PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 19 सरकार के अंग-न्यायपालिका

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 19 सरकार के अंग-न्यायपालिका Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 19 सरकार के अंग-न्यायपालिका

दीर्घ उ त्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
न्यायपालिका के कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
(Describe in brief the functions of the Judiciary.)
उत्तर-
न्यायपालिका सरकार का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग है जिसका मुख्य कार्य विधानमण्डल के बनाए हुए कानूनों की व्याख्या करना तथा परस्पर झगड़ों को निपटाना है। इस अंग की कुशल व्यवस्था पर ही नागरिकों के हितों तथा अधिकारों की रक्षा निर्भर करती है। न्यायपालिका कानूनों की व्याख्या करते समय कई नए कानूनों को भी जन्म देती है। संघात्मक राज्यों में न्यायपालिका केन्द्रीय सरकार तथा प्रान्तीय सरकारों के झगड़ों को निपटाती है तथा संविधान की रक्षा करती है। न्यायपालिका का महत्त्व इतना बढ़ चुका है कि शासन की कार्यकुशलता का अनुमान न्यायपालिका की कुशलता से ही लगाया जाता है।

लॉर्ड ब्राइस (Lord Bryce) ने ठीक ही लिखा है, “किसी शासन की श्रेष्ठता जांचने के लिए उसकी न्याय व्यवस्था की कुशलता से बढ़कर और कोई अच्छी कसौटी नहीं है, क्योंकि किसी और वस्तु का नागरिकों की सुरक्षा और हितों पर इतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना उसके इस ज्ञान से कि एक निश्चित, शीघ्र तथा निष्पक्ष न्याय शासन पर निर्भर रह सकता है।” न्यायपालिका का कर्त्तव्य है कि वह अमीर अथवा गरीब, शक्तिशाली अथवा निर्बल, सरकारी अथवा गैर-सरकारी का भेदभाव किए बिना न्याय करे। जब किसी नागरिक पर अत्याचार होता है तो वह न्यायपालिका के संरक्षण में जाता है और इस विश्वास से जाता है कि उचित न्याय मिलेगा। प्रजातन्त्र राज्यों में न्यायपालिका का महत्त्व दिन-प्रति-दिन बढ़ता जा रहा है क्योंकि न्यायपालिका को अनेक कार्य करने पड़ते हैं।

मैरियट (Merriot) ने ठीक ही लिखा है, “सरकार के जितने भी मुख्य कार्य हैं, न्याय कार्य उनमें निःसन्देह अति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध नागरिकों से होता है। चाहे कानून बनाने की मशीनरी कितनी ही विस्तृत और वैज्ञानिक क्यों न हो, चाहे कार्यपालिका का संगठन कितना ही पूर्ण क्यों न हो, परन्तु फिर भी नागरिक का जीवन दुःखी हो सकता है तथा उसकी सम्पत्ति को खतरा उत्पन्न हो सकता है यदि न्याय करने में देरी हो जाए या न्याय में दोष रह जाए अथवा कानून की व्यवस्था पक्षतापूर्ण या भ्रामक हो।” गार्नर ने तो यहां तक लिखा है कि न्यायपालिका के बिना एक सभ्य राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। न्यायपालिका के अभाव में चोरों, डाकुओं तथा अन्य शक्तिशाली शक्तियों का निर्बलों की सम्पत्ति पर कब्जा हो जाएगा और चारों ओर अन्याय का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा। लोग कानूनों का ठीक प्रकार से पालन करें और दूसरों के अधिकारों का हनन न करें, इसके लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है। इस लोकतन्त्रात्मक युग में न्यायपालिका के अभाव में किसी भी राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती।

न्यायपालिका के कार्य (Functions of Judiciary)-

न्यायपालिका के कार्य विभिन्न प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। संविधान की प्रकृति, राजनीतिक व्यवस्था के स्वरूप, न्यायपालिका के संगठन इत्यादि पर न्यायपालिका के कार्य निर्भर करते हैं। आधुनिक लोकतन्त्रात्मक प्रणाली में न्यायपालिका को मुख्यता निम्नलिखित कार्य करने पड़ते हैं-

1. न्याय करना (To do Justice)न्यायपालिका का मुख्य कार्य न्याय करना है। विधानमण्डल के बनाए गए कानूनों को कार्यपालिका लागू करती है, परन्तु राज्य के अन्तर्गत कई नागरिक ऐसे होते हैं जो कानूनों का उल्लंघन करते हैं। कार्यपालिका ऐसे नागरिकों को पकड़कर न्यायपालिका के सामने पेश करती है ताकि कानून तोड़ने वाले नागरिकों को सज़ा दी जा सके। न्यायपालिका उन मुकद्दमों को सुनकर निर्णय करती है। न्यायपालिका उन समस्त मुकद्दमों को सुनती है जो उसके सामने आते हैं। अतः न्यायपालिका फौजदारी तथा दीवानी दोनों तरह के मुकद्दमों को सुनती है। न्यायपालिका व्यक्तियों के बीच हुए झगड़ों तथा सरकार और नागरिकों के बीच हुए झगड़ों का निर्णय करती है। न्यायपालिका न्याय करके नागरिकों को बुरे नागरिकों तथा सरकार के अत्याचारों से बचाती है।

2. कानून की व्याख्या करना (To Interpret Laws)-न्यायपालिका विधानमण्डल के बनाए हुए कानूनों की व्याख्या करती है। विधानमण्डल के बनाए हुए कानून कई बार स्पष्ट नहीं होते जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपने लाभ के लिए उस कानून की व्याख्या करता है। अत: कानून की स्पष्टता की आवश्यकता पड़ती है। न्यायपालिका उन कानूनों की व्याख्या करती है जो स्पष्ट नहीं होते। न्यायपालिका द्वारा की गई कानून की व्याख्या अन्तिम होती है और कोई भी व्यक्ति उस व्याख्या को मानने से इन्कार नहीं कर सकता। अमेरिका तथा भारत में न्यायपालिका को कानून की व्याख्या करने का अधिकार प्राप्त है।

3. कानूनों का निर्माण (Making of Laws)-साधारणतया कानून निर्माण का कार्य विधानमण्डल करता है, परन्तु कई दशाओं में न्यायपालिका भी कानूनों का निर्माण करती है। कानून की व्याख्या करते समय न्यायाधीश कई नए अर्थों को जन्म देते हैं जिनसे कानून का अर्थ ही बदल जाता है और एक नए कानून का निर्माण हो जाता है। अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट ने कानूनों की व्याख्या करते समय कई नए कानूनों को निर्माण किया है। कई बार न्यायपालिका के सामने ऐसे मुकद्दमे आते हैं जहां कानून बना नहीं होता। ऐसे समय पर न्यायाधीश न्याय के नियमों, निष्पक्षता, समानता तथा ईमानदारी के आधार पर निर्णय करते हैं। यही निर्णय भविष्य में कानून बन जाते हैं। इस प्रकार न्यायपालिका कानूनों का निर्माण भी करती है।

4. संविधान का संरक्षक (Guardian of the Constitution)—जिन देशों में संविधान लिखित होता है वहां पर प्रायः संविधान को राज्य का सर्वोच्च कानून माना जाता है। संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी न्यायपालिका पर होती है। न्यायपालिका को अधिकार प्राप्त होता है कि यदि विधानपालिका कोई ऐसा कानून बनाए जो संविधान की धाराओं के विरुद्ध हो तो उस कानून को असंवैधानिक घोषित कर दे। न्यायपालिका की इस शक्ति को न्यायिक पुनर्निरीक्षण (Judicial Review) की शक्ति का नाम दिया गया है। संविधान की व्याख्या करने का अधिकार भी न्यायपालिका को ही प्राप्त होता है। इस प्रकार न्यायपालिका संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करती है। अमेरिका तथा भारत में न्यायपालिका को संविधान की व्याख्या करने का अधिकार तथा न्यायिक पुनर्निरीक्षण का अधिकार प्राप्त है।

5. संघ का संरक्षक (Guardian of Federation)-जिन देशों में संघात्मक शासन प्रणाली को अपनाया गया है वहां न्यायपालिका संघ के संरक्षक के रूप में भी कार्य करती है। संघात्मक शासन प्रणाली में केन्द्र तथा राज्य अपनी शक्तियां संविधान से प्राप्त करते हैं। परन्तु कई बार केन्द्र तथा राज्यों के बीच कई प्रकार के झगड़े उत्पन्न हो जाते हैं। इन पारस्परिक झगड़ों का निर्णय न्यायपालिका के द्वारा ही किया जाता है। न्यायपालिका का यह कार्य होता है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि केन्द्र राज्यों के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करे और न ही राज्य केन्द्र के क्षेत्र में दखल दे।

6. व्यक्तिगत अधिकारों का संरक्षण (Guardian of Individual Rights)-भारत, जापान, अमेरिका, कनाडा इत्यादि देशों के संविधानों में व्यक्ति के अधिकारों का वर्णन किया गया है। व्यक्ति के अधिकारों का संविधान में वर्णन ही महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि उन अधिकारों को लागू करना तथा उनको सुरक्षित करना और भी महत्त्वपूर्ण है। न्यायपालिका ही व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करती है तथा दूसरे व्यक्तियों अथवा सरकार को व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करने से रोकती है, भारत में प्रत्येक नागरिक को अधिकार है कि वह सुप्रीम कोर्ट अथवा हाई कोर्ट के पास अपील कर सकता है यदि उसके किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ हो। सुप्रीम कोर्ट विधानमण्डल के कानूनों को भी रद्द कर सकती है यदि वे कानून नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों।

7. सलाह देना (Advisory Functions)-कई देशों में न्यायपालिका कानूनी मामलों में सलाह भी देती है। इंग्लैण्ड में प्रिवी-कौंसिल (Privy Council) की न्यायिक समिति से संवैधानिक समस्याओं पर परामर्श लिया जाता है। भारत में राष्ट्रपति किसी भी विषय पर सुप्रीम कोर्ट की सलाह ले सकता है, परन्तु सुप्रीम कोर्ट की सलाह मानना अथवा न मानना राष्ट्रपति पर निर्भर करता है। अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति को सलाह देने से इन्कार कर दिया है। कैनेडा का गवर्नर-जनरल भी कुछ बातों पर सर्वोच्च न्यायालय की सलाह ले सकता है।।

8. प्रशासनिक कार्य (Administrative Functions)-कई देशों में न्यायालयों को प्रशासनिक कार्य भी करने पड़ते हैं। भारत में सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा निम्न न्यायालयों पर प्रशासकीय नियन्त्रण करती है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 19 सरकार के अंग-न्यायपालिका

9. आज्ञा-पत्र जारी करना (To Act Injunctions and Writs of Mandamus)-न्यायपालिका जनता को आदेश दे सकती है कि वे प्रमुख कार्य नहीं कर सकते और साथ ही कोई कार्य जिनके करने से लोग बचना चाहते हों, करवा सकती है। यदि वे कार्य न किए जाएं तो न्यायालयों का अपमान माना जाता है, जिस पर न्यायालय बिना अभियोग चलाए दण्ड दे सकता है। कई बार न्यायालय मानहानि का अभियोग लगाकर जुर्माना आदि भी कर सकता है।

10. कोर्ट ऑफ़ रिकार्ड के कार्य (To Act as a Court of Record)-न्यायपालिका कोर्ट ऑफ़ रिकार्ड का भी कार्य करती है जिसका अर्थ है कि न्यायपालिका को भी सभी मुकद्दमों में निर्णयों तथा सरकार को दिए गए परामर्शों का रिकार्ड रखना पड़ता है। ये निर्णय तथा परामर्श की प्रतियां किसी भी समय प्राप्त की जा सकती हैं।

11. विविध कार्य (Miscellaneous Functions)-न्यायपालिका उपरलिखित कार्यों के अतिरिक्त कुछ और भी कार्य करती है
(क) न्यायपालिका नाबालिगों की सम्पत्ति की देख-रेख के लिए संरक्षक (Trustee) नियुक्त करती है।
(ख) जब किसी व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उसकी सम्पत्ति के स्वामित्व के सम्बन्ध में झगड़ा उत्पन्न होता है, तब न्यायालय उस सम्पत्ति को अपने अधिकार में ले लेता है और उस समय तक प्रबन्ध करता है जब तक उस झगड़े का फैसला न हो जाए।
(ग) न्यायपालिका नागरिक विवाह (Civil Marriage) की अनुमति देती है। (घ) न्यायपालिका विवाह-विच्छेद (Divorce) के मुकद्दमे भी सुनती है। (ङ) शस्त्र इत्यादि रखने के लिए लाइसेंस जारी करती है।
(च) भारत में निर्वाचन सम्बन्धी अपीलें हाई कोर्ट सुनती है। उच्च अधिकारियों को शपथ दिलवाना न्यायपालिका का ही कार्य है।

निष्कर्ष (Conclusion)-किसी भी सरकार का न्यायपालिका अंग अपने कार्यों व शक्तियों का निर्धारण स्वयं नहीं करता। वह निर्धारण राज्य के संविधान और विधानपालिका के कानूनों द्वारा किया जाता है। इस कारण हर राज्य में न्यायपालिका के कार्य सदा एक समान नहीं होते। इसके अतिरिक्त एक प्रजातन्त्रात्मक ढांचे में न्यायपालिका को संविधान और लोगों के अधिकारों का रक्षक माना जाता है। अच्छे प्रजातन्त्र के आवश्यक तत्त्वों में निपुण और स्वतन्त्र न्यायपालिका का प्रमुख स्थान है।

प्रश्न 2.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता से क्या अभिप्राय है ? यह किस तरह से प्राप्त की जा सकती है ?
(What is meant by ‘Independence of Judiciary’ ? How can it be secured ?)
उत्तर-
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ (Meaning of Independence of Judiciary)-वर्तमान युग में न्यायपालिका का महत्त्व इतना बढ़ चुका है कि न्यायपालिका इन कार्यों को निष्पक्षता तथा कुशलता से तभी कर सकती है जब न्यायपालिका स्वतन्त्र हो। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि न्यायाधीश स्वतन्त्र, निष्पक्ष तथा निडर होने चाहिएं। न्यायाधीश निष्पक्षता से न्याय तभी कर सकते हैं, जब उन पर किसी प्रकार का दबाव न हो। न्यायपालिका विधानमण्डल तथा कार्यपालिका के अधीन नहीं होनी चाहिए और विधानमण्डल तथा कार्यपालिका को न्यायपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। यदि न्यायपालिका कार्यपालिका के अधीन कार्य करेगी तो न्यायाधीश नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं की रक्षा नहीं कर सकेंगे।

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का महत्त्व (Importance of Independence of Judiciary)-आधुनिक युग में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का विशेष महत्त्व है। स्वतन्त्र न्यायपालिका ही नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं की रक्षा कर सकती है। अमीर-गरीब, शक्तिशाली, निर्बल, पढ़े-लिखे, अनपढ़ तथा सरकारी, गैर-सरकारी सभी को न्याय तभी मिल सकता है जब न्यायाधीश स्वतन्त्र हों। यदि न्यायाधीश विधानमण्डल के अधीन होंगे तो वे विधानमण्डल के कानूनों को असंवैधानिक घोषित नहीं कर सकेंगे और इस तरह वे संविधान की रक्षा नहीं कर सकेंगे। लोकतन्त्र की सफलता के लिए न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का होना आवश्यक है। माण्टेस्क्यू ने व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लिए ही शक्तियों का पृथक्करण का सिद्धान्त दिया ताकि सरकार के तीनों अंग स्वतन्त्र होकर कार्य कर सकें।

संघीय राज्यों में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का महत्त्व और भी अधिक है। संघ राज्यों में केन्द्र तथा प्रान्तों में शक्तियों का विभाजन होता है। कई बार शक्तियों के विभाजन पर केन्द्र तथा प्रान्तों में झगड़े उत्पन्न हो जाते हैं। इन झगड़ों को निपटाने के लिए एक स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है। बिना स्वतन्त्र न्यायपालिका के संघीय शासन सफलतापूर्वक चल ही नहीं सकता है।

अमेरिकन राष्ट्रपति टाफ्ट ने न्यायपालिका के महत्त्व के विषय में कहा है, “सभी मामलों में, चाहे वे व्यक्ति तथा राज्य के बीच में हों, चाहे अल्पसंख्यक वर्ग और बहुमत के बीच में हों, न्यायपालिका को निष्पक्ष रहना चाहिए और बिना किसी भय के निर्णय देना चाहिए।” डॉ० गार्नर (Garner) ने न्यायपालिका के महत्त्व का वर्णन करते हुए लिखा है, “यदि न्यायाधीशों में प्रतिभा और निर्णय देने की स्वतन्त्रता न हो तो न्यायपालिका का यह सारा ढांचा खोखला प्रतीत होगा और ऊंचे उद्देश्य की सिद्धि नहीं होगी जिसके लिए उसका निर्माण किया गया है।” (“If judges lack wisdom, probity and freedom of decision, the high purposes for which the Judiciary is established cannot be realised.’) अत: व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा के लिए संविधान की रक्षा के लिए, संघ की सफलता के लिए, न्याय के लिए तथा लोकतन्त्र की सफलता के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना अनिवार्य है।

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को स्थापित करने वाले तत्त्व (Factors that Establish the Independence of Judiciary)—प्रत्येक लोकतन्त्रीय राज्य में न्यायपालिका को स्वतन्त्र बनाने के लिए कोशिश की जाती है। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को स्थापित करने के लिए निम्नलिखित तत्त्व सहायक हैं-

1. न्यायाधीशों की नियुक्ति का ढंग (Mode of Appointment of Judges)-न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उनकी नियुक्ति किस ढंग से की जाती है। न्यायाधीशों की नियुक्ति के तीन ढंग हैं
(क) जनता द्वारा चुनाव (Election by the People)
(ख) विधानमण्डल द्वारा चुनाव (Election by the Legislature)
(ग) कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति (Appointment by the Executive)

(क) जनता द्वारा चुनाव-न्यायाधीशों की नियुक्ति के सब ढंगों में जनता द्वारा चुने जाने का ढंग सबसे अधिक दोषपूर्ण है। इसलिए यह पद्धति अधिक प्रचलित नहीं है।
(ख) विधानमण्डल द्वारा चुनाव-स्विट्ज़रलैण्ड तथा रूस में न्यायाधीशों का चुनाव विधानमण्डल द्वारा किया जाता है। यह पद्धति भी न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए उचित नहीं है।
(ग) कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति-न्यायाधीशों की नियुक्ति का सबसे अच्छा ढंग कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति है। संसार के मुख्य देशों में इसी प्रणाली को ही अपनाया गया है। भारत में सुप्रीमकोर्ट तथा हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश राष्ट्रपति सीनेट की अनुमति से नियुक्त करता है। इंग्लैण्ड, कैनेडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी अफ्रीका में न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका के द्वारा ही की जाती है। यह प्रणाली इसलिए अच्छी समझी जाती है क्योंकि कार्यपालिका योग्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकती है। इससे राजनीतिक दलों का प्रभाव भी कम हो जाता है।

2. नौकरी की सुरक्षा (Security of Service) न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता को कायम रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि उनको नौकरी की सुरक्षा प्राप्त हो। उनको हटाने का तरीका काफ़ी कठिन होना चाहिए ताकि कार्यपालिका अपनी इच्छा से उन्हें न हटा सके। यदि न्यायाधीशों को नौकरी की चिन्ता रहेगी तो वह अपना कार्य कुशलतापूर्वक नहीं कर सकेंगे। यदि न्यायाधीशों को यह पता हो कि उन्हें तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक वे भ्रष्टाचारी साधनों का प्रयोग नहीं करते तो इससे वे बिना किसी डर के न्याय कर सकते हैं। न्यायाधीश कार्यपालिका के अत्याचारों के विरुद्ध तभी निर्णय दे सकते हैं जब उनकी अपनी नौकरी सुरक्षित हो और न्यायाधीश की नौकरी तभी सुरक्षित हो सकती है यदि उन्हें हटाने की विधि कठोर हो। इसलिए संसार के अधिकांश देशों में न्यायाधीशों की नौकरी को सुरक्षित रखा गया है ताकि वे स्वतन्त्र होकर अपना कार्य कर सकें। भारत में सुप्रीमकोर्ट तथा हाईकोर्ट के न्यायाधीश को राष्ट्रपति उसी समय हटा सकता है जब संसद् के दोनों सदन अपने कुल सदस्यों के उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से एक प्रस्ताव पास करके राष्ट्रपति से किसी न्यायाधीश को हटाने की सिफ़ारिश करते हैं।

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3. लम्बा कार्यक्रम (Long Tenure)-न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायाधीशों का कार्यक्रम काफ़ी लम्बा हो। यदि न्यायाधीशों का कार्यकाल थोड़ा हो तो न्यायाधीश कभी भी स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष होकर कार्य नहीं कर सकते। जब न्यायाधीशों को कार्यकाल छोटा होता है तब न्यायाधीश रिश्वतें लेकर थोड़े समय में अधिक-से-अधिक धन इकट्ठा करने की कोशिश करते हैं। कार्यकाल थोड़ा होने की दशा में न्यायाधीशों को दोबारा न चुने जाने की चिन्ता रहती है। इसलिए न्यायाधीशों का कार्यकाल काफ़ी लम्बा होना चाहिए। इसके अतिरिक्त लम्बे कार्यकाल का यह भी होता है कि न्यायाधीशों को अपने कार्य का अनुभव हो जाता है जिससे वे अपने कार्य को अधिक कुशलतापूर्वक करते हैं। संसार के प्रायः सभी देशों में न्यायाधीशों को अपने कार्य का अनुभव हो जाता है जिससे वे अपने कार्य को अधिक कुशलतापूर्वक करते हैं। संसार के प्रायः सभी देशों में न्यायाधीशों का कार्यकाल काफ़ी लम्बा रखा जाता है। भारत में सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक तथा हाईकोर्ट के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक सदाचार पर्यन्त अपने पद पर बने रहते हैं। इंग्लैण्ड में न्यायाधीश सदाचार पर्यन्त अपने पद पर रहते हैं। अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सदाचार के आधार पर जीवन भर अपने पद पर रहते हैं।

4. न्यायाधीशों को अच्छा वेतन तथा पैन्शन (Good Salary and Pension to Judges)-न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता को बनाए रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि उन्हें अच्छा वेतन मिले ताकि वे अपना गुजारा अच्छी तरह कर सकें और अपने जीवन स्तर को अपने पद के अनुसार रखें। यदि न्यायाधीशों को अच्छा वेतन नहीं मिलेगा तो वे अपनी आमदनी को बढ़ाने के लिए भ्रष्टाचारी साधनों का प्रयोग करेंगे। भारतवर्ष में न्यायाधीशों को बहुत अच्छा वेतन मिलता है-सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को 2,80,000 रुपये तथा न्यायाधीशों को 2,50,000 रुपये मासिक वेतन मिलता है जबकि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को 2,50,000 रुपये तथा अन्य न्यायाधीशों को 2,25,000 रुपये मासिक वेतन मिलता है।

अच्छे वेतन के अतिरिक्त न्यायाधीशों को रिटायर होने के पश्चात् पैन्शन भी मिलनी चाहिए ताकि न्यायाधीशों को रिटायर होने के पश्चात् अपनी रोजी की चिन्ता न रहे। यदि उन्हें रिटायर होने के पश्चात् पैन्शन न दी जाए तो इसका अर्थ होगा कि वे अपने कार्यकाल में अधिक-से-अधिक धन इकट्ठा करने की कोशिश करेंगे ताकि रिटायर होने के पश्चात् उनका जीवन सुख से व्यतीत हो सके। इससे न्यायाधीश भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलने लगेंगे। भारतवर्ष तथा अमेरिका में न्यायाधीशों को रिटायर होने के पश्चात् अच्छी पैन्शन दी जाती है।

5. सेवा की शर्तों में हानिकारक परिवर्तन न होना (No change in the terms of their disadvantage)न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के पश्चात् उनकी हानि के लिए वेतन, पैन्शन, छुट्टियों के नियमों में कोई परिवर्तन न किया जाए।

6. न्यायाधीशों की उच्च योग्यताएं (High Qualifications of Judges)-न्यायाधीश तभी स्वतन्त्र रह सकते हैं जब उनकी नियुक्ति योग्यता के आधार पर हुई हो तथा न्यायाधीशों के लिए उच्च योग्यताएं निश्चित होनी चाहिएं। अयोग्य न्यायाधीश जिनकी नियुक्ति सिफ़ारिश पर की जाती है कभी भी निष्पक्ष नहीं रह सकते और न ही अपने कार्य को कुशलता से कर सकते हैं। यदि न्यायाधीशों को कानून का पूर्ण ज्ञान नहीं होगा तो वे चतुर वकीलों की बातों में आ जाएंगे और न्याय निष्पक्षता से नहीं कर पाएंगे। भारत में सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश वही व्यक्ति बन सकता है जो हाई कोर्ट में पांच वर्ष न्यायाधीश रहा हो अथवा दस वर्ष तक हाई कोर्ट में एडवोकेट रहा तो अथवा राष्ट्रपति की दृष्टि में एक प्रसिद्ध कानूनज्ञाता हो।

7. रिटायर होने के पश्चात् वकालत की मनाही (No Practice after Retirement) न्याय की निष्पक्षता के लिए आवश्यक है कि उन्हें रिटायर होने के पश्चात् वकालत करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। यदि न्यायाधीशों को रिटायर होने के पश्चात् वकालत करने का अधिकार होगा तो इससे न्याय दूषित होगा। जब कोई न्यायाधीश रिटायर होने के पश्चात् कोर्ट के सामने वकील की हैसियत से पेश होता है तो उसके साथी न्यायाधीश उसका पक्षपात करेंगे, जिससे न्याय निष्पक्ष नहीं होगा। भारत में न्यायाधीश को वकालत करने की बिल्कुल मनाही है।

8. अवकाश प्राप्ति के पश्चात् न्यायाधीशों की सेवाओं पर प्रतिबन्ध (Restrictions on utilising services of Judges after Retirement) न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायाधीशों को रिटायर होने के पश्चात् किसी भी प्रकार का राजकीय अथवा अर्द्ध-राजकीय पद नहीं दिया जाना चाहिए।

9. न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण (Separation of Judiciary from the Executive)न्यायपालिका को स्वतन्त्र रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखा जाये तथा कार्यपालिका को न्यायपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप करने का अधिकार न दिया जाये। यदि एक ही व्यक्ति के हाथों में कार्यपालिका तथा न्यायपालिका की शक्तियां दे दी जाएं तो वह उनका दुरुपयोग करेगा अर्थात् यदि मुकद्दमा चलाने वाला ही न्यायाधीश हो तो इससे नागरिकों को न्याय नहीं मिलेगा।

10. न्यायपालिका को व्यापक अधिकार (Sufficient Powers to Judiciary) न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायपालिका को काफ़ी अधिकार प्राप्त हों। न्यायपालिका को साधारणतया विधानमण्डल तथा कार्यपालिका से निर्बल माना जाता है क्योंकि विधानमण्डल का नियन्त्रण देश के वित्त पर होता है जबकि कार्यपालिका का नियन्त्रण देश की शक्ति (सेना) पर होता है। इसलिए न्यायपालिका को सम्मान का स्थान देने के लिए आवश्यक हो जाता है कि इसको भी काफ़ी शक्तियां प्राप्त हों ताकि न्यायपालिका अपना कार्य स्वतन्त्रता से कर सके। अत: न्यायपालिका को विधानमण्डल के कानूनों को असंवैधानिक घोषित करने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए।

11. कार्य की स्वतन्त्रता (Liberty of Action)-न्यायाधीश को अपने कार्य में पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए। वे जब किसी भी मुकद्दमे का निर्णय कर रहे हों, किसी अन्य व्यक्ति को उनके काम में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। न्यायाधीशों के कार्यों की सार्वजनिक आलोचना भी नहीं होनी चाहिए। भारत में प्रत्येक न्यायालय उनके काम में हस्तक्षेप करने वाले तथा उसका अनादर करने वाले के विरुद्ध स्वयं मुकद्दमा चला कर उसे दण्ड दे सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion) उपर्युक्त विचारों से स्पष्ट है कि न्यायपालिका को स्वतन्त्र बनाने के लिए यह आवश्यक है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका के द्वारा की जाए। एक बार नियुक्ति करने पर उनका कार्यकाल सदाचारपर्यन्त लम्बा हो, उनको हटाने का तरीका कठिन हो, उसकी नियुक्ति के लिए उच्च योग्यताएं निश्चित हों, उन्हें अच्छा वेतन मिले तथा रिटायर होने के पश्चात् पैन्शन दी जाए तथा न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखा जाये। अतः ये सब तत्त्व मिल कर ही न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को कायम रख सकते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायपालिका के चार कार्यों की व्याख्या करें।
उत्तर-
न्यायपालिका के मुख्य तीन कार्य निम्नलिखित हैं

  1. न्याय करना-विधानमण्डल के बनाए गए कानूनों को कार्यपालिका लागू करती है, परन्तु राज्य के अन्तर्गत कई नागरिक ऐसे भी होते हैं जो इन कानूनों का उल्लंघन करते हैं। कार्यपालिका ऐसे व्यक्तियों को पकड़कर न्यायपालिका के समक्ष पेश करती है। न्यायपालिका मुकद्दमों को सुनकर न्याय करती है।
  2. कानून की व्याख्या-न्यायपालिका, विधानमण्डल के बनाए हुए कानूनों की व्याख्या करती है। कई बार विधानमण्डल के बनाए हुए कानून स्पष्ट नहीं होते। अतः कानूनों की स्पष्टता की आवश्यकता पड़ती है। तब न्यायपालिका उन कानूनों की व्याख्या कर उन्हें स्पष्ट करती है।
  3. कानूनों का निर्माण-साधारणतया कानूनों का निर्माण विधानपालिका के द्वारा किया जाता है, परन्तु कई दशाओं में न्यायपालिका भी कानूनों का निर्माण करती है। कानूनों की व्याख्या करते समय न्यायाधीश कई नए अर्थों को जन्म देते हैं जिससे उस कानून का अर्थ ही बदल जाता है और एक नए कानून का निर्माण होता है।
  4. संविधान का संरक्षक-न्यायपालिका संविधान की संरक्षक मानी जाती है।

प्रश्न 2.
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ तथा महत्त्व लिखें।
उत्तर-
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ-वर्तमान युग में न्यायपालिका का महत्त्व इतना बढ़ चुका है कि न्यायपालिका इन कार्यों को तभी सफलता एवं निष्पक्षता से कर सकती है जब न्यायपालिका स्वतन्त्र हो। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि न्यायाधीश स्वतन्त्र, निष्पक्ष तथा निडर होने चाहिएं। न्यायाधीश निष्पक्षता से न्याय तभी कर सकते हैं जब उन पर किसी प्रकार का दबाव न हो। न्यायपालिका विधानमण्डल तथा कार्यपालिका के अधीन नहीं होनी चाहिए और विधानमण्डल तथा कार्यपालिका को न्यायपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यदि न्यायपालिका, कार्यपालिका के अधीन कार्य करेगी तो न्यायाधीश जनता के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाएंगे।

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का महत्त्व-आधुनिक युग में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का विशेष महत्त्व है। स्वतन्त्र न्यायपालिका ही नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतन्त्रताओं की रक्षा कर सकती है। लोकतन्त्र की सफलता के लिए न्यायपालिका का स्वतन्त्र होना आवश्यक है। संघीय राज्यों में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का महत्त्व और भी अधिक है। संघ राज्यों में शक्तियों का केन्द्र और राज्यों में विभाजन होता है। कई बार शक्तियों के विभाजन पर केन्द्र और राज्यों में झगड़ा हो जाता है। इन झगड़ों को निपटाने के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है।

प्रश्न 3.
न्यायपालिका को स्वतन्त्र बनाने के लिए कोई चार शर्ते लिखें।
उत्तर-
न्यायपालिका को निम्नलिखित तथ्यों द्वारा स्वतन्त्र बनाया जा सकता है-

  1. न्यायाधीशों की नियुक्ति का ढंग-न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उनकी नियुक्ति किस ढंग से की जाती है। न्यायाधीशों की नियुक्ति के क्रमश: तीन ढंग हैं-
    (1) जनता द्वारा चुनाव (2) विधानमण्डल द्वारा चुनाव (3) कार्यपालिका द्वारा चुनाव। न्यायाधीशों की नियुक्ति का सबसे अच्छा ढंग कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति है।
  2. नौकरी की सुरक्षा-न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता को कायम रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि उन्हें नौकरी की सुरक्षा प्राप्त हो। उन्हें हटाने का तरीका काफ़ी कठिन होना चाहिए ताकि वे निष्पक्षता और कुशलता से अपना कार्य कर सकें।
  3. लम्बा कार्यकाल-न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायाधीशों का कार्यकाल लम्बा हो। यदि न्यायाधीशों का कार्यकाल थोड़ा होगा तो वे कभी भी स्वतन्त्रतापूर्वक एवं निष्पक्षता से अपना कार्य नहीं कर सकेंगे।
  4. अच्छा वेतन-न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है, कि उन्हें अच्छा वेतन मिले।

प्रश्न 4.
बंदी उपस्थापक अथवा प्रत्यक्षीकरण लेख (Writ of Habeas Corpus) का अर्थ बताएं।
उत्तर-
‘हैबियस कॉर्पस’ लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है, ‘हमारे सम्मुख शरीर को प्रस्तुत करो।’ (Let us have the body.) इस आदेश के अनुसार, न्यायालय किसी अधिकारी को, जिसने किसी व्यक्ति को गैर-कानूनी ढंग से बन्दी बना रखा हो, आज्ञा दे सकता है कि कैदी को समीप के न्यायालय में उपस्थित किया जाए ताकि उसके गिरफ्तारी के कानूनों का औचित्य अथवा अनौचित्य का निर्णय किया जा सके। अनियमित गिरफ्तारी की दशा में न्यायालय उसको स्वतन्त्र करने का आदेश दे सकता है।

प्रश्न 5.
परमादेश लेख (Writ of Mandamus) का अर्थ बताएं।
उत्तर-
‘मैण्डमस’ शब्द लैटिन भाषा का है जिसका अर्थ है, “हम आदेश देते हैं” (We Command)। इस आदेश द्वारा न्यायालय किसी अधिकारी, संस्था अथवा निम्न न्यायालय को अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए बाधित कर सकता है। इस आदेश द्वारा न्यायालय राज्य के कर्मचारियों से ऐसे कार्य करवा सकता है जिनको वे किसी कारण न कर रहे हों तथा जिनके न किए जाने से किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 19 सरकार के अंग-न्यायपालिका

