PSEB 7th Class Science Notes Chapter 17 वन: हमारी जीवन रेखा

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 17 वन: हमारी जीवन रेखा will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 17 वन: हमारी जीवन रेखा

→ पौधों, जंतुओं तथा सूक्ष्मजीवों से बनी एक प्रणाली को वन कहते हैं।

→ वनों की परतें चंदोया (Canopy) बीच की परत ताज (Crown) तथा निम्न परत (Understory) होते हैं।

→ वन भूमि-अपरदन से रक्षा करते हैं।

→ भूमि वृक्षों के उगने तथा बढ़ने में सहायता करती है।

→ ह्यूमस से पता लगता है कि मृत पौधे तथा जंतुओं के शरीर से पोषक, मिट्टी में शामिल हुए हैं।

→ वन हरे फेफड़ों की भांति कार्य करते हैं तथा इनसे कई उत्पाद प्राप्त होते हैं। इसलिए वन बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

→ वन एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी सबसे ऊपरी सतह वृक्ष शिखर बनाते हैं।

→ वन हमेशा हरे रंग के होते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 17 वन: हमारी जीवन रेखा

→ विभिन्न प्रकार के जंतु, पौधे तथा कीट जंगलों में पाए जाते हैं।

→ सभी वन्य जंतु, शाकाहारी या मांसाहारी, किसी-न-किसी रूप में वन में पाए जाने वाले भोजन के लिए पौधों पर निर्भर करते हैं।

→ वन बढ़ते और विकास करते रहते हैं तथा पुनर्स्थापित (Regenerate) हो सकते हैं।

→ वन जलवायु, जल-चक्र और हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

→ वृक्ष, झांड़ियां, वनस्पति, जड़ी-बूटियां आदि जंगल से प्राप्त होते हैं।

→ वृक्षों और पौधों की ऊंचाई के अनुसार वनों को तीन श्रेणियों-

  1. चंदोया
  2. ताज तथा
  3. निम्न परत में । रखा गया है।

→ वनों की मृदा/मिट्टी पुनउत्पत्ति में सहायक होती है।

→ वन भूमि को अपरदन (Soil Erosion) से बचाते हैं।

→ वन के पौधे वाष्पोत्सर्जन करते हैं तथा वर्षा लाने में सहायक होते हैं।

→ वन जंगली कई पौधों, जंतुओं तथा सूक्ष्म-जीवों से मिलकर बनी एक प्रणाली है।

→ वन में वनस्पति की भिन्न-भिन्न परतें जंतुओं, पक्षियों और कीटों को भोजन और सहारा प्रदान करती हैं।

→ वन में मिट्टी, जल, हवा तथा सजीवों का आपस में आदान-प्रदान होता है।

→ क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए वन उनके जीवन के लिए ज़रूरी सामग्री उपलब्ध करवाते हैं।

→ वन जलवायु, जल-चक्र और हवा की खूबी को बनाए रखते हैं और नियमित करते हैं।

→ अपघटक पौधों और जीव-जंतुओं के मृत शरीरों पर निर्भर करते हैं और उनको सरल पदार्थों में अपघटित करते हैं।

→ वनों की कटाई से विश्व तापन होता है, वर्षा कम होती है, प्रदूषण बढ़ता है और भूमि अपरदन होता है।

→ प्रकृति में संतुलन कायम करने और वन्य जीवों तथा पौधों का निवास बनाए रखने के लिए वन का संरक्षण आवश्यक है।

→ वन : वन एक ऐसा क्षेत्र होता है जहां जीव-जन्तुओं समेत बहुत घने पौधे, वृक्ष, झाड़ियां तथा बूटियां प्रकृतिक रूप से उगी होती हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 17 वन: हमारी जीवन रेखा

→ चंदोया : वृक्षों की डोलियां ऊपरी परत पृथ्वी पर वृक्षों की घनी छत बनाती हैं, जिसे चंदोया कहते हैं।

→ ताज या मुकुट : वह परत जिसमें डालियां तथा तने आते हैं, उसे ताज कहते हैं।

→ निम्न परत : निचला छाया वाला क्षेत्र जहां बहुत कम प्रकाश होता है।

5. पारिस्थितिक प्रबंध : सजीव और उनका वातावरण मिलकर पारिस्थितिक प्रबन्ध बनाते हैं। पौधे, जंतु तथा सूक्ष्मजीव पारिस्थितिक प्रबंध के जैविक अंश हैं। इन्हें विभिन्न श्रेणियों उत्पादक, खपतकार तथा अपघटक में बांटा गया है।

→ भोजन-चक्र : ऐसा चक्र जिसमें उत्पादक को शाकाहारी खाता है और शाकाहारी को मांसाहारी खाता है, को भोजन-चक्र कहते हैं।
PSEB 7th Class Science Notes Chapter 17 वन हमारी जीवन रेखा 1

→ भोजन जाल : एक भोजन जाल में बहुत-से भोजन-चक्र जुड़े होते हैं। एक भोजन-चक्र अगले भोजन स्तर के जीवों को भोजन उपलब्ध करवाने में सहायता करते हैं।

→ वन लगाना : बड़े स्तर पर वृक्ष लगाने की प्रक्रिया को वन लगाना/रोपण कहते हैं।

→ अपघटक : सूक्ष्मजीव जो पौधों तथा जंतुओं के मृत शरीर को ह्यूमस में परिवर्तित करते हैं, अपघटक कहलाते हैं।

→ भूमि अपरदन : वृक्षों और पौधों की अनुपस्थिति में मिट्टी का वर्षा के साथ बहाव में बह जाना भूमि अपरदन कहलाता है।

→ वन की प्रतिपर्ति : अधिक मात्रा में पौधों को लगाना वनों की प्रतिपूर्ति कहलाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 16 जल: एक बहुमूल्य संसाधन

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 16 जल: एक बहुमूल्य संसाधन will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 16 जल: एक बहुमूल्य संसाधन

→ सभी जीवों को जीवित रहने के लिए जल की आवश्यकता होती है।

→ जल की तीन अवस्थाएँ–ठोस, द्रव तथा गैस हैं।

→ दुनिया के कुल ताजे पानी का 1% से भी कम या धरती/पृथ्वी पर उपलब्ध संपूर्ण जल का लगभग 0.003% जल ही मनुष्य के प्रयोग के लिए उपलब्ध है।

→ पृथ्वी पर उपलब्ध लगभग संपूर्ण जल समुद्रों तथा महासागरों, नदियों, तालाबों, ध्रुवीय बर्फ, भूमि जल तथा वायुमंडल में मिलता है।

→ उपयोग के लिए उपयुक्त जल ताज़ा पानी है।

→ पृथ्वी पर नमक रहित जल पृथ्वी पर उपलब्ध जल की मात्रा का 0.006% है।

→ जल की तीन अवस्थाएं हैं-

  1. ठोस,
  2. द्रव,
  3. गैस।

→ ठोस अवस्था में जल बर्फ तथा हिम के रूप में पृथ्वी के ध्रुवों पर बर्फ से ढके पहाड़ों तथा ग्लेशियरों में मिलता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 16 जल: एक बहुमूल्य संसाधन

