगे कि यह पानी यहाँ से 300 मील दूर उनके खेतों में कैसे पहुंच सकता है ? गुरु जी ने उत्तर दिया कि यदि तुम्हारा पानी लाखों मील दूर स्थित सूर्य तक पहुँच सकता है तो मेरा पानी इतने निकट स्थित खेतों तक क्यों नहीं पहुँच सकता ? गुरु जी के इस उत्तर से लोग बहुत प्रभावित हुए तथा उनके अनुयायी बन गए।

6. गोरखमता (Gorakhmata)—गुरु नानक देव जी हरिद्वार के पश्चात् गोरखमता पहुँचे। गुरु नानक देव जी ने यहाँ के सिद्ध योगियों को बताया कि कानों में कुंडल पहनने, शरीर पर विभूति रमाने, शृंख बजाने से अथवा सिर मुंडवा देने से मुक्ति प्राप्त नहीं होती। मुक्ति तो आत्मा की शुद्धि से प्राप्त होती है। ये योगी गुरु साहिब के उपदेशों से अत्यधिक प्रभावित हुए। उस समय से ही गोरखमता का नाम नानकमता पड़ गया।

7. बनारस (Banaras)-बनारस भी हिंदुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान था। यहाँ गुरु नानक देव जी का पंडित चतर दास से मूर्ति-पूजा के संबंध में एक दीर्घ वार्तालाप हुआ। गुरु जी के उपदेशों से प्रभावित होकर चतर दास गुरु जी का सिख बन गया।

8. कामरूप (Kamrup)-धुबरी से गुरु नानक देव जी कामरूप (असम) पहुँचे। यहाँ की प्रसिद्ध जादूगरनी नूरशाही ने अपनी सुंदरता के बल पर गुरु जी को भटकाने का असफल प्रयास किया। गुरु जी ने उसे जीवन का सही मनोरथ बताया।

9. जगन्नाथ पुरी (Jagannath Puri)-असम की यात्रा के पश्चात् गुरु नानक देव जी उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी पहुँचे। पंडितों ने गुरु साहिब को जगन्नाथ देवता की आरती करने के लिए कहा। गुरु नानक साहिब ने उन्हें बताया कि उस परम पिता परमात्मा की आरती प्रकृति सदैव करती रहती है।

10. लंका (Ceylon)-गुरु नानक जी दक्षिण भारत के प्रदेशों से होते हुए लंका पहुँचे। गुरु साहिब के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होकर लंका का राजा शिवनाथ गुरु जी का अनुयायी बन गया।

11. पाकपटन (Pakpattan)—लंका से पंजाब वापसी के समय गुरु नानक देव जी पाकपटन में ठहरे। यहाँ वे शेख फरीद जी की गद्दी पर बैठे शेख़ ब्रह्म को मिले। यह मुलाकात दोनों के लिए एक प्रसन्नता का स्रोत सिद्ध हुई।

2. “The Great Master did not confine his mission to this country; he travelled far and wide to far off lands and countries in order to enlighten humanity as a whole.” Dr. S.S. Kohli, Travels of Guru Nanak (Chandigarh : 1978) p. IX.
3. “Sajjan’s den of an assassin was transformed into a dharmsala.” K.S. Duggal, Sikh Gurus : Their Lives and Teachings (New Delhi : 1993) p. 17.

द्वितीय उदासी
(Second Udasi)
गुरु नानक देव जी ने 1513 ई० के अंत में अपनी द्वितीय उदासी उत्तर की ओर आरंभ की। इस उदासी में उन्हें तीन वर्ष लगे। इस उदासी के दौरान गुरु नानक देव जी निम्नलिखित प्रमुख स्थानों पर गए—

1. पहाड़ी रियासतें (Hilly States)—गुरु नानक देव जी ने मंडी, रवालसर, ज्वालामुखी, काँगड़ा, बैजनाथ और कुल्लू इत्यादि पहाड़ी रियासतों की यात्रा की। गुरु नानक देव जी के उपदेशों से प्रभावित होकर इन पहाड़ी रियासतों के बहुत-से लोग उनके अनुयायी बन गए।

2. कैलाश पर्वत (Kailash Parvat)-गुरु नानक देव जी तिब्बत से होते हुए कैलाश पर्वत पहुँचे। गुरु साहिब के यहाँ पहुँचने पर सिद्ध बहुत हैरान हुए। गुरु नानक देव जी ने उन्हें बताया कि संसार से सत्य लुप्त हो गया है और चारों ओर भ्रष्टाचार और झूठ का बोलबाला है। इसलिए गुरु साहिब ने उन्हें मानवता का पथ-प्रदर्शन करने का संदेश दिया।

3. लद्दाख (Ladakh)—कैलाश पर्वत के पश्चात् गुरु नानक देव जी लद्दाख पहुँचे। यहाँ के बहुत-से लोग गुरु साहिब के अनुयायी बन गए।

4. कश्मीर (Kashmir)-कश्मीर में स्थित मटन में गुरु नानक देव जी का पंडित ब्रह्मदास से काफ़ी लंबा धार्मिक शास्त्रार्थ हुआ। गुरु नानक देव जी ने उसे समझाया कि मुक्ति केवल वेदों और रामायण इत्यादि को पढ़ने से नहीं अपितु उनमें दी गई बातों पर अमल करके प्राप्त की जा सकती है।।

5. हसन अब्दाल (Hasan Abdal)-गुरु नानक देव जी पंजाब की वापसी यात्रा के समय हसन अब्दाल ठहरे। यहाँ एक अहँकारी फकीर वली कंधारी ने गुरु नानक देव जी को कुचलने के उद्देश्य से एक बहुत बड़ा पत्थर पहाड़ी से नीचे की ओर लुढ़का दिया। गुरु साहिब ने इसे अपने पंजे से रोक दिया। इस स्थान को आजकल पंजा साहिब कहा जाता है।

6. स्यालकोट (Sialkot) स्यालकोट में गुरु नानक देव जी की मुलाकात एक मुसलमान सन्त हमजा गौस से हुई। उसने किसी बात पर नाराज़ होकर अपनी शक्ति द्वारा सारे शहर को नष्ट करने का निर्णय कर लिया था। परंतु जब वह गुरु साहिब से मिला तो वह उनके व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपना निर्णय बदल दिया। इस घटना का लोगों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

तृतीय उदासी
(Third Udasi)
गुरु नानक देव जी ने 1517 ई० के अंत में अपनी तृतीय उदासी आरंभ की। इस उदासी के दौरान गुरु साहिब पश्चिमी एशिया के देशों की ओर गए। इस उदासी के दौरान गुरु नानक साहिब ने निम्नलिखित प्रमुख स्थानों की यात्रा की—

1. मुलतान (Multan)—मुलतान में बहुत-से सूफ़ी संत निवास करते थे। मुलतान में गुरु साहिब की भेंट प्रसिद्ध सूफी संत शेख बहाउद्दीन से हुई। शेख बहाउद्दीन उनके विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए।

2. मक्का (Mecca)-मक्का हज़रत मुहम्मद साहिब का जन्म स्थान है । सिख परम्परा के अनुसार गुरु नानक देव जी जब मक्का पहुँचे तो काअबे की ओर पाँव करके सो गए। जब काज़ी रुकनुद्दीन ने यह देखा तो वह क्रोधित हो गया। कहा जाता है कि जब काजी ने गुरु साहिब के पाँव पकड़कर दूसरी ओर घुमाने आरंभ किए तो मेहराब भी उसी ओर घूमने लग पड़ा। यह देखकर मुसलमान बहुत प्रभावित हुए। गुरु साहिब ने उन्हें समझाया कि अल्लाह सर्वव्यापक है।

3. मदीना (Madina) मक्का के पश्चात् गुरु नानक देव जी मदीना पहुँचे। गुरु साहिब ने अपने उपदेशों का प्रचार किया। यहाँ गुरु साहिब का इमाम आज़िम के साथ शास्त्रार्थ भी, हुआ।

4. बगदाद (Baghdad) बगदाद में गुरु नानक देव जी की भेंट शेख बहलोल से हुई। वह गुरु साहिब की वाणी से प्रभावित होकर उनका श्रद्धालु बन गया।

5. सैदपुर (Saidpur)—गुरु नानक देव जी जब 1520 ई० के अंत में सैदपुर पहुंचे तो उस समय बाबर ने पंजाब पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से वहाँ पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के समय हज़ारों की संख्या में लोगों को बंदी बना लिया गया। इन बंदी बनाए गए लोगों में गुरु नानक साहिब भी थे। जब बाद में बाबर को यह ज्ञात हुआ कि गुरु साहिब एक महान् संत हैं तो उसने न केवल गुरु नानक देव जी को बल्कि बहुत से अन्य बंदियों को भी रिहा कर दिया।

इसके पश्चात् गुरु नानक देव जी तलवंडी आ गए। इस प्रकार गुरु नानक देव जी की इन यात्राओं की श्रृंखला 1521 ई० में समाप्त हुई।
उदासियों का प्रभाव
(Impact of the Udasis)
गुरु नानक देव जी की यात्राओं के बहुत महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े। वे लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूर करने और उनमें एक नई जागृति लाने में काफ़ी सीमा तक सफल हुए। गुरु नानक देव जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर हज़ारों की संख्या में लोग उनके परम श्रद्धालु बन गए। इस प्रकार गुरु नानक देव जी के जीवन काल में ही सिख पंथ अस्तित्व में आ गया। अंत में हम डॉक्टर एस० एस० कोहली के इन शब्दों से सहमत हैं,
“वे (गुरु नानक देव जी) एक पवित्र उद्देश्य को पूर्ण करना चाहते थे और इसमें उन्हें चमत्कारी सफलता प्राप्त हुई।”4
4. “He had a holy mission to perform and his performance was no less than a miracle.” Dr. S.S. Kohli, op, cit., p. XV..

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गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ
(Teachings of Guru Nanak Dev Ji)

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
(Describe in detail the teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाएँ क्या थी ? उनका सामाजिक महत्त्व क्या था ?
(What were the main teachings of Guru Nanak Dev Ji ? What was their social importance ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का अध्ययन कीजिए। उनका सामाजिक महत्त्व क्या था ?
(Study the main teachings of Guru Nanak Dev Ji. What was their social significance ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का वर्णन करें। (Study the main teachings of Guru Nanak Dev Ji.).
अथवा
गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन करो। (Give a brief account of the main teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का वर्णन करो। (Describe the teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ बड़ी सरल किंतु प्रभावशाली थीं। उनकी शिक्षाएँ किसी एक वर्ग, जाति अथवा प्रांत के लिए नहीं थीं। इनका संबंध तो सारी मानव जाति से था। गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का वर्णन इस प्रकार है—

1. ईश्वर का स्वरूप (The Nature of God)-गुरु नानक देव जी एक ईश्वर में विश्वास रखते थे। उन्होंने अपनी वाणी में बार-बार ईश्वर की एकता पर बल दिया है। गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर ही संसार की रचना करता है, उसका पालन-पोषण करता है और उसका विनाश करता है। देवी-देवते सैंकड़ों और हजारों हैं, परंतु ईश्वर एक है। उसे कई नामों से जाना जाता है जैसे-हरि, गोपाल, वाहेगुरु, साहिब, अल्लाह, खुदा और राम इत्यादि। ईश्वर के दो रूप हैं। वह निर्गुण भी है और सगुण भी। गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। वह जो चाहता है, वही होता है। उसकी इच्छा के विपरीत कुछ नहीं हो सकता। गुरु जी के अनुसार ईश्वर निराकार है। उसका कोई आकार अथवा रंग-रूप नहीं है। उसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

2. माया (Maya)-गुरु नानक देव जी के अनुसार माया मनुष्य के लिए मुक्ति के मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी बाधा है। मनमुख व्यक्ति सदैव सांसारिक वस्तुएँ जैसे धन-दौलत, उच्च पद, ऐश्वर्य, सुंदर नारी, पुत्र इत्यादि के चक्र में फंसा रहता है। इसी को माया कहते हैं। माया के कारण वह ईश्वर से दूर हो जाता है और आवागमन के चक्र में फंसा रहता है।

3. हऊमै (Haumai)-मनमुख व्यक्ति में हऊमै (अहं) की भावना बड़ी प्रबल होती है। हऊमै के कारण वह संसार की बुराइयों में फंसा रहता है। फलस्वरूप वह मुक्ति प्राप्त करने की अपेक्षा आवागमन के चक्र में और फंस जाता है।

4. जाति प्रथा का खंडन (Condemnation of the Caste System) उस समय का हिंदू समाज न केवल चार मुख्य जातियों बल्कि अनेक अन्य उपजातियों में विभाजित था। उच्च जाति के लोग निम्न जाति से बहुत घृणा करते थे और उन पर बहुत अत्याचार करते थे। समाज में छुआछूत की भावना बहुत फैल गई थी। गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। गुरु साहिब ने लोगों को परस्पर भ्रातृभाव का संदेश दिया।

5. मूर्ति-पूजा का खंडन (Condemnation of Idol Worship)-गुरु नानक देव जी ने मूर्ति-पूजा के विरुद्ध प्रचार किया। गुरु साहिब का कहना था कि पत्थर की मूर्तियाँ निर्जीव हैं। यदि उन्हें पानी में फेंक दिया जाए तो वे डूब जाएँगी। जो मूर्तियाँ स्वयं की रक्षा नहीं कर पातीं, वे मनुष्य को कैसे इस भवसागर से पार उतार सकती हैं ? अतः इन मूर्तियों की पूजा करना व्यर्थ है।

6. खोखले रीति-रिवाजों का खंडन (Condemmation of Empty Rituals)-गुरु नानक देव जी ने समाज में प्रचलित खोखले रीति-रिवाजों एवं अंधविश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने लोगों को बताया कि माथे पर तिलक लगाने, शरीर पर राख मलने, उपवास रखने, वन में जाकर तपस्या करने, भगवे वस्त्र पहनने से मनुष्य को मुक्ति प्राप्त नहीं होती। उनके अनुसार उस व्यक्ति का धर्म सच्चा है जिसका अंतःकरण सच्चा है।

7. स्त्रियों के साथ निम्न बर्ताव का खंडन (Denounced IItreatment with Women)-गुरु नानक देव जी के समय समाज में स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी। उनमें असंख्य कुरीतियाँ प्रचलित थीं। गुरु नानक देव जी ने स्त्रियों में प्रचलित कुरीतियों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने समानता के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। गुरु नानक साहिब फरमाते हैं,
सो क्यों मंदा आखिए जित जम्मे राजान ॥

8. नाम का जाप (Recitation of Nam)-गुरु नानक देव जी नाम जपने और शब्द की आराधना को ईश्वर की भक्ति का सर्वोच्च रूप समझते थे। इन पर चलकर मनुष्य इस रोगग्रस्त अथवा कष्टमयी संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। नाम के बिना मनुष्य आवागमन के चक्र में फंसा रहता है। ईश्वर के नाम का जाप पावन मन और सच्ची श्रद्धा से करना चाहिए। डॉक्टर दीवान सिंह लिखते हैं,

9. गुरु का महत्त्व (Importance of the Guru)—गुरु नानक देव जी ईश्वर तक पहुँचने के लिए गुरु को बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं। उनके अनुसार गुरु मुक्ति तक ले जाने वाली वास्तविक सीढ़ी है। गुरु ही मनुष्य को अंधकार (अज्ञानता) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर लाता है। सच्चे गुरु का मिलना कोई सरल कार्य नहीं है। ईश्वर की कृपा के बिना मनुष्य को गुरु की प्राप्ति नहीं हो सकती।

10. हुक्म (Hukam)-गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं में परमात्मा के हुक्म को विशेष महत्त्व प्राप्त है। हुक्म के कारण ही मनुष्य को सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। गुरवाणी में अनेक स्थानों पर उस वाहिगुरु के हुक्म को मीठा करके मानने का आदेश दिया गया है। जो मनुष्य ऐसा करता है उसे मुक्ति प्राप्त होती है। जो मनुष्य परमात्मा के आदेश को नहीं मानता वह दर-दर की ठोकरें खाता है।

11. सच्च-खंड (Sach Khand)-गुरु नानक देव जी के अनुसार मानव जीवन का उच्चतम उद्देश्य सच्च-खंड को प्राप्त करना है। सच्च-खंड तक पहुँचने के लिए मनुष्य को धर्म-खंड, ज्ञान-खंड, शर्म-खंड तथा कर्म-खंड में से गुज़रना होता है। सच्च-खंड आखिरी अवस्था है। सच्च-खंड में आत्मा पूर्णतया परमात्मा में लीन हो जाती है।

“पापों एवं बुराइयों से ग्रसित मानवता की मुक्ति के लिए केवल नाम ही सबसे प्रभावकारी स्रोत एवं . शक्ति है।”5
5. Nam is the only and most efficacious source and agent for the redemption and salvation of the sinful and self-engrossed mankind.” Dr. Dewan Singh, Mysticism of Guru Nanak (Amritsar : 1995)2. 57.

शिक्षाओं का महत्त्व
(Importance of Teachings)
गुरु नानक देव जी के उपदेशों ने समाज के विभिन्न क्षेत्रों को पर्याप्त सीमा तक प्रभावित किया। परिणामस्वरूप लोगों को एक नई दिशा मिली। वे व्यर्थ के रस्म-रिवाज छोड़कर एक परमात्मा की पूजा करने लगे। गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा का खंडन करके, परस्पर भ्रातृ-भाव का प्रचार करके, स्त्रियों को पुरुषों के समान दर्जा देकर, संगत तथा पंगत नामक संस्थाओं की स्थापना करके एक नए समाज की आधारशिला रखी। गुरु जी ने अपने उपदेशों द्वारा उस समय के अत्याचारी शासकों तथा उनके भ्रष्ट अधिकारियों को भी झकझोर डाला। प्रसिद्ध इतिहासकार . आई० बी० बैनर्जी के अनुसार,
“गुरु नानक का समय अज्ञानता तथा संघर्ष का समय था तथा हम यह बिना झिझक कह सकते हैं कि गुरु नानक का सन्देश सत्य तथा शाँति का संदेश था।”6

6. “The age of Guru Nanak was an age of ignorance and an age of strife, and we may say at . once the message of Nanak was a message of truth and a message of peace.” Dr. I.B. Banerjee Evolution of the Khalsa (Calcutta : 1979) Vol. I, p. 95.

