PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

Punjab State Board PSEB 12th Class Religion Book Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Religion Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
जैन धर्म के आरंभ के बारे आप क्या जानते हैं ? वर्णन करो। (What do you know about the origin of Jainism ? Explain.)
उत्तर-
जैन धर्म भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। इसका साधुओं वाला मार्ग और योग की रीतियों का आरंभ हड़प्पा काल में से ढूँढा जा सकता है। वैदिक साहित्य में जैन आचार्यों का वर्णन मिलता है। इससे पता चलता है कि जैन धर्म उस समय प्रचलित था। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार ऋषभनाथ जो कि उनका पहला तीर्थंकर था वह पहला व्यक्ति था जिससे मनुष्य की सभ्यता का आरंभ हुआ। इस तरह सभ्यता के आरंभ के समय पर ही जैन धर्म मौजूद था।
जैन शब्द संस्कृत के शब्द जिन से निकला है जिससे भाव है विजेता। विजेता से भाव उस व्यक्ति से है जिसने अपनी इंद्रियों और मन को जीत लिया हो। जैन धर्म को आरंभ में निरग्रंथ के नाम से जाना जाता है। निरग्रंथ से भाव था बंधनों से रहित अथवा मुक्त। जैन आचार्यों को तीर्थंकर भी कहा जाता है। तीर्थंकर से भाव है पुल बनाने वाला अथवा संसार के भवसागर से पार करने वाला गुरु। जैन दर्शन को अर्हत दर्शन भी कहा जाता है। अर्हत से भाव है पूजनीय। जैन धर्म को मानने वाले जैनी कहलाते हैं। जैन 24 तीर्थंकरों में विश्वास रखते हैं। इनके नाम ये हैं:—

  1. ऋषभनाथ
  2. अजित
  3. संभव
  4. अभिनंदन
  5. सुमति
  6. पद्मप्रभु
  7. सुपार्श्व
  8. चंद्रप्रभु
  9. पुष्पदंत
  10. शीतल
  11. श्रेयांसम
  12. वासुपूज्य
  13. विमल
  14. अनंत
  15. धर्म
  16. शाँति
  17. कुंथ
  18. अरह
  19. मल्लि
  20. मुनिसुव्रत
  21. नामि
  22. नेमि
  23. पार्श्वनाथ
  24. महावीर

जैनी ऋषभनाथ को जैन धर्म का संस्थापक मानते हैं। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार उनका जन्म अयोध्या में हुआ। उन्होंने कई वर्षों तक राज्य किया। बाद में उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र भरत को सौंप दिया और स्वयं संसार त्याग कर तपस्या में लग गये। अंत में उनको ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने इस ज्ञान के बारे लोगों को उपदेश दिया। इस तरह वह पहले तीर्थंकर कहलाये। ऋषभनाथ के बाद होने वाले 21 तीर्थंकरों को ऐतिहासिक बताना संभव नहीं है, परंतु जैनियों की पवित्र अनुश्रुतियों में इनका वर्णन आता है। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और 24वें तीर्थंकर महावीर ऐतिहासिक व्यक्ति थे। स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले बनारस के राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता जी का नाम वामादेवी था। उनका बचपन बहुत ही ऐश-ओ-आराम में बीता। 30 वर्षों की आयु में पार्श्वनाथ ने अपने सारे सुखों का त्याग कर दिया और सच्चे ज्ञान की खोज में निकल गये। उनको 83 दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के बाकी 70 वर्ष अपने उपदेशों का प्रचार करने में व्यतीत किये। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊंट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। पार्श्वनाथ की शिक्षा को चार्तुयाम अथवा चार प्रण कहते हैं। यह चार प्रण ये हैं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)।

स्वामी महावीर ने इन चार असूलों में एक और असूल जोड़ा जिसको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्वामी महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं बल्कि सुधारक थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 2.
(क) जैन धर्म में कुल कितने तीर्थंकर हुए हैं ?
(ख) भगवान् महावीर के जीवन पर प्रकाश डालें।
[(a) Give the total number of Tirthankaras in Jainism.
(b) Throw light on the life of Lord Mahavira.]
अथवा
महावीर की माता का क्या नाम था ? भगवान् महावीर के जन्म से पहले उनकी माता को कितने स्वप्न आए थे? भगवान महावीर के जीवन पर एक नोट लिखें।
(Give the name of Mahavir as mother. How many dreams Lord Mehavira’s mother had before giving birth to Mahavira ? Write a note on the life of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म में कितने तीर्थंकर हुए हैं ? 24वें तीर्थंकर के जीवन पर नोट लिखें।
(Give the number of Tirthankaras in Jainism. Write a note on the life of 24th Tirthankara.)
अथवा
भगवान् महावीर जैन धर्म के कौन से तीर्थंकर थे ? उनके जीवन के संबंध में जानकारी दें।
(What was Lord Mahavira’s number among Jain Tirthankaras ? Write about Mahavira’s life.)
उत्तर-
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर के जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—
PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ 1
LORD MAHAVIRA

1. महावीर का जन्म और बचपन (Birth and Childhood of Mahavira)- महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली (बिहार) के नज़दीक कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्म तिथि 540 ई० पू० बताते हैं। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर जी के पिता जी का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले जनत्रिका के मुखिया थे। महावीर जी की माता जी का नाम तृषला था। वह लिच्छवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व उसे 14 स्वप्न आए थे। महावीर को शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किये गये थे। महावीर जी का बचपन से ही सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही विचारों में डूबे रहते थे।

2. विवाह (Marriage)—सांसारिक कार्यों की ओर महावीर जी का ध्यान लगाने के लिए उनके पिता जी ने महावीर का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की आयु कितनी थी इसके बारे हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियादर्शना रखा गया।

3. महान् त्याग और ज्ञान प्राप्ति (Renunciation and Enlightenment)-गृहस्थी जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों की राह में किसी तरह की अड़चन (रुकावट) न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद महावीर अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर गृह त्याग्न कर जंगलों में ज्ञान की खोज के लिए चले गये। उस समय महावीर जी की आयु 30 वर्ष थी। उन्होंने 12 वर्षों तक बड़ा कठोर तप किया। अंततः उनको ऋजुपालिका नदी के नज़दीक जरिमबिक गाँव में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद वर्धमान जिन (इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने वाला) और महावीर (महान् विजयी) कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।

4. धर्म प्रचार (Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर जी ने लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूंर करने के लिए और उनको सच्चा मार्ग बताने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए और वे महावीर जी के अनुयायी बन गये। महावीर जी के प्रसिद्ध प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार और उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन मत को स्वीकार कर लिया।

5. निर्वाण (Nirvana)—स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।

प्रश्न 3.
जैन धर्म के आरंभ तथा विकास के बारे में प्रकाश डालें। (Discuss the origin and development of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। इसका साधुओं वाला मार्ग और योग की रीतियों का आरंभ हड़प्पा काल में से ढूँढा जा सकता है। वैदिक साहित्य में जैन आचार्यों का वर्णन मिलता है। इससे पता चलता है कि जैन धर्म उस समय प्रचलित था। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार ऋषभनाथ जो कि उनका पहला तीर्थंकर था वह पहला व्यक्ति था जिससे मनुष्य की सभ्यता का आरंभ हुआ। इस तरह सभ्यता के आरंभ के समय पर ही जैन धर्म मौजूद था।
जैन शब्द संस्कृत के शब्द जिन से निकला है जिससे भाव है विजेता। विजेता से भाव उस व्यक्ति से है जिसने अपनी इंद्रियों और मन को जीत लिया हो। जैन धर्म को आरंभ में निरग्रंथ के नाम से जाना जाता है। निरग्रंथ से भाव था बंधनों से रहित अथवा मुक्त। जैन आचार्यों को तीर्थंकर भी कहा जाता है। तीर्थंकर से भाव है पुल बनाने वाला अथवा संसार के भवसागर से पार करने वाला गुरु। जैन दर्शन को अर्हत दर्शन भी कहा जाता है। अर्हत से भाव है पूजनीय। जैन धर्म को मानने वाले जैनी कहलाते हैं। जैन 24 तीर्थंकरों में विश्वास रखते हैं। इनके नाम ये हैं:—

  1. ऋषभनाथ
  2. अजित
  3. संभव
  4. अभिनंदन
  5. सुमति
  6. पद्मप्रभु
  7. सुपार्श्व
  8. चंद्रप्रभु
  9. पुष्पदंत
  10. शीतल
  11. श्रेयांसम
  12. वासुपूज्य
  13. विमल
  14. अनंत
  15. धर्म
  16. शाँति
  17. कुंथ
  18. अरह
  19. मल्लि
  20. मुनिसुव्रत
  21. नामि
  22. नेमि
  23. पार्श्वनाथ
  24. महावीर

जैनी ऋषभनाथ को जैन धर्म का संस्थापक मानते हैं। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार उनका जन्म अयोध्या में हुआ। उन्होंने कई वर्षों तक राज्य किया। बाद में उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र भरत को सौंप दिया और स्वयं संसार त्याग कर तपस्या में लग गये। अंत में उनको ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने इस ज्ञान के बारे लोगों को उपदेश दिया। इस तरह वह पहले तीर्थंकर कहलाये। ऋषभनाथ के बाद होने वाले 21 तीर्थंकरों को ऐतिहासिक बताना संभव नहीं है, परंतु जैनियों की पवित्र अनुश्रुतियों में इनका वर्णन आता है। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और 24वें तीर्थंकर महावीर ऐतिहासिक व्यक्ति थे। स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले बनारस के राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता जी का नाम वामादेवी था। उनका बचपन बहुत ही ऐश-ओ-आराम में बीता। 30 वर्षों की आयु में पार्श्वनाथ ने अपने सारे सुखों का त्याग कर दिया और सच्चे ज्ञान की खोज में निकल गये। उनको 83 दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के बाकी 70 वर्ष अपने उपदेशों का प्रचार करने में व्यतीत किये। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊंट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। पार्श्वनाथ की शिक्षा को चार्तुयाम अथवा चार प्रण कहते हैं। यह चार प्रण ये हैं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)।

स्वामी महावीर ने इन चार असूलों में एक और असूल जोड़ा जिसको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्वामी महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं बल्कि सुधारक थे।

1. महावीर का जन्म और बचपन (Birth and Childhood of Mahavira)- महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली (बिहार) के नज़दीक कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्म तिथि 540 ई० पू० बताते हैं। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर जी के पिता जी का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले जनत्रिका के मुखिया थे। महावीर जी की माता जी का नाम तृषला था। वह लिच्छवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व उसे 14 स्वप्न आए थे। महावीर को शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किये गये थे। महावीर जी का बचपन से ही सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही विचारों में डूबे रहते थे।

2. विवाह (Marriage)—सांसारिक कार्यों की ओर महावीर जी का ध्यान लगाने के लिए उनके पिता जी ने महावीर का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की आयु कितनी थी इसके बारे हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियादर्शना रखा गया।

3. महान् त्याग और ज्ञान प्राप्ति (Renunciation and Enlightenment)-गृहस्थी जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों की राह में किसी तरह की अड़चन (रुकावट) न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद महावीर अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर गृह त्याग्न कर जंगलों में ज्ञान की खोज के लिए चले गये। उस समय महावीर जी की आयु 30 वर्ष थी। उन्होंने 12 वर्षों तक बड़ा कठोर तप किया। अंततः उनको ऋजुपालिका नदी के नज़दीक जरिमबिक गाँव में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद वर्धमान जिन (इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने वाला) और महावीर (महान् विजयी) कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।

4. धर्म प्रचार (Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर जी ने लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूंर करने के लिए और उनको सच्चा मार्ग बताने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए और वे महावीर जी के अनुयायी बन गये। महावीर जी के प्रसिद्ध प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार और उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन मत को स्वीकार कर लिया।

5. निर्वाण (Nirvana)—स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 4.
जैन धर्म की बुनियाद नैतिक शिक्षाएँ हैं चर्चा करो।
(“Ethical teachings are the foundation of Jainism.” Discuss.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं के विषय में जानकारी दीजिए। (Describe the Ethical teachings of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की बुनियादी शिक्षाओं के विषय में संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण जानकारी दीजिए।
(Describe in brief but meaningful the basic teachings of Jainism.)
अथवा
“नैतिक मूल्य जैन धर्म का आधार हैं।” प्रकाश डालिए।
(“Moral values are the basis of Jainism.” Elucidate.)
अथवा
जैन सदाचार पर एक विस्तृत नोट लिखो।
(Write a detailed note on Jain Ethics. )
अथवा
जैन धर्म के सदाचारक गुणों संबंधी जानकारी दो। (Discuss the Ethical values of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाओं की चर्चा करो।
(Discuss the main teachings of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं संबंधी जानकारी दो। (Give information about moral teachings of Jainism.)
अथवा
भगवान् महावीर की नैतिक शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the Ethical teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म की शिक्षाओं के बारे में बताएँ।
(Write the teachings of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक कीमतों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the Ethical values of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं के बारे में चर्चा कीजिए। (Discuss about the Ethical teachings of Jainism.)
अथवा
भगवान् महावीर की मूल शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the basic teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म की मुख्य सदाचारक कीमतें कौन-सी हैं ? प्रकाश डालें। (What were the main Ethical values of Jainism ? Elucidate.)
अथवा
जैन धर्म की सदाचारक शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the Ethical teachings of Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म की अथवा महावीर जी की मुख्य नैतिक शिक्षाओं ने भारतीय संस्कृति को एक ऐसी देन दी जिस पर हमें आज भी गर्व है। जैन धर्म ने लोगों को त्रि-रत्न, अहिंसा, शुद्ध आचरण और आपसी भाइचारे का पाठ पढ़ाया। इसने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। इसका यज्ञों, बलियों, वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में कोई विश्वास नहीं था। इसने मनुष्य को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। निस्संदेह जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं ने भारतीय समाज को एक नई दिशा देने का एक महान् कार्य किया।—

1. त्रि-रत्न (Tri-Ratna)-जैन धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्त करना है। इसको प्राप्त करने के लिए जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए त्रि-रत्नों पर चलना अति ज़रूरी है। ये तीन रत्न हैं-सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार। पहले रत्न के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 24 तीर्थंकरों, नौ सच्चाइयों और जैन शास्त्रों में अटल विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्नानुसार जैनियों को सच्चा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यह तीर्थंकरों के उपदेशों के गहरे अध्ययन से प्राप्त होता है। इस ज्ञान के दो रूप बताये गये हैं जिनको प्रत्यक्ष और परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। आत्मा द्वारा प्राप्त ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और वह ज्ञान जो इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होता है उसको परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। ज्ञान की पाँच किस्में हैं, जिनके नाम इस तरह हैं-मति ज्ञान, श्रुति ज्ञान, अवधि ज्ञान, मनपर्याय ज्ञान और केवल्य ज्ञान। तीसरे रत्नानुसार प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे आचार के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। सच्चा आचार वह है जिसकी शिक्षा जैन धर्म देता है। ये तीनों रत्न साथ-साथ चलते हैं। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति मनुष्य को उसकी मंजिल तक नहीं पहुँचा सकती। उदाहरण के तौर पर जैसे एक दीये को प्रकाश देने के लिए उसमें तेल, बाती और आग का होना ज़रूरी है। यदि इसमें से एक भी वस्तु की कमी हो तो वह प्रकाश नहीं दे सकता।

2. अहिंसा (Ahimsa)-जैन धर्म में अहिंसा पर बहुत जोर दिया गया है। अहिंसा की महत्ता बताते हुए आचारांग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना-अपना जीवन प्यारा है, सब ही सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सारे ही जीने की इच्छा रखते हैं।” इसीलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है। हिंसा दो तरह की होती है-मन से हिंसा और कर्म से हिंसा। कर्म अथवा अमल में आने वाली हिंसा से पहले मन भाव विचारों में हिंसा आती है। गुस्सा, अहंकार, लालच और धोखा मन की हिंसा है। इसलिए हिंसा से बचने के लिए मन के विचारों को शुद्ध करना अति ज़रूरी है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्यों के अतिरिक्त पशुओं, पत्थरों और वृक्षों आदि में भी आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी कारण जैनी लोग नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और अंधेरा हो जाने के बाद कुछ नहीं खाते ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाये। बी० एन० लूनीया के अनुसार,
“अहिंसा जैन धर्म की आधारशिला है।”1

3. नौ सच्चाइयाँ (Nine Truths)-जैन दर्शन नौ सच्चाइयों की शिक्षा देता है। ये सच्चाइयाँ हैं(1) जीव-जैन दर्शन में आत्मा को जीव कहा गया है। यह चेतन सुरूप है। यह शरीर के कर्मों के अच्छे-बुरे फल भुगतता है और आवागमन के चक्र में पड़ता है। (2) अजीव-यह जंतु पदार्थ है। यह निर्जीव है और इनमें समझ नहीं होती। इनकी दो श्रेणियाँ हैं रूपी और अरूपी। (3) पुण्य-यह अच्छे कर्मों का नतीजा है। इसके नौ साधन हैं। (4) पाप-यह जीव के बंधन का मुख्य कारण है। इसके परिणामस्वरूप घोर सज़ायें मिलती हैं। (5) अशर्व-यह वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मा अपने अंदर कर्मों को संचित करती रहती है। कर्म 8 किस्मों के होते हैं। (6) संवर-कर्म को आत्मा की ओर आने की क्रिया को रोकने को संवर कहते हैं। कर्म को रोकने की 57 विधियाँ हैं। (7) बंध-इससे भाव बंधन है। यह जीव (आत्मा) का पुदगल (परमाणु) से मेल है। बंध के लिए पाँच कारण जिम्मेवार हैं। (8) निर्जर-इस से भाव है दूर भगाना। यह कर्मों को नष्ट करने और जला देने का कार्य करता है। (9) मोक्ष-इसमें जीव कर्मों के जंजाल से मुक्त हो जाता है। यह पूर्ण शाँति की अवस्था है जिसमें हर तरह के दुःखों से छुटकारा प्राप्त हो जाता है।

4. कर्म सिद्धांत (Karma Theory)-जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस सिद्धांत के अनुसार, “जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसे बीजोगे वैसा काटोगे, यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा, किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा।” जैसे ही हमारे मन में कोई अच्छा या बुरा विचार आता है वह तुरंत जीव (आत्मा) से उसी तरह जुड़ जाता है, जैसे तेल लगे हुए शरीर में धूलि कण चिपक जाते हैं। ये कर्म आठ प्रकार के हैं-(1) ज्ञानवर्णीय कर्म-यह आत्मा के ज्ञान को रोकते हैं। (2) दर्शनवर्णीय कर्म-यह आत्मा की इच्छा शक्ति को रोकते हैं। (3) वैदनीय कर्म-ये सुख-दुःख उत्पन्न करने वाले कर्म हैं। (4) मोहनीय कर्म-ये आत्मा को मोह माया में फंसाने वाले कर्म हैं। (5) आयु कर्मये कर्म मनुष्य की आय को निर्धारित करते हैं। (6) नाम कर्म-ये कर्म मनुष्य की आय को निर्धारित करते हैं। (7) गोत्र कर्म-ये व्यक्ति के गोत्र और समाज में उसके ऊँचे या नीचे स्थान को निर्धारित करते हैं। (8) अंतरीय कर्म-ये अच्छे कर्म को रोकने वाले कर्म हैं।
कर्मों के कारण मनुष्य आवागमन के चक्रों में फंसा रहता है। कर्मों का नाश करके ही मनुष्य इससे छुटकारा प्राप्त कर सकता है।

5. अनेकांतवाद (The Doctrine of Manyness)-अनेकांतवाद जैन दर्शन का एक अनोखा दार्शनिक सिद्धांत है। अनेकांत शब्द किसी भी पदार्थ के अनेक धर्मों या गुणों का संकेत करता है। इसका भाव यह है कि जिस वस्तु का ज्ञान हमें जिस रूप में होता है, उसी वस्तु का ज्ञान किसी अन्य व्यक्ति को किसी और रूप में हो सकता है। उदाहरणतया जैसे एक बच्चे को उसकी माँ पुत्र समझती है, बहन भाई समझती है, दादी पोता समझती है, नानी दोहता समझती है और बच्चे उसको अपना मित्र समझते हैं। कहने से.भाव यह है कि हर पदार्थ अनेकांत या अनेक गुणों वाला है। इसी कारण हर पदार्थ के बारे में हमारा ज्ञान आंशिक होता है। इसको स्यादवाद कहा जाता है। यह अनेकांतवाद का दूसरा रूप है।

6. पाँच अणुव्रत अथवा महाव्रत (Five Annuvartas or Mahavartas)-जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में पाँच अणुव्रतों अथवा महाव्रतों की पालना करनी चाहिए। इनके अनुसार (i) मनुष्य को सदा अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए। (ii) उसको हमेशा सत्य बोलना चाहिए। (iii) उसको कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसको दान में प्राप्त न हुई हो। (iv) उसको अपने पास धन नहीं रखना चाहिए। (v) उसको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
इनमें से पहले चार सिद्धांतों का प्रचलन पार्श्वनाथ ने किया जबकि पाँचवां सिद्धांत महावीर जी ने शामिल किया। डॉक्टर के० सी० सौगानी के अनुसार,
“इन पाँच अणुव्रतों का पालन व्यक्तिगत और सामाजिक उन्नति लाने में सहायक है।’2

7. शुद्ध आचरण (Good Character) स्वामी महावीर ने शुद्ध आचरण को विशेष महत्त्व दिया। उन्होंने कहा कि हमें चोरी, झूठ, चुगली, लालच आदि बुराइयों से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। मनुष्य को पापी से नहीं, बल्कि पाप से नफरत करनी चाहिए।

8. चौबीस तीर्थंकरों की पूजा (Worship of Twenty Four Tirthankaras) जैन धर्म को मानने वाले अपने 24 तीर्थंकरों को देवते मान कर उनकी पूजा करते हैं। उनका विश्वास है कि तीर्थंकरों में पक्का विश्वास रखने से मनुष्य को निर्वाण की प्राप्ति होती है।

9. समानता में विश्वास (Belief in Equality)-जैन धर्म समानता के सिद्धांत में विश्वास रखता है। इसके अनुसार सारे मनुष्य बराबर हैं। इसलिए मनुष्यों को अमीर-गरीब, ऊँच-नीच आदि का भेदभाव नहीं करना चाहिए।

10. यज्ञों, बलियों आदि में अविश्वास (Disbelief in Yajnas and Sacrifices etc.)—जैन धर्म यज्ञों, बलियों और अन्य झूठे रीति-रिवाजों को एक अन्य ढोंग मात्र ही बताता है। उनके अनुसार कोई भी मनुष्य धर्म के बाह्य दिखावे से निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए जैन धर्म के लोगों को इन अंध-विश्वासों से दूर रहने को कहा।

11. वेदों और संस्कृत भाषा में अविश्वास (Disbelief in Vedas and Sanskrit Language)-स्वामी महावीर जी हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ-वेदों में कोई विश्वास नहीं रखते थे। उनका कहना था कि वेदों की रचना ईश्वरीय ज्ञान से नहीं हुई। इसलिए वेदों के मंत्रों को पढ़ना बिल्कुल व्यर्थ है। वह संस्कृत भाषा की पवित्रता में भी विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने सारी भाषाओं को पवित्र माना। उन्होंने अपने उपदेशों का प्रचार उस समय में प्रचलित अर्धमगधी भाषा में किया।

12. ईश्वर में अविश्वास (Disbelief in God)-जैन धर्म ईश्वर की उपस्थिति में विश्वास नहीं रखता है। इसके अनुसार ईश्वर संसार की रचना, इसकी पालना और समाप्ति करने वाला नहीं है। निर्वाण प्राप्त करने के लिए ईश्वर की कोई जरूरत नहीं है। मनुष्य की आत्मा ही उसकी महान् शक्ति है। मनुष्य सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करके निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है।

13. निर्वाण (Nirvana) ‘महावीर जी के अनुसार मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है। जैनमत में निर्वाण से भाव आवागमन के चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है। निर्वाण प्राप्ति के बाद मनुष्य का इस संसार में जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है और उसको स्थाई शाँति मिलती है।

1. “Ahimsa is the sheet anchor of Jainism.” B.N. Luniya, Life and Culture in Ancient India (Agra : 1982) p. 162.
2. “The observance of these five vows is capable of bringing about individual as well as social progress.” Dr. K.C. Sogani, Jainism (Patiala : 1986) p. 65.

प्रश्न 5.
भगवान् महावीर का जीवन तथा प्रसिद्ध शिक्षाएँ बताएँ।
(Describe the life and important teachings of Bhagwan Mahavira.)
उत्तर-
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर के जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. महावीर का जन्म और बचपन (Birth and Childhood of Mahavira)- महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली (बिहार) के नज़दीक कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्म तिथि 540 ई० पू० बताते हैं। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर जी के पिता जी का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले जनत्रिका के मुखिया थे। महावीर जी की माता जी का नाम तृषला था। वह लिच्छवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व उसे 14 स्वप्न आए थे। महावीर को शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किये गये थे। महावीर जी का बचपन से ही सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही विचारों में डूबे रहते थे।

2. विवाह (Marriage)—सांसारिक कार्यों की ओर महावीर जी का ध्यान लगाने के लिए उनके पिता जी ने महावीर का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की आयु कितनी थी इसके बारे हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियादर्शना रखा गया।

3. महान् त्याग और ज्ञान प्राप्ति (Renunciation and Enlightenment)-गृहस्थी जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों की राह में किसी तरह की अड़चन (रुकावट) न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद महावीर अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर गृह त्याग्न कर जंगलों में ज्ञान की खोज के लिए चले गये। उस समय महावीर जी की आयु 30 वर्ष थी। उन्होंने 12 वर्षों तक बड़ा कठोर तप किया। अंततः उनको ऋजुपालिका नदी के नज़दीक जरिमबिक गाँव में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद वर्धमान जिन (इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने वाला) और महावीर (महान् विजयी) कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।

4. धर्म प्रचार (Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर जी ने लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूंर करने के लिए और उनको सच्चा मार्ग बताने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए और वे महावीर जी के अनुयायी बन गये। महावीर जी के प्रसिद्ध प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार और उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन मत को स्वीकार कर लिया।

5. निर्वाण (Nirvana)—स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 6.
जैन धर्म में त्रि-रत्न से क्या अभिप्राय है ? चर्चा करें।
(What is meant by three Jewels in Jainism ? Discuss.)
अथवा
‘त्रि-रत्न’ की व्याख्या करो और बताओ कि यह किस धर्म से संबंधित है ? (Explain Tri-Ratna and tell to which religion, do they belong.)
अथवा
जैन मत के तीन हीरों की व्याख्या करें।
(Explain the three Jewels of Jainism.).
अथवा
जैन धर्म के त्रि-रत्नों के बारे में चर्चा करो।
(Discuss the Tri-Ratnas of Jainism.)
उत्तर-
जैन दर्शन के सिद्धांतों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पहले जीव (आत्मा) शुद्ध रूप में होता है। बाद में यह कार्मिक पदार्थों के कारण दूषित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को घोर दुःखों का सामना करना पड़ता है। यदि कार्मिक पदार्थों का नाश कर दिया जाये तो व्यक्ति इस भवसागर से पार उतर सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। जैन दर्शन मोक्ष प्राप्ति को मनुष्य के जीवन का सबसे ऊँचा उद्देश्य मानता है। कोई भी व्यक्ति बिना किसी जाति, लिंग, धर्म, वर्ग या आयु पर इस मार्ग पर चल सकता है। इस मार्ग पर चलने के लिए जैन धर्म में त्रि-रत्न निर्धारित किये गये हैं। ये त्रि-रत्न हैं-(1) सच्चा विश्वास (2) सच्चा ज्ञान (3) सच्चा आचार। ये त्रि-रत्न मोक्ष प्राप्ति के तीन भिन्न-भिन्न मार्ग नहीं हैं, बल्कि एक मार्ग के तीन साथ-साथ चलने वाले रास्ते हैं। यदि इनमें से एक की भी कमी हो तो व्यक्ति अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर सकता। उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति ने अपने मकान की छत पर जाना हो तो उसको सीढ़ी लगानी पड़ेगी और यदि इस सीढ़ी के सिरे पर लगे दो और बीच में लगे डंडों में से एक चीज़ की भी कमी हो तो व्यक्ति किसी भी स्थिति में ऊपर नहीं पहुँच सकता। त्रि-रत्नों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित है—

1. सच्चा विश्वास (Right Belief)-जैन दर्शन के त्रि-रत्नों में सच्चा विश्वास नामक रत्न को पहला अथवा प्रमुख स्थान दिया गया है। क्योंकि यदि व्यक्ति में सच्चा विश्वास न हो तो वह सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार कभी प्राप्त नहीं कर सकता। सच्चा विश्वास से भाव यह है कि जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, उसे 24 जैन तीर्थंकरों, नौ महान् सच्चाइयों और जैन शास्त्रों में पक्की श्रद्धा होनी चाहिए। जैन शास्त्रों के अनुसार सच्चा विश्वास तभी पूरा हो सकता है यदि संबंधित व्यक्ति 8 अंगों को धारण करे। ये 8 अंग हैं—

  • जैन धर्म के सिद्धांतों के बारे कोई शंका नहीं होनी चाहिए।
  • सांसारिक वस्तुओं से कोई प्यार नहीं होना चाहिए।
  • शरीर में चाहे अनगिनत बुराइयाँ हैं, परंतु इसके प्रति कोई तिरस्कार की भावना नहीं होनी चाहिए।
  • गलत मार्ग की ओर कोई झुकाव नहीं होना चाहिए।
  • पवित्र व्यक्तियों की प्रशंसा की जानी चाहिए, परंतु दूसरे व्यक्तियों की निंदा नहीं की जानी चाहिए।
  • जो व्यक्ति धर्म की राह से भटक गये हों उनको ठीक मार्ग दर्शाना चाहिए।
  • धार्मिक व्यक्तियों का पूरा आदर किया जाना चाहिए।
  • जैन सिद्धांतों के प्रचार के लिए पूरे यत्न करने चाहिए।

सच्चा विश्वास किसी भी व्यक्ति द्वारा तब ही प्राप्त किया जा सकता है यदि वह तीन प्रकार के अंध-विश्वासों और आठ प्रकार के घमंडों से दूर रहे। तीन तरह के अंध-विश्वास ये हैं—

  • पहाड़ पर चढ़कर, नदी में नहाकर या आग पर चल कर अपने आप को पवित्र समझना।
  • झूठे देवी-देवताओं में विश्वास करना।
  • झूठे तपस्वियों का सत्कार करना।

आठ प्रकार के घमंड ये हैं—

  • ज्ञान का घमंड
  • पूजा का घमंड
  • परिवार का घमंड
  • जाति का घमंड
  • शक्ति का घमंड
  • दौलत का घमंड
  • तप का घमंड
  • सुंदर शरीर का घमंड।

सच्चा विश्वास हमारे लिए समृद्धि तथा मोक्ष का आधार तैयार करता है।

2. सच्चा ज्ञान (Right Knowledge)-सच्चा विश्वास ही सच्चे ज्ञान की आधारशिला है। इस कारण सच्चा विश्वास और सच्चे ज्ञान के मध्य गहरा संबंध है। सच्चा ज्ञान वह है जो जैन शास्त्रों में दिया गया है। जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करना चाहता है उसके लिए सच्चे ज्ञान को प्राप्त करना अति ज़रूरी है। यह ज्ञान बाहर से नहीं आता बल्कि जीव पर पड़े कर्म पदार्थों के पर्दे को दूर हटाने से उत्पन्न हो जाता है। इस ज्ञान के दो रूप बताये गये हैं जिनको प्रत्यक्ष ज्ञान और परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। वह ज्ञान जो आत्मा द्वारा सीधा प्राप्त किया जाता है प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाता है और वह ज्ञान जो इंद्रियों के रास्ते से प्राप्त होता है परोक्ष ज्ञान कहलाता है।
जैनी ज्ञान को पाँच तरह का बताते हैं—

  • मति ज्ञान-यह ज्ञान इंद्रियों द्वारा प्राप्त किया जाता है और यह सीमित होता है।
  • श्रुती ज्ञान-यह ज्ञान शास्त्रों को पढ़ने और या सुनने से प्राप्त होता है। इससे भूत, वर्तमान और भविष्य संबंधी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यह ज्ञान भी इंद्रियों के द्वारा जाना जा सकता है।
  • अवधि ज्ञान-दूर के समय या स्थान के बारे जो ज्ञान आत्मा के द्वारा होता है उसको अवधि ज्ञान कहते हैं।
  • मनपर्याय ज्ञान-यह वह ज्ञान है जिस द्वारा व्यक्ति किसी दूसरे के मन के विचारों को जान सकता है। यह ज्ञान भी आत्मा द्वारा होता है।
  • कैवल्य ज्ञान-यह पूर्ण सच्चा ज्ञान है। इसको परमार्थिक ज्ञान भी कहा जाता है। इस ज्ञान को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को सिद्ध कहा जाता है।

ज्ञान दोष तीन तरह से पैदा होता है—

  • इंद्रियों की गलती के कारण।
  • गलत अध्ययन के कारण।
  • अस्पष्ट दृष्टिकोण के कारण।

जैसे दूध की भारी मात्रा में थोड़ा-सा खट्टा डाल दिया जाये तो वह सारे दूध को खट्टा कर देता है। ठीक उसी तरह यदि व्यक्ति द्वारा प्राप्त ज्ञान में थोड़ा-सा भी दोष आ जाये तो वह सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।

3. सच्चा आचार (Right Conduct)-मोक्ष को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति के लिए सच्चा विश्वास और सच्चा ज्ञान होने के बाद सच्चा आचार का होना अति ज़रूरी है। व्यक्ति का सच्चा आचार ही जीव के कार्मिक पदार्थों का नाश करता है और उसके लिए मोक्ष का मार्ग तैयार करता है। सच्चे आचार पर चलने के लिए जैन धर्म में कुछ नियम निर्धारित किये गये हैं। ये नियम यद्यपि समान रूप में आम लोगों और जैन मुनियों पर लागू होते हैं परंतु उन पर सख्ती का अंतर है । जैन मुनियों को इन नियमों की सख्ती से पालना करनी पड़ती है जबकि आम लोगों को कुछ छूट दी गई है। इन नियमों को पाँच महाव्रत या पाँच अणुव्रत कहा जाता है इनके अनुसार—

  • मनुष्य को कभी किसी जीव को दु:ख नहीं देना चाहिए और उसको अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए।
  • उसको सदा सत्य बोलना चाहिए। उसके बोल मीठे और हितकारी होने चाहिए।
  • उसको कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसको दान में प्राप्त न हुई हो।
  • उसको सांसारिक वस्तुओं से मोह नहीं करना चाहिए।
  • उसको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

ऊपरलिखित त्रि-रत्नों पर चलने के कारण जीव के कर्म पदार्थ धीरे-धीरे नष्ट होने शुरू हो जाते हैं और वह अपने परम उद्देश्य मोक्ष को प्राप्त करता है। अंत में हम प्रसिद्ध लेखक जे० पी० सुधा के इन शब्दों से सहमत हैं,
“जैनियों के अनुसार सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार जो त्रि-रत्नों के तौर पर जाने जाते हैं उस मार्ग का निर्धारण करते हैं जो जीव अपने अंदर कार्मिक पदार्थों को आने से रोकते हैं और व्यक्ति को आवागमन के बंधनों से मुक्त करते हैं।”3

3. “According to the three jewels of right faith, right knowledge and right conduct, known as Triratna constitute the path which prevents fresh Karmic matter from entering the soul and frees the individual from the bonds of rebirth.” J.P. Sudha, Religions in India (New Delhi : 1978) p. 211.

प्रश्न 7.
जैन धर्म में अहिंसा पर नोट लिखें। (Write a note on Ahimsa (non-violence) of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म में अहिंसा के सिद्धांत के बारे में प्रकाश डालें।
(Throw light on the Jain principle of Ahimsa.)
अथवा
अहिंसा से क्या भाव है ? जैन धर्म में इसका क्या महत्त्व है ? (What is meant by Ahimsa ? What is its importance in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में अहिंसा के सिद्धांत पर नोट लिखें।
(Write a note on the concept of Ahimsa in Jainism.)
उत्तर-
1. अहिंसा से अभिप्राय (Meaning of Ahimsa)-जैन धर्म में अहिंसा की नीति को जितना महत्त्व दिया गया है उतना विश्व के किसी अन्य धर्म में नहीं दिया गया। यदि अहिंसा को जैन धर्म की आधारशिला कह दिया तो इसमें कोई अतिकथनी नहीं होगी। अहिंसा से अभिप्राय है किसी भी जीवित चीज़ को कोई कष्ट न देना। जीवित जीवों को कस के बाँधने, उनको मारने-पीटने, उनकी हिम्मत से अधिक भार जोतने, उनको खुराक और पानी से वंचित रखने में जैन धर्म में मनाही है। इनके अतिरिक्त उनको अपने भोजन के लिए मारना बिल्कुल अनुचित है।
जैन दर्शन के अनुसार वृक्षों और पत्थरों आदि में भी जान होती है। इसलिए हमें उनको भी किसी किस्म का दु:ख नहीं देना चाहिए। आचारांग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना जीवन प्यारा है, सभी सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सभी जीने की इच्छा रखते हैं।” इसलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है।

2. दो प्रकार की हिंसा (Two types of Ahimsa)-हिंसा दो प्रकार की होती है-विचार या मन से हिंसा और कर्म से भाव शारीरिक और बाहरी हिंसा। बाहरी हिंसा के व्यवहार में आने से पहले मनुष्य के विचारों में हिंसा आती है। जब मनुष्य के मन में आवेग उठते हैं और इन आवेगों के प्रति विचार उत्पन्न होते हैं तो व्यक्ति पाप करता है और हिंसा का दोषी बन जाता है। मनुष्य संसार के लालचों में फंसकर अपनी काम वासना को पूरा करने के लिए , किसी को धोखा देने के लिए, किसी से अपना बदला लेने के लिए हिंसा करता है। जब इससे संबंधित विचार व्यक्ति के मन में आते हैं तो वह पहले अपनी आत्मा को दूषित करता है। वह यहाँ ही बस नहीं करता और बाद में बाहरी हिंसा के द्वारा दूसरों को दुःख पहुँचाता है और स्वयं भी दुःखी होता है। हिंसा को रोकने के लिए व्यक्ति का अपने विचारों को शुद्ध करना ज़रूरी है। महावीर ने अपने शिष्यों को शिक्षा देते हुए कहा, “हे श्रमणो, पहले अपने आप से युद्ध करो और आत्म शुद्धि की ओर कदम बढ़ाओ। बाहरी युद्ध से कुछ नहीं होगा।”

3. अहिंसा जीवन का एक मार्ग (Ahimsa is a way of Life)-जैन दर्शन में अहिंसा को जीवन का एक मार्ग कहा गया है। किसी भी व्यक्ति द्वारा अहिंसा के प्रति प्रतिज्ञा का पूरी तरह पालन तभी संभव है यदि उसको हिंसा की किस्मों और रूपों के बारे में पूर्ण ज्ञान हो। जैनी सूत्रों में 108 प्रकार की हिंसा का वर्णन मिलता है जिन्हें चार वर्गों में बाँटा जा सकता है। पहले वर्ग में हिंसा तीन स्तर की है। हिंसा व्यक्ति स्वयं कर सकता है, यह दूसरों से करवाई जा सकती है और यह उसकी अपनी सहमति के द्वारा की जा सकती है। व्यक्ति मन, वाणी और शरीर द्वारा हिंसा कर सकता है। दूसरे वर्ग में तीन स्तरीय हिंसा नौ स्तरीय बन जाती है क्योंकि यह मन, वाणी और शरीर रूपी तीन साधनों में प्रत्येक साधन द्वारा की जा सकती है। तीसरे वर्ग में नौ स्तरीय हिंसा सताईस स्तरीय बन जाती है क्योंकि हिंसा की तीन स्थितियाँ हैं, भाव हिंसा के बारे में सोचना, हिंसा के लिए तैयारी करना और फिर उस को व्यावहारिक रूप देना। चौथे वर्ग में सत्ताईस स्तरीय हिंसा 108 स्तरीय हिंसा बन जाती है क्योंकि यह चार मनोवेगों में से किसी न किसी से उत्तेजित होती है।

4. हिंसा से बचने के साधन (Ways to Escape Ahimsa)-हिंसा के सभी रूपों में किसी से बचना आसान नहीं है। फिर भी जैनी अपने जीवन में इनसे बचने के लिए अनेक नियमों का पालन करते हैं। वे नंगे पाँव चलते हैं ताकि कोई कीड़ा उनके पाँवों के नीचे आकर मर न जाये। वे मुँह पर पट्टी बाँध कर रखते हैं ताकि कोई कीटपतंगा सांस से उनके अंदर न चला जाए। इस उद्देश्य से वे पानी छान कर पीते हैं और सूर्य ढलने के बाद भोजन नहीं करते। जैनी ज्यादातर व्यापार का धंधा करते हैं और खेतीबाड़ी बिल्कुल नहीं करते क्योंकि उनका विचार है कि खेतीबाड़ी करते समय अनेक जीवों की हत्या हो जाती है।
जैन धर्म में व्यक्ति के मन में हिंसा के विचारों को उभरने से रोकने के लिए शराब और दूसरी नशीली वस्तुओं के सेवन, माँस खाने और युद्ध करने की मनाही है। नशीली वस्तुओं का प्रयोग करने से हमारे अंदर काम वासना और अन्य कई वासनाएँ उत्तेजित होती हैं। इनसे पाप की भावना और हिंसा उत्पन्न होती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति लापरवाही में ही हिंसा कर देता है। माँस का प्रयोग करने पर इसलिए पाबंदी लगाई गई है ताकि मनुष्य पशुओं और पक्षियों को अपने भोजन के लिए न मारे और न ही वह हिंसा का भागीदार बने। युद्ध के दौरान व्यक्ति अपने दुश्मनों को मार कर बहुत बहादुरी का काम समझता है परंतु जैन दर्शन के अनुसार किसी भी व्यक्ति को मारना बिल्कुल अयोग्य है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

ऊपरलिखित विवरण से स्पष्ट है कि जैन धर्म में अन्य नियमों के मुकाबले अहिंसा के सिद्धांत पर अधिक बल दिया गया है। डॉक्टर ज्योति प्रसाद जैन का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
“अहिंसा का जीवन सारी नैतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बुराइयों का राम बाण इलाज है। अहिंसा सर्वोच्च धर्म है और जहाँ अहिंसा है वहाँ जीत है।”4

4. “The Ahimstic way of life is the sure panacea for all moral, social, economic and political ills. Ahimsa is the highest religion, and where there is Ahimsa, there is victory.” Dr. Jyoti Prasad Jain, Religion and Culture of the Jains (New Delhi : 1983) p. 101.