→ द्रव अवस्था में जल महासागरों, झीलों, नदियों के अतिरिक्त भूमि तल के नीचे भूमि जल के रूप में मिलता है।

→ गैसी अवस्था में जल हवा में जलवायु के रूप में उपलब्ध रहता है।

→ वर्षा का जल सबसे शुद्ध जल समझा जाता है।

→ जल-चक्र द्वारा जल का स्थानांतरण होता है।

→ जल का मुख्य स्रोत भूमि-जल है।

→ स्थिर कठोर चट्टानों की पर्तों में भूमि जल इकट्ठा हो जाता है।

→ जनसंख्या में वृद्धि, औद्योगिक तथा खेती गतिविधियों आदि भूमि-जल स्तर को प्रभावित करने वाले कारक हैं।

→ भूमि-जल का अधिक उपयोग तथा जल का कम रिसाव होने के कारण भूमि-जल का स्तर कम हो गया है।

→ भूमि-जल स्तर को प्रभावित करने वाले कारक हैं-जंगलों (वनों) का कटना तथा पानी को सोखने के लिए आवश्यक क्षेत्रों की कमी।

→ बावड़िया तथा बूंद (ड्रिप) सिंचाई प्रणाली जल की कमी को पूर्ण करने की तकनीकें हैं।

→ पौधों को कुछ दिनों तक पानी/जल न देने से वह मुरझा जाते हैं तथा अंत में सूख जाते हैं।

→ पंजाब सरकार ने वर्ष 2009 में “पंजाब भूमि-जल संरक्षण कानून 2009” पास (लागू) किया था जिसके तहत पहली बार धान की खेती लगाने की तारीख 10 जून निर्धारित की गई। बाद में वर्ष 2015 में इसे 15 जून किया गया।

→ मृत सागर एक नमकीन झील है जो पूर्व से जार्डन तथा पश्चिम से इसराईल तथा फिलस्तीन से घिरा हुआ है। यह दूसरे महासागरों से 8.6 गुणा अधिक क्षारक है। अधिक क्षारीय होने से जलीय पौधे तथा जलीय जंतुओं को उत्पन्न होने से रोकता है, जिस कारण इसे मृत सागर कहते हैं।

→ जल चक्र : कई प्रक्रियाएँ जैसे कि पानी का वायु में वाष्पीकरण, संघनन क्रिया द्वारा बादलों का बनना तथा वर्षा का आना जिससे पृथ्वी पर जल का कायम रहना, भले ही पूरी दुनिया इसका प्रयोग करती है, जल चक्र कहलाता है।

→ ताज़ा जल : जो जल पीने के लिए उचित होता है, वह ताज़ा जल है। इसमें कम मात्रा में नमक (लवण) घुले होते हैं। यह पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का लगभग 3% है जो नदियों, झीलों, ग्लेशियरों, बर्फ से ढकी चोटियों तथा पृथ्वी के नीचे होता है।

→ जल-स्तर या वॉटर-टेबल : जलीय स्रोत के समीप गहराई में जहाँ चट्टानों के बीच की जगह जल से भरी होती है, को पृथ्वी के नीचे का क्षेत्र या संतृप्त क्षेत्र कहते हैं। इस जल की ऊपरी सतह को जल स्तर या वॉटर टेवल कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 16 जल: एक बहुमूल्य संसाधन

→ जलीय चट्टानी पर्त : पृथ्वी के नीचे का जल वाटर लेबल से भी नीचे सख्त चट्टानों की पर्तों के बीच होता है जिसे जलीय चट्टानी पर्त कहते हैं। यह जल नलों तथा ट्यूबवैलों द्वारा निकाला जाता है।

→ इनफिल्ट्रेशन (अंकुइफिर) : जल के भिन्न-भिन्न स्रोतों जैसे-वर्षा, नदी तथा छप्पड़ों का पानी गुरुत्वाकर्षण के कारण रिस-रिस कर पृथ्वी के अंदर के रिक्त स्थान पर भरने को इनफिल्ट्रेशन कहते है।

→ जल प्रबंधन : जल को उचित ढंग से बाँटना जल प्रबंधन है।

→ बूंद सिंचाई प्रणाली : यह सिंचाई की ऐसी तकनीक है जिसमें पानी पाइपों के द्वारा पौधों तक बूंद-बूंद करके पहुँचता है।

→ जल भंडारण : वर्षा जल को आवश्यकता के समय उपयोग में लाने के लिए जमा करने की विधि को जल भंडारण कहते हैं। इसको जल स्तर की प्रतिपूर्ति के लिए किया जाता है।

→ बाउली (बावड़ी) : यह पुरातन (प्राचीन) काल की जल भंडारण की विधि है। भारत में कई स्थानों पर यह विधि जल-भंडारण के लिए प्रयोग होती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 15 प्रकाश

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 15 प्रकाश will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 15 प्रकाश

→ प्रकाश हमें इर्द-गिर्द की वस्तुओं को देखने में सहायता करता है।

→ किसी प्रकाशमान वस्तु या प्रकाश के स्रोत से आ रही प्रकाश किरणें वस्तु से टकरा कर हमारी आँखों में दाखिल/प्रवेश होती हैं तो हमें वस्तु दिखाई देती है।

→ प्रकाश हमेशा सीधी रेखा में चलता है।

→ प्रतिबिम्ब देखने के लिए वस्तु की सतह से परावर्तन एक समान होना चाहिए।

→ किसी सतह से टकराने के बाद प्रकाश का वापिस उसी माध्यम में एक खास दिशा में मुड़ने की प्रक्रिया को प्रकाश का परावर्तन कहते हैं।

→ जो प्रकाश की किरण वस्तु पर टकराती है, उसे आपाती किरण कहते हैं तथा जो प्रकाश की किरण वस्तु पर टकराने के बाद उसी माध्यम में एक खास दिशा में वापिस आती है उसे परावर्तित किरण कहते हैं।

→ आपाती किरण तथा आपतन बिंदु पर खींचे गए लम्ब के कोण को आपतन कोण कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 15 प्रकाश

→ परावर्तित किरण तथा अभिलम्ब के कोण को परावर्तन कोण कहते हैं।

→ आपतन कोण तथा परावर्तन कोण हमेशा बराबर होते हैं। इसे परावर्तन का नियम कहते हैं।

→ परावर्तित किरणों के वास्तविक रूप में मिलने पर बने प्रतिबिम्ब को वास्तविक प्रतिबिंब कहते हैं। इस प्रतिबिम्ब को स्क्रीन (पर्दे) पर प्राप्त किया जा सकता है।

→ यदि परावर्तित किरणें आपस में वास्तविक रूप में नहीं मिलती परन्तु मिलते हुए दिखाई देती हैं तो उनसे प्राप्त हुए प्रतिबिम्ब को आभासी प्रतिबिम्ब कहते हैं। ऐसा प्रतिबिम्ब पर्दे पर प्राप्त नहीं होता।