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी की सिख पंथ को देन के संबंध में संक्षिप्त जानकारी दें। (Give a brief account of the contribution of Guru Nanak Dev Ji to Sikhism.)
उत्तर-
15वीं शताब्दी में, जब गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ तो उस समय लोग अज्ञानता के अँधकार में भटक रहा था। समाज में महिलाओं की दशा बहुत खराब थी। गुरु नानक देव जी ने लोगों में नई जागृति उत्पन्न करने के उद्देश्य से देश तथा विदेश की यात्राएँ की। गुरु जी ने संगत तथा पंगत नामक संस्थाओं की नींव डाली। गुरु नानक देव जी ने 1539 ई० में ज्योति-जोत समाने से पूर्व अंगद देव जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गुरु अंगद देव जी की नियुक्ति सिख पंथ के विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण प्रमाणित हुई।

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प्रश्न 2.
उदासियों से क्या भाव है ? गुरु नानक देव जी की उदासियों के क्या उद्देश्य थे ?
(What do you mean by Udasis ? What were the aims of Guru Nanak Dev Ji’s Udasis ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की उदासियों के क्या उद्देश्य थे ? (What were the aims of the Udasis of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी द्वारा विभिन्न दिशाओं में की गई यात्राओं को उनकी उदासियाँ कहा जाता है। इन उदासियों का उद्देश्य लोगों में फैली अज्ञानता तथा अंधविश्वास को दूर करना था। वह एक ईश्वर की पूजा तथा भाईचारे का संदेश जन-साधारण तक पहुंचाना चाहते थे। गुरु नानक साहिब ने लोगों को अपने विचारों से अवगत कराया। उन्होंने समाज में प्रचलित झठे रीति-रिवाजों, कर्मकांडों तथा कुप्रथाओं का खंडन किया। उनकी यात्रा का प्रमुख उद्देश्य धर्म के वास्तविक रूप को लोगों के समक्ष लाना था।

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी की उदासियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (Give a brief account of the Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की किन्हीं तीन महत्त्वपूर्ण उदासियों का संक्षिप्त वर्णन करें। (Give a brief account of any three important Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-

  1. गुरु नानक देव जी ने अपनी प्रथम उदासी सैदपुर से शुरू की। मलिक भागों द्वारा पूछने पर गुरु जी ने बताया कि हमें मेहनत की कमाई से गुजारा करना चाहिए न कि बेईमानी के पैसों से।।
  2. हरिद्वार में गुरु नानक देव जी ने लोगों को यह बात समझाई कि गंगा स्नान करने से या पितरों को पानी देने से कुछ प्राप्त नहीं होता।
  3. मक्का में गुरु जी ने यह प्रमाणित किया कि अल्लाह किसी विशेष स्थान पर नहीं अपितु प्रत्येक स्थान पर विद्यमान है।

प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का सार लिखिए।
(Write an essence of the teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the teachings of Guru Nanak Dev Ji ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की किन्हीं तीन शिक्षाओं का वर्णन कीजिए। (Describe any three teachings of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-

  1. गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर एक है। वह निराकार तथा सर्वव्यापक है।
  2. गुरु जी माया को मुक्ति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा मानते थे।
  3. गुरु जी काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार को मनुष्य के पाँच शत्रु बताते हैं। इनके कारण मनुष्य आवागमन के चक्र में फंसा रहता है।
  4. गुरु नानक देव जी ने मूर्ति पूजा का खंडन किया।
  5. गुरु नानक देव जी के अनुसार मनमुख व्यक्ति में अहंकार की भावना बहुत प्रबल होती है।

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प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी के ईश्वर संबंधी क्या विचार थे ? (What was Guru Nank Dev Ji’s concept of God ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी के ईश्वर संबंधी क्या विचार थे ? (What were the views of Guru Nanak Dev Ji about God ?)
उत्तर-

  1. गुरु नानक देव जी एक ईश्वर में विश्वास रखते थे। उन्होंने ईश्वर की एकता पर बल दिया।
  2. केवल ईश्वर ही संसार को रचने वाला, पालने वाला तथा नाश करने वाला है।
  3. ईश्वर के दो रूप हैं। वह निर्गुण भी है और सगुण भी।
  4. ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। उसकी इच्छा के विपरीत कुछ नहीं हो सकता।
  5. वह आवागमन के चक्र से मुक्त है।

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी ने किन प्रचलित धार्मिक विश्वासों तथा प्रथाओं का खंडन किया ?
(Which prevalent religious beliefs and conventions were condemned by Guru Nanak Dev Ji ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी ने कौन-से प्रचलित धार्मिक विश्वासों तथा व्यवहारों का खंडन किया ? (What type of religious beliefs and rituals were condemned by Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने समाज में प्रचलित समस्त अंधविश्वासों तथा व्यवहारों का ज़ोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने वेद, शास्त्र, मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा, तथा जीवन के विभिन्न महत्त्वपूर्ण अवसरों से संबंधित संस्कारों का विरोध किया। ब्राह्मण इन रस्मों के मुख्य समर्थक थे। उन्होंने जोगियों की पद्धति को भी दो कारणों से स्वीकार न किया। प्रथम, जोगियों में ईश्वर के प्रति श्रद्धा का अभाव था। दूसरा, वे अपने सामाजिक दायित्व से दूर भागते थे। गुरु नानक देव जी अवतारवाद में भी विश्वास नहीं रखते थे।

प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी का माया का संकल्प क्या है ? संक्षिप्त उत्तर दीजिए।
(What was Guru Nanak Dev Ji’s concept of Maya ? Explain in brief.)
अथवा
गुरु नानक देव जी के माया के संकल्प का वर्णन कीजिए।
(Describe Guru Nanak Dev Ji’s concept of Maya.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी मानते थे कि माया मनुष्य के लिए मुक्ति के मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी बाधा है। मनमुख व्यक्ति सदैव सांसारिक वस्तुओं जैसे धन-दौलत, उच्च पद, सुंदर नारी, पुत्र आदि के चक्रों में फंसा रहता है। इसे ही माया कहते हैं। माया जिससे वह इतना प्रेम करता है, उसका मौत के बाद साथ नहीं देती। माया के कारण वह आवागमन के चक्र में फंसा रहता है।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी के उपदेशों में गुरु का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of ‘Guru’ in Guru Nanak Dev Ji’s teachings ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी के गुरु संबंधी क्या विचार थे ? (What was Guru Nanak Dev Ji’s concept of ‘Guru’ ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ईश्वर तक पहुँचने के लिए गुरु को एक वास्तविक सीढ़ी मानते हैं। वह ही मनुष्य को मोह और अहं के रोग से दूर करता है। वही नाम और शब्द की आराधना करने का ढंग बताता है। गुरु के बिना भक्ति भाव और ज्ञान संभव है। गुरु के बिना मनुष्य को चारों और अँधकार दिखाई देता है। गुरु ही मनुष्य को अँधकार से प्रकाश की ओर लाता है। सच्चा गुरु ईश्वर स्वयं है, जो शब्द द्वारा शिक्षा देता है।

प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी के उपदेशों में ‘नाम’ का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of ‘Nam’ in Guru Nanak.Dev Ji’s teachings ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी नाम की आराधना को ईश्वर की भक्ति का सर्वोच्च रूप समझते थे। नाम आराधना के कारण मनुष्य इस रोगग्रस्त अथवा कष्टमयी संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। नाम की आराधना करने वाले मनुष्य के सभी भ्रम दूर हो जाते हैं तथा उसके सभी दुःखों का नाश हो जाता है। उसकी आत्मा सदैव एक कमल के फूल की तरह खिली रहती है। ईश्वर के नाम के बिना मनुष्य का इस संसार में आना व्यर्थ है। नाम के बिना मनुष्य सभी प्रकार के पापों और आवागमन के चक्र में फंसा रहता है। ईश्वर उसे नरक से नहीं बचा सकता।

प्रश्न 10.
गुरु नानक देव जी के उपदेशों में हुक्म का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of ‘Hukam’ in Guru Nanak Dev Ji’s teachings ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं में परमात्मा के हुक्म अथवा भाणे को विशेष महत्त्व प्राप्त है। सारा संसार उस परमात्मा के हुक्म के अनुसार चलता है। उसके हुक्म के अनुसार ही जीव इस संसार में जन्म लेता है या उसकी मृत्यु होती है। उसे प्रशंसा प्राप्त होती है अथवा वह नीच बन जाता है। हुक्म के कारण ही उसे सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य परमात्मा के हुकम को नहीं मानता वह दर-दर की ठोकरे खाता है।

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प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी के स्त्री जाति संबंधी क्या विचार थे ? (What were the views of Guru-Nanak Dev Ji about women ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के समय समाज में स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी। समाज में स्त्रियों का स्थान पुरुषों के समान नहीं समझा जाता था। गुरु नानक देव जी बाल-विवाह, बहु-विवाह तथा सती प्रथा के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने का समर्थन किया। इस संबंध में उन्होंने स्त्रियों को संगत एवं पंगत में सम्मिलित होने की आज्ञा दी।

प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी के संदेश का सामाजिक अर्थ क्या था ? (What was the social meaning of Guru Nanak Dev Ji’s message ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का पंजाब पर क्या प्रभाव पड़ा ? (What was the impact of teachings of Guru Nanak Dev Ji on Punjab ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के संदेश के सामाजिक अर्थ बहुत महत्त्वपूर्ण थे। उनका संदेश प्रत्येक के लिए था। कोई भी स्त्री-पुरुष गुरु जी द्वारा दर्शाए गए मार्ग को अपना सकता था। मुक्ति का मार्ग सबके लिए खुला था। गुरु जी ने सामाजिक समानता का प्रचार किया। उन्होंने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। सामाजिक समानता के संदेश को व्यावहारिक रूप देने के लिए गुरु जी ने संगत तथा पंगत (लंगर) नामक दो संस्थाएँ चलाईं। लंगर तैयार करते समय जाति-पाति का कोई भेद-भाव नहीं किया जाता था।

प्रश्न 13.
जाति प्रथा पर गुरु नानक देव जी के क्या विचार थे? (What were the views of Guru Nanak Dev Ji on caste system ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उनका प्रमुख उद्देश्य सामाजिक असमानता को दूर करना था। गुरु नानक देव जी का कथन था कि कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के कारण अमीर अथवा ग़रीब नहीं होता। परमात्मा के दरबार में जाति नहीं अपितु कर्मों के अनुसार फल मिलता है। गुरु नानक देव जी ने निम्न जातियों एवं निम्न वर्गों के लोगों को अपने साथ जोड़ा।

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प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ भक्ति प्रचारकों से किस प्रकार भिन्न थीं ?
(How far were the teachings of Guru Nanak Dev Ji different from the Bhakti reformers ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा निराकार है। वह कभी भी मानवीय रूप को घारण नहीं करता। भक्ति प्रचारकों ने कृष्ण तथा राम को परमात्मा का अवतार माना। गुरु नानक देव जी मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी थे। जबकि भक्ति प्रचारकों का इसमें पूर्ण विश्वास था। गुरु नानक देव जी गृहस्थ जीवन में विश्वास रखते थे। भक्ति प्रचारक गृहस्थ जीवन को मुक्ति की राह में आने वाली एक बड़ी रुकावट मानते थे। गुरु नानक देव जी ने संगत तथा पंगत नामक दो संस्थाएँ स्थापित की। भक्ति प्रचारकों ने ऐसी कोई संस्था स्थापित नहीं की।

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी एक महान् कवि और संगीतकार थे। इसकी व्याख्या करें।
(Guru Nanak Dev Ji was a great poet and musician. Explain.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी एक धार्मिक महापुरुष होने के साथ-साथ एक महान् संगीतकार तथा कवि भी थे। आपकी कविताओं के मुकाबले की कविताएँ विश्व साहित्य में भी बहुत कम हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में अंकित आप जी के 976 शब्द आपके महान् कवि होने का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। गुरु नानक देव जी ने इन कविताओं में परमात्मा तथा मानवता का गुणगान किया है। इनमें उच्चकोटि के अलंकरणों तथा उपमाओं का प्रयोग किया गया है। गुरु नानक देव जी कई प्रकार के रागों की जानकारी रखते थे। उनके कीर्तन का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ता था।

प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष कहाँ तथा कैसे व्यतीत किए ? (How and where did Guru Nanak Dev Ji spend last 18 years of his life ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने करतारपुर (अर्थात् ईश्वर का नगर) मामक नगर की स्थापना की। इसी स्थान पर गुरु साहिब ने अपने परिवार के साथ जीवन के अंतिम 18 वर्ष व्यतीत किए। इस समय के मध्य गुरु साहिब ने ‘संगत’ और ‘पंगत’ नामक संस्थाओं की स्थापना की । ‘संगत’ से अभिप्राय उस सभा से था जो प्रतिदिन गुरु जी के उपदेशों को सुनने के लिए होती थी। ‘पंगत’ से अभिप्राय था- एक पंक्ति में बैठकर लंगर छकना। इनके अतिरिक्त गुरु जी ने 976 शब्दों की रचना की। गुरु साहिब का यह कार्य सिख पंथ के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

(i) एक शब्द से एक पंक्ति तक के उत्तर (Answer in One Word to One Sentence)

प्रश्न 1.
सिख धर्म के संस्थापक कौन थे ?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी।

प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी का जन्म कब हुआ ?
उत्तर-
1469 ई०।

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर-
तलवंडी (पाकिस्तान)।

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प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी के जन्म स्थान को आजकल क्या कहा जाता है ?
उत्तर-
ननकाणा साहिब।

प्रश्न 5.
“सतगुरु नानक प्रगटिआ मिटी धुंधु जागु चानणु होआ” किसने कहा था?
उत्तर-
भाई गुरदास जी।

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी के पिता का क्या नाम था ?
उत्तर-
मेहता कालू जी।

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प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी के पिता जी किस जाति से संबंधित थे?
उत्तर-
बेदी।

प्रश्न 8.
मेहता कालू जी कौन थे?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के पिता।

प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी की माता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-
तृप्ता जी।

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प्रश्न 10.
तृप्ता जी कौन थी?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की माता जी।

प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी की बहन का क्या नाम था ?
उत्तर-बेबे नानकी जी।

प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी की पत्नी का क्या नाम था ?
अथवा
गुरु नानक देव जी का विवाह किसके साथ हुआ था?
उत्तर-
बीबी सुलक्खनी जी से।

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प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी ने सच्चा सौदा कितने रुपयों के साथ किया?
उत्तर-
20 रुपयों के साथ।

प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी को सुल्तानपुर लोधी क्यों भेजा गया?
उत्तर-
नौकरी करने के लिए।

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति कब हुई ?
उत्तर-
1499 ई०

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प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी ने ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् सर्वप्रथम कौन-से शब्द कहे?
अथवा
गुरु नानक साहिब ने किस स्थान से तथा किन शब्दों से सर्वप्रथम प्रचार आरंभ किया?
उत्तर-
“न को हिंदू न को मुसलमान”

प्रश्न 17.
गुरु नानक देव जी की उदासियों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की उदासियों से अभिप्राय उनकी यात्राओं से है।

प्रश्न 18.
गुरु नानक देव जी की उदासियों का क्या उद्देश्य था?
उत्तर-
लोगों में फैली अज्ञानता और अंधविश्वासों को दूर करना।

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प्रश्न 19.
गुरु नानक देव जी ने अपनी प्रथम उदासी कब आरंभ की?
उत्तर-
1499 ई०।

प्रश्न 20.
गुरु नानक देव जी ने अपनी उदासी कहाँ से आरंभ की?
उत्तर-
सैदपुर।

प्रश्न 21.
गुरु नानक देव जी ने अपनी प्रथम उदासी के दौरान जिन स्थानों पर चरण रखे, उनमें से किसी एक महत्त्वपूर्ण स्थान का नाम बताएँ।
उत्तर-
कुरुक्षेत्र।

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प्रश्न 22.
उदासियों के समय गुरु नानक देव जी का साथी कौन था ?
उत्तर-
भाई मरदाना जी।

प्रश्न 23.
भाई मरदाना कीर्तन के समय कौन-सा साज़ बजाता था ?
उत्तर-
रबाब।

प्रश्न 24.
श्री गुरु नानक देव जी सैदपुर में किसके घर ठहरे थे ?
अथवा
गुरु नानक देव जी का प्रथम शिष्य कौन था ?
उत्तर-
भाई लालो।

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प्रश्न 25.
गुरु नानक देव जी ने सैदपुर (ऐमनाबाद) में मलिक भागो का भोजन खाने से क्यों इंकार कर दिया था?
उत्तर-
क्योंकि उसकी कमाई ईमानदारी की नहीं थी।

प्रश्न 26.
गुरु नानक देव जी सज्जन ठग को कहाँ मिले ?
अथवा
श्री गुरु नानक देव जी की सज्जन के साथ मुलाकात कहाँ हुई थी ?
उत्तर-
तालुंबा में।

प्रश्न 27.
गुरु नानक देव जी ने किस स्थान पर पूर्व की अपेक्षा पश्चिम दिशा में अपने खेतों को पानी दिया?
उत्तर-
हरिद्वार।

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प्रश्न 28.
गुरु नानक देव जी पानीपत में किस सूफ़ी से मिले ?
उत्तर-
शेख ताहिर से।

प्रश्न 29.
गुरु नानक देव जी की उदासी के बाद गोरखमता का क्या नाम पड़ा?
उत्तर-
नानकमता।

प्रश्न 30.
नूरशाही कौन थी?
उत्तर-
कामरूप की प्रसिद्ध जादूगरनी।

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प्रश्न 31.
उड़ीसा के किस मंदिर में गुरु साहिब ने लोगों को आरती का सही अर्थ बताया?
उत्तर-
जगन्नाथ पुरी।

प्रश्न 32.
गुरु नानक साहिब ने कैलाश पर्वत के सिद्धों को क्या उपदेश दिया?
उत्तर-
वह मानवता की सेवा करें।

