PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 16 श्रवण कुमार (2nd Language)

श्रवण कुमार अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिन्दी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਆਗਿਆਕਾਰੀ = आज्ञाकारी
  • ਤੀਰਥ-ਯਾਤਰਾ = तीर्थ-यात्रा
  • ਚਿੰਤਾ = चिंता
  • ਸੇਵਾ = सेवा
  • ਦਸ਼ਰਥ = दशरथ
  • ਜੰਗਲੀ = जंगली

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिन्दी शब्दों को लिखो :

  • ਸ਼ਰਵਨ = श्रवण
  • ਅੰਨ੍ਹਾਂ = अन्धा
  • ਭਾਂਡਾ = पात्र, बरतन
  • ਤੀਰ = बाण
  • ਛਾਤੀ = सीना

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) ज् + अ = ज्ञ = आज्ञा
प् + य = ष्य = मनुष्य
श् + र = श्र = श्रवण
श् + य = श्य= अवश्य
त् + र = त्र = पात्र, एकमात्र
न् + ध = न्ध = अन्धा
च् + छ = च्छ = इच्छा
ध् + य = ध्य = अयोध्या
क् + त = क्त = वक्त
प् + य = प्य = प्यास
त् + य = त्य त्य = त्याग
न् + य = न्य = धन्य

(ख) न् + न = न्न = भिन्न

श्रवण कुमार शब्दार्थ Meanings

  • आज्ञाकारी = आदेश का पालन करने वाला
  • एकमात्र = अकेला
  • बहँगी = बाँस के फट्टे के दोनों छोरों पर छीका लटकाकर बनाया हुआ बोझ ढोने का साधन, काँवर।
  • तरकीब = उपाय, ढंग
  • पात्र = बरतन
  • बाण = तीर
  • प्रतीक्षा = इन्तज़ार
  • प्राण त्यागना = मर जाना

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार

बताओ

प्रश्न 1.
श्रवण कुमार कैसा बालक था?
उत्तर :
श्रवण कुमार एक आज्ञाकारी बालक था।

प्रश्न 2.
श्रवण कुमार अपने माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर कैसे लेकर गया?
उत्तर :
उसने एक बहँगी बनाई और अपने मातापिता को उसमें बिठा कर तीर्थ-यात्रा के लिए लेकर गया।

प्रश्न 3.
सरयू नदी के निकट श्रवण क्या करने गया था?
उत्तर :
श्रवण अपने प्यासे माता-पिता के लिए पानी लाने के लिए सरयू नदी के तट पर गया था।

प्रश्न 4.
श्रवण कुमार को बाण किसने मारा?
उत्तर :
श्रवण कुमार को बाण अयोध्या के राजा दशरथ ने मारा।

प्रश्न 5.
श्रवण ने राजा दशरथ से क्या कहा?
उत्तर :
श्रवण ने राजा दशरथ से कहा कि उधर कुछ दूरी पर पेड़ के नीचे मेरे माता-पिता पानी की प्रतीक्षा में बैठे हैं। वे प्यासे हैं। आप कृपया उन्हें पानी पिला दीजिए।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार

वाक्य पूरे करो

  1. श्रवण एक ……………………………….. बालक था।
  2. उसके माता-पिता ……………………………….. थे।
  3. तीर्थ यात्रा पर जाने के लिए उसने एक ……………………………….. बनाई।
  4. श्रवण राजा ……………………………….. के बाण से घायल हुआ।
  5. उसे मरते वक्त भी अपने ……………………………….. की चिन्ता थी।

उत्तर :

  1. आज्ञाकारी,
  2. अन्धे,
  3. बहँगी,
  4. दशरथ,
  5. माता-पिता।

जानो

भूख – प्यास
धनुष – बाण
सोच – विचार
माता – पिता
जिया – मरा
तीर्थ – यात्रा
उत्तर :
उपरोक्त शब्दों में दो शब्दों को जोड़ने का काम (-) योजक चिहन द्वारा किया गया है।

इतने नये शब्द बनाओ

  1. ज्ञ
  2. क्ष
  3. त्र
  4. श्र

उत्तर :

  1. ज्ञ = ज्ञान, ज्ञानी, विज्ञान।
  2. क्ष = क्षत्रिय, शिक्षा।
  3. त्र = पत्र, मित्र, चित्र।
  4. ष्य = मनुष्य, विशेष्य।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार

रचनात्मक कौशल

बच्चो, आपने सावन के महीने में काँवरियों को देखा होगा जो गंगा नदी से जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। अपने अध्यापक की सहायता से काँवर के चित्र में रंग भरें।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार 1

श्रवण कुमार बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
श्रवण कुमार कैसा बालक था?
(i) आज्ञापूर्ण
(ii) आज्ञाकारी
(iii) अवज्ञाकारी
(iv) अच्छा।
उत्तर :
(ii) आज्ञाकारी

प्रश्न 2.
श्रवण कुमार पानी लेने किस नदी के तट पर गया?
(i) सरयू
(i) गंगा
(iii) यमुना
(iv) गोदावारी।
उत्तर :
(i) सरयू

प्रश्न 3.
श्रवण कुमार को तीर किसने मारा?
(i) भरत ने
(ii) शत्रुघ्न ने
(iii) दशरथ ने
(iv) राक्षस ने।
उत्तर :
(iii) दशरथ ने

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार

प्रश्न 4.
पंजाबी शब्द ‘भागिभावाठी’ का हिन्दी अर्थ
(i) आज्ञाकारी
(ii) अवज्ञाकारी
(ii) सेवाकारी
(iv) सेवादार।
उत्तर :
(i) आज्ञाकारी

श्रवण कुमार Summary in Hindi

श्रवण कुमार बहुत आज्ञाकारी बालक था। वह अपने अन्धे माता-पिता का एकमात्र सहारा था और वह उनकी हर इच्छा को पूरी करता था।

एक बार श्रवण के माता-पिता ने तीर्थ-यात्रा पर जाने की इच्छा प्रकट की। श्रवण कुमार ने उन्हें ले जाने के लिए बहँगी तैयार की और उसमें अपने माता-पिता को बैठाकर तीर्थ-यात्रा के लिए निकल पड़ा।

तीर्थ यात्रा करते हुए वे एक दिन सरयू नदी के किनारे पहुँचे। श्रवण कुमार के माता-पिता को प्यास लगी तो वह उनके लिए पानी लाने नदी की ओर चला गया। उधर अयोध्या नगरी का राजा दशरथ जंगली जानवरों का शिकार करने आया हुआ था।

जब श्रवण ने पानी भरने के लिए लोटा पानी में डुबोया तो उसकी आवाज़ से राजा ने समझा कि कोई जंगली जानवर नदी किनारे पानी पीने आया हुआ है और उसने आवाज़ आने की दिशा में जो तीर छोड़ा वह श्रवण कुमार के सीने में जा लगा। तीर लगने पर श्रवण कुमार ज़ोर से चीखा।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार 2

उसकी चीख सुनकर राजा तुरन्त वहाँ पहुँचा और उसे घायल देखकर वह बहुत दुःखी हुआ।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 16 श्रवण कुमार

घायल श्रवण कुमार ने राजा से कहा कि आपने तो मझे अनजाने में घायल कर दिया। मैं तो अपने माता| पिता के लिए पानी लाने आया था। मेरे माता-पिता कुछ ही दूरी पर पेड़ के नीचे बैठे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं आप उन्हें यह पानी अवश्य पिला दीजिए क्योंकि वे प्यासे हैं। इतना कहकर उसने प्राण त्याग दिए।

धन्य है श्रवण कुमार जो जीया तो अपने मातापिता के लिए और माता-पिता के लिए ही अपने प्राण भी दे डाले।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 10 जन्म दिन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 10 जन्म दिन (2nd Language)

जन्म दिन अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਜਨਮਦਿਨ = जन्मदिन
  • ਸਹਿਪਾਠੀ = सहपाठी
  • ਅਨਾਥ ਆਸ਼ਰਮ = अनाथाश्रम
  • ਮੋਮਬੱਤੀ = मोमबत्ती
  • ਗੁਬਾਰੇ = गुब्बारे
  • ਕੋਕ = केक
  • ਛੁੱਟੀ = छुट्टी
  • ਹਲਵਾ = हलवा

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਭੈਣ = बहन
  • ਧੰਨਵਾਦ = धन्यवाद
  • ਨਾਚ = नृत्य
  • ਤਾੜੀਆਂ = तालियाँ
  • ਵਿਦਾਇਗੀ = अलविदा
  • ਹੌਸਲਾ = उत्साह

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) न् + म = न्म = जन्म
स् + व = स्व = स्वागत
क् + र = क्र = आइसक्रीम
र् + वी = र्वी = चार्वी
स् + त = स्त = बिस्तर, दोस्त, मस्ती
न् + द = न्द = सुन्दर
र् + टी = र्टी = पार्टी
स् + क = स्क = स्कूल
न् + य = न्य = धन्यवाद
त् + स = त्स = उत्साहित
म् + ह + म्ह = तुम्हारा

(ख) श् + र = श्र = आश्रम

(ग) म् + म = म्म= मम्मी
ब् + ब + ब्ब = गुब्बारा
त् + य + त्य = नृत्य
ट् + ट + ट्ट = छुट्टी

किसने कहा

प्रश्न 1.
“चार्वी बेटी उठो! आज तुम्हारा जन्मदिन है।”
उत्तर :
चार्वी की माँ ने कहा है।

प्रश्न 2.
“अनाथाश्रम जाकर बच्चों को मिठाई भी तो बाँटनी है।”
उत्तर :
चावी के पापा ने कहा है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

प्रश्न 3.
“तुम्हारे जन्मदिन के लिए केक और हलवा मैंने अपने हाथों से बनाया है।”
उत्तर :
चा की माँ ने कहा है।

प्रश्न 4.
“सात मोमबत्तियों को बुझा दो और आठवीं मोमबत्ती को जलती रहने दो।”
उत्तर :
चावी की माँ ने कहा है।

बताओ

प्रश्न 1.
चार्वी क्यों खुश है?
उत्तर :
चार्वी इसलिए खुश है क्योंकि आज उसका जन्मदिन है।।

प्रश्न 2.
चार्वी की बहन का क्या नाम है?
उत्तर :
चार्वी की बहन का नाम एलीका है।

प्रश्न 3.
चार्वी को जन्मदिन की बधाई सबसे पहले किसने दी?
उत्तर :
चार्वी को जन्मदिन की बधाई सबसे पहले माँ ने दी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

प्रश्न 4.
चार्वी और एलीका ने जन्मदिन की क्या-क्या तैयारी की?
उत्तर :
चार्वी और एलीका ने सारे घर को गुब्बारों और झिलमिलाती झंडियों से सजा दिया।

प्रश्न 5.
चार्वी ने अपना जन्मदिन कैसे मनाया?
उत्तर :
चार्वी ने अपने जन्मदिन पर अनाथाश्रम जाकर बच्चों को मिठाई बॉटी, स्कूल में सहपाठियों को टाफियाँ बाँटी फिर घर पर पार्टी में केक काटा और सभी को केक, हलवा, गुलाब जामुन और समोसे खिलाए।

पढ़ो, समझो और लिखो।

(क) टॉफी = टॉफियाँ
झंडी = झंडियाँ
मिठाई = मिठाइयाँ
मोमबत्ती = मोमबत्तियाँ
ताली = तालियाँ
सहेली = सहेलियाँ
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के बहुवचन रूप सामने दर्शाए गए हैं।

(ख) माता = पिता
बहन = भाई
मामा = मामी
बेटा – बेटी
चाचा = चाची
नाना = नानी
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के विपरीत लिंगी शब्द सामने दर्शाये गए हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

अन्तर समझो

(क) थोड़ी देर [में] मेहमान आते ही होंगे।
आज [मैं] टॉफियाँ लेकर स्कूल जाऊँगी।
[उसने] नयी पोशाक पहनी।
चार्वी [उन] का धन्यवाद कर रही थी।
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्द युग्म शब्द कहलाते हैं।

इनसे नये शब्द बनाओ
क्र, श्र
उत्तर :
(i) क्र = क्रम, विक्रय।
(ii) ‘f = बर्फी, सर्दी।
(ii) श्र = श्रम, विश्राम।

रचनात्मक कौशल
जन्मदिन से संबंधित चित्र बनाओ और उसमें अलग-अलग रंग भरो।

रचनात्मक अभिव्यक्ति

  1. आज मेरा …………………………………. है।
  2. मैंने नयी …………………………………. पहनी है।
  3. मेरे माता-पिता …………………………………. लाये हैं।
  4. मैंने सबके साथ मिलकर …………………………………. काटा।
  5. सभी ने मिलकर …………………………………. गाया।

उत्तर :

  1. आज मेरा जन्मदिन है।
  2. मैंने नयी पोशाक पहनी है।
  3. मेरे माता-पिता उपहार लाए हैं।
  4. मैंने सबके साथ मिलकर केक काटा।
  5. सभी ने मिलकर गाना गाया।

अध्यापन निर्देश

  1. अध्यापक बच्चों को जन्मदिन की भाँति घर में होने वाले समारोहों को मिलकर मनाने की ओर प्रेरित करे। स्कूल में होने वाले समारोहों में सभी बच्चे मिलजुल कर काम करें। जिससे उनमें यह भावना विकसित हो कि खुशी के अवसर मिलजुल कर मनाने से मन खुश रहता है, सहयोग की भावना उत्पन्न होती है तथा किसी से भी कोई वस्तु लेते/ देते समय वे उसका धन्यवाद अवश्य करें।
  2. ‘र’ व्यंजन को संयुक्त करने के विभिन्न रूप पाठ संख्या 3 में समझाए गये हैं। अध्यापक उनका बार बार अभ्यास करवाये।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

जन्म दिन बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘मठमरिठ’ का हिन्दी अर्थ है : जन्म दिवस/जन्मदिन/जन्मपत्री/जन्मीपत्र
उत्तर :
जन्मदिन

प्रश्न 2.
‘टॉफी’-टाफियाँ है तो मोमबत्ती है :
(i) मोमबत्तियाँ
(ii) मोमबत्ती
(iii) मोमबत्तीय
(iv) मोम की बत्तिया।
उत्तर :
(i) मोमबत्तियाँ,

प्रश्न 3.
‘ताली’-तालियाँ है तो मिठाई है
(i) मीठा
(ii) मिठावाला
(iii) मिठाइयाँ
(iv) मिठाइयों।
उत्तर :
(iii) मिठाइयाँ।

जन्म दिन Summary in Hindi

आज चार्वी का जन्मदिन है। अभी वह सो ही रही थी कि उसके माता-पिता और बहन ने उसे जगाकर जन्मदिन की बधाई दी। माँ से उसने कहा कि वह आज स्कूल में अपने सहपाठियों के लिए टॉफियाँ ले जाएगी। माँ ने उसे पहले अनाथाश्रम में बच्चों को मिठाई बाँटने को कहा।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन 1

स्कूल जाकर चार्वी ने अपने सहपाठियों को टाफियाँ बाँटीं। उसके घर आने पर उसके जन्मदिन की पार्टी मनाने की तैयारियाँ होने लगीं। समय पर चार्वी के रिश्तेदार, मेहमान और दोस्त आ गए। आज चार्वी का आठवाँ जन्म दिन था। उसने केक काटा। सब ने तालियाँ बजाकर उसे जन्मदिन की बधाई दी।

पार्टी में सब ने खूब मौज मस्ती की। उन्हें आज का दिन सदा याद रहेगा।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 10 जन्म दिन

जन्म दिन शब्दार्थ :

  • सहपाठी = साथ पढ़ने वाला
  • उपहार = तोहफा
  • अनाथाश्रम = वह स्थान जहाँ बिना माँ-बाप के बच्चे रखे जाते हैं।
  • मेहमान = अतिथि
  • नृत्य = नाच
  • अलविदा = विदा होते समय कहा जाने वाला एक पद- अच्छा, अब चलते हैं।
  • धन्यवाद = कृतज्ञता प्रकट करने का एक शब्द

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 15 लोहड़ी

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 15 लोहड़ी Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 15 लोहड़ी (2nd Language)

लोहड़ी अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਲੋਹੜੀ = लोहड़ी
  • ਭੱਟੀ = भट्टी
  • ਲੋਕਗੀਤ = लोकगीत
  • ਪੰਜਾਬ = पंजाब
  • ਰੇਵੜੀਆਂ = रेवड़ियाँ
  • ਮੂੰਗਫਲੀ = मूंगफली
  • ਗਿੱਦਾ = गिद्दा
  • ਭੰਗੜਾ = भंगड़ा

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 15 लोहड़ी

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਸਾਲੂ = दुपट्टा
  • ਪਾਥੀਆਂ = उपले
  • ਗੋਹਾ = गोबर
  • ਵਿਹੜਾ = आँगन
  • ਕੁੜੀ = लड़की
  • ਮੱਕੀ = मकई

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) न् + द = न्द = सुदंर, आनन्द
त् + य = त्य = त्योहार
ध् + य = ध्य = मध्य

(ख) ल् + ल = ल्ल = दुल्ला, मोहल्ला
क = क्क = शक्कर, चक्कर
ट् + ट = ट्ट =भट्टी, लुट्टी
ग् + ग = ग्ग = भुग्गा

लोहड़ी शब्दार्थ Meaning

  • लोकगीत = साधारण जनता में प्रचलित गीत
  • उपले = गोबर में तूड़ी आदि मिलाकर हाथों से थोप पीटकर बनाई गई टिकिया,
  • गिद्दा = स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला पंजाबी लोकनृत्य
  • पोले = जूते
  • भंगड़ा = बड़े ढोल के ताल पर होने वाला पंजाबी लोकनृत्य

बताओ

प्रश्न 1.
लोहड़ी का त्योहार किस महीने में मनाया जाता है?
उत्तर :
ला गाहार जनतरी पहा। मना५. गाता है।

प्रश्न 2.
इस त्योहार को मनाने के लिए बच्चे क्या-क्या तैयारियाँ करते हैं?
उत्तर :
इस त्योहार को मनाने के लिए बच्चे टोलियाँ बनाकर घर-घर जाते हैं और लोहड़ी का गीत गाकर लोहड़ी माँगते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 15 लोहड़ी

प्रश्न 3.
लकड़ियाँ किस आकार में चिनी जाती हैं?
उत्तर :
लकड़ियाँ गोलाकार में चिनी जाती हैं।

प्रश्न 4.
जलती हुई आग में क्या-क्या डाला जाता है?
उत्तर :
जलती हुई आग में तिल, रेवड़ियाँ आदि डाली जाती हैं।

प्रश्न 5.
लोहड़ी वाले दिन लोग क्या-क्या खाते हैं?
उत्तर :
लोहड़ी वाले दिन लोग, मँगफली, रेवड़ियाँ, गचक, भुग्गा और मकई के दाने आदि खाते हैं।

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) लड़की = लड़कियाँ

  1. लड़का = लड़के
  2. टोली = …………………………
  3. उपला = …………………………
  4. लकड़ी = …………………………
  5. मुहल्ला = …………………………
  6. रेवड़ी = …………………………
  7. दाना = …………………………

उत्तर :
लड़की = लड़कियाँ।

  1. टोली = टोलियाँ।
  2. लकड़ी = लकड़ियाँ।
  3. रेवड़ी = रेवड़ियाँ।
  4. लड़का = लड़के।
  5. उपला = उपलें।
  6. मुहल्ला = मुहल्ले।
  7. दाना = दाने।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 15 लोहड़ी

इनसे नये शब्द बनाओ

  1. न्द
  2. त्य
  3. ध्य
  4. ट्ट
  5. ग्ग।

उत्तर :

  1. न्द = आनन्द।
  2. त्य = त्याग।
  3. ध्य = ध्यान।
  4. ट्ट = भट्ट।
  5. ग्ग = चुग्गा।

रचनात्मक अभिव्यक्ति
1. लोहड़ी के समय गाये जाने वाले अन्य गीत याद करें और स्कूल में या घर में लोहड़ी के त्योहार पर उन्हें सुनायें।
2. अध्यापक से पता करें कि साल में कितने महीने होते हैं? सभी महीनों के नाम लिखें।
3. आपके परिवेश में मनाये जाने वाले सभी त्योहारों की सूची बनायें और पता करें कि कौन सा त्योहार किस महीने में मनाया जाता है?

लोहड़ी बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
लकड़ियाँ किस आकार की थीं?
(i) गोलाकार
(ii) लोहाकार
(iii) त्रिकोणाकार
(iv) वम्नाकार।
उत्तर :
(i) गोलाकार

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 15 लोहड़ी

प्रश्न 2.
लड़की-लड़कियां है तो लकड़ी हैं –
(i) लकड़ियाँ
(ii) लकड़ी
(iii) लबरी
(iv) लालिमा।
उत्तर :
(i) लकड़ियाँ

प्रश्न 3.
मुहल्ला-मुहल्ले है तो ‘लड़का’ है
(i) लकड़ी
(ii) लड़के
(iii) लड़े
(iv) लड़ी।
उत्तर :
(ii) लड़के

प्रश्न 4.
पंजाबी शब्द ‘डी’ का हिन्दी अर्थ है : लड़की/घड़ी/फड़ी/लड़ी।
उत्तर :
लड़की।

लोहड़ी Summary in Hindi

लोहड़ी पंजाब का प्रसिद्ध त्योहार है। यह त्योहार जनवरी महीने की तेरह तारीख को मनाया जाता है। लड़के-लड़कियाँ टोलियाँ बनाकर लोहड़ी का गीत गाते हुए घर-घर जाकर लोहड़ी माँगते हैं। सायंकाल के समय मुहल्ले के सभी लोग इकट्ठे होकर लकड़ियाँ इकट्ठी कर आग जलाते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 15 लोहड़ी 1

उस आग में तिल, रेवड़ियाँ आदि डाली जाती हैं। फिर वे जलती हुई आग के चारों ओर गीत गाते हुए चक्कर लगाते हैं तथा उसके – पास बैठकर मूंगफली, रेवड़ियाँ, गचक, भुग्गा और मकई के दाने खाते हैं तथा एक-दूसरे को खिलाते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 15 लोहड़ी

लोग आग के इर्द-गिर्द भँगडा और गिद्दा आदि डालते हैं इससे इस त्योहार का आनन्द और बढ़ जाता है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

Punjab State Board PSEB 12th Class Religion Book Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 12 Religion Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न-

प्रश्न 1.
जैन धर्म के आरंभ के बारे आप क्या जानते हैं ? वर्णन करो। (What do you know about the origin of Jainism ? Explain.)
उत्तर-
जैन धर्म भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। इसका साधुओं वाला मार्ग और योग की रीतियों का आरंभ हड़प्पा काल में से ढूँढा जा सकता है। वैदिक साहित्य में जैन आचार्यों का वर्णन मिलता है। इससे पता चलता है कि जैन धर्म उस समय प्रचलित था। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार ऋषभनाथ जो कि उनका पहला तीर्थंकर था वह पहला व्यक्ति था जिससे मनुष्य की सभ्यता का आरंभ हुआ। इस तरह सभ्यता के आरंभ के समय पर ही जैन धर्म मौजूद था।
जैन शब्द संस्कृत के शब्द जिन से निकला है जिससे भाव है विजेता। विजेता से भाव उस व्यक्ति से है जिसने अपनी इंद्रियों और मन को जीत लिया हो। जैन धर्म को आरंभ में निरग्रंथ के नाम से जाना जाता है। निरग्रंथ से भाव था बंधनों से रहित अथवा मुक्त। जैन आचार्यों को तीर्थंकर भी कहा जाता है। तीर्थंकर से भाव है पुल बनाने वाला अथवा संसार के भवसागर से पार करने वाला गुरु। जैन दर्शन को अर्हत दर्शन भी कहा जाता है। अर्हत से भाव है पूजनीय। जैन धर्म को मानने वाले जैनी कहलाते हैं। जैन 24 तीर्थंकरों में विश्वास रखते हैं। इनके नाम ये हैं:—

  1. ऋषभनाथ
  2. अजित
  3. संभव
  4. अभिनंदन
  5. सुमति
  6. पद्मप्रभु
  7. सुपार्श्व
  8. चंद्रप्रभु
  9. पुष्पदंत
  10. शीतल
  11. श्रेयांसम
  12. वासुपूज्य
  13. विमल
  14. अनंत
  15. धर्म
  16. शाँति
  17. कुंथ
  18. अरह
  19. मल्लि
  20. मुनिसुव्रत
  21. नामि
  22. नेमि
  23. पार्श्वनाथ
  24. महावीर

जैनी ऋषभनाथ को जैन धर्म का संस्थापक मानते हैं। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार उनका जन्म अयोध्या में हुआ। उन्होंने कई वर्षों तक राज्य किया। बाद में उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र भरत को सौंप दिया और स्वयं संसार त्याग कर तपस्या में लग गये। अंत में उनको ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने इस ज्ञान के बारे लोगों को उपदेश दिया। इस तरह वह पहले तीर्थंकर कहलाये। ऋषभनाथ के बाद होने वाले 21 तीर्थंकरों को ऐतिहासिक बताना संभव नहीं है, परंतु जैनियों की पवित्र अनुश्रुतियों में इनका वर्णन आता है। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और 24वें तीर्थंकर महावीर ऐतिहासिक व्यक्ति थे। स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले बनारस के राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता जी का नाम वामादेवी था। उनका बचपन बहुत ही ऐश-ओ-आराम में बीता। 30 वर्षों की आयु में पार्श्वनाथ ने अपने सारे सुखों का त्याग कर दिया और सच्चे ज्ञान की खोज में निकल गये। उनको 83 दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के बाकी 70 वर्ष अपने उपदेशों का प्रचार करने में व्यतीत किये। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊंट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। पार्श्वनाथ की शिक्षा को चार्तुयाम अथवा चार प्रण कहते हैं। यह चार प्रण ये हैं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)।

स्वामी महावीर ने इन चार असूलों में एक और असूल जोड़ा जिसको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्वामी महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं बल्कि सुधारक थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 2.
(क) जैन धर्म में कुल कितने तीर्थंकर हुए हैं ?
(ख) भगवान् महावीर के जीवन पर प्रकाश डालें।
[(a) Give the total number of Tirthankaras in Jainism.
(b) Throw light on the life of Lord Mahavira.]
अथवा
महावीर की माता का क्या नाम था ? भगवान् महावीर के जन्म से पहले उनकी माता को कितने स्वप्न आए थे? भगवान महावीर के जीवन पर एक नोट लिखें।
(Give the name of Mahavir as mother. How many dreams Lord Mehavira’s mother had before giving birth to Mahavira ? Write a note on the life of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म में कितने तीर्थंकर हुए हैं ? 24वें तीर्थंकर के जीवन पर नोट लिखें।
(Give the number of Tirthankaras in Jainism. Write a note on the life of 24th Tirthankara.)
अथवा
भगवान् महावीर जैन धर्म के कौन से तीर्थंकर थे ? उनके जीवन के संबंध में जानकारी दें।
(What was Lord Mahavira’s number among Jain Tirthankaras ? Write about Mahavira’s life.)
उत्तर-
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर के जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—
PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ 1
LORD MAHAVIRA

1. महावीर का जन्म और बचपन (Birth and Childhood of Mahavira)- महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली (बिहार) के नज़दीक कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्म तिथि 540 ई० पू० बताते हैं। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर जी के पिता जी का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले जनत्रिका के मुखिया थे। महावीर जी की माता जी का नाम तृषला था। वह लिच्छवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व उसे 14 स्वप्न आए थे। महावीर को शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किये गये थे। महावीर जी का बचपन से ही सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही विचारों में डूबे रहते थे।

2. विवाह (Marriage)—सांसारिक कार्यों की ओर महावीर जी का ध्यान लगाने के लिए उनके पिता जी ने महावीर का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की आयु कितनी थी इसके बारे हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियादर्शना रखा गया।