→ समतल दर्पण द्वारा बनाया प्रतिबिम्ब हमेशा दर्पण के पीछे बनता है। यह प्रतिबिम्ब आभासी, सीधा तथा वस्तु के आकार का होता है।

→ समतल दर्पण द्वारा बनाया गया प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे उतनी दूरी पर ही बनता है, जितनी दूरी पर वस्तु दर्पण के सामने रखी होती है।

→ समतल दर्पण द्वारा बनाया गया प्रतिबिम्ब का पार्श्व परिवर्तन होता है अर्थात् वस्तु की दाईं तरफ का प्रतिबिम्ब बाईं तरफ नज़र आता है तथा वस्तु की बाईं तरफ का प्रतिबिम्ब का दाईं तरफ नज़र आता है।

→ अवतल दर्पण एक ऐसा गोलाकार दर्पण होता है, जिसकी परावर्तक सतह अन्दर की ओर होती है।

→ उत्तल दर्पण एक ऐसा गोलाकार दर्पण होता है, जिसकी परावर्तक सतह बाहर की ओर उभरी होती है।

→ बहुत दूर स्थित किसी वस्तु से आ रही प्रकाश की किरणें एक-दूसरे के समानान्तर मानी जाती हैं तथा दर्पण से परावर्तन होने के बाद जिस बिन्दु पर वास्तव में मिलती हैं या मिलती हुई प्रतीत होती हैं, उसे दर्पण का फोकस बिन्दु कहते हैं।

→ अवतल दर्पण में केवल उसी स्थिति में आभासी, सीधा तथा बड़ा प्रतिबिम्ब बनता है जब वस्तु अवतल दर्पण के मुख्य फोकस तथा दर्पण के बीच रखी हो। इसके अतिरिक्त वस्तु की अन्य स्थितियों में प्रतिबिम्ब वास्तविक तथा उल्टा बनता है।

→ उत्तल दर्पण के लिए वस्तु की प्रत्येक स्थिति में प्रतिबिम्ब आभासी, सीधा तथा आकार में वस्तु से छोटा बनता है।

→ लैंस एक पारदर्शी माध्यम का टुकड़ा होता है जो दो सतहों से घिरा होता है। लैंस मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं-

  1. उत्तल लैंस तथा
  2. अवतल लैंस।

→ उत्तल लैंस मध्य से मोटा तथा किनारों पर पतला होता है।

→ अवतल लैंस किनारों की तुलना में मध्य से पतला होता है।

→ उत्तल लैंस को अभिसारी लैंस तथा अवतल लैंस को अपसारी लैंस भी कहते हैं।

→ उत्तल लैंस द्वारा बारीक तथा छोटी वस्तुओं को बड़े आकार में देखा जा सकता है। इसलिए इसे रीडिंग ग्लास भी कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 15 प्रकाश

→ प्रकाश का परावर्तन : जब सीधी रेखा में चलता प्रकाश किसी दर्पण या किसी पॉलिश की गई अपारदर्शी सतह से टकराने के बाद यह अपनी दिशा बदल लेता है तथा वापिस उसी माध्यम में आ जाता है तो प्रकाश की इस अपनी दिशा बदल लेने की प्रक्रिया को प्रकाश का परावर्तन कहते हैं।

→ आपाती किरण : जो प्रकाश की किरण प्रकाश स्रोत से चलकर दर्पण पर टकराती है, उसे आपाती किरण कहते हैं।

→ परावर्तित किरण : जो प्रकाश की किरण दर्पण पर टकराने के बाद अपनी दिशा बदलकर उसी माध्यम पर एक विशेष दिशा में वापिस आ जाती है, उसे परावर्तित किरण कहते हैं।

→ आपतन कोण : आपाती किरण तथा आपतन बिन्दु पर खींचे गए अभिलम्ब के मध्य बने कोण को आपतन कोण कहते हैं।

→ परावर्तन कोण : परावर्तित किरण और आपतन बिन्दु पर खींचे गए कोण के मध्य बने कोण को परावर्तन कोण कहते हैं।

→ आपतन बिन्दु : आपाती किरण दर्पण की सतह पर जिस बिन्दु पर जाकर टकराती है, उसे आपतन बिन्दु कहते हैं।

→ अभिलम्ब : आपतन बिन्दु पर बनाए गए लम्ब को अभिलम्ब कहते हैं।

→ प्रतिबिम्ब : प्रकाश की किरणें दर्पण से प्रकाश परावर्तन के बाद जिस बिन्दु पर वास्तविक रूप में मिलती हैं या मिलती हुई प्रतीत होती हैं, उसे प्रतिबिम्ब कहते हैं।

→ वास्तविक प्रतिबिम्ब : जब किसी वस्तु से आ रही प्रकाश किरणें परावर्तन के बाद किसी बिन्दु पर असल/ वास्तव में मिलती हैं, तो उसे वास्तविक प्रतिबिम्ब कहते हैं।

→ आभासी प्रतिबिम्ब : जब प्रकाश की किरणें दर्पण से हो रहे परावर्तन के बाद किसी बिन्दु पर वास्तव में मिलती हुई प्रतीत होती हैं परन्तु किसी बिन्दु पर मिलती हों, तो उस बिन्दु को आभासी प्रतिबिम्ब कहते हैं। आभासी प्रतिबिम्ब को पर्दे पर नहीं लाया जा सकता है।

→ गोलाकार दर्पण : ऐसा दर्पण जिसकी परावर्तक सतह एक खोखले काँच के गोले का एक भाग होता है।

→ उत्तल दर्पण : ऐसा गोलाकार दर्पण जिसकी परावर्तक सतह उत्तल या बाहर की ओर उभरी हुई है, तो उसे उत्तल दर्पण कहते हैं।

→ अवतल दर्पण : ऐसा गोलाकार दर्पण जिसकी परावर्तक सतह अवतल या अन्दर की ओर होती है।

→ प्रकाश अपवर्तन : जब प्रकाश की किरणें किसी एक माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में दाखिल होती हैं, तो वह अपना पथ बदल लेती हैं, प्रकाश किरणों के पथ बदलने की प्रक्रिया को प्रकाश अपवर्तन कहते हैं।

→ उत्तल लैंस : यह पारदर्शी कांच का ऐसा टुकड़ा है, जो किनारों के मुकाबले मध्य से मोटा होता है। इसे अभिसारी लैंस भी कहते हैं।

→ अवतल लैंस : यह पारदर्शी कांच का ऐसा टुकड़ा है जो मध्य से पतला तथा किनारों से मोटा होता है। इस लैंस को अपसारी लैंस भी कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 15 प्रकाश

→ फोकस बिन्दु : मुख्य अक्ष पर स्थित वह बिन्दु जहाँ प्रकाश की समानान्तर किरणें लैंस से गुज़रने के बाद असल रूप में मिलती हैं या मिलती हुई प्रतीत होती हैं, को फोकस बिन्दु कहते हैं।

→ फोकस दूरी : मुख्य फोकस तथा लैंस के प्रकाश केन्द्र के बीच की दूरी, लैंस की फोकस दूरी कहलाती है।

