फुटबाल (Football) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions फुटबाल (Football) Game Rules.

फुटबाल (Football) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

याद रखने योग्य बातें

  1. फुटबाल मैदान की लम्बाई = 120m × 80m (130 गज़ × 100 गज़)
  2. फुटबाल मैदान की चौड़ाई = 50 गज़ से 100 गज़, 45-90 मीटर
  3. मैदान का आकार = आयताकार
  4. खिलाड़ियों की गिनती = 11, बदलवे 7
  5. फुटबाल की परिधि = 27″ से 28″, 68 सैं०मी० 70 सैं०मी०
  6. फुटबाल का भार = 14 से 16 औंस, 410 ग्राम से 450 ग्राम
  7. खेल का समय = 45—45 मिनट के दो हाफ
  8. आराम का समय = 15 मिनट
  9. मैच में बदले जा सकने वाले खिलाड़ी = 3 मिनट
  10. मैच के अधिकारी = एक टेबल आफिशल, एक रैफ़री और दो लाइन मैन.
  11. अंतर्राष्ट्रीय मैच के लिए मैदान का आकार = अधिक-से-अधिक 110 × 75 मीटर 100 × 64 मीटर कम-से-कम
  12. अन्तर्राष्ट्रीय मैचों में मैदान का माप = अधिकतम 110 मी० × 75 मीटर (120 गज़ × 80 गज़) कम-से-कम 100 मी० × 64 मी० (100 गज़ × 70 गज़)
  13. गोल पोस्ट की ऊँचाई = 2.44 मीटर
  14. कार्नर फ्लैग की ऊँचाई = कम-से-कम 5 फीट

फुटबाल खेल की संक्षेप रूपरेखा
(Brief outline of the Football Game)

  1. मैच दो टीमों के बीच होता है। प्रत्येक टीम में ग्यारह-ग्यारह खिलाड़ी होते हैं। एक टीम में 16 खिलाड़ी होते हैं जिनमें से 11 खेलते हैं और 5 खिलाड़ी स्थानापन्न (Substitutes) होते हैं। इनमें से एक गोलकीपर होता है।
  2. एक टीम मैच में तीन से अधिक खिलाड़ी और एक गोलकीपर बदल सकती है।
  3. एक बदला हुआ खिलाड़ी दोबारा नहीं बदला जा सकता।
  4. खेल का समय 45-5-45 मिनट का होता है। मध्यान्तर का समय 5 मिनट का होता है।
  5. मध्यान्तर या अवकाश के बाद टीमें अपनी साइडें बदलती हैं।
  6. खेल का आरम्भ खिलाड़ी एक-दूसरे की सैंटर लाइन की निश्चित जगह से पास देकर शुरू करते हैं और साइडों का फैसला टॉस द्वारा किया जाता है।
  7. मैच खिलाने के लिए एक टेबल अधिकारी, एक रैफरी और दो लाइनमैन होते हैं।
  8. गोलकीपर की वर्दी अपनी टीम से भिन्न होती है।
  9. खिलाड़ी को कोई ऐसी वस्तु नहीं पहननी चाहिए जो दूसरे खिलाड़ियों के लिए घातक हो।
  10. मैदान के बाहरी भाग से कोचिंग नहीं होनी चाहिए।
  11. जब गेंद गोल रेखा या साइड लाइन को पार कर जाए तो खेल रुक जाता है।
  12. रैफ़री स्वयं भी किसी वजह से खेल बन्द कर सकता है।

फुटबाल (Football) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
फुटबाल का मैदान, गोल क्षेत्र, गोल, पैनल्टी क्षेत्र, कार्नर क्षेत्र, रेखाएं और गेंद के बारे में बताइए।
खेल का मैदान
(Playing Field)
आकार-फुटबॉल का मैदान आयताकार होता है। इसकी लम्बाई 100 m से कम और 120 m से अधिक न होगी। इसकी चौड़ाई 55 m से कम और 90 m से अधिक न होगी। अन्तर्राष्ट्रीय मैचों में इसकी लम्बाई 90 से 120 m तक चौड़ाई 50 से 90 m होगी। – रेखांकन (Lining)-खेल का मैदान स्पष्ट रेखाओं द्वारा अंकित होना चाहिए। लम्बी रेखाएं स्पर्श रेखाएं या पक्ष रेखाएं कहलाती हैं और छोटी रेखाओं को गोल रेखाएं कहा जाता है। मैदान के प्रत्येक कोने पर 1.50 m ऊँचे खम्बे पर झंडी (कार्नर फ्लैग) लगाई जाएगी। यह केन्द्रीय रेखा पर कम-से-कम एक गज़ पर होनी चाहिए। मैदान के मध्य में एक वृत्त लगाया जाता है जिसका अर्द्धव्यास 9.15 m गज़ होगा।
FOOTBALL GROUND
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कार्नर क्षेत्र-प्रत्येक कार्नर क्षेत्र पोस्ट से खेल के क्षेत्र के अन्दर एक गज़ के अर्द्धव्यास का चौथाई वृत्त खींचा जाएगा।
गोल क्षेत्र-खेल के मैदान में दोनों सिरों पर रेखाएं खींची जाएंगी जो गोल रेखा पर लम्ब होंगी। ये मैदान में 5.5 m की दूरी तक फैली रहेंगी और गोल रेखा के समानान्तर एक रेखा से मिला दी जाएंगी। इन रेखाओं तथा गोल रेखाओं द्वारा घिरे मध्य क्षेत्र को गोल क्षेत्र कहते हैं।
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पैनल्टी क्षेत्र-खेल के मैदान में दोनों सिरों पर प्रत्येक गोल पोस्ट से 16.50 m की दूरी पर गोल रेखा के समकोण पर दो रेखाएं खींची जाएंगी। ये मैदान में 16.50m की दूरी तक फैली होंगी। इन्हें गोल रेखा के समानान्तर एक रेखा खींच कर मिलाया जाएगा। इन रेखाओं तथा गोल रेखाओं से घिरे हुए क्षेत्र को पैनल्टी क्षेत्र कहा जाएगा।

गोल-गोल रेखा के मध्य में से 7.32 m की दूरी पर दो पोल (डंडे) गाड़े जाएंगे। इनके सिरों को एक क्रासबार द्वारा मिलाया जाएगा जिसका निचला सिरा भूमि से 2.44 m ऊंचा होगा। गोल पोस्टों तथा क्रासबार की चौड़ाई और गहराई 5 इंच से अधिक नहीं होगी। देखें खेल के मैदान का चित्र।
गेंद-गेंद का आकार गोल होगा। यह चमड़े या किसी अन्य स्वीकृत वस्तु की बनी होनी चाहिए। इसकी परिधि 27″ से 28″ तक होगी। इसका भार 14 औंस से 16 औंस तक होगा। रैफ़री की आज्ञा के बिना खेल के दौरान गेंद बदली नहीं जा सकती।

खिलाड़ी और उसकी पोशाक
खिलाड़ी का सामान-खिलाड़ी प्रायः जर्सी या कमीज़, निक्कर, जुराबें तथा बूट पहन सकता है। गोल कीपर की कमीज़ या जर्सी का रंग बाकी खिलाड़ियों से भिन्न होगा। बूट पहनने आवश्यक हैं। कोई भी खिलाड़ी ऐसी वस्तु नहीं पहन सकता जो अन्य खिलाड़ियों के लिए हानिकारक हो।

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प्रश्न
निम्नलिखित से आप क्या जानते हैं ?
उत्तर-
खिलाड़ियों की संख्या, अधिकारियों की गिनती, खेल की अवधि, स्कोर अथवा गोल।
खिलाड़ियों की संख्या-फुटबॉल का खेल दो टीमों के बीच होता है। प्रत्येक टीम में ग्यारह-ग्यारह तथा अतिरिक्त (Extra) 5 खिलाड़ी होते हैं। एक मैच में किसी टीम को दो से अधिक खिलाड़ियों को बदलने की आज्ञा नहीं होती। बदले हुए खिलाड़ी को पुनः इस मैच में भाग लेने का अधिकार नहीं दिया जाता। मैच में गोलकीपर बदल सकते हैं। । अधिकारी-एक रैफ़री, दो लाइनमैन, एक टाइम कीपर रैफ़री खेल के नियमों का पालन करवाता है और किसी भी झगड़े वाले प्रश्न का निर्णय करता है। खेल में क्या हुआ और परिणाम क्या निकला इस पर उसका निर्णय अन्तिम होता है।
खेल की अवधि-खेल 45-45 मिनट की दो समान अवधियों में खेला जाएगा। पहले 45 मिनट के खेल के बाद 10 मिनट का मध्यान्तर (Interval) या इससे अधिक
होगा।

गोल्डन गोल (Golden Goal)-फुटबॉल खेल में यदि समय समाप्ति पर दोनों टीमें बराबर रहती हैं तो बराबर की स्थिति में फालतू समय 15-15 मिनट का खेल होगा। इस समय के खेल में जहां भी गोल हो जाए तो खेल समाप्त हो जाता है। गोल करने वाली टीम विजयी घोषित की जाती है। उसके बाद यदि फिर भी गोल न हो तो दोनों टीमों को 5-5 पैनल्टी किक उस समय तक दिए जाते रहेंगे जब तक फैसला नहीं हो जाता परन्तु यदि लीग विधि से टूर्नामैंट हो रहा हो तो बराबर रहने पर दोनों टीमों को एक-एक अंक (Point) दिया जाएगा।
खेल का आरम्भ-खेल के प्रारम्भ में टॉस द्वारा किक मारने और साइड (पक्ष) चुनने का निर्णय किया जाता है। टॉस जीतने वाली टीम को किक लगाने या साइड चुनने की छूट होती है। गेंद खेल से बाहर-गेंद खेल से बाहर मानी जाएगी—

  1. जब गेंद भूमि या हवा में गोल रेखा या स्पर्श रेखा पूरी तरह पार कर जाए।
  2. जब रैफरी खेल को रोक दे।

स्कोर (फलांकन) या गोल-जब गेंद नियमानुसार गोल पोस्टों के बीच क्रास बार के नीचे और गोल रेखा के पार चली जाए तो गोल माना जाता है। जो भी टीम अधिक गोल बना लेगी उसे विजयी माना जाएगा। यदि कोई गोल नहीं होता या बराबर संख्या में गोल होते हैं तो खेल बराबर माना जाएगा। परन्तु यदि लीग विधि से टूर्नामैंट हो रहा हो तो बराबर रहने पर दोनों टीमों को एक-एक अंक (Point) दिया जाएगा।

प्रश्न
फुटबाल खेल में ऑफ साइड, फ्री किक, पैनल्टी किक, कार्नर किक और गोल किक क्या होते हैं ?
उत्तर-
ऑफ साइड-कोई भी खिलाड़ी अपने मध्य में ऑफ साइड नहीं होता।
ऑफ साइड उस समय होता है जब वह विरोधी टीम के मध्य में हो और उसके पीछे दो विरोधी खिलाड़ी न हों।

  1. उसकी अपेक्षा विरोधी खिलाड़ी अपनी गोल रेखा के निकट न हों।
  2. वह मैदान में अपने अंर्द्ध-क्षेत्र में न हो।
  3. गेंद अन्तिम बार विरोधी को न लगी हो या उसके द्वारा खेली न गई हो।
  4. उसे गोल-किक, कार्नर किक, थ्रो-इन द्वारा गेंद सीधी न मिली हो या रैफ़री ने न फेंका हो।

दण्ड-इस नियम का उल्लंघन करने पर विरोधी खिलाड़ी को उस स्थान से फ्री किक दी जाएगी, जहां पर नियम का उल्लंघन हुआ हो।
फ्री किक-फ्री किक दो प्रकार की होती है-प्रत्यक्ष फ्री किक (Direct Kick) तथा अप्रत्यक्ष फ्री किक (Indirect Kick)। प्रत्यक्ष फ्री किक वह है जहां से सीधा गोल किया जा सकता है। जब तक कि गेंद किसी और खिलाड़ी को छू न जाए।
जब कोई खिलाड़ी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष फ्री किक लगाता है तो अन्य खिलाड़ी गेंद से कम से कम दस गज की दूरी पर होंगे। वे अपने परिधि पथ और पैनल्टी क्षेत्र को पार करते ही गेंद फौरन खेलेंगे। यदि गेंद पैनल्टी क्षेत्र से परे सीधे खेल में किक नहीं लगाई गई तो किक पुनः लगाई जाएगी।
दण्ड-इस नियम का उल्लंघन करने पर रक्षक टीम को उल्लंघन वाले स्थान से अप्रत्यक्ष फ्री किक लगाने को मिलेगी।
फ्री किक लगाने वाला खिलाड़ी गेंद को दूसरी बार उस समय तक नहीं छू सकता जब तक इसे किसी अन्य खिलाड़ी ने न छू लिया हो।
पैनल्टी किक-पैनल्टी किक पैनल्टी निशान से लगाई जाएगी। पैनल्टी किक लगाने के समय किक मारने वाला (प्रहारक) तथा गोल रक्षक ही पैनल्टी क्षेत्र में होंगे। बाकी ‘खिलाड़ी पैनल्टी क्षेत्र से बाहर और पैनल्टी के निशान से कम से कम 10 गज़ दूर होंगे। गेंद को किक लगने तक गोल रक्षक गोल रेखा पर स्थिर खड़ा रहेगा। किक मारने वाला गेंद को दूसरी बार छू नहीं सकता जब तक कि उसे गोल कीपर छू नहीं लेता।
दण्ड-इस नियम के उल्लंघन पर—

  1. यदि रक्षक टीम द्वारा उल्लंघन होता है और यदि गोल न हुआ हो तो किक दूसरी बार ली जाएगी।
  2. यदि आक्रामक टीम द्वारा उल्लंघन होता है तो गोल हो जाने पर भी दोबारा किक दी जाएगी।
  3. यदि पैनल्टी किक लेने वाले खिलाड़ी से अथवा उसके साथी से गोल उल्लंघन होता है तो विरोधी खिलाड़ी उल्लंघन वाले स्थान से अप्रत्यक्ष गोल किक लगाएगा।

थो-इन-जब गेंद भूमि पर या हवा में पार्श्व रेखाओं (Side Lines) से बाहर चली जाती है तो विरोधी टीम का एक खिलाड़ी उस स्थान से जहां से गेंद पार हुई होती है, खड़ा होकर गेंद मैदान के अन्दर फेंकता है।
गेंद अन्दर फेंकने वाला खिलाड़ी मैदान की ओर मुंह करके दोनों पांवों का कोई भाग स्पर्श रेखा या स्पर्श रेखा से बाहर ज़मीन पर रख कर खड़ा हो जाता है। वह हाथों से गेंद पकड़ कर सिर के ऊपर से घुमा कर अन्दर मैदान में फेंकेगा। वह उस समय तक गेंद को नहीं छू सकता जब तक किसी दूसरे खिलाड़ी ने इसे न छू लिया हो।
दण्ड—

  1. यदि थ्रो-इन उचित ढंग से न हो तो विरोधी टीम का खिलाड़ी थ्रो-इन करेगा।
  2. यदि थ्रो-इन करने वाला खिलाड़ी गेंद को किसी दूसरे खिलाड़ी द्वारा छुए जाने से पहले ही स्वयं छू लेता है तो विरोधी टीम को एक अप्रत्यक्ष किक लगाने को दी जाएगी।
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    गोल किक-किसी आक्रामक टीम के खिलाड़ी द्वारा खेले जाने पर जब गेंद भूमि के साथ हवा में गोल रेखा को पार कर जाए तो रक्षक टीम का खिलाड़ी इसे गोल क्षेत्र से बाहर किक करता है। यदि वह गोल क्षेत्र से बाहर नहीं निकलती और सीधे खेल के मैदान में नहीं पहुंच पाती तो किक दोबारा लगाई जाएगी। किक करने वाला खिलाड़ी गेंद को उस समय तक पुनः नहीं छू सकता जब तक इसे किसी दूसरे खिलाड़ी द्वारा छू न लिया जाए।
    दण्ड-यदि किक लगाने वाला खिलाड़ी गेंद को किसी अन्य खिलाड़ी द्वारा छूने से पहले पुनः छू ले तो विरोधी को उसी स्थान से एक अप्रत्यक्ष फ्री किक दी जाएगी जहां कि उल्लंघन हुआ है।

कार्नर किक-जब रक्षक टीम के किसी खिलाड़ी द्वारा रखेले जाने पर गेंद भूमि पर या हवा में गोल रेखा पार कर जाए तो आक्रामक टीम का खिलाड़ी निकटतम कार्नर फ्लैग पोस्ट के चौथाई वृत्त के भीतर से गेंद को किक लगाएगा। ऐसी किक से प्रत्यक्ष गोल भी किया जा सकता है। जब तक कार्नर किक न ले ली जाए, विरोधी टीम के खिलाड़ी 10 गज दूर रहेंगे। किक करने वाला खिलाड़ी भी उस समय तक गेंद को दुबारा नहीं छू सकता जब तक किसी अन्य खिलाड़ी ने उसे छ न लिया हो।
दण्ड-इस नियम के उल्लंघन पर विरोधी टीम को उल्लंघन वाले स्थान से अप्रत्यक्ष फ्री किक दी जाएगी।

फुटबाल (Football) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न
फुटबाल खेल में कौन-कौन से फाऊल हो सकते हैं ?
उत्तर-
फाऊल तथा त्रुटियां
(क) यदि कोई भी खिलाड़ी निम्नलिखित अवज्ञा या अपराधों में से कोई भी जान-बूझ कर करता है तो विरोधी दल को अवज्ञा अथवा अपराध वाले स्थान से प्रत्यक्ष फ्री किक दी जाएगी।
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  1. विरोधी खिलाड़ी को किक मारे या किक मारने की कोशिश करे।
  2. विरोधी खिलाड़ी पर कूदे या धक्का या मुक्का मारे अथवा कोशिश करे।
  3. विरोधी खिलाड़ी पर भयंकर रूप से आक्रमण करे।
  4. विरोधी खिलाड़ी पर पीछे से आक्रमण करे।
  5. विरोधी खिलाडी को पकड़े या उसके वस्त्र पकड़ कर खींचे।
  6. विरोधी खिलाड़ी को चोट लगाए या लगाने की कोशिश करे।
  7. विरोधी खिलाड़ी के रास्ते में बाधा बने या टांगों के प्रयोग से उसे गिरा दे या गिराने की कोशिश करे।
  8. विरोधी खिलाड़ी को हाथ या भुजा के किसी भाग से धक्का दे।
  9. गेंद को हाथ से पकड़ता है।

यदि रक्षक टीम का खिलाड़ी इन अपराधों में से कोई एक अपराध पैनल्टी क्षेत्र में जान-बूझकर करता है तो आक्रामक टीम को पैनल्टी किक दी जाएगी।
(ख) यदि निम्नलिखित अपराधों में से कोई एक अपराध करता है तो विरोधी टीम को अपराध वाले स्थान से अप्रत्यक्ष फ्री किक दी जाएगी—

  1. जब गेंद को खतरनाक ढंग से खेलता है।
  2. जब गेंद कुछ दूर हो तो दूसरे खिलाड़ी को कन्धे मारे।
  3. गेंद खेलते समय विरोधी खिलाड़ी को जान-बूझ कर रोकता है।
  4. गोलकीपर पर आक्रमण करना, केवल उन स्थितियों को छोड़कर जब वह
    • विरोधी खिलाड़ी को रोक रहा हो।
    • गेंद पकड़ रहा हो।
    • गोल क्षेत्र से बाहर निकल गया हो।
    • गोल रक्षक के रूप में गेंद भूमि पर बिना टप्पा मारे चार कदम आगे को जाना।
    • गोल रक्षक के रूप में ऐसी चालाकी में लग जाना जिससे खेल में बाधा पड़े, समय नष्ट करे और अपने पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाने की कोशिश करे।

(ग) खिलाड़ी को चेतावनी दी जाएगी और विरोधी टीम को अप्रत्यक्ष फ्री किक दी जाएगी जब कोई खिलाड़ी

  1. खेल के नियमों का लगातार उल्लंघन करता है।
  2. दुर्व्यवहार का अपराधी होता है।
  3. शब्दों या प्रक्रिया द्वारा रैफरी के निर्णय से मतभेद प्रकट करता है।

(घ) खिलाड़ी को खेल के मैदान से बाहर निकाल दिया जाएगा यदि—

  1. वह गाली-गलौच करता है या फाऊल करता है।
  2. चेतावनी मिलने पर भी बुरा व्यवहार करता है।
  3. वह गम्भीर फाऊल खेलता है या दुर्व्यवहार करता है।

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प्रश्न
फुटबाल की महत्त्वपूर्ण तकनीकों के बारे में लिखें।
उत्तर-
किकिंग-किकिंग वह ढंग है जिसके द्वारा बॉल को इच्छित दिशा में पांवों की सहायता से इच्छित गति से, यह देखते हुए कि बॉल इच्छित स्थान पर पहुंच जाए, आगे बढ़ाया जाता है । किकिंग की कला में सही निशाना, गति, दिशा एवं अन्तर केवल एक पांव, बाएं या दहने में नहीं बल्कि दोनों पांवों से काम किया जाता है। शायद नवसिखयों को सिखलाई जाने वाली सबसे जरूरी बात दोनों पांवों से खेल को खेलने पर बल देने की ज़रूरत है। युवकों और नवसिखयों को दोनों पांवों से खेलना सिखाना आसान है। इसके बगैर खेल के किसी सफलता के मरतबे पर पहुंच पाना असम्भव है।

  1. पांवों को अंदरूनी भाग से किक मारना—
  2. पावों का बाहरी भाग—

जब बॉल को नज़दीक दूरी पर किक किया जाता है तो इन दोनों परिवर्तनों का इस्तेमाल किया जाता है। ताकत कम लगाई जाती है, परन्तु इस में अधिक शुद्धता होती है और नतीजे के तौर पर यह ढंग गोलों का निशाना बनाते समय अधिक इस्तेमाल किया जाता है।
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हॉफ़ वाली तथा वॉली किक—
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जब बॉल खिलाड़ी के पास उछलता हुआ या हवा में आ रहा हो तो उस समय एक अस्थिरता होती है, न केवल फुटबाल के क्रीड़ा स्थल की सतह के कारण इसके उछलन की दिशा के बारे, बल्कि इसकी ऊंचाई और गति के बारे में भी। इसको प्रभावशाली ढंग से साफ करने हेतु जो बात ज़रूरी है वह है शुद्ध समय और मार रहे पांव के चलने का तालमेल और शुद्ध ऊंचाई तक उठाना।

ओवर हैड किकइस किक—
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का उद्देश्य तीन पक्षीय होता है (क) सामने मुकाबला कर रहे खिलाड़ी से बॉल की और दिशा में मोड़ना, (ख) बॉल को किक की पहली दिशा में ही आगे बढ़ाना और (ग) बॉल को वापिस उसी दिशा में मोड़ना. जहां से वह आया होता है। ओवर हैड किक संशोधित वॉली किक है और इसका इस्तेमाल आमतौर पर ऊंचे उछलते हुए बॉल को मारने हेतु किया जाता है।
पास देना—
फुटबॉल में पास देने का काम टीम वर्क का आधार है। पास टीम को, समन्वय बढ़ाते हुए और टीम वर्क को अहसास कराते हुए जोड़ता है। पास खेल की स्थिति से जुड़ी हुई खेल की सच्चाई है तथा एक मौलिक तत्त्व है, जिसके लिए टीम की सिखलाई और अभ्यास के दौरान अधिक समय और विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। गोलों में प्रवीणता के लिए टीम का पास व्यक्तिगत खिलाड़ी का शुद्ध आलाम है। यह कहा जाता है कि एक सफल पास तीन किकों से अच्छा होता है। पास देना तालमेल का एक अंग है, व्यक्तिगत बुद्धिमता को खेल में आक्रमण करते समय या सुरक्षा समय खिलाड़ियों में हिलडुल के पेचीदा ढांचे को एक सुर करना है। पास में पास देने वाला, बॉल और पास हासिल करने वाला शामिल होते हैं।
पास देने की क्रिया को आमतौर पर दो भागों में बांटा गया है-लम्बे पास तथा छोटे पास।

  1. लम्बे पास-ऐसे पास का इस्तेमाल खेल की तेज़ गति की स्थिति में किया जाता है, जहां कि लम्बे पास गुणकारी होते हैं और पास दाएं-बाएं या पीछे की ओर भी दिया जा सकता है। सभी लम्बे पासों में पांवों में पांव के ऊपरी हिस्से का इस्तेमाल किया जाता है। लम्बे सुरक्षा पास को मज़बूत करते हैं तथा छोटे पास देने को आसान करते हैं।
  2. छोटे पास-छोटे पास 15 गज़ या इतनी-सी ही दूरी तक पास देने में इस्तेमाल किए जाते हैं। ये पास लम्बे पासों से अधिक तेज़ एवं शुद्ध होते हैं।

पुश पास—
पुश पास का इस्तेमाल आमतौर पर जब दूसरी टीम का खिलाड़ी अधिक नज़दीक न हो, नज़दीक से गोलों में बॉल डालने के लिए और बॉल को बाएं-दाएं ओर फेंकने हेतु किया जाता है।
लॉब पास—
यह पुश पास से छोटा होता है। मगर इसमें बॉल को ऊपर उठाया जाता है या उछाला जाता है। लॉब पास का इस्तेमाल दूसरी टीम का खिलाड़ी जब पास में हो या थ्रो बॉल लेने की कोशिश कर रहा हो तो उसके सिर के ऊपर से बॉल को आगे बढ़ाने हेतु किया जाता है।
पांव का बाहरी भाग……..फलिक या जॉब पास—
पहले बताए गए दो पासों के विपरीत फलिक पास से पाँव को भीतर की ओर घुमाते हुए बॉल को फलिक किया जाता है या पुश किया जाता है। इस तरह के पास का पीछे की ओर पास देने हेतु बॉल को नियन्त्रण में रखते हुए और धरती पर ही आगे रेंगते हुए इस्तेमाल किया जाता है।
ट्रैपिंग—
ट्रैपिंग बॉल को नियन्त्रण में रखने का आधार है। बॉल को ट्रैप करने का अर्थ बॉल को खिलाड़ी के नियन्त्रण से बाहर जाने से रोकना है। यह केवल बॉल को रोकने या गतिहीन करने की ही क्रिया नहीं बल्कि आ रहे बॉल को मजबूत नियन्त्रण में करने के लिए अनिवार्य तकनीक भी है। रोकना तो बॉल नियन्त्रण का पहला अंग है और दूसरा अंग जो खिलाड़ी इससे उपरान्त अपने एवं टीम के लाभ हेतु करता है, भी बराबर अनिवार्य है।
नोट-ट्रैप की सिखलाई

  1. रेंगते बॉल तथा
  2. उछलते बॉल के लिए दी जानी चाहिए।

पांव के निचले भाग से ट्रैप—
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यदि कोई शीघ्रता नहीं होती और जिस वक्त काफ़ी स्वतन्त्र अंग होता है खिलाड़ी के आसपास कोई नहीं होता तो इस तरह की ट्रैपिंग बहुत गुणकारी होती है।

पांव के भीतरी भाग से ट्रैप—
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यह सबसे प्रभावशाली और आम इस्तेमाल किया जाता ट्रैप है। इस तरह का ट्रैप न केवल खिलाड़ी को बॉल ट्रैप करने के योग्य बनाता है, बल्कि उसको किसी भी दिशा में जाने के लिए सहायता करता है और अक्सर उसी गति में ही। यह ट्रैप दाएं-बाएं ओर से या तिरछे आ रहे बॉल के लिए अच्छा है। यदि बॉल सीधा सामने से आ रहा है तो बदन को उसी दिशा में घुमाया जाता है जिस ओर बॉल ने जाना होता है।

पांव के बाहरी भाग से ट्रैप—
यह पहले जैसा ही है, मगर कठिन है, क्योंकि हरकत में खिलाड़ी को बदन का भार बाहर की तथा केन्द्र से बाहर सन्तुलन करने के लिए ज़रूरी होता है।
पेट तथा सीना ट्रैप—
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यदि बॉल कमर से ऊंचा हो और पांव से असरदार ढंग से ट्रैप न हो सकता हो तो बॉल को पेट तथा सीने पर सीधा या धरती से उछलता हुआ लिया जाता है।
हैड ट्रैप—
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यह अनुभवी खिलाड़ियों के लिए है और उसके लिए है जो हैडिंग में अपने को अच्छी तरह स्थापित कर चुके हैं।
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(क) सामने की ओर हैडिंग

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(ख) बाई तथा दाई ओर हैडिंग

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(ग) नीचे की ओर हैडिंग

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PSEB 10th Class Physical Education Practical फुटबाल (Football)

प्रश्न 1.
फुटबाल के मैदान की लम्बाई और चौड़ाई बताओ।
उत्तर-
फुटबाल के मैदान की लम्बाई 130 गज़ से अधिक और 100 गज़ से कम नहीं होनी चाहिए और चौड़ाई 100 गज़ से अधिक और 50 गज़ से कम नहीं होनी चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय मैचों में लम्बाई 120 गज़ से 110 गज़ और चौड़ाई 70 से 80 गज़ तक होनी चाहिए।

प्रश्न 2.
फुटबाल की खेल में कुल खिलाड़ी कितने होते हैं और किन-किन स्थितियों में खेलते हैं ?
उत्तर-
फुटबाल की खेल में कुल 16 खिलाड़ी होते हैं जिनमें 11 खिलाडी खेलते हैं और 5 खिलाड़ी अतिरिक्त (Substitutes) होते हैं। स्थिति-गोल कीपर = 1, फुलबैक = 2, हाफ = 3, फ़ारवर्ड = 5.

फुटबाल (Football) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 3.
फुटबाल के खेल का समय बताइए।
उत्तर-
फुटबाल के खेल का समय 45-5-45 मिनट होता है।

प्रश्न 4.
फुटबाल का भार कितना होता है और उसकी गोलाई बताओ।
उत्तर-
फुटबाल का भार 14 औंस से 16 औंस तक होता है और उसकी गोलाई 27 इंच से 28 इंच तक होती है।

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प्रश्न 5.
फुटबाल के मैदान की लाइनों की मोटाई बताओ।
उत्तर-
फुटबाल के मैदान की सभी लाइनें 5 सैं० मी० चौड़ी होती हैं।

प्रश्न 6.
फुटबाल में हवा का भार कितना होता है ?
उत्तर-
फुटबाल में हवा का भार 0.6007 या 9.01505 पौंड वर्ग इंच होगा।

प्रश्न 7.
फुटबाल का खेल कैसे शुरू होता है ?
उत्तर-
फुटबाल का खेल गेंद के पास द्वारा शुरू होता है।

फुटबाल (Football) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 8.
गोल पोस्टों की लम्बाई और ऊंचाई बताओ।
उत्तर-
गोल पोस्टों की लम्बाई 8 गज़ और ऊंचाई 8 फुट होती है।

प्रश्न 9.
पैनल्टी किक की दूरी बताओ।
उत्तर-
पैनल्टी किक 16 गज़ की दूरी से लगाई जाती है।

प्रश्न 10.
गोल कब होता है ?
उत्तर-
जब गेंद गोल पोस्टों के मध्य रेखा गोल को पार कर जाए तो गोल माना जाता है।

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प्रश्न 11.
फुटबाल में किक लगाते समय विरोधी खिलाड़ियों को कितनी दूरी पर खड़े होना चाहिए?
उत्तर-
फुटबाल की खेल में किक लगाते समय 10 गज की दूरी पर विरोधी खिलाड़ियों को खड़े होना चाहिए।

प्रश्न 12.
थो-इन किसे कहा जाता है ?
उत्तर-
जब गेंद खेल के मैदान से पूरे तौर पर बाहर चली जाती है तो विरोधी खिलाड़ी उसी स्थान पर खड़े होकर गेंद को अन्दर फेंकता है तो उसको थ्रो-इन कहा जाता है।

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प्रश्न 13.
फुटबाल के खेल में कितने फ्लैग लगाए जाते हैं ?
उत्तर-
फुटबाल की खेल में 6 फ्लैग लगाए जाते हैं जिनमें से 4 ग्राऊंड के कार्नर में तथा दो ग्राऊंड की मध्य की सैंटर लाइन के अन्त में एक गज़ की दूरी पर पीछे हट कर लगाए जाते हैं।

प्रश्न 14.
फुटबाल की खेल के चार फाऊल बताओ।
उत्तर-
फुटबाल की खेल के चार फाऊल निम्नलिखित हैं—

  1. विरोधी खिलाड़ी को ठुड्ड मारना,
  2. फुटबाल को हाथ लगाना।
  3. धक्का देना।
  4. विरोधी खिलाड़ी पर पीछे से हमला करना।

फुटबाल (Football) Game Rules - PSEB 10th Class Physical Education

प्रश्न 15.
फुटबाल के खेल को खेलाने वाले अधिकारियों की संख्या बताओ।
उत्तर-

  1. टेबल आफिसर = 1
  2. रैफरी = 1
  3. लाइनमैन = 2

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 3 समाज, समुदाय तथा समिति

Punjab State Board PSEB 11th Class Sociology Book Solutions Chapter 3 समाज, समुदाय तथा समिति Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Sociology Chapter 3 समाज, समुदाय तथा समिति

पाठ्य-पुस्तक के प्रश्न (Textual Questions)

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 1-15 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
समाज का अर्थ बताइये।
उत्तर-
मैकाइवर के अनुसार, “समाज सामाजिक संबंधों का जाल है।”

प्रश्न 2.
समाज और समुदाय किन शब्दों से लिये गए हैं ?
उत्तर-
समाज (Society) शब्द लातीनी भाषा के शब्द ‘Socius’ से निकला है जिसका अर्थ है साथ अथवा मित्रता। समुदाय (Community) भी लातीनी भाषा के शब्द ‘Communitas’ से निकला है जिसका अर्थ है ‘सबका सांझा’।

प्रश्न 3.
किसने कहा, “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ?”
उत्तर-
ये शब्द अरस्तु (Aristotle) के हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 3 समाज, समुदाय तथा समिति

प्रश्न 4.
सरल युग्म समाज, युग्म समाज, द्वि-युग्म समाज तथा त्रि-युग्म समाज का वर्गीकरण किसने दिया ?
उत्तर-
यह वर्गीकरण हरबर्ट स्पैंसर (Herbert Spencer) ने दिया था।

प्रश्न 5.
समिति किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जब कुछ लोग किसी विशेष उद्देश्य के लिए आपस में सहयोग करके संगठन का निर्माण करते है तो इस संगठित संगठन को समिति कहते हैं।

प्रश्न 6.
खुला समाज किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जिस समाज में अलग-अलग वर्गों में आने-जाने की पाबंदी नहीं होती उसे खुला समाज कहते हैं।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30-35 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
समाज की तीन विशेषताएं बताइये।
उत्तर-

  1. समाज लोगों का समूह होता है जिनमें आपसी संबंध होते हैं।
  2. समाज हमेशा समानताओं तथा अंतरों पर निर्भर करता है।
  3. समाज सहयोग तथा संघर्ष पर आधारित होता है।
  4. प्रत्येक समाज में स्तरीकरण पाया जाता है।

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प्रश्न 2.
समाज के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
सम्पूर्ण संसार में बहुत-से समाज मिल जाते हैं जैसे कि जनजातीय समाज, ग्रामीण समाज, औद्योगिक समाज, उत्तर औद्योगिक समाज इत्यादि। परन्तु अलग-अलग विद्वानों ने समाजों के अलग-अलग आधारों पर प्रकार दिए हैं जैसे कि काम्ते (बौद्धिक विकास), स्पैंसर (संरचनात्मक जटिलता), मार्गन (सामाजिक विकास), टोनीज़ (सामाजिक संबंधों के प्रकार), दुर्थीम (एकता के प्रकार) इत्यादि।

प्रश्न 3.
समुदाय किसे कहते हैं ?
उत्तर-
जब कुछ व्यक्ति एक समूह में एक विशेष क्षेत्र में संगठित रूप से रहते हैं तथा वह किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि अपना जीवन ही वहां पर व्यतीत करते हैं तो उसे हम समुदाय कहते हैं। यह एक मूर्त संकल्प है जिसके सदस्यों के बीच हम भावना होती है।

प्रश्न 4.
समाज किस प्रकार समुदाय से भिन्न है ? दो अन्तर बताइये।
उत्तर-

  • समाज का कोई भौगोलिक क्षेत्र नहीं होता परन्तु समुदाय का एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र होता है।
  • समाज में सहयोग तथा संघर्ष दोनों होते हैं परन्तु समुदाय में केवल सहयोग ही होता है।

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प्रश्न 5.
समिति को परिभाषित कीजिए तथा इसकी विशेषताओं की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
बोगार्डस के अनुसार, “सभा साधारणतया कुछ उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए व्यक्तियों का मिल कर कार्य करना है।” इसकी कुछ विशेषताएं होती हैं जैसे कि इसकी विचारपूर्वक स्थापना होती है, इसका निश्चित उद्देश्य होता है, इसका जन्म तथा विनाश होता रहता है, इसकी सदस्यता इच्छा पर आधारित होती है इत्यादि।

प्रश्न 6.
समुदाय तथा समिति के मध्य दो अन्तर बताइये।
उत्तर-

  1. समुदाय किसी निश्चित उद्देश्य के लिए नहीं बनाया जाता परन्तु सभा एक निश्चित उद्देश्य के लिए निर्मित होती है।
  2. समुदाय की सदस्यता ऐच्छिक नहीं होती परन्तु सभा की सदस्यता ऐच्छिक होती है।
  3. समुदाय का निश्चित संगठन नहीं होता परन्तु सभा का एक निश्चित संगठन होता है।

III. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 75-85 शब्दों में दीजिए :

प्रश्न 1.
मानव समाज पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
इस पृथ्वी पर मनुष्य तथा मानवीय समाज प्रकृति द्वारा बनाई गई एक अनुपम रचना है। मानवीय समाज की कुछ ऐसी विशेषताएं होती हैं जो इसे पृथ्वी के अन्य जीवों से अलग करती हैं। इन विशेषताओं के कारण ही मानवीय समाज ने प्रगति की है तथा इसकी अपनी संस्कृति तथा सभ्यता विकसित हो सकी है। मानवीय समाज ने अपनी संस्कृति विकसित कर ली है जो काफ़ी आधुनिक स्तर पर पहुंच चुकी है चाहे प्रत्येक समाज के लिए यह अलग-अलग होती है। मानवीय समाज की इकाइयां अर्थात् मनुष्य अलग-अलग स्थितियों, उत्तरदायित्वों, अधिकारों, संबंधों के प्रति भी जागरूक होते हैं। मानवीय समाज हमेशा परिवर्तनशील होता है तथा इसमें समय के साथ-साथ परिवर्तन आते रहते हैं।

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प्रश्न 2.
अगस्ते कोंत द्वारा प्रस्तुत मानव समाज के तीन चरणों के नाम बताइये।
उत्तर-
अगस्ते कोंत ने मानवीय समाज के उद्विकास के तीन स्तर दिए हैं तथा वे हैं-

  1. आध्यात्मिक पड़ाव (Theological Stage)
  2. अधिभौतिक पड़ाव (Metaphysical Stage)
  3. सकारात्मक पड़ाव (Positive Stage)।

प्रश्न 3.
समुदाय के प्रमुख आधार कौन-से हैं ?
उत्तर-

  • समुदाय का जन्म स्वयं ही हो जाता है।
  • प्रत्येक समुदाय का एक विशेष नाम होता है।
  • समुदाय का अपना एक भौगोलिक क्षेत्र होता है जिसमें व्यक्ति रहता है।
  • आजकल के समुदाय का एक विशेष आधार होता है कि यह स्वयं में आत्मनिर्भर होता है।
  • प्रत्येक समुदाय में हम-भावना मिल जाती है।
  • समुदाय में हमेशा स्थिरता रहती है अर्थात् यह टूटते नहीं हैं।

प्रश्न 4.
समिति के तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर-

  1. राजनीतिक दल (Political Parties)
  2. लेबर यूनियन (Labour Union)
  3. धार्मिक संगठन (Religious Organisations)
  4. अन्तर्राष्ट्रीय संगठन (International Associations)।

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प्रश्न 5.
टोनीज़ द्वारा प्रस्तुत समाज के प्रकार कौन से हैं ?
उत्तर-
1. जैमिन शाफ़ट (Gemein Schaft)-टोनीज़ के अनुसार, “जैमिनशाफ़ट एक समुदाय है जिसके सदस्य एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हुए रहते हैं तथा अपना जीवन व्यतीत करते हैं। इस समुदाय के जीवन में स्थायी रूप तथा प्राथमिक संबंध पाए जाते हैं।” उदाहरण के लिए ग्रामीण समुदाय।।

2. गैसिल शाफ़ट (Gesell Schaft)-टोनीज़ के अनुसार गैसिल शाफ़ट एक नया सामाजिक प्रकरण है जो औपचारिक तथा कम समय वाला होता है। यह और कुछ नहीं बल्कि समाज के लोगों का जीवन है। इसके सदस्यों के बीच द्वितीय संबंध पाए जाते हैं।

IV. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 250-300 शब्दों में दें :

प्रश्न 1.
समाज शब्द से आप क्या समझते हैं ? एक विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
साधारण भाषा में समाज का अर्थ ‘व्यक्तियों के समूह’ से लिया जाता है। बहुत से विद्वान् इस शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में करते हैं। इस प्रकार समाज का अर्थ किसी समूह के व्यक्तियों द्वारा लिया जा सकता है अपितु उनके मध्य के रिश्तों से नहीं। कभी-कभी समाज के अर्थ को किसी संस्था के नाम से भी लिया जाता है जैसेआर्य समाज, ब्रह्म समाज इत्यादि। इस प्रकार साधारण व्यक्ति की भाषा में समाज का अर्थ इन्हीं अर्थों में लिया जाता है, परन्तु समाजशास्त्र में इस शब्द का अर्थ कुछ और ही अर्थों में लिया जाता है।

समाजशास्त्र में ‘समाज’ शब्द का अर्थ लोगों के समूह से नहीं लिया जाता अपितु उनके बीच में पैदा हुए रिश्तों के फलस्वरूप जो सम्बन्ध पैदा हुए हैं उनसे लिया जाता है। सामाजिक रिश्तों में लोगों का बहुत महत्त्व होता है। वे समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग हैं यह एक प्रक्रिया है न कि वस्तु। समाज में एक आवश्यक वस्तु लोगों के बीच के रिश्ते एवं अन्तर्सम्बन्धों के बीच के नियम हैं जिसके साथ समाज के सदस्य एक-दूसरे के साथ रहते हैं। जब समाजशास्त्री समाज शब्द का अर्थ साधारण रूप में करते हैं तो उनका अर्थ समाज में होने वाले सामाजिक सम्बन्धों के जाल से है और जब वह समाज शब्द को विशेष रूप में प्रयोग करते हैं तो उनका अर्थ होता है कि समाज उन व्यक्तियों का समूह है जिनमें विशेष प्रकार के सम्बन्ध पाए जाते हैं।

समाज (Society)—जब समाजशास्त्री ‘समाज’ शब्द का प्रयोग करते हैं तो उनका अर्थ सिर्फ लोगों के समूह मात्र से नहीं होता बल्कि उनका अर्थ होता है समाज के लोगों में पाए जाने वाले सम्बन्धों के जाल से जिसके साथ लोग एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। सिर्फ कुछ लोगों को इकट्ठा करने से ही समाज नहीं बन जाता। समाज उस समय ही बनता है जब समाज के उन लोगों में अर्थपूर्ण संबंध स्थापित हो जाएं। यह सम्बन्ध अस्थिर होते हैं। हम इन्हें देख नहीं सकते और न ही इनका कोई ठोस रूप होता है। हम केवल इन्हें महसूस कर सकते हैं। यह जीवन के प्रत्येक रूप में मौजूद होते हैं। इन सम्बन्धों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। यह तो आपस में इतने अन्तर्सम्बन्धित होते हैं कि इनको अलग-अलग करना बहुत मुश्किल है। यह सभी सम्बन्ध जो व्यक्तियों के बीच होते हैं, इनके जाल को ही समाज कहते हैं। हम इन्हें देख नहीं सकते इसीलिए यह अमूर्त होते हैं।

कुछ लेखक यह विचार करते हैं कि समाज तभी बनता है जब इसके सदस्य एक-दूसरे को जानते हों और उनके कुछ आपसी हित हों। उदाहरण के लिए यदि कोई दो व्यक्ति बस में सफर कर रहे हों और एक-दूसरे को जानते न हों, तो वह समाज नहीं बना सकते। परन्तु यदि वही दो व्यक्ति आपस में बातचीत करनी शुरू कर देते हैं, एक-दूसरे के बारे में जानना शुरू कर देते हैं तो समाज का अस्तित्व कायम होना शुरू हो जाता है। उन दोनों के बीच में एक-दूसरे की तरफ व्यवहार ज़रूरी है।

वास्तव में समाज, सामाजिक सम्बन्धों का जाल है। व्यक्ति जो एक स्थान पर रहते हैं उनके बीच आपसी सम्बन्ध होते हैं और एक-दूसरे के साथ लाभ जुड़े होते हैं। वह एक-दूसरे के ऊपर निर्भर होते हैं और इस प्रकार समाज का निर्माण करते हैं।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 3 समाज, समुदाय तथा समिति

प्रश्न 2.
व्यक्ति तथा समाज अन्तःसम्बन्धित हैं। तर्क दीजिए।
उत्तर-
ग्रीक (यूनानी) फ़िलॉस्फर अरस्तु (Aristotle) ने कहा था कि “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” इस का अर्थ यह है कि मनुष्य समाज में रहता है। समाज के बिना मनुष्य की कीमत कुछ भी नहीं है। वह मनुष्य जो और मनुष्यों के साथ मिलकर साझे जीवन को नहीं निभाता, वह मनुष्यता के नीचे स्तर से है। मनुष्य को लंबा जीवन जीने के लिए बहुत सारी ज़रूरतों के लिए अन्य मनुष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। उसे अपनी सुरक्षा, भोजन, शिक्षा, सामान, कई प्रकार की सेवाओं के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। मनुष्य को हम सामाजिक प्राणी तीन अलग-अलग आधारों पर कह सकते हैं

1. मनुष्य प्रकृति से सामाजिक है (Man is social by nature)-सबसे पहले मनुष्य प्रकृति से ही सामाजिक है। मनुष्य अकेला नहीं रह सकता। कोई भी समाज से अलग रह कर आम तरीके से विकास नहीं कर सकता। बहुत-से समाजशास्त्रियों ने अनुभव किए हैं कि जो बच्चे समाज से अलग रह कर के बड़े हुए हैं वह सही तरह विकास नहीं कर सके हैं। यहाँ तक कि एक बच्चा 17 साल की उम्र का होकर भी सही तरह से चल नहीं सकता है। उसको शिक्षा देने के बाद भी वह साधारण मनुष्यों की भांति नहीं रह सका।

इसके साथ का एक केस हमारे सामने आया। 1920 में दो हिन्दू बच्चे एक भेड़िए की गुफ़ा में मिले थे। उनमें से एक बच्चा तो मिलने से कुछ समय बाद ही मर गया था पर दूसरे बच्चे ने अजीब तरह से व्यवहार किया। वह मनुष्यों की भाँति चल नहीं सकता था। वह उनकी तरह खा भी नहीं सकता था और बोल भी नहीं सकता था। वह जानवरों की तरह चार हाथों पैरों के भार चलता था, उस के पास कोई भाषा नहीं थी और वह भेड़िए की तरह चीखता था। वह बच्चा मनुष्यों से डरता था। उसके बाद उस बच्चे के साथ हमदर्दी और प्यार भरा व्यवहार अपनाया गया जिसके कारण वह कुछ सामाजिक आदतें और व्यवहार सीख सका।

एक और केस अमेरिका में एक बच्चे के साथ प्रयोग किया गया। उस बच्चे के माता-पिता का पता नहीं था। उसको 6 महीने की उम्र से ही एक कमरे में एकांत में रखा गया। 5 साल बाद देखा गया कि वह बच्चा न तो चल सकता है और न ही बोल सकता है तथा वह और मनुष्यों से भी डरता था।

यह सभी उदाहरण यह साबित करते हैं कि मनुष्य प्रकृति से ही सामाजिक है। मनुष्य उस स्थिति में ही ठीक तरह से विकास कर सकते हैं जब वह समाज में रहते हों और अपने जीवन को दूसरे मनुष्यों के साथ बाँटते हों। उपरोक्त उदाहरणों से हम देख सकते हैं कि उन बच्चों में मनुष्यों जैसा सामर्थ्य तो था पर सामाजिक समझौतों की कमी में वह सामाजिक तौर पर विकास करने में असमर्थ रहे। समाज में ऐसी चीज़ है जो मनुष्य की प्रकृति की आवश्यक चीज़ों को पूरा करती है। यह कोई भगवान् द्वारा थोपी गई चीज़ नहीं है बल्कि मनुष्य प्रकृति से ही सामाजिक है।

2. आवश्यकता इन्सान को सामाजिक बनाती है (Necessity makes a man social)—मनुष्य समाज में इसलिए रहता है क्योंकि उसको समाज से बहुत कुछ चाहिए होता है। यदि वह समाज के दूसरे सदस्यों के साथ सहयोग नहीं करेगा तो उसकी बहुत-सी ज़रूरतें पूरी नहीं होंगी। हर बच्चा आदमी और औरत के आपसी सम्बन्धों का परिणाम होता है, बच्चा अपने माँ-बाप की देख-रेख में बड़ा होता है और अपने माँ-बाप के साथ रहते हुए वह बहुत कुछ सीखता है। बच्चा अपने अस्तित्व के लिए लिए पूरी तरह समाज पर निर्भर करता है। यदि एक नए जन्मे बच्चे को समाज की सुरक्षा न मिले तो शायद वह नया जन्मा बच्चा एक दिन भी जिंदा न रह सके। मनुष्य का बच्चा इतना असहाय होता है कि उसको समाज की सहायता की आवश्यकता पड़ती ही है। हम उसके खाने, कपड़े और रहने की ज़रूरतें पूरी करते हैं क्योंकि हम सब समाज में रहते हैं और सिर्फ समाज में रह कर ही ये आवश्यकताएं पूरी हो सकती हैं। ऊपर दी गई उदाहरणों ने यह साबित किया है कि जो बच्चे जानवरों द्वारा बड़े किए जाते हैं वह आदतों से जानवर ही रहते हैं। बच्चे के शारीरिक विकास और मानसिक विकास के लिए समाज का होना आवश्यक है। कोई भी तब तक मनुष्य नहीं कहलाता जब तक वह मनुष्य के समाज में अन्य मनुष्यों के साथ न रहे। खाने की भूख हमें अन्य लोगों के साथ सम्बन्ध बनाने को बाध्य करती है इसलिए हमें कुछ काम करने पड़ते हैं तथा यह काम औरों के साथ सम्बन्ध बनाते हैं। इस तरह सिर्फ मनुष्य की प्रकृति के कारण ही नहीं बल्कि अपनी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए समाज में रहता है।

3. समाज व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाता है (Society makes personality)- मनुष्य समाज में अपने शारीरिक एवं मानसिक पक्ष को विकसित करने के लिए रहता है। समाज अपनी संस्कृति और विरासत को संभाल कर रखता है ताकि इसको अपनी अगली पीढ़ी को सौंपा जा सके। यह हमें स्वतन्त्रता भी देता है ताकि हम अपने गुणों को निखार सकें और अपने व्यवहार, इच्छाओं, विश्वास, रीतियों इत्यादि को परिवर्तित कर सकें। समाज के बिना व्यक्ति का मन एक बच्चे के मन की भाँति होता है। हमारी संस्कृति और हमारी विरासत हमारे व्यक्तित्व को बनाती हैं क्योंकि हमारे व्यक्तित्व पर सबसे ज्यादा प्रभाव हमारी संस्कृति का होता है। समाज सिर्फ हमारी शारीरिक आवश्यकताएं ही नहीं बल्कि मानसिक आवश्यकताओं को भी पूरी करता है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि मनुष्य प्रकृति से ही सामाजिक है। यदि मनुष्य मनुष्यों की तरह रहना चाहता है तो उसको समाज की ज़रूरत है। उसको सिर्फ एक दो या कुछ आवश्यकताओं के लिए ही नहीं बल्कि अपने व्यक्तित्व को बनाने के लिए भी समाज की आवश्यकता पड़ती है।

व्यक्तियों के बिना समाज भी अस्तित्व में नहीं आ सकता। समाज कुछ नहीं है बल्कि सम्बन्धों का एक जाल है और सम्बन्ध सिर्फ व्यक्तियों में ही हो सकते हैं। इसीलिए यह एक-दूसरे पर निर्भर हैं। दोनों के बीच सम्बन्ध एक तरफ़ा नहीं है। यह दोनों एक-दूसरे के अस्तित्व के लिए ज़रूरी हैं। व्यक्तियों को सिर्फ जीव नहीं कहा जा सकता और समाज सिर्फ मनुष्य की ज़रूरतों को पूरा करने का साधन नहीं है। समाज वह है जिसके बिना व्यक्ति नहीं रह सकते तथा व्यक्ति वह है जिनके बिना समाज अस्तित्व में नहीं आ सकता। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या समाज से ज्यादा मनुष्य ज़रूरी है या मनुष्यों से ज्यादा समाज ज़रूरी है। यह प्रश्न उस प्रश्न के समान है कि दुनिया में पहले मुर्गी आई या अंडा। वास्तविकता यह है कि सभी मनुष्य समाज में पैदा हुए हैं और पैदा होते ही समाज में डाल दिए जाते हैं। कोई भी पूर्ण रूप में व्यक्तिगत नहीं हो सकता और न ही कोई पूर्ण रूप में सामाजिक हो सकता है।

वास्तव में ये दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। दोनों में से यदि एक भी न हो तो दूसरे का होना मुश्किल है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। समाज ही व्यक्ति में स्वैः (Self) का विकास करता है। समाज में रहकर ही व्यक्ति सामाजिक आदतों को ग्रहण करता है और सामाजिक बनता है। इसके साथ समाज व्यक्तियों के बिना नहीं बन सकता। समाज बनाने के लिए कम-से-कम दो व्यक्तियों की ज़रूरत पड़ती है। उनके बीच सम्बन्ध होना भी ज़रूरी है। इस तरह समाज व्यक्तियों के बीच में पैदा हुए सम्बन्धों का जाल है। इस तरह एक का अस्तित्व दूसरे पर निर्भर करता है। एक की अनुपस्थिति से दूसरे का अस्तित्व मुमकिन नहीं है।

प्रश्न 3.
समुदाय से आप क्या समझते हैं ? समुदाय की विशेषताओं की विस्तृत चर्चा कीजिए।
उत्तर–
प्रत्येक समाज में अलग-अलग प्रकार के समूह पाए जाते हैं। इन अलग-अलग प्रकार के समूहों को अलग-अलग प्रकार के नाम दिए गए हैं और समुदाय इन नामों में से एक है। समुदाय अपने आप में एक समाज है और यह एक निश्चित क्षेत्र में होता है जैसे-कोई गाँव अथवा शहर। जब से मनुष्य ने एक जगह पर रहना शुरू किया है तब से ही वह समुदाय में रहता आया है। सबसे पहले जब मनुष्य ने कृषि करनी शुरू की उस समय से ही व्यक्ति ने समुदाय में रहना शुरू कर दिया है क्योंकि व्यक्ति एक ही स्थान पर रहना शुरू हो गया और इसके साथ लेन-देन शुरू हो गया।

समाजशास्त्र में समुदाय का अर्थ- समाजशास्त्र में इस शब्द समुदाय के व्यापक अर्थ हैं। साधारण शब्दों में जब कुछ व्यक्ति एक समूह में, एक विशेष इलाके में संगठित रूप से रहते हैं और वह किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि अपना जीवन ही उधर बिताते हैं तब उसको हम समुदाय कहते हैं। यह एक मूर्त संकल्प है। समुदाय की स्थापना जान-बूझ कर नहीं की जाती। इसका जन्म भी नहीं होता इसका तो विकास होता है और अपने आप ही हो जाता है। जब लोग इलाके में रहते हैं और सामाजिक प्रक्रियाएँ करते हैं तो यह अपने आप ही विकास कर जाता है। समुदाय का अपना एक भौगोलिक क्षेत्र होता है जहाँ सदस्य अपनी ज़रूरतें खुद ही पूरी कर लेते हैं क्योंकि सदस्यों में आपस में लेन-देन होता है। समुदाय के सदस्य अपनी हर प्रकार की ज़रूरत को खुद ही पूरा कर लेते हैं। जब व्यक्ति ज़रूरतें पूरी करने के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हैं तो उनमें साझ पैदा हो जाती है जिसके कारण हम भावना उत्पन्न हो जाती है। जब लोग आपस में मिलकर रहते हैं तो उनमें कुछ नियम भी उत्पन्न हो जाते हैं।

समुदाय की विशेषताएं या तत्त्व (Characteristics or Elements of Community) –

1. हम भावना (We feeling)—समुदाय की यह विशेषता होती है कि इसमें हम भावना होती है। हम भावना के कारण ही समुदाय का हर सदस्य अपने आपको एक-दूसरे से अलग नहीं समझता बल्कि उन पर विश्वास करते हैं कि वह सब एक हैं। वह औरों जैसा और औरों में से एक है।

2. भूमिका की भावना (Role feeling) समुदाय की दूसरी विशेषता यह है कि इसके सदस्यों में भूमिका की भावना होती है। समुदाय में हर किसी को कोई-न-कोई पद और भूमिका प्राप्त होती है और उन को पता होता है कि उन्होंने कौन-से काम करने हैं और कौन-से कर्तव्यों का पालन करना है ।

3. निर्भरता (Dependence)-समुदाय की एक और विशेषता यह होती है कि समुदाय के सदस्य अपनी ज़रूरतों के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं और अकेले एक व्यक्ति के लिए समुदाय से अलग रहना सम्भव नहीं है। व्यक्ति सभी कार्य अकेले नहीं कर सकता। इसीलिए उसको अपने बहुत सारे कार्यों के लिए औरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

4. स्थिरता (Permanence)—समुदाय में स्थिरता होती है। इसके सदस्य अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी होते हैं। यदि कोई व्यक्ति कुछ समय के लिए समुदाय छोड़कर चला जाता है तो कोई बात नहीं फिर भी वह अपने समुदाय से जुड़ा रहता है। यदि कोई अपना समुदाय छोड़कर विदेश चला जाता है तो समुदाय का दायरा बढ़ने लग जाता है क्योंकि बाहरी देश में जाने के बाद भी व्यक्ति अपने समुदाय को भूलता नहीं है। आज-कल कोई व्यक्ति सिर्फ एक समुदाय का सदस्य नहीं है। अलग-अलग समय में व्यक्ति अलग-अलग समुदाय का सदस्य होता है। इसलिए व्यक्ति चाहे जिस भी समुदाय का सदस्य हो उसमें भी स्थिरता रहती है।

5. आम जीवन (Common life)-समुदाय का कोई विशेष उद्देश्य नहीं होता। उसका सिर्फ एक ही उद्देश्य होता है कि सारे अपना जीवन आराम से बिता सकें और मनुष्य अपना जीवन समुदाय में रहते हुए ही बिता देता है।

6. भौगोलिक क्षेत्र (Geographical Area) हर समुदाय का अपना भौगोलिक क्षेत्र होता है जिसमें वह रहता है। बिना किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र के समुदाय नहीं बन सकता।

7. अपने आप जन्म (Spontaneous Birth) समुदाय अपने आप ही पैदा हो जाता है। समुदाय का कोई विशेष इरादा नहीं होता। इसकी स्थापना जान-बूझ कर नहीं की जाती। जिस जगह पर व्यक्ति अधिक समय के लिए रहना शुरू कर देते हैं उधर समुदाय अपने आप पैदा हो जाता है। समुदाय उसको वे सभी सहूलतें देते हैं जिसके साथ मनुष्य अपनी ज़रूरतें आराम से पूरी कर सकता है।

8. विशेष नाम (Particular Name)-प्रत्येक समुदाय को एक विशेष नाम दिया जाता है जोकि समुदाय के बनने के लिए आवश्यक है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 3 समाज, समुदाय तथा समिति

प्रश्न 4.
समुदाय को परिभाषित कीजिए। समुदाय किस अर्थ में समाज से भिन्न है ? चर्चा कीजिए।
उत्तर-
नोट- समुदाय की परिभाषा-इसके लिए प्रश्न देखें 3.
समुदाय तथा समाज में अंतर (Difference between Community and Society)

  1. समाज व्यक्तियों का समूह है जो स्वयं ही विकसित हो जाता है परन्तु समुदाय चाहे स्वयं ही विकसित होता है परन्तु यह होता किसी विशेष क्षेत्र में है।
  2. समाज का कोई विशेष भौगोलिक क्षेत्र नहीं होता परन्तु समुदाय का एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र होता है।
  3. समाज का कोई विशेष नाम नहीं होता परन्तु समुदाय का एक विशेष नाम होता है।
  4. समाज सामाजिक संबंधों पर आधारित होता है जिस कारण यह अमूर्त होता है परन्तु समुदाय एक मूर्त संकल्प है।
  5. प्रत्येक समाज अपने आप में आत्मनिर्भर नहीं होता परन्तु प्रत्येक समुदाय अपने आप में आत्मनिर्भर होता है जिस कारण यह अपने सदस्यों की सभी आवश्यकताएं पूर्ण कर सकता है।
  6. समाज के सदस्यों के बीच हम भावना नहीं होती परन्तु समुदाय के सदस्यों के बीच हम भावना होती है।

प्रश्न 5.
समुदाय तथा समिति के मध्य अन्तर कीजिए।
उत्तर-
समुदाय तथा समिति में अन्तर-

  1. समुदाय अपने आप में विकसित होता है, इसको बनाया नहीं जाता जबकि समिति का निर्माण जानबूझ कर किया जाता है।
  2. समुदाय का कोई विशेष उद्देश्य नहीं होता। यह सभी के हितों की पूर्ति करता है जबकि समितियों का एक निश्चित उद्देश्य होता है।
  3. एक व्यक्ति एक समय में सिर्फ एक समुदाय का सदस्य होता है जबकि व्यक्ति एक ही समय में कई समितियों का सदस्य हो सकता है।
  4. समुदाय की सदस्यता व्यक्ति की ज़रूरत होती है जबकि समिति की सदस्यता ऐच्छिक होती है।
  5. समुदाय के लिए एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र का होना ज़रूरी है जबकि समिति के लिए यह जरूरी नहीं है।
  6. समुदाय अपने आप में एक उद्देश्य होता है जबकि समिति किसी उद्देश्य को पूरा करने का साधन होती है।
  7. समुदाय स्थायी होता है पर समिति अस्थायी होती है।
  8. व्यक्ति समुदाय में पैदा होता है और इसमें ही मर जाता है पर व्यक्ति समिति में इसीलिए हिस्सा लेता है क्योंकि उसको किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति करनी होती है।
  9. समुदाय का कोई वैधानिक दर्जा नहीं होता पर समिति का वैधानिक दर्जा होता है।

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प्रश्न 6.
समाज तथा सभा के मध्य अन्तर की चर्चा कीजिए।
उत्तर-
1. सभा व्यक्तियों का समूह है जो किसी विशेष उद्देश्य के लिए निर्मित की जाती है परन्तु समाज व्यक्तियों का समूह है जो किसी विशेष उद्देश्य के लिए नहीं बल्कि स्वयं ही विकसित हो जाता है।

2. सभा की सदस्यता व्यक्ति के लिए ऐच्छिक होती है तथा व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के पश्चात् इनकी सदस्यता छोड़ भी सकता है परन्तु समाज की सदस्यता ऐच्छिक नहीं होती बल्कि आवश्यक होती है तथा व्यक्ति को तमाम आयु समाज का सदस्य बन कर रहना पड़ता है। .