3. महान् त्याग और ज्ञान प्राप्ति (Renunciation and Enlightenment)-गृहस्थी जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों की राह में किसी तरह की अड़चन (रुकावट) न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद महावीर अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर गृह त्याग्न कर जंगलों में ज्ञान की खोज के लिए चले गये। उस समय महावीर जी की आयु 30 वर्ष थी। उन्होंने 12 वर्षों तक बड़ा कठोर तप किया। अंततः उनको ऋजुपालिका नदी के नज़दीक जरिमबिक गाँव में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद वर्धमान जिन (इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने वाला) और महावीर (महान् विजयी) कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।

4. धर्म प्रचार (Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर जी ने लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूंर करने के लिए और उनको सच्चा मार्ग बताने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए और वे महावीर जी के अनुयायी बन गये। महावीर जी के प्रसिद्ध प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार और उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन मत को स्वीकार कर लिया।

5. निर्वाण (Nirvana)—स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।

प्रश्न 3.
जैन धर्म के आरंभ तथा विकास के बारे में प्रकाश डालें। (Discuss the origin and development of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म भारत के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है। इसका साधुओं वाला मार्ग और योग की रीतियों का आरंभ हड़प्पा काल में से ढूँढा जा सकता है। वैदिक साहित्य में जैन आचार्यों का वर्णन मिलता है। इससे पता चलता है कि जैन धर्म उस समय प्रचलित था। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार ऋषभनाथ जो कि उनका पहला तीर्थंकर था वह पहला व्यक्ति था जिससे मनुष्य की सभ्यता का आरंभ हुआ। इस तरह सभ्यता के आरंभ के समय पर ही जैन धर्म मौजूद था।
जैन शब्द संस्कृत के शब्द जिन से निकला है जिससे भाव है विजेता। विजेता से भाव उस व्यक्ति से है जिसने अपनी इंद्रियों और मन को जीत लिया हो। जैन धर्म को आरंभ में निरग्रंथ के नाम से जाना जाता है। निरग्रंथ से भाव था बंधनों से रहित अथवा मुक्त। जैन आचार्यों को तीर्थंकर भी कहा जाता है। तीर्थंकर से भाव है पुल बनाने वाला अथवा संसार के भवसागर से पार करने वाला गुरु। जैन दर्शन को अर्हत दर्शन भी कहा जाता है। अर्हत से भाव है पूजनीय। जैन धर्म को मानने वाले जैनी कहलाते हैं। जैन 24 तीर्थंकरों में विश्वास रखते हैं। इनके नाम ये हैं:—

  1. ऋषभनाथ
  2. अजित
  3. संभव
  4. अभिनंदन
  5. सुमति
  6. पद्मप्रभु
  7. सुपार्श्व
  8. चंद्रप्रभु
  9. पुष्पदंत
  10. शीतल
  11. श्रेयांसम
  12. वासुपूज्य
  13. विमल
  14. अनंत
  15. धर्म
  16. शाँति
  17. कुंथ
  18. अरह
  19. मल्लि
  20. मुनिसुव्रत
  21. नामि
  22. नेमि
  23. पार्श्वनाथ
  24. महावीर

जैनी ऋषभनाथ को जैन धर्म का संस्थापक मानते हैं। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार उनका जन्म अयोध्या में हुआ। उन्होंने कई वर्षों तक राज्य किया। बाद में उन्होंने अपना राज्य अपने पुत्र भरत को सौंप दिया और स्वयं संसार त्याग कर तपस्या में लग गये। अंत में उनको ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने इस ज्ञान के बारे लोगों को उपदेश दिया। इस तरह वह पहले तीर्थंकर कहलाये। ऋषभनाथ के बाद होने वाले 21 तीर्थंकरों को ऐतिहासिक बताना संभव नहीं है, परंतु जैनियों की पवित्र अनुश्रुतियों में इनका वर्णन आता है। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ और 24वें तीर्थंकर महावीर ऐतिहासिक व्यक्ति थे। स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले बनारस के राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता जी का नाम वामादेवी था। उनका बचपन बहुत ही ऐश-ओ-आराम में बीता। 30 वर्षों की आयु में पार्श्वनाथ ने अपने सारे सुखों का त्याग कर दिया और सच्चे ज्ञान की खोज में निकल गये। उनको 83 दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के बाकी 70 वर्ष अपने उपदेशों का प्रचार करने में व्यतीत किये। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊंट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। पार्श्वनाथ की शिक्षा को चार्तुयाम अथवा चार प्रण कहते हैं। यह चार प्रण ये हैं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)।

स्वामी महावीर ने इन चार असूलों में एक और असूल जोड़ा जिसको ब्रह्मचर्य कहा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्वामी महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं बल्कि सुधारक थे।

1. महावीर का जन्म और बचपन (Birth and Childhood of Mahavira)- महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली (बिहार) के नज़दीक कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्म तिथि 540 ई० पू० बताते हैं। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर जी के पिता जी का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले जनत्रिका के मुखिया थे। महावीर जी की माता जी का नाम तृषला था। वह लिच्छवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व उसे 14 स्वप्न आए थे। महावीर को शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किये गये थे। महावीर जी का बचपन से ही सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही विचारों में डूबे रहते थे।

2. विवाह (Marriage)—सांसारिक कार्यों की ओर महावीर जी का ध्यान लगाने के लिए उनके पिता जी ने महावीर का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की आयु कितनी थी इसके बारे हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियादर्शना रखा गया।

3. महान् त्याग और ज्ञान प्राप्ति (Renunciation and Enlightenment)-गृहस्थी जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों की राह में किसी तरह की अड़चन (रुकावट) न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद महावीर अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर गृह त्याग्न कर जंगलों में ज्ञान की खोज के लिए चले गये। उस समय महावीर जी की आयु 30 वर्ष थी। उन्होंने 12 वर्षों तक बड़ा कठोर तप किया। अंततः उनको ऋजुपालिका नदी के नज़दीक जरिमबिक गाँव में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद वर्धमान जिन (इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने वाला) और महावीर (महान् विजयी) कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।

4. धर्म प्रचार (Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर जी ने लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूंर करने के लिए और उनको सच्चा मार्ग बताने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए और वे महावीर जी के अनुयायी बन गये। महावीर जी के प्रसिद्ध प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार और उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन मत को स्वीकार कर लिया।

5. निर्वाण (Nirvana)—स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 4.
जैन धर्म की बुनियाद नैतिक शिक्षाएँ हैं चर्चा करो।
(“Ethical teachings are the foundation of Jainism.” Discuss.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं के विषय में जानकारी दीजिए। (Describe the Ethical teachings of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की बुनियादी शिक्षाओं के विषय में संक्षिप्त परंतु भावपूर्ण जानकारी दीजिए।
(Describe in brief but meaningful the basic teachings of Jainism.)
अथवा
“नैतिक मूल्य जैन धर्म का आधार हैं।” प्रकाश डालिए।
(“Moral values are the basis of Jainism.” Elucidate.)
अथवा
जैन सदाचार पर एक विस्तृत नोट लिखो।
(Write a detailed note on Jain Ethics. )
अथवा
जैन धर्म के सदाचारक गुणों संबंधी जानकारी दो। (Discuss the Ethical values of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाओं की चर्चा करो।
(Discuss the main teachings of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं संबंधी जानकारी दो। (Give information about moral teachings of Jainism.)
अथवा
भगवान् महावीर की नैतिक शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the Ethical teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म की शिक्षाओं के बारे में बताएँ।
(Write the teachings of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक कीमतों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the Ethical values of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं के बारे में चर्चा कीजिए। (Discuss about the Ethical teachings of Jainism.)
अथवा
भगवान् महावीर की मूल शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the basic teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म की मुख्य सदाचारक कीमतें कौन-सी हैं ? प्रकाश डालें। (What were the main Ethical values of Jainism ? Elucidate.)
अथवा
जैन धर्म की सदाचारक शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए। (Describe the Ethical teachings of Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म की अथवा महावीर जी की मुख्य नैतिक शिक्षाओं ने भारतीय संस्कृति को एक ऐसी देन दी जिस पर हमें आज भी गर्व है। जैन धर्म ने लोगों को त्रि-रत्न, अहिंसा, शुद्ध आचरण और आपसी भाइचारे का पाठ पढ़ाया। इसने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। इसका यज्ञों, बलियों, वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में कोई विश्वास नहीं था। इसने मनुष्य को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। निस्संदेह जैन धर्म की नैतिक शिक्षाओं ने भारतीय समाज को एक नई दिशा देने का एक महान् कार्य किया।—

1. त्रि-रत्न (Tri-Ratna)-जैन धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्त करना है। इसको प्राप्त करने के लिए जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए त्रि-रत्नों पर चलना अति ज़रूरी है। ये तीन रत्न हैं-सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार। पहले रत्न के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 24 तीर्थंकरों, नौ सच्चाइयों और जैन शास्त्रों में अटल विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्नानुसार जैनियों को सच्चा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यह तीर्थंकरों के उपदेशों के गहरे अध्ययन से प्राप्त होता है। इस ज्ञान के दो रूप बताये गये हैं जिनको प्रत्यक्ष और परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। आत्मा द्वारा प्राप्त ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और वह ज्ञान जो इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होता है उसको परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। ज्ञान की पाँच किस्में हैं, जिनके नाम इस तरह हैं-मति ज्ञान, श्रुति ज्ञान, अवधि ज्ञान, मनपर्याय ज्ञान और केवल्य ज्ञान। तीसरे रत्नानुसार प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे आचार के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। सच्चा आचार वह है जिसकी शिक्षा जैन धर्म देता है। ये तीनों रत्न साथ-साथ चलते हैं। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति मनुष्य को उसकी मंजिल तक नहीं पहुँचा सकती। उदाहरण के तौर पर जैसे एक दीये को प्रकाश देने के लिए उसमें तेल, बाती और आग का होना ज़रूरी है। यदि इसमें से एक भी वस्तु की कमी हो तो वह प्रकाश नहीं दे सकता।

2. अहिंसा (Ahimsa)-जैन धर्म में अहिंसा पर बहुत जोर दिया गया है। अहिंसा की महत्ता बताते हुए आचारांग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना-अपना जीवन प्यारा है, सब ही सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सारे ही जीने की इच्छा रखते हैं।” इसीलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है। हिंसा दो तरह की होती है-मन से हिंसा और कर्म से हिंसा। कर्म अथवा अमल में आने वाली हिंसा से पहले मन भाव विचारों में हिंसा आती है। गुस्सा, अहंकार, लालच और धोखा मन की हिंसा है। इसलिए हिंसा से बचने के लिए मन के विचारों को शुद्ध करना अति ज़रूरी है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्यों के अतिरिक्त पशुओं, पत्थरों और वृक्षों आदि में भी आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी कारण जैनी लोग नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और अंधेरा हो जाने के बाद कुछ नहीं खाते ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाये। बी० एन० लूनीया के अनुसार,
“अहिंसा जैन धर्म की आधारशिला है।”1

3. नौ सच्चाइयाँ (Nine Truths)-जैन दर्शन नौ सच्चाइयों की शिक्षा देता है। ये सच्चाइयाँ हैं(1) जीव-जैन दर्शन में आत्मा को जीव कहा गया है। यह चेतन सुरूप है। यह शरीर के कर्मों के अच्छे-बुरे फल भुगतता है और आवागमन के चक्र में पड़ता है। (2) अजीव-यह जंतु पदार्थ है। यह निर्जीव है और इनमें समझ नहीं होती। इनकी दो श्रेणियाँ हैं रूपी और अरूपी। (3) पुण्य-यह अच्छे कर्मों का नतीजा है। इसके नौ साधन हैं। (4) पाप-यह जीव के बंधन का मुख्य कारण है। इसके परिणामस्वरूप घोर सज़ायें मिलती हैं। (5) अशर्व-यह वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मा अपने अंदर कर्मों को संचित करती रहती है। कर्म 8 किस्मों के होते हैं। (6) संवर-कर्म को आत्मा की ओर आने की क्रिया को रोकने को संवर कहते हैं। कर्म को रोकने की 57 विधियाँ हैं। (7) बंध-इससे भाव बंधन है। यह जीव (आत्मा) का पुदगल (परमाणु) से मेल है। बंध के लिए पाँच कारण जिम्मेवार हैं। (8) निर्जर-इस से भाव है दूर भगाना। यह कर्मों को नष्ट करने और जला देने का कार्य करता है। (9) मोक्ष-इसमें जीव कर्मों के जंजाल से मुक्त हो जाता है। यह पूर्ण शाँति की अवस्था है जिसमें हर तरह के दुःखों से छुटकारा प्राप्त हो जाता है।

4. कर्म सिद्धांत (Karma Theory)-जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस सिद्धांत के अनुसार, “जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसे बीजोगे वैसा काटोगे, यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा, किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा।” जैसे ही हमारे मन में कोई अच्छा या बुरा विचार आता है वह तुरंत जीव (आत्मा) से उसी तरह जुड़ जाता है, जैसे तेल लगे हुए शरीर में धूलि कण चिपक जाते हैं। ये कर्म आठ प्रकार के हैं-(1) ज्ञानवर्णीय कर्म-यह आत्मा के ज्ञान को रोकते हैं। (2) दर्शनवर्णीय कर्म-यह आत्मा की इच्छा शक्ति को रोकते हैं। (3) वैदनीय कर्म-ये सुख-दुःख उत्पन्न करने वाले कर्म हैं। (4) मोहनीय कर्म-ये आत्मा को मोह माया में फंसाने वाले कर्म हैं। (5) आयु कर्मये कर्म मनुष्य की आय को निर्धारित करते हैं। (6) नाम कर्म-ये कर्म मनुष्य की आय को निर्धारित करते हैं। (7) गोत्र कर्म-ये व्यक्ति के गोत्र और समाज में उसके ऊँचे या नीचे स्थान को निर्धारित करते हैं। (8) अंतरीय कर्म-ये अच्छे कर्म को रोकने वाले कर्म हैं।
कर्मों के कारण मनुष्य आवागमन के चक्रों में फंसा रहता है। कर्मों का नाश करके ही मनुष्य इससे छुटकारा प्राप्त कर सकता है।

5. अनेकांतवाद (The Doctrine of Manyness)-अनेकांतवाद जैन दर्शन का एक अनोखा दार्शनिक सिद्धांत है। अनेकांत शब्द किसी भी पदार्थ के अनेक धर्मों या गुणों का संकेत करता है। इसका भाव यह है कि जिस वस्तु का ज्ञान हमें जिस रूप में होता है, उसी वस्तु का ज्ञान किसी अन्य व्यक्ति को किसी और रूप में हो सकता है। उदाहरणतया जैसे एक बच्चे को उसकी माँ पुत्र समझती है, बहन भाई समझती है, दादी पोता समझती है, नानी दोहता समझती है और बच्चे उसको अपना मित्र समझते हैं। कहने से.भाव यह है कि हर पदार्थ अनेकांत या अनेक गुणों वाला है। इसी कारण हर पदार्थ के बारे में हमारा ज्ञान आंशिक होता है। इसको स्यादवाद कहा जाता है। यह अनेकांतवाद का दूसरा रूप है।

6. पाँच अणुव्रत अथवा महाव्रत (Five Annuvartas or Mahavartas)-जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में पाँच अणुव्रतों अथवा महाव्रतों की पालना करनी चाहिए। इनके अनुसार (i) मनुष्य को सदा अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए। (ii) उसको हमेशा सत्य बोलना चाहिए। (iii) उसको कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसको दान में प्राप्त न हुई हो। (iv) उसको अपने पास धन नहीं रखना चाहिए। (v) उसको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
इनमें से पहले चार सिद्धांतों का प्रचलन पार्श्वनाथ ने किया जबकि पाँचवां सिद्धांत महावीर जी ने शामिल किया। डॉक्टर के० सी० सौगानी के अनुसार,
“इन पाँच अणुव्रतों का पालन व्यक्तिगत और सामाजिक उन्नति लाने में सहायक है।’2

7. शुद्ध आचरण (Good Character) स्वामी महावीर ने शुद्ध आचरण को विशेष महत्त्व दिया। उन्होंने कहा कि हमें चोरी, झूठ, चुगली, लालच आदि बुराइयों से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। मनुष्य को पापी से नहीं, बल्कि पाप से नफरत करनी चाहिए।

8. चौबीस तीर्थंकरों की पूजा (Worship of Twenty Four Tirthankaras) जैन धर्म को मानने वाले अपने 24 तीर्थंकरों को देवते मान कर उनकी पूजा करते हैं। उनका विश्वास है कि तीर्थंकरों में पक्का विश्वास रखने से मनुष्य को निर्वाण की प्राप्ति होती है।

9. समानता में विश्वास (Belief in Equality)-जैन धर्म समानता के सिद्धांत में विश्वास रखता है। इसके अनुसार सारे मनुष्य बराबर हैं। इसलिए मनुष्यों को अमीर-गरीब, ऊँच-नीच आदि का भेदभाव नहीं करना चाहिए।

10. यज्ञों, बलियों आदि में अविश्वास (Disbelief in Yajnas and Sacrifices etc.)—जैन धर्म यज्ञों, बलियों और अन्य झूठे रीति-रिवाजों को एक अन्य ढोंग मात्र ही बताता है। उनके अनुसार कोई भी मनुष्य धर्म के बाह्य दिखावे से निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए जैन धर्म के लोगों को इन अंध-विश्वासों से दूर रहने को कहा।

11. वेदों और संस्कृत भाषा में अविश्वास (Disbelief in Vedas and Sanskrit Language)-स्वामी महावीर जी हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ-वेदों में कोई विश्वास नहीं रखते थे। उनका कहना था कि वेदों की रचना ईश्वरीय ज्ञान से नहीं हुई। इसलिए वेदों के मंत्रों को पढ़ना बिल्कुल व्यर्थ है। वह संस्कृत भाषा की पवित्रता में भी विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने सारी भाषाओं को पवित्र माना। उन्होंने अपने उपदेशों का प्रचार उस समय में प्रचलित अर्धमगधी भाषा में किया।

12. ईश्वर में अविश्वास (Disbelief in God)-जैन धर्म ईश्वर की उपस्थिति में विश्वास नहीं रखता है। इसके अनुसार ईश्वर संसार की रचना, इसकी पालना और समाप्ति करने वाला नहीं है। निर्वाण प्राप्त करने के लिए ईश्वर की कोई जरूरत नहीं है। मनुष्य की आत्मा ही उसकी महान् शक्ति है। मनुष्य सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करके निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है।

13. निर्वाण (Nirvana) ‘महावीर जी के अनुसार मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है। जैनमत में निर्वाण से भाव आवागमन के चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है। निर्वाण प्राप्ति के बाद मनुष्य का इस संसार में जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है और उसको स्थाई शाँति मिलती है।

1. “Ahimsa is the sheet anchor of Jainism.” B.N. Luniya, Life and Culture in Ancient India (Agra : 1982) p. 162.
2. “The observance of these five vows is capable of bringing about individual as well as social progress.” Dr. K.C. Sogani, Jainism (Patiala : 1986) p. 65.

प्रश्न 5.
भगवान् महावीर का जीवन तथा प्रसिद्ध शिक्षाएँ बताएँ।
(Describe the life and important teachings of Bhagwan Mahavira.)
उत्तर-
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर के जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. महावीर का जन्म और बचपन (Birth and Childhood of Mahavira)- महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली (बिहार) के नज़दीक कुंडग्राम में हुआ। कुछ इतिहासकार उनकी जन्म तिथि 540 ई० पू० बताते हैं। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। महावीर जी के पिता जी का नाम सिद्धार्थ था और वह एक क्षत्रिय कबीले जनत्रिका के मुखिया थे। महावीर जी की माता जी का नाम तृषला था। वह लिच्छवी वंश के शासक चेटक की बहन थी। भगवान् महावीर के जन्म से पूर्व उसे 14 स्वप्न आए थे। महावीर को शिक्षा देने के लिए विशेष प्रबंध किये गये थे। महावीर जी का बचपन से ही सांसारिक वस्तुओं से कोई लगाव नहीं था। वह अपने ही विचारों में डूबे रहते थे।

2. विवाह (Marriage)—सांसारिक कार्यों की ओर महावीर जी का ध्यान लगाने के लिए उनके पिता जी ने महावीर का विवाह एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से कर दिया। विवाह के समय महावीर जी की आयु कितनी थी इसके बारे हमें कोई निश्चित जानकारी प्राप्त नहीं है। कुछ समय पश्चात् महावीर जी के घर एक पुत्री ने जन्म लिया। उसका नाम प्रियादर्शना रखा गया।

3. महान् त्याग और ज्ञान प्राप्ति (Renunciation and Enlightenment)-गृहस्थी जीवन भी महावीर जी की धार्मिक रुचियों की राह में किसी तरह की अड़चन (रुकावट) न बन सका। अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने के बाद महावीर अपने बड़े भाई नंदीवर्मन से आज्ञा लेकर गृह त्याग्न कर जंगलों में ज्ञान की खोज के लिए चले गये। उस समय महावीर जी की आयु 30 वर्ष थी। उन्होंने 12 वर्षों तक बड़ा कठोर तप किया। अंततः उनको ऋजुपालिका नदी के नज़दीक जरिमबिक गाँव में कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च सत्य) प्राप्त हुआ। इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद वर्धमान जिन (इंद्रियों पर जीत प्राप्त करने वाला) और महावीर (महान् विजयी) कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के समय महावीर जी की आयु 42 वर्ष थी।

4. धर्म प्रचार (Preachings)-ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर जी ने लोगों में फैले अंधविश्वासों को दूंर करने के लिए और उनको सच्चा मार्ग बताने के लिए अपने उपदेशों का प्रचार किया। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग प्रभावित हुए और वे महावीर जी के अनुयायी बन गये। महावीर जी के प्रसिद्ध प्रचार केंद्र राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथिला, विदेह और अंग थे। जैन परंपराओं के अनुसार मगध के शासक बिंबिसार और उसके पुत्र अजातशत्रु ने जैन मत को स्वीकार कर लिया।

5. निर्वाण (Nirvana)—स्वामी महावीर ने लगभग 30 वर्षों तक अपना प्रचार किया। 72 वर्ष की आयु में पावा (पटना) में 527 ई० पू० में उन्होंने निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त किया। उस समय महावीर जी के 14,000 अनुयायी थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 6.
जैन धर्म में त्रि-रत्न से क्या अभिप्राय है ? चर्चा करें।
(What is meant by three Jewels in Jainism ? Discuss.)
अथवा
‘त्रि-रत्न’ की व्याख्या करो और बताओ कि यह किस धर्म से संबंधित है ? (Explain Tri-Ratna and tell to which religion, do they belong.)
अथवा
जैन मत के तीन हीरों की व्याख्या करें।
(Explain the three Jewels of Jainism.).
अथवा
जैन धर्म के त्रि-रत्नों के बारे में चर्चा करो।
(Discuss the Tri-Ratnas of Jainism.)
उत्तर-
जैन दर्शन के सिद्धांतों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पहले जीव (आत्मा) शुद्ध रूप में होता है। बाद में यह कार्मिक पदार्थों के कारण दूषित हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को घोर दुःखों का सामना करना पड़ता है। यदि कार्मिक पदार्थों का नाश कर दिया जाये तो व्यक्ति इस भवसागर से पार उतर सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। जैन दर्शन मोक्ष प्राप्ति को मनुष्य के जीवन का सबसे ऊँचा उद्देश्य मानता है। कोई भी व्यक्ति बिना किसी जाति, लिंग, धर्म, वर्ग या आयु पर इस मार्ग पर चल सकता है। इस मार्ग पर चलने के लिए जैन धर्म में त्रि-रत्न निर्धारित किये गये हैं। ये त्रि-रत्न हैं-(1) सच्चा विश्वास (2) सच्चा ज्ञान (3) सच्चा आचार। ये त्रि-रत्न मोक्ष प्राप्ति के तीन भिन्न-भिन्न मार्ग नहीं हैं, बल्कि एक मार्ग के तीन साथ-साथ चलने वाले रास्ते हैं। यदि इनमें से एक की भी कमी हो तो व्यक्ति अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर सकता। उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति ने अपने मकान की छत पर जाना हो तो उसको सीढ़ी लगानी पड़ेगी और यदि इस सीढ़ी के सिरे पर लगे दो और बीच में लगे डंडों में से एक चीज़ की भी कमी हो तो व्यक्ति किसी भी स्थिति में ऊपर नहीं पहुँच सकता। त्रि-रत्नों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित है—

1. सच्चा विश्वास (Right Belief)-जैन दर्शन के त्रि-रत्नों में सच्चा विश्वास नामक रत्न को पहला अथवा प्रमुख स्थान दिया गया है। क्योंकि यदि व्यक्ति में सच्चा विश्वास न हो तो वह सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार कभी प्राप्त नहीं कर सकता। सच्चा विश्वास से भाव यह है कि जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, उसे 24 जैन तीर्थंकरों, नौ महान् सच्चाइयों और जैन शास्त्रों में पक्की श्रद्धा होनी चाहिए। जैन शास्त्रों के अनुसार सच्चा विश्वास तभी पूरा हो सकता है यदि संबंधित व्यक्ति 8 अंगों को धारण करे। ये 8 अंग हैं—

  • जैन धर्म के सिद्धांतों के बारे कोई शंका नहीं होनी चाहिए।
  • सांसारिक वस्तुओं से कोई प्यार नहीं होना चाहिए।
  • शरीर में चाहे अनगिनत बुराइयाँ हैं, परंतु इसके प्रति कोई तिरस्कार की भावना नहीं होनी चाहिए।
  • गलत मार्ग की ओर कोई झुकाव नहीं होना चाहिए।
  • पवित्र व्यक्तियों की प्रशंसा की जानी चाहिए, परंतु दूसरे व्यक्तियों की निंदा नहीं की जानी चाहिए।
  • जो व्यक्ति धर्म की राह से भटक गये हों उनको ठीक मार्ग दर्शाना चाहिए।
  • धार्मिक व्यक्तियों का पूरा आदर किया जाना चाहिए।
  • जैन सिद्धांतों के प्रचार के लिए पूरे यत्न करने चाहिए।

सच्चा विश्वास किसी भी व्यक्ति द्वारा तब ही प्राप्त किया जा सकता है यदि वह तीन प्रकार के अंध-विश्वासों और आठ प्रकार के घमंडों से दूर रहे। तीन तरह के अंध-विश्वास ये हैं—

  • पहाड़ पर चढ़कर, नदी में नहाकर या आग पर चल कर अपने आप को पवित्र समझना।
  • झूठे देवी-देवताओं में विश्वास करना।
  • झूठे तपस्वियों का सत्कार करना।

आठ प्रकार के घमंड ये हैं—

  • ज्ञान का घमंड
  • पूजा का घमंड
  • परिवार का घमंड
  • जाति का घमंड
  • शक्ति का घमंड
  • दौलत का घमंड
  • तप का घमंड
  • सुंदर शरीर का घमंड।

सच्चा विश्वास हमारे लिए समृद्धि तथा मोक्ष का आधार तैयार करता है।

2. सच्चा ज्ञान (Right Knowledge)-सच्चा विश्वास ही सच्चे ज्ञान की आधारशिला है। इस कारण सच्चा विश्वास और सच्चे ज्ञान के मध्य गहरा संबंध है। सच्चा ज्ञान वह है जो जैन शास्त्रों में दिया गया है। जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करना चाहता है उसके लिए सच्चे ज्ञान को प्राप्त करना अति ज़रूरी है। यह ज्ञान बाहर से नहीं आता बल्कि जीव पर पड़े कर्म पदार्थों के पर्दे को दूर हटाने से उत्पन्न हो जाता है। इस ज्ञान के दो रूप बताये गये हैं जिनको प्रत्यक्ष ज्ञान और परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। वह ज्ञान जो आत्मा द्वारा सीधा प्राप्त किया जाता है प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाता है और वह ज्ञान जो इंद्रियों के रास्ते से प्राप्त होता है परोक्ष ज्ञान कहलाता है।
जैनी ज्ञान को पाँच तरह का बताते हैं—

  • मति ज्ञान-यह ज्ञान इंद्रियों द्वारा प्राप्त किया जाता है और यह सीमित होता है।
  • श्रुती ज्ञान-यह ज्ञान शास्त्रों को पढ़ने और या सुनने से प्राप्त होता है। इससे भूत, वर्तमान और भविष्य संबंधी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। यह ज्ञान भी इंद्रियों के द्वारा जाना जा सकता है।
  • अवधि ज्ञान-दूर के समय या स्थान के बारे जो ज्ञान आत्मा के द्वारा होता है उसको अवधि ज्ञान कहते हैं।
  • मनपर्याय ज्ञान-यह वह ज्ञान है जिस द्वारा व्यक्ति किसी दूसरे के मन के विचारों को जान सकता है। यह ज्ञान भी आत्मा द्वारा होता है।
  • कैवल्य ज्ञान-यह पूर्ण सच्चा ज्ञान है। इसको परमार्थिक ज्ञान भी कहा जाता है। इस ज्ञान को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को सिद्ध कहा जाता है।

ज्ञान दोष तीन तरह से पैदा होता है—

  • इंद्रियों की गलती के कारण।
  • गलत अध्ययन के कारण।
  • अस्पष्ट दृष्टिकोण के कारण।

जैसे दूध की भारी मात्रा में थोड़ा-सा खट्टा डाल दिया जाये तो वह सारे दूध को खट्टा कर देता है। ठीक उसी तरह यदि व्यक्ति द्वारा प्राप्त ज्ञान में थोड़ा-सा भी दोष आ जाये तो वह सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।

3. सच्चा आचार (Right Conduct)-मोक्ष को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति के लिए सच्चा विश्वास और सच्चा ज्ञान होने के बाद सच्चा आचार का होना अति ज़रूरी है। व्यक्ति का सच्चा आचार ही जीव के कार्मिक पदार्थों का नाश करता है और उसके लिए मोक्ष का मार्ग तैयार करता है। सच्चे आचार पर चलने के लिए जैन धर्म में कुछ नियम निर्धारित किये गये हैं। ये नियम यद्यपि समान रूप में आम लोगों और जैन मुनियों पर लागू होते हैं परंतु उन पर सख्ती का अंतर है । जैन मुनियों को इन नियमों की सख्ती से पालना करनी पड़ती है जबकि आम लोगों को कुछ छूट दी गई है। इन नियमों को पाँच महाव्रत या पाँच अणुव्रत कहा जाता है इनके अनुसार—

  • मनुष्य को कभी किसी जीव को दु:ख नहीं देना चाहिए और उसको अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए।
  • उसको सदा सत्य बोलना चाहिए। उसके बोल मीठे और हितकारी होने चाहिए।
  • उसको कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसको दान में प्राप्त न हुई हो।
  • उसको सांसारिक वस्तुओं से मोह नहीं करना चाहिए।
  • उसको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

ऊपरलिखित त्रि-रत्नों पर चलने के कारण जीव के कर्म पदार्थ धीरे-धीरे नष्ट होने शुरू हो जाते हैं और वह अपने परम उद्देश्य मोक्ष को प्राप्त करता है। अंत में हम प्रसिद्ध लेखक जे० पी० सुधा के इन शब्दों से सहमत हैं,
“जैनियों के अनुसार सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार जो त्रि-रत्नों के तौर पर जाने जाते हैं उस मार्ग का निर्धारण करते हैं जो जीव अपने अंदर कार्मिक पदार्थों को आने से रोकते हैं और व्यक्ति को आवागमन के बंधनों से मुक्त करते हैं।”3

3. “According to the three jewels of right faith, right knowledge and right conduct, known as Triratna constitute the path which prevents fresh Karmic matter from entering the soul and frees the individual from the bonds of rebirth.” J.P. Sudha, Religions in India (New Delhi : 1978) p. 211.