प्रश्न 8.
जैन धर्म की नौ सच्चाइयों से क्या भाव है ? इनका संक्षेप वर्णन करो। (What is meant by Nine Truths of Jainism ? Explain briefly.)
अथवा
जैन धर्म के नौ तत्त्व कौन से हैं ? चर्चा करें।
(Which are the nine tatvas in Jainism ? Discuss.)
अथवा
जैन धर्म के नौ तथ्यों पर एक नोट लिखो।
(Write a note on nine tatvas of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के नौ तत्त्वों से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
(What do we learn from nine tatvas of Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म के नौ रत्नों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the Nine Rattans of Jainism.)
उत्तर-
नौ सच्चाइयों अथवा तत्त्वों को जैन दर्शन में केंद्रीय स्थान प्राप्त है। वह व्यक्ति जो निर्वाण प्राप्त करने का चाहवान है उसके लिए इन नौ सच्चाइयों के बारे जानकारी होना अति जरूरी है। ये नौ सच्चाइयाँ हैं—
(i) जीव
(ii) अजीव
(iii) पुण्य ”
(iv) पाप
(v) आश्रव
(vi) बंध
(vii) संवर
(viii) निर्जर
(ix) मोक्ष।

दिगंबर संप्रदाय के अनुसार सात सच्चाइयाँ हैं । वे पाप और पुण्य को अलग नहीं मानते। उनके अनुसार ये अश्रव और बंध में शामिल हैं। इन सच्चाइयों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. जीव (Jiva)-जीव शब्द का अर्थ है आत्मा। यह चेतन तथ्य है। जैन दर्शन में जीव दो प्रकार के हैं। इनको सांसारिक जीव और मुक्त जीव कहा जाता है। सांसारिक जीव को बंधन जीव भी कहते हैं। यह जीव आवागमन के चक्र में रहता है और अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता है और अपने अच्छे बुरे फल भुगतता है। मुक्त जीव वह जीव है जो पुनर्जन्म से रहित है। यह जीव अनंत ज्ञान वाला, अनंत शक्ति वाला और अनंत गुणों वाला होता है। यह जीव कर्मों के जाल से मुक्त होता है।

2. अजीव (Ajiva)-अजीव से भाव उन जड़ पदार्थों से है जिनमें चेतना नहीं होती जैसे पुस्तक, कागज़, मेज़ और स्याही आदि। उदाहरण के तौर पर ऊँट के शरीर में जीव फैल कर ऊँट जितना बड़ा हो जाता है और कीड़ी के शरीर में सिकुड़ कर कीड़ी जितना हो जाता है। यह जीव तब नहीं दिखाई देता है परंतु शरीर की क्रियाओं के आधार पर इसकी उपस्थिति का ज्ञान हो जाता है। परंतु जब शरीर का अंत हो जाता है तो जीव लोप हो जाता है। जीव जिस शरीर को धारण करता है वह उस के आकार का ही हो जाता है। अजीव दो प्रकार के होते हैं रूपी और अरूपी । रूपी वह हैं जो दिखाई देते हैं जैसे कुर्सी, पैन, घड़ा आदि। अरूपी वह हैं जो दिखाई नहीं देते जैसे समय, चिंता और खुशी आदि। जैन दर्शन में अजीवों के पाँच अचेतन तत्त्व बताए गए हैं। इनका संक्षेप वर्णन निम्नलिखित है

  • पुदगल (Pudgala)-पुदगल से भाव पदार्थ या परमाणु है। यह पुदगल रूप, स्पर्श, रस और गंध-चार गुणों वाले होते हैं। अग्नि के पुदगल रूप गुण वाले, वायु के पुदगल स्पर्श गुण वाले, जल के पुदगल रस गुण वाले और पृथ्वी के पुदगल गंध गुण वाले होते हैं। पुदगलों के दो रूप माने गए हैं-अणु रूप वाले और स्कंध रूप वाले। अणु रूप वाले पुदगल जीवों के भोग के लायक नहीं होते हैं जबकि स्कंध रूप वाले होते हैं। पुदगलों को सारे भौतिक जगत् की रचना का मूल आधार माना जाता है।
  • धर्म (Dharma) यह तत्त्व जीव और पुदगलों में गति पैदा करता है और उनके आपसी सहयोग में सहायक माना जाता है। जैसे मछली की गति के लिए पानी की ज़रूरत अति आवश्यक है ठीक उसी प्रकार जीवों और पुदगलों की गति के लिए धर्म की ज़रूरत अति आवश्यक है। धर्म के बिना गति पैदा नहीं हो सकती।
  • अधर्म (Adharma)-इसका स्वरूप और कार्य धर्म से बिल्कुल उल्ट है। यह जीवों की ओर पुदगलों की गति में रुकावट पैदा करता है। परंतु अधर्म को धर्म का विरोधी नहीं समझा जाता। अधर्म के द्वारा गति में पाई गई रुकावट जीव के आराम के लिए सहायक मानी गई है।
  • आकाश (Akasha)-आकाश से भाव वह स्थान है जिसमें जीव, मुदगल, धर्म और अधर्म सारे विस्तार वाले तत्त्व रहते हैं। इन तत्त्वों के आधार पर ही आकाश की उपस्थिति का अनुमान किया जाता है। जैन दर्शन के अनुसार आकाश दो प्रकार के हैं-लोकाकाश और अलोकाकाश। लोकाकाश उस आकाश को कहा गया है जिस भाग में भौतिक लोक की स्थिति है और उससे ऊपर जो आकाश है उसको अलोकाकाश कहा गया है।
  • काल (Kala)-काल से भाव समय है। यह विस्तार वाला तत्त्व नहीं है। इसकी उपस्थिति का ज्ञान अनुमान के द्वारा प्राप्त होता है। काल को जगत् के परिवर्तन का मूल कारण माना गया है। भूत, वर्तमान, भविष्य से काल का संबंध है। काल को आदि और अंत वाला तत्त्व कहा जाता है।

3. पुण्य (Punya)-पुण्य वह कर्म है जो अच्छे अमलों से कमाये जाते हैं। पुण्य कमाने के अलग-अलग ढंग हैं। भूखे को खाना देना, प्यासे को पानी पिलाना, नंगे को कपड़ा देना, हाथों से सेवा करनी, मीठा बोलना आदि पुण्य के काम हैं, पुण्य को मानने के 42 साधन हैं। अच्छी सेहत, आर्थिक समृद्धि, प्रसिद्धि, अच्छा वैवाहिक जीवन, अच्छे रिश्तेदारों और दोस्तों का मिलना, अच्छी पढ़ाई और उच्च पदवियों पर नियुक्ति आदि अच्छे पुण्यों का ही नतीजा है। पुण्य को आत्मा का सहायक माना जाता है क्योंकि इससे खुशी प्राप्त होती है।

4. पाप (Papa)-पाप को जीव के बंधन का मुख्य कारण माना जाता है। जीवों को मारना, झूठ, चोरी, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, धोखा, नशा और दुश्मनी आदि सब पापों के भार में वृद्धि करते हैं। पापियों को घोर सजाएँ . मिलती हैं। आपने देखा होगा कि एक ही घर में पैदा हुए दो सगे भाइयों के जीवन में भारी अंतर होता है। एक ऊँची पदवी पर सुशोभित होता है और उसको प्रसिद्धि प्राप्त होती है। दूसरा दर-दर की ठोकरें खाता फिरता है, चोरियाँ करता है और बदनामी कमाता है। ऐसा क्यों होता है ? जैन दर्शन के अनुसार ऐसा व्यक्ति के पुण्य और पाप कमाने का कारण होता है। पापी मनुष्य कभी भी सुखी नहीं हो सकता और उसको अपने जीवन में घोर संकट का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा भी तड़पती रहती है। जैन सूत्रों के अनुसार पापों के 82 अलग-अलग परिणाम निकलते हैं।

5. आशरव (Asrava) ब्रह्मांड में अनगिनत सूक्ष्म अणु (कार्मिक पदार्थ) घूमते रहते हैं जिनको आत्मा अपने अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार अपनी ओर खींचती है। इस अंदर आने की कारवाई को आश्व कहते हैं। मनुष्य के कर्म आत्मा में उसी तरह शामिल होते हैं जैसे एक सुराख के रास्ते से नाव में पानी। कर्म जीव के बंधन का एक मुख्य कारण है। कर्म जड़ हैं। इसलिए आप जीव में प्रवेश नहीं करते, वे मन, वचन और शरीर की सहायता से जीव में प्रवेश करते हैं। कर्म दो प्रकार के हैं शुभ और अशुभ। यदि शुभ कर्म जीव में प्रवेश होंगे तो उसको सुख की प्राप्ति होगी और यदि कर्म अशुभ होंगे तो जीव को कष्ट होगा। इसलिए कर्मों का शुभ अथवा अशुभ होना व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।

6. बंध (Bandha)-जब कर्म पदार्थ का पर्दा जीव के शुद्ध स्वरूप पर पड़ जाता है तो वह दूषित हो जाता है। यह जीव के बंधन का कारण बनता है। जैन दर्शन के अनुसार इस दिशा की ओर ले जाने वाले पाँच कारण हैं।

  • मिथ्या दर्शन-इससे भाव गलत विश्वास है।
  • आवृत्ति-इससे भाव है प्रतिज्ञा की कमी।
  • प्रसाद-इससे भाव है लापरवाही।
  • काश्य-इससे भाव है काम वासना।
  • योग-इससे भाव है शरीर, मन और बोल की प्रक्रिया।
    बंध चार प्रकार के हैं—
  • प्रकृति-जीव से जुड़े कर्म पदार्थों का स्वरूप।
  • स्थिति-कर्म पदार्थ जीव से कितने समय के लिए जुड़े हैं।
  • अनुभाग-कर्म पदार्थ सख्त चरित्र के हैं या नर्म चरित्र के। (घ) प्रदेश जीव-जीव से जुड़े कर्म पदार्थों में अणुओं की संख्या।
    कर्मों के जाल में फंस कर जीव का व्यावहारिक रूप नष्ट हो जाता है और वह बंधन में फंस जाता है। इस कारण वह बार-बार जन्म लेता है और शरीर रूपी कैद भोगता है।

7. संवर (Sanvara)—योग क्रिया के द्वारा कर्म पदार्थ जीव की ओर खींचे आते हैं। मोक्ष प्राप्त करने के लिए इस क्रिया को रोकना अति ज़रूरी है। इसको संवर कहते हैं। इसको आश्व निरोध भी कहते हैं, जिससे भाव है कर्मों का हमारे अंदर प्रवेश करने से रुक जाना। कर्म को रोकने की 57 विधियाँ हैं। इनमें आत्म संयम, शुभ विचार, लोभ, मोह, अहंकार, क्रोध और पापों से परहेज़ आदि शामिल हैं। इस कारण जीव के इर्द-गिर्द एक ऐसी ऊँची दीवार बन जाती है जिसके अंदर कर्म पदार्थों का दाखिल होना असंभव है। जैसे एक तालाब में जिस नाली के द्वारा पानी जा रहा है उसको रोकना संभव है ठीक उसी प्रकार कर्म पदार्थों को संवर के द्वारा जीव में प्रवेश करने से रोकना संभव है।

8. निर्जर (Nirjara)-निर्जर से भाव कर्म पदार्थों को जीव से दूर हटाना है। यह जीव के द्वारा संचित कर्मों को नष्ट करने का एक मुख्य साधन है। संवर द्वारा जीव में कर्मों के बढ़ने और प्रवेश को रोका जाता है। परंतु पुराने कर्मों को जिन का जीव के भीतर आश्व हो गया है निर्जर के द्वारा नाश किया जा सकता है। निर्जर में तपस्या शामिल है। तपस्या अग्नि की तरह कर्म पदार्थों के इकट्ठे हुए ढेर को जला कर राख कर देती है। इसी प्रकार जब जीव पर से कर्म पदार्थों का पड़ा पर्दा हट जाता है तो उसका शुद्ध स्वरूप प्रकट हो जाता है। जैसे बिलौर के सामने काला कपड़ा रखने से वह काला नज़र आने लग जाता है। परंतु जब कपड़ा हटा लिया जाता है तो उसकी अपनी चमक दुबारा प्रकट हो जाती है।

9. मोक्ष (Moksha)-जैन दर्शन के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष अथवा निर्वाण को प्राप्त करना है। इसमें जीव कर्मों के सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है। कर्मों की समाप्ति से मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिए संवर और निर्जर आवश्यक है। कर्मों के बंधन को तोड़ने के लिए जैनी तीन सद्गुणों के पालन की सिफ़ारिश करते हैं, जिनको त्रि-रत्न कहा जाता है। ये हैं सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार। मोक्ष जीव की प्राप्ति की सर्वोच्च अवस्था है। जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर लेता है उसको सिद्ध कहते हैं । सिद्ध पुरुष जन्म, मृत्यु, सुख और दुःख से दूर है। वह ब्रह्मांड में चिरंजीवी शाँति प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 9.
जैन धर्म के पाँच महाव्रतों के महत्त्व का उल्लेख करें। (Describe the importance of Five Mahavartas in Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के पाँच महाव्रतों के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss the Five Mahavartas of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म में पाँच महाव्रतों का क्या महत्त्व है ? प्रकाश डालिए।
(What is the importance of Five Mahavartas in Jainism ? Elucidate.)
अथवा
जैन धर्म के पाँच अणुव्रतों के बारे में जानकारी दें।
(Describe the Five Anuvartas of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के पाँच अणुव्रतों का क्या महत्व है ? प्रकाश डालें।
(What is the importance of Five Anuvartas of Jainism ? Elucidate.) ।
उत्तर-
जैन धर्म में पाँच महाव्रतों को विशेष स्थान प्राप्त है। इन नियमों की पालना करनी प्रत्येक जैनी के लिए आवश्यक है। ये नियम बहुत कठोर हैं। ये नियम जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए बनाए गए थे। गृहस्थियों के लिए ये नियम इतने कठोर नहीं थे। इनके लिए बनाए गए नियमों को पाँच अणुव्रत (Five Anuvartas) कहा जाता है। इन पाँच महाव्रतों या अणुव्रतों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. अहिंसा (Ahimsa)-जैन धर्म में अहिंसा पर बहुत ज़ोर दिया गया है। अहिंसा की महत्ता बताते हुए आचारांग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना-अपना जीवन प्यारा है सब ही सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सारे ही जीने की इच्छा रखते हैं।” इसीलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है। हिंसा दो तरह की होती है-मन से हिंसा और कर्म से हिंसा। कर्म अथवा अमल में आने वाली हिंसा से पहले मन भाव विचारों में हिंसा आती है। गुस्सा, अहंकार, लालच और धोखा मन की हिंसा है। इसलिए हिंसा से बचने के लिए मन के विचारों को शुद्ध करना अति ज़रूरी है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्यों के अतिरिक्त पशुओं, पत्थरों और वृक्षों आदि में भी आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी कारण जैन लोग नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और अंधेरा हो जाने के बाद कुछ नहीं खाते ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाये। बी० एन० लूनीया के अनुसार,
“अहिंसा जैन धर्म की आधारशिला है।”5

2. सत्य (Satya)-जैन धर्म में सत्य बोलने पर बहुत बल दिया गया है। हमें हमेशा सत्य और मीठे वचन बोलने चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति दूसरे के मन को मोह लेता है। झूठ बोलने से आत्मा को दुःख होता है। झूठ बोलने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता। वास्तव में झूठ बोलने से कलह-क्लेश बढ़ता है और इसका अंत नहीं होता। विवश होकर अंत में व्यक्ति को सत्य मानना ही पड़ता है। झूठ के परिणाम हमेशा बुरे ही होते हैं। हमें किसी के डर के कारण, लालच के कारण अथवा हंसी-मज़ाक में भी झूठ नहीं बोलना चाहिए। इसलिए हमें हमेशा सोच-समझ कर बोलना चाहिए। गुस्सा आने पर शांत बने रहना चाहिए। जैन धर्म में इस बात पर भी बल दिया गया है कि हमें किसी पर भी झूठा आरोप नहीं लगाना चाहिए। हमें किसी के साथ भी धोखा नहीं करना चाहिए। हमें किसी को भी गलत परामर्श देकर उसे मार्ग से विचलित नहीं करना चाहिए। झूठ बोलकर किसी का रिश्ता तय नहीं करना चाहिए। पंचायत अथवा किसी भी और स्थान पर झूठी गवाही नहीं देनी चाहिए। झूठ ही हिंसा को जन्म देता है। सत्य अहिंसा का आधार है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

3. अस्तेय (Asteya)—जैन धर्म में अस्तेय को बहुत महत्त्व दिया गया है। अस्तेय का भाव है चोरी न करना। जैन धर्म में चोरी का अर्थ बहुत विशाल है। किसी की वस्तु चुरा लेनी एक सीधा अपराध है, लेकिन जैन धर्म में उसको चोरी ही माना गया है जो कोई भी व्यक्ति किसी द्वारा भूली हुई वस्तु का प्रयोग भी करता है। हमें किसी की वस्तु उसके मालिक की आज्ञा के बिना नहीं लेनी चाहिए। हमें किसी के घर में भी बिना आज्ञा के प्रवेश नहीं करना चाहिए। गुरु की स्वीकृति के बिना भिक्षा में प्राप्त अनाज को ग्रहण नहीं करना चाहिए। बिना स्वीकृति के हमें किसी के घर निवास नहीं करना चाहिए। यदि घर में रहने की स्वीकृति मिले तो उसकी आज्ञा के बिना उसकी वस्तु को इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जैन धर्म के अनुसार चोरी के दो प्रकार हैं। ये हैं-सूक्ष्म चोरी और स्थूल चोरी। सूक्ष्म चोरी उसको कहते हैं जिस में मनुष्य अपने परिवार के हित के लिए संयम स्वभाव से काम करता है। जैसे जंगल में लकड़ी और फल आदि प्राप्त करना। समाज और कानून की नज़रों में जिस चोरी को दंड योग्य माना जाता है उसको स्थूल चोरी कहा जाता है। मिलावट करनी, चोर की सहायता करनी, चोरी का माल खरीदना, कम मापदंड करना, लोगों से धोखे के सा. अधिक ब्याज प्राप्त करने को स्थूल चोरी कहा जाता है। एक बार चोरी करने वाला मनुष्य ग़रीब घर में जन्म लेता है बार-बार चोरी करने वाला मनुष्य अगले जन्म में गुलाम के रूप में जन्म लेगा।

4. अपरिग्रह (Aparigraha) जैन धर्म में अपरिग्रह महाव्रत को बहुत महत्ता दी गई है। अपरिग्रह से भाव है सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह न रखना। ये सामान्य देखने में आता है कि गृहस्थी लोग आवश्यक वस्तुओं को आवश्यकता से ज्यादा इकट्ठा करते हैं। जीवन की आवश्यक वस्तुओं को इकट्ठा करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन वस्तुओं का आवश्यकता से अधिक भंडार इकट्ठा करना वास्तव में अन्य लोगों के अधिकार को मारना है। जितनी अधिक वस्तुओं को इकट्ठा करने की आकांक्षा बढ़ेगी उतना ही मन अशांत रहेगा। ऐसा मनुष्य कभी भी मोक्ष प्राप्त – * कर सकता। आवश्यकता से ज्यादा संपत्ति इकट्ठा करना भी एक अनुचित कर्म है। जैन साधुओं को आवप्रगकता से अधिक भोजन करने, कपड़े पहनने और बिस्तर आदि रखने की मनाही है। इस महाव्रत की पालना करने वाला व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है।

5. ब्रह्मचर्या (Brahmacharya)—जैन धर्म में ब्रह्मचर्या महाव्रत को विशेष महत्त्व प्राप्त है। इससे भाव है काम वासना से दूर रहना। जैन साधुओं के लिए इस सम्बन्धी कठोर नियम बनाए गए हैं। उनके लिए ये आवश्यक कि वे किसी स्त्री की ओर न देखें, उनसे बातें न करें, किसी भी स्त्री के साथ भूतकाल में बिताए समय को याद न करें। ऐसे किसी घर में न जाए जहाँ कोई स्त्री अकेली रहती हो। शुद्ध और थोड़ा भोजन खाना चाहिए। इस तरह जैन साधवियों के लिए भी नियम निश्चित हैं। उनके लिए किसी पुरुष के साथ बातचीत करने और उनके बारे में सोचने की मनाही है। ग्रहस्थियों के लिए केवल अपनी स्त्री का साथ करना ही ब्रह्मचर्या है। जैन धर्म में काम को वास्तव में जीवन को समाप्त करने वाला रोग माना गया है।
उपरोक्त पाँच महाव्रतों की पालना करने वाला व्यक्ति संयमी बन जाता है और निर्वाण अथवा मोक्ष प्राप्त करता है। डॉ० के० सी० सोगानी के अनुसार,
“इन पाँच महाव्रतों की पालना व्यक्तिगत और सामाजिक उन्नति के लिए सहायक है।”6

5. “Ahimsa is the sheet anchor of Jainism.” B.B. Luniya, Life and Culture in Ancient India (Agra : 1982) p. 162.
6. “The observance of these five rows is capable of bringing about individual as well as social progress.”: Dr. K.C. Sogani, op. cit., p, 65.

प्रश्न 10.
प्रमुख जैन संप्रदायों के बारे में जानकारी दें।
(Write about the main sects in Jainism.)
उत्तर-
जैनी अनेक संप्रदायों में बंटे हुए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख संप्रदायों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार—

1. अजीविक (The Ajivika)-इस संप्रदाय का संस्थापक गोशाल था। वह स्वामी महावीर का शिष्य था और 6 वर्षों के पश्चात् उनसे अलग हो गया था। यह संप्रदाय अपने नियति (किस्मत) के विशेष सिद्धांत के लिए प्रसिद्ध है। इसके अनुसार हर वस्तु की किस्मत पहले से ही निश्चित है। इस को मनुष्य के यत्नों के द्वारा बदला नहीं जा सकता। गोशाल के द्वारा प्रचारित धर्म भारत में 13वीं शताब्दी तक प्रफुल्लित रहा और बाद में लोप हो गया।

2. दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय (The Digambara and Shvetambra Sects)-जैन धर्म के सब संप्रदायों में से दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के समय मगध में भयंकर अकाल पड़ा था। इसलिए भद्रबाहु जो जैनी भिक्षुकों का नेता था अपने साथ बहुत सारे भिक्षुओं को लेकर मैसूर (कर्नाटक) चला गया। जो भिक्षुक मगध में रह गये थे उन्होंने स्थूलभद्र को अपना मुखिया चुन लिया। इन भिक्षुकों ने पाटलिपुत्र में एक सभा का आयोजन किया और अपने साहित्य को एक नया रूप दिया। इस साहित्य को उन्होंने अंग का नाम दिया। इसके अतिरिक्त इन भिक्षुओं ने नंगे रहने की प्रथा को त्याग दिया और सफ़ेद कपड़े पहनने शुरू कर दिये। 12 वर्षों के पश्चात् जब भद्रबाहु अपने अन्य भिक्षुकों के साथ दुबारा मगध आया तो उसने स्थूलभद्र द्वारा किए गए परिवर्तनों को स्वीकार न किया। परिणामस्वरूप जैनी दो संप्रदायों दिगंबर और श्वेतांबर में बाँटे गए। दिगंबर से भाव था नग्न रहने वाले और श्वेतांबर से भाव था सफ़ेद वस्त्र पहनने वाले। इन दोनों में प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं—

  • दिगंबर संप्रदाय वाले नंगे रहते थे जबकि श्वेतांबर जाति वाले सफ़ेद वस्त्र पहनते थे।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्त्रियाँ तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं लेती। श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस सिद्धांत को गलत मानते हैं। उनका कहना है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  • दिगंबर संप्रदाय वाले स्त्रियों को जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा नहीं देते। दूसरी ओर श्वेतांबर संप्रदाय वाले स्त्रियों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाते। उनका कहना था कि 19वीं तीर्थंकर मल्ली एक स्त्री थी। दिगंबर संप्रदाय वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह नहीं करवाया था। श्वेतांबर संप्रदाय वाले यह मानते हैं कि स्वामी महावीर ने विवाह करवाया था। उनकी एक पुत्री थी, जिसका नाम प्रियादर्शना था।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों का यह मत है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले साधुओं को भोजन की ज़रूरत नहीं रहती जबकि श्वेतांबर मत वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  • दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय वालों का धार्मिक साहित्य अलग-अलग है।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों की मूर्तियाँ नंगेज होती हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वालों की मूर्तियों को कपड़े पहनाये जाते हैं और उनको गहनों से सजाया जाता है।

3. लोक संप्रदाय (Lonka Sect)-इस संप्रदाय का मुखिया लोंक सा था। वह अहमदाबाद का रहने वाला था। 1474 ई० में एक जैनी साधु ज्ञान जी ने कुछ धार्मिक जैनी ग्रंथों का उतारा करने के लिए लोक सा को कहा। इन ग्रंथों को पढ़ते समय लोंक सा ने देखा कि मूर्ति पूजा का वर्णन कहीं भी नहीं आया जबकि जैनी कई सदियों से मूर्ति पूजा करते आ रहे थे। इसलिए उसने जैन धर्म में प्रचलित मूर्ति पूजा का खंडन किया। इससे जैनियों में एक बड़ा विवाद शुरू हो गया ? भानाजी लोंक सा के मत से सहमत हुआ और इस तरह वह लोंक सा संप्रदाय का पहला आचार्य बना।

4. स्थानकवासी (Sthanakvasi)-इस संप्रदाय का संस्थापक वीराजी था। वह सूरत का रहने वाला था। इस नए संप्रदाय का नाम स्थानकवासी इसलिए पड़ा क्योंकि इस संप्रदाय के साधु मंदिरों की जगह मठों में रहते थे। वे बहुत ही सादा जीवन व्यतीत करते थे। वे मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्राओं में विश्वास नहीं रखते थे।

5. तेरा पंथ (Terapanth)-इंस संप्रदाय के संस्थापक मारवाड़ के भीखनजी थे। इसकी स्थापना 1706 ई० में की गई थी। इस संप्रदाय के तेरह धार्मिक नियम थे जिस कारण इस संप्रदाय का नाम तेरा पंथ पड़ा। यह संप्रदाय भी मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता। यह तप और अनुशासन पर बहुत ज़ोर देता है।

6. तारना पंथ (Taranapanina)-इस पंथ की स्थापना स्वामी तारना ने ग्वालियर में की थी। इस पंथ को मानने वाले मूर्ति पूजा, धर्म के बाहरी दिखावे और जाति भेदों के विरुद्ध हैं। उनके अपने अलग मंदिर हैं जिनमें मूर्तियाँ ही नहीं बल्कि पवित्र धार्मिक ग्रंथों की पूजा भी की जाती है।

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प्रश्न 11.
जैन मत के प्रमुख संप्रदाय कौन से हैं ? उनके मध्य समानताएँ तथा भिन्नताएँ स्पष्ट करें।
(What are the main sects in Jainism ? Explain their similarities and differences.)
अथवा
जैन धर्म के फिरके दिगंबर और श्वेतांबर के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the sects Digambara and Shvetambra of Jainism.)
उत्तर-
दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय (The Digambara and Shvetambra Sects)-जैन धर्म के सब संप्रदायों में से दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के समय मगध में भयंकर अकाल पड़ा था। इसलिए भद्रबाहु जो जैनी भिक्षुकों का नेता था अपने साथ बहुत सारे भिक्षुओं को लेकर मैसूर (कर्नाटक) चला गया। जो भिक्षुक मगध में रह गये थे उन्होंने स्थूलभद्र को अपना मुखिया चुन लिया। इन भिक्षुकों ने पाटलिपुत्र में एक सभा का आयोजन किया और अपने साहित्य को एक नया रूप दिया। इस साहित्य को उन्होंने अंग का नाम दिया। इसके अतिरिक्त इन भिक्षुओं ने नंगे रहने की प्रथा को त्याग दिया और सफ़ेद कपड़े पहनने शुरू कर दिये। 12 वर्षों के पश्चात् जब भद्रबाहु अपने अन्य भिक्षुकों के साथ दुबारा मगध आया तो उसने स्थूलभद्र द्वारा किए गए परिवर्तनों को स्वीकार न किया। परिणामस्वरूप जैनी दो संप्रदायों दिगंबर और श्वेतांबर में बाँटे गए। दिगंबर से भाव था नग्न रहने वाले और श्वेतांबर से भाव था सफ़ेद वस्त्र पहनने वाले। इन दोनों में प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं—

  1. दिगंबर संप्रदाय वाले नंगे रहते थे जबकि श्वेतांबर जाति वाले सफ़ेद वस्त्र पहनते थे।
  2. दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्त्रियाँ तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं लेती। श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस सिद्धांत को गलत मानते हैं। उनका कहना है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  3. दिगंबर संप्रदाय वाले स्त्रियों को जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा नहीं देते। दूसरी ओर श्वेतांबर संप्रदाय वाले स्त्रियों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाते। उनका कहना था कि 19वीं तीर्थंकर मल्ली एक स्त्री थी। दिगंबर संप्रदाय वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  4. दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह नहीं करवाया था। श्वेतांबर संप्रदाय वाले यह मानते हैं कि स्वामी महावीर ने विवाह करवाया था। उनकी एक पुत्री थी, जिसका नाम प्रियादर्शना था।
  5. दिगंबर संप्रदाय वालों का यह मत है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले साधुओं को भोजन की ज़रूरत नहीं रहती जबकि श्वेतांबर मत वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  6. दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय वालों का धार्मिक साहित्य अलग-अलग है।
  7. दिगंबर संप्रदाय वालों की मूर्तियाँ नंगेज होती हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वालों की मूर्तियों को कपड़े पहनाये जाते हैं और उनको गहनों से सजाया जाता है।

प्रश्न 12.
जैन संघ की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो। (Explain the salient features of Jain Sangha.)
अथवा
जैन धर्म के संघ-अनुशासन के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss the Sangha discipline of Jainism.)
उत्तर-
जैन संघ की स्थापना स्वामी महावीर जी ने पावा नगर में की थी। इसने जैन धर्म के प्रसार में प्रशंसनीय योगदान दिया।

1. सदस्य (Member)-जैन संघ में चार प्रकार के लोग शामिल होते हैं जिनको भिक्षु और भिक्षुणियाँ तथा श्रावक और श्राविका कहा जाता था। भिक्षु और भिक्षुणियाँ वे थे जिन्होंने संसार का त्याग कर दिया था। श्रावक और श्राविका वे थे जो गृहस्थी का जीवन व्यतीत करते थे।

2. दीक्षा (Initiation)—जो व्यक्ति संघ में शामिल होना चाहता था उसको अपने माता-पिता और संरक्षक से आज्ञा लेनी पड़ती थी। इसके बाद वह अपना मुंडन करके, स्नान करके, सफ़ेद कपड़े पहन के भिक्षा का बर्तन लेकर किसी प्रमुख जैन आचार्य के पास जा कर दीक्षा लेता था। इस संस्कार को निष्कर्म संस्कार कहते थे। स्त्रियाँ भी जैन संघ में शामिल हो सकती थीं। जैन संघ के दरवाज़े सभी जातियों के लिए खुले थे। केवल अधर्मी व्यक्तियों को संघ में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं थी।

3. अनुशासित जीवन (Disciplined Life)-दीक्षा प्राप्त करने के बाद भिक्षु-भिक्षुणियों को बहुत अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। उनको पाँच महाव्रतों, अहिंसा, सुनित, अस्तेय, अपरिगृह और ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था। उनको मन, वचन और शरीर से किसी को भी हिंसा पहुँचाने की मनाही थी। उनको झूठ बोलने, चोरी करने, अपने पास संपत्ति रखने, सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग करने, जूते, छाता, पलंग और कुर्सी आदि का प्रयोग करने, बिना आज्ञा किसी के घर जाने, गृहस्थी के बर्तनों में भोजन करने, अधिक खाने, रात हो जाने के बाद भोजन करने, किसी की निंदा करने, किसी स्त्री के साथ बातचीत करने, जिस घर में स्त्री हो वहाँ ठहरने आदि की सख्त मनाही थी। गृहस्थी व्यक्तियों को भी यद्यपि इन नियमों का पालन करने के लिए कहा गया है, परंतु उन पर इतनी सख्ती लागू नहीं की गई थी।

4. प्रतिदिन जीवन (Daily Life)-प्रत्येक भिक्षु अथवा भिक्षुणी अपने रोज़ाना जीवन को 8 भागों में बाँटता था। इनमें 4 भाग धार्मिक ग्रंथों की पढ़ाई के लिए, 2 तप के लिए, 1 खाने के लिए और 1 आराम करने के लिए निश्चित होता था। वे अपना भोजन प्रतिदिन माँग कर खाते थे। उनको एक से अधिक घर से भिक्षा लेने की मनाही थी। जैन संघ के सारे सदस्य वर्षा के चार महीनों में एक स्थान पर रह कर जैन धर्म का प्रचार करते थे। बाकी के आठ महीने वे अलग-अलग स्थानों पर जा कर जैन धर्म के प्रचार में व्यतीत करते थे।

5. जैन संघ का मुखिया (Chief of the Jain Sangha)-जैन संघ का मुखिया आचार्य कहलाता था। वह संघ के सारे भिक्षुओं पर नियंत्रण रखता था। केवल उसी को ही दीक्षा देने, संघ का सदस्य बनाने अथवा किसी को सज़ा देने का अधिकार था। इस पदवी के लिए बहुत ही सुलझे हुए और उच्च चरित्र के व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था। स्त्रियों के अपने अलग संघ होते थे। इसके प्रमुख को प्रवर्तिनी कहा जाता था। उसका प्रमुख कार्य जैन संघ में अनुशासन स्थापित रखना था।

6. जैन संघ की भूमिका (Role of Jain Sangha)-जैन संघ ने भारत में जैन धर्म को लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैन संघ में सम्मिलित होने वाले भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों ने जैन धर्म के प्रसार के लिए कोई प्रयास शेष नहीं छोड़ा। प्रसिद्ध लेखक एस० सी० रैचौधरी के अनुसार,

“वास्तव में जैन संघ के प्रयासों के कारण जैन धर्म ने भारत की भूमि में अपनी गहरी जड़ें बना लीं तथा यह आज भी कायम हैं।”7

7. “In fact, it is mainly due to their efforts that Jainism took root into Indian soil and still survives,” S.C. Raychoudhary, History of Ancient India (Delhi : 2006) p. 107.