3. सभा एक मूर्त व्यवस्था है क्योंकि यह लोगों की आवश्यकताओं पर आधारित होती है परन्तु समाज अमूर्त व्यवस्था है क्योंकि यह सामाजिक संबंधों पर आधारित होता है जोकि अमूर्त होते हैं।

4. सभा चेतन रूप से लोगों के प्रयासों से विकसित होती है परन्तु समाज स्वयं ही विकसित हो जाते हैं तथा इसमें चेतन प्रयासों की आवश्यकता नहीं होती।

5. सभा का एक औपचारिक ढांचा होता है जिसमें प्रधान, सैक्रेटरी, कैशियर, सदस्य इत्यादि होते हैं तथा इनका चुनाव निश्चित समय के लिए होता है परन्तु समाज का कोई औपचारिक ढांचा नहीं होता तथा सभी व्यक्ति ही इसके सदस्य होते हैं। यह तमाम आयु इसकी सदस्यता नहीं छोड़ सकते।

6. सभा की उत्पत्ति केवल उन व्यक्तियों के प्रयासों का परिणाम होती है जिनके इसके साथ उद्देश्य जुड़े हुए होते हैं परन्तु समाज की उत्पत्ति सभी लोगों की सहमति से होती है तथा इसके साथ किसी व्यक्ति विशेष का स्वार्थ नहीं जुड़ा होता।

7. व्यक्ति अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के पश्चात् सभा को अचानक ही खत्म कर देते हैं परन्तु कोई भी व्यक्ति को तोड़ नहीं सकता तथा इसका अस्तित्व खत्म नहीं हो सकता।

8. सभा की उत्पत्ति विचार से नहीं बल्कि उद्देश्य से संबंधित होती है परन्तु समाज की उत्पत्ति सामाजिक संबंधों पर निर्भर करती है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

I. बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions) :

प्रश्न 1.
यह शब्द किसके हैं-“मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।”
(A) मैकाइवर
(B) वैबर
(C) अरस्तु
(D) प्लेटो।
उत्तर-
(D) प्लेटो।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 3 समाज, समुदाय तथा समिति

प्रश्न 2.
समाज के निर्माण के लिए समानता तथा अन्तरों की क्या आवश्यकता है ?
(A) सम्बन्ध बनाने के लिए
(B) सामाजिक प्रगति के लिए
(C) समाज को जनसंख्यात्मक रूप में आगे बढ़ाने के लिए
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3.
मार्क्स के अनुसार ऐतिहासिक दृष्टि से सबसे पहला समाज कौन-सा था ?
(A) आदिम साम्यवादी
(B) सामन्तवादी
(C) दास मूलक
(D) पूंजीवादी।
उत्तर-
(A) आदिम साम्यवादी।

प्रश्न 4.
व्यक्ति और व्यक्तियों के साथ सामाजिक सम्बन्ध क्यों बनाता है ?
(A) अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
(B) स्वयं निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए
(C) अपने आपको स्वार्थी व्यक्तियों के उत्पीड़न से बचने के लिए
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 5.
व्यक्ति एवं समाज एक-दूसरे के …….. माने जाते हैं।
(A) विरुद्ध
(B) पूरक
(C) समान
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(B) पूरक।

प्रश्न 6.
इनमें से समाज में क्या पाया जाता है ?
(A) समानता
(B) सहयोग
(C) संघर्ष
(D) संघर्ष तथा सहयोग।
उत्तर-
(D) संघर्ष तथा सहयोग।

प्रश्न 7.
व्यक्तियों का एक संगठन जो किन्हीं सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाया गया है, उसे क्या कहते है ?
(A) एक समाज
(B) समाज
(C) समूह
(D) एक संगठन।
उत्तर-
(A) एक समाज।

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प्रश्न 8.
इनमें से कौन समुदाय के बीच नहीं आता ?
(A) केरल के लोग दिल्ली में
(B) अमेरिका में जन्मे लोग
(C) ट्रेड यूनियन आन्दोलन
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(D) कोई नहीं।

प्रश्न 9.
समाज किसका जाल है ?
(A) सामाजिक परिमापों का
(B) एक-दूसरे के साथ सम्बन्धों का
(C) व्यक्तिगत रिश्तों का
(D) कोई नहीं।
उत्तर-
(B) एक-दूसरे के साथ सम्बन्धों का।

प्रश्न 10.
व्यक्ति तथा समाज में क्या सम्बन्ध है ?
(A) मनुष्य प्रकृति से सामाजिक है तथा वह अकेला नहीं रह सकता
(B) मनुष्य अपनी आवश्यकताओं के लिए समाज में रहता है
(C) समाज व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाता है
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपर्युक्त सभी।

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II. रिक्त स्थान भरें (Fill in the blanks) :

1. समाज ……………. पर आधारित होता है।
2. समुदाय लोगों की ……………. से स्वयं ही विकसित हो जाता है।
3. …………. की स्थापना विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए सोच समझ कर की जाती है।
4. ………….. की सदस्यता व्यक्ति की इच्छा पर आधारित होती है।
5. समाज ……… होता है।
6. ……….. समाज में टोटम का महत्त्व होता है।
7. ………. की सदस्यता औपचारिक होती है।
उत्तर-

  1. सामाजिक संबंधों,
  2. अन्तक्रियाओं,
  3. समिति,
  4. समिति,
  5. अमूर्त,
  6. आदिवासी,
  7. समिति।

III. सही गलत (True/False) :

1. समाज की सदस्यता व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करती है।
2. समाज सामाजिक संबंधों के कारण बनता है।
3. समुदाय स्वयं विकसित होता है।
4. समिति का निर्माण जानबूझ कर दिया जाता है।
5. समिति की सदस्यता अनौपचारिक होती है।
6. मानवीय समाज में भाषा का बहुत महत्त्व होता है।
7. संस्था किसी कार्य या उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए परिमापों की व्यवस्था है।
उत्तर-

  1. गलत,
  2. सही,
  3. सही,
  4. सही,
  5. गलत,
  6. सही,
  7. सहीं।

IV. एक शब्द/पंक्ति वाले प्रश्न उत्तर (One Wordline Question Answers) :

प्रश्न 1.
व्यक्तियों के समूह को कौन समाज कहता है ?
उत्तर-
एक साधारण व्यक्ति, व्यक्तियों के समूह को समाज कहता है।

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प्रश्न 2.
अगर समाज के सदस्यों के बीच सहयोग खत्म हो जाए तो क्या होगा ?
उत्तर-
अगर समाज के सदस्यों के बीच सहयोग खत्म हो जाए तो समाज खत्म हो जाएगा।

प्रश्न 3.
समाज………..पर आधारित है।
उत्तर-
समाज सम्बन्धों पर आधारित है।

प्रश्न 4.
किसने कहा था कि, “समाज समानताओं एवं असमानताओं के बिना चल नहीं सकता।”
उत्तर-
यह शब्द वैस्टमार्क के हैं।

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प्रश्न 5.
किताब SOCIETY का लेखक………….है।
उत्तर-
किताब SOCIETY के लेखक मैकाइवर तथा पेज हैं।

प्रश्न 6.
समाज अमूर्त क्यों होता है ?
उत्तर-
क्योंकि समाज सम्बन्धों का जाल है तथा सम्बन्ध अमूर्त होते हैं और हम सम्बन्धों को देख नहीं सकते।

प्रश्न 7.
समाज की एक विशेषता बताएं।
उत्तर-
समाज सम्बन्धों पर आधारित होता है तथा भिन्नताओं और समानताओं पर आधारित होता है।

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प्रश्न 8.
समाज क्या होता है ?
उत्तर-
साधारण शब्दों में, व्यक्तियों के समूह को समाज कहते हैं, परन्तु समाजशास्त्र में सामाजिक सम्बन्धों के जाल को समाज कहते हैं।

प्रश्न 9.
समाज का प्रमुख आधार क्या होता है ?
उत्तर-
समाज की इकाइयों अर्थात् व्यक्तियों में पाये जाने वाले सामाजिक सम्बन्ध समाज के प्रमुख आधार हैं।

प्रश्न 10.
समुदाय क्या है ?
उत्तर-
समुदाय मनुष्यों का एक भौगोलिक समूह है जहाँ व्यक्ति अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करता है।

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प्रश्न 11.
क्या मनुष्यों में सभी समूह समुदाय होते हैं ?
उत्तर-
जी नहीं, वे संस्थाएं अथवा कई अन्य प्रकार के समूह भी हो सकते हैं।

प्रश्न 12.
समुदाय का शाब्दिक अर्थ बताएं।
उत्तर-
समुदाय शब्द अंग्रेज़ी के Community शब्द का हिन्दी रूपांतर है जिसका अर्थ है इकट्ठे मिलकर बनाना।

प्रश्न 13.
शब्द Community किन दो लातीनी शब्दों को मिलाकर बना है ?
उत्तर-
शब्द Community लातीनी भाषा के शब्दों Com तथा Munus से मिलकर बना है।

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प्रश्न 14.
समुदाय कैसे विकसित होता है ?
उत्तर-
समुदाय लोगों की अंतक्रियाओं से स्वयं ही विकसित हो जाता है।

प्रश्न 15.
समुदाय का जन्म किस प्रकार होता है ?
उत्तर-
समुदाय का जन्म अपने आप ही हो जाता है।

प्रश्न 16.
क्या समुदाय में सामुदायिक भावना होती है ?
उत्तर-
जी हाँ, समुदाय में सामुदायिक भावना होती है।

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प्रश्न 17.
सभा क्या है ?
उत्तर-
जब कुछ लोग किसी विशेष उद्देश्य के लिए आपस में सहयोग करते हैं तथा संगठन बनाते हैं तो इस संगठित हुए संगठन को सभा कहते हैं।

प्रश्न 18.
सभा की स्थापना कैसे होती है ?
उत्तर-
सभा की स्थापना विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए सोच-समझ कर की जाती है।

प्रश्न 19.
सभा की सदस्यता का आधार क्या है ?
उत्तर-
सभा की सदस्यता का आधार व्यक्ति की इच्छा है अर्थात् वह अपनी इच्छा से सभा का सदस्य बनता है।

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प्रश्न 20.
सभा की सदस्यता किस प्रकार की होती है ?
उत्तर-
सभा की सदस्यता औपचारिक होती है।

प्रश्न 21.
सभा तथा समुदाय में एक अन्तर बताएं।
उत्तर-
समुदाय अपने आप विकसित होता है। इसे बनाया नहीं जाता परन्तु किसी संभा का निर्माण चेतन प्रयासों से किया जाता है।

अति लघु उतरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समाज।
उत्तर-
समाज का अर्थ केवल लोगों के इकट्ठे होने से नहीं है बल्कि समाज के लोगों में पाए जाने वाले संबंधों के जाल से है जिससे लोग एक-दूसरे से जुड़े होते थे। तब लोगों के बीच संबंध बनते हैं तो समाज का निर्माण होता है।

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प्रश्न 2.
समाज की परिभाषा।
उत्तर-
पारसन्ज़ के अनुसार, “समाज को उन संबंधों की पूर्ण जटिलता के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है जो कार्यों के करने से उत्पन्न हुए हों तथा यह कार्य व उद्देश्य के रूप में किए गए हों चाहे वह आंतरिक हों या सांकेतिक।”

प्रश्न 3.
समाज की दो विशेषताएं।
उत्तर-

  1. समाज संबंधों पर आधारित होता है, लोगों के बीच बिना संबंधों के समाज का निर्माण नहीं हो सकता।
  2. समाज समानताओं तथा भिन्नताओं पर आधारित होता है। दोनों के बिना समाज कायम नहीं हो सकता।

प्रश्न 4.
अमूर्तता।
उत्तर-
समाज अमूर्त होता है क्योंकि यह संबंधों का जाल है। इन संबंधों को हम देख नहीं सकते तथा न ही स्पर्श कर सकते हैं। इन्हें तो केवल महसूस किया जा सकता है क्योंकि हम इन्हें स्पर्श नहीं कर सकते इसलिए यह अमूर्त होता है।

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प्रश्न 5.
समाज में भाषा का महत्त्व।
उत्तर-
मानवीय समाज में भाषा का बहुत महत्त्व होता है क्योंकि भाषा ही अपने विचार व्यक्त करने का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। बिना भाषा के संबंध स्थापित नहीं हो सकते तथा समाज स्थापित नहीं हो सकता ।

प्रश्न 6.
मानवीय समाज तथा पशुओं के समाज में एक अन्तर।
उत्तर-
मानवीय समाज में केवल मनुष्य ही है जो बोल सकते हैं तथा अपने विचारों को स्पष्ट रूप दे सकते हैं। अन्य कोई पशु या प्राणी बोल नहीं सकता। वह केवल तरह-तरह की आवाजें निकाल सकते हैं।

प्रश्न 7.
समुदाय।
उत्तर-
जब कुछ व्यक्ति एक समूह में एक विशेष इलाके में संगठित रूप में रहते हैं तथा वह किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि अपना जीवन ही वहीं व्यतीत करते हैं तो उसे हम समुदाय कहते हैं।

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प्रश्न 8.
समुदाय का शाब्दिक अर्थ।।
उत्तर-
समुदाय अंग्रेज़ी के Community का हिंदी रूपांतर है। यह लातीनी भाषा के दो शब्दों Com जिसका अर्थ है इकट्ठे मिलकर रहना तथा Munus जिसका अर्थ है बनाना, से मिल कर बना है तथा इकट्ठे होकर इसका अर्थ है इकट्ठे मिल कर बनाना।

प्रश्न 9.
सभा का अर्थ।
उत्तर-
सभा सहयोग के ऊपर आधारित होती है। जब कुछ लोग किसी विशेष उद्देश्य के लिए आपस में सहयोग करते हैं तथा संगठन बनाते हैं तो इस संगठित हुए संगठन को सभा कहते हैं।

प्रश्न 10.
सभा की परिभाषा।
उत्तर-
गिलिन तथा गिलिन के अनुसार, “सभा व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो किसी निश्चित उद्देश्य या उद्देश्यों के लिए परस्पर संबंधित होते हैं तथा स्वीकृत कार्य प्रणालियों तथा व्यवहारों द्वारा संगठित रहते हैं।”

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प्रश्न 11.
संस्था का अर्थ।
उत्तर-
संस्था किसी कार्य या उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए परिमापों की व्यवस्था है। संस्था तो किसी विशेष महत्त्वपूर्ण मानवीय क्रिया के द्वारा केंद्रित रूढ़ियों तथा लोकरीतियों का गुच्छा है। संस्थाएं तो संरचित प्रक्रियाएं हैं जिनके द्वारा व्यक्ति अपने कार्य करता है।

प्रश्न 12.
संस्था का एक आवश्यक तत्त्व।
उत्तर-
विचार संस्था का आवश्यक तत्त्व है। किसी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए एक विचार की शुरुआत होती है जिसे समूह अपने लिए आवश्यक समझता है। इस कारण इसकी रक्षा के लिए संस्था विकसित होती है।

प्रश्न 13.
संस्था के प्रकार।
उत्तर-
वैसे तो संस्थाएं कई प्रकार की होती हैं परन्तु यह मुख्य रूप से चार प्रकार की होती हैं तथा वह हैं-

  1. सामाजिक संस्थाएं
  2. धार्मिक संस्थाएं
  3. राजनीतिक संस्थाएं
  4. तथा आर्थिक संस्थाएं।

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लघु उतरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समाज का अर्थ।
उत्तर-
जब समाजशास्त्री समाज शब्द का उपयोग करते हैं तो उनका अभिप्राय केवल लोगों के योग मात्र से नहीं बल्कि उनका अर्थ होता है। समाज के लोगों में पाए गए सम्बन्धों के जाल से जिससे लोग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। केवल कुछ लोग इकट्ठे करने से समाज नहीं बन जाता। समाज केवल तब ही बनता है जब समाज के उन लोगों में अर्थ पूर्ण सम्बन्ध बन जाते हैं। यह सम्बन्ध अमूर्त होते हैं हम इन्हें देख नहीं सकते हैं। यह जीवन के हर रूप में मौजूद होते हैं इन सम्बन्धों को एक-दूसरे से भिन्न नहीं किया जा सकता। यह तो आपस में इतने अन्तर्सम्बन्धित होते हैं कि इनको अलग करना कठिन है। यह सभी सम्बन्ध जो व्यक्तियों में होते हैं, इनके जाल को ही समाज कहते हैं। इन्हें हम देख नहीं सकते इसलिए यह अमूर्त होते हैं।

प्रश्न 2.
समाज की विशेषताएं।
उत्तर-

  1. समाज सामाजिक सम्बन्धों पर आधारित होता है।
  2. समाज भिन्नताओं व समानताओं पर आधारित होता है।
  3. समाज के व्यक्ति एक-दूसरे पर अन्तर्निर्भर होते हैं।
  4. समाज अमूर्त होता है, क्योंकि यह सम्बन्धों का जाल है।
  5. समाज का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त उसकी जनसंख्या होती है।
  6. समाज में सहयोग व संघर्ष ज़रूरी होता है।

प्रश्न 3.
समुदाय।
उत्तर-
आम शब्दों में, जब कुछ व्यक्ति एक समूह में एक विशेष क्षेत्र में संगठित रूप से रहते हैं व वह किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि अपना जीवन ही वहां बिताते हैं तो उसको हम समुदाय कहते हैं। यह एक मूर्त संकल्प है। समुदाय की स्थापना जान-बूझ कर नहीं की जाती। इसका तो विकास अपने आप ही हो जाता है।

समुदाय का अपना एक भौगोलिक क्षेत्र होता है जहां सदस्य आप अपनी ज़रूरतों को पूरा कर लेते हैं। जब वह आपस में अपनी ज़रूरतें पूरी करते हैं तो उनमें ‘हम’ की भावना पैदा हो जाती है।

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प्रश्न 4.
समुदाय की विशेषताएं।
उत्तर-

  1. प्रत्येक समुदाय में ‘हम’ की भावना होती है।
  2. समुदाय के सदस्यों में एकता की भावना होती है।
  3. समुदाय के सदस्य अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।
  4. समुदाय में स्थिरता होती है व इसके सदस्य अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी होते हैं।
  5. समुदाय के लोग समुदाय में ही अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं।
  6. प्रत्येक समुदाय का अपना भौगोलिक क्षेत्र होता है जिस में वह रहता है।
  7. समुदाय का कोई विशेष उद्देश्य नहीं होता। यह तो अपने आप ही पैदा हो जाता है।

प्रश्न 5.
सभा।
उत्तर-
सभा सहयोग पर आधारित होती है। जब कुछ लोग विशेष उद्देश्य के लिए आपस में सहयोग करते हैं व संगठन बनाते हैं तो इस संगठित हुए संगठन को सभा कहते हैं। आम शब्दों में, किसी विशेष उद्देश्य के लिए बनाए गए संगठन को सभा कहते हैं। सभा का एक निश्चित उद्देश्य होता है जिसकी पूर्ति के बाद इसको छोड़ा जा सकता है।

प्रश्न 6.
सभा की विशेषताएं।
उत्तर-

  1. सभा व्यक्तियों का समूह होती है।
  2. सभा की स्थापना किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए सोच-विचार कर की जाती है।
  3. सभा के निश्चित उद्देश्य होते हैं।
  4. सभा का जन्म व विनाश होता रहता है।
  5. सभा की सदस्यता व्यक्ति की इच्छा पर आधारित होती है।
  6. सभा की सदस्यता पारम्परिक होती है।
  7. प्रत्येक सभा अपने कुछ अधिकारियों का चनाव करती है।
  8. प्रत्येक सभा के कुछ निश्चित उद्देश्य होते हैं।

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बड़े उत्तरों वाले प्रश्न :

प्रश्न 1.
समाज का अर्थ, परिभाषाओं तथा विशेषताओं के साथ बताएं।
उत्तर-
समाज का अर्थ-
साधारण भाषा में समाज का अर्थ ‘व्यक्तियों के समूह’ से लिया जाता है। बहुत से विद्वान् इस शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में करते हैं। इस प्रकार समाज का अर्थ किसी समूह के व्यक्तियों द्वारा लिया जा सकता है अपितु उनके मध्य के रिश्तों से नहीं। कभी-कभी समाज के अर्थ को किसी संस्था के नाम से भी लिया जाता है जैसेआर्य समाज, ब्रह्म समाज इत्यादि। इस प्रकार साधारण व्यक्ति की भाषा में समाज का अर्थ इन्हीं अर्थों में लिया जाता है, परन्तु समाजशास्त्र में इस शब्द का अर्थ कुछ और ही अर्थों में लिया जाता है।

समाजशास्त्र में ‘समाज’ शब्द का अर्थ लोगों के समूह से नहीं लिया जाता अपितु उनके बीच में पैदा हुए रिश्तों के फलस्वरूप जो सम्बन्ध पैदा हुए हैं उनसे लिया जाता है। सामाजिक रिश्तों में लोगों का बहुत महत्त्व होता है। वे समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग हैं यह एक प्रक्रिया है न कि वस्तु। समाज में एक आवश्यक वस्तु लोगों के बीच के रिश्ते एवं अन्तर्सम्बन्धों के बीच के नियम हैं जिसके साथ समाज के सदस्य एक-दूसरे के साथ रहते हैं। जब समाजशास्त्री समाज शब्द का अर्थ साधारण रूप में करते हैं तो उनका अर्थ समाज में होने वाले सामाजिक सम्बन्धों के जाल से है और जब वह समाज शब्द को विशेष रूप में प्रयोग करते हैं तो उनका अर्थ होता है कि समाज उन व्यक्तियों का समूह है जिनमें विशेष प्रकार के सम्बन्ध पाए जाते हैं।

समाज (Society)—जब समाजशास्त्री ‘समाज’ शब्द का प्रयोग करते हैं तो उनका अर्थ सिर्फ लोगों के समूह मात्र से नहीं होता बल्कि उनका अर्थ होता है समाज के लोगों में पाए जाने वाले सम्बन्धों के जाल से जिसके साथ लोग एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। सिर्फ कुछ लोगों को इकट्ठा करने से ही समाज नहीं बन जाता। समाज उस समय ही बनता है जब समाज के उन लोगों में अर्थपूर्ण संबंध स्थापित हो जाएं। यह सम्बन्ध अस्थिर होते हैं। हम इन्हें देख नहीं सकते और न ही इनका कोई ठोस रूप होता है। हम केवल इन्हें महसूस कर सकते हैं। यह जीवन के प्रत्येक रूप में मौजूद होते हैं। इन सम्बन्धों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। यह तो आपस में इतने अन्तर्सम्बन्धित होते हैं कि इनको अलग-अलग करना बहुत मुश्किल है। यह सभी सम्बन्ध जो व्यक्तियों के बीच होते हैं, इनके जाल को ही समाज कहते हैं। हम इन्हें देख नहीं सकते इसीलिए यह अमूर्त होते हैं।

कुछ लेखक यह विचार करते हैं कि समाज तभी बनता है जब इसके सदस्य एक-दूसरे को जानते हों और उनके कुछ आपसी हित हों। उदाहरण के लिए यदि कोई दो व्यक्ति बस में सफर कर रहे हों और एक-दूसरे को जानते न हों, तो वह समाज नहीं बना सकते। परन्तु यदि वही दो व्यक्ति आपस में बातचीत करनी शुरू कर देते हैं, एक-दूसरे के बारे में जानना शुरू कर देते हैं तो समाज का अस्तित्व कायम होना शुरू हो जाता है। उन दोनों के बीच में एक-दूसरे की तरफ व्यवहार ज़रूरी है।

वास्तव में समाज, सामाजिक सम्बन्धों का जाल है। व्यक्ति जो एक स्थान पर रहते हैं उनके बीच आपसी सम्बन्ध होते हैं और एक-दूसरे के साथ लाभ जुड़े होते हैं। वह एक-दूसरे के ऊपर निर्भर होते हैं और इस प्रकार समाज का निर्माण करते हैं।

परिभाषाएँ (Definitions)-
1. मैकाइवर और पेज (Maclver and Page) के अनुसार, “समाज व्यवहारों एवं प्रक्रियाओं की, अधिकार एवं परस्पर सहयोग की, अनेक समूहों एवं विभागों की, मानव व्यवहार के नियन्त्रण एवं स्वाधीनता की व्यवस्था है। इस निरन्तर परिर्वतनशील व्यवस्था को हम ‘समाज’ कहते हैं। यह सामाजिक सम्बन्धों का जाल है।”

2. गिडिंग्ज़ (Giddings) के अनुसार, “समाज एक संगठन है, यह पारस्परिक औपचारिक सम्बन्धों का ऐसा मेल है जिसके कारण उसके अन्तर्गत सभी व्यक्ति एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं।”

3. टालक्ट पारसन्ज (Talcot Parsons) के अनुसार, “समाज को उन सम्बन्धों की पूर्ण जटिलता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कार्यों के कारण से पैदा हुए हों और कार्य एवं उद्देश्य के रूप में किए गए हों चाहे वह आन्तरिक हों या सांकेतिक।”

4. कूले (Cooley) के अनुसार, “समाज स्वरूपों या प्रक्रियाओं का एक जाल है जिसमें हर कोई एक-दूसरे के साथ क्रिया करके जीता और आगे बढ़ता है और सभी एक-दूसरे के साथ इस प्रकार जुड़े होते हैं कि एक के प्रभावित होने के साथ बाकी सभी भी प्रभावित होते हैं।”

इस प्रकार समाज की ऊपर लिखी परिभाषाओं को देख कर हम यह कह सकते हैं कि यह परिभाषाएँ दो प्रकार की हैं। पहली प्रकार की हैं कार्यात्मक (Functional) परिभाषाएँ और दूसरी प्रकार की हैं संगठनात्मक (Structural) परिभाषाएँ। कार्यात्मक पक्ष से हम समाज को इस तरह परिभाषित कर सकते हैं कि यह समूहों का जाल है जिसमें अनुपूरक प्रकार के रिश्ते हों जो एक-दूसरे के साथ और जिन व्यक्तियों को अपने जीवन के काम करने में मदद करें और व्यक्ति को और व्यक्तियों के साथ रहते हुए उस की इच्छाएं पूरी करने में मदद करें।

संगठनात्मक पक्ष से समाज तो हमारे रीति-रिवाजों, आदतों, संस्थाओं, इच्छाओं आदि की एक सामाजिक विरासत है। इस प्रकार समाज कार्यात्मक एवं संगठनात्मक रूप, दोनों के साथ परिभाषित किया गया है कि यह व्यक्तियों के आपसी रिश्तों के साथ बना है और साथ ही साथ यह एक व्यवस्था है, एक जाल है न कि लोगों का एकत्र। हम समाज को इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं कि समाज मनुष्य के सम्बन्धों का वह संगठन है जिसको मनुष्यों द्वारा निर्मित, संचालित और परिवर्तित किया जाता है। सरल शब्दों में समाज एक अमूर्त धारणा है, समाज लोगों का सिर्फ समूह नहीं है। यह समाज सामाजिक सम्बन्धों का संगठन या व्यवस्था है।

समाज की विशेषताएँ (Characteristics of Society) –

1. समाज सम्बन्धों पर आधारित होता है (Society is based on relationships)-मैकाइवर और पेज के अनुसार, “समाज सामाजिक सम्बन्धों का जाल है।” इसका अर्थ यह हुआ कि समाज सम्बन्धों पर आधारित होता है। यहाँ ‘जाल’ शब्द का प्रयोग क्यों हुआ ? क्योंकि समाज में हजारों प्रकार के सम्बन्ध पाए जाते हैं। सिर्फ एक परिवार में 15 से ज्यादा तरह के सम्बन्ध पाए जा सकते हैं। इस से हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि समाज में कितने प्रकार के सम्बन्ध मौजूद होंगे। समाज केवल मनुष्यों का समूह मात्र नहीं है।

2. समाज अन्तरों और समानताओं पर आधारित होता है (Society depends upon likeness and differences)—समाज अन्तरों एवं समानताओं, दोनों पर आधारित होता है। दोनों के बिना समाज कायम नहीं रह सकता। यह चाहे एक-दूसरे के विरोध में रहती हैं परन्तु यह एक-दूसरे के बिना भी नहीं रह सकतीं। समाज में कभी समानता आती है और कभी अंतर आते है और इसलिए यह एक-दूसरे के पूरक होते हैं। सामाजिक सम्बन्ध तब ही स्थापित हो सकते हैं यदि किसी प्रकार की समानता हो क्योंकि इसके बिना एक-दूसरे के प्रति खिंचाव नहीं उत्पन्न हो सकता और समाज उत्पन्न नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त अन्तरों का होना भी आवश्यक है।

3. अन्तर्निर्भरता (Inter-dependence)- समाज के बने रहने के लिए अन्तर्निर्भरता एक आवश्यक तत्त्व है। मनुष्य को अपनी ज़रूरतों को पूरा करने हेतु अन्य व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध रखने पड़ते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की इतनी समर्था नहीं होती कि वह सभी कार्य अपने आप कर सके । उसको अन्य व्यक्तियों पर निर्भर रहना ही पड़ता है। व्यक्ति जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है वैसे-वैसे दूसरों पर निर्भर होता जाता है क्योंकि उसकी आवश्यकताएं बढ़ती जाती हैं। इस प्रकार अन्तर्निर्भरता समाज का एक ज़रूरी तत्त्व है।

4. समाज अमूर्त होता है (Society is abstract)-समाज अमूर्त होता है क्योंकि यह सम्बन्धों का जाल है इन सम्बन्धों को हम देख नहीं सकते और न ही स्पर्श सकते हैं। इनको तो हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं। क्योंकि हम सम्बन्धों को स्पर्श नहीं सकते इसीलिए इनका कोई ठोस रूप नहीं होता। इसीलिए यह अमूर्त होते हैं। क्योंकि सम्बन्ध अमूर्त होते हैं इसीलिए सम्बन्धों द्वारा बना समाज भी अमूर्त होता है।

5. जनसंख्या (Population)-समाज का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व मनुष्य है। मनुष्यों के बिना कोई समाज नहीं बन सकता। यदि मनुष्य ही नहीं होंगे तो सम्बन्ध कौन स्थापित करेगा और समाज कैसे बनेगा। व्यक्तियों के अस्तित्व के बिना समाज का अस्तित्व होना नामुमकिन है। इसीलिए ज़रूरी है कि जनसंख्या हो। जनसंख्या के होने के लिए भी कई चीजें ज़रूरी हैं जैसे-जनसंख्या को काफ़ी मात्रा में भोजन उपलब्ध हो, जनसंख्या की हर मुसीबत से सुरक्षा हो, समाज का और जनसंख्या का आगे बढ़ना ज़रूरी है क्योंकि यदि जनसंख्या न बढ़ी तो एक दिन सभी लोग खत्म हो जाएंगे। इस प्रकार जनसंख्या के बिना समाज का बनना नामुमकिन है।

6. समाज में सहयोग और संघर्ष ज़रूरी होता है (Co-operation and conflict are must for society)-जैसे समानताएं और अंतर समाज के अस्तित्व के लिए ज़रूरी हैं उसी प्रकार सहयोग एवं संघर्ष भी समाज के अस्तित्व के लिए ज़रूरी है। सहयोग समाज के निर्माण का एक ज़रूरी तत्त्व है। समाज में मनुष्य रहते हैं और वह एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। यह अन्तर्निर्भरता तब ही होती है यदि उनके बीच सहयोग होगा। एक बच्चे को बड़ा करने में कई हाथ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और यह सिर्फ सहयोग पर आधारित है। परिवार भी तब ही आगे बढ़ता है यदि पति-पत्नी आपस में सहयोग करें। इस तरह समाज के हर पक्ष में सहयोग की आवश्यकता है। इसी तरह संघर्ष भी ज़रूरी है। जीवन जीने के लिए व्यक्ति को कई प्रकार की शक्तियों से लड़ना पड़ता है। जीने के लिए व्यक्ति को संघर्ष करना पड़ता है।

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प्रश्न 3.
सभा की परिभाषा दें। सभा की विशेषताओं पर विस्तार से लिखें।
अथवा
सभा के अर्थ तथा लक्षणों की व्याख्या करें ।
उत्तर-
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक प्राणी होने के नाते उसकी कुछ आवश्यकताएं भी होती हैं। अपनी इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए व्यक्ति कई प्रकार की कोशिशें करता है। वह तीन प्रकार की कोशिशें करता है-

  • पहली कोशिश यह होती है कि वह अपनी आवश्यकताएं बिना किसी सहायता के पूर्ण करें, पर आज कल के आधुनिक समाज में अकेले रह पाना और अकेले ही अपनी ज़रूरतें पूरी कर पाना सम्भव नहीं है।
  • दूसरा तरीका यह होता है वह अपनी आवश्यकता की चीजें दुनिया से छीनकर पूरी कर सके। पर दूसरों से छीनकर अपनी आवश्यकताएं पूरी करना मुमकिन नहीं है क्योंकि यह तरीका गैर-सामाजिक है और मनुष्य समाज में रहते हुए इस तरह के तरीके नहीं अपना सकता।
  • तीसरा आखिरी और सबसे बढ़िया तरीका यह है कि मनुष्य समाज में रहते हुए दूसरों के साथ सहयोग करते हुए अपनी ज़रूरतें पूरी करे क्योंकि यह ही जीवन का आधार है।

सभा भी इसी सहयोग पर आधारित है। जब कुछ लोग किसी विशेष उद्देश्य के लिए आपस में सहयोग करते हैं और संगठन बनाते हैं तो इस संगठित हुए संगठन को सभा कहते हैं। आम शब्दों में, किसी विशेष मकसद के लिए बनाए गए संगठन को सभा कहते हैं। सभा का एक निश्चित उद्देश्य होता है जिसकी पूर्ति के बाद इसको छोड़ भी जा सकता है।

मनुष्य का स्वभाव और ज़रूरतें उसको समाज में रहने के लिए मजबूर करती हैं। जानवरों की तरह मनुष्यों की सिर्फ शारीरिक ज़रूरतें ही नहीं होतीं बल्कि इनसे ज्यादा ज़रूरी सामाजिक आवश्यकताएं भी होती हैं जिनको पूरा करना उसके लिए आवश्यक होता है। इस तरह जब समाज के अलग-अलग व्यक्ति अपनी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हैं तो इसके साथ सभा या समिति का जन्म होता है। यहां एक बात ध्यान रखने वाली है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताएं पूर्ण होने के बाद इसको छोड़ भी सकता है।

परिभाषाएं (Definitions)-

  • बोगार्डस (Bogardus) के अनुसार, “सभा आम तौर पर कुछ उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए व्यक्तियों का मिल कर काम करना है।”
  • जिन्सबर्ग (Ginsberg) के अनुसार, “सभा परस्पर सम्बन्धित उन सामाजिक प्राणियों का एक समूह है जो एक निश्चित उद्देश्य या उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आम संगठन बना लेते हैं।”
  • गिलिन और गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “सभा व्यक्तियों का ऐसा समूह है जो किसी निश्चित उद्देश्य या उद्देश्यों के लिए परस्पर सम्बन्धित होते हैं और स्वीकृत कार्य प्रणालियों और व्यवहारों द्वारा संगठित. रहते हैं।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि सभा के तीन मुख्य आधार हैं-

  • सब कुछ व्यक्तियों का समूह है।
  • यह संगठन सहयोग पर आधारित है।
  • इसके द्वारा कुछ उद्देश्यों की पूर्ति होती है।

इस तरह सभा हमारी सभी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकती। संक्षेप में जब कोई व्यक्ति संगठित रूप में सोचविचार करके कुछ विशेष कामों की पूर्ति के लिए आपस में सहयोग करते हैं उस संगठन या समूह को सभा कहते

सभा की विशेषताएं (Characteristics of Association) –
1. सभा व्यक्तियों का समूह है (Group of people)-सभा की स्थापना कुछ व्यक्तियों के द्वारा की जाती है जिसके कारण इसको समूह कहा जाता है। इस तरह सभा मूर्त है क्योंकि व्यक्ति मूर्त होते हैं।

2. विचारपूर्वक स्थापना (Thoughtful establishment)—सभा समुदाय की तरह अपने आप ही पैदा नहीं हो जाती। इसका निर्माण तो किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए सोच-समझ कर और विचार करने से स्थापित किया जाता है।

3. निश्चित उद्देश्य (Definite aim)- सभा के निश्चित उद्देश्य होते हैं। सभा हमारे सामाजिक जीवन की सारी ज़रूरतें नहीं बल्कि कुछ ज़रूरतें पूरी करती है और साथ ही साथ अपने सदस्यों के हितों की रक्षा करती है।

4. सभाओं का जन्म और विनाश होता रहता है (Association takes birth and comes to an end)- सभा का स्वभाव अस्थायी होता है क्योंकि इसकी स्थापना कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होती है और उन सारे उद्देश्यों की पूर्ति के बाद सभा की ज़रूरत भी खत्म हो जाती है।

5. सदस्यता इच्छा पर आधारित होती है (Membership is based on wish)—सभा व्यक्तियों का इच्छुक संगठन होता है। व्यक्ति अपनी इच्छा के अनुसार इसका सदस्य बन सकता है और जब चाहे इसको छोड़ सकता है। इसका कारण यह है कि व्यक्ति को जब लगता है कि सभा उसके लिए लाभदायक है तो वह उसको अपना लेता है और जब उसका फायदा पूरा हो जाता है तो उसे छोड़ देता है।

6. सभा की सदस्यता औपचारिक होती है (Formal membership)-इसकी सदस्यता औपचारिक होती है। वह जब चाहे इसको अपना सकता है और जब चाहे इसको छोड़ सकता है पर इसके लिए उसको त्याग-पत्र या प्रार्थना-पत्र देना पड़ता है और सदस्यता फीस भी देनी पड़ती है।

7. हर सभा कुछ अधिकारियों को चुनती है (Selection of officers) हर सभा अपने कामों के लिए कुछ अधिकारियों को चुनती है जैसे प्रधान, उप-प्रधान, सैक्रेटरी कैशियर इत्यादि। इन सबका चुनाव भी निश्चित समय पर होता है।

8. हर सभा के कुछ निश्चित नियम होते हैं (Definite rules)-हर सभा अपने कामों की पूर्ति के लिए नियम भी बनाती है और हर सदस्य को इन नियमों के अन्तर्गत रहकर काम करना पड़ता है।

9. सहयोग की भावना (Feeling of co-operation)—सभा का जन्म सहयोग की भावना पर आधारित होता है। किसी विशेष उद्देश्य की प्राप्ति हेतु सहयोग की भावना ही व्यक्ति को सभा का निर्माण करने के लिए प्रेरित करती है।

PSEB 11th Class Sociology Solutions Chapter 3 समाज, समुदाय तथा समिति

समाज, समुदाय तथा समिति PSEB 11th Class Sociology Notes

  • अरस्तु के अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रह सकता। व्यक्ति समाज से बाहर न तो रह सकता है तथा न ही इसके बारे में सोच सकता है। उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है।
  • व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य लोगों से संबंध बनाने पड़ते हैं तथा सामाजिक संबंधों के जाल को समाज कहते हैं। जब दो अथवा दो से अधिक लोगों के बीच संबंध बनते हैं तो हम कह सकते हैं कि समाज का निर्माण हो रहा है।
  • सम्पूर्ण संसार में बहुत-से समाज मिल जाते हैं जैसे कि जनजातीय समाज, ग्रामीण समाज, औद्योगिक समाज, उत्तर-औद्योगिक समाज इत्यादि। अलग-अलग समाजशास्त्रियों ने समाजों को अलग-अलग आधारों पर विभाजित किया है। उदाहरण के लिए काम्ते (बौद्धिक विकास), स्पैंसर (संरचनात्मक जटिलता),
    मार्गन (सामाजिक विकास), टोनीज़ (सामाजिक संबंधों के प्रकार), दुर्थीम (एकता के प्रकार) इत्यादि।
  • समाज की बहुत-सी विशेषताएं होती हैं जैसे कि यह अमूर्त होता है, यह समानताओं तथा अंतरों पर आधारित होता है, इसमें सहयोग तथा संघर्ष दोनों होते हैं, इसमें स्तरीकरण की व्यवस्था होती है इत्यादि।
  • व्यक्ति का समाज से काफ़ी गहरा संबंध होता है क्योंकि व्यक्ति अकेला नहीं रह सकता। उसे जीवन जीने के लिए अन्य व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। दुर्थीम के अनुसार समाज हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष से संबंधित है तथा उसमें मौजूद है। समाज के लिए भी व्यक्ति सबसे महत्त्वपूर्ण होते हैं क्योंकि व्यक्ति के बिना समाज का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
  • जब कुछ व्यक्ति एक समूह में एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में संगठित रूप से रहते हैं तथा वह किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि अपना सम्पूर्ण जीवन ही वहां पर व्यतीत करते हैं तो उसे समुदाय कहते हैं। समुदाय में ‘हम’ भावना आवश्यक रूप में पाई जाती है।
  • समुदाय के कुछ आवश्यक तत्त्व होते हैं जैसे कि लोगों का समूह, निश्चित क्षेत्र, सामुदायिक भावना, समान संस्कृति इत्यादि। समाज तथा समुदाय में काफ़ी अंतर होता है।
  • सभा सहयोग पर आधारित होती है। जब कुछ लोग किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए आपस में सहयोग करते हैं तथा संगठन बनाते हैं तो इस संगठित संगठन को सभा कहते हैं।
  • एकत्रता (Aggregate)-किसी स्थान पर इक्ट्ठे हुए लोगों का समूह जिनमें आपस में कोई संबंध नहीं होता।
  • सहयोग (Co-operation)-जब कुछ लोग किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक-दूसरे की सहायता करते हैं तो उसे सहयोग कहते हैं।
  • संस्था (Institution) समुदाय के बीच व्यक्तियों के व्यवहार को नियमित करने वाला सामाजिक व्यवस्था का एक साधन।
  • कानून (Law)-लिखे हुए नियम जिन्हें किसी सरकारी संस्था द्वारा लागू किया जाता है।
  • पहचान (Identity)—एक व्यक्ति अथवा समूह के चरित्र की विशेषताएं जो यह बताती हैं कि वे कौन हैं तथा उनके लिए अर्थपूर्ण हैं।
  • उत्पादन के साधन (Means of Production)—वह साधन जिनसे समाज में भौतिक वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है, जिनमें न केवल तकनीक बल्कि उत्पादकों के आपसी संबंध भी शामिल हैं।
  • हम भावना (We-feeling)-वह शक्तिशाली भावना जिससे एक समूह के सदस्य स्वयं को पहचानते हैं तथा अन्य लोगों से अलग करते हैं। इससे उनमें शक्तिशाली एकता भी दिखती है।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

SST Guide for Class 10 PSEB गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था Textbook Questions and Answers

(क) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर एक शब्द/एक पंक्ति (1-15 शब्दों) में लिखिए-

प्रश्न 1.
बहलोल खाँ लोधी कौन था?
उत्तर-
बहलोल खाँ लोधी दिल्ली का सुल्तान (1450-1489) था।

प्रश्न 2.
इब्राहिम लोधी के व्यक्तित्व का कोई एक गुण बताइए।
उत्तर-
इब्राहिम लोधी एक वीर सिपाही तथा काफ़ी सीमा तक सफल जरनैल था।

प्रश्न 3.
इब्राहिम लोधी के किन्हीं दो अवगुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  1. इब्राहिम लोधी पठानों के स्वभाव तथा आचरण को नहीं समझ सका।
  2. उसने पठानों में अनुशासन स्थापित करने का असफल प्रयास किया।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

प्रश्न 4.
बाबर को पंजाब पर जीत कब प्राप्त हुई तथा इस लड़ाई में उसने किसे हराया?
उत्तर-
बाबर को पंजाब पर 21 अप्रैल, 1526 को जीत प्राप्त हुई। इस लड़ाई में उसने इब्राहिम लोधी को हराया।

प्रश्न 5.
मुस्लिम समाज कौन-कौन सी श्रेणियों में बंटा हुआ था?
उत्तर-
15वीं शताब्दी के अन्त में मुस्लिम समाज चार श्रेणियों में बंटा हुआ था-

  1. अमीर तथा सरदार,
  2. उलेमा तथा सैय्यद,
  3. मध्य श्रेणी तथा
  4. गुलाम अथवा दास।

प्रश्न 6.
उलेमा बारे आप क्या जानते हो?
उत्तर-
उलेमा मुस्लिम धार्मिक वर्ग के नेता थे जो अरबी भाषा तथा धार्मिक साहित्य के विद्वान् थे।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

प्रश्न 7.
मुस्लिम तथा हिन्दू समाज के भोजन में क्या फ़र्क था?
उत्तर-
मुस्लिम समाज में अमीरों, सरदारों, सैय्यदों, शेखों, मुल्लाओं तथा काजी लोगों का भोजन बहुत तैलीय (घी वाला) होता था, जबकि हिन्दुओं का भोजन सादा तथा वैष्णो (शाकाहारी) होता था।

प्रश्न 8.
सैय्यद कौन थे?
उत्तर-
सैय्यद अपने आप को हज़रत मुहम्मद की पुत्री बीबी फातिमा की सन्तान मानते थे।

प्रश्न 9.
मुस्लिम-मध्य श्रेणी का वर्णन करो।
उत्तर-
मुस्लिम मध्य श्रेणी में सरकारी कर्मचारी, सिपाही, व्यापारी तथा किसान आते थे।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

प्रश्न 10.
मुसलमान स्त्रियों के पहरावे का वर्णन करो।
उत्तर-
मुसलमान स्त्रियां जम्पर, घाघरा तथा पायजामा पहनती थीं और बुर्के का प्रयोग करती थीं।

प्रश्न 11.
मुसलमानों के मनोरंजन के साधनों का वर्णन करो।
उत्तर-
मुस्लिम सरदारों तथा अमीरों के मनोरंजन के मुख्य साधन चौगान, घुड़सवारी, घुड़दौड़ आदि थे, जबकि ‘चौपड़’ का खेल अमीर तथा ग़रीब दोनों में प्रचलित था।

(ख) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 30-50 शब्दों में लिखें

प्रश्न 1.
सिकन्दर लोधी की धार्मिक नीति का वर्णन करो।
उत्तर-
मुसलमान इतिहासकारों के अनुसार सिकन्दर लोधी एक न्यायप्रिय, बुद्धिमान् तथा प्रजा हितैषी शासक था। परन्तु डॉ० इन्दू भूषण बैनर्जी इस मत के विरुद्ध हैं। उनका कथन है कि सिकन्दर लोधी की न्यायप्रियता अपने वर्ग (मुसलमान वर्ग) तक ही सीमित थी। उसने अपनी हिन्दू प्रजा के प्रति अत्याचार और असहनशीलता की नीति का परिचय दिया। उसने हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया और उनके मन्दिरों को गिरवाया। हजारों की संख्या में हिन्दू सिकन्दर लोधी के अत्याचारों का शिकार हुए।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

प्रश्न 2.
सिकन्दर लोधी के राज्य-प्रबन्ध का वर्णन करो।
उत्तर-
सिकन्दर लोधी एक शक्तिशाली शासक था। उसने अपने राज्य प्रबन्ध को केन्द्रित किया तथा अपने सरदारों एवं जागीरदारों पर पूरा नियन्त्रण रखा। उसने दौलत खाँ लोधी को पंजाब राज्य का निज़ाम नियुक्त किया। उस समय पंजाब प्रान्त की सीमाएं भेरा (सरगोधा) से लेकर सरहिंद तक थीं। दीपालपुर भी पंजाब का एक शक्तिशाली उप-प्रान्त था। परन्तु यह प्रान्त नाममात्र ही लोधी साम्राज्य के अधीन था।
सिकन्दर लोधी एक प्रजा हितकारी शासक था और वह उनकी शिकायतों को दूर करना अपना कर्त्तव्य समझता था। परन्तु उसकी यह नीति मुसलमानों तक ही सीमित थी। हिन्दुओं से वह बहुत अधिक घृणा करता था।

प्रश्न 3.
इब्राहिम लोधी के समय हुए विद्रोहों का वर्णन करो।
उत्तर-
1. पठानों का विद्रोह-इब्राहिम लोधी ने स्वतन्त्र स्वभाव के पठानों को अनुशासित करने का प्रयास किया। पठान इसे सहन न कर सके। इसलिए उन्होंने विद्रोह कर दिया। इब्राहिम लोधी इस बगावत को दबाने में असफल रहा।
2. पंजाब में दौलत खां लोधी का विद्रोह-दौलत खाँ लोधी पंजाब का सूबेदार था। वह इब्राहिम लोधी के कठोर, घमण्डी तथा शक्की स्वभाव से दुखी था। इसलिए उसने स्वयं को स्वतन्त्र करने का निर्णय कर लिया और वह दिल्ली के सुल्तान के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगा। उसने अफ़गान शासक बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए भी आमन्त्रित किया।

प्रश्न 4.
दिलावर खां लोधी दिल्ली क्यों गया ? इब्राहिम लोधी ने उसके साथ क्या बर्ताव किया?
उत्तर-
दिलावर खाँ लोधी अपने पिता की ओर से आरोपों की सफाई देने के लिए दिल्ली गया। इब्राहिम लोधी ने दिलावर खाँ को खूब डराया धमकाया। उसने उसे यह भी बताने का प्रयास किया कि विद्रोही को क्या दण्ड दिया जा सकता है। उसने उसे उन यातनाओं के दृश्य दिखाए जो विद्रोही लोगों को दी जाती थीं और फिर उसे बन्दी बना लिया। परन्तु वह किसी-न-किसी तरह जेल से भाग निकला। लाहौर पहुंचने पर उसने अपने पिता को दिल्ली में हुई सारी बातें सुनाईं। दौलत खाँ समझ गया कि इब्राहिम लोधी उससे दो-दो हाथ अवश्य करेगा।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

प्रश्न 5.
बाबर के सैय्यद के आक्रमण का वर्णन करो।
उत्तर-
सियालकोट को जीतने के बाद बाबर सैय्यदपुर (ऐमनाबाद) की ओर बढ़ा। वहां की रक्षक सेना ने बाबर की घुड़सेना का डटकर सामना किया। फिर भी अन्त में बाबर की जीत हुई। शेष बची हुई रक्षक सेना को कत्ल कर दिया गया। सैय्यदपुर की जनता के साथ भी निर्दयतापूर्ण व्यवहार किया गया। कई लोगों को दास बना लिया गया। गुरु नानक देव जी ने इन अत्याचारों का वर्णन ‘बाबर वाणी’ में किया है।

प्रश्न 6.
बाबर के 1524 ई० के हमले का हाल लिखो।
उत्तर-
1524 ई० में बाबर ने भारत पर चौथी बार आक्रमण किया। इब्राहिम लोधी के चाचा आलम खाँ ने बाबर से प्रार्थना की थी कि वह उसे दिल्ली का सिंहासन पाने में सहायता प्रदान करे। पंजाब के सूबेदार दौलत खाँ ने भी बाबर से सहायता के लिए प्रार्थना की थी। अतः बाबर भेरा होते हुए लाहौर के निकट पहुंच गया। यहां उसे पता चला कि दिल्ली की सेना ने दौलत खाँ को मार भगाया है। बाबर ने दिल्ली की सेना से दौलत खाँ लोधी की पराजय का बदला तो ले लिया, परन्तु दीपालपुर में दौलत खाँ तथा बाबर के बीच मतभेद पैदा हो गया। दौलत खाँ को आशा थी कि विजयी होकर बाबर उसे पंजाब का सूबेदार नियुक्त करेगा, परन्तु बाबर ने उसे केवल जालन्धर और सुल्तानपुर के ही प्रदेश सौंपे। दौलत खाँ ईर्ष्या की आग में जलने लगा। वह पहाड़ियों में भाग गया ताकि तैयारी करके बाबर से बदला ले सके। स्थिति को देखते हुए बाबर ने दीपालपुर का प्रदेश आलम खां को सौंप दिया और स्वयं और अधिक तैयारी के लिए काबुल लौट गया।

प्रश्न 7.
आलम खाँ ने पंजाब को हथियाने के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए?
उत्तर-
आलम खाँ इब्राहिम लोधी का चाचा था। अपने चौथे अभियान में बाबर ने उसे दीपालपुर का प्रदेश सौंपा था। अब वह पूरे पंजाब को हथियाना चाहता था। परन्तु दौलत खाँ लोधी ने उसे पराजित करके उसकी आशाओं पर पानी फेर दिया। अब वह पुन: बाबर की शरण में जा पहुंचा। उसने बाबर के साथ एक सन्धि की। इसके अनुसार उसने बाबर को दिल्ली का राज्य प्राप्त करने में सहायता देने का वचन दिया। उसने यह भी विश्वास दिलाया कि पंजाब का प्रदेश प्राप्त होने पर वह वहां पर बाबर के कानूनी अधिकार को स्वीकार करेगा। परन्तु उसका यह प्रयास भी असफल’ रहा। अन्त में उसने इब्राहिम लोधी (दिल्ली का सुल्तान) के विरुद्ध दौलत खाँ लोधी की सहायता की। परन्तु यहां भी उसे पराजय का सामना करना पड़ा और उसकी पंजाब को हथियाने की योजनाएं मिट्टी में मिल गईं।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

प्रश्न 8.
पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोधी तथा बाबर की फ़ौज की योजना का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोधी की सेना संख्या में एक लाख थी। इसे चार भागों में बांटा गया था

  1. आगे रहने वाली सैनिक टुकड़ी,
  2. केन्द्रीय सेना,
  3. दाईं ओर की सेना तथा
  4. बाईं ओर की सेना। सेना के आगे लगभग 5000 हाथी थे।

बाबर ने अपनी सेना के आगे 700 बैलगाड़ियां खड़ी की हुई थीं। इन बैलगाड़ियों को चमड़े की रस्सियों से बांध दिया गया था। बैलगाड़ियों के पीछे तोपखाना था। तोपों के पीछे अगुआ सैनिक टुकड़ी तथा केन्द्रीय सेना थी। दाएं तथा बाएं तुलुगमा पार्टियां थीं। सबसे पीछे बहुत-सी घुड़सवार सेना तैनात थी जो छिपी हुई थी।

प्रश्न 9.
अमीरों तथा सरदारों के बारे में एक नोट लिखें।
उत्तर-
अमीर तथा सरदार ऊंची श्रेणी के लोग थे। इनको ऊंची पदवी और खिताब प्राप्त थे। सरदारों को ‘इक्ता’ अर्थात् इलाका दिया जाता था जहां से वे भूमिकर वसूल करते थे। इस धन को वह अपनी इच्छा से व्यय करते थे।
सरदार सदा लड़ाइयों में ही व्यस्त रहते थे। वे सदा स्वयं को दिल्ली सरकार से स्वतन्त्र करने की सोच में रहते थे। स्थानीय प्रबन्ध की ओर वे कोई ध्यान नहीं देते थे। धनी होने के कारण ये लोग ऐश्वर्य प्रिय तथा दुराचारी थे। ये बड़ीबड़ी हवेलियों में रहते थे और कई-कई विवाह करवाते थे। उनके पास कई पुरुष तथा स्त्रियां दासों के रूप में रहती थीं।

प्रश्न 10.
मुसलमानों के धार्मिक नेताओं के बारे में लिखें।
उत्तर-
मुसलमानों के धार्मिक नेता दो उप-श्रेणियों में बंटे हुए थे। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है —

  1. उलेमा-उलेमा धार्मिक वर्ग के नेता थे। इनको अरबी तथा धार्मिक साहित्य का ज्ञान प्राप्त था।
  2. सैय्यद-उलेमाओं के अतिरिक्त एक श्रेणी सैय्यदों की थी। वे अपने आप को हज़रत मुहम्मद की पुत्री बीबी फातिमा की सन्तान मानते थे। समाज में इन का बहुत आदर मान था।
    इन दोनों को मुस्लिम समाज में प्रचलित कानूनों का भी पूरा ज्ञान था।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

प्रश्न 11.
गुलाम श्रेणी का वर्णन कीजिए।
उत्तर-

  1. गुलामों का मुस्लिम समाज में सबसे नीचा स्थान था। इनमें हाथ से काम करने वाले लोग (बुनकर, कुम्हार, मज़दूर) तथा हिजड़े सम्मिलित थे। युद्ध बंदियों को भी गुलाम बनाया जाता था। कुछ गुलाम अन्य देशों से भी लाये जाते थे।
  2. गुलाम हिजड़ों को बेग़मों की सेवा के लिए रनिवासों (हरम) में रखा जाता था।
  3. गुलाम स्त्रियां अमीरों तथा सरदारों के मन-बहलाव का साधन होती थीं। इनको भर-पेट खाना मिल जाता था। उनकी सामाजिक अवस्था उनके मालिकों के स्वभाव पर निर्भर करती थी।
  4. गुलाम अपनी चतुराई से तथा बहादुरी दिखाकर ऊंचे पद प्राप्त कर सकते थे अथवा गुलामी से छुटकारा पा सकते थे।

प्रश्न 12.
मुसलमान लोग क्या खाते-पीते थे?
उत्तर-
उच्च वर्ग के लोगों का भोजन-मुस्लिम समाज में अमीरों, सरदारों, सैय्यदों, शेखों, मुल्लाओं तथा काज़ियों का भोजन बहुत घी वाला होता था। उन के भोजन में मिर्च मसालों की अधिक मात्रा होती थी। ‘पुलाव तथा कोरमा’ उनका मन-पसन्द भोजन था। मीठे में हलवा तथा शरबत का प्रचलन था। उच्च वर्ग के मुसलमानों में नशीली वस्तुओं का प्रयोग करना साधारण बात थी। – साधारण लोगों का भोजन-साधारण मुसलमान मांसाहारी थे। गेहूँ की रोटी तथा भुना हुआ मांस उनका रोज़ का भोजन था। यह भोजन बाजारों में पका पकाया भी मिल जाता था। हाथ से काम करने वाले मुसलमान खाने के साथ लस्सी (छाछ) पीना पसन्द करते थे।

प्रश्न 13.
मुसलमानों के पहरावे के बारे में लिखिए।
उत्तर-

  1. उच्च वर्गीय मुसलमानों का पहनावा भड़कीला तथा बहुमूल्य होता था। उनके वस्त्र रेशमी तथा बढ़िया सूत के बने होते थे। अमीर लोग तुर्रेदार पगड़ी पहनते थे। पगड़ी को ‘चीरा’ भी कहा जाता था।
  2. शाही गुलाम (दास) कमरबन्द पहनते थे। वे अपनी जेब में रूमाल रखते थे और पैरों में लाल जूता पहनते थे। उनके सिर पर साधारण सी पगड़ी होती थी।
  3. धार्मिक श्रेणी के लोग मुलायम सूती वस्त्र पहनते थे। उनकी पगड़ी सात गज़ लम्बी होती थी। पगड़ी का पल्ला उनकी पीठ पर लटकता रहता था। सूफ़ी लोग खुला चोगा पहनते थे।
  4. साधारण लोगों का मुख्य पहनावा कमीज़ तथा पायजामा था। वे जूते और जुराबें भी पहनते थे। (5) मुसलमान औरतें जम्पर, घाघरा तथा उनके नीचे तंग पायजामा पहनती थीं।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

प्रश्न 14.
मुस्लिम समाज में महिलाओं की दशा का वर्णन करो।
उत्तर-
मुस्लिम समाज में महिलाओं की दशा का वर्णन इस प्रकार है —

  1. महिलाओं को समाज में कोई सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं था।
  2. अमीरों तथा सरदारों की हवेलियों में स्त्रियों को हरम में रखा जाता था। इनकी सेवा के लिए दासियां तथा रखैलें रखी जाती थीं।
  3. समाज में पर्दे की प्रथा प्रचलित थी। परन्तु ग्रामीण मुसलमानों में पर्दे की प्रथा सख्त नहीं थी।
  4. साधारण परिवारों में स्त्रियों के रहने के लिए अलग स्थान बना होता था। उसे ‘ज़नान खाना’ कहा जाता था। यहां से स्त्रियां बुर्का पहन कर ही बाहर निकल सकती थीं।

प्रश्न 15.
गुरु नानक साहिब के काल से पहले की जाति-पाति अवस्था के बारे में लिखें।
उत्तर-
गुरु नानक साहिब के काल से पहले का हिन्दू समाज विभिन्न श्रेणियों अथवा जातियों में बंटा हुआ था। ये जातियां थीं-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। इन जातियों के अतिरिक्त अन्य भी कई उपजातियां उत्पन्न हो चुकी थीं।

  1. ब्राह्मण-ब्राह्मण समाज के प्रति अपना कर्त्तव्य भूल कर स्वार्थी बन गए थे। वे उस समय के शासकों की चापलूसी करके अपनी श्रेणी को बचाने के प्रयास में रहते थे। साधारण लोगों पर ब्राह्मणों का प्रभाव बहुत अधिक था। वे ब्राह्मणों के कारण अनेक अन्धविश्वासों में फंसे हुए थे।
  2. वैश्य तथा क्षत्रिय-वैश्यों तथा क्षत्रियों की दशा ठीक थी।
  3. शूद्र-शूद्रों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। उन्हें अछूत समझ कर उनसे घृणा की जाती थी। हिन्दुओं की जातियों तथा उप-जातियों में आपसी सम्बन्ध कम ही थे। उनके रीति-रिवाज भी भिन्न-भिन्न थे।

प्रश्न 16.
बाबर तथा इब्राहिम लोधी के सेना-प्रबन्ध के बारे में लिखिए।
उत्तर-
इसके लिए प्रश्न 8 पढ़ें।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

(ग) निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 100-120 शब्दों में लिखिए

प्रश्न 1.
गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक अवस्था का वर्णन करो।
उत्तर-
गुरु नानक देव जी से पहले (16वीं शताब्दी के आरम्भ में ) पंजाब की राजनीतिक दशा बड़ी शोचनीय थी। यह प्रदेश उन दिनों लाहौर प्रान्त के नाम से प्रसिद्ध था और दिल्ली सल्तनत का अंग था। परन्तु दिल्ली सल्तनत की शान अब जाती रही थी। इस लिये केन्द्रीय सत्ता की कमी के कारण पंजाब के शासन में शिथिलता आ गई थी। संक्षेप में, 16वीं शताब्दी के आरम्भ में पंजाब के राजनीतिक जीवन की झांकी इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है —

  1. निरंकुश शासन-उस समय पंजाब में निरंकुश शासन था। इस काल में दिल्ली के सभी सुल्तान (सिकन्दर लोधी, इब्राहिम लोधी) निरंकुश थे। राज्य की सभी शक्तियां उन्हीं के हाथों में केन्द्रित थीं। उनकी इच्छा ही कानन का ऐसे निरंकुश शासक के अधीन प्रजा के अधिकारों की कल्पना करना भी व्यर्थ था।
  2. राजनीतिक अराजकता-लोधी शासकों के अधीन सारा देश षड्यन्त्रों का अखाड़ा बना हुआ था। सिकन्दर लोधी के शासन काल के अन्तिम वर्षों में सारे देश में विद्रोह होने लगे। इब्राहिम लोधी के काल में तो इन विद्रोहों ने और भी भयंकर रूप धारण कर लिया। उसके सरदार तथा दरबारी उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे थे। प्रान्तीय शासक या तो अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने के प्रयास में थे या फिर सल्तनत के अन्य दावेदारों का पक्ष ले रहे थे। परंतु वे जानते थे कि पंजाब पर अधिकार किए बिना कोई भी व्यक्ति दिल्ली का सिंहासन नहीं पा सकता था। अतः सभी सूबेदारों की दृष्टि पंजाब पर ही टिकी हुई थी। फलस्वरूप सारा पंजाब अराजकता की लपेट में आ गया।
  3. अन्याय का नंगा नाच-16वीं शताब्दी के आरम्भ में पंजाब में अन्याय का नंगा नाच हो रहा था। शासक वर्ग भोग-विलास में मग्न था। सरकारी कर्मचारी भ्रष्टाचारी हो चुके थे तथा अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते थे। इन परिस्थितियों में उनसे न्याय की आशा करना व्यर्थ था। गुरु नानक देव जी ने कहा था, “न्याय दुनिया से उड़ गया है।” वह आगे कहते हैं, “कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो रिश्वत लेता या देता न हो। शासक भी तभी न्याय देता है जब उसकी मुट्ठी गर्म कर दी जाए।”
  4. युद्ध-इस काल में पंजाब युद्धों का अखाड़ा बना हुआ था। सभी पंजाब पर अपना अधिकार जमा कर दिल्ली की सत्ता हथियाने के प्रयास में थे। सरदारों, सूबेदारों तथा दरबारियों के षड्यन्त्रों तथा महत्त्वाकांक्षाओं ने अनेक युद्धों को जन्म दिया। इस समय इब्राहिम लोधी और दौलत खां में संघर्ष चला। यहां बाबर ने आक्रमण आरम्भ किए।

प्रश्न 2.
बाबर की पंजाब पर विजय का वर्णन करो।
उत्तर-
बाबर की पंजाब विजय पानीपत की पहली लड़ाई का परिणाम थी। यह लड़ाई 1526 ई० में बाबर तथा दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोधी के बीच हुई। इसमें बाबर विजयी रहा और पंजाब पर उसका अधिकार हो गया।
बाबर का आक्रमण-नवम्बर, 1525 ई० में बाबर 12000 सैनिकों सहित काबुल से पंजाब की ओर बढ़ा। मार्ग में दौलत खाँ लोधी को पराजित करता हुआ वह दिल्ली की ओर बढ़ा। दिल्ली का सुल्तान इब्राहिम लोधी एक लाख सेना लेकर उसके विरुद्ध उत्तर पश्चिम की ओर निकल पड़ा। उसकी सेना चार भागों में बंटी हुई थी-आगे रहने वाली सैनिक टुकड़ी, केन्द्रीय सेना, दाईं ओर की सैनिक टुकड़ी तथा बाईं ओर की सैनिक टुकड़ी। सेना के आगे लगभग 5000 हाथी थे। दोनों पक्षों की सेनाओं का पानीपत के मैदान में सामना हुआ।
युद्ध का आरम्भ-पहले आठ दिन तक किसी ओर से भी कोई आक्रमण नहीं हुआ। परन्तु 21 अप्रैल, 1526 ई० की प्रातः इब्राहिम लोधी की सेना ने बाबर पर आक्रमण कर दिया। बाबर के तोपचियों ने भी लोधी सेना पर गोले बरसाने आरम्भ कर दिए। बाबर की तुलुगमा सेना ने आगे बढ़कर शत्रु को घेर लिया । बाबर की सेना के दाएं तथा बाएं पक्ष आगे बढ़े और उन्होंने ज़बरदस्त आक्रमण किया। इब्राहिम लोधी की सेनाएं चारों ओर से घिर गईं। वे न तो आगे बढ़ सकती थीं और न पीछे हट सकती थीं। इब्राहिम लोधी के हाथी घायल होकर पीछे की ओर दौड़े और उन्होंने अपने ही सैनिकों को कुचल डाला। देखते ही देखते पानीपत के मैदान में लाशों के ढेर लग गए। दोपहर तक युद्ध समाप्त हो गया। इब्राहिम लोधी हज़ारों लाशों के मध्य मृतक पाया गया। बाबर को पंजाब पर पूर्ण विजय प्राप्त हुई।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

PSEB 10th Class Social Science Guide गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

I. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
इब्राहिम लोधी के अधीन पंजाब की राजनीतिक दशा कैसी थी?
उत्तर-
इब्राहिम लोधी के समय में पंजाब का गवर्नर दौलत खां लोधी काबुल के शासक बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित करके षड्यन्त्र रच रहा था।

प्रश्न 2.
इब्राहिम लोधी ने दौलत खाँ लोधी को दिल्ली क्यों बुलवाया?
उत्तर-
इब्राहिम लोधी ने दौलत खां लोधी को दण्ड देने के लिए दिल्ली बुलवाया।

प्रश्न 3.
श्री गुरु नानक देव जी का जन्म कब और कहां हुआ?
उत्तर-
1469 ई० में तलवण्डी नामक स्थान पर।

PSEB 10th Class SST Solutions History Chapter 2 गुरु नानक देव जी से पहले के पंजाब की राजनीतिक तथा सामाजिक अवस्था

प्रश्न 4.
तातार खां को पंजाब का निज़ाम किसने बनाया?
उत्तर-
बहलोल लोधी ने।

प्रश्न 5.
लोधी-वंश का सबसे प्रसिद्ध बादशाह किसे माना जाता है?
उत्तर-
सिकन्दर लोधी को।

प्रश्न 6.
तातार खाँ के बाद पंजाब का सूबेदार कौन बना?
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी।

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प्रश्न 7.
दौलत खाँ लोधी के छोटे पुत्र का नाम बताओ।
उत्तर-
दिलावर खां लोधी।

प्रश्न 8.
बाबर ने 1519 के अपने पंजाब आक्रमण में किन स्थानों पर अपना अधिकार किया?
उत्तर-
बजौर तथा भेरा पर।

प्रश्न 9.
बाबर का लाहौर पर कब्जा कब हुआ?
उत्तर-
1524 ई०।

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प्रश्न 10.
पानीपत की पहली लड़ाई (21 अप्रैल, 1526) किसके बीच हुई?
उत्तर-
बाबर तथा इब्राहिम लोधी के बीच।

प्रश्न 11.
स्वयं को हज़रत मुहम्मद की सुपुत्री बीबी फातिमा की सन्तान कौन मानता था?
उत्तर-
सैय्यद।

प्रश्न 12.
न्याय सम्बन्धी कार्य कौन करते थे?
उत्तर-
काजी।

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प्रश्न 13.
मुस्लिम समाज में सबसे निचले दर्जे पर कौन था?
उत्तर-
गुलाम।

प्रश्न 14.
गुरु नानक देव जी से पहले हिन्दुओं को क्या समझा जाता था?
उत्तर-
जिम्मी।

प्रश्न 15.
गुरु नानक देव जी से पहले हिन्दुओं पर कौन-सा धार्मिक कर था?
उत्तर-
जज़िया।

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प्रश्न 16.
‘सती’ की कुप्रथा किस जाति में प्रचलित थी?
उत्तर-
हिन्दुओं में।

प्रश्न 17.
मुस्लिम अमीरों द्वारा पहनी जाने वाली तुरेदार पगड़ी को क्या कहा जाता था?
उत्तर-
चीरा।

प्रश्न 18.
दौलत खाँ लोधी ने दिल्ली के सुल्तान के पास अपने पुत्र दिलावर खाँ को क्यों भेजा?
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी भांप गया कि सुल्तान उसे दण्ड देना चाहता है।

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प्रश्न 19.
दौलत खाँ लोधी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए क्यों बुलाया?
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोधी की शक्ति का अन्त करके स्वयं पंजाब का स्वतन्त्र शासक बनना चाहता था।

प्रश्न 20.
दौलत खाँ लोधी बाबर के विरुद्ध क्यों हआ?
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी को विश्वास था कि विजय के पश्चात् बाबर उसे सारे पंजाब का गवर्नर बना देगा। परंतु जब बाबर ने उसे केवल जालन्धर और सुल्तानपुर का ही शासन सौंपा तो वह बाबर के विरुद्ध हो गया।

प्रश्न 21.
दौलत खाँ लोधी ने बाबर का सामना कब किया?
उत्तर-
बाबर द्वारा भारत पर पांचवें आक्रमण के समय दौलत खाँ लोधी ने उसका सामना किया।

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प्रश्न 22.
बाबर के भारत पर पाँचवें आक्रमण का क्या परिणाम निकला?
उत्तर-
इस लड़ाई में दौलत खाँ लोधी पराजित हुआ और सारे पंजाब पर बाबर का अधिकार हो गया।

प्रश्न 23.
16वीं शताब्दी के आरम्भ में पंजाब की राजनीतिक दशा के विषय में गुरु नानक देव जी के विचारों पर दो वाक्य लिखो।
उत्तर-
गुरु नानक देव जी लिखते हैं”राजा शेर है तथा मुकद्दम कुत्ते हैं जो दिन-रात प्रजा का शोषण करने में लगे रहते हैं” अर्थात् शासक वर्ग अत्याचारी है।
“इन कुत्तों (लोधी शासकों) ने हीरे जैसे देश को धूलि में मिला दिया है।”

II. रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. बाबर ने पंजाब को …………… ई० में जीता।
  2. सैय्यद अपने आप को हज़रत मुहम्मद की पुत्री …………. की संतान मानते थे।
  3. इब्राहिम लोधी ने ………… लोधी को दण्ड देने के लिए दिल्ली बुलवाया।
  4. तातार खां लोधी के बाद …………. को पंजाब का सूबेदार बनाया गया।
  5. मुस्लिम अमीरों द्वारा पहनी जाने वाली तुर्रेदार पगड़ी को ……….. कहा जाता था।
  6. …………. दौलत खां लोधी का पुत्र था।

उत्तर-

  1. 1520,
  2. बीबी फ़ातिमा,
  3. दौलत खां,
  4. दौलत खां लोधी,
  5. चीरा,
  6. दिलावर खां लोधी।

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III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बाबर ने 1526 की लड़ाई में हराया
(A) दौलत खां लोधी को
(B) बहलोल लोधी को
(C) इब्राहिम लोधी को
(D) सिकंदर लोधी को।
उत्तर-
(C) इब्राहिम लोधी को

प्रश्न 2.
श्री गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ
(A) 1269 ई० में
(B) 1469 ई० में
(C) 1526 ई० में
(D) 1360 ई० में।
उत्तर-
(B) 1469 ई० में

प्रश्न 3.
तातार खां को पंजाब का निज़ाम किसने बनाया?
(A) बहलोल लोधी ने
(B) इब्राहिम लोधी ने
(C) दौलत खां लोधी ने
(D) सिकंदर लोधी ने
उत्तर-
(A) बहलोल लोधी ने

प्रश्न 4.
लोधी वंश का सबसे प्रसिद्ध बादशाह माना जाता है
(A) बहलोल लोधी को।
(B) इब्राहिम लोधी को
(C) दौलत खां लोधी को
(D) सिकंदर लोधी को।
उत्तर-
(D) सिकंदर लोधी को।

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प्रश्न 5.
स्वयं को हज़रत मुहम्मद की सुपुत्री बीबी फ़ातिमा की सन्तान मानते थे
(A) शेख
(B) उलेमा
(C) सैय्यद
(D) काजी।
उत्तर-
(C) सैय्यद

IV. सत्य-असत्य कथन

प्रश्न-सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/ग़लत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं

  1. बाबर को पंजाब पर 1530 ई० में जीत प्राप्त हुई।
  2. सैय्यद अपने आपको ख़लीफा अबु बकर के उत्तराधिकारी मानते थे।
  3. श्री गुरु नानक देव जी का जन्म तलवण्डी नामक स्थान पर हुआ।
  4. पानीपत की पहली लड़ाई बाबर और इब्राहिम लोधी के बीच हुई।
  5. सती की कुप्रथा मुस्लिम समाज में प्रचलित थी।

उत्तर-

  1. (✗),
  2. (✗),
  3. (✓),
  4. (✓),
  5. (✗).