प्रश्न 33.
गुरु नानक देव जी लंका के किस शासक को मिले थे ?
उत्तर-
शिवनाथ।

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प्रश्न 34.
गुरु नानक देव जी ने अपनी उदासियों के दौरान किस स्थान पर काबे को घुमाया?
उत्तर-
मक्का

प्रश्न 35.
मक्का में गुरु नानक देव जी का किस काजी के साथ वाद-विवाद हुआ?
उत्तर-
रुकनुद्दीन।

प्रश्न 36.
हसन अब्दाल को अब किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर-
पंजा साहिब।

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प्रश्न 37.
श्री गुरु नानक देव जी बगदाद में किस शेख को मिले ?
उत्तर-
शेख बहलोल।

प्रश्न 38.
गुरु नानक देव जी को बाबर ने कब गिरफ्तार किया था?
उत्तर-
1520 ई०।

प्रश्न 39.
गुरु नानक देव जी का समकालीन मुग़ल बादशाह कौन था?
उत्तर-
बाबर।

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प्रश्न 40.
गुरु नानक देव जी ने सैदपुर आक्रमण की तुलना किसके साथ की है?
उत्तर-
पाप की बारात।

प्रश्न 41.
गुरु नानक देव जी की कोई एक मुख्य शिक्षा बताएँ।
उत्तर-
ईश्वर एक है।

प्रश्न 42.
गुरु नानक देव जी का माया का संकल्प क्या था?
उत्तर-
संसार एक माया है।

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प्रश्न 43.
गुरु नानक देव जी के अनुसार मनुष्य के पाँच दुश्मन कौन-से हैं ?
उत्तर-
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार।

प्रश्न 44.
गुरु नानक देव जी की शिक्षा में गुरु का क्या महत्त्व है?
अथवा
सिख धर्म में गुरु को क्या महत्त्व दिया गया है?
उत्तर-
गुरु मुक्ति तक ले जाने वाली वास्तविक सीढ़ी है।

प्रश्न 45.
गुरु नानक देव जी के अनुसार नाम जपने का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
नाम के बिना मनुष्य का इस संसार में आना व्यर्थ है।

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प्रश्न 46.
मनमुख व्यक्ति की कोई एक विशेषता बताएँ।
उत्तर-
मनमुख व्यक्ति इंद्रिय-जन्य भूख से घिरा रहता है।

प्रश्न 47.
आत्म-समर्पण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
अहं का त्याग।

प्रश्न 48.
‘नदिर’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
ईश्वर की दया।

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प्रश्न 49.
हुक्म शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
ईश्वर की इच्छा।

प्रश्न 50.
‘किरत’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
मेहनत तथा इमानदारी का श्रम।

प्रश्न 51.
अंजन माहि निरंजन’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
संसार की बुराइयों में रहते हुए सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करना।

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प्रश्न 52.
गुरु नानक देव जी ने अपने अनुयायियों को कौन-सी तीन बातों पर चलने को कहा?
अथवा
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का सार तीन शब्दों में बताएँ।
उत्तर-
श्रम करो, नाम जपो तथा बाँट कर खाओ।

प्रश्न 53.
कीर्तन की प्रथा किस गुरु जी ने आरंभ की?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी।

प्रश्न 54.
रावी के किनारे गुरु नानक देव जी ने कौन-सा नगर बसाया?
उत्तर-
करतारपुर।

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प्रश्न 55.
करतारपुर से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
‘ईश्वर का नगर’। प्रश्न 56. करतारपुर में गुरु नानक देव जी ने कौन-सी दो संस्थाएँ स्थापित की? उत्तर-‘संगत और पंगत’।

प्रश्न 57.
संगत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
संगत से अभिप्राय उस समूह से है जो एकत्रित होकर गुरु जी के उपदेश सुनते हैं।

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प्रश्न 58.
पंगत से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
पंक्तियों में बैठकर लंगर खाना।

प्रश्न 59.
लंगर प्रथा का आरंभ किस गुरु साहिब ने किया?
उत्तर-
गुरु नानक देव जी।

प्रश्न 60.
गुरु नानक देव जी तथा भक्तों की शिक्षाओं में कोई एक अंतर बताएँ।
उत्तर-
गुरु नानक देव जी मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे जबकि भक्त नहीं।

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प्रश्न 61.
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन का अंतिम समय कहाँ व्यतीत किया?
अथवा
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष कहाँ व्यतीत किए ?
उत्तर-
करतारपुर।

प्रश्न 62.
गुरु नानक देव जी कब ज्योति-जोत समाए थे?”
उत्तर-
1539 ई० में।

प्रश्न 63.
गुरु नानक देव जी कहाँ ज्योति-जोत समाए ?
उत्तर-
करतारपुर (पाकिस्तान)।

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प्रश्न 64.
गुरु नानक देव जी ने किसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया?
उत्तर-
गुरु अंगद देव जी।

प्रश्न 65.
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को अंगद देव का नाम क्यों दिया?
उत्तर-
क्योंकि वह भाई लहणा जी को अपने शरीर का एक अंग समझते थे।

(ii) रिक्त स्थान भरें (Fill in the Blanks)

प्रश्न 1.
……………. में गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ।
उत्तर-
(1469 ई०)

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प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी के पिता जी का नाम ………….. जी था।
उत्तर-
(मेहता कालू)

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी की बहन का नाम ……………… जी था।
उत्तर-
(बेबे नानकी)

प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी की माता जी का नाम ………………. जी था।
उत्तर-
(तृप्ता )

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प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी ने सच्चा सौदा …………. रुपयों से किया।
उत्तर-
(20)

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी ने ……………….. के मोदीखाने में नौकरी की।
उत्तर-
(सुल्तानपुर लोधी)

प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी के ज्ञान-प्राप्ति के समय उनकी आयु ………… थी।
उत्तर-
(30 वर्ष)

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प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी ने ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् सर्वप्रथम …………….. शब्द कहे।
उत्तर-
(न को हिंदू, न.को मुसलमान)

प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी की उदासियों से भाव है …………..।
उत्तर-
(यात्राएँ)

प्रश्न 10.
गुरु नानक देव जी ने पहली उदासी ………….. ई० में शुरू की।
उत्तर-
(1499)

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प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी ने यात्राओं के समय …………….. सदैव उनके साथ रहता था।
उत्तर-
(भाई मरदाना)

प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी के अपनी पहली यात्रा के दौरान सबसे पहले …………….. नामक स्थान पर गए।
उत्तर-
(सैदपुर)

प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी की सज्जन ठग के साथ मुलाकात जन ठग के साथ मुलाकात …………….. में हुई।
उत्तर-
(तालुंबा)

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प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी ने …………… में अपने खेतों को पानी दिया।
उत्तर-
(हरिद्वार)

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी ने ……………. में परमात्मा की वास्तविक आरती के महत्त्व के बारे में बताया।
उत्तर-
(जगन्नाथ पुरी)

प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी की सिद्धों के साथ मुलाकात …………… में हुई थी।
उत्तर-
(कैलाश पर्वत)

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प्रश्न 17.
गुरु नानक देव जी मक्का यात्रा के समय वहाँ के काजी का नाम ……………… था।
उत्तर-
(रुकनुद्दीन)

प्रश्न 18.
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष …………… में व्यतीत किए।
उत्तर-
(करतारपुर)

प्रश्न 19.
गुरु नानक देव जी ने …………….. और …………… नामक दो संस्थाओं की स्थापना की।
उत्तर-
(संगत, पंगत)

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प्रश्न 20.
गुरु नानक देव जी ………….. परमात्मा में विश्वास रखते थे।
उत्तर-
(एक)

प्रश्न 21.
गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा और मूर्ति पूजा का ……………… किया।
उत्तर-
(खंडन)

प्रश्न 22.
गुरु नानक देव जी के अनुसार मनुष्य के ……………. शत्रु हैं।
उत्तर-
(पाँच)

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प्रश्न 23.
गुरु नानक देव जी के अनुसार मानव जीवन का उच्चतम उद्देश्य ……………… को प्राप्त करना है।
उत्तर-
(सच्च-खंड)

प्रश्न 24.
गुरु नानक देव जी ……………….. में ज्योति-ज्योत समाए।
उत्तर-
(1539 ई०)

प्रश्न 25.
गुरु नानक देव जी ने ……………… को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
उत्तर-
(भाई लहणा जी)

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(ii) ठीक अथवा गलत (True or False)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा गलत चुनें

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 ई० में हुआ।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी के जन्म स्थान को आजकल पंजा साहिब कहा जाता है।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी के पिता जी का नाम मेहता काल जी था।
उत्तर-
ठीक

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी की माता का नाम सभराई देवी जी था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी की बहन का नाम बेबे नानकी जी था।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी बेदी जाति के साथ संबंधित थे।
उत्तर-
ठीक

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी ने 40 रुपयों से सच्चा सौदा किया।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी का विवाह अमृतसर निवासी बीबी सुलक्खनी जी के साथ किया गया था।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी के दो पुत्रों के नाम श्रीचंद और लख्मी दास थे।
उत्तर-
ठीक

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 10.
गुरु नानक देव जी ने गोइंदवाल साहिब के मोदीखाने में नौकरी की थी।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी ने ज्ञान प्राप्ति के बाद ‘म को हिंदू, न को मुसलमान’ नामक शब्द कहे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 12.
ज्ञान प्राप्ति के समय गुरु नानक देव जी की आयु 35 वर्ष थी।
उत्तर-
गलत

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी की उदासियों से भाव उनकी यात्राओं से हैं।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी ने अपनी पहली उदासी सैदपुर से आरंभ की।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी सैदपुर में मलिक भागो के घर ठहरे थे।
उत्तर-
गलत

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी कुरुक्षेत्र में सज्जन ठग से मिले।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 17.
गुरु नानक देव जी ने हरिद्वार से अपने खेतों को पानी दिया था। .
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 18.
गुरु नानक देव जी ने जगन्नाथ पुरी में पंडितों को वास्तविक आरती की जानकारी दी।
उत्तर-
ठीक

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 19.
मक्का में गुरु नानक देव जी काबे की ओर पैर करके सो गए थे।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 20.
गुरु नानक देव जी ने संगत और पंगत नामक दो संस्थाओं की स्थापना की थी।
उत्तर-
ठीक

प्रश्न 21.
गुरु नानक देव जी एक परमात्मा में विश्वास रखते थे।
उत्तर-
ठीक

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 22.
गुरु नानक देव जी जाति प्रथा और मूर्ति पूजा में विश्वास रखते थे।
उत्तर-
गलत

प्रश्न 23.
गुरु नानक देव जी स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार देने के पक्ष में थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 24.
गुरु नानक देव जी 1539 ई० में ज्योति-ज्योत समाए।
उत्तर-
ठीक

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 25.
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
उत्तर-
ठीक

(iv) बहु-विकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
सिख धर्म के संस्थापक कौन थे ?
(i) गुरु नानक देव जी
(ii) गुरु अंगद देव जी
(iii) गुरु हरगोबिंद जी
(iv) गुरु गोबिंद सिंह जी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 2.
गुरु नानक देव जी का जन्म कब हुआ ?
(i) 1459 ई० में
(ii) 1469 ई० में
(iii) 1479 ई० में
(iv) 1489 ई० में।
उत्तर-
(ii)

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी का जन्म स्थान कौन-सा था ? ।
(i) कीरतपुर साहिब
(ii) करतारपुर
(iii) तलवंडी
(iv) लाहौर।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी के पिता जी का क्या नाम था ?
(i) मेहता कालू जी
(ii) जैराम जी
(iii) श्री चंद जी
(iv) फेरुमल जी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी की माता जी का क्या नाम था ?
(i) खीवी जी
(ii) तृप्ता जी
(iii) नानकी जी
(iv) गुजरी जी।
उत्तर-
(ii)

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से कौन गुरु नानक देव जी की बहन थी ?
(i) बेबे नानकी जी
(ii) भानी जी
(iii) दानी जी
(iv) खीवी जी।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी ने सच्चा सौदा कितने रुपयों में किया था ?
(i) 10
(ii) 20
(iii) 30
(iv) 50
उत्तर-
(i)

प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी की पत्नी का क्या नाम था ?
(i) गंगा देवी जी
(ii) सुलक्खनी जी
(iii) बीबी वीरो जी
(iv) बीबी भानी जी।
उत्तर-
(ii)

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 9.
मेहता कालू ने गुरु नानक देव जी को कहाँ नौकरी करने के लिए भेजा था ?
(i) मुलतान
(ii) सीतापुर
(iii) सुल्तानपुर लोधी
(iv) कीरतपुर साहिब।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 10.
ज्ञान प्राप्ति के समय गुरु नानक देव जी की आयु कितनी थी ?
(i) 20 साल
(ii) 22 साल
(iii) 26 साल
(iv) 30 साल।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 11.
गुरु नानक देव जी की उदासियों का उद्देश्य क्या था ?
(i) लोगों में फैले अन्धविश्वास को दूर करना
(ii) नाम का प्रचार करना
(iii) आपसी भाईचारे का प्रचार करना
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

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प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी ने अपनी पहली उदासी कहाँ से आरंभ की ?
(i) गोरखमता
(ii) हरिद्वार
(iii) सैदपुर
(iv) कुरुक्षेत्र।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी की मुलाकात सजन ठग से कहाँ हुई थी ?
(i) तालुंबा में
(ii) सैदपुर में।
(iii) दिल्ली में
(iv) धुबरी में।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी जादूगरनी नूरशाही को कहाँ मिले थे ?
(i) गया
(ii) कामरूप
(iii) धुबरी में
(iv) बनारस।
उत्तर-
(ii)

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प्रश्न 15.
किस स्थान पर गुरु नानक साहिब ने बताया परमात्मा की आरती प्रकृति सदैव करती रहती है ?
(i) हरिद्वार
(ii) कुरुक्षेत्र
(iii) बनारस
(iv) जगन्नाथ पुरी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी श्री लंका में किस शासक से मिले थे ?
(i) कृष्णदेव राय
(ii) भोलेनाथ
(ii) शिवनाथ
(iv) शंकर देव।
उत्तर-
(iii)

प्रश्न 17.
निम्नलिखित में से किस स्थान को आजकल पंजा साहिब के नाम से जाना जाता है ?
(i) पाकपटन
(ii) स्यालकोट
(iii) हसन अब्दाल
(iv) गोरखमता।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 18.
मक्का में कौन-से काज़ी ने गुरु नानक देव जी को काबे की तरफ पाँव करके सोने से रोका था?
(i) बहाउदीन
(ii) कुतुबुदीन
(iii) रुकनुदीन
(iv) शमसुदीन।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 19.
गुरु नानक देव जी की बगदाद में किसके साथ मुलाकाल हुई ?
(i) सज्जन ठग
(ii) शेख बहलोल
(iii) बाबर
(iv) चैतन्य महाप्रभु।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 20.
गुरु नानक देव जी ने करतारपुर में कब निवास किया ?
(i) 1519 ई० में
(ii) 1520 ई० में
(iii) 1521 ई० में
(iv) 1522 ई० में।
उत्तर-
(iii)

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 21.
गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा का क्या स्वरूप है ?
(i) वह सर्वशक्तिमान है
(ii) वह सदैव रहने वाला है
(iii) वह निर्गुण और सगुण है
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 22.
निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता मनमुख व्यक्ति की नहीं है ?
(i) वह माया के चक्कर में फंसा रहता है।
(ii) वह सदैव नाम का जाप करता है
(iii) उसमें हऊमै की भावना रहती है
(iv) वह सदैव इंद्रियजन्य भूख से घिरा रहता है।
उत्तर-
(ii)

प्रश्न 23.
गुरु नानक देव जी ने निम्नलिखित में से किसका खंडन नहीं किया ?
(i) पुरोहित वर्ग का
(i) जाति प्रथा का
(iii) मूर्ति पूजा का
(iv) स्त्री पुरुष की बराबरी का।
उत्तर-
(iv)

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 24.
गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा तक पहुँचने का कौन-सा साधन अपनाना चाहिए ?
(i) नाम का जाप करना
(ii) सच्चे गुरु को मिलना
(iii) परमात्मा का हुक्म मानना
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 25.
गुरु नानक देव जी ने मनुष्य के कितने शत्रु बताएँ हैं ?
(i) दो
(ii) तीन
(iii) चार
(iv) पाँच।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 26.
गुरु नानक देव जी ने निम्नलिखित में से कौन-से सिद्धांत पर चलने के लिए प्रत्येक मनुष्य के लिए ज़रूरी बताया ?
(i) किरत करना
(ii) नाम जपना
(iii) बाँट छकना
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 27.
कीर्तन की प्रथा किस गुरु ने आरंभ की ?
(i) गुरु नानक देव जी ने
(ii) गुरु अमरदास जी ने
(iii) गुरु अर्जन देव जी ने
(iv) गुरु गोबिंद सिंह जी ने।
उत्तर-
(i)

प्रश्न 28.
निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य प्रमाणित करता है कि गुरु नानक देव जी एक क्रांतिकारी थे ?
(i) नई संस्थाओं की स्थापना
(i) जाति प्रथा का विरोध
(iii) मूर्ति पूजा का खंडन
(iv) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(iv)

प्रश्न 29.
गुरु नानक देव जी ने अपना उत्तराधिकारी किसे नियुक्त किया ?
(i) भाई जेठा जी
(ii) भाई दुर्गा जी
(iii) भाई लहणा जी
(iv) श्री चंद जी।
उत्तर-
(iii)

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प्रश्न 30.
गुरु नानक देव जी कब ज्योति-जोत समाए थे ?
(i) 1519 ई० में
(ii) 1529 ई० में
(iii) 1539 ई० में
(iv) 1549 ई० में।
उत्तर-
(iii)