प्रश्न 6.
न्यायपालिका को सरकार के अन्य अंगों से क्यों खास महत्त्व दिया जाता है ?
उत्तर-
न्यायपालिका को राज्य सरकार के तीनों अंगों में विशेष महत्त्व प्राप्त होता है। ब्राइस के अनुसार, “यदि किसी राज्य के प्रशासन की जानकारी आप को प्राप्त करनी है तो आपके लिए यह आवश्यक है कि आप वहां की न्यायपालिका का अध्ययन करें और यदि न्याय व्यवस्था अच्छी व सुचारु है तो प्रशासन बढ़िया है।” न्यायपालिका को निम्नलिखित कारणों द्वारा खास महत्त्व प्राप्त है-

  • न्यायपालिका संविधान की रक्षक है।
  • न्यायपालिका लोगों के अधिकारों और स्वतन्त्रता की रक्षा करती है।
  • जिन देशों में संघात्मक शासन प्रणाली है वहां न्यायपालिका संघ के संरक्षक के रूप में काम करती है।
  • न्यायपालिका विधानमण्डल के बनाए कानूनों की व्याख्या करती है।
  • कई देशों में न्यायपालिका कानूनी मामलों में सलाह भी देती है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
न्यायपालिका के दो कार्यों की व्याख्या करें।
उत्तर-

  1. न्याय करना-न्यायपालिका मुकद्दमों को सुनकर न्याय करती है।
  2. कानून की व्याख्या-न्यायपालिका, विधानमण्डल के बनाए हुए कानूनों की व्याख्या करती है।

प्रश्न 2.
न्यायपालिका स्वतन्त्रता का अर्थ लिखें।
उत्तर-
वर्तमान युग में न्यायपालिका का महत्त्व इतना बढ़ चुका है कि न्यायपालिका इन कार्यों को तभी सफलता एवं निष्पक्षता से कर सकती है जब न्यायपालिका स्वतन्त्र हो। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ है कि न्यायाधीश स्वतन्त्र, निष्पक्ष तथा निडर होने चाहिएं। न्यायाधीश निष्पक्षता से न्याय तभी कर सकते हैं जब उन पर किसी प्रकार का दबाव न हो। न्यायपालिका विधानमण्डल तथा कार्यपालिका के अधीन नहीं होनी चाहिए और विधानमण्डल तथा कार्यपालिका को न्यायपालिका के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यदि न्यायपालिका, कार्यपालिका के अधीन कार्य करेगी तो न्यायाधीश जनता के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाएंगे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. संविधान की कोई एक परिभाषा दें।
उत्तर-बुल्जे के अनुसार, “संविधान उन नियमों का समूह है, जिनके अनुसार सरकार की शक्तियां, शासितों के अधिकार तथा इन दोनों के आपसी सम्बन्धों को व्यवस्थित किया जाता है।”

प्रश्न 2. संविधान के कोई दो रूप/प्रकार लिखें।
उत्तर-

  1. विकसित संविधान
  2. निर्मित संविधान।

प्रश्न 3. विकसित संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-जो संविधान ऐतिहासिक उपज या विकास का परिणाम हो, उसे विकसित संविधान कहा जाता है।

प्रश्न 4. लिखित संविधान किसे कहते हैं ? ।
उत्तर-लिखित संविधान उसे कहा जाता है, जिसके लगभग सभी नियम लिखित रूप में उपलब्ध हों।

प्रश्न 5. अलिखित संविधान किसे कहते हैं ?
उत्तर-अलिखित संविधान उसे कहते हैं, जिसकी धाराएं लिखित रूप में न हों, बल्कि शासन संगठन अधिकतर रीति-रिवाज़ों और परम्पराओं पर आधारित हो।

प्रश्न 6. कठोर एवं लचीले संविधान में एक अन्तर लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान की अपेक्षा लचीले संविधान में संशोधन करना अत्यन्त सरल है।

प्रश्न 7. लचीले संविधान का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर- लचीला संविधान समयानुसार बदलता रहता है।

प्रश्न 8. किसी एक विद्वान् का नाम लिखें, जो लिखित संविधान का समर्थन करता है?
उत्तर-डॉ० टॉक्विल ने लिखित संविधान का समर्थन किया है।

प्रश्न 9. कठोर संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान राजनीतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता।

प्रश्न 10. एक अच्छे संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-संविधान स्पष्ट एवं सरल होता है।

प्रश्न 11. अलिखित संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-यह समयानुसार बदलता रहता है।

प्रश्न 12. अलिखित संविधान का कोई एक दोष लिखें।
उत्तर-अलिखित संविधान में शक्तियों के दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है।

प्रश्न 13. लिखित संविधान का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर-लिखित संविधान निश्चित तथा स्पष्ट होता है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 19 सरकार के अंग-न्यायपालिका

प्रश्न 14. लिखित संविधान का एक दोष लिखें।
उत्तर-लिखित संविधान समयानुसार नहीं बदलता।

प्रश्न 15. जिस संविधान को आसानी से बदला जा सके, उसे कैसा संविधान कहा जाता है ?
उत्तर-उसे लचीला संविधान कहा जाता है।

प्रश्न 16. जिस संविधान को आसानी से न बदला जा सकता हो, तथा जिसे बदलने के लिए किसी विशेष तरीके को अपनाया जाता हो, उसे कैसा संविधान कहते हैं ?
उत्तर-उसे कठोर संविधान कहते हैं। प्रश्न 17. लचीले संविधान का एक दोष लिखें। उत्तर-यह संविधान पिछड़े हुए देशों के लिए ठीक नहीं।

प्रश्न 18. कठोर संविधान का एक गुण लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान निश्चित एवं स्पष्ट होता है।

प्रश्न 19. कठोर संविधान का एक दोष लिखें।
उत्तर-कठोर संविधान क्रान्ति को प्रोत्साहन देता है।

प्रश्न 20. शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Power) का सिद्धान्त किसने प्रस्तुत किया?
उत्तर-शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त मान्टेस्क्यू ने प्रस्तुत किया।

प्रश्न 21. संविधानवाद की साम्यवादी विचारधारा के मुख्य समर्थक कौन हैं ?
उत्तर-संविधानवाद की साम्यवादी विचारधारा के मुख्य समर्थक कार्ल-मार्क्स हैं।

प्रश्न 22. संविधानवाद के मार्ग की एक बड़ी बाधा लिखें।
उत्तर-संविधानवाद के मार्ग की एक बाधा युद्ध है।

प्रश्न 23. अरस्तु ने कितने संविधानों का अध्ययन किया?
उत्तर-अरस्तु ने 158 संविधानों का अध्ययन किया।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. ……………. संविधान उसे कहा जाता है, जिसमें आसानी से संशोधन किया जा सके।
2. जिस संविधान को सरलता से न बदला जा सके, उसे …………… संविधान कहते हैं।
3. लिखित संविधान एक ……………. द्वारा बनाया जाता है।
4. ……………. संविधान समयानुसार बदलता रहता है।
5. ……………. में क्रांति का डर बना रहता है।
उत्तर-

  1. लचीला
  2. कठोर
  3. संविधान सभा
  4. अलिखित
  5. लिखित संविधान।

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. अलिखित संविधान अस्पष्ट एवं अनिश्चित होता है।
2. लचीले संविधान में क्रांति की कम संभावनाएं रहती हैं।
3. कठोर संविधान अस्थिर होता है।
4. एक अच्छा संविधान स्पष्ट एवं निश्चित होता है।
5. कठोर संविधान समयानुसार बदलता रहता है।
उत्तर-

  1. सही
  2. सही
  3. ग़लत
  4. सही
  5. ग़लत ।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
कठोर संविधान का गुण है
(क) यह राजनीतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता
(ख) संघात्मक राज्य के लिए उपयुक्त नहीं है
(ग) समयानुसार नहीं बदलता
(घ) संकटकाल में ठीक नहीं रहता।
उत्तर-
(क) यह राजनीतिक दलों के हाथ में खिलौना नहीं बनता

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प्रश्न 2.
एक अच्छे संविधान का गुण है-
(क) संविधान का स्पष्ट न होना
(ख) संविधान का बहुत विस्तृत होना
(ग) व्यापकता तथा संक्षिप्तता में समन्वय
(घ) बहुत कठोर होना।
उत्तर-
(ग) व्यापकता तथा संक्षिप्तता में समन्वय

प्रश्न 3.
“संविधान उन नियमों का समूह है, जो राज्य के सर्वोच्च अंगों को निर्धारित करते हैं, उनकी रचना, उनके आपसी सम्बन्धों, उनके कार्यक्षेत्र तथा राज्य में उनके वास्तविक स्थान को निश्चित करते हैं।” किसका कथन है ?
(क) सेबाइन
(ख) जैलिनेक
(ग) राबर्ट डाहल
(घ) आल्मण्ड पावेल।
उत्तर-
(ख) जैलिनेक

प्रश्न 4.
निम्नलिखित में से एक अच्छे संविधान की विशेषता है-
(क) स्पष्ट एवं निश्चित
(ख) अस्पष्टता
(ग) कठोरता
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(क) स्पष्ट एवं निश्चित

ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules.

ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਯਾਦ ਰੱਖਣ ਵਾਲੀਆਂ ਗੱਲਾਂ
(Points to Remember)

  1. ਫੁਟਬਾਲ ਮੈਦਾਨ ਦੀ ਲੰਬਾਈ = 130 × 80 ਗਜ਼ ਤੋਂ 130 × 80 ਗਜ਼
  2. ਫੁਟਬਾਲ ਮੈਦਾਨ ਦੀ ਚੌੜਾਈ = 50 ਗਜ਼ ਤੋਂ 100 ਗਜ਼ (90m × 120m)
  3. ਫੁਟਬਾਲ ਮੈਦਾਨ ਦਾ ਆਕਾਰ = ਆਇਤਾਕਾਰ
  4. ਫੁਟਬਾਲ ਦੀ ਟੀਮ ਵਿਚ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ = 11 ਖਿਡਾਰੀ ਵਾਧੂ 5 ਖਿਡਾਰੀ
  5. ਫੁਟਬਾਲ ਦਾ ਘੇਰਾ = 27″ ਤੋਂ 28″
  6. ਫੁਟਬਾਲ ਦਾ ਭਾਰ = 14 ਅੰਜ ਤੋਂ 16 ਅੰਜ
  7. ਖੇਡ ਦਾ ਸਮਾਂ = 45-45 ਦੇ ਦੋ ਹਾਫ਼
  8. ਆਰਾਮ ਦਾ ਸਮਾਂ = 15 ਮਿੰਟ
  9. ਮੈਚ ਵਿਚ ਬਦਲੇ ਜਾਂ ਮੰਨਣ ਵਾਲੇ ਖਿਡਾਰੀ = 3
  10. ਮੈਚ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰੀ = ਇਕ ਟੇਬਲ ਆਫੀਸ਼ਲ, ਇਕ ਰੈਫ਼ਰੀ ਅਤੇ ਦੋ ਲਾਈਨਮੈਨ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।
  11. ਕਾਰਨਰ ਫਲੈਗ ਦੀ ਉੱਚਾਈ = 5 ਮੀ.
  12. ਅੰਤਰਰਾਸ਼ਟਰੀ ਮੈਚਾਂ ਵਿਚ ਮੈਦਾਨ ਦਾ ਮਾਪ = 110 ਮੀ. × 75 ਮੀ. (120 ਗਜ਼ × 80 ਗਜ਼) ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ (100 ਮੀ. × 64 ਮੀ.) (100 ਗਜ਼ × 70 ਗਜ਼)
  13. ਗੋਲ ਪੋਸਟ ਦੀ ਉੱਚਾਈ = 2.44 ਮੀ.
  14. ਕਾਰਨਰ ਫ਼ਲੈਗ ਦੀ ਉੱਚਾਈ = = ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ 5 ਫੁੱਟ ।

ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਖੇਡ ਸੰਬੰਧੀ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਜਾਣਕਾਰੀ

  1. ਮੈਚ ਦੋ ਟੀਮਾਂ ਵਿਚਕਾਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਹਰੇਕ ਟੀਮ ਵਿਚ ਗਿਆਰਾਂ-ਗਿਆਰਾਂ ਖਿਡਾਰੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਇਕ ਟੀਮ ਦੇ ਕੁੱਲ ਖਿਡਾਰੀ 16 ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚੋਂ ਗਿਆਰਾਂ ਖੇਡਦੇ ਹਨ । ਇਹਨਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਇਕ ਗੋਲਕੀਪਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਪੰਜ ਖਿਡਾਰੀ ਬਦਲਵੇਂ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।
  2. ਇਕ ਟੀਮ ਮੈਚ ਵਿਚ ਤਿੰਨ ਖਿਡਾਰੀ ਅਤੇ ਇਕ ਗੋਲਕੀਪਰ ਬਦਲੇ ਜਾ ਸਕਦੇ ਹਨ ।
  3. ਬਦਲਿਆ ਹੋਇਆ ਖਿਡਾਰੀ ਫਿਰ ਦੁਬਾਰਾ ਨਹੀਂ ਬਦਲਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ।
  4. ਖੇਡ ਦਾ ਸਮਾਂ 45-5-45 ਮਿੰਟ ਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਮੱਧ ਅੰਤਰ ਦਾ ਸਮਾਂ 5 ਮਿੰਟ ਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ।
  5. ਮੱਧ ਅੰਤਰ ਜਾਂ ਆਰਾਮ ਤੋਂ ਪਿੱਛੋਂ ਟੀਮਾਂ ਆਪਣੇ ਪਾਸੇ ਬਦਲਦੀਆਂ ਹਨ ।
  6. ਖੇਡ ਦਾ ਆਰੰਭ ਖਿਡਾਰੀ ਸੈਂਟਰ ਲਾਈਨ ਦੀ ਨਿਸਚਿਤ ਥਾਂ ਤੋਂ ਇਕ-ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਪਾਸ ਦੇ ਕੇ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਸਾਈਡਾਂ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਟਾਸ ਰਾਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।
  7. ਮੈਚ ਖਿਡਾਉਣ ਲਈ ਇਕ ਟੇਬਲ ਆਫੀਸ਼ਲ, ਇਕ ਰੈਫ਼ਰੀ ਅਤੇ ਦੋ ਲਾਈਨਮੈਨ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।
  8. ਗੋਲ ਕੀਪਰ ਦੀ ਵਰਦੀ ਆਪਣੀ ਟੀਮ ਤੋਂ ਵੱਖਰੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।
  9. ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਕੋਈ ਵੀ ਅਜਿਹੀ ਚੀਜ਼ ਨਹੀਂ ਪਾਉਣੀ ਚਾਹੀਦੀ, ਜਿਹੜੀ ਦੂਜੇ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਲਈ ਖ਼ਤਰਨਾਕ ਹੋਵੇ ।
  10. ਜਦੋਂ ਗੇਂਦ ਗੋਲ ਜਾਂ ਸਾਈਡ ਲਾਈਨ ਨੂੰ ਪਾਰ ਕਰ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਖੇਡ ਰੁਕ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।
  11. ਰੈਫ਼ਰੀ ਆਪ ਵੀ ਕਿਸੇ ਕਾਰਨ ਖੇਡ ਬੰਦ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 1.
ਫੁਟਬਾਲ ਦਾ ਮੈਦਾਨ, ਰੇਖਾ ਅੰਕਣ, ਗੋਲ ਖੇਤਰ, ਪੈਨਲਟੀ ਖੇਤਰ, ਗੋਲ ਖੰਭੇ, ਕਾਰਨਰ ਖੇਤਰ ਅਤੇ ਗੇਂਦ ਬਾਰੇ ਲਿਖੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਫੁਟਬਾਲ ਦਾ ਮੈਦਾਨ (Football play ground) – ਫੁਟਬਾਲ ਦਾ ਮੈਦਾਨ ਆਇਤਾਕਾਰ ਹੋਵੇਗਾ । ਇਸ ਦੀ ਲੰਬਾਈ 100 × 120 ਗਜ਼ ਤੋਂ 90 × 110 ਰਾਜ਼ ਤੋਂ ਵੱਧ ਨਹੀਂ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ । ਇਸ ਦੀ ਚੌੜਾਈ 50 ਗਜ਼ ਤੋਂ 100 (45 ਤੋਂ 90 ਮੀ.) ਤੋਂ ਵੱਧ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਗੀ | ਅੰਤਰ-ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਮੈਚਾਂ ਵਿਚ ਇਸ ਦੀ ਲੰਬਾਈ 110 ਗਜ਼ ਤੋਂ 120 ਗਜ਼ ਅਤੇ ਚੌੜਾਈ 22.9 m ਤੋਂ 55 m ਹੋਵੇਗੀ । ਲੰਬਾਈ ਚੌੜਾਈ ਨਾਲੋਂ ਹਮੇਸ਼ਾ ਜ਼ਿਆਦਾ ਹੋਵੇਗੀ ।

ਰੇਖਾ ਅੰਕਣ – ਖੇਡ ਦਾ ਮੈਦਾਨ ਸਾਫ਼ ਰੇਖਾਵਾਂ ਨਾਲ ਅੰਕਿਤ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਰੇਖਾਵਾਂ ਦੀ ਚੌੜਾਈ 1.20 m ਤੋਂ ਵੱਧ ਨਹੀਂ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ । ਲੰਬੀਆਂ ਰੇਖਾਵਾਂ ਸਪਰਸ਼ ਰੇਖਾਵਾਂ ਜਾਂ ਸਾਈਡ ਰੇਖਾਵਾਂ ਅਖਵਾਉਂਦੀਆਂ ਹਨ ਅਤੇ ਛੋਟੀਆਂ ਰੇਖਾਵਾਂ ਨੂੰ ਗੋਲ ਰੇਖਾਵਾਂ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਮੈਦਾਨ ਦੇ ਹਰੇਕ ਕੋਨੇ ‘ਤੇ 1.20 m ਉੱਚੇ ਖੰਭੇ ਤੇ ਝੰਡੀ ਲਗਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਇਹ ਕੇਂਦਰੀ ਰੇਖਾ ‘ਤੇ ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ 90 cm ਦੀ ਦੂਰੀ ‘ਤੇ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ । ਮੈਦਾਨ ਦੇ ਮੱਧ ਵਿਚ ਇਕ ਘੇਰਾ ਲਗਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਜਿਸ ਦਾ ਅਰਧ ਵਿਆਸ 10 ਗਜ਼ ਹੋਵੇਗਾ ।

ਗੋਲ ਖੇਤਰ (Goal Area) – ਖੇਡ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਦੇ ਦੋਹਾਂ ਸਿਰਿਆਂ ‘ਤੇ ਦੋ ਰੇਖਾਵਾਂ ਖਿੱਚੀਆਂ ਜਾਣਗੀਆਂ ਜੋ ਗੋਲ ਰੇਖਾਵਾਂ ਤੇ ਲੰਬ ਹੋਣਗੀਆਂ । ਇਹ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ 1.80 m ਤਕ ਫੈਲੀਆਂ ਰਹਿਣਗੀਆਂ ਅਤੇ ਗੋਲ ਰੇਖਾ ਦੇ ਸਮਾਨਾਂਤਰ ਇਕ ਰੇਖਾ ਨਾਲ ਮਿਲਾ ਦਿੱਤੀਆਂ ਜਾਣਗੀਆਂ । ਇਹਨਾਂ ਰੇਖਾਵਾਂ ਅਤੇ ਗੋਲ ਰੇਖਾਵਾਂ ਦੁਆਰਾ ਰੇ ਹੋਏ ਮੱਧ ਖੇਤਰ ਨੂੰ ਗੋਲ ਖੇਤਰ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

ਪੈਨਲਟੀ ਖੇਤਰ (Penalty Area) – ਮੈਦਾਨ ਦੇ ਹਰੇਕ ਸਿਰੇ ‘ਤੇ ਦੋ ਰੇਖਾਵਾਂ ਗੋਲ ਰੇਖਾ ‘ਤੇ ਸਮਕੋਣ ਖਿੱਚੀਆਂ ਜਾਣਗੀਆਂ ਜੋ ਗੋਲ ਪੋਸਟ ਤੋਂ 16.50 m ਤੱਕ ਹੋਣਗੀਆਂ ਅਤੇ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਗੋਲ ਰੇਖਾ ਦੇ ਸਮਾਨਾਂਤਰ ਖਿੱਚੀ ਇਕ ਰੇਖਾ ਨਾਲ ਮਿਲਾਇਆ ਜਾਵੇਗਾ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਰੇਖਾਵਾਂ ਅਤੇ ਗੋਲ ਰੇਖਾਵਾਂ ਦੁਆਰਾ ਘਿਰੇ ਖੇਤਰ ਨੂੰ ਪੈਨਲਟੀ ਖੇਤਰ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।
ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education 1

ਗੋਲ ਖੰਬੇ (Goal Post) – ਗੋਲ ਰੇਖਾ ਦੇ ਮੱਧ ਵਿਚ 7.30 m ਦੀ ਦੂਰੀ ‘ਤੇ ਦੋ ਪੋਲ ਗੱਡੇ ਜਾਣਗੇ । ਇਹਨਾਂ ਦੇ ਸਿਰਿਆਂ ਨੂੰ ਇਕ ਕਾਸਬਾਰ ਰਾਹੀਂ ਮਿਲਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜਿਹਨਾਂ ਦੇ ਹੇਠਾਂ ਦੇ ਸਿਰੇ ਧਰਤੀ ਤੋਂ 2.44 ਉੱਚੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ । ਗੋਲ ਪੋਸਟਾਂ ਅਤੇ ਤ੍ਰਾਸਬਾਰ ਦੀ ਚੌੜਾਈ ਅਤੇ ਡੂੰਘਾਈ 5 ਇੰਚ ਤੋਂ ਵਧੇਰੇ ਨਹੀਂ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ।

ਕਾਰਨਰ ਖੇਤਰ (Corner Area) – ਹਰੇਕ ਕਾਰਨਰ ਫਲੈਗ ਪੋਸਟ ਤੋਂ ਖੇਡ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਦੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਚੌੜਾਈ ਚੱਕਰ (Circle) ਖਿੱਚਿਆ ਜਾਵੇਗਾ, ਜਿਸ ਦਾ ਅਰਧ ਵਿਆਸ 1 ਗਜ਼ ਹੋਵੇਗਾ । ਗਰਾਉਂਡ ਦੇ ਚਾਰੇ ਕਾਰਨਰਾਂ ‘ਤੇ ਤਿੰਨ ਗਜ਼ ਉੱਚੇ ਫਲੈਗ ਲਾਏ ਜਾਂਦੇ ਹਨ । ਦੋ ਫਲੈਗ ਸੈਂਟਰ ਲਾਈਨ ਦੇ ਦੋਨਾਂ ਪਾਸਿਆਂ ਤੋਂ ਗਰਾਉਂਡ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਇਕ ਗਜ਼ ਦੀ ਦੂਰੀ ਤੇ ਲਾਏ ਜਾਂਦੇ ਹਨ । ਬਾਕੀ ਦੋ ਗਰਾਉਂਡ ਦੇ ਕਾਰਨਰ ਤੇ ਲੱਗੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।
ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education 2
ਗੇਂਦ (Ball) – ਗੇਂਦ ਦਾ ਆਕਾਰ ਗੋਲ ਹੋਵੇਗਾ । ਇਸ ਦੇ ਉੱਪਰ ਦਾ ਹਿੱਸਾ ਚਮੜੇ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਮਨਜ਼ੂਰਸ਼ੁਦਾ ਚੀਜ਼ ਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਗੇਂਦ ਦੀ ਗੋਲਾਈ 68.5 ਸਮ ਤੋਂ ਘੱਟ ਅਤੇ 71 ਸਮ ਤੋਂ ਵੱਧ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ । ਇਸ ਦਾ ਭਾਰ 14 ਔਸ ਤੋਂ 16 ਸ ਹੋਵੇਗਾ । ਰੈਫ਼ਰੀ ਦੀ ਆਗਿਆ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਖੇਡ ਦੇ ਦੌਰਾਨ ਗੇਂਦ ਨੂੰ ਬਦਲਿਆ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕਦਾ ।

ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 2.
ਹੇਠ ਲਿਖਿਆਂ ਤੋਂ ਤੁਸੀਂ ਕੀ ਸਮਝਦੇ ਹੋ-
ਫੁਟਬਾਲ ਦੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਪਹਿਰਾਵੇ, ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ, ਖੇਡ ਦਾ ਸਮਾਂ, ਖੇਡ ਦਾ ਆਰੰਭ, ਸਕੋਰ ਜਾਂ ਗੋਲ ।
ਉੱਤਰ-
ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ – ਫੁਟਬਾਲ ਦੀ ਖੇਡ ਦੋ ਟੀਮਾਂ ਵਿਚਕਾਰ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਹਰੇਕ ਟੀਮ ਵਿਚ 11-11 ਅਤੇ ਐਕਸਟਰਾ 5 ਖਿਡਾਰੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ i ਇਕ ਮੈਚ ਵਿਚ ਕਿਸੇ ਵੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਤਿੰਨ ਤੋਂ ਵੱਧ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਬਦਲਣ ਦੀ ਆਗਿਆ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ । ਬਦਲੇ ਹੋਏ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਮੁੜ ਉਸ ਮੈਚ ਵਿਚ ਭਾਗ ਲੈਣ ਦਾ ਅਧਿਕਾਰ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ । ਮੈਚ ਵਿਚ ਗੋਲਕੀਪਰ ਬਦਲ ਸਕਦੇ ਹਾਂ ।

ਪਹਿਰਾਵਾ – ਖਿਡਾਰੀ ਅਕਸਰ ਜਰਸੀ ਜਾਂ ਕਮੀਜ਼, ਨਿੱਕਰ, ਜੁਰਾਬਾਂ ਅਤੇ ਬੂਟ ਪਾ ਸਕਦਾ ਹੈ । ਗੋਲ ਕੀਪਰ ਦੀ ਕਮੀਜ਼ ਜਾਂ ਜਰਸੀ ਦਾ ਰੰਗ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਨਾਲੋਂ ਵੱਖਰਾ ਹੋਵੇਗਾ | ਬੂਟ ਪਹਿਨਣੇ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹਨ ।

ਅਧਿਕਾਰੀ – ਇਕ ਰੈਫ਼ਰੀ, ਦੋ ਲਾਈਨਮੈਨ, ਟਾਈਮ ਕੀਪਰ, ਰੈਫ਼ਰੀ ਖੇਡ ਦੇ ਨਿਯਮਾਂ ਦੀ ਪਾਲਨਾ ਕਰਵਾਉਂਦਾ ਹੈ ਤੇ ਕਿਸੇ ਵੱਡੇ ਝਗੜੇ ਵਾਲੇ ਸਵਾਲ ਦਾ ਨਿਬੇੜਾ ਕਰਦਾ ਹੈ । ਖੇਡ ਵਿਚ ਕੀ ਹੋਇਆ ਤੇ ਕੀ ਨਤੀਜਾ ਨਿਕਲਿਆ, ਇਸ ਬਾਬਤੇ ਉਸ ਦਾ ਫ਼ੈਸਲਾ ਆਖਰੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ।

ਖੇਡ ਦਾ ਸਮਾਂ-ਖੇਡ 45-45 ਮਿੰਟ ਦੀਆਂ ਦੋ ਬਰਾਬਰ ਮਿਆਦਾਂ ਵਿਚ ਖੇਡਿਆ ਜਾਵੇਗਾ ! ਪਹਿਲੇ 45 ਮਿੰਟ ਦੀ ਖੇਡ ਮਗਰੋਂ 5 ਮਿੰਟ ਦਾ ਇੰਟਰਵਲ ਹੋਵੇਗਾ ਜਾਂ ਇਸ ਤੋਂ ਵੱਧ ਦੋਨਾਂ ਟੀਮਾਂ ਦੀ ਰਜ਼ਾਮੰਦੀ ਨਾਲ ।

ਗੋਲਡਨ ਗੋਲ (Golden Goal) – ਫੁਟਬਾਲ ਦੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਬਰਾਬਰ ਰਹਿਣ ਦੀ ਹਾਲਤ ਵਿਚ ਵਾਧੂ ਸਮੇਂ ਦੀ 15,15 ਮਿੰਟ ਦੀ ਖੇਡ ਹੋਵੇਗੀ । ਇਸ ਸਮੇਂ ਵਿਚ ਜਿੱਥੇ ਵੀ ਗੋਲ ਹੋ ਜਾਵੇ ਉੱਥੇ ਖੇਡ ਖ਼ਤਮ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਗੋਲ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਟੀਮ ਜੇਤੂ ਮੰਨੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਜੇਕਰ ਇਸ ਸਮੇਂ ਦੌਰਾਨ ਵੀ ਗੋਲ ਨਾ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਦੋਨਾਂ ਟੀਮਾਂ ਨੂੰ 5-5 ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ ਉਦੋਂ ਤਕ ਦਿੱਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਜਿੰਨੀ ਦੇਰ ਫੈਸਲਾ ਨਹੀਂ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ।

ਖੇਡ ਦਾ ਆਰੰਭ – ਖੇਡ ਦੇ ਆਰੰਭ ਵਿਚ ਟਾਸ ਦੁਆਰਾ ਕਿੱਕ ਮਾਰਨ ਅਤੇ ਸਾਈਡ ਚੁਣਨ ਦਾ ਨਿਰਣਾ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਟਾਸ ਜਿੱਤਣ ਵਾਲੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਪਾਸਾ ਚੁਣਨ ਅਤੇ ਕਿੱਕ ਮਾਰਨ ਦੀ ਛੋਟ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।

ਸਕੋਰ ਜਾਂ ਗੋਲ – ਜਦੋਂ ਗੇਂਦ ਨਿਯਮ ਅਨੁਸਾਰ ਗੋਲ ਪੋਸਟਾਂ ਵਿਚੋਂ ਝਾਸਬਾਰ ਦੇ ਹੇਠਾਂ ਅਤੇ ਗੋਲ ਰੇਖਾ ਦੇ ਪਾਰ ਚਲੀ ਜਾਵੇ, ਤਾਂ ਗੋਲ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਜੋ ਟੀਮ ਜ਼ਿਆਦਾ ਗੋਲ ਕਰ ਲਵੇਗੀ ਉਸ ਨੂੰ ਜੇਤੂ ਮੰਨਿਆ ਜਾਵੇਗਾ । ਜੇਕਰ ਕੋਈ ਗੋਲ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਜਾਂ ਇਕੋ ਜਿੰਨੇ ਗੋਲ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਤਾਂ ਖੇਡ ਬਰਾਬਰ ਮੰਨੀ ਜਾਵੇਗੀ । ਪਰ ਜੇ ਲੀਗ ਵਿਧੀ ਨਾਲ ਟੂਰਨਾਮੈਂਟ ਹੋ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਬਰਾਬਰ ਰਹਿਣ ‘ਤੇ ਦੋਹਾਂ ਟੀਮਾਂ ਨੂੰ ਇਕ-ਇਕ ਅੰਕ ਦਿੱਤਾ ਜਾਵੇਗਾ ।

ਗੇਂਦ ਕਦੋਂ ਆਊਟ ਆਫ਼ ਪਲੇ ਅਤੇ ਕਦੋਂ ਖੇਡ ਵਿਚ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ?
ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਕਾਰਨਾਂ ਦੇ ਕਾਰਨ ਗੇਂਦ ਆਉਟ ਆਫ਼ ਪਲੇ ਹੁੰਦੀ ਹੈ-

  1. ਜੇਕਰ ਗੇਂਦ ਧਰਤੀ ਅਤੇ ਹਵਾ ਵਿਚ ਗੋਲ ਰੇਖਾ ਨੂੰ ਪਾਰ ਕਰ ਜਾਵੇ ।
  2. ਰੈਫ਼ਰੀ ਦੀ ਆਗਿਆ ਤੇ ਖੇਡ ਰੋਕਣ ਨਾਲ ।
  3. ਜਦ ਉਹ ਗੋਲ ਪੋਸਟ ਕਾਸ਼ਬਾਰ ਜਾਂ ਕਾਰਨਰ ਫਲੈਗ ਪੋਸਟ ਤੋਂ ਲੱਗ ਕੇ ਬਾਹਰ ਚਲੀ ਜਾਵੇ ।
  4. ਜਦ ਪੂਰਨ ਗੇਂਦ ਗੋਲ ਪੋਸਟਾਂ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਫ਼ਾਸਬਾਰ ਦੇ ਥੱਲੇ ਗੋਲ ਰੇਖਾ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲ ਜਾਵੇ, ਪਰੰਤੂ ਸ਼ਰਤ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਗੇਂਦ ਨੂੰ ਹੱਥ ਜਾਂ ਬਾਂਹ ਨਾਲ ਨਾ ਸੁੱਟਿਆ ਜਾਵੇ ।
  5. ਕੋਈ ਖਿਡਾਰੀ ਜਦ ਆਪਣੇ ਵਿਰੋਧੀ ਦੀ ਗੋਲ ਲਾਈਨ ਤੋਂ ਉਸ ਨਾਲੋਂ ਘੱਟ ਦੂਰੀ ‘ਤੇ ਜੋ ਗੇਂਦ ਉਸ ਸਮੇਂ ਸੀ, ਤਦ ਉਸ ਨੂੰ ਖੇਡਿਆ ਗਿਆ ਸੀ ।

ਬਾਲ ਕ ਖੇਡ ਵਿਚ ਹੁੰਦਾ ਹੈ – ਬਾਲ ਮੈਚ ਦੇ ਆਰੰਭ ਤੋਂ ਅੰਤ ਤੱਕ ਖੇਡ ਵਿਚ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਇਨ੍ਹਾਂ ਪ੍ਰਸਥਿਤੀਆਂ ਵਿਚ ਵੀ ।

  1. ਜੇ ਬਾਲ ਗੋਲ ਖੰਭੇ, ਕਾਸਬਾਰ ਕਾਰਨਰ ਅਤੇ ਝੰਡੀ ਨਾਲ ਟਕਰਾ ਕੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਪਰਤੇ ।
  2. ਗਲਤ ਖੇਡ ਤੋਂ ਅੰਪਾਇਰ ਦੀ ਸੀਟੀ ਤੱਕ ।
  3. ਜਦ ਬਾਲ ਅੰਪਾਇਰ ਜਾਂ ਰੇਖਾ ਨਿਰੀਖਿਅਕ ਨਾਲ ਟਕਰਾ ਜਾਵੇ ਜਦੋਂ ਕਿ ਉਹ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਹੋਵੇ ।
  4. ਮੈਦਾਨ ਦੇ ਬਾਹਰ ਤੋਂ ਆਈ ਸੀਟੀ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਤੱਕ ।
  5. ਕਿਸੇ ਨਿਯਮ ਦੀ ਉਲੰਘਣਾ ’ਤੇ ਵੀ ਖੇਡ ਤਦ ਤੱਕ ਜਾਰੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ, ਜਦ ਤੱਕ ਕਿ ਅੰਪਾਇਰ ਖੇਡ ਨੂੰ ਰੋਕ ਨਾ ਦੇਵੇ ।

ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਦੀ ਬਣਤਰ – ਫੁਟਬਾਲ ਦੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਦੀ ਬਣਤਰ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਆਮ ਕਰਕੇ 1-2-3-5 ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਪਰ ਯੂਰਪੀਅਨ ਦੇਸ਼ਾਂ ਵਿਚ ਬਣਤਰ ਇਸ ਪ੍ਰਕਾਰ ਹੈ-
1-4-2-4
1-3-3-4
ਖਿਡਾਰੀ ਖੇਡ ਦੇ ਸਮੇਂ ਲੋੜ ਅਨੁਸਾਰ ਬਣਤਰ ਬਣਾਉਂਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ ।

ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 3.
ਫੁਟਬਾਲ ਖੇਡ ਵਿਚ ਆਫ਼ ਸਾਈਡ, ਫਰੀ ਕਿੱਕ, ਥਰੋ-ਇਨ, ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ, ਕਾਰਨਰ ਕਿੱਕ ਅਤੇ ਗੋਲ ਕਿੱਕ ਕੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ?
ਉੱਤਰ-
1. ਆਫ਼ ਸਾਈਡ (Off side) – ਜਦ ਕੋਈ ਖਿਡਾਰੀ ਵਿਰੋਧੀ ਪੱਖ ਦੀ ਗੋਲ ਰੇਖਾ ਜਾਂ ਉਹ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦੇ ਅੱਧ ਵਿਚ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦੇ ਦੋ ਖਿਡਾਰੀ ਨਾ ਰਹਿਣ ਤਾਂ ਆਫ਼ ਸਾਈਡ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਇਸ ਹਾਲਤ ਵਿਚ ਹੁੰਦੇ ਹੋਏ ਵੀ ਖਿਡਾਰੀ ਆਫ਼ ਸਾਈਡ ਹੇਠ ਲਿਖੀਆਂ ਹਾਲਤਾਂ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ-

  1. ਉਹ ਮੈਦਾਨ ਦੇ ਆਪਣੇ ਅੱਧ-ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਹੋਵੇ ।
  2. ਗੇਂਦ ਆਖਰੀ ਵਾਰ ਉਸ ਨੂੰ ਛੂੰਹਦੀ ਹੈ ਜਾਂ ਉਹ ਇਸ ਨਾਲ ਖੇਡਦਾ ਹੈ ।
  3. ਜਦ ਉਸ ਨੂੰ ਗੇਂਦ ਗੋਲ-ਕਿੱਕ, ਥਰੋ-ਇਨ, ਕਾਰਨਰ ਕਿੱਕ ਰਾਹੀਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਜਾਂ ਜਦ ਉਸ ਨੂੰ ਰੈਫ਼ਰੀ ਹੇਠਾਂ ਸੁੱਟਦਾ ਹੈ ।
  4. ਜਦ ਗੇਂਦ ਨੂੰ ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਨੇ ਖੇਡਿਆ ਹੋਵੇ । ਇਸ ਨਿਯਮ ਦੀ ਉਲੰਘਣਾ ਲਈ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦੇ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਉਲੰਘਣਾ ਵਾਲੇ ਥਾਂ ਤੋਂ ਪ੍ਰਤੱਖ ਫ਼ਰੀ ਕਿੱਕ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ ।

2. ਫ਼ਰੀ ਕਿੱਕ (Free Kick) – ਫ਼ਰੀ ਕਿੱਕ ਦੋ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਪ੍ਰਤੱਖ ਕਿੱਕ (Direct Kick) ਅਤੇ ਅਪ੍ਰਤੱਖ ਕਿੱਕ (Indirect Kick) | ਜਦ ਪ੍ਰਤੱਖ ਜਾਂ ਅਪ੍ਰਤੱਖ ਕਿੱਕ ਲਾਈ ਜਾ ਰਹੀ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਦੂਜੇ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਗੇਂਦ ਤੋਂ ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ 10 ਗਜ਼ ਦੀ ਦੂਰੀ ‘ਤੇ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ । ਪ੍ਰਤੱਖ ਕਿੱਕ ਉਹ ਹੈ, ਜਿੱਥੋਂ ਸਿੱਧਾ ਗੋਲ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕੇ । ਅਪ੍ਰਤੱਖ ਕਿੱਕ ਉਹ ਹੈ, ਜਿੱਥੋਂ ਸਿੱਧਾ ਗੋਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ, ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਕਿ ਗੇਂਦ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਨਾ ਛੂਹ ਜਾਵੇ । ਇਸ ਨਿਯਮ ਦੀ ਉਲੰਘਣਾ ਕਰਨ ‘ਤੇ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ (Opposing Team) ਨੂੰ ਉਸੇ ਥਾਂ ਤੋਂ ਜਿੱਥੋਂ ਦੀ ਉਲੰਘਣਾ ਚੋਈ ਹੈ, ਅਪ੍ਰਤੱਖ ਫ਼ਰੀ ਕਿੱਕ ਲਾਉਣ ਲਈ ਦਿੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।

3. ਥਰੋ-ਇਨ (Throw-in) – ਜਦੋਂ ਬਾਲ ਹਵਾ ਵਿਚ ਜਾਂ ਜ਼ਮੀਨ ‘ਤੇ ਸਪਰਸ਼ ਰੇਖਾ ਨੂੰ ਪਾਰ ਕਰ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਇਸ ਨੂੰ ਉਸ ਥਾਂ ਤੋਂ ਥੋ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜਿੱਥੋਂ ਇਸ ਨੇ ਇਸ ਰੇਖਾ ਨੂੰ ਪਾਰ ਕੀਤਾ ਸੀ । ਜਿਸ ਰੇਖਾਵਾਂ ਤੋਂ ਗੇਂਦ ਬਾਹਰ ਚਲੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਤਾਂ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦਾ ਇਕ ਖਿਡਾਰੀ ਉਸ ਥਾਂ ‘ਤੇ ਜਿੱਥੋਂ ਗੇਂਦ ਬਾਹਰ ਗਈ ਹੋਵੇ, ਖੜ੍ਹਾ ਹੋ ਕੇ ਗੇਂਦ ਮੈਦਾਨ ਦੇ ਅੰਦਰ ਸੁੱਟਦਾ ਹੈ । ਥ-ਇਨ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਥਰੋ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਖਿਡਾਰੀ ਦਾ ਚਿਹਰਾ ਮੈਦਾਨ ਵਲ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਉਸ ਦਾ ਹਰੇਕ ਪੈਰ ਸਪਰਸ਼ ਰੇਖਾ ‘ਤੇ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਜ਼ਮੀਨ ‘ਤੇ ਹੋਵੇ । ਥਰੋ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਦੋਵੇਂ ਹੱਥਾਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕਰੇਗਾ ਅਤੇ ਬਾਲ ਨੂੰ ਪਿੱਛੋਂ ਆਪਣੇ ਸਿਰ ਤੋਂ ਘੁਮਾ ਕੇ ਸੁੱਟੇਗਾ । ਉਹ ਬਾਲ ਨੂੰ ਉਸ ਸਮੇਂ ਤਕ ਨਹੀਂ ਖੇਡ ਸਕਦਾ, ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਇਸ ਨੂੰ ਦੂਜੇ ਖਿਡਾਰੀ ਨੇ ਛੂਹ ਜਾਂ ਖੇਡ ਨਾ ਲਿਆ ਹੋਵੇ ।

ਜੇਕਰ ਥੋ-ਇਨ ਠੀਕ ਨਾ ਹੋਵੇ, ਤਾਂ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦੇ ਖਿਡਾਰੀ ਦੁਆਰਾ ਬੋ-ਇਨ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਜੇਕਰ ਥੋ-ਇਨ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਗੇਂਦ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਦੂਜੇ ਖਿਡਾਰੀ ਦੁਆਰਾ ਲਏ ਜਾਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਆਪ ਛੂਹ ਲੈਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਇਕ ਅਪ੍ਰਤੱਖ ਫ਼ਰੀ ਕਿੱਕ ਲਗਾਉਣ ਨੂੰ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ ।

4. ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ (Penalty Kick) – ਇਹ ਕਿੱਕ ਪੈਨਲਟੀ ਨਿਸ਼ਾਨ ਤੋਂ ਹੀ ਲਗਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਜਦ ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ ਲਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਗੋਲ ਰੱਖਿਅਕ ਅਤੇ ਕਿੱਕ ਮਾਰਨ ਵਾਲਾ ਹੀ ਪੈਨਲਟੀ ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਬਾਕੀ ਖਿਡਾਰੀ ਇਸ ਖੇਤਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਹੁੰਦੇ ਹਨ । ਇਹ ਨਿਸ਼ਾਨ ਤੋਂ ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ 10 ਗਜ਼ ਦੀ ਦੂਰੀ ‘ਤੇ ਹੋਣਗੇ । ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਲਈ ਹਾਫ਼ ਟਾਈਮ ਜਾਂ ਪੁਰਾ ਟਾਈਮ ਅੱਗੇ ਵਧਾਇਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ।

ਜਿਸ ਸਮੇਂ ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ ਲਗਾਉਣ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ ਲਾ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਗੋਲਕੀਪਰ ਨੂੰ ਗੋਲ ਲਾਇਨ ਤੋਂ ਇਕ ਥਾਂ ‘ਤੇ ਖੜ੍ਹਾ ਰਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ । ਕਿੱਕ ਲਾਉਣ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਗੋਲਕੀਪਰ ਹਿੱਲ-ਜੁਲ ਸਕਦਾ ਹੈ | ਅਜਿਹੀ ਉਲੰਘਣਾ ਕਰਨ ‘ਤੇ ਦੋਬਾਰਾ ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ ਲਾਈ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ । ਪਰ ਜੇਕਰ ਕਿਸੇ ਕਾਰਨ ਕਰਕੇ ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ ਲਾਉਣ ਵਾਲਾ ਨਾ ਲਾ ਸਕੇ ਤਾਂ ਫਿਰ ਰੱਖਿਅਕ ਨੂੰ 16 ਗਜ਼ ਦੀ ਦੂਰੀ ਤੋਂ ਕਿੱਕ ਲਗਾਉਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

ਜੇਕਰ ਰੱਖਿਅਕ ਟੀਮ ਇਸ ਨਿਯਮ ਦਾ ਉਲੰਘਣ ਕਰੇ ਤੇ ਗੋਲ ਨਾ ਹੋਇਆ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਕਿੱਕ ਦੂਜੀ ਵਾਰ ਲਾਈ ਜਾਵੇਗੀ । ਜੇਕਰ ਇਸ ਨਿਯਮ ਦਾ ਉਲੰਘਣ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਕਰਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਗੋਲ ਹੋ ਜਾਣ ਤੇ ਵੀ ਕਿੱਕ ਦੁਬਾਰਾ ਲਾਈ ਜਾਵੇਗੀ । ਜੇਕਰ ਇਸ ਨਿਯਮ ਦੀ ਉਲੰਘਣਾ ਕਿੱਕ ਮਾਰਨ ਵਾਲਾ ਜਾਂ ਉਸ ਦਾ ਸਾਥੀ ਖਿਡਾਰੀ ਹੀ ਕਰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦਾ ਖਿਡਾਰੀ ਉਲੰਘਣਾ ਵਾਲੀ ਥਾਂ ‘ਤੇ ਗੋਲ ਕਿੱਕ ਲਾਵੇਗਾ ।

5. ਕਾਰਨਰ ਕਿੱਕ (Corner Kick) – ਜਦ ਗੇਂਦ ਗੋਲ ਪਾਰ ਕਰ ਜਾਵੇ ਅਤੇ ਉਸ ਨੂੰ ਰੱਖਿਅਕ ਖਿਡਾਰੀ ਨੇ ਆਖ਼ਰੀ ਵਾਰੀ ਖੇਡਿਆ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਕਾਰਨਰ ਕਿੱਕ ਲਾਉਣ ਲਈ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦਾ ਖਿਡਾਰੀ ਸਭ ਤੋਂ ਨੇੜੇ ਦੇ ਫਲੈਗ ਪੋਸਟ ਦੇ ਚੌਥਾਈ ਘੇਰੇ ਦੇ ਅੰਦਰ ਤੋਂ ਕਾਰਨਰ ਕਿੱਕ ਮਾਰਦਾ ਹੈ । ਜਦੋਂ ਤਕ ਕਾਰਨਰ ਕਿੱਕ ਨਾ ਲੈ ਲਈ ਜਾਵੇ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦੇ ਖਿਡਾਰੀ 10 ਗਜ਼ ਦੂਰ ਰਹਿਣਗੇ । ਕਿੱਕ ਮਾਰਨ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਉਸ ਸਮੇਂ ਤਕ ਗੇਂਦ ਨੂੰ ਦੁਬਾਰਾ ਨਹੀਂ ਛੂਹ ਸਕਦਾ, ਜਦੋਂ ਤਕ ਕਿਸੇ ਦੂਜੇ ਖਿਡਾਰੀ ਨੇ ਇਸ ਨੂੰ ਛੂਹ ਨਾ ਲਿਆ ਹੋਵੇ ।

6. ਗੋਲ ਕਿੱਕ (Goal Kick) – ਜਦ ਗੱਦ ਗੋਲ ਰੇਖਾ ਨੂੰ ਗੋਲ ਪੋਸਟਾਂ ਤੋਂ ਨਹੀਂ ਪਾਰ ਕਰ ਜਾਵੇ ਅਤੇ ਇਸ ਨੂੰ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਖੇਡ ਰਹੀ ਹੋਵੇ, ਤਾਂ ਰੱਖਿਅਕ ਟੀਮ ਪੈਨਲਟੀ ਖੇਤਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਕਿੱਕ ਕਰਦੀ ਹੈ । ਕਿੱਕ ਦੇ ਲਗਦੇ ਸਮੇਂ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦੇ ਖਿਡਾਰੀ ਪੈਨਲਟੀ ਖੇਤਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਹੋਣਗੇ । ਜੇਕਰ ਉਹ ਪੈਨਲਟੀ ਖੇਤਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਨਹੀਂ ਨਿਕਲਦੀ ਅਤੇ ਸਿੱਧੇ ਖੇਡ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਪਹੁੰਚ ਸਕਦੀ ਤਾਂ ਕਿੱਕ ਦੁਬਾਰਾ ਲਗਾਈ ਜਾਵੇਗੀ । ਕਿੱਕ ਮਾਰਨ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਉਸ ਸਮੇਂ ਤਕ ਗੇਂਦ ਨੂੰ ਮੁੜ ਨਹੀਂ ਛੂਹ ਸਕਦਾ ਜਦੋਂ ਤੱਕ ਇਸ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਦੂਜੇ ਖਿਡਾਰੀ ਨੇ ਛੂਹ ਨਾ ਲਿਆ ਹੋਵੇ ।
ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education 3

ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 4.
ਫੁਟਬਾਲ ਦੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਕਿਹੜੇ-ਕਿਹੜੇ ਫਾਊਲ ਹੋ ਸਕਦੇ ਹਨ ? ਲਿਖੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਫੁਟਬਾਲ ਦੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਫਾਊਲ ਅਤੇ ਗ਼ਲਤੀਆਂ-

(ਉ) ਜੇਕਰ ਕੋਈ ਖਿਡਾਰੀ ਹੇਠ ਲਿਖੀ ਅਵੱਗਿਆ ਜਾਂ ਅਪਰਾਧਾਂ ਵਿਚੋਂ ਕੋਈ ਜਾਣ-ਬੁਝ ਕੇ ਕਰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਅਵੱਗਿਆ ਜਾਂ ਅਪਰਾਧ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਥਾਂ ਤੋਂ ਅਪ੍ਰਤੱਖ ਫ਼ਰੀ ਕਿੱਕ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ ।
ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education 4

  1. ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਕਿੱਕ ਮਾਰੇ ਜਾਂ ਮਾਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰੇ ।
  2. ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ’ਤੇ ਕੁੱਦੇ ਜਾਂ ਧੱਕਾ ਜਾਂ ਮੁੱਕਾ ਮਾਰੇ ਜਾਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰੇ ।
  3. ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ’ਤੇ ਭਿਆਨਕ ਰੂਪ ਨਾਲ ਹਮਲਾ ਕਰਨਾ ।
  4. ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਦੇ ਪਿੱਛੋਂ ਹਮਲਾ ਕਰਨਾ ।
  5. ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਫੜੇ ਜਾਂ ਉਸ ਦੇ ਕੱਪੜੇ ਫੜ ਕੇ, ਖੇਡੇ ।
  6. ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਸੱਟ ਪਹੁੰਚਾਏ ਜਾਂ ਪਹੁੰਚਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰੇ ।
  7. ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਦੇ ਰਾਹ ਵਿਚ ਰੋਕ ਬਣੇ ਜਾਂ ਲੱਤਾਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਨਾਲ ਉਸ ਨੂੰ ਡੇਗ ਦੇਵੇ ਜਾਂ ਡੇਗਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰੇ ।
  8. ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਹੱਥ ਜਾਂ ਬਾਂਹ ਦੇ ਕਿਸੇ ਭਾਗ ਨਾਲ ਧੱਕਾ ਦੇਵੇ ।
  9. ਗੇਂਦ ਨੂੰ ਹੱਥ ਵਿਚ ਫੜੇ ।

ਜੇਕਰ ਰੱਖਿਅਕ ਟੀਮ ਦਾ ਖਿਡਾਰੀ ਇਹਨਾਂ ਅਪਰਾਧਾਂ ਵਿਚੋਂ ਕੋਈ ਵੀ ਅਪਰਾਧ ਪੈਨਲਟੀ ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਜਾਣ-ਬੁੱਝ ਕੇ ਕਰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਹਮਲਾਵਰ ਟੀਮ ਨੂੰ ਪੈਨਲਟੀ ਕਿੱਕ ਦਿੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।

(ਅ) ਜੇ ਖਿਡਾਰੀ ਹੇਠ ਲਿਖੇ ਅਪਰਾਧਾਂ ਵਿਚੋਂ ਕੋਈ ਅਪਰਾਧ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਅਪਰਾਧ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਥਾਂ ਅਪ੍ਰਤੱਖ ਕਿੱਕ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ ।

  1. ਗੇਂਦ ਨੂੰ ਖਤਰਨਾਕ ਢੰਗ ਨਾਲ ਖੇਡਦਾ ਹੈ ।
  2. ਜਦੋਂ ਗੇਂਦ ਕੁੱਝ ਦੂਰ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਦੂਜੇ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਮੋਢਾ ਮਾਰੇ ।
  3. ਗੇਂਦ ਖੇਡਦੇ ਸਮੇਂ ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਜਾਣ-ਬੁੱਝ ਕੇ ਰੋਕਦਾ ਹੈ ।
  4. ਗੋਲ ਕੀਪਰ ‘ਤੇ ਹਮਲਾ ਕਰਨਾ, ਕੇਵਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਸਥਿਤੀਆਂ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ, ਜਦੋਂ ਉਹ-
    • (i) ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਰੋਕ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇ ।
    • (ii) ਗੇਂਦ ਫੜ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇ ।
    • (iii) ਗੋਲ-ਖੇਤਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲ ਗਿਆ ਹੋਵੇ ।
  5. (ਉ) ਗੋਲਕੀਪਰ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਗੇਂਦ ਧਰਤੀ ‘ਤੇ ਬਿਨਾਂ ਮਾਰੇ ਚਾਰ ਕਦਮ ਅੱਗੇ ਨੂੰ ਜਾਣਾ ।
    (ਅ) ਗੋਲਕੀਪਰ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਅਜਿਹੀ ਚਲਾਕੀ ਵਿਚ ਲੱਗ ਜਾਣਾ ਜਿਸ ਨਾਲ ਖੇਡ ਵਿਚ ਰੋਕ ਪਵੇ, ਸਮਾਂ ਨਸ਼ਟ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਪੱਖ ਨੂੰ ਅਣਉੱਚਿਤ ਲਾਭ ਪਹੁੰਚਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰੇ ।
    (ੲ) ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਚੇਤਾਵਨੀ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ ਅਤੇ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਅਪ੍ਰਤੱਖ ਫ਼ਰੀ ਕਿੱਕ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇਗੀ, ਜਦੋਂ ਕੋਈ ਖਿਡਾਰੀ-

1. ਗਾਲ੍ਹਾਂ ਕੱਢਦਾ ਹੈ ਜਾਂ ਫਾਊਲ ਕਰਦਾ ਹੈ ।
2. ਚੇਤਾਵਨੀ ਮਿਲਣ ‘ਤੇ ਵੀ ਬੁਰਾ ਵਿਹਾਰ ਕਰਦਾ ਹੈ ।
3. ਗੰਭੀਰ ਫਾਉਲ ਖੇਡਦਾ ਹੈ ਜਾਂ ਦੁਰਵਿਹਾਰ ਕਰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਰੈਫ਼ਰੀ ਉਸ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਪੂਰੇ ਸਮੇਂ ਲਈ ਮੈਦਾਨ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਕੱਢ ਸਕਦਾ ਹੈ ।

ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 5.
ਫੁਟਬਾਲ ਦੀ ਖੇਡ ਦੀਆਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਤਕਨੀਕਾਂ ਬਾਰੇ ਲਿਖੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਫੁਟਬਾਲ ਦੀਆਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਤਕਨੀਕਾਂ
ਕਿਕਿੰਗ-
ਕਿਕਿੰਗ ਉਹ ਢੰਗ ਹੈ, ਜਿਸ ਰਾਹੀਂ ਆ ਬਾਲ ਨੂੰ ਲੋੜੀਂਦੀ ਦਿਸ਼ਾ ਵੱਲੋਂ ਪੈਰਾਂ ਦੀ ਮਦਦ ਨਾਲ, ਲੋੜੀਂਦੀ ਰਫ਼ਤਾਰ ਨਾਲ, ਇਹ ਦੇਖਦੇ ਹੋਇਆਂ ਕਿ ਉਹ ਉਦੇਸ਼ ਉੱਤੇ ਪਹੁੰਚੇ, ਅੱਗੇ ਲਿਜਾਇਆ ਜਾਂਦਾ । ਹੈ । ਕਿਕਿੰਗ ਦੇ ਹੁਨਰ ਵਿਚ ਦਰੁਸਤੀ, ਰਫ਼ਤਾਰ, ਦਿਸ਼ਾ ਅਤੇ ਫ਼ਾਸਲਾ ਸਿਰਫ L ਇਕ ਪੈਰ ਖੱਬੇ ਜਾਂ ਸੱਜੇ ਨਾਲ ਹੀ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਦੋਹਾਂ ਪੈਰਾਂ ਨਾਲ ਕਾਇਮ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਸ਼ਾਇਦ ਸਿਖਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਸਿਖਾਉਣ ਲਈ ਸਭ ਤੋਂ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਗੱਲ ਦੋਹਾਂ ਪੈਰਾਂ ਨਾਲ ਖੇਡ ਖੇਡਣ ਉੱਤੇ ਜ਼ੋਰ ਦੇਣ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ । ਛੋਟੇ ਅਤੇ ਨਵੇਂ ਸਿਖਿਆਰਥੀਆਂ ਨੂੰ ਦੋਹਾਂ ਪੈਰਾਂ ਨਾਲ ਖੇਡਣਾ ਸਿਖਾਉਣਾ ਆਸਾਨ ਹੈ । ਇਸ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਖੇਡ ਦੇ ਕਿਸੇ ਕਾਮਯਾਬੀ ਦੇ ਮਿਆਰ ਉੱਤੇ ਪਹੁੰਚਣਾ ਅਸੰਭਵ ਹੈ ।
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  1. (1) ਪੈਰਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰਲੇ ਭਾਗ ਨਾਲ ਕਿੱਕ ਮਾਰਨੀ ।
  2. (2) ਪੈਰਾਂ ਦਾ ਬਾਹਰੀ ਭਾਗ ।

ਜਦੋਂ ਬਾਲ ਨੂੰ ਨਜ਼ਦੀਕ ਦੁਰੀ ਦੇ ਅੰਦਰ ਕਿੱਕ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੋਹਾਂ ਤਬਦੀਲੀਆਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਬਾਲ ਤਾਂ ਘਟਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਇਸ ਵਿਚ ਵੱਡੀ ਦਰੁਸਤੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਇਹ ਢੰਗ ਗੋਲਾਂ ਦਾ ਨਿਸ਼ਾਨਾ ਬਣਾਉਂਦੇ ਸਮੇਂ ਅਕਸਰ ਵਰਤਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

ਹਾਫ ਵਾਲੀ ਤੇ ਵਾਲੀ ਕਿੱਕ-
ਜਦੋਂ ਬਾਲ ਖਿਡਾਰੀ ਕੋਲ ਬੁੜਕਦਾ ਹੋਇਆ ਜਾਂ ਹਵਾ ਵਿਚ ਆ ਰਿਹਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਸ ਸਮੇਂ ਇਕ ਅਸਥਿਰਤਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਨਾ ਸਿਰਫ਼ ਫੁਟਬਾਲ ਦੀ ਖੇਡ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਦੀ ਸਤਹਿ ਕਰਕੇ ਇਸ ਦੇ ਬੁੜਕਣ ਦੀ ਦਿਸ਼ਾ ਬਾਰੇ, ਸਗੋਂ ਇਸ ਦੀ ਉਚਾਈ ਅਤੇ ਰਫ਼ਤਾਰ ਬਾਰੇ ਵੀ । ਇਸ ਨੂੰ ਅਸਰਦਾਰ ਢੰਗ ਨਾਲ ਸਪੱਸ਼ਟ ਕਰਨ ਲਈ ਜਿਹੜੀ ਗੱਲ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ ਉਹ ਹੈ ਦਰੁਸਤ ਸਮਾਂ ਅਤੇ ਕਿੱਕ ਮਾਰ ਰਹੇ ਪੈਰ ਦੇ ਚੱਲਣ ਦਾ ਤਾਲਮੇਲ ਅਤੇ ਉੱਚਿਤ ਉਚਾਈ ਤੱਕ ਉਠਾਉਣਾ ।
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ਓਵਰ ਹੈਡ ਕਿੱਕ – ਇਸ ਕਿੱਕ ਦਾ ਉਦੇਸ਼ ਤੀਹਰਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ।
(ੳ) ਸਾਹਮਣੇ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰ ਰਹੇ ਖਿਡਾਰੀ ਵਲੋਂ ਬਾਲ ਨੂੰ ਹੋਰ ਦਿਸ਼ਾ ਵੱਲ ਮੋੜਨਾ,
(ਅ) ਬਾਲ ਨੂੰ ਕਿੱਕ ਦੀ ਉਸ ਦਿਸ਼ਾ ਵੱਲ ਹੀ ਵਧਾਉਣਾ,
(ਏ) ਅਤੇ ਬਾਲ ਨੂੰ ਵਾਪਿਸ ਉਸੇ ਦਿਸ਼ਾ ਵੱਲ ਮੋੜਨਾ, ਜਿਧਰੋਂ ਇਹ ਆਇਆ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਓਵਰ ਹੈਡ ਕਿੱਕ ਸੋਧੀ ਹੋਈ ਵਾਲੀ ਕਿੱਕ ਹੈ ਅਤੇ ਇਹ ਆਮ ਕਰਕੇ ਉੱਚੇ ਬੁੜਕ ਰਹੇ ਬਾਲ ਨੂੰ ਮਾਰੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।
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ਪਾਸ ਦੇਣਾ-
ਫੁਟਬਾਲ ਵਿਚ ਪਾਸ ਦੇਣ ਦੀ ਕਿਰਿਆ ਟੀਮ-ਵਰਕ ਦਾ ਆਧਾਰ ਹੈ | ਪਾਸ ਟੀਮ ਨੂੰ ਤਾਲਮੇਲ ਨੂੰ ਵਧਾਉਂਦਿਆਂ ਅਤੇ ਟੀਮ ਵਰਕ ਦਾ ਵਿਕਾਸ ਕਰਦਿਆਂ ਜੋੜਦਾ ਹੈ । ਪਾਸ ਖੇਡ ਸਥਿਤੀ ਨਾਲ ਜੁੜਿਆ ਹੋਇਆ ਟੀਮ ਖੇਡ ਦਾ ਅਸਲੀਪਨ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਕ ਮੁੱਢਲਾ ਤੱਤ ਹੈ, ਜਿਸ ਵਾਸਤੇ ਟੀਮ ਦੀ ਸਿਖਲਾਈ ਅਤੇ ਅਭਿਆਸ ਦੌਰਾਨ ਉਚੇਚਾ ਧਿਆਨ ਅਤੇ ਸਮਾਂ ਦਿੱਤਾ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ । ਗੋਲਾਂ ਵਿਖੇ ਪੂਰਨਤਾ ਲਈ ਟੀਮ ਦਾ ਪਾਸ ਵਿਅਕਤੀਗਤ ਖਿਡਾਰੀ ਵਲੋਂ ਦਰੁਸਤ ਕਿੱਕ ਦਾ ਅਲਾਪ ਹੈ । ਇਹ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਕ ਸਫਲ ਪਾਸ ਤਿੰਨ ਕਿੱਕਾਂ ਨਾਲੋਂ ਚੰਗਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ | ਪਾਸ ਦੇਣਾ ਮੇਲ-ਜੋਲ ਦਾ ਅੰਗ ਹੈ, ਵਿਅਕਤੀਗਤ ਬੁੱਧੀਮਤਾ ਨੂੰ ਖੇਡ ਵਿਚ ਹਮਲਾ ਕਰਨ ਵੇਲੇ ਜਾਂ ਸੁਰੱਖਿਆ ਕਰਨ ਵੇਲੇ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਵਿਚਕਾਰ ਸਾਂਝੀ ਹਿਲ-ਜੁਲ ਦੇ ਗੁੰਝਲਦਾਰ ਢਾਂਚੇ ਵਿਚ ਇਕਸੁਰ ਕਰਨਾ ਹੈ । ਪਾਸ ਵਿਚ ਪਾਸ ਦੇਣ ਵਾਲਾ, ਬਾਲ ਅਤੇ ਪਾਸ ਹਾਸਿਲ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਸ਼ਾਮਿਲ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।

ਪਾਸ ਦੇਣ ਨੂੰ ਆਮ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਲੰਬੇ ਪਾਸਾਂ ਅਤੇ ਛੋਟੇ ਪਾਸਾਂ ਵਿਚ ਵਰਗ-ਬੱਧ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।
(ਉ) ਲੰਬੇ ਪਾਸ : ਇਨ੍ਹਾਂ ਪਾਸਾਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਖੇਡ ਦੀ ਤੇਜ਼ ਰਫ਼ਤਾਰ ਦੀ ਸਥਿਤੀ ਵੇਲੇ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਜਿੱਥੇ ਕਿ ਲੰਬੇ ਪਾਸ ਲਾਭਕਾਰੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਬਾਲ ਪਾਸਿਆਂ ਨੂੰ ਜਾਂ ਪਿੱਛੋਂ ਵੱਲ ਵੀ ਦਿੱਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ । ਸਾਰੇ ਹੀ ਲੰਬੇ ਪਾਸਾਂ ਵਿਚ ਪੈਰ ਦੇ ਉਤਲੇ ਪਾਸੇ ਜਾਂ ਛੱਡਣ ਦੀ ਕਿੱਕ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਲੰਬੇ ਪਾਸ ਸੁਰੱਖਿਆ ਨੂੰ ਵਧਾਉਂਦੇ ਹਨ ਤੇ ਛੋਟੇ ਪਾਸਾਂ ਨੂੰ ਅਸਾਨ ਕਰਦੇ ਹਨ ।
(ਅ) ਛੋਟੇ ਪਾਸ : ਛੋਟੇ ਪਾਸ 15 ਗਜ਼ ਜਾਂ ਏਨੀ ਕੁ ਦੂਰੀ ਤਕ ਲਈ ਵਰਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਉਹ ਲੰਬੇ ਪਾਸਾਂ ਨਾਲੋਂ ਵਧੇਰੇ ਤੇਜ਼ ਅਤੇ ਦਰੁਸਤ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।

ਪੁਸ਼ ਪਾਸ-
ਇਕ ਪੁਸ਼-ਪਾਸ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਆਮ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਜਦੋਂ ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਬਹੁਤਾ ਨਜ਼ਦੀਕ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਨੇੜਿਉਂ ਗੋਲਾਂ ਵਿਚ ਬਾਲ ਸੁੱਟਣ ਲਈ ਅਤੇ ਪਾਸਿਆਂ ਵੱਲ ਬਾਲ ਸੁੱਟਣ ਲਈ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।

ਲਾਬ ਪਾਸ-
ਇਹ ਪੁਸ਼-ਪਾਸ ਨਾਲੋਂ ਛੋਟਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਬਾਲ ਨੂੰ ਉੱਪਰ ਚੁੱਕਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਬੁੜਕਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਲਾਬ ਪਾਸ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਜਦੋਂ ਨੇੜੇ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਥਰੋਬਾਲ ਲੈਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੋਵੇ, ਤਾਂ ਉਸ ਦੇ ਸਿਰ ਦੇ ਉੱਪਰੋਂ ਬਾਲ ਲੰਘਾਉਣ ਲਈ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।

ਪੈਰਾਂ ਦਾ ਬਾਹਰਲਾ ਹਿੱਸਾ-ਫਲਿੱਕ ਜਾਂ ਜਾਬ ਪਾਸ-
ਪਹਿਲਾਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ ਦੋ ਪਾਸਾਂ ਦੇ ਉਲਟ ਫਲਿੱਕ ਪਾਸ ਨਾਲ ਪੈਰਾਂ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਵੱਲ ਮੋੜਦਿਆਂ ਹੋਇਆਂ ਬਾਲ ਨੂੰ ਫਲਿੱਕ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਜਾਂ ਪੁਸ਼ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਇਸ ਕਿਸਮ ਦੇ ਪਾਸ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਵੱਲ ਪਾਸ ਦੇਣ ਲਈ ਬਾਲ ਨੂੰ ਘੇਰੇ ਅੰਦਰ ਰੱਖਦਿਆਂ ਅਤੇ ਅਕਸਰ ਰੇੜ੍ਹਦਿਆਂ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।