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V. उचित मिलान

  1. हज़रत मुहम्मद की पुत्री फातिमा से संबंधित — दौलत खां लोधी
  2. तातार खां को पंजाब का निज़ाम बनाया — बाबर तथा इब्राहिम लोधी
  3. तातार खां के बाद पंजाब का सूबेदार — बहलोल लोधी
  4. पानीपत की पहली लड़ाई — सैय्यद

उत्तर-

  1. हज़रत मुहम्मद की पुत्री फातिमा से संबंधित — सैय्यद,
  2. तातार खां को पंजाब का निज़ाम बनाया — बहलोल लोधी,
  3. तातार खां के बाद पंजाब का सूबेदार — दौलत खां लोधी,
  4. पानीपत की पहली लड़ाई — बाबर तथा इब्राहिम लोधी।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में पंजाब की राजनीतिक दशा की विवेचना कीजिए।
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में पंजाब का राजनीतिक वातावरण बड़ा शोचनीय चित्र प्रस्तुत करता है। उन दिनों यह प्रदेश लाहौर प्रान्त के नाम से जाना जाता था और यह दिल्ली सल्तनत का अंग था। इस काल में दिल्ली के सभी सुल्तान (सिकन्दर लोधी, इब्राहिम लोधी) निरंकुश थे। उनके अधीन पंजाब में राजनीतिक अराजकता फैली हुई थी। सारा प्रदेश षड्यन्त्रों का अखाड़ा बना हुआ था। पूरे पंजाब में अन्याय का नंगा नाच हो रहा था। शासक वर्ग भोगविलास में मग्न था। सरकारी कर्मचारी भ्रष्टाचारी हो चुके थे और वे अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते थे। इन परिस्थितियों में उनसे न्याय की आशा करना व्यर्थ था। गुरु नानक देव जी ने कहा था कि न्याय दुनिया से उड़ गया है। भाई गुरुदः । श्री इस समय में पंजाब में फैले भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का वर्णन किया है।

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प्रश्न 2.
16वीं शताब्दी के आरम्भ में इब्राहिम लोधी तथा दौलत खाँ लोधी के बीच होने वाले संघर्ष का क्या कारण था? इब्राहिम लोधी से निपटने के लिए दौलत खाँ ने क्या किया?
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी इब्राहिम लोधी के समय में पंजाब का गवर्नर था। कहने को तो वह दिल्ली के सुल्तान के अधीन था, परन्तु वास्तव में वह एक स्वतन्त्र शासक के रूप में कार्य कर रहा था। उसने इब्राहिम लोधी के चाचा आलम खाँ लोधी को दिल्ली की राजगद्दी दिलाने में सहायता देने का वचन देकर उसे अपनी ओर गांठ लिया। इब्राहिम लोधी को जन गौलत खाँ के षड्यन्त्रों की सूचना मिली तो उसने दौलत खाँ को दिल्ली बुलाया। परन्तु दौलत खाँ ने स्वयं जाने की बजाए अपने पुत्र दिलावर खाँ को भेज दिया। दिल्ली पहुंचने पर सुल्तान ने दिलावर खाँ को बन्दी बना लिया। कुछ ही समय के पश्चात् दिलावर खाँ जेल से भाग निकला और अपने पिता के पास लाहौर जा पहुंचा। दौलत खाँ ने इब्राहिम लोधी के इस व्यवहार का बदला लेने के लिए बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमन्त्रित किया।

प्रश्न 3.
बाबर तथा दौलत खाँ में होने वाले संघर्ष पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए दौलत खाँ लोधी ने ही आमन्त्रित किया था। उसे आशा थी कि विजयी होकर बाबर उसे पंजाब का सूबेदार नियुक्त करेगा। परन्तु बाबर ने उसे केवल जालन्धर और सुल्तानपुर के ही प्रदेश सौंपे। अतः उसने बाबर के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा फहरा दिया। शीघ्र ही दोनों पक्षों में युद्ध छिड़ गया जिसमें दौलत खाँ और उसका पुत्र गाजी खाँ पराजित हुए। इसके बाद बाबर वापस काबुल लौट गया। उसके वापस लौटते ही दौलत खाँ ने बाबर के प्रतिनिधि आलम खाँ को मार भगाया और स्वयं पुनः सारे पंजाब का शासक बन बैठा। आलम खाँ की प्रार्थना पर बाबर ने 1525 ई० में पंजाब पर पुनः आक्रमण किया। दौलत खाँ लोधी पराजित हुआ और पहाड़ों में जा छिपा।

प्रश्न 4.
बाबर और इब्राहिम लोधी के बीच संघर्ष का वर्णन कीजिए।
अथवा
पानीपत की पहली लड़ाई का वर्णन कीजिए। पंजाब के इतिहास में इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर-
बाबर दौलत खाँ को हरा कर दिल्ली की ओर बढ़ा। दूसरी ओर इब्राहिम लोधी भी एक विशाल सेना के साथ शत्रु का सामना करने के लिए दिल्ली से चल पड़ा। 21 अप्रैल, 1526 ई० के दिन पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हो गई। इब्राहिम लोधी पराजित हुआ और रणक्षेत्र में ही मारा गया। बाबर अपनी विजयी सेना सहित दिल्ली पहुंच गया और उसने वहां अपनी विजय पताका फहराई। यह भारत में दिल्ली सल्तनत का अन्त और मुग़ल सत्ता का श्रीगणेश था। इस प्रकार पानीपत की लड़ाई ने न केवल पंजाब का बल्कि सारे भारत के भाग्य का निर्णय कर दिया।

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प्रश्न 5.
सोलहवीं शताब्दी के पंजाब में हिन्दुओं की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के हिन्दू समाज की दशा बड़ी ही शोचनीय थी ! प्रत्येक हिन्दू को शंका की दृष्टि से देखा जाता था। उन्हें उच्च सरकारी पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता था। उनसे जज़िया तथा तीर्थ यात्रा आदि कर बड़ी कठोरता से वसूल किए जाते थे। उनके रीति-रिवाजों, उत्सवों तथा उनके पहरावे पर भी सरकार ने कई प्रकार की रोक लगा दी थी। हिन्दुओं पर भिन्न-भिन्न प्रकार के अत्याचार किए जाते थे ताकि वे तंग आ कर इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लें। सिकन्दर लोधी ने बोधन (Bodhan) नाम के एक ब्राह्मण को इस्लाम धर्म न स्वीकार करने पर मौत के घाट उतार दिया था। यह भी कहा जाता है कि सिकन्दर लोधी एक बार कुरुक्षेत्र के एक मेले में एकत्रित होने वाले सभी हिन्दुओं को मरवा देना चाहता था। परन्तु वह हिन्दुओं के विद्रोह के डर से ऐसा कर नहीं पाया।

प्रश्न 6.
16वीं शताब्दी में पंजाब में मुस्लिम समाज के विभिन्न वर्गों का वर्णन करें।
उत्तर-
16वीं शताब्दी में मुस्लिम समाज निम्नलिखित तीन श्रेणियों में बंटा हुआ था —

  1. उच्च श्रेणी-इस श्रेणी में अफगान अमीर, शेख, काज़ी, उलेमा (धार्मिक नेता), बड़े-बड़े जागीरदार इत्यादि शामिल थे। सुल्तान के मन्त्री, उच्च सरकारी कर्मचारी तथा सेना के बड़े-बड़े अधिकारी भी इसी श्रेणी में आते थे। ये लोग अपना समय आराम तथा भोग-विलास में व्यतीत करते थे।
  2. मध्य श्रेणी-इस श्रेणी में छोटे काज़ी, सैनिक, छोटे स्तर के सरकारी कर्मचारी, व्यापारी आदि शामिल थे। उन्हें राज्य की ओर से काफ़ी स्वतन्त्रता प्राप्त थी तथा समाज में उनका अच्छा सम्मान था।
  3. निम्न श्रेणी-इस श्रेणी में दास, घरेलू नौकर तथा हिजड़े शामिल थे। दासों में स्त्रियां भी सम्मिलित थीं। इस श्रेणी के लोगों का जीवन अच्छा नहीं था।

बड़े उत्तर वाले प्रश्न (Long Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
16वीं शताब्दी में पंजाब में मुसलमानों की सामाजिक दशा का वर्णन करो।
उत्तर-
सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में पंजाब में मुसलमानों की काफ़ी संख्या थी। उनकी स्थिति हिन्दुओं से बहुत अच्छी थी। इसका कारण यह था कि उस समय पंजाब पर मुसलमान शासकों का शासन था। मुसलमानों को उच्च सरकारी पदों पर नियुक्त किया जाता था।
मुसलमानों की श्रेणियां-मुस्लिम समाज निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित था —

  1. उच्च श्रेणी-इस श्रेणी में बड़े-बड़े सरदार, इक्तादार, उलेमा, सैय्यद आदि की गणना होती थी। सरदार राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त थे। उन्हें ‘खान’, ‘मलिक’, ‘अमीर’ आदि कहा जाता था। इक्तादार एक प्रकार के जागीरदार थे। सभी सरदारों का जीवन प्रायः भोग-विलास का जीवन था। वे महलों अथवा भवनों में निवास करते थे। वे सुरा, सुन्दरी और संगीत में खोये रहते थे। उलेमा लोगों का समाज में बड़ा आदर था। उन्हें अरबी भाषा तथा कुरान की पूर्ण जानकारी होती थी। अनेक उलेमा राज्य के न्याय कार्यों में लगे हुए थे। वे काज़ियों के पदों पर आसीन थे और धार्मिक तथा न्यायिक पदों पर काम कर रहे थे।
  2. मध्य श्रेणी-मध्य श्रेणी में कृषक, व्यापारी, सैनिक तथा छोटे-छोटे सरकारी कर्मचारी सम्मिलित थे। मुसलमान विद्वानों तथा लेखकों की गणना भी इसी श्रेणी में की जाती थी। यद्यपि इस श्रेणी के मुसलमानों की संख्या उच्च श्रेणी के लोगों की अपेक्षा अधिक थी, फिर भी इनका जीवन स्तर उच्च श्रेणी जैसा ऊंचा नहीं था। मध्य श्रेणी के मुसलमानों की आर्थिक दशा तथा स्थिति हिन्दुओं की तुलना में अवश्य अच्छी थी। इस श्रेणी का जीवन-स्तर हिन्दुओं की अपेक्षा काफ़ी ऊंचा था।
  3. निम्न श्रेणी-निम्न श्रेणी में शिल्पकारों, निजी सेवकों, दास-दासियों आदि की गणना की जाती थी। इस श्रेणी के मुसलमानों का जीवन-स्तर अधिक ऊंचा नहीं था। उन्हें आजीविका कमाने के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता था। बुनकर, सुनार, लुहार, बढ़ई, चर्मकार आदि शिल्पकार सारे दिन के परिश्रम के पश्चात् ही अपना पेट भर पाते थे। निजी सेवकों तथा दास-दासियों को बड़े-बड़े सरदारों की नौकरी करनी पड़ती थी।

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प्रश्न 2.
16वीं शताब्दी के पंजाब में स्त्रियों की दशा कैसी थी?
उत्तर-
16वीं शताब्दी के पंजाब में स्त्री का जीवन इस प्रकार का था —

  1. स्त्रियों की दशा-16वीं शताब्दी के आरम्भ में समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी नहीं थी। उसे अबला, हीन और पुरुषों से नीचा समझा जाता था। घर में उनकी दशा एक दासी के समान थी। उन्हें सदा पुरुषों के अधीन रहना पड़ता था। कुछ राजपूत कबीले ऐसे भी थे जो कन्या को दुःख का कारण मानते थे और पैदा होते ही उसका वध कर देते थे। मुस्लिम समाज में भी स्त्रियों की दशा शोचनीय थी। वह मन बहलाव का साधन मात्र ही समझी जाती थीं। इस प्रकार जन्म से लेकर मृत्यु तक स्त्री को बड़ा ही दयनीय जीवन व्यतीत करना पड़ता था।
  2. कुप्रथाएं-समाज में अनेक कुप्रथाएं भी प्रचलित थीं जो स्त्री जाति के विकास के मार्ग में बाधा बनी हुई थीं। इनमें से मुख्य प्रथाएं सती-प्रथा, कन्या-वध, बाल-विवाह, जौहर प्रथा, पर्दा-प्रथा, बहु-पत्नी प्रथा आदि थीं। सती-प्रथा के अनुसार जब किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती थी तो उसे भी अपने मृतक पति के साथ जीवित जल जाना पड़ता था। यदि कोई स्त्री इस क्रूर प्रथा का पालन नहीं करती थी तो उसके साथ बड़ा कठोर व्यवहार किया जाता था और उसे घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। वास्तव में, उससे जीवन की सभी सुविधाएं छीन ली जाती थीं। जौहर की प्रथा राजपूत स्त्रियों में प्रचलित थी। इसके अनुसार वे अपने सतीत्व तथा सम्मान की रक्षा के लिए जीवित जल जाती थीं।
  3. पर्दा प्रथा-पर्दा प्रथा हिन्दू तथा मुसलमान दोनों में ही प्रचलित थी। हिन्दू स्त्रियों को बूंघट निकालना पड़ता था और मुसलमान स्त्रियां बुर्के में रहती थीं। मुसलमानों में बहु-पत्नी प्रथा जोरों से प्रचलित थी। सुल्तान तथा बड़े सरदार अपने मनोरंजन के लिए सैंकड़ों स्त्रियां रखते थे। स्त्री शिक्षा की ओर बहुत कम ध्यान दिया जाता था। केवल कुछ उच्च घराने की स्त्रियां ही अपने घर पर शिक्षा प्राप्त कर सकती थीं। शेष स्त्रियां प्रायः अनपढ़ ही होती थीं। स्त्रियों पर कुछ और प्रतिबन्ध भी लगे हुए थे। उदाहरण के लिए वे घर की चारदीवारी में ही बन्द रहती थीं। उनका घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं समझा जाता था। पंजाब में प्रायः स्त्री के विषय में यह कहावत प्रसिद्ध थी-“घर बैठी लक्ख दी बाहर गई कख दी।”

प्रश्न 3.
पंजाब में दौलत खाँ लोधी के षड्यन्त्रों तथा महत्त्वपूर्ण कार्यों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर-
दौलत खाँ लोधी तातार खाँ (Tatar Khan) का बेटा पंजाब का गवर्नर था। वह सिकन्दर लोधी के जीवन काल में तो दिल्ली सल्तनत के प्रति वफ़ादार रहा, परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् वह स्वतन्त्र शासक बनने के लिए षड्यन्त्र रचने लगा। नया सुल्तान इब्राहिम लोधी एक घमण्डी तथा मूर्ख शासक था। वह अपने सम्बन्धियों का घोर विरोधी था। इसका लाभ उठाकर दौलत खाँ लोधी ने अपनी स्थिति को दृढ़ बनाना शुरू कर दिया। इसके लिए उसने षड्यन्त्रों का सहारा लिया।

  1. इब्राहिम लोधी के विरुद्ध षड्यन्त्र-इब्राहिम लोधी को दौलत खाँ के षड्यन्त्रों का पता चल गया। उसने उसे सफ़ाई देने के लिए दिल्ली बुलवा भेजा। दौलत खाँ ने स्वयं जाने की बजाय अपने पुत्र दिलावर खाँ को दिल्ली भेज दिया। इब्राहिम लोधी ने दिलावर खाँ को खूब डराया धमकाया। उसने उसे उन यातनाओं के दृश्य भी दिखाए जो विद्रोहियों को दी जाती थीं। उसने दिलावर खाँ को बन्दी बना लिया। परन्तु वह किसी-न-किसी तरह जेल से भाग निकला। इस घटना से दौलत खाँ समझ गया कि इब्राहिम लोधी उससे दो-दो हाथ अवश्य करेगा। अतः उसने तुरन्त ही अपने आप को स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया और अपने हाथ मज़बूत करने के लिए वह काबुल के शासक बाबर के साथ सांठ-गांठ करने लगा। बाबर भारत का सम्राट बनने की इच्छा रखता था। वह पहले भी भारत पर कई आक्रमण कर चुका था। अत: दौलत खाँ का निमन्त्रण पाकर वह पूरी शक्ति के साथ भारत की ओर बढ़ा और बड़ी आसानी से उसने लाहौर पर विजय प्राप्त कर ली। परन्तु जब वह आगे बढ़ा तो कुछ अफ़गान सरदारों ने उसका घोर विरोध किया। इस पर उसने अपनी सेना को लाहौर में लूटमार करने की आज्ञा दे दी। बाद में उसने दीपालपुर और जालन्धर को भी लूटा। पंजाब विजय के पश्चात् बाबर ने दौलत खाँ को जालन्धर का सूबेदार नियुक्त किया और शेष सारा प्रदेश उसने आलम खाँ को सौंप दिया।
  2. बाबर के विरुद्ध विद्रोह-दौलत खाँ को पूरा विश्वास था कि बाबर उसे पूरे पंजाब का स्वतन्त्र शासक बनाएगा। परन्तु जब बाबर ने उसे केवल जालन्धर दोआब का ही सूबेदार नियुक्त किया तो वह क्रोध से भड़क उठा। उसने अपने पुत्र गाजी खाँ को साथ लेकर बाबर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। बाबर ने बड़ी आसानी से विद्रोह को कुचल डाला। परंतु बाबर के वापिस जाने के बाद उसने आलम खाँ और इब्राहिम लोधी की सेनाओं को पराजित कर पंजाब के अधिकांश भाग पर अपना अधिकार कर लिया।
  3. दौलत खाँ की पराजय और मृत्यु-बाबर दौलत खाँ की गतिविधियों से बेखबर नहीं था। उसे जब पता चला
    लाहौर पहुंचने पर उसे सूचना मिली कि दौलत खाँ होशियारपुर में स्थित मलोट नामक स्थान पर डेरा डाले हुए है। अत: बाबर ने तुरन्त ही मलोट पर आक्रमण कर दिया। दौलत खाँ बाबर की शक्ति के सामने अधिक देर तक न टिक सका और पराजित हुआ।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग (सहायक सेवा तथा ज्ञान/विशेष क्षेत्रों की क्रियाएं)

Punjab State Board PSEB 12th Class Geography Book Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग (सहायक सेवा तथा ज्ञान/विशेष क्षेत्रों की क्रियाएं) Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Geography Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग (सहायक सेवा तथा ज्ञान/विशेष क्षेत्रों की क्रियाएं)

PSEB 12th Class Geography Guide आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग (सहायक सेवा तथा ज्ञान/विशेष क्षेत्रों की क्रियाएं) Textbook Questions and Answers

प्रश्न I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक वाक्यों में दें:

प्रश्न 1.
निर्माण उद्योग आर्थिकता के कौन-से क्षेत्र की क्रिया है ?
उत्तर-
निर्माण उद्योग आर्थिकता के द्वितीयक क्षेत्र की क्रिया है।

प्रश्न 2.
गन्ने की कृषि पर निर्माण क्षेत्र का कौन-सा उद्योग आधारित है ?
उत्तर-
गन्ने की कृषि पर चीनी उद्योग आधारित है।

प्रश्न 3.
कागज़ बनाने का उद्योग कौन-सी मौलिक क्रिया पर आधारित है ?
उत्तर-
लकड़ी की लुगदी से कागज़ बनाने की क्रिया पर।।

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प्रश्न 4.
किसी उद्योग के स्थानीयकरण पर कैसे दो कारक प्रभाव डालते हैं ?
उत्तर-
1. कच्चा माल, मज़दूर, यातायात के साधन (भौगोलिक कारक),
2. पूंजी, सरकारी नीति, (गैर भौगोलिक कारक)।

प्रश्न 5.
TISCO का पूरा नाम क्या था ?
उत्तर-
टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड।

प्रश्न 6.
ढाका में बनता कौन-सी किस्म का कपड़ा बहुत प्रसिद्ध है ?
उत्तर-
ढाके की मलमल का कपड़ा बहुत प्रसिद्ध रहा है।

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प्रश्न 7.
गन्ने से चीनी के अलावा क्या-क्या बनाया जा सकता है ?
उत्तर-
गन्ने से कई पदार्थ, जैसे-चीनी, शीरा, मोम, खाद, कागज़ इत्यादि भी तैयार किए जाते हैं।

प्रश्न 8.
बठिंडा स्थित तेल शोधक कारखाने का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर-
गुरु गोबिंद सिंह रिफायनरी, तेल शोधक कारखाने का पूरा नाम है।

प्रश्न 9.
आर्थिकता के चौथे स्तर पर किस किस्म के उद्योग आते हैं ?
उत्तर-
इसमें विद्वान्, चिंतक तथा बुद्धिजीवी उद्योग आते हैं।

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प्रश्न 10.
मीडिया सेवाएं, आर्थिकता के कौन-से स्तर की क्रियाएं हैं ?
उत्तर-
मीडिया सेवाएं आर्थिकता के पांचवें स्तर की क्रियाएं हैं।

प्रश्न 11.
CAGR का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर-
Compound Annual Growth Rate/Compound Advance Growth Rate.

प्रश्न 12.
हरा कालर श्रमिक कौन से क्षेत्रों के क्रियाशील व्यक्तियों को कहते हैं ?
उत्तर-
पर्यावरण वैज्ञानिक, सलाहकार, सौर ऊर्जा क्षेत्रों के साथ जुड़े क्रियाशील व्यक्तियों को हरा कालर श्रमिक कहते हैं।

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प्रश्न 13.
कामकाजी औरतों की रोजगार क्रियाएं कौन-से रंग के कालर से संबंधित होती हैं ?
उत्तर-
गुलाबी कालर श्रमिक से संबंधित होती हैं।

प्रश्न 14.
कृषि निर्यात जोन के अधीन पंजाब से क्या कुछ निर्यात किया जा सकेगा?
उत्तर-
कृषि निर्यात जोन अधीन सब्जियां, आलू, चावल, शहद, पंजाब से निर्यात किया जाएगा।

प्रश्न 15.
भारत का मानचैस्टर कौन-से शहर को कहते हैं ?
उत्तर-
अहमदाबाद को भारत का मानचैस्टर कहते हैं।

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प्रश्न II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर तीन-चार पंक्तियों में दें:

प्रश्न 1.
मज़दूरों की संख्या के आधार पर उद्योगों का विभाजन करो तथा विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
मजदूरों की संख्या के आधार पर उद्योगों को निम्नलिखित तीन किस्मों में विभाजित किया जाता है-

  1. बड़े पैमाने के उद्योग-जहाँ मज़दूरों की संख्या बहुत अधिक हो।
  2. मध्यम पैमाने के उद्योग-जहाँ मज़दूरों की संख्या न अधिक होती हैं न कम; जैसे-साइकिल उद्योग, बिजली ‘ उपकरण उद्योग इत्यादि।
  3. छोटे पैमाने के उद्योग-जहाँ निजी स्तर से या बहुत कम मज़दूरों की आवश्यकता हों।

प्रश्न 2.
ग्रामीण उद्योग तथा कुटीर उद्योगों की विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
ग्रामीण उद्योग-यह गाँव में स्थित होते हैं तथा गाँव की आवश्यकता को पूरा करते हैं; जैसे-गेहूं, चक्की इत्यादि।
घरेलू/कुटीर उद्योग-जहाँ शिल्पकार अपने घर में ही लकड़ी, बांस, पत्थरों इत्यादि को तराश कर सामान बनाते . हैं; जैसे-खादी, चमड़े के उद्योग इत्यादि।

प्रश्न 3.
पूंजी प्रधान तथा मज़दूर प्रधान उद्योगों में अंतर स्पष्ट करो।
उत्तर-
पूंजी प्रधान- जिन उद्योगों में पैसे के निवेश की आवश्यकता होती है; जैसे-लौहा तथा इस्पात, सीमेंट इत्यादि पूंजी प्रधान उद्योग कहलाते हैं।
मज़दूर प्रधान – जिन उद्योगों में ज्यादा मजदूरों की आवश्यकता होती है; जैसे-जूते, बीड़ी उद्योग इत्यादि मजदूर प्रधान उद्योग कहलाते हैं।

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प्रश्न 4.
यातायात उद्योगों के स्थानीयकरण के कारक के तौर पर कैसे प्रभाव डालते हैं ?
उत्तर-
कच्चे माल को उद्योगों तक पहुँचाने तथा फिर निर्माण उद्योग से उपयोग योग्य तैयार सामान को बाजार तक पहुँचाने के लिए अच्छी सड़कें, रेल मार्ग, जल मार्ग तथा समुद्री मार्ग की आवश्यकता होती है। बंदरगाहों के कारण कोलकाता, मुंबई, चेन्नई शहरों के आस-पास काफी उद्योग विकसित हो सके हैं। यहाँ तक पंजाब में लुधियाना के पास लगते रेलवे स्टेशन ढंडारी कलां को तो शुष्क बंदरगाह तक का नाम दे दिया गया है।

प्रश्न 5.
भद्रावती के लोहा इस्पात उद्योग से जान-पहचान करवाओ।
उत्तर-
18 जनवरी, 1923 को मैसूर आयरन वर्क्स के नाम के अंतर्गत भद्रावती (कर्नाटक) में शुरू हुए थे। इस प्लांट का नाम भारत के मशहूर इंजीनियर भारत रत्न श्री एम० विश्वेश्वरैया के नाम पर विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील लिमिटेड रख दिया गया। यह उत्पादन केंद्र भी स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया के अंतर्गत ही आता है।

प्रश्न 6.
भारत में सूती वस्त्र के उत्पादन संबंधी इतिहास के बारे में कुछ बताओ।
उत्तर-
भारतीय सूती वस्त्र तथा इसके सूत का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से शुरू हुआ समझा जाता है। 1500 ईसा पूर्व से 1500 ई० तक लगभग 3000 साल तक भारत के सूती वस्त्र का उत्पादन विश्व में काफी प्रसिद्ध है। ढाका शहर के मलमल का कपड़ा, मसूलीपटनम का छींट, कालीकट की कल्लीकैंज से कैम्बे में बने बफता वस्त्र पूरे विश्व में प्रसिद्ध थे। भारत में पहली सूती कपड़े की मिल 1818 में फोर्ट ग्लोस्टर कोलकाता में लगाई गई थी परंतु यह मिल अधिक कामयाब नहीं हुई। फिर एक कामयाब मिल 1854 में मुंबई में लगाई गई तथा देश के विभाजन के समय 1941, में लंबे रेशे वाली कपास वाले क्षेत्र पाकिस्तान की तरफ चले गए परंतु कपड़े के उद्योग गुजरात तथा महाराष्ट्र में रह गए।

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प्रश्न 7.
सूती वस्त्र मिलों को कौन-से वर्गों में विभाजित किया जा सकता है ?
उत्तर-
सूती वस्त्र मिलों को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

  • कताई मिलें (Spinning Mills)
  • बुनाई मिलें (Weaving Mills)
  • धागे तथा कपड़ा मिलें (Thread and Cotton both produced)

कताई मिलों को आगे अन्य भागों में विभाजित किया जाता है।

  • हथकरघा (Handloom)
  • बिजली के साथ चलने वाली कताई मशीनें (Powerloom)।

प्रश्न 8.
मन्जूर माल भाड़ा गलियारा से जान पहचान करवाएं।
उत्तर-
यह गलियारा पश्चिमी गलियारे दादरी से जवाहर लाल नेहरू बंदरगाह, मुंबई तक लगभग 1468 कि०मी० का क्षेत्र शामिल है। इसके अलावा पूर्वी गलियारा-लुधियाना (पंजाब) से पश्चिमी बंगाल तक लगभग 1760 कि०मी० का क्षेत्र शामिल है।

प्रश्न 9.
दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारों से पहचान करवाओ।
उत्तर-
यह गलियारा देश के कुछ सात राज्यों में फैला हुआ है। यह योजनाबद्ध औद्योगिक गलियारा देश की राजधानी दिल्ली से लेकर आर्थिक राजधानी मुंबई तक 1500 किलोमीटर तक लंबा है। इसमें 24 औद्योगिक क्षेत्र, 8 स्मार्ट शहर तथा दो हवाई अड्डे, 5 बिजली उत्पादन केंद्र तथा बेहतर यातायात प्रबंध शामिल हैं।

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प्रश्न 3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 10-12 पंक्तियों में दें: :

प्रश्न 1.
किसी उद्योग के स्थानीयकरण के लिए कौन-कौन से गैर भौगोलिक कारक कार्यशील होते हैं ?
उत्तर-
किसी उद्योग के स्थानीयकरण के लिए गैर भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं-

  • पूंजी-पूंजी की उद्योगों को लगाने तथा चलाने के लिए खास आवश्यकता होती हैं।
  • सरकारी नीतियां-किसी देश की अच्छी सरकारी नीतियां उस देश के औद्योगिक विकास में योगदान डालती हैं
  • औद्योगिक सुविधाएं-जब कोई उद्योग अपनी उत्पत्ति वाले स्थान पर स्थापित होकर पूरा विकास करे; जैसे-उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ में तालों का उद्योग तथा लुधियाना में हौजरी उद्योग इत्यादि।
  • कुशल संगठन-कुशल प्रबंध का होना भी अति आवश्यक है। अयोग्य प्रबंधन कारण कई बार कामयाब उद्योग भी बर्वाद हो जाते हैं।
  • बैंक की सुविधा-उद्योग लगाने तथा इसके प्रबंधन के लिए काफी धन राशि की आवश्यकता होती है। इसलिए इस उद्योग के लिए बैंक की सुविधाएं ज़रूरी होनी चाहिए।
  • बीमा-किसी भी अनहोनी दुर्घटना जो मनुष्य या मशीनरी इत्यादि के साथ भी हो, की सूरत में बीमे की सुविधा का होना ज़रूरी है।

प्रश्न 2.
भारत में लोहा तथा इस्पात उद्योग की शुरुआत तथा स्थापना के लिए जरूरी कारकों से पहचान करवाओ।
उत्तर-
भारत में लोहा-इस्पात की शुरुआत 1874 ई० में हुई। जब बंगाल आयरन वर्क्स ने पश्चिमी बंगाल में आसनसोल के नज़दीक ‘कुलटी’ नामक स्थान पर स्टील प्लांट लगाया गया था परंतु यह अधिक सफल न हो सका। यह प्लांट 1907 ई० में कामयाब हुआ जब जमशेद जी टाटा द्वारा झारखंड में ‘साकची’ नामक स्थान पर सम्पूर्ण भारतीय कंपनी टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी का प्लांट लगाया गया तथा 1,20,000 टन कच्चे लोहे का निर्माण किया। सन् 1947 ई० के समय जहाँ 10 लाख टन कच्चे लोहे का निर्माण हुआ। 2014-15 तक भारत संसार में लोहे का तीसरा बड़ा उत्पादक देश बन गया।

कच्चा लोहा, इस्पात उद्योग की स्थापना के लिए आवश्यक कारक-इन उद्योगों के लिए पानी की बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है। यह उद्योग विशेषतया उन क्षेत्रों में लगाये जाते हैं जहाँ नदियां, नहरें, झीलें हों क्योंकि इन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धि के साथ-साथ यातायात भी आसान हो जाती है। इसके साथ-साथ पूंजी, मजदूर, रेल तथा सड़क यातायात तथा उचित बाजार की आवश्यकता है।

प्रश्न 3.
भारत में सूती वस्त्र उद्योग की मुसीबतों तथा उनके समाधान बताओ।
उत्तर-
भारत में सूती वस्त्र उद्योग में आने वाली मुख्य कठिनाइयां (मुसीबतें) निम्नलिखित हैं-

  • देश में लम्बे रेशे वाली कपास का उत्पादन कम है।
  • कारखाने काफी पुराने हैं जिस कारण उत्पादकता पर असर पड़ता है। मशीनरी पुरानी है जिसको बदलना बहुत ज़रूरी है तथा औद्योगिक पक्ष से देश पीछे है तथा मशीनरी महंगी है।
  • भारतीय सूती वस्त्र को कृत्रिम रेशे के साथ मुकाबला करना पड़ रहा है।
  • भारत को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बंगलादेश, चीन, जापान तथा इंग्लैंड से मुकाबला करना पड़ रहा है जिनका कच्चा माल भारत के कच्चे माल में ज्यादा अच्छा है।
  • पूंजी की कमी भी सूती वस्त्र उद्योग के लिए समस्या का एक कारण है।

समाधान-नई तकनीक वाली मशीनरी को लाना चाहिए तथा उद्योग को आधुनिक बनाने के लिए सस्ते ब्याज पर ऋण उपलब्ध करवाने चाहिए। तैयार माल की कीमतों को कम रखने के लिए औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाया जाना चाहिए। कच्चे माल, बिजली तथा मजदूरों की निरन्तर पूर्ति होनी चाहिए।

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प्रश्न 4.
भारत में चीनी उद्योग में पंजाब का क्या योगदान है तथा समूचे तौर पर उद्योग को क्या-क्या कठिनाइयां आ रही हैं ?
उत्तर-
भारत में चीनी उद्योग में पंजाब का योगदान-पंजाब राज्य में कुल 17 चीनी मिलें हैं जिनमें 10 मिलें चालू हालात में हैं जो कि अजनाला, बटाला, भोगपुर, बुंदेबाल, फाजिल्का, फगवाड़ा, गुरदासपुर, नवांशहर, नकोदर, मोरिंडा में स्थित हैं। परंतु यहां की 17 चीनी मिलों में 7 मिलें बंद हो गई हैं जोकि धूरी, फरीदकोट, रखड़ा, तरनतारन, जीरा, बुढ़लाडा, जगराओं में हैं।

कठिनाइयां –

  • गन्ने की लागत पर ज्यादा खर्चा होता है परंतु मूल्य में गिरावट होती है।
  • गन्ना कटाई के बाद तेजी से सूख जाता है तथा लंबे समय के लिए इसको बचा के न रख सकना भी बड़ी समस्या है।
  • चीनी मिलों के मालिकों द्वारा किसानों को समय पर अदायगी न करने से भी गन्ना उत्पादक किसान निराश होता है।
  • कोहरे के कारण भारत की फसल खराब हो जाती है।
  • यातायात की लागत बढ़ने के साथ भी गन्ने की फसल में कठिनाइयां आती हैं।
  • चीनी मिलें छोटी हैं तथा सहकारी क्षेत्र की मिलों में सिर्फ मुनाफा कमाने की नीति कारण रुकावट आ चुकी

प्रश्न 5.
भारत के औद्योगिक गलियारे से पहचान करवाओ तथा किसी एक गलियारे पर नोट लिखो।
उत्तर-
उद्योगों में कच्चा माल पहुंचाने तथा तैयार हुए माल को बाजार तक पहुंचाने के लिए रेल मंत्रालय के अंतर्गत माल गाड़ियां चलाने के लिए अलग-अलग रेल लाइनें बिछाने की योजना तैयार की गई। इसके लिए निरोल माल भाड़ा गलियारा निगम की स्थापना की गई। ऐसे गलियारे की योजना, विकास, निर्माण, कामकाज तथा देख-रेख इत्यादि का सारा प्रबंध 11वीं पंचवर्षीय योजना के समय किया गया तथा इस योजना के अधीन पूर्वी निरोल माल-भाड़ा गलियारा पंजाब में लुधियाना से पश्चिमी बंगाल तक के पश्चिमी निरोल माल-भाड़ा गलियारा जवाहर लाल नेहरू बंदरगाह मुंबई से उत्तर प्रदेश में दादरी तक होगा। इस गलियारा को बनाने का मुख्य उद्देश्य है कि समर्थ, भरोसे योग्य, सुरक्षित तथा सस्ती गाड़िया चलाना तथा पर्यावरण की संभाल रखते हुए रेलवे में लोगों के भरोसे को बढ़ाना। इस तरह से गलियारों के साथ-साथ आवश्यकता का सामान भी उपलब्ध करवाना है ताकि योजना से अधिक से अधिक लाभ उठाया जा सके।

सुनहला चतुर्भुज माल-भाड़ा गलियारा-यह गलियारा केंद्रों, सड़कों, यातायात तथा राजमार्ग मंत्रालय की योजना है जिसके द्वारा मुख्य रूप में 4 महानगरों, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई तथा कोलकाता को जोड़कर एक चतुर्भुज बनाई जाती है तथा उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम की तरफ दो लंब रूप मालभाड़ा गलियारा बनाया गया। इस द्वारा सड़क मार्गों की लंबाई 10,122 कि०मी० होगी तथा भारतीय रेल की तरफ जाए तो मालभाड़े के 55% हिस्से से भी अधिक कमाई की जाए।

प्रश्न 6.
भारत की आर्थिकता में तृतीयक क्षेत्र की क्रियाओं पर विस्तार से एक नोट लिखो।
उत्तर-
तृतीयक क्षेत्र या सेवा क्षेत्र आर्थिकता की पहली तथा दूसरी श्रेणी के बाद तीसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। इसमें उत्पादकता के प्रदर्शन के ज्ञान में जानकारी का प्रयोग करके वृद्धि की जाती है। इस क्षेत्र में खासकर सेवाओं का प्रयोग किया जाता है। इस क्षेत्र में आने वाली मुख्य सेवाएं हैं मनोरंजन, सरकारी सेवाएं, टैलीकॉम, दूरसंचार, पर्यटन, मीडिया, शिक्षा, बीमा, बैकिंग सुविधाएं, निवेश, लेखा सेवाएं, वकीलों के सुझाव, चिकित्सा सेवाएं, यातायात के साधन इत्यादि को शामिल किया जाता है। भारत में सेवा क्षेत्र, राष्ट्रीय तथा राज्यों की आमदनी तथा आर्थिकता का बड़ा हिस्सा है जो कि व्यापार, सीधी विदेशी पूंजीकारी तथा नौकरी में वृद्धि संबंधी देश की काफी सहायता करता है। यह आर्थिक वृद्धि की पूंजी है। यह क्षेत्र की कुल कीमत की वृद्धि में 66.1% हिस्सा भारत में डालता है तथा विदेशी निवेश की तरफ खींच पैदा करता है। केन्द्रीय आंकड़ा दफ्तर के अनुमान मुताबिक साल 2016-17 में सेवा क्षेत्र 8.8% की दर से बढ़ेगा।

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प्रश्न 7.
भारत सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम से पहचान करवाओ।
उत्तर-
भारत के निर्माण उद्योग को ताकतवर बनाने के लिए खोज तथा स्थापना के क्षेत्रों में देश को विश्व स्तर पर लाने के लिए भारत सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ योजना की शुरुआत की। इस योजना के मुख्य रूप में चार स्तंभ हैं पहला यह एक नयी प्रक्रिया, दूसरा नयी बुनियादी संरचना, तीसरा नया विकास क्षेत्र तथा चौथा नई सोच। बुनियादी संरचना तथा सेवा के क्षेत्र को भी इस योजना में लाया गया। सरकार ने इस योजना के तहत लैब पैट्रोल की योजना संबंधी जागरुकता तथा जानकारी हित शुरू किया है। इसमें राष्ट्रीय बुनियादी तथा दिल्ली, मुंबई औद्योगिक गलियारे शामिल हैं। इन 25 क्षेत्रों में स्वचालित कार, खनन, सेहत, पर्यटन, वस्त्र, ताप, ऊर्जा, चमड़ा, सूचना तकनोलॉजी, निर्माण रसायन, उड्डयन, बिजली मशीनरी इत्यादि शामिल हैं।

प्रश्न 8.
भारत के पैट्रोकैमिकल उद्योग पर नोट लिखो।
उत्तर-
भारत का पैट्रोकैमिकल उद्योग देश के सब उद्योगों से तेजी के साथ बढ़ रहा है क्योंकि यह उद्योग वस्त्र, कृषि, निर्माण तथा दवाइयों के उद्योगों को मूल सहायता करवाता है। देश में इस औद्योगिक विकास के कारण आर्थिकता को काफी उभार मिलता हैं। भारत में मुख्य रूप में चार बड़ी कंपनियां हैं जो पैट्रोकैमिकल कंपनी की पूरी मार्किट पर कंट्रोल करती हैं। इनमें रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड, इंडियन पैट्रोकैमिकल की जोड़ी तथा गैस अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड तथा हल्दियां पैट्रोकैमिकल की जोड़ी शामिल हैं। भारत में हर रोज प्रयोग किए जाने वाले खनिज तेल का 70 प्रतिशत भाग बाहर से आयात किया जाता हैं। हम अपनी ज़रूरत का सिर्फ 30% हिस्सा ही अपने साधनों से पैदा करते हैं। बाकी का तेल ईरान, साऊदी अरब तथा खाड़ी के देशों से लाया जाता है। पैट्रोकैमिकल उद्योगों को मुख्य रूप में दो स्तर होते हैं-

1. पृथ्वी से कच्चा तेल निकालना
2. तेल शोधन करना।

प्रश्न 4. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 20 पंक्तियों में दो :

प्रश्न 1.
भारत के लोहा-इस्पात उद्योगों के साथ संबंधित प्लांटों से पहचान करवाओ।
उत्तर-
लोहा-इस्पात उद्योग आधुनिक समाज का नींव पत्थर है। लोहा कठोरता, प्रबल तथा सस्ता होने के कारण दूसरी धातुओं की तुलना में अधिक उपयोगी है। इसके साथ कई तरह की मशीनों, यातायात के साधन, कृषि, उपकरण, ऊंचे-ऊंचे पुल, सैनिक हथियार, टैंक, रॉकेट तथा दैनिक प्रयोग की गई वस्तुएं तैयार की जाती हैं। लोहा-इस्पात का उत्पादन ही किसी देश के आर्थिक विकास का मापदंड है। आधुनिक सभ्यता लोह-इस्पात पर निर्भर करती है। इसलिए वर्तमान युग को ‘इस्पात युग’ कहते हैं। लोहा निर्माण का काम आज से 3000 साल पहले, मिस्र, रोम इत्यादि देशों में किया जाता था। इस युग को लोह युग कहा जाता है। पृथ्वी की खानों में लोहा अशुद्ध रूप में मिलता है। लोहे को भट्टी में गला कर साफ करके इस्पात बनाया जाता है। इस कार्य के लिए कई वर्ग प्रयोग किए जाते हैं। खुली भट्टी, कोक भट्टी तथा बिजली की पावर भट्टियों का भी ज्यादातर प्रयोग किया जाता है।

भारत के कुछ महत्त्वपूर्ण स्टील प्लांट-
1. टाटा स्टील लिमिटेड-इसका पहले नाम टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) था। यह भारत की बहुराष्ट्रीय स्टील कंपनी है। इसका मुख्यालय मुंबई में है। इसकी कुल क्षमता 2 करोड़ 53 लाख टन उत्पादन की थी, यह 2015 में विश्व की 10वीं बड़ी स्टील उत्पादन कंपनी है। इसका सबसे बड़ा प्लांट जमशेदपुर में 1907 में जमशेद जी टाटा ने लगाया था।

2. इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी (IISCO)—यह स्टील प्लांट आसनसोल (ज़िला बर्धमान) के नज़दीक बर्नपुर में है जो कि स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया के अधीन इस्पात का उत्पादन करता है।

3. विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील लिमिटेड-भद्रावती (कर्नाटक) में 18 जनवरी, 1923 को मैसूर आयरन वर्क्स के नाम पर शुरू हुए इस प्लांट का नाम प्रसिद्ध भारतीय श्री एम० विश्वेश्वरैया के नाम पर विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील प्लांट पड़ गया।

4. भिलाई स्टील प्लांट (BSP) भिलाई स्टील प्लांट छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित सबसे बड़ा उत्पादन प्लांट है। यहाँ इस्पात की चौड़ी पलेटें बनती हैं। जहाँ इस्पात के निर्माण का काम 1955 में शुरू हुआ।

5. दुर्गापुर स्टील प्लांट (DSP)—यह उद्योग पश्चिमी बंगाल के दुर्गापुर शहर में स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया का एक सामूहिक स्टील प्लांट है। इसको 1955 में बर्तानिया की सहायता के साथ स्थापित किया गया था।

6. बोकारो स्टील प्लांट-यह प्लांट स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया के अंतर्गत, झारखण्ड राज्य के बोकारो शहर में है। इसको 1864 में रूस की सहायता से लगाया गया तथा बाद में स्टील अथारिटी जो कि भारतीय सरकार की कंपनी है के कंट्रोल में आ गया।

7. राऊरकेला स्टील प्लांट-राऊरकेला स्टील प्लांट भी स्टील अथारिटी आफ इंडिया अंतर्गत उत्पादन वाला . सरकारी क्षेत्र का प्लांट है। यह उड़ीसा में है। इसकी स्थापना 1960 में हुई। तब से पश्चिमी जर्मनी ने इसकी सहायता की है।

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प्रश्न 2.
भारतीय सूती वस्त्र उद्योग के विभाजन में पश्चिमी तथा पूर्वी क्षेत्रों की तुलना करो।
उत्तर-
वस्त्र मनुष्य की मूल आवश्यकता है। सूती वस्त्र उद्योग बहुत प्राचीन है। आज से लगभग 5000 साल पहले सूती वस्त्र उद्योग भारत में घरेलू उद्योग के रूप में उन्नत थे। ढाके की मलमल विश्व भर में प्रसिद्ध थी। सूती वस्त्र मिल उद्योग की शुरुआत 18वीं सदी में ग्रेट, ब्रिटेन में हुई। औद्योगिक क्रांति के कारण आरकराईट, क्रामपटन तथा कार्टराइट नामी कारीगरों ने पावरलूम इत्यादि कई मशीनों की खोज की। सूती वस्त्र बनाने की मशीनों के कारण इंग्लैंड का लेका शहर सूती वस्त्र के उद्योग कारण प्रसिद्ध हो गया।

भारतीय सूती वस्त्र उद्योग के विभाजन में पश्चिमी पूर्वी क्षेत्र की तुलना-

1. पश्चिमी क्षेत्र–भारत के पश्चिमी क्षेत्र में महाराष्ट्र, गुजरात, मुंबई इत्यादि सूती वस्त्र उद्योग के मुख्य केंद्र हैं।
अहमदाबाद को भारत का मानचेस्टर कहते हैं। अहमदाबाद सूती वस्त्र उद्योग का बड़ा केन्द्र है। यहाँ 75 मिलें हैं। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र में सूरत, भावनगर, राजकोट इत्यादि बहुत प्रसिद्ध सूती वस्त्र के उत्पादक केन्द्र हैं। महाराष्ट्र राज्य सूती कपड़ा उद्योग में सबसे आगे है। यहां 100 मिलें हैं। मुंबई शुरू से ही सूती वस्त्र उद्योग का मुख्य केन्द्र रहा है। इसलिए इसको सूती वस्त्रों की राजधानी कहते हैं। गुजरात की सूती कपड़े के उत्पादन में दूसरी जगह है। देश के पश्चिमी क्षेत्र में सूती वस्त्र उद्योग भी विकसित हुआ। इसके कारण हैं

  • महाराष्ट्र तथा गुजरात की उपजाऊ काली मिट्टी जो कपास की कृषि के लिए बहुत उपयुक्त है। इस प्रकार कच्चा माल, कपास आसानी के साथ मिल जाती है।
  • पश्चिमी घाट से पनबिजली आसानी से मिल जाती है।
  • मुंबई तथा कांडला की बंदरगाहों के कारण माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना आसान हो जाता है तथा व्यापार विकसित होता है।
  • नमी वाली जलवायु होने के कारण धागा बुनना आसान है।
  • पारसी तथा भाटिया व्यापारी पूंजी के निवेश में योगदान डालते हैं।
  • कोंकण, सतारा तथा शोलापुर और इलाकों में स्थानीय कुशल तथा सस्ते मज़दूर मिल जाते हैं।
  • यातायात के बढ़िया साधनों के कारण भी यहां व्यापार अच्छा है।

2. पूर्वी क्षेत्र-इस क्षेत्र में पश्चिमी बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा असम राज्य शामिल हैं। अधिकतर मिलें कोलकाता, बेलगाड़ियां, श्याम नगर, गुमुरी, सालकिया, श्रीरामपुर, मुरीग्राम इत्यादि स्थानों पर हैं। इस क्षेत्र में कोलकाता बंदरगाह व्यापार को काफी फायदा देती हैं। क्षेत्र में उद्योगों के विकास के कारण –

  • कोलकाता की बंदरगाहें व्यापार के लिए काफी उपयोगी हैं।
  • यातायात के साधन अच्छे हैं।
  • जलवायु में नमी की मात्रा मौजूद है तथा सूती वस्त्र की मांग बहुत ज्यादा है।

प्रश्न 3.
पंजाब की खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के बारे विस्तार से नोट लिखो।
उत्तर-
पंजाब की कृषि में भिन्नता लाने के लिए तथा खाद्यान्न से जुड़े हुए उद्योगों के विकास के लिए पूंजी लगाने को प्रोत्साहित करने के लिए भारतीय सरकार ने खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने देश में खासकर पंजाब में इस उद्योग को बढ़ावा दिया।

1. पंजाब में 2762 करोड़ रुपये की लागत से मैगा कृषि प्रसंस्करण यूनिट मंजूर किये गए हैं। इसके साथ 2680 ‘करोड़ के साथ 20 मैगा प्रकल्प (Project) जिसमें एशनोन निर्माण, सेहत के लिए खाने, चीनी, बच्चों के लिए खाना इत्यादि के 20 मैगा प्रकल्पों को शामिल किया गया। इनके साथ 23145 यूनिट बहुत छोटे क्षेत्र में 1258 करोड़ की लागत से लगाए गए। इनमें अनाज, दालें, सब्जी, डेयरी, मुर्गीपालन आजि पर आधारित उद्योग शामिल हैं।

2. कृषि उत्पाद निर्यात जोन-2002 में भारत सरकार ने कृषि निर्यात जोन सब्जियों; जैसे कि आलू, चावल, शहद इत्यादि निर्यात करने के लिए बनाए। इनमें फतेहगढ़ साहिब, संगरूर, रोपड़ तथा लुधियाना तथा पटियाला के जिले शामिल हैं।

3. कृषि फूड पार्क-छोटे तथा मध्यम यूनिटों का विकास करने के लिए खोज, कोल्ड स्टोर बनाने पर भंडारीकरण तथा पैकिंग सुविधाएँ बढ़ाने के लिए पंजाब एग्रो ऑक्सपोर्ट जोन बनाया गया जो कि पटियाला, फतेहगढ़ साहिब, संगरूर, रोपड़ तथा लुधियाना में बने।

4. मैगा खाद्य पार्क-फूड प्रसंस्करण मंत्रालय ने 8 मैगा खादृा पूरे भारत में लाने का फैसला लिया जिसके बीच सिर्फ पंजाब में तीन मैगा खाद्य पार्क लगाए जाने थे। अब इ२, पंजाब में फाजिल्का में मैगा खाद्य पार्क लगाने का फैसला लिया गया। पंजाब में लगने वाले यह मैगा खाद्य पार्क पंजाब की कृषि के लिए बहुत उपयोगी है। यह केन्द्र मुख्य तौर पर समराला, नाभा, होशियारपुर, लालगढ़ तथा गुरदासपुर में बनाए गए।

खाद्य मंत्रालय ने कपूरथला जिले के गाँव रेहाणा जट्टां में मक्की पर आधारित मैगा खाद्य पार्क का नींव पत्थर रखा। यह पार्क सुरजीत मैगा खाद्य पार्क एंड एनफरा कंपनी लगाने वाली है। इसमें सालाना 250 करोड़ रुपये की लागत के साथ 30 यूनिट लगाये जाने का सुझाव है जिसका सालाना कारोबार 500 करोड़ रुपये होने का अंदाजा है तथा इसके साथ 2500 किसानों को फायदा होगा तथा 5000 लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर
रोज़गार मिलेगा।

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प्रश्न 4.
भारत में दवाइयां बनाने के उद्योग के बारे में विस्तार से नोट लिखो।
उत्तर-
भारत संसार की 10 प्रतिशत तक की दवाइयां बनाकर, संख्या तथा उद्योग के आधार पर तीसरा स्थान हासिल कर रहा है परंतु दवाइयों की कीमत तथा खर्च के अंदाजे के अनुसार भारत का तीसरा स्थान नहीं यह 13वां स्थान बनता है। भारत के रसायन तथा खाद्य मंत्रालय अंतर्गत आते फर्मासुटिकल विभाग के अनुसार साल 2008 से सितंबर 2009 तक देश ने 21 अरब 4 करोड़ अमेरिकी डॉलर का कुल कारोबार किया। भारत दुनिया में कई देशों को दवाइयां निर्यात करता है तथा यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा जापान के साथ कई देश भारतीय दवाइयों के खरीददार हैं। भारत जैनरिक दवाइयों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है, जो कि संसार की 20 फीसदी जैनरिक दवाइयों को बना रहा है। दवाइयों की सामूहिक सालाना विकास दर के हिसाब से 2005-2016 तक दवाइयों के उत्पादन में 17.46% की दर से वृद्धि हुई तथा 2005 में उत्पादन मूल्य 6 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़ कर 2016 के साल दौरान 36 अरब 70 करोड़ अमेरिका डॉलर तक पहुंच गया। एक अंदाजे के अनुसार 2020 तक यह कारोबार 15.92 फीसदी की दर से बढ़ कर 55 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाने की उम्मीद है। भारतीय दवाइयों के अच्छे उत्पादन के कारण इस क्षेत्र में भारत का झंडा बुलंद है। भारत में पांच दवाइयां बनाने के बड़े केन्द्र हैं, सरकारी क्षेत्र में पांच क्षेत्र हैं, जैसे कि-
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1. इंडियन ड्रग एंड फार्मासुटिकल लिमिटेड (IDPL)—यह भारत सरकार के अंतर्गत सबसे बड़ी कंपनी है जो दवाइयां बनाती है। इसके बड़े कारखाने हैदराबाद, ऋषिकेश, गुड़गाँव तथा छोटे कारखाने चेन्नई तथा मुजफ्फरनगर में हैं। चेन्नई वाला कारखाना नंदमबक्म में स्थित है।

2. हिन्दुस्तान एंटीबायोटिक लिमिटेड, पिंपरी-पुणे (HAL)—यह दवाइयां बनाने का सरकारी क्षेत्र में एक बड़ा उद्योग है। यह 10 मार्च, 1954 को स्थापित किया गया तथा साल 1955-56 में इसने अपना काम शुरू किया। यह भारत का सबसे पुराना उद्योग है। इस कारखाने में एंटीबायोटिक तथा कृषि-वैध दवाइयां बनती हैं।

3. बंगाल कैमिकल एंड फार्मासुटिकल वर्क्स लिमिटेड-12 अप्रैल, 1901 में ब्रिटिश राज्य के दौरान यह कारखाना स्थापित हुआ था। सबसे पहला 1905 में यह कारखाना माणिकताल जो कि कोलकाता में है लगाया गया। इसके बिना पणीग्पट्टी, उत्तरी 24 परगना ज़िला, पश्चिमी बंगाल में 1920 के समय 1938 में मुंबई में तथा कानपुर में 1949 में इस तरह तीन कारखाने लगाये हैं।

प्रश्न 5.
भारतीय उद्योगों के कोई तीन आधारों पर वर्गीकरण करो तथा विशेषताओं से पहचान करवाओ।
उत्तर-
भारतीय उद्योगों के आधार, उनका वर्गीकरण तथा विशेषताएं निम्नलिखित अनुसार हैं-
मज़दूरों की संख्या के आधार पर वर्गीकरण-इस प्रकार के उद्योगों को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है।

  • बड़े पैमाने के उद्योग-इस प्रकार के उद्योगों में मजदूरों की संख्या अधिक होती है तथा अधिकतर काम मज़दूर अपने हाथों द्वारा करते हैं। जैसे कि सूती वस्त्र तथा पटसन उद्योग।
  • मध्यम पैमाने के उद्योग-इस प्रकार के उद्योगों में मजदूरों की संख्या बहुत अधिक भी नहीं होती है तथा अधिक कम भी नहीं होती ; जैसे कि साइकल उद्योग, टेलीविज़न उद्योग इत्यादि।
  • छोटे पैमाने के उद्योग-इस प्रकार के उद्योगों में मजदूरों की संख्या काफी कम होती है तथा यह उद्योग निजी स्तर पर ही स्थापित होते हैं।

II. कच्चे तथा तैयार माल पर आधार तथा वर्गीकरण-कच्चे माल की उपलब्धि के आधार पर भी उद्योगों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

  • भारे उद्योग-जिन उद्योगों में भारी कच्चा माल अधिक उपयोग किया जाता हैं उन्हें भारे उद्योग कहते हैं ; जैसे कि लौहा तथा इस्पात उद्योग।
  • हल्के उद्योग-जिन उद्योगों में हल्का कच्चा माल उपयोग किया जाता है, उन्हें हल्के उद्योग कहते हैं; जैसे कि पंखे, सिलाई मशीनें इत्यादि।

III. स्वामित्व के आधार तथा वर्गीकरण-स्वामित्व के आधार पर उद्योगों को आगे चार वर्गों में विभाजित किया जाता है-

  • निजी उद्योग-जो उद्योग किसी खास व्यक्ति या कंपनी के द्वारा चलाया जाए, निजी उद्योग कहलाता हैं; जैसे-रिलायंस, बजाज; अडानी, टाटा आयरन एंड स्टील इत्यादि।
  • सरकारी क्षेत्र के उद्योग-जो उद्योग सरकार के अधीन चलते हैं सरकारी क्षेत्र के उद्योग कहलाते हैं। जैसे कि हैवी इलैक्ट्रीकल उद्योग, भिलाई स्टील प्लांट, दुर्गापुर स्टील प्लांट इत्यादि।
  • सामूहिक क्षेत्र के उद्योग-यह उद्योग जो सरकार तथा निजी, गैर सरकारी दोनों द्वारा चलाये जाए सामूहिक उद्योग कहलाते हैं। जैसे-ऑल इंडिया तथा ग्रीन गैस लिमिटेड इत्यादि।
  • सहकारी क्षेत्र-जो उद्योग लोगों द्वारा मिलजुल कर चलाये जाए, सहकारी क्षेत्र के उद्योग कहलाते हैं। जैसे कि अमूल, मदर डेयरी इत्यादि।

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I. वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर (Objective Type Question Answers)-

A. बहु-विकल्पी प्रश्न :

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन-सा औद्योगिक स्थापना का कारक नहीं है ?
(A) बाजार
(B) पूंजी
(C) ऊर्जा
(D) आबादी का घनत्व।
उत्तर-
(D) आबादी का घनत्व।

प्रश्न 2.
पहली सूती वस्त्र मिल मुंबई में क्यों लगाई गई?
(A) मुंबई एक बंदरगाह है
(B) यह कपास पैदा करने वाले क्षेत्रों के नज़दीक है
(C) मुंबई में पूंजी है
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(D) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 3.
मुंबई में पहली सूती वस्त्र मिल कब लगाई गई ?
(A) 1834
(B) 1844
(C) 1864
(D) 1854.
उत्तर-
(D) 1854.

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प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से कौन-से उद्योग फुटकल उद्योग कहलाते हैं ?
(A) ग्रामीण उद्योग
(B) जंगलों पर आधारित उद्योग
(C) सहकारी उद्योग
(D) बड़े उद्योग।
उत्तर-
(A) ग्रामीण उद्योग

प्रश्न 5.
उद्योगों के स्थानीयकरण पर प्रभाव डालने वाले निम्नलिखित कौन-सा भौगोलिक कारक नहीं है ?
(A) कच्चा माल
(B) मज़दूर
(C) बाज़ार
(D) बैंक की सुविधा।
उत्तर-
(D) बैंक की सुविधा।

प्रश्न 6.
जमशेद जी टाटा ने साकची नामक स्थान पर टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी का प्लांट कब लगाया?
(A) 1907
(B) 1905
(C) 1906
(D) 1909.
उत्तर-
(A) 1907

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प्रश्न 7.
ढाके में किस प्रकार का वस्त्र मशहूर है ?
(A) मलमल
(B) छींट
(C) सूती
(D) सिल्क।
उत्तर-
(A) मलमल

प्रश्न 8.
निम्नलिखित में कौन-सा सूती वस्त्र उद्योग का क्षेत्र पश्चिम की तरफ स्थित है ?
(A) कर्नाटक
(B) महाराष्ट्र
(C) हरियाणा
(D) कोलकाता।
उत्तर-
(A) कर्नाटक

प्रश्न 9.
भारत में सबसे अधिक गन्ने का उत्पादन किस राज्य में होता है ?
(A) उत्तर प्रदेश
(B) हरियाणा
(C) पंजाब
(D) दिल्ली।
उत्तर-
(A) उत्तर प्रदेश

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प्रश्न 10.
संसार में सबसे अधिक गन्ने का उत्पादक देश कौन-सा है ?
(A) ब्राजील
(B) ऑस्ट्रेलिया
(C) अफ्रीका
(D) रूस।
उत्तर-
(A) ब्राजील

प्रश्न 11.
कोंची शोधनशाला किस राज्य में स्थित है ?
(A) केरल
(B) तमिलनाडु
(C) पश्चिमी बंगाल
(D) उत्तर प्रदेश।
उत्तर-
(A) केरल

प्रश्न 12.
वेतन भोगी दफ़्तरी श्रमिक किस कॉलर के मज़दूर हैं ?
(A) सफेद कॉलर
(B) नीला कॉलर
(C) गुलाबी कॉलर
(D) सुनहरी कॉलर।
उत्तर-
(A) सफेद कॉलर

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प्रश्न 13.
किस नगर को भारत की इलैक्ट्रॉनिक राजधानी कहते हैं ?
(A) मुंबई
(B) कोलकाता
(C) बंगलौर
(D) पूना।
उत्तर-
(C) बंगलौर

प्रश्न 14.
निर्माण किस वर्ग की क्रिया है ?
(A) प्राथमिक
(B) द्वितीयक
(C) तृतीयक
(D) चतुर्थक।
उत्तर-
(B) द्वितीयक

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में से किस उद्योग को खनिजों पर आधारित उद्योग कहते हैं ?
(A) वस्त्र उद्योग
(B) तांबा उद्योग
(C) डेयरी उद्योग
(D) कृषि उद्योग।
उत्तर-
(B) तांबा उद्योग

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B. ‘खाली स्थान भरें :

1. उद्योगों को चलाने के लिए ………. की ज़रूरत होती है।
2. भारत में आधुनिक लौह तथा इस्पात उद्योग ………. में शुरू हुआ।
3. पश्चिमी बंगाल के …………… शहर में स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया के सामूहिक यत्नों का बड़ा स्टील प्लांट है।
4. अहमदाबाद को ………. भी कहा जाता है।
5. भारत में ………….. करोड़ टन गन्ना उगाने वाले किसान हैं।
उत्तर-

  1. ऊर्जा,
  2. 1874,
  3. दुर्गापुर,
  4. मानचेस्टर आफ इंडिया,
  5. 2.5.

C. निम्नलिखित कथन सही (√) हैं या गलत (×):

1. बंगाल कैमिकल एंड फार्मासुटिकल वर्क्स लिमिटेड की स्थापना ब्रिटिश राज्य के समय 1901 में हुई।
2. कैदी लोग संतरी कॉलर वाले मज़दूर हैं। 3. भिलाई स्टील प्लांट पश्चिमी बंगाल के दुर्गापुर शहर में स्थित है।
4. सूती वस्त्र उद्योग गुजरात में उन्नत है क्योंकि जहाँ सस्ते मज़दूरों की उपलब्धि है।
5. दवाइयां बनाने के उद्योग में, संसार की दवाइयां बनाकर, संख्या के पक्ष में भारत का पहला स्थान है।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. गलत
  4. सही
  5. गलत।

Geography Guide for Class 12 PSEB आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग (सहायक सेवा तथा ज्ञान/विशेष क्षेत्रों की क्रियाएं) Important Questions and Answers

II. एक शब्द/एक पंक्ति वाले प्रश्नोत्तर (One Word/Line Question Answers) :

प्रश्न 1.
निर्माण उद्योग क्या है ?
उत्तर-
कच्चे माल से तैयार वस्तुएं बनाना।

प्रश्न 2.
टूशरी व्यवसाय क्या हैं ?
उत्तर-
जो सेवाएं प्रदान करते हैं।

प्रश्न 3.
द्वितीयक उद्योग क्या हैं ?
उत्तर-
निर्माण उद्योग इस उद्योग के अंतर्गत आते हैं।

प्रश्न 4.
कोयले पर आधारित दो औद्योगिक प्रदेश बताओ।
उत्तर-
रूहर घाटी, दामोदर घाटी।

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प्रश्न 5.
भारत में पहला लौह-इस्पात कारखाना कहां और कब लगाया गया ?
उत्तर-
1907 में जमशेदपुर झारखण्ड में।

प्रश्न 6.
संयुक्त राज्य में लौह-इस्पात उद्योग के दो केन्द्र बताओ।
उत्तर-
पिट्सबर्ग तथा यंगस्टाऊन।

प्रश्न 7.
भारत में इस्पात उद्योग में सरकारी क्षेत्र में तीन केन्द्र बताओ।
उत्तर-
भिलाई, राऊरकेला, दुर्गापुर।

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प्रश्न 8.
भारत में सूती वस्त्र उद्योग के लिए किस नगर को मानचेस्टर कहा जाता है ?
उत्तर-
अहमदाबाद।

प्रश्न 9.
संसार में चीनी का कटोरा किस देश को कहते हैं ?
उत्तर-
क्यूबा।

प्रश्न 10.
पृथ्वी का तापमान बढ़ने के दो कारण बताओ।
उत्तर-
पथराट बालन का अधिक प्रयोग तथा औद्योगिक विकास।

प्रश्न 11.
सूती वस्त्र मिलों को कौन-से तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है ?
उत्तर-
कताई मिलें, बुनाई मिलें तथा धागा तथा वस्त्र मिलें।

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प्रश्न 12.
भारतीय सूती वस्त्र उद्योग कौन-से चार प्रमुख इलाकों में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर-
पश्चिमी क्षेत्र, दक्षिणी क्षेत्र, उत्तरी क्षेत्र तथा पूर्वी क्षेत्र।

प्रश्न 13.
भारतीय सूती वस्त्र उद्योग को आने वाली कोई एक कठिनाई बताओ।
उत्तर-
भारत में लम्बे रेशे वाली कपास कम उगाई जाती है।

प्रश्न 14.
पैट्रोकैमिकल उद्योग के प्रमुख स्तर कौन से हैं ?
उत्तर-
धरती के नीचे से तेल निकालना तथा तेल का शोधन करना पैट्रोकैमिकल उद्योग का ही मुख्य स्तर है।

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प्रश्न 15.
बरौनी शोधनशाला भारत के किस राज्य में है ?
उत्तर-
बिहार में।

प्रश्न 16.
सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण पर प्रभाव डालने वाले कारक बताओ।
उत्तर-
कच्चा माल, ऊर्जा, रासायनिक पदार्थ, मशीनरी, मज़दूर, यातायात के साधन तथा बाजार।

प्रश्न 17.
भारत में किस राज्य में सबसे अधिक सूती मिलें हैं ?
उत्तर-
तमिलनाडु 439 मिलें।

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प्रश्न 18.
पहली सूती वस्त्र मिल भारत में कब और कहां लगी ?
उत्तर-
1854 में मुंबई में।

प्रश्न 19.
कच्चेमाल के स्रोत के आधार पर उद्योगों को कौन-से मुख्य वर्गों में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर-
कृषि पर आधारित उद्योग, खनिजों पर आधारित, पशुओं पर आधारित तथा जंगलों पर आधारित उद्योग।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
आप ऐसा क्या सोचते हो कि लौह-इस्पात उद्योग भारत के औद्योगिक विकास की मूल इकाई है?
उत्तर-
आज के औद्योगिक विकास के लिए लौह तथा इस्पात उद्योग एक मूल इकाई है। यह बड़े उद्योगों के लिए कच्चे माल को संभालता है। इस द्वारा नयी मशीनों का निर्माण किया जाता है। इसलिए यह एक मूल तथा बुनियादी उद्योग है।

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प्रश्न 2.
कच्चे माल के नज़दीक कौन-से उद्योग लगाए जाते हैं ? उदाहरण दो।
उत्तर-
कच्चा माल निर्माण उद्योग का आधार है। जिन उद्योगों का निर्माण के बाद भार कम हो जाता है। वह उद्योग कच्चे माल के नज़दीक लगाये जाते हैं। जैसे गन्ने से चीनी बनाना। जिन उद्योगों में भारी कच्चे माल का प्रयोग किया जाता है। वह उद्योग कच्चे माल के नज़दीक लगाए जाते हैं; जैसे-लौह-इस्पात उद्योग।

प्रश्न 3.
उद्योगों की स्थापना के लिए किस प्रकार का श्रम ज़रूरी है? कुशल श्रमिक के आधार पर कहाँकहाँ उद्योग स्थित हैं ?
उत्तर-
उद्योगों की स्थापना के लिए सस्ते, कुशल तथा अधिक मात्रा में मजदूरों की आवश्यकता होती है। भारत में जगाधरी तथा मुरादाबाद में बर्तन उद्योग, फिरोजाबाद में कांच उद्योग तथा जापान में खिलौनों का उद्योग कुशल श्रमिक के कारण ही विकसित हुआ है।

प्रश्न 4.
यातायात के साधनों का उद्योग की स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा है ?
उत्तर-
सस्ते यातायात के साधन उद्योगों की स्थिति में सहायक होते हैं। कच्चा माल कारखानों तक ले जाने तथा बनाये माल को बाजार तक लाने में कम लागत लगती है। महान् झीलें तथा तट्टी तथा हुगली नदी घाटी में जापान के पत्तनों तथा राईन नदी घाटी में उद्योगों का संकेंद्रण सस्ते जल मार्गों के कारण ही है।

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प्रश्न 5.
विकासशील देशों में निर्माण उद्योगों की कमी क्यों है ?
उत्तर-
निर्माण उद्योगों के लिए अधिक पूंजी आवश्यक होती है। इन उद्योगों के लिए मांग क्षेत्र तथा बाजार का होना भी आवश्यक है, पर विकासशील देशों में पूंजी की कमी है तथा लोगों की खरीद शक्ति कम है। इसलिए मांग भी कम है। इसलिए विकासशील देशों में भारी उद्योग की कमी है।

प्रश्न 6.
भारत के कोई पाँच लौह-इस्पात केंद्र वाले नगरों के नाम लिखो।
उत्तर-
लौह-इस्पात नगर— भारत में निम्नलिखित नगरों में आधुनिक इस्पात कारखाने स्थित हैं। इन्हें लौहा इस्पात नगर भी कहा जाता है।

  • जमशेदपुर (झारखंड)
  • बोकारो (झारखंड)
  • भिलाई (छत्तीसगढ़)
  • राऊरकेला (उड़ीसा)
  • भद्रावती (कर्नाटक)

प्रश्न 7.
भारे उद्योग किसे कहते हैं ?
उत्तर-
खनिज पदार्थों का प्रयोग करने वाले आधारभूत उद्योगों को भारे उद्योग कहते हैं। इन उद्योगों में भारी पदार्थों का आधुनिक मिलों में निर्माण किया गया है। यह उद्योग किसी देश के औद्योगिक विकास की आधारशिला हैं। लौहइस्पात उद्योग, मशीनरी, औज़ार तथा इंजीनियरिंग सामान बनाने के उद्योग भारी उद्योग के वर्ग में गिने जाते हैं।

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प्रश्न 8.
निर्माण उद्योग से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
जब कच्चे माल की मशीनों की सहायता के रूप बदल कर अधिक उपयोगी तैयार माल प्राप्त करने की क्रिया को निर्माण उद्योग कहते हैं। यह मनुष्य का एक सहायक या गौण व्यवसाय है इसलिए निर्माण उद्योग में जिस वस्तु का रूप बदल जाता है, वह वस्तु अधिक उपयोगी हो जाती है तथा निर्माण द्वारा उस पदार्थ की मूल्य-वृद्धि हो जाती है जैसे लकड़ी से लुगदी तथा कागज़ बनाया जाता है।

प्रश्न 9.
लौह तथा इस्पात उद्योग के महत्त्वपूर्ण प्लांट (उत्पादन केंद्र) कौन से हैं ?
उत्तर-
लौह तथा इस्पात उद्योग के महत्त्वपूर्ण प्लांट निम्नलिखित हैं –

  • टाटा आयरन लिमिटेड
  • इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी
  • विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील कंपनी
  • भिलाई स्टील प्लांट
  • दुर्गापुर स्टील प्लांट
  • राऊरकेला स्टील प्लांट
  • बोकारो स्टील प्लांट ।

प्रश्न 10.
गन्ने की कृषि का महत्त्व बताओ।
उत्तर-
सारे संसार में चीनी लोगों के भोजन का एक आवश्यक अंग है। गन्ना तथा चुकंदर चीनी के दो मुख्य साधन हैं। संसार की 65% चीनी गन्ने से तथा बाकी चुकंदर से तैयार की जाती है। गन्ना एक व्यापारिक तथा औद्योगिक फ़सल है। गन्ने से कई पदार्थ-कागज़, शीरा, खाद, मोम, चीनी इत्यादि भी तैयार किए जाते हैं। भारत को गन्ने का जन्म स्थान माना जाता है। यहाँ से गन्ने का विस्तार पश्चिमी देशों में हुआ है।

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प्रश्न 11.
चीनी उद्योग में आने वाली कोई दो कठिनाइयों के बारे में बताओ।
उत्तर-

  1. गन्ने की उत्पादन लागत से बिक्री मूल्य का कम होना चीनी उद्योग के लिए बड़ी कठिनाई है ।
  2. गन्ने के रस को निकालने के बाद यह जल्दी ही सूख जाता है तथा लम्बे समय के लिए इसको बचा कर रखना बड़ी समस्या है।

प्रश्न 12.
पेट्रो रसायन उद्योग का महत्त्व क्या है ?
उत्तर-
पेट्रो रसायन उद्योग की महत्ता इस प्रकार है –

  • यह उद्योग कपड़ा, कृषि, पैकिंग, निर्माण तथा दवाइयों के उद्योगों को मूल सहायता प्रदान करता है।
  • इन उद्योगों के विकास के साथ देश की आर्थिकता के स्तर में भी वृद्धि हुई है।

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प्रश्न 13.
हिन्दुस्तान एंटीबायोटिक लिमिटेड पर नोट लिखें।
उत्तर-
हिन्दुस्तान एंटीबायोटिक लिमिटेड, पिंपरी-पुणे-दवाइयां बनाने का सरकारी क्षेत्र का एक बड़ा उद्योग है। यह 10 मार्च, 1954 को स्थापित हुआ तथा 1955-56 में इसने अपना काम शुरू किया। इस तरह यह भारत का पुराना उद्योग हैं। इस उद्योग में एंटीबायोटिक तथा ऐग्रो तथा वैट दवाइयां बनती हैं।

प्रश्न 14.
ज्ञान आधारित उद्योग कौन-से हैं ?
उत्तर-
ज्ञान पर आधारित उद्योग आर्थिकता की रीढ़ की हड्डी का काम करते हैं। 1970 से सबसे अधिक रोज़गार के साधनों में विकास ज्ञान पर आधारित क्षेत्रों में हुआ। इसमें दवाइयां सेहत से संबंधित, दूरसंचार, साफ्टवेयर, डाक्टरी उपकरण, हवाई जहाज, इत्यादि उद्योग शामिल हैं। इन उद्योगों का कच्चा माल प्रकृति से हमें नहीं मिलता, बल्कि मनुष्य यह खुद अपनी समझ के साथ बनाता है।

प्रश्न 15.
औद्योगिक गलियारों से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
यह एक भौगोलिक क्षेत्र है यहाँ उद्योगों के विकास के लिए हर संभव स्वरूप अपनाया जाता है तथा औद्योगिक विकास को काफी प्रोत्साहन मिलता है तथा प्रारभिक ज़रूरतें एक जगह पर ही प्राप्त हो जाती हैं। औद्योगिक गलियारा कहलाता है। जैसे कि बंदरगाह, राष्ट्रीय राजमार्ग इत्यादि।

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प्रश्न 16.
निरोल मालभाड़ा गलियारा निगम की स्थापना कब तथा क्यों हुई ?
उत्तर-
निरोल मालभाड़ा गलियारा निगम की स्थापना कंपनी एक्ट 1956 के तहत 30 अक्तूबर, 2006 में हुई। उद्योगों के विकास के कारण कच्चा माल तथा तैयार माल एक स्थान से दूसरी जगह पर पहुंचाने के लिए भारतीय रेलवे मंत्रालय ने मालगाड़ियों को चलाने के लिए अलग रेल लाइनें बनाने की योजना बनाई थी। ताकि आसानी से इस माल की सप्लाई की जा सके। इसलिए इस गलियारा निगम की स्थापना की गयी।

प्रश्न 17.
पूंजी प्रधान उद्योग कौन-से हैं ?
उत्तर-
जिन उद्योगों के लिए कच्चा माल खरीदने तथा तैयार माल बनाने के लिए काफी मात्रा में पैसे के निवेश की ज़रूरत होती है, पूंजी पर आधारित उद्योग कहलाते हैं; जैसे लौहा तथा इस्पात उद्योग, सीमेंट उद्योग तथा एल्यूमीनियम उद्योग इत्यादि।

प्रश्न 18.
किसी उद्योग के स्थानीयकरण पर प्रभाव डालने वाले कोई दो गैर भौगोलिक कारकों की जानकारी दो।
उत्तर-

  1. पूंजी-उद्योगों को स्थापित करने, कच्चा माल खरीदने तथा माल को तैयार करने के लिए काफी पूंजी की आवश्यकता होती है। मुंबई, कोलकाता जैसे नगरों में उद्योगों के विकास होने के कारण जहाँ पूंजीपतियों की अधिकता का होना आवश्यक है।
  2. बैंक की सुविधा-जैसे कि एक उद्योग को चलाने के लिए काफी पूंजी का निवेश होता है। इसलिए उद्योग लगाने के लिए बैंक की सुविधा का होना अति आवश्यक है।

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प्रश्न 19.
लौह-इस्पात का महत्त्व बताओ।
उत्तर-
लौह-इस्पात उद्योग आधुनिक उद्योग का नींव पत्थर है। लोहा कठोर, प्रबल तथा सस्ता होने के कारण दूसरी धातुओं की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसके साथ कई तरह की मशीनों, यातायात के साधन, कृषि उपकरण, ऊंचे ऊंचे सैनिक हथियार, टैंक, राकेट तथा दैनिक प्रयोग की कई वस्तुएं तैयार की जाती हैं। लौह-इस्पात का उत्पादन ही किसी देश के आर्थिक विकास का मापदंड है। आधुनिक सभ्यता लौह-इस्पात पर निर्भर करती है। इसलिए वर्तमान युग को इस्पात युग भी कहते हैं।

प्रश्न 20.
कौन-सा कच्चा माल पैट्रो रसायन उद्योग के लिए आवश्यक है ? इस उद्योग की स्थापना के लिए ज़रूरी कारक कौन-से हैं ?
उत्तर-
कच्चे माल के रूप में पैट्रो रसायन उद्योग के लिए काफी उपयोगी है। पैट्रोरसायन उद्योग खासकर तेल शोधनशालाओं के पास भी लगाये जाते हैं। उद्योग की स्थापना के लिए आवश्यक कारक है-