Long Answer Type Question

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी की सिख पंथ को देन के संबंध में संक्षिप्त जानकारी दें। (Give a brief account of the contribution of Guru Nanak Dev Ji to Sikhism.)
उत्तर-
15वीं शताब्दी में, जब गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ तो उस समय भारत की राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक दशा बहुत शोचनीय थी। मुसलमान शासक वर्ग से संबंधित थे। वे हिंदुओं से बहुत घृणा करते थे और उन पर भारी अत्याचार करते थे। धर्म केवल एक दिखावा बन कर रह गया था। लोग अज्ञानता के अंधकार में भटक रहे थे। समाज में महिलाओं की दशा बहुत खराब थी। गुरु नानक देव जी ने लोगों में प्रचलित अंधविश्वासों को दूर करने के लिए तथा उनमें नई जागृति उत्पन्न करने के उद्देश्य से देश तथा विदेश की यात्राएँ कीं। इन यात्राओं के दौरान गुरु जी ने लोगों से एक ईश्वर की पूजा करने, आपसी भ्रातृत्व, महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने, शुद्ध व पवित्र जीवन व्यतीत करने तथा अंध-विश्वासों को त्यागने का.प्रचार किया। गुरु जी जहाँ भी गए उन्होंने अपने उपदेशों द्वारा लोगों पर गहरा प्रभाव डाला। गुरु जी ने शासक वर्ग तथा उसके कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उन्होंने संगत तथा पंगत नामक संस्थाओं की नींव रखी। गुरु जी के जीवन काल में ही एक नया भाईचारा अस्तित्व में आ चुका था। गुरु नानक देव जी ने 1539 ई० में ज्योति-जोत समाने से पूर्व अंगद देव जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गुरु अंगद देव जी की नियुक्ति सिख पंथ के विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण प्रमाणित हुई।

प्रश्न 2.
उदासियों से क्या भाव है ? गुरु नानक देव जी की उदासियों के क्या उद्देश्य थे ? (What do you mean by Udasis ? What were the aims of Guru Nanak Dev Ji’s Udasis ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी की उदासियों के क्या उद्देश्य थे ?
(What were the aims of the Udasis of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की उदासियों से अभिप्राय उनकी यात्राओं से था। गुरु नानक देव जी की उदासियों का मुख्य उद्देश्य लोगों में फैली अज्ञानता तथा अंध-विश्वासों को दूर करना था। वह एक ईश्वर की पूजा तथा आपसी भ्रातृत्व का संदेश जन-साधारण तक पहुँचाना चाहते थे। उस समय हिंदू तथा मुसलमान दोनों ही धर्म के वास्तविक सिद्धांतों को भूल कर अपने मार्ग से भटक चुके थे। पुरोहित वर्ग जिसका मुख्य कार्य भटके हुए लोगों का उचित दिशा निर्देशन करना था, वह स्वयं ही भ्रष्ट हो चुका था। जब धर्म के ठेकेदार स्वयं ही अंधकार में भटक रहे हों तो जन-साधारण की दशा का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। लोगों ने अनगिनत देवी-देवताओं, कब्रों, वृक्षों, साँपों तथा पत्थरों आदि की पूजा आरंभ कर दी थी। इस प्रकार धर्म की सच्ची भावना समाप्त हो चुकी थी। समाज जातियों तथा उपजातियों में विभाजित था। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से घृणा करते थे। समाज में महिलाओं की दशा दयनीय थी। उन्हें पुरुषों के समान नहीं समझा जाता था। गुरु नानक देव जी ने अज्ञानता के अंधेरे में भटक रहे इन लोगों को प्रकाश का एक नया मार्ग दिखाने के लिए यात्राएँ कीं।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 3.
गुरु नानक देव जी की प्रमुख उदासियों का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (Give a brief account of the main Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
अथवा
गुरु नानक देव जी की किन्हीं छः महत्त्वपूर्ण उदासियों का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Give a brief account of any six important Udasis of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-
1. सैदपुर-गुरु नानक देव जी अपनी प्रथम उदासी के दौरान सर्वप्रथम सैदपुर पहुंचे। यहाँ पहुँचने पर मलिक भागो ने गुरु साहिब को एक ब्रह्मभोज पर निमंत्रण दिया, परंतु गुरु साहिब एक निर्धन बढ़ई भाई लालो के घर ठहरे। जब इस संबंध में मलिक भागो ने गुरु नानक देव जी से पूछा तो उन्होंने एक हाथ में मलिक भागो के भोज और दूसरे हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी लेकर ज़ोर से दबाया। मलिक भागो के भोज से खून और भाई लालो की रोटी में से दूध निकला। इस प्रकार गुरु साहिब ने उसे बताया कि हमें श्रम तथा ईमानदारी की कमाई करनी चाहिए।

2. तालुंबा-तालुंबा में गुरु नानक देव जी की भेंट सज्जन ठग से हुई। उसने यात्रियों के लिए अपनी हवेली में एक मंदिर और मस्जिद बनाई हुई थी। वह दिन के समय तो यात्रियों की खूब सेवा करता, किंतु रात के समय उन्हें लूटकर कुएँ में फेंक देता था। वह गुरु नानक देव जी और मरदाना के साथ भी कुछ ऐसा ही करने की योजनाएँ बना रहा था। रात्रि के समय जब गुरु नानक देव जी ने वाणी पढ़ी तो सज्जन ठग गुरु साहिब के चरणों में गिर पड़ा। गुरु नानक देव जी ने उसे क्षमा कर दिया। इस घटना के पश्चात् सज्जन ने अपना शेष जीवन सिख धर्म का प्रचार करने में व्यतीत किया। .

3. गोरखमता-हरिद्वार के पश्चात् गुरु नानक देव जी गोरखमता पहुँचे। गुरु नानक देव जी ने यहाँ के सिद्ध योगियों को बताया कि कानों में कुंडल पहनने, शरीर पर विभूति रमाने, बँख बजाने से अथवा सिर मुंडवा देने से मुक्ति प्राप्त नहीं होती। मुक्ति तो आत्मा की शुद्धि से प्राप्त होती है। ये योगी गुरु नानक देव जी के उपदेशों से अत्यधिक प्रभावित हुए। उस समय से ही गोरखमता का नाम नानकमता- पड़ गया।

4. हसन अब्दाल-गुरु नानक देव जी पंजाब की वापसी यात्रा के समय हसन अब्दाल ठहरे। यहाँ एक अहँकारी फकीर वली कंधारी ने गुरु नानक देव जी को कुचलने के उद्देश्य से एक बहुत बड़ा पत्थर पहाड़ी से नीचे की ओर लुढ़का दिया। गुरु साहिब ने इसे अपने पंजे से रोक दिया। इस स्थान को आजकल पंजा साहिब कहा जाता है।

5. मक्का -मक्का हज़रत मुहम्मद साहिब का जन्म स्थान है। सिख परंपरा के अनुसार गुरु नानक देव जी जब मक्का पहुँचे तो वह काअबे की ओर पाँव करके सो गए। जब काज़ी रुकनुद्दीन ने यह देखा तो वह क्रोधित हो गया। गुरु साहिब ने उसे समझाया कि अल्लाह सर्वव्यापक है।

6. जगन्नाथ पुरी-असम की यात्रा के पश्चात् गुरु नानक देव जी उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी पहुँचे। पंडितों ने गुरु साहिब को जगन्नाथ देवता की आरती करने के लिए कहा। गुरु नानक साहिब ने उन्हें बताया कि उस परम पिता परमात्मा की आरती प्रकृति सदैव करती रहती है।

प्रश्न 4.
गुरु नानक देव जी की प्रथम उदासी का वर्णन करो।
(Give a brief account of the first Udasi of Guru Nanak Dev Ji.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने 1499 ई० के अंत में अपनी पहली यात्रा आरंभ की। इन यात्राओं के समय भाई मरदाना उनके साथ रहा। इस यात्रा को गुरु नानक देव जी ने 12 वर्ष में संपूर्ण किया और वह पूर्व से दक्षिण की ओर गए। इस यात्रा के दौरान गुरु जी ने निम्नलिखित प्रमुख स्थानों की यात्रा की—

1. सैदपुर-गुरु नानक देव जी अपनी प्रथम उदासी के दौरान सर्वप्रथम सैदपुर पहुँचे। यहाँ पहुँचने पर मलिक भागो ने गुरु साहिब को एक ब्रह्मभोज पर निमंत्रण दिया, परंतु गुरु साहिब एक निर्धन बढ़ई भाई लालो के घर ठहरे। जब इस संबंध में मलिक भागो ने गुरु नानक देव जी से पूछा तो उन्होंने एक हाथ में मलिक भागो के भोज और दूसरे हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी लेकर ज़ोर से दबाया। मलिक भागो के भोज से खून और भाई लालो की रोटी में से दूध निकला। इस प्रकार गुरु साहिब ने उसे बताया कि हमें श्रम तथा ईमानदारी की कमाई करनी चाहिए।

2. कुरुक्षेत्र-गुरु नानक देव जी सूर्य ग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र पहुँचे। इस अवसर पर हज़ारों ब्राह्मण और साधु एकत्रित हुए थे। गुरु साहिब ने ब्राह्मणों को समझाया कि हमें सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। गुरु जी के विचारों से प्रभावित होकर अनेक लोग उनके अनुयायी बन गए।

3. गोरखमता-हरिद्वार के पश्चात् गुरु नानक देव जी गोरखमता पहुँचे। गुरु नानक साहिब ने यहाँ के सिद्ध योगियों को बताया कि कानों में कुंडल पहनने, शरीर पर विभूति रमाने, शैख बजाने से अथवा सिर मुंडवा देने से मुक्ति प्राप्त नहीं होती। मुक्ति तो आत्मा की शुद्धि से प्राप्त होती है। ये योगी गुरु साहिब के उपदेशों से अत्यधिक प्रभावित हुए। उस समय से ही गोरखमता का नाम नानकमता पड़ गया।

4. कामरूप-धुबरी से गुरु नानक देव जी कामरूप (असम) पहुँचे। यहाँ की प्रसिद्ध जादूगरनी नूरशाही ने. अपनी सुंदरता के बल पर गुरु जी को भटकाने का असफल प्रयास किया। गुरु जी ने उसे जीवन का सही मनोरथ बताया।

5. जगन्नाथ पुरी-असम की यात्रा के पश्चात् गुरु नानक देव जी उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी पहुँचे। पंडितों ने गुरु साहिब को जगन्नाथ देवता की आरती करने के लिए कहा। गुरु नानक साहिब ने उन्हें बताया कि उस परम पिता परमात्मा की आरती प्रकृति सदैव करती रहती है।

6. लंका-गुरु नानक देव जी ने लंका की भी यात्रा की। लंका का शासक शिवनाथ गुरु नानक देव जी के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुआ तथा उनका श्रद्धालु बन गया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 5.
गुरु नानक देव जी की दूसरी उदासी के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about the Second Udasi of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-गुरु नानक देव जी ने 1513 ई० में अपनी द्वितीय उदासी उत्तर की ओर आरंभ की। इस उदासी में उन्हें तीन वर्ष लगे। इस उदासी के दौरान गुरु नानक देव जी निम्नलिखित प्रमुख स्थानों पर गए—

1. पहाड़ी रियासतें-गुरु नानक देव जी ने अपनी दूसरी उदासी दौरन मंडी, रवालसर, ज्वालामुखी काँगड़ा, बैजनाथ और कुल्लू इत्यादि पहाड़ी रियासतों की यात्रा की। गुरु नानक देव जी के उपदेशों से प्रभावित होकर इन पहाडी रियासतों के बहुत-से लोग उनके अनुयायी बन गए।

2. कैलाश पर्वत-गुरु नानक देव जी तिब्बत से होते हुए कैलाश पर्वत पहुँचे। गुरु साहिब के यहाँ पहुँचने पर सिद्ध बहुत हैरान हुए। गुरु नानक देव जी ने उन्हें बताया कि संसार से सत्य लुप्त हो गया है और चारों ओर भ्रष्टाचार और झूठ का बोलबाला है। इसलिए गुरु साहिब ने उन्हें मानवता का पथ-प्रदर्शन करने का संदेश दिया।

3. लद्दाख–कैलाश पर्वत के पश्चात् गुरु नानक देव जी लद्दाख पहुँचे। यहाँ के बहुत-से लोग गुरु साहिब के अनुयायी बन गए।

4. कश्मीर-कश्मीर में स्थित मटन में गुरु नानक देव जी का पंडित ब्रह्मदास से काफ़ी लंबा धार्मिक शास्त्रार्थ हुआ। गुरु नानक देव जी ने उसे समझाया कि मुक्ति केवल वेदों और रामायण इत्यादि को पढ़ने से नहीं अपितु उनमें दी गई बातों पर अमल करके प्राप्त की जा सकती है।

5. हसन अब्दाल—गुरु नानक देव जी पंजाब की वापसी यात्रा के समय हसन अब्दाल ठहरे। यहाँ एक अहँकारी फकीर वली कंधारी ने गुरु नानक देव जी को कुचलने के उद्देश्य से एक बहुत बड़ा पत्थर पहाड़ी से नीचे की ओर लुढ़का दिया। गुरु साहिब ने इसे अपने पंजे से रोक दिया। इस स्थान को आजकल पंजा साहिब कहा जाता है।

6. स्यालकोट स्यालकोट में गुरु नानक देव जी की मुलाकात एक मुसलमान संत हमजा गौस से हुई। उसने किसी बात पर नाराज़ होकर अपनी शक्ति द्वारा सारे शहर को नष्ट करने का निर्णय कर लिया था। परंतु जब वह गुरु साहिब से मिला तो वह उनके व्यक्तित्व से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपना निर्णय बदल दिया। इस घटना का लोगों के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 6.
गुरु नानक देव जी की तीसरी उदासी के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Third Udasi of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने 1517 ई० के अंत में अपनी तृतीय उदासी आरंभ की। इस उदासी के दौरान गुरु साहिब पश्चिमी एशिया के देशों की ओर गए। इस उदासी के दौरान गुरु नानक देव जी ने निम्नलिखित प्रमुख स्थानों की यात्रा की—

1. मुलतान-मुलतान में बहुत-से सूफी संत निवास करते थे। मुलतान में गुरु नानक देव जी की भेंट प्रसिद्ध सूफी संत शेख बहाउद्दीन से हुई। शेख बहाउद्दीन उनके विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए।

2. मक्का-मक्का हज़रत मुहम्मद साहिब का जन्म स्थान है। सिख परंपरा के अनुसार गुरु नानक देव जी जब मक्का पहुँचे तो काअबे की ओर पाँव करके सो गए। जब काज़ी रुकनुद्दीन ने यह देखा तो वह क्रोधित हो गया। कहा जाता है कि जब काजी ने गुरु साहिब के पाँव पकड़कर दूसरी ओर घुमाने आरंभ किए तो मेहराब भी उसी ओर घूमने लग पड़ा। यह देखकर मुसलमान बहुत प्रभावित हुए। गुरु साहिब ने उन्हें समझाया कि अल्लाह सर्वव्यापक है।

3. मदीना-मक्का के पश्चात् गुरु नानक देव जी मदीना पहुँचे और वहाँ अपने उपदेशों का प्रचार किया। यहाँ गुरु साहिब का इमाम आज़िम के साथ शास्त्रार्थ भी हुआ।

4. बगदाद-बगदाद में गुरु नानक देव जी की भेंट शेख बहलोल से हुई। वह गुरु साहिब की वाणी से प्रभावित होकर उनका श्रद्धालु बन गया।

5. सैदपुर-गुरु नानक देव जी जब 1520 ई० के अंत में सैदपुर पहुँचे तो उस समय बाबर ने पंजाब पर बिजय प्राप्त करने के उद्देश्य से वहाँ पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के समय हज़ारों की संख्या में लोगों को बंदी बना लिया गया। इन बंदी बनाए गए लोगों में गुरु नानक देव जी भी थे। जब बाद में बाबर को यह ज्ञात हुआ कि गुरु साहिब एक महान् संत हैं तो उसने न केवल गुरु नानक देव जी को बल्कि बहुत-से अन्य बंदियों को भी रिहा कर दिया।

6. पेशावर-गुरु नानक देव जी अपनी तीसरी उदासी के दौरान पेशावर भी गये। यहाँ वे योगियों से मिले तथा उन्हें धर्म का वास्तविक मार्ग बताया।

PSEB 12th Class History Solutions Chapter 4 गुरु नानक देव जी का जीवन और उनकी शिक्षाएँ

प्रश्न 7.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन करें। (Briefly describe of the teachings of Guru Nanak Dev Ji.).
अथवा
गुरु नानक देव जी की किन्हीं छः शिक्षाओं के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about any six teachings of Guru Nanak Dev Ji ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ बड़ी सरल किंतु प्रभावशाली थीं। उनकी शिक्षाएँ किसी एक वर्ग, जाति अथवा प्रांत के लिए नहीं थीं। इनका बंध तो सारी मानव जाति से था। गुरु नानक देव जी की मुख्य शिक्षाओं का वर्णन इस प्रकार है—

1. ईश्वर का स्वरूप-गुरु नानक देव जी एक ईश्वर में विश्वास रखते थे। उन्होंने अपनी वाणी में बार-बार ईश्वर की एकता पर बल दिया है। गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर ही संसार की रचना करता है, उसका पालन-पोषण करता है और उसका विनाश करता है। गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर सर्वशक्तिमान् है।

2. माया-गुरु नानक देव जी के अनुसार माया मनुष्य के लिए मुक्ति के मार्ग में आने वाली सबसे बड़ी बाधा है। मनमुख व्यक्ति सदैव सांसारिक वस्तुएँ जैसे धन-दौलत, उच्च पद, ऐश्वर्य, सुंदर नारी, पुत्र इत्यादि के चक्र में फंसा रहता है। इसी को माया कहते हैं। माया के कारण वह ईश्वर से दूर हो जाता है और आवागमन के चक्र में फंसा रहता है।

3. जाति प्रथा का खंडन-उस समय का हिंदू समाज न केवल चार मुख्य जातियों बल्कि अनेक अन्य उपजातियों में विभाजित था। उच्च जाति के लोग निम्न जाति से बहुत घृणा करते थे और उन पर बहुत अत्याचार करते थे। समाज में छुआछूत की भावना बहुत फैल गई थी। गुरु नानक देव जी ने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। गुरु साहिब ने लोगों को परस्पर भ्रातृभाव का संदेश दिया।