प्रश्न 7.
जैन धर्म में अहिंसा पर नोट लिखें। (Write a note on Ahimsa (non-violence) of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म में अहिंसा के सिद्धांत के बारे में प्रकाश डालें।
(Throw light on the Jain principle of Ahimsa.)
अथवा
अहिंसा से क्या भाव है ? जैन धर्म में इसका क्या महत्त्व है ? (What is meant by Ahimsa ? What is its importance in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में अहिंसा के सिद्धांत पर नोट लिखें।
(Write a note on the concept of Ahimsa in Jainism.)
उत्तर-
1. अहिंसा से अभिप्राय (Meaning of Ahimsa)-जैन धर्म में अहिंसा की नीति को जितना महत्त्व दिया गया है उतना विश्व के किसी अन्य धर्म में नहीं दिया गया। यदि अहिंसा को जैन धर्म की आधारशिला कह दिया तो इसमें कोई अतिकथनी नहीं होगी। अहिंसा से अभिप्राय है किसी भी जीवित चीज़ को कोई कष्ट न देना। जीवित जीवों को कस के बाँधने, उनको मारने-पीटने, उनकी हिम्मत से अधिक भार जोतने, उनको खुराक और पानी से वंचित रखने में जैन धर्म में मनाही है। इनके अतिरिक्त उनको अपने भोजन के लिए मारना बिल्कुल अनुचित है।
जैन दर्शन के अनुसार वृक्षों और पत्थरों आदि में भी जान होती है। इसलिए हमें उनको भी किसी किस्म का दु:ख नहीं देना चाहिए। आचारांग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना जीवन प्यारा है, सभी सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सभी जीने की इच्छा रखते हैं।” इसलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है।

2. दो प्रकार की हिंसा (Two types of Ahimsa)-हिंसा दो प्रकार की होती है-विचार या मन से हिंसा और कर्म से भाव शारीरिक और बाहरी हिंसा। बाहरी हिंसा के व्यवहार में आने से पहले मनुष्य के विचारों में हिंसा आती है। जब मनुष्य के मन में आवेग उठते हैं और इन आवेगों के प्रति विचार उत्पन्न होते हैं तो व्यक्ति पाप करता है और हिंसा का दोषी बन जाता है। मनुष्य संसार के लालचों में फंसकर अपनी काम वासना को पूरा करने के लिए , किसी को धोखा देने के लिए, किसी से अपना बदला लेने के लिए हिंसा करता है। जब इससे संबंधित विचार व्यक्ति के मन में आते हैं तो वह पहले अपनी आत्मा को दूषित करता है। वह यहाँ ही बस नहीं करता और बाद में बाहरी हिंसा के द्वारा दूसरों को दुःख पहुँचाता है और स्वयं भी दुःखी होता है। हिंसा को रोकने के लिए व्यक्ति का अपने विचारों को शुद्ध करना ज़रूरी है। महावीर ने अपने शिष्यों को शिक्षा देते हुए कहा, “हे श्रमणो, पहले अपने आप से युद्ध करो और आत्म शुद्धि की ओर कदम बढ़ाओ। बाहरी युद्ध से कुछ नहीं होगा।”

3. अहिंसा जीवन का एक मार्ग (Ahimsa is a way of Life)-जैन दर्शन में अहिंसा को जीवन का एक मार्ग कहा गया है। किसी भी व्यक्ति द्वारा अहिंसा के प्रति प्रतिज्ञा का पूरी तरह पालन तभी संभव है यदि उसको हिंसा की किस्मों और रूपों के बारे में पूर्ण ज्ञान हो। जैनी सूत्रों में 108 प्रकार की हिंसा का वर्णन मिलता है जिन्हें चार वर्गों में बाँटा जा सकता है। पहले वर्ग में हिंसा तीन स्तर की है। हिंसा व्यक्ति स्वयं कर सकता है, यह दूसरों से करवाई जा सकती है और यह उसकी अपनी सहमति के द्वारा की जा सकती है। व्यक्ति मन, वाणी और शरीर द्वारा हिंसा कर सकता है। दूसरे वर्ग में तीन स्तरीय हिंसा नौ स्तरीय बन जाती है क्योंकि यह मन, वाणी और शरीर रूपी तीन साधनों में प्रत्येक साधन द्वारा की जा सकती है। तीसरे वर्ग में नौ स्तरीय हिंसा सताईस स्तरीय बन जाती है क्योंकि हिंसा की तीन स्थितियाँ हैं, भाव हिंसा के बारे में सोचना, हिंसा के लिए तैयारी करना और फिर उस को व्यावहारिक रूप देना। चौथे वर्ग में सत्ताईस स्तरीय हिंसा 108 स्तरीय हिंसा बन जाती है क्योंकि यह चार मनोवेगों में से किसी न किसी से उत्तेजित होती है।

4. हिंसा से बचने के साधन (Ways to Escape Ahimsa)-हिंसा के सभी रूपों में किसी से बचना आसान नहीं है। फिर भी जैनी अपने जीवन में इनसे बचने के लिए अनेक नियमों का पालन करते हैं। वे नंगे पाँव चलते हैं ताकि कोई कीड़ा उनके पाँवों के नीचे आकर मर न जाये। वे मुँह पर पट्टी बाँध कर रखते हैं ताकि कोई कीटपतंगा सांस से उनके अंदर न चला जाए। इस उद्देश्य से वे पानी छान कर पीते हैं और सूर्य ढलने के बाद भोजन नहीं करते। जैनी ज्यादातर व्यापार का धंधा करते हैं और खेतीबाड़ी बिल्कुल नहीं करते क्योंकि उनका विचार है कि खेतीबाड़ी करते समय अनेक जीवों की हत्या हो जाती है।
जैन धर्म में व्यक्ति के मन में हिंसा के विचारों को उभरने से रोकने के लिए शराब और दूसरी नशीली वस्तुओं के सेवन, माँस खाने और युद्ध करने की मनाही है। नशीली वस्तुओं का प्रयोग करने से हमारे अंदर काम वासना और अन्य कई वासनाएँ उत्तेजित होती हैं। इनसे पाप की भावना और हिंसा उत्पन्न होती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति लापरवाही में ही हिंसा कर देता है। माँस का प्रयोग करने पर इसलिए पाबंदी लगाई गई है ताकि मनुष्य पशुओं और पक्षियों को अपने भोजन के लिए न मारे और न ही वह हिंसा का भागीदार बने। युद्ध के दौरान व्यक्ति अपने दुश्मनों को मार कर बहुत बहादुरी का काम समझता है परंतु जैन दर्शन के अनुसार किसी भी व्यक्ति को मारना बिल्कुल अयोग्य है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

ऊपरलिखित विवरण से स्पष्ट है कि जैन धर्म में अन्य नियमों के मुकाबले अहिंसा के सिद्धांत पर अधिक बल दिया गया है। डॉक्टर ज्योति प्रसाद जैन का यह कहना बिल्कुल ठीक है,
“अहिंसा का जीवन सारी नैतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बुराइयों का राम बाण इलाज है। अहिंसा सर्वोच्च धर्म है और जहाँ अहिंसा है वहाँ जीत है।”4

4. “The Ahimstic way of life is the sure panacea for all moral, social, economic and political ills. Ahimsa is the highest religion, and where there is Ahimsa, there is victory.” Dr. Jyoti Prasad Jain, Religion and Culture of the Jains (New Delhi : 1983) p. 101.

प्रश्न 8.
जैन धर्म की नौ सच्चाइयों से क्या भाव है ? इनका संक्षेप वर्णन करो। (What is meant by Nine Truths of Jainism ? Explain briefly.)
अथवा
जैन धर्म के नौ तत्त्व कौन से हैं ? चर्चा करें।
(Which are the nine tatvas in Jainism ? Discuss.)
अथवा
जैन धर्म के नौ तथ्यों पर एक नोट लिखो।
(Write a note on nine tatvas of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के नौ तत्त्वों से हमें क्या शिक्षा मिलती है ?
(What do we learn from nine tatvas of Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म के नौ रत्नों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the Nine Rattans of Jainism.)
उत्तर-
नौ सच्चाइयों अथवा तत्त्वों को जैन दर्शन में केंद्रीय स्थान प्राप्त है। वह व्यक्ति जो निर्वाण प्राप्त करने का चाहवान है उसके लिए इन नौ सच्चाइयों के बारे जानकारी होना अति जरूरी है। ये नौ सच्चाइयाँ हैं—
(i) जीव
(ii) अजीव
(iii) पुण्य ”
(iv) पाप
(v) आश्रव
(vi) बंध
(vii) संवर
(viii) निर्जर
(ix) मोक्ष।

दिगंबर संप्रदाय के अनुसार सात सच्चाइयाँ हैं । वे पाप और पुण्य को अलग नहीं मानते। उनके अनुसार ये अश्रव और बंध में शामिल हैं। इन सच्चाइयों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. जीव (Jiva)-जीव शब्द का अर्थ है आत्मा। यह चेतन तथ्य है। जैन दर्शन में जीव दो प्रकार के हैं। इनको सांसारिक जीव और मुक्त जीव कहा जाता है। सांसारिक जीव को बंधन जीव भी कहते हैं। यह जीव आवागमन के चक्र में रहता है और अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता है और अपने अच्छे बुरे फल भुगतता है। मुक्त जीव वह जीव है जो पुनर्जन्म से रहित है। यह जीव अनंत ज्ञान वाला, अनंत शक्ति वाला और अनंत गुणों वाला होता है। यह जीव कर्मों के जाल से मुक्त होता है।

2. अजीव (Ajiva)-अजीव से भाव उन जड़ पदार्थों से है जिनमें चेतना नहीं होती जैसे पुस्तक, कागज़, मेज़ और स्याही आदि। उदाहरण के तौर पर ऊँट के शरीर में जीव फैल कर ऊँट जितना बड़ा हो जाता है और कीड़ी के शरीर में सिकुड़ कर कीड़ी जितना हो जाता है। यह जीव तब नहीं दिखाई देता है परंतु शरीर की क्रियाओं के आधार पर इसकी उपस्थिति का ज्ञान हो जाता है। परंतु जब शरीर का अंत हो जाता है तो जीव लोप हो जाता है। जीव जिस शरीर को धारण करता है वह उस के आकार का ही हो जाता है। अजीव दो प्रकार के होते हैं रूपी और अरूपी । रूपी वह हैं जो दिखाई देते हैं जैसे कुर्सी, पैन, घड़ा आदि। अरूपी वह हैं जो दिखाई नहीं देते जैसे समय, चिंता और खुशी आदि। जैन दर्शन में अजीवों के पाँच अचेतन तत्त्व बताए गए हैं। इनका संक्षेप वर्णन निम्नलिखित है

  • पुदगल (Pudgala)-पुदगल से भाव पदार्थ या परमाणु है। यह पुदगल रूप, स्पर्श, रस और गंध-चार गुणों वाले होते हैं। अग्नि के पुदगल रूप गुण वाले, वायु के पुदगल स्पर्श गुण वाले, जल के पुदगल रस गुण वाले और पृथ्वी के पुदगल गंध गुण वाले होते हैं। पुदगलों के दो रूप माने गए हैं-अणु रूप वाले और स्कंध रूप वाले। अणु रूप वाले पुदगल जीवों के भोग के लायक नहीं होते हैं जबकि स्कंध रूप वाले होते हैं। पुदगलों को सारे भौतिक जगत् की रचना का मूल आधार माना जाता है।
  • धर्म (Dharma) यह तत्त्व जीव और पुदगलों में गति पैदा करता है और उनके आपसी सहयोग में सहायक माना जाता है। जैसे मछली की गति के लिए पानी की ज़रूरत अति आवश्यक है ठीक उसी प्रकार जीवों और पुदगलों की गति के लिए धर्म की ज़रूरत अति आवश्यक है। धर्म के बिना गति पैदा नहीं हो सकती।
  • अधर्म (Adharma)-इसका स्वरूप और कार्य धर्म से बिल्कुल उल्ट है। यह जीवों की ओर पुदगलों की गति में रुकावट पैदा करता है। परंतु अधर्म को धर्म का विरोधी नहीं समझा जाता। अधर्म के द्वारा गति में पाई गई रुकावट जीव के आराम के लिए सहायक मानी गई है।
  • आकाश (Akasha)-आकाश से भाव वह स्थान है जिसमें जीव, मुदगल, धर्म और अधर्म सारे विस्तार वाले तत्त्व रहते हैं। इन तत्त्वों के आधार पर ही आकाश की उपस्थिति का अनुमान किया जाता है। जैन दर्शन के अनुसार आकाश दो प्रकार के हैं-लोकाकाश और अलोकाकाश। लोकाकाश उस आकाश को कहा गया है जिस भाग में भौतिक लोक की स्थिति है और उससे ऊपर जो आकाश है उसको अलोकाकाश कहा गया है।
  • काल (Kala)-काल से भाव समय है। यह विस्तार वाला तत्त्व नहीं है। इसकी उपस्थिति का ज्ञान अनुमान के द्वारा प्राप्त होता है। काल को जगत् के परिवर्तन का मूल कारण माना गया है। भूत, वर्तमान, भविष्य से काल का संबंध है। काल को आदि और अंत वाला तत्त्व कहा जाता है।

3. पुण्य (Punya)-पुण्य वह कर्म है जो अच्छे अमलों से कमाये जाते हैं। पुण्य कमाने के अलग-अलग ढंग हैं। भूखे को खाना देना, प्यासे को पानी पिलाना, नंगे को कपड़ा देना, हाथों से सेवा करनी, मीठा बोलना आदि पुण्य के काम हैं, पुण्य को मानने के 42 साधन हैं। अच्छी सेहत, आर्थिक समृद्धि, प्रसिद्धि, अच्छा वैवाहिक जीवन, अच्छे रिश्तेदारों और दोस्तों का मिलना, अच्छी पढ़ाई और उच्च पदवियों पर नियुक्ति आदि अच्छे पुण्यों का ही नतीजा है। पुण्य को आत्मा का सहायक माना जाता है क्योंकि इससे खुशी प्राप्त होती है।

4. पाप (Papa)-पाप को जीव के बंधन का मुख्य कारण माना जाता है। जीवों को मारना, झूठ, चोरी, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, धोखा, नशा और दुश्मनी आदि सब पापों के भार में वृद्धि करते हैं। पापियों को घोर सजाएँ . मिलती हैं। आपने देखा होगा कि एक ही घर में पैदा हुए दो सगे भाइयों के जीवन में भारी अंतर होता है। एक ऊँची पदवी पर सुशोभित होता है और उसको प्रसिद्धि प्राप्त होती है। दूसरा दर-दर की ठोकरें खाता फिरता है, चोरियाँ करता है और बदनामी कमाता है। ऐसा क्यों होता है ? जैन दर्शन के अनुसार ऐसा व्यक्ति के पुण्य और पाप कमाने का कारण होता है। पापी मनुष्य कभी भी सुखी नहीं हो सकता और उसको अपने जीवन में घोर संकट का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा भी तड़पती रहती है। जैन सूत्रों के अनुसार पापों के 82 अलग-अलग परिणाम निकलते हैं।

5. आशरव (Asrava) ब्रह्मांड में अनगिनत सूक्ष्म अणु (कार्मिक पदार्थ) घूमते रहते हैं जिनको आत्मा अपने अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार अपनी ओर खींचती है। इस अंदर आने की कारवाई को आश्व कहते हैं। मनुष्य के कर्म आत्मा में उसी तरह शामिल होते हैं जैसे एक सुराख के रास्ते से नाव में पानी। कर्म जीव के बंधन का एक मुख्य कारण है। कर्म जड़ हैं। इसलिए आप जीव में प्रवेश नहीं करते, वे मन, वचन और शरीर की सहायता से जीव में प्रवेश करते हैं। कर्म दो प्रकार के हैं शुभ और अशुभ। यदि शुभ कर्म जीव में प्रवेश होंगे तो उसको सुख की प्राप्ति होगी और यदि कर्म अशुभ होंगे तो जीव को कष्ट होगा। इसलिए कर्मों का शुभ अथवा अशुभ होना व्यक्ति की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है।

6. बंध (Bandha)-जब कर्म पदार्थ का पर्दा जीव के शुद्ध स्वरूप पर पड़ जाता है तो वह दूषित हो जाता है। यह जीव के बंधन का कारण बनता है। जैन दर्शन के अनुसार इस दिशा की ओर ले जाने वाले पाँच कारण हैं।

  • मिथ्या दर्शन-इससे भाव गलत विश्वास है।
  • आवृत्ति-इससे भाव है प्रतिज्ञा की कमी।
  • प्रसाद-इससे भाव है लापरवाही।
  • काश्य-इससे भाव है काम वासना।
  • योग-इससे भाव है शरीर, मन और बोल की प्रक्रिया।
    बंध चार प्रकार के हैं—
  • प्रकृति-जीव से जुड़े कर्म पदार्थों का स्वरूप।
  • स्थिति-कर्म पदार्थ जीव से कितने समय के लिए जुड़े हैं।
  • अनुभाग-कर्म पदार्थ सख्त चरित्र के हैं या नर्म चरित्र के। (घ) प्रदेश जीव-जीव से जुड़े कर्म पदार्थों में अणुओं की संख्या।
    कर्मों के जाल में फंस कर जीव का व्यावहारिक रूप नष्ट हो जाता है और वह बंधन में फंस जाता है। इस कारण वह बार-बार जन्म लेता है और शरीर रूपी कैद भोगता है।

7. संवर (Sanvara)—योग क्रिया के द्वारा कर्म पदार्थ जीव की ओर खींचे आते हैं। मोक्ष प्राप्त करने के लिए इस क्रिया को रोकना अति ज़रूरी है। इसको संवर कहते हैं। इसको आश्व निरोध भी कहते हैं, जिससे भाव है कर्मों का हमारे अंदर प्रवेश करने से रुक जाना। कर्म को रोकने की 57 विधियाँ हैं। इनमें आत्म संयम, शुभ विचार, लोभ, मोह, अहंकार, क्रोध और पापों से परहेज़ आदि शामिल हैं। इस कारण जीव के इर्द-गिर्द एक ऐसी ऊँची दीवार बन जाती है जिसके अंदर कर्म पदार्थों का दाखिल होना असंभव है। जैसे एक तालाब में जिस नाली के द्वारा पानी जा रहा है उसको रोकना संभव है ठीक उसी प्रकार कर्म पदार्थों को संवर के द्वारा जीव में प्रवेश करने से रोकना संभव है।

8. निर्जर (Nirjara)-निर्जर से भाव कर्म पदार्थों को जीव से दूर हटाना है। यह जीव के द्वारा संचित कर्मों को नष्ट करने का एक मुख्य साधन है। संवर द्वारा जीव में कर्मों के बढ़ने और प्रवेश को रोका जाता है। परंतु पुराने कर्मों को जिन का जीव के भीतर आश्व हो गया है निर्जर के द्वारा नाश किया जा सकता है। निर्जर में तपस्या शामिल है। तपस्या अग्नि की तरह कर्म पदार्थों के इकट्ठे हुए ढेर को जला कर राख कर देती है। इसी प्रकार जब जीव पर से कर्म पदार्थों का पड़ा पर्दा हट जाता है तो उसका शुद्ध स्वरूप प्रकट हो जाता है। जैसे बिलौर के सामने काला कपड़ा रखने से वह काला नज़र आने लग जाता है। परंतु जब कपड़ा हटा लिया जाता है तो उसकी अपनी चमक दुबारा प्रकट हो जाती है।

9. मोक्ष (Moksha)-जैन दर्शन के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष अथवा निर्वाण को प्राप्त करना है। इसमें जीव कर्मों के सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है। कर्मों की समाप्ति से मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिए संवर और निर्जर आवश्यक है। कर्मों के बंधन को तोड़ने के लिए जैनी तीन सद्गुणों के पालन की सिफ़ारिश करते हैं, जिनको त्रि-रत्न कहा जाता है। ये हैं सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार। मोक्ष जीव की प्राप्ति की सर्वोच्च अवस्था है। जो व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर लेता है उसको सिद्ध कहते हैं । सिद्ध पुरुष जन्म, मृत्यु, सुख और दुःख से दूर है। वह ब्रह्मांड में चिरंजीवी शाँति प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 9.
जैन धर्म के पाँच महाव्रतों के महत्त्व का उल्लेख करें। (Describe the importance of Five Mahavartas in Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के पाँच महाव्रतों के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss the Five Mahavartas of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म में पाँच महाव्रतों का क्या महत्त्व है ? प्रकाश डालिए।
(What is the importance of Five Mahavartas in Jainism ? Elucidate.)
अथवा
जैन धर्म के पाँच अणुव्रतों के बारे में जानकारी दें।
(Describe the Five Anuvartas of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के पाँच अणुव्रतों का क्या महत्व है ? प्रकाश डालें।
(What is the importance of Five Anuvartas of Jainism ? Elucidate.) ।
उत्तर-
जैन धर्म में पाँच महाव्रतों को विशेष स्थान प्राप्त है। इन नियमों की पालना करनी प्रत्येक जैनी के लिए आवश्यक है। ये नियम बहुत कठोर हैं। ये नियम जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए बनाए गए थे। गृहस्थियों के लिए ये नियम इतने कठोर नहीं थे। इनके लिए बनाए गए नियमों को पाँच अणुव्रत (Five Anuvartas) कहा जाता है। इन पाँच महाव्रतों या अणुव्रतों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. अहिंसा (Ahimsa)-जैन धर्म में अहिंसा पर बहुत ज़ोर दिया गया है। अहिंसा की महत्ता बताते हुए आचारांग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना-अपना जीवन प्यारा है सब ही सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सारे ही जीने की इच्छा रखते हैं।” इसीलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है। हिंसा दो तरह की होती है-मन से हिंसा और कर्म से हिंसा। कर्म अथवा अमल में आने वाली हिंसा से पहले मन भाव विचारों में हिंसा आती है। गुस्सा, अहंकार, लालच और धोखा मन की हिंसा है। इसलिए हिंसा से बचने के लिए मन के विचारों को शुद्ध करना अति ज़रूरी है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्यों के अतिरिक्त पशुओं, पत्थरों और वृक्षों आदि में भी आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी कारण जैन लोग नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और अंधेरा हो जाने के बाद कुछ नहीं खाते ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाये। बी० एन० लूनीया के अनुसार,
“अहिंसा जैन धर्म की आधारशिला है।”5

2. सत्य (Satya)-जैन धर्म में सत्य बोलने पर बहुत बल दिया गया है। हमें हमेशा सत्य और मीठे वचन बोलने चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति दूसरे के मन को मोह लेता है। झूठ बोलने से आत्मा को दुःख होता है। झूठ बोलने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता। वास्तव में झूठ बोलने से कलह-क्लेश बढ़ता है और इसका अंत नहीं होता। विवश होकर अंत में व्यक्ति को सत्य मानना ही पड़ता है। झूठ के परिणाम हमेशा बुरे ही होते हैं। हमें किसी के डर के कारण, लालच के कारण अथवा हंसी-मज़ाक में भी झूठ नहीं बोलना चाहिए। इसलिए हमें हमेशा सोच-समझ कर बोलना चाहिए। गुस्सा आने पर शांत बने रहना चाहिए। जैन धर्म में इस बात पर भी बल दिया गया है कि हमें किसी पर भी झूठा आरोप नहीं लगाना चाहिए। हमें किसी के साथ भी धोखा नहीं करना चाहिए। हमें किसी को भी गलत परामर्श देकर उसे मार्ग से विचलित नहीं करना चाहिए। झूठ बोलकर किसी का रिश्ता तय नहीं करना चाहिए। पंचायत अथवा किसी भी और स्थान पर झूठी गवाही नहीं देनी चाहिए। झूठ ही हिंसा को जन्म देता है। सत्य अहिंसा का आधार है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