→ प्रकाश का वर्ण-विक्षेपण : सफेद प्रकाश का किसी पारदर्शी माध्यम (जैसे कांच का प्रिज्म) में से गुज़र कर सात रंगों में विभक्त हो जाने की प्रक्रिया वर्ण-विक्षेपण कहलाती है।

→ स्पैक्ट्रम : सफ़ेद प्रकाश के प्रिज्म में से गुज़रने के बाद प्राप्त सात रंगों की पट्टी को जिसके एक सिरे पर बैंगनी रंग तथा दूसरे सिरे पर लाल रंग होता है, स्पैक्ट्रम कहलाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 14 विद्युत धारा तथा इसके चुंबकीय प्रभाव

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 14 विद्युत धारा तथा इसके चुंबकीय प्रभाव will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 14 विद्युत धारा तथा इसके चुंबकीय प्रभाव

→ विद्युत अवयवों को प्रतीकों द्वारा निरूपित किया जा सकता है जो कि बहुत सुविधाजनक है।

→ सर्कट चित्र (Circuit Diagram) विद्युत सर्कट का चित्रात्मक प्रतिरूप होता है।

→ विद्युत सैल का प्रतीक दो समानांतर रेखाएं हैं। जिनमें एक लंबी और दूसरी छोटी रेखा है।

→ बैटरी दो या दो से अधिक सैंलों का श्रेणी क्रम में संयोजक है।

→ बैटरी का उपयोग टार्च, ट्रांजिस्टर, रेडियो, खिलौने, टी०वी०, रीमोट कंट्रोल आदि में किया जाता है।

→ विद्युत बल्बों में एक पतला तंतु (फिलामैंट) होता है, जो विद्युत धारा के प्रवाह से दीप्त हो जाता है। ऐसा विद्युत धारा के तापीय प्रभाव से होता है।

→ विद्युत तापक (Heater), रूम तापक (हीटर) तथा टैस्टर आदि में विद्युत धारा के तापीय प्रभाव का उपयोग किया जाता है।

→ विशेष पदार्थ की तारें जिनमें से अधिक मात्रा में विद्युत धारा गुज़ारने से वह गर्म होकर पिघल जाती हैं; जिनका प्रयोग फ्यूज़ बनाने के लिए किया जाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 14 विद्युत धारा तथा इसके चुंबकीय प्रभाव

→ सर्कट में विद्युत फ्यूज़, विद्युत उपकरणों को आग लगने या किसी अन्य नुकसान से बचाने के लिए लगाए जाते हैं।

→ धातु की तार में से विद्युत धारा प्रवाह करने से वह चुंबक जैसा व्यवहार करती है। विद्युत धारा के इस प्रभाव को चुंबकीय प्रभाव कहते हैं।

→ ऐसा पदार्थ जिसमें से विद्युत धारा प्रवाह करने से वह चुंबकीय बन जाता है तथा विद्युत प्रवाह बंद करने पर अपना चुंबकीय गुण खो देता है, को विद्युत चुंबक कहते हैं।

→ लोहे के किसी टुकड़े के इर्द-गिर्द विद्युत रोधी तार लपेट कर उसमें से विद्युत धारा प्रवाहित की जाए तो लोहे का टुकड़ा चुंबकीय व्यवहार करता है। इस प्रकार बनाए गए चुंबक को विद्युत चुंबक कहते हैं। विद्युत चुंबक अस्थायी चुंबक होता है क्योंकि विद्युत धारा बंद करने से यह अपना चुंबकीय गुण खो/गंवा देता है।

→ विद्युत चुंबक का प्रयोग कई यंत्रों में किया जाता है; जैसे विद्युत घंटी, चुंबकीय क्रेन आदि।

→ चालक : वह पदार्थ, जो अपने में से विद्युत धारा को प्रवाहित होने देता है।

→ रोधक : वह पदार्थ जो अपने में से विद्युत धारा को प्रवाहित होने से रोकता है।

→ स्विच : यह एक साधारण युक्ति है जो विद्युत परिपथ में विद्युत धारा प्रवाह को पूर्ण होने या विद्युत धारा के प्रवाह को तोड़ने के लिए प्रयुक्त होती है।

→ सर्कट या परिपथ : विद्युत धारा के बहाव को बैटरी के धन-टर्मिनल से स्विच, बल्ब के रास्ते दूसरे ऋण-टर्मिनल तक पहुँचने का पथ, सर्कट या परिपथ कहलाता है।

→ बल्ब : एक साधारण युक्ति जिसमें विद्युत ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित/रूपांतरित करती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 14 विद्युत धारा तथा इसके चुंबकीय प्रभाव

→ ऐलीमैंट या तंतु : टंगस्टन धातु का एक बारीक टुकड़ा जो विद्युत धारा के प्रवाह से गर्म होकर प्रकाश उत्सर्जित करता है।

→ बैटरी : यह एक विद्युत रासायनिक सैलो का संयोजन है जो रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।

→ विद्युत चुंबक : कुंडली के भीतर एक नरम लोहे का टुकड़ा रखकर कुंडली में से विद्युत धारा प्रवाहित करने से लोहे के टुकड़े में चुंबक के गुण आ जाते हैं। इस युक्ति को विद्युत चुंबक कहते हैं।

→ विद्युत घण्टी : वह यांत्रिक युक्ति जो विद्युत चुंबक के सिद्धांत पर काम करती है तथा विद्युत धारा प्रवाहित करने से बार-बार ध्वनि उत्पन्न करती है।

→ विद्युत क्रेन : ऐसी क्रेन जिसके एक छोर पर बड़ा शक्तिशाली चुंबक जुड़ा हो जिसका इस्तेमाल करके लोहे से बने हुए भारी सामान को उठाकर एक स्थान-से-दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है या फिर कबाड़ में से लोहे को अलग किया जा सकता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय

→ यदि कोई वस्तु अपने इर्द-गिर्द की वस्तुओं तथा समयानुसार अपनी स्थिति में परिवर्तन नहीं करती तो उस वस्तु को विराम अवस्था में कहा जाता है।

→ यदि कोई वस्तु अपनी स्थिति अपने इर्द-गिर्द की वस्तुओं तथा समयानुसार अपनी स्थिति बदलती है तो वह गति अवस्था में होती है।

→ वस्तु की सीधी रेखा में गति को सरल रेखा गति कहते हैं।

→ किसी वस्तु की चक्कराकार पथ पर हो रही गति को चक्कराकार गति कहते हैं।

→ यदि कोई वस्तु अपनी मध्य स्थिति के इधर-उधर गति करती है, तो उस वस्तु की गति को दोलन गति कहते हैं।

→ यदि कोई वस्तु थोड़ी दूरी को तय करने में बहुत कम समय लगाती है, तो उस वस्तु को गति तेज़ होती है तथा यदि वस्तु उसी दूरी को तय करने में अधिक समय लगाती है तो उसकी गति मंद गति/धीमी गति कहलाती है।

→ इकाई/एकांक समय में तय की गई दूरी को चाल कहते हैं। इसकी S.I. इकाई मीटर/प्रति सैकण्ड (m/s) है।

→ चाल की गणना निम्नलिखित सूत्र द्वारा की जा सकती है :
PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय 1