प्रश्न 13.
जैन धर्म ग्रंथों की भाषा क्या है ? जैन धर्म ग्रंथों के बारे में प्रारंभिक जानकारी दें।
(What is the language of Jain scriptures ? Give preliminary information about Jain scriptures.)
अथवा
जैन धर्म ग्रंथों के बारे में प्रारंभिक जानकारी दें।
(Give preliminary information about the major Jain scriptures.)
अथवा
जैन मत के प्रमुख धार्मिक ग्रंथों की जानकारी दो। (Give information about the prominent scriptures of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के प्रमुख ग्रंथों के बारे में आप क्या जानते हो ?
(What do you know about the prominent scriptures of Jainism ?)
अथवा
प्रमुख जैन धार्मिक ग्रंथों पर प्रकाश डालें।
(Throw light on the prominent Jain scriptures.)
उत्तर-
जैनियों ने अनेक धार्मिक ग्रंथों की रचना की। इनमें से जो ग्रंथ हमें आज उपलब्ध हैं उनकी संख्या 45 है। ये सारे ग्रंथ जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के साथ संबंधित हैं। ये ग्रंथ प्राकृत अथवा अर्ध मगधी जो उस समय लोगों की बोलचाल की आम भाषा थी में लिखे गए हैं। इन ग्रंथों को गुजरात में वल्लभी के स्थान पर 5वीं शताब्दी में लिखित रूप दिया गया। इनको एक प्रसिद्ध जैनी साधु देवरिद्धी ने संपूर्ण किया। इन ग्रंथों को 6 वर्गों में बाँटा गया है। इनके नाम हैं—
(1) 12 अंम
(2) 12 उपांग
(3) 10 प्राकिरण
(4) 6 छेदसूत्र
(5) 4 मूलसूत्र
(6) 2 विविध पुस्तकें।
इनका संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. 12 अंग (The Twelve Angas)-जैनियों के धार्मिक ग्रंथों में 12 अंगों को सब से अधिक पवित्र समझा जाता है। इन अंगों के नाम और उनका संक्षेप वर्णन इस प्रकार है

  • आचारांग सूत्र-इसमें जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियमों का वर्णन किया गया है। इसमें महावीर के जीवन का भी वर्णन मिलता है।
  • सूत्रक्रितांग- इसमें कर्म और अहिंसा के सिद्धांतों के बारे में और नरक के दु:खों के बारे में वर्णन मिलता है। इनके अतिरिक्त इसमें विरोधी धर्मों के सिद्धांतों का खंडन इस उद्देश्य से किया गया है ताकि जैनियों का अपने धर्म में पक्का विश्वास रहे।
  • स्थानांग-इसमें जैन धर्म के अलग-अलग विषयों के बारे जानकारी दी गई है।
  • समवायांग-इसमें जैन सिद्धांतों का संख्यात्मक ढंग से वर्णन किया गया है।
  • भगवती सूत्र-इसको जैन धार्मिक साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ समझा जाता है। इसमें जैन सिद्धांतों का प्रश्न-उत्तर रूप में वर्णन किया गया है। ये प्रश्न स्वामी महावीर के प्रमुख शिष्य गौतम इंद्रभूति द्वारा पूछे गये थे और इनका उत्तर स्वामी महावीर ने स्वयं दिया था।
  • ज्ञात धर्म कथा-इसमें जैन धर्म से संबंधित प्रसिद्ध कथाओं का वर्णन मिलता है। इन कथाओं को उदाहरणों सहित समझाया गया है।
  • उपासकदशा-इसमें स्वामी महावीर के समय के 10 उन अमीर व्यक्तियों की कहानियाँ दी गई हैं जो महावीर के शिष्य बन गए थे और जिन्होंने कठोर तपस्या के बाद मोक्ष प्राप्त किया।
  • अंतक्रिदशा-इसमें उन जैन मुनियों के जीवन का वर्णन मिलता है जिन्होंने कठोर तप के बाद मोक्ष प्राप्त किया।
  • अनउत्तरोपपातिक-इसमें भी कुछ जैन मुनियों के जीवन का वर्णन मिलता है।
  • प्रश्न व्याकरण- इसमें पाँच महाव्रतों और पाँच अणुव्रतों का वर्णन किया गया है।
  • विपाकसूत्र-इसमें अच्छे या बुरे कर्मों से मिलने वाले फलों का वर्णन किया गया है।
  • दृष्टिवाद-यह अंग अब लोप हो चुका है। अन्य ग्रंथों में से इस अंग से संबंधित मिलते विवरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि इसमें विभिन्न सिद्धांतों का संक्षेप वर्णन किया गया था।

2. 12 उपांग (The Twelve Upangas)-प्रत्येक अंग का एक-एक उपांग है। इनमें मिथिहासिक कथाओं का अधिक वर्णन मिलता है। इनसे ज्योतिष, भूगोल और ब्रह्मांड आदि के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। कहीं-कहीं ऐतिहासिक घटनाओं का भी जिक्र आता है। 12 उपांगों में राज्य प्रश्नीय नामक उपांग सब से अधिक प्रसिद्ध है। इसमें जैन मुनी केश और पायोस नामक राजा के मध्य हुई वार्तालाप का विवरण लिखा हुआ है।

3. 10 प्राकिरण (The Ten Prakirans)-इनमें जैन धर्म से संबंधित विभिन्न विषयों को पद्य रूप में लिखा गया है। इनसे स्वामी महावीर के जीवन और उसके उपदेशों संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

4. 6 छेदसूत्र (The Six Chhedasutras)-इनमें जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के आचार से संबंधित नियमों का वर्णन किया गया है। छेदसूत्रों में कल्पसूत्र को सबसे प्रसिद्ध माना जाता है। इसकी रचना भद्रबाह ने की थी। इसमें स्वामी महावीर की जीवन कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।

5. 4 मूलसूत्र (The Four Mulasutras)-4 मूलसूत्रों को जैनी साहित्य में बहुमूल्य समझा जाता है। इनमें जैन धर्म से संबंधित कथाओं और उनसे मिलने वाली शिक्षा, जैन संघ के नियमों और कुछ जैन मुनियों के जीवन तथा उनके उपदेशों के बारे जानकारी प्राप्त होती है। ये सारे मूलरूप में लिखे गये हैं। मूलसूत्रों में उत्तर अध्ययन नामक सूत्र को सबसे महत्त्वपूर्ण समझा जाता है।

6. 2 विविध पुस्तकें (Two Miscellaneous Texts)—इनमें नंदीसूत्र और अनुयोगद्वार नामक पुस्तकें शामिल हैं। ये एक प्रकार से विश्वकोष हैं। इनमें जैन धर्म की विभिन्न शाखाओं, धार्मिक सिद्धांतों, अर्थशास्त्र और काम शास्त्र के विषयों के संबंध में जानकारी दी गई है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 14.
जैन धर्म का भारतीय सभ्यता को क्या योगदान है ? (What is the Legacy of Jainism to Indian Civilization ?)
उत्तर-
इसमें कोई शक नहीं कि जैन धर्म बौद्ध धर्म की तरह उन्नत हो सका परंतु फिर भी इसने भारत में सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी गहरी छाप छोड़ी।।

1. सामाजिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Social Field) सामाजिक क्षेत्र में जैनियों ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। छठी शताब्दी में हिंदू धर्म में जाति प्रथा बड़ी कठोर हो गई थी। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से सख्त नफ़रत करते थे। शूद्र जाति के लोगों के साथ जानवरों से भी बुरा व्यवहार किया जाता था। महावीर ने जाति प्रथा का ज़ोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने अपने धर्म में प्रत्येक धर्म से संबंधित लोगों को शामिल किया। उन्होंने लोगों में आपसी भाईचारे और बराबरी का प्रचार किया। परिणामस्वरूप वह लोगों में फैली आपसी घृणा को काफी सीमा तक दूर करने में सफल हुए। इस प्रकार जैनियों ने भारतीय समाज को एक नया रूप दिया।

2. धार्मिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Religious Field)-धार्मिक क्षेत्र में भी जैनियों का योगदान बहुत प्रशंसनीय था। जैन धर्म ने लोगों को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। जैन धर्म में फ़िजूल के रीति-रिवाजों, यज्ञों और बलियों आदि के लिए कोई स्थान नहीं था। जैन धर्म के यत्नों के कारण धार्मिक क्षेत्र में फैले बहुत सारे अंध-विश्वासों का अंत हो गया। जैन धर्म की बढ़ती हुई प्रसिद्धि को देखकर हिंदू धर्म के नेताओं ने अपने धर्म को सुरजीत करने के उद्देश्य से अपने धर्म में आवश्यक सुधार किए।

3. सांस्कृतिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Cultural Field)—सांस्कृतिक क्षेत्र में भी जैन धर्म का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण था। जैन धर्म के सिद्धांतों ने अपने ग्रंथ प्राकृत, गुजराती, हिंदी, मराठी, कन्नड़ और तामिल भाषाओं में लिखे। परिणामस्वरूप इन क्षेत्रीय भाषाओं को बहुत उत्साह मिला। इन ग्रंथों में यद्यपि धर्म से संबंधित बातें लिखी गई हैं पर फिर भी इनसे हमें उस समय की भारत की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इस कारण इन जैनी ग्रंथों को भारतीय इतिहास का एक अमूल्य स्रोत माना जाता है। जैनियों ने कई प्रभावशाली और प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया। इन मंदिरों में कई बहुत मनमोहक मूर्तियाँ रखी जाती थीं। राजस्थान में माऊँट आबू और कर्नाटक में श्रावण बेलगोला में बने जैनियों के मंदिर अपनी भूवन निर्माण कला के कारण न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त जैनियों ने भारत में कई प्रसिद्ध स्तूपों का निर्माण भी करवाया।

4. लोक कल्याण के क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Field of Public Welfare)-स्वामी महावीर ने अपने शिष्यों को समाज सेवा का उपदेश दिया था। इसी कारण जैनमत वालों ने लोगों की सहायता के लिए बहुत सी धर्मशालाएँ बनाईं। शिक्षा के प्रचार के लिए शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की, मनुष्यों और पशुओं के इलाज के लिए कई अस्पताल खुलवाए और कई अन्य लोक कल्याण के कार्य भी किए। जैनियों द्वारा स्थापित की गई कई शिक्षा संस्थाएँ आज भी प्रसिद्ध हैं। उनके द्वारा खोले गए अस्पतालों में आज भी ग़रीब रोगियों का मुफ्त इलाज होता है और जानवरों की देखभाल की जाती है।

5. राजनीतिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Political Field) जैन मत में अहिंसा के सिद्धांत पर बहुत ज़ोर दिया जाता था। इसने लोगों को शांतमयी जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। परिणामस्वरूप कई राजाओं ने लड़ाई में हिस्सा लेना बंद कर दिया ताकि निर्दोष लोगों का खून न बहाया जाये। वे शांतिप्रिय बन गए। इसी कारण भारत में काफी समय तक शाँति और खुशहाली का वातावरण रहा परंतु दूसरी ओर इसका भारतीय राजनीति पर कुछ बुरा प्रभाव भी पड़ा। युद्धों में भाग न लेने के कारण भारतीय सेना कमजोर हो गई। परिणामस्वरूप वह बाद में होने वाले विदेशी आक्रमणों का डट कर मुकाबला न कर सकी। इसी कारण भारतीयों को सैंकड़ों वर्षों तक गुलामी का जीवन व्यतीत करना पड़ा।

समूचे रूप में हम यह कह सकते हैं कि जैनियों ने भारतीय समाज को कई क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान दिया। अंत में हम डॉक्टर वी० ए० मंगवी के इन शब्दों से सहमत हैं,
“वास्तव में भारत में जैनियों की सबसे प्रमुख विशेषता भारतीय संस्कृति को दिया गया उनका बहुमूल्य योगदान का रिकार्ड है। उनकी सीमित एवं थोड़ी जनसंख्या को देखते हुए जैनियों ने जो योगदान भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को दिया वह वास्तव में महान् है।”8

8. “In fact, the most outstanding characteristic of Jainism in India is their very impressive record of contributions to Indian culture in comparison with the limited and small population of Jains, the achievements of Jains in enriching the various aspects of Indian culture are re great.” Dr. V.A. Sangve, Aspects of Jaina Religion (New Delhi: 1990) p. 98.

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तीर्थंकर से क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by Tirthankara ?)
उत्तर-
जैन आचार्यों को तीर्थंकर कहा जाता है। तीर्थंकर से अभिप्राय है संसार के भवसागर से पार करने वाला गुरु। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। पहले तीर्थंकर का नाम ऋषभनाथ था। 23वां तीर्थंकर पार्श्वनाथ था। वह स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले हुए। 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर थे। उनको जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उनके समय में जैन धर्म ने अद्वितीय विकास किया।

प्रश्न 2.
पार्श्वनाथ। (Parshvanatha.)
उत्तर-
पार्श्वनाथ जैन धर्म का 23वां तीर्थंकर था। उसकी मुख्य शिक्षाएँ यह थीं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊँट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया।

प्रश्न 3.
स्वामी महावीर। (Lord Mahavira.)
उत्तर-
स्वामी महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ। आपके पिता जी का नाम सिद्धार्थ तथा माता जी का नाम त्रिशला था। महावीर के बचपन का नाम वर्द्धमान था। महावीर की शादी एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से हुई। महावीर ने 30 वर्षों की आयु में गृह त्याग दिया था। उन्होंने 12 वर्ष तक घोर तपस्या के पश्चात् ज्ञान प्राप्त किया। आपने 30 वर्षों तक अपने ज्ञान का प्रसार किया। राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथला, विदेह तथा अंग उनके प्रसिद्ध प्रचार केंद्र थे। 527 ई० पू० उन्होंने पावा में निर्वाण प्राप्त किया।

प्रश्न 4.
भगवान महावीर की शिक्षाओं के बारे में चर्चा कीजिए। (Discuss about the teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
स्वामी महावीर की शिक्षाएँ। (Teachings of Lord Mahavira.)
उत्तर-
स्वामी महावीर ने अपने अनुयायियों को तीन रत्नों पर चलने के लिए कहा। उन्होंने कठोर तप, अहिंसा तथा उच्च आचरण पर जोर दिया। वह समानता, आवागमन तथा कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे। वह ईश्वर, यज्ञों, बलियों, वेद तथा संस्कृत में विश्वास नहीं रखते थे। उनके अनुसार प्रत्येक जैनी को अपने जीवन में पाँच महाव्रतों की पालना करनी चाहिए। उनके अनुसार मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है।

प्रश्न 5.
त्रि-रत्न। (Tri-Ratna.)
अथवा
त्रि-रत्न क्या हैं ? (What is Tri-Ratna ?)
उत्तर-
स्वामी महावीर जी ने अपने अनुयायियों को तीन रत्नों पर चलने के लिए कहा। ये त्रि-रत्न थे-सच्ची श्रद्धा, सच्चा ज्ञान तथा शुद्ध आचरण। पहले रत्न के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 24 तीर्थंकरों में अटल विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्नानुसार जैनियों को सच्चा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिए तथा इनको व्यर्थ के रीति-रिवाज़ों में विश्वास नहीं रखना चाहिए। तीसरे रत्नानुसार प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे आचार के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। इनमें से किसी एक ही अनुपस्थिति मनुष्य को उसकी मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकती।

प्रश्न 6.
अहिंसा। (Ahimsa.)
उत्तर-
जैन धर्म में अहिंसा की नीति को जितना महत्त्व दिया गया है, उतना विश्व के किसी अन्य धर्म में नहीं दिया गया। अगर अहिंसा को जैन धर्म की आधारशिला कहा जाए तो इसमें कोई संदेह नहीं होगा। अहिंसा से अभिप्राय है कि किसी भी जैव वस्तु को कष्ट न देना। जैन दर्शन के अनुसार मनुष्यों और पशुओं के अतिरिक्त वृक्षों तथा पत्थरों में भी आत्मा का निवास होता है। इस कारण हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी उद्देश्य से जैनी नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और सूर्य छिपने के पश्चात् भोजन नहीं करते।

प्रश्न 7.
स्वामी महावीर की शिक्षा के अनुसार एक जैन भिक्षु को कैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता था ? (According to the teachings of Lord Mahavira how a Jaina monk led his life ?)
उत्तर-

  1. स्वामी महावीर की शिक्षा के अनुसार जैन भिक्षुओं को बहुत स्वच्छ जीवन व्यतीत करना पड़ता था।
  2. प्रत्येक भिक्षु को पाँच प्रतिज्ञाओं की पालना करनी पड़ती थी।
  3. प्रत्येक भिक्षु को सदैव सत्य बोलना चाहिए। उनको अहिंसा की नीति की पालना करनी पड़ती थी।
  4. प्रत्येक भिक्षु के लिए आवश्यक था कि उनकी वेशभूषा और खाना-पीना बिल्कुल सादा हो।

प्रश्न 8.
स्वामी महावीर जी की शिक्षाओं का साधारण मनुष्य के जीवन के लिए क्या महत्त्व था ?
(What was the importance of the teachings of Lord Mahavira in the life of a common man ?)
उत्तर-
स्वामी महावीर जी की शिक्षाएँ साधारण मनुष्य के लिए महत्त्वपूर्ण थीं। भगवान् महावीर ने अपने धर्म में बिना किसी भेद-भाव के प्रत्येक वर्ग के लोगों को शामिल किया। इससे समाज में प्रचलित परस्पर घृणा बहुत सीमा तक दूर हुई और लोगों में परस्पर बंधुत्व एवं प्रेम-भाव बढ़ गया। स्वामी महावीर जी ने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। साधारण लोग भी इन परंपराओं के विरुद्ध थे। इसलिए उनके हृदयों पर स्वामी महावीर जी की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव पड़ा। स्वामी महावीर जी ने लोगों को समाज सेवा का उपदेश दिया।

प्रश्न 9.
स्वामी महावीर ने कौन-सी धार्मिक तथा सामाजिक बुराइयों का खंडन किया ? (Which religious and social evils were condemned by Lord Mahavira ?)
उत्तर-
स्वामी महावीर ने यज्ञों, बलियों, पुरोहितवाद तथा धर्म के बाहरी दिखावों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। वह मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे। उनको वेदों तथा संस्कृत भाषा की पवित्रता में विश्वास नहीं था। वह जाति प्रथा तथा समाज में प्रचलित अन्य रूढ़िवादी विचारों के घोर विरोधी थे। उन्होंने इन रीतियों को एक ढोंग बताया तथा कहा कि कोई भी व्यक्ति इनका पालन करने से निर्वाण को प्राप्त नहीं कर सकता।

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प्रश्न 10.
दिगंबर। (Digambaras.)
उत्तर-
दिगंबर जैनियों का एक प्रमुख संप्रदाय है। दिगंबर से अभिप्राय है नग्न रहने वाले। इस संप्रदाय के भिक्षु नग्न रहते हैं। इस संप्रदाय को मानने वालों का कहना है कि स्त्रियाँ तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं, लेतीं। उन्हें जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा नहीं दी जा सकती। इस संप्रदाय का कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह नहीं करवाया था। इनका अपना अलग साहित्य है।

प्रश्न 11.
श्वेतांबर। (Svetambaras.)
उत्तर-
श्वेतांबर जैन धर्म का एक प्रमुख संप्रदाय है। श्वेतांबर से अभिप्राय है सफेद वस्त्र धारण करने वाले। इस कारण इस संप्रदाय के लोग सफेद वस्त्र पहनते हैं। इस संप्रदाय के लोगों का कहना है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में ही मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं। वे स्त्रियों को जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा देते थे। उनका कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह करवाया था। इस संप्रदाय का अपना अलग साहित्य है।

प्रश्न 12.
जैन धर्म भारत में लोकप्रिय क्यों नहीं हो सका ? (Why could not Jainism become popular in India ?)
उत्तर-
जैन धर्म की शिक्षाएँ यद्यपि सरल थीं, परंतु कई कारणों से यह धर्म लोगों में लोकप्रिय न हो सका। पहला, जैन धर्म वालों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया। दूसरा, जैन धर्म को बौद्ध धर्म की भाँति राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हो सका। तीसरा, जैन धर्म वाले कठोर तप, शरीर को अत्यधिक कष्ट देने में विश्वास रखते थे। इसके अतिरिक्त उनका अहिंसा में आवश्यकता से अधिक विश्वास था। जन सामान्य के लिए इन नियमों का पालन करना बहुत कठिन था। चौथा, बौद्ध धर्म के सिद्धांत सरल थे। परिणामस्वरूप लोगों ने जैन धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म को अपनाना आरंभ कर दिया।

प्रश्न 13.
जैन संघ के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Jain Sangha ?)
उत्तर-
जैन संघ की स्थापन स्वामी महावीर जी ने की थी। इसमें शामिल होने वाले प्रत्येक भिक्षु तथा भिक्षुणियों को अपने माता-पिता और संरक्षक से आज्ञा लेनी पड़ती थी। उनको बहुत अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। जैन संघ के सारे सदस्य वर्षा के चार महीनों को छोड़कर बाकी समय अलग-अलग स्थानों पर जाकर धर्म प्रचार करने में व्यतीत करते थे। जैन संघ का मुखिया आचार्य कहलाता था। स्त्रियों के अपने अलग संघ होते थे।

प्रश्न 14.
जैन मत की देन। (Legacy of Jainism.)
अथवा
जैन मत का प्रभाव। (Effects of Jainism.)
उत्तर-
जैन मत ने भारतीय सभ्यता को कई क्षेत्रों में बहुमूल्य देन दी। उन्होंने परस्पर भ्रातृत्व तथा समानता का प्रचार किया। जैन मत ने लोगों को सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। जैन धर्म के विद्वानों ने अनेक भाषाओं में अपने ग्रंथ लिखे। इस कारण क्षेत्रीय भाषाओं को उत्साह मिला। जैनियों ने अनेक प्रभावशाली तथा प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया। इस कारण भारतीय भवन निर्माण कला को एक नया उत्साह मिला। जैन धर्म ने शांति का संदेश दिया।

प्रश्न 15.
स्वामी पार्श्वनाथ पर एक संक्षिप्त नोट लिखो। (Write a short note on Lord Parshvanatha.)
उत्तर-
स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले बनारस के राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता जी का नाम वामादेवी था। उनका बचपन बहुत ही ऐश-ओ-आराम में बीता। 30 वर्षों की आयु में पार्श्वनाथ ने अपने सारे सुखों का त्याग कर दिया और सच्चे ज्ञान की खोज में निकल गये। उनको 83 दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के बाकी 70 वर्ष अपने उपदेशों का प्रचार करने में व्यतीत किये। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊँट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। पार्श्वनाथ की शिक्षा को चार्तुयाम अथवा चार प्रण कहते हैं। यह चार प्रण ये हैं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)।

प्रश्न 16.
स्वामी महावीर पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर के महत्त्व को दर्शाइए।
(Describe the importance of 24th Tirthankar of Jainism.)
उत्तर-
स्वामी महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। उन्हें जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उनका जन्म 599 ई० पू० वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ। उनके पिता जी का नाम सिद्धार्थ तथा माता जी का नाम त्रिशला था। महावीर का बचपन का नाम वर्द्धमान था। वे शुरू से ही बहुत विचारशील थे। वे सांसारिक कार्यों में बहुत कम रुचि लेते थे। महावीर की शादी एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से की गई। उनके घर एक पुत्री ने जन्म लिया जिसका नाम प्रियदर्शना अथवा अनोजा रखा गया। महावीर ने 30 वर्षों की आयु में गृह त्याग दिया था। उन्होंने 12 वर्ष तक घोर तपस्या के पश्चात् ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने लोगों में फैले अंधकार को दूर करने के लिए अपने ज्ञान का प्रसार किया। राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथला, विदेह तथा अंग उनके प्रसिद्ध प्रचार केंद्र थे। महावीर ने त्रि-रत्न अहिंसा, कठिन तप, शुद्ध आचरण आदि पर बल दिया। वह यज्ञों, बलियों, वेदों, संस्कृत भाषा तथा ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते थे। 527 ई० पू० उन्होंने पावा में निर्वाण प्राप्त किया। निस्संदेह जैन धर्म के विकास में उनका योगदान बहुमूल्य था।

प्रश्न 17.
भगवान महावीर की शिक्षाओं के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss about the teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
स्वामी महावीर की शिक्षाएँ का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Discuss briefly the teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म की मुख्य शिक्षाएँ क्या थीं?
(What were the main teachings of Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the pre-eminent teaching of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म का आधार उसकी नैतिक कीमतें हैं। संक्षिप्त चर्चा करें।
(The base of Jainism is their Ethical values. Discuss in brief.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक कीमतों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the moral-values of Jainism.)
अथवा
नैतिक कीमतें जैन धर्म में प्रमुख हैं। चर्चा कीजिए।
(Moral values are supreme in Jainism. Discuss.)
उत्तर-
स्वामी महावीर जी की शिक्षाएँ अत्यंत सरल एवं प्रभावशाली थीं। उनके अनुसार मानव जीवन का परम उद्देश्य निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त करना है। अतः उन्होंने अपने अनुयायियों को तीन रत्नों—

  1. सच्ची श्रद्धा,
  2. सच्चा ज्ञान,
  3. और शुद्ध आचरण पर चलने के लिए कहा।

वे कठोर तप में विश्वास रखते थे। वे अहिंसा पर बहुत ज़ोर देते थे। उनके अनुसार मनुष्य और पशुओं के अतिरिक्त हमें पेड़-पौधों और पक्षियों आदि को भी कष्ट नहीं देना चाहिए। वे आवागमन और कर्म सिद्धांतों में विश्वास रखते थे। उन्होंने समानता व आपसी भाईचारे का प्रचार किया। उन्होंने लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। उन्होंने हिंदू धर्म में फैले झूठे रीति-रिवाजों और यज्ञों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। वे वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने अपना प्रचार लोगों की साधारण भाषा में किया। वे परमात्मा के अस्तित्व में भी विश्वास नहीं रखते थे। उनका कथन था कि मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। अतः उसे ईश्वर की सहायता की आवश्यकता नहीं है। जैसा मनुष्य कर्म करेगा उसे वैसा ही फल प्राप्त होगा। वे तीर्थंकरों की उपासना में विश्वास रखते थे।

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प्रश्न 18.
त्रि-रत्न से क्या भाव है ? इसका क्या महत्त्व है ? (What is meant by Tri-Ratnas ? What is its importance ?)
अथवा
त्रि-रत्न से क्या भाव है ?
(What is meant by Tri-Ratnas ?)
अथवा
आप त्रि-रत्न के बारे में क्या जानते हैं ? (What do you understand by Tri-Ratna ?)
अथवा
जैन धर्म के तीन रत्नों का उल्लेख करें। (Write about the Tri-Ratnas of Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्त करना है। इसको प्राप्त करने के लिए जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए त्रि-रत्नों पर चलना अति ज़रूरी है। ये तीन रत्न हैंसच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार। पहले रत्न के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 24 तीर्थंकरों, नौ सच्चाइयों और जैन शास्त्रों में अटल विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्नानुसार जैनियों को सच्चा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यह तीर्थंकरों के उपदेशों के गहरे अध्ययन से प्राप्त होता है। इस ज्ञान के दो रूप बताये गये हैं जिनको प्रत्यक्ष और परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। आत्मा द्वारा प्राप्त ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और वह ज्ञान जो इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होता है उसको परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। तीसरे रत्नानुसार प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे आचार के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। सच्चा आचार वह है जिसकी शिक्षा जैन धर्म देता है। ये तीनों रत्न साथ-साथ चलते हैं। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति मनुष्य को उसकी मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकती। उदाहरण के तौर पर जैसे एक दीये को प्रकाश देने के लिए उसमें तेल, बाती और आग का होना ज़रूरी है। यदि इसमें से एक भी वस्त की कमी हो तो वह प्रकाश नहीं दे सकता।

प्रश्न 19.
जैन धर्म में अहिंसा का क्या महत्त्व है ? (What is the importance Ahimsa in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में अहिंसा के महत्त्व का वर्णन करें।
(Explain the importance of Ahimsa in Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म में अहिंसा पर बहुत ज़ोर दिया गया है। अहिंसा की महत्ता बताते हुए आचारंग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना-अपना जीवन प्यारा है, सब ही सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सारे ही जीने की इच्छा रखते हैं।” इसीलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है। हिंसा दो तरह की होती है-मन से हिंसा और कर्म से हिंसा। कर्म अथवा अमल में आने वाली हिंसा से पहले मन भाव विचारों में हिंसा आती है। गुस्सा, अहंकार, लालच और धोखा मन की हिंसा है। इसलिए हिंसा से बचने के लिए मन के विचारों को शुद्ध करना अति ज़रूरी है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्यों के अतिरिक्त पशुओं, पत्थरों .और वृक्षों आदि में भी आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी कारण जैनी लोग नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और अंधेरा हो जाने के बाद कुछ नहीं खाते ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाये।

प्रश्न 20.
जैन धर्म की नौ सच्चाइयों पर नोट लिखो। (Write a short note on the Nine Truths of the Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के नौ-तत्त्वों के बारे में जानकारी दें।
(Describe the Nine Tatvas of Jainism.)
उत्तर-
जैन दर्शन नौ सच्चाइयों की शिक्षा देता है। ये सच्चाइयाँ हैं—

  1. जीव-जैन दर्शन में आत्मा को जीव कहा गया है। यह चेतन सुरूप है। यह शरीर के कर्मों के अच्छे-बुरे फल भुगतता है और आवागमन के चक्र में पड़ता है।
  2. अजीव-यह जंतु पदार्थ है। यह निर्जीव है और इनमें समझ नहीं होती। इनकी दो श्रेणियाँ हैं रूपी और अरूपी।
  3. पुण्य-यह अच्छे कर्मों का नतीजा है। इसके नौ साधन हैं।
  4. पाप-यह जीव के बंधन का मुख्य कारण है। इसके परिणामस्वरूप घोर सजायें मिलती हैं।
  5. अशर्व-यह वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मा अपने अंदर कर्मों को संचित करती रहती है। कर्म 8 किस्मों के होते हैं।
  6. संवर-कर्म को आत्मा की ओर आने की क्रिया को रोकने को संवर कहते हैं। कर्म को रोकने की 57 विधियाँ हैं।
  7. बंध-इससे भाव बंधन है। यह जीव (आत्मा) का पुदगल (परमाणु) से मेल है। बंध के लिए पाँच कारण जिम्मेवार हैं।
  8. निर्जर-इस से भाव है दूर भगाना। यह कर्मों को नष्ट करने और जल देने का कार्य करता है।
  9. मोक्ष-इसमें जीव कर्मों के जंजाल से मुक्त हो जाता है। यह पूर्ण शाँति की अवस्था है जिसमें हर तरह के दुःखों से छुटकारा प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 21.
जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of Karma Theory in Jain Philosophy ?)
अथवा
जैन धर्म का कार्य सिद्धांत के बारे में क्या विचार है ? (What is meant by Karma Theory of Jainism ?)
उत्तर-
जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस सिद्धांत के अनुसार, “जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसा बीजोगे वैसा काटोगे, यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा, किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा।” जैसे ही हमारे मन में कोई अच्छा या बुरा विचार आता है वह तुरंत जीव (आत्मा) से उसी तरह जुड़ जाता है, जैसे तेल लगे हुए शरीर से धूलि कण चिपक जाते हैं। ये कर्म आठ प्रकार के हैं-

  1. ज्ञानवर्णीय कर्म- यह आत्मा के ज्ञान को रोकते हैं।
  2. दर्शनवीय कर्म- यह आत्मा की इच्छा शक्ति को रोकते हैं।
  3. वैदनीय कर्म-ये सुख-दुःख उत्पन्न करने वाले कर्म हैं।
  4. मोहनीय कर्म-ये आत्मा को मोह माया में फंसाने वाले कर्म हैं।
  5. आयु कर्म-ये कर्म मनुष्य की आयु को निर्धारित करते हैं।
  6. नाम कर्म-ये कर्म मनुष्य के व्यक्तित्व को निर्धारित करते हैं।
  7. गोत्र कर्म-ये व्यक्ति के गोत्र और समाज में उसके ऊँचे या नीचे स्थान को निर्धारित करते हैं।
  8. अंतरीय कर्म-ये अच्छे कर्म को रोकने वाले कर्म हैं।

प्रश्न 22.
जैन धर्म में जीव एवं अजीव से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Jiva and Ajiva in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में जीव से क्या अभिप्राय है?
(What is meant by Jiva in Jainism ?)
उत्तर-
1. जीव-जीव शब्द का अर्थ है आत्मा। यह चेतन तथ्य है। जैन दर्शन में जीव दो प्रकार के हैं। इनको सांसारिक जीव और मुक्त जीव कहा जाता है। सांसारिक जीव को बंधन जीव भी कहते हैं। यह जीव आवागमन के चक्र में रहता है और अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता है और अपने अच्छे बुरे फल भुगतता है। मुक्त जीव वह जीव है जो पुनर्जन्म से रहित है। यह जीव अनंत ज्ञान वाला, अनंत शक्ति वाला और अनंत गुणों वाला होता है। यह जीव कर्मों के जाल से मुक्त होता है।

2. अजीव-अजीव से भाव उन जड़ पदार्थों से है जिनमें चेतना नहीं होती जैसे पुस्तक, कागज़, मेज़ और स्याही आदि। उदाहरण के तौर पर ऊँट के शरीर में जीव फैल कर ऊँट जितना बड़ा हो जाता है और कीड़ी के शरीर में सिकुड़ कर कीड़ी जितना हो जाता है । यह जीव तब नहीं दिखाई देता है परंतु शरीर की क्रियाओं के आधार पर इसकी उपस्थिति का ज्ञान हो जाता है। परंतु जब शरीर का अंत हो जाता है तो जीव लोप हो जाता है। जीव जिस शरीर को धारण करता है वह उस के आकार का ही हो जाता हैं।

प्रश्न 23.
जैन धर्म में पाप एवं पुण्य से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Papa and Punya in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में पाप से क्या अभिप्राय है ?
(What is meant by Paap in the Jainism ?)
उत्तर-
1. पाप-पाप को जीव के बंधन का मुख्य कारण माना जाता है। जीवों को मारना, झूठ, चोरी, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, धोखा, नशा और दुश्मनी आदि सब पापों के भार में वृद्धि करते हैं। पापियों को घोर सजायें मिलती हैं। आपने देखा होगा कि एक ही घर में पैदा हुए दो सगे भाइयों के जीवन में भारी अंतर होता है। एक ऊँची पदवी पर सुशोभित होता है और उसको प्रसिद्धि प्राप्त होती है। दूसरा दर-दर की ठोकरें खाता फिरता है, चोरियाँ करता है और बदनामी कमाता है। ऐसा क्यों होता है ? जैन दर्शन के अनुसार ऐसा व्यक्ति के पुण्य और पाप कमाने का कारण होता है। पापी मनुष्य कभी भी सुखी नहीं हो सकता और उसको अपने जीवन में घोर संकट का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा भी तड़पती रहती है। जैन सूत्रों के अनुसार पापों के 82 अलगअलग परिणाम निकलते हैं।

2. पुण्य-पुण्य वह कर्म है जो अच्छे अमलों से कमाये जाते हैं। पुण्य कमाने के अलग-अलग ढंग हैं। भूखे को खाना देना, प्यासे को पानी पिलाना, नंगे को कपड़ा देना, हाथों से सेवा करनी, मीठा बोलना आदि पुण्य के काम हैं, पुण्य को मानने के 42 साधन हैं। अच्छी सेहत, आर्थिक समृद्धि, प्रसिद्धि, अच्छा वैवाहिक जीवन, अच्छे रिश्तेदारों और दोस्तों का मिलना, अच्छी पढ़ाई और उच्च पदवियों पर नियुक्ति आदि अच्छे पुण्यों का ही नतीजा है। पुण्य को आत्मा का सहायक माना जाता है क्योंकि इससे खुशी प्राप्त होती है।

प्रश्न 24.
महावीर जी की शिक्षाओं का साधारण मनुष्य के जीवन के लिए क्या महत्त्व था ? (What was the importance of Mahavira’s teachings in the life of a common man ?)
उत्तर-
महावीर जी की शिक्षाएँ साधारण मनुष्य के लिए महत्त्वपूर्ण थीं। उस समय हिंदू धर्म में जाति प्रथा बहुत कठोर हो गई थी। उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों से घृणा करते थे। भगवान महावीर ने अपने धर्म में _बिना किसी भेद-भाव के प्रत्येक वर्ग के लोगों को शामिल किया। इससे समाज में प्रचलित परस्पर घृणा बहुत सीमा तक दूर हुई और लोगों में परस्पर बंधुत्व एवं प्रेम-भाव बढ़ गया। महावीर जो ने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। साधारण लोग भी इन परंपराओं के विरुद्ध थे। इसलिए उनके हृदयों पर महावीर जी की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव पड़ा। महावीर जी की अहिंसा नीति के कारण लोगों को युद्ध से घृणा हो गई और वे शाँति को पसंद करने लगा। महावीर जी ने लोगों को समाज सेवा का उपदेश दिया। परिणामस्वरूप जैन मत वालों ने लोगों की सहायता के लिए बहुत-सी धर्मशालाएँ बनवाईं। शिक्षा प्रचार के लिए शिक्षा संस्थाएँ और मनुष्यों एवं पशुओं की चिकित्सा के लिए अस्पताल खोले।

प्रश्न 25.
महावीर की शिक्षा के अनुसार एक जैन भिक्षु को कैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता था ?
(What type of life a Jain monk had to lead according to the teachings of Mahavira ?)
उत्तर-
महावीर की शिक्षा के अनुसार जैन भिक्षुओं को बहुत स्वच्छ जीवन व्यतीत करना पड़ता था। प्रत्येक भिक्षु को पाँच प्रतिज्ञाओं की पालना करनी पड़ती थी।

  1. प्रत्येक भिक्षु को सदैव सत्य बोलना चाहिए।
  2. उसको अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए।
  3. उसको कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसको दान में प्राप्त न हुई हो।
  4. उसको अपने पास धन नहीं रखना चाहिए।
  5. उसको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

इनके अतिरिक्त भिक्षु के लिए आवश्यक था कि उनकी वेश-भूषा और खाना-पीना बिल्कुल सादा हो। उनके लिए छाता और सुगंध देने वाली वस्तुओं के प्रयोग करने पर प्रतिबंध था। भिक्षु के लिए किसी स्त्री से बातचीत करने पर भी प्रतिबंध था। उनको सदैव मीठे वचन बोलने के लिए कहा गया था जिससे किसी को दुःख न पहुँचे। उनको इस बात का भी ध्यान रखना पड़ता था कि उनके चलने से या खान-पीने में किसी जीव की हत्या न हो।

प्रश्न 26.
दिगंबर और श्वेतांबर पर एक नोट लिखें। (Write a note on Digambara and Svetambara.)
अथवा
दिगंबर तथा श्वेतांबर से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you understand by Digambara and Svetambara ?)
उत्तर-
जैन धर्म के सभी संप्रदायों में से दिगंबर तथा श्वेतांबर संप्रदायों को प्रमुख स्थान प्राप्त है। दिगंबर से अभिप्राय था नग्न रहने वाले तथा श्वेतांबर से अभिप्राय था श्वेत (सफ़ेद) वस्त्र धारण करने वाले। इन दोनों संप्रदायों में प्रमुख अंतर निम्नलिखित अनुसार थे—

  1. दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी नग्न रहते हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं।
  2. दिगंबर संप्रदाय स्त्रियों को जैन संघ में सम्मिलित होने की आज्ञा नहीं देता जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वाले ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाते।
  3. दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्त्रियां तब एक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं लेतीं। श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस सिद्धांत को गलत मानते हैं। उनका कथन है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  4. दिगंबर संप्रदाय वालों का यह कथन है कि स्वामी महावीर जी ने विवाह नहीं करवाया था। श्वेतांबर संप्रदाय वालों का यह कथन है कि स्वामी महावीर जी ने विवाह करवाया था तथा उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम प्रियदर्शना था।
  5. दिगंबर संप्रदाय वालों का कथन है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले साधुओं को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  6. दिगंबर तथा श्वेतांबर संप्रदायों का साहित्य भी अलग-अलग है।
  7. दिगंबर संप्रदाय वालों की मूर्तियाँ नंगेज हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वालों की मूर्तियों को वस्त्र पहनाए जाते हैं तथा उन्हें गहनों से सुसज्जित किया जाता है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 27.
जैन धर्म भारत में लोकप्रिय क्यों नहीं हो सका ? (Why could not Jainism become popular in India ?)
उत्तर-
जैन धर्म की शिक्षाएँ यद्यपि सरल थीं, परंतु कई कारणों से यह धर्म लोगों में लोकप्रिय न हो सका। पहला, जैन धर्म वालों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया। किसी भी धर्म की सफलता के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक होता है। दूसरा, जैन धर्म को बौद्ध धर्म की भाँति राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हो सका। यह सही है कि बिंबिसार, अजातशत्रु और खारवेल जैसे शासकों ने जैन धर्म को अपना संरक्षण दिया, परंतु वे बौद्ध धर्म की भाँति जैन धर्म को प्रगति के शिखर तक पहुँचाने में विफल रहे। तीसरा, जैन धर्म वाले कठोर तप, शरीर को अत्यधिक कष्ट देने में विश्वास रखते थे। इसके अतिरिक्त उनका अहिंसा में आवश्यकता से अधिक विश्वास था। वे मुँह पर पट्टी बाँधते थे, नंगे पाँव चलते थे और पानी छान कर पीते थे ताकि किसी जीव की मृत्यु न हो जाए। वे वृक्षों और पत्थरों को भी प्राणवान् मानते थे। इसलिए इन्हें कष्ट देना भी पाप समझा जाता था। वे बीमार पड़ने पर औषधि का भी प्रयोग नहीं करते थे। जन सामान्य के लिए इन नियमों का पालन करना बहुत कठिन था। चौथा, जैन धर्म के लोकप्रिय न होने का एक कारण यह भी था कि उस समय बौद्ध धर्म के सिद्धांत भी बहुत सरल थे। परिणामस्वरूप लोगों ने जैन धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म को अपनाना आरंभ कर दिया। पाँचवां, समय के साथ-साथ जैन लोगों ने हिंदू धर्म के कई सिद्धांतों को अपना लिया। परिणामस्वरूप वे अपने अलग अस्तित्व को न बनाए रख सके।

प्रश्न 28.
जैन स्रोत। (The Jaina Sources.)
उत्तर-
जैन स्रोत प्राचीन भारत के इतिहास पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। जैनियों ने अनेक ग्रंथों की रचना की। ये ग्रंथ प्राकृत अथवा अर्द्ध मगधी जो उस समय लोगों की बोलचाल की आम भाषा थी में लिखे गए हैं। जैनियों के धार्मिक ग्रंथों में 12 अंशों को सबसे महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र समझ जाता है। इनमें महावीर के जीवन तथा जैन धर्म के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया है। जैन धर्म के 12 उपांग भी हैं। इनमें अधिकाँश मिथिहासिक कथाओं का वर्णन मिलता है। जैन धर्म के 10 प्राकिरणों से महावीर के जीवन एवं उसके उपदेशों संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। 6 छेदसूत्रों में जैन भिक्षु एवं भिक्षुणियों के नियमों का वर्णन किया गया है। जैनी साहित्य में 4 मूलसूत्रों को बहुमूल्य समझा जाता है। इनसे जैन धर्म से संबंधित कथाओं के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है।

प्रश्न 29.
जैन मत की भारतीय सभ्यता को क्या देन है ? (What is the legacy of Jainism to the Indian Civilization ?)
उत्तर-
जैन मत ने भारतीय सभ्यता को कई क्षेत्रों में बहुमूल्य देन दी। महावीर ने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने अपने धर्म में प्रत्येक जाति से संबंधित लोगों को शामिल किया। उन्होंने परस्पर भ्रातृत्व तथा समानता का प्रचार किया। परिणामस्वरूप समाज में फैली घृणा को काफ़ी सीमा तक दूर किया जा सका। जैन मत ने लोगों को सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। इसके प्रयत्नों के कारण लोगों में फैले बहुत-से धार्मिक अंध-विश्वासों का अंत हो गया। जैन धर्म की बढ़ती हुई प्रसिद्धि को देख कर हिंदू धर्म के नेताओं ने इसमें आवश्यक सुधार किए। जैन धर्म के विद्वानों ने अनेक भाषाओं में अपने ग्रंथ लिखे। इस कारण क्षेत्रीय भाषाओं को उत्साह मिला। ये ग्रंथ भारतीय इतिहास के बहुमूल्य स्रोत हैं। जैनियों ने अनेक प्रभावशाली तथा प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया। इस कारण भारतीय भवन निर्माण कला को एक नया उत्साह मिला। जैन धर्म ने लोगों के कल्याण के लिए अनेक धर्मशालाएँ, शौक्षिक संस्थाएँ तथा अस्पतालों आदि की स्थापना की जो आज भी जारी हैं। जैन धर्म ने शाँति का संदेश दिया। यह युद्धों के विरुद्ध था। इसका भारतीय राजनीति पर बुरा प्रभाव पड़ा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1. ‘जैन’ शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-विजेता।

प्रश्न 2. जैन धर्म को आरंभ में क्या नाम दिया गया था ?
उत्तर-निग्रंथ।

प्रश्न 3. निग्रंथ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-बंधनों से मुक्त।

प्रश्न 4. जैन आचार्यों को किस अन्य नाम से जाना जाता था ?
उत्तर-तीर्थंकर।

प्रश्न 5. तीर्थंकर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-संसार के भवसागर से पार कराने वाला गुरु।

प्रश्न 6. जैन धर्म में कुल कितने तीर्थंकर हुए हैं ?
उत्तर-24 तीर्थंकर।।

प्रश्न 7. जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का क्या नाम था ?
अथवा
जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम बताओ।
उत्तर-ऋषभदेव।

प्रश्न 8. जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर कौन थे ?
उत्तर-पार्श्वनाथ।

प्रश्न 9. स्वामी पार्श्वनाथ जैन धर्म के कौन-से तीर्थंकर थे ?
उत्तर-23वें।

प्रश्न 10. स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर-बनारस में।

प्रश्न 11. स्वामी पार्श्वनाथ के पिता जी कौन थे ?
उत्तर- बनारस के राजा अश्वसेन।

प्रश्न 12. स्वामी पार्श्वनाथ ने जब अपना घर त्याग दिया उस समय उनकी आयु कितनी थी ?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 13. स्वामी पार्श्वनाथ ने कितने दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त किया ?
उत्तर-83 दिनों के।

प्रश्न 14. स्वामी पार्श्वनाथ ने कितने सिद्धांतों का प्रचलन किया ?
उत्तर-स्वामी पार्श्वनाथ ने चार सिद्धांतों का प्रचलन किया।

प्रश्न 15. स्वामी पार्श्वनाथ के सिद्धांतों को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-चातुर्याम।

प्रश्न 16. स्वामी पार्श्वनाथ का कोई एक सिद्धांत बताएँ।
उत्तर-कभी झूठ न बोलो।

प्रश्न 17. स्वामी पार्श्वनाथ ने कितने वर्ष प्रचार किया ?
उत्तर-स्वामी पार्श्वनाथ ने 70 वर्ष प्रचार किया।

प्रश्न 18. स्वामी पार्श्वनाथ ने कब निर्वाण प्राप्त किया?
उत्तर-777 ई० पू०।

प्रश्न 19. जैन धर्म का संस्थापक कौन था और वह कितना तीर्थंकर था ?
उत्तर-जैन धर्म का संस्थापक स्वामी महावीर था और वह 24वां तीर्थंकर था।

प्रश्न 20. जैन धर्म का अंतिम तीर्थंकर कौन था ?
अथवा
जैन धर्म का 24वां तीर्थंकर कौन था ?
उत्तर-स्वामी महावीर जी।

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प्रश्न 21. जैन धर्म के पहले व आखिरी तीर्थंकर का नाम बताएँ।
उत्तर-जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम ऋषभदेव था तथा आखिरी तीर्थंकर का नाम स्वामी महावीर था।

प्रश्न 22. स्वामी महावीर जी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर-599 ई० पू० कुंडग्राम में।

प्रश्न 23. स्वामी महावीर जी का जन्म कहाँ हुआ ?
उत्तर-कुंडग्राम में।

प्रश्न 24. स्वामी महावीर जी के पिता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-सिद्धार्थ।

प्रश्न 25. स्वामी महावीर जी की माता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-त्रिशला।

प्रश्न 26. भगवान् महावीर जी के जन्म से पूर्व उनकी माता को कितने स्वप्न आए थे ?
उत्तर-14.