ਟੈਪਿੰਗ-
ਟੈਪਿੰਗ ਬਾਲ ਨੂੰ ਕੰਟਰੋਲ ਕਰਨ ਦਾ ਆਧਾਰ ਹੈ । ਬਾਲ ਨੂੰ ਟੈਪ ਕਰਨ ਦਾ ਮਤਲਬ ਬਾਲ ਨੂੰ ਖਿਡਾਰੀ ਕੋਲੋਂ ਬਾਹਰ ਜਾਣ ਤੋਂ ਰੋਕਣਾ ਹੈ । ਇਹ ਸਿਰਫ ਬਾਲ ਨੂੰ ਰੋਕਣ ਜਾਂ ਹਿਲਜੁਲ ਰਹਿਤ ਕਰਨ ਦੀ ਹੀ ਕਿਆ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਆ ਰਹੇ ਬਾਲ ਨੂੰ ਪੱਕੇ ਕੰਟਰੋਲ ਵਿਚ ਲੈਣ ਦੇ ਮਨੋਰਥ ਨਾਲ ਲਾਜ਼ਮੀ ਤਕਨੀਕ ਹੈ । ਰੋਕਣਾ ਤਾਂ ਬਾਲ ਕੰਟਰੋਲ ਦਾ ਪਹਿਲਾ ਹਿੱਸਾ ਹੈ ਅਤੇ ਦੂਸਰਾ ਹਿੱਸਾ, ਜਿਹੜਾ ਖਿਡਾਰੀ ਉਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਆਪਣੇ ਅਤੇ ਉਸ ਦੇ ਉੱਤੇ ਫਾਇਦੇ ਲਈ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਵੀ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੈ ।

ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education 8
ਨੋਟ – ਟ੍ਰੈਪਸ ਦੀ ਸਿਖਲਾਈ
(ੳ) ਰਿੜ੍ਹਦੇ ਬਾਲ ਅਤੇ
(ਅ) ਬੁੜਕਦੇ ਬਾਲ ਲਈ ਦਿੱਤੀ ਜਾਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ।

ਪੈਰਾਂ ਦੇ ਹੇਠਲੇ ਹਿੱਸੇ ਨਾਲ ਟ੍ਰੈਪ-
ਜਦੋਂ ਕੋਈ ਜਲਦੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ ਅਤੇ ਜੇ ਕਾਫੀ ਸੁਤੰਤਰ ਅੰਤਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਤੁਹਾਡੇ ਦੁਆਲੇ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਤਾਂ ਇਸ ਕਿਸਮ ਦੀ ਟੈਪਿੰਗ ਬੜੀ ਚੰਗੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ।

ਪੈਰਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰਲੇ ਭਾਗ ਨਾਲ ਟੈਪ-
ਇਹ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਅਸਰਦਾਰ ਅਤੇ ਆਮ ਵਰਤਿਆ ਜਾਂਦਾ ਟੈਪ ਹੈ । ਇਸ ਕਿਸਮ ਦਾ ਟੈਪ ਨਾ ਸਿਰਫ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਬਾਲ ਵੈਪ ਕਰਨ ਦੇ ਯੋਗ ਬਣਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਸਗੋਂ ਉਸ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਵੀ ਦਿਸ਼ਾ ਵਲ ਜਾਣ ਵਿਚ ਮੱਦਦ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਅਕਸਰ ਉਸੇ ਹੀ ਹਰਕਤ ਵਿਚ ਇਹ ਪ ਖਾਸ ਕਰਕੇ ਪਾਸੇ ਵਾਲੇ ਜਾਂ ਇਕ ਕੋਣ ’ਤੇ ਆ ਰਹੇ ਬਾਲ ਲਈ ਚੰਗਾ ਹੈ । ਜੇ ਬਾਲ ਸਿੱਧਾ ਸਾਹਮਣੇ ਆਉਂਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਉਸੇ ਦਿਸ਼ਾ ਵੱਲ ਮੋੜਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜਿਧਰ ਕਿ ਬਾਲ ਨੇ ਜਾਣਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ।
ਫੁਟਬਾਲ (FootBall) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education 9

ਪੈਰਾਂ ਦੇ ਬਾਹਰਲੇ ਹਿੱਸੇ ਤੋਂ ਟੈਪ-
ਇਹ ਪਹਿਲੇ ਵਰਗਾ ਹੀ ਹੈ, ਪਰ ਇਹ ਮੁਸ਼ਕਿਲ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਹਰਕਤ ਵਿਚ ਖਿਡਾਰੀ ਦਾ ਭਾਰ ਬਾਹਰ ਵੱਲ ਮੁੜਨ ਅਤੇ ਕੇਂਦਰ ਤੋਂ ਲਾਂਭੇ ਸੰਤੁਲਨ ਕਰਨ ਲਈ ਲੋੜੀਂਦਾ ਹੈ ।

ਪੇਟ ਜਾਂ ਛਾਤੀ ਟੈਪ-
ਜਦੋਂ ਬਾਲ ਕਮਰ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਪੈਰਾਂ ਨਾਲ ਅਸਰਦਾਰ ਢੰਗ ਨਾਲ ਟੈਪ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਤਾਂ ਬਾਲ ਨੂੰ ਪੇਟ ਜਾਂ ਛਾਤੀ ਉੱਤੇ ਜਾਂ ਧਰਤੀ ਤੋਂ ਬੁੜਕਦਿਆਂ ਲਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।
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ਹੈਡ ਢੈਪ-
ਇਹ ਤਜਰਬੇਕਾਰ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਲਈ ਹੈ, ਜਿਹੜੇ ਹੈਡਿੰਗ ਦੀ ਬੁਨਿਆਦ ਵਿਚ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸਥਾਪਿਤ ਹਨ ।
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ਬੈਡਮਿੰਟਨ (Badminton) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

Punjab State Board PSEB 10th Class Physical Education Book Solutions ਬੈਡਮਿੰਟਨ (Badminton) Game Rules.

ਬੈਡਮਿੰਟਨ (Badminton) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਯਾਦ ਰੱਖਣ ਵਾਲੀਆਂ ਗੱਲਾਂ
(Points to Remember)

  1. ਡਬਲ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਲਈ ਕੋਰਟ ਦਾ ਆਕਾਰ = 44′ × 20′ ਜਾਂ 13.40 ਮੀ. × 6. 10 ਮੀ.
  2. ਸਿੰਗਲ ਲਈ ਕੋਰਟ ਦਾ ਆਕਾਰ = 44′ × 17′
  3. ਜਾਲ ਦੀ ਚੌੜਾਈ = 2′ × 6′
  4. ਪੋਲਾਂ ਤੋਂ ਜਾਲ ਦੀ ਉਚਾਈ = 5′ 1″
  5. ਸ਼ਟਲ ਦੇ ਪਰਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ = 16
  6. ਸ਼ਟਲ ਦੇ ਪਰਾਂ ਦੀ ਲੰਬਾਈ = 2\(\frac{1}{2}\) ਤੋਂ 3\(\frac{3}{4}\) ਇੰਚ
  7. ਡਬਲ ਖੇਡ ਵਿਚ ਅੰਕ = 21 ਅੰਕ
  8. ਔਰਤਾਂ ਦੀ ਸਿੰਗਲਜ਼ ਖੇਡ ਦੇ ਅੰਕ = 21
  9. ਕਿਨਾਰਿਆਂ ਦੀ ਗੈਲਰੀ ਦਾ ਆਕਾਰ = 1′ 6”
  10. ਪਿਛਲੀ ਗੈਲਰੀ ਦਾ ਆਕਾਰ = 2′ 6”
  11. ਰੈਕਟ ਦਾ ਭਾਰ ਅਤੇ ਲੰਬਾਈ = 85 ਤੋਂ 140 ਗਰਾਮ 27″ ਲੰਬਾਈ ਰੈਕਟ ਦੀ
  12. ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਵਿਚ ਸੈੱਟਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ = = ਤਿੰਨ
  13. ਰੈਕੇਟ ਦੀ ਲੰਬਾਈ = 274, ਜਾਂ 680 ਮਿ.ਮੀ.
  14. ਫਰੇਮ ਦੀ ਲੰਬਾਈ = 11” ਜਾਂ 270 ਮਿ.ਮੀ.
  15. ਫਰੇਮ ਦੀ ਚੌੜਾਈ = 9 ਮਿ.ਮੀ. ।

ਬੈਡਮਿੰਟਨ (Badminton) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਖੇਡ ਸੰਬੰਧੀ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਜਾਣਕਾਰੀ

  1. ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਖੇਡ ਦੋ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ-ਸਿੰਗਲਜ਼ ਤੇ ਡਬਲਜ਼ । ਸਿੰਗਲਜ਼ ਵਿਚ ਦੋ ਖਿਡਾਰੀ, ਇਕ ਇਕ ਖੇਡਣ ਵਾਲਾ ਅਤੇ ਇਕ ਬਦਲਵਾਂ ਖਿਡਾਰੀ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਡਬਲਜ਼ ਵਿਚ ਚਾਰ ਖਿਡਾਰੀ ਖੇਡਣ ਵਾਲੇ ਅਤੇ ਦੋ ਬਦਲਵੇਂ (Substitutes) ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।
  2. ਸਿੰਗਲਜ਼ ਖੇਡ ਲਈ ਖੇਡ ਦੇ ਕੋਰਟ ਦਾ ਆਕਾਰ 13.400 ਸੈਂਟੀਮੀਟਰ × 5.180 ਸੈਂਟੀਮੀਟਰ (44′ × 17′) ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਡਬਲਜ਼ ਖੇਡ ਲਈ 13.400 ਸੈਂਟੀਮੀਟਰ × 6.100 ਸੈਂਟੀਮੀਟਰ (44′ × 20′) ਹੁੰਦਾ ਹੈ ।
  3. ਟਾਸ ਜਿੱਤਣ ਵਾਲਾ ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਫ਼ੈਸਲਾ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਉਸ ਨੇ ਪਹਿਲਾਂ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨੀ ਹੈ ਜਾਂ ਸਾਈਡ ਲੈਣੀ ਹੈ ।
  4. ਡਬਲਜ਼ ਖੇਡ 15 ਅੰਕ ਦਾ ਹੋਵੇਗਾ ।
  5. ਕੁੜੀਆਂ ਲਈ ਸਿੰਗਲਜ਼ ਮੈਚ ਦੇ 11 ਪੁਆਇੰਟ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।
  6. ਸਰਵਿਸ ਤਦ ਤਕ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਜਦੋਂ ਤਕ ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਤਿਆਰ ਨਾ ਹੋਵੇ ।
  7. ਸਿੰਗਲਜ਼ ਖੇਡ ਵਿਚ 5 ਪੁਆਇੰਟ ਹੋਣ ‘ਤੇ ਦੋਵੇਂ ਖਿਡਾਰੀ ਅੱਧੀ ਕੋਰਟ ਬਦਲ ਲੈਣਗੇ ।
  8. ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਵਿਚ ਖੇਡ ਸਮਾਂ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਸਗੋਂ ਇਸ ਵਿਚ ਬੈਸਟ ਆਫ਼ ਥਰੀ ਗੇਮਜ਼ ਲਈਆਂ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ । ਜੋ ਟੀਮ ਤਿੰਨਾਂ ਵਿਚੋਂ ਦੋ ਗੇਮਜ਼ ਜਿੱਤ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਜੇਤੂ ਕਰਾਰ ਦਿੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।
  9. ਖੇਡ ਵਿਚ ਵਿਸਲ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ।
  10. ਇਸ ਖੇਡ ਨੂੰ ਆਮ ਕਰਕੇ (Indoor Stadium) ਵਿਚ ਹੀ ਖੇਡਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 1.
ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਕੋਰਟ, ਜਾਲ, ਸ਼ਟਲ ਕਾਕ ਅਤੇ ਬੱਲੀਆਂ ਸੰਬੰਧੀ ਵਿਸਥਾਰ ਨਾਲ ਲਿਖੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਖੇਡ ਵਿਚ ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਕੋਰਟ, ਬੱਲੀਆਂ, ਜਾਲ, ਸ਼ਟਲ ਕਾਕ-
ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਕੋਰਟ (Badminton Court) – ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਕੋਰਟ ਵਿਚ ਦੋ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਖੇਡ ਹੁੰਦੀ ਹੈ -ਸਿੰਗਲਜ਼ ਅਤੇ ਡਬਲਜ਼ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੋਹਾਂ ਖੇਡਾਂ ਲਈ ਦੋ ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਕੋਰਟ ਦੀ ਪੈਮਾਇਸ਼ ਨੂੰ ਚਿਤਰ ਵਿਚ ਦਿਖਾਈਆਂ ਗਈਆਂ 1 × 2″ (4 ਸ. ਮ.) ਮੋਟੀਆਂ ਸਫ਼ੈਦ ਜਾਂ ਕਾਲੀਆਂ ਲਾਈਨਾਂ ਰਾਹੀਂ ਸਪੱਸ਼ਟ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ ।

ਡਬਲਜ਼ ਖੇਡ ਲਈ ਕੋਰਟ ਦਾ ਸਾਈਜ਼ 4 ਫੁੱਟ × 20 ਫੁੱਟ ਅਤੇ ਸਿੰਗਲਜ਼ ਲਈ 44 ਫੁੱਟ × 17 ਫੁੱਟ ਹੋਵੇਗਾ । ਇਸ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਅਤੇ ਸਾਈਡਾਂ ਦੀ ਗੈਲਰੀ ਕ੍ਰਮਵਾਰ 2\(\frac{1}{2}\) ਅਤੇ 1\(\frac{1}{2}\) ਫੁੱਟ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਨੈਟ ਦੇ ਦੋਵੇਂ ਪਾਸੇ 6\(\frac{1}{2}\) ਫੁੱਟ ਸ਼ਾਰਟ ਸਰਵਿਸ ਰੇਖਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਕੇਂਦਰੀ ਰੇਖਾ ਕੋਰਟ ਦੀ ਦੋ ਹਿੱਸਿਆਂ ਵਿਚ ਵੰਡੀ ਸਾਈਡ ਲਈ ਲਾਈਨ ਦੇ ਸਮਾਨਾਂਤਰ ਇਕ ਲਾਈਨ ਖਿੱਚੀ ਜਾਵੇਗੀ । ਕੋਰਟ ਦਾ ਖੱਬਾ ਅੱਧਾ ਹਿੱਸਾ ਖੱਬੀ ਸਰਵਿਸ ਕੋਰਟ ਅਤੇ ਸੱਜਾ ਅੱਧਾ ਹਿੱਸਾ ਸੱਜੀ ਸਰਵਿਸ ਕੋਰਟ ਕਹਾਵੇਗਾ | ਕੋਰਟ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਦੋ ਪੋਸਟ ਗੱਡੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ । ਇਹ ਫਰਸ਼ ਤੋਂ 5′-1′ ਉੱਚੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ।

ਬੱਲੀਆਂ (Poles) – ਨੈੱਟ (ਜਾਲ ਨੂੰ ਤਾਨ ਕੇ ਰੱਖਣ ਲਈ ਦੋ ਬੱਲੀਆਂ ਲਗਾਈਆਂ ਜਾਣਗੀਆਂ । ਇਹ ਬੱਲੀਆਂ ਫ਼ਰਸ਼ ਤੋਂ 5 ਫੁੱਟ 1 ਇੰਚ (1.55 ਮੀ.) ਉੱਚੀਆਂ ਹੋਣੀਆਂ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇੰਨੀ ਮਜ਼ਬੂਤੀ ਨਾਲ ਬੰਨ੍ਹਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਜਾਲ ਨੂੰ ਕੱਸ ਕੇ ਰੱਖਣ ।
ਬੈਡਮਿੰਟਨ (Badminton) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education 1

ਜਾਲ (Net) – ਜਾਲ ਰੰਗੀਨ ਵਧੀਆ ਡੋਰ ਦਾ ਬਣਿਆ ਹੋਵੇਗਾ । ਉਸ ਦੀ ਜਾਲੀ ਦੀ ਹਰੇਕ ਮੋਰੀ 3.3 ਇੰਚ ਹੋਵੇਗੀ । ਇਸ ਦੀ ਚੌੜਾਈ ਦੋ ਫੁੱਟ 6 ਇੰਚ (0.76 ਮੀਟਰ) ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ । ਇਸ ਦਾ ਉੱਪਰਲਾ ਹਿੱਸਾ ਕੇਂਦਰ ਵਿਚ ਜ਼ਮੀਨ ਤੋਂ ਪੰਜ ਫੁੱਟ ਅਤੇ ਬੱਲੀਆਂ ਤੋਂ ਪੰਜ ਫੁੱਟ ਇਕ ਇੰਚ ਉੱਚਾ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ । ਉਸ ਨੂੰ ਦੋਹਾਂ ਪਾਸਿਆਂ ਤੋਂ ਬੱਲੀ ’ਤੇ ਕੱਸ ਕੇ ਬੰਨਿਆ ਗਿਆ ਹੋਵੇ । ਉਸ ਦੀ ਲੰਬਾਈ ਇੰਨੀ ਹੋਵੇ ਕਿ ਸੀਮਾ ਰੇਖਾਵਾਂ ਦੇ ਦੋਹਾਂ ਪਾਸਿਆਂ ਵਿਚ ਫੈਲ ਜਾਵੇ ! ਜਾਲ ਦੇ ਦੋਵੇਂ ਸਿਰਿਆਂ ਉੱਤੇ 3′ ਦੀ ਦੋਹਰੀ ਗੇਂਦ ਸੈੱਟ ਹੋਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਵਿਚ ਡੋਰੀਆਂ ਹੋਣ, ਜਿਹੜੀਆਂ ਜਾਲ ਨੂੰ ਬੱਲੀਆਂ ਉੱਤੇ ਕੱਸ ਕੇ ਤਾਣ ਕੇ ਰੱਖਣ ਵਿਚ ਕੰਮ ਲਿਆਂਦੀਆਂ ਜਾ ਸਕਣ ।

ਚਿੜੀ (ਸ਼ਟਲ ਕਾਕ) (Shuttle Cock) – ਚਿੜੀ ਦਾ ਭਾਰ 73 ਗ੍ਰਾਮ ਤੋਂ 85 ਗ੍ਰਾਮ ਤਕ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ । ਉਸ ਦੇ 14 ਜਾਂ 16 ਖੰਭ ਹੋਣ ਜੋ ਕਿ ” ਤੋਂ \(\frac{1}{2}\)” ਤਕ ਦੇ ਵਿਆਸ ਵਾਲੀ ਕਾਰਕ ਵਿਚ ਮਜ਼ਬੂਤੀ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਹੋਣ । ਪੰਖਾਂ ਦੀ ਲੰਬਾਈ 2\(\frac{1}{2}\)” ਤੋਂ 2\(\frac{3}{4}\)” ਅਤੇ ਉਹ
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ਉੱਪਰ ਦੇ ਸਿਰੇ ਤੋਂ 2\(\frac{1}{3}\)” ਤੋਂ 2\(\frac{1}{2}\)” ਤਕ ਫੈਲੇ ਹੋਏ ਹੋਣ । ਕਾਰਕ ਦਾ ਵਿਆਸ 1\(\frac{1}{2}\)” ਤੋਂ 1″ ਤਕ ਹੁੰਦਾ ਹੈ । ਇਹ ਪੱਕੇ ਧਾਗੇ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਦੂਸਰੀ ਉਪਯੋਗੀ ਵਸਤੂ ਨਾਲ ਕੱਸੇ ਹੋਏ ਹੋਣ ।

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ਪ੍ਰਸ਼ਨ 2.
ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਖੇਡ ਵਿਚ ਖਿਡਾਰੀ, ਸਕੋਰ ਅਤੇ ਦਿਸ਼ਾਵਾਂ ਬਦਲਣ ਤੋਂ ਤੁਸੀਂ ਕੀ ਸਮਝਦੇ ਹੋ ?
ਉੱਤਰ-
ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਖੇਡ ਦੀ ਸੰਖੇਪ ਰਚਨਾ-
ਖਿਡਾਰੀ (Players) – ਡਬਲਜ਼ ਖੇਡ ਵਿਚ ਹਰੇਕ ਟੀਮ ਵਿਚ ਦੋ ਖਿਡਾਰੀ ਅਤੇ ਸਿੰਗਲਜ਼ ਖੇਡ ਵਿਚ ਇਕ-ਇਕ ਖਿਡਾਰੀ ਹੋਵੇਗਾ ।

ਖੇਡ ਦੇ ਸ਼ੁਰੂ ਵਿਚ ਜਿਹੜੀ ਟੀਮ ਪਹਿਲਾਂ ਸਰਵਿਸ ਕਰੇਗੀ, ਉਸ ਟੀਮ ਦੀ ਸਾਈਡ ਨੂੰ ਇਨ ਮਾਈਡ ਅਤੇ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦੀ ਸਾਈਡ ਨੂੰ ਆਉਟ ਸਾਈਡ ਕਹਾਂਗੇ ।

ਟਾਸ (Toss) – ਖੇਡ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਦੋਵੇਂ ਟੀਮਾਂ ਵੱਲੋਂ ਪਾਸ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ । ਟਾਸ ਜਿੱਤਣ ਵਾਲੀ ਟੀਮ ਅੱਗੇ ਲਿਖੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਦੀ ਚੋਣ ਕਰੇਗੀ-

  1. ਪਹਿਲੇ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਜਾਂ
  2. ਪਹਿਲੇ ਸਰਵਿਸ ਨਾ ਕਰਨ ਜਾਂ
  3. ਸਾਈਡ ਦੀ ।
    ਬਾਕੀ ਗੱਲਾਂ ਦੀ ਚੋਣ ਟਾਸ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਟੀਮ ਹੀ ਕਰੇਗੀ ।

ਸਕੋਰ (Score) – ਮਰਦਾਂ ਦੇ ਡਬਲਜ਼ ਅਤੇ ਸਿੰਗਲਜ਼ ਲਈ 15 ਅੰਕਾਂ ਦੀ ਖੇਡ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਇਸਤਰੀਆਂ ਦੀ ਖੇਡ ਵਿਚ 11 ਅੰਕ ਹੁੰਦੇ ਹਨ । ਜੇਕਰ ਪੁਰਸ਼ਾਂ ਦੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਸਕੋਰ 14-14 ਬਰਾਬਰ ਹੋ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਪਹਿਲਾਂ 14 ਅੰਕ ਬਣਾਉਣ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਖੇਡ ਨੂੰ 3 ਅੰਕਾਂ ਤੇ ਸਥਿਰ (ਸੈਟ ਕਰ ਲੈਂਦਾ ਹੈ । 14 ਅੰਕਾਂ ਤੇ ਖੇਡ ਸਥਿਰ ਹੋਣ ਦੀ ਸੂਰਤ ਵਿਚ 7 ਅੰਕ ਲੈਣ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਜੇਤੂ ਮੰਨਿਆ ਜਾਵੇਗਾ । ਇਸਤਰੀਆਂ ਦੀ ਖੇਡ ਵਿਚ 16 ਅੰਕ ਬਰਾਬਰ ਹੋਣ ਦੀ ਹਾਲਤ ਵਿਚ 12 ਅੰਕਾਂ ਦੀ ਖੇਡ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਜਿਸ ਖਿਡਾਰੀ ਨੇ ਪਹਿਲਾਂ 30 ਅੰਕ ਬਣਾਏ ਹੋਣ ਉਹ 12 ਅੰਕਾਂ ਦੀ ਆਪਸ਼ਨ ਲੈ ਸਕਦਾ ਹੈ । ਜਿੱਥੇ ਲੜਕੇ ਅਤੇ ਲੜਕੀਆਂ ਮਿਲ ਕੇ ਖੇਡਦੇ ਹੋਣ ਉਹ ਗੇਮ ਵੀ 11 ਅੰਕਾਂ ਦੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ । ਇਹ ਨਿਯਮ ਪਹਿਲੀ ਅਗਸਤ 2002 ਤੋਂ ਅੰਤਰ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਫੈਡਰੇਸ਼ਨ (I.B.F.) ਦੇ ਆਦੇਸ਼ਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਲਾਗੂ ਹੋਏ ਹਨ ।

ਦਿਸ਼ਾਵਾਂ ਬਦਲਣਾ (Changing Sides) – ਪਹਿਲੇ ਫੈਸਲੇ ਅਨੁਸਾਰ ਦੋਹਾਂ ਟੀਮਾਂ ਦਰਮਿਆਨ ਤਿੰਨ ਖੇਡਾਂ ਹੋਣਗੀਆਂ । ਤਿੰਨਾਂ ਵਿਚੋਂ ਦੋ ਖੇਡਾਂ ਜਿੱਤਣ ਵਾਲੀ ਟੀਮ ਜੇਤੁ ਘੋਸ਼ਿਤ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇਗੀ । ਖਿਡਾਰੀ ਪਹਿਲੀ ਖੇਡ ਖਤਮ ਹੋਣ ਅਤੇ ਦੂਜੀ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਸਾਈਡ ਬਦਲਣਗੇ ਅਤੇ ਜੇ ਤੀਜੀ ਖੇਡ ਖੇਡਣੀ ਜ਼ਰੂਰੀ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਉਸ ਵਿਚ ਸਾਈਡ ਬਦਲੀ ਜਾਵੇਗੀ ।

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 3.
ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਖੇਡ ਵਿਚ ਡਬਲਜ਼ ਖੇਡ ਅਤੇ ਸਿੰਗਲਜ਼ ਖੇਡ ਕਿਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਖੇਡੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ?
ਉੱਤਰ-
ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਖੇਡ ਵਿਚ ਡਬਲਜ਼ ਖੇਡ ਤੇ ਸਿੰਗਲਜ਼ ਖੇਡ-
(i) ਡਬਲਜ਼ ਖੇਡ (Doubles Games) – ਇਸ ਖੇਡ ਵਿਚ ਦੋਨੋਂ ਪਾਸੇ ਦੋ-ਦੋ ਖਿਡਾਰੀ ਹੁੰਦੇ ਹਨ । ਪਹਿਲੇ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਟੀਮ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਹੋ ਜਾਣ ਉੱਤੇ ਉਸ ਟੀਮ ਦੇ ਸੱਜੇ ਅੱਧੇ ਪਾਸੇ ਵਾਲੇ ਖਿਡਾਰੀ ਖੇਡ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨਗੇ । ਉਹ ਸੱਜੇ ਅੱਧੇ ਪਾਸੇ ਵਾਲੇ ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਸਰਵਿਸ ਦੇਵੇਗਾ। ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਚੋਣ ਜੇਤੂ ਪੱਖ ਕਰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਦੂਸਰੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਦਾ ਹਾਰਿਆ ਪੱਖ ਤੋਂ ਇਸ ਗੱਲ ਦਾ ਫ਼ੈਸਲਾ ਪਹਿਲਾਂ ਤੋਂ ਕਰ ਲਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਖੇਡ 15 ਅੰਕਾਂ ਦੀ ਹੋਵੇ । ਜੇ ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਸ਼ਟਲ ਦੇ ਜ਼ਮੀਨ ਨੂੰ ਛੂਹਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਉਸ ਨੂੰ ਵਾਪਸ ਕਰ ਦੇਵੇ, ਤਾਂ ਖੇਡ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਫਿਰ ਉਸ ਨੂੰ ਵਾਪਿਸ ਕਰੇਗਾ । ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਖੇਡ ਤਦ ਤਕ ਜਾਰੀ ਰਹੇਗੀ, ਜਦ ਤਕ ਕਿ ਫਾਊਲ ਨਾ ਹੋ ਜਾਵੇ ਜਾਂ ਚਿੜੀ ਹੇਠਾਂ ਨਾ ਡਿੱਗ ਜਾਵੇ : ਸਰਵਿਸ ਵਾਪਸ ਨਾ ਹੋਣ ‘ਤੇ ਜਾਂ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਵਲੋਂ ਫਾਉਲ ਹੋਣ ਦੀ ਦਿਸ਼ਾ ਵਿਚ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਇਕ ਅੰਕ ਜਿੱਤ ਜਾਵੇਗਾ ! ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਟੀਮ ਦੇ ਖਿਡਾਰੀ ਆਪਣਾ ਅੱਧਾ ਪਾਸਾ ਵੀ ਬਦਲਣਗੇ । ਹੁਣ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਖੱਬੇ ਅੱਧ ਵਿਚ ਰਹੇਗਾ ਅਤੇ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਦੇ ਖੱਬੇ ਅੱਧ ਵਿਚ ਖੜ੍ਹੇ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਹੀ ਸਰਵਿਸ ਕਰੇਗਾ ।
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ਹਰੇਕ ਵਾਰੀ ਦੇ ਸ਼ੁਰੂ ਵਿਚ ਹਰੇਕ ਟੀਮ ਪਹਿਲੀ ਸਰਵਿਸ ਸੱਜੇ ਅੱਧੇ ਖੇਤਰ ਤੋਂ ਕਰੇਗੀ ।

(ii) ਸਿੰਗਲਜ਼ ਖੇਡ (Singles Games) – ਉੱਪਰ ਵਾਲੇ ਸਾਰੇ ਨਿਯਮ ਸਿੰਗਲਜ਼ ਖੇਡ ਵਿਚ ਲਾਗੂ ਹੋਣਗੇ ਪਰ

  • ਖਿਡਾਰੀ ਉਸ ਹਾਲਤ ਵਿਚ ਸੱਜੇ ਅਰਧ ਖੇਤਰ ਤੋਂ ਸਰਵਿਸ ਕਰੇਗਾ ਜਾਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰੇਗਾ । ਜਦ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਦਾ ਪੁਆਇੰਟ ਜ਼ੀਰੋ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਖੇਡ ਵਿਚ ਸਮ ਅੰਕ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੇ ਗਏ ਹੋਣ ਤਾਂ ਸਰਵਿਸ ਹਮੇਸ਼ਾ ਸੱਜੀ ਕੋਰਟ ਵਿਚ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਟਾਂਕ (Odd) ਨੰਬਰਾਂ ਤੇ ਸਮੇਂ ਖੱਬੇ ਹੱਥ ਵਲੋਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।
  • ਇਕ ਪੁਆਇੰਟ ਹੋ ਜਾਣ ‘ਤੇ ਦੋਵੇਂ ਖਿਡਾਰੀ ਅੱਧੀ ਕੋਰਟ ਲੈਂਦੇ ਹਨ ।
  • ਕੁੜੀਆਂ ਲਈ ਸਿੰਗਲ ਮੈਚ ਦੇ ਵੀ 11 ਪੁਆਇੰਟ ਹੁੰਦੇ ਹਨ । ਜਦ ਪੁਆਇੰਟ “10 All” ਹੋ ਜਾਣ ਤਾਂ 10 ਅੰਕ ਤੇ ਪਹਿਲਾਂ ਪੁੱਜਣ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਖੇਡ ਨੂੰ ਤਿੰਨ ਪੁਆਇੰਟ ‘ਤੇ ਸੈੱਟ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ ।

ਬੈਡਮਿੰਟਨ (Badminton) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਪ੍ਰਸ਼ਨ 4.
ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਦੀਆਂ ਮੁੱਖ ਤਰੁੱਟੀਆਂ ਦਾ ਵਰਣਨ ਕਰੋ ।
ਉੱਤਰ-
ਗ਼ਲਤੀਆਂ (Faults) – ਖੇਡ ਰਹੀ ਟੀਮ ਦੇ ਖਿਡਾਰੀ ਵੱਲੋਂ ਗ਼ਲਤੀ ਹੋਣ ਉੱਤੇ ਉਸ ਟੀਮ ਦਾ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਖਿਡਾਰੀ ਆਉਟ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ । ਜੇ ਵਿਰੋਧੀ ਗ਼ਲਤੀ ਕਰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਖੇਡ ਰਹੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਇਕ ਅੰਕ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਵੇਗਾ ।
(ਉ) ਜੇ ਸਰਵਿਸ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਚਿੜੀ ਖਿਡਾਰੀ ਦੇ ਲੱਕ ਤੋਂ ਉੱਚੀ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਰੈਕਟ ਦਾ ਅਗਲਾ ਸਿਰਾ ਚਿੜੀ ਨੂੰ ਮਾਰਦੇ ਵਕਤ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਰੈਕਟ ਵਾਲੇ ਹੱਥ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਉੱਠਿਆ ਹੋਵੇ ।
(ਅ) ਜੇ ਸਰਵਿਸ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਚਿੜੀ ਗ਼ਲਤ ਅੱਧੇ ਪਾਸੇ ਵੱਲ ਡਿੱਗ ਪਵੇ ਜਾਂ ਛੋਟੀ ਸਰਵਿਸ ਰੇਖਾ ਤਕ ਨਾ ਪਹੁੰਚੇ ਜਾਂ ਲੰਬੀ ਸਰਵਿਸ ਰੇਖਾ ਤੋਂ ਪਾਰ ਡਿੱਗੇ ਜਾਂ ਠੀਕ ਅਰਧ ਖੇਤਰ ਦੀ ਸੀਮਾ ਦੇ ਬਾਹਰ ਜਾ ਡਿੱਗੇ ।
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(ੲ) ਜੇ ਸਰਵਿਸ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਖਿਡਾਰੀ ਦੇ ਪੈਰ ਠੀਕ ਅਰਧ ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਨਾ ਹੋਣ ।
(ਸ) ਜੇ ਖਿਡਾਰੀ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਜਾਂ ਸਰਵਿਸ ਕਰਦੇ ਵਕਤ ਜਾਣ ਬੁੱਝ ਕੇ ਵਿਰੋਧੀ ਦੇ ਰਸਤੇ ਵਿਚ ਰੁਕਾਵਟ ਪਾਵੇ ।
(ਹ) ਜੇ ਸਰਵਿਸ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਖੇਡ ਦੇ ਸਮੇਂ ਚਿੜੀ ਸੀਮਾਵਾਂ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲ ਜਾਵੇ, ਜਾਲ ਦੇ ਹੇਠਾਂ ਜਾਂ ਵਿਚੋਂ ਨਿਕਲ ਜਾਵੇ ਜਾਂ ਜਾਲ ਨਾਂ ਪਾਰ ਕਰ ਸਕੇ ਜਾਂ ਕਿਸੇ ਖਿਡਾਰੀ ਦੇ ਪੈਰ ਕੱਪੜੇ ਆਦਿ ਨੂੰ ਛੂਹ ਜਾਵੇ ।
(ਕ) ਜੇ ਖੇਡ ਦੇ ਸਮੇਂ ਜਾਲ ਉੱਤੇ ਜਾਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਮਾਰਨ ਵਾਲੇ ਨਾਲ ਚਿੜੀ ਟਕਰਾ ਜਾਵੇ ।
(ਖ) ਜਦ ਚਿੜੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ਖਿਡਾਰੀ ਰੈਕਟ, ਸਰੀਰ ਜਾਂ ਕੱਪੜਿਆਂ ਦੇ ਨਾਲ ਜਾਲ ਜਾਂ ਬੱਲੀਆਂ ਨੂੰ ਛੂਹ ਜਾਵੇ ।
(ਗ) ਚਿੜੀ ਰੈਕਟ ਉੱਤੇ ਰੁਕ ਜਾਵੇ, ਕੋਈ ਖਿਡਾਰੀ ਚਿੜੀ ਨੂੰ ਲਗਾਤਾਰ ਦੋ ਵਾਰੀ ਮਾਰ ਦੇਵੇ ਜਾਂ ਪਹਿਲੇ ਉਹ ਅਤੇ ਬਾਅਦ ਵਿਚ ਉਸ ਦਾ ਸਾਥੀ ਵਾਰੀ-ਵਾਰੀ ਲਗਾਤਾਰ ਮਾਰ ਦੇਵੇ ।
(ਘ) ਵਿਰੋਧੀ ਤਿਆਰ ਮੰਨਿਆ ਜਾਵੇਗਾ, ਜੇ ਖੇਡ ਦੇ ਸਮੇਂ ਉਹ ਚਿੜੀ ਨੂੰ ਵਾਪਸ ਕਰਦਾ ਹੈ ਜਾਂ ਮਾਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਭਾਵੇਂ ਉਹ ਖੇਤਰ ਦੀ ਸੀਮਾ ਦੇ ਬਾਹਰ ਖੜਾ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਅੰਦਰ ।
(ਝ) ਜੇ ਕੋਈ ਖਿਡਾਰੀ ਵਿਰੋਧੀ ਖਿਡਾਰੀ ਦੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਰੁਕਾਵਟਾਂ ਪਾਉਂਦਾ ਹੈ ।