4. स्त्रियों के साथ निम्न बर्ताव का खंडन—गुरु नानक देव जी के समय समाज में स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी। उनमें असंख्य कुरीतियाँ प्रचलित थीं। गुरु नानक देव जी ने स्त्रियों में प्रचलित कुरीतियों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने समानता के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई।

5. गुरु का महत्त्व-गुरु नानक देव जी ईश्वर तक पहुँचने के लिए गुरु को बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं। उनके अनुसार गुरु मुक्ति तक ले जाने वाली वास्तविक सीढ़ी है। गुरु ही मनुष्य को अंधकार (अज्ञानता) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर लाता है। सच्चे गुरु का मिलना कोई सरल कार्य नहीं है। ईश्वर की कृपा के बिना मनुष्य को गुरु की प्राप्ति नहीं हो सकती।

6. हक्म-गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं में परमात्मा के हुक्म (आदेश) अथवा इच्छा को विशेष महत्त्व प्राप्त है। हुक्म के कारण ही मनुष्य को सुख-दुःख प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य परमात्मा के आदेश को नहीं मानता वह दरदर की ठोकरें खाता है।

प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी के ईश्वर संबंधी क्या विचार थे ? (What was Guru Nanak’s concept of God ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के अनुसार ईश्वर के स्वरूप संबंधी विशेषताएँ निम्नलिखित अनुसार हैं—

1. परमात्मा एक है—गुरु नानक देव जी अपनी बाणी में बार-बार परमात्मा के एक होने पर बल देते हैं। उनके अनुसार परमात्मा ही संसार की रचना, उसका पालन-पोषण तथा उसका संहार करने वाला है। उसके द्वारा किए गए ये काम दूसरे देवी-देवताओं के महत्त्व को कम करते हैं। देवी-देवते सैंकड़ों तथा हज़ारों हैं, परंतु परमात्मा एक है। उस परमात्मा को हरि, गोपाल, अल्लाह, खुदा, राम तथा साहिब आदि नाम से पुकारा जाता है।

2. निर्गुण और सगुण-परमात्मा के दो रूप हैं। वह निर्गुण भी है और सगुण भी। पहले जब परमात्मा ने पृथ्वी तथा आकाश की रचना नहीं की थी तो वह अपने आप में ही रहता था। यह परमात्मा का निर्गुण स्वरूप था। फिर परमात्मा ने सृष्टि की रचना की। इस रचना द्वारा परमात्मा ने स्वयं को रूपमान किया। यह परमात्मा का सगुण स्वरूप

3. रचयिता, पालनकर्ता और नाशवानकर्ता-ईश्वर ही इस संसार का रचयिता, पालनकर्ता और इसका विनाश करने वाला है। ईश्वर के मन में जब आया तब उसने इस संसार की रचना की। वह ही इस संसार का पालन करता है। ईश्वर जब चाहे तब इस संसार का विनाश कर सकता है।

4. सर्वशक्तिमान-गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा सर्वशक्तिमान है। वह जो चाहता है, वही होता है। उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं हो सकता। यदि परमात्मा की इच्छा हो तो वह भिखारी को भी सिंहासन पर बैठा सकता है और राजा को रंक (भिखारी) बना सकता है। .

5. अजर-अमर-परमात्मा द्वारा रची हुई सृष्टि नश्वर है। यह अस्थिर है। परमात्मा सदैव रहने वाला है। वह आवागमन तथा जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त है।

6. परमात्मा की महानता—गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा महान् है। उसकी महानता का वर्णन करना असंभव है। वह क्या देखता है और क्या सुनता है, उसका ज्ञान कितना है और वह कितना दयालु है और उसके दिए गए उपहारों का परिचय नहीं दिया जा सकता। परमात्मा स्वयं ही जानता है कि वह कितना महान् है। परमात्मा को छोड़कर किसी अन्य देवी-देवता की पूजा करना व्यर्थ है। ये परमात्मा के सम्मुख उसी प्रकार हैं जिस प्रकार सूर्य के सम्मुख एक छोटा सा तारा।

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प्रश्न 9.
गुरु नानक देव जी का माया का संकल्प क्या है ? (What was Guru Nanak Dev Ji’s concept of Maya ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के अनुसार माया मनुष्य के लिए मुक्ति मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। मनमुख व्यक्ति सदैव सांसारिक वस्तुओं जैसे धन-दौलत, उच्च पद, ऐश्वर्य, सुंदर नारी, पुत्र आदि के चक्रों में फंसा रहता है। इसे ही माया कहते हैं। मनमुख रचयिता और उसकी रचना के अंतर को नहीं समझ सकता। गुरु नानक देव जी ने माया को सर्पणी, माया ममता मोहणी, माया मोह, त्रिकुटी तथा सूहा रंग इत्यादि के नामों से पुकारा है। माया जिससे वह इतना प्रेम करता है, उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके साथ नहीं जाती। माया के कारण वह ईश्वर से दूर हो जाता है और आवागमन के चक्र में फंसा रहता है। गुरु जी कहते हैं कि मनुष्य सोना-चाँदी आदि एकत्रित करके सोचता है कि वह संसार का बहुत बड़ा व्यक्ति बन गया है परंतु वास्तव में वह व्यक्ति अपने जीवन के लिए विष एकत्रित कर रहा होता है। इसी प्रकार वह दुविधा में फंस कर अपने जीवन का नाश कर लेता है। संक्षेप में माया मनुष्य की खुशियों का स्रोत नहीं अपितु उसके दुःखों का भंडार है। जो व्यक्ति माया का शिकार होता है उसे ईश्वर के दरबार में कोई स्थान नहीं मिलता।

प्रश्न 10.
गुरु नानक देव जी के उपदेशों में ‘गुरु’ का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of ‘Guru’ in Guru Nanak Dev’s Ji teachings ?)
अथवा
गुरु नानक देव जी के ‘गुरु’ संबंधी विचार क्या थे ? (What was Guru Nanak Dev Ji’s concept of ‘Guru’ ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ईश्वर तक पहुँचने के लिए गुरु का बहुत महत्त्व मानते हैं। उनके अनुसार गुरु मुक्ति तक ले जाने वाली एक वास्तविक सीढ़ी है। गुरु ही मनुष्य को मोह और अहं के रोग से दूर करता है। वही नाम और शब्द की आराधना द्वारा भक्ति के मार्ग का अनुसरण करने का ढंग बताता है। गुरु के बिना भक्ति भाव और ज्ञान संभव नहीं होता। गुरु के बिना मनुष्य को चारों ओर अँधकार दिखाई देता है। गुरु ही मनुष्य को अँधकार (अज्ञानता) से प्रकाश की ओर ले जाता है। वह प्रत्येक असंभव कार्य को.संभव बना सकता है। अतः उसके साथ मिलने से ही मनुष्य की जीवनधारा बदल जाती है। वह सदा निरवैर रहता है। दोस्त तथा दुश्मन उसके लिए एक हैं। यदि कोई दुश्मन भी उसकी शरण में आ जाए तो वह उसे माफ कर देता है। सच्चे गुरु का मिलना कोई सरल कार्य नहीं है। परमात्मा की दया के बिना मनुष्य को गुरु की प्राप्ति नहीं हो सकती। यह बात यहाँ विशेष उल्लेखनीय है कि गुरु नानक देव जी जब गुरु की बात करते हैं तो उनका अभिप्राय किसी मानवीय गुरु से नहीं है। सच्चा गुरु तो ईश्वर स्वयं है, जो शब्द द्वारा शिक्षा देता है।

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प्रश्न 11.
नाम जपना, किरत करनी व बाँटकर छकना, सिख धर्म के बुनियादी नियम हैं। व्याख्या करें।
(Name, Do the Honest Labour Remembering Divine and Sharing with the Needy are the basis of the Sikh Way of Life. Discuss.)
उत्तर-

1. नाम जपना-सिख धर्म में नाम की आराधना अथवा सिमरन को ईश्वर की भक्ति का सर्वोच्च रूप समझा गया है। गुरु नानक देव जी का कथन था कि नाम की आराधना से जहाँ मन के पाप दूर हो जाते हैं वहीं वह निर्मल हो जाता है। इस कारण मनुष्य के सभी कष्ट खत्म हो जाते हैं। नाम की आराधना से मनुष्य के सभी कार्य सहजता से होते चले जाते हैं क्योंकि ईश्वर स्वयं उसके सभी कार्यों में सहायता करता है। नाम के बिना मनुष्य का इस संसार में आना व्यर्थ है।

2. किरत करनी-किरत से भाव है मेहनत एवं ईमानदारी की कमाई करना। किरत करना अत्यंत आवश्यक है। यह परमात्मा का हुक्म (आदेश) है। हम प्रतिदिन देखते हैं कि विश्व का प्रत्येक जीव-जंतु किरत करके अपना पेट पाल रहा है। मानव के लिए किरत करने की आवश्यकता सबसे अधिक है क्योंकि वह सभी जीवों का सरदार है। जो व्यक्ति किरत नहीं करता वह अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट नहीं रख सकता। ऐसा व्यक्ति वास्तव में उस परमात्मा के विरुद्ध गुनाहं करता है।

3. बाँट छकना-सिख धर्म में बाँट छकने के सिद्धांत को काफी महत्त्व दिया गया है। बाँट छकने से भाव ज़रूरतमंद लोगों के साथ बाँटो। सिख धर्म खा कर पीछे बाँटने की नहीं अपितु पहले बाँटकर बाद में खाने की शिक्षा देता है। इसमें दूसरों को भी अपना भाई-बहन समझने तथा उन्हें पहले बाँटने की प्रेरणा दी गई है। गुरु नानक देव जी फरमाते हैं—
घालि खाए कुछ हथों देइ॥
नानक राह पछाणे सेइ॥
दान देने अथवा बाँट के खाने के लिए केवल वही व्यक्ति सफल है जो श्रम की कमाई करके दान देता है। सिख धर्म में दशाँश देने का हुक्म है। इससे भाव यह है कि आप कमाई (आय) का दसवां हिस्सा लोक कल्याण कार्यों के लिए खर्च करें।

प्रश्न 12.
गुरु नानक देव जी के स्त्री जाति संबंधी क्या विचार थे? (What were the views of Guru Nanak Dev Ji about women ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के समय समाज में स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी। समाज में उनका स्तर पुरुषों के समान नहीं था। उनमें अनेक कुरीतियाँ जैसे बाल-विवाह, बहु-विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा तथा तलाक प्रथा इत्यादि प्रचलित थीं। गुरु नानक देव जी ने स्त्रियों में प्रचलित कुरीतियों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने समाज में स्त्रियों का सम्मान बढ़ाने हेतु एक ज़ोरदार अभियान चलाया। वह बाल-विवाह, बहु-विवाह, पर्दा प्रथा तथा सती प्रथा इत्यादि कुरीतियों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार दिए जाने का समर्थन किया। इस संबंध में उन्होंने स्त्रियों को संगत एवं पंगत में सम्मिलित होने की आज्ञा दी। गुरु जी का विचार था कि हमें स्त्रियों से जो कि महान् सम्राटों को जन्म देती हैं, के साथ कभी भी बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए। वह स्त्रियों को शिक्षा दिए जाने के पक्ष में थे।

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प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी के संदेश का सामाजिक अर्थ क्या था ? (What was the social meaning of Guru Nanak Dev Ji’s message ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी के संदेश के सामाजिक अर्थ बहुत महत्त्वपूर्ण थे। उनका संदेश प्रत्येक के लिए था। कोई भी स्त्री-पुरुष गुरु जी द्वारा दर्शाए गए मार्ग को अपना सकता था। मुक्ति का मार्ग सबके लिए खुला था। गुरु जी ने सामाजिक समानता का प्रचार किया। उन्होंने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। सामाजिक समानता के संदेश को व्यावहारिक रूप देने के लिए गुरु जी ने संगत तथा पंगत (लंगर) नामक दो संस्थाएँ चलाईं। लंगर तैयार करते समय जाति-पाति का कोई भेद-भाव नहीं किया जाता था। गुरु नानक देव जी ने अपने समय के शासकों में प्रचलित अन्याय की नीति और व्याप्त भ्रष्टाचार की जोरदार शब्दों में निंदा की। शासक वर्ग के साथ-साथ गुरु जी ने अत्याचारी सरकारी कर्मचारियों की भी आलोचना की। इस प्रकार गुरु नानक देव जी ने पंजाब के समाज को एक नया स्वरूप देने का उपाय किया।

प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ भक्ति प्रचारकों से किस प्रकार भिन्न थीं ? (How far were the teachings of Guru Nanak different from the Bhakti reformers ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ भक्ति प्रचारकों से कई पक्षों से भिन्न थीं। गुरु नानक देव जी के अनुसार परमात्मा निराकार है। वह कभी भी मानवीय रूप को धारण नहीं करता। भक्ति प्रचारकों ने कृष्ण तथा राम को परमात्मा का अवतार माना। गुरु नानक देव जी मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी थे जबकि भक्ति प्रचारकों का इसमें पूर्ण विश्वास था। गुरु नानक देव जी ने सिख धर्म का प्रसार करने के लिए गुरु अंगद देव जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करके गुरुगद्दी को जारी रखा। दूसरी ओर बहुत कम भक्ति प्रचारकों ने गुरुगद्दी की परंपरा को जारी रखा। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उनका अस्तित्व खत्म हो गया। गुरु नानक देव जी गृहस्थ जीवन में विश्वास रखते थे। भक्ति प्रचारक गृहस्थ जीवन को मुक्ति की राह में आने वाली एक बड़ी रुकावट मानते थे। गुरु नानक देव जी ने संगत तथा पंगत नामक दो संस्थाएँ स्थापित की। इनमें प्रत्येक स्त्री, पुरुष अथवा बच्चे बिना किसी भेद-भाव के सम्मिलित हो सकते थे। भक्ति प्रचारकों ने ऐसी कोई संस्था स्थापित नहीं की। गुरु नानक देव जी संस्कृत को पवित्र भाषा नहीं मानते थे। उन्होंने अपनी शिक्षाओं का प्रचार लोगों की आम भाषा पंजाबी में किया। अधिकतर भक्ति प्रचारक संस्कृत को पवित्र भाषा समझते थे।

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प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी एक महान् कवि और संगीतकार थे । इसकी व्याख्या करें। (Guru Nanak Dev Ji was a great poet and musician. Explain.)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी न केवल एक धार्मिक महापुरुष थे अपितु एक महान् कवि एवं संगीतकार भी थे। आपकी कविताएँ इतनी उच्चकोटि की थीं कि इनके मुकाबले की कविताएँ विश्व साहित्य में भी बहुत कम हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में अंकित आप जी के 976 शब्द आपके महान् कवि होने का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। गुरु नानक देव जी ने इन कविताओं में परमात्मा तथा मानवता का अत्यंत सुंदर ढंग से वर्णन किया है। इनमें उच्चकोटि के अलंकरणों तथा उपमाओं का प्रयोग किया गया है। गुरु नानक साहिब बहुत संक्षिप्त शब्दों में काफ़ी गहराई की बातें कह जाते हैं। गरु साहिब की ये कविताएँ पंजाबी साहित्य को एक अमूल्य देन हैं। गुरु नानक देव जी प्रथम ऐसे सुधारक थे जिन्होंने अपने उपदेशों को लोगों तक पहुँचाने के लिए संगीत का प्रयोग किया। वह कई प्रकार के रागों की जानकारी रखते थे। उनके कीर्तन को सुन कर बड़े-बड़े पापी भी उनके चरणों पर गिर जाते थे।

प्रश्न 16.
गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष कहाँ तथा कैसे व्यतीत किए ? (How and where did Guru Nanak Dev Ji spend last 18 years of his life ?)
उत्तर-
गुरु नानक देव जी ने 1521 ई० में रावी नदी के तट पर करतारपुर (अर्थात् ईश्वर का नगर) नामक नगर की स्थापना की। इसी स्थान पर गुरु साहिब ने अपने परिवार के साथ जीवन के अंतिम 18 वर्ष व्यतीत किए। इस समय के मध्य गुरु साहिब ने ‘संगत’ और ‘पंगत’ नामक संस्थाओं की स्थापना की। ‘संगत’ से अभिप्राय उस सभा से था जो प्रतिदिन गुरु जी के उपदेशों को सुनने के लिए होती थी। इस संगत में बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को शामिल होने का अधिकार था। इसमें केवल एक परमात्मा के नाम का जाप होता था। ‘पंगत’ से अभिप्राय था-पंक्ति में बैठकर लंगर छकना। लंगर में जाति अथवा धर्म इत्यादि का कोई भेद-भाव नहीं किया जाता था। ये दोनों संस्थाएँ गुरु साहिब के उपदेशों का प्रसार करने में सहायक सिद्ध हुईं। इनके अतिरिक्त गुरु जी ने 976 शबदों की रचना की। गुरु साहिब का यह कार्य सिख पंथ के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। गुरु साहिब की प्रमुख वाणियों के नाम जपुजी साहिब, वार माझ, आसा दीवार, सिद्ध गोष्टि, वार मल्हार, बारह माह और पट्टी इत्यादि हैं।

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Source Based Questions

नोट-निम्नलिखित अनुच्छेदों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उनके अंत में पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए।

1
गुरु नानक देव जी की गणना विश्व के महापुरुषों में की जाती है। वह सिख पंथ के संस्थापक थे। 15वीं शताब्दी में जब उनका जन्म हुआ तो भूमि पर चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था। लोगों में अंध-विश्वास बहुत बढ़ गए थे। वे अज्ञानता के अंधकार में भटक रहे थे। चारों ओर अधर्म, झूठ और भ्रष्टाचार का बोलबाला था। लोग धर्म की वास्तविकता को भूल चुके थे। यह केवल आडंबरों और कर्मकांडों का एक दिखावा-सा बनकर रह गया था। शासक
और उनके कर्मचारी प्रजा का कल्याण करने की अपेक्षा उन पर अत्याचार करते थे। वे अपना अधिकतर समय रंगरलियों में व्यतीत करते थे। गुरु नानक साहिब ने अज्ञानता के अंधकार में भटक रही मानवता को ज्ञान का मार्ग दिखाया।