3. अस्तेय (Asteya)—जैन धर्म में अस्तेय को बहुत महत्त्व दिया गया है। अस्तेय का भाव है चोरी न करना। जैन धर्म में चोरी का अर्थ बहुत विशाल है। किसी की वस्तु चुरा लेनी एक सीधा अपराध है, लेकिन जैन धर्म में उसको चोरी ही माना गया है जो कोई भी व्यक्ति किसी द्वारा भूली हुई वस्तु का प्रयोग भी करता है। हमें किसी की वस्तु उसके मालिक की आज्ञा के बिना नहीं लेनी चाहिए। हमें किसी के घर में भी बिना आज्ञा के प्रवेश नहीं करना चाहिए। गुरु की स्वीकृति के बिना भिक्षा में प्राप्त अनाज को ग्रहण नहीं करना चाहिए। बिना स्वीकृति के हमें किसी के घर निवास नहीं करना चाहिए। यदि घर में रहने की स्वीकृति मिले तो उसकी आज्ञा के बिना उसकी वस्तु को इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जैन धर्म के अनुसार चोरी के दो प्रकार हैं। ये हैं-सूक्ष्म चोरी और स्थूल चोरी। सूक्ष्म चोरी उसको कहते हैं जिस में मनुष्य अपने परिवार के हित के लिए संयम स्वभाव से काम करता है। जैसे जंगल में लकड़ी और फल आदि प्राप्त करना। समाज और कानून की नज़रों में जिस चोरी को दंड योग्य माना जाता है उसको स्थूल चोरी कहा जाता है। मिलावट करनी, चोर की सहायता करनी, चोरी का माल खरीदना, कम मापदंड करना, लोगों से धोखे के सा. अधिक ब्याज प्राप्त करने को स्थूल चोरी कहा जाता है। एक बार चोरी करने वाला मनुष्य ग़रीब घर में जन्म लेता है बार-बार चोरी करने वाला मनुष्य अगले जन्म में गुलाम के रूप में जन्म लेगा।

4. अपरिग्रह (Aparigraha) जैन धर्म में अपरिग्रह महाव्रत को बहुत महत्ता दी गई है। अपरिग्रह से भाव है सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह न रखना। ये सामान्य देखने में आता है कि गृहस्थी लोग आवश्यक वस्तुओं को आवश्यकता से ज्यादा इकट्ठा करते हैं। जीवन की आवश्यक वस्तुओं को इकट्ठा करने में कोई बुराई नहीं, लेकिन वस्तुओं का आवश्यकता से अधिक भंडार इकट्ठा करना वास्तव में अन्य लोगों के अधिकार को मारना है। जितनी अधिक वस्तुओं को इकट्ठा करने की आकांक्षा बढ़ेगी उतना ही मन अशांत रहेगा। ऐसा मनुष्य कभी भी मोक्ष प्राप्त – * कर सकता। आवश्यकता से ज्यादा संपत्ति इकट्ठा करना भी एक अनुचित कर्म है। जैन साधुओं को आवप्रगकता से अधिक भोजन करने, कपड़े पहनने और बिस्तर आदि रखने की मनाही है। इस महाव्रत की पालना करने वाला व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है।

5. ब्रह्मचर्या (Brahmacharya)—जैन धर्म में ब्रह्मचर्या महाव्रत को विशेष महत्त्व प्राप्त है। इससे भाव है काम वासना से दूर रहना। जैन साधुओं के लिए इस सम्बन्धी कठोर नियम बनाए गए हैं। उनके लिए ये आवश्यक कि वे किसी स्त्री की ओर न देखें, उनसे बातें न करें, किसी भी स्त्री के साथ भूतकाल में बिताए समय को याद न करें। ऐसे किसी घर में न जाए जहाँ कोई स्त्री अकेली रहती हो। शुद्ध और थोड़ा भोजन खाना चाहिए। इस तरह जैन साधवियों के लिए भी नियम निश्चित हैं। उनके लिए किसी पुरुष के साथ बातचीत करने और उनके बारे में सोचने की मनाही है। ग्रहस्थियों के लिए केवल अपनी स्त्री का साथ करना ही ब्रह्मचर्या है। जैन धर्म में काम को वास्तव में जीवन को समाप्त करने वाला रोग माना गया है।
उपरोक्त पाँच महाव्रतों की पालना करने वाला व्यक्ति संयमी बन जाता है और निर्वाण अथवा मोक्ष प्राप्त करता है। डॉ० के० सी० सोगानी के अनुसार,
“इन पाँच महाव्रतों की पालना व्यक्तिगत और सामाजिक उन्नति के लिए सहायक है।”6

5. “Ahimsa is the sheet anchor of Jainism.” B.B. Luniya, Life and Culture in Ancient India (Agra : 1982) p. 162.
6. “The observance of these five rows is capable of bringing about individual as well as social progress.”: Dr. K.C. Sogani, op. cit., p, 65.

प्रश्न 10.
प्रमुख जैन संप्रदायों के बारे में जानकारी दें।
(Write about the main sects in Jainism.)
उत्तर-
जैनी अनेक संप्रदायों में बंटे हुए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख संप्रदायों का संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार—

1. अजीविक (The Ajivika)-इस संप्रदाय का संस्थापक गोशाल था। वह स्वामी महावीर का शिष्य था और 6 वर्षों के पश्चात् उनसे अलग हो गया था। यह संप्रदाय अपने नियति (किस्मत) के विशेष सिद्धांत के लिए प्रसिद्ध है। इसके अनुसार हर वस्तु की किस्मत पहले से ही निश्चित है। इस को मनुष्य के यत्नों के द्वारा बदला नहीं जा सकता। गोशाल के द्वारा प्रचारित धर्म भारत में 13वीं शताब्दी तक प्रफुल्लित रहा और बाद में लोप हो गया।

2. दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय (The Digambara and Shvetambra Sects)-जैन धर्म के सब संप्रदायों में से दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के समय मगध में भयंकर अकाल पड़ा था। इसलिए भद्रबाहु जो जैनी भिक्षुकों का नेता था अपने साथ बहुत सारे भिक्षुओं को लेकर मैसूर (कर्नाटक) चला गया। जो भिक्षुक मगध में रह गये थे उन्होंने स्थूलभद्र को अपना मुखिया चुन लिया। इन भिक्षुकों ने पाटलिपुत्र में एक सभा का आयोजन किया और अपने साहित्य को एक नया रूप दिया। इस साहित्य को उन्होंने अंग का नाम दिया। इसके अतिरिक्त इन भिक्षुओं ने नंगे रहने की प्रथा को त्याग दिया और सफ़ेद कपड़े पहनने शुरू कर दिये। 12 वर्षों के पश्चात् जब भद्रबाहु अपने अन्य भिक्षुकों के साथ दुबारा मगध आया तो उसने स्थूलभद्र द्वारा किए गए परिवर्तनों को स्वीकार न किया। परिणामस्वरूप जैनी दो संप्रदायों दिगंबर और श्वेतांबर में बाँटे गए। दिगंबर से भाव था नग्न रहने वाले और श्वेतांबर से भाव था सफ़ेद वस्त्र पहनने वाले। इन दोनों में प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं—

  • दिगंबर संप्रदाय वाले नंगे रहते थे जबकि श्वेतांबर जाति वाले सफ़ेद वस्त्र पहनते थे।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्त्रियाँ तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं लेती। श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस सिद्धांत को गलत मानते हैं। उनका कहना है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  • दिगंबर संप्रदाय वाले स्त्रियों को जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा नहीं देते। दूसरी ओर श्वेतांबर संप्रदाय वाले स्त्रियों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाते। उनका कहना था कि 19वीं तीर्थंकर मल्ली एक स्त्री थी। दिगंबर संप्रदाय वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह नहीं करवाया था। श्वेतांबर संप्रदाय वाले यह मानते हैं कि स्वामी महावीर ने विवाह करवाया था। उनकी एक पुत्री थी, जिसका नाम प्रियादर्शना था।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों का यह मत है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले साधुओं को भोजन की ज़रूरत नहीं रहती जबकि श्वेतांबर मत वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  • दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय वालों का धार्मिक साहित्य अलग-अलग है।
  • दिगंबर संप्रदाय वालों की मूर्तियाँ नंगेज होती हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वालों की मूर्तियों को कपड़े पहनाये जाते हैं और उनको गहनों से सजाया जाता है।

3. लोक संप्रदाय (Lonka Sect)-इस संप्रदाय का मुखिया लोंक सा था। वह अहमदाबाद का रहने वाला था। 1474 ई० में एक जैनी साधु ज्ञान जी ने कुछ धार्मिक जैनी ग्रंथों का उतारा करने के लिए लोक सा को कहा। इन ग्रंथों को पढ़ते समय लोंक सा ने देखा कि मूर्ति पूजा का वर्णन कहीं भी नहीं आया जबकि जैनी कई सदियों से मूर्ति पूजा करते आ रहे थे। इसलिए उसने जैन धर्म में प्रचलित मूर्ति पूजा का खंडन किया। इससे जैनियों में एक बड़ा विवाद शुरू हो गया ? भानाजी लोंक सा के मत से सहमत हुआ और इस तरह वह लोंक सा संप्रदाय का पहला आचार्य बना।

4. स्थानकवासी (Sthanakvasi)-इस संप्रदाय का संस्थापक वीराजी था। वह सूरत का रहने वाला था। इस नए संप्रदाय का नाम स्थानकवासी इसलिए पड़ा क्योंकि इस संप्रदाय के साधु मंदिरों की जगह मठों में रहते थे। वे बहुत ही सादा जीवन व्यतीत करते थे। वे मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्राओं में विश्वास नहीं रखते थे।

5. तेरा पंथ (Terapanth)-इंस संप्रदाय के संस्थापक मारवाड़ के भीखनजी थे। इसकी स्थापना 1706 ई० में की गई थी। इस संप्रदाय के तेरह धार्मिक नियम थे जिस कारण इस संप्रदाय का नाम तेरा पंथ पड़ा। यह संप्रदाय भी मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता। यह तप और अनुशासन पर बहुत ज़ोर देता है।

6. तारना पंथ (Taranapanina)-इस पंथ की स्थापना स्वामी तारना ने ग्वालियर में की थी। इस पंथ को मानने वाले मूर्ति पूजा, धर्म के बाहरी दिखावे और जाति भेदों के विरुद्ध हैं। उनके अपने अलग मंदिर हैं जिनमें मूर्तियाँ ही नहीं बल्कि पवित्र धार्मिक ग्रंथों की पूजा भी की जाती है।

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प्रश्न 11.
जैन मत के प्रमुख संप्रदाय कौन से हैं ? उनके मध्य समानताएँ तथा भिन्नताएँ स्पष्ट करें।
(What are the main sects in Jainism ? Explain their similarities and differences.)
अथवा
जैन धर्म के फिरके दिगंबर और श्वेतांबर के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the sects Digambara and Shvetambra of Jainism.)
उत्तर-
दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय (The Digambara and Shvetambra Sects)-जैन धर्म के सब संप्रदायों में से दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के समय मगध में भयंकर अकाल पड़ा था। इसलिए भद्रबाहु जो जैनी भिक्षुकों का नेता था अपने साथ बहुत सारे भिक्षुओं को लेकर मैसूर (कर्नाटक) चला गया। जो भिक्षुक मगध में रह गये थे उन्होंने स्थूलभद्र को अपना मुखिया चुन लिया। इन भिक्षुकों ने पाटलिपुत्र में एक सभा का आयोजन किया और अपने साहित्य को एक नया रूप दिया। इस साहित्य को उन्होंने अंग का नाम दिया। इसके अतिरिक्त इन भिक्षुओं ने नंगे रहने की प्रथा को त्याग दिया और सफ़ेद कपड़े पहनने शुरू कर दिये। 12 वर्षों के पश्चात् जब भद्रबाहु अपने अन्य भिक्षुकों के साथ दुबारा मगध आया तो उसने स्थूलभद्र द्वारा किए गए परिवर्तनों को स्वीकार न किया। परिणामस्वरूप जैनी दो संप्रदायों दिगंबर और श्वेतांबर में बाँटे गए। दिगंबर से भाव था नग्न रहने वाले और श्वेतांबर से भाव था सफ़ेद वस्त्र पहनने वाले। इन दोनों में प्रमुख अंतर निम्नलिखित हैं—

  1. दिगंबर संप्रदाय वाले नंगे रहते थे जबकि श्वेतांबर जाति वाले सफ़ेद वस्त्र पहनते थे।
  2. दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्त्रियाँ तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं लेती। श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस सिद्धांत को गलत मानते हैं। उनका कहना है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  3. दिगंबर संप्रदाय वाले स्त्रियों को जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा नहीं देते। दूसरी ओर श्वेतांबर संप्रदाय वाले स्त्रियों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाते। उनका कहना था कि 19वीं तीर्थंकर मल्ली एक स्त्री थी। दिगंबर संप्रदाय वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  4. दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह नहीं करवाया था। श्वेतांबर संप्रदाय वाले यह मानते हैं कि स्वामी महावीर ने विवाह करवाया था। उनकी एक पुत्री थी, जिसका नाम प्रियादर्शना था।
  5. दिगंबर संप्रदाय वालों का यह मत है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले साधुओं को भोजन की ज़रूरत नहीं रहती जबकि श्वेतांबर मत वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  6. दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय वालों का धार्मिक साहित्य अलग-अलग है।
  7. दिगंबर संप्रदाय वालों की मूर्तियाँ नंगेज होती हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वालों की मूर्तियों को कपड़े पहनाये जाते हैं और उनको गहनों से सजाया जाता है।

प्रश्न 12.
जैन संघ की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करो। (Explain the salient features of Jain Sangha.)
अथवा
जैन धर्म के संघ-अनुशासन के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss the Sangha discipline of Jainism.)
उत्तर-
जैन संघ की स्थापना स्वामी महावीर जी ने पावा नगर में की थी। इसने जैन धर्म के प्रसार में प्रशंसनीय योगदान दिया।

1. सदस्य (Member)-जैन संघ में चार प्रकार के लोग शामिल होते हैं जिनको भिक्षु और भिक्षुणियाँ तथा श्रावक और श्राविका कहा जाता था। भिक्षु और भिक्षुणियाँ वे थे जिन्होंने संसार का त्याग कर दिया था। श्रावक और श्राविका वे थे जो गृहस्थी का जीवन व्यतीत करते थे।

2. दीक्षा (Initiation)—जो व्यक्ति संघ में शामिल होना चाहता था उसको अपने माता-पिता और संरक्षक से आज्ञा लेनी पड़ती थी। इसके बाद वह अपना मुंडन करके, स्नान करके, सफ़ेद कपड़े पहन के भिक्षा का बर्तन लेकर किसी प्रमुख जैन आचार्य के पास जा कर दीक्षा लेता था। इस संस्कार को निष्कर्म संस्कार कहते थे। स्त्रियाँ भी जैन संघ में शामिल हो सकती थीं। जैन संघ के दरवाज़े सभी जातियों के लिए खुले थे। केवल अधर्मी व्यक्तियों को संघ में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं थी।

3. अनुशासित जीवन (Disciplined Life)-दीक्षा प्राप्त करने के बाद भिक्षु-भिक्षुणियों को बहुत अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। उनको पाँच महाव्रतों, अहिंसा, सुनित, अस्तेय, अपरिगृह और ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था। उनको मन, वचन और शरीर से किसी को भी हिंसा पहुँचाने की मनाही थी। उनको झूठ बोलने, चोरी करने, अपने पास संपत्ति रखने, सुगंधित वस्तुओं का प्रयोग करने, जूते, छाता, पलंग और कुर्सी आदि का प्रयोग करने, बिना आज्ञा किसी के घर जाने, गृहस्थी के बर्तनों में भोजन करने, अधिक खाने, रात हो जाने के बाद भोजन करने, किसी की निंदा करने, किसी स्त्री के साथ बातचीत करने, जिस घर में स्त्री हो वहाँ ठहरने आदि की सख्त मनाही थी। गृहस्थी व्यक्तियों को भी यद्यपि इन नियमों का पालन करने के लिए कहा गया है, परंतु उन पर इतनी सख्ती लागू नहीं की गई थी।

4. प्रतिदिन जीवन (Daily Life)-प्रत्येक भिक्षु अथवा भिक्षुणी अपने रोज़ाना जीवन को 8 भागों में बाँटता था। इनमें 4 भाग धार्मिक ग्रंथों की पढ़ाई के लिए, 2 तप के लिए, 1 खाने के लिए और 1 आराम करने के लिए निश्चित होता था। वे अपना भोजन प्रतिदिन माँग कर खाते थे। उनको एक से अधिक घर से भिक्षा लेने की मनाही थी। जैन संघ के सारे सदस्य वर्षा के चार महीनों में एक स्थान पर रह कर जैन धर्म का प्रचार करते थे। बाकी के आठ महीने वे अलग-अलग स्थानों पर जा कर जैन धर्म के प्रचार में व्यतीत करते थे।

5. जैन संघ का मुखिया (Chief of the Jain Sangha)-जैन संघ का मुखिया आचार्य कहलाता था। वह संघ के सारे भिक्षुओं पर नियंत्रण रखता था। केवल उसी को ही दीक्षा देने, संघ का सदस्य बनाने अथवा किसी को सज़ा देने का अधिकार था। इस पदवी के लिए बहुत ही सुलझे हुए और उच्च चरित्र के व्यक्ति को नियुक्त किया जाता था। स्त्रियों के अपने अलग संघ होते थे। इसके प्रमुख को प्रवर्तिनी कहा जाता था। उसका प्रमुख कार्य जैन संघ में अनुशासन स्थापित रखना था।

6. जैन संघ की भूमिका (Role of Jain Sangha)-जैन संघ ने भारत में जैन धर्म को लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जैन संघ में सम्मिलित होने वाले भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों ने जैन धर्म के प्रसार के लिए कोई प्रयास शेष नहीं छोड़ा। प्रसिद्ध लेखक एस० सी० रैचौधरी के अनुसार,

“वास्तव में जैन संघ के प्रयासों के कारण जैन धर्म ने भारत की भूमि में अपनी गहरी जड़ें बना लीं तथा यह आज भी कायम हैं।”7

7. “In fact, it is mainly due to their efforts that Jainism took root into Indian soil and still survives,” S.C. Raychoudhary, History of Ancient India (Delhi : 2006) p. 107.

प्रश्न 13.
जैन धर्म ग्रंथों की भाषा क्या है ? जैन धर्म ग्रंथों के बारे में प्रारंभिक जानकारी दें।
(What is the language of Jain scriptures ? Give preliminary information about Jain scriptures.)
अथवा
जैन धर्म ग्रंथों के बारे में प्रारंभिक जानकारी दें।
(Give preliminary information about the major Jain scriptures.)
अथवा
जैन मत के प्रमुख धार्मिक ग्रंथों की जानकारी दो। (Give information about the prominent scriptures of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के प्रमुख ग्रंथों के बारे में आप क्या जानते हो ?
(What do you know about the prominent scriptures of Jainism ?)
अथवा
प्रमुख जैन धार्मिक ग्रंथों पर प्रकाश डालें।
(Throw light on the prominent Jain scriptures.)
उत्तर-
जैनियों ने अनेक धार्मिक ग्रंथों की रचना की। इनमें से जो ग्रंथ हमें आज उपलब्ध हैं उनकी संख्या 45 है। ये सारे ग्रंथ जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के साथ संबंधित हैं। ये ग्रंथ प्राकृत अथवा अर्ध मगधी जो उस समय लोगों की बोलचाल की आम भाषा थी में लिखे गए हैं। इन ग्रंथों को गुजरात में वल्लभी के स्थान पर 5वीं शताब्दी में लिखित रूप दिया गया। इनको एक प्रसिद्ध जैनी साधु देवरिद्धी ने संपूर्ण किया। इन ग्रंथों को 6 वर्गों में बाँटा गया है। इनके नाम हैं—
(1) 12 अंम
(2) 12 उपांग
(3) 10 प्राकिरण
(4) 6 छेदसूत्र
(5) 4 मूलसूत्र
(6) 2 विविध पुस्तकें।
इनका संक्षेप वर्णन निम्नलिखित अनुसार है—

1. 12 अंग (The Twelve Angas)-जैनियों के धार्मिक ग्रंथों में 12 अंगों को सब से अधिक पवित्र समझा जाता है। इन अंगों के नाम और उनका संक्षेप वर्णन इस प्रकार है

  • आचारांग सूत्र-इसमें जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए नियमों का वर्णन किया गया है। इसमें महावीर के जीवन का भी वर्णन मिलता है।
  • सूत्रक्रितांग- इसमें कर्म और अहिंसा के सिद्धांतों के बारे में और नरक के दु:खों के बारे में वर्णन मिलता है। इनके अतिरिक्त इसमें विरोधी धर्मों के सिद्धांतों का खंडन इस उद्देश्य से किया गया है ताकि जैनियों का अपने धर्म में पक्का विश्वास रहे।
  • स्थानांग-इसमें जैन धर्म के अलग-अलग विषयों के बारे जानकारी दी गई है।
  • समवायांग-इसमें जैन सिद्धांतों का संख्यात्मक ढंग से वर्णन किया गया है।
  • भगवती सूत्र-इसको जैन धार्मिक साहित्य का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ समझा जाता है। इसमें जैन सिद्धांतों का प्रश्न-उत्तर रूप में वर्णन किया गया है। ये प्रश्न स्वामी महावीर के प्रमुख शिष्य गौतम इंद्रभूति द्वारा पूछे गये थे और इनका उत्तर स्वामी महावीर ने स्वयं दिया था।
  • ज्ञात धर्म कथा-इसमें जैन धर्म से संबंधित प्रसिद्ध कथाओं का वर्णन मिलता है। इन कथाओं को उदाहरणों सहित समझाया गया है।
  • उपासकदशा-इसमें स्वामी महावीर के समय के 10 उन अमीर व्यक्तियों की कहानियाँ दी गई हैं जो महावीर के शिष्य बन गए थे और जिन्होंने कठोर तपस्या के बाद मोक्ष प्राप्त किया।
  • अंतक्रिदशा-इसमें उन जैन मुनियों के जीवन का वर्णन मिलता है जिन्होंने कठोर तप के बाद मोक्ष प्राप्त किया।
  • अनउत्तरोपपातिक-इसमें भी कुछ जैन मुनियों के जीवन का वर्णन मिलता है।
  • प्रश्न व्याकरण- इसमें पाँच महाव्रतों और पाँच अणुव्रतों का वर्णन किया गया है।
  • विपाकसूत्र-इसमें अच्छे या बुरे कर्मों से मिलने वाले फलों का वर्णन किया गया है।
  • दृष्टिवाद-यह अंग अब लोप हो चुका है। अन्य ग्रंथों में से इस अंग से संबंधित मिलते विवरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि इसमें विभिन्न सिद्धांतों का संक्षेप वर्णन किया गया था।

2. 12 उपांग (The Twelve Upangas)-प्रत्येक अंग का एक-एक उपांग है। इनमें मिथिहासिक कथाओं का अधिक वर्णन मिलता है। इनसे ज्योतिष, भूगोल और ब्रह्मांड आदि के संबंध में जानकारी प्राप्त होती है। कहीं-कहीं ऐतिहासिक घटनाओं का भी जिक्र आता है। 12 उपांगों में राज्य प्रश्नीय नामक उपांग सब से अधिक प्रसिद्ध है। इसमें जैन मुनी केश और पायोस नामक राजा के मध्य हुई वार्तालाप का विवरण लिखा हुआ है।

3. 10 प्राकिरण (The Ten Prakirans)-इनमें जैन धर्म से संबंधित विभिन्न विषयों को पद्य रूप में लिखा गया है। इनसे स्वामी महावीर के जीवन और उसके उपदेशों संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

4. 6 छेदसूत्र (The Six Chhedasutras)-इनमें जैन भिक्षुओं और भिक्षुणियों के आचार से संबंधित नियमों का वर्णन किया गया है। छेदसूत्रों में कल्पसूत्र को सबसे प्रसिद्ध माना जाता है। इसकी रचना भद्रबाह ने की थी। इसमें स्वामी महावीर की जीवन कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।

5. 4 मूलसूत्र (The Four Mulasutras)-4 मूलसूत्रों को जैनी साहित्य में बहुमूल्य समझा जाता है। इनमें जैन धर्म से संबंधित कथाओं और उनसे मिलने वाली शिक्षा, जैन संघ के नियमों और कुछ जैन मुनियों के जीवन तथा उनके उपदेशों के बारे जानकारी प्राप्त होती है। ये सारे मूलरूप में लिखे गये हैं। मूलसूत्रों में उत्तर अध्ययन नामक सूत्र को सबसे महत्त्वपूर्ण समझा जाता है।

6. 2 विविध पुस्तकें (Two Miscellaneous Texts)—इनमें नंदीसूत्र और अनुयोगद्वार नामक पुस्तकें शामिल हैं। ये एक प्रकार से विश्वकोष हैं। इनमें जैन धर्म की विभिन्न शाखाओं, धार्मिक सिद्धांतों, अर्थशास्त्र और काम शास्त्र के विषयों के संबंध में जानकारी दी गई है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 14.
जैन धर्म का भारतीय सभ्यता को क्या योगदान है ? (What is the Legacy of Jainism to Indian Civilization ?)
उत्तर-
इसमें कोई शक नहीं कि जैन धर्म बौद्ध धर्म की तरह उन्नत हो सका परंतु फिर भी इसने भारत में सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपनी गहरी छाप छोड़ी।।

1. सामाजिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Social Field) सामाजिक क्षेत्र में जैनियों ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। छठी शताब्दी में हिंदू धर्म में जाति प्रथा बड़ी कठोर हो गई थी। एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से सख्त नफ़रत करते थे। शूद्र जाति के लोगों के साथ जानवरों से भी बुरा व्यवहार किया जाता था। महावीर ने जाति प्रथा का ज़ोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने अपने धर्म में प्रत्येक धर्म से संबंधित लोगों को शामिल किया। उन्होंने लोगों में आपसी भाईचारे और बराबरी का प्रचार किया। परिणामस्वरूप वह लोगों में फैली आपसी घृणा को काफी सीमा तक दूर करने में सफल हुए। इस प्रकार जैनियों ने भारतीय समाज को एक नया रूप दिया।

2. धार्मिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Religious Field)-धार्मिक क्षेत्र में भी जैनियों का योगदान बहुत प्रशंसनीय था। जैन धर्म ने लोगों को सादा और पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। जैन धर्म में फ़िजूल के रीति-रिवाजों, यज्ञों और बलियों आदि के लिए कोई स्थान नहीं था। जैन धर्म के यत्नों के कारण धार्मिक क्षेत्र में फैले बहुत सारे अंध-विश्वासों का अंत हो गया। जैन धर्म की बढ़ती हुई प्रसिद्धि को देखकर हिंदू धर्म के नेताओं ने अपने धर्म को सुरजीत करने के उद्देश्य से अपने धर्म में आवश्यक सुधार किए।

3. सांस्कृतिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Cultural Field)—सांस्कृतिक क्षेत्र में भी जैन धर्म का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण था। जैन धर्म के सिद्धांतों ने अपने ग्रंथ प्राकृत, गुजराती, हिंदी, मराठी, कन्नड़ और तामिल भाषाओं में लिखे। परिणामस्वरूप इन क्षेत्रीय भाषाओं को बहुत उत्साह मिला। इन ग्रंथों में यद्यपि धर्म से संबंधित बातें लिखी गई हैं पर फिर भी इनसे हमें उस समय की भारत की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इस कारण इन जैनी ग्रंथों को भारतीय इतिहास का एक अमूल्य स्रोत माना जाता है। जैनियों ने कई प्रभावशाली और प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया। इन मंदिरों में कई बहुत मनमोहक मूर्तियाँ रखी जाती थीं। राजस्थान में माऊँट आबू और कर्नाटक में श्रावण बेलगोला में बने जैनियों के मंदिर अपनी भूवन निर्माण कला के कारण न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त जैनियों ने भारत में कई प्रसिद्ध स्तूपों का निर्माण भी करवाया।

4. लोक कल्याण के क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Field of Public Welfare)-स्वामी महावीर ने अपने शिष्यों को समाज सेवा का उपदेश दिया था। इसी कारण जैनमत वालों ने लोगों की सहायता के लिए बहुत सी धर्मशालाएँ बनाईं। शिक्षा के प्रचार के लिए शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की, मनुष्यों और पशुओं के इलाज के लिए कई अस्पताल खुलवाए और कई अन्य लोक कल्याण के कार्य भी किए। जैनियों द्वारा स्थापित की गई कई शिक्षा संस्थाएँ आज भी प्रसिद्ध हैं। उनके द्वारा खोले गए अस्पतालों में आज भी ग़रीब रोगियों का मुफ्त इलाज होता है और जानवरों की देखभाल की जाती है।

5. राजनीतिक क्षेत्र में योगदान (Legacy in the Political Field) जैन मत में अहिंसा के सिद्धांत पर बहुत ज़ोर दिया जाता था। इसने लोगों को शांतमयी जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। परिणामस्वरूप कई राजाओं ने लड़ाई में हिस्सा लेना बंद कर दिया ताकि निर्दोष लोगों का खून न बहाया जाये। वे शांतिप्रिय बन गए। इसी कारण भारत में काफी समय तक शाँति और खुशहाली का वातावरण रहा परंतु दूसरी ओर इसका भारतीय राजनीति पर कुछ बुरा प्रभाव भी पड़ा। युद्धों में भाग न लेने के कारण भारतीय सेना कमजोर हो गई। परिणामस्वरूप वह बाद में होने वाले विदेशी आक्रमणों का डट कर मुकाबला न कर सकी। इसी कारण भारतीयों को सैंकड़ों वर्षों तक गुलामी का जीवन व्यतीत करना पड़ा।

समूचे रूप में हम यह कह सकते हैं कि जैनियों ने भारतीय समाज को कई क्षेत्रों में बहुमूल्य योगदान दिया। अंत में हम डॉक्टर वी० ए० मंगवी के इन शब्दों से सहमत हैं,
“वास्तव में भारत में जैनियों की सबसे प्रमुख विशेषता भारतीय संस्कृति को दिया गया उनका बहुमूल्य योगदान का रिकार्ड है। उनकी सीमित एवं थोड़ी जनसंख्या को देखते हुए जैनियों ने जो योगदान भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को दिया वह वास्तव में महान् है।”8

8. “In fact, the most outstanding characteristic of Jainism in India is their very impressive record of contributions to Indian culture in comparison with the limited and small population of Jains, the achievements of Jains in enriching the various aspects of Indian culture are re great.” Dr. V.A. Sangve, Aspects of Jaina Religion (New Delhi: 1990) p. 98.