→ एक सीधी रेखा के ऊपर एक गति से चल रही वस्तु की गति को एक समान गति कहते हैं, जबकि एक सीधी रेखा के ऊपर भिन्न-भिन्न गति से चल रही वस्तु की गति को असमान गति/चाल कहते हैं।

→ घड़ी, घंटों वाली सूई की गति, धरती की सूरज के इर्द-गिर्द गति तथा साधारण पेंडुलम की गति एक समान गति है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय

→ समय की S.I. इकाई सैकण्ड है। एक धागे से बांधकर किसी स्थिर जगह या स्टैंड से लटकाए गए भारी पुंज (धातु गोले) को साधारण पेंडुलम कहते हैं।

→ साधारण पेंडुलम की इधर-उधर की गति को आवर्ती या दोलन गति कहते हैं।

→ पेंडुलम के एक दोलन गति को पूरा करने के लिए लगे समय को आवर्त काल कहते हैं।

→ एक सैंकण्ड में पूरी की दोलन संख्या को आवर्ती कहते हैं। आवर्ती की S.I. इकाई हरटज़ है।

→ वाहनों की चाल मापने वाले यंत्र को स्पीडोमीटर कहते हैं।

→ स्पीडोमीटर वाहनों की चाल को किलोमीटर/घण्टा में मापता है।

→ वाहनों द्वारा तय की गयी दूरी मापने के लिए प्रयोग किये जाने वाले यंत्र को ओडोमीटर कहते हैं।

→ ग्राफ एक मात्रा की दूसरी मात्रा से तुलना को चित्र रूप में दर्शाता है।

→ सामान्य रूप से तीन प्रकार के ग्राफ प्रचलित हैं :

  1. रेखीय ग्राफ,
  2. छड़ ग्राफ,
  3. पाई चार्ट ग्राफ।

→ दूरी समय ग्राफ एक रेखा ग्राफ है। यह वस्तु द्वारा तय की गयी दूरी तथा समय के बीच ग्राफ को दर्शाता है। जो मात्रा स्वतन्त्र होती है उसको क्षितिज अक्ष (x-axis) तथा दूसरी मात्रा जो निर्भर होती है को उर्ध्वाकार अक्ष (y-axis) पर लिया जाता है।

→ समान समय अंतराल में समान दूरी तय करने वाली वस्तु की गति कहलाती है।

→ जब कोई वस्तु समान समय अंतरालों में असमान दूरी तय करे या असमान समय अंतरालों में समान दूरी तय करे, तो उसकी गति को असमान गति कहते हैं।

→ जब कोई वस्तु विराम अवस्था में है, तो उसकी दूरी-समय ग्राफ X-अक्ष के समानांतर एक सीधी रेखा है।

→ ग्राफ : वह दो राशियाँ जो आपस में एक-दूसरे पर निर्भर करती हैं तथा इनका चित्र द्वारा निरूपण ग्राफ कहलाता है।

→ चाल : इकाई समय अंतराल में वस्तु द्वारा तय की गई दूरी चाल कहलाती है।

→ समान चाल : जब कोई वस्तु समान समय अंतराल में समान दूरी तय करती है तो उस वस्तु की चाल होती है।

→ असमान चाल : समान समय अंतराल में एक समान दूरी न तय करने पर वस्तु की चाल असमान चाल कहलाती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 13 गति तथा समय

→ सरल पेंडुलम : धातु या पत्थर के छोटे से टुकड़े को किसी दृढ़ (मज़बूत) बिंदू पर धागे की सहायता से लटकाने पर सरल पेंडुलम प्राप्त होता है।

→ दोलन : एक स्वतन्त्रतापूर्वक लटक रही वस्तु जब अपनी मध्य स्थिति से एक तरफ चर्म सीमा तक जाए और फिर दूसरे तरफ की चर्म सीमा तक जाए और आखिर में अपनी पूर्व स्थिति अर्थात् मध्य स्थिति पर पहुँच जाए जो वह वस्तु एक दोलन पूरा कर लेती है।

→ आवर्तन काल : सरल पेंडुलम द्वारा एक दोलन पूरा करने में लगा समय आवर्तनकाल कहलाता है।

→ एक समान गति : जब कोई वस्तु समान समय अंतराल में समान दूरी तय करती है भले ही समय अंतराल कितना ही छोटा क्यों न हो तो उस समय वस्तु की गति एक समान गति कहलाती है।

→ असमान गति : जब कोई वस्तु समान समय अंतराल में समान दूरी न तय करे भले ही समय अंतराल कितना भी छोटा क्यों न हो तो उस वस्तु की गति असमान गति कहलाती है। अध्याय के अन्तर्गत आने वाले प्रश्न-उत्तर

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 12 पौधों में प्रजनन

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 12 पौधों में प्रजनन will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 12 पौधों में प्रजनन

→ पौधों में दो प्रकार का प्रजनन होता है-

  1. अलैंगिक प्रजनन,
  2. लैंगिक प्रजनन।

→ अलैंगिक प्रजनन, प्रजनन की ऐसी विधि है, जिसके द्वारा केवल एक ही जनक से नए पौधे पैदा होते हैं।

→ दो-खंडन विधि, कलियों द्वारा, विखंडन, बीजाणु द्वारा, पुनर्जनन, अलैंगिक प्रजनन की भिन्न-भिन्न विधियाँ हैं।

→ दो-खंडन प्रजनन विधि में जीव दो बराबर हिस्सों में बाँटा जाता है। दोनों हिस्से विकसित होकर दो नए जीव बन जाते हैं।

→ लैंगिक प्रजनन के दौरान पौधों के नर जनन तथा मादा जनन अंग नर युग्मक तथा मादा युग्मक पैदा करते हैं जो मिलकर युग्मज़ बनाते हैं। युग्मज़ नए पौधों में विकसित होता है।

→ लैंगिक प्रजनन केवल फूलदार पौधों में होता है।

→ कायिक प्रजनन एक ऐसी विधि है जिसमें जड़, तने या पत्ते जैसे अंगों द्वारा नए पौधे पैदा होते हैं। प्रजनन की इस विधि में न जनन अंग भाग लेते हैं तथा न ही बीज भाग लेते हैं।

→ पौधों में प्रजनन के कई बनावटी ढंग भी हैं। यह हैं कलमें लगाना, प्योंद चढ़ाना तथा ज़मीन के नीचे दाब लगाना।

→ पके हुए परागकणों का परागकोष से परागकण-ग्राही (वर्तिकाग्र) तक स्थानांतरण परागण क्रिया कहलाता है। यह उसी फूल पर या दूसरे फूल के स्त्री केसर की परागकण-ग्राही तक पहुँचते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 12 पौधों में प्रजनन

→ काई जैसे फूल रहित पौधे विखंडन द्वारा प्रजनन करते हैं; खमीर कलियों द्वारा, जब कि फफूंदी तथा मौस बीजाणुओं द्वारा प्रजनन करते हैं।

→ नर युग्मक तथा मादा युग्मक के अंडाणु में सुमेल (Fusion) को निषेचन क्रिया कहते हैं।