  1. सिख धर्म के संस्थापक कौन थे ?
  2. गुरु नानक देव जी के जन्म के समय समाज की स्थिति कैसी थी ?
  3. गुरु नानक देव जी के जन्म के समय शासक व कर्मचारी वर्ग का प्रजा के प्रति व्यवहार कैसा था ?
  4. गुरु नानक देव जी ने मानवता को कौन-सा मार्ग दिखाया ?
  5. गुरु नानक देव जी के समय लोग धर्म की वास्तविकता को ………… चुके थे।

उत्तर-

  1. सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी थे।।
  2. उस समय लोगों में अंध-विश्वास बहुत बढ़ गया था।
  3. गुरु नानक देव जी के जन्म समय शासक तथा कर्मचारी वर्ग प्रजा पर बहुत अत्याचार करते थे।
  4. गुरु नानक देव जी ने मानवता को सत्य तथा ज्ञान का मार्ग दिखाया।
  5. भूल।

2
1499 ई० में ज्ञान-प्राप्ति के पश्चात् गुरु नानक देव जी अधिकाँश समय सुल्तानपुर लोधी में न ठहरे और वे देश और विदेशों की लंबी यात्रा के लिए निकल पड़े। गुरु नानक साहिब ने लगभग 21 वर्ष इन यात्राओं में व्यतीत किए। गुरु नानक साहिब की इन यात्राओं को उदासियाँ भी कहा जाता है क्योंकि गुरु साहिब इस समय के दौरान घर-द्वार त्याग कर एक उदासी की भाँति भ्रमण करते रहे। गुरु साहिब की इन उदासियों के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए हमें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पहला, गुरु जी ने अपनी उदासियों के संबंध में कुछ नहीं लिखा। दूसरा, इन उदासियों से संबंधित हमें कोई तत्कालीन स्रोत प्राप्त नहीं है।

  1. गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति कहाँ हुई ?
  2. उदासियों से क्या भाव है?
  3. गुरु नानक देव जी की उदासियों से संबंधित आने वाली कोई एक कठिनाई के बारे में बताएँ।
  4. गुरु नानक देव जी ने अपनी उदासियों का आरंभ कहाँ से किया ?
  5. गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति कब हुई थी ?
    • 1469 ई०
    • 1479 ई०
    • 1489 ई०
    • 1499 ई०।

उत्तर-

  1. गुरु नानक देव जी को ज्ञान की प्राप्ति सुल्तानपुर लोधी में हुई।
  2. उदासियों से भाव गुरु नानक देव जी की यात्राओं से है।
  3. इन उदासियों से संबंधित हमें कोई समकालीन स्रोत नहीं मिला है।
  4. गुरु नानक देव जी ने अपनी उदासियों का आरंभ सैदपुर से किया।
  5. 1499 ई०।

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3
गुरु नानक देव जी जब 1520 ई० के अंत में सैदपुर पहुंचे तो उस समय बाबर ने पंजाब पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से वहाँ पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के समय मुग़ल सेनाओं ने बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों की हत्या कर दी। सैदपुर में भारी लूटपाट की गई और घरों में आग लगा दी गई। स्त्रियों को अपमानित किया गया। हज़ारों की संख्या में पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों को बंदी बना लिया गया। इन बंदी बनाए गए लोगों में गुरु नानक साहिब भी थे। जब बाद में बाबर को यह ज्ञात हुआ कि गुरु साहिब एक महान् संत है तो वह गुरु जी के दर्शन के लिए स्वयं आया वह गुरु साहिब के व्यक्तित्व से इतना अधिक प्रभावित हुआ कि उसने न केवल गुरु साहिब को बल्कि बहुत-से अन्य बंदियों को भी रिहा कर दिया।

  1. बाबर ने सैदपुर पर आक्रमण कब किया था ?
  2. बाबर की सेना ने सैदपुर में क्या किया ?
  3. क्या बाबर ने गुरु नानक देव जी को सैदपुर में कैद किया था.?
  4. बाबर ने जब गुरु नानक देव जी के दर्शन किए उसने क्या किया ?
  5. बाबर की सेना ने सैदपुर में स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार किया ? .
    • उनको अपमानित किया गया।
    • उनका सम्मान किया गया
    • उनको गिरफ्तार कर लिया गया
    • उपरोक्त में से कोई नहीं।

उत्तर-

  1. बाबर ने सैदपुर पर 1520 ई० में आक्रमण किया था।
  2. बाबर की सेना ने सैदपुर में बड़ी संख्या में लूटमार की थी।
  3. जी, हाँ, बाबर ने सैदपुर में गुरु नानक देव जी को कैद किया था।
  4. बाबर ने जब गुरु नानक देव जी के दर्शन किए तब उसने गुरु साहिब व अन्य कई कैदियों को भी रिहा कर दिया।
  5. उनको अपमानित किया गया।

4
गुरु नानक देव जी ने रावी नदी के तट पर 1521 ई० में करतारपुर (अर्थात् ईश्वर का नगर) नामक नगर की स्थापना की। इसी स्थान पर गुरु साहिब ने अपने परिवार के साथ जीवन के अंतिम 18 वर्ष व्यतीत किए। इस समय के मध्य गुरु साहिब ने ‘संगत’ और ‘पंगत’ नामक संस्थाओं की स्थापना की। संगत’ से अभिप्राय उस सभा से था जो प्रतिदिन गुरु जी के उपदेशों को सुनने के लिए होती थी। इस संगत में बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को शामिल होने का अधिकार था। इसमें केवल एक परमात्मा के नाम का जाप होता था। ‘पंगत’ से अभिप्राय था-पंक्ति में बैठकर लंगर छकना। लंगर में जाति अथवा धर्म इत्यादि का कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। ये दोनों संस्थाएँ गुरु साहिब के उपदेशों का प्रसार करने में सहायक सिद्ध हुईं। इनके अतिरिक्त गुरु जी ने 976 शब्दों की रचना की। गुरु साहिब का यह कार्य सिख पंथ के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

  1. करतारपुर से क्या भाव है ?
  2. गुरु नानक देव जी ने करतारपुर में कौन-सी दो संस्थाओं की स्थापना की ?
  3. गुरु नानक देव जी ने कितने शब्दों की रचना की ?
  4. गुरु नानक देव जी की किन्हीं दो प्रमुख वाणियों के नाम लिखें।
  5. गुरु नानक देव जी ने करतारपुर की स्थापना कब की थी ?
    • 1501 ई० में
    • 1511 ई० में
    • 1521 ई० में
    • 1531 ई० में।

उत्तर-

  1. करतारपुर से भाव है ईश्वर का नगर।
  2. गुरु नानक देव जी ने करतारपुर में संगत व पंगत नाम की दो संस्थाओं की स्थापना की।
  3. गुरु नानक देव जी ने 976 शब्दों की रचना की।
  4. गुरु नानक देव जी की दो प्रमुख वाणियों के नाम जपुजी साहिब तथा आसा दी वार हैं।
  5. 1521 ई० में।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन पकाने के कारण

Punjab State Board PSEB 6th Class Home Science Book Solutions Chapter 3 भोजन पकाने के कारण Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Home Science Chapter 3 भोजन पकाने के कारण

PSEB 6th Class Home Science Guide भोजन पकाने के कारण Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
भोजन पकाने की सबसे सरल विधि कौन-सी है ?
उत्तर-
उबालना।

प्रश्न 2.
कौन-सा विटामिन पकाने से नष्ट हो जाता है ?
उत्तर-
विटामिन सी।

प्रश्न 3.
कौन-सा विटामिन भोजन पकाने पर नष्ट नहीं होता ?
उत्तर-
विटामिन ‘ए’, क्योंकि यह जल में घुलनशील नहीं होता।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन पकाने के कारण

प्रश्न 4.
भोजन पकाने का प्रमुख कारण क्या है ?
उत्तर-
भोजन को सरलता से पचने योग्य बनाना।

प्रश्न 5.
शुष्क सेंक से भोजन पकाने की दो विधियों के नाम लिखो।
उत्तर-
भूनना, बेक करना।

प्रश्न 6.
घी से पकाने की किसी एक विधि का नाम लिखो।
उत्तर-
तलना।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन पकाने के कारण

प्रश्न 7.
शक्करकन्दी आमतौर पर किस विधि से पका कर खाई जाती है ?
उत्तर-
भून कर।

प्रश्न 8.
पकाने से भोजन हानिरहित कैसे हो जाता है ?
उत्तर-
इसमें मौजूद बैक्टीरिया, सूक्ष्मजीव समाप्त हो जाते हैं।

प्रश्न 9.
गीले सेंक से पकाने के किसी एक तरीके का नाम लिखो।
उत्तर-
भाप से पकाना।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन पकाने के कारण

प्रश्न 10.
बेकिंग से पकने वाले दो खाद्य पदार्थों के नाम लिखो।
उत्तर-
केक, रस, बिस्कुट।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
खाना क्यों पकाया जाता है ?
उत्तर-
खाना स्वादिष्ट और सुपाच्य बनाने के लिए पकाया जाता है।

प्रश्न 2.
पके हुए तथा कच्चे भोजन में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
पके हुए तथा कच्चे भोजन में निम्नलिखित अन्तर हैं –

पका भोजन कच्चा भोजन
1. पका हुआ भोजन नर्म हो जाता है तथा चबाने और पचाने में सुगम होता है। 1. कच्चा भोजन सख्त होता है। अतः इसे चबाना एवं पचाना कठिन होता है।
2. पके हुए भोजन का रंग, रूप, स्वाद तथा सुगन्ध अच्छे हो जाते हैं। 2. बिना पकाए भोजन देखने अथवा खाने और सुगन्ध में अच्छे नहीं होते हैं।
3. पकाने से अधिक तापमान के कारण कई हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं। 3. कच्चे भोजन में कई हानिकारक कीटाणु होते हैं जो कि स्वास्थ्य को हानि पहुँचाते हैं।
4. पकाने से एक ही वस्तु को अलग-अलग तरीकों से बनाया जा सकता है। 4. यदि भोजन को पकाया न जाए और उसे एक रूप में खाया जाए तो उससे जल्दी ही मन भर जाता है।
5. पकाने से भोजन को ज़्यादा देर तक सुरक्षित रखा जा सकता है। 5. कच्चा भोजन जल्दी खराब हो जाता  है। उसमें जीवाणु उत्पन्न हो जाते हैं।

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प्रश्न 3.
उबालने तथा तलने के दोष लिखो।
उत्तर-
उबालने तथा तलने के निम्नलिखित दोष हैं –
उबालने के दोष –
1. ज़्यादा तेज़ी से पानी उबालने से पानी शीघ्र सूख जाता है तथा अधिक ईंधन का खर्च . होता है।
2. इस विधि से वस्तु शीघ्र नहीं पकती है।
तलने के दोष –
1. अधिक तलने-भूनने से कुछ पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
2. भोजन गरिष्ठ हो जाता है।
3. भोजन सुपाच्य न होने से कभी-कभी पाचन बिगड़ जाता है।

प्रश्न 4.
बेक करने तथा भूनने में क्या अन्तर हैं ?
उत्तर-
बेक करने तथा भूनने में निम्नलिखित अन्तर हैं –

बेक भूनना
1. इसमें पदार्थ को बन्द गर्म भट्ठी में रखकर ऊष्मा से पकाया जाता है। 1. इसमें पदार्थ को थोड़ी-सी चिकनाई लगाकर सेंका जाता है।
2. भोजन वाले बर्तन को पहले ज़्यादा तथा फिर कम आँच पर रखा जाता पर पकाया जाता है। 2. इसमें भोज्य पदार्थ को सीधे आँच पर पकाया जाता है।
3. इसमें भट्ठी का तापक्रम बराबर रहना चाहिए। 3. इसमें भट्ठी का तापक्रम सदैव धीमे चाहिए।
4. इसमें पानी के बिना भोजन के सारे तत्त्व सुरक्षित रहते हैं। 4. इसमें भोजन के तत्त्व भी आग में गिर जाते हैं।
5. इसमें कच्चे केले तथा अन्य फलों को भी मसाला लगाकर पकाया जाता है। 5. इसमें दाने भट्ठी पर कड़ाही में रखकर रेत में भूने जाते हैं।

प्रश्न 5.
कौन-कौन से भोज्य-पदार्थों को भूना जा सकता है ?
उत्तर-
निम्नलिखित भोज्य-पदार्थों को भूना जा सकता है –

1. आलू,
2. बैंगन,
3. मांस के टुकड़े,
4. मुर्गा,
5. मक्का के भुट्टे,
6. चपाती,
7. मछली,
8. दाने।

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन पकाते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए ?
उत्तर-
भोजन पकाते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए –

  1. भोजन पकाते समय पानी का तापक्रम एक जैसा रहना चाहिए।
  2. भोजन वाले बर्तन से पानी वाला बर्तन न बहुत बड़ा और न ही पूरा फिट होना चाहिए।
  3. भोजन वाला बर्तन यदि बन्द करके रखना हो तो उसके मुँह पर चिकना कागज़ लगाकर बन्द करना चाहिए।
  4. पानी के बर्तन को कसकर बंद करना चाहिए, ताकि भाप व्यर्थ न जाए।

प्रश्न 2.
जिस पानी में भोजन पकाया जाए उसे फेंकना क्यों नहीं चाहिए? भाप द्वारा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष पकाने में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर-
जिस पानी में भोजन पकाया जाए उसे इसलिए नहीं फेंकना चाहिए कि उसमें खनिज लवण घुल जाते हैं और पानी फेंकने पर ये पौष्टिक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।

भाप द्वारा भोजन पकाना-इस विधि में भोजन को उबलते हुए जल से निकली भाप से पकाया जाता है। खाद्य पदार्थ का पकना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से होता है –

1. प्रत्यक्ष विधि-
(i) जलरहित पकाना-जिन सब्जियों में स्वाभाविक जलांश रहता है उनमें यही जलांश उन्हें पकाने का काम करता है। इस विधि में भोजन धीमी आँच पर पकाया जाता है।

(ii) बफाना-इस विधि में डेगची या भगौने में पानी उबाला जाता है और उसके मुँह पर कपड़ा बाँध कर भोज्य वस्तु को उस पर रखकर और उसे ढक कर बफाते हैं।

(iii) इसमें एक विशेष प्रकार का पात्र उपयोग में लाते हैं जिसमें ढक्कनदार बर्तन होता है तथा ढक्कन में जालीदार थाली-सी लगी रहती है। इस पर रखकर सब्जी, गोश्त, इडली भाप द्वारा पकाते हैं।

2. अप्रत्यक्ष विधि-इस विधि में बन्द बर्तन में थोड़े पानी में खाद्य सामग्री को पकाया जाता है। ढक्कन इतना कसकर लगाया जाता है कि अन्दर की भाप बाहर नहीं निकले। खाद्य पदार्थ उसी भाप के दबाव से पक जाता है। इस विधि से पकाने के लिए प्रेशर कुकर का भी इस्तेमाल किया जाता है। प्रेशर कुकर में भोजन पकाने से ईंधन और समय की बचत तो होती ही है, साथ में भोज्य तत्त्व भी नष्ट नहीं होते हैं।

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प्रश्न 3.
किन भोजन पदार्थों को बिना पकाये खाया नहीं जा सकता ? सूची बनाइये।
उत्तर-
कई ऐसे भोजन पदार्थ हैं जिनको कच्चा खाया ही नहीं जा सकता। इसके कई कारण हो सकते हैं। भोज्य पदार्थ कठोर हो सकता है, इनमें से अच्छी सुगन्ध नहीं आती, ये देखने में अच्छे नहीं लगते आदि। इनको कच्चा खाने का मन नहीं करता। इसलिए इन्हें बिना पकाए नहीं खा सकते। निम्नलिखित भोजन पदार्थों को बिना पकाये नहीं खाया जा सकता, जैसे-अनाज, दालें, मांस, मछली, कई प्रकार की सब्जियां आदि।

प्रश्न 4.
तलने से क्या भाव है ?
उत्तर-
तलना-इस विधि द्वारा खूब गर्म घी अथवा तेल में भोज्य पदार्थ को तलकर पकाया जाता है। तलने के लिए आग तेज़ होनी चाहिए। भोज्य पदार्थ दो प्रकार से तला जाता है

1. अधिक चिकनाई में तलना या गहरा तलना-जिस बर्तन में खाद्य पदार्थ तलना है वह गहरा होना चाहिए, साथ ही पर्याप्त मात्रा में घी या तेल होना चाहिए। इस विधि में तेज़ आग पर खाद्य पदार्थ घी या तेल की गर्मी से पकता है। जब घी या तेल में से धुआँ उठने लगता है तब खाद्य सामग्री उसमें पकाने के लिये डाली जाती है।

2. उथला तलना-इस विधि में भोजन किसी भी चपटे बर्तन में बनाते हैं। तेल या घी कम मात्रा में इस्तेमाल करते हैं ताकि वस्तु बर्तन की सतह से चिपके नहीं। इसके लिए आग मध्यम रखते हैं। इस विधि से आलू की टिकिया, पूड़े, आमलेट, परांठे आदि बनाये जाते हैं।

तलने से भोजन स्वादिष्ट होता है, देखने में भी सुन्दर व आकर्षक लगता है। तली हुई चीजें शीघ्रता से नहीं पचती हैं। अधिक ताप पर खाद्य पदार्थ के विटामिन नष्ट हो जाते हैं।

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Home Science Guide for Class 6 PSEB भोजन पकाने के कारण Important Questions and Answers

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन पकाने की सर्वोत्तम विधि कौन-सी है ?
उत्तर-
भाप द्वारा पकाना।

प्रश्न 2.
भाप द्वारा भोजन पकाने की विधि सर्वोत्तम विधि क्यों मानी जाती है ?
उत्तर-
क्योंकि इस विधि में भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते। भोजन हल्का व शीघ्रता से पचने वाला होता है।

प्रश्न 3.
विटामिन ‘सी’ भोजन पकाने पर नष्ट क्यों हो जाता है ?
उत्तर-
क्योंकि यह जल में घुलनशील होता है तथा ताप के प्रभाव से भी नष्ट हो जाता है।

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प्रश्न 4.
मक्खन को गर्म क्यों नहीं करना चाहिए ?
उत्तर-
मक्खन को गर्म करने से उसका विटामिन ‘ए’ नष्ट हो जाता है।