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तीर्थंकर से क्या अभिप्राय है ? (What do you mean by Tirthankara ?)
उत्तर-
जैन आचार्यों को तीर्थंकर कहा जाता है। तीर्थंकर से अभिप्राय है संसार के भवसागर से पार करने वाला गुरु। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। पहले तीर्थंकर का नाम ऋषभनाथ था। 23वां तीर्थंकर पार्श्वनाथ था। वह स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले हुए। 24वें तीर्थंकर स्वामी महावीर थे। उनको जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उनके समय में जैन धर्म ने अद्वितीय विकास किया।

प्रश्न 2.
पार्श्वनाथ। (Parshvanatha.)
उत्तर-
पार्श्वनाथ जैन धर्म का 23वां तीर्थंकर था। उसकी मुख्य शिक्षाएँ यह थीं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊँट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया।

प्रश्न 3.
स्वामी महावीर। (Lord Mahavira.)
उत्तर-
स्वामी महावीर का जन्म 599 ई० पू० वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ। आपके पिता जी का नाम सिद्धार्थ तथा माता जी का नाम त्रिशला था। महावीर के बचपन का नाम वर्द्धमान था। महावीर की शादी एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से हुई। महावीर ने 30 वर्षों की आयु में गृह त्याग दिया था। उन्होंने 12 वर्ष तक घोर तपस्या के पश्चात् ज्ञान प्राप्त किया। आपने 30 वर्षों तक अपने ज्ञान का प्रसार किया। राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथला, विदेह तथा अंग उनके प्रसिद्ध प्रचार केंद्र थे। 527 ई० पू० उन्होंने पावा में निर्वाण प्राप्त किया।

प्रश्न 4.
भगवान महावीर की शिक्षाओं के बारे में चर्चा कीजिए। (Discuss about the teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
स्वामी महावीर की शिक्षाएँ। (Teachings of Lord Mahavira.)
उत्तर-
स्वामी महावीर ने अपने अनुयायियों को तीन रत्नों पर चलने के लिए कहा। उन्होंने कठोर तप, अहिंसा तथा उच्च आचरण पर जोर दिया। वह समानता, आवागमन तथा कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे। वह ईश्वर, यज्ञों, बलियों, वेद तथा संस्कृत में विश्वास नहीं रखते थे। उनके अनुसार प्रत्येक जैनी को अपने जीवन में पाँच महाव्रतों की पालना करनी चाहिए। उनके अनुसार मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है।

प्रश्न 5.
त्रि-रत्न। (Tri-Ratna.)
अथवा
त्रि-रत्न क्या हैं ? (What is Tri-Ratna ?)
उत्तर-
स्वामी महावीर जी ने अपने अनुयायियों को तीन रत्नों पर चलने के लिए कहा। ये त्रि-रत्न थे-सच्ची श्रद्धा, सच्चा ज्ञान तथा शुद्ध आचरण। पहले रत्न के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 24 तीर्थंकरों में अटल विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्नानुसार जैनियों को सच्चा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिए तथा इनको व्यर्थ के रीति-रिवाज़ों में विश्वास नहीं रखना चाहिए। तीसरे रत्नानुसार प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे आचार के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। इनमें से किसी एक ही अनुपस्थिति मनुष्य को उसकी मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकती।

प्रश्न 6.
अहिंसा। (Ahimsa.)
उत्तर-
जैन धर्म में अहिंसा की नीति को जितना महत्त्व दिया गया है, उतना विश्व के किसी अन्य धर्म में नहीं दिया गया। अगर अहिंसा को जैन धर्म की आधारशिला कहा जाए तो इसमें कोई संदेह नहीं होगा। अहिंसा से अभिप्राय है कि किसी भी जैव वस्तु को कष्ट न देना। जैन दर्शन के अनुसार मनुष्यों और पशुओं के अतिरिक्त वृक्षों तथा पत्थरों में भी आत्मा का निवास होता है। इस कारण हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी उद्देश्य से जैनी नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और सूर्य छिपने के पश्चात् भोजन नहीं करते।

प्रश्न 7.
स्वामी महावीर की शिक्षा के अनुसार एक जैन भिक्षु को कैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता था ? (According to the teachings of Lord Mahavira how a Jaina monk led his life ?)
उत्तर-

  1. स्वामी महावीर की शिक्षा के अनुसार जैन भिक्षुओं को बहुत स्वच्छ जीवन व्यतीत करना पड़ता था।
  2. प्रत्येक भिक्षु को पाँच प्रतिज्ञाओं की पालना करनी पड़ती थी।
  3. प्रत्येक भिक्षु को सदैव सत्य बोलना चाहिए। उनको अहिंसा की नीति की पालना करनी पड़ती थी।
  4. प्रत्येक भिक्षु के लिए आवश्यक था कि उनकी वेशभूषा और खाना-पीना बिल्कुल सादा हो।

प्रश्न 8.
स्वामी महावीर जी की शिक्षाओं का साधारण मनुष्य के जीवन के लिए क्या महत्त्व था ?
(What was the importance of the teachings of Lord Mahavira in the life of a common man ?)
उत्तर-
स्वामी महावीर जी की शिक्षाएँ साधारण मनुष्य के लिए महत्त्वपूर्ण थीं। भगवान् महावीर ने अपने धर्म में बिना किसी भेद-भाव के प्रत्येक वर्ग के लोगों को शामिल किया। इससे समाज में प्रचलित परस्पर घृणा बहुत सीमा तक दूर हुई और लोगों में परस्पर बंधुत्व एवं प्रेम-भाव बढ़ गया। स्वामी महावीर जी ने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। साधारण लोग भी इन परंपराओं के विरुद्ध थे। इसलिए उनके हृदयों पर स्वामी महावीर जी की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव पड़ा। स्वामी महावीर जी ने लोगों को समाज सेवा का उपदेश दिया।

प्रश्न 9.
स्वामी महावीर ने कौन-सी धार्मिक तथा सामाजिक बुराइयों का खंडन किया ? (Which religious and social evils were condemned by Lord Mahavira ?)
उत्तर-
स्वामी महावीर ने यज्ञों, बलियों, पुरोहितवाद तथा धर्म के बाहरी दिखावों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। वह मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे। उनको वेदों तथा संस्कृत भाषा की पवित्रता में विश्वास नहीं था। वह जाति प्रथा तथा समाज में प्रचलित अन्य रूढ़िवादी विचारों के घोर विरोधी थे। उन्होंने इन रीतियों को एक ढोंग बताया तथा कहा कि कोई भी व्यक्ति इनका पालन करने से निर्वाण को प्राप्त नहीं कर सकता।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 10.
दिगंबर। (Digambaras.)
उत्तर-
दिगंबर जैनियों का एक प्रमुख संप्रदाय है। दिगंबर से अभिप्राय है नग्न रहने वाले। इस संप्रदाय के भिक्षु नग्न रहते हैं। इस संप्रदाय को मानने वालों का कहना है कि स्त्रियाँ तब तक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं, लेतीं। उन्हें जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा नहीं दी जा सकती। इस संप्रदाय का कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह नहीं करवाया था। इनका अपना अलग साहित्य है।

प्रश्न 11.
श्वेतांबर। (Svetambaras.)
उत्तर-
श्वेतांबर जैन धर्म का एक प्रमुख संप्रदाय है। श्वेतांबर से अभिप्राय है सफेद वस्त्र धारण करने वाले। इस कारण इस संप्रदाय के लोग सफेद वस्त्र पहनते हैं। इस संप्रदाय के लोगों का कहना है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में ही मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं। वे स्त्रियों को जैन संघ में शामिल होने की आज्ञा देते थे। उनका कहना है कि स्वामी महावीर ने विवाह करवाया था। इस संप्रदाय का अपना अलग साहित्य है।

प्रश्न 12.
जैन धर्म भारत में लोकप्रिय क्यों नहीं हो सका ? (Why could not Jainism become popular in India ?)
उत्तर-
जैन धर्म की शिक्षाएँ यद्यपि सरल थीं, परंतु कई कारणों से यह धर्म लोगों में लोकप्रिय न हो सका। पहला, जैन धर्म वालों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया। दूसरा, जैन धर्म को बौद्ध धर्म की भाँति राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हो सका। तीसरा, जैन धर्म वाले कठोर तप, शरीर को अत्यधिक कष्ट देने में विश्वास रखते थे। इसके अतिरिक्त उनका अहिंसा में आवश्यकता से अधिक विश्वास था। जन सामान्य के लिए इन नियमों का पालन करना बहुत कठिन था। चौथा, बौद्ध धर्म के सिद्धांत सरल थे। परिणामस्वरूप लोगों ने जैन धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म को अपनाना आरंभ कर दिया।

प्रश्न 13.
जैन संघ के बारे में आप क्या जानते हैं ? (What do you know about Jain Sangha ?)
उत्तर-
जैन संघ की स्थापन स्वामी महावीर जी ने की थी। इसमें शामिल होने वाले प्रत्येक भिक्षु तथा भिक्षुणियों को अपने माता-पिता और संरक्षक से आज्ञा लेनी पड़ती थी। उनको बहुत अनुशासित जीवन व्यतीत करना पड़ता था। जैन संघ के सारे सदस्य वर्षा के चार महीनों को छोड़कर बाकी समय अलग-अलग स्थानों पर जाकर धर्म प्रचार करने में व्यतीत करते थे। जैन संघ का मुखिया आचार्य कहलाता था। स्त्रियों के अपने अलग संघ होते थे।

प्रश्न 14.
जैन मत की देन। (Legacy of Jainism.)
अथवा
जैन मत का प्रभाव। (Effects of Jainism.)
उत्तर-
जैन मत ने भारतीय सभ्यता को कई क्षेत्रों में बहुमूल्य देन दी। उन्होंने परस्पर भ्रातृत्व तथा समानता का प्रचार किया। जैन मत ने लोगों को सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। जैन धर्म के विद्वानों ने अनेक भाषाओं में अपने ग्रंथ लिखे। इस कारण क्षेत्रीय भाषाओं को उत्साह मिला। जैनियों ने अनेक प्रभावशाली तथा प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया। इस कारण भारतीय भवन निर्माण कला को एक नया उत्साह मिला। जैन धर्म ने शांति का संदेश दिया।

प्रश्न 15.
स्वामी पार्श्वनाथ पर एक संक्षिप्त नोट लिखो। (Write a short note on Lord Parshvanatha.)
उत्तर-
स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म स्वामी महावीर के जन्म से 250 वर्ष पहले बनारस के राजा अश्वसेन के घर हुआ था। उनकी माता जी का नाम वामादेवी था। उनका बचपन बहुत ही ऐश-ओ-आराम में बीता। 30 वर्षों की आयु में पार्श्वनाथ ने अपने सारे सुखों का त्याग कर दिया और सच्चे ज्ञान की खोज में निकल गये। उनको 83 दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने जीवन के बाकी 70 वर्ष अपने उपदेशों का प्रचार करने में व्यतीत किये। 777 ई० पू० के लगभग उन्होंने बिहार के माऊँट समेता नामक पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया। पार्श्वनाथ की शिक्षा को चार्तुयाम अथवा चार प्रण कहते हैं। यह चार प्रण ये हैं—

  1. सजीव वस्तुओं को कष्ट न पहुँचायें (अहिंसा)।
  2. झूठ न बोलो (सुनृत)।
  3. बिना दिये कुछ न लो (अस्तेय)।
  4. सांसारिक पदार्थों से मोह न करो (अपरिग्रह)।

प्रश्न 16.
स्वामी महावीर पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
(Write a short note on Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर के महत्त्व को दर्शाइए।
(Describe the importance of 24th Tirthankar of Jainism.)
उत्तर-
स्वामी महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। उन्हें जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उनका जन्म 599 ई० पू० वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ। उनके पिता जी का नाम सिद्धार्थ तथा माता जी का नाम त्रिशला था। महावीर का बचपन का नाम वर्द्धमान था। वे शुरू से ही बहुत विचारशील थे। वे सांसारिक कार्यों में बहुत कम रुचि लेते थे। महावीर की शादी एक सुंदर राजकुमारी यशोदा से की गई। उनके घर एक पुत्री ने जन्म लिया जिसका नाम प्रियदर्शना अथवा अनोजा रखा गया। महावीर ने 30 वर्षों की आयु में गृह त्याग दिया था। उन्होंने 12 वर्ष तक घोर तपस्या के पश्चात् ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने लोगों में फैले अंधकार को दूर करने के लिए अपने ज्ञान का प्रसार किया। राजगृह, वैशाली, कौशल, मिथला, विदेह तथा अंग उनके प्रसिद्ध प्रचार केंद्र थे। महावीर ने त्रि-रत्न अहिंसा, कठिन तप, शुद्ध आचरण आदि पर बल दिया। वह यज्ञों, बलियों, वेदों, संस्कृत भाषा तथा ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते थे। 527 ई० पू० उन्होंने पावा में निर्वाण प्राप्त किया। निस्संदेह जैन धर्म के विकास में उनका योगदान बहुमूल्य था।

प्रश्न 17.
भगवान महावीर की शिक्षाओं के बारे में चर्चा कीजिए।
(Discuss about the teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
स्वामी महावीर की शिक्षाएँ का संक्षिप्त वर्णन करें।
(Discuss briefly the teachings of Lord Mahavira.)
अथवा
जैन धर्म की मुख्य शिक्षाएँ क्या थीं?
(What were the main teachings of Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाओं के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the pre-eminent teaching of Jainism.)
अथवा
जैन धर्म का आधार उसकी नैतिक कीमतें हैं। संक्षिप्त चर्चा करें।
(The base of Jainism is their Ethical values. Discuss in brief.)
अथवा
जैन धर्म की नैतिक कीमतों के बारे में जानकारी दीजिए।
(Describe the moral-values of Jainism.)
अथवा
नैतिक कीमतें जैन धर्म में प्रमुख हैं। चर्चा कीजिए।
(Moral values are supreme in Jainism. Discuss.)
उत्तर-
स्वामी महावीर जी की शिक्षाएँ अत्यंत सरल एवं प्रभावशाली थीं। उनके अनुसार मानव जीवन का परम उद्देश्य निर्वाण (मुक्ति) प्राप्त करना है। अतः उन्होंने अपने अनुयायियों को तीन रत्नों—

  1. सच्ची श्रद्धा,
  2. सच्चा ज्ञान,
  3. और शुद्ध आचरण पर चलने के लिए कहा।

वे कठोर तप में विश्वास रखते थे। वे अहिंसा पर बहुत ज़ोर देते थे। उनके अनुसार मनुष्य और पशुओं के अतिरिक्त हमें पेड़-पौधों और पक्षियों आदि को भी कष्ट नहीं देना चाहिए। वे आवागमन और कर्म सिद्धांतों में विश्वास रखते थे। उन्होंने समानता व आपसी भाईचारे का प्रचार किया। उन्होंने लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। उन्होंने हिंदू धर्म में फैले झूठे रीति-रिवाजों और यज्ञों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। वे वेदों और संस्कृत भाषा की पवित्रता में विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने अपना प्रचार लोगों की साधारण भाषा में किया। वे परमात्मा के अस्तित्व में भी विश्वास नहीं रखते थे। उनका कथन था कि मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। अतः उसे ईश्वर की सहायता की आवश्यकता नहीं है। जैसा मनुष्य कर्म करेगा उसे वैसा ही फल प्राप्त होगा। वे तीर्थंकरों की उपासना में विश्वास रखते थे।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 18.
त्रि-रत्न से क्या भाव है ? इसका क्या महत्त्व है ? (What is meant by Tri-Ratnas ? What is its importance ?)
अथवा
त्रि-रत्न से क्या भाव है ?
(What is meant by Tri-Ratnas ?)
अथवा
आप त्रि-रत्न के बारे में क्या जानते हैं ? (What do you understand by Tri-Ratna ?)
अथवा
जैन धर्म के तीन रत्नों का उल्लेख करें। (Write about the Tri-Ratnas of Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का परम उद्देश्य मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्त करना है। इसको प्राप्त करने के लिए जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के लिए त्रि-रत्नों पर चलना अति ज़रूरी है। ये तीन रत्न हैंसच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचार। पहले रत्न के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को 24 तीर्थंकरों, नौ सच्चाइयों और जैन शास्त्रों में अटल विश्वास होना चाहिए। दूसरे रत्नानुसार जैनियों को सच्चा और पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यह तीर्थंकरों के उपदेशों के गहरे अध्ययन से प्राप्त होता है। इस ज्ञान के दो रूप बताये गये हैं जिनको प्रत्यक्ष और परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। आत्मा द्वारा प्राप्त ज्ञान को प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और वह ज्ञान जो इंद्रियों के द्वारा प्राप्त होता है उसको परोक्ष ज्ञान कहा जाता है। तीसरे रत्नानुसार प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे आचार के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। सच्चा आचार वह है जिसकी शिक्षा जैन धर्म देता है। ये तीनों रत्न साथ-साथ चलते हैं। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति मनुष्य को उसकी मंज़िल तक नहीं पहुँचा सकती। उदाहरण के तौर पर जैसे एक दीये को प्रकाश देने के लिए उसमें तेल, बाती और आग का होना ज़रूरी है। यदि इसमें से एक भी वस्त की कमी हो तो वह प्रकाश नहीं दे सकता।

प्रश्न 19.
जैन धर्म में अहिंसा का क्या महत्त्व है ? (What is the importance Ahimsa in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में अहिंसा के महत्त्व का वर्णन करें।
(Explain the importance of Ahimsa in Jainism.)
उत्तर-
जैन धर्म में अहिंसा पर बहुत ज़ोर दिया गया है। अहिंसा की महत्ता बताते हुए आचारंग सूत्र में कहा गया है, “सभी को अपना-अपना जीवन प्यारा है, सब ही सुख चाहते हैं, दुःख कोई नहीं चाहता, अधिक कोई नहीं चाहता, सब को जीवन प्यारा है और सारे ही जीने की इच्छा रखते हैं।” इसीलिए जो हमारे लिए सुखमयी है वह दूसरों के लिए भी सुखमयी है। हिंसा दो तरह की होती है-मन से हिंसा और कर्म से हिंसा। कर्म अथवा अमल में आने वाली हिंसा से पहले मन भाव विचारों में हिंसा आती है। गुस्सा, अहंकार, लालच और धोखा मन की हिंसा है। इसलिए हिंसा से बचने के लिए मन के विचारों को शुद्ध करना अति ज़रूरी है। जैन धर्म के अनुसार मनुष्यों के अतिरिक्त पशुओं, पत्थरों .और वृक्षों आदि में भी आत्मा निवास करती है। इसलिए हमें किसी जीव या निर्जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए। इसी कारण जैनी लोग नंगे पाँव चलते हैं, मुँह पर पट्टी बाँधते हैं, पानी छान कर पीते हैं और अंधेरा हो जाने के बाद कुछ नहीं खाते ताकि किसी जीव की हत्या न हो जाये।

प्रश्न 20.
जैन धर्म की नौ सच्चाइयों पर नोट लिखो। (Write a short note on the Nine Truths of the Jainism.)
अथवा
जैन धर्म के नौ-तत्त्वों के बारे में जानकारी दें।
(Describe the Nine Tatvas of Jainism.)
उत्तर-
जैन दर्शन नौ सच्चाइयों की शिक्षा देता है। ये सच्चाइयाँ हैं—

  1. जीव-जैन दर्शन में आत्मा को जीव कहा गया है। यह चेतन सुरूप है। यह शरीर के कर्मों के अच्छे-बुरे फल भुगतता है और आवागमन के चक्र में पड़ता है।
  2. अजीव-यह जंतु पदार्थ है। यह निर्जीव है और इनमें समझ नहीं होती। इनकी दो श्रेणियाँ हैं रूपी और अरूपी।
  3. पुण्य-यह अच्छे कर्मों का नतीजा है। इसके नौ साधन हैं।
  4. पाप-यह जीव के बंधन का मुख्य कारण है। इसके परिणामस्वरूप घोर सजायें मिलती हैं।
  5. अशर्व-यह वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मा अपने अंदर कर्मों को संचित करती रहती है। कर्म 8 किस्मों के होते हैं।
  6. संवर-कर्म को आत्मा की ओर आने की क्रिया को रोकने को संवर कहते हैं। कर्म को रोकने की 57 विधियाँ हैं।
  7. बंध-इससे भाव बंधन है। यह जीव (आत्मा) का पुदगल (परमाणु) से मेल है। बंध के लिए पाँच कारण जिम्मेवार हैं।
  8. निर्जर-इस से भाव है दूर भगाना। यह कर्मों को नष्ट करने और जल देने का कार्य करता है।
  9. मोक्ष-इसमें जीव कर्मों के जंजाल से मुक्त हो जाता है। यह पूर्ण शाँति की अवस्था है जिसमें हर तरह के दुःखों से छुटकारा प्राप्त हो जाता है।

प्रश्न 21.
जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत का क्या महत्त्व है ? (What is the importance of Karma Theory in Jain Philosophy ?)
अथवा
जैन धर्म का कार्य सिद्धांत के बारे में क्या विचार है ? (What is meant by Karma Theory of Jainism ?)
उत्तर-
जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस सिद्धांत के अनुसार, “जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसा बीजोगे वैसा काटोगे, यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा, किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा।” जैसे ही हमारे मन में कोई अच्छा या बुरा विचार आता है वह तुरंत जीव (आत्मा) से उसी तरह जुड़ जाता है, जैसे तेल लगे हुए शरीर से धूलि कण चिपक जाते हैं। ये कर्म आठ प्रकार के हैं-

  1. ज्ञानवर्णीय कर्म- यह आत्मा के ज्ञान को रोकते हैं।
  2. दर्शनवीय कर्म- यह आत्मा की इच्छा शक्ति को रोकते हैं।
  3. वैदनीय कर्म-ये सुख-दुःख उत्पन्न करने वाले कर्म हैं।
  4. मोहनीय कर्म-ये आत्मा को मोह माया में फंसाने वाले कर्म हैं।
  5. आयु कर्म-ये कर्म मनुष्य की आयु को निर्धारित करते हैं।
  6. नाम कर्म-ये कर्म मनुष्य के व्यक्तित्व को निर्धारित करते हैं।
  7. गोत्र कर्म-ये व्यक्ति के गोत्र और समाज में उसके ऊँचे या नीचे स्थान को निर्धारित करते हैं।
  8. अंतरीय कर्म-ये अच्छे कर्म को रोकने वाले कर्म हैं।

प्रश्न 22.
जैन धर्म में जीव एवं अजीव से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Jiva and Ajiva in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में जीव से क्या अभिप्राय है?
(What is meant by Jiva in Jainism ?)
उत्तर-
1. जीव-जीव शब्द का अर्थ है आत्मा। यह चेतन तथ्य है। जैन दर्शन में जीव दो प्रकार के हैं। इनको सांसारिक जीव और मुक्त जीव कहा जाता है। सांसारिक जीव को बंधन जीव भी कहते हैं। यह जीव आवागमन के चक्र में रहता है और अपने कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता है और अपने अच्छे बुरे फल भुगतता है। मुक्त जीव वह जीव है जो पुनर्जन्म से रहित है। यह जीव अनंत ज्ञान वाला, अनंत शक्ति वाला और अनंत गुणों वाला होता है। यह जीव कर्मों के जाल से मुक्त होता है।

2. अजीव-अजीव से भाव उन जड़ पदार्थों से है जिनमें चेतना नहीं होती जैसे पुस्तक, कागज़, मेज़ और स्याही आदि। उदाहरण के तौर पर ऊँट के शरीर में जीव फैल कर ऊँट जितना बड़ा हो जाता है और कीड़ी के शरीर में सिकुड़ कर कीड़ी जितना हो जाता है । यह जीव तब नहीं दिखाई देता है परंतु शरीर की क्रियाओं के आधार पर इसकी उपस्थिति का ज्ञान हो जाता है। परंतु जब शरीर का अंत हो जाता है तो जीव लोप हो जाता है। जीव जिस शरीर को धारण करता है वह उस के आकार का ही हो जाता हैं।

प्रश्न 23.
जैन धर्म में पाप एवं पुण्य से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by Papa and Punya in Jainism ?)
अथवा
जैन धर्म में पाप से क्या अभिप्राय है ?
(What is meant by Paap in the Jainism ?)
उत्तर-
1. पाप-पाप को जीव के बंधन का मुख्य कारण माना जाता है। जीवों को मारना, झूठ, चोरी, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, धोखा, नशा और दुश्मनी आदि सब पापों के भार में वृद्धि करते हैं। पापियों को घोर सजायें मिलती हैं। आपने देखा होगा कि एक ही घर में पैदा हुए दो सगे भाइयों के जीवन में भारी अंतर होता है। एक ऊँची पदवी पर सुशोभित होता है और उसको प्रसिद्धि प्राप्त होती है। दूसरा दर-दर की ठोकरें खाता फिरता है, चोरियाँ करता है और बदनामी कमाता है। ऐसा क्यों होता है ? जैन दर्शन के अनुसार ऐसा व्यक्ति के पुण्य और पाप कमाने का कारण होता है। पापी मनुष्य कभी भी सुखी नहीं हो सकता और उसको अपने जीवन में घोर संकट का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा भी तड़पती रहती है। जैन सूत्रों के अनुसार पापों के 82 अलगअलग परिणाम निकलते हैं।