प्रश्न 27. स्वामी महावीर जी का आरंभिक नाम क्या था ?
उत्तर-वर्धमान।

प्रश्न 28. स्वामी महावीर जी का संबंध किस कबीले के साथ था ?
उत्तर-जनत्रिका।

प्रश्न 29. स्वामी महावीर जी का विवाह किसके साथ हुआ ?
उत्तर-यशोदा से।

प्रश्न 30. स्वामी महावीर जी की पुत्री का क्या नाम था ?
उत्तर-प्रियदर्शना।

प्रश्न 31. घर त्याग के समय स्वामी महावीर जी की आयु कितनी थी?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 32. स्वामी महावीर जी ने कितने वर्षों तक कठोर तप किया ?
उत्तर-12 वर्ष।

प्रश्न 33. स्वामी महावीर जी ने कौन-सी आयु में ज्ञान प्राप्त किया ?
उत्तर-42 वर्ष की।

प्रश्न 34. कैवल्य ज्ञान से क्या भाव है ?
उत्तर-सर्वोच्च सत्य।

प्रश्न 35. स्वामी महावीर जी ने कितने वर्षों तक प्रचार किया ?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 36. स्वामी महावीर जी के कोई दो प्रसिद्ध प्रचार केंद्रों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. राजगृह
  2. वैशाली।

प्रश्न 37. स्वामी महावीर जी ने कब निर्वाण प्राप्त किया?
उत्तर-527 ई० पू०।

प्रश्न 38. स्वामी महावीर जी ने कहाँ निर्वाण प्राप्त किया था ?
उत्तर-पावा में।

प्रश्न 39. स्वामी महावीर जी ने जब निर्वाण प्राप्त किया तब उनकी आयु क्या थी ?
उत्तर-72 वर्ष।

प्रश्न 40. जैन धर्म की बुनियादी कीमतें किसने निर्धारित की ?
उत्तर-स्वामी महाबीर जी ने।

प्रश्न 41. जैन धर्म की कोई एक प्रमुख शिक्षा बताएँ।
उत्तर-जैन धर्म अहिंसा में विश्वास रखता था।

प्रश्न 42. त्रिरत्न किस धर्म के साथ संबंधित है ?
उत्तर-जैन धर्म के साथ।

प्रश्न 43. जैन धर्म के तीन रत्न कौन-से हैं ?
अथवा
जैन धर्म के त्रिरत्नों के नाम बताएँ।
अथवा
जैन धर्म के तीन रत्न क्या हैं ?
उत्तर-

  1. सत्य-श्रद्धा
  2. सत्य-ज्ञान
  3. सत्य-आचरण।

प्रश्न 44. जैन धर्म में ब्रह्मचर्य का सिद्धांत किसने प्रचलित किया ?
उत्तर-स्वामी महावीर जी ने।

प्रश्न 45. जैन धर्म दर्शन में कितने तत्त्व माने गए हैं ?
उत्तर-9.

प्रश्न 46. जैन धर्म की कोई दो सच्चाइयाँ बताएँ।
उत्तर-

  1. पाप
  2. पुण्य।

प्रश्न 47. जैन दर्शन में आत्मा को क्या कहा गया है ?
उत्तर-जीव।

प्रश्न 48. जैन दर्शन में अजीव की कौन-सी दो श्रेणियाँ हैं ?
उत्तर-

  1. रूपी
  2. अरूपी

प्रश्न 49. जैन दर्शन में कर्म को आत्मा की ओर आने की क्रिया को रोकने को क्या कहते हैं ?
उत्तर-संवर।

प्रश्न 50. जैन धर्म में अशर्व के क्या अर्थ है ?
उत्तर-वह प्रक्रिया जिसके अनुसार आत्मा अपने अंदर कर्मों को संचित करती रहती है।

प्रश्न 51. जैन धर्म में पुदगल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-परमाणु।

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प्रश्न 52. जैन धर्म के अनुसार कर्म कितनी प्रकार के हैं ?
उत्तर-8 प्रकार के।

प्रश्न 53. जैन धर्म के किसी एक प्रकार के कर्म का नाम बताएँ।
उत्तर-ज्ञानवर्णनीय कर्म।

प्रश्न 54. जैन धर्म में जीव से क्या भाव है ?
उत्तर-आत्मा।

प्रश्न 55. जैन धर्म में अजीव से क्या भाव है ?
उत्तर-जड़ पदार्थ।

प्रश्न 56. जैन दर्शन में कितनी प्रकार की हिंसा का वर्णन मिलता है ?
उत्तर-108 प्रकार की।

प्रश्न 57. जैन दर्शन में पुण्य को मानने के कितने साधन हैं ?
उत्तर-42.

प्रश्न 58. जैन दर्शन के अनुसार पाप के कितनी प्रकार के परिणाम निकलते हैं ?
उत्तर-82 प्रकार के।

प्रश्न 59. अनेकांतवाद का सिद्धांत किस धर्म के साथ संबंधित है ?
उत्तर-जैन धर्म के साथ।

प्रश्न 60. जैन दर्शन के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में कितने अणुव्रतों की पालना करनी चाहिए ?
उत्तर-पाँच अणुव्रतों की।

प्रश्न 61. जैन धर्म में निर्वाण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-आवागमन के चक्र से मुक्ति।

प्रश्न 62. जैन धर्म को नास्तिक धर्म क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-क्योंकि यह धर्म ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता।

प्रश्न 63. अजीविक संप्रदाय का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-गौशाल।

प्रश्न 64. अजीविक संप्रदाय का प्रमुख सिद्धांत क्या था ?
उत्तर-इस संप्रदाय का प्रमुख सिद्धांत नियति (किस्मत) था।

प्रश्न 65. जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय कौन-से हैं ?
उत्तर-जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों के नाम दिगंबर एवं श्वेतांबर है।

प्रश्न 66. दिगंबर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-दिगंबर से अभिप्राय है नग्न रहने वाला।

प्रश्न 67. श्वेतांबर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-श्वेतांबर से अभिप्राय है श्वेत वस्त्र धारण करने वाला।

प्रश्न 68. लोंक सा कौन था ?
उत्तर-लोक सा लोंक संप्रदाय का मुखिया था।

प्रश्न 69. स्थानकवासी संप्रदाय का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-वीराजी।

प्रश्न 70. तेरा पंथ का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-भीखनजी।

प्रश्न 71. जैन संघ में कितनी तरह के लोग शामिल होते हैं ?
उत्तर-चार तरह के।

प्रश्न 72. जैन संघ में किन्हें सम्मिलित होने की आज्ञा नहीं थी ?
उत्तर- अधर्मी व्यक्तियों को।

प्रश्न 73. जैन धर्म में सम्मिलित होने वाले स्त्री एवं पुरुषों को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-

  1. भिक्षुणियाँ
  2. भिक्षु।

प्रश्न 74. जैन धर्म ग्रंथों की भाषा क्या है ?
उत्तर-प्राकृत अथवा अर्ध मगधी।

प्रश्न 75. जैन धर्म में सर्वाधिक पवित्र पुस्तकें कौन-सी हैं ?
उत्तर-12 अंग।

प्रश्न 76. जैन धर्म के किसी एक अंग का नाम बताएँ।
उत्तर-आचारांग सूत्र।

प्रश्न 77. जैन धर्म के किस ग्रंथ में जैन भिक्षुओं से संबंधित नियम दिए गए हैं ?
उत्तर-आचारांग सूत्र में।

प्रश्न 78. जैन धर्म में कितने उपांग हैं ?
उत्तर-12 उपांग।

प्रश्न 79. कल्पसूत्र की रचना किसने की थी ?
उत्तर-भद्रबाहू ने।

प्रश्न 80. कल्पसूत्र का विषय क्या है ?
उत्तर-स्वामी महावीर जी का जीवन।

प्रश्न 81. जैन धर्म में कितने छेदसूत्र हैं ?
उत्तर-जैन धर्म में 6 छेदसूत्र हैं।

प्रश्न 82. जैन धर्म से संबंधित मूलसूत्र कितने हैं ?
उत्तर-4.

प्रश्न 83. जैन धर्म के दिगंबर से संबंधित कितनी पुस्तकें उपलब्ध हैं ?
उत्तर-4.

प्रश्न 84. दिगंबर संप्रदाय से संबंधित एक पुस्तक का नाम बताएँ।
उत्तर-पर्थमानु योग।

नोट-रिक्त स्थानों की पूर्ति करें—

प्रश्न 1. जैन धर्म को आरंभ में ………….. के नाम से जाना जाता था।
उत्तर-निग्रंथ

प्रश्न 2. जैन धर्म में कुल ………. तीर्थंकर थे।।
उत्तर-24

प्रश्न 3. जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम ………… था।
उत्तर-ऋषभनाथ

प्रश्न 4. जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर …………… थे।
उत्तर- पार्श्वनाथ

प्रश्न 5. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर …………… थे।
उत्तर-स्वामी महावीर

प्रश्न 6. स्वामी महावीर का जन्म ……….. में हुआ।
उत्तर-599 ई०पू०

प्रश्न 7. स्वामी महावीर की माता जी का नाम ………. था।
उत्तर-त्रिशला

प्रश्न 8. स्वामी महावीर के जन्म से पहले उनकी माता जी को ………… स्वप्न आए थे।
उत्तर-14

प्रश्न 9. स्वामी महावीर जी की पुत्री का नाम ………. था।
उत्तर-प्रियदर्शना

प्रश्न 10. ज्ञान प्राप्ति के समय स्वामी महावीर जी की आयु ………. थी।
उत्तर-42 वर्ष

प्रश्न 11. स्वामी महावीर जी ने ………. में निर्वाण प्राप्त किया।
उत्तर-527 ई० पू०

प्रश्न 12. जैन धर्म ……….. रत्नों में विश्वास रखता है।
उत्तर-तीन

प्रश्न 13. जैन धर्म में ब्रह्मचर्य का सिद्धांत ………. ने प्रचलित किया।
उत्तर-स्वामी महावीर

प्रश्न 14. जैन धर्म ………… सच्चाइयों में विश्वास रखता है।
उत्तर-नौ

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प्रश्न 15. जैन धर्म के अनुसार ………. वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मा अपने आंतरिक कर्मों को संचित करती रहती है।
उत्तर-अशर्व

प्रश्न 16. जैन धर्म ………. प्रकार के कर्मों में विश्वास रखता है।
उत्तर-आठ

प्रश्न 17. अनेकांतवाद को ………… के नाम से भी जाना जाता है।
उत्तर-स्यादवाद

प्रश्न 18. जैन धर्म ………… महाव्रतों में विश्वास रखता है।
उत्तर-पाँच

प्रश्न 19. जैन धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च उद्वेश्य …………. प्राप्त करना है।
उत्तर-निर्वाण

प्रश्न 20. जैन धर्म के अनुसार पुदगल से भाव ……….. है।
उत्तर-परमाणु

प्रश्न 21. अजीविक संप्रदाय का संस्थापक ………… था।
उत्तर-गौशाल

प्रश्न 22. अजीविक संप्रदाय ……….. के सिद्धांत में विश्वास रखता था।
उत्तर-नियति

प्रश्न 23. ………. संप्रदाय वाले श्वेत वस्त्र धारण करते थे।
उत्तर-श्वेतांबर

प्रश्न 24. लोक संप्रदाय का संस्थापक ………. था।
उत्तर-लोक सा

प्रश्न 25. तेरा पंथ संप्रदाय का संस्थापक ……….. था।
उत्तर-भीखनजी

प्रश्न 26. जैन धर्म का संस्थापक ……….. कहलाता था।
उत्तर-आचार्य

प्रश्न 27. जैन धर्म ………… अंगों में विश्वास रखता है।
उत्तर-12

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा ग़लत चुनें—

प्रश्न 1. जैन धर्म कुल 20 तीर्थंकरों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 2. जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम विमल था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 3. स्वामी पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 4. स्वामी पार्श्वनाथ को 23 दिनों के कठिन तप के पश्चात् ज्ञान प्राप्त हुआ था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 5. स्वामी पार्श्वनाथ की शिक्षा को चातुरयाम कहते हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 6. स्वामी महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 7. स्वामी महावीर का जन्म 567 ई०पू० में हुआ था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 8. स्वामी महावीर जी के बचपन का नाम वर्धमान था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 9. स्वामी महावीर जी की माता का नाम महामाया था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 10. ज्ञान प्राप्ति के समय स्वामी महावीर जी की उनकी आयु 42 वर्ष थी।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 11. स्वामी महावीर जी ने पावा में निर्वाण प्राप्त किया था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 12. जैन धर्म त्रि-रत्नों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 13. जैन धर्म अहिंसा में विश्वास नहीं रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 14. जैन धर्म के अनुसार तत्व नौ प्रकार के हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 15. जैन धर्म तीन प्रकार के कर्मों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 16. जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में पाँच अनुव्रतों की पालना करनी चाहिए।
उत्तर-ठीक

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 17. जैन धर्म के अनुसार मानवीय जीवन का मुख्य उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 18. जैन धर्म के अनुसार सच्चा विश्वास सच्चे ज्ञान की आधारशिला है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 19. जैन धर्म के अनुसार ज्ञान पाँच प्रकार का होता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 20. जैन धर्म के अनुसार हिंसा आठ प्रकार की होती है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 21. जैन धर्म में जीव शब्द का अर्थ है ‘आत्मा’।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 22. जैन धर्म के अनुसार पुण्य प्राप्त करने के 42 साधन हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 23. जैन धर्म के अनुसार कर्म को रोकने की 57 विधियां हैं। .
उत्तर-ठीक

प्रश्न 24. जैन धर्म चार महाव्रतों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 25. अजीविक संप्रदाय किस्मत के सिद्धांत में विश्वास रखता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 26. तारना संप्रदाय का संस्थापक भीखनजी था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 27. स्थानकवासी संप्रदाय का संस्थापक वीराजी था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 28. जैनियों के धार्मिक ग्रंथों में 12 अंगों को सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
उत्तर-ठीक

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर चनें—

प्रश्न 1.
जैन धर्म कुल कितने तीर्थंकरों में विश्वास रखता है ?
(i) 20
(ii) 23
(iii) 24
(iv) 25
उत्तर-
(iii) 24

प्रश्न 2.
जैन धर्म का पहला तीर्थंकर कौन था ?
(i) पार्श्वनाथ
(ii) महावीर
(iii) विमल
(iv) ऋषभनाथ।
उत्तर-
(iv) ऋषभनाथ।

प्रश्न 3.
जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर कौन थे ?
(i) विमल
(ii) अनंत
(iii) ऋषभनाथ
(iv) पार्श्वनाथ।
उत्तर-
(iv) पार्श्वनाथ।

प्रश्न 4.
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर कौन थे ?
(i) अभिनंदन
(ii) महावीर
(iii) पुष्पदंत
(iv) अजित।
उत्तर-
(ii) महावीर

प्रश्न 5.
स्वामी महावीर जी का जन्म कब हुआ ?
(i) 566 ई० पू०
(ii) 567 ई० पू०
(iii) 569 ई० पू०
(iv) 599 ई० पू०।
उत्तर-
(iv) 599 ई० पू०।

प्रश्न 6.
स्वामी महावीर जी का जन्म कहाँ हुआ ?
(i) लुंबिनी में
(ii) कुंडग्राम में
(iii) कुशीनगर में
(iv) कपिलवस्तु में।
उत्तर-
(ii) कुंडग्राम में

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 7.
स्वामी महावीर जी के पिता जी का नाम क्या था ?
(i) सिद्धार्थ
(ii) राहुल
(iii) वर्धमान
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i) सिद्धार्थ

प्रश्न 8.
स्वामी महावीर जी की माता जी का नाम क्या था ?
(i) त्रिशला
(ii) यशोधरा
(iii) महामाया
(iv) प्रजापति गौतमी।
उत्तर-
(i) त्रिशला

प्रश्न 9.
स्वामी महावीर जी के जन्म से पूर्व उनकी माता जी को कितने स्वप्न आए थे ?
(i) 8
(ii) 10
(iii) 12
(iv) 14.
उत्तर-
(iv) 14.

प्रश्न 10.
स्वामी महावीर जी के बचपन का नाम क्या था ?
(i) वर्धमान
(ii) सिद्धार्थ
(ii) राहुल
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i) वर्धमान

प्रश्न 11.
स्वामी महावीर जी की ज्ञान प्राप्ति के समय उनकी आयु कितनी थी ?
(i) 20 वर्ष
(ii) 30 वर्ष
(iii) 35 वर्ष
(iv) 42 वर्ष।
उत्तर-
(iv) 42 वर्ष।

प्रश्न 12.
स्वामी महावीर जी को ज्ञान की प्राप्ति कहाँ हुई थी ?
(i) जरिमबिक गाँव
(ii) बौद्ध गया
(ii) वैशाली
(iv) कुंडग्राम।
उत्तर-
(i) जरिमबिक गाँव

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में कौन-सा स्वामी महावीर जी का प्रचार केंद्र नहीं था ?
(i) राजगृह
(ii) वैशाली
(iii) अंग
(iv) पुरुषपुर।
उत्तर-
(iv) पुरुषपुर।

प्रश्न 14.
स्वामी महावीर जी को कहाँ निर्वाण प्राप्त हुआ था ?
(i) विदेह
(ii) अंग
(iii) राजगृह
(iv) पावा।
उत्तर-
(iv) पावा।

प्रश्न 15.
स्वामी महावीर जी की निर्वाण प्राप्ति के समय उनकी आयु कितनी थी ?
(i) 60 वर्ष
(ii) 62 वर्ष
(iii) 72 वर्ष
(iv) 80 वर्ष।
उत्तर-
(iii) 72 वर्ष

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से कौन-सा धर्म त्रि-रत्नों में विश्वास रखता था ?
(i) बौद्ध धर्म
(ii) जैन धर्म
(iii) ईसाई धर्म
(iv) पारसी धर्म।
उत्तर-
(ii) जैन धर्म

प्रश्न 17.
जैन धर्म कितनी सच्चाइयों में विश्वास रखता है ?
(i) 3
(i) 5
(iii) 7
(iv) 9.
उत्तर-
(iv) 9.

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 18.
जैन धर्म जीव के बंधन का मुख्य कारण किसे मानते हैं ?
(i) पाप
(ii) पुण्य
(iii) मोक्ष
(iv) अजीव।
उत्तर-
(i) पाप

प्रश्न 19.
निम्नलिखित में से कौन-सी स्वामी महावीर जी की शिक्षा नहीं है ?
(i) वह अहिंसा में विश्वास रखते थे
(ii) वह कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे ।
(iii) वह समानता में विश्वास रखते थे
(iv) वह ईश्वर में विश्वास रखते थे।
उत्तर-
(iv) वह ईश्वर में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 20.
जैन धर्म कितने अनुव्रतों में विश्वास रखता है ?
(i) 3
(ii) 5
(iii) 7
(iv) 9.
उत्तर-
(ii) 5

प्रश्न 21.
जैन धर्म के अनुसार हिंसा कितने प्रकार की होती है ?
(i) 2
(ii) 3
(iii) 4
(iv) 5.
उत्तर-
(i) 2

प्रश्न 22.
कौन-सा तत्व जीव और पुदगल के मध्य गति पैदा करता है ?
(i) पुदगल
(ii) धर्म
(iii) अधर्म
(iv) पाप।
उत्तर-
(ii) धर्म

प्रश्न 23.
अजीविक संप्रदाय का संस्थापक कौन था ?
(i) गोशाल
(ii) स्वामी महावीर
(iii) वीराजी
(iv) भीखनजी।
उत्तर-
(i) गोशाल

प्रश्न 24.
निम्नलिखित में से कौन जैन धर्म के साथ संबंधित संप्रदाय नहीं हैं ?
(i) दिगंबर
(ii) श्वेतांबर
(iii) लोंक
(iv) महायान।
उत्तर-
(iv) महायान।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 25.
निम्नलिखित में से कौन-सा धर्म जैन धर्म के साथ संबंधित नहीं है ?
(i) दीपवंश
(ii) कल्पसूत्र
(iii) भगवती सूत्र
(iv) आचारंग सूत्र।
उत्तर-
(i) दीपवंश

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता) Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 9 तितली रानी (कविता) (2nd Language)

तितली रानी (कविता) अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਤਿਤਲੀ = तितली
  • ਬਸੰਤ = बसंत
  • ਰੰਗੋਲੀ = रंगोली
  • ਗਿਆਨੀ = सयानी
  • ਨਾਨੀ = नानी
  • ਪਰੀ = परी

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਖੰਭ = पंख
  • ਵਨ-ਸੁਵੰਨੀ = रंग-बिरंगी
  • ਰੁੱਤ = ऋतु
  • ਹੱਥ = हाथ
  • ਸਪਨਾ = स्वप्न
  • ਸੁਨਹਿਰਾ/ਸੋਨਾ = स्वर्ण

पढ़ो, समझो और लिखो

स् + व = स्व, प् + न = प्न = स्वप्न
स् + व + र् + ण = स्व र्ण

कविता की पंक्तियाँ पूरी करो :

(1) रंग-बिरंगी ………………………………..,
पंखों पर ………………………………..।

(2) रुत बसंत में ………………………………..,
गीत खुशी के ………………………………..।
उत्तर :
(1) रंग-बिरंगी जिसकी चोली।
पंखों पर जिसके रंगोली।

(2) रुत बसन्त में आती तितली,
गीत खुशी के गाती तितली।

बताओ

प्रश्न 1.
तितली के पंख कैसे होते हैं?
उत्तर :
तितली के पंख रंग-बिरंगे होते हैं।

प्रश्न 2.
तितली किस ऋतु में दिखाई देती है?
उत्तर :
तितली वसन्त ऋतु में दिखाई देती है।

प्रश्न 3.
नानी किसकी कहानी सुनाया करती थी?
उत्तर :
नानी स्वर्ण परी की कहानी सुनाया करती थी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

तुक मिलाओ

  1. चोली = रंगोली
  2. सजाती = ………………………………..
  3. इठलाती = ………………………………..
  4. आती = ………………………………..

उत्तर :

  1. चोली = रंगोली।
  2. सजाती = शर्माती।
  3. इठलाती = लुभाती।
  4. आती = गाती।

वाक्य बनाओ

  1. रंग-बिरंगी
  2. बसंत
  3. कहानी
  4. सयानी

उत्तर :

  1. रंग-बिरंगी-लाल किला रंगबिरंगी रोशनी से सजा हुआ था।
  2. बसन्त-बसन्त में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं।
  3. कहानी-नानी माँ ने हमें कहानी सुनाई।
  4. सयानी-रानी अब सयानी हो गई है।

रचनात्मक कौशल

तितली को उड़ते हुए देखो। तितली का चित्र बनाओ। उसमें रंग भरो।

अध्यापन निर्देश

1. अध्यापक गीत एवं अभिनय प्रणाली द्वारा कविता का सस्वर गायन करवाए। बच्चों के मन में प्राकृतिक वस्तुओं के प्रति प्रेम जागृत करे।
2. पाठ में ‘ऋतु’ को बोलचाल की भाषा में ‘रुत’ कहा गया है।
3. अध्यापक बच्चों को सभी ऋतुओं का ज्ञान देते हुए विशेष रूप से ऋतुराज बसंत ऋतु’ के बारे में बताये।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

तितली रानी (कविता) बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘उिँउली’ का हिन्दी अर्थ है : चितली/तितली/पुतली/नेतरी
उत्तर :
तितली

प्रश्न 2.
पंजाबी शब्द ‘व’ का हिन्दी अर्थ है : हल्की/हाथी/हाथ/हाथों
उत्तर :
हाथ

प्रश्न 3.
तितली के पंख कैसे होते हैं?
(i) रंग
(ii) बिरंगे
(iii) रंग-बिरंगे
(iv) बेरंग।
उत्तर :
(iii) रंग-बिरंगे

प्रश्न 4.
नानी किसकी कहानी सनाया करती थी?
(i) स्वर्ण की
(ii) परी की
(iii) स्वर्ण – परी की
(iv) राक्षस की।
उत्तर :
(iii) स्वर्ण-परी की

प्रश्न 5.
चोली से तुकबन्दी करते हुए शब्द मिलाएँ।
सही पर गोला लगाओ।
(i) रंगोली
(ii) तुली
(iii) कुली
(iv) टुली।
उत्तर :
(i) रंगोली

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

प्रश्न 6.
‘इठलाती’ से तुकबन्दी करते हुए शब्द मिलाएं।
(i) जीती
(ii) लुभाती
(iii) पत्री
(iv) छत्री।
उत्तर :
(ii) लुभाती।

तितली रानी (कविता) Summary in Hindi

1. तितली रानी, तितली रानी,
अपने घर को बड़ी सयानी।
रंग-बिरंगी जिसकी चोली,
पंखों पर जिसके रंगोली।
फूलों पर उड़ती-इठलाती,
बच्चों को यह बहुत लुभाती॥

शब्दार्थ :

  • सयानी = समझदार।
  • चोली = वस्त्र।।
  • इठलाती = गर्व करती।
  • लुभाती = अच्छी लगती है।

सरलार्थ-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कविता ‘तितली रानी’ से ली गई हैं। उसमें कवि तितली की सुन्दरता का वर्णन करते हुए कहता है कि तितली रानी अपने घर के लिए बहुत समझदार है। उसके रंग-बिरंगे पंख हैं। ऐसा लगता है जैसे उसके पंखों पर किसी ने रंगदार रंगोली सजा दी है। फूलों पर यह इठलाती हुई उड़ती जाती है। बच्चों को भी यह बहुत अच्छी लगती है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता) 1

2. आँखों में यह स्वप्न सजाती,
हाथ लगाने से शर्माती।
रुत बसन्त में आती तितली,
गीत खुशी के गाती तितली।
कभी कहा करती थी नानी,
स्वर्ण परी की एक कहानी।
तितली रानी, तितली रानी,
अपने घर को बड़ी सयानी॥

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

शब्दार्थ :

  • स्वप्न = सपने।
  • शर्माती = लज्जाती।
  • रुत = ऋतु, मौसम।
  • खुशी = प्रसन्नता।
  • स्वर्ण-परी = सुनहरी परी।
  • सयानी = समझदार।

सरलार्थ-
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि तितली की सुन्दरता की प्रशंसा करते हुए कहता है कि यह सुन्दरतितली अपनी आँखों में सुन्दर सपने सजाती है। हाथलगाने से वह शरमा जाती है। जब बसन्त ऋतु आतीहै तब यह तितली प्रसन्नता से भर कर खुशी के गीत गाती है। कवि कहता है कि कभी हमें नानी सुनहरीपरी की एक कहानी सुनाती थी। तितली को देखकरहमें लगता है कि यही वह सुनहरी परी है। तितलीरानी, अपने घर के लिए बड़ी समझदार है।

तितली रानी (कविता) शब्दार्थ Meanings

  • रंगोली = अलग-अलग रंगों का मेल, त्योहार आदि पर रंगीन बुरादे से फर्श पर की जाने वाली चित्रकारी
  • स्वप्न = सपना
  • रुत = ऋतु
  • लुभाना = मोहित करना
  • स्वर्ण = सोना

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 14 हंस किसका? Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 14 हंस किसका? (2nd Language)

हंस किसका? अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਹੰਸ = हंस
  • ਰਾਜਕੁਮਾਰ = राजकुमार
  • ਸਿਧਾਰਥ = सिद्धार्थ
  • ਦੇਵਦੱਤ = देवदत्त
  • ਤੀਰ = तीर
  • ਪੱਟੀ = पट्टी
  • ਭਾਈਚਾਰਾ = भाईचारा
  • ਸੰਸਾਰ = संसार
  • ਪੇਮ = प्रेम
  • ਬੰਦ = बंद

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਖਿੜੇ = खिले
  • ਪੰਛੀ = पक्षी
  • ਖੰਭ = पंख
  • ਤੀਰ ਕਮਾਨ = धनुष-बाण
  • ਜ਼ਖਮੀ = घायल

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) द् + ध = द्ध, = सिद्धार्थ, बुद्ध
क् + ष = क्ष = पक्षी
प् + य = प्य = प्यार

(ख) ट् + ट = ट्ट = पट्टी
त् + त = त्त = उत्तर, देवदत्त

बताओ

प्रश्न 1.
राजकुमार का क्या नाम था?
उत्तर :
राजकुमार का नाम सिद्धार्थ था।

प्रश्न 2.
सिद्धार्थ कहाँ घूम रहा था?
उत्तर :
सिद्धार्थ बगीचे में घूम रहा था।

प्रश्न 3.
हंस क्यों छटपटा रहा था?
उत्तर :
हंस के शरीर में तीर लगा था इसीलिए वह छटपटा रहा था।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

प्रश्न 4.
सिद्धार्थ ने हंस की क्या सहायता की?
उत्तर :
सिद्धार्थ ने हंस को उठाकर धीरे से उसका तीर निकाला और फिर घाव धोकर उस पर पट्टी बाँधी।

प्रश्न 5.
सिद्धार्थ के चचरे भाई का क्या नाम था?
उत्तर :
सिद्धार्थ के चचेरे भाई का नाम देवदत्त था।

प्रश्न 6.
सिद्धार्थ के पिता ने हंस किसे और क्यों दिया?
उत्तर :
सिद्धार्थ के पिता ने हंस सिद्धार्थ को दिया क्योंकि उसने हंस को बचाया था।

प्रश्न 7.
सिद्धार्थ को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर :
सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 8.
गौतम बुद्ध ने संसार को कौन-सा पाठ पढ़ाया?
उत्तर :
गौतम बुद्ध ने संसार को सत्य, अहिंसा, प्रेम, दयालुता, करुणा, सहानुभूति और परोपकार का पाठ पढ़ाया।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

वाक्य पूरे करो

  1. बगीचे में …………………………………… फूल खिले हुए थे। – तीर
  2. हंस के शरीर में …………………………………… लगा हुआ था। – बचाने वाले
  3. मारने वाले से …………………………………… का हक ज्यादा होता है। – रंग-बिरंगे
  4. सिद्धार्थ बड़ा होकर …………………………………… बना। – गौतम बुद्ध
  5. …………………………………… सिद्धार्थ का चचेरा भाई था। – देवदत्त

उत्तर :

  1. रंग-बिरंगे
  2. तीर।
  3. बचाने वाले।
  4. गौतम बुद्ध
  5. देवदत्त।

पढ़ो और समझो

(क) पक्षी = पंछी
बगीचा = उपवन
तीर = बाण
शरीर = तन
पंख = पर
राजा = नृप
पशु-पक्षी = पशु और पक्षी
धनुष-बाण = धनुष और बाण
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के पर्यायवाचीशब्द सामने दर्शाए गए हैं।

(ख) राजकुमार = राजा का कुमार
राजमहल = राजा का महल
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के समास-शब्द सामने दर्शाये गए हैं। विद्यार्थी इन्हें समझ कर लिखने का अभ्यास करें।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

अन्तर समझो

(क) [हंस} के शरीर में तीर लगा हुआ था।
जोकर को देखकर मैं [हँस] पड़ा।
(ख) सिद्धार्थ हंस को लेकर राजमहल [की] ओर चल दिया।
देवदत्त ने शिकायत की [कि] सिद्धार्थ मेरा हंस नहीं दे रहा।
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों में (हंस/हँस) तथा (की/कि) शब्दों के अन्तर को दिखाया गया है। विद्यार्थी इन्हें समझें।

रचनात्मक अभिव्यक्ति

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका 2
चित्र देखकर वाक्य पूरे करो

  1. बालक …………………………………… को …………………………………… खिला रहा है।
  2. बालिका …………………………………… को …………………………………… पिला रही है।
  3. पिताजी …………………………………… को सहला रहे हैं।

उत्तर :

  1. बालक मुरगी को दाना खिला रहा
  2. बालिका गाय को पानी पिला रही है।
  3. पिताजी कुत्ते को सहला रहे हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

हंस किसका? बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
सिद्धार्थ को किस नाम से जाना जाता है?
(i) गौतम बुद्ध
(ii) गौतम भाई
(iii) गौतमभाई
(iv) राजकुमार।
उत्तर :
(i) गौतम बुद्ध

प्रश्न 2.
सिद्धार्थ के पिता ने हंस किसे दिया?
(i) सिद्धार्थ को
(ii) चचेरे भाई को
(iii) ममेरे भाई को
(iv) किसी को नहीं।
उत्तर :
(i) सिद्धार्थ को

प्रश्न 3.
पंजाबी शब्द ‘सधी’ का हिन्दी अर्थ है : जख्म/घायल/पागल/सहगल
उत्तर :
घायल

प्रश्न 4.
पंजाबी शब्द ‘प’ का हिन्दी अर्थ है : बुद्ध/बुद्धा/प्रबुद्ध/प्रसून
उत्तर :
बुद्ध

हंस किसका? Summary in Hindi

राजकुमार सिद्धार्थ बहुत ही दयालु था। उसे पशुपक्षियों से बहुत प्यार था। एक दिन वह बगीचे में घूम रहा था। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। पक्षी चहचहा रहे थे। अचानक पक्षियों का चहचहाना बंद हो गया। सिद्धार्थ ने ऊपर देखा। तभी अचानक एक हंस उसके पैरों के पास आकर गिरा। वह छटपटा रहा था, उसके शरीर में तीर लगा हुआ था।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

सिद्धार्थ ने हंस को ऊपर उठाया। उसके पंखों पर प्यार से हाथ फेरते हए तीर को निकाला और उसके घाव को धोकर उस पर पट्टी बाँधी। इतने में सिद्धार्थ का चचेरा भाई देवदत्त वहाँ आया उसके हाथ में धनुष-बाण था। आते ही उसने सिद्धार्थ से कहा, “यह हंस मेरा है, इसे मुझे दे दो।”

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका 1

इस पर सिद्धार्थ ने कहा, “नहीं यह हंस मेरा है। मैंने इसे बचाया है।” इतना कहते हुए सिद्धार्थ हंस को लेकर राजमहल की ओर चल दिया। पीछे-पीछे देवदत्त भी चल पड़ा। देवदत्त ने राजा शुद्धोधन से सिद्धार्थ की शिकायत की।