प्रश्न 5.
भारतीय शैली में भोजन के अन्त में क्या परोसा जाता है ?
उत्तर-
मीठी चीजें (स्वीट डिश)।

प्रश्न 6.
भोजन परोसने की तीन विधियाँ कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर-

  1. भारतीय शैली,
  2. विदेशी शैली,
  3. बुफे भोज।

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प्रश्न 7.
यथासम्भव एक ही धातु के पात्रों में भोजन क्यों परोसना चाहिए ?
उत्तर-
एकरूपता होने के कारण आकर्षण बढ़ता है।

प्रश्न 8.
बुफे विधि प्रायः कहाँ प्रयोग में लाई जाती है ?
उत्तर-
शादी, पार्टियों, सामूहिक भोज आदि अवसरों पर।

प्रश्न 9.
सेकने की विधि द्वारा भोजन पकाने के लाभ तथा हानि क्या हैं ?
उत्तर-
लाभ- भोज्य पदार्थ स्वादिष्ट तथा पोषक तत्त्वयुक्त रहता है। हानि-यह महँगी विधि है और इसमें अधिक सावधानी की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 10.
चावल पकाते समय चावलों में कितना पानी डालना चाहिए ?
उत्तर-
जितना पानी चावल सोख लें।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
उबालना और धीमे ताप पर पकाने में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
उबालने और धीमे ताप पर पकाने में अन्तर –

उबालना धीमे ताप पर पकाना
1. भोजन जल्दी पकता है। 1. भोजन देर से पकता है।
2. ईंधन कम खर्च होता है। 2. ईंधन अधिक खर्च होता है।
3. इसमें भोजन अधिक ताप पर (100°C या 212°F) पर पकाया जाता है। 3. इसमें भोजन कम ताप (90°C या 100°F) पर पकाया जाता है।
4. इसमें पानी की मात्रा अधिक रखी जाती है। 4. इस विधि में पानी की मात्रा कम  रखी जाती है। पानी छोड़ने वाले पदार्थ में पानी बिल्कुल नहीं डाला जाता।
5. भोज्य पदार्थ में उपस्थित पोषक तत्त्व, रंग, गंध आदि जल में घुल-मिल जाता है। 5. इसमें पोषक तत्त्व, स्वाद व सुगन्ध सुरक्षित रहते हैं।

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प्रश्न 2.
गहरा तलना से क्या भाव है ?
उत्तर-
जिस बर्तन में खाद्य पदार्थ तलना है वह गहरा होना चाहिए, साथ ही पर्याप्त मात्रा में घी या तेल होना चाहिए। इस विधि में तेज़ आग पर खाद्य पदार्थ घी या तेल की गर्मी से पकता है। जब घी या तेल में से धुआँ उठने लगता है तब खाद्य सामग्री उसमें पकाने के लिये डाली जाती है।

प्रश्न 3.
अप्रत्यक्ष भूनना के बारे में लिखें।
उत्तर-
अप्रत्यक्ष भूनना- इस विधि में किसी माध्यम को गर्म करके उसकी ऊष्मा द्वारा भोज्य पदार्थ को भूनते हैं। चना, मटर, मूंगफली, मक्का, गेहूँ को गर्म बालू में भूना जाता है। टोस्टर में डबल रोटी के टुकड़े भी इसी विधि द्वारा भूने जाते हैं।

प्रश्न 4.
बफाना से क्या भाव है ?
उत्तर-
बफाना-इस विधि में डेगची या भगौने में पानी उबाला जाता है और उसके मुँह पर कपड़ा बाँध कर भोज्य वस्तु को उस पर रखकर और उसे ढक कर बफाते हैं।

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प्रश्न 5.
तलने से क्या भाव है ?
उत्तर-
तलना-इस विधि द्वारा खूब गर्म घी अथवा तेल में भोज्य पदार्थ को तलकर पकाया जाता है। तलने के लिए आग तेज़ हानी चाहिए।

प्रश्न 6.
उबालने के लाभ लिखें।
उत्तर-
उबालने के लाभ –

  1. उबाला हुआ भोजन आसानी से पचने योग्य होता है।
  2. इस विधि में भोजन के पौष्टिक तत्त्व कम नष्ट होते हैं।
  3. यह विधि सरल तथा कम खर्चीली है।
  4. प्रेशर कुकर में खाद्य पदार्थ उबालने से समय और ईंधन की भी बचत होती है।

प्रश्न 7.
तलने के लाभ लिखें।
उत्तर-
तलने के लाभ –

  1. तला हुआ भोजन अधिक स्वादिष्ट हो जाता है।
  2. भोज्य पदार्थ का वसा से संयोग होने के कारण कैलोरी भार अधिक बढ़ जाता है।
  3. तले पदार्थ शीघ्र खराब नहीं होते।

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बड़े उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
भोजन पकाने की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
भोजन पकाने की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –
1. उबालना
2. तलना
3. भूनना
4. भाप से पकाना
5. सेकना
6. धीमी आँच पर भोजन पकाना (स्ट्यू करना)।
1. उबालना-उबाल कर भोजन पकाने की विधि सबसे प्राचीन, सरल व साधारण है। इसमें पानी की गर्मी से ही खाद्य पदार्थ पकता है। पानी के उबलने (100°C या 212°F) के बाद आँच धीमी कर देनी चाहिए ताकि तापक्रम पूरे समय तक एक-सा नियन्त्रित रहे। दाल, चावल, मांस, तरकारी आदि इसी विधि से उबाले जाते हैं। उबालने की क्रिया में भोज्य पदार्थ में उपस्थित पोषक तत्त्व, रंग, गंध आदि जल में घुल-मिल जाते हैं तथा उसको स्वादिष्ट बना देते हैं। दाल व चावल को उबालने के लिए उतना ही पानी डालना चाहिए कि पक जाने पर उसे फेंकना न पड़े।

2. तलना-इस विधि द्वारा खूब गर्म घी अथवा तेल में भोज्य पदार्थ को तलकर जाता है –
(1) अधिक चिकनाई में तलना या गहरा तलना-जिस बर्तन में खाद्य पदार्थ तलना है वह गहरा होना चाहिए, साथ ही पर्याप्त मात्रा में घी या तेल होना चाहिए। इस विधि में तेज़ आग पर खाद्य पदार्थ घी या तेल की गर्मी से पकता है। जब घी या तेल में से धुआँ उठने लगता है तब खाद्य सामग्री उसमें पकाने के लिये डाली जाती है।

(2) उथला तलना-इस विधि में भोजन किसी भी चपटे बर्तन में बनाते हैं। तेल या घी कम मात्रा में इस्तेमाल करते हैं ताकि वस्तु बर्तन की सतह से चिपके नहीं। इसके लिए आग मध्यम रखते हैं। इस विधि से आलू की टिकिया, पूड़े, आमलेट, परांठे आदि बनाये जाते हैं।
तलने से भोजन स्वादिष्ट होता है, देखने में भी सुन्दर व आकर्षक लगता है। तली हुई चीजें शीघ्रता से नहीं पचती हैं। अधिक ताप पर खाद्य पदार्थ के विटामिन नष्ट हो जाते हैं।

3. भूनना-पकाने की इस विधि में खाद्य पदार्थ को अग्नि के सीधे सम्पर्क में लाया जाता है। भूनना निम्नलिखित प्रकार का होता है –
(1) प्रत्यक्ष भूनना-इस विधि में भोज्य वस्तु सीधे आग के सम्पर्क में आती है। पदार्थ को चारों ओर घुमाकर भूनते हैं, जैसे आलू, बैंगन, मांस के टुकड़े, मुर्गा, मक्का के भुट्टे, चपाती आदि।

(2) अप्रत्यक्ष भूनना-इस विधि में किसी माध्यम को गर्म करके उसकी ऊष्मा द्वारा भोज्य पदार्थ को भूनते हैं। चना, मटर, मूंगफली, मक्का, गेहूँ को गर्म बालू में भूना जाता है। टोस्टर में डबल रोटी के टुकड़े भी इसी विधि द्वारा भूने जाते हैं।
(3) पात्र में भूनना-इस विधि में भोज्य पदार्थ को किसी बर्तन में डालकर बर्तन आग पर रखकर भूना जाता है लेकिन भूनने में चिकनाई का प्रयोग किया जाता है।

4. भाप द्वारा भोजन पकाना-इस विधि में भोजन को उबलते हुए जल से निकली भाप से पकाया जाता है। खाद्य पदार्थ का पकना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार से होता –
(1) प्रत्यक्ष विधि-
(i) जलरहित पकाना-जिन सब्जियों में स्वाभाविक जलांश रहता है उनमें यही जलांश उन्हें पकाने का काम करता है। इस विधि में भोजन धीमी आँच पर पकाया जाता है।

(ii) बफाना-इस विधि में डेगची या भगौने में पानी उबाला जाता है और उसके मुँह पर कपड़ा बाँध कर भोज्य वस्तु को उस पर रखकर और उसे ढक कर बफाते हैं।

(iii) इसमें एक विशेष प्रकार का पात्र उपयोग में लाते हैं जिसमें ढक्कनदार बर्तन होता है तथा ढक्कन में जालीदार थाली-सी लगी रहती है। इस पर रखकर सब्जी, गोश्त, इडली भाप द्वारा पकाते हैं।

(2) अप्रत्यक्ष विधि-इस विधि में बन्द बर्तन में थोड़े पानी में खाद्य सामग्री को पकाया जाता है। ढक्कन इतना कसकर लगाया जाता है कि अन्दर की भाप बाहर नहीं निकले। खाद्य पदार्थ उसी भाप के दबाव से पक जाता है। इस विधि से पकाने के लिए प्रेशर कुकर का भी इस्तेमाल किया जाता है। प्रेशर कुकर में भोजन पकाने से ईंधन और समय की बचत तो होती ही है, साथ में भोज्य तत्त्व भी नष्ट नहीं होते हैं।

5. सेकना-इस विधि में भोज्य पदार्थों को किसी भी तरह से पूरी तपी हुई भट्टी या तन्दूर (Oven) में पकाया जाता है। शुष्क उष्णता ही पकाने का माध्यम रहती है। सेकने की दो विधियाँ हैं
(1) सीधे ताप पर रखकर सेकना-इस प्रकार सेके जाने वाले आहारीय पदार्थों में रोटी तथा पापड़ आते हैं। इन्हें सदैव धीमे ताप पर सेकना चाहिए।

(2) बेकिंग-इस विधि में गर्म हवा का एक स्थान से दूसरे स्थान पर संवाहन होता रहता है। विभिन्न प्रकार के व्यंजनों को बेक करने के लिए भिन्न-भिन्न तापक्रम रखना पड़ता है। इस विधि से अधिकतर तन्दूरी रोटी, पावरोटी, पेस्ट्री, केक, बिस्कुट आदि बनाए जाते हैं। सेकने के लिए बर्तनों का विभिन्न आकार होता है। इस विधि में भट्टी का तापक्रम एक-सा होना चाहिए जिससे पेस्ट्री या केक के चारों ओर से ऊष्मा मिल सके। भट्टी गर्म होने के बाद ही भोज्य पदार्थ उसमें रखना चाहिए। तन्दूर (oven) का तापक्रम आवश्यकता से अधिक नहीं होना चाहिए। सेकने के बर्तन में वसा अवश्य लगा लेनी चाहिए जिससे भोज्य पदार्थ पक जाने के बाद आसानी से निकल सके।

6. धीमी आँच पर भोजन पकाना (स्ट्य करना)-इस विधि में भोज्य पदार्थों को बन्द बर्तन में रखकर, धीमी आँच पर धीरे-धीरे पकाया जाता है। इसमें पानी की मात्रा कम रखी जाती है। पानी छोड़ने वाले पदार्थ में पानी बिल्कुल ही नहीं डाला जाता है। इस विधि में पानी का तापक्रम 180°F या 90°C तक रहता है। पकाते समय ढक्कन विधिवत् बन्द कर देना चाहिए, ताकि वाष्प बाहर न निकलने पाये। इस विधि में भोजन पकाने पर उसका स्वाद, सुगन्ध, पोषक तत्त्व सुरक्षित रहते हैं। मांस, साग, सब्जी तथा फल का स्ट्यू इसी विधि से तैयार किया जाता है। मन्द ताप से कठोर हुए बिना प्रोटीन का स्कन्दन हो जाता है।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 3 भोजन पकाने के कारण

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
पकाया हुआ भोजन ……… पच जाता है।
उत्तर-
आसानी से।

प्रश्न 2.
भोजन को कितने ढंगों द्वारा पकाया जाता है ?
उत्तर-
तीन।

प्रश्न 3.
भोजन पकाने का सस्ता तथा सरल ढंग बताएं।
उत्तर-
स्ट्यू करना।

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प्रश्न 4.
बेक करके क्या पकाया जाता है, एक का नाम बताएं।
उत्तर-
केक।

प्रश्न 5.
उथला तलना विधि द्वारा पकाए जाने वाले एक पदार्थ का नाम लिखें।
उत्तर-
आलू की टिक्की।

प्रश्न 6.
भोजन तलने का एक दोष बताएं।
उत्तर-
भोजन पचने में मुश्किल होती है।

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प्रश्न 7.
भोजन को अधिक घी में पकाने के तरीके को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
तलना।

प्रश्न 8.
टोस्टर में डबलरोटी को भूनना, भूनने की कैसी विधि है ?
उत्तर-
अप्रत्यक्ष भूनना।

प्रश्न 9.
स्ट्यू करते समय पानी का तापमान कितना होता है ?
उत्तर-
90° C.

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भोजन पकाने के कारण PSEB 6th Class Home Science Notes

  • पका हुआ भोजन सुगमता से पच जाता है।
  • पकाने से खाने वाली चीज़ का रंग, रूप, स्वाद तथा सुगंध को अच्छा बनाया जा सकता है।
  • पकाने से कई तरह के हानिकारक बैक्टीरिया तथा अन्य सूक्ष्म जीवाणु मर जाते हैं तथा भोजन हानिरहित हो जाता है।
  • पकाने से भोजन को अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
  • भोजन को तीन ढंगों से पकाया जा सकता है –
    1. सूखे सेंक से पकाना, 2. गीले सेंक से पकाना, 3. घी में पकाना।
  • जब किसी चीज़ को अधिक पानी में पकाया जाए तो उसे उबालना कहते हैं।
  • पदार्थ को थोड़ी-सी चिकनाई लगाकर सेंकने को भूनना कहते हैं।
  • पका भोजन शीघ्र पचने वाला तथा मीठी सुगन्ध वाला होता है।
  • भोजन को घी में पकाने को तलना कहते हैं।
  • दाने भट्ठी पर कड़ाही में रखकर रेत से भूने जाते हैं।
  • तला हुआ भोजन निःसंदेह स्वादिष्ट होता है, परन्तु सख्त तथा भारी होता है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 4 कृषि उत्पादों का मंडीकरण

Punjab State Board PSEB 11th Class Agriculture Book Solutions Chapter 4 कृषि उत्पादों का मंडीकरण Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Agriculture Chapter 4 कृषि उत्पादों का मंडीकरण

PSEB 11th Class Agriculture Guide कृषि उत्पादों का मंडीकरण Textbook Questions and Answers

(क) एक-दो शब्दों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
उपयुक्त मंडीकरण फसल की कटाई से पूर्व आरम्भ होता है या बाद में ?
उत्तर-
पहले।

प्रश्न 2.
यदि किसान महसूस करें कि उन्हें मंडी में उत्पाद का उचित मूल्य नहीं दिया जा रहा, तो उन्हें किसके साथ सम्पर्क करना चहिए?
उत्तर-
मार्केटिंग इंस्पैक्टर तथा मार्केटिंग कमेटी वालों से।.