2. पुण्य-पुण्य वह कर्म है जो अच्छे अमलों से कमाये जाते हैं। पुण्य कमाने के अलग-अलग ढंग हैं। भूखे को खाना देना, प्यासे को पानी पिलाना, नंगे को कपड़ा देना, हाथों से सेवा करनी, मीठा बोलना आदि पुण्य के काम हैं, पुण्य को मानने के 42 साधन हैं। अच्छी सेहत, आर्थिक समृद्धि, प्रसिद्धि, अच्छा वैवाहिक जीवन, अच्छे रिश्तेदारों और दोस्तों का मिलना, अच्छी पढ़ाई और उच्च पदवियों पर नियुक्ति आदि अच्छे पुण्यों का ही नतीजा है। पुण्य को आत्मा का सहायक माना जाता है क्योंकि इससे खुशी प्राप्त होती है।

प्रश्न 24.
महावीर जी की शिक्षाओं का साधारण मनुष्य के जीवन के लिए क्या महत्त्व था ? (What was the importance of Mahavira’s teachings in the life of a common man ?)
उत्तर-
महावीर जी की शिक्षाएँ साधारण मनुष्य के लिए महत्त्वपूर्ण थीं। उस समय हिंदू धर्म में जाति प्रथा बहुत कठोर हो गई थी। उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों से घृणा करते थे। भगवान महावीर ने अपने धर्म में _बिना किसी भेद-भाव के प्रत्येक वर्ग के लोगों को शामिल किया। इससे समाज में प्रचलित परस्पर घृणा बहुत सीमा तक दूर हुई और लोगों में परस्पर बंधुत्व एवं प्रेम-भाव बढ़ गया। महावीर जो ने समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों का जोरदार शब्दों में खंडन किया। साधारण लोग भी इन परंपराओं के विरुद्ध थे। इसलिए उनके हृदयों पर महावीर जी की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव पड़ा। महावीर जी की अहिंसा नीति के कारण लोगों को युद्ध से घृणा हो गई और वे शाँति को पसंद करने लगा। महावीर जी ने लोगों को समाज सेवा का उपदेश दिया। परिणामस्वरूप जैन मत वालों ने लोगों की सहायता के लिए बहुत-सी धर्मशालाएँ बनवाईं। शिक्षा प्रचार के लिए शिक्षा संस्थाएँ और मनुष्यों एवं पशुओं की चिकित्सा के लिए अस्पताल खोले।

प्रश्न 25.
महावीर की शिक्षा के अनुसार एक जैन भिक्षु को कैसा जीवन व्यतीत करना पड़ता था ?
(What type of life a Jain monk had to lead according to the teachings of Mahavira ?)
उत्तर-
महावीर की शिक्षा के अनुसार जैन भिक्षुओं को बहुत स्वच्छ जीवन व्यतीत करना पड़ता था। प्रत्येक भिक्षु को पाँच प्रतिज्ञाओं की पालना करनी पड़ती थी।

  1. प्रत्येक भिक्षु को सदैव सत्य बोलना चाहिए।
  2. उसको अहिंसा की नीति पर चलना चाहिए।
  3. उसको कोई भी ऐसी वस्तु अपने पास नहीं रखनी चाहिए जो उसको दान में प्राप्त न हुई हो।
  4. उसको अपने पास धन नहीं रखना चाहिए।
  5. उसको ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

इनके अतिरिक्त भिक्षु के लिए आवश्यक था कि उनकी वेश-भूषा और खाना-पीना बिल्कुल सादा हो। उनके लिए छाता और सुगंध देने वाली वस्तुओं के प्रयोग करने पर प्रतिबंध था। भिक्षु के लिए किसी स्त्री से बातचीत करने पर भी प्रतिबंध था। उनको सदैव मीठे वचन बोलने के लिए कहा गया था जिससे किसी को दुःख न पहुँचे। उनको इस बात का भी ध्यान रखना पड़ता था कि उनके चलने से या खान-पीने में किसी जीव की हत्या न हो।

प्रश्न 26.
दिगंबर और श्वेतांबर पर एक नोट लिखें। (Write a note on Digambara and Svetambara.)
अथवा
दिगंबर तथा श्वेतांबर से आपका क्या अभिप्राय है ? (What do you understand by Digambara and Svetambara ?)
उत्तर-
जैन धर्म के सभी संप्रदायों में से दिगंबर तथा श्वेतांबर संप्रदायों को प्रमुख स्थान प्राप्त है। दिगंबर से अभिप्राय था नग्न रहने वाले तथा श्वेतांबर से अभिप्राय था श्वेत (सफ़ेद) वस्त्र धारण करने वाले। इन दोनों संप्रदायों में प्रमुख अंतर निम्नलिखित अनुसार थे—

  1. दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी नग्न रहते हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी सफ़ेद वस्त्र धारण करते हैं।
  2. दिगंबर संप्रदाय स्त्रियों को जैन संघ में सम्मिलित होने की आज्ञा नहीं देता जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वाले ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाते।
  3. दिगंबर संप्रदाय वालों का कहना है कि स्त्रियां तब एक मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती जब तक वे पुरुष के रूप में जन्म नहीं लेतीं। श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस सिद्धांत को गलत मानते हैं। उनका कथन है कि स्त्रियाँ इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं।
  4. दिगंबर संप्रदाय वालों का यह कथन है कि स्वामी महावीर जी ने विवाह नहीं करवाया था। श्वेतांबर संप्रदाय वालों का यह कथन है कि स्वामी महावीर जी ने विवाह करवाया था तथा उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम प्रियदर्शना था।
  5. दिगंबर संप्रदाय वालों का कथन है कि ज्ञान प्राप्त करने वाले साधुओं को भोजन की आवश्यकता नहीं रहती जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वाले इस बात का खंडन करते हैं।
  6. दिगंबर तथा श्वेतांबर संप्रदायों का साहित्य भी अलग-अलग है।
  7. दिगंबर संप्रदाय वालों की मूर्तियाँ नंगेज हैं जबकि श्वेतांबर संप्रदाय वालों की मूर्तियों को वस्त्र पहनाए जाते हैं तथा उन्हें गहनों से सुसज्जित किया जाता है।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 27.
जैन धर्म भारत में लोकप्रिय क्यों नहीं हो सका ? (Why could not Jainism become popular in India ?)
उत्तर-
जैन धर्म की शिक्षाएँ यद्यपि सरल थीं, परंतु कई कारणों से यह धर्म लोगों में लोकप्रिय न हो सका। पहला, जैन धर्म वालों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं किया। किसी भी धर्म की सफलता के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक होता है। दूसरा, जैन धर्म को बौद्ध धर्म की भाँति राजकीय संरक्षण प्राप्त नहीं हो सका। यह सही है कि बिंबिसार, अजातशत्रु और खारवेल जैसे शासकों ने जैन धर्म को अपना संरक्षण दिया, परंतु वे बौद्ध धर्म की भाँति जैन धर्म को प्रगति के शिखर तक पहुँचाने में विफल रहे। तीसरा, जैन धर्म वाले कठोर तप, शरीर को अत्यधिक कष्ट देने में विश्वास रखते थे। इसके अतिरिक्त उनका अहिंसा में आवश्यकता से अधिक विश्वास था। वे मुँह पर पट्टी बाँधते थे, नंगे पाँव चलते थे और पानी छान कर पीते थे ताकि किसी जीव की मृत्यु न हो जाए। वे वृक्षों और पत्थरों को भी प्राणवान् मानते थे। इसलिए इन्हें कष्ट देना भी पाप समझा जाता था। वे बीमार पड़ने पर औषधि का भी प्रयोग नहीं करते थे। जन सामान्य के लिए इन नियमों का पालन करना बहुत कठिन था। चौथा, जैन धर्म के लोकप्रिय न होने का एक कारण यह भी था कि उस समय बौद्ध धर्म के सिद्धांत भी बहुत सरल थे। परिणामस्वरूप लोगों ने जैन धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म को अपनाना आरंभ कर दिया। पाँचवां, समय के साथ-साथ जैन लोगों ने हिंदू धर्म के कई सिद्धांतों को अपना लिया। परिणामस्वरूप वे अपने अलग अस्तित्व को न बनाए रख सके।

प्रश्न 28.
जैन स्रोत। (The Jaina Sources.)
उत्तर-
जैन स्रोत प्राचीन भारत के इतिहास पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। जैनियों ने अनेक ग्रंथों की रचना की। ये ग्रंथ प्राकृत अथवा अर्द्ध मगधी जो उस समय लोगों की बोलचाल की आम भाषा थी में लिखे गए हैं। जैनियों के धार्मिक ग्रंथों में 12 अंशों को सबसे महत्त्वपूर्ण एवं पवित्र समझ जाता है। इनमें महावीर के जीवन तथा जैन धर्म के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया है। जैन धर्म के 12 उपांग भी हैं। इनमें अधिकाँश मिथिहासिक कथाओं का वर्णन मिलता है। जैन धर्म के 10 प्राकिरणों से महावीर के जीवन एवं उसके उपदेशों संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। 6 छेदसूत्रों में जैन भिक्षु एवं भिक्षुणियों के नियमों का वर्णन किया गया है। जैनी साहित्य में 4 मूलसूत्रों को बहुमूल्य समझा जाता है। इनसे जैन धर्म से संबंधित कथाओं के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है।

प्रश्न 29.
जैन मत की भारतीय सभ्यता को क्या देन है ? (What is the legacy of Jainism to the Indian Civilization ?)
उत्तर-
जैन मत ने भारतीय सभ्यता को कई क्षेत्रों में बहुमूल्य देन दी। महावीर ने जाति प्रथा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने अपने धर्म में प्रत्येक जाति से संबंधित लोगों को शामिल किया। उन्होंने परस्पर भ्रातृत्व तथा समानता का प्रचार किया। परिणामस्वरूप समाज में फैली घृणा को काफ़ी सीमा तक दूर किया जा सका। जैन मत ने लोगों को सादा तथा पवित्र जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित किया। इसके प्रयत्नों के कारण लोगों में फैले बहुत-से धार्मिक अंध-विश्वासों का अंत हो गया। जैन धर्म की बढ़ती हुई प्रसिद्धि को देख कर हिंदू धर्म के नेताओं ने इसमें आवश्यक सुधार किए। जैन धर्म के विद्वानों ने अनेक भाषाओं में अपने ग्रंथ लिखे। इस कारण क्षेत्रीय भाषाओं को उत्साह मिला। ये ग्रंथ भारतीय इतिहास के बहुमूल्य स्रोत हैं। जैनियों ने अनेक प्रभावशाली तथा प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाया। इस कारण भारतीय भवन निर्माण कला को एक नया उत्साह मिला। जैन धर्म ने लोगों के कल्याण के लिए अनेक धर्मशालाएँ, शौक्षिक संस्थाएँ तथा अस्पतालों आदि की स्थापना की जो आज भी जारी हैं। जैन धर्म ने शाँति का संदेश दिया। यह युद्धों के विरुद्ध था। इसका भारतीय राजनीति पर बुरा प्रभाव पड़ा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1. ‘जैन’ शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-विजेता।

प्रश्न 2. जैन धर्म को आरंभ में क्या नाम दिया गया था ?
उत्तर-निग्रंथ।

प्रश्न 3. निग्रंथ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-बंधनों से मुक्त।

प्रश्न 4. जैन आचार्यों को किस अन्य नाम से जाना जाता था ?
उत्तर-तीर्थंकर।

प्रश्न 5. तीर्थंकर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-संसार के भवसागर से पार कराने वाला गुरु।

प्रश्न 6. जैन धर्म में कुल कितने तीर्थंकर हुए हैं ?
उत्तर-24 तीर्थंकर।।

प्रश्न 7. जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर का क्या नाम था ?
अथवा
जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम बताओ।
उत्तर-ऋषभदेव।

प्रश्न 8. जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर कौन थे ?
उत्तर-पार्श्वनाथ।

प्रश्न 9. स्वामी पार्श्वनाथ जैन धर्म के कौन-से तीर्थंकर थे ?
उत्तर-23वें।

प्रश्न 10. स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म कहाँ हुआ था ?
उत्तर-बनारस में।

प्रश्न 11. स्वामी पार्श्वनाथ के पिता जी कौन थे ?
उत्तर- बनारस के राजा अश्वसेन।

प्रश्न 12. स्वामी पार्श्वनाथ ने जब अपना घर त्याग दिया उस समय उनकी आयु कितनी थी ?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 13. स्वामी पार्श्वनाथ ने कितने दिनों के घोर तप के बाद परम ज्ञान प्राप्त किया ?
उत्तर-83 दिनों के।

प्रश्न 14. स्वामी पार्श्वनाथ ने कितने सिद्धांतों का प्रचलन किया ?
उत्तर-स्वामी पार्श्वनाथ ने चार सिद्धांतों का प्रचलन किया।

प्रश्न 15. स्वामी पार्श्वनाथ के सिद्धांतों को क्या कहा जाता है ?
उत्तर-चातुर्याम।

प्रश्न 16. स्वामी पार्श्वनाथ का कोई एक सिद्धांत बताएँ।
उत्तर-कभी झूठ न बोलो।

प्रश्न 17. स्वामी पार्श्वनाथ ने कितने वर्ष प्रचार किया ?
उत्तर-स्वामी पार्श्वनाथ ने 70 वर्ष प्रचार किया।

प्रश्न 18. स्वामी पार्श्वनाथ ने कब निर्वाण प्राप्त किया?
उत्तर-777 ई० पू०।

प्रश्न 19. जैन धर्म का संस्थापक कौन था और वह कितना तीर्थंकर था ?
उत्तर-जैन धर्म का संस्थापक स्वामी महावीर था और वह 24वां तीर्थंकर था।

प्रश्न 20. जैन धर्म का अंतिम तीर्थंकर कौन था ?
अथवा
जैन धर्म का 24वां तीर्थंकर कौन था ?
उत्तर-स्वामी महावीर जी।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 21. जैन धर्म के पहले व आखिरी तीर्थंकर का नाम बताएँ।
उत्तर-जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम ऋषभदेव था तथा आखिरी तीर्थंकर का नाम स्वामी महावीर था।

प्रश्न 22. स्वामी महावीर जी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर-599 ई० पू० कुंडग्राम में।

प्रश्न 23. स्वामी महावीर जी का जन्म कहाँ हुआ ?
उत्तर-कुंडग्राम में।

प्रश्न 24. स्वामी महावीर जी के पिता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-सिद्धार्थ।

प्रश्न 25. स्वामी महावीर जी की माता जी का क्या नाम था ?
उत्तर-त्रिशला।

प्रश्न 26. भगवान् महावीर जी के जन्म से पूर्व उनकी माता को कितने स्वप्न आए थे ?
उत्तर-14.

प्रश्न 27. स्वामी महावीर जी का आरंभिक नाम क्या था ?
उत्तर-वर्धमान।

प्रश्न 28. स्वामी महावीर जी का संबंध किस कबीले के साथ था ?
उत्तर-जनत्रिका।

प्रश्न 29. स्वामी महावीर जी का विवाह किसके साथ हुआ ?
उत्तर-यशोदा से।

प्रश्न 30. स्वामी महावीर जी की पुत्री का क्या नाम था ?
उत्तर-प्रियदर्शना।

प्रश्न 31. घर त्याग के समय स्वामी महावीर जी की आयु कितनी थी?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 32. स्वामी महावीर जी ने कितने वर्षों तक कठोर तप किया ?
उत्तर-12 वर्ष।

प्रश्न 33. स्वामी महावीर जी ने कौन-सी आयु में ज्ञान प्राप्त किया ?
उत्तर-42 वर्ष की।

प्रश्न 34. कैवल्य ज्ञान से क्या भाव है ?
उत्तर-सर्वोच्च सत्य।

प्रश्न 35. स्वामी महावीर जी ने कितने वर्षों तक प्रचार किया ?
उत्तर-30 वर्ष।

प्रश्न 36. स्वामी महावीर जी के कोई दो प्रसिद्ध प्रचार केंद्रों के नाम लिखो।
उत्तर-

  1. राजगृह
  2. वैशाली।

प्रश्न 37. स्वामी महावीर जी ने कब निर्वाण प्राप्त किया?
उत्तर-527 ई० पू०।

प्रश्न 38. स्वामी महावीर जी ने कहाँ निर्वाण प्राप्त किया था ?
उत्तर-पावा में।

प्रश्न 39. स्वामी महावीर जी ने जब निर्वाण प्राप्त किया तब उनकी आयु क्या थी ?
उत्तर-72 वर्ष।

प्रश्न 40. जैन धर्म की बुनियादी कीमतें किसने निर्धारित की ?
उत्तर-स्वामी महाबीर जी ने।

प्रश्न 41. जैन धर्म की कोई एक प्रमुख शिक्षा बताएँ।
उत्तर-जैन धर्म अहिंसा में विश्वास रखता था।

प्रश्न 42. त्रिरत्न किस धर्म के साथ संबंधित है ?
उत्तर-जैन धर्म के साथ।

प्रश्न 43. जैन धर्म के तीन रत्न कौन-से हैं ?
अथवा
जैन धर्म के त्रिरत्नों के नाम बताएँ।
अथवा
जैन धर्म के तीन रत्न क्या हैं ?
उत्तर-

  1. सत्य-श्रद्धा
  2. सत्य-ज्ञान
  3. सत्य-आचरण।

प्रश्न 44. जैन धर्म में ब्रह्मचर्य का सिद्धांत किसने प्रचलित किया ?
उत्तर-स्वामी महावीर जी ने।

प्रश्न 45. जैन धर्म दर्शन में कितने तत्त्व माने गए हैं ?
उत्तर-9.

प्रश्न 46. जैन धर्म की कोई दो सच्चाइयाँ बताएँ।
उत्तर-

  1. पाप
  2. पुण्य।

प्रश्न 47. जैन दर्शन में आत्मा को क्या कहा गया है ?
उत्तर-जीव।

प्रश्न 48. जैन दर्शन में अजीव की कौन-सी दो श्रेणियाँ हैं ?
उत्तर-

  1. रूपी
  2. अरूपी

प्रश्न 49. जैन दर्शन में कर्म को आत्मा की ओर आने की क्रिया को रोकने को क्या कहते हैं ?
उत्तर-संवर।

प्रश्न 50. जैन धर्म में अशर्व के क्या अर्थ है ?
उत्तर-वह प्रक्रिया जिसके अनुसार आत्मा अपने अंदर कर्मों को संचित करती रहती है।

प्रश्न 51. जैन धर्म में पुदगल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-परमाणु।

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प्रश्न 52. जैन धर्म के अनुसार कर्म कितनी प्रकार के हैं ?
उत्तर-8 प्रकार के।

प्रश्न 53. जैन धर्म के किसी एक प्रकार के कर्म का नाम बताएँ।
उत्तर-ज्ञानवर्णनीय कर्म।

प्रश्न 54. जैन धर्म में जीव से क्या भाव है ?
उत्तर-आत्मा।

प्रश्न 55. जैन धर्म में अजीव से क्या भाव है ?
उत्तर-जड़ पदार्थ।

प्रश्न 56. जैन दर्शन में कितनी प्रकार की हिंसा का वर्णन मिलता है ?
उत्तर-108 प्रकार की।

प्रश्न 57. जैन दर्शन में पुण्य को मानने के कितने साधन हैं ?
उत्तर-42.

प्रश्न 58. जैन दर्शन के अनुसार पाप के कितनी प्रकार के परिणाम निकलते हैं ?
उत्तर-82 प्रकार के।

प्रश्न 59. अनेकांतवाद का सिद्धांत किस धर्म के साथ संबंधित है ?
उत्तर-जैन धर्म के साथ।

प्रश्न 60. जैन दर्शन के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में कितने अणुव्रतों की पालना करनी चाहिए ?
उत्तर-पाँच अणुव्रतों की।

प्रश्न 61. जैन धर्म में निर्वाण से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-आवागमन के चक्र से मुक्ति।

प्रश्न 62. जैन धर्म को नास्तिक धर्म क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-क्योंकि यह धर्म ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता।

प्रश्न 63. अजीविक संप्रदाय का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-गौशाल।

प्रश्न 64. अजीविक संप्रदाय का प्रमुख सिद्धांत क्या था ?
उत्तर-इस संप्रदाय का प्रमुख सिद्धांत नियति (किस्मत) था।

प्रश्न 65. जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय कौन-से हैं ?
उत्तर-जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदायों के नाम दिगंबर एवं श्वेतांबर है।

प्रश्न 66. दिगंबर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-दिगंबर से अभिप्राय है नग्न रहने वाला।

प्रश्न 67. श्वेतांबर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-श्वेतांबर से अभिप्राय है श्वेत वस्त्र धारण करने वाला।

प्रश्न 68. लोंक सा कौन था ?
उत्तर-लोक सा लोंक संप्रदाय का मुखिया था।

प्रश्न 69. स्थानकवासी संप्रदाय का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-वीराजी।

प्रश्न 70. तेरा पंथ का संस्थापक कौन था ?
उत्तर-भीखनजी।

प्रश्न 71. जैन संघ में कितनी तरह के लोग शामिल होते हैं ?
उत्तर-चार तरह के।

प्रश्न 72. जैन संघ में किन्हें सम्मिलित होने की आज्ञा नहीं थी ?
उत्तर- अधर्मी व्यक्तियों को।

प्रश्न 73. जैन धर्म में सम्मिलित होने वाले स्त्री एवं पुरुषों को क्या कहा जाता था ?
उत्तर-

  1. भिक्षुणियाँ
  2. भिक्षु।

प्रश्न 74. जैन धर्म ग्रंथों की भाषा क्या है ?
उत्तर-प्राकृत अथवा अर्ध मगधी।

प्रश्न 75. जैन धर्म में सर्वाधिक पवित्र पुस्तकें कौन-सी हैं ?
उत्तर-12 अंग।

प्रश्न 76. जैन धर्म के किसी एक अंग का नाम बताएँ।
उत्तर-आचारांग सूत्र।

प्रश्न 77. जैन धर्म के किस ग्रंथ में जैन भिक्षुओं से संबंधित नियम दिए गए हैं ?
उत्तर-आचारांग सूत्र में।

प्रश्न 78. जैन धर्म में कितने उपांग हैं ?
उत्तर-12 उपांग।

प्रश्न 79. कल्पसूत्र की रचना किसने की थी ?
उत्तर-भद्रबाहू ने।

प्रश्न 80. कल्पसूत्र का विषय क्या है ?
उत्तर-स्वामी महावीर जी का जीवन।

प्रश्न 81. जैन धर्म में कितने छेदसूत्र हैं ?
उत्तर-जैन धर्म में 6 छेदसूत्र हैं।

प्रश्न 82. जैन धर्म से संबंधित मूलसूत्र कितने हैं ?
उत्तर-4.

प्रश्न 83. जैन धर्म के दिगंबर से संबंधित कितनी पुस्तकें उपलब्ध हैं ?
उत्तर-4.

प्रश्न 84. दिगंबर संप्रदाय से संबंधित एक पुस्तक का नाम बताएँ।
उत्तर-पर्थमानु योग।

नोट-रिक्त स्थानों की पूर्ति करें—

प्रश्न 1. जैन धर्म को आरंभ में ………….. के नाम से जाना जाता था।
उत्तर-निग्रंथ

प्रश्न 2. जैन धर्म में कुल ………. तीर्थंकर थे।।
उत्तर-24

प्रश्न 3. जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम ………… था।
उत्तर-ऋषभनाथ

प्रश्न 4. जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर …………… थे।
उत्तर- पार्श्वनाथ

प्रश्न 5. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर …………… थे।
उत्तर-स्वामी महावीर

प्रश्न 6. स्वामी महावीर का जन्म ……….. में हुआ।
उत्तर-599 ई०पू०

प्रश्न 7. स्वामी महावीर की माता जी का नाम ………. था।
उत्तर-त्रिशला

प्रश्न 8. स्वामी महावीर के जन्म से पहले उनकी माता जी को ………… स्वप्न आए थे।
उत्तर-14

प्रश्न 9. स्वामी महावीर जी की पुत्री का नाम ………. था।
उत्तर-प्रियदर्शना

प्रश्न 10. ज्ञान प्राप्ति के समय स्वामी महावीर जी की आयु ………. थी।
उत्तर-42 वर्ष

प्रश्न 11. स्वामी महावीर जी ने ………. में निर्वाण प्राप्त किया।
उत्तर-527 ई० पू०

प्रश्न 12. जैन धर्म ……….. रत्नों में विश्वास रखता है।
उत्तर-तीन

प्रश्न 13. जैन धर्म में ब्रह्मचर्य का सिद्धांत ………. ने प्रचलित किया।
उत्तर-स्वामी महावीर

प्रश्न 14. जैन धर्म ………… सच्चाइयों में विश्वास रखता है।
उत्तर-नौ

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प्रश्न 15. जैन धर्म के अनुसार ………. वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मा अपने आंतरिक कर्मों को संचित करती रहती है।
उत्तर-अशर्व

प्रश्न 16. जैन धर्म ………. प्रकार के कर्मों में विश्वास रखता है।
उत्तर-आठ

प्रश्न 17. अनेकांतवाद को ………… के नाम से भी जाना जाता है।
उत्तर-स्यादवाद

प्रश्न 18. जैन धर्म ………… महाव्रतों में विश्वास रखता है।
उत्तर-पाँच

प्रश्न 19. जैन धर्म के अनुसार मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च उद्वेश्य …………. प्राप्त करना है।
उत्तर-निर्वाण

प्रश्न 20. जैन धर्म के अनुसार पुदगल से भाव ……….. है।
उत्तर-परमाणु

प्रश्न 21. अजीविक संप्रदाय का संस्थापक ………… था।
उत्तर-गौशाल

प्रश्न 22. अजीविक संप्रदाय ……….. के सिद्धांत में विश्वास रखता था।
उत्तर-नियति

प्रश्न 23. ………. संप्रदाय वाले श्वेत वस्त्र धारण करते थे।
उत्तर-श्वेतांबर

प्रश्न 24. लोक संप्रदाय का संस्थापक ………. था।
उत्तर-लोक सा

प्रश्न 25. तेरा पंथ संप्रदाय का संस्थापक ……….. था।
उत्तर-भीखनजी

प्रश्न 26. जैन धर्म का संस्थापक ……….. कहलाता था।
उत्तर-आचार्य

प्रश्न 27. जैन धर्म ………… अंगों में विश्वास रखता है।
उत्तर-12

नोट-निम्नलिखित में से ठीक अथवा ग़लत चुनें—

प्रश्न 1. जैन धर्म कुल 20 तीर्थंकरों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 2. जैन धर्म के पहले तीर्थंकर का नाम विमल था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 3. स्वामी पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 4. स्वामी पार्श्वनाथ को 23 दिनों के कठिन तप के पश्चात् ज्ञान प्राप्त हुआ था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 5. स्वामी पार्श्वनाथ की शिक्षा को चातुरयाम कहते हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 6. स्वामी महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 7. स्वामी महावीर का जन्म 567 ई०पू० में हुआ था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 8. स्वामी महावीर जी के बचपन का नाम वर्धमान था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 9. स्वामी महावीर जी की माता का नाम महामाया था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 10. ज्ञान प्राप्ति के समय स्वामी महावीर जी की उनकी आयु 42 वर्ष थी।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 11. स्वामी महावीर जी ने पावा में निर्वाण प्राप्त किया था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 12. जैन धर्म त्रि-रत्नों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 13. जैन धर्म अहिंसा में विश्वास नहीं रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 14. जैन धर्म के अनुसार तत्व नौ प्रकार के हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 15. जैन धर्म तीन प्रकार के कर्मों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 16. जैन धर्म के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में पाँच अनुव्रतों की पालना करनी चाहिए।
उत्तर-ठीक

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प्रश्न 17. जैन धर्म के अनुसार मानवीय जीवन का मुख्य उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 18. जैन धर्म के अनुसार सच्चा विश्वास सच्चे ज्ञान की आधारशिला है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 19. जैन धर्म के अनुसार ज्ञान पाँच प्रकार का होता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 20. जैन धर्म के अनुसार हिंसा आठ प्रकार की होती है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 21. जैन धर्म में जीव शब्द का अर्थ है ‘आत्मा’।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 22. जैन धर्म के अनुसार पुण्य प्राप्त करने के 42 साधन हैं।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 23. जैन धर्म के अनुसार कर्म को रोकने की 57 विधियां हैं। .
उत्तर-ठीक

प्रश्न 24. जैन धर्म चार महाव्रतों में विश्वास रखता है।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 25. अजीविक संप्रदाय किस्मत के सिद्धांत में विश्वास रखता है।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 26. तारना संप्रदाय का संस्थापक भीखनजी था।
उत्तर-ग़लत

प्रश्न 27. स्थानकवासी संप्रदाय का संस्थापक वीराजी था।
उत्तर-ठीक

प्रश्न 28. जैनियों के धार्मिक ग्रंथों में 12 अंगों को सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
उत्तर-ठीक

नोट-निम्नलिखित में से ठीक उत्तर चनें—

प्रश्न 1.
जैन धर्म कुल कितने तीर्थंकरों में विश्वास रखता है ?
(i) 20
(ii) 23
(iii) 24
(iv) 25
उत्तर-
(iii) 24

प्रश्न 2.
जैन धर्म का पहला तीर्थंकर कौन था ?
(i) पार्श्वनाथ
(ii) महावीर
(iii) विमल
(iv) ऋषभनाथ।
उत्तर-
(iv) ऋषभनाथ।

प्रश्न 3.
जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर कौन थे ?
(i) विमल
(ii) अनंत
(iii) ऋषभनाथ
(iv) पार्श्वनाथ।
उत्तर-
(iv) पार्श्वनाथ।

प्रश्न 4.
जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर कौन थे ?
(i) अभिनंदन
(ii) महावीर
(iii) पुष्पदंत
(iv) अजित।
उत्तर-
(ii) महावीर

प्रश्न 5.
स्वामी महावीर जी का जन्म कब हुआ ?
(i) 566 ई० पू०
(ii) 567 ई० पू०
(iii) 569 ई० पू०
(iv) 599 ई० पू०।
उत्तर-
(iv) 599 ई० पू०।

प्रश्न 6.
स्वामी महावीर जी का जन्म कहाँ हुआ ?
(i) लुंबिनी में
(ii) कुंडग्राम में
(iii) कुशीनगर में
(iv) कपिलवस्तु में।
उत्तर-
(ii) कुंडग्राम में

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प्रश्न 7.
स्वामी महावीर जी के पिता जी का नाम क्या था ?
(i) सिद्धार्थ
(ii) राहुल
(iii) वर्धमान
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i) सिद्धार्थ

प्रश्न 8.
स्वामी महावीर जी की माता जी का नाम क्या था ?
(i) त्रिशला
(ii) यशोधरा
(iii) महामाया
(iv) प्रजापति गौतमी।
उत्तर-
(i) त्रिशला

प्रश्न 9.
स्वामी महावीर जी के जन्म से पूर्व उनकी माता जी को कितने स्वप्न आए थे ?
(i) 8
(ii) 10
(iii) 12
(iv) 14.
उत्तर-
(iv) 14.