→ अंडाणुओं के निषेचन के बाद अंडाशय फल में तथा अंडाणु बीज रूप में विकसित हो जाते हैं।

→ बीजों को जनक पौधों से दूर पहुँचाने के लिए बीजों को बिखेरना आवश्यक होता है, ताकि बीज नये पौधे के रूप में विकसित हो सके।

→ प्रजनन : सजीवों के अपने जैसे नये जीव उत्पन्न करने की योग्यता को प्रजनन कहते हैं।

→ अलैंगिक प्रजनन : ऐसी विधि जिसमें नये पौधे उगाने के लिए बीजों की आवश्यकता नहीं होती। एक ही जनक से नया पौधा तैयार हो जाता है।

→ लैंगिक प्रजनन : नर तथा मादा के युग्मकों के संयोग से नया जीव पैदा करने को लैंगिक प्रजनन कहते हैं।

→ कायिक प्रजनन : जब पौधो के किसी भी अंग से नया पौधा तैयार हो, तो उसे कायिक प्रजनन कहते हैं।

→ विखंडन : प्राणियों के शरीर का दो या दो से अधिक भागों में बँटकर नये जीव का बनना विखंडन कहलाता है।

→ एकलिंगी पुष्प : वे फूल जिनमें केवल पुंकेसर या केवल स्त्री केसर मौजूद हों, को एकलिंगी पुष्प कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 12 पौधों में प्रजनन

→ द्विलिंगी पुष्प : वे फूल जिसमें पुंकेसर और स्त्री केसर दोनों मौजूद हो, उसे द्विलिंगी पुष्प कहते हैं।

→ निषेचन : नर युग्मक तथा मादा युग्मक के सुमेल को निषेचन क्रिया कहते हैं।

→ परागण : पके हुए परागकणों का परागकोष से परागकण–ग्राही या वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण कहलाता है।

→ स्वःपरागण : दो लैंगिक पुष्यों में परागकण, परागकोष में से जब उसी पुष्प के स्त्री केसर की परागकण ग्राही तक जाते हैं तो इस क्रिया को स्वः परागकण कहते हैं।

→ पर-परागण : पर-परागण क्रिया में परागकण एक पुष्प के पुंकेसर से किसी और फूल की परागकण-ग्राही (स्त्री केसर) तक जाते हैं। पर-परागकण क्रिया एक ही पौधे के दो पुष्पों या उसी प्रजाति के दो पौधों के पुष्पों के बीच होती है।

→ बीजों का उगना (बीजों का अंकुरन) : शुष्क मिट्टी पर पहुँच कर बीज पानी अवशोषित कर फूल जाते हैं। भ्रूण अंकुरित होना शुरू करता है, जड़ अंकुर मिट्टी में धंस जाता तथा तना अंकुर ऊपर हवा की ओर निकल आता है। पत्ते निकल आते हैं। इस प्रक्रिया को बीजों का अंकुरन कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 11 जंतुओं और पादपों में परिवहन

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 11 जंतुओं और पादपों में परिवहन will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 11 जंतुओं और पादपों में परिवहन

→ सभी सजीवों को विभिन्न टूटने-बनने की क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो प्राप्त किए भोजन से मिलती है।

→ पत्तों को प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन तैयार करने के लिए जल तथा CO2 की आवश्यकता होती है।

→ जानवरों में भोजन, ऑक्सीजन तथा जल शरीर के प्रत्येक सैल तक पहुँचाया जाता है तथा व्यर्थ पदार्थ सैलों से शरीर के निकासी अंग तक पहुंचाए जाते हैं।

→ जीवों में पदार्थों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना परिवहन कहलाता है।

→ विकसित जीवों की रक्त संचार प्रणाली में हृदय, रक्त वाहिनियां तथा रक्त होता है जो ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, भोजन, हार्मोनों तथा एंजाइमों का शरीर के एक भाग से दूसरे भागों में परिवहन करता है।

→ एक सैली जीवों में रक्त संचार प्रणाली नहीं होती।

→ रक्त में लाल रक्त सैल, श्वेत रक्त सैल, प्लेटलेट्स तथा प्लाज्मा होते हैं। रक्त का लाल रंग होमोग्लोबिन नाम के वर्णक के कारण होता है।

→ हृदय एक पेशीदार अंग है, जो रक्त के संचार के लिए पम्प की तरह निरन्तर धड़कता रहता है।

→ एक मिनट में धड़कनों की गिनती को नब्ज़ दर कहा जाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 11 जंतुओं और पादपों में परिवहन

→ धमनियों में ऑक्सीजन युक्त रक्त होता है तथा शिराओं में कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रक्त होता है।

→ रक्त तथा टिशु द्रवों के बीच पोषक तत्त्वों, गैसों तथा फोकट (व्यर्थ) पदार्थों का आदान-प्रदान कोशिकाओं द्वारा होता है।

→ मनुष्य के उत्सर्जन तन्त्र में जोड़ा गुर्दा, एक जोड़ा मूत्र वाहिनियां, एक मूत्राशय तथा एक मूत्र मार्ग उत्सर्जन होता है।

→ गुर्दे व्यर्थ पदार्थों को मूत्र के रूप में, फेफड़े कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में तथा चमड़ी पसीने के रूप में शरीर से बाहर निकालते हैं।

→ मानवीय गुर्यों में उपलब्ध रक्त कोशिकाएं रक्त को छानने का कार्य करती हैं।

→ एक मशीन की सहायता से रक्त में व्यर्थ पदार्थों तथा फोकट तरल को बाहर निकालने की प्रक्रिया को डायलाइसिस कहते हैं।

→ प्रसरण वह प्रक्रिया है जिसमें गैसों तथा द्रवों के अणु अधिक सघनता वाले माध्यम से कम सघनता वाले माध्यम की ओर गति करते हैं।

→ परासरण वह प्रक्रिया है जिसमें घोलक एक अर्ध पारगामी (Semi Permeable) झिल्ली द्वारा कम सघनता वाले घोल से अधिक सघनता वाले घोल की ओर जाता है।

→ एक सैली जीव बाहरी पर्यावरण में पदार्थों की अदला-बदली सैल की सतह से करते हैं।

→ प्रकाश संश्लेषण : सूर्य प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन-डाइऑक्साइड तथा जल जैसे सरल यौगिकों से हरे पौधों द्वारा क्लोरोफिल की मौजूदगी में कार्बोहाइड्रेट के निर्माण की प्रक्रिया को प्रकाश संश्लेषण कहा जाता है।

→ परासरण : यह वह प्रक्रिया है जिसमें घोलक एक अर्द्ध-पारगामी झिल्ली द्वारा कम सघनता वाले घोल से अधिक सघनता वाले घोल की ओर जाता है तथा दोनों ओर के घोलों की सघनता बराबर हो जाती है। इस प्रकार का परिवहन बहुत कम दूरी तक ही होता है। पौधों के जड़बाल परासरण विधि द्वारा मिट्टी से जल ग्रहण करते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 11 जंतुओं और पादपों में परिवहन