  • धरती के नीचे से तेल निकालना।
  • यह कच्चे माल के नजदीकी स्थान पर लगेंगे।
  • मंडी तथा बाजार पास होना।
  • या किसी बंदरगाह के पास।

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लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
उद्योगों का वर्गीकरण किस विभिन्न प्रकार द्वारा किया जा सकता है?
उत्तर-
उद्योगों का वर्गीकरण निम्नलिखित आधार पर किया जाता है –
1. उद्योगों के आकार पर आधारित वर्गीकरण-

  • बड़े पैमाने के उद्योग
  • मध्यम पैमाने के उद्योग
  • छोटे पैमाने के उद्योग।

2. कच्चे माल के आधार पर वर्गीकरण

  • कृषि पर आधारित उद्योग
  • खनिजों पर आधारित उद्योग
  • भारे उद्योग
  • हल्के उद्योग।

3. विकास पर आधारित उद्योग-

  • ग्रामीण उद्योग
  • कुटीर उद्योग
  • सहायक उद्योग
  • उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग
  • पूंजी प्रधान उद्योग
  • मजदूर प्रधान उद्योग।

4. स्वामित्व पर आधारित वर्गीकरण-

  • सार्वजनिक उद्योग
  • निजी उद्योग
  • सहकारी क्षेत्र के उद्योग

5. कच्चे माल पर आधारित वर्गीकरण

  • पशुओं पर आधारित उद्योग।
  • जंगलों पर आधारित उद्योग।

प्रश्न 2.
स्वामित्व के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण करो ।
उत्तर-
स्वामित्व के आधार पर उद्योगों का वर्गीकरण निम्नलिखित है-

  • सरकारी क्षेत्र के उद्योग-यह राज्य द्वारा चलाये जाते हैं। यह खासकर भारे उद्योग होते हैं तथा पूरी तरह सरकारी हाथों में होते हैं; जैसे कि भिलाई स्टील प्लांट।
  • निजी क्षेत्र के उद्योग-यह उद्योग किसी निजी हाथों या गैर सरकारी कंपनियों के द्वारा चलाये जाते हैं; जैसे TISCO.
  • सामूहिक क्षेत्र के उद्योग-जो उद्योग सरकार तथा प्राइवेट सामूहिक क्षेत्र में आते हैं, वह सामूहिक क्षेत्र के उद्योग हैं; जैसे-ऑल इंडिया, ग्रीन गैस लिमिटेड।
  • सहकारी क्षेत्र के उद्योग-जो उद्योग सहकारी क्षेत्र में या लोगों के द्वारा मिल कर चलाया जाए; जैसे कि अमूल, मदर डेयरी इत्यादि।

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प्रश्न 3.
भारी उद्योग तथा कृषि उद्योगों में अन्तर स्पष्ट करो।
उत्तर-
कृषि उद्योग (Agro Industries):

  1. यह प्रायः प्राथमिक उद्योग होते हैं।
  2. यह उद्योग कृषि पदार्थों पर आधारित होते हैं।
  3. इसको कृषि पदार्थों का रूप बदल कर अधिक उपयोगी पदार्थ जैसे कपास से कपड़ा बनाया जाता है।
  4. यह श्रम-प्रधान उद्योग होते हैं।
  5. इसमें प्राय: छोटे तथा मध्यम वर्ग के उद्योग लगाए जाते हैं।
  6. यह विकासशील देशों में अधिकतर पाए जाते हैं।

भारी उद्योग (Heavy Industries):

  1. यह प्रायः गौण उद्योग होते हैं।
  2. इन उद्योगों में शक्तिचालित मशीनों का अधिक प्रयोग होता है।
  3. इन उद्योगों में बड़े पैमाने पर विषम यन्त्र तथा मशीनें बनाई जाती हैं।
  4. यह पूंजी प्रधान उद्योग होते हैं।
  5. इनमें प्राय: बड़े पैमाने के उद्योग लगाए जाते हैं।
  6. ये उद्योग विकसित देशों में स्थापित हैं।

प्रश्न 4.
इस्पात निर्माण ढंग पर नोट लिखो।
उत्तर-
लौहा निर्माण का काम आज से 3000 साल पहले, भारत, मिस्र तथा रोम इत्यादि देशों में किया जाता था। इस युग को लौह युग कहा जाता है। लौहे को भट्टी में गला कर साफ करके इस्पात बनाया जाता है। इस कार्य के लिए कई ढंग प्रयोग में लाये जाते हैं। खुली भट्टी, कोक भट्टी तथा बिजली की पावर भट्टी का अधिक प्रयोग किया जाता है

  • लौहे को पिघला कर शुद्ध करके कच्चा लौहा तैयार किया जाता है।
  • कच्चे लौहे में मैंगनीज को मिलाकर इस्पात बनाया जाता हैं जिसके साथ गार्डर, रेल, पटरियां, चादरे तथा पाइप इत्यादि बनाये जाते हैं।
  • क्रोमियम तथा निक्कल मिलाने के साथ जंग न लगने वाला स्टेनलेस स्टील बनाया जाता है।
  • कोबाल्ट मिलाने के साथ तेज गति के साथ धातु काटने वाले उपकरण बनाये जाते हैं।

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प्रश्न 5.
लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के कारक बताओ।
उत्तर-
लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के कारक-लौह-इस्पात उद्योग का स्थानीयकरण निम्नलिखित कारणों पर निर्भर करता है।

  • कच्चा माल (Raw material)-यह उद्योग लोहे तथा कोयले की खानों के नजदीक लगाया जाता हैं इसके अलावा मैंगनीज, चूने के पत्थर, पानी तथा रद्दी, लोहा इत्यादि कच्चे माल भी नजदीक हो।
  • कोक कोयला (Coking Coal)-लौह-इस्पात उद्योग की भट्टियों में लौहा साफ करने के लिए कोक प्राप्त हो। कई बार लकड़ी का कोयला भी प्रयोग किया जाता है।
  • सस्ती भूमि (Cheap Land)—इस उद्योग के साथ कोक भट्टिया, गोदामों, इमारतों इत्यादि के बनाने के लिए सस्ती तथा काफी धरती की आवश्यकता है, ताकि कारखानों का विस्तार भी किया जा सके।
  • मंडी से नजदीकी (Nearness to the Market)-इस उद्योग से बनी मशीनों तथा उपकरण भारे होते हैं। इसलिए यह उद्योग मांग क्षेत्रों के नजदीक लगाये जाते हैं।
  • पूंजी (Capital) इस उद्योग को आधुनिक स्तर पर लगाने में काफी पूंजी की जरूरत होती है। इसलिए उन्नत देशों की सहायता के साथ विकासशील देशों में इस्पात कारखाने लगाये जाते हैं। भारत में रूस की सहायता के साथ बोकारो तथा भिलाई के इस्पात कारखाने लगाए गये हैं।

प्रश्न 6.
भारत में लोहा तथा इस्पात उद्योग को पेश आने वाली मुश्किलों तथा उनके समाधान के बारे में बताएं।
उत्तर-
भारत में लोहा तथा इस्पात उद्योग को पेश आने वाली मुश्किलें निम्नलिखित हैं-

  • सस्ती आयात-चीन, कोरिया, तथा रूस इत्यादि से आ रहे सस्ते आयात के कारण देश के लोहे के उत्पादन पर गलत प्रभाव पड़ता है।
  • कच्चे माल की समस्या-विश्व मंडी में इस्पात की कीमत कम होने के कारण भारत में कच्चे माल की मांग की प्राप्ति के बाद इस्पात के उत्पादन के मूल्य में काफी वृद्धि आ जाती है।
  • लचकदार सरकारी नीतियां-सरकारें साधारणतया कच्चे लोहे की खानों की आबंटन में देरी तथा नीतियां बदलती रहती हैं जिस कारण उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है।
  • निम्न स्तर उत्पादन-भारतीय उद्योग लोहे के मूल्यों का मुकाबला करने के लिए 50% स्क्रैप लोहे का उपयोग कर जो घटिया प्रकार का होता है उद्योग चलाते हैं।
  • ऊर्जा की कमी-भारत में बढ़िया किस्म का कोयला तथा उसकी निर्यात होने के कारण तथा भारतीय कोयला उत्पादक, कोल इंडिया लिमिटेड की तरफ घटिया किस्म का कोयला ही उपलब्ध करवाया जाए तथा उसकी भी ज़रूरत के अनुसार पूर्ति न करके इस्पात उत्पादक केंद्रों की ऊर्जा की आवश्यकता कभी भी पूरी नहीं होती।
  • पूंजी-पूंजी की कमी भी लोहा तथा इस्पात उद्योग के लिए समस्या का एक कारण है।

समाधान-कच्चे माल की समस्या का समाधान करना चाहिए : सरकार को बार-बार नीतियों में परिवर्तन नहीं करनी चाहिए तथा साफ-स्पष्ट नीतियां बनानी चाहिए। स्क्रैप लोहे के उपयोग पर पाबंदी लगानी चाहिए तथा बैंक की सुविधा प्रदान करनी चाहिए और उचित ऊर्जा की सुविधाएं उपलब्ध करवानी चाहिए।

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प्रश्न 7.
चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के तत्व बताओ।
उत्तर-
चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के तत्व-

  • कच्चा माल-चीनी मिलें गन्ना पैदा करने वाले क्षेत्रों में लगाई जाती हैं। इसलिए उष्ण कटिबन्ध के देशों में चीनी बनाने के बहुत कारखाने मिलते हैं।
  • सस्ते यातायात-गन्ने की यातायात के लिए सस्ते साधन आवश्यक होते हैं।
  • सस्ते मज़दूर-गन्ने की कटाई इत्यादि तथा मिलों में काम करने के लिए सस्ते तथा अधिक मजदूरों की जरूरत पड़ती है।
  • खपत का ज्यादा होना-चीनी उद्योगों से बचे हुए पदार्थों जैसे कि शीर, एल्कोहल, खाद्य, मोम, कागज इत्यादि उद्योग चलाये जाते हैं इसलिए यह उद्योग कागज तथा गन्ना मिलों के नज़दीक होने चाहिए।

प्रश्न 8.
भारत के चीनी उद्योग के विकास का वर्णन करो।
उत्तर–
चीनी उद्योग भारत का प्राचीन उद्योग है। सन् 1932 में सरकार ने विदेशों से आने वाली चीनी पर टैक्स लगा दिया। इस तरह बाहर से आने वाली चीनी महंगी हो गई है तथा देशों में चीनी उद्योगों का विकास हो गया। अब देश में 500 चीनी मिलें हैं तथा चीनी का उत्पादन लगभग 140 लाख टन है। भारत संसार में सबसे अधिक चीनी पैदा करता है। देश की अर्थव्यवस्था में चीनी उद्योग का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रति साल 10 लाख टन चीनी निर्यात की जाती है।

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प्रश्न 9.
भारतीय चीनी उद्योग को आने वाली मुख्य कठिनाइयों कौन-सी हैं ?
उत्तर-
भारतीय चीनी उद्योग को आने वाली मुख्य कठिनाइयां हैं-

  • गन्ने के उत्पादन के लिए लगी हुई पूंजी से बिक्री मूल्यों में भारी गिरावट एक मुख्य समस्या है!
  • गन्ने के रस को निकालने के बाद इसको अधिक समय के लिए बचाया नहीं जा सकता. यह सूख जाता है।
  • चीनी मिलों के मालिकों द्वारा भुगतान किसानों को समय पर नहीं दिया जाता।
  • कोहरा पड़ने के कारण फसल खराब हो जाती है।
  • यातायात पर लागत अधिक आती है।
  • चीनी मिलें छोटी होती हैं।
  • गन्ना प्राप्त न होने के कारण मिलें वर्ष में कुछ महीने बन्द रहती हैं।

प्रश्न 10.
तीसरे क्षेत्र के क्षेत्र या सेवा क्षेत्र बारे में आप क्या समझते हो ?
उत्तर-
आर्थिकता के पहले स्तर तथा दूसरे क्षेत्र से प्राप्त वस्तुओं के बाद तीसरा स्तर आता है जिसको सेवाक्षेत्र कहते हैं। इसमें उत्पादकता के स्तर में सुधार होता है क्योंकि इस क्षेत्र में ज्ञान का आदान प्रदान होता है। इस क्षेत्र में कई सेवाएं, जैसे-मनोरंजन, सरकारी सेवाएं, टेलीकॉम, दूरसंचार. अतिथि उद्योग, मीडिया, सेहत संभाल, सूचना तकनोलॉजी, कूड़ा संभाल, परचून, बिक्री सलाह. अचल जायदाद, शिक्षा, बीमा बैंकिंग सेवाएं, वकीलों के सुझाव इत्यादि को इसके अंतर्गत शामिल किया जाता है।

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प्रश्न 11.
पंजाब के खाद्य संसाधन उद्योग पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
पंजाब की कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए कृषि पर आधारित उद्योगों में पूंजी लगाने के लिए पूंजीपतियों को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार ने खाद्य संसाधन उद्योग मंत्रालय देश भर में लगाये हैं तथा इस उद्योग को प्रोत्साहित किया है।

पंजाब में 2762 करोड़ रुपये खर्च करके 33 मैगा कृषि संसाधन यूनिट स्थापित किया गया है। इसके अलावा 20 मैगा प्रोजैक्ट जो कि 2680 करोड़ रुपये की लागत के हैं। स्वास्थ्य प्रगति, खाना बनाने, चीनी, बच्चों के भोजन इत्यादि के लिए शामिल किये गए हैं। कपूरथला के जिला रेहाना जट्टां में मक्की पर आधारित मैगा खाद्य पार्क का नींव पत्थर भी केंद्र सरकार के खाद्य संसाधन मंत्रालय द्वारा रखा गया।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

प्रश्न 1.
निर्माण उद्योग क्या हैं ? इन उद्योगों का वर्गीकरण करो।
उत्तर-
वस्तुओं का रूप बदल के माल तैयार करने की क्रिया को निर्माण उद्योग कहते हैं। यह मनुष्य का एक सहायक धंधा (रोजगार) है। प्राचीन काल से निर्माण उद्योग छोटे पैमाने पर शिल्प उद्योग के रूप में था। आधुनिक युग में यह उद्योग मिल के रूप में बड़े पैमाने पर स्थापित हो गए हैं।
उद्योगों का वर्गीकरण निम्नलिखितानुसार किया जा सकता है-

1. मजदूरों की संख्या के आधार पर वर्गीकरण (On the basis of Labour)—मज़दूरों की संख्या के आधार पर उद्योगों को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है।

  • बड़े पैमाने के उद्योग (Large Scale Industries) इन क्षेत्रों में जनसंख्या की वृद्धि के कारण मजदूर आसानी के साथ मिल जाते हैं तथा मजदूरों की संख्या अधिक होती है। बड़े पैमाने के उद्योग है; जैसे कि सूती कपड़ा तथा पटसन उद्योग।
  • छोटे पैमाने के उद्योग (Small Scale Industries)-जो छोटे उद्योग होते हैं खासकर निजी स्तर पर खोले जाते हैं तथा कम मजदूरों की आवश्यकता होती है, छोटे पैमाने के उद्योग हैं।

2. कच्चे माल पर आधारित उद्योग (On the basis of Product or Raw Material) कच्चे माल पर आधारित उद्योगों को आगे दो भागों में विभाजित किया जाता है-

  • भारे उद्योग (Heavy Industries) जिन उद्योगों में भारे कच्चे माल का प्रयोग किया जाता है, भारे उद्योग कहलाते हैं; जैसे-लौहा तथा इस्पात उद्योग।
  • हल्के उद्योग (Light Industries)-हल्के कच्चे माल का प्रयोग करने वाले उद्योगों को हल्के उद्योग कहते हैं; जैसे कि सिलाई मशीनों के उद्योग।

3. स्वामित्व के आधार पर वर्गीकरण (On the Basis of Ownership)-स्वामित्व के आधार पर उद्योगों को चार मुख्य भागों में वर्गीकृत किया जाता है।

  • निजी उद्योग (Private Industries)—जो उद्योग कुछेक व्यक्तियों द्वारा चलाये जाते हैं तथा सरकार के कंट्रोल के बाहर हों, पूरी तरह से निजी हाथों में हों, निजी उद्योग कहलाते हैं। जैसे-बजाज, रिलायंस इत्यादि।
    PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग 2
  • सरकारी उद्योग (Public Industries)–जो उद्योग सरकारी कंट्रोल के अंतर्गत आते हों तथा सरकार
    द्वारा चलाये जाएं, सरकारी उद्योग कहलाते हैं; जैसे कि भारी विद्युत्, दुर्गापुर स्टील प्लांट इत्यादि।
  • सामूहिक क्षेत्र के उद्योग (Joint Sector Industries)—जो उद्योग सरकार तथा प्राइवेट दोनों के अंतर्गत हों, सहायक क्षेत्र का उद्योग कहलाते हैं; जैसे कि आयल इंडिया इत्यादि।
  • सहकारी क्षेत्र (Cooperative Industries) जब कुछ व्यक्ति या लोग मिलकर किसी उद्योग को चलाएं सहकारी क्षेत्र का उद्योग कहलाता हैं; जैसे कि अमूल, मदर डेयरी इत्यादि।

4. कच्चे माल पर आधारित उद्योग (On the basis of Raw Material) कच्चे माल पर आधारित उद्योगों को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जाता है-

  • कृषि पर आधारित उद्योग (Agro Based Industries)—जो उद्योग अपने लिए कच्चा माल कृषि से हासिल करते हैं कृषि पर आधारित उद्योग कहलाते हैं; जैसे कि चीनी उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग इत्यादि।
  • खनिजों पर आधारित उद्योग (Mineral Based Industries)-जो उद्योग अपने लिए कच्चा माल खानों में से खनिज के रूप में लेते हैं, खनिजों पर आधारित उद्योग कहलाते हैं; जैसे कि तांबा उद्योग, इस्पात उद्योग इत्यादि।
  • पशुओं पर आधारित उद्योग (Animals Based Industries)-जब किसी उद्योग को चलाने के लिए कच्चा माल पशुओं से लिया जाता है, पशुओं पर आधारित उद्योग कहलाता है। जैसे कि जूते, डेयरी उत्पाद इत्यादि।
  • जंगलों पर आधारित उद्योग (Forest Based Industries)-जब किसी उद्योग के लिए कच्चा माल जंगलों से लिया जाता है, जगलों पर आधारित उद्योग कहलाते हैं, जैसे कि कागज़, टोकरी, इत्यादि के उद्योग।

5. फुटकल उद्योग (Miscellaneous Industries)-इन उद्योगों को मुख्य रूप में सात भागों में विभाजित किया जाता हैं-

  • ग्रामीण उद्योग (Rural Industries)—जो उद्योग गाँव में लगाये जाते हैं तथा वह गाँव की ज़रूरतों को पूरा करते हैं। ग्रामीण उद्योग कहलाते हैं; जैसे-आटा चक्कियां इत्यादि।
  • कुटीर उद्योग (Cottage Industries)—जब कोई शिल्पकार अपने घर में ही कोई सामान बनाये, जैसे कि बांस, पीतल इत्यादि को तराश के, वह कुटीर उद्योग कहलाते हैं; जैसे चमड़े के सामान बनाने का उद्योग।
  • उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग (Consumer Products Industries)-जिनमें कच्चे माल को तैयार करके उपभोक्ता तक पहुँचाया जाता है उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग कहते हैं-जैसे वस्त्र, चीनी इत्यादि।
  • सहायक उद्योग (Co-operative Industries)-जब किसी स्थान पर छोटे पुर्जे इत्यादि बना कर बड़े उद्योगों को भेजे जाते हैं, तब छोटे पुर्जे बनाने वाले उद्योग सहायक उद्योग कहलाते हैं जैसे-ट्रक, बस, रेल इंजन इत्यादि।
  • बुनियादी उद्योग (Basic Industries)-जो उद्योग निर्माण की प्रक्रिया के लिए दूसरे उद्योगों पर निर्भर करते हैं, बुनियादी उद्योग कहलाते हैं, जैसे बिजली बनाना।
  • पूंजी प्रधान उद्योग (Money Based Industries)-जिन उद्योगों में पैसे का प्रयोग अधिक होता है, पूंजी प्रधान उद्योग कहलाते हैं; जैसे सीमेंट, एल्यूमीनियम उद्योग।
  • मजदूर प्रधान उद्योग (Labour Based Industries)-जिन उद्योगों में मजदूरों की अधिक से अधिक आवश्यकता होती है, वह मज़दूर प्रधान उद्योग कहलाते हैं; जैसे कि बीड़ी उद्योग इत्यादि।

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प्रश्न 2.
उद्योगों का स्थानीयकरण कौन से तत्वों पर निर्भर करता है ? उदाहरण सहित व्याख्या करो।
उत्तर-
उद्योगों का स्थानीयकरण भौतिक तथा मानवीय दो तरह के मुख्य तत्वों पर निर्भर करता है। उदाहरणों सहित व्याख्या इस प्रकार है-
PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग 3
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I. भौगोलिक कारक (Geographical Factors)-

1. कच्चे माल की निकटता (Nearness of Raw Material) उद्योग कच्चे माल के स्रोत के निकट ही स्थापित किए जाते हैं। कच्चा माल उद्योगों की आत्मा है। उद्योग वहीं पर स्थापित किए जाते हैं, जहां कच्चा माल अधिक मात्रा में कम लागत पर, आसानी से उपलब्ध हो सके। इसलिए लौहे और चीनी के कारखाने कच्चे माल की प्राप्ति-स्थान के निकट लगाए जाते हैं। शीघ्र खराब होने वाली वस्तुएं जैसे डेयरी उद्योग भी उत्पादक केन्द्रों के निकट लगाए जाते हैं। भारी कच्चे माल के उद्योग उन वस्तुओं के मिलने के स्थान के निकट ही लगाए जाते हैं। इस्पात उद्योग कोयला तथा लौहा खानों के निकट स्थित है। कागज़ की लुगदी के कारखाने तथा आरा मिले कोणधारी वन प्रदेशों में स्थित है। उदाहरण-कच्चे माल की प्राप्ति के कारण ही चीनी उद्योग उत्तर प्रदेश में, पटसन उद्योग पश्चिमी बंगाल में, सूती वस्त्र उद्योग महाराष्ट्र में तथा लौह इस्पात उद्योग बिहार, उड़ीसा में लगे हुए हैं।

2. शक्ति के साधन (Power Resources) कोयला, पेट्रोलियम तथा जल-विद्युत् शक्ति के प्रमुख साधन हैं।
भारी उद्योगों में शक्ति के साधनों का अधिक मात्रा में प्रयोग किया जाता है। इसलिए अधिकतर उद्योग उन स्थानों पर लगाए जाते हैं जहां कोयले की खाने समीप हों या पेट्रोलियम अथवा जल-विद्युत् उपलब्ध हो। भारत में दामोदर घाटी, कोयले के कारण ही प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं। खाद व रासायनिक उद्योग, एल्यूमीनियम उद्योग, कागज़ उद्योग, जल-विद्युत् शक्ति केन्द्रों के निकट लगाए जाते हैं, क्योंकि इनमें अधिक मात्रा में सस्ती बिजली की आवश्यकता होती है।

उदाहरण-भारत में इस्पात उद्योग झरिया तथा रानीगंज की कोयला खानों के समीप स्थित है। पंजाब में भाखड़ा योजना से जल-विद्युत् प्राप्ति के कारण खाद का कारखाना नंगल में स्थित है। एल्यूमीनियम उद्योग एक ऊर्जा-गहन (Energy intensive) उद्योग है जो रेनूकूट में (उत्तर प्रदेश) विद्युत शक्ति उपलब्धता के कारण स्थापित है।

3. यातायात के साधन (Means of Transport)-उन स्थानों पर उद्योग लगाए जाते हैं, जहां सस्तो, उत्तम
कुशल और शीघ्रगामी यातायात के साधन उपलब्ध हो। कच्चा माल, श्रमिक तथा मशीनों को कारखानों तक पहुंचाने के लिए सस्ते साधन चाहिए। तैयार किए हुए माल को कम खर्च पर बाज़ार तक पहुंचाने के लिए उत्तम परिवहन साधन बहुत सहायक होते हैं।

उदाहरण-जल यातायात सबसे सस्ता साधन है। इसलिए अधिक उद्योग कोलकाता, चेन्नई आदि बंदरगाहों
के स्थान पर हैं जो अपनी पश्चभूमियों (Hinterland) से रेल मार्ग तथा सड़क मार्गों द्वारा जुड़ी हुई हैं।

4. कुशल श्रमिक (Skilled Labour)-कुशल श्रमिक अधिक और अच्छा काम कर सकते हैं जिससे उत्तम तथा सस्ता माल बनता है। किसी स्थान पर लम्बे समय से एक ही उद्योग में काम करने वाले श्रमिकों के कारण औद्योगिक केन्द्र बन जाते हैं। आधुनिक मिल उद्योग में अधिक कार्य मशीनों द्वारा होता है, इसलिए कम श्रमिकों .. की आवश्यकता होती है। कुछ उद्योगों में अत्यन्त कुशल तथा कुछ उद्योगों में अर्द्ध-कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। श्रम प्रधान उद्योग (Labour Intensive) उद्योग कुशल तथा सस्ते श्रम क्षेत्रों की ओर आकर्षित होते हैं। उदाहरण-मेरठ और जालन्धर में खेलने का सामान बनाने, लुधियाना में हौजरी उद्योग तथा वाराणसी में जरी उद्योग, मुरादाबाद में पीतल के बर्तन बनाने तथा फिरोजाबाद में चूड़ियां बनाने का उद्योग कुशल श्रमिकों के कारण ही है।

5. जल की पूर्ति (Water Supply) कई उद्योगों में प्रयोग किए जल की विशाल राशि की आवश्यकता होती है जैसे-लौह-इस्पात उद्योग, खाद्य संसाधन. कागज़ उद्योग, रसायन तथा पटसन उद्योग, इसलिए ये उद्योग झीलों, नदियों तथा तालाबों के निकट लगाए जाते हैं।
उदाहरण-जमशेदपुर में लौह-इस्पात उद्योग खोरकाई तथा स्वर्ण रेखा नदियों के संगम पर स्थित है।

6. जलवायु (Climate) कुछ उद्योगों में जलवायु का मुख्य स्थान होता है। उत्तम जलवायु मनुष्य की कार्य कुशलता पर भी प्रभाव डालती है। सूती कपड़े के उद्योग के लिए आर्द्र जलवायु अनुकूल होती है। इस जलवायु में धागा बार-बार नहीं टूटता। वायुयान उद्योग के लिए शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। उदाहरण-मुंबई में सूती कपड़ा उद्योग आर्द्र जलवायु के कारण तथा बंगलौर में वायुयान उद्योग (Aircraft) शुष्क जलवायु के कारण स्थित है।

7. बाजार से निकटता (Nearness to Market) मांग क्षेत्रों का उद्योग के निकट होना आवश्यक है। इससे कम खर्च पर तैयार माल बाजारों में भेजा जाता है। माल की खपत जल्दी हो जाती है तथा लाभ प्राप्त होता है। शीघ्र खराब होने वाली वस्तुओं के उद्योग जैसे डेयरी उद्योग, खाद्य उद्योग बड़े नगरों के निकट लगाए जाते हैं। यहां अधिक जनसंख्या के कारण लोगों की माल खरीदने की शक्ति अधिक होती है। एशिया के देशों में अधिक जनसंख्या है, परन्तु निर्धन लोगों के कारण ऊंचे मूल्य वस्तुओं की मांग कम है। यही कारण है कि विकासशील देशों में निर्माण उद्योगों की कमी है। छोटे-छोटे पुर्ने तैयार करने वाले उद्योग बड़े कारखानों के निकट लगाए जाते हैं जहां इन पों का प्रयोग होता है।

8. सस्ती व समतल भूमि (Cheap and Level Land)-भारी उद्योगों के लिए समतल मैदानी भूमि की बहुत आवश्यकता होती है। इसी कारण से जमशेदपुर का इस्पात उद्योग दामोदर नदी घाटी के मैदानी क्षेत्र में स्थित है।

9. स्थान (Site) किसी भी उद्योग के लिए अच्छे धरातल अर्थ सही समतल ज़मीन की जरूरत होती है ताकि यातायात के साधन अच्छे हों। खासकर खुली जगह पर ऐसे उद्योग स्थापित किये जाते हैं।

II. मानवीय कारक-कच्चे माल के भाव में, मौजूदा विज्ञान तथा तकनीकी विकास के अनुसार कई चीजों को
शामिल किया गया है। उपरोक्त लिखे कई भौगोलिक कारकों के बिना कई गैर भौगोलिक कारक भी हैं जो किसी उद्योग के स्थानीयकरण के लिए ज़रूरी हैं जैसे कि-

1. पूंजी की सुविधा (Capital) -उद्योग उन स्थानों पर लगाए जाते हैं जहां पूंजी पर्याप्त मात्रा में ठीक समय पर तथा उचित दर पर मिल सके। निर्माण उद्योग को बड़े पैमाने पर चलाने के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है। विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों में पूंजी लगाने के कारण उद्योगों का विकास हुआ है। राजनीतिक स्थिरता और बिना डर के पूंजी विनियोग उद्योगों के विकास में सहायक है। उदाहरण-दिल्ली, मुंबई, कोलकाता आदि नगरों में बड़े-बड़े पूंजीपतियों और बैंकों की सुविधा के कारण ही औद्योगिक विकास हुआ है।

2. पूर्व आरम्भ (Early Start) जिस स्थान पर कोई उद्योग पहले से ही स्थापित हों, उसी स्थान पर उस उद्योग के अनेक कारखाने स्थापित हो जाते हैं। मुम्बई में सूती कपड़े के उद्योग तथा कोलकाता में जूट उद्योगों इसी कारण से केन्द्रित हैं। किसी स्थान पर अचानक किसी ऐतिहासिक घटना के कारण सफल उद्योग स्थापित हो जाते हैं। अलीगढ़ में ताला उद्योग इसका उदाहरण है।

3. सरकारी नीति (Government Policy)—सरकार के संरक्षण में कई उद्योग विकास कर जाते हैं, जैसे देश में चीनी उद्योग सन् 1932 के पश्चात् सरकारी संरक्षण से ही उन्नत हुआ है। सरकारी सहायता से कई उद्योगों को बहुत-सी सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं। सरकार द्वारा लगाए टैक्सों से भी उद्योग पर प्रभाव पड़ता है। मथुरा में तेल शोधनशाला, कपूरथला में कोच फैक्टरी तथा जगदीशपुर में उर्वरक कारखाना सरकारी नीति के अधीन लगाए गए हैं।

4. बैंकों की सुविधाएं (Facilities of Banks)-उद्योग में खरीद तथा बेच के रुपये का लेन-देन बहुत होता है। इसलिए बैंक की सहूलियतें बड़े शहरों में उद्योगों के लिए आकर्षित करते हैं।

5. सुरक्षा (Defence)-देश में सैनिक सामान तैयार करने वाले कारखाने सुरक्षा के दृष्टिकोण के साथ देश के अंदरूनी भागों में लाये जाते हैं। बंगलौर में हवाई जहाजों का उद्योग इसलिए ही स्थापित है।

6. ऐतिहासिक कारक (Historical Factors) अचानक ही किसी स्थान से कभी कोई उद्योग का रूप धारण कर लेता है; जैसे अलीगढ़ में ताला उद्योग इसलिए ही प्रसिद्ध है।
7. बीमा (Insurance) किसी भी अनहोनी जो मनुष्य या मशीनरी इत्यादि किसी के साथ भी हो ऐसी सूरत में बीमा की सुविधा होनी ज़रूरी है।

8. औद्योगिक जड़त्व (Industrial Inertia)-जिस स्थान पर कोई उद्योग शुरू हुआ होता है कई बार वहाँ ही पूरी तरह से विकसित हो जाता है। यह जड़त्व भौगोलिक तथा औद्योगिक किसी भी प्रकार का हो सकता है; जैसे उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में तालों का उद्योग इत्यादि।

9. अन्य तत्व (Other Factors)-कई और तत्व भी औद्योगिक विकास पर प्रभाव डालते हैं। जल की पूर्ति के लिए कई उद्योग नदियों या झीलों के तट पर लगाये जाते हैं। तकनीकी ज्ञान प्रबंध, संगठन तथा राजनीतिक ‘ कारण भी उद्योग की स्थापना पर प्रभाव डालते हैं।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग (सहायक सेवा तथा ज्ञान/विशेष क्षेत्रों की क्रियाएं)

प्रश्न 3.
भारत में लौह तथा इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण तथा उद्योग का विवरण दो। भारत में लगाये गये कारखानों का वर्णन करो।
उत्तर-
लौह-इस्पात उद्योग आधुनिक औद्योगिक युवा की आधारशिला है। लोहा कठोरता, प्रबलता तथा सस्ता होने के कारण अन्य धातुओं की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण है। इससे अनेक प्रकार की मशीनें, परिवहन के साधन, कृषि यन्त्र, ऊंचे-ऊंचे भवन, सैनिक अस्त्र-शस्त्र, राकेट तथा दैनिक प्रयोग की अनेक वस्तुएं तैयार की जाती हैं। लौह इस्पात का उत्पादन ही किसी देश के आर्थिक विकास का मापदंड है। आधुनिक सभ्यता लौह-इस्पात पर निर्भर करती है, इसलिए वर्तमान युग को ‘इस्पात युग’ कहते हैं।

इस्पात निर्माण ढंग-लोहा निर्माण का काम आज से 3000 साल पहले, भारत, मिस्र तथा रोम इत्यादि देशों में किया जाता था। इस युग को लौहयुग कहा जाता है। पृथ्वी की खानों में लोहा अशुद्ध रूप में मिलता है। लोहे को भट्टी में गला कर साफ करके इस्पात बनाया जाता हैं। इस कार्य के लिए ढंग प्रयोग में लाये जाते हैं। खुली भट्टी, कोक भट्टी तथा बिजली की पावर भट्टियों का प्रयोग किया जाता है।

  1. लोहे को पिघला कर शुद्ध करके कच्चा लौहा तैयार किया जाता है।
  2. कच्चे लोहे में मैंगनीज़ मिलाकर इस्पात बनाया जाता है जिसके साथ गार्डर, रेल पटरियां, चादरें तथा पाइप इत्यादि बनाये जाते हैं।
  3. क्रोमियम तथा निक्कल मिलाकर रखने से जंगाल न लगने वाला स्टेनलेस स्टील बनाया जाता है।
  4. कोबाल्ट मिलाने से तेज गति के साथ धातु काटने वाले उपकरण बनाये जाते हैं।

लौह-इस्पात उद्योग के स्थानीयकरण के तत्व (Locational Factors)-लौह-इस्पात उद्योग निम्नलिखित दशाओं पर निर्भर करता है।

  • कच्चा कोयला (Raw Material)—यह उद्योग लोहे तथा कोयले की खानों के निकट लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त मैंगनीज़, चूने के पत्थर, पानी तथा रद्दी लौहा (Scrap Iron) इत्यादि कच्चे माल भी निकट ही प्राप्त हों।
  • सस्ती भूमि (Cheap Land)—इस उद्योग से बाकी भट्टियों, गोदामों, इमारतों इत्यादि के बनाने के लिए सस्ती तथा पर्याप्त भूमि चाहिए ताकि कारखानों का विस्तार भी किया जा सके।
  • कोक कोयला (Coking Coal)-लौह-इस्पात उद्योग की भट्टियों में लोहा साफ करने के लिए ईंधन के रूप में कोक कोयला प्राप्त हों। कई बार लकड़ी का कोयला भी प्रयोग किया जाता है।
  • बाज़ार की निकटता (Nearness to the Market)-इस उद्योग से बनी मशीनों तथा यन्त्र भारी होते हैं इसलिए यह उद्योग मांग क्षेत्रों के निकट लगाये जाते हैं।
  • पूंजी (Capital)-इस उद्योग को आधुनिक स्तर पर लगाने के लिए पर्याप्त पूंजी की आवश्यकता होती है। इसलिए उन्नत देशों की सहायता से विकासशील देशों में इस्पात कारखाने लगाए जाते हैं।
  • इस उद्योग के लिए परिवहन के सस्ते साधन, कुशल, श्रमिक, सुरक्षित स्थानों तथा तकनीकी ज्ञान की सुविधाएं प्राप्त होनी चाहिएं। भारत में आधुनिक ढंग का पहला कारखाना सन् 1907 में साकची जमशेदपुर बिहार में जमशेद जी टाटा ने लगाया था जो अब झारखण्ड राज्य में है।

निजी क्षेत्र के प्रमुख इस्पात केंद्र-

1. जमशेदपुर में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO)

  • कच्चा लौहा-सिंहभूमि जिले में कच्चा लोहा निकट ही से प्राप्त हो जाता है। उड़ीसा की मयूरभंज खानों से 75 कि०मी० दूरी से कच्चा लोहा मिलता है।
  • कोयला-कोक कोयले के क्षेत्र झरिया तथा रानीगंज के निकट ही हैं।
  • अन्य खनिज पदार्थ-चूने के पत्थर गंगपुर में, मैंगनीज़ बिहार से तथा क्वार्टज मिट्टी कालीमती स्थान से आसानी से प्राप्त हो जाती है।
  • नदियों की सुविधा-रेत तथा जल कई नदियों से जैसे दामोदर स्वर्ण रेखा, खोरकाई से प्राप्त हो जाते हैं।
  • सस्ते व कुशल श्रमिक-बिहार, बंगाल राज्य के घनी जनसंख्या वाले प्रदेशों में सस्ते व कुशल श्रमिक आसानी से मिलते हैं।
  • बंदरगाहों की सुविधा-कोलकाता बंदरगाह निकट है तथा आयात व निर्यात की आसानी है।
  • यातायात के साधन-रेल, सड़क व जलमार्गों के यातायात के सुगम व सस्ते साधन प्राप्त हैं।
  • समतल भूमि-नदी घाटियों में समतल व सस्ती भूमि प्राप्त है, जहां कारखाने लगाए जा सकते हैं।

2. बेर्नपुर में इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी (IISCO)—पश्चिमी बंगाल में यह निजी क्षेत्र में इस्पात कारखाना स्थित है। यह कारखाना सन् 1972 ई० से केन्द्र द्वारा नियंत्रित है। यहां निम्नलिखित सुविधाएं प्राप्त हैं।

  • रानीगंज तथा झरिया से 137 कि०मी० की दूरी पर कोयला प्राप्त होता है।
  • लौहा झारखंड में सिंहभूमि क्षेत्र में।
  • चूने का पत्थर उड़ीसा से, गंगपुर क्षेत्र से।
  • जल दामोदर नदी से प्राप्त हो जाता है।
  • कोलकाता बंदरगाह से आयात-निर्यात तथा व्यापार की सुविधाएं प्राप्त हैं।

3. विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील लिमिटेड (VISL) यह कारखाना कर्नाटक राज्य में भद्रा नदी के पश्चिमी किनारे पर स्थित भद्रावती स्थान पर सन् 1923 में लगाया गया।

सुविधाएं (Factors)-

  • हैमेटाइट लोहा बाबा बूदन पहाड़ियों से।
  • लकड़ी का कोयला कादूर के वनों से।
  • जल बिजली जोग जल प्रपात तथा शिवसमुद्रम प्रपात से
  • चूने का पत्थर भंडी गुड्डा से प्राप्त होता है।
  • शिमोगा से मैंगनीज़ प्राप्त होता है।

सार्वजनिक क्षेत्र से लौह-इस्पात केंद्र-देश में इस्पात उद्योग में वृद्धि करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में हिंदस्तान स्टील लिमिटेड (HSL) कंपनी की स्थापना की गई। इसके अधीन विदेशी सहायता से चार इस्पात कारखाने लगाए गए हैं।

I. भिलाई-यह कारखाना छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में भिलाई स्थान पर रूस की सहायता से लगाया गया है।

  • यहां लौहा 97 कि०मी० दूरी से धाली-राजहारा पहाड़ी से प्राप्त होता है।
  • कोयला कोरबा तथा झरिया खानों से मिलता है।
  • मैंगनीज़ बालाघाट क्षेत्र से तथा चूने का पत्थर नंदिनी खानों से प्राप्त होता है।
  • तांदुला तालाब से जल प्राप्त होता है।
  • यह नगर कोलकाता, नागपुर रेलमार्ग पर स्थित है। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता को 25 लाख टन से बढ़ाकर 40 लाख टन किया जा रहा है।

II. दुर्गापुर-यह इस्पात कारखाना पश्चिमी बंगाल में इंग्लैंड की सहायता से लगाया गया है।

  • यहां लोहा सिंहभूम क्षेत्र से प्राप्त होता है।
  • कोयला रानीगंज क्षेत्र से प्राप्त होता है।
  • गंगपुर क्षेत्र में डोलोमाइट व चूने का पत्थर मिलता है।
  • दामोदर नदी से जल तथा विद्युत प्राप्त होती है। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता को 16 लाख टन से बढ़ाकर 24 लाख टन किया जा रहा है।

III. राऊरकेला-यह कारखाना उड़ीसा में जर्मनी की फर्म क्रुप एण्ड डीमग की सहायता से लगाया गया है।

  • यहां लोहा उड़ीसा के बोनाई क्षेत्र से प्राप्त होता है।
  • कोयला झरिया तथा रानीगंज से प्राप्त होता है।
  • चूने का पत्थर पुरनापानी तथा मैंगनीज़ ब्राजमदा क्षेत्र से प्राप्त होता है।
  • हीराकुंड बांध से जल तथा जल विद्युत् मिल जाती है। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता को 18 लाख टन से बढ़ा कर 28 लाख टन करने की योजना है।

IV. बोकारो-यह कारखाना झारखंड में बोकारो नामक स्थान पर रूस की सहायता से लगाया गया है।

  • इस केन्द्र की स्थिति कच्चे माल के स्रोतों के मध्य में है। यहां बोकारो, झरिया से कोयला, उडीसा के क्योंझर क्षेत्र से लोहा प्राप्त होता है।
  • जल विद्युत हीराकुंड तथा दामोदर योजना से।
  • जल बोकारो तथा दामोदर नदियों से। इस कारखाने की उत्पादन क्षमता को 25 लाख टन से बढ़ाकर 40 लाख टन किया जा रहा है।

सातवीं पंचवर्षीय योजना के नए कारखाने-सातवीं पंचवर्षीय योजना में तीन नए कारखाने लगाए जाने की योजना बनाई गई है।

  1. आंध्र में विशाखापट्टनम
  2. तमिलनाडु में सेलम
  3. कर्नाटक में होस्पेट के निकट विजय नगर।

उत्पादन-देश में उत्पादन बढ़ जाने के कारण कुछ ही वर्षों में भारत संसार के प्रमुख इस्पात देशों में स्थान प्राप्त कर लेगा। 2009 में देश में तैयार इस्पात का उत्पादन 597 लाख टन था। यंत्रों इत्यादि के लिए स्पैशल इस्पात का उत्पादन
PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग 5
5 लाख टन था। भारत में इस्पात की प्रति व्यक्ति खपत केवल 32 किलोग्राम है जबकि अमेरिका में 500 किलोग्राम है। भारत में प्रतिवर्ष 20 लाख टन लोहा तथा इस्पात विदेशों को निर्यात किया जाता हैं। जिसका मूल्य ₹ 2000 करोड़ है।

भविष्य-24 जनवरी, 1973 को स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया (SAIL) की स्थापना की गई है। यह संगठन लौह इस्पात, उत्पादन व निर्यात का कार्य संभालेगा। विभिन्न कारखानों की क्षमता को बढ़ाकर उत्पादन 1000 लाख टन तक ले जाने का लक्ष्य है। देश में इस्पात बनाने के लिए छोटे-छोटे कारखाने लगाकर उत्पादन बढ़ाया जाएगा।

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प्रश्न 4.
भारत में सूती कपड़ा उद्योग के स्थानीयकरण तथा सूती कपड़ा उद्योग का विवरण दो। यह उद्योग किन कारणों से मुंबई तथा अहमदाबाद में केंद्रित है?
उत्तर-
इतिहास (History)—वस्त्र मनुष्य की मूल आवश्यकता है। सूती कपड़ा उद्योग बहुत प्राचीन है। आज से लगभग बहुत समय पहले सूती वस्त्र उद्योग भारत में घरेलू उद्योग के रूप में उन्नत था। ढाके की मलमल संसार में प्रसिद्ध थी। सूती मिल उद्योग का आरम्भ 18वीं शताब्दी में ग्रेट ब्रिटेन में हुआ। औद्योगिक क्रान्ति के कारण आर्कराइट, क्रोम्पटन तथा कार्टहाईट नामक कारीगरों ने पावरलूम इत्यादि कई मशीनों का आविष्कार किया। सूती कपड़ा बनाने की इन मशीनों के कारण इंग्लैंड का लंकाशायर प्रदेश संसार भर में सूतीवस्त्र उद्योग के लिए प्रसिद्ध हो गया है। इसके पश्चात् सूती वस्त्र का मिल उद्योग संसार में कई क्षेत्रों में यू०एस०ए०, रूस, यूरोप, भारत तथा जापान इत्यादि में फैल गया।

सूती वस्त्र उद्योग के स्थानीयकरण के तत्व (Factors of Location)सूती वस्त्र उद्योग संसार के बहुत सारे देशों में फैल गया है। लगभग 40 देशों में यह उद्योग उन्नत है। कपास की प्राप्ति तथा हर एक देश की मांग होने के कारण इस उद्योग का विस्तार होता जा रहा है। यह उद्योग अग्रलिखित तत्वों पर निर्भर करता है।

  • कच्चे माल की नजदीकी-सूती वस्त्र उद्योग कपास पैदा करने वाले क्षेत्रों में लगाना उपयोगी होता है जैसे भारत में अहमदाबाद क्षेत्र तथा यू०एस०ए० की कपास की पेटी में सूती वस्त्र उद्योग है। जापान तथा इंग्लैंड विदेशों से कपास निर्यात करते हैं।
  • जलवायु-सूती कपड़ा उद्योग के लिए सिल्ल तथा समुद्री जलवायु अनुकूल होती है। इस जलवायु में धागा बार-बार नहीं टूटता। इसीलिए मुंबई, लंकाशायर तथा जापान तट पर यह उद्योग स्थापित है। कई खुश्क भागों में बनावटी नमी पैदा करने वाली मशीनों का प्रयोग किया जाता है; जैसे कानपुर में, परन्तु इस तरह से उत्पादन करने पर खर्च ज्यादा होता है।
  • सस्ती यातायात-जापान तथा इंग्लैंड सस्ती यातायात द्वारा कपास मंगवा कर अपने देश में उद्योग चलाते हैं।
  • सस्ते तथा कुशल श्रमिक-इस उद्योग के लिए कुशल मजदूर अधिक मात्रा में होने चाहिए।
  • बाजार से निकटता- यह उद्योग बाज़ार मुखी उद्योग है। यह उद्योग स्थानिक खपत केन्द्रों तथा विदेशी मंडियों के नज़दीक लगाये जाते हैं। भारत, चीन, जापान में इस उद्योग की एशिया की घनी जनसंख्या के कारण एक विशाल मंडी है।
  • शक्ति के साधन-इस उद्योग के लिए जल बिजली की सुविधा हो या कोयला निकट हो जैसे कोलकाता में रानीगंज कोयला क्षेत्र नजदीक है।
  • अन्य तत्व-इसके बिना सूती वस्त्र उद्योग के लिए मशीनरी, साफ जल, ज्यादा पूंजी, तकनीकी ज्ञान, सरकारी सहायता, रासायनिक पदार्थों इत्यादि की ज़रूरत भी होती है। सूती कपड़ा उद्योग भारत का प्राचीन उद्योग है। ढाका की मलमल दूर-दूर के देशों में प्रसिद्ध है। यह उद्योग घरेलू उद्योग के रूप में उन्नत है, परन्तु अंग्रेजी सरकार ने इस उद्योग को समाप्त करके भारत को इंग्लैंड में बने कपड़े की एक मंडी बना दिया। भारत में पहली आधुनिक मिल सन् 1818 में कोलकत्ता (कोलकाता) में स्थापित की गई।

महत्त्व (Importance)-

  • यह उद्योग भारत का सबसे बड़ा तथा प्राचीन उद्योग है।
  • इसमें 10 लाख मज़दूर काम करते हैं।
  • सब उद्योगों में से अधिक पूंजी इसमें लगी हुई है।
  • इस उद्योग के माल के निर्यात से 2000 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
  • इस उद्योग पर रंगाई, धुलाई, रासायनिक उद्योग निर्भर करते हैं। इस उद्योग में 50 लाख रुपए के रासायनिक पदार्थ प्रयोग होते हैं।

सूती कपड़ा उद्योग का स्थानीयकरण (Location)-भारत में इस उद्योग की स्थापना के लिए निम्नलिखित अनुकूल सुविधाएं हैं-

1. अधिक मात्रा में कपास। 2. उचित मशीनें । 3. मांग का अधिक होना।

उत्पादन (Production)-देश में 1300 कपड़ा मिलें थीं। इन कारखानों में 200 लाख तकले तथा 2 लाख करघे हैं। इन मिलों में लगभग 150 करोड़ किलोग्राम सूत तथा 2000 करोड़ मीटर कपड़ा तैयार किया जाता है।
वितरण (Distribution)-सूती कपड़े के कारखाने सभी प्रान्तों में हैं। लगभग 80 नगरों में सूती मिलें बिखरी हुई हैं। इन प्रदेशों में सूती कपड़ा उद्योग की उन्नति निम्नलिखित कारणों से हैं-

1. महाराष्ट्र-यह राज्य सूती कपड़ा उद्योग मे सबसे आगे है। यहां 100 मिलें हैं। मुंबई आरम्भ से ही सूती वस्त्र उद्योग का प्रमुख केंद्र है। इसलिए इसे सूती वस्त्रों की राजधानी (Cotton-Polis of India) कहते हैं। मुंबई के अतिरिक्त नागपुर, पुणे, शोलापुर, अमरावती प्रसिद्ध केन्द्र हैं । मुंबई नगर में सूती कपड़ा उद्योग की उन्नति के निम्नलिखित कारण हैं-

    • पूर्व आरम्भ-भारत की सबसे पहली आधुनिक मिल मुंबई में खोली गई।
    • पूंजी-मुंबई के व्यापारियों ने कपड़ा मिलें खोलने में बहुत धन लगाया।
    • कपास-आस-पास के खानदेश तथा बरार प्रदेश की काली मिट्टी के क्षेत्र में उत्तम कपास मिल जाती है।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग 6

  • उत्तम बन्दरगाह-मुंबई एक उत्तम बन्दरगाह है, जहां मशीनरी तथा कपास आयात करने तथा कपड़ा निर्यात करने की सुविधा है।
  • सम जलवायु-सागर से निकटता तथा नम जलवायु इस उद्योग के लिए आदर्श है।
  • सस्ते श्रमिक-घनी जनसंख्या के कारण सस्ते श्रमिक प्राप्त हो जाते हैं।
  • जल विद्युत्-कारखानों के लिए सस्ती बिजली टाटा विद्युत् केन्द्र से प्राप्त होती है।
  • यातायात-मुंबई रेलों व सड़कों द्वारा देश के भीतरी भागों से मिला है।
  • जल प्राप्ति-कपड़े की धुलाई, रंगाई द्वारा देश के लिए पर्याप्त जल मिल जाता है।

2. गुजरात-गुजरात राज्य का इस उद्योग में दूसरा स्थान हैं। अहमदाबाद प्रमुख केंद्र है। जहां 75 मिलें हैं। अहमदाबाद को भारत का मानचेस्टर कहते हैं। इसके अतिरिक्त सूरत, बड़ौदा, राजकोट प्रसिद्ध केन्द्र हैं। यहां सस्ती भूमि व उत्तम कपास के कारण उद्योग का विकास हुआ है।

3. तमिलनाडु-इस राज्य में पनबिजली के विकास तथा लम्बे रेशे की कपास की प्राप्ति के कारण यह उद्योग बहुत उन्नत है मुख्य केन्द्र मदुराई, कोयम्बटूर, सेलम, चेन्नई हैं।

4. पश्चिमी बंगाल- इस राज्य में अधिकतर मिलें हुगली क्षेत्र में हैं। यहां रानीगंज से कोयला, समुद्री आर्द्र जलवायु, सस्ते मज़दूर व अधिक मांग के कारण यह उद्योग स्थित हैं।

5. उत्तर प्रदेश-यहां अधिकतर (14) मिलें कानपुर में स्थित हैं। कानपुर को उत्तरी भारत का मानचेस्टर कहते हैं। यह कपास उन्नत करने वाला राज्य है। यहां घनी जनसंख्या के कारण सस्ते मजदूर हैं व सस्ते कपड़े की मांग अधिक है। इसके अतिरिक्त आगरा, मोदीनगर, बरेली, वाराणसी, सहारनपुर प्रमुख केन्द्र हैं।

6. मध्य प्रदेश में इंदौर, ग्वालियर, उज्जैन, भोपाल।
7. आन्ध्र प्रदेश में हैदराबाद तथा वारंगल ।
8. कर्नाटक में मैसूर तथा बंगलौर।।
9. पंजाब में अमृतसर, फगवाड़ा, अबोहर, लुधियाना।
10. हरियाणा में भिवानी।
11. अन्य नगर दिल्ली, पटना, कोटा, जयपुर, कोचीन।

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प्रश्न 5.
भारत में चीनी उद्योग के स्थानीयकरण, विकास तथा उद्योग का विवरण दो। भारतीय चीनी उद्योग कौन-कौन सी मुख्य कठिनाइयों का सामना कर रहा है ?
उत्तर-
भारत में चीनी पैदा करने का मुख्य स्रोत (कच्चा माल) गन्ना है। सूती कपड़े के उद्योग के बाद गन्ना उद्योग भारत का दूसरा बड़ा उद्योग है जिसमें 1 अरब से अधिक पूंजी लगी हुई है। देश को 500 मिलों में 2.5 लाख मजदूर काम करते हैं। इस उद्योग में देश के 2 करोड़ कृषकों को लाभ होता है। संसार में ब्राजील के बाद भारत सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है। भारत विश्व की 10% चीनी उत्पन्न करता है। यहाँ 500 से भी ज्यादा चीनी बनाने की मिलें हैं। इस उद्योग के बचे-खुचे पदार्थों पर एल्कोहल, खाद, मोम, कागज़ उद्योग पर निर्भर करते हैं।

चीनी उद्योग के स्थानीयकरण के लिए महत्वपूर्ण कारक-भारतीय चीनी उद्योग पूरी तरह से गन्ने पर आधारित हैं जो कि भारी तथा जल्दी से सूखने वाली फसल है। इसको काटने के शीघ्र बाद ही इसका रस निकालना जरूरी होता हैं, नहीं तो इसका रस सूख जाता है! औद्योगीकरण के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं-
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  • कच्चे माल की निकटता-गन्ना एक भारी पदार्थ है तथा जल्दी ही कटाई के बाद सूख जाता है। इसलिए कच्चा माल उद्योग के नजदीक ही उपलब्ध होना चाहिए, ताकि कटाई के जल्द बाद इसका रस निकाल लिया जाए।
  • बाजार की निकटता-बाज़ार की निकटता भी इस उद्योग के लिए उपयोगी है।
  • सस्ते तथा कुशल मज़दूर-इस उद्योग के लिए कुशल तथा सस्ते मजदूर अधिक मात्रा में चाहिए।
  • अनुकूल जलवायु-इस फसल के लिए तापमान 21°C से 27° C तक चाहिए तथा कम से कम 75 cm से 100 cm तक वार्षिक वर्षा की ज़रूरत है। जिन स्थानों पर वर्षा कम होती है, सिंचाई सुविधा से कृषि की जाती है।

भारतीय चीनी उद्योग में राज्यों की देन इस प्रकार है-

1. उत्तर प्रदेश-भारत में उत्तर प्रदेश चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। गन्ना उत्पादन में भी यह प्रदेश प्रथम
स्थान पर है। यहां चीनी मिलें भी दो क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
(क) तराई क्षेत्र-गोरखपुर, बस्ती, सीतापुर, फैजाबाद।
(ख) दोआब क्षेत्र-सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर।

उत्तरी भारत में सुविधाएं-भारत का 50% गन्ना उत्तर प्रदेश में उत्पन्न होता है। अधिक जनसंख्या के कारण खपत अधिक है तथा सस्ते श्रमिक प्राप्त हैं। सस्ती जल बिजली तथा बिहार से कोयला मिल जाता है। यातायात के साधन उत्तम हैं।

2. महाराष्ट्र-महाराष्ट्र में चीनी उद्योग का विकास तेजी से हुआ है। यहाँ ज्यादातर मिलें पश्चिमी हिस्से में हैं यहाँ के पठारी इलाके में नदी घाटियां स्थित हैं यहां अहमदाबाद सब से बड़ा चीनी का उत्पादक राज्य है। कोल्हापुर, पुणे, शोलापुर, सितारा तथा नासिक चीनी के लिए काफी प्रसिद्ध हैं।
PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग 8

3. तमिलनाडु-पिछले कुछ सालों से तमिलनाडु के चीनी उद्योग का विकास हो रहा है। यहाँ कुल 32 चीनी मिलें हैं जो कि कोयम्बटूर, तिरुचिरापल्ली, रामानाथपुरम, अरकोट इत्यादि स्थानों पर स्थित हैं।

4. कर्नाटक-कर्नाटक में तकरीबन 30 चीनी मिलें हैं जो देश की. 14.7 फीसदी चीनी का उत्पादन करती हैं। राज्य में सबसे ज्यादा चीनी बेलगांव, रामपुर, पाण्डुपुर से आती है।

5. आन्ध्र प्रदेश-यहाँ 35 से भी अधिक चीनी मिलें हैं। ज्यादातर मिलें पूर्वी तथा पश्चिमी गोदावरी जिलों तथा कृष्णा नदी घाटियों में मौजूद हैं। मुख्य चीनी मिलें हैदराबाद, विशाखापट्टनम, विजयवाड़ा, हास्पेट, पीठापुरम में हैं।

6. गुजरात-गुजरात के सूरत, भावनगर, अमरेली, राजकोट, अहमदनगर इत्यादि स्थानों पर भीनी मिलें हैं।

7. हरियाणा-हरियाणा में रोहतक, पलवल, पानीपत, यमुनानगर, जींद, कैथल, सोनीपत, फरीदाबाद इत्यादि .. जिलों में चीनी मिलें मौजूद हैं।
8. पंजाब-पंजाब में 17 मुख्य चीनी मिलें हैं जिनमें 10 ही चलती हैं। सात चीनी मिलें बंद पड़ी हैं। जो कि धूरी, .बुढ़लाड़ा, फरीदकोट, जगराओं, रखड़ा, तरनतारन तथा जीरा में हैं। अजनाला, बटाला, भोगपुर, बुद्देवाल, फाजिल्का, फगवाड़ा, गुरदासपुर, नकोदर, मोरिंडा, नवांशहर इत्यादि चीनी मिलें काफी प्रसिद्ध हैं।

चीनी उद्योग को आने वाली मुख्य कठिनाइयां-

  • भारत में गन्ने की प्रति हेक्टेयर उपज कम है।
  • गन्ने पर पैसा उत्पादन के समय ज्यादा लगता है तथा बिक्री मूल्य में दिन प्रति दिन गिरावट आ रही है।
  • गन्ने की कटाई के बाद इसका रस जल्दी सूख जाता है। इसको लम्बे समय तक बचाकर नहीं रखा जा सकता।
  • चीनी मिलों के मालिक किसानों को पैसे का भुगतान समय पर नहीं करते।
  • गन्ना एक भारी पदार्थ है। एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाना मुश्किल है। यातायात पर लागत ज्यादा आती
  • गन्ना प्राप्त न होने के कारण मिलें वर्ष में कुछ महीने बन्द रहती हैं।
  • चीनी उद्योग के बचे खुचे पदार्थों का ठीक उपयोग नहीं होता।

भविष्य-पिछले कुछ वर्षों में चीनी उद्योग दक्षिणी भारत की ओर स्थानान्तरित कर रहा है। कोयम्बटर में गन्ना खोज केन्द्र भी स्थापित किया गया है। दक्षिणी भारत में गन्ना अधिक मोटा होता है तथा इसमें रस की मात्रा अधिक होती है। दक्षिणी भारत में गन्ने की पिराई का समय भी अधिक होता है। गन्ने की प्रति हेक्टेयर उपज भी अधिक है। यहां आधुनिक चीनी मिलें सहकारी क्षेत्र में लगाई गई हैं।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग (सहायक सेवा तथा ज्ञान/विशेष क्षेत्रों की क्रियाएं)

प्रश्न 6.
औद्योगिक गलियारे से आपका क्या भाव है ? भारतीय औद्योगिक गलियारों के निर्माण के अलगअलंग स्तरों का वर्णन करो।
उत्तर-
जिस क्षेत्र में उद्योगों के विकास के लिए हर संभव कोशिश की जाती है तथा एक गलियारा ढांचा तैयार करवाया जाता है, ताकि उद्योग को प्रोत्साहन मिल सके तथा प्रारंभिक ज़रूरतों को एक स्थान से ही पूरा किया जा सके।
औद्योगिक गलियारा कहलाता है। उदाहरण-बंदरगाह, राष्ट्रीय मार्ग तथा रेल प्रबंध इत्यादि को विकसित करना। औद्योगिक गलियारों के निर्माण स्तर-इस समय भारत में लगभग सात औद्योगिक गलियारे तैयार किये गये हैं तथा इनका निर्माण अलग अलग स्तरों पर होता है। जिसका वर्णन इस प्रकार है.

1. दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा (Delhi-Mumbai Industrial corridors) यह गलियारा देश के सात राज्यों में फैला हुआ है। यह गलियारा दिल्ली से आर्थिक राजधानी मुंबई तक फैला है। जिसकी लंबाई – 1500 किलोमीटर हैं। जिसमें 24 औद्योगिक क्षेत्रों के साथ-साथ 8 स्मार्ट शहर, दो हवाई अड्डे भी शामिल हैं। यहां यातायात के साधन भी विकसित हैं।

2. मंबई-बेंगलरू आर्थिक गलियारा (Mumbai-Bangaluru Industrial Corridors) यह गलियारा देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से लेकर बेंगलुरू (कर्नाटक की राजधानी) तक फैला हुआ हैं। इसमें महाराष्ट्र तथा कर्नाटक राज्यों में चितदुर्ग, हुबली, बेलागांव, शोलापुर इत्यादि शहर शामिल हैं।

3. चेन्नई-बेंगलुरू औद्योगिक गलियारा (CBIC) यह गलियारा भारत सरकार का एक विशाल तथा बुनियादी ढांचा प्रदान करने वाला प्रोजैक्ट है, जिसका निर्माण अभी तक चल रहा है। इसके अधीन चेन्नई, श्री पोरंबदर, राणीपेट, चिंतुर, पालामानौर इत्यादि शामिल हैं।

4. विशाखापट्टनम-चेन्नई औद्योगिक गलियारा (VCIC)—इस गलियारे को विजाग चेन्नई औद्योगिक गलियारा भी कहते हैं। यह पूर्वी तटी आर्थिक गलियारे का एक हिस्सा है। यह सुनहरो चतुर्भुज के साथ जुड़ा हुआ है तथा भारत के पूर्व के तरफ ध्यान दें तथा मेक इन इंडिया जैसे प्रोग्राम हैं जो इसकी वृद्धि में काफी सहायक हैं।

5. अमृतसर, कोलकाता औद्योगिक गलियारा (AKIC)—यह औद्योगिक गलियारा अमृतसर, दिल्ली, कोलकाता इत्यादि महत्त्वपूर्ण शहरों से जुड़ा हुआ है। यह गलियारा भी भारत के सात रज्यों में निकलता है। इस प्रोजैक्ट के अधीन सड़कें, बंदरगाहें, हवाई मार्ग इत्यादि का विकास किया जा रहा है।

6. वडारेवू तथा निजामापट्टनम (VANPIC)-यह गलियारा आन्ध्र प्रदेश के गंटूर के प्रकासम जिलों से जुड़ा हुआ है।

7. उधना पालमाणा औद्योगिक गलियारा (OPIC)-यह गलियारा गुजरात तथा पालमाणा राजस्थान के बीच फैला हुआ है जिसमें धातुओं से जुड़े उद्योग, सूती कपड़ा, दवाइयां, प्लास्टिक तथा रासायन इत्यादि उद्योग शामिल हैं।

PSEB 12th Class Geography Solutions Chapter 6 आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग (सहायक सेवा तथा ज्ञान/विशेष क्षेत्रों की क्रियाएं)

आर्थिक भूगोल निर्माण उद्योग (सहायक सेवा तथा ज्ञान/विशेष क्षेत्रों की क्रियाएं) PSEB 12th Class Geography Notes

  • आर्थिक भूगोल मुख्य रूप में प्रारंभिक, द्वितीयक, तृतीयक तीन क्षेत्रों में विभाजित होती है तथा निर्माण । उद्योग द्वितीयक सैक्टर के अंतर्गत आता है। इसमें प्रारंभिक क्षेत्र से लेकर आये कच्चे माल का उपयोग योग्य सामान उद्योगों में तैयार किया जाता है।
  • उद्योगों को आगे उनमें मजदूरों की संख्या के आधार पर, कच्चे माल पर आधारित उद्योग, मालिकी के आधार पर, कच्चे माल के स्रोतों के आधार पर फुटकल उद्योगों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
  • उद्योगों की स्थापना पर कई भौगोलिक कारक (जैसे कच्चा माल, मजदूर, यातायात इत्यादि), गैर भौगोलिक कारक (पूंजी, सरकारी नीतियां, बैंक की सुविधा इत्यादि) प्रभाव डालते हैं।
  • लौहा तथा इस्पात का उद्योग प्रारंभिक उद्योग है। इसका उपयोग यातायात के साधनों, मशीनरी, भवन निर्माण, समुद्री जहाज़ बनाने इत्यादि में किया जाता है।
  • भारत में मौजूदा लौह तथा इस्पात उद्योग की शुरुआत सन् 1854 ई० में हुई।
  • भारत में TISCO, VISL, BSP, DSP तथा बोकारो स्टील प्लांट, राऊरकेला प्रमुख स्टील प्लांट हैं।
  • भारतीय लौहा तथा इस्पात उद्योग को मुख्य रूप में सस्ती दरामद, कच्चे माल की समस्या, लचकदार सरकारी नीति, ऊर्जा तथा पूंजी की कमी इत्यादि मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
  • आने वाले समय में 2025 तक भारत में लौह-इस्पात के उत्पादन की क्षमता 30 करोड़ तक पहुंचा देने का उद्देश्य रखा गया है।
    भारतीय सूती कपड़े की मिल 1818 में फोर्ट ग्लॉस्टर कोलकाता में लगाई गई थी जो कि नाकाम रही। पहली सफल कपड़ा मिल 1854 में मुंबई में लगाई गई।
  • भारतीय सूती कपड़ा उद्योग देश के कुल 14 प्रतिशत उत्पादन का हिस्सा डालता हैं। भारत में ढाके की । मलमल, मसूलीपटनम छींट, कालीकट की कल्लीकेंज से कैम्बे में बने बफता वस्त्र पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।।
  • चीनी का उत्पादन गन्ने तथा चुकन्दर से होता है। ब्राजील के बाद भारत का गन्ना उत्पादन में दूसरा स्थान है। देश में 35 करोड़ टन गन्ना तथा 2 करोड़ टन चीनी का वार्षिक उत्पादन होता है। भारत में मुख्य गन्ना उत्पादक राज्य हैं-उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, हरियाणा इत्यादि।
  • भारत का पैट्रोकैमिकल उद्योग देश के सबसे अधिक तेजी से बढ़ने वाले उद्योगों में सबसे आगे हैं। यह उद्योग वस्त्र, पैकिंग, कृषि, निर्माण तथा दवाइयों के उद्योगों को मुख्य सुविधा उपलब्ध करवाता है।।
  • पैट्रो रसायन उद्योग के दो उद्योग पृथ्वी के नीचे से कच्चा तेल निकालना तथा तेलशोधन करना, इत्यादि प्रमुख हैं।
  • औषधि बनाने के उद्योग में भारत विश्व की 10 फीसदी औषधियां बनाता है तथा विश्व में तीसरा स्थान प्राप्त करता है।
  • विश्व की नई आर्थिकता की रीढ़ की हड्डी ज्ञान पर आधारित उद्योग है। 1970 के बाद संसार में इन उद्योगों का विकास अधिक हुआ।
  • उद्योग तथा गलियारे वह भौगोलिक क्षेत्र होते हैं जिसमें उद्योगों के विकास के लिए हर एक संभव बुनियादी स्वरूप उपलब्ध करवाया जाता है। इसमें भारत में सात बड़े उद्योग गलियारे हैं जो कि DMIC, CBIC, BMEC, VCIC, AKIC, VANPIC इत्यादि हैं।
  • निर्माण उद्योग-यह एक सहायक क्रिया है जिसमें कच्चे माल को मशीनों की सहायता से रूप बदल कर अधिक उपयोगी बनाया जाता है।
  • उद्योगों की किस्में (1) बड़े पैमाने तथा छोटे पैमाने के उद्योग (2) भारी तथा हल्के उद्योग (3) निजी, सरकारी तथा सार्वजनिक उद्योग (4) कृषि आधारित तथा खनिज आधारित उद्योग (5) कुटीर उद्योग तथा मिल उद्योग।
  • उद्योगों के स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक (1) कच्चा माल, (2) ऊर्जा, (3) यातायात, (4) मजदूर, (5) बाज़ार, (6) पानी, (7) जलवायु इत्यादि।
  • इस्पात उद्योग-भारत में पहला इस्पात उद्योग जमशेदपुर में 1907 में लगाया गया।
  • सहकारी क्षेत्र-वह उद्योग जो सहकारी क्षेत्र या फिर लोगों द्वारा मिलकर चलाये जाते हैं सहकारी क्षेत्र के उद्योग होते हैं-जैसे-डेयरी, अमूल इत्यादि।
  • विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील लिमिटेड (VISL)- यह 18 जनवरी, 1923 को मैसूर आयरन वर्क्स के नाम से शुरू हुआ था। बाद में इसका नाम मशहूर इंजीनियर भारत रत्न श्री एम० विश्वेश्वरैया के नाम पर VISL पड़ गया।
  • सूती वस्त्र मिल का वर्गीकरण-मुख्य रूप में सूती कपड़ा मिल को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है।
    1.कताई मिलें, 2. बुनाई मिलें, 3. धागे से कपड़ा मिलें।
  • विश्व में ब्राजील, भारत, यूरोपीय संघ, चीन तथा थाइलैंड पांच बड़े चीनी के उत्पादक राज्य हैं।
  • नीला कॉलर श्रमिक-नीला कॉलर श्रमिक हाथ से काम करने वाले मजदूर हैं जो कि कुछ घंटों या किये गये काम के मुताबिक वेतन लेते हैं।
  • बड़े पैमाने के उद्योग-वह उद्योग जिनमें मजदूरों की संख्या ज्यादा हो जैसे-सूती कपड़ा उद्योग।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

Punjab State Board PSEB 12th Class Political Science Book Solutions Chapter 20 भारत और सार्क Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Political Science Chapter 20 भारत और सार्क

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (दक्षेस) की पृष्ठभूमि एवं इसकी स्थापना के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।
(Describe the background and efforts made for the establishment of South Asian Association for Regional Co-operation-SAARC.)
अथवा
सार्क की स्थापना पर नोट लिखें तथा सार्क के उद्देश्यों का वर्णन करें। (Write a note on Establishment (formation) of SAARC and discuss its objectives.)
उत्तर-
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) दक्षिण एशिया के आठ देशों-भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, भूटान, नेपाल, मालदीव, अफ़गानिस्तान और श्रीलंका का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन की स्थापना आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग द्वारा दक्षिणी एशिया के लोगों के कल्याण के लिए की गई थी।

सार्क की स्थापना (Establishment of SAARC)-द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व दो गुटों-पूंजीवादी गुट और साम्यवादी गुट में बंट गया था। पूंजीवादी गुट का नेतृत्व अमेरिका जबकि साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ करने लगा। विश्व में आर्थिक सहयोग और सुरक्षात्मक उद्देश्यों को लेकर क्षेत्रीय संगठन बनने लगे। आपसी संगठन बनाने की यह प्रक्रिया पूरे यूरोप और धीरे-धीरे विश्व भर में फैलने लगी।
1975 में व्यापारिक उद्देश्यों के लिए बंगला देश, भारत, फिलीपीन्स, लाओस, श्रीलंका, थाइलैंड आदि देशों ने समझौता किया।