ਸਰਵਿਸ ਸੰਬੰਧੀ ਨਿਯਮਾਂ ਬਾਰੇ ਜਾਣਕਾਰੀ

  • ਸਰਵਿਸ ਉਹੋ ਖਿਡਾਰੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰੇਗਾ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਸਰਵਿਸ ਦਿੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ । ਜੇ ਚਿੜੀ ਦੂਜੇ ਖਿਡਾਰੀ ਨੂੰ ਛੂਹ ਜਾਵੇ ਜਾਂ ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਮਾਰ ਦੇਵੇ ਤਾਂ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਨੂੰ ਇਕ ਅੰਕ ਮਿਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ : ਇਕ ਖਿਡਾਰੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਦੋ ਵਾਰੀ ਸਰਵਿਸ ਪ੍ਰਾਪਤ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ ।
  • ਪਹਿਲੀ ਵਾਰੀ ਵਿਚ ਖੇਡ ਆਰੰਭ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਹੀ ਖਿਡਾਰੀ ਸਰਵਿਸ ਕਰੇਗਾ । ਬਾਕੀ ਦੀਆਂ ਵਾਰੀਆਂ ਵਿਚ ਹਰੇਕ ਖਿਡਾਰੀ ਸਰਵਿਸ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ । ਖੇਡ ਜਿੱਤਣ ਵਾਲੀ ਟੀਮ ਹੀ ਪਹਿਲਾਂ ਸਰਵਿਸ ਕਰੇਗੀ । ਜਿੱਤੀ ਹੋਈ ਟੀਮ ਦਾ ਕੋਈ ਵੀ ਖਿਡਾਰੀ ਸਰਵਿਸ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਹਾਰੀ ਹੋਈ ਟੀਮ ਦਾ ਕੋਈ ਵੀ ਖਿਡਾਰੀ ਸਰਵਿਸ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ ।
  • ਜੇ ਕੋਈ ਖਿਡਾਰੀ ਆਪਣੀ ਵਾਰੀ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਜਾਂ ਗ਼ਲਤ ਪਾਸਿਉਂ ਸਰਵਿਸ ਕਰ ਦੇਵੇ ਅਤੇ ਅੰਕ ਜਿੱਤ ਲਵੇ ਤਾਂ ਉਹ ਸਰਵਿਸ 1 ਲੈਟ (Let) ਕਹਾਵੇਗੀ । ਪਰ ਇਸ ‘ਲੈਟ’ ਦੀ ਮੰਗ ਦੁਜੀ ਸਰਵਿਸ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਕੀਤੀ ਜਾਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ।

ਬੈਡਮਿੰਟਨ ਖੇਡ ਦੇ ਸਧਾਰਨ ਨਿਯਮ ਹਨ-
ਸਧਾਰਨ ਨਿਯਮ (General Rules) –

  • ਸਰਵਿਸ ਨੂੰ ਕੇਵਲ ਉਹੀ ਖਿਡਾਰੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਦੇ ਪਾਸੇ ਸਰਵਿਸ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ । ਇਕ ਹੀ ਖੇਡ ਵਿਚ ਕੋਈ ਵੀ ਖਿਡਾਰੀ ਲਗਾਤਾਰ ਦੋ ਵਾਰ ਸਰਵਿਸ ਪ੍ਰਾਪਤ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ ।
  • ਸਰਵਿਸ ਤਦ ਤਕ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਜਦ ਤਕ ਵਿਰੋਧੀ ਤਿਆਰ ਨਾ ਹੋਵੇ ।
  • ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਦੀ ਸਰਵਿਸ ਪਹਿਲੀ ਵਾਰ ਵਿਚ ਕੇਵਲ ਇਕ ਵਾਰ ਹੋਵੇਗੀ । ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਸਭ ਵਾਰੀਆਂ ਵਿਚ ਖੜ੍ਹੇ ਪਤੀਪੱਖ ਦੇ ਖਿਡਾਰੀ ਵਾਰੀ-ਵਾਰੀ ਸਰਵਿਸ ਕਰਨਗੇ ।
  • ਸਰਵਿਸ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਅਤੇ ਉਸ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਦੋਵੇਂ ਹੀ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਅਰਧ ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਖੜੇ ਹੋਣਗੇ । ਇਹਨਾਂ ਦੋਨਾਂ ਦੇ ਪੈਰ ਦਾ ਕੁੱਝ ਹਿੱਸਾ ਸਰਵਿਸ ਸਮਾਪਤ ਹੋਣ ਤਕ ਧਰਤੀ ‘ਤੇ ਜ਼ਰੂਰ ਰਹੇਗਾ ।
  • ਸਰਵਿਸ ਜੇਕਰ ਉਂਝ ਤਾਂ ਠੀਕ ਹੋਵੇ ਪਰੰਤੂ ਚਿੜੀ ਨਾਲ ਛੂਹ ਜਾਵੇ ਤਦ ਆਉਟ ਹੋਵੇਗਾ । ਪਰੰਤੂ ਅਜਿਹਾ ਹੋ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਤਰੁੱਟੀ ਨਹੀਂ ਮੰਨੀ ਜਾਵੇਗੀ । ਜੇਕਰ ਬੱਲੀ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲ ਕੇ ਵਿਰੋਧੀ ਖੇਤਰ ਦੇ ਕਿਸੇ ਸੀਮਾ ਰੇਖਾ ਦੇ ਜਾਂ ਕਿਵੇਂ ਵੀ ਅੰਦਰ ਜਾ ਡਿੱਗੇ, ਤਾਂ ਉਹ ਚੰਗੀ ਸਰਵਿਸ ਮੰਨੀ ਜਾਵੇਗੀ । ਜੇਕਰ ਕੋਈ ਅਚਾਨਕ ਜਾਂ ਅਨਿਸਚਿਤ ਰੁਕਾਵਟ ਆ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਨਿਰਣਾਇਕ ਲੈਟ ਕਹਿ ਸਕਦਾ ਹੈ ।
  • ਕੋਈ ਖਿਡਾਰੀ ਜੇਕਰ ਆਪਣੀ ਵਾਰੀ ਲਏ ਬਿਨਾਂ ਗ਼ਲਤ ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਸਰਵਿਸ ਕਰ ਦੇਵੇ ਅਤੇ ਨੰਬਰ ਜਿੱਤ ਲਵੇ ਤਾਂ ਸਰਵਿਸ ਲੈਟ ਅਖਵਾਏਗੀ । ਪਰੰਤੂ ਸ਼ਰਤ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਦੂਸਰੀ ਸਰਵਿਸ ਆਰੰਭ ਹੋਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਇਸ ਦੀ ਮੰਗ ਦੂਸਰੇ ਪਾਸੇ ਤੋਂ ਹੋਵੇ ਅਤੇ ਜਿਸ ਦੀ ਆਗਿਆ ਵੀ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ ।
  • ਕੋਈ ਖਿਡਾਰੀ ਜੇਕਰ ਆਪਣੇ ਖੇਤਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਹੋ ਕੇ ਸਰਵਿਸ ਦੇਵੇ, ਤਾਂ ਹੋਰ ਉਸ ਦਾ ਪੱਖ ਜਿੱਤ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਉਹ ਸਰਵਿਸ ਲੈਟ ਅਖਵਾਏਗੀ, ਪਰੰਤੂ ਸ਼ਰਤ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਦੂਸਰੀ ਸਰਵਿਸ ਤੋਂ ਪਹਿਲੇ ਹੀ ਇਸ ਲੈਟ ਦੀ ਮੰਗ ਦੀ ਆਗਿਆ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ ।
  • ਜੇਕਰ ਸਰਵਿਸ ਕਰਦੇ ਸਮੇਂ ਚਿੜੀ ਨੈਟ ਦੇ ਨਾਲ ਡਿੱਗੇ, ਤਾਂ ਸਰਵਿਸ Short ਕਹੀ ਜਾਵੇਗੀ ਅਤੇ ਵਿਰੋਧੀ ਟੀਮ ਨੂੰ ਸਰਵਿਸ ਜਾਂ ਨੰਬਰ ਮਿਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

ਬੈਡਮਿੰਟਨ (Badminton) Game Rules – PSEB 10th Class Physical Education

ਫਾਉਲ
(FOULS)
ਅਧਿਕਾਰੀ ਫਾਊਲ ਖੇਡਣ ਤੇ ਜਾਂ ਖੇਡ ਵਿਚ ਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੀ ਅਨੁਚਿਤ ਕਾਰਵਾਈ ਕਰਨ ‘ਤੇ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਦੋ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕਾਰਡ ਦਿਖਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ।
ਪੀਲਾ ਕਾਰਡ (Yellow Card) – ਇਹ ਪੀਲਾ ਕਾਰਡ ਖਿਡਾਰੀਆਂ ਦੇ ਅਨੁਚਿਤ ਵਿਵਹਾਰ ਕਰਨ ਤੇ ਦਿਖਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।
ਲਾਲ ਕਾਰਡ (Red Card) – ਇਹ ਕਾਰਡ ਮੈਚ ਜਾਂ ਟੂਰਨਾਮੈਂਟ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਕੱਢਣ ਲਈ ਦਿਖਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ।

PSEB 11th Class Chemistry Book Solutions Guide in Punjabi English Medium

Punjab State Board Syllabus PSEB 11th Class Chemistry Book Solutions Guide Pdf in English Medium and Punjabi Medium are part of PSEB Solutions for Class 11.

PSEB 11th Class Chemistry Guide | Chemistry Guide for Class 11 PSEB in English Medium

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 15 सरकारों के रूप-संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकारें

Punjab State Board PSEB 11th Class Political Science Book Solutions Chapter 15 सरकारों के रूप-संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकारें Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 11 Political Science Chapter 15 सरकारों के रूप-संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकारें

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
संसदात्मक सरकार की मुख्य विशेषताएं बताइए।
(Describe the chief characteristics of the parliamentary form of government.)
अथवा
संसदीय सरकार क्या है ? संसदीय सरकार की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो।
(What is parliamentary government ? Discuss the main features of parliamentary Government.)
उत्तर-
कार्यपालिका और विधानपालिका के सम्बन्धों के आधार पर दो प्रकार के शासन होते हैं-संसदीय तथा अध्यक्षात्मक। यदि कार्यपालिका और विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध हों और दोनों एक-दूसरे का अटूट भाग हों तो संसदीय सरकार होती है और यदि कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से लगभग स्वतन्त्र हों तो अध्यक्षात्मक सरकार होती है।

संसदीय सरकार का अर्थ (Meaning of Parliamentary Government)–संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। संसदीय सरकार शासन की वह प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने समस्त कार्यों के लिए संसद् (विधानपालिका) के प्रति उत्तरदायी होती है और अब तक अपने पद पर रहती है जब तक इसको संसद् का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका संसद् का विश्वास खो बैठे तभी कार्यपालिका को त्याग-पत्र देना पड़ता है। संसदीय सरकार को उत्तरदायी सरकार (Responsible Government) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है। इस सरकार को कैबिनेट सरकार (Cabinet Government) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें कार्यपालिका की शक्तियां कैबिनेट द्वारा प्रयोग की जाती हैं।

1. डॉ० गार्नर (Dr. Garner) का मत है कि, “संसदीय सरकार वह प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका, मन्त्रिमण्डल या मन्त्रिपरिषद् अपनी राजनीतिक नीतियों और कार्यों के लिए प्रत्यक्ष तथा कानूनी रूप से विधानमण्डल या उसके एक सदन (प्रायः लोकप्रिय सदन) के प्रति और राजनीतिक तौर पर मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी हो जबकि राज्य का अध्यक्ष संवैधानिक या नाममात्र कार्यपालिका हो और अनुत्तरदायी हो।”

2. गैटेल (Gettell) के अनुसार, “संसदीय शासन प्रणाली शासन के उस रूप को कहते हैं जिसमें प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् अर्थात् वास्तविक कार्यपालिका अपने कार्यों के लिए कानूनी दृष्टि से विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। चूंकि विधानपालिका के दो सदन होते हैं अतः मन्त्रिमण्डल वास्तव में उस सदन के नियन्त्रण में होता है जिसे वित्तीय मामलों पर अधिक शक्ति प्राप्त होती है जो मतदाताओं का अधिक सीधे ढंग से प्रतिनिधित्व करता है।”
इस परिभाषा से यह स्पष्ट है कि संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल अपने समस्त कार्यों के लिए विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होता है और राज्य का नाममात्र का मुखिया किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होता।

संसदीय सरकार को सर्वप्रथम इंग्लैंड में अपनाया गया था। आजकल इंग्लैंड के अतिरिक्त जापान, कनाडा, नार्वे, स्वीडन, बंगला देश तथा भारत में भी संसदीय सरकारें पाई जाती हैं।

संसदीय सरकार के लक्षण
(Features of Parliamentary Government)-

संसदीय प्रणाली के निम्नलिखित लक्षण होते हैं-
1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी (Head of the State is Nominal Executive)-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी होता है। सैद्धान्तिक रूप में तो राज्य की सभी कार्यपालिका शक्तियां राज्य के अध्यक्ष के पास होती हैं और उनका प्रयोग भी उनके नाम पर होता है, पर वह उनका प्रयोग अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकता। उसकी सहायता के लिए एक मन्त्रिमण्डल होता है, जिसकी सलाह के भार ही उस अपनी शक्तियों का प्रयोग करना पड़ता है। अध्यक्ष का काम तो केवल हस्ताक्षर करना है।

2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है (Cabinet is the Real Executive)-राज्य के अध्यक्ष के नाम में दी गई शक्तियों का वास्तविक प्रयोग मन्त्रिमण्डल करता है। अध्यक्ष के लिए मन्त्रिमण्डल से सलाह मांगना और मानना अनिवार्य है। मन्त्रिमण्डल ही अन्तिम फैसला करता है और वही देश का वास्तविक शासक है। शासन का प्रत्येक विभाग एक मन्त्री के अधीन होता है और सब कर्मचारी उसके अधीन काम करते हैं। हर मन्त्री अपने विभागों का काम मन्त्रिमण्डल की नीतियों के अनुसार चलाने के लिए उत्तरदायी होता है।

3. कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में घनिष्ठ सम्बन्ध (Close Relation between Executive and Legislature)-संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है। इसके सदस्य अर्थात् मन्त्री संसद् में से ही लिए जाते हैं। ये मन्त्री संसद् की बैठकों में भाग लेते हैं, बिल पेश करते हैं, बिलों पर बोलते हैं और यदि सदन के सदस्य हों तो मतदान के समय मत का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार मन्त्री प्रशासक (Administrator) भी हैं, कानून-निर्माता (Legislator) भी।

4. मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व (Responsibility of the Cabinet)—कार्यपालिका अर्थात मन्त्रिमा अपने सब कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। संसद् सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूट सकते हैं, जिनका उन्हें उत्तर देना पड़ता है। मन्त्रिमण्डल अपनी नीति निश्चित करता है, उसे संसद् के सामने रखता है तथा उसका समर्थन प्राप्त करता है। मन्त्रिमण्डल, अपना कार्य संसद् की इच्छानुसार ही करता है।

5. उत्तरदायित्व सामूहिक होता है (Collective Responsibility)-मन्त्रिमण्डल इकाई के रूप में कार्य करता है और मन्त्री सामूहिक रूप से संसद् के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यदि संसद् एक मन्त्री के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पास कर दे तो समस्त मन्त्रिमण्डल को अपना पद छोड़ना पड़ता है। किसी विशेष परिस्थिति में एक मन्त्री अकेला भी हटाया जा सकता है।

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6. मन्त्रिमण्डल का अनिश्चित कार्यकाल (Tenure of the Cabinet is not Fixed)-मन्त्रिमण्डल की अवधि भी निश्चित नहीं होती। संसद् की इच्छानुसार ही वह अपने पद पर रहते हैं। संसद् जब चाहे मन्त्रिमण्डल को अपदस्थ कर सकती है, अर्थात् यदि निम्न सदन का बहुमत मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध हो तो उसे अपना पद छोड़ना पड़ता है। यही कारण है कि निम्न सदन के नेता को ही प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाता है और उसकी इच्छानुसार ही दूसरे मन्त्रियों की नियुक्ति होती है।

7. मन्त्रिमण्डल की राजनीतिक एकरूपता (Political Homogeneity of the Cabinet)—संसदीय सरकार की एक विशेषता यह भी है कि इसमें मन्त्रिमण्डल के सदस्य एक ही राजनीतिक दल से सम्बन्धित होते हैं। यह आवश्यक भी है क्योंकि जब तक मन्त्री एक ही विचारधारा और नीतियों के समर्थक नहीं होंगे, मन्त्रिमण्डल में सामूहिक उत्तरदायित्व विकसित नहीं हो सकेगा।

8. गोपनीयता (Secrecy)-संसदीय सरकार में पद सम्भालने से पूर्व मन्त्री संविधान के प्रति वफादार रहने तथा सरकार के रहस्यों को गुप्त रखने की शपथ लेते हैं। कोई भी मन्त्री मन्त्रिमण्डल में हुए वाद-विवाद तथा निर्णयों को मन्त्रिमण्डल की स्वीकृति के बिना घोषित नहीं कर सकता। यदि कोई मन्त्रिमण्डल के रहस्यों की सूचना दूसरे लोगों को देता है तो कानून के अनुसार उसे सख्त दण्ड दिया जाता है।

9. प्रधानमन्त्री का नेतृत्व (Leadership of the Prime Minister)-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में कार्य करता है। जिस दल का बहुमत होता है उसके नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाता है। प्रधानमन्त्री मन्त्रिमण्डल का निर्माण करता है, मन्त्रियों में विभाग बांटता है, मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता करता है और सभी मन्त्री उसके अधीन कार्य करते हैं।

10. प्रधानमन्त्री संसद् के निम्न सदन को भंग कराने का अधिकार रखता है (Right of the Prime Minister to get the Lower House of the Parliament dissolved)–संसदीय शासन प्रणाली में प्रधानमन्त्री की सिफ़ारिश पर ही राष्ट्रपति या राजा संसद् के निम्न सदन को भंग करता है।

प्रश्न 2.
संसदीय सरकार के गुणों और दोषों की व्याख्या करें।
(Discuss the merits and demerits of Parliamentary Government.)
उत्तर-
संसदीय सरकार के गुण (Merits of Parliamentary Government)-
संसदीय शासन प्रणाली में बहुत-से गुण हैं-

1. कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग (Complete Harmony between the Executive and Legislature)–संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य होते हैं, बैठकों में भाग लेते हैं तथा बिल पास करते हैं। कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है तथा शासन में दक्षता आती है।

2. उत्तरदायी सरकार (Responsible Government)—संसदीय सरकार में सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। मन्त्रिमण्डल अपनी शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छा से न करके विधानमण्डल की इच्छानुसार कार्य करता है। विधानपालिका के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछते हैं, काम रोको प्रस्ताव पेश करते हैं तथा निन्दा प्रस्ताव पास करते हैं और यदि मन्त्रिमण्डल अपनी मनमानी करता है विधानमण्डल अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकता है।

3. सरकार निरंकुश नहीं बन सकती (Government cannot become Despotic)-मन्त्रिमण्डल अपने कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होने के कारण निरंकुश नहीं बन सकता। यदि मन्त्रिमण्डल अपनी मनमानी करता है तो विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पास करके उसे हटा सकती है। विरोधी दल सरकार की आलोचना करके जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करता है। विरोधी दल सरकार को निरंकुश नहीं बनने देता।

4. परिवर्तनशील सरकार (Flexible Government)—संसदीय सरकार का यह भी गुण है कि इसमें सरकार परिवर्तनशील होती है। सरकार को समय के अनुसार बदला जा सकता है। उदाहरणस्वरूप द्वितीय महायुद्ध में जब इंग्लैण्ड में चेम्बरलेन सफल न हो सका तो उसके स्थान पर चर्चिल को प्रधानमन्त्री बनाया गया।

5. सरकार जनमत के अनुसार चलती है (Government is responsive to Public Opinion)–संसदीय शासन प्रणाली में सरकार जनमत की इच्छानुसार शासन को चलाती है। मन्त्री विधानपालिका के सदस्य होते हैं और इस प्रकार वे जनता के प्रतिनिधि होते हैं। बहुमत दल ने चुनाव के समय जनता के साथ कुछ वायदे किए होते हैं। इन वायदों को पूरा करने के लिए मन्त्रिमण्डल अपनी नीतियों का निर्माण करता है। मन्त्री सदा जनमत के अनुसार कार्य करते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि यदि उन्होंने जनता की इच्छाओं को पूरा न किया तो उन्हें अगले चुनाव में बहुमत प्राप्त नहीं होगा।

6. योग्य व्यक्तियों का शासन (Government by Able Men)-संसदीय शासन प्रणाली में योग्य व्यक्तियों का शासन होता है। बहुमत दल उसी व्यक्ति को नेता चुनता है जो दल में सबसे योग्य, बुद्धिमान तथा लोकप्रिय हो। प्रधानमन्त्री उन्हीं व्यक्तियों को मन्त्रिमण्डल में शामिल करता है जो शासन चलाने के योग्य होते हैं। यदि कभी अनजाने में अयोग्य व्यक्ति को मन्त्री बना भी दिया जाए तो बाद में उसे हटाया जा सकता है। मन्त्रियों को अपने विभागों का प्रबन्ध करने के लिए स्वतन्त्रता प्राप्त होती है जिससे मन्त्रियों को अपनी योग्यता दिखाने का अवसर मिलता है।

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7. जनता को राजनीतिक शिक्षा मिलती है (Political Education to the People) संसदीय सरकार राजनीतिक दलों पर आधारित होती है। प्रत्येक दल जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए अपनी नीतियों का प्रचार करता है और दूसरे दलों की नीतियों की आलोचना करता है। इस तरह जनता को विभिन्न दलों की नीतियों का पता चलता है। चुनाव के पश्चात् भी विरोधी दल सरकार की नीतियों की आलोचना करके जनमत को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करता है और सत्तारूढ़ दल सरकार की नीतियों का समर्थन करता है। इस प्रकार जनता को बहुत राजनीतिक शिक्षा मिलती है जिससे नागरिक राजनीतिक विषयों में रुचि लेने लगता है।

8. राज्य का अध्यक्ष निष्पक्ष सलाह देता है (Head of the State gives Impartial Advice)-राज्य का अध्यक्ष किसी राजनीतिक पार्टी से सम्बन्धित नहीं होता जिस कारण उसकी सलाह निष्पक्ष होती है। राज्य का अध्यक्ष सदा राष्ट्र के हित में सलाह देता है जिसे प्रधानमन्त्री प्रायः मान लेता है।

9. राजतन्त्र को प्रजातन्त्र में बदलना (Monarchy changed into Democracy)–संसदीय शासन प्रणाली का यह भी गुण है कि इसने राजतन्त्र को प्रजातन्त्र में बदल दिया है। संसदीय सरकार में शासन का मुखिया तथा राज्य का मुखिया अलग-अलग होता है। राजा राज्य का मुखिया होता है जबकि प्रधानमन्त्री शासन का मुखिया होता है। यदि आज इंग्लैण्ड में राजतन्त्रीय व्यवस्था होते हुए भी प्रजातन्त्र शासन है तो इसका श्रेय संसदीय शासन प्रणाली को है।

10. वैकल्पिक शासन की व्यवस्था (Provision for Alternative Government)-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल तब तक अपने पद पर बना रहता है जब तक उसे विधानमण्डल का विश्वास प्राप्त रहता है। अविश्वास प्रस्ताव पास होने की दशा में मन्त्रिमण्डल को त्याग-पत्र देना पड़ता है तब विरोधी दल सरकार बनाता है। इस प्रकार प्रशासन लगातार चलता है और शासन में रुकावट नहीं पड़ती।

संसदीय सरकार के दोष (Demerits of Parliamentary Government)-

1. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है (It is against the theory of Separation of Powers)–संसदीय सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है। शक्तियों के केन्द्रीयकरण से व्यक्तियों की निजी स्वतन्त्रता खतरे में पड़ सकती है। संसदीय सरकार में शासन चलाने की शक्ति तथा कानून निर्माण की शक्ति मन्त्रिमण्डल के पास केन्द्रित होती है। मन्त्री विधानपालिका के सदस्य होते हैं, बिल पेश करते हैं तथा पास करवाते हैं। प्रधानमन्त्री राज्य के अध्यक्ष को सलाह देकर विधानपालिका के निम्न सदन को भंग करवा सकता है। इस प्रकार यह शासन प्रणाली शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है।

2. अस्थिर सरकार (Unstable Government)—संसदीय शासन प्रणाली में सरकार अस्थिर होती है क्योंकि मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं होती। विधानपालिका किसी भी समय अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकती है। जिन देशों में दो से अधिक राजनीतिक दल होते हैं वहां पर सरकार बहुत अस्थिर होती है। सरकार अस्थिर होने के कारण लम्बे काल की योजनाएं नहीं बनाई जा सकतीं।

3. नीति में निरन्तरता की कम सम्भावना (Less Possibility of Continuity of Policy)—संसदीय शासन प्रणाली में सरकार की स्थिरता की कम सम्भावना रहती है। इसलिए शासन की नीतियों में निरन्तरता नहीं रहती। कार्यपालिका को विधानपालिका जब चाहे पद से हटा सकती है। इस प्रकार कभी एक राजनीतिक दल का शासन होता है तो कभी दूसरा दल सत्ता में आ जाता है। इसी कारण इस प्रणाली में नीति की निरन्तरता की सम्भावना कम रहती है।

4. शासन में दक्षता का अभाव (Administration lacks Efficiency)—इस शासन प्रणाली में शासन में दक्षता का अभाव होता है, क्योंकि इसमें शासन की बागडोर अनाड़ियों के हाथ में होती है। मन्त्रियों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर न होकर राजनीतिक आधार पर होती है। कई बार मन्त्री को उस विभाग का अध्यक्ष भी बना दिया जाता है जिसके बारे में बिल्कुल ज्ञान ही नहीं होता।

5. मन्त्रिमण्डल की तानाशाही का भय (Danger of Dictatorship of the Cabinet)—संसदीय शासन प्रणाली में जहां केवल दो दल होते हैं वहां मन्त्रिमण्डल की तानाशाही स्थापित हो जाती है। जिस दल को विधानपालिका में बहुमत प्राप्त होता है उसी दल का मन्त्रिमण्डल बनता है और मन्त्रिमण्डल तब तक अपने पद पर रहता है जब तक उसे बहुमत का समर्थन प्राप्त रहता है। दल में अनुशासन के कारण दल का प्रत्येक सदस्य मन्त्रिमण्डल की नीतियों का समर्थन करता है। विरोधी दल की आलोचना का मन्त्रिमण्डल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता और मन्त्रिमण्डल अगले चुनाव तक अपनी मनमानी कर सकता है।

6. संसद् की दुर्बल स्थिति (Weak Position of the Parilament)-जिन देशों में राजनीतिक दल होते हैं वहां पर संसद् मन्त्रिमण्डल के हाथों का खिलौना बन जाती है। संसद् की बैठकों की तिथि तथा समय मन्त्रिमण्डल निश्चित करता है। 95% बिल मन्त्रियों द्वारा पेश किए जाते हैं और मन्त्रिमण्डल का बहुमत प्राप्त होने के कारण सभी बिल पास हो जाते हैं। वास्तव में संसद् स्वयं कानून नहीं बनाती बल्कि मन्त्रिमण्डल की सलाह से कानूनों का निर्माण करती है।

7. यह उग्र दलीय भावना को जन्म देती है (It gives birth to Aggressive Partisan Spirit)—यह शासन प्रणाली राजनीतिक दलों पर आधारित होने के कारण उग्र दलीय भावना को जन्म देती है। बहुमत दल अधिक-से-अधिक समय तक शासन पर नियन्त्रण रखना चाहता है और इसके लिए हर कोशिश करता है। दूसरी ओर विरोधी दल शीघ्रसे-शीघ्र सत्तारूढ़ दल को हटा कर स्वयं शासन पर नियन्त्रण करना चाहता है। विरोधी दल सरकार की आलोचना केवल आलोचना करने के लिए करता है। इस तरह सत्तारूढ़ दल तथा विरोधी दल में खींचातानी चलती रहती है।

8. संकटकाल के समय निर्बल सरकार (Weak in time of Emergency)—संकटकाल में शक्तियों का केन्द्रीयकरण होना चाहिए, परन्तु संसदीय सरकार में सभी निर्णय मन्त्रिमण्डल के द्वारा होते हैं और सभी निर्णय बहुमत से स्वीकृत किए जाते हैं। मन्त्रिमण्डल में वाद- विवाद पर काफ़ी समय बरबाद होता है जिससे निर्णय लेने में देरी हो जाती है। संकटकाल में संकट का सामना करने के लिए निर्णयों का शीघ्रता से होना अति आवश्यक है।

9. आलोचना आलोचना के उद्देश्य से (Criticism for the sake of Criticism)-संसदीय प्रणाली का यह दोष भी है कि विरोधी दल सरकार के हर कार्य की आलोचना करता है, चाहे वह अच्छी और जन-हित में भी क्यों न हो। ऐसा करना अच्छी बात नहीं और इससे विरोधी दल की शक्ति भी नष्ट होती है और जनता को भी उचित शिक्षा नहीं मिलती।

10. योग्य व्यक्तियों की उपेक्षा (Able Persons Neglected)—संसदीय प्रणाली में बहुमत दल के सदस्यों को ही मन्त्रिमण्डल में शामिल किया जाता है। चाहे उनमें बहुत-से अयोग्य ही क्यों हों और विरोधी दल के योग्य व्यक्तियों को भी नहीं पूछा जाता। इनसे देश को हानि होती है।

निष्कर्ष (Conclusion)–संसदीय सरकार अनेक दोषों के बावजूद भी अधिक लोकप्रिय है। आज संसार के अधिकांश देशों में संसदीय सरकार को अपनाया गया है। इस शासन प्रणाली की लोकप्रियता का कारण यह है कि इसमें सरकार जनमत की इच्छानुसार शासन चलाती है तथा अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है और इसमें परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन किया जा सकता है।

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प्रश्न 3.
अध्यक्षात्मक सरकार की मुख्य विशेषताएं बताइए।
(Describe the chief characteristics of the Presidential form of Government.)
अथवा
अध्यक्षात्मक सरकार से आप क्या समझते हैं ? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
(What do you understand by Presidential form of Government ? Discuss its main features.)
उत्तर-
अध्यक्षात्मक सरकार वह शासन प्रणाली है जिसमें कार्यपालिका विधानपालिका से स्वतन्त्र होती है और उसके प्रति उसका कोई उत्तरदायित्व नहीं होता। राज्य का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है और वह वास्तविक शासक होता है। राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर चुना जाता है और विधानपालिका जब चाहे राष्ट्रपति को नहीं हटा सकती। राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल का निर्माण स्वयं करता है और जब चाहे मन्त्रिमण्डल को तोड़ सकता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य नहीं होते। इस प्रकार अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है।

1. डॉ० गार्नर (Garner) के अनुसार, “अध्यक्षात्मक सरकार वह प्रणाली है जिसमें राज्य का अध्यक्ष और मन्त्री अपने कार्यकाल के लिए संवैधानिक तौर पर व्यवस्थापिका से स्वतन्त्र होते हैं और अपनी नीतियों के लिए उसके प्रति उत्तरदायी नहीं होते। इस प्रणाली में राज्य का अध्यक्ष केवल नाममात्र कार्यपालिका नहीं होता बल्कि वास्तविकता कार्यपालिका होता है और संविधान तथा कानूनों द्वारा दी गई शक्तियों का वास्तव में प्रयोग करता है।”
2. गैटेल (Gettell) के अनुसार, “अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था उसे कहते हैं जिसमें प्रधान कार्यपालिका अपनी नीति एवं कार्यों के बारे में विधानपालिका से स्वतन्त्र होता है।”

संयुक्त राज्य अमेरिका, चिल्ली, मैक्सिको, श्रीलंका, जर्मन, रूस आदि देशों में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली पाई जाती है।
अध्यक्षात्मक प्रणाली के लक्षण (Features of the Presidential System)-अध्यक्षात्मक प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख बातें होती हैं-

1. नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं (No distinction between Nominal and Real Executive)-अध्यक्षात्मक सरकार में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं पाया जाता। राष्ट्र का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। उसे संविधान द्वारा जो शक्तियां प्राप्त होती हैं उनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है। मन्त्रिमण्डल का निर्माण राष्ट्रपति स्वयं करता है और मन्त्रिमण्डल की सलाह को मानना अथवा न मानना राष्ट्रपति पर निर्भर करता है। राष्ट्रपति जब चाहे मन्त्रियों को हटा सकता है।

2. मन्त्रिमण्डल केवल सलाहकार के रूप में (Cabinet is only an Advisory Body)-अध्यक्षात्मक प्रणाली में भी मन्त्रिमण्डल की व्यवस्था होती है, परन्तु इसकी स्थिति संसदीय प्रणाली के मन्त्रिमण्डल की स्थिति से पूर्णतः भिन्न होती है। अध्यक्ष मन्त्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य नहीं होता। मन्त्री केवल सलाहकार ही होते हैं। उसकी अपनी इच्छा है कि मन्त्रियों से सलाह ले या न ले।

3. Cruiuifcich it alareucht at yerCUT (Separation of Executive and Legislature) अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में कोई सम्बन्ध नहीं होता। अध्यक्ष अपने मन्त्री संसद् में से नहीं लेता। मन्त्री संसद् की बैठकों मे न भाग ले सकते हैं, न बिल पेश कर सकते हैं, न भाषण दे सकते हैं। इस प्रकार व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में कोई सम्बन्ध नहीं रहता है।

4. कार्यपालिका का अनुत्तरदायित्व (Irresponsibility of the Executive)-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका अपने कार्यों तथा नीतियों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। राष्ट्रपति को अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटाया जा सकता। संसद् सदस्य मन्त्रियों से लिखित रूप में प्रश्न पूछ सकते हैं, परन्तु मन्त्री उनका उत्तर दें या न दें, उनकी इच्छा पर निर्भर है। मन्त्री राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाते हैं और वे राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

5. कार्यपालिका की निश्चित अवधि (Fixed Tenure of the Executive)-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। विधानपालिका राष्ट्रपति को केवल महाभियोग द्वारा ही हटा सकती है। अमेरिका में राष्ट्रपति चार वर्ष के लिए चुना जाता है और उसे केवल महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है।

6.शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित (Based on the theory of Separation of Powers)-अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित होती है। इसमें सरकार के मुख्य कार्य तीन विभिन्न अंगों द्वारा किए जाते हैं जो एक-दूसरे से स्वतन्त्र होते हैं। अमेरिका में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त को अपनाया गया है।

7. राष्ट्रपति विधानमण्डल को भंग नहीं कर सकता (President cannot dissolve the Parliament)अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है। इसलिए राष्ट्रपति विधानपालिका के किसी सदन को भंग नहीं कर सकता। विधानपालिका की अवधि संविधान द्वारा निश्चित होती है और यदि राष्ट्रपति चाहे भी तो समय से पहले इसको भंग नहीं कर सकता।

8. राजनीतिक एकरूपता अनावश्यक (Political Homogeneity is Unnecessary)-इस प्रणाली में मन्त्रियों का एक ही राजनीतिक दल से सम्बन्धित होना आवश्यक नहीं होता। यह इसलिए कि मन्त्री केवल अपने व्यक्तिगत रूप में ही अध्यक्ष के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इसलिए इस प्रणाली में मन्त्री के सामूहिक उत्तरदायित्व का लक्षण अनुपस्थित होता है। इसलिए उनका राजनीतिक विचारों में पूर्णतः एकमत होना अधिक आवश्यक नहीं होता।

प्रश्न 4.
अध्यक्षात्मक शासन के गुणों और दोषों का वर्णन करें।
(Discuss the merits and demerits of Presidential Government.)
उत्तर-
अध्यक्षात्मक शासन के गुण (Merits of Presidential Government)-
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के निम्नलिखित गुण हैं-

1. शासन में स्थिरता (Stability in Administration)-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होती है जिससे शासन में स्थिरता आती है। राष्ट्रपति को केवल महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है। अमेरिका में अभी तक किसी राष्ट्रपति को नहीं हटाया गया। शासन में स्थिरता के कारण लम्बी योजनाएं बनाई जाती हैं और उन्हें दृढ़ता से लागू किया जाता है।

2. संकटकाल के लिए उचित सरकार (Suitable in time of Emergency)-अध्यक्षात्मक सरकार संकटकाल के लिए बहुत उपयुक्त है। शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है। शासन के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय राष्ट्रपति द्वारा लिए जाते हैं । इसलिए राष्ट्रपति संकटकाल में शीघ्र निर्णय लेकर उन्हें दृढ़ता से लागू कर संकट का सामना कर सकता है। युद्ध और आर्थिक संकट का सामना करने के लिए अध्यक्षात्मक सरकार सर्वश्रेष्ठ है।

3. इसमें नीति की एकता बनी रहती है (It ensures Continuity of Policy)-इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका एक निश्चित समय तक अपने पद पर रहती है जिससे एक ही नीति निश्चित अवधि तक चलती रहती है। शासन की नीतियों में शीघ्रता से परिवर्तन न होने के कारण एक शक्तिशाली नीति को अपनाया जा सकता है।

4. शासन में दक्षता (Efficiency in Administration)-यह प्रणाली शक्ति विभाजन के सिद्धान्त पर कार्य करती है। मन्त्रियों को न तो चुनाव लड़ना पड़ता है और न ही उन्हें संसद् की बैठकों में ही भाग लेना पड़ता है। उनके पास तो केवल शासन चलाने का ही कार्य रहता है। वे स्वतन्त्रतापूर्वक शासन-कार्य में लगे रहते हैं। इससे शासन में दक्षता आना स्वाभाविक ही है।

5. योग्य व्यक्तियों का शासन (Administration by Able Statesmen)-इस प्रणाली में मन्त्रियों को संसद् का सदस्य होने की आवश्यकता नहीं। इसलिए राष्ट्रपति ऐसे व्यक्तियों को मन्त्रिमण्डल में तथा सरकारी पदों पर नियुक्त करता है जो योग्य प्रशासक और अनुभवी राजनीतिज्ञ हों और इस प्रणाली में सभी राजनीतिक दलों से मन्त्री लिए जा सकते हैं।

6. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है (It is based on the Theory of Separation of Powers) कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से स्वतन्त्र होती हैं। विधानपालिका कानूनों का निर्माण करती है और कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है। कार्यपालिका विधानपालिका को भंग नहीं कर सकती और न ही विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पास करके कार्यपालिका को हटा सकती है। शक्तियों के विभाजन के कारण सरकार का कोई भाग निरंकुश नहीं बन सकता और नागरिकों की स्वतन्त्रता का खतरा नहीं रहता।।

7. इसमें राजनीतिक दल उग्र नहीं होते (Political Parties are Less Aggressive)-अध्यक्षात्मक सरकार में संसदीय सरकार की अपेक्षा राजनीतिक दलों का प्रभाव कम होता है। संसदीय सरकार में चुनाव के पश्चात् भी विरोधी दल सत्तारूढ़ दल को हटा कर स्वयं शासन पर अधिकार करने के लिए प्रयत्न करते रहते हैं, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार के चुनाव के पश्चात् राजनीतिक दलों की उग्रता समाप्त हो जाती है क्योंकि विरोधी दल को पता होता है कि राष्ट्रपति को अगले चुनाव से पहले नहीं हटाया जा सकता।

8. बहु-दलीय प्रणाली के लिए उपयुक्त (Suitable for a Multiple-Party System)—जिस देश में बहुदल प्रणाली हो अर्थात् कई राजनीतिक दल हों और किसी भी दल को संसद् में बहुमत प्राप्त न होता हो, उस देश में यही प्रणाली अधिक उपयुक्त रहती है। बहुदल प्रणाली में संसदीय सरकार स्थापित हो जाए तो मन्त्रिमण्डल जल्दी-जल्दी बदलता रहता है, परन्तु अध्यक्षात्मक प्रणाली में चुनाव के समय ही दलों का संघर्ष अधिक रहता है और कार्यपालिका जल्दी-जल्दी नहीं बदलती।

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दोष (Demerits of Presidential Government)-
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं-

1. निरंकुशता का भय (Fear of Despotism)-शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिससे वह निरंकुश बन सकता है। राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होने के कारण अगले चुनाव तक उसे हटाया नहीं जा सकता है। अतः राष्ट्रीय अपनी शक्तियों का प्रयोग मनमाने ढंग से कर सकता है।

2. शासन को परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला जा सकता (Government is not changeable according to Circumstances)–संसदीय सरकार में प्रधानमन्त्री तथा मन्त्रियों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जा सकता है, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और विधानपालिका की अवधि भी निश्चित होती है। राष्ट्रपति यदि शासन को ठीक ढंग से न चलाए तो भी जनता उसे निश्चित अवधि से पहले नहीं हटा सकती।

3. कार्यपालिका और विधानपालिका में गतिरोध की सम्भावना (Possibility of deadlock between the Executive and Legislature)-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका के एक-दूसरे से स्वतन्त्र होने के कारण दोनों में गतिरोध उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। विशेषकर यदि राष्ट्रपति एक दल से हो और विधानमण्डल में किसी दूसरे राजनीतिक दल का बहुमत हो तो इन दोनों अंगों में संघर्ष होना अनिवार्य हो जाता है। इससे शासन अच्छी तरह नहीं चलता। विधानपालिका कार्यपालिका की इच्छानुसार कानून नहीं बनाती और न ही कार्यपालिका कानून को उस भावना से लागू करती है जिस भावना से कानूनों को बनाया गया होता है।

4. शक्तियों का विभाजन सम्भव नहीं (Separation of Powers not Possible)-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त पर आधारित है, परन्तु यह सिद्धान्त व्यावहारिक नहीं है और न ही वांछनीय है। शासन एक इकाई है तथा इसके अंगों को उसी प्रकार बिल्कुल पृथक् नहीं किया जा सकता है जिस प्रकार शरीर के अंगों को। यदि सरकार के तीन अंगों को एक-दूसरे से बिल्कुल पृथक् रखा जाए तो इसका परिणाम यह होगा कि शासन की एकता समाप्त हो जाएगी और तीनों अंगों में क्षेत्राधिकार सम्बन्धी झगड़े उत्पन्न हो जाएंगे। अतः शक्तियों के विभाजन का सिद्धान्त अच्छे शासन के लिए आवश्यक नहीं है।

5. जनमत की अवहेलना (Public Opinion Neglected)—अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में जनमत की अवहेलना होने की बहुत अधिक सम्भावना रहती है। मन्त्री संसद् के सदस्य नहीं होते और न ही विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इन्हें चुनाव नहीं लड़ना पड़ता है। इसलिए उन्हें जनमत की परवाह नहीं होती।

6. अच्छे कानूनों का निर्माण नहीं होता (Good Laws are not Passed)-अच्छे कानूनों के निर्माण के लिए कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग का होना आवश्यक है, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार में दोनों एक-दूसरे से स्वतन्त्र होते हैं। विधानपालिका को इस बात का पता नहीं होता कि कार्यपालिका को किस तरह के कानूनों की आवश्यकता है। आवश्यकतानुसार कानूनों का निर्माण न होने के कारण शासन में कुशलता नहीं रहती।

7. अनुत्तरदायी सरकार (Irresponsible Government)-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में सरकार अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं होती। राष्ट्रपति विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होता। इसलिए राष्ट्रपति अपनी मनमानी कर सकता है।

8. संविधान की कठोरता (Rigid Constitution)-अध्यक्षात्मक सरकार में संविधान बहुत कठोर होता है। इसलिए उसमें समयानुसार परिवर्तन नहीं किए जा सकते।

9. विदेशी सम्बन्धों में निर्बलता (Weakness in conduct of Foreign Relations)-अध्यक्षात्मक प्रणाली में कार्यपालिका दूसरे देशों के साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकती। इसका कारण यह है कि युद्ध और शान्ति की घोषणा करने की स्वीकृति संसद् ही दे सकती है। राष्ट्रपति को इस बात का भरोसा नहीं होता कि संसद् उस पर अपनी स्वीकृति देगी या नहीं।

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10. दल दोषों से मुक्त नहीं (Not free from Party Evils)—यह कहना ठीक नहीं है कि अध्यक्षात्मक सरकार में राजनीतिक दलों में बुराइयां नहीं पाई जातीं। राष्ट्रपति का चुनाव दलीय व्यवस्था के आधार पर होता है और जिस दल का उम्मीदवार राष्ट्रपति चुना जाता है वह अपने समर्थकों को खुश करने के लिए उन्हें बड़े-बड़े पद देता है। अमेरिका में राष्ट्रपति अपना पद ग्रहण करने के बाद अपने दल के व्यक्तियों को ऊंचे-ऊंचे राजनीतिक पदों पर नियुक्त करता है। इससे शासन में भ्रष्टाचार फैलता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के गुण भी हैं और अवगुण भी। अमेरिका में यह प्रणाली सन् 1787 से प्रचलित है और सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। भारत में बहुदल प्रणाली को देखकर कुछ एक विद्वान् भारत में संसदीय प्रणाली के स्थान पर अध्यक्षात्मक प्रणाली को स्थापित करने का सुझाव देते हैं, परन्तु सुझाव न तो ठोस है और न ही इसके माने जाने की सम्भावना है। फ्रांस में बहुदल के कारण वहां की संसदीय शासन प्रणाली ठीक प्रकार न चल सकी। इस कारण वहां भी अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के कुछ अंश अपनाए गए हैं।

प्रश्न 5.
संसदीय सरकार और अध्यक्षात्मक सरकारों की तुलना करो तथा दोनों में अन्तर का वर्णन करो।
(Compare and contrast the parliamentary and Presidential forms of governments.)
उत्तर-
संसदीय शासन प्रणाली और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में अग्रलिखित अन्तर पाए जाते हैं-

संसदीय सरकार की विशेषताएं-

  1. अध्यक्षात्मक सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया न हो कर वास्तविक शासक होता है। संविधान के द्वारा शासन की सभी शक्तियां उसके पास होती हैं और वह उसका प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है।
  2. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका से स्वतन्त्र होती है। राष्ट्रपति तथा मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानमण्डल के सदस्य नहीं होते। मन्त्री न तो विधानपालिका की बैठकों में भाग ले सकते हैं और न ही बिल पेश कर सकते हैं।
  3. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती। मन्त्री राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी होते हैं न कि विधानपालिका के प्रति। विधानपालिका कार्यपालिका को अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटा सकती।
  4. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित होती है। राष्ट्रपति को केवल महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है।
  5. संसदीय सरकार में प्रधानमन्त्री राज्य के अध्यक्ष को सलाह देकर विधानपालिका को भंग कर सकता है।

अध्यक्षात्मक सरकार की विशेषताएं-

  1. संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया होता है। व्यवहार में उसकी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल के द्वारा किया जाता है।
  2. संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। मन्त्रिमण्डल के सभी सदस्य विधानपालिका के सदस्य होते हैं । मन्त्री विधानमण्डल की बैठकों में भाग लेते हैं, बिल पेश करते हैं तथा वोट डालते हैं।
  3. संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। विधानपालिका के सदस्य मन्त्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं, काम रोको तथा निन्दा प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकते हैं।
  4. संसदीय सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित नहीं होती। विधानपालिका जब चाहे अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकती है।
  5. अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति विधानपालिका के किसी सदन को भंग नहीं कर सकता।

प्रश्न 6.
दोनों प्रकार की सरकारों में आप किसे श्रेष्ठ मानते हैं और क्यों ?
(Which of the two types do you consider better ? Why ?)
उत्तर-
यह एक विवाद का विषय है कि दोनों प्रकार की शासन प्रणालियों में से कौन-सी शासन प्रणाली अच्छी है। यह कहना कठिन है कि कौन-सी शासन प्रणाली पूर्ण रूप से अच्छी है। इसका कारण यह है कि दोनों शासनप्रणालियों के अपने-अपने गुण भी हैं और दोष भी हैं। इंग्लैण्ड में संसदीय सरकार अच्छी तरह चल रही है जबकि अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार। परन्तु फिर भी आजकल निम्नलिखित कारणों की वजह से संसदीय शासन व्यवस्था को अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था से अच्छा समझा जाता है

1. संसदीय शासन व्यवस्था कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग का विश्वास दिलाती हैसंसदीय शासन व्यवस्था में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं, वाद-विवाद में भाग लेते हैं और बिल पेश करते हैं। मन्त्रिमण्डल का विधानमण्डल में बहुमत होता है जिस कारण मन्त्रिमण्डल द्वारा पेश किए गए बिल पास हो जाते हैं। मन्त्रिमण्डल के समर्थन के बिना कोई बिल पास नहीं हो सकता है। मन्त्रिमण्डल तथा विधानपालिका में सहयोग होने के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है। सरकार में दक्षता तभी आती है जब सरकार के विभिन्न अंगों में सहयोग हो, क्योंकि सरकार एक इकाई होती है। संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग होता है।

अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था में कार्यपालिका तथा विधानपालिका एक-दूसरे से स्वतन्त्र होती है और मन्त्रियों को विधानपालिका की बैठकों में भाग लेने का अधिकार नहीं होता है। यदि राष्ट्रपति एक दल से हो और विधापालिका में दूसरे दल का बहुमत हो, तो इन दोनों में संघर्ष होना अनिवार्य हो जाता है और गतिरोध उत्पन्न हो जाता है। 1968 से 1976 तक अमेरिका में राष्ट्रपति रिपब्लिकन पार्टी से था जबकि कांग्रेस में डैमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत था। जबकि 1992 से 2000 तक अमेरिका में राष्ट्रपति डैमोक्रेटिक पार्टी का था, और कांग्रेस में बहुमत रिपब्लिकन पार्टी का था। विधानपालिका और कार्यपालिका में सहयोग न होने के कारण विधानपालिका कार्यपालिका की इच्छानुसार कानून नहीं बनाती और न ही विधानपालिका के बनाए हुए कानूनों को कार्यपालिका उस भावना से लागू करती है, जिस भावना से कानूनों को बनाया गया होता है।

2. संसदीय शासन व्यवस्था अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था से अधिक प्रजातन्त्रात्मक होती है-संसदीय शासनव्यवस्था को अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली से अच्छा समझा जाता है क्योंकि यह अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था से अधिक प्रजातन्त्रात्मक होती है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य जनता के प्रतिनिधियों की निरन्तर आलोचना के अधीन कार्य करते हैं। निरन्तर आलोचना के कारण मन्त्री सदैव सतर्क रहते हैं और निरंकुश बनने की चेष्टा नहीं करते। ‘अविश्वास प्रस्ताव’ के डर के कारण मन्त्री जनता की इच्छाओं के अनुसार काम करते हैं। अध्यक्षात्मक शासन में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और उसे अविश्वास प्रस्ताव पास करके नहीं हटाया जा सकता। निःसन्देह अमेरिका में राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है, परन्तु महाभियोग का तरीका इतना कठिन है कि अभी तक अमेरिका में एक भी राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा नहीं हटाया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि अमेरिका में राष्ट्रपति को अवधि से पहले नहीं हटाया जा सकता।

3. गृह और विदेश-नीति में दृढ़ता-संसदीय शासन-व्यवस्था में मन्त्रिमण्डल गृह और विदेश नीति को दृढ़ता से लागू करता है क्योंकि उसे यह पता होता है कि विधानपालिका में उसे बहुमत का समर्थन प्राप्त है। इसके विपरीत अध्यक्षात्मक शासन-व्यवस्था में राष्ट्रपति विदेशी नीति को दृढ़ता से नहीं अपना सकता क्योंकि उसको कांग्रेस के समर्थन का विश्वास नहीं होता। इसके अतिरिक्त अमेरिका में राष्ट्रपति सीनेट की स्वीकृति के बिना दूसरे देशों के साथ सन्धिसमझौते नहीं कर सकता। अतः राष्ट्रपति दूसरे देशों के साथ दृढ़ नीति को नहीं अपना सकता।

4. संसदीय शासन-व्यवस्था में वैकल्पिक शासन की व्यवस्था-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास होने की दशा में वैकल्पिक शासन की स्थापना बिना चुनाव करवाए सम्भव होती है। विशेषकर इंग्लैण्ड में जहां द्वि-दलीय प्रणाली पाई जाती है, सत्तारूढ़ दल के हटने पर विरोधी दल सरकार बनाने के लिए सदैव तैयार रहता है। इस प्रकार प्रशासन लगातार चलता रहता है और शासन में कोई रुकावट नहीं पड़ती है।

संसदीय शासन प्रणाली के विपरीत अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में साधारणतया सरकार नहीं हटती क्योंकि राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है, परन्तु यदि सरकार हटती है तो इससे नए चुनाव करवाने की समस्या उत्पन्न होती है। वास्तव में अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था में दो चुनावों के बीच के काल में नोति में कोई परिवर्तन सम्भव नहीं होता है। नीति में परिवर्तन तभी सम्भव होता है यदि चुनाव के समय दल अपने विभिन्न कार्यक्रम के आधार पर चुना जाए, परन्तु संसदीय शासन-प्रणाली में नीति में परिवर्तन चुनावों के बीच के काल में भी सम्भव होता है।

5. संसदीय शासन-व्यवस्था में सरकार परिवर्तनशील होती है-संसदीय शासन प्रणाली को सरकार की परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है। उदाहरणस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध में जब इंग्लैण्ड में चैम्बरलेन सफल न हो सका तो उसके स्थान पर चर्चिल को प्रधानमन्त्री बनाया गया, परन्तु अध्यक्षात्मक सरकार में ऐसा नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें कार्यपालिका के अध्यक्ष की अवधि निश्चित होती है। राष्ट्रपति चाहे ठीक ढंग से शासन न चलाए जनता उसे निश्चित अवधि से पूर्व नहीं हटा सकती।

6. जनमत के प्रति उत्तरदायी-संसदीय शासन प्रणाली में मन्त्रिमण्डल जनमत के प्रति अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की अपेक्षा अधिक उत्तरदायी होते हैं। मन्त्रिमण्डल सदैव जनमत के अनुसार शासन चलाता है और जनता के साथ किए गए वायदों को पूरा करने के लिए भरसक प्रयत्न करता है। मन्त्रिमण्डल यह जानता है कि उसका बना रहना जनमत के समर्थन पर निर्भर करता है, इसलिए कोई भी मन्त्रिमण्डल आसानी से जनमत के प्रति उदासीन नहीं रह सकता।

इसके विपरीत अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में शक्तियों के पृथक्करण के कारण सरकार जनमत के प्रति इतना अधिक उत्तरदायी नहीं होती। राष्ट्रपति और मन्त्रिमण्डल के सदस्य कांग्रेस के सदस्य नहीं होते, इसलिए उन्हें जनता के प्रतिनिधियों के द्वारा यह जानने का अवसर प्राप्त नहीं होता कि जनमत क्या चाहता है। इसके अतिरिक्त कार्यपालिका इसलिए जनमत की परवाह नहीं करती क्योंकि उसको पता होता है कि उसका पद पर बने रहना जनमत पर निर्भर नहीं करता और अगले चुनाव तक जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। चुनाव आने पर ही कार्यपालिका जनमत की ओर ध्यान देती है।

निष्कर्ष (Conclusion)—संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि संसदीय शासन-प्रणाली अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली की अपेक्षा अधिक अच्छी है।

प्रश्न 7.
क्या आप इस मत से सहमत हैं कि भारत के लिए संसदात्मक सरकार ही अधिक उचित है ? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
(Do you agree with the view that the parliamentary form of government is more suitable to India ? Give reasons.)
उत्तर-
कुछ विद्वानों एवं राजनीतिज्ञों का विचार है कि भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली की अपेक्षा अध्यक्षात्मक शासन अधिक उपयुक्त है। इन विद्वानों का मुख्य तर्क यह है कि विधानपालिका अविश्वास प्रस्ताव पेश करके कार्यपालिका को नहीं हटा सकती, जिससे शासन में स्थिरता रहती है। देश की प्रगति के लिए कार्यपालिका का विधानपालिका से स्वतन्त्र होना आवश्यक है ताकि कार्यपालिका अपना सारा समय शासन में लगा सके जबकि संसदीय शासन में कार्यपालिका का काफ़ी समय संसद् में बर्बाद हो जाता है। भारत में बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है जोकि संसदीय शासन के लिए उपयुक्त नहीं है। अतः इन विद्वानों के अनुसार भारत के लिए अध्यक्षात्मक शासन अधिक उपयुक्त है।

परन्तु हमारे विचार से भारत के लिए संसदीय शासन ही अधिक उपयुक्त है। संसदीय शासन प्रणाली स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर अब तक सफलता से कार्य कर रही है। इसमें शासन संसद् के प्रति उत्तरदायी होता है और संसद् के साथ कार्यपालिका का गहरा सम्बन्ध होने के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है। संसदीय शासन को परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है और एक अच्छे शासन के लिए यह आवश्यक भी है। अत: भारत के लिए संसदीय शासन उपयुक्त है।
नोट- भारत के लिए संसदीय सरकार उचित होने के वही कारण हैं जो संसदीय सरकार के होते हैं। अतः पिछला प्रश्न देखें।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संसदीय सरकार किसे कहते हैं ? संसदीय सरकार की परिभाषा दें ।
उत्तर-
संसदीय सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने सभी कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है और तब तक अपने पद पर रह सकती है जब तक उसको विधानपालिका का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका विधानपालिका का विश्वास खो देती है तो कार्यपालिका को अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है।

डॉ० गार्नर का मत है, “संसदीय सरकार वह प्रणाली है जिसमें वास्तविक कार्यपालिका-मन्त्रिमण्डल या मन्त्रिपरिषद् अपनी राजनीतिक नीतियों और कार्यों के लिए प्रत्यक्ष तथा कानूनी रूप से विधानमण्डल या उसके एक सदन (प्रायः लोकप्रिय सदन) के प्रति और राजनीतिक तौर पर मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी हो जबकि राज्य का अध्यक्ष संवैधानिक या नाममात्र कार्यपालिका हो और उत्तरदायी हो।”

प्रश्न 2.
संसदीय सरकार की चार विशेषताएं लिखें।
उत्तर-
संसदीय शासन प्रणाली में निम्नलिखित विशेषताएं पाई जाती हैं-

  1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का शासक होता है। सैद्धान्तिक रूप में राज्य की सभी शक्तियों उसके नाम पर होती हैं, परन्तु वास्तव में उन शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है।
  2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है-राज्य के अध्यक्ष को सौंपी गई शक्तियों का प्रयोग वास्तव में मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है।
  3. कार्यपालिका और विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होना-संसदीय शासन प्रणाली में विधानपालिका और कार्यपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्यों के लिए संसद् का सदस्य होना अनिवार्य है और वे संसद् की बैठकों में भाग भी लेते हैं, बिल पेश करते हैं और बिलों पर मतदान करते हैं।
  4. मन्त्रिमण्डल का उत्तरदायित्व-कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल अपने सब कार्यों के लिए व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 3.
संसदीय सरकार के चार गुणों का वर्णन करो।
उत्तर-
संसदीय शासन प्रणाली में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं-

  1. कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है। मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य होते हैं, बैठकों में भाग लेते हैं तथा बिल पास करते हैं। कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है तथा शासन में दक्षता होती
  2. उत्तरदायी सरकार-संसदीय सरकार में सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि मन्त्रिमण्डल अपनी मनमानी करता है तो विधानमण्डल अविश्वास प्रस्ताव पास करके मन्त्रिमण्डल को हटा सकता है।
  3. सरकार निरंकुश नहीं बन सकती-मन्त्रिमण्डल अपने कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होने के कारण निरंकुश नहीं बन सकता।
  4. परिवर्तनशील सरकार-संसदीय सरकार का यह भी गुण है, कि इसमें सरकार परिवर्तनशील होती है। सरकार को समय के अनुसार बदला जा सकता है।

प्रश्न 4.
संसदीय सरकार के चार अवगुण बताइए।
उत्तर-
संसदीय सरकार में निम्नलिखित दोष पाए जाते हैं-

  1. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है-संसदीय सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है। इसमें मन्त्रिमण्डल (कार्यपालिका) के सदस्य संसद् के सदस्य भी होते हैं, जिससे कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। शक्तियों के केन्द्रीयकरण के कारण व्यक्तियों की निजी स्वतन्त्रता खतरे में पड़ सकती है।
  2. अस्थिर सरकार-संसदीय शासन प्रणाली में सरकार अस्थिर होती है, क्योंकि मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं होती।
  3. नीति में निरन्तरता की कम सम्भावना-संसदीय शासन प्रणाली में नीति की निरन्तरता की कम सम्भावना रहती है क्योंकि विधानपालिका, कार्यपालिका को जब चाहे अविश्वास प्रस्ताव पास करके हटा सकती है।
  4. शासन में दक्षता का अभाव-संसदीय शासन प्रणाली में शासन में दक्षता का अभाव होता है, क्योंकि इसमें शासन की बागडोर अनाड़ियों के हाथ में होती है।

प्रश्न 5.
अध्यक्षात्मक सरकार का अर्थ एवं परिभाषा लिखें।
उत्तर-
अध्यक्षात्मक सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं, जिसमें कार्यपालिका संवैधानिक दृष्टि से विधानपालिका से अपनी नीतियों और कार्यों के लिए स्वतन्त्र होती है। कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती और दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं होता। विधानपालिका मन्त्रियों को उनके पद से हटा नहीं सकती। राज्य का अध्यक्ष वास्तविक कार्यपालिका होता है और संविधान द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है। अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार है।

डॉ० गार्नर के शब्दानुसार, “अध्यक्षात्मक सरकार वह प्रणाली है जिसमें राज्य का अध्यक्ष और मन्त्री अपने कार्यकाल के लिए संवैधानिक तौर पर व्यवस्थापिका से स्वतन्त्र होते हैं और अपनी राजनीतिक नीतियों के लिए उसके प्रति उत्तरदायी नहीं होते। इस प्रणाली में राज्य का अध्यक्ष केवल नाममात्र कार्यपालिका नहीं होता बल्कि वास्तविक कार्यपालिका होता है और संविधान तथा कानूनों द्वारा दी गई शक्तियों का वास्तव में प्रयोग करता है।”

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प्रश्न 6.
अध्यक्षात्मक सरकार की चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर-
अध्यक्षात्मक प्रणाली में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएं होती हैं-

  1. नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं-अध्यक्षात्मक सरकार में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं पाया जाता। राष्ट्र का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। उसे संविधान द्वारा जो शक्तियां प्राप्त होती हैं उनका प्रयोग वह अपनी इच्छानुसार करता है।
  2. मन्त्रिमण्डल केवल सलाहकार के रूप में अध्यक्षात्मक प्रणाली में भी मन्त्रिमण्डल की व्यवस्था होती है, परन्तु इसकी स्थिति संसदीय प्रणाली के मन्त्रिमण्डल की स्थिति में पूर्णत: भिन्न होती है। अध्यक्ष मन्त्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य नहीं होता। मन्त्री केवल सलाहकार ही होते हैं। उसकी अपनी इच्छा है कि मन्त्रियों से सलाह ले या न ले।
  3. कार्यपालिका और व्यवस्थापिका का पृथक्करण-अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका में कोई सम्बन्ध नहीं होता। अध्यक्ष अपने मन्त्री संसद् में से नहीं लेता। मन्त्री संसद् की बैठकों में न भाग ले सकते हैं, न बिल पेश कर सकते हैं, न भाषण दे सकते हैं। इस प्रकार व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में कोई सम्बन्ध नहीं रहता है।
  4. कार्यपालिका का अनुत्तरदायित्व-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका अपने कार्यों तथा नीतियों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती।

प्रश्न 7.
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के चार गुण लिखें।
उत्तर-
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में निम्नलिखित चार गुण पाए जाते हैं-

  1. शासन में स्थिरता-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होती है जिससे शासन में स्थिरता आती है।
  2. इसमें नीति की एकता बनी रहती है-इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका एक निश्चित समय तक अपने पद पर रहती है जिससे एक ही नीति निश्चित अवधि तक चलती रहती है।
  3. शासन में दक्षता-यह प्रणाली शक्ति विभाजन के सिद्धान्त पर कार्य करती है। मन्त्रियों को न तो चुनाब लड़ना पड़ता है और न ही संसद् की बैठकों में भाग लेना पड़ता है। उनके पास तो केवल शासन चलाने का कार्य होता है। वे स्वतन्त्रतापूर्वक शासन चलाने में लगे रहते हैं, इससे शासन में दक्षता आना स्वाभाविक है।
  4.   संकटकाल के लिए उचित सरकार- अध्यक्षात्मक सरकार संकटकाल के लिए उचित सरकार मानी जाती है।

प्रश्न 8.
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के चार दोष बताइए।
उत्तर-
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के मुख्य चार दोष नीचे दिए गए हैं-

  1. निरंकुशता का भय-शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिससे वह निरंकुश बन सकता है।
  2. शासन की परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला जा सकता- अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है और विधानपालिकाओं की अवधि भी निश्चित होती है। राष्ट्रपति यदि शासन ठीक ढंग से न चलाए तो भी जनता उसे निश्चित अवधि से पहले नहीं हटा सकती।
  3. कार्यपालिका और विधानपालिका में गतिरोध की सम्भावना-अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका के एक-दूसरे से स्वतन्त्र होने के कारण दोनों में गतिरोध उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है।
  4. जनमत की अवहेलना-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में जनमत की अवहेलना होने की बहुत अधिक सम्भावना रहती है।

प्रश्न 9.
संसदीय सरकार और अध्यक्षात्मक सरकार में चार अन्तर लिखें।
उत्तर-
संसदीय सरकार और अध्यक्षात्मक सरकार में निम्नलिखित मुख्य अन्तर पाए जाते हैं-

संसदीय सरकार-

  1. संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया होता है। व्यवहार में उसकी शक्तियों का प्रयोग मन्त्रिमण्डल के द्वारा किया जाता है।
  2. संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।
  3. संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
  4. संसदीय सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित नहीं होती।

अध्यक्षात्मक सरकार-

  1. अध्यक्षात्मक सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया न हो कर वास्तविक शासक होता है। संविधान के द्वारा शासन की सभी शक्तियां उसके पास होती हैं और वह उसका प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है।
  2. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका एवं विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध नहीं पाया जाता।
  3. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती।
  4. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका की अवधि निश्चित होती है।

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प्रश्न 10.
संसदीय शासन प्रणाली और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कौन-सी अच्छी सरकार है ? कारण दीजिए।
उत्तर-
संसदीय और अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में से संसदीय शासन प्रणाली को निम्नलिखित कारणों से अच्छा माना जाता है-