सिद्धार्थ ने कहा, “पिता जी, देवदत्त ने इसे तीर से मारा है, लेकिन मैंने इसे बचाया है। इसलिए यह हंस मेरा है।” देवदत्त भी अपनी बात पर अड़ा रहा। राजा शुद्धोधन ने दोनों की बात सुन कर फैसला सुनाया कि “देवदत्त तुमने इसे अपने तीर से निशाना बनाया परन्तु सिद्धार्थ ने इसे बचाया है और मारने वाले से बचाने वाले का हक ज्यादा होता है। इसलिए यह हंस सिद्धार्थ का है।” यही सिद्धार्थ बड़ा होकर गौतमबुद्ध बना जिसने दया तथा अहिंसा का पाठ पढ़ाया।

हंस किसका? शब्दार्थ :

  • राजकुमार = राजा का बेटा
  • दयालु = कृपायुक्त
  • प्यार = प्रेम
  • छटपटाना = तड़पना
  • चचेरा भाई = चाचा का बेटा
  • राजमहल = राजा का महल
  • हक = अधिकार
  • घाव = जख्म
  • घायल = ज़ख्मी
  • अहिंसा = किसी को हानि न पहुँचाना
  • परोपकार = दूसरे का भला करना
  • भाईचारा = भाई का नाता या भाव
  • सहानुभूति = हमदर्दी

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन

Punjab State Board PSEB 8th Class Physical Education Book Solutions Chapter 3 विटामिन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Physical Education Chapter 3 विटामिन

PSEB 8th Class Physical Education Guide विटामिन Textbook Questions and Answers

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1.
विटामिन किसे कहते हैं ?
उत्तर-
विटामिन (Vitamins) विटामिन रासायनिक पदार्थ होते हैं। हमारे शरीर की वृद्धि के लिए इनकी बहुत आवश्यकता होती है। यह शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं। यह हमारे शरीर की सुरक्षा करते हैं। इसलिए इन्हें रक्षक तत्त्व या जीवनदाता कहा जाता है। हमारे भोजन में इनका उचित मात्रा में विद्यमान होना बहुत ज़रूरी है। विटामिन मुख्य रूप से छः प्रकार के होते हैं। विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘बी’, विटामिन ‘सी’, विटामिन ‘डी’, विटामिन ‘ई’ और विटामिन ‘के’। विटामिन भिन्न-भिन्न खाद्य पदार्थों में भिन्न-भिन्न मात्रा में मिलते हैं।

प्रश्न 2.
विटामिन का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
विटामिनों का महत्त्व (Importance of Vitamins) विटामिनों का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है –

  1. विटामिन हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखते हैं।
  2. ये हमारी शारीरिक वृद्धि और विकास में सहायता करते हैं।
  3. ये हमारी पाचन शक्ति को बढ़ाते हैं।
  4. ये हमारे खून को साफ़ करते हैं और खून की मात्रा को बढ़ाते हैं।
  5. ये हड्डियों और दाँतों को मजबूत बनाते हैं।
  6. ये हमें बीमारियों का मुकाबला करने के योग्य बनाते हैं।
  7. विटामिनों के प्रयोग से चमड़ी के रोग दूर हो जाते हैं।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन

प्रश्न 3.
विटामिन ‘ए’ क्या होता है ? इसकी कमी व अधिकता के बारे में लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘ए’ (Vitamin A)-विटामिन ‘ए’ के काम निम्नलिखित हैं –

  1. इससे आँखों की ज्योति बढ़ती है।
  2. भूख बढ़ती है।
  3. पाचन-शक्ति ठीक रहती है।
  4. यह विटामिन शरीर के विकास और शक्ति की वृद्धि में योगदान देते हैं।

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—ये अधिकतर, दूध, दही, मक्खन, पनीर, अण्डों, मछली, पत्तों वाली सब्जियों जैसे पालक और ताज़ी सब्जियों जैसे गाजर, बन्दगोभी, टमाटर तथा केले, संतरे, आम, पपीता और अनानास आदि फलों में मिलते हैं।

विटामिन ‘ए’ की कमी से होने वाली हानियाँ-विटामिन ‘ए’ की कमी से छत के रोगों से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है और व्यक्ति बिमारियों का शिकार हो जाता है। आँखों में खारिश और जलन होने लग जाती है। इसकी कमी से रात को साफ दिखाई नहीं देता और व्यक्ति को अंधराता हो जाता है। अश्रु ग्रंथियां कार्य नहीं करतीं। त्वचा शुष्क और कठोर हो जाती है। गुर्दो में पत्थरी बनने की सम्भावना बढ़ जाती है। दांत टूटने लगते हैं। दाँतों में पायरिया नामक रोग हो जाता है।

विटामिन ‘ए’ की अधिक मात्रा से होने वाली हानियाँ- यदि बच्चों में विटामिन ‘ए’ की मात्रा बढ़ जाए तो बच्चों की त्वचा सूख जाती है। हाथों-पैरों की उंगलियों में सूजन आ जाती है। एक साधारण व्यक्ति में इस विटामिन की मात्रा बढ़ने से कमज़ोरी एवं थकावट महसूस होने लगती है। शरीर को सुस्ती और बेचैनी होने लगती है। कब्ज, सिरदर्द और जोड़ों में दर्द रहता है। आँखों में खून बहने के चिह्न प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 4.
विटामिन ‘बी’ कम्पलैक्स समूह किसे कहते हैं ? इसके प्राप्ति के स्रोतों के बारे में लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘बी'(Vitamin-B) यह कई विटामिनों का मिश्रण है। इस में विटामिन बी-1, बी-2, तथा बी-12 मिले रहते हैं। यह विटामिन बी-कम्पलैक्स (B-Complex) के नाम से जाना जाता है।

विटामिन ‘बी’ के कार्य (Functions of Vitamin-B) विटामिन ‘बी’ के कार्य इस प्रकार हैं –

  1. इस विटामिन से नर्वस सिस्टम (नाड़ी प्रणाली) ठीक रहता है।
  2. यह नाड़ियों, पेशियों, दिल और दिमाग को शक्ति प्रदान करता है।
  3. भूख को बढ़ाता है।
  4. चर्म रोगों से सुरक्षा करता है।

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—यह दूध, दही, मक्खन, पनीर, दालों, अनाज, सोयाबीन, मटर, अण्डे, हरी और पत्तों वाली सब्जियों, जैसे-पालक, बन्दगोभी, शलगम, टमाटर, प्याज़ और सलाद आदि में पाया जाता है।

प्रश्न 5.
विटामिन ‘सी’ क्या है ? इसके कार्य लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘सी’ (Vitamin C) विटामिन ‘सी’ पानी में घुलनशील है। इसके निम्नलिखित कार्य हैं –

  1. यह विटामिन लहू (खून, रक्त) को साफ़ रखता है।
  2. दांतों को मजबूत करता है।
  3. ज़ख्मों और टूटी हुई हड्डियों को भी शीघ्र ठीक करता है।
  4. शरीर की छूत की बीमारियों से रक्षा करता है।
  5. गले को ठीक रखता है।
  6. जुकाम से बचाता है।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (1)

प्राप्ति के स्रोत (Sources)- यह प्रायः रसदार और खट्टे पदार्थों में होता है। जैसेसंतरा, माल्टा, मुसम्मी, अंगूर, अनार, नींबू, अमरूद और आंवला आदि। इसके अतिरिक्त हरी सब्जियों, जैसे टमाटर, बन्दगोभी, गाजर, पालक, शलगम आदि में भी मिलता है।

विटामिन ‘सी’ की कमी से होने वाली हानियाँ-विटामिन ‘सी’ की कमी से ‘स्कर्वी’ रोग हो जाता है। हाथों-पैरों में दर्द और सूजन आ जाती है। हड्डियों का निर्माण और विकास रुक जाता है और हड़ियां टेढी-मेढी हो जाती हैं। ज़ख्म शीघ्र नहीं भरते और ज़ख्मों में से रक्त बहता है। दाँत कमजोर हो जाते हैं। मसूड़ों में से रक्त बहने लग जाता है। त्वचा का रंग पीला हो जाता है। आँखों के नीचे काले घेरे पड़ जाते हैं। छूत के रोग लगने की सम्भावना बढ़ जाती है।

प्रश्न 6.
विटामिन ‘डी’ क्या है ? इस विटामिन की कमी से होने वाली हानियाँ लिखिए।
उत्तर-

विटामिन डी (Vitamin D)-विटामिन ‘डी’ चर्बी में घुलनशील है। इसके कार्य निम्नलिखित हैं
1. यह विटामिन हड्डियों और दाँतों का निर्माण करता है।
2. उन्हें मज़बूत भी बनाता है।
PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (2)
3. बच्चों के शारीरिक विकास के लिए इसकी बहुत आवश्यकता होती है।

विटामिन ‘डी’ की कमी से होने वाली हानियाँ –
विटामिन ‘डी’ की कमी से मांसपेशियों व हड्डियों में दर्द होता है। छोटे बच्चों में दमा होने का डर रहता है। इसकी कमी से बच्चों को ‘सोका’ (शरीर का सूखना) रोग हो जाता है।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन

प्रश्न 7.
विटामिन ‘ई’ क्या है ? इस विटामिन की प्राप्ति के स्रोत लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘ई’ (Vitamin E)—विटामिन ‘ई’ चर्बी में घुलनशील है । इस विटामिन के कार्य इस प्रकार हैं –

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (3)

  1. यह विटामिन स्त्रियों और पुरुषों में सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति को बढ़ाता है।
  2. यह नपुंसकता और बांझपन को रोकता है।

प्राप्ति के स्त्रोत (Sources)—यह बन्दगोभी, गाजर, सलाद, मटर, प्याज, टमाटर, फूलगोभी में होता है। इसके अतिरिक्त शहद, गेहूँ, चावल, बीजों के तेल, अण्डे की जर्दी, बादाम, पिस्ता, चने की दाल और दलिया में अधिक मात्रा में होता है।

प्रश्न 8.
विटामिन ‘के’ क्या है ? इस विटामिन की कमी से होने वाली हानियाँ लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘के’ (Vitamin K)–विटामिन ‘के’ चर्बी में घुलनशील है। विटामिन ‘के’ के कार्य निम्नलिखित हैं

  1. यह विटामिन ज़ख्मों से रिस रहे रक्त को रोकता है।
  2. उसके जमाव में सहायता करता है।
  3. यह चमड़ी के रोगों से सुरक्षा करता है।

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—यह अधिकतर बन्दगोभी, पालक, मछली, सोयाबीन, टमाटर और अण्डे की जर्दी आदि में होता है।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (4)

विटामिन ‘के’ की कमी से होने वाली हानियाँ-इस विटामिन का निर्माण छोटी आंत में होने के कारण इसकी कमी बहुत कम होती है। यदि किसी को विटामिन ‘के’ की कमी हो तो उसे चोट लगने से उसका रक्त बहना बंद नहीं होता। त्वचा खुरदरी हो जाती है। जिगर की बीमारियां और दस्त लग जाते हैं। खून की कमी से सम्बन्धित रोग लग जाते हैं। समय से पूर्व (Pre Mature) पैदा होने वाले बच्चों में इस विटामिन की कमी रहती है।

Physical Education Guide for Class 8 PSEB विटामिन Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
विटामिन की किस्में हैं –
(क) विटामिन A
(ख) विटामिन B
(ग) विटामिन C और D
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
विटामिन D कहाँ से प्राप्त होता है ?
(क) दूध से
(ख) अनाज से
(ग) फलों से
(घ) धूप से।
उत्तर-
(घ) धूप से।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन

प्रश्न 3.
बेरी-बेरी रोग किस विटामिन की कमी से होता है ?
(क) विटामिन C
(ख) विटामिन A
(ग) विटामिन K
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) विटामिन C

प्रश्न 4.
किस विटामिन की कमी से स्कर्वी रोग होता है ?
(क) विटामिन C
(ख) विटामिन A
(ग) विटामिन D
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) विटामिन C

प्रश्न 5.
विटामिन की कमी से कौन-कौन से रोग लग जाते हैं ?
(क) अंधराता और चमड़ी के रोग
(ख) भूख नहीं लगती
(ग) अनीमिया रोग हो जाता है
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

बहुत छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
विटामिन कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
विटामिन छः प्रकार के होते हैं– A, B, C, D, E और K |

प्रश्न 2.
अंधराता रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है?
उत्तर-
यह रोग विटामिन A की कमी के कारण होता है।

प्रश्न 3.
किस विटामिन की कमी के कारण स्कर्वी रोग हो जाता है?
उत्तर-
विटामिन C की कमी के कारण।

प्रश्न 4.
बेरी-बेरी रोग किस विटामिन की कमी के कारण हो जाता है?
उत्तर-
विटामिन B की कमी के कारण।

प्रश्न 5.
पायोरिया रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है ?
उत्तर-
विटामिन C की कमी के कारण।

प्रश्न 6.
बांझपन का रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है?
उत्तर-
विटामिन E की कमी के कारण।

प्रश्न 7.
कौन-से विटामिन पानी में घुलनशील नहीं हैं ?
उत्तर-
विटामिन C, D, E और K ।

प्रश्न 8.
जीवन तत्त्व किन्हें कहते हैं?
उत्तर-
विटामिनों को।

प्रश्न 9.
पानी में घुलनशील विटामिन कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
विटामिन B तथा C ।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
विटामिन क्या होते हैं ?
उत्तर-
विटामिन (Vitamins)-विटामिन ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जो हमारे शरीर के विकास के लिए आवश्यक होते हैं। अब तक कई प्रकार के विटामिनों की खोज की जा चुकी है, परन्तु प्रमुख विटामिन छ:- ही हैं। ये हैं-विटामिन ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’, ‘डी’, ‘ई’ और ‘के’। इनमें विटामिन ‘बी’ और ‘सी’ पानी में घुलनशील हैं और शेष विटामिन ‘ए’, ‘डी’, ‘ई’ और ‘के’ चर्बी में घुलनशील होते हैं। विटामिन एक प्रकार के विशेष पदार्थों में पाए जाते हैं। भोजन में विटामिनों का उचित मात्रा में होना बहुत ज़रूरी है। विटामिन का जीवन के लिए बहुत अधिक महत्त्व अनुभव करते हुए इन्हें ‘जीवन दाता’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
विटामिन ‘ए’ के काम और प्राप्ति के स्रोत लिखो।
उत्तर-
विटामिन ‘ए’ (Vitamin A)-विटामिन ‘ए’ के काम निम्नलिखित हैं –

  1. इससे आँखों की ज्योति बढ़ती है।
  2. भूख बढ़ती है।
  3. पाचन-शक्ति ठीक रहती है।
  4. यह विटामिन शरीर के विकास और शक्ति की वृद्धि में योगदान देते हैं।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (5)

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—ये अधिकतर, दूध, दही, मक्खन, पनीर, अण्डों, मछली, पत्तों वाली सब्जियों जैसे पालक और ताज़ी सब्जियों जैसे गाजर, बन्दगोभी, टमाटर तथा केले, संतरे, आम, पपीता और अनानास आदि फलों में मिलते हैं।

प्रश्न 3.
विटामिन ‘ई’ और ‘के’ के प्राप्ति स्त्रोत लिखें।
उत्तर-
विटामिन ‘ई’ की प्राप्ति के स्त्रोत (Sources)—यह बन्दगोभी, गाजर, सलाद, मटर, प्याज, टमाटर, फूलगोभी में होता है। इसके अतिरिक्त शहद, गेहूं, चावल, बीजों के तेल, अण्डे की जर्दी, बादाम, पिस्ता, चने की दाल और दलिया में अधिक मात्रा में होता है।
विटामिन ‘के’ की प्राप्ति के स्त्रोत (Sources)—यह अधिकतर बन्दगोभी, पालक, मछली, सोयाबीन, टमाटर और अण्डे की जर्दी आदि में होता है।

प्रश्न 4.
हमारे शरीर को विटामिन की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर-
हमारे शरीर को विटामिनों की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से होती है –

  1. विटामिन हमारे स्वास्थ्य को बनाये रखते हैं।
  2. विटामिन हमारे शरीर में वृद्धि और विकास में सहायता करते हैं।
  3. विटामिन से हमें भूख लगती है।
  4. विटामिन हमारे रक्त को साफ करते हैं और इसमें बढ़ावा करते हैं।
  5. हड्डियों और दाँतों को मज़बूत रखते हैं।
  6. विटामिन हमारे शरीर में प्रतिरोधक शक्ति पैदा करते हैं।
  7. त्वचा के रोगों को ठीक करते हैं।
  8. वे हमारे शरीर को ताकत देते हैं।

PSEB 12th Class Chemistry Book Solutions Guide in Punjabi English Medium

Punjab State Board Syllabus PSEB 12th Class Chemistry Book Solutions Guide Pdf in English Medium and Punjabi Medium are part of PSEB Solutions for Class 12.

PSEB 12th Class Chemistry Guide | Chemistry Guide for Class 12 PSEB in English Medium

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता) Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 13 काम ही पूजा (कविता) (2nd Language)

काम ही पूजा (कविता) अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਲਲਾਰੀ = ललारी
  • ਪਗੜੀ = पगड़ी
  • ਧੋਬੀ = धोबी
  • ਗਵਾਲਾ = ग्वाला
  • ਕਿਸਾਨ = किसान
  • ਨਾਈ = नाई
  • ਮਾਲੀ = माली

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਕੰਮ = काम
  • ਇਜੱਤ = सम्मान
  • ਘੁਮਿਆਰ = कुम्हार
  • ਵੱਟ = सिलवट
  • ਚੁੰਨੀ = चुनरी
  • ਪੈਸ = इस्त्री

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) स् + त्+ र = स्र = इस्री
श् + ऋ = शृ = शृंगार
ग् + व = ग्व = ग्वाला
म् + ह = म्ह = कुम्हार

(ख) म् + म = म्म = सम्मान

(ग) ध + र् + म = धर्म
च + र् + म = चर्म

काम ही पूजा (कविता) शब्दार्थ Meanings

  • सम्मान = इज्जत
  • कुम्हार = मिट्टी के बर्तन बनाने वाला
  • चर्मकार= चमड़े का काम करने वाला
  • ललारी = रंगाई का काम करने वाला
  • मेहतर = सफ़ाई करने वाला
  • ग्वाला = घर में आकर दूध देने वाला व्यक्ति

बताओ

प्रश्न 1.
कुम्हार क्या काम करता है?
उत्तर :
कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाता है।

प्रश्न 2.
चर्मकार क्या काम करता है?
उत्तर :
चर्मकार, चमड़े का काम करता है।

प्रश्न 3.
रंगाई का काम करने वाले को क्या कहते हैं?
उत्तर :
रंगाई का काम करने वाले को ललारी कहते हैं।

प्रश्न 4.
धोबी क्या काम करता है?
उत्तर :
धोबी कपड़े धोता है और उन्हें इस्त्री करता है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

प्रश्न 5.
अपने आस-पास के उन सभी लोगों के नाम लिखो जो अपने हाथ से काम करते हों।
उत्तर :
ग्वाला, धोबी, ललारी, माली, फेरीवाला आदि।

वाक्य बनाओ

  1. कुम्हार,
  2. चर्मकार,
  3. ललारी,
  4. माली,
  5. मेहतर,
  6. ग्वाला

उत्तर :

  1. कुम्हार-कुम्हार बर्तन बना रहा है।
  2. चर्मकार-चर्मकार चमड़ा रंग रहा है।
  3. ललारी-ललारी कपड़ों को रंग रहा है।
  4. माली-माली पौधे लगा रहा है।
  5. मेहतर-मेहतर सफाई कर रहा था।
  6. ग्वाला-ग्वाला दूध दोह रहा है।

तुक मिलाओ

  1. गान = …………………………………
  2. माली = …………………………………
  3. बनाता = …………………………………
  4. शृंगार = …………………………………

उत्तर :

  1. गान = सम्मान।
  2. माली = लाली।
  3. बनाता = सजाता।
  4. श्रृंगार = आधार।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

समझो

  1. घड़ा = घड़े
  2. कपड़ा = …………………………………
  3. जूता = …………………………………
  4. गमला = …………………………………

उत्तर :

  1. घड़ा = घड़े।
  2. कपड़ा = कपड़े।
  3. जूता = जूते।
  4. गमला = गमले।

इन से नये शब्द बनायें

स्र, र, ‘,’ (‘ऋ’ की मात्रा)
उत्तर :
स्त्र = स्त्री।
र् = मार्ग।
ऋ = मृग।

रचनात्मक अभिव्यक्ति
नीचे दिए गए चित्रों का ध्यान से देखो। प्रत्येक पर तीन चार वाक्य लिखें।

बच्चे घर के फालतू सामान से कोई फोटो फ्रेम, पेन/पेंसिल स्टेंड आदि बनायें अथवा कोई तसवीर बनाकर उसमें रंग भरें।

नीचे दिए गए शब्दों की सहायता से वाक्य पूरे करो –
कपड़ा, जूते, लकड़ी, लोहे, रंग

  1. लुहार ………………………………… का काम करता है।
  2. चर्मकार ………………………………… बनाता है।
  3. पेंटर खिड़की और दरवाज़ों पर ………………………………… करता है।
  4. जुलाहा ………………………………… बुनता है
  5. बढ़ई ………………………………… का काम करता है।

उत्तर :

  1. लुहार लोहे का काम करता है।
  2. हलवाई मिठाई बनाता है।
  3. पेंटर खिड़की और दरवाजों पर रंग करता है।
  4. जुलाहा कपड़ा बुनता है।
  5. बढ़ई लकड़ी का काम करता है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

काम ही पूजा (कविता) बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘ललाठी’ का हिन्दी अर्थ है। लाती/लालिमा/ललारी/ललाही
उत्तर :
ललारी

प्रश्न 2.
पंजाबी शब्द ‘ठाडाला’ का हिन्दी अर्थ है: गवला/ग्वाला/गाला/पाला
उत्तर :
ग्वाला

प्रश्न 3.
कुम्हार क्या बनाता है?
(i) बर्तन
(ii) सर्तन
(iii) कुर्बान
(iv) तुरतन।
उत्तर :
(i) बर्तन

प्रश्न 4.
हम इन्हें क्या कहते हैं। सही पर गोला लगाओ?
कपड़ों को रंग करने वाला- धोबी/ललारी
उत्तर :
ललारी।

काम ही पूजा (कविता) Summary in Hindi

1. काम ही पूजा, काम धर्म है
इस मंत्र का, गान करें।
काम कोई भी, नहीं है छोटा
काम का हम सम्मान करें।

शब्दार्थ :

  • गान करें = गाएँ।
  • सम्मान = इज्ज़त, आदर।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

सरलार्थ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिन्दी की पाठ्य-पुस्तक में संकलित कविता ‘काम ही पूजा’ से ली गई हैं। इसमें कवि काम को पूजा के समान समझाते हुए, काम करने पर बल देते हुए कहता है कि काम करना ही हमारी पूजा होनी चाहिए, काम करना ही हमारा धर्म होना चाहिए। हमें इसी मंत्र को “ना चाहिए। काम कोई भी हो, वह छोटा नहीं होता। इसलिए हमें काम की इज्जत करनी चाहिए।

2. यह कुम्हार है-घड़े बनाता।
गमले बर्तन-खूब सजाता।
चर्मकार-जूते चमकाए।
टूटे गाँठ दे नए बनाए।

शब्दार्थ :

  • कुम्हार = मिट्टी के बर्तन बनाने वाला।
  • चर्मकार = चमड़े का काम करने वाला।
  • गाँठ कर = मुरम्मत करके।

सरलार्थ :
काम को पूजा समझना चाहिए इस तथ्य पर बल देते हुए कवि कहता है कि यह कुम्हार है, जो घड़े बनाता है। वह गमले और बर्तन बनाकर उन्हें खूब सजाता है। यह चमड़े का काम करने वाला चर्मकार है। जो जूते बनाकर उन्हें चमकाता है और पुराने टूटे हुए जूतों को गाँठ कर नए बना देता है।।

3. यह ललारी खुशियाँ बिखराता,
चुनरी पगड़ी पे रंग चढ़ाता।
रंगों से जब रंग मिल जाते,
जीवन को रंगीन बनाते।

शब्दार्थ :

  • ललारी = कपडे रंगने वाला।
  • रंगीन = खुशियों से भरा, रंगदार।

सरलार्थ :
कवि कहता है कि यह कपड़े रंगने वाला ललारी है जो कपड़ों को रंगकर हमारे जीवन में खुशियाँ भर देता है। वह चुनरी हो या पगड़ी, उस पर रंग चढ़ाता है। जब रंगों से रंग मिल जाते हैं तो। वे हमारे जीवन को रंगों से भर देते हैं। हमारे जीवन को खशियों से भरा बना देते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

4. धोकर कपड़े इस्त्री है करता,
कपड़ों की सिलवट को हरता।
धुले-प्रैस कपड़े हम पाएँ,
धोबी को तब भूल न जाएं।

शब्दार्थ :

  • इस्त्री = प्रैस-कपड़ों की सिलवटें निकालने की क्रिया।
  • सिलवट = बल।
  • हरता = दूर करता।

सरलार्थ : कवि कहता है कि धोबी कपड़ों को धोकर उन पर इस्त्री करता है और इस तरह वह कपड़ों की सिलवटें दूर करता है। जब भी हम धुले हुए और इस्त्री किए हुए कपड़ों को प्राप्त करें हम धोबी को न भूल जाएँ।

5. हो किसान नाई या माली,
देते हैं जीवन को लाली।
मेहतर हो या फेरी वाला,
कोई नहीं कम चाहे ग्वाला॥

शब्दार्थ :

  • लाली = खुशियाँ।
  • ग्वाला = दूध बेचने वाला।

सरलार्थ :
कवि कहता है कि चाहे किसान हो, नाई हो या माली हो। ये सभी अपना-अपना काम करके हमारे जीवन को खुशियों से भर देते हैं। चाहे कोई मेहतर हो या कोई फेरी वाला हो या फिर ग्वाला हो, कोई भी कम नहीं है। सबका अपनाअपना महत्त्व है।

6. प्यारे बच्चो इतना जानो।
मन से करो जो भी ठानो।
काम ही जीवन का श्रृंगार।
काम ही है सुख का आधार॥

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

शब्दार्थ :

  • मन से करना = जी लगाकर करना।
  • ठानो = निश्चय करो।
  • श्रृंगार = सजावट।

सरलार्थ :
कवि कहता है कि प्यारे बच्चो इतना समझ लो कि जिस काम को करने का तुम निश्चय कर लेते हो उसे जी लगा कर करो क्योंकि काम ही जीवन की सजावट है और काम ही सुख का आधार है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो! Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 12 हमारी भी सुनो! (2nd Language)

हमारी भी सुनो! अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਗੇਂਦ = गेंद
  • ਗੱਪਸ਼ਪ = गपशप
  • ਦੁਰਘਟਨਾ = दुर्घटना
  • ਸੜਕ = सड़क
  • ਬੱਤੀ = बत्ती
  • ਬੁੱਤ = बुत
  • ਸਦਉਪਯੋਗ = सदुपयोग
  • ਦੁਰਉਪਯੋਗ = दुरुपयोग

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਰਸਤਾ = पथ
  • ਮੋਟਰ ਗੱਡੀ = मोटर गाड़ी
  • ਖਤਰਾ = जोखिम
  • ਅੱਖਾਂ = आँखों
  • ਇੰਤਜਾਰ = प्रतीक्षा
  • ਸੁਰਖਿਆ = सुरक्षा
  • ਖੱਬੇ = बाएं
  • मॅने = दाएं

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) प् + र = प्र = प्रयोग
क् + ष = क्ष = सुरक्षा
दु + र् = दुर् = दुर्घटना
ज + य = ज्य = ज्यादा

(ख) न् + न = न्न = चुन्नू-मुन्नू
ल् + ल = ल्ल = उल्लंघन
त् + त = त्त = बत्ती

हमारी भी सुनो! शब्दार्थ Meaning

  • दुःख = कष्ट, तकलीफ
  • उल्लंघन = नियम को तोड़ना
  • जोखिम = खतरा
  • दुर्घटना = बुरी घटना
  • दुरुपयोग = बुरा उपयोग
  • सदुपयोग = अच्छा उपयोग
  • इशारा = संकेत
  • अनदेखा = बिना देखे
  • बुत = मूर्ति की तरह जड़
  • प्रतीक्षा = इन्तज़ार

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

बताओ

प्रश्न 1.
चुन्नू-मुन्नू को चोट कैसे लगी?
उत्तर :
गेंद खेलते समय मोटर गाड़ी से टकरा जाने के कारण चुन्नू-मुन्नू को चोट लगी।

प्रश्न 2.
लाल बत्ती हमें क्या संकेत देती है?
उत्तर :
लाल बत्ती हमें रुकने का संकेत देती है।

प्रश्न 3.
पीली बत्ती पर हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर :
पीली बत्ती पर हमें चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।

प्रश्न 4.
हरी बत्ती का क्या अर्थ है?
उत्तर :
हरी बत्ती चलने का संकेत देती है।

प्रश्न 5.
हमें सड़क कैसे पार करनी चाहिए?
उत्तर :
सड़क हमेशा पहले बाईं ओर देखकर फिर दाईं ओर देखकर पार करनी चाहिए।

प्रश्न 6.
सड़क पर काली-सफेद धारियाँ क्यों बनी होती हैं?
उत्तर :
सड़क पर काली-सफेद धारियाँ पैदल चलने वालों के लिए बनी होती हैं। इसे ज़ेबरा क्रासिंग कहते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

सही मिलान करो

काली-सफेद धारियाँ – रुकना
पीली बत्ती – चलना
हरी बत्ती – तैयार रहना
लाल बत्ती – पैदल सड़क पार करना
उत्तर :
काली-सफ़ेद धारियाँ – पैदल सड़क पार करना।
पीली बत्ती – तैयार रहना।
हरी बत्ती – चलना।
लाल बत्ती – रुकना।

पढ़ो, समझो और लिखो

आज = कल
दाएँ = बाएँ
सुख = दुःख
चलना = रुकना
ऊपर = नीचे
सदुपयोग = दुरुपयोग
खड़ा = बैठा
काली = सफेद
उत्तर :
उपरोक्त शब्दों के विपरीतार्थक शब्द उनके सामने दिए गए हैं। विद्यार्थी उन्हें याद करके लिखें।

समझो

कालिमा = काला
लालिमा = लाल
पीतिमा = पीला
हरीतिमा = हरा

रचनात्मक कौशल
बच्चे ज़ेबरा लाइनों, लाल, पीली और हरी बत्ती का चित्र बनायें तथा उनमें रंग भरें।

इन्हें अपनायें

(1) हमेशा सड़क के बाईं ओर चलें।
(2) सड़क के निकट गेंद न खेलें।
(3) सड़क हमेशा दाएँ-बाएँ देखकर पार करनी चाहिए।
(4) पैदल चलते समय सड़क हमेशा काली-सफेद धारियों, जिन्हें ज़ेबरा लाइनें कहा जाता है, से पार करनी चाहिए।
(5) लाल बत्ती होने पर रुकना चाहिए।
(6) पीली बत्ती होने पर चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।
(7) हरी बत्ती होने पर चलना चाहिए।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

हमारी भी सुनो! बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘टिंउलात’ का हिन्दी अर्थ : इंतर/अंतर/प्रतीक्षा/परीक्षा
उत्तर :
प्रतीक्षा

प्रश्न 2.
पंजाबी शब्द ‘अधां’ का हिन्दी अर्थ है : अंखी/आँखें/आँहें/आटी
उत्तर :
आँखें

प्रश्न 3.
लाल बत्ती क्या संकेत देती है ?
(i) रुकने
(ii) चलने
(iii) दौड़ने
(iv) भगाने।
उत्तर :
(i) रुकने

प्रश्न 4.
हरी बत्ती क्या संकेत देती है?
(i) रुकने
(ii) चलने
(iii) फिरने
(iv) दौड़ने।
उत्तर :
(i) चलने

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

प्रश्न 5.
अगर ‘आज’-कल है तो सदुपयोग है
(i) परसो
(ii) दुरुपयोग।
(iii) सच्चा
(iv) अच्छोपयोग।
उत्तर :
(ii) दुरुपयोग

प्रश्न 6.
अगर ‘ऊपर-नीचे है तो ‘काली’ है
(i) सफेद
(ii) कालिया
(iii) कलुआ
(iv) सफेदा।
उत्तर :
(i) सफेद।

हमारी भी सुनो! Summary in Hindi

सड़क पर पाये जाने वाले रास्ते और ट्रैफिक बत्तियाँ आपस में बातें करते हैं। कालिमा पैदल पथ को बताती है कि लोग उसका प्रयोग लापरवाही से करते हैं। आज ही सुबह चुन्नू-मुन्नू को चोट लग गई। वे गेंद खेलते-खेलते मोटरगाड़ी से टकरा गए। पैदलपथ ने कहा कि बच्चे मानते ही नहीं।

उन्हें मेरे साथ ही चलना चाहिए। हम लोगों की सेवा के लिए हैं पर लोग हमारा दुरुपयोग करते हैं। उनकी बातें सुनकर लालिमा और पीतिमा और हरीतिमा ने भी अपनी-अपनी राम कहानी सुनाई कि किस तरह लोग उनकी अनदेखी करते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो! 1

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

उनकी बातें सुनकर जेबरा ने कहा कि यदि पैदल चलने वाले उसी से सड़क पार करें और वाहन चालक उससे पहले बनी सफेद लकीर पर वाहन रोक दें तो पैदल चलने वालों को असुविधा न हो। इस पर कालिमा ने कहा कि लोगों को सदा मेरी बायीं ओर ही चलना चाहिए।

पैदलपथ ने कहा कि यदि लोग हमारी बातों को मानेंगे तो दुर्घटना नहीं होगी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 11 साहसी दीपा Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 11 साहसी दीपा (2nd Language)

साहसी दीपा अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिन्दी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਲੜਕੀ = लड़की
  • ਨੌਕਰੀ = नौकरी
  • ਸਹੇਲੀ = सहेली
  • ਨਦੀ = नदी
  • ਬਹਾਦੁਰ = बहादुर
  • ਮਗਰਮੱਛ = मगरमच्छ

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिन्दी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिन्दी शब्दों को लिखो :

  • ਬਾਰ੍ਹਾਂ = बारह
  • ਜੀਉਂਦੇ = जीवित
  • ਪ੍ਰਸੰਸਾ = सराहना।
  • ਇਨਾਮ = पुरस्कार

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) च् + छ = च्छ = अच्छा, मगरमच्छ
न् + य = न्य = धन्यवाद
ल् + द = ल्द = जल्दी
स् + क = स्क = पुरस्कार

बताओ

प्रश्न 1.
दीपा कैसी लड़की थी?
उत्तर :
दीपा साहसी लड़की थी।

प्रश्न 2.
दीपा नदी के किनारे क्या कर रही थी?
उत्तर :
दीपा नदी के किनारे कपड़े धो रही थी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

प्रश्न 3.
‘बचाओ-बचाओ’ की आवाजें किसने लगाईं?
उत्तर :
बचाओ-बचाओ’ की आवाजें हरीश ने लगाईं।

प्रश्न 4.
दीपा की सहेली ने उसे नदी में कूदने से मना क्यों किया?
उत्तर :
पानी में तेजी से बढे आ रहे मगरमच्छ को देखकर दीपा की सहेली ने दीपा को पानी में कूदने से मना किया।

प्रश्न 5.
दीपा ने रवि को डूबने से कैसे बचाया?
उत्तर :
दीपा झट से पानी में कूद गई और रवि को पानी से निकाल कर बाहर ले आई। इस प्रकार उसने रवि को डूबने से और मगरमच्छ से बचाया।

प्रश्न 6.
दीपा को कौन-सा पुरस्कार, कब मिला?
उत्तर :
दीपा को वीरता का पुरस्कार 26 जनवरी को मिला।

वाक्य पूरे करो

होशियार किनारे मगरमच्छ बहादुर धन्यवाद वीरता पुरस्कार।

  1. दीपा ………………………. और ………………………. लड़की थी।
  2. नदी में ………………………. था।
  3. दीपा रवि को ………………………. पर ले आई।
  4. रवि और हरीश के माता-पिता ने दीपा का ………………………. किया।
  5. दीपा को 26 जनवरी के दिन ………………………. मिला।

उत्तर :

  1. दीपा बहादुर और होशियार लड़की थी।
  2. नदी में मगरमच्छ था।
  3. दीपा रवि को किनारे पर ले आई।
  4. रवि और हरीश के माता-पिता ने दीपा का धन्यवाद किया।
  5. दीपा को 26 जनवरी के दिन वीरता पुरस्कार मिला।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

वाक्य बनाओ

  1. हिम्मत,
  2. धन्यवाद,
  3. बहादुरी,
  4. पुरस्कार,
  5. ठान लेना,
  6. हिम्मत बंधाना,
  7. एक न मानना,
  8. खाली हाथ लौटना,
  9. अपना-सा मुँह लेकर रह जाना।

उत्तर :

  1. हिम्मत-वह बहुत हिम्मत करके मेरे पास आया।
  2. धन्यवाद-मुख्याध्यापक ने अतिथि का धन्यवाद किया।
  3. मगरमच्छ-मगरमच्छ पानी में रहता है।
  4. पुरस्कार-दीपा को उसकी बहादुरी पर वीरता पुरस्कार मिला।
  5. ठान लेना-मैंने इस प्रतियोगिता को जीतने की ठान ली है।
  6. एक न मानना-वह अपने माता-पिता की एक नहीं मानता, अपने मन की करता है।
  7. हिम्मत बँधाना-दीपा ने हरीश को हिम्मत बँधाई।
  8. खाली हाथ लौटना-मगरमच्छ को खाली हाथ लौटना पड़ा।
  9. अपना सा मुँह लेकर रह जाना-मगरमच्छ शिकार हाथ से निकलते देखकर अपना सा मुँह लेकर रह गया।

पढ़ो, समझो और लिखो

साल = वर्ष
लड़की = बालिका
किनारा = तट
जीवित – ज़िन्दा
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के पर्यायवाची शब्द सामने दर्शाये गए हैं। विद्यार्थी इन पर्याय-शब्दों को स्मरण रखें।

लिंग बदलो

  1. माता = ……………………….
  2. लड़की = ……………………….