दक्षिण एशियाई देशों में सामाजिक, जातीय, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों की सामान्य सांझ है और तीव्र विकास की इच्छा भी है लेकिन इनमें कई बातों पर आपसी अविश्वास की भावना भी देखी जा सकती है। विशेष रूप से इन देशों के सुरक्षात्मक हित, विभिन्न राजनीतिक संस्कृति भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद और इस क्षेत्र में भारत की विशेष स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। 70 के दशक के अंत में बंगला देश के दिवंगत राष्ट्रपति जिआउर्रहमान ने एक विचार दिया था कि दक्षिण एशिया के सात देशों को मिलकर इस क्षेत्र की समस्याओं पर विचार करना चाहिए और आर्थिक विकास के लिए प्रयास करना चाहिए। आपसी सहयोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग के लिए बंगला देश कार्यकारी पत्र (Bangladesh Working paper on South Asian Regional Cooperation) जारी किया गया जिसमें सहयोग के 11 प्रमुख बिंदुओं पर बल दिया गया। ये 11 प्रमुख बिंदु थे-दूर संचार, यातायात, जहाजरानी, शैक्षणिक व सांस्कृतिक सहयोग, वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग, कृषि अनुसन्धान, पर्यटन, संयुक्त उपक्रम, बाज़ार प्रोत्साहन, मौसम विज्ञान। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि ‘सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे।’ दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के द्विपक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क कोई राजनीतिक संघ

या मंच नहीं है। इस संघ का उद्देश्य सामूहिक सहयोग है। सभी सदस्य एक-दूसरे की सम्प्रभुता को मान्यता देते हैं और कोई देश किसी दूसरे के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और सभी सदस्य सामूहिक हित के लिए काम करेंगे।

अनेक अध्ययनों के पश्चात् 1-2 अगस्त, 1983 को दिल्ली में सात देशों-भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और बंगला देश के विदेश मंत्रियों की एक बैठक हुई। इस बैठक में सातों देशों के विदेश मंत्रियों ने दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते की उद्घोषणा में कहा गया कि दक्षिणी एशिया में आपसी सहयोग लाभदायक, वांछनीय और आवश्यक है और इससे क्षेत्र के लोगों के जीवन को सुधारने में मदद और प्रोत्साहन मिलेगा। अंतत: दक्षिणी एशियाई देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन बंगला देश की राजधानी ढाका में हुआ जिसमें 8 दिसम्बर, 1985 को सार्क घोषणा-पत्र (Charter) को स्वीकार किया गया। इस प्रकार औपचारिक रूप से दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) अस्तित्व में आया। इस संगठन की स्थापना में भारत की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही। इसके प्रथम शिखर सम्मेलन से लेकर अन्त तक भारत का योगदान इसमें विशेष स्थान रखता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि भारत दक्षिणी एशिया का एक प्रमुख देश है और सार्क की सफलता या असफलता बहुत सीमा तक भारत के सक्रिय सहयोग पर ही निर्भर करती है।

निष्कर्ष (Conclusion)-इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क दक्षिणी एशिया के आठ देशों का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। यह एक राजनीतिक संगठन नहीं है। यह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीकी व वैज्ञानिक हितों की पूर्ति के लिए आपसी सहयोग पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन का उदय भी अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं से प्रेरित है। सार्क की स्थापना में भारत की सक्रिय भागीदारी रही है।
सार्क के उद्देश्य-

सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों-भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बंगला देश, नेपाल, मालदीव, अफ़गानिस्तान और भूटान का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन की स्थापना भी बदलते हुए अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण के सन्दर्भ में हुई। इस संगठन की स्थापना बंगला देश के दिवंगत शासनाध्यक्ष जिआउर्रहमान की पहल पर हुई। इसके लिए 1-2 अगस्त, 1983 को नई दिल्ली में इन सात देशों के विदेश मन्त्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में सदस्य देशों ने आपसी सहयोग के कुछ मुद्दों पर एक सहमति पत्र तैयार किया। इस सहमति पत्र के आधार पर दिसम्बर, 1985 में ढाका में सार्क देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन हुआ। इस शिखर सम्मेलन में 8 दिसंबर को सार्क का घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया।

सार्क के सिद्धान्त (Principles of SAARC) दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे। दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्वि-पक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता व राजनीतिक स्वतन्त्रता का सम्मान करता है और किसी दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सार्क एक राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इसका उद्देश्य आपसी सहयोग द्वारा विकास करना है। इसके लिए सदस्य देश आपसी सहयोग को प्राथमिकता देंगे।

सार्क के उद्देश्य (Objectives of the SAARC)-दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के चार्टर में इसके निम्नलिखित उद्देश्यों का वर्णन किया गया है

  • दक्षिण एशियाई देशों के लोगों का कल्याण और जीवन में गुणात्मकता लाना।
  • आर्थिक वृद्धि, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास।
  • सामूहिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
  • अन्य देशों के साथ सहयोग करना।
  • आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।
  • अन्य क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आपसी सहयोग को मज़बूत बनाना।
  • एक दूसरे की समस्याओं के लिए आपसी विश्वास, समझ-बूझ व सहृदयता विकसित करना।

निष्कर्ष (Conclusion)-इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क एक ऐसा संगठन है जो सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, स्वतन्त्रता, समानता व अखण्डता में विश्वास रखते हुए क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए आपसी सहयोग की अपेक्षा रखता है। सार्क क्षेत्रीय विकास एवं कल्याण के लिए बनाया गया संगठन है। यह कोई सैनिक या राजनीतिक गठबन्धन नहीं है। सार्क के घोषणा पत्र में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इसमें द्वि-पक्षीय मामलों पर बहस नहीं की जाएगी। किन्तु इसकी बैठकों में कई बार द्वि-पक्षीय मामले उठाने का भी प्रयास किया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान की ओर से यह प्रयास अधिक होता है। भारत ने सदैव इसका विरोध किया है। सार्क क्षेत्रीय सहयोग के लिए बनाया गया है और यदि यह निर्धारित सिद्धान्तों का पालन करें तो घोषित उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

प्रश्न 2.
सार्क के लक्ष्य और सिद्धान्त क्या हैं ? । (What are objectives and principles of SAARC ?)
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों-भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बंगला देश, नेपाल, मालदीव, अफ़गानिस्तान और भूटान का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन की स्थापना भी बदलते हुए अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण के सन्दर्भ में हुई। इस संगठन की स्थापना बंगला देश के दिवंगत शासनाध्यक्ष जिआउर्रहमान की पहल पर हुई। इसके लिए 1-2 अगस्त, 1983 को नई दिल्ली में इन सात देशों के विदेश मन्त्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में सदस्य देशों ने आपसी सहयोग के कुछ मुद्दों पर एक सहमति पत्र तैयार किया। इस सहमति पत्र के आधार पर दिसम्बर, 1985 में ढाका में सार्क देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन हुआ। इस शिखर सम्मेलन में 8 दिसंबर को सार्क का घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया।

सार्क के सिद्धान्त (Principles of SAARC) दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे। दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्वि-पक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता व राजनीतिक स्वतन्त्रता का सम्मान करता है और किसी दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सार्क एक राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इसका उद्देश्य आपसी सहयोग द्वारा विकास करना है। इसके लिए सदस्य देश आपसी सहयोग को प्राथमिकता देंगे।

सार्क के उद्देश्य (Objectives of the SAARC)-दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के चार्टर में इसके निम्नलिखित उद्देश्यों का वर्णन किया गया है

  • दक्षिण एशियाई देशों के लोगों का कल्याण और जीवन में गुणात्मकता लाना।
  • आर्थिक वृद्धि, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास।
  • सामूहिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
  • अन्य देशों के साथ सहयोग करना।
  • आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।
  • अन्य क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आपसी सहयोग को मज़बूत बनाना।
  • एक दूसरे की समस्याओं के लिए आपसी विश्वास, समझ-बूझ व सहृदयता विकसित करना।

निष्कर्ष (Conclusion)-इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क एक ऐसा संगठन है जो सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, स्वतन्त्रता, समानता व अखण्डता में विश्वास रखते हुए क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए आपसी सहयोग की अपेक्षा रखता है। सार्क क्षेत्रीय विकास एवं कल्याण के लिए बनाया गया संगठन है। यह कोई सैनिक या राजनीतिक गठबन्धन नहीं है। सार्क के घोषणा पत्र में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इसमें द्वि-पक्षीय मामलों पर बहस नहीं की जाएगी। किन्तु इसकी बैठकों में कई बार द्वि-पक्षीय मामले उठाने का भी प्रयास किया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान की ओर से यह प्रयास अधिक होता है। भारत ने सदैव इसका विरोध किया है। सार्क क्षेत्रीय सहयोग के लिए बनाया गया है और यदि यह निर्धारित सिद्धान्तों का पालन करें तो घोषित उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

प्रश्न 3.
सार्क की महत्त्वपूर्ण गतिविधियां क्या रही हैं ? उनमें भारत की भूमिका क्या है ?
(What important actiyities of SAARC has taken up during its existence ? What has been India’s role in them ?)
अथवा
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) द्वारा अपने अस्तित्व में किए गए मुख्य कार्य कौन-से हैं ? इनमें भारत की भूमिका क्या रही है ?
(What important activities has SAARC taken up during its existense ? What has been India’s role in them.)
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन का उद्देश्य इन देशों के बीच अधिकाधिक क्षेत्रों में सहयोग स्थापित करना है ताकि समस्याएं एक-दूसरे की सहायता से हल हो सकें। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि, ‘सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे।’ दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्विपक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा।’ सार्क कोई राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इस संघ का उद्देश्य सामूहिक सहयोग है। सभी सदस्य एक-दूसरे को सम्प्रभुता को मान्यता देते हैं और कोई देश किसी दूसरे की आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और सभी सदस्य सामूहिक हित के लिए काम करेंगे।

प्रथम शिखर सम्मेलन-दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ का प्रथम शिखर सम्मेलन 1985 में ढाका में हुआ। इस सम्मेलन में सभी सदस्यों ने पारस्परिक सहयोग के लिए अपनी वचनबद्धता पर सहमति प्रकट की।

द्वितीय शिखर सम्मेलन-द्वितीय शिखर सम्मेलन नवम्बर, 1986 में भारत में बंगलौर में हुआ। इन देशों ने 1990 तक सार्वभौमिक प्रतिरक्षण, सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा, मातृ-शिशु पोषाहार, साफ़ सुरक्षित पेय जल की व्यवस्था और 2000 से पूर्व समुचित आवास के लक्ष्य निर्धारित किए। – तृतीय शिखर सम्मेलन-सार्क का तीसरा शिखर सम्मेलन नवम्बर, 1987 में काठमांडू में हुआ। इस सम्मेलन में तीन ऐतिहासिक निर्णय लिए गए

(1) आतंकवाद को समाप्त करने का समझौता हुआ।
(2) दक्षिण एशियाई खाद्य सुरक्षा भंडार की स्थापना का निर्णय किया गया।
(3) तीसरा महत्त्वपूर्ण निर्णय सार्क क्षेत्र के पर्यावरण की रक्षा के उपाय करने के लिए पर्यावरण सम्बन्धी अध्ययन करना है।

चौथा शिखर सम्मेलन-सार्क का चौथा सम्मेलन श्रीलंका की अशांत स्थिति के कारण वहां न होकर 29 सितम्बर, 1988 को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुआ। इस सम्मेलन का विशेष महत्त्व है क्योंकि यह सम्मेलन पाकिस्तान में लोकतन्त्र की बहाली के बाद हुआ। इस सम्मेलन में महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए गए

  • इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रीय संसदों के सदस्य एक विशेष सार्क पत्र दस्तावेज़ पर किसी भी देश की यात्रा कर सकेंगे तथा उन्हें वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं होगी।
  • नशीले पदार्थों के ग़लत प्रयोग को रोकने हेतु ज़ोरदार अभियान जारी रखने का संकल्प किया।
  • इस सम्मेलन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ‘सार्क 2000’ का निर्माण है। ‘सार्क 2000’ एक क्षेत्रीय योजना की अवधारणा है। इस योजना द्वारा शताब्दी के अंत तक इस क्षेत्र के एक अरब से ज्यादा लोगों की आवास, शिक्षा और साक्षरता की आवश्यकताएं पूरी की जा सकें।
  • संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के अनुसार वर्ष 1989 को ‘बालिका वर्ष’ के रूप में मनाने का आह्वान किया गया। (5) परमाणु निःशस्त्रीकरण का भी निर्णय लिया गया।
  • शिखर सम्मेलन के निर्णय के अनुसार इस क्षेत्र का कोई भी देश सार्क का सदस्य बन सकता है, यदि वह इसके घोषणा-पत्र के सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों में विश्वास रखता है।

कोलंबो सम्मेलन-21 दिसम्बर, 1991 को सार्क का सम्मेलन कोलंबो में हुआ। सार्क के सातों देश क्षेत्र में व्यापार को उदार बनाने पर सहमत हो गए। सातों सदस्य देशों ने नि:शस्त्रीकरण की सामान्य प्रवृत्तियों का स्वागत किया। घोषणा-पत्र में मानव अधिकारों की रक्षा की बात कही गई है।

ढाका शिखर सम्मेलन-12 दिसम्बर, 1992 को सार्क का शिखर सम्मेलन ढाका (बंगला देश) में होना था, परन्तु भारत के आग्रह पर स्थगित कर दिया गया और 13 जनवरी, 1993 को शिखर सम्मेलन होना निश्चित किया गया। 13 जनवरी को भी यह सम्मेलन न हो सका। यह सम्मेलन 10 और 11 अप्रैल को ढाका में हुआ। इस सम्मेलन में दक्षेस राष्ट्रों के नेताओं ने सातों राष्ट्रों के बीच एक ‘महाबाज़ार’ का निर्माण करने तथा दक्षिण एशिया के स्वतन्त्र व्यक्तित्व पर विशेष बल दिया।

नई दिल्ली सम्मेलन-2 मई, 1995 को सार्क का आठवां शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में आरम्भ हुआ। इस सम्मेलन की मुख्य उपलब्धि आपसी सहयोग के क्षेत्र में दक्षिण एशियाई वरीयता व्यापार व्यवस्था (साप्टा) पर सदस्य राष्ट्रों की सहमति है। सभी सदस्य राज्यों ने वर्ष 1995 को ‘दक्षेस ग़रीबी उन्मूलन वर्ष’ मनाने का फैसला
किया।

नौवां शिखर सम्मेलन-मई, 1997 में मालद्वीप की राजधानी माले में सार्क का नौवां शिखर सम्मेलन हुआ। माले शिखर सम्मेलन में सन् 2001 तक दक्षेस में मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) स्थापित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया।

दक्षेस का दसवां शिखर सम्मेलन-दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन का दसवां शिखर सम्मेलन तीन दिन के लिए कोलंबो में 28 जुलाई, 1998 को प्रारम्भ हुआ और 31 जुलाई को समाप्त हुआ। दक्षेस ने सदस्य देशों की सभी क्षेत्रों में समृद्धि के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक कार्यसूची की घोषणा की। सदस्य देशों ने परमाणु हथियारों को पूरी तरह से नष्ट करने और प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय नियंत्रण के तहत विश्वभर में परमाणु निःशस्त्रीकरण को बढ़ावा देने की आवश्यकता की अपनी वचनबद्धता को दोहराया।

दक्षेस का 11वां शिखर सम्मेलन-दक्षेस का 11वां शिखर सम्मेलन नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारत एवं पाकिस्तान के तनाव के बीच 5 एवं 6 फरवरी, 2002 को हुआ। इस सम्मेलन में अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये गये, जैसे कि आतंकवाद को समाप्त करने एवं दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) को शीघ्र लागू करने के फैसले लिए। इसके अतिरिक्त महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर रोक और एड्स के मुकाबले के लिए सामूहिक पहल की बात भी दक्षेस घोषणा में कही गई।

12वां सार्क शिखर सम्मेलन, जनवरी-2004-‘दक्षेस’ देशों का 12वां शिखर-सम्मेलन 4 जनवरी, 2004 को इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में हुआ। इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया। सम्मेलन के अन्त में 11 पृष्ठों का एक सांझा घोषणा-पत्र (इस्लामाबाद घोषणा-पत्र) जारी किया गया। इस सम्मेलन की प्रमुख बातें निम्नलिखित रहीं-

  • ‘दक्षिणी एशियाई मुक्त व्यापार व्यवस्था’ (साफ्टा) को मंजूरी दी गई। यह समझौता 1 जनवरी, 2006 से लागू होगा।
  • दक्षिणी एशिया से ग़रीबी, पिछड़ापन आदि दूर करने के लिए सामाजिक घोषणा-पत्र जारी किया गया।
  • 1987 में किए गए आतंकवाद निरोधक सार्क समझौते की समीक्षा की गई तथा आतंकवाद पर प्रभावी रोकथाम . लगाने पर सहमति हुई।
  • दक्षेस पुरस्कार आरम्भ करने का निर्णय लिया गया।

13वां सार्क शिखर सम्मेलन-नवम्बर, 2005-सार्क का 13वां शिखर सम्मेलन नवम्बर, 2005 में ढाका में हुआ। सार्क सदस्य देशों ने परस्पर वीजा नियमों को उदार बनाने के लिए सार्क संचार परिषद् का गठन करने के लिए तथा सीमा शुल्क मामलों में परस्पर सहयोग के लिए आपस में समझौता किया।

14वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 14वां शिखर सम्मेलन 3-4 अप्रैल, 2007 को भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुआ। इस सम्मेलन में अफ़गानिस्तान को सार्क का 8वां सदस्य बनाया गया। इस सम्मेलन में सदस्य देशों ने निम्नलिखित मुद्दों पर अपनी सहमति प्रकट की

  • आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए उनको मिलने वाली वित्तीय सहायता को रोकने का प्रयास किया जाए।
  • दक्षिण एशिया विकास फंड की शुरुआत की जाए।
  • साफ्टा को और मज़बूत किया जाए।
  • सार्क देशों से ग़रीबी दूर करने तथा बच्चों एवं महिलाओं के विकास के लिए विशेष प्रयास किए जाएं।

15वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 15वां शिखर सम्मेलन 2-3 अगस्त, 2008 को श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में हुआ। इस सम्मेलन में एक 41 सूत्रीय घोषणा पत्र जारी किया गया जिसके महत्त्वपूर्ण प्रावधान इस प्रकार

  • आतंकवाद को रोकने के लिए प्रभावशाली प्रयास किए जाएंगे।
  • साफ्टा पूर्ण तौर पर लागू किया जाए।
  • एक सांझा खाद्यान्न भण्डार स्थापित किया जाएगा।
  • सार्क देशों में मादक पदार्थों, मानवीय और हथियारों की तस्करी को रोकने के लिए एक सांझा कानूनी तन्त्र विकसित किया जाएगा। ___

16वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 16वां शिखर सम्मेलन 28-29 अप्रैल, 2010 को भूटान की राजधानी थिम्पू में हुआ। सार्क घोषणा पत्र में सभी तरह के आतंकवाद की आलोचना करते हुए उसके विरुद्ध लड़ने के लिए पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देने की बात की गई। सार्क नेताओं ने 2011-20 के दशक को डिकेट ऑफ़ इंट्रारीजनल कनेक्टिविटी इन सार्क के रूप में मनाने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया।

17वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 17वां शिखर सम्मेलन 10-11 नवम्बर, 2011 को मालदीव में हुआ। इस सम्मेलन में राष्ट्रों ने आपसी व्यापार, आपदा प्रबन्धन, समुद्री दस्युओं से निपटने की समस्या व वैश्विक आर्थिक संकट के मुद्दों पर चर्चा हुई।

18वां सार्क शिखर सम्मेलन-सार्क का 18वां शिखर सम्मेलन 26-27 नवम्बर 2014 को नेपाल में हुआ। भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सार्क सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए आतंकवाद तथा अर्न्तदेशीय अपराधों से निपटने का

आहवान किया। उन्होंने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सार्क देशों को तीन से पांच साल का व्यापार वीजा देने की घोषणा की।

PSEB 12th Class Political Science Solutions Chapter 20 भारत और सार्क

प्रश्न 4.
सार्क का महत्त्व लिखो और इसके सामने आने वाली समस्याओं का वर्णन करो। (Write down the Importance of SAARC and explain its Problems.).
अथवा
सार्क की समस्याओं का वर्णन करो। (Explain the Problems of SAARC)
अथवा
सार्क की स्थापना कब हई ? सार्क की असफलताओं के कारणो का वर्णन करें। (When was ‘SAARC’ formed ? Explain the reasons for the failure of SAARC.)
उत्तर-
आज के तकनीकी युग में कोई देश आपसी सहयोग के बिना उन्नति नहीं कर सकता। विश्व के लगभग सभी राष्ट्र आर्थिक उन्नति के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। इसी आपसी सहयोग को बनाने एवं बढ़ाने के विचार से दक्षिण एशिया के सात देशों ने देश की स्थापना की। सार्क के दक्षिण एशिया के सदस्य राष्ट्रों की आर्थिक उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की है। आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के लिए 1995 में सार्क देशों ने साफ्टा को लागू किया। इस सहयोग को और अधिक बढ़ाने के लिए सार्क के 12वें शिखर सम्मेलन में साफ्टा को वर्ष 2006 से लागू करने की अनुमति दे दी है।

सार्क का महत्त्व/सफलताएं-सार्क देशों द्वारा अपनाए गए आर्थिक सहयोग कार्यक्रम का महत्त्व निम्नलिखित

  • दक्षिण एशियाई देशों द्वारा आर्थिक रूप से एक-दूसरे से सहयोग के कारण इस क्षेत्र में लोगों के जीवन स्तर में भारी सुधार आया है।
  • इसने आर्थिक विकास को गति प्रदान की है।
  • आर्थिक सहयोग के चलते सदस्य राष्ट्रों द्वारा एक-दूसरे पर से विभिन्न प्रकार के कर हटाने से व्यापार को बढ़ावा मिला है।
  • दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था में सुधार आया है।
  • आर्थिक क्षेत्र में सहयोग से सार्क देशों के सम्बन्धों में अधिक मज़बूती आई है।

सार्क की समस्याएं-

  • सार्क की सफलता में सदैव भारत-पाक के कटु सम्बन्ध रुकावट पैदा करते हैं।
  • सार्क के सदस्य देश भारत जैसे बड़े देश पर पूर्ण विश्वास नहीं कर पा रहे हैं।
  • सार्क के अधिकांश देशों में आन्तरिक अशान्ति एवं अस्थिरता इसके मार्ग में रुकावट है।
  • सार्क देशों में अधिक मात्रा में अनपढ़ता, बेरोज़गारी तथा भुखमरी पाई जाती है, जोकि इसकी सफलता में बाधा पैदा करती है।
  • सार्क के देश एक ही वस्तु के लिए परस्पर प्रतियोगिता करते हैं।
  • सार्क क्षेत्र में महाशक्तियों की राजनीति के कारण विकास की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
  • सार्क की एक महत्त्वपूर्ण समस्या आतंकवाद है।
  • सार्क देशों के बीच अर्तक्षेत्रीय व्यापार बहुत कम है।
  • सार्क देशों में प्रशासनिक बाधाएं बहुत अधिक पाई जाती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
सार्क से आपका क्या अभिप्राय है? इसके मुख्य उद्देश्यों के बारे में संक्षेप में लिखिए। (P.B. 2010)
अथवा
सार्क के मुख्य उद्देश्य लिखो।
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1-2 अगस्त, 1983 को सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली की बैठक में की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन 7-8 दिसम्बर, 1985 को ढाका में हुआ। इस प्रकार औपचारिक रूप से सार्क की स्थापना हुई। दक्षेस के सदस्य हैं-भारत, मालदीव, पाकिस्तान, बंगला देश, श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान और नेपाल । दक्षेस के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं
(1) दक्षिण एशिया के राज्यों में सहयोग बढ़े और एक-दूसरे के विकास में सकारात्मक सहायता प्रदान करें। (2) दक्षेस के राज्य अपनी आपसी समस्याओं का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग से करें। (3) क्षेत्र की अधिक-से-अधिक सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति करना। (4) दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्म-विश्वास पैदा करना।

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प्रश्न 2.
दक्षेस (SAARC) का क्या अर्थ है ? इसके महत्त्व का वर्णन करें।
अथवा
सार्क (SAARC) की महत्ता लिखें।
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना अगस्त, 1983 में सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली में बैठक की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन दिसम्बर, 1985 में ढाका (बंगला देश) में हुआ। इस प्रकार 1985 में सार्क की औपचारिक स्थापना हो गई। सार्क का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया के राष्ट्रों की समस्याओं को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाना है और इन राष्ट्रों में राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में विकास करना है।
महत्त्व-(1) सार्क के कारण दक्षिण एशिया के देश एक-दूसरे के समीप आए हैं और कुछ सामान्य समस्याओं को हल करने में सार्क सफल रहा है।
(2) क्षेत्र के बाहर के देशों का हस्तक्षेप काफ़ी कम हो गया है।

प्रश्न 3.
सार्क (SAARC) के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं ?
उत्तर-
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे। दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्वि-पक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता व राजनीतिक स्वतन्त्रता का सम्मान करता है और किसी दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सार्क एक राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इसका उद्देश्य आपसी सहयोग द्वारा विकास करना है। इसके लिए सदस्य देश आपसी सहयोग को प्राथमिकता देंगे।

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प्रश्न 4.
‘साप्टा’ पर संक्षेप टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
‘साप्टा’ का उद्देश्य सार्क देशों के मध्य व्यापारिक सहयोग को बढ़ाकर एक ‘दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र’ (साप्टा) की स्थापना करना है। मुक्त व्यापार क्षेत्र से अभिप्राय सदस्य देशों के बीच ऐसे व्यापार से है जो कस्टम और प्रशुल्क के प्रतिबन्धों से मुक्त हो अर्थात् ऐसा क्षेत्र जिसमें वस्तुओं का स्वतन्त्र आवागमन हो। ‘साफ्टा’ की स्थापना इसी उद्देश्य के लिए की गई थी। यह भी आशा की गई थी कि 21वीं शताब्दी के शुरू होने से पहले ‘साप्टा’ का स्थान साफ्टा ले लेगा। सार्क के 10वें शिखर सम्मेलन (ढाका) में यह निर्णय लिया गया कि साफ्टा’ के सम्बन्ध में एक विशेषज्ञ समिति की स्थापना की जाए जो 2001 की एक सन्धि तक पहुंचने के लिए अपना निष्कर्ष दे। जनवरी, 2004 में इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में हुए 12वें सार्क शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (साप्टा) समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता ‘दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था’ (साप्टा) का स्थान लेगा। इस समझौते के लागू होने से यह आशा की जा सकती है कि इससे दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

प्रश्न 5.
‘सार्क’ से आपका क्या अभिप्राय है ? इसके मुख्य उद्देश्यों के बारे में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर-
‘सार्क’ का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें। सार्क के उद्देश्य(1) सार्क के सामने सबसे बड़ी समस्या इस क्षेत्र में पायी जाने वाली राजनीतिक असिथरता है। (2) वर्तमान समय में सार्क के सामने दूसरी सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद है। (3) सार्क के सामने एक अन्य समस्या इस क्षेत्र में पाए जाने वाली निर्धरता एवं बेरोज़गारी है।

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प्रश्न 6.
‘सार्क’ की कोई चार उपलब्धियां लिखिए।
उत्तर-

  • सार्क ने इस क्षेत्र में शान्ति की सम्भावनाएं पैदा की हैं।
  • सार्क के माध्यम से कई क्षेत्रों में सहयोग के विकास का प्रयास किया गया है।
  • सार्क देशों ने खाद्यान्नों की सुरक्षा के लिए भण्डार बनाया है।
  • सार्क के कारण दक्षिण एशिया के देश परस्पर समीप आए हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
सार्क से आपका क्या भाव है ?
उत्तर-
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1-2 अगस्त, 1983 को सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली की बैठक में की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन 78 दिसम्बर, 1985 को ढाका में हुआ। इस प्रकार औपचारिक रूप से सार्क की स्थापना हुई। दक्षेस के सदस्य हैंभारत, मालदीव, पाकिस्तान, बंगला देश, श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान और नेपाल।

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प्रश्न 2.
सार्क के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर-

  • दक्षिण एशिया के राज्यों में सहयोग बढ़े और एक-दूसरे के विकास में सकारात्मक सहायता प्रदान करें।
  • दक्षेस के राज्य अपनी आपसी समस्याओं का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग से करें।

प्रश्न 3.
सार्क (SAARC) का पूरा नाम लिखें।
उत्तर-
सार्क (SAARC)-दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (South Asian Association for Regional Co-operation)।

प्रश्न 4.
सार्क (SAARC) के कोई चार देशों के नाम बताएं।
उत्तर-
सार्क (SAARC) के चार देश हैं-(1) भारत (2) बांग्लादेश (3) श्रीलंका (4) भूटान।

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प्रश्न 5.
‘सार्क’ की कोई दो उपलब्धियां लिखिए।
उत्तर-

  • सार्क ने इस क्षेत्र में शान्ति की सम्भावनाएं पैदा की हैं।
  • सार्क के माध्यम से कई क्षेत्रों में सहयोग के विकास का प्रयास किया गया है। .

वस्तुनिष्ठ प्रश्न-

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.
दक्षेस (सार्क) का अर्थ लिखें।
उत्तर-
दक्षेस (सार्क) अर्थात् ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक संगठन है, जिसकी स्थापना इन देशों ने आपसी सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से की है।

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प्रश्न 2.
सार्क की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर-
सन् 1985 में।

प्रश्न 3.
सार्क के किसी एक सदस्य देश का नाम लिखें।
उत्तर-
भारत सार्क का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य देश है।

प्रश्न 4.
दक्षेस (SAARC) का कार्यालय कहाँ स्थापित किया गया है ?
उत्तर-
दक्षेस (SAARC) का कार्यालय नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में स्थापित किया गया है।

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प्रश्न 5.
सार्क का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर-
सार्क (SAARC)–दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (South Asian Association for Regional Co-operation)।

प्रश्न 6.
साफ्टा (SAFTA) का पूर्ण रूप लिखिए।
उत्तर-
दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (South Asian Free Trade Area)।

प्रश्न 7.
सार्क देशों में कौन-सा देश है, जिसकी सीमाएं सभी सार्क देशों के साथ लगती हैं ?
उत्तर-
भारत की सीमाएं सभी स्पर्क देशों के साथ लगती हैं।

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प्रश्न 8.
सार्क के अब तक कितने सम्मेलन हो चुके हैं ?
उत्तर-
सार्क के अब तक 18-शिखर सम्मेलन हो चुके हैं।

प्रश्न 9.
‘सार्क’ में शामिल देशों के नाम लिखो।
उत्तर-
सार्क में भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, मालद्वीप तथा अफ़गानिस्तान शामिल हैं।

प्रश्न 10.
अफ़गानिस्तान सार्क का सदस्य कब बना था?
उत्तर-
अफ़गानिस्तान को अप्रैल 2007 में भारत में हुए 14वें सार्क शिखर सम्मेलन में सार्क का सदस्य बनाया गया।

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प्रश्न 11.
वर्तमान समय में सार्क के कितने देश सदस्य हैं ?
उत्तर-
वर्तमान समय में सार्क के 8 सदस्य हैं।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. दक्षिण एशिया के सहयोग संगठन को …….. कहते हैं।
2. 70 के दशक में बांग्ला देश के दिवंगत राष्ट्रपति ……….. ने सार्क का विचार दिया।
3. 1-2 अगस्त ……. को दक्षिण एशिया के सात देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक दिल्ली में हुई।
4. सार्क की औपचारिक रूप से स्थापना सन् …….. में हुई।
उत्तर-

  1. सार्क
  2. जिआउर्रहमान
  3. 1983
  4. 1985.

प्रश्न III. निम्नलिखित वाक्यों में से सही या ग़लत का चुनाव करें

1. सार्क एक राष्ट्रीय संगठन है।
2. सार्क दक्षिण एशियाई देशों का संगठन है।
3. सार्क की स्थापना 1990 में की गई ।
4. सार्क का पहला सम्मेलन ढाका में हुआ।
उत्तर-

  1. ग़लत
  2. सही
  3. ग़लत
  4. सही।

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प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सार्क का उद्देश्य है
(क) दक्षिण एशियाई देशों में सहयोग बढ़े
(ख) दक्षेस के राज्य समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण ढंग से करें
(ग) दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्मविश्वास पैदा करना
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
सार्क है एक
(क) सर्वव्यापक (संस्था) संगठन
(ख) क्षेत्रीय संगठन
(ग) विश्व संगठन
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन।
उत्तर-
(ख) क्षेत्रीय संगठन

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प्रश्न 3.
सार्क ने ग़रीबी उन्मूलन वर्ष किस वर्ष मनाने का निर्णय किया ?
(क) 1990
(ख) 1995
(ग) 2000
(घ) 2005.
उत्तर-
(ख) 1995

प्रश्न 4.
साप्टा (SAPTA) का अर्थ है
(क) दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था
(ख) दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र
(ग) दक्षिण एशियाई हिंसा क्षेत्र
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(क) दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्य

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 4 प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मिट्टियां

Punjab State Board PSEB 10th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 4 प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मिट्टियां Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 10 Social Science Geography Chapter 4 प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मिट्टियां

SST Guide for Class 10 PSEB प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मिट्टियां Textbook Questions and Answers

I. नीचे दिये गये प्रत्येक प्रश्न का एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दीजिए

(अ) प्राकृतिक वनस्पति

प्रश्न 1.
देश में मौजूद विदेशी वनस्पति जातियों के नाम व मात्रा बताइए।
उत्तर-

  1. देश में मौजूद विदेशी वनस्पति जातियों को बोरिअल (Boreal) और पेलियो-उष्ण खण्डीय (PaleoTropical) के नाम से पुकारते हैं।
  2. भारत की वनस्पति में विदेशी वनस्पति की मात्रा 40% है।

प्रश्न 2.
‘बंगाल का डर’ किस वनस्पति को कहा जाता है?
उत्तर-
जल हायसिंथ (Water-Hyacinth) नामक पौधे को ‘बंगाल का डर’ (Terror of Bengal) कहा जाता है।

प्रश्न 3.
देश में वन भूमि का प्रतिशत कितना है।
उत्तर-
हमारे देश के कुल वन क्षेत्र का 57% भाग प्रायद्वीपीय पठार और इसके साथ लगी पर्वत श्रृंखलाओं में फैला

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प्रश्न 4.
देश के सबसे कम और सबसे अधिक वन क्षेत्रफल वाले राज्यों का नाम बताओ।
उत्तर-
भारत में सबसे कम वन क्षेत्रफल पंजाब में और सबसे अधिक वन क्षेत्रफल त्रिपुरा में है।

प्रश्न 5.
राज्य वन (State Forests) किसको कहते हैं?
उत्तर-
राज्य वन (State Forests) वे वन हैं जिन पर किसी राज्य सरकार का एकाधिकार होता है।

प्रश्न 6.
उष्ण सदाबहार वनस्पति के वृक्षों के नाम बताओ।
उत्तर-
उष्ण सदाबहार वनस्पति क्षेत्र में पाये जाने वाले वृक्षों में महोगनी, बांस, रबड़, आम, मैचीलश और कदम्ब आदि मुख्य हैं।

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प्रश्न 7.
अर्द्ध-शुष्क पतझड़ी वनस्पति का विनाश कौन-कौन से तत्त्व करते हैं?
उत्तर-
अर्द्ध-शुष्क पतझड़ी वनस्पति के विनाश का मुख्य कारण कृषि क्षेत्र का विस्तार है।

प्रश्न 8.
शुष्क क्षेत्रों में मिलने वाली वनस्पति के नाम बताओ।
उत्तर-
(i) शुष्क क्षेत्रों में मिलने वाली वनस्पति में मुख्यत: कीकर, बबूल, जण्ड, तमारिक्श, रामबांस, बेर, नीम, कैक्टस और मंजु घास आदि शामिल है।

प्रश्न 9.
ज्वारीय वनस्पति को दूसरे किस नाम से पुकारा जाता है?
उत्तर-
ज्वारीय वनस्पति को मैंग्रोव, दलदली (Swamps), समुद्री किनारे वाली अथवा सुन्दर-वन (Sundervan) जैसे नामों से भी पुकारा जाता है।

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प्रश्न 10.
पूर्वी हिमालय क्षेत्र में 2500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मिलने वाले वृक्षों के नाम बताओ।
उत्तर-
पूर्वी हिमालय क्षेत्र में 2500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर मिलने वाले वृक्षों में मुख्यतः सिलवर फर, पाईन, स्पूस, देवदार, नीला पाईन आदि शामिल हैं।

प्रश्न 11.
दक्षिणी पठार में पर्वतीय वनस्पति किन स्थानों पर पैदा होती है ?
उत्तर-
दक्षिणी पठार में पर्वतीय वनस्पति बस्तर, पंचमढ़ी, महाबलेश्वर, नीलगिरि, पलनी शिवराय और अन्नामलाई के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।

प्रश्न 12.
किन-किन वनस्पतियों से हमें औषधियां प्राप्त होती हैं?
उत्तर-
खैर, सिनकोना, नीम, सृपगम्पा झाड़ी, बहेड़ा, आंवला आदि वनस्पतियों से हमें औषधियां प्राप्त होती हैं।

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प्रश्न 13.
चमड़ा रंगने के लिए किन-किन वृक्षों से सामग्री प्राप्त की जाती है?
उत्तर-
चमड़ा रंगने के लिए मैंग्रोव कंच, गैम्बीअर, हरड़, बहेड़ा, आंवला और कीकर के वृक्षों से सामग्री प्राप्त की जाती है।

(आ) जीव-जन्तु

प्रश्न 1.
जीव-जन्तु कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर-
जीव-जन्तु हज़ारों प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 2.
हाथी किस तरह के क्षेत्र में रहना पसन्द करता है?
उत्तर-
हाथी अधिक वर्षा और घने जंगल वाले क्षेत्र में रहना पसन्द करता है।

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प्रश्न 3.
भारत में हिरणों की कौन-कौन सी किस्में पाई जाती हैं?
उत्तर-
भारत में पाई जाने वाली हिरणों की जातियों में चौसिंघा, काला हिरण, चिंकारा तथा सामान्य हिरण प्रमुख हैं।

प्रश्न 4.
देश में शेर किन स्थानों पर मिलते हैं?
उत्तर-
भारतीय शेर का प्राकृतिक निवास स्थान गुजरात में सौराष्ट्र के गिर वन हैं।

प्रश्न 5.
हिमालय में मिलने वाले जीवों के नाम बताओ।
उत्तर-
हिमालय में जंगली भेड़, पहाड़ी बकरी, साकिन (एक लम्बे सींग वाली जंगली बकरी) तथा टैपीर आदि जीव-जन्तु पाये जाते हैं, जबकि उच्च पहाड़ी क्षेत्रों में पांडा तथा हिमतेंदुआ नामक जन्तु मिलते हैं।

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प्रश्न 6.
हमारे देश के राष्ट्रीय पशु व पक्षी का नाम बताओ।
उत्तर-
हमारे देश का राष्ट्रीय पशु बाघ और राष्ट्रीय पक्षी मोर है।

प्रश्न 7.
देश में किन जीवों के समाप्त हो जाने का डर है?
उत्तर-
भारत में बाघ, गैंडा, सोहन चिड़िया, सिंह आदि जीवों के विलुप्त होने का डर है।

(इ) मिट्टी

प्रश्न 1.
मिट्टी की परिभाषा बताइए।
उत्तर-
पृथ्वी के धरातल पर पाये जाने वाले हल्के, ढीले तथा असंगठित चट्टानी चूरे (शैल चूर्ण) तथा बारीक जीवांश के संयुक्त मिश्रण को मिट्टी अथवा मृदा कहा जाता है।

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प्रश्न 2.
मिट्टी कैसे बनती है?
उत्तर-
मिट्टी मौसमी क्रियाओं द्वारा चट्टानों की तोड़-फोड़ से बनती है।

प्रश्न 3.
मिट्टी के मूल तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर-
मिट्टी के मूल तत्त्व हैं-

  1. प्रारम्भिक चट्टान,
  2. जलवायु,
  3. क्षेत्रीय ढलान,
  4. प्राकृतिक वनस्पति और
  5. अवधि।

प्रश्न 4.
काली मिट्टी में कौन-कौन से रासायनिक तत्त्व पाये जाते हैं?
उत्तर-
काली मिट्टी में मुख्य रूप से लोहा, पोटाश, एल्यूमीनियम, चूना तथा मैग्नीशियम आदि तत्त्व पाये जाते हैं।

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प्रश्न 5.
लैटराइट मिट्टी देश के किन भागों में मिलती है?
उत्तर-
लैटराइट मिट्टी विन्ध्याचल, सतपुड़ा के साथ लगे मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल की बेसाल्टिक पर्वत चोटियां, दक्षिणी महाराष्ट्र, कर्नाटक की पश्चिमी घाट की पहाड़ियां, केरल में मालाबार तथा शिलांग के पठार के उत्तर एवं पूर्वी भाग में पाई जाती हैं।

प्रश्न 6.
‘भूड़’ मिट्टी कहां पाई जाती है?
उत्तर-
पंजाब तथा हरियाणा के सीमावर्ती जिलों में।

प्रश्न 7.
खारी या नमकीन मिट्टी देश के किन भागों में मिलती है?
उत्तर-
खारी मिट्टी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा तथा पंजाब के दक्षिणी भागों में छोटे-छोटे टुकड़ों में मिलती है।

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प्रश्न 8.
चाय उत्पादन के लिए उपयुक्त मिट्टी देश के किन भागों में मिलती है?
उत्तर-
चाय उत्पादन के लिए उपयुक्त मिट्टी असम, हिमाचल प्रदेश (लाहौल-स्पीति, किन्नौर), पश्चिमी बंगाल, उत्तराखण्ड तथा दक्षिण में नीलगिरि के पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है।

प्रश्न 9.
मिट्टी के कटाव से क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
भौतिक तत्वों द्वारा धरातल की ऊपरी परत का हटा दिया जाना मिट्टी का कटाव कहलाता है।

प्रश्न 10.
मरुस्थल को बढ़ने से रोकने के लिए क्या-क्या उपाय किये जाते हैं?
उत्तर-
वृक्षों की कतारें लगाना तथा घास उगाना।

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II. प्रत्येक प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर दीजिए

(अ) प्राकृतिक वनस्पति

प्रश्न 1.
दूसरे देशों से आयी वनस्पति से हमारे देश में किस प्रकार की समस्याएं बन गयी हैं? उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
भारतीय वनस्पति का 40 प्रतिशत भाग विदेशी जातियों का है, जिन्हें बोरिअल तथा पेलियो-उष्ण खण्डीय जातियां कहा जाता है। इनमें से अधिकतर पौधे सजावट के लिए (डैकोरेटिव प्लांट) हैं। हमारे देश में आयी इस विदेशी वनस्पति से निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं —

  1. यहां के गर्म-शुष्क मौसम के कारण देश की नदियों, तालाबों, नहरों आदि में इन पौधों की संख्या इतनी अधिक बढ़ गई है कि इनको फलने-फूलने से रोक पाना असम्भव सा हो गया है।
  2. ये विदेशी पौधे स्थानीय लाभकारी वनस्पति के विकास में रुकावट बन गए हैं। ये उपयोगी भूमि को कम करने तथा खतरनाक रोगों को फैलाने में भी अपना प्रभाव दिखा रहे हैं।
  3. जल हयास्थि (Water-Hyacinth) पौधे के जल-स्रोतों में फैल जाने के कारण इसको ‘बंगाल का डर’ कहा जाता है। इसी प्रकार लेनटाना’ नामक पौधे ने देश के हरे-भरे चरागाहों तथा वनों में तेजी से फैलकर अपना प्रभाव जमा लिया है।
  4. पारथेनियम घास अथवा कांग्रेसी घास ने भी तेजी से देश के अन्दर फैलकर लोगों में सांस तथा त्वचा के रोगों में भारी मात्रा में वृद्धि की है।
  5. खाद्यान्नों की कमी के दौरान आयात किये गये गेहूँ के दानों के साथ आए अवांछनीय बीज भी तेजी से फैले हैं। इन्हें समाप्त करने के लिए विदेशी दवाइयों पर काफ़ी धन व्यय होता है।

प्रश्न 2.
विदेशी पौधों से हमें क्या नुक्सान हो सकते हैं?
उत्तर-
विदेशी पौधों से हमें निम्नलिखित हानियां हो सकती हैं —

  1. हमारी स्थानीय लाभकारी वनस्पति नष्ट हो सकती है।
  2. विदेशी वनस्पति को नष्ट करने में हमारा बहुत-सा धन व्यय होगा।
  3. विदेशी वनस्पति से सांस तथा त्वचा सम्बन्धी खतरनाक रोग फैल सकते हैं।
  4. हमारे जल-भण्डार विदेशी वनस्पति से प्रदूषित हो सकते हैं।
  5. हमारी उपयोगी भूमि कम हो सकती है, चरागाहों में कमी आ सकती हैं तथा वन्य क्षेत्र नष्ट हो सकते हैं।

प्रश्न 3.
हमारी प्राकृतिक वनस्पति का असल में प्राकृतिक न रहने के क्या कारण हैं?
उत्तर-
हमारी प्राकृतिक वनस्पति वास्तव में प्राकृतिक नहीं रही। यह केवल देश के कुछ ही भागों में दिखाई पड़ती है। अन्य भागों में इसका बहुत बड़ा भाग या तो नष्ट हो गया है या फिर नष्ट हो रहा है। इसके निम्नलिखित कारण हैं —

  1. तेजी से बढ़ती हुई हमारी जनसंख्या
  2. परम्परागत कृषि विकास की प्रथा
  3. चरागाहों का विनाश या अति चराई
  4. ईंधन व इमारती लकड़ी के लिए वनों का अन्धाधुन्ध कटाव
  5. विदेशी पौधों में बढ़ती हुई संख्या।

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प्रश्न 4.
पतझड़ या मानसूनी वनस्पति पर संक्षेप में टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
वह वनस्पति जो ग्रीष्म ऋतु के शुरू होने से पहले अधिक वाष्पीकरण को रोकने के लिए अपने पत्ते गिरा देती है, पतझड़ या मानसून की वनस्पति कहलाती है। इस वनस्पति को वर्षा के आधार पर आई व आर्द्र-शुष्क दो उपभागों में बाँटा जा सकता है।

  1. आर्द्र पतझड़ वन-इस तरह की वनस्पति उन चार बड़े क्षेत्रों में पाई जाती है, जहाँ पर वार्षिक वर्षा 100 से 200 सें. मी. तक होती है।
    इन क्षेत्रों में पेड़ कम सघन होते हैं परन्तु इनकी ऊँचाई 30 मीटर तक पहुंच जाती है। साल, शीशम, सागौन, टीक, चन्दन, जामुन, अमलतास, हलदू, महुआ, शारबू, ऐबोनी, शहतूत इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं।
  2. शुष्क पतझड़ी वनस्पति-इस प्रकार की वनस्पति 50 से 100 सें. मी० से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है।
    इसकी लम्बी पट्टी पंजाब से आरम्भ होकर दक्षिण के पठार के मध्यवर्ती भाग के आस-पास के क्षेत्रों तक फैली हुई है। कीकर, बबूल, बरगद, हलदू यहां के मुख्य वृक्ष हैं।

प्रश्न 5.
पूर्वी हिमालय में किस प्रकार की वनस्पति मिलती है?
उत्तर-
पूर्वी हिमालय में 4000 किस्म के फूल और 250 किस्म की फर्न मिलती है। यहां की वनस्पति पर ऊँचाई के बढ़ने से तापमान और वर्षा में आए अन्तर का गहरा प्रभाव पड़ता है।

  1. यहां 1200 मीटर की ऊँचाई तक पतझड़ी वनस्पति के मिश्रित वृक्ष अधिक मिलते हैं।
  2. यहां 1200 से लेकर 2000 मीटर की ऊँचाई तक घने सदाबहार वन मिलते हैं। साल और मैंगनोलिया इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं। इनमें दालचीनी, अमूरा, चिनोली तथा दिलेनीआ के वृक्ष भी मिलते हैं।
  3. यहां पर 2000 से 2500 मीटर की ऊँचाई तक तापमान कम हो जाने के कारण शीतोष्ण प्रकार (Temperate type) की वनस्पति पाई जाती है। इसमें ओक, चेस्टनट, लॉरेल, बर्च, मैपल तथा ओलढर जैसे चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष मिलते हैं।
  4. इस क्षेत्र में 2500 से लेकर 3500 मीटर तक तीखे पत्ते वाले कोणधारी तथा शंकुधारी वृक्ष दिखाई देते हैं। इनमें सिलवर फर, पाईन, स्यूस, देवदार, रोडोढेन्ढरोन, नीला पाईन जैसे कम ऊँचाई वाले वृक्ष पाए जाते हैं।
  5. यहां इससे अधिक ऊँचाई पर छोटी-छोटी प्राकृतिक घास तथा फूल आदि के पौधे ही उगते हैं।

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प्रश्न 6.
प्राकृतिक वनस्पति किस प्रकार उद्योगों के लिए जीवन दान का कार्य करती है?
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति अनेक प्रकार से उद्योगों का आधार है। वनों पर आधारित कुछ महत्त्वपूर्ण उद्योग निम्नलिखित हैं —

  1. दियासलाई उद्योग-वनों से प्राप्त नर्म प्रकार की लकड़ी दियासलाई बनाने के काम आती है।
  2. लाख उद्योग-लाख एक प्रकार के कीड़े से प्राप्त होती है। इसे रिकार्ड, बूट पॉलिश, बिजली का सामान आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है।
  3. कागज़ उद्योग-कागज़ उद्योग में बांस, सफेदा तथा कई प्रकार की घास प्रयोग की जाती है। बांस तराई प्रदेश में बहुत अधिक मिलता है।
  4. वार्निश तथा रंग-वार्निश तथा रंग गन्दे बिरोजे से तैयार होते हैं जो वनों से प्राप्त होता है।
  5. औषधि-निर्माण-वनों से प्राप्त कुछ वृक्षों से उपयोगी औषधियां भी बनाई जाती हैं। उदाहरण के लिए सिनकोना से कुनीन बनती है।
  6. अन्य उद्योग-वनों पर पैंसिल, डिब्बे बनाना, रबड़, तारपीन, चन्दन का तेल, फ़र्नीचर तथा खेलों का सामान बनाने के उद्योग भी आधारित हैं।

प्रश्न 7.
प्राकृतिक वनस्पति के अन्धाधुन्ध कटाव से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है। परंतु पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक वनस्पति की अन्धाधुन्ध कटाई की गई है। इस कटाई से हमें निम्नलिखित हानियां हुई हैं —

  1. प्राकृतिक वनस्पति की कटाई से वातावरण का सन्तुलन बिगड़ गया है।
  2. पहाड़ी ढलानों और मैदानी क्षेत्रों के वनस्पति विहीन होने के कारण बाढ़ व मृदा अपरदन की समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं।
  3. पंजाब के उत्तरी भागों में शिवालिक पर्वतमालाओं के निचले भाग में बहने वाले बरसाती नालों के क्षेत्रों में वनकटाव से भूमि कटाव की समस्या के कारण बंजर जमीन में वृद्धि हुई है।
  4. मैदानी क्षेत्रों का जल-स्तर भी प्रभावित हुआ है जिससे कृषि को सिंचाई की समस्या से जूझना पड़ रहा है।

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(आ) जीव-जन्तु

प्रश्न 1.
देश में जीव-जन्तुओं की देख-रेख के लिए कौन-कौन से कार्य किये जा रहे हैं?
उत्तर-

  1. 1972 में भारतीय वन्य जीवन सुरक्षा अधिनियम बनाया गया। इसके अन्तर्गत देश के विभिन्न भागों में 1,50,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र (देश का 2.7 प्रतिशत तथा कुल वन क्षेत्र का 12 प्रतिशत भाग) को राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य प्राणी अभ्यारण्य घोषित कर दिया गया।
  2. संकटापन्न (Near Extinction) वन्य जीवों पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा है।
  3. पशु-पक्षियों की गणना का कार्य राष्ट्रीय स्तर पर आरम्भ किया गया है।
  4. देश के विभिन्न भागों में इस समय बाघों के 16 आरक्षित क्षेत्र हैं।
  5. असम में गैंडे के संरक्षण की एक विशेष योजना चलायी जा रही है।
    सच तो यह है कि देश में अब तक 18 जीव आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves) स्थापित किये जा चुके हैं। योजना के अधीन सबसे पहला जीव आरक्षण क्षेत्र नीलगिरि में बनाया गया था। इस योजना के अन्तर्गत प्रत्येक जन्तु का – संरक्षण अनिवार्य है। यह प्राकृतिक धरोहर (Natural heritage) भावी पीढ़ियों के लिए है।

(इ) मिट्टियां

प्रश्न 1.
मिट्टियों के जन्म में प्राथमिक चट्टानों का क्या योगदान है?
उत्तर-
देश में प्राथमिक चट्टानों में उत्तरी मैदानों की तहदार चट्टाने अथवा पठारी भाग की लावा निर्मित चट्टानें आती हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के खनिज होते हैं। इसलिए इनसे अच्छी किस्म की मिट्टी बनती है। प्राथमिक चट्टानों से बनने वाली मिट्टी का रंग, गठन, बनावट आदि इस बात पर निर्भर करता है कि चट्टानें कितने समय से तथा किस तरह की जलवायु द्वारा प्रभावित हो रही हैं। पश्चिमी बंगाल जैसे प्रदेश में, जलवायु में रासायनिक क्रियाओं के प्रभाव तथा ह्यूमस के कारण मृदा अति विकसित होती है। परन्तु राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्र में वनस्पति के अभाव के कारण मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। इसी तरह अधिक वर्षा तथा तेज़ पवनों वाले क्षेत्र में मिट्टी का कटाव अधिक होता है। परिणामस्वरूप उपजाऊपन कम हो जाता है।

प्रश्न 2.
मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने के लिए क्या उपाय करने चाहिएं?
उत्तर-
मिट्टी बहुमूल्य संसाधन है। इसके संरक्षण तथा उपजाऊपन को बनाये रखने के लिए आज हमारी सबकी नैतिक ज़िम्मेदारी है।

  1. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात में पवनों की गति को कम करने के लिए वृक्षों की कतारें लगाई जानी चाहिएं। साथ ही रेतीले टीलों पर घास उगाई जानी चाहिये।
  2. पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत, ढाल के विपरीत दिशा में मेड़ें (Contour Bending) बनानी तथा छोटे-छोटे जल भण्डार बनाये जाने चाहिये।
  3. मैदानी भागों में भूमि पर वनस्पति उगानी चाहिये।
  4. इसके अतिरिक्त, फसल-चक्र, ढाल के विपरीत खेतों को जोतना तथा गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिये। इससे मिट्टी के उपजाऊपन में वृद्धि की जा सकती है।

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प्रश्न 3.
पीट तथा दलदली मिट्टी पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
पीट तथा दलदली मिट्टी केवल 1500 वर्ग कि० मी० के क्षेत्र में मिलती है। इसका विस्तार सुन्दरवन डेल्टा, उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र, तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तटवर्ती भाग, मध्यवर्ती बिहार तथा उत्तराखंड के अल्मोड़ा में है। जैविक पदार्थों की अधिकता के कारण इसका रंग काला तथा स्वभाव तेजाबी होता है। इस रंग के कारण इसे केरल में ‘काली मिट्टी’ (Black Soil) के नाम से भी जाना जाता है। जैविक पदार्थों की अधिकता के कारण यह नीले रंग वाली मिट्टी भी बन जाती है।

प्रश्न 4.
मिट्टी का कटाव कितने प्रकार का होता है?
उत्तर-
धरातल के ऊपर मिलने वाली मिट्टी की सतह का भौतिक व गैर-भौतिक तत्त्वों द्वारा टूटना अथवा हटना मिट्टी का कटाव कहलाता है। यह कटाव तीन प्रकार का हो सकता है —

  1. सतहदार कटाव-इस तरह के कटाव में पवनों के तथा नदी जल के लम्बे समय तक बहने के बाद धरातल की ऊपरी सतह बह जाती है या उड़ाकर ले जाती है।
  2. नालीदार कटाव-मूसलाधार वर्षा के समय अधिक जल कम चौड़ाई वाली नालियों में बहने लगता है। इससे धरातल पर लम्बी-लम्बी खाइयां व खड्डे बन जाते हैं। इन्हें नालीदार कटाव कहते हैं।
  3. खड्डेदार कटाव-पवनें तथा जल धरातल के विशिष्ट स्थानों पर मिट्टी के उड़ने या धुलने के पश्चात् गहरे खड्डे बना देते हैं। धीरे-धीरे ये खड्डे बहुत बड़े हो जाते हैं।

प्रश्न 5.
मिट्टी कटाव के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
मिट्टी का कटाव मुख्य रूप से दो कारणों से होता है-भौतिक क्रियाओं द्वारा तथा मानव क्रियाओं द्वारा। आज के समय में मानव क्रियाओं से मिट्टियों के कटाव की प्रक्रिया बढ़ती जा रही है।
भौतिक तत्त्वों में उच्च तापमान, बर्फीले तूफान, तेज़ हवाएं, मूसलाधार वर्षा तथा तीव्र ढलानों की गणना होती है। ये मिट्टियों के कटाव के प्रमुख कारक हैं। मानवीय क्रियाओं में जंगलों की कटाई, पशुओं की बेरोकटोक चराई, स्थानांतरी कृषि की दोषपूर्ण पद्धति, खानों की खुदाई आदि तत्त्व आते हैं।

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III. निम्नलिखित का उत्तर दीजिए

प्रश्न 1.
भारतीय वनस्पति के वर्गीकरण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
भारतीय वनस्पति का कई आधारों पर वर्गीकरण किया जा सकता है। इनमें मुख्य आधार निम्नलिखित हैं —

  1. पहुंच के आधार पर इस दृष्टि से वन दो प्रकार के हैं-दुर्गम वन तथा अगम्य वम। देश में 18% वन क्षेत्र ऐसे हैं जोकि हिमालय की ऊंची ढलानों पर स्थित हैं। इस कारण यह मानव पहुंच से बाहर हैं अर्थात् अगम्य है। हम केवल 82% वन क्षेत्र का ही प्रयोग कर पाते हैं।
  2. पत्तियों के आधार पर-देश में कुल उपलब्ध वनों के 5% क्षेत्र केवल नुकीली पत्तियों वाले हैं। ये बहुमूल्य शंकुधारी वन हिमालय की ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर स्थित होने के कारण लगभग अछूते ही रह जाते हैं। इसके विपरीत हम चौड़े पत्ती वाले साल व टीक जैसे 95% वनों का प्रयोग कर सकते हैं।
  3. प्रशासनिक अथवा प्रबन्ध के आधार पर वनों के प्रबन्धन को ध्यान में रखते हुए इन्हें तीन भागों में विभाजित किया गया है। इसके अनुसार 95% (717 लाख हेक्टेयर) वन क्षेत्र राज्य के अधीन हैं। इन पर राज्य सरकार का एकाधिकार होता है। दूसरे प्रकार के वन स्थानीय नगरपालिका अथवा जिला परिषद् की देख-रेख के अधीन होते हैं। ये सामूहिक वन भी कहलाते हैं। शेष वन क्षेत्र लोगों के निजी अधिकार (Private Forest) में आता है।
  4. वन कानून के आधार पर-वनों के कानूनी नियंत्रण तथा सुरक्षा की दृष्टि से वनों को तीन वर्गों में बांटा जाता है-सुरक्षित वन, संरक्षित वन तथा अवर्गीकृत वन। सुरक्षित वनों में 52% वन क्षेत्र आता है। इन्हें देश में भूमि कटाव को रोकने, वातावरण की सम्भाल तथा लकड़ी की पूर्ति के लिए सुरक्षित रखा गया है। इन वनों में पशुओं को चराना तथा लकड़ी काटना मना है। दूसरे 32% (233 लाख हेक्टेयर) वन संरक्षित वन क्षेत्र हैं। सरकारी कानून के अनुसार
    इन्हें नष्ट नहीं किया जा सकता। परन्तु यहां पर पशु चराना, लकड़ी काटना आदि सुविधाएं मिल जाती हैं। अवर्गीकृत वन 16% हैं। इनमें भी लोगों को सुविधाएं प्राप्त हैं।
  5. भौगोलिक तत्त्वों के आधार पर-भौगोलिक तत्त्वों के आधार पर देश की प्राकृतिक वनस्पति को निम्नलिखित खण्डों में विभाजित किया जा सकता है —
    1. उष्ण सदाबहार वनस्पति
    2. पतझड़ या मानसूनी वनस्पति
    3. शुष्क वनस्पति
    4. ज्वारीय या मैंग्रोव वनस्पति
    5. पर्वतीय वनस्पति।

प्रश्न 2.
देश में भौगोलिक तत्त्वों के आधार पर प्राकृतिक वनस्पति का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर-
भौगोलिक तत्त्वों के आधार पर भारत की वनस्पति को निम्नलिखित पाँच भागों में बांटा जा सकता है —

  1. उष्ण सदाबहार वन-इस प्रकार के वन मुख्य रूप से अधिक वर्षा (200 सें० मी० से अधिक) वाले भागों में मिलते हैं। इसलिए इन्हें बरसाती वन भी कहते हैं। ये वन अधिकतर पूर्वी हिमालय के तराई प्रदेश, पश्चिमी घाट, पश्चिमी अण्डमान, असम, बंगाल तथा उड़ीसा के कुछ भागों में पाए जाते हैं। इन वनों में पाए जाने वाले मुख्य वृक्ष महोगनी, ताड़, बांस, बैंत, रबड़, चपलांस, मैचीलश तथा कदम्ब हैं। .
  2. पतझड़ी अथवा मानसूनी वन-पतझड़ी या मानसूनी वन भारत के उन प्रदेशों में मिलते हैं जहां 100 से 200 सें. मी. तक वार्षिक वर्षा होती है। भारत में ये मुख्य रूप से हिमालय के निचले भाग, छोटा नागपुर, गंगा की घाटी, पश्चिमी घाट की पूर्वी ढलानों तथा तमिलनाडु क्षेत्र में पाए जाते हैं। इन वनों में पाए जाने वाले मुख्य वृक्ष सागवान, साल, शीशम, आम, चन्दन, महुआ, ऐबोनी, शहतूत तथा सेमल हैं। गर्मियों में ये वृक्ष अपनी पत्तियां गिरा देते हैं, इसलिए इन्हें पतझड़ी वन भी कहते हैं।
  3. मरुस्थलीय वन-इस प्रकार के वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां वार्षिक वर्षा का मध्यमान 20 से 60 सें. मी० तक होता है। भारत में ये वन राजस्थान, पश्चिमी हरियाणा, दक्षिण-पश्चिमी पंजाब और गुजरात में पाए जाते हैं। इन वनों में रामबांस, खैर, पीपल और खजूर के वृक्ष प्रमुख हैं।
  4. ज्वारीय वन-ज्वारीय वन नदियों के डेल्टाओं में पाए जाते हैं। यहां की मिट्टी भी उपजाऊ होती है और पानी भी अधिक मात्रा में मिल जाता है। भारत में इस प्रकार के वन महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि के डेल्टाई प्रदेशों में मिलते हैं। यहां की वनस्पति को मैंग्रोव अथवा सुन्दर वन भी कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में ताड़, कैंस, नारियल आदि के वृक्ष भी मिलते हैं।
  5. पर्वतीय वन-इस प्रकार की वनस्पति हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों तथा दक्षिण में नीलगिरि की पहाड़ियों पर पायी जाती है। इस वनस्पति में वर्षा की मात्रा तथा ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ अन्तर आता है। कम ऊंचाई पर सदाबहार वन पाये जाते हैं, तो अधिक ऊंचाई पर केवल घास तथा कुछ फूलदार पौधे ही मिलते हैं।

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प्रश्न 3.
प्राकृतिक बनस्पति के लाभों का वर्णन करो।
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति से हमें कई प्रत्यक्ष तथा परोक्ष लाभ होते हैं। प्रत्यक्ष लाभ-प्राकृतिक वनस्पति से होने वाले प्रत्यक्ष लाभों का वर्णन इस प्रकार है —

  1. वनों से हमें कई प्रकार की लकड़ी प्राप्त होती है। जिसका प्रयोग इमारतें, फ़र्नीचर, लकड़ी-कोयला आदि बनाने में होता है। इसका प्रयोग ईंधन के रूप में भी होता है।
  2. खैर, सिनकोना, कुनीन, बहेड़ा व आंवले से कई प्रकार की औषधियां तैयार की जाती हैं।
  3. मैंग्रोव, कंच, गैम्बीअर, हरड़, बहेड़ा, आंवला और कीकर आदि के पत्ते, छिलके व फलों को सुखाकर चमड़ा रंगने का पदार्थ तैयार किया जाता है।
  4. पलाश व पीपल से लाख, शहतूत से रेशम, चंदन से तुंग व तेल और साल से धूपबत्ती व बिरोजा तैयार किया जाता है।

परोक्ष लाभ-प्राकृतिक वनस्पति से हमें निम्नलिखित परोक्ष लाभ होते हैं

  1. वन जलवायु पर नियन्त्रण रखते हैं। सघन वन गर्मियों में तापमान को बढ़ने से रोकते हैं तथा सर्दियों में तापमान को बढ़ा देते हैं।
  2. सघन वनस्पति की जड़ें बहते हुए पानी की गति को कम करने में सहायता करती हैं। इससे बाढ़ का प्रकोप कम हो जाता है। दूसरे जड़ों द्वारा रोका गया पानी भूमि के अन्दर समा लिए जाने से भूमिगत जल-स्तर (Water-table) ऊंचा उठ जाता है। वहीं दूसरी ओर धरातल पर पानी की मात्रा कम हो जाने से पानी नदियों में आसानी से बहता रहता है।
  3. वृक्षों की जड़ें मिट्टी की जकड़न को मज़बूत किए रहती हैं और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं।
  4. वनस्पति के सूखकर गिरने से जीवांश के रूप में मिट्टी को हरी खाद मिलती है।
  5. हरी-भरी वनस्पति बहुत ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है। इससे आकर्षित होकर लोग सघन वन क्षेत्रों में यात्रा, शिकार तथा मानसिक शान्ति के लिए जाते हैं। कई विदेशी पर्यटक भी वन-क्षेत्रों में बने पर्यटन केन्द्रों पर आते हैं। इससे सरकार को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
  6. सघन वन अनेक उद्योगों के आधार हैं। इनमें से कागज़, लाख, दियासिलाई, रेशम, खेलों का सामान, प्लाईवुड, गोंद, बिरोज़ा आदि उद्योग प्रमुख हैं।

प्रश्न 4.
मिट्टी की बनावट किन-किन तत्त्वों पर निर्भर करती है?
उत्तर-
मिट्टी की बनावट निम्नलिखित तत्त्वों पर निर्भर करती है —

  1. प्रारम्भिक चट्टान-देश के उत्तरी मैदानों की मोड़दार चट्टानें भिन्न-भिन्न खनिजों की बनी होने के कारण अच्छी किस्म की मिट्टी प्रदान करती है। दूसरी ओर देश के पठारी भाग की लावा निर्मित चट्टानें ज़ोनल मिट्टियों को जन्म देती हैं। इनमें कई प्रकार के खनिज पदार्थ मिलते हैं जिसके कारण ये सभी मिट्टियां उपजाऊ होती हैं।
  2. जलवायु-प्राथमिक चट्टानों से बनने वाली मिट्टी का रंग, गठन, बनावट आदि इस बात पर निर्भर करती है कि चट्टानें कितने समय से तथा किस तरह की जलवायु द्वारा प्रभावित हो रही हैं। पश्चिमी बंगाल जैसे प्रदेश में जलवायु, रासायनिक क्रियाओं के प्रभाव व ह्यमस के कारण मृदा बहुत ही विकसित होती है। इसके विपरीत राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्र में वनस्पति के अभाव के कारण मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम होती है। इसी प्रकार अधिक वर्षा व तेज़ पवनों वाले क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव अधिक होने से मिट्टी की ऊपजाऊ शक्ति कम हो जाती है।
  3. ढलान-जलवायु के अलावा क्षेत्रीय ढलान भी मृदा के विकास को प्रभावित करती है। देश के तीव्र ढलान वाले पहाड़ी क्षेत्रों में पानी के तेज बहाव तथा गुरुत्वाकर्षण के कारण मिट्टी खिसकती रहती है। यही कारण है कि पर्वतीय क्षेत्रों की ढलानों की बजाय गंगा, सिन्धु एवं ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों की घाटियों में मिट्टी ज्यादा उपजाऊ होती है।
  4. प्राकृतिक वनस्पति-प्राकृतिक वनस्पति जैविक चूरे की पूर्ति करके मिट्टी का विकास करने वाला मुख्य तत्त्व है। परन्तु हमारे देश की अधिकतर भूमि कृषि के अधीन होने के कारण प्राकृतिक वनस्पति की कमी है। देश के लावे वाली मिट्टियों में व सुरक्षित वन क्षेत्र की मिट्टियों में 5-10% तक जैविक अंश मिलता है।
  5. अवधि-इन सभी तत्त्वों के अतिरिक्त मिट्टी के विकास में अवधि अर्थात् समय का भी अपना महत्त्व होता है। मिट्टियों में प्रत्येक वर्ष ह्यमस व जीवांश प्राप्त हो जाती है तथा लाखों वर्ष निर्विघ्न क्रिया द्वारा ही बढ़िया मिट्टी का निर्माण होता है।

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प्रश्न 5.
भारतीय मिट्टियों की किस्मों एवं विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
भारत में कई प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं। इनके गुणों के आधार पर इन्हें निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है —

  1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)-भारत में जलोढ़ मिट्टी उत्तरी मैदान, राजस्थान, गुजरात तथा दक्षिण के तटीय मैदानों में सामान्य रूप से मिलती है। इसमें रेत, गाद तथा मृत्तिका मिली होती है। जलोढ़ मिट्टी दो प्रकार की होती हैखादर तथा बांगर। जलोढ़ मिट्टियां सामान्यतः सबसे अधिक उपजाऊ होती हैं। इन मिट्टियों में पोटाश, फॉस्फोरस अम्ल तथा चूना पर्याप्त मात्रा में होता है। परन्तु इनमें नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थों की कमी होती है।
  2. काली अथवा रेगड़ मिट्टी (Black Soil)-इस मिट्टी का निर्माण लावा के प्रवाह से हुआ है। यह मिट्टी कपास की फसल के लिए बहुत लाभदायक है। अतः इसे कपास वाली मिट्टी भी कहा जाता है। इस मिट्टी का स्थानीय नाम ‘रेगड़’ है। यह मिट्टी दक्कन ट्रैप प्रदेश की प्रमुख मिट्टी है। यह पश्चिम में मुंबई से लेकर पूर्व में अमरकंटक पठार, उत्तर में गुना (मध्य प्रदेश) और दक्षिण में बेलगाम तक त्रिभुजाकार क्षेत्र में फैली हुई है। काली मिट्टी नमी को अधिक समय तक धारण कर सकती है। इस मृदा में लौह, पोटाश, चूना, एल्यूमीनियम तथा मैगनीशियम की मात्रा अधिक होती है। परन्तु नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा जीवांश की मात्रा कम होती है।
  3. लाल मिट्टी (Red Soil)-इस मिट्टी का लाल रंग लोहे के रवेदार तथा परिवर्तित चट्टानों में बदल जाने के कारण होता है। इसका विस्तार तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, दक्षिणी बिहार, झारखंड, पूर्वी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतीय राज्यों में हैं। लाल मिट्टी में नाइट्रोजन तथा चूने की कमी, परन्तु मैग्नीशियम, एल्यूमीनियम तथा लोहे की मात्रा अधिक होती है।
  4. लैटराइट मिट्टी (Laterite Soil)-इस मिट्टी में नाइट्रोजन, चूना तथा पोटाश की कमी होती है। इसमें लोहे तथा एल्यूमीनियम ऑक्साइड की मात्रा अधिक होने के कारण इसका स्वभाव तेज़ाबी हो जाता है। इसका विस्तार विन्ध्याचल, सतपुड़ा के साथ लगे मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल की बैसाल्टिक पर्वतीय चोटियों, दक्षिणी महाराष्ट्र तथा उत्तर-पूर्व में शिलांग के पठार के उत्तरी तथा पूर्वी भाग में है।
  5. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)-इस मिट्टी का विस्तार पश्चिम में सिन्धु नदी से लेकर पूर्व में अरावली पर्वतों तक है। यह राजस्थान, दक्षिणी पंजाब व दक्षिणी हरियाणा में फैली हुई है। इसमें घुलनशील नमक की मात्रा अधिक होती है। परन्तु इसमें नाइट्रोजन तथा ह्यूमस की बहुत कमी होती है। इसमें 92% रेत व 8% चिकनी मिट्टी का अंश होता है। इसमें सिंचाई की सहायता से बाजरा, ज्वार, कपास, गेहूँ, सब्जियां आदि उगाई जा रही हैं।
  6. खारी व तेजाबी मिट्टी (Saline & Alkaline Soil)-यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा व पंजाब के दक्षिणी भागों में छोटे-छोटे टुकड़ों में मिलती है। खारी मिट्टियों से सोडियम भरपूर मात्रा में मिलता है। तेज़ाबी मिट्टी में कैल्शियम व नाइट्रोजन की कमी होती है। इसी लवणीय मिट्टी को उत्तर प्रदेश में औसढ़’ या ‘रेह’, पंजाब में ‘कल्लर’ या ‘थुड़’ तथा अन्य भागों में ‘रक्कड़’ कार्ल और. ‘छोपां’ मिट्टी भी कहा जाता है।
  7. पीट एवं दलदली मिट्टी (Peat & Marshy Soil)-इसका विस्तार सुन्दरवन डेल्टा, उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र, तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तटवर्ती भाग, मध्यवर्ती बिहार तथा उत्तराखंड के अल्मोड़ा में है। इसका रंग जैविक पदार्थों की अधिकता के कारण काला तथा तेजाबी स्वभाव वाला होता है। जैविक पदार्थों की अधिकता के कारण कहीं-कहीं इसका रंग नीला भी है।
  8. पर्वतीय मिट्टी (Mountain Soil)-इस मिट्टी में रेत, पत्थर तथा बजरी की मात्रा अधिक होती है। इसमें चूना कम लेकिन लोहे की मात्रा अधिक होती है। यह चाय की खेती के लिए अनुकूल होती है। इसका विस्तार असम, लद्दाख, लाहौल-स्पीति, किन्नौर, दार्जिलिंग, देहरादून, अल्मोड़ा, गढ़वाल व दक्षिण में नीलगिरि के पर्वतीय क्षेत्र में है।