  1. संसदीय सरकार परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशील है।
  2. उत्तरदायी सरकार।
  3. विधानपालिका तथा कार्यपालिका में सहयोग।
  4. अच्छे कानूनों का निर्माण।
  5. संसदीय सरकार जनमत पर आधारित है।

संसदीय सरकार अध्यक्षात्मक सरकार से अच्छी है, इसका यह भी प्रमाण है कि आज संसार के अधिकांश देशों में संसदीय सरकार को अपनाया गया है।

प्रश्न 11.
क्या अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली भारत के लिए अधिक उपयुक्त है ?
उत्तर-
कुछ विद्वानों एवं राजनीतिज्ञों का विचार है कि भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली की अपेक्षा अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली अधिक उपयुक्त है। इन विद्वानों का मुख्य तर्क यह है कि अध्यक्षात्मक शासन में कार्यपालिका का चुनाव निश्चित अवधि के लिए होता है और विधानपालिका अविश्वास-प्रस्ताव पेश करके कार्यपालिका को नहीं हटा सकती, जिससे शासन में स्थिरता बनी रहती है। भारत में बहुदलीय प्रणाली पाई जाती है जो कि संसदीय शासन के लिए उपयुक्त है। अतः इन विद्वानों के मतानुसार भारत के लिए अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली अधिक उपयुक्त है।

परन्तु हमारे विचार में भारत के लिए संसदीय शासन ही अधिक उपयुक्त है । स्वतन्त्रता प्राप्ति से लेकर अब तक संसदीय शासन प्रणाली सफलता से कार्य कर रही है। इसमें शासन संसद् के प्रति उत्तरदायी होता है और संसद् के साथ कार्यपालिका का गहरा सम्बन्ध होने के कारण अच्छे कानूनों का निर्माण होता है। संसदीय शासन को परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है और एक अच्छे शासन के लिए यह आवश्यक भी है। अतः भारत के लिए संसदीय शासन प्रणाली उपयुक्त है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संसदीय सरकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-
संसदीय सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें कार्यपालिका तथा विधानपालिका में घनिष्ठ सम्बन्ध पाया जाता है। कार्यपालिका (मन्त्रिमण्डल) अपने सभी कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है और तब तक अपने पद पर रह सकती है जब तक उसको विधानपालिका का विश्वास प्राप्त रहता है। जिस समय कार्यपालिका विधानपालिका का विश्वास खो देती है तो कार्यपालिका को अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ता है।

प्रश्न 2.
संसदीय सरकार की दो विशेषताएं लिखें।
उत्तर-

  1. राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का सत्ताधारी-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का शासक होता है।
  2. मन्त्रिमण्डल वास्तविक कार्यपालिका होती है-राज्य के अध्यक्ष को सौंपी गई शक्तियों का प्रयोग वास्तव में मन्त्रिमण्डल द्वारा किया जाता है।

प्रश्न 3.
संसदीय सरकार के दो गुणों का वर्णन करो।
उत्तर-

  1. कार्यपालिका तथा विधानपालिका में पूर्ण सहयोग-संसदीय सरकार में कार्यपालिका तथा विधानपालिका में सहयोग बना रहता है।
  2. उत्तरदायी सरकार-संसदीय सरकार में सरकार अपने समस्त कार्यों के लिए विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी होती है।

प्रश्न 4.
संसदीय सरकार के दो अवगुण बताइए।
उत्तर-

  1. यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है-संसदीय सरकार शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
  2. अस्थिर सरकार-संसदीय शासन प्रणाली में सरकार अस्थिर होती है, क्योंकि मन्त्रिमण्डल की अवधि निश्चित नहीं होती।

प्रश्न 5.
अध्यक्षात्मक सरकार का अर्थ लिखें।
उत्तर-
अध्यक्षात्मक सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं, जिसमें कार्यपालिका संवैधानिक दृष्टि से विधानपालिका से अपनी नीतियों और कार्यों के लिए स्वतन्त्र होती है। कार्यपालिका विधानपालिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती और दोनों में कोई सम्बन्ध नहीं होता। विधानपालिका मन्त्रियों को उनके पद से हटा नहीं सकती। राज्य का अध्यक्ष वास्तविक कार्यपालिका होता है और संविधान द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करता है। अमेरिका में अध्यक्षात्मक सरकार है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 15 सरकारों के रूप-संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकारें

प्रश्न 6.
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दो गुण लिखें।
उत्तर-

  1. शासन में स्थिरता-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति की अवधि निश्चित होती है जिससे शासन में स्थिरता आती है।
  2. इसमें नीति की एकता बनी रहती है-इस शासन प्रणाली में कार्यपालिका एक निश्चित समय तक अपने पद पर रहती है जिससे एक ही नीति निश्चित अवधि तक चलती रहती है।

प्रश्न 7.
अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दो दोष बताइए।
उत्तर-

  1. निरंकुशता का भय-शासन की सभी शक्तियां राष्ट्रपति के पास होती हैं जिससे वह निरंकुश बन सकता है।
  2. शासन की परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदला जा सकता-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। राष्ट्रपति यदि शासन ठीक ढंग से न चलाए तो भी जनता उसे निश्चित अवधि से पहले नहीं हटा सकती।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न I. एक शब्द/वाक्य वाले प्रश्न-उत्तर-

प्रश्न 1. संसदीय सरकार का क्या अर्थ है ?
उत्तर-संसदीय सरकार में कार्यपालिका अपने कार्यों के लिए संसद् के प्रति उत्तरदायी होती है। वह तब तक अपने पद पर रहती है, जब तक इसको संसद का विश्वास प्राप्त रहता है।

प्रश्न 2. संसदीय सरकार की कोई एक विशेषता बताएं।
उत्तर-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाम-मात्र का सत्ताधारी होता है।

प्रश्न 3. संसदीय सरकार का कोई एक गुण लिखें।
उत्तर-संसदीय सरकार में कार्यपालिका एवं विधानपालिका में पूर्ण सहयोग रहता है।

प्रश्न 4. संसदीय सरकार का कोई एक अवगुण लिखें।
उत्तर-संसदीय सरकार अस्थिर होती है।

प्रश्न 5. सामूहिक उत्तरदायित्व किस सरकार में पाया जाता है ?
उत्तर-संसदीय सरकार में।

प्रश्न 6. अध्यक्षात्मक सरकार किसे कहते हैं ?
उत्तर-अध्यक्षात्मक सरकार उस शासन प्रणाली को कहते हैं जिसमें कार्यपालिका संवैधानिक दृष्टि से विधानपालिका से अपनी नीतियों और कार्यों के लिए स्वतन्त्र होती है।

प्रश्न 7. संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकार में कोई एक अन्तर बताओ।
उत्तर-संसदीय सरकार में राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का मुखिया होता है जबकि अध्यक्षात्मक सरकार में राज्य का अध्यक्ष वास्तविक अध्यक्ष होता है।

प्रश्न 8. अध्यक्षात्मक सरकार की कोई एक विशेषता बताओ।
उत्तर-अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में कार्यपालिका का अध्यक्ष वास्तविक अध्यक्ष होता है। शासन की शक्तियों का प्रयोग अध्यक्ष द्वारा ही किया जाता है।

प्रश्न 9. अध्यक्षात्मक सरकार का कोई एक गुण बताओ।
उत्तर-इसमें सरकार स्थिर रहती है।

प्रश्न 10. अध्यक्षात्मक सरकार का कोई एक अवगुण बताओ।
उत्तर-अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति के निरंकुश बनने का भय बना रहता है।

प्रश्न 11. भारतीय राष्ट्रपति किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर- भारतीय राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका है।

प्रश्न 12. भारतीय प्रधानमन्त्री किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर-भारतीय प्रधानमन्त्री वास्तविक कार्यपालिका है।

प्रश्न 13. इंग्लैण्ड की रानी या राजा किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर-इंग्लैण्ड की रानी या राजा नाममात्र की कार्यपालिका है।

प्रश्न 14. इंग्लैण्ड का प्रधानमन्त्री किस प्रकार की कार्यपालिका है?
उत्तर-इंग्लैण्ड में प्रधानमन्त्री वास्तविक कार्यपालिका है।

PSEB 11th Class Political Science Solutions Chapter 15 सरकारों के रूप-संसदीय और अध्यक्षात्मक सरकारें

प्रश्न 15. संसदीय एवं अध्यक्षात्मक सरकार में से किसे श्रेष्ठ समझा जाता है?
उत्तर-संसदीय सरकार को श्रेष्ठ समझा जाता है।

प्रश्न 16. अमेरिका में किस प्रकार की शासन प्रणाली है?
उत्तर-अमेरिका में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली है।

प्रश्न 17. भारत में संसदीय शासन प्रणाली अपनाने का एक कारण लिखें।
उत्तर-संसदीय परम्पराएं।

प्रश्न II. खाली स्थान भरें-

1. संसदीय शासन प्रणाली में सरकार …………….. की इच्छानुसार शासन को चलाती है।
2. संसदीय सरकार शक्तियों के ……………. के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
3. संसदीय सरकार में शासन की …………… का अभाव रहता है।
4. संकटकाल के समय संसदीय सरकार …………… साबित होती है।
उत्तर-

  1. जनमत
  2. पृथक्करण
  3. कुशलता
  4. कमज़ोर।

प्रश्न III. निम्नलिखित में से सही एवं ग़लत का चुनाव करें-

1. अध्यक्षात्मक सरकार में कार्यपालिका विधानपालिका से स्वतन्त्र होती है।
2. अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति नाममात्र का शासक होता है।
3. अध्यक्षात्मक सरकार में मन्त्रिमण्डल के सदस्य विधानपालिका के सदस्य नहीं होते।
4. अध्यक्षात्मक सरकार में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका में भेद नहीं पाया जाता।
5. अध्यक्षात्मक सरकार शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित है।
उत्तर-

  1. सही
  2. ग़लत
  3. सही
  4. सही
  5. सही।

प्रश्न IV. बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अध्यक्षात्मक शासन में जनमत की अवहेलना हो सकती है, यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) सही है।

प्रश्न 2.
अध्यक्षात्मक शासन में सरकार में राजनीतिक एकरूपता नहीं होती। यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(क) सही है।

प्रश्न 3.
संसदीय सरकार में मन्त्रिमण्डल को महाभियोग द्वारा हटाया जाता है, यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(ख) ग़लत है ।

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प्रश्न 4.
अध्यक्षात्मक सरकार में राष्ट्रपति को अविश्वास प्रस्ताव पास करके हटाया जाता है। यह कथन-
(क) सही है
(ख) ग़लत है
(ग) उपरोक्त दोनों
(घ) कोई नहीं।
उत्तर-
(ख) ग़लत है ।

PSEB 12th Class Maths Book Solutions Guide in Punjabi English Medium

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PSEB 5th Class Hindi रचना कहानी-लेखन (2nd Language)

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Hindi Rachana Kahani Lekhan कहानी-लेखन Exercise Questions and Answers, Notes.

PSEB 5th Class Hindi Rachana कहानी-लेखन (2nd Language)

प्यासा कौवा

एक बार गर्मी का मौसम था। जेठ महीने की दोपहर थी। आकाश से आग बरस रही थी। सभी प्राणी गर्मी से घबरा कर अपने घरों में आराम कर रहे थे। पक्षी अपने घौंसलों में दोपहरी काट रहे थे।

PSEB 5th Class Hindi रचना कहानी-लेखन

ऐसे समय में एक कौवा प्यास से छटपटा रहा था। वह पानी की तलाश में इधर-उधर उड़ रहा था। परन्तु उसे कहीं पानी न मिला। अन्त में वह एक बाग में पहुँचा। वहाँ पानी का घड़ा पड़ा था। कौवा घडे को पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। वह उड़कर घड़े के पास गया।

उसने पानी पीने के लिए घड़े में अपनी चोंच डाली। परन्तु घड़े में पानी बहुत कम था। उसकी चोंच पानी तक न पहुँच सकी। फिर भी – उसने आशा न छोड़ी।

उसी समय उसको एक युक्ति सूझी। वहाँ बहुत से कंकर पड़े थे। उसने एक-एक कंकर घड़े में डालना शुरू कर दिया। थोड़ी देर में पानी ऊपर आ गया। कौवा बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने जी भर कर पानी पिया और ईश्वर को धन्यवाद दिया।

शिक्षा-

  • जहाँ चाह वहाँ राह
  • आवश्यकता आविष्कार की जननी है।
  • यत्न करने पर कोई उपाय अवश्य निकल आता है।

चालाक लोमड़ी

एक लोमड़ी थी। वह बहुत भूखी थी। वह भोजन की खोज में इधर-उधर घूमने लगी। जब सारे जंगल में भटकने के बाद भी कुछ न मिला तो वह गर्मी और भूख से परेशान होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गई। अचानक उसकी नज़र ऊपर की ओर गई। वहाँ पर एक कौवा बैठा हुआ था।

उसके मुँह में रोटी का टुकड़ा था। रोटी देखकर लोमड़ी के मुँह में पानी भर आया। वह कौए से रोटी छीनने का उपाय सोचने लगी। तभी उसने कौए को कहा, “क्यों कौवा भैया। सुना है तुम गीत बहुत अच्छा गाते हो। क्या मुझे गीत नहीं सुनाओगे ?” कौवा अपनी झूठी प्रशंसा को सुन कर बहुत खुश हुआ।

उसने ज्यों ही गाने के लिए मुँह खोला त्यों ही रोटी का टुकड़ा नीचे गिर गया। लोमड़ी ने रोटी का टुकड़ा उठाया और नौ-दो ग्यारह हो गई। कौवा पछताने लगा।

शिक्षा-किसी की झूठी प्रशंसा में कभी नहीं आना चाहिए।

PSEB 5th Class Hindi रचना कहानी-लेखन

दो बिल्लियाँ और बन्दर

किसी नगर में दो बिल्लियाँ रहती थीं। एक दिन उन्हें रोटी का टुकड़ा मिला। वे आपस में लड़ने लगीं। वे उसे आपस में समान भागों में बाँटना चाहती थीं लेकिन उन्हें कोई ढंग न मिला।

उसी समय एक बन्दर उधर आ निकला। वह बहुत चालाक था। उसने बिल्लियों से लड़ने का कारण पूछा। बिल्लियों ने उसे सारी बात सुनाई। वह तराजू ले आया और बोला, “लाओ, मैं तुम्हारी रोटी को बराबर बाँट देता हूँ।” उसने रोटी के दो टुकड़े लेकर

एक-एक पलड़े में रख दिये। जिस पलड़े में रोटी अधिक होती, बन्दर उसे थोड़ी-सी तोड़ कर खा लेता। इस प्रकार थोड़ी-सी रोटी रह गई। बिल्लियों ने अपनी रोटी वापस माँगी। लेकिन बन्दर ने शेष बची रोटी भी मुँह में डाल ली। बिल्लियाँ मुँह देखती रह गईं। शिक्षा-आपस में लड़ना-झगड़ना अच्छा नहीं।

अंगूर खट्टे हैं

एक बार एक लोमड़ी बहुत भूखी थी। वह भोजन की खोज में इधर-उधर गई पर भोजन नहीं मिला। अन्त में वह एक बाग में पहुँची। वहाँ उसने अंगूर की बेलों पर अंगूरों के गुच्छे देखे। इन्हें देखकर उसके मुँह में पानी आ गया। वह इन्हें खाना चाहती थी। अंगूर बहुत ऊँचे थे।

वह इन्हें पाने के लिए उछलने लगी। बार-बार उछलने पर भी उसके हाथ एक भी अंगूर नहीं लगा। अन्त में वह थक गई और निराश होकर यह कहती हुई वापिस लौट गई कि अंगूर खट्टे हैं। मैं इन्हें खाऊँगी तो बीमार पड़ जाऊँगी। शिक्षा-हाथ न पहुँचे थू कौड़ी।

लालची कुत्ता

एक बार एक कुत्ते को बहुत भूख लगी। वह भोजन की खोज में इधर उधर भटका। अन्त में उसे एक रोटी का टुकड़ा मिला। वह उसे अकेले में बैठकर खाना चाहता था। रास्ते में नदी का पुल पार करते समय उसने पानी में झाँका। पानी में उसे अपनी ही परछाईं दिखाई दी।

PSEB 5th Class Hindi रचना कहानी-लेखन

उसने समझा कि यह कोई दूसरा कुत्ता है जिसके पास भी एक रोटी का टुकड़ा है। उसके मन में लालच आ गया। उसने उस दूसरे कुत्ते से भी रोटी छीननी चाही। इसलिए वह ज़ोर से भौंका। भौंकने से उसका अपना रोटी का टुकड़ा भी पानी में जा गिरा। वह अपना टुकड़ा भी खो बैठा।

अब वह पछताने लगा और निराश होकर वापिस लौट गया।

शिक्षा-लालच बुरी बला है।

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.3

Punjab State Board PSEB 12th Class Maths Book Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.32 Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Maths Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.3

Question 1.
Let f:{1, 3, 4} → {1, 2, 5} and g:{ 1, 2, 5} → {1, 3} be given by f = {(1, 2), (3, 5), (4, 1)} and g = {(1, 3), (2, 3), (5,1)}. Write down gof.
Solution.
The functions f :{1, 3, 4} → {1, 2, 5} and g: {1, 2, 5} → {1, 3} are defined as f = {(1, 2), (3, 5), (4,1)} and g = {(1, 3), (2, 3), (5,1)}.
gof (1) = g(f(1)) = g(2) = 3 [∵ f(1) = 2 and g(2) = 3]
gof (3) = g(f(3)) = g(5) = 1 [∵ f(3) = 5 and g(5) = 1]
gof (4) = g(f(4)) = g(1) = 3 [∵ f(4) = 1 and g(1) = 3]
∴ gof = {(1,3), (3,1), (4, 3)}.

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.3

Question 2.
Let f, g and h be functions from R to R. Show that (f + g)oh = foh + goh (f . g)oh = (foh) (goh)
Solution.
To prove (f + g)oh = foh + goh Consider
((f + g)oh)(x) = (f + g)(h(x))
f(h(x)) + g(h(x)) = (foh)(x) + (goh)(x) = {{foh) + (goh)}(x)
((f + g)oh)(x) = {(foh) + (goh)} (x) ∀ x ∈ R
Hence, (f + g)oh = foh + goh.
To prove (f . g)oh = (foh) . (goh)
Consider
((f . g)oh) (x) = (f . g) (h(x)) = f(h(x)) . g(h(x))
= (foh)(x).(goh)(x)
= {(foh) . (goh)}(x)
∴ ((f . g)oh)(x) = {(foh) . (goh)}(x) ∀ x ∈ R
Hence, (f . g)oh = (/oh) . (goh)

Question 3.
Find gof and fog, if
(i) f(x) = |x| and g(x) = |5x – 2|
(ii) f(x) = 8x3 and g(x) = \(x^{\frac{1}{3}}\)
Solution.
(i) f(x) =|x| and g(x) = |5x – 2|
∴ (gof)(x) = g(f (x)) = g(| x |) =| 5| x | – 2 |
(fog(x)) = f(g(x)) = f(| 5x – 2 |) = | | 5x-2 || = |5x – 2|

(ii) f(x) = 8x3 and g(x) = \(x^{\frac{1}{3}}\)
∴ gof(x) = g(f(x))
= g(8x3)
= (8x3)\(\frac{1}{3}\)
= 8x

(fog)(x) = f(g(x))
= f(\(x^{\frac{1}{3}}\))
= 8(\(x^{\frac{1}{3}}\))3
= 8x

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.3

Question 4.
If f(x) = \(\frac{(4 x+3)}{(6 x-4)}\), x ≠ \(\frac{2}{3}\) show that fof(x) = x for all x ≠ \(\frac{2}{3}\) What is the inverse of f?
Solution.
It is given that f(x) = \(\frac{(4 x+3)}{(6 x-4)}\), x ≠ \(\frac{2}{3}\)
(fof)(x) = f(f(x)) = f(\(\frac{(4 x+3)}{(6 x-4)}\))
= \(\frac{4\left(\frac{4 x+3}{6 x-4}\right)+3}{6\left(\frac{4 x+3}{6 x-4}\right)-4}\)
= \(\frac{16 x+12+18 x-12}{24 x+18-24 x+16}=\frac{34 x}{34}\) = x
Therefore, fof(x) = x, for all x ≠ \(\frac{2}{3}\).
⇒ fof = 1.
Hence, the given function f is invertible and the inverse of f is itself.

Question 5.
State with reason whether the following functions have inverse
(i) f: {1, 2, 3, 4} → {10} with  f = {(1, 10), <2,10), (8, 10), <4, 10)}
(ii) g: {5, 6, 7,8} → {1, 2, 3, 4,} with g = {(5, 4), (6,3), (7,4), (8, 2)}
(iii) h:{2, 3, 4, 5} → {7, 9, 11, 13} with h = {(2, 7), (3, 9), (4, 11), (5, 13)}.
Solution.
(i) Function f:{1, 2, 3, 4} {10} defined as
f = {(1,10), (2,10), (3,10), (4,10)}
From the given definition of f, we can see that f is a many-one function as:
f(1) = f(2) = f(3) = f(4) = 10
∴ f is not one-one.
Hence, function f does not have an inverse.

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.3

(ii) Function g:{5, 6, 7,8} → {1,2, 3, 4,} defined as g = {(5, 4), (6, 3), (7, 4), (8, 2)}
From the given definition of g, it is seen that g is a many-one function as : g(5) = g(7) = 4.
∴ g is not one-one,
Hence, function g does not have an inverse.

(iii) Function h:{2, 3, 4, 5,} → {7, 9,11,13} defined as h = {(2, 7), (3, 9), (4,11), (5,13)}
It is seen that all distinct elements of the set {2, 3, 4, 5} have distinct images under h.
∴ Function h is one-one.
Also, h is onto since for every element y of the set {7, 9, 11, 13}, there exists an element x in the set {2, 3, 4, 5} such that h(x) = y.
Thus, h is a one-one and onto function. Hence, h has an inverse.

Question 6.
Show that f: [- 1,1] → R, given by f(x) = \(\frac{x}{x+2}\) is one-one. Find the inverse of the function f: [- 1, 1] → Range f.
[Hint : For y ∈ R Range f, y = f(x) = \(\frac{x}{x+2}\), for some x in [- 1, 1] i.e., x = \(\frac{2 y}{1-y}\)]
Solution.
f: [- 1, 1] → R, is given as f(x) = \(\frac{x}{x+2}\)
Let f(ix) = f(y).
⇒ \(\frac{x}{x+2}=\frac{y}{y+2}\)
⇒ 2x = 2y
⇒ x = y
∴ f is one-one function.
It is clear that f: [- 1,1] Range f is onto.
∴ f: [- 1, 1] → Range f is one-one and onto and therefore, the inverse of the function :
f: [- 1, 1] → Range f exists.
Let g: Range f → [- 1, 1] be the inverse of f.
Let y be an arbitrary element of range f.
Since, f: [- 1, 1] → Range f is onto , we have
y = f(x) for some x ∈ [- 1, 1]
⇒ y = \(\frac{x}{x+2}\)
⇒ xy + 2y = x
⇒ x(1 – y) = 2y
⇒ x = \(\frac{2 y}{1-y}\), y ≠ 1
Now, let us define g: Range f → [- 1, 1] as g(y) = \(\frac{2 y}{1-y}\), y ≠ 1.
Now, (gof)(x) = g(f(x))
= g(\(\frac{x}{x+2}\)) = \(\frac{2\left(\frac{x}{x+2}\right)}{1-\frac{x}{x+2}}\)
= \(\frac{2 x}{x+2-x}=\frac{2 x}{2}\) = x

(fog)(y) = f(g(y))
= f(\(\frac{2 y}{1-y}\)) = \(\frac{\frac{2 y}{1-y}}{\frac{2 y}{1-y}+2}\)
= \(\frac{2 y}{2 y+2-2 y}=\frac{2 y}{2}\) = y
∴ gof = I[- 1, 1] and fog = IRange f
∴ f-1 = g
⇒ f-1(y) = \(\frac{2 y}{1-y}\), y ≠ 1.

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Question 7.
Consider f:R → R given by f(x) = 4x + 3. Show that f is invertible. Find the inverse of f.
Solution.
Here, f: R → R is given by f(x) = 4x +3
Let x, y ∈ R, such that
f(x) = f(y)
⇒ 4x + 3 = 4y + 3
⇒ 4x = 4y
⇒ x = y
Therefore, f is a one-one function. .
Let y = 4x +3
⇒ There exists, x = \(\frac{y-3}{7}\) ∈ R, ∀ y ∈ R
Therefore for any y ∈ R, there exists x = \(\frac{y-3}{4}\) ∈ R such that
f(x) = f(\(\frac{y-3}{4}\)) = 4 (\(\frac{y-3}{4}\)) + 3 = y
Therefore, f is onto function.
Thus, f is one-one and onto and therefore, f-1 exists.
Let us define g: R → R by g(x) = \(\frac{x-3}{4}\)
Now, (gof)(x) = g(f(x)) = g(4x + 3)
= \(\frac{(4 x+3)-3}{4}\) = x

(fog)(y) = f(g(y))
= \(f\left(\frac{y-3}{4}\right)=4\left(\frac{y-3}{4}\right)\) + 3
= y – 3 + 3 = y
Therefore, gof = fog = IR
Hence, f is invertible and the inverse of f is given by
f-1 (y) = g(y) = \(\frac{y-3}{4}\)

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Question 8.
Consider f: R → [4, ∞) given by f(x) = x2 + 4 Show that f is invertible with the inverse f-1 of f given by f-1(y) = \(\sqrt{y-4}\), where R is the set of all non-negative real numbers.
Solution.
Function f: R+ → [4, ∞) is given as f(x) = x2 + 4.

One-one :
Let f(x) = f(y).
⇒ x2 + 4 = y2 + 4
⇒ x2 = y2
⇒ x = y [as x = y ∈ R+]
∴ f is one-one function.

Onto :
For y ∈ [4, ∞), let y = x2 + 4.
⇒ x2 = y – 4 ≥ 0 [as y ≥ 4]
⇒ x = \(\sqrt{y-4}\) > 0
Therefore, for any y ∈ R, there exists x = \(\sqrt{y-4}\) ∈ R such that
f(x) = f(\(\sqrt{y-4}\))
= (\(\sqrt{y-4}\))2 + 4
= y – 4 + 4 = y
∴ f is onto.
Thus, f is one-one and onto and therefore, f-1 exists.
Let us define g:[4, ∞) → R+ by,
g(y) = \(\sqrt{y-4}\)
Now, gof (x) = g(f(x)) = g(x2 + 4)
= \(\sqrt{\left(x^{2}+4\right)-4}=\sqrt{x^{2}}\) = x

and, fog(y) = f(g(y))
= f(\(\sqrt{y-4}\))
= \((\sqrt{y-4})^{2}+4\)
= (y – 4) + 4 = y
∴ gof = fog = IR+
Hence, f is invertible and the inverse of f is given by
f-1 (y) = g(y) = \(\sqrt{y-4}\)

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.3

Question 9.
Consider f: R → [- 5, ∞) given by f(x) = 9x2 + 6x – 5. Show that f is invertible with f-1 (y) = \(\left(\frac{(\sqrt{y+6}-1}{3}\right)\)
Solution.
f: R+ → [- 5, ∞) is given as f(x) = 9x2 + 6x – 5
Let y be an arbitrary element of (- 5, ∞)
Let y = 9x2 + 6x – 5
y = (3x + 1)2 – 1 – 5
= (3x + 1)2 – 6
⇒ (3x + 1)2 = y + 6
⇒ 3x + 1 = \(\sqrt{y+6}\) [as y ≥ – 5 ⇒ y + 6 > 0]
⇒ x = \(\frac{\sqrt{y+6}-1}{3}\)
∴ f is onto, thereby range f = [- 5, ∞]
Let us define g: [- 5, ∞) → R+ as g(y) = \(\frac{\sqrt{y+6}-1}{3}\)
We now have :
(gof)(x) = g(f(x)) = g(9x2 + 6x – 5) = g((3x +1)2 – 6)
= \(\frac{\sqrt{(3 x+1)^{2}-6+6}-1}{3}=\frac{3 x+1-1}{3}\) = x
and, (fog)(y) = f(g(y))
= \(f\left(\frac{\sqrt{y+6}-1}{3}\right)=\left[3\left(\frac{(\sqrt{y+6})-1}{3}\right)+1\right]^{2}-6\)
= \((\sqrt{y+6})^{2}\) – 6 = y + 6 – 6 = y
∴ gof = IR and fog = I[ – 5, ∞]
Hence f is invertible and inverse of f is given by
f-1(y) = g(y) = \(\frac{\sqrt{y+6}-1}{3}\)

Question 10.
Let f: X → Y be an invertible function. Show that f has unique inverse.
[Hint: Suppose g1 and g2 are two inverses of f. Then for all y ∈ Y, fog1 (y) = 1, (y) = fog2 (y). Use one-one ness of f].
Solution.
Let f: X → Y be an invertible function.
Also, suppose f has two inverses (say g1 and g2).
Then, for all y ∈ Y, we have
fog1 (y) = Iy(y) = fog2(y)
⇒ f(g1(y)) = f(g2(y))
⇒ g1(y) = g2(y) [f is invertible ⇒ f is one-one, g is one-one]
⇒ g1 = g2
Hence, f has a unique inverse.

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.3

Question 11.
Consider f: {1, 2, 3} → {a, b, c} given by f(1) = a, f(2) = b and f(3) = c. Find f-1 and show that (f-1)-1 = f.
Solution.
Function f: {1,2, 3} → {a, b, c} is given by f(1) = a, f(2) = b and f(3) = c
If we define g :{a, b, c} → {1, 2, 3} as g(a) = 1, g(b) = 2, g(c) = 3, then we
(fog)(a) = f(g(a)) = f(1) = a
(fog)(b) = f(g(b) = f(2) = b
(fog)(c) = f(g(c)) = f(3) = c
(gof)(2) = g(f(2)) = g(b) = 2
(gof)(3) = g(f(3)) = g(c) = 3
∴ gof = IX and fog = IY, where X = {1, 2, 3} and Y = {a, b, c}. Thus, the inverse of f exists and f-1 = g.
∴ f-1 : {a, b, c} → {1, 2, 3} is given by,
f-1(a) = 1, f-1(b) = 2, f-1(c) = 3
Let us now find the inverse of f-1 i.e., find the inverse of g.
If we define h:{ 1,2, 3} → {a, b, c} as h(1) = a, h(2) = b, h(3) = c, then we have
(goh)(1) = g(h(1l)) = g(a) = 1
(goh) (2) = g(h(2)) = g(b) = 2
(goh) (3) = g(h(3)) = g(c) = 3
and,(hog)(a) = h(g(a)) – h(1) = a
(hog) (b) = h(g(b)) = h(2) = b
(hog)(c) = h(g(c)) = h(3) = c
∴ goh = IX and hog = IY, where X = {1, 2, 3} and Y = {a, b, c}.
Thus, the inverse of g exists and g-1 = h
⇒ (f-1)-1 = h
It can be noted that h = f.
Hence, (f-1)-1 = f.

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.3

Question 12.
Let f: X → Y be an invertible function. Show that the inverse of f1 is f, i.e., (f -1)-1 = f.
Solution.
Let f:X → Y be an invertible function.
Then, there exists a functiong:Y → X such that gof = IX and fog – IY.
Here, f-1 = g.
Now, gof = IX and fog = IY
⇒ f-1 = IX and fof-1 = IY
Hence, f-1: Y → X is invertible and f is the inverse of f-1 i-e., (f-1)-1 = f

Question 13.
If f : R → R be given by fix) = (3 – x3)\(\frac{1}{3}\), then fof(x) is
(A) x\(\frac{1}{3}\)
(B) x3
(C) x
D) (3 – x3)
Solution.
Function f: R → R is given as f(x) = {3 – x3)\(\frac{1}{3}\); f(x) = (3 – x3)\(\frac{1}{3}\)
∴ fof(x) = f(f(x)) = f(3 – x3)\(\frac{1}{3}\)
= [3 – ((3 – x3)\(\frac{1}{3}\))3]\(\frac{1}{3}\)
= [3 – (3 – x3)]\(\frac{1}{3}\)
= (x3)\(\frac{1}{3}\) = x
∴ fof(x) = x
The correct answer is (C)

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.3

Question 14.
Let f: R – {- \(\frac{4}{3}\)} R be a function defined as f(x) = \(\frac{4 x}{3 x+4}\). The inverse of f is the map g: Range f → R given by
(A) g(y) = \(\frac{3 y}{3-4 y}\)

(B) g(y) = \(\frac{4 y}{4-3 y}\)

(C) g(y) = \(\frac{4 y}{3-4 y}\)

(D) g(y) = \(\frac{3 y}{4-3 y}\)
Solution.
Given that f : R – {- \(\frac{4}{3}\)} → R is a function defined as
f(x) = \(\frac{4 x}{3 x+4}\)
i.e., y = \(\frac{4 x}{3 x+4}\)
3 xy + 4y = 4x
4y = 4x – 3xy
4 y = x(4 – 3y)
x = \(\frac{4 y}{4-3 y}\)
∴ f-1(y) = g(y) = \(\frac{4 y}{4-3 y}\)
The correct answer is (B).

PSEB 5th Class Hindi रचना निबंध-लेखन (2nd Language)

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Hindi Rachana Nibandh Lekhan निबंध-लेखन Exercise Questions and Answers, Notes.