प्रश्न 10.
स्वामी महावीर जी के बचपन का नाम क्या था ?
(i) वर्धमान
(ii) सिद्धार्थ
(ii) राहुल
(iv) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(i) वर्धमान

प्रश्न 11.
स्वामी महावीर जी की ज्ञान प्राप्ति के समय उनकी आयु कितनी थी ?
(i) 20 वर्ष
(ii) 30 वर्ष
(iii) 35 वर्ष
(iv) 42 वर्ष।
उत्तर-
(iv) 42 वर्ष।

प्रश्न 12.
स्वामी महावीर जी को ज्ञान की प्राप्ति कहाँ हुई थी ?
(i) जरिमबिक गाँव
(ii) बौद्ध गया
(ii) वैशाली
(iv) कुंडग्राम।
उत्तर-
(i) जरिमबिक गाँव

प्रश्न 13.
निम्नलिखित में कौन-सा स्वामी महावीर जी का प्रचार केंद्र नहीं था ?
(i) राजगृह
(ii) वैशाली
(iii) अंग
(iv) पुरुषपुर।
उत्तर-
(iv) पुरुषपुर।

प्रश्न 14.
स्वामी महावीर जी को कहाँ निर्वाण प्राप्त हुआ था ?
(i) विदेह
(ii) अंग
(iii) राजगृह
(iv) पावा।
उत्तर-
(iv) पावा।

प्रश्न 15.
स्वामी महावीर जी की निर्वाण प्राप्ति के समय उनकी आयु कितनी थी ?
(i) 60 वर्ष
(ii) 62 वर्ष
(iii) 72 वर्ष
(iv) 80 वर्ष।
उत्तर-
(iii) 72 वर्ष

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से कौन-सा धर्म त्रि-रत्नों में विश्वास रखता था ?
(i) बौद्ध धर्म
(ii) जैन धर्म
(iii) ईसाई धर्म
(iv) पारसी धर्म।
उत्तर-
(ii) जैन धर्म

प्रश्न 17.
जैन धर्म कितनी सच्चाइयों में विश्वास रखता है ?
(i) 3
(i) 5
(iii) 7
(iv) 9.
उत्तर-
(iv) 9.

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 18.
जैन धर्म जीव के बंधन का मुख्य कारण किसे मानते हैं ?
(i) पाप
(ii) पुण्य
(iii) मोक्ष
(iv) अजीव।
उत्तर-
(i) पाप

प्रश्न 19.
निम्नलिखित में से कौन-सी स्वामी महावीर जी की शिक्षा नहीं है ?
(i) वह अहिंसा में विश्वास रखते थे
(ii) वह कर्म सिद्धांत में विश्वास रखते थे ।
(iii) वह समानता में विश्वास रखते थे
(iv) वह ईश्वर में विश्वास रखते थे।
उत्तर-
(iv) वह ईश्वर में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 20.
जैन धर्म कितने अनुव्रतों में विश्वास रखता है ?
(i) 3
(ii) 5
(iii) 7
(iv) 9.
उत्तर-
(ii) 5

प्रश्न 21.
जैन धर्म के अनुसार हिंसा कितने प्रकार की होती है ?
(i) 2
(ii) 3
(iii) 4
(iv) 5.
उत्तर-
(i) 2

प्रश्न 22.
कौन-सा तत्व जीव और पुदगल के मध्य गति पैदा करता है ?
(i) पुदगल
(ii) धर्म
(iii) अधर्म
(iv) पाप।
उत्तर-
(ii) धर्म

प्रश्न 23.
अजीविक संप्रदाय का संस्थापक कौन था ?
(i) गोशाल
(ii) स्वामी महावीर
(iii) वीराजी
(iv) भीखनजी।
उत्तर-
(i) गोशाल

प्रश्न 24.
निम्नलिखित में से कौन जैन धर्म के साथ संबंधित संप्रदाय नहीं हैं ?
(i) दिगंबर
(ii) श्वेतांबर
(iii) लोंक
(iv) महायान।
उत्तर-
(iv) महायान।

PSEB 12th Class Religion Solutions Chapter 8 जैन धर्म की नैतिक शिक्षाएँ

प्रश्न 25.
निम्नलिखित में से कौन-सा धर्म जैन धर्म के साथ संबंधित नहीं है ?
(i) दीपवंश
(ii) कल्पसूत्र
(iii) भगवती सूत्र
(iv) आचारंग सूत्र।
उत्तर-
(i) दीपवंश

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता) Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 9 तितली रानी (कविता) (2nd Language)

तितली रानी (कविता) अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਤਿਤਲੀ = तितली
  • ਬਸੰਤ = बसंत
  • ਰੰਗੋਲੀ = रंगोली
  • ਗਿਆਨੀ = सयानी
  • ਨਾਨੀ = नानी
  • ਪਰੀ = परी

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਖੰਭ = पंख
  • ਵਨ-ਸੁਵੰਨੀ = रंग-बिरंगी
  • ਰੁੱਤ = ऋतु
  • ਹੱਥ = हाथ
  • ਸਪਨਾ = स्वप्न
  • ਸੁਨਹਿਰਾ/ਸੋਨਾ = स्वर्ण

पढ़ो, समझो और लिखो

स् + व = स्व, प् + न = प्न = स्वप्न
स् + व + र् + ण = स्व र्ण

कविता की पंक्तियाँ पूरी करो :

(1) रंग-बिरंगी ………………………………..,
पंखों पर ………………………………..।

(2) रुत बसंत में ………………………………..,
गीत खुशी के ………………………………..।
उत्तर :
(1) रंग-बिरंगी जिसकी चोली।
पंखों पर जिसके रंगोली।

(2) रुत बसन्त में आती तितली,
गीत खुशी के गाती तितली।

बताओ

प्रश्न 1.
तितली के पंख कैसे होते हैं?
उत्तर :
तितली के पंख रंग-बिरंगे होते हैं।

प्रश्न 2.
तितली किस ऋतु में दिखाई देती है?
उत्तर :
तितली वसन्त ऋतु में दिखाई देती है।

प्रश्न 3.
नानी किसकी कहानी सुनाया करती थी?
उत्तर :
नानी स्वर्ण परी की कहानी सुनाया करती थी।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

तुक मिलाओ

  1. चोली = रंगोली
  2. सजाती = ………………………………..
  3. इठलाती = ………………………………..
  4. आती = ………………………………..

उत्तर :

  1. चोली = रंगोली।
  2. सजाती = शर्माती।
  3. इठलाती = लुभाती।
  4. आती = गाती।

वाक्य बनाओ

  1. रंग-बिरंगी
  2. बसंत
  3. कहानी
  4. सयानी

उत्तर :

  1. रंग-बिरंगी-लाल किला रंगबिरंगी रोशनी से सजा हुआ था।
  2. बसन्त-बसन्त में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं।
  3. कहानी-नानी माँ ने हमें कहानी सुनाई।
  4. सयानी-रानी अब सयानी हो गई है।

रचनात्मक कौशल

तितली को उड़ते हुए देखो। तितली का चित्र बनाओ। उसमें रंग भरो।

अध्यापन निर्देश

1. अध्यापक गीत एवं अभिनय प्रणाली द्वारा कविता का सस्वर गायन करवाए। बच्चों के मन में प्राकृतिक वस्तुओं के प्रति प्रेम जागृत करे।
2. पाठ में ‘ऋतु’ को बोलचाल की भाषा में ‘रुत’ कहा गया है।
3. अध्यापक बच्चों को सभी ऋतुओं का ज्ञान देते हुए विशेष रूप से ऋतुराज बसंत ऋतु’ के बारे में बताये।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

तितली रानी (कविता) बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘उिँउली’ का हिन्दी अर्थ है : चितली/तितली/पुतली/नेतरी
उत्तर :
तितली

प्रश्न 2.
पंजाबी शब्द ‘व’ का हिन्दी अर्थ है : हल्की/हाथी/हाथ/हाथों
उत्तर :
हाथ

प्रश्न 3.
तितली के पंख कैसे होते हैं?
(i) रंग
(ii) बिरंगे
(iii) रंग-बिरंगे
(iv) बेरंग।
उत्तर :
(iii) रंग-बिरंगे

प्रश्न 4.
नानी किसकी कहानी सनाया करती थी?
(i) स्वर्ण की
(ii) परी की
(iii) स्वर्ण – परी की
(iv) राक्षस की।
उत्तर :
(iii) स्वर्ण-परी की

प्रश्न 5.
चोली से तुकबन्दी करते हुए शब्द मिलाएँ।
सही पर गोला लगाओ।
(i) रंगोली
(ii) तुली
(iii) कुली
(iv) टुली।
उत्तर :
(i) रंगोली

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

प्रश्न 6.
‘इठलाती’ से तुकबन्दी करते हुए शब्द मिलाएं।
(i) जीती
(ii) लुभाती
(iii) पत्री
(iv) छत्री।
उत्तर :
(ii) लुभाती।

तितली रानी (कविता) Summary in Hindi

1. तितली रानी, तितली रानी,
अपने घर को बड़ी सयानी।
रंग-बिरंगी जिसकी चोली,
पंखों पर जिसके रंगोली।
फूलों पर उड़ती-इठलाती,
बच्चों को यह बहुत लुभाती॥

शब्दार्थ :

  • सयानी = समझदार।
  • चोली = वस्त्र।।
  • इठलाती = गर्व करती।
  • लुभाती = अच्छी लगती है।

सरलार्थ-
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक में संकलित कविता ‘तितली रानी’ से ली गई हैं। उसमें कवि तितली की सुन्दरता का वर्णन करते हुए कहता है कि तितली रानी अपने घर के लिए बहुत समझदार है। उसके रंग-बिरंगे पंख हैं। ऐसा लगता है जैसे उसके पंखों पर किसी ने रंगदार रंगोली सजा दी है। फूलों पर यह इठलाती हुई उड़ती जाती है। बच्चों को भी यह बहुत अच्छी लगती है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता) 1

2. आँखों में यह स्वप्न सजाती,
हाथ लगाने से शर्माती।
रुत बसन्त में आती तितली,
गीत खुशी के गाती तितली।
कभी कहा करती थी नानी,
स्वर्ण परी की एक कहानी।
तितली रानी, तितली रानी,
अपने घर को बड़ी सयानी॥

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 9 तितली रानी (कविता)

शब्दार्थ :

  • स्वप्न = सपने।
  • शर्माती = लज्जाती।
  • रुत = ऋतु, मौसम।
  • खुशी = प्रसन्नता।
  • स्वर्ण-परी = सुनहरी परी।
  • सयानी = समझदार।

सरलार्थ-
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि तितली की सुन्दरता की प्रशंसा करते हुए कहता है कि यह सुन्दरतितली अपनी आँखों में सुन्दर सपने सजाती है। हाथलगाने से वह शरमा जाती है। जब बसन्त ऋतु आतीहै तब यह तितली प्रसन्नता से भर कर खुशी के गीत गाती है। कवि कहता है कि कभी हमें नानी सुनहरीपरी की एक कहानी सुनाती थी। तितली को देखकरहमें लगता है कि यही वह सुनहरी परी है। तितलीरानी, अपने घर के लिए बड़ी समझदार है।

तितली रानी (कविता) शब्दार्थ Meanings

  • रंगोली = अलग-अलग रंगों का मेल, त्योहार आदि पर रंगीन बुरादे से फर्श पर की जाने वाली चित्रकारी
  • स्वप्न = सपना
  • रुत = ऋतु
  • लुभाना = मोहित करना
  • स्वर्ण = सोना

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 14 हंस किसका? Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 14 हंस किसका? (2nd Language)

हंस किसका? अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਹੰਸ = हंस
  • ਰਾਜਕੁਮਾਰ = राजकुमार
  • ਸਿਧਾਰਥ = सिद्धार्थ
  • ਦੇਵਦੱਤ = देवदत्त
  • ਤੀਰ = तीर
  • ਪੱਟੀ = पट्टी
  • ਭਾਈਚਾਰਾ = भाईचारा
  • ਸੰਸਾਰ = संसार
  • ਪੇਮ = प्रेम
  • ਬੰਦ = बंद

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਖਿੜੇ = खिले
  • ਪੰਛੀ = पक्षी
  • ਖੰਭ = पंख
  • ਤੀਰ ਕਮਾਨ = धनुष-बाण
  • ਜ਼ਖਮੀ = घायल

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) द् + ध = द्ध, = सिद्धार्थ, बुद्ध
क् + ष = क्ष = पक्षी
प् + य = प्य = प्यार

(ख) ट् + ट = ट्ट = पट्टी
त् + त = त्त = उत्तर, देवदत्त

बताओ

प्रश्न 1.
राजकुमार का क्या नाम था?
उत्तर :
राजकुमार का नाम सिद्धार्थ था।

प्रश्न 2.
सिद्धार्थ कहाँ घूम रहा था?
उत्तर :
सिद्धार्थ बगीचे में घूम रहा था।

प्रश्न 3.
हंस क्यों छटपटा रहा था?
उत्तर :
हंस के शरीर में तीर लगा था इसीलिए वह छटपटा रहा था।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

प्रश्न 4.
सिद्धार्थ ने हंस की क्या सहायता की?
उत्तर :
सिद्धार्थ ने हंस को उठाकर धीरे से उसका तीर निकाला और फिर घाव धोकर उस पर पट्टी बाँधी।

प्रश्न 5.
सिद्धार्थ के चचरे भाई का क्या नाम था?
उत्तर :
सिद्धार्थ के चचेरे भाई का नाम देवदत्त था।

प्रश्न 6.
सिद्धार्थ के पिता ने हंस किसे और क्यों दिया?
उत्तर :
सिद्धार्थ के पिता ने हंस सिद्धार्थ को दिया क्योंकि उसने हंस को बचाया था।

प्रश्न 7.
सिद्धार्थ को अन्य किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर :
सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 8.
गौतम बुद्ध ने संसार को कौन-सा पाठ पढ़ाया?
उत्तर :
गौतम बुद्ध ने संसार को सत्य, अहिंसा, प्रेम, दयालुता, करुणा, सहानुभूति और परोपकार का पाठ पढ़ाया।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

वाक्य पूरे करो

  1. बगीचे में …………………………………… फूल खिले हुए थे। – तीर
  2. हंस के शरीर में …………………………………… लगा हुआ था। – बचाने वाले
  3. मारने वाले से …………………………………… का हक ज्यादा होता है। – रंग-बिरंगे
  4. सिद्धार्थ बड़ा होकर …………………………………… बना। – गौतम बुद्ध
  5. …………………………………… सिद्धार्थ का चचेरा भाई था। – देवदत्त

उत्तर :

  1. रंग-बिरंगे
  2. तीर।
  3. बचाने वाले।
  4. गौतम बुद्ध
  5. देवदत्त।

पढ़ो और समझो

(क) पक्षी = पंछी
बगीचा = उपवन
तीर = बाण
शरीर = तन
पंख = पर
राजा = नृप
पशु-पक्षी = पशु और पक्षी
धनुष-बाण = धनुष और बाण
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के पर्यायवाचीशब्द सामने दर्शाए गए हैं।

(ख) राजकुमार = राजा का कुमार
राजमहल = राजा का महल
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों के समास-शब्द सामने दर्शाये गए हैं। विद्यार्थी इन्हें समझ कर लिखने का अभ्यास करें।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

अन्तर समझो

(क) [हंस} के शरीर में तीर लगा हुआ था।
जोकर को देखकर मैं [हँस] पड़ा।
(ख) सिद्धार्थ हंस को लेकर राजमहल [की] ओर चल दिया।
देवदत्त ने शिकायत की [कि] सिद्धार्थ मेरा हंस नहीं दे रहा।
उत्तर :
उपरोक्त रेखांकित शब्दों में (हंस/हँस) तथा (की/कि) शब्दों के अन्तर को दिखाया गया है। विद्यार्थी इन्हें समझें।

रचनात्मक अभिव्यक्ति

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका 2
चित्र देखकर वाक्य पूरे करो

  1. बालक …………………………………… को …………………………………… खिला रहा है।
  2. बालिका …………………………………… को …………………………………… पिला रही है।
  3. पिताजी …………………………………… को सहला रहे हैं।

उत्तर :

  1. बालक मुरगी को दाना खिला रहा
  2. बालिका गाय को पानी पिला रही है।
  3. पिताजी कुत्ते को सहला रहे हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

हंस किसका? बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
सिद्धार्थ को किस नाम से जाना जाता है?
(i) गौतम बुद्ध
(ii) गौतम भाई
(iii) गौतमभाई
(iv) राजकुमार।
उत्तर :
(i) गौतम बुद्ध

प्रश्न 2.
सिद्धार्थ के पिता ने हंस किसे दिया?
(i) सिद्धार्थ को
(ii) चचेरे भाई को
(iii) ममेरे भाई को
(iv) किसी को नहीं।
उत्तर :
(i) सिद्धार्थ को

प्रश्न 3.
पंजाबी शब्द ‘सधी’ का हिन्दी अर्थ है : जख्म/घायल/पागल/सहगल
उत्तर :
घायल

प्रश्न 4.
पंजाबी शब्द ‘प’ का हिन्दी अर्थ है : बुद्ध/बुद्धा/प्रबुद्ध/प्रसून
उत्तर :
बुद्ध

हंस किसका? Summary in Hindi

राजकुमार सिद्धार्थ बहुत ही दयालु था। उसे पशुपक्षियों से बहुत प्यार था। एक दिन वह बगीचे में घूम रहा था। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। पक्षी चहचहा रहे थे। अचानक पक्षियों का चहचहाना बंद हो गया। सिद्धार्थ ने ऊपर देखा। तभी अचानक एक हंस उसके पैरों के पास आकर गिरा। वह छटपटा रहा था, उसके शरीर में तीर लगा हुआ था।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका?

सिद्धार्थ ने हंस को ऊपर उठाया। उसके पंखों पर प्यार से हाथ फेरते हए तीर को निकाला और उसके घाव को धोकर उस पर पट्टी बाँधी। इतने में सिद्धार्थ का चचेरा भाई देवदत्त वहाँ आया उसके हाथ में धनुष-बाण था। आते ही उसने सिद्धार्थ से कहा, “यह हंस मेरा है, इसे मुझे दे दो।”

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 14 हंस किसका 1

इस पर सिद्धार्थ ने कहा, “नहीं यह हंस मेरा है। मैंने इसे बचाया है।” इतना कहते हुए सिद्धार्थ हंस को लेकर राजमहल की ओर चल दिया। पीछे-पीछे देवदत्त भी चल पड़ा। देवदत्त ने राजा शुद्धोधन से सिद्धार्थ की शिकायत की।

सिद्धार्थ ने कहा, “पिता जी, देवदत्त ने इसे तीर से मारा है, लेकिन मैंने इसे बचाया है। इसलिए यह हंस मेरा है।” देवदत्त भी अपनी बात पर अड़ा रहा। राजा शुद्धोधन ने दोनों की बात सुन कर फैसला सुनाया कि “देवदत्त तुमने इसे अपने तीर से निशाना बनाया परन्तु सिद्धार्थ ने इसे बचाया है और मारने वाले से बचाने वाले का हक ज्यादा होता है। इसलिए यह हंस सिद्धार्थ का है।” यही सिद्धार्थ बड़ा होकर गौतमबुद्ध बना जिसने दया तथा अहिंसा का पाठ पढ़ाया।

हंस किसका? शब्दार्थ :

  • राजकुमार = राजा का बेटा
  • दयालु = कृपायुक्त
  • प्यार = प्रेम
  • छटपटाना = तड़पना
  • चचेरा भाई = चाचा का बेटा
  • राजमहल = राजा का महल
  • हक = अधिकार
  • घाव = जख्म
  • घायल = ज़ख्मी
  • अहिंसा = किसी को हानि न पहुँचाना
  • परोपकार = दूसरे का भला करना
  • भाईचारा = भाई का नाता या भाव
  • सहानुभूति = हमदर्दी

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन

Punjab State Board PSEB 8th Class Physical Education Book Solutions Chapter 3 विटामिन Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 8 Physical Education Chapter 3 विटामिन

PSEB 8th Class Physical Education Guide विटामिन Textbook Questions and Answers

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

प्रश्न 1.
विटामिन किसे कहते हैं ?
उत्तर-
विटामिन (Vitamins) विटामिन रासायनिक पदार्थ होते हैं। हमारे शरीर की वृद्धि के लिए इनकी बहुत आवश्यकता होती है। यह शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं। यह हमारे शरीर की सुरक्षा करते हैं। इसलिए इन्हें रक्षक तत्त्व या जीवनदाता कहा जाता है। हमारे भोजन में इनका उचित मात्रा में विद्यमान होना बहुत ज़रूरी है। विटामिन मुख्य रूप से छः प्रकार के होते हैं। विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘बी’, विटामिन ‘सी’, विटामिन ‘डी’, विटामिन ‘ई’ और विटामिन ‘के’। विटामिन भिन्न-भिन्न खाद्य पदार्थों में भिन्न-भिन्न मात्रा में मिलते हैं।

प्रश्न 2.
विटामिन का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
विटामिनों का महत्त्व (Importance of Vitamins) विटामिनों का महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है –

  1. विटामिन हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखते हैं।
  2. ये हमारी शारीरिक वृद्धि और विकास में सहायता करते हैं।
  3. ये हमारी पाचन शक्ति को बढ़ाते हैं।
  4. ये हमारे खून को साफ़ करते हैं और खून की मात्रा को बढ़ाते हैं।
  5. ये हड्डियों और दाँतों को मजबूत बनाते हैं।
  6. ये हमें बीमारियों का मुकाबला करने के योग्य बनाते हैं।
  7. विटामिनों के प्रयोग से चमड़ी के रोग दूर हो जाते हैं।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन

प्रश्न 3.
विटामिन ‘ए’ क्या होता है ? इसकी कमी व अधिकता के बारे में लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘ए’ (Vitamin A)-विटामिन ‘ए’ के काम निम्नलिखित हैं –

  1. इससे आँखों की ज्योति बढ़ती है।
  2. भूख बढ़ती है।
  3. पाचन-शक्ति ठीक रहती है।
  4. यह विटामिन शरीर के विकास और शक्ति की वृद्धि में योगदान देते हैं।

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—ये अधिकतर, दूध, दही, मक्खन, पनीर, अण्डों, मछली, पत्तों वाली सब्जियों जैसे पालक और ताज़ी सब्जियों जैसे गाजर, बन्दगोभी, टमाटर तथा केले, संतरे, आम, पपीता और अनानास आदि फलों में मिलते हैं।

विटामिन ‘ए’ की कमी से होने वाली हानियाँ-विटामिन ‘ए’ की कमी से छत के रोगों से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है और व्यक्ति बिमारियों का शिकार हो जाता है। आँखों में खारिश और जलन होने लग जाती है। इसकी कमी से रात को साफ दिखाई नहीं देता और व्यक्ति को अंधराता हो जाता है। अश्रु ग्रंथियां कार्य नहीं करतीं। त्वचा शुष्क और कठोर हो जाती है। गुर्दो में पत्थरी बनने की सम्भावना बढ़ जाती है। दांत टूटने लगते हैं। दाँतों में पायरिया नामक रोग हो जाता है।

विटामिन ‘ए’ की अधिक मात्रा से होने वाली हानियाँ- यदि बच्चों में विटामिन ‘ए’ की मात्रा बढ़ जाए तो बच्चों की त्वचा सूख जाती है। हाथों-पैरों की उंगलियों में सूजन आ जाती है। एक साधारण व्यक्ति में इस विटामिन की मात्रा बढ़ने से कमज़ोरी एवं थकावट महसूस होने लगती है। शरीर को सुस्ती और बेचैनी होने लगती है। कब्ज, सिरदर्द और जोड़ों में दर्द रहता है। आँखों में खून बहने के चिह्न प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 4.
विटामिन ‘बी’ कम्पलैक्स समूह किसे कहते हैं ? इसके प्राप्ति के स्रोतों के बारे में लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘बी'(Vitamin-B) यह कई विटामिनों का मिश्रण है। इस में विटामिन बी-1, बी-2, तथा बी-12 मिले रहते हैं। यह विटामिन बी-कम्पलैक्स (B-Complex) के नाम से जाना जाता है।

विटामिन ‘बी’ के कार्य (Functions of Vitamin-B) विटामिन ‘बी’ के कार्य इस प्रकार हैं –

  1. इस विटामिन से नर्वस सिस्टम (नाड़ी प्रणाली) ठीक रहता है।
  2. यह नाड़ियों, पेशियों, दिल और दिमाग को शक्ति प्रदान करता है।
  3. भूख को बढ़ाता है।
  4. चर्म रोगों से सुरक्षा करता है।

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—यह दूध, दही, मक्खन, पनीर, दालों, अनाज, सोयाबीन, मटर, अण्डे, हरी और पत्तों वाली सब्जियों, जैसे-पालक, बन्दगोभी, शलगम, टमाटर, प्याज़ और सलाद आदि में पाया जाता है।

प्रश्न 5.
विटामिन ‘सी’ क्या है ? इसके कार्य लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘सी’ (Vitamin C) विटामिन ‘सी’ पानी में घुलनशील है। इसके निम्नलिखित कार्य हैं –