प्रश्न 6.
मिट्टी का कटाव क्या होता है? इसके क्षेत्रीय प्रारूप का वर्णन कीजिए तथा मिट्टी संरक्षण के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
धरातल पर मिलने वाली 15 से 30 सें० मी० मोटी सतह का भौतिक व गैर-भौतिक तत्त्वों द्वारा अपने मूल स्थान से टूट जाना या हट जाना मिट्टी का कटाव कहलाता है।
क्षेत्रीय प्रारूप-मिट्टी के कटाव का देश के अग्रलिखित भागों पर प्रभाव पड़ा है —

  1. बाह्य हिमालय (शिवालिक) क्षेत्रों में प्राकृतिक वनस्पति का अत्यधिक कटाव हुआ है। इसने उपजाऊ भूमि को गारे (कीचड़) से लादकर कृषि विहीन कर दिया है।
  2. पंजाब के होशियारपुर, रोपड़ जिले, यमुना, चम्बल, माही व साबरमती नदियों के अपवाह क्षेत्र में नालियों व ‘चोअ’ ने वनस्पति की कमी के कारण भूमि को बंजर बना दिया है।
  3. दक्षिणी पंजाब, हरियाणा व पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश व उत्तर-पूर्वी गुजरात के शुष्क क्षेत्रों में पवनों के द्वारा कटाव हुआ है।
  4. देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में पश्चिमी बंगाल, समेत भारी वर्षा, बाढ़ व नदी-किनारों की कटाई से सैंकड़ों टन मिट्टी बंगाल की खाड़ी में चली जाती है।
  5. दक्षिण व दक्षिणी पूर्वी भारत में मिट्टी का कटाव तीव्र ढलानों, भारी वर्षा व कृषि की दोषपूर्ण पद्धति अपनाने से हुआ है। मिट्टी का संरक्षण-

मिट्टी के संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय किये जा रहे हैं —

  1. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात में पवनों के वेग को कम करने के लिए वृक्षों की कतारें लगाई जा रही हैं।
  2. रेतीले टीलों पर घास उगाई जा रही है।
  3. पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत, ढाल के विपरीत दिशा में मेडें बनाकर छोटे-छोटे जल भण्डार बनाये जाते हैं।
  4. मैदानी भागों में भूमि पर वनस्पति उगाकर, फसल चक्र, ढाल के विपरीत खेतों को जोतकर तथा गोबर की खाद प्रयोग करके मिट्टी का कटाव कम किया जा सकता है और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाई जा सकती है।
  5. झारखण्ड सरकार ने छोटा नागपुर के पठारी भाग में स्थानान्तरी कृषि के लिए कठोर नियम बनाये हैं।

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IV. भारत के मानचित्र में निम्न को दर्शाएं:

  1. शुष्क वनस्पति क्षेत्र।
  2. मैंग्रोव वनस्पति क्षेत्र।
  3. काली एवं जलोढ़ मिट्टी क्षेत्र।

उत्तर-विद्यार्थी अध्यापक की सहायता से स्वयं करें।

PSEB 10th Class Social Science Guide प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मिट्टियां Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Type Questions)

I. उत्तर एक शब्द अथवा एक लाइन में

प्रश्न 1.
भारत में कई प्रकार की वनस्पति पाए जाने का क्या कारण है?
उत्तर-
भारत की प्राकृतिक दशा, इसकी जलवायु और इसकी मिट्टी में भिन्नता के कारण यहां कई प्रकार की वनस्पति पाई जाती है।

प्रश्न 2.
उष्ण सदाबहार वन भारत के किन भागों में पाए जाते हैं?
उत्तर-
उष्ण सदाबहार वन भारत के पश्चिमी तट, पश्चिमी घाट, असम, नागालैंड, त्रिपुरा और पश्चिमी बंगाल में पाए जाते हैं।

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प्रश्न 3.
मानसूनी वन भारत के किन भागों में पाए जाते हैं?
उत्तर-
मानसूनी वन महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, बिहार तथा उड़ीसा में पाये जाते हैं।

प्रश्न 4.
मानसूनी वनों में पाए जाने वाले चार मुख्यं वृक्षों के नाम बताएं।
उत्तर-
साल, सागवान, शीशम तथा ऐबोनी।

प्रश्न 5.
डैल्टाई वनों में पाए जाने वाले एक प्रमुख वृक्ष का नाम बताएं।
उत्तर-
सुन्दरी।

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प्रश्न 6.
फर्नीचर, समुद्री जहाज तथा रेलों के डिब्बों के लिए कौन-सी लकड़ी सबसे अच्छी रहती है?
उत्तर-
इनके लिए सागवान की लकड़ी सबसे अच्छी रहती है।

प्रश्न 7.
उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वनों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता बताइए।
उत्तर-
उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वन सदा हरित रहते हैं।

प्रश्न 8.
उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वाले वनों के व्यापारिक उपयोग में क्यों कठिनाई आती है?
उत्तर-
उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वाले वनों में एक साथ मिले हुए अनेक जातियों के वृक्ष पाए जाते हैं।

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प्रश्न 9.
उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन किस जलवायु प्रदेश के विशिष्ट वन हैं?
उत्तर-
उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन मानसून प्रदेश के विशिष्ट वन हैं।

प्रश्न 10.
मानसूनी (उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती) वनों के कौन-कौन से दो उप वर्ग हैं?
उत्तर-
मानसूनी वनों के दो उप वर्ग हैं-

  1. आई पर्णपाती वन
  2. शुष्क पर्णपाती वन।

प्रश्न 11.
(i) मेनग्रोव के वृक्ष कहां पाये जाते हैं?
(ii) इनकी मुख्य विशेषता क्या है?
उत्तर-
(i) मेनग्रोव के वृक्ष समुद्र तट के साथ-साथ तथा नदियों के ज्वारीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं।
(ii) इन वृक्षों की विशेषता यह है कि ये खारे पानी तथा ताजे पानी दोनों में ही पनप सकते हैं।

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प्रश्न 12.
मरुस्थलों में वृक्षों की जड़ें लम्बी क्यों होती हैं?
उत्तर-
प्रकृति ने उन्हें लम्बी जड़ें इसलिए प्रदान की हैं ताकि ये गहराई से नमी प्राप्त कर सकें।

प्रश्न 13.
क्या कारण है कि.वनों से बाढ़ की भयंकरता कम हो जाती है?
उत्तर-
वनों की रोक के कारण बाढ़ का बहाव धीमा हो जाता है।

प्रश्न 14.
मरुस्थलीय मृदा के उपजाऊ होने पर भी इसमें कृषि कम होती है, क्यों?
उत्तर-
वर्षा की कमी के कारण इस मृदा में नाइट्रोजन तथा जीवांश का अभाव रहता है।

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प्रश्न 15.
जलोढ़ मृदा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
जलोढ़ मृदा से हमारा अभिप्राय ऐसी मृदा से है जिसका निर्माण नदियों द्वारा होता है।

प्रश्न 16.
जलोढ़ मृदा के चार प्रकार कौन-से हैं?
उत्तर-
जलोढ़ मृदा के चार प्रकार हैं-बांगर मृदा, खादर मृदा, डेल्टाई मृदा और तटवर्ती जलोढ़ मृदा।

प्रश्न 17.
काली मृदा का कोई एक गुण बताओ।
उत्तर-
काली मृदा में नमी सोखने की क्षमता अधिक होती है।

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प्रश्न 18.
काली मृदा किस उपज के लिए आदर्श मानी जाती है?
उत्तर-
कपास।

प्रश्न 19.
लैटराइट मृदा में किन तत्त्वों की मात्रा अधिक होती है?
उत्तर-
लैटराइट मृदा में लोहा और एल्यूमीनियम की मात्रा अधिक होती है।

प्रश्न 20.
भारत में पाई जाने वाली सम्पूर्ण वनस्पति जाति का कितने प्रतिशत भाग विदेशी जातियों का है?
उत्तर-
40%

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प्रश्न 21.
किस विदेशी वनस्पति ने लोगों में त्वचा तथा सांस सम्बन्धी रोगों में वृद्धि की है?
उत्तर-
पारथेनियम अथवा कांग्रेसी घास।

प्रश्न 22.
भारत में पहली बार वन नीति (राष्ट्रीय वन नीति) की घोषणा कब की गई थी?
उत्तर-
1951 में।

प्रश्न 23.
भारत में प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र कितना है?
उत्तर-
0.14 हेक्टेयर।

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प्रश्न 24.
किस केन्द्र शासित प्रदेश में सबसे अधिक वन क्षेत्र है?
उत्तर-
अण्दमान व निकोबार द्वीप समूह।

प्रश्न 25.
केन्द्रीय शासित प्रदेशों में सबसे कम वन क्षेत्र किस प्रदेश का है?
उत्तर-
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का।

प्रश्न 26.
हम अपने कितने प्रतिशत वन क्षेत्र का प्रयोग कर पाते हैं?
उत्तर-
82 प्रतिशत का।

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प्रश्न 27.
कीकर और बबूल किस प्रकार की वनस्पति के वृक्ष हैं?
उत्तर-
मरुस्थलीय अथवा शुष्क वनस्पति।

प्रश्न 28.
स्तनधारियों में राजसी ठाठ-बाठ वाला शाकाहारी पशु किसे माना जाता है?
उत्तर-
हाथी।

प्रश्न 29.
थार मरुस्थल का सामान्य पशु कौन-सा है?
उत्तर-
ऊंट।

प्रश्न 30.
भारत में जंगली गधे कहां पाये जाते हैं?
उत्तर-
कच्छ के रण में।

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प्रश्न 31.
भारत में एक सींग वाला गेंडा कहां मिलता है?
उत्तर-
असम तथा पश्चिमी बंगाल के उत्तरी भागों में।

प्रश्न 32.
जंगली जीवों में सबसे शक्तिशाली पश कौन-सा है?
उत्तर-
शेर।

प्रश्न 33.
प्रसिद्ध बंगाली शेर अथवा बंगाल टाईगर का प्राकृतिक आवास कौन-सा है?
उत्तर-
गंगा डेल्टा के सुन्दर वन।

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प्रश्न 34.
गुजरात में सौराष्ट्र के गिर वन किस विशिष्ट पशु का प्राकृतिक आवास है?
उत्तर-
भारतीय सिंह का।

प्रश्न 35.
हिमालय के उच्च क्षेत्रों में पाये जाने वाले दो जानवरों के नाम लिखिए।
उत्तर-
लामचिता तथा हिम-तेन्दुआ।

प्रश्न 36.
भारत का सबसे पहला वन आरक्षित क्षेत्र कब और कहां बनाया गया था?
उत्तर-
भारत का पहला वन आरक्षित क्षेत्र 1986 में नीलगिरी में बनाया गया था।

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प्रश्न 37.
दरियाई जलोढ़ मिट्टी को कौन-कौन से दो उपभागों में बांटा जाता है?
उत्तर-
खादर तथा बांगर।

प्रश्न 38.
आग्नेय चट्टानों के टूटने से बनी मिट्टी क्या कहलाती है?
उत्तर-
काली मिट्टी।

प्रश्न 39.
केन्द्रीय मृदा रक्षा बोर्ड की स्थापना कब हुई?
उत्तर-
1953 में।

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प्रश्न 40.
किस प्रकार के वनों को बरसाती वन कहा जाता है?
उत्तर-
उष्ण सदाबहार वनों को।

प्रश्न 41.
भारत में संकटापन्न वन्य जीवों के नाम बताइए।
उत्तर-
भारत में दो संकटापन्न वन्य जीव बाघ तथा गैंडा हैं।

प्रश्न 42.
(i) राष्ट्रीय उद्यान किसे कहते हैं ?
(ii) इसके दो उदाहरण भारत से दीजिए।
उत्तर-
(i) राष्ट्रीय उद्यान से अभिप्राय उन सुरक्षित स्थलों से है जहां पर जानवरों को उनकी नस्लें सुरक्षित रखने के लिए रखा जाता है।
(ii) कार्बेट नेशनल पार्क तथा काजीरंगा नेशनल पार्क।

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II. रिक्त स्थानों की पूर्ति

  1. फर्नीचर, समुद्री जहाज़ तथा रेल के डिब्बे बनाने के लिए ……………. की लकड़ी सबसे अच्छी रहती है।
  2. …………………………..वर्षा वन सदा हरे-भरे रहते हैं।
  3. भारत में पाई जाने वाली सम्पूर्ण वनस्पति जाति का ………….प्रतिशत भाग विदेशी जातियों का है।
  4. विदेशी वनस्पति की ……….. घास ने लोगों में त्वचा तथा सांस सम्बन्धी रोगों में वृद्धि की है।
  5. थार मरुस्थल का सामान्य पशु ……………….. है।
  6. भारत में जंगली गधे ………………… में पाए जाते हैं।
  7. जंगली जीवों में ……………………. सबसे शक्तिशाली पशु है।
  8. भारत का पहला वन आरक्षित क्षेत्र ……………… में बनाया गया।
  9. आग्नेय चट्टानों के टूटने से बनी मिट्टी …………….. मिट्टी कहलाती है।
  10. केन्द्रीय मृदा रक्षा बोर्ड की स्थापना ………………….. ई० में की गई।

उत्तर-

  1. सागवान,
  2. उष्ण कटिबंधीय,
  3. 40,
  4. कांग्रेसी,
  5. ऊंट,
  6. रण के कच्छ,
  7. शेर,
  8. नीलगिरी,
  9. काली,
  10. 1953

III. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
डेल्टाई वनों में पाया जाने वाला मुख्य वृक्ष है —
(A) साल
(B) शीशम
(C) सुन्दरी
(D) सागवान।
उत्तर-
(C) सुन्दरी

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प्रश्न 2.
काली मृदा किस उपज के लिए आदर्श मानी जाती है?
(A) कपास
(B) गेहूं
(C) चावल
(D) गन्ना।
उत्तर-
(A) कपास

प्रश्न 3.
किस मृदा में लोहे तथा एल्यूमीनियम की मात्रा अधिक होती है?
(A) काली मृदा
(B) लैटराइट मृदा
(C) मरूस्थलीय मृदा
(D) जलोढ़ मृदा।
उत्तर-
(B) लैटराइट मृदा

प्रश्न 4.
भारत में पहली बार वन नीति (राष्ट्रीय वन नीति) की घोषणा की गई.
(A) 1947 ई० में
(B) 1950 ई० में
(C) 1937 ई० में
(D) 1951 ई० में
उत्तर-
(D) 1951 ई० में

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प्रश्न 5.
भारत में प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र है —
(A) 0.14 हेक्टेयर
(B) 1.4 हेक्टेयर
(C) 14.0 हेक्टेयर
(D) 4.1 हेक्टेयर।
उत्तर-
(A) 0.14 हेक्टेयर

प्रश्न 6.
किस केन्द्र शासित प्रदेश में सबसे अधिक वन क्षेत्र है?
(A) चण्डीगढ़ में
(B) अण्डेमान तथा निकोबार द्वीप समूह में
(C) दादरा तथा नगर हवेली में
(D) पाण्डिचेरी (पुड्डूचेरी) में।
उत्तर-
(B) अण्डेमान तथा निकोबार द्वीप समूह में

प्रश्न 7.
निम्न केन्द्र शासित प्रदेश में सबसे कम वन क्षेत्र है —
(A) चण्डीगढ़
(B) लक्षद्वीप
(C) दिल्ली
(D) दमन-द्वीप।
उत्तर-
(C) दिल्ली

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प्रश्न 8.
स्तनधारियों में राजसी ठाठ-बाठ वाला शाकाहारी पशु माना जाता है —
(A) बन्दर
(B) हाथी
(C) लंगूर
(D) भैंस।
उत्तर-
(B) हाथी

प्रश्न 9.
भारत में एक सींग वाला गेंडा मिलता है —
(A) तमिलनाडु में
(B) असम तथा उत्तर प्रदेश में ।
(C) असम तथा पश्चिमी बंगाल में
(D) उत्तराखण्ड तथा उत्तर प्रदेश में।
उत्तर-
(C) असम तथा पश्चिमी बंगाल में

प्रश्न 10.
भारत में पहला वन आरक्षित क्षेत्र बनाया गया
(A) 1986 ई० में
(B) 1976 ई० में
(C) 1971 ई० में
(D) 1981 ई० में।
उत्तर-
(A) 1986 ई० में

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IV. सत्य-असत्य कथन

प्रश्न-सत्य/सही कथनों पर (✓) तथा असत्य/गलत कथनों पर (✗) का निशान लगाएं.

  1. सुंदरवन का जीव आरक्षित क्षेत्र मध्य प्रदेश में स्थित है।
  2. राष्ट्रीय वन नीति 1951 के अनुसार देश के कुल क्षेत्रफल के एक तिहाई (33.3 प्रतिशत) भाग पर वन होने चाहिए।
  3. बबूल, कीकर आदि वृक्ष आर्द्र पतझड़ी वनों के वृक्ष हैं।
  4. सघन वन गर्मियों में तापमान बढ़ने से रोकते हैं।
  5. पर्वतीय मिट्टी चाय उत्पादन के अनुकूल होती है।

उत्तर-

  1. (✗),
  2. (✓),
  3. (✗),
  4. (✓),
  5. (✓).

V. उचित मिलान

  1. जल हायसिंध (Water-Hyacinth) — सुन्दर वन
  2. भारत में सबसे अधिक वन क्षेत्रफल — पंजाब तथा हरियाणा
  3. ज्वारीय वनस्पति — बंगाल का डर
  4. भूड़ मिट्टी — त्रिपुरा।

उत्तर-

  1.  जल हायसिंध (Water-Hyacinth) — बंगाल का डर,
  2. भारत में सबसे अधिक वन क्षेत्रफल — त्रिपुरा,
  3. ज्वारीय वनस्पति — सुन्दर वन,
  4. भूड़ मिट्टी — पंजाब तथा हरियाणा।

PSEB 10th Class SST Solutions Geography Chapter 4 प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु तथा मिट्टियां

छोटे उत्तर वाले प्रश्न (Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1.
शुष्क पतझड़ी वनस्पति पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर-
इस प्रकार की वनस्पति 50 से 100 सें० मी० से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है।
क्षेत्र-इसकी एक लम्बी पट्टी पंजाब से लेकर हरियाणा, दक्षिण-पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान, काठियावाड़, दक्षिण के पठार के मध्यवर्ती भाग के आस-पास के क्षेत्रों में फैली हुई है।
प्रमुख वृक्ष-इस वनस्पति में शीशम या टाहली, कीकर, बबूल, बरगद, हलदू जैसे वृक्ष प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें चन्दन, महुआ, सीरस तथा सागवान जैसे कीमती वृक्ष भी मिलते हैं। ये वृक्ष प्रायः गर्मियां शुरू होते ही अपने पत्ते गिरा देते हैं। घास-इन क्षेत्रों में दूर-दूर तक काँटेदार झाड़ियाँ व कई प्रकार की घास नजर आती हैं जोकि घास के मैदान की तरह नज़र आती है। इस घास को मंजु, कांस व सवाई कहा जाता है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणियां लिखिए
(i) वन्य जीवों का संरक्षण।
(ii) मिट्टी का संरक्षण।
उत्तर-
(i) वन्य जीवों का संरक्षण-भारत में विभिन्न प्रकार के वन्य जीव पाए जाते हैं। उनकी उचित देखभाल न होने से जीवों की कई एक जातियाँ या तो लुप्त हो गई हैं या लुप्त होने वाली हैं। इन जीवों के महत्त्व को देखते हुए अब इनकी सुरक्षा और संरक्षण के उपाय किये जा रहे हैं। नीलगिरि में भारत का पहला जीव आरक्षित क्षेत्र स्थापित किया गया। यह कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल के सीमावती क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसकी स्थापना 1986 में की गई थी। नीलगिरि के पश्चात् 1988 ई० में उत्तराखंड (वर्तमान) में नन्दा देवी का जीव आरक्षित क्षेत्र बनाया गया। उसी वर्ष मेघालय में तीसरा ऐसा ही क्षेत्र स्थापित किया गया। एक और जीव आरक्षित क्षेत्र अण्दमान तथा निकोबार द्वीप समूह में स्थापित किया गया है। इन जीव आरक्षित क्षेत्रों के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात तथा असम में भी जीव आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए गए हैं।
(ii) मिट्टी का संरक्षण-भारत में विभिन्न प्रकार की मिट्टियां मिलती हैं। इन मिट्टियों में कई प्रकार की फ़सलें पैदा की जा सकती हैं। देश में पाई जाने वाली उपजाऊ मिट्टियों के कारण ही भारत कृषि उत्पादों में आत्म-निर्भर हो सका है। परन्तु मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं। हमें मिट्टियों का उचित संरक्षण करना चाहिए तथा उन्हें अपरदन से बचाना चाहिए। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक खादों की सहायता भी लेनी चाहिए। अतः स्पष्ट है कि भूमि की उत्पादकता को निरन्तर बनाए रखने के लिए मिट्टी का संरक्षण बहुत आवश्यक है।

प्रश्न 3.
रेगड़ मिट्टी तथा लैटराइट मिट्टी में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
रेगड मिट्टी तथा लैटराइट मिट्टी में निम्नलिखित अन्तर है

रेगड़ मिट्टी (काली मिट्टी) लैटराइट मिट्टी
(1) इस मिट्टी का निर्माण लावा के प्रवाह से हुआ है। (1) इस मिट्टी का निर्माण भारी वर्षा से होने वाली निक्षालन क्रिया से हुआ है।
(2) इसमें मिट्टी के पोषक तत्त्व काफ़ी मात्रा में पाए जाते हैं। इसलिए यह मिट्टी उपजाऊ होती है। (2) इस मिट्टी के अधिकतर पोषक तत्त्व वर्षा में बह जाते हैं। इसलिए यह मिट्टी कम उपजाऊ होती है।
(3) यह मिट्टी कपास की उपज के लिए आदर्श होती है। (3) इस मिट्टी में केवल घास और झाड़ियां ही उग पाती हैं।
(4) इस मिट्टी में अधिक समय तक नमी. धारण करने की क्षमता होती है। (4) इस मिट्टी में अधिक समय तक नमी धारण करने की क्षमता नहीं होती है।

 

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प्रश्न 4.
हमारी मदा की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। इसे दूर करने के लिए आप क्या सुझाव देंगे?
उत्तर-
भारत की मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं

  1. रासायनिक खादों का प्रयोग-हमारे देश के किसान अधिकतर गोबर की खाद का प्रयोग करते हैं जिससे उपज कम होती है। रासायनिक खाद का प्रयोग करने से आवश्यक तत्त्वों की कमी को पूरा किया जा सकता है। इसलिए किसानों को गोबर की खाद के साथ-साथ रासायनिक खादों का भी प्रयोग करना चाहिए।
  2. भूमि को खाली छोड़ना-यदि भूमि को कुछ समय के लिए खाली छोड़ दिया जाए तो वह उर्वरा शक्ति में आई कमी को पूरा कर लेती है। इसलिए भूमि को कुछ समय के लिए खाली छोड़ देना चाहिए।
  3. फसलों की फेर-बदल-पौधे अपना भोजन भूमि से प्राप्त करते हैं। प्रत्येक पौधा भूमि से अलग-अलग प्रकार के तत्त्व प्राप्त करता है। यदि एक फसल को बार-बार बोया जाए तो भूमि में एक विशेष तत्त्व की कमी हो जाती है। इसलिए फसलों को अदल-बदल कर बोना चाहिए।

प्रश्न 5.
भारत में पाई जाने वाली काली तथा लाल मृदा की तुलना करो।
उत्तर-
भारत में पाई जाने वाली काली मृदा तथा लाल मृदा की तुलना अग्र प्रकार है

काली मृदा लाल मृदा
(1) यह मृदा लावा से बनी हुई चट्टानों के टूटने से बनती है। (1) यह मृदा उन चट्टानों के टूटने से बनती है जिनमें लोहे की मात्रा अधिक होती है।
(2) इस मृदा में पोटाशियम, मैग्नीशियम, लोहा और जीवांश मिले हुए होते हैं। (2) इस मृदा में मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, चूना और नाइट्रोजन नहीं होता। इसमें लोहे का ऑक्साइड अधिक मात्रा में होता है।
(3) काली मृदा पानी को बहुत देर तक सोख सकती है। अतः इसे अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। (3) लाल मृदा बहुत देर तक पानी नहीं सोख सकती। र इसमें वर्षा के समय ही कृषि हो सकती है।
(4) यह मृदा बहुत उपजाऊ होती है। (4) यह मृदा अधिक उपजाऊ नहीं होती।

 

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प्रश्न 6.
जलोढ़ मृदा से क्या अभिप्राय है? यह भारत के किन-किन भागों में पाई जाती है? इस मृदा के गुण तथा लक्षणों का वर्णन करो।
उत्तर-
नदियां अपने साथ लाई हुई मृदा और मृत्तिका के बारीक कणों को मैदान में बिछा देती हैं। इस प्रकार से जो मृदा बनती है, उसे जलोढ़ मृदा कहते हैं। जलोढ़ मृदा बड़ी उपजाऊ होती है।
जलोढ़ मृदा के क्षेत्र-भारत में जलोढ़ मृदा गंगा-सतलुज के मैदान, महानदी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टाओं, ब्रह्मपुत्र की घाटी और पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय मैदानों में पाई जाती है।
गुण तथा लक्षण-

  1. यह मृदा बहुत उपजाऊ होती है।
  2. यह मृदा कठोर नहीं होती। इसलिए इसमें आसानी से हल चलाया जा सकता है।
  3. वर्षा कम होने पर इस मृदा में नाइट्रोजन तथा जीवांश की मात्रा कम हो जाती है और पोटाश तथा फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ जाती है और तब यह कृषि योग्य नहीं रहती।

प्रश्न 7.
जलोढ़ मृदा कितने प्रकार की होती है? वर्णन करो।
उत्तर-
जलोढ़ मृदा में वर्षा की भिन्नता के कारण क्षार, बालू और चीका की मात्रा अलग-अलग होती है। इसी आधार पर इसको चार भागों में बांटा जा सकता है

  1. बांगर मृदा-यह प्राचीन जलोढ़ मृदा है। जहां ऐसी मृदा पाई जाती है वहां बाढ़ का पानी नहीं पहुंच पाता। इसमें बालू और चीका की मात्रा लगभग बराबर होती है। इसमें कहीं-कहीं कंकड़ और चूने की डलियां भी मिलती हैं।
  2. खादर मृदा-इसे नवीन जलोढ़ भी कहते हैं। इस प्रकार की मृदा के क्षेत्र नदियों के समीप पाए जाते हैं। इन क्षेत्रों में बाढ़ का पानी प्रति वर्ष पहुंच जाता है जिससे नई जलोढ़ का जमाव होता रहता है।
  3. डैल्टाई मृदा-इसे नवीनतम कछारी मृदा भी कहते हैं। यह नदियों के डेल्टाओं के आस-पास पाई जाती है। इसमें चीका की मात्रा अधिक होती है।
  4. तटवर्ती जलोढ़ मिट्टी-इस प्रकार की मृदा का निर्माण तटों के साथ समुद्री लहरों के निक्षेप से प्राप्त चूरे से होता है।

प्रश्न 8.
वन्य प्राणियों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य क्यों है?
उत्तर-
हमारे वनों में बहुत-से महत्त्वपूर्ण पशु-पक्षी पाए जाते हैं। परन्तु खेद की बात यह है कि पक्षियों और जानवरों की अनेक जातियां हमारे देश से लुप्त हो चुकी हैं। अतः वन्य प्राणियों की रक्षा करना हमारे लिए बहुत आवश्यक है। मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए वनों को काटकर तथा जानवरों का शिकार करके दुःखदायी स्थिति उत्पन्न कर दी है। आज गैंडा, चीता, बन्दर, शेर और सारंग नामक पशु-पक्षी बहुत ही कम संख्या में मिलते हैं। इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह वन्य प्राणियों की रक्षा करे।

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प्रश्न 9.
किसान के लिए पशुधन/पशुपालन का क्या महत्त्व है?
उत्तर-
हमारे देश में विशाल पशु धन पाया जाता है, जिन्हें किसान अपने खेतों पर पालते हैं। पशुओं से किसान को गोबर प्राप्त होता है, जो मृदा की उर्वरता को बनाए रखने में उसकी सहायता करता है। पहले किसान गोबर को ईंधन के रूप में प्रयोग करते थे, परन्तु अब प्रगतिशील किसान गोबर को ईंधन और खाद दोनों रूपों में प्रयोग करते हैं। खेत में गोबर को खाद के रूप में प्रयोग करने से पहले वे उससे गैस बनाते हैं जिस पर वे खाना बनाते हैं और रोशनी प्राप्त करते हैं। पशुओं की खालें बड़े पैमाने पर निर्यात की जाती हैं। पशुओं से उन्हें ऊन प्राप्त होती है। सच तो यह है कि पशुधन भारतीय किसान के लिए अतिरिक्त आय का साधन है।

प्रश्न 10.
मृदा के प्रमुख पांच उपयोग बताओ।
उत्तर-
मृदा एक अत्यन्त उपयोगी प्राकृतिक उपहार है। इससे हमें भिन्न-भिन्न उत्पाद प्राप्त होते हैं। इसके मुख्य पांच उपयोग निम्नलिखित हैं

  1. इससे गेहूं, चावल, बाजरा, ज्वार आदि अनाज प्राप्त होता है।
  2. इसमें पशुओं के लिए घास और चारा उगता है।
  3. इससे कपास, पटसन, सीसल आदि रेशेदार पदार्थ मिलते हैं।
  4. इससे हमें दालें मिलती हैं।
  5. इससे उपयोगी लकड़ी प्राप्त होती है।

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बड़े उत्तर वाला प्रश्न (Long Answer Type Question)

प्रश्न
भारत में पाये जाने वाले वन्य प्राणियों का वर्णन करो।
उत्तर-
वनस्पति की भान्ति ही हमारे देश के जीव-जन्तुओं में भी बड़ी विविधता है। भारत में इनकी 81,000 जातियां पाई जाती हैं। देश के ताजे और खारे पानी में 2500 जातियों की मछलियां मिलती हैं। इसी प्रकार यहां पर पक्षियों की भी 2000 जातियां पाई जाती हैं। मुख्य रूप से भारत के वन्य प्राणियों का वर्णन इस प्रकार है

  1. हाथी-हाथी राजसी ठाठ-बाठ वाला पशु है। यह ऊष्ण आर्द्र वनों का पशु है। यह असम, केरल तथा कर्नाटक के जंगलों में पाया जाता है। इन स्थानों पर भारी वर्षा के कारण बहुत घने वन मिलते हैं।
  2. ऊँट-ऊँट गर्म तथा शुष्क मरुस्थलों में पाया जाता है।
  3. जंगली गधा-जंगली गधे कच्छ के रण में मिलते हैं।
  4. एक सींग वाला गैंडा-एक सींग वाले गैंडे असम और पश्चिमी बंगाल के उत्तरी भागों के दलदली क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  5. बन्दर-भारत में बन्दरों की अनेक जातियां मिलती हैं। इनमें से लंगूर सामान्य रूप से पाया जाता है। पूंछ वाला बन्दर (मकाक) बड़ा ही विचित्र जीव है। इसके मुंह पर चारों ओर बाल उगे होते हैं जो एक प्रभामण्डल के समान दिखाई देते हैं।
  6. हिरण-भारत में हिरणों की अनेक जातियां पाई जाती हैं। इनमें चौसिंघा, काला हिरण, चिंकारा तथा सामान्य हिरण प्रमुख हैं। यहां हिरणों की कुछ अन्य जातियां भी मिलती हैं। इनमें कश्मीरी बारहसिंघा, दलदली मृग, चित्तीदार मृग, कस्तूरी मृग तथा मूषक मृग उल्लेखनीय हैं।
  7. शिकारी जन्तु–शिकारी जन्तुओं में भारतीय सिंह का विशिष्ट स्थान है। अफ्रीका के अतिरिक्त यह केवल भारत में ही मिलता है। इसका प्राकृतिक आवास गुजरात में सौराष्ट्र के गिर वनों में है। अन्य शिकारी पशुओं में शेर, तेंदुआ, लामचिता (क्लाउडेड लियोपार्ड) तथा हिम तेन्दुआ प्रमुख हैं।
  8. अन्य जीव-जन्तु-हिमालय की श्रृंखलाओं में भी अनेक प्रकार के जीव-जन्तु रहते हैं। इनमें जंगली भेडें तथा पहाड़ी बकरियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भारतीय जन्तुओं में भारतीय मोर, भारतीय भैंसा तथा नील गाय प्रमुख हैं। भारत सरकार कुछ जातियों के जीव-जन्तुओं के संरक्षण के लिए विशेष प्रयत्न कर रही है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें

Punjab State Board PSEB 11th Class Geography Book Solutions Chapter 7 पवनें Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Geography Chapter 7 पवनें

PSEB 11th Class Geography Guide पवनें Textbook Questions and Answers

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक या दो शब्दों में दो :

प्रश्न (क)
ITCZ का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर-
Inter Tropical Convergence Zone.

प्रश्न (ख)
नक्षत्रीय पवनों को अंग्रेजी में क्या कहते हैं ?
उत्तर-
Planetary winds.

प्रश्न (ग)
मानसून कौन-सी भाषा का शब्द है ?
उत्तर-
अरबी भाषा।

प्रश्न (घ)
साइबेरिया की कौन-सी झील मानसून सिद्धांत से संबंधित है ?
उत्तर-
बैकाल झील।

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प्रश्न (ङ)
मानसून फटने की क्रिया कब घटित होती है ?
उत्तर-
28 से 30 मई के मध्य केरल के तट पर।

प्रश्न (च)
पंजाब के दक्षिणी भागों में गर्मियों में बहती हवाओं को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
लू (loo)।

प्रश्न (छ)
ऑस्ट्रेलिया में चक्रवातों को किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर-
विल्ली-विल्ली।।

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प्रश्न (ज)
Tornado का पंजाबी में क्या नाम है ?
उत्तर-
वावरोला।

प्रश्न (झ)
विपरीत चक्रवात का सिद्धांत किसने दिया ?
उत्तर-
फ्रांसिस गैलटन ने।

प्रश्न (ब)
यूरोप में फोहेन (Fohen) नाम से जानी जाने वाली पवनों को उत्तरी अमेरिका में कौन-सा नाम दिया जाता है ?
उत्तर-
चिनूक पवनें।

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2. प्रश्नों के उत्तर दो-चार वाक्यों में दो :

प्रश्न (क)
पश्चिमी पवनों को मलाहां की ओर से 40′, 50° और 60° अक्षांश पर क्या-क्या नाम दिए जाते हैं ?
उत्तर-
40° अक्षांश . – गर्जते चालीस
50° अक्षांश – गुस्सैल पचास
60° अक्षांश – कूकते (चीखते) साठ।

प्रश्न (ख)
स्थायी पवनों के उदाहरणों के नाम लिखें।
उत्तर-

  1. व्यापारिक पवनें
  2. पश्चिमी पवनें
  3. ध्रुवीय पवनें।

प्रश्न (ग)
फैरल के नियमानुसार उत्तरी गोलार्द्ध में क्या प्रभाव पड़ते हैं ?
उत्तर-
उत्तरी गोलार्द्ध में पवनें अपने दायीं ओर मुड़ जाती हैं।

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प्रश्न (घ)
एलनीनो का पता किसने लगाया था ?
उत्तर-
लगभग 100 साल पहले मौसम विभाग के डायरैक्टर जनरल गिलबर्ट वाल्कर (Gilbert Walker) ने एलनीनो का पता लगाया था।

प्रश्न (ङ)
सांता एना क्या है ?
उत्तर-
कैलीफोर्निया राज्य के दक्षिणी भागों में पहाड़ी क्षेत्रों से नीचे उतरती पवनों को सांता एना कहते हैं।

प्रश्न (च)
बलिजार्ड (Balizard) क्या है ?
उत्तर-
ध्रुवीय क्षेत्रों में चलने वाली ठंडी, शुष्क और बर्फीली पवनों को बलिजार्ड कहते हैं।

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प्रश्न (छ)
हरीकेन और बाईगुइस में क्या अंतर है ?
उत्तर-
खाड़ी मैक्सिको में चलने वाले चक्रवातों को हरीकेन कहते हैं जबकि फिलीपाइन के निकट चलने वाले चक्रवातों को बाईगुइस कहते हैं।

प्रश्न (ज)
हुद-हुद, नीलोफर और नानुक का आपस में क्या संबंध है ?
उत्तर-
सन् 2014 में, भारत के तट पर चलने वाले चक्रवातों को हुद-हुद, नीलोफर और नानुक नाम दिए गए थे।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 60 और 80 शब्दों में दें-

प्रश्न (क)
विपरीत चक्रवातों के रहते गर्मियों और सर्दियों के मौसम कैसे होते हैं ?
उत्तर-
विपरीत चक्रवातों का अर्थ है-उच्च हवा के दबाव के क्षेत्र। गर्मियों में विपरीत चक्रवातों के समय मौसम साफ-साफ, नीला आसमान, बादल रहित और शुष्क होता है। सर्दियों के मौसम में कोहरा और धुंध हो सकती है।

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प्रश्न (ख)
एल-नीनो क्या है ? व्याख्या करें।
उत्तर-
एल-नीनो गर्म जल की धारा है, जो दक्षिणी प्रशांत महासागर में पेरु-चिल्ली के तट के साथ-साथ छह से सात वर्षों के अंतराल से बहती है। हम्बोलाट की ठंडी धारा के विपरीत गर्म जल की धारा एल-नीनो बहती है, इसलिए मानसून की वर्षा कम हो जाती है।

प्रश्न (ग)
तिब्बत के पठार का मानसून पवनों संबंधी क्या योगदान है ?
उत्तर-
तिब्बत का पठार एक विशाल पठार है, जिसका क्षेत्रफल 2000-600000 वर्ग किलोमीटर है। यह पवनों के लिए प्राकृतिक रोक लगाता है और यहाँ गर्मियों के मौसम में तापमान बहुत अधिक हो जाता है, इसलिए पश्चिमी जेट धारा तिब्बत के उत्तर की ओर खिसक जाती है।

प्रश्न (घ)
‘आमों की बौछार’ स्पष्ट करें।
उत्तर-
जून के महीने में मानसून पवनें केरल के तट से शुरू होती हैं। इन्हें मानसून का फटना कहते हैं। यह वर्षा केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में आमों की उपज के लिए बहुत लाभदायक होती है। इसलिए इसे ‘आम्रवृष्टि’ (Mango Showers) भी कहा जाता है।

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प्रश्न (ङ)
पवन-पेटियों के फिसलने की क्रिया स्पष्ट करें।
उत्तर-
धरती की परिक्रमा के कारण, धरती के ऊपर सूर्य की स्थिति सारा साल लगातार बदलती रहती है। सूर्य की किरणें कभी भूमध्य रेखा पर, कभी कर्क रेखा पर और कभी मकर रेखा पर लंब रूप में पड़ती हैं। जब सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर लंब रूप में पड़ती हैं, तो पवन-पेटियाँ उत्तर की ओर खिसक जाती हैं। इसके विपरीत जब सूर्य की किरणें मकर रेखा पर लंब रूप में पड़ती हैं, तो पवन-पेटियाँ दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं।

प्रश्न (च)
कोरिओलिस (Coriolis) प्रभाव क्या है ? पृथ्वी पर इसका क्या प्रभाव है ? संक्षेप में लिखें।
उत्तर-
कोरिओलिस प्रभाव (Coriolis effect)-धरातल पर पवनें कभी भी उत्तर से दक्षिण की ओर सीधी नहीं बहतीं। सभी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपने दाएँ ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाएँ ओर मुड़ जाती हैं। इसे फैरल का नियम कहते हैं। (“All moving bodies are deflected to the right in the Northern Hemisphere and to the left in the Southern Hemisphere.”)

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें 1

हवा की दिशा में परिवर्तन का कारण धरती की दैनिक गति है। जब हवाएँ कम चाल वाले भागों से अधिक चाल वाले भागों की ओर आती हैं, तो पीछे रह जाती हैं। जैसे-उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी-पूर्वी व्यापारिक पवनें अपने दाएँ ओर मुड़ जाती हैं तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाएँ ओर मुड़ जाती हैं। इसे कोरिओलिस प्रभाव कहते हैं।

प्रश्न (छ)
शृंकां से क्या भाव है ? इस पर एक स्पष्ट नोट लिखें।
उत्तर-
उत्तरी अमेरिका में बसंत ऋतु में पर्वतों के नीचे उत्तर के मैदानों की ओर बहती गर्म शुष्क पवनों को चिनूक पवनें कहते हैं। कनाडा में पंजाबी में इसे ‘शंकां’ भी कहते हैं।

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4. प्रश्नों के उत्तर 150 से 250 शब्दों में लिखो-

प्रश्न (क)
स्थानीय पवनों के तापमान के आधार पर विभाजन और व्याख्या करें।
उत्तर-
स्थानीय पवनें (Local winds)-कुछ पवनें भू-तल के किसी छोटे-से सीमित भाग में चलती हैं, जिन्हें स्थानीय पवनें कहते हैं।

1. थल और जल समीर (Land and Sea Breezes)–थल पर स्थायी पवनों का एक सिलसिला है, पर जल और थल के तापमान की भिन्नता के कारण कुछ स्थानीय पवनें पैदा होती हैं। जल समीर और थल समीर अस्थायी पवनें हैं, जो समुद्र तल के निकट के क्षेत्रों में महसूस की जाती हैं। ये जल और थल की बहुत कम गर्मी के कारण पैदा होती हैं, इसलिए इन्हें छोटे पैमाने की मानसून पवनें (Monsoon on a Small Scale) भी कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें 2

(i) जल समीर (Sea Breeze)—ये वे पवनें हैं, जो दिन के समय समुद्र से थल की ओर चलती हैं। उत्पत्ति का कारण (Origin)—दिन के समय सूर्य की तीखी गर्मी के कारण थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक और जल्दी गर्म हो जाता है। थल पर हवा गर्म होकर ऊपर उठती है और वायु दबाव कम हो जाता है, परंतु समुद्र पर थल की तुलना में अधिक वायु दबाव रहता है। इस प्रकार थल पर कम दबाव का स्थान लेने के लिए समुद्र की ओर से ठंडी हवाएं चलती हैं। थल की गर्म हवा ऊपर उठकर समुद्र की ओर चली जाती है। इस प्रकार हवा के बहने का एक चक्र बन जाता है।

प्रभाव (Effects)-

  • जल समीर ठंडी और सुहावनी (Cool and fresh) होती है।
  • यह गर्मियों में तटीय क्षेत्रों में तापमान को कम करती है, परंतु सर्दियों में तटीय तापमान को ऊँचा करती है। इस प्रकार मौसम सुहावना और समान हो जाता है।
  • इसके प्रभाव समुद्र तट से 20 मील की दूरी तक सीमित रहते हैं।

(ii) थल समीर (Land Breeze)-ये वे पवनें हैं, जो रात के समय थल से समुद्र की ओर चलती हैं।
उत्पत्ति के कारण (Origin)—रात के समय स्थिति दिन से विपरीत होती है। थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक और जल्दी ठंडे हो जाते हैं। समुद्र पर वायु दबाव कम हो जाता है, परंतु थल पर वायु दबाव अधिक होता है। इस प्रकार थल की ओर से समुद्र की ओर पवनें चलती हैं। समुद्र की गर्म हवा ऊपर उठकर थल पर उतरती है, जिससे हवा चलने का चक्र बन जाता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें 3

प्रभाव (Effects)–

  • इसका थल भागों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • इन पवनों का फायदा उठाकर मछुआरे प्रातः थल समीर (Land Breeze) की सहायता से समुद्र की ओर बढ़ जाते हैं और शाम को जल समीर (Sea Breeze) के साथ-साथ तट की ओर वापस आ जाते हैं।
  • इसका प्रभाव तभी अनुभव होता है, जबकि आकाश साफ हो, दैनिक तापमान अधिक हो और तेज़ पवनें न बहती हों।

2. पर्वतीय और घाटी की पवनें (Mountain and Valley Winds)—यह आमतौर पर दैनिक पवनें होती हैं, जो दैनिक तापांतर के फलस्वरूप वायु-दबाव की भिन्नता के कारण चलती हैं।

(i) पर्वतीय पवनें (Mountain Winds)—पर्वतीय प्रदेशों में रात के समय पर्वत के शिखर से घाटी की ओर ठंडी और भारी हवाएँ चलती हैं, जिन्हें पर्वतीय पवनें (Mountain winds) कहा जाता है।।

उत्पत्ति (Origin)-रात के समय तेज विकिरण (Rapid Radiation) के कारण हवा ठंडी और भारी हो जाती है। यह हवा गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravity) के कारण ढलानों से होकर नीचे उतरती है। इसे वायु प्रवाह (Air Drainage) भी कहते हैं।

प्रभाव (Effects)-इन पवनों के कारण घाटियाँ (Valleys) ठंडी हवा से भर जाती हैं, जिससे घाटी के निचले भागों पर पाला पड़ता है, इसीलिए कैलीफोर्निया (California) में फलों के बाग और ब्राजील में कॉफी (कहवा) के बाग ढलानों पर लगाए जाते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें 4

(ii) घाटी की पवनें (Valley Winds)-दिन के समय घाटी की गर्म हवा ढलान के ऊपर से होकर चोटी की ओर ऊपर चढ़ती है। इसे घाटी की पवनें कहा जाता है।

उत्पत्ति (Origin)-दिन के समय पर्वत के शिखर पर तेज़ गर्मी और विकिरण के कारण हवा गर्म होकर ऊपर उठती है और कम वायु दबाव हो जाता है। उसका स्थान लेने के लिए घाटी से हवाएँ ऊपर चढ़ती हैं। जैसे-जैसे ये पवनें ऊपर चढ़ती हैं, वे ठंडी होती जाती हैं।

प्रभाव (Effects)-

  • ऊपर चढ़ने के कारण ये पवनें ठंडी होकर भारी वर्षा करती हैं।
  • ये ठंडी पवनें गहरी घाटियों में गर्मी की तेज़ी को कम करती हैं।

3. चिनक और फौहन पवनें (Chinook and Foehn Winds)-

(i) चिनूक पवनें (Chinnok Winds)-अमेरिका में रॉकी (Rocky) पर्वतों को पार करके प्रेरीज़ के मैदान में चलने वाली पवनों को चिनूक (Chinook) पवनें कहते हैं। चिनूक का अर्थ है-बर्फ खाने वाला। चूँकि ये पवनें अधिक तापमान के कारण बर्फ को पिघला देती हैं और कई बार 24 घंटों के समय में 50° F (10° C) तापमान बढ़ जाता है।

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(ii) फोहन पवनें (Foehn Winds)-यूरोप में अल्पस पर्वतों को पार करके स्विट्ज़रलैंड में उतरने वाली पवनों को फोहन (Foehn) पवनें कहते हैं।

प्रभाव (Effects)-

  • ये पवनें तापमान बढ़ा देती हैं और बर्फ पिघल जाती है, जिससे फसलों को पकने में सहायता मिलती है।
  • ये पवनों की कठोरता को कम करती हैं।
  • बर्फ के पिघल जाने से पहाड़ी चरागाह वर्ष-भर खुले रहते हैं और पशु-पालन में आसानी रहती है।

4. बोरा और मिस्ट्रल (Bora and Mistral)—ये दोनों एक ही प्रकार की शीतल और शुष्क पवनें हैं, जिन्हें यूगोस्लाविया के एडरिआटिक सागर (Adriatic Sea) और इटली के तट पर बोरा तथा फ्रांस की रोम घाटी (Rome Valley) में मिस्ट्रल कहते हैं। शीतकाल में मध्य यूरोप अत्यंत ठंड के कारण उच्च वायु दाब के अंतर्गत होता है। इसकी तुलना में भूमध्य सागर में निम्न वायु दाब होता है। परिणामस्वरूप मध्य यूरोप में भूमध्य सागर की ओर से ठंडी और शुष्क पवनें चलने लगती हैं। आम तौर पर ये शक्तिशाली पवनें होती हैं, जिनकी गति तेज़ होती है। रोहन नदी की तंग घाटी में ये पवनें बड़ा भयानक रूप धारण कर लेती हैं और कई बार इनकी तेज़ गति के कारण मकानों की छतें भी उड़ जाती हैं।

5. बवंडर (Tornado)—संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्यवर्ती मैदानों में, गर्मी की ऋतु आरंभ होने के साथ ही तेज़ अंधेरियाँ चलनी शुरू हो जाती हैं, जिन्हें ‘बवंडर’ के नाम से पुकारा जाता है। इन मैदानों में, गर्मी की ऋतु आरंभ होते ही गर्मी में तेजी से वृद्धि होनी आरंभ हो जाती है। फलस्वरूप वहाँ निम्न वायु दाब उत्पन्न हो जाता है। निकटवर्ती बर्फ से ढके रॉकी पर्वतों के उच्च वायु दाब से अत्यंत ठंडी शुष्क पवनें तेज़ गति से यहाँ पहुँचती हैं और मैक्सिको की खाड़ी से आती हुई गर्म और नम पवनों के साथ संबंध स्थापित कर लेती हैं। शीतल और शुष्क तथा उष्ण और नम पवनों के मेल से प्रचंड बवंडर की उत्पत्ति होती है। ये बवंडर बहुत विनाशकारी होते हैं।

6. लू (Loo)-भारत के उत्तरी विशाल मैदानों और पाकिस्तान के सिंध और इसकी सहायक नदियों के मैदानों में मई-जून के महीनों में बहुत गर्म पवनें चलती हैं। ये अक्सर शुष्क होती हैं, जो पश्चिमी दिशा की ओर बहती हैं। इन्हें ‘लू’ कहते हैं। इनका तापमान 45°-50° सैल्सियस के बीच होता है। ये बहुत असहनीय होती हैं।

7. हर्मटन (Harmattan)—पश्चिमी अफ्रीका में सहारा मरुस्थल से शुष्क, गर्म और धूल भरी पवनें चलती हैं। पश्चिमी अफ्रीका के पश्चिमी तटों के गर्म व शुष्क वातावरण की नमी शरीर के पसीने को सुखा देती है। इस प्रकार ये पवनें स्वास्थ्य के लिए ठीक समझी जाती हैं। परिणामस्वरूप इन्हें डॉक्टर (Doctor) कह कर पुकारा जाता है।

8. सिरोको (Sirroco)—सहारा मरुस्थल से ही गर्म, शुष्क और धूल भरी पवनें भूमध्य सागर की ओर चलती हैं। इटली में इन्हें सिरोको और सहारा में ‘सिमूम’ कहा जाता है। भूमध्य सागर को पार करते समय ये नमी ग्रहण कर लेती हैं। इटली में ये मौसम को अत्यंत गर्म और चिपचिपा कर देती हैं। इस प्रकार ये दुखदायी होती हैं।

9. बलिजार्ड (Blizard) बर्फ से ढके ध्रुवीय क्षेत्रों में चलने वाली ठंडी, शुष्क और बर्फीली पवनों को बलिजार्ड कहते हैं। इनकी गति 70 से 100 किलोमीटर घंटा होती है। इनमें मुसाफिर मार्ग में भटक जाते हैं, इसे बर्फ का अंधापन (Snow blindness) कहा जाता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें

प्रश्न (ख)
स्थायी पवनें क्या हैं ? प्रकार सहित इनकी व्याख्या करें।
उत्तर-
पवनें (Winds)-वायु हमेशा उच्च दबाव वाले क्षेत्रों से निम्न दबाव वाले क्षेत्रों की ओर चलती है। इस चलती हुई वायु को पवन (Wind) कहते हैं। वायु-दबाव में अंतर आ जाने के कारण ही भू-तल पर चलने वाली पवनें उत्पन्न होती हैं। पवनों की दिशा (Direction of the wind) वह होती है, जिस दिशा से वे आती हैं।

1. भू-मंडलीय या स्थायी पवनें (Planetary or Permanent Winds)-
धरातल पर उच्च वायु दाब और निम्न वायु दाब की अलग-अलग पेटियाँ (Belts) होती हैं। उच्च वायु दाब और निम्न वायु दाब की ओर से लगातार पवनें चलती हैं। इन्हें स्थायी पवनें कहते हैं। ये सदा एक ही दिशा की ओर चलती हैं। स्थायी पवनें तीन प्रकार की होती हैं-

  1. व्यापारिक पवनें (Trade winds)
  2. पश्चिमी पवनें (Westerlies)
  3. ध्रुवीय पवनें (Polar winds)

1. व्यापारिक पवनें (Trade Winds) विस्तार (Extent) व्यापारिक पवनें वे स्थायी पवनें हैं, जो गर्म कटिबंध (Tropics) के मध्य भूमध्य रेखा की ओर चलती हैं। ये पवनें घोड़ा अक्षांशों (Horse Latitudes) या उपोष्ण कटिबंध के उच्च दबाव (Sub Tropical High Pressure) के क्षेत्र से डोलड्रमज़ (Dol Drums) या भूमध्य रेखा की निम्न वायु दबाव वाली पेटी की ओर चलती हैं। इनका विस्तार आम तौर पर 5°-35° उत्तर और दक्षिण तक चला जाता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें 6

दिशा (Direction)-ये दोनों गोलार्डों में पूर्व से आती दिखाई देती हैं, इसलिए इन्हें पूर्वी पवनें (Easterlies) भी कहते हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पूर्वी (North-East) और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिणी-पूर्वी (South-East) होती है। नाम का कारण (Why so Called ?)—इन पवनों को व्यापारिक पवनें (Trade winds) कहने के दो कारण हैं-

1. प्राचीन काल में यूरोप और अमेरिका के बीच समुद्री जहाजों को इन पवनों से बहुत सहायता मिलती थी। ये पवनें Backing winds के रूप में जहाज़ों की गति बढ़ा देती हैं, इसलिए व्यापार में सहायक होने के कारण इन्हें व्यापारिक पवनें कहा जाता है।

2. अंग्रेज़ी के मुहावरे, To blow trade का अर्थ है-लगातार बहना। ये पवनें लगातार एक ही दिशा की ओर बहती हैं। इसलिए इन्हें Trade winds कहते हैं।

उत्पत्ति का कारण (Why caused ?) भूमध्य रेखा पर बहुत गर्मी के कारण निम्न वायु दाब पेटी मिलती है। भूमध्य रेखा से ऊपर उठने वाली गर्म और हल्की हवा 30° उत्तर और दक्षिण के पास ठंडी और भारी होकर नीचे उतरती रहती है। ध्रुवों से खिसक कर आने वाली हवा भी इन अक्षांशों में नीचे उतरती है। इन नीचे उतरती हुई पवनों के कारण मकर रेखा के निकट उच्च वायु दाब पेटी बन जाती है। इसलिए भूमध्य रेखा के निम्न वायु दाब (Low Pressure) का स्थान ग्रहण करने के लिए 30° उत्तर और दक्षिण के उच्च वायु दाब से भूमध्य रेखा की ओर व्यापारिक पवनें चलती हैं।

दिशा परिवर्तन (Change in Direction)—यदि धरती स्थिर होती तो ये पवनें उत्तर-दक्षिण दिशा में चलतीं, परंतु धरती की दैनिक गति के कारण ये पवनें इस लंबवत् दिशा से हटकर एक तरफ झुक जाती हैं और Deflect हो जाती हैं। फैरल के नियम और कोरोलिस बल के कारण, ये पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाती हैं।

प्रभाव (Effects)-

  • गर्म प्रदेशों में चलने के कारण ये पवनें आम तौर पर शुष्क होती हैं।
  • ये पवनें महाद्वीपों के पूर्वी भागों में वर्षा करती हैं और पश्चिमी भागों तक पहुँचते-पहुँचते शुष्क हो जाती हैं। यही कारण है कि पश्चिमी भागों में 20°-30° में गर्म मरुस्थल (Hot Deserts) मिलते हैं।
  • ये पवनें उत्तरी भाग में उच्च दाब (High Pressure) के निकट होने के कारण ठंडी (Cool) और शुष्क (Dry) होती हैं, पर भूमध्य रेखा के निकट दक्षिणी भागों में गर्म (Hot) और नम (Wet) होती हैं।
  • ये पवनें समुद्रों से लगातार और धीमी चाल में चलती हैं, पर महाद्वीपों में इनकी दिशा और गति में अंतर आ जाता है।

व्यापारिक पवनों के देश (Areas)-उत्तरी गोलार्द्ध में पूर्वी अमेरिका और मैक्सिको, दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी अफ्रीका और पूर्वी ब्राज़ील।

2. पश्चिमी पवनें (Westerlies) विस्तार (Extent)-ये पवनें ऐसी स्थायी पवनें हैं जो शीतोष्ण (Temperate) खंड में 30° उच्च वायु दाब से 60° के उप-ध्रुवीय निम्न वायु दाब (Sub-Polar Low Pressure) की ओर चलती हैं। इनका विस्तार आम तौर पर 30° से 65° तक पहुँच जाता है। इन पवनों की उत्तरी सीमा ध्रुवीय सीमांत (Polar Fronts) और चक्रवातों (Cyclones) के कारण सदा बदलती रहती है।

दिशा (Direction)-उत्तरी गोलार्द्ध में इन पवनों की दिशा दक्षिण-पश्चिमी (South-west) होती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में इन पवनों की दिशा उत्तर-पश्चिमी (North-west) होती है।

नाम का कारण (Why so Called ?)दोनों गोलार्डों में ये पवनें पश्चिम से आती हुई महसूस होती हैं, इसलिए इन्हें पश्चिमी पवनें कहते हैं। इनकी दिशा व्यापारिक पवनों के विपरीत होती है, इसलिए इन्हें प्रतिकूल व्यापारिक पवनें (Anti-Trade winds) भी कहते हैं।

उत्पत्ति का कारण (Why Caused ?)-कर्क रेखा और मकर रेखा के निकट नीचे उतरती पवनों (Descending winds) के कारण उच्च वायु दाब हो जाता है। भूमध्य रेखा से गर्म और हल्की हवा इन अक्षांशों में नीचे उतरती है। इसी प्रकार ध्रुवों से खिसक कर आने वाली हवा भी नीचे उतरती है, परंतु 60°C अक्षांशों के निकट Antarctic Circle पर धरती की दैनिक गति के कारण निम्न वायु दाब हो जाता है। इसलिए 30° के उच्च वायु दाब की ओर से 60° के निम्न वायु दाब की ओर पश्चिमी पवनें चलती हैं।

दिशा परिवर्तन (Change in Direction)-आम तौर पर पवनों की दिशा उत्तर-दक्षिणी होनी चाहिए, परंतु धरती की दैनिक गति के कारण यह पवनें लंबवत् दिशा से हटकर एक ओर झुक जाती हैं। फैरल के नियम (Ferral’s Law) के अनुसार और कोरोलिस बल के कारण ये पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाती हैं।

प्रभाव (Effects)-

  • समुद्रों की नमी से भरी होने के कारण यह पवनें अधिक वर्षा करती हैं।
  • यह पवनें पश्चिमी प्रदेशों में बहुत वर्षा करती हैं, परंतु पूर्वी भाग सूखे रह जाते हैं।
  • यह पवनें बहुत अस्थिर होती हैं। इनकी दिशा और शक्ति बदलती रहती है। चक्रवात (Cyclones) और प्रति-चक्रवात (Anti-cyclones) इनके मार्ग में अनिश्चित मौसम ले आते हैं। वर्षा, बादल, कोहरा, बर्फ और तेज़ आँधियों के कारण मौसम लगातार बदलता रहता है।
  • यह दक्षिणी गोलार्द्ध में समुद्रों पर लगातार और तेज़ चाल से चलती हैं। 40°-50° दक्षिण के अक्षांशों में इन्हें गर्जते चालीस (Roaring Forty) कहा जाता है। 50°-60° दक्षिण में इन्हें क्रमशः गुस्सैल पचास (Furious Fifties) और कूकते (चीखते) साठ (Shrieking Sixty) कहते हैं। इन प्रदेशों में ये इतनी तेज़ी से चलती हैं कि दक्षिणी अमेरिका के Cape-Horn पर समुद्री आवाजाही रुक जाती है।
  • व्यापारिक पवनों की तुलना में इनका प्रवाह-क्षेत्र बड़ा होता है।

पश्चिमी पवनों के क्षेत्र (Areas)-इन पवनों के कारण पश्चिमी यूरोप के सभी देशों में आदर्श जलवायु (Ideal Climate) होती है। इसके अतिरिक्त पश्चिमी अमेरिका, पश्चिमी कनाडा, दक्षिणी-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड तथा दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका के प्रदेश इन पवनों के प्रभाव में आ जाते हैं।

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प्रश्न (ग)
निम्नलिखित पर नोट लिखें-
(i) कोरियोलिस प्रभाव
(ii) ऐलनीनो प्रभाव।
उत्तर-
(i) कोरियोलिस प्रभाव (Coriolis Effect)
पवनों की दिशा पर पृथ्वी के घूमने का प्रभाव (Effect of Earth’s Rotation on Wind’s Direction)पवनें उच्च दाब से निम्न दाब की दिशा की ओर चलती हैं। आम तौर पर ये सीधी चलती हैं, परंतु पृथ्वी की दैनिक गति ऐसा नहीं होने देती। इस गति के कारण पवनों की दिशा में विचलन (Deflection) हो जाता है। इस मोड़ने वाली या विचलन वाली शक्ति को विचलन शक्ति (Deflection Force) कहते हैं। इस बल की खोज एक फ्रांसीसी गणित शास्त्री कोरियोलिस (G.G. de Coriolis, 1792-1843) ने की थी। उसके नाम पर ही इस बल को कोरियोलिस बल या प्रभाव (Coriolis Force or Effect) का नाम दिया गया है।

इस प्रभाव के फलस्वरूप भू-तल पर चलने वाली सारी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपने दाएँ हाथ और दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बाएँ हाथ मुड़ जाती हैं। इस प्रकार इस तथ्य की पुष्टि एक अन्य वैज्ञानिक फैरल (Ferral) ने एक प्रयोग द्वारा की थी। इसे फैरल का नियम (Ferral’s Law) भी कहते हैं।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें 7

(ii) ऐलनीनो प्रभाव (Al-Nino Effect)-
ऐलनीनो गर्म पानी की एक धारा है, जो दक्षिणी महासागर में पेरु तथा चिली के तट के साथ-साथ बहती है। यह 6-7 वर्षों बाद चलती है। इस तट के साथ हंबोलट की ठंडी धारा बहती है, पर ऐलनीनो में स्थिति विपरीत हो जाती है और गर्म पानी की धारा बहती है। इसी कारण पेरु आदि देशों में भारी वर्षा होती है, पर मानसूनी वर्षा कम हो जाती है। भारत आदि देशों में सूखे के हालात बन जाते हैं।

प्रश्न (घ)
मानसून की उत्पत्ति संबंधी भिन्न-भिन्न सिद्धांतों का वर्णन करें।
उत्तर-
मानसून पवनें (Monsoon Winds)-परिभाषा (Definition)-मानसून वास्तव में अरबी भाषा के शब्द ‘मौसम’ से बना है। सबसे पहले इनका प्रयोग अरब सागर पर चलने वाली हवाओं के लिए किया गया था। मानसून पवनें वे मौसमी पवनें हैं, जिनकी दिशा मौसम के अनुसार बिल्कुल विपरीत होती है। ये पवनें गर्मी की ऋतु में छह महीने समुद्र से थल की ओर तथा सर्दी की ऋतु में छह महीने थल से समुद्र की ओर चलती हैं।

कारण (Causes)-मानसून पवनें वास्तव में एक बड़े पैमाने पर थल समीर (Land Breeze) और जल समीर (Sea Breeze) हैं। इनकी उत्पत्ति का कारण जल और थल के गर्म और ठंडा होने में भिन्नता (Difference in the cooling and Heating of land and water) है। जल और थल असमान रूप से गर्म और ठंडे होते हैं। इस प्रकार मौसम के अनुसार वायु दाब में भी अंतर हो जाता है, जिनसे हवाओं की दिशा विपरीत हो जाती है।

थल भाग समुद्र की अपेक्षा जल्दी गर्म और जल्दी ठंडा हो जाता है। दिन के समय समुद्र के निकट थल पर निम्न दाब (Low Pressure) और समुद्र पर उच्च दाब (High Pressure) होता है। परिणामस्वरूप समुद्र से थल की ओर जल समीर (Sea Breeze) चलती है, पर रात को दिशा विपरीत हो जाती है और थल से समुद्र की ओर थल समीर (Land Breeze) चलती है। इस प्रकार हर दिन वायु की दिशा बदलती रहती है परंतु मानसून पवनों की दिशा मौसम के अनुसार बदलती है। ये पवनें तट के निकट के प्रदेशों में ही नहीं, बल्कि एक पूरे महाद्वीप में चलती हैं। इसलिए मानसून पवनों को थल समीर (Land Breeze) और जल समीर (Sea Breeze) का एक बड़े पैमाने पर दूसरा रूप कह सकते हैं।

मानसून की उत्पत्ति के लिए जरूरी दशाएँ (Necessary Conditions)—मानसून पवनों की उत्पत्ति के लिए इन दशाओं की आवश्यकता होती है-

  • एक विशाल महाद्वीप का होना।
  • एक विशाल महासागर का होना।
  • थल और जल भागों के तापमान में काफी अंतर का होना।
  • एक लंबी तट रेखा का होना।

मानसूनी प्रदेश (Areas)-ये मानसून पवनें सदा उष्ण-कटिबंध में चलती हैं, परंतु एशिया में ये पवनें 60° उत्तरी अक्षांश तक चलती हैं। इसलिए मानसून खंड दो भागों में विभाजित होते हैं। हिमालय पर्वत इन्हें अलग करता है।

(i) पूर्वी एशियाई मानसून (East-Asia Monsoon)-हिंद-चीन (Indo-China), चीन और जापान क्षेत्र।
(ii) भारतीय मानसून (Indian Monsoon)-भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश, बर्मा क्षेत्र।

गर्मी ऋतु की मानसून पवनें (Summer Monsoons)—मानसून पवनों के उत्पन्न होने और इनके प्रभाव के बारे में स्पष्ट करने के लिए एक ही वाक्य कहा जा सकता है-(“The chain of events is from temperature through pressure and winds to rainfall.”)

अथवा

Temp. → Pressure → Winds → Rainfall.
इन मानसून पवनों की तीन विशेषताएँ हैं-

(i) मौसम के साथ दिशा परिवर्तन।
(ii) मौसम के साथ वायु दाब केंद्रों का विपरीत हो जाना।
(iii) गर्मी ऋतु में वर्षा।

तापमान की भिन्नता के कारण वायु भार में अंतर पड़ता है और अधिक वायु भार से कम वायु भार की ओर ही पवनें चलती हैं। समुद्र से आने वाली पवनें वर्षा करती हैं। गर्मी की ऋतु में सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर सीधी पड़ती हैं, इसलिए भारत, चीन और मध्य एशिया के मैदान गर्म हो जाते हैं। इन थल भागों में कम वायु दाब केंद्र (Low Pressure Centres) स्थापित हो जाते हैं और हिंद महासागर तथा शांत महासागर से भारत और चीन की तरफ समुद्र से थल की ओर पवनें (Sea to Land Winds) चलती हैं। भारत में इन्हें दक्षिण-पश्चिमी गर्मी की ऋतु का मानसून (South-west Summer Monsoon) कहते हैं। चीन में इनकी दिशा दक्षिण-पूर्वी होती है। भारत में ये पवनें भारी वर्षा करती हैं, जिसे मानसून का फटना (Burst of Monsoon) भी कहते हैं। भारत में यह वर्षा बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय कृषि इसी वर्षा पर निर्भर करती है। इसीलिए “भारतीय बजट को मानसून का जुआ” (“Indian Budget is a gamble of Monsoon.”) कहा जाता है।

सर्दी की मानसून पवनें (Winter Monsoon)-सर्दी की ऋतु में मानसून पवनों की उत्पत्ति थल भागों पर होती है। सूर्य की किरणें मकर रेखा पर सीधी चमकती हैं, इसलिए उत्तरी गोलार्द्ध के थल भाग आस-पास के सागरों की तुलना. में ठंडे हो जाते हैं। मध्य एशिया में गोबी मरुस्थल (Gobi Desert) और भारत में राजस्थान प्रदेश में उच्च वायु दाब हो जाता है, इसीलिए इन भागों से समुद्र की ओर पवनें (Land to sea winds) चलती हैं। ये पवनें शुष्क और ठंडी होती हैं। भारत में इन्हें उत्तर-पूर्वी सर्दी ऋतु का मानसून (North-East winter Monsoon) कहते हैं। ये पवनें खाड़ी बंगाल को पार करने के बाद तमिलनाडु प्रदेश में वर्षा करती हैं। भू-मध्य रेखा पार करने के बाद ऑस्ट्रेलिया के तटीय भागों में भी इन पवनों से ही वर्षा होती है।

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मानसून पवनों की उत्पत्ति (Origin of Monsoons)-मानसून पवनों की उत्पत्ति के बारे में नीचे लिखी विचारधाराएँ प्रचलित हैं

1. तापीय विचारधारा (Thermal Concept)-इनकी उत्पत्ति का कारण जल और थल के गर्म और ठंडा होने में भिन्नता (Difference in the cooling and Heating of Land and Water) है। जल और थल असमान रूस से गर्म और ठंडे होते हैं। इस प्रकार मौसम के अनुसार वायु दाब में भी अंतर हो जाता है जिससे हवाओं की दिशा विपरीत हो जाती है। गर्मी की ऋतु में ये पवनें समुद्र से थल की ओर चलती हैं और शीत ऋतु में ये पवनें थल से समुद्र की ओर चलती हैं।

2. स्पेट की विचारधारा (Spate’s Concept) स्पेट नाम के विद्वान् के अनुसार मानसून पवनें चक्रवातों और प्रति-चक्रवातों के कारण पैदा होती हैं। इनके मिलने के कारण सीमांत बनते हैं, जिसमें चक्रवातीय हवा को मानसून कहते हैं।

3. फ्लॉन की विचारधारा (Flohn’s Concept)—मानसून पवनों की उत्पत्ति के बारे में सिद्धांतों में कमियों को देखते हुए फ्लॉन (Flohn) नामक विद्वान् ने एक नई विचारधारा को जन्म दिया। इसके अनुसार व्यापारिक पवनों और भूमध्य रेखीय निम्न वायु दाब क्षेत्र के आपसी मिलन स्थल (Inter-tropical convergence Zone-ITCZ) से पैदा हुए चक्रवातों के कारण मानसून पवनों की उत्पत्ति होती है और भारी वर्षा होती है, जिसे मानसून का फटना (Burst of Monsoon) कहते हैं। फ्लॉन के शब्दों में मानसून पवनें भू-मंडलीय पवन-तंत्र का ही रूपांतर हैं। (“The tropical Monsoon is simply a modification of Planetary wind system”.)