PSEB 5th Class Hindi Rachana निबंध-लेखन (2nd Language)

मेरा घर

मेरा घर जालन्धर की बस्ती शेख में है। मेरा घर पक्की ईंटों से बना है। मेरा घर बहुत ही साफ़-सुथरा है। घर में प्रवेश करने के लिए काले रंग का एक बड़ा दरवाज़ा है। यह दरवाजा लोहे का है। बाहर की दीवारों का रंग हल्का हरा है। मैं अपने घर में माता-पिता, एक छोटे भाई और बहन के साथ रहता हूँ।

मेरे घर में चार कमरे हैं जिसमें एक बैठक और दो बैड रूम हैं तथा एक कमरा स्टोर रूम है जिसमें घर का फालतू सामान पड़ा रहता है। एक कमरा हम दो भाई-बहन का है। एक । रसोई घर तथा एक नहाने का छोटा कमरा भी है। रसोई घर में माता जी खाना बनाती हैं। हमारा कमरा बहुत सुन्दर है।

इसकी दीवारों का रंग हल्का पीला है। अपने कमरे में हमने अपनी तस्वीरें लगा रखी हैं। हमारा घर छोटा पर रोशनी वाला तथा हवादार है। मेरे घर में सुख-शान्ति का वास है क्योंकि घर में सभी प्यार से रहते हैं। मुझे मेरा घर बहुत प्रिय है।

PSEB 5th Class Hindi रचना निबंध-लेखन

मेरा मित्र

मोहन मेरा मित्र है। उसके पिता गाँव के नम्बरदार हैं। उसकी माता जी गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती हैं। मैं और मेरा मित्र मोहन पाँचवीं श्रेणी में एक ही स्कूल में पढ़ते हैं। हम दोनों समय पर स्कूल जाते हैं। श्रेणी के कमरे में बड़ी लगन के साथ पढ़ाई करते मैं और मेरा मित्र सफ़ाई का खास ध्यान रखते हैं।

हम दोनों हर रोज़ इकट्ठे ही खेलने जाते हैं। अक्सर हम दोनों स्कूल का काम मिल-जुल कर ही निपटाते हैं। हमारे अध्यापक हम दोनों पर बहुत खुश रहते हैं क्योंकि हम उनकी हर आज्ञा का पालन करते हैं। हम दोनों मित्र हर परीक्षा में अच्छे अंक लेकर पास होते हैं। मुझे अपने मित्र पर गर्व है। भगवान् ऐसा मित्र हर किसी को दे।

मेरा स्कूल

मेरे स्कूल का नाम ‘सरकारी प्राइमरी स्कूल’ है।

यह रेलवे स्टेशन के पास ही है। हमारे स्कूल में दस कमरे हैं। हर कमरे में हवा तथा रोशनी का पूरा प्रबन्ध है। सभी कमरों में बिजली के पंखे लगे हुए हैं। सभी कमरे बहुत अच्छे सजे हुए हैं। मेरे स्कूल में छोटा-सा बगीचा भी है। इसमें सुन्दर फूल खिले हुए हैं। इन फूलों से हमारे स्कूल की सुन्दरता और भी बढ़ जाती है। स्कूल में एक खेल का मैदान भी है। हम आधी छुट्टी के समय यहाँ खेलते हैं। हमारे स्कूल में सभी अध्यापक बहुत अच्छे हैं।

उनका पढ़ाने का ढंग बड़ा सरल है। इसलिए हमारे स्कूल के परिणाम सदा अच्छे रहते हैं। सच पूछो तो हमारा स्कूल हमारे नगर का सबसे अच्छा स्कूल है।

मेरा प्रिय अध्यापक

मेरे स्कूल में बहुत-से अध्यापक हैं। लेकिन श्री राजेन्द्र कुमार जी मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। वह मेरे प्रिय अध्यापक हैं। उनके पढ़ाने का ढंग बहुत सरल है। वह विद्यार्थियों से बड़े प्रेम के साथ व्यवहार करते हैं।

उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की है। वह स्वयं उच्च विचारों वाले तथा नम्र-स्वभाव के व्यक्ति हैं। वह स्वयं भी सदा सत्य बोलते हैं और हमें भी सदा सत्य के पथ पर चलने की शिक्षा देते हैं। वह सदा समय पर स्कूल आते हैं।

वह बहुत ही दयालु हैं। वह गरीब तथा कमज़ोर बच्चों की सहायता भी करते हैं। वह एक अच्छे खिलाड़ी भी हैं इसी कारण वह हमें भी खेलने की प्रेरणा देते हैं। ईश्वर उनकी आयु लम्बी करे।

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होली

होली रंगों का त्योहार है। होली घर-घर खुशियाँ बाँटती है। यह एक ऐसा त्योहार है, जिसमें न कोई. बड़ा होता है, न कोई छोटा माना जाता है। होली में जात-पात का भेद भी समाप्त हो जाता है। गाँव हो या शहर सब लोग मिल कर होली खेलते हैं। एकदूसरे पर गुलाल डालते हैं। प्यार से सभी होली की हुड़दंग मचाते हैं। होली के दिन सभी के चेहरे लाल, नीले, काले रंगों से रंगे होते हैं। होली पर एक-दूसरे को उपहार भी दिये जाते हैं। होली हमारे भाई-चारे को मज़बूत बनाती है। होली हमें भक्त प्रह्लाद की याद दिलाती है।

होली को वसन्त ऋतु का उपहार माना जाता है। यह त्योहार हम सब को सभी प्रकार के झगड़े खत्म करने की प्रेरणा देता है। आपसी भाईचारे को बढ़ाना ही होली का सच्चा सन्देश है।

जन्म दिन कैसे मनाया

इस बार मैंने अपना जन्म दिन बहुत ही सादगी से मनाया। यह मेरा नवम् जन्म दिन था। इस दिन प्रातः काल मैंने नहा धोकर नए कपड़े पहने और गुरुद्वारे में माथा टेकने गया। आते हुए मार्ग में शिव जी के मन्दिर में भी हो आया। मैंने अपने माता-पिता के चरण स्पर्श किए। उन्होंने मुझे दीर्घायु होने का आशीर्वाद प्रदान किया। मेरे माता-पिता और मेरी बहन ने मुझे सुन्दर-सुन्दर उपहार दिए और मैंने भी अपनी नन्हींसी प्यारी बहन को उपहार के रूप में गुड़िया प्रदान की। मेरे सभी मित्रों को मेरे जन्म दिन का पता एक दिन पहले ही चल गया था।

जन्म दिन के दिन शाम से ही मित्रों की मंडली मेरे घर आ पहुँची। किन्हीं के हाथों में गुलदस्ते थे तो किन्हीं के हाथों में उपहार के पैकेट। मेरा मन मित्र-मंडली को पाकर झूम उठा। मेरे माता जी ने चाय-पार्टी का पहले से ही प्रबन्ध कर रखा था। पिता जी स्वयं बढ़िया-बढ़िया मिठाइयाँ लेकर आए थे। सभी ने मुझे बधाइयाँ दीं। हमने केक काटा और गाने लगाकर खूब नाचे। हमने अपने जन्मदिन पर खूब मजा किया। इस बार का जन्मदिन मुझे सदा याद रहेगा।

मेरी श्रेणी का कमरा

मैं पाँचवीं श्रेणी का छात्र हूँ। अपने गाँव के स्कूल में पढ़ता हूँ। हमारा स्कूल तालाब के किनारे ऊँचे स्थान पर स्थित है। स्कूल में प्रवेश करते ही दाईं ओर मेरी श्रेणी का कमरा है। इसके बाहर रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ हैं। ये मेरे श्रेणी के कमरे की सुन्दरता को चार चाँद लगा रही हैं। मेरी श्रेणी का कमरा बहुत ही साफ़-सुथरा और शान्त है। किसी भी प्रकार का यहाँ कोई शोर नहीं है। इसी कारण सभी छात्रों का दिल पूरी तरह पढ़ाई में लगा रहता है।

‘मेरी श्रेणी का कमरा हवादार है। इसमें किसी प्रकार की घुटन अनुभव नहीं होती। गर्मियों में बिजली के पंखे हवा देते हैं। सर्दियों में खिड़कियाँ बन्द करके ठंडी हवा से बचाव होता है। श्रेणी के ऐसे कमरे प्रत्येक स्कूल में होने चाहिए। साथ ही हमें अपने श्रेणी के कमरे की स्वयं सफ़ाई का ध्यान रखना चाहिए।

PSEB 5th Class Hindi रचना निबंध-लेखन

दीवाली

दीवाली हमारे देश का एक पवित्र और प्रसिद्ध त्योहार है। यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। यह दशहरे के बीस दिन बाद आता है। इस दिन भगवान् राम लंका के राजा रावण को मार कर तथा वनवास के चौदह वर्ष खत्म कर अयोध्या लौटे थे। तब लोगों ने उनके स्वागत में रात को दीये जलाए थे। उनकी पवित्र याद में यह दिन बड़े सम्मान से मनाया जाता है। इस दिन सिक्खों के छठे गुरु गुरु हरगोबिन्द जी ग्वालियर के किले से मुक्त होकर लौटे थे अतः इसलिए सिक्ख भी बड़े उत्साह से इस त्योहार को मनाते हैं।

दीवाली से कई दिन पहले ही इसकी तैयारी आरम्भ हो जाती है। लोग घरों की लिपाई-पुताई करते हैं। कमरों को सजाते हैं। घरों का कूड़ा-कर्कट बाहर निकालते हैं। अमावस को दीपमाला मनाई जाती है। – इस दिन लोग मित्रों को बधाई देते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं।

बच्चे और युवा नए-नए वस्त्र पहनते हैं। रात को आतिशबाज़ी चलाते हैं। लोग रात को लक्ष्मी की पूजा करते हैं। कुछ लोग दुर्गा सप्तशति का पाठ भी करते हैं। दीवाली हमारा धार्मिक त्योहार है। इस दिन शराब आदि का सेवन नहीं करना चाहिए न ही इस दिन जुआ आदि खेलना चाहिए। इसकी पवित्रता बनाए रखने के लिए इसे उचित रीति से मनाना चाहिए।

दशहरा

दशहरा प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह आश्विन मास की शुक्ला दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन श्री राम ने रावण पर विजय पाई थी। भगवान् राम के वनवास के दिनों में रावण छल से सीता को हर ले गया था। राम ने हनुमान और सुग्रीव आदि मित्रों की सहायता से लंका पर हमला किया तथा रावण को मार कर लंका पर विजय पाई। तभी से यह दिन मनाया जाता है।

दशहरा रामलीला का आखिरी दिन होता है। भिन्नभिन्न स्थानों में अलग-अलग प्रकार से यह दिन मनाया जाता है। हिमाचल में कुल्लू का दशहरा सबसे प्रसिद्ध है, वहाँ यह त्योहार कई दिनों तक मनाया जाता है। दशहरे के दिन रावण, कुम्भकर्ण तथा मेघनाथ के कागज़ के पुतले बनाए जाते हैं।

इस दिन कुछ लोग शराब पीते हैं और लड़ते हैं। यह ठीक नहीं। यदि ठीक ढंग से इस त्योहार को मनाया जाए तो बहुत लाभ हो सकता है।

वर्षा ऋतु

भारत में मई और जून की कड़कती गर्मी के बाद जुलाई और अगस्त में वर्षा का आगमन होता है। वर्षा का स्वागत किसान नाच-गा कर करते हैं, स्त्रियाँ झूला झूलती हैं तथा बच्चे नंग-धडंग हो कर वर्षा में गलियों और बाजारों में घूमते हैं। चारों तरफ हरियाली छा जाती है। जल ग्रहण कर पौधे और वृक्ष खुशी से झूम उठते हैं। तालाब और जौहड़ पानी से भर जाते हैं। जगह-जगह मेंढक टर-टराने शुरू हो जाते हैं।

नदी-नालों में बरसात का पानी भर जाने से नवयौवन का संचार हो जाता है। समय पर यदि अच्छी वर्षा हो जाए तो देश में अन्न का संकट टल जाता है। वर्षा ऋतु काफ़ी कष्टप्रद भी है। यह ऋतु अपने साथ अनेक मुसीबतें भी ले आती है। कई स्थानों पर बाढ़ें आ जाती हैं। भारी हानि होती है। वर्षा ऋतु में कई बीमारियाँ भी फैल जाती हैं। फिर भी वर्षा ऋतु का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है।

PSEB 5th Class Hindi रचना निबंध-लेखन

प्रातः भ्रमण

प्रातः भ्रमण शरीर को स्वस्थ रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह न केवल शरीर को स्वस्थ रखता है बल्कि चुस्ती-स्फूर्ति भी प्रदान करता है। प्रातःकाल सैर करने से सारा दिन काम करने में मन लगता है और थकान भी महसूस नहीं होती। मैं प्रतिदिन अपने मित्र मोहन के साथ प्रात:काल सैर के लिए निकलता हूँ। वह सुबह मेरे घर आता है फिर हम इकट्ठे ही सैर को निकल पड़ते हैं।

रास्ते में कई और लोग सैर के लिए जाते हुए मिलते हैं। हम एक बाग़ में पहुँच कर थोड़ा सैर करते हैं फिर कुछ व्यायाम करते हैं। बाग़ में सुबह के समय सुन्दर और ताजी हवा चलती है। फूलों की सुगन्ध से सारा

वातावरण महक उठता है। घास, फूलों और पत्तियों पर ओस की बूंदें मोतियों के समान चमकती हैं। हम कुछ देर हरी-हरी घास पर नंगे पाँव चलते हैं। ऐसा करने से आँखों की रोशनी बढ़ती है। कुछ समय पश्चात् सूर्य-देवता अपने दर्शन देने लगते हैं। प्रात:कालीन सूर्य की किरणें शरीर के लिए अच्छी होती हैं। थोड़ा विश्राम करने के पश्चात् हम घर की ओर चल पड़ते हैं। सुबह की सैर हमें नीरोग रखती हैं और हमारी बुद्धि भी तीक्षण होती है।

26 जनवरी-गणतन्त्र दिवस

26 जनवरी हमारा गणतन्त्र दिवस है। यह राष्ट्रीय उत्सवों में विशेष स्थान रखता है, क्योंकि भारतीय गणतन्त्रात्मक लोकराज का अपना बनाया संविधान इसी पुण्य तिथि को लागू हुआ था। इसी दिन सन् 1950. ई० को भारत में गर्वनर जनरल के पद की समाप्ति हुई थी और शासन का मुखिया राष्ट्रपति बनाया गया था।

सन् 1929 में जब लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ तो उसमें कांग्रेस के प्रधान श्री जवाहरलाल नेहरू बने थे। उन्होंने यह आदेश निकाला था कि 26 जनवरी के दिन प्रत्येक भारतवासी राष्ट्रीय झण्डे के नीचे खड़ा होकर प्रतिज्ञा करे कि हम भारत के लिए आज़ादी की मांग करेंगे और उसके लिए आखिरी. दम, तक संघर्ष (जद्दो-जहद) करेंगे। तब से हर साल 26 जनवरी का पर्व मनाने की परम्परा (रिवाज़) चल पड़ी।

चाहे यह समारोह देश के हर बड़े-छोटे शहर में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है परन्तु भारत की राजधानी दिल्ली में इसकी शोभा देखते ही बनती है। हर प्रदेश के लोकनर्तक दल लोक नाच तथा शिल्प, आदि का प्रदर्शन करते हैं। कई ऐतिहासिक महत्त्व की वस्तुएं भी दिखाई जाती हैं। भारत के सैनिक दस्ते भी इस अवसर पर अपनी शक्ति प्रकट-करते हैं। छात्र-छात्राएँ भी इसमें भाग लेती हैं और कला का प्रदर्शन करती हैं।

स्वतन्त्रता दिवस-15 अगस्त

आ प्यारे स्वतन्त्र देश आ, स्वागत करता हूँ तेरा।

तुझे देखकर आज हो रहा, प्रमुदित दूना मन मेरा।

15 अगस्त, सन् 1947 का दिन भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाने योग्य है। उस दिन भारत माता की गुलामी के बन्धन टूक-टूक हुए थे। इस आज़ादी को प्राप्त करने के लिए अनेक देशभक्तों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। पण्डित जवाहरलाल जी स्वतन्त्र भारत के पहले प्रधानमन्त्री बने।

संसद् भवन पर तिरंगा झण्डा लहराया गया था। उस दिन दिल्ली के लाल किले पर पं० जवाहर लाल नेहरू ने अपने हाथों से तिरंगा झण्डा लहराया था। लाखों लोगों ने उसमें भाग लिया। अब स्वतंत्रतादिवस के अवसर पर देश का वर्तमान प्रधानमंत्री दिल्ली में ध्वजारोहण करता है।

PSEB 5th Class Hindi रचना निबंध-लेखन

व्यायाम

व्यायाम शरीर को ठीक रखने का सबसे अच्छा साधन है। व्यायाम का अर्थ है- शरीर को हिलानाडुलाना। हमारा शरीर एक मशीन की भान्ति है। इसे ठीक रखना अति आवश्यक है। खेल खेलना, कुश्ती लड़ना और सैर करना ये सब व्यायाम ही हैं। _ व्यायाम करने से हमारे शरीर को अनेक लाभ होते हैं।

व्यायाम करने वाला मनुष्य कभी अति मोटा नहीं हो सकता। हमारी पाचन शक्ति बढ़ती है और अनेक रोगों से छुटकारा मिलता है। इससे शरीर को ताकत मिलती है और स्फूर्ति आती है। व्यायाम प्रायः खाली पेट करना चाहिए। इसके लिए प्रातःकाल का समय ही अच्छा होता है।

प्रात:काल की सैर सबसे अच्छा व्यायाम है। व्यायाम सदा खुली हवा में करना चाहिए। व्यायम सब को करना चाहिए। मुझे व्यायाम का बड़ा चाव है। मैं प्रतिदिन सैर करने जाता हूँ। किसी खुले मैदान में पहुँच कर मैं अपने मित्रों के साथ फुटबाल खेलता हूँ। मुझे किसी प्रकार का रोग नहीं है। शरीर भी हृष्ट-पुष्ट है। इसका एकमात्र कारण व्यायाम है।

हमारा देश

हमारे देश का नाम भारत है। यह हमारी मातृभूमि है। दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र भारत के नाम पर इसका भारत नाम पड़ा। यह एक विशाल देश है। जनसंख्या की दृष्टि से यह संसार में दूसरे स्थान पर है। इसकी जनसंख्या 125 करोड़ से भी ज्यादा है। यहाँ पर अलग-अलग जातियों के लोग रहते हैं।

भारत के उत्तर में हिमालय है और शेष तीनों ओर समुद्र है। स्थान-स्थान पर हरे-भरे वन इसकी शोभा है। यह एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की 80% जनता गाँवों में रहती है। यहाँ गेहूँ, मक्का-बाजरा, ज्वार, चना, धान, गन्ना आदि फसलें होती हैं। यहाँ की धरती बहुत उपजाऊ है।

यहाँ गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियाँ बहती हैं। इसकी भूमि से लोहा, कोयला, सोना आदि कई प्रकार के खनिज पदार्थ निकलते हैं।

यहाँ पर कई धर्मों के लोग निवास करते हैं। सभी प्रेम से रहते हैं। यहाँ पर अनेक तीर्थस्थल हैं। ताजमहल, लालकिला, सारनाथ, शिमला, मंसूरी, श्रीनगर आदि पर्यटन स्थल हैं जो देखने योग्य हैं। यहाँ पर कई महापुरुषों ने जन्म लिया। राम-कृष्ण, गुरुनानक, दयानन्द, रामतीर्थ, तिलक, गांधी आदि इस देश की शोभा थे। यहाँ के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद हैं। यह देश दिन दुगुनी रात चौगुनी उन्नति कर रहा है।

PSEB 5th Class Hindi रचना निबंध-लेखन

खेलों का लाभ

विद्यार्थी जीवन में खेलों का बड़ा महत्त्व है। पुस्तकों में उलझ कर थका-मांदा विद्यार्थी जब खेल के मैदान में जाता है तो उसकी थकावट तुरन्त गायब हो जाती है। विद्यार्थी अपने आप में चुस्ती और ताज़गी अनुभव करता है। मानव जीवन में सफलता के लिए मानसिक, शारीरिक शक्तियों के विकास से जीवन सम्पूर्ण बनता है। स्वस्थ, प्रसन्न, चुस्त और फुर्तीला रहने के लिए शारीरिक शक्ति का विकास ज़रूरी है। शरीर का विकास खेल-कूद पर निर्भर करता है।

यदि हम सारा दिन कार्य करते हैं तो शरीर में घबराहट, चिड़चिड़ापन या सुस्ती छा जाती है। ज़रा खेल के मैदान में जाइये, फिर देखिए घबराहट, चिड़चिड़ापन या सुस्ती कैसे दूर भागती है। शरीर हल्का-फुल्का और साहसी बन जाता है। मन में और अधिक कार्य करने की लगन पैदा होती है।

खेलों में भाग लेने से विद्यार्थी खेल के मैदान में से अनेक शिक्षाएं ग्रहण करता है। खेलें संघर्ष द्वारा विजय प्राप्त करने की भावना पैदा करती हैं। खेलें हँसते-हँसते अनेक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करना सिखा देती हैं। खेल के मैदान में विद्यार्थी के अन्दर अनुशासन में रहने की भावना पैदा होती है। सहयोग करने तथा भ्रातृभाव की आदत बनती है।

मेरा प्रिय खेल कबड्डी

आज हमारे भारत देश में अनेक खेल खेले जाते हैं। उन सब खेलों में कबड्डी का खेल मेरा प्रि: खेल है। यह खेल सब खेलों में सस्ता खेल है। आज यह खेल भी राष्ट्रीय खेल में गिना जाता है। यह दो प्रकार का है-पंजाबी कबड्डी और नेशनल कबड्डी।

यह खेल भी दो पक्षों में खेला जाता है। इस खेल की प्रत्येक टीम में सात खिलाड़ी होते हैं। यह खेल केन्द्र में रेखा डालकर खेला जाता है। यह खेल किसी खुले मैदान में खेला जाता है। इस खेल में यदि किसी एक खिलाड़ी का सांस टूट जाता है या विपक्ष के खिलाड़ी उसे छू लेते हैं या पकड़ लेते हैं तो रैफरी उसे मरा हुआ घोषित कर देता है। इस प्रकार विपक्ष एक अंक प्राप्त कर लेता है।

यदि वह खिलाड़ी दूसरे पक्ष के जितने खिलाड़ियों को छूकर अपने पक्ष में लौट आता है तो रैफरी विपक्ष के उतने ही खिलाड़ियों को मरा हुआ घोषित कर देता है। इस प्रकार यह बीस मिनट तक चलता है। बीस मिनट बाद रैफरी अर्धावकाश की सीटी मार देता है। अर्धावकाश पांच मिनट का होता है।

इस समय में खिलाड़ी जलपान करते हैं। इसके अतिरिक्त दोनों टीमों के प्रशिक्षक अपने खिलाड़ियों की गलतियों को बताते हैं। पाँच मिनट बाद रैफरी की सीटी के बाद फिर खेल उसी क्रम से शुरू होता है और बीस मिनट के बाद फिर समाप्त हो जाता है। पहले तथा दूसरे समय में जो टीम ज्यादा नंबर लेती है वही विजयी होती है।

PSEB 5th Class Hindi रचना निबंध-लेखन

ग्रीष्म ऋतु

बसन्त की समाप्ति पर ग्रीष्म का आगमन होता है। ग्रीष्म ऋतु ज्येष्ठ और आषाढ़ महीनों में पड़ती है। बसन्त में चलने वाली मन्द-मन्द हवा ग्रीष्म के आते ही गर्म हवा में बदल जाती है जिसे दूसरे शब्दों में ‘लू’ कहते हैं।

ग्रीष्म के प्रारम्भ होते ही दिन भी मानो गर्मी से फैलने लगते हैं। सूर्य का उदय शीघ्र ही हो जाता है और फिर अस्ताचल की ओर उसका गमन भी देर से होता है। दोपहर के समय तो मानो आकाश से अंगारे बरसते हैं। एक ओर जलती हुई लू तो दूसरी ओर जलाती हुई भूमि। इस समय बाहर निकलना भी एक समस्या बन जाता है। पशु-पक्षी भी इस समय पेड़ों के नीचे विश्राम करते हैं।

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.2

Punjab State Board PSEB 12th Class Maths Book Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.2 Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Maths Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.2

Question 1.
Show that the function F: R → R, defined by f(x) = \(\frac{1}{x}\) is one-one and onto, where R, is the set of all non-zero real numbers. Is the result true, if the domain R. is replaced by N with co-domain being same as R?
Solution.
It is given that f: R. → R. is defined by f(x) = \(\frac{1}{x}\)
One-one :
f(x) = f(y)
⇒ \(\frac{1}{x}\) = \(\frac{1}{y}\)
⇒ x = y
∴ f is one-one.

Onto :
It is clear that for y ∈ R., there exists x = \(\frac{1}{y}\) ∈ R. (Exists as y ≠ 0) such that f(x) = \(\frac{1}{\left(\frac{1}{y}\right)}\) = y.
∴ f is onto.
Thus, the given function (f) is one-one and onto.
Now, consider function g :N →R, defined by
g(x) = \(\frac{1}{x}\)
We have,
g(x1) = g(x2)
⇒ \(\frac{1}{x_{1}}=\frac{1}{x_{2}}\)
x1 = x2
∴ g is one-one.
Further, it is clear that g is^not onto as for 1.2 ∈ R, there does not exist any x in N such that g(x) = \(\frac{1}{1.2}\).
Hence, function g is one-one but not onto.

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Question 2.
Check the injectivity and surjectivity of the following functions
(i) f: N → N given by f(x) = x2
(ii) f: Z → Z given by f(x) = x2
(iii) f: R → R given by f(x) = x2
(vi) f: N → N given by f(x)) = x3
(v) f: Z → Z given by f(x) = x3
Solution.
(i) f: N → N is given by,
f(x) = x2
It is seen that for x, y ∈ N, f(x) = f(y)
⇒ x2 = y2
⇒ x = y
∴ f is injective.
Now, 2 ∈ N. But, there does not exist any x in N such that f(x) = x2 = 2.
∴ f is not surjective.
Hence, function f is injective but not surjective.

(ii) f: Z → Z is given by,
f(x) = x2
It is seen that f(- 1) = f(1) = 1, but = – 1 ≠ 1.
∴ f is not injective.
Now, – 2 ∈ Z. But, there does not exist any element x ∈ Z such that f(x) = x2 = – 2
∴ f is not surjective.
Hence, function f is neither injective nor surjective.

(iii) f: R → R is given by, f(x) = x2
It is seen that f(- 1) = f(1) = 1, but -1 ≠ 1.
∴ f is not injective.
Now, – 2 ∈ R. But , there does not exist any element x ∈ R such that f(x) = x2 = – 2.
∴ f is not surjective.
Hence, function f is neither injective nor surjective.

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(iv) f : N → N given by,
f(x) = x3
It is seen that for x, y ∈ N, f(x) = f(y)
⇒ x3 = y3
⇒ x = y
∴ f is injective.
Now, 2 ∈ N. But, there does not exist any element x in domain N such that f(x) = x3 = 2.
∴ f is not surjective
Hence, function f is injective but not surjective.

(v) f: Z → Z is given by, f(x) = x3
It is seen that for x, y ∈ Z, f(x) = f(y)
⇒ x3 = y3
⇒ x = y.
∴ f is injective.
Now, 2 ∈ Z. But, there does not exist any element x in domain Z such that f(x) = x3 = 2.
∴ f is not surjective.
Hence, function f is injective but not surjective.

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Question 3.
Prove that the greatest integer function f: R → R given by f(x) = [x], is neither one-one nor onto, where [x] denotes the greatest integer less than or equal to x.
Solution.
f: R → R is given by,
f(x) = [x]
It is seen that /(1.2) = [1.2] = 1,
f(1.9) = [1.9] = 1.
∴ f(1.2) = f(1.9), but 1.2 ≠ 1.9.
∴ f is not one-one.
Now, consider 0.7 ∈ R.
It is known that f(x) = [x] is always an integer. Thus, there does not exist any element x ∈ R such that f(x) = 0.7.
∴ f is not onto.
Hence, the greatest integer function is neither one-one nor onto.

Question 4.
Show that the modulus function f: R → R given by f(x) = |x|, is neither one-one nor onto, where x is x, if x is positive or 0 and |x| is – x, if x is negative.
Solution.
f: R → R is given by,
f(x) = |x| = {x, if x ≥ 0; – x if x < 0
It is seen that f(- 1) = |- 1| = 1, f(1) = |1| = 1.
∴ f(- 1) = f(1),but – 1 ≠ 1.
∴ f is not one-one.
Now, consider – 1 ∈ R.
It is known that f(x) = |x| is always non-negative,. Thus, there does not exist any element x in domain R such that f(x) = |x| = – 1.
∴ f is not onto.
Hence, the modulus function is neither one-one nor onto.

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Question 5.
Show that the signum function f: R → R, given by
PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.2 1
is neither one-one nor onto.
Solution.
f: R → R is given by,

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.2 1

It is seen that f(1) = f(2) = 1, but 1 ≠ 2.
∴ f is not one-one.
Now, as f(x) takes only 3 values (1, 0, or – 1) for the element – 2 in co-domain R, there does not exist any x in domain R such that f(x) = – 2.
∴ f is not onto.
Hence, the signum function is neither one-one nor onto.

Question 6.
Let A = {1, 2, 3,}, B = {4 5, 6, 7} and let f = {(1, 4), (2, 5), (3, 6)} be a function from A to B. Show that f is one-one.
Solution.
It is given that A = {1, 2, 3}, B = {4, 5, 6, 7}.
f: A → B is defined as f = {(1, 4), (2, 5), (3, 6)}.
∴ f(1) = 4, f(2) = 5, f(3) = 6
It is seen that the images of distinct elements of A under f are distinct. Hence, function f is one-one.

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Question 7.
In each of the following cases, state whether the function is one-one, onto or bijective. Justify your answer.
(i) f: R → R defined as f(x) = 3 – 4x
(ii) f: R → R defined as f(x) = 1 + x3
Solution.
(i ) f: R → R is defined as f(x) = 3- 4x.
Let x1, x2 ∈ R such that f(x1) = f(x2)
⇒ 3 – 4x1 = 3 – 4x2
⇒ – 4x1 = – 4x1
⇒ x1 = x2
∴ f is one-one.
For any real number (y) in R, there exists \(\frac{3-y}{4}\) in R such that
f(\(\frac{3-y}{4}\)) = 3 – 4(\(\frac{3-y}{4}\)) = y
∴ f is onto.
Hence, f is bijective.

(ii) f: R → R is defined as f(x) = 1 + x2
Let x1, x2 ∈ R such that f(x1) = f(x2)
⇒ 1 + x12 = 1 + x22
⇒ x12 = ± x22
⇒ x1 = x2
⇒ f(x1) = f(x2) does not imply that x1 = x2.
For instance, f(1) = f(- 1) = 2
∴ f is not one-one.
Consider an element – 2 in co-domain R.
k is seen that f(x) = 1 + x2 is positive for all x ∈ R.
Thus, there does not exist any x in domain R such that f(x) = – 2.
∴ f is not onto.
Hence, f is neither one-one nor onto.

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Question 8.
Let A and B be sets. Show that f: A × B – B × A such that f (a, b) (b, a) is bijective function.
Solution.
f: A × B → B × A is defined as f(a, b) = (b, a).
Let(a1, b1), (a2, b2) ∈ A × B such that f(a1, b1) = f(a2, b2)
⇒ (b1, a1) = (b2, a2)
⇒ b1 = b2 and a1 = a2
⇒ (a1, b1) = (a2, b2)
∴ f is one – one.
Now, let (b, a) ∈ B × A be any element.
Then, there exists (a, b) ∈ A × B such that f(a, b) = (b, a). [by definition of f]
∴ f is onto.
Hence, f is bijective.

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Question 9.
Let f: N → N be defined by

(n) = PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.2 2

State whether the function is bijective. Justify your answer.
Solution.

PSEB 12th Class Maths Solutions Chapter 1 Relations and Functions Ex 1.2 2

It can be observed that:
f(1) = \(\frac{1+1}{2}\) = 1 amnd f(2) = \(\frac{2}{2}\) = 1 [by definition of f]
∴ f(1) = f(2), where 1 ≠ 2.
∴ f is not one-one.
Consider a natural number (n) in co-domain N.

Case I: n is odd.
∴ n = 2r + 1 for some r ∈ N. Then, there exists 4r + 1 ∈ N such that
f(4r + 1) = \(\frac{4 r+1+1}{2}\) = 2r+ 1

Case II : n is even,
∴ n – 2r for some r ∈ N. Then there exists 4r ∈ N such that 4r
f(4r) = \(\frac{4r}{2}\) = 2r.
∴ f is onto.
Hence, f is not a bijective function.

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Question 10.
Let A = R – {3} and B = R – {1}. Consider the function f: A → B defined by f(x) = \(\left(\frac{x-2}{x-3}\right)\). Is f one-one and onto? Justify your answer.
Solution.
Here, A = R – {3}, B = R – {1}
and f: A → B is defined as f(x) = \(\left(\frac{x-2}{x-3}\right)\)
Let x, y ∈ A such that f(x) = f(y).
⇒ \(\frac{x-2}{x-3}=\frac{y-2}{y-3}\)
⇒ (x – 2) (y – 3) = (y – 2) (x – 3)
⇒ xy – 3x – 2y + 6 = xy – 3y – 2x + 6
⇒ – 3x – 2y = – 3y – 2x
⇒ 3x – 2x = 3y – 2y
⇒ x = y
∴ f is one-one.
Let y ∈ B = R – {1}. Then, y ≠ 1.
The function f is onto if there exists x ∈ A such that f(x) = y.
Now, f(x) = y
⇒ \(\frac{x-2}{x-3}\) = y
⇒ x – 2 = xy – 3y
⇒ x(1 – y) = – 3y + 2
⇒ x = \(\frac{2-3 y}{1-y}\) ∈ A

Thus, for any y B, there exists \(\frac{2-3 y}{1-y}\) ∈ A such that
f(\(\frac{2-3 y}{1-y}\)) = \(\frac{\left(\frac{2-3 y}{1-y}\right)-2}{\left(\frac{2-3 y}{1-y}\right)-3}\)

= \(\frac{2-3 y-2+2 y}{2-3 y-3+3 y}=\frac{-y}{-1}\) = y

∴ f is onto.
Hence, function f is one-one and onto.

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Question 11.
Let f: R → R be defined as f(x) = x4. Choose the correct answer.
(A) f is one-one onto
(B) f is many-one onto
(C) f is one-one but not onto
(D) f is neither one-one nor onto
Solution.
f : R → R is defined as f(x) = x4 Let x, yeR such that f(x) = f(y).
⇒ x4 = y4
⇒ x = ±y
∴ f(x1) = f(x2) does not imply that x1 = x2.
For instance,
f(1) = f(- 1) = 1
∴ f is not one-one.
Consider an element 2 in co-domain it. It is clear that there does not exist any x in domain R such that f(x) – 2 .
∴ f is not onto.
Hence, function f is neither one-one nor onto.
The correct answer is (D).

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Question 12.
Let f: R → R be defined as f(x) = 3x. Choose the correct answer.
(A) f is one-one onto
(B) f is many-one onto
(C) f is one-one not onto
(D) f is neither one-one nor onto
Solution.
f: R → R is defined as f(x) = 3x.
Let x, y ∈ R such that f(x) = f(y).
⇒ 3x – 3y
⇒ x = y .
∴ f is one-one.
Also any real number (y) in co-domain R, there exists \(\frac{y}{3}\) in R such that
f(\(\frac{y}{3}\)) = 3(\(\frac{y}{3}\)) = y
∴ f is onto.
Hence, function f is one-one and onto.
The correct answer is (A).