उत्तर :

  1. माता = पिता।
  2. लड़की = लड़का।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

समझो

गाँव = शहर
घर = बाहर
डूबना = तैरना
वीर = कायर
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द उनके सामने लिखे गए हैं। विद्यार्थी इन्हें समझकर कण्ठस्थ कर लें।

इनसे नये शब्द बनाओ

  1. च्छ
  2. न्य
  3. स्क
  4. ल्द

उत्तर :

  1. च्छ = स्वच्छ।
  2. न्य = अन्य।
  3. स्क= पुरस्कार।
  4. ल्द = जल्द।

रचनात्मक अभिव्यक्ति

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा 1
चित्र देखकर नीचे दिए गए शब्दों की सहायता से वाक्य पूरे करो

साहसी दुकान दीवाली पटाखों आग बच्चा बचा

…………………………………. का त्योहार है। बाज़ार में …………………………………. की दुकानें सजी हुई हैं। एक दुकान में अचानक …………………………………. लग गई है। एक …………………………………. आग में फँस गया है। वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा है। एक बालिका उसे जान पर खेलकर …………………………………. रही है। वह …………………………………. बालिका है।
उत्तर :
दीवाली का त्योहार है। बाज़ार में पटाखों की दुकानें सजी हुई हैं। एक दुकान में अचानक आग लग गई है। एक बच्चा आग में फँस गया है। वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा है। एक बालिका उसे जान पर खेलकर बचा रही है। वह साहसी बालिका है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

साहसी दीपा बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
दीपा कैसी लड़की थी?
(i) साहसी
(i) निडर
(iii) योगी
(iv) सुंदर।
उत्तर :
(i) साहसी

प्रश्न 2.
दीपा नदी किनारे क्या कर रही थी?
(i) कपड़े धो रही थी
(ii) कपड़े सिल रह थे
(iii) खेल रही थी
(iv) सो रही थी।
उत्तर :
(i) कपड़े धो रही थी

प्रश्न 3.
‘ठान लेना’ का अर्थ है
(i) पक्का इरादा
(ii) पक्की बात
(iii) पक्के लोग
(iv) पक्की रस्सी।
उत्तर :
(i) पक्का इरादा

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

प्रश्न 4.
अगर ‘गाँव’-शहर है तो ‘घर ………………………………. है।
(i) बाहर
(ii) बाह्य
(iii) बाहरी
(iv) बाहु।
उत्तर :
(i) बाहर।

साहसी दीपा Summary in Hindi

पाठ का सार माधोपुर गाँव में दीपा नामक लड़की रहती थी। उसकी आयु बारह वर्ष की थी। उसके पिता शहर में नौकरी करते थे और माँ घर में बीमार रहती थी। दीपा बड़ी बहादुर लड़की थी। सारे घर के कामकाज करती और नदी में कपड़े धोने भी जाती थी।

एक दिन दीपा अपनी सहेली के साथ नदी के किनारे कपडे धो रही थी और थोड़ी ही दूरी पर रवि और हरीश नदी में नहा रहे थे। नहाते-नहाते रवि नदी में डूबने लगा तो हरीश ने उसे बचाने की कोशिश की और सहायता के लिए चिल्लाने लगा।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा 2

उसकी आवाज़ सुनकर दीपा उसकी सहायता के लिए दौड़ी तो उसकी सहेली ने उसे मना कर दिया क्योंकि उसने देखा कि पानी में मगरमच्छ रवि की ओर चला आ रहा था। लेकिन दीपा ने इसकी परवाह नहीं की और पानी में कूद गई। उसने जल्दी से रवि को पकड़ा और किनारे पर ले आई।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 11 साहसी दीपा

इस प्रकार उसने रवि को मगरमच्छ से बचा लिया। इतने में दीपा की सहेली रवि और हरीश के माता-पिता को ले आई। अपने बच्चों को सुरक्षित देखकर वे बहुत खुश हुए और दीपा का धन्यवाद किया। गाँव के सभी लोगों ने भी दीपा के साहस की सराहना की।

दीपा की बहादुरी पर उसे 26 जनवरी को पुरस्कार दिया गया।

साहसी दीपा शब्दार्थ Meanings

  • होशियार = सावधान, चौकस
  • कोशिश = प्रयास, यत्न
  • मगरमच्छ = गहरे जल में पाया जाने वाला बहुत बड़ा, भीषण एवं हिंसक जंतु, घड़ियाल
  • चंगुल = हाथ की उँगलियों के मोड़ने से बनी मुद्रा, पकड़, काबू
  • धन्यवाद = कृतज्ञता
  • सराहना = प्रशंसा प्रकट करने का शब्द
  • पुरस्कार = इनाम

PSEB 9th Class SST Solutions Geography Chapter 5 प्राकृतिक वनस्पति तथा जंगली जीवन

Punjab State Board PSEB 9th Class Social Science Book Solutions Geography Chapter 1a भारत : आकार व स्थिति Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 9 Social Science Geography Chapter 1a भारत : आकार व स्थिति

SST Guide for Class 9 PSEB भारत : आकार व स्थिति Textbook Questions and Answers

(क) नक्शा कार्य (Map Work) :

प्रश्न 1.
भारत के रेखाचित्र में भरें(i) कुदरती वनस्पति के कोई 3 किस्म के क्षेत्र। (ii) किसी पांच राज्यों में राष्ट्रीय पार्क। (iii) पंजाब की सुरक्षित जलगाहें (पंजाब के रेखाचित्र में)।
उत्तर-
यह प्रश्न विद्यार्थी MBD Map Master की सहायता से स्वयं करें।

प्रश्न 2.
निम्न दी गई तस्वीरों में वृक्ष पहचान कर वनस्पति की प्रकार बताएं।
PSEB 9th Class Social Science Guide भारत आकार व स्थिति Important Questions and Answers (1)
उत्तर-
यह प्रश्न विद्यार्थी स्वयं करें।

प्रश्न 3.
अपने क्षेत्र के 10 वृक्षों, 5 जानवरों तथा 5 पक्षियों की तस्वीरें चार्ट पर लगाकर नाम लिखें।
उत्तर-
यह प्रश्न विद्यार्थी स्वयं करें।

(ख) निम्न के उत्तर एक शब्द से एक वाक्य में दें:

  1. पौधे ………. की ……….. से ………… विधि द्वारा अपना भोजन तैयार करते हैं।
  2. पंजाब का ………… फीसदी क्षेत्र वनों के अधीन है जो कि ……….. वर्ग किलोमीटर है।
  3.  …………. मंडल में वनस्पति उगती है और ……… की प्रकार ……… पर असर डालती है।

उत्तर-

  1. सूर्य, किरणें, फोटोसिंथेसिस
  2. 6.07%, 3058.
  3. जीव, मिट्टी, वनस्पति।

प्रश्न 4.
पृथ्वी का वो कौन-सा मंडल है जिसमें जीवन है :
(i) वायु मंडल
(ii) थल मंडल
(iii) जल मंडल
(iv) जीव मंडल।
उत्तर-
(iv) जीव मंडल में।

प्रश्न 5.
इनमें से कौन-से जिले में सबसे अधिक वन मिलते हैं ?
(i) मानसा
(ii) रूपनगर
(iii) अमृतसर
(iv) बठिंडा।
उत्तर-
(ii) रूपनगर में।

प्रश्न 6.
चिंकारा कौन-से जानवर की प्रकार है ?
उत्तर-
चिंकारा एक छल्लेदार सींगों वाला हिरन है।

प्रश्न 7.
बीड़ क्या होती है ?
उत्तर-
कुछ क्षेत्रों में घनी वनस्पति होती थी तथा इसके छोटे बड़े टुकड़ों को बीड़ कहते हैं।

प्रश्न 8.
उप उष्ण झाड़ीदार वनस्पति में मिलती घास का नाम लिखें।
उत्तर-
यहां लंबी प्रकार का घास-सरकंडा मिलता है।

प्रश्न 9.
पंजाब के कुल क्षेत्रफल का कितने फीसदी क्षेत्र वनों के अधीन है ?
उत्तर-
6.07%.

प्रश्न 10.
झाड़ियां व कांटेदार वनस्पति वाले क्षेत्रों में कौन-से जानवर मिलते हैं ?
उत्तर-
यहां ऊंट, शेर, बब्बर शेर, खरगोश, चूहे इत्यादि मिलते हैं।

(ग) इन प्रश्नों के संक्षेप उत्तर दें :

प्रश्न 1.
फलोरा व फौना क्या है ? स्पष्ट करें।
उत्तर-
किसी विशेष क्षेत्र में मिलने वाले पौधों के लिए फलोरा शब्द प्रयोग किया जाता है। उस क्षेत्र के पौधे उस क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी, वर्षा इत्यादि पर निर्भर करते हैं। इस प्रकार किसी क्षेत्र में मिलने वाले जानवरों की प्रजातियों को फौना कहा जाता है। प्रत्येक क्षेत्र में मिलने वाले जानवरों की प्रजातियां भी अलग-अलग होती हैं।

प्रश्न 2.
वनों की रक्षा क्यों आवश्यक है, लिखें।
उत्तर-

  1. वन जलवायु पर नियंत्रण रखते हैं। सघन वन गर्मियों में तापमान को बढ़ने से रोकते हैं तथा सर्दियों में तापमान को बढ़ा देते हैं।
  2. सघन वनस्पति की जड़ें बहते हुए पानी की गति को कम करने में सहायता करती हैं। इससे बाढ़ का प्रकोप कम हो जाता है। दूसरे जड़ों द्वारा रोका गया पानी भूमि के अंदर समा लिए जाने से भूमिगत जल-स्तर (Water-table) ऊंचा उठ जाता है। वहीं दूसरी ओर धरातल पर पानी की मात्रा कम हो जाने से पानी नदियों में आसानी से बहता रहता है।
  3. वृक्षों की जड़ें मिट्टी की जकड़न को मज़बूत किए रहती हैं और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं।
  4. वनस्पति के सूखकर गिरने से जीवांश के रूप में मिट्टी को हरी खाद मिलती है।
  5. हरी-भरी वनस्पति बहुत ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है। इससे आकर्षित होकर लोग सघन वन क्षेत्रों में यात्रा, शिकार तथा मानसिक शांति के लिए जाते हैं। कई विदेशी पर्यटक भी वन-क्षेत्रों में बने पर्यटन केंद्रों पर आते हैं। इससे सरकार को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
  6. सघन वन अनेक उद्योगों के आधार है। इनमें से कागज़, लाख, दियासिलाई, रेशम, खेलों का सामान, प्लाईवुड, गोंद, बिरोजा आदि उद्योग प्रमुख हैं।

प्रश्न 3.
सदाबहार वनों की विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  1. सदाबहार वनों के सभी पत्ते एक साथ नहीं झड़ते तथा हमेशा हरे रहते हैं।
  2. यह वन गर्म तथा नमी वाले क्षेत्रों में मिलते हैं जहां पर 200 सैंटीमीटर से अधिक वर्षा होती है।
  3. सदाबहार वनों के पेड़ 60 मीटर या उससे ऊंचे भी जा सकते हैं।
  4. यह वन घने होने के कारण एक छतरी (Canopy) बना लेते हैं। जहां से कई बार तो सूर्य की किरणें धरातल तक नहीं पहुंच पातीं।
  5. पेड़ों के नीचे बहुत-से छोटे-छोटे पौधे उग जाते हैं तथा आपस में उलझ जाते हैं जिस कारण इनमें निकलना मुश्किल होता है।

प्रश्न 4.
पंजाब की प्राकृतिक वनस्पति से जान-पहचान करवाएं।
उत्तर-
इस समय पंजाब के कुल क्षेत्रफल का केवल 6.07% हिस्सा ही वनों के अंतर्गत आता है। इसका काफी बड़ा भाग मनुष्यों द्वारा उगाया जा रहा है। पंजाब की प्राकृतिक वनस्पति को कई भागों में बांटा जा सकता है

  1. हिमालय प्रकार की सीधी शीत उष्ण वनस्पति
  2. उपउष्ण झाड़ीदार पर्वतीय वनस्पति
  3. उपउष्ण झाड़ीदार वनस्पति वनस्पति
  4. उष्ण शुष्क पतझड़ी वनस्पति
  5. उष्ण कांटेदार वनस्पति।

प्रश्न 5.
आंवला, तुलसी तथा सिनकोना के क्या लाभ हो सकते हैं, लिखें।
उत्तर-

  1. आंवला-आंवला विटामिन सी से भरा होता है तथा यह व्यक्ति की पाचन शक्ति को ठीक करने में सहायता करता है। आंवला कब्ज, शूगर तथा खांसी को दूर करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
  2. तुलसी-अगर किसी को बुखार, खांसी या जुकाम हो जाए तो तुलसी काफी लाभदायक होती है।
  3. सिनकोना-सिनकोना के पौधे की छाल को कुनीन बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है जिसे मलेरिया ठीक करने के लिए दिया जाता है।

(घ) निम्नलिखित प्रश्नों के विस्तृत उत्तर दें:

प्रश्न 1.
प्राकृतिक वनस्पति मानव समाज के फेफड़े होते हैं, कैसे ?
उत्तर-
इसमें कोई शंका नहीं है कि प्राकृतिक वनस्पति मानवीय समाज के फेफड़े होते हैं। अग्रलिखित बिंदुओं से यह स्पष्ट हो जाएगा

  1. जंगल बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ते हैं तथा कार्बन-डाइऑक्साइड का प्रयोग करते हैं। यह ऑक्सीजन जानवरों तथा मनुष्यों को जीवन देती है।
  2. जंगल पृथ्वी में मौजूद पानी के स्तर को ऊंचा करने में काफी सहायता करते हैं।
  3. जंगल के पेड़ों में मौजूद पानी सूर्य की गर्मी के कारण वाष्प बनकर उड़ता रहता है जो वायु के तापमान को कम करने में सहायता करता है।
  4. जंगलों में बहुत-से जीव रहते हैं तथा उन्हें भोजन तथा रहने का स्थान जंगल में ही मिलता है।
  5. हमारे वातावरण को सुंदर तथा स्वस्थ बनाने में भी जंगल काफी सहायक होते हैं।
  6. पवन की गति को कम करने, ध्वनि प्रदूषण को कम करने तथा सूर्य में चमक को कम करने में जंगल काफी सहायता करते हैं।
  7. वृक्ष की जड़ें मिट्टी के कणों को पकड़ कर रखती हैं जिस कारण जंगलों से भूमि क्षरण नहीं होती।
  8. वर्षा करवाने में भी जंगल काफी सहायक होते हैं।
  9. जंगलों से हम कई प्रकार की लकड़ी प्राप्त करते हैं।
  10. जंगलों के कारण ही कई प्रकार के उद्योगों का विकास हो पाया है।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक वनस्पति को कौन-से भौगोलिक तत्त्व प्रभावित करते हैं ?
उत्तर-
अलग-अलग क्षेत्रों में बहुत-सी भौगोलिक विभिन्नताएं होती हैं जिस कारण वहां की प्राकृतिक वनस्पति भी अलग-अलग होती है। इस कारण प्राकृतिक वनस्पति को कई तत्त्व प्रभावित करते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है

  1. भूमि अथवा धरातल (Land on Relief)-किसी भी क्षेत्र की भूमि का वनस्पति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। मैदानों, पर्वतों, डैल्टा इत्यादि की वनस्पति एक समान नहीं हो सकती। भूमि के स्वभाव का वनस्पति पर प्रभाव पड़ता है। ऊंचे पर्वतों पर लंबे वृक्ष मिलते हैं परंतु मैदानों पर पर्णपाती (Deciduous) वृक्ष मिलते हैं।
  2. मृदा (Soil)-मृदा पर ही वनस्पति पैदा होती है। अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग प्रकार की मिट्टी मिलती है, जो अलग-अलग प्रकार की वनस्पति का आधार है। जैसे कि मरुस्थल में रेतली मिट्टी मिलती है जिस कारण वहां पर कांटेदार झाड़ियां मिलती हैं। नदियों के डैल्टे पर बढ़िया प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। पर्वतों की ढलानों पर मिट्टी की परत गहरी होती है जिस कारण वहां पर लंबे पेड़ मिलते हैं।
  3. तापमान (Temperature) वनस्पति की विविधता तथा विशेषता तापमान तथा वायु की नमी पर निर्भर करती है। हिमालय पर्वत की ढलानों तथी दक्षिणी पठार के पर्वतों पर 915 मीटर की ऊंचाई से ऊपर तापमान में नयी वनस्पति के उगने तथा बढ़ने को प्रभावित करती है। इस कारण वहां की वनस्पति मैदानी क्षेत्रों से अलग होती है।
  4. सूर्य की रोशनी (Sunlight) किसी भी क्षेत्र में कितनी सूर्य की रोशनी आती है, इस पर भी वनस्पति निर्भर करती है। किसी भी स्थान पर कितनी सूर्य की रोशनी आएगी यह वहां की अक्षांश रेखाओं (Parallels of Latitudes) तथा भूमध्य रेखा से दूरी, समुद्र तल से ऊंचाई तथा ऋतु पर निर्भर करता है। गर्मियों में अधिक रोशनी मिलने के कारण वृक्ष तेजी से बढ़ते हैं।
  5. वर्षा (Rainfall)-जिन क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है वहां पर सदाबहार वन मिलते हैं। वह घने भी होते हैं। परंतु वहां कम वर्षा होती है जहां पर पर्णपाती वन (Deciduous Forests) मिलते हैं। जहां पर बहुत ही कम वर्षा होती है, जैसे कि मरुस्थल, वहां पर जंगल भी काफी कम या न के समान होते हैं। इस प्रकार वर्षा की मात्रा पर भी वनस्पति का प्रकार निर्भर करता है।

प्रश्न 3.
भारतीय जंगलों को जलवायु के आधार पर बांटें व वृक्षों के नाम भी लिखें।
उत्तर-
भारतीय जंगलों को जलवायु के आधार पर कई भागों में विभाजित किया जा सकता है जिसका वर्णन इस प्रकार है

  1. उष्ण सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests)-इस प्रकार के वन मुख्य रूप से अधिक वर्षा (200 सें०मी० से अधिक) वाले भागों में मिलते हैं। इसलिए इन्हें बरसाती वन भी कहते हैं। ये वन अधिकतर पूर्वी हिमालय के तराई प्रदेश पश्चिमी घाट, पश्चिमी अंडमान, असम, बंगाल तथा ओडिशा के कुछ भागों में पाए जाते हैं। इन वनों में पाए जाने वाले मुख्य वृक्ष महोगनी, ताड़, बांस, रबड़, चपलांस, मैचोलश तथा कदंब हैं।
  2. पतझड़ी अथवा मानसूनी वन (Tropical Deciduous or Monsoon Forests)-पतझड़ी या मानसूनी वन भारत के उन प्रदेशों में मिलते हैं जहां 100 से 200 सें.मी. तक वार्षिक वर्षा होती है। भारत में ये मुख्य रूप से हिमालय के निचले भाग, छोटा नागपुर, गंगा की घाटी, पश्चिमी घाट की पूर्वी ढलानों तथा तमिलनाडु क्षेत्र में पाए जाते हैं। इन वनों में पाए जाने वाले मुख्य वृक्ष सागवान, साल, शीशम, आम, चंदन, महुआ, ऐबोनी, शहतूत तथा सेमल हैं। गर्मियों में ये वृक्ष अपनी पत्तियां गिरा देते हैं, इसलिए इन्हें पतझड़ी वन भी कहते हैं।
  3. झाड़ियां या कांटेदार जंगल (The Scrubs and Thorny Forest)-इस प्रकार के वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां वार्षिक वर्षा का मध्यमान 20 से 60 सें० मी० तक होता है। भारत में ये वन राजस्थान, पश्चिमी हरियाणा, दक्षिणपश्चिमी पंजाब और गुजरात में पाए जाते हैं। इन वनों में रामबांस, खैर, पीपल, बबूल, थोअर और खजूर के वृक्ष प्रमुख हैं।
  4. ज्वारीय वन (Tidal Forests)-ज्वारीय वन नदियों के डेल्टाओं में पाए जाते हैं। यहां की मिट्टी भी उपजाऊ होती है और पानी भी अधिक मात्रा में मिल जाता है। भारत में इस प्रकार के वन महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि के डेल्टाई प्रदेशों में मिलते हैं। यहां की वनस्पति को मैंग्रोव अथवा सुंदर वन भी कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में ताड़, कैंस, नारियल इत्यादि के वृक्ष भी मिलते हैं।
  5. पर्वतीय वन (Mountains Forests) – इस प्रकार को वनस्पति हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों तथा दक्षिण में नीलगीर की पहाड़ियों पर पायी जाती हैं। इस वनस्पति में वर्षा की मात्रा तथा ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ अंतर आता है। कम ऊंचाई पर सदाबहार वन पाये जाते हैं, तो अधिक ऊंचाई पर केवल घास तथा कुछ फूलदार पौधे ही मिलते हैं।

PSEB 9th Class Social Science Guide भारत आकार व स्थिति Important Questions and Answers (2)

प्रश्न 4. पंजाब की प्राकृतिक वनस्पति के वर्गीकरण पर प्रकाश डालें।
उत्तर-पंजाब के अलग-अलग भागों में धरातल, जलवायु तथा मिट्टी की प्रकार अलग-अलग होने के कारण यहां अलग-अलग प्रकार की वनस्पति मिलती है तथा इनका वर्णन इस प्रकार है

1. हिमालय प्रकार की आर्द्र शीत-उष्ण वनस्पति (Himalayan Type Moist Temperate Vegetation)पंजाब के पठानकोट की धार कलां तहसील में इस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। पंजाब के इस हिस्से में वर्षा भी अधिक होती है तथा यह पंजाब के अन्य भागों से ऊंचाई पर भी स्थित है। यहां कई प्रकार के वृक्ष मिल जाते हैं जैसे कि कम ऊंचाई वाले चील के वृक्ष, शीशम, शहतूत, पहाड़ी बबूल, आम इत्यादि।

2. उप उष्ण चील वनस्पति (Sub Tropical Pine Vegetation)—पंजाब के कई जिलों की कई तहसीलों में इस प्रकार की वनस्पति मिलती है जैसे कि पठानकोट जिले की पठानकोट तहसील तथा होशियारपुर जिले की मुकेरियां, दसूहा तथा होशियारपुर तहसीलें। यहां चील के वृक्ष काफी कम मिलते हैं तथा उनकी प्रकार भी बढ़िया नहीं होती। यहां शीशम, खैर, शहतूत तथा अन्य कई प्रकार के वृक्ष पाए जाते हैं।

3. उप उष्ण झाड़ीदार पर्वतीय वनस्पति (Sub Tropical Scrub Hill Vegetation)-होशियारपुर तथा रूपनगर ज़िलों के पूर्वी भागों तथा पठानकोट जिले के बाकी बचे भागों में इस प्रकार की वनस्पति मिलती है। इस क्षेत्र में आज से चार-पांच सदियों पहले तक काफी घने जंगल मिलते हैं परंतु काफी अधिक वृक्षों की कटाई, जानवरों के चरने, जंगलों की आग तथा भूमि-क्षरण के कारण यहां की वनस्पति झाड़ीदार हो गई है। यहां कई प्रकार के वृक्ष मिलते हैं जैसे कि शीशम, खैर, बबूल, शहतूत, बकायन, नीम, सिंबल, बांस, अमलतास इत्यादि। यहां लंबी घास भी उगती है जिसे सरकंडा कहते हैं जिसे रस्सियों तथा कागज़ बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

4. उष्ण-शुष्क पतझड़ी वनस्पति (Tropical Dry Deciduous Vegetation)-पंजाब के शुष्क तथा गर्म क्षेत्रों में इस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। कंडी क्षेत्र के मैदान, पंजाब के लहरदार तथा ऊंचे नीचे मैदान तथा मध्यवर्तीय मैदानों में इस प्रकार की वनस्पति मिलती है। किसी समय यहां पर घनी वनस्पति हुआ करती थी। आज भी घनी वनस्पति के कुछ छोटे बड़े टुकड़े मिल जाते हैं जिन्हें बीड़, झंगीया झिड़ी के नाम से पुकारा जाता है। एस०ए०एस० नगर तथा पटियाला के क्षेत्रों में भी घने वृक्षों वाले क्षेत्र मिलते हैं जिन्हें बीड़ कहा जाता है। बीड़ भादसों, छत्तबीड़, बीड़ भुन्नरहेड़ी, बीड़ मोती बाग इत्यादि इनमें प्रमुख हैं। यहां नीम, टाहली, बरगद, पीपल, आम, बबूल, निम्ब इत्यादि के वृक्ष मिलते हैं। यहां सफैदा तथा पापुलर के पेड़ भी लगाए जाते हैं।

5. उष्ण कांटेदार वनस्पति (Tropical Thorny Vegetation)—पंजाब के कई क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां कम वर्षा होती है तथा वहां इस प्रकार की वनस्पति मिलती है। बठिंडा, मानसा, फाजिलका के कई भागों, फिरोजपुर तथा फरीदकोट के मध्य दक्षिण भागों में कांटेदार वनस्पति मिलती है। यहां के कई क्षेत्रों में तो वनस्पति है ही नहीं। कांटेदार झाड़ियां, थोहर (Cactus), शीशम, जण्ड, बबूल इत्यादि वृक्ष यहां पर मिलते हैं।

प्रश्न 5.
जंगली जीवन व उसकी सुरक्षा विधियों पर विस्तार से लिखें।
उत्तर-
वनस्पति की तरह ही हमारे देश में जीव-जंतुओं की काफी विभिन्नता है। भारत में इनकी 89000 प्रजातियां मिलती हैं। देश के ताज़ा तथा खारे पानी में 2500 से अधिक प्रकार की मछलियां मिलती हैं। इस प्रकार पक्षियों की भी 2000 से ऊपर प्रजातियां पाई जाती हैं। हमारे वनों में काफी महत्त्वपूर्ण पशु-पक्षी मिलते हैं। परंतु अफसोस की बात है कि पक्षियों तथा जानवरों की अनेक प्रजातियां देश में से लुप्त हो चुकी हैं। इस कारण जंगली जीवों की रक्षा करना हमारे लिए बहुत ही आवश्यक है। मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए वनों को काट कर तथा जानवरों का शिकार करके एक दुखद स्थिति उत्पन्न कर दी है। आज गैंडा, चीता, बंदर, शेर इत्यादि काफी कम संख्या में मिलते हैं।

इस कारण प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह जंगली जीवों की रक्षा करे।
PSEB 9th Class Social Science Guide भारत आकार व स्थिति Important Questions and Answers (3)

जंगली जीवों की सुरक्षा विधियां-

  1. वैसे तो सरकार ने कई राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव अभ्यारण्य बनाए हैं परंतु और राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्य जीव अभ्यारण्य बनाए जाने की आवश्यकता है।
  2. वन्य जीवों के शिकार पर कठोर पाबंदी लगाई जानी चाहिए तथा इस पाबंदी को कठोरता से लागू किया जाना चाहिए।
  3. राष्ट्रीय उद्यानों तथा वन्य जीव अभ्यारण्यों में जीवों के खाने का उचित प्रबंध होना चाहिए।
  4. जो प्रजातियां खत्म होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं उन्हें संभालने तथा बचाने की तरफ विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
  5. जंगलों तथा राष्ट्रीय उद्यानों में शिकारियों तथा चरवाहों को दाखिल होने की आज्ञा नहीं दी जानी चाहिए।
  6. अभ्यारण्यों तथा राष्ट्रीय उद्यानों में जीवों के लिए मैडिकल सुविधाएं भी होनी चाहिए ताकि किसी बिमारी होने की स्थिति में उन्हें बचाया जा सके।
  7. बड़े स्तर पर प्रशासकीय निर्णय लिए जाने चाहिए ताकि इन्हें बचाने के निर्णय जल्दी लिए जा सकें। 8. आम जनता में जंगली जीवों को संभालने के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए सैमीनार करवाए जाने चाहिए।

PSEB 9th Class Social Science Guide भारत : आकार व स्थिति Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
किसी क्षेत्र में मौजूद सभी प्राणियों को ……… कहा जाता है।
(क) फौना
(ख) फलौरा
(ग) वायुमंडल
(घ) जलमंडल।
उत्तर-
(क) फौना

प्रश्न 2.
भारतीय जंगल सर्वेक्षण विभाग का हैडक्वाटर कहां पर है ?
(क) मंसूरी
(ख) देहरादून
(ग) दिल्ली
(घ) नागपुर।
उत्तर-
(ख) देहरादून

प्रश्न 3.
इनमें से कौन-सा तत्त्व प्राकृतिक वनस्पति की भिन्नता के लिए उत्तरदायी है ?
(क) भूमि
(ख) मिट्टी
(ग) तापमान
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 4.
उष्ण सदाबहार वन के पत्ते हमेशा ………….. रहते हैं।
(क) हरे
(ख) पीले
(ग) झड़ते
(घ) लाल।
उत्तर-
(क) हरे

प्रश्न 5.
कौन-से जंगलों के वृक्ष 60 मीटर या उससे ऊपर जा सकते हैं ?
(क) उष्ण पतझड़ी जंगल
(ख) उष्ण सदाबहार जंगल
(ग) ज्वारीय जंगल
(घ) कांटेदार जंगल।
उत्तर-
(ख) उष्ण सदाबहार जंगल

प्रश्न 6.
इनमें से कौन-सा वृक्ष हमें कोणधारी जंगलों में मिलता है ?
(क) स्परूस
(ख) चील
(ग) फर
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 7.
घनी वनस्पति के छोटे-बड़े टुकड़ों को पंजाब में क्या कहते हैं ?
(क) झांगी
(ख) झिड़ी
(ग) बीड़
(घ) उपर्युक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 8.
पंजाब का कितना क्षेत्र प्राकृतिक वनस्पति के अंतर्गत आता है ?
(क) 5.65%
(ख) 3.65%
(ग) 4.65%
(घ) 6.65%.
उत्तर-
(ख) 3.65%

प्रश्न 9.
पंजाब के किस जिले में सबसे अधिक प्राकृतिक वनस्पति है ?
(क) बठिंडा
(ख) पटियाला
(ग) रूपनगर
(घ) फरीदकोट।
उत्तर-
(ग) रूपनगर

प्रश्न 10.
पंजाब के जंगलात विभाग में लगभग …… लोग कार्य कर रहे हैं।
(क) 5500
(ख) 6500
(ग) 7500
(घ) 8500.
उत्तर-
(ख) 6500

प्रश्न 11.
भारत में सबसे बड़ा स्तनधारी प्राणी कौन-सा है ?
(क) हाथी
(ख) गैंडा
(ग) हिप्पो
(घ) जिराफ।
उत्तर-
(क) हाथी

प्रश्न 12.
……….. भारत का राष्ट्रीय पक्षी है।
(क) कबूतर
(ख) मोर
(ग) कोयल
(घ) फलैमिंगो।
उत्तर-
(ख) मोर

रिक्त स्थान की पूर्ति करें :

  1. भारत में ………. राष्ट्रीय उद्यान तथा ……… वन्यजीव अभ्यारण्य बनाए गए हैं।
  2.  ………. विटामिन सी से भरपूर होता है।
  3. ……… की गुठलियां शूगर कंट्रोल करने के लिए प्रयोग की जाती हैं।
  4. नीम को संस्कृत में ……… कहा जाता है।
  5. पृथ्वी पर जीवन के चार मंडल-जीव मंडल, …………. , ………….. तथा वायु मंडल के कारण ही संभव है।
  6. मनुष्य के चारों मंडलों का एक-दूसरे पर निर्भर होना ही ……………… कहलाता है।

उत्तर-

  1. 103, 544
  2. आंवला
  3. जामुन
  4. सर्व रोग निवारक
  5. थलमंडल, जलमंडल
  6. ईको सिस्टम।

सही/ग़लत:

  1. जंगली जीव सुरक्षा कानून 1972 में बना था।
  2. किसी क्षेत्र की संपूर्ण वनस्पति को फलौरा कहते हैं।
  3. भारत की प्राकृतिक वनस्पति को आठ श्रेणियों में बांटा गया है।
  4. ऊष्ण पतझड़ी वनस्पति में वृक्ष सारा साल हरे-भरे रहते हैं।
  5. भारत का 21.53% हिस्सा ही जंगलों के अंतर्गत आता है।
  6. ज्वारी जंगल नमकीन पानी में रह सकते हैं।

उत्तर-

  1. (✓)
  2. (✓)
  3. (✗)
  4. (✗)
  5. (✓)
  6. (✓)

अति लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पृथ्वी के चार मंडल कौन-से हैं ?
उत्तर-
थलमंडल, वायुमंडल, जलमंडल तथा जीवमंडल।

प्रश्न 2.
जीव मंडल क्या है ?
उत्तर-
जीव मंडल पृथ्वी का वह मंडल है जिसमें कई प्रकार के जीव रहते हैं।

प्रश्न 3.
फौना (Fauna) क्या है ?
उत्तर-
किसी भी क्षेत्र में किसी समय पर रहने वाले सभी प्राणियों को फौना कहा जाता है।

प्रश्न 4.
फ्लौरा (Flora) क्या है ?
उत्तर-
किसी क्षेत्र या समय में मौजूद संपूर्ण वनस्पति को फलौरा कहा जाता है।

प्रश्न 5.
ईकोसिस्टम कैसे बनता है ?
उत्तर-
किसी क्षेत्र में प्राणियों तथा पौधों की एक-दूसरे पर निर्भर प्रजातियां ईकोसिस्टम का निर्माण करती है।

प्रश्न 6.
प्राकृतिक वनस्पति क्या होती है ?
उत्तर-
वह वनस्पति जो स्वयं तथा बिना किसी मानवीय प्रभाव के उत्पन्न होती है उसे प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं।

प्रश्न 7.
प्राकृतिक वनस्पति कौन-से तत्त्वों पर निर्भर करती है ?
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति भूमि, मृदा, तापमान, सूर्य की रोशनी का समय, वर्षा इत्यादि पर निर्भर करती है।

प्रश्न 8.
ऊंचे पहाड़ों पर कौन-से वक्ष उगते हैं ?
उत्तर-
ऊंचे पहाड़ों पर चील तथा स्परूस के वृक्ष उगते हैं।

प्रश्न 9.
कौन-सी मिट्टी में बहुत घनी वनस्पति उत्पन्न होती है ?
उत्तर-
डैल्टाई मिट्टी में बहुत घनी वनस्पति उत्पन्न होती है।

प्रश्न 10.
प्रकाश संश्लेषण क्या होता है ?
उत्तर-
पौधों की सूर्य की रोशनी से भोजन तैयार करने की विधि को प्रकाश संश्लेषण कहा जाता है।

प्रश्न 11.
भारतीय वनस्पति को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया जाता है ?
उत्तर-
भारतीय वनस्पति को पांच श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

प्रश्न 12.
उष्ण सदाबहार जंगलों की एक विशेषता बताएं।
उत्तर-
यहां वृक्षों के पत्ते एक साथ नहीं झड़ते जिस कारण यह संपूर्ण वर्ष हरे ही रहते हैं।

प्रश्न 13.
ऊष्ण सदाबहार जंगल किन क्षेत्रों में मिलते हैं ?
उत्तर-
जो भाग गर्म तथा नम होते हैं तथा जहां वार्षिक 200-300 सैंटीमीटर वर्षा होती है।

प्रश्न 14.
कौन से जंगलों को वर्षा वन कहा जाता है ?
उत्तर-
ऊष्ण सदाबहार वनों को वर्षा वन कहा जाता है।

प्रश्न 15.
ऊष्ण सदाबहार वनों में कौन-से वृक्ष मिलते हैं ?
उत्तर-
महोगनी, रोज़वुड, ऐबोनी, बांस, शीशम, रबड़, सिनकोना, मैगवोलिया इत्यादि।

प्रश्न 16.
सिनकोना वृक्ष की छाल कहाँ पर प्रयोग की जाती है ?
उत्तर-
सिनकोना वृक्ष की छाल कुनीन की दवा बनाने के लिए प्रयोग की जाती है।

प्रश्न 17.
ऊष्ण सदाबहारी वन किन प्रदेशों में मिलते हैं ?
उत्तर-
पश्चिमी घाट की पश्चिमी ढलानों, उत्तर-पूर्व भारत की पहाड़ियों, तमिलनाडु तट, पश्चिमी बंगाल के कुछ हिस्से, ओडिशा, अंडेमान निकोबार, लक्षद्वीप।

प्रश्न 18.
ऊष्ण पतझड़ी वन कितनी वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं ?
उत्तर-
70 से 200 सैंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में।

प्रश्न 19.
ऊष्ण पतझड़ी जंगलों की एक विशेषता बताएं।
उत्तर-
इन जंगलों में ऋतु के हिसाब से पत्ते झड़ते हैं।

प्रश्न 20.
ऊष्ण पतझड़ी जंगल कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
दो प्रकार-नम तथा शुष्क पतझड़ी जंगल।

प्रश्न 21.
नम पतझड़ी जंगल कितनी वर्षा वाले क्षेत्रों में होते हैं ?
उत्तर-
100 से 200 सैंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में।

प्रश्न 22.
नम पतझड़ी जंगल कहां पर मिलते हैं ?
उत्तर-
उत्तर-पूर्वी राज्यों में, पश्चिमी घाट, ओडिशा, छत्तीसगढ़ के कुछ भागों में।

प्रश्न 23.
नम पतझड़ी जंगलों में कौन-से वृक्ष मिलते हैं ?
उत्तर-
साल, टीक, देओदार, संदलवुड, शीशम, खैर इत्यादि।

प्रश्न 24.
शुष्क पतझड़ी जंगलों में कौन-से वृक्ष मिलते हैं ? ।
उत्तर-
पीपल, टीक, नीम, सफ़ेदा, साल इत्यादि।

प्रश्न 25.
झाड़ियां तथा कांटेदार जंगल कहां पर मिलते हैं ?
उत्तर-
यह जंगल उन क्षेत्रों में मिलते हैं जहां 70 सैंटीमीटर से कम वर्षा होती है।

प्रश्न 26.
झाड़ियां तथा कांटेदार जंगल कौन-से राज्यों में मिलते हैं ?
उत्तर-
राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश इत्यादि।

प्रश्न 27.
कौन-सी नदियों के डैल्टा में ज्वारी जंगल होते हैं ?
उत्तर-
गंगा-ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी।

प्रश्न 28.
सुंदरवन क्या है ?
उत्तर-
गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के डैल्टा क्षेत्र में मिलने वाले जंगलों को सुंदरवन कहा जाता है क्योंकि यहां सुंदरी वृक्ष काफी मिलते हैं।

प्रश्न 29. पर्वतीय जंगलों में कौन-से वृक्ष मिलते हैं ?
उत्तर-चील, स्परूस, दियार, फर, ओक, अखरोट इत्यादि।

प्रश्न 30.
पर्वतीय जंगलों में कौन-से जानवर मिलते हैं ?
उत्तर-
हिरन, याक, बर्फ में रहने वाला चीता, बारासिंगा, भालू, जंगली भेड़ें, बकरियां इत्यादि।

प्रश्न 31.
पंजाब में कौन-सी मृदाएं मिलती हैं ?
उत्तर-
जलोढ़ी मृदा, रेतली मृदा, चिकनी मृदा, दोमट मृदा, पर्वतीय मृदा तथा खारी मृदा।

प्रश्न 32.
अंग्रेजों ने प्राकृतिक वनस्पति को बचाने के लिए क्या किया ?
उत्तर-
उन्होंने जंगलों की हदबंदी की तथा पशुओं के चरने पर रोक लगाई।

प्रश्न 33.
पंजाब में कौन-से प्रकार की वनस्पति मिलती है ?
उत्तर-
हिमालय प्रकार की आई शोत ऊष्ण वनस्पति, उप ऊष्णू चील वनस्पति, उप ऊष्ण झाड़ेदार पर्वतीय वनस्पति, ऊष्ण खुष्क पतझड़ी वनस्पति तथा ऊष्ण कांटेदार वनस्पति।

प्रश्न 34.
बीड़ किसे कहते हैं ?
उत्तर-
मैदानों में घनी वनस्पति के कुछ छोटे-बड़े टुकड़े मिलते हैं जिन्हें बीड़ कहा जाता है।

प्रश्न 35.
पंजाब का कितना क्षेत्र प्राकृतिक वनस्पति के अंतर्गत आता है ?
उत्तर-
केवल 6.07%।

प्रश्न 36.
पंजाब के किस जिले में प्राकृतिक वनस्पति सबसे अधिक है ?
उत्तर-
रूपनगर जिले में – 37.19%.