4. जेट प्रवाह विचारधारा (Jet Stream Theory)-वायुमंडल में ऊपरी सतहों में तेज़ गति से चलने वाली हवा को जेट प्रवाह कहते हैं। इस प्रवाह की गति 500 कि०मी० प्रति घंटा होती है। यह एक विशाल क्षेत्र को घेरे हुए 20°N-40°N के मध्य मिलती है। हिमालय पर्वत की रुकावट के कारण इसकी दो शाखाएँ हो जाती हैं-उत्तरी जेट प्रवाह और दक्षिणी जेट प्रवाह। दक्षिणी जेट प्रवाह भारत की जलवायु पर प्रभाव डालता है।
इस जेट प्रवाह के कारण दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पवनें भारत की ओर चलती हैं।

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प्रश्न (ङ)
चक्रवात क्या होते हैं ? उष्ण विभाजीय (कटिबंधीय) और शीतोष्ण विभाजीय (कटिबंधीय) चक्रवातों का वर्णन करें।
उत्तर-
चक्रवात निम्न वायुदाब का क्षेत्र होता है। चक्रवात में पवनें उत्तरी गोलार्द्ध (Northern Hemisphere) में घड़ी की दिशा के विपरीत तथा दक्षिणी गोलार्द्ध (Southern Hemisphere) में घड़ी की दिशा के साथ चलती हैं। इस प्रकार पवनों के उच्च वायु दाब से निम्न वायु दाब की ओर सुइयों के प्रतिकूल और अनुकूल चलने के कारण पवनों का एक चक्र उत्पन्न हो जाता है, जिसे चक्रवात कहते हैं। चक्रवात को उनकी स्थिति के अनुसार दो भागों में बांटा जाता है-

(1) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones)
(2) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)

1. शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones) – ये चक्रवात शीतोष्ण कटिबंध में मुख्य रूप से 30° से 60° अक्षांशों के मध्य पश्चिमी पवनों की पेटी में उत्पन्न होते हैं, जो आकृति में प्रायः वृत्त-आकार या अंडाकार होते हैं। इन्हें वायुगर्त (Depression) या निम्न (Low) या ट्रफ (Trough) भी कहते हैं।

1. आकृति और विस्तार (Shape and Size)-ये चक्रवात प्राय: वृत्त-आकार या अंडाकार होते हैं। इनका व्यास 1000 से 2000 किलोमीटर तक होता है। कभी-कभी इनका व्यास 3000 किलोमीटर से भी बढ़ जाता है। इनकी दाब-ढलान (Pressure Gradient) कम होती है।

2. उत्पत्ति (Formation)-शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति उष्ण और शीतल वायु-पिंडों (Air Masses) के मिलने से होती है। गर्म प्रदेशों से आने वाली गर्म पश्चिमी पवनें जब ध्रुवों से आने वाली पवनों से शीतोष्ण कटिबंध में मिलती हैं, तो शीतल पवनें गर्म पवनों को चारों ओर से घेर लेती हैं, जिसके फलस्वरूप केंद्र में गर्म पवनों से निम्न वायु दाब और बाहर गर्म पवनों से उच्च दाब बन जाता है। इस प्रकार चक्रवातों की उत्पत्ति होती है। इसे ध्रुवीय सीमांत सिद्धांत (Polar Front Theory) भी कहते हैं।
चक्रवातों के जीवन के इतिहास में अवस्थाओं का एक क्रम देखा जा सकता है-

1. पहली अवस्था-इस अवस्था के अनुसार दो वायु-राशियाँ एक-दूसरे के निकट आती हैं और सीमांत (Front) की रचना होती है। ध्रुवों की वायु-राशि और भूमध्य रेखा से आने वाली गर्म वायु विपरीत दिशाओं से आती है।

2. दूसरी अवस्था-इस अवस्था में उष्ण वायु-राशि में एक उभार उत्पन्न हो जाता है और फ्रंट एक तरंग का
रूप धारण कर लेता है। फ्रंट (Front) के दो भाग हो जाते हैं-उष्ण फ्रंट और शीत फ्रंट। गर्म वायु-राशि उष्ण फ्रंट (Warm Front) के निकट शीत वायु से टकराती है।

3. तीसरी अवस्था-इस अवस्था में शीत फ्रंट तेज़ी से आगे बढ़ता है। तरंगों की ऊँचाई और वेग में वृद्धि होती है। गर्म वायु-राशि का भाग छोटा हो जाता है।

4. चौथी अवस्था-इस अवस्था में तरंगों की ऊँचाई अधिकतम होती है। दोनों वायु राशियों में धाराएँ चक्राकार गति प्राप्त कर लेती हैं और चक्रवात का विकास होता है।

5. पाँचवी अवस्था-इस अवस्था में शीत फ्रंट उष्ण फ्रंट को पकड़ लेता है। शीतल वायु उष्ण वायु को धरातल पर दबा देती है।

6. अंतिम अवस्था-इस अवस्था में उष्ण वायु अपने स्रोत से हटकर ऊपर उठ जाती है। धरातल पर शीतल वायु की एक भँवर (Whirl) चक्रवात का निर्माण होता है।

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3. प्रवाह की दिशा (Direction of Movement)-चक्रवात सदा प्रवाहित होते रहते हैं। प्रायः ये प्रचलित पवनों द्वारा प्रवाहित होते हैं। पश्चिमी पवनों के कटिबंध में ये पूर्व दिशा की ओर चलते हैं। इनका क्षेत्र उत्तरी प्रशांत महासागर, उत्तरी संयुक्त राज्य अमेरिका और दक्षिणी कनाडा, उत्तरी अंधमहासागर और उत्तर-पश्चिमी यूरोप है।

4. वेग (Velocity)-इन चक्रवातों का वेग (गति) ऋतु और स्थिति पर निर्भर करता है। गर्म ऋतु की तुलना में शीतकाल में इनका वेग तीव्र होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में ये गर्मी की ऋतु में 60 कि०मी० प्रति घंटा और सर्दियों की ऋतु में 48 कि०मी० प्रति घंटे की गति से आगे बढ़ते हैं।

5. मौसम की स्थिति (Weather Conditions)—इनमें तापमान ऋतु परिवर्तन के साथ बदलता रहता है। शीतकाल में इसका अगला भाग कुछ उष्ण रहता है और पिछला भाग शीतल। गर्मी की ऋतु में पिछला भाग शीतकाल की तुलना में निम्न रहता है। आम तौर पर चक्रवात का अगला भाग पूरा वर्ष लगभग उष्ण-नम (Muggy) होता है। इन चक्रवातों के आने पर आकाश पर खंभ-आकारी बादल छा जाते हैं। सूर्य और चंद्रमा के आस-पास एक प्रकाश-वृत्त (Halo) बन जाता है। फिर धीरे-धीरे फुहार शुरू हो जाती है, जो जल्दी ही तेज़ वर्षा का रूप धारण कर लेती है। परंतु शीघ्र ही आकाश साफ और सुहावना हो जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि चक्रवात का केंद्र पहुँच गया है। जब यह केंद्र आगे बढ़ जाता है, तो मौसम फिर ठंडा हो जाता है। ठंड बहुत तेजी से बढ़ने लगती है। आकाश में घने बादल छा जाते हैं और वर्षा की झड़ी लग जाती है। वर्षा के साथ ओले भी पड़ने लगते हैं। बहुत तेज़ हवाएँ चलती हैं जिसके परिणामस्वरूप तापमान और भी कम हो जाता है। बादल गर्जते हैं और बिजली चमकती है। चक्रवात के शीत पिंड पर पहुँचने पर वर्षा बंद हो जाती है और इस प्रकार चक्रवात का अंत हो जाता है और आकाश साफ हो जाता है।

2. उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)-

उष्ण कटिबंध 2372° उत्तर से 2372° दक्षिणी अक्षांशों के बीच उत्पन्न होने वाले चक्रवातों को उष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहते हैं। ये चक्रवात अपनी आकृति, वेग और मौसमी स्थिति संबंधी विशेषताओं में अलग हैं।

1. आकृति और विस्तार (Shape and size)-ये चक्रवात प्रायः वृत्ताकार और शीतोष्ण चक्रवातों की तुलना में छोटे व्यास के होते हैं। इनका व्यास 80 से 3000 कि०मी० तक होता है; पर कभी-कभी ये 50 कि०मी० से भी कम व्यास के होते हैं।

2. उत्पत्ति (Formation)-इनकी उत्पत्ति गर्मी के कारण उत्पन्न संवहन धाराओं (Convection Currents) के द्वारा होती है। मुख्य रूप में चक्रवात भूमध्य रेखीय निम्न वायु दाब पेटी में उत्पन्न संवहन धाराओं का प्रतिफल है, विशेष रूप से जब यह पेटी सूर्य के साथ उत्तर की ओर खिसक जाती है। इसकी उत्पत्ति गर्मी की ऋतु के अंतिम भाग में होती है।

3. प्रवाह की दिशा (Direction of Movement)-इन चक्रवातों का मार्ग विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न होता है। प्राय: यह व्यापारिक पवनों के साथ पूर्व से पश्चिम दिशा में प्रवाह करते हैं। जब ये महासागर से स्थल में प्रवेश करते हैं, तो उनकी शक्ति कम हो जाती है और वे जल्दी ही समाप्त हो जाते हैं।

4. वेग (Velocity)–इन चक्रवातों के वेग में भिन्नता पाई जाती है। प्रायः ये 32 कि०मी० प्रति घंटा के वेग से चलते हैं, परंतु इनमें से कुछ अधिक शक्तिशाली, जैसे-हरीकेन (Harricane) और टाईफून (Typhoon) 120 कि०मी० प्रति घंटा से भी अधिक गति से चलते हैं। सागरों में इनकी गति तेज़ हो जाती है, परंतु स्थल पर विभिन्न भू-आकृतियों द्वारा रुकावट होने पर ये कमज़ोर पड़ जाते हैं। ये सदा गतिशील नहीं रहते। कभी-कभी ये एक स्थान पर ही कई दिन तक रुककर भारी वर्षा करते हैं।

5. मौसमी स्थिति (Weather Conditions)-उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के केंद्र को ‘चक्रवात की आँख’ (Eye of the Cyclone) कहा जाता है। इस क्षेत्र में आकाश साफ होता है। केंद्र में पवनें गर्म होकर ऊपर उठती हैं, जिसके परिणामस्वरूप घने बादल बन जाते हैं और तेज़ वर्षा करते हैं। चक्रवात के अगले भाग (Front) में पिछले भाग (Rear) की तुलना में गर्मी अधिक होती है। चक्रवात के दाएँ और अगले भाग में अधिक वर्षा होती है। ये अपनी प्रचंड गति वाली पवनों के कारण अत्यंत विनाशकारी होते हैं। इनमें अलगअलग पिंड (Front) न होने के कारण शीतोष्ण चक्रवातों के समान तापमान की भिन्नता नहीं होती। इन चक्रवातों के आने से पहले पतले सिरस बादल (Cirrus Clouds) की उत्पत्ति होती है। मौसम शांत और गर्म होता है। धीरे-धीरे कपासी (Cumulus) और पतली परत (Stratus) वाले बादल आ जाते हैं। जल्दी ही आकाश बादलों से ढक जाता है। अंधेरी आ जाती है और बादल गर्जते हैं। इसके बाद बड़ी-बड़ी बूंदों वाली वर्षा प्रारंभ हो जाती है। चक्रवात के पिछले भाग में ओले पड़ते हैं और कुछ समय बाद मौसम सुहावना हो जाता है।

प्रभावित प्रदेश (Affected Regions)-विश्व में इनसे प्रभावित होने वाले प्रमुख देश नीचे लिखे हैं-

  • पश्चिमी द्वीप समूह (West Indies)-इन प्रदेशों में इन चक्रवातों को हरीकेन (Hurricane) कहते हैं।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका मैक्सिको (Mexico)—यहाँ इन्हें टोरनैडो (Tornado) कहते हैं।
  • बंगाल की खाड़ी और अरब सागर-यहाँ इन्हें साइक्लोन (Cyclone) या चक्रवात कहते हैं।
  • फिलीपाइन द्वीप समूह (Philippine Island)–चीन और जापान में इन्हें टाईफून (Typhoon) कहते हैं। .
  • पश्चिमी अफ्रीका का गिनी प्रदेश–यहाँ इन चक्रवातों को टोरनैडो (Tornado) कहते हैं।
  • ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पश्चिमी प्रदेश–यहाँ इन्हें विल्ली-विल्ली (Willy-Willy) का नाम दिया जाता है।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का विनाशकारी प्रभाव-उष्ण कटिबंधीय चक्रवात निम्न दाब के केंद्र होते हैं। बाहर से तीव्र हवाएँ अंदर आती हैं। इनकी गति 200 कि०मी० प्रति घंटा होती है। ये चक्रवात महासागर के ऊपर बिना रोकटोक के चलते हैं। समुद्र में ऊँची-ऊँची लहरें उठती हैं, जिनसे समुद्री जहाजों को नुकसान होता है। समुद्री तटों के ऊपर छोटे-छोटे द्वीपों के ऊपर भयानक लहरें जान और माल का नुकसान करती हैं। हजारों लोग समुद्र में डूब जाते हैं। समुद्री यातायात ठप्प हो जाता है। सन् 1970 में बांग्लादेश में इसी प्रकार के चक्रवात आए थे, जिन्होंने जान और माल का बहुत अधिक नुकसान किया था।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें

प्रश्न (च)
निम्नलिखित पर नोट लिखें(i) टोरनैडो (ii) विपरीत चक्रवात।
उत्तर-
(i) टोरनैडो या बवंडर (Tornado)-संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्यवर्ती मैदान में गर्मी की ऋतु के प्रारंभ होने के साथ तेज़ आंधियाँ चलनी आरंभ हो जाती हैं, जिन्हें बवंडर के नाम से पुकारा जाता है। इन मैदानों में गर्मी की ऋतु आरंभ होते ही गर्मी में तेजी से वृद्धि होनी आरंभ हो जाती है। फलस्वरूप वहाँ निम्न वायु दाब उत्पन्न हो जाता है। निकटवर्ती बर्फ से ढके रॉकी पर्वत के उच्च वायु दाब से अत्यंत ठंडी और शुष्क पवनें तेज़ गति से यहाँ पहुँचती हैं और मैक्सिको की खाड़ी से आती हुई गर्म और नम पवनों के साथ संबंध स्थापित कर लेती हैं। शीतल और शुष्क तथा उष्ण और नम पवनों के मेल से प्रचंड बवंडर की उत्पत्ति होती है। ये बवंडर बहुत विनाशकारी होते हैं।

(ii) विपरीत चक्रवात (Anti-Cyclones)-विपरीत चक्रवात में वायु दाब की व्यवस्था चक्रवात से बिल्कुल विपरीत होती है। जब मध्य में उच्च वायु दाब और चारों ओर निम्न वायु दाब होता है, तो वायु दाब की इस स्थिति को प्रति चक्रवात कहते हैं। इसमें पवनें केंद्र से बाहर की ओर चलती हैं। फैरल के नियम के अनुसार, उत्तरी गोलार्द्ध में यह घड़ी की सुइयों के समान (Clockwise) और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के विपरीत (Anti-Clock wise) चलती हैं। केंद्र से बाहर की ओर वायु दाब निम्न होता जाता है जिससे प्रति चक्रवात में समदाब रेखाएँ (Isobars) लगभग गोलात्मक होती हैं।

(क) आकृति और विस्तार (Shape and Size)-प्रति चक्रवात प्रायः वृत्त आकार के होते हैं, परंतु कभी-कभी दो चक्रवातों के बीच स्थित होने के कारण ये फलीदार (Wedge-Shaped) होते हैं। ये – बहुत बड़े होते हैं, जिनका व्यास 3000 कि०मी० से भी अधिक होता है। कभी-कभी तो इनका व्यास 9000 कि०मी० तक भी होता है। समूचे यूरोप और साइबेरिया जैसे विशाल भू-खंड को कभी-कभी एक ही प्रतिकूल चक्रवात घेर लेता है।

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(ख) मार्ग और वेग (Track and Velocity)-प्रतिकूल चक्रवात का अपना कोई निश्चित मार्ग नहीं होता क्योंकि ये प्रायः शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों में रहते हैं और उनका मार्ग ही अपनाते हैं। कभी-कभी ये एक ही स्थान पर निरंतर कई दिनों तक रहते हैं। जब ये चलते हैं, तो इनका वेग 30 से 50 कि०मी० प्रति घंटा होता है। इनकी दिशा और मार्ग अनिश्चित होते हैं। ये अचानक प्रवाह दिशा में परिवर्तन भी कर लेते हैं।

Geography Guide for Class 11 PSEB वपवनें Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न तु (Objective Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-4 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
पूर्वी पवनें किन्हें कहते हैं ?
उत्तर-
व्यापारिक पवनों को।

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प्रश्न 2.
व्यापारिक पवनों की उत्तरी गोलार्द्ध में दिशा बताएँ।
उत्तर-
उत्तरी-पूर्वी।

प्रश्न 3.
व्यापारिक पवनों के मरुस्थल कहाँ मिलते हैं ?
उत्तर-
पश्चिमी भागों में।

प्रश्न 4.
पश्चिमी पवनों की उत्तरी गोलार्द्ध में दिशा बताएँ।
उत्तर-
दक्षिणी-पश्चिमी।।

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प्रश्न 5.
उस प्राकृतिक खंड का नाम बताएँ, जहाँ पश्चिमी पवनों के कारण सर्दियों में वर्षा होती है।
उत्तर-
भू-मध्य सागरीय खंड।

प्रश्न 6.
शीतोष्ण चक्रवात किन पवनों के साथ-साथ चलते हैं ?
उत्तर-
पश्चिमी पवनों।

प्रश्न 7.
40°- 50° दक्षिणी अक्षांशों में पश्चिमी पवनों को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
गर्जता चालीस।

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प्रश्न 8.
रॉकी पर्वत से नीचे उतर कर प्रेरीज़ में चलने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-
चिनूक पवनें।

प्रश्न 9.
अल्पस पर्वत से नीच उतर कर चलने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-
फोहन पवनें।

प्रश्न 10.
दिन के समय तटीय क्षेत्रों में चलने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-
जल-समीर।

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प्रश्न 11.
रात के समय तटीय क्षेत्रों में चलने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-
थल-समीर।

प्रश्न 12.
दिन के समय पहाड़ी ढलानों के ऊपर उठने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-
घाटी पवनें।

प्रश्न 13.
रात के समय घाटी ढलानों से नीचे उतरने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-
पर्वतीय पवनें।

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प्रश्न 14.
आरोही पवनों को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
घाटी पवनें।

प्रश्न 15.
अवरोही पवनों को क्या कहते हैं ?
उत्तर-
पर्वतीय पवनें।

प्रश्न 16.
बर्फ को खाने वाली पवनों का नाम बताएँ।
उत्तर-
चिनूक पवनें।

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बहुविकल्पीय प्रश्न

नोट-सही उत्तर चुनकर लिखें-

प्रश्न 1.
उत्तरी गोलार्द्ध में व्यापारिक पवनों की दिशा है
(क) उत्तर-पूर्वी
(ख) दक्षिण-पूर्वी
(ग) पश्चिमी
(घ) दक्षिणी।
उत्तर-
उत्तर-पूर्वी।

प्रश्न 2.
वायु दाब मापने की इकाई है-
(क) बार
(ख) मिलीबार
(ग) कैलोरी
(घ) मीटर।
उत्तर-
मिलीबार।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 2-3 वाक्यों में दें-

प्रश्न 1.
नक्षत्रीय पवनों या स्थायी पवनों से क्या अभिप्राय है ? इनके उदाहरण बताएँ।
उत्तर-
भू-तल पर सदा एक ही दिशा में लगातार चलने वाली पवनों को स्थायी या नक्षत्रीय पवनें कहते हैं, जैसेव्यापारिक पवनें, पश्चिमी पवनें और ध्रुवीय पवनें।

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प्रश्न 2.
व्यापारिक पवनों की दिशा बताएँ।
उत्तर-
उत्तरीय गोलार्द्ध में व्यापारिक पवनें उत्तर-पूर्व दिशा में और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्व दिशा में चलती हैं।

प्रश्न 3.
पश्चिमी पवनों की दिशा बताएँ।
उत्तर-
पश्चिमी पवनें उत्तरी-गोलार्द्ध में दक्षिण-पश्चिम दिशा में और दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिम दिशा में चलती हैं।

प्रश्न 4.
व्यापारिक पवनों के क्षेत्र में पश्चिमी भागों में मरुस्थल क्यों मिलते हैं ?
उत्तर-
व्यापारिक पवनें पूर्वी भागों में वर्षा करती हैं और पश्चिमी भाग शुष्क रह जाते हैं। यहाँ सहारा, थार, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया, कालाहारी, ऐटेकामा मरुस्थल मिलते हैं।

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प्रश्न 5.
दक्षिणी गोलार्द्ध में पश्चिमी पवनों के कोई चार उपनाम बताएँ।
उत्तर-
दक्षिणी गोलार्द्ध में थल की कमी के कारण पश्चिमी पवनों के मार्ग में कोई रुकावट नहीं होती। तेज़ गति से चलने के कारण इन्हें वीर पश्चिमी पवनें (Brave Westerlies) कहते हैं। 40°-50° अक्षाशों में गर्जता चालीस (Roaring forties), 50°-60° अक्षाशों में गुस्सैल पचास (Ferocious fifties) और 60° से आगे इन्हें कूकते या चीखते साठ (Shrieking Sixties) कहते हैं।

प्रश्न 6.
तटवर्ती भागों में चलने वाली दो स्थानीय पवनों के नाम बताएँ।
उत्तर-
थल समीर और जल समीर।

प्रश्न 7.
पर्वतीय भागों की दो स्थानीय पवनों के नाम बताएँ।
उत्तर-
पर्वतीय समीर और घाटी समीर।

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प्रश्न 8.
पर्वतीय ढलानों से नीचे उतरती दो स्थानीय पवनों के नाम बताएँ।
उत्तर-
चिनूक पवनें (उत्तरी अमेरिका) और फोहन पवनें (अल्पस पर्वत)।

प्रश्न 9.
थल समीर और जल समीर में क्या अंतर है ?
उत्तर-
तटवर्ती भागों में दिन के समय समुद्र से थल की ओर जल समीर चलती है, परंतु रात के समय थल से समुद्र की ओर थल समीर चलती है।

प्रश्न 10.
चिनूक पवनों और फोहन पवनों के बारे में बताएँ।
उत्तर-
चिनूक पवनें रॉकी पर्वतीय ढलानों से उतर कर अमेरिका और कनाडा के मैदानी भागों में चलती हैं। ये गर्म पवनें बर्फ को पिघला देती हैं। अल्पस पर्वत को पार करके फोहन पवनें स्विट्ज़रलैंड में चलती हैं।

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प्रश्न 11.
कुछ स्थानीय पवनों के नाम बताएँ, जो यूरोप और अफ्रीका की ओर चलती हैं।
उत्तर-

  1. बौरा पवनें-इटली
  2. मिस्ट्रल-फ्रांस के तट पर
  3. लू-उत्तरी भारत
  4. हर्मटन-पश्चिमी अफ्रीका
  5. सिरोको-इटली।

प्रश्न 12.
पवन पेटियों के खिसकने का क्या कारण है ?
उत्तर-
पृथ्वी की वार्षिक गति में 21 जून को सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर लंब पड़ती है। परिणामस्वरूप उच्च तापमान के क्षेत्र भी अपना स्थान बदल लेते हैं, इसलिए गर्मियों में सभी पवनों की पेटियाँ कुछ उत्तर की ओर तथा सर्दी की ऋतु में दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं।

प्रश्न 13.
पवन-पेटियों के खिसकने का रोम सागरीय खंड पर क्या प्रभाव होता है ?
उत्तर-
पवन-पेटियों के खिसकने के कारण रोम सागरीय खंड (30°-45°) में गर्मी की ऋतु में उच्च वायु दाब पेटी बन जाती है और शुष्क ऋतु होती है, परंतु सर्दी की ऋतु में यहाँ पश्चिमी पवनें चलती हैं और वर्षा करती हैं। रोम सागरीय खंड को शीतकाल की वर्षा का खंड कहते हैं।

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प्रश्न 14.
कोरियोलिस बल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
पवनें उत्तर-दक्षिण दिशा की ओर चलती है, परंतु पृथ्वी की घूमने की गति के कारण उनमें विक्षेप बल पैदा होता है, जिसके कारण पवनें अपने दायीं या बायीं ओर मुड़ जाती हैं, इस बल को कोरियोलिस बल कहते हैं।

प्रश्न 15.
फैरल का सिद्धांत क्या है ?
उत्तर-
पृथ्वी के घूमने के प्रभाव के अंतर्गत भू-तल पर चलने वाली पवनें उत्तरी-गोलार्द्ध में अपने दाएँ हाथ और.. दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बाएँ हाथ की ओर मुड़ जाती हैं, इसे फैरल (Ferral) का सिद्धांत कहते हैं।

प्रश्न 16.
Buys Ballot का नियम क्या है ?
उत्तर-
Buys Ballot नामक वैज्ञानिक के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में निम्न वायु दाब का क्षेत्र पवन प्रवाह की दिशा के दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में प्रवाह की दिशा के बायीं ओर होता है। इसे Buys Ballot का नियम कहते हैं।

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लघु उत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 60-80 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
भूमध्य रेखा का शांत खंड कैसे बनता है ?
उत्तर-
स्थिति (Location)-यह शांत खंड भूमध्य रेखा के दोनों तरफ 5°N और 5°S के मध्य स्थित है। इसे भूमध्य रेखा का शांत खंड (Equatorial Calms) भी कहते हैं। धरातल पर चलने वाली वायु की मौजूदगी नहीं होती या बहुत ही शांत वायु चलती है। यह शांत खंड भूमध्य रेखा के चारों ओर फैला हुआ है। इस खंड में सूर्य की किरणें पूरा वर्ष सीधी पड़ती हैं और औसत तापमान अधिक रहता है। हवा गर्म और हल्की होकर लगातार संवाहक धाराओं (Convection Currents) के रूप में ऊपर उठती रहती है और धरालत पर वायु दाब कम हो जाता है।

प्रश्न 2.
फैरल के नियम का वर्णन करें।
उत्तर-
फैरल का नियम (Ferral’s Law)-धरालत पर पवनें कभी भी उत्तर से दक्षिण की ओर सीधी नहीं चलतीं। सभी पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर तथा दक्षिण गोलार्द्ध में अपनी बायीं ओर मुड़ जाती हैं। इसे फैरल का नियम कहते हैं । (“All moving bodies are deflected to the right in the Northern Hemisphere and to the left in the Southern Hemisphere.”)

हवा की दिशा में परिवर्तन का कारण धरती की दैनिक गति है। जब हवाएँ धीमी चाल वाले भागों से तेज़ चाल वाले भागों की ओर आती हैं, तो पीछे रह जाती हैं, जैसे-उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें अपनी दायीं ओर मुड़ जाती हैं। पश्चिमी पवनें भी मुड़कर उत्तर-पश्चिमी दिशा में चलती हैं। इसी प्रकार दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें अपनी बायीं ओर मुड़ जाती हैं। पश्चिमी पवनें भी मुड़कर दक्षिण-पश्चिमी दिशा में चलती हैं। इस विक्षेप शक्ति को कोरोलिस बल (Corolis Force) भी कहते हैं।

प्रश्न 3.
जल समीर और थल समीर में अंतर बताएँ।
उत्तर-
1. जल समीर (Sea Breeze)—ये वे पवनें हैं, जो दिन के समय समुद्र से थल की ओर चलती हैं। दिन के समय सूर्य की तीखी गर्मी से थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक और जल्दी गर्म हो जाता है। थल पर हवा गर्म होकर ऊपर उठती है और निम्न वायु दाब बन जाता है, परंतु समुद्र पर थल की तुलना में अधिक वायु दाब रहता है। इस प्रकार थल पर निम्न दबाव का स्थान लेने के लिए समुद्र की ओर से ठंडी हवाएँ चलती हैं। थल की गर्म हवा ऊपर उठकर समुद्र की ओर चली जाती है, इस प्रकार हवा के बहने का एक चक्र बन जाता है। जल समीर ठंडी और सुहावनी (Cool and Fresh) होती है।

2. थल समीर (Land Breeze)-ये वे पवनें हैं, जो दिन के समय थल से समुद्र की ओर चलती हैं। रात को स्थिति दिन के विपरीत होती है। थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक और जल्दी ठंडे हो जाते हैं। समुद्र पर वायु दाब कम हो जाता है, परंतु थल पर अधिक वायु दाब होता है। इस प्रकार थल से समुद्र की ओर पवनें चलती हैं। समुद्र की गर्म हवा ऊपर उठकर थल पर उतरती है, जिससे हवा के बहने का एक चक्र बन जाता है।

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प्रश्न 4.
पर्वतीय और घाटी की पवनों में अंतर बताएँ।
उत्तर-
1. पर्वतीय पवनें (Mountain Winds)-पर्वतीय प्रदेशों में रात के समय पर्वत के शिखर से घाटी की ओर ठंडी और भारी हवाएं चलती हैं, जिन्हें पर्वतीय पवनें (Mountain Winds) कहते हैं। रात के समय तेज़ विकिरण (Rapid Radiation) के कारण हवा ठंडी और भारी हो जाती है। यह हवा गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravity) के कारण ढलानों से होकर नीचे उतरती है। इसे वायु प्रवाह (Air Drainage) भी कहते हैं। इन पवनों के कारण घाटियाँ (Valleys) ठंडी हवाओं से भर जाती हैं, जिसके फलस्वरूप घाटी के निचले भागों
में पाला पड़ता है।

2. घाटी की पवनें (Valley Winds)-दिन के समय घाटी की गर्म हवाएँ ढलान पर से होकर चोटी की ओर ऊपर चढ़ती हैं, इन्हें घाटी की पवनें (Valley Winds) कहते हैं। दिन के समय पर्वत के शिखर पर तेज़ गर्मी और वायु दाब पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह प्रदेश घोड़ा अक्षांशों की उच्च वायु दाब पेटी के प्रभाव में आ जाता है, जिसके कारण पवनें इस प्रदेश की ओर नहीं चलतीं। इसलिए यहाँ गर्मियों में वर्षा नहीं होती। इसके विपरीत सर्दियों में वायु दाब पेटियों के दक्षिणी दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह खंड पश्चिमी पवनों के प्रभाव में आ जाता है और ये पवनें इस खंड में वर्षा करती हैं। इस प्रकार भूमध्य सागरीय प्रदेश में शीतकाल में वर्षा होती है, जबकि गर्मी की ऋतु में यह शुष्क रहता है।

प्रश्न 5.
चक्रवात से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
चक्रवात (Cyclones)—वायु दाब में अंतर होने के कारण वायुमंडल गतिशील होता है। जिस क्षेत्र में वायु दाब निम्न होता है, उसके निकटवर्ती चारों ओर के क्षेत्रों में उच्च वायु दाब होता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च वायु दाब क्षेत्र से निम्न वायु क्षेत्र की ओर पवनें चलती हैं। फैरल के नियम अनुसार पृथ्वी की दैनिक गति के कारण पवनें उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दायीं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाती हैं। परिणामस्वरूप इन पवनों की गति उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों के विपरीत (anti-clock wise) और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुइयों की समान (clock wise) दिशा में होती है। इस प्रकार पवनों के उच्च वायु दाब से निम्न वायु दाब की ओर सुइयों के विपरीत और अनुकूल चलने के कारण पवनों का एक चक्र उत्पन्न हो जाता है, जिसे चक्रवात कहते हैं।

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प्रश्न 6.
शीतोष्ण चक्रवात की प्रमुख विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर-
शीतोष्ण चक्रवात (Temperate Cyclones)-

  • ये चक्रवात पश्चिमी पवनों के क्षेत्र में 35° से 65° के अक्षांशों के बीच पश्चिमी-पूर्वी दिशा में चलते हैं।
  • शीतोष्ण चक्रवात की शक्ल गोलाकार या V आकार जैसी होती है।
  • इस प्रकार के चक्रवातों की मोटाई 9 से 11 किलोमीटर और व्यास 100 किलोमीटर चौड़ा होता है।
  • चक्रवात की अभिसारी पवनें केंद्र की वायु को ऊपर उठा देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप बादलों का निर्माण और वर्षा होती है।
  • साधारण रूप में इनकी गति 50 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। गर्मी की ऋतु की तुलना में शीतकाल में इनकी गति अधिक होती है।

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प्रश्न 7.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के प्रमुख गुणों का वर्णन करें।
उत्तर-
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)-

  • ये चक्रवात 50 से 30° अक्षांशों के बीच व्यापारिक पवनों के साथ-साथ पूर्व से पश्चिम दिशा में चलते हैं।
  • इनके केंद्र में निम्न दाब होता है और समदाब रेखाएँ गोलाकार होती हैं।
  • साधारण रूप में इनका आकार और विस्तार छोटा होता है। इनका व्यास 150 से 500 मीटर तक होता है।
  • चक्रवात के केंद्रीय भाग को ‘तूफान की आँख’ (Eye of the Storm) कहते हैं। ये प्रदेश शांत और वर्षाहीन होते हैं। ये गर्म वायु की धाराओं के रूप में ऊपर से उठने पर बनता है और इसकी ऊर्जा का स्रोत संघनन की गुप्त ऊष्मा है।
  • शीत ऋतु की तुलना में गर्मी की ऋतु में इनका अधिक विकास होता है।
  • इन चक्रवातों में हरीकेन और तूफान बहुत विनाशकारी होते हैं।
  • इन चक्रवातों द्वारा भारी वर्षा होती है।

निबंधात्मक प्रश्न (Essay Type Questions)

नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर 150-250 शब्दों में दें-

प्रश्न 1.
वायु पेटियों के खिसकने के कारण और प्रभाव बताएँ।
उत्तर-
पृथ्वी की वार्षिक गति और इसका अपनी धुरी पर झुके रहने के कारण पूरा वर्ष सूर्य की किरणें एक समान नहीं पड़तीं। सूर्य की किरणें 21 जून को कर्क रेखा पर लंब पड़ती हैं, तब वायु पेटियाँ उत्तर की ओर खिसक जाती हैं। 22 दिसंबर को सूर्य की किरणें मकर रेखा पर लंब पड़ती हैं, तब वायु पेटियाँ दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं।

इस क्रिया को वायु दाब पेटियों का सरकना (Swing of the Pressure Belts) कहते हैं। पवनें वायु दाब की भिन्नता के कारण उत्पन्न होती हैं, इसलिए वायु दाब पेटियों के साथ-साथ पवन पेटियाँ भी सरक जाती हैं।

कारण (Causes)—पृथ्वी की धुरी पर तिरछा स्थित होने के कारण परिक्रमा के समय सूर्य 237°N त 237°S तक (47° क्षेत्र) में अपनी स्थिति बदलता रहता है। इस स्थिति बदलने की क्रिया के कारण उच्च तापमान की पेटियाँ भी उत्तर या दक्षिण की ओर खिसक जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप वायु पेटियाँ भी सरकती हैं।

21 जून की दशा (Summer Solstice)—सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर लंब पड़ती हैं। इस क्षेत्र के उच्च वायु दाब का स्थान निम्न वायु दाब पेटी ले लेती है। उच्च वायु दाब पेटी उत्तर की ओर सरक जाती है।

22 दिसंबर की दशा (Winter Solstice)—सूर्य की किरणें मकर रेखा पर लंब पड़ती हैं। उच्च वायु दाब पेटी कुछ दक्षिण की ओर खिसक जाती है और इसका स्थान निम्न वायु दाब पेटी ले लेती है।

वायु दाब और पवनों के खिसकने से नीचे लिखे प्रभाव पड़ते हैं-

प्रभाव (Effects)-

1. गर्मी की ऋतु में मानसून पवनों की उत्पत्ति (Formation of Summer Monsoons)-गर्म संक्रांति या 21 जून को सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर लंब पड़ती हैं, जिसके फलस्वरूप भूमध्य रेखा पर निम्न वायु दाब पेटी कर्क रेखा की ओर खिसक जाती है। घोड़ा अक्षांशों के दक्षिणी उपोष्ण उच्च वायु दाब पेटी से आने वाली पवनें भूमध्य रेखा को पार करके फैरल के नियम के अनुसार, दक्षिण-पश्चिमी हो जाती हैं, उन्हें गर्मी की ऋतु की मानसून पवनें कहते हैं। इस प्रकार मानसूनी पवनें भूमंडलीय पवन-तंत्र (Planetary Wind System) का ही रूपांतर होती हैं।

2. सर्दी की ऋतु में मानसून पवनों की उत्पत्ति (Formation of Winter Monsoons)-शीत संक्रांति या 22 दिसंबर को सूर्य की लंब किरणें मकर रेखा पर पड़ती हैं, जिसके फलस्वरूप भूमध्य रेखीय निम्न दाब पेटी मकर रेखा की ओर खिसक जाती है। घोड़ा अक्षांशों की उत्तरी उपोष्ण उच्च वायु दाब पेटी की पवनें भूमध्य रेखा को पार करते ही, फैरल के नियम के अनुसार दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी बायीं ओर मुड़ जाती हैं। फलस्वरूप दक्षिणी गोलार्द्ध में इनकी दिशा उत्तर-पश्चिमी हो जाती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इन पवनों को शीत काल की मानसूनी पवनों का नाम दिया जाता है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें 12

3. सुडान जैसे प्राकृतिक प्रदेशों पर प्रभाव (Effect on Sudan type of Natural Region)-सुडान जैसे प्राकृतिक प्रदेश 5° से 20° अक्षांश पर महाद्वीप के मध्यवर्ती क्षेत्रों में विस्तृत हैं। शीतकाल में वायु दाब पेटियों के दक्षिण दिशा में सरकने के फलस्वरूप यह खंड घोड़ा अक्षांशों की उच्च वायु दाब पेटी के प्रभाव के अंतर्गत आ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप पवनें इस प्रदेश की ओर नहीं चलतीं, इसलिए यह क्षेत्र शीतकाल की वर्षा से रहित रहता है। इसके विपरीत गर्मियों में वायु दाब पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह प्रदेश भूमध्य रेखीय निम्न वायु दाब पेटी के प्रभाव में आ जाता है, फलस्वरूप पवनें इस प्रदेश की ओर चलती हैं और वर्षा करती हैं। इस प्रकार सुडान प्रदेश में गर्मियों में वर्षा होती है।

4. रोम सागरीय प्राकृतिक प्रदेश पर प्रभाव (Effect on Mediterranean Type of Natural Region) रोम सागरीय प्राकृतिक प्रदेश 30°-45° अक्षांशों के बीच महाद्वीप के पश्चिमी भागों में विस्तृत है। गर्मियों में वायु दाब पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह प्रदेश घोड़ा अक्षांशों की उच्च पेटी के प्रभाव में आ जाता है, जिसके परिणामस्वरूप पवनें इस प्रदेश की ओर नहीं चलतीं। इसलिए यह गर्मी की वर्षा से रहित रह जाता है। इसके विपरीत सर्दियों में वायु दाब पेटियों के दक्षिण दिशा में खिसकने के फलस्वरूप यह खंड पश्चिमी पवनों के प्रभाव में आ जाता है और ये पवनें इस खंड में वर्षा करती हैं। इस प्रकार रोम सागरीय प्रदेश में शीतकाल में वर्षा होती है, जबकि गर्मी की ऋतु शुष्क रहती है।

PSEB 11th Class Geography Solutions Chapter 7 पवनें

प्रश्न 2.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों और शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की तुलना करें।
उत्तर-
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclones)-

  1. स्थिति-ये चक्रवात उष्ण कटिबंध में 50°- 30° अक्षांशों तक चलते हैं।
  2. दिशा-ये व्यापारिक पवनों के साथ पूर्व से पश्चिम की ओर चलते हैं।
  3. विस्तार-इनका व्यास 150 से 500 किलोमीटर तक होता है।
  4. आकार-ये गोल आकार के होते हैं।
  5. उत्पत्ति-ये संवाहक धाराओं के कारण जन्म लेते हैं।
  6. गति-इनमें हवा की गति 100 से 200 किलोमीटर प्रति घंटा होती है।
  7. रचना-यह अधिक गर्मी की ऋतु में अस्तित्व में आते हैं। इनके केंद्रीय भाग को ‘तूफान की आँख’ कहा जाता है।
  8. मौसम-इसमें थोड़े समय के लिए तेज़ हवाएँ चलती हैं और भारी वर्षा होती है।

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclones)-

  1. ये चक्रवात शीतोष्ण कटिबंध में 35°-65° अक्षांश तक चलते हैं।
  2. ये पश्चिमी पवनों के साथ-साथ पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हैं।
  3. इनका व्यास 1000 किलोमीटर से अधिक होता है।
  4. ये ‘V’ आकार के होते हैं।
  5. ये गर्म और ठंडी हवाओं के मिलने से जन्म लेते हैं।
  6. इनमें हवा की गति 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा होती है।
  7. यह अधिक सर्दी की ऋतु में बनते हैं। इसके दो भाग-उष्ण सीमांत और शीत सीमांत होते हैं।
  8. इसमें शीत लहर चलती है और कई दिनों तक रुक-रुककर वर्षा होती है।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 4 घर

Punjab State Board PSEB 6th Class Home Science Book Solutions Chapter 4 घर Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 6 Home Science Chapter 4 घर

PSEB 6th Class Home Science Guide घर Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
बड़े शहरों में घर की सफ़ाई के लिए बिजली से चलने वाले किस उपकरण का प्रयोग किया जा सकता है ?
उत्तर-
वैक्यूम क्लीनर, कार्पेट स्वीपर।

प्रश्न 2.
दरी साफ़ करने के लिए किस उपकरण का प्रयोग किया जा सकता
उत्तर-
ब्रुश का।

प्रश्न 3.
प्रतिदिन प्रयोग में आने वाली कौन-कौन सी सुविधाएं घर के पास होनी चाहिए ?
उत्तर-
कार्य का स्थान, स्कूल, अस्पताल, बैंक, बाजार आदि।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 4 घर

प्रश्न 4.
घर कैसी जगहों के पास नहीं होना चाहिए ?
उत्तर-
स्टेशन, श्मशान घाट आदि के पास नहीं होना चाहिए।

लघूत्तर प्रश्न

प्रश्न 1.
घर का क्या अर्थ है ?
उत्तर-
मनुष्य जहाँ अपने परिवार के साथ रहने की व्यवस्था करता है वही उसका घर कहलाता है।

प्रश्न 2.
घर के आस-पास कैसे लोग होने चाहिएँ ?
उत्तर-
घर के आस-पास के लोग गम्भीर, मिलनसार तथा सुख-दुःख के साथी होने चाहिएँ।

प्रश्न 3.
यदि फैक्टरी, स्टेशन घर के समीप हों तो क्या हानि है ?
उत्तर-
यदि फैक्टरी, स्टेशन घर के समीप हों तो हमें निम्न हानियाँ हैं-फैक्टरी का धुआँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तथा रेलें शांति को समाप्त करती हैं।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 4 घर

प्रश्न 4.
मकान बनाते समय कौन-सी सुविधाओं को ध्यान में रखना चाहिए ?
उत्तर-
मकान बनाते समय निम्नलिखित सुविधाओं को ध्यान में रखना चाहिए –

  1. मकान बनाते समय यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि दैनिक प्रयोग में आने वाली वस्तुएँ शीघ्र तथा सुगमता से प्राप्त हो सकती हों।
  2. नौकरी वाले लोगों के लिए नौकरी का स्थान तथा दुकानदार के लिए दुकान समीप होना चाहिए।
  3. अस्पताल तथा बाज़ार भी घर से बहुत दूर नहीं होने चाहिए।
  4. डाकघर तथा बैंक भी समीप होना चाहिए।
  5. रिक्शा, टाँगा और लोकल बस सुगमता से प्राप्त होनी चाहिए।

प्रश्न 5.
घर को साफ़ रखना क्यों जरूरी है ?
उत्तर-
गंदा घर कीड़े-मकौड़े पैदा करके बीमारियाँ पैदा करता है। इसलिए घर को साफ़ रखना ज़रूरी है।

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
घर को साफ़ करने के ढंगों के नाम लिखो।
उत्तर-
घर साफ़ करने के लिए निम्नलिखित ढंग इस प्रकार हैं –

  1. झाड़ लगाना,
  2. झाड़ना,
  3. पोचा लगाना।

PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 4 घर

प्रश्न 2.
चीज़ों को झाड़ लगाने के बाद क्यों झाड़ना चाहिए ?
उत्तर-
वस्तुएँ झाड़ने का काम झाडू लगाने के बाद तथा पोचा लगाने से पहले करना चाहिए ताकि झाड़ लगाने से जो मिट्टी वस्तुओं पर उड़कर पड़ती है, वह झाड़न से साफ़ हो जाए।

प्रश्न 3.
पोचा लगाने तथा ब्रश फेरने में क्या अन्तर है ?
उत्तर-
पोचा लगाने तथा ब्रुश फेरने में अन्तर –

पोचा ब्रुश
1. पक्के फर्श पर प्रतिदिन झाड़ लगाने के बाद मोटे कपड़े को गीला करके पोचा लगाना चाहिए। 1. सप्ताह में एक बार दीवारों तथा छत को झाड़ लगाने से पहले ब्रुश से साफ़ कर लेना चाहिए।
2. पोचा लगाने वाला कपड़ा मोटा और ऐसा होना चाहिए कि पानी तथा मिट्टी को सोख सके। 2. ब्रुश ऐसा होना चाहिए जिससे मकड़ी तथा कीड़े-मकौड़े से छुटकारा मिल  जाए।
3. पोचा मोटा सूती कपड़ा फलालेन या बाज़ार से मिलने वाला पोचा प्रयोग करना चाहिए। 3. ब्रश एक बलिश्त लम्बा तथा छोटी सी हत्थी वाला प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 4.
ब्रुश या झाड़ की किस्मों के बारे में तुम जो जानते हो, विस्तार से लिखो।
उत्तर-
ब्रुश की किस्में –
1. दरी या कालीन साफ़ करने वाला ब्रुश-यह सख्त बुर का एक बलिश्त लम्बा छोटी-सी हत्थी वाला ब्रुश होता है। इससे दरी तथा कालीन साफ़ किए जाते हैं।

2. पालिश करने वाला बुश-खिड़कियों, अलमारियों, जालीदार डोली तथा कमरों के दरवाज़े पालिश करने के लिए छोटी-सी डंडी वाला ब्रुश होता है।

3. फर्श धोने के लिए ब्रुश-ईंटों का फर्श धोने के लिए लोहे की तार का सुदृढ़ ब्रुश होता है। इससे ईंटों से मिट्टी तथा चिकनाई सुगमता से दूर की जाती है।।

4. सफेदी (कली) करने वाला ब्रुश-घर की दीवारों पर सफेदी करने के लिए बाज़ार से घास-फूस का बना ब्रुश मिलता है। उसे कूची कहा जाता है।
PSEB 6th Class Home Science Solutions Chapter 4 घर 1

5. दीवारें तथा छतें साफ़ करने के लिए ब्रुश-यह गोलाकार होता है। दीवारों तथा छत तक पहुँचाने के लिए इसके साथ लम्बी छड़ी लगी होती है। इससे जाले तथा मिट्टी बड़ी सुगमता से साफ़ हो जाते हैं।

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Home Science Guide for Class 6 PSEB घर Important Questions and Answers

अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
आदिकाल में मनुष्य कहाँ रहते थे ?
उत्तर-
गुफाओं में ।

प्रश्न 2.
घर किन चीज़ों से बनता है ?
उत्तर-
मकान तथा परिवार से।

प्रश्न 3.
प्राणी में जन्मजात चेतना क्या होती है ?
उत्तर-
प्राणी अपने विकास के लिए ऐसे ठौर का निर्माण करना चाहता है जहाँ उसे सुख-शाँति प्राप्त हो सके। यही जन्मजात चेतना होती है।

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प्रश्न 4.
समय, श्रम व धन की बचत के लिए मकान कहाँ होना चाहिए ?
उत्तर-
समय, श्रम व धन की बचत के लिए मकान, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, दफ्तर, बाज़ार आदि के निकट होना चाहिए।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
घर में व्यक्ति को कौन-कौन सी सुविधाएँ मिलती हैं ?
उत्तर-
घर में व्यक्ति को निम्न सुविधाएँ मिलती हैं –

  1. सुरक्षात्मक सुविधाएँ
  2. कार्य करने की सुविधा
  3. शारीरिक सुख
  4. मानसिक शान्ति
  5. विकास एवं वृद्धि की सुविधा।

प्रश्न 2.
हमारा घर कैसा होना चाहिए ?
उत्तर-
हमारा घर ऐसा होना चाहिए जहां –

  1. परिवार के सभी सदस्यों के पूर्ण विकास व वृद्धि का ध्यान रखा जाए।
  2. सदा प्रत्येक सदस्य की कार्य क्षमता को प्रोत्साहन दिया जाए।
  3. एक-दूसरे के प्रति सद्भावना व प्रेम से व्यवहार किया जाए।
  4. परिवार की आर्थिक स्थिति में पूर्ण योगदान दिया जाए।

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प्रश्न 3.
घर की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर-

  1. वर्षा, धूप, ठण्ड, आँधी, तूफ़ान आदि से बचने के लिए।
  2. जीव-जन्तुओं, चोरों तथा आकस्मिक घटनाओं से अपने-आप को सुरक्षित रखने के लिए।
  3. शान्तिपूर्वक, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्यप्रद जीवन व्यतीत करने के लिए।
  4. अपना तथा बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए।

प्रश्न 4.
घर का हमारे स्वास्थ्य से क्या सम्बन्ध है ? समझाकर लिखें।
उत्तर-
हमारे स्वास्थ्य का घर से बहुत गहरा सम्बन्ध है। बहुत हद तक हमारा स्वास्थ्य घरों के स्वास्थ्यकर होने पर ही निर्भर करता है हम कितना ही पुष्टिकर भोजन क्यों न करें, हमारी आदतें कितनी भी अच्छी क्यों न हों, लेकिन यदि हमारा निवास स्वास्थ्यकर नहीं होगा तो हम कभी भी स्वस्थ जीवन व्यतीत नहीं कर सकते। अस्वस्थ वातावरण, अपर्याप्त शुद्ध वायु और सूर्य-प्रकाश के अभाव में लोग दुर्बल हो जाते हैं। उनकी कार्य-क्षमता घट जाती है। तंग और गन्दे घरों में रहने से लोगों का सिर-दर्द, कमजोरी, रक्तहीनता, अनिद्रा, जुकाम, क्षय तथा अन्यान्य सांस और छूत के रोग हो जाते हैं। अतः स्पष्ट है कि हमारा स्वास्थ्य घर के स्वास्थ्यकर होने पर ही निर्भर करता है।

प्रश्न 5.
सफ़ाई में काम आने वाले पदार्थों के नाम लिखो।
उत्तर-
सफ़ाई में काम आने वाले विभिन्न पदार्थ जैसे नींबू, सिरका, स्प्रिट, तारपीन का तेल, बैंजीन, क्लोरीन, हाइड्रोक्लोरिक एसिड आदि का प्रयोग, दाग-धब्बे दूर करने हेतु किया जाता है। डी० टी० टी०, फिनाइल, मिट्टी का तेल आदि का प्रयोग जीव-जन्तुओं का नाश करने हेतु किया जाता है। ब्रासो क्रीम, फर्नीचर क्रीम आदि को धातु, शीशे तथा फर्नीचर की सफ़ाई में प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 6.
सामान्य रूप से सफ़ाई की क्या विधियाँ हैं ?
उत्तर-
सामान्य रूप से सफ़ाई की निम्नलिखित विधियाँ हैं –

  1. झाड़ लगाना
  2. गीले-पोचे से फर्श आदि की धूल-मिट्टी साफ़ करना
  3. वस्तुओं को कपड़े से पोंछना
  4. पानी से धुलाई करना (फ़र्श की धुलाई)
  5. वैक्यूम क्लीनर का प्रयोग
  6. फ़र्श स्वीपर (कार्पेट-स्वीपर) का प्रयोग।

बड़े उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
घर की सफाई के लिए आवश्यक सामग्री को चित्रों द्वारा समझाइये।
उत्तर-
घर की सफ़ाई के लिए केवल झाड़ ही पर्याप्त नहीं होती। अच्छी सफ़ाई के लिए सफ़ाई के अनुरूप सामग्री की आवश्यकता होती है। सफ़ाई के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है –
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  1. झाड़, ब्रुश, झाड़न या कपड़े व चिथड़े, स्पंज।
  2. डस्ट पैन, डोल, बाल्टी, जग या मग।
  3.  सफ़ाई करने के यंत्र-वैक्यूम क्लीनर, कार्पेट स्वीपर आदि।
  4. सफ़ाई में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ-डी० टी० टी०, फिनायल, मिट्टी का तेल, स्प्रिट, तारपीन का तेल, बैंजीन, क्लोरीन, नींबू, सिरका, हाइड्रोक्लोरिक एसिड आदि । ब्रासो क्रीम, फर्नीचर क्रीम, विम, राख, साबुन का पानी या सर्फ आदि।

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एक शब्द में उत्तर दें …………………………………………………………..

प्रश्न 1.
मनुष्य जिस स्थान पर अपने परिवार के साथ रहता है उसे क्या कहते हैं ?
उत्तर-
घर।

प्रश्न 2.
स्वस्थ रहने के लिए ………………. आवश्यक है।
उत्तर-
सफ़ाई।

प्रश्न 3.
घर के पास …………………. तथा गन्दगी के ढेर नहीं होने चाहिए।
उत्तर-
डेयरी फ़ार्म।

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प्रश्न 4.
बैंक घर के …………………… होना चाहिए।
उत्तर-
पास।

प्रश्न 5.
दीवारों तथा छतों की सफ़ाई वाला ब्रुश कैसा होता है ?
उत्तर-
गोलाकार।

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घर PSEB 6th Class Home Science Notes

  • घर एक निजी स्वर्ग का नाम है।
  • मनुष्य अपने जीवन का बहुत-सा समय घर में ही बिताता है।
  • मनुष्य एक बुद्धि प्रधान जीव है।
  • घर के चारों ओर का वातावरण शांत होगा तो आपका जीवन सुगम तथा शांतमय होगा।
  • घर के समीप डेयरी फार्म तथा गन्दगी का ढेर भी नहीं होना चाहिए।
  • ऊँचे वृक्ष घर से दूर होने चाहिएँ।
  • मकान बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि दैनिक प्रयोग में आने वाली वस्तुएँ शीघ्र तथा सुगमता से प्राप्त हो सकती हों।
  • अस्पताल तथा बाज़ार भी घर से बहुत दूर नहीं होने चाहिए।
  • स्वस्थ रहने के लिए सफ़ाई रखना आवश्यक है।
  • कच्चे फर्श पर थोड़ा-सा पानी छिड़ककर ही उसे साफ करना चाहिए ताकि मिट्टी अधिक न उड़े।
  • वस्तुएँ झाड़ने का काम झाड़ लगाने के बाद तथा पोचा लगाने से पहले करना चाहिए ताकि झाडू लगाने से जो मिट्टी वस्तुओं पर उड़कर पड़ती है, वह झाड़न से साफ हो जाए।
  • पोचा लगाते समय पानी में कोई कृमिनाशक औषधि डाल लेनी चाहिए ताकि मक्खी एवं मच्छर से छुटकारा मिल सके।
  • सप्ताह में एक बार दीवारों तथा छत को झाड़ लगाने से पहले ब्रुश से साफ कर लेना चाहिए।
  • झाड़ की किस्में-1. नारियल का झाड़, 2. खजूरे का झाड़, 3. फूल झाड़।।
  • ब्रुश की किस्में-1. दरी या कालीन साफ़ करने के लिए, 2. पालिश करने वाले ब्रुश, 3. फ़र्श धोने के लिए, 4. सफेदी करने वाला ब्रुश, 5. दीवारों तथा छतें साफ़ करने के लिए ब्रुश।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 14 दक्षिण में नई शक्तियों का उदय

Punjab State Board PSEB 11th Class History Book Solutions Chapter 14 दक्षिण में नई शक्तियों का उदय Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 History Chapter 14 दक्षिण में नई शक्तियों का उदय

अध्याय का विस्तृत अध्ययन

(विषय सामग्री की पूर्ण जानकारी के लिए)

प्रश्न 1.
शिवाजी के उत्थान व शासन-प्रबन्ध के सन्दर्भ में 1713 ई० तक के मराठों के इतिहास की प्रमुख राजनीतिक घटनाओं की चर्चा करें ।
उत्तर-
मराठे दक्षिण में महाराष्ट्र के रहने वाले थे । वे सर्वप्रथम शिवाजी के अधीन एक शक्ति के रूप में उभरे । शिवाजी को शक्तिशाली बनाने में अनेक बातों ने योगदान दिया । सर्वप्रथम इस दिशा में उनकी मां ने भूमिका निभाई । उन्होंने शिवाजी को महापुरुषों की कहानियां सुना-सुना कर उनमें देशभक्ति की भावना भरी । समरथ गुरु रामदास ने उनका चरित्र-निर्माण किया । दादा कोण्ड देव ने उन्हें तीर, तलवार तथा घुड़सवारी की शिक्षा दी । महाराष्ट्र की पहाड़ियों ने उन्हें परिश्रमी तथा वीर बनाया । दक्षिण की मुस्लिम रियासतों ने मराठों को सैनिक शिक्षा दी और ये प्रशिक्षित सैनिक शिवाजी की शक्ति का आधार बने । वैसे भी सन्त एकनाथ तथा तुकाराम के उपदेशों ने महाराष्ट्र में एकता का संचार किया और इस एकता ने शिवाजी को बल प्रदान किया । परिस्थितियों ने तो शिवाजी को शक्ति प्रदान की ही थी, साथ ही उनके अपने कार्यों ने भी उन्हें शक्तिशाली बनाया । उन्होंने मुट्ठी भर सैनिक लेकर 19 वर्ष की आयु में तोरण का किला जीता । इसके बाद उन्होंने सिंहगढ़, पुरन्धर तथा अन्य दुर्गों पर विजय पाई । इन विजयों से उन्हें धन भी प्राप्त हुआ और यश भी । धन का प्रयोग उन्होंने अपनी सैनिक शक्ति को बढ़ाने के लिए किया । संक्षेप में, शिवाजी के उत्थान, शासन-प्रबन्ध तथा 1713 ई० तक मराठा इतिहास की प्रमुख घटनाओं का वर्णन इस प्रकार है :-

शिवाजी का उत्थान (विजयें)-

शिवाजी एक महान् मराठा सरदार थे । सबसे पहले उन्होंने बिखरी हुई मराठा शक्ति को संगठित करके एक विशाल सेना तैयार की। उन्होंने 1646 ई० में अपना विजय अभियान आरम्भ कर दिया । शिवाजी की पहली विजय तोरण दुर्ग पर थी । इसके बाद उन्होंने चाकन, सिंहगढ़, पुरन्धर तथा कोन्द्रन के दुर्गों पर अपना अधिकार जमा लिया । उन्होंने जावली के सरदार चन्द्र राव को मरवा कर जावली को भी अपने अधिकार में ले लिया । शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर बीजापुर का सुल्तान चिन्ता में पड़ गया । उसने शिवाजी के विरुद्ध अपने सेनापति अफ़जल खां को भेजा । अफ़जल खां ने धोखे से शिवाजी को मारने का प्रयत्न किया परन्तु इस प्रयास में वह स्वयं मारा गया । अब शिवाजी ने मुग़ल प्रदेशों में लूटमार आरम्भ कर दी जिससे मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब को चिन्ता हुई । अतः 1660 ई० में उसने दक्षिण के सूबेदार शाइस्ता खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । वह बढ़ता हुआ पूना तक जा पहुंचा, परन्तु शिवाजी ने उसे यहां से भागने पर विवश कर दिया ।

अब शिवाजी ने सूरत के समृद्ध नगर पर आक्रमण कर दिया और वहां खूब लूटमार की । इससे औरंगज़ेब की चिन्ता और भी बढ़ गई । उसने राजा जयसिंह तथा दिलेर खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । उनके नेतृत्व में मुग़ल सेनाओं ने मराठों के अनेक किले जीत लिए । विवश होकर शिवाजी ने मुग़लों के साथ सन्धि कर ली । सन्धि के बाद शिवाजी आगरा में मुग़ल दरबार में पहुंचे । वहां उन्हें बन्दी बना लिया गया । परन्तु शिवाजी बड़ी चालाकी से मुग़लों की कैद से भाग निकले । 1676 ई० में उन्होंने रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक किया । इस अवसर पर उन्होंने छत्रपति की उपाधि धारण की । राज्याभिषेक के पश्चात् उन्होंने कर्नाटक के समृद्ध प्रदेशों जिंजी और वैलोर पर भी अपना अधिकार कर लिया । इस तरह वह दक्षिण भारत में एक स्वतन्त्र मराठा राज्य स्थापित करने में सफल हुए ।

शासन प्रबन्ध-

शिवाजी ने उच्चकोटि के शासन-प्रबन्ध द्वारा भी मराठों को एकता के सूत्र में बांधा । केन्द्रीय शासन का मुखिया छत्रपति (शिवाजी) स्वयं था । राज्य की सभी शक्तियां उसके हाथ में थीं । छत्रपति को शासन कार्यों में सलाह देने के लिए आठ मन्त्रियों का एक मन्त्रिमण्डल था । इसे अष्ट-प्रधान कहते थे । प्रत्येक मन्त्री के पास एक अलग विभाग था । शिवाजी ने अपने राज्य को तीन प्रान्तों में बांटा हुआ था। प्रत्येक प्रान्त एक सूबेदार के अधीन था । प्रान्त आगे चलकर परगनों अथवा तर्कों में बंटे हुए थे । शासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी।

शिवाजी की न्याय-प्रणाली बड़ी साधारण थी । परन्तु यह लोगों की आवश्यकता के अनुरूप थी । मुकद्दमों का निर्णय प्रायः हिन्दू धर्म की प्राचीन परम्पराओं के अनुसार ही किया जाता था । राज्य की आय के मुख्य साधन भूमि-कर, चौथ तथा सरदेशमुखी थे । शिवाजी ने एक शक्तिशाली सेना का संगठन किया । उनकी सेना में घुड़सवार तथा पैदल सैनिक शामिल थे । उनके पास एक शक्तिशाली समुद्री बेड़ा, हाथी तथा तोपें भी थीं । सैनिकों को नकद वेतन दिया जाता था । उनकी सेना की सबसे बड़ी विशेषता अनुशासन थी । शिवाजी एक उच्च चरित्र के स्वामी थे । वह एक आदर्श पुरुष, वीर योद्धा, सफल विजेता तथा उच्च कोटि के शासन प्रबन्धक थे । धार्मिक सहनशीलता तथा देश-प्रेम उनके चरित्र के विशेष गुण थे । देशप्रेम से प्रेरित होकर उन्होंने मराठा जाति को संगठित किया और एक स्वतन्त्र हिन्दू राज्य की स्थापना की ।

शिवाजी के पश्चात् 1713 ई० तक मराठा-इतिहास –

शिवाजी के जीवन काल में औरंगजेब ने यह प्रयत्न किया था कि शिवाजी या तो मुग़ल साम्राज्य के मनसबदार बन जाएं या सामन्त । परन्तु वह अपने उद्देश्य में सफल न हो सका । 1680 ई० के पश्चात् तो स्थिति और भी बदल गई । औरंगजेब के पुत्र शहज़ादा अकबर ने बादशाह होने की घोषणा कर दी और वह शिवाजी के उत्तराधिकारी शम्भाजी की शरण में चला गया । औरंगजेब ने शम्भा जी के विरुद्ध अभियान भेजे किन्तु वह सफल न हुआ । बीजापुर तथा गोलकुण्डा के सुल्तान मराठों की सहायता करते रहे. । औरंगज़ेब ने बीजापुर और गोलकुण्डा दोनों को जीत लिया । इस प्रकार 1686-87 ई० तक दक्कन में केवल मराठे ही ऐसे लोग रह गए जो अभी तक स्वतन्त्र थे । औरंगज़ेब ने उन्हें अपने अधीन करने का निर्णय किया । उसने 1689 ई० में शम्भा जी को गिरफ्तार कर लिया तथा उनके पुत्र शाहू को भी पकड़ लिया गया । परन्तु शिवाजी का दूसरा पुत्र राजा राम मुग़लों के विरुद्ध जिंजी के किले से युद्ध करता रहा । 1700 ई० में राजाराम की भी मृत्यु हो गई । परन्तु अब उसकी पत्नी ताराबाई ने कोल्हापुर से संघर्ष जारी रखा । इस समय तक स्वराज्यी एवं मुगलई का अन्तर मिट गया था । मराठों के पास राज्य नहीं रहा था किन्तु बहुत से किले और छोटे-छोटे इलाके अब भी उनके अधिकार में आते रहे । इस प्रकार मराठे 1713 ई० तक मुग़लों से अपने प्रदेश वापस छीनने के लिए प्रयत्नशील रहे ।

PSEB 11th Class History Solutions Chapter 14 दक्षिण में नई शक्तियों का उदय

प्रश्न 2.
18वीं सदी में पेशवाओं तथा मराठा सरदारों के अधीन मराठा शक्ति के उत्थान की रूप-रेखा बताएं।
उत्तर-
शिवाजी की मृत्यु के पश्चात् उनके पुत्र शम्भाजी का वध कर दिया गया और उनके पौत्र शाहूजी को दिल्ली में बन्दी बना लिया गया । उसकी अनुपस्थिति में राजाराम की विधवा ताराबाई अपने पुत्र की संरक्षिका बन कर शासन करने लगी। मुग़लों ने मराठों को आपस में लड़ाने के लिए शाहूजी को बन्दीगृह से मुक्त कर दिया । शाहूजी के महाराष्ट्र पहुंचते ही बालाजी विश्वनाथ नामक ब्राह्मण ने उसकी सहायता की । उसने अन्य मराठा सरदारों को भी शाहूजी के साथ मिला दिया । प्रसन्न होकर शाहजी ने उसे अपना पेशवा नियुक्त कर लिया । बालाजी विश्वनाथ ने 1719 ई० में मुग़ल बादशाह से एक सन्धि की जिसके कारण शाहूजी को मुग़लों से वे सभी प्रदेश वापस मिल गए जो शिवाजी के अधीन स्वराज्य प्रदेश कहलाते थे । इसके अतिरिक्त मराठों को वे प्रदेश भी मिल गए जो कभी उन्होंने खानदेश, बरार, गोंडवाना, गोलकुण्डा तथा कर्नाटक में विजय किए थे।

1719 ई० में बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र बाजीराव प्रथम को पेशवा बनाया गया । 1740 ई० में उसकी भी मृत्यु हो गई और बालाजी बाजीराव पेशवा बना । वह 1761 ई० तक पेश्वा के पद पर आसीन रहा । इन दो पेशवाओं के अधीन मराठों ने लगभग समस्त भारत पर अपना अधिकार कर लिया और मराठा झण्डा अटक की दीवारों तक फहराने लगा । 1757 ई० तक वे मुग़ल बादशाह के भी संरक्षक बन गए । इसी कारण जब 1757 ई० में अहमदशाह ने लाहौर तथा सरहिन्द के प्रान्त पर आक्रमण किया, तो मराठों ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया और अहमदशाह अब्दाली के पुत्र तैमूरशाह को पंजाब से मार भगाया । इसी बीच कई अन्य मराठा सरदारों ने कई प्रदेश जीते और मराठा राज्य की शक्ति में वृद्धि की । – पेशवाओं के पराक्रम से शाहूजी बड़े प्रसन्न थे । उन्होंने राज्यकर्म का सारा भार उन्हीं पर छोड़ दिया । धीरे-धीरे पेशवा ही राज्य के शासक बन गए । 1751 ई० में शाहूजी की मृत्यु के पश्चात् छत्रपति की शक्ति नाममात्र रह गई और पेशवा ही वास्तविक शासक बन गए । 1772 ई० के पश्चात् मराठा राजनीति का केन्द्र बिन्दु ‘पेशवा’ बन गया और स्वयं अंग्रेज़ भी उन्हीं से सन्धियां करने लगे । इस प्रकार मुख्यमन्त्री के रूप में कार्य करने वाला ‘पेशवा’ समय की गति के साथ-साथ राज्य की वास्तविक शक्ति बन गया ।

पेशवाओं तथा मराठा सरदारों के कार्य-पेशवाओं तथा मराठा सरदारों द्वारा शक्ति के विकास के लिए किए गए कार्यों का विस्तृत वर्णन इस प्रकार है-

बालाजी विश्वनाथ पेशवा वंश का संस्थापक था । शाहूजी ने उसे 1713 ई० में पेशवा नियुक्त किया । बालाजी विश्वनाथ ने मुग़ल राज परिवार के आपसी झगड़ों का लाभ उठाया । उसने 1719 ई० में मुग़लों से एक सन्धि की, जिसकी शर्ते ये थीं : (क) शाहूजी को ‘स्वराज्य प्रदेशों’ का शासक स्वीकार कर लिया । (ख) शाहूजी दक्षिण के 6 मुग़ल प्रदेशों से ‘चौथ’ तथा ‘सरदेशमुखी’ एकत्र कर सकेंगे । ये सूबे थे-खानदेश, बीदर, बरार, बीजापुर, गोलकुण्डा तथा औरंगाबाद । (ग) शाहूजी मुग़लों की सहायता के लिए एक सेना तैयार रखेंगे जिसमें 15 हज़ार सैनिक होंगे । इस सन्धि द्वारा वास्तव में शाहू जी को मराठों का राजा मान लिया गया । अतः मराठा सरदारों की शक्ति अब शाहू के विरुद्ध लड़ने की बजाय दूर स्थित प्रदेशों को । जीतने में लग गई । धीरे-धीरे पेशवा की शक्ति इतनी बढ़ गई कि वह शासन का सर्वेसर्वा हो गया ।

बाजीराव प्रथम-बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा बना । उसने निज़ाम हैदराबाद को 1728 ई० में ‘मालखेद’ के स्थान पर पराजित किया और उसके साथ मुजीशिव गांव की सन्धि की । उसने 1738 ई० में एक बार फिर निज़ाम को भोपाल के समीप पराजित किया । निजाम तथा मुग़लों ने नर्मदा और चम्बल के बीच का प्रदेश मराठों को दे दिया । बाजीराव प्रथम ने बुन्देल सरदार छत्रसाल की सहायता करके बुन्देलखण्ड के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया । उसने दिल्ली के समीप मुग़ल सेना को पराजित किया । उसने अपने भाई ‘चिमनाजी आपे’ की सहायता से पुर्तगालियों को पराजित करके थाना, सालसट तथा बसीन के प्रदेश जीत लिए । इस प्रकार बाजीराव प्रथम ने एक के बाद दूसरा प्रर्देश जीता और चारों दिशाओं में मराठा शक्ति का विकास किया। निःसन्देह वह एक महान् सेनानायक था ।

बालाजी बाजीराव तथा मराठा सरदार-बालाजी बाजीराव अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् पेशवा नियुक्त हुआ । उस समय उसकी आयु 18 वर्ष की थी । उसके काल में जहां मराठा शक्ति का उत्थान हुआ, वहां मराठा सरदारों की स्वतन्त्र सत्ता का भी विकास हुआ । उसके काल की मुख्य घटनाएं थीं :

(i) मराठा सरदार सिंधिया तथा होल्कर ने जयपुर के शासक ईश्वर सिंह से ‘चौथ’ मांगा । ईश्वर सिंह कर देने में असमर्थ था इसलिए तंग आकर उसने विष खा कर आत्म-हत्या कर ली । यह मराठों की एक बहुत बड़ी भूल थी जिसके परिणामस्वरूप मराठों को राजपूतों की सहानुभूति से वंचित होना पड़ा ।