→ वाष्प उत्सर्जन : पौधों के पत्तों द्वारा जल के वाष्पन को वाष्प उत्सर्जन कहते हैं।

→ स्थानान्तरण : पत्तों से भोजन का पौधों के अन्य भागों (हिस्सों) तक पहुंचना स्थानान्तरण कहलाता है।

→ फ्लोएम : पौधों के जो टिशु पत्तों में बने भोजन को पौधों के अन्य हिस्सों तक पहुँचाता है, उसे ‘फ्लोएम’ कहते हैं।

→ धमनियाँ : ऐसी वाहिनियाँ जो हृदय से ऑक्सीजन युक्त रक्त को शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाती हैं, उन्हें धमनियाँ कहते हैं।

→ शिराएँ : ऐसी वाहिनियाँ जो शरीर के भिन्न-भिन्न भागों से रक्त हृदय तक पहुँचाती हैं, उन्हें शिराएँ कहते हैं।

→ मानव उत्सर्जन तन्त्र : शरीर में कई क्रियाओं द्वारा पैदा हुए अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन तन्त्र कहते हैं।

→ डायलाइसिस : शरीर के गुर्दो में से बनावटी मशीन की सहायता से यूरिया तथा अन्य हानिकारक पदार्थों को बाहर निकालने की प्रणाली को डायालाइसिस कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 10 जीवों में श्वसन

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 10 जीवों में श्वसन will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 10 जीवों में श्वसन

→ साँस लेना, श्वसन प्रक्रम का एक हिस्सा है, जिस दौरान सजीव ऑक्सीजन युक्त हवा अंदर लेते हैं तथा कार्बनडाइऑक्साइड युक्त हवा बाहर निकालते हैं।

→ साँस लेते समय हम जो ऑक्सीजन लेते हैं यह ग्लूकोज़ को पानी तथा कार्बन डाइऑक्साइड में तोड़ती है तथा ऊर्जा भी मुक्त करती है जो सजीवों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।

→ सैंलमयी (कोशकीय) श्वसन क्रिया के दौरान जीव के सैलों (कोशिकाओं) में ग्लूकोज़ का विखण्डन होता है।

→ वायवीय श्वसन क्रिया के दौरान ऑक्सीजन की उपस्थिति में ग्लूकोज़ का विखण्डन होता है।

→ अवायवीय श्वसन क्रिया के दौरान ग्लूकोज़ का विखण्डन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है।

→ भारी व्यायाम के समय जब ऑक्सीजन की पूरी उपलब्धता नहीं होती तो भोजन का विखंडन अवायवीय श्वसन क्रिया द्वारा होता है।

→ तेज़ शारीरिक गतिविधियों के समय साँस लेने की दर भी बढ़ जाती है।

→ विभिन्न जीवों में साँस लेने के अंग भी भिन्न-भिन्न होते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 10 जीवों में श्वसन

→ साँस अंदर लेने पर फेफडे फैलते हैं तथा सांस छोड़ते (उच्छ्वसन) समय जब हवा बाहर निकलती है तो वापिस पहली स्थिति में आ जाते हैं।

→ रक्त में हीमोग्लोबिन होता है जो ऑक्सीजन को शरीर के भिन्न-भिन्न भागों (हिस्सों) तक ले जाता है।

→ गाय, भैंस, कुत्ते, बिल्लियों तथा अन्य स्तनधारियों में भी श्वसन अंग मनुष्य के श्वसन अंगों जैसे होते हैं तथा श्वसन क्रिया भी मनुष्य की तरह होती है।

→ केंचुए में गैसों की अदला-बदली गीली त्वचा द्वारा होती है। मछलियों में यह क्रिया गलफड़ों द्वारा तथा कीटों में श्वासनली द्वारा होती है।

→ पौधों में भी ग्लूकज़ का विखण्डन दूसरे जीवों के जैसा ही होता है।

→ पौधों में जड़ें मिट्टी से हवा लेती हैं।

→ पत्तों में छोटे-छोटे छेद होते हैं। जिन्हें स्टोमैटा कहते हैं। इनके द्वारा गैसों की अदला-बदली होती है।

→ श्वसन : जीवों में होने वाली वह जैव-रासायनिक क्रिया जिसमें जटिल कार्बनिक भोजन पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है। जिसके फलस्वरूप कार्बनडाइऑक्साइड तथा पानी बनते हैं तथा ऊर्जा मुक्त होती है।

→ वायवीय श्वसन : ऑक्सीजन की मौजूदगी में होने वाली श्वसन क्रिया को वायवीय श्वसन क्रिया कहा जाता है।

→ अवायवीय श्वसन : ऑक्सीजन की गैर-मौजूदगी में होने वाली श्वसन क्रिया अवायवीय श्वसन क्रिया कहलाती है।

→ स्टोमैटा : पत्तों की सतह पर हवा तथा जलवाष्पों का आदान-प्रदान के लिए खास प्रकार के बहुत सूक्ष्म छिद्र होते हैं, जिन्हें स्टोमैटा कहते हैं।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 10 जीवों में श्वसन

→ श्वसन-क्रिया : यह सरल यांत्रिक क्रिया है जिसमें ऑक्सीजन से भरपूर हवा वातावरण में से खींच कर फेफड़ों में जाती है। इस क्रिया को श्वसन क्रिया (साँस लेना) कहते हैं। साँस लेने के बाद कार्बन डाइऑक्साइड युक्त हवा बाहर वातावरण (पर्यावरण) में निकाल दी जाती है, जिसे साँस छोड़ना (उच्छ्वसन) कहते हैं, श्वसन क्रिया कहलाती है।

→ साँस लेना : पर्यावरण में से ऑक्सीजन से भरपूर हवा खींच कर श्वास अंगों (फेफड़ों) को भरने की क्रिया को साँस लेना कहते हैं।

→ श्वास छोड़ना : ऐसी क्रिया जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड से युक्त हवा को फेफड़ों से बाहर निकाला जाता है।

→ सैंलमयी/कोशिकीय श्वसन क्रिया : सैल/ कोशिका के अंदर होने वाली वह प्रक्रिया जिसमें भोजन का रासायनिक श्वसन क्रिया अपघटन होने के उपरांत (पश्चात्) ऊर्जा पैदा होती है, को सैंलमयी/कोशिकीय श्वसन क्रिया कहते हैं।

→ श्वास दर : कोई व्यक्ति एक मिनट में जितनी बार साँस लेता है, उसे श्वास दर कहते हैं। आम (सामान्य) व्यक्ति की श्वास दर 12 से 20 प्रति मिनट होती है।

→ गलफड़े : यह रक्त-बहनियाँ पंखों जैसी विशेष अंग होती हैं जिनकी सहायता से कुछ जलजीव जैसे मछली आदि साँस लेते हैं। इनमें पानी तथा रक्त उल्ट (विपरीत) दिशा में बहते हैं जिससे ऑक्सीजन का प्रसरण (Diffusion) अधिक होता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 9 मृदा

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 9 मृदा will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 9 मृदा

→ धरती की सबसे ऊपर की पर्त जिसमें पौधे या फसलें उग सकती हैं, मृदा कहलाती है।

→ मृदा, टूटी चट्टानों, कार्बनिक पदार्थ, जन्तु, पौधे तथा सूक्ष्मजीवों से बनी है।

→ मृदा की भिन्न-भिन्न पर्ते होती हैं, जिन्हें मृदा की परिछेदिका में देखा जा सकता है।

→ मृदा कार्बनिक तथा अकार्बनिक दोनों प्रकार के घटकों से बनी होती है।

→ पौधों के मृत तथा गले सड़े पत्ते या पौधे, कीट या मृत जन्तुओं के मृदा में दबे शरीर, पशुओं का गोबर आदि मिल कर कार्बनिक पदार्थ बनाते हैं, जिसे ह्यूमस (Humus) कहते हैं।

→ मृदा जिसमें कार्बनिक तथा अकार्बनिक पदार्थों का मिश्रण होता है, फसलों के लिए अधिक लाभदायक है।

→ कणों के आकार के आधार पर मृदा चिकनी, रेतीली, पथरीली तथा दोमट होती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 9 मृदा

→ रासायनिक गुण के आधार पर मृदा अम्लीय, क्षारीय तथा उदासीन हो सकती है।

→ अम्लीय मिट्टी का pH 1 से 6 तक होता है।

→ क्षारीय मृदा का pH 8 से 14 तक होता है।

→ उदासीन मृदा का pH 7 होता है।

→ मृदा अथवा मृदा का गुण जानने के लिए pH पेपर का प्रयोग किया जाता है।

→ काली मृदा में लोहे के लवण होते हैं तथा यह कपास उगाने के लिए अच्छी होती है।

→ जिस मृदा में गंधक होती है, वह मृदा प्याज उगाने के लिए अच्छी होती है।

→ विभिन्न फसलें उगाने के लिए भिन्न-भिन्न मृदा की आवश्यकता होती है।

→ मृदा की ऊपरी पर्त बनने में कई साल लगते हैं।

→ बाढ़, आँधी, तूफ़ानों तथा खदानें खोदने के कारण मृदा की ऊपरी पर्त नष्ट हो जाने को मृदा अपरदन कहते हैं।

→ खदानें खोदने से, चरने वाले पशुओं के खुरों से मृदा नर्म हो जाती है तथा आँधी, जल से नर्म हुई मृदा का जल्दी मृदा अपरदन हो जाता है।

→ वृक्ष लगाकर, चैक डैम बनाकर, खेतों की मेडों पर घास लगाकर तथा नदियों या नहरों के किनारे पक्के करके मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 9 मृदा

→ मृदा : चट्टान/शैल कणों तथा ह्यूमस का मिश्रण मृदा कहलाता है।

→ मृदा परिच्छेदिका : मृदा की विभिन्न परतों से गुजरती हुई ऊर्ध्वाकाट मृदा परिच्छेदिका कहलाती है।

→ ह्यूमस : मृदा में उपस्थित सड़े-गले जैव पदार्थ ह्यूमस कहलाते हैं।

→ मृदा-आर्द्रता या नमी : मृदा अपने अंदर जल को रोक के रखती है, जिसे मृदा आर्द्रता या नमी कहते हैं।

→ मृदा-अपरदन : जल, पवन या बर्फ के द्वारा मृदा की ऊपरी तह का हटना मृदा अपरदन कहलाता है।

→ अपक्षय : वह प्रक्रम जिसमें पवन, जल और जलवायु की क्रिया से चट्टानों के टूटने पर मृदा का निर्माण होता है, अपक्षय कहलाता है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 8 पवन, तूफ़ान और चक्रवात

This PSEB 7th Class Science Notes Chapter 8 पवन, तूफ़ान और चक्रवात will help you in revision during exams.

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 8 पवन, तूफ़ान और चक्रवात

→ हमारे इर्द-गिर्द की हवा दबाव डालती है।

→ गतिशील हवा को पवन/आँधी कहते हैं।

→ बहुत तेज़ हवा चलने से दबाव घटता है।

→ गर्म होने पर हवा फैलती है और ठंडी होने पर सिकुड़ जाती है।

→ ठंडी हवा की तुलना में गर्म हवा हल्की होती है।

→ हवा अधिक दाब वाले क्षेत्रों से कम दाब वाले क्षेत्रों की ओर बहती है।

→ हवा की गति अनीमोमीटर यंत्र से मापी जाती है।

→ हवा की गति की दिशा पवन/विंड वेन (Wind Vane) से मापी जाती है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 8 पवन, तूफ़ान और चक्रवात

→ पवन धाराएँ पृथ्वी के असमान रूप से गर्म होने के कारण उत्पन्न होती हैं।

→ मानसूनी पवन जल से भरी होती है तथा वर्षा लाती है।

→ चक्रवात विनाशकारी होते हैं।

→ उड़ीसा के तट को 18 अक्तूबर, 1999 में एक चक्रवात ने पार किया था।

→ चक्रवात का पवन वेग ज्यादा होता है।

→ चक्रवात बहुत ही शक्तिशाली चक्रीय रूप में घूमने वाला तूफ़ान होता है जो बहुत कम दबाव वाले केन्द्र के गिर्द घूमता है।

→ कीप आकार के बादलों के साथ घूमती तेज़ हवाओं वाले भयानक तूफ़ान को आंधी कहते हैं।

→ आसमानी बिजली (Lightning) के समय पैदा हुई ऊँची आवाज़ को गर्जन (Thunder) कहते हैं।

→ तेज़ आंधी के साथ आने वाली भारी वर्षा को तूफ़ान (Storm) कहते हैं। ।

→ अमेरिका का हरीकेन तथा जापान का टाइफून चक्रवात ही है।

PSEB 7th Class Science Notes Chapter 8 पवन, तूफ़ान और चक्रवात

→ टारनेडो गहरे हरे रंग के कीपाकार बादल होते हैं, जो पृथ्वी तल और आकाश के बीच समाते हैं।

→ हर प्रकार की प्राकृतिक आपदाएँ जैसे कि चक्रवात, टारनेडो आदि संपत्ति, तारों, संचार प्रणाली तथा वृक्षों का नुकसान करते हैं।

→ आपदा के समय विशेष नीतियाँ अपनाई जाती हैं।

→ उपग्रहों तथा राडार की सहायता से चक्रवात चेतावनी 48 घंटे पहले दी जाती है।

→ स्वयं की सहायता सबसे अच्छी सहायता है। इसलिए किसी भी चक्रवात के आने से पहले अपनी सुरक्षा की योजना बना लेना तथा सुरक्षा के उपायों को तैयार रखना लाभदायक होता है।

→ पवन : गतिशील हवा पवन कहलाती है।

→ मानसून पवन : समुद्र से आने वाली पवन जो जलवाष्पों से भरी होती है, मानसून पवन कहलाती है।

→ टारनेडो : गहरे रंग के कीप के बादल जिनकी कीपकार संरचना आकाश से धरती तल की ओर आती है, टारनेडो कहलाती है।

→ चक्रवात : उच्च वेग से वायु की अनेक परतों को कुंडली के रूप में घूमना चक्रवात कहलाता है।