प्रश्न 37.
जंगलों का एक महत्त्व बताएं।
उत्तर-
वृक्ष कार्बन-डाइऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन छोड़ते हैं जो मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक है।

प्रश्न 38.
जंगली जीवन क्या होता है ?
उत्तर-
प्राकृतिक अरण्यों अर्थात् वनों में मौजूद जानवरों, पक्षियों तथा कीड़े-मकौड़े इत्यादि को जंगली जीवन कहा जाता है।

प्रश्न 39.
हमारे देश में जानवरों की कितनी प्रजातियां रहती हैं ?
उत्तर-
हमारे देश में जानवरों की 89,000 प्रजातियां रहती हैं जो विश्व के जानवरों की प्रजातियों का 6.5% बनता है।

प्रश्न 40.
भारतीय जंगलों में मिलने वाले जानवरों के नाम लिखें।
उत्तर-
हाथी, गैंडे, बारासिंगा, शेर, बंदर, लंगूर, लोमड़ी, मगरमच्छ, घड़ियाल, कछुए इत्यादि।

प्रश्न 41.
किस जानवर को ‘बर्फ का बैल’ कहा जाता है ?
उत्तर-
याक को।

प्रश्न 42.
कस्तूरी किस जानवर से प्राप्त होती है ?
उत्तर-
कस्तूरी थम्मन नामक हिरन से प्राप्त होती है।

प्रश्न 43.
भारत में पक्षियों की कितनी प्रजातियां रहती हैं ?
उत्तर-
लगभग 2000 प्रजातियां।

प्रश्न 44.
शीत ऋतु में भारत आने वाले कुछ प्रवासी पक्षियों के नाम लिखें।
उत्तर-
साइबेरियाई सास, ग्रेटर फलैमिंगो, स्टालिंग, रफ्फ, रोज़ी पैलीकन, आमटील इत्यादि।

प्रश्न 45.
जंगली जीवों के लिए भारतीय बोर्ड कब तथा क्यों स्थापित किया गया था ?
उत्तर-
1972 में ताकि लोगों को जंगली जानवरों को संभालने के लिए जागृत किया जा सके।

प्रश्न 46.
आरक्षित जीव मंडल क्या है ?
उत्तर-
यह बहुउद्देशीय सुरक्षित क्षेत्र हैं जिनका कार्य ईकोसिस्टम में प्रवृत्ति की अनेकता को संभाल कर रखता है।

प्रश्न 47.
बिल को क्यों प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
बिल को कब्ज तथा दस्त ठीक करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 48.
सर्पगंधा को क्यों प्रयोग किया जाता है ?
उत्तर-
रक्त प्रवाह में सुधार करने के लिए।

लघु उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
जीवमंडल पर एक नोट लिखो।
उत्तर-
पृथ्वी के चार मंडल होते हैं तथा उनमें से जीव मंडल ऐसा मंडल है जहां कई प्रकार के जीव रहते हैं। यह एक जटिल क्षेत्र है जहां पर बाकी तीन मंडल आपस में मिलते हैं। क्योंकि इस मंडल में जीवन मौजूद है, इस कारण इसका हमारे जीवन में काफी महत्त्व है। इसमें बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीव से लेकर हाथी जैसे बड़े जीव रहते हैं। सभी प्रकार के जीवों को दो भागों में विभाजित किया जाता है तथा वह हैं-वनस्पति जगत् तथा प्राणी जगत्। वनस्पति जगत् को फ्लौरा कहा जाता है जिसमें प्रत्येक प्रकार की वनस्पति आ जाती है। प्राणी जगत् को फौना कहा जाता है जिसमें जीव मंडल में मौजूद सभी प्राणी आ जाते हैं।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक वनस्पति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग क्यों होती है ?
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग होती है क्योंकि प्राकृतिक वनस्पति को अलगअलग भौगोलिक तत्त्व प्रभावित करते हैं। किसी स्थान पर जिस प्रकार के भौगोलिक तत्त्व होंगे, वहां उस प्रकार की वनस्पति ही उत्पन्न होगी। प्राकृतिक वनस्पति को कई तत्त्व प्रभावित करते हैं जैसे कि:

  1. भूमि (Land)
  2. मृदा (Soil)
  3. तापमान (Temperature)
  4. वर्षा (Rainfall)
  5. सूर्य की रोशनी का समय (Duration of Sunlight)।

प्रश्न 3.
ऊष्ण सदाबहार जंगलों की विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  1. ऊष्ण सदाबहार जंगल वह क्षेत्र होते हैं जहां 200 सैंटीमीटर से अधिक वर्षा होती है।
  2. वृक्षों के पत्ते इकट्ठे नहीं झड़ते जिस कारण यह संपूर्ण वर्ष हरे रहते हैं।
  3. यह घने जंगल गर्म तथा नम क्षेत्रों में मिलते हैं।
  4. इन जंगलों के वृक्ष 60 मीटर से भी ऊंचे हो जाते हैं तथा घने होने के कारण यह एक छतरी (Canopy) बना लेते हैं। इस कारण कई स्थानों पर सूर्य की रोशनी भूमि तक भी नहीं पहुंच पाती।
  5. महोगनी, रोज़वुड, ऐबोनी, बांस, शीशम, सिनकोना रबड़ इत्यादि इस क्षेत्र में मिलने वाले वृक्ष हैं।
  6. यह पश्चिमी घाट की ढलानों, उत्तर पूर्वी भारत की पहाड़ियों, पश्चिमी बंगाल तथा ओडिशा के कुछ भागों, लक्षद्वीप तथा अंडमान निकोबार में मिलते हैं।

प्रश्न 4.
ऊष्ण पतझड़ी अथवा मानसूनी जगलों की कुछ विशेषताएं बताएं।
उत्तर-

  1. ऊष्ण पतझड़ी जंगल उन क्षेत्रों में होते हैं जहां 70 से 200 सैंटीमीटर तक वर्षा होती है।
  2. इन जंगलों के वृक्षों के पत्ते मौसम के अनुसार झड़ते हैं जो गर्मियों में लगभग छ: से आठ हफ्तों के बीच होता है।
  3. यह जंगल दो प्रकार के होते हैं-नम पतझड़ी जंगल (100 से 200 सैंटीमीटर वर्षा) तथा शुष्क पतझड़ी जंगल (70-100 सैंटीमीटर वर्षा)।
  4. यहां टीक, संदलवुड, साल, शीशम, देओदार, खैर, पीपल, नीम, टीक, सफैदा इत्यादि वृक्ष उगते हैं।
  5. यह सदाबहार जंगलों की तरह घने तो नहीं होते परंतु फिर भी काफी घने होते हैं।

प्रश्न 5.
पंजाब में मिलने वाली मिट्टियों (मृदाओं) के नाम बताएं।
उत्तर-
पंजाब के अलग-अलग क्षेत्रों में मिट्टी के कई प्रकार मिलते हैं जिनके नाम निम्नलिखित हैं :

  1. जलोढ़ या दरियाई मिट्टी (Alluvial or River Soil)
  2. रेतली मिट्टी (Sandy Soil)
  3. चिकनी मिट्टी (Clayey Soil)
  4. दोमट मिट्टी (Loamy Soil)
  5. पर्वतीय मिट्टी अथवा कंडी की मिट्टी (Hill Soil or Kandi Soil)
  6. सोडिक अथवा ख़ारी मिट्टी. (Sodic and Saline Soil)।

प्रश्न 6.
अंग्रेजों ने प्राकृतिक वनस्पति को बचाने के लिए कौन-से प्रयास किए ?
उत्तर-
वृक्षों की लगातार कटाई के कारण, पशुओं के चरने तथा कानूनों की कमी के कारण पंजाब में वनस्पति का क्षेत्र काफी तेजी से कम हो रहा था। इस कारण अंग्रेजों ने वनस्पति को बचाने के लिए कुछ प्रयास किए जैसे कि :

  1. जंगलों की हदबंदी की गई तथा जंगलों को कई भागों में विभाजित किया गया।
  2. जंगलों में पशुओं के चरने पर रोक लगा दी गई ताकि प्राकृतिक वनस्पति बची रह सके।
  3. कृषि को बढ़ाने के लिए अतिरिक्त वनस्पति को साफ किया गयाँ तथा भूमि को कृषि योग्य बनाया गया। इससे अधिक अनाज पैदा करके जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति की गई।

प्रश्न 7.
भारत के जंगली जीवन पर एक नोट लिखें।
उत्तर-
जो जंगली जीव, पक्षी तथा कीड़े-मकौड़े, प्राकृतिक आरण्य अर्थात् जंगलों में रहते हैं, उन्हें जंगली जीवन कहा जाता है। भारत में कई प्रकार की प्राकृतिक स्थितियों के मिलने के कारण तथा मिट्टी के प्रकार के अंतर होने के कारण यहां कई प्रकार के प्राकृतिक आरण्य मिलते हैं। इस कारण यहां जंगली जीवन भी कई प्रकार का मिलता है। भारत में 89,000 से अधिक जानवरों की प्रजातियां मिलती हैं जोकि संसार में मिलने वाले जानवरों की प्रजातियों का लगभग 6.5% बनता है। इस प्रकार हमारे देश में पक्षियों की 2000 प्रजातियां, मछलियों की 2546 प्रजातियां, रेंगने वाले जीवों की 458 प्रजातियां तथा कीड़े-मकौड़ों की 60,000 से भी अधिक प्रजातियां मिल जाती हैं।

प्रश्न 8.
भारत में सर्दियों में कौन-से प्रवासी पक्षी आते हैं ?
उत्तर-
सर्दियों में कई अन्य देशों से प्रवासी पक्षी हमारे देश में आते हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं :

  1. ग्रेटर फलैमिंगो
  2. साइबेरिआई सारस
  3. काले पंखों वाली स्टिलट
  4. आम ग्रीन सारक
  5. रफ़ल
  6. रोज़ी पैलीकन
  7. लांगबिल्ड।
  8. आम टील
  9. गढ़वाल।

प्रश्न 9.
भारत में गर्मियों में आने वाले प्रवासी पक्षियों के नाम लिखें।
उत्तर-
भारत में गर्मियों में कई प्रकार के प्रवासी पक्षी आते हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं :

1. ब्लु चीकड बी ईटर
2. कूम्ब डक
3. कुकु (कोयल)
4. ब्लु टेल्ड बी ईटर
5. युरेशियन गोलफन ओरीओल
6. एशियन कोयल।
7. ब्लैक क्राऊनड नाइट हैरोन।

प्रश्न 10.
जंगली जीवों को बचाने के सरकारी प्रयासों का वर्णन करें।
उत्तर-

  1. 1952 में सरकार ने जंगली जीवों के लिए भारतीय बोर्ड का गठन किया जिसका कार्य सरकार को जीवों को संभालने की सलाह देना, लोगों को जंगली जानवरों को संभालने के लिए जागृत करना तथा जंगली जीव अभ्यारण्य इत्यादि का निर्माण करना है।
  2. 1972 में जंगली जीव सुरक्षा कानून बनाया गया ताकि खत्म होने की कगार तक पहुंच चुके जंगली जीवों की संभाल तथा उनका शिकारियों से बचाव किया जा सके।
  3. देश में कई आरक्षित जीव मंडल (Biosphere Reserves) का निर्माण किया गया ताकि जानवरों की अनेकता को संभाल कर रखा जा सके। अब तक 18 आरक्षित जीव मंडल बनाए जा चुके हैं।
  4. जंगली जीवों को बचाने के लिए तथा उन्हें संभालने के लिए देश में 103 राष्ट्रीय उद्यान तथा 555 जंगली जीव अभ्यारण्य बन चुके हैं जहां शिकार करना गैर कानूनी है।

प्रश्न 11.
हमारी प्राकृतिक वनस्पति का वास्तव में प्राकृतिक न रहने के क्या कारण हैं ?
उत्तर-
हमारी प्राकृतिक वनस्पति वास्तव में प्राकृतिक नहीं रही। यह केवल देश के कुछ ही भागों में दिखाई पड़ती है। अन्य भागों में इसका बहुत बड़ा भाग या तो नष्ट हो गया है या फिर नष्ट हो रहा है। इसके निम्नलिखित कारण हैं

  1. तेजी से बढ़ती हुई हमारी जनसंख्या
  2. परंपरागत कृषि विकास की प्रथा
  3. चरागाहों का विनाश या अति चराई
  4. ईंधन व इमारती लकड़ी के लिए वनों का अंधाधुंध कटाव
  5. विदेशी पौधों में बढ़ती हुई संख्या।

प्रश्न 12.
देश के वन क्षेत्र का क्षेत्रीय तथा राज्यों के स्तर पर वर्णन कीजिए।
उत्तर-
देश के विकास तथा वातावरण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए देश की कम-से-कम 33 प्रतिशत भूमि पर वन अवश्य होने चाहिएं। परंतु भारत की केवल 22.7 प्रतिशत भूमि ही वनों के अधीन है। राज्यों के स्तर पर इसका वितरण बहुत ही असमान है, जो निम्नलिखित ब्योरे से स्पष्ट है-

  1. त्रिपुरा (59.6%), हिमाचल प्रदेश (48.1%), अरुणाचल प्रदेश (45.8%), मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ (32.9%) तथा असम (29.3%) में अपेक्षाकृत अधिक वन क्षेत्र हैं।
  2. पंजाब (2.3%), राजस्थान (3.6%), गुजरात (8.8%), हरियाणा (12.1%), पश्चिमी बंगाल (12.5%) तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 15% से भी कम भूमि वनों के अधीन है।
  3. केंद्रीय शासित प्रदेशों में अंडमान व निकोबार द्वीप समूह में सबसे अधिक (94.6%) तथा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में सबसे कम (2.1%) वन क्षेत्र हैं।

PSEB 9th Class Social Science Guide भारत आकार व स्थिति Important Questions and Answers (4)

प्रश्न 13.
पतझड़ या मानसूनी वनस्पति पर संक्षेप में टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
वह वनस्पति जो ग्रीष्म ऋतु के शुरू होने से पहले अधिक वाष्पीकरण को रोकने के लिए अपने पत्ते गिरा देती है, पतझड़ या मानसून की वनस्पति कहलाती है। इस वनस्पति को वर्षा के आधार पर आई व आर्द्र-शुष्क दो उपभागों में बांटा जा सकता है।

  1. आई पतझड़ वन-इस तरह की वनस्पति उन चार बड़े क्षेत्रों में पाई जाती है, जहां पर वार्षिक वर्षा 100 से 200 से० मी० तक होती है।
    इन क्षेत्रों में पेड़ कम सघन होते हैं परंतु इनकी ऊंचाई 30 मीटर तक पहुंच जाती है। साल, शीशम, सागौन, टीक, चंदन, जामुन, अमलतास, हलदू, महुआ, शारबू, ऐबोनी, शहतूत इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं। .
  2. शुष्क पतझड़ी वनस्पति-इस प्रकार की वनस्पति 50 से 100 सें. मी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है।
    इसकी लंबी पट्टी पंजाब से आरंभ होकर दक्षिण के पठार के मध्यवर्ती भाग के आस-पास के क्षेत्रों तक फैली हुई है। बबूल, बरगद, हलदू यहां के मुख्य वृक्ष हैं।

प्रश्न 14.
पूर्वी हिमालय में किस प्रकार की वनस्पति मिलती है ?
उत्तर-
पूर्वी हिमालय में 4000 किस्म के फूल और 250 किस्म की फर्न मिलती है। यहां की वनस्पति पर ऊंचाई के बढ़ने से तापमान और वर्षा में आए अंतर का गहरा प्रभाव पड़ता है।

  1. यहां 1200 मीटर की ऊंचाई तक पतझड़ी वनस्पति के मिश्रित वृक्ष अधिक मिलते हैं।
  2. यहां 1200 से लेकर 2000 मीटर की ऊंचाई तक घने सदाबहार वन मिलते हैं। साल और मैंगनोलिया इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं। इनमें दालचीनी, अमूरा, चिनोली तथा दिलेनीआ के वृक्ष भी मिलते हैं। .
  3. यहां पर 2000 से 2500 मीटर की ऊंचाई तक तापमान कम हो जाने के कारण शीतोष्ण प्रकार (Temperate type) की वनस्पति पाई जाती है। इसमें ओक, चेस्टनट, लॉरेल, बर्च, मैपल तथा ओलढर जैसे चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष मिलते हैं।

प्रश्न 15.
प्राकृतिक वनस्पति के अंधाधुंध कटाव से होने वाली हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है। परंतु पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक वनस्पति की अंधाधुंध कटाई की गई है। इस कटाई से हमें निम्नलिखित हानियां हुई हैं

  1. प्राकृतिक वनस्पति की कटाई से वातावरण का संतुलन बिगड़ गया है।
  2. पहाड़ी ढलानों और मैदानी क्षेत्रों के वनस्पति विहीन होने के कारण बाढ़ व मृदा अपरदन की समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं।
  3. पंजाब के उत्तरी भागों में शिवालिक पर्वतमालाओं के निचले भाग में बहने वाले बरसाती नालों के क्षेत्रों में वनकटाव से भूमि कटाव की समस्या के कारण बंजर जमीन में वृद्धि हुई है।
  4. मैदानी क्षेत्रों का जल-स्तर भी प्रभावित हुआ है जिससे कृषि को सिंचाई की समस्या से जूझना पड़ रहा है।

प्रश्न 16.
मिट्टी कटाव के कारणों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
मिट्टी का कटाव मुख्य रूप से दो कारणों से होता है-

  1. भौतिक क्रियाओं द्वारा तथा मानव क्रियाओं द्वारा। आज के समय में मानव क्रियाओं से मिट्टियों के कटाव की प्रक्रिया बढ़ती जा रही है।
  2. भौतिक तत्त्वों में उच्च तापमान, बर्फीले तूफान, तेज़ हवाएं, मूसलाधार वर्षा तथा तीव्र ढलानों की गणना होती है। ये मिट्टियों के कटाव के प्रमुख कारक हैं। मानवीय क्रियाओं में जंगलों की कटाई, पशुओं की बेरोकटोक चराई, स्थानांतरी कृषि की दोषपूर्ण पद्धति, खानों की खुदाई आदि तत्त्व आते हैं।

प्रश्न 17.
शुष्क पतझड़ी वनस्पति पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर-
इस प्रकार की वनस्पति 50 से 100 से० मी० से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है।
क्षेत्र-इसकी एक लंबी पट्टी पंजाब से लेकर हरियाणा, दक्षिण-पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान, काठियावाड़, दक्षिण के पठार के मध्यवर्ती भाग के आस-पास के क्षेत्रों में फैली हुई है।
प्रमुख वृक्ष-इस वनस्पति में शीशम या टाहली, बबूल, बरगद, हलदू जैसे वृक्ष प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें चंदन, महुआ, सीरस तथा सागवान जैसे कीमती वृक्ष भी मिलते हैं। ये वृक्ष प्रायः गर्मियां शुरू होते ही अपने पत्ते गिरा देते हैं।

प्रश्न 18.
वन्य प्राणियों की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य क्यों है ?
उत्तर-
हमारे वनों में बहुत-से महत्त्वपूर्ण पशु-पक्षी पाए जाते हैं। परंतु खेद की बात यह है कि पक्षियों और जानवरों की अनेक जातियां हमारे देश से लुप्त हो चुकी हैं। अत: वन्य प्राणियों की रक्षा करना हमारे लिए बहुत आवश्यक है। मनुष्य ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए वनों को काटकर तथा जानवरों का शिकार करके दुःखदायी स्थिति उत्पन्न कर दी है। आज गैंडा, चीता, बंदर, शेर और सारंग नामक पशु-पक्षी बहुत ही कम संख्या में मिलते हैं। इसलिए प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह वन्य प्राणियों की रक्षा करे।

प्रश्न 19.
हमारे जीवन में पशुओं का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
हमारे देश में विशाल पशु धन पाया जाता है, जिन्हें किसान अपने खेतों पर पालते हैं। पशुओं से किसान को गोबर प्राप्त होता है, जो मृदा की उर्वरता को बनाए रखने में उसकी सहायता करता है। पहले किसान गोबर को ईंधन के रूप में प्रयोग करते थे, परंतु अब प्रगतिशील किसान गोबर को ईंधन और खाद दोनों रूपों में प्रयोग करते हैं। खेत में गोबर को उर्वरक के रूप में प्रयोग करने से पहले वे उससे गैस बनाते हैं जिस पर वे खाना बनाते हैं और रोशनी प्राप्त करते हैं। पशुओं की खालें बड़े पैमाने पर निर्यात की जाती हैं। पशुओं से हमें ऊन प्राप्त होती है।

प्रश्न 20.
वन्य जीवों के संरक्षण पर एक संक्षेप टिप्पणी लिखें।
उत्तर-
वन्य जीवों का संरक्षण-भारत में विभिन्न प्रकार के वन्य जीव पाए जाते हैं। उनकी उचित देखभाल न होने से जीवों की कई एक जातियां या तो लुप्त हो गई हैं या लुप्त होने वाली हैं। इन जीवों के महत्त्व को देखते हुए अब इनकी सुरक्षा और संरक्षण के उपाय किये जा रहे हैं। नीलगिरि में भारत का पहला जीव आरक्षित क्षेत्र स्थापित किया गया। यह कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल के सीमावर्ती क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसकी स्थापना 1986 में की गई थी। नीलगिरि के पश्चात् 1988 ई० में उत्तराखंड (वर्तमान) में नंदा देवी का जीव आरक्षित क्षेत्र बनाया गया। उसी वर्ष मेघालय में तीसरा ऐसा ही क्षेत्र स्थापित किया गया। एक और जीव आरक्षित क्षेत्र अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह में स्थापित किया गया है। इन जीव आरक्षित क्षेत्रों के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, गुजरात तथा असम में भी जीव आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए गए हैं।

दीर्घ उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
“देश में उष्ण सदाबहार वनस्पति से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक का क्रम मिलता है।” इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर-
भारत की वनस्पति में व्यापक विविधता देखने को मिलती है। इसका मुख्य कारण है-देश में पाई जाने वाली विविध प्रकार की जलवायु दशाएं तथा धरातलीय असमानता। केवल पर्वतीय क्षेत्रों में ही ऊंचाई के साथ-साथ एक के बाद एक वनस्पति क्षेत्र पाए जाते हैं। यहां उष्ण सदाबहार वनस्पति से लेकर अल्पाइन वनस्पति तक देखने को मिलती है। निम्नलिखित विवरण से यह बात स्पष्ट हो जाएगी-

  1. शिवालिक श्रेणियों के वन-हिमालय की गिरिपाद शिवालिक श्रेणियों में ऊष्ण कटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन पाए जाते हैं। आर्थिक दृष्टि से इन वनों का सबसे महत्त्वपूर्ण वृक्ष साल हैं। यहां पर बांस भी बहुत होता है।
  2. 1200 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाले वन-समुद्र तल से 1200 से लेकर 2000 मीटर तक की ऊंचाई पर घने सदाबहार वन पाए जाते हैं। इन वनों में सदा हरित चौड़ी पत्ती वाले साल तथा चेस्टनट के वृक्ष सामान्य रूप में मिलते हैं। ऐश तथा बीच इन वनों के अन्य वृक्ष हैं।
  3. 2000 से 2500 मीटर की ऊंचाई पर पाये जाने वाले वन-समुद्र तल से 2000 से लेकर 2500 मीटर की ऊंचाई तक शीतोष्ण कटिबंध के शंकुधारी वन पाए जाते हैं। इन वनों में मुख्य रूप से बीच, चीड़, सीडर, सिल्वर, फ़र तथा स्परूस के वृक्ष मिलते हैं। हिमालय की आंतरिक श्रेणियों में तथा अपेक्षाकृत शुष्क भागों में देवदार का वृक्ष भलीभांति पनपता है।
  4. 2500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर पाये जाने वाले वन-समुद्र तल से 2500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर अल्पाइन वन पाये जाते हैं। सिल्वर, फ़र, चीड़, भुर्ज (बर्च) तथा जूनिपर (हपूशा) इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं। इसके पश्चात् अल्पाइन वनों का स्थान झाड़ियां, गुल्म तथा घास-भूमियां ले लेती हैं।
    दक्षिणी पठार के पहाड़ी भागों में भी पर्वतीय वनस्पति मिलती है। यहां के नीलगिरि पर्वतीय क्षेत्रों में 200 सें० मी० से अधिक वर्षा होती है। इसी कारण यहां पर चौड़े-पत्तों वाले सदाबहार वन 1800 मीटर तक की ऊंचाई पर मिल जाते हैं। दक्षिण भारत में इनको ‘शोला वन’ कहा जाता है। इनमें जामुन, मैचीलस, मैलियोसोमा, सैलटिस आदि प्रमुख वृक्ष हैं। परंतु 1800 से 3000 की ऊंचाई पर शीतोष्ण कोणधारी वनस्पति मिलती है। इसमें सिल्वर, फर, चीड़, बर्च, पीला चम्पा जैसे वृक्ष मिलते हैं। इससे अधिक ऊंचाई पर छोटी-छोटी घास मिलती है।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक वनस्पति (वनों) के लाभों का वर्णन करो।
उत्तर-
प्राकृतिक वनस्पति से हमें कई प्रत्यक्ष तथा परोक्ष लाभ होते हैं।
प्रत्यक्ष लाभ-प्राकृतिक वनस्पति से होने वाले प्रत्यक्ष लाभों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. वनों से हमें कई प्रकार की लकड़ी प्राप्त होती है, जिसका प्रयोग इमारतें, फ़र्नीचर, लकड़ी-कोयला इत्यादि बनाने में होता है। इसका प्रयोग ईंधन के रूप में भी होता है।
  2. खैर, सिनकोना, कुनीन, बहेड़ा व आंवले से कई प्रकार की औषधियां तैयार की जाती हैं।
  3. मैंग्रोव, कंच, गैंबीअर, हरड़, बहेड़ा, आंवला और बबूल इत्यादि के पत्ते, छिलके व फलों को सूखाकर चमड़ा रंगने का पदार्थ तैयार किया जाता है।
  4. पलाश व पीपल से लाख, शहतूत से रेशम, चंदन से तुंग व तेल और साल से धूपबत्ती व बिरोज़ा तैयार किया जाता है।

परोक्ष लाभ-प्राकृतिक वनस्पति से हमें निम्नलिखित परोक्ष लाभ होते हैं-

  1. वन जलवायु पर नियंत्रण रखते हैं। सघन वन गर्मियों में तापमान को बढ़ने से रोकते हैं तथा सर्दियों में तापमान को बढ़ा देते हैं।
  2. सघन वनस्पति की जड़ें बहते हुए पानी की गति को कम करने में सहायता करती हैं। इससे बाढ़ का प्रकोप कम हो जाता है। दूसरे जड़ों द्वारा रोका गया पानी भूमि के अंदर समा लिए जाने से भूमिगत जल-स्तर (Water-table) ऊंचा उठ जाता है। वहीं दूसरी ओर धरातल पर पानी की मात्रा कम हो जाने से पानी नदियों में आसानी से बहता रहता है।
  3. वृक्षों की जड़ें मिट्टी की जकड़न को मज़बूत किए रहती हैं और मिट्टी के कटाव को रोकती हैं।
  4. वनस्पति के सूखकर गिरने से जीवांश के रूप में मिट्टी को हरी खाद मिलती है।
  5. हरी-भरी वनस्पति बहुत ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है। इससे आकर्षित होकर लोग सघन वन क्षेत्रों में यात्रा, शिकार तथा मानसिक शांति के लिए जाते हैं। कई विदेशी पर्यटक भी वन-क्षेत्रों में बने पर्यटन केंद्रों पर आते हैं। इससे सरकार को विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
  6. सघन वन अनेक उद्योगों के आधार हैं। इनमें से कागज़, लाख, दियासिलाई, रेशम, खेलों का सामान, प्लाईवुड, गोंद, बिरोज़ा इत्यादि उद्योग प्रमुख हैं।

प्रश्न 3.
भारतीय मिट्टियों की किस्मों एवं विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
भारत में कई प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं। इनके गुणों के आधार पर इन्हें निम्नलिखित वर्गों में बांटा जा सकता है-

  1. जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) भारत में जलोढ़ मिट्टी उत्तरी मैदान, राजस्थान, गुजरात तथा दक्षिण के तटीय मैदानों में सामान्य रूप से मिलती है। इसमें रेत, गाद तथा मृत्तिका मिली होती है। जलोढ़ मिट्टी दो प्रकार की होती हैखादर तथा बांगर।
    जलोढ़ मिट्टियां सामान्यतः सबसे अधिक उपजाऊ होती हैं। इन मिट्टियों में पोटाश, फॉस्फोरस अम्ल तथा चूना पर्याप्त मात्रा में होता है। परंतु इनमें नाइट्रोजन तथा जैविक पदार्थों की कमी होती है।-
  2. काली अथवा रेगड़ मिट्टी (Black Soil)—इस मिट्टी का निर्माण लावा के प्रवाह से हुआ है। यह मिट्टी कपास की फसल के लिए बहुत लाभदायक है। अतः इसे कपास वाली मिट्टी भी कहा जाता है। इस मिट्टी का स्थानीय नाम ‘रेगड़’ है। यह मिट्टी दक्कन ट्रैप प्रदेश की प्रमुख मिट्टी है। यह पश्चिम में मुंबई से लेकर पूर्व में अमरकंटक पठार, उत्तर में गुना (मध्य प्रदेश) और दक्षिण में बेलगाम तक त्रिभुजाकार क्षेत्र में फैली हुई है।
    काली मिट्टी नमी को अधिक समय तक धारण कर सकती है। इस मृदा में लौह, पोटाश, चूना, एल्यूमीनियम तथा मैग्नीशियम की मात्रा अधिक होती है। परंतु नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा जीवांश की मात्रा कम होती है।
  3. लाल मिट्टी (Red Soil)-इस मिट्टी का लाल रंग लोहे के रवेदार तथा परिवर्तित चट्टानों में बदल जाने के कारण होता है। इसका विस्तार तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, दक्षिणी बिहार, झारखंड, पूर्वी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा उत्तरी-पूर्वी पर्वतीय राज्यों में है। लाल मिट्टी में नाइट्रोजन तथा चूने की कमी, परंतु मैग्नीशियम, एल्यूमीनियम तथा लोहे की मात्रा अधिक होती है।।
  4. लैटराइट मिट्टी (Laterite Soil) इस मिट्टी में नाइट्रोजन, चूना तथा पोटाश की कमी होती है। इसमें लोहे तथा एल्यूमीनियम ऑक्साइड की मात्रा अधिक होने के कारण इसका स्वभाव तेज़ाबी हो जाता है। इसका विस्तार विंध्याचल, सतपुड़ा के साथ लगे मध्य प्रदेश, ओडिशा पश्चिमी बंगाल की बैसाल्टिक पर्वतीय चोटियों, दक्षिणी महाराष्ट्र तथा उत्तर-पूर्व में शिलांग के पठार के उत्तरी तथा पूर्वी भाग में है।
  5. मरुस्थलीय मिट्टी (Desert Soil)—इस मिट्टी का विस्तार पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में अरावली पर्वतों तक है। यह राजस्थान, दक्षिणी पंजाब व दक्षिणी हरियाणा में फैली हुई है। इसमें घुलनशील नमक की मात्रा अधिक होती है। परंतु इसमें नाइट्रोजन तथा ह्यूमस की बहुत कमी होती है। इसमें 92% रेत व 8% चिकनी मिट्टी का अंश होता है। इसमें सिंचाई की सहायता से बाजरा, ज्वार, कपास, गेहूं, सब्जियां आदि उगाई जा रही हैं।
  6. खारी व तेजाबी मिट्टी (Saline & Alkaline Soil)—यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा व पंजाब के दक्षिणी भागों में छोटे-छोटे टुकड़ों में मिलती है। खारी मिट्टियों से सोडियम भरपूर मात्रा में मिलता है। तेज़ाबी मिट्टी में कैल्शियम व नाइट्रोजन की कमी होती है। इसी लवणीय मिट्टी को उत्तर प्रदेश में औसढ़’ या ‘रेह’, पंजाब में ‘कल्लर’ या ‘थुड़’ तथा अन्य भागों में ‘रक्कड़’ कार्ल और ‘छोपां’ मिट्टी भी कहा जाता है।
  7. पीट एवं दलदली मिट्टी (Peat & Marshy Soil)-इसका विस्तार सुंदरवन डेल्टा, उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र, तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तटवर्ती भाग, मध्यवर्ती बिहार तथा उत्तराखंड के अल्मोड़ा में है। इसका रंग जैविक पदार्थों की अधिकता के कारण काला तथा तेजाबी स्वभाव वाला होता है। जैविक पदार्थों की अधिकता के कारण कहीं-कहीं इसका रंग नीला भी है।
  8. पर्वतीय मिट्टी (Mountain Soil)—इस मिट्टी में रेत, पत्थर तथा बजरी की मात्रा अधिक होती है। इसमें चूना कम लेकिन लोहे की मात्रा अधिक होती है। यह चाय की खेती के लिए अनुकूल होती है। इसका विस्तार असम, लद्दाख, लाहौल-स्पीति, किन्नौर, दार्जिलिंग, देहरादून, अल्मोड़ा, गढ़वाल व दक्षिण में नीलगिरि के पर्वतीय क्षेत्र में है।

प्रश्न 4.
भारत में पाये जाने वाले वन्य प्राणियों का वर्णन करो।
उत्तर-
वनस्पति की भांति ही हमारे देश के जीव-जंतुओं में भी बड़ी विविधता है। भारत में इनकी 81,000 जातियां पाई जाती हैं। देश के ताज़े और खारे पानी में 2500 जातियों की मछलियां मिलती हैं। इसी प्रकार यहां पर पक्षियों की भी 2000 जातियां पाई जाती हैं। मुख्य रूप से भारत के वन्य प्राणियों का वर्णन इस प्रकार है-

  1. हाथी-हाथी राजसी ठाठ-बाठ वाला पशु है। यह ऊष्ण आर्द्र वनों का पशु है। यह असम, केरल तथा कर्नाटक के जंगलों में पाया जाता है। इन स्थानों पर भारी वर्षा के कारण बहुत घने वन मिलते हैं।
  2. ऊंट-ऊंट गर्म तथा शुष्क मरुस्थलों में पाया जाता है।
  3. जंगली गधा-जंगली गधे कच्छ के रण में मिलते हैं।
  4. एक सींग वाला गैंडा-एक सींग वाले गैंडे असम और पश्चिमी बंगाल के उत्तरी भागों के दलदली क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  5. बंदर-भारत में बंदरों की अनेक जातियां मिलती हैं। इनमें से लंगूर सामान्य रूप से पाया जाता है। पूंछ वाला बन्दर (मकाक) बड़ा ही विचित्र जीव है। इसके मुंह पर चारों ओर बाल उगे होते हैं जो एक प्रभामण्डल के समान दिखाई देते हैं।
  6. हिरण-भारत में हिरणों की अनेक जातियां पाई जाती हैं। इनमें चौसिंघा, काला हिरण, चिंकारा तथा सामान्य हिरण प्रमुख हैं। यहां हिरणों की कुछ अन्य जातियां भी मिलती हैं। इनमें कश्मीरी बारहसिंघा, दलदली मृग, चित्तीदार मृग, कस्तूरी मृग तथा मूषक मृग उल्लेखनीय हैं।
  7. शिकारी जंतु-शिकारी जंतुओं में भारतीय सिंह का विशिष्ट स्थान है। अफ्रीका के अतिरिक्त यह केवल भारत में ही मिलता है। इसका प्राकृतिक आवास गुजरात में सौराष्ट्र के गिर वनों में है। अन्य शिकारी पशुओं में शेर, तेंदुआ, लामचिता (क्लाउडेड लियोपार्ड) तथा हिम तेंदुआ प्रमुख हैं।
  8. अन्य जीव-जंतु-हिमालय की श्रृंखलाओं में भी अनेक प्रकार के जीव-जंतु रहते हैं। इनमें जंगली भेड़ें तथा पहाड़ी बकरियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भारतीय जंतुओं में भारतीय मोर, भारतीय भैंसा तथा नील गाय प्रमुख हैं। भारत सरकार कुछ जातियों के जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए विशेष प्रयत्न कर रही है।

PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom

Punjab State Board PSEB 11th Class Chemistry Book Solutions Chapter 2 Structure of Atom Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Chemistry Chapter 2 Structure of Atom

PSEB 11th Class Chemistry Guide Structure of Atom InText Questions and Answers

Question 1.
(i) Calculate the number of electrons which will together weigh one gram.
(ii) Calculate the mass and charge of one mole of electrons.
Answer:
(i) Mass of one electron = 9.1 × 10-31 g
Number of electrons in 1.0 g = \(\frac{1}{9.1 \times 10^{-31}}\) = 1.098 x 1030 electrons

(ii) One mole of electron = 6.022 × 1023 electrons
Mass of 1 electron = 9.1 × 10-31 kg
Mass of 6.022 × 1023 electrons – (9.1 x 10-31 kg) × (6.022 x 1023)
= 5.48 × 10-7 kg
Charge on one electron = 1.602 × 10-19 coulomb
Charge on one mole of electrons = 1.602 × 10-19 × 6.022 × 1023
= 9.65 × 104 coulomb.

PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom

Question 2.
(i) Calculate the total number of electrons present in one mole of methane.
(ii) Find (a) the total number and (b) the total mass of neutrons in 7 mg of 14C.
(Assume that mass of a neutron = 1.675 × 10-27 kg)
(iii) Find (a) the total number and (b) the total mass of protons in 34 mg of NH3 at STP.
Will the answer change if the temperature and pressure are changed?
Answer:
(i) Number of electrons present in 1 molecule of methane (CH4)
= {1(6) + 4(1)} = 10 electrons
Number of electrons present in 1 mole i.e., 6.022 × 1023 molecules of
methane = 6.022 × 1023 × 10 = 6.022 × 1024 electrons
(ii) (a) Mass of a neutron = 1.675 × 10-27 kg
14.0 g of 14C contains 1 mole of atoms of C-14
∴ 14.0 g of 14C contains 8 × 6.022 × 1023 neutrons
[∵ each atom of C-14 contains 8 neutrons]
7 mg (= 7 × 10-3 g) of 14C contains
= \(\frac{6.022 \times 10^{23} \times 8 \times 7 \times 10^{-3}}{14}\) = 2.4092 × 1021 neutrons

(b) Mass of one neutron = 1.675 × 1027 kg
Mass of 2.4092 × 1021 neutrons
= (2.4092 × 1021)(1.675 × 10-27 kg) = 4.035 × 10-6 kg

(iii) 1 mole of NH3 contains protons = 7 + 3 = 10 moles of protons
= 6.022 × 1023 × 10 protons = 6.022 × 1024 protons

(a) 17 gNH3 contains 6.022 × 1024 protons.
Number of protons in 34 mg NH3 will contain
= \(6.022 \times 10^{24} \times 34 \times 10^{-3}\) = 1.2046 x 1022 Protons

(b) Mass of one proton = 1.675 x 10-27 kg
Total mass of protons in 34 mg of NH3
– (1.675 × 10-27 kg) (1.2046 × 1022)
= 2.0177 × 10-5 kg
The number of protons, electrons and neutrons in an atom is independent of temperature and pressure conditions. Hence, the obtained values will remain unchanged if the temperature and pressure is changed.