  1. यह विटामिन लहू (खून, रक्त) को साफ़ रखता है।
  2. दांतों को मजबूत करता है।
  3. ज़ख्मों और टूटी हुई हड्डियों को भी शीघ्र ठीक करता है।
  4. शरीर की छूत की बीमारियों से रक्षा करता है।
  5. गले को ठीक रखता है।
  6. जुकाम से बचाता है।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (1)

प्राप्ति के स्रोत (Sources)- यह प्रायः रसदार और खट्टे पदार्थों में होता है। जैसेसंतरा, माल्टा, मुसम्मी, अंगूर, अनार, नींबू, अमरूद और आंवला आदि। इसके अतिरिक्त हरी सब्जियों, जैसे टमाटर, बन्दगोभी, गाजर, पालक, शलगम आदि में भी मिलता है।

विटामिन ‘सी’ की कमी से होने वाली हानियाँ-विटामिन ‘सी’ की कमी से ‘स्कर्वी’ रोग हो जाता है। हाथों-पैरों में दर्द और सूजन आ जाती है। हड्डियों का निर्माण और विकास रुक जाता है और हड़ियां टेढी-मेढी हो जाती हैं। ज़ख्म शीघ्र नहीं भरते और ज़ख्मों में से रक्त बहता है। दाँत कमजोर हो जाते हैं। मसूड़ों में से रक्त बहने लग जाता है। त्वचा का रंग पीला हो जाता है। आँखों के नीचे काले घेरे पड़ जाते हैं। छूत के रोग लगने की सम्भावना बढ़ जाती है।

प्रश्न 6.
विटामिन ‘डी’ क्या है ? इस विटामिन की कमी से होने वाली हानियाँ लिखिए।
उत्तर-

विटामिन डी (Vitamin D)-विटामिन ‘डी’ चर्बी में घुलनशील है। इसके कार्य निम्नलिखित हैं
1. यह विटामिन हड्डियों और दाँतों का निर्माण करता है।
2. उन्हें मज़बूत भी बनाता है।
PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (2)
3. बच्चों के शारीरिक विकास के लिए इसकी बहुत आवश्यकता होती है।

विटामिन ‘डी’ की कमी से होने वाली हानियाँ –
विटामिन ‘डी’ की कमी से मांसपेशियों व हड्डियों में दर्द होता है। छोटे बच्चों में दमा होने का डर रहता है। इसकी कमी से बच्चों को ‘सोका’ (शरीर का सूखना) रोग हो जाता है।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन

प्रश्न 7.
विटामिन ‘ई’ क्या है ? इस विटामिन की प्राप्ति के स्रोत लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘ई’ (Vitamin E)—विटामिन ‘ई’ चर्बी में घुलनशील है । इस विटामिन के कार्य इस प्रकार हैं –

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (3)

  1. यह विटामिन स्त्रियों और पुरुषों में सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति को बढ़ाता है।
  2. यह नपुंसकता और बांझपन को रोकता है।

प्राप्ति के स्त्रोत (Sources)—यह बन्दगोभी, गाजर, सलाद, मटर, प्याज, टमाटर, फूलगोभी में होता है। इसके अतिरिक्त शहद, गेहूँ, चावल, बीजों के तेल, अण्डे की जर्दी, बादाम, पिस्ता, चने की दाल और दलिया में अधिक मात्रा में होता है।

प्रश्न 8.
विटामिन ‘के’ क्या है ? इस विटामिन की कमी से होने वाली हानियाँ लिखिए।
उत्तर-
विटामिन ‘के’ (Vitamin K)–विटामिन ‘के’ चर्बी में घुलनशील है। विटामिन ‘के’ के कार्य निम्नलिखित हैं

  1. यह विटामिन ज़ख्मों से रिस रहे रक्त को रोकता है।
  2. उसके जमाव में सहायता करता है।
  3. यह चमड़ी के रोगों से सुरक्षा करता है।

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—यह अधिकतर बन्दगोभी, पालक, मछली, सोयाबीन, टमाटर और अण्डे की जर्दी आदि में होता है।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (4)

विटामिन ‘के’ की कमी से होने वाली हानियाँ-इस विटामिन का निर्माण छोटी आंत में होने के कारण इसकी कमी बहुत कम होती है। यदि किसी को विटामिन ‘के’ की कमी हो तो उसे चोट लगने से उसका रक्त बहना बंद नहीं होता। त्वचा खुरदरी हो जाती है। जिगर की बीमारियां और दस्त लग जाते हैं। खून की कमी से सम्बन्धित रोग लग जाते हैं। समय से पूर्व (Pre Mature) पैदा होने वाले बच्चों में इस विटामिन की कमी रहती है।

Physical Education Guide for Class 8 PSEB विटामिन Important Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न :

प्रश्न 1.
विटामिन की किस्में हैं –
(क) विटामिन A
(ख) विटामिन B
(ग) विटामिन C और D
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

प्रश्न 2.
विटामिन D कहाँ से प्राप्त होता है ?
(क) दूध से
(ख) अनाज से
(ग) फलों से
(घ) धूप से।
उत्तर-
(घ) धूप से।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन

प्रश्न 3.
बेरी-बेरी रोग किस विटामिन की कमी से होता है ?
(क) विटामिन C
(ख) विटामिन A
(ग) विटामिन K
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) विटामिन C

प्रश्न 4.
किस विटामिन की कमी से स्कर्वी रोग होता है ?
(क) विटामिन C
(ख) विटामिन A
(ग) विटामिन D
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर-
(क) विटामिन C

प्रश्न 5.
विटामिन की कमी से कौन-कौन से रोग लग जाते हैं ?
(क) अंधराता और चमड़ी के रोग
(ख) भूख नहीं लगती
(ग) अनीमिया रोग हो जाता है
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर-
(घ) उपरोक्त सभी।

बहुत छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
विटामिन कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर-
विटामिन छः प्रकार के होते हैं– A, B, C, D, E और K |

प्रश्न 2.
अंधराता रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है?
उत्तर-
यह रोग विटामिन A की कमी के कारण होता है।

प्रश्न 3.
किस विटामिन की कमी के कारण स्कर्वी रोग हो जाता है?
उत्तर-
विटामिन C की कमी के कारण।

प्रश्न 4.
बेरी-बेरी रोग किस विटामिन की कमी के कारण हो जाता है?
उत्तर-
विटामिन B की कमी के कारण।

प्रश्न 5.
पायोरिया रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है ?
उत्तर-
विटामिन C की कमी के कारण।

प्रश्न 6.
बांझपन का रोग किस विटामिन की कमी के कारण होता है?
उत्तर-
विटामिन E की कमी के कारण।

प्रश्न 7.
कौन-से विटामिन पानी में घुलनशील नहीं हैं ?
उत्तर-
विटामिन C, D, E और K ।

प्रश्न 8.
जीवन तत्त्व किन्हें कहते हैं?
उत्तर-
विटामिनों को।

प्रश्न 9.
पानी में घुलनशील विटामिन कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-
विटामिन B तथा C ।

छोटे उत्तर वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
विटामिन क्या होते हैं ?
उत्तर-
विटामिन (Vitamins)-विटामिन ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जो हमारे शरीर के विकास के लिए आवश्यक होते हैं। अब तक कई प्रकार के विटामिनों की खोज की जा चुकी है, परन्तु प्रमुख विटामिन छ:- ही हैं। ये हैं-विटामिन ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’, ‘डी’, ‘ई’ और ‘के’। इनमें विटामिन ‘बी’ और ‘सी’ पानी में घुलनशील हैं और शेष विटामिन ‘ए’, ‘डी’, ‘ई’ और ‘के’ चर्बी में घुलनशील होते हैं। विटामिन एक प्रकार के विशेष पदार्थों में पाए जाते हैं। भोजन में विटामिनों का उचित मात्रा में होना बहुत ज़रूरी है। विटामिन का जीवन के लिए बहुत अधिक महत्त्व अनुभव करते हुए इन्हें ‘जीवन दाता’ भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
विटामिन ‘ए’ के काम और प्राप्ति के स्रोत लिखो।
उत्तर-
विटामिन ‘ए’ (Vitamin A)-विटामिन ‘ए’ के काम निम्नलिखित हैं –

  1. इससे आँखों की ज्योति बढ़ती है।
  2. भूख बढ़ती है।
  3. पाचन-शक्ति ठीक रहती है।
  4. यह विटामिन शरीर के विकास और शक्ति की वृद्धि में योगदान देते हैं।

PSEB 8th Class Physical Education Solutions Chapter 3 विटामिन (5)

प्राप्ति के स्रोत (Sources)—ये अधिकतर, दूध, दही, मक्खन, पनीर, अण्डों, मछली, पत्तों वाली सब्जियों जैसे पालक और ताज़ी सब्जियों जैसे गाजर, बन्दगोभी, टमाटर तथा केले, संतरे, आम, पपीता और अनानास आदि फलों में मिलते हैं।

प्रश्न 3.
विटामिन ‘ई’ और ‘के’ के प्राप्ति स्त्रोत लिखें।
उत्तर-
विटामिन ‘ई’ की प्राप्ति के स्त्रोत (Sources)—यह बन्दगोभी, गाजर, सलाद, मटर, प्याज, टमाटर, फूलगोभी में होता है। इसके अतिरिक्त शहद, गेहूं, चावल, बीजों के तेल, अण्डे की जर्दी, बादाम, पिस्ता, चने की दाल और दलिया में अधिक मात्रा में होता है।
विटामिन ‘के’ की प्राप्ति के स्त्रोत (Sources)—यह अधिकतर बन्दगोभी, पालक, मछली, सोयाबीन, टमाटर और अण्डे की जर्दी आदि में होता है।

प्रश्न 4.
हमारे शरीर को विटामिन की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर-
हमारे शरीर को विटामिनों की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से होती है –

  1. विटामिन हमारे स्वास्थ्य को बनाये रखते हैं।
  2. विटामिन हमारे शरीर में वृद्धि और विकास में सहायता करते हैं।
  3. विटामिन से हमें भूख लगती है।
  4. विटामिन हमारे रक्त को साफ करते हैं और इसमें बढ़ावा करते हैं।
  5. हड्डियों और दाँतों को मज़बूत रखते हैं।
  6. विटामिन हमारे शरीर में प्रतिरोधक शक्ति पैदा करते हैं।
  7. त्वचा के रोगों को ठीक करते हैं।
  8. वे हमारे शरीर को ताकत देते हैं।

PSEB 12th Class Chemistry Book Solutions Guide in Punjabi English Medium

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PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता) Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 13 काम ही पूजा (कविता) (2nd Language)

काम ही पूजा (कविता) अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਲਲਾਰੀ = ललारी
  • ਪਗੜੀ = पगड़ी
  • ਧੋਬੀ = धोबी
  • ਗਵਾਲਾ = ग्वाला
  • ਕਿਸਾਨ = किसान
  • ਨਾਈ = नाई
  • ਮਾਲੀ = माली

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਕੰਮ = काम
  • ਇਜੱਤ = सम्मान
  • ਘੁਮਿਆਰ = कुम्हार
  • ਵੱਟ = सिलवट
  • ਚੁੰਨੀ = चुनरी
  • ਪੈਸ = इस्त्री

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) स् + त्+ र = स्र = इस्री
श् + ऋ = शृ = शृंगार
ग् + व = ग्व = ग्वाला
म् + ह = म्ह = कुम्हार

(ख) म् + म = म्म = सम्मान

(ग) ध + र् + म = धर्म
च + र् + म = चर्म

काम ही पूजा (कविता) शब्दार्थ Meanings

  • सम्मान = इज्जत
  • कुम्हार = मिट्टी के बर्तन बनाने वाला
  • चर्मकार= चमड़े का काम करने वाला
  • ललारी = रंगाई का काम करने वाला
  • मेहतर = सफ़ाई करने वाला
  • ग्वाला = घर में आकर दूध देने वाला व्यक्ति

बताओ

प्रश्न 1.
कुम्हार क्या काम करता है?
उत्तर :
कुम्हार मिट्टी के बर्तन बनाता है।

प्रश्न 2.
चर्मकार क्या काम करता है?
उत्तर :
चर्मकार, चमड़े का काम करता है।

प्रश्न 3.
रंगाई का काम करने वाले को क्या कहते हैं?
उत्तर :
रंगाई का काम करने वाले को ललारी कहते हैं।

प्रश्न 4.
धोबी क्या काम करता है?
उत्तर :
धोबी कपड़े धोता है और उन्हें इस्त्री करता है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

प्रश्न 5.
अपने आस-पास के उन सभी लोगों के नाम लिखो जो अपने हाथ से काम करते हों।
उत्तर :
ग्वाला, धोबी, ललारी, माली, फेरीवाला आदि।

वाक्य बनाओ

  1. कुम्हार,
  2. चर्मकार,
  3. ललारी,
  4. माली,
  5. मेहतर,
  6. ग्वाला

उत्तर :

  1. कुम्हार-कुम्हार बर्तन बना रहा है।
  2. चर्मकार-चर्मकार चमड़ा रंग रहा है।
  3. ललारी-ललारी कपड़ों को रंग रहा है।
  4. माली-माली पौधे लगा रहा है।
  5. मेहतर-मेहतर सफाई कर रहा था।
  6. ग्वाला-ग्वाला दूध दोह रहा है।

तुक मिलाओ

  1. गान = …………………………………
  2. माली = …………………………………
  3. बनाता = …………………………………
  4. शृंगार = …………………………………

उत्तर :

  1. गान = सम्मान।
  2. माली = लाली।
  3. बनाता = सजाता।
  4. श्रृंगार = आधार।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

समझो

  1. घड़ा = घड़े
  2. कपड़ा = …………………………………
  3. जूता = …………………………………
  4. गमला = …………………………………

उत्तर :

  1. घड़ा = घड़े।
  2. कपड़ा = कपड़े।
  3. जूता = जूते।
  4. गमला = गमले।

इन से नये शब्द बनायें

स्र, र, ‘,’ (‘ऋ’ की मात्रा)
उत्तर :
स्त्र = स्त्री।
र् = मार्ग।
ऋ = मृग।

रचनात्मक अभिव्यक्ति
नीचे दिए गए चित्रों का ध्यान से देखो। प्रत्येक पर तीन चार वाक्य लिखें।

बच्चे घर के फालतू सामान से कोई फोटो फ्रेम, पेन/पेंसिल स्टेंड आदि बनायें अथवा कोई तसवीर बनाकर उसमें रंग भरें।

नीचे दिए गए शब्दों की सहायता से वाक्य पूरे करो –
कपड़ा, जूते, लकड़ी, लोहे, रंग

  1. लुहार ………………………………… का काम करता है।
  2. चर्मकार ………………………………… बनाता है।
  3. पेंटर खिड़की और दरवाज़ों पर ………………………………… करता है।
  4. जुलाहा ………………………………… बुनता है
  5. बढ़ई ………………………………… का काम करता है।

उत्तर :

  1. लुहार लोहे का काम करता है।
  2. हलवाई मिठाई बनाता है।
  3. पेंटर खिड़की और दरवाजों पर रंग करता है।
  4. जुलाहा कपड़ा बुनता है।
  5. बढ़ई लकड़ी का काम करता है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

काम ही पूजा (कविता) बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘ललाठी’ का हिन्दी अर्थ है। लाती/लालिमा/ललारी/ललाही
उत्तर :
ललारी

प्रश्न 2.
पंजाबी शब्द ‘ठाडाला’ का हिन्दी अर्थ है: गवला/ग्वाला/गाला/पाला
उत्तर :
ग्वाला

प्रश्न 3.
कुम्हार क्या बनाता है?
(i) बर्तन
(ii) सर्तन
(iii) कुर्बान
(iv) तुरतन।
उत्तर :
(i) बर्तन

प्रश्न 4.
हम इन्हें क्या कहते हैं। सही पर गोला लगाओ?
कपड़ों को रंग करने वाला- धोबी/ललारी
उत्तर :
ललारी।

काम ही पूजा (कविता) Summary in Hindi

1. काम ही पूजा, काम धर्म है
इस मंत्र का, गान करें।
काम कोई भी, नहीं है छोटा
काम का हम सम्मान करें।

शब्दार्थ :

  • गान करें = गाएँ।
  • सम्मान = इज्ज़त, आदर।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

सरलार्थ :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिन्दी की पाठ्य-पुस्तक में संकलित कविता ‘काम ही पूजा’ से ली गई हैं। इसमें कवि काम को पूजा के समान समझाते हुए, काम करने पर बल देते हुए कहता है कि काम करना ही हमारी पूजा होनी चाहिए, काम करना ही हमारा धर्म होना चाहिए। हमें इसी मंत्र को “ना चाहिए। काम कोई भी हो, वह छोटा नहीं होता। इसलिए हमें काम की इज्जत करनी चाहिए।

2. यह कुम्हार है-घड़े बनाता।
गमले बर्तन-खूब सजाता।
चर्मकार-जूते चमकाए।
टूटे गाँठ दे नए बनाए।

शब्दार्थ :

  • कुम्हार = मिट्टी के बर्तन बनाने वाला।
  • चर्मकार = चमड़े का काम करने वाला।
  • गाँठ कर = मुरम्मत करके।

सरलार्थ :
काम को पूजा समझना चाहिए इस तथ्य पर बल देते हुए कवि कहता है कि यह कुम्हार है, जो घड़े बनाता है। वह गमले और बर्तन बनाकर उन्हें खूब सजाता है। यह चमड़े का काम करने वाला चर्मकार है। जो जूते बनाकर उन्हें चमकाता है और पुराने टूटे हुए जूतों को गाँठ कर नए बना देता है।।

3. यह ललारी खुशियाँ बिखराता,
चुनरी पगड़ी पे रंग चढ़ाता।
रंगों से जब रंग मिल जाते,
जीवन को रंगीन बनाते।

शब्दार्थ :

  • ललारी = कपडे रंगने वाला।
  • रंगीन = खुशियों से भरा, रंगदार।

सरलार्थ :
कवि कहता है कि यह कपड़े रंगने वाला ललारी है जो कपड़ों को रंगकर हमारे जीवन में खुशियाँ भर देता है। वह चुनरी हो या पगड़ी, उस पर रंग चढ़ाता है। जब रंगों से रंग मिल जाते हैं तो। वे हमारे जीवन को रंगों से भर देते हैं। हमारे जीवन को खशियों से भरा बना देते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

4. धोकर कपड़े इस्त्री है करता,
कपड़ों की सिलवट को हरता।
धुले-प्रैस कपड़े हम पाएँ,
धोबी को तब भूल न जाएं।

शब्दार्थ :

  • इस्त्री = प्रैस-कपड़ों की सिलवटें निकालने की क्रिया।
  • सिलवट = बल।
  • हरता = दूर करता।

सरलार्थ : कवि कहता है कि धोबी कपड़ों को धोकर उन पर इस्त्री करता है और इस तरह वह कपड़ों की सिलवटें दूर करता है। जब भी हम धुले हुए और इस्त्री किए हुए कपड़ों को प्राप्त करें हम धोबी को न भूल जाएँ।

5. हो किसान नाई या माली,
देते हैं जीवन को लाली।
मेहतर हो या फेरी वाला,
कोई नहीं कम चाहे ग्वाला॥

शब्दार्थ :

  • लाली = खुशियाँ।
  • ग्वाला = दूध बेचने वाला।

सरलार्थ :
कवि कहता है कि चाहे किसान हो, नाई हो या माली हो। ये सभी अपना-अपना काम करके हमारे जीवन को खुशियों से भर देते हैं। चाहे कोई मेहतर हो या कोई फेरी वाला हो या फिर ग्वाला हो, कोई भी कम नहीं है। सबका अपनाअपना महत्त्व है।

6. प्यारे बच्चो इतना जानो।
मन से करो जो भी ठानो।
काम ही जीवन का श्रृंगार।
काम ही है सुख का आधार॥

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 13 काम ही पूजा (कविता)

शब्दार्थ :

  • मन से करना = जी लगाकर करना।
  • ठानो = निश्चय करो।
  • श्रृंगार = सजावट।

सरलार्थ :
कवि कहता है कि प्यारे बच्चो इतना समझ लो कि जिस काम को करने का तुम निश्चय कर लेते हो उसे जी लगा कर करो क्योंकि काम ही जीवन की सजावट है और काम ही सुख का आधार है।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

Punjab State Board PSEB 5th Class Hindi Book Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो! Textbook Exercise Questions and Answers.

PSEB Solutions for Class 5 Hindi Chapter 12 हमारी भी सुनो! (2nd Language)

हमारी भी सुनो! अभ्यास

नीचे गुरुमुखी और देवनागरी लिपि में दिये गये शब्दों को पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखने का अभ्यास करो :

  • ਗੇਂਦ = गेंद
  • ਗੱਪਸ਼ਪ = गपशप
  • ਦੁਰਘਟਨਾ = दुर्घटना
  • ਸੜਕ = सड़क
  • ਬੱਤੀ = बत्ती
  • ਬੁੱਤ = बुत
  • ਸਦਉਪਯੋਗ = सदुपयोग
  • ਦੁਰਉਪਯੋਗ = दुरुपयोग

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

नीचे एक ही अर्थ के लिए पंजाबी और हिंदी भाषा में शब्द दिये गये हैं। इन्हें ध्यान से पढ़ो और हिंदी शब्दों को लिखो :

  • ਰਸਤਾ = पथ
  • ਮੋਟਰ ਗੱਡੀ = मोटर गाड़ी
  • ਖਤਰਾ = जोखिम
  • ਅੱਖਾਂ = आँखों
  • ਇੰਤਜਾਰ = प्रतीक्षा
  • ਸੁਰਖਿਆ = सुरक्षा
  • ਖੱਬੇ = बाएं
  • मॅने = दाएं

पढ़ो, समझो और लिखो

(क) प् + र = प्र = प्रयोग
क् + ष = क्ष = सुरक्षा
दु + र् = दुर् = दुर्घटना
ज + य = ज्य = ज्यादा

(ख) न् + न = न्न = चुन्नू-मुन्नू
ल् + ल = ल्ल = उल्लंघन
त् + त = त्त = बत्ती

हमारी भी सुनो! शब्दार्थ Meaning

  • दुःख = कष्ट, तकलीफ
  • उल्लंघन = नियम को तोड़ना
  • जोखिम = खतरा
  • दुर्घटना = बुरी घटना
  • दुरुपयोग = बुरा उपयोग
  • सदुपयोग = अच्छा उपयोग
  • इशारा = संकेत
  • अनदेखा = बिना देखे
  • बुत = मूर्ति की तरह जड़
  • प्रतीक्षा = इन्तज़ार

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

बताओ

प्रश्न 1.
चुन्नू-मुन्नू को चोट कैसे लगी?
उत्तर :
गेंद खेलते समय मोटर गाड़ी से टकरा जाने के कारण चुन्नू-मुन्नू को चोट लगी।

प्रश्न 2.
लाल बत्ती हमें क्या संकेत देती है?
उत्तर :
लाल बत्ती हमें रुकने का संकेत देती है।

प्रश्न 3.
पीली बत्ती पर हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर :
पीली बत्ती पर हमें चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।

प्रश्न 4.
हरी बत्ती का क्या अर्थ है?
उत्तर :
हरी बत्ती चलने का संकेत देती है।

प्रश्न 5.
हमें सड़क कैसे पार करनी चाहिए?
उत्तर :
सड़क हमेशा पहले बाईं ओर देखकर फिर दाईं ओर देखकर पार करनी चाहिए।

प्रश्न 6.
सड़क पर काली-सफेद धारियाँ क्यों बनी होती हैं?
उत्तर :
सड़क पर काली-सफेद धारियाँ पैदल चलने वालों के लिए बनी होती हैं। इसे ज़ेबरा क्रासिंग कहते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

सही मिलान करो

काली-सफेद धारियाँ – रुकना
पीली बत्ती – चलना
हरी बत्ती – तैयार रहना
लाल बत्ती – पैदल सड़क पार करना
उत्तर :
काली-सफ़ेद धारियाँ – पैदल सड़क पार करना।
पीली बत्ती – तैयार रहना।
हरी बत्ती – चलना।
लाल बत्ती – रुकना।

पढ़ो, समझो और लिखो

आज = कल
दाएँ = बाएँ
सुख = दुःख
चलना = रुकना
ऊपर = नीचे
सदुपयोग = दुरुपयोग
खड़ा = बैठा
काली = सफेद
उत्तर :
उपरोक्त शब्दों के विपरीतार्थक शब्द उनके सामने दिए गए हैं। विद्यार्थी उन्हें याद करके लिखें।

समझो

कालिमा = काला
लालिमा = लाल
पीतिमा = पीला
हरीतिमा = हरा

रचनात्मक कौशल
बच्चे ज़ेबरा लाइनों, लाल, पीली और हरी बत्ती का चित्र बनायें तथा उनमें रंग भरें।

इन्हें अपनायें

(1) हमेशा सड़क के बाईं ओर चलें।
(2) सड़क के निकट गेंद न खेलें।
(3) सड़क हमेशा दाएँ-बाएँ देखकर पार करनी चाहिए।
(4) पैदल चलते समय सड़क हमेशा काली-सफेद धारियों, जिन्हें ज़ेबरा लाइनें कहा जाता है, से पार करनी चाहिए।
(5) लाल बत्ती होने पर रुकना चाहिए।
(6) पीली बत्ती होने पर चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।
(7) हरी बत्ती होने पर चलना चाहिए।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

हमारी भी सुनो! बहुवैकल्पिक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंजाबी शब्द ‘टिंउलात’ का हिन्दी अर्थ : इंतर/अंतर/प्रतीक्षा/परीक्षा
उत्तर :
प्रतीक्षा

प्रश्न 2.
पंजाबी शब्द ‘अधां’ का हिन्दी अर्थ है : अंखी/आँखें/आँहें/आटी
उत्तर :
आँखें

प्रश्न 3.
लाल बत्ती क्या संकेत देती है ?
(i) रुकने
(ii) चलने
(iii) दौड़ने
(iv) भगाने।
उत्तर :
(i) रुकने

प्रश्न 4.
हरी बत्ती क्या संकेत देती है?
(i) रुकने
(ii) चलने
(iii) फिरने
(iv) दौड़ने।
उत्तर :
(i) चलने

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

प्रश्न 5.
अगर ‘आज’-कल है तो सदुपयोग है
(i) परसो
(ii) दुरुपयोग।
(iii) सच्चा
(iv) अच्छोपयोग।
उत्तर :
(ii) दुरुपयोग

प्रश्न 6.
अगर ‘ऊपर-नीचे है तो ‘काली’ है
(i) सफेद
(ii) कालिया
(iii) कलुआ
(iv) सफेदा।
उत्तर :
(i) सफेद।

हमारी भी सुनो! Summary in Hindi

सड़क पर पाये जाने वाले रास्ते और ट्रैफिक बत्तियाँ आपस में बातें करते हैं। कालिमा पैदल पथ को बताती है कि लोग उसका प्रयोग लापरवाही से करते हैं। आज ही सुबह चुन्नू-मुन्नू को चोट लग गई। वे गेंद खेलते-खेलते मोटरगाड़ी से टकरा गए। पैदलपथ ने कहा कि बच्चे मानते ही नहीं।

उन्हें मेरे साथ ही चलना चाहिए। हम लोगों की सेवा के लिए हैं पर लोग हमारा दुरुपयोग करते हैं। उनकी बातें सुनकर लालिमा और पीतिमा और हरीतिमा ने भी अपनी-अपनी राम कहानी सुनाई कि किस तरह लोग उनकी अनदेखी करते हैं।

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो! 1

PSEB 5th Class Hindi Solutions Chapter 12 हमारी भी सुनो!

उनकी बातें सुनकर जेबरा ने कहा कि यदि पैदल चलने वाले उसी से सड़क पार करें और वाहन चालक उससे पहले बनी सफेद लकीर पर वाहन रोक दें तो पैदल चलने वालों को असुविधा न हो। इस पर कालिमा ने कहा कि लोगों को सदा मेरी बायीं ओर ही चलना चाहिए।

पैदलपथ ने कहा कि यदि लोग हमारी बातों को मानेंगे तो दुर्घटना नहीं होगी।