प्रश्न 3.
यदि बोरी के वजन से अधिक उत्पाद तोला गया हो तो इसकी शिकायत किस को करनी चाहिए?
उत्तर-
मंडीकरण के उच्च अधिकारी से।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 4 कृषि उत्पादों का मंडीकरण

प्रश्न 4.
उत्पाद को मंडी में ले जाने से पूर्व कौन सी दो बातों की ओर ध्यान देना जरूरी है?
उत्तर-

  1. दानों में नमी की मात्रा निर्धारित माप दण्ड के अनुसार ठीक होनी चाहिए।
  2. उत्पाद की सफाई।

प्रश्न 5.
मंडी गोबिंदगढ़, मोगा और जगराओं में गेहूं संभालने के लिए ब्लॉक हैंडलिंग इकाइयां किसने स्थापित की हैं ?
उत्तर-
भारतीय खाद्य निगम।

प्रश्न 6.
किसानों को फसल की तोलाई के बाद आढ़ती से कौन सा फार्म लेना जरूरी है?
उत्तर-
जे (J) फार्म।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 4 कृषि उत्पादों का मंडीकरण

प्रश्न 7.
अलग-अलग मंडियों में उत्पादों के मूल्यों (कीमतों) की जानकारी किन साधनों द्वारा प्राप्त की जा सकती है?
उत्तर-
टी०वी०, रेडियो, समाचार-पत्र आदि द्वारा।

प्रश्न 8.
सरकारी खरीद एजेंसियां उत्पाद का मूल्य किस आधार पर लगाती हैं ?
उत्तर-
नमी की मात्रा देख कर।

प्रश्न 9.
संदेह के आधार पर मंडीकरण एक्ट के अनुसार कितने प्रतिशत तक उत्पाद की तोलाई बिना पैसे दिए करवाई जा सकती है?
उत्तर-
10% उत्पाद की।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 4 कृषि उत्पादों का मंडीकरण

प्रश्न 10.
कौन सा एक्ट किसानों को तुलाई पड़ताल का अधिकार देता है?
उत्तर-
मंडीकरण एक्ट 1961।

(ख) एक-दो वाक्यों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
कृषि सम्बन्धी कौन-कौन से काम करते समय विशेषज्ञों की राय लेनी चाहिए?
उत्तर-
गुडाई, दवाइयों का प्रयोग, पानी, खाद, कटाई, गहाई इत्यादि कार्य करते समय विशेषज्ञों की राय लेनी चाहिए।

प्रश्न 2.
खेती के लिए फसलों का चुनाव करते समय किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर-
कृषि के लिए उस फसल का चुनाव करें जिससे अधिक लाभ मिल सकता है और इस फसल की बढ़िया किस्म की ही बुआई करें।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 4 कृषि उत्पादों का मंडीकरण

प्रश्न 3.
उत्पाद बिक्री के लिए मंडी में ले जाने से पूर्व किस बात की पड़ताल कर लेनी चाहिए?
उत्तर-
मंडी ले जाने से पहले दानों के बीच नमी की मात्रा निर्धारित मापदण्डों के अनुसार है या नहीं इसकी जांच कर लेनी चाहिए और फसल को तोल कर और वर्गीकरण करके मण्डी में ले जाने पर अधिक लाभ मिलता है।

प्रश्न 4.
मंडी में उत्पाद की बिक्री के समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर-
सफ़ाई, तोल और बोली के समय किसान अपनी ढेरों के पास ही खड़ा रहे और देखे कि उसके उत्पाद का मूल्य ठीक लग रहा है या नहीं। यदि मूल्य ठीक न लगे तो मार्केटिंग इन्स्पैक्टर की सहायता ली जा सकती है। तोलाई वाले बाटों पर सरकारी मोहर लगी होनी चाहिए।

प्रश्न 5.
ब्लॉक हैंडलिंग इकाइयों में सीधे उत्पाद बिक्री से क्या लाभ होते हैं ?
उत्तर-
बल्क हैंडलिंग इकाइयों में सीधा उत्पाद बिक्री से कई लाभ होते हैं, जैसे-पैसे का भुगतान उसी दिन हो जाता है, मंडी का खर्चा नहीं देना पड़ता, मज़दूरों का खर्चा बचता है, प्राकृतिक आपदाओं, जैसे-वर्षा, आंधी आदि के कारण उत्पाद नुकसान से बच जाता है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 4 कृषि उत्पादों का मंडीकरण

प्रश्न 6.
मंडी में उत्पाद की निगरानी क्यों जरूरी है?
उत्तर-
कई बार मंडी में मज़दूर जानबूझ कर उत्पाद को किसी अन्य ढेरी में मिला देते हैं या कई बार उत्पाद को बचे हुए ‘छान’ में मिला देते हैं जिससे किसान को बहुत नुकसान हो जाता है। इसलिए उत्पाद का ध्यान रखना ज़रूरी है।

प्रश्न 7.
अलग-अलग मंडियों में उत्पादों के मूल्यों की जानकारी के क्या लाभ हैं?
उत्तर-
फसल की मंडी में आमद अधिक हो जाने या कम हो जाने पर कीमतें घटती तथा बढ़ती रहती हैं। इसलिए मंडियों के मूल्यों की लगातार जानकारी लेते रहना चाहिए ताकि अधिक मूल्य पर उत्पाद बेचा जा सके।

प्रश्न 8.
मार्किट कमेटी के दो मुख्य काम क्या हैं ?
उत्तर-
मार्किट कमेटी का मुख्य काम मण्डी में किसानों के अधिकारों की रक्षा करना है। यह उत्पाद की बोली करवाने में पूरा-पूरा तालमेल बना कर रखती है। इसके अलावा उत्पाद की तुलाई भी ठीक ढंग से होती है यह भी ध्यान रखती है।

PSEB 11th Class Agriculture Solutions Chapter 4 कृषि उत्पादों का मंडीकरण

प्रश्न 9.
श्रेणीबद्ध से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
फसल को उसकी गुणवत्ता के अनुसार भिन्न-भिन्न भागों में बांटने को वर्गीकरण (श्रेणीबद्ध) करना कहा जाता है।

प्रश्न 10.
जे (J) फार्म लेने के क्या-क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
जे (J) फार्म में बिक चुके उत्पाद के बारे में सारी जानकारी होती है, जैसेउत्पाद की मात्रा, बिक्री कीमत तथा प्राप्त किए खर्चे । यह फार्म लेने के अन्य लाभ हैं कि बाद में यदि कोई बोनस मिलता है तो वह भी प्राप्त किया जा सकता है तथा मण्डी फीस की चोरी को भी रोका जा सकता है।

(ग) पांच-छ: वाक्यों में उत्तर दो-

प्रश्न 1.
मंडीकरण में सरकारी दखल पर नोट लिखो।
उत्तर-
एक समय था जब कृषक अपनी उपज के लिए व्यापारियों पर निर्भर था। व्यापारी अकसर कृषक को अधिक उत्पाद लेकर कम दाम ही देते थे। अब सरकार द्वारा कई नियम कानून बना दिए गए हैं तथा मार्किट कमेटियां, सहकारी संस्थाएं आदि बन गई हैं। नियमों कानूनों के अनुसार किसान को उचित दाम तो मिलता ही है क्योंकि सरकार द्वारा कमसे-कम निर्धारित मूल्य तय कर दिया जाता है। किसान को यदि किसी तरह का शक हो तो वह अपने उत्पाद की तुलाई करवा सकता है तथा पैसे नहीं लगते। सरकार द्वारा मैकेनिकल हैंडलिंग इकाइयां भी स्थापित की गई हैं। किसान अपने उत्पाद को बेच कर आढ़ती से फार्म-J ले सकता है जिसके बाद में बोनस मिलने पर किसान को सुविधा रहती है। इस प्रकार सरकार के दखल से किसान के अधिकार अधिक सुरक्षित हो गए हैं।

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प्रश्न 2.
सहकारी मंडीकरण का संक्षेप में विवरण दो।
उत्तर-
सहकारी मंडीकरण द्वारा किसानों को अपनी उपज बेच कर अच्छा दाम मिल जाता है। ये सभाएं आम करके कमीशन ऐजंसियों का काम करती हैं। ये सभाएं किसानों द्वारा ही बनाई जाती हैं। इसलिए यह किसानों को अधिक दाम प्राप्त करवाने के लिए सहायक होती हैं। इनके द्वारा किसानों को आढ़ती से जल्दी भुगतान हो जाता है। इन सभाओं द्वारा किसानों को अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं; जैसे-फसलों के लिए ऋण तथा सस्ते दाम पर खादें, कीटनाशक दवाइयां मिलना आदि।

प्रश्न 3.
कृषि उत्पादों को श्रेणीबद्ध करने के क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
वर्गीकरण (श्रेणीबद्ध) की हुई फसल का मूल्य अच्छा मिलता है। अच्छी उपज एक ओर करके अलग दों में मंडी में लेकर जाओ। घटिया उपज को दूसरे दर्जे में रखो। इस प्रकार अधिक लाभ कमाया जा सकता है। यदि वर्गीकरण (श्रेणीबद्ध) किए बिना घटिया वस्तु नीचे और ऊपर अच्छी वस्तु रख कर बेची जाएगी तो कुछ दिन तो अच्छे पैसे कमा लोगे परन्तु जल्दी ही लोगों को इस बात का पता चल जाएगा और किसान ग्राहकों में अपना विश्वास खो बैठेगा और दोबारा लोग ऐसे किसानों से चीज़ खरीदने में परहेज करेंगे। परन्तु यदि किसान मंडी में ईमानदारी के साथ अपना माल बेचेगा तो लोग भी उसका माल खरीदने के लिए उत्सुक होंगे और किसान अब लम्बे समय तक लाभ कमाता रहेगा। ऐसा तब ही हो सकता है जब कृषक अपनी उपज की दर्जाबन्दी करें।

प्रश्न 4.
मकैनिकल हैंडलिंग इकाइयों पर संक्षेप में नोट लिखो।
उत्तर-
पंजाब राज्य मंडी बोर्ड द्वारा पंजाब में कुछ मंडियों में मकैनिकल हैंडलिंग इकाइयां स्थापित की गई हैं। इन इकाइयों की सहायता से किसान के उत्पाद की सफाई, भराई तथा तुलाई मशीनों द्वारा मिनटों में हो जाती है। यदि इसी कार्य को मजदूरों ने करना हो तो कई घण्टे लग जाएंगे। इन इकाइयों का प्रयोग किया जाए तो किसानों को कम खर्चा करना पड़ता है तथा उत्पाद की कीमत भी अधिक मिल जाती है। रकम का भुगतान भी उसी समय हो जाता है। भारतीय खाद्य निगम द्वारा मोगा, मंडी गोबिंदगढ़ तथा जगराओं में गेहूँ को संभालने के लिए इसी तरह की बड़े स्तर पर इकाइयों की स्थापना की गई हैं । यहां किसान सीधा गेहूँ बेच सकता है। उसको उसी दिन भुगतान हो जाता है। मंडी का खर्चा नहीं पड़ता, प्राकृतिक आपदाओं से भी उत्पाद का बचाव हो जाता है। किसान को इन इकाइयों का पूरा लाभ लेना चाहिए।

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प्रश्न 5.
कृषि उत्पादों के उपयुक्त मंडीकरण के क्या लाभ हैं?
उत्तर-
फसल उगाने के लिए बड़ी मेहनत लगती है और इसका उचित मूल्य भी मिलना चाहिए। इसके लिए मंडीकरण का काफ़ी महत्त्व हो जाता है। मण्डीकरण की तरफ बुवाई के समय से ही ध्यान देना चाहिए। ऐसी फसल की कृषि करें जिससे अधिक लाभ मिल सके। अधिक फसल की उन्नत किस्म की बुवाई करें। फसल की सम्भाल ठीक ढंग से करें। खादें, कृषि जहर, निराई, सिंचाई आदि के लिए कृषि विशेषज्ञों की राय लें। फसल को धूल मिट्टी से बचाएं। इसे नाप तोल कर और इसका वर्गीकरण करके ही मण्डी में लेकर जाएं। मण्डी में जल्दी पहुंचे और कोशिश करें कि उसी दिन फसल बिक जाए।

Agriculture Guide for Class 11 PSEB कृषि उत्पादों का मंडीकरण Important Questions and Answers

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हम अपनी उपज का उपयुक्त मूल्य कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?
उत्तर-
उपज के मण्डीकरण की ओर विशेष ध्यान देकर।

प्रश्न 2.
उपयुक्त मण्डीकरण कब आरम्भ होता है?
उत्तर-
बुवाई के समय से ही।

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प्रश्न 3.
उपज का पूर्ण मूल्य लेने के लिए उसमें कितनी नमी होनी चाहिए?
उत्तर-
नमी की मात्रा निर्धारित मापदंडों के अनुसार होनी चाहिए।

प्रश्न 4.
सफाई, तोलाई और बोली के समय किसान को कहां होना चाहिए?
उत्तर-
अपने उत्पाद के समीप।

प्रश्न 5.
किस प्रकार की फसल की कृषि के बारे में किसान को सोचना चाहिए?
उत्तर-
जिससे अधिक मुनाफा कमाया जा सके।

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प्रश्न 6.
आकार के अनुसार सब्जियों और फलों के वर्गीकरण (श्रेणीबद्ध करने) को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-
वर्गीकरण या श्रेणीबद्ध या दर्जाबंदी।

प्रश्न 7.
क्या अपने उत्पाद को बिक्री के लिए मण्डी ले जाने से पहले मण्डी की परिस्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए अथवा नहीं ?
उत्तर-
मण्डी की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।

प्रश्न 8.
उपयुक्त मण्डीकरण की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है या नहीं ?
उत्तर-
अच्छे मण्डीकरण की ओर ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है।

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प्रश्न 9.
फसल निकालने के बाद इसे तोलना क्यों चाहिए?
उत्तर-
ऐसा करने से मण्डी में बेची जाने वाली फसल का अन्दाज़ा रहता है।

प्रश्न 10.
आढ़ती से फार्म पर रसीद लेने का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
इस तरह क्या कमाया, कितना खर्च किया इसकी पड़ताल की जा सकती है।

प्रश्न 11.
यदि किसान को उसके उत्पाद का उचित मूल्य न मिल रहा हो तो उसे क्या करना चाहिए?
उत्तर-
यदि उत्पाद का उचित मूल्य न मिले तो मार्केटिंग इन्सपैक्टर की सहायता लेनी चाहिए।

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प्रश्न 12.
सब्जियों और फलों का वर्गीकरण (श्रेणीबद्ध) करने से क्या लाभ होता है ?
उत्तर-
वर्गीकरण (श्रेणीबद्ध) किए हुए फलों और सब्जियों को बेचने पर अधिक मूल्य प्राप्त होता है।

प्रश्न 13.
लोगों का विश्वास जीतने के लिए किसान को क्या करना चाहिए?
उत्तर-
किसान को वर्गीकरण करके अपनी फसल ईमानदारी से बेचनी चाहिए ताकि ग्राहकों का विश्वास बनाया जा सके।

प्रश्न 14.
खेती उत्पादों के मण्डीकरण से क्या भाव है?
उत्तर-
फसलों की मण्डी में अच्छी बिक्री।

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प्रश्न 15.
उत्तम क्वालटी के उत्पाद तैयार करने के लिए किसानों को किसकी आवश्यकता है?
उत्तर-
शोधित प्रमाणित बीज तथा अच्छी योजनाबंदी।

प्रश्न 16.
वर्गीकरण ( श्रेणीबद्ध) करके उत्पाद भेजने से कितनी अधिक कीमत मिल जाती है?
उत्तर-
10 से 20%

प्रश्न 17.
मण्डी में उत्पाद कब लेकर जाना चाहिए?
उत्तर-
सुबह ही।

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प्रश्न 18.
फसल की कटाई पूरी तरह पकने से पहले करने से क्या होता है?
उत्तर-
दाने सिकुड़ जाते हैं।

प्रश्न 19.
देर से कटाई करने की क्या हानि है?
उत्तर-
दाने झड़ने का डर रहता है।

प्रश्न 20.
दर्जाबंदी सहायक कहां होता है ?
उत्तर-
दाना मण्डी में नियुक्त होता है।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
फसल की संभाल उपयुक्त विधि से करने का क्या भाव है?
उत्तर-
फसल की संभाल उपयुक्त विधि से करने का भाव है कि गुड़ाई, दवाइयों का प्रयोग, खाद, पानी, कटाई तथा गहाई के काम विशेषज्ञों के मतानुसार करना चाहिए।

प्रश्न 2.
किसान को फसल का अच्छा मूल्य लेने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर-

  1. किसान को अपनी फसल तोल, माप कर मण्डी में ले जानी चाहिए।
  2. किसान को उत्पाद की दर्जाबंदी (श्रेणीबद्ध) करके मण्डी में लेकर जाना चाहिए।
  3. उत्पाद में नमी की मात्रा निर्धारित माप-दंडों के अनुसार होनी चाहिए।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए किसान को किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर-

  1. सफाई, तोलाई तथा बोली के समय किसान को अपने उत्पाद के समीप रहना चाहिए।
  2. यदि उत्पाद की कम कीमत मिले तो किसान को मार्केटिंग इंस्पैक्टर तथा मार्कीट कमेटी के अमले की सहायता लेनी चाहिए।
  3. तोलाई के समय तुला तथा वाटों के ऊपर सरकारी मोहर देख लेनी चाहिए।
  4. उत्पाद बेचने की आढ़ती से फार्म पर रसीद लेनी चाहिए।

प्रश्न 2.
कृषि उत्पादों की बिक्री के समय कौन-सी बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर-

  1. सफ़ाई, तोलाई और बोली के समय किसान अपनी ढेरी के पास ही खड़ा हो।
  2. तोलाई के समय तराजू और बाटों की जांच करो। बांटों पर सरकारी मोहर लगी होनी चाहिए।
  3. यदि लगे कि फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है तो मार्केटिंग इन्स्पैक्टर और मार्केटिंग स्टाफ की सहायता लो।
  4. फसल बेचकर आढ़ती से फार्म के ऊपर रसीद ले लो। इस तरह लाभ और खर्चों की जांच की जा सकती है।

प्रश्न 3.
अधिक लाभ कमाने के लिए किसान को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर-

  1. ऐसी फसल बोएं जिससे अच्छी आमदन हो जाए।
  2. अच्छी किस्म का पता करने के बाद बोना चाहिए।
  3. फसल की संभाल अच्छी प्रकार करनी चाहिए।
  4. गुड़ाई, दवाइयों का प्रयोग, खाद, सिंचाई, कटाई, गहाई विशेषज्ञों की राय के अनुसार करें।

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कृषि उत्पादों का मंडीकरण PSEB 11th Class Agriculture Notes

  • कृषि उपज का मंडीकरण बढ़िया ढंग से किया जाए तो अधिक मुनाफ़ा कमाया जा सकता है।
  • अच्छे मंडीकरण के लिए बुवाई के समय से ही ध्यान रखना पड़ता है।
  • अधिक पैसा दिलाने वाली फसल की उत्तम किस्म की बुवाई करें।
  • निराई, दवाइयों का प्रयोग, पानी, खाद, कटाई आदि विशेषज्ञों की सलाह से करें।
  • उत्पाद निकालने के बाद इसे तोल लेना चाहिए। यह बेहद जरूरी है।
  • उत्पादों का वर्गीकरण करके उसे मंडी में ले जाएं।
  • उत्पाद बेचने के दौरान आढ़ती से फार्म व रसीद ले लें ताकि मुनाफे और खर्चे की पड़ताल की जा सके।
  • किसानों को अपनी उपज का मंडीकरण सांझी तथा सहकारी संस्थाओं द्वारा करना चाहिए।
  • पंजाब राज्य मण्डी बोर्ड द्वारा कुछ मंडियों में मकैनिकल हैंडलिंग इकाइयाँ स्थापित की गई हैं।
  • भारतीय खाद्य निगम द्वारा मंडी गोबिन्दगढ़, मोगा तथा जगराओं में गेहँ को संभालने के लिए बड़े स्तर पर प्रबंध इकाइयों की स्थापना की गई है।
  • कृषकों को अपने आस-पास की मंडियों के भाव की जानकारी लेते रहना चाहिए।
  • भिन्न-भिन्न मंडियों के मूल्य रेडियो, टी०वी० तथा समाचार-पत्रों आदि से भी पता लगते रहते हैं।
  • कृषक को उत्पाद बेचने के लिए कोई समस्या आए तो वह मार्किट कमेटी के उच्च अधिकारियों से सम्पर्क कर सकता है।