(ii) 1758 ई० में सदाशिव राव ने 40 हज़ार सैनिकों की सहायता से निज़ाम पर आक्रमण किया । उदयगीर में निज़ाम पराजित हुआ । सन्धि के अनुसार निज़ाम को बीजापुर, औरंगाबाद, बीदर तथा दौलताबाद से हाथ धोना पड़ा ।

(iii) मराठों ने उत्तर में भी अपने राज्य का विस्तार आरम्भ कर दिया । सितम्बर, 1751 ई० में मलहार राव होल्कर तथा रघुनाथ राव दिल्ली की ओर बढ़े । उन्होंने अब्दाली के प्रतिनिधि को गिरफ्तार कर लिया और दिल्ली का प्रबन्ध वज़ीर इमान को सौंप दिया । तत्पश्चात् वे पंजाब की ओर बढ़े । मार्च, 1758 ई० में इन्होंने सरहिन्द पर अधिकार कर लिया और अप्रैल में लाहौर पर । उन्होंने अब्दाली के पुत्र तैमूर शाह तथा उसके जरनैल जमाल खां को मार भगाया ।

(iv) शाहूजी भौंसले ने कटक पर अधिकार कर लिया और अलीवरदी खां से 20 लाख रुपया प्राप्त किया
(v) सदाशिव राव ने कर्नाटक पर अधिकार कर लिया । इस प्रकार हम देखते हैं कि बालाजी बाजीराव के अधीन मराठा शक्ति अपनी चरम सीमा पर पहुंच गई । मराठा पताका अटक तक फहराने लगी।

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प्रश्न 3.
18वीं सदी में हैदराबाद एवं मैसूर के नए-नए राज्यों के उत्थान और मराठों के साथ उनके सम्बन्धों के बारे में बताएं।
उत्तर-
18वीं शताब्दी में उत्तरी तथा दक्षिणी भारत में अनेक नई शक्तियों का उदय हुआ । इनमें से हैदराबाद तथा मैसूर की रियासतें काफ़ी महत्त्वपूर्ण थीं । इन रियासतों के उत्थान तथा मराठों के साथ उनके सम्बन्धों का वर्णन इस प्रकार है :-

1. हैदराबाद-

हैदराबाद 18वीं शताब्दी में दक्षिण भारत की एक बहुत ही शक्तिशाली रियासत थी । इसकी स्थापना किलिच खां ने की। वह 1713 ई० में दक्षिण का मुग़ल सूबेदार बना और सम्राट ने उसे निजाम-उल-मुल्क की उपाधि प्रदान की । वह बड़ा ही महत्त्वाकांक्षी था। वह दक्षिण भारत का स्वतन्त्र शासक बनना चाहता था । इसलिए 1724 ई० में उसने मुग़ल सम्राट के मुख्य वज़ीर से लड़ाई की और उसे हरा कर दक्षिण पर अपना अधिकार जमा लिया । अत: मुग़ल सम्राट् मुहम्मद शाह ने उसे दक्षिण का सूबेदार मान लिया और 1725 ई० में उसे आसफजाह की उपाधि से सुशोभित किया । परन्तु सम्राट का यह काम दिखावा मात्र था । आसफजाह अब तक दक्षिण का शासक बन चुका था । वह और उसके उत्तराधिकारी हैदराबाद के निज़ाम के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

निजाम-उल-मुल्क आसफजाह दक्षिण के सारे मुग़ल प्रदेशों में अपनी शक्ति स्थापित न कर सका । मरने से पहले उसके पास केवल वही राज्य रह गया था जो सबसे पहले मुग़ल साम्राज्य का गोलकुण्डा प्रान्त था । उसकी राजधानी भी गोलकुण्डा की पुरानी राजधानी हैदराबाद ही थी । 1719 में बाला जी विश्वनाथ ने बादशाह के साथ राजा शाहू के नाम से एक सन्धि करके दक्षिण के मुग़ल सूबे से चौथ तथा सरदेशमुखी एकत्रित करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था । परन्तु अब निजाम-उलमुल्क आसफजाह मराठों के इस अधिकार को स्वीकार नहीं कर सकता था । इसलिए मराठों से उसकी लड़ाई होनी आवश्यक हो गई थी । उसने राजा शाहू के विरुद्ध उसके कोल्हापुर वाले सम्बन्धियों को भड़काना आरम्भ कर दिया । उसने कुछ मराठा सरदारों को भी पेशवा के विरुद्ध उत्तेजित किया । स्वयं 1728 ई० में निज़ाम-उल-मुल्क ने पेशवा के साथ लड़ाई की जो मालखेद में हुई। परन्तु इस लड़ाई में निजाम-उल-मुल्क पराजित हुआ और उसने शाहू को छत्रपति मान लिया । उसने छत्रपति को चौथ और सरदेशमुखी देना भी स्वीकार कर लिया ।

निजाम-उल-मुल्क अब भी यह नहीं चाहता था कि मराठों की शक्ति का अधिक विस्तार हो । उसको यह भय था कि मराठे उत्तरी भारत में अपनी शक्ति बढ़ा कर और मुग़ल सम्राट् से अधिकार प्राप्त करके हैदरबाद की रियासत को समाप्त करने का प्रयत्न करेंगे । इसलिए यह आवश्यक था कि वह मालवा पर अपना अधिकार स्थापित करते । परन्तु 1738 ई० में वह भोपाल के निकट मराठों से एक बार फिर हार गया । अब वह इस योग्य न रहा कि मराठों को उत्तरी-भारत में शक्ति बढ़ाने से रोक सके । मुग़ल सम्राट की दृष्टि में भी उसकी शक्ति स्पष्ट रूप से मराठों से क्षीण हो गई थी । उसकी 1748 ई० में मृत्यु हो गई । इस समय तक वह हैदराबाद का एक स्वतन्त्र शासक बन चुका था ।

निज़ाम-उल-मुल्क की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्रों तथा निकट सम्बन्धियों के बीच हैदराबाद की राजगद्दी के लिए आपसी संघर्ष छिड़ गया । फलस्वरूप लगभग दस-बारह वर्षों तक हैदराबाद की राजनीतिक दशा बड़ी शोचनीय रही । परन्तु 1761 ई० में उसके पुत्र निज़ाम अली ने अपनी शक्ति बढ़ा ली और मुग़ल सम्राट् से हैदराबाद पर अपने अधिकार का अनुमति पत्र प्राप्त कर लिया । सम्राट ने उसे भी निज़ाम-उल-मुल्क तथा आसफजाह की उपाधि प्रदान की । इतना होने पर भी निज़ाम अली हैदराबाद की शक्ति को और अधिक न बढ़ा सका । कई वर्षों तक उसे मैसूर के शासक हैदर अली की ओर से खतरा बना रहा । समय-समय पर हैदरअली के साथ उसकी लड़ाई भी हुई परन्तु किसी को भी निर्णायक विजय प्राप्त न हो सकी। कुछ अन्य पड़ोसी शक्तियों से भी उसका संघर्ष चलता रहा। इन परिस्थितियों में उसने 1798 ई० में अंग्रेजों के साथ एक सन्धि की और उनकी अधीनता स्वीकार कर ली । इस प्रकार हैदराबाद की रियासत अंग्रेजों की अधीनता में आ गई।

2. मैसूर-

मैसूर रियासत का उदय विजयनगर राज्य के पतन के बाद हुआ । 1600 ई० के लगभग उदियार नामक एक व्यक्ति ने विजयनगर के सामन्त के रूप में मैसूर में अपना राज्य स्थापित कर लिया था । लगभग 1700 ई० में उदियार का एक अधिकारी मैसूर का स्वतन्त्र शासक बन गया । उसका नाम देव राय था । लगभग आधी शताब्दी तक उसके उत्तराधिकारियों ने इस रियासत को स्थाई रखा । परन्तु वे धीरे-धीरे निर्बल होते गए और उनके मन्त्री शक्तिशाली हो गए । 1750 ई० से कुछ समय पश्चात् मैसूर के एक मन्त्री नन्दराज के संरक्षण में हैदरअली नामक एक सेनानायक मैसूर का मुख्य सेनापति बन गया । वह 1761 ई० नन्दराज से भी अधिक शक्तिशाली हो गया । इसके दो वर्ष बाद उसने मराठों के कुछ राज्यों को अपने अधीन करना आरम्भ कर दिया । इसीलिए मराठों से उसकी टक्कर होनी आवश्यक हो गई ।

1764 से 1770 के बीच मराठों ने कई बार मैसूर पर आक्रमण किया और हैदरअली को पराजित किया । परन्तु मराठा सरदार आपसी झगड़ों के कारण मैसूर का अन्त न कर सके । 1770 ई० में उन्होंने हैदरअली से सन्धि कर ली । इस सन्धि से भी हैदरअली की कठिनाइयों का अन्त न हुआ । उसे मराठों के अतिरिक्त हैदराबाद, कर्नाटक तथा अंग्रेजों से भी निपटना पड़ा । इस प्रकार अपनी मृत्यु तक वह किसी-न-किसी लड़ाई में ही उलझा रहा । उसके बाद उसके पुत्र टीपू ने एक स्वतन्त्र शासक के रूप में मैसूर की राजगद्दी सम्भाली । उसे भी अंग्रेजों से टक्कर लेनी पड़ी । 1799 ई० में वह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया । अंग्रेजों ने मैसूर के बहुत से प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया और शेष राज्य उदियार वंश के एक राजकुमार को दे दिया । हैदराबाद की भान्ति मैसूर की रियासत भी अंग्रेजों के अधीन 1947 ई० तक स्थापित रही ।

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महत्त्वपूर्ण परीक्षा-शैली प्रश्न

I. वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. उत्तर एक शब्द से एक वाक्य तक

प्रश्न 1.
शिवाजी का जन्म कब तथा कहां हुआ ?
उत्तर-
शिवाजी का जन्म 1627 ई० में पूना के निकट शिवनेरी के दुर्ग में हुआ।

प्रश्न 2.
शिवाजी के माता-पिता का क्या नाम था ?
उत्तर-
शिवाजी की माता का नाम जीजाबाई तथा पिता का नाम शाह जी भौंसले था ।

प्रश्न 3.
शाइस्ता खां कौन था ?
उत्तर-
शाइस्ता खां औरंगजेब का मामा था जो एक योग्य सेनानायक था।

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प्रश्न 4.
पुरन्धर की सन्धि किस-किस के बीच हुई ?
उत्तर-
पुरन्धर की सन्धि मुग़ल सेनानायक मिर्जा राजा जयसिंह तथा शिवाजी के बीच में हुई।

प्रश्न 5.
ताराबाई कौन थी ?
उत्तर-
ताराबाई छत्रपति शिवाजी के पुत्र की पत्नी अर्थात् शिवाजी की पुत्रवधू थी। वह अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षिका थी।

2. रिक्त स्थानों की पूर्ति

(i) शाहू ………. का पुत्र था ।
(ii) पानीपत का तीसरा युद्ध ……… ई० में हुआ था।
(iii) टीपू सुल्तान ………… का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था।
(iv) हैदराबाद रियासत का संस्थापक ………… था।
(v) अंग्रेजों ने दिल्ली पर ………. ई० में अधिकार किया।
उत्तर-
(i) शम्भा जी
(ii) 1761
(iii) हैदरअली
(iv) चिन किलिच खान
(v) 1803 ।

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3. सही/ग़लत कथन

(i) पानीपत का तीसरा युद्ध अहमदशाह अब्दाली तथा शिवाजी के बीच हुआ। — (✗)
(ii) होल्कर सरदारों की राजधानी इंदौर थी। — (✓)
(iii) हैदरअली मैसूर का मुख्य सेनापति था। — (✓)
(iv) शिण्डे सरदार मालवा पर शासन करते थे। — (✗)
(v) शिण्डे सरदारों की राजधानी ग्वालियर थी। — (✓)

4. बहु-विकल्पीय प्रश्न

प्रश्न (i)
मिर्जा राजा जयसिंह किसका सेनापति था?
(A) अकबर
(B) औरंगजेब
(C) शिवाजी
(D) हैदरअली ।
उत्तर-
(B) औरंगजेब

प्रश्न (ii)
निम्न में से कौन सा अंग शिवाजी की सेना का नहीं था?
(A) पैदल सैनिक
(B) तोपखाना
(C) घुड़सवार
(D) अश्व सेना ।
उत्तर-
(D) अश्व सेना ।

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प्रश्न (iii)
निम्न लड़ाई मराठों के लिए बहुत घातक सिद्ध हुई-
(A) पानीपत की पहली लड़ाई
(B) पानीपत की दूसरी लड़ाई
(C) पानीपत की तीसरी लड़ाई
(D) उपरोक्त सभी ।
उत्तर-
(C) पानीपत की तीसरी लड़ाई

प्रश्न (iv)
शिवाजी के ‘अष्ट प्रधान’ का मुखिया कहलाता था-
(A) पेशवा
(B) पण्डित राव
(C) पाटिल
(D) इनमें से कोई नहीं ।
उत्तर-
(A) पेशवा

प्रश्न (v)
हैदरअली की मृत्यु हुई-
(A) 1702
(B) 1707
(C) 1761
(D) 1782.
उत्तर-
(D) 1782.

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II. अति छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मराठों के इतिहास की जानकारी के स्रोतों के चार मुख्य प्रकारों के नाम बताओ ।
उत्तर-
मराठों के इतिहास की जानकारी के चार प्रकार के स्रोत हैं-मराठी में लिखे गए वृत्तान्त, मराठा सरकार के रिकार्ड, फ़ारसी एवं राजस्थानी में भेजे गए पत्र और तत्कालीन अखबार ।

प्रश्न 2.
इतिहासकार कौन-सी सदी को ‘मराठों का युग’ कहते हैं और क्यों ?
उत्तर-
इतिहासकार 18वीं सदी को मराठों का युग कहते हैं क्योंकि इस सदी में मराठे सबसे अधिक शक्तिशाली थे ।

प्रश्न 3.
शिवाजी का जन्म कब हुआ और उन्होंने राज्य स्थापना का प्रयत्न कब आरम्भ किया ?
उत्तर-
शिवाजी का जन्म 1627 ई० में हुआ । उन्होंने राज्य स्थापना का प्रयत्न 1646 ई० में आरम्भ किया ।

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प्रश्न 4.
शिवाजी के पिता का क्या नाम था और उन्होंने दक्कन के किन सुल्तानों से जागीरें प्राप्त की थी ?
उत्तर-
शिवाजी के पिता का नाम शाहजी था । उन्होंने अहमदनगर तथा बीजापुर के सुल्तानों से जागीरें प्राप्त की ।

प्रश्न 5.
शिवाजी ने अपनी विजय किस प्रदेश से आरम्भ की तथा 1646 ई० में किस किले पर अधिकार किया ?
उत्तर-
शिवाजी ने अपनी विजय पश्चिमी घाट के कोंकण प्रदेश से आरम्भ की । उन्होंने 1646 ई० में तोरण के किले पर अधिकार किया ।

प्रश्न 6.
शिवाजी ने दक्षिण के कौन-से चार राज्यों के क्षेत्रों में विजय प्राप्त की ?
उत्तर-
शिवाजी ने दक्षिण के अहमदनगर, बीजापुर, मैसूर तथा कर्नाटक राज्यों के क्षेत्रों में विजय प्राप्त की ।

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प्रश्न 7.
शिवाजी ने कौन-सी प्रसिद्ध मुगल बन्दरगाह को लूटा तथा किस मुगल सेनापति को हराया ?
उत्तर-
शिवाजी ने मुग़लों की प्रसिद्ध बन्दरगाह सूरत को लूटा । उन्होंने मुग़ल सेनापति शाइस्ता खाँ को हराया ।

प्रश्न 8.
शिवाजी ने मुग़लों के साथ कौन-सी सन्धि की तथा यह किसके प्रयासों से हुई ?
उत्तर-
शिवाजी ने मुग़लों से पुरन्धर की सन्धि की । यह सन्धि मुग़ल सेनापति जयसिंह के प्रयासों से हुई ।

प्रश्न 9.
शिवाजी औरंगजेब को कहां और कौन-से वर्ष में मिले थे ?
उत्तर-
शिवाजी औरंगजेब को 1666 ई० में आगरा में मिले थे ।

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प्रश्न 10.
शिवाजी का राज्याभिषेक कब और कहां हुआ तथा उन्होंने कौन-सी उपाधि धारण की ?
उत्तर-
शिवाजी का राज्याभिषेक 16 जून, 1676 को रायगढ़ में हुआ । उन्होंने ‘छत्रपति’ की उपाधि धारण की ।

प्रश्न 11.
शिवाजी की मृत्यु कब हुई तथा उनका उत्तराधिकारी कौन था ?
उत्तर-
शिवाजी की मृत्यु 1680 ई० में हुई । उनका उत्तराधिकारी शम्भाजी था ।

प्रश्न 12.
शिवाजी का राज्य कितने प्रशासनिक भागों में बंटा हुआ था ?
उत्तर-
शिवाजी का राज्य ‘प्रान्तों’, ‘परगनों’, ‘तरफों’ तथा गांवों में बंटा हुआ था । इस प्रकार उनका राज्य चार प्रशासनिक भागों में विभाजित था ।

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प्रश्न 13.
शिवाजी के मन्त्रिमण्डल को क्या कहा जाता था तथा उनका प्रधान कौन था ?
उत्तर-
शिवाजी के मन्त्रिमण्डल को ‘अष्ट प्रधान’ कहा जाता था । ‘अष्ट प्रधान’ का मुखिया (प्रधान) पेशवा होता था ।

प्रश्न 14.
शिवाजी की सेना में कौन-से चार अंग थे ?
उत्तर-
शिवाजी की सेना के चार अंग थे-‘घुड़सवार’, ‘पैदल सैनिक’, ‘तोपखाना’ तथा ‘समुद्री बेड़ा’।

प्रश्न 15.
स्वराजीय तथा मुगलई से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
स्वराजीय वे प्रदेश थे जो सीधे तौर पर शिवाजी के अधीन थे । मुग़लई वे प्रदेश थे जहां से शिवाजी चौथ तथा सरदेशमुखी नामक कर वसूल करते थे ।

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प्रश्न 16.
चौथ तथा सरदेशमुखी लगान के कौन-से भाग थे ?
उत्तर-
चौथ लगान का चौथा भाग तथा सरदेशमुखी लगान का दसवां भाग होता था ।

प्रश्न 17.
शिवाजी के दो पुत्रों के नाम बताएं और ताराबाई किसकी पत्नी थी और वह कहां से राज्य करती थी ?
उत्तर-
शिवाजी के दो पुत्रों के नाम थे-शम्भाजी तथा राजाराम । ताराबाई राजाराम की पत्नी थी जो कोल्हापुर से राज्य करती थी।

प्रश्न 18.
शाहू किसका पुत्र था तथा उसने अपनी राजधानी कौन-सी बनाई ?
उत्तर-
शाहू शम्भाजी का पुत्र था । उसने सतारा को अपनी राजधानी बनाया ।

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प्रश्न 19.
शाहू ने अपना पेशवा कब और किसको बनाया ?
उत्तर-
शाहू ने 1713 ई० में बालाजी विश्वनाथ को अपना पेशवा बनाया ।

प्रश्न 20.
शाहू तथा मुगल बादशाह में सन्धि कब हुई तथा इसमें शाहू का प्रतिनिधित्व किसने किया ?
उत्तर-
शाहू तथा मुग़ल बादशाह में 1719 ई० में सन्धि हुई । इसमें शाहू का प्रतिनिधित्व बालाजी विश्वनाथ ने किया ।

प्रश्न 21.
मुगल बादशाह के साथ सन्धि के द्वारा शाहू ने कितने घुड़सवार रखना और कितना खिराज देना स्वीकार किया ?
उत्तर-
इस सन्धि द्वारा शाहू ने 15,000 घुड़सवार रखना तथा दस लाख रुपया वार्षिक खिराज देना स्वीकार किया ।

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प्रश्न 22.
18वीं सदी के चार महत्त्वपूर्ण पेशवाओं के नाम बताएं । .
उत्तर-
18वीं सदी के चार महत्त्वपूर्ण पेशवा थे-बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव, बालाजी बाजीराव और माधोराव ।

प्रश्न 23.
किन दो पेशवाओं के समय में मराठों की शक्ति अपने शिखर पर पहुंची तथा उनका कार्यकाल क्या था ?
उत्तर-
बालाजी विश्वनाथ तथा बाजीराव के समय में मराठों की शक्ति अपने शिखर पर पहुंची । बालाजी विश्वनाथ का कार्यकाल 1713 ई० से 1719 ई० तथा बाजीराव का कार्यकाल 1719 ई० से 1740 ई० तक था ।

प्रश्न 24.
मराठों ने दक्षिण के किन दो शासकों से खिराज वसूल किया ?
उत्तर-
मराठों ने दक्षिण में हैदराबाद तथा कर्नाटक के शासकों से खिराज वसूल किया ।

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प्रश्न 25.
मराठों ने पुर्तगालियों से कौन-से दो स्थान जीते ?
उत्तर-
मराठों ने पुर्तगालियों से सालसैट और बसीन के प्रदेश जीते ।

प्रश्न 26.
1740 ई० से पूर्व मराठों ने उत्तरी भारत के कौन-कौन से दो प्रदेशों पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर ली ?
उत्तर-
1740 ई० से पूर्व मराठों ने उत्तरी भारत के मालवा और बुन्देलखण्ड प्रदेशों में अपनी प्रभुसत्ता स्थापित की ।

प्रश्न 27.
1740 ई० से पूर्व मराठों ने कौन-से चार प्रदेशों से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल किया ?
उत्तर-
1740 ई० से पूर्व मराठों ने हैदराबाद, कर्नाटक, मालवा और बुन्देलखण्ड के प्रदेशों से चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल किया ।

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प्रश्न 28.
कौन-से वर्ष में मराठे मुग़ल बादशाह के रक्षक बन गए तथा उन्होंने अहमदशाह अब्दाली के पुत्र को पंजाब से कब खदेड़ा ?
उत्तर-
मराठे 1757 ई० में मुग़ल बादशाह के रक्षक बन गए । उन्होंने अहमदशाह अब्दाली के पुत्र को 1758 ई० में पंजाब से खदेड़ा।

प्रश्न 29.
पानीपत का तीसरा युद्ध कब और किनके बीच हुआ?
उत्तर-
पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 ई० में हुआ । यह युद्ध अहमदशाह अब्दाली तथा मराठों के बीच हुआ ।

प्रश्न 30.
पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद किन पांच इलाकों में मराठों की सत्ता समाप्त हो गई ?
उत्तर-
पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद मराठा सत्ता बंगाल, बिहार, अवध, पंजाब और मैसूर में समाप्त हो गई ।

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प्रश्न 31.
गुजरात पर कौन-से मराठा सरदारों का अधिकार था और उनकी राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-
गुजरात पर गायकवाड़ सरदारों का अधिकार था । उनकी राजधानी बड़ौदा थी ।

प्रश्न 32.
उड़ीसा तथा मध्य भारत पर कौन-से मराठा सरदारों का अधिकार था तथा उनकी राजधानी कौन-सी थी?
उत्तर-
उड़ीसा तथा मध्य भारत पर भौंसला सरदारों का शासन था । उनकी राजधानी नागपुर थी ।

प्रश्न 33.
होल्कर सरदार किस प्रदेश पर शासन करते थे तथा उनकी राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-
होल्कर सरदार मालवा में शासन करते थे । उनकी राजधानी इन्दौर थी ।

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प्रश्न 34.
शिण्डे सरदार किस प्रदेश पर शासन करते थे तथा उनकी राजधानी कौन-सी थी ?
उत्तर-
शिण्डे सरदार बुन्देलखण्ड पर शासन करते थे । उनकी राजधानी ग्वालियर थी ।

प्रश्न 35.
पानीपत के युद्ध के बाद नए पेशवा का क्या नाम था तथा उसकी राजधानी कहां थी ?
उत्तर-
पानीपत के युद्ध के बाद नए पेशवा का नाम माधोराव था । उसकी राजधानी पूना थी ।

प्रश्न 36.
मराठे कौन-से मुगल बादशाह को और कब दिल्ली में लाए ?
उत्तर-
मराठे मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय को 1772 ई० में दिल्ली लाए ।

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प्रश्न 37.
उत्तर भारत में सबसे शक्तिशाली मराठा सरदार कौन था तथा उसे मुग़ल बादशाह से कौन-सी पदवियां मिलीं ?
उत्तर-
उत्तर भारत में सबसे शक्तिशाली मराठा सरदार महादजी शिण्डे था । उसे मुग़ल बादशाह से ‘वकील-ए-मुतलक’ तथा ‘मीर बख्शी’ की पदवियां मिलीं ।

प्रश्न 38.
अंग्रेजों ने 1802-03 ई० में कौन-से चार मराठा सरदारों के साथ सन्धियां की ?
उत्तर-
अंग्रेजों ने 1802-03 ई० में जिन चार मराठा सरदारों से सन्धियां कीं, वे थे-गायकवाड़, भौंसले, शिण्डे तथा स्वयं पेशवा ।

प्रश्न 39.
अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब अधिकार किया और किस मुग़ल बादशाह को अपने प्रभाव अधीन लिया ?
उत्तर-
अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर 1803 ई० में अधिकार किया । इस प्रकार उन्होंने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय को अपने प्रभाव अधीन कर लिया ।

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प्रश्न 40.
18वीं सदी में मराठों के बाद दक्षिण की सबसे शक्तिशाली रियासत कौन-सी थी तथा इसके आरम्भिक संस्थापक का नाम क्या था ?
उत्तर-
18वीं सदी में मराठों के बाद दक्षिण की सबसे शक्तिशाली रियासत हैदराबाद थी । इसके आरम्भिक संस्थापक का नाम चिन किलिच खान था ।

प्रश्न 41.
हैदराबाद के शासक को मुगल बादशाह की ओर से कौन-सी दो उपाधियां और कब दी गईं ?
उत्तर-
हैदराबाद के शासक को मुग़ल बादशाह की ओर से ‘निजामुलमुल्क’ तथा ‘आसफ़जाह’ की उपाधियां दी गईं। उसे पहली उपाधि 1713 ई० में और दूसरी उपाधि 1725 ई० में दी गई ।

प्रश्न 42.
निजामुलमुल्क मराठों से किन दो लड़ाइयों में तथा कब पराजित हुआ ?
उत्तर-
निज़ामुलमुल्क मराठों से मालखेद तथा भोपाल के निकट लड़ी गई लड़ाइयों में क्रमश: 1728 ई० तथा 1738 ई० में पराजित हुआ ।

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प्रश्न 43.
निज़ामअली किसका पुत्र था तथा उसने कब सत्ता प्राप्त की ?
उत्तर-
निज़ामअली आसफजाह (निजामुलमुल्क) का पुत्र था । उसने 1761 ई० में सत्ता प्राप्त की ।

प्रश्न 44.
हैदरअली कब और किस राज्य का मुख्य सेनापति बना ?
उत्तर-
हैदरअली 1750 ई० से कुछ समय पश्चात् मैसूर राज्य का मुख्य सेनापति बना ।

प्रश्न 45.
हैदरअली की दक्षिण की कौन-सी चार शक्तियों के साथ लड़ाई रही ?
उत्तर-
हैदरअली की दक्षिण की जिन शक्तियों के साथ लड़ाई रही, वे थीं-मराठे, हैदराबाद का शासक, कर्नाटक का नवाब और अंग्रेज़ ।

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प्रश्न 46.
हैदरअली ने मराठों के साथ समझौता कब किया और कितना रुपया देना स्वीकार किया ?
उत्तर-
हैदरअली ने 1770 ई० में मराठों के साथ समझौता किया और उन्हें 31 लाख रुपया देना स्वीकार किया ।

प्रश्न 47.
हैदरअली की मृत्यु कब हुई तथा उसके उत्तराधिकारी का नाम क्या था ?
उत्तर-
हैदरअली की मृत्यु 1782 ई० में हुई । उसके उत्तराधिकारी का नाम टीपू सुल्तान था ।

प्रश्न 48.
टीपू सुल्तान ने अपने आपको एक स्वतन्त्र शासक कब घोषित किया तथा उसकी मृत्यु कब और किससे लड़ते समय हुई ?
उत्तर-
टीपू सुल्तान ने 1786 ई० में अपने आपको स्वतन्त्र शासक घोषित किया । उसकी मृत्यु 1799 ई० में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते समय हुई ।

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III. छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
18वीं शताब्दी में दक्षिणी भारत की नई रियासतें कौन-सी थीं ?
उत्तर-
18वीं शताब्दी में मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण में अनेक नई रियासतों का उदय हुआ । इनमें से मराठा राज्य, हैदराबाद और मैसूर प्रमुख थीं । मराठा राज्य यूं तो 17वीं शताब्दी में ही शिवाजी के अधीन शक्तिशाली हो गया था परन्तु इसके उत्तराधिकारियों के समय तथा पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद इस राज्य की शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई । हैदराबाद राज्य की स्थापना चिन-किलिच खान ने की थी । सम्राट् मुहम्मद शाह ने 1725 ई० में इसे आसफजाह की उपाधि दी जो कि एक दिखावा मात्र थी । वास्तव में आसफजाह निज़ाम के नाम से प्रसिद्ध हुए । 1798 ई० में हैदराबाद के शासक ने अंग्रेजों के साथ सन्धि कर ली और उनकी शरण ले ली । इसके बाद भारत के स्वतन्त्र होने तक यह रियासत अंग्रेजों की अधीनता में ही स्थापित रही ।

मैसूर रियासत का उदय विजयनगर राज्य के पतन के बाद हुआ । इस राज्य के प्रसिद्ध शासक थे-हैदरअली और टीपू सुल्तान । अंग्रेजों ने 1799 ई० में टीपू सुल्तान को हराकर मैसूर के बहुत-से प्रदेशों पर अपना अधिकार कर लिया और शेष राज्य उदियार वंश के एक राजकुमार को दे दिया । हैदराबाद की भान्ति मैसूर की रिसायत भी अंग्रेजों के अधीन 1947 ई० तक स्थापित रही।

प्रश्न 2.
दक्षिण में मराठा शक्ति के उदय के कारण लिखो ।
उत्तर-
मराठे महाराष्ट्र के रहने वाले थे । इस प्रदेश में पश्चिमी घाट की पहाड़ियां स्थित हैं । अतः मराठों को आजीविका कमाने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता था । परिश्रम के जीवन ने उन्हें वीर तथा साहसी बनाया । दक्षिण के मुसलमान राज्यों में रह कर उनके सैनिक गुणों का विकास हुआ । यहां के मुसलमान शासकों ने उन्हें सेना में भर्ती किया और उनकी सहायता से अनेक युद्ध जीते । इस प्रकार मराठों को अपनी सैनिक शक्ति का पूर्णतया आभास हो गया । 15वीं तथा 16वीं शताब्दी में मराठा प्रदेश में धार्मिक पुनर्जागरण हुआ । तुकाराम, एकनाथ, रामदास तथा वामन पण्डित आदि सन्तों ने मराठों में एकता और समानता की भावना का प्रचार किया । परिणामस्वरूप मराठे जाति-पाति के भेदभाव भूल कर एक हो गए । मराठा शक्ति के उत्थान में सबसे अधिक योगदान शिवाजी का था। उन्होंने अपनी योग्यता और वीरता से बिखरी हुई मराठा शक्ति को एक लड़ी में पिरोया । अन्त में शिवाजी के नेतृत्व में मराठे दक्षिण भारत में सबसे अधिक शक्तिशाली हो गए ।

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प्रश्न 3.
बाजीराव के नेतृत्व में मराठा शक्ति के उत्तरी भारत में विस्तार का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
बाजीराव 1719 ई० में पेशवा बना । मराठा इतिहास में उसे सबसे महान् पेशवा कहा जाता है । वह मराठा राज्य का विस्तार सारे भारत में करना चाहता था । उसने निज़ाम हैदराबाद को 1728 ई० में पराजित किया और उसके साथ एक सन्धि की । सन्धि के अनुसार निज़ाम ने शाहू जी को एकमात्र मराठा राजा स्वीकार किया और वचन दिया कि वह शम्भूजी का पक्ष नहीं लेगा । 1738 ई० में भोपाल के समीप बाजीराव ने पुनः निज़ाम को पराजित किया । निज़ाम तथा मुगलों ने नर्मदा और चम्बल के बीच का प्रदेश मराठों को दे दिया । इसके अतिरिक्त पेशवा के भाई चिमना जी आपे ने मालवा के गवर्नर गिरधर बहादुर को पराजित किया । पेशवा ने बुन्देल सरदार छत्रसाल की सहायता करके बुन्देलखण्ड के कुछ भाग पर भी अधिकार कर लिया । उसने दिल्ली के समीप मुग़ल सेना को हराया। तत्पश्चात् उसने अपने भाई चिमना जी आपे की सहायता से पुर्तगालियों को पराजित करके थाना, सालसेट तथा बसीन के प्रदेशों पर भी विजय प्राप्त की । इस प्रकार बाजीराव प्रथम ने अनेक प्रदेश विजित किए और मराठा राज्य का विस्तार किया ।

प्रश्न 4.
पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों की पराजय के कारणों की समीक्षा कीजिए ।
उत्तर-
पानीपत की तीसरी लड़ाई में अनेक कारणों से मराठों की पराजय हुई । प्रथम, मराठा सरदार सदाशिव राव बड़ा ही हठी स्वभाव का व्यक्ति था। अपने हठी स्वभाव के कारण ही उसने राजपूतों को अपना शत्रु बना लिया था। परिणामस्वरूप पानीपत के युद्ध में मराठों को राजपूतों की सहायता न मिल सकी। दूसरे, युद्ध में मराठा सरदार विश्वास राव की मृत्यु के कारण सदाशिव राव चुपचाप हाथी से नीचे उतर आया। उसके सैनिकों ने जब उसे हाथी पर न देखा तो उनका धैर्य टूट गया। तीसरे, मराठा सरदारों में आपसी एकता नहीं थी। एकता के अभाव में उन्हें पराजित होना पड़ा । चौथे, मराठा सैनिक छापामार युद्ध करने में अधिक कुशल थे। वे इस आमने-सामने के युद्ध में शत्रु सेना का पूरी तरह सामना न कर सके । पांचवें, इस युद्ध में अब्दाली को अवध के नवाब तथा रुहेला सरदारों ने भी सहायता दी, जिससे उसकी शक्ति बढ़ गई । छठे, युद्ध में मराठा सेना की रसद का प्रबन्ध ठीक न होने के कारण उन्हें कई बार भूखा रहना पड़ा । यह बात भी उनकी पराजय का कारण बनी।

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प्रश्न 5.
मराठे एक शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित करने में क्यों असफल रहे ?
उत्तर-
मराठे कई कारणों से भारत में शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित करने में असफल रहे । प्रथम, शिवाजी अपने सैनिकों को नकद वेतन देते थे । परन्तु पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने जागीर प्रथा आरम्भ कर दी । परिणाम यह हुआ कि मराठा सरदार शक्तिशाली हो गए और केन्द्रीय सत्ता निर्बल हो गई । दूसरे, पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों के लगभग 70 हज़ार सैनिक मारे गये। इस प्रकार उनकी सैनिक शक्ति लगभग नष्ट हो गई । तीसरे, मराठों के पास अंग्रेज़ों की तरह अच्छे शस्त्र नहीं थे। उनकी सेना भी अंग्रेज़ों जैसी संगठित नहीं थी। इस कारण वे अंग्रेजों के विरुद्ध पराजित हुए । चौथे, मराठे गुरिल्ला युद्ध प्रणाली में कुशल थे। परन्तु उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध मैदानी युद्ध करने पड़े । पांचवें, मराठा सरदारों में एकता का अभाव था। इस स्थिति में शक्तिशाली राज्य स्थापित करना असम्भव था । छठे, मराठों ने शासन-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की ओर विशेष ध्यान न दिया। वे अधिकतर लूटमार में ही अपना समय बिताते थे । इस कारण उनकी प्रजा उनसे नाराज़ हो गई और मराठा राज्य का पतन हो गया ।

प्रश्न 6.
मैसूर में हैदरअली और टीपू सुल्तान की सफलताओं का वर्णन करो ।
उत्तर-
हैदरअली मैसूर का शासक था । उसने यहां का शासन 1761 ई० में मैसूर के एक हिन्दू राजा से प्राप्त किया था। वह एक वीर तथा साहसी व्यक्ति था । वह पक्का देशभक्त था । वह अंग्रेज़ों का घोर शत्रु था और उनकी कूटनीति को खूब समझता था । इसलिए वह इन्हें भारत से बाहर निकालना चाहता था । इस उद्देश्य से उसने अंग्रेजों के साथ दो युद्ध किए । प्रथम युद्ध में तो उसे कुछ सफलता मिली परन्तु दूसरे युद्ध के दौरान उसकी मृत्यु हो गई । परिणामस्वरूप वह अपना उद्देश्य पूरा न कर सका ।

टीपू सुल्तान एक योग्य शासक, कुशल सेनापति और महान् प्रशासक था । टीपू सुल्तान ने एक नवीन कैलेंडर लागू किया और सिक्के ढालने की एक नई प्रणाली आरम्भ की । उसने मापतोल के नये पैमाने भी अपनाए । उसने अपने पुस्तकालय में धर्म, इतिहास, सैन्य विज्ञान, औषधि विज्ञान और गणित आदि विषयों की पुस्तकों का समावेश किया । उसने अपनी सेना को यूरोपीय ढंग से संगठित किया। उसने व्यापार तथा औद्योगिक विकास की ओर पूरा ध्यान दिया । संक्षेप में, उसकी उपलब्धियां अपने युग के अन्य शासकों की तुलना में महान् थीं। .

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प्रश्न 7.
शिवाजी के राज्य प्रबन्ध की मुख्य विशेषताएं बताएं ।
उत्तर-
शिवाजी का राज्य प्रबन्ध प्राचीन हिन्दू नियमों पर आधारित था । शासन के मुखिया वह स्वयं थे । उनकी सहायता तथा परामर्श के लिए 8 मन्त्रियों की राजसभा थी, जिसे अष्ट-प्रधान कहते थे । इसका मुखिया ‘पेशवा’ कहलाता था । प्रत्येक मन्त्री के अधीन अलग-अलग विभाग थे । प्रशासन की सुविधा के लिए राज्य को चार प्रान्तों में बांटा गया था । प्रत्येक प्रान्त एक सूबेदार के अधीन था। प्रान्त परगनों में बंटे हुए थे । शासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी । इसका प्रबन्ध ‘पाटिल’ करते थे । शिवाजी के राज्य की आय का सबसे बड़ा साधन भूमिकर था । भूमि-कर के अतिरिक्त चौथ, सरदेशमुखी तथा कुछ अन्य कर भी राज्य की आय के मुख्य साधन थे । न्याय के लिए पंचायतों की व्यवस्था थी। शिवाजी ने एक शक्तिशाली सेना का संगठन भी किया । उन्होंने घुड़सवार सेना भी तैयार की। घुड़सवार सिपाही पहाड़ी प्रदेशों में लड़ने में फुर्तीले होते थे । शिवाजी के पास एक समुद्री बेड़ा भी था ।

प्रश्न 8.
चौथ तथा सरदेशमुखी से क्या अभिप्राय था तथा इसका क्या महत्त्व था ?
उत्तर–
चौथ तथा सरदेशमुखी दो प्रकार के कर थे । शिवाजी कर निश्चित इलाकों से प्राप्त किया करते थे । उनके प्रभावाधीन दो तरह के क्षेत्र थे-एक वे प्रदेश जो सीधे तौर पर शिवाजी के राज्य में शामिल थे । इन प्रदेशों को स्वराज्यी कहा जाता था । दूसरे प्रकार के प्रदेश इसके चारों ओर के इलाके में फैला था । इसे मुग़लई कहते थे । मुगलई इलाकों से चौथ अथवा लगान का एक चौथाई भाग और सरदेशमुखी अथवा लगान का दसवां भाग तलवार के ज़ोर से वसूल किया जाता था । शिवाजी छत्रपति होने के अतिरिक्त स्वयं को महाराष्ट्र का सरदेशमुख (सबसे बड़ा देशमुख) भी कहलाते थे । अतः लगान का दसवां हिस्सा लेना वे अपना अधिकार समझते थे । चौथ और सरदेशमुखी मराठा शक्ति के चिन्ह भाग बन गए । इनके कारण मराठा शक्ति का क्षेत्र अधिक विस्तृत दिखाई देता था ।

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प्रश्न 9.
बालाजी विश्वनाथ ने राजा शाहू की स्थिति को सुदृढ़ करने में क्या योगदान दिया ?
उत्तर-
बालाजी ने शाहू जी के लिए अनेक कार्य किए । उसने ताराबाई तथा अन्य सरदारों को पराजित करके शाहूजी की स्थिति सुदृढ़ की । अत: शाहूजी ने उसे 1713 ई० में पेशवा नियुक्त किया । पेशवा के रूप में बालाजी ने न केवल मराठा सत्ता को सुदृढ़ किया बल्कि अपने परिवार के लिए पेशवा की गद्दी सदा के लिए सुरक्षित कर ली । बाला जी विश्वनाथ ने मुग़ल राज परिवार के आपसी झगड़ों का लाभ उठाया । उसने 1719 में मुग़लों से एक सन्धि की । इस सन्धि के अनुसार शाहूजी को ‘स्वराज प्रदेशों’ का शासक स्वीकार कर लिया गया और उसे दक्षिण के मुग़ल प्रदेशों से ‘चौथ’ तथा ‘सरदेशमुखी’ वसूल करने का अधिकार भी मिल गया । यह निर्णय भी किया गया कि शाहूजी मुग़लों की सहायता के लिए सेना तैयार रखेंगे जिसमें 15 हज़ार सैनिक होंगे । बालाजी ने शाहूजी की माता तथा मराठा राज-परिवार के अन्य सदस्यों को मुग़ल कैद से छुड़ाने में भी सफलता प्राप्त की । उसने शाहूजी को दक्षिण में मुग़ल शासन का प्रतिनिधि बनवा दिया और ताराबाई की सत्ता का अन्त कर दिया ।

प्रश्न 10.
इतिहास में पानीपत के तीसरे युद्ध का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 ई० में अहमदशाह अब्दाली तथा मराठों के बीच हुआ । अहमदशाह को तो इस युद्ध से कोई विशेष लाभ न हुआ, परन्तु मराठा शक्ति पर इस युद्ध का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा । युद्ध में लगभग दो लाख मराठा सैनिक तथा अन्य लोग मारे गए । पेशवा बालाजी बाजीराव इस पराजय के शोक से मर गए । फलस्वरूप भारत में मराठों का अदबा लगभग समाप्त हो गया। बंगाल, बिहार, अवध, पंजाब और मैसूर में उनकी सत्ता समाप्त हो गई । पेशवा पद का महत्त्व इतना कम हो गया कि मराठा सरदार अपनी मनमानी करने लगे । मराठों की इस कमज़ोरी का लाभ अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी सत्ता को पहुँचा ।

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प्रश्न 11.
प्रमुख मराठा सरदार तथा उनके राज्य क्षेत्र कौन-से थे ?
उत्तर-
मराठा राज्य में बड़े-बड़े मराठा सरदारों ने अपने राज्य क्षेत्र अलग-अलग स्थापित किए हुए थे । ज्यों-ज्यों पेशवा की शक्ति बढ़ी त्यों-त्यों मराठा सरदारों का अधिकार क्षेत्र भी बढ़ा । पानीपत के युद्ध से पूर्व ही पांच अलग-अलग मराठा राज्य क्षेत्र अस्तित्व में आ चुके थे । पूना से पेशवा स्वयं महाराष्ट्र पर शासन करता था । गुजरात में गायकवाड़ सरदार प्रधान थे। उनकी राजधानी बड़ौदा थी। उड़ीसा को मिलाकर मध्य भारत पर भौंसला सरदारों का शासन था । उनकी राजधानी नागपुर थी। मालवा में होल्कर सरदार इन्दौर से शासन करते थे। इसी तरह बुन्देलखण्ड में ग्वालियर से शिंडे सरदार राज्य करते थे। पानीपत के युद्ध के पश्चात् कुछ सरदारों ने नए पेशवा माधोराव का विरोध करना आरम्भ कर दिया । परन्तु महादजी शिंडे की सहायता से उसकी स्थिति बनी रही। 1772 में माधोराव की मृत्यु के पश्चात् पेशवा की ओर से नाना फड़नवीस ने 1800 तक मराठा सरदारों को एक सूत्र में बांधे रखा। बाद में मराठा सरदारों की नई पीढ़ियां लगभग स्वतन्त्र हो गईं ।

IV. निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
(क) शिवाजी के नेतृत्व में मराठों के उत्थान का वर्णन कीजिए ।
(ख) मराठों की शक्ति को रोकने के लिए औरंगजेब को किस सीमा तक सफलता मिली ? .
अथवा
शिवाजी की विजयों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
(क) शिवाजी के नेतृत्व में मराठों का उत्थान-शिवाजी एक महान् मराठा सरदार थे । उन्होंने मराठों को एक सूत्र में बांधने के अनेक प्रयत्न किए । सबसे पहले उन्होंने बिखरी हुई मराठा शक्ति को संगठित करके एक विशाल सेना तैयार की । 1646 ई० में उन्होंने अपना विजय-अभियान आरम्भ किया ।

विजयें-शिवाजी की पहली विजय तोरण दुर्ग पर थी । इसके बाद उन्होंने चाकन, सिंहगढ़, पुरन्धर तथा कोंकण के दुर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया । उन्होंने जावली के सरदार चन्दराव को मरवा कर जावली को भी अपने अधिकार में ले लिया । शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति को देखकर बीजापुर का सुल्तान चिन्ता में पड़ गया । उसने शिवाजी के विरुद्ध अपने सेनापति अफज़ल खां को भेजा। अफज़ल खां ने धोखे से शिवाजी को मारने का प्रयत्न किया । परन्तु इस प्रयास में वह स्वयं मारा गया । अब शिवाजी ने मुग़ल प्रदेशों में लूट-मार आरम्भ कर दी जिससे मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब को चिन्ता हुई । अतः 1660 ई० में उसने दक्षिण के सूबेदार शाइस्ता खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । वह बढ़ता हुआ पूना तक जा पहुंचा । परन्तु शिवाजी ने उसे वहां से भागने पर विवश कर दिया ।

अब शिवाजी ने सूरत के समृद्ध नगर पर आक्रमण कर दिया और वहां खूब लूट-मार की । इससे औरंगजेब की चिन्ता और बढ़ गई। उसने राजा जयसिंह तथा दिलेर खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । उनके नेतृत्व में मुग़ल सेनाओं ने मराठों के अनेक किले जीत लिए । विवश होकर शिवाजी ने मुगलों के साथ सन्धि कर ली । सन्धि के बाद शिवाजी आगरा में मुग़लदरबार में पहुंचे । वहां उन्हें बन्दी बना लिया गया । परन्तु शिवाजी बड़ी चालाकी से मुग़लों की कैद से बच निकले । 1674 ई० में उन्होंने रायगढ़ में अपना राज्याभिषेक किया। इस अवसर पर उन्होंने छत्रपति की उपाधि भी धारण की । राज्याभिषेक के पश्चात् उन्होंने कर्नाटक के समृद्ध प्रदेशों जिंजी और वैलोर पर भी अपना अधिकार कर लिया । इस तरह वह दक्षिणी भारत में एक स्वतन्त्र मराठा राज्य स्थापित करने में सफल हुए।

(ख) औरंगज़ेब द्वारा मराठा शक्ति को रोकने के उपाय-औरंगज़ेब ने मराठा शक्ति को दबाने के अनेक कार्य किए–

  • सबसे पहले उसने 1660 ई० में दक्षिण के सूबेदार शाइस्ता खां को शिवाजी के विरुद्ध भेजा। वह बढ़ता हुआ पूना जा पहुंचा। परन्तु उसे वहां से भागने पर विवश कर दिया।
  • शाइस्ता खां की पराजय के पश्चात् औरंगज़ेब ने राजा जयसिंह को शिवाजी के विरुद्ध भेजा । उसने मराठों के अनेक किले जीत लिए । विवश हो कर शिवाजी ने मुग़लों के साथ सन्धि कर ली । सन्धि के बाद वह आगरा में मुग़ल दरबार में पहुंचे जहां उन्हें बन्दी बना लिया गया परन्तु शिवाजी बड़ी चालाकी से मुग़लों की कैद से भाग गए।
  • 1689 ई० में औरंगज़ेब नए मराठा शासक शम्भाजी को बन्दी बनाने में सफल हो गया और उसका वध कर दिया।
  • शम्भा जी के वध के पश्चात् औरंगज़ेब ने उसके पुत्र शाहूजी को भी कैद कर लिया। उसे पूरी तरह विलासी बना दिया गया ताकि वह शासन करने के योग्य न रहे।
  • शाहूजी के पश्चात् शिवाजी के दूसरे पुत्र राजा राम ने मुग़लों से संघर्ष किया । उसने मुग़लों के अनेक दुर्ग जीत लिए । उसकी विजयों को देखते हुए औरंगजेब ने मराठों के साथ सन्धि कर ली।
  • राजाराम की 1707 ई० में मृत्यु हो गई और उसकी विधवा ताराबाई ने बड़ी कुशलता से मराठों का नेतृत्व किया। औरंगजेब ने उसकी शक्ति को कुचलने का काफ़ी प्रयास किया, परन्तु असफल रहा । 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 2.
शिवाजी की शासन व्यवस्था का वर्णन कीजिए ।
अथवा
शिवाजी के असैनिक तथा सैनिक शासन प्रबंध की अलग-अलग चर्चा कीजिए।
उत्तर-
शिवाजी ने एक उच्च कोटि के शासन प्रबन्ध की व्यवस्था की। उनके शासन-प्रबन्ध की रूप-रेखा इस प्रकार थी –

असैनिक प्रबन्ध-
1. केन्द्रीय शासन–केन्द्रीय शासन का मुखिया छत्रपति (शिवाजी) था । राज्य की सभी शक्तियां उसके हाथ में थीं । छत्रपति को शासन-कार्यों में सलाह देने के लिए आठ मन्त्रियों का एक मन्त्रिमण्डल था । इसे अष्ट-प्रधान कहते थे । प्रत्येक मन्त्री के अधीन एक विभाग होता था ।।

2. प्रान्तीय शासन-शिवाजी ने अपने राज्य को तीन प्रान्तों में बांटा हुआ था । प्रत्येक प्रान्त एक सूबेदार के अधीन था। प्रान्त आगे चलकर परगनों तथा तर्कों में बंटे हुए थे । शासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी ।

3. न्याय-प्रणाली-शिवाजी की न्याय-प्रणाली बड़ी साधारण थी, परन्तु यह लोगों की आवश्यकता के अनुरूप थी । मुकद्दमों का निर्णय प्रायः हिन्दू धर्म की प्राचीन परम्पराओं के अनुसार ही किया जाता था ।

4. कर प्रणाली-शिवाजी ने राज्य की आय को बढ़ाने के लिए कृषि को विशेष प्रोत्साहन दिया । सारी भूमि की पैमाइश करवाई गई और उपज का 2/5 भाग ‘भूमि-कर’ निश्चित किया गया । यह कर नकद अथवा उपज दोनों रूप में दिया जा सकता था। भूमि-कर के अतिरिक्त चौथ तथा सरदेशमुखी नामक कर भी राज्य की आय के महत्त्वपूर्ण स्रोत थे ।

सैनिक प्रबन्ध-

शिवाजी ने एक शक्तिशाली सेना का संगठन किया । इसके प्रमुख अंगों तथा विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है

  • घुड़सवार सेना-घुड़सवार सैनिक शिवाजी की सेना का महत्त्वपूर्ण अंग थे । उनकी सेना में घुड़सवारों की संख्या लगभग 45,000 थी । इस सेना को ‘पागा’ कहा जाता था । पागा कई टुकड़ियों में बंटी हुई थी । सबसे छोटी टुकड़ी 25 सैनिकों की होती थी, जिसके मुखिया को ‘हवलदार’ कहा जाता था । घुड़सवार सेना का सबसे बड़ा अधिकारी ‘पांच हज़ारी’ कहलाता था ।
  • पैदल सेना-शिवाजी की पैदल सेना में लगभग 10,000 सैनिक थे । यह भी कई टुकड़ियों में विभक्त थे । सबसे छोटी टुकड़ी 9 सैनिकों की होती थी । इसके मुखिया को ‘नायक’ कहते थे । पैदल सेना का सबसे बड़ा अधिकारी ‘सरए-नौबत’ कहलाता था ।
  • हाथी सेना-शिवाजी की सेना में हाथी भी सम्मिलित थे । हाथियों की संख्या लगभग 1,260 थी ।
  • जल सेना-शिवाजी ने जल सेना की व्यवस्था भी की हुई थी । इस सेना में कुल 200 जल सैनिक थे । उसके पास एक जहाज़ी बेड़ा भी था ।।
  • तोपखाना-तोपखाना शिवाजी की सेना का विशेष अंग था ।
  • दुर्ग अथवा किले-शिवाजी के राज्य में किलों की संख्या 280 थी । संकट के समय मराठा सैनिक इन्हीं किलों में रहते थे । शिवाजी ने इन किलों का प्रबन्ध भी बड़े अच्छे ढंग से किया हुआ था ।

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अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न 1.
स्काऊटिंग और गाइडिंग के क्या लाभ हैं ? विस्तार से लिखो।
उत्तर-
स्काऊटिंग और गाइडिंग के निम्नलिखित लाभ हैं—

  1. स्काऊटिंग और गाइडिंग बच्चों को प्रसन्न, शक्तिशाली, निष्ठावान, देश-भक्त और जन-सहायक बनाती हैं।
  2. स्काऊटिंग और गाइडिंग बच्चों के मन से घृणा, ऊंच-नीच, जाति-पाति और ईर्ष्या की भावना दूर करती है।
  3. स्काऊटिंग और गाइडिंग से बच्चों को ‘न कोई वैरी, न ही बेगाना’ की शिक्षा मिलती है।
  4. स्काऊटिंग और गाइडिंग रैलियों से बच्चों को दूसरे प्रान्त और दूसरे देश के लोगों से प्यार करने की प्रेरणा मिलती है।
  5. भूकम्प, बाढ़, तूफान, बीमारी अथवा किसी अन्य कठिनाई के समय स्काऊट दुःखियों की सहायता करके उनका दुःख कम करते हैं।
  6. स्काऊटिंग और गाइडिंग से बच्चों को नियमों के अनुसार रहना, बड़ों-छोटों का सम्मान करना और सेवा-भाव की शिक्षा मिलती है।
  7. स्काऊटिंग और गाइडिंग से बच्चों को बहुत अच्छे नागरिक बनाया जाता है।
  8. स्काऊटिंग और गाइडिंग से बच्चे हर कठिनाई का साहस से सामना करना और हर स्थिति में प्रसन्न रहना सीखते हैं।

प्रश्न 2.
स्काऊटिंग और गाइडिंग के प्रण हमें क्या शिक्षा देते हैं ? संक्षेप में वर्णन करो।
उत्तर-
किसी भी धर्म या संस्था में प्रवेश करने के पश्चात् एक विशेष प्रकार का प्रण करना पड़ता है। यह प्रण पुलिस और सेना के जवानों को भी करना पड़ता है। स्काऊटिंग
और गाइडिंग में निम्नलिखित प्रण लिया जाता है—
मैं परमात्मा को प्रत्यक्ष मान कर प्रण करता हूं कि मैं

  1. परमात्मा और देश सम्बन्धी अपने कर्त्तव्य को निभाने
  2. दूसरों की सहायता करने और स्काऊटिंग नियमों का पालन करने में अधिक-से-अधिक ज़ोर लगाऊंगा।

उपर्युक्त प्रण हमें परमात्मा में विश्वास करना सिखलाता है। इस प्रकार का प्रण करने वाला मनुष्य नास्तिक नहीं होगा। यह प्रण मनुष्य में देश-भक्ति की भावना पैदा करता है। इसके साथ ही यह प्रण मनुष्य को कर्तव्य पालन की शिक्षा भी देता है।
PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 7 स्काऊटिंग और गाइडिंग 2
इस प्रण से मनुष्य में सेवा-भाव पैदा होता है। मनुष्य प्रत्येक ज़रूरतमन्द मनुष्य की सहायता करने में प्रसन्नता का अनुभव करता है।
इस प्रण से बचपन से ही मनुष्य नियमानसुार | जीवन जीना सीख जाता है। मनुष्य को यह भी समझ आ जाता है कि प्रत्येक संस्था के कुछ नियम हैं। नियमों का पालन करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। अनियमित जीवन नीरस होता है। जो नियम के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं वे जीवन में सुखी रहते हैं।

यह प्रण मनुष्य को आदर्शवादी बनने और उन्नति करने की प्रेरणा देता है। ये प्रण स्काऊट को ऊंचा और सच्चे बनने में सहायक होते हैं। ऐसे प्रणों पर चलने वाले नागरिक अच्छे नागरिक बनते हैं। ऐसे मनुष्यों से विश्व-शान्ति की आशा रखी जा सकती है।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 7 स्काऊटिंग और गाइडिंग

प्रश्न 3.
स्काऊट नियमों की विस्तारपूर्वक व्याख्या करो।
उत्तर-
नियमों के बिना कोई संस्था या संगठन नहीं चल सकता। यह विश्व भी नियमों पर ही निर्भर है। स्काऊटिंग के भी अपने ही नियम हैं। ये निम्नलिखित प्रकार हैं—

1. स्काऊटिंग की आन विश्वसनीय होती है-स्काऊट सदैव सत्य बोलता है। वह अच्छे काम करके विश्वास पैदा करता है और सम्मान भी प्राप्त करता है।

2. स्काऊट निष्ठावान् होता है-स्काऊट अपने मित्रों, नेतागणों और देश से कभी विश्वासघात नहीं करता।

3. स्काऊट आस्तिक, देश-भक्त और जन सेवक होता है-स्काऊट परमात्मा को किसी-न-किसी रूप में मानता है। इससे उसका मन शुद्ध रहता है। वह अपने देश के प्रति निष्ठावान् होता है। वह संविधान का पूरा पालन करता है और देश की शान के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं सुनता। वह ज़रूरतमन्दों की दिल से सहायता करता है। वह दिन में एक अच्छा काम अवश्य करता है। इसे पूरा करने के लिए वह अपने गले में डाले हुए रूमाल को सवेरे एक गांठ दे देता है।
PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 7 स्काऊटिंग और गाइडिंग 3

4. स्काऊट सबका मित्र, भाई और ऊंचनीच से ऊंचा होता है-स्काऊट में जाति-पाति, ऊंच-नीच, धर्म और नस्ल सम्बन्धी कोई भेदभाव नहीं होता है। हर धर्म, देश, जाति-पाति और नस्ल के स्काऊट आपस में मिलकर बैठते व काम करते हैं, मिलकर भोजन पकाते और खाते हैं। स्काऊट दूसरे स्काऊटों को भाई समझता है।

5. स्काऊट मीठा बोलने वाला होता हैस्काऊट हर मनुष्य से बड़े प्यार से बोलता है। वह मीठा बोल कर दूसरों का दिल जीत लेता है।

6. स्काऊट जीव-जन्तुओं का मित्र होता | है-स्काऊट किसी भी पक्षी या पशु को कभी हानि नहीं पहुंचाता। वह पशु-पक्षियों से प्यार करता है।

7. स्काऊट अनुशासित और आज्ञाकारी होता है-स्काऊट सदा ही नियमों का पालन करता है। वह मनमानी नहीं कर सकता। वह बड़ों का आदेश प्रसन्नता से स्वीकार करता है।

8. स्काऊट बहादुर और कठिनाई का सामना करने वाला होता है-स्काऊट दुःख के समय में कभी घबराता नहीं। वह हर कठिनाई का सामना साहस से करता है।

9. स्काऊट संयमी होता है-स्काऊट सदा ही संयमी होता है। वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संयम का प्रयोग करता है।

10. स्काऊट मन, वचन और कर्म से शुद्ध होता है-स्काऊट का मन पवित्र, वचन का पक्का और कर्म का शुद्ध होता है। वह किसी को भला-बुरा नहीं कहता। किसी की निन्दा नहीं करता। वह दु:ख के समय पूर्ण शक्ति लगा कर मानवता की सहायता करता है।

प्रश्न 4.
स्काऊटिंग में स्काऊट की क्या महत्ता है ? वर्णन करो।
उत्तर-
स्काऊटिंग लोगों की लहर होने के कारण बच्चों को देश-भक्त, आज्ञाकारी तथा स्वस्थ बनाती है। उनमें से ऊँच-नीच, जाति-पाति तथा ईर्ष्या को निकाल कर उनको अच्छे नागरिक बनाती है। उनको ‘न कोई वैरी न ही बिगाना’ का उद्देश्य देती है।

स्काऊटिंग से बच्चे एक-दूसरे के मित्र बनते हैं जिससे अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध अच्छे बनते हैं। संसार में शान्ति बनी रहती है। इस लहर से बच्चे सेवक, परोपकारी तथा दानी बन जाते हैं। बच्चे (स्काऊट) मेलों में सेवा करते हैं। कष्ट के समय बाढ़ों, भूकम्पों तथा बीमारियों से तबाह हुए गरीबों तथा अनाथों की हर प्रकार से मदद करते हैं। लड़ाई में घायलों की सेवा करने के लिए तैयार रहते हैं। स्काऊटिंग से देश के प्रति सम्मान बढ़ जाता है तथा अपने हाथों से कार्य करने के गुण पैदा होते हैं। स्कूलों में पढ़ते समय स्काऊट हाथों से कार्य करके पैसे भी कमा लेते हैं, जिसे वह अपनी फीसों, पुस्तकों तथा ज़रूरतमंद वस्तुओं पर खर्च करते हैं।

स्काऊटिंग बच्चों का सर्वपक्षीय विकास करती है तथा एक मार्ग-दर्शक का कार्य करती है तथा बचपन से ही उनको अच्छे रास्तों पर चलना सिखाती है। इस शिक्षा से अनुशासन स्वयं ही आता है।

PSEB 7th Class Physical Education Solutions Chapter 7 स्काऊटिंग और गाइडिंग

प्रश्न 5.
“स्काऊटिंग शिक्षा से बच्चे का चौमुखी विकास होता है।” अपने विचार दीजिए।
उत्तर-
स्काऊटिंग बच्चों को प्रसन्न, शक्तिशाली, देश-भक्त और आज्ञाकारी तथा जनसहायक बनाती है। उनमें से घृणा, जाति-पाति, ऊंच-नीच आदि की भावना दूर करती है। इससे बच्चों को ‘न कोई वैरी न ही बेगाना’ की शिक्षा मिलती है।

स्काऊट रैलियों से अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध अच्छे और दृढ़ होते हैं। विश्व में अशान्ति नहीं रहती। इस आन्दोलन से बच्चे परोपकारी, सेवक, सहायक और दानी बन जाते हैं। बच्चे मेलों और कठिनाइयों के समय लोगों की सेवा करते हैं।

स्काऊटिंग से बच्चे अपने स्काऊट मास्टर, अफसरों और माता-पिता का आदेश हँसते हुए मानते हैं। उनमें से अपने बड़ों के लिए ही नहीं अपितु छोटों के लिए भी निष्ठा भर जाती है।

स्काऊटिंग से देश के प्रति प्यार और सम्मान बढ़ जाता है। हाथ से काम करने का गुण पैदा होता है। बच्चे हाथ से परिश्रम करके पुस्तकें, कापियां और अन्य आवश्यक वस्तुएं खरीदते हैं।

स्काऊटिंग शिक्षा से बच्चों को कठिनाइयों में से सफल होकर निकलने का ढंग समझ आ जाता है। बच्चों में से हीन भावना निकल जाती है।

स्काऊटिंग बच्चों को अच्छे मार्ग पर डालती है। इस शिक्षा से अनुशासन अपने आप आ जाता है। उनमें आत्म-निर्भरता की भावना और अच्छे नागरिक के गुण पैदा होते हैं। इन बातों से पता चलता है कि स्काऊटिंग बच्चों का चहुंमुखी विकास करती है जिससे बच्चे का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास होता है।

प्रश्न 6.
स्काउट का आदर्श है ‘तैयार’। स्पष्ट करो।
उत्तर-
स्काऊट्स (बच्चे) परोपकारी, सेवक और सहायक होते हैं। कठिनाई, भूकम्प, तूफान, बाढ़, आंधी और बीमारी के समय स्काऊट्स दुःखियों की सेवा करते हैं। वे हर ज़रूरतमन्द की सेवा करने के लिए तैयार रहते हैं। वे बड़ों की आज्ञा मानने के लिए तत्पर रहते हैं। वे हाथ से काम करने से जी नहीं चुराते, अपितु अपना काम अपने हाथ से करने के लिए तैयार रहते हैं। वे मार्ग भूले, माता-पिता से बिछुड़े बच्चों और ज़रूरतमन्दों की सेवा कराने के लिए हर समय तैयार रहते हैं। वे हर कार्य तत्परता से करते हैं।

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प्रश्न 7.
“स्काऊट एक अच्छा नागरिक होता है।” व्याख्या करो।
उत्तर-
जो गुण एक अच्छे नागरिक में होने आवश्यक हैं वे एक स्काऊट को बचपन से ही सिखलाए जाते हैं। अच्छे नागरिक ही किसी देश का नाम रोशन करते हैं। स्काऊट्स को परमात्मा में विश्वास करने का प्रण लेना पड़ता है। इस प्रकार उसका धार्मिक विकास होता है। वह देश सेवा करने के लिए भी प्रण लेता है। उसे बड़ों का सम्मान करना और उनके आदेशों का प्रसन्नता से पालन करना भी सिखाया जाता है। उसे साथियों से प्यार करने की शिक्षा मिलती है। स्काऊट कैम्पों में विभिन्न प्रान्तों के बच्चों को आपस में मिलजुलकर बैठने का अवसर मिलता है। इस प्रकार उनमें राष्ट्रीय एकता की भावना आ जाती है। स्काऊट सम्मेलनों से बच्चों में विश्व-बन्धुत्व की भावना पैदा होती है।

स्काऊट्स को हर कठिनाई का सामना साहस से करने की शिक्षा दी जाती है। उन्हें हाथ से काम करना सिखलाया जाता है। वे अपना कार्य स्वयं करने के योग्य हो जाते हैं।

कठिनाई, बाढ़, तूफान या बीमारी के समय उन्हें मानवता की सेवा करनी सिखलायी जाती है। भूले भटकों को रास्ता दिखाना, बूढ़ों और बच्चों की यथा-योग्य सेवा करना उनका पहला कर्तव्य है।

उपर्युक्त गुणों वाले अच्छे नागरिक ही होते हैं। अत: यह कहना ठीक है कि स्काऊट एक अच्छा नागरिक होता है। स्काऊट में सहानुभूति, देश-प्रेम, साहस, अनुशासन, नम्रता, आत्म-निर्भरता आदि सभी गुण होते हैं। वह एक अच्छा ही नहीं अपितु आदर्श नागरिक होता है।

प्रश्न 8.
स्काऊट लहर को आरम्भ करने के लिए लॉर्ड बेडन की क्या देन है ?
उत्तर-
स्काऊट लहर के जन्मदाता लॉर्ड बेडन थे। उन्होंने फौज के उच्च पद को त्याग कर अपना सारा ध्यान इस ओर लगा दिया।
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उन्होंने पहला अमली प्रयोग बर्तानिया के एक टापू ब्राऊन-सी में 1907 ई० में लड़कों की एक छोटी टोली पर किया। लड़कों ने इस स्काऊटिंग शिक्षा कैम्प में पूरी दिलचस्पी दिखाई। 1908 ई० में बेडन पावल ने स्काऊटिंग फॉर बुआएज़ (Scouting for Boys) नामक पुस्तक प्रकाशित की और उसके साथ ही ‘दी स्काऊट’ (The Scout) नाम का एक साप्ताहिक समाचार-पत्र छापना भी शुरू किया। इस तरह पुस्तक और समाचार-पत्र द्वारा स्काऊटिंग का काफ़ी प्रचार हो गया। 1909 ई० में ‘क्रिस्टिल पैलेस’ (Crystal Palace) लन्दन में स्काऊटों की एक बड़ी रैली हुई। इस रैली । में हज़ारों की संख्या में दूर-दूर से आए स्काऊटों ने भाग लिया जिसमें स्काऊटों के हुनर , और कर्तव्यों की दर्शकों ने बहुत प्रशंसा की और उन्होंने अपने बच्चों को स्काऊट लहर में भाग लेने के लिए भेजना शुरू कर दिया। इस तरह यह लहर बहुत लोकप्रिय हो गई और धीरे-धीरे सारे संसार में फैल गई। बड़ी उम्र के बच्चों को स्काऊटिंग करते देख कर छोटे बच्चों में भी इस लहर में शामिल होने की इच्छा जागने लगी। इसके बाद बेडन पावल ने 7 से 12 साल की आयु वाले बच्चों के लिए कबिंग प्रारम्भ की और इस पर एक पुस्तक जिसका नाम ‘दी वुल्फ कब हैंड बुक’ (The Wolf Cub Hand Book) है, छापी और इस तरह बाद में बड़ी आयु वालों अर्थात् रोवर्ज़ के लिए रोवरिंग (Rovering) की संस्था शुरू की और उनके नेतृत्व के लिए एक पुस्तक ‘रोवरिंग टू सक्सैस’ (Rovering to Success) भी लिखी। बेडन पावल ने 1918 ई० में लड़कियों के लिए गाइडिंग शुरू की और इस लहर में चीफ गाइड उन्होंने अपनी पत्नी लेडी बेडन पावल को बनाया। उनकी मेहनत और अच्छे मार्ग दर्शन से ही यह लहर संसार में अत्यधिक सफल हुई।

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Physical Education Guide for Class 7 PSEB स्काऊटिंग और गाइडिंग Important Questions and Answers

बहुत छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्काऊटिंग आन्दोलन का जन्म-दाता कौन था ?
उत्तर-
लॉर्ड बेडन पावल।

प्रश्न 2.
स्काऊटिंग आन्दोलन सबसे पहले कहां शुरू हुआ ?
उत्तर-
बर्तानिया में।

प्रश्न 3.
सर्वप्रथम स्काऊटिंग शिक्षा कैम्प कहां लगा ?
उत्तर-
ब्राऊन सी टापू (बर्तानिया) में।

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प्रश्न 4.
सबसे पहले लड़कियों की स्काऊटिंग का इन्चार्ज़ कौन था ?
उत्तर-
लेडी बेडन पावल।

प्रश्न 5.
भारत के स्काऊटों की रैली दिल्ली में कब हई ?
उत्तर-
1937 में।

प्रश्न 6.
स्काऊटों को विशेषतया क्या सिखाया जाता है ?
उत्तर-
अच्छे गुण।

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प्रश्न 7.
एक स्काऊट दूसरे स्काऊट को मिलते समय क्या करता है ?
उत्तर-
तीन अंगुलियों से सैल्यूट देता है।

प्रश्न 8.
एक स्काऊट के लिए कौन-सी बातों का पालन करना आवश्यक है ?
उत्तर-
स्काऊट नियमों का।

छोटे उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
स्काऊटिंग आन्दोलन का प्रवर्तक कौन था ? सर्वप्रथम स्काऊटिंग आन्दोलन कहां आरम्भ हुआ ?
उत्तर-
स्काऊटिंग आन्दोलन के प्रवर्तक लॉर्ड बेडन पावल थे। उन्होंने बर्तानिया में स्काऊटिंग आन्दोलन आरम्भ किया। उन्होंने सर्वप्रथम स्काऊटिंग कैम्प 1907 में बर्तानिया के टापू ब्राऊन-सी में लगाया।

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प्रश्न 2.
बेडन पावल ने कौन-सी पुस्तकें लिखीं ?
उत्तर-
बेडन पावल ने ‘स्काऊटिंग फार बुआएज़’, ‘दी वुल्फ कब हैंड बुक’ और ‘रोवरिंग टू सक्सैस’ नामक तीन पुस्तकें लिखीं।

प्रश्न 3.
स्काऊटिंग रैलियों के क्या लाभ हैं ?
उत्तर-
स्काऊटिंग रैलियों से एक प्रान्त के बच्चों को दूसरे प्रान्त के बच्चों से मिलने और प्यार करने का अवसर मिलता है। एक देश के बच्चों को दूसरे देश के बच्चों से मिलने का अवसर मिलता है। इस प्रकार बच्चों में से ईर्ष्या भाव, रंग और नस्ल के भेदभाव दूर होते हैं। स्काऊटिंग रैलियां विश्व शान्ति की ओर एक प्रशंसनीय पग हैं।