Question 3.
How many neutrons and protons are there in the following nuclei?
\({ }_{6}^{13} \mathrm{C},{ }_{8}^{16} \mathrm{O},{ }_{12}^{24} \mathrm{Mg},{ }_{26}^{56} \mathrm{Fe},{ }_{38}^{88} \mathrm{Sr}\)
Answer:
\({ }_{6}^{13} \mathrm{C}\)C : Atomic mass =13
Atomic number = Number of protons = 6
Number of neutrons = (Atomic mass) – (Atomic number)
= 13 – 6 = 7
\({ }_{8}^{16} \mathrm{O}\) :
Atomic mass =16
Atomic number = 8
Number of protons = 8
Number of neutrons = (Atomic mass) – (Atomic number)
= 16 – 8 = 8
\({ }_{12}^{24} \mathrm{Mg}\) : Atomic mass = 24
Atomic number = Number of protons = 12
Number of neutrons = (Atomic mass) – (Atomic number)
= 24-12 = 12
\({ }_{26}^{56} \mathrm{Fe}\) : Atomic mass = 56
Atomic number = Number of protons = 26
Number of neutrons = (Atomic mass) – (Atomic number)
= 56 – 26 = 30
\({ }_{38}^{88} \mathrm{Sr}\) : Atomic mass = 88
Atomic number = Number of protons = 38
Number of neutrons = (Atomic mass) – (Atomic number)
= 88 – 38 = 50

Question 4.
Write the complete symbol for the atom with the given atomic number (Z) and atomic mass (A)
(i) Z = 17, A = 35
(ii) Z = 92, A = 233
(iii) Z = 4, A = 9
Answer:
(i) Z = 17, A = 35
Since the no. of protons = 17 – no. of electrons
∴ The atom is chlorine, Cl: \({ }_{17}^{35} \mathrm{Cl}\)

(ii) Z = 92, A = 233
No. of protons = 92
∴ The atom is uranium, U : \({ }_{92}^{233} U\)

(iii) Z = 4, A = 9
No. of protons = 4
∴ The atom is Beryllium, Be : \({ }_{4}^{9} \mathrm{Be}\)

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Question 5.
Yellow light emitted from a sodium lamp has a wavelength (A.) of 580 nm. Calculate the frequency (υ) and wave number (\(\overline{\mathbf{v}}\)) of the ‘ yellow light.
Answer:
We know that,
Frequency, v = \(\frac{c}{\lambda}\)
1 nm = 10-9 m
580 nm = 580 × 10-9 m = 580 x 10-7 cm
v = \(\) = 5.17 × 1014s-1
(velocity of light = 3 × 108 m/s)
Wave number, \(\bar{v}=\frac{1}{\lambda}\)
= \(\frac{1}{580 \times 10^{-7}}\) = 1.72 × 104 cm-1

Question 6.
Find energy of each of the photons which
(i) correspond to light of frequency 3 × 1015 Hz.
(ii) have wavelength of 0.50 Å
Answer:
(i) Energy E = hv
where, h = Planck’s constant = 6.626 × 10-34 Js
and v = frequency of light = 3 × 1015 Hz
E= (6.626 × 10-34)(3 × 1015)
E = 1.988 × 10-18 J

(ii) Energy E = \(\frac{h c}{\lambda}\)
where, h = Planck’s constant = 6.626 × 10-34 Js
c = velocity of light in vacuum = 3 × 108 m/s
= wavelength = 0.50Å = 0.50 × 10-10
E = \(\frac{\left(6.626 \times 10^{-34}\right)\left(3 \times 10^{8}\right)}{0.50 \times 10^{-10}}\) = 3.976 × 10-15 J

Question 7.
Calculate the wavelength, frequency and wave number of a light wave whose period is 2.0 × 10-10 s.
Answer:
Frequency of light (v) = \(\frac{1}{\text { Time period }}=\frac{1}{2.0 \times 10^{-10} \mathrm{~s}}\) = 5.0 × 109s-1
Wavelength of light (λ) = \(\frac{c}{v}\)
where, c = velocity of light in vacuum = 3 × 108 m/s
λ = \(\frac{3 \times 10^{8}}{5.0 \times 10^{9}}\) = 6.0 × 10-2 m
Wave number(\(\bar{v}\)) of light
= \(\frac{1}{\lambda}=\frac{1}{6.0 \times 10^{-2}}\) = 1.66 × 101m-1 = 16.66m-1

Question 8.
What is the number of photons of light with a wavelength of 4000 pm that provide 1 J of energy?
Answer:
Energy (E) of a photon = hv = \(\frac{h c}{\lambda}\)
where, = wavelength of light = 4000 pm = 4000 × 10-12 m
(∵ 1 pm = 10-12 m)
c = velocity of light in vacuum = 3 × 108 m/s
h = Planck’s constant = 6.626 × 10-34 Js
E = \(\frac{6.626 \times 10^{-34} \times 3 \times 10^{8}}{4000 \times 10^{-12}}\) = 4.9695 × 10-17J
Number of protons, N = \(\frac{1}{4.9695 \times 10^{-17}}\) = 2.0122 × 1016 protons.

Question 9.
A photon of wavelength 4 × 10-7 m strikes on metal surface, the work function of the metal being 2.13 eV. Calculate (i) the energy of the photon (eV), (ii) the kinetic energy of the emission, and (iii) the velocity of the photoelectron (1 eV = 1.6020 × 10-19 J).
Answer:
(i) Energy (E) of a photon = hv = \(\frac{h c}{\lambda}\)
where,
h = Planck’s constant = 6.626 × 10-34 Js
c = velocity of light in vacuum = 3 × 108 m/s
λ = wavelength of photon =4 × 10-7 m
E = \(\frac{\left(6.626 \times 10^{-34}\right)\left(3 \times 10^{8}\right)}{4 \times 10^{-7}}\)
= 4.9695 × 10-19j = \(\frac{4.9695 \times 10^{-19}}{1.602 \times 10^{-19}}\) [∵ 1 eV = 1.602 x 10-19J]
= 3.10 eV
Hence, the energy of the photon is 3.10 eV.

(ii) The kinetic energy of emission Ek is given by
= hv – hv0 = (E – W) eV
= 3.10 – 2.13 eV = 0.97 eV
Hence, the kinetic energy of emission is 0.97 eV.

(iii) The velocity of a photoelectron is given by
KE = \(\frac{1}{2}\) mv2 – hv – hv0 = 0.97 eV
\(\frac{1}{2}\)mv2 = 0.97 × 1.602 × 10-19 J
(∵ 1 eV = 1.602 x 10-19 J)
\(\frac{1}{2}\) × 9.11 × 10-31 kg × v2 = 0.97 × 1.602 × 10-19 J
(∵ mass of electron = 9.11 × 10-31 kg)
v2 = \(\frac{0.97 \times 1.602 \times 10^{-19} \times 2}{9.11 \times 10^{-31}}\) = 0.341 × 1012
v = 0.584 × 106 = 5.84 × 105 m/s
Hence, the velocity of the photoelectron is 5.84 × 105 ms-1.

Question 10.
Electromagnetic radiation of wavelength 242 run is just sufficient to ionise the sodium atom. Calculate the ionisation energy of sodium in kJ mol-1.
Answer:
Energy (E) = \(\frac{h c}{\lambda}\)
= \(\frac{\left(6.626 \times 10^{-34} \mathrm{Js}\right)\left(3 \times 10^{8} \mathrm{~ms}^{-1}\right)}{242 \times 10^{-9} \mathrm{~m}}\)
= 0.0821 × 10-17 J
This energy is sufficient for ionisation of one Na atom.
E = 6.02 × 1023 × 0.0821 × 10-17 J/mol
E = 4.945 × 105 J/mol = 4.945 × 102 kJ/mol

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Question 11.
A 25 watt bulb emits monochromatic yellow light of wavelength of 0.57 (am. Calculate the rate of emission of quanta per second.
Answer:
Power of bulb, P = 25 watt = 25 Js-1
Wavelength,
λ = 0.57 µm = 0.57×10-6 m
Energy of one photon,
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Question 12.
Electrons are emitted with zero velocity from a metal surface when it is exposed to radiation of wavelength 6800Å. Calculate threshold frequency (v0) and work function (W0) of the metal.
Answer:
Threshold wavelength of radiation
λ0 = 6800Å = 6800 × 10-10 m
Threshold frequency (v0) of the metal
= \(\frac{c}{\lambda_{0}}=\frac{3 \times 10^{8} \mathrm{~ms}^{-1}}{6800 \times 10^{-10} \mathrm{~m}}\) = 4.41 × 1014s-1
Thus, the threshold frequency (v0) of the metal is 4.41 × 1014s-1.
Hence, work function (W0) of the metal = hv0
= (6.626 × 10-34Js)(4.41 × 1014s-1)= 2.922 × 10-19 J

Question 13.
What is the wavelength of light emitted when the electron in a hydrogen atom undergoes transition from an energy level with n = 4 to an energy level with n = 2 ?
Answer:
The ni = 4 to nf= 2 transition will give rise to a spectral line of the
Balmer series. The energy involved in the transition is given by the relation,
E = 2.18 × 10-18 \(\left[\frac{1}{n_{i}^{2}}-\frac{1}{n_{f}^{2}}\right]\)
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Question 14.
How much energy is required to ionise a H atom if the electron occupies n = 5 orbit? Compare your answer with the ionization enthalpy of H atom (energy required to remove the electron from n – 1 orbit).
Answre:
Energy change, ΔE = Ef – Ei
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Hence, far higher energy (25 times) is required to remove an electron from first orbit.

Question 15.
What is the maximum number of emission lines when the excited electron of a H atom in n = 6 drops to the ground state?
Answer:
The maximum number of emission lines
= \(\frac{n(n-1)}{2}=\frac{6(6-1)}{2}\) = 3 × 5 = 15

Question 16.
(i) The energy associated with the first orbit in the hydrogen atom is -2.18 × 10-18 J atom-1. What is the energy associated with the fifth orbit?
(ii) Calculate the radius of Bohr’s fifth orbit for hydrogen atom.
Answer:
(i) Energy associated with the fifth orbit of hydrogen atom is calculated as :
E5 = \(\frac{-\left(2.18 \times 10^{-18}\right)}{(5)^{2}}=\frac{-2.18 \times 10^{-18}}{25}\)
E5 = -8.72 × 10-20 J
(ii) Radius of Bohr’s nth orbit for hydrogen atom is given by,
rn = (0.0529 nm) n2
For, n= 5
r5 = (0.0529 nm) (5)2
r5 = 1.3225 nm

PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom

Question 17.
Calculate the wave number for the longest wavelength transition in the Balmer series of atomic hydrogen.
Answer:
For the Balmer series, a transition from n1= 2 to n2 = 3 is allowed.
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Question 18.
What is the energy in joules, required to shift the electron of the hydrogen atom from the first Bohr orbit to the fifth Bohr orbit and what is the wavelength of the light emitted when the electron returns to the ground state? The ground state electron energy is -2.18 × 10-11 ergs.
Answer:
ΔE = E5 – E1 = 2.18 × 10-11 (\(\left(\frac{1}{n_{i}^{2}}-\frac{1}{n_{f}^{2}}\right)\))erg
(ni = 1st orbit and nf = 5th orbit)
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PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 6 - 2

Question 19.
The electron energy in hydrogen atom is given by En = (-218 × 10-18)/n2J. Calculate the energy required to remove an electron completely from n = 2 orbit. What is the longest wavelength of light in cm that can be used to cause this transition?
Answer:
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Question 20.
Calculate the wavelength of an electron moving with a velocity of 2.05 × 107 ms-1.
Answer:
According to de Broglie’s equation,
λ = \(\frac{h}{m v}\)
where, λ = wavelength of moving electron
m = mass of electron = 9.1 × 10-31 kg
h= Planck’s constant – 6.626 × 10-34 Js
v = velocity of electron = 2.05 × 107 ms-1
λ = \(\frac{6.626 \times 10^{-34} \mathrm{Js}}{\left(9.1 \times 10^{-31} \mathrm{~kg}\right)\left(2.05 \times 10^{7} \mathrm{~ms}^{-1}\right)}\)
λ = 3.548 × 10-11 m
Hence, the wavelength of the electron moving with a velocity of
2.5× 107 ms-1 is 3.548 x 10-11m.

Question 21.
The mass of an electron is 9.1 x 10-31 kg. If its K.E. is 3.0 x 10-25 J, calculate its wavelength.
Answer:
Kinetic energy, K.E. = \(\frac{1}{2}\) mv2
∴ Velocity(v) = \(\sqrt{\frac{2 \mathrm{KE}}{m}}=\sqrt{\frac{2\left(3.0 \times 10^{-25}\right)}{9.1 \times 10^{-31} \mathrm{~kg}}}=\sqrt{0.6593 \times 10^{6}}\)
_ 6.626 x 10~34 Js
~ (9.1 x 10-31 kg)(811.579 ms-1)
λ = 8.968 x 10-7 m
Hence, the wavelength of the eliectron is 8.968 x 10-7 m or 8968 Å.

Question 22.
Which of the following are isoelectronic species i.e., those having the same number of electrons?
Na+, K+, Mg2+, Ca2+, S2-, Ar
Ans. No. of electrons in Na+ = 10 [11-1]
No. of electrons in K+ = 18 [19-1]
No. of electrons in Mg2+ = 10 [12-2]
No. of electrons in Ca2+ =18 [20 – 2]
No. of electrons in S2- = 18 [16 + 2]
No. of electrons in Ar = 18
∴ Na+ , Mg2+ are isoelectronic (10 e each)
∴ Ca2+, K+, S2-, Ar are isoelectronic (18 e each).

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Question 23.
(i) Write the electronic configurations of the following ions:
(a) H (b) Na+ (c)02- (d)F
(ii) What are the atomic numbers of elements whose outermost electrons are represented by
(a) 3s1 (b) 2p3 (c) 3p5?
(iii) Which atoms are indicated by the following configurations?
(a) [He] 2s1 (b) [Ne] 3s2 3p3 (c) [Ar] 4s23d1.
Answer:
(i) (a) H ion
The electronic configuration of H atom is 1s1.
A negative charge on the species indicates the gain of an electron by it.
∴ Electronic configuration of H = 1s2

(b) Na+ ion
The electronic configuration of Na atom is 1s2 2s2 2p6 3s1.
A positive charge on the species indicates the loss of an electron by it.
∴ Electronic configuration of Na+ = 1s2 2s2 2p6 3s° or 1s2 2s2 2p6

(c) O2- ion
The electronic configuration of O atom is 1s22s2 2p4
A dinegative charge on the species indicates that two electrons are gained by it.
∴ Electronic configuration of 02- ion is 1s2 2s2 2p6

(d) F ion
The electronic configuration of F atom is 1s22s22p5.
A negative charge on the species indicates the gain of an electron by it.
∴ Electronic configuration of F“ ion is 1s2 2s2 2p6.

(ii) (a) 3s1
Completing the electronic configuration of the element as 1s2 2s2 2p6 3s1. .-. Number of electrons present in the atom of the element = 2 +2 + 6 +1=11
∴ Atomic number of the element = 11

(b) 2p3
Completing the electronic configuration of the element as 1s2 2s2 2p3
∴ Number of electrons present in the atom of the element = 2+ 2+ 3 = 7
∴ Atomic number of the element = 7

(c) 3p5
Completing the electronic configuration of the element as 1s2 2s2 2p6 3s2 3 P5
∴ Number of electrons present in the atom of the element
2 + 2 + 6 + 2 + 5 = 17
∴ Atomic number of the element = 17

(iii) (a) [He] 2s1
The electronic configuration of the element is [He]2s1 = 1s22s1.
∴ Atomic number of the element = 3
Hence, the element with the electronic configuration [He] 2s1 is lithium (Li).

(b) [Ne] 3s2 3p3
The electronic configuration of the element is
[Ne] 3s2 3p3 = 1s2 2s2 2p6 3s2 3p3
∴ Atomic number of the element = 15
Hence, the element with the electronic configuration [Ne] 3s2 3p3 is phosphorus (P).

(c) [Ar] 4s2 3d1
The electronic configuration of the element is [Ar] 4s2 3d1 = 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 4s2 3d1.
∴ Atomic number of the element = 21
Hence, the element with the electronic configuration [Ar] 4s2 3d2 is scandium (Sc).

Question 24.
What is the lowest value of n that allows g orbitals to exist?
Answer:
For g-orbitals, l = 4.
As for any value ‘n’ of principal quantum number, the Azimuthal quantum number (l) can have a value from zero to (n —1).
∴ For l = 4, minimum value of n = 5

Question 25.
An electron is in one of the 3d orbitais. Give the possible values of n, l and ml for this electron.
Answer:
For the 3d orbital:
Principal quantum number (n) = 3
Azimuthal quantum number (L) = 2
Magnetic quantum number (ml) = – l to + l including 0 = -2 -1, 0, 1, 2

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Question 26.
An atom of an element contains 29 electrons and 35 neutrons. Deduce (i) the number of protons and (ii) the electronic configuration of the element.
Answer:
No. of protons in a neutral atom = No. of electrons = 29
Electronic configuration = 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 3d10 4s1.

Question 27.
Give the number of electrons in the species : H2+, H2 and 02+.
Answer:
H2+ = one ; H2 = two ; 02+ = 15

Question 28.
(i) An atomic orbital has n = 3. What are the possible values of l and ml ?
(ii) List the quantum numbers ml and l of electron in 3rd orbital.
(iii) Which of the following orbitals are possible ?
1p, 2s, 2p and 3f.
Answer:
(i) For n = 3; l = 0, 1 and 2.
For l = 0 ; ml = 0
For l = 1; ml = +1, 0, -1
For l = 2 ; ml = +2, +1,0, +1, + 2
(ii) For an electron in 3rd orbital ; n = 3; l = 2 ; ml can have any of the values -2, -1, 0,
+ 1, +2.
(iii) 1p and 3f orbitals are not possible.

Question 29.
Using s, p and d notations, describe the orbitals with follow ing quantum numbers :
(a) n = 1, l = 0
(b) n = 4, l = 3
(c) n = 3, l = 1
(d) n = 4, l = 2
Answer:
(a) 1s orbital
(b) 4f orbital
(c) 3p orbital
(d) 4d orbital

Question 30.
From the following sets of quantum numbers, state which are possible. Explain why the others are not possible.
(i) n = 0, l = 0, ml = 0, ms = +1/2
(ii) n = 1, l = 0, ml = 0, ms – – 1/2
(iii) n = 1, l = 1, ml = 0, ms= +1/2
(iv) n = 1, l = 0, ml = +1, ms= +1/2
(v) n = 3, l = 3, ml = -3, ms = +1/2
(vi) n = 3, l = 1, ml = 0, ms= +1/2
Answer:
(i) The set of quantum numbers is not possible because the minimum value of n can be 1 and not zero.
(ii) The set of quantum numbers is possible.
(iii) The set of quantum numbers is not possible because, for n = 1, l can not be equal to 1. It can have 0 value.
(iv) The set of quantum numbers is not possible because for l = 0. mt cannot be + 1. It must be zero.
(v) The set of quantum numbers is not possible because, for n = 3, l ≠ 3.
(vi) The set of quantum numbers is possible.

Question 31.
How many electrons in an atom may have the following quantum numbers ?
(a) n = 4 ; ms = -1/2
(b) n = 3, l = 0.
Answer:
(a) For n = 4
Total number of electrons = 2n2 = 2 × 16 = 32
Half out of these will have ms = —1/2
∴ Total electrons with ms (-1/2) = 16
(b) For n = 3
l= 0 ; ml = 0, ms +1/2, -1/2 (two e)

Question 32.
Show that the circumference of the Bohr orbit for the hydrogen atom is an integral multiple of the de Broglie wavelength associated with the electron revolving around the orbit.
Answer:
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 20
Thus, the circumference (2πr) of the Bohr orbit for hydrogen atom is an integral multiple of the de Broglie wavelength.

PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom

Question 33.
Calculate the number of atoms present in :
(i) 52 moles of He
(ii) 52 u of He
(iii) 52 g of He.
Answer:
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 21

Question 34.
Calculate the energy required for the process :
He+fe) → He2+(g) + e
The ionisation energy’ for the H atom in the ground state is 2.18 × 10-18  J atom-1
Answer:
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 22

For H atom (Z = 1), En =2.18 × 10-18 × (l)2 J atom-1 (given)
For He+ ion (Z = 2), En =2.18 × 10-18 × (2)2 = 8.72 × 10-18 J atom-1 (one electron species)

Question .35.
If the diameter of carbon atom is 0.15 nm, calculate the number of carbon atoms which can be placed side by side in a straight line across a length of a scale of length 20 cm long.
Answer:
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 23

Question 36.
2 × 108 atoms of carbon are arranged side by side. Calculate the radius of carbon atom if the length of this arrangement is 2.4 cm.
Answer:
The length of the arrangement = 2.4 cm
Total number of carbon atoms present = 2 ×108
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 24
Radius of each carbon atom = 12(1.2 × 10-8) = 6.0 × 10-9cm = 0.06 nm

Question 37.
The diameter of zinc atom is 2.6 Å. Calculate :
(a) the radius of zinc atom in pm
(b) number of atoms present in a length of 1.6 cm if the zinc atoms are arranged side by side length wise.
Answer:
(a) Radius of zinc atom =Undefined control sequence = 1.3 Å = 1.3 × 10-10m = 130 × 10-12m = 130 pm
(b) Length of the scale = 1.6 cm = 1.6 × 1010 pm
Diameter of zinc atom = 260 pm
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 25

Question 38.
A certain particle carries 2.5 x 10-16 C of static electric charge. Calculate the number of electrons present in it.
Answer:
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 26

Question 39.
In Millikan’s experiment, the charge on the oil droplets was found to be – 1.282 x 10-18C. Calculate the number of electrons present in it.
Answer:
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 27

PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom

Question 40.
In Rutherford experiment, generally the thin foil of heavy atoms like gold, platinum etc. have been used to be bombarded by the a-particles. If a thin foil of light atoms like aluminium etc. is used, what difference would be observed from the above results ?
Answer:
We have studied that in the Rutherford’s experiment by using heavy metals like gold and platinum, a large number of a-particles sufferred deflection while a very few had to retrace their path.

If a thin foil of lighter atoms like aluminium etc. be used in the Rutherford experiment, this means that the obstruction offered to the path of the fast moving a-particles will be comparatively quite less.

As a result, the number of a-particles deflected will be quite less and the particles which are deflected back will be negligible.

Question 41.
Symbols \(_{ 35 }^{ 79 }{ Br }\) and 79Br can be written whereas symbols \(_{ 79 }^{ 35 }{ Br }\) and 35Br are not accepted. Answer in brief.
Answer:
In the symbol \(_{ A }^{ B }{ X }\) of an element :
A denotes the atomic number of the element
B denotes the mass number of the element.
The atomic number of the element can be identified from its symbol because no two elements can have the atomic number. However, the mass numbers have to be mentioned in order to identify the elements. Thus,
Symbols \(_{ 35 }^{ 79 }{ Br }\) and 79Br are accepted because atomic number of Br will remain 35 even if not mentioned. Symbol \(_{ 79 }^{ 35 }{ Br }\) is not accepted because atomic number of Br cannot be 79 (more than the mass number = 35). Similarly, symbol 35Br cannot be accepted because mass number has to be mentioned. This is needed to differentiate the isotopes of an element.

Question 42.
An element with mass number 81 contains 31.7% more neutrons as compared to protons. Assign the symbol to the element.
Answer:
An element can be identified by its atomic number only. Let us find the atomic number.
Let the number of protons = x
Number of neutrons = x + [\(\frac { x\times 31.7 }{ 100 } \) = (x × 0.317x)
Now, Mass no. of element = no. of protons =no. neutrons
81 = x + x + 0-317 x = 2.317 x or x = \(\frac { 81 }{ 2.317 } \) = 35
∴ No. of protons = 35, No. of neutrons = 81 – 35 =46
Atomic number of element (Z) = No. of protons = 35
The element with atomic number (Z) 35 is bromine \(_{ 35 }^{ 81 }{ Br }\).

Question 43.
An ion with mass number 37 possesses one unit of negative charge. If the ion contains 11 -1% more neutrons than the electrons, find the symbol of the ion.
Answer:
Let the no. of electron in the ion = x
∴ the no. of protons = x – 1 (as the ion has one unit negative charge)
and the no. of neutrons = x + \(\frac { x\times 11.1 }{ 100 } \) = 1.111 x
Mass no. or mass of the ion = No. of protons + No. of neutrons
(x – 1 + 1.111 x)
Given mass of the ion = 37
∴ x- 1 + 1.111 x = 37 or 2.111 x = 37 + 1 = 38
x = \(\frac { 38 }{ 2.111 } \) = 18
No. of electrons = 18 ; No. of protons = 18 – 1 = 17
Atomic no. of the ion = 17 ; Atom corresponding to ion = Cl
Symbol of the ion = \(_{ 17 }^{ 37 }{ Cl }\)

Question 44.
An ion with mass number 56 contains 3 units of positive charge and 30.4% more neutrons than electrons. Assign symbol to the ion.
Answer:
Let the no. of electrons in the ion = x
∴ the no. of the protons = x + 3 (as the ion has three units positive charge)
and the no. of neutrons = x + \(\frac { x\times 31.7 }{ 100 } \) = xc + 0.304 x
Now, mass no. of ion = No. of protons + No. of neutrons
= (x + 3) + (x + 0.304x)
∴ 56 = (x + 3) + (x + 0.304x) or 2.304x = 56 – 3 = 53
x = \(\frac { 53 }{ 2.304 } \) = 23
Atomic no. of the ion (or element) = 23 + 3 = 26
The element with atomic number 26 is iron (Fe) and the corresponding ion is Fe3+.

Question 45.
Arrange the following type of radiations in increasing order of frequency:
(a) radiation from microwave oven (b) amber light from traffic signal (c) radiation from FM radio (d) cosmic rays from outer space and (e) X-rays.
Answer:
The increasing order of frequency is as follows :
Radiation from FM radio < Radiation from microwave oven < Amber light from traffic signal < X-rays < Cosmic rays from outer space.

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Question 46.
Nitrogen laser produces a radiation at a wavelength of 337.1 nm. If the number of photons emitted is 5.6 x 1024 , calculate the power of this laser.
Answer:
Power of laser (E) = \(\frac{n h c}{\lambda}\)
= \(\frac{\left(5.6 \times 10^{24}\right)\left(6.626 \times 10^{-34} \mathrm{Js}\right)\left(3 \times 10^{8} \mathrm{~ms}^{-1}\right)}{\left(337.1 \times 10^{-9} \mathrm{~m}\right)}\)
= 0.3302 x 107 J = 3.33 x 106 J
Hence, the power of the laser is 3.33 x 106 J.

Question 47.
Neon gas is generally used in the sign boards. If it emits strongly at 616 nm, calculate (a) the frequency of emission, (b) distance travelled by this radiation in 30 s (c) energy of quantum and (d) number of quanta present if it produces 2 J of energy.
Answer:
(a) Frequency (v) of emission can be calculated as: c = v x λ
where, λ – wavelength = 616 nm = 616 x 10-9 ms-1
c = velocity of light = 3.0 x 108 ms-1
v = \(\frac{c}{\lambda}=\frac{3.0 \times 10^{8}}{616 \times 10^{-9}}\) = 4.87 x 1014s-1

(b) Distance travelled in 1 second = 3.0 x 108 m
Distance travelled in 30 seconds = 30 x 3.0 x 108 m = 9 x 109 m
(c) Energy of the photon (quantum)
E= hv = 6.626 x 10-34 x 4.87 x 1014J
= 32.26 x 10-20 J

(d) Number of quanta = \(\frac{Total energy produced}
{Energy of one quantum}\)
= \(\frac{2}{32.26 \times 10^{-20}}\) = 6.2 x 1018

Question 48.
In astronomical observations, signals observed from the distant stars are generally weak. If the photon detector receives a total of 3.15 x 10-18 J from the radiations of 600 rnn, calculate the number of photons received by the detector.
Answer:
Energy of one photon, E = \(\frac{h c}{\lambda}\)
= \(\frac{\left(6.626 \times 10^{-34} \mathrm{Js}\right)\left(3 \times 10^{8} \mathrm{~ms}^{-1}\right)}{\left(600 \times 10^{-9} \mathrm{~m}\right)}\) = 3.313 x 10<sup>-19</sup> J
Number of photons = \(\frac{Total energy received}{Energy of one photon}\)
= \(\frac{3.15 \times 10^{-18} \mathrm{~J}}{3.313 \times 10^{-19} \mathrm{~J}}\)

Question 49.
Lifetimes of the molecules in the excited states are often measured by using pulsed radiation source of duration nearly in the nano second range. If the radiation source has the duration of 2 ns and the number of photons emitted during the pulse source is 2.5 x 1015, calculate the energy of the source.
Answer:
Duration of radiation source = 2 ns = 2 x 10-9 s
No. of photons (n) = 2.5 x 1015
Frequency of radiation
v = \(\frac{1}{2.0 \times 10^{-9} \mathrm{~s}}\) = 5.0 x 108s-1
Energy (E) of source = n x hv
E= (2.5 x 1015)(6.626 x 10-34Js) (5.0 x 108)
E = 8.282 x 10-10J
Hence, the energy of the source (E) is 8.282 x 10-10 J.

Question 50.
The longest wavelength doublet absorption transition is observed at 589 and 589.6 nm. Calculate the frequency of each transition and energy difference between two excited states.
Answer:
For λ1 = 589 nm = 589 x 10-9
Frequency of transition (v1) = \(\) = 5.093 x 1014s-1
Similarly, for λ2 = 589.6 nm = 589.6 x 10-9m
Frequency of transition (v2) = \(\frac{c}{\lambda_{2}}=\frac{3.0 \times 10^{8} \mathrm{~ms}^{-1}}{589.6 \times 10^{-9} \mathrm{~m}}\) = 5.088 x 1014s-1
Energy difference (ΔE) between excited states = E1 – E2
ΔE = h(v1 – v2)
= (6.626 × 10-34Js) (5.093 × 1014 – 5.088 × 1014)s-1
= (6.626 × 10-34Js) (0.005 × 10-14) s-1
ΔE = 3.31 × 10-22

Question 51.
The work function for caesium atom is 1.9 eV. Calculate (a) the threshold wavelength and (b) the threshold frequency of the radiation. If the caesium element is irradiated with a wavelength 500 nm, calculate the kinetic energy and the velocity of the ejected photoelectron.
Answer:
It is given that the work function (W0) for caesium atom is 1.9 eV.
(a) Work function,
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λ0 = 6.53 × 10-7 m
= 653 × 10-9m = 653nm.
Hence the threshold wave length is 653nm

(b) threshold frequency
v0 = \(\frac{W_{0}}{h}\)
v0 = \(\frac{1.9 \times 1.6 \times 10^{-19} \mathrm{~J}}{6.626 \times 10^{-34} \mathrm{Js}}\) = 4.59 x 1014s-1
Hence the threshold frequency of radiation is 4.59 x 1014s-1
According to the question :
wavelength used in irradiation = 500nm
Kinetic Energy = h(v – v0)
= hc( \(\frac{1}{\lambda}-\frac{1}{\lambda_{0}}\) )

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Question 52.
Following results are observed when sodium metal is irradiated with different wavelengths. Calculate (a) threshold wavelength and, (b) Planck’s constant.
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Answer:
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 8
Mass of electron, m = 9.1 × 10-31 kg
Here, λ = 500 × 10-9 m
vmax = 2.55 ×105ms-1
λ0 = ?
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Question 53.
The ejection of the photoelectron from the silver metal in the photoelectric effect experiment can be stopped by applying the voltage of 0.35 V when the radiation 256.7 nm is used. Calculate the work function for silver metal.
Answer:
h = 6.626 × 10-34 Js
V0 = 0.35 volt
e = 1.6 × 10-19 C
λ = 256.7 nm = 256.7 × 10-9 m
W0 = ? (eV)
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Question 54.
If the photon of the wavelength 150 pm strikes an atom and one of its inner bound electrons is ejected out with a velocity of 1.5 x 107ms-1, calculate the energy with which it is bound to the nucleus.
Answer:
λ = wavelength = 150 pm = 150 × 10-12 m
v = velocity = 1.5 × 107 ms-1
Kinetic energy of the ejected electron
= \(\frac{1}{2}\) mv7 = \(\frac{1}{2}\) x 9.1 x 10-31 x (1.5 x 107 )2 J = 0.102 x 10-15 J
Energy of the incident radiation
hv= hv0 +\(\frac{1}{2}\)mv2
E = hv = \(\frac{h c}{\lambda}=\frac{6.626 \times 10^{-34} \times 3.0 \times 10^{8}}{150 \times 10^{-12}}\)
= 1.325 × 10-15 J
Minimum energy required to eject the electron
E0 = E – K.E.
= (1.325 × 10-15 – 0.102 × -15 ) J
= 1.223 × 10-15J
= \(\frac{1.223 \times 10^{-15}}{1.602 \times 10^{-19}} \mathrm{eV}\)
[ 1J = 1.602 × 10-19 eV]
= 7.6 × 103 eV

Question 55.
Emission transitions in the Paschen series end at orbit n = 3 and start from orbit n and can be represented as v = 3.29 x 1015 (Hz) \(\left[\frac{1}{3^{2}}-\frac{1}{n^{2}}\right]\)
Calculate the value of n if the transition is observed at 1285 nm. Find the region of the spectrum.
Answer:
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Question 56.
Calculate the wavelength for the emis8ion transition if it starts from the orbit having radius 1.3225 mn and ends at 211.6 pm. Name the series to which this transition belongs and the region of the spectrum.
Answer:
The radius of the nth orbit of hydrogen like particles is given by
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Thus, the transition ocurs from the 5th orbit to the 2nd orbit. It belongs to the Balmer series.
Wave number ( \(\bar{V}\) ) for the transition is given by,
\(\bar{v}=\frac{1}{\lambda}=1.097 \times 10^{7}\left(\frac{1}{2^{2}}-\frac{1}{5^{2}}\right)=1.097 \times 10^{7}\left(\frac{21}{100}\right)\)
= 2.303 × 106 m-1
∴ Wavelength ) associated with the emission transition is given by,
λ = \(\frac{1}{\bar{v}}=\frac{1}{2.303 \times 10^{6} \mathrm{~m}^{-1}}\)
= 0.434 × 10-6 = 434 nm
∴ This transition belongs to Balmer series and comes in the visible region of the spectrum.

Question 57.
Dual behaviour of matter proposed by de Broglie led to the discovery of electron microscope often used for the highly magnified images of biological molecules and other type of material. If the velocity of the electron in this microscope is 1.6 x 106 ms-1, calculate de Broglie wavelength associated with this electron.
Answer:
From Broglie’s equation,
λ = \(\frac{h}{m v}\)
λ = \(\frac{6.626 \times 10^{-34} \mathrm{Js}}{\left(9.1 \times 10^{-31} \mathrm{~kg}\right)\left(1.6 \times 10^{6} \mathrm{~ms}^{-1}\right)}\) (1J = 1 kgm2s-2)
= 4.55 × 10-10 m = 455 pm
∴ de Broglie’s wavelength associated with the electron is 455 pm.

Question 58.
Similar to electron diffraction, neutron diffraction microscope is also used for the determination of the structure of molecules. If the wavelength used here is 800 pm, calculate the characteristic velocity associated with the neutron.
Answer:
From de Broglie’s equation,
λ = \(\frac{h}{m v}\)
v = \(\frac{h}{m \lambda}\)
mass of neutron, m = 1.675 × 10-27 kg
λ = 800pm = 800 × 10-12 m
v = \(\frac{6.626 \times 10^{-34} \mathrm{Js}}{\left(1.675 \times 10^{-27} \mathrm{~kg}\right)\left(800 \times 10^{-12} \mathrm{~m}\right)}\) = 4.94 × 102ms-1
= 494 ms-1
∴ Velocity associated with the neutron is 494 ms-1.

Question 59.
If the velocity of the electron in Bohr’s first orbit is 2.19 × 106ms-1, calculate the de Broglie wavelength associated with it.
Answer:
According to de Broglie’s equation,
λ = \(\frac{h}{m v}\)
Mass of electron = 9.1 × 10-31 kg, h = 6.626 × 10-34 Js,
velocity = 2.19 × 106 ms-1
= \(\frac{6.626 \times 10^{-34} \mathrm{Js}}{\left(9.1 \times 10^{-31} \mathrm{~kg}\right)\left(2.19 \times 10^{6} \mathrm{~ms}^{-1}\right)}\) = 3.32 × 10-10m
= 3.32 × 10-10m × \(\frac{100}{100}\) = 332 × 10-12 m
λ = 332pm
∴ Wavelength associated with the electron is 332 pm.

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Question 60.
The velocity associated with a proton moving in a potential difference of 1000 V is 437 × 105 ms-1. If the hockey ball of mass 0.1 kg is moving with this velocity, calculate the wavelength associated with this velocity.
Answer:
Wavelength associated with the velocity of hockey ball,
λ = \(\frac{h}{m v}\)
λ = \(\frac{6.626 \times 10^{-34} \mathrm{Js}}{(0.1 \mathrm{~kg})\left(4.37 \times 10^{5} \mathrm{~ms}^{-1}\right)}\)
λ = 1.516 × 10-38 m

Question 61.
If the position of the electron is measured within an accuracy of ± 0.002 nm, calculate the uncertainty in the momentum of the electron. Suppose the momentum of the electron is \(\frac{h}{4 \pi_{m}}\) × 0.05 nm, is there any problem in defining this value.
Answer:
From Heisenberg’s uncertainty principle,
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Since the magnitude of the actual momentum is smaller than the uncertainty, the value cannot be defined.

Question 62.
The quantum numbers of six electrons are given below. Arrange them in order of increasing energies. If any of these comhination(s) has/have the same energy lists.
1. n = 4, l = 2, ml = -2, ms = – \(\frac{1}{2}\)
2. n = 3, l = 2, ml= 1, ms = + \(\frac{1}{2}\)
3. n = 4, l = 1, ml = 0, ms = +\(\frac{1}{2}\)
4. n = 3, l – 2, ml = -2, ms = –\(\frac{1}{2}\)
5. n = 3, l = 1, ml = -1, ms = + \(\frac{1}{2}\)
6. n = 4, l = 1, ml = 0, ms = + \(\frac{1}{2}\)
Answer:
For n = 4 and l = 2, the orbital occupied is 4d.
For n = 3 and l = 2, the orbital occupied is 3d.
For n = 4 and l = 1, the orbital occupied is 4p.
Hence, the six electrons i.e., 1, 2, 3, 4, 5 and 6 are present in the 4d, 3d, 4p, 3d, 3p and 4p orbitals respectively.
Therefore, the increasing order of energies are
5(3p) < 2(3d) = 4(3d) < 6(4p) = 3(4p) < 1(4d).

Question 63.
The bromine atom possesses 35 electrons. It contains 6 electrons in 2p orbital,6 electrons in 3p orbital and 5 electrons in 4p orbital. Which of these electron experiences the lowest effective nuclear charge.
Answer:
Effective nuclear charge decreases as the distance of the orbitals increases from the nucleus. Hence, 4p electrons experience the lowest effective nuclear charge.

Question 64.
Among the following pairs of orbitals which orbital will experience the larger effective nuclear charge? (i) 2s and 3s, (ii) 4d and 4f, (iii) 3d and 3p.
Answer:
Nuclear charge is defined as the net positive charge experienced by an electron in the orbital of a multi-electron atom. The closer the orbital, the greater is the nuclear charge experienced by the electron (s) in it.
(i) The electron(s) present in the 2s orbital will experience greater nuclear charge (being closer to the nucleus) than the electron(s) in the 3s orbital.
(ii) 4d will experience greater nuclear charge than 4/ since 4d is closer to the nucleus.
(iii) 3p will experience greater nuclear charge since it is closer to the nucleus than 3/.

Question 65.
The unpaired electrons in A1 and Si are present in 3p orbital. Which electrons will experience more effective nuclear charge from the nucleus?
Answer:
13Al = 1s22s22p63s23p1
14Si = 1s22s22p63s23p2
Si (+4) has greater nuclear charge than aluminium (+3). Hence, 3p unpaired electrons of Si experience greater effective nuclear charge than Al.

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Question 66.
Indicate the number of unpaired electrons in
(a) P, (b) Si, (c) Cr, (d) Fe and (e) Kr.
Answer:
(a) Phosphorus (P) : Atomic number = 15
The electronic configuration of P is : 1s2 2s2 2p6 3s2 3p3

The orbital picture of P can be represented as :
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 15
From the orbital picture, phosphorus has three unpaired electrons
(b) Silicon (Si) : Atomic number = 14
The electronic configuration of Si is : 1s2 2s2 2p6 3s2 3p2
The orbitai picture of Si can be represented as :
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 16
From the orbital picture, silicon has two unpaired electrons.
(c) Chromium (Cr) : Atomic number = 24
The electronic configuration of Cr is : 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 4s1 3d5
The orbital picture of chromium is :
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 17
From the orbital picture, chromium has six unpaired electrons.
(d) Iron (Fe) : Atomic number = 26

The electronic configuration of Fe is : 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 4s2 3d6
The orbital picture of Fe is:
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 18
From the orbital picture, iron has four unpaired electrons.
(e) Krypton (Kr) : Atomic number = 36
The electronic configuration of Kr is : 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 4s2 3d10 4p6
The orbital picture of krypton is :
PSEB 11th Class Chemistry Solutions Chapter 2 Structure of Atom 19
Since all orbitals are fully occupied, there are no unpaired electrons in krypton.

Question 67.
(a) How many sub-shells are associated with n = 4? (b) How many electrons will be present in the sub-shells having ms value of \(\) 1/2 for n – 4?
Answer:
(a) n = 4 (Given)
For a given value of ‘rt, V can have values from zero to n -1.
l = 0, 1, 2, 3
Thus, four sub-shells are associated with n = 4, which are s, p, d and f
(b) Number of orbitals in the nth shell = n2
For n = 4
Number of orbitals = 16
If each orbital is taken fully, then it will have 1 electron with ms value of \(-\frac{1}{2}\)
Number of electrons with ms value of (\(-\frac{1}{2}\)